Incest GHAR KI AAG (URDU) - Page 2 - SexBaba
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Incest GHAR KI AAG (URDU)

अपडेट लिखते लिखते आज थोड़ी देर होगयी, एडिटिंग और कुछ कुछ जगह सही से सन बन नहीं पारहा था, लेकिन जैसे तैसे कम्पलीट कर कर पोस्ट कर रहा हु कुछ hi देर में,

लेट अपडेट के लिए मुआफी का तलबगार हु.....

अपडेट कैसा लगा ज़रूर बताना और ऐसे hi मेरी हौंसला अफ़ज़ाई करते रहिएगा.

शुक्रिया.
 
**घर की आग**

Episode 5: खामोश राज़ और बंद कमरे की तपिश

लाहौर की तपिश अब सिर्फ मौसम तक महदूद नहीं थी, बल्कि घर की char-diwari के अंदर एक अलग hi गर्माहट जनम ले रही थी.

सुबह के 10:30 बज रहे थे. रशीद साहिब अपने काम पर निकल चुके थे और छोटे बच्चों का कॉलेज भी शुरू हो गया था. घर में सिर्फ नसीम, सीमा और उस्मान रह गए थे.

सीमा किचन में अम्मी की मदद कर रही थी, लेकिन उसके हाथ काँप रहे थे. उसने महसूस किया के नसीम की नज़रें उसकी गर्दन पर रुके हलके से निशाँ और उसकी बेचैनी का पीछा कर रही हैं.

"सीमा... तू आज कल बोहोत खामोश रहने लगी है," नसीम ने धनिया kaat-te हुए बड़े सुकून से कहा, लेकिन उसकी आँखों में एक सवालिया निशाँ था.

"नहीं तोह अम्मी, बस... गर्मी की वजह से थकन हो जाती है," सीमा ने नज़रें चुराते हुए जवाब दिया.

तभी उस्मान किचन में दाखिल हुआ. उसके चेहरे पर वही mutma'in मुस्कराहट थी जो सीमा को अंदर तक झंझोर देती थी.

"अम्मी, मुझे थोड़ा काम से बहार जाना है, लेकिन दोपहर तक वापस आ जाऊंगा. सीमा एपीआई, आप को कुछ मंगवाना तोह नहीं?" उस्मान ने बड़े सलीक़े से पुछा, लेकिन उसने 'एपीआई' लफ्ज़ पर जो हल्का सा ज़ोर दिया, वह सिर्फ सीमा hi समझ सकती थी.

"नहीं... मुझे कुछ नहीं चाहिए," सीमा ने जल्दी से कहा और किचन से बहार निकल गयी.

उस्मान ने अम्मी को देखा और हल्का सा मुस्कुरा कर बहार चला गया. नसीम वहीँ कड़ी सब देख रही थी. उसे याद आया के कैसे रात को उसने ऊपर से आती धीमी सरगोशियां सुनी थीं. उसका दिल काँप utha—kya उसकी तरबियत में कोई कमी रह गयी थी या यह जवानी का अँधा जूनून था?

रात का मंज़र (12:45 ऍम):

घर में मुकम्मल सन्नाटा था. सीमा अपने कमरे में लेती थी, लेकिन नींद उससे सदियों दूर थी. उसने दरवाज़ा बंद नहीं किया tha—jaise वह किसी का इंतज़ार कर रही हो और साथ hi उस एहसास से डर भी रही हो.

धीरे से दरवाज़े की चरखट हुई. उस्मान अंदर दाखिल हुआ. इस बार उसने कोई बहाना नहीं किया.

"एपीआई... मैंने कहा था न, मैं वापस आऊंगा," उस्मान ने बिलकुल पास बैठते हुए कहा. उसके जिस्म से एक मरदाना खुशबु और पसीने की हलकी सी महक आ रही थी.

सीमा ने उठने की कोशिश की, "उस्मान, देखो... जो कल हुआ वह एक खता थी. हम यह बार बार नहीं कर सकते. अम्मी को शक हो रहा है."

उस्मान ने सीमा का हाथ थमा और उसकी हथेली पर अपनी उँगलियाँ फेरने लगा. "शक तोह तब होगा न जब हम कुछ बदलेंगे. हम वैसे hi रहेंगे जैसे सबके सामने हैं... लेकिन बंद कमरे में, हम सिर्फ हम होंगे."

उसने सीमा को अपनी तरफ खिंचा. सीमा का सर उस्मान के मज़बूत सीने पर टिका था. उसकी सांसें तेज़ हो गयी थीं.

