Incest GHAR KI AAG (URDU) - Page 7 - SexBaba
  • From this section you can read all the hindi sex stories in hindi font. These are collected from the various sources which make your cock rock hard in the night. All are having the collections of like maa beta, devar bhabhi, indian aunty, college girl. All these are the amazing chudai stories for you guys in these forum.

    If You are unable to access the site then try to access the site via VPN Try these are vpn App Click Here

Incest GHAR KI AAG (URDU)

घर की आग

Episode 29: देहलीज़ की तपिश और कराची की कसक

सन 1: कराची — सुबह का नाश्ता और फराह का पहरा

कराची में सुबह की नमकीन हवा खिड़कियों से अंदर आ रही थी. बिलाल की रात काफी be-chain गुज़री थी. रात को फराह ने उसे जिस तरह अम्मी के कमरे में पकड़ा था, उसके बाद बिलाल की हिम्मत नहीं हो रही थी के वो नज़रें मिलाये.

नाश्ते की टेबल पर शमीम बनु हमेशा की तरह निहायत सलीक़े से पराठे बना रही थीं. उन्होंने एक हलकी गुलाबी रंग की क़मीज़ पहनी थी. पसीने की वजह से उनके माथे पर लटकने वाली लातें उनके गोर चेहरे पर चिपक रही थीं.

"बिलाल, बीटा... आज ऑफिस जल्दी जाना है?" शमीम ने धीरे से पूछा, उनकी आवाज़ में वही पुराणी ममता थी, उन्हें पता hi नहीं था के उनका बीटा रात को किस नियत से उनके पास आया था.

"जी अम्मी... एक मीटिंग है," बिलाल ने नाश्ते में नज़रें गड़ाए हुए कहा.





फराह, जो पास hi बैठी चाय पी रही थी, उसने बिलाल पर एक गहरी नज़र डाली. "भैया... रात को तोह आप कह रहे थे के आपको मच्छरों की वजह से नींद नहीं आ रही? अभी से thake-thake लग रहे हैं?"

बिलाल का निवाला हलक़ में फँस गया. शमीम ने हैरत से फराह की तरफ देखा. "मच्छर? लेकिन बिलाल के कमरे का तोह एक बिलकुल ठीक काम कर रहा है?"

फराह ने मुस्कुराते हुए बिलाल की आँखों में देखा, एक ऐसी मुस्कराहट जिसमे चेतावनी (वार्निंग) थी. "पता नहीं अम्मी... शायद भैया को आपके के कमरे की ठंडक ज़्यादा पसंद है. रात को वहां मच्छर चेक कर रहे थे."

शमीम ने हस्ते हुए कहा, "अरे... बिलाल तोह बचपन से hi मेरे बग़ैर नहीं सोता था. अब बड़ा हो गया है, शादी भी होगयी तोह क्या हुआ, माँ तोह माँ hi रहती है."

बिलाल ने जल्दी से चाय ख़तम की और उठ खड़ा हुआ. "मैं निकल रहा हूँ." जैसे hi वो दरवाज़े की तरफ बढ़ा, उसने महसूस किया के फराह उसके पीछे आयी है.

"भैया... रुकिए," फराह ने धीरे से कहा. "अम्मी मासूम हैं, उन्हें हर बात मज़ाक़ लगती है. मगर मैं बची नहीं हूँ. कल रात जो मैंने देखा... और आपकी शलवार में जो 'सच' दिख रहा था... बेहतर है के वो दोबारा नज़र न आये. वर्ण मुझे ज़ोया बजी को बताने में देर नहीं लगेगी."

बिलाल बिना कुछ कहे तेज़ी से बहार निकल गया. उसका दिल धारक रहा था. एक तरफ फराह का डर था, और दूसरी तरफ शमीम अम्मी के बदन की वो महक जो उसे पागल कर रही थी. ऑफिस जाते हुए रस्ते में उसे हर औरत में अपनी माँ का अक्स नज़र आ रहा था. ये हवस अब उसकी rag-rag में ज़हर बन कर फैल रहा था.

सन 2: लाहौर — हवेली में रशीद साहब की "स्पेशल क्लास"

लाहौर की हवेली में दोपहर का वक़्त था. सीमा और हमजा की रात वाली चुदाई ने उन दोनों को काफी रिलैक्स कर दिया था, मगर आयेशा के लिए आज का दिन इम्तेहान का था.

नसीम ने आयेशा को नए लिबास में तैयार किया tha—ek बिलकुल बारीक़ और ट्रांसपेरेंट शिफॉन की क़मीज़, जिसके निचे उसने ब्रा नहीं पहनी थी. आयेशा के कमसिन और naye-naye उभरे हुए मम्मी उस बारीक़ कपडे के निचे से साफ़ झलक रहे थे.





"अम्मी... ये तोह सब नज़र आ रहा है," आयेशा ने शर्म से दुपटा लपेटना चाहा.

नसीम ने उसका दुपटा फ़ेंक दिया. "आज दुपटा नहीं, आज सिर्फ मर्दानगी का लम्स होगा. रशीद साहब आते hi होंगे. आयेशा, याद रख... वो तेरे बाप हैं, उन्हें सब पता है. बस उन्हें खुश कर दे, फिर देख तुझे कैसी आज़ादी मिलती है."

तभी रशीद साहब कमरे में दाखिल हुए. उनके हाथ में एक किताब थी, जैसे वाक़ई कोई 'दरस' देने आये हों. नसीम और हिरा धीरे से बहार निकल गयीं और दरवाज़ा बहार से बंद कर दिया.

रशीद साहब बीएड पर बैठ गए और आयेशा को अपने सामने खड़ा होने का इशारा किया. आयेशा की टांगें कैंप रही थीं.

"आयेशा... बेटी... पास आओ," रशीद साहब की आवाज़ में आज वो सख्ती नहीं थी, बल्कि एक अजीब सी नरमी और bhari-pan था.

आयेशा धीरे से उनके क़रीब गयी. रशीद साहब ने उसकी थोड़ी (चीन) ऊपर उठायी. "कल रात मैंने जो किया, उसके लिए डर गयी थी न? वो सिर्फ शुरुवात थी. आज मैं तुम्हे बताऊंगा के मर्द को मज़ा कैसे देते हैं... और मर्द से मज़ा कैसे लेते हैं."

उन्होंने आयेशा का हाथ पकड़ा और उसे धीरे से अपने तने हुए लुंड पर रखा, जो उनकी ढीली शलवार के निचे किसी पहर की तरह तना हुआ था. आयेशा ने पहली बार इतने hosh-o-hawas में अपने बाप की मर्दानगी को महसूस किया.

"इसे महसूस करो आयेशा... ये लोहा नहीं, ये मेरा प्यार है तुम्हारे लिए. इसे धीरे से सेहलाओ," रशीद साहब ने हिदायत दी.

आयेशा ने कांपते हाथों से उनके लुंड को मुट्ठी में भरा. उसका दिल तेज़ी से धारक रहा था. "अब्बू... ये... ये बहुत गरम है."

"हाँ बेटी... ये तुम्हारे लिए hi गरम है. अब अपनी क़मीज़ धीरे से उतरो... मैं देखना चाहता हूँ मेरी बेटी कितनी जवान हो गयी है." रशीद साहब की नज़रों में हवस की आग थी, मगर वो उसे बड़े "रोमांटिक" अंदाज़ में कण्ट्रोल कर रहे थे.





आयेशा ने dhere-dhere अपनी क़मीज़ ऊपर की. उसके गोर और नरम मम्मी जब रशीद साहब की नज़रों के सामने आये, तोह उन्होंने एक गहरी सांस ली. "S*********h... बिलकुल अपनी माँ पर गयी है."

सन 3: बिज़नेस और — बिलाल का कनफ्लिक्ट

कराची में बिलाल अपने ऑफिस में बैठा था. सामने फाइल्स पड़ी थीं मगर उसका दिमाग काम में नहीं लग रहा था. उसका एक दोस्त और बिज़नेस पार्टनर, समीर, ऑफिस में दाखिल हुआ.

"बिलाल! कहाँ खोये हुए हो? अगले हफ्ते का जो कन्साइनमेंट है, उसकी क्लीयरेंस करनी है," समीर ने कुर्सी पर बैठते हुए कहा.

"हाँ... वो... मैं देख रहा हूँ," बिलाल ने बात टालने की कोशिश की.

समीर ने उसे ग़ौर से देखा. "यार, जब से लाहौर से लौटा है, बड़ा badla-badla लग रहा है. क्या बात है? भाभी (सीमा) की याद आ रही है या लाहौर में कोई 'नया चक्कर' चला लिया है?"

बिलाल ने एक झूटी हंसी हसी. "नहीं यार... बस गर्मी और थकन है."

"चल छोर... आज शाम को क्लब चलते हैं. थोड़ी ड्रिंक पिएंगे, कुछ अछि लड़कियां आती हैं वहां... दिमाग फ्रेश हो जायेगा," समीर ने आंख मरी.

बिलाल ने सोचा के शायद बहार जाने से उसका दिमाग अपनी अम्मी से हैट जाये. "ठीक है... चलते हैं."

मगर जब शाम को बिलाल क्लब गया, वहां ढेरों हसीं लड़कियां थीं, छोटे कपडे पहने हुए, डांस करती हुई. समीर एक लड़की के साथ नज़दीक हो रहा था, मगर बिलाल का दिमाग कहीं और था. उसे वो लड़कियां 'सस्ती' लग रही थीं. उसके दिमाग में bar-bar शमीम अम्मी का वो "मलमल वाला रूप" आ रहा था.

वो घर की शराफत, वो माँ की महक... उसे एहसास हुआ के बहार की दुनिया की चुदाई में वो नशा नहीं जो "घर की आग" में है. वो क्लब से जल्दी निकल गया, ये बहाना बना कर के उसकी तबियत ठीक नहीं. रस्ते में उसने मार्किट से अपनी अम्मी के लिए उनके पसंदीदा "गजरे" खरीदे. ये उसका अपना तरीक़ा था उनके क़रीब जाने ka—pyar के बहाने हवस की दीवार बनाना.

सन 4: हवेली का "रोमांटिक" मोड़ — आयेशा का समर्पण

वापस लाहौर की हवेली में, रशीद साहब ने आयेशा को बीएड पर बड़े सुकून से लिटा लिया था. वो जानते थे के आयेशा अभी इस नए रिश्ते से थोड़ी सेहमी हुई है, इसलिए उन्होंने सीधा हमला करने के बजाये उसे लज़्ज़त के समंदर में डुबोने का फैसला किया. उन्होंने आयेशा के निप्पल्स को धीरे से अपने होठों में लिया और उन्हें सहलाने लगे.

"अह्ह्ह... अब्बू... उफ़... ये... ये मज़ा है या दर्द?" आयेशा सिसकारियां ले रही थी.





"ये नशा है आयेशा... मेरी जान," रशीद साहब ने उसके कान में सरगोशी की. उन्हों ने धीरे से आयेशा की क़मीज़ ऊपर की और उसके naye-naye उभरे हुए मम्मों को सहलाने लगे.

"आयेशा, मेरी जान... आज मैं तुझे वो मज़ा दूंगा जो तूने कभी ख्वाब में भी नहीं सोचा होगा," उन्होंने सरगोशी की.

उन्होंने निचे झुक कर आयेशा की शलवार धीरे से उतरी. आयेशा ने शर्म से अपनी आँखें बंद कर लीन, मगर रशीद साहब ने उसकी दोनों टांगें फैला कर उसकी नरम और नाज़ुक छूट पर अपनी ऊँगली फेरी. आयेशा की एक सिसकारी निकल गयी.













"अब्बू... ये... ये क्या कर रहे हैं आप?"

रशीद साहब ने जवाब नहीं दिया, बल्कि अपना मुँह निचे ले गए और आयेशा की छूट के नरम लबों पर अपनी गरम ज़बान फेर दी. आयेशा का जिस्म एक झटके से अकड़ गया. उसने पहले कभी ऐसा कुछ महसूस नहीं किया था. जब रशीद साहब ने उसके "डेन" (क्लाइटोरिस) को अपनी ज़बान से छेड़ा, तोह आयेशा ने बेडशीट को ज़ोर से मुट्ठी में झकड़ लिया.





"अह्ह्ह... अब्बू... उफ़... ये क्या हो रहा है... मज़ा... बोहोत मज़ा आ रहा है!" आयेशा की सिसकारियां अब कमरे में गूँज रही थीं. रशीद साहब ने अपनी ज़बान की रफ़्तार बढ़ा दी, वो उसकी छूट का रास ऐसे पी रहे थे जैसे कोई प्यासा शबनम पी रहा हो. आयेशा का जिस्म थिरकने लगा,





और कुछ hi देर में वो झटके कहते हुए फारिग (ओर्गास्म) हो गयी. उसका जिस्म बिलकुल ढीला पद गया.

रशीद साहब ने जब आयेशा की छूट को अपनी ज़बान से tar-batar कर दिया, तोह आयेशा लज़्ज़त की वजह से बिलकुल बेहाल हो चुकी थी. अब रशीद साहब दोबारा उसके मम्मों की तरफ मुदाय. उन्होंने देखा के आयेशा के मम्मी जो पहले नरम थे, अब काफी सख्त और तनय हुए महसूस हो रहे थे, और उनके निप्पल्स बिलकुल खड़े (ेरेक्ट) हो चुके थे.





आयेशा ने हैरत से अपने जिस्म की इस तब्दीली को देखा और पूछा, "अब्बू... ये मेरे मम्मी इतने सख्त क्यों हो गए हैं? जैसे इन में कोई करंट दौड़ रहा हो..."

रशीद साहब ने मुस्कुराते हुए एक निप्पल को अपने अंगूठे और ऊँगली के बीच हल्का सा दबाया,





जिस से आयेशा की एक सिसकारी निकल गयी. उन्होंने समझाना शुरू किया:

"मेरी जान, ये जिस्म का एक कुदरती निज़ाम है. जब एक औरत जिन्सी तौर पर गरम होती है, तोह उसके जिस्म में खून का बहाओ तेज़ हो जाता है. तुम्हारे मम्मों की जो नरम तिसुएस हैं, उन में खून भर जाता है जिस से वो फूलने लगते हैं और सख्त हो जाते हैं."





उन्होंने निप्पल को धीरे से चूसते हुए मज़ीद कहा, "और ये निप्पल्स... इन में हज़ारों बारीक़ नसें होती हैं. जब इन्हें छेड़ा जाता है, तोह ये दिमाग को सुकून देतें हैं, जिस से ये पत्थर की तरह सख्त हो जाते हैं ताके इन्हे ज़्यादा महसूस किया जा सके. ये इस बात की निशानी है मेरी बची, के तुम्हारा जिस्म अब मर्द की गर्मी मांग रहा है."

आयेशा ने अपने सख्त निप्पल्स को देखा और फिर अपने बाप की मर्दानगी की तरफ इशारा किया. "तोह फिर दिएर किस बात की है अब्बू? इन्हें और सख्त कीजिये न..."

रशीद साहब ने केहक़हा लगाया और अपना लुंड आयेशा के मुँह के क़रीब ले गए. "सबर मेरी बेटी... आज सिर्फ तुम्हारे सीखने का वक़्त है"

"अब मेरी बारी है बेटी... इसे अपने मुँह में लो," रशीद साहब ने हुकुम दिया.

रशीद साहब ने जब अपना मोटा और कला लुंड आयेशा के सामने किया तोह उसकी आँखें पहात गयीं. वो इतना मोटा था के उसकी रगों का जाल साफ़ नज़र आ रहा था.





"इसे अपने मुँह में लो आयेशा... जैसे चॉकलेट चूसते हैं," रशीद साहब ने हुकुम दिया.









आयेशा ने हिचकिचाते हुए लुंड की टोपी को अपने नरम होठों में लिया. पहले उसे घिन आयी, मगर जब रशीद साहब ने उसके बालों को प्यार से सहलाया, तोह उसने dhere-dhere उसे चूसना शुरू किया.





"शाबाश... मेरी बेटी... ऐसे hi," रशीद साहब कराहने लगे.





आयेशा को महसूस हुआ के उसके बाप की मर्दानगी का एक अजीब सा ज़ायक़ा है.

