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#152.
वेदांत रहस्यम्
(15 जनवरी 2002, मंगलवार, 15:00, ट्रांस अंटार्कटिक माउन्टेन, अंटार्कटिका)
विल्मर को सुनहरी ढाल देने के बाद शलाका ने जेम्स को वापस उसी कमरे में रुकाया और स्वयं अपने शयनकक्ष में आ गई।
शलाका ने अपने भाईयों पर नजर मारी जो कि दूसरे कमरे में थे।
शलाका ने अब अपने कमरे का द्वार अंदर से बंद कर लिया, वह नहीं चाहती थी कि वेदांत रहस्यम् पढ़ते समय कोई भी उसे डिस्टर्ब करे।
कक्ष में मौजूद अलमारी से शलाका ने वेदांत रहस्यम् निकाल ली और उसे ले अपने बिस्तर पर आ गई।
लाल रंग के जिल्द वाली, 300 पृष्ठ वाली, 5,000 वर्ष पुरानी, आर्यन के द्वारा लिखी किताब अब उसके सामने थी।
शलाका जानती थी कि इसी किताब में वह रहस्य भी दफन है कि आर्यन ने क्यों अपनी इच्छा से अपनी मौत का वरण किया? यह पुस्तक अपने अंदर सैकड़ों राज दबाये थी, इसलिये उसे खोलते समय शलाका के हाथ कांपने लगे।
शलाका ने वेदांत रहस्यम् का पहला पृष्ठ खोला।
पहले पृष्ठ पर वेदालय की फोटो बनी थी। जिसे आर्यन ने अपनी स्मृति से रेखा चित्रों के माध्यम से बनाया था। उसे देखकर एक पल में ही शलाका 5,000 वर्ष पहले की यादें अपने दिल में महसूस करने लगी।
शलाका जानती थी, कि यह किताब जादुई है, अगर उसने वेदालय की फोटो को छुआ, तो वह उस स्थान पर पहुंच जायेगी, इसलिये इच्छा होने के बाद भी शलाका ने वेदालय की फोटो को स्पर्श नहीं किया।
शलाका ने अब दूसरा पृष्ठ पलटा। उस पृष्ठ पर वेदालय की वह तस्वीर थी, जब पहली बार सभी वेदालय में प्रविष्ठ हुए थे।
उस तस्वीर में आकृति, आर्यन से चिपक कर खड़ी थी और शलाका उनसे थोड़ा दूर खड़ी थी।
कुछ देर के लिये ही सही पर यह तस्वीर देखते ही शलाका के मन में आकृति के लिये गुस्सा भर गया।
शलाका ने अब एक-एक कर पन्ने पलटने शुरु कर दिये।
आगे के लगभग 30 पेज वेदालय की अलग-अलग यादों से भरे हुए थे। पर एक पेज पलटते ही शलाका से रहा नहीं गया, उसने उस तस्वीर को छू लिया।
एक पल में ही शलाका उस तस्वीर में समाकर उस काल में पहुंच गई, जहां वह एक नदी के किनारे आर्यन के साथ अकेली थी।
आर्यन और शलाका दोनों ही इस समय xyz (chhote) वर्ष के थे।
तो आइये दोस्तों देखते हैं कि ऐसा क्या था उस फोटो में कि शलाका अपने आप को उसे छूने से रोक नहीं पायी।
वेदालय से कुछ दूरी पर एक सुंदर सी झील थी, जहां इस मौसम में बहुत से पंछी और चिड़िया उड़कर, उस स्थान पर आते थे।
इस समय जिधर नजर जा रही थी, उधर चारो ओर रंग-बिरंगे फूल, तितलियां और पंछी दिखाई दे रहे थे। ऐसे मौसम में आर्यन और शलाका उस स्थान पर बैठे थे।
“आज तो छुट्टी का दिन था फिर तुम मुझे यहां पर क्यों लाये आर्यन?” शलाका ने अपनी नन्हीं आँखों से आर्यन को देखते हुए पूछा।
“क्यों कि तुम मुझसे एक छोटी सी शर्त हार गई थी और शर्त केअनुसार एक दिन के लिये मैं जो कहूं, वो तुम्हें मानना पड़ता, तो फिर मैंने सोचा कि क्यों ना मैं तुम्हें अपनी सबसे फेवरेट जगह दिखाऊं, बस यही सोच मैं तुम्हें यहां ले आया। मुझे पता है कि अगर शर्त नहीं होती तो तुम कभी मेरे साथ नहीं आती। पर सच कहूं तो मैं तुम्हें ऐसे अकेले कमरे में बंद पड़े नहीं देख सकता। तुम पता नहीं कमरे से बाहर क्यों नहीं निकलती?”
