घर की आग
Episode 33: जवान शर्तें, पुराने खिलाडी
सन 1: गेस्ट रूम का ख़ुफ़िया सबक़
लाहौर की शाम अब ढल्ल रही थी. हमजा ने अपनी बाइक मिस किरण के घर के बहार खरी की. ये एक pur-sukoon गली में एक छोटा मगर निहायत सलीक़े से बना हुआ घर था. हमजा का दिल थोड़ा ज़ोर से धारक रहा tha—aakhir आज वो अपनी दोस्त अर्सलान की माँ के घर "तनहा" आया था.
उसने दुर्बल बजायी. कुछ देर बाद दरवाज़ा खुला और हमजा की सांसें जैसे रुक सी गयीं. मिस किरण सामने खरी थीं, मगर आज वो "मिस किरण" नहीं लग रही थीं. कोचिंग वाला सख्त कॉटन का सूट नहीं बल्कि, उन्होंने हलके नीले रंग की एक ट्रांसपेरेंट काफटाण सूट पहना था. बाल जो हमेशा सख्त जुड़े (बन) में बंधे होते थे, आज उनके कन्धों पर खुले बिखरे हुए थे.

"आ गए हमजा? अंदर आओ," मिस किरण ने निहायत नरम मगर pur-aitamad आवाज़ में कहा. उनके जिस्म से वही मेहेंगी परफ्यूम की खुशबू आ रही थी जो कोचिंग में हमजा का ध्यान भटकती थी.
हमजा अंदर दाखिल हुआ. ड्राइंग रूम में हलकी रौशनी थी और एक की ठंडक ने माहौल को मज़ीद nasha-awar बना दिया था.

"बैठो. मैं पानी लेकर आती हूँ, फिर शुरू करते हैं," वो किचन की तरफ चलीं गयीं. हमजा ने ग़ौर किया के उनका वो लिबास पीछे से साफ़ शफ़्फ़ाफ़ (ट्रांसपेरेंट) था, जो उनके भर्राय हुए जिस्म की हर हरकत को नुमाया कर रहा था.
कुछ देर बाद वो दो गिलास जूस लेकर आयीं और हमजा के बिलकुल क़रीब सोफे पर बैठ गयीं. इतने क़रीब के हमजा को उनकी साँसों की गर्मी महसूस हो रही थी.