आयेशा की शर्म अब पूरी तरह ख़तम हो रही थी. वो समझ रही थी के उसका जिस्म कैसे उसके जज़्बात का साथ दे रहा है. उसने अपने सख्त मम्मों को अपने hi हाथों से मसला और फिर हिचकिचाहट के बगैर लुंड की टोपी को अपने नरम होठों में लिया. रशीद साहब ने उसके बालों को प्यार से सहलाया, तोह उसने पूरी शिदत से उनके लुंड को चूसना शुरू कर दिया.





"शाबाश... मेरी बेटी... ऐसे hi," रशीद साहब कराहने लगे.

रशीद साहब ने उसके सर्र को पकड़ा और dhere-dhere धक्के मारने शुरू किये.





ये मंज़र इतना इरोटिक था के कमरे के बहार कड़ी हिरा और नसीम भी एक दूसरे को देख कर गरम हो रही थीं.





आयेशा की शर्म अब पूरी तरह टूट रही थी. वो अपने बाप के लुंड को पूरी शिदत से चूस रही थी, जैसे वो कोई मुकदस (हौली) चीज़ हो.

जब रशीद साहब का जोश बढ़ा, उन्होंने आयेशा को लिटा कर उसके पेट पर अपने लुंड को रगड़ना शुरू किया. "आयेशा... देख... तेरा अब्बू तेरे लिए पागल हो रहे हैं!"





"आह्हः.... ाग्घ्ह्ह्ह्ह..... hunnmm.....uffff" और फिर एक zor-dar सिसकारी के साथ, रशीद साहब ने अपना गरम लावा आयेशा के naye-naye उभरे हुए मम्मों पर बिखेर दिया.





आयेशा ने देखा के कैसे वो सफ़ेद गाढ़ा पानी उसके जिस्म पर धार बन कर गिर रहा है. रशीद साहब ने वही पानी अपनी ऊँगली से उठाया और आयेशा के होठों पर लगा दिया.





"ये हमारे प्यार की पहली निशानी है आयेशा," उन्होंने उसे चूमा.

आयेशा ने वो "माल" छठा और मुस्कुरा दी. उसका डर अब पूरी तरह ख़तम हो चूका था. वो अब इस "घर की आग" का एक अहम् हिस्सा बन चुकी थी.

Episode 29 ख़तम

क्लिफहैंगर: कराची में बिलाल गजरे लेकर घर पहुंचा है, मगर वहां फराह ने पहले से hi ज़ोया बजी को कुछ बता दिया है. क्या बिलाल के गजरे शमीम अम्मी के बालों में लगेंगे या उनकी शर्म की दीवार और ऊँची हो जाएगी? और लाहौर में, रशीद साहब ने आयेशा को तोह "ट्रैन" कर दिया, मगर अब उनकी नज़र हिरा पर है...
 
घर की आग

Episode 30: रिश्तों की ढूंढ और देहलीज़ का नया शिकार

सन 1: कराची — गजरे, गिल्ट और ज़ोया का पहरा

कराची की शाम ढल रही थी. बिलाल हाथ में सफ़ेद गजरे लिए घर दाखिल हुआ. उसके दिमाग में क्लब की वो हसीं लड़कियां नहीं, बल्कि अपनी अम्मी का वो नरम और मातुरे बदन घूम रहा था.

Halla-gulla काम था. बिलाल ने देखा के उनकी अम्मी किचन में रात के खाने की तयारी कर रही हैं. ज़ोया और फराह हॉल में बैठी कोई पुराण ड्रामा देख रही थीं. ज़ोया की नज़र जैसे hi बिलाल के हाथ में मौजूद गाजरों पर पड़ी, उसकी आँखें थोड़ा सिकुड़ीं.

"भैया? आज गजरे? खैरियत?" ज़ोया ने उठते हुए पूछा. उसकी आवाज़ में वही bade-pan वाली संजीदगी थी.

ज़ोया, जो घर में सबसे ज़्यादा अक़लमंद और संजीदा समझी जाती है, वो बिलाल को पिछले दो दिनों से ऑब्सेर्वे कर रही थी. उसे फराह ने खुल कर कुछ नहीं बताया था, मगर फराह की घबराहट और बिलाल का baar-baar अपनी अम्मी के क़रीब जाना ज़ोया की नज़रों से छुपा नहीं था. जब बिलाल ने गजरे ला कर टेबल पर रखे, तोह ज़ोया को दाल में कुछ कला लगा.

"वो... रस्ते में मिल रहे थे तोह ले लिए. अम्मी को पसंद हैं न," बिलाल ने नज़रें चुराते हुए कहा और किचन की तरफ बढ़ गया.

फराह ने ज़ोया की तरफ देख कर एक ma’ni-khez इशारा किया. दोनों बहनें अब बिलाल की हर हरकत पर नज़र रख रही थीं.

किचन में शमीम पसीने से शराबोर थीं. "अम्मी... ये आपके लिए," बिलाल ने गजरे टेबल पर रखे.

शमीम ने मुद कर देखा और उनके चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कराहट आ गयी. "अरे बिलाल! इतनी गर्मी में इनकी क्या ज़रुरत थी? कितनी अछि खुशबू है." उन्होंने गजरे उठाये और अपने बालों में लगाने की कोशिश करने लगीं. "ज़रा लगाना बीटा, मुझसे ठीक से लग नहीं रहे."

बिलाल के दिल की धड़कन तेज़ हो गयी. वो धीरे से अपनी अम्मी के पीछे खड़ा हुआ. उनकी गर्दन पर पसीने की नन्ही बूँदें चमक रही थीं. बिलाल ने जब उनके बालों में गजरे सजाये, तोह उसकी उँगलियाँ गलती से (या शायद jaan-boojh कर) अम्मी की नरम गर्दन से मास (टच) हुईं.

शमीम को एक झुरझुराती सी महसूस हुई. "बिलाल... धीरे... चुभ रहा है."

तभी ज़ोया किचन के दरवाज़े पर आ खरी हुई. "अम्मी, लाइए मैं लगा देती हूँ. भैया थके हुए आये हैं, उन्हें फ्रेश होने दें." ज़ोया ने बिलाल के हाथ से गजरे लपक लिए. बिलाल वहां से ख़ामोशी से निकल गया, मगर उसने महसूस किया के ज़ोया ने उसे घूरा है.

कराची में ये नया खेल अब डर और शक की शकल इख़्तियार कर रहा था. बिलाल अपने कमरे में जा कर बीएड पर गिर गया. उसने अपने हाथों को सूंघा... उनमें अब भी अम्मी की गर्दन और गाजरों की mili-juli महक बाकि थी.

सन 2: लाहौर — सुबह का सफर और कोचिंग के Mas'saley

लाहौर की सुबह मॉडल टाउन में हमेशा की तरह bhagam-bhag वाली थी. नाश्ते के बाद रशीद साहब और उस्मान ऑफिस के लिए तैयार थे. उस्मान अपनी बाइक की चाबी उठा रहा था जब आयेशा, जो आज काफी खुश और रिलैक्स्ड नज़र आ रही थी, सीढ़ियों से नीचे आरही थी.

"अब्बू... अगर आप बुरा न मानें तोह क्या आज आप मुझे कॉलेज ड्राप कर सकते हैं? रस्ते में मुझे आपसे कुछ बात भी करनी थी," आयेशा ने निहायत ऐतमाद (कॉन्फिडेंस) के साथ पूछा. उसके चेहरे पर अब वो कल वाला डर नहीं था.

उस्मान ने हैरत से देखा. "अरे आयेशा, मैं तोह ड्राप कर hi देता हूँ रोज़?"

"नहीं भाई, आज अब्बू के साथ जाना है," आयेशा ने मुस्कुराते हुए कहा. रशीद साहब ने एक नज़र आयेशा के pur-sakoon चेहरे पर डाली और उनके लबों पर एक गहरी मुस्कराहट आ गयी. उन्हें समझ आ गया के उनकी "स्पेशल क्लास" ने बेटी का डर ख़तम कर दिया है.

"ठीक है उस्मान, तुम निकलो. मैं आयेशा को छोड़ते हुए ऑफिस चला जाऊंगा," रशीद साहब ने कहा और दोनों कार की तरफ बढ़ गए.

कार जैसे hi हवेली से बहार निकली और लाहौर की ठंडी सड़कों पर दौड़ने लगी, रशीद साहब ने एक हाथ स्टीयरिंग पर रखा और दूसरा हाथ धीरे से आयेशा की हथेली पर. "आज तोह मेरी बेटी बहुत खुश लग रही है. लगता है साड़ी थकन उतर गयी है?" रशीद साहब ने शरारत से पूछा.

आयेशा थोड़ा सा मुस्कुरायी और उनका हाथ कास के पकड़ लिया. "जी अब्बू... आपने कल जिस तरह मुझे समझाया, मुझे एहसास हुआ के मैं खामखा डर रही थी. आपका वो... वो 'प्यार' करने का तरीक़ा... मुझे ाचा लगा." उसने नज़रें झुका कर कहा, मगर उसकी आवाज़ में अब थोड़ी शर्म के साथ साथ प्यार और कॉन्फिडेंस भी झलक रहा था.

"अभी तोह बहुत कुछ सीखना बाकी है आयेशा. बस हम पर और खुद पर भरोसा रखना," रशीद साहब ने रस्ते में एक अछि बेकरी पर गाड़ी रोकी और आयेशा को उसके पसंदीदा कपकेक्स दिलवाये. ये एक बाप का अपनी बेटी के लिए नार्मल प्यार था, मगर इसके पीछे वो "घर की आग" थी जो दोनों महसूस कर रहे थे.

आयेशा को कॉलेज ड्राप करने के बाद, रशीद साहब अपने ऑफिस पहुंचे. वहां मामूलात बिलकुल नार्मल थे. मुंशी जी ने पुराने रेंट एकाउंट्स पेश किये, कुछ नए प्लॉट्स की फाइल्स आयीं. रशीद साहब ने दो घंटे सकूं से पेपरवर्क किया, फ़ोन पर कुछ क्लाइंट्स से बात की और शहर के प्रॉपर्टी रेट का जायज़ा लिया. बहार की दुनिया में वो वही पुराने, roab-daar रशीद साहब थे.

दोपहर को हमजा अपनी कोचिंग सेण्टर पहुंचा. लाहौर के गुलबर्ग एरिया में ये एक मशहूर अकादमी थी. आज हमजा का दिमाग किताबों में काम और सीमा बजी और हिरा के ख्यालों में ज़्यादा था.

फिजिक्स का लेक्चर चल रहा था. मिस किरण तारिक़, जो एक काफी rob-daar और हसीं खातून थीं, बोर्ड पर डेरीवाशंस समझा रही थीं. उनका बीटा, अर्सलान, जो हमजा का class-mate भी था, आगे वाली सीट पर बैठा ध्यान से सुन रहा था.

"हमजा! मैं कब से पूछ रही हूँ, 'Ohm's लॉ' की लिमिट क्या है? तुम कहाँ खोये हुए हो?" मिस किरण की सख्त आवाज़ ने हमजा को होश में लाया.





"यह... सॉरी मिस, वो... थोड़ा ध्यान भटक गया था," हमजा ने हड़बड़ा कर कहा.





मिस किरण ने चश्मा उतरा और हमजा के पास आयीं. "हमजा, तुम्हारे गरदेस पिछले कुछ हफ़्तों से गिर रहे हैं. अगर पढ़ने में दिल नहीं लग रहा तोह घर बैठो. कल मुझे तुम्हारे पेरेंट्स से बात करनी पड़ेगी."





हमजा ने नज़रें झुका लीं. लेक्चर ख़तम होने के बाद, जब सब बहार निकले, तोह अर्सलान और उसके दोस्तों ने हमजा को घेर लिया.

"ोये हमजा! क्या चक्कर है भाई? आज कल तू दुन्या से काट गया है. क्या किसी लाहौर की हसीना ने दिल पर कब्ज़ा कर लिया है?" अर्सलान ने मज़ाक़ उड़ाते हुए पूछा.

"नहीं यार, ऐसी कोई बात नहीं. बस घर के कुछ मसले हैं," हमजा ने बात टालने की कोशिश की.

"घर के मसले या घर के अंदर कोई 'माइड' मिल गयी है?" एक और दोस्त ने छेड़ा. "हमें तोह लगता है हमजा भाई किसी बड़े शिकार के चक्कर में हैं, तभी तोह पढाई से कंसंट्रेशन गायब है."

हमजा ने एक झूटी हंसी हसी. उसने अर्सलान की तरफ देखा, जो अपनी अम्मी (मिस किरण) का बैग लेकर उनकी कार की तरफ जा रहा था. हमजा ने सोचा, "अगर मिस किरण को पता चल जाये के मैं घर में क्या कर रहा हूँ, तोह शायद वो डांटने की जगह मुझे कुछ और hi सिखाएं." मगर उसने खुद को कण्ट्रोल में रखा और ख़ामोशी से अपनी बाइक स्टार्ट करके घर की तरफ निकल गया.

सन 3: हवेली की छत — हिरा का शिकार और रशीद की नज़र

हवेली के अंदर दोपहर 4:00 पं के क़रीब सन्नाटा था. आयेशा कॉलेज से वापिस आकर अपने कमरे में सो रही थी. नसीम अपनी बड़ी बेटी सीमा के साथ किचन में किसी काम में मसरूफ थी.

हिरा छत पर कपडे सूखने गयी थी. उसने एक निहायत बारीक़ और ढीली क़मीज़ पहनी थी जहाँ से उसके निप्पल्स का उभार साफ़ नज़र आ रहा था., और गर्मी की वजह से उसने अपनी सलवार को घुटनो तक ऊपर चढ़ाया हुआ था. उसके गोर और चिकने पाऊँ धुप में चमक रहे थे.

उसी वक़्त रशीद साहब ऑफिस से घर लौटे. उनका मूड आज काफी 'business-like' था मगर जिस्म में वही नयी भूक थी. उन्होंने देखा के हिरा छत पर कपडे सूखा रही है.

रशीद साहब dhere-dhere ऊपर आये. उन्होंने देखा के हिरा jann-boojh कर jhuk-jhuk कर कपडे पहला रही है, जैसे उसे पता हो के इधर से कोई उसे देख रहा है.

"हिरा... बेटी, इतनी धुप में क्यों कड़ी हो?" रशीद साहब उसके क़रीब आये. उन्होंने देखा के हिरा के चेहरे पर पसीने की बूँदें हैं. उन्होंने अपने रुमाल से धीरे से उसका माथा साफ़ किया.

हिरा को थोड़ा अजीब लगा मगर नसीम ने उसे पहले hi "ट्रैन" किया हुआ था, वो उन्हें देख कर मुस्कुरायी. "अब्बू... काम भी तोह देखना है. वैसे भी, घर की बेटियां अगर काम नहीं करेंगी तोह अम्मी थक जाएँगी." उसने अपनी क़मीज़ को थोड़ा ठीक किया, मगर इस तरह के उसके उभार और ज़्यादा नुमाया हो गए.

रशीद साहब ने उसके कंधे पर हाथ रखा. "हिरा, तू आयेशा की तरह डरपोक नहीं है. मैंने देखा है, तू काफी होशियार है."

हिरा ने अपनी आंखें नचा कर पूछा, "होशियार? या थोड़ी बेशरम?" उसने एक ऐडा से रशीद साहब की तरफ देखा. "अब्बू, मुझे पता है आपकी नज़रें कहाँ हैं. आप आयेशा बजी के साथ तोह बहुत 'रोमांटिक' हो गए थे, मगर मेरे साथ...?"

रशीद साहब हैरत से हसने लगे. "अरे वाह! तू तोह बड़ी तीखी निकली. ाचा... तोह तू क्या चाहती है? मैं तुझे भी 'स्पेशल तालीम' दूँ?"

हिरा ने अपना हाथ रशीद साहब के सीने पर रखा और धीरे से ऊँगली फेरी. "अब्बू, मैं इतनी जल्दी 'बुद्धों' के हवाले नहीं होने वाली. पहले मुझे मानना पड़ेगा... मेहेंगे तोहफे, शॉपिंग और थोड़ी सी 'आज़ादी'. फिर शायद मैं आपके कमरे का रास्ता देखूं."

