Fantasy 'सुप्रीम' एक रहस्यमई सफर - Page 32 - SexBaba
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Fantasy 'सुप्रीम' एक रहस्यमई सफर

#141.

जलकवच: (15 जनवरी 2002, मंगलवार, 10:30, मायावन, अराका द्वीप)

सुबह सभी थोड़ा देर से उठे थे। रात को सभी को नींद भी बहुत अच्छी आयी थी।

क्रिस्टी तो देर रात काफी देर तक ऐलेक्स से बात ही करती रही थी, शायद वह बीच के दिनों की पूरी कसर निकाल रही थी।

सभी खा-पीकर तैयार हो गये थे। सुयश का इशारा पाते ही सभी आगे की ओर बढ़ गये।

सामने एक छोटा सा पहाड़ था, जिसे पार करने में इन लोगों को ज्यादा समय नहीं लगा।

अब इन्हें पोसाईडन पर्वत बिल्कुल सामने दिख रहा था, पर पोसाईडन पर्वत और इन लोगों के बीच एक 30 फुट चौड़ी नहर का फासला था।

“कैप्टेन अंकल, इस नहर पर कहीं भी पुल बना नहीं दिख रहा, हम लोग उधर जायेंगे कैसे?” शैफाली ने सुयश से पूछा- “क्या पानी के अंदर उतरना सही रहेगा?”

“हमारा आज तक का इस जंगल का अनुभव बताता है, कि हर पानी में कोई ना कोई परेशानी मौजूद थी, तो पहले हम पानी में उतरने के बारे में नहीं सोचते। हम इस नहर के किनारे-किनारे आगे की ओर बढ़ेंगे।

"हो सकता है कि आगे कहीं इस नहर पर पुल बना हो? क्यों कि जो लोग पोसाईडन पर्वत के उस तरफ रह रहें होगे, वह भी किसी ना किसी प्रकार से उस पार तो जाते ही होंगे। और सबसे बड़ी बात कि जरा पोसाईडन की मूर्ति को ध्यान से देखो, वो हमारे ठीक सामने नहीं है, तो हो सकता है कि मूर्ति के ठीक सामने कोई ना कोई पुल हो?”

सुयश की बात सभी को सही लगी, इसलिये वह नहर के किनारे-किनारे आगे बढ़ने लगे।

लगभग आधा घंटा चलने के बाद उन्हें नहर के ऊपर रखे लकड़ी के 2 मोटे लट्ठे दिखाई दिये।

“लो मिल गया रास्ता।” क्रिस्टी ने उन लट्ठों की ओर देखते हुए कहा- “और कैप्टेन ने सही कहा था, यह रास्ता बिल्कुल पोसाईडन की मूर्ति के सामने है।”

तभी तौफीक की नजर नहर के दूसरी ओर बनी एक सुनहरी झोपड़ी पर पड़ी।

“कैप्टेन नहर के उस पार वह सुनहरी झोपड़ी कैसी है?” तौफीक ने सुयश को झोपड़ी की ओर इशारा करते हुए कहा।

सभी आश्चर्य से उस विचित्र झोपड़ी को देखने लगे।

“कुछ कह नहीं सकते? हो सकता है कि उसमें कैस्पर ही रहता हो और वहीं से तिलिस्मा का नियंत्रण करता हो?” सुयश ने कहा।

“हैलो...मेरा कैस्पर झोपड़ी में नहीं रहता।” शैफाली ने चिढ़ते हुए कहा।

“अरे वाह! मेरा कैस्पर....।” क्रिस्टी ने हंसकर शैफाली का मजाक उड़ाया- “लगता है अब शैफाली पूरी मैग्ना बनने वाली है?”

शैफाली ने नाक सिकोड़कर क्रिस्टी को चिढ़ाया और सुयश की ओर देखने लगी।

“हमें पहले उस पार चलना चाहिये। उस पार पहुंचने के बाद ही पता चलेगा, कि उस झोपड़ी का क्या रहस्य है?”

“अब तो हममें से कई लोगों के पास शक्तियां हैं, इस नहर को तो हम आसानी से पार कर लेंगे।” ऐलेक्स ने कहा।

“अच्छा जी! तो चलो पहले तुम ही पार करके दिखाओ, जरा हम भी तो देखें, तुम्हारी वशीन्द्रिय शक्तियां किस प्रकार काम करती हैं?” क्रिस्टी ने ऐलेक्स का मजाक उड़ाते हुए कहा।

वैसे क्रिस्टी को अपने अनुभव के आधार पर पता था, कि इस नहर में भी कोई मायाजाल छिपा होगा।

ऐलेक्स ने क्रिस्टी के चैलेंज को स्वीकार कर लिया और एक लकड़ी के लट्ठे पर अपना बांया पैर रखा।

ऐलेक्स के लट्ठे पर पैर रखते ही, लट्ठे का दूसरा सिरा हवा में उठना शुरु हो गया।

यह देख ऐलेक्स ने अपना पैर लट्ठे से हटा लिया। ऐलेक्स के पैर हटाते लट्ठा अपने यथा स्थान आ गया।

यह देख क्रिस्टी ने मुस्कुराते हुए बच्चों की तरह तुतला कर ऐलेक्स का मजाक उड़ाया- “क्या हुआ छोते बच्चे...तुम्हारी छक्तियां काम नहीं कल लहीं क्या?”

ऐलेक्स ने घूरकर क्रिस्टी को देखा और फिर प्यार से क्रिस्टी की चोटी खींच ली।

इस बार ऐलेक्स ने दूसरे लट्ठे पर अपना पैर रखा। उस लट्ठे पर भी वही क्रिया हुई, जो कि पहले लट्ठे पर हुई थी।

“लगता है ये भी किसी प्रकार का मायाजाल है?” जेनिथ ने कहा।

“छोता बाबू औल कोछिछ कलेगा?” क्रिस्टी ने फिर ऐलेक्स को चिढ़ाया।

ऐलेक्स ने इस बार क्रिस्टी पर ध्यान नहीं दिया। इस बार ऐलेक्स ने अपनी त्वचा को लचीला आकार दिया और दौड़कर नहर के पास आकर दूसरी ओर कूदने की कोशिश की।

पर इस कोशिश में ऐलेक्स का शरीर किसी अदृश्य दीवार से टकराया और वह जमीन पर गिर पड़ा। उसे बहुत तेज चोट लगी थी।

अगर वशीन्द्रिय शक्ति ने समय पर ऐलेक्स का शरीर वज्र का नहीं बनाया होता, तो ऐलेक्स की कुछ हड्डियां तो जरुर टूट जानीं थीं।

“लगता है छोता बाबू...तूत-फूत गया।” क्रिस्टी अभी भी ऐलेक्स से मजा ले रही थी।

“ठीक है मैं हार गया...मेरी शक्ति भी काम नहीं कर रही। चलो अब तुम ही पार करके दिखा दो इसे। अगर तुमने इसे पार कर दिया तो तुम जो मांगोगी, मैं तुम्हें दूंगा।” ऐलेक्स ने क्रिस्टी को चैलेंज देते हुए कहा।

“ठीक है...पर अपना वादा भूलना नहीं ऐलेक्स।” क्रिस्टी यह कहकर उस लट्ठे के पास आ गयी।

उसने एक बार लट्ठे को हिलाकर उसकी मजबूती का जायजा लिया और फिर उछलकर क्रिस्टी ने अपना बांया पैर एक लट्ठे पर रखा।

क्रिस्टी के पैर रखते ही हर बार की तरह, उस लट्ठे का दूसरा सिरा तेजी से हवा में उठा। तभी क्रस्टी फिर हवा में उछली और इस बार उसने अपना दाहिना पैर दूसरे लट्ठे पर रखकर, अपना पहला पैर पहले लट्ठे से हटा लिया।

क्रिस्टी का पैर पहले लट्ठे से हटते ही पहला लट्ठा अपनी पुरानी स्थिति में आ गया। लेकिन तब तक दूसरा लट्ठा हवा में उठने लगा।

क्रिस्टी एक बार फिर उछली। अब उसने अपना बांया पैर फिर से पहले लट्ठे पर रख, दूसरे लट्ठे से पैर हटा लिया।

इस तरह से क्रिस्टी हर बार अपना एक पैर एक लट्ठे पर रखती और जैसे ही वह उठता उछलकर दूसरा पैर दूसरे लट्ठे पर रख देती। क्रिस्टी ऐसे ही उछल-उछल कर आगे बढ़ती जा रही थी।

ऐलेक्स आँखें फाड़े उस ‘जिमनास्टिक गर्ल’ को देख रहा था।

कुछ ही पलों में क्रिस्टी ने आसानी से उस नहर को पार कर लिया।

अब वह दूसरी ओर पहुंचकर ऐलेक्स को देखकर चिल्ला कर बोली- “अपना वादा याद रखना छोता बाबू।”

क्रिस्टी का यह अभूतपूर्व प्रदर्शन देख सभी ताली बजाने लगे। इन तालियों में एक ताली ऐलेक्स की भी थी।

अब ऐलेक्स के चेहरे पर मुस्कुराहट भी थी और क्रिस्टी के लिये प्यार भी था।

“आज क्रिस्टी ने यह साबित कर दिया कि शक्तियां होने से कुछ नहीं होता, दिमाग और शारीरिक शक्तियां ही बहुत हैं तिलिस्मा को तोड़ने के लिये।” सुयश ने क्रिस्टी की तारीफ करते हुए कहा।

“वो तो ठीक है कैप्टेन अंकल।” शैफाली ने कहा- “पर अब हम लोग कैसे उस पार जायेंगे? अब ये सोचना है।”

“देखो क्रिस्टी की तरह फूर्ति हममें से किसी के भी पास नहीं है, इसलिये हमें कोई दूसरा तरीका सोचना पड़ेगा।” सुयश ने कहा- “यहां ना तो आसपास कोई बाँस का पेड़ है और ना ही किसी प्रकार की रस्सी।

इसलिये हम कूदकर और हवा में झूलकर नहीं जा सकते। अब अगर क्रिस्टी दूसरी ओर से लकड़ी के लट्ठे को किसी चीज से दबाकर रखे और उसे उस ओर से उठने ना दे, तो शायद काम बन सकता है।”

सुयश की बात सुन क्रिस्टी ने अपने चारो ओर नजरें दौड़ाईं, पर उसे लट्ठे पर रखने के लिये कुछ ना मिला। यह देख क्रिस्टी ने उस लट्ठे को अपने हाथों से दबा कर देखा।

क्रिस्टी को लट्ठे को दबाते देख सुयश ने फिर एक बार अपना पैर लट्ठे पर रखकर देखा, पर क्रिस्टी की शक्ति, लट्ठे के आगे कुछ नहीं थी।

लट्ठा क्रिस्टी सहित हवा में ऊपर की ओर उठा। यह देख क्रिस्टी ने लट्ठे से अपना हाथ हटा लिया।

“कैप्टेन... इसे किसी भी चीज से दबाकर नहीं रखा जा सकता, यह बहुत ज्यादा शक्ति लगा कर ऊपर उठ रहा है।“ क्रिस्टी ने कहा।

“कैप्टेन... क्यों ना अब हम पानी के रास्ते ही उधर जाने के बारे में सोचें?” तौफीक ने सुयश को सुझाव देते हुए कहा।

तौफीक का आइडिया सुयश को सही लगा, उसने हां में सिर हिलाकर अपनी स्वीकृति दे दी।

अब तौफीक एक कम ढलान वाली जगह से उतरकर पानी की ओर बढ़ गया।

तौफीक ने एक बार सबको देखा और फिर अपना बांया पैर पानी में डाल दिया।

तौफीक के पैर डालते ही पानी तौफीक के शरीर से 3 फुट दूर हो गया।

“अरे, यह पानी तो अपने आप मेरे शरीर से दूर जा रहा है। इस तरह तो आसानी से यह नहर पार हो जायेगी” यह कह तौफीक ने अपना दूसरा कदम भी आगे बढ़ा दिया।

पानी अभी भी तौफीक के शरीर से 3 फुट की दूरी पर था। तौफीक ने यह देख उत्साह से 2 और कदम आगे बढ़ दिये।

पर जैसे ही तौफीक की दूरी किनारे से 3 फुट से ज्यादा हुई, पानी ने किनारे की ओर को फिर कवर कर लिया। अब तौफीक से पानी एक 3 फुट के दायरे में दूर था।

तभी चलता हुआ तौफीक रुक गया। अब उसके इस 3 फुट के दायरे में, पानी ऊपर की ओर उठने लगा और इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, तौफीक एक 3 फुट के जलकवच में बंद हो गया।

वह जलकवच पारदर्शी था, उसके पार की आवाजें भी तौफीक को सुनाई दे रहीं थीं, पर तौफीक अपनी तमाम कोशिशों के बाद भी उस जलकवच से बाहर नहीं आ पा रहा था।

“तौफीक!” क्रिस्टी ने चीखकर कहा- “क्या तुम उस जलकवच के अंदर साँस ले पा रहे हो?”