“वो....वो मैं तुमसे बात करना चाहती हूं, तुम्हारे साथ घूमना भी चाहती हूं, पर वो आकृति हमेशा तुम्हारे साथ रहती है और वह मुझसे बहुत चिढ़ती है, बस इसी लिये मैं तुम्हारे साथ बाहर कहीं नहीं जाती।”
शलाका ने धीरे से कहा।
“कोई बात नहीं, पर आज तो आकृति मेरे साथ नहीं है...आज तुम यहां मेरे साथ खेल सकती हो।” आर्यन ने भोला सा चेहरा बनाते हुए कहा।
“ठीक है, पर तुम यहां पर आकर कौन सा खेल खेलते हो?” शलाका ने आर्यन की बातों में रुचि लेते हुए कहा।
“मैं यहां पर प्रकृति को महसूस करने वाला खेल खेलता हूं। क्या यह खेल तुम मेरे साथ खेलोगी?” आर्यन ने कहा।
“पर मुझे तो ये खेल नहीं आता। इसे कैसे खेलते हैं आर्यन?” शलाका ने कहा।
“यह खेलना बहुत आसान है...सबसे पहले हम कोई चिड़िया ले लेते हैं और उसे महसूस करते हैं।”
“चिड़िया?” शलाका को कुछ भी समझ में नहीं आया- “चिड़िया में महसूस करने वाला क्या होता है आर्यन?”
“रुको , मैं तुम्हें यह करके दिखाता हूं।” यह कहकर आर्यन ने इधर-उधर देखा।
आर्यन को कुछ दूरी पर एक नन्ही सी लाल रंग की चिड़िया उड़ती हुई दिखाई दी, आर्यन उस चिड़िया की ओर दौड़ा।
चिड़िया एक नन्हें बच्चे को अपनी ओर भागते देख, चीं-चीं कर तेजी से उड़ने लगी।
आर्यन ने कुछ देर तक चिड़िया को देखा और फिर वह चिड़िया के समान ही आवाज निकालता उस चिड़िया से अलग दिशा में दौड़ा।
चिड़िया उस नन्हें बालक को अपनी तरह बोलता देख, आर्यन के पीछे-पीछे उड़ने लगी।
अब नजारा उल्टा था, पहले चिड़िया के पीछे आर्यन था, पर अब आर्यन के पीछे चिड़िया।
सच कहें तो शलाका को कुछ समझ में नहीं आ रहा था, पर आर्यन के पीछे चिड़िया का भागना उसे अच्छा लग रहा था।
अब आर्यन एक जगह पर रुक गया, और अपने दोनों हाथों को फैलाकर, फिर चिड़िया की तरह बोलने लगा।
कुछ ही देर में चिड़िया आकर आर्यन के हाथ पर बैठ गयी, आर्यन ने धीरे से चिड़िया के पंखों को सहलाया।
चिड़िया को आर्यन का सहलाना बहुत अच्छा लगा, वह फिर चीं-चीं कर मानो आर्यन को और ऐसा करने को कह रही थी।
आर्यन ने अब उसे कई बार सहलाया और फिर उसे लेकर शलाका के पास आ गया।
“अब अपना हाथ आगे करो शलाका।” आर्यन ने शलाका से कहा।
शलाका ने डरते-डरते अपना हाथ आगे कर दिया। आर्यन ने नन्हीं चिड़िया को शलाका के हाथों पर रख दिया।
नन्हीं चिड़िया शलाका के हाथ पर फुदक कर चीं-चीं कर रही थी।
कुछ ही देर में शलाका का डर खत्म हो गया और वह भी चिड़िया के साथ खेलने लगी।
शलाका चिड़िया से खेलने में इतना खो गई कि वह भूल गई कि आर्यन भी उसके साथ है।
“क्या अब तुम इस चिड़िया को महसूस कर पा रही हो शलाका?” आर्यन ने शलाका से पूछा।