रशीद साहब ने हिरा की कमर को धीरे से थपथपाया. "ज़रूर बेटी. जो तू कहेगी वही होगा. मगर याद रख, मेरा लुंड अभी भी जवान है, तेरी ये जवानी उसे ज़्यादा देर इंतज़ार नहीं करवा सकती."

हिरा ने एक झटके से अपना जिस्म छुड़ाया और हस्ते हुए निचे भाग गयी. रशीद साहब वहीँ खड़े रहे, उनकी सांसें भरी थीं. उन्हें पता था के हिरा काफी 'high-maintenance' शिकार है, मगर उसका नशा आयेशा से भी ज़्यादा तीखा होगा.

सन 4: कराची का कनफ्लिक्ट — बिलाल और शमीम का टकराओ

शाम को बिलाल अपने कमरे से निकला तोह माहौल थोड़ा टेंशन वाला था. ज़ोया ने शायद अम्मी को गजरे वाली बात पर कुछ समझाया था. शमीम अम्मी थोड़ी खामोश थीं.

बिलाल खाने की टेबल पर बैठा था जब शमीम अम्मी ने सालन डाला. उन्होंने आज दुपट्टा अछि तरह ओढ़ा हुआ था.

"बिलाल, बीटा... समीर का फ़ोन आया था. वो कह रहा था तुम क्लब से जल्दी निकल आये?" शमीम ने पूछा.

"जी अम्मी... वहां दिल नहीं लग रहा था," बिलाल ने कहा.

"क्यों? वहां तोह बहुत रौनक होती है न?" फराह ने बीच में टक्का. "या फिर भैया को अब घर की रौनक ज़्यादा पसंद आने लगी है?"

बिलाल ने फराह को घूरा. "फराह, अपनी हद्द में रहो."

"हद्द की बात तोह आप न hi करें तोह बेहतर है," फराह ने धीरे से कहा जो सिर्फ बिलाल को सुनाई दिया.

खाने के बाद, जब उनकी अम्मी बर्तन धो रही थीं, बिलाल किचन में गया. "अम्मी... गजरे कहाँ हैं? आपने पहने नहीं?"

शमीम ने हिचकिचा ते हुए कहा, उनकी आँखों में थोड़ी नाराज़ी और थोड़ा गिल्ट था. "बीटा... ज़ोया कह रही थी के इस उम्र में ये सब ाचा नहीं लगता. पडोसी क्या कहेंगे."

"अम्मी, क्या हुआ? आप परीक्षण क्यों हैं?" बिलाल ने उनके क़रीब जा कर पूछा.

शमीम ने मुद कर देखा, उनकी आँखों में डर था. "बिलाल... वो..... असल में...... ज़ोया अजीब बातें कर रही है. वह कह रही है के तुम्हारा मुझसे 'अटैचमेंट' थोड़ा ज़्यादा हो गया है. बीटा... लोग... लोग... क्या कहेंगे?"

बिलाल ने धीरे से अम्मी का हाथ पकड़ लिया. "अम्मी... लोग तोह कुछ न कुछ कहेंगे hi. क्या एक बीटा अपनी माँ से मोहब्बत नहीं कर सकता? मैंने तोह सिर्फ गजरे लाये थे."

"मगर बिलाल... तुम जिस तरह मुझे देखते हो... मुझे डर लगता है," शमीम ने धीरे से कहा, मगर उन्होंने अपना हाथ पीछे नहीं खिंचा.

"अम्मी... आप हसीं हैं. इसमें मेरा क्या कसूर?" बिलाल ने धीरे से उनकी हथेली को चूमा. "अम्मी... पडोसी थोड़ी न हमारे रिश्ते को जानते हैं. आप मेरे लिए हमेशा वही मोहतरम रहेंगी."

शमीम बनु thar-thara गयीं. "बिलाल... ये... ये तुम क्या कर रहे हो? छोडो मुझे... कोई देख लेगा." डर और हैरत उनके चेहरे पर थे.

तभी ज़ोया वहां से गुज़री और उन्हें देख कर रुक गयी. "अम्मी...! और कितनी है, मेरे बालो में तेल लगा दीजिये... मुझे सोने में देर हो रही है." ज़ोया की आवाज़ एक तलवार की तरह थी.

बिलाल ने अम्मी का हाथ छोड़ा और बहार निकल गया. कराची में हवस अब अपनी जगह बना रही थी.

शमीम को एहसास हो रहा था के उनका बीटा उन्हें एक मर्द की नज़र से देख रहा है, और हैरत की बात ये थी के उन्हें इसमें एक an-jaana नशा महसूस हो रहा था. वो रात भर आईने में अपने आप को देखती रहीं, ये सोचते हुए के क्या वाक़ई वो इतनी हसीं हैं के उनका बीटा उन पर फ़िदा हो जाये?

Episode 30 ख़तम

क्लिफहैंगर: कराची में बिलाल और शमीम के बीच की खामोश 'शर्म' अब टूटने के क़रीब है, मगर ज़ोया एक दीवार बन कर कड़ी है. लाहौर में, रशीद साहब ने हिरा की 'शर्तें' मान ली हैं, मगर हमजा ने रात को हिरा के लिए कुछ अलग hi प्लान किया है. क्या आज रात हिरा को 'अब्बू' हैंडल करेंगे या 'हमजा'?



 
थे बिग्गेस्त Episode ऑफ़ थिस story(till नाउ) इस अंडर प्रेप.... स्टे तुनेड गाइस..... It's वैरी 🔥 🔥 🔥 🔥 🔥

Wed/Thursday को मिलेगा नया Episode.
 
घर की आग

Episode 31: जवान ख्वाहिशें और नसीम की शरारत.

सन 1: कराची — ज़ोया का हमला और बिलाल की सफाई

रात के सन्नाटे में कराची की नमकीन हवा बिलाल के कमरे की खिड़कियों से टकरा रही थी. बिलाल अपने बिस्टेर पर लेता वही पुराण मंज़र सोच रहा था जब उसने शमीम (अम्मी) का हाथ चूमा था. तभी ज़ोया ने दाखिल होकर माहौल गरम कर दिया.

"भैया, ये बेशर्मी कब तक चलेगी?" ज़ोया की आवाज़ सपाट थी मगर उसमे कड़वाहट बहोत थी.

बिलाल हड़बड़ा कर उठा. "ज़ोया? इतनी रात को यहाँ क्या कर रही हो?"

"वही करने आयी हूँ जो आप भूल चुके hain—aapko आइना दिखने. भैया, फराह ने मुझे सब बता दिया है. वो रात को अम्मी के कमरे वाला किस्सा, और आज किचन में जो मैंने अपनी आँखों से देखा... क्या आपकी मर्दानगी ख़तम होरही है जो अपनी सगी माँ पर डोरे दाल रहे हो?" ज़ोया ने बिलकुल सामने खड़े होकर उसकी आँखों में देखा.





बिलाल ने पहले तोह डर दिखाया, मगर फिर उसने अपने आप को संभाला. उसे पता था के ज़ोया को ठंडा करना ज़रूरी है. "ज़ोया, बात वो नहीं है जो तुम समझ रही हो. अम्मी कितने सालों से अकेली हैं? क्या उन्हें किसी के साथ की ज़रुरत नहीं? मैं तोह बस उनका अकेलापन दूर करना चहरहा हूँ."

"उनका अकेलापन या अपनी हवस?" ज़ोया ने तंज़ किया. "देखिये भैया, अगर कल तक आपने ये हरकतें बंद नहीं कीं, तोह मैं सुबह पहला फ़ोन खलु (रशीद साहब) को करुँगी. फिर लाहौर से जो आंधी आएगी, वो आप बर्दाश्त नहीं कर पाएंगे."

ज़ोया की ये धमकी बिलाल के लिए खतरनाक थी, मगर उसने महसूस किया के ज़ोया सिर्फ बोल रही है, उसकी आँखों में थोड़ी सी हैरत भी थी के उसका भाई इतनी हिम्मत कैसे कर गया. ज़ोया के निकलने के बाद बिलाल ने गहरी सांस li—wo जनता था के अब उसे अपनी अम्मी को जल्दी 'फ़तेह' करना होगा इससे पहले के ज़ोया कोई बड़ा क़दम उठाये.

सन 2: लाहौर — हिरा की जवान ख्वाहिश और हमजा की नाकाम कोशिश

हवेली में रशीद साहब अपने कमरे में thake-hare सो चुके थे, मगर ऊपर हमजा के कमरे में माहौल काफी गरम था. हिरा वही ब्लैक लास वाली अंडरवियर हाथ में लिए बीएड पर बैठी थी.

"हमजा... ये तोह बहुत hi 'रंडी' किस्म की चीज़ लाया है तू," हिरा ने शरारत से कहा और अपनी क़मीज़ उतार कर साइड पर फ़ेंक दी.





उसके gore-chitte कमसिन मम्मी अँधेरे में चमक रहे थे.

हमजा ने हिरा की कमर में हाथ डाला और उसे अपने क़रीब खिंचा. "बजी, आप पर ये बहुत जचेगी. वैसे अब्बू ने आज छत पर आपको घेर hi लिया था न? क्या इरादा है उनका?"

हिरा ने ठंडी सांस भरी. "अब्बू... वो तोह आयेशा के बाद अब मुझ पर hi टाक लगाए बैठे हैं. उन्हें लगता है के मैं उनकी बातों में आ जाउंगी. मगर हमजा... तुझे सच बताऊँ? मेरा दिल नहीं करता किसी बुड्ढे लुंड से अपनी सील तुड़वाने का. मेरी ख्वाहिश है के कोई जवान लुंड, जो लोहे की तरह सख्त हो, वो मेरी पहली चुदाई का मज़ा दे." उसने हमजा की आँखों में देखा और धीरे से उसकी शलवार के ऊपर से उसके तने हुए लुंड पर हाथ रखा.





हमजा का लुंड झटके मारने लगा. "बजी... तोह फिर देर किस बात की? मैं कब से तैयार खड़ा हूँ."

हमजा ने हिरा को बिस्टेर पर लिटा दिया और उसकी सलवार निचे खिंच दी. हिरा की गोरी और नंगी छूट देख कर हमजा की सांसें भरी हो गयीं. उसने अपना लुंड निकाला और हिरा की छूट के लबों पर रगड़ना शुरू किया.





"अह्ह्ह... हमजा... मज़ा आ रहा है... और रगड़," हिरा सिसकारियां लेने लगी.





हमजा ने जब अंदर घुसने की कोशिश की तोह हिरा ने उसके कंधे पकड़ कर उसे रोक दिया.





"नहीं हमजा! अंदर नहीं... अभी अम्मी ने इसकी इजाज़त नहीं दी.





उन्होंने कहा है जब तक अब्बू का 'मसला' हल नहीं होता, तब तक मैं अपनी सील नहीं तुड़वा सकती. बाकी तू जो चाहे कर ले."

हमजा ने अपना रुख बदला और हिरा की टांगें कन्धों पर रख कर उसकी छूट पर अपनी ज़बान रख दी.





हिरा ने बीएड की चादर मुट्ठी में भन्छ ली.





"ोये... हमजा... भेनचोद... क्या चाट रहा है... उफ़!"

हिरा ने हमजा का सर्र पकड़ कर अपनी छूट में धंसा दिया.





हमजा ने jee-jaan लगा कर उसकी छूट का पानी निकाला. हिरा का जिस्म झटके लेने लगा और वो फ़ारिग़ हो गयी.





फिर उसने हमजा को लिटा दिया और उसका लुंड अपने मुँह में ले लिया.





वो इतनी शिदत से चूस रही थी जैसे वो साड़ी भूक आज hi मिटा देगी.





हमजा ने उसके बाल पकडे और आखरी धक्के मारे.





हमजा का गरम मादा हिरा के मुँह और चेहरे पर बिखर्र गया.





हिरा ने उसे chat-te हुए हमजा को देखा और मुस्कुरायी. "ये नशा अब्बू में कहाँ..."





सन 3: मार्किट — मरदाना ताक़त की फ़िक्र और उस्मान का इंतज़ार

अगली दोपहर, सीमा और नसीम मार्किट में शॉपिंग ख़तम करके एक ठन्डे जूस कार्नर पर बैठी थीं. वो उस्मान का इंतज़ार कर रही थीं जो उन्हें लेने आने वाला था.

"अम्मी, आपको कल रात का पता है? हमजा आज कल हिरा के साथ बहुत वक़्त गुज़र रहा है," सीमा ने जूस का सिप लेते हुए कहा.

नसीम ने पर्दा ठीक किया और धीरे से बोली, "सीमा बेटी, घर की आग घर में रहे तोह hi ठीक रहता है. मगर मेरी फ़िक्र कुछ और है. आज कल हमारे घर के मर्दों का 'पानी' बहुत निकल रहा है. रशीद साहब हो, हमजा हो या उस्मान... सब काम में लगे हैं. इन्हे कमज़ोरी से बचाना हमारी ज़िम्मेदारी है."

सीमा हैरत से देखने लगी. "तोह आपने क्या सोचा है?"

"मैंने 'शाही माजून' और कुछ देसी नुस्खे सोचे हैं. बादाम का दूध और असली घी की खुराक बढ़ानी होगी. मरदाना ताक़त बरक़रार रहेगी तोह hi तोह हम औरतों को सुकून मिलेगा न?" नसीम ने बेशर्मी से मुस्कुरा कर कहा. "वैसे भी, उस्मान आज कल काफी गरम रहता है. उसे तोह थोड़ा ज़्यादा 'ख्याल' रखने की ज़रुरत है."

तभी उस्मान अपनी कार लेकर वहां पहुंचा. उसने ने कार जूस कार्नर के बिलकुल सामने रोकी. वो काफी थका हुआ लग रहा था मगर जैसे hi उसने नसीम और सीमा को देखा, उसकी रगों में खून की गर्दिश तेज़ हो गयी. नसीम ने आज निहायत hi बारीक़ दुपट्टा ओढ़ा था जो उनके भरे हुए बदन को छुपाने में नाकाम था.





"Asalam-o-alaikum अम्मी, बजी... चलिए बोहोत देर हो गयी है," उस्मान ने दरवाज़ा खोलते हुए कहा.

नसीम उठीं और अपनी क़मीज़ को थोड़ा झटक दिया, जिससे उनका भरा हुआ सीना थोड़ा उछला. उन्होंने सीमा की तरफ देख कर आंख मरी. "सीमा बेटी, आज तू गाड़ी चला. मैं उस्मान के साथ पीछे बेठुंगी, इस बेचारे से थोड़ी 'ज़रूरी' बातें करनी हैं."

उस्मान थोड़ा हिचकिचाया. "अम्मी... पीछे क्यों? आप आगे बैठें न, सीमा बजी को थकन होगी."

"ोये खबीस! जो कह रही हूँ वही कर न," नसीम ने हलकी सी गाली देते हुए उस्मान को घूरा. "तुझे क्या लग रहा है, मैं तुझे खा जाउंगी? Chup-chap पीछे बेथ."

उस्मान ने डर कर सीमा की तरफ देखा, मगर सीमा ने सिर्फ एक शरारती मुस्कराहट दी और ड्राइविंग सीट पर बैठ गयी. नसीम ने पीछे बैठते hi दरवाज़ा बंद किया और सेंट्रल लॉकिंग की 'टिक' की आवाज़ आयी.

सन 4: कार में शरारत और हवेली में चुदाई

कार लाहौर की मसरूफ सड़कों पर निकल चुकी थी. सीमा काफी मज़े से गाड़ी चला रही थी, मगर उसकी नज़र baar-bar पीछे वाले आईने (rear-view मिरर) पर जा रही थी.





नसीम ने उस्मान का हाथ कास के पकड़ लिया और उसे अपनी नरम राण पर रख दिया. "उस्मान... तेरी हथेलियां इतनी ठंडी क्यों हैं? क्या मार्किट में कोई 'नयी छोरी' देख ली जो डर गया?"

"नहीं अम्मी... वो... रस्ते में इतने लोग हैं, कोई देख लेगा... आप प्लीज हाथ हटाइये," उस्मान ने दबी आवाज़ में कहा और बहार खिरकी की तरफ देखने लगा.

