Fantasy 'सुप्रीम' एक रहस्यमई सफर - Page 35 - SexBaba
  • From this section you can read all the hindi sex stories in hindi font. These are collected from the various sources which make your cock rock hard in the night. All are having the collections of like maa beta, devar bhabhi, indian aunty, college girl. All these are the amazing chudai stories for you guys in these forum.

    If You are unable to access the site then try to access the site via VPN Try these are vpn App Click Here

Fantasy 'सुप्रीम' एक रहस्यमई सफर

#162.

बर्फ का गोला: (16.01.02, बुधवार, 10:40, सनकिंग जहाज, अटलांटिक महासागर)

सनकिंग वही जहाज था, जिस पर सुनहरी ढाल लेकर विल्मर यात्रा कर रहा था।

आकृति को सुर्वया के माध्यम से विल्मर की पूरी जानकारी मिल गई थी, इसलिये वह मकोटा के दिये नीलदंड की मदद से छिपकर सनकिंग पर आ गई थी।

आकृति चाहती तो तुरंत ही विल्मर के कमरे में घुसकर सुनहरी ढाल प्राप्त कर सकती थी, पर वह इतनी गलतियां कर चुकी थी, कि अब अपना कदम फूंक-फूक कर उठा रही थी।

आकृति को नहीं मालूम था कि विल्मर के पास यह सुनहरी ढाल आयी कहां से? क्यों कि सुर्वया बर्फ के नीचे, पानी के अंदर और हवा में रह रहे किसी भी जीव को नहीं ढूंढ सकती थी, इसलिये सुर्वया ने शलाका को विल्मर को सुनहरी ढाल देते हुए नहीं देखा था।

आकृति ने जहाज पर प्रवेश करते ही, एक अकेली लड़की क्राउली को नीलदंड की मदद से पक्षी बनाकर समुद्र में उड़ा दिया और उसी के कपड़े धारण कर वह जहाज में घूमने लगी।

यह जहाज बहुत बड़ा नहीं था, इसलिये आकृति को विल्मर को ढूंढने में ज्यादा मुश्किल नहीं आयी।

इस समय आकृति जहाज के रेस्टोरेंट में बैठी कॉफी का घूंट भर रही थी। विल्मर उससे कुछ दूरी पर एक दूसरी टेबल पर बैठा था।

आखिरकार आकृति अपनी टेबल से उठी और टहलती हुई विल्मर के पास जा पहुंची।

“क्या मैं यहां बैठ सकती हूं?” आकृति ने विल्मर की ओर देखते हुए पूछा।

विल्मर अपने सामने इतनी खूबसूरत लड़की को देख खुश होते हुए बोला - “हां-हां क्यों नहीं....।”

आकृति विल्मर के सामने वाली कुर्सी पर बैठ गई।

“मैं बहुत देर से आपके सामने बैठी आपको देख रही थी, मुझे आपका चेहरा कुछ जाना-पहचाना लगा, इसीलिये मैं आपसे पूछने चली आई। क्या हम पहले कहीं मिल चुके हैं?” आकृति ने विल्मर की आँखों में

झांकते हुए कहा।

विल्मर ने आकृति को ध्यान से देखा और ना में सिर हिला दिया।

अगर शलाका ने विल्मर की स्मृतियां ना छीनी होतीं, तो विल्मर ने शलाका जैसे चेहरे वाली आकृति को, तुरंत पहचान लेना था, पर अभी उसे

आकृति का चेहरा बिल्कुल ही अंजान लगा।

“ओह सॉरी, फिर तो मैं चलती हूं।”

यह कहकर आकृति कुर्सी से उठने लगी।

तभी विल्मर ने उसे रोकते हुए कहा- “इससे क्या फर्क पड़ता है कि मैं आपको नहीं जानता। अरे जान पहचान बनाने के लिये किसी को

पहले से जानना जरुरी थोड़ी ना है .....वैसे मेरा नाम विल्मर है।”

यह कहकर विल्मर ने अपना हाथ आकृति की ओर बढ़ा दिया, पर आकृति को विल्मर से हाथ मिलाने में कोई रुचि नहीं थी, इसलिये वह पहले के समान ही बैठी रही।

आकृति को हाथ ना मिलाते देख विल्मर ने अचकचाकर अपना हाथ पीछे कर लिया।

“मेरा नाम क्राउली है, मैं एक आर्कियोलॉजिस्ट हूं। मैं पुरानी से पुरानी चीज को देखकर, कार्बन डेटिंग के द्वारा किसी भी वस्तु का काल और उसकी कीमत का निर्धारण करती हूं।” आकृति ने अपना दाँव फेंकते हुए कहा।

आकृति की बात सुन विल्मर खुश हो गया, उसे ऐसे ही किसी इंसान की तो तलाश थी, जो कि उसकी सुनहरी ढाल का मूल्यांकन कर सके।

“ओह, आप तो बहुत अच्छा काम करती हैं मिस क्राउली।” विल्मर ने आकृति की ओर देखते हुए कहा- “सॉरी मैं बात करने में आपसे पूछना भूल गया। आप कुछ लेंगी क्या?”

“नहीं-नहीं, मैंने अभी कॉफी पी है और मुझे अभी किसी चीज की जरुरत नहीं है...और वैसे भी मेरे मतलब की चीज इस जहाज पर कहां? मेरा मतलब है कि मेरी रुचि तो सिर्फ एंटीक चीजों में ही होती है।...एक्चुली मैं अपने काम को इस समय बहुत मिस कर रहीं हूं।” आकृति ने फिर से विल्मर को फंसाते हुए कहा।

“मेरे पास आपके काम की एक चीज है....क्या आप उसे देखना चाहेंगी?” विल्मर ने आकृति से पूछा।

“वाह! इससे अच्छा क्या हो सकता है। मैं जरुर देखना चाहूंगी।” आकृति खुश होते हुए अपनी सीट से खड़ी हो गई।

आकृति को तुरंत कुर्सी से खड़ा होता देख, विल्मर ने एक बार टेबल पर पड़े अपने आधे खाये हुए खाने को देखा और फिर वह उठकर वाश बेसिन की ओर बढ़ गया।

कुछ ही देर में विल्मर आकृति को लेकर अपने केबिन में पहुंच गया।

आकृति ने विल्मर के कमरे पर नजर मारी, पर उसे वह सुनहरी ढाल कहीं नजर नहीं आयी? आकृति कमरे में पड़ी एक सोफे पर बैठ गई।

तभी विल्मर ने दीवार पर लगी एक रंगीन पेंटिंग उतार ली, जो कि गोल आकार में थी और उभरी हुई थी।

आकृति ध्यान से उस पेटिंग को देखने लगी, तभी उसके आकार को देख आकृति को झटका लगा, यह वही सुनहरी ढाल थी, जिसे कि विल्मर ने चालाकी दिखाते हुए रंगों से पेंट कर दिया था।

विल्मर ने वह ढाल आकृति को पकड़ा दी।

“यह तो एक साधारण पेंटिंग है, जिसे शायद किसी ने अभी हाल में ही पेंट किया है, यह कोई एंटीक चीज नहीं है।” आकृति ने विल्मर को देखते हुए कहा।

तभी विल्मर ने आकृति के हाथ से वह ढाल ले, उस पर एक जगह कोई स्प्रे मार दिया, अब उस स्प्रे के नीचे से चमचमाती हुई सुनहरी ढाल नजर आने लगी थी।

“अब जरा देखिये।” विल्मर ने यह कहते हुए दोबारा से सुनहरी ढाल आकृति के हाथों में पकड़ा दी।

“यह तो काफी पौराणिक ढाल लग रही है, इसकी कीमत करोड़ों डॉलर है....पर इससे तुम्हें कोई फायदा नहीं होने वाला।” आकृति ने कहा।

“क्यों? क्या मैं इसे एंटीक मार्केट में बेच नहीं सकता?” विल्मर ने सोचने वाले अंदाज में पूछा।

“नहीं....क्यों कि यह तुम्हारे पास रहेगा नहीं।” यह कहते ही आकृति के हाथ में नीलदंड नजर आने लगा और इससे पहले कि विल्मर कुछ समझ पाता, नीलदंड से निकली किरणों ने, विल्मर को एक सीगल

(समुद्री पक्षी) में बदल दिया। इसी के साथ आकृति ने दरवाजा खोलकर सीगल को बाहर उड़ा दिया।

अब आकृति ने ढाल को अपने हाथ में उठाया और नीलदंड को सामने की ओर जोर से नचाया, पर नीलदंड उसी समय हवा में गायब हो गया।

“यह क्या नीलदंड कहां गया?” आकृति ने घबरा कर दोबारा हाथ हिलाया, पर नीलदंड उसके हाथ में वापस नहीं आया।

अब आकृति पूरी तरह से घबरा गई- “ये क्या हुआ? क्या मकोटा ने अपना नीलदंड वापस ले लिया? क्या ...क्या वह मेरे बारे में सबकुछ जान गया?...पर अगर नीलदंड चला गया तो मैं यहां से वापस अराका पर

कैसे जाऊंगी?....मेरे पास तो अभी इतनी शक्तियां भी नहीं है...अब मैं क्या करुं?

"इस ढाल की तलवार भी सीनोर राज्य में ही है, उसके बिना मैं दे...राज इंद्र से वरदान भी नहीं मांग सकती। और रोजर, मेलाइट और

सुर्वया का क्या होगा? चलो सुर्वया तो जादुई दर्पण में बंद है, उसे कुछ नहीं होगा, पर रोजर और मेलाइट का क्या?....रोजर तो मर भी जाये, तो मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता...पर अगर मेलाइट को कुछ हो गया, तो मैं कभी भी शलाका के चेहरे से मुक्ति नहीं पा पाऊंगी।....और .... और ग्रीक देवता तो मुझे मार ही डालेंगे।

“मुझे कुछ भी करके और शक्तियां इकठ्ठा करके वापस अराका पर जाना ही होगा...क्यों कि अब देवराज का वरदान ही मुझे मेरे पुत्र के पास पहुंचा सकता है।...पर...पर पहले मुझे यहां से निकलना होगा। वैसे यह जहाज 7 से 8 घंटों के बाद न्यूयार्क पहुंच जायेगा। मुझे वहां पहुंचकर अपनी बची हुई शक्तियों के साथ, कुछ और ही प्लान करना होगा।” यह सोच आकृति सुनहरी ढाल लेकर चुपचाप उस कमरे से निकल, क्राउली के कमरे की ओर बढ़ गई।

क्राउली के कमरे में पहुंच जैसे ही आकृति ने सुनहरी ढाल को बिस्तर पर रखा , तभी उसे बाहर से आती किसी शोर की आवाज सुनाई दी।

धड़कते दिल से आकृति केबिन के बाहर आ गई और उस ओर चल दी, जिधर से शोर की आवाज आ रही थी।

शोर की आवाजें डेक की ओर से आ रहीं थीं। आकृति ने पास जाकर देखा, तो उसे जहाज के डेक पर 1 मीटर व्यास का एक बर्फ का गोला पड़ा दिखाई दिया।

उस गोले के पास एक छोटा सा जाल पड़ा था, जिसे देख कोई भी समझ सकता था कि इस बर्फ के गोले को, इसी जाल के द्वारा समुद्र से निकाला गया है।

बहुत से व्यक्ति उस गोले के चारो ओर खड़े उसे देख रहे थे।

तभी उनमें से एक व्यक्ति बोला - “इस बर्फ के गोले में कोई इंसान है?” यह सुनकर सभी उस गोले के अंदर झांककर देखने लगे।

आकृति की नजर भी उस बर्फ के गोले के अंदर की ओर गई, सच में उस गोले में एक मानव शरीर था, पर उसके चेहरे पर नजर पड़ते ही आकृति हैरान हो गई क्यों कि वह व्यक्ति और कोई नहीं बल्कि विक्रम था।

विक्रम....वारुणि का सबसे करीबी।

“यह विक्रम इस बर्फ के गोले में कैसे आ गया?” आकृति यह देख समझ गई कि विक्रम अभी भी जिंदा हो सकता है।

अतः वह सभी को देखकर चिल्लाई- “बर्फ को तोड़ो, यह मेरा दोस्त है और यह अभी भी साँस ले रहा है।”

आकृति की बात सुन वहां खड़े व्यक्तियों का एक समूह उस बर्फ को तोड़ने लगा।

बर्फ को तोड़ने में ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी क्यों कि बर्फ की ऊपरी पर्त पहले से ही कमजोर थी, शायद यह बर्फ का गोला काफी समय से नमकीन समुद्री पानी में पड़ा हुआ था।

बर्फ टूटने के बाद विक्रम का शरीर बर्फ से बाहर आ गया। यह देख जहाज का एक डॉक्टर विक्रम का चेकअप करने लगा।

सभी उत्सुकता भरी निगाहों से उस डॉक्टर को देख रहे थे।

“यह व्यक्ति पूरी तरह से ठीक है, बस बर्फ में काफी देर तक दबे रहने से, इसके शरीर का तापमान गिर गया है, पर मुझे लगता है कि आधे से 1 घंटे के बीच यह होश में आ जायेगा।” डॉक्टर ने आकृति की ओर देखते हुए कहा- “आप इन्हें अपने कमरे में रख सकती हैं...अगर कोई परेशानी हो तो मुझे बता दीजियेगा। पर सच कहूं तो इनका इस प्रकार बर्फ में दबे रहने के बाद बचना किसी चमत्कार से कम नहीं।” यह कहकर डॉक्टर चला गया।

आकृति ने कुछ लोगों की मदद ले विक्रम को क्राउली के कमरे में रख लिया।

जब सभी कमरे से चले गये, तो आकृति फिर से अपनी सोच में गुम हो गई।

लगभग 45 मिनट के बाद विक्रम ने कराह कर अपनी आँखें खोलीं।

आँखें खोलने के बाद विक्रम ने तुरंत ही अपना सिर पकड़ लिया।

यह देख आकृति भागकर विक्रम के पास आ गई- “क्या हुआ विक्रम? तुम ठीक तो हो ना ?”

“कौन हो आप?” विक्रम ने आश्चर्य से आकृति को देखते हुए पूछा।

“तुम्हें क्या हो गया विक्रम? तुम मुझे पहचान क्यों नहीं पा रहे हो?” आकृति के चेहरे पर उलझन के भाव आ गये।

“मैं...मैं कौन हूं? तुम मुझे विक्रम क्यों बुला रही हो ? मेरा नाम तो.... मेरा नाम?....मेरा नाम मुझे याद क्यों नहीं आ रहा?” विक्रम के चेहरे पर उलझन के भाव साफ नजर आ रहे थे।

“लगता है चोट लगने के कारण विक्रम की स्मृति चली गई है।” आकृति ने मन में सोचा- “इस समय मेरे पास ज्यादा शक्तियां नहीं हैं.... अगर मैं विक्रम को कोई झूठी कहानी सुना दूं, तो मैं विक्रम की शक्तियों का इस्तेमाल स्वयं के लिये कर सकती हूं...और अगर कभी विक्रम की स्मृति वापस भी आ गई, तो वह शलाका का दुश्मन बन जायेगा....वाह क्या उपाय आया है मस्तिष्क में।

“पर...पर अगर बीच में कभी वारुणी ने विक्रम से, मानसिक तरंगों के द्वारा सम्पर्क करने की कोशिश की तो वह सबकुछ जान जायेगा

....सबसे पहले इसे अपनी नीली अंगूठी पहना देती हूं, इससे वारुणि कभी मानसिक तरंगों के द्वारा विक्रम से सम्पर्क स्थापित नहीं कर पायेगी, वैसे भी इस अंगूठी का इस्तेमाल, मैं पहले भी कई बार आर्यन को शलाका से बचाने के लिये कर चुकी हूं और इस अंगूठी का रहस्य भी किसी को नहीं पता।”

“आप मुझे विक्रम पुकार रहीं हैं।” विक्रम ने कहा- “मेरा नाम विक्रम है क्या?...पर मुझे कुछ भी याद क्यों नहीं आ रहा है?”

“मेरा नाम वारुणि है, तुम मेरे पति विक्रम हो, हम दोनों भारत में रहते हैं। तुम्हारे पास वायु की शक्तियां हैं, इन शक्तियों से तुम पृथ्वी की रक्षा करते हो। पर कुछ दिन पहले एक शक्तिशाली दुश्मन से लड़ते समय

तुम्हारे सिर पर चोट आ गई, जिससे तुम्हारी स्मृतियां चलीं गईं हैं। डॉक्टर ने तुम्हें कुछ दिन आराम करने को बोला है, इसलिये हम इस जहाज से न्यूयार्क घूमने जा रहे हैं। मेरे पिता ने मुझे एक अभिमंत्रित अंगूठी दी है। उन्होंने कहा है कि अगर तुम अगले 10 दिनों तक इस अंगूठी को बिना उतारे अपनी उंगली में पहने रहोगे, तो तुम्हारी स्मृतियां वापस आ जायेंगी।” आकृति ने कम समय में अच्छी खासी कहानी गढ़ दी।

यह कहकर आकृति ने अपने हाथ में पहनी नीली अंगूठी को विक्रम की ओर बढ़ा दिया।

आकृति की बात सुनकर विक्रम सोच में पड़ गया।

उसे सोच में पड़ा देख आकृति पुनः बोल उठी- “तुम्हें डॉक्टर ने ज्यादा सोचने को मना किया है।” अभी आकृति ने यह कहा ही था कि तभी उसके केबिन की घंटी बज उठी।

आकृति ने अंदर से ही तेज आवाज में पूछा- “कौन?”

“मैं जहाज का केबिन क्रू हूं, मुझे जहाज के डॉक्टर ने उस नौजवान की तबियत जानने के लिये भेजा है।” बाहर से एक आवाज उभरी।

“विक्रम की तबियत अब बिल्कुल ठीक है, उन्हें अब डॉक्टर की जरुरत नहीं है। मेरी तरफ से डॉक्टर को धन्यवाद कह देना।” आकृति ने बिना दरवाजा खोले ही तेज आवाज में कहा।

आकृति की बात सुन आगन्तुक चला गया, पर उसका इस प्रकार आना आकृति के लिये लाभकारी रहा।

अब विक्रम के चेहरे से चिंता के भाव हटते दिखाई दे रहे थे।

“अब तुम आराम से सो जाओ विक्रम, जब न्यूयार्क आयेगा, तो मैं तुम्हें उठा दूंगी।” आकृति ने कहा और विक्रम को सहारा देकर बिस्तर पर लिटा दिया।

विक्रम ने आकृति की दी हुई अंगूठी अपने दाहिने हाथ की सबसे छोटी उंगली में पहन ली थी।

जारी रहेगा______✍️
 
#163.

ओरैकल की भविष्यवाणी:

(16.01.02, बुधवार, 12:30, ग्रीक देव..ओं का महल, ग्रीस)

आर्टेमिस इस समय बहुत क्रोध में दिख रही थी। वह इस समय खाने की टेबल पर थी, लेकिन उसका गुस्सा शांत होने का नाम ही नहीं ले रहा था।

तभी ‘गैनी मेड’ हाथ में एक ट्रे लिये हुए डाइनिंग रुम में दाखिल हुआ।

गैनी मेड ग्रीक देव..ओं का रसोइयां था, वही दे..ताओं को खाना बनाकर खिलाता था।

गैनी मेड ने ट्रे को टेबल पर रखा और आर्टेमिस को एम्ब्रोशिया और नेक्टर परोसने लगा। (एम्ब्रोशिया- एक प्रकार का खाना, जो उन्को हमेशा जवान बनाए रखता है और नेक्टरः एक प्रकार का पेय पदार्थ, जो ग्रीक देव..ओं को अमरत्व प्रदान करता है)

“क्या बात है आर्टेमिस, आप बहुत गुस्से में दिख रहीं हैं?” गैनी मेंड ने आर्टेमिस के गुस्से का कारण पूछते हुए कहा।

“चलो किसी ने तो पूछा कि मैं गुस्सा क्यों हूं?” आर्टेमिस ने गैनी मेड की ओर देखते हुए कहा- “आज 2 दिन बीत गये मेलाइट का अपहरण हुए ....मैं पिछले 2 दिन से सभी देवों से मिलने को कह रही हूं, पर कोई

मिल ही नहीं रहा। यहां तक कि मेरा भाई अपोलो भी नहीं। अब तुम ही बताओ कि और कौन है इस ग्रीस में, जो मुझे मेलाइट का पता बता दे?”

“अगर आप आज्ञा दें तो मैं आपको एक पुरानी घटना, कहानी की तरह सुनाना चाहता हूं।” गैनी मेड ने आर्टेमिस की ओर देखते हुए कहा।

पहले तो यह सुनकर आर्टेमिस को बहुत गुस्सा आया कि वह अपना दुख बयान कर रही है और ये गैनी मेड उसको कहानी सुनाना चाह रहा है, पर फिर आर्टेमिस को गैनी मेड की समझदारी का ध्यान आया, इसलिये उसने बुझे मन से आज्ञा दे दी और एम्ब्रोशिया को खाना शुरु कर दिया।

आज्ञा मिलते ही गैनी मेड शुरु हो गया- “दे..ता जीयूष ने आपकी माँ ‘लेटो’ के साथ विवाह कर लिया, जिसके फलस्वरुप उनकी पहली पत्नि ‘हेरा’ को बहुत गुस्सा आया। जब आपकी माँ लेटो आपको जन्म देने वाली थीं, तो उस रात देवी हेरा ने एक ड्रैगन को आपकी माँ को मारने के लिये भेजा।

"आपकी माँ ने आपको और आपके भाई अपोलो को एक साथ जन्म दिया। जब आपकी माँ को यह पता चला कि एक ड्रैगन उन्हें मारने आ रहा है, तो उन्होंने आपके भाई अपोलो को एक घंटे में ही छोटे से जवान कर दिया। फिर आपके भाई ने, अपने तीर से उस ड्रैगन को मार दिया। अपोलो ने उस ड्रैगन को ग्रीस के डेल्फी शहर में मारा।

“मरने के बाद उस ड्रैगन का शरीर जमीन में बनी एक बड़ी सी दरार में समा गया। चूंकि आपके भाई ने पैदा होते ही एक विशाल ड्रैगन को मारा, इसलिये सभी ने उन्हें देवता मान लिया। लेकिन जिस दरार में वह ड्रैगन मरकर गिरा था, उस दरार से एक अजीब सी गैस निकलने लगी, जिसके घेरे में डेल्फी शहर की एक पवित्र स्त्री ‘ओरैकल’ आ गई।

"कहते हैं तबसे ओरैकल में यह शक्ति आ गई कि वह किसी का भी भविष्य बता सकती थी। यानि ओरैकल की आत्मा किसी माध्यम से ईश्वर के साथ जुड़ गई। ओरैकल के मरने के सैकड़ों वर्षों के बाद भी, आज भी डेल्फी शहर में कोई ना कोई पवित्र स्त्री ओरैकल का वह धर्म निभा रही है। वह पवित्र पानी में नहा कर सभी को उनका भविष्य बताती है।” यह कहकर गैनी मेड चुप हो गया और आर्टेमिस की ओर देखने लगा।

आर्टेमिस कुछ देर तक सोचती रही कि इस कहानी से उसको क्या फायदा हुआ।

तभी अचानक वह जोर से उछली और खुश होते हुए बोली- “यही चीज तुम साधारण तरीके से नहीं बता सकते थे कि डेल्फी जाकर मैं ओरैकल से मिल लूं।”

“अरे! क्या आपको मेरी कहानी में आपकी समस्य हल मिल गया?...मैं तो बस आपके भाई की बहादुरी की कहानी सुना रहा था।” यह कहकर गैनी मेड बर्तन उठा कर वापस अंदर की ओर बढ़ गया।

आर्टेमिस तेजी से महल से निकली और एक चुटकी बजाकर डेल्फी शहर पहुंच गई। आर्टेमिस सीधा वहां से ओरैकल के मंदिर में पहुंच गई।

ओरैकल ने आर्टेमिस को देख उसका स्वागत किया। आर्टेमिस ने भी अपनी समस्या ज्यों की त्यों ओरैकल के सामने रख दी।

ओरैकल ने अपने धर्मानुसार आर्टेमिस से कुछ रीतियां करवाईं और स्वयं आँख बंद कर अपना सम्पर्क दूसरी दुनिया से जोड़ने में लग गई।

आर्टेमिस, ओरैकल के सामने बैठी उसे देख रही थी।

कुछ देर बाद ओरैकल के चेहरे पर, एक अजीब सी लाल रंग की रोशनी आकर पड़ने लगी, अब उसने आँखें खोल दीं ।

उसने आर्टेमिस की ओर देखते हुए बोली- “तुम मेलाइट के बारे में जानना चाहती हो ना?....मुझे मेलाइट इस समय दिखाई दे रही है...पर वह खुश है....उसे वह मिला है जिसकी उसे हजारों वर्षों से तलाश थी...हरक्यूलिस का सोचना बिल्कुल ठीक था..अब तुम्हें उसकी चिंता करने की कोई जरुरत नहीं है आर्टेमिस.....अब उसका विचार अपने दिमाग से त्याग दो...अब वह कभी तुम्हारे पास वापस नहीं आयेगी...कभी नहीं।” आर्टेमिस को ओरैकल की बातें समझ नहीं आ रहीं थीं।

“आप क्या कह रहीं हैं? मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है? कौन मिल गया है मेलाइट को ? और वह कौन है? जिसने उसका अपहरण किया था।” आर्टेमिस ने ओरैकल से पूछा।

“अगर हर कोई भविष्य को समझ ले, तो भविष्य का कोई मतलब ही नहीं रह जायेगा.......मेलाइट को उसका सोने का हिरण मिल गया है....सुनहरी कस्तूरी वाला सोने का हिरण....और जिसने उसका अपहरण किया...वह वो नहीं है...जो दिखती है...वह एक धोखा है... उसका चेहरा भी धोखा है....मगर तुम चिंता मत करो...उसको उसकी सजा मिल गई है....ध्यान रखना आर्टेमिस....बिना अपोलो उससे मिलने मत जाना कभी....चाहे वह तुम्हारे सामने ही क्यों ना हो? नहीं तो हार जाओगी...भूल जाओ मेलाइट को...भूल जाओ...।” यह कहते ही ओरैकल के चेहरे की लाल चमक गायब हो गई और अब वह सामान्य नजर आने लगी।

“क्या आपको आपके सवालों का जवाब मिला?” ओरैकल ने आर्टेमिस से पूछा।

आर्टेमिस ने धीरे से अपना सिर हिलाया और उठकर मंदिर से बाहर निकल गई, परंतु यहां आने के बाद आर्टेमिस के चेहरे पर उलझन के भाव और बढ़ गये

चैपटर-8

स्टेचू ऑफ़ लिबर्टी: (तिलिस्मा 3.2)

चींटियों के संसार को पार करने के बाद सभी जिस दरवाजे में घुसे, उस दरवाजे ने सभी को अमेरिका के न्यूयार्क शहर में पहुंचा दिया।

जी नहीं, यह असली न्यूयार्क नहीं, बल्कि कैश्वर द्वारा बनाया नकली न्यूयार्क शहर था, क्यों कि यहां लिबर्टी द्वीप पर एक नहीं बल्कि 2 स्टेचू ऑफ़ लिबर्टी खड़ी दिखाई दे रहीं थीं और सुयश सहित, सभी एक स्टेचू ऑफ़ लिबर्टी के समीप खड़े थे।

“यह तो न्यूयार्क शहर का वातावरण है।” जेनिथ ने मूर्तियों को देखते हुए कहा- “मगर यहां पर 2-2 स्टेचू ऑफ़ लिबर्टी हैं। क्या मतलब हो सकता है इसका ?”

