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घर की आग
Episode 14: गुनाह की पहली लकीर
लाहौर की वह रात हद से ज़्यादा खामोश थी, मगर हमजा के कमरे के अंदर जज़्बात का एक ऐसा तूफ़ान उठा हुआ था जो बरसों की परहेज़गारी को बहा ले जाने के लिए काफी था. नसीम, जो अभी कुछ देर पहले तक सिर्फ एक माँ थी, अब हमजा के सामने एक तड़पती हुई औरत बन कर कड़ी थी. उसने हमजा का कालर इतनी सख्ती से पकड़ा हुआ था के उसकी उँगलियाँ सफ़ेद पद रही थीं.
"क्यों खामोश हो हमजा? मेरी आँखों में देखो!" नसीम की आवाज़ में एक अजीब सी थरथराहट थी. "क्या तुम्हे लगता है के तुम्हारी बहन हिरा मुझ से ज़्यादा जवान है? क्या उसके जिस्म की तपिश मेरी गर्माहट से ज़्यादा है?"
हमजा का दिल डूबा जा रहा था. उसने कभी नहीं सोचा था के उसकी परसा माँ इस हद तक गिर जाएगी के अपनी hi बेटी से मुक़ाबला करने लगेगी. मगर सच तोह यह था के नसीम की इस be-baaki ने हमजा के अंदर के उस जानवर को जगा दिया था जो महीनो से क़ैद था. उसने नसीम की लॉन की क़मीज़ के नीचे से उभरते हुए bhare-bhare मम्मों को देखा, जो हर सांस के साथ ऊपर निचे हो रहे थे.
"अम्मी... आप होश में नहीं हैं," हमजा ने लड़खड़ाती ज़बान से कहा, मगर उसने नसीम को अपने से दूर नहीं किया.
"होश में तोह मैं अब आयी हूँ हमजा," नसीम ने सरगोशी की और हमजा का हाथ पकड़ कर अपनी क़मीज़ के ऊपर hi अपने बाएं मम्मी पर रख दिया. "देखो... देखो यह कितना तड़प रहा है.

तुम्हारे बाप ने तोह इसे बरसों पहले भुला दिया था. क्या तुम भी मुझे ऐसे hi तड़पाओ गए?"
नसीम का नरम और गरम मां हमजा की हथेली में था.

उसका निप्पल कपडे के ऊपर से hi सख्त महसूस हो रहा था. हमजा से अब और सब्र नहीं हुआ. उसने एक झटके से नसीम को अपनी तरफ खिंचा और उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए. यह बोसा (किश) कोई मामूली बोसा नहीं था; इसमें नफरत, मोहब्बत, और be-pannah हवस घुली हुई थी.

थे डिसेंट ईंटो लस्ट:
नसीम ने हमजा की गर्दन में बाहें दाल दें और पूरी शिद्दत से उसका साथ देने लगी. दोनों एक दूसरे के मुंह की राल (सलीवा) पी रहे थे.

हमजा का हाथ तेज़ी से नसीम की शलवार के नारे (स्ट्रिंग) तक पहुंचा और उसने एक झटके में उसे खोल दिया.
"ओह्ह्ह हमजा... मेरे बचे... छोड़ो मुझे... आज मुझे तबाह कर दो," नसीम ने सिसकियों के दरमियान कहा.
हमजा ने नसीम को बिस्तर पर पटक दिया. उसने अपनी बनयान उतारी और फिर अपनी शलवार भी फ़ेंक दी. जब वह नंगा हुआ, तोह नसीम की आँखें पहात गयीं.


उसने ज़िन्दगी में सिर्फ रशीद साहिब का लुंड देखा था, जो अब ढीला और be-jaan हो चूका था. मगर हमजा का लुंड... वह किसी काले सांप की तरह खड़ा था, नसें उभरी हुई थीं और वह इतना लम्बा और मोटा था के नसीम का जिस्म डर से thar-thara उठा.


