Incest Pyaar - 100 Baar - Page 49 - SexBaba
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Incest Pyaar - 100 Baar

अपडेट 201

अवसर (ा)

"इन्दर का फ़ोन था पापा. वो कह रहा है की अभी 2 दिन उसको काम की वजह से बहार रहना पड़ेगा.", शंकर बैठक से बहार निकल कर आँगन में आया था और उसके पिता बगीचे में पौधों को पानी देने के बाद अभी सांस दुरुस्त करने में लगे थे. कौशल्या जी ाँ मुस्कान के साथ बबिता के गाँव जाने वाली थी जिस वजह से शंकर इतनी जल्दी तैयार था. अभी सुबह के 6 हे तोह बजे थे.

"हम्म्म. परसो सुबह तक लौट आएगा या उसके ये 2 दिन कल और परसो समेत है? आज राजू को बोल देता हु की वो घर पर हे रहे. मैं ले जाऊंगा तुम्हारी माँ को उधर राममेहर की तरफ. कुछ काम भी है वह और तेरी परेशानी भी काम होगी ऐसे.", रामेश्वर जी कमीज पहन कर बटन लगते हुए शंकर से भी बातचीत कर रहे थे. रुपाली अपनी दादी के साथ वह नाश्ता ले आयी थी जिसको शंकर जी ने 500 रुपये पकड़ा दिए जैसे ये उसकी जेबखर्ची थी. रुपाली को भी अब झिझक नहीं होती थी जिस तरह से कुछ हे समय में वो पूर्ण सदस्य और Shankar-Rekha की वास्तविक बेटी बन चुकी थी.

"कह तोह रहा है की कल रात तक लौट आएगा पर उसकी रात 8 बजे से सुबह 4 के बीच कुछ भी हो सकती है पापा, आप तोह जानते हे है. वैसे कल आप घर भी देरी से आये और आने के बाद बस आधा गिलास दूध पी कर सो भी गए. सब ठीक तोह हैं न पापा?", शंकर ने आज नाश्ते में रूचि न दिखते हुए पहले अपने पिता के मैं को टटोलना बेहतर समझा. जबकि हमेशा की तरह आज भी जवाब दोनों की प्लेट लगाती कौशल्या जी ने हे दिया.

"मुझे आजतक ये समझ नहीं आया की क्यों ये अपने दादा जी के स्वर्गवास वाले दिन ऐसे हो जाते है.? कल उनकी पुण्यतिथि थी शंकर और ये ऐसे दिन भी घर में उनके लिए कोई पूजा पथ हे नहीं करवाते. नाम हे ले लेना चाहिए जी काम से काम. आज बीटा पूछ रहा है तोह इसको हे जवाब दे दो नहीं तोह कल को अर्जुन पूछने लगा तोह आपके नहीं बताने से वो पहोच जाएगा आपके दादा की भी माँ की कोख तक ये पूछने की क्या वजह है.", कौशल्या जी के जवाब पर आज पहली बार था की पंडित जी मुस्कुराये नहीं थे.

"रहने दो न माँ, क्यों सुबह सुबह इस बात को खिंच रही हो. हमने तोह देखा भी नहीं पापा के दादा जी को तोह क्या फरक पड़ता है जब जानकारी हे न हो. होगी कोई वजह या पापा दर्द बांटना नहीं चाहते होंगे.", शंकर को अपनी पैरवी करते देख रामेश्वर जी ने अपनी ख़ामोशी भांग की.

"अब तुमने तोह उन्हें देखा नहीं जो हमारे पिता के भी पिता थे लेकिन हम अपने हे पिता को नहीं समझ पाए कभी. हाँ उनके जैसे हम कभी नहीं बन सकते क्योंकि वो घर की देहलीज से बहार निकलते हे सभी को एक सामान देखते थे, फिर चाहे गली में हम हे क्यों न दिख जाए. मुंशी जी वही jawaab-sawaal कर लेते थे. ऐसा नहीं है के हमारे पिता कठोर थे या ज़िद्दी, वो नरमदिल इंसान थे. हमारे दादा जी का देहांत नहीं हुआ था, बल्कि उनकी हत्या कर दी गयी थी और इसके परिणाम स्वरुप कोई आधा दर्जन शक्क में आने वाले अपनी जान गँवा बैठे. दादा जी की लाश को घर तक भी नहीं लाया गया था और नदी किनारे हे आज के दिन बस संस्कार कर दिया. मैं तोह था भी नहीं वह और न हमारे पंडित जी ने इसकी सूचना तक भिजवाई. पूछने पर माँ ने हे बताया की अपराधबोध है हमारे पिता को जो उन्होंने पंडित हो कर अस्त्र उठा लिया. लेकिन अब हो गया जो होना था पर पिता का पिंड, श्राद तोह दूर की बात है तस्वीरें तक हटा दी अगर वो कही थी भी. लोग हर घर में मरते है पर क्या हम वह टाला जड़ दे? इन्दर ने यही किया था क्या? हवेली पर रघुवीर ने तोह न पहरेदार बिठाये पर ये हमारे पंडित जी जाने किस आत्मग्लानि में फंस गए जो दादा जी की हर निशानी दूर कर दी. हम अपने पिता पर संदेह नहीं कर सकते शंकर. वो सचमुच dev-aatma थे जिनके लिए एक नवजात प्राणी और बुजुर्ग में कोई फरक नहीं था, सेवाभाव दोनों के लिए. जो व्यक्ति हर जीवन का महत्व स्वीकारता हो, वो कैसे इतनी जान ले सकता है? और फिर उसके पश्चाताप में अपने हे पिता से दूर होना? हमे घर में नाम लेने और पूजा पथ की मनाही थी दादा जी की पर घर से बहार हम कर सकते है. हाँ कोई भी स्त्री वैसा नहीं कर सकती इसलिए बचे तोह बस मैं और पिद्दी. वो लाडला भी था उनका चाहे मुझे मेरे दादा अँगरेज़ बोल देते थे गुस्से में लेकिन स्नेह मेरे साथ भी था. अब वजह बता दी भगवान तोह रोटी भी खिला दो?", रामेश्वर जी थे थोड़े गंभीर हे अभी लेकिन कौशल्या जी मंद मंद हंसती हुई उन्हें खाना परोसने लगी.

"बड़ा अजीब फैंसला था उनका और क्या यही वजह है की वो अपनी भी तस्वीर के खिलाफ थे? उधर भी उनकी फोटो नहीं लगी, सिर्फ दादी की है और यहाँ तोह दादी की भी नहीं.", शंकर के सवाल जैसे आज हे शुरू होने थे.

"जा के पूछ ले बीटा तू हे उनसे. तू स्कूल जाने लगा था तब तक वो मेरे कान खिंच देते थे की ये कैसे कर दिया? वो चीज वह से क्यों उठाई? तू इन्दर को समझाता नहीं थोड़ा भी. मैं करता हु क्या तुम्हारे साथ कुछ ऐसा? और वो तोह बड़े थे फिर उन्होंने ये बात न कही इन्दर से. ब्याज ज्यादा प्यारा होता है और उसके बदले बेटे की खिंचाई कर लो."

"आप भी यही करते हो थानेदार साहब. अक्सर बेटे बाप पे हे जाते है.", कौशल्या जी के तंज से अब शंकर भी हंसने लगा था. उसके पिता बहोत काम बार हे ऐसे खीजते देखे थे उसने.

"अरे भगवान, मैं उनके साथ ज्यादा रहा नहीं और जो रहा वो पिद्दी का पिद्दी रह गया. रघुवीर हे बढ़िया था जिसकी एक समय तक उनसे दोस्ती भी हो गयी थी. और इस शंकर ने बड़े झंडे गाड़ दिए. बीटा बाप पे जाता है लेकिन इसने तोह जो औलाद भी पैदा करि वो भी मेरा बाप. मेरी जवानी तक पंडित जी सवाल करते रहे और बुढ़ापे में सोचा था चैन से रहूँगा लेकिन उन्होंने तोह ठान लिया था के चैन नहीं लेने दूंगा. भेज दिया अर्जुन, जो उनके सवाल रह गए होंगे उन्हें ये पूछ पूछ के बचा खुचा चैन ले लेता है. चाय हे पीला दो एक कप कौशल्या.", पंडित जी ने रोटी से पहले हे हाथ रोक दिए.

"हाँ ये तोह आपने आज सच बोल हे दिया. इसलिए कई बार गुस्से में उसको 'मेरे बाप' बोल देते हो और वैसे बात उसकी आ जाए तोह फिर किसी की सुनते भी नहीं हो. हम सबको तोह लगता था के बस दादा पौटे का प्यार है, पर देख ले शंकर आज इन्होने वजह बताई की वो कितना ख़ास है इनके लिए.", माँ बीटा हंस रहे थे और उनके साथ इस बार रामेश्वर जी भी.

"कौशल्या, अम्मा जी एक गल्ल कई वरि केहन्दी हुंडई सी. इंसान दुनिया विच जे अपने दिन लिखवा के आया है तह ोसडा एक हिसाब जरूर रेह्न्दा. ओह जे सुकून विच दुनिया तोह नहीं जांदा ताः ोस्डे मकसद न पूरा कारन लायी, ऊपरवाला किसे ोस्डे हे अपने न वापस भेजदा है दुनिया विच.' मैं मानता नहीं था इस सबको और आज भी इस यकीन नहीं है. बस अम्मा जी कहती थी क्योंकि ऐसा उनका विश्वास था और मुझे ये याद रहा. अर्जुन को देख कर बस उन दोनों की याद आ जाती है. जब बचे में maa-baap हे दिखने लगे तोह फिर कैसे मैं उसको अनदेखा कर दू.? और तुम्हे भी इस बात पर थोड़ी ज्यादा आजादी भी मिली है शंकर. अब तुम माँ बेटो का santri-mantri खेलना हो गया हो तोह 2 निवाले खा सकता हु?", रामेश्वर जी के इतने बेमिसाल जवाब पर कौशल्या जी निरुत्तर हे हो गयी. उनके पति ने जैसे उनकी भी आस्था का सम्मान किया था अम्मा जी वाली बात बता कर और मजाक में हे शंकर को भी चेता दिया की वो बहोत कुछ जानते है लेकिन अब उसको ज्यादा टोकते नहीं. अब गरमा गरम नाश्ते के साथ baap-beto की साधारण सी चर्चा चलती रही और अलका ने अपनी बात हो जाने के बाद कौशल्या जी को टेलीफोन थमा दिया था. अर्जुन उनसे इतनी सुबह हे तोह बात करता था आजकल. और शंकर जैसे ऐसे हे एकांत की प्रतीक्षा में था अपने पिता के समीप.

"इन्दर ने कुछ और भी बताया है मुझे पापा और मुझे लगता है हमको इस बारे में चर्चा करनी चाहिए. अब मुझे भी लगता है की वो दरगाह वाले अखाड़े में बात सिर्फ कुश्ती की हे नहीं है और उसमे कुछ प्रावधान भी है, बहोत ख़ास.", शंकर की बात से रामेश्वर जी ने हमेशा वाला अंदाज हे दिखाया, सहमति में सर हिलना बस.

"वह तोह यही कहा गया था की ये बस 5 बड़े गाँव और उनके भीतर आने वाले 10-11 छोटे गाँव तक हे ये सिमित रहता है. मतलब बस साधारण पहलवान जो इन्ही चुनिंदा गाँव से वास्ता रखते है वही दंगल में भाग ले सकते है, वो भी जैसा नियम है 2 का 5 या उसका उल्टा.", शंकर के जवाब में जो सवाल था उसको सुन्न कर रामेश्वर जी ने पहले अपने हाथ उस साफ़ टोल्ये से पहुंचे और चाय की घूँट लेने के बाद अपने बेटे की तरफ देखा.

"कोई भी व्यक्ति जो raj-darbar में सेवक या ओहदे पर हो या कभी रहा हो, वो चुनौती पेश कर सकता है अकेले हे. फिर सामने हम हो या अर्जुन, उसको चुनौती उठानी हे पड़ेगी. पर ऐसा हमने सिर्फ 2 बार हे होते देखा है वो भी तुम पैदा नहीं हुए थे या कहो हमारी शादी भी नहीं हुई थी. पहली बार तोह हम स्वयं 10-11 बरस के रहे होंगे और ये दरगाह वाला मेला ऐसा नहीं होता था जैसा गाँव बन्न ने के बाद सन्न 1949 से दिख रहा है. तब दूर दराज से भी प्रतिष्ठित लोग, बड़े हुकुमरान आते थे और दृश्य अलग रहता था. जान भी ली जा सकती थी जिसको स्वयं पिता जी ने नियम में बदला. हाँ तोह हम कह रहे थे की 10 बरस से कुछ ऊपर रहे होंगे जब अखाड़े में suraksha-pramukh ने पिता जी को हे चुनौती दे डाली थी. ये जानते हुए भी की वो दंगल नहीं करते. पर उन्हें मैदान में उतरना पड़ा था और तभी हमने देखा थी की क्यों उन्हें बापू जी भी कहा जाता था. उसके बाद हमने 2 बरस मेले में भाग लिया, प्रशिक्षण जांचने के लिए पहली बार और दूसरी बार हमारे रक्त की वजह से. संरक्षक का परिवार चुनौती उठा सकता था और दे भी. संयोग से जिन sena-pramukh ने पिता जी को चुनौती दी थी, ये उनके हे छोटे भाई थे, दूसरी माँ से. रघुवीर थोड़ा सनकी था जिसने वीर सिंह के साथ उसकी टोली को हे बुलवा लिया अखाड़े के भीतर. 5-2 का रिवाज ऐसे शुरू हुआ था लेकिन बस एक हे साल चला क्योंकि रघुवीर कायदे काम हे मानता था. फिर पाबन्दी लग गयी थी हम दोनों पर हे. सुना है के पहले खुली चुनौती होती थी और अखाड़े में खड़ा चाहे विजेता हे क्यों न हो, हुंकार भरी है तोह raj-darbar से ताल्लुक रखने वाले किसी भी व्यक्ति का सामना करना हे पड़ेगा. यही वजह थी की हमने इन्दर को उस दिन सजा दी थी. गनीमत समझो की इन्होने ढोल नहीं बजवाये थे और बात उतनी दूर तक जाने से पहले ये अखाड़े से निकल आये. कोई आ जाता तोह बात गरम हो जाती? सुरक्षा प्रमुख अक्सर इसके लिए तैयार रहते थे.", पूरा विस्तार से वर्णन करने के बाद अब वो शंकर को देख रहे थे जैसे मैं को टटोल रहे हो उसके. आखिर कोई तोह ऐसी बात होगी जो शंकर ने ये जीकर किया या नरिंदर का सन्देश सुनाया.

"ढोल तोह इस बार भरपूर बजे है जिनकी आवाज हिमाचल तक भी जा पहुंची. इन्दर वही गया है किसी काम से और उधर भी कोई छोटा मोटा घराना है या संपत्ति के देखभाल वाले लोग. आप अब क्या कहेंगे अर्जुन की इस बेवकूफी को? क्या माँ उतनी हे खुश रहेगी वह उम्मीद से अलग होने पर?"

"वो बेवकूफ होता तोह घर बैठ कर सवाल करता शंकर या हमारी तरह हाथ पर हाथ रखे कभी बगीचे तोह कभी बाकी दोस्तों में समय बर्बाद करता. वो पिछले हे साल उतर सकता था उस अखाड़े में जैसा नियम है पर वो इस बार गया और उसने ये घोषणा भी समय से पहले हे करवाई की पंडित अर्जुन शर्मा, क्सक्सक्सक्स ग्राम प्रमुख ये चुनौती उठा रहा है. कोई रोकने आना चाहे तोह रोके. इन शब्दों का मतलब समझो शंकर. वो उन्हें हे ललकार रहा है जो अब हैं हे नहीं और अगर कोई भुला बिसरा सामने निकला भी तोह इस अश्वमेध के अर्जुन रुपी अश्व को थाम न सकेगा. हमे चिंता किस बात की थी अगर ये सिर्फ अखाडा हे होता? तुम्हारी कही बात को जानते हुए हे हम असहज थे लेकिन तुम्हारी माँ ने सही कहा की उसके फैंसले का आदर करना चाहिए. और हम अब कर भी रहे है क्योंकि बदल तोह सकते नहीं."

"तोह आप मानते है की आपने उसको वसीयत और अधिकार दे कर कुछ गलती की है? वो नासमझ है और अगर एक प्रतिशत भी ऐसा हुआ की सामने दरदबार से हे कोई टकराने आ गया तोह बात हाथ से भी जा सकती है."

"लगता है तुम्हे हिंदी समझ नहीं आती शंकर. हम पिता जी की वसीयत के कभी भी हक़दार थे हे नहीं, सिर्फ प्रतिनिधि थे. उन्होंने ये वसीयत ऐसे बनी थी जैसे मकड़ी का जला हो कोई. मैं और रघुवीर इसमें सामान अधिकार रखते थे, गवाही तुम्हारे चाचा कृष्ण की थी और तस्दीक खुद महल के पमुख करेंगे की वारिस इस लायक है भी या नहीं. इसमें एक हस्तक्षेप का अधिकार वारिस की माता का भी रखा गया था क्योंकि पिता जी के लिए माँ शब्द की हे परिभाषा भगवन से बढ़ कर थी. जिस वजह से पहले इसमें कौशल्या और पूर्णिमा भाभी का नाम था इक़बालनामा देने के लिए जो तुम्हारी माँ ने रेखा बहु का करवा दिए 4 नालायक और एक maha-nalayak देखने के बाद. तुम उन 4 में हे हो बीटा, वो maha-nalayak सबसे छोटे वाला विनोद है. कोई भी पिता जी और महल की शर्तो पर खरा नहीं उतरा और अर्जुन 13 की उम्र में हे रघुवीर से ये हक़ ले गया. कृष्ण ने तोह पहले हे उस करारनामे पर दस्तक किये है जैसे उसको खुद जल्दी हो की वो मुक्त हो कर अपने खेतो में चिपका रहे. तुम्हारी माँ ने सुशीला की घर वापसी पर हे रेखा से बात करके उसकी सहमति ले ली और हमे खुद रानी सौंदर्य का सन्देश मिला की वो अर्जुन से प्रभावित है और कुछ सवाल चाहती है उस से करने लेकिन पहले मैं वसीयत पे अपनी सहमति दे कर इसकी पुष्टि कर दू. मुझे करना पड़ा वैसा.", शंकर का तोह दिमाग हे काम करना बंद हो गया इतने लम्बे चौड़े नियम और वसीयत की उलझी सी शर्ते सुन्न कर.

"और फिर उन्होंने बात करने से पहले हे मोहर लगा दी? वो है हे कितना बड़ा पापा और चलो समझदार है ये मैं मानता हु लेकिन जिम्मेवारी? इतनी बड़ी जिम्मेवारी सँभालने लायक नहीं है अभी वो."

"दे कौन रहा है उसको जिम्मेवारी? जब तक वो 25 का नहीं हो जाता वो उस वसीयत और उस से होने वाली आमदनी का एक पैसा भी अपने ऊपर नहीं खर्च सकता. हाँ उसको कुछ अधिकार मिल गए है चौपाल में बैठने के, छोटी मोती सजा देने और मामले सुन्न ने के. महल तक बात करने जा सकता है अगर कुछ परेशानी हो गाँव के विकास में. संरक्षक हम हे है उसके फ़िलहाल."

"बहोत सही बात कही आपने. ये फैंसले छोटे मोठे है और जब अधिकार मिलेगा तोह क्या वो महल में जा बैठेगा?"

"हो सकता है, मैं इस पर क्या टिपण्णी दू. जैसे नियम बनाये गए थे उन्हें बस अर्जुन हे पूरा कर पाया और रही बात छोटे होने की तोह वो 8 कक्षा में हे तुम्हारे गज्जू और अपने गुरु को पटखनी दे चूका है. रिश्ता भुला कर कभी अभ्यास करना चाहो तोह यकीन दिलाता हु वो बंद नस्से खोल देगा तुम्हारी. हमारे पिता जी की पीठ जीवन भर कोई मिटटी पर न टिका सका और इसकी भी नहीं टिकने वाली, सामने कागज़ और कलम पड़ी है.", रामेश्वर जी का ये अभिमान था या अर्जुन पर खुद से भी अधिक भरोसा, लेकिन था बेजोड़.

"सामने कागज़ और कलम से क्या होगा?"

"लिख लो भाई हमारी बात को. कल हम न रहे तोह भी तुम्हारे पास सबूत होगा के हम झूठ नहीं बोले थे. वो जब जब घुटने टिका कर सांस भरेगा, सामने वाला जितना बड़ा दैत्य हो फिर अपने पाँव पर खड़ा नहीं रहने वाला. चलो आज के लिए बहोत हो गयी chanda-mama और बेताल कथा. जा कर अपना काम धाम देखो, मैं रिटायर्ड हुआ हु लेकिन काम मुझे भी बहोत है. फिलहाल तोह ड्राइवर की नौकरी मिली है कुछ घंटे की.", रामेश्वर जी भोजन करके अब उठ चुके थे और उन्हें ज्यादा दिलचस्पी अपने पौटे की आवाज सुन्न ने की थी जहा दादी पौटे जाने किस बहस में लगे थे. शंकर भी कलाई घडी में समय देखते हुए भीतर चल दिया. अपनी बीवी के शयन कक्ष से इस मासूम को सुस्त चाल में निकलते देख पहले तोह उसको माथे पर प्यार दिया और फिर खुद कमरे में चले गए. ऋतू अभी और सोना चाहती थी इसलिए दादी के कमरे की तरफ बढ़ गयी.

"आप? नाश्ता लगवाओ आपके लिए? बस कमरा सही करवाया है अभी कोमल से और ऋतू नहाने गयी है.", रेखा खुद भी जैसे नहाने के बाद पूजा करके फारिग हुई थी अभी अभी. कमरे में हे रहना होता था इसलिए साड़ी बदल कर एक साधारण से आधी ब्याह के सूती गाउन में खुद को समेटे थी. जाने क्या राज था इस बेमिसाल ख़ूबसूरती का जो इस व्यथित पल में भी स्फटिक सी चमकती बरकरार थी. अपने पति को सामने देख बिस्टेर से तकिये ठीक करके वो किनारे पर हे बैठ गयी. सामने वाली मेज के करीब राखी कुर्सी पर खुद शंकर जी.

"नहीं, मैंने पापा के साथ कर लिया है और अब निकलने हे वाला हु काम पे. तुमसे कुछ जरुरी बात करनी थी, बाद में पता नहीं याद रहती या नहीं."

"अब जरुरी बात तोह बाद में भी याद रहेगी नहीं तोह फिर जरुरी कैसे हुई जी?", रेखा ने तोह जैसे उन्हें बात शुरू करने से पहले हे भेदना शुरू कर दिया जिस पर वो अनमने ढंग से मुस्कुराये जैसे फ़िलहाल ये उपहास का वक़्त नहीं. दरवाजा बैठे हुए धकेल कर बंद करने के बाद उन्होंने वो जरुरी बात प्रारम्भ की जिसको शायद भूल भी सकते थे.

"हमारी खेती और बगीचे वाली साड़ी जमीन की संरक्षक तुम हो, माँ की तरफ वाली की कोमल, तुम्हारे पिता जी की तरफ से भी तुम, इधर वाले गाँव की संजीव के और किराया देने वाली प्रॉपर्टी पर कृष्णा लेकिन सभी में मालिक अर्जुन हे है. और तुम्हे तोह पता होगा की अब वो गाँव की पूरी वसीयत का भी मालिक है जिसमे एक संरक्षक तुम हो? मुझे इस से लेना देना नहीं की उनका मालिक अर्जुन बना है, बस ये समझ नहीं आ रहा की 80% तुम्हारे संरक्षण में क्यों कर हुई? कोई जवाब नहीं देने वाला मुझे इसका सिवाए तुम्हारे.", रेखा इस सवाल से हलकी सी गंभीर हुई जैसे उसको इसकी उम्मीद हे नहीं थी. आज लगा था के वो उसका हाल पूछने आये है और कल साथ नहीं जा पाने का कारण देने आये होंगे.

"मैंने कभी सवाल नहीं किया जी इस मामले में और पहले ये 20 हे था जिसमे खुद कृष्णा दीदी और संजीव के साथ छोटे पिता जी ने उनकी तरफ से अर्जुन के नाम कर दिया और उसको कुछ हो जाए या वो गलती करे तोह मैं सब वापिस ले सकू क्योंकि मैं उसकी माँ हु और सबको लगता है ऐसा करने से मेरी नजर हमेशा रहेगी अर्जुन पर. मैं हर महीने पूरा ब्यौरा माँ जी को नियमित देती हु एक एक पैसे का और उसके हिसाब से हे सभी के खाते में पैसे भी डलवाती हु, अर्धवार्षिक कमाई वाले भी. हाँ ये काम थोड़ा सा पेचीदा लगता है लेकिन मुझे परेशानी नहीं होती.", रेखा के सरल और स्पष्ट जवाब से के बार को तोह शंकर जी संतुष्ट हो गए पर फिर गाँव वाली बात वापिस उभर आयी.

"लेकिन तुम्हे 8-9 बरस पहले हे पापा ने दादा जी की वसीयत में महत्वपूर्ण सदस्य बना दिया था जो तुमने मुझे बताया हे नहीं. जानती हो न की उसमे सबसे ज्यादा अधिकार अगर कोई रखता है तो वो तुम हो? तुम्हारे बस एक सिग्न से वो काम से काम गाँव को जायदाद किसी के भी नाम हो सकती है और अगले 7 साल तक अर्जुन की सहमति भी जरुरी नहीं ऐसा करने के लिए? वह का भी अकाउंट तुम्ही देखती हो?"

"हाँ मैं हे देखती हु लेकिन उसका हिसाब पिता जी करते है क्योंकि खर्च उस हिसाब से हे गाँव की जरुरत पर होता है, बाकी बची राशि बैंक में सुरक्षित रहती है. सबसे ज्यादा धनराशि उन्ही 2 बैंक खातों में है जिसमे से अर्जुन या बेहतर कहु की मेरे पास 20% व्यक्तिगत के तौर पर है. उसमे सिर्फ जमा हे होते रहे है आजतक, एक पैसा भी नहीं निकला गया.", रेखा भी जैसे इस वक़्त किसी सुलझे हुए अधिकारी की तरह जवाब दे रही थी. शंकर को भी पता था के वो जितनी पढ़ी लिखी है उस से ज्यादा अनुभवी और समझदार है.

"अर्जुन के लिए राजी सिर्फ इसलिए हे हुई थी की इतना सबकुछ उसको मिल रहा था? या तुमको? देखा जाए तोह अब तुम अपने घर और यहाँ के साथ साथ गाँव में भी सबसे ऊँचे स्थान पर हो."

"ये मेरा घर है और वो पीहर है. सोने की थाली में भी इंसान भूख से ज्यादा नहीं खा सकता और उतनी हैसियत तोह रही होगी न मेरी अपने पीहर में? आप तोह बेहतर जानते है क्योंकि मैं वह साल में 2 बार जाती हु लेकिन आप हफ्ते में एक बार हो हे आते है. मुझे ताक़त नहीं एक जिम्मेवारी सौंपी गयी है जिसमे सभी को उनका हक़ नियमित रूप से मिलता रहा और अर्जुन को मालिकाना हक़ भी इसलिए दिया गया है क्योंकि ये उसकी चाहत नहीं थी कभी. वो सबसे एक सामान प्यार करता है और स्वयं से पहले बाकी सभी को उनका हिस्सा देने के बाद जो उसके पास बचता है वो आधा मेरे और बाकी आधा आपके बचत खाते में जिसको आपने के बार भी नहीं देखा. हाँ उसके पास और भी कमाई आती है और मैं उस से नहीं पूछती की वो मंजू को कितने देता है, मेनका का क्या खर्चा बंधा है और किनके बचो को शिक्षा और ख़ुशी दे रहा है. वो हर महीने कागज़ जरूर दे रहा है मुझे पिछले 4 महीनो से लेकिन मैंने एक बार भी नहीं देखा. आप ऊँचे स्थान की बात कर रहे है लेकिन असलियत में यहाँ ऊंच नीच मिटा कर हे ये सब प्रबंध किये गए और देखा जाए तोह स्थान आपका हे ऊपर है.", रेखा के तर्क के सामने शंकर बेबस हो चूका था क्योंकि अनजाने में हे एक बार फिर से उसने अपनी बीवी के सम्मान पर हमला किया था लेकिन वो कभी उकसाने पर भी बुरा नहीं मानती थी.