“इन दोनों मूर्तियों में कुछ अंतर हैं।” सुयश ने कहा- “जैसे एक मूर्ति का रंग हल्का हरा है, जबकि दूसरी मूर्ति हल्के भूरे रंग की है, इसका मतलब एक असली है और एक नकली।”

“कहीं हमें दोनों मूर्तियों के बीच अंतर तो नहीं ढूंढना?” ऐलेक्स ने कहा।

“हो सकता है, पर हम इस समय भूरी मूर्ति वाले पत्थर पर खड़े हैं, जो कि मुझे नकली मूर्ति दिख रही है।” तौफीक ने कहा - “क्यों कि असली स्टेचू ऑफ़ लिबर्टी का रंग हल्का हरा है।”

“क्या हममें से कोई स्टेचू ऑफ़ लिबर्टी के बारे में सबकुछ जानता है?” क्रिस्टी ने सबको देखते हुए कहा- “क्यों कि बिना सबकुछ जाने हमें दोनों के बीच अंतर नहीं कर पायेंगे।”

“मुझे इस स्टेचू ऑफ़ लिबर्टी के बारे में काफी कुछ पता है, क्यों कि मैं काफी समय से न्यूयार्क में ही रह रहा हूं।” सुयश ने आह भरते हुए कहा- “पर पता नहीं क्यों, आज प्रोफेसर अलबर्ट की बहुत याद आ रही है।”

अलबर्ट की बात सुन शैफाली की आँखों में भी, कुछ बूंदें तैरने लगीं, पर उसने तुरंत अपने को कंट्रोल कर लिया।

तभी सुयश ने स्टेचू ऑफ़ लिबर्टी के बारे में बताना शुरु कर दिया- “स्टेचू ऑफ़ लिबर्टी अमेरिका के न्यूयार्क शहर से कुछ दूर ‘लिबर्टी द्वीप’ पर मौजूद है, यह पूरी तरह तांबे से निर्मित मूर्ति है। मूर्ति की ऊंचाई 151 फुट 11 इंच है और अगर इसके पत्थर की ऊंचाई को भी जोड़ लें, तो यह मूर्ति 305 फुट 6 इंच है। इस मूर्ति को फ्रांस और अमेरिका की दोस्ती के प्रतीक के तौर पर फ्रांस ने अमेरिका को दिया था।

"इस मूर्ति का अनावरण 28 अक्टूबर 1886 को तत्कालीन अमेरिकन राष्ट्रपति ‘ग्रोवर क्लीवलैंड’ ने किया था। इस मूर्ति का डिजाइन ‘फ्रेडरिक अगस्त बार्थोल्टी’ ने किया था। इसके मूर्तिकार का नाम ‘गुस्ताव एफिल’ था। यह मूर्ति रोमन देवी ‘लिबर्टस’ की है, जिन्हें स्वतंत्रता की देवी भी कहा जाता है। चूंकि अमेरिका 4 जुलाई 1776 को आजाद हुआ था, इसलिये इस मूर्ति के हाथ में पकड़ी किताब पर वही तारीख रोमन अंकों में लिखी है।

"22 मंजिल इस मूर्ति के ऊपर तक पहुंचने के लिये 354 घुमावदार सीढ़ियां हैं। मूर्ति के सिर पर जो मुकुट लगा है, उस पर 7 किरणें बनी हैं, जो कि विश्व के 7 महाद्वीपों का प्रतिनिधित्व करती हैं। मुकुट पर 25 खिड़कियां भी बनी हैं, जो धरती के रत्नों को दर्शाती हैं। मूर्ति के हाथ में पकड़ी मशाल की फ्लेम पहले साधारण थी, परंतु बाद में इस पर 24 कैरेट सोने की पतली पर्त चढ़वा दी गई। इसी प्रकार पहले यह मूर्ति भूरे रंग की थी, पर बाद में समुद्र के पानी के द्वारा ऑक्सीकरण हो जाने की वजह से, यह हल्के हरे रंग में परिवर्तित हो गई।” इतना कहकर सुयश चुप हो गया।

“अरे वाह कैप्टेन, आपकी जानकारी तो इस मूर्ति के बारे में बहुत अच्छी है।” जेनिथ ने मुस्कुराते हुए कहा।

“वो क्या है ना कि इतनी बार इस जगह पर गया हूं कि गाईड को सुनते-सुनते सब कुछ कंठस्थ हो गया है।” सुयश ने भी मुस्कुराते हुए जवाब दिया।

“तो अब श्योर हो गया कि हम जिस मूर्ति के पास खड़े है, वह नकली है।” शैफाली ने कहा- “और हमें इस नकली मूर्ति को सुधार कर उस असली मूर्ति के समान करना है।”

“तो फिर हमें सबसे पहले मूर्ति के नीचे से ही शुरु करना होगा।” तौफीक ने कहा।

“नीचे मूर्ति की पहली गलती तो मुझे दिखाई दे रही है।” सुयश ने कहा- “नकली मूर्ति की पैरों में जंजीर बंधी है, जबकि असली मूर्ति के पैरों में वह जंजरी टूटी हुई पड़ी है। इसका मतलब हमें पहले इस जंजीर को

तोड़ना होगा।”

“पर कैसे कैप्टेन अंकल?” शैफाली ने सुयश को देखते हुए कहा- “आप देखिये ये जंजीर तो धातु की बनी है और बहुत मोटी भी है, तोड़ना तो छोड़ो, हम तो इसे उठा भी नहीं सकते।”

“तो फिर पहले ऊपर की ओर चलते हैं, हो सकता है कि ऊपर कोई ऐसी चीज मौजूद हो, जिससे इन बेड़ियों को तोड़ा जा सके।” सुयश ने कहा।

सभी को सुयश का यह सुझाव सही लगा, इसलिये सभी स्टेचू ऑफ़ लिबर्टी की सीढ़ियों की ओर बढ़ गये।

पर सीढ़ियों के पास पहुंचकर सभी ठिठककर रुक गये, क्यों कि सीढ़ियों पर एक दरवाजा था, जिस पर एक 3 डिजिट का लॉक लगा था।

“लो हो गया कैश्वर का काम शुरु।” ऐलेक्स ने मुंह बनाते हुए कहा- “लॉक मिलना शुरु हो गये....अब पहले इसका कोड ढूंढना पड़ेगा।”

“चूंकि इस लॉक पर यह नहीं लिखा है कि इसे कितनी बार में खोलना है, इसलिये मैं इस लॉक को ‘क्रमचय-संचय’ या फिर ‘प्रायिकता’ (गणित का एक सूत्र) लगा कर आसानी से कुछ देर में खोल दूंगी।” शैफाली ने सभी को देखते हुए कहा।

“इतना समय भी देने की जरुरत नहीं है, मुझे लगता है कि इसका कोड मुझे पता है।” यह कहकर सुयश ने आगे बढ़कर उस लॉक पर एक नम्बर लगाया और लॉक तुरंत खुल गया।” यह देख सभी आश्चर्य में पड़ गये।

“कैप्टेन आपको इस लॉक का कोड कैसे पता चला?” तौफीक ने सुयश को देखते हुए आश्चर्य से पूछा।

“अब धीरे-धीरे मैं भी कैश्वर के दिमाग को पढ़ना सीख रहा हूं।” सुयश ने मुस्कुरा कर कहा- “वैसे इस दरवाजे का कोड 354 था, जो कि स्टेचू ऑफ़ लिबर्टी की इन सीढ़ियों की कुल संख्या है। कैश्वर इसके अलावा और किसी कोड को रखने के बारे में सोचता भी नहीं।”

सुयश यह कहकर दरवाजा खोलकर सीढियां चढ़ना शुरु हो गया।

सभी सुयश के पीछे-पीछे चल दिये।

ऊपर पहुंचने तक सबकी हालत खराब हो गई क्यों कि 22 मंजिल सीढ़ियों के द्वारा चढ़ना इतना भी आसान नहीं था।

“बेड़ा गर्क हो इस कैश्वर का।” ऐलेक्स ने अपनी फूलती साँसों के साथ कैश्वर को भला-बुरा कहना शुरु कर दिया- “अगर ऐसे ही 3-4 बार ऊपर-नीचे करना पड़े, तो आदमी बिना तिलिस्मा के खतरे के मारा जायेगा।”

सभी ने कुछ देर तक बैठकर आराम किया और फिर अपने आस-पास देखने लगे।

इस समय सभी मूर्ति के सिर वाले मुकुट में बने कमरे में थे, जिसके चारो ओर खिड़कियां बनी थीं।

कमरे की छत पर एक गोला सा बना था, जिससे मुकुट की सारी किरणें जुड़ीं थीं ।

उस गोले में 7 घिरनियां लगीं थीं, जो कि पतले पाइप पर फिसल सकती थीं। शायद हर घिरनी एक किरण का प्रतिनिधित्व कर रही

थी।

ऐलेक्स ने ध्यान से उन घिरनियों को देखा, तो उसे 2 घिरनियां बहुत पास-पास दिखाई दीं।

“कैप्टेन, मुझे इन घिरनियों में कुछ प्रॉब्लम दिख रही है?” ऐलेक्स ने सुयश को आवाज लगाते हुए कहा।

ऐलेक्स की आवाज सुन सुयश उन घिरनियों की ओर देखने लगा। कुछ देर तक देखने के बाद सुयश ने आगे जाकर, एक खिड़की से झांककर मूर्ति के ऊपर की ओर देखा।

कुछ देर देखने के बाद सुयश ने अपना सिर अंदर कर लिया और बोला- “बाहर मूर्ति के मुकुट में 7 किरणें होनी चाहिये थीं, पर अभी वह 6 ही नजर आ रही हैं, इसका मतलब हमें उन्हें 7 करना होगा.... अब अगर अंदर कमरे की छत पर मौजूद इन घिरनियों को देखें, तो साफ पता चलता है कि इन घिरनियों से ही मुकुट की किरणें नियंत्रित होती हैं और यह 2 घिरनियां पास-पास है, जिसकी वजह से बाहर 6 ही किरणें नजर आ रहीं हैं। यानि हमें किसी भी प्रकार से इन घिरनियों को इनकी वास्तविक स्थिति पर लाना होगा। अब चूंकि कमरे की ऊंचाई 15 फुट है, तो हममें से कोई भी इस ऊंचाई तक नहीं पहुंच सकता, पर अगर हम सम्मिलित कोशिश करें, तो हम एक के ऊपर एक खड़े होकर ऊपर तक पहुंच सकते हैं।”

सुयश की बात से सभी सहमत हो गये। आनन-फानन सभी ने गोला बना कर, अथक प्रयास कर शैफाली को ऊपर तक पहुंचा दिया ।

पर शैफाली की पूरी ताकत लगाने के बाद भी, वह किसी भी घिरनी को हिला नहीं पाई। यह देख शैफाली नीचे आ गई।

“इसका मतलब घिरनी को घुमाने के लिये कोई और साधन है, यह हाथ से नहीं घूमेगी।” सुयश ने चारो ओर देखते हुए कहा- “अब फिलहाल इस कमी को भी बाद में सुधारेंगे....अब कुछ नयी गलती ढूंढो।”

“कैप्टेन अंकल आपने कहा था कि इस मुकुट में 25 खिड़कियां है, पर मुझे यहां सिर्फ 24 खिड़कियां ही दिखाई दे रहीं है।” शैफाली ने सबका ध्यान खिड़कियों की ओर कराते हुए कहा।

सुयश ने भी खिड़कियों की गिनती की, शैफाली सही कह रही थी। अब सुयश ध्यान से सभी खिड़कियों के बीच की दूरी का अध्ययन करने लगा, पर सभी खिड़कियों में बराबर दूरी थी।

“कैप्टेन, सभी खिड़कियों की दूरी बराबर है और इसके बीच कोई नयी खिड़की नहीं लगाई जा सकती।” तौफीक ने कहा- “इसका साफ मतलब है कि हमें मूर्ति के सिर के पीछे वाले स्थान पर ही कुछ ढूंढना

पड़ेगा क्यों कि वहां पर खाली दीवार है।”

तौफीक की बात सुन सभी मूर्ति के चेहरे के पीछे वाली साइड में आ गये। ऐलेक्स अब हाथों से टटोलकर उस दीवार को देखने लगा।

तभी ऐलेक्स का हाथ किसी अदृश्य चीज से टकराया।

ऐलेक्स ने उस चीज को अपनी ओर खींचा, वह अदृश्य चीज अब दीवार से निकलकर ऐलेक्स के हाथ में आ गई और इसी के साथ उस दीवार में अब 25 खिड़की नजर आने लगी।

25वीं खिड़की देख सभी खुशी से भर उठे। अब वह सभी ऐलेक्स की ओर देख रहे थे, जो कि अपने हाथों को अजीब ढंग से हवा में घुमाकर कुछ कर रहा था।

“तुम यह क्या कर रहे हो ऐलेक्स?” क्रिस्टी ने ऐलेक्स से पूछा- “और तुमने यह 25वीं खिड़की कैसे बनायी?”

“25वीं खिड़की पहले से ही यहां पर थी, पर उसे किसी अदृश्य चीज ने घेर रखा था ? मैंने जैसे ही उस अदृश्य चीज को दीवार से हटाया़ वह खिड़की दिखाई देने लगी।” ऐलेक्स ने कहा- “और अब मैं उसी अदृश्य चीज को समझने की कोशिश कर रहा हूं कि वह है क्या?”

“ऐलेक्स भैया, आप वह चीज मुझे दे दीजिये, मेरा स्पर्श का अनुभव आपसे ज्यादा है, मैं उसे आसानी से समझ सकती हूं।” शैफाली की बात सही थी क्यों कि शैफाली ने 13 वर्षों तक हर चीज को छूकर ही तो अनुभव किया था।

ऐलेक्स ने वह चीज शैफाली को दे दी। शैफाली ने वह चीज ले, अपनी आँखें बंद कर लीं और छूकर उसे

महसूस करने लगी।

“यह चीज किसी जापानी पंखें की तरह है, जिसे फैलाकर खोला और बंद किया जा सकता है।” यह कहकर शैफाली ने उस अदृश्य जापानी पंखे को खोल दिया, तभी मूर्ति के चेहरे की ओर से एक तेज आवाज उभरी, वह आवाज सुन शैफाली ने डरकर पंखें को फिर से बंद कर दिया।

अब सभी मूर्ति के चेहरे की ओर आ गये।

“शैफाली के जापानी पंखे के खोलने पर आगे से कोई आवाज उभरी थी। शायद इस ओर उस समय कुछ घटित हुआ था।” सुयश ने शैफाली को देखते हुए कहा- “शैफाली जरा एक बार फिर उस पंखे को खोलो, मैं देखना चाहता हूं कि वह आवाज कहां से आयी थी?”

सुयश की बात सुन शैफाली ने एक झटके से पंखे को फिर खोल दिया।

पंखा खुलते ही आपस में चिपकी हुई दोनों घिरनियां अलग-अलग हो गईं, जिसे सभी ने देख लिया।

यह देख सुयश ने भागकर एक खिड़की से फिर बाहर की ओर झांक कर देखा। बाहर अब मूर्ति के मुकुट पर 7 किरणें दिखाई देने लगीं थीं, यह देख सुयश खुश हो गया।

“हमने 3 बाधाओं को पार कर लिया।” सुयश ने सभी की ओर देखते हुए कहा- “पहली सीढ़ियों के लॉक की बाधा, दूसरी 25वीं खिड़की को खोजना और तीसरा 7वीं किरण को सही करना।.... वेलडन दोस्तों....अब हमें मूर्ति की अगली कमी पर ध्यान देना होगा... एक तो मूर्ति की बेड़ियां अभी भी लगी हैं...और दूसरा मूर्ति का रंग अभी भी भूरा है...पर इसको सही करने के पहले हमें एक बार फिर से ध्यान से मूर्ति को देखना होगा कि मूर्ति में कोई और कमी तो नहीं है?”

सुयश की बात सुन सभी खिड़कियों से झांककर मूर्ति का देखने लगे।

“कैप्टेन, मूर्ति के हाथ में पकड़ी मशाल की फ्लेम नहीं है।” ऐलेक्स ने बाहर झांकते हुए कहा।

“कैप्टेन मुझे मूर्ति के हाथ में पकड़ी किताब की तारीख भी सही नहीं लग रही है।” क्रिस्टी ने कहा- “चूंकि अमेरिका 4 जुलाई 1776 को आजाद हुआ था, इस हिसाब से किताब पर रोमन में ‘IV’ (यानि 4)

MDCCLXXVI (यानि 1776) लिखा होना चाहिये था, पर किताब में ‘IV’ (यानि 4) MDCCLSSIV (यानि 1774) लिखा है, जो कि गलत है।” (रोमन संख्याः M=1000, D=500, C=100, L=50, X=10, VI=6, IV=4)

“यानि कि यह तारीख अमेरिका की आजादी के 2 वर्ष पहले की है, शायद इसी लिये मूर्ति के पैरों में, अभी भी बेड़ियां लगी हुईं है।”

जारी रहेगा_______✍️
 
#164.

“बहुत अच्छे क्रिस्टी। तुमने बहुत अच्छी चीज पर ध्यान दिया।” सुयश ने क्रिस्टी की तारीफ करते हुए कहा- “यानि की अगर हम उस किताब पर लिखी तारीख को सही कर दें तो मूर्ति के पैरों में लगी बेड़ियां अपने आप हट जायेंगी।”

“कैप्टेन, आपने मेरी तारीफ क्यों नहीं की ?” ऐलेक्स ने नकली मुंह बनाते हुए कहा।

ऐलेक्स का ऐसा मुंह देख सभी की चेहरे पर मुस्कान आ गई।

सुयश ने ऐलेक्स की ओर देखा और जोर से उसका गाल पकड़ कर खींच दिया। यह देख सभी हंस दिये।

“अच्छा अगली बात कि मूर्ति के हाथ में पकड़ी मशाल की फ्लेम भी गायब है, हमें उसे भी ढूंढना पड़ेगा।” सुयश ने सभी को फिर से काम की याद दिलाते हुए कहा।

“कैप्टेन, मशाल वाली जगह पर जाने के लिये तो सीढ़ियां बनी हैं, पर इस किताब वाली जगह पर कैसे जायेंगे, वहां जाने का तो कोई रास्ता नहीं है।” तौफीक ने सुयश को ध्यान दिलाते हुए कहा।

“हमें वहां पर उतरने के लिये एक लंबी और मजबूत रस्सी चाहिये होगी...जो कि शायद यहीं कहीं हमें ढूंढने पर मिल जाये?...पर पहले हमें मशाल वाली जगह पर चलना होगा।” सुयश यह कहकर वापस सीढ़ियों की ओर बढ़ गया।

कुछ देर में सभी मशाल वाली जगह पर थे।

यह जगह मूर्ति की सबसे ऊंची जगह थी, यहां से न्यूयार्क शहर का एक बहुत बड़ा हिस्सा दिख रहा था।

सभी ने चारो ओर देखा, पर मशाल की फ्लेम कहीं भी नजर नहीं आयी।

जब काफी देर तक मशाल की फ्लेम नहीं मिली, तो थककर ऐलेक्स ने कहा - “मशाल की फ्लेम का आकार काफी बड़ा है, ऐसे में उस फ्लेम को इस स्थान के अलावा मूर्ति में कहीं नहीं रखा गया होगा, क्यों कि अगर उसे कहीं और रखा गया होता, तो उसको उठाकर यहां तक लाने के लिये कुछ ना कुछ व्यवस्था जरुर होती? पर हमें यहां और कुछ नहीं दिखाई दे रहा? इसका मतलब कुछ तो जरुर ऐसा है, जिसे हम समझ नहीं पा रहे हैं?”

ऐलेक्स के शब्द सुन सुयश कुछ देर के लिये सोच में पड़ गया और फिर वह मशाल की सीढ़ियां चढ़कर मशाल की फ्लेम के पास आ गया।

सुयश कुछ देर तक मशाल की फ्लेम के ऊपर हवा में हाथ लहराता

रहा और अचानक से जैसे ही सुयश ने अपना हाथ नीचे किया, मशाल पर फ्लेम दिखाई देने लगी।

सुयश अब उतरकर नीचे आ गया। सुयश के नीचे आते ही सभी ने उसे घेर लिया।

“कैप्टेन, आप ने यह कैसे किया?” जेनिथ ने सुयश से पूछ लिया।

“दरअसल मुझे अपने पुराने समय की एक घटना याद आ गई।” सुयश ने कहा- “जब मैं xv साल का था, तो मुझे याद है कि अमेरिका के एक प्रसिद्ध जादूगर ‘डेविड कॉपरफील्ड’ ने सबके सामने जादू से, स्टेचू ऑफ़ लिबर्टी को गायब कर दिया था, मैंने भी वह शोटी.वी. पर देखा था। उस समय तो सभी के लिये, यह एक बहुत बड़े जादू के समान था, पर बाद में पता चला कि स्टेचू ऑफ़ लिबर्टी कहीं गायब ही नहीं हुआ था, जादूगर ने उसके सामने एक शीट लगा कर सिर्फ दुनिया की नजर में गायब किया था।

“तो जब ऐलेक्स यह कह रहा था कि मशाल की फ्लेम को कहीं और नहीं रखा जा सकता? तो मुझे लगा कि कहीं मशाल की फ्लेम अपनी जगह पर ही तो नहीं है, जिसे किसी अदृश्य शीट से ढक दिया गया हो। तभी मुझे उस अदृश्य चीज का ख्याल आया, जिससे कैश्वर ने 25 वीं खिड़की गायब की थी। बस यही सोचने के बाद, मैं उसे चेक करने के लिये मशाल के पास जा पहुंचा और मेरा सोचना बिल्कुल ठीक निकला। कैश्वर ने मशाल की फ्लेम को भी हमें भ्रमित करने के लिये अदृश्य कर रखा था।”

“तो कैप्टेन अब सिर्फ 2 चीजें ही बदलने को बची हैं।” तौफीक ने कहा- “एक तो किताब की तारीख बदल कर मूर्ति की बेड़ियां तोड़नी है और दूसरा मूर्ति का रंग भूरे से हरा करना है बस।”

“तो फिर पहले हमें तुरंत कहीं से रस्सी ढूंढनी होगी।” क्रिस्टी ने कहा।

“तो फिर सबसे पहले इस स्थान को ही ठीक से चेक कर लेते हैं और फिर वापस मुकुट वाले स्थान पर जायेंगे।” ऐलेक्स ने कहा।

सभी ने मशाल वाली जगह को हाथ से टटोलकर ठीक से देख लिया, पर वहां कुछ भी नहीं था।

इसके बाद सभी मुकुट वाले स्थान पर आ गये। पूरा कमरा सबने छान मारा, पर कहीं भी उन्हें रस्सी ना मिली।

यह देख जेनिथ ने हर खिड़की को खोलकर, उसके नीचे बाहर की ओर चेक करना शुरु कर दिया।

आखिरकार जेनिथ को सफलता मिल ही गई। उसका हाथ किसी अदृश्य चीज से टकराया।

“कैप्टेन!” जेनिथ ने खुशी से चीखते हुए कहा- “हम लोग रस्सी ढूंढ रहे थे, पर यहां इस खिड़की के नीचे बाहर की ओर अदृश्य सीढ़ियां हैं, जो कि नीचे किताब तक जा रहीं हैं।” यह सुन सुयश ने राहत की साँस ली।

“पर यह सीढियां तो अदृश्य हैं, बिना देखे इस पर से उतरना खतरे से खाली नहीं है।” क्रिस्टी ने कहा।

“इसीलिये तो मैं आप लोगों के साथ हूं।” शैफाली ने मुस्कुराते हुए कहा- “यह काम भी मुझसे अच्छा कोई नहीं कर सकता।”

सभी को शैफाली का तर्क सही लगा। अब शैफाली ने खिड़की के ऊपर चढ़कर अपना पहला कदम

सीढ़ियों पर रखा।

कुछ ही देर में टटोलते हुए शैफाली किताब तक पहुंच गई। शैफाली ने अब किताब के ऊपर लिखे रोमन अक्षरों को सही से सेट कर दिया।

जैसे ही किताब के अक्षर बदले, मूर्ति के पैर में बंधी बेड़ियां अपने आप खुल गईं। शैफाली धीरे-धीरे वापस ऊपर आ गई।

तभी एका एक स्टेचू ऑफ़ लिबर्टी के ऊपर काले घनघोर बादल नजर आने लगे और मौसम बहुत ज्यादा खराब हो गया।

सभी आश्चर्य से ऊपर की ओर देख रहे थे, क्यों कि बादल सिर्फ स्टेचू ऑफ़ लिबर्टी के ही ऊपर थे।

न्यूयार्क की ओर मौसम बिल्कुल साफ नजर आ रहा था।

तभी समुद्र का पानी भी जोर-जोर से ऊपर की ओर उछलने लगा।

“यह मौसम एकाएक कैसे खराब हो गया?” सुयश ने आश्चर्य से ऊपर आसमान की ओर देखते हुए कहा।

तभी अचानक सुयश को कुछ याद आया और वह चीखकर सभी से बोला- “तुरंत यहां से नीचे की ओर भागो, नहीं तो सब मारे जायेंगे।”

“ये आप क्या कह रहे हैं कैप्टेन?” ऐलेक्स ने आश्चर्यचकित होते हुए पूछा- “हमें यहां पर किससे खतरा है?”

“पहले भागो, रास्ते में बताता हूं।” यह कहकर सुयश भी तेजी से सीढ़ियां उतरने लगा।

किसी को कुछ भी समझ में नहीं आया कि सुयश क्यों सबको भागने के लिये कह रहा है, पर फिर भी सभी सुयश के पीछे भागने लगे।

भागते-भागते सुयश ने चिल्ला कर कहा- “यह मूर्ति तांबे की बनी है, जिसके कारण यह मूर्ति आसमान की बिजली को अपनी ओर खींचती है। इसी वजह से पूरे साल में इस पर कम से कम 300 बार बिजली गिरती है। अगर हमारे यहां रहते, वह बिजली इस पर गिरी तो हम झुलस जायेंगे।”

सुयश के शब्द सुन सभी डर गये और तेजी से सीढ़ियां उतरने लगी।

तभी कहीं पानी में जोर की बिजली गिरी, जिसकी वजह से समुद्र के पानी ने मूर्ति को भिगा दिया।

समुद्र के पानी में भीगते ही स्टेचू ऑफ़ लिबर्टी का रंग भूरे से, हल्का हरा हो गया।

तभी सभी मूर्ति के नीचे मौजूद पत्थर पर पहुंच गये। अभी यह जैसे ही पत्थर के पास पहुंचे, तभी मूर्ति के ऊपर एक जोर की बिजली गिरी।

बिजली के गिरने से तेज प्रकाश चारो ओर फैल गया। अगर सुयश सभी को लेकर समय पर नीचे नहीं आया होता, तो अब तक सभी बिजली में झुलस गये होते।

तभी सुयश की निगाह मूर्ति के हरे रंग पर गई।

“लगता है समुद्र का पानी मूर्ति पर गिरने से ऑक्सीकरण के द्वारा मूर्ति हरी हो गई है।” सुयश ने कहा- “पर अगर मूर्ति हरी हो गई है तो अभी तक यह माया जाल टूटा क्यों नहीं?” सुयश के चेहरे पर आश्चर्य के भाव उभरे।

तभी एक और बिजली आकर मूर्ति पर गिरी। बिजली की रोशनी में सुयश ने जो देखा, उसे देखकर उसकी रुह फना हो गई।

बगल वाली स्टेचू ऑफ़ लिबर्टी जिंदा हो गई थी और उन्हीं की ओर आ रही थी।

सुयश के चेहरे के भावों को बदलता देख सभी की निगाह उस ओर चली गई, जिधर सुयश देख रहा था।

दूसरी मूर्ति को जिंदा होते देख सबकी हालत खराब हो गई क्यों कि इस समय किसी के भी पास कोई भी चमत्कारी शक्ति नहीं थी और बिना किसी चमत्कारी शक्ति के 151 फुट ऊंची धातु की प्रतिमा को पराजित करना इनमें से किसी के भी बस की बात नहीं थी।

“अब क्या करें कैप्टेन?” क्रिस्टी ने घबराए स्वर में कहा- “बिजली अभी चमकना बंद नहीं हुई है, इसलिये हम मूर्ति के अंदर भी नहीं जा सकते और बाहर रहे तो ये दूसरी मूर्ति हमें मार देगी और इस मूर्ति को हम किसी भी प्रकार से परजित नहीं कर सकते।”

क्रिस्टी की बात तो सही थी, पर पता नहीं क्यों अभी भी सुयश तेजी से कुछ सोच रहा था।

अचानक सुयश जोर से चिल्लाया- “तुम लोग कुछ देर तक इससे बचने की कोशिश करो, मैं देखता हूं कि मैं क्या कर सकता हूं?” यह कहकर सुयश तेजी से सीढ़ियां चढ़कर वापस ऊपर की ओर भागा।

किसी की समझ में नहीं आया कि सुयश क्यों अब मूर्ति के ऊपर जाकर अपनी मौत को दावत दे रहा है, पर अभी सबका ध्यान दूसरी मूर्ति की ओर था।

दूसरी मूर्ति चलती हुई पहली मूर्ति के पास आयी और पानी में हाथ लगाकर उसे गिराने का प्रयत्न करने लगी।

सभी उसे देखकर मूर्ति वाले पत्थर के नीचे छिपकर खड़े हो गये थे।

अभी तक दूसरी मूर्ति की निगाह इनमें से किसी पर नहीं पड़ी थी, इसलिये वह बस पहली मूर्ति को उखाड़ने का प्रयत्न ही कर रही थी।

उधर सुयश लगातार सीढ़ियां चढ़ता जा रहा था, इस समय जैसे उस पर किसी थकान का कोई असर नहीं हो रहा था।

कुछ ही देर में सुयश मूर्ति के मुकुट वाले स्थान पर पहुंच गया, अब वो तेजी से जमीन पर टटोलते हुए जापानी पंखा ढूंढ रहा था।

कुछ देर की मेहनत के बाद सुयश के हाथ वह जापानी पंखा लग गया। सुयश ने तेजी से उस पंखे को वापस बंद कर दिया।

ऐसा करते ही पहली मूर्ति के मुकुट की सारी किरणें सिमट कर एक हो गईं और दूसरी मूर्ति अपनी जगह पर स्थिर हो गई।

तभी फिर से एक जोर की बिजली आसमान से पहली मूर्ति पर गिरी, परंतु आश्चर्यजनक ढंग से वह सारी बिजली बिना सुयश को क्षति पहुंचा ये उस एक किरण से निकलकर दूर पानी में जा गिरी। यह देख सुयश के चेहरे पर मुस्कान खिल गई।

अब उसने जापानी पंखें के द्वारा पहली मूर्ति की किरण को इस प्रकार सेट कर दिया कि अगर अब पहली मूर्ति पर बिजली गिरे तो वह परावर्तित होकर दूसरी मूर्ति पर जा गिरे।

अब बस सुयश को इंतजार था, एक बार फिर से बिजली के पहली मूर्ति पर गिरने का। और इसके लिये सुयश को ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ा।

कुछ ही देर में आसमान में फिर जोर की बिजली कड़की और पहली मूर्ति पर आ गिरी।

इसी के साथ पहली मूर्ति के मुकुट में बनी किरण ने, बिजली को संकेन्द्रित करके दूसरी मूर्ति की ओर भेज दिया।

दूसरी मूर्ति पर बिजली गिरते ही वह मूर्ति टूटकर कणों में परिवर्तित हो गई। और इसी के साथ आसमान में छाए घने बादल कहीं गायब हो गए।

अब सुयश ने एक बार फिर से जापानी पंखे का प्रयोग कर पहली मूर्ति की सातो किरणों को पहले के समान कर दिया।

जैसे ही मूर्ति अपने वास्तविक रुप में आयी, मूर्ति जिस पत्थर पर खड़ी थी, उसमें एक नया द्वार खुल गया, जो कि इस बात का प्रमाण था कि तिलिस्मा का यह द्वार भी पार हो चुका है।

अब सभी को बस सुयश के नीचे आने का इंतजार था। जैसे ही सुयश नीचे आया, सभी ने सुयश के नाम का जोर का जयकारा लगाया।

कुछ देर खुशी मनाने के बाद सभी शांत हो गये।

अब ऐलेक्स ने आखिर पूछ ही लिया- “आपने यह सब कैसे किया कैप्टेन?”