“हां.... इस चिड़िया का धड़कता दिल, इसके खुशी से फुदकने का अहसास, इसका पंख पसार कर उड़ना, इसका मेरे हाथों पर चोंच मारना, मुझे सबकुछ महसूस हो रहा है आर्यन। सच कहूं तो यह बहुत अच्छी फीलिंग है, मैंने ऐसा पहले कभी नहीं महसूस किया।”
“यही प्रकृति है शलाका, अगर हम अपने आसपास की चीजों को दिल से महसूस करने लगें तो हम कभी स्वयं को अकेला महसूस नहीं करेंगे। अकेले होकर भी कभी हम दुखी नहीं होंगे।”
आर्यन ने अब उस नन्हीं चिड़िया को चीं-चीं कर कुछ कहा और फिर उसे आसमान में उड़ा दिया।
“क्या तुम्हें पंछियों की भाषा आती है आर्यन?” शलाका ने आर्यन की आँखों में देखते हुए पूछा।
“नहीं !”
“तो फिर तुम उस चिड़िया से बात कैसे कर रहे थे?” शलाका ने हैरानी से कहा।
“किसने कहा कि मैं उससे बात कर रहा था। मैं तो बस उसे महसूस कर रहा था, पर महसूस करते-करते, वह मेरी भावनाओं को स्वयं समझ जा रही थी।” आर्यन ने मुस्कुराते हुए कहा।
तभी शलाका को एक फूल पर बैठी बहुत ही खूबसूरत तितली दिखाई दी, जो नीले और काले रंग की थी।
उसे देख शलाका ने उसे पकड़ लिया।
वह तितली अब शलाका की पकड़ से छूटने का प्रयास करने लगी।
यह देख आर्यन ने शलाका का हाथ थाम लिया और बोला- “किसी को दुख पहुंचा कर हमें खुशी कभी नहीं मिल सकती शलाका।”
आर्यन के शब्द सुन शलाका ने अपनी चुटकी खोलकर उस तितली को उड़ा दिया।
यह देख आर्यन ने अपने हाथ पसार कर अपने मुंह से एक विचित्र सी ध्वनि निकाली, ऐसा करते ही पता नहीं कहां से सैकड़ों तितलियां आकर आर्यन के हाथ पर बैठ गईं।
“एक बार तितली को तुम छूकर के देख लो, हर पंख उसका छाप दिल पर छोड़ जायेगा।”
आर्यन के शब्द समझ शलाका ने अपने हाथों की ओर देखा, जिस पर तितली का नीला और काला रंग अब भी लगा था।
तितली का रंग शलाका के हाथ पर एक छाप छोड़ गया था, पर आर्यन का रंग शलाका के दिल पर एक अमिट छाप छोड़ रहा था, वह अब महसूस कर रही थी, इस पूरे जहान को, नीले से आसमान को....और
कुछ अलग सा महसूस कराने वाले उस आर्यन को............।”
शलाका अब वापस अपने कमरे में आ गई थी, पर उन कुछ पलों ने शलाका के दिमाग में एक हलचल सी मचा दी थी।
कुछ पलों तक शलाका यूं ही बैठी रही फिर उसने एक गहरी साँस भरी और वेदांत रहस्यम् के आगे के पन्नों को पलटने लगी।
धीरे-धीरे वेदालय की सभी घटनाएं निकल गईं। इसके बाद कुछ और चित्र नजर आये, पर वह शलाका के लिये जरुरी नहीं थे, उसे तो बस अब रहस्य जानना था, इसलिये शलाका ने जल्दी-जल्दी बहुत से पृष्ठ पलट
दिये।
अब शलाका की नजर एक ऐसे पृष्ठ पर थी, जिसमें आर्यन शलाका के साथ उसके कमरे में था, पर बहुत याद करने के बाद भी शलाका को कोई ऐसी स्मृति याद नहीं आयी, यह सोच शलाका ने उस फोटो को भी छू लिया।..............
