Incest GHAR KI AAG (URDU) - Page 6 - SexBaba
  • From this section you can read all the hindi sex stories in hindi font. These are collected from the various sources which make your cock rock hard in the night. All are having the collections of like maa beta, devar bhabhi, indian aunty, college girl. All these are the amazing chudai stories for you guys in these forum.

    If You are unable to access the site then try to access the site via VPN Try these are vpn App Click Here

Incest GHAR KI AAG (URDU)

घर की आग

Episode 25: डर का माहौल और Khoon-Rezi

सन 1: हॉल का धमाका — Parda-Fash

हवेली के हॉल में सन्नाटा किसी ऊँची दीवार की तरह खड़ा था. दरवाज़े पर रशीद साहब, नसीम और उस्मान को देख कर हमजा का हाथ झटके से आयेशा की छाती से हटा. हिरा, जो हमजा के लुंड का चोप्पा लगाने में मसरूफ थी, अचानक उनके (ख़ास कर नसीम के) आजाने से वही पत्थर की बन गयी. हिरा नेचर से तो चुलबुली और बेबाक थी लेकिन नसीम से पता नहीं क्यों उसकी इतनी पहतहती थी.

सब से बुरा हाल आयेशा का था. उसने जब अपने बाप की नज़रें अपने नंगे निप्पल्स पर देखि, तोह उसकी रूह कैंप गयी. वो रोने वाले लहज़े में सोफे के पीछे दुबकने की नाकाम कोशिश करने लगी, अपने हाथों से अपने बदन को ढकने की कोशिश करती हुई. "अब्बू... वो... मैं..." उसके मुँह से अलफ़ाज़ नहीं निकल रहे थे.

मगर सीमा, जो नंगी छाती पर दुपट्टा ओढ़े बैठी थी, बिलकुल पुरसुकून थी. वो उठी और मुस्कुरा कर नसीम के पास गयी. "अम्मी, इतनी देर करदी? सिद्दीकी का बंद बजा कर आये या नहीं?"

नसीम ने उसे घूरा, एक झूठा ग़ुस्सा दिखते हुए डांटा, "सीमा! शर्म कर थोड़ी! बाप खड़ा है सामने और तू ऐसे सवाल कर रही है? पहले जाकर अपने ये बहार निकलते हुए मम्मों को तोह धक्, पूरी रांड लग रही है इस वक़्त!"

सीमा नसीम की प्यार भरी दांत, फिर अपना हुलिया देख कर शर्मा गयी. उसने चोर निगाहों से रशीद साहब को देखा तोह उनके चेहरे पर उसे ग़ुस्से और हैरत के मिले झूले taa-ssurat नज़र आये, फिर जब उसकी नज़र उस्मान से मिली तोह दोनों ने एक दूसरे को देख कर मुस्कुराया.

नसीम ने माहौल को सँभालने के लिए हमजा और हिरा को इशारा किया. "तुम दोनों जाओ यहाँ से, बहुत खेल लिया तुमने. उस्मान, तुम ऊपर जाहि रहे हो तोह ये लैपटॉप भी ले जा अपना साथ में."

सब निकल लिए अपनी अपनी जगह लेकिन, रशीद साहब अभी भी आयेशा को देख रहे थे, उनकी आँखों में गुस्सा काम और एक अजीब सी हैरतज़दा फिक्रमंदी ज़्यादा थी. "आयेशा...," बेसाख्ता hi रशीद की जुबां से धेरै से निकला, मगर आयेशा ने दर के मारे अपना चेहरा हाथों में छुपा लिया.

नसीम ने आयेशा का हाथ पकड़ा और उसे सहारा देकर उठाते हुए कहा, "सीमा, रशीद साहब का ख्याल रख, इन्हें ठंडा पानी पीला. मैं ज़रा आयेशा को संभालती हूँ, इसकी हालत देख कर लगता है के इसकी जान hi न निकल जाए." नसीम आयेशा को उसके कमरे की तरफ ले गयी, जहाँ आयेशा की सिसकारियां अब भी हॉल में गूँज रही थीं.

सन 2: सीमा का मश्वरा और नसीम का फैसला — "कुंवारेपन" का सौदा

आयेशा के कमरे में नसीम ने उसे पानी पिलाया और उसके सर पर हाथ रखा. "श... रोना बंद कर. कुछ नहीं हुआ...., और न hi तुमलोगों ने कुछ ग़लत किया है. सब हमारे इस प्यारे से घर में अपनी मर्ज़ी से जैसे चाहे रहसकते हैं. (आयेशा की हिचकियाँ अब भी जारी थीं, उसकी हालत एक पैनिक अटैक" जैसी थी) कोई भी तुमसे नाराज़ नहीं हैं, मैं केहरहि हूँ न..., न मैं न तुम्हारे abbu....koi भी नहीं. मुझे ख़ुशी है के हिरा की तरह तुम भी अपनी खुशियां ढूढ़ना सीख रही हो. चुप होजा मेरी बच्ची..., रोना बंद kar......,haan अब चुप होजा." नसीम की तसल्ली और प्यार ने आयेशा को कुछ हद तक सेटल करदिया था. थोड़ी देर नसीम वहीँ बैठी रही लेकिन जब आयेशा को सुकून में आता देकर वो (नसीम) वापिस रशीद साहब के पास आयी. सीमा वहां पहले से hi रशीद के सहने सेहला रही थी.

"रशीद साहब, इतना मत सोंचिये," नसीम ने उनके पास बैठ कर कहा. "ये जवान खून है. इन्हें जितना रोकेंगे, ये उतना hi गलत रास्ता पकड़ेंगे. आयेशा मासूम है, मगर उसके अंदर की आग हमजा ने भरका दी है. अगर आज हमने टोक दिया या उसे नहीं संभाला toh,.....,toh वो कल बहार मुँह मरने की कोशिश करेगी, जबकि पहले से hi सिद्दीकी और अबरार जैसे भेड़िये टाक लगाए बैठे रहते हैं."

सीमा ने बात को आगे बढ़ाया, "अब्बू, आयेशा का दिल हमेशा से आपके लिए धड़कता देखा है हमने. वो हमजा के पास सिर्फ इसलिए गयी क्यूंकि आपने कभी उसे अपना प्यार दिखाया hi नहीं."

डिस्कशन गहरा होता गया. रशीद साहब घबराये हुए थे. "लेकिन नसीम... वो मेरी बेटी है. मैं कैसे...?"

नसीम ने उनका हाथ पकड़ा, "इसलिए के आप इस घर के मालिक हैं. आपकी मर्दानगी hi उसे रांड बनने से बचा सकती है. आज hi सही वक़्त है जब वो गरम भी है और दरी हुई भी. सीमा, जा... आयेशा को तैयार कर. उसे समझा कर यहाँ ले आए., आयेशा को बता के उसके अब्बू उसे सजा नहीं, मज़ा देना चहरहे हैं."

"लेकिन नसीम... मैं... मेरी उम्र... क्या मैं कर paunga....?.......wo जवान है और शायद.. कुंवारी भी.....!" रशीद ने हिचकिचाते हुए पूछा.

सीमा ने मुस्कुरा कर अपनी अम्मी की तरफ देखा. "उसका इंतेज़ाम हम करलेंगे, आप फ़िक्र न करें. मैं आपके लिए 'शाही माजून' और मिल्क शेक लरहि हूँ, और अगर ज़रूरत पड़ी तोह एक गोली (वियाग्रा) भी है. मगर मुझे लगता है के जब आप नंगी आयेशा को अपने सामने देखेंगे, तोह आपको किसी दवा की ज़रूरत नहीं पड़ेगी."

सीमा मुस्कुराते हुए आयेशा के पास गयी. आयेशा अब भी बिस्तर पर सेहमी हुई बैठी थी.

"आयेशा, मेरी जान... तू क्यों इतना डर रही है?" सीमा ने उसके पास बैठ कर उसका हाथ पकड़ा.

"एपीआई... अब्बू मुझे मार डालेंगे न? मैंने... मैंने हमजा के साथ जो किया..." आयेशा ने रट हुए कहा.

सीमा ने उसके आंसू पोंछे, "पागल है क्या? अब्बू तोह तुझसे बोहोत प्यार करते हैं. उल्टा वो तोह परेशां हैं के मेरी इतनी हसीं बेटी हमजा जैसे बचे के पास क्यों गयी...? आयेशा, अब्बू तुझे सजा नहीं देना चाहते, बल्कि वो चाहते हैं के तुझे वो मज़ा दें जो हमजा अभीतक नहीं दे सका. सोच, इतने pur-waqar मर्द का लम्स (टच)... क्या तू नहीं चाहती के अब्बू तुझे अपने हाथों से प्यार करें?"

आयेशा ने हैरत से देखा, "लेकिन एपीआई... वो तोह अब्बू हैं..."

"वही तोह मज़ा है आयेशा. इस हवेली में कोई पर्दा नहीं. देख मुझे, देख अम्मी को... हम सब आपस के प्यार में कितने खुश हैं. तू बस मेरे साथ चल, बाकी मुझ पर छोड़ दे." सीमा की बातों ने आयेशा के अंदर एक अजीब सी हलचल पैदा कर दी. डर के पीछे एक an-jaani ख्वाहिश ने अंगड़ाई ली.

सन 3: आयेशा की जवानी और रशीद का पानी

सीमा आयेशा को धेरै से रशीद साहब के कमरे में ले गयी. कमरे में हलकी मद्धम रौशनी थी. रशीद साहब बीएड पर बैठे थे, उनके चेहरे पर अब ग़ुस्सा नहीं बल्कि एक मरदाना be-chaini थी. नसीम उनके बराबर बैठी उनका हाथ सेहला रही थी.

"आइये, हमारी शहज़ादी आ गयी," नसीम ने उठ कर आयेशा को रशीद के क़रीब बिठाया. रशीद ने हिचकिचाते हुए आयेशा के कंधे पर हाथ रखा.

"आयेशा... बेटी... ऐसे डरो नहीं, मेरे पास तोह आओ... मैं भी तोह देखूं मेरी मासूम बेटी कैसे बदल रही है" रशीद की भरी मगर रोमानी आवाज़ ने आयेशा के जिस्म में सिहरन (शिवर) पैदा कर दी.

"अब्बू... I'm सॉरी," आयेशा ने नज़रें झुका कर कहा.

रशीद ने उसकी थोड़ी (चीन) ऊपर की और पहली बार अपनी बेटी की आँखों में एक मर्द की नज़र से देखा. "सॉरी नहीं बेटी... आज से सिर्फ प्यार."





रशीद ने धेरै से झुक कर आयेशा के माथे को चूमा, और फिर dhire-dhire उनके होंठ आयेशा के गालों से होते हुए उसके होठों पर जा टिकी. ये पहला किश था.