"अर्जुन को खतरा है, ये जानते हुए भी तुमने उसको इस सबमे पड़ने दिया.? तुम्हारी एक ना उसको बचा सकती थी रेखा."

"उद्देशःया में ना नहीं किया जाता, शामिल होना पड़ता है. जैसे सही राजा सिंहासन पर नहीं बैठाया जाता, जमीन से अवगत करवाया जाता है जिस से वो अपने करम निष्ठां से निभा सके. ठीक वैसे हे अर्जुन अभी सही शिक्षा हे प्राप्त कर रहा है. और खतरा तोह कब नहीं था? मंदिर ले जाते हुए एक बरस के उस बचे को भी था और घर से दूर 10 बरस वाले चिंतित लड़के को भी. वैसे भी मैंने अर्जुन को सिर्फ जन्म दिया है, उसके mata-pita वही है जो आपके है. जो हमसे बेहतर जानते है की अर्जुन के लिए क्या सही है क्या गलत. आप उनसे चर्चा कर सकते है. चाय पीयेंगे?", ये इशारा था की अब आप जा सकते है.

"आपका रुमाल.", रेखा ने उठ कर साफ़ रुमाल उनकी तरफ बढ़ा दिया था. बाकी सब तोह उन्ही के पास था पहले से. लेकिन शंकर आज इस बातचीत से जरूर खुद पर गुस्सा था. वो जिस तरह से बात करना चाहता था अक्सर हो कुछ और हे जाता था. अर्जुन के अतीत वाले पहलु हमेशा हे उसको अफ़सोस करवा जाते थी उस दौरान वो क्यों उसकी सुरक्षा के लिए नहीं था लेकिन दूसरा पहलु भी था जब वो अर्जुन से परेशां हो जाता था. मधु और उसके बीच भी कही न कही अर्जुन हे व्यवधान था लेकिन क्या उसमे अर्जुन की गलती थी? कार में बैठने से पहले हे शंकर ने बिना पानी के वो 2 गोलियां हलक से निचे उतार ली. सर दुखने से पहले हे वो इलाज कर लेना चाहता था क्योंकि दिन सही से शुरू भी नहीं हुआ था आज.

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"दिल लग गया है न बीटा यहाँ पर? माफ़ करना थोड़ा सा व्यस्त होना पद रहा है, कुछ दिन जमीन और काम से दूर था तोह.. समझ हे सकते हु की जमींदारी कितनी जरुरी है जब काम इतना अधिक हो तोह.", नाश्ता यहाँ हवेली पर भी अधिकतर लोगो का हो चूका था और अब आँचल तैयार होने गयी थी तोह अर्जुन अपने छोटे दादा के साथ बातों में लगा था. बात तोह दोनों ने पहले भी की थी लेकिन उसका विषय सामाजिक नहीं था. आज अनामिका चची तोह एक बार भी इनकी तरफ न आयी थी सिवाए अर्जुन जब तैयार हो रहा था तोह उसका रुमाल, बटुआ और घडी पकड़ने के. दोनों ने सुबह की मीठी मुलाकात वही कर ली थी अपने कमरे में.

"दिल लगाने के लिए किसी के पास टाइम होना जरुरी है पापा और अर्जुन तोह इस मामले में जैसे आप और ताऊजी पे हे गया है. आपकी तरह ये साहब भी कब घर आते है कब बहार रहते है, कुछ पता नहीं चलता. अभी देखलो ये शहर जाने लगा है वो भी बेमतलब ऐसे हे काम से और आँचल तोह जैसे तैयार हे रहती है.", दामिनी ने अपने पिता को चाय पकड़ते हुए अर्जुन पर तंज़ कैसा तोह उसने बस सर झुका लिया.

"पता है मुझे की ये दीपा बहु की बिटिया के दाखिले के लिए जा रहा है और हमारी आँचल भी इसके साथ जा कर अपनी किताबे लेके आ रही है जिस से पढाई पर असर न पड़े. क्या आपत्ति है तुम्हे इसमें? साथ जाना चाहती हो तोह चली जाओ, बहु और बाबू को भी ले जाओ. घूम लेना थोड़ा बाजार इस बहाने.", अब जो सुझाव उन्होंने दिया था वो अर्जुन को जरा भी मंजूर न था जिसमे उसने नजरे उठा कर अपने दादा को देखा जो मुस्कराहट से हे उसको आश्वस्त कर रहे थे.

"जब जाना होगा तब मैं खुद चली जाउंगी. आँचल अकेले जा रही है तोह फिर मैं क्यों सबके साथ अपना प्रोग्राम बनाऊ? और बिनोदि आएगा तोह उसकी गाडी में जाउंगी मैं, इन खतरा में न बैठने लगी. तुम्हे चाय चाहिए छोटे प्रधान जी?", दामिनी उखड़ी हुई थी बुरी तरह और वजह भी अर्जुन की करतूत हे थी जो उसको हर बार ज्यादा सताए जा रहा था.

"आपको अभी मेरी पसंद नापसंद सही पता नहीं चली बुआ. मैं चाय नहीं पीटा और नाश्ता करने के बाद तोह अगले 2-3 घंटे कुछ खता भी नहीं. वैसे आज समय से घर आ जाऊंगा, अपनी शिकायते एकत्रित कर लीजिये इतने. चलता हु दादा जी.", अर्जुन ने खड़े होने पर कमीज के बल सही किये और धुप वाला चस्मा आँखों पर लगते हुए मोटरसाइकिल की तरफ बढ़ गया. सेवक ने हे उसको धोने के बाद ाचे से चमकाया था और आँचल भी कासी हुई कुर्ती के निचे पटिआला सलवार पहन कर do-ranga दुपट्टा सर और गले में सही करते हुए दोनों पाँव एक तरफ करती हुई पीछे बैठ गयी. दामिनी से तोह जैसे ये देखा हे न गया जिस तरह से उसकी बेटी ने उसके सामने हे अर्जुन की कमर में एक हाथ लपेट लिया था. बैठी वो सभ्य तरीके से हे थी और उनके बहार निकलते हे वो बड़बड़ाती हुई अपने कमरे की तरफ चली गयी. उसका गुस्सा और kaam-jwar इतना अधिक बढ़ चूका था की ऐसे वक़्त में वो किसी को भी अपने ऊपर चढ़ा लेती पर फिलहाल उसके जेहन में सिर्फ अर्जुन था जिसको वो आज रात हर हाल में पाना चाहती थी. शायद अर्जुन भी इशारा दे गया था के वो भी कदम बढ़ने को तैयार है. अर्जुन इस खिली सुबह मुस्कुराता हुआ दीपा भाभी के घर के सामने पहुंच चूका था. और वो भी पहले से हे बहार कड़ी किसी महिला से बातचीत में व्यस्त थी. अर्जुन की मोटरसाइकिल रुकते हे उस महिला ने भी नजर घुमाई तोह कुछ आश्चर्य और अधिक ख़ुशी से वो खुद हे उसकी तरफ लपकी.

"मेरा सोहना पट अपने पिंड आया होया ते मेनू स्नेहा तक नई दित्ता.?", ये थी जगतार भाई की माता जी, जीने गाँव में कोक्की भें जी के नाम से बेहतर जाना जाता था. दीपा भाभी के साथ आँचल भी उनसे कुछ दुरी पर कड़ी हैरान हो रही थी जैसे उन्होंने अर्जुन को अपने सीने से लगाने के बाद उसके बालो को सहलाते हुए आशीर्वाद दिया. अर्जुन तोह उनके पाँव छूने की कोशिश में था इस से पहले.

"अब आपने भी तोह नहीं बताया की आप इधर आणि वाली है? कुछ कमजोर लग रही है आप, सफर के बाद घर रुकना नहीं हुआ होगा न ज्यादा?"

"दिल हे नहीं लग्न था अभी कुछ दिन उधर. ऊपर से जसलीन ने जग्गी को बता दिया की तू इधर आया हुआ है तोह वो सवेरे गुरुघर के बाद गद्दी उठा के सबको हे इधर ले आया. फिलहाल तोह सोये पड़े है दोनों भाई और जसलीन अपने दादा जी का दमाग खाने में लगी है. ये दीपा है, पिंड की सब्सि प्यारी बहु है और मुझे भें जी से ज्यादा सैस डा सम्मान डंडी है.", दीपा भाभी का तोह आजकल हर व्यक्ति परिचय देता था जबकि ये दोनों कही बेहतर जानते थे एक दूसरे को.

"जेउस से तोह मिलने आना हे पड़ेगा आंटी जी और ये भाभी जी हे वजह है के आपसे मुलाकात हो गयी. इनके हे पास आ रहा था निम्रत का फॉर्म लेने के लिए, लास्ट डेट है न उसके एडमिशन की और दीदी की बुक्स भी लेके आणि है वह इनके घर से. दोपहर को आता हु आपके हाथ का खाना खाने और जग्गी भैया की भी आप थोड़ी खिंचाई कर देना बस दिखावे के लिए.", अर्जुन की बात सुन्न कर आंटी जी भी हंसने लगी और दीपा भाभी ने पैसे और फॉर्म उसकी तरफ बढ़ा दिए. चेहरे पर उनके भी मुस्कान थी, धन्यवाद या शायद कृतज्ञता की. सोच रही होंगी की देखो इस लड़के को खुद हे अपने आपको खाने पर आमंत्रित कर लेता है.

"ध्यान से जाना और दार जी ने जीकर तोह किया थे कोई खाने पर आने वाला है दिन में लेकिन नाम नहीं बताया था. तोह उनके छोटे पंडत तुम्ही हो? कोई नई पुत्तर जी, आया जे. दीपा, तनु न कहना पावे हुन्न, घरे टेम दे नाल आ जाई. मंजे वाली न मैं बोल के हे इत्थे आयी है. जग जग जिए मेरा सोहना पट.", आँचल तोह बस दूर से खामोश नमस्ते हे करके रह गयी और अर्जुन उन्हें बगल से गले मिलने के बाद दीपा भाभी की तरफ हलके से सर हिला कर वापिस अपनी रानी पर सवार हो चला. अब आँचल काफी बेहतर थी जैसे जैसे गाँव पीछे जा रहा था.

"भें जी आप कब मिली अर्जुन से पहले? और ये तोह जैसे सब को हे जानता है?", अब जेउस को कुत्ता कह कर तोह दीपा भाभी सम्बोधित नहीं कर सकती थी, जितनी गहरी उनकी पहचान थी जग्गी की माता जी से.

"बड़ा हे बिबा बचा है दीपा और जानती कैसे नहीं? जग्गी के ज्यादा दोस्त नहीं है लेकिन उसने पहली बार किसी को छोटे भाई और दोस्त के रूप में पाया है. उम्र में छोटा और पंडित जी के घर से न होता तोह मैंने अपनी जसलीन व्याह देनी थी इसके नाल. हाहाहा.. फेर वि न व्यहन्दी, बिबा बचा है न और ओह मेरी बिगड़ैल शहजादी. ज़िद्दी बहोत है वो और अर्जुन समझदार बीटा है. 2 बार घर आया था वह शहर में और फेर शादी में जसलीन भी हफ्ता भर लगा के आयी, जिसके गुणगान करती नहीं थक रही. फोटो धुलवा के लायी है कल शाम और आज देखने को मिलेंगी. ाचा है बचे पिंड से वाखरे वाखरे बड़े हुए लेकिन बहार भी आपस में जुड़ रहे है तोह इस से ाचा क्या होगा. वैसे इसके साथ तू hans-bol नहीं रही थी जैसे तेरी आदत है?", यहाँ तोह दीपा भाभी की हे चोरी पकड़ी गयी थी जैसे.

"ध्यान रखना पड़ता है न भें जी छोटे बड़े का. वो आपके लिए पिंड से पहले बीटा बन गया पर यहाँ वो मुखिया बन्न के आया है पूरे पिंड का. सम्मान करता है और सेवाभाव भी है लेकिन वो आसमान और हम जमीन, ये याद रखना जरुरी है न भें जी.?", अब बारी थोड़ा हैरान होने की जग्गी की माता जी की थी.

"जे नया मुखिया है? हाँ ऐसा हो सकता है दीपा, लड़का लायक है और जीवन का गहरा ज्ञान रखता है. पर मुझे नहीं लगता की वो तेरे सामने किसी मुखिया की तरह आया था. उसके उस सच को देख जो उसके व्यक्तित्व में है, ओहदे को तोह जैसे वो खुद नहीं मान रहा. चलती हु, वैसे आसमान कभी जमीन से अलग नहीं होता चाहे हमारी आदत ऊपर देखने की है. वो परत हे है जो सतह से चिपकी होती है, हम हे गर्दन उठाये उसकी ऊंचाई खयालो में बनाते रहे तोह फिर गलती हमारी है.", दीपा भाभी को ये गहरा ज्ञान दे कर वो हंसती हुई चली गयी. अपने अंतर्मनन से जूझती दीपा भाभी ने कुछ समय राणो को चारा खिलते बिताया और फिर घर के भीतर चली गयी

"आप चाहे तोह आज अपनी क्लास भी लगा सकती है. जैसी मुझे समझ है 2 घंटे से ज्यादा की क्लास तोह नहीं रहती कंप्यूटर सेण्टर पर.", अब सपाट हाईवे पर थोड़ा यातायात तोह जरूर दिख रहा था, समय हे ऐसा था जहा शहर काम करने जाने वाले लोग निकल रहे थे. लेकिन इस सबको najar-andaaj करती आँचल तोह अर्जुन से चिपकी हुई आगे देखने के नाटक में अपना चेहरा उसके दाए कंधे पर टिकाये थी, जिसमे थोड़ी मुश्किल भी हो रही थी उसके कद की वजह से.

"मेरा टाइम 12 से 2 का रहता है लेकिन तब भी मुझे कोई दिलचस्पी नहीं. तुम्हे मेरे साथ हमारा शहर घूमने में तकलीफ है कोई?", आँचल की हरकतों से हे अर्जुन जान चूका था की वो ना हे बोलने वाली है. और बदले में सवाल ने उसको हे फंसा दिया.

"नहीं ऐसी बात नहीं है लेकिन आप तोह घर से बुक्स हे लेने आयी है और ये शहर घूमना हमने कब प्लान किया? पहले ये दीपा भाभी वाला काम पूरा कर देते है, धुप में शहर भी देख लेंगे.", अर्जुन ने अनमने ढंग से जवाब दिया था और आँचल हिम्मत बढाती हुई खुदसे हे अपना सीना उसकी पीठ पर दबाते हुए जाने क्या निरिक्षण कर रही थी. अर्जुन समझता था इन नयी नयी उमंगो को लेकिन वो इतनी जल्दी आँचल के साथ बहना नहीं चाहता था.

"आपको डर लग रहा है तोह मैं थोड़ा धीरे चलौ क्या?"

"डर नहीं पर ाचा लग रहा है. धुप में मुझे भी ज्यादा घूमना पसंद नहीं लेकिन जहा ये कोचिंग क्लास है उधर हे मार्किट और मेरा कॉलेज भी है. घर भी गोल चौक से नजदीक हे है लेकिन मैं इतनी जल्दी वापिस नहीं जाने वाली कही तुम ये सोच कर आये हो.", अब जैसे हे आँचल ने अपनी हथेली ठीक अर्जुन के सख्त छाती के फुलाव पर टिके अर्जुन के कान गरम होने लगे. पहले हे वो पिछले 10 मिनट से अपने चुचो का दबाव इतना बढ़ा चुकी थी की खुद उसको समझ आ चूका होगा की उसके ये नरम मॉटे चुके अर्जुन की पीठ से डाब कर बस पिचक हे सकते है, उसमे छेड़ नहीं करने वाले.

"आप 2 दिन से कुछ बदल सी गयी है और आपको नहीं लगता की ऐसी हरकते सवाल उठा सकती है? ये राह गलत मंज़िल की तरफ ले जा रही है और हम भी वही गलती दोहराएंगे तोह फिर हम में और उनमे फरक क्या रहा? आप बड़ी है और ये भी समझती है की ऐसा कुछ करना तोह दूर सिर्फ शक होने की सूरत में हे परिणाम बहोत बुरे हो सकते है.", अर्जुन ने उन सफेदे के लम्बे वृक्षों के किनारे हे ब्रेक लगा दिए थे. मील का पत्थर बता रहा था के शहर 7 किलोमीटर बाकी है. आँचल जैसे उसकी पूरी बात सुन्न कर थोड़ा पीछे हो गयी जैसा अर्जुन को लग रहा था लेकिन वो रानी से हे उतर कर एक तरफ आ कड़ी हुई जिधर सफ़ेद थे. अर्जुन उसके चेहरे पर पड़ती धुप का बस गहरा स्वरुप देख प् रहा था, गहरे चश्मे की पीछे से. लेकिन उसके बाद आँचल ने जैसे पालक झपकने से पहले हे उसके होंठो से होंठ भिड़ा कर चेहरा पीछे किया तोह अर्जुन के पाँव कैंम्प उठे. वो आँचल की तरफ न देख सड़क पर ध्यान देने लगा जैसे ऐसा करते हुए किसी ने दोनों को देख न लिया हो. पर वैसा कुछ नहीं था.

"देख लो ाचे से देख लो की कोई बहार वाला हे सवाल पूछने तोह नहीं आ रहा लेकिन तुम्हे परेशां करने से पहले जवाब मैं दूंगी. आखिर करने वाली भी तोह मैं हे हु न. तुम खुदको समझते क्या हो अर्जुन? यही की तुम सबकी परेशानिया ख़तम कर सकते हो, गलत सही को ढून्ढ सकते हो? किसी को दुखी नहीं देख सकते? कोई भी आ कर अपना काम तुम्हे सौंप दे तोह उसको करके खुश होने का दिखावा कर देते हो? तुम्हारा भी एक सच है जिस से तुम जान कर भी अनजान हो. लेकिन मैंने जो 2 दिन पहले वाली रात में जाना उसके बाद भले हे दुःख ज्यादा हुआ लेकिन खुद के लड़की होने का भी तोह पता चला जहा तुम मेरे साथ थे. वह मुझे लगा था की अगर मैं किसी इंसान के साथ सुरक्षित हु तोह वो तुम हो. अंदर जो लोग थे वो इंसान नहीं थे और जो बहार मेरे साथ था वो चाहता तोह कुछ भी कर सकता था और मैं बस गूंगी बानी रहती. शुरुआत में वही खौफ था न मेरी आँखों में जब तुमने मेरा मुँह बंद किया tha?",Arjun इस बहस को एक अनकहे सच की तरफ जाता देख बस खामोश खड़ा रहा.

"मैंने ये कुकर्म दसियो बार देखा है मेरे घर पर लेकिन उस रात से ज्यादा घिनोना पहले कभी नहीं था. पर तुम साथ थे मेरे, चाहे असल ज़िन्दगी में हम एक दूसरे से अनजान हे है लेकिन वह तुम थे जो मुझे संभाले हुए थे. वही मैंने सोच लिया था की मां या माँ तोह प्लान बनाते रहेंगे पर उनसे पहले मेरा अधिकार मैं तुम्हे दे कर उन दोनों को बता दूंगी की जो चाहते थे वो अब नहीं मिल सकता. और तुमने भी तोह मेरे आँखों पर किश करके कोई वादा किया था न अर्जुन?", अर्जुन तोह इतने स्पष्ट खुलासे से बेबस हे हो चला था लेकिन वो फिर भी एक और कोशिश करना चाहता था क्योंकि आँचल अगर उसके ख़याल में नहीं भी थी तोह उसका साथ देना भी उसके लिए खतरे से काम नहीं था.

"मैं समझ सकता हु लेकिन मेरा इरादा तोह वैसा नहीं था न और ये आप जानती है ाचे से. इस तरह अगर उनका सामना करना होता तोह आपकी जगह ऐसा मैं नहीं करता? आपकी माँ को मैं आपके प्रयोग से न काबू करता? लेकिन इस से बुआ एक बार को तोह बेबस हो जाती हो पर विनोद चाचा का क्या? जो बदलाव मैं विनोद चाचा में लाने की कोशिश कर रहा हु वो बदलने की जगह मुझे हे दुश्मन समझने लगते. बुआ एक पल को मान भी लेती की उनकी चोरी को पकड़ कर अब हम ये सब उनके सामने कर सकते है पर वो जब खाली हाथ उस शक्श के पास जाती जो ये सब घिनोने षड़यंत्र रचे बैठा है तोह वो इसकी सजह उनके साथ साथ आपको भी देता. आपका मेरे करीब आना सिर्फ आपके हे नहीं बहोत से लोगो के लिया परेशानी बन्न सकता है. मैं ये कल रात भी कह सकता था पर शायद मैं समझा नहीं पता उधर."

"तुम अब भी नहीं समझा सकते अर्जुन. तुम मुझे बचने की बात क्यों करते हो? ऐसा क्यों नहीं कहते की मुझे सामना करना चाहिए और मजबूत रहना चाहिए. एक दिन तुम तोह लौट जाओगे, विनोद न सही पर कोई और वही मांग करेगा उनके जैसी. किस्मत से मैं पहले भी एक बार बची हु क्योंकि माँ का प्लान तोह पहले भी एक बार ऐसा हे करने का हुआ था मेरे साथ अपने उस आशिक़ के साथ जिसको तुम नहीं जानते पर तब किस्मत शायद मेहरबान थी की वो आदमी किसी घटना में मारा गया नहीं तोह न माँ इतना वक़्त यहाँ गाँव में रूकती और न मां को वो सपने दिखती. फिर भी तुम्हारी बात मान लेती हु, क्योंकि चाहत एक तरफ़ा हो और उसमे कुछ जबरदस्ती या बेबसी तोह इश्क़ का नाम बदल जाता है. हर बार बचने किस्मत और तुम नहीं होने वाले लेकिन चलो जैसी तुम्हारी मर्जी, सर्वे dukh-harta सर्वे sukh-karta.. अपना न सोचे, न सोचे अपनों का..", ये गुनगुनाहट सबसे तीखा बाण था जो अर्जुन के mann-mastishk पर आँचल की व्यथा, दशा और चाहत से भी अधिक गहरा वार कर गया. इस बार आँचल फिर से अर्जुन के पीछे बैठ चुकी थी लेकिन स्पर्श तोह दूर, उसके वस्त्र का धागा तक अर्जुन के करीब न था. ख़ामोशी के बीच सफर मुश्किल से कटा लेकिन जैसे तैसे पूरा हो गया.

"इधर से लेफ्ट और फिर गोल चक्कर से स्ट्रैट. दूर से हे क्सक्सक्सक्स कोचिंग सेण्टर दिख जाएगा लेफ्ट लाइन में.", अर्जुन को मोटरसाइकिल रोक कर उस कोचिंग सेण्टर का बड़ा इश्तिहार पढ़ते देख ये पहली बात थी जो आँचल नहीं कही थी पिछले 15 मिनट में. और वो भी शुक्रिया कहते हुए जैसे बताया गया वैसे हे चल दिया. खुली साफ़ सड़के और hara-bhara गोल चौक जहा दिन के उजाले में भी फुहारा चल रहा था. Rang-birangi गाइयाँ अपनी निर्धारित या उस से भी काम गति से चलती हर तरफ. कही कही लड़के लड़कियां भी जोड़े के रूप में वृक्षों की छाया में पैदल चलते दिखे जैसे वो लोग भी ऐसे हे संस्थानों पर पढाई करते होंगे. पीली चादर चढ़े काले टेम्पू, जो जगह जगह रुक कर सवारियां बैठा या उतार रहे थे. ताज़ी सब्ज़ीयों की रेहड़ियां, कही नाश्ते के ठेले और दुकानों के आगे पानी का छिड़काव करते दुकानदार या मुलाजिम. अभी से ये बाजार और शहर का ख़ास हिस्सा व्यस्त दिखाई पद रहा था. कई नजरे इन दोनों की भी देखती और बताये पते के करीब हे जैसे लड़कियों का ख़ास प्रशिक्षण संस्थान भी था जहा कई छोटे छोटे झुण्ड अपनी अपनी पहचान और दोस्ती के हिसाब से खड़े थे, सभी लड़कियां. कुछ लड़के जरूर उधर से धीमी रफ़्तार में गुजरते इन्हे देख कर हे खुश हो रहे थे और शायद इनमे से भी 2-4 होंगी जो किसी को मुस्कुरा कर देखती तोह किसी को मुँह बना कर.

"लगदा मुंडा बहार तोह आया. वेख तह सही, माशूक नाल है इस करके नई वेख रहा मेनू नै तह ेहड़ा कड़े होया के किसे ने जीनत न ीगोंरे कित्ता होव?", अर्जुन की दुनिया जैसे ज्यादातर सफ़ेद नीले तक हे सिमटी थी कपड़ो के मामले में और इतने तगड़े और आकर्षक चेहरे वाले युवक को चमचमाती लाल बुलेट मोटरसाइकिल का स्टैंड लगाने के बाद अपने साथ आयी लड़की से कागज लेने के बाद बगल वाले संस्थान में जाते देख करीब हे कड़ी इन खूबसूरत सी बालाओं में से सबसे tej-taraar वाली ने अपने दिल की कह हे दी. आँचल वही इनके करीब मोटरसाइकिल की सीट से तक लगाए थी. ये लड़ियाँ हद्द से ज्यादा हे चंचल और बेबाक जान पड़ती थी जो अब आँचल को हे देख रही थी अर्जुन के जाने के बाद. लम्बी, खूबसूरत और एक जैसे पहरावे में जिनके संसथान का दरवाजा जैसे अभी बंद था जहा लिखा था IELTS/Air होस्टेस.

"इधर का तोह नहीं लगता जीनत लेकिन तेरी बात सही है. हैंडसम है तभी अकड़ू है और कमीने की गर्लफ्रेंड नाराज जान पड़ती है जैसे कही और जाना था लेकिन आ कही और गए.. हाहाहा..", ये वाली भी उतने हे तीखे अंदाज की निकली जो आँचल के बुझे हुए चेहरे का मजाक बना रही थी.

"सीधा बोल न डॉलफिन में जाना चाहती थी पर राँझा इसका दाखिला करने ले आया. कसम से बस ये एक बार हाथ पकड़ ले न तोह बोलने से पहले पंतय उतार दू. जालिम ने तोह देखा तक नहीं नजर घुमा कर. हाय ऋ किस्मत जो सोहना होता है वही फुद्दू क्यों बनाया? मरजाना ट्रेनर लार टपकता फिरता है जिसको कोई देखना नहीं चाहता और फिर ऐसे भी लोग होते है.", तीसरी वाली के तोह इरादे हे स्पष्ट थे जो सीधा बिस्टेर से हे बात शुरू करना चाहती थी.

"ओह रहने दे कमलिये ज्यादा न उड़द. जितना तगड़ा है न तेरी पंतय के साथ कुछ और भी फाड़ देना उसने. देख आया बहार और साथ में ढिल्ला भी आया इसके तोह. जरूर साला किसी बड़े घर की औलाद है नहीं तोह ये मास्टर तोह बस अंदर जाने के बाद शटर गिरा के हे जाता दीखता है.", जीनत की बात पर इन दोनों लड़कियों के साथ साथ इनके विचार सुन्न रही खामोश आँचल भी उधर गलियारे में देखने लगी जो सेण्टर के बहार था. तक़रीबन 45-46 बरस का वो व्यक्ति जिसके सर के बीचो बीच चाँद निकला था लेकिन चेहरे पर रुतबे की चमक थी, अर्जुन का हाथ दोनों हाथ में पकडे हंस हंस कर ऐसे बातें कर रहा था जैसे दोनों हे बचपन के यार हो. अंदर आने जाने वाले बचे और उनके अभिभावकों को रास्ता देते ये दोनों दरवाजे से थोड़ा दूर खड़े हो गए पर इन चारो की नजर के सामने हे रहे.

"ऐ तुम तीनो कहा लगी हो? ट्रेनर और मैडम नहीं आये अभी तक?", ये चौथी लड़की अभी टेम्पू से उतर कर थोड़ी दुरी से चलती हुई सीधा इन तीनो के पास आ रुकी.