"देख इस haram-zade को!" नसीम ने ज़ोर से उस्मान का कण खेंचा और उसे अपने चेहरे के क़रीब किया. "लोगों की फ़िक्र है तुझे? जब किचन में मेरे पीछे खड़ा हो कर मेरा जिस्म देख रहा था तब तोह कुछ ख्याल नहीं आया? तब तोह बड़ा मर्द बन रहा था."

सीमा ने आईने में देख कर मज़ाक़ उदय. "अम्मी, लगता है उस्मान सिर्फ बातों का शेर है. असल में तोह ये बेचारा अभी 'बचा' hi है."

"बचा?" नसीम ने उस्मान की पंत के ऊपर से hi उसके dhere-dhere तानते हुए लुंड को मुट्ठी में दबोचा. "ये बचा है? देख सीमा, ये तोह अभी से मेरा हाथ तोड़ने पर तुला हुआ है."





उस्मान ने ज़ोर से सिसकारी ली. "अह्ह्ह... अम्मी... बजी देख रही हैं... प्लीज... उफ़... और कोई रस्ते से भी देख सकता है."

सीमा ने आईने में देख कर कहा, "फ़िक्र मत कर उस्मान, मैं रस्ते पर ध्यान दे रही हूँ. तू अम्मी की 'बात' सुन्न."

"हाँ देखने दे सीमा को.... क्या फ़र्क़ पड़ता है, तुम दोनों ने hi तोह ये सब शुरू किया है! और पर्दा तोह लगा hi हुआ है गाड़ी में," नसीम ने उस्मान के कान पर दांतो से हल्का सा काटा. "और सुन्न, अगर तूने आज मुझे खुश नहीं किया न, तोह तेरी ऐसी 'खबर' लुंगी के तू बाइक चलने के क़ाबिल नहीं रहेगा. सीमा, ज़रा गाड़ी को सुनसान रस्ते से ले... मैं इसका डर थोड़ा दूर कर दूँ."

सीमा ने गाड़ी को एक साइड वाली गली में डाला जहाँ थोड़ा सन्नाटा भी था और पेड़ों की छाओं भी थी. नसीम ने बिना किसी शर्म के उस्मान की पंत की चैन खोली.





"अम्मी! नहीं... रुकिए... ये यहाँ सही नहीं है,..... रुकिए न.." उस्मान ने उनका हाथ रोकने की कोशिश की.

"अब मुझे सही ग़लत मत सीखा! चुप कर के बैठा रह," नसीम ने एक हलकी झिड़की दी और उसका 8-इंच का सरिया बहार निकाल लिया. "उफ़... कितना गरम है ये... बिलकुल अपने बाप (रशीद) पर गया है. देख सीमा, इसकी टॉप तोह बिलकुल सुर्ख हो रही है."





add image description





सीमा ने स्टीयरिंग छोड़ कर एक पल के लिए पीछे देखा. "वाह अम्मी... उस्मान तोह वाक़ई तैयार लग रहा है, बस इसे तोह थोड़ा केयर और प्यार चाहिए."





नसीम ने वही कार में झुक कर उस्मान के लुंड को अपने मुँह में भर लिया. उस्मान ने अपना सर्र सीट की पुष्ट पर दे मारा. "ओह्ह्ह... अम्मी... उफ़... भेनचोद... क्या कर रही हैं... अह्ह्ह... मैं... मैं फ़ारिग़ हो जाऊंगा."

"फ़ारिग़ हुआ तोह तेरी खाल उधर दूंगी!"









नसीम ने लुंड मुँह से निकाल कर धमकी दी. "ये सारा माल घर के लिए बचा के रख, मुझे घर जा कर अपनी ये छूट में चाहिए, अभी सिर्फ नशा कर." नसीम ने उसकी आँखों में देख कर कहा, और फिर से तेज़ी से चेतना शुरू किया.





उस्मान का डर अब पूरी तरह हवस में बदल चूका था. उसने नसीम के बाल पकडे और उनका मुँह अपने लुंड पर दबाने लगा. "हाँ... अम्मी... ऐसे hi... उफ़... आपकी ज़बान... ओह्ह्ह..."





नसीम उसे गरम करती रहीं मगर जैसे hi वो फ़ारिग़ होने वाला होता, वो रुक जतिन.

सीमा ने कार की रफ़्तार बढ़ा दी. "बस 5 मिनट अम्मी, घर पहुँचने वाले हैं. फिर आप दोनों का घमासान शुरू करना."

नसीम ने उस्मान की आँखों में देखा, उनके होठों पर उस्मान की मर्दानगी की नमी चमक रही थी. "उस्मान... आज तू देखना के तेरी ये 'अम्मी' तुझे जन्नत कैसे दिखती है. आज से तू सीमा को भी भूल जायेगा."

घर पहुँचते hi, नसीम ने उस्मान को कार से ऐसे खिंचा जैसे कोई शिकारी अपने शिकार को ले जाता है. घर पहुंचते hi उस्मान का डर और झिजक दोनों ग़ायब होगये, बल्कि अब उसकी आँखों में वो आग थी जो नसीम को चीरने के लिए काफी थी.

कार से निकलते hi नसीम ने उस्मान का हाथ इतनी ज़ोर से पकड़ा के उसकी उँगलियाँ उस्मान के गोश्त में धस गयीं. सीमा ने एक शरारती मुस्कराहट के साथ उन्हें देखा और धीरे से बोली, "अम्मी, ज़रा ध्यान से... कहीं उस्मान बेचारा आज hi न ढेर हो जाये."

नसीम ने मुद कर सीमा को देखा, उनकी आँखों में हवस की सुर्खी थी. "तू फ़िक्र मत कर सीमा, इसने जो गर्मी कार में दिखाई है, वो अभी निकलना ज़रूरी है. तू बहार ध्यान रखना."

नसीम उस्मान को खींचते हुए अपने कमरे में ले गयीं और अंदर से बंद तोह किया लेकिन लॉक नहीं लगाया. कमरे में एक चल रहा था मगर दोनों के जिस्म तप रहे थे.

"उस्मान... अब दिखा मुझे वो मर्दानगी जिसके बारे में तू किचन में बड़े दवा (क्लेम्स) कर रहा था," नसीम ने अपने दुपट्टा उतार कर फेंका और अपनी क़मीज़ के बटन खोलने लगीं.





उस्मान ने उन्हें देखा तोह उसकी सांसें रुक गयीं. नसीम ने ब्रा नहीं पहनी थी. उनके भरी हुई दूध जैसी सफ़ेद चटियन और उन पर bade-bade भूरे (ब्राउन) निप्पल्स देख कर उस्मान का लुंड शलवार फाड़ने पर मजबूर हो गया.

"अम्मी... आप... आप तोह किसी जवान लड़की से भी ज़्यादा गरम हैं," उस्मान ने धीरे से उनके मम्मों को अपने हाथों में भरा और एक एक करके बेरहमी से चूसने और दबाने लगा.





"Uh...mmmm aahhhh....sssss......haaa, सिर्फ गरम नहीं उस्मान... मैं बहुत भूकी भी हूँ. आज मुझे अपने 'बेटे' का वो सरिया (रोड) चाहिए जो मुझे मेरी जवानी याद दिला दे," नसीम ने उस्मान की पंत निचे खींची और उसका 8-इंच का कला और तनय हुआ लुंड बहार निकल आया.





नसीम ने बिना देर किये बिस्टेर पर लेट कर अपनी टांगें पूरी तरह फैला दीं. उनकी छूट के बाल काफी सफाये से कतरे हुए थे मगर वो पानी से बिलकुल गीली हो चुकी थी. "पहले इसे साफ़ कर उस्मान... अपनी ज़बान से इसका नशा चख."

उस्मान ने नसीम की रानों के बीच अपना सर्र रख दिया. उसने पहले उनकी छूट के लबों को सहलाया और फिर अपनी ज़बान सीधा उनके 'दाने' (क्लाइटोरिस) पर रख दी.





"अह्ह्ह... उफ़... उस्मान... भेनचोद... कितनी गर्मी है तेरी ज़बान में!" नसीम बीएड की चादर को मुट्ठी में भन्छ कर चीखीं. "हाँ... वही... वही चाट... पूरा अंदर तक... मेरा सारा पानी निकल दे आज!"

उस्मान ने काफी देर तक नसीम की छूट को छठा और चूसा, यहाँ तक के नसीम का जिस्म झटके लेने लगा और उनकी छूट ने पहला 'फव्वारा' छोड़ा. नसीम ने उस्मान का सर्र पकड़ कर अपने चेहरे के क़रीब किया.





"अब बहुत हो गया... अब मुझे चीयर दे उस्मान! वो लोहा अंदर दाल और दिखा के रशीद साहब का खून कितना गरम है!"

नसीम का 52 साल की उम्र में भी गोरा और भरा हुआ जिस्म और उसकी छूट की गर्मी देख कर उस्मान पागल हो गया. उसने नसीम को उठाकर दीवार से लगाया और उनकी एक तंग हवा में उठा कर अपना लोहे जैसा लुंड उनकी गीली छूट में ठूंस दिया. "अह्ह्ह! उस्मान... मार... मार अपनी इस हसीं अम्मी को!" नसीम चीखी.





उस्मान ने हैवानियत से धक्के मारना शुरू किये. नसीम की भरी हुई गांड दीवार से टकरा रही थी. 'Phat-phat-phat' की आवाज़ पूरे कमरे में गूँज रही थी. उस्मान ने नसीम के निप्पल्स को अपने दांतो से काटा और उनकी छूट को फॉर कर रख दिया. नसीम ने इतनी शिदत से आज तक रशीद साहब से भी नहीं लिया था. कुछ hi देर में उसकी हिम्मत जवाब देने लगी.

"उस्मान, ऐसे मैं ज़्यादा देर नहीं रुक सकती" नसीम ने दर्द और तड़प से कहा.

उस्मान ने नसीम को घोरी (डोगग्य स्टाइल) बनने का इशारा किया. नसीम ने अपनी भरी हुई गांड ऊपर उठायी. उस्मान ने अपने लुंड पर थोड़ा थूक लगाया और उनकी गीली छूट के दरवाज़े पर रखा. एक zor-dar झटके के साथ उसने पूरा लुंड दोबारा अंदर ठूंस दिया.





"ोोूईएएए... माँ रीई!" नसीम की चीख निकल गयी. "खा गया... पूरा खा गया भेनचोद... कितना मोटा है तेरा!"

उस्मान ने उनकी कमर पकड़ी और 'Phat-Phat-Phat' धक्के मारना शुरू किये.





"कैसा लग रहा है अम्मी? अब्बू तोह इतना अंदर नहीं जाते होंगे न?" उस्मान ने धक्के मारते हुए कान में सरगोशी की.

"ऐसी बात अह्ह्ह.... नहीं है, जवानी में उफ़... wo.....ahhhh.... wo.....uff... वो भी काम नहीं थे, अह्ह्ह... लेकिन उनको इतने तरीके नहीं आते थे..... तू तोह मेरी bacha-daani को छू रहा है... अह्ह्ह... मार... और ज़ोर से मार अपने इस कुटिया को!"





नसीम बेशर्मी की साड़ी हदें पार कर चुकी थीं.

उस्मान ने फिर एंगल बदला. उसने नसीम को बिस्टेर के किनारे पर लिटाया और उनकी दोनों टांगें अपने कन्धों पर रख लीं (मिशनरी विथ डीप पेनेट्रेशन). इस एंगल में उसका लुंड और भी गहरा जा रहा था.





"उस्मान... तेरे लुंड की राजन... मुझे अंदर महसूस हो रही हैं... अह्ह्ह... मैं फिर फ़ारिग़ होने वाली हूँ... मेरा पानी... मेरा सारा पानी तेरे लुंड पर गिरने वाला है!"

"गिरने दें अम्मी... आज इस कमरे में सिर्फ आपका पानी और मेरा garma-garam माल होगा," उस्मान ने अपनी रफ़्तार और बढ़ा दी.





नसीम की आँखें ऊपर चढ़ गयीं, उनका बदन thar-thara रहा था. उस्मान ने उन्हें कास के पकड़ा और आखरी 10-12 हैवानी धक्के मारे.





नसीम ने ज़ोर से उस्मान को अपने जिस्म से चिपकाया और उनकी छूट ने पानी छोड़ा, ठीक उसी वक़्त उस्मान ने अपना गरम लावा नसीम की bacha-daani में उलट दिया.





दोनों काफी देर तक एक दूसरे से लिपटे रहे, भांपते हुए. नसीम ने उस्मान के माथे का पसीना साफ़ किया और उसके होठों पर एक लम्बा बोसा (किश) दिया.

"आज तूने मुझे वाक़ई 'माँ' बना दिया उस्मान... उस सुख का जो मुझे बरसों से नहीं मिला था."





नसीम ने उसे कास के पकड़ लिया और दोनों बिस्टेर पर ढेर हो गए.

Episode 31 ख़तम

क्लिफहैंगर: कराची में ज़ोया की धमकी बिलाल को क्या करने पर मजबूर करेगी? बिलाल की मुश्किल में उसका साथ कौन देने वाला है? और लाहौर में, नसीम और उस्मान की ये 'कार वाली मस्ती' हवेली में क्या रंग लाएगी? मिस किरण की दांत का हमजा पर क्या असर पड़ेगा?
 
ी ऍम वैरी डिसअप्पोइंटेड गाइस, ी ऍम वैरी डिसअप्पोइंटेड विथ यू आल.

Episode पोस्ट करने में मुझ से अगर कुछ देर होजाये तोह आप लोग अपडेट अपडेट की झड़ी लगा देते हो... लेकिन जब Episode ाज्ये तोह उसे पढ़ने के बाद एक फीडबैक देना भी ज़रूरी नहीं समझ रहे हो.

गाइस योर फीडबैक इस वैरी इम्पोर्टेन्ट फॉर में. आईटी गाइड्स में तो पुश थे स्टोरी इन थे राइट डायरेक्शन एंड मेक नेसेसरी चंगेस इन माय आइडियाज.

होप यू गाइस अंडरस्टैंड एंड ेन्सॉरगे में विथ योर फीडबैक.

थैंक यू.
 
घर की आग

Episode 32 — साज़िशें, तश्नगी और हतमी मुतालबा

सन 1: कराची — सीमा की मास्टरक्लास और शमीम की बेचैनी

कराची में रात अब गहरा चुकी थी. बिलाल अपने कमरे में अकेला bais-o-pash में था. ज़ोया की धमकी उसके कानो में किसी थप्पड़ की तरह गूँज रही थी. "मैं सुबह पहला फ़ोन खलु (रशीद साहब) को करुँगी." बिलाल को पता था के रशीद साहब इस मामले में बुरा नहीं मानेंगे, क्यूंकि वो खुद लाहौर में यही सब कर रहे हैं, मगर मसला बदनामी का था. ज़ोया अगर घर में हंगामा खड़ा कर देती तोह शमीम (अम्मी) की नज़रों में बिलाल हमेशा के लिए गिर जाता, और वो ऐसा रिस्क नहीं लेना चाहता था.

उसने अपना फ़ोन उठाया और लाहौर कॉल मिलायी. दूसरी तरफ उसकी बीवी, सीमा, ने तीसरी बेल्ल पर फ़ोन उठा लिया.

"इतनी रात को हमारी याद कैसे आ गयी.. बिलाल?, तोह सुनाओ फिर कहाँ तक पहुंचे - वहां तोह माहौल काफी गरम कर रखा है न तुमने?," सीमा की आवाज़ में एक खास किस्म की चाशनी और तजुर्बा था. वो लाहौर की हवेली की वो खिलाडी थी जिसने सारे खेल नसीम और रशीद के खेल को बरसों से देख और समझते हुए सीखा था.

बिलाल ने एक गहरी सांस ली और पूरा किस्सा सुना दिया— "सीमा... मसला हो गया है," बिलाल ने कमरे का दरवाज़ा एक बार फिर चेक करते हुए कहा. उसने फराह की जासूसी से लेकर किचन में गजरे सजाने, गाजरों वाला किस्सा, शमीम अम्मी की वो लर्ज़िश (शिवेरिंग) और फिर ज़ोया की धमकी तक पूरी तफ्सील से बताई. "ज़ोया बीच में दीवार बन गयी है. वो धमकी दे रही है के सब को बता देगी. मुझे समझ नहीं आ रहा के मैं पीछे हैट जाऊं या इस आग को और भड़काऊ?"