आयेशा ने पहले झटका खाया मगर फिर रशीद के मरदाना लम्स ने उसे पिघला दिया. नसीम और सीमा दोनों ने मिल कर आयेशा की क़मीज़ उतरी. आयेशा के gore-chitte और कमसिन मम्मी रशीद के सामने थे.

रशीद साहब ने कांपते हाथों से आयेशा के मम्मों को छूना शुरू किया. आयेशा ने पहली बार अपने बाप का खुरदुरा (रफ़) हाथ अपने जिस्म पर महसूस किया तोह एक ठंडी सिसकारी ली. रशीद ने झुक कर उसके निप्पल्स को अपने मुँह में लिया.





"अह्ह्ह... अब्बू... उफ़... धेरै," आयेशा ने उनके बाल मुट्ठी में जाकर लिए. रशीद ने कांपते हाथों से उन मम्मों को थमा. "कितने नरम हैं... बिलकुल रुई जैसे," उन्होंने एक मां मुट्ठी में भरा और ज़ोर से दबाया.





"अह्ह्ह... अब्बू... उफ़..." आयेशा की सिसकारी निकली. रशीद ने झुक कर निप्पल्स को अपने मुँह में भर लिया और उन्हें डेंटन से हल्का सा कतरने लगे.





"अह्ह्ह... नहीं..... अब्बू... प्लीज दर्द होरहा है....., please.......uff..." आयेशा तड़पने लगी.

सीमा ने रशीद का कुरता उतरा और उनके जिस्म पर हाथ फेरने लगी, जबकि नसीम आयेशा की सलवार उतार कर उसकी बिलकुल साफ़ और कमसिन छूट को सहलाने लगी. आयेशा तड़प रही थी, उसका जिस्म पहली बार इतने हाथों का नशा चख रहा था.

सीमा पीछे से बोली, "अब्बू, इसे थोड़ा गन्दा बोलना शुरू कीजिये, देखिये कैसे पागल होती है ये रांड!"

रशीद साहब ने आयेशा की आँखों में देखा. "आयेशा... तेरी ये तंग छूट आज से मेरे इस बड़े लुंड को रोज़ तरसेगी. तू मेरी सब से प्यारी रांड बेटी है न."

रशीद ने अपनी लुंगी निकाली.





उनका 9 इंच का कला और सख्त लुंड देख कर आयेशा की आंखें पहात गयीं.





"अब्बू... ये... ये मुझ में नहीं जायेगा! मैं मर जाउंगी!,





नहीं प्लीज अम्मी..... मुझे दर लग रहा है.... अम्मी, मुझे नहीं करना ये सब, प्लीज मुझे बचालो.... मैं मर जौंगीयी......."





आयेशा की घबराहट देख रशीद साहब थोड़ा पीछे हटने लगे सीमा ने उनके नंगे लुंड को, जो आयेशा की घबराहट से कुछ जोश खोता हुआ नज़र आरहा था, अपने हाथ में पकड़कर सहलाते हुए kaha.."ye पीछे हट ने का वक़्त नहीं है अब्बू."





आयेशा की इस चीख पुकार से नसीम चिड़चिड़ाहट में आगयी, नसीम ने आयेशा की टांगें फैलायीं और उसके छूट के लबों पर तेल लगाया. "नहीं मारेगी छिनाल! बर्दाश्त कर."





नसीम ने hi रशीद के लुंड को अपने हाथ से पकड़ कर उसके छूट के खरीब लायी और लुंड की टोपी को आयेशा की कुंवारी छोट की दरार में सेट किया और हल्का सा धक्का मरने को कहा. "शुरू कीजिये रशीद साहब, मैदान तैयार है नयी इन्निंग्स के लिए."

"अब्बू प्लीज....... अम्मी... नहीं.... Ammiiiii......please...... रुको........





रशीद साहब ने पहला धक्का बहोत hi एहतियात और धीरे से मारा... उनके लुंड की टोपी आयेशा के कुंवारेपन को तोड़ने की कोशिश में छूट के लबों को चीरते हुए अंदर दाखिल हो चुकी थी.





"आआह्ह्ह्हह्ह्ह्हह!!!!" आयेशा की एक dard-bhari चीख कमरे में गूंजी.





उसके होंठ नीले पद गए, एक और धीमा धक्का लगाया रशीद ने तोह उसकी छूट के किनारे फटने लगे थे.







"आआह्ह्ह!" आयेशा की चीख निकल गयी. "निकलू... पहात रही हूँ मैं......!"





"नहीं मेरी पहली sautan(Co-Wife), अभी तोह शुरू हुआ है," नसीम ने कहा और रशीद की कमर पर थपकी देते हुए ज़ोर लगाने का इशारा किया. रशीद ने एक बोहोत बड़ा और faisla-kun धक्का मारा.





"पलोपपपपपपप!"

लुंड पूरा जड़ तक आयेशा की सील तोड़ते हुए अंदर धस गया. आयेशा का जिस्म कमान की तरह अकड़ा और फिर ढीला पद गया.





उसकी छूट से खून की एक धार निकली जो सफ़ेद चादर पर फैल गयी.









"अह्ह्ह... बहनचोद कितनी तंग है!" रशीद ने भांपते हुए कहा.

नसीम ने आयेशा के आंसू पोंछे. "शाबाश मेरी बेटी... अब तू असली औरत बन गयी है."





रशीद ने dhire-dhire धक्के मारना शुरू किये. थप... थप... थप... नसीम आयेशा के निप्पल्स को चूस रही थी ताके उसका दर्द काम हो और जोश बना रहे. आयेशा, जो पहले दर्द से कराह रही थी, अब dhire-dhire मज़े लेने लगी. उसने अपनी टांगें रशीद की कमर के गिर्द लपेट लीन.





"हाँ... अब्बू... मारो... फॉर दो अपनी इस छिनाल बेटी को!" आयेशा के मुँह से जब ये लफ्ज़ निकले, तोह रशीद का जोश हद्द से गुज़र गया. उन्होंने be-rehami से धक्के मारना शुरू किये.





आयेशा की तड़प और उसकी सिसकारियां पूरे कमरे का माहौल गरम कर चुकी थी, अगले 8-10 मिनट्स तक यह घमासान चलता रहा, आयेशा ज़्यादा देर झेल नहीं पायी और ढीली पढ़ गयी...... नसीम और सीमा का भी बुरा हाल था छूट में ऊँगली करते करते ये दोनों भी झाड़ चुकी थी.

जब रशीद का जोश जवाब दे गया तोह उन्होंने भी अपने धक्कों की रफ़्तार तेज़ करदी और "ले रांड... ले मेरा गरम माल!" रशीद ने चिल्ला कर कहा और आखरी धक्का मार कर लुंड बहार निकाला.





अगले hi पल, उनका गधा और सफ़ेद लावा आयेशा के गोर पेट और उसके नंगे मम्मों पर धार बन कर गिरने लगा.





आयेशा निढाल होकर लेती रही. उसके जिस्म पर उसके बाप की मर्दानगी चमक रही थी. नसीम ने आगे बढ़ कर वो "माल" अपनी ऊँगली से उठाया और आयेशा को चटवाया. "ये है तेरी इस जीतका इनाम, आयेशा."

सन 4: कराची — बिलाल का कनफ्लिक्ट

कराची में रात के 3 बज रहे थे. बिलाल अपनी बालकनी में खड़ा था. उसके दिमाग में लाहौर की हवेली का वो मंज़र baar-baar घूम रहा था जहाँ उसने नसीम को नंगा करके छोड़ रहा था.

उसने मुद कर कमरे में देखा जहाँ उसकी माँ शमीम और बहनें सो रही थीं. शमीम की निघ्त्य थोड़ी ऊपर थी, उनकी गोरी टांगें नज़र आ रही थीं. बिलाल के दिमाग में एक गन्दा ख्याल आया मगर उसने झटके से अपना सर हिला दिया.

"नहीं... ये क्या सोंच रहा हूँ मैं? वो मेरी माँ है... वो मेरी बहनें हैं," उसने खुद से कहा. बिलाल का दिल छह रहा था के वो सब भूल जाये, मगर लाहौर का नशा उसकी रगों में दौड़ रहा था. वो इन मासूम जिस्मों में अब वही हवस ढून्ढ रहा था जिस हवस में वो लाहौर से नाहा कर आया था.

**Episode 25 ख़तम**

क्लिफहैंगर: आयेशा की शर्म टूट चुकी है और वो अब इस गन्दी राह की मुसाफिर बन गयी है. मगर कराची में बिलाल की मासूमियत और हवस के बीच का यह कनफ्लिक्ट क्या रंग लाएगा?



 
गुड नाईट गाइस.... थका हुआ हूँ, सवेरे फिर मुलाखत होगी.....
 
घर की आग

Episode 26: कराची की खामोश गर्मी और लाहौर का नया सवेरा

सन 1: कराची — बिलाल का घर (रात का पहला पहर)

कराची की हवा में नमक और हिद्दत (हमीदित्य) हमेशा रहती है. समंदर की तरफ से आने वाली गरम हवाओं ने शहर को अपनी लपेट में ले रखा था. बिलाल अपने कमरे में adh-nanga बदन लेता हुआ था, सिर्फ एक पतली बनयान पहनी थी, मगर गर्मी थम ने का नाम नहीं ले रही थी. एक तोह ठीक से चल रहा था मगर हवा hi बिलकुल गरम थी.

बिलाल की आँखों में नींद का nam-o-nishan नहीं था. जब से वह लाहौर से लौटा था, उसके दिमाग में एक अजीब सी खलबली मची हुई थी. उसने अपनी सास नसीम के साथ जो वक़्त गुज़ारा था, उनका वो नशीला बदन और वो बेशरम बातें... वो सब बिलाल के दिमाग में किसी फिल्म की तरह bar-bar घूम रही थीं.

तभी दरवाज़ा धीरे से खुला. बिलाल की अम्मी, शमीम बनु (54 साल), दाखिल हुईं. शमीम बनु इस उम्र में भी निहायत हसीं थीं. उनका बदन अभी भी कैसा हुआ था और शराफत उनके चेहरे से टपकती थी. उन्होंने एक बारीक मलमल की सफ़ेद क़मीज़ और शलवार पहनी थी. गर्मी और पसीने की वजह से वो क़मीज़ उनके कन्धों और पीठ से चिपक रही थी, जिसके निचे से उनकी गोरी जिल्द साफ़ नज़र आ रही थी.

"बिलाल... बीटा, सोये नहीं अब तक? तुम्हारे लिए दूध लायी हूँ," शमीम ने बिलाल के सर पर हाथ रखते हुए कहा.