“शलाका-शलाका कहां हो तुम?” आर्यन, शलाका को आवाज देते हुए अपने घर में प्रविष्ठ हुआ- “देखो मैं वापस आ गया।” आर्यन यह कहते हुए धड़धड़ा कर अपने कमरे में प्रविष्ठ हो गया।
कमरे में शलाका एक अलमारी के पास खड़ी थी, आर्यन ने उसे देखते ही गोद में उठा लिया और उसे पूरे कमरे में नचाने लगा- “आज मेरा सपना पूरा हो गया, आज मैंने वो हासिल कर लिया, जिसकी वजह से अब हम सदियों तक साथ रह सकते हैं। अब मुझे तुमसे कोई अलग नहीं कर सकता, यहां तक कि मौत भी नहीं।” यह कहकर आर्यन ने शलाका को नीचे उतार दिया।
“तुमने.... तुमने ऐसा क्या प्राप्त कर लिया आर्यन? जिससे अब तुम सदियों तक मेरे साथ रहोगे।” शलाका ने अपना चेहरा आर्यन की ओर से दूसरी ओर घुमाते हुए कहा।
“ये लो कितनी भुलक्कड़ हो यार तुम। अरे मैंने तुम्हें जाने से पहले बताया तो था कि मैं, हम दोनों के लिये ब्रह्मकलश से अमृत लेने जा रहा हूं।” आर्यन ने कहा।
“तो क्या....तो क्या तुम्हें अमृत प्राप्त हो गया?” शलाका के शब्द कांप रहे थे।
“ऐसा हो सकता है क्या कि मैं कोई चीज चाहूं और मुझे ना मिले?”
आर्यन ने मुस्कुराते हुए कहा- “अरे हां यार...मैंने अमृत की 2 बूंदें प्राप्त कर लीं। अब हम शादी शुदा जिंदगी बिताते हुए भी अमरत्व प्राप्त कर सकते हैं।” यह कहते हुए आर्यन ने 2 नन्हीं सुनहरी धातु की बनी शीशियां शलाका के सामने रख दीं।
“और अब हम कल सुबह नहा कर, पूजा करके इस अमृत को धारण करेंगे।” आर्यन के शब्दों में खुशी साफ झलक रही थी- “और ये तुम अपना मुंह घुमाकर क्या बात कर रही हो? मैं 3 महीने के बाद वापस आया हूं और तुम अजीब सी हरकतें कर रही हो।”
“क्या हम इसे अभी नहीं पी सकते?” शलाका ने पलटते हुए कहा- “सुबह का इंतजार करने से क्या फायदा?”
“नहीं हम इसे सुबह ही पीयेंगे।” आर्यन ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा।
“तो फिर हम अभी क्या करेंगे?” शलाका ने आर्यन की ओर देखते हुए पूछा।
“ये लो ये भी कोई पूछने की बात है?” आर्यन ने हंसकर शलाका को पकड़ लिया- “अभी हम सिर्फ और सिर्फ प्यार करेंगे।”
यह कहकर आर्यन ने वहां जल रही शमा को बुझा दिया। कमरे में अब पूरा अंधेरा छा गया था। इसी के साथ शलाका वापस वेदांत रहस्यम् के पास आ गई।
पर इस समय शलाका की आँखें, उसका चेहरा और यहां तक कि उसके बाल भी अग्नि के समान प्रतीत हो रहे थे क्यों कि जिस शलाका को वह अभी आर्यन के साथ देखकर आ रही थी, वह वो नहीं थी।
शलाका ने तुरंत अपनी भावनाओं को नियंत्रण में किया, नहीं तो उसकी अग्नि शक्ति से अभी वेदांत रहस्यम् भी जल जाती।
“काश....काश इस वेदांत रहस्यम् से भूतकाल को बदला जा सकता।” शलाका ने गुर्राकर कहा और जल्दी से वेदांत रहस्यम् का अगला पन्ना खोल दिया।
जारी रहेगा______
वेदांत रहस्यम्
(15 जनवरी 2002, मंगलवार, 15:00, ट्रांस अंटार्कटिक माउन्टेन, अंटार्कटिका)
विल्मर को सुनहरी ढाल देने के बाद शलाका ने जेम्स को वापस उसी कमरे में रुकाया और स्वयं अपने शयनकक्ष में आ गई।