“मैंने सोचा कि दूसरी मूर्ति अगर पहली मूर्ति की सब कमियां दूर करने के बाद जिंदा हुई है, तो वापस पहली मूर्ति में कमी लाकर दूसरी मूर्ति को रोका जा सकता था। यही सोचकर मैंने जापानी पंखे के द्वारा मूर्ति के मुकुट में फिर से कमी ला दी, जिससे दूसरी मूर्ति अपने स्थान पर ही रुक गई। अब रही बात उस मूर्ति को नष्ट करने की, तो मैंने यह देखा कि बिजली उस मूर्ति पर नहीं गिर रही है, इसका साफ मतलब था कि वह मूर्ति तांबे से नहीं बनी है।"

“अब बची बात इस मूर्ति की तो तांबा हमेशा नमक वाले पानी से रिएक्शन कर एक बैटरी का रुप ले लेता है और समुद्र के पानी में नमक था, यानि कि जितनी बार बिजली इस मूर्ति पर गिर रही थी, वह इसे चार्ज करती जा रही थी, अब बस उस बिजली को बढ़ाकर सही दिशा देने की जरुरत थी और वह सही दिशा मैंने सभी किरणों को एक करके कर दी। इस प्रकार से नयी गिरी बिजली, मूर्ति में स्टोर की हुई बिजली के साथ संकेन्द्रित होकर एक दिशा में जाने लगी। जिसे देखकर मैंने उस किरण का मुंह दूसरी मूर्ति की ओर कर दिया और इसी के साथ वह दूसरी मूर्ति नष्ट हो गई।”

“वाह कैप्टेन! आपने तो कमाल कर दिया ।” क्रिस्टी ने सुयश की तारीफ करते हुए कहा- “हम तो सोच भी नहीं सकते थे कि इतनी बड़ी मूर्ति को बिना किसी चमत्कारी शक्ति के भी पराजित किया जा सकता है।”

“जिस समय तुमने बिना किसी शक्ति के रेत के सभी जीवों को पराजित किया था, यह भी बिल्कुल वैसे ही था।” सुयश ने क्रिस्टी से कहा- “हमें किसी भी चीज को पराजित करने के लिये सही समय पर सही सोच की जरुरत होती है बस...और वह सही सोच हममें से सबके पास है।”

सुयश के शब्दों से सभी प्रभावित हो गए। कुछ देर बाद सभी अगले द्वार में प्रवेश कर गये।

जारी रहेगा_____✍️
 
#165.

अंधेरे का देवता: (16.01.02, बुधवार, 13:50, मकोटा महल, सीनोर राज्य, अराका द्वीप)

लुफासा जब मेलाइट, रोजर और सुर्वया का परिचय पूछ रहा था, तभी मकोटा ने लुफासा को सिग्नल भेजकर अपने महल में बुलवा लिया था।

पर आज पूरा 1 दिन बीत जाने के बाद भी मकोटा, लुफासा से मिला नहीं था। लुफासा इंतजार करते-करते पूरी तरह से परेशान हो गया था, पर मकोटा से वह कुछ कह भी नहीं सकता था।

एक तो मकोटा महल में उन काले भेड़ियों के अलावा कोई था भी तो नहीं, तो लुफासा आखिर पूछता भी तो किससे? कि मकोटा को मिलने में और कितना समय लगेगा? बहरहाल लुफासा के पास और इंतजार करने के अलावा कुछ नहीं था।

आखिरकार एक लंबे इंतजार के बाद, उस कमरे का एक दरवाजा खुला और उसमें से मकोटा चलकर आता दिखाई दिया।

मकोटा को देख लुफासा ने राहत की साँस ली और झुककर मकोटा को अभिवादन किया।

“कल से तुम्हें बुलाने के बाद अचानक से पिरामिड में काम कुछ बढ़ गया था, इसलिये मिलने में कुछ ज्यादा ही समय लग गया। उम्मीद है तुम्हें कोई परेशानी नहीं हुई होगी?” मकोटा ने लुफासा को देखते हुए कहा।

लुफासा का मन किया कि इस मकोटा की गंजी खोपड़ी पर कोई डंडा फेंक कर मार दे, पर उसने अपनी भावनाओं पर काबू करते हुए ‘ना ’ में अपना सिर हिला दिया।

मकोटा लुफासा के सामने पड़ी कुर्सी पर बैठते हुए बोला- “देखो लुफासा, तुम अराका का भविष्य हो। मैं चाहता हूं कि तुम अराका ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण पृथ्वी पर राज करो, बस इसी लिये मैं दिन-रात मेहनत कर रहा हूं। मेरी मेहनत को देखते हुए तुम्हारा भी हक बनता है कि तुम भी पूरे दिल से मेरा साथ दो।....और अब वैसे भी मेरे सपने को पूरा होने से कोई नहीं रोक सकता....मेरा मतलब है कि तुम्हें राजा बनने से।..... देखो लुफासा, मैंने पिछले कुछ दिनों में तुम्हें कई कार्य सौंपे, पर तुम इतनी शक्तियां होने के बाद भी, किसी भी कार्य में सफल नहीं हो पाये।

“जब मैंने ध्यान से सोचा तो मुझे लगा कि ये तुम्हारी शक्तियों का दोष नहीं है, सिर्फ तुम्हारी मानसिक स्थिति का दोष है। तुम अपने स्वयं के निर्णय लेने में भी बहुत असमंजस में दिखते हो। और ऐसा इसलिये है कि तुम्हें मैं ज्यादा कुछ नहीं बताता। पर आज मैंने तुम्हें सबकुछ बताने का निर्णय लिया है। जिससे आगे भविष्य में तुम अपने अच्छे-बुरे को पहचान सको। ये पहचान सको कि तुम्हारे साथ कौन खड़ा है? और तुम्हारे विरुद्ध कौन है?”

मकोटा के शब्द सुनकर लुफासा और सतर्क हो गया। वह समझ गया कि मकोटा उसके आस-पास कोई और जाल बुनना चाह रहा है।

“तुम मेरे साथ पिरामिड चलो, मैं आज तुम्हें सारा सच बताना चाहता हूं।” यह कहकर मकोटा कुर्सी से उठकर खड़ा हो गया।

मकोटा को उठकर जाते देख लुफासा भी मकोटा के पीछे-पीछे चल दिया।

लुफासा जान गया था कि कुछ भी हो पर आज मकोटा के कई रहस्यों से पर्दा उठने वाला था।

कुछ ही देर में भेड़ियों के रथ पर बैठकर मकोटा और लुफासा सीनोर राज्य में स्थित, उन 4 पिरामिडों के पास पहुंच गये।

मकोटा ने अपना रथ पिरामिड नंबर 4 के पास रोका, यह देख लुफासा हैरान हो गया क्यों कि आज तक उसने किसी को भी पिरामिड नंबर 4 में जाते हुए नहीं देखा था? मकोटा, लुफासा को लेकर पिरामिड नंबर 4 में प्रवेश कर गया।

पिरामिड नंबर 4 के बीच में 2 ताबूत रखे थे। मकोटा लुफासा को लेकर उन्हीं ताबूतों के पास पहुंच गया।

उन ताबूतों का ऊपरी हिस्सा पारदर्शी शीशे का बना था। लुफासा आश्चर्य से उन ताबूतों को देखने लगा।

“तुम्हें पता है लुफासा कि इन ताबूतों में कौन है?” मकोटा ने लुफासा से पूछा।

लुफासा ने अपना सिर ना के अंदाज में हिला दिया।

“इन ताबूतों में ‘मुफासा और कागोशी’ की लाश हैं।” मकोटा ने कहा।

मकोटा के शब्द सुनते ही लुफासा पर बिजली सी गिर गई।

“आपका मतलब है कि इन ताबूतों में मेरे माता-पिता की लाशें हैं?” लुफासा ने शीशे के पास अपना चेहरा लाकर, अंदर झांकते हुए कहा।

“हां ये तुम्हारे माता-पिता की ही लाश हैं, जिन्हें आज से 22 वर्ष पहले सामरा राज्य के राजा कलाट ने मार दिया था।” मकोटा के शब्द रहस्य से भरे थे।

“कलाट ने?” लुफासा कलाट का नाम सुन आश्चर्य से भर उठा।

“चलो मैं तुम्हें शुरु से सुनाता हूं।” लग रहा था कि आज मकोटा सारे रहस्य खोलने के मूड में था-

“तुम्हें पता है कि सामरा और सीनोर के लोगों की औसत आयु 800 वर्ष होती है, पर दोनों ही राज्यों के नियम के अनुसार जिस व्यक्ति को राजा बनाया जाता है, उसे 600 वर्षों तक अपने राज्य पर शासन करना होता है, इस दौरान वह पुत्र या पुत्री उत्पन्न नहीं कर सकता। तो आज से 625 वर्ष पहले भी, इसी प्रकार से सीनोर का राजा मुफासा को और सामरा का राजा कलाट को बनाया गया। तुम तो जानते ही हो कि सामरा और सीनोर की दुश्मनी हजारों वर्षों से चली आ रही थी। इस दुश्मनी की वजह से दोनों ही अपनी शक्तियों को बढ़ाना चाहते थे।

“पर इस कहानी में नया मोड़ तब आया, जब सन् 1908 में मध्य साइबेरिया के जंगलों में एक बहुत बड़ा उल्का पिंड गिरा। मुफासा उस उल्का पिंड की जांच के लिये साइबेरिया जा पहुंचा। वहां पहुंचकर मुफासा को पता चला कि वह कोई उल्का पिंड नहीं, बल्कि बुद्ध ग्रह की एक यान रुपी प्रयोगशाला थी। जिसमें बुद्ध ग्रह के जीव, हरे कीड़े थे, जो कि पृथ्वी पर एक प्रयोग करने आ रहे थे, परंतु पृथ्वी के वातावरण में प्रवेश करते समय, किसी प्रकार उनका यान दुर्घटनाग्रस्त हो गया और वह साइबेरिया के जंगलों में जा गिरे।

“उन बुद्ध ग्रह के हरे कीड़ों ने मनुष्यों से तो अपना यान छिपा लिया, परंतु मुफासा से नहीं छिपा पाये। मुफासा को जब हरे कीड़ों के आने का उद्देश्य पता चला, तो वह उनकी मदद को तैयार हो गया, पर बदले में वह उनके देवता जैगन से मिलना चाहता था। हरे कीड़े सहर्ष ही इस बात पर तैयार हो गये। जैगन से मिलने के बाद यह तय हुआ कि मुफासा पृथ्वी पर हरे कीड़ों की शक्तियों के विस्तार के लिये पिरामिड बनवायेगा और बदले में जैगन उन्हें वैज्ञानिक शक्तियां देकर शक्तिशाली बनायेगा। अब शुरु हुआ धरती पर पिरामिडों का निर्माण। बुद्ध गह की मदद से धरती पर कुल 8 पिरामिडों का निर्माण हुआ, जिसमें 4 पिरामिड सीनोर राज्य में, 2 पिरामिड मैक्सिको में और 2 पिरामिड मिस्र में बनवाये गये।

“ सारा कार्य बहुत गुपचुप तरीके से किया गया। दरअसल हरे कीड़े मनुष्यों के शरीर की ऊर्जा खींचकर, अपना आकार बढ़ाना चाहते थे, जिससे वह हर प्रकार के वातावरण में जिंदा रह सकें। इस कार्य की

शुरुआत के लिये जब जैगन पृथ्वी पर आया, तब तुम और वीनस 2-3 साल के थे। मुफासा का राजा होने का कार्यकाल अब खत्म हो चुका था। मुफासा ने जैगन से काला मोती प्राप्त करने के लिये मदद मांगी, तभी पता नहीं कैसे धरा, मयूर और कलाट ने हमारे इस पिरामिड पर हमला कर दिया।

"जहां एक ओर धरा ने अपनी धरा शक्ति से जैगन को पृथ्वी से बांध दिया, वहीं दूसरी ओर अराका द्वीप के नियमों के विपरीत जाने की वजह से कलाट ने तुम्हारे पिता और माता को मार दिया। सभी के यहां से जाने के बाद, मैंने तुम्हारे माता और पिता के शरीर पर एक रसायन का लेप लगाकर इस ताबूत में रख दिया। मुझे पता था कि जब जैगन जागेगा, तो अपने गुरु ‘कुवान’ की मदद से तुम्हारे माता-पिता को फिर से जिंदा कर देगा क्यों कि जैगन की अंधेरी शक्तियां भी कुवान की ही देन थीं। पर जब 15 वर्षों के बाद भी जैगन नहीं जागा, तो हमने जैगन के सेवक गोंजालो के कहने से, स्वयं अदृश्य शक्तियों के स्वामी कुवान की साधना करनी शुरु कर दी।

“ कुवान के आशीर्वाद से हमें भेड़ियों की फौज और मेरा सेवक वुल्फा मिला। अब हम कुवान के आदेशानुसार काला मोती को प्राप्त करने के लिये, दूसरे पिरामिड से तिलिस्मा के अंदर तक एक सुरंग बना रहे हैं, जिससे हम बिना तिलिस्मा में प्रवेश किये ही काला मोती को प्राप्त कर लें और तुम्हारे माता-पिता को जिन्दा करके कलाट से बदला ले सकें।” यह कहकर मकोटा कुछ देर के लिये रुक गया और ध्यान से लुफासा के चेहरे को देखने लगा।

लुफासा मकोटा की बातें सुनकर बहुत तेजी से कुछ सोच रहा था, यह देख मकोटा फिर से बोल उठा-

“अगर तुम्हें सबकुछ समझ आ गया हो और अगर तुम मेरी बात से सहमत हो तो मुझे बताओ, तब मैं इसके आगे की बात बताऊं?”

“पहले मुझे ये बताये कि ये सारी बातें सनूरा को क्यों नहीं पता ? जबकि वह तो पिछले 600 वर्षों से सीनोर राज्य की सेनापति है।” लुफासा ने अपना शक प्रकट करते हुए कहा।

“मुफासा का साइबेरिया जाना और जैगन से मिलकर पिरामिड बनवाना बहुत ही गुप्त रखा गया था, इस बात का पता तो तुम्हारी माँ कागोशी को भी नहीं था, फिर सनूरा को कैसे होता? और अब रही बात कलाट के तुम्हारे माता-पिता को मारने की बात, तो उस समय सनूरा किसी कार्य से अराका द्वीप से बाहर गई थी? उसके आने के बाद हमने कलाट की बात उसे इसलिये नहीं बताई कि यह बात सुनकर कहीं तैश में आकर सामरा राज्य पर हमला ना बोल दे और उस समय तक सामरा राज्य की शक्तियां हमसे ज्यादा थीं, इसलिये मैं बस समय आने का इंतजार कर रहा था, जिससे उचित समय पर मैं ये सारी बातें तुम्हें स्वयं बता सकूं।” मकोटा ने कहा।

“अब मुझे ये बताइये कि कलाट ने मेरी माँ को क्यों मारा, उसने किसी का क्या बिगाड़ा था?” लुफासा ने क्रोध में आते हुए कहा।

“कलाट ने जब तलवार से तुम्हारे पिता पर हमला किया, उस समय तुम्हारी माँ बीच में आ गई, जिससे वह भी मारी गई।” मकोटा ने कहा।

“जैगन के इस प्रयोग से तो पूरी इंसानियत खतरे में पड़ रही थी, आप लोगों ने जैगन की बात मानने ये पहले ये क्यों नहीं सोचा?” लुफासा ने कहा।

“मनुष्य पहले भी अटलांटियन के आगे कुछ नहीं थे, इसलिये अटलांटियन को कभी भी मनुष्यों की चिंता नहीं रही।....ऐसा मैं नहीं ...तुम्हारे पिता का कहना था। मैं तो बस उनकी आज्ञा का पालन कर रहा था।” मकोटा ने उदास होते हुए कहा।

“ठीक है, अब आप मुझसे क्या चाहते हैं?” लुफासा ने कहा।

“चलो मैं पहले तुम्हें बाकी के पिरामिड दिखाता हूं, फिर कहीं बैठकर बात करेंगे।” यह कहकर मकोटा तीसरे पिरामिड की ओर बढ़ गया।

तीसरे पिरामिड में एक विशाल भेड़िया मानव की मूर्ति लगी थी, जिसके पीछे की ओर एक काँच की लिफ्ट लगी थी। मकोटा उसी लिफ्ट में बैठा कर, लुफासा को जमीन के नीचे की ओर ले गया।

यहां चारो ओर लगभग 20 काँच के कैप्सूल दिखाई दे रहे थे, जिसमें बहुत से विचित्र जीव योद्धा खड़े दिखाई दे रहे थे, परंतु वह सभी निष्क्रिय थे।

“ये सभी योद्धा अलग-अलग जीवों से मिलाकर बनाये गये हैं, जिसे बाद में कुवान अपनी शक्तियों से जीवित करेंगे। यह सभी योद्धा हमें सामरा राज्य से युद्ध में जीत दिलायेंगे।” यह कहकर मकोटा लुफासा को वहां से भी लेकर दूसरे पिरामिड की ओर चल दिया।

यह पिरामिड पिछले 2 पिरामिडों से बड़ा था। दूसरे पिरामिड के एक कमरे में कुछ हरे कीड़े जमीन में सुरंग खोद रहे थे।

एक कमरे में गोंजालो जख्मी हालत में लेटा था, और हरे कीड़े उसका इलाज कर रहे थे।

“यह गोंजालो कैसे जख्मी हो गया, इसके पास तो बहुत सी शक्तियां थीं।” लुफासा ने मकोटा से पूछा।

“आजकल समय ही खराब है...मैंने तुम्हें जिस देवी शलाका से मिलाया था, वह भी झूठी निकली और मेरी कई शक्तियां लेकर भाग गई। उधर गोंजालो जब सामरा राज्य मे छिपकर खबर लाने गया था, तो किसी अज्ञात इंसान ने गोंजालो पर महाशक्ति से हमला कर दिया, बहुत मुश्किल से गोंजालो बचकर वापस आ पाया है।”

मकोटा ने कहा- “मुझे तो यही समझ नहीं आ रहा कि एक इंसान के पास महाशक्ति आयी कैसे?.... उधर गोंजालो का ऊर्जा द्वार, तिलिस्मा के ऊर्जा द्वार से टकरा गया, जिससे तिलिस्मा का कोई जीव भी भाग निकला, पर हम जैसे ही उस द्वार से घुसने चले, वह द्वार पुनः बंद हो गया।”

“तिलिस्मा का ऊर्जा द्वार?” लुफासा ने हैरान होते हुए कहा।

“हां, हमें भी नहीं मालूम था कि पिरमिड के पीछे तिलिस्मा का कोई छिपा ऊर्जा द्वार है, नहीं तो हम पहले ही उस द्वार से छिपकर तिलिस्मा में प्रवेश कर जाते, पर अब तो वह भी बंद हो गया। अब तो सुरंग ही एक

मात्र रास्ता है, अगर वहां भी कोई अड़चन नहीं आयी तो?” मकोटा ने कहा- “बस एक ही चीज हमारे साथ अच्छी हुई है.....ना जाने कैसे धरा शक्ति ने काम करना बंद कर दिया जिससे जैगन होश में आ गया है....

अब अगर तुम और सनूरा भी दिल से हमारा साथ देना शुरु कर दो, तो फिर हम जल्दी ही तुम्हारे माता-पिता को भी जिंदा कर लेंगे और फिर जीत हमारी ही होगी।”

“मैं तो पहले भी आपका साथ दे रहा था, फिर भी मैं आपके हर कार्य को करने के लिये अब अपनी जी-जान लगा दूंगा। आप बस आदेश करें मांत्रिक” लुफासा ने कहा और मकोटा के सामने अपने घुटने टेक कर सिर झुका दिया।

मकोटा ने रहस्य बताने के बहाने लुफासा को अपनी ओर करना चाहा था, लुफासा इस बात को अच्छी तरह से समझ रहा था, पर फिर भी अपने माता-पिता के नाम पर, वह भी मकोटा का साथ देने को मजबूर था।

लुफासा का यह रुप देख मक्कार मकोटा मुस्कुरा दिया....आखिर उसकी चाल कामया ब हो ही गई।

जारी रहेगा_____✍️
 
#166.

चैपटर-9

सपनों का संसार: (तिलिस्मा 3.3)

सुयश के साथ सभी अगले द्वार में प्रवेश कर गये।

तिलिस्मा के इस द्वार में प्रवेश करते ही सभी को लगभग 100 फुट ऊंची एक किताब दिखाई दी। जिस पर बड़े-बड़े अक्षरों में ‘सपनों का संसार’ लिखा था।

उस किताब में एक दरवाजा भी लगा था। दरवाजे के अंदर कुछ सीढ़ियां बनीं थीं, जो कि ऊपर की ओर जा रहीं थीं। सभी उस दरवाजे में प्रवेश कर गये और सीढ़ियां चढ़कर ऊपर की ओर चल दिये।

लगभग 50 सीढ़ियां चढ़ने के बाद सभी को फिर से एक दरवाजा दिखाई दिया। सभी उस दरवाजे से अंदर प्रवेश कर गये।

अब वह सभी एक ऊंचे से प्लेटफार्म पर खड़े थे और ऊपर आसमान की ओर ऐसे सैकड़ों प्लेटफार्म दिखाई दे रहे थे।

हर प्लेटफार्म के चारो ओर कुछ सीढ़ियां और 2 दरवाजे बने थे। सारे प्लेटफार्म हवा में झूल रहे थे।

“यह सब क्या है? और हमें जाना कहां है?” ऐलेक्स ने सुयश को देखते हुए कहा।

“पता नहीं, पर मुझे लगता है कि हमें अपने सामने मौजूद दूसरे दरवाजे में घुसने पर ही पता चलेगा कि हमें जाना कहां है?” सुयश ने कहा।

यह सुनकर क्रिस्टी अपने सामने मौजूद दरवाजे में प्रवेश कर गई, अब क्रिस्टी उनसे काफी ऊंचाई पर बने दूसरे प्लेटफार्म पर दिखाई दी।

“कैप्टेन आप लोग भी ऊपर आ जाइये, मुझे लगता है कि हमें इन प्लेटफार्म के द्वारा ही ऊपर की ओर जाना है।” क्रिस्टी ने तेज आवाज में कहा।

क्रिस्टी की आवाज सुन सभी उस दरवाजे में प्रवेश कर गये।

इसी प्रकार कई बार अलग-अलग दरवाजों में प्रवेश करने के बाद, आखिरकार उनका दरवाजा एक बादल के ऊपर जाकर खुला।

जैसे ही सभी बादल के ऊपर खड़े हुए, वह दरवाजा और प्लेटफार्म दोनों ही गायब हो गये।

अब सभी ने अपने चारो ओर नजर डाली। इस समय वह सभी जिस बादल पर खड़े थे, वह लगभग 200 वर्ग फुट का था और बिल्कुल सफेद था।

उस बादल से 100 मीटर की दूरी पर एक बड़ा सा गोला सूर्य के समान चमक रहा था, उसकी रोशनी से ही पूरा क्षेत्र प्रकाशमान था।

“क्या वह कृत्रिम सूर्य है?” जेनिथ ने उस सूर्य के समान गोले की ओर देखते हुए कहा।

“लगता है कैश्वर ने यह द्वार कुछ अलग तरीके से बनाया है।” सुयश ने कहा- “वह सामने का गोला कृत्रिम सूर्य है, जो सूर्य के समान ही रोशनी दे रहा है। हम इस समय बादलों के ऊपर खड़े हैं। पर इन दोनों के अलावा यहां पर कुछ नजर नहीं आ रहा। ना तो बाहर निकलने का कोई दरवाजा दिख रहा है और ना ही यह समझ में आ रहा है कि यहां पर करना क्या है?”

तभी शैफाली की नजर आसमान की ओर गई। आसमान पर नजर पड़ते ही शैफाली आश्चर्य से भर उठी।

“कैप्टेन अंकल, जरा ऊपर आसमान की ओर देखिये, वहां पर बहुत कुछ विचित्र सा है?” शैफाली ने सुयश को आसमान की ओर इशारा करते हुए कहा। शैफाली की बात सुन सभी ने आसमान की ओर देखा।

अब सभी अपना सिर उठाये विस्मय से ऊपर की ओर देख रहे थे।

“यह आसमान में क्या चीजें बनी हैं?” ऐलेक्स ने बड़बड़ाते हुए कहा।

“मुझे लग रहा है कि हमारे सिर के ऊपर आसमान नहीं बल्कि जमीन है, आसमान पर तो हम लोग खड़े हैं, यानि कि यहां पर सब कुछ उल्टा-पुल्टा है।” क्रिस्टी ने कहा।

“सब लोग जरा ध्यान लगाकर देखो कि वहां ऊपर क्या-क्या चीजें है?” सुयश ने सभी से कहा।

“कैप्टेन मुझे वहां एक खेत दिखाई दे रहा है, जिस में एक किसान बीज बो रहा है।” तौफीक ने कहा।

“मुझे उस खेत के बाहर 5 मूर्तियां दिखाई दे रहीं हैं, शायद वह किसी देवी-देवता की मूर्तियां हैं, उन मूर्तियों पर कुछ लिखा भी है, पर यह भाषा मैं पढ़ना नहीं जानती।” जेनिथ ने कहा।

“वह मूर्तियां सूर्य, चंद्र, इंद्र, पवन और पृथ्वी की हैं।” सुयश ने मूर्तियों की ओर देखते हुए कहा- “और उस पर हिंदी भाषा में लिखा है।” यह कहकर सुयश ने सभी को उन देवी देवताओं के बारे में बता दिया।

“कैप्टेन खेत से कुछ दूरी पर एक बड़ा सा तालाब बना है, जिससे समुद्र जैसी लहरें उठ रहीं हैं।” ऐलेक्स ने कहा- और उसके सामने एक बड़ा सा कमरा बना है, जिस पर एक तीर ऊपर की ओर मुंह किये हुए लगा है। उस तीर के सामने एक बड़ी सी पवनचक्की जमीन पर गिरी पड़ी है।”

“यह तो कोई बहुत अजीब सी पहेली लग रही है....क्यों कि ना तो हम सूर्य के पास जा सकते हैं और ना ही ऊपर जमीन की ओर.....और इन बादलों में कुछ है नहीं?...फिर इस पहेली को हल कैसे करें?” क्रिस्टी ने कहा।

सभी बहुत देर तक सोचते रहे, परंतु किसी को कुछ समझ नहीं आया कि करना क्या है? तभी जेनिथ की निगाह सूर्य की ओर गई।

“कैप्टेन सूर्य अपना रंग बदल रहा है...अब वह सुनहरे से सफेद होता जा रहा है।” जेनिथ ने कहा।

जेनिथ की बात सुन सभी सूर्य की ओर देखने लगे। जेनिथ सही कह रही थी, सूर्य सच में एक किनारे से सफेद हो रहा था।

“मुझे लग रहा है कि सूर्य धीरे-धीरे चंद्रमा में परिवर्तित हो रहा है।” शैफाली ने कहा- “यानि दिन के समय यही सूर्य बन जाता है और रात को यही चंद्रमा बन जाता है।”

“मुझे लगता है कि हमें थोड़ी देर और इंतजार करना चाहिये, हो सकता है कि रात होने पर चंद्रमा हमें कोई मार्ग दिखाए?” तौफीक ने कहा।

तौफीक की बात सुन सभी आराम से वहीं सफेद बादल पर बैठ गये।

धीरे-धीरे सूर्य पूरी तरह से चंद्रमा में परिवर्तित हो गया, अब सभी ध्यान से चंद्रमा को देखने लगे।

“कैप्टेन चंद्रमा में एक द्वार बना है, मुझे लगता है कि हमें उसी द्वार से बाहर जाना है।” जेनिथ ने कहा।

“चलो एक परेशानी तो दूर हुई, कम से कम ये तो पता चला कि हमें जाना कहां है?” सुयश ने खुशी भरे शब्दों में कहा- “अब हमें बस चंद्रमा तक जाने का रास्ता ढूंढना है। क्यों कि इन बादलों से चंद्रमा के बीच सिर्फ हवा ही है।”

“मुझे लगता है कि हमें यहां से कूद कर जमीन तक जाना होगा, चंद्रमा का रास्ता अवश्य ही नीचे से होगा।” ऐलेक्स ने कहा।

“अरे बुद्धू, हम खुद ही नीचे हैं, कूदने से ऊपर कैसे चले जायेंगे?” क्रिस्टी ने ऐलेक्स से हंस कर कहा।

“तो फिर अगर कोई चीज इन बादलों से गिरे तो वह कहां जायेगी? हमसे भी नीचे....या फिर ऊपर जमीन की ओर?” ऐलेक्स की अभी भी समझ में नहीं आ रहा था।

“रुको अभी चेक कर लेते हैं।” यह कहकर क्रिस्टी ने अपनी जेब में रखा एक फल निकाला और उसे कुछ दूरी पर फेंक दिया।

वह फल नीचे जाने की जगह तेजी से ऊपर जमीन की ओर चला गया।

“अब समझे, जमीन और उसका गुरुत्वाकर्षण ऊपर की ओर ही है, हम लोग सिर्फ ऊंचाई पर खड़े हैं और हमें उल्टा दिख रहा है बस। ....और अगर तुमने यहां से कूदने की कोशिश की तो तुम्हारी हड्डियां भी टूट जायेंगी या फिर तुम मर भी सकते है, क्यों कि हमारी ऊंचाई बहुत ज्यादा है।” क्रिस्टी ने ऐलेक्स को समझाते हुए कहा।

सुयश ने कहा- “मुझे तो लगता है कि अवश्य ही अब इन बादलों में कुछ ना कुछ छिपा है...खाली हाथ तो हम लोग इस द्वार को पार नहीं कर पायेंगे।”

सुयश की बात सुन सभी उस सफेद बादल में हाथ डालकर, टटोल कर कुछ ढूंढने की कोशिश करने लगे।

तभी शैफाली का हाथ बादल में मौजूद किसी चीज से टकराया। शैफाली ने उस चीज को खींचकर निकाल लिया। वह एक 3 फुट का वर्गाकार शीशा था।

“पहले मेरे दिमाग में यह बात क्यों नहीं आयी।” सुयश ने शीशे को देख अपने सिर पर हाथ मारते हुए कहा- “और ढूंढो...हो सकता है कि कुछ और भी यहां पर हो ?”