बिलाल ने चौंक कर देखा. शमीम ने दूध का गिलास साइड टेबल पर रखा और बिलाल के क़रीब बीएड पर बैठ गयीं. जब वो झुकीं, तोह उनके गले का गहरा कट नुमाया हुआ, जहाँ से उनका नरम और गोरा बदन नज़र आ रहा था. बिलाल ने फ़ौरन अपनी नज़रें फेर लीन, मगर उसके दिमाग में नसीम का ज़हर धीरे धीरे फैल रहा था.

"बस अम्मी... काम की थोड़ी टेंशन थी," बिलाल ने लड़खड़ाती आवाज़ में कहा.

"इतना ज़्यादा भी काम मत किया करो. देखो कितने दुबले हो गए हो," शमीम ने उसका चेहरा थमा. उनके हाथों की ठंडक बिलाल को सुकून देने की जगह बेचैन कर रही थी. वो अपनी माँ के इतने क़रीब होने से डर रहा था. पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था इस घर में.

"अम्मी, आप जाकर सो जाएं, काफी रात हो गयी है," बिलाल ने धीरे से उनका हाथ हटाया. शमीम को थोड़ा अजीब लगा, मगर वो मुस्कुरा कर चली गयीं. दरवाज़े से निकलते वक़्त उनकी मातुरे गांड का झूला बिलाल की नज़रों ने महसूस किया, और उसने झटके से तकिये में मुँह छुपा लिया. 'नहीं बिलाल... ये तेरी अम्मी है!' उसका दिल चिल्लाया.

सन 2: लाहौर — हवेली (सुबह का मंज़र)





लाहौर की हवेली में सुबह हो चुकी थी. आयेशा के लिए ये ज़िन्दगी की एक नयी सुबह थी. रात जो दर्द और मज़ा उसने अपने बाप, रशीद साहब, के हाथों चखा था, उसने उसके चलने ढलने का अंदाज़ बदल दिया था.

नसीम किचन में नाश्ता बना रही थी. रशीद साहब कुर्सी पर बैठे अख़बार पढ़ रहे थे, मगर उनकी नज़रें baar-baar आयेशा पर जा रही थीं जो abhi-abhi कमरे से निकली थी. आयेशा ने आज दुपट्टा नहीं लिया था, सिर्फ एक ढीली क़मीज़ थी. उसके चेहरे पर अब वह पहली वाली मासूमियत नहीं, बल्कि एक "औरत" होने का गरूर था.

"आयेशा बेटी, आज काफी देर होगयी उठने में?, फज्र में उठने का मामूल छूटना नहीं चाहिए, चाहे रात में कितनी भी देर होजाये." रशीद साहब ने एक गहरी नज़र उस पर डाली.

आयेशा ने अपने बाप की नज़रों का मुक़ाबला किया और मुस्कुरा दी. "जी अब्बू..., आईन्दा ख्याल रखूंगी, लेकिन अगर कभी देर हो तो आप hi उठा दीजिये."

नसीम ने किचन से तवज्जो दी. "कोई बात नहीं रशीद साहब, हमारी शहज़ादी ने कल बोहोत म्हणत की है. क्यों आयेशा?" नसीम ने आंख दबायी. तभी हिरा किचन में दाखिल हुई, उसने एक निहायत hi छोटी सी स्लीवलेस निघ्त्य पहनी थी जिसके साइड से उसके गोर बग़ल और उभार साफ़ झलक रहे थे.

"ओहो! शहज़ादी का नया रूप तोह देखो!" हिरा ने चुलबुलापन दिखते हुए आयेशा के क़रीब आकर उसके नरम मम्मों को हल्का सा चुनती काटा. "रात अब्बू ने लगता है काफी 'सर्विस' की है. चेहरा तोह देखो कैसा गुलाबी हो रहा है, जैसे अभी अभी खेत की ताज़ा फसल काट कर आयी हो!"

आयेशा शर्मा कर नसीम के क़रीब चली गयी. नसीम ने धेरै से उसके कान में कहा, "दर्द कैसा है? रशीद साहब ने पूरा ज़ोर लगाया था न?"

"अम्मी... आप भी न!" आयेशा ने नसीम को गले लगा लिया. "मगर सच में... अब्बू अभी भी काफी 'ताक़तवर' हैं. जब उन्होंने पहला धक्का मारा तोह मुझे लगा मेरा पेट पहात जायेगा, मगर फिर उनका वो गरम लावा... उफ़ अम्मी!"

हिरा ने पीछे से आकर आयेशा की कमर में हाथ डाला. "बजी, इतना मज़ा अकेले मत लो. अब्बू को कहो हमें भी कभी अपने 'शाही दस्तार ख्वान' पर बुलाएं. क्यों अम्मी? क्या सिर्फ आयेशा hi अब्बू की थकान उतरेगी या हमारा भी कुछ 'कोटा' बचता है?"

नसीम ने हिरा की गांड पर एक थप्पड़ मारा. "बदमाश! तू तोह हमेशा hi तैयार बैठी रहती है. बस थोड़ा सब्र कर, अभी आयेशा की गर्मी तोह ठंडी होने दे." तीनो maa-betiyan खुल कर हसने लगीं, और किचन का माहौल हवस की हिद्दत से भर गया.

सन 3: कराची — नाश्ते की टेबल और पहला "टच"





बिलाल नाश्ते की टेबल पर बैठा था. उसकी दोनों बहनें, ज़ोया (26 साल) और फराह (19 साल), भी वहां मौजूद थीं. दोनों hi जवान और हसीं थीं. ज़ोया थोड़ी संजीदा थी मगर फराह काफी चुलबुली थी.

"भैया! आप जब से लाहौर से आते हैं, हमारे लिए कुछ न कुछ लाते hi हैं लेकिन, लगता है इस बार कुछ ज़्यादा hi मसरूफ थे जो खली हाट आगये." फराह ने शिकायत करते हुए बिलाल का हाथ पकड़ा. फराह ने स्लीवलेस बनयान और शार्ट पजामा पहना था, जैसा वो अक्सर घर में पहनती थी. जब उसने बिलाल का हाथ हिलाया, तोह उसके जवान जिस्म का लम्स बिलाल को किसी करंट की तरह लगा.

"फराह! भाई को तंग मत करो," ज़ोया ने डांटा.

"नहीं... कोई बात नहीं," बिलाल ने मुस्कुरा कर कहा, मगर उसने महसूस किया के फराह का एक मां उसके सहने से हल्का सा मास हो रहा है. वो एक मासूम हरकत थी, मगर बिलाल के दिमाग में 'हवस' का नशा चढ़ने लगा था.

शमीम नाश्ता लाते हुए बोली, "बिलाल, आज शाम को मुझे मार्किट ले जाना, घर का कुछ सामन लेना है."

"ठीक है अम्मी," बिलाल ने कहा. उसका दिल डर भी रहा था और चाह भी रहा था के वह अपनी माँ के साथ अकेला वक़्त गुज़ारे.

सन 4: लाहौर — हवेली की छत (शाम का झुंझलाता अँधेरा)

सूरज ढल चूका था और लाहौर की आस्मां पर लाली फेल रही थी. हवेली की छत पर सीमा दीवार से टिक्की कड़ी थी, उसकी नज़रें दूर कहीं जमी थीं मगर दिमाग में ख्यालों का एक तूफ़ान था. नसीम छत पर आयी तोह बेटी को इस तरह खोया हुआ देख कर उसके क़रीब चली गयी.

"सीमा? क्या बात है बीटा, बड़ी गहरी सोच में दिख रही हो?" नसीम ने उसके कंधे पर हाथ रखा.

सीमा ने एक ठंडी सांस भरी. "अम्मी, बस थोड़ा परेशान हूँ. मुझे बिलाल की याद आ रही है. वो कराची में अकेला पता नहीं क्या कर रहा होगा... और यहाँ हवेली में इतना सब कुछ हो गया. सब कुछ इतना बदल गया है."

नसीम ने मुस्कुराते हुए सीमा के सहने thap-thapaye. "बिलाल की फ़िक्र मत कर मेरी जान. मैंने उसे ऐसी घुट्टी पिलाई है और ऐसी 'यादें' दे कर भेजा है के वो कराची में भी हमारा hi नाम जप रहा होगा. वो अब कहीं नहीं जाने वाला."

सीमा ने पलट कर नसीम की आँखों में देखा, "अम्मी, बात सिर्फ बिलाल की नहीं है. सच तोह ये है के मुझे अब यहाँ के इस खुले और नए माहौल की आदत सी हो रही है. अब्बू का ये नया रूप, आपका ये be-bak अंदाज़... मुझे डर लगता है के जब मैं वापस अपने ससुराल कराची जाउंगी, तोह क्या मैं वहां फिर से उसी पुराणी पाबंदियों में एडजस्ट कर पाऊँगी? मेरा बदन अब इस 'आज़ादी' का आदि हो चूका है."





नसीम ने सीमा की थोड़ी (चीन) पकड़ कर ऊपर उठायी और शरारत से मुस्कुरा दी. "पागल न बन. जब बिलाल पूरा बदल जायेगा, तोह तेरा ससुराल भी हवेली जैसा बन जायेगा. वैसे भी, मर्द को मुट्ठी में करना सीख लिया है तूने. मगर देखना ये है के वो अपनी 'फॅमिली' को वहां कैसे हैंडल करता है... तू बस बिलाल से बात करती रहा कर, उसे गर्मी देती रह, उसका भी मूड बना रहेगा और तेरा दिल भी हल्का रहेगा."

"पर मेरा दिल कब हल्का होगा?" अचानक एक भरी मगर मासूम आवाज़ गूंजी.

नसीम और सीमा दोनों चौंक गयी थीं. हमजा उनके बिलकुल पीछे खड़ा था. उसने सिर्फ एक ढीला पजामा और एक स्लीव्स बनयान में था, उसका बदन पसीने में चमक रहा था और उसकी नज़रों में एक अजीब सी भूक थी. सीमा और नसीम ने एक दुसरे को देख कर एक ma’ni-khez मुस्कराहट सांझा की.

"अजा मेरे शेर! तू क्यों मुंह बनाये खड़ा है?" नसीम ने हमजा का हाथ पकड़ कर उसे अपने और सीमा के दरमियान खिंच लिया.

सीमा ने हमजा के गठीले बदन पर हाथ फेरते हुए नसीम से छेड़खानी शुरू की, "अम्मी, लगता है आपका ये लाडला आपके दूध के hi तालाब में इधर उधर भटक रहा है. देखिये तोह सही, कैसा तना हुआ खड़ा है, जैसे अभी फतह कर लेगा सब कुछ."

हमजा ने सिसकारी लेते हुए नसीम की मलमल की क़मीज़ के ऊपर से hi उनके भरे हुए मम्मों पर हाथ रख दिया. "अम्मी... बजी सही कह रही हैं. जब से हमारे इस हवेली की हवा में हवस घुली है, मेरा हर वक़्त खरा रहता है. मुझे सख्त ज़रुरत है... आप दोनों की."