शलाका ने अपने भाईयों पर नजर मारी जो कि दूसरे कमरे में थे।
शलाका ने अब अपने कमरे का द्वार अंदर से बंद कर लिया, वह नहीं चाहती थी कि वेदांत रहस्यम् पढ़ते समय कोई भी उसे डिस्टर्ब करे।
कक्ष में मौजूद अलमारी से शलाका ने वेदांत रहस्यम् निकाल ली और उसे ले अपने बिस्तर पर आ गई।
लाल रंग के जिल्द वाली, 300 पृष्ठ वाली, 5,000 वर्ष पुरानी, आर्यन के द्वारा लिखी किताब अब उसके सामने थी।
शलाका जानती थी कि इसी किताब में वह रहस्य भी दफन है कि आर्यन ने क्यों अपनी इच्छा से अपनी मौत का वरण किया? यह पुस्तक अपने अंदर सैकड़ों राज दबाये थी, इसलिये उसे खोलते समय शलाका के हाथ कांपने लगे।
शलाका ने वेदांत रहस्यम् का पहला पृष्ठ खोला।
पहले पृष्ठ पर वेदालय की फोटो बनी थी। जिसे आर्यन ने अपनी स्मृति से रेखा चित्रों के माध्यम से बनाया था। उसे देखकर एक पल में ही शलाका 5,000 वर्ष पहले की यादें अपने दिल में महसूस करने लगी।
शलाका जानती थी, कि यह किताब जादुई है, अगर उसने वेदालय की फोटो को छुआ, तो वह उस स्थान पर पहुंच जायेगी, इसलिये इच्छा होने के बाद भी शलाका ने वेदालय की फोटो को स्पर्श नहीं किया।
शलाका ने अब दूसरा पृष्ठ पलटा। उस पृष्ठ पर वेदालय की वह तस्वीर थी, जब पहली बार सभी वेदालय में प्रविष्ठ हुए थे।
उस तस्वीर में आकृति, आर्यन से चिपक कर खड़ी थी और शलाका उनसे थोड़ा दूर खड़ी थी।
कुछ देर के लिये ही सही पर यह तस्वीर देखते ही शलाका के मन में आकृति के लिये गुस्सा भर गया।
शलाका ने अब एक-एक कर पन्ने पलटने शुरु कर दिये।
आगे के लगभग 30 पेज वेदालय की अलग-अलग यादों से भरे हुए थे। पर एक पेज पलटते ही शलाका से रहा नहीं गया, उसने उस तस्वीर को छू लिया।
एक पल में ही शलाका उस तस्वीर में समाकर उस काल में पहुंच गई, जहां वह एक नदी के किनारे आर्यन के साथ अकेली थी।
आर्यन और शलाका दोनों ही इस समय xyz (chhote) वर्ष के थे।
तो आइये दोस्तों देखते हैं कि ऐसा क्या था उस फोटो में कि शलाका अपने आप को उसे छूने से रोक नहीं पायी।
वेदालय से कुछ दूरी पर एक सुंदर सी झील थी, जहां इस मौसम में बहुत से पंछी और चिड़िया उड़कर, उस स्थान पर आते थे।
इस समय जिधर नजर जा रही थी, उधर चारो ओर रंग-बिरंगे फूल, तितलियां और पंछी दिखाई दे रहे थे। ऐसे मौसम में आर्यन और शलाका उस स्थान पर बैठे थे।
“आज तो छुट्टी का दिन था फिर तुम मुझे यहां पर क्यों लाये आर्यन?” शलाका ने अपनी नन्हीं आँखों से आर्यन को देखते हुए पूछा।
“क्यों कि तुम मुझसे एक छोटी सी शर्त हार गई थी और शर्त केअनुसार एक दिन के लिये मैं जो कहूं, वो तुम्हें मानना पड़ता, तो फिर मैंने सोचा कि क्यों ना मैं तुम्हें अपनी सबसे फेवरेट जगह दिखाऊं, बस यही सोच मैं तुम्हें यहां ले आया। मुझे पता है कि अगर शर्त नहीं होती तो तुम कभी मेरे साथ नहीं आती। पर सच कहूं तो मैं तुम्हें ऐसे अकेले कमरे में बंद पड़े नहीं देख सकता। तुम पता नहीं कमरे से बाहर क्यों नहीं निकलती?”
