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घर की आग
Episode 25: डर का माहौल और Khoon-Rezi
सन 1: हॉल का धमाका — Parda-Fash
हवेली के हॉल में सन्नाटा किसी ऊँची दीवार की तरह खड़ा था. दरवाज़े पर रशीद साहब, नसीम और उस्मान को देख कर हमजा का हाथ झटके से आयेशा की छाती से हटा. हिरा, जो हमजा के लुंड का चोप्पा लगाने में मसरूफ थी, अचानक उनके (ख़ास कर नसीम के) आजाने से वही पत्थर की बन गयी. हिरा नेचर से तो चुलबुली और बेबाक थी लेकिन नसीम से पता नहीं क्यों उसकी इतनी पहतहती थी.
सब से बुरा हाल आयेशा का था. उसने जब अपने बाप की नज़रें अपने नंगे निप्पल्स पर देखि, तोह उसकी रूह कैंप गयी. वो रोने वाले लहज़े में सोफे के पीछे दुबकने की नाकाम कोशिश करने लगी, अपने हाथों से अपने बदन को ढकने की कोशिश करती हुई. "अब्बू... वो... मैं..." उसके मुँह से अलफ़ाज़ नहीं निकल रहे थे.
मगर सीमा, जो नंगी छाती पर दुपट्टा ओढ़े बैठी थी, बिलकुल पुरसुकून थी. वो उठी और मुस्कुरा कर नसीम के पास गयी. "अम्मी, इतनी देर करदी? सिद्दीकी का बंद बजा कर आये या नहीं?"
नसीम ने उसे घूरा, एक झूठा ग़ुस्सा दिखते हुए डांटा, "सीमा! शर्म कर थोड़ी! बाप खड़ा है सामने और तू ऐसे सवाल कर रही है? पहले जाकर अपने ये बहार निकलते हुए मम्मों को तोह धक्, पूरी रांड लग रही है इस वक़्त!"
सीमा नसीम की प्यार भरी दांत, फिर अपना हुलिया देख कर शर्मा गयी. उसने चोर निगाहों से रशीद साहब को देखा तोह उनके चेहरे पर उसे ग़ुस्से और हैरत के मिले झूले taa-ssurat नज़र आये, फिर जब उसकी नज़र उस्मान से मिली तोह दोनों ने एक दूसरे को देख कर मुस्कुराया.
नसीम ने माहौल को सँभालने के लिए हमजा और हिरा को इशारा किया. "तुम दोनों जाओ यहाँ से, बहुत खेल लिया तुमने. उस्मान, तुम ऊपर जाहि रहे हो तोह ये लैपटॉप भी ले जा अपना साथ में."
सब निकल लिए अपनी अपनी जगह लेकिन, रशीद साहब अभी भी आयेशा को देख रहे थे, उनकी आँखों में गुस्सा काम और एक अजीब सी हैरतज़दा फिक्रमंदी ज़्यादा थी. "आयेशा...," बेसाख्ता hi रशीद की जुबां से धेरै से निकला, मगर आयेशा ने दर के मारे अपना चेहरा हाथों में छुपा लिया.
नसीम ने आयेशा का हाथ पकड़ा और उसे सहारा देकर उठाते हुए कहा, "सीमा, रशीद साहब का ख्याल रख, इन्हें ठंडा पानी पीला. मैं ज़रा आयेशा को संभालती हूँ, इसकी हालत देख कर लगता है के इसकी जान hi न निकल जाए." नसीम आयेशा को उसके कमरे की तरफ ले गयी, जहाँ आयेशा की सिसकारियां अब भी हॉल में गूँज रही थीं.
सन 2: सीमा का मश्वरा और नसीम का फैसला — "कुंवारेपन" का सौदा
आयेशा के कमरे में नसीम ने उसे पानी पिलाया और उसके सर पर हाथ रखा. "श... रोना बंद कर. कुछ नहीं हुआ...., और न hi तुमलोगों ने कुछ ग़लत किया है. सब हमारे इस प्यारे से घर में अपनी मर्ज़ी से जैसे चाहे रहसकते हैं. (आयेशा की हिचकियाँ अब भी जारी थीं, उसकी हालत एक पैनिक अटैक" जैसी थी) कोई भी तुमसे नाराज़ नहीं हैं, मैं केहरहि हूँ न..., न मैं न तुम्हारे abbu....koi भी नहीं. मुझे ख़ुशी है के हिरा की तरह तुम भी अपनी खुशियां ढूढ़ना सीख रही हो. चुप होजा मेरी बच्ची..., रोना बंद kar......,haan अब चुप होजा." नसीम की तसल्ली और प्यार ने आयेशा को कुछ हद तक सेटल करदिया था. थोड़ी देर नसीम वहीँ बैठी रही लेकिन जब आयेशा को सुकून में आता देकर वो (नसीम) वापिस रशीद साहब के पास आयी. सीमा वहां पहले से hi रशीद के सहने सेहला रही थी.