क्रिस्टी की बात सुन तौफीक ने अपने दाहिने हाथ के अंगूठे को ऊपर उठाकर हां में इशारा किया।

“यह मायाजाल तो कुछ ज्यादा ही खतरनाक दिख रहा है।” सुयश ने तौफीक की ओर देखते हुए कहा- “अब ये भी पता चल गया कि हम पानी और हवा के माध्यम से आगे नहीं जा सकते। हमें इस लकड़ी के लट्ठे से ही होकर आगे जाना पड़ेगा।

“कैप्टेन!” जेनिथ ने कहा- “अभी तक हम लोगों ने इस लट्ठे पर अपना एक पैर रखा था, अगर हम एक ही लट्ठे पर अपने दोनों पैर रखें, तो क्या होगा?”

“यह भी करके देख लेते हैं।” सुयश ने कहा और उछलकर एक लट्ठे

पर अपने दोनों पैर रख दिये।

इस बार लट्ठे के दोनों किनारे तेजी से हवा में उठे और इससे पहले कि सुयश कुछ समझता, वह आसमान में ऊपर की ओर जाने लगे।

यह देख सुयश उस लट्ठे से पानी में कूद गया। सुयश तौफीक से 5 फुट की दूरी पर पानी में गिरा।

चूंकि नहर ज्यादा गहरी नहीं थी, इसलिये सुयश का पूरा शरीर दर्द से लहरा उठा, ईश्वर की दया से उसे कोई फ्रैक्चर नहीं हुआ।

सुयश के 5 फुट दूर गिरते ही तौफीक और सुयश दोनों एक ही जलकवच में आ गये, पर यह जलकवच अब 11 फुट बड़ा हो गया था।

यह देख जैसे ही तौफीक, सुयश की ओर बढ़ा, जलकवच का आकार, उन दोनों के पास आते ही छोटा होने लगा।

यह देख सुयश सोच में पड़ गया और उसने तौफीक से दोबारा दूर जाने को कहा।

तौफीक के देर जाते ही फिर जलकवच का दायरा बड़ा हो गया।

उधर जेनिथ उस नहर को पार ना कर पाते देख क्रिस्टी से बोल उठी-

“क्रिस्टी हम इस नहर को पार नहीं कर पा रहे हैं, इसलिये तुम भी अब इसी ओर आ जाओ, हम सब एक साथ बैठकर कुछ सोचते हैं।”

क्रिस्टी को जेनिथ की बात सही लगी, इसलिये वह वापसी के लिये दोबारा से उस लट्ठे की ओर चल दी।

पर जैसे ही क्रिस्टी उन लट्ठों के पास पहुंची, दोनों लट्ठों के बीच एक सुराख हो गया और उसमें से एक गाढ़े भूरे रंग का चिकना द्रव निकलकर पूरे लट्ठे पर फैल गया।

यानि अब क्रिस्टी भी वापस नहीं आ सकती थी। अगर वह इन लट्ठों से होकर वापस आने की कोशिश करती, तो इस बार वह भी फिसलकर नहर में गिर जाती।

यह देख शैफाली ढलान से उतरकर नहर के पानी के पास आ गयी। उसने अपनी शक्ति से अपना बुलबुले वाला कवच बनाया और पानी में उतरकर सुयश की ओर बढ़ गयी।

शैफाली को पूरा विश्वास था कि उसके बुलबुले पर नहर के जलकवच का कोई प्रभाव नहीं होगा, पर उसका सोचना गलत था।

जैसे ही उसकी दूरी नहर के किनारे से 3 फुट हुई, उसके बुलबुले को भी जलकवच ने पूरा घेर लिया।

अब शैफाली भी आगे नहीं बढ़ पा रही थी। यह देख शैफाली ने अपना बुलबुला गायब कर दिया।

अब इस किनारे पर सिर्फ जेनिथ और ऐलेक्स बचे थे। यह देख जेनिथ ने नक्षत्रा को पुकारा- “नक्षत्रा, क्या तुम्हारे पास इस जलकवच से बचने का कोई उपाय है?”

“मैं सिर्फ समय रोक सकता हूं, जिससे नहर का पानी का बहाव तो रुक जायेगा, परंतु मैं विश्वास के साथ नहीं कह सकता कि मैं जलकवच को बनने से रोक पाऊंगा।” नक्षत्रा ने कहा।

यह सुन जेनिथ ने कुछ सोचा और फिर बोल उठी- “कोई बात नहीं ...हम एक कोशिश तो करके देख ही सकते हैं...हो सकता है नहर के जल का प्रवाह रुकने से वह कवच बने ही नहीं?”

जेनिथ ने यह सोचकर ऐलेक्स को वहीं रुकने को कहा और स्वयं नहर के पानी की ओर बढ़ चली।

जेनिथ ने पानी के पास पहुंचते ही नक्षत्रा से कहकर समय को रुकवा दिया और स्वयं पानी में उतर गई।

जेनिथ के ऐसा करते ही पानी का प्रवाह तो रुक गया, पर जैसे ही उसने पानी में कदम रखा, पानी उससे भी 3 फुट दूर हटा।

जेनिथ इसके बाद भी आगे बढ़ती गई और कुछ ही पलों में वह भी जलकवच में फंस गई थी।

जलकवच पर समय का कोई प्रभाव नहीं पड़ा था।

अब सिर्फ ऐलेक्स और क्रिस्टी ही पानी से बाहर थे। जेनिथ ने स्वयं को भी फंसते देख समय को रिलीज कर दिया।

शैफाली बहुत देर से सभी की गतिविधियां देख रही थी, उसका दिमाग बहुत तेजी से चल रहा था।

अचानक उसके दिमाग में एक विचार आया और वह अपने मन में ही कोई कैलकुलेशन करने लगी।

कैलकुलेशन के सॉल्यूशन पर पहुंचते ही उसके चेहरे पर मुस्कान बिखर गई।

“सब लोग मेरी बात ध्यान से सुनो, मैंने इस नहर से बचने का एक उपाय निकाल लिया है।” शैफाली ने तेज आवाज में कहा।

शैफाली की आवाज सुन सभी ध्यान से शैफाली की ओर देखने लगे।

“जिंदगी में कभी-कभी हम किसी पहेली को बहुत बड़ा मान लेते हैं, और उसका जवाब ढूंढने के लिये बहुत ज्यादा दिमाग का इस्तेमाल करते हैं, जबकि उस पहेली का जवाब बहुत ही साधारण होता है। अब सब लोग जरा इस नहर को देखिये, इसमें जो भी प्रवेश करता है, नहर का पानी उससे 3 फुट दूर चला जाता है, पर जैसे ही उसकी दूरी किनारे से 3 फुट से ज्यादा हो जाती है, तो पानी एक जलकवच बना कर उसे अपने घेरे में ले लेता है। यानि अगर हम पानी को किनारे से दूर होने ही ना दें, तो हम आसानी से इस नहर को पार कर सकते हैं और ऐसा तभी हो सकता है, जब सभी लोग एक दूसरे का हाथ पकड़ लें और आखिरी इंसान की दूरी किनारे से बस 2 फुट की ही हो, तो हम सभी को जलकवच नहीं घेर पायेगा।

"इस हिसाब से देखें तो हम कुल 6 लोग हैं, यानि की अगर हम अपने एक दूसरे के हाथ पकड़ें तो 2 लोगों के बीच 6 फुट की दूरी हो जायेगी। और किनारे की दूरियां मिला कर कुल दूरी 34 फुट की हो जायेगी।

इस तरह से हम यह नहर आसानी से पार कर लेंगे। “

शैफाली का प्लान बहुत अच्छा था। तुरंत सबने उसके हिसाब से काम करना शुरु कर दिया।

ऐलेक्स सबसे पहले नहर में उतरा और किनारे से 2 फुट की दूरी रखकर जेनिथ की ओर अपने पैर बढ़ाये। जैसे ही वह जेनिथ के पास पहुंचा, जेनिथ का जलकवच गायब हो गया।

अब जेनिथ ने हाथ आगे बढ़ाकर शैफाली का हाथ थाम लिया। अब शैफाली का भी जलकवच गायब हो गया। इसी प्रकार शैफाली ने सुयश का और सुयश ने तौफीक का हाथ थाम लिया।

अब तौफीक का हाथ नहर के दूसरी ओर से मात्र 4 फुट दूर ही बचा था, पर क्रिस्टी ने दूसरी ओर से पानी में उतरकर वह दूरी भी खत्म कर दी।

अब सभी ने एकता की शक्ति दिखाकर एक मानव पुल का निर्माण कर दिया था।

अब क्रिस्टी सबसे पहले नहर से निकली और फिर एक दूसरे का हाथ थामें सभी नहर के दूसरी ओर पहुंच गये।

नहर पार करने के बाद सभी ने राहत की साँस ली।

“इस जलकवच के तिलिस्म ने हमें यह समझा दिया कि महाशक्तियां भी जहां पर फेल हो जातीं हैं, उस समय मानव मस्तिष्क के द्वारा ही जीता जा सकता है।” सुयश ने कहा- “और यह अभ्यास ये भी बताता है कि बिना एक दूसरे का साथ दिये हम तिलिस्मा नहीं पार कर पायेंगे।”

यह कहकर सुयश ने अपना हाथ फैलाकर अपनी मुठ्ठी को आगे बढ़ाया, जिस पर एक-एक करके सभी अपना हाथ रखते चले गये।

एकता की शक्ति ने आज सभी को बचा लिया था।

अब सभी की नजर उस सुनहरी झोपड़ी की ओर थी, जो कि शायद इस मायावन का आखिरी द्वार था, इसके बाद तिलिस्मा शुरु होना था।

सभी झोपड़ी की ओर बढ़ गये।

जारी रहेगा_______✍️
 
#142.

चैपटर-14

सुनहरी ढाल: (15 जनवरी 2002, मंगलवार, 11:10, ट्रांस अंटार्कटिक माउन्टेन, अंटार्कटिका)

शलाका अपने कमरे में बैठी सुयश के बारे में सोच रही थी।उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था, कि इतने दिन बाद वह आर्यन से अच्छे से मिली।

उसकी यह खुशी दो तरफा थी।

एक तो वह अब जान गयी थी कि तिलिस्मा टूटने वाला है। यानि कि जिस तिलिस्मा के टूटने का, उसके पिछले 8 पूर्वज सपना देखते हुए गुजर गये, वह सपना अब उसकी आँखों में सामने पूरा होना था और दूसरी बात सुयश के साथ दोबारा से रहते हुए एक साधारण जिंदगी व्यतीत करना।

2 दिन से काम की अधिकता होने की वजह से वह सुयश की लिखी ‘वेदांत रहस्यम्’ को अभी नहीं पढ़ पायी थी, पर आज वह इस किताब को जरुर पढ़कर खत्म करना चाहती थी।

तभी उसे जेम्स और विल्मर का ख्याल आया। ज्यादा काम के चक्कर में, वह उन दोनेां को तो भूल ही गई थी।

शलाका ने पहले जेम्स और विल्मर से मिलना उचित समझा।

यह सोच उसने अपने त्रिशूल को हवा में लहराकर द्वार बनाया और जा पहुंची, जेम्स और विल्मर के कमरे में।

जेम्स और विल्मर बिस्तर पर बैठे आपस में कोई गेम खेल रहे थे। शलाका को देख वह खुश होकर उठकर खड़े हो गये।

विल्मर को अब अपनी आजादी का अहसास होने लगा था।

“कैसे हो तुम दोनों?” शलाका ने मुस्कुराते हुए पूछा।

“बाकी सब तो ठीक है, पर बहुत ज्यादा बोरियत हो रही है।” विल्मर ने कहा।

“अब मैं जाकर काफी हद तक फ्री हो गयी हूं, तो मैं अब चाहती हूं कि तुम दोनों बताओ कि तुम्हें अब क्या चाहिये?” शलाका ने गहरी साँस लेते हुए कहा।

विल्मर तो जैसे इसी शब्द का बेसब्री से इंतजार कर रहा था।

“क्या हम जो भी मागेंगे, आप उसे दोगी?” विल्मर ने लालच भरी निगाहों से पूछा।

“हां-हां दूंगी, पर बताओ तो सही कि तुम्हें क्या चाहिये?” शलाका ने विल्मर को किसी बच्चे की तरह मचलते देख कह दिया।

“मैं जब से यहां आया था मैंने 2 ही कीमती चीजें यहां देखीं थीं। एक आपका वह त्रिशूल और दूसरा वह सुनहरी ढाल, जिससे द्वार खोलकर हम इस दुनिया में आये थे। मुझे पता है कि त्रिशूल आपसे मांगना व्यर्थ है, वह आपकी शक्ति से ही चल सकता है। इसलिये मैं अपने लिये आपसे वह सुनहरी ढाल मांगता हूं।” विल्मर ने कहा।