“वो....वो मैं तुमसे बात करना चाहती हूं, तुम्हारे साथ घूमना भी चाहती हूं, पर वो आकृति हमेशा तुम्हारे साथ रहती है और वह मुझसे बहुत चिढ़ती है, बस इसी लिये मैं तुम्हारे साथ बाहर कहीं नहीं जाती।”
शलाका ने धीरे से कहा।
“कोई बात नहीं, पर आज तो आकृति मेरे साथ नहीं है...आज तुम यहां मेरे साथ खेल सकती हो।” आर्यन ने भोला सा चेहरा बनाते हुए कहा।
“ठीक है, पर तुम यहां पर आकर कौन सा खेल खेलते हो?” शलाका ने आर्यन की बातों में रुचि लेते हुए कहा।
“मैं यहां पर प्रकृति को महसूस करने वाला खेल खेलता हूं। क्या यह खेल तुम मेरे साथ खेलोगी?” आर्यन ने कहा।
“पर मुझे तो ये खेल नहीं आता। इसे कैसे खेलते हैं आर्यन?” शलाका ने कहा।
“यह खेलना बहुत आसान है...सबसे पहले हम कोई चिड़िया ले लेते हैं और उसे महसूस करते हैं।”
“चिड़िया?” शलाका को कुछ भी समझ में नहीं आया- “चिड़िया में महसूस करने वाला क्या होता है आर्यन?”
“रुको , मैं तुम्हें यह करके दिखाता हूं।” यह कहकर आर्यन ने इधर-उधर देखा।
आर्यन को कुछ दूरी पर एक नन्ही सी लाल रंग की चिड़िया उड़ती हुई दिखाई दी, आर्यन उस चिड़िया की ओर दौड़ा।
चिड़िया एक नन्हें बच्चे को अपनी ओर भागते देख, चीं-चीं कर तेजी से उड़ने लगी।
आर्यन ने कुछ देर तक चिड़िया को देखा और फिर वह चिड़िया के समान ही आवाज निकालता उस चिड़िया से अलग दिशा में दौड़ा।
चिड़िया उस नन्हें बालक को अपनी तरह बोलता देख, आर्यन के पीछे-पीछे उड़ने लगी।
अब नजारा उल्टा था, पहले चिड़िया के पीछे आर्यन था, पर अब आर्यन के पीछे चिड़िया।
सच कहें तो शलाका को कुछ समझ में नहीं आ रहा था, पर आर्यन के पीछे चिड़िया का भागना उसे अच्छा लग रहा था।
अब आर्यन एक जगह पर रुक गया, और अपने दोनों हाथों को फैलाकर, फिर चिड़िया की तरह बोलने लगा।
कुछ ही देर में चिड़िया आकर आर्यन के हाथ पर बैठ गयी, आर्यन ने धीरे से चिड़िया के पंखों को सहलाया।
चिड़िया को आर्यन का सहलाना बहुत अच्छा लगा, वह फिर चीं-चीं कर मानो आर्यन को और ऐसा करने को कह रही थी।
आर्यन ने अब उसे कई बार सहलाया और फिर उसे लेकर शलाका के पास आ गया।
“अब अपना हाथ आगे करो शलाका।” आर्यन ने शलाका से कहा।
शलाका ने डरते-डरते अपना हाथ आगे कर दिया। आर्यन ने नन्हीं चिड़िया को शलाका के हाथों पर रख दिया।
नन्हीं चिड़िया शलाका के हाथ पर फुदक कर चीं-चीं कर रही थी।
कुछ ही देर में शलाका का डर खत्म हो गया और वह भी चिड़िया के साथ खेलने लगी।
शलाका चिड़िया से खेलने में इतना खो गई कि वह भूल गई कि आर्यन भी उसके साथ है।
“क्या अब तुम इस चिड़िया को महसूस कर पा रही हो शलाका?” आर्यन ने शलाका से पूछा।