"या अल्लाह... हमजा... यह... यह इतना बड़ा?" नसीम ने पहली बार अपने बेटे का लुंड देखा था और उसकी हालत देख कर उसकी छूट में एक अजीब सी खुजली और geela-pan महसूस होने लगा.
हमजा ने बिना कुछ कहे नसीम की क़मीज़ और ब्रा उतार दी. नसीम के भरे हुए, गोर मम्मी अब पूरी तरह नंगे थे. उन पर नीली नसें साफ़ दिख रही थीं और निप्पल्स बिलकुल सख्त हो कर खड़े थे. हमजा ने एक पल के लिए रुका और अपनी माँ के जिस्म को देखा. उसने कभी तसव्वुर भी नहीं किया था के उसकी माँ इतनी हसीं होगी.
"अम्मी... आप तोह किसी हूर से काम नहीं हैं," हमजा ने कहा और झुक कर उसके एक मम्मी को पूरे मुंह में भर लिया.

"आआह्ह्ह! हमज़ाआ... हैं... चूसो... मेरी जान... ज़ोर से दबाओ!" नसीम ने अपना सर तकिये में धसाये हुए चीखी.
हमजा ने नसीम की नंगी छूट को देखा. वहां बालों की एक हलकी सी तेह थी, और उसके बीच से पानी (लुब्रिकेशन) निकल कर बहार बह रहा था. उसने अपनी ऊँगली नसीम की छूट के सुराख़ पर राखी. नसीम का पूरा जिस्म एक झटके से ऊपर उठा.
"बहुत गीली हो गयी हैं आप अम्मी," हमजा ने शैतानी मुस्कराहट के साथ कहा.
"तुम्हारी माँ की छूट बरसों से प्यासी है बीटा... आज इस प्यास को बुझा दो... छोड़ो अपनी माँ को... ऐसी चुदाई करो के मैं चलने के क़ाबिल न रहूँ," नसीम अब पूरी तरह बेशरम हो चुकी थी.
हमजा ने नसीम की दोनों टांगें (लेग्स) हवा में उठा कर अपने क्षणों पर रखीं. उसने अपने लुंड की टोपी (हेड) नसीम की छूट के फट्टों पर राखी और एक ज़ोर दर झटका मारा.

"ननणायआईईईन्न्नण!!!!" नसीम की एक dard-naak और lutf-bhari चीख निकली. हमजा का मोटा लुंड उसकी तंग छूट को चीरता हुआ आधा अंदर दाखिल हो गया था. "ऊऊह्ह्ह माआ... मर गयी... हमजा... बहुत मोटा है... आह्हः... धीरे... धीरे बीटा..."
हमजा ने कोई रहम नहीं खाया. उसने एक और ज़ोर दर धक्का मारा और पूरा लुंड जड़ तक नसीम के अंदर उतार दिया. नसीम की आँखें उलट गयीं. उसने महसूस किया के हमजा का लुंड उसकी bacha-dani (उतेरुस) से टकरा रहा है.

"उफ्फफ्फ्फ़... कितनी तंग है आपकी छूट... लगता है अब्बू ने सदियों से यहाँ हाथ नहीं लगाया," हमजा ने हप्ते हुए कहा और तेज़ी से धक्के लगाने शुरू कर दिए.

कमरे में thap-thap की आवाज़ गूंजने लगी. हमजा के लुंड और नसीम की छूट का मिलाप इतना शिद्दत वाला था के दोनों के जिस्मो से पसीना फूट रहा था. हमजा ने नसीम के होंठों को अपने दांतो से काटा, और नसीम ने दर्द के मरे हमजा की पीठ पर अपने नाख़ून गड दिए.
"हाँ हमजा... ऐसे hi... ज़ोर से छोड़ो अपनी इस रंडी माँ को... आह्हः... गाली दो मुझे... कहो के मैं एक गन्दी औरत हूँ!" नसीम ने जूनून में कहा.
"हाँ... तुम मेरी रंडी हो! इतनी उम्र में भी इतनी गरम छूट लेकर बैठी हो... आज तुम्हारी इस छूट को पहाड़ दूंगा," हमजा ने गुस्से और हवस के mile-jule जज़्बात के साथ कहा और नसीम की पोजीशन बदल दी.
उसने नसीम को घुटनो के बल किया (डोगग्य स्टाइल). नसीम की भरी हुई गांड अब हमजा के सामने थी. हमजा ने पीछे से अपना लुंड निकाला और फिर से एक ज़ोर दर धक्के के साथ नसीम की छूट में दाखिल कर दिया. हर धक्के पर नसीम के मम्मी आगे पीछे झूल रहे थे.