शलाका यह सुनकर सोच में पड़ गयी।

“वैसे क्या तुम्हें ये पता भी है कि वह ढाल क्या है?” शलाका ने गम्भीरता से कहा।

“मुझे नहीं पता, पर मुझे ये पता है कि वह बहुत कीमती ढाल है।” विल्मर ने कहा।

“क्या तुम कुछ और नहीं मांग सकते?” शलाका ने उदास होते हुए पूछा।

“नहीं...मुझे तो वह ढाल ही चाहिये।” विल्मर ने किसी नन्हें बच्चे की तरह जिद करते हुए कहा।

“ठीक है, मैं तुम्हें वह ढाल दे दूंगी, लेकिन बदले में मुझे भी तुमसे कुछ चाहिये होगा।” शलाका ने छोटी सी शर्त रखते हुए कहा।

“पर मेरे पास ऐसा क्या है, जिसकी आपको जरुरत है?” विल्मर के शब्द आश्चर्य से भर उठे।

“मुझे बदले में तुम्हारी यहां की पूरी स्मृतियां चाहिये।” शलाका ने गम्भीर स्वर में कहा- “देखो विल्मर, मैं तुम्हें यहां से जाने दूंगी तो कोई गारंटी नहीं है कि तुम यहां के बारे में किसी को नहीं बताओगे और अगर गलती से भी तुमने यहां के बारे में किसी को बता दिया तो भविष्य के मेरे सारे प्लान मुश्किल में पड़ जायेंगे।

"इसलिये मैं तुम्हें वह ढाल तो दे दूंगी, मगर उसके बदले तुम्हारी यहां की सारी स्मृतियां छीन लूंगी। यानि कि यहां से जाने के बाद, तुम्हें अपनी पूरी जिंदगी की हर बात याद होगी, सिवाय यहां की यादों के। यहां के और मेरे बारे में तुम्हें कुछ भी याद नहीं रह जायेगा। अगर तुम्हें यह मंजूर है तो बताओ।”

“मुझे मंजूर है।” विल्मर ने सोचने में एक पल भी नहीं लगाया।

“ठीक है।” यह कहकर अब शलाका जेम्स की ओर मुड़ गयी- “और तुम्हें क्या चाहिये जेम्स?”

“मैने अपनी पूरी जिंदगी में जितना कुछ नहीं देखा था, वह सब यहां आकर देख लिया।” जेम्स ने कहा- “इसलिये मैं आपसे मांगने की जगह कुछ पूछना चाहता हूं?”

जेम्स की बात सुन विल्मर और शलाका दोनों ही आश्चर्य से भर उठे।

“हां पूछो जेम्स! क्या पूछना चाहते हो?” शलाका ने जेम्स को आज्ञा देते हुए कहा।

“क्या मैं आपके साथ हमेशा-हमेशा के लिये यहां रह सकता हूं।” जेम्स के शब्द आशाओं के बिल्कुल विपरीत थे।

“तुम यहां मेरे पास क्यों रहना चाहते हो जेम्स? पहले तुम्हें मुझे इसका कारण बताना होगा।” शलाका ने कहा।

“मेरा बाहर की दुनिया में कोई नहीं है। मेरे माँ-बाप बचपन में ही एक दुर्घटना का शिकार हो गये थे। मैं जब छोटा था, तो सभी मुझे बहुत परेशान करते थे, तब मैं रात भर यही सोचता था कि काश मेरे पास भी कोई ऐसी शक्ति होती, जिसके द्वारा मैं उन लोगों को मार सकता। मैं हमेशा सुपर हीरो के सपने देखता रहता था, जिसमें एक सुपर हीरो पूरी दुनिया को बचाता था। पर जैसे-जैसे मैं बड़ा होने लगा, मुझे यह पता चल गया कि इस दुनिया में असल में कोई सुपर हीरो नहीं है, यहां तक कि भगवान के भी अस्तित्व पर मुझे शक होने लगा।

"लेकिन जब मैं यहां से हिमालय पहुंचा और मैने बर्फ के नीचे से शिव मंदिर को प्रकट होते देखा, तो मुझे विश्वास हो गया कि इस धरती पर ईश्वर है, बस वह स्वयं लोगों के सामने नहीं आता, वह अपनी शक्तियों को कुछ अच्छे लोगों को बांटकर उनसे हमारी धरती की रक्षा करवाता रहता है। मैंने वहां महा-शक्तिशाली हनुका को देखा, मैंने वहां अलौकिक शक्तियों वाले रुद्राक्ष और शिवन्या को देखा। तभी से मेरा मन आपके पास ही रहने को कर रहा है।

"आप मुझे जो भी काम देंगी, मैं बिना कुछ भी पूछे, आपका दिया काम पूरा करुंगा। मुझे मनुष्य के अंदर की शक्ति का अहसास हो गया है, अब मैं भला इन छोटे-मोटे हीरे-जवाहरातों को लेकर क्या करुंगा। इसलिये आप विल्मर को यहां से जाने दीजिये, पर मुझे अपनी सेवा में यहां रख लीजिये। वैसे भी आपको इतनी बड़ी पृथ्वी संभालने के लिये किसी इंसान की जरुरत तो होगी ही, फिर वो मैं क्यों नहीं हो सकता?” इतना कहकर जेम्स शांत हो गया।

“क्या तू सच में मेरे साथ अपनी दुनिया में नहीं जाना चाहता?” विल्मर ने कहा।

“मेरे लिये अब यही मेरी दुनिया है। तुम जाओ विल्मर... मुझे यहीं रहना है।” जेम्स ने कहा।

शलाका बहुत ध्यान से जेम्स की बातें सुन रही थी। जेम्स की बातों से शलाका को उसके भाव बहुत शुद्ध और निष्कपट लग रहे थे।

“मुझे तुम्हारे विचार सुनकर बहुत अच्छा लगा जेम्स। मैं तुम्हें अपने पास रखने को तैयार हूं, पर एक शर्त है, आगे से तुम मुझे शलाका कहकर बुलाओगे, देवी या देवी शलाका कहकर नहीं।” शलाका ने मुस्कुराकर कहा।

“जी देवी....उप्स...मेरा मतलब है जी शलाका।” जेम्स ने हड़बड़ा कर अपनी बात सुधारते हुए कहा।

“तो क्या अब तुम यहां से जाने को तैयार हो विल्मर?” शलाका ने पूछा।

“जी देवी।” यह कहकर विल्मर ने जेम्स को गले लगाते हुए कहा- “तुम्हारी बहुत याद आयेगी। तुम बहुत अच्छे इंसान हो।”

शलाका ने अब अपना हाथ ऊपर हवा में लहराया, उसके हाथ में अब वही सुनहरी ढाल दिखने लगी थी, जिसे जेम्स और विल्मर ने सबसे पहले देखा था।

शलाका ने वह ढाल विल्मर के हाथ में पकड़ायी और विल्मर के सिर से अपना त्रिशूल सटा दिया।

त्रिशूल से नीली रोशनी निकलकर विल्मर के दिमाग में समा गई।

कुछ देर बाद विल्मर का शरीर वहां से गायब हो गया। विल्मर को जब होश आया तो उसने स्वयं को अंटार्कटिका की बर्फ पर गिरा पड़ा पाया। सुनहरी ढाल उसके हाथ में थी।

“अरे मैं बर्फ पर क्यों गिरा पड़ा हूं और जेम्स कहां गया। हम तो इस जगह पर किसी सिग्नल का पीछा करते हुए आये थे।....और यह मेरे पास इतनी बहुमूल्य सुनहरी ढाल कहां से आयी?”

विल्मर को कुछ याद नहीं आ रहा था, इसलिये उसने ढाल को वहां पड़े अपने बड़े से बैग में डाला और अपने श्टेशन की ओर लौटने लगा।

दिव्यदृष्टि: (15 जनवरी 2002, मंगलवार, 13:40, सीनोर राज्य, अराका द्वीप)

रोजर को आकृति की कैद में बंद आज पूरे 10 दिन बीत गये थे।

आज तक आकृति उससे काम कराने के बाद सिर्फ एक बार मिलने आयी थी और वह भी सिर्फ 10 मिनट के लिये।

आकृति रोजर को ना तो कमरे से निकलने दे रही थी और ना ही यह बता रही थी कि उसने उसे क्यों बंद करके रखा है।

रोजर कमरे में बंद-बंद बिल्कुल पागलों के समान लगने लगा था, उसकी दाढ़ी और बाल भी काफी बढ़ गये थे।

रोजर को कभी-कभी बाहर वाले कमरे से कुछ आवाजें आती सुनाई देती थीं, लेकिन कमरे का दरवाजा बाहर से बंद होने की वजह से वह यह नहीं जान पाता था कि वह आवाजें किसकी हैं?

पिछले एक दिन से तो, उसे अपने कमरे के बगल वाले कमरे से, किसी के जोर-जोर से कुछ पटकने की अजीब सी आवाजें भी सुनाई दे रहीं थीं।

रोजर ने कई बार काँच के खाली गिलास को उल्टा करके, दीवार से लगा कर के उन आवाजों को सुनने की कोशिश की थी, पर ना जाने यहां कि दीवारें किस चीज से निर्मित थीं, कि रोजर को कभी साफ आवाज सुनाई ही नहीं देती थी।

आज भी रोजर अपने बिस्तर पर लेटा, आकृति को मन ही मन गालियां दे रहा था कि तभी एक खटके की आवाज से वह बिस्तर से उठकर बैठ गया।

वह आवाज दरवाजे की ओर से आयी थी। रोजर की निगाह दरवाजे पर जाकर टिक गयी।

तभी उसी एक धीमी आवाज के साथ अपने कमरे का दरवाजा खुलता हुआ दिखाई दिया।

यह देख रोजर भागकर दरवाजे के पास आ गया। दरवाजे के बाहर रोजर को एक स्त्री खड़ी दिखाई दी।

वह सनूरा थी, सीनोर राज्य की सेनापति और लुफासा की राजदार।

सनूरा ने मुंह पर उंगली रखकर रोजर को चुप रहने का इशारा किया। रोजर दबे पाँव कमरे से बाहर आ गया।

सनूरा ने रोजर को अपने पीछे आने का इशारा किया। रोजर सनूरा के पीछे-पीछे चल पड़ा।

रोजर सनूरा को पहचानता नहीं था, लेकिन इस समय उसे सनूरा किसी देवदूत जैसी प्रतीत हो रही थी, जो उसे इस नर्क रुपी कैद से आजाद करने आयी थी।

सनूरा रोजर के कमरे से निकलकर एक दूसरे कमरे में दाखिल हो गई।

“आकृति इस समय यहां नहीं है, इसलिये उसके आने के पहले चुपचाप मेरे साथ निकल चलो।” सनूरा ने धीमी आवाज में कहा।

“पर तुम हो कौन? कम से कम ये तो बता दो।” रोजर ने सनूरा से पूछा।

“मेरा नाम सनूरा है, मैं इस सीनोर राज्य की सेनापति हूं। मैंने तुम्हें कुछ दिन पहले यहां पर कैद देख लिया था, तबसे मैं आकृति के यहां से कहीं जाने का इंतजार कर रही थी। 2 दिन पहले भी वह कहीं गई थी, पर उस समय मुझे मौका नहीं मिला। अभी फिलहाल यहां से निकलो, बाकी की चीजें मैं तुम्हें किसी दूसरे सुरक्षित स्थान पर समझा दूंगी।”सनूरा ने फुसफुसा कर कहा।

“क्या तुम राजकुमार लुफासा के साथ रहती हो?” रोजर ने पूछा।

“तुम्हें राजकुमार लुफासा के बारे में कैसे पता?” सनूरा ने आश्चर्य से रोजर को देखते हुए कहा।

“मुझे भी इस द्वीप के बहुत से राज पता हैं।” रोजर ने धीमे स्वर में कहा।

“मुझे लुफासा ने ही तुम्हें यहां से निकालने के लिये भेजा है। अभी ज्यादा सवाल-जवाब करके समय मत खराब करो और तुरंत निकलो यहां से।” सनूरा ने रोजर को घूरते हुए कहा।

“मैं तुम्हारें साथ चलने को तैयार हूं, पर अगर एक मिनट का समय दो, तो मैं किसी और कैदी को भी यहां से छुड़ा लूं, जो कि मेरी ही तरह मेरे बगल वाले कमरे में बंद है।”

रोजर के शब्द सुन सनूरा आश्चर्य से भर उठी- “क्या यहां कोई और भी बंद है?”