"मिनी उधर देख जो सामने है, ट्रेनर कही कुलचे छोले ठूस रहा होगा. मैडम न आने वाली 10 से पहले.", अपनी सहेलियों को उस युवक पर आँखे गड़ाए देख ये लड़की थोड़ा सा पीछे हो गयी.

"ोये, तुम पागल तोह नहीं जो sare-aam बेशर्मो की तरह अर्जुन को देख रही हो. उन्होंने देख लिया तोह मेरी शामत आ जानी है.", ये लड़की जैसे ाचे से अर्जुन को जानती थी, या गाँव की हे थी.

"अर्जुन नाम है उसका?"

"धीरे बोल जीनु, ये दीदी जो इधर कड़ी है न वो इनके नाना छोटे प्रधान है. अर्जुन उनका पौता है और वो खेल मेले में इन्होने हे चैलेंज दिया है.", उसकी हालत देख ये लड़कियां भी थोड़ा पीछे सरक गयी पर मुद्दा अभी भी अर्जुन हे था.

"मतलब ये दोनों bhai-behan है? और तू नाम ले कर बात कर रही है पर 'इन्होने' भी कह रही है. वैसे ये चैलेंज करे तोह मैं कुछ भी करने को त्यार हु. बात करवा दे बस एक बार और जैसी पार्टी कहेगी वैसी दूंगी. लाइन साफ़ है जब ये भाई बहिन हुए तोह."

"ोये वो उम्र में साल 2 साल छोटे है और नाम लेने के लिए उन्होंने हे कहा पर पिंड के मालिक है एक तरह से. और तुम लोग अपने मैं से कुछ भी सोच बैठी थी इन दोनों के बारे में?", अभी ये मिनी कुछ और कहती उस से पहले वो केंद्र प्रमुख और अर्जुन टहलते हुए मोटरसाइकिल तक चले आये. आँचल का परिचय करवाते समय अर्जुन की नजर इस देखि हुई लड़की पर गयी तोह वो उन दोनों को वही छोड़ इसके करीब चला आया.

"तोह हमारी मीनाक्षी जी यहाँ से फ्लाइट अटेंडेंट का कोर्स कर रही है? कल आपका बैडमिंटन मैच ज्यादा नहीं देख सका उसके लिए सॉरी, काम था कुछ तोह शहीद भैया के साथ जाना पड़ा. वैसे अपनी फ्रेंड्स से नहीं मिलवाएंगी.", अर्जुन को अपने सामने खड़ा देख बाकी तीनो को तोह सांप हे सूंघ गया पर ये मीनाक्षी हलके जोश के साथ मुस्कुराई अर्जुन द्वारा इतना सम्मान दिए जाने पर.

"जी ये जीनत है, ये गगनदीप कौर हमारे सामने वाले पिंड से है और ये साक्षी है. साक्षी और जीनत यही सिटी से हे है और तीनो मेरी बातचमते के साथ साथ कॉलेज से हे फ्रेंड्स है. और आप है अर्जुन शर्मा जी, बाकी तोह मैं बता हे चुकी हु जैसा तुम लोग पूछ रही थी.", अब अर्जुन अकेला हंस रहा था और वो तीनो नजरे झुकाये मैं हे मान अपनी सहेली को गालियां दे रही थी. मीनाक्षी भी अर्जुन को अपने साथ खड़ा देख हलके से मुस्कुराई.

"It's ऑलराइट एंड सॉरी सोज़ I'm इन हुर्री देय तो सम इम्पोर्टेन्ट वर्क बूत we'll मीट एंड कैच उप सून, डेफिनाटेली ात ा बेटर प्लेस. अल्लोव में मीनाक्षी एंड कीप थिस 'जी' आसीदे. ब्बये जीनत, गगन एंड साक्षी जी.", और जाने से पहले अर्जुन ने मीनाक्षी से औपचारिक हाथ मिलाया जो उसकी सहेलिया देख रही थी. आँचल इधर देखने के साथ उन महाशय से भी थोड़ी बहोत जानकारी ले रही थी जो अर्जुन के आते हे समाप्त हुई.

"आपका बहोत बहोत शुक्रिया गोयल सर और कॉलेज वाली बात हम संडे को करते है. नरिंदर चाचा जी ने फाइल तोह पास करवा पहले हे करवा दी थी और कल मैं शाम को यही लेता आऊंगा कुमार साहब के इधर से.", अर्जुन ने जैसे ये बात आपसी जानकारी में कही थी जो इन दोनों को हे समझ आयी.

"यार तुम आने का कष्ट मत करना, मैं थोड़ा पहले निकल लूंगा सेण्टर बंद करके. वैसे ये काम इतना जल्दी होने की उम्मीद किसी को नहीं थी लेकिन वो कहते है न की 'होप एंड स्कोप अरे बियॉन्ड प्रोबेबिलिटी'. हाहाहा. जल्दी मिलते है बस फ़ोन कर देना."

"वैरी ट्रू सर. लेकिन हम कल हे मिलते है और ठीक 5 बजे मैं हे आता हु आपके पास. कुछ इम्पोर्टेन्ट हुआ तोह संडे से पहले एक बार दादा जी से डिसकस कर लेंगे.", अब सामने वाले ने बस सर झुका दिया हँसते हुए और उन्हें अलविदा कहता अर्जुन भी आँचल के साथ निकल लिया यहाँ से आगे.

"तू तोह बड़ी छुपी रुस्तम निकली मिनी और ये कौनसा मैच दिखा रही थी तू इस अंग्रेज को? मिलने का बोल कर गया है और नहीं मिलने आया तोह मैं हे आ जाउंगी तेरे घर. हाय उसने तोह तेरा हाथ भी पकड़ा और मुझे सही से देखा भी नहीं. पक्का चक्कर हैं न तेरा कोई.?", जीनत तोह उनके जाते हे मीनाक्षी के पीछे हे पड़ गयी थी. बदले में मीनाक्षी की हलकी मुस्कान और शर्म जैसे उनकी बात को आधा सच भी बता रही थी.

"कल योनेक्स का राकेट गिफ्ट किया था जैसा तुम्हे पता है की मैं रोज बैडमिंटन खेलने जाती हु हमारे स्पोर्ट्स सेण्टर पर. और वह बहोत सा नया सामान लगवाया है जिस से बाकी लोग भी एक्सरसाइज कर सके या खेल सके. मैं खुश थी इसलिए पूछ लिया था के राकेट टेस्ट करने के लिए. साथ नहीं खेले पर थोड़ा मैच देख कर चले गए अपने काम से. और तुम जैसा सोच रही हो वैसा नहीं है.", मीनाक्षी की चाहत और उसकी बातें एक दूसरे का साथ नहीं दे रही थी और ये उसकी सहेलियां भी जान गयी जब कनखियों से वो जा चुके अर्जुन को तलशती लगी.

"पता नहीं अब तू हमारे साथ खेल रही है या तेरा दिल उसके साथ खेलना चाहता है? उसने अपने हाथो से पहला गिफ्ट तोह दे दिया है तुझे अब तू उसको गिफ्ट देती है या उस से पहले मैं हे पार्टी दे दू?", जीनत ने अपनी इस खोयी हुई सहेली से ये कहने के साथ बाकी दोनों को आँख मार कर साथ देने का इशारा दिया.

"हाँ यार ज़ालिम सच में दिल ले गया और अब पंतय मैं उसको खुद दे दूंगी.. मतलब पार्टी. मिनी का तोह कुछ है नहीं ऐसा वैसा.", ये वही दूसरी खूबसूरत बाला थी जिसका नाम साक्षी था. जहा ये जीनत और साक्षी आधुनिक होने के साथ थोड़े बिंदास स्वभाव की थी वही गगनदीप एक भरे जिस्म की ज्यादा आधुनिक तोह नहीं बेबाक जरूर थी. मीनाक्षी इनसे अलग थी बातचीत के मामले में लेकिन उसका शांत सा आकर्षण भरी पड़ता था बाकी तीनो पर.

"अभी बस दोस्ती है जिसके लिए पूरी रात और अगला दिन कैसे कटा ये सिर्फ मैं जानती हु. और हिम्मत करके दोस्ती की पहल की तोह किस्मत ने इशारा भी ऐसा दिया की ज़ालिम तोहफा दे गए नजराने में. तुम चाहे पार्टी दो या पंतय, किस्मत यही मेहरबान हुई तोह बाहें मेरी होंगी और वजूद इनका उसके दरमियान. चल तेरा ख़ास ट्रेनर आ गया, छोले कुलचे ठूस के.", मीनाक्षी इनसे आगे चलती हुई केंद्र में दाखिल हुई तोह ये धीमी गति से उसके पीछे.

"उसको प्यार करने दे, मैं तेरे साथ वो पंतय वाली पार्टी का प्लान बनती हु. गग्गू डार्लिंग, तेरे अनार भी पक्क चुके है. पहलवान सारा रस निचोड़ देगा बस दिखने की देरी है.", जीनत की ऐसी बेशर्मी भरी बात पर साक्षी तोह उसके साथ हे हंस दी लेकिन गगनदीप अपने कमीज को व्यवस्थित करती हुई उभरे सीने को छुपाने लगी.

"अगर वो प्यार करने लगी है तोह मैं उसके लिए खुश हु यार. अनार वही निचोड़ेगा जो इनका एकलौता मालिक बनेगा. दूसरी सच्चाई ये भी है जो मुझे पहले नहीं पता थी की अर्जुन ने खेल में चैलेंज दिया है और हमारा तोह पूरा पिंड हे जैसे पागल हुआ पड़ा जब से ये खबर उठी है. मैं नहीं जानती की वो सब क्या है और लड़कियों के बीच इसकी चर्चा भी नहीं होती पर बड़े बुजुर्ग कहते है की असली राजा लौटा है जो मेले के साथ सबके जीवन में रंग भर देगा, अगर जीता तोह. भगवान् वैसा हे करे.", गगन की बातें इन्हे कितनी समझ आयी ये तोह कहना मुश्किल था क्योंकि वो भीतर जा चुकी थी और ये दोनों एक तरफ बाथरूम में.

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"तुम यही बैठो, मैं पानी लाती हु.", घर के बहार हे एक ऑफिस था जिसका शटर बंद देख कर आँचल ने उस लोहे के गेट पर लगा टाला खोलने के बाद अपने घर में प्रवेश करने के बाद वापिस दरवाजा लगा दिया. पप शर्मा का घर शहर में था और वो भी ाचे इलाके में. 250 गज के इस घर में हे बहार उसने अपना एक ऑफिस बनाया हुआ था और गाडी बहार हे कड़ी की जाती थी ऑफिस के आगे बने शेड के निचे. अर्जुन इस चौड़े गलियारे और छत्त की छाया में चलता हुआ बस ख़ामोशी से हे कभी आँचल को तोह कभी इस घर की संरचना को देखता रहा. गलियारा ख़तम होते हे ये खुला आँगन था जिसके ऊपर छत्त और एक तरफ दूसरी मंज़िल के लिए सीढिया बानी थी. बहार वाले ऑफिस में जाने का दरवाजा इधर भी था और हॉल के उस पार रसोई और आगे कमरे. हॉल बेहद व्यवस्थित था जहा कालीन, सोफे, टेलीविज़न और खाने की मेज जिसके साथ 6 कुर्सी लगी थी. रसोईघर और कमरों से पहले लाल रंग का रेफ्रीजिरेटर था जिसका बटन चालू था.

"नहीं पानी की जरुरत नहीं है, अगर आपने पीना है तोह ठीक है. बस अपने कपडे और जरुरी किताबे पैक कर लीजिये.", अब तक आँचल ट्रे में पानी ले कर बहार निकल आयी थी और अर्जुन के मन करने पर गिलास वही टेबल पर रखती हुई वापिस रसोई में जाते हुए बोली.

"मैं वापिस नहीं जा रही उधर. वैसे भी कल मां ने वह जाना है तोह इधर पापा अकेले होंगे और 3 दिन मैं क्लास हे लगा लुंगी. तुम जा सकते हो.", अर्जुन को देखे बिना वो दुपट्टा फ्रिज के पास हे खूंटी पर टांग कर कमरे में चली गयी. जैसे घर की saaf-safaai शुरू करने वाले हो. अर्जुन कुछ पल तोह इस अनदेखी को झेलता रहा फिर अपने आप हे उसके कदम सामने वाले कमरे की और बढ़ चले जहा अभी तक कोई लाइट नहीं जाली थी. कदमो की आहात न होने की वजह से आँचल तोह उसको आते न देख सकीय पर वो उस शयनकक्ष के एक कोने में बस कपडे से कुछ साफ़ कर रही थी, दरवाजे की तरफ पीठ किये. अर्जुन का साया जबतक दिखाई देता उसकी कमर और स्टैनो के बीच वाला हिस्सा अर्जुन की बाहों में क़ैद था. कांपते हाथो ने वो सजावट का सामान निचे गिरा दिया. आँचल की भीगी आँखों में देखने से पहले अर्जुन ने अपने होंठ उस निर्वस्त्र गले पर रखते हुए कुछ गिरफ्त भी मजबूत कर दी.

"आपको मैं सबसे महफूज रखने की कोशिश कर रहा था लेकिन देख लीजिये ऐसा करना कितना मुश्किल कर दिया है खुद आपने. बचाव की जगह सामना करने की बात तोह कह दी, लेकिन किसका सामना करना है ये समझी नहीं. मैं आपको खुद से दूर नहीं कर रहा बस इतना चाहता हु की आप इस सबसे बहार रहे. फिर जैसा आप चाहती है अर्जुन वही करेगा. लेकिन ऐसे सबकी नजरो से दूर बस हमारे एकांत में.", अर्जुन की सरगोशी से आँचल ने अपना गाल हे उसके होंठो पर लगा दिया. अर्जुन का इतना मजबूत स्पर्श और ऐसे चिपकना आँचल को सबसे नया एहसास दे गया जिसमे आख़िरकार वो तनहा नहीं थी. मुलायम गालो पर अर्जुन का चुम्बन और उसके आगे फिसलते जाना. आँचल ने खुद हे अपने होंठ उसके होठो से जोड़ दिए. कितना अध्भुत्त था इतने मजबूत और बड़े जिस्म का उसको अपने में समेत लेना.

"आठ. क्या कर रहे हो? पापा आ सकते है. कपडे पर निशाँ?", अर्जुन तोह उसको गॉड में उठा बिस्टेर पर हे ले आया था. उसको अपने ऊपर छाया देख आँचल ने चेहरा घुमा लिया जैसे शुतुरमुर्ग शिकारी को देख अपनी आँख बंद करके समझे की वो सुरक्षित है. उन मॉटे स्टैनो पर अर्जुन की हथली का वजन पड़ते हे आँचल ने चेहरा उसके सामने कर लिया. बस इतने में हे उसकी हालत ख़राब हो चुकी थी और इस बार अर्जुन ने उन लाल अधरों को जी भर के निचोड़ा जब तक स्वयं आँचल ने हे अपनी जीभ उसके मुँह में क़ैद न कर दी. कमर की तरफ से अर्जुन ने अपना जिस्म उस से दूर हे रखा था लेकिन स्टैनो की नरमी और गोलाई का अनुभव लेने के लिए पकड़ मजबूत करते हे आँचल पलट गयी.

"जानता हु की अभी आने वाला तोह कोई नहीं पर आप जो चाहत रखती है वो भी इस तरह शुरू नहीं होती. घर चलते है न. प्यार से हर रोज कुछ समय साथ बिताने का वादा मेरा लेकिन वो नया बदलाव बस मेरे तक और मेरे लिए. घर में किसी के सामने कुछ नहीं. उन्हें दिखना ये चाहिए की हमारी दोस्ती होने लगी है. फिर खुद फैसला करना की सूट की फ़िक्र करनी है या नया सूट लेना है.", अर्जुन ने उठने से पहले आँचल को बाहों में ले कर थोड़ा और प्यार दिया, बाल सही करने के साथ हलकी सी चपत कूल्हों पर लगते हुए. उसके सुलझे हुए अवतार और ऐसी समझदारी पर आँचल ने गलती स्वीकार कर ली. अब उसको यु अर्जुन के पहलु में लेटना किसी सपने सा हे लग रहा था.

"मुझे वो भी करना है और तुम सब प्यार से करोगे. कोई फरेब नहीं की मुझे मन लिया तोह फिर दूर भागते रहोगे.", आँचल की उत्सुकता और चाहत सुन्न कर अर्जुन हलके से हँसते हुए उसके दोनों गाल हाथो में ले कर जवाब देने लगा.

"सूट नया दिलवाने का मेरा मतलब वही था. लेकिन जब एहसास ज़िन्दगी में पहली बार हो रहा हो तोह उसको लम्बा जीना चाहिए. मंज़िल पाने के बाद अक्सर उसकी कदर काम कर देते है इंसान. दोस्ती, थोड़ा प्यार और सबकी िज्जात्त, चाहे वो लायक हो या न हो. नहीं तोह फिर बाथरूम तोह है हे."

"छी.. तुम भूले नहीं उस बात को?"

"खूबसूरत पल याद रखने चाहिए और इस बार हर दिन ऐसा एक न एक पल तोह मैं देने हे वाला हु. अब कपडे और बुक्स पैक करो, निकलते है.", अर्जुन उठ कर कपडे सही करने लगा तोह इस बार आँचल ने उसको बाहों में लेते हुए चूमा.

"जैसा तुम कहोगे वैसा हे होगा. नहीं सामना करती माँ का और न वो सब. बस वो लोग ाचे नहीं है और तुम मां को जान चुके हो न."

"वो मेरी सरदर्दी है और इन मां जी को तोह कल हे ठीक कर देंगे, देखती जाओ. चलते है अब.", कूल्हे पर फिर से थपकी पड़ते हे आँचल तुरंत अलग हो गयी.

"देख रही हु तुम इधर कुछ ज्यादा हे हाथ मारते हो."

"चेक करता हु की बड़ी हो गयी हो या टाइम लगेगा. बड़ी हो गयी हो.", आँचल हंसती हुई इस से भी अगले कमरे में चली गयी. अब वो ख़ामोशी और गुस्सा नहीं था जो सफर शुरू होने पर हुआ था. अगले 5 मिनट बाद दोनों हे वापिस चल निकले थे. अर्जुन रस्ते याद करता हुआ हर तरफ ध्यान दे रहा था और आँचल उसके पीछे इस बार दोनों पाँव अलग दिशा में करके ठीक प्रेमिका की तरह चिपकी बैठी थी. बैग का बहाना जरूर था जो बीच में रखा था, पर जिस्म चिपकने से वो छोटा सा बैग भी नहीं रोक सकता था. अर्जुन ने आखिर इस प्रेयसी को भी शीशे में उतार लिया था अपने मुताबिक. अबसे वो दामिनी का सामना नहीं करने वाली थी.

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"ये बड़ी दीदी आज सुबह से हे थोड़ी परेशां दिख रही है रेखा. जरा तू बात तोह करके देख, मेरे को तोह समझा देंगी कुछ भी कह कर.", कृष्णा जी का स्वस्थ्य लाभ बेहद शानदार चल रहा था और आजकल तोह वो सबके साथ उठने बैठने लगी थी, किताबे एक तरफ रख कर. हाँ ये सोने से पहले आज भी उनका पसंदीदा काम था. रेखा से इधर उधर की बातें करने के बाद जब उन्हें ललिता जी का ध्यान हुआ तोह उन्होंने ये चर्चा रेखा से सांझी की. सरोज भी आयी हुई थी रेखा का हालचाल लेने और Manju-Menaka के साथ ऋतू और प्रीती उसके घर गयी हुई थी.

"ये भी न पूछ सकती उनसे तोह. मैं हे पकड़ती हु ललिता दीदी को और तुम थोड़ा बैठो इसके साथ शायद इसने भी कुछ अपनी केहनी होगी. 2 चाय तोह पी चुके है तीसरी ललिता दीदी के साथ सही. और बात बिलकुल सही है के कुछ तोह जरूर हुआ है जो वो थोड़ी परेशां सी है नहीं तोह यहाँ से 10 मिनट में तोह उठके जाने से रही. माँ जी भी नहीं है तोह फिर काम का भी चक्कर नहीं होना चाहिए. बैठो दोनों मैं आती हु उनकी खोज ले कर.", सरोज का बेहद करीबी रिश्ता था ललिता जी के साथ, चाहे दोस्ती हे कह ले. कृष्णा जी ने भी जरुरी बात तोह करनी हे थी अपनी इस छोटी बहिन और जेठानी से इसलिए सरोज के जाने के बाद उन्होंने दरवाजा जरूर लगा लिया. उधर ललिता जी तोह बिस्टेर पर बिखरे साफ़ धुले हुए कपड़ो को तेह लगा कर बड़े टेबल पर रखती जा रही थी. ज्यादातर कपडे समेत चुकी थी वो और कमरे दाखिल होती अपनी हंसमुख सखी को देख उन्होंने भी आने का इशारा दिया. यहाँ भी दरवाजा ढाल दिया गया और सरोज बिस्टेर पर बैठ बाकी कपडे उनके साथ समेटने लगी.

"क्या घुँण का रहा है दीदी आपको? देख सब रहे है लेकिन पूछ कोई न रहा. हाँ बस हम लोग हे समझ सकती है के थोड़ी परेशां है पर वजह हे बता दो क्या पता हल हो जाए.", सरोज की बात सुन्न कर ललिता जी अपनी साड़ी को हल्का ढीला करने के बाद सही से आ बैठी उनके करीब.

"कोई परेशानी नहीं है ऋ. जरूर रेखा या कृष्णा ने तिल्ली लगाईं होगी और तू भोली उनकी बातों में चली आयी इधर.", ललिता जी के खूबसूरत गाल सबसे बेहतर आकर्षण था उनका और फ़िलहाल वो कुछ पल चमकते लगे.

"हाँ तभी तोह आप ये सब करके समय खराब कर रही है. नहीं तोह इस वक़्त तोह अक्सर महफ़िल लगती है हमारी और मधु होती तोह आप कोई मौका न छोड़ती उसकी हालत खराब करने का. अब बोलो भी दीदी, मसला क्या है? भाई साहब से तोह परेशानी हो नहीं सकती और बचो का ब्याह करके आप फुर्सत में हो थोड़ा. रेखा और कृष्णा परेशां है लेकिन अगर उन्होंने पूछना शुरू किया तोह शायद आप बता नहीं सकेंगी और वो पूछे बिना रहेंगी नहीं.", अब ललिता जी ने भी धीमी आवाज में जाएब देने की कोशिश शुरू की. हाथ अभी भी कपड़ो को तेह लगाने में जुटे थे.

"तू एक बात सच सच कहेगी?"

"विद्या पढाई की नेम. आपसे तोह मैंने कभी छुपाया हे नहीं जैसे आप खुद अपने बिस्टेर से बाथरूम तक का बता देती हो मुझे. अगर मुझसे हे पूछ के आपका जवाब मिलना है तोह पूछ लो हमारी दुखी ज़िन्दगी.", सरोज दुखी शब्द कहते हुए भी हंस रही थी.

"लल्ला के लिए मधु ने हाँ भरी थी न, चाहे मुँह से न सही.?", इस एक सवाल ने तोह सरोज को हे झंजोड़ दिया था पर वो संयमती रही.

"हाँ दीदी. क्या वो बात किसी के सामने खुल गयी क्या?"

"अरे नहीं पागल. कैसी बावली है तू जो ये पूछ रही.? वैसा कभी हो भी नहीं सकता लेकिन जानती है मधु ने मुझसे ये बात अभी शादी से पहले वाले दिन भी कही थी जब हम दोनों हे साथ थी. उसका कहना था के अब वो बहु और माँ तोह जरूर है अपने घर लेकिन एक ऐसी डोर बांध चुकी है यहाँ से जो पहली नहीं थी. लल्ला के बिना दिन गुजर सकता है पर हफ्ते महीने सजा जैसे होंगे. हल पूछ रही थी जिसके बदले मैंने यही कहा के अब उसका घर भी अगला शहर छोड़ कर राधिका के हे शहर में है. महीने 2 महीने में मिल सकती है, परेशानी नहीं होने वाली और लल्ला को बुला भी सकती है.", सरोज ख़ामोशी से सुन्न रही थी और जैसे उसके मैं में भी सवाल थे कुछ.

"तोह ये बात का तोह हल दे दिया आपने. फिर अब कौनसी दुविधा है?"

"तेरा मैं कैसे रह जाता है उसके बिना? जितनी मुझे समझ है तू भी जान तोह गयी है न उसको?", अब सरोज का चेहरा कुछ झुका था लेकिन फिर वही बात की इनके बीच कुछ छुपा भी नहीं था.

"तोह फिर आपकी परेशानी है उस से दुरी? मैं तोह 3 तरफ़ा क़ैद हु दीदी लेकिन आपके साथ तोह उसका prem-pyar और लगाव जाहिर है. अब कही ऐसा तोह नहीं हो गया की भाई साहब ने कोशिश की और पता चल गया?", उल्टा सरोज ने हे उन्हें घेर लिया था उनके सवाल पर. अब ललिता जी के चेहरे पर जो दर्द था उसमे एक गहरा द्वन्द भी शामिल हो चूका था.

"समझ सकती हु की तुम्हारे लिए ये मुश्किल है सरोज पर मेरे लिए भी सबकुछ आसान नहीं रहा. पता नहीं निगोड़ी जवानी का भी एहसास तभी होना था जब बुढ़ापे की तरफ चलने लगी थी. तेरे भाई साहब परेशानी नहीं है मेरी, मेरा मान और नींद ने परेशां कर दिया है. स्वार्थ में मैं कब इतना आगे निकल गयी की सही रिश्ते भी याद न रहे और वापिस लौटना बहोत मुश्किल है.", ललिता जी की दशा देख सरोज ने उनका हाथ थाम कर कहा.

"कुछ गलत नहीं है दीदी और प्रेम की सीमा कोई एक तये नहीं करता, जब इसमें 2 लोग शामिल हो. आपकी हालत भी अर्जुन ने ठीक वैसे हे समझी जैसे उसने मेरी या मधु की. अगर कुछ ऐसा जिस से इंसान खुश है और उसका प्रभाव समाज पर नहीं पड़ रहा तोह मेरी नजर में वो गलत नहीं. सच कहु तोह हंसी आ जाती है जब मैं खुद की हे बेटी को कभी कभी बेशर्मी करते देखती हु. वो जैसे मुझे अनजाने हे ये एहसास करवा देती है अर्जुन ने उसको कितना खुश रखा हुआ है और मधु को नहीं देखा आपने? ब्याह में भी उसकी चमक किसी 30 बरस की लुगाई जैसी थी जिसकी वजह यही तोह है. आप खुद उसके आसपास होती हो तोह कोई नहीं कह सकता की इतने बड़े बचो का विवाह करने वाली सास बन्न चुकी हो. नींद में लगता है न की वो करीब क्यों नहीं है? रज्ज की उम्र करीब आते समय अक्सर चाहत भी चरम पर पहुंच जाती है लेकिन अब संतुष्टि का जरिया हे इतना बेजोड़ हो तोह फिर दूसरा हल मुमकिन कहा? आपकी ये परेशानी तोह बस दूर कर सकता है. वैसे आखिरी बार kab?",Ab ललिता जी के चेहरे पर पुराणी हंसी आयी थी जो वो सरोज की जांघ पर हाथ मरती हुई सुर्ख लाल होने लगी. सेब जैसे हे तोह गाल थे उनके, जो अर्जुन के करीब कुछ ज्यादा हे लाल रहते थे.

"महीने से ऊपर हो गया और तू सही कहती है. आग ज्यादा बढ़ने लगी है आजकल और कल रात भी 2 बार नहाने के बाद सुबह सबसे पहले मैं हे उठी थी घर में. निगोड़ा गलत लत्त लगा गया? वैसे तू भी हिम्मत वाली निकली जो झेल गयी उस बागड़बिल्ले को."