इनकी बातें सुनकर नसीम ने ज़ोर से क़हक़हा लगाया और हमजा के पजामा के ऊपर से hi उसके सख्त लुंड को मुट्ठी में भर लिया.





"क्यों नहीं? अगर मेरा बीटा इतना बेचैन है, तोह माँ और बेहेन किस काम की हैं? हमजा, तुझे पता है न के तेरी सीमा बजी भी अब 'एक्सपर्ट' हो चुकी हैं?"

हमजा ने सिसकारी ली और सीमा के गले में बाहें दाल दिन. "अम्मी... मुझसे अब सब्र नहीं होता. घर में सब को अपना अपना 'साथी' मिल गया है, सिर्फ मैं hi तड़प रहा हूँ."

नसीम ने सीमा को इशारा किया. सीमा ने फ़ौरन wahi'n छत पर बिछी चारपाई पर हमजा को अपनी गोद में लिटा लिया. नसीम ने हमजा के पजामा का नैरा खोला और उसका सख्त और गरम लुंड बहार निकाल लिया. सीमा ने अपने दोनों मम्मों को ब्लाउज से आज़ाद kiya—wo नरम और गोर गुब्बारे हमजा की आँखों के सामने thar-thara रहे थे.

"ले हमजा... चख ले अपनी बजी का दूध," सीमा ने कहते हुए अपना एक मां हमजा के मुँह में ठूंस दिया.



हमजा ने be-sabri से उसे चूसना शुरू किया मगर फिर अचानक रुक कर एक सवाल किया, "लेकिन आपि... इसमें असली दूध कब भरोगी? मुझे तोह वो पीना है."

सीमा और नसीम की एक साथ हंसी निकल गयी. सीमा ने हमजा के सर के बालों को खींचते हुए कहा, "लगता है अब ज़्यादा देर नहीं लगेगी... दो मर्द (बिलाल और उस्मान) आलरेडी म्हणत कर रहे हैं. तुम और अब्बू भी इसमें हाथ बता दो तोह शायद जल्द hi khush-khabri मिल जाये और तेरे मुँह में असली दूध भी आ जाये."

हमजा ने हैरत से नसीम की तरफ देखा, "लेकिन वो बचा होगा किसका? बिलाल भाई का, उस्मान भाई का या मेरा?"

नसीम ने हमजा के लुंड को ज़ोर से दबाया और आँख मार कर बोली, "क्यों रे पागल? इससे क्या फ़र्क़ पड़ता है? होगा तोह इसी हवेली का न! चाहे नुत्फा (सीड) किसी का भी हो, क्या इस हवेली का खून होना काफी नहीं है? हम सब एक हैं, और ये बचा भी हम सबका होगा."

नसीम wahi'n चारपाई के निचे बैठ गयी और हमजा के लुंड को अपने मम्मो के बीच रगड़ने लगी.



"देख सीमा, तेरे भाई का जोश तोह देख. कितना गरम है." नसीम ने बिना देर किये हमजा के लुंड का टोपा अपने मुँह में भर लिया.









एक तरफ सीमा अपने मम्मों से हमजा का चेहरा मसल रही थी, और दूसरी तरफ उनकी अपनी सगी माँ उनके बेटे का लुंड निहायत बेशर्मी से चूस रही थी. छत पर सिसकारियों और गहरे साँसों का एक तूफ़ान बरपा था.

नसीम ने नीचे झुक कर लुंड के टोपे पर अपनी ज़बान फेरी और बोली,



"हमजा... ये जो तेरी रगों में गर्मी है न, ये तेरी माँ के दूध का hi असर है. आज देख कैसे मैं अपने हाथों से तेरा नशा निकालती हूँ." नसीम ने पूरा लुंड अपने मुँह में भर लिया (डीप थ्रोट), और छत पर सिर्फ 'shllupp-shllupp' की आवाज़ें गूंजने लगीं.





सीमा ने हमजा की पीठ पर नाख़ून गाड़ते हुए कहा, "अम्मी, थोड़ा मेरे लिए भी छोड़िये... मुझे इसके लुंड की रगड़ अपनी राणो (तइस) और छूट के दाने पर महसूस करनी है."

नसीम ने लुंड पर से मुँह हटाया, उसके होठ लुंड के पानी से चमक रहे थे.







"हाँ करलो अपनी मर्ज़ी का भी, इसका ये सांप इतनी जल्दी नहीं मरेगा."

नसीम wahi'n बैठ गयी और मज़ा लेने लगी जब हमजा ने सीमा को चारपाई पर लिटाया और उसकी नंगी राणो को क़रीब करके जोड़ दिया.







उसने सीमा की राणो के दरमियान में अपना लुंड फंसा कर तेज़ी से झटके मारने लगा. सीमा की राणो के दरमियान होने वाली रगड़ ने हमजा को पागल कर दिया था.









"अह्ह्ह... सीमा बजी... उफ़ अम्मी... देखिये मैं कैसे रगड़ रहा हूँ...







आप दोनों की महक ने मुझे पागल कर दिया है!" हमजा ने अपनी सांस को रोकते हुए कहा और नसीम के ऊपर झुक कर उसके मम्मों को काटने लगा. नसीम ने फ़ौरन अपनी क़मीज़ ऊपर उठायी और अपना एक भरा हुआ मां उसके मुँह में ठूंस कर उसके सर के बाल सहलाने लगी.



"हाँ लो पिलो, कहीं मेरा भी असली दूध निकल ने की ख्वाहिश तो नहीं हैना?"

सीमा ने हमजा की कमर को अपनी टांगों में जकड लिया और हमजा ने आखरी कुछ zor-dar झटके मारे. सीमा की सिसकारियां और हमजा की घुर्राहट एक साथ गूंजी और हमजा का गरम लावा सीमा की तइस और पेट पर बिखरता चला गया.





दोनों ने एक दुसरे को कास कर पकड़ लिया, दोनों फ़ारिग़ हो चुके थे.

तभी ईशा की अज़ान की आवाज़ गुंजी.

नसीम ने हप्ते हुए हमजा को रोका. "बस... बस मेरे शेर! अब रुक जा. चलो जल्दी से अपने आप को साफ़ करके घुसूल करलो... अगर नमाज़ के लिए देर हो गयी तोह रशीद साहब का ग़ुस्सा झेलना मुश्किल हो जायेगा. वो तोह वक़्त के बहुत पक्के हैं, और उन्हें पता चल गया के हम यहाँ क्या 'इबादत' कर रहे थे, तोह क़यामत आ जाएगी."

सीमा ने मुस्कुरा कर अपना गन्दा पेट साफ़ किया और हमजा को आंख मारी. "जाओ... अब्बू इंतज़ार कर रहे होंगे."

Episode 26 ख़तम

क्लिफहैंगर: लाहौर में हमजा और सीमा की 'इबादत' तोह मुकम्मल हुई, मगर कराची में बिलाल अपनी अम्मी शमीम बनु के साथ मार्किट निकल चूका है. क्या कराची की भीड़ और धक्कों में बिलाल अपना सब्र बरक़रार रख पायेगा?
 
ग्लिम्पसे ऑफ़ नेक्स्ट episode











 
घर की आग

Episode 27: शर्म की दीवार और दर्द का मरहम

सन - 1: मार्किट का कोहराम और थकन

कराची में शाम की हिद्दत और shor-o-gul के बीच एक रिक्शा तेज़ी से तारिक़ रोड की तरफ बढ़ रहा था. रिक्शा की तंग सीट पर बीच में शमीम बनु बैठी थीं, एक तरफ बिलाल और दूसरी तरफ फराह.

कराची की सड़कें toot-phoot का शिकार थीं. हर झटके के साथ शमीम का कैसा हुआ बदन कभी बिलाल से टकराएगा तोह कभी फराह से. बिलाल ने रिक्शा की डंडी को कास कर पकड़ा हुआ था ताके वो अपनी अम्मी से थोड़ा फैसला रख सके, मगर गर्मी और तंग जगह ने उसे मजबूर कर दिया था. रिक्शा के हर झटके पर उनका नरम मांस बिलाल की राण पर रगड़ खता, जिसे महसूस करके बिलाल के बदन में झुरझुराती दौड़ने लगी.

"अम्मी, आप थोड़ा उधर हो कर बैठें, आपको धक्का लग रहा है," बिलाल ने लड़खड़ाती आवाज़ में कहा.

शमीम ने मासूमियत से मुस्कुराते हुए कहा, "हाँ बीटा, जगह काम है, थोड़ा बर्दाश्त कर लो." उन्हें पता hi नहीं था के उनका बीटा उनके हर लम्स पर पिघल रहा है.

"तुम्हारी गाडी और कितने दिन रहेगी गेराज में?" शमीम ने पुछा.

"अम्मी गाडी रिपेयर होने में वक़्त तो लगता hi हैना...!" जैसे hi फराह ने कहा, "तुम अगर आज मार्किट आने की ज़िद्द न करती तोह शायद हम बाइक पर hi आराम से आजाते." शमीम ने फराह को टोक दिया.

मार्किट पहुँचते hi इंसानो का एक समंदर था. धक्के लग रहे थे, शोर था और गर्मी इन्तहा पर थी. बिलाल को अपनी अम्मी और बेहेन को भीड़ से बचाना था.

"फराह, मेरा हाथ पकड़ो! बिलाल, तुम हमारे पीछे रहो," शमीम ने हिदायत दी.

"भैया, ज़रा देखें तोह सही ये लोग कैसे धक्के मार रहे हैं! मेरे नए जूतों का सत्यानास कर दिया," फराह ने चिढ़ते हुए कहा.

शमीम पसीने में शराबोर थीं, उनकी सफ़ेद मलमल की क़मीज़ उनके कैसे हुए बदन से चिपक कर उनकी पीठ और ब्रा की पट्टी साफ़ दिखा रही थी. बिलाल की नज़रें कभी फराह की तैरती हुई जवानी पर जतिन तोह कभी अम्मी की मातुरे पीठ पर.

भीड़ इतनी ज़्यादा थी के एक मोड़ पर अचानक लोगों का एक बड़ा रेल्ला (रश) आया. बिलाल ने फ़ौरन अपनी अम्मी को धक्के से बचने के लिए उनके पीछे से दोनों हाथ फैला कर उन्हें घेर लिया. शमीम का पूरा जिस्म पीछे की तरफ बिलाल के सीने से चिपक गया.

बिलाल ने महसूस किया के शमीम की मातुरे और भरी हुई गांड का झूला उसके तने हुए लुंड पर baraye-raast (डायरेक्टली) डाब रहा है. शमीम भीड़ से बचने के लिए थोड़ा और पीछे हुईं, "बीटा, बहुत धक्के लग रहे हैं, संभल कर रहो और हमारा भी ख्याल रखना."