“हां...मैंने अपने बगल वाले कमरे से उसकी आवाज सुनी है।” यह कहकर रोजर दबे पाँव सनूरा को लेकर एक दूसरे कमरे के दरवाजे के पास पहुंच गया।

उस कमरे का द्वार भी बाहर से बंद था। रोजर ने धीरे से उस कमरे का द्वार खोलकर अंदर की ओर झांका।

उसे कमरे में पलंग के पीछे किसी का साया हिलता हुआ दिखाई दिया।

“देखो, तुम जो भी हो...अगर इस कैद से निकलना चाहते हो, तो हमारे साथ यहां से चलो। अभी आकृति यहां नहीं है।” रोजर ने धीमी आवाज में कहा।

रोजर के यह बोलते ही सुनहरी पोशाक पहने एक खूबसूरत सी लड़की बेड के पीछे से निकलकर सामने आ गई।

उस लड़की के बाल भी सुनहरे थे। रोजर उस लड़की की खूबसूरती में ही खो गया। वह लगातार बस उस लड़की को ही देख रहा था।

“मेरा नाम मेलाइट है, आकृति ने मुझे यहां 2 दिन से बंद करके रखा है।” मेलाइट ने कहा।

“चलो अब जल्दी निकलो यहां से।” सनूरा ने रोजर को खींचते हुए कहा।

रोजर ने मेलाइट से बिना पूछे उसका हाथ थामा और उसे लेकर सनूरा के पीछे भागा।

रोजर के इस प्रकार देखने और हाथ पकड़ने से मेलाइट को थोड़ा अलग महसूस हुआ। आज तक उसके साथ ऐसा किसी ने भी नहीं किया था।

तीनों तेजी से मुख्य कमरे से निकलकर आकृति के कक्ष की ओर भागे, क्यों कि उधर से ही होकर गुफाओं का रास्ता हर ओर जाता था।

रोजर भी पहली बार इसी रास्ते से होकर आकृति के कक्ष में आया था। तीनों तेजी से आकृति के कक्ष में प्रवेश कर गये।

पर इससे पहले कि वह गुफाओं वाले रास्तें की ओर जा पाते, उन्हें एक और लड़की की आवाज सुनाई दी- “अगर सब लोग भाग ही रहे हो, तो मुझे भी लेते चलो।”

तीनों वह आवाज सुन आश्चर्य से रुक गये, पर उन्हें कोई आसपास दिखाई नहीं दिया।

“कौन हो तुम? और हमें दिखाई क्यों नहीं दे रही?” सनूरा ने कहा।

“मैं यहां हूं, कक्ष में मौजूद उस शीशे के अंदर।” वह रहस्यमयी आवाज फिर सुनाई दी।

सभी की नजर कक्ष में मौजूद एक आदमकद शीशे पर गई। वह आवाज उसी से आती प्रतीत हो रही थी।

“तुम शीशे में कैसे बंद हुई?” रोजर ने पूछा।

“मेरा नाम सुर्वया है, मुझे इस शीशे में आकृति ने ही बंद करके रखा है, अगर तुम लोग इस शीशे को तोड़ दोगे, तो मैं भी आजाद हो जाऊंगी।”

रोजर ने सुर्वया की बात सुन सनूरा की ओर देखा। सनूरा ने रोजर को आँखों से इशारा कर उसे शीशे को तोड़ने का आदेश दे दिया।

रोजर ने वहीं पास में दीवार पर टंगी, एक सुनहरी तलवार को उठाकर शीशे पर मार दिया।

‘छनाक’ की आवाज के साथ शीशा टूटकर बिखर गया।

उस शीशे के टूटते ही उसमें से एक धुंए की लकीर निकली, जो कि कुछ ही देर में एक सुंदर लड़की में परिवर्तित हो गई।

सनूरा के पास, अब किसी से उसके बारे में पूछने का भी समय नहीं बचा था। वह सभी को अपने पीछे आने का इशारा करते हुए, तेजी से गुफा की ओर बढ़ गयी।

जारी रहेगा______✍️
 
#143.

सभी लगभग भागते हुए से चल रहे थे। रोजर ने अभी तक उस तलवार को नहीं फेंका था।

वह उस तलवार को हाथ में ही लेकर मेलाइट को घेरे हुए चल रहा था।ऐसा रोजर ने मेलाइट की सुरक्षा की वजह से किया था, पर मेलाइट भागते हुए भी रोजर को देख रही थी।

3-4 गुफा की सुरंगों को पार करते हुए, वह सभी एक मैदान में निकले। मैदान में आगे, कुछ दूरी पर एक छोटा सा, परंतु खूबसूरत महल बना दिखाई दे रहा था।

सनूरा सबको लेकर उसी महल की ओर बढ़ गयी।

महले में कई गलियारों और कमरों को पार करने के बाद वह एक विशाल शयनकक्ष में पहुंच गई।

उस कक्ष में एक बड़ी सी सेंटर टेबल के इर्द-गिर्द बहुत सी कुर्सियां लगीं थीं। बीच वाली कुर्सी पर एक बलिष्ठ इंसान बैठा था। रोजर उसे देखते ही पहचान गया, वह लुफासा था।

लुफासा ने सभी को कुर्सियों पर बैठने का इशारा किया। लुफासा का इशारा पाकर सभी वहां रखी कुर्सियों पर बैठ गये।

“तुम तो एक इंसान को लाने गयी थी, फिर ये इतने लोग तुम्हें कहां से मिल गये?” लुफासा ने सनूरा को देखते हुए कहा।

“आकृति ने एक नहीं अनेक लोगों को बंद कर रखा था, इसलिये सभी को छुड़ा लायी और वैसे भी दुश्मन का दुश्मन अपना दोस्त होता है।” सनूरा ने मुस्कुराते हुए कहा।

“ठीक है, तो सबसे पहले, हम सभी एक दूसरे को अपना परिचय दे दें, इससे सभी खुलकर एक दूसरे से बात कर सकेंगे।”

लुफासा ने कहा- “पहले मैं स्वयं से ही शुरु करता हूं। मेरा नाम लुफासा है और मैं इस अराका द्वीप के एक हिस्से सीनोर राज्य का राजकुमार हूं। आकृति ने हमारी देवी शलाका का रुप धरकर हम सभी को बहुत लंबे समय से मूर्ख बना रही है। हमें नहीं पता कि वह कौन है? और उसके पास कितनी शक्तियां हैं? हम इसी बात को जानने के लिये काफी दिनों से उस पर नजर रखें हुए थे।

"इसी बीच हमने रोजर को आकृति के पास देखा, पहले हमें लगा कि यह भी आकृति के साथ मिला है, पर बाद में पता चला कि आकृति ने इसे भी कैद कर रखा है। इसीलिये मैंने सीनोर राज्य की सेनापति सनूरा को रोजर को छुड़ाने के लिये भेजा। अब आप लोग अपने बारे में बतांए।”

“मेरा नाम रोजर है, मैं सुप्रीम नामक जहाज का असिस्टेंट कैप्टेन था, अराका द्वीप के पास जब मेरा

हेलीकॉप्टर क्रैश हो गया, तो आकृति ने मुझे बंदी बना लिया था।”

“मेरा नाम मेलाइट है, मैं एक ‘फ्रेश वॉटर निम्फ’ हूं, जो कि एक ‘सीरीनियन हिंड’ में परिवर्तित हो जाती हूं। आप लोगों ने मेरी कहानी अवश्य सुन रखी होगी। देवता हरक्यूलिस को दिये गये 12 कार्यों में से एक कार्य मुझे पकड़कर लाना भी था। ग्रीक देवी आर्टेमिस की मैं सबसे प्रिय हूं। जब मैं सुनहरी हिरनी बनकर जंगल में घूम रही थी, तो इस मायावी आकृति ने मेरा अपहरण कर लिया। अब यह मुझे यहां क्यों लायी है? ये मुझे भी नहीं पता। पर अब देवी आर्टेमिस इस आकृति को किसी भी हाल में नहीं छोड़ेंगी।“

(ग्रीक माइथालोजी में साफ पानी में रहने वाली अप्सराओं को फ्रेश वॉटर निम्फ कहा जाता है)

(दक्षिण ग्रीस का एक प्राचीन नगर ‘सिरीनिया’ के एक जंगल में पायी जाने वाली सुनहरी हिरनी को सिरीनियन हिंड के नाम से जाना जाता है)

“तुम वही सुनहरी हिरनी हो, जिसकी 4 बहनें देवी आर्टेमिस के रथ को खींचती हैं?” लुफासा ने आश्चर्य से भरते हुए कहा।

“हां, मैं वहीं हूं।” मेलाइट ने कहा।

“हे मेरे ईश्वर इस आकृति ने क्या-क्या गड़बड़ कर रखी है। अगर मेलाइट ने देवताओं को यहां के बारे में बता दिया, तो देवता इस पूरे द्वीप को समुद्र में डुबो देंगे।” लुफासा की आँखों में भय के निशान साफ-साफ

दिख रहे थे।

अब लुफासा की किसी से और कुछ पूछने की हिम्मत ही नहीं बची थी।

“देखो मेलाइट...तुम जब भी जहां भी जाना चाहो, हम तुम्हें इस द्वीप से वहां भिजवा देंगे, पर एक वादा करो कि देवी आर्टेमिस से तुम आकृति की शिकायत करोगी, हम सभी की नहीं। हम देवता ‘अपोलो’ और देवी 'आर्टेमिस' के कोप का भाजन नहीं बनना चाहते।” लुफासा ने विनम्र शब्दों में मेलाइट से कहा।

लुफासा के ऐसे शब्दों को सुनकर मेलाइट ने धीरे से सिर हिला दिया।

मेलाइट का परिचय जानकर, अब रोजर की मेलाइट की ओर देखने की हिम्मत भी नहीं हो रही थी।

मेलाइट ने कनखियों से रोजर को देखा और उसे नीचे देखते पाकर धीरे से मुस्कुरा दी।

अब लुफासा की निगाह उस दूसरी लड़की पर पड़ी- “अब आप भी अपना परिचय दे दीजिये।”

“मेरा नाम सुर्वया है, मैं सिंहलोक की राजकुमारी हूं। एक समय मैं आकृति की बहुत अच्छी दोस्त थी, पर जब आकृति को मेरी दिव्यदृष्टि के बारे में पता चला, तो उसने मुझे उस शीशे में कैद करके हमेशा-हमेशा के लिये अपने पास रख लिया।” सुर्वया ने कहा।

“तुम्हारे पास किस प्रकार की दिव्यदृष्टि है?” सनूरा ने सुर्वया से पूछा।

“मैं इस पृथ्वी पर मौजूद हर एक जीव को अपनी आँखें बंद करके देख सकती हूं।” सुर्वया ने कहा।

“क्या ऽऽऽऽऽऽऽ?” सुर्वया के शब्द सुनकर सभी के मुंह से एकसाथ निकला।

“ये कैसी शक्ति है? यह शक्ति तो जिसके पास होगी, वह कुछ भी कर सकता है।” रोजर ने कहा।

“नहीं मेरी भी कुछ कमियां हैं, मैं सिर्फ उसी व्यक्ति या जीव को देख सकती हूं, जो उस समय जमीन पर हो। मैं पानी, बर्फ या हवा में रह रहे किसी जीव को नहीं ढूंढ सकती। मेरी इसी विद्या की वजह से, आकृति तुम सब लोगों के बारे में जान जाती थी। पर मेरे ना रहने के बाद अब वह कमजोर पड़ जायेगी।” सुर्वया ने कहा।

“तो क्या तुम बता सकती हो कि इस समय आकृति कहां है?” लुफासा ने कहा।

लुफासा की बात सुनकर सुर्वया मुस्कुरा दी- “यह बताने के लिये मुझे दिव्यदृष्टि की जरुरत नहीं है। मैंने ही उसे इस समय न्यूयार्क भेजा था।”

“न्यूयार्क?” लुफासा को सुर्वया की बात समझ में नहीं आयी।

“दरअसल किसी कार्य हेतु आकृति को एक सुनहरी ढाल की जरुरत है और वह ढाल इस समय एक पानी के जहाज के अंदर है, जो अंटार्कटिका से न्यूयार्क की ओर जा रहा है। वह उसे ही लाने गयी है।” सुर्वया ने कहा।

“क्या तुम ये बता सकती हो कि उसने मेरा अपहरण क्यों किया?” मेलाइट ने सुर्वया से पूछा।

“हां....आकृति के चेहरे पर इस समय शलाका का चेहरा है, जिसे वह स्वयं की मर्जी से हटा नहीं सकती, जबकि तुम्हारे पास एक कस्तूरी है, जिसे पीसकर उसका लेप लगाने पर आकृति अपने पुराने रुप में आ सकती है, इसी लिये उसने तुम्हारा अपहरण किया था।” सुर्वया ने कहा।

“पर मेलाइट के पास कस्तूरी कैसे हो सकती है?” लुफासा ने कहा- “कस्तूरी तो सिर्फ नर मृग में पायी जाती है।”

“वह कस्तूरी मेरी नहीं है, वह मेरे पास किसी की निशानी है, जिसे मैं उस आकृति को कभी भी नहीं दूंगी।” मेलाइट ने गुस्से से कहा- “और उसे इस कस्तूरी के बारे में पता कैसे चला? यह बात तो मेरे सिवा कोई भी नहीं जानता।”

“माफ करना मेलाइट, पर यह जानकारी मैंने ही उसे दी थी और मुझसे कुछ भी छिपा पाना असंभव है।” सुर्वया ने कहा।

तभी लुफासा के कमरे में लगी एक लाल रंग की बत्ती जलने लगी, जिसे देखकर लुफासा थोड़ा चिंतित हो गया।

“दोस्तों आप लोग अभी आराम करिये, मुझे अभी कुछ जरुरी काम से कहीं जाना है। मैं लौटकर आप लोगों से बात करता हूं।” यह कह लुफासा ने सनूरा की ओर देखा।

सनूरा जान गयी थी कि लुफासा को मकोटा ने याद किया था, उसने इशारे से लुफासा को निश्चिंत होकर जाने को कहा और फिर उठकर सबको कमरा दिखाने के लिये चल दी।

उड़ने वाली झोपड़ी: (15 जनवरी 2002, मंगलवार, 14:30, पोसाईडन पर्वत, अराका द्वीप)

सभी अब अपने सामने मौजूद सुनहरी झोपड़ी को निहार रहे थे। सबसे पहले उन सभी झोपड़ी को चारो ओर से ध्यान से देखा।

झोपड़ी के सामने की ओर उसका दरवाजा था, झोपड़ी के पीछे कुछ भी नहीं था, पर झोपड़ी के दाहिने और बांयी ओर 2 छोटी खिड़कियां बनीं थीं।

उन खिड़कियों के नीचे, दोनो तरफ एक-एक सुनहरा पंख लगा था। जो हवा के चलने से धीरे-धीरे लहरा रहा था। पंख देख सभी आश्चर्य से भर उठे।

“कैप्टेन, इस झोपड़ी के पंख क्यों है? आपको क्या लगता है? क्या ये उड़ती होगी ?” ऐलेक्स ने सुयश से कहा।

“मुझे नहीं लगता कि ये उड़ती होगी। क्यों कि इतनी बड़ी झोपड़ी को इतने छोटे पंख, हवा में उड़ा ही नहीं सकते।“ सुयश ने अपने विचार को प्रकट करते हुए कहा- “यह अवश्य ही किसी और कार्य के लिये बनी

होगी?”