तभी जेनिथ ने खुशी से कहा- “कैप्टेन, मुझे यह छड़ी मिली है।” सुयश ने जेनिथ के हाथ में थमी छड़ी को देखा। वह एक साधारण लकड़ी की छड़ी लग रही थी।

सभी फिर से बादलों से कुछ और पाने की चाह में उन बादलों का मंथन करने लगे। पर काफी देर ढूंढने के बाद भी बादलों से कुछ और ना मिला।

“यहां तो सिर्फ एक शीशा और छड़ी थी, इन दोनों के द्वारा भला हम चंद्रमा तक कैसे पहुंच सकते हैं?” क्रिस्टी ने कहा।

“इन दोनों के द्वारा हम चंद्रमा तक नहीं पहुंच सकते, पर इनका कुछ ना कुछ तो उपयोग है।” यह कहकर सुयश ने शीशे को चंद्रमा की रोशनी की ओर कर दिया, पर उसमें चंद्रमा की परछाईं दिखने के सिवा कुछ नहीं हुआ।

धीरे-धीरे कई घंटे और बीत गये। अब चंद्रमा फिर से सूर्य में परिवर्तित होने लगा।

सूर्य की पहली किरण सुयश के माथे से आकर टकराई, तभी सुयश के दिमाग में एक विचार कौंधा।

अब सुयश ने शैफाली से शीशा लेकर सूर्य की दिशा में कर दिया।

सूर्य की किरणें शीशे से टकरा कर परावर्तित होने लगीं। अब सुयश ने जमीन की ओर ध्यान से देखा।

खेत में बैठा किसान बीज बोने के बाद, बार-बार ऊपर बादलों की ओर देख रहा था। कभी-कभी वह अपने माथे पर आये पसीने को, अपने कंधे पर रखे कपड़े से पोंछ रहा था।

अब सुयश की निगाह इंद्र की मूर्ति पर पड़ी। इंद्र की मूर्ति देखने के बाद सुयश के चेहरे पर मुस्कान बिखर गई।

सुयश की मुस्कान देखकर सभी समझ गये कि सुयश को अवश्य कोई ना कोई उपाय मिल गया है?

“कुछ समझ में आया तुम लोगों को?” सुयश ने सभी से पूछा। सभी ने ना में सिर हिला दिया।

यह देख सुयश ने बोलना शुरु कर दिया- “मुझे भी अभी सबकुछ तो समझ में नहीं आया है, पर उस किसान को देखकर यह साफ पता चल रहा है कि उसे बीज बोने के बाद बारिश का इंतजार है और वह बारिश हमें करानी पड़ेगी।”

“यह कैसे संभव है कैप्टेन? हम भला बारिश कैसे करा सकते हैं?” तौफीक ने सुयश का मुंह देखते हुए आश्चर्य से पूछा।

“संभव है....मगर पहले मुझे ये बताओ कि धरती पर बारिश होती कैसे है?” सुयश ने उल्टा तौफीक से ही सवाल कर दिया।

“समुद्र का पानी, सूर्य की गर्मी से वाष्पीकृत होकर, बादलों का रुप ले लेता है और बादल जब आपस में टकराते हैं या फिर उनमें पानी की मात्रा ज्यादा हो जाती है, तो वह बूंदों के रुप में धरती की प्यास बुझाते हैं।” तौफीक ने कहा।

“अब जरा जमीन की ओर देखो। सूर्य की रोशनी उस तालाब के ऊपर नहीं पड़ रही है, इसीलिये किसान के खेत पर बारिश नहीं हो रही है।” सुयश ने तालाब की ओर इशारा करते हुए कहा।

“पर हम सूर्य की रोशनी को तालाब की ओर कैसे मोड़ पायेंगे?” क्रिस्टी के चेहरे पर उलझन के भाव नजर आये।

“इस शीशे की मदद से।” सुयश ने कहा- “इसकी मदद से हम सूर्य के प्रकाश को परावर्तित कर उस तालाब पर डाल सकते हैं।”

“पर यह प्रक्रिया तो बहुत लंबी चलती है। क्या हमें शीशा इतनी देर तक पकड़े रखना पड़ेगा?” ऐलेक्स ने पूछा।

“पता नहीं कितना समय लगेगा, पर इसके सिवा दूसरा कोई रास्ता भी नहीं है?” यह कहकर सुयश ने शीशे को इस प्रकार पकड़ लिया, कि अब सूर्य की रोशनी उससे परावर्तित होकर तालाब पर जाकर पड़ने लगी।

लगभग 2 घंटे की अपार सफलता के बाद, तालाब का पानी वाष्पीकृत होकर बादलों का रुप लेने लगा।

यह देख सभी में नयी ऊर्जा का संचार हो गया। अब सभी बारी-बारी शीशे को पकड़ रहे थे।

अब उनके सफेद बादल का रंग धीरे-धीरे काला होने लगा।

लगभग आधे दिन के बाद उनके बादलों का रंग पूर्ण काला हो गया। अब उस बादल के बीच बिजली भी कड़क रही थी, पर आश्चर्यजनक तरीके से वह बिजली इनमें से किसी को भी कोई नुकसान नहीं पहुंचा रही थी।

बादलों की गड़गड़ाहट और बिजली की चमक देख किसान खुशी से नाचने लगा।

पर बादलों को बरसाना कैसे था? यह किसी को नहीं पता था?

सुयश की निगाह अब जेनिथ के हाथ में पकड़ी छड़ी की ओर गई। सुयश ने वह छड़ी जेनिथ के हाथ से ले ली।

सुयश ने बादल पर जैसे ही वह छड़ी मारी, बादल से जोर की आवाज करती बिजली निकली और जमीन पर स्थित उस घर के ऊपर बने तीर में समा गई।

सुयश ने 2-3 बार ऐसे ही किया। अब बादल से तेज मूसलाधार बारिश शुरु हो गई और धरा की प्यास बुझाने, पृथ्वी की ओर जाने लगी।

बहुत ही विचित्र नजारा था। बादलों से निकली हर बूंद ऊपर की ओर जा रही थी।

तभी सूर्य के सतरंगी प्रकाश से आसमान में एक बड़ा इंद्रधनुष बन गया। सभी को पता था कि यह सब कुछ असली नहीं है, फिर भी वह सभी मंत्रमुग्ध से प्रकृति के इस सुंदर दृश्य को निहार रहे थे।

बूंदों ने अब किसान के खेत पर बरसना शुरु कर दिया। बूंदों के पड़ते ही अचानक किसान का बोया हुआ बीज अंकुरित हो गया।

कुछ ही देर में वह अंकुरित बीज एक लता का रुप ले उस बादल की ओर बढ़ने लगा।

सभी आश्चर्य से उस पृथ्वी के पौधे को बढ़ता हुआ देख रहे थे। 10 मिनट में ही उस लता धारी वृक्ष ने, बादलों से पृथ्वी तक एक विचित्र पुल का निर्माण कर दिया।

तभी वह शीशा और छड़ी गायब हो गये।

“यही है वह रास्ता, जिससे होकर हमें पृथ्वी तक पहुंचना है।” सुयश ने धीरे से पेड़ की लताओं को पकड़ा और सरककर नीचे जाने लगा।

सुयश को ऐसा करते देख, सभी उसी प्रकार से सुयश के पीछे आसमान से उतरने लगे। कुछ ही देर बाद सभी जमीन पर थे।

“अब जाकर कुछ बेहतर महसूस हुआ।” ऐलेक्स ने लंबी साँस छोड़ते हुए कहा- “ऊपर से उल्टा देखते-देखते दिमाग चकरा गया था।

सुयश ने अब खेत के चारो ओर देखा। सभी के बादलों से उतरते ही वह पेड़ और किसान दोनों ही गायब हो गये थे।

सुयश सभी को लेकर खेत से बाहर आ गया। बाहर अब 2 ही मूर्तियां दिख रहीं थीं।

“कैप्टेन, यह 3 मूर्तियां कहां गायब हो गईं?” क्रिस्टी ने कहा।

“जिन मूर्तिंयों का कार्य खत्म हो गया, वह मूर्तियां स्वतः गायब हो गयीं। जैसे सूर्य की मूर्ति का कार्य सूर्य के प्रकाश को परावर्तित करने तक था। इंद्र की मूर्ति का कार्य बिजली और बारिश तक ही सीमित था और पृथ्वी की मूर्ति का कार्य पेड़ को बड़ा होने तक था।” सुयश ने सभी को समझाते हुए कहा।

“इसका मतलब अब चंद्र और पवन का काम बचा है।” जेनिथ ने कहा।

“बिल्कुल ठीक कहा जेनिथ...और इन्हीं 2 मूर्तियों के कार्य के द्वारा ही हम तिलिस्मा के इस द्वार को पार कर पायेंगे।” सुयश ने जेनिथ को देखते हुए कहा- ‘चलो सबसे पहले उस जमीन पर पड़ी पवनचक्की को

देखते हैं। जरुर उसी से हमें चंद्रमा तक जाने का रास्ता मिलेगा।”

सभी को सुयश की बात सही लगी, इसलिये वह तालाब के किनारे स्थित उस मैदान तक जा पहुंचे, जहां पर जमीन पर वह पवनचक्की पड़ी थी।

पवनचक्की का आकार काफी बड़ा था। उस पवनचक्की के बीच में एक गोल प्लेटफार्म बना था। उस प्लेटफार्म पर चढ़ने के लिये सीढियां बनीं थीं।

सभी सीढ़ियां चढ़कर उस प्लेटफार्म के ऊपर आ गये। प्लेटफार्म के ऊपर एक बड़ा सा लीवर लगा था।

प्लेटफार्म का ऊपरी हिस्सा जालीदार था, जो कि एक मजबूत धातु से बना लग रहा था। उस जालीदार हिस्से के नीचे नीले रंग का कोई द्रव भरा हुआ था।

“वह द्रव किस प्रकार का हो सकता है?” तौफीक ने कहा - “वह ऐसी जगह पर रखा है जो कि पूरी तरह से बंद है इसलिये हम सिर्फ उसे देख ही सकते हैं।”

“मैं उस द्रव को सूंघ भी सकता हूं।” ऐलेक्स ने अपनी नाक पर जोर देते हुए कहा- “वह किसी प्रकार का ‘कास्टिक’ है, जिससे साबुन बनाया जाता है।”

“साबुन???” जेनिथ ने आश्चर्य से कहा- “साबुन का यहां क्या काम हो सकता है?”

“कोई भी काम हो...पर अब यह तो श्योर हो गया है कि यही पवनचक्की हमें चंद्रमा तक पहुंचायेगी क्यों कि एक तो यह बिल्कुल सूर्य के नीचे है और दूसरा अभी पवनदेव का काम बचा हुआ है....अब बस ये देखना है कि इस पवनचक्की को शुरु कैसे करना है?” सुयश ने कहा- “चलो चलकर उस कमरे को भी देख लें, हो सकता है कि पवनचक्की का नियंत्रण उसी कमरे में ही हो?”

सभी पवनचक्की के पास बने, उस कमरे के अंदर आ गये। कमरे में एक बहुत बड़ी सी मशीन रखी थी, जिसमें कुछ लाल रंग की लाइट जल रहीं थीं।

सुयश ने ध्यान से पूरी मशीन को देखा और फिर बोल उठा- “पवनचक्की इस मशीन से ही चलेगी। इस कमरे की छत पर जो तीर लगा है, असल में वह तड़ित-चालक (लाइटनिंग अरेस्टर) है, जिसका प्रयोग नये भवनों के निर्माण में किया जाता है।

"तड़ित चालक भवनों के ऊपर गिरने वाली आसमानी बिजली को, जमीन के अंदर भेज कर भवनों की सुरक्षा करता है। पर इस कमरे पर लगे, तड़ित-चालक पर जब बिजली गिरी तो उसने सारी बिजली को इस मशीन में सुरक्षित कर लिया था। अब उसी बिजली के द्वारा पवन-चक्की को हम चला सकते हैं और वह पवनचक्की हमें किसी ना किसी प्रकार से चंद्रमा पर भेज देगी।”

“इसका मतलब इसे शुरु करने के बाद हमें पवनचक्की पर मौजद उस प्लेटफार्म पर जाकर खड़े होना होगा और वहां मौजूद लीवर को दबाते ही, पवनचक्की हमें चंद्रमा पर भेज देगी।” क्रिस्टी ने कहा।

“बिल्कुल ठीक कहा क्रिस्टी...जरुर ऐसा ही होगा।” जेनिथ ने भी क्रिस्टी की हां में हां मिलाते हुए कहा।

“तो फिर देर किस बात की, चलिये मशीन को शुरु करके एक बार देख तो लें।” ऐलेक्स ने कहा।

सुयश ने सिर हिलाया और मशीन से कुछ दूरी पर लगे, एक ऑन बटन को दबा दिया, पर ऑन बटन के दबाने के बाद भी मशीन शुरु नहीं हुई।

अब सुयश फिर ध्यान से उस मशीन के मैकेनिज्म को समझने की कोशिश करने लगा।

“यह मशीन ऐसे स्टार्ट नहीं होगी।” नक्षत्रा ने जेनिथ को समझाते हुए कहा- “इस मशीन का कोई भी कनेक्शन ऑन बटन के साथ नहीं है, इसका मतलब मशीन के ऑन बटन को स्टार्ट करने के लिये कोई और तरीका है....जेनिथ जरा एक बार कमरे में पूरा घूमो...मैं देखना चाहता हूं कि यहां और क्या-क्या है?”

नक्षत्रा के ऐसा कहने पर जेनिथ कमरे में चारो ओर घूमने लगी।

तभी एक छोटी सी मशीन को देख नक्षत्रा ने जेनिथ को रुकने का इशारा किया- “यह मशीन टरबाइन की तरह लग रही है, और यही छोटी मशीन, एक तार के माध्यम से ऑन बटन के साथ जुड़ी है...तुम एक काम करो सुयश को यह सारी चीजें बता दो, मैं जानता हूं कि वह समझ जायेगा कि उसे आगे क्या करना है?”

जेनिथ ने नक्षत्रा की सारी बातें सुयश को समझा दीं।

“ओ.के. टरबाइन को चलाने के लिये हमें किसी सोर्स की जरुरत होती है, फिर चाहे वह हवा हो या फिर पानी.....पानी....बिल्कुल सही, ये टरबाइन तालाब की लहरों से स्टार्ट किया जा सकता है और देखो इसका तार भी बहुत लंबा है।”

सुयश अब तौफीक और ऐलेक्स की मदद से उस भारी टरबाइन को लेकर तालाब के किनारे आ गया।

तालाब के किनारे टरबाइन को रखने का एक प्लेटफार्म भी बना था, पर इस समय तालाब का पानी बिल्कुल शांत था।

यह देख सुयश का चेहरा मुर्झा सा गया।

“क्या हुआ कैप्टेन? आप उदास क्यों हो गये?” ऐलेक्स ने कहा- “आपने तो कहा था कि तालाब के पानी से यह टरबाइन चलायी जा सकती है?”

“जब हम ऊपर बादलों पर थे, तो तालाब का पानी किसी समुद्र की लहर की भांति काम कर रहा था, पर अभी यह बिल्कुल शांत है और टरबाइन को चलाने के लिये हमें लहरों की जरुरत पड़ेगी।” सुयश ने कहा।

“कैप्टेन अंकल, आप परेशान मत होइये, मैं जानती हूं कि तालाब का पानी अभी शांत क्यों है?” शैफाली ने कहा।

शैफाली के शब्द सुन सुयश आश्चर्य से शैफाली की ओर देखने लगा।

“कैप्टेन अंकल समुद्र की लहरों के लिये चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण ही जिम्मेदार माना जाता है और आप देख रहे हैं कि अभी दिन है और आसमान में सूर्य निकला हुआ है। मुझे लगता है कि जैसे ही शाम होगी और आसमान में चंद्रमा निकलेगा, तालाब का पानी फिर से लहरों में परिवर्तित हो जायेगा और वैसे भी हम दिन में आसमान में जाकर करेंगे भी तो क्या? यहां से निकलने का द्वार तो चंद्रमा में मौजूद है। इसलिये आप बस थोड़ा सा इंतजार कर लीजिये बस...।” शैफाली ने कहा।

शैफाली के शब्दों से एक पल में सुयश सब कुछ समझ गया।

“अच्छा तो इसी के साथ पवन और चंद्रमा की मूर्तियों का कार्य भी पूर्ण हो जायेगा।” सुयश ने खुश होते हुए कहा।

सभी अब चुपचाप वहीं बैठकर चंद्रमा के आने का इंतजार करने लगे।

जैसे ही सूर्य पूरी तरह से सफेद हुआ, शैफाली के कहे अनुसार तालाब का पानी लहरों में परिवर्तित होकर हिलोरें मारने लगा।

तालाब की लहरें अब टरबाइन पर गिरने लगीं, जिससे टरबाइन के अंदर मौजूद ब्लेड ने घूमना शुरु कर दिया।

सुयश टरबाइन पर पानी गिरता देख, भागकर कमरे में पहुंचा और उस मशीन का ऑन बटन दबा दिया।

एक घरघराहट के साथ मशीन ऑन हो गई। यह देख सुयश सभी को साथ लेकर पवनचक्की के ऊपर मौजूद जालीदार प्लेटफार्म पर पहुंच गया।

सुयश ने एक बार सभी को देखा और फिर वहां मौजूद उस लीवर को नीचे की ओर कर दिया।

एक गड़गड़ाहट के साथ विशालकाय पवनचक्की घूमना शुरु हो गई।

जहां सभी एक ओर इक्साइटेड भी थे, वहीं पर सावधान भी थे।

पवनचक्की ने जैसे ही गति पकड़ी, प्लेटफार्म के नीचे मौजूद नीले रंग का कास्टिक तेजी से जाली के ऊपर की ओर आया और जाली पर एक

विशालकाय बुलबुला बन गया।

सभी उस बुलबुले के अंदर बंद हो गये और इसी के साथ वह बुलबुला पवनचक्की की तेज हवाओं से ऊपर आसमान की ओर जाने लगा।

ऐलेक्स को छोड़ सभी को एकाएक शैफाली का बुलबुला और ज्वालामुखी वाला सीन याद आ गया।

“अब समझ में आया कि वहां नीचे कास्टिक क्यों रखा था।” सुयश ने मुस्कुराते हुए कहा।

“अपने ऐलेक्स की नाक तो बिल्कुल कुत्ते जैसी हो गई।” क्रिस्टी ने ऐलेक्स का मजाक उड़ाते हुए कहा।

“और तुम्हारी आँखें भी तो....।” कहते-कहते ऐलेक्स रुक गया।

“हां-हां बोलो-बोलो मेरी आँखें भी तो....किसी जानवर से मिलती ही होंगी।” क्रिस्टी ने मुंह बनाते हुए कहा।

“हां तुम्हारी आँखें बिल्कुल जलपरी के जैसी हैं, जी चाहता है कि इसमें डूब जाऊं।” अचानक से ऐलेक्स ने सुर ही बदल दिया।

क्रिस्टी को ऐलेक्स से इस तरह के जवाब की उम्मीद नहीं थी, इसलिये वह शर्मा सी गई।

“और तुम्हारा चेहरा इस चंद्रमा से भी ज्यादा खूबसूरत है।” ऐलेक्स क्रिस्टी को शर्माते देख किसी शायर की तरह क्रिस्टी की तारीफ करने लगा।

चांद पर थोड़ा गुरूर हम भी कर लें,

पर मेरी नजरें पहले महबूब से तो हटें..!!🥰


सभी क्रिस्टी और ऐलेक्स की इन मीठी बातों का आनन्द उठा रहे थे।

उधर वह बुलबुला धीरे-धीरे हवा में तैरता हुआ चंद्रमा तक जा पहुंचा।

सभी के चंद्रमा पर उतरते ही वह बुलबुला हवा में फट गया।

बुलबुले के फटते ही सभी चंद्रमा पर उतर गये और चंद्रमा के द्वार में प्रवेश कर गये।

जारी रहेगा_____✍️
 
#167.

समुद्री हमला: (17.01.02, गुरुवार, 08:00, वॉशिंगटन डी.सी., अमेरिका)

धरा और मयूर को गये हुए आज 4 दिन बीत गये थे।

वीनस पिछले 4 दिन से वेगा के घर पर ही रह रही थी, उसे अब अपने भाई लुफासा का भी डर नहीं था, वह अब खुलकर अपनी जिंदगी जीना चाहती थी, भले ही बाद में अंजाम कुछ भी हो।

इस समय सुबह के 8 बज रहे थे। वेगा और वीनस दोनों ही बेडरुम में सो रहे थे कि तभी ‘खट्-खट्’

की हल्की आवाज ने वीनस की नींद खोल दी।

वीनस ने अपने बगल में सो रहे वेगा को देखा और फिर उसके माथे को चूम लिया।

तभी वीनस को फिर वही खट्-खट् की आवाज सुनाई दी। अब वीनस ने अपनी नजरें आवाज की दिशा में घुमाई। वह आवाज बेडरुम की खिड़की से आ रही थी।

वीनस अपने बेड से उठी और पर्दे को हटा कर बंद पड़ी खिड़की की ओर देखने लगी।

तभी उसे खिड़की से बाहर एक नन्हीं चिड़िया, खिड़की के शीशे पर अपनी चोंच मारती हुई दिखाई दी। वह खट्-खट् की आवाज उसी वजह से हो रही थी।

वीनस को वह रंग-बिरंगी नन्हीं चिड़िया बहुत अच्छी लगी, इसलिये उसने खिड़की के शीशे को खोल दिया।

जैसे ही वीनस ने खिड़की का शीशा हटाया, वह चिड़िया कमरे में आ गई और चीं-चीं कर पूरे कमरे में चक्कर लगाने लगी।

यह देख वीनस मुस्कुरा कर चिड़िया की ओर चल दी- “अरे नन्हीं चिड़िया ये तुम्हारा घर नहीं है। यहां कहां से आ गई?”

पर वह चिड़िया अभी भी खुली खिड़की से बाहर जाने का नाम नहीं ले रही थी।

अब वीनस को वह चिड़िया थोड़ी परेशान दिखाई दी।

उसे परेशान देख वीनस ने उस चिड़िया की आवाज में ही उससे पूछा- “क्या हुआ नन्हीं चिड़िया? तुम कुछ परेशान दिख रही हो?”

अब चिड़िया हैरानी से वीनस की ओर देखने लगी, शायद उसने कभी किसी इंसान को अपनी आवाज में बोलते नहीं देखा था।

पर वह वीनस से कुछ कहने की जगह डरकर एक पर्दे के पीछे छिप गई।

अब वीनस को शक होने लगा कि कहीं यह लुफासा तो नहीं? जो कि चिड़िया का रुप धरकर यहां आ गया हो।

इसलिये वीनस धीरे-धीरे पर्दे के पीछे बैठी, उस चिड़िया की ओर बढ़ने लगी।

चिड़िया को बाहर निकालने के चक्कर में, वीनस ने खिड़की को अभी बंद नहीं किया था। तभी खिड़की से अनगिनत चिड़िया और कौए कमरे में घुसने लगे।

यह देख वीनस घबरा गई, वह उस चिड़िया को छोड़ जल्दी से खिड़की के बंद करने के पीछे भागी।

कमरे में चारो ओर चिड़ियों और कौओं का शोर गूंजने लगा। इस शोर को सुनकर वेगा भी घबरा कर उठ गया। उठते ही वेगा की नजर कमरे में घूम रहे, दर्जनों पक्षियों पर पड़ी।

उन पक्षियों को देखकर वह चिल्लाने लगा- “मैंने पहले ही कहा था कि लुफासा खाली नहीं बैठेगा, लो वह आ गया अपने सब दोस्तों को लेकर, मुझसे बदला लेने।”

तभी वेगा की नजर वीनस पर पड़ी, जो कि लगातार खिड़की खोले बाहर की ओर देख रही थी।

वेगा को वीनस का इस प्रकार खिड़की पर खड़े होना, थोड़ा आश्चर्यजनक सा लगा, इसलिये वह तुरंत बिस्तर से कूदकर वीनस के पास आ गया।

वेगा की नजर उस ओर गई, जिधर वीनस देख रही थी, इसी के साथ वेगा आश्चर्य से भर गया।

पूरे वॉशिंगटन डी.सी. की सड़कें, मरे हुए पक्षियों से भरी हुई थी।

कुछ पक्षी तड़प रहे थे, तो कुछ मर चुके थे। पर अभी भी आसमान से पक्षियों का गिरना रुका नहीं था।

“ये सब क्या हो रहा है? ये पक्षी कैसे मर रहें हैं?” वेगा ने वीनस से सवाल कर दिया। कुछ देर के लिये वेगा अपने कमरे में घूम रहे पक्षियों को भूल गया।

“मुझे भी नहीं पता, पर जो कुछ भी हो रहा है, वह ठीक नहीं लग रहा।” वीनस ने कहा- “पता नहीं क्यों ऐसा लग रहा है कि जैसे कुछ बहुत बुरा होने वाला है?”

अब आसमान से पक्षियों का गिरना बंद हो गया था, जिसका साफ मतलब था कि या तो आसमान में पक्षी ही खत्म हो गये थे या फिर वह अंजानी मुसीबत चली गई थी।

अब वीनस का ध्यान कमरे के अंदर के पक्षियों पर गया। कमरे के अंदर के सारे पक्षी अब उड़ना छोड़, इधर-उधर कमरे में ही छिप गये थे।

यह देख वीनस की नजर एक कबूतर पर गई, जो कि एक टेबल के पीछे छिपा था। वह दूसरों से उम्र में कुछ बड़ा दिख रहा था और थोड़ा सा बेहतर भी महसूस हो रहा था।

वीनस ने कबूतर को देखते हुए उसकी जुबान में कहा- “मुझसे डरो नहीं, मैं तुम्हारी दोस्त हूं, मुझे बताओ कि बाहर क्या हुआ था?”

वीनस को अपनी भाषा में बोलता देख कबूतर टेबल की ओट से बाहर आ गया।

“तुम हमारी भाषा कैसे बोल लेती हो?” कबूतर ने पूछा।

“क्यों कि मैं तुम्हारी दोस्त हूं, इसलिये तुम्हारी भाषा समझ सकती हूं। तुम मुझे बताओ कि बाहर क्या हुआ था?”