"तुम्हे डर नहीं लगता?" सीमा ने सरगोशी में पुछा.

"डर लगता तोह यहाँ नहीं होता. मुझे सिर्फ तुम्हारी इस खामोश प्यास का डर है जो तुम्हे तड़पती है," उस्मान ने उसकी थोड़ी (चीन) ऊपर उठाते हुए कहा.

दोनों की आँखें मिली. सीमा की आँखों में गिल्ट और हवस की एक अजीब सी जुंग चल रही थी.

"सीमा एपीआई..." उस्मान ने सरगोशी की.

सीमा उठ कर बैठ गयी, उसने हलके कपडे पहने हुए थे जो उसके जिस्म के उभारों को नुमाया कर रहे थे. "उस्मान... मत करो यह सब. कोई देख लेगा तोह क़यामत आ जाएगी."

"कोई नहीं देखेगा," उस्मान ने पास बैठते हुए कहा और सीमा का नरम हाथ अपने हाथ में ले लिया. "तुम्हे पता है तुम कितनी हसीं हो? कल से तुम्हारी वह खुशबु मेरे दिमाग से नहीं निकल रही."

उस्मान ने धीरे से सीमा को अपनी तरफ खिंचा. सीमा ने शुरू में हलकी सी मुज़हमत की, लेकिन जब उस्मान के गरम होंठ उसकी गर्दन से टकराये, तोह उसके जिस्म की ठंडक पिघलने लगी. सीमा के मुंह से एक हलकी सी सिसकी निकली.

उस्मान ने सीमा की शर्ट के बटन खोलने शुरू किये. सीमा की सांसें तेज़ हो गयी थीं. "उस्मान... तुम पागल हो गए हो," उसने कहा, लेकिन उसके हाथ khud-ba-khud उस्मान के बालों में फँस गए थे.

जब उस्मान ने उसके जिस्म से कपडे अलग किये, तोह सीमा का गोरा बदन चांदनी में चमकने लगा. उस्मान की नज़रें उसकी भरी हुई छातियों और पतली कमर पर जमी थीं. उसने मज़ीद इंतज़ार नहीं किया और सीमा के होंतून को अपने होंतून में भर लिया. यह चुम्बन मामूली नहीं था, इसमें सदियों की भूक और हवस शामिल थी.

"ाः... उस्मान... धीरे," सीमा ने कराहते हुए कहा जब उस्मान ने उसकी एक छाती को अपने मुंह में भर कर ज़ोर से चूसा. सीमा का जिस्म कमान की तरह टर्र गया. वह अपने भाई के इस नए रूप को देख कर दांग थी, लेकिन उसकी मरदाना क़ुव्वत उसे पागल कर रही थी.

उस्मान ने अपने कपडे भी उतार फेंके. उसका जिस्म गर्माहट से तप रहा था. उसने सीमा की टांगों को फैलाया और उसके बीच की गीली जगह को महसूस किया. "एपीआई... तुम तोह पहले से hi तैयार हो," उस्मान ने शरारत से कहा और एक गन्दी गली बकते हुए उसकी फूडी पर हाथ फेरा.





"हरामज़ादे... ज़बान संभाल के," सीमा ने सांस फूलते हुए कहा, लेकिन उसकी आँखों में नशा था.

उस्मान ने अपना सख्त और तना हुआ औज़ार सीमा की रनो के बीच रखा और एक झटके से अंदर दाखिल हो गया.

"ऊऊओह्ह्ह मारी गयी! उस्मान... निकालो... बोहोत बड़ा है!" सीमा ने दर्द और लुत्फ़ के मरे उस्मान के कंधे पर दांत गार दिए.





उस्मान ने रुकने के बजाये लम्बे और गहरे धक्के लगाना शुरू किये. कमरे में सिर्फ उनके जिस्मों के टकराने की 'thap-thap' की आवाज़ गूँज रही थी. सीमा अब दर्द भूल चुकी थी, वह हर धक्के पर उछलती और उस्मान को और अंदर खींचती.

"हाँ... ऐसे hi... और ज़ोर से... मेरे भाई... और ज़ोर से छोड़ो मुझे!" सीमा अब hosh-o-hawaas खो चुकी थी. वह अपने छोटे भाई के नीचे एक रांड की तरह तड़प रही थी.





उस्मान ने उसकी टांगों को अपने कन्धों पर रखा और पूरी क़ुव्वत से धक्के मरने लगा. सीमा की फूडी से निकलने वाली गीलेपन ने काम और आसान कर दिया था. कुछ देर बाद, दोनों का जिस्म पसीने से शराबोर हो गया. उस्मान ने आखरी चाँद तेज़ झटके मारे और अपना सारा गरम मादा सीमा के अंदर खली कर दिया.