"आआह्ह्ह... हमजा... पीछे से तोह जान hi निकल रही है... उफ्फफ्फ्फ़... छोड़ो... और ज़ोर से छोड़ो!"
तक़रीबन आधे घंटे तक यह नंगा नाच चलता रहा. नसीम का जिस्म अब बिलकुल ढीला पद चूका था, मगर उसकी रूह को वह सुकून मिल रहा था जिसके लिए वह बरसों से तरप रही थी.
आखिर में, हमजा ने अपना लुंड निकाला और नसीम के चेहरे पर रख दिया. "अम्मी... लीजिये... अपना इनाम लीजिये."

नसीम ने बिना किसी हिचकिचाहट के अपने बेटे का लुंड मुंह में भर लिया और उसे ऐसे चूसने लगी जैसे कोई छोटा बचा लोल्लिपोप चूसता है. उसने लुंड की टोपी को अपनी ज़बान से सहलाया और पूरा लुंड हलक़ तक उतार लिया. कुछ hi देर में हमजा ने एक गहरी कराह (मोअन) ली और अपना सारा गरम माल (सीमेन) नसीम के मुंह में छोड़ दिया. नसीम ने एक क़तरा भी जाया नहीं होने दिया और सब जातक गयी.

Ahsaas-E-Gunah:
जब तूफ़ान थमा, तोह कमरे में वापस वही भरी ख़ामोशी छ गयी. नसीम बिस्तर के एक कोने में पड़ी हुई थी, उसकी आँखों से अब आंसू बह रहे थे. यह गुनाह का बोझ था जो अब उसके सीने पर पहर बन कर गिर रहा था.
हमजा ने अपने कपडे पहने और बिना नसीम की तरफ देखे खिड़की के पास जा कर खड़ा हो गया. "आप अब जा सकती हैं... अब्बू उठ जायेंगे."
नसीम ने लरज़ते हाथों से अपने कपडे पहने. उसका जिस्म अभी भी दर्द कर रहा था, मगर उसके दिल में एक अजीब सी khali-pan की जगह डर ने ले ली थी. वह दबे पाऊँ कमरे से बहार निकली.
जैसे hi वह कॉरिडोर में पहुंची, उसके क़दम वहीँ जैम गए.
सिद्दीकी साहिब (रशीद साहिब के पुराने दोस्त और पडोसी) हॉल में बैठे थे और रशीद साहिब उनके सामने सर पकडे हुए थे.
"रशीद... यह बहुत बड़ा मसला है. अगर हैदराबाद वाले फार्महाउस की यह खबर सच है, तोह तुम्हारी इज़्ज़त मिटटी में मिल जाएगी," सिद्दीकी साहिब की आवाज़ में फ़िक्र थी.
नसीम दीवार की ओट में छुप गयी. उसका दिल zor-zor से धड़कने लगा. हैदराबाद? सीमा और उस्मान वहां थे.
"क्या हुआ है सिद्दीकी? Saaf-saaf कहो," रशीद साहिब ने गुस्से में पुछा.
"फार्महाउस के चौकीदार ने मुझे फ़ोन किया था. वह कह रहा था के सीमा और उस्मान... उन दोनों के बीच कुछ ऐसा चल रहा है जो bhai-bahen के दरमियान नहीं होना चाहिए. और बिलाल... बिलाल को शायद इस बात की भनक लग गयी है और वह वहां से गायब है. लोगों का कहना है के बिलाल ने किसी को क़तल करने की धमकी दी है!"
नसीम के पाऊँ टेल से ज़मीन निकल गयी. एक तरफ उसने अभी अपने बेटे के साथ जाना किया था, और दूसरी तरफ उसकी बेटी और बीटा भी उसी आग में जल रहे थे. घर का सुकून अब सिर्फ मुतासिर नहीं हुआ था, बल्कि राख होने वाला था.