“हां.... इस चिड़िया का धड़कता दिल, इसके खुशी से फुदकने का अहसास, इसका पंख पसार कर उड़ना, इसका मेरे हाथों पर चोंच मारना, मुझे सबकुछ महसूस हो रहा है आर्यन। सच कहूं तो यह बहुत अच्छी फीलिंग है, मैंने ऐसा पहले कभी नहीं महसूस किया।”
“यही प्रकृति है शलाका, अगर हम अपने आसपास की चीजों को दिल से महसूस करने लगें तो हम कभी स्वयं को अकेला महसूस नहीं करेंगे। अकेले होकर भी कभी हम दुखी नहीं होंगे।”
आर्यन ने अब उस नन्हीं चिड़िया को चीं-चीं कर कुछ कहा और फिर उसे आसमान में उड़ा दिया।
“क्या तुम्हें पंछियों की भाषा आती है आर्यन?” शलाका ने आर्यन की आँखों में देखते हुए पूछा।
“नहीं !”
“तो फिर तुम उस चिड़िया से बात कैसे कर रहे थे?” शलाका ने हैरानी से कहा।
“किसने कहा कि मैं उससे बात कर रहा था। मैं तो बस उसे महसूस कर रहा था, पर महसूस करते-करते, वह मेरी भावनाओं को स्वयं समझ जा रही थी।” आर्यन ने मुस्कुराते हुए कहा।
तभी शलाका को एक फूल पर बैठी बहुत ही खूबसूरत तितली दिखाई दी, जो नीले और काले रंग की थी।
उसे देख शलाका ने उसे पकड़ लिया।
वह तितली अब शलाका की पकड़ से छूटने का प्रयास करने लगी।
यह देख आर्यन ने शलाका का हाथ थाम लिया और बोला- “किसी को दुख पहुंचा कर हमें खुशी कभी नहीं मिल सकती शलाका।”
आर्यन के शब्द सुन शलाका ने अपनी चुटकी खोलकर उस तितली को उड़ा दिया।
यह देख आर्यन ने अपने हाथ पसार कर अपने मुंह से एक विचित्र सी ध्वनि निकाली, ऐसा करते ही पता नहीं कहां से सैकड़ों तितलियां आकर आर्यन के हाथ पर बैठ गईं।
“एक बार तितली को तुम छूकर के देख लो, हर पंख उसका छाप दिल पर छोड़ जायेगा।”
आर्यन के शब्द समझ शलाका ने अपने हाथों की ओर देखा, जिस पर तितली का नीला और काला रंग अब भी लगा था।
तितली का रंग शलाका के हाथ पर एक छाप छोड़ गया था, पर आर्यन का रंग शलाका के दिल पर एक अमिट छाप छोड़ रहा था, वह अब महसूस कर रही थी, इस पूरे जहान को, नीले से आसमान को....और
कुछ अलग सा महसूस कराने वाले उस आर्यन को............।”
शलाका अब वापस अपने कमरे में आ गई थी, पर उन कुछ पलों ने शलाका के दिमाग में एक हलचल सी मचा दी थी।
कुछ पलों तक शलाका यूं ही बैठी रही फिर उसने एक गहरी साँस भरी और वेदांत रहस्यम् के आगे के पन्नों को पलटने लगी।
धीरे-धीरे वेदालय की सभी घटनाएं निकल गईं। इसके बाद कुछ और चित्र नजर आये, पर वह शलाका के लिये जरुरी नहीं थे, उसे तो बस अब रहस्य जानना था, इसलिये शलाका ने जल्दी-जल्दी बहुत से पृष्ठ पलट
दिये।
अब शलाका की नजर एक ऐसे पृष्ठ पर थी, जिसमें आर्यन शलाका के साथ उसके कमरे में था, पर बहुत याद करने के बाद भी शलाका को कोई ऐसी स्मृति याद नहीं आयी, यह सोच शलाका ने उस फोटो को भी छू लिया।..............