झोपड़ी के बाहर ऐसा कुछ भी नहीं था, जिसके बारे में और कुछ बात की जाती, इसलिये सभी ने अब अंदर जाने का फैसला कर लिया।

“दोस्तों, अंदर जाने से पहले मैं कुछ बातें करना चाहता हूं।” सुयश ने सभी को सम्बोधित करते हुए कहा- “हम शायद मायावन के आखिरी द्वार पर हैं, इसके बाद तिलिस्मा शुरु होगा। हमें नहीं पता कि आगे आने

वाली मुसीबतें किस प्रकार की होंगी, इसलिये मैं चाहता हूं कि सभी लोग आगे पड़ने वाली किसी भी चीज को तब तक हाथ नहीं लगायेंगे, जब तक सभी की अनुमति ना ले लें।”

सभी ने अपना सिर हां में हिलाकर सुयश की बात का समर्थन किया।

अब सुयश के इशारे पर सभी झोपड़ी के अंदर की ओर चल दिये।

झोपड़ी अंदर से ज्यादा बड़ी नहीं थी और ना ही उसमें बहुत ज्यादा सामान ही रखा था।

झोपड़ी की सभी दीवारें और जमीन लकड़ी के ही बने थे, बस उसकी छत साधारण झोपड़ी की तरह घास-फूस से बनी थी।

झोपड़ी के बीचो बीच एक पत्थर के वर्गा कार टुकड़े पर, काँच का बना एक गोल बर्तन रखा था, जो आकार में कार के टायर के बराबर था, परंतु उसकी गहराई थोड़ी ज्यादा थी।

उस काँच के बर्तन में पानी के समान पारदर्शी परंतु गाढ़ा द्रव भरा था। उस द्रव में नीले रंग की बहुत छोटी -छोटी मछलियां घूम रहीं थीं।

अब इतने गाढ़े द्रव में मछली कैसे घूम रहीं थीं, ये समझ से बाहर था।

उस काँच के बर्तन के बीच में एक नीले रंग का कमल का फूल रखा था।

झोपड़ी के एक किनारे पर, एक छोटे से स्टैंड पर, एक पकी मिट्टी की बनी छोटी सी मटकी रखी थी, उस मटकी पर ‘जलपंख’ लिखा था और जलपंख के नीचे एक गोले जैसे आकार में 2 लहर की आकृतियां बनीं थीं।

मटकी से पतली डोरी के माध्यम से, एक पानी निकालने वाला सोने का डोंगा भी बंधा था।

झोपड़ी की दूसरी दीवार पर एक कील गड़ी थी, जिसमें एक मानव खोपड़ी से निर्मित माला टंगी थी।

उस माला का धागा साधारण ही दिख रहा था।

दोनों खिड़कियों में लकड़ी के पल्ले लगे थे, जो कि खुले हुए थे।

“किसी को कुछ समझ में आ रहा है?” सुयश ने झोपड़ी में मौजूद सभी चीजों को देखने के बाद सबसे पूछा।

“कैप्टेन, इस झोपड़ी की दीवारें लकड़ी की हैं, यह समझ में आता है, पर इसकी जमीन क्यों लकड़ी की बनी है? यह समझ में नहीं आ रहा, क्यों कि कोई भी झोपड़ी बनाते समय उसकी जमीन नहीं बनवाता। और ऐसा सिर्फ वही लोग करते हैं जिन्हें अपने घर को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाना होता है।” तौफीक ने कहा। तौफीक का तर्क अच्छा था।

“और किसी को कुछ महसूस हुआ?” सुयश ने पूछा।

“उस नीलकमल, मानव खोपड़ी और इस मटकी में कुछ तो काम्बिनेशन है।” शैफाली ने कहा- “पर करना क्या है? ये समझ में नहीं आ रहा है।”

“तो फिर पहले किसी एक चीज को उठा कर देखते हैं, अगर कुछ बदलाव हुआ तो अपने आप पता चल जायेगा।“ सुयश ने कहा।

“कैप्टेन पहले इस नीलकमल को छूकर देखते हैं।” जेनिथ ने अपना सुझाव दिया।

सुयश ने जेनिथ को हां में इशारा किया। सुयश का इशारा पाकर जेनिथ ने धीरे से उस नीलकमल को उठा लिया। पर नीलकमल को उठाने के बाद कोई भी घटना नहीं घटी।

यह देख जेनिथ ने नीलकमल को वापस उसके स्थान पर रख दिया।

“अब मटकी को चेक करते हैं क्यों कि इस पर लिखा यह जलपंख और उसके नीचे बना गोला मुझे कुछ अजीब लग रहा है।” इस बार क्रिस्टी ने कहा।

सुयश के इशारा पाते ही क्रिस्टी ने जैसे ही मटकी को छुआ, उसे तेज करंट का झटका लगा।

“कैप्टेन, यह तो करंट मार रहा है।” क्रिस्टी ने घबरा कर अपना हाथ खींचतें हुए कहा।

“यानि की इसमें कुछ रहस्य अवश्य है।” शैफाली ने कहा- “कैप्टेन अंकल इस पर जलपंख क्यों लिखा है? कहीं इसका पानी बाहर बने झोपड़ी के पंख पर डालने के लिये तो नहीं है?”

“हो भी सकता है, पर यह तो छूने पर करंट मार रहा है, फिर इसका पानी पंख पर डाल कर ट्राई कैसे करें?” सुयश ने कहा।

“कैप्टेन...जलपंख तो समझ में आ गया, पर इस गोले वाले निशान का क्या मतलब है?” ऐलेक्स ने कहा- “यह पानी की लहरों के जैसा निशान है।”

“कहीं यह निशान एक जोडियाक चिन्ह तो नहीं है?” शैफाली ने निशान को देखते हुए कहा- “क्यों कि राशियों में कुम्भ राशि का निशान ऐसा ही होता है।”

“कुम्भ राशि!” सुयश ने सोचने वाले अंदाज में कहा।

“जो लोग 20 जनवरी से 19 फरवरी के बीच पैदा होते हैं, उनके राशि कुम्भ राशि होती है, और ऐसा निशान कुम्भ राशि का ही होता है।” शैफाली ने कहा।

“एक मिनट!” सुयश ने कुछ सोचते हुए कहा- “कुम्भ राशि का प्रतीक मटका ही तो होता है और यह निशान भी मटके पर ही है। इसका मतलब तुम सही सोच रही हो शैफाली।...क्या कोई यहां पर ऐसा है जिसकी राशि कुम्भ हो?”

“यस कैप्टेन!” जेनिथ ने अपना हाथ उठाते हुए कहा- “मेरा जन्म 11 फरवरी को हुआ है, उस हिसाब से मेरी राशि कुम्भ ही है।”

“जेनिथ तुम मटके को छूने की कोशिश करो, देखो यह तुम्हें भी करंट मारता है या नहीं?” सुयश ने जेनिथ को मटका छूने का निर्देश दिया।

जेनिथ ने डरते-डरते मटके को छुआ, पर उसे करंट नहीं लगा, यह देख शैफाली के चेहरे पर मुस्कान आ गयी।

“जेनिथ अब तुम इस डोंगे को पानी से पूरा भरकर, बांयी तरफ वाली खिड़की से, बाहर लगे पंख पर डालो, फिर देखते हैं कि क्या होता है?” सुयश ने जेनिथ से कहा।

जेनिथ ने सुयश के बताए अनुसार ही किया। पंख पर पानी पड़ते ही उसका आकार थोड़ा बड़ा हो गया।

“तो ये बात है....हमें पूरी मटकी का पानी बारी-बारी दोनों पंखों पर डालना होगा, तब पंख आकार में इस झोपड़ी के बराबर हो जायेंगे और फिर यह झोपड़ी हमें तिलिस्मा में पहुंचायेगी।” सुयश ने सबको समझाते हुए कहा- “पर जेनिथ इस बात का ध्यान रखना, कि पानी दोनों पंखों पर बराबर पड़े, नहीं तो एक पंख छोटा और एक पंख बड़ा हो जायेगा। जिससे बाद में उड़ते समय यह झोपड़ी अपना नियंत्रण खोकर गिर जायेगी।”

जेनिथ ने हामी भर दी। कुछ ही देर के प्रयास के बाद जेनिथ ने मटकी का पूरा पानी खत्म कर दिया।

झोपड़ी के दोनों ओर के पंख अब काफी विशालकाय हो गये थे।

जैसे ही मटकी का पानी खत्म हुआ, झोपड़ी के दोनों ओर की खिड़की अपने आप गायब हो गई।

अब झोपड़ी में उस स्थान पर भी लकड़ी की दीवार दिखने लगी थी।

“कैप्टेन, खिड़की का गायब होना, यह साफ बताता है कि पंख तैयार हो चुके हैं, अब बस इस झोपड़ी को उड़ाने की जरुरत है।” क्रिस्टी ने कहा।

“अब दीवार पर लगी वह खोपड़ी ही बची है, उसे भी छूकर देख लेते हैं। शायद वही झोपड़ी को उड़ाने वाली चीज हो।” शैफाली ने कहा।

जारी रहेगा______✍️
 
#144.

सुयश ने उस कील से खोपड़ी की माला उतार ली। माला उतारने के बाद, वह कील थोड़ी सी ऊपर की ओर खिसक गई, पर सुयश इस बदलाव को देख नहीं पाया।

सुयश ने खोपड़ी वाली माला को उलट-पुलट कर देखा, पर उसमें कुछ भी विचित्र नहीं था।

काफी देर तक ऐसे ही झोपड़ी में घूमने के बाद भी, किसी को ऐसा कोई सुराग नहीं मिला, जिससे यह पता चल पाता कि झोपड़ी कैसे उड़ेगी?

“कैप्टेन, क्यों ना इस काँच के बर्तन में भी हाथ डालकर उन मछलियों को देखें? क्या पता उनमें कुछ रहस्य छिपा हो।” तौफीक ने कहा।

सुयश की बात सुन जेनिथ ने आगे बढ़कर पहले उस नीलकमल को निकाल लिया, पर नीलकमल को निकालते ही झोपड़ी ऊपर की ओर हवा में उड़ने लगी।

यह देख सभी जमीन पर बैठ गये

“यह कैसे संभव हुआ? इस फूल को तो पहले भी हम निकाल कर देख चुके थे, तब तो कुछ नहीं हुआ था।” ऐलेक्स ने आश्चर्य से उस फूल की ओर देखते हुए कहा।

झोपड़ी अब हवा में नाच रही थी, पर अब उसे जमीन पर उतारना किसी को नहीं आता था। झोपड़ी के उड़ने से, इन्हें झटके नहीं लग रहे थे।

जब कुछ देर तक झोपड़ी को उड़ते हुए हो गया, तो सुयश बोल उठा- “लगता है कि इस झोपड़ी को उतारना भी हमें ही पड़ेगा।....जेनिथ तुम फूल को अपनी जगह पर वापस रख दो।”

जेनिथ ने फूल को वापस रख दिया, फिर भी झोपड़ी का उड़ना बंद नहीं हुआ। जेनिथ ने यह देख फूल को थोड़ा हिला-डुला कर देखा।

पर जेनिथ के फूल को हिलाते ही, झोपड़ी एक ही जगह पर गोल-गोल नाचने लगी।

यह देख सुयश उस नीलकमल के पास आकर ध्यान से उस फूल को देखने लगा।

“यह पूरा सिस्टम किसी मशीन की तरह काम कर रहा है।” सुयश ने कहा- “जैसे कि कोई कार। अब अगर ध्यान दें तो उस मटकी का पानी इस झोपड़ी का फ्यूल का काम कर रहा है, यह फूल इस झोपड़ी का स्टेयरिंग है। हम इस फूल को जिस दिशा में घुमा रहें हैं, यह झोपड़ी उस दिशा में घूम जा रही है। फिर तो काँच में मौजूद यह द्रव्य इंजन ऑयल की तरह होगा। इसका साफ मतलब है कि कहीं ना कहीं इस झोपड़ी को स्टार्ट करने वाला इग्नीशन भी रहा होगा, जिससे हमने अंजाने में ही, इस झोपड़ी को आसमान में उड़ा दिया। पर कहां?”