मगर सब से बड़ा ट्विस्ट तोह अभी बाकी था.
नसीम ने महसूस किया के उसके पीछे कोई खड़ा है. उसने पलट कर देखा तोह हिरा कड़ी थी. हिरा की आँखों में आंसू नहीं थे, बल्कि एक अजीब सी नफरत और मुस्कराहट थी. उसने अपना मोबाइल दिखाया, जिसमें उसने हमजा के कमरे की थोड़ी देर पहले की साड़ी आवाज़ें रिकॉर्ड कर ली थीं.
"अम्मी... आपने तोह कहा था के हिरा कच्ची काली है," हिरा ने सरगोशी की. "लेकिन इस कच्ची काली ने आपका पूरा तमाशा देख लिया है. अब बताईये... पहले मैं अब्बू को हैदराबाद की खबर सुनौ, या आपकी और हमजा की यह रिकॉर्डिंग सुनौ?"
नसीम का डैम घुटने लगा. पूरा खंडन एक ऐसी दलदल में धस चूका था जहाँ से निकलने का कोई रास्ता नहीं था. एक माँ का गुनाह अब उसकी बेटी के हाथ में हथ्यार बन चूका था.
क्लिफहैंगर: हिरा और नसीम में अलग जंग छिड़ी हुई है, ये ब्लैकमेलिंग से क्या करना चाहती है हिरा? क्या नसीम अब डर जाएगी? रशीद साहब के दोस्त ने जो खबर दी है क्या वो सच है? क्या सच में ये घर अब बदनाम होगा?
Episode 14: गुनाह की पहली लकीर
लाहौर की वह रात हद से ज़्यादा खामोश थी, मगर हमजा के कमरे के अंदर जज़्बात का एक ऐसा तूफ़ान उठा हुआ था जो बरसों की परहेज़गारी को बहा ले जाने के लिए काफी था. नसीम, जो अभी कुछ देर पहले तक सिर्फ एक माँ थी, अब हमजा के सामने एक तड़पती हुई औरत बन कर कड़ी थी. उसने हमजा का कालर इतनी सख्ती से पकड़ा हुआ था के उसकी उँगलियाँ सफ़ेद पद रही थीं.
"क्यों खामोश हो हमजा? मेरी आँखों में देखो!" नसीम की आवाज़ में एक अजीब सी थरथराहट थी. "क्या तुम्हे लगता है के तुम्हारी बहन हिरा मुझ से ज़्यादा जवान है? क्या उसके जिस्म की तपिश मेरी गर्माहट से ज़्यादा है?"
हमजा का दिल डूबा जा रहा था. उसने कभी नहीं सोचा था के उसकी परसा माँ इस हद तक गिर जाएगी के अपनी hi बेटी से मुक़ाबला करने लगेगी. मगर सच तोह यह था के नसीम की इस be-baaki ने हमजा के अंदर के उस जानवर को जगा दिया था जो महीनो से क़ैद था. उसने नसीम की लॉन की क़मीज़ के नीचे से उभरते हुए bhare-bhare मम्मों को देखा, जो हर सांस के साथ ऊपर निचे हो रहे थे.
"अम्मी... आप होश में नहीं हैं," हमजा ने लड़खड़ाती ज़बान से कहा, मगर उसने नसीम को अपने से दूर नहीं किया.
"होश में तोह मैं अब आयी हूँ हमजा," नसीम ने सरगोशी की और हमजा का हाथ पकड़ कर अपनी क़मीज़ के ऊपर hi अपने बाएं मम्मी पर रख दिया. "देखो... देखो यह कितना तड़प रहा है.