दोनों लम्बी लम्बी सांसें लेते हुए एक दुसरे से लिपट गए. सीमा का सर उस्मान के सीने पर था. "तुमने मुझे कहीं का नहीं छोड़ा, उस्मान," उसने सरगोशी की.

उस्मान ने उसके माथे को चूमा. "मैंने तोह तुम्हे सिर्फ जीना सिखाया है, एपीआई."

सुबह का मंज़र:

नाश्ते की मेज़ पर सब बैठे थे. सीमा ने दुपट्टा अच्छे से सर पर लिया हुआ था, लेकिन उसकी आँखों की थकन और चेहरे की चमक कुछ और hi कह रही थी.

हमजा ने अचानक लुक़मा तोड़ते हुए पुछा, "भाई, कल रात मैं पानी पीने उठा था, आपके कमरे का दरवाज़ा खुला था और आप वहां नहीं थे. आप कहाँ थे इतनी रात को?"

नसीम ने अचानक अपनी नज़रें उठायीं और सीधा उस्मान और सीमा को देखा. सीमा का हाथ चाय के पियले पर थरथराया.

अगला Episode: क्या उस्मान पकड़ा जायेगा? या कोई नया बहाना बनाएगा?
 
गिफ्स ऐड करने में काफी मुश्किल होरही है
 
**घर की आग**

Episode 6: शक का घेरा और नयी साज़िश
नाश्ते की मेज़ पर हमजा के अचानक सवाल ने फ़ज़ा में ज़हर घोल दिया था. उस्मान ने महसूस किया के उसकी पीठ पर पसीने की एक बूँद निकल कर रींग रही है, लेकिन उसने अपने चेहरे के तजुर्बे को नहीं बदलने दिया. सीमा ने फ़ौरन पानी का गिलास उठाया ताके अपनी थरथराहट छुपा सके.

"भाई, आप कहाँ गए थे?" हमजा ने दोबारा ज़ोर देते हुए पुछा.

उस्मान ने बड़े सुकून से पराठा तोडा और हमजा की तरफ देख कर मुस्कुरा दिया. "अरे यार, कल रात गर्मी बोहोत थी और मुझे नींद नहीं आ रही थी. मैं छत्त (रूफ) पर चला गया था ठंडी हवा खाने. वहां कुर्सी पर बैठ कर लाहौर की खामोश सड़कों को देख रहा था के कब आँख लग गयी पता hi नहीं चला. फजर की अज़ान हुई तोह नीचे आया."

नसीम ने उस्मान को घोर से देखा. "तोह फिर कमरे का दरवाज़ा क्यों खुला छोड़ा था?"

"अम्मी, जल्दी में भूल गया हूँगा," उस्मान ने ढिटाई से जवाब दिया.

सीमा ने हिम्मत जमा की और बात को मोड़ने के लिए कहा, "हमजा, तुम अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो, भाई की जासूसी छोरो. आज तुम्हारा टेस्ट था न?"

हमजा ने कांधा उचकाया और नाश्ता ख़तम करके निकल गया. लेकिन नसीम की नज़रें अब भी सीमा के चेहरे पर जमी थीं. वह माँ थी, वह अपनी बेटी के चेहरे की शिकन और उसकी आँखों में छुपी 'थकन' को पहचान रही थी.

दोपहर का मंज़र:

उस्मान घर से बहार था, लेकिन सीमा किचन में काम करते हुए मुसलसल डर रही थी. नसीम अचानक किचन में दाखिल हुई और सीमा के बिलकुल पीछे कड़ी हो गयी.

"सीमा, कल रात तू मेरे कमरे में आयी थी?" नसीम ने धीरे से पुछा.

सीमा का दिल धक् से रह गया. "N-nahi अम्मी, क्यों?"

"मुझे रात को किसी के चलने की और सरगोशियों की आवाज़ आ रही थी. मुझे लगा शायद तेरी तबियत ख़राब है," नसीम ने सीमा की गर्दन के पास बिखरे बालों को हटते हुए कहा. "यह निशाँ कैसा है, सीमा?"

सीमा ने जल्दी से दुपट्टा ऊपर कर लिया. "वह... वह मच्छर ने काट लिया था अम्मी, मैंने खुजली कर दी तोह निशाँ पद गया."

नसीम ने कुछ नहीं कहा, बस एक गहरी सांस ली और वहां से चली गयी. सीमा को लगा जैसे वह पकड़ी गयी है.