सीमा फ़ोन के दूसरी तरफ हल्का सा हंसी. "बिलाल, मेरे प्यारे मियां... तुम लाहौर की हवेली से सीख कर तोह गए हो, मगर अभी तुम्हारे अंदर वो ठहराओ नहीं आया जो अम्मी (नसीम) और अब्बू (रशीद) में है. तुम ने गलती ये की के तुम ने ज़ोया को अपने रस्ते का कांटा बनने दिया. ज़ोया अक़लमंद है, वो तुम्हारी नियत को भांप गयी है. और जब तक एक तीसरा बाँदा घर में निगरानी कर रहा हो, तब तक तुम अम्मी को फ़तेह नहीं कर सकते."

"तोह मैं क्या करून? ज़ोया को कैसे चुप करवाएं?" बिलाल ने be-chaini से पूछा.

"ज़ोया को चुप करवाने की ज़रुरत नहीं है, उसे 'अँधेरा' दिखने की ज़रुरत है. मगर उससे पहले, तुम्हे अम्मी के साथ एक नया खेल खेलना होगा," सीमा ने तकिये का सहारा लेते हुए कहा. "सुनो, कल से तुम बिलकुल बदल जाओ. अब तक तुम ने अम्मी को 'तासीर' (इन्फ्लुएंस) दी है, अब उन्हें 'तश्नगी' (तृषित) दो. कल सुबह से उनकी तरफ देखना बंद कर दो. उन्हें ऐसा महसूस करवाओ जैसे तुम ने ज़ोया की बात मान ली है और तुम्हे अपनी हरकतों पर शर्मिंदगी है."

बिलाल हैरान हुआ. "इससे तोह वो और दूर हो जाएँगी?"

"नहीं पागल!" सीमा ने समझाया. "औरतों की फितरत होती है, बिलाल. जब उन्हें तवज्जो (अटेंशन) मिल रही हो तोह वो नखरे दिखती हैं, मगर जब वही तवज्जो अचानक चीन जाये, तोह वो परेशां हो जाती हैं. शमीम खला ने तुम्हारे लम्स (टच) का नशा चख लिया है. वो जो तुम ने उनके बालों में गजरे सजाये थे, उनकी गर्दन को मास किया था... उनकी रगों में वो गर्मी अब भी दौड़ रही होगी. जब तुम अचानक 'शरीफ' बन जाओगे, तोह उन्हें अपना आप अधूरा लगने लगेगा. उन्हें लगेगा के शायद वो अब तुम्हारे लिए हसीं नहीं रहीं, या तुम उनसे ुक़्ता गए हो."

सीमा की आवाज़ अब और गहरी हो गयी थी. "जब मर्द पीछे hat-ta है न, तोह औरत का तजस्सुस (क्यूरोसिटी) और उसकी भूक दुगनी हो जाती है. अम्मी खुद तड़पेंगी ये देखने के लिए के बिलाल की आँखों में वो पुराणी चमक कहाँ गयी. वो खुद तुम्हारे पास आएँगी, बहाने बनाएंगी, तुम्हारे कमरे में आएँगी. और ज़ोया? ज़ोया को लगेगा के वो जीत गयी है. वो थोड़ी 'दिल्ली' (रिलैक्स) होगी, और वही वक़्त होगा जब हम उसे किसी और खेल में फंसायेंगे."

बिलाल को अपनी बीवी की अकलमंदी पर रश्क आ रहा था. "सीमा, तुम वाक़ई उस्ताद हो. मैंने सोचा था के मैं zor-zabardasti करूँगा, मगर तुम ने तोह गेम hi बदल दिया."

"तुम बस कुछ दिन और इसी तरह निकालो फिर मैं भी वहीँ रहूंगी न तुम्हारे साथ तोह हम मिलकर संभल लेंगे ज़ोया और फराह को, और हाँ याद रखो zor-zabardasti से जिस्म मिलता है, बिलाल... रूह और चाहत नहीं. हमें तोह खला को इस हद्द तक ले जाना है के वो खुद कहें के 'बिलाल, मुझे छू लो'. तुम बस अगले कुछ दिन उन्हें तरसते रहो. उन्हें महसूस होने दो के तुम्हारी एक नज़र के लिए उन्हें कितनी म्हणत करनी पड़ेगी."

अगली सुबह

नाश्ते की टेबल पर सूरज की पहली किरण पारदी, मगर बिलाल का चेहरा बिलकुल सपाट (फ्लैट) था. शमीम (अम्मी) ने आज खास तौर पर हलकी गुलाबी रंग की क़मीज़ पहनी थी, बालों को सलीक़े से संवारा tha—shayad उन्हें उम्मीद थी के बिलाल कल की तरह फिर कोई शरारत करेगा. मगर बिलाल ने प्लेट में नज़रें गाढ़ राखी थीं.

"बिलाल बीटा... आज तुमने पराठा नहीं लिया? गर्मी ज़्यादा है, थोड़ा दही खा लो," शमीम ने निहायत नरमी से कहा और कटोरी उसकी तरफ बधाई.

"नहीं अम्मी, शुक्रिया. मेरा पेट भरा हुआ है," बिलाल ने बिना उनकी तरफ देखे कहा और चाय का आखरी सिप लेकर खरा हो गया. "ज़ोया, मेरा बैग देना... मैं ऑफिस के लिए लेट हो रहा हूँ."

ज़ोया ने हैरत से अपने भाई को देखा. कल तक जो बाँदा अम्मी के aage-piche घूम रहा था, आज वो उनकी आवाज़ तक नहीं सुन रहा था. ज़ोया को कुछ सुकून मिला के शायद उसकी धमकी काम कर गयी है. उसने मुस्कुराते हुए बैग पकड़ाया. "ये लीजिये भैया. आज तोह आप काफी 'रेस्पोंसिबल' लग रहे हैं."

बिलाल ख़ामोशी से निकल गया. शमीम बनु वहीँ खरी रह गयीं. उनके हाथ में दही की कटोरी थी और दिल में एक अजीब सा बोझ. उन्होंने पूरा दिन गौर किया... बिलाल शाम को लौटा तोह भी वही माहौल. उसने अम्मी से पानी तक नहीं माँगा, बल्कि खुद किचन में जा कर गिलास भर लिया. शमीम उसके पीछे गयीं, सोचा कुछ बात करें.

"बिलाल... आज बड़े थके हुए लग रहे हो? कुछ... कुछ हुआ है क्या ऑफिस में?" शमीम ने धीरे से पूछा, उनकी आवाज़ में एक an-jaani फ़िक्र थी.

"नहीं अम्मी, बस काम ज़्यादा था. मैं आराम करना चाहता हूँ," बिलाल ने सपाट लहजे में कहा और अपने कमरे में चला गया.

शमीम का दिल धक् से रह गया. वो आईने के सामने खरी हो गयीं. क्या वाक़ई वो बूढ़ी लग रही हैं? क्या बिलाल को अब उनमें कोई दिलचस्पी नहीं रही? कल तक तोह वो उनकी गर्दन पर पसीने की बूँदें गईं रहा था, और आज वो उनकी तरफ देखना भी पसंद नहीं कर रहा. शमीम को ये ख़ामोशी बर्दाश्त नहीं हो रही थी. उन्हें गुस्सा भी आ रहा था के उनका बीटा उन्हें nazar-andaz कर रहा है, और साथ hi साथ वो पुराण 'नशा' उन्हें तड़पा रहा था.

रात को शमीम बिस्टेर पर लेटिन तोह उन्हें वही गाजरों की खुशबू महसूस हुई जो बिलाल लाया था. उन्होंने अँधेरे में अपनी गर्दन पर हाथ फेरा... वही जगह जहाँ बिलाल की उँगलियाँ टच हुई थीं. उन्हें अचानक बिलाल की सख्त हथेलियां याद आने लगीं. वो be-chain हो गयीं. उन्हें एहसास हुआ के बिलाल की तवज्जो (अटेंशन) अब उनकी ज़रुरत बन चुकी है.

वो उठी और धीरे से बिलाल के कमरे की तरफ बढ़ीं. उनका दिल ज़ोर से धड़क रहा था. उन्हें पता था के ज़ोया सो रही है, मगर वो खुद को रोक नहीं प् रही थीं. उन्हें सिर्फ ये पूछना था... "बिलाल, तुम मुझसे नाराज़ क्यों हो?"

मगर दरवाज़े पर पहुँच कर वो रुक गयीं. उन्हें डर लगा... कहीं बिलाल ने कुछ और न समझ लिया? शमीम बनु की हालत अब वैसी hi थी जैसा सीमा ने कहा tha—wo न उगल सकती थीं, न निगल सकती थीं. वो एक ऐसी देहलीज़ पर खरी थीं जहाँ से रास्ता सिर्फ "घर की आग" की तरफ जाता था.

सन 2: लाहौर — कोचिंग सेण्टर और मिस किरण की "होम क्लास"

लाहौर की दोपहर की तपिश गुलबर्ग की सड़कों पर महसूस हो रही थी. हमजा कोचिंग सेण्टर के हॉल में बैठा फिजिक्स का लेक्चर सुन रहा था, मगर उसकी नोटबुक पर डेरीवाशंस की जगह कुछ और hi बन रहा था. उसके दिमाग में baar-baar हिरा की वो नंगी पीठ और वो "ब्लैक लास" वाली अंडरवियर घूम रही थी.

"हमजा रशीद!"

एक सख्त और खनकदार आवाज़ ने हमजा के दिमाग के झाले साफ़ कर दिए. उसने झटके से सर्र उठाया. सामने मिस किरण तारिक़ खरी थीं. सफ़ेद कॉटन का सूट, हाथों में वाच और आँखों पर बारीक फ्रेम वाला chashma—unka हसीं मगर संजीदा चेहरे पर थोड़ी नाराज़ी थी.

अर्सलान, जो हमजा का दोस्त भी था और मिस किरण का बीटा भी, अगली सीट पर बैठा ध्यान से अपनी अम्मी की बात सुन रहा था. उसने मुद कर हमजा को देखा और आँख मारी, जैसे कह रहा हो, "बीटा, आज तोह तू गया!"

"जी... जी मिस?" हमजा ने हड़बड़ा कर कहा.

"मैं पिछले पांच मिनट से 'प्रोजेक्टिले मोशन' समझा रही हूँ और तुम अपनी hi किसी दुनिया में गम हो. नोटबुक लाओ अपनी," मिस किरण उसके बेंच के पास आयीं.

उनके जिस्म से आने वाली मेहेंगी परफ्यूम की खुशबू ने हमजा के दिमाग को और सुझा दिया. जब उन्होंने नोटबुक उठायी, तोह हमजा का दम निकल गया. नोटबुक के कोने में उसने एक औरत का जिस्म बनाया हुआ था जो काफी हद्द तक हिरा से मिलता जुलता था — निहायत hi बोल्ड और उकसाने वाला.

मिस किरण ने एक पल के लिए उस तस्वीर को देखा, फिर हमजा की आँखों में देखा. उनकी आँखों में गुस्सा तोह था, मगर एक अजीब सी हैरत भी थी. उन्होंने नोटबुक बंद की और मेज़ पर थपथपाई.

"अर्सलान, तुम बहार जा कर कार साफ़ करो, मैं आती हूँ. हमजा, तुम रुको, मुझे तुमसे बात करनी है," उन्होंने सपाट लहजे में कहा. अर्सलान be-khabari में मुस्कुरा कर बहार निकल गया, ये सोचे बग़ैर के उसकी माँ उसके दोस्त के साथ क्या बात करने वाली हैं.

क्लास के बाद — तनहा क्लासरूम

जब सारे बचे निकल गए, हमजा दररते दररते मिस किरण के पास गया. हॉल बिलकुल खली था और एक की हलकी सी gar-garahat महसूस हो रही थी.

"इधर आओ हमजा," मिस किरण ने कुर्सी पर बैठते हुए कहा. उन्होंने अपना चश्मा उतर कर टेबल पर रखा. "तुम्हारे घर में सब ठीक है? तुम्हारा ध्यान कहाँ है आज कल?"

"जी मिस... वो... घर में थोड़े मसले हैं," हमजा ने नज़रें झुका कर झूट बोलै.

मिस किरण ने एक गहरी सांस ली और थोड़ा आगे को झुकीं. उनका गाला थोड़ा खुला था जहाँ से उनकी गोरी गर्दन साफ़ नज़र आ रही थी. "मसले हर घर में होते हैं हमजा. मगर जो तस्वीर तुम ने बनायीं थी... वो किसी 'परीक्षण' दिमाग की नहीं, बल्कि किसी 'प्यासे' दिमाग की निशानी है. क्या तुम्हारी उम्र में ये सब मुनासिब है?"

हमजा ने थोड़ा हौसला ीखता किया. उसे पता था के मिस किरण विडो हैं और काफी वक़्त से अकेली हैं. "मिस... जब गर्मी हद्द से बढ़ जाये तोह इंसान क्या करे? पढाई में दिल तब लगता है जब दिमाग सुकून में हो. और आज कल मेरे aas-pass का माहौल hi कुछ ऐसा है..."

मिस किरण ने हमजा को ग़ौर से देखा. उन्हें उम्मीद नहीं थी के ये लड़का इतनी हिम्मत से जवाब देगा. उन्होंने अपनी टांगें एक दूसरे के ऊपर रखीं (Cross-legged), जिससे उनकी शलवार थोड़ी ऊपर हुई और उनका गोरा टखना (एंकल) नज़र आने लगा.

"तोह तुम्हे सुकून चाहिए?" मिस किरण की आवाज़ थोड़ी नरम हुई मगर रॉब अब भी वही था. "कोचिंग में तोह बाकी बचे होते हैं, यहाँ तुम्हारा ध्यान भटक जाता है. कल तुम शाम को 6 बजे सीधा मेरे घर आओगे. मैं तुम्हे 'पर्सनल कोचिंग' दूँ गई. वहां कोई शोर नहीं होगा."

हमजा का दिल झटके लेने लगा. दोस्त की माँ के घर जा कर "पर्सनल क्लास" लेना? ये तोह उसने सोचा hi नहीं था. "लेकिन मिस... अर्सलान वहां होगा तोह...?"

"अर्सलान को मैंने उसके दोस्त की तरफ भेज देना है. तुम बस वक़्त पर पहुँच जाना," मिस किरण ने हमजा की आँखों में देखा. उनकी नज़रों में एक ऐसी चमक थी जो सिर्फ एक उस्ताद की नहीं थी. "और याद रखना हमजा, अगर तुमने ध्यान नहीं दिया, तोह मैं तुम्हारे अब्बू से मिलने खुद हवेली आउंगी... फिर वो देखेंगे के उनका बीटा कितना ाचा 'आर्टिस्ट' है."

हमजा ने मिस किरण के चेहरे पर एक अजीब सी कशिश देखि. उसे एहसास हुआ के मिस किरण सिर्फ उसे दांत नहीं रही थीं, बल्कि शायद वो भी हमजा के अंदर की उस आग को दरयाफ्त करना चाहती थीं जो उसे be-chain कर रही थी.

"मैं ज़रूर आऊंगा मिस... जैसा आप कहें," हमजा ने उनकी आँखों में देखा.

मिस किरण ने हलकी सी मुस्कराहट दबायी और अपना बैग उठाया. "ठीक है. अब जाओ... और वो तस्वीर फॉर देना."

हमजा बहार निकला तोह उसके चेहरे पर एक फतेहना मुस्कराहट थी. उसे लग रहा था के हवेली के अंदर की आग अब हवेली से बहार भी फैलने वाली है.

सन 3: लाहौर हवेली — नसीम और सीमा की Pur-Asrar गुफ्तगू

दोपहर का वक़्त था और हवेली में अजीब सा सन्नाटा था. मर्दों के ऑफिस और बच्चों के कॉलेज जाने के बाद, ये वक़्त सिर्फ नसीम और सीमा का होता था. नसीम अपने कमरे में बिस्टेर पर आधी लेती हुई थी, उनकी चाल में एक हलकी सी लचक और जिस्म में एक मीठा सा दर्द tha—Usman की कल की हैवानियत का निशाना.