तुम्हारे बाप ने तोह इसे बरसों पहले भुला दिया था. क्या तुम भी मुझे ऐसे hi तड़पाओ गए?"
नसीम का नरम और गरम मां हमजा की हथेली में था.

उसका निप्पल कपडे के ऊपर से hi सख्त महसूस हो रहा था. हमजा से अब और सब्र नहीं हुआ. उसने एक झटके से नसीम को अपनी तरफ खिंचा और उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए. यह बोसा (किश) कोई मामूली बोसा नहीं था; इसमें नफरत, मोहब्बत, और be-pannah हवस घुली हुई थी.

थे डिसेंट ईंटो लस्ट:
नसीम ने हमजा की गर्दन में बाहें दाल दें और पूरी शिद्दत से उसका साथ देने लगी. दोनों एक दूसरे के मुंह की राल (सलीवा) पी रहे थे.
हमजा का हाथ तेज़ी से नसीम की शलवार के नारे (स्ट्रिंग) तक पहुंचा और उसने एक झटके में उसे खोल दिया.
"ओह्ह्ह हमजा... मेरे बचे... छोड़ो मुझे... आज मुझे तबाह कर दो," नसीम ने सिसकियों के दरमियान कहा.
हमजा ने नसीम को बिस्तर पर पटक दिया. उसने अपनी बनयान उतारी और फिर अपनी शलवार भी फ़ेंक दी. जब वह नंगा हुआ, तोह नसीम की आँखें पहात गयीं.


उसने ज़िन्दगी में सिर्फ रशीद साहिब का लुंड देखा था, जो अब ढीला और be-jaan हो चूका था. मगर हमजा का लुंड... वह किसी काले सांप की तरह खड़ा था, नसें उभरी हुई थीं और वह इतना लम्बा और मोटा था के नसीम का जिस्म डर से thar-thara उठा.


"या अल्लाह... हमजा... यह... यह इतना बड़ा?" नसीम ने पहली बार अपने बेटे का लुंड देखा था और उसकी हालत देख कर उसकी छूट में एक अजीब सी खुजली और geela-pan महसूस होने लगा.
हमजा ने बिना कुछ कहे नसीम की क़मीज़ और ब्रा उतार दी. नसीम के भरे हुए, गोर मम्मी अब पूरी तरह नंगे थे. उन पर नीली नसें साफ़ दिख रही थीं और निप्पल्स बिलकुल सख्त हो कर खड़े थे. हमजा ने एक पल के लिए रुका और अपनी माँ के जिस्म को देखा. उसने कभी तसव्वुर भी नहीं किया था के उसकी माँ इतनी हसीं होगी.
"अम्मी... आप तोह किसी हूर से काम नहीं हैं," हमजा ने कहा और झुक कर उसके एक मम्मी को पूरे मुंह में भर लिया.

"आआह्ह्ह! हमज़ाआ... हैं... चूसो... मेरी जान... ज़ोर से दबाओ!" नसीम ने अपना सर तकिये में धसाये हुए चीखी.
हमजा ने नसीम की नंगी छूट को देखा. वहां बालों की एक हलकी सी तेह थी, और उसके बीच से पानी (लुब्रिकेशन) निकल कर बहार बह रहा था. उसने अपनी ऊँगली नसीम की छूट के सुराख़ पर राखी. नसीम का पूरा जिस्म एक झटके से ऊपर उठा.
"बहुत गीली हो गयी हैं आप अम्मी," हमजा ने शैतानी मुस्कराहट के साथ कहा.
"तुम्हारी माँ की छूट बरसों से प्यासी है बीटा... आज इस प्यास को बुझा दो... छोड़ो अपनी माँ को... ऐसी चुदाई करो के मैं चलने के क़ाबिल न रहूँ," नसीम अब पूरी तरह बेशरम हो चुकी थी.
हमजा ने नसीम की दोनों टांगें (लेग्स) हवा में उठा कर अपने क्षणों पर रखीं. उसने अपने लुंड की टोपी (हेड) नसीम की छूट के फट्टों पर राखी और एक ज़ोर दर झटका मारा.