बिलाल का सब्र अब टूटने के क़रीब था. वो अपनी माँ को प्रोटेक्ट कर रहा था या उनके बदन का मज़ा ले रहा था, ये फ़र्क़ मिट रहा था. उसने धीरे से अपने हाथ शमीम की पतली कमर पर रखे. शमीम को लगा बीटा उन्हें संभल रहा है, मगर बिलाल को उनकी मलमल की क़मीज़ के निचे से उनका गरम बदन महसूस हो रहा था. हर धक्के के साथ जब वो टकराते, बिलाल की आँखें बंद हो जाती थीं.

बिलाल एक दुकान के बहार अपनी अम्मी के साथ खड़ा था, उसके जेब में फ़ोन बजा. सीमा का कॉल था.

"Hello, बिलाल?" सीमा की आवाज़ में शरारत थी.

"हाँ सीमा... मैं मार्किट में हूँ अम्मी के साथ, बहुत भीड़ है," बिलाल ने हप्ते हुए कहा.

सीमा : भीड़ है? तोह फिर तोह मज़ा आ रहा होगाणा?

बिलाल : क्या मतलब?

सीमा : मैंने देखा है कराची की भीड़ में लोग एक दुसरे के बहुत क़रीब आ जाते हैं. अम्मी का ख्याल रख रहे हो न? उनके क़रीब hi रहना, कहीं कोई और न टकरा जाये.

बिलाल : देखो सीमा, मैं पहले hi परेशां हूँ, तुम मुझे और न भड़काऊ.

सीमा : नाराज़ क्यों होरहे हो.... मैं तोह सिर्फ मज़ाक़ कर रही थी.... अच्छा जब फ्री होजाओ तोह कॉल करलेना, मैं इंतज़ार करुँगी.

बिलाल ने फ़ोन कान से हटाया मगर उसका चेहरा सुर्ख हो चूका था. उसने देखा के शमीम एक दुपट्टा देख रही थीं और उनका बदन झुकने की वजह से और नुमाया हो रहा था.... ये सब देखकर बिलाल और बेचैन होता गया. घर को लौटने तक ऐसी hi बेचैनी के साथ ये शाम गुज़री.

घर पहुँचते hi सब थकन से चूर थे. ज़ोया जो घर पर थी, पानी लेकर आयी. "अम्मी, आप तोह बिलकुल भीग गयी हैं गर्मी से, जाइये नाहा लीजिये," ज़ोया ने कहा.

शमीम अपने कमरे में चारपाई पर बैठ गयीं और बिलाल को पाऊँ दबाने का इशारा किया. फराह वहीँ साइड में बैठी अपना मोबाइल चला रही थी.

"बीटा बिलाल, आज तोह तूने वाक़ई मुझे संभल लिया, वर्ण मैं तोह गिर hi जाती," शमीम ने ठंडी सांस भरी. बिलाल उनके पाऊँ दबाते हुए dhere-dhere उनकी राणो तक पहुँच रहा था. उसका दिल धड़क रहा था के कहीं फराह या ज़ोया देख न लें, मगर नसीम का फैलाया हुआ नशा उसे रुकने नहीं दे रहा था.

सन - 2: आयेशा की तकलीफ - नसीम की फ़िक्र - उस्मान का शुक्राना.

लाहौर की हवेली में शाम के साये गहरे हो चुके थे. आयेशा आज पूरा दिन अपने कमरे से बहार नहीं निकली थी. रात की चुदाई का असर अब उसपर असर दिखा रही थी, रशीद साहब ने उसके जिस्म के निचले हिस्से (फुद्दी) को सुजा दिया था. वो बिस्टेर पर करवट लेते हुए भी कराह रही थी.

नसीम और हिरा किचन में खाना बना रही थीं. हिरा ने अचानक पूछा, "अम्मी, आयेशा बजी नाश्ते के बाद से कहीं नज़र क्यों नहीं आ रहीं? अपने कमरे से बहार hi नहीं निकली."

नसीम ने मुस्कुरा कर कहा, "तुम्हे तोह पता है के कल रात आयेशा पर रशीद साहब ने ऐसी म्हणत की है के बेचारी चलने के लायक नहीं रही. तुम्हारे अब्बू ने उसकी छूट को इतनी बुरी तरह रगड़ दिया है के अब वो बिस्टेर से लग गयी है."

"हिरा हल्का सा मुस्कुरा दी, "अम्मी, लगता है अब्बू ने इतने सालों की थकन जो निकाली है. फिर कुछ सोंच कर - "आप को भी तोह हमजा ने........ मेरा मतलब है के........" हिरा ने hichkicha-te हुए अपनी बात अधूरी छोड़ी.

नसीम को हिरा की मासूमियत पे प्यार आया...., "हाँ, लेकिन क्या मुझ में और आयेशा में फ़र्क़ नहीं है?, ये उस बेचारी का पहली बार था."

"क्या पहली बार सब की ऐसी hi हालत होती है?" हिरा ने तजस्सुस से पुछा.

नसीम ने समझाया की, "किसी को काम तोह किसी को ज़्यादा लेकिन तकलीफ तोह रहती है"...... तोह...... "क्या तुम्हे अब डर लग रहा है..." नसीम ने हिरा को छेड़ा तोह हिरा भी मुस्कुराने लगी.

नसीम ने हिरा को कहा, "खाना तोह बन hi गया है, नसीम ने एक कटोरा गरम नमक का तैयार किया और एक कपडे में बांध कर पोटली बना ली. "ये ले. उसका खाना ऊपर hi ले जा और खाने के बाद धीरे से उसकी राणो और निचे छूट की अछि तरह सिकाई कर देना. और सुन... सोने से पहले उसे गरम पानी के टब में बिठाना, ताके उसकी सूजन काम हो जाये."

"बड़ा hi मज़ेदार काम मिला है आज..." हिरा चहकती हुई किचन से निकल गयी.

हिरा के किचन से बहार निकलते hi उस्मान किचन में दाखिल हुआ. उस्मान की नज़रों में अपनी अम्मी के लिए इज़्ज़त और प्यार दोनों थे.

"अम्मी... खाने में क्या बना है? बड़ी भूक लगी है," उस्मान ने धीरे से पूछा.

नसीम ने मुद कर देखा और मुस्कुरा दी, "उस्मान....? अरे वह!!!, तुम किचन में...? क्या बात है... खाने की भूक hi लगी है या और कोई बात है? अपनी भारी गांड की तरफ एक नज़र डालते हुए कहा आज अचानक इतनी भूक चमक गयी तेरी?"

"अम्मी... बस दिल किया के आपका शुक्रिया ऐडा करूँ," उस्मान ने अपना सर नसीम के कंधे पर रखा. "जब से सीमा और मैं पकडे गए थे, आपने जिस तरह मुझे संभाला, इस घर को बिखरने से बचाया... मैं कभी नहीं भूल सकता. अगर आप न होतीं तोह अब्बू मेरा क़तल कर देते. आप इस घर की असली 'जान' हैं." उस्मान के हाथ नीचे से रेंगते हुए ऊपर कन्धों की तरफ आगे बढ़े और उन्हें कसके पकड़ लिया.





नसीम थोड़ा चौंक गयी मगर उसने खुद को छुड़ाया नहीं. "उस्मान! ये क्या बदमाशी है?"

उस्मान ने मौका पाकर पीछे से नसीम को बाँहों में भर लिया और अपना तना हुआ लुंड उनकी गांड के बीच चुभाया. "अम्मी, आप सब समझती हैं. आपने जिस तरह मुझे और सीमा को बचाया, उसके लिए ये शुक्राना तोह बनता है."





नसीम ने सिसकारी ली, "अह्ह्ह... उस्मान..., छोड़ मुझे...."

उस्मान ने जज़्बात में आकर नसीम की कमर को थोड़ा कास लिया और धीरे से अपना सख्त लुंड नसीम की भरी हुई गांड में चुभाया. "अम्मी... आप बहुत महँ हैं... और सच कहूं तोह बहुत हसीं भी."





नसीम ने सिसकारी ली और धीरे से कोहनी मारी, "हटो! बहुत बदमाश हो गए हो तुम भी. अभी मुझे बहोत काम हैं लेकिन, जल्द hi मैं तुम्हारे प्यार का 'टेस्ट' भी लेने वाली हूँ, तब देखूंगी कितने बड़े मर्द हो."

सन - 3: आयेशा की तकलीफ - हिरा का मरहम.

हिरा खाना लेकर आयेशा के कमरे में पहुंची. आयेशा बिस्टेर पर नंगी चादर ोाधि लेती हुई थी.

"लो शहज़ादी साहिबा, शाही dastar-khwan हाज़िर है," हिरा ने खाना रखा.

आयेशा ने नाराज़ होकर कहा, "ये क्या शहज़ादी... शाही डस्टर का ताना दे रही हो? हिरा, तुम्हे काम करते हुए तकलीफ है तोह मत किया करो, ये ताने मेरे से बर्दाश्त नहीं होंगे."

हिरा ने फ़ौरन आयेशा का हाथ पकड़ा, "ओहो बजी, आप तोह बुरा मान गयी. मैं तोह बस मज़ाक़ कर रही थी. मुझे पता है आप तकलीफ में हैं, इसलिए chid-chidi हो रही हैं." आयेशा का गुस्सा ठंडा हुआ और वो थोड़ा कम्प्रोमिसिंग मोड में आ गयी.

"वैसे बजी, कल रात आपके कमरे से जो सिसकारियां आ रही थीं, उन्होंने तोह पूरी हवेली जगा दी थी. लगता है अब्बू ने आपका आँगन बिगाड़ दिया है."

हिरा ने चादर हटाई तोह आयेशा की नंगी रानें और सूजी हुई सुर्ख छूट नज़र आयी.





आयेशा ने शर्म से चादर में मुँह छुपा लिया, "हिरा... चुप कर! मैं यहाँ दर्द से मर रही हूँ और तुझे मज़ाक़ सूझ रहा है. अब्बू... का वो बहुत सख्त हैं. वहां बहुत दर्द है, अब्बू ने बहुत ज़ोर से अपना वो घुसाया था," आयेशा करहि."

हिरा ने बेबाकी से कहा, "बजी, शर्मा क्यों रही हैं? 'wo..wo' नहीं, 'लुंड' बोलो 'लुंड', अब्बू का लुंड है hi इतना मोटा के आपकी छूट फटने को हो गयी है. और देखिये आपके मम्मी... कैसे नीले पद रहे हैं अब्बू के हाथों के निशाँ से."