सीमा दरवाज़ा बंद करके अंदर आयी और नसीम के पाऊँ के पास बैठ गयी. उसने देखा के नसीम की आँखों में अभी भी वो खुमारी बाक़ी थी जो सिर्फ एक भरपूर चुदाई के बाद आती है.

"अम्मी... लगता है कल उस्मान ने वाक़ई आपका पुर्ज़ा पुर्ज़ा ढीला कर दिया है," सीमा ने शरारत से नसीम की राण पर हाथ रखा. "आपकी तोह कमर भी सीढ़ी नहीं हो रही."

नसीम ने एक गहरी और ठंडी सांस ली, उनके होठों पर एक mard-kush मुस्कराहट आयी. "उफ़ सीमा... क्या बताऊँ तुझे. उस्मान दिखने में तोह बचा लगता है, मगर उसके अंदर जो जान है... वो तेरे अब्बू में भी नहीं रही. कल उसने मुझे दीवार से लगा कर जो धक्के मारे हैं, मेरी bacha-daani तक हिल गयी है."

सीमा का चेहरा थोड़ा सुर्ख हुआ, उसकी सांसें भरी होने लगीं. "अम्मी, ये तोह na-insaafi है न? मैंने hi उसे गरम किया, मैंने hi रास्ता साफ़ किया, और मज़ा सारा आप लूट लेगी? मेरा भी तोह दिल करता है के आपके साथ मिल कर उस्मान की उस मर्दानगी का इम्तेहान लून. क्या ख्याल है? अगली बार हम दोनों मिल कर उसे निचा दिखाएंगे... थ्रीसम?"

नसीम ने हंसी में क़हक़हा लगाया. "हाय नई बेशरम! Maa-beti एक साथ एक hi मर्द के निचे? मगर हाँ... माहौल तोह ऐसा hi बनता जा रहा है. तू फ़िक्र मत कर, उस्मान तेरा hi है, मैं तोह बस उसका नशा चेक कर रही थी."

सीमा ने बात का रुख बदला और थोड़ी संजीदा हो गयी. "अम्मी, मज़ाक़ अपनी जगह, मगर एक मसला है. मेरी बिलाल से बात हुई थी... कराची में ज़ोया दीवार बन कर खरी हो गयी है. वो खला (शमीम) तक बिलाल को पहुँचने नहीं दे रही और बदनामी की धमकियाँ दे रही है. बिलाल बेचारा पीछे हैट गया है, मगर कब तक?"

नसीम ने थोड़ी देर सोचा, फिर उनकी आँखों में एक शैतानी चमक आयी. "ज़ोया... वो थोड़ी 'परसा' (पियस) बनती है न? सीमा, उसका एक hi हल है. ज़ोया को हवेली की इस आग में झोंकना होगा. क्यों न हम ज़ोया और उस्मान की शादी की बात शुरू करें? जब ज़ोया का रिश्ता उस्मान से तय हो जायेगा, तोह वो उस्मान के लुंड की गर्मी महसूस करने के लिए खुद be-chain होगी. जब उसके अपने पेअर फिसलेंगे, तोह वो बिलाल और शमीम पर ऊँगली उठाने के क़ाबिल नहीं रहेगी. उस्मान को हम इस्तेमाल करेंगे ज़ोया को 'ठंडा' करने के लिए."

सीमा की आँखें चमक उठीं. "वह अम्मी! आप तोह वाक़ई उस्ताद हैं. उस्मान जब ज़ोया को sambhale-ga, तोह बिलाल का रास्ता साफ़ हो जायेगा. मगर अम्मी... एक ख्वाहिश मेरी भी है."

सीमा, नसीम के और क़रीब हो गयी और उनका हाथ पकड़ कर अपने पेट पर रखा. "मैं कराची वापिस जाने से पहले चाहती हूँ के इस हवेली के hi किसी मर्द से प्रेग्नेंट हो कर जाऊं. मैं चाहती हूँ के मेरे बचे की रगों में हवेली का वही गरम खून हो. बिलाल तोह है hi, मगर मुझे किसी अपने का hi बीज (सीमेन) चाहिए."

नसीम ने सीमा को ग़ौर से देखा और फिर उसे अपने सीने से लगा लिया. "तू फ़िक्र क्यों करती है? हमजा है न... उसका खून सब से ज़्यादा गरम है आज कल. मैं माहौल banau-ngi. तू बस तैयार रहना."

नसीम ने सीमा के कान में सरगोशी की, "बस जल्दी से उम्मीद से हो जा... फिर जब बचा होगा, तोह तू वापिस आना... हमजा को अपना दूध पिलाने के लिए. वैसे भी उस लड़के को जवान औरतों के दूध का बड़ा शौक़ है."

दोनों maa-beti ज़ोर से हंसने लगीं. पुरे कमरे में हवस और साज़िश की खुशबू फैल गयी थी. उन्हें पता था के अब हवेली का कोई भी मर्द उनके हुस्न और हवस के जाल से बच नहीं पायेगा.

सन 4: लाहौर हवेली — हिरा का इंकार और रशीद साहब का वार

शाम ढल रही थी और हवेली के dar-o-deewar पर नरंजी (ऑरेंज) रौशनी फैली हुई थी. हिरा कॉलेज से वापिस आ कर अपने कमरे में कपडे बदल रही थी के अचानक दरवाज़ा खुला और रशीद साहब दाखिल हुए. उनके चेहरे पर आज वही पुराणी सख्ती थी जो किसी फैसले से पहले आती है.

हिरा ने जल्दी से अपना दुपट्टा कंधे पर डाला. "अब्बू? आप... इस वक़्त?"

रशीद साहब ने आगे बढ़ कर दरवाज़ा अंदर से बंद किया और थक कर सोफे पर बैठ गए. उनकी नज़रें हिरा के कमसिन जिस्म पर ऐसे घूम रही थीं जैसे वो कोई mal-e-ghanimat (त्रैझ) देख रहे हों. "हिरा... कब तक छुपाओगी अपने आप को? छत पर उस दिन तुम ने जो वादा किया था, वो अभी तक अधूरा है."

हिरा ने एक गहरी सांस ली और आईने के सामने खरी हो गयी. "अब्बू, मैंने कोई वादा नहीं किया था. मैंने सिर्फ इतना कहा था के मैं सोचूंगी. और सच तोह ये है के मुझे दर लगता है."

"दर कैसा?" रशीद साहब उठ कर उसके पीछे खरे हो गए. आईने में उनका बूढ़ा मगर मज़बूत जिस्म हिरा के गोरा बदन के साथ अजीब सा ताज़्ज़ाद (कंट्रास्ट) पैदा कर रहा था. उन्होंने हिरा के कन्धों पर हाथ रखा. "मैं तुम्हारा बाप हूँ, मुझे पता है के तुम्हे किस चीज़ की ज़रुरत है. आयेशा को देखो, वो कितनी सुकून में है. तुम क्यों अपनी जवानी जाया कर रही हो?"

हिरा ने झटके से उनका हाथ हटाया और उनकी तरफ मुड़ी. उसके चेहरे पर अब वही "जवान तेवर" थे जो उसने हमजा को दिखाए थे. "अब्बू, आयेशा बजी की बात और थी. मगर मेरी पसंद अलग है. मैं नहीं चाहती के मेरी पहली बार... किसी ऐसे के साथ हो जो... जो मेरी उम्र का न हो."

रशीद साहब की आँखों में ग़ुस्सा चमका. "मतलब? तुम्हे लगता है के मैं बूढ़ा हो गया हूँ? तुम्हे लगता है के मुझ में वह दम नहीं रहा?" उन्होंने हिरा का हाथ मरोरा और उसे अपने क़रीब खिंचा. "पूरी हवेली मेरे इशारे पर चलती है हिरा. नसीम हो या सीमा... सब ने मेरा लोहा मन है. तुम क्या चीज़ हो?"

हिरा ने दर्द से कराह कर कहा, "अब्बू, zor-zabardasti से आप मेरा जिस्म तोह प् लेंगे, मगर मैं आपका साथ नहीं दूँ गई. मेरी शर्त है... अगर आप चाहते हैं के मैं खुद चल कर आपके कमरे में आऊं, तोह मुझे थोड़ा वक़्त दें. मुझे अपने दिमाग को तैयार करने दें."

रशीद साहब ने उसे छोर दिया, मगर उनके होठों पर एक मक्कारी भरी मुस्कराहट आयी. "वक़्त? वक़्त तोह बहुत दे दिया हिरा. चलो, एक नया सोडा (डील) करते हैं. अगले हफ्ते कराची से बिलाल अपनी फॅमिली (शमीम, ज़ोया और फराह) को लेकर आ रहा है ताके सीमा को वापिस ले जा सके. मैंने उनकी आमद पर एक बड़ी दावत राखी है. अगर उस दिन तक तुम ने मुझे खुश नहीं किया, तोह याद रखना... मैं तुम्हारी शादी किसी ऐसे पुराने खंडन में करवा दूंगा जहाँ तुम पूरी ज़िन्दगी ghut-ghut कर मरोगी. न जवान लुंड मिलेगा, न सुकून."

हिरा थोड़ा सेहमी, मगर उसने अपने दिमाग में हमजा का प्लान रखा हुआ था. "ठीक है अब्बू... अगले हफ्ते तक का वक़्त दें. मगर तब तक... आप मुझ पर दबाओ नहीं डालेंगे."

रशीद साहब ने हिरा की थोड़ी (चीन) पकड़ी और उसे हल्का सा झटका दिया. "ठीक है. मगर याद रखना हिरा... रशीद साहब को इंकार सुनने की आदत नहीं है. अगर तुम ने मेरा साथ दिया, तोह ये हवेली तुम्हारे क़दमों में होगी. और अगर नहीं... तोह फिर नतीजा तुम जानती हो."

वो कमरे से निकल गए, मगर उनके जाने के बाद हिरा ने गुस्से में मेज़ पर रखा परफ्यूम का बोतल दीवार पर दे मारा. "बुझते चिराग की लौ तेज़ होती है..., कुछ ऐसे hi हाल हैं इनके, इन्हें लगता है ये मुझे डरा देंगे."

उसने फ़ौरन हमजा को मैसेज किया: "प्लान तेज़ करना होगा हमजा. अब्बू ने अल्टीमेटम दे दिया है. बिलाल भाई और उनके घरवाले अगले हफ्ते आ रहे हैं, तब तक हमें कुछ बड़ा सोचना होगा. कल कोचिंग से सीधे घर hi आजाना, मैं कॉलेज से जल्दी आजाऊंगी."

Episode 32 ख़तम

क्लिफहैंगर: कराची में बिलाल का "खामोश वार" शमीम को तड़पने पर मजबूर कर चूका है, मगर क्या सीमा का ये प्लान ज़ोया की जासूसी के सामने टिक पायेगा? हिरा ने रशीद साहब के मुतालबे को चैलेंज तोह कर दिया है, लेकिन क्या हमजा वक़्त पर उसकी सील तोड़ पायेगा या रशीद साहब अपनी हैबत से हिरा को झुका देंगे? और सब से बड़ा सवाल... कल शाम हमजा, मिस किरण के घर "फिजिक्स" के कौन से नए लॉज़ लिखेगा?
 
नेक्स्ट Episode विल बे प्रेसेंटेड आफ्टर थे फिनाले ऑफ़ टाटाइपल2026.
 
Episode 33 विल बे थे मेगा एपिसोड्स. (ऑलमोस्ट ट्रिपल ऑफ़ रेगुलर ओने)
 
घर की आग

Episode 33: जवान शर्तें, पुराने खिलाडी


सन 1: गेस्ट रूम का ख़ुफ़िया सबक़


लाहौर की शाम अब ढल्ल रही थी. हमजा ने अपनी बाइक मिस किरण के घर के बहार खरी की. ये एक pur-sukoon गली में एक छोटा मगर निहायत सलीक़े से बना हुआ घर था. हमजा का दिल थोड़ा ज़ोर से धारक रहा tha—aakhir आज वो अपनी दोस्त अर्सलान की माँ के घर "तनहा" आया था.

उसने दुर्बल बजायी. कुछ देर बाद दरवाज़ा खुला और हमजा की सांसें जैसे रुक सी गयीं. मिस किरण सामने खरी थीं, मगर आज वो "मिस किरण" नहीं लग रही थीं. कोचिंग वाला सख्त कॉटन का सूट नहीं बल्कि, उन्होंने हलके नीले रंग की एक ट्रांसपेरेंट काफटाण सूट पहना था. बाल जो हमेशा सख्त जुड़े (बन) में बंधे होते थे, आज उनके कन्धों पर खुले बिखरे हुए थे.





"आ गए हमजा? अंदर आओ," मिस किरण ने निहायत नरम मगर pur-aitamad आवाज़ में कहा. उनके जिस्म से वही मेहेंगी परफ्यूम की खुशबू आ रही थी जो कोचिंग में हमजा का ध्यान भटकती थी.

हमजा अंदर दाखिल हुआ. ड्राइंग रूम में हलकी रौशनी थी और एक की ठंडक ने माहौल को मज़ीद nasha-awar बना दिया था.





"बैठो. मैं पानी लेकर आती हूँ, फिर शुरू करते हैं," वो किचन की तरफ चलीं गयीं. हमजा ने ग़ौर किया के उनका वो लिबास पीछे से साफ़ शफ़्फ़ाफ़ (ट्रांसपेरेंट) था, जो उनके भर्राय हुए जिस्म की हर हरकत को नुमाया कर रहा था.

कुछ देर बाद वो दो गिलास जूस लेकर आयीं और हमजा के बिलकुल क़रीब सोफे पर बैठ गयीं. इतने क़रीब के हमजा को उनकी साँसों की गर्मी महसूस हो रही थी.





"तोह... प्रोजेक्टिले मोशन समझा था तुमने कल?" उन्होंने पूछा, मगर उनकी नज़रें हमजा की नोटबुक पर नहीं, बल्कि उसके चेहरे पर थीं.

"मिस... कोशिश तोह की थी, मगर दिमाग कहीं और hi अटका हुआ था," हमजा ने हिम्मत करके उनकी आँखों में देखा.

मिस किरण ने हल्का सा मुस्कुराते हुए अपना गिलास टेबल पर रख दिया. "हमजा, तुम्हारे अब्बू ने मुझसे कहा था के तुम्हारे रिजल्ट्स अचे आने चाहिए. मगर तुम्हारे 'आर्टिस्ट' बनने का शौक़ तोह कुछ और hi बता रहा है. वो तस्वीर... जो तुम ने कोचिंग में बनायीं थी... वो किस की थी?"

हमजा ने एक लम्हे के लिए सोचा और फिर धीरे से बोलै, "वो तस्वीर किसी शख्स की नहीं थी मिस... वो मेरी 'तश्नगी' (तृषित) की थी. जब इंसान को सुकून न मिले, तोह वो ऐसे hi ख्वाब बनता है."

मिस किरण ने अपना हाथ आगे बढ़ाया और निहायत नरमी से हमजा के बालों में उँगलियाँ फेरी. "इतनी छोटी उम्र में इतनी गर्मी, हमजा? तुम्हे पता है तुम किसके सामने बैठे हो? मैं तुम्हारी टीचर भी हूँ और तुम्हारे दोस्त की माँ भी."

"मुझे पता है मिस... मगर इस वक़्त आप सिर्फ मेरी उस्ताद हैं. और उस्ताद का काम तोह वाजिब रास्ता दिखाना होता है न?" हमजा की आवाज़ अब भरी हो चुकी थी.

मिस किरण की सांसें थोड़ी तेज़ हुईं. उन्होंने अपना पेअर (लेग) दूसरे पेअर पर रखा, जिसके वजह से उनका पजामा थोड़ा और ऊपर हुआ और उनका गोरा, मुलायम टखना साफ़ नज़र आने लगा. "हमजा... तुम बहुत खतरनाक बातें कर रहे हो. अगर अर्सलान आ गया तोह?"

"आपने hi तोह कहा था के वो दोस्त की तरफ गया है," हमजा ने धीरे से अपना हाथ मिस किरण के घुटने पर रखा. "मिस... फिजिक्स तोह हम रोज़ पढ़ते हैं, आज थोड़ी केमिस्ट्री .....?" उसने अपनी बात अधूरी छोड़ दी.