रात का मंज़र (थे रिस्क टैक्स ओवर):

रात को उस्मान वापस आया तोह सीमा ने उसे रोखने की कोशिश की. "उस्मान, आज मत आना. अम्मी को शक हो गया है. उन्होंने मेरा निशाँ देख लिया."

उस्मान ने सीमा को दीवार से लगा दिया. उसका होंठ सीमा के कान के पास लाये. "तोह क्या हुआ? जितना खतरा बढ़ता है, मज़ा उतना hi ज़्यादा आता है. अम्मी सो चुकी हैं, और अब्बू तोह वैसे भी गहरी नींद सोते हैं."

उस्मान ने सीमा का हाथ पकड़ कर अपने पजामा के ऊपर उसके सख्त होते हुए औज़ार पर रख दिया. सीमा ने पहले हाथ हटाने की कोशिश की, लेकिन उसकी सख्ती महसूस करते hi वह पिघल गयी.

"तुम नहीं मानोगे न?" सीमा ने सांस फूलते हुए पुछा.

"बिलकुल नहीं," उस्मान ने उसकी शर्ट के ऊपर से hi उसके मुम्मों को ज़ोर से मसला.





"आज तोह मैं तुम्हे छठ पर ले जाऊंगा... वहां खुले आसमान के नीचे."

सीमा डर रही थी, लेकिन उसके जिस्म की आग उस पर हावी हो रही थी. दोनों दबे पाऊँ छठ पर गए. छठ पर एक पुराणी चारपाई बिछी थी. उस्मान ने सीमा को उस पर लिटाया और उसकी सलवार एक झटके में घुटनो तक उतार दी.

"उस्मान... कोई देख लेगा!" सीमा ने सरगोशी में चिल्लाया.

"लाहौर सो रहा है, सीमा... तुम बस इसका मज़ा लो," उस्मान ने अपना लुंड निकल कर सीमा के होंटो पर रगड़ा.





सीमा ने बिना कहे उसे मुंह में ले लिया और ज़ोर ज़ोर से चूसने लगी.





उस्मान ने सीमा को घुटनो के बल किया और पीछे से उसकी फूडी में अपना लुंड एक hi झटके में उतार दिया. "आआह्ह्ह! उस्मान... हरामज़ादे... पहात जाएगी मेरी!" सीमा ने चारपाई की बानी (रोप्स) को ज़ोर से पकड़ लिया.





उस्मान ने उसकी कमर पकड़ी और जानवरों की तरह धक्के मरने लगा. खुले आसमान के नीचे, ठंडी हवा में, दोनों के जिस्मों की गर्माहट और 'thap-thap' की आवाज़ फ़ज़ा में गूँज रही थी.





लेकिन उन्हें यह नहीं पता था के नीचे से कोई छत की तरफ आने वाली सीढ़ियों पर खड़ा उनकी हर हरकत और हर गन्दी गाली सुन रहा था.

क्लिफहैंगर:

सीढ़ियों पर नसीम कड़ी थी, उसके हाथ में पानी का गिलास था जो उसके हाथ से टूट कर गिरने hi वाला था. उसने अपनी बेटी को अपने hi बेटे के नीचे कुत्तिया की तरह तड़पते देख लिया था.
 
अगले Episode में क्या नसीम उन्हें रेंज हाथो पकड़ेगी? या वह खामोश रह कर कोई बड़ा कदम उठाएगी?
 
**घर की आग**

Episode 7: देहलीज़ की मर्यादा और गुनाह की लपेट

लाहौर की ठंडी रात अब सरगोशियों से भर चुकी थी. छत्त पर बिछी उस पुराणी चारपाई पर उस्मान और सीमा एक दुसरे के वजूद में खोये हुए थे. सीमा, जो 31 साल की शादीशुदा औरत थी, जिसका शोहर कराची गया हुआ था, आज अपने hi सेज भाई के हाथों में माँ की तरह पिघल रही थी. उस्मान, जो 29 साल का जवान मर्द था और अपने बाप रशीद साहिब के साथ प्रॉपर्टी का कारोबार संभल रहा था, आज अपनी hi बहन की इज़्ज़त से खेलने में एक अजीब सी फ़तेह महसूस कर रहा को था.

"उस्मान... रुक जाओ... कोई आ जायेगा," सीमा ने भांपते हुए कहा, लेकिन उसके हाथ उस्मान की चौरी पीठ पर कस्ते जा रहे थे.