“मैं बाहर आसमान में अपनी रोटी लेकर उड़ रहा था कि तभी एक दूसरे कबूतर ने मेरी रोटी छीनने की कोशिश की, मैं अपनी रोटी बचा कर भागा कि तभी पता नहीं मेरे पीछे वाले कबूतर ने कौन सा जादू किया, कि आसमान में मेरे साथ उड़ रहे सभी पक्षियों का दम घुटने लगा और हम नीचे गिरने लगे। वह कोई बहुत बड़ा जादूगर कबूतर था।” उस समझदार कबूतर ने अपनी समझदारी का परिचय देते हुए कहा।

कोई और समय होता, तो वीनस को उस कबूतर की समझदारी पर बहुत तेज हंसी आती, पर यह समय कुछ और था, इसलिये वीनस उस कबूतर को छोड़ दूसरे पक्षियों की ओर देखने लगी।

तभी एक छोटा सा कौआ कमरे की ओट से निकलकर बाहर आ गया और वीनस को देखते हुए बोला- “यह कबूतर तो मूर्ख है, मैं आपको बताता हूं कि क्या हुआ?” मैं उस समय एक ऊंची सी छत पर बैठा था कि तभी एक विचित्र सा जीव आसमान में उड़ता हुआ आया। उसके हाथ में कोई यंत्र था, उसने आसमान में चारो ओर उस यंत्र से कुछ फैला दिया। उसने जो भी चीज आसमान में फैलाई थी, वह दिखाई नहीं दे रही थी, पर उस अदृश्य चीज ने सबको मारा है, मैं भी अगर इस कमरे में नहीं आता, तो मै भी मारा जाता।”

“उसके बाद वह जीव किधर गया?” वीनस ने कौए से पूछा।

“मैंने उसे आखिर में समुद्र की ओर जाते हुए देखा था।” कौए ने कहा।

“बहुत अच्छे, तुम इन सबसे ज्यादा समझदार हो।” वीनस ने उस कौए की तारीफ करते हुए कहा।

कौआ अपनी तारीफ सुनकर खुश हो गया।

“क्या कहा इन पक्षियों ने? क्या इनमें से किसी को पता है कि यह परेशानी कैसे उत्पन्न हुई?” वेगा ने वीनस से पूछा।

वीनस ने कौए की सारी बातें वेगा को बता दीं। पर इससे पहले कि वेगा कुछ और पूछ पाता कि तभी बाहर से शोर की आवाज सुनाई दी।

शोर सुनकर वेगा और वीनस दोनों ही भाग कर खिड़की के पास पहुंच गये।

वह लोग जो कुछ देर पहले अपने घरों से निकलकर पक्षियों की फोटो खींच रहे थे, अब वह चीखकर भाग रहे थे।

कुछ ही देर में वेगा और वीनस को उनके चीखने का कारण पता चल गया, उन लोगों के पीछे समुद्र के कुछ विचित्र जीव दौड़ रहे थे।

“अरे, यह जीव कैसे हैं?” वीनस ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा- “वेगा जरा इन्हें ध्यान से देखो, इनमें से कुछ शार्क जैसे लग रहे हैं और कुछ दूसरी बड़ी और छोटी मछलियों के जैसे। पर यह समुद्री जीव विकृत

होकर पानी से बाहर कैसे आ गये? और ये पानी के बाहर साँस कैसे ले रहे हैं? कुछ ना कुछ तो गड़बड़ है ...पर हमें सभी लोगों को इन जीवों से बचाना होगा।”

“पर कैसे वीनस, हममें से अगर किसी ने भी बाहर जाकर, अपनी शक्तियों से सब लोगों को बचाने की कोशिश की, तो सभी हमें पहचान लेंगे और फिर बाद में हमें सबके सवालों के जवाब देने पड़ेंगे, जो कि हम नहीं दे सकते।” वेगा ने अपनी लाचारी प्रकट करते हुए कहा।

“हम इतनी शक्तियां होते हुए भी ऐसे घर में बैठे नहीं रह सकते वेगा।” यह कहकर वीनस ने अलमारी से कैंची निकाली और एक पर्दे को काट जल्दी से उसमें आँखों के देखने भर की जगह काट कर निकाल दी

और ऐसा करके 2 मास्क तैयार कर दिये।

वीनस ने एक मास्क अपने चेहरे पर कसकर बांधा और दूसरा मास्क वेगा के चेहरे पर। अब उन दोनों के चेहरे छिप गये थे, बस आँख की जगह 2 छेद दिखाई दे रहे थे।

यह करके दोनों अपने घर से निकलकर बाहर की ओर आ गये।

इस समय चारो ओर शोर-शराबा होने की वजह से किसी ने उन पर ध्यान नहीं दिया। वेगा ने बाहर निकलते समय अपनी जोडियाक वॉच पहनना नहीं भूला था।

बाहर निकलते ही वीनस को एक बड़ी सी मछली, एक 1xxx2 वर्षीय ब..च्चे के पीछे भागती दिखाई दी।

वीनस ने उछलते हुए अपने पास रखा एक ड्रम उस मछली की ओर फेंक दिया।

मछली का सारा ध्यान इस समय ब..च्चे की ओर था। इसलिये वह ड्रम का वार झेल नहीं पायी और लड़खड़ा गयी।

इतनी देर में वीनस ने उस बच्चे को पकड़ अपनी ओर खींच लिया।

उधर वेगा ने अपनी जोडियाक वॉच पर सिंह राशि को सेट कर दिया। ऐसा करते ही वेगा के सामने, एक विचित्र जीव प्रकट हो गया, जिसका सिर शेर का और शरीर किसी ताकतवर इंसान की तरह था।

उस सिंहमानव ने एक सुनहरी धातु का कवच अपने सीने पर पहन रखा था। अचानक उसके हाथ के नाखून बहुत लंबे और स्टील की तरह पैने दिखने लगे।

अब उस सिंहमानव ने अपने हाथों से सामने से आ रही मछलियों को चीरना-फाड़ना शुरु कर दिया।

एक नजर में वह नर…सिंह का अवतार दिखाई दे रहा था।

“अरे वाह, अब तो मुझे कुछ करने की जरुरत ही नहीं है, यह सिंहमानव ही अकेले सबको निपटा देगा।” वेगा खुश होते हुए एक स्थान पर बैठ गया।

तभी उसकी नजर वीनस पर पड़ी, जो कि जमीन से कुछ ना कुछ उठा कर, उन जीवों पर फेंक रही थी और उनसे बचने की कोशिश भी कर रही थी।

यह देख वेगा सटपटा गया और उठकर वीनस की ओर भागा।

“तुम इधर क्यों आ गये? उधर जाकर बैठकर आराम करो, मैं अकेले ही इनसे निपट लूंगी।” वीनस की बात सुन वेगा समझ गया कि वीनस ने उसे बैठे देख लिया था।

“वो ये तुम्हारा बनाया मास्क मेरी आँखों पर आ गया था, उसी को बैठकर एडजेस्ट कर रहा था।” वेगा ने सफाई देते हुए कहा।

“चल झूठे, शर्म नहीं आती झूठ बोलते।” वीनस ने अपने हाथ में पकड़ी कैंची को एक ऑक्टोपस की आँखों में मारते हुए कहा।

“अरे बाप रे, तुम अभी तक आँख मारती थी, अब आँख फोड़ने भी लगी।” वेगा अभी भी आराम से खड़ा होकर शरारतें कर रहा था।

तभी ऑक्टोपस ने अपने एक हाथ से वीनस की गर्दन पकड़ ली। वीनस की साँसें अब घुटने लगीं। कैंची भी उसके हाथ से छूटकर नीचे गिर गई।

यह देख वेगा ने पास पड़े पानी के पाइप से पानी की फुहार, ऑक्टोपस के चेहरे पर मारने लगा।

“अरे बेवकूफ, तुम उसकी ओर हो या मेरी ओर।” वीनस ने अपना गला छुड़ाते हुए कहा- “वह पानी का ही जीव है और तुम उस पर पानी मार रहे हो ।”

वेगा को अपनी गलती का अहसास हो गया, पर तब तक वह ऑक्टोपस आकार में और बड़ा हो गया।

तभी सिंहमानव बाकी जीवों को अपने पंजो से नोचता हुआ उधर आ गया, उसने बिना उस ऑक्टोपस को मौका दिये, उसका पूरा पेट अपने पंजे से फाड़ दिया।

यह देख वीनस डरकर वेगा की ओर आ गई। सिंहमानव अब बाकियों का काल बनकर आगे बढ़ गया।

तभी अचानक पता नहीं कहां से सैकड़ों समुद्री जीवों ने सिंहमानव पर हमला कर दिया।

एकसाथ इतने जीवों से लड़ना सिंहमानव के बस की भी बात नहीं थी, अब वह सभी जीव मिलकर सिंहमानव को काटने लगे।

यह देख वेगा ने अपनी घड़ी के वॉलपेपर को बदलकर ‘सिंह’ से ‘धनु’ कर लिया।

अब वह सिंहमानव अपनी जगह से गायब हो गया और उसकी जगह एक अश्वमानव दिखाई देने लगा।

अश्वमानव के हाथ में तीर और धनुष था। अश्वमानव ने बिना किसी को मौका दिये दूर से ही सबको तीरों से

बेधना शुरु कर दिया।

अश्वमानव के तीर चलाने के गति इतनी अधिक थी, कि कोई जलीय जंतु उसके पास ही नहीं आ पा रहा था।

वह एक साथ अपने धनुष पर 5 तीर चढ़ाकर सबको मार रहा था। सबसे विशेष बात थी कि उसके तरकश से तीर खत्म ही नहीं हो रहे थे।

वेगा और वीनस अब मात्र दर्शक बने उस अश्वमानव को युद्ध करते देख रहे थे।

“क्या ये जलीय जीव तुम्हारा कहना नहीं मान रहे थे?” वेगा ने वीनस से पूछा।

“नहीं, इनका मस्तिष्क इनके बस में नहीं है और ऐसी स्थिति में यह मेरा कहना नहीं मान सकते।” वीनस ने कहा।

तभी पता नहीं कहां से एक ईल मछली आकर वेगा के गले से लिपट गई। यह देख वीनस ने अश्वमानव की ओर देखा, अश्वमानव अभी भी सभी से युद्ध कर रहा था।

वीनस समझ गई कि एक पल की भी देरी वेगा के लि ये घातक हो सकती है, पर परेशानी ये थी कि वीनस उस ईल को अपने हाथों से नहीं छुड़ा सकती थी।

तभी वीनस की नजर सामने एक शेड पर बैठे बाज की ओर गई। बाज को देखते ही वीनस के मुंह से एक विचित्र सी आवाज उभरी।

उस आवाज को सुन बाज तेजी से उस ओर आया और वेगा के गले में फंसी ईल को एक झटके से ले हवा में उड़ गया।

यह देख वीनस ने भागकर वेगा को थामा। गला घुटने की वजह से वेगा की आँखों के आगे अंधेरा छा गया था। पर साँस आते ही वेगा ठीक हो गया।

“मैं भी सोच रही थी कि उस ईल के मुंह पर पानी मार दूं, पर आसपास कहीं पानी था ही नहीं, इसलिये बाज के द्वारा उस ईल को पास के तालाब तक भिजवा दिया है।” वीनस ने मुस्कुराते हुए कहा।

वेगा ने घूरकर वीनस की ओर देखा पर कुछ कहा नहीं। उधर तब तक अश्वमानव ने सभी जलीय जीवों का सफाया कर दिया था।

“सारे जीव खत्म हो गये हैं, पर अब अपने घर कैसे चलें? आसपास के सारे लोग खिड़की से हमें ही देख रहे हैं।” वीनस ने दबी आवाज में कहा।

“तो फिर अभी घर की जगह कहीं और चलो, कुछ देर बाद हम वापस आ जायेंगे।“

यह कह वेगा ने अश्वमानव को गायब किया और चुपचाप अपने घर की विपरीत दिशा में वीनस के साथ दौड़ पड़ा।

आज इन दोनों का एक सुपरहीरो की तरह पहला युद्ध था, लेकिन इस पहले युद्ध ने ही इन्हें बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया था।

जारी रहेगा______✍️
 
#168.

चैपटर-10

शरद ऋतु: (तिलिस्मा 4.1)

सुयश के साथ सभी अब एक विशाल कमरे में निकले। इस कमरे में एक किनारे पर 15 फुट ऊंचा, एक पृथ्वी का ग्लोब रखा था, जिसे नचाया भी जा सकता था।

उस ग्लोब के आगे एक 12 इंच की त्रिज्या का, सुनहरी धातु का रिंग रखा था, जिसके आगे एक धातु की पट्टी पर, अंग्रेजी के कैपिटल अक्षरों से RING लिखा था। इस रिंग के बगल में एक छोटी सी ट्रे रखी थी, जिसमें 4 रंग के छोटे फ्लैग रखे थे।

उस कमरे की पूरी जमीन काँच की बनी थी, जिस पर पूरे विश्व का मानचित्र बना था।

मानचित्र में विश्व के सभी देशों को 4 अलग-अलग रंगों से दर्शाया गया था। एक जगह पर उन 4 रंगों का वर्गीकरण किया गया था।

जहां लाल रंग ग्रीष्म ऋतु का, नीला रंग शीत ऋतु का, नारंगी रंग शरद ऋतु का और हरा रंग वसंत ऋतु के प्रतीक के रुप में दर्शाया गया था।

“कैप्टेन, इस कमरे को देख कर तो लग रहा है कि यहां पर विश्व के अलग-अलग देशों को, वहां पायी जाने वाली ऋतुओं के हिसाब से वर्गीकृत किया गया है और उसे ग्लोब और मानचित्र के माध्यम से दर्शाया गया है।” जेनिथ ने सुयश को देखते हुए कहा।

“तुम बिल्कुल ठीक कह रही हो जेनिथ।” सुयश ने कमरे में चारो ओर देखते हुए कहा- “पर अब हमें यह देखना है कि हमें यहां करना क्या है? क्यों कि उसको जाने बिना हम इस द्वार को नहीं पार कर पायेंगे?”

“कैप्टेन मैंने एक चीज गौर की है कि जमीन पर बने मानचित्र में भी 4 रंगों को दर्शाया गया है और यहां टेबल पर रखी ट्रे में मौजूद फ्लैग भी उन्हीं 4 रंग के हैं, इसका मतलब इनमें आपस में कोई ना कोई सम्बन्ध तो जरुर है?” ऐलेक्स ने कहा।

“दरअसल विश्व के अधिकतर देशों में 4 ऋतुओं को ही प्रधानता दी गई है, इसलिये यहां उन्हीं 4 ऋतुओं को मानचित्र के माध्यम से दर्शाया गया है।” सुयश ने कहा।

“कैप्टेन अंकल, मुझे तो इस कमरे में सबकुछ एक ही थीम पर आधारित लग रहा है, बस यह रिंग यहां पर कुछ अजीब सा लग रहा है क्यों कि ऋतुओं या विश्व के मानचित्र में रिंग का कहीं उल्लेख नहीं है।” शैफाली ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा।

“बात तो तुम्हारी सही है शैफाली, तो फिर चलो पहले इसी पर ध्यान देते हैं।” यह कहकर सुयश उस रिंग के पास आकर खड़ा हो गया और ध्यान से उसे देखने लगा।

“कैप्टेन एक बात और है।” तौफीक ने कहा- “यह रिंग हमारे सामने रखा है और हम इसे देखकर पहचान सकते हैं कि यह एक रिंग है, फिर इसके पास यह नेम प्लेट लगा कर रिंग लिखा क्यों गया है?” मुझे यह बात थोड़ी अजीब सी लग रही है।”

इधर सभी बातें कर रहे थे, उधर ऐलेक्स ग्लोब के पास खड़ा होकर ग्लोब को नचा रहा था। जैसे ही ग्लोब रुक जाता, ऐलेक्स उसे फिर नचा देता।

कुछ देर तक ऐसे ही करते रहने के बाद ऐलेक्स ने इस बार जैसे ही ग्लोब को नचाना चाहा, उसके हाथों पर किसी चीज का स्पर्श हुआ।

यह अहसास होते ही ऐलेक्स ध्यान से उस स्थान को देखने लगा। ध्यान से देखने पर ऐलेक्स को इंडिया वाले स्थान पर एक उभरी हुई बिन्दी चिपकी दिखाई दी।

“कैप्टेन, जरा एक बार इसे देखिये।” ऐलेक्स ने सुयश को वहां आने का इशारा करते हुए कहा- “यहां ग्लोब में इंडिया वाले स्थान पर उभरी हुई बिन्दी चिपकी है। क्या इसका कोई मतलब हो सकता है?”

ऐलेक्स की आवाज सुन सुयश सहित, सभी उस ग्लो ब के पास आ गये और छूकर उस बिन्दी को देखने लगे।

“इस बिन्दी का कोई रंग नहीं है, यह पूर्णतया पारदर्शी है।” सुयश ने कहा- “यानि कि इसे छुए बिना इसके बारे में नहीं जाना जा सकता था, अब ऐसी चीज कैश्वर ने यूं ही तो नहीं लगाई होगी? इसकी कुछ ना कुछ तो अर्थ निकलता ही होगा?”

“ऐलेक्स भैया, एक बार पूरा ग्लोब ध्यान से देखिये। क्या ग्लोब पर और भी ऐसी ही बिन्दियां हैं?” शैफाली ने ऐलेक्स से कहा।

शैफाली की बात सुन कर ऐलेक्स, अपने हाथों के स्पर्श से ग्लोब पर और भी बिन्दियों को ढूंढने में लग गया। कुछ ही देर में ऐलेक्स ने पूरा ग्लोब ध्यान से चेक कर लिया।

“इस ग्लोब पर इंडिया के अलावा रुस, ग्रीनलैंड और न्यूजीलैंड के स्थान पर भी पारदर्शी बिन्दियां भी मौजूद हैं।” ऐलेक्स ने शैफाली से कहा।

यह सुनकर शैफाली मुस्कुरा दी और उठकर ऐलेक्स के गले लगते हुए बोली- “वाह ऐलेक्स भैया, आपने तो इतनी बड़ी समस्या को आसानी से सुलझा दिया।”

पर ऐलेक्स को तो स्वयं नहीं समझ में आया कि उसने कौन सी समस्या को अंजाने में सुलझा दिया, इसलिये वह प्रश्नवाचक नजरों से शैफाली की ओर देखने लगा।

“कैप्टेन अंकल, यहां पर लिखा RING शब्द 4 अक्षर R, I, N और G से बना है, जबकि ग्लोब पर जिन देशों के आगे पारदर्शी बिन्दियां चिपकी हुई हैं, उनके नाम का पहला अक्षर भी यही है। यानि कि Russia का R, India का I, New Zealand का N और Greenland का G....अब मुझे लग रहा है कि हमें ट्रे में मौजूद इन फ्लैग्स को ग्लोब के ऊपर लगाना होगा? पर ध्यान रहे कि जिस देश की ऋतु का रंग जो मानचित्र बता रहा है, फ्लैग हमें उसी ढंग से लगाना होगा।”

शैफाली ने तो एक झटके से पूरी गुत्थी ही सुलझा दी। सभी के चेहरे पर अब खुशी साफ नजर आने लगी थी।

तुरंत तौफीक ने जमीन पर बने मानचित्र पर सबसे पहले रुस देश का रंग देखा, जो कि नारंगी था।

अब ऐलेक्स ने ट्रे से नारंगी रंग का फ्लैग निकालकर उसे ग्लोब के उसी पारदर्शी बिन्दी पर लगा दिया।

जैसे ही ऐलेक्स ने फ्लैग को रुस के स्थान पर लगाया, वातावरण में एक तेज ‘बजर’ की आवाज सुनाई देने लगी।

सभी वह आवाज सुन डर गये। तभी उनकी नजर जमीन पर गई, अब पूरी जमीन पर सिर्फ रुस का ही मानचित्र दिख रहा था और रुस की राजधानी मास्को के स्थान पर एक लाल रंग की लाइट जोर से ब्लिंक

करती हुई दिखाई दी।

“यह सब क्या हो रहा है कैप्टेन?” क्रिस्टी ने सुयश से पूछा।

“मुझे लगता है कि हम जहां खड़े है, वह तिलिस्म नहीं है, बल्कि अब हमें तिलिस्म में प्रवेश करना है और यह बजर हमें इसी का संकेत दे रही है।” सुयश ने कहा- “मुझे लगता है कि तिलिस्म का अगला द्वार मास्को में हमारा इंतजार कर रहा है।” यह कहकर सुयश आगे बढ़कर मास्को के उस स्थान पर खड़ा हो गया, जहां पर लाइट ब्लिंक कर रही थी।

सुयश जैसे ही वहां पर खड़ा हुआ, वह उस स्थान से गायब हो गया। यह देख सभी उस स्थान पर पहुंच कर खड़े हो गये और इसी के साथ सभी गायब हो कर मास्को के एक पार्क में जा पहुंचे। सुयश वहां पहले से ही खड़ा था।

“यह तो मास्को का एक पार्क है।” ऐलेक्स ने चारो ओर देखते हुए कहा- “यहां तो मैं रोज घूमने आता था, यहां से मेरा घर ज्यादा दूर नहीं है।”

“अच्छा तो ब्वॉयफ्रेंड जी, कहीं आप हमको छोड़ कर अपने घर जाने की तो नहीं सोच रहे?” क्रिस्टी ने एक बार फिर से ऐलेक्स को छेड़ते हुए कहा।

“ये लो कर लो बात।” ऐलेक्स ने क्रिस्टी की आँखों में झांकते हुए कहा- “अरे तुम्हारे लिये तो मैं दुनिया छोड़ दूं, तुम्हारे सामने घर की बिसात ही क्या है। और वैसे भी मुझे पता है कि यह कैश्वर का बनाया एक सेट है, असली मास्को नहीं। लेकिन एक बात तो इससे कंफर्म हो गई कि कैश्वर किसी प्रकार से हमारे दिमाग को पढ़ रहा है और उसके बाद ही इन दरवाजों की रचना कर रहा है।”

ऐलेक्स की बात सुन सुयश भी सोच में पड़ गया क्यों कि ऐलेक्स कह तो सही रहा था, इस तिलिस्मा में ऐसी चीजों का ही निर्माण हुआ था, जो कहीं ना कहीं उनके दिमाग में थीं।

“चलिये कैप्टेन, अब इस पार्क को भी देख लें कि यहां पर क्या-क्या है?” तौफीक की आवाज ने सुयश का ध्यान भंग कर दिया और वह अपनी सोच की दुनिया से बाहर आ गया।

सभी अब पार्क में घूमकर वहां मौजूद एक-एक चीज को देखने लगे।

उस पार्क में सबसे पहले एक देवी की मूर्ति मौजूद थी, जो अपने हाथ में ‘सैंड वॉच’ लिये थी।

“क्या कोई बता सकता है कि यह कौन सी देवी हैं?” सुयश ने सभी की ओर देखते हुए पूछा।

“हां, मैं जानती हूं इनके बारे में।” क्रिस्टी ने जवाब दिया- “यह देवी ‘कार्पो’ हैं, ग्रीक माइथालोजी में इन्हें शरद ऋतु (Autumn Season) की देवी कहा जाता है, यानि कि ये देवी बारिश के बाद, प्रकृति में बड़ा बदलाव करते हुए, सभी पेड़ों के पुराने वस्त्रों, यानि कि उनके पत्तों को उनके शरीर से गिरा देती हैं। इसी लिये इस मौसम को पतझड़ भी कहते हैं। यह सबकुछ समय के द्वारा नियंत्रित करती हैं।”

“हमने वहां मानचित्र में भी नारंगी रंग को शरद ऋतु के प्रतीक के रुप में देखा था, यानि तिलिस्मा के चौथे द्वार में इस बार हमारा पाला ऋतुओं से पड़ा है और उसी के फलस्वरुप हम पहली ऋतु का सामना करने के लिये मास्को आये हैं।” जेनिथ ने कहा।

जैसे ही जेनिथ ने यह कहा अचानक से मूर्ति ने अपने हाथ में पकड़ी ‘सैंड वॉच’ को उल्टा कर दिया।

यह देख सभी आश्चर्य से मूर्ति की ओर देखने लगे।

तभी उनके आसपास के वातावरण में बदलाव शुरु हो गये और वहां मौजूद सैकड़ों ‘मैपल’ के पेड़ों की पत्तियों ने अपना रंग बदलना शुरु कर दिया।

अब सभी मैपल की पत्तियां हरे से लाल रंग में परिवर्तित होने लगी। हवा भी अब थोड़ी शुष्क हो चली थी।

“कैप्टेन अंकल, देवी कार्पो के सैंड वॉच के चलते ही मौसम में शरद ऋतु के समान बदलाव होने लगे हैं.... इसी के साथ देवी का सैंड वॉच यह भी बता रहा है कि हमें जो भी करना है, उसके लिये हमारे पास बस 2 घंटे का ही समय है...पर हमें करना क्या है? यह हमें अभी तक नहीं पता।” शैफाली ने पार्क में चारो ओर देखते हुए कहा- “इसलिये हमें सबसे पहले अपना कार्य पहचानना होगा, तभी हम उसे समय रहते पूरा कर पायेंगे।”

शैफाली की बात बिल्कुल सही थी, इसलिये बिना देर किये सभी पार्क के चारो ओर घूमकर वहां मौजूद चीजों से अपना कार्य ढूंढने की चेष्टा करने लगे।

तभी उन्हें पार्क के बीचो बीच एक हरा-भरा पेड़ दिखाई दिया, जो अपनी ग्रीनरी के कारण सभी पेड़ों से अलग ही नजर आ रहा था।

“यह क्या? जहां सभी मैपल के पेड़ों के पत्ते धीरे-धीरे लाल होने लगे है, वहां यह पेड़ अभी भी इतना हरा-भरा कैसे नजर आ रहा है?” तौफीक ने कहा।

“शायद इस पेड़ पर देवी कार्पो और शरद ऋतु का कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा?” शैफाली ने कहा- “और मुझे लग रहा है कि यही हमारा कार्य है। हमें इस पेड़ पर भी शरद ऋतु का प्रभाव डालना ही होगा, नहीं तो यह

प्रकृति के विरुद्ध होगा और इसका दुष्परिणाम हमें भुगतना होगा।”

शैफाली की बात से सभी सहमत थे। पर जैसे ही ऐलेक्स ने आगे बढ़कर पेड़ के पास जाने की सोची, किसी अदृश्य दीवार ने ऐलेक्स का रास्ता रोक लिया।

“कैप्टेन, यहां पर कोई अदृश्य दीवार है, जो मुझे आगे जाने नहीं दे रही है।” ऐलेक्स ने सुयश से कहा- “अब अगर आगे जायेंगे ही नही, तो इस पेड़ की परेशानी को दूर कैसे करेंगे?”

ऐलेक्स के शब्द सुनकर सभी ने पेड़ के पास जाने की कोशिश की, पर सभी पेड़ के पास पहुंचने में असफल रहे।

“हमें पेड़ के पास पहुंचने का कोई ना कोई तरीका तो ढूंढना ही होगा?” जेनिथ ने कहा और अपने आसपास कुछ ढूंढने लगी।

पर पार्क में उस जगह पर एक बेंच के सिवा कुछ नहीं था। समय धीरे-धीरे बीत रहा था, पार्क के बाकी पेड़ों की पत्तियां पूरी लाल हो चुकीं थीं, पर सामने खड़ा वह पेड़ अपनी हरी पत्तियों को दिखाकर मानो सबको चिढ़ा रहा था।

सुयश अब थककर पेड़ की ओर देख रहा था, कि तभी सुयश को पेड़ के पास, एक छोटे से बिल से एक चूहा झांकता नजर आया, जो कि सुयश को अपनी ओर देखता पाकर वापस बिल में घुस गया।

चूहे को देखकर अचानक सुयश के मस्तिष्क में एक आइडिया आ गया।

“दोस्तों, मैंने अभी इस पेड़ के पास एक चूहा घूमता देखा, तो मुझे लग रहा है कि यदि हम जमीन के अंदर-अंदर, इस पेड़ तक एक सुरंग खोदें तो उस पर इस अदृश्य दीवार का असर नहीं होगा।”

“पर कैप्टेन, हमारे पास समय बहुत कम है, ऐसे में बिना किसी फावड़े या कुदाल के हम इतनी जल्दी इतनी बड़ी सुरंग कैसे खोद पायेंगे?” जेनिथ ने कहा।

“पहली बात है कि हमें सुरंग को पेड़ तक नहीं खोदना है, हमें बस उसे 2 फुट ही खोदना है, जिससे कि हम बस इस अदृश्य दीवार को पार कर जायें। दूसरी बात जिस पेड़ के पास चूहों ने अपना घर बनाया होता है, उस पेड़ के पास की जमीन वैसे ही अंदर से नर्म होती है, इसलिये हमें ज्यादा मुश्किल नहीं आयेगी।” सुयश ने कहा।

तभी ऐलेक्स भागकर सामने पड़ी बेंच की ओर आ गया। वह कुछ देर तक बेंच को देखता रहा और फिर उसने बेंच के हत्थे को खींचकर बेंच से निकाल लिया।

बेंच का वह हत्था बिल्कुल किसी कुदाल के अगले भाग की तरह था, उसके बीच में लकड़ी लगाने के लिये छेद भी था।

ऐलेक्स की नजरें अब बेंच के लकड़ी के एक पाये की ओर गई। इस बार ऐलेक्स ने बेंच से लकड़ी का वह पाया भी अलग कर लिया।

ऐलेक्स ने लकड़ी के उस पाये को कुदाल के अगले भाग में फंसा दिया। इसके बाद जमीन पर थोड़ा ठोंकते ही कुदाल ने पूरा आकार ले लिया।

अब ऐलेक्स ने भागकर वह कुदाल सुयश को पकड़ा दी। सुयश आश्चर्य से ऐलेक्स को देख रहा था, उसे तो समझ में भी नहीं आया कि ऐलेक्स यह कुदाल ले कहां से आया?