"रशीद साहब, इतना मत सोंचिये," नसीम ने उनके पास बैठ कर कहा. "ये जवान खून है. इन्हें जितना रोकेंगे, ये उतना hi गलत रास्ता पकड़ेंगे. आयेशा मासूम है, मगर उसके अंदर की आग हमजा ने भरका दी है. अगर आज हमने टोक दिया या उसे नहीं संभाला toh,.....,toh वो कल बहार मुँह मरने की कोशिश करेगी, जबकि पहले से hi सिद्दीकी और अबरार जैसे भेड़िये टाक लगाए बैठे रहते हैं."
सीमा ने बात को आगे बढ़ाया, "अब्बू, आयेशा का दिल हमेशा से आपके लिए धड़कता देखा है हमने. वो हमजा के पास सिर्फ इसलिए गयी क्यूंकि आपने कभी उसे अपना प्यार दिखाया hi नहीं."
डिस्कशन गहरा होता गया. रशीद साहब घबराये हुए थे. "लेकिन नसीम... वो मेरी बेटी है. मैं कैसे...?"
नसीम ने उनका हाथ पकड़ा, "इसलिए के आप इस घर के मालिक हैं. आपकी मर्दानगी hi उसे रांड बनने से बचा सकती है. आज hi सही वक़्त है जब वो गरम भी है और दरी हुई भी. सीमा, जा... आयेशा को तैयार कर. उसे समझा कर यहाँ ले आए., आयेशा को बता के उसके अब्बू उसे सजा नहीं, मज़ा देना चहरहे हैं."
"लेकिन नसीम... मैं... मेरी उम्र... क्या मैं कर paunga....?.......wo जवान है और शायद.. कुंवारी भी.....!" रशीद ने हिचकिचाते हुए पूछा.
सीमा ने मुस्कुरा कर अपनी अम्मी की तरफ देखा. "उसका इंतेज़ाम हम करलेंगे, आप फ़िक्र न करें. मैं आपके लिए 'शाही माजून' और मिल्क शेक लरहि हूँ, और अगर ज़रूरत पड़ी तोह एक गोली (वियाग्रा) भी है. मगर मुझे लगता है के जब आप नंगी आयेशा को अपने सामने देखेंगे, तोह आपको किसी दवा की ज़रूरत नहीं पड़ेगी."
सीमा मुस्कुराते हुए आयेशा के पास गयी. आयेशा अब भी बिस्तर पर सेहमी हुई बैठी थी.
"आयेशा, मेरी जान... तू क्यों इतना डर रही है?" सीमा ने उसके पास बैठ कर उसका हाथ पकड़ा.
"एपीआई... अब्बू मुझे मार डालेंगे न? मैंने... मैंने हमजा के साथ जो किया..." आयेशा ने रट हुए कहा.
सीमा ने उसके आंसू पोंछे, "पागल है क्या? अब्बू तोह तुझसे बोहोत प्यार करते हैं. उल्टा वो तोह परेशां हैं के मेरी इतनी हसीं बेटी हमजा जैसे बचे के पास क्यों गयी...? आयेशा, अब्बू तुझे सजा नहीं देना चाहते, बल्कि वो चाहते हैं के तुझे वो मज़ा दें जो हमजा अभीतक नहीं दे सका. सोच, इतने pur-waqar मर्द का लम्स (टच)... क्या तू नहीं चाहती के अब्बू तुझे अपने हाथों से प्यार करें?"
आयेशा ने हैरत से देखा, "लेकिन एपीआई... वो तोह अब्बू हैं..."
"वही तोह मज़ा है आयेशा. इस हवेली में कोई पर्दा नहीं. देख मुझे, देख अम्मी को... हम सब आपस के प्यार में कितने खुश हैं. तू बस मेरे साथ चल, बाकी मुझ पर छोड़ दे." सीमा की बातों ने आयेशा के अंदर एक अजीब सी हलचल पैदा कर दी. डर के पीछे एक an-jaani ख्वाहिश ने अंगड़ाई ली.
सन 3: आयेशा की जवानी और रशीद का पानी
सीमा आयेशा को धेरै से रशीद साहब के कमरे में ले गयी. कमरे में हलकी मद्धम रौशनी थी. रशीद साहब बीएड पर बैठे थे, उनके चेहरे पर अब ग़ुस्सा नहीं बल्कि एक मरदाना be-chaini थी. नसीम उनके बराबर बैठी उनका हाथ सेहला रही थी.
"आइये, हमारी शहज़ादी आ गयी," नसीम ने उठ कर आयेशा को रशीद के क़रीब बिठाया. रशीद ने हिचकिचाते हुए आयेशा के कंधे पर हाथ रखा.
"आयेशा... बेटी... ऐसे डरो नहीं, मेरे पास तोह आओ... मैं भी तोह देखूं मेरी मासूम बेटी कैसे बदल रही है" रशीद की भरी मगर रोमानी आवाज़ ने आयेशा के जिस्म में सिहरन (शिवर) पैदा कर दी.
"अब्बू... I'm सॉरी," आयेशा ने नज़रें झुका कर कहा.
रशीद ने उसकी थोड़ी (चीन) ऊपर की और पहली बार अपनी बेटी की आँखों में एक मर्द की नज़र से देखा. "सॉरी नहीं बेटी... आज से सिर्फ प्यार."