"अर्सलान घर पर नहीं है तोह इसका मतलब ये नहीं के घर खली है. मेरी छोटी बेटी, फलक (फस्क फर्स्ट ईयर स्टूडेंट, अर्सलान की बेहेन), अंदर अपने कमरे में सो रही है. उसे हल्का बुखार था इसलिए आज वो जल्दी लेट गयी," मिस किरण ने धीरे से सरगोशी की. "ठीक है... केमिस्ट्री के लिए हमें गेस्ट रूम की तरफ जाना होगा हमजा, अगर तुम सीखना चाहते हो, तोह आओ उस गेस्ट रूम में चलो, वहां बोर्ड भी है और सुकून भी... वहां मैं तुम्हे बताती हूँ के 'फाॅर्स' और 'फ्रिक्शन' असलियत में क्या होते हैं."

वो उठीं और हमजा को इशारा किया. हमजा जब उनके पीछे कमरे की तरफ जा रहा था, तोह उसने देखा के मिस किरण की चाल में अब एक mard-kush लचक थी. उसे समझ आ गया था के आज फिजिक्स का लेक्चर नहीं, बल्कि उसकी जवानी का असली इम्तेहान होने वाला है.

गेस्ट रूम में दाखिल होते hi मिस किरण ने दरवाज़ा बंद किया. कमरे में एक बड़ा सा वाइट बोर्ड लगा था, मगर माहौल किसी क्लास जैसा नहीं था. उन्होंने हमजा को कुर्सी पर बैठने का इशारा किया और खुद बोर्ड के पास कड़ी हो गयीं.

"तोह हमजा... फिजिक्स का पहला सबक़ शुरू करें?" उन्होंने मार्कर उठाते हुए कहा, मगर उनकी नज़रें हमजा की आँखों में गाढ़ गयी थीं.

हमजा ने कोशिश तोह बहुत की के वो बोर्ड की तरफ देखे, मगर मिस किरण का वो ट्रांसपेरेंट काफटाण सूट उसके होश उदा रहा था. एक की ठंडी हवा से जब सूट का कपडा उनके बदन से चिपकता, तोह उनके जिस्म की एक एक चउरवे हमजा को पुकारती, महसूस होती.

"मिस... फोकस नहीं हो प् रहा," हमजा ने be-baaki से कहा.

मिस किरण ने मार्कर मेज़ पर रखा और धीरे से चल कर हमजा के पास आयीं. उन्होंने कुर्सी के दोनों हाथों (आर्म्स) पर हाथ रख कर हमजा के ऊपर झुकीं. उनके खुले बाल हमजा के चेहरे को छू रहे थे.

"क्यों हमजा? क्या चल रहा है तुम्हारे इस शैतानी दिमाग में? क्या तुम मेरे बारे में... अजीब बातें सोचते हो?" उन्होंने निहायत नरम मगर उकसाने वाले लहजे में पूछा.

हमजा की सांसें भरी हो गयीं. "अजीब नहीं मिस... बहुत इंटेंस बातें. मेरा दिल करता है के मैं देखु के इस उस्ताद वाले रॉब के पीछे कितनी गर्मी है. मैं देखना चाहता हूँ के जब आप फिजिक्स पद्धति हैं, तोह क्या आपका अपना जिस्म भी उन्ही 'लॉज़' को मंटा है?"

मिस किरण की आँखों में एक अजीब सी चमक आयी. उन्होंने हमजा के चेहरे पर हाथ फेरा. "तोह तुम्हारी फैंटसीज इतनी गहरी हैं? तुम्हे लगता है तुम मुझे संभल पाओगे?" उन्होंने निहायत धीरे से अपना हाथ निचे किया और हमजा की जीन्स के ऊपर से hi उसकी मर्दानगी की सख्ती को महसूस किया.

"उफ़... हमजा," उनके होंठ थरथराये. "तुम्हारी 'तश्नगी' तोह वाक़ई हद्द से ज़्यादा है."





वो धीरे से निचे फर्श पर कारपेट पर बैठ गयीं, हमजा सोफे पर hi बैठा रहा. उन्होंने निहायत इत्मीनान से हमजा की मर्दानगी का जायज़ा लिया. हमजा का औज़ार उसकी जवानी और तालाब का साफ़ सबूत दे रहा था. मिस किरण, जो इस खेल की पुराणी खिलाडी थीं, आज खुद को रोक न सकीं. उन्होंने हमजा की ज़िप खोली और पहली बार उसकी असली मर्दानगी को अपनी आँखों के सामने पाया.





"तुम तोह वाक़ई एक 'तूफ़ान' छुपा कर बैठे हो हमजा," उन्होंने सरगोशी की और अपना मुंह आगे बढ़ाया.





हमजा ने पीछे को हो कर आंखें बंद कर ली. उसे महसूस हुआ के मिस किरण ने अपनी "उस्ताद" वाली महारत अब एक नए काम में लगा दी है. ब्लोजॉब का वो नशा हमजा के पुरे जिस्म में बिजली बन कर दौड़ने लगा.





इसी दौरान, गेस्ट रूम का दरवाज़ा जो शायद पूरी तरह कुण्डी में नहीं था, हल्का सा खुला. फलक, जो अपने कमरे से पानी लेने निकली थी, दबे पाऊँ वहां आ कड़ी हुई. उसने अपनी मम्मी को फर्श पर बैठा और हमजा के साथ उस हालत में देख लिया.





हमजा की अचानक आँख खुली तोह उसने फलक को दरवाज़े के झांकते हुए देखा. उसका दम निकल गया, वो हड़बड़ा कर पीछे हटने लगा.



मगर मिस किरण ने उसकी राण पर हाथ रख कर उसे रोका. उन्होंने पीछे मुद कर देखा... उनकी नज़रें फलक से मिली.









फलक वहां जैम सी गयी थी, उसकी आँखों में हैरत थी मगर डर नहीं

मिस किरण के चेहरे पर ज़रा भी शर्मिंदगी नहीं आयी. उन्होंने निहायत सख्त और pur-aitamad नज़र से फलक की तरफ देखा और सिर्फ अपने सर के इशारे से उसे वापिस जाने को कहा.

उनकी नज़रों में एक ऐसा हुकुम था जिसे फलक ताल नहीं सकती थी. फलक ने एक आखरी नज़र हमजा की मर्दानगी पर डाली और ख़ामोशी से दरवाज़ा भीरा कर वापिस अपने कमरे की तरफ चली गयी.

हमजा का पसीना छूट रहा था. "मिस... वो... फलक..."





"चुप रहो हमजा... और मज़ा लो," मिस किरण ने दोबारा वही शुरू कर दिया.





कुछ देर बाद, जब हमजा पूरी तरह फ़ारिग़ हो गया और उसकी सांसें बहाल हुईं,





तोह मिस किरण ने उठ कर अपने बाल सँवारे. उन्होंने टेबल से टिश्यू उठा कर अपना मुंह साफ़ किया और हमजा की तरफ देख कर मुस्कुरायी.

"आज का सबक़ यही ख़तम होता है हमजा. कल इसी वक़्त आना... फिजिक्स के अगले chapter के लिए," उन्होंने निहायत सलीक़े से कहा जैसे कुछ हुआ hi न हो.





हमजा ने लड़खड़ाते क़दमों से अपनी जीन्स सही की. उसे एहसास हुआ के मिस किरण सिर्फ एक खिलाडी नहीं, बल्कि इस पुरे खेल की मलिका हैं. वो ख़ामोशी से कमरे से निकला, मगर उसके दिमाग में फलक की वो आखरी नज़र अब भी किसी नए खतरे या नए मौके की तरह घूम रही थी.

सन 2: कराची — खामोश आग और बदलते तेवर

नाश्ते की टेबल पर अजीब सा सन्नाटा था. शमीम ने आज बहुत ध्यान से सुरमई रंग का जोड़ा पहना था और हाथों में वही पुराणी छुरियां जो बिलाल को पसंद थीं. मगर बिलाल? वह तोह जैसे कोई और शख्स बन गया था.

"बिलाल... ये पराठा तोह चखो, तुम्हारे लिए बनाया है," शमीम ने निहायत नरम आवाज़ में कहा, उनकी नज़रों में एक इल्तेजा (रिक्वेस्ट) थी.

बिलाल ने अख़बार से नज़र हटाई तक नहीं. "शुक्रिया अम्मी, मेरा दिल नहीं है. मैं ऑफिस जा रहा हूँ." उसने कुर्सी पीछे की और खरा हो गया.

ज़ोया, जो सामने बैठी ये सब देख रही थी, उसके चेहरे पर एक फतेहना मुस्कराहट थी. उसने बिलाल की तरफ देख कर एक गहरी नज़र daali—jaise कह रही हो, "गुड बॉय, अपनी औक़ात में रहो."

"भैया, आज आप काफी सुकून में लग रहे हैं. आखिर आपको समझ तोह आ गयी के घर की इज़्ज़त सब से पहले है," ज़ोया ने चोट की.

बिलाल ने सपाट लहजे में जवाब दिया, "तुम ने सही कहा था ज़ोया. मैं भटक गया था. अब सब ठीक है."

शमीम का दिल ये सुन कर जैसे छलनी हो गया. वह जो बिलाल की आँखों में अपने लिए "तालाब" देखा करती थीं, वहां अब सिर्फ एक ठंडी ख़ामोशी थी. उन्हें लगा जैसे उनका वजूद बिलाल के लिए ख़तम हो गया हो.

दोपहर का वक़्त — किचन

फराह किचन में पानी लेने आयी तोह उसने देखा के शमीम अम्मी खरी दीवार को तक्क रही हैं और चूल्हे पर रखा दूध उबाल कर गिर रहा है.

"अम्मी! दूध गिर रहा है!" फराह ने दौरते हुए चूल्हा बंद किया. "आप कहाँ गम हैं? आज कल आप बहुत भूलने लगी हैं."

शमीम ने झटके से होश संभाला. "कुछ नहीं फराह... बस थोड़ा सर्र में दर्द था."

फराह ने हैरत से उन्हें देखा. "अम्मी, बिलाल भाई को क्या हुआ है? आज कल वो न मज़ाक़ करते हैं, न सही से बात. और ज़ोया आपि तोह जैसे पुरे घर की मलिका बानी बैठी हैं. कल मैंने देखा ज़ोया आपि, बिलाल भाई को कुछ समझा रही थीं और भाई ने सर झुका कर मान लिया. अजीब लग रहा है सब."

शमीम ने फराह की बात का कोई जवाब नहीं दिया, मगर उनके दिमाग में एक hi बात घूम रही थी, क्या बिलाल वाक़ई मुझसे उक्त गया है? या ज़ोया ने उसे इतना डरा दिया है के वो मेरी तरफ देखने से भी कटरा रहा है?

रात का वक़्त — कॉरिडोर

रात के सन्नाटे में शमीम धीरे से बिलाल के कमरे की तरफ बढ़ीं. उनका मक़सद बिलाल के सामने सरेंडर करना नहीं था, बल्कि उस "बेरुखी" का सबब पूछना था जो उन्हें ज़िंदा दर्गोर कर रही थी.

जैसे hi वो दरवाज़े के पास पहुंचीं, उन्होंने देखा के ज़ोया वहां खरी है, बिलाल के कमरे का दरवाज़ा बहार से बंद कर रही है.

"ज़ोया? तुम यहाँ क्या कर रही हो?" शमीम ने हैरत से पूछा.

ज़ोया ने पलट कर अम्मी को देखा, उसकी आँखों में अब रॉब था. "अम्मी, भैया थके हुए हैं. मैंने उन्हें कह दिया है के अब से वो अपने कमरे में सुकून से रहे और किसी की फ़ुज़ूल की खिदमत की ज़रुरत नहीं है. आप भी अपने कमरे में आराम कीजिये."

शमीम बनु वही खरी रह गयीं. उनकी अपनी बेटी उन्हें अपने hi बेटे से दूर कर रही थी, और बिलाल... बिलाल ने अंदर से कोई आवाज़ तक नहीं दी.

शमीम वापिस अपने कमरे में आयीं और आईने के सामने खरी हो गयीं. उन्हें अपना आप बिखरता हुआ महसूस हुआ. वह तड़प जो बिलाल ने पैदा की थी, अब एक तूफ़ान बन चुकी थी.

यहाँ सीमा की वो बात सही होती दिख रही है के "मर्द जब पीछे hat-ta है, तोह औरत की भूक दुगनी हो जाती है."



शमीम ने अँधेरे में अपनी मुट्ठियां भींच लीन. उन्हें एहसास हुआ के वो बिलाल की इस बेरुखी को ज़्यादा दिन बर्दाश्त नहीं कर पाएंगी. उन्हें बिलाल चाहिए था... हर क़ीमत पर.

सन 3: हवेली की सियासत और शर्तें

रात के खाने का वक़्त था. हवेली के बड़े डाइनिंग टेबल पर रशीद साहब सदर (हेड) कुर्सी पर बैठे थे, मगर उनके चेहरे पर अजीब सी ukhra-pan और नाराज़ी थी. नसीम उनके दाएं तरफ थीं, और सीमा उनके बिलकुल सामने. हमजा, हिरा, उस्मान और आयेशा भी ख़ामोशी से खाना खा रहे थे, मगर माहौल में तनाव (टेंशन) साफ़ महसूस हो रही थी.

सीमा ने माहौल को हल्का करने के लिए रशीद साहब की प्लेट में गोश्त के सालन की एक नल्ली राखी. "अब्बू, क्या बात है? आज खाना कुछ पसंद नहीं आया या दिमाग पर किसी कारोबारी उलझन का बोझ है?" उसने निहायत शोखी से पूछा.

रशीद साहब ने चमचा रखा और एक गहरी सांस ली. "सीमा, जब घर की औलाद हुज्जत पर उतर आये और बाप को उसकी औक़ात दिखने लगे, तोह भूक क्या ख़ाक होनी है." उन्होंने एक तिरछी नज़र हिरा पर डाली जो निहायत इत्मीनान से अपना खाना खा रही थी.

हिरा ने अपनी नज़रें उठायीं, उसके चेहरे पर ज़रा भी डर नहीं था. "अब्बू, आप बात को गलत रंग दे रहे हैं. मैंने सिर्फ इतना कहा था के अभी नहीं हो सकता ये सब. आपने अपनी ख्वाहिश ज़ाहिर की और मैंने मेरी. जब तक मेरा dil-o-dimaagh और फिर ये जिस्म किसी चीज़ के लिए तैयार न हो, मैं कैसा साथ दे सकती हूँ आपका?"

नसीम, जो अब तक खामोश थीं, थोड़ा चिढ कर बोलीं. "रशीद साहब! आखिर कोई खुल कर बोलेगा भी के ये क्या हो रहा है? Baap-beti की ये पहेलियाँ मेरी समझ से बहार हैं."

रशीद साहब ने नसीम की तरफ देखा और सपाट लहजे में बोले. "नसीम, तुम्हारी बेटी चाहती है के मैं इसका इंतज़ार करून. मेरी ख्वाहिश है के ये हवेली की जो नयी रीत हम लोगों ने आयेशा की नहज पर शुरू की है, उसे हिरा आगे बढ़ाये. मैं चाहता हूँ के हिरा मेरी 'खिदमत' करे, बिलकुल वैसे hi जैसे आयेशा ने की है. मगर ये मैडम कहती हैं के इनको सिर्फ 'जवान लुंड' hi चाहिए."

नसीम ने हैरत से हिरा को देखा. "हिरा? क्या ये सच है?"

हिरा ने निहायत संजीदगी और be-baaki से जवाब दिया. "अम्मी, मैंने अब्बू से छोड़ने के लिए इंकार नहीं किया. मगर अम्मी, सोचिये न... मेरी पसंद अलग है. मैं चाहती हूँ के मेरी पहली चुदाई हो, तोह उसमे मेरी मर्ज़ी भी शामिल हो. मैं चाहती हूँ के मेरी छूट की सील जब टूटे, तोह वो कोई जवान और गरम लुंड से हो. मैं अपनी पहली चुदाई किसी बूढ़े लुंड से नहीं करना चाहती... मुझे 'नयी जवानी' और 'नए जज़्बात' की तालाब है. कुल मिलकर मैं इतना कहना चाहती हूँ के मैं अपनी पहली चुदाई को किसी जवान लुंड के साथ स्पेशल बनाना चाहती हूँ. अब्बू अगर अपनी ज़िद्द पर अदेय रहेंगे तोह मैं कैसे तैयार हो सकती हूँ? मैं पहले अपनी ख्वाहिश पूरी कर लून, फिर अब्बू जब चाहें तब छोड़ लें मुझे, मैं इंकार थोड़ी करुँगी..."