"पूछो हे न के कैसे झेला और फिर कभी कभी सोचती हु की हिम्मत तोह फिर मेरी बेटी की है. सुनी थी उसकी बातें जब वो कुछ दिन पहले बात कर रही थी फ़ोन पे. रात से सुबह तक लगे रहे और ये लड़की फेर गाँव आ के भी मटकती रही. 75 से काम तोह वजन मेरा न है जिसको वो हवा में उठा के झुल्ला झूला गया. कहा था मैंने की खाने पे बुला लेती हु पर बोली इस घर में नहीं. माँ को तोह 10 मिनट न खुश होने दे रही ये बलूंगड़ी और इधर आयी तोह साहब खुद लम्बी छुट्टी पे निकले हुए है. वैसे वही घूम आओ और बेटी के घर भी चक्कर लगा लेना. एक पंथ 2 काज.", ललिता जी को पहले तोह बड़े मजे आ रहे थे ये सुन्न कर की अर्जुन सरोज को किस तरह तरसा रहा है पर मंजू के साथ उसका इतना भयंकर मेल है तोह लड़की तारीफ के हे काभिल है. अब माधुरी का बहाना दिए तोह ललिता जी को कुछ आशा की किरण दिखाई दी.

"हँ.. 2 को आ रही है वापिस माधुरी और माँ जी भी कह रही थी की लड़की के घर थोड़ा चक्कर लगा लेना चाहिए, घर में सास ससुर नहीं है. बात करती हु उस से शाम को. चल रेखा के हे तरफ चलते है, जब तू इतना सबर रख सकती है तोह मेरे तोह वो पास हे है. भाड़ में जाए मैं के गलत ख़याल. सही ख्याल तोह यही है के लल्ला जैसा सुख न दे सकता कोई और बहोत मालिश करि है उसकी. अब करवाने की बरी है. उठ, कृष्ण से चाय बनवाती हु फेर.", सरोज मंद हे मंद हंस रही थी इनको तरोताजा देख. आखिर ललिता जी ने फैंसला कर हे लिया था के वो वैसा अब सोचेंगी हे नहीं जिस से मैं विचलित हो. अर्जुन अगर उन्हें सुख देता है तोह तोह ये दोतरफा हे है. अब उन्हें सरोज पर जरूर तरस आ रहा था जिसका हल वो जरूर करने वाली थी.

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सुच्चा सिंह जी के तोह घर आज बहरपुर रौनक लगी हुई थी. इतने बड़े घर में ज्यादातर बस गिनती के 4-5 लोग हे रहते थे पर आज उनकी बड़ी बहु के साथ पौता पौती के आने पर दोपहर का भोज कुछ और भी ख़ास हो गया था. जगतार से मिलने जुगराज जी भी आये थे और निहाल का परिवार भी. तंदूर पर प्याज वाली रोटियां लगते हुए घर की दोनों बहुओं के साथ खुस माता जी, निहाल की बेबे, दीपा भाभी भी मौजूद थी. हवेली जैसे हे उनका घर हर तरफ कहकहे और किस्सों से भरा था. लकड़ी पर पकते विभिन्न साग और सब्जियां, हाथ से बिलोई जाती दही की लस्सी और खाने के साथ परोसा जाने वाला ठंडा खीरे का सलाद. लगता था जैसे यहाँ पर हे आज जैसे बैसाखी मनाई जा रही थी. इतनी खुली जगह पर आ कर जेउस भी सबके आसपास खुश होता हुआ घूम रहा था जो कभी जग्गी की माता जी से सलाद खता तोह कभी छोटे बचो के साथ मस्ती करता. ऐसा तोह एक पल भी नहीं लगा था के यहाँ एक आदमी से विवाहित 2 महिलाओं में कुछ रश्क हो, वो बहनो जैसी ज्यादा थी. कोक्की बहिन जी उर्फ़ परमीत कौर और उनसे छोटी संप्रीत कौर जिन्हे प्यार से सिम्मो भें जी भी बुआलया जाता था. इनकी बस एक हे बेटी, सुखजीत उर्फ़ जीती. कॉलेज में इस वर्ष हे दाखिला लिया था लेकिन जाना शुरू नहीं हुआ था.

"पधारो भाई पधारो महारे घर में. ऐसे हे बोलते न हरयाणा में छोटे सरकार.", देहलीज पे कदम हे रखा था अर्जुन ने और सबसे पहले जेउस से भेंट हुई और अभी वो अर्जुन की तरफ लपकता उस से पहले बहार बैठक से उसको देख कर स्वयं जगतार बाजी मार गया. हत्ता कट्टा पंजाबी था जिसने अर्जुन को कमर से पकड़ कर ऊपर उठा लिया. आगे आँगन की छाया में काम करती कई महिलाओं ने झीने दुपट्टे से इधर रुख किया और जग्गी की माता जी काम छोड़ इधर आ पहुंची.

"ओह बस कर पुत्तर बस कर. तू ताः चक्कर हे चढ़ाई जांदा मूंदे न. बेबे जी, अर्जुन शर्मा अपने प्रधान जी डा पौता.", इतनी बुजुर्ग होने के बावजूद स्वर्गीय मेजर साहब की धर्मपत्नी जी नजर और शरीर से भली चंगी थी जो हाथ धोने के बाद अर्जुन को आशीर्वाद देने आयी थी पर जग्गी उसको 3-4 बार घूमने के बाद हे रुका.

"बल्ले हो बामना, यार तू तह भरा हे बाला हो गया. क्यों बीजी, फेर लगदा मुंडा हाँ डा?", जग्गी अपनी दादी से भी मजाक कर रहा था और वो हँसते हुए 2 बार अर्जुन को आशीर्वाद देने के बाद हाथ पकड़ते हुए बोली.

"वड्डे पंडत जी वर्ग ऐ पट. अर्जुन पुत्तर रब्ब तनु दिन दूँ रात चौगनी तरक्की दावे. जग जग जियो बीटा और ये तुम्हारा हे घर है. दार जी ने पहले हे खबर देती सी पुत्तर दे आने दी. चंगा लगेया के जग्गी नाल पहले तोह प्यार है. नई सिम्मो, लस्सी बर्फी लेके आ."

"आप भी ऐसे हे जवान रहो दादी मेरी भी इसमें हे ख़ुशी है. दादा जी से मिल लेता हु पहले, फिर उन्होंने सो जाना. और चिंता जरूर करना, खाना खाने हे आया हु और ाचे से खाऊंगा. वैसे ये जग्गी भैया बोल रहे थे की दादी को दीखता नहीं, वो लाठी ले कर चलती है और खाने में चीनी नमक का भी पता नहीं चलता.", अर्जुन ने आते हे जगतार को फंसा दिया था और उसकी आवाज भी दादी जितनी हे ऊँची थी जिसको सुन्न कर एक तरफ खड़ा निहाल और मास्टर जी भी हंसने लगे. जग्गी तोह तुरंत अपनी बेबे के पीछे खड़ा हो गया अर्जुन को हैरानी से देखता.

"मेनू पता स कोक्की ऐ मुंडा जरूर मेरी खुरचन kad-da होना. वे तू सामने आ मेरे, आया वड्डा विलयतिया. नीले फडाई जरा मेरी दांग मैं दस्सू इस नेकी दे मूंदे न.", दादी जी ने तोह तसल्ली हे करवा दी थी जग्गी की और उसकी माता जी भी सबके साथ हंसती हुई एक तरफ हुई तोह दादी ने कान पकड़ लिया.

"ओह बीजी, ऐ छोटा बामन ऐसा डोवा न लड़ा रहा. मैं तह ेंज कहा स के पूरे पिंड विच मेरी बीजी तोह जवान सुनक्खी कोई हैगी हे नहीं. ऐ कहंदा की दीपा भाभी नालो सोहनी नई होनी. हूँ तवा ला रहा जड़ो एसडी गाल गलत साबित होई.", अब तोह दादी ने भी जग्गी का कान छोड़ दिया था और अपना नाम सुन्न कर दीपा भाभी जाने क्यों नजरे बचती हुई शर्माने लगी थी.

"तुस्सी दोनों शादी लगदे हो पूरे. चंगा है पट, ेहड़ा हंसदे khed-de रहो, जवानिया मारो. दीपा सुन्न ले हूँ तू मेरी टक्कर दी हो गयी छोटे पंडत दे मुताबिक.", ये दादी तोह सचमुच हे टॉप थी जो मजाक के बदले दुगना मजाक करती थी. जग्गी और अर्जुन को दोनों तरफ लगते हुए उन्होंने प्यार दिया और उसके बाद जग्गी के साथ बैठक में जाने से पहले अर्जुन कुछ वक़्त सुच्चा सिंह जी के भी कमरे में उनके पास रहा. उस दौरान उसको किसी ने ज्यादा परेशां नहीं किया था. हंसी मजाक एक बार फिर बैठक में शुरू हुआ था जहा मास्टर जी कटाई कोच वाले अवतार में न दिखे. उनका बीटा और बेटी भी आये थे यहाँ. बीटा टेलीविज़न देखने में व्यस्त था 15 की उम्र जो थी और बेटी जसलीन और सुखजीत के साथ उनके कमरे में बंद थी.

हँसते बोलते हुए सभी पुरुषो का खाना भी लगा दिया गया जो सचमुच ख़ास था और अर्जुन जितने गले तक न भर गया जग्गी की choti-badi दोनों माता जी उसको खिलाती रही. यहाँ भी जग्गी उसको हे फसा रहा था और उसकी हालत पर खुश भी होता रहा. निहाल की भी ाची जमती थी इन दोनों के साथ और वो भोला इंसान भी बीच बीच में बोल कर हंसी बढ़ा देता. बहुत समय बाद जैसे अर्जुन ऐसा माहौल देख रहा था, उसके घर हे अक्सर ये हाल होता था जब सभी खाने की मेज पर होते और Ritu-Alka कोई मौका न छोड़ती थी उसको परेशान करने का, भरपेट खिलने के बाद. इन सभी का खाना होने के बाद दोनों बीजी को उनके कमरे में खिलाया गया और आखिर में सभी महिलाये अपनी महफ़िल अंदर वाली तरफ बड़े हॉल में लगा कर बैठ गयी. कमाल की बात थी की जसलीन अभी तक सामने न आयी थी.

"फेर क्या सोचा है अखाड़े के बारे में अर्जुन बीटा? इस बार तोह लगता है कबड्डी में भी पहला नंबर लेके आएंगे भूत, निहाल एंड पार्टी. लेकिन तुम्हारी झंडी की आवाज पोल्य्तेच्निकल कॉलेज और शहर से भी परे जा चुकी है. 16 गाँव बस इस बन्दे को देखने आने वाले है जिसने ललकार दी है. ये तोह साफ़ है की झंडी पकड़ेंगे पार्ले ऊँचे पिंड वाले और उनके बाद थोड़ा दम है तोह पिछले चौक वाले कसबे में. लेकिन लगता नहीं की 5 मिनट से ऊपर कोई टीम टिकेगी. जग्गी पट देखा है कभी इसका जलवा?", जुगराज जी की नजर में तोह अर्जुन ख़ास स्थान बना चूका था लेकिन अब जग्गी थोड़ा चिंतित लगा.

"वो लोग 25-30 से ज्यादा भी उम्र के हो सकते है चाचा. हाँ अर्जुन का जलवा मैं हे सबसे पहले देख चूका हु यहाँ के किसी भी इंसान से और उस मामले में मैं भी आपसे सहमत हु लेकिन 2 की जगह ये अकेला और काम से काम 5 से तोह भिड़ना पड़ेगा, 10 भी हो सकते है. अगर 2 पिंड झंडी उठा गए तोह मामला बिगड़ सकता है. वो आपस में लड़ कर फिर जीतने वाला इसके साथ नहीं भीड़ सकता?"

"वह यही लोग नहीं खेलने आने वाले जग्गी भैया और इनकी चिंता भी नहीं है मुझे क्योंकि दूसरी तरफ वाले पिंड को छोड़ कर बाकी सब तोह इसको बंद करवाने के हे हक़ में है. झगड़ा इनके भी साथ नहीं है लेकिन थोड़ा बाद फैक्टर वाला मामला है जैसे मेरे दोनों चाचा ने वो चुनौती दे डाली थी ें मौके पर. तब कबड्डी की टीम ने मुक़ाबला किया था. तोह मैं में मलाल तोह होना हे है. लेकिन सबसे बड़ी वजह है की ये 2 हे गाँव कसबे जितने है और अगर इनका नाम भी एक हो जाए तोह बेहतर विकास होने लगेगा. नाम अलग अलग रख भी सकते है सुब डिवीज़न की तरह. जैसे दिल्ली ईस्ट और नार्थ है या बहोत से ऐसे शहर जो एक है लेकिन 2 हिस्से है प्राकृतिक या आपसी सहमति से. गाँव को उतनी ग्रांट भी नहीं मिलती और उनका नंबर ज्यादा होने से ध्यान भी उतना नहीं दिया जाता. यहाँ की पापुलेशन और स्टैंडर्ड्स टाउन स्टेटस के लिए काम है. दोनों के एक होने से नक्शा भी बदलेगा और सहूलियतें भी. वैसे भी जमीन तोह वो भी महल से हे पारित है और पुराने कागज़ में इसका जीकर दादा जी के दादा के नाम से है. खुद हे सोचिये की वह पर दादा जी के पिता जी दरगाह के लिए जमीन कैसे दे सकते थे अगर वैसा न होता? उसके बाद दोनों गाँव स्थापित हुए है. सड़क एक अदृश्य बॉर्डर रहेगी पंचायत अलग होने से अगर किसी को ऐतराज रहता है और समर्थन मिलेगा तोह विलय बेहतरी के लिए हे हो रहा है.", अर्जुन की इतनी दूर की सोच देख कर अब जग्गी से ज्यादा जुगराज जी हैरान थे क्योंकि वो तोह बस इसको अखाड़े की चुनौती बंद करने की नजर से देख रहे थे.

"और दोनों के मिलने पर मुखिया कौन बनेगा? बात तोह ये जरूर उठेगी अर्जुन."

"वो दार जी एंड पार्टी हे रहेंगे बस उनके साथ 2 लोग और शामिल हो जाएंगे उधर से. विकास और तरक्की कौन नहीं चाहेगा अंकल? और इसकी पहल मैं वही पर करूँगा सबके सामने. और उनके पास हाँ कहने के सिवा दूसरा जवाब नहीं होगा. यकीन कीजिये और मेरे पास चुनौती के साथ दोस्ती का हाथ बढ़ने से बेहतर हल नहीं था. सामने जीत कर भी अगर मुझे ये बात घुटने के बल केहनी पड़ेगी तब भी मैं कहूंगा. जाने को तोह आज मैं लीगल तरीके से भी वह जा सकता हु और उन्हें मान न भी पड़ेगा क्योंकि ये सच है पर जब लोग अपने हो तोह अपनापन बढ़ाना बेहतर है बजाये उन्हें झुकाने के. जीत का इनाम समझ लीजिये जो मैं उनसे मांगूंगा.", अर्जुन के दार्शनिक अंदाज पर वो ख़ुशी से मुस्कुराये और जग्गी ने कुछ ज्यादा हे जोश से थपकी लगा दी.

"आउच.. भैया रीढ़ की हड्डी फेफड़ो के साथ लगा के मानोगे क्या?"

"ओह रेहन दे शेरा किथे न चुक्क पेंदी तेन्नु. वैसे यह गल्ल फ़िलहाल इस कमरे तोह बहार न जान देई. लोग अधूरी बात पहले फैला देंगे की बामन कब्ज़ा लें आ रहा. हाहाहा..", जगतार की बात सही थी जिस पर जुगराज जी के कहने पर निहाल ने भी चरण सर हिला दिया की वो भोलेपन में भी इसका जीकर नहीं करेगा. उनके बेटे के आवाज देने पर वो बहार चल दिए, जग्गी भी अर्जुन को वही रुकने का बोलता हुआ उनके साथ गया छोड़ने.

"नीले, पाह जी को डिब्बा दे आ."

"जे भाभी जी. अर्जुन बाई मैं शाम को मिलता हु.", निहाल भी निकल गया तोह अर्जुन अब यहाँ सोफे पर तक लगाए अकेला हे पसरा हुआ था. कभी दरगाह वाले मेले के अबूझ ख़याल तोह कभी मोतीलाल जी की अगली चिट्ठी के बारे में सोचता. फिर आँचल और दामिनी के बीच इतना फरक याद करके हल्का मुस्कुरा देता. और खुली आँखों से खोये अर्जुन के सामने गुलाबी दुपट्टा लहराने के साथ उन खूबसूरत उँगलियों ने चुटकी बजाई तोह वो चौंक कर सीधा बैठ गया.

"मिल गयी फुर्सत हुजूर को? सुना है बड़े आदमी बन्न गए और ये दावत तुम्हारे हे लिए थी.", जसलीन हमेशा हे आधुनिक कपड़ो में दिखती थी सिवाए गुरुघर के लेकिन यहाँ उसको इतने खूबसूरत सलवार कमीज और लम्बी छोटी के साथ कलाई में चूड़ियां, माथे पे छोटी सी काली बिंदी और payjeb-jutti में देख अर्जुन बस उसको देखता हे रह गया. ये तक न ख़याल रहा के इधर उसके साथ 2 युवतियां और भी आयी थी जो सोफे से पहले हे रुक गयी अर्जुन की पीठ पीछे. सुखजीत और रेनम, निहाल की बड़ी बहिन. जसलीन मेज पर अर्जुन के सामने बैठी थी, घुटने 2 इंच की दुरी पर. और यु उसका देखना जहा ख़ुशी दे रहा था वही वो सब याद दिला रहा था जो बस आपस में घटित हुआ था.

"ये सुखजीत है, मेरी छोटी बहिन और ये निहाल की बहिन और हमारी फ्रेंड रेनम.", अर्जुन अब बुरी तरह से हड़बड़ाया तोह उसकी हालत देख जसलीन तोह कुछ शरमाई पर उसके जैसे हे लम्बी पतली तीखे नैन नक्श वाली सुखजीत एक अदा से मुस्कुराई. रेनम तोह बस अर्जुन को एकटक देखे जा रही थी.

"जी.. नमस्ते. मैं अर्जुन शर्मा, पंडित जी का पौता और लंच पे आया था."

"हाहाहा.. ोये यार जस.. बाँदा बड़ा घैंट है. हाँ जी, आप लंच पे हे आये थे लेकिन फिर दिन विच हे सपने वेखन लग रहे स. कित्थे मेरी भें दे तह नै?", अर्जुन ने तोह तुरंत ना में सर हिला दिया.

"जी वो परसो कुश्ती है न बस उसके बारे में सोच रहा था. जग्गी भैया आते होंगे, उनसे मिल कर बस मैं भी जाने लगा हु. 3 बज चुके है न.", अर्जुन को लगा था के उसकी चोरी पकड़ी गयी है पर यहाँ तोह उसने खुद हे उनके हवाले होने का काम कर दिखाया.

"दूर फिट्टे मुँह. ये तोह नीले से भी भोला है और जस कह रही थी की बड़ी ाची बातें करता है. लड़कियों से डर लगता है अर्जुन जी?", रेनम ने तोह खिंचाई करने के हे ठान ली थी पर जसलीन मैं हे मैं कह रही थी की दूर रह नहीं तोह तू जरूर डर जाएगी जे इसके चक्कर में फंस गयी तोह. अर्जुन के कंधे पर जसलीन ने हाथ रखा तोह उसने पाया की वो अकेला नहीं है.

"बस करो यार तुम दोनों. अब इसके लिए नयी हो तोह ऐसे एकदम से क्या कुछ भी बात कर लेगा.? रेनम बेबे आवाज दे रही तेरी और जीती, तू चल मैं आती हु.", जसलीन ने तोह दोनों को यही से हे वापिस भेज दिया और उनके जाते हे अर्जुन ने ठंडी सांस भरी.

"अरे इन्होने क्या खा लिया था? मुझे लगा के हम किश कर रहे थे और इन्होने देख लिया."

"तभी तोह भेजा है इन्हे बुधुराम. शाम को इस सड़क के आखिर वाले मदद पर मिलते है, ठीक 6 बजे. उस तरफ हमारे खेत है और मैं जीती के साथ जाने वाली हु और उधर बस हमारी हे जमीन है. आगे पानी का जोहड़ और जंगल है तोह डेड एन्ड. उमाहहह..", जसलीन ने जो बेबाक अंदाज दिखते हुए अर्जुन के होंठो को चूमा था वो सन्न हे रह गया. उसको ये खबर नहीं थी की सुखजीत आउट से देख रही है और रेनम बहार नजर रख रही थी.

"कितने बजे?"

"6 बजे, आखिर वाले मदद पर."

"याद से और अकेले. जग्गी शहर जाने वाला है 5 बजे बेबे और दार जी के साथ. जाने के लिए पूछे तोह साफ़ मन. ये तोह बताया नहीं की मैं कैसी लग रही हु?", जसलीन एक बार और अर्जुन के सीने से सीना चिपकती हुई करीब आयी और इस बार अर्जुन ने बिना डरे उसके नितम्ब पकड़ कर ये गहरा चुंबंन जड़ दिया.

"वही बताता हु इधर सेफ नहीं क्योंकि वर्ड्स प्रक्टिकली ज्यादा ाचे से समझ आएंगे."

"आठ.. इन्तजार रहेगा. वैसे जग्गी 5-10 मिनट लेगा लेकिन उधर सबका खाना हो चूका होगा इसलिए चलती हु. 6 बजे मिलते है.", जसलीन जैसे आयी थी वैसे निकल चली बस इस बार चाल में हिरणी सा लोच था और चेहरे पर सबकुछ पाने की ख़ुशी. अर्जुन चेहरा साफ़ करते हुए वापिस बैठ गया लेकिन इस बार सामने की तरफ जिस से अंदर कोई आये तोह देख सके. जग्गी भी समय पर लौट आया था जिसके साथ अर्जुन अपनी कुछ व्यक्तिगत बातें सांझी करने लगा और रेनम के घर जाते हे जसलीन को जीती ने दबोच लिया, कमरा बंद करते हुए.

"ओह तेरी जस क्या था वो? तुझे जरा भी डर न लगा और मुझे लगा था के कोरी गप्प होगी? तूने तोह दिलेरी दिखाई हे लेकिन वो तगड़ा सांड कैसे किश कर रहा था तुझे.. वैसे उसके हाथ कही और घूम रहे थे.."

"देख तूने कसम चुक्की है और ये बात रेनम तक भी नहीं जानी चाहिए. अर्जुन से रिश्ता बढ़ नहीं सकता लेकिन मैं इतने में हे खुश हु. और वो भी मेरा ख़याल दिल से करता है, चाहे मैं उसकी मंज़िल नहीं.", जसलीन को खुश होने के साथ ऐसी बात कहते हुए सुखजीत थोड़ी हैरान हुई.

"ोये कसम तोह जान से बढ़ कर है दीदी. लेकिन ऐसा क्यों की रिश्ता नहीं हो सकता? जग्गी वीर जी का भी वो ख़ास है और बड़ी बेबे को भी पसंद है. धरम वाला मसला है?"

"ोये नहीं भोलिये, आपसी दिल का मामला अलग और उसका सच अलग. प्यार तोह उसके कई और भी करती है और ये बाँदा भी किसी का दिल नहीं दुखता. पर इसके वाली सबसे ख़ास है जिसके सामने इसकी नजरो में सिर्फ िज्जात्त और प्यार देखा है मैंने. उनके बीच तोह रब्ब भी आने की जरुरत न करे लेकिन अब मुखिया जी है ये तोह दासियाँ तोह रख सकते है न? वैसे तू बड़े गौर से देख रही थी.", अब सुखजीत थोड़ा झेंपती सी नजरे झुकाने लगी जिसको जसलीन ने अपने साथ लगा लिया उस बड़े बिस्टेर पर तक लगाए हुए.

"न शर्मा इतना. जानती हु तेरे लिए ये सब नया होगा चाहे फिल्मो कहानियों में पढ़ा देखा हो."

"उसके सामने तोह जस तुम भी छोटी दिखती हो चाहे हम दोनों हे लम्बी है, रेनम से भी 2 इन्चा ऊपर हो तुम लेकिन कितना चौड़ा गबरू है. वीर जी से भी लम्बा है और अगर तुम दोनों वैसा कुछ करने की तोह नहीं सोच रहे न? देख मैं बोल देती हु कोई मसला न हो जाए."

"नहीं होता मसला और फिलहाल बस मैंने टाइम बिताना है इसके साथ जिसमे तू अब मेरा साथ देगी. हफ्ता भर तोह मैं कही जा नहीं रही और उसके बाद भी रुक सकती हु अगर ये मिलता रहा तोह. जग्गी ने निकल जाना 3 बाद तोह बेबे भी यही रुकेगी. ाची बात है उनके रुकने से फायदा हे है. वैसे तू वो मसला क्यों बोल रही थी?"

"वो.. वो एक सहेली है मेरी थोड़ी बड़ी है मुझसे. आप जानती तोह हो यार मेरे मां वाली बेटी को. उसके साथ थोड़ी बहोत बात होती रहती है और अभी शादी के बाद जब वो बेबे से मिलने इधर आयी हुई थी तोह रात में बातचीत करते हुए वैसी बात भी चल पड़ी. कह रही थी के बहोत दर्द होता है ये मर्द लोग बस अपनी हे सोचते है. पहली बार था और ज्यादा बातचीत करे बिना उनके पति ने वो सब कर दिया. लेकिन जस जो हमने तुम्हारे उधर फिल्म देखि थी उसमे तोह हीरो बहोत कुछ करता दिखाया, सबसे ज्यादा तोह किश और इधर. फिर ये दीदी वाले मामला तोह बिलकुल उल्टा है जैसे उन्होंने बताया की निचे किया और हो उनका काम हो जाने के बाद सो गए. फिल्म और असलियत इतने अलग होते hai",Ye शायद ज्यादा नहीं जानती थी अंतरंग सम्बन्धो के साथ साथ चुदाई और prem-milan के फरक को.

"वो हवस हुई जिसमे बस एक का काम निकला और हट गए परे. प्यार में जरुरी नहीं की 'वो असली काम' हे हो. एक दूसरे के साथ प्यार भरा समय और ढेर साड़ी बातें ज्यादा मायने रखती है. किसिंग और टच तोह फील करवाने के लिए जरुरी है न तभी तोह पता लगता है की यहाँ सिर्फ एक हे इंसान की चाहत नहीं है. दोनों शामिल है और वो पसंद करते है एक दूसरे को. मैंने किश किया तोह क्या अर्जुन ने कपडे फाड़ दिए मेरे? मुझे ज्यादा बेहतर तरीके से उसने मुझे बाहों में लेते हुए किश किया. वो डरा नहीं क्योंकि मैंने पहल की थी जिसका मतलब सुरक्षित है. आपस में सुरक्षा का भाव देना भी जरुरी है. बाकी तुझे शाम को ाचे से देखने मिल जाएगा. मैं कपडे बदल के आती हु. नींद न पूरी हो रही."

"सपने लेने है सीधा कहो न? वैसे दिल तोह मेरा भी कर रहा है के आधी हक़ जमा दू.", सुखजीत ने खिंचाई करनी चाहि थी पर डाव उल्टा पड़ गया.

"कोशिश करके देख लियो जानी, अपने पाँव पे तोह कड़ी न रहने वाली जो आधा भी हक़ ले लिया तोह. चल बोल दूंगी एक मीठी पप्पी देदे इस आधे हक़ वाली को. हाहाहा..", सुखजीत ने तकिया फेंक कर मारा तोह जसलीन पहले हे दरवाजा बंद करके बाथरूम में बंद हो गयी. असलियत में तोह उसकी पंतय इतने में हे भीग चुकी थी.