रशीद ने धेरै से झुक कर आयेशा के माथे को चूमा, और फिर dhire-dhire उनके होंठ आयेशा के गालों से होते हुए उसके होठों पर जा टिकी. ये पहला किश था.

आयेशा ने पहले झटका खाया मगर फिर रशीद के मरदाना लम्स ने उसे पिघला दिया. नसीम और सीमा दोनों ने मिल कर आयेशा की क़मीज़ उतरी. आयेशा के gore-chitte और कमसिन मम्मी रशीद के सामने थे.
रशीद साहब ने कांपते हाथों से आयेशा के मम्मों को छूना शुरू किया. आयेशा ने पहली बार अपने बाप का खुरदुरा (रफ़) हाथ अपने जिस्म पर महसूस किया तोह एक ठंडी सिसकारी ली. रशीद ने झुक कर उसके निप्पल्स को अपने मुँह में लिया.

"अह्ह्ह... अब्बू... उफ़... धेरै," आयेशा ने उनके बाल मुट्ठी में जाकर लिए. रशीद ने कांपते हाथों से उन मम्मों को थमा. "कितने नरम हैं... बिलकुल रुई जैसे," उन्होंने एक मां मुट्ठी में भरा और ज़ोर से दबाया.

"अह्ह्ह... अब्बू... उफ़..." आयेशा की सिसकारी निकली. रशीद ने झुक कर निप्पल्स को अपने मुँह में भर लिया और उन्हें डेंटन से हल्का सा कतरने लगे.

"अह्ह्ह... नहीं..... अब्बू... प्लीज दर्द होरहा है....., please.......uff..." आयेशा तड़पने लगी.
सीमा ने रशीद का कुरता उतरा और उनके जिस्म पर हाथ फेरने लगी, जबकि नसीम आयेशा की सलवार उतार कर उसकी बिलकुल साफ़ और कमसिन छूट को सहलाने लगी. आयेशा तड़प रही थी, उसका जिस्म पहली बार इतने हाथों का नशा चख रहा था.
सीमा पीछे से बोली, "अब्बू, इसे थोड़ा गन्दा बोलना शुरू कीजिये, देखिये कैसे पागल होती है ये रांड!"
रशीद साहब ने आयेशा की आँखों में देखा. "आयेशा... तेरी ये तंग छूट आज से मेरे इस बड़े लुंड को रोज़ तरसेगी. तू मेरी सब से प्यारी रांड बेटी है न."
रशीद ने अपनी लुंगी निकाली.

उनका 9 इंच का कला और सख्त लुंड देख कर आयेशा की आंखें पहात गयीं.

"अब्बू... ये... ये मुझ में नहीं जायेगा! मैं मर जाउंगी!,

नहीं प्लीज अम्मी..... मुझे दर लग रहा है.... अम्मी, मुझे नहीं करना ये सब, प्लीज मुझे बचालो.... मैं मर जौंगीयी......."

आयेशा की घबराहट देख रशीद साहब थोड़ा पीछे हटने लगे सीमा ने उनके नंगे लुंड को, जो आयेशा की घबराहट से कुछ जोश खोता हुआ नज़र आरहा था, अपने हाथ में पकड़कर सहलाते हुए kaha.."ye पीछे हट ने का वक़्त नहीं है अब्बू."

आयेशा की इस चीख पुकार से नसीम चिड़चिड़ाहट में आगयी, नसीम ने आयेशा की टांगें फैलायीं और उसके छूट के लबों पर तेल लगाया. "नहीं मारेगी छिनाल! बर्दाश्त कर."

नसीम ने hi रशीद के लुंड को अपने हाथ से पकड़ कर उसके छूट के खरीब लायी और लुंड की टोपी को आयेशा की कुंवारी छोट की दरार में सेट किया और हल्का सा धक्का मरने को कहा. "शुरू कीजिये रशीद साहब, मैदान तैयार है नयी इन्निंग्स के लिए."
"अब्बू प्लीज....... अम्मी... नहीं.... Ammiiiii......please...... रुको........