"तोह... प्रोजेक्टिले मोशन समझा था तुमने कल?" उन्होंने पूछा, मगर उनकी नज़रें हमजा की नोटबुक पर नहीं, बल्कि उसके चेहरे पर थीं.
"मिस... कोशिश तोह की थी, मगर दिमाग कहीं और hi अटका हुआ था," हमजा ने हिम्मत करके उनकी आँखों में देखा.
मिस किरण ने हल्का सा मुस्कुराते हुए अपना गिलास टेबल पर रख दिया. "हमजा, तुम्हारे अब्बू ने मुझसे कहा था के तुम्हारे रिजल्ट्स अचे आने चाहिए. मगर तुम्हारे 'आर्टिस्ट' बनने का शौक़ तोह कुछ और hi बता रहा है. वो तस्वीर... जो तुम ने कोचिंग में बनायीं थी... वो किस की थी?"
हमजा ने एक लम्हे के लिए सोचा और फिर धीरे से बोलै, "वो तस्वीर किसी शख्स की नहीं थी मिस... वो मेरी 'तश्नगी' (तृषित) की थी. जब इंसान को सुकून न मिले, तोह वो ऐसे hi ख्वाब बनता है."
मिस किरण ने अपना हाथ आगे बढ़ाया और निहायत नरमी से हमजा के बालों में उँगलियाँ फेरी. "इतनी छोटी उम्र में इतनी गर्मी, हमजा? तुम्हे पता है तुम किसके सामने बैठे हो? मैं तुम्हारी टीचर भी हूँ और तुम्हारे दोस्त की माँ भी."
"मुझे पता है मिस... मगर इस वक़्त आप सिर्फ मेरी उस्ताद हैं. और उस्ताद का काम तोह वाजिब रास्ता दिखाना होता है न?" हमजा की आवाज़ अब भरी हो चुकी थी.
मिस किरण की सांसें थोड़ी तेज़ हुईं. उन्होंने अपना पेअर (लेग) दूसरे पेअर पर रखा, जिसके वजह से उनका पजामा थोड़ा और ऊपर हुआ और उनका गोरा, मुलायम टखना साफ़ नज़र आने लगा. "हमजा... तुम बहुत खतरनाक बातें कर रहे हो. अगर अर्सलान आ गया तोह?"
"आपने hi तोह कहा था के वो दोस्त की तरफ गया है," हमजा ने धीरे से अपना हाथ मिस किरण के घुटने पर रखा. "मिस... फिजिक्स तोह हम रोज़ पढ़ते हैं, आज थोड़ी केमिस्ट्री .....?" उसने अपनी बात अधूरी छोड़ दी.
"अर्सलान घर पर नहीं है तोह इसका मतलब ये नहीं के घर खली है. मेरी छोटी बेटी, फलक (फस्क फर्स्ट ईयर स्टूडेंट, अर्सलान की बेहेन), अंदर अपने कमरे में सो रही है. उसे हल्का बुखार था इसलिए आज वो जल्दी लेट गयी," मिस किरण ने धीरे से सरगोशी की. "ठीक है... केमिस्ट्री के लिए हमें गेस्ट रूम की तरफ जाना होगा हमजा, अगर तुम सीखना चाहते हो, तोह आओ उस गेस्ट रूम में चलो, वहां बोर्ड भी है और सुकून भी... वहां मैं तुम्हे बताती हूँ के 'फाॅर्स' और 'फ्रिक्शन' असलियत में क्या होते हैं."
वो उठीं और हमजा को इशारा किया. हमजा जब उनके पीछे कमरे की तरफ जा रहा था, तोह उसने देखा के मिस किरण की चाल में अब एक mard-kush लचक थी. उसे समझ आ गया था के आज फिजिक्स का लेक्चर नहीं, बल्कि उसकी जवानी का असली इम्तेहान होने वाला है.
गेस्ट रूम में दाखिल होते hi मिस किरण ने दरवाज़ा बंद किया. कमरे में एक बड़ा सा वाइट बोर्ड लगा था, मगर माहौल किसी क्लास जैसा नहीं था. उन्होंने हमजा को कुर्सी पर बैठने का इशारा किया और खुद बोर्ड के पास कड़ी हो गयीं.
"तोह हमजा... फिजिक्स का पहला सबक़ शुरू करें?" उन्होंने मार्कर उठाते हुए कहा, मगर उनकी नज़रें हमजा की आँखों में गाढ़ गयी थीं.
हमजा ने कोशिश तोह बहुत की के वो बोर्ड की तरफ देखे, मगर मिस किरण का वो ट्रांसपेरेंट काफटाण सूट उसके होश उदा रहा था. एक की ठंडी हवा से जब सूट का कपडा उनके बदन से चिपकता, तोह उनके जिस्म की एक एक चउरवे हमजा को पुकारती, महसूस होती.
"मिस... फोकस नहीं हो प् रहा," हमजा ने be-baaki से कहा.
मिस किरण ने मार्कर मेज़ पर रखा और धीरे से चल कर हमजा के पास आयीं. उन्होंने कुर्सी के दोनों हाथों (आर्म्स) पर हाथ रख कर हमजा के ऊपर झुकीं. उनके खुले बाल हमजा के चेहरे को छू रहे थे.
"क्यों हमजा? क्या चल रहा है तुम्हारे इस शैतानी दिमाग में? क्या तुम मेरे बारे में... अजीब बातें सोचते हो?" उन्होंने निहायत नरम मगर उकसाने वाले लहजे में पूछा.
हमजा की सांसें भरी हो गयीं. "अजीब नहीं मिस... बहुत इंटेंस बातें. मेरा दिल करता है के मैं देखु के इस उस्ताद वाले रॉब के पीछे कितनी गर्मी है. मैं देखना चाहता हूँ के जब आप फिजिक्स पद्धति हैं, तोह क्या आपका अपना जिस्म भी उन्ही 'लॉज़' को मंटा है?"
मिस किरण की आँखों में एक अजीब सी चमक आयी. उन्होंने हमजा के चेहरे पर हाथ फेरा. "तोह तुम्हारी फैंटसीज इतनी गहरी हैं? तुम्हे लगता है तुम मुझे संभल पाओगे?" उन्होंने निहायत धीरे से अपना हाथ निचे किया और हमजा की जीन्स के ऊपर से hi उसकी मर्दानगी की सख्ती को महसूस किया.
"उफ़... हमजा," उनके होंठ थरथराये. "तुम्हारी 'तश्नगी' तोह वाक़ई हद्द से ज़्यादा है."

वो धीरे से निचे फर्श पर कारपेट पर बैठ गयीं, हमजा सोफे पर hi बैठा रहा. उन्होंने निहायत इत्मीनान से हमजा की मर्दानगी का जायज़ा लिया. हमजा का औज़ार उसकी जवानी और तालाब का साफ़ सबूत दे रहा था. मिस किरण, जो इस खेल की पुराणी खिलाडी थीं, आज खुद को रोक न सकीं. उन्होंने हमजा की ज़िप खोली और पहली बार उसकी असली मर्दानगी को अपनी आँखों के सामने पाया.

"तुम तोह वाक़ई एक 'तूफ़ान' छुपा कर बैठे हो हमजा," उन्होंने सरगोशी की और अपना मुंह आगे बढ़ाया.