आयेशा ने हैरत से पूछा, "हिरा! तुझे ये ऐसे (लुंड, छूट, मम्मी) बोलते हुए शर्म नहीं आती?"

हिरा ने क़हक़हा लगाया, "शर्म कैसी बजी? हम लड़कियां हैं इसलिए हमें शर्माना चाहिए? आपको पता है, चुदाई के वक़्त शायद अम्मी ने आपको 'छिनाल' कहा था... अम्मी बता रही थीं."

आयेशा ने गहरी सांस ली, "हाँ हिरा... उन्होंने कहा था. और सच कहूं तोह जब उन्होंने मुझे छिनाल कहा और मेरे आबू का लुंड पकड़ कर मेरी छूट में ठूंसा, तोह मुझे दर्द के साथ एक अजीब सा नशा आ रहा था."

हिरा ने मुस्कुरा कर आयेशा के राणो से चादर हटाई और देखा के वो अंदर से नीली पद रही थीं. हिरा ने गरम नमक की पोटली से धीरे से सिकाई शुरू की.

"स्स्स्सह्ह्ह... हिरा... गरम है!" आयेशा झटपटायी.





"सब्र कीजिये बजी. ये तोह होना hi था. अब्बू ने मुझसे कहा के कल वो आपको 'नए तरीके' सिखाएंगे. वो तरीके जो अम्मी को भी नहीं पता.", हिरा ने मज़ाक़ किया.

आयेशा ने हैरत से देखा, "और क्या सिखाएंगे? क्या ये दर्द काफी नहीं था?"

हिरा ने मज़ाक़ करते हुए कहा, "बजी, ये दर्द hi तोह असली मज़ा है. देखिये तोह सही, कल अब्बू आपको कैसे 'कामिल औरत' बनाते हैं."





छूट और राणो को अच्छे से सेंकने के बाद हिरा ने आयेशा को खाना खिलाया.

हिरा ने आयेशा को सहारा देकर बाथरूम ले जाकर गरम पानी के बाथटब में बिठाया, पानी की गर्मी जब आयेशा के नरम अंगों से टकराई, तोह उसकी सिसकारियां गूंजने लगीं.





हिरा ने उसके नंगे बदन से खेलते हुए उसे dhere-dhere गरम किया.





हिरा ने बाथटब में भी आयेशा के जिस्म से खेलते हुए मज़ाक़ मस्ती जारी राखी.





"बजी, आपके ये मम्मी तोह पहले से ज़्यादा भरी लग रहे हैं." बाथटब से लेकर सुलाते वक़्त हिरा ने आयेशा के जिस्म को सहलाया और उसे आराम से लिटा दिया.





सन - 4: बेटी की फिसली ज़ुबान - हुआ माँ का नुकसान.

उधर रशीद साहब अपने कमरे में बेचैन थे. आयेशा का वो जवान बदन उनके दिमाग से निकल hi नहीं रहा था. उनका लुंड अभी भी उनकी शलवार को फाड़ने पर तुला था. वो bar-bar दरवाज़े की तरफ देख रहे थे.

नसीम कमरे में आयी और उनका हाल देख कर मुस्कुरा दी. "रशीद साहब, क्या बात है? आज 'टीवी' में दिल नहीं लग रहा?"

"नसीम... वो आयेशा... उसकी महक ने मुझे पागल कर दिया है. वो आयी क्यों नहीं अबतक," रशीद साहब ने नसीम की तरफ देखकर कहा.

नसीम ने उन्हें बीएड पर बिठाया और उनके कंधे दबाने लगी. "थोड़ा सब्र कीजिये. बिचारि अभी उठने के लायक नहीं है. आपने कल रात इतना ज़ोर लगाया के वो सूज गयी है. इस उम्र में इतनी 'म्हणत' आपकी सेहत के लिए भी ठीक नहीं. कहीं कमज़ोरी न हो जाये."

तभी सीमा भी wahi'n आगयी, उसने कहा, "हाँ अब्बू, अम्मी सही कह रही हैं. आज आप आराम कीजिये. कल आयेशा जब ठीक हो जाएगी, तोह वो खुद आपके पास आएगी. आज आप अम्मी के साथ hi सुकून कीजिये."

रशीद साहब बीएड पर बैठे थे. नसीम उनके पाऊँ दबा रही थी और सीमा वहां बैठी उन्हें हैदराबाद के क़िस्से सुना रही थी.

"उस दिन अगर सिद्दीकी हवेली न आता, फिर उसके दिल में आयेशा के रिश्ते की बात न आती, हम सिद्दीकी के घर न जाते, बचे (सीमा, हिरा, हमजा और आयेशा) उस रात वो नादानी न करते, उस रात आयेशा का वह नंगा बदन आपके नज़र में न पड़ता, आपके अंदर वो शोख न उठते तोह क्या आप आयेशा के बदन का लुत्फ़ लेलिए होते?, आपको तोह उसका शुक्रिया कहना चाहिए." नसीम ने एक लम्बी दास्ताँ सुना डाली.

"पता नहीं उस फार्महाउस की क़बर सिद्दीकी को कैसे लगी और वो घर पहुंच गया आपको बताने के लिए" सीमा bad-bada रही थी,.... "मज़े की बात तो ये है के जब सिद्दीकी घर आया था, अम्मी पहली बार हमजा को प्याआर............", सीमा ने बोलते बोलते अपनी ज़बान को दांतो में दबलिया, उसे एहसास होगया था के उसने ग़लती करदी है.

रशीद साहब के चेहरे पर हैरत और गुस्सा एक साथ आया. "नसीम! ये क्या सुन रहा हूँ? तूने अपने hi बेटे हमजा को अपने पीछे पागल कर रखा है? इतनी बेशर्मी के तूने उसे 'मादरचोद' बना दिया?"

रशीद साहब ने नसीम के बाल पकड़ कर उसे ऊपर खिंचा और घुर्राटे हुए बोले, "कुट्टी... तू वाक़ई शातिर है. ठीक है, अगर तूने अपने बेटे को मादरचोद बनाया है, तोह आज मैं देखूंगा के इस मादरचोद की माँ में ऐसा क्या जादू है." सीमा ने मुस्कुरा कर लाइट बंद की और हवेली की फ़ज़ा हवस की लपेट में आ गयी.

रशीद साहब ने नसीम को बिस्तर पर ढाका दिया और अपनी शलवार खोली, उनका भरी और कला लुंड गुस्से में कमान की तरह तना हुआ था. नसीम थकी हुई थी, मगर रशीद साहब के गुस्से और हवस ने उसे डरा दिया था.

तभी सीमा ने आगे बढ़कर रशीद साहब का हाथ थमा. उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी.

"अब्बू... अम्मी को आज थोड़ा आराम करने दीजिये," सीमा ने नरम और नशीली आवाज़ में कहा. "घर के काम की वजह से वो बहुत थकी हुई हैं. और हमजा का राज़ खुलने के बाद उनकी जान तोह पहले hi सूख गयी है."

सीमा धीरे से रशीद साहब के पैरों के बीच घुटनो के बल बैठ गयी. उसने रशीद साहब के तने हुए लुंड पर अपनी नरम उँगलियाँ फेरी.





"आज अपनी बड़ी बेटी का मुँह छोड़िये," सीमा ने रशीद साहब की आँखों में देखते हुए अपना मुँह खोला.









रशीद साहब हैरत से सीमा को देखने लगे. उन्होंने कभी नहीं सोचा था के उनकी बेटी इतनी बेबाकी से खुद को पेश करेगी. सीमा ने बग़ैर किसी शर्म के रशीद साहब के मोठे लुंड की टोपी को अपने होठों में लिया और उसे चूसा.





रशीद साहब के मुँह से एक गहरी कराह निकली, "अह्ह्ह... सीमा... हरामज़ादी... तू तोह अपनी माँ से भी दो हाथ आगे है!"





सीमा ने लुंड को पूरा हलक़ तक उतरा और रशीद साहब के अण्डों (टेस्टिकल्स) को अपने हाथों से मसलने लगी.





नसीम बिस्टेर पर लेती ये मंज़र देख रही थी, उसकी आँखों में डर और गरूर दोनों थे के उसकी बेटी ने रशीद साहब को कैसे काबू कर लिया है.

"उफ़... सीमा... हरामज़ादी... तू ने ये सब कहाँ से सीखा?" रशीद साहब ने हप्ते हुए पूछा.

सीमा ने लुंड मुँह से निकाला, उस पर थूक की चमक थी जो रशीद साहब की हवस को और भड़का रही थी.





उसने मुस्कुरा कर अपने अब्बू की तरफ देखा, "अम्मी ने सिखाया है अब्बू... के मर्द को कैसे काबू में रखते हैं. और आज आपका गुस्सा ठंडा करना मेरी ज़िम्मेदारी है."





सीमा ने फिर से लुंड को हलक़ तक उतरा. वो इतनी गहरायी तक ले रही थी के उसकी आँखों में हल्का सा पानी आ गया,







मगर उसने लुंड नहीं छोड़ा. रशीद साहब ने अब तेज़ी से धक्के मारना शुरू किये. वो सीमा का सर्र पकड़ कर अपने मोठे लुंड को उसके हलक़ की दीवारों से टकरा रहे थे. सीमा की 'ghut-ghut' की आवाज़ें कमरे में गूँज रही थीं.









नसीम बीएड पर लेती ये मंज़र देख रही थी. उसे एक पल के लिए घिन आयी मगर अगले hi पल उसने महसूस किया के सीमा ने वाक़ई रशीद साहब के उस गुस्से को हवस में बदल दिया है जो हमजा का राज़ सुन कर पैदा हुआ था.





रशीद साहब अब बर्दाश्त की इन्तहा पर थे. उन्होंने सीमा का सर्र ज़ोर से झटका और चिल्ला कर बोले, "सीमा! तैयार हो जा... मैं निकलने वाला हूँ!"





सीमा ने लुंड को मुँह से निकाला और उस पर अपना थूक लगते हुए उसे ज़ोर से मुट्ठी में भरा. रशीद साहब ने एक ज़ोर का झटका मारा और उनका गरम सफ़ेद लावा सीमा के चेहरे और होंठों पर पिचकारियों की तरह गिरने लगा.













सीमा ने बड़ी बेबाकी से अपना मुँह खोला और कुछ बूँदें अपनी ज़बान पर भी ले लें.





जब सब ख़तम हुआ, रशीद साहब निढाल होकर बीएड पर गिर गए. सीमा ने अपने होंठ साफ़ किये और उनके सीने पर सर रख दिया.





"अब सुकून है न अब्बू?" सीमा ने शरारत से पूछा.





रशीद साहब ने उसकी पेशानी चूमि और भांपते हुए बोले, "हाँ... तू तोह वाक़ई मेरी 'बड़ी' बेटी निकली. नसीम! देख ले... तेरी बेटी ने आज तुझसे बेहतर काम किया है."