“ऐलेक्स ने तो इस काम को बहुत आसान कर दिया। चलो दोस्तों अब थोड़ा मेहनत भी कर ली जाए।” यह कहकर सुयश तेजी से कुदाल से अदृश्य दीवार के आगे के हिस्से को खोदने लगा।

बाकी के लोग खुदी हुई मिट्टी को दूर करने में लगे थे। सुयश का कहना सही था, चूहों ने पेड़ के आस पास की मिट्टी को भुरभुरा बना दिया था। इसलिये एक छोटी सुरंग तैयार करने में मात्र 15 मिनटं की मेहनत ही करनी पड़ी।

सुरंग बनते ही सुयश और तौफीक तेजी से उस सुरंग में घुसकर पेड़ के पास पहुंच गये और कुछ ना समझ में आते देख पेड़ की पत्तियों को उखाड़ना शुरु कर दिया।

पर सुयश और तौफीक जितनी पत्तियां तोड़ रहे थे, उतनी ही पत्तियां पेड़ पर फिर से आ जा रहीं थीं।

“कैप्टेन अंकल, रुक जाइये।” शैफाली ने सुयश को रुकने का इशारा किया- “आप लोग जितनी पत्तियां तोड़ रहे हैं, उतनी ही पेड़ पर फिर उग रहीं हैं, इसलिये मुझे नहीं लगता कि यह सही तरीका है पेड़ के बदलाव का। हमें कुछ और ही सोचना होगा?”

शैफाली की बात सुन सुयश के चेहरे पर चिंता की लकीरें उभर आईं क्यों कि लगभग 1.5 घंटा बीत चुका था, अब सिर्फ आधा घंटा ही शेष था। आसपास के बाकी पेड़ की पत्तियां लगभग झड़ चुकीं थीं।

“जो भी सोचना है जल्दी सोचो शैफाली, क्यों कि हमारे पास ज्यादा समय नहीं बचा है और पेड़ के बारे में तुमसे बेहतर हममें से कोई नहीं सोच सकता।” सुयश ने शैफाली की तारीफ करते हुए उसका उत्साह बढ़ाया।

सुयश के शब्दों को सुन शैफाली जोर-जोर से बड़बड़ा कर सोचने लगी- “मैपल के पेड़ की पत्तियां गर्मियों में हरी होती है, पर जैसे ही शरद ऋतु आती है, वह लाल होने लगती हैं। शरद ऋतु में सूर्य की प्रकाश ज्यादा पृथ्वी पर नहीं पहुंच पाता, इसका मतलब कि इस पेड़ को भी, कहीं से सूर्य का प्रकाश ज्यादा मिल रहा है, जिसकी वजह से यह इस मौसम में भी अच्छे से क्लोरोफिल बना रहा है, यानि हमें इसका हरा पन रोकने के लिये, सूर्य के प्रकाश के स्रोत का पता लगाना होगा?”

शैफाली की बात सुन ऐलेक्स ने एक बार फिर ध्यान लगा कर पेड़ को देखना शुरु कर दिया, अब उसे प्रकाश की एक किरण किसी ओर से आकर उस पेड़ पर पड़ती दिखाई दी।

“सब लोग मेरे पीछे आओ, मुझे एक प्रकाश की किरण कहीं से आकर इस पेड़ पर पड़ती हुई दिख रही है।” यह कहकर ऐलेक्स पार्क में एक दिशा की ओर भागा।

तब तक सुयश और तौफीक भी सुरंग के रास्ते वापस बाहर निकल आये थे। सभी अब ऐलेक्स के पीछे भागे।

ऐलेक्स भागकर पार्क में मौजूद एक दूसरी मूर्ति के पास पहुंच गया। यह मूर्ति 20 फुट ऊंची थी। उस मूर्ति ने अपने हाथ में एक गोला उठाया हुआ था, जो कि नारंगी रंग का चमक रहा था। वह प्रकाश उसी गोले से आ रहा था।

“यह मूर्ति ग्रीक देवता हीलीयस की है, इन्हें सूर्य के देवता के रुप में जाना जाता है।” क्रिस्टी ने मूर्ति को देखते हुए कहा- “और इन्होंने सूर्य को ही अपने हाथों में उठा रखा है।”

“इसका मतलब इसी सूर्य की किरणों से वह पेड़ अब भी हरा है।” शैफाली ने कहा- “हमें कैसे भी इन किरणों को उस पेड़ तक पहुंचने से रोकना होगा?”

“पर इन किरणों को रोका कैसे जा सकता है?” क्रिस्टी ने दिमाग लगाते हुए कहा।

कुछ सोचने के बाद सुयश ने अपनी बदन पर मौजूद लेदर की जैकेट को उछालकर हीलीयस के हाथ में पकड़े सूर्य पर टांग दिया, पर एक मिनट से भी कम समय में वह जैकेट जलकर राख हो गई और इसी के साथ सुयश के शरीर पर बिल्कुल वैसी ही एक नयी जैकेट आ गई।

“यह प्लान तो काम नहीं करेगा।” सुयश ने कहा- “हम इस सूर्य को किसी भी चीज से ढक नहीं सकते। कुछ और ही सोचना पड़ेगा?”

यह सुनकर सभी इधर-उधर देखने लगे कि शायद यहां कोई और ऐसी चीज हो, जिससे सूर्य की रोशनी को रोका जा सके।

तभी क्रिस्टी की निगाह मूर्ति के पीछे की ओर गई और उसने चिल्ला कर सुयश का ध्यान अपनी ओर कराया- “कैप्टेन, कुछ ढूंढने की जरुरत नहीं है, सूर्य का ग्लोब पीछे की ओर से आधा काला है, इसका साफ मतलब है कि हमें इसके सामने कुछ नहीं रखना, बल्कि इसे घुमाकर इसका पिछला हिस्सा आगे की ओर कर देना है।”

“यह काम मैं करता हूं।” यह कहकर ऐलेक्स तेजी से मूर्ति के ऊपर चढ़ने लगा।

कुछ ही देर में ऐलेक्स मूर्ति के ऊपर था, अब वह सूर्य के ग्लोब को घुमाने की कोशिश करने लगा, पर ऐलेक्स के पूरी ताकत लगा देने के बाद भी वह सूर्य का ग्लोब टस से मस नहीं हुआ।

यह देख ऐलेक्स ने ऊपर से चिल्ला कर कहा- “कैप्टेन यह ग्लोब घूम नहीं रहा है, आप नीचे से देखो, हो सकता है कि मूर्ति को घुमाया जा सके।”

ऐलेक्स की बात सुन सुयश नीचे से मूर्ति को घुमाने की कोशिश करने लगा, पर उस मूर्ति में भी घूमने का कोई ऑप्शन दिखाई नहीं दिया।

अब सच में सबके लिये चिंता की बात थी, क्यों कि अब मात्र 5 मिनट

का ही समय बचा था।

“कैप्टेन, मुझे लगता है कि अब हम इस द्वार को नहीं पार कर पायेंगे, क्यों कि अब हमारे पास सिर्फ और सिर्फ 5 मिनट ही बचा है।” जेनिथ ने निराश होने वाले अंदाज में कहा।

“हमें अंतिम दम तक हार नहीं माननी चाहिये। जिंदगी में कभी-कभी हम उस स्थान से हारकर वापस आ जाते हैं, जो समस्या के समाधान से बिल्कुल करीब होता है। इसलिये अपनी ओर से सभी लोग आखिरी सेकेण्ड तक कोशिश जारी रखो, बाकी सब कुछ ईश्वर पर छोड़ दो।”

सुयश के शब्द बिल्कुल जादू से भरे थे। इन शब्दों ने सभी में एक बार फिर से जोश का संचार कर दिया था।

सुयश के शब्द सुन ऐलेक्स के कान में गूंजने लगे- “सब कुछ ईश्वर पर छोड़ दो....यही कहा है कैप्टेन ने.... पर मेरे पास तो देवता हीलीयस के सिवा इस समय कोई नहीं है, चलो इन्हीं पर ध्यान लगाता हूं।” यह सोच ऐलेक्स हीलीयस की मूर्ति को ध्यान से देखने लगा, तभी ऐलेक्स को मूर्ति की गर्दन और सिर के बीच कुछ गैप दिखाई दिया।

कुछ सोच ऐलेक्स ने मूर्ति के सिर को घुमाने की कोशिश की। ऐलेक्स की जरा सी कोशिश से ही मूर्ति का सिर पीछे की ओर घूम गया।

और जैसे ही मूर्ति का सिर पीछे की ओर हुआ, मूर्ति का शरीर भी स्वतः पीछे की ओर घूम गया।

इसी के साथ सूर्य की ग्लोब का अंधेरे वाला हिस्सा आगे की ओर आ गया और उस पेड़ को सूर्य की रोशनी मिलनी बंद हो गई।

इसी के साथ उस पेड़ के पत्तों का रंग भी लाल हो गया। यह देख सब खुशी से चिल्लाये। पर सुयश की निगाह अब देवी कार्पो के हाथ में थमी सैंड वॉच पर थी।

उस सैंड वॉच में अब बहुत थोड़ी सी रेत ही बची थी। अब सुयश कभी मैपल के पेड़ के पत्तों को, तो कभी सैंड वॉच में बची सैंड को देख रहा था।

पेड़ के पत्ते अब पूरे लाल होकर झड़ना शुरु हो गये थे, पर रेत भी बिल्कुल समाप्ति की ओर आ पहुंची थी।

सभी की साँसें इस प्रकार रुकी थीं, मानों विश्व कप फुटबाल के फाइनल के मैच में दोनों टीमें बराबरी पर हों और आखि री 60 सेकेण्ड का टाइमर चल रहा हो।

पेड़ के सारे पत्ते झड़ गये, पर एक अखिरी पत्ता अभी भी डाल पर मौजूद था और सैंड वॉच में सिर्फ 5 सेकेण्ड की रेत ही बची थी......5....4.....3 तभी तौफीक के हाथ में चाकू नजर आया और वह बिजली की तेजी से उस आखिरी पत्ते की ओर झपटा -2..........1 पर आखिरी मिली सेकेण्ड में चाकू ने उस पत्ते को पेड़ से गिरा दिया और इसी के साथ वह द्वार भी पार हो गया।

इससे पहले कि सभी खुशी मना पाते कि रोशनी के एक तेज झमाके के साथ सभी वापस उस कमरे में आ गये, जहां पृथ्वी का ग्लोब रखा था।

तौफीक पर नजर पड़ते ही जेनिथ को छोड़, सभी दौड़कर तौफीक के गले लग गये।

तौफीक की निगाह दूर खड़ी जेनिथ की ओर थी, पर इस समय जेनिथ की आँख में भी, तौफीक के लिये तारीफ के भाव थे।

“अपने मन को इतना व्यथित मत करो जेनिथ।” नक्षत्रा ने कहा- “जो चला गया, उसे जाने दो....तुम्हारे भाग्य में शायद उससे भी बेहतर कुछ लिखा हो?”

नक्षत्रा की बात सुन जेनिथ ने स्वयं के भावों को एक बार फिर से कंट्रोल किया और बोली- “तुमको बड़ा पता है मेरे भाग्य के बारे में। ...एक तो वैसे ही यहां तिलिस्मा में तुम मुझसे कम बात करते हो और ऊपर से ज्ञान और दे रहे हो।”

“मैं क्या करुं जेनिथ, यहां एक कार्य अभी सही से खत्म भी नहीं होता कि दूसरा शुरु हो जाता है, बात करने का समय ही कहां मिल पा रहा? कैश्वर ने तो सबको रोबोट से भी बदतर बना दिया। अब वो देखो सभी फिर से अगले द्वार में जाने की तैयारी कर रहे हैं...जाओ अब तुम भी उनके पास...जब तक मैं कुछ नई खोज करता हूं।”

“तुम्हारे पास खोज करने के लिये लैब तो है ही नहीं, फिर तुम ये खोज करते कहां हो?” जेनिथ ने नक्षत्रा से पूछा।

“क्यों तुम्हारा दिमाग की प्रयोगशाला, किसी नक्षत्रशाला से कम है क्या? बस इसी में एक टेबल डालकर बैठा हूं। पर तुम चिंता मत करो, तुम्हारे दिमाग में होने वाले सारे प्रयोग पर बस तुम्हारा ही अधिकार होगा।” नक्षत्रा ने कहा।

“सिर्फ तुम्हारे प्रयोग पर ही नहीं तुम पर भी मेरा सारा अधिकार है, आखिर मैं ही तो सिखा रही हूं तुम्हें नयी -नयी चीजें।” जेनिथ ने कहा।

“अच्छा जी, कल तक तो दोस्त बता रही थी और आज अधिकार जताने लगी।” नक्षत्रा ने मजा लेते हुए कहा - “चलो माना तुम्हारा अधिकार स्वयं पर...पर देखता हूं कि जब कोई मुझे तुम से अलग करने आयेगा, तो उसका सामना कैसे करोगी?”

“कौन अलग करने आयेगा?...क्या तुम मुझसे कुछ छिपा रहे हो नक्षत्रा?” जेनिथ यह बात सुन थोड़ा परेशान दिखने लगी।

“नहीं...नहीं...मैं तो ऐसे ही मजाक कर रहा था। तुम कुछ अलग ही अर्थ निकालने लगी।” नक्षत्रा ने अपनी बात को संशोधित करते हुए कहा- “और जल्दी से उधर जाओ, देखो सारे लोग तैयार हैं, अगले द्वार में

जाने के लिये।”

नक्षत्रा की बात सुन जेनिथ ने सबकी ओर देखा, सच में ऐलेक्स लाल रंग का फ्लैग हाथ में लिये, इंडिया के स्थान पर लगाने के लिये तैयार खड़ा था।

जेनिथ तुरंत सबके पास पहुंच गई। उसे पास आता देख ऐलेक्स ने लाल रंग के फ्लैग को इंडिया वाले स्थान पर, पृथ्वी के ग्लोब में लगा दिया।

इस बार जमीन पर बने मानचित्र में इंडिया का मैप बड़ा होकर आ गया और उस पर खड़े होते ही सभी एक बार फिर उस मानचित्र में समा गये।

जारी रहेगा______✍️
 
#169.

कस्तूरी मृग: (17.01.02, गुरुवार, 09:30, सीनोर महल, अराका द्वीप)

सनूरा ने सुर्वया और मेलाइट को एक कमरे में ठहरा दिया था और रोजर को दूसरा कमरा दिया था।

लुफासा के कहे अनुसार सनूरा ने मेलाइट को वापस जाने का भी आग्रह किया था, पर मेलाइट ने इस आग्रह को अस्वीकार कर दिया था।

इस समय मेलाइट और सुर्वया अपने कमरे में बैठीं थीं कि तभी सनूरा की आवाज ने दोनों का ध्यान भंग किया- “क्या हम अंदर आ सकते हैं?”

“हां-हां आइये ना।” मेलाइट ने विनम्र लहजे में कहा- “आपका ही महल है, आपको पूछने की आवश्यकता नहीं है।”

“जब एक कमरे में 2 राजकुमारियां बैठीं हों, तो सेनापति को हमेशा पूछ कर ही कमरे में जाना चाहिये।” सनूरा ने मुस्कुराते हुए कहा।

सनूरा की बात सुन मेलाइट और सुर्वया मुस्कुरा दीं। सनूरा अब उनके सामने रखी कुर्सी पर बैठ गई।

“आप दोनों को यहां रहते हुए आज 2 दिन बीत गये हैं, उम्मीद है कि अब आप दोनों थोड़ा सहज महसूस करने लगी होंगी, इसलिये मैंने सोचा कि आप लोगों से आपकी पूरी कहानी सुन लूं, क्यों कि उस दिन लुफासा के जाने के बाद, हमें एक दूसरे से कुछ ज्यादा पूछने का समय नहीं मिला। ऊपर से आप लोग, उस दिन थोड़ा असहज भी दिख रहीं थीं, इसलिये मैंने 2 दिन तक आप लोगों से बात भी नहीं की।” सनूरा ने दोनों को देखते हुए कहा।

“बिल्कुल सही कहा आपने।” सुर्वया ने सनूरा की ओर देखते हुए कहा- “उस दिन हम लोग यही नहीं समझ पा रहे थे कि आप लोग सही हैं या गलत? इसलिये आपसे बहुत सोच-समझकर बात कर रहे थे। पर आज

हम आपके सामने बेहतर महसूस कर रहे हैं। इसलिये अपनी कहानी बताने को तैयार हैं।”

“एक मिनट-एक मिनट।” मेलाइट ने बीच में ही सुर्वया को टोकते हुए कहा- “क्या हमें रोजर को भी इस समय यहां बुला लेना चाहिये? उसे भी तो जानना होगा, हम सबके बारे में।”

मेलाइट की बात सुन सुर्वया मुस्कुराते हुए बोली- “तुम्हें रोजर की बहुत याद आ रही है ....सबकुछ ठीक तो है ना?”

सुर्वया के शब्दों में एक अर्थ छिपा था, जिसे मेलाइट तो समझ गई, पर सनूरा को कुछ समझ नहीं आया।

“क्या मैं जान सकती हूं कि आप दोनों रोजर की बात सुनकर इतना मुस्कुरा क्यों रहीं हैं?” सनूरा ने आश्चर्य से दोनों को देखते हुए कहा।

“एक मिनट रुकिये सनूरा, बस आपको अभी पता चल जायेगा ....जरा दरवाजे की ओर देखिये।” सुर्वया ने मुस्कुराते हुए सनूरा को दरवाजे की ओर देखने का इशारा किया।

सनूरा ने कमरे के दरवाजे की ओर देखा, पर उसे कुछ नजर नहीं आया।

तभी कमरे के दरवाजे से रोजर भागता हुआ कमरे में प्रविष्ठ हुआ।

उसकी साँसें बहुत तेज चल रहीं थीं।

रोजर की कमर पर इस समय सिर्फ एक तौलिया लिपटा हुआ था, जिसने उसके निचले बदन को ढंक रखा था।

रोजर की नाभि से इस समय एक तीव्र सुनहरा प्रकाश निकल रहा था, उस प्रकाश से बहुत अच्छी खुशबू भी आ रही थी।

“कोई बतायेगा कि यह मेरे साथ क्या हो रहा है?” रोजर ने घबराए अंदाज में सबको देखते हुए कहा- “यह मेरे शरीर से कैसा प्रकाश निकल रहा है? कहीं यह आप दोनों की कोई शरारत तो नहीं?”

सनूरा भी आश्चर्य से रोजर के शरीर से निकलते प्रकाश को देख रही थी, उसे भी इस प्रकाश का स्रोत समझ में नहीं आया, पर सुर्वया के हल्के से इशारे से सनूरा चुपचाप बैठी रही।

रोजर की बात सुन मेलाइट अपनी जगह से उठकर खड़ी हुई और चलती हुई रोजर के पास जा पहुंची।

“क्या तुम्हें लगता है रोजी...आई मीन रोजर...कि यह हम दोनों की कोई शरारत है?” मेलाइट ने भोलेपन से जवाब दिया।

“हां , लगता है....2 दिन से आप दोनों मुझे अलग-अलग तरह से परेशान कर रही हो।” रोजर ने रोनी सूरत बनाते हुए कहा।

“हम दोनों?....नहीं-नहीं रोजर.... इसमें सुर्वया का कोई हाथ नहीं। वह तो सिर्फ मेरे साथ थी....तुम्हें तो परेशान तो मैं कर रही थी....आई मीन...हम तुम्हें परेशान क्यों करेंगे। दरअसल हमें तो पता भी नहीं कि

यह रोशनी कहां से आ रही है? पर ....पर इसकी खुशबू मुझे मदहोश कर रही है रोजर....कहां से लाते हो तुम इतनी खुशबू?” यह कहकर मेलाइट बेहोश होने का नाटक कर लहरा कर गिरने लगी।

मेलाइट को गिरते देख रोजर ने बीच में ही उसे थाम लिया। अब रोजर मेलाइट की बंद आँखों को निहार रहा था।

तभी मेलाइट ने अपनी आँखें खोल दीं और अपने चेहरे पर बनावटी गुस्सा लाते हुए कहा- “ये तुमने मुझे अपनी बाहों में क्यों भर रखा है? क्या तुम्हें पता नहीं कि हम कौन हैं? और...और ये तुम बिना कपड़ों के हमारे कमरे में क्या कर रहे हो? क्या तुम्हें पता नहीं कि इस कमरे में 3 लड़कियां हैं? अगर तुम्हारा यह तौलिया अपने स्थान से खिसक गया तो। अगर तुम ऐसी हरकत करोगे, तो मैं देवी आर्टेमिस से तुम्हारी शिकायत करुंगी।”

मेलाइट की बात सुन रोजर ने घबराकर मेलाइट को छोड़ दिया।

अब रोजर की नाभि से सुनहरी रोशनी निकलना बंद हो चुकी थी, यह देख रोजर ने एक नजर सब पर मारी और फिर वहां से जान छुड़ाकर

ऐसे भागा, जैसे कि उसके पीछे भूत पड़े हों।

रोजर के जाने के बाद, मेलाइट अपने स्थान पर आकर पुनः बैठ गई, पर इस समय मेलाइट, सुर्वया और सनूरा तीनों के ही चेहरे पर एक मुस्कान थी।

“हां, तो हम कहां थे? आई मीन क्या बात कर रहे थे?” मेलाइट ने सनूरा से पूछा।

“हां...हम एक-दूसरे से अपनी कहानियां सुनाने की बात कर रहे थे।” सनूरा ने कहा- “पर अब सबसे पहले मैं मेलाइट की कहानी जानना चाहती हूं, क्यों कि ये जो अभी कुछ देर पहले हुआ, ये मुझे काफी रोचक

लगा।”

सनूरा की बात सुन मेलाइट के चेहरे पर फैली मुस्कान और गहरी हो गई और वह बोल उठी- “हम 5 बहनें दक्षिण ग्रीस के, सीरीनिया नामक जंगल के बीच की, एक सुंदर सी झील में रहते थे। हम सभी स्वच्छ जल में रहने वाली अप्सराएं थीं... और आप तो जानती ही हैं कि पुराने समय में अप्सराओं का जीवन कितना विचित्र होता था, अप्सराओं की सुंदरता ही उनके लिये अभिशाप बन जाती थी। जब भी किसी देवता या शक्तिशाली मनुष्य की निगाह सुंदर अप्सराओं पर पड़ती थी, तो वह जबरन उसे उठा ले जाते थे।

“इस प्रकार की किसी भी घटना से बचने के लिये अप्सराओं के देवता ने, हर अप्सरा को किसी जीव में बदल जाने की शक्ति दी, जिससे वह अपने घर से बाहर निकलते समय उस जीव में परिवर्तित हो जाती थीं। कुछ ऐसी ही शक्ति के तहत हम सभी बहनें भी सुनहरी हिरनी का रुप धारण कर लेते थे। एक दिन जब हम सीरीनिया के जंगल में सुनहरी हिरनी बनकर घूम रहे थे, तो शिकार की देवी आर्टेमिस ने हमें देख लिया, पर वह हमारी सुंदरता से मुग्ध हो गईं, इसलिये उन्होंने हमें मारा नहीं। मेरी 4 बहनों ने अपनी इच्छा से देवी आर्टेमिस का रथ खींचने का कार्यभार संभाल लिया। परंतु मैंने देवी आर्टेमिस की बात नहीं मानी।”

“क्यों? मैं जानना चाहती हूं कि तुमने देवी आर्टेमिस की बात क्यों नहीं मानी?” सनूरा ने बीच में ही मेलाइट को टोकते हुए कहा।

“क्यों कि देवी आर्टेमिस कुंवारी थीं इसलिये उनका रथ खींचने वाली सभी हिरनिओं को आजीवन कौमार्य व्रत धारण करना पड़ता और मुझे ये मंजूर नहीं था। मैं विवाह करके गृहस्थ जीवन जीना चाहती थी।” मेलाइट ने कहा- “आर्टेमिस ने मुझे इसकी इजाजत दे दी। अब मुझे तलाश थी किसी ऐसे योद्धा की, जिसके साथ रहने पर मुझे लगाव महसूस हो सके।

“आखिरकार एक दिन मुझे वह योद्धा मिल ही गया और वह योद्धा था- हरक्यूलिस, जो कि राजा यूरीस्थियस के कहे अनुसार अपने 12 कार्यों को पूरा करने निकला था। हरक्यूलिस को दिये गये 12 कार्यों में से एक मुझे पकड़कर ले जाना भी था। यूरीस्थियस नहीं चाहता था कि हरक्यूलिस अपने कार्य में सफल हो, इसलिये उसने मुझे पकड़ने का कार्य दिया था।

“उसे पता था कि जब हरक्यूलिस मुझे पकड़ने की कोशिश करेगा, तो देवी आर्टेमिस उसे जिंदा नहीं छोड़ेंगी। इसी कार्य के तहत हरक्यूलिस ने मुझे पकड़ लिया। मुझे हरक्यूलिस की वीरता और साहस से प्यार हो गया। मैंने बाद में हरक्यूलिस के सामने अपने विवाह का प्रस्ताव रखा, पर हरक्यूलिस तैयार नहीं हुआ। उसने कहा कि मेरे लिये ‘कोई और’ बना है।

“जब मैंने हरक्यूलिस से उस ‘कोई और’ के बारे में पूछा, तो उसने मुझे एक सुनहरी कस्तूरी दी और मुझसे कहा कि जब कभी मुझे, कोई भी पुरुष पहली बार स्पर्श करेगा, तो यह सुनहरी कस्तूरी उसकी नाभि में प्रवेश कर जायेगी। इस सुनहरी कस्तूरी की वजह से वह पुरुष एक सुनहरे मृग में भी परिवर्तित हो सकेगा और उसमें बहुत सी अदृश्य शक्तियां भी आ जायेंगी। वही पुरुष मेरा ‘कोई और’....मेरा मतलब है कि मेरा जीवन साथी बनेगा। बस तब से आज तक मैं उस ‘कोई और’ को ढूंढ रहीं हूं।” इतना कहकर मेलाइट चुप हो गई।

“अच्छा, अब मुझे समझ में आया कि तुम यहां से क्यों नहीं जाना चाहती।” सनूरा ने मुस्कुराते हुए कहा- “दरअसल तुम्हें यहां ‘कोई और’ मिल गया है, जो कि तौलिये में ‘किसी और’ के सामने घूम रहा है।”

सनूरा के यह शब्द सुन तीनों ही जोर से हंस दिये।

“अच्छा, एक बात तो बताओ मेलाइट? कि वह रोजर के शरीर से निकल रहा सुनहरा प्रकाश अपने आप बंद कैसे हो गया?” सनूरा ने अब किसी दोस्त की भांति मेलाइट से पूछा।

“जब भी मेरे मन में प्रेम की कोपलें फूटेंगी, उसके शरीर से प्रकाश प्रस्फुटित होने लगेगा, पर जैसे ही वह मुझे स्पर्श करेगा, उसके शरीर का प्रकाश स्वतः बंद हो जायेगा।” मेलाइट ने किसी जादूगर की भांति खड़े होकर अपना हाथ हवा में लहराते हुए अपने विचार प्रकट किये।

“ओ...होऽऽऽऽऽ जादू भरी प्रेम कहानी।....अद्भुत....पर बेचारा रोशनी का देवता....उसे तो अपनी ही प्रेम कहानी मालूम नहीं है।” सुर्वया ने आह भरते हुए मेलाइट को चिढ़ाया।

“तो ‘कोई और’ की कहानी तो पूरी हो गई।” सनूरा ने टॉपिक बदलते हुए, सुर्वया की ओर देखा- “अब आपकी कहानी में भी ‘कोई और’ तो नहीं।”

सनूरा ने अपने शब्दों से सुर्वया को अपनी कहानी सुनाने का इशारा किया था।

सनूरा की बात सुन सुर्वया ने गहरी साँस भरी और बोलना शुरु कर दिया- “काश...मेरी भी कहानी में कोई और होता?....मेरी कहानी में जादू तो है, पर ‘कोई और’ नहीं.... बस आकृति है...एक ऐसी आकृति, जिसकी आकृति मुझे बिल्कुल भी पसंद नहीं।...बात आज से लगभग 5,015 वर्ष पहले कि है जब आकृति और आर्यन वेदालय के एक कार्य के चलते, सिंहलोक से ‘चतुर्मुख सिंहराज’ को लेने आये थे।”

“एक मिनट, यह आर्यन कौन है? वेदालय क्या है? और यह ‘चतुर्मुख सिंहराज’ क्या था? जरा खुलकर समझाओगी क्यों कि मैं इसके बारे में नहीं जानती।” सनूरा ने बीच में ही टोकते हुए कहा।