हमजा ने पीछे को हो कर आंखें बंद कर ली. उसे महसूस हुआ के मिस किरण ने अपनी "उस्ताद" वाली महारत अब एक नए काम में लगा दी है. ब्लोजॉब का वो नशा हमजा के पुरे जिस्म में बिजली बन कर दौड़ने लगा.

इसी दौरान, गेस्ट रूम का दरवाज़ा जो शायद पूरी तरह कुण्डी में नहीं था, हल्का सा खुला. फलक, जो अपने कमरे से पानी लेने निकली थी, दबे पाऊँ वहां आ कड़ी हुई. उसने अपनी मम्मी को फर्श पर बैठा और हमजा के साथ उस हालत में देख लिया.

हमजा की अचानक आँख खुली तोह उसने फलक को दरवाज़े के झांकते हुए देखा. उसका दम निकल गया, वो हड़बड़ा कर पीछे हटने लगा.

मगर मिस किरण ने उसकी राण पर हाथ रख कर उसे रोका. उन्होंने पीछे मुद कर देखा... उनकी नज़रें फलक से मिली.


फलक वहां जैम सी गयी थी, उसकी आँखों में हैरत थी मगर डर नहीं

मिस किरण के चेहरे पर ज़रा भी शर्मिंदगी नहीं आयी. उन्होंने निहायत सख्त और pur-aitamad नज़र से फलक की तरफ देखा और सिर्फ अपने सर के इशारे से उसे वापिस जाने को कहा.

उनकी नज़रों में एक ऐसा हुकुम था जिसे फलक ताल नहीं सकती थी. फलक ने एक आखरी नज़र हमजा की मर्दानगी पर डाली और ख़ामोशी से दरवाज़ा भीरा कर वापिस अपने कमरे की तरफ चली गयी.
हमजा का पसीना छूट रहा था. "मिस... वो... फलक..."

"चुप रहो हमजा... और मज़ा लो," मिस किरण ने दोबारा वही शुरू कर दिया.

कुछ देर बाद, जब हमजा पूरी तरह फ़ारिग़ हो गया और उसकी सांसें बहाल हुईं,

तोह मिस किरण ने उठ कर अपने बाल सँवारे. उन्होंने टेबल से टिश्यू उठा कर अपना मुंह साफ़ किया और हमजा की तरफ देख कर मुस्कुरायी.
"आज का सबक़ यही ख़तम होता है हमजा. कल इसी वक़्त आना... फिजिक्स के अगले chapter के लिए," उन्होंने निहायत सलीक़े से कहा जैसे कुछ हुआ hi न हो.