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"तोह आज फिर से सब वैसा हे है जैसा 10 बरस पहले था? धुल भी बंद कमरों में आने लगी है लेकिन किसी के कदम बहार तक नहीं दिखे. शीश भवन अब काली हवेली कहलाने लगा है और यही इसका नसीब लगने लगा है हमे. पता नहीं ये हमारा खौफ है या इस हवेली में क़ैद उन मासूम बच्चियों का मुकद्दर जिसके सामने कोई सच्चा इंसान भी आने से कटरा रहा है. बहार घनी होती झाड़ियों और सुनसान घात तोह हमे भी विस्मित करते है. कितनी आबाद जगह थी ये और हम ठीक ऐसी हवेली की चाहत रखते थे जब जब अपना घर बनाने की सोचते, अपना छोटा सा संसार जिसमे हमारे दोनों बेटे एकसाथ रहे और हमारी प्यारी गुड्डी साल में 2-4 बार काम से काम अपना चेहरा दिखने आये. ढेर सारे naati-paute पौती और बुढ़ापे में बस हमारी अर्धांगिनी के साथ उन नन्हे पौधों को बड़े बगीचे में देख कर खुद को बाकी दुनिया से अलग कर ले. पता नहीं कैसे 10 बरस बाद आज दिवार फांदते वक़्त जब झाडी में उलझे तोह ये छोटी सी चप्पल हाथ लग गयी. हमारी हथेली से आधी होगी लेकिन इसका माप खुद हमने कागज़ पर गुड्डी का पाँव रखवाते हुए लिया था. बहोत शौक था उसको चमड़े के अंगूठे वाली चप्पल का, लड़को वाली कह कर उसकी माँ दांत भी लगा देती थी. आज ये हमारे हाथ में है और जाने क्यों हर लफ्ज़ लिखते हुए शरीर के समस्त रोयें खड़े होते हुए हमे कमजोर कर रहे है. हम कभी अश्रु नहीं बहते क्योंकि माँ ने यही तोह कहा था हमसे की अगर मैं रोया तोह वो हमसे नाराज हो जाएंगी. हम नहीं रोये जब वो दुनिया से चली गयी. आज.. आज शायद ये आँखें माँ की बात सुन्न कर भीग गयी. बेहला दिया था न उन्होंने अपने प्रेम में और गुड्डी के लिए कैसे खुद को बेहलायें?

किसी ने सन्देश दिया था के इधर 3-4 दिन पहले हलचल देखि गयी थी लेकिन हमने ध्यान नहीं दिया, डरते है न इस अँधेरे से और लोग मानते है की हम सबसे सख्तजान है. कैसे कहे की वो जिसको देखते है वो इंसान नहीं है, वो बस एक ऐसा व्यक्ति है जो शाशन में समर्पित है. कैसे कहे की जब जब हम घर में उन बच्चों को देखते है जिन्हे हम अपने अलग संसार में देखने के सपने बुनते थे उन्हें देख कर हमे डर लगता है. प्यार भी नहीं जताते उनसे तोह इस वजह से हम. बस ज्यादा से ज्यादा सर पे हाथ फेर दिया या सबके सामने बोल बतला लिए. गुड्डी खो चुके है जो दुनिया से विलीन होने के बावजूद हर रात हमारे अंतर्मनन में यही कहती है की बाबा, मैं ौना नै. रस के जा ऋ है हेली तेह. हो गया उसका रुसणा सच और हम न मन पाए और न उसको वापिस ला पाए.

राम पूछता था के उसकी गुड्डी को दफनाया कहा है हमने और जगह बताई तोह वो पागल रात में हे खोदने चला गया. वो बेचारा पहले हे तजा जख्म से नहीं उबरा था और हमारे उस झूठ से ऐसा आहात हुआ की खुद को उसी कबर में दफ़न करने लगा. हमने पहली बार हाथ उठाया था अपने बेटे पर लेकिन गलती हमारी थी. जानते हुए भी की दुनिया में राम माँ को सबसे ऊपर रखता था लेकिन उसके दिल में गुड्डी से ऊपर कोई था भी नहीं. वो टूटा हुआ था लक्षिका और अपनी बड़ी बहिन की हत्या से, राघे की सगी बहिन राम की ज्यादा थी. एक माह बाद अगर बहिन और दादा को भी खो दिया और उसको बताया भी न जाए तोह गलती हमारी हे थी. नहीं जानते की वो लड़का कैसे सम्भला था पर उस रात वो मिटटी में दफ़न होने से तोह हमने रोक लिया पर अपने आप में डूबने से उसको कोई रोक न पाया. यहाँ राघे जैसा मजबूत दिल भी हमने जंगल में रट देखा और अपनी धर्मपत्नी को भी. संसार नाम हमने उन माँ बेटो से हे तोह चुराया था. अक्सर राम यही कहता था के अम्मा जी जिथे तुस्सी हो सद्दा संसार. ऐ महल किसे दिन देह जाने, संसार हमेशा रहना. आज 10 बरस बाद ये खंडहर क्यों मजबूत खड़ा है फिर? इस बार वो अवकाश ले कर मिलने भी नहीं आया. चिट्ठी जरूर भेजी की बीवी बचे आ रहे है पर उसको जरुरी काम है. ये जरुरी काम ज्यादा बढे जा रहे है जिस वजह से वो दिन में अपनी माँ से मिल कर वापिस चला जाता है साल में 3-4 बार लेकिन हमसे 15 महीने पहले मुलाकत की थी.

यहाँ लिखने के लिए बैठने से पहले हम इस चप्पल को लिए जाने कैसे तहखाने में दाखिल हो गए. वह कुछ है जिसने हमे कुछ पल जकड सा लिया था फिर होश आया तोह लालटेन बुझ चुकी थी और हम उस बिस्टेर के करीब घुटनो पर बैठे रो रहे थे. 2 चूड़ी के टुकड़े अपने पास रख रहे है, सबूत के लिए अनगिनत वह बिखरे है. अपनी हवेली में ये रखना चाहते है बस यादगार के लिए. वो यही देने के लिए जैसे हमे बुला रही थी और हम अपनी बेटी की ख्वाहिश हे पूरी न करे तोह कैसे बाप हुए? बेटियां तोह हमेशा से हे पिता का मान होती है और दुर्भाग्य से वही दूर होती है. हमारे छोटे सुपुत्र ने तोह बहोत हे बहादुरी का काम कर दिखाया, पता नहीं तीनो औलाद इतनी विभिन्न कैसे हो गयी. शायद bahu-sansarg का श्राप हमे इनके रूप में मिला या वरदान. लेकिन हमारा हर सम्बन्ध वासना से परे है जिसके लिए हम माँ लक्ष्मी की सौगत उठा रहे है. अनामिका और रज्जो, दोनों बच्चियों के पिता है हम है लेकिन ये सिर्फ हमने उनकी माँ के अटूट प्रेम की परीक्षा लेने के बाद तये किया और बलविंदर जानता है इस राज को. उसको प्रभा के सिवा किसी से प्रेम नहीं, समिति दुरसी रानी बानी तोह वजह उसके पिता जी थे. लेकिन हमारे इस नादान कृष्ण ने वो सच तब बताया जब वो खुद 2 बचो का पिता बन चूका है देवकी से. इस saral-buddhi की वजह से हमारा हे खून 3 बरस पहले महल से पृथक हो कर खो गया. उतनी हे गलती संगी की भी है जिसने गुस्से में ये तोह कह दिया की वो गर्भवती अनामिका को जंगल में मार आया. पर भाई है न और कृष्ण का गहरा दोस्त भी, चाहे जैसा भी है लेकिन दोनों के बीच अटूट प्रेम है. महीने भर पहले हमने देख लिया था इन दोनों को जब कृष्ण उसके गले लग कर रो रहा था और हमारे सवाल करने पर भी वो चुप न हुआ तोह संगी हमारे पाँव में गिरकर माफ़ी मांगने लगा. वो अनामिका और कृष्ण के प्रेम का प्रहरी भी था पर किसी के बहकावे या जाल में फंस कर ये दोनों अपना अपना प्यार बता न सके. हमे देवकी तोह कभी पसंद हे नहीं थी लेकिन ऐसा प्रेम और वो भी इन maha-murkho का? क्या कहते जब कुछ कर हे नहीं सकते. बस इस बार रामेश्वर आता है तोह ठन्डे दिमाग से बात करूँगा. लेकिन उम्मीद काम है की वो सलामत मिलेगी. लॉलीअ बहोत शातिर थी और उस से ज्यादा वो मनीराम. यही दोनों है सब उजड़ने वाले लेकिन लगता है इनकी भी कुछ कहानी रही होगी. ऐसे बदले की भावना तोह कोई नहीं रखता और वो भी इतनी काम उम्र me.Bade बेटे का प्रेम हमारी अनदेखी से न बच सका और छोटे वाले हिम्मत न कर सके. करते तोह कौनसा हम ऐसा होने देते. बहिन भाई का रिश्ता पति पत्नी में बदल दे? मार भी नहीं सकते क्यूंकि उसने तोह सच्चा प्रेम हे किया था और आज कही वो मिल भी जाए तोह बचे को नाम क्या देंगे अगर जीवित हुआ तोह?

बस खोज रहे है उस कड़ी को जो अनामिका और लॉलीअ के बीच है. वो तोह बहोत पहले जा चुकी थी इधर से और आजतक लापता है लेकिन सारंग कुछ भी कर सकता है पर कृष्ण के मामले में झूठ नहीं बोलने वाला. उसकी तोह सगी बहिन थी और वो कृष्ण से अपनी दोस्ती को सबसे ऊपर रखता आया है फिर चाहे उसके लिए परीक्षा में अंनुट्रिन हे क्यों न होना पड़ा हो या शाही खेल छोड़ कर नदी किनारे कांच की गोलिया. जीवन में सब कुछ देख लिया पर ये सुकून जाने कब मिलने वाला है. सोचता हु की अब अपनी माँ को हे बेहला दू, उनके पास जा कर. लेकिन बलविंदर और अर्धांगिनी को छोड़ कर कैसे जाऊ? और ये जो इतनी अदृश्य नन्ही गुड़िया मेरे करीब बैठी देख रही है की मैं उनके लिए और क्या प्रयास कर सकता हु, इन्हे धोखा कैसे दू? चलो एक और ख़ास बात बता देता हु जैसा हमरारी धर्मपत्नी जी कहती रहती है न की जिनके मकसद पूरे न हो प्रभु उन्हें सुकून देने में असफल नहीं होते अगर वो दुनिया से चले जाए तोह. वो उनका अंश जरूर भेजते है वापिस, जो उन बंद मंज़िलो को खोल कर रोशन करता है. दरबारी आदमी हु तोह पंजाबी काम हे बोलता हु पर वो जैसे बोलते है सुन्न कर एक ख़याली तसल्ली मिल हे जाती है. हाँ इस बात से हे तोह वो ख़ास बात जुडी है, अब तुम्हे ये कागज़ मिले तोह हंसना मैट भाई. ये बच्चियां भी शायद खुश हो रही है क्योंकि आज मैं इनके पास हु. अब हल्का सा दर्द भूल कर कुछ मजेदार लिख रहा हाउ.

हमने खुद को हे देखा अपने खवाब में, थोड़ा सा विलायती स्वरुप था लेकिन जीप यही थी जो अभी हमारे पास है. वो बहोत ख़ास पल था क्योंकि जब हम उस उतरे तोह एक बिलकुल हमारे हे नयन लिए सुंदरी ने हमको आलिंगन में भर लिया. हमको उम्मीद नहीं थी जैसे उनकी और सच में अभी तक हम महसूस कर प् रहे है उस हृदयगति को. अविस्मरणीय और दोनों इतने सामान जोड़ीदार कैसे हो सकते है? वो सुंदरी हम पर हावी थी और पहली बार जीवन में हमने खुद को किसी महिला के अधीन सुरक्षित पाया. एक बार होता तोह भुआल भी देते या स्मरण हे नहीं रहता, नींद इतनी आती भी कहा. लेकिन 6 माह में kam-s-kam 6 बार तोह ये हमने देखा है. वो जगह भी हमारी हे थी जैसी आज है तोह इसका क्या अर्थ समझे? हाँ अजीब है न इसलिए किसी से कहा नहीं.

भाई आज हम इस से ज्यादा नहीं लिखेंगे क्योंकि एक बार फिर हमे तहखाने में जाना होगा, खुला छोड़ आये थे और कुछ वक़्त सीढ़ियों पर बैठने के बाद हम लौट जाएंगे. तुम जब भी आओ बस आ जरूर जाना. दवा शुरू करवा दी गयी है हमारी अनिद्रा की वजह से लेकिन उसको खाने के बाद तोह ज्यादा डर लगता है. अभी जो हमे घेरे हुए है यही फिर सोने नहीं देती. हो सकता है ये भी उस दवा का हे असर हो. लिखते वक़्त हे खा चबा ली, वो आज घर पे खाने से बच रहे थे इसलिए उछाल कर जेब में हे गिरा ली थी. अजीब लग रहा है थोड़ा. चलते है.

मुलाकात की आस नहीं है, बस एक प्रयास जरूर करना. साबित यही करना है की हमारे सीने का बोझ तब भी सच्चाई के साथ था और आज भी हम सच के लिए अपनी बिजली कही भी चला सकते है. सबूत तोह दे हे चुके है पहले पत्र में.

Lakshmi-Narayan की कृपा सदा बानी रहे.

याचक

पंडित मोतीलाल अनुराधा शर्मा

25/05/1958

आखिरी पहर"

आज अर्जुन का भी चेहरा आंसुओ से भीगा था लेकिन वो कितने समय से रो रहा था ये खुद वो नहीं जानता था पर आखिर में गीले चेहरे पर हलकी सी मुस्कान भी थी और खुद उसने कहा, 'हम आ चुके है पंडित जी. आशीर्वाद तोह पहले हे दे गए थे आप और ये पत्र ऐसे हे दिखने वाले है आपके पुत्र श्रीमान रामेश्वर शर्मा जी को'. अब चलते है दूध पी कर किसी की प्रेम परीक्षा लेने, बिना दबाव के. चची ने भी दूध के लिए आवाज लगा दी थी घडी में 5:30 देख कर.
 
लो भाई सबसे बड़ी हिंट उस सपने की जहा सबने अर्जुन और ऋतू देखे..

तू दूर सबतो है

क्यों मेरे करीब वे

आया क्यों मेरी पीड़ ते

रेहनी हां मैं तेहतो दूर ने

कॉल स सदा क्यों चाह्वा मैं

दर्द मेरा तू क्यों खोले है

तेरी हाँ, पर तस्दीक क्यों

वेख के मैं तह खुश हाँ

तू कॉल सबदे

दूर मेरे तोह
 
अपडेट 201

अवसर (बी)


"क्या कह रहा था आपका लाल और उसने आज 5 मिनट में हे फ़ोन भी रख दिया?", कौशल्या जी कुछ वक़्त पहले हे गाँव से लौटी थी अपने पति के साथ. सितारा देवी ने उन्हें शाम की चाय पीला कर हे जाने दिया था और इस दौरान वो बबिता के परिवार से भी ाचे से मिली थी. पंडित जी भी अधिकांश समय गाँव के जानकार लोगो और थोड़ा बहोत किसानो के बीच बैठ आये थे. कपडे बदल कर एक बार फिर से चाय का इत्छा थी और इस दौरान उनकी अर्जुन से भी कुछ बातचीत हुई टेलीफोन पर.

"ये लड़का हमे रिश्वत भी ऐसी पेश कर रहा है जिसका खुलासा वो करना नहीं चाहता और शर्त ये है की हम पहले हवेली पर आये, दरगाह पर नहीं. ये हमारे साथ हे उधर जाना चाहता है. अब जाने इस चिड़ीमार के हाथ कौनसा ऐसा कारण का खजाना लग गया जो हमारे लिए दुनिया में सबसे अनमोल हो सकता है? खुराक में कुछ और तोह नहीं मिला कर दे रही तुम इसको?", अब तोह कौशल्या जी भी बिस्टेर पर चाय की ट्रे रख कर गौर से सोचने लगी.

"वो ये तोह ाचे से जानता है की आपकी दौलत तोह बस परिवार हे है. जरूर कुछ ऐसा हे होगा और मिल कर आया क्या वो कॉलेज के लिए गोयल से?", कौशलय जी भी बहोत कुछ जानती थी क्योंकि अक्सर अपने शयनकक्ष में इन दोनों के बीच हर मुद्दे पर चर्चा होती थी.

"कह रहा था के सब हो चूका है और फाइल सिग्न करवा दी है हर विभाग से. लेकिन सावन नहीं अखाड़े के बाद हे वो तुम्हारे हाथ से वह नीव पत्थर रखवाने वाला है. अभी तोह इन्दर, महेंद्र के साथ ग्राम समिति में भी हमने इसकी बैठक नहीं की थी. सोच रहे थे की समय लगेगा कुछ महीने का और फिर sarv-sehmati से निर्णय लेंगे पर इनके मनसूबे कुछ अलग जान पड़ते है. जानती हो वो जगह कहा पड़ती है?", रामेश्वर जी के प्रश्न से पहले तोह कौशल्या जी बहोत खुश हुई थी क्योंकि उनके अर्जुन ने आखिर उनके लिया इतना कुछ सोच रखा था. पर अब जमीन वाली बात सुन्न कर वो समझ गयी की इतना सीधा भी नहीं है सबकुछ.

"अब ये जमीन में कोई पेच है क्या जी?"

"हाँ सबसे बड़ा पेच तोह यही है कौशल्या लेकिन लगता है जैसे अर्जुन इस अवसर की हे तलाश में था. वो गाँव में प्रवेश करते समय जो अड्डे के साथ हमारी जमीन है उस पर कॉलेज बनवाने का ितचुक है. मतलब हाईवे पर जिस से ज्यादा से ज्यादा बचे वह पहुंच सके. ठीक भी है क्योंकि गाँव के भीतर वो शांति बानी रहेगी. वैसे महेंद्र ने बताया की अब उधर पुलिस चौकी की जगह थाना बनाने का आवेदन भी दिया गया है, सुचारु बस अड्डे के साथ. देखा जाए तोह नक्शा हे बदल जाएगा और पिता जी ऐसा हे कुछ चाहते थे की बचे पूरी सुरक्षा में विद्या ग्रहण कर सके. अब तोह पूर्णिमा को भी जाना पड़ेगा क्योंकि अकेले तोह तुम भी bhoomi-poojan न करने वाली.", रामेश्वर जी तोह अंदर हे अंदर उस रिश्वत में हे उलझे हुए तोह जो अर्जुन उन्हें देना चाहता था. लेकिन पत्नी को खुश देख वो मुस्कुराते रहे.

"ये इस सबके लिए वह गया था जी?"

"फाइल तोह हमने हे भिजवाई थी इसके हाथ क्योंकि महेंद्र आ जाता लेने. पर अधिकार है अब उसके पास तोह वो शायद यही से फाइल पढ़ कर गया होगा और उधर सबकुछ देख परख के उसने ये बदलाव किये. ाचे बदलाव है और हम भी वैसा न कर सकते थे जैसा इन्दर ने कहा था के सड़क किनारे वाली जमीन पर वो मार्किट बना सकता है. इसने कॉलेज बनाने की ठान ली और अब उसकी दादी खुद कन्या महा विद्यालय की नीव रखेगी तोह इस से बेहतर उदहारण क्या होगा शिक्षा और नारी के महत्व का.? ये लड़का अगर आने वाले समय में प्रदेश के चुनाव लड़ने चला गया तोह भजन की सीट नहीं बचने वाली. हाहाहा. जानते है वो बस परिवार में रहना चाहता है. लगा दो फ़ोन अब पूर्णिमा जी को कौशल्या जी. कल हम ले आएंगे उन्हें."

"हाँ ये नहीं कहते की तुम साथ चलना लेने? बुढ़ापे में देख रही हु की वही दिन लौट रहे है जब अगली सीट पर देवर भाभी बैठे होते थे. कही चुन्नी वुननि तोह न अटकती थी पूर्णिमा की?"

"अरे बक्शो भाई हमे. तुम्ही साथ चलना नहीं तोह राजू को भेज देंगे."

"हाहाहा.. जाना तोह आपको हे पड़ेगा जी क्योंकि राजू के साथ तोह वो आने से रही. और मैं कल घर हे रहूंगी, फिर परसो गाँव में रुकना पड़ सकता है अगर इतना कुछ होने वाला है तोह. चाय ठंडी हो रही पी लो, बाद में खुली आँखों से सपने देख लेना पूर्णिमा के साथ सफर के. वैसे पहले आप उसको मोटरसाइकिल से भी लेके आते थे न हमारे घर?", अब तोह रामेश्वर जी को जोरदार ठसका लगा चाय का घूँट लेते हे.

"हमको तोह लगता है आप कही ज्यादा याद कर रही है उन दिनों को. चाय पीने दो कौशल्या जी नहीं तोह हम ड्यूटी पर रहते थे जब आप फिल्म देखने निकल जाती थी, मोटरसाइकिल पर हे. 2 लोगो के वाहन पर एक पुरुष और 2 महिलाये."

"अपनी फिजूल की बातें अपने तक हे रखो जी. मैं चली अपनी बहु का हाल लेने, ड्यूटी तोह खुदको प्यारी थी और मैं पिक्चर भी न देखने जाऊ अपनी बहिन के साथ.", कौशल्या जी तुनक हे गयी थी इस तंज पर लेकिन उनको जाते देख भी पंडित जी ने आखिर बाण चला हे दिया.

"2 बहने और जीजा या फेर देवर? इस मामले की जांच होनी चाहिए कौशल्या जी."

"कल मुजरिम को साथ हे लेते आओगे, तफ्सील से सुन्न लेना कहानियां. आज पता चला के उसके पास जाने से पहले बगल वाली सीट रुमाल से क्यों साफ़ करते हो.", ये नहीं जीतने देती थी कभी अपने पति को. रामेश्वर जी ने तोह चाय का प्याला हे वापिस रख दिया.

'कलेजा बाल के चा ठंडी करती. बेडा गरक होये उस दिन डा जिस दिन सीट साफ़ कित्ती सी. हो न हो यह वि ेहड़ा हे कम् होना नहीं तेह बंद गद्दी विच कौन सीट खराब करू?'

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"खेलने जा रही हो?", अर्जुन आज पैदल हे निकला था हवेली से और दूध के समय थोड़ी बहोत बातचीत दामिनी, देवकी के साथ आँचल से भी कंप्यूटर और पढ़ाई पर चर्चा करके वो टहलता हुआ चौपाल से उस तरफ जा रहा था जहाँ जगतार के घर की पिछली गली अंत में वही पहुँचती थी जहा जसलीन ने उसको बुलवाया था. गली में कुछ हे आगे पंहुचा था और इधर तक़रीबन 8-10 हे घर थे, खुले आँगन और बहार वृक्षों की छाया वाले. इस घर से निकल कर ये युवती अपनी सहेली के साथ उसके सामने एकाएक प्रकट हो गयी. अर्जुन को देख कर एक सरल मुस्कान और आँखों में अनकहे भाव.

"जी बस प्रैक्टिस के लिए जा रहे है. आज आप नहीं आ रहे उधर?", ये मीनाक्षी थी उर्फ़ मिनी. अर्जुन को अपने सामने देख भूरी जुल्फ को कान के पीछे ले जाती वो अपनी सहेली को भी देख रही थी.

"आऊंगा लेकिन कबड्डी वालो की प्रैक्टिस के बाद. वैसे भी बस एक्सरसाइज हे करनी है तोह थोड़ा घूमने निकल आया इस तरफ. वैसे भी आया नहीं था न इधर अभी तक. और ये जी वाला मुद्दा अब बंद भी कर दीजिये.", अर्जुन इनसे बातें कर रहा था और मीनाक्षी की दादी जी खुले द्वार को बंद करने चली आयी. मीनाक्षी थोड़ा सा सतर्क हो गयी थी जैसे जवाब देना पड़े उन्हें अब.

"नमस्ते बेबे. कैसी हैं आप? दादा जी के साथ गुरुघर के बहार हे मिले थे तोह पता नहीं था आप यहाँ रहती है.", अर्जुन ने झुक कर उनका आशीर्वाद लिया तोह उन्होंने भी ख़ुशी से उसका माथा चूम कर स्नेह दिया.

"जग जग जियो बीटा. अब तुम पहले फुर्सत तोह पा लो बाकी सब से तभी इस बुढ़िया के लिए वक़्त निकाल सकोगे. दार जी बता रहे थे बड़ी जिम्मेवारिया है इन जवान कंधो पर. आओ मैं बस चाय बनाने लगी थी अर्जुन."

"नहीं बेबे आज तोह मुमकिन नहीं अभ्यास के लिए भी जाना है और दूध पी कर निकला था अभी लेकिन जल्दी हे आपके उलाहने दूर करके जाऊंगा. परसो दादी भी आ रही है सेहर से और उनके साथ हे आऊंगा आपके पास. दर जी को मेरी नमस्ते बोल देना.", अर्जुन ने जाने के वक़्त फिर से चरण स्पर्श किये तोह मीनाक्षी की दादी जी ने आशीर्वाद देने के बाद द्वार लगा लिए. दोनों लड़कियां अभी भी अपनी जगह हे कड़ी ये सब देख रही थी.

"डाका डालने वाले हो क्या हमारे घर पे जो दादी को खुश कर रहे थे? वैसे बहाने बहोत तैयार रहते है आपके.", मीनाक्षी ने जिस तरह उन्मुक्त हो कर ये कहा था अर्जुन ने हाथ जोड़ दिए.

"आप चाय नहीं बनाने वाली थी और उनसे काम करवाना नहीं चाहता. वैसे सच हे कहा है की इनसे मिलने परसो आऊंगा."

"बस दादी से मिलने?", मीनाक्षी किस नशे में थी ये खुद उसको नहीं पता था. वो अर्जुन से सवाल कर रही थी जैसे वो कुछ और सुन्न न चाहती हो.

"हाँ दार जी और आपके माता पिता से भी मिल लेंगे. वो अभी तोह घर नहीं लौटे है, सरकारी नौकरी जो है दोनों की.", अब मीनाक्षी ने चेहरा निचे करते हुए करीब से निकलना हे शुरू किया था की अर्जुन ने इतने धीमे से कहा की दूसरी तरफ से जाने वाली उसकी सहेली भी न सुन्न सकीय.

"आपसे तोह मुलाकात कुछ वक़्त बाद होने हे वाली है. और शायद कल पार्टी भी देनी पड़े आपको.", अर्जुन आगे बढ़ गया था तेज कदमो से जबकि मीनाक्षी के कदम तोह अपनी हे जगह चिपक गए. चेहरे पर हजार भाव आये और गए लेकिन जो लाली और मुस्कान थी, बहुमूल्य.

"अब चल भी ले यार मिनी. थोड़ा अजीब सा बाँदा है जो मेरी तोह समझ में न आया के क्या अंकल आंटी की बात कर रहा था."

"हाँ अजीब तोह है पर क्या कर सकते है. देख नहीं रही वह जा रहे है जहा बस खाली तालाब है और जंगल. घूमने दो आखिर गाँव में घूमने की मनाही थोड़ी है. चल पहले हे लेट हो गए पर लाइट लगी है तोह टेंशन नहीं.", दोनों khel-ghar की तरफ बढ़ चली बिना वापिस पलट के देखे. अर्जुन भी इस आबादी से आगे निकल कर अब कच्ची सी सड़क पर था जहा ये और जगतार वाली गली ख़तम हो कर काफी पीछे रह गयी थी. एक मात्रा माउद पर खम्बे पर टिमटिमाता बल्ब काफी रौशनी कर रहा था जिसकी फ़िलहाल ज्यादा जरुरत भी नहीं थी. ाची जमीन थी सुच्चा सिंह जी के परिवार की जो इस पगडण्डी से आगे काफी दूर तक थी. यहाँ तार की जगह लोग वृक्षों की कतार से घेराव रखते थे कृषि जमीन का और पगडण्डी से दूसरी और थोड़ा निचे चमकता ठहरा हुआ पानी उस विशाल तालाब में. आगे बस जंगल सा हे था दूसरी तरफ.

"पूरे टाइम पर पहुंचे हो मिस्टर. ाचा लगा की काम से काम थोड़ी बहोत तोह कदर है हमारी.", दिन वाले सलवार कमीज की जगह जसलीन ने बिना किसी ज्यादा प्रसाधन और साज सज्जा किये ये ढीली सफ़ेद कुर्ती और चुस्त बनियान से कपडे की पजामी पहनी हुई थी, सुर्ख रंग की. दुपट्टा भी बस गले में और बाल एक क्लिप में कुछ ऊंचाई से बंधे. जिस तरह से सामने से आते हे उसने अपनी एक बाजू अर्जुन की बगल से उसकी ब्याह पर फंदे सी बनाई थी, स्पष्ट था के यहाँ उसके सिवा कोई और नहीं है. पगडण्डी पर इस खामोश प्राकृतक दृश्य में जसलीन के साथ बढ़ता अर्जुन उसकी ख़ुशी से खुश भी था और आसपास नजर रखते हुए थोड़ा चौकन्ना भी.