रशीद साहब ने पहला धक्का बहोत hi एहतियात और धीरे से मारा... उनके लुंड की टोपी आयेशा के कुंवारेपन को तोड़ने की कोशिश में छूट के लबों को चीरते हुए अंदर दाखिल हो चुकी थी.

"आआह्ह्ह्हह्ह्ह्हह!!!!" आयेशा की एक dard-bhari चीख कमरे में गूंजी.

उसके होंठ नीले पद गए, एक और धीमा धक्का लगाया रशीद ने तोह उसकी छूट के किनारे फटने लगे थे.


"आआह्ह्ह!" आयेशा की चीख निकल गयी. "निकलू... पहात रही हूँ मैं......!"

"नहीं मेरी पहली sautan(Co-Wife), अभी तोह शुरू हुआ है," नसीम ने कहा और रशीद की कमर पर थपकी देते हुए ज़ोर लगाने का इशारा किया. रशीद ने एक बोहोत बड़ा और faisla-kun धक्का मारा.

"पलोपपपपपपप!"
लुंड पूरा जड़ तक आयेशा की सील तोड़ते हुए अंदर धस गया. आयेशा का जिस्म कमान की तरह अकड़ा और फिर ढीला पद गया.

उसकी छूट से खून की एक धार निकली जो सफ़ेद चादर पर फैल गयी.


"अह्ह्ह... बहनचोद कितनी तंग है!" रशीद ने भांपते हुए कहा.
नसीम ने आयेशा के आंसू पोंछे. "शाबाश मेरी बेटी... अब तू असली औरत बन गयी है."

रशीद ने dhire-dhire धक्के मारना शुरू किये. थप... थप... थप... नसीम आयेशा के निप्पल्स को चूस रही थी ताके उसका दर्द काम हो और जोश बना रहे. आयेशा, जो पहले दर्द से कराह रही थी, अब dhire-dhire मज़े लेने लगी. उसने अपनी टांगें रशीद की कमर के गिर्द लपेट लीन.

"हाँ... अब्बू... मारो... फॉर दो अपनी इस छिनाल बेटी को!" आयेशा के मुँह से जब ये लफ्ज़ निकले, तोह रशीद का जोश हद्द से गुज़र गया. उन्होंने be-rehami से धक्के मारना शुरू किये.

आयेशा की तड़प और उसकी सिसकारियां पूरे कमरे का माहौल गरम कर चुकी थी, अगले 8-10 मिनट्स तक यह घमासान चलता रहा, आयेशा ज़्यादा देर झेल नहीं पायी और ढीली पढ़ गयी...... नसीम और सीमा का भी बुरा हाल था छूट में ऊँगली करते करते ये दोनों भी झाड़ चुकी थी.
जब रशीद का जोश जवाब दे गया तोह उन्होंने भी अपने धक्कों की रफ़्तार तेज़ करदी और "ले रांड... ले मेरा गरम माल!" रशीद ने चिल्ला कर कहा और आखरी धक्का मार कर लुंड बहार निकाला.

अगले hi पल, उनका गधा और सफ़ेद लावा आयेशा के गोर पेट और उसके नंगे मम्मों पर धार बन कर गिरने लगा.

आयेशा निढाल होकर लेती रही. उसके जिस्म पर उसके बाप की मर्दानगी चमक रही थी. नसीम ने आगे बढ़ कर वो "माल" अपनी ऊँगली से उठाया और आयेशा को चटवाया. "ये है तेरी इस जीतका इनाम, आयेशा."
सन 4: कराची — बिलाल का कनफ्लिक्ट
कराची में रात के 3 बज रहे थे. बिलाल अपनी बालकनी में खड़ा था. उसके दिमाग में लाहौर की हवेली का वो मंज़र baar-baar घूम रहा था जहाँ उसने नसीम को नंगा करके छोड़ रहा था.
उसने मुद कर कमरे में देखा जहाँ उसकी माँ शमीम और बहनें सो रही थीं. शमीम की निघ्त्य थोड़ी ऊपर थी, उनकी गोरी टांगें नज़र आ रही थीं. बिलाल के दिमाग में एक गन्दा ख्याल आया मगर उसने झटके से अपना सर हिला दिया.
"नहीं... ये क्या सोंच रहा हूँ मैं? वो मेरी माँ है... वो मेरी बहनें हैं," उसने खुद से कहा. बिलाल का दिल छह रहा था के वो सब भूल जाये, मगर लाहौर का नशा उसकी रगों में दौड़ रहा था. वो इन मासूम जिस्मों में अब वही हवस ढून्ढ रहा था जिस हवस में वो लाहौर से नाहा कर आया था.
**Episode 25 ख़तम**
क्लिफहैंगर: आयेशा की शर्म टूट चुकी है और वो अब इस गन्दी राह की मुसाफिर बन गयी है. मगर कराची में बिलाल की मासूमियत और हवस के बीच का यह कनफ्लिक्ट क्या रंग लाएगा?