हमजा ने लड़खड़ाते क़दमों से अपनी जीन्स सही की. उसे एहसास हुआ के मिस किरण सिर्फ एक खिलाडी नहीं, बल्कि इस पुरे खेल की मलिका हैं. वो ख़ामोशी से कमरे से निकला, मगर उसके दिमाग में फलक की वो आखरी नज़र अब भी किसी नए खतरे या नए मौके की तरह घूम रही थी.
सन 2: कराची — खामोश आग और बदलते तेवर
नाश्ते की टेबल पर अजीब सा सन्नाटा था. शमीम ने आज बहुत ध्यान से सुरमई रंग का जोड़ा पहना था और हाथों में वही पुराणी छुरियां जो बिलाल को पसंद थीं. मगर बिलाल? वह तोह जैसे कोई और शख्स बन गया था.
"बिलाल... ये पराठा तोह चखो, तुम्हारे लिए बनाया है," शमीम ने निहायत नरम आवाज़ में कहा, उनकी नज़रों में एक इल्तेजा (रिक्वेस्ट) थी.
बिलाल ने अख़बार से नज़र हटाई तक नहीं. "शुक्रिया अम्मी, मेरा दिल नहीं है. मैं ऑफिस जा रहा हूँ." उसने कुर्सी पीछे की और खरा हो गया.
ज़ोया, जो सामने बैठी ये सब देख रही थी, उसके चेहरे पर एक फतेहना मुस्कराहट थी. उसने बिलाल की तरफ देख कर एक गहरी नज़र daali—jaise कह रही हो, "गुड बॉय, अपनी औक़ात में रहो."
"भैया, आज आप काफी सुकून में लग रहे हैं. आखिर आपको समझ तोह आ गयी के घर की इज़्ज़त सब से पहले है," ज़ोया ने चोट की.
बिलाल ने सपाट लहजे में जवाब दिया, "तुम ने सही कहा था ज़ोया. मैं भटक गया था. अब सब ठीक है."
शमीम का दिल ये सुन कर जैसे छलनी हो गया. वह जो बिलाल की आँखों में अपने लिए "तालाब" देखा करती थीं, वहां अब सिर्फ एक ठंडी ख़ामोशी थी. उन्हें लगा जैसे उनका वजूद बिलाल के लिए ख़तम हो गया हो.
दोपहर का वक़्त — किचन
फराह किचन में पानी लेने आयी तोह उसने देखा के शमीम अम्मी खरी दीवार को तक्क रही हैं और चूल्हे पर रखा दूध उबाल कर गिर रहा है.
"अम्मी! दूध गिर रहा है!" फराह ने दौरते हुए चूल्हा बंद किया. "आप कहाँ गम हैं? आज कल आप बहुत भूलने लगी हैं."
शमीम ने झटके से होश संभाला. "कुछ नहीं फराह... बस थोड़ा सर्र में दर्द था."
फराह ने हैरत से उन्हें देखा. "अम्मी, बिलाल भाई को क्या हुआ है? आज कल वो न मज़ाक़ करते हैं, न सही से बात. और ज़ोया आपि तोह जैसे पुरे घर की मलिका बानी बैठी हैं. कल मैंने देखा ज़ोया आपि, बिलाल भाई को कुछ समझा रही थीं और भाई ने सर झुका कर मान लिया. अजीब लग रहा है सब."
शमीम ने फराह की बात का कोई जवाब नहीं दिया, मगर उनके दिमाग में एक hi बात घूम रही थी, क्या बिलाल वाक़ई मुझसे उक्त गया है? या ज़ोया ने उसे इतना डरा दिया है के वो मेरी तरफ देखने से भी कटरा रहा है?
रात का वक़्त — कॉरिडोर
रात के सन्नाटे में शमीम धीरे से बिलाल के कमरे की तरफ बढ़ीं. उनका मक़सद बिलाल के सामने सरेंडर करना नहीं था, बल्कि उस "बेरुखी" का सबब पूछना था जो उन्हें ज़िंदा दर्गोर कर रही थी.
जैसे hi वो दरवाज़े के पास पहुंचीं, उन्होंने देखा के ज़ोया वहां खरी है, बिलाल के कमरे का दरवाज़ा बहार से बंद कर रही है.
"ज़ोया? तुम यहाँ क्या कर रही हो?" शमीम ने हैरत से पूछा.
ज़ोया ने पलट कर अम्मी को देखा, उसकी आँखों में अब रॉब था. "अम्मी, भैया थके हुए हैं. मैंने उन्हें कह दिया है के अब से वो अपने कमरे में सुकून से रहे और किसी की फ़ुज़ूल की खिदमत की ज़रुरत नहीं है. आप भी अपने कमरे में आराम कीजिये."
शमीम बनु वही खरी रह गयीं. उनकी अपनी बेटी उन्हें अपने hi बेटे से दूर कर रही थी, और बिलाल... बिलाल ने अंदर से कोई आवाज़ तक नहीं दी.
शमीम वापिस अपने कमरे में आयीं और आईने के सामने खरी हो गयीं. उन्हें अपना आप बिखरता हुआ महसूस हुआ. वह तड़प जो बिलाल ने पैदा की थी, अब एक तूफ़ान बन चुकी थी.
यहाँ सीमा की वो बात सही होती दिख रही है के
"मर्द जब पीछे hat-ta है, तोह औरत की भूक दुगनी हो जाती है."
शमीम ने अँधेरे में अपनी मुट्ठियां भींच लीन. उन्हें एहसास हुआ के वो बिलाल की इस बेरुखी को ज़्यादा दिन बर्दाश्त नहीं कर पाएंगी. उन्हें बिलाल चाहिए था... हर क़ीमत पर.
सन 3: हवेली की सियासत और शर्तें