"आना नहीं होता तोह समय क्यों देता? लगता है मुझसे पहले तोह तुम पहुंच चुकी थी. वैसे ाची जमीन है और जगह भी कितनी शांत. इस तरफ कुछ ऐसा होगा, नहीं जानता था.", अर्जुन चलते हुए उस बड़ी हौदी तक आया जिधर आम का घाना वृक्ष उस साफ़ पानी को अपनी छाया में लिए था. इतना बड़ा वृक्ष वो भी इस प्रजाति का अर्जुन ने पहले नहीं देखा था और उसकी झुकी हुई मोटी दाल पर हाथ से बनी मोटी रस्सी और कपडे का वो झूला जैसे काफी समय से मौजूद था. इस जगह, दुनिया से दूर बस यही दोनों थे और जसलीन को अपनी हे तरफ मुँह करवाते हुए अर्जुन ने उस झूले पर बैठा दिया.

"कही ऐसा तोह नहीं की नए मालिक की नजर हम गरीबो की 2 बीघा जमीन पर है? हाहाहा.."

"सोच तोह वही रहे थे, लेकिन जमीन से ज्यादा मूल्यवान इसकी मालकिन अगर मिल जाए तोह ज्यादा बेहतर होगा. तुम सचमुच बहोत प्यारी लग रही हो जसलीन. लगता है जैसे ये जगह इसलिए ज्यादा आबाद लग रही है के तुम यहाँ हो. बाल खोल दो न?", अर्जुन के ऐसे इजहार से जसलीन के पतले गुलाबी होंठो पर वही मुस्कान बन्न आयी जिस से ाचे ात्चो का दिल बैठ जाता था. कॉलेज के साथ साथ पूरे यूनिवर्सिटी में इस आधुनिक के अनगिनत दीवाने थे पर इसके नजदीक आने का सौभागय बस अर्जुन को हे मिला था, खुद जसलीन की चाहत की वजह से. धीरे धीरे उसको झूलते हुए अर्जुन ने वो क्लिप उसके हाथ से लेते हुए अपनी जेब में रख लिया. अब वो रेशमी लमि जुल्फे जिस तरह से लहरा रही थी अर्जुन झूलने की रफ़्तार को काम करते हुए थोड़ा सा घुटने के बल बैठ जसलीन के चेहरे के सामने चेहरा ले आया. आखिरी पींग रुकते हे जसलीन के नरम होंठ अर्जुन के होंठो से जा मिले. वो फैली हुई जुल्फे और अर्जुन के दोनों हाथ सिर्फ रस्सी पर लेकिन ये सटीक चुम्बन. यहाँ जसलीन ने हे उसका सहारा लेते हुए अपनी चाहत का खुल कर इजहार किया. एक हाथ अर्जुन की गर्दन पर रखते हुए वो अब उसको खींचने हे लगी थी.

"मालकिन के बस सपने देखते रहो तुम. ुह्ह्ह्ह. बहोत तड़पाया है तुमने और वह बस तुम्हे देख सकती थी जो ज्यादा बुरा था.", हफ्ते हुए जसलीन अब झूले की जगह जमीन पर लेते अर्जुन की कमर के दोनों तरफ पाँव किये उसके ऊपर थी. आँखों में चाहत की गहरी होती लाली और उखड़ी हुई सांसें. बस इस दिल वाले मामले में हे तोह अर्जुन की पीठ जमीन पर लगती थी. उसकी घनी जुल्फों के साये में अर्जुन बस इस गुलाब से चेहरे को देखता रहा. जसलीन ने बहोत ज्यादा इम्तिहान दिए थे इतने करीब आने के लिए पर अब अर्जुन खुद हे उसके निचे था. लैब फिर एक बार आपस में उलझे तोह अर्जुन के हाथ जसलीन की लम्बी टांगो से फिसलते हुए उसके माध्यम से कूल्हों को दबा कर अपने उस सख्त अंग पर दबाने लगे जो ठीक जसलीन की फैली हुई जांघो के बीच था. इस तरह खुले में और सांझ के गहराते धुन्दल्के के बीच ये जंगली प्रेम जैसे बेलगाम था. जसलीन सिसक उठी जब उसकी एक सम्पूर्ण चूची अर्जुन ने हथेली में भरते हुए हलके से मसल दी. एकदम सटीक अकार था उन पक्के नारंगियों का जो अर्जुन की हथेली से बच कुछ हे बहार थे. तीन तरफ़ा हुम्ला और ये खामोश जगह जहा साँसों की गूँज हवा से हिलते पत्तो से अधिक जान पड़ती थी.

"ओह्ह्ह.. बस बाबा.. बाकी बाद में कर लेना आह्हः..", अर्जुन से चेहरा अलग करते हे जसलीन के होंठो से हलकी सी लार अर्जुन के मुख पर हे रह गे. जुल्फों के साथ हालत भी बिखरी दिख रही थी जहा अभी तक अर्जुन का हाथ उस बाए कठोर सतांन को पकडे था. कुर्ती ऊपर सरक चुकी थी और चुस्त चिपकी हुई पजामी के भीतर तजा नमी ने जसलीन के कौमार्य के बहार वो ख़ास घेराव बना दिया था. आज सही मायने में जसलीन ने स्पर्श लिया था अर्जुन के तगड़े अंग का. वो इस से ज्यादा उसके ऊपर अपनी योनि टिकाये रखने में असमर्थ थी और हँसते हुए अर्जुन ने खुद हे उसको गॉड में बैठाये हुए हे बालो को पीछे ले जा कर सही से क्लिप में बंधा. ब्रा की पत्तिया भी वापिस कमीज के भीतर सही करते हुए वो जसलीन की नाक से नाक रगड़ते हुए बता रहा था के वो सचमुच उसके लिए बहोत ख़ास है. जाने ये कितनी देर ताका चला था पर जब दोनों उठने लगे तोह सूर्यास्त के बाद की या अंतिम लाली नभछोर पर दिखाई दी.

"ये बस बाकी बाद का मतलब नहीं समझा मैं?", अर्जुन हौदी के ठन्डे पानी से मुँह धोने के बाद कुछ छींटे उसकी मुंडेर पर आ बैठी जसलीन पर फेंकते हुए उस से मस्ती करने लगा.

"अब सचमुच दिल को समझाना मेरे बस में नहीं अर्जुन. पता है जब तुम्हारे बारे में गुरदीप से पता चला के तुम इधर आये हो तोह कल का पूरा दिन बड़ी मुश्किल से निकला. गुरदीप तोह मिलने भी आना चाहती थी पर मैंने कह दिया की मैं भी पिंड आ चुकी हु. और दिन में बस इसलिए साथ नहीं बैठी क्योंकि फिर रुकना मुश्किल हो जाता. तुम चाहे बंधे हो पर मेरी भी हालत वैसी हे है. कल रात हवेली से निकल सकते हो क्या?", जसलीन ने जिस तरह से मनुहार की थी अर्जुन मन न कर सका लेकिन हवेली से निकल कर वो इनके घर नहीं आना चाहता था.

"यही सोच रहे हो न जग्गी के होते हुए हमारे घर में ये सब ठीक नहीं?"

"हाँ और मैं जवाब भी नहीं दे पाउँगा. लेकिन तुम्हारी चाहत के लिए चलो ये भी सही."

"बुद्धू हो तुम पूरे के पूरे. मैं क्या तुम्हारे और जग्गी के रिश्ते में फरक लाना चाहूंगी? तुम्हारी हवेली के पीछे वाली गली में या तोह सामने की तरफ दिवार है या सिर्फ एक घर की बक्सीडे. आगे गली हवेली के बाद घूम कर हवेली के सामने हे आ जाती है लेकिन इधर से वही एक घर है जो कोने पर है.", जसलीन अब अर्जुन का दिमाग जांच रही थी की वो कौनसा घर हो सकता है.

"दीपा भाभी का घर हवेली से बहार निकलते हे मोड़ मुड़ने के बाद है पर क्या वो दूसरी तरफ से हवेली के पास लगता है? हाँ लगता हे होगा क्योंकि सामने से तोह वो कोने पर है और हवेली का बगीचा जिधर है वो जगह ज्यादा चौड़ी है फ्रंट वाले हिस्से से. कही दीपा भाभी के घर का तोह नहीं सोच रही?"

"तुम्हे पसंद करने की ये भी बड़ी वजह है डार्लिंग. दिमाग दूर तक मार करता है. लेकिन भाभी की टेंशन मैट लो. मैं और जीती कल रात उनके घर रुकने वाले है, रेनम भी होगी पर इस से फरक नहीं पड़ता. ये लोग फिल्म का प्रोग्राम बनाये हुए है और भाभी अपनी बिंदास है इस मामले में लेकिन सोने वो टाइम पे जाती है ठीक 10 बजे. ज्यादा से ज्यादा 11 बज जाएंगे हमारे साथ और अब तुम अगर उधर आओ तोह सबसे पहला कमरा हमारा नहीं तोह मैं उधर आयी तोह तुम देखो." ये तोह सच में हे पूरी स्कीम बना के बैठी थी वो भी इतनी जल्दी. हवेली में तोह इधर मीणा भी रहती थी.

"मैं हे आता हु लेकिन उनके घर में एक बिल्ली भी है, ध्यान रखना कही उसने भाभी को उठा दिया तोह वो मुझे चूहा बना देंगी."

"डरते क्यों हो जब मैं लड़की हो कर नहीं डर रही? वैसे एक बढ़िया जगह और भी है जिसमे कोई खतरा नहीं. उनकी छत्त पर जाने के लिए दोनों तरफ से सीढ़ियां है. ऐसे हे खुले में..", अब जसलीन ने हे मुँह फेर लिया था और अर्जुन ने भी दीपा भाभी एक घर की संरचना देखि थी ाचे से.

"ये ज्यादा ठीक है मालकिन. उधर से मैं सीधा गली में भी कूद सकता हु अगर मामला हाथ से निकलता दिखा. हाहाहा.", अर्जुन अब उसकी बगल में आ बैठा था और दुपट्टे से हे मुँह साफ़ करने लगा तोह जसलीन ने हे होंठो के पास वो सूती कपडा ाचे से फिराया. उसको ये छोटी छोटी हरकते भी अलग सी ख़ुशी दे रही थी जैसे अर्जुन उसके हर सपने को सच कर रहा था. उनकी जमीन, शहर से दूर और यु एक खट्ठी मीठी मुलाकात. फिर सोच पर वो हे हंसती हुई उठ कड़ी हुई.

"भाग के जा भी कहा सकते हो मामला बिगड़ने पर? अपनी हे सुनवाई करनी पड़ेगी चौपाल में मुखिया जी, लेकिन हमारे दिल की चौपाल में फैंसला हमारे हक़ में जाना चाहिए. चलो अब तुम निकलो यहाँ से, दिन में मिलना हुआ तोह आपकी मेहरबानी.", जसलीन उसको एक बार फिर उस पगडण्डी पर ले आयी थी जहा से अर्जुन दाखिल हुआ था. जाने से पहले एक बार फिर अर्जुन ने उसके नरम होंठो का स्पर्श लिया, दोनों कूल्हों को दबोच कर उसके हलके जिस्म को अपने चेहरे की तरफ उठाते हुए.

"तुम्हे छोड़ देता हु, रुकूंगा नहीं."

"जीती परली मोटर पे आ चुकी है जो तुम्हे दिखाई नहीं दिया अपना चेहरा साफ़ करते हुए. निकलो इस से पहले कही वो ढूंढ़ती हुई इधर आ जाए.", अर्जुन सर झटकता हुआ हँसते हुए निकल चला. जैसे वो भी जानता था की दो बहनो में ये सब क्या चल रहा है. पर वो जसलीन के दिल को ाचे से जान चूका था जिसमे अगर कुछ भी था तोह बस एक चाहत अर्जुन के प्रति और समर्पण, उम्मीद से भी बढ़कर. ाचा अवसर था आज ये दोनों के पास और उतना हे इन्होने भुनाया, हर एक लम्हे को. अर्जुन टीशर्ट और अपने खिलाडी वाले पाजामे को झाड़ता हुआ कुछ हे वक़्त में नजरो से ओझल हुआ तोह जसलीन को वही खोया देख उसके कंधे को थपथपाती सुखजीत ने चैहटन तोड़ी.

"कसम से यार क्या रोमियो जूलिएट वाली कहानी है तुम दोनों की. पर तुमने तोह सेक्स किया हे नहीं जबकि कितना टाइम था? मेरी पसीने से हालत तोह खराब हो गयी थी लेकिन रुक सकती थी थोड़ा और तुम्हारे लिए."

"चल पागल कही की. ये सेक्स कहा से आ गया बीच में एकदम? तुझे कहा था न के प्यार ख़ास हो न तोह वो एहसास दिलाता है के तुम ख़ास हो. और इसका इरादा सेक्स का तोह बिलकुल नहीं है, चाल बदल देगा अगर वह इसने प्यार की बारिश की तोह.", एक दार्शनिक अंदाज में वो कल्पना हे कर रही थी कल रात क्या हो सकता है उसकी.

"हाहाहा.. देख लेना वो ऐसे न जाने देना वाले तुम्हे जस जब कल रात भाभी की छत्त पर तुम उस से मिलोगी. यार कितना रोमान्तिका था न वो उसका यु झूला झूलते हुए तुम्हे देखना और फिर कोई जल्दबाजी नहीं तुम दोनों के किश में.. हाय बड़ा हे फिल्मी सन था जस और तुम तोह खुद हे उसको ध कर उसके ऊपर चढ़ बैठी थी. थोड़ा सा गन्दा सन भी था जब वो तुम्हे उधर हाथ लगा रहा था."

"चल बन्दरिये.. सब उसका हे है तोह जहा मर्जी हाथ लगाए. पर मैं देख रही हु तू वो फिल्मे देख के उनको यहाँ कैसे जोड़ रही है. शुक्र है तूने वैसी फिल्म नहीं देखि."

"देख किसी को मैट कहना पर मैंने फिल्म की जगह वो सब असली में हे देख लिया, गलती से.", अब जसलीन हैरान थी और उसको अपना राज बताने वाली जीती नजरे झुकाये कड़ी थी उसके सामने.

"कहा और किसको देख लिया?", जसलीन ने प्यार से उसके गाल को थपकते हुए मुस्कुरा कर पुछा जिस से जीती बुरा न महसूस करे.

"जस, सच में मैंने जानबूझ कर वैसा नहीं किया. वो तोह बस थोड़ी करिओउसीतय सी बढ़ गयी थी अजीब सी हलचल देख कर जब मैं रेनम के साथ उनके खेत वाली तरफ गयी हुई थी. कोई लड़का हे था और वो औरत खेत में मजदूरी करने वाली आंटी जैसी थी. दोनों झाड़ियों के दूसरी तरफ थे और वो बस उस आंटी की कमर को पकडे हुए 2-3 मिनट हिलता रहा और कुछ पैसे दे कर वही मैदान से निकल गया. इतनी समझ तोह है मुझे की वो पैसे के बदले उस अपने से आधी उम्र के लड़के के साथ क्या कर रही थी. पर जब काम इतना हे है तोह तुम दोनों यही कर लेते और फिर मां वाली बेटी वो दर्द वाली बात बोल रही थी जबकि वो आंटी तोह हंसती हुई अपने ब्लाउज में पैसे दाल कर वापिस काम में लग गयी.", सुखजीत के जवान मैं में ढेरो सवाल थे और उसके पास खुशकिस्मती से समझदार और आधुनि बड़ी बहिन जैसी दोस्त थी जसलीन के रूप में.

"सेक्स कोई गुनाह नहीं है की इस पर बात नहीं की जा सकती बहिन. देख मेरी है कुछ फ्रेंड्स जो अपने बॉयफ्रैंड्स के साथ थोड़ा बहोत और सबकुछ भी कर चुकी है. अब वो लड़का जो तुम्हे देखने को मिला वो यक़ीनन kam-umar और गलत सांगत वाला रहा होगा और ये जो औरत थी वो उम्र में ज्यादा बड़ी होने के साथ जरूर बचो की माँ होगी जो थोड़े ज्यादा पैसे के लालच में ये गन्दा काम करती होगी. गन्दा इसलिए की वो ऐसा सिर्फ उस लड़के के साथ तोह नहीं करती होगी जिस तरह से तुमने उसको पैसे लेने के बाद खुश देखा. रही बात लड़का और लड़की के बीच फिजिकल रिलेशन और उस से जुडी अलग अलग बातों की तोह सेक्सुअल रिप्रोडक्शन तुमने भी पढ़ा होगा जैसा सभी पढ़ते है. मेल part और फीमेल part का आपस में मिलना और फिर स्पर्म का वॉम्ब में जाना जिस से बचा होता है.", सरल उदहारण के साथ जसलीन ने अपनी बात शुरू की और साथ हे खेत से बहार चलना भी.

"हाँ ये तोह पढ़ा है लेकिन वह इतना थोड़ी बताते थे और क्लास में लड़के तोह हंसने लगते थे इसलिए मैडम ने वो स्किप हे करवा दिया था. पेनिस और वागिना के कनेक्शन से वही होता है जो आपने बताया. जब नैचुरली ये बने हे इस काम के लिए है तोह सब इतना डिफरेंट कैसे.?", आधे अधूरे सवाल ने जसलीन को हंसने पर मजबूर कर दिया था.

"ये कोई nut-bolt वाला सिस्टम नहीं है बाबा. तू कैसी है शरीर से और रेनम को देख या फिर तेरी कोई सहेली जो तुझसे अलग हे होगी. बॉडी से सब अलग है न और तू तेरे ब्रेअस्ट्स देख, रेनम के कितने हैवी है ठीक वैसे हे वह से भी थोड़ा डिफरेंट होगी न और लड़को में भी यही सब होता है. किसी का पेनिस बड़ा तोह किसी का छोटा. लेकिन सेक्स सिर्फ इन 2 पार्ट्स का कनेक्शन नहीं है जैसा माननी (मां की लड़की) का एक्सपीरियंस हुआ. अर्जुन क्या कर रहा था देखा था न या मैं? किश, टच और फील करना एक दूसरे को और यही सब बाद में बिना कपड़ो को. मतलब मैंने आजतक वो नहीं किया है पर ऐसा हे होता है और जब दोनों कम्फर्टेबले हो तोह आगे वो जो तुम्हे सेक्स लगता है. लेकिन जैसे पेनिस डिफरेंट होते है वैसे हे लड़को का स्टैमिना भी. अब तुमने कहा की वो लड़का 2-4 मिनट में हे हट गया, हो सकता है इतना नेचुरल हो लेकिन मेरी फ्रेंड ने बताया की वो लोग 10-15 मिनट भी टिकते है दूसरी बार करते हुए और उसने यही बताया की पैन सिर्फ पहली बार में हुआ था जो ज्यादा नहीं था. आयी बात कुछ समझ में भोली जीती मेरी.?"

"हाँ कुछ तोह पल्ले पड़ा मेरे और क्या आप भी अर्जुन के साथ कल रात नंगी होने वाली है? उसका वो देखा है आपने?"

"हाहाहा.. तू बहोत पागल है. यार जब प्यार करते है तोह क्या फरक पड़ता है की कपड़ो में है या नंगे? कोई देखने थोड़ी न आने वाला है हमे. और मैंने उसका वो देखा नहीं बस फील किया है. ाचा तूने उस लड़के का देखा था?", जैसे अब जसलीन कुछ पक्का करना चाहती थी और सुखजीत सर खुजाते हुए बाने लगी.

"वो पुन्नी? मतलब उसका पेनिस सामने से रेड था और पंत ऊपर करने से पहले मैंने बस थोड़ा हे देखा था. ढेर सारे बाल थे उसके और इतना बड़ा होगा. ऐसा मैं इसलिए कह रही हु की उसने उसको जब हिलाया तोह वो उसकी पकड़ से थोड़ा सा बहार था. 4 इंच या ज्यादा से ज्यादा 5 लेकिन मोमबत्ती से ज्यादा मोटा नहीं था जैसे पकड़ा हुआ था उसने."

"बड़ी डिटेल में देखा तूने थोड़ी हे देर में."

"बहोत गन्दा फील हुआ था मुझे. युक.. बिलकुल डार्क स्किन थी और गंदे बालो से भरा हुआ. हेयर तोह मेरे भी आते है लेकिन बहोत पतले और सॉफ्ट. मैं हटा देती हु टाइम पर जैसे आपने सिखाया था ुंडेरर्मः के लिए. बताओ न अर्जुन का कैसा फील हुआ.?", उसकी मासूमियत देख कर जसलीन ने भी ज्यादा नहीं तसय.

"ये जो तेरी कलाई है न जहा ज्यादा मांस है, इतना राउंड और जितना फील कर सकीय उस हिसाब से वो लड़का तोह फिर कुछ भी नहीं था.", अब खुद जसलीन सोच में पड़ गयी थी और सुखजीत अपनी हे कलाई को बार बार पकड़ कर देख रही थी जैसे उसकी बहिन ने कोई मजाक कर दिया हो.

"गलती लगी होगी आपको, कुछ और हे न हो. वैसे भी उधर इतना रास्ता थोड़ी न होता है. माननी दीदी के इसलिए तोह दर्द नहीं होता होगा की जिजे का उस लड़के से भी बड़ा होगा पर आपको गलत फेहमी हुई है."

"नहीं हुई बाबा और मैंने वह हाथ भी लगा के देखा हुआ है गलती सी. लेकिन अब मैं भी यही सोच रही हु की क्या वो इतनी छोटी सी जगह जाएगा."

"कल पता चल जाना है फिर सोच के क्या करना. प्यार में सब जायज है न जैसा कहा था आपने और सच कहु तोह अर्जुन वीर जी से भी कही ज्यादा तगड़ा और लम्बा है. आपने कहा था न के सबका अलग होता है और टेंशन न लो. बेबे तोह आपकी उम्र में मुझे पैदा कर चुकी थी. बेबी भी तोह उधर से हे आता है ये नहीं पढ़ा आपने सेक्सुअल रिप्रोडक्शन में?"

"ठहर जा तू जीती की बची.. तू मेरे मजे ले रही थी?", जसलीन को समझ आ गया था चाहे सुखजीत ने मस्ती में हे उसको ये सच बताया पर परेशानी एक पल में ख़तम कर दी थी. दोनों भगति हुई आँगन में दाखिल हुई तोह जीती दादी की चारपाई के पीछे जा कड़ी हुई. घर में बेटियों को हँसते खेलते देख सभी खुश हो रहे थे और बहने अगर सहेलियां भी हो तोह ज्यादा दोस्तों की जरुरत हे कहा रहती है.

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विनोद का होटल भी चाहे 5 सितारा नहीं था लेकिन बहुमंज़िला और आलिशान ईमारत थी वो और रेस्ट्रा एक साथ साथ काफी सुविधाएं थी इस 50 कमरे के होटल में जो शहर के ाचे इलाके में स्थित था. आज जीजा साले व्यस्त दिन के बाद थोड़ा जल्दी हे इस ख़ास कमरे में आ बैठे थे जो विनोद का व्यक्तिगत कमरा था, hall-bar-rasoi के साथ तमाम सुविधा संपन्न. शंकर के साथ रहने के चाहे काफी नुक्सान उठाये थे लेकिन अब वो भी थोड़ा रईसी से रहने की आदत दाल रहा था जिसका सबूत था कांच की टेबल पर राखी वो ब्लैक लेबल की बोतल और खाने में फलो के साथ ाची खुराक.

"कुछ ख़ास चल रहा है क्या दिमाग में विनोद जो आजकल तुम बदले बदले से रहने लगे हो?", पप शर्मा ने शराब शुरू करने से पहले थोड़ा ठंडा पीया और वेटर से सोडा बर्फ लेने के बाद दरवाजा भीतर से बंद कर लिया. वातानुकूलन अपनी चरम पर चल रहा था जिस से गर्मी का कटरा तक इस विशाल कमरे में न पता चले.

"ऐसा क्या देख लिया जीजा जो मैं हे न देख पाया? दिमाग लगाना हे बंद कर दिया है मैंने फालतू में इधर उधर. वैसे ऐसा कहने की ख़ास वजह?", विनोद कपडे बदल कर घुटनो तक की निक्कर पहने शर्मा के सामने वाले सोफे पर आ पसरा. शरीर सचमुच पोला और औसत दर्जे का थे लेकिन विनोद चेहरे और रंग से फिर भी बेहतर था. गले में मोटी सोने की चैन और कलाई में ये नया चमचमाता कड़ा जो कौशल्या जी ने खुद पहनाया था उसको.

"घर पे ध्यान देने लगे हो, होटल का रजिस्टर 11 बजे रात को देखने के बाद सुबह 9 बजे चक्कर लगाने चले जाते हो और ऑफिस में सब व्यवस्थित करवा दिया. और अब तोह लड़की की जगह लडक अपना सहायक रख लिया है. शंकर और राजेश को भूल गए क्या इतनी जल्दी?", पप शर्मा ने दोनों के गिलास बनाने के बाद 2-2 बड़े टुकड़े बर्फ के गिराने के बाद सोडा पानी भरके एक गिलास उसकी तरफ सरका दिया. विनोद थोड़ा संजीदा था इस पल में.

"नुक्सान तोह बहोत किया है शंकर भैया ने मेरा या ये कहु हमारा जीजा. वैसे आपके हिसाब से हमारा व्यक्तिगत नुक्सान कितना हुआ था कॉन्ट्रीफार्म पे? इन्शुरन्स के कागज़ भी देखे होंगे आपने.", विनोद ने जैसे बात करना भी सीखें शुरू कर दिया था.

"वैल्यू साढ़े 4 लगी थी और कवर 3 करोड़ का बताया है जबकि जमीन हमारी है हे. और लूट में हमारा 4 करोड़ था टोटल 50 से लगभग वो ले गए थे वह से. क्या बात कुछ लफड़ा है क्या साले साहब?"

"इन्शुरन्स किसने करवाई थी?", विनोद ने जाम टकराने के बाद छोटा सा घूँट लेने के बाद बिस्टेर पर राखी फाइल उठा ली. शर्म साफ़ सुथा इंसान था अपने साले के साथ व्यापार में.

"रमन ने क्योंकि वही इंचार्ज था उधर का तोह."

"गलत. रमन ने तोह 2 साल पहले हे रिन्यूअल बंद करवा दी थी जो 1.75 की थी. ये राजेश भाई ने करवाई थी क्योंकि उन्हें पता था के मैं कौन हु, रिश्तेदार है वो मेरे भी. और यहाँ अपने इधर सुशिल ने बताया की राइड पड़ चुकी थी नशे की वजह से जिसके चलते सील करने टीम आ गयी थी लेकिन उसको वापिस भिजवाया अर्जुन ने, शायद ताऊ जी की मदद से. मुझे अर्जुन ने नहीं बताया पर मैं बहतिजे को थोड़ा सा जान गया हु और सुशिल ने बताया था के जवान लड़के की हे आवाज थी फ़ोन पर. ये कुछ जमीन के कागज़ है जिसमे शंकर भैया और उमेद जी ने आपका और मेरा भी हिस्सा रखा है. 200 करोड़ से ज्यादा का प्रोजेक्ट है और हम दोनों उसमे 20 प्रतिशत के मतलब 40 करोड़. ये रौशनी दीदी को हर महीने अर्जुन वाले हिस्से से 60 हजार और 20 अंजलि बिटिया को. कुछ जमीन भी नाम करवा दी गयी है और अंजलि की शादी का खर्चा ताई जी ने अपने जिम्मे लिया है. अब बताओ मैं किसके साथ सींग फँसौ? कितना नुक्सान हुआ है हमारा और कौन दुश्मन है या था? आपकी और मेरी जान तोह तभी जा सकती थी जब नवीन रमन के कहने पर हमारे हे गिरेबान को पकड़ चूका था. काम कौन आया जरा बताओ? और क्या आप, मैं भाड़े के 50 गुंडे ले कर भी किसी एक को जख्मी कर सकते है? पहला सच है की इन्दर भैया हमेशा मुझसे मिलने यहाँ आते थे और जितना ठीक लगता समझते. ये साइट उन्होंने आधे दाम पर ले कर दी जबकि ताऊ जी गुस्सा था मुझसे, जमीन बेचने पर. हमारी संपत्ति पर एक तरह से वो लोग कब्ज़ा करके नशे का धंदा चला रहे थे जिन्हे मेरे बड़े भाइयों ने साफ़ किया. 4 करोड़ के बदले 60 करोड़ वापिस कर दिए और आज अपने काम में शामिल कर लिया, बिना बताये. क्या कहते हो की ये सब उनकी चाल होगी?", पप शर्मा लाजवाब हो गया था ये सब सुन्न कर और अब उसके हाथ में वो पक्के कागज़ थे जो विनोद ने बढ़ाये थे.