Episode 25: डर का माहौल और Khoon-Rezi
सन 1: हॉल का धमाका — Parda-Fash
हवेली के हॉल में सन्नाटा किसी ऊँची दीवार की तरह खड़ा था. दरवाज़े पर रशीद साहब, नसीम और उस्मान को देख कर हमजा का हाथ झटके से आयेशा की छाती से हटा. हिरा, जो हमजा के लुंड का चोप्पा लगाने में मसरूफ थी, अचानक उनके (ख़ास कर नसीम के) आजाने से वही पत्थर की बन गयी. हिरा नेचर से तो चुलबुली और बेबाक थी लेकिन नसीम से पता नहीं क्यों उसकी इतनी पहतहती थी.
सब से बुरा हाल आयेशा का था. उसने जब अपने बाप की नज़रें अपने नंगे निप्पल्स पर देखि, तोह उसकी रूह कैंप गयी. वो रोने वाले लहज़े में सोफे के पीछे दुबकने की नाकाम कोशिश करने लगी, अपने हाथों से अपने बदन को ढकने की कोशिश करती हुई. "अब्बू... वो... मैं..." उसके मुँह से अलफ़ाज़ नहीं निकल रहे थे.
मगर सीमा, जो नंगी छाती पर दुपट्टा ओढ़े बैठी थी, बिलकुल पुरसुकून थी. वो उठी और मुस्कुरा कर नसीम के पास गयी. "अम्मी, इतनी देर करदी? सिद्दीकी का बंद बजा कर आये या नहीं?"
नसीम ने उसे घूरा, एक झूठा ग़ुस्सा दिखते हुए डांटा, "सीमा! शर्म कर थोड़ी! बाप खड़ा है सामने और तू ऐसे सवाल कर रही है? पहले जाकर अपने ये बहार निकलते हुए मम्मों को तोह धक्, पूरी रांड लग रही है इस वक़्त!"
सीमा नसीम की प्यार भरी दांत, फिर अपना हुलिया देख कर शर्मा गयी. उसने चोर निगाहों से रशीद साहब को देखा तोह उनके चेहरे पर उसे ग़ुस्से और हैरत के मिले झूले taa-ssurat नज़र आये, फिर जब उसकी नज़र उस्मान से मिली तोह दोनों ने एक दूसरे को देख कर मुस्कुराया.
नसीम ने माहौल को सँभालने के लिए हमजा और हिरा को इशारा किया. "तुम दोनों जाओ यहाँ से, बहुत खेल लिया तुमने. उस्मान, तुम ऊपर जाहि रहे हो तोह ये लैपटॉप भी ले जा अपना साथ में."
सब निकल लिए अपनी अपनी जगह लेकिन, रशीद साहब अभी भी आयेशा को देख रहे थे, उनकी आँखों में गुस्सा काम और एक अजीब सी हैरतज़दा फिक्रमंदी ज़्यादा थी. "आयेशा...," बेसाख्ता hi रशीद की जुबां से धेरै से निकला, मगर आयेशा ने दर के मारे अपना चेहरा हाथों में छुपा लिया.
नसीम ने आयेशा का हाथ पकड़ा और उसे सहारा देकर उठाते हुए कहा, "सीमा, रशीद साहब का ख्याल रख, इन्हें ठंडा पानी पीला. मैं ज़रा आयेशा को संभालती हूँ, इसकी हालत देख कर लगता है के इसकी जान hi न निकल जाए." नसीम आयेशा को उसके कमरे की तरफ ले गयी, जहाँ आयेशा की सिसकारियां अब भी हॉल में गूँज रही थीं.
सन 2: सीमा का मश्वरा और नसीम का फैसला — "कुंवारेपन" का सौदा
आयेशा के कमरे में नसीम ने उसे पानी पिलाया और उसके सर पर हाथ रखा. "श... रोना बंद कर. कुछ नहीं हुआ...., और न hi तुमलोगों ने कुछ ग़लत किया है. सब हमारे इस प्यारे से घर में अपनी मर्ज़ी से जैसे चाहे रहसकते हैं. (आयेशा की हिचकियाँ अब भी जारी थीं, उसकी हालत एक पैनिक अटैक" जैसी थी) कोई भी तुमसे नाराज़ नहीं हैं, मैं केहरहि हूँ न..., न मैं न तुम्हारे abbu....koi भी नहीं. मुझे ख़ुशी है के हिरा की तरह तुम भी अपनी खुशियां ढूढ़ना सीख रही हो. चुप होजा मेरी बच्ची..., रोना बंद kar......,haan अब चुप होजा." नसीम की तसल्ली और प्यार ने आयेशा को कुछ हद तक सेटल करदिया था. थोड़ी देर नसीम वहीँ बैठी रही लेकिन जब आयेशा को सुकून में आता देकर वो (नसीम) वापिस रशीद साहब के पास आयी. सीमा वहां पहले से hi रशीद के सहने सेहला रही थी.