सब लोग हिरा की इस क़दर be-baaki पर ta'ajjub कर रहे थे. रशीद साहब हिरा को अभी भी घूर रहे थे. हिरा की इस बात पर आयेशा ने ज़ोर से अपना गिलास टेबल पर रखा, उसके चेहरे पर जलन साफ़ थी. "हिरा! कुछ तोह लिहाज़ करो. अब्बू की मर्दानगी किसी जवान से काम नहीं है. तुम्हे शायद अंदाज़ा नहीं के तुम क्या 'मिस' कर रही हो." आयेशा को डर था के कहीं हिरा का ये naya-pan रशीद साहब को उस से बिलकुल hi दूर न कर दे.

नसीम ने निहायत सलीक़े से रशीद साहब का हाथ थमा और निहायत नरम आवाज़ में बोली. "रशीद साहब, आप इतने तजुर्बेकार होकर बच्ची की बात का बुरा मान गए? हिरा का कहना गलत नहीं है. एक फूल को खिलने के लिए धुप और थोड़ी ठंडक दोनों चाहिए होती है. अगर आप zor-zabardasti करेंगे, तोह वो मज़ा नहीं आएगा जिसके आप शौक़ीन हैं. इसकी साख (डिग्निटी) का ख्याल रखना भी तोह आप hi का फ़र्ज़ है. इससे थोड़ा नखरे दिखने दें, इसी में तोह मज़ा है."

हिरा ने फिर कहा, "अब्बू आप से मैं भी उतना hi प्यार करती हूँ जितना सीमा एपीआई और आयेशा बजी करती हैं... आप चाहें तोह मैं अभी आपका लुंड चूस दूँगी यहीं सब के सामने, या आपको मेरे ये छोटे मम्मी छोड़ने हैं तोह छोड़ लीजिये मैं मन नहीं करुँगी, लेकिन मैं अभी आपको मेरी छूट नहीं दूँगी. इसके लिए मुझे और वक़्त चाहिए." हिरा ने रोनी सी सूरत बनायीं जिस पर सब हंस दिए... रशीद साहब भी हल्का सा मुस्कुरा दिए.

आयेशा ने होंठ भींचिये, उसकी जलन अब गुस्से में बदल रही थी. नसीम ने माहौल को संभालने के लिए उस्मान और ज़ोया के रिश्ते का बम फोरने का ये सही मौक़ा जाना.

नसीम ने आयेशा की बेचैनी समझी और उसकी तरफ देखते हुए कहा, "हमें प्यार और मोहब्बत से hi एक दूसरे से मज़ा लेना है. और फिर अब वक़्त है खंडन को बढ़ने का. मैंने सोचा है के क्यों न हम उस्मान और ज़ोया के रिश्ते की बात शुरू करें शमीम बजी से? कराची से बिलाल और उसके घर वाले जब आएंगे, तोह हम ये दावत इसी ख़ुशी में रखेंगे."

ये सुनते hi उस्मान के हाथ से निवाला गिरते गिरते बचा. उसने शॉक में नसीम को देखा, जबकि हमजा और आयेशा ने एक्ससिटेमेंट दिखाई. "वह अम्मी! ये तोह बहुत ज़बरदस्त खबर है," आयेशा ने चहकते हुए कहा और रशीद साहब की तरफ झुकी. "अब्बू, अब तोह गुस्सा थूक दें. देखिये घर में कितनी खुशियां आने वाली हैं. हिरा भी मान जाएगी, बस आप थोड़ा नरम पर जाएं."

रशीद साहब का सख्त चेहरा पिघलने लगा तोह उस्मान ने मौक़ा देख कर छेड़ते हुए कहा, "अब्बू, लगता है हिरा ने कोई 'जवान खिलाडी' ढून्ढ रखा है, तभी इतनी बड़ी शर्त रख रही है. कहीं ऐसा न हो के आप इंतज़ार करते रह जाएं और मैदान कोई और मार ले जाये."

इधर हमजा ने भी हँसते हुए बोलै, "भैया सही कह रहे हैं. सीमा एपीआई और आयेशा बजी तोह अब्बू के तजुर्बे की दीवानी हैं, मगर हिरा को शायद 'zor-azmayi' ज़्यादा पसंद है."

रशीद साहब ने हमजा और उस्मान को घूरा, मगर उनकी नज़रों में अब ग़ुस्सा नहीं था, लेकिन एक मायूसी ज़रूर थी. उन्होंने हिरा का हाथ थपथपाया, "ठीक है हिरा, मैं तुम्हारे जज़्बातो का लिहाज़ रखूँगा, लेकिन अपने इस बूढ़े बाप को ज़्यादा मायूस मत करना."

सीमा ने रशीद साहब की मायूसी को महसूस किया और उन्हें खुश करने की नियत से कुर्सी पर थोड़ा आगे को झुकी, जिससे उसकी गोरी गर्दन और सेक्सी क्लीवेज रशीद साहब के बिलकुल सामने आ गयी. "अब्बू... ये रूठना मानना तोह अपनी जगह है, मगर मेरी भी एक ख्वाहिश है," सीमा ने निहायत धीरे और नशीली आवाज़ में कहा. "वैसे तोह हमारे घर में मर्दानगी की खिल्लत नहीं है, मगर मुझे आपके उस मरदाना तजुर्बे की तालाब है जो मुझे 'दूसरी तरफ' (गांड) से फ़तेह कर सके. अम्मी ने बताया है आप इस फानन में उस्ताद हैं. हिरा जब तक नखरे दिखती है, तब तक क्यों न आप मुझ पर अपना तजुर्बा आज़माएं?"

रशीद साहब की आँखों में अचानक एक चमक आयी. सीमा की इस be-baak पेशकश ने उनकी मायूसी को काफूर कर दिया. "नसीम... हमारी बेटियां वाक़ई मर्दों को रिझाना जानती हैं," रशीद साहब ने ठंडी सांस लेते हुए कहा. "ठीक है. हिरा को उसका वक़्त दिया, मगर सीमा... तुम्हारी ख्वाहिश कल hi पूरी होगी."

हमजा ने शरारत से सीमा की तरफ देखा, "बजी, अब्बू का 'पिछले रास्ता' खोलने का तजुर्बा तोह बड़ा mash'hoor hi लगता है, मगर संभल कर... कहीं आपका पिछले दरवाज़ा हमेशा के लिए न खुला रह जाये!"

नसीम ने हिरा की तरफ देख कर आँख मारी. पूरे दस्तरख्वान पर अब खाना काम और आने वाली रंगीन रातों की साज़िशें ज़्यादा परोसी जा रही थीं.

सब का खाना ख़तम हुआ. सब काम निपटा कर जब सीमा ऊपर अपने कमरे में जाने लगी तोह हमजा ने उसे रस्ते में hi रोक लिया. "आपि, आप अपनी गांड का पहला मौक़ा मुझे hi देने वाली थीं, आप ने वडा भी किया था... क्या आप अपना वडा तोड़ेंगी?"

सीमा ने हमजा के लुंड को उसके ट्राउज़र्स के ऊपर से hi दबाते हुए कहा, "क्या करूँ हमजा, अब्बू का वो मायूस चेहरा मुझसे देखा नहीं गया इसलिए मजबूरी में मैंने अब्बू को ऑफर दे दी. लेकिन तू फ़िक्र न कर, मैं जल्दी तेरे लिए मेरी सास शमीम खला को रेडी करने वाली हूँ. मेरे बदले तू उनकी गांड मार लेना."

"कोई बात नहीं आपि, मुझे 'seal-veal' की कोई ऐसी ख्वाहिश नहीं है. प्यार से जो भी जब भी कोई मौक़ा मिल जाये मैं उसी में खुश हो जाता हूँ," हमजा ने साफ़ दिली से कह दिया. सीमा ने उसकी साफ़ दिली का इनाम प्यार से उसके होंठ चूस कर दिया,









और थकावट की वजह से दोनों अपने अपने कमरों में चले गए..

सन 4: हिरा का कमरा — राज़ और इरादे

रात के दो बज रहे थे. हवेली में हर तरफ एक गहरा और भीतर तक उतर जाने वाला सन्नाटा था, सिर्फ पुराणी deewar-ghari के टिकटिकने की मद्धम आवाज़ कॉरिडोर की ख़ामोशी को चीयर रही थी. हमजा ने निहायत दबे पाऊँ हिरा के कमरे का दरवाज़ा खोला और अंदर दाखिल हो गया. हिरा बिस्टेर पर दोनों घुटने सीने से लगाए, अजीब सी उलझन और सोच में डूबी हुई थी.

"हिरा बजी? सोइ नहीं अब तक?" हमजा ने धीरे से दरवाज़ा बंद करते हुए पूछा.

हिरा ने झटके से गर्दन मोर कर उसे देखा, उसकी आँखों में dastar-khwan वाली वह शोखी नहीं थी, बल्कि एक थकन सी थी. फिर भी उसने खुद को सँभालते हुए हलकी सी मुस्कराहट बिखरी. "कैसे सो जाती हमजा? आज जो तमाशा टेबल पर लगा कर आयी हूँ, उसकी थरथराहट अभी तक जिस्म से गयी नहीं है."

हमजा धीरे से उसके पास बिस्टेर पर बैठ गया. "वाक़ई बजी, आपने तोह आज हद्द कर दी. अब्बू के सामने वह 'जवान लुंड' वाली शर्त... और फिर वह लुंड चूसने वाली ऑफर? पूरा खंडन शॉक में था. मुझे लगा आप वाक़ई इतनी be-baak हो गयी हो."

हिरा ने एक गहरी सांस ली और अपना काँपता हुआ हाथ हमजा के बाज़ू पर रख दिया. उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं. "हमजा... मैं पागल नहीं हूँ, और न hi मैं इतनी निदारर हूँ जितना दिखने की कोशिश करती हूँ. मैं जानती हूँ अब्बू की रगों में कितनी भेड़िया नुमा हवस दौड़ रही है. अगर मैं आज सिर्फ 'न' कह देती, तोह वो मुझे दांत कर या zor-zabardasti से अभी तक अपने बिस्तर पर लिटाये हुए होते."

उसने अपनी नज़रें झुका लीन, उसके चेहरे पर एक अजीब सी शर्मिंदगी और डर के साये साफ़ नज़र आने लगे. "असल बात कुछ और है हमजा... मैं बोहोत दरी हुई हूँ. मैंने आयेशा बजी की वह दर्दनाक हालत अपनी आँखों से देखि है जब उनकी सील टूटी थी. अब्बू का वह 9-इंच का मोटा और भरी लुंड... उसके बारे में सोच कर hi मेरी रूह काँप जाती है. इतने दिनों तक तोह मैं इस खौफ को मस्ती मज़ाक़ और chhed-khaniyon के पीछे छुपाती आयी हूँ, मगर आज जब dastar-khwan पर मुझे लगा के अब वही अज़्दहा (पाइथन) मेरी छूट पर वार करने के लिए बिलकुल तना खरा है... तोह अंदर से मेरा दम निकल गया."

हमजा ने हैरत और हमदर्दी से उसे देखा. हिरा ने धीरे से अपना सर हमजा के कंधे पर टिका दिया. "मुझे सबके सामने यह बोलते हुए शर्म आ रही थी के मैं अब्बू के उस मोठे औज़ार से डर कर भाग रही हूँ... इसलिए मैंने वह 'जवान लुंड' और 'नयी जवानी' का पूरा खेल रचा. ताके अब्बू को लगे के उनका मुक़ाबला किसी और से है, और उनकी मरदाना आना थोड़ी ढीली पद जाये. इस झूट की आड़ में मैंने न सिर्फ अपने लिए थोड़ा वक़्त निकल लिया, बल्कि उन्हें मायूस कर सीमा बजी की तरफ ढाका भी दे दिया."

हमजा ने फिक्रमंदी से उसकी थोड़ी को ऊपर उठाया. "मगर बजी, कब तक? अब्बू कल नहीं तोह परसो फिर तुम्हारी तरफ देखेंगे. यह डर कब तक छुपाओगी?"

हिरा ने हमजा की नरम और जवान आँखों में देखा, जहाँ कोई खौफनाक हवस नहीं बल्कि एक अपनापन था. "तब तक हमजा, जब तक तुम पूरी तरह तैयार नहीं हो जाते. मैं चाहती हूँ के मेरी छूट की सील इस हवेली के सब से स्पेशल और जवान लुंड से टूटे, ताके मुझे वह बेहनाप दर्द न मिले जो आयेशा बजी ने झेला. मैं अपनी पहली चुदाई तुम्हारे साथ नरम और स्पेशल बनाना चाहती हूँ, अब्बू के उस बेरहम मोठे लुंड के साथ नहीं. क्या तुम मुझे इस डर से नहीं निकलोगे?"

हमजा का दिल ये सुन कर ज़ोर से धरकने लगा. हिरा की इस मासूमियत और उसके अंदर छुपे डर ने हमजा के अंदर एक मरदाना हिफाज़त का जज़्बा जगा दिया. उसने हिरा को बाज़ुओं में कसकर क़रीब खिंचा और उसके माथे को निहायत नरमी से चूमा. "मैं आपको कभी मायूस नहीं करूँगा, बजी. आपकी सील पर पहला और आखरी हक़ मेरा hi होगा, आप फ़िक्र न करें. वैसे... आज मेरे साथ भी कुछ अजीब हुआ है."

हिरा ने अपनी बेचैनी को थोड़ा पीछे ढेलडे हुए तजस्सुस से पूछा, "क्या? मिस किरण के घर फिजिक्स कैसी रही?"

हमजा ने हप्ते हुए पूरा किस्सा sunaya—kaise मिस किरण ने उसे गेस्ट रूम में बुलाया, कैसे उन्होंने उसका "टेस्ट" लिया, और सब से बड़ी बात, कैसे उनकी बेटी फलक ने उन्हें उस हालत में देख लिया.

हिरा की आँखें फटी की फटी रह गयीं. "क्या?! फलक ने देख लिया? और मिस किरण ने उसे रोका तक नहीं?"

"नहीं," हमजा ने सर हिलाया. "मिस ने बस इशारा किया और वो चली गयी. ऐसा लगता है जैसे उस घर में भी वही सब नार्मल है जो यहाँ होता है. फलक की नज़रों में डर नहीं था हिरा बजी... वहां कुछ और hi था. शायद भूक, या शायद जलन."

हिरा ने एक शैतानी मुस्कराहट के साथ हमजा की थोड़ी पकड़ी. "तोह इसका मतलब है के तुम सिर्फ माँ को hi नहीं, बेटी को भी फंसने वाले हो? हमजा, तुम तोह बड़े खिलाडी निकले."

"अभी तोह शुरुआत है हिरा बजी," हमजा ने उसके लबों के क़रीब होते हुए कहा. "मिस किरण ने मुझे कल फिर बुलाया है. उन्होंने कहा है के कल 'फाॅर्स' और 'फ्रिक्शन' का अगला chapter पढ़ाएंगी."

हिरा ने हमजा के होंठ चूस लिए. "ठीक है... तुम वहां फिजिक्स पढ़ो, मैं यहाँ अब्बू को हैंडल करती हूँ. मगर याद रखना हमजा... पहला हक़ मेरा है."

दोनों एक दूसरे की बाँहों में सिमट गए. हवेली की दीवारों ने एक और नए गुनाह की साज़िश को अपने अंदर जज़्ब कर लिया.

Episode 33 ख़तम

क्लिफहैंगर: एक तरफ हमजा और हिरा अगले बड़े खेल की तयारी कर रहे हैं, तोह दूसरी तरफ रशीद साहब, सीमा की "पिछली तरफ" वाली दावत के इंतज़ार में हैं. मगर क्या हिरा अपने अब्बू के बेरहम लुंड से अपनी छूट बचा पायेगी? और क्या शमीम बनु, बिलाल की बेरुखी को बर्दाश्त कर पाएंगी या फिर कोई बड़ा क़दम उठाएंगी?
 
Back
Top