इतना कहकर सुयश अपने हाथ में पकड़ी, उस खोपड़ी की माला को देखने लगा। कुछ पल सुयश ने सोचा और उस खोपड़ी की माला को उसी कील पर टांग दिया।

माला के कील पर टंगते ही झोपड़ी जमीन पर उतर गई। अब झोपड़ी के दरवाजे के सामने पोसाईडन की मूर्ति दिखाई दे रही थी।

पोसाईडन की मूर्ति के पैर में एक बड़ा सा दरवाजा खुला हुआ दिखाई दे रहा था।

“लगता है कि हमें उस पोसाईडन की मूर्ति के, पैर में बने दरवाजे से, अंदर की ओर जाना है।” तौफीक ने बाहर की ओर देखते हुए कहा।

ऐलेक्स ने जैसे ही झोपड़ी के दरवाजे से बाहर जाने के अपना कदम बाहर की ओर बढ़ाया ।

एकाएक क्रिस्टी ने ऐलेक्स का हाथ जोर से अंदर की ओर खींचा।

ऐलेक्स झोपड़ी के अंदर आ गिरा और क्रिस्टी को अजीब सी नजरों से घूरने लगा।

“क्या हुआ क्रिस्टी? तुमने ऐलेक्स के साथ ऐसा क्यों किया?” सुयश ने भी क्रिस्टी को घूरते हुए पूछा।

“कैप्टेन, जब ऐलेक्स ने अपना पैर बाहर की ओर निकाला, तो उसका पैर बाहर दिखाई नहीं दिया, इसी लिये मैंने ऐलेक्स को अंदर की ओर खींचा था।” क्रिस्टी के शब्द पूरी तरह से रहस्य से भरे नजर आ रहे थे।

“मैं कुछ समझा नहीं ।” ऐलेक्स को भी क्रिस्टी की बातें समझ में नहीं आयी- “तुम कहना क्या चाहती हो क्रिस्टी?”

“आओ, दिखाती हूं तुम्हें।” यह कहकर क्रिस्टी ने ऐलेक्स को सहारा देकर जमीन से उठाया और उसे लेकर झोपड़ी के द्वार के पास पहुंच गयी।

“अब जरा एक बार फिर अपना पैर झोपड़ी से बाहर निकालो ऐलेक्स।” क्रिस्टी ने कहा।

ऐलेक्स ने क्रिस्टी के कहे अनुसार अपना एक पैर बाहर निकाला, पर ऐलेक्स को अपना पैर द्वार से बाहर कहीं दिखाई नहीं दिया।

यह देख ऐलेक्स ने घबरा कर अपना पैर वापस अंदर की ओर खींच लिया।

“यह कौन सी परेशानी है? यह दरवाजा हमें कहां ले जा रहा है?” सुयश ने कहा।

“कैप्टेन अंकल, शायद यह द्वार हमें तिलिस्मा में नहीं बल्कि कहीं और ले जा रहा है।” शैफाली ने अपना तर्क दिया।

“तो फिर क्या हम सामने दिख रहे तिलिस्म में प्रवेश नहीं कर सकते?” जेनिथ ने कहा।

“कुछ तो गड़बड़ है, जो हमें समझ में नहीं आ रहा?” सुयश का दिमाग तेजी से चलने लगा- “कहीं ऐसा तो नहीं कि हमें तिलिस्मा में घुसने के लिये कोई कार्ड या फिर गेट पास जैसी कोई चीज चाहिये, क्यों कि

तिलिस्मा में हमें ले तो यही झोपड़ी जायेगी।”

“कैप्टेन अंकल क्या पता हमें झोपड़ी में मौजूद किसी सामान को लेकर तिलिस्मा में जाना हो?” शैफाली ने कहा- “अगर आप कहें तो ये भी ट्राई करके देख लें।”

“चलो यह भी करके देख लेते हैं।” सुयश ने कहा- “सबसे पहले इस मटकी को ले चलते हैं क्यों कि जब पंख को पानी पिलाने के बाद खिड़की गायब हो गई, तो मटकी क्यों नहीं हुई। इसका मतलब मटकी का काम अभी झोपड़ी से खत्म नहीं हुआ है।”

यह कहकर सुयश ने मटकी तौफीक को पकड़ा कर बाहर निकलने की ओर इशारा किया।

तौफीक ने मटकी को लेकर झोपड़ी से निकलने की कोशिश की। पर वह बाहर नहीं जा पाया।

इसके बाद उसने फूल को ट्राई किया, फिर भी वो सफल नहीं हुआ। अब फूल को यथा स्थान रखकर तौफीक ने खोपड़ी की माला उतार ली।

तौफीक उस खोपड़ी की माला को जैसे लेकर निकलने चला, वह आसानी से बाहर निकल गया।

यह देख सबकी जान में जान आयी।

“तो इस खोपड़ी की माला को लेकर बाहर निकलना था।” सुयश ने हंसकर कहा- “यही है तिलिस्मा का गेट पास।“

अब तौफीक ने खोपड़ी को वापस अंदर की ओर फेंक दिया। इस बार शैफाली खोपड़ी लेकर बाहर निकल गयी।

उसके बाद फिर क्रिस्टी, फिर ऐलेक्स और फिर जेनिथ। जेनिथ ने बाहर निकलकर खोपड़ी को वापस अंदर की ओर फेंक दिया।

पर सुयश ने जब बाहर निकलने की कोशिश की तो इस बार उसे करंट का झटका लगा। तयह देख सुयश हैरान हो गया।

“इस माला ने सबको निकाल दिया, पर यह माला मुझे बाहर लेकर क्यों नहीं जा रही है?” सुयश मन ही मन बड़बड़ा उठा।

तभी तौफीक ने सुयश को बाहर ना निकलते देख पूछ लिया- “क्या हुआ कैप्टेन आप बाहर क्यों नहीं आ रहे हैं?”

सुयश ने तौफीक को भी परेशानी बता दी।

यह सुन तौफीक अंदर की ओर वापस आने चला, पर उसे करंट का झटका लगा, जिसका साफ मतलब था कि बाहर आया हुआ कोई भी व्यक्ति अब अंदर नहीं जा सकता।

यानि कि सुयश को अपनी परेशानी स्वयं ही समाप्त करनी थी। सुयश लगातार सोच रहा था।

तभी उसकी नजर उस कील पर गई, जिस पर वह खोपड़ी की माला लटकी थी।

सुयश अब वहां जाकर ध्यान से उस कील को देखने लगा। कील को छूने पर सुयश को वह कील हिलती हुई दिखाई दी।

अब सुयश इस मायाजाल को समझ गया था।

“तो ये बात है, इस खोपड़ी की माला को उतारते ही यह कील ऊपर की ओर हो जाती है, यानि यही इस झोपड़ी का इग्नीशन है, जो कि इसे उड़ाने में सहायक है। यानि कि मैं बिना माला टांगे यहां से बाहर नहीं जा सकता और बिना इस माला को लिये भी मैं बाहर नहीं जा सकता। ...... हे भगवान अब ये कैसा मायाजाल है?” अब सुयश परेशान हो उठा।

“कैसे....आखिर कैसे यह संभव है?”

तभी सुयश को सामने पड़ी मटकी दिखाई दी।

उसे तुरंत अपने ही बोले शब्द याद आ गये कि मटकी का कार्य अगर खत्म हो जाता तो मटकी भी गायब हो गई होती।

यह ध्यान कर सुयश की आँखें खुशी से चमकने लगीं।

उसने एक हाथ में खोपड़ी और दूसरे हाथ में मटकी लेकर दोनों का वजन किया। दोनों का ही वजन लगभग एक समान ही था।

अब सुयश ने सोने के डोंगे में बंधे धागे को खोलकर उस धागे से मटकी को बांधकर, उसे भी खोपड़ी की माला जैसा बना दिया।

अब सुयश ने खोपड़ी की माला को उतारकर अपने गले में पहन लिया। इसके बाद उस मटकी की माला को उस कील पर टांग दिया।

मटकी को कील पर टांगते ही कील वापस नीचे आ गई।

अब सुयश मुस्कुराया और झोपड़ी के द्वार की ओर चल दिया। वह समझ गया था कि दीवार पर खोपड़ी की माला टंगे रहना जरुरी नहीं था, बल्कि उस कील का नीचे झुके रहना जरुरी था।

सुयश ने अपना एक पैर बाहर निकाला और फिर पूरा का पूरा बाहर निकल गया। सभी सुयश को बाहर निकलते देखकर खुश हो गये।

तभी झोपड़ी हवा में गायब हो गई और झोपड़ी के अंदर रखा वह पत्थर, काँच के बर्तन, मछली और नीलकमल पोसाईडन के पैर में बने दरवाजे में समा गया।

सभी ने एक दूसरे को देखकर, फिर हाथ मिलाये और एकता की शक्ति का मूलमंत्र दोहराते हुए पोसाईडन पर्वत के पैर में बने दरवाजे की ओर बढ़ चले।

यह वो साधारण मनुष्य थे, जिनके पास हिम्मत, विश्वास, बुद्धि, ज्ञान और सबसे बढ़कर कभी ना झुकने का हौसला था।

उन्हें डर नहीं था, देवताओं की उन शक्ति से भी, जो तिलिस्मा के अंदर मौत बनकर बैठी उनका इंतजार कर रहीं थीं।

वह सभी तिलिस्मा की ओर ऐसे बढ़ रहे थे, जैसे कुछ मतवाले हाथियों का झुण्ड लहलहाते हुए गन्ने के खेत की ओर बढ़ता है।

प्रश्नमाला

दोस्तों जैसा कि आप देख रहे हैं कि यह कथानक बहुत तेजी से बढ़ता जा रहा है और हर पेज पर आपके दिमाग एक नया प्रश्न खड़ा करता जा रहा है। प्रश्नों की संख्या अब इतनी ज्यादा हो चुकी है कि अब

वह मस्तिष्क में एकत्रित नहीं हो पा रहे हैं।

तो क्यों न इन सारे प्रश्नों को एक जगह पर एकत्रित कर लें-

1) क्या वेगा अराका द्वीप के बारे में सबकुछ जानता था?

2) ‘अटलांटिस का इतिहास’ नामक किताब ‘लाइब्रेरी ऑफ कांग्रेस' में कैसे पहुची? क्या इसके लेखक वेगा के बाबा कलाट ही थे? क्या इस किताब से और भी राज आगे खुले?

3) क्या वेगा को सम्मोहन आता था?

4) नीलाभ अब कहां गायब हो गया था? उसके पास कैसी शक्तियां थीं?

5) माया से विदा लेने के बाद मेरोन और सोफिया का क्या हुआ?

6) ट्रांस अंटार्कटिक के पहाड़ों में दबा शलाका का महल असल में क्या था?

7) हनुका कौन था? ...देव ने नीलाभ के विवाह में उपहार स्वरुप हनुका को क्यों दिया?

8) क्या थी वह जीवशक्ति और वृक्षशक्ति जिससे मैग्ना ने मायावन का निर्माण किया था?

9) क्या जेनिथ सुयश के सामने तौफीक का राज खोल पायी?

10) पंचशूल का निर्माण किसने और क्यों किया था?

11) क्रिस्टी को नदी की तली से मिली, वह काँच की पेंसिल कैसी थी?

12) हवा के गोले में समाने के बाद गोंजालो का क्या हुआ?

13) कैस्पर के समुद्री घोड़े जीको का क्या रहस्य था? वह उड़ने वाला घोड़ा कैसे बन जाता था?

14) क्या देवी शलाका के भाइयों के पास सच में कोई शक्ति थी?

15) शैफाली को मैग्ना की ड्रेस तक पहुंचाने वाली पेंग्विन और डॉल्फिन क्या थीं?

16) धरा के भाई विराज के बारे में वेगा कैसे जान गया था? वेगा को वीनस की भी सारी बातें पता थीं। तो क्या वेगा के पास और भी कोई शक्ति थी?

17) काँच के अष्टकोण में बंद वह छोटा बालक कौन था? जिसका चित्र देखकर सुयश को कुछ आवाजें सुनाई देनें लगीं थीं?

18) वेदांत रहस्यम् में ऐसे कौन से राज छिपे थे? जिसके कारण शलाका सुयश को वह किताब पढ़ने नहीं दे रही थी?