नसीम धीरे से उनके क़रीब आयी और सीमा के बालों को सहलाया, "मैंने कहा था न रशीद साहब... ये घर अब आपकी हर ख्वाहिश पूरी करेगा."

हवेली की फ़ज़ा अब एक अजीब सी ख़ामोशी और गुनाह की तपिश में डूबी हुई थी, जहाँ रिश्तों की दीवारें अब पूरी तरह टूट चुकी थीं.

**Episode 27 ख़तम**

क्लिफहैंगर: सीमा के कॉल ने उसके दिमाग में जो हलचल मचाई थी, क्या बिलाल उस पर काबू पा सकेगा? सीमा ने बड़ी बेबाकी से रशीद साहब का गुस्सा ठंडा कर दिया है, मगर असली इम्तेहान कल सुबह आयेशा का होना है. क्या आयेशा का नाज़ुक बदन रशीद साहब की उस "स्पेशल तालीम" के लिए तैयार हो पायेगा जिसकी तैयारी नसीम और हिरा ने शुरू कर दी है?



 
ओह... यस, थिस इस ों थे कार्ड्स.... अन्य गेस्सेस?



 
घर की आग

Episode 28: Tapish-e-Gunaah और Be-inteha हवस

सन 1: कराची — रात की ख़ामोशी और बिलाल की तड़प

कराची की रात नमकीन और भरी थी. शमीम बनु के घर में सन्नाटा था, मगर बिलाल के दिमाग में एक तूफ़ान बरपा था. मार्किट से वापसी के बाद जब उसने अपनी अम्मी के पाऊँ दबाये थे, तोह उनकी राणो की गर्मी उसके हाथों से होती हुई उसके लुंड तक उतर गयी थी. वो बिस्टेर पर लेता था, मगर उसकी आँखें छत को घूर रही थीं.

उसने आँखें बंद कीं तोह उसे रिक्शा का वो झटका याद आया जब शमीम अम्मी की भरी हुई गांड ने उसके तने हुए लुंड को मसला था. "उफ़... अम्मी... आपने मुझे किस अज़ाब में दाल दिया है," बिलाल ने करवट बदली. उसका लुंड उसकी शलवार के अंदर लोहे की सलाख बन चूका था. उसका दिल छह रहा था के वो अभी उठे, अम्मी के कमरे में जाये और उनके नंगे बदन पर टूट पड़े, मगर "माँ" का रिश्ता उसके रस्ते में दीवार बन कर खड़ा था.

वो पानी पीने के लिए उठा. पूरे घर में अँधेरा था, सिर्फ जीरो का बल्ब शमीम अम्मी के कमरे से हलकी रौशनी फेक रहा था. बिलाल के क़दम khud-ba-khud उस तरफ मुद गए. उसका जिस्म डर से काँप रहा था, मगर हवस का नशा उसे खिंच रहा था. उसने धीरे से दरवाज़ा धकेला.

अंदर का मंज़र देख कर बिलाल की सांस रुक गयी. शमीम अम्मी गर्मी की वजह से बिस्टेर पर be-sudh सो रही थीं. उनकी सफ़ेद मलमल की क़मीज़ ऊपर को चढ़ गयी थी, जहाँ से उनकी गोरी और भरी हुई रानें पूरी तरह नंगी नज़र आ रही थीं. उनकी क़मीज़ के गले से उनके भरे हुए मम्मों का उभार साफ़ दिख रहा था. बिलाल ने देखा के उनकी ब्रा की पट्टी उनके बदन में धंसी हुई थी.

बिलाल dhere-dhere बीएड के क़रीब गया. वो इतना क़रीब था के उसे अम्मी के बदन की महक और उनकी गरम सांसें महसूस हो रही थीं. उसका हाथ कपकपाते हुए उनकी नंगी राण की तरफ बढ़ा. उसने सिर्फ एक ऊँगली से उनका नरम मांस छूना चाहा.

तभी दरवाज़े पर एक साया लहराया.

"भैया...?"





बिलाल के होश उड़ गए. वो झटके से पलटा. फराह दरवाज़े पर कड़ी थी, उसकी आँखों में हैरत और शक साफ़ नज़र आ रहा था. "आप... इतनी रात को अम्मी के कमरे में? और आपके हाथ...?"

बिलाल ने फ़ौरन अपने हाथ पीछे किये, मगर उसकी सांसें इतनी तेज थीं के फराह ने महसूस कर लिया. "वो... फराह... मैं... मैं देख रहा था के कहीं अम्मी को मच्छर तोह नहीं काट रहे. उन्होंने चादर नहीं ोाधि थी न," बिलाल ने लड़खड़ाती आवाज़ में झूट बोलै.

फराह ने बिलाल की आँखों में देखा और फिर उनकी शलवार पर नज़र डाली जहाँ बिलाल का 'तनाव' किसी दुश्मन की तरह साफ़ नुमाया था. फराह को लगा जैसे उसके दिमाग में कोई घंटी बजी हो. "भैया, अम्मी ठीक सो रही हैं. आप जाइये... मैं उन्हें चादर ओढ़ा देती हूँ," फराह ने थोड़े सख्त लहजे में कहा.

बिलाल वहां से निकल गया, मगर फराह वहीँ कड़ी रही. उसने अपनी सोती हुई माँ को देखा और फिर उस रस्ते को जहाँ से बिलाल गया था. उसके दिल में एक अजीब सी बेचैनी बैठ गयी thi—kya उसका भाई वाक़ई अम्मी को उस नज़र से देख रहा है?

सन 2: लाहौर — कोचिंग से हवेली तक की तपिश

दोपहर का वक़्त था. हमजा अपनी कोचिंग क्लास से बहार निकला तोह धुप तेज थी. उसने देखा के सीमा बजी स्कूटी पर कड़ी उसका इंतज़ार कर रही थीं. सीमा ने आज बहुत hi फिट salwar-qameez पहना था, जिसमे उनके जिस्म के मोड़ साफ़ झलक रहे थे.

"आओ हमजा, अम्मी ने भेजा है मुझे," सीमा ने चश्मा उतारते हुए कहा.

हमजा पीछे बैठा तोह स्कूटी की सीट काम थी. उसने धीरे से अपने हाथ सीमा बजी की कमर पर रखे. सीमा ने कोई ऐतराज़ नहीं किया. रस्ते में जब भी ब्रेक लगती, हमजा का सीना सीमा की पीठ से टकराता और उसका तना हुआ लुंड सीमा की भरी हुई गांड में धंस जाता.





"बजी... आप आज बहुत हसीं लग रही हैं," हमजा ने उनके कान के पास धीरे से कहा.

सीमा ने आईने में हमजा की आँखें देखीं, "बदमाश हो गए हो कोचिंग जा कर... या वहां की लड़कियों ने बिगड़ दिया है?"

"लड़कियां तोह बहुत हैं बजी, मगर जो मज़ा आपकी इस गांड की रगड़ में है, वो किसी में नहीं," हमजा ने बेबाकी से कहा तोह सीमा ने स्कूटी की रफ़्तार बढ़ा दी.

घर पहुँचते hi हमजा ने सीमा बजी को उनके कमरे में ढाका दिया. दरवाज़ा बंद होते hi हमजा ने उन्हें दीवार से लगा दिया.

"हमजा... ये क्या बदतमीज़ी है? मैं तेरी बड़ी बजी हूँ," सीमा ने झूटी नाराज़ी दिखाई.

"वही तोह मज़ा है बजी... मेरी बड़ी बजी, जिसे पूरा शहर 'शरीफ' समझता है, मगर उसकी असलियत सिर्फ मुझे पता है," हमजा ने सीमा का दुपट्टा खिंच कर फ़ेंक दिया और उनके होंठों को बुरी तरह चूसने लगा.





"अह्ह्ह हमजा... क्या हुआ? स्कूटी पर मज़ा आ रहा था?" सीमा ने हँसते हुए पुछा.

"Saima...baji, आज आपने रस्ते में जो मेरा हाल किया है न, उसकी कीमत तोह लेनी padegi,"Hamza पागलो की तरह सीमा बदन पर हाथ फेरते हुए उसकी क़मीज़ को एक hi झटके में बीच से पहाड़ दिया. सीमा के गोर और भरे हुए मम्मी बहार निकल आये, जिन पर नीली वेइन्स साफ़ दिख रही थीं.









"अह्ह्ह! हमजा... आराम से कुत्ते! कपडे क्यों पहाड़ रहा है?" सीमा चीखी, मगर उसकी चीख में दर्द से ज़्यादा नशा था.

सीमा ने जब हमजा की बेचैनी देखि तोह वो भी गरम हो गयी. उसने खुद hi अपनी शलवार उतरी और नंगी होकर बिस्टेर पर लेट गयी.





हमजा ने अपना तना हुआ लुंड निकाला जो लोहे की सलाख बन चूका था.

हमजा ने सीमा बजी को बिस्टेर पर पटका





और उन्हें '69 पोजीशन' में कर दिया. सीमा का मुँह हमजा के लुंड पर था और हमजा की ज़बान सीमा की गीली छूट पर.





सीमा बजी ने पहली बार इतनी शिदत से हमजा का लुंड चूसा, जैसे वो उसे निगल जाना चाहती हों.





"अह्ह्ह... सीमा बजी... क्या मुँह चलाया है आपने... उफ़!" हमजा करहा.

"आज आपको बताऊंगा के अपनी रंडी बहन की छूट मरने का असली मज़ा क्या होता है," हमजा ने गन्दी गाली दी.

सीमा ने क़हक़हा लगाया, "हाँ हमजा... मार न! देख क्या रहा है? ये छूट सिर्फ तेरे लुंड के लिए तड़प रही है."

हमजा ने सीमा को बिस्टेर के किनारे पर लेटाया और उनकी टांगें हवा में फैला कर उन पर टूट पड़ा. हर धक्का इतना गहरा था के सीमा की आँखें उबलने लगती थीं.





"हमजा... अह्ह्ह... मेरी छूट पहाड़ दे कुत्ते! बोल... बोल के तू अपनी बजी को छोड़ रहा है," सीमा ने गन्दी गाली दी.

"हाँ बजी... मैं अपनी सगी बजी को छोड़ रहा हूँ! देखो कैसे आपका भाई आपकी छूट का सुर्ख पानी निकाल रहा है," हमजा ने हैवानियत से धक्के मारे. 'Phat-phat-phat' की आवाज़ कमरे की दीवारों से टकरा रही थी.





सीमा ने बिस्टेर की चादर कास के पकड़ ली, "अह्ह्ह... हमजा... और ज़ोर से! मैं तेरी ग़ुलामी के लिए तैयार हूँ... बस रुकना मत!"