"ननणायआईईईन्न्नण!!!!" नसीम की एक dard-naak और lutf-bhari चीख निकली. हमजा का मोटा लुंड उसकी तंग छूट को चीरता हुआ आधा अंदर दाखिल हो गया था. "ऊऊह्ह्ह माआ... मर गयी... हमजा... बहुत मोटा है... आह्हः... धीरे... धीरे बीटा..."
हमजा ने कोई रहम नहीं खाया. उसने एक और ज़ोर दर धक्का मारा और पूरा लुंड जड़ तक नसीम के अंदर उतार दिया. नसीम की आँखें उलट गयीं. उसने महसूस किया के हमजा का लुंड उसकी bacha-dani (उतेरुस) से टकरा रहा है.

"उफ्फफ्फ्फ़... कितनी तंग है आपकी छूट... लगता है अब्बू ने सदियों से यहाँ हाथ नहीं लगाया," हमजा ने हप्ते हुए कहा और तेज़ी से धक्के लगाने शुरू कर दिए.

कमरे में thap-thap की आवाज़ गूंजने लगी. हमजा के लुंड और नसीम की छूट का मिलाप इतना शिद्दत वाला था के दोनों के जिस्मो से पसीना फूट रहा था. हमजा ने नसीम के होंठों को अपने दांतो से काटा, और नसीम ने दर्द के मरे हमजा की पीठ पर अपने नाख़ून गड दिए.
"हाँ हमजा... ऐसे hi... ज़ोर से छोड़ो अपनी इस रंडी माँ को... आह्हः... गाली दो मुझे... कहो के मैं एक गन्दी औरत हूँ!" नसीम ने जूनून में कहा.
"हाँ... तुम मेरी रंडी हो! इतनी उम्र में भी इतनी गरम छूट लेकर बैठी हो... आज तुम्हारी इस छूट को पहाड़ दूंगा," हमजा ने गुस्से और हवस के mile-jule जज़्बात के साथ कहा और नसीम की पोजीशन बदल दी.
उसने नसीम को घुटनो के बल किया (डोगग्य स्टाइल). नसीम की भरी हुई गांड अब हमजा के सामने थी. हमजा ने पीछे से अपना लुंड निकाला और फिर से एक ज़ोर दर धक्के के साथ नसीम की छूट में दाखिल कर दिया. हर धक्के पर नसीम के मम्मी आगे पीछे झूल रहे थे.

"आआह्ह्ह... हमजा... पीछे से तोह जान hi निकल रही है... उफ्फफ्फ्फ़... छोड़ो... और ज़ोर से छोड़ो!"
तक़रीबन आधे घंटे तक यह नंगा नाच चलता रहा. नसीम का जिस्म अब बिलकुल ढीला पद चूका था, मगर उसकी रूह को वह सुकून मिल रहा था जिसके लिए वह बरसों से तरप रही थी.
आखिर में, हमजा ने अपना लुंड निकाला और नसीम के चेहरे पर रख दिया. "अम्मी... लीजिये... अपना इनाम लीजिये."

नसीम ने बिना किसी हिचकिचाहट के अपने बेटे का लुंड मुंह में भर लिया और उसे ऐसे चूसने लगी जैसे कोई छोटा बचा लोल्लिपोप चूसता है. उसने लुंड की टोपी को अपनी ज़बान से सहलाया और पूरा लुंड हलक़ तक उतार लिया. कुछ hi देर में हमजा ने एक गहरी कराह (मोअन) ली और अपना सारा गरम माल (सीमेन) नसीम के मुंह में छोड़ दिया. नसीम ने एक क़तरा भी जाया नहीं होने दिया और सब जातक गयी.