"कोई नहीं आएगा एपीआई. सब सो रहे हैं," उस्मान ने उसके कान के पास सरगोशी की और उसकी गर्दन पर एक गहरा निशाँ छोर दिया. "तुम्हारा शोहर तोह वहां बिज़नेस डील कर रहा होगा, और यहाँ... यहाँ तुम मेरे साथ असली डील कर रही हो."

लेकिन उन्हें नहीं मालूम था के सीढ़ियों के अँधेरे में नसीम कड़ी थी. उसने पानी पीने के लिए रसोई का रुख किया था, मगर ऊपर से आती 'thap-thap' और सीमा की सिसकियों ने उसे ठिठकने पर मजबूर कर दिया. जब नसीम ने chori-chupe ऊपर देखा, तोह उसके पाऊँ टेल ज़मीन निकल गयी. उसकी बड़ी बेटी, जो खुद एक घर की इज़्ज़त थी, अपने hi भाई के निचे be-libas थी.

नसीम का डैम घुटने लगा. वह दबे पाऊँ वापस नीचे उत्तरी और अपने कमरे में जा कर रोने लगी. रशीद साहिब सुकून से सो रहे थे. नसीम को समझ नहीं आ रहा था के वह क्या करे. अगर वह शोर मचती, तोह रशीद साहिब की ग़ैरत और उनका प्रॉपर्टी बिज़नेस का नाम मिटटी में मिल जाता.

अगली सुबह: एक खामोश तूफ़ान

सूरज की रौशनी लाहौर की गलियों में फैल चुकी थी. रशीद साहिब तैयार हो कर नाश्ते की मेज़ पर बैठे थे. आयेशा, जो अपने ब के फाइनल एक्साम्स की तैयारी में मसरूफ थी, फाइल्स पलट रही थी. हिरा, जो हमेशा की तरह शर्मीली और खामोश थी, B.Com की किताबें लिए बैठी थी. हमजा, जो नीट की कोचिंग से थका हरा आया था, नाश्ते का इंतज़ार कर रहा था.

उस्मान और सीमा मेज़ पर आये, दोनों की आँखें थकन से भरी थीं मगर चेहरे पर एक अजीब सी बेचैनी थी.

"सीमा बेटी, तुम्हारे शोहर का फ़ोन आया था?" रशीद साहिब ने अख़बार से नज़रें हटा कर पुछा.

सीमा ने चाय का पियाला पकडे हुए थरथराते हाथों से जवाब दिया, "जी अब्बू... कल रात बात हुई थी. शायद अगले हफ्ते तक वापस आ जाएँ."

नसीम ने किचन से निकलते हुए सीमा और उस्मान पर एक गहरी, नफरत भरी नज़र डाली. "सीमा, नाश्ता करके मेरे कमरे में आओ. मुझे तुमसे कुछ ज़रूरी बात करनी है."

उस्मान ने मौसम का मिज़ाज पहचान लिया. उसने महसूस किया के अम्मी का लहजा बदल चूका है.

दोपहर का मंज़र: कोंफ्रोंटेशन

जब सब लोग अपने अपने कामो में मसरूफ हो gaye—Rashid साहिब और उस्मान प्रॉपर्टी के ऑफिस चले गए, आयेशा लाइब्रेरी चली गयी और हिरा अपने कमरे में पढ़ने lagi—tab नसीम ने सीमा को अपने कमरे में बुलाया और दरवाज़ा अंदर से बंद कर लिया.

"सीमा... तुम एक शादीशुदा औरत हो. एक घर की इज़्ज़त हो," नसीम की आवाज़ काँप रही थी.

सीमा ने नज़रें चुरायीं. "अम्मी, आप क्या कह रही हैं?"

नसीम ने आगे बढ़ कर सीमा का दुपट्टा उसकी गर्दन से हटाया. कल रात के निशाँ साफ़ चमक रहे थे. "यह क्या है? क्या यह तुम्हारे शोहर ने दिए हैं जो कराची में है? या उस भाई ने... जिसे मैंने बड़ी म्हणत से पला था?"

सीमा के घुटने टिक गए. वह रोने लगी. "अम्मी... मुझसे गलती हो गयी. उस्मान ने... उसने मुझे मजबूर किया."

"झूट मत बोलो!" नसीम ने चिल्ला कर कहा, लेकिन आवाज़ दबाई हुई थी. "मैंने तुम दोनों को छठ पर देखा है. तुम मजबूर नहीं थीं, तुम उसके साथ शामिल थीं. तुम्हे शर्म नहीं आयी? अपने मियां का घर छोर कर यहाँ मइके में यह गुल खिला रही हो?"