"रशीद साहब, इतना मत सोंचिये," नसीम ने उनके पास बैठ कर कहा. "ये जवान खून है. इन्हें जितना रोकेंगे, ये उतना hi गलत रास्ता पकड़ेंगे. आयेशा मासूम है, मगर उसके अंदर की आग हमजा ने भरका दी है. अगर आज हमने टोक दिया या उसे नहीं संभाला toh,.....,toh वो कल बहार मुँह मरने की कोशिश करेगी, जबकि पहले से hi सिद्दीकी और अबरार जैसे भेड़िये टाक लगाए बैठे रहते हैं."
सीमा ने बात को आगे बढ़ाया, "अब्बू, आयेशा का दिल हमेशा से आपके लिए धड़कता देखा है हमने. वो हमजा के पास सिर्फ इसलिए गयी क्यूंकि आपने कभी उसे अपना प्यार दिखाया hi नहीं."
डिस्कशन गहरा होता गया. रशीद साहब घबराये हुए थे. "लेकिन नसीम... वो मेरी बेटी है. मैं कैसे...?"
नसीम ने उनका हाथ पकड़ा, "इसलिए के आप इस घर के मालिक हैं. आपकी मर्दानगी hi उसे रांड बनने से बचा सकती है. आज hi सही वक़्त है जब वो गरम भी है और दरी हुई भी. सीमा, जा... आयेशा को तैयार कर. उसे समझा कर यहाँ ले आए., आयेशा को बता के उसके अब्बू उसे सजा नहीं, मज़ा देना चहरहे हैं."
"लेकिन नसीम... मैं... मेरी उम्र... क्या मैं कर paunga....?.......wo जवान है और शायद.. कुंवारी भी.....!" रशीद ने हिचकिचाते हुए पूछा.
सीमा ने मुस्कुरा कर अपनी अम्मी की तरफ देखा. "उसका इंतेज़ाम हम करलेंगे, आप फ़िक्र न करें. मैं आपके लिए 'शाही माजून' और मिल्क शेक लरहि हूँ, और अगर ज़रूरत पड़ी तोह एक गोली (वियाग्रा) भी है. मगर मुझे लगता है के जब आप नंगी आयेशा को अपने सामने देखेंगे, तोह आपको किसी दवा की ज़रूरत नहीं पड़ेगी."
सीमा मुस्कुराते हुए आयेशा के पास गयी. आयेशा अब भी बिस्तर पर सेहमी हुई बैठी थी.
"आयेशा, मेरी जान... तू क्यों इतना डर रही है?" सीमा ने उसके पास बैठ कर उसका हाथ पकड़ा.
"एपीआई... अब्बू मुझे मार डालेंगे न? मैंने... मैंने हमजा के साथ जो किया..." आयेशा ने रट हुए कहा.
सीमा ने उसके आंसू पोंछे, "पागल है क्या? अब्बू तोह तुझसे बोहोत प्यार करते हैं. उल्टा वो तोह परेशां हैं के मेरी इतनी हसीं बेटी हमजा जैसे बचे के पास क्यों गयी...? आयेशा, अब्बू तुझे सजा नहीं देना चाहते, बल्कि वो चाहते हैं के तुझे वो मज़ा दें जो हमजा अभीतक नहीं दे सका. सोच, इतने pur-waqar मर्द का लम्स (टच)... क्या तू नहीं चाहती के अब्बू तुझे अपने हाथों से प्यार करें?"
आयेशा ने हैरत से देखा, "लेकिन एपीआई... वो तोह अब्बू हैं..."
"वही तोह मज़ा है आयेशा. इस हवेली में कोई पर्दा नहीं. देख मुझे, देख अम्मी को... हम सब आपस के प्यार में कितने खुश हैं. तू बस मेरे साथ चल, बाकी मुझ पर छोड़ दे." सीमा की बातों ने आयेशा के अंदर एक अजीब सी हलचल पैदा कर दी. डर के पीछे एक an-jaani ख्वाहिश ने अंगड़ाई ली.
सन 3: आयेशा की जवानी और रशीद का पानी
सीमा आयेशा को धेरै से रशीद साहब के कमरे में ले गयी. कमरे में हलकी मद्धम रौशनी थी. रशीद साहब बीएड पर बैठे थे, उनके चेहरे पर अब ग़ुस्सा नहीं बल्कि एक मरदाना be-chaini थी. नसीम उनके बराबर बैठी उनका हाथ सेहला रही थी.
"आइये, हमारी शहज़ादी आ गयी," नसीम ने उठ कर आयेशा को रशीद के क़रीब बिठाया. रशीद ने हिचकिचाते हुए आयेशा के कंधे पर हाथ रखा.
"आयेशा... बेटी... ऐसे डरो नहीं, मेरे पास तोह आओ... मैं भी तोह देखूं मेरी मासूम बेटी कैसे बदल रही है" रशीद की भरी मगर रोमानी आवाज़ ने आयेशा के जिस्म में सिहरन (शिवर) पैदा कर दी.
"अब्बू... I'm सॉरी," आयेशा ने नज़रें झुका कर कहा.
रशीद ने उसकी थोड़ी (चीन) ऊपर की और पहली बार अपनी बेटी की आँखों में एक मर्द की नज़र से देखा. "सॉरी नहीं बेटी... आज से सिर्फ प्यार."