"अह्हह्ह्ह्ह! हमज़ाआ... भेनचोद... मार डाला!" सीमा ने बिस्टेर की चादर मुट्ठी में भन्छ ली. उनकी आँखें दर्द और मज़े से फटने लगीं.

"बजी... क्या छूट है आपकी... इतनी गरम के मेरा लुंड पिघल जाये," हमजा ने तेज़ी से धक्के मारना शुरू किये. Phat-phat-phat की आवाज़ पूरे कमरे में गूंजने लगी.

"हाँ हमजा... और ज़ोर से... छोड़ अपनी इस बड़ी बजी को! क्या कोचिंग में कोई ऐसी छूट मिलती है तुझे?" सीमा ने हप्ते हुए पूछा.

"कहाँ बजी... वहां तोह सब बच्चियां हैं. आपके इस भरे हुए जिस्म और इस 'मातुरे' छूट का कोई मुक़ाबला नहीं. देखो कैसे मेरा लुंड आपकी गहराईयों को चुम्म रहा है," हमजा ने एक गहरा धक्का मारा जो सीमा के bacha-daani से जा टकराया.





सीमा ने हमजा के कंधे पकडे और उसे रोक दिया. "रुक... हमजा... अब मुझे तेरे ऊपर बैठने दे. आज मैं तुझे बताउंगी के तेरी बजी ने अम्मी से क्या सीखा है."

हमजा पीछे होकर लेट गया और सीमा बजी उनके ऊपर सवार हो गयीं. उन्होंने हमजा का लुंड पकड़ा और dhere-dhere अपनी छूट के अंदर उतारने लगीं.









जब पूरा लुंड अंदर चला गया, तोह उन्होंने अपनी कमर को gol-gol घूमना शुरू किया.





"उफ़... बजी... ये आप क्या कर रही हैं... अह्ह्ह... मज़ा आ गया!" हमजा ने सीमा के भरे हुए मम्मों को पकड़ कर मसलना शुरू किया.









"ये 'चक्की' है हमजा... अब देख तेरी बजी तुझे कैसे निचोड़ती है," सीमा ने तेज़ी से upar-neeche होना शुरू किया.









उनके मम्मी हवा में बुरी तरह उछाल रहे थे.





"बोल हमजा... क्या तुझे शर्म नहीं आती अपनी सगी बजी के ऊपर ऐसे उछालते हुए?"





"शर्म कैसी बजी? जब आप जैसी औरत सामने हो, तोह मर्द सगी माँ को न छोड़े, आप तोह फिर भी बजी हैं. आपकी ये गांड जब मेरे पेट से टकराती है, तोह मेरा दिमाग सुन्न हो जाता है," हमजा ने सीमा के निप्पल को अपने दांतो से काटा.





सीमा का नशा अब इन्तहा पर था. वो बीएड से उठी और दीवार की तरफ इशारा किया. "हमजा... मुझे खड़ा कर... पीछे से मार मेरी... आज मुझे कुट्टी बना दे!"

हमजा ने सीमा बजी को दीवार से लगाया और उन्हें आगे झुकने को कहा. सीमा ने अपने दोनों हाथ दीवार पर टिकी और अपनी भरी हुई गांड पीछे की तरफ निकाल दी.

उसने पीछे से उनकी गांड पर एक ज़ोर का थप्पड़ मारा.





"बजी... ये पिछवारा तोह देखो... क्या दिल करता है इसे सुजा दूँ!"

सीमा ने हप्ते हुए पीछे देखा, "नहीं हमजा... अभी वहां नहीं... पहले मुझे अपनी छूट में पूरा महसूस होने दे. जब मेरा दिल करेगा, तोह सबसे पहले तू hi मेरी गांड मरेगा... ये तेरी बजी का वादा है."

हमजा ने पीछे से उनकी कमर पकड़ी और अपना तना हुआ लुंड उनकी दोनों राणो के बीच से गुज़रते हुए छूट में ठूंस दिया.





"अह्ह्ह! हमजा... ये पोजीशन... उफ़... कितना गहरा जा रहा है!" सीमा ने दीवार पर अपना सर्र मार दिया.

"बजी... आपकी ये गांड... कसम से पूरे लाहौर में ऐसी गांड नहीं होगी. देखिये कैसे आपका छोटा भाई पीछे से आपकी छूट पहाड़ रहा है," हमजा ने हैवानियत से धक्के मारे. हर धक्का सीमा के जिस्म को दीवार से टकरा रहा था.





"हाँ हमजा... मार... और ज़ोर से मार इस रांड को! मैं तेरी बजी नहीं, तेरी रखैल हूँ... मुझे छोड़... गन्दी गालियां दे मुझे!" सीमा पागल हो रही थीं.

"तू मेरी रांड है सीमा! मेरी सगी बजी और मेरी सगी रांड... तेरी इस छूट में आज इतना पानी निकलूंगा के तू चलने के लायक नहीं रहेगी," हमजा ने उनके बाल पीछे से खींचे और उनका सर्र पीछे करके उनके होंठों को बुरी तरह चूसने लगा, जबकि नीचे से धक्कों की रफ़्तार और तेज हो गयी.





सीमा ने सिसकारी ली, "हमजा... मैं... मैं निकलने वाली हूँ... अह्ह्ह... मज़ा... हमज़ाआ!"

हमजा ने उन्हें ज़ोर से पकड़ा और आखरी panch-cheh हैवानी धक्के मारे. सीमा की छूट ने thar-thara कर अपना सारा पानी छोड़ दिया.





"बजी, अह्ह्ह... ुहम्म..... मेरा भी होने वाला है." हमजा ने हानते हुए कहा.

"अगर बाप बनाना है तोह मुझे लिटा के तेरा पानी मेरे अंदर तक छोड़ना पड़ेगा..." सीमा ने शर्म और ada'a से कहा.

दोनों पसीने में शराबोर थे. हमजा ने सीमा को बिस्टेर पर सीधा लिटा कर उनके ऊपर पूरा वज़न दाल दिया और उनके होंठों को चूसते हुए आखरी panch-cheh हैवानी धक्के मारे और अपना सारा गरम मादा उनकी छूट की गहराईयों में उतार दिया.







दोनों वही बिस्तर पर ढेर हो गए, पसीने और गुनाह की महक में डूबे हुए.

सन 3: आयेशा का कमरा — शर्म की दीवार का गिरना

आयेशा अपने कमरे में डर से सिमटी बैठी थी. उसे पता था के थोड़ी देर में रशीद साहब आने वाले हैं. तभी नसीम और हिरा कमरे में दाखिल हुईं.

"बजी, अभी तक तैयार नहीं हुईं?" हिरा ने शरारत से कहा.

"अम्मी... मुझे बहुत डर लग रहा है. कल वाला दर्द अभी गया नहीं," आयेशा ने रट हुए कहा.

नसीम ने आयेशा के पास बैठ कर उसके बाल सहलाये फिर उसकी छूट पर थोड़ा सा कुनकुना टेल (आयल) लगाया और उसे धीरे से मसला. "पागल न बन आयेशा. शुरू में सब को ऐसा hi लगता है. देख, रशीद साहब ने आज तेरे लिए 'नए तरीके' सोचे हैं. वो तुझे दर्द नहीं, नशा देना चाहते हैं."

नसीम ने एक टेल निकाला और आयेशा की नंगी राणो पर मलने लगी. "अम्मी... मैं नहीं कर सकती. अब्बू का वो बहुत बड़ा है, मेरी जान निकल जाती है," आयेशा ने रट हुए कहा.

नसीम ने आयेशा की राणो को फैलाया और उन्हें dhere-dhere सहलाया. "आयेशा... मर्द का लुंड एक मरहम होता है अगर तुम उसे सही से लेना सीख जाओ. आज जब रशीद साहब आएं, तोह उन्हें रोकना मत. उन्हें अपना बदन सौंप देना... देखना फिर वो तुम्हे कैसे सुकून देते हैं."

हिरा ने आयेशा के मम्मों को अपने नरम हाथों में लिया और उनके निप्पल को चूसने लगी. "बजी... देखिये तोह सही... जब मैं ऐसे करती हूँ तोह आपको कैसा लगता है? अब्बू तोह इससे भी बेहतर करेंगे."

हिरा की इस हरकत ने आयेशा के बदन में बिजली दौड़ा दी. उसने करवट ली और हिरा का हाथ पकड़ लिया. "हिरा... छोड़... ये क्या कर रही है?"

"वही कर रही हूँ बजी जो आपको गरम करेगा," हिरा ने मुस्कुरा कर कहा. "आप इतनी हसीं हैं के अब्बू क्या, कोई भी मर्द आपको देख कर पागल हो जाये. देखिये, आपकी छूट अभी से गीली होने लगी है."

"अम्मी... क्या अब्बू मुझे प्यार करेंगे?" आयेशा ने हिचकिचा ते हुए पूछा.

"हाँ बेटी, बहुत प्यार करेंगे," नसीम ने मुस्कुरा कर कहा. "हाँ तुम देखना, और आज जब वो आएं, तोह उनके लुंड को अपने हाथों से पकड़ना और उसे महसूस करना."

नसीम और हिरा ने मिल कर आयेशा को इतना गरम कर दिया के उसकी सांसें तेज होने लगीं. उसके नरम अंगों में एक अजीब सी खुजली होने लगी.

"अम्मी... क्या वाक़ई मज़ा आएगा?" आयेशा ने हिचकिचा ते हुए पूछा.

नसीम ने उसके होंठों पर ऊँगली राखी. "मज़ा नहीं... नशा आएगा. अब उठ, चादर हटा और तैयार हो जा... तेरे अब्बू आते hi होंगे."

आयेशा ने गहरी सांस ली. उसके जिस्म में अब डर की जगह एक अजीब सी खुजली और हवस अंगड़ाइयां ले रही थी. "अम्मी... थोड़ा धीरे बोलने को कहना उन्हें..."

"सब ठीक होगा बेटी," नसीम ने कहा और हिरा को इशारा किया के वो अब बहार चलें क्यूंकि रशीद साहब के क़दमों की आवाज़ कॉरिडोर में सुनाई दे रही थी. आयेशा ने आँखें बंद कर लीं और खुद को उस आने वाले तूफ़ान के लिए तैयार कर लिया.

**Episode 28 ख़तम**

क्लिफहैंगर: लाहौर में सीमा और हमजा की चुदाई के बाद माहौल अब ठंडा हो रहा है, मगर रशीद साहब और आयेशा के दरमियान अब एक नया "रोमांटिक" रिश्ता शुरू होने वाला है. क्या आयेशा अपने बाप की हवस को बर्दाश्त कर पायेगी? और कराची में, फराह का शक क्या बिलाल को घर से निकलने पर मजबूर कर देगा?
 
Back
Top