रात के खाने का वक़्त था. हवेली के बड़े डाइनिंग टेबल पर रशीद साहब सदर (हेड) कुर्सी पर बैठे थे, मगर उनके चेहरे पर अजीब सी ukhra-pan और नाराज़ी थी. नसीम उनके दाएं तरफ थीं, और सीमा उनके बिलकुल सामने. हमजा, हिरा, उस्मान और आयेशा भी ख़ामोशी से खाना खा रहे थे, मगर माहौल में तनाव (टेंशन) साफ़ महसूस हो रही थी.
सीमा ने माहौल को हल्का करने के लिए रशीद साहब की प्लेट में गोश्त के सालन की एक नल्ली राखी. "अब्बू, क्या बात है? आज खाना कुछ पसंद नहीं आया या दिमाग पर किसी कारोबारी उलझन का बोझ है?" उसने निहायत शोखी से पूछा.
रशीद साहब ने चमचा रखा और एक गहरी सांस ली. "सीमा, जब घर की औलाद हुज्जत पर उतर आये और बाप को उसकी औक़ात दिखने लगे, तोह भूक क्या ख़ाक होनी है." उन्होंने एक तिरछी नज़र हिरा पर डाली जो निहायत इत्मीनान से अपना खाना खा रही थी.
हिरा ने अपनी नज़रें उठायीं, उसके चेहरे पर ज़रा भी डर नहीं था. "अब्बू, आप बात को गलत रंग दे रहे हैं. मैंने सिर्फ इतना कहा था के अभी नहीं हो सकता ये सब. आपने अपनी ख्वाहिश ज़ाहिर की और मैंने मेरी. जब तक मेरा dil-o-dimaagh और फिर ये जिस्म किसी चीज़ के लिए तैयार न हो, मैं कैसा साथ दे सकती हूँ आपका?"
नसीम, जो अब तक खामोश थीं, थोड़ा चिढ कर बोलीं. "रशीद साहब! आखिर कोई खुल कर बोलेगा भी के ये क्या हो रहा है? Baap-beti की ये पहेलियाँ मेरी समझ से बहार हैं."
रशीद साहब ने नसीम की तरफ देखा और सपाट लहजे में बोले. "नसीम, तुम्हारी बेटी चाहती है के मैं इसका इंतज़ार करून. मेरी ख्वाहिश है के ये हवेली की जो नयी रीत हम लोगों ने आयेशा की नहज पर शुरू की है, उसे हिरा आगे बढ़ाये. मैं चाहता हूँ के हिरा मेरी 'खिदमत' करे, बिलकुल वैसे hi जैसे आयेशा ने की है. मगर ये मैडम कहती हैं के इनको सिर्फ 'जवान लुंड' hi चाहिए."
नसीम ने हैरत से हिरा को देखा. "हिरा? क्या ये सच है?"
हिरा ने निहायत संजीदगी और be-baaki से जवाब दिया. "अम्मी, मैंने अब्बू से छोड़ने के लिए इंकार नहीं किया. मगर अम्मी, सोचिये न... मेरी पसंद अलग है. मैं चाहती हूँ के मेरी पहली चुदाई हो, तोह उसमे मेरी मर्ज़ी भी शामिल हो. मैं चाहती हूँ के मेरी छूट की सील जब टूटे, तोह वो कोई जवान और गरम लुंड से हो. मैं अपनी पहली चुदाई किसी बूढ़े लुंड से नहीं करना चाहती... मुझे 'नयी जवानी' और 'नए जज़्बात' की तालाब है. कुल मिलकर मैं इतना कहना चाहती हूँ के मैं अपनी पहली चुदाई को किसी जवान लुंड के साथ स्पेशल बनाना चाहती हूँ. अब्बू अगर अपनी ज़िद्द पर अदेय रहेंगे तोह मैं कैसे तैयार हो सकती हूँ? मैं पहले अपनी ख्वाहिश पूरी कर लून, फिर अब्बू जब चाहें तब छोड़ लें मुझे, मैं इंकार थोड़ी करुँगी..."
सब लोग हिरा की इस क़दर be-baaki पर ta'ajjub कर रहे थे. रशीद साहब हिरा को अभी भी घूर रहे थे. हिरा की इस बात पर आयेशा ने ज़ोर से अपना गिलास टेबल पर रखा, उसके चेहरे पर जलन साफ़ थी. "हिरा! कुछ तोह लिहाज़ करो. अब्बू की मर्दानगी किसी जवान से काम नहीं है. तुम्हे शायद अंदाज़ा नहीं के तुम क्या 'मिस' कर रही हो." आयेशा को डर था के कहीं हिरा का ये naya-pan रशीद साहब को उस से बिलकुल hi दूर न कर दे.
नसीम ने निहायत सलीक़े से रशीद साहब का हाथ थमा और निहायत नरम आवाज़ में बोली. "रशीद साहब, आप इतने तजुर्बेकार होकर बच्ची की बात का बुरा मान गए? हिरा का कहना गलत नहीं है. एक फूल को खिलने के लिए धुप और थोड़ी ठंडक दोनों चाहिए होती है. अगर आप zor-zabardasti करेंगे, तोह वो मज़ा नहीं आएगा जिसके आप शौक़ीन हैं. इसकी साख (डिग्निटी) का ख्याल रखना भी तोह आप hi का फ़र्ज़ है. इससे थोड़ा नखरे दिखने दें, इसी में तोह मज़ा है."
हिरा ने फिर कहा, "अब्बू आप से मैं भी उतना hi प्यार करती हूँ जितना सीमा एपीआई और आयेशा बजी करती हैं... आप चाहें तोह मैं अभी आपका लुंड चूस दूँगी यहीं सब के सामने, या आपको मेरे ये छोटे मम्मी छोड़ने हैं तोह छोड़ लीजिये मैं मन नहीं करुँगी, लेकिन मैं अभी आपको मेरी छूट नहीं दूँगी. इसके लिए मुझे और वक़्त चाहिए." हिरा ने रोनी सी सूरत बनायीं जिस पर सब हंस दिए... रशीद साहब भी हल्का सा मुस्कुरा दिए.