“आज से 20,000 वर्ष पहले हि..न्दू दे..ओं ने, भविष्य में पृथ्वी की सुरक्षा के लिये ब्रह्मांड रक्षकों को बनाने का निर्णय लिया। इसके लिये उन्हें कुछ अजेय मनुष्यों की जरुरत थी, जो कि देव-शक्तियों के द्वारा छिपकर, पृथ्वी की रक्षा कर सकें। इस कार्य के तहत महागुरु नीलाभ और उनकी पत्नि माया को दे..ताओं ने 15 लोकों का निर्माण करने को कहा। इन 15 लोकों में देओं ने 30 देव शक्तियों को छिपा दिया। फिर इसके बाद एक रहस्यमयी विद्यालय ‘वेदालय’ की रचना की गई।

“जिसमें पृथ्वी के सर्वश्रेष्ठ 13 बच्चों का चुनाव किया गया। इस वेदालय की पढ़ाई पूरे 10 वर्षों तक चलनी थी और इन 10 वर्षों में उन सभी बच्चों को वेदालय में ही रहकर इन सभी 30 देव शक्तियों को ढूंढना था। आकृति और आर्यन इन्हीं 13 बच्चों में से 2 थे। हमारा सिंहलोक भी इन्हीं 15 लोकों में से एक था, जहां पर 2 देव शक्तियां छिपी थीं- पहली थी ‘चतुर्मुख सिंहराज’ और दूसरी थी- ‘शुभार्जना’। दरअसल इन 2 शक्तियों की वजह से ही हमारा लोक एक प्रकार से अमर था। ‘चतुर्मुख सिंहराज’ एक 4 सिर वाली सिंह की प्रतिमा थी, जिसे राज्य के द्वार पर लगाया गया था।

“कहते थे कि यह ‘चतुर्मुख सिंहराज’ जिस राज्य के द्वार पर रहेगा, वहां कभी भी मृत्यु के देवता ‘यम’ प्रविष्ठ नहीं हो सकते। हमारे लोक की दूसरी शक्ति थी- शुभार्जना। शुभार्जना, एक छोटी सी डिबिया में बंद एक सिंह की गर्जना थी, जिसका 3 बार प्रयोग कर, किसी भी 3 मृत इंसान को जीवित किया जा सकता था। हां... तो अब आते हैं ‘चतुर्मुख सिंहराज’ पर, जो कि आर्यन और आकृति हमारे लोक लेने के लिये आये थे।

“यहां मेरी दोस्ती आकृति से हो गई, जिससे आकृति को मेरी कायांतरण और दिव्यदृष्टि का पता चल गया।

कायांतरण के द्वारा मैं किसी का भी चेहरा 24 घंटे के लिये बदल सकती थी और दिव्यदृष्टि के द्वारा किसी भी जीव को, जो जमीन पर हो, ढूंढ सकती थी।.....एक बार वेदालय की पढ़ाई खत्म हो जाने के बाद आकृति मेरे पास आयी और उसने मुझसे अपने चेहरे पर शलाका का चेहरा लगाने को कहा। मुझे नहीं पता था कि वह इसके माध्यम से क्या करना चाहती है? इसलिये मैंने वैसा ही किया, जैसा कि वह चाहती थी।

“आकृति शलाका का चेहरा लगवा कर वहां से चली गई। 2 दिन बाद ही वह मेरे पास वापस आ गई, पर उसका चेहरा 24 घंटे के बाद भी शलाका का ही था। यह देख मुझे भी आश्चर्य हुआ कि मेरी कायांतरण शक्ति सही काम क्यों नहीं कर रही? बाद में मुझे पता चला कि आकृति ने शलाका के वेश में अमृतपान कर लिया था और अमृतपान का यह नियम था कि उसे जिस वेश में पिया जाता, वह वेश सदा के लिये पीने वाले को धारण करना पड़ता। यानि कि अब आकृति चाहकर भी, अपना चेहरा नहीं पा सकती थी। आकृति ने गुस्सा होकर मुझे एक जादुई दर्पण में बंद कर दिया और उस दर्पण को एक अंधेरे कमरे में रख दिया।

“मैं बिना प्रकाश के अपनी दिव्यदृष्टि का प्रयोग नहीं कर सकती थी। अब मैं सदा के लिये अंधेरे कमरे में, उस जादुई दर्पण में बंद हो गई। लगभग 10 महीने के बाद आकृति ने मुझे अंधेरे कमरे से निकाला और मुझे उसके पुत्र को ढूंढने के लिये कहा।

"उसने कहा कि अगर मैं उसके पुत्र को ढूंढ दूंगी, तो वह मुझे कैद से आजाद कर देगी। मैंने आकृति के पुत्र को ढूंढने की बहुत कोशिश की। पर वह मुझे नहीं मिला...शायद आर्यन ने उसे किसी ऐसी जगह रखा था, जहां मेरी दिव्यदृष्टि नहीं पहुंच पा रही थी। फिर अचानक एक दिन आर्यन और शलाका दोनों ही मेरी दिव्यदृष्टि से ओझल हो गये। यह सुनकर आकृति और ज्यादा गुस्सा

गई और उसने मुझे फिर कभी भी अपनी कैद से नहीं छोड़ा।” यह कहकर सुर्वया शांत हो गई।

“हम्...तुम्हारी कहानी तो काफी दर्द भरी थी।” मेलाइट ने कहा- “पर तुमने यह नहीं बताया कि तुम सिंहलोक में कैसे पहुंची? तुम्हारे परिवार में कौन-कौन था? और तुम्हारे बाद सिंहलोक का क्या हुआ?”

“वह कहानी बहुत लंबी है...उसे मैं फिर कभी सुनाऊंगी।” सुर्वया ने मुस्कुराने की असफल चेष्टा करते हुए कहा।

सुर्वया के चेहरे के भाव देख मेलाइट और सनूरा ने सुर्वया को और नहीं कुरेदा, पर वो समझ गये कि सुर्वया की जिंदगी का अभी एक और पन्ना खुलना बाकी है, जो कि समय आने पर ही खुलेगा।

“अब तुम अपने बारे में बताओ सनूरा।” सुर्वया ने सनूरा की ओर देखते हुए कहा।

लेकिन इससे पहले कि सनूरा अपने बारे में कुछ बोल पाती, कि तभी महल में, किसी बड़े से ढोल की आवाज गूंजने लगी, वह आवाज सुन सनूरा डर गई।

“यह तो खतरे का सिग्नल है, क्या सीनोर राज्य पर कोई खतरा मंडरा रहा है?” सनूरा ने कहा।

“रुको मैं देखती हूं।” यह कहकर सुर्वया ने अपनी आँखें बंद कर लीं। अब सुर्वया के माथे पर एक लाल रंग का प्रकाशपुंज दिखाई देने लगा।

“नहीं...नहीं...मुझे धुंधला दिखाई दे रहा है...शायद खतरा अभी भी पानी के अंदर है...रुको...मुझे समुद्र की लहरों पर एक धुंधली सी विशाल आकृति दिख रही है...क्या...क्या यह कोई राक्षस है या फिर कोई बड़ा सा अंतरिक्ष यान?” सुर्वया ने इतना देखकर अपनी आँखें खोल दीं- “जब तक वह समुद्र की लहरों पर है, तब तक मैं उसे साफ नहीं देख सकती।”

सुर्वया के शब्द सुन सनूरा तेजी से बाहर की ओर भागी।

सनूरा को बाहर जाते देख मेलाइट और सुर्वया ने एक दूसरे की ओर देखा और फिर वह भी सनूरा के पीछे भाग लीं।

आखिर वह सब अब एक अच्छी दोस्त थीं।

जारी रहेगा______✍️
 
#170.

चैपटर-11

ग्रीष्म ऋतु-1: (तिलिस्मा 4.2)

तिलिस्मा ने इस बार सभी को अपने द्वारा बनाये भारत के किसी स्थान पर भेज दिया।

वहां एक बहुत विशालकाय क्षेत्र था। चारो ओर हरियाली फैली थी, पेड़-पौधों पर रंग-बिरंगे फूल लगे थे, जो कि अपनी खुशबू से पूरा क्षेत्र महका रहे थे।

आसमान में पंछी अपनी मधुर आवाज बिखेर रहे थे। कुल मिलाकर बहुत ही खुशनुमा वातावरण था।

“मुझे तो लगा था कि हमारा सामना यहां ग्रीष्म ऋतु से होगा और हमें यहां चिलचिलाती हुई गर्मी मिलेगी, पर यहां का मौसम तो बहुत ही खुशनुमा है।” जेनिथ ने कहा- “ऐसा लगता है कि जैसे यहां कोई परेशानी

है ही नहीं?”

“कैश्वर ने हमें यहां मौज-मस्ती के लिये नहीं भेजा होगा...अभी देखना, कुछ ही देर में कैश्वर का कार्य शुरु हो जायेगा।” ऐलेक्स ने नाक सिकोड़ते हुए कहा।

“चलो जब तक कोई परेशानी शुरु नहीं होती, तब तक इस क्षेत्र को अच्छी तरह से देख लेते हैं।” सुयश ने कहा- “पता नहीं बाद में समय मिले की नहीं?”

सुयश की बात सभी को सही लगी, इसलिये सभी आगे बढ़कर वह क्षेत्र देखने लगे।

परंतु कुछ आगे जाते ही सभी को जमीन पर एक विशालकाय खेल के जैसी कोई संरचना दिखाई दी।

“लो जी, कैश्वर से हमारी खुशी देखी नहीं गई, इसलिये भेज दिया किसी आफत को हमसे लड़ने के लिये।” ऐलेक्स ने फिर कैश्वर पर कटाक्ष करते हुए कहा- “और दूर से ही मुझे यह कोई बहुत बड़ी परेशानी दिख

रही है, क्यों कि यह लगभग 1 किलोमीटर के क्षेत्र में फैली हुई है।”

“मुझे तो यह कोई बड़ा सा बोर्ड गेम लग रहा है?” तौफीक ने कहा।

धीरे-धीरे चलते हुए सभी उसके पास पहुंच गये, पर वह पूरा सेटअप इतना बड़ा था कि पास से पूरा दिख ही नहीं रहा था।

“कैप्टेन हमें उस बड़ी सी चट्टान से यह खेल पूरा नजर आ जायेगा” क्रिस्टी ने पास की ही एक चट्टान की ओर इशारा करते हुए कहा।

क्रिस्टी की बात सही थी, इसलिये सभी उस ऊंची सी चट्टान की ओर बढ़ गये। चट्टान पर चढ़ने के बाद सभी ने उस पूरे खेल पर नजर डाली।

“कैप्टेन अंकल, यह तो साँप-सीढ़ी की तरह का कोई विशाल गेम है, जिस पर नम्बर्स लिखे हैं, मगर इस पर साँप-सीढ़ी की जगह कुछ संरचनाएं और चीजें बनी हैं।” शैफाली ने कहा।

“मगर यह पूरी आकृति गोलाकार है और इस के बहुत से नम्बरों पर हमारी आकाशगंगा के नक्षत्र घूम रहे हैं, यह संरचना बिल्कुल जलेबी की भांति है और इसके मध्य में आकाशगंगा के समान एक सूर्य चमक रहा है और यह पूरी संरचना उस सूर्य का चक्कर लगा रही है।” ऐलेक्स ने कहा- “यह तो बहुत विचित्र और खतरनाक द्वार लग रहा है।”

“कैप्टेन, एकाएक आपको इस चट्टान पर कुछ गर्मी बढ़ती हुई महसूस नहीं हो रही क्या?” क्रिस्टी ने अपने माथे पर बह आये पसीने को पोंछते हुए कहा।

“मुझे भी कुछ गर्मी बढ़ती हुई सी लग रही है।” तौफीक ने भी अपनी जैकेट उतारते हुए कहा।

“कैश्वर ने तो कहा था कि हमें तिलिस्मा में कुछ भी अहसास नहीं होगा। फिर यह गर्मी कैसे बढ़ रही है?” ऐलेक्स ने कहा।

“कैश्वर ने कहा था कि हमें भूख, प्यास नहीं लगेगी, गर्मी, सर्दी तो महसूस हो ही सकती है, पर यह देखो कि इतनी गर्मी के बाद भी हमें प्यास नहीं लग रही है।” तौफीक ने कहा।

कुछ ही देर में गर्मी और बढ़ गई, अब सबके लिये जैकेट को पहने रख पाना मुश्किल हो गया था, इसलिये बाकी सभी ने अपनी जैकेट उतार लीं।

“कैप्टेन कहीं इस गर्मी के बढ़ने के पीछे इस गेम का हाथ तो नहीं?” ऐलेक्स ने कहा- “क्यों कि इस गेम में भी आकाशगंगा और सूर्य ही बना है और वैसे भी हम इस समय मानचित्र के अनुसार विश्व के एक गर्म हिस्से में हैं।”

“ऐलेक्स तुम्हीं सबसे ज्यादा दूर तक साफ देख सकते हो। तुम ही एक बार चेक करके बताओ कि तुम्हें इस गेम में क्या अलग नजर आ रहा है?....मेरा मतलब कि इस गेम में हमें करना क्या है?” जेनिथ ने ऐलेक्स को देखते हुए कहा।

जेनिथ की बात सुन ऐलेक्स ध्यान से उस पूरे गेम को देखने लगा।

कुछ देर तक उस पूरे गेम का अध्ययन करने के बाद ऐलेक्स ने कहा- “कैप्टेन इस पूरे गेम में सभी ग्रह हमारी आकाशगंगा की ही भांति सूर्य का चक्कर लगा रहे हैं, परंतु इस समय इस गेम में, पृथ्वी अपनी अक्ष के परितः नहीं घूम रही है, जिसकी वजह से उसका एक भाग, लगातार सूर्य की परिक्रमा करते हुए सूर्य के सामने है। मुझे लग रहा है कि तभी हमारे आसपास गर्मी बढ़ती जा रही है। यानि अब पृथ्वी के एक भाग में हमेशा दिन रहेगा और दूसरे भाग में हमेशा रात होगी। दिन वाला भाग निरंतर गर्म होता जायेगा और रात वाला भाग निरंतर ठंडा। और हम इस समय पृथ्वी के गर्म वाले भाग में हैं।”

“यानि कि हमें जल्दी से जल्दी इस समस्या का समाधान करना होगा, नहीं तो गर्मी इतनी बढ़ जायेगी कि हम लोग उसे बर्दास्त नहीं कर पायेंगे।” क्रिस्टी ने कहा- “इसका साफ मतलब निकलता है कि इस

बार हमारा कार्य पृथ्वी को उसके अक्ष के परितः गति देना है।”

“बिल्कुल सही।” ऐलेक्स ने कहा - “तभी यह गोलाकार जलेबी जैसी संरचना सिर्फ पृथ्वी तक ही बनी है।”

“कैप्टेन तो फिर तुरंत चलते हैं इस गेम की ओर...अब हमें ज्यादा देर करना सही नहीं होगा।” जेनिथ ने चट्टान से उतरते हुए कहा।

जेनिथ की बात सुन सभी तेजी से चट्टान से उतरने लगे। कुछ ही देर में सभी उस विचित्र गेम के शुरुआती स्थान पर पहुंच गये।

पूरा गेम 10 बाई 10 फुट के वर्गाकार पत्थरों से बना था। नम्बर 1 की जगह स्टार्ट लिखा हुआ था और 10 नंबर पर आकाशगंगा की ‘कुईपर बेल्ट’ बनी थी।

(कुईपर बेल्ट हमारे आकाशगंगा का वह आखिरी छोर है, जहां तक हमारे सूर्य का गुरुत्वाकर्षण काम करता है। इस क्षेत्र में क्षुद्र ग्रह और स्टेरायड आते हैं)

“पर इस गेम में पासे तो हैं ही नहीं, फिर हमें चलना कैसे है?” क्रिस्टी ने कहा- “क्या मैं एक कदम आगे बढ़कर देखूं कैप्टेन?”

“नहीं थोड़ी देर रुक जाओ क्रिस्टी, मुझे लगता है कि कुछ ही देर में हमें पता चल जायेगा कि आगे कैसे बढ़ना है?” सुयश ने क्रिस्टी को रोकते हुए कहा।

तभी इनके सामने हवा में एक नीले रंग का धुंआ दिखाई दिया, उस धुंए ने हवा में अब कुछ लिखना शुरु कर दिया था।

कुछ ही देर में इन सभी के सामने हवा में, धुंए से एक पहेली लिखी नजर आने लगी।

इस पहेली पर लिखा था-

“एक लक्ष्य है, तीन हैं भाले,

अपनी किस्मत आजमाले।”

“यह क्या लिखा है हवा में?” सुयश ने ध्यान से उसे पढ़ते हुए कहा- “ना तो यहां पर भाले हैं और ना ही कोई लक्ष्य। फिर इन पंक्तियों का क्या मतलब है?”

सुयश का इतना कहना था कि तभी हवा में 3 भाले प्रकट हो गये।

“वाह! अगर निशाना लगाना है तो यह प्रतियोगिता तौफीक के लिये बहुत आसान हो जायेगी।” क्रिस्टी ने कहा।

“अरे पर पहले लक्ष्य को तो दिखने दो, फिर निशाने के बारे में सोचेंगे।” सुयश ने कहा।

“लक्ष्य हमारे सामने है कैप्टेन अंकल।” शैफाली ने कहा।

“कहां है लक्ष्य, मुझे तो नहीं दिखाई दे रहा।” तौफीक ने शैफाली की ओर देखते हुए पूछा।

“हम इस समय 1 नम्बर पर खड़े हैं तौफीक अंकल और वह लक्ष्य 10 नम्बर पर एक 2 इंच की मछली के रुप में है, जो एक लकड़ी के मध्य फंसी है और अपने अक्ष के परितः हवा मे गोल-गोल नाच रही है। पर मुझे लगता है कि वह अदृश्य है और सिर्फ मुझे ही दिख रही है।” शैफाली ने सामने की ओर देखते हुए कहा।

“वह मुझे भी दिख रही है, पर मैं इस जैसे 100 भाले से भी उसका निशाना नहीं लगा सकता।” ऐलेक्स ने मछली की ओर देखते हुए कहा।

“अब क्या करें कैप्टेन?” जेनिथ ने डरते हुए सुयश से पूछा- “जिसे वह मछली दिख रही है, वह निशाना लगा नहीं सकता और जो निशाना लगा सकता है, उसे वह मछली दिखाई नहीं दे रही है।”

“इसीलिये कहा था कि निशाने का नाम सुनते ही खुश होने की जरुरत नहीं है, वह कैश्वर है, हमें हमेशा अगली चुनौती, पिछली चुनौती से ज्यादा खतरनाक देगा।” सुयश ने कहा- “चलो कोई बात नहीं, मुझे अभी भी तौफीक की क्षमता पर पूरा भरोसा है, वह 3 बार में सही निशाना जरुर लगा लेगा, बस शैफाली या ऐलेक्स को तौफीक को गाइड करना होगा।”

“मेरे हिसाब से तौफीक अंकल को गाइड करने का काम मुझे करने दीजिये कैप्टेन अंकल, मुझे दिशा, हवा और बीच की दूरी का ज्यादा अच्छा ज्ञान है।” शैफाली ने स्वयं को मोटीवेट करते हुए सबके सामने प्रस्तुत किया, पर अगर वह ऐसा ना भी करती, तब भी सुयश ने यह काम शैफाली से ही करवाना था।

तौफीक ने अब पहला भाला हवा से उठा लिया। तौफीक ने पहले भाले के वजन का जायजा लिया और फिर उसे 2-3 बार अपने हाथों में ही चला कर देख लिया, अब वह शैफाली की ओर देखने लगा।

शैफाली ने तौफीक को अपनी ओर देख बोलना शुरु कर दिया- “तौफीक अंकल, मैं आपको सिर्फ 4 चीजों के बारे में बताती हूं। नंबर 1, आपसे मछली की दूरी शत-प्रतिशत 100 फुट है, नंबर 2, मछली इस

वर्गाकार पत्थर के बीच में है। नंबर 3, मछली की ऊंचाई जमीन से 5 फुट और 6 इंच है। नंबर 4, हवा का बहाव हमारे दाहिने से बांयी ओर लगभग 8 किलोमीटर प्रति घंटा है। अब आप अपनी तैयारी करिये और जैसे ही मैं 3 तक गिनती गिनूं, आप भाला चला दीजियेगा।”

तौफीक ने अपना सिर हिलाकर अपनी स्वीकृति दे दी। अब तौफीक ने भाला अपनी कंधे की ऊंचाई पर लाकर अपनी तैयारी पूरी कर ली।

तौफीक की नजरें अब बस शैफाली के बताये हुए आंकड़ों के हिसाब से हवा में केन्द्रित हो गई। अब तौफीक को बस शैफाली की गिनती का इंतजार था।

उधर शैफाली ध्यान से मछली के गोल घूमने की गति का अंदाजा लगा रही थी।

लगभग 5 मिनट तक शैफाली ने ध्यान से उस मछली को देखा और फिर अपनी गिनती शुरु कर दी- “3.....2......1” शैफाली के एक बोलते ही तौफीक ने अपने हाथ में पकड़ा भाला चला दिया।

भाला सनसनाता हुआ सीधा मछली के सिर में जा घुसा। 2 और निशाने की जरुरत ही नहीं पड़ी।

निशाना सही जगह लगते देख शैफाली और ऐलेक्स खुशी से चीख उठे।

उनके चीखने के अंदाज से ही सभी जान गये कि निशाना सही लगा है।

तभी वह पत्थर, जिस पर सब खड़े थे, अपने आप फिसलता हुआ उन्हें 11 नंबर पर लेकर पहुंच गया और पीछे के सभी नंबर अब गायब दिखने लगे।

अभी सब ठीक से खुशी भी नहीं मना पाये थे कि अब उनके सामने एक और समस्या खड़ी थी।

अब 20 नंबर पर प्लूटो ग्रह नाचता दिखाई दे रहा था और उसके बगल एक गोल सी चकरी लगी थी।

11 से 20 नंबर के बीच के क्षेत्र में जमी हुई झील के जैसा पानी दिखाई दे रहा था। 11 नंबर के अंत में 9 धातु के टुकड़ों पर एक पहेली फिर लिखी हुई नजर आ रही थी।

“डालो पानी में पानी,

बन जाओ जल की रानी।”

“अब इस पहेली का क्या मतलब हुआ?” क्रिस्टी ने कहा- “भला पानी में पानी कैसे डालना है? और मुझे तो साफ दिख रहा है कि उस पार लगी चकरी को घुमाने पर आगे का द्वार खुल जायेगा।.....कैप्टेन अगर

आप कहें तो मैं इस पानी में उतर कर इसे पार करने की कोशिश करूं क्या? हो सकता है कि इसे ऐसे ही पार करना हो?”

“रुक जाओ क्रिस्टी।” सुयश ने क्रिस्टी को रोकते हुए कहा- “यह पानी बर्फ सा ठंडा दिख रहा है, पहले इसमें मैं उतरकर देखता हूं।”

यह कहकर सुयश ने पानी में उतरने के लिये अपने पाँव लटकाये, पर उसे पानी में बहुत तेज करंट का झटका लगा।

“यह पानी तो करंट मार रहा है, पानी में उतर कर इसे पार नहीं किया जा सकता। कुछ और ही सोचना होगा?” सुयश ने अपने पैर ऊपर करते हुए कहा।

सुयश की बात सुन क्रिस्टी ने ऊपर से ही पानी को छुआ, पर उसे करंट का अहसास नहीं हुआ।

“कैप्टेन, यह पानी मुझे करंट नहीं मार रहा।” क्रिस्टी ने आश्चर्य से सुयश की ओर देखते हुए कहा।

“अब मुझे समझ में आया, इस पहेली की दूसरी पंक्ति यही कहती है कि इसमें कोई लड़की ही उतर सकती है।” शैफाली ने सभी को समझाते हुए कहा।

“तो कैप्टेन, क्या अब मैं पानी में उतरने की कोशिश कर सकती हूं?” क्रिस्टी ने रिक्वेस्ट वाले लहजे में सुयश से कहा।

सुयश ने अब सिर हिलाकर क्रिस्टी को अनुमति दे दी।

“सुयश की आज्ञा मिलते ही क्रिस्टी पानी में उतर गई, पर जैसे ही वह तैरने चली, पानी उसे नीचे की ओर खींचने लगा। यह देख क्रिस्टी घबरा कर ऊपर आ गई।

“कैप्टेन, यह पानी मुझे नीचे की ओर खींच रहा है, ऐसे में तैरकर इसे पार नहीं किया जा सकता।” क्रिस्टी ने कहा और बैठकर वहां लिखे शब्दों को ध्यान से देखने लगी।

अब सभी अपना दिमाग तेजी से चला रहे थे।

“कैप्टेन इस कविता में 9 ही शब्द हैं और यह सारे शब्द अलग-अलग धातु के टुकड़ों पर लिखे हैं, ऐसा क्यों है? यह सारे शब्द किसी एक ही टुकड़े पर भी तो लिखे जा सकते थे, फिर कैश्वर ने ऐसा क्यों किया?”