19) लुफासा की इच्छाधारी शक्ति का क्या रहस्य था?

20) सीनोर राज्य में मकोटा ने पिरामिड क्यों बनवाया था?

21) मकोटा के द्वारा आकृति को दिये ‘नीलदंड’ में क्या विशेषताएं थीं?

22) आकृति का चेहरा शलाका से कैसे मिलने लगा? वह पिछले 5000 वर्षों से जिंदा कैसे है?

23) ऐमू के अमरत्व का क्या राज है?

24) जैगन का सेवक गोंजालो का क्या राज है? सीनोर राज्य में उसकी मूर्ति क्यों लगी है?

25) क्या सनूरा की शक्तियों का राज एक रहस्यमय बिल्ली है?

26) आकृति वेदांत रहस्यम् क्यों छीनना चाह रही थी?

27) आर्यन ने स्वयं अपनी मौत का वरण क्यों किया था?

28) आकृति शलाका के चेहरे से क्यों परेशान है?

29) मैग्ना का ड्रैगन, लैडन नदी की तली में क्यों सो रहा था? मेलाइट उसे क्यों जगाना चाहती थी?

30) पृथ्वी की ओजोन लेयर कैसे टूट गयी थी?

31) 3 आँख और 4 हाथ वाले उस विचित्र जीव का क्या रहस्य था? कैस्पर की शक्तियां इस्तेमाल करके उसे किसने बनाया था?

32) सुर्वया की दिव्यदृष्टि का क्या रहस्य था?

33) ब्रह्मकलश के अमरत्व का क्या रहस्य था?

34) आकृति सुनहरी ढाल क्यों प्राप्त करना चाहती थी?

35) वुल्फा कौन था? क्या उसमें भी शैतानी शक्तियां थीं?

36) उड़नतश्तरी के अंदर मौजूद 6 फुट का हरा कीड़ा बाकी कीड़ों से अलग क्यों था? वह इंसानों की तरह कैसे चल रहा था?

37) मकोटा के सर्पदंड का क्या रहस्य था?

38) सामरा राज्य पर स्थित अटलांटिस वृक्ष का क्या रहस्य है? उसने किस प्रकार युगाका को वृक्षशक्ति दी?

39) सागरिका, वेगिका, अग्निका आदि चमत्कारी पुस्तकों का क्या रहस्य था?

40) कैसा था तिलिस्मा? उसमें कौन सी मुसीबतें छिपीं थीं?

41) क्या तिलिस्मा में घुसे सभी लोग तिलिस्मा को पार कर काला मोती प्राप्त कर सके?

42) क्या माया कैस्पर को उसकी असलियत बता पायी?

ऐसे ही ना जाने कितने सवाल होंगे जो आपके दिमाग में घूम रहे होंगें।

तो दोस्तों इन सारे अनसुलझे सवालों के जवाब हम इस समय नहीं दे पा रहे हैं। तो इंतजार कीजिए हमारे इसके अगले चैप्टर का जिसमें हम आपको ले चलेंगे, इस तिलिस्म के एक ऐसे अद्भुत संसार में, जहां पर छिपी तिलिस्मी मौत बेसब्री से अपने शिकार का इंतजार कर रही है।....................

दोस्तों इन्द्रधनुष के रंगों की मांनिद होती है एक लेखक की रचनाएं। जिस प्रकार इन्द्रधनुष में सात रंग होते हैं, ठीक उसी प्रकार लेखक की रचनाओं में भी सात रंग पाये जाते हैं। हर रंग अपने आप में एक अलग पहचान रखता है।

एक उच्चस्तरीय लेख लिखने के लिए सबसे पहले एक सम्मोहक कथानक की आवश्यकता होती है, फिर इसके एक एक पात्र को मनका समझकर माला में पिरोया जाता है, जिससे पाठकों को हर एक पात्र के जीवंत दर्शन हो सके।

फिर कल्पना के असीम सागर में डुबकी लगाकर मोतियों की तरह एक एक शब्द को चुनकर उनके भावों को अभिव्यक्त करना पड़ता है। तब कहीं जाकर तैयार होती है एक लेखक की रचना।

दोस्तों इस कथा को लिखने में बहुत मेहनत और शोध लगा है। अगर आपको यह कथा अच्छी लगी, तो कृपया इसको रिव्यू देना ना भूलें। आपका यह छोटा सा प्रयास मुझे और अच्छा लिखने के लिये प्रेरित करेगा।

"दूसरों को बनाने में तमाम उम्र गुजारी है,

पंख नये हैं पर अब मेरे उड़ने की बारी है“

जारी ररहेगा_______✍️
 
तिलिस्मा

कल्पना- एक ऐसा शब्द जो अपने अंदर संपूर्ण ब्रह्मांड को समेटे है। इस ब्रह्मांड में लहराता हुआ सागर भी है और सितारों से भरा आकाश भी।

इस ब्रह्मांड में प्रकृति के सुंदर रंग भी हैं और समस्त जीवों की असीम भावनाएं भी। तो क्यों ना इस कल्पना की कूची से, अपने जीवन को एक नया रंग देकर देखें। यकीन मानिये, वह अहसास बहुत ही खूबसूरत होगा।

मायाजाल- एक ऐसा शब्द, जो हमारी आँखों के सामने रहस्यों से भरी पहेलियों का एक संसार खड़ा कर देता है। जहां एक ओर गणितीय उलझनें होती हैं, तो वहीं दूसरी ओर कुछ ऐसी वैचारिक पहेलियां, जिनमें

उलझना अधिकांशतः लोगों को पसंद होता है। पर क्या हो? जब ऐसी उलझनों और पहेलियों के मध्य आपका जीवन दाँव पर लगा हो। अर्थात अगर आप इन उलझनों को पार ना कर पायें, तो आप हमेशा-हमेशा के लिये इस मायाजाल में कैद हो जाएं।

इस कहानी में कुछ मनुष्यों के सामने, कुछ ऐसी ही मुसीबतें खड़ी हैं। जरा सोचकर देखिये-

1) क्या हो अगर हमें किसी फूल की पहली पंखुड़ी को पहचानना पड़े?

2) क्या हो अगर आप किसी विशाल कछुए की पीठ पर रखे पिंजरे में बंद हो जाएं और वह आपको लेकर समुद्र की गहराई में चला जाए?

3) क्या हो जब आप छोटे हो कर चींटियों के संसार में पहुंच जाएं? और चींटियां आप पर आक्रमण कर दें।

4) क्या हो जब स्टेचू ऑफ़ लिबर्टी जीवित हो कर आप पर हमला कर दे?

5) क्या हो जब किसान खेत में बारिश की बाट जोह रहा हो? और आपको देवराज इंद्र की भूमिका निभानी हो।

6) क्या हो जब आपके सामने पृथ्वी की रोटेशन रुक जाये? क्या आप पृथ्वी को गति दे सकते है?

7) क्या हो जब आपका टकराव 4 ऋतुओं से हो जाये?

8) क्या हो जब आप किसी वृक्ष में समाकर, किसी ऐसी दुनिया में पहुंच जाएं? जो स्वप्न से भी परे हो।

9) क्या हो जब आपको पेगासस और ड्रैगन जैसे जीवों का निर्माण करना पड़े?

10) क्या हो जब दूसरी आकाशगंगा के शक्तिशाली जीव आपके सामने खड़े हों? और उन पर आपकी पृथ्वी का कोई नियम ना लागू होता हो?


ऐसे ही अनगिनत सवालो का जवाब है यह कहानी। तो आइये इन्हें जानने के लिये पढ़ते हैं, रहस्य, रोमांच, तिलिस्म और साहसिक कार्यों से भरपूर, एक ऐसा किस्सा, जो विज्ञान के इस युग में भी ईश्वरीय शक्ति का अहसास दिलाता है।

तो दोस्तों आईये शुरू करते हैं इस रहस्यमय गाथा को, जिसका इंतजार आप काफी समय से कर रहें है।:

तिलिस्मा- एक अकल्पनीय मायाजाल”

#145.

चैपटर-1

कल्पना शक्ति:
(19125 वर्ष पहले...... माया क्रीड़ा स्थल, माया सभ्यता, बेलिज शहर, सेण्ट्रल अमेरिका)

जैसा की आप पढ़ चुके हैं, मयासुर की पुत्री माया, श्राप के चलते, भारतवर्ष से हजारों किलोमीटर दूर, सेण्ट्रल अमेरिका में आकर बस गई।

बेलिज शहर से 70 किलोमीटर दूर, कैरेबियन सागर में स्थित ‘दि ग्रेट ब्लू होल’ की समुद्री गुफाओं में माया ने अपना निवास स्थान चुना।

एक बार जब माया सागर की गहराइयों से निकलकर, बेलिज शहर के तट पर, सूर्य की सुनहरी धूप का आनन्द उठा रही थी , उसी समय एक प्राचीन अमेरिकी कबीले ‘हांडा’ के एक मनुष्य ‘कबाकू’ की निगाह माया पर जा पड़ी।

माया को देवी समझ, वह माया के समक्ष नतमस्तक हो गया।

माया को यह भोला-भाला आदिवासी बहुत अच्छा लगा।

माया ने कबाकू को हांडा कबीले का सरदार बना दिया और हांडा कबीले के लिये एक नयी सभ्यता का निर्माण किया, जिसे बाद में ‘माया सभ्यता’ के नाम से जाना गया।

माया सभ्यता के लोग माया को देवी की तरह से पूजते थे, पर माया कबाकू के सिवा किसी से मिलती नहीं थी।

माया सिर्फ कबाकू से मानसिक शक्तियों के द्वारा ही बात करती थी।

पूरी माया सभ्यता में हि.म.न्दू देओं के मंदिर बने थे। माया ने अपनी शक्तियों से सूर्य और चन्द्र के विशाल पिरामिडों का भी निर्माण किया।

इन पिरामिडों में खगोल शास्त्र, ज्योतिष और ज्यामिति का ज्ञान भी दिया जाता था।

इन पिरामिडों में माया की सिर्फ आवाज ही गूंजती थी, किसी ने माया को देखा नहीं था।

फिर विभिन्न परिस्थितियों में, माया को कैस्पर और मैग्ना को पालने की जिम्मेदारी मिली।

कैस्पर और मैग्ना 6 वर्ष के हो गये थे, पर इन बीते 6 वर्षों में माया ने दोनों को सिर्फ एक ही चीज सिखाई थी और वह थी योग के माध्यम से कल्पना करना।

दोनों बच्चों का बचपन बिना किसी भय और बाधा के आराम से बीत रहा था।

माया ने इन दोनों बच्चों को विभिन्न परिस्थितियों में साँस लेने के अनुकूल बनाया था।

इन दोनों बच्चों के मिलने के बाद, माया का समय अच्छे से बीतने लगा, पर ऐसा नहीं था कि माया को नीलाभ और हनुका की याद नहीं आती थी।

हनुका के बाल स्वप्न आज भी माया को विचलित करते थे। आज भी वह अपनी इन्हीं कल्पनाओं में खोई हुई थी कि मैग्ना ने उसे झंझोड़कर उठा दिया।

“क्या माँ आप अभी भी कुछ सोच रहीं हैं? आज तो आपने हमें हमारी शिक्षा का पहला पाठ देना था। देखो हम दोनों कितनी देर से आपके स्वप्न से बाहर आने का इंतजा र कर रहे हैं।” मैग्ना ने भोलेपन से मुंह बनाते हुए कहा।

मैग्ना के झंझोड़ने पर माया उठकर बैठ गई। उसने एक नजर अपने बिस्तर के पास खड़े मैग्ना और कैस्पर पर मारी और फिर उन दोनों के बालों में हाथ फेरकर उनके माथे पर एक चुंबन ले लिया।

माया ने 20,000 वर्ष तक कुछ ना बोलने का कठोर प्रण लिया था, इसलिये वह सभी से मानसिक शक्तियों के द्वारा ही बात करती थी।

“तुम लोग तैयार हो, बाहर चलने के लिये?” माया की आवाज वातावरण में गूंजी।

“क्या माँ...हम तो कब से तैयार बैठे हैं, आप ही सोई हुईं थीं।” मैग्ना ने फिर चटाक से जवाब दिया।

“तुझे बड़ा आता है फटाक से जवाब देना।” माया ने प्यार से मैग्ना के कान उमेठते हुए कहा- “एक कैस्पर को देख कितना शांत रहता है और तू है कि पट्-पट् बोलते जाती है।”

“अरे माँ, वो तो तो भोंदू है...उसे तो थोड़ी देर तक कुछ भी समझ नहीं आता।” मैग्ना ने अपना कान छुड़ाते हुए कहा।

“मैं भोंदू हूं...रुक चुहिया अभी बताता हूं तुझे।” इतना कहकर कैस्पर मैग्ना के पीछे दौड़ पड़ा।

माया इन दोनों की शैतानियां देखकर मुस्कुरा उठी।

इससे पहले कि दोनों कोई और शैतानी कर पाते, माया ने लपक कर दोनों का हाथ पकड़ लिया और गुफा से बाहर आ गई।

गुफा के बाहर एक ब्लू व्हेल खड़ी थी। सभी को आता देख ब्लू व्हेल ने अपना मुंह खोल दिया।

माया, कैस्पर और मैग्ना को लेकर ब्लू व्हेल के खुले मुंह में प्रवेश कर गई।

“क्या माँ, कुछ नयी सवारी ले लो, मुझे इस व्हेल के मुंह में बैठना बिल्कुल भी नहीं पसंद।” मैग्ना ने मुंह बनाते हुए कहा- “इसके दाँत देखो...यह तो अपना मुंह भी साफ नहीं करती। छीःऽऽ!”