"यार विनोद, अपने से भरी गलती हो गयी यार. देख मैं तोह जमीन का ज्यादा दलाल रहा हु और मन मुटाव थोड़ा उस बात का हे था. तेरे वो लड़कियों वाले काण्ड बहोत भरी थे जिसमे तू 8-10 साल अंदर जा सकता था लेकिन ये भी सच है की सिर्फ इन्होने हे तुझे जाने नहीं दिया. हमने वो ताक़त थोड़ी गलत समझ ली. शंकर तोह मुझसे भी जीजा कहके बड़े प्यार से हे मिला था और इन्दर तोह हंसी मजाक भी वैसा हे करता है. चोर तोह अपने हे मैं में था. लेकिन अब तोह लगता है साला नजरे न मिला सकूंगा."

"ताई ने कहा था के बचे गलती कर भी दे तोह सुधर सकते है. आखिर वो अपने हे तोह हैं और बड़े उन्हें समझने के लिए थोड़ा सख्त हो जाते है कभी कभी. मेरी हालत देखि थी ताई ने की मैं उस दिन रानी माँ और कुमार साहब के करीब जाना चाहता था, आज फ़ोन आया की अर्जुन मेरे होटल सञ्चालन की तारीफ कर रहा था. कुमार साहब मुझसे मिलना चाहते है कल शाम 4 बजे. इस अर्जुन से लड़ रहा था मैं जिसने उन आदमियों की क्या धुलाई की थी जो आजतक हॉस्पिटल में है. दलीप की बेटी से नजरे मैं न मिला सकूंगा अब तोह लेकिन देखो जीजा इस लड़के को जो बदले की जगह मुझे और बेहतर मुकाम देना चाहता है. इस सब की वजह अर्जुन हे है चाहे वो प्रोजेक्ट हो या आज सबकी तरफ से मुझे माफ़ी, वो भी बिना मांगे. ताऊ जी के पास जब मैं डरता हुआ गया तोह उन्होंने गले लगा कर ये कहा था के बीटा, मैं हु और मेरे होते हुए मेरे इस बिन्नी को कोई हाथ नहीं लगा सकता. मैं रो पड़ा था उनके गले लग कर जीजा.. मैं रो पड़ा था. वो गलत नहीं है बस मेरी माँ गलत है, आपकी बीवी और मेरी बहिन गलत है जीजा.. लेकिन जो अर्जुन कहता है न की इंसान गलत नहीं होता बस वजह ढून्ढ कर उसको ठीक करना पड़ता है. ये 2 टिकट है और ये कागज़ वीसा के. दीदी को ले जाओ हफ्ते भर मॉरिटिओउस, ताक़त की गोली और तेल लेते जाना. 2 की टिकट है और 10 की वापसी.", कभी शर्मा उन टिकट को देखता तोह कभी सामने बैठे विनोद को. वो हैरान था के हर वक़्त मस्ती और खुराफात करने वाला उसका ये साला इस हद्द तक सुधर सकता है.

"तुम अनामिका को भी साथ ले चलते. अब इतना सब सुधर रहा है तोह अपनी बीवी की भी ख़ुशी के बारे में सोचो थोड़ा."

"जीजा, बलात्कारी हु मैं एक तरह से उसका और इतनी जल्दी हे सबको सुधरा हुआ मिल गया तोह न खुद को तसल्ली दे पाउँगा न सबको विश्वास. अनामिका के साथ मेरा जुड़ाव है हे नहीं उल्टा मैंने तोह बस उसको तकलीफ दी है. कुछ दिन पहले तोह उसने पहली बार मुझसे कुछ कहा जबकि मैंने तोह 6 बरस उसको बस पालतू पशु से ज्यादा कुछ समझा नहीं था. काम से काम 6 बरस तोह पश्चाताप करना चाहिए या नहीं? फिर अगर उसके काबिल बन्न पाया तोह नए सिरे से शुरुआत करेंगे. इतने घर की बहु को घरवालों के साथ रहने देते है और जिम्मवारियाँ समझते है थोड़ी. उमेद जी के साथ इस सोमवार दिल्ली जाना है और कल ये मीटिंग हो जाए कुमार साहब के साथ तोह व्यवसाय सँभालते है. 60 के बदले विनोद शर्मा अपने बड़े भाइयों को 100 वापिस करके दिखायेगा. दारु का मजा लो अब बस और ये 50 हजार वाली दलाली बंद करके होटल और बीवी बचो के साथ समय बिताओ.", विनोद ने तोह अपना दिल हे सामने रख दिया शर्मा के और जब साले ने जीजा के गिलास से गिलास फिर से भिड़ाया तोह आंसू पप शर्मा की आँखों में थे.

"सच कहता है रे तू, बिलकुल सच कहता है. लेकिन ये पश्चाताप तू अकेले नहीं कर सकता. साथ थे हम दोनों तोह ये भी साथ हे करेंगे. दामिनी की अनदेखी मैंने हे की है और उसको वापिस भी मुझे हे पाना होगा. हजार गलतियां मेरी है तोह उसकी गलतियों को भुला कर मैं कुछ बड़ा नहीं कर रहा. दिल्ली कब जाना है?"

"पहले हनीमून मन आओ फिर इस होटल से बहार बस घर हे जाना हुआ करेगा आपका. 10 जून के बाद ये आपका है और कॉन्ट्रीफार्म के बारे में भैया से हे सलाह करता हु, जाली हुई जगह तोह मैं अब शुरू करने से रहा. थोड़ा desh-videsh भी घुमते है, गोरी मेमे जोरदार होती है जीजा.", विनोद ने जिस तरह से मुस्कुराते हुए आँख मार कर ये कहा तोह शर्मा भी हँसता हुआ ना में सर हिलने लगा.

"तू ये मेमे अपने तक हे रख. साला अभी तोह इतनी बड़ी बड़ी बातें कर रहा था और फिर से वही पहोच गया."

"देखो जीजा शौक अलग बात है और मैं अब किसी देसी के जीवन में हाथ लगाने से रहा. अब हमारी बाहों में जो आएगी वो कीमत और मर्जी से आएगी, वो भी फिरंगी. न देसी दारु और न देसी लड़की. पहले काम और सिर्फ काम उसके बाद महीने में एक दिन सिर्फ अपने लिए. चलो दारू ख़तम करो और नया पेग बनाओ. डेटोल से भी 2-3 कीटाणु बच जाते है और मेरे में तोह कुछ ज्यादा हे थे, सारे न मरने वाले इतनी जल्दी.", विनोद बहोत हद्द तक सुधर चूका था और अब उसका ज़िन्दगी के प्रति नजरिया भी. जीजा साले की ये महफ़िल अभी लम्बी चलने वाली थी जिसमे हंसी मजाक के साथ बहोत को साँझा होने वाला था. रामेश्वर जी ने आखिर इस maha-nalayak को भी नालायक वाली श्रेणी में आने का अवसर दे हे दिया था.

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"आज बड़ी जल्दी बिस्टेर पर चले आये? आँचल कब गयी कमरे से?", सचमुच अर्जुन आज कुछ जल्दी हे आ गया था और निकेतन को सीने पर लिटाये थपकी देते हुए उसको सुला भी चूका था. समय 10 हो चला था रात का और आज हवेली में भी ज्यादा हे ख़ामोशी थी. अनामिका कपडे बदलने के लिया कमरे में आते हे निश्चिंत हो गयी जब वह आँचल न दिखी.

"इतनी देर से तोह दिगमग खाये जा रही थी, शुक्र है सोने चली गयी. ये भी सो गया चची और कपडे बदल के आ जाओ आप फिर मैं चलता हु.", अर्जुन के जाने की बात सुन्न कर अनामिका जहा थी वही रुक गयी.

"कोई गलती हो गयी क्या मुझसे?"

"अरे यार अब आप ऐसे तोह मत कहो. आ जाओ कपडे बदल कर और मैं आपको सुलाने के बाद हे जाता हु. कुछ काम है और उसके बाद वापिस आ जाऊंगा मैं यही कमरे में आपके पास.", अनामिका ने आगे सवाल नहीं किया लेकिन अब कुछ हद्द तक वो खुश थी की अर्जुन उसकी हर बात मान लेता है. अर्जुन इस वक़्त बस यही सोच रहा था के यहाँ भी उसकी हालत अपने शहर जैसी हे होती जा रही है. आँचल जहा हलकी मस्ती करने के बाद जैसे उसको चूम कर गयी थी वो उसका सच्चा प्यार था, जसलीन तोह पहले हे इजहार से आगे आ चुकी थी लेकिन मिनी उसकी तरफ सिर्फ आकर्षित नहीं हुई थी, वो अर्जुन के पास आने पर जिस तरह खिलने के साथ शर्माती थी ऐसा सिर्फ और सिर्फ एक अदृश्य डोर की वजह से होता है जो वो बना चुकी थी.

"परेशानी है कुछ?", चची आ चुकी थी नाहा कर और कई जगह से चिपका वो ढीला गाउन बता रहा था के उन्हें जैसे आने की कुछ ज्यादा हे जल्दी थी. बचे को अर्जुन से ले कर उन्होंने पालने में सही से लिटा दिया और खुद अर्जुन की बगल में आ गयी.

"नहीं परेशानी और मेरा दूर दूर तक रिश्ता नहीं. बस थोड़ा काम बाकी है और फिर परसो सुबह मेला भी तोह वही सब दिमाग में चल रहा था. आप तोह और भी ज्यादा सुन्दर लग रही हो लाल रंग में. अंदर भी लाल पहना है?", अर्जुन करवट लेते हुए उन्हें अपने साथ चिपका कर सीने का सपर्श लेने के साथ साथ उभरे कूल्हे को पकड़ चूका था.

"आह्हः. शैतान हो तुम और मुझे भी अपने जैसा बना दिया. दोनों तरफ पता कर लिया न की अंदर कुछ नहीं है? लाल में देखना चाहते हो?", अर्जुन के होंठो पर आँखे बंद कर के चुम्बन करने के बाद वो भी उसके सीने से लिपट जैसे अब बातें करना चाहती थी जिसमे सिर्फ ये दोनों हो.

"हाँ, सबकुछ लाल रंग का और कोई फालतू श्रृंगार नहीं सिवाए कुछ चूड़ियों के, रंग वही. मेले से अगले दिन आप मेरे साथ चलेंगी.", अर्जुन का हाथ उस गाउन के काख की तरफ वाले खुले हिस्से से हे अंदर दाखिल होता उस मुलायम चिकने सतांन को सहलाने लगा. अनामिका शर्म से और अन्दर धंसने की कोशिश करती रही लेकिन अर्जुन को नहीं रोका.

"यही इस बिस्टेर पर पहला मिलान करोगे, हाँ तुम्हारी पसंद पूरा करना मेरी जिम्मेवारी. पिता जी और माँ जी जाने वाले है उस दिन रौशनी दीदी के घर. फ़ोन पर बात कर रहे थे आज दीदी से जब बड़े पिता जी ने बताया की वो लोग रौशनी दीदी को यही लेके आएंगे परसो. तुम्हारे चाचा से इन्होने बात की थी उसके बाद और वो कह रहे थे की वही लेके चलेंगे इन्हे और रात दीदी के घर रुक कर अगले दिन लौट आएंगे. क्यों जाना फिर char-diwari से बहार किराये की जगह पर?", अर्जुन के हाथो में थोड़ा दूध लगा तोह उसने हाथ बहार निकल लिया. अनामिका की पूरी बात सुन्न कर उसने अपनी सहमति दे दी थी. कुछ वक़्त बस ऐसे हे हल्का प्यार भरा समय बिता कर वो उठने लगा तोह अनामिका ने बस हाथ पकड़ लिया कुछ कहे बिना.

"जरुरी है समझो पर सोने यही आऊंगा."

"उसके साथ करना पड़े तोह कर लेना. जानती हु तुम भी नहीं चाहते पर तुम नहीं करोगे तोह भी वो पीछे नहीं हटेंगी. ाचा है की उसका दिमाग बदल दो पर सावधानी से."

"हाँ इसलिए मैं ऐसा उन्हें बिना मौका दिए हे करना चाहता हु. धन्यवाद् मुझे समझने के लिए. कुछ वक़्त अपने कमरे में हु अभी.", अर्जुन वो बक्सा निकाल कर चला गया और अनामिका नींद लेने की जगह दरवाजा ढाल कर बिस्टेर से तक लगते हुए बैठ गयी.

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"तोह तुम नहीं आये अनजान मुसाफिर? कैसे आ सकते हो जब हम भी यहाँ आने की हिम्मत नहीं करते लेकिन आशा तोह आशावान इंसान हमेशा रखता है. आज लिखने से पहले हमने स्वयं हे सभी कमरे साफ़ किये और दीवारे थोक बजा कर देखि की कही कुछ और भी हाथ लग जाए. निराश तोह नहीं हुए कुछ न मिलने पर परन्तु पिता जी के कमरे से हमे कुछ खास जरूर दिखाई दे गया. उनकी दूषित मानसिकता और वो घात जिसकी वजह से वो खिड़की बनवाई गयी. 50 से कुछ ज्यादा गरीब परिवार उधर हे तोह कपडे धोने और पीने का पानी लेने आते थे. बचे भी उधर छोटी दिवार से घेरे में खेलना नहाना करते रहते थे जो अब कुछ बरस से निर्जन है और आगे चल कर तोह दशा और बुरी हे होने वाली है जितनी वीभत्स कहानिया इस हवेली से जुड़ चुकी है. तोह ये एक अनकहा पहलु है शाही घरानो का जहा हर चीज नियम और निति से होती है सिवाए ऐसे कुंठित मानसिकता वाले बुजुर्गो के. चाय के बहाने 2 बूढ़े इंसान वह subah-dopehar बैठे रहते थे और क्या देखते थे? शब्द नहीं है हमारे पास और जितना जानते जा रहे है उतना ज्यादा हमारा मैं आंदोलित होता जाता है. बहु बेटियों और परिवार से दूर ये कैसा वनवास जी रहे थे जुगलाल जी और भूपिंदर सिंह? नाम नहीं लेना चाहिए हमे पर दिल कर रहा था ऐसा करने का.

हमारी माता जी, हमारी सर्वेसर्वा शायद ये सब जानती थी या जान गयी होंगी. दायी माँ ने बताया की वो बहोत नेक और शुद्ध आचरण वाली बड़ी हे सुलझी हुई महिला थी, dharam-karam करने वाली. मृत्यु से पहले उन्होंने 2 महीने खुद को घर में हे क़ैद कर लिया था जहा सिर्फ हम उनके पास होते थे या दाई माँ. हम तोह विद्यालय भी जाने नहीं लगे थे तोह कितनी समझ रखते होंगे? वो प्राकृतिक मौत नहीं थी जितना हम दाई माँ की बातो और उस समय को थोड़ा बहोत याद करते हुए आज इस निष्करः पर पहुंचे है. पिता जी तोह अक्सर कई कई दिन घर से गायब रहते थे और ऐसे हे विलासी व्यक्ति उनके परम मित्र भूपेंद्र सिंह जी, जिन्होंने जब raj-gaddi उन कमजोर कंधो को सौंपी तोह राज्य भी वैसा हे कमजोर हो चूका था. दाई माँ से हम बहोत कुछ पूछना चाहते थे लेकिन अब वो भी इस दुनिया में नहीं रही. बलविंदर ने हमेशा से हे हमे बड़े भाई का दर्जा दिया और दोस्ती भी हमारी गहरी है परन्तु ये और भी गहरी हो गयी जब दाई माँ ने हम दोनों के सामने अपने अंतिम स्वास लेते हुए बताया की वो भी हमारी माता का दूध पी कर ज़िंदा रहा. महारानी जी का तोह हमे भी स्मरण नहीं लेकिन ये जानते थे की बलविंदर के जनम लेते हे वो दुनिया से चली गयी थी और ये अलग हे नियति रही होगी की जिस माँ ने हमे पोषित किया उन्होंने हे बलविंदर को भी जीवन दिया. ऐसा तोह सिर्फ एक माँ हे कर सकती लेकिन दुर्भाग्य से वो हम दोनों को बड़ा होते न देख सकीय. दाई माँ ने जीकर तोह किया था की महाराज का आचरण ठीक नहीं था और अक्सर वो हमारे पिता के साथ हे घुमते फिरते रहते थे. रंगमहल जैसी जगह हे उनका अधिकतर समय गुजरा जिसको हमने हे टाला लगाया, पदवी मिलते हे.

हम कभी इन 2 व्यक्तियों को समझ हे न पाए क्योंकि साथ रहना हे कितना नसीब हुआ. राम कभी रोटी देने आता था और कृष्ण यहाँ दिनभर उनके आसपास हे खेलता कूदता रहता और हमने कभी हमारे पिता के दूसरे पहलु को इनके साथ नहीं देखा. वो बहोत स्नेह रखते थे दोनों लड़को के साथ परन्तु उन्होंने हे कृष्ण और संगी को गलत राह दिखने की कोशिश भी की जैसा दोनों ने हे कबूल किया था जब हमने इन दोनों बेवकूफ लड़को को गुजरी के साथ संलिप्त पाया. क्यों किया होगा एक दादा ने पौटे के साथ ऐसा? हाँ दोनों के हे दादा शामिल थे और जैसा संगी ने बताया की पहली बार संसर्ग स्वयं भूपेंद्र जी ने हे उसको सेविका के साथ सिखाया था तोह मतलब साफ़ था के वो आने वाली ये मासूम नेसल खराब हे करना चाहते थे. भोले भाले लड़के थे न दोनों और अक्सर ऐसे बचो को शामिल करना उनका अपना हे स्वार्थ था. 2 व्यक्तियों के लिए इस बड़ी हवेली में 8 सेविकाएं और 2 सेवक? सेवक मुख्या ईमारत में नहीं आ सकते थे सांझ के बाद लेकिन एक पदवी प्राप्त तांत्रिक और उसके 4 शिष्या यहाँ जमघट लगा सकते थे. आखिर ये लोग जब अपना sukh-saadhan इस हद्द तक जमा किये हुए थे तोह फिर ये बच्चियां? ज़िंदा नहीं बचे और लाशें कुछ बोलने से रही पर कैसा अनुष्ठान कर रहे थे जो इतनी बच्चियों संग उन हैवानो ने कुकर्म करने के बाद उनकी हत्या करके जिस्म तक गायब कर दिए.? जवाब श्रीधर और कल्पतरु हे दे सकते है क्योंकि बाकी 3 हैवानो को तोह हमने यही निचे हे परलोक पंहुचा दिया था जब वो बच्चियां उनका शिकार बन्न रही थी.

कौनसा इष्टदेव ऐसी चाहत रखता है जब ऊपरवाला स्वयं ये दुनिया बना रहा है? कैसे उसका कोई प्रतीक ये कुंठित और हैवानी मांग से खुश हो सकता है? अनुष्ठान के बदले ये सिर्फ और सिर्फ उन तांत्रिको की kaam-pipasa, वासना और भोग था जिनके संरक्षक ये हमारे 2 बुजुर्ग जो स्वयं 8 जवान युवतियों को अपनी सेवा में रखे दुनिया को दिखावे का वनवास जी रहे थे इस हवेली में. राजा है तोह क्या उन्हें अधिकार मिल गया हर युवती को भोगने का? Dhan-daulat के साथ ताक़त और रसूख इन गरीब लड़कियों को बेबस कर हे देते है. बलविंदर ने हमारी सलाह पर अमल करते हुए कन्या शिक्षा अनिवार्य कर दी है और प्राथमिकी विद्यालयों के साथ बड़े गाँव और कस्बो में बड़े शिक्षा संसथान भी बने है और बनवाये है. ये प्रयास हम इसलिए कर रहे है जिस से अशिक्षित लोग ऐसे tantra-mantra और रसूख वालो से अपनी सुरक्षा कर सके. अब जितने हम इस राजतंत्र का हिस्सा है ऐसी गलती और दुर्घटना फिर से नहीं होने देंगे. 6 महीने पहले हमने एक मजबूत उदहारण पेश किया था तहसील में और अपना सन्देश उन सभी तक पंहुचा दिया जो बच्चियों को आसान शिकार समझते है. चौक पर उस दरिंदे का सर हमने बचे से टांग कर गाड़ दिया था जिसने क्सक्स वर्ष की अपनी हे भांजी के साथ ये घिनौनी हरकत की थी. इस हवेली में जो हुआ वैसा करने की अब किसी को हिम्मत नहीं रखने देंगे. गुजरते समय के साथ हमारा बोझ भी बढ़ता जा रहा है.

प्रभा के साथ लक्ष्य और मिनाक्षी बिटिया की हत्या से आजतक नहीं उबरे थे और शांतनु भी जीवन की जुंग हार गया 8 माह पहले. प्यार बहोत था मिनाक्षी बिटिया के साथ उसका, आखिर पसंद से शादी की थी और बिटिया गर्भ से थी जब उसकी निर्ममता से हत्या कर दी गयी. राम तहकीकात करना चाहता था उस मामले की परन्तु ये सरासर खुदखुशी होती हमारे बेटे द्वारा. मनीराम उस दिन से हे तोह गायब है और वो लोग भी जो उसके साथ शामिल होंगे. फिर भी मान न पड़ेगा उस युवक को जो यहाँ से दूर रह कर भी आजतक अपने जीवट होने के प्रमाण देता रहता है. मंझली रानी ज्योत्सना तोह प्रीतम और वैदेही को ले कर विदेश जा बसी, शक तोह हमे प्रीतम पर भी था लेकिन हाथ डालना मुनासिब नहीं था उस दौरान. अब शांतनु मानसिक द्वन्द से इतने बरस बिस्टेर और चिकित्सको के बीच निकाल गया लेकिन जीने की आस तोह उसने छोड़ हे दी थी. अब राम राजा राजगद्दी नहीं स्वीकारने वाला और वारिस कोई बचा नहीं है सिवाए संगी के. उसको बलविंदर कभी राजा नहीं बनाने वाला और हमसे भी वो यही आशा रखता है की छोटी रानी के साथ उनके बचो को भी हम नुक्सान पहुचाये बिना इधर से सुरक्षित हटा दे. तुम सोच रहे होंगे भाई की मैं क्या be-sar-pair की बातें कर रहा हु लेकिन मैं व्यथित होने के साथ साथ बहोत साडी उलझनों से भरा है. यहाँ ये मासूम असंख्य चीखें, उधर ये शाही मसले और षडयंत्रो का जाल, घर पे अलग हे महाभारत तोह हम क्या ऐसे हे बिना सुकून पाए दुनिया से चले जाएंगे? मैंने सलाह दी है की सौंदर्य समझदार बिटिया है और वो समाज के सामने nari-shakti का उदहारण बनेगी अगर उसको गद्दी सौंपी जाती है लेकिन बलविंदर सहमत नहीं है. राम चाहे गद्दी पर न बैठे लेकिन वही राजा रहेगा और अगर वो राजपाट जिसको भी सुपुर्द करता है तब भी जिम्मेवार वही रहेगा, जिसका लिखित प्रमाण सहेजे बैठे है वो.

करो भाई सब अपनी मर्जी करो क्योंकि हम तोह raaj-sewak और सलाहकार है. राम को वचन से बांध कर हमने स्वयं उसकी मुसीबत बढ़ा दी है पर हल कर लेगा वो इसका कोई. बहादुरी का तमगा मिला है कुछ समय पहले उसको. बड़े बड़े अफसर जहा अपनी जान गवा बैठे और बाकी कोई जाना नहीं चाहता था वह से वो डैकती की पूरी मंडली पकड़ के ले आया. हमने हमारे हे खून की ताक़त को कमतर आंकने की भूल की लेकिन हमे गर्व भी है की वो अपने नाम पर खरा उतर रहा है. वनवास भी स्वीकार किया, वचन भी और maa-baap की सेवा से पीछे भी नहीं हैट रहा चाहे दूर से हे सही. कौशल्या बहु पर भी हम गर्व करते है और सही मायने में वही एक उत्कृष्ट उदहारण है समाज में नारी शक्ति का. पढ़ना लिखना जानती है, उपचार और जड़ी बूटियों से लगाव रखती है हमारी बहु और सबसे ख़ास बात की गुसलखाने जितने बड़े 2 कमरों में उसने राम का संसार बना दिया. हमारी अर्धांगिनी को भी उसने jod-ghata सब सीखा दिया है जिस से वो आजकल हिसाब रखने लगी है घर का. बचे तोह बचे छोटी बहु तक कौशल्या बहु के सामने नजर उठाने से कतराती है. इंसान को ऐसा हे होना चाहिए जब परिवार को सहेज कर एकसाथ रखना हो. बहोत दुःख होता है हमे जब ये लोग वापिस चले जाते है कुछ दिन बिताने के बाद. राम के माँ तोह 2-3 दिन आंसू बहती हमे भी बुरा भला कह देती है फिर माफ़ी भी मांग लेती है. कसूरवार है न हम उन माँ बेटो के लेकिन दूर रह कर सुरक्षित रहे ये बेहतर है करीब रह कर मरने से. रघु और राम मिल कर भी इन सबका सामना नहीं कर सकते चाहे वो जितने बड़े शिकारी हो. यहाँ पता हे नहीं की कौन शिकार है और कौन शिकारी. कोई एक भी हाथ आया तोह स्वयं मृत्यु को आमंत्रण होगा ये, बाघ का शिकार जैसे. तुम ये पत्र पढ़ रहे हो तोह ये जान लो बीटा की हमारी नजर में तुम ज्यादा बेहतर शिकारी होंगे या वो बाघ जिसके कदमो की आहात अक्सर बकरी बाँधने वाले को भी नहीं होती और ये उसका हे काल बनता है. मैंने पिछले पत्रों में भी इतना विवरण दिया है और आज भी बहोत व्यक्तियों का उल्लेख किया, आशा है न की तुम कोई अपने हे हो जो तलाश में आये हो. अतीत और परिवार की तलाश में. तुम पर वचन लागू नहीं होने वाला इसलिए तुम वचन की खोज से इधर आये हो. तुम मेरे अपने हो बीटा, मेरी आशा की किरण हो जो इस प्रांत को बेहतर कर सकता है और raaj-mehal को रोशन. चलते है, आज काफी समय से इधर आये हुए है. मध्यरात्रि का समय हो चला है और पहर ख़तम होने से पहले हमे कही निकलना भी है.

लक्ष्मी नारायण सदैव तुम्हारे साथ रहे.

तुम्हारा अपना,

पंडित मोतीलाल अनुराधा शर्मा.

25/05/1954

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'मध्यरात्रि तोह यहाँ भी हो गयी है बड़े पंडित जी लेकिन आप थे बहोत दिलेर इंसान. मान न पड़ेगा की थानेदार साहब अगर आज भी आपके नाम को जपते है तोह उनके चेहरे पर अलग हे गर्व होता है जो आज मेरे सामने भी है. आपके हे नालायक है हम लेकिन इतने तैयार हो कर आये है की घेरने वाले खुद घिर चुके है जो उन्हें पता तक नहीं. न बकरी बचेगी और न अदृश्य शिकारी. वादा है की उन मासूम आवाजों को मुक्ति देंगे और आपके नाम को हर उस जगह फिर स्थापित करेंगे जहा के अधिकारी है आप. बस ये कुमार प्रीतम और कुमारी वैदेही वाला किस्सा नहीं जानते थे और क्या किस्मत रही है बेचारे रघुवीर दादा जी की? हाँ अपने पंडित जी की भी तोह वही हुई. मिनाक्षी दादी, ये मनीराम और उस बुढ़िया ललिया उर्फ़ लाजो काकी का तोह तगड़ा बंदोबस्त करूँगा. ज़िंदा रहना मनीराम और इस बार बस एक इशारा कर देना की तुम हो. फिर तोह तुम्हे न राजा बचा सकेगा न कोई तांत्रिक. चलते है बड़े पंडित जी और आपने ठीक कहा के कुछ रिश्ते कलंक से बढ़ कर हो सकते है. जुगलाल जी तोह अव्वल दर्जे के निकले और अब यहाँ देवकी जी है जिनकी जड़े जाने कहा कहा जुडी है, शुरू उनकी बकरी.. सॉरी उनकी बेटी से हे करते है. माफ़ करना आपकी पौती के साथ जो मैं करने जा रहा हु वो आपके नियम और पंडित जी के कानून में अपराध है. मिलते है सुबह आपसे और ये 3-4 पत्र गायब करके आपने ठीक नहीं किया. लिखा हुआ मिटा सकते हो पर घटना से हमे दूर नहीं कर सकते. चलिए आपको वापिस बंद कर देता हु, गलती से ऐसा वैसा देख लिया तोह कहेंगे की ये गुण तोह मेरे में भी नहीं थे.', अर्जुन खुदसे हे बातें करता हुआ अपना पसीना साफ़ करने के बाद आहिस्ता से दरवाजा बंद करता हुआ सीढ़ियों से छत्त पर चल दिया. उसने इशारा तोह दिया था दामिनी को रात ऊपर सोने का.
 