रशीद ने धेरै से झुक कर आयेशा के माथे को चूमा, और फिर dhire-dhire उनके होंठ आयेशा के गालों से होते हुए उसके होठों पर जा टिकी. ये पहला किश था.

आयेशा ने पहले झटका खाया मगर फिर रशीद के मरदाना लम्स ने उसे पिघला दिया. नसीम और सीमा दोनों ने मिल कर आयेशा की क़मीज़ उतरी. आयेशा के gore-chitte और कमसिन मम्मी रशीद के सामने थे.
रशीद साहब ने कांपते हाथों से आयेशा के मम्मों को छूना शुरू किया. आयेशा ने पहली बार अपने बाप का खुरदुरा (रफ़) हाथ अपने जिस्म पर महसूस किया तोह एक ठंडी सिसकारी ली. रशीद ने झुक कर उसके निप्पल्स को अपने मुँह में लिया.

"अह्ह्ह... अब्बू... उफ़... धेरै," आयेशा ने उनके बाल मुट्ठी में जाकर लिए. रशीद ने कांपते हाथों से उन मम्मों को थमा. "कितने नरम हैं... बिलकुल रुई जैसे," उन्होंने एक मां मुट्ठी में भरा और ज़ोर से दबाया.

"अह्ह्ह... अब्बू... उफ़..." आयेशा की सिसकारी निकली. रशीद ने झुक कर निप्पल्स को अपने मुँह में भर लिया और उन्हें डेंटन से हल्का सा कतरने लगे.

"अह्ह्ह... नहीं..... अब्बू... प्लीज दर्द होरहा है....., please.......uff..." आयेशा तड़पने लगी.
सीमा ने रशीद का कुरता उतरा और उनके जिस्म पर हाथ फेरने लगी, जबकि नसीम आयेशा की सलवार उतार कर उसकी बिलकुल साफ़ और कमसिन छूट को सहलाने लगी. आयेशा तड़प रही थी, उसका जिस्म पहली बार इतने हाथों का नशा चख रहा था.
सीमा पीछे से बोली, "अब्बू, इसे थोड़ा गन्दा बोलना शुरू कीजिये, देखिये कैसे पागल होती है ये रांड!"
रशीद साहब ने आयेशा की आँखों में देखा. "आयेशा... तेरी ये तंग छूट आज से मेरे इस बड़े लुंड को रोज़ तरसेगी. तू मेरी सब से प्यारी रांड बेटी है न."
रशीद ने अपनी लुंगी निकाली.

उनका 9 इंच का कला और सख्त लुंड देख कर आयेशा की आंखें पहात गयीं.

"अब्बू... ये... ये मुझ में नहीं जायेगा! मैं मर जाउंगी!,

नहीं प्लीज अम्मी..... मुझे दर लग रहा है.... अम्मी, मुझे नहीं करना ये सब, प्लीज मुझे बचालो.... मैं मर जौंगीयी......."

आयेशा की घबराहट देख रशीद साहब थोड़ा पीछे हटने लगे सीमा ने उनके नंगे लुंड को, जो आयेशा की घबराहट से कुछ जोश खोता हुआ नज़र आरहा था, अपने हाथ में पकड़कर सहलाते हुए kaha.."ye पीछे हट ने का वक़्त नहीं है अब्बू."

आयेशा की इस चीख पुकार से नसीम चिड़चिड़ाहट में आगयी, नसीम ने आयेशा की टांगें फैलायीं और उसके छूट के लबों पर तेल लगाया. "नहीं मारेगी छिनाल! बर्दाश्त कर."

नसीम ने hi रशीद के लुंड को अपने हाथ से पकड़ कर उसके छूट के खरीब लायी और लुंड की टोपी को आयेशा की कुंवारी छोट की दरार में सेट किया और हल्का सा धक्का मरने को कहा. "शुरू कीजिये रशीद साहब, मैदान तैयार है नयी इन्निंग्स के लिए."
"अब्बू प्लीज....... अम्मी... नहीं.... Ammiiiii......please...... रुको........

रशीद साहब ने पहला धक्का बहोत hi एहतियात और धीरे से मारा... उनके लुंड की टोपी आयेशा के कुंवारेपन को तोड़ने की कोशिश में छूट के लबों को चीरते हुए अंदर दाखिल हो चुकी थी.