Ahsaas-E-Gunah:
जब तूफ़ान थमा, तोह कमरे में वापस वही भरी ख़ामोशी छ गयी. नसीम बिस्तर के एक कोने में पड़ी हुई थी, उसकी आँखों से अब आंसू बह रहे थे. यह गुनाह का बोझ था जो अब उसके सीने पर पहर बन कर गिर रहा था.
हमजा ने अपने कपडे पहने और बिना नसीम की तरफ देखे खिड़की के पास जा कर खड़ा हो गया. "आप अब जा सकती हैं... अब्बू उठ जायेंगे."
नसीम ने लरज़ते हाथों से अपने कपडे पहने. उसका जिस्म अभी भी दर्द कर रहा था, मगर उसके दिल में एक अजीब सी khali-pan की जगह डर ने ले ली थी. वह दबे पाऊँ कमरे से बहार निकली.
जैसे hi वह कॉरिडोर में पहुंची, उसके क़दम वहीँ जैम गए.
सिद्दीकी साहिब (रशीद साहिब के पुराने दोस्त और पडोसी) हॉल में बैठे थे और रशीद साहिब उनके सामने सर पकडे हुए थे.
"रशीद... यह बहुत बड़ा मसला है. अगर हैदराबाद वाले फार्महाउस की यह खबर सच है, तोह तुम्हारी इज़्ज़त मिटटी में मिल जाएगी," सिद्दीकी साहिब की आवाज़ में फ़िक्र थी.
नसीम दीवार की ओट में छुप गयी. उसका दिल zor-zor से धड़कने लगा. हैदराबाद? सीमा और उस्मान वहां थे.
"क्या हुआ है सिद्दीकी? Saaf-saaf कहो," रशीद साहिब ने गुस्से में पुछा.
"फार्महाउस के चौकीदार ने मुझे फ़ोन किया था. वह कह रहा था के सीमा और उस्मान... उन दोनों के बीच कुछ ऐसा चल रहा है जो bhai-bahen के दरमियान नहीं होना चाहिए. और बिलाल... बिलाल को शायद इस बात की भनक लग गयी है और वह वहां से गायब है. लोगों का कहना है के बिलाल ने किसी को क़तल करने की धमकी दी है!"
नसीम के पाऊँ टेल से ज़मीन निकल गयी. एक तरफ उसने अभी अपने बेटे के साथ जाना किया था, और दूसरी तरफ उसकी बेटी और बीटा भी उसी आग में जल रहे थे. घर का सुकून अब सिर्फ मुतासिर नहीं हुआ था, बल्कि राख होने वाला था.
मगर सब से बड़ा ट्विस्ट तोह अभी बाकी था.
नसीम ने महसूस किया के उसके पीछे कोई खड़ा है. उसने पलट कर देखा तोह हिरा कड़ी थी. हिरा की आँखों में आंसू नहीं थे, बल्कि एक अजीब सी नफरत और मुस्कराहट थी. उसने अपना मोबाइल दिखाया, जिसमें उसने हमजा के कमरे की थोड़ी देर पहले की साड़ी आवाज़ें रिकॉर्ड कर ली थीं.
"अम्मी... आपने तोह कहा था के हिरा कच्ची काली है," हिरा ने सरगोशी की. "लेकिन इस कच्ची काली ने आपका पूरा तमाशा देख लिया है. अब बताईये... पहले मैं अब्बू को हैदराबाद की खबर सुनौ, या आपकी और हमजा की यह रिकॉर्डिंग सुनौ?"
नसीम का डैम घुटने लगा. पूरा खंडन एक ऐसी दलदल में धस चूका था जहाँ से निकलने का कोई रास्ता नहीं था. एक माँ का गुनाह अब उसकी बेटी के हाथ में हथ्यार बन चूका था.
क्लिफहैंगर: हिरा और नसीम में अलग जंग छिड़ी हुई है, ये ब्लैकमेलिंग से क्या करना चाहती है हिरा? क्या नसीम अब डर जाएगी? रशीद साहब के दोस्त ने जो खबर दी है क्या वो सच है? क्या सच में ये घर अब बदनाम होगा?



