आयेशा ने होंठ भींचिये, उसकी जलन अब गुस्से में बदल रही थी. नसीम ने माहौल को संभालने के लिए उस्मान और ज़ोया के रिश्ते का बम फोरने का ये सही मौक़ा जाना.
नसीम ने आयेशा की बेचैनी समझी और उसकी तरफ देखते हुए कहा, "हमें प्यार और मोहब्बत से hi एक दूसरे से मज़ा लेना है. और फिर अब वक़्त है खंडन को बढ़ने का. मैंने सोचा है के क्यों न हम उस्मान और ज़ोया के रिश्ते की बात शुरू करें शमीम बजी से? कराची से बिलाल और उसके घर वाले जब आएंगे, तोह हम ये दावत इसी ख़ुशी में रखेंगे."
ये सुनते hi उस्मान के हाथ से निवाला गिरते गिरते बचा. उसने शॉक में नसीम को देखा, जबकि हमजा और आयेशा ने एक्ससिटेमेंट दिखाई. "वह अम्मी! ये तोह बहुत ज़बरदस्त खबर है," आयेशा ने चहकते हुए कहा और रशीद साहब की तरफ झुकी. "अब्बू, अब तोह गुस्सा थूक दें. देखिये घर में कितनी खुशियां आने वाली हैं. हिरा भी मान जाएगी, बस आप थोड़ा नरम पर जाएं."
रशीद साहब का सख्त चेहरा पिघलने लगा तोह उस्मान ने मौक़ा देख कर छेड़ते हुए कहा, "अब्बू, लगता है हिरा ने कोई 'जवान खिलाडी' ढून्ढ रखा है, तभी इतनी बड़ी शर्त रख रही है. कहीं ऐसा न हो के आप इंतज़ार करते रह जाएं और मैदान कोई और मार ले जाये."
इधर हमजा ने भी हँसते हुए बोलै, "भैया सही कह रहे हैं. सीमा एपीआई और आयेशा बजी तोह अब्बू के तजुर्बे की दीवानी हैं, मगर हिरा को शायद 'zor-azmayi' ज़्यादा पसंद है."
रशीद साहब ने हमजा और उस्मान को घूरा, मगर उनकी नज़रों में अब ग़ुस्सा नहीं था, लेकिन एक मायूसी ज़रूर थी. उन्होंने हिरा का हाथ थपथपाया, "ठीक है हिरा, मैं तुम्हारे जज़्बातो का लिहाज़ रखूँगा, लेकिन अपने इस बूढ़े बाप को ज़्यादा मायूस मत करना."
सीमा ने रशीद साहब की मायूसी को महसूस किया और उन्हें खुश करने की नियत से कुर्सी पर थोड़ा आगे को झुकी, जिससे उसकी गोरी गर्दन और सेक्सी क्लीवेज रशीद साहब के बिलकुल सामने आ गयी. "अब्बू... ये रूठना मानना तोह अपनी जगह है, मगर मेरी भी एक ख्वाहिश है," सीमा ने निहायत धीरे और नशीली आवाज़ में कहा. "वैसे तोह हमारे घर में मर्दानगी की खिल्लत नहीं है, मगर मुझे आपके उस मरदाना तजुर्बे की तालाब है जो मुझे 'दूसरी तरफ' (गांड) से फ़तेह कर सके. अम्मी ने बताया है आप इस फानन में उस्ताद हैं. हिरा जब तक नखरे दिखती है, तब तक क्यों न आप मुझ पर अपना तजुर्बा आज़माएं?"
रशीद साहब की आँखों में अचानक एक चमक आयी. सीमा की इस be-baak पेशकश ने उनकी मायूसी को काफूर कर दिया. "नसीम... हमारी बेटियां वाक़ई मर्दों को रिझाना जानती हैं," रशीद साहब ने ठंडी सांस लेते हुए कहा. "ठीक है. हिरा को उसका वक़्त दिया, मगर सीमा... तुम्हारी ख्वाहिश कल hi पूरी होगी."
हमजा ने शरारत से सीमा की तरफ देखा, "बजी, अब्बू का 'पिछले रास्ता' खोलने का तजुर्बा तोह बड़ा mash'hoor hi लगता है, मगर संभल कर... कहीं आपका पिछले दरवाज़ा हमेशा के लिए न खुला रह जाये!"
नसीम ने हिरा की तरफ देख कर आँख मारी. पूरे दस्तरख्वान पर अब खाना काम और आने वाली रंगीन रातों की साज़िशें ज़्यादा परोसी जा रही थीं.
सब का खाना ख़तम हुआ. सब काम निपटा कर जब सीमा ऊपर अपने कमरे में जाने लगी तोह हमजा ने उसे रस्ते में hi रोक लिया. "आपि, आप अपनी गांड का पहला मौक़ा मुझे hi देने वाली थीं, आप ने वडा भी किया था... क्या आप अपना वडा तोड़ेंगी?"
सीमा ने हमजा के लुंड को उसके ट्राउज़र्स के ऊपर से hi दबाते हुए कहा, "क्या करूँ हमजा, अब्बू का वो मायूस चेहरा मुझसे देखा नहीं गया इसलिए मजबूरी में मैंने अब्बू को ऑफर दे दी. लेकिन तू फ़िक्र न कर, मैं जल्दी तेरे लिए मेरी सास शमीम खला को रेडी करने वाली हूँ. मेरे बदले तू उनकी गांड मार लेना."
"कोई बात नहीं आपि, मुझे 'seal-veal' की कोई ऐसी ख्वाहिश नहीं है. प्यार से जो भी जब भी कोई मौक़ा मिल जाये मैं उसी में खुश हो जाता हूँ," हमजा ने साफ़ दिली से कह दिया. सीमा ने उसकी साफ़ दिली का इनाम प्यार से उसके होंठ चूस कर दिया,