सीमा ने नसीम के पेअर पकड़ लिए. "अम्मी, प्लीज अब्बू को मत बताना. वह मर जायेंगे. मैं वापस चली जाउंगी, मैं अब कभी उस्मान के क़रीब नहीं जाउंगी."

तभी दरवाज़ा खुला. उस्मान दाखिल हुआ. वह ऑफिस से जल्दी वापस आ गया था क्यूंकि उसे खतरे का एहसास था.

"अम्मी, गुस्सा करने से मसला हल नहीं होगा," उस्मान ने बड़े dheet-pan से कहा.

"तू... तू कैसे बोल रहा है? तू ने अपनी बहन की इज़्ज़त उजारि है!" नसीम ने उस्मान की तरफ बढ़ते हुए कहा.

उस्मान ने नसीम का हाथ पकड़ लिया. "अम्मी, देखिये. सीमा एपीआई का शोहर महीनो बहार रहता है. उन्हें भी ज़रुरत है. और मैं... मैं बहार किसी रांड के पास जाने से बेहतर है के घर में hi रहूँ. आप को तोह खुश होना चाहिए के हम दोनों खुश हैं."

नसीम यह सुन कर सुन्न रह गयी. उसका बीटा इतना गिर गया था के गुनाह को लॉजिक दे रहा था. "मैं... मैं तुम दोनों को इस घर से निकलवा दूंगी."

"नहीं अम्मी, आप ऐसा नहीं करेंगी," उस्मान ने मुस्कुरा कर कहा. "क्यूंकि अगर आप ने ऐसा किया, तोह लाहौर में अब्बू की प्रॉपर्टी का काम थप हो जायेगा. लोगो को पता चलेगा तोह कोई उनके साथ डील नहीं करेगा. आप हमारी ख़ामोशी खरीदिये, और हम आप की."

रात का मंज़र: गुनाह की नयी इन्तहा

नसीम ने पुरे दिन खुद को कमरे में बंद रखा. उसकी ममता और ग़ैरत के बीच जुंग चल रही थी. उधर, सीमा अपने कमरे में डर रही थी, लेकिन उसके जिस्म में उस्मान के धक्कों की thap-thap अब भी गूँज रही थी.

रात के दो बजे, जब पूरा घर सो गया, उस्मान फिर से सीमा के कमरे में दाखिल हुआ. इस बार उसने दरवाज़ा बंद भी नहीं किया, बल्कि खुला chhoda—jaise वह अपनी माँ को चैलेंज कर रहा हो.

"उस्मान, चले जाओ... अम्मी ने देख लिया है," सीमा ने सरगोशी की.

"अम्मी ने देख लिया है, इसलिए अब दररने की ज़रुरत नहीं," उस्मान ने सीमा की निघ्त्य का एक स्ट्राप निचे गिरते हुए कहा. उसने सीमा को बीएड पर धक्का दिया. "आज तोह मैं तुम्हे बताऊंगा के एक शादीशुदा औरत को कैसे असली मज़ा दिया जाता है."

उस्मान ने सीमा की टांगों को अपने कन्धों पर रखा. उसने सीमा की रनो के बीच अपनी उँगलियाँ फेरीं और देखा के वह पहले hi गीली हो चुकी थी. "देखा... तुम्हारा जिस्म खुद मुझे पुकार रहा है."

उस्मान ने अपना गरम और सख्त औज़ार सीमा की फूडी के मुंह पर रखा और एक hi zor-daar झटके में पूरा अंदर उतार दिया.

"आआआहहह... उस्मान!" सीमा ने चीखने की कोशिश की मगर उस्मान ने अपना हाथ उसके मुंह पर रख दिया.

"चुप कर रांड... अगर कोई जाग गया तोह मज़ा किरकिरा हो जायेगा," उस्मान ने गन्दी गाली दी और अपनी कमर चलने लगा. हर धक्का इतना गहरा था के सीमा की आँखें ऊपर चढ़ गयीं. सीमा का जिस्म पसीने से शराबोर था, वह अपने भाई के निचे एक कुत्तिया की तरह तड़प रही थी.

दोनों इस क़दर गुनाह में डूबे थे के उन्हें एहसास hi नहीं हुआ के नसीम दरवाज़े के बहार कड़ी थी. लेकिन इस बार नसीम रो नहीं रही थी. उसकी आँखों में एक अजीब सा नशा था. उसने अपने बचो को इस हालत में देखा, और फिर धीरे से अपने hi बदन पर हाथ फेरा.