“शलाका-शलाका कहां हो तुम?” आर्यन, शलाका को आवाज देते हुए अपने घर में प्रविष्ठ हुआ- “देखो मैं वापस आ गया।” आर्यन यह कहते हुए धड़धड़ा कर अपने कमरे में प्रविष्ठ हो गया।
कमरे में शलाका एक अलमारी के पास खड़ी थी, आर्यन ने उसे देखते ही गोद में उठा लिया और उसे पूरे कमरे में नचाने लगा- “आज मेरा सपना पूरा हो गया, आज मैंने वो हासिल कर लिया, जिसकी वजह से अब हम सदियों तक साथ रह सकते हैं। अब मुझे तुमसे कोई अलग नहीं कर सकता, यहां तक कि मौत भी नहीं।” यह कहकर आर्यन ने शलाका को नीचे उतार दिया।
“तुमने.... तुमने ऐसा क्या प्राप्त कर लिया आर्यन? जिससे अब तुम सदियों तक मेरे साथ रहोगे।” शलाका ने अपना चेहरा आर्यन की ओर से दूसरी ओर घुमाते हुए कहा।
“ये लो कितनी भुलक्कड़ हो यार तुम। अरे मैंने तुम्हें जाने से पहले बताया तो था कि मैं, हम दोनों के लिये ब्रह्मकलश से अमृत लेने जा रहा हूं।” आर्यन ने कहा।
“तो क्या....तो क्या तुम्हें अमृत प्राप्त हो गया?” शलाका के शब्द कांप रहे थे।
“ऐसा हो सकता है क्या कि मैं कोई चीज चाहूं और मुझे ना मिले?”
आर्यन ने मुस्कुराते हुए कहा- “अरे हां यार...मैंने अमृत की 2 बूंदें प्राप्त कर लीं। अब हम शादी शुदा जिंदगी बिताते हुए भी अमरत्व प्राप्त कर सकते हैं।” यह कहते हुए आर्यन ने 2 नन्हीं सुनहरी धातु की बनी शीशियां शलाका के सामने रख दीं।
“और अब हम कल सुबह नहा कर, पूजा करके इस अमृत को धारण करेंगे।” आर्यन के शब्दों में खुशी साफ झलक रही थी- “और ये तुम अपना मुंह घुमाकर क्या बात कर रही हो? मैं 3 महीने के बाद वापस आया हूं और तुम अजीब सी हरकतें कर रही हो।”
“क्या हम इसे अभी नहीं पी सकते?” शलाका ने पलटते हुए कहा- “सुबह का इंतजार करने से क्या फायदा?”
“नहीं हम इसे सुबह ही पीयेंगे।” आर्यन ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा।
“तो फिर हम अभी क्या करेंगे?” शलाका ने आर्यन की ओर देखते हुए पूछा।
“ये लो ये भी कोई पूछने की बात है?” आर्यन ने हंसकर शलाका को पकड़ लिया- “अभी हम सिर्फ और सिर्फ प्यार करेंगे।”
यह कहकर आर्यन ने वहां जल रही शमा को बुझा दिया। कमरे में अब पूरा अंधेरा छा गया था। इसी के साथ शलाका वापस वेदांत रहस्यम् के पास आ गई।
पर इस समय शलाका की आँखें, उसका चेहरा और यहां तक कि उसके बाल भी अग्नि के समान प्रतीत हो रहे थे क्यों कि जिस शलाका को वह अभी आर्यन के साथ देखकर आ रही थी, वह वो नहीं थी।
शलाका ने तुरंत अपनी भावनाओं को नियंत्रण में किया, नहीं तो उसकी अग्नि शक्ति से अभी वेदांत रहस्यम् भी जल जाती।
“काश....काश इस वेदांत रहस्यम् से भूतकाल को बदला जा सकता।” शलाका ने गुर्राकर कहा और जल्दी से वेदांत रहस्यम् का अगला पन्ना खोल दिया।
जारी रहेगा______