और थकावट की वजह से दोनों अपने अपने कमरों में चले गए..
सन 4: हिरा का कमरा — राज़ और इरादे
रात के दो बज रहे थे. हवेली में हर तरफ एक गहरा और भीतर तक उतर जाने वाला सन्नाटा था, सिर्फ पुराणी deewar-ghari के टिकटिकने की मद्धम आवाज़ कॉरिडोर की ख़ामोशी को चीयर रही थी. हमजा ने निहायत दबे पाऊँ हिरा के कमरे का दरवाज़ा खोला और अंदर दाखिल हो गया. हिरा बिस्टेर पर दोनों घुटने सीने से लगाए, अजीब सी उलझन और सोच में डूबी हुई थी.
"हिरा बजी? सोइ नहीं अब तक?" हमजा ने धीरे से दरवाज़ा बंद करते हुए पूछा.
हिरा ने झटके से गर्दन मोर कर उसे देखा, उसकी आँखों में dastar-khwan वाली वह शोखी नहीं थी, बल्कि एक थकन सी थी. फिर भी उसने खुद को सँभालते हुए हलकी सी मुस्कराहट बिखरी. "कैसे सो जाती हमजा? आज जो तमाशा टेबल पर लगा कर आयी हूँ, उसकी थरथराहट अभी तक जिस्म से गयी नहीं है."
हमजा धीरे से उसके पास बिस्टेर पर बैठ गया. "वाक़ई बजी, आपने तोह आज हद्द कर दी. अब्बू के सामने वह 'जवान लुंड' वाली शर्त... और फिर वह लुंड चूसने वाली ऑफर? पूरा खंडन शॉक में था. मुझे लगा आप वाक़ई इतनी be-baak हो गयी हो."
हिरा ने एक गहरी सांस ली और अपना काँपता हुआ हाथ हमजा के बाज़ू पर रख दिया. उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं. "हमजा... मैं पागल नहीं हूँ, और न hi मैं इतनी निदारर हूँ जितना दिखने की कोशिश करती हूँ. मैं जानती हूँ अब्बू की रगों में कितनी भेड़िया नुमा हवस दौड़ रही है. अगर मैं आज सिर्फ 'न' कह देती, तोह वो मुझे दांत कर या zor-zabardasti से अभी तक अपने बिस्तर पर लिटाये हुए होते."
उसने अपनी नज़रें झुका लीन, उसके चेहरे पर एक अजीब सी शर्मिंदगी और डर के साये साफ़ नज़र आने लगे. "असल बात कुछ और है हमजा... मैं बोहोत दरी हुई हूँ. मैंने आयेशा बजी की वह दर्दनाक हालत अपनी आँखों से देखि है जब उनकी सील टूटी थी. अब्बू का वह 9-इंच का मोटा और भरी लुंड... उसके बारे में सोच कर hi मेरी रूह काँप जाती है. इतने दिनों तक तोह मैं इस खौफ को मस्ती मज़ाक़ और chhed-khaniyon के पीछे छुपाती आयी हूँ, मगर आज जब dastar-khwan पर मुझे लगा के अब वही अज़्दहा (पाइथन) मेरी छूट पर वार करने के लिए बिलकुल तना खरा है... तोह अंदर से मेरा दम निकल गया."
हमजा ने हैरत और हमदर्दी से उसे देखा. हिरा ने धीरे से अपना सर हमजा के कंधे पर टिका दिया. "मुझे सबके सामने यह बोलते हुए शर्म आ रही थी के मैं अब्बू के उस मोठे औज़ार से डर कर भाग रही हूँ... इसलिए मैंने वह 'जवान लुंड' और 'नयी जवानी' का पूरा खेल रचा. ताके अब्बू को लगे के उनका मुक़ाबला किसी और से है, और उनकी मरदाना आना थोड़ी ढीली पद जाये. इस झूट की आड़ में मैंने न सिर्फ अपने लिए थोड़ा वक़्त निकल लिया, बल्कि उन्हें मायूस कर सीमा बजी की तरफ ढाका भी दे दिया."