क्लिफहैंगर:

अगली सुबह, रशीद साहिब ने नाश्ते पर कहा, "उस्मान, बीटा, अगले हफ्ते तुम्हे और सीमा को हैदराबाद जाना है एक नयी प्रॉपर्टी की रजिस्ट्री के लिए. सीमा, तुम्हारा शोहर भी वहां आ जायेगा."

सीमा और उस्मान ने एक दुसरे को देखा. क्या हैदराबाद का यह सफर उनके गुनाह को और बढ़ाएगा? और नसीम जो अब खामोश हो गयी थी, वह क्या सोच रही थी?
 
सॉरी गाइस no गिफ्स थिस टाइम. क्यूंकि मझे गिफ्स मिल hi नहीं रहे ाचे वाले
 
**घर की आग**

Episode 8: हैदराबाद का सफर और नए इरादे

नाश्ते की मेज़ पर रशीद अहमद की बातों ने सन्नाटा फैला दिया था. "हैदराबाद" का नाम सुनते hi सीमा का दिल ज़ोर से धड़कने लगा. एक तरफ अपने शोहर बिलाल से मिलने का दर और दूसरी तरफ उस्मान के साथ इस सफर की तन्हाई का नशा.

"जी अब्बू, मैं तैयार हूँ," उस्मान ने चाय का आखरी सिप लेते हुए सीमा की तरफ एक गहरी नज़र डाली, "सीमा एपीआई को भी थोड़ा चेंज मिल जायेगा, घर में रह कर बोर हो गयी हैं."

नसीम, जो अब तक खामोश थी, ने अचानक अपना सर उठाया. उसने देखा के कैसे उस्मान की बातों में एक मालिकाना हक़ था. "रशीद साहिब, क्या मेरा जाना ज़रूरी नहीं? सीमा अकेली दो मर्दों के बीच... मेरा मतलब है, बिलाल तोह वहां रजिस्ट्री के वक़्त hi आएगा न?"

रशीद ने मुस्कुरा कर कहा, "नसीम, तुम घर सम्भालो. हमजा के एक्साम्स हैं और Ayesha-Hira को भी तुम्हारी ज़रुरत है. उस्मान है न अपनी बहन के साथ, तुम फ़िक्र क्यों करती हो?"

नसीम ने सीमा की तरफ देखा, जिसने शर्म और डर से नज़रें झुका ली थीं. नसीम के ज़हन में अब भी वह मंज़र घूम रहा था जब उसने अपने hi बच्चों को गुनाह की हद्द पार करते देखा था. मगर अब उसकी नफरत में एक अजीब सी 'क्यूरोसिटी' (तजस्सुस) शामिल हो रही थी.

सफर की तयारी (दोपहर 3:00 पं):

सीमा ऊपर अपने कमरे में पैकिंग कर रही थी. गर्मी की वजह से उसने एक बारीक लॉन का सूट पहना था, जिसमे से उसके भरे हुए जिस्म की बनावट साफ़ झलक रही थी. तभी दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ आयी.

उस्मान अंदर था. उसने आते hi सीमा को पीछे से बाहों में भर लिया. उसके हाथ सीमा के नरम पेट पर कैसे हुए थे.

"छोडो उस्मान... कोई आ जायेगा. अम्मी का डर नहीं तुम्हे?" सीमा ने थोड़ा पीछे हटने की कोशिश की, मगर उसके जिस्म ने उस्मान की गर्माहट को क़बूल कर लिया था.

"अम्मी अब नहीं आएँगी. वह जान चुकी हैं के उनका बीटा अब बड़ा हो गया है," उस्मान ने सीमा के कान की लौ को दांतों से हल्का सा दबाया. "हैदराबाद में बिलाल के आने से पहले हमारे पास दो रातें हैं. सोचो... एक नया शहर, एक नया होटल, और कोई rokne-tokne वाला नहीं."

सीमा ने पलट कर उस्मान की आँखों में देखा. "तुम बोहोत बदल गए हो उस्मान. पहले मेरे भाई थे, अब मेरे... मेरे क्या हो?"

उस्मान ने सीमा को बिस्तर पर गिरा दिया और उसके ऊपर झुक गया. "मैं तुम्हारा वह नशा हूँ जो तुम उतार नहीं सकती. तुम्हे बिलाल के पास जाने से पहले इतना तड़पाऊंगा के तुम उसका लम्स भूल जाओगी."