"आआह्ह्ह्हह्ह्ह्हह!!!!" आयेशा की एक dard-bhari चीख कमरे में गूंजी.

उसके होंठ नीले पद गए, एक और धीमा धक्का लगाया रशीद ने तोह उसकी छूट के किनारे फटने लगे थे.


"आआह्ह्ह!" आयेशा की चीख निकल गयी. "निकलू... पहात रही हूँ मैं......!"

"नहीं मेरी पहली sautan(Co-Wife), अभी तोह शुरू हुआ है," नसीम ने कहा और रशीद की कमर पर थपकी देते हुए ज़ोर लगाने का इशारा किया. रशीद ने एक बोहोत बड़ा और faisla-kun धक्का मारा.

"पलोपपपपपपप!"
लुंड पूरा जड़ तक आयेशा की सील तोड़ते हुए अंदर धस गया. आयेशा का जिस्म कमान की तरह अकड़ा और फिर ढीला पद गया.

उसकी छूट से खून की एक धार निकली जो सफ़ेद चादर पर फैल गयी.


"अह्ह्ह... बहनचोद कितनी तंग है!" रशीद ने भांपते हुए कहा.
नसीम ने आयेशा के आंसू पोंछे. "शाबाश मेरी बेटी... अब तू असली औरत बन गयी है."

रशीद ने dhire-dhire धक्के मारना शुरू किये. थप... थप... थप... नसीम आयेशा के निप्पल्स को चूस रही थी ताके उसका दर्द काम हो और जोश बना रहे. आयेशा, जो पहले दर्द से कराह रही थी, अब dhire-dhire मज़े लेने लगी. उसने अपनी टांगें रशीद की कमर के गिर्द लपेट लीन.

"हाँ... अब्बू... मारो... फॉर दो अपनी इस छिनाल बेटी को!" आयेशा के मुँह से जब ये लफ्ज़ निकले, तोह रशीद का जोश हद्द से गुज़र गया. उन्होंने be-rehami से धक्के मारना शुरू किये.

आयेशा की तड़प और उसकी सिसकारियां पूरे कमरे का माहौल गरम कर चुकी थी, अगले 8-10 मिनट्स तक यह घमासान चलता रहा, आयेशा ज़्यादा देर झेल नहीं पायी और ढीली पढ़ गयी...... नसीम और सीमा का भी बुरा हाल था छूट में ऊँगली करते करते ये दोनों भी झाड़ चुकी थी.
जब रशीद का जोश जवाब दे गया तोह उन्होंने भी अपने धक्कों की रफ़्तार तेज़ करदी और "ले रांड... ले मेरा गरम माल!" रशीद ने चिल्ला कर कहा और आखरी धक्का मार कर लुंड बहार निकाला.

अगले hi पल, उनका गधा और सफ़ेद लावा आयेशा के गोर पेट और उसके नंगे मम्मों पर धार बन कर गिरने लगा.

आयेशा निढाल होकर लेती रही. उसके जिस्म पर उसके बाप की मर्दानगी चमक रही थी. नसीम ने आगे बढ़ कर वो "माल" अपनी ऊँगली से उठाया और आयेशा को चटवाया. "ये है तेरी इस जीतका इनाम, आयेशा."
सन 4: कराची — बिलाल का कनफ्लिक्ट
कराची में रात के 3 बज रहे थे. बिलाल अपनी बालकनी में खड़ा था. उसके दिमाग में लाहौर की हवेली का वो मंज़र baar-baar घूम रहा था जहाँ उसने नसीम को नंगा करके छोड़ रहा था.
उसने मुद कर कमरे में देखा जहाँ उसकी माँ शमीम और बहनें सो रही थीं. शमीम की निघ्त्य थोड़ी ऊपर थी, उनकी गोरी टांगें नज़र आ रही थीं. बिलाल के दिमाग में एक गन्दा ख्याल आया मगर उसने झटके से अपना सर हिला दिया.
"नहीं... ये क्या सोंच रहा हूँ मैं? वो मेरी माँ है... वो मेरी बहनें हैं," उसने खुद से कहा. बिलाल का दिल छह रहा था के वो सब भूल जाये, मगर लाहौर का नशा उसकी रगों में दौड़ रहा था. वो इन मासूम जिस्मों में अब वही हवस ढून्ढ रहा था जिस हवस में वो लाहौर से नाहा कर आया था.
**Episode 25 ख़तम**
क्लिफहैंगर: आयेशा की शर्म टूट चुकी है और वो अब इस गन्दी राह की मुसाफिर बन गयी है. मगर कराची में बिलाल की मासूमियत और हवस के बीच का यह कनफ्लिक्ट क्या रंग लाएगा?




















































