हमजा ने फिक्रमंदी से उसकी थोड़ी को ऊपर उठाया. "मगर बजी, कब तक? अब्बू कल नहीं तोह परसो फिर तुम्हारी तरफ देखेंगे. यह डर कब तक छुपाओगी?"
हिरा ने हमजा की नरम और जवान आँखों में देखा, जहाँ कोई खौफनाक हवस नहीं बल्कि एक अपनापन था. "तब तक हमजा, जब तक तुम पूरी तरह तैयार नहीं हो जाते. मैं चाहती हूँ के मेरी छूट की सील इस हवेली के सब से स्पेशल और जवान लुंड से टूटे, ताके मुझे वह बेहनाप दर्द न मिले जो आयेशा बजी ने झेला. मैं अपनी पहली चुदाई तुम्हारे साथ नरम और स्पेशल बनाना चाहती हूँ, अब्बू के उस बेरहम मोठे लुंड के साथ नहीं. क्या तुम मुझे इस डर से नहीं निकलोगे?"
हमजा का दिल ये सुन कर ज़ोर से धरकने लगा. हिरा की इस मासूमियत और उसके अंदर छुपे डर ने हमजा के अंदर एक मरदाना हिफाज़त का जज़्बा जगा दिया. उसने हिरा को बाज़ुओं में कसकर क़रीब खिंचा और उसके माथे को निहायत नरमी से चूमा. "मैं आपको कभी मायूस नहीं करूँगा, बजी. आपकी सील पर पहला और आखरी हक़ मेरा hi होगा, आप फ़िक्र न करें. वैसे... आज मेरे साथ भी कुछ अजीब हुआ है."
हिरा ने अपनी बेचैनी को थोड़ा पीछे ढेलडे हुए तजस्सुस से पूछा, "क्या? मिस किरण के घर फिजिक्स कैसी रही?"
हमजा ने हप्ते हुए पूरा किस्सा sunaya—kaise मिस किरण ने उसे गेस्ट रूम में बुलाया, कैसे उन्होंने उसका "टेस्ट" लिया, और सब से बड़ी बात, कैसे उनकी बेटी फलक ने उन्हें उस हालत में देख लिया.
हिरा की आँखें फटी की फटी रह गयीं. "क्या?! फलक ने देख लिया? और मिस किरण ने उसे रोका तक नहीं?"
"नहीं," हमजा ने सर हिलाया. "मिस ने बस इशारा किया और वो चली गयी. ऐसा लगता है जैसे उस घर में भी वही सब नार्मल है जो यहाँ होता है. फलक की नज़रों में डर नहीं था हिरा बजी... वहां कुछ और hi था. शायद भूक, या शायद जलन."
हिरा ने एक शैतानी मुस्कराहट के साथ हमजा की थोड़ी पकड़ी. "तोह इसका मतलब है के तुम सिर्फ माँ को hi नहीं, बेटी को भी फंसने वाले हो? हमजा, तुम तोह बड़े खिलाडी निकले."
"अभी तोह शुरुआत है हिरा बजी," हमजा ने उसके लबों के क़रीब होते हुए कहा. "मिस किरण ने मुझे कल फिर बुलाया है. उन्होंने कहा है के कल 'फाॅर्स' और 'फ्रिक्शन' का अगला chapter पढ़ाएंगी."
हिरा ने हमजा के होंठ चूस लिए. "ठीक है... तुम वहां फिजिक्स पढ़ो, मैं यहाँ अब्बू को हैंडल करती हूँ. मगर याद रखना हमजा... पहला हक़ मेरा है."
दोनों एक दूसरे की बाँहों में सिमट गए. हवेली की दीवारों ने एक और नए गुनाह की साज़िश को अपने अंदर जज़्ब कर लिया.
Episode 33 ख़तम
क्लिफहैंगर: एक तरफ हमजा और हिरा अगले बड़े खेल की तयारी कर रहे हैं, तोह दूसरी तरफ रशीद साहब, सीमा की "पिछली तरफ" वाली दावत के इंतज़ार में हैं. मगर क्या हिरा अपने अब्बू के बेरहम लुंड से अपनी छूट बचा पायेगी? और क्या शमीम बनु, बिलाल की बेरुखी को बर्दाश्त कर पाएंगी या फिर कोई बड़ा क़दम उठाएंगी?