हमजा की बेचैनी:

नीचे हॉल में हमजा बैठा था. उसने पिछले कुछ दिनों से घर का माहौल बदला हुआ महसूस किया था. उस्मान भाई का सीमा एपीआई के कमरे में baar-baar जाना, अम्मी का खामोश रहना, और सीमा एपीआई के चेहरे की वह अजीब सी लाली. हमजा जवान हो रहा था, उसके जिस्म में भी नए रंग उतर रहे थे. उसने अक्सर रात को तन्हाई में सीमा एपीआई के बारे में सोचा था, मगर उन्हें किसी और के saath—woh भी अपने भाई के saath—dekhne का ख्याल उसे बेचैन कर रहा था.

उसने दबे पाऊँ ऊपर का रुख किया. सीमा एपीआई के कमरे का दरवाज़ा आधा खुला था.

अंदर का मंज़र देख कर हमजा की सांस अटक गयी. उस्मान भाई ने सीमा एपीआई की कमीज ऊपर उठा राखी थी और उनके गोर, भरे हुए मम्मों को बेहरमी से मसल रहे थे. सीमा एपीआई के मुंह से दबी दबी सिसकारियां निकल रही थीं.

"ाः... उस्मान... मारी गयी... इतना ज़ोर से मत दबाओ," सीमा सरगोशी कर रही थी.

हमजा ने देखा के कैसे उसके बड़े भाई का हाथ उसकी बहन के जिस्म पर राज कर रहा था. उसके अपने पजामा में भी हलचल शुरू हो गयी थी. गुस्से और जलन के बजाये, उसके अंदर एक अजीब सी हवस जाग रही थी. वह वहां से भगा नहीं, बल्कि दरवाज़े की झिर्री से देखता रहा.

नसीम का नया रूप:

किचन में नसीम अकेले काम कर रही थी. उसने महसूस किया के घर की दीवारों से अब शरीफाना आवाज़ें नहीं, बल्कि हवस की गर्माहट निकल रही है. उसने अपने जिस्म को देखा—52 साल की उम्र में भी वह किसी जवान लड़की से काम नहीं थी. रशीद साहिब तोह कब के थक चुके थे, मगर उसके अंदर की औरत अब भी प्यासी थी.

उसने सोचा, "अगर मेरे बचे इस आग में जल सकते हैं, तोह मैं क्यों राख बन रही हूँ?"

रात के 11:30 पं (सफर से एक रात पहले):

सीमा अपने कमरे में लेती थी जब दरवाज़ा खुला. मगर इस बार उस्मान नहीं था.

अम्मी (नसीम) अंदर आयी थीं. उनके हाथ में एक गिलास दूध था. सीमा घबरा कर बैठ गयी.

"अम्मी... आप?"

नसीम ने दूध का गिलास रखा और सीमा के पास बैठ गयी. उसने सीमा के बालों को सहलाया. "डर मत. मैं तुझे डांटा नहीं आयी. मैं बस देखने आयी हूँ के मेरी बेटी इतनी जवान कब हो गयी के अपने भाई को भी पागल कर दिया."

सीमा की आँखें पहात गयीं. "अम्मी... आप क्या कह रही हैं?"

नसीम ने सीमा की आँखों में देखा, उसकी नज़रों में अब गुस्सा नहीं, बल्कि एक अजीब सी साज़िश थी. "हैदराबाद जा रही हो न? उस्मान के साथ. देखो सीमा, जो तुम कर रही हो वह गुनाह है... मगर गुनाह में मज़ा बोहोत है. बस याद रखना, अगर घर की आग बहार निकली तोह सब राख हो जायेगा. इसलिए... जो भी करना, ढंग से करना."

नसीम ने सीमा के गले के निशाँ को अपनी ऊँगली से छुआ और धीरे से मुस्कुरा दी. "कल से मैं भी कुछ नया शुरू करुँगी. हमजा बड़ा हो गया है, उसे भी तोह कुछ सीखना चाहिए न?"

सीमा सुन्न रह गयी. क्या उसकी माँ भी इस हवस की भट्टी में कूदने वाली थी?

Episode 8 ख़तम.

क्लिफहैंगर: हैदराबाद की ट्रैन कल सुबह है. उस्मान ने सीमा के लिए एक 'स्पेशल' तोहफा ख़रीदा है जो उसे होटल में पहनना है. हमजा ने जो देखा, वह अब उसके दिमाग से नहीं निकल रहा. और नसीम का हमजा की तरफ बढ़ता हुआ झुकाओ... क्या यह घर अब एक कोठा बनने वाला है?
 
आज के अपडेट में कुछ खामियां, ग़लतियाँ या टाइपिंग िर्रोर्स नज़र अजय Bara-e-Meharbani माफ़ करदिजियेगा.
 
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