सबके बैठते ही व्हेल बेलिज शहर की ओर चल पड़ी।

“ऐसा नहीं बोलते मैग्ना, व्हेल को बुरा लगेगा।” माया ने मुस्कुराते हुए कहा।

“मैं तो बड़ी होकर एक अच्छा सा हाइड्रा ड्रैगन लूंगी, जो पानी में तैर भी सके और आसमान में उड़ भी सके।” मैग्ना ने कल्पना करते हुए कहा- “ओये भोंदू...बड़ा होकर तू क्या लेगा?”

“मैं एक ऐसा घोड़ा लूंगा, जिसके पंख हों और पानी में वह समुद्री घोड़ा बन जाए।” कैस्पर ने भी अपनी कल्पनाओं में एक तस्वीर को उकेरा।

“अरे वाह! तुम दोनों की कल्पनाएं तो काफी अच्छी हो गईं हैं।” माया ने खुश होते हुए कहा।

“अरे माँ...हमने आज तक कल्पना करने के सिवा किया ही क्या है?” मैग्ना ने किसी बड़े के समान बोलते हुए कहा- “पिछले 5 वर्ष से हम अभी तक बस कल्पना ही तो कर रहे हैं। मैंने तो अब तक इस भोंदू के सिर की जगह भी, 100-200 जानवरों के चेहरे की कल्पना कर ली है।”

कैस्पर ने घूरकर मैग्ना को देखा, पर कुछ कहा नहीं।

“कोई बात नहीं मैग्ना...यह कल्पना शक्ति ही अब तुम्हारे काम आने वाली है।” माया ने मैग्ना के बालों पर हाथ फेरते हुए कहा।

“कैसे माँ?” मैग्ना ने ना समझने वाले अंदाज में कहा।

“चलो अभी बताती हूं, कुछ देर की बात और है बस?”

मैग्ना ने अभी यह कहा ही था कि तभी व्हेल पानी के बाहर आ गई।

व्हेल ने अपना मुंह खो लकर सभी को बेलिज के तट पर उतार दिया।

तट पर कबाकू पहले से ही खड़ा था। उसके पास 4 सफेद घोड़ों का

रथ भी था।

उसने झुककर तीनों को प्रणाम किया और फिर बोला- “आपके कहे अनुसार आज कोई भी क्रीड़ा स्थल पर नहीं है देवी। क्रीड़ा स्थल पूर्णतया खाली है।”

माया ने सिर हिलाकर कबाकू को आगे चलने का आदेश दिया।

कबाकू ने आगे बढ़कर दोनों बच्चों को रथ पर बैठाया और फिर माया को भी बैठने का इशारा कर, स्वयं आगे कोचवान वाली जगह पर जाकर बैठ गया। माया के बैठते ही कबाकू ने रथ को आगे बढ़ा दिया।

कैस्पर की निगाह तो बस उन सफेद घोड़ों पर ही थी। वह अपलक उन घोड़ों को निहार रहा था, लेकिन यह बात मैग्ना की निगाह से छिपी नहीं थी।

कुछ ही देर में रथ क्रीड़ा स्थल तक पहुंच गया। कबाकू ने रथ को क्रीड़ा स्थल के बाहर ही रोक दिया और क्रीड़ा स्थल का द्वार खोल माया को अंदर जाने का इशारा किया।

माया, मैग्ना और कैस्पर को लेकर क्रीड़ा स्थल के अंदर प्रविष्ठ हो गई। तीनों के अंदर प्रवेश करते ही कबाकू ने द्वार को बंद कर दिया और स्वयं वहीं बाहर बैठकर उन तीनों के निकलने की प्रतीक्षा करने लगा।

क्रीड़ा स्थल किसी विशाल स्टेडियम की भांति बड़ा था। उसमें चारो ओर लोगों के बैठने के लिये सीटें लगीं थीं। इस क्रीड़ा स्थल का प्रयोग विशाल आयोजनों के लिये माया ने ही करवाया था। इस समय उस स्थान पर कोई भी नहीं था।

“सबसे पहले मैं, कैस्पर को सिखाऊंगी।” माया ने यह कहकर कैस्पर की ओर देखा।

कैस्पर ने सिर हिलाकर अपने तैयार होने की पुष्टि कर दी।

“देखो कैस्पर अब मैं जो कुछ भी बता रहीं हूं, उसे ध्यान से सुनना।” माया ने कैस्पर की ओर देखते हुए कहा- “मेरा एक-एक शब्द पूरी जिंदगी तुम्हारे काम आने वाला है।”

यह पाठ मैग्ना के लिये नहीं था, फिर भी मैग्ना सारी बातें ध्यान से सुन रही थी।

दोनों को ध्यान से सुनते देख माया ने बोलना शुरु कर दिया-

“समस्त ब्रह्मांड कणों से बना है और प्रत्येक कण में त्रिकण शक्ति होती है। प्रथम कण धनात्मक, द्वितीय कण ऋणात्मक और तृतीय कण तटस्थ होता है। तटस्थ कण नाभिक में स्थित होता है और वही इन दोनों कणों को बांधे रखता है।

"धनात्मक और ऋणात्मक कण नाभिक के चारो ओर चक्कर लगातें हैं। यह कण वातावरण में भी फैले हैं और हमारा शरीर भी इन्हीं कणों से बना है। हम वातावरण में उपस्थित कणों को नियंत्रित नहीं कर सकते, परंतु अपने शरीर में उपस्थित जीवद्रव्य और जीवऊर्जा की मदद से, अपने शरीर के कणों को बांधे रखते हैं। अब ब्रह्मांड में एक ऐसी शक्ति है, जो इन प्रत्येक कणों को नियंत्रित कर सकती है और वह शक्ति है ब्रह्मशक्ति।

"हां...यह वही शक्ति है जिसके द्वारा ब्रह्मदेव ने ब्रह्मांड की रचना की। उन्हों ने अपनी शक्ति से इन कणों का नियंत्रण किया और ग्रहों के साथ समस्त वातावरण व प्राकृतिक पदार्थों की रचना की। आज मैं तुम्हें उसी ब्रह्मशक्ति का ज्ञान देने जा रही हूं। इस ब्रह्मशक्ति के माध्यम से तुम निर्जीव व सजीव सभी चीजों की रचना कर सकते हो । परंतु ये ध्यान रखना कि इस ब्रह्मशक्ति से उत्पन्न जीव स्वयं की वंशवृद्धि नहीं कर सकते। वह जिस कार्य के लिये उत्पन्न किये जायेंगे, उस कार्य को समाप्त करने के बाद वह स्वयं वातावरण में विलीन हो जायेंगे।

"ठीक उसी प्रकार तुम इनसे जिन इमारतों, भवनों और शहरों का निर्माण करोगे, उनकी आयु भी

निश्चित होगी। हां उनकी आयु को निश्चित करने का अधिकार तुम्हारे ही पास होगा, लेकिन वह तुम्हें निर्माण के समय ही सोचना होगा। अब इसके बाद मैं तुम्हें बताती हूं कि मैंने 5 वर्षों तक तुम लोगों को कल्पना करना क्यों सिखाया?..... ब्रह्मशक्ति के प्रयोग में सबसे विशेष स्थान कल्पना का ही है। जिस समय तुम किसी चीज का निर्माण करोगे, वह सभी कुछ कल्पना के ही आधार पर होगा। जितनी अच्छी कल्पना होगी, उतना ही अच्छा निर्माण करने में तुम सफल होगे। तो कैस्पर... क्या अब तुम तैयार हो ब्रह्मशक्ति प्राप्त करने के लिये?”

कैस्पर ने सिर हिलाकर अपनी स्वीकृति दी।

कैस्पर को तैयार देख माया ने अपनी दोनों आँखों को बंद कर,

अपना दाहिना हाथ आगे कर लिया और मन ही मन किसी मंत्र का उच्चारण करने लगी।

माया के मंत्र का उच्चारण करते ही अचानक से, आसमान में घने काले बादल घिर आये और मौसम बहुत खराब दिखने लगा।

अब बादलों में ब्रह्म.. का चेहरा नजर आने लगा।

तभी आसमान में एक जोर की बिजली कड़की और सीधे आकर माया के फैलाये हाथ पर जा गिरी।

इसी के साथ ही बादल सहित देव.. का चेहरा भी आसमान से गायब हो गया।

मौसम अब फिर सामान्य हो गया था, परंतु अब माया के हाथों में एक पीले रंग की मणि चमक रही थी।

मणि से निकल रही रोशनी बहुत तेज थी।

माया ने अब अपनी आँखें खोल दीं और बोली- “कैस्पर पुत्र...मेरे

साथ-साथ अब हाथ जोड़कर इस मंत्र को तेज-तेज तीन बार दोहराओ।

यह कहकर माया ने मंत्र बोलना शुरु कर दिया- “ऊँ चतुर-मुखाया विद्महे............. तन्नो ब्र...ह्मा प्रचोदयात्।”

कैस्पर ने ..देव के मंत्र को तीन बार दोहराया।

माया ने अब उस पीले रंग की मणि को कैस्पर के मस्तक से स्पर्श करा दिया।

एक तीव्र रोशनी फेंकते हुए वह मणि कैस्पर के मस्तक में समा गई।

कैस्पर घबराकर अपने चेहरे को देखने लगा, पर वहां पर अब किसी भी प्रकार का कोई निशान नहीं था।

“ब्रह्म..शक्ति ने अब तुम्हारे मस्तक में अपना स्थान बना लिया है।”

माया ने कैस्पर को प्यार से देखते हुए कहा- “अब तुम्हारे सिवा इस मणि को कोई भी तुम्हारे मस्तक से नहीं निकाल सकता। क्या अब तुम इसके प्रयोग के लिये तैयार हो कैस्पर?”

“हां...मैं इसका प्रयोग करने के लिये तैयार हूं।” कैस्पर ने कहा।

“ठीक है...तो अब अपने दोनों हाथों को सामने फैलाकर, अलग-अलग दिशा में गोल-गोल लहराओ।” माया ने कहा।

कैस्पर ने ऐसा ही किया।

कैस्पर के ऐसा करते ही वातावरण में उपस्थित कण, हवा में गोल-गोल नाचने लगे।

जैसे-जैसे कैस्पर अपने हाथों को नचा रहा था, कणों की संख्या बढ़ती जा रही थी।

“जब तुम्हें लगे कि अब वातावरण में पर्याप्त कण हो गयें हैं, तो अपने दोनों हाथों से उन कणों को धक्का देकर दूर भेज देना और फिर अपनी आँख बंद करके, किसी भी प्रकार के निर्माण के बारे में सोचना....जब तुम आँख खोलोगे तो निर्माण हो चुका होगा।” माया ने कैस्पर को समझाते हुए कहा।

कैस्पर माया की बात को सुनकर कुछ देर तक हवा में अपने दोनों हाथ हिलाता रहा, फिर उसने एक धक्के से हवा में नाच रहे उन कणों को दूर धकेला और आँख बंदकर कुछ कल्पना करने लगा।

माया और मैग्ना की उत्सुक निगाहें, सामने कणों से हो रही उस रचना पर थी।

उस रचना के आधा बनते ही, माया के चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई।

वह एक शानदार ऊंची कद काठी वाला, सफेद रंग का पंखों वाला घोड़ा था।

कुछ देर तक कल्पना करने के बाद, कैस्पर ने अपनी आँखें खोलीं।

उसके सामने दूध सा सफेद पंखों वाला घोड़ा खड़ा था।

कैस्पर से आँख मिलते ही घोड़े ने हिनहिना कर, अपनी उपस्थिति दर्ज करायी।

कैस्पर मंत्रमुग्ध सा उस विलक्षण घोड़े को निहार रहा था कि तभी वह घोड़ा बोल उठा- “कृपया मुझे मेरा नाम बताएं।”

“तुम्हारा नाम जीको होगा...तुम आसमान में अपने पंख पसार कर उड़ सकोगे और पानी में समुद्री घोड़े का रुप लेकर तैर सकोगे... तुम्हारी आयु मेरी आयु के बराबर होगी। तुम मेरी सवारी बनोगे।” कैस्पर ने घोड़े को छूते हुए कहा।

“जो आज्ञा कैस्पर। क्या तुम अभी मुझ पर बैठकर सवारी करना चाहोगे?” जीको ने पूछा।


जारी रहेगा..........✍️
 
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