यह सुनते ही शैफाली के होंठों पर मुस्कान आ गई- “मिल गया मुझे कविता की पहली पंक्ति का अर्थ।”

यह कहकर शैफाली ने सभी शब्दों में से ‘पानी ’ शब्द वाले दोनों धातु के टुकड़े उठा लिये और उसे उठा कर बर्फीले पानी में फेंक दिया।

शैफाली के ऐसा करते ही उन धातु के टुकड़ों में नीचे की ओर 2 हैण्डिल निकल आये और वह तेजी से 11 से 20 नंबर के बीच पानी में तैरने लगे।

“अच्छा तो पानी वाले शब्द को पानी में डालना था।” जेनिथ ने मुस्कुराते हुए कहा।

यह देख एक बार फिर क्रिस्टी पानी में उतर गई और साँस रोककर उन धातु के टुकड़ों के नीचे लगे हैण्डिल को दोनों हाथों से पकड़ लिया।

अब क्रिस्टी का पूरा शरीर पानी के अंदर था, पर धातु के टुकड़े 10 सेकेण्ड में ही क्रिस्टी को लेकर 20 नंबर के पास पहुंच गये।

क्रिस्टी धातु के टुकड़ों को छोड़ अब 20 नंबर पर पहुंच गई। 20 नंबर पर पहुंचते ही क्रिस्टी ने वहां लगी चकरी को क्लाक वाइज घुमा दिया।

चकरी के घुमाते ही 11 से 20 नंबर के बीच एक पुल बन गया और सभी उस पुल से हो कर 21 नंबर पर पहुंच गये।

अब उन्हें 30 नंबर पर ‘नेपच्यून’ ग्रह नाचता हुआ दिख रहा था, जिसके पास एक बंदर की मूर्ति लगी दिखाई दी। उस बंदर के हाथ में एक केला था और उसकी पूंछ किसी असली बंदर के समान हवा में लहरा रही थी।

21 से 30 नंबर तक के बीच में जमीन धधक रही थी और उस जमीन से आग की तेज लपटें उठ रहीं थीं।

उन आग की लपटों के ऊपर हवा में 3 रस्सियां कुछ-कुछ दूरी पर लटक रहीं थीं। यह रस्सियां ऊपर कहां से बंधी थीं, यह दिखाई नहीं दे रहा था।

तभी आग की लपटों से कुछ चिंगारियां निकलकर हवा में कुछ लिखने लगीं।

थोड़ी ही देर में सभी को हवा में लिखी एक और कविता नजर आने लगी, जिस पर लिखा था-

“झूलकर बन जाओ बंदर,

पार करो फिर अग्नि समुंदर।”

“ये लो फिर से एक और कविता।” ऐलेक्स ने कविता को पढ़ते हुए कहा।

“हां, पर ये इस कविता का सार बहुत ही आसान है।” क्रिस्टी ने कहा- “साफ पता चल रहा है कि हमें इन रस्सियों पर झूलते हुए इस आग के समुंदर को पार करना है।”

“कविता को समझना तो आसान है, पर हर किसी के लिये इस आग के समुंदर को पार करना इतना आसान नहीं है।” सुयश ने आग के ऊपर बंधी रस्सी की ओर देखते हुए कहा।

“मैं इसके द्वारा उस पार आसानी से जा सकता हूं।” ऐलेक्स ने सुयश की ओर देखते हुए कहा- “पर मुझे नहीं लगता कि किसी एक इंसान के पार करने से यह समस्या खत्म होगी।”

“क्यों अभी मैंने भी तो बर्फ की नदी पार की थी, उसके बाद तो सबके लिये पुल बन ही गया था।” क्रिस्टी ने ऐलेक्स से कहा- “जरुर यहां पर भी ऐसा ही होगा। वैसे भी कैश्वर को पता है कि सभी लोग झूलकर इसे

पार नहीं कर सकते, इसलिये वह ऐसा तिलिस्म बनाएगा ही नहीं।”

“तो फिर ठीक है, मैं पहले उस पार जाता हूं, फिर उधर जाकर देखता हूं कि बाकी लोगों के उधर जाने की क्या व्यवस्था है।” ऐलेक्स ने कहा।

“जाओ मेरे बंदर, ये कार्य सिर्फ तुम्हारे लिये ही बना है। जाकर अपना कार्य पूर्ण करो।” यह कहकर क्रिस्टी ने किसी देवी की भांति अपना एक हाथ उठाकर ऐलेक्स को आशीर्वाद देते हुए कहा।

ऐलेक्स ने यह सुन क्रिस्टी को घूरकर देखा और फिर मुस्कुरा कर 21 नंबर के पत्थर के किनारे पर आ गया।

ऐलेक्स ने एक बार रस्सी की ओर ध्यान से देखकर उसकी दूरी का जायजा लिया और फिर पहली रस्सी की ओर छलांग लगा दी।

पहली रस्सी आसानी से ऐलेक्स के हाथ में आ गई। अब ऐलेक्स ने अपने शरीर को हवा मे थोड़ा झुलाया और एक हाथ से दूसरी रस्सी पकड़ ली।

पर दूसरी रस्सी को पकड़ते ही वह रस्सी पूरी के पूरी आग में गिर गई। भला हो कि अभी ऐलेक्स ने पहली रस्सी को छोड़ा नहीं था। इसलिये ऐलेक्स का शरीर लड़खड़ाया, पर उसने स्वयं को संभाल लिया।

ऐलेक्स को फिसलता देख क्रिस्टी के मुंह से चीख निकल गई, पर ऐलेक्स को सुरक्षित देख उसने राहत की साँस ली।

“ऐलेक्स क्या तुम अब तीसरी रस्सी तक पहुंच पाओगे?” सुयश ने चिल्ला कर ऐलेक्स से पूछा।

“तीसरी रस्सी की दूरी थोड़ी ज्यादा है, पर मुझे लगता है कि मैं उस तक पहुंच जाऊंगा।” ऐलेक्स ने विश्वास से कहा।

लेकिन इससे पहले कि ऐलेक्स तीसरी रस्सी पर कूद पाता, कि तभी नीचे से आयी एक आग की लपट ने तीसरी रस्सी का जला दिया।

यह देख अब सभी के चेहरे पर चिंता की लकीरें आ गईं, क्यों कि अब यह टास्क ऐलेक्स के लिये भी मुश्किल बन गया था।

पर फिर भी ऐलेक्स ने हार नहीं मानी, उसने एक बार फिर अपने शरीर को हवा में जोर जोर से हिलाना शुरु कर दिया। कुछ ही देर में ऐलेक्स के हवा में झूलने की गति काफी तेज हो गई।

अब ऐलेक्स धीरे-धीरे सरक कर रस्सी के बिल्कुल आखिरी किनारे पर आ गया, उसे पता था कि वह जितना नीचे से रस्सी को पकड़ेगा, उतना ही दूर तक जायेगा। अब ऐलेक्स की नजरें सिर्फ और सिर्फ 30 नंबर के पत्थर पर थी।

आखिरकार ऐलेक्स ने रस्सी छोड़ दी। अब उसका शरीर हवा में उड़ता हुआ तेजी से 30 नंबर के पत्थर की ओर चल दिया।

ऐलेक्स को छलांग लगाते देख सभी की साँसें रुक सी गयीं। आखिरकार ऐलेक्स का पैर 30 नंबर पत्थर के आखिरी छोर पर पहुंच ही गया। यह देख सभी खुश हो गये।

पर ऐलेक्स के शरीर का पूरा बैलेंस अभी बना नहीं था। इसी के साथ ऐलेक्स का शरीर हवा में लहराकर आग की ओर झुकने लगा।

यह देख क्रिस्टी के मुंह से चीख निकल गई।

ऐलेक्स समझ गया कि अब उसका बैलेंस बन नहीं पायेगा, तभी ऐलेक्स के हाथ में उस बंदर की मूर्ति की पूंछ आ गई, जो कि हवा में लहरा रही थी।

ऐलेक्स ने घबरा कर उस बंदर की पूंछ पकड़ ली। बंदर की मूर्ति की पूंछ काफी मजबूत थी, जिसने आखिरकार ऐलेक्स को बचा ही लिया।

“देखा, मैंने कहा था ना कि तुम बंदरों के परिवार से हो, और अब इस बंदर ने तुम्हें बचा कर यह साबित भी कर दिया।” क्रिस्टी ने तेज से चिल्लाकर ऐलेक्स से कहा।

ऐलेक्स ने इस समय क्रिस्टी की बात पर ध्यान नहीं दिया, वह तो अब जल्दी-जल्दी वहां कोई ऐसा यंत्र ढूंढने लगा, जिससे उस आग के समुंदर पर पुल बनाया जा सके।

पर काफी ढूंढने के बाद भी ऐलेक्स को वहां ऐसा कुछ नजर नहीं आया। अब ऐलेक्स उस बंदर की मूर्ति को ध्यान से देखने लगा, जो कि अपने हाथ में एक केला लिए बैठा था।

“ये लो कर लो बात, इधर मैं परेशान हो रहा हूं और ये भाई साहब केला लिये, जीभ निकालकर मुझे चिढ़ा रहे हैं।” यह कहकर ऐलेक्स ने बंदर के मूर्ति के सिर पर एक धीरे से चपत लगा दी।

ऐलेक्स के ऐसा करते ही बंदर ने अपनी जीभ अंदर कर ली और केला खाने लगा, जैसे ही बंदर का केला खत्म हुआ, वह बंदर कहीं गायब हो गया, पर अब उस आग के समुंदर पर एक पुल बन चुका था। यह देख ऐलेक्स खुश हो गया।

सभी उस पुल से होते हुए 30 नंबर को पार कर 31 नंबर पर पहुंच गये। अब उन्हें आगे की स्टेज दिखाई देने लगी थी।

40 नंबर पर एक पुच्छल तारा हवा में गोल-गोल नाच रहा था। 31 से 40 नंबर तक के बीच जमीन में एक पीले रंग का द्रव भरा था, जिसमें जगह-जगह पर बुलबुले उठ रहे थे।

उस पूरे रास्ते के बीच 8 बड़े आकार के लट्टू हवा में नाच रहे थे। सभी लट्टू क्लाक वाइज नाच रहे थे।

तभी सुनहरी रोशनी से फिर कविता की कुछ पंक्तियां हवा में उभरी-

“नाच सको तो नाच लो,

अपनी प्रतिभा जांच लो।”

इन पंक्तियों को पढ़ जेनिथ के चेहरे पर मुस्कान आ गयी- “इस कैश्वर ने सभी की प्रतिभा के साथ पूरा न्याय किया है, जैसे कि अब देख कर ही पता चल रहा है कि यह द्वार मेरे लिये ही बनाया गया है।” जेनिथ के शब्दों में सच्चाई झलक रही थी।

“पर जेनिथ तुम्हें उस पार जाने से पहले 2 चीजों का बहुत ज्यादा ध्यान रखना है।” सुयश ने जेनिथ को समझाते हुए कहा- “पहला यह कि लट्टू के नीचे का वह द्रव तेजाब है, तो अगर तुम गिरी तो मुझे नहीं लगता कि नक्षत्रा इतनी जल्दी तुम्हें सही कर पायेगा। दूसरी बात हर लट्टू क्लाक वाइज नाच रहा है। ऐसी स्थिति में तुम्हें एक लट्टू से दूसरे पर कूदना बहुत मुश्किल होगा। हां अगर एक क्लाक वाइज और दूसरा एंटी क्लाक वाइज नाचता तो तुम्हें बैलेंस करने में परेशानी नहीं आती। पर यहां पर ऐसा नहीं है, इसलिये तुम्हें लट्टू बदलते समय अपने बैलेंस का बहुत ध्यान रखना होगा।”

जेनिथ ने ध्यान से सुयश की बातें सुनीं और धीरे से उछलकर पहले लट्टू पर आ गई।

अगर यह कार्य जमीन पर करना होता, तो जेनिथ के लिये बिल्कुल मुश्किल नहीं होती क्यों कि नीलकमल पर जेनिथ ने इससे ज्यादा गति का सामना किया था, पर अभी यहां स्थिति अलग थी, यहां पर तेजाब का डर भी शामिल था।

तेजाब को देखकर जेनिथ में थोड़ा सा डर आ गया था।

यह देखकर नक्षत्रा बोल उठा- “परेशान मत हो जेनिथ, अगर तुमने अपने भय को काबू में रखा, तो तुम आसानी से यह क्षेत्र पार कर सकोगी।”

“पर नक्षत्रा, वह तेजाब मुझे डरा रहा है, पता नहीं क्यों तेजाब को देखकर मुझे यह महसूस हो रहा है कि मैं इसमें गिर जाऊंगी।” जेनिथ ने डरते हुए कहा।

“अच्छा ये बताओ जेनिथ कि अगर तुम्हें यह तेजाब नहीं दिखाई दे रहा होता, तो क्या तुम इसे आसानी से पार कर सकती थी?” नक्षत्रा ने जेनिथ से पूछा।

“100 प्रतिशत मैं इसे आसानी से पार कर लेती।” जेनिथ ने पूर्ण विश्वास से कहा।

“तो फिर ठीक है, एक बार अपनी आँखें बंद करो और फिर खोलो।” नक्षत्रा के शब्द रहस्य से भरे थे।

जेनिथ को कुछ समझ में तो नहीं आया, पर उसने वैसा ही किया, जैसा कि नक्षत्रा ने कहा था।

आँखें खोलते ही जेनिथ आश्चर्य से भर गई, अब उसे लट्टू के नीचे तेजाब नहीं बल्कि हरी-हरी नर्म घास दिखाई दे रही थी।

“ज्यादा खुश हो कर घास पर अपना पैर मत रख देना जेनिथ, यह बस मैंने तुम्हारा डर कम करने के लिये किया है, यह घास सिर्फ तुम्हारे आँखों का भ्रम है, नीचे अभी भी तेजाब ही है, पर मैंने अपनी शक्ति से तुम्हारे दिमाग में भ्रम उत्पन्न कर दिया है।” नक्षत्रा ने कहा।

“पर तुम यह किस प्रकार कर सकते हो नक्षत्रा?” जेनिथ ने नक्षत्रा से पूछा।

“लोग समझते हैं कि वह अपनी आँखों के द्वारा देखते हैं, पर यह गलत है। हमारी आँखों से निकली किरणे, जब किसी चीज से टकराकर हमारी आँखों में वापस आती हैं, तो वह इन्हें तरंगों के रुप में मस्तिष्क तक भेजती हैं और मस्तिष्क इन तरंगों को डीकोड कर समझ जाता है कि उस इंसान ने क्या देखा। तो इसका मतलब कोई भी चीज हमें आँखें नहीं बल्कि दिमाग दिखाता है। बस मैंने इसी थ्योरी पर काम कर एक नयी शक्ति का विकास कर लिया। अब मैं जब चाहूं तुम्हें तुम्हारी मनचाही वस्तु दिखा सकता हूं, पर यह ध्यान रखना कि वह असल में होगी नही, बस वह तुम्हें दिखेगी।” नक्षत्रा ने कहा।

हर बार की तरह इस बार भी विज्ञान की बातें जेनिथ की खोपड़ी के ऊपर से चलीं गईं, पर उसने सिर हिला दिया।

“एक बात और बता दो नक्षत्रा कि तुम इस शक्ति का प्रयोग तिलिस्मा में कैसे कर पा रहे हो, यहां तो बाहर की शक्ति काम नहीं करती।” जेनिथ ने एक सवाल और पूछ लिया।

“यह शक्ति कहां है जेनिथ, यह तो मात्र भ्रम है।” नक्षत्रा ने कहा- “अब तुम ज्यादा सवाल मत करो और इस द्वार को पार करो, देखो सभी आश्चर्य से तुम्हें इतनी देर से लट्टू पर नाचते देख रहे हैं। अब जरा इन लोगों

को भी अपनी प्रतिभा दिखा दो।”

जेनिथ ने एक नजर किनारे पर खड़े लोगों पर मारी और फिर आराम से इस तरह सभी लट्टू को पार करती चली गई, जैसे वह अपने गार्डन में खड़ी हो।

“वाह! क्या बात है? जेनिथ को तो इस द्वार में कोई भी परेशानी नहीं हुई?” तौफीक ने जेनिथ की तारीफ करते हुए कहा।

उधर जेनिथ जैसे ही दूसरी ओर पहुंची, तेजाब के ऊपर हवा में एक पुल बन गया, जिससे होकर सभी दूसरी ओर आ गये।

अब सभी जाकर 41 नंबर पर खड़े हो गये।

जारी रहेगा_____✍️
 
#171.

जीव शक्ति: (18 वर्ष पहले........जुलाई 1977, सीनोर राज्य का समुद्र तट, अराका द्वीप)

सुबह का समय था। आज मौसम भी काफी अच्छा था इसलिये लुफासा और वीनस आज मौज-मस्ती करने के लिये, समुद्र तट के पास आ गये थे।

इस समय लुफासा की आयु साxxx वर्ष और वीनस की आयु मात्र पाxxx वर्ष की थी।

“भाई, आज मौसम कितना अच्छा है, लहरें भी ऊंची-ऊंची उठ रही हैं, चलो ना लहरों के बीच चलें, वहां बहुत मजा आयेगा।” वीनस ने लुफासा को खींचते हुए लहरों की ओर ले जाना चाहा।

“नहीं, जब यहां किनारे से ही इतना अच्छा दृश्य दिख रहा है, तो वहां लहरों के पास जाने की क्या जरुरत है?” लुफासा ने वीनस से अपना हाथ छुड़ाते हुए कहा- “अगर लहरों की वजह से तुम्हारा सिर किसी चट्टान से टकरा गया तो?”

“क्या भाई, आप भी कितना डरते हो? हम यहां कोई पहली बार तो नहीं आ रहें हैं ना।” वीनस ने अपनी जीभ निकालकर लुफासा को चिढ़ाते हुए कहा।

“देखो, तुम डरने का नाम मत लो, मैं किसी से नहीं डरता।” लुफासा ने गुस्साते हुए कहा।

“अच्छा ठीक है भाई, अब मैं आपको डरपोक नहीं कहूंगी।” यह कहकर वीनस, लुफासा से थोड़ा दूर गई और फिर तेज से चिल्लाकर भागी- “डरपोक....डरपोक।”

“रुक जा अभी बताता हूं तुझे।” यह कहकर लुफासा भी वीनस के पीछे-पीछे उसे पकड़ने को भागा।

वीनस ने पास आ रही एक समुद्र की लहर को देखा और फिर वहां पड़े एक बड़े से पत्थर पर खड़ी होकर लुफासा के आने का इंतजार करने लगी।

“पकड़ लिया....।” लुफासा ने पत्थर पर चढ़कर वीनस को पकड़ते हुए कहा- “अब बता क्या कह रही थी?”

“भाई....वो...वो....मैं कह रही थी।” तभी समुद्र की तेज लहर ने वीनस और लुफासा दोनों को ही सराबोर कर दिया- “कि...........समुद्र की लहर इस पत्थर के ऊपर तक आने वाली हैं।”

लुफासा ने पहले अपने भीग चुके पूरे कपड़ों को देखा और फिर वीनस को डांटते हुए कहा- “बोलने में इतना देर लगाते हैं क्या? जब तक तुमने बोला, तब तक तो हम भीग चुके थे।”

“इसी लिये तो धीरे-धीरे बोल रही थी कि आपका ध्यान पूरी तरह से लहरों से भटककर मेरी ओर आ जाये और आप भीग जाओ।” वीनस ने शरारत भरे अंदाज में कहा- “भाई, अब तो चलो ना लहरों के बीच, देखो

अब तो आपके कपड़े भी पूरी तरह से भीग गये हैं।”

लेकिन इससे पहले कि लुफासा कोई जवाब दे पाता, उसके नीचे की जमीन हिलने लगी और वह स्वतः ही समुद्र की ओर जाने लगे।

“यह क्या भाई, हमें यह पत्थर समुद्र की ओर क्यों ले जा रहा है?” वीनस ने डरते हुए कहा।

लुफासा पत्थर को सरकते देख उस पर कूद गया और ध्यान से उस पत्थर को देखने लगा।

“अरे, यह पत्थर नहीं बल्कि कोई बड़ा सा कछुआ है, जो अब समुद्र की ओर जा रहा है।” लुफासा ने कहा- “जल्दी से उतर जाओ, नहीं तो यह तुम्हें भी लेकर समुद्र में चला जायेगा।”

“ले जाने दो।” वीनस ने उस कछुए पर आराम से बैठते हुए कहा- “भाई तो ले नहीं जा रहा समुद्र में, तो यह कछुआ ही सही। अब मैं आज से इसे ही भाई कहकर बुलाउंगी, कम से कम यह मेरी बात तो मानता है।

चलो-चलो कछुआ भाई...समुद्र की ओर चलो...और इस लुफासा की बात मत सुनना। यह अच्छा लड़का नहीं है।”

लुफासा अब वीनस को घूरकर देख रहा था, पर उसने भी ना तो वीनस को कछुए से नीचे उतारा और ना ही कछुए को रोका।

लुफासा को लग रहा था कि अभी कुछ आगे जाने के बाद वीनस डर कर कछुए से उतर जायेगी, पर वीनस भी एक नंबर की जिद्दी थी, वह भी लुफासा को परेशान करने के लिये कछुए से उतरी नहीं। बल्कि पानी के पास पहुंचने तक, अपने हाथ हिलाकर लुफासा को ‘बाय’ करती रही।

लुफासा को अब थोड़ी गड़बड़ लगने लगी थी क्यों कि वीनस अब बिल्कुल लहरों के पास पहुंच गई थी।

तभी समुद्र की एक ऊंची सी लहर आयी और जोर से वीनस और कछुए पर गिरी।

जब वह लहर हटी, तो लुफासा को ना तो वीनस कहीं नजर आयी और ना ही वह कछुआ।

यह देख लुफासा बहुत घबरा गया। माता-पिता के जाने के बाद अब वह वीनस को भी खोना नहीं चाहता था।

लुफासा अब चीखकर समुद्र की ओर भागा- “वीनसऽऽऽऽऽऽ।”

पर दूर-दूर तक लहरों के शोर के सिवा कुछ नहीं था। वैसे तो सभी अटलांटियन पानी में साँस लेना जानते थे, यानि की वीनस के डूबने का तो प्रश्न ही नहीं उठता था।

पर लुफासा की चिंता इसलिये भी ज्यादा दिख रही थी क्यों कि एक साधारण द्वीप के किनारे से इतनी आसानी से कोई कहीं नहीं जाता? पर अराका पानी पर तैर रहा एक कृत्रिम द्वीप था, जिसके थोड़ा ही आगे से गहरा समुद्र शुरु हो जाता था और गहरे समुद्र में खतरा पानी नहीं, बल्कि उसमें रहने वाले विशाल जीव थे।

लुफासा तुरंत वहां पहुंच गया, जहां कि अभी कुछ देर पहले वीनस और कछुआ थे। लुफासा उस स्थान पर पानी में अपना मुंह डालकर अंदर की ओर देखने लगा, पर वीनस आसपास कहीं दिखाई नहीं दी।

अब लुफासा धीरे-धीरे समुद्र में आगे की ओर बढ़ने लगा। कुछ ही देर में लुफासा अराका की धरती से कुछ दूर आ गया, पर पानी में दूर-दूर तक कुछ नहीं था।

तभी लुफासा को अराका की जमीन में पानी के नीचे एक कपड़ा फंसा हुआ दिखाई दिया।

वह कपड़ा देख लुफासा वापस अराका की ओर आ गया। पानी के अंदर, अराका की जमीन में एक झाड़ी के पास वह कपड़ा फंसा था।

लुफासा ने वह कपड़ा खींचा, पर उस कपड़े का दूसरा सिरा वीनस ने पकड़ रखा था, जो कि झाड़ियों के पीछे छिपी एक गुफा में बैठी मुस्कुरा रही थी।

यह देख लुफासा को बहुत गुस्सा आया। वह समझ गया कि वीनस ने जानबूझकर यह शरारत की थी।

तभी वीनस ने लुफासा को मुंह पर उंगली रखकर चुप रहने का इशारा किया और तैरकर उस गुफा के अंदर चली गई।

लुफासा को गुस्सा तो बहुत आया, पर फिर भी वो वीनस के पीछे-पीछे उस गुफा के अंदर चला गया।

अंदर काफी अंधेरा था, पर दूर कहीं एक लाल रंग की रोशनी दिखाई दे रही थी। लुफासा पानी के अंदर उस लाल रंग की रोशनी देख आश्चर्य से भर उठा।

अब उत्सुकता वश लुफासा तेजी से उस दिशा में तैरने लगा।

कुछ ही देर में वीनस और लुफासा एक ऐसे स्थान पर पहुंच गये, जिसका एकमात्र द्वार वह गुफा ही दिखाई दे रही थी।

यह स्थान लगभग 500 वर्ग फुट के आकार का था। उस स्थान पर काँच का 1 वर्ग फुट का एक वर्गाकार डिब्बा दिखाई दे रहा था, जिसके अंदर सुर्ख लाल रंग का एक रत्न रखा हुआ था।

उसी रत्न का प्रकाश उस पूरी गुफा में फैला दिखाई दे रहा था। वह गुफा उस लाल प्रकाश में पूरी जगमगा रही थी।

उस रत्न को देख, कुछ देर के लिये लुफासा यह भूल गया कि वह वीनस को डांट लगाने के लिये वहां आया था।

तभी लुफासा को वही समुद्री कछुआ दिखाई दिया, जो कि वीनस को लेकर भागा था। उसे देख लुफासा समझ गया कि इसी कछुए का पीछा करते हुए, वीनस को झाड़ियों के पीछे छिपी यह गुफा दिखाई दी होगी।

अब वह कछुआ भी लाल रंग के प्रकाश की ओर आकर्षित हो गया था। कछुए ने आगे बढ़कर उस काँच के डिब्बे को छू लिया।

उस डिब्बे को छूते ही कछुए के शरीर से लाल रंग का प्रकाश निकलने लगा। अब वह कछुआ खुशी से उस गुफा के चारो ओर चक्कर लगाने लगा।

यह देख वीनस और लुफासा भी तैरते हुए, उस काँच के डिब्बे के पास पहुंच गये।

डिब्बे के ऊपरी सिरे पर एक ढक्कन लगा था, जिसे लुफासा ने हल्के से प्रयास से ही खोल दिया।

अब लुफासा और वीनस की नजरें आपस में टकराईं और दोनों ने एक साथ झपटकर उस लाल रंग के रत्न को उठा लिया।

दोनों का हाथ रत्न पर एक साथ पड़ा, पर लुफासा ने वीनस से वह रत्न छीन लिया और उसे ध्यान से देखने लगा।

लुफासा और वीनस के छूते ही वह गाढ़े रंग का लाल प्रकाश उन दोनों के शरीर में समा गया और इसी के साथ वह रत्न पता नहीं कहां गायब हो गया?

रत्न के इस प्रकार गायब हो जाने पर दोनों घबराकर, अपने आसपास रत्न को ढूंढने लगे।

तभी वीनस को एक आवाज सुनाई दी- “वह रत्न गायब हो गया, मैंने देखा था।”

वीनस ने हैरान होते हुए अपने आसपास देखा।

तभी वीनस से कुछ दूरी पर पानी में तैर रहा वही कछुआ बोल उठा - “इधर-उधर क्या देख रही हो? मैं ही बोल रहा हूं।”

वीनस कछुए को बोलते देख हैरान हो गई। तभी वीनस को एक महीन गाने की आवाज सुनाई दी।

वीनस ने उस दिशा की ओर देखा, तो उसे कुछ नन्हीं रंग-बिरंगी मछलियां पानी में इधर-उधर घूमती दिखाईं दीं। गाना वही मछलियां गा रहीं थीं।

यह देख वीनस की खुशी का ठिकाना ही नहीं रहा, वह भी पानी में तैरते हुए जोर-जोर से मछलियों

वाला गाना गाने लगी।

कुछ देर बाद जब वीनस रुकी, तो उसने देखा कि उसके आसपास सैकड़ों जलीय जंतु उसे हैरानी से गाते हुए देख रहे थे और लुफासा डरा-डरा गुफा के एक किनारे से चिपका हुआ था।

“आप हमारी भाषा जानती हो?” एक सितारा मछली ने आगे आते हुए पूछा।

“मुझे नहीं पता, पर अभी तुम जो बोली, मैं वह समझ गई। क्या तुम भी मेरी बात को समझ पा रही हो?” वीनस ने सितारा मछली से पूछा।

“हां...यह ही क्या, हम सभी तुम्हारी बात सुन और समझ पा रहे हैं।” तभी एक नन्हें ऑक्टोपस ने आगे बढ़कर कहा।

“अरे वाह, ये तो बहुत अच्छी बात है, फिर तुम सब खड़े क्यों हो? मेरे साथ नाचते क्यों नहीं?” वीनस ने यह कहा और फिर से जोर-जोर से गाकर पानी में नाचने लगी।

वीनस को देख वहां के सभी जलीय जंतु वीनस के साथ-साथ पानी में नाचने लगे।

लुफासा यह देखकर और ज्यादा डर गया, उसे लगा कि वीनस में कोई समुद्री भूत घुस गया है, इसलिये वह किसी को डिस्टर्ब नहीं कर रहा था।

काफी देर तक उस गुफा में यह नाच गाने का कार्य चलता रहा, पर अब वीनस थक गई थी। इसलिये उसने अब सभी को वहां कल आने को बोल, लुफासा के पास आ गई।

लुफासा अब भी डरी-डरी नजरों से वीनस को देख रहा था।

“क्या हुआ भाई, आप मुझे ऐसे क्यों देख रहे हो ?” वीनस ने लुफासा की ओर देखते हुए पूछा।

“तुम में कोई समुद्री भूत घुस गया है, जिसकी वजह से तुम अभी समुद्री जीव-जंतुओं से बातें कर रही थी।” लुफासा ने डरते हुए कहा।

“क्या भाई आप भी ना? कितना डरते हो।” वीनस ने लुफासा पर गुस्साते हुए कहा- “अरे वह पत्थर जिसे हमने छुआ था, वह कोई चमत्कारी पत्थर था। उसी की वजह से अब मैं सभी जीवों की भाषा बोल और समझ सकती हूं।.....हम दोनों ने एक साथ पत्थर छुआ था, आप भी देखो ना भाई, अवश्य ही आप में भी कोई शक्ति आयी होगी। देखो आपके हाथों के अंदर अभी भी हल्की सी लाल रंग की रोशनी निकल रही है।”

वीनस की बात सुन लुफासा अपने हाथों की ओर देखने लगा।

“हां रोशनी तो निकल रही है, पर अगर मुझे भी तेरी तरह शक्ति मिली होती तो मैं भी उन मछलियों की भाषा समझ पाता, पर ऐसा नहीं हुआ, मुझे उनकी भाषा नहीं समझ में आयी।” लुफासा ने बेचैनी से कहा।

तभी एक पीले रंग की नन्हीं मछली लुफासा के चेहरे के पास आकर तैरने लगी। यह देख लुफासा ने गुस्से से उसे घूरा, पर उसको घूरते ही लुफासा स्वयं, उस मछली के समान बन गया।

यह देख वीनस खुशी से चीख उठी- “देखा भाई, मैंने कहा था ना कि कोई ना कोई शक्ति तो आपको भी मिली होगी?”

अपने आपको मछली बना देख लुफासा भी खुशी से नाचने लगा, तभी दूसरी दिशा से एक थोड़ी बड़ी मछली आयी और मछली बनी लुफासा को अपने मुंह में भरकर चली गई।

यह देख वीनस के मुंह से चीख निकल गई, वह तेजी से उस बड़ी मछली की ओर भागी, पर तभी एक आवाज ने उसे रोक लिया- “मैं यहां ठीक हूं वीनस, वापस लौट आओ।”

यह आवाज लुफासा की ही थी। वीनस ने पलटकर देखा, तो उसे लुफासा उसी स्थान पर बैठा दिखाई दिया, जहां पर वह मछली बनने के पहले बैठा था।

“यह क्या है भाई, आपको तो वह मछली निगल गई थी। फिर आप बच कैसे गये?” वीनस ने आश्चर्य से लुफासा की ओर देखते हुए कहा।

“मुझे भी नहीं पता, जब उस बड़ी मछली ने मुझे निगला, तो उसके बाद मैंने स्वयं को, अपने असली रुप में यहीं पर पाया।.....पर....पर अब मैं वह पीली सी मछली नहीं बन पा रहा हूं। शायद मेरी शक्ति चली गई।”

तभी लुफासा के सामने से एक दूसरी नीले रंग की मछली निकली। इस बार लुफासा ने उसे ध्यान से देखा और इसी के साथ लुफासा अब नीले रंग की मछली के समान बन गया।

“लगता है कि अगर किसी एक रुप में मेरी मौत हो गई, तो वह रुप मैं दोबारा नहीं धर सकता और मेरे उस रुप की मौत होने के बाद मैं वापस उसी स्थान और रुप में पहुंच जाता हूं, जो मैं उस रुप के पहले था।”

लुफासा ने कहा।

“अरे वाह, ये तो इच्छाधारी शक्ति है...आप कोई भी रुप धारण कर सकते हो।” वीनस ने कहा और अब वह लुफासा से बार-बार अलग-अलग रुप बदलने को कहने लगी।

उन्हें देखकर ऐसा लग रहा था कि मानों उन बच्चों को एक नया खेल मिल गया हो।

पर जो भी हो, लुफासा और वीनस अपनी शक्तियों से खुश थे।

जारी रहेगा_____✍️
 
Back
Top