"सो गयी क्या बुआ?", अर्जुन जानबूझ कर छत्त पर आते हुए कदमो की आहात करने लगा था. दामिनी सीढ़ियों से कही आगे की तरफ खुली छत्त के बीच हे करवट कर लेती हुई थी, जिस्म की गर्मी ने उसकी नींद पहले हे उदा राखी थी और अब अर्जुन के आने से वो ख़ामोशी भी भांग हो गयी. खुली छत्त और ताज़ी ठंडी हवा के साथ सितारों से रोशन आसमान. थोड़ा अभ्यस्त होने पर सबकुछ साफ़ दिख रहा था चन्द्रमा की रौशनी में. सफ़ेद झीना सा कपडा गोरी मोती पिंडलियों से हल्का ऊपर तक चढ़ा हुआ और कंधे पर बस डोरी जितना कपडा. दामिनी अंदर से वैसी हे थी जैसी उम्मीद उसकी गर्मी को देखते हुए. अर्जुन को अपने गद्दे पर बिलकुल करीब बैठे देख वो हलकी सी अंगड़ाई का प्रदर्शन करती हुई बैठी तोह सामने उसके सीने के बड़े उभारो का जलवा जानलेवा हे था. काम रौशनी में भी वो दूध से चमकते हुए लगभग अपना पूरा अकार दिखा रहे थे.

"शिकायत इकट्ठी करने के बाद क्या करना है छोटे पंडित जी? जल्दी नहीं आ गया कुछ या आये भी किसी परेशानी का समाधान लेने हो?", अर्जुन की जांघ पर हलके से हाथ चलती हुई वो सचमुच कामदेवी हे लग रही थी. खुली उलझी हुई जुल्फे और भरे हुए होंठ जिन्हे हल्का चबाती हुई वो अर्जुन को ठीक वैसे देख रही थी जैसे शिकारी अपने थके हुए शिकार को.

"लेट हो गया लेकिन मैंने तोह कहा भी था की पढ़ने के बाद आऊंगा. कल पढ़ते पढ़ते हे नींद आ गयी थी लेकिन आज नींद भी नहीं आ रही बुआ. नुनु ज्यादा अकड़ कर दुःख रही है अब तोह. आपने कहा था न के आप पक्का इलाज कर देंगी?", अर्जुन को ऐसे निराश देख दामिनी वो मकसद भूल बैठी जिसकी वजह से उसने अर्जुन को फांसना था. गर्मी भी तोह अर्जुन हे बढ़ता रहा इतने दिन और आया भी तोह मुद्दे की बात कर दी.

"ओह्ह्ह.. छोटे पंडित जी इलाज के लिए आये है? मेरी फीस जानते हो? और इसको नुनु नहीं लुंड बोलना शुरू कर दो अर्जुन प्यारे", दामिनी की उँगलियाँ अपने आप हे सरकती हुई अर्जुन की निक्कर में बने उस भयंकर तम्बू पर जा लिपटी. दोनों के हे मुँह से हलकी सिसकी निकली और मैं हे मैं दामिनी इस कठोर लुंड का गुणगान कर बैठी. '.. हाय क्या जानदार हथियार है.. लुंड नहीं लोढ़ा बोलना चाहिए इसको.. आज नहीं जाने दूंगी..'

"देखा न आपने ये कैसे टाइट हुआ पड़ा है बुआ. इस वजह से तोह मैं कभी कभी जीन्स भी नहीं पहन पता. हाथ से हिलाते हुए पसीना आ गया इस लू.. लुंड को."

"देखा कहा है अभी, सिर्फ पकड़ा हे है और तुम्हे नहीं पता के तुम कितने ख़ास हो इसकी वजह से. ये हाथ से हिलने की चीज नहीं है प्यारे और मैंने तोह खुद कहा थे जब ज्यादा परेशां करे तोह मेरे पास चले आना, बिना सोचे. तुमने अपने दोस्त के साथ वो वाली फिल्म देखि थी न?", अब अर्जुन जैसे थोड़ा घबरा गया था दामिनी की बात सुन्न कर लेकिन दामिनी ने एक कदम और आगे बढ़ते हुए निक्कर के जांघ वाले रस्ते हे उस मूसल को निर्वस्त्र थाम लिया. अब उसकी गर्मी और मोटाई ने दामिनी का kaam-jwar सीमा पार कर दिया था. फिल्म वाली बात कहने के साथ हे उसने अर्जुन का हाथ खुदसे अपने सीने पर टिका दिया.

"घबराओ मैट.. इन्हे ऐसे दबाओ जैसे पानी के गुब्बारे हो.. जैसे उस फिल्म में देखा होगा तुमने. तुम्हारी इस बुआ के सीने में भी वैसी हे अकड़न रहती है जैसे तुम्हारे इस डंडे में. ाचे से पकड़ कर इन्हे दबाओ तब तक मैं तुम्हारे इसको तैयार करती हु ख़ास इलाज के लिए.", दामिनी सोच कर हे आयी थी छत्त पर जैसा अर्जुन ने उसको तकिये के निचे से वो तेल की शीशी निकलते देख जाना. वो अपनी हथेली चुपड़ने के बाद अर्जुन को निक्कर खिंच कर उतरने का इशारा देने लगी. अर्जुन के तोह हाथ चुचो के ऊपर हिस्से पर रखे भी काँप रहे थे.

'कच्चा है लेकिन आज के बाद नहीं रहेगा.'

"यहाँ कोई नहीं है और बिना डरे बस यहाँ बैठो.", दामिनी की नजरे उस मूसल पर हे अटकी रही जो जाने कैसे उस निक्कर के भीतर क़ैद था. अब आजाद होते हे आसमान को देखता सूपड़ा दामिनी के मुँह में लार पैदा करने में सफल रहा. तेल का ठंडा स्पर्श लुंड पर महसूस करते हे अर्जुन ने एक उभर का ाचा खासा हिस्सा हथेली में भरते हुए दबा दिया. बस इस एक पकड़ ने हे दामिनी को बता दिया था के शिकार बहोत मजबूत है..

"आह्हः.. ऐसे हे दबा inhe..sara दिन अकड़ते रहते है लेकिन मालिश तेरे जैसे हाथो से हे मुमकिन है अर्जुन.. आह्हः.", एक हाथ से लगातार उसके लिंग को तेल की मालिश देती दामिनी ने दूसरे हाथ से खुद हे अपना सीना पूरा उजागर कर दिया अर्जुन के सामने. किसी छोटी फुटबॉल के अकार के वो चुके जितने बड़े थे उनके निप्पल भी मॉटे और लम्बे, छोटे अंगूर से. वजन की वजह से कुछ लटके लेकिन भरपूर ठोस. अर्जुन के हाथ फिसलते हुए निप्पल को उत्सुकता से सहलाने लगे थे जो दामिनी का kaam-kendra थे शायद.

"बुआ, ये इतने मॉटे और टाइट कैसे है?"

"ढीला कर दे न इन्हे दबा दबा के. चाहे तोह चूस ले इन्हे, बहुत परेशां करते है ये तेरी बुआ को.. आह्हः.. सीधा लेट जा अर्जुन इधर.", दामिनी ने जैसे हे उसके सीने को दबाया अर्जुन गद्दे पर पीठ के बल फैलता हुआ पसर गया. दामिनी को किसी के देखे जाने की परवाह हे कहा थी और रात के वक़्त गाँव की इस ऊँची हवेली पर देखता भी कौन. खड़े होते हे वो वस्त्र गद्दे पर हे रह गया. हटती कटती दामिनी की जाँघे भी खूब भरवा और गोल थी, छूट से ऊपर बस हल्का सा हे उभरा हुआ पेट लेकिन 45 की उम्र में इतना भरा और ठोस शरीर देख कर कुंवारे का तोह शीघ्रपतन हे हो जाए.

"अब आप क्या करने वाली हो बुआ?", अर्जुन की कमर तक आने के बाद जिस तरह दामिनी ने दोनों पाँव फैला कर खुद को लिंग की सीध में किया था अर्जुन बड़े गौर से देखता रहा. टाँगे मदद कर दामिनी उकडू बैठने की मुद्रा में निचे आती गयी जब तक उसकी कुछ फैली हुई योनि के नरम होंठ लिंगमुण्ड पर न टिक गए. मांस से भरी दामिनी की छूट भी खासी फूली और नरम थी, कुछ हिस्सा बहार निकला हुआ. दामिनी के जिस्म में अगर सबसे क़यामत कुछ था तोह वो उसके असाधारण रूप से बड़े और मांस से भरे कूल्हे थे. और इस अवस्था में पीछे से कोई उसके कूल्हों को देखता था उनके दिल का अकार देख दिल हार बैठता.

"ये जरुरत से ज्यादा हे मोटा है. अर्जुन, ये तेल उठा जरा.. और अपने लुंड के साथ मेरी छूट पर भी ाचे से लगा दे. देखना इसके बाद तेरा ऐसा नरम कर दूंगी की चैन से यही सो जाएगा. जानता है न हम क्या कर रहे है?", अर्जुन ने पीठ उठाने के साथ साथ शीशी भी उठा ली. थोड़ा आगे खिसक कर वो अब अपनी तेल सनी हथेली को पेशाब वाले आसान में बैठी दामिनी की बहार निकली छूट पर ऐसे लगाने लगा जैसे अभी तक सदमे में हो.

"ाचे से लगा न और डर मैट. जैसे मैंने तेरी मालिश की थी तू मेरी कर रहा है. aahhh..Haan ऐसे हे और अंदर भी लगा दे.. उम्"

"ये इतनी गरम कैसे है बुआ? और यहाँ भी लगा दू?", अर्जुन ने बहार तेल लगाने के साथ हे छूट के अंदर भी चिकनाई भर दी. एक सिधाई में हथेली चलते हुए वो छूट एक साथ लगते गांड के छेड़ तक को तेल से टर्र करने लगा. अर्जुन की ऊँगली का थोड़ा सा दबाव छूट के साथ गांड के छेड़ पर होते हे ऐसी मुद्रा की वजह से दोनों तरफ उँगलियाँ कुछ अंदर जा घुसी. दामिनी जैसे इस हमले को न संभल सकीय और अर्जुन के कंधे पर हाथ रखते हुए अपने चुके उसके मुँह पर दबा दिए.

"आठ.. कहा से सीखा रे तू ऐसी मालिश करना.. निहाल हे कर दिया अर्जुन.. उम्म्म.. "

"Wo..wo फिल्म में देखा था बुआ और मेरा दोस्त बता रहा था की लड़का लड़की ऐसा करते है तोह उसको सेक्स बोलते है.. हम सेक्स करेंगे?"

"आठ.. बीटा चुदाई बोल.. तू मेरी फुद्दी फाड़ने वाला है आज अपने इस तगड़े मूसल जैसे लौड़े से...", अर्जुन का ये हाथ निरंतर दोनों छेद जंचता उन्हें चिकना करता रहा जबतक दामिनी ने उसके कंधे पर सर न टिका दिया.

"आपको ये बड़ा क्यों लगता है बुआ? फिल्म वाले अँगरेज़ का भी ऐसा हे था कुछ. और क्या अब मैं इसको दाल दू वह?"

"बीटा, लगता नहीं की फिल्म वाले का भी इतना होगा.. आह्ह्ह्ह. मुँह बंद करना पड़ेगा और बिना जोर डाले तोह ये अंदर नहीं जाने वाला.. तू अपनी बुआ के होंठ बंद करेगा अपने होंठो से?"

"किश करने वाली तरह?"

"हां मेरे शेर किश करना है लेकिन मैं जब एकदम से बैठूंगी तोह मुँह मैट छोड़ देना मेरा और तुझे थोड़ा दर्द भी होगा मेरी तरह. इसको निशाने पर लगाने दे फिर करियो अपनी बुआ को किश.", हलके से कांपती हुई दामिनी हवस में इतनी चूर हो चुकी थी की उसको खुदकी हालत तक का ख़याल न रहा. एक पाँव थोड़ा उचका कर उसने लुंड को छूट के मुहाने टिकने के बाद अर्जुन से अपना लुंड वैसे हे सख्ती से पकडे रहने और उसके होंठो को मुँह में भरने का कहा. और अर्जुन ने आज्ञाकारी बचे की तरह ठीक वैसा हे किया क्योंकि दामिनी एक झटके में इस पर सवार होना चाहती थी. दोनों भरे भरे होंटो को ाचे से मुँह में बंद करते हुए अर्जुन ने एक हाथ अपने लुंड की जड़ पे तोह दूसरा दामिनी की पीठ को जकड़ने में लगा दिया. आँखे बंद करती दामिनी अंदाजे से थोड़ा ऊपर उचक कर जैसे हे dand-baithak की तरह तेजी से अपनी चौड़ी गांड पटकती नीचे हुई, उसका पूरा वजूद काँप उठा. जैसे किसी ने कोई बड़ा खंजर उसकी अक्षत गांड में पेवस्त करते हुए चीयर दिया. इतना वजन और नरम गांड का चला जिसको पहले हे तेल से चिकना करने के साथ थोड़ा खोल दिया हो, ऐसे लुंड पर गिरने से फटना तये हे था. दामिनी की चीख तोह घुट्ट गयी लेकिन रोम रोम दर्द से भर उठा, आंखों में आंसू और गांड से हल्का रक्त बहते हुए. अभी वो संभालती उस से पहले हे अर्जुन ने भी दर्द का दिखावा करते हुए उसको बाहों में भर कर और निचे दबा लिया. दामिनी उस भयंकर लिंग की लम्बाई चौड़ाई से तड़पने लगी थी और अर्जुन के कंधे को खुरचते हे अर्जुन ने होंठ छोड़ दिए.

"आह्हः. बुआ मार क्यों रही हो..? मुझे तोह पहले हे दर्द हो रहा है जैसे लुंड कट गया हो मेरा.. बहोत दर्द हो रहा है जैसे ये कही बुरी तरह फंस गया हो आपके अंदर. हिलना मैट.."

"ओह अर्जुन.. फंस तोह मैं गयी रे .. आह्ह्ह्ह माँ.. अनादि का छोड़ना और छूट का सत्यानाश.. गांड फाड़ दी रे तूने मेरी.. और किसने कहा था लुंड हिलने के लिए? तेरा हे नहीं मेरा भी खून निकल गया है.. फाड़ दी है तूने मेरी कंवरी कोरी गांड.. ऊँगली तक न की थी इसमें.. आह्हः.", दामिनी आंसू बहती हुई अपना सर पटक रही थी और निचे गांड में 6-7 इंच तक घुसा वो कलाई से मोटा लुंड और फूलने लगा था इतने कसाव से.

"निकाल लेता हु बुआ इसको. दुःख रहा है."

"ना.. ऐसे न करना अर्जुन, पूरी फट जाएगी अगर अभी कुछ बची होगी तोह.. मेरे चुचो दबा, इन्हे ाचे से रगड़ जिस से ध्यान हेट थोड़ा. गांड में तोह मिर्च भर दी रे तूने.. अब तुझे भी क्या कहु जब मैं हे जल्दबाजी में थी. आइंदा सब खुद हे करुँगी.. आह्ह्ह्ह.. बस ऐसे हे दबा.. खा जा इन्हे.", अर्जुन का सर सहलाती हुई दामिनी अपन दर्द सचमुच काम होता महसूस करने लगी थी जब ये पहलवान कास कास कर उसके खरबूजों को आते की तरह मसलता और मुँह में ले कर मॉटे निप्पल होंठो में दबा कर चूसक्ता. लेकिन कमर से निचे दोनों के जिस्म में कोई हरकत न हुई. दामिनी को हल्का खिंचाव बढ़ता महसूस होने लगा था लुंड फूलने की वजह से. थोड़ा सा अपने कूल्हों को ऊपर उठाने की कोशिश की तोह जैसे खाल बहार हे निकलने लगी थी लुंड से चिपकती हुई..

"आए माँ.. ये क्या ले लिया ऋ आज मैंने अपने अंदर...", और इस बार निचे होना हे पड़ा इतने खिंचाव की वजह से. छूट के चक्कर में गांड और लुंड nut-bolt से जुड़ चुके थे लेकिन अर्जुन ने मदहोशी में एक कूल्हे का मांस पकड़ कर मसला तोह दामिनी की गांड कुछ नरम पड़ती ऊपर उठने लगी. उत्तेजना में अर्जुन ने भी कमर उचकाई तोह तेल से चिकना थोड़ा हिस्सा और अंदर घुस गया. ये रगड़ अर्जुन के लिए हे मजेदार थी, दामिनी को तोह ऐसा लग रहा था के आज की रात उसकी आखिरी है. 3-4 बार उसको ऊपर उठाने और फिर निचे दबाने में अर्जुन को अब अलग सा मजा आने लगा था. दामिनी ने तोह खुदको अब पूरी तरह अर्जुन के हवाले छोड़ दिया, वो चाहे अब जान भी लेले बस दर्द मिटा दे. दोनों के होठ एक बार फिर जुड़े जो अर्जुन ने किया था और बाहों में दामिनी को भरते हुए वो खुद हे उसको अपने लुंड पर धीरे धीरे झूला झूलने लगा. हर बार दामिनी सिसक उठती लेकिन उसके वश में कुछ था हे कहा.

"आह्हः.. अब मजा आ रहा है बुआ.. ये तोह बहोत अलग इलाज है. कितना गरम और नरम है आपके andar...Aahhhhhh उम्म्म्म", दामिनी के आंसू तोह रुक चुके थे लेकिन जिस तरह अर्जुन अपनी मर्जी से उसकी गांड छोड़ रहा था हर बार उसको अपने पेट पर लुंड लगता महसूस होता. 7-8 इंच की लम्बाई वो भी इतनी मांसल लचीली गांड के भीतर जो अब तक कोरी हे थी. 2-3 इंच का हे घर्षण उसको तड़पा रहा था और जब वो इसको सहने के काबिल हुई तोह जोश से भरे अर्जुन ने जोरदार झटका देते हुए जड़ तक 9 इंच से ज्यादा लम्बा मूसल दामिनी के भीतर उतार दिया.

"तेरी माँ की छूवोत्तत्त.. साले ये अभी भी बचा हुआ था? पेट फाड़ेगा अब मेरा जो गांड फाड़ एक चैन न मिला?", एक बार फिर दामिनी उस से बुरी तरह लिपटी हुई मचल रही थी और अर्जुन आँखे बंद किये उसको गॉड में चढ़ाये कुछ पल शांत रुका रहा.

"ओह बुआ.. बहोत मजा आ रहा था और जोश में ज्यादा जोर से कर दिया. अब आराम से करता हु और आप चाहो तोह निचे लेट जाओ."

"रेहम खा रे थोड़ा.. अब निचे लिटा के भी करना है तुझे? कितनी देर से लगा हुआ है तू, इतनी देर में तोह तेरे फूफा 3 बार झाड़ जाते पर मुझे वही मिल जाए बहोत है. मैं नहीं बड़े के चक्कर में अपनी गांड फ़तवाना चाहती. लिटा ले निचे लिटा ले लेकिन जल्दी कर और मुझे बक्श.", अर्जुन का दिल किया की वो बस करे पर गाली के साथ सचमुच माँ की याद भी दिला दी थी दामिनी ने. बाहों में भरे हे उसने दामिनी को गद्दे पर लिटा दिया, दोनों मांसल टाँगे ऊपर उठा कर फैलते हुए. दामिनी के जिस्म की लोच जबरदस्त थी और इसका लाभ उठाते हुए अर्जुन दोनों चुचो को मसलता अब और भी गहरे धक्के लगाने लगा. हर बार लुंड आधा बहार और फिर ठप्प की आवाज के साथ पूरा भीतर. उसकी ताक़त और इतनी देर तक मैदान में ठीके रहने से दामिनी न चाहते हुए भी प्रभावित हुई. 5 मिनट बाद उसके जिस्म में दर्द की जगह हल्का खुमार उठने लगा था और अब वो अर्जुन के होंठो को चूमती चूसती हुई बाहों में कसने लगी. धक्के धीमे न हुए और दामिनी पहली बार गांड छुड़वाने पर छूट की तरफ से झड़ने लगी थी. अर्जुन ने आज उसके सख्त चुचो की साड़ी अकड़ निकाल दी थी जिन्हे वो पिछले आधे घंटे से मसल रहा था. Thap-thap का शोर इतना बढ़ा की दामिनी के स्खलित होने की चीख सुनाई न दी. अब वो अर्जुन को कैसे भी रोकना चाहती थी लेकिन जिस्म में जान हे न बची और जैसे उसकी हालत पर अर्जुन को हे तरस आ गया.

"आह्ह्ह्ह बाआआ...", हुंकार भरता हुआ वो अपनी टंकी उस गहराई में खली करने लगा जहा बस वही आया था. गरम वीर्य ने जैसे दामिनी का सारा दर्द चूस लिया और जोरदार धारो ने कुछ आराम पहुंचाया लेकिन अगले हे पल चीख की जगह जोरदार हिचकी निकली उसके मुख से जब बुरी तरह फुला हुआ वो भीषण सूपड़ा कैसे हुए गांड के चले को फैलता हुआ बहार निकला. इस अवस्था में वो छेड़ किसी बड़े सिक्के से भी ज्यादा चौड़ा नजर आ रहा था जैसे दामिनी ने बस इसमें हे आजतक चुदाई करवाई हो.

"ओह्ह्ह्ह. अर्जुन.. सत्यानाश हो मेरी माँ का जिसने तेरे सामने लेटने को कहा.. ये गांड ले कर मैं तोह अब उठने से रही.. गयी तेरी अकड़ अब?"

"अकड़ आपकी माँ के जाने वाली बुआ और ये तोह अर्जुन का प्यार है आपके साथ जो तेल लगा कर गांड का उद्धघाटन किया नहीं तोह जो मेरी माँ के साथ आपने किया था और जैसा आप आँचल दीदी के साथ करना चाहती है, दिल तोह करता है की दोनों हाथ काट कर आपको सबके सामने नंगा कर दू. औरत हो न आप और मेरी बुआ भी, इसलिए मैंने जो किया वो प्यार से किया. विनोद चाचा सुधारना चाहते है लेकिन आपकी माँ नहीं चाहती की उनका कोई भी बचा सुखी हो चाहे वो कितना हे प्यार करती हो आपको या चाचा को. बेटी दांव पर लगाने वाली थी आप? क्यों? आज कैमरा भी सेट नहीं कर सकीय और करती तोह वो अपनी माँ को हे देती लेकिन उनका मकसद भी पता है.?", दामिनी तोह अपना दर्द भूल कर आँखे फाड़े हुए बस अर्जुन को हे देखती रही जो वही रखे पानी से अपना लिंग साफ़ करने के बाद निक्कर पहन चूका था.

"तुम.. तुम सब जानते थे? मैं कोई खेल नहीं खेल रही.. तुम्हे शायद गलती लगी है?"

"आप खुद इतनी बेवकूफ है जो ये नहीं समझ रही की मैं देख चूका हु आपको विनोद चाचा के साथ निचे पिछले कमरे में. उन्हें आप ने कितना लालच दिया और गॉड में चढ़ कर कैसे बेशर्मी से उछाल रही थी. सब सुना और देखा लेकिन आपको खुद नहीं पता की आप वैसा क्यों कर रही है."

"माँ ने कहा था और मुझसे गलती हो गयी अर्जुन. मैं तोह रेखा भाभी को भी मारना नहीं चाहती थी लेकिन माँ के पास मेरा.. देखो मैं उन्हें कह दूंगी की तुम मेरे जाल में नहीं फंसे और विनोद से जो चाहती थी वो तोह तुमने कर हे दिया अपने आप. बात ख़तम और मैं अब वापिस इधर आउंगी भी नहीं..", दामिनी की आँखों में जो आंसू थे उनकी अपनी एक कहानी थी और वो अगर मजबूर है तोह जरूर वजह बड़ी हे होगी.

"शठ.. पानी पीयो पहले.. आपकी वो सरदार के साथ कोई रिकॉर्डिंग है दादी के पास? या यहाँ गाँव के किसी आदमी के साथ?"

"उनके पास बहोत कुछ है मेरे और कई लोगो के खिलाफ. यहाँ तक की किसी के कहने पर उन्होंने काम उम्र लड़कियां भी गायब करवाई है. मुझे नहीं पता की उन्हें कौन मजबूर कर रहा है या वो सब जान बूझ कर कर रही है. लेकिन उन्हें अगर सबसे ज्यादा किसी से दिक्कत है तोह वो तुम हो. तुम शायद अखाड़े से वापिस न आओ."

"मुझे हे क्यों मरवाना चाहती है वो?"

"नहीं पता. तुम्हे और रेखा भाभी को हे मारना उनका मकसद है. वजह नहीं पता मुझे लेकिन इतना जरूर है की हवेली में रहते हुए भी उनकी पहोच बहोत दूर तक है. और वो महीने में एक या 2 बार कही जाती है और घर पर हमेशा गुरु जी या मंदिर का बहाना होता है.", इसके बाद भी दामिनी ने अर्जुन को बहोत कुछ बताया जो वो आधा अधूरा जान सकीय थी लेकिन हर बात सुन्न कर अर्जुन हे विचलित होता जाता.

"सो जाओ आप और मुझे आज के लिए माफ़ करना. बोलना के आपने अपना काम कर दिया पर रिकॉर्डिंग के लिए बटन नहीं दबा सकीय थी. जितना जल्दी हो सके आप इस सबसे दूर हो जाना बुआ. जानता हु की आपको मैंने भी तकलीफ दी है आपकी माँ के साथ साथ. लेकिन उन्हें सजा मिलेगी और ऐसी की जो इनके पीछे खेल रहे है उन्हें सामने आना हे पड़ेगा. देखती जाओ, इस घर से जब विदा लूंगा, देवकी दादी नजरे उठाने के काबिल नहीं रहेंगी. आप पलट कर लेट जाओ, सुबह बुखार भी हो सकता है. पेनकिलर मैं देने आ जाऊंगा.", अर्जुन ने उन्हें वो ढीला कपडा पहनाने के बाद सीने के बल सोने में मदद की और पाँव की तरफ भी तकिया रख कर निचे चल दिया. दिमाग फटने की कगार पे था और अभी जैसे देवकी का आधा सच भी उसको पता लगा था. लेकिन पुराण और नेत्रं जरूर पता चल गए थे और ladkiyan-tantrik जैसा इधर भी था.

'ये बात उजागर जरूर होगी मोतीलाल जी, परिवार कायम रहे न रहे लेकिन जैसे आप इस देवकी के खिलाफ थे, अब मैं इसके अस्तित्व के खिलाफ हु.', अर्जुन निचे आया तोह सबकुछ पहले जैसा हे था लेकिन उसका मैं नहीं. लड़खड़ाते कदमो और कान पर हाथ रख कर वो अनामिका के कमरे में दाखिल हुआ तोह सामने उसको इन्तजार में जागते पाया. 2 घंटे से अनामिका तक लगाए बैठी थी. अर्जुन की गीली आँखें देख वो तुरंत उसकी तरफ लपकी.

"शहहह.. क्या हुआ है तुम्हे?"

"घुटन हो रही है चची.. ऐसा लग रहा है जैसे मैं अब बस कही दूर चला जाऊ जहा कोई इंसान न हो. मुझे संभल लो चची.. मेरे कान में ढेरो चीखें गूँज रही है.. रो रही है वो सब.. ", जैसे तैसे अर्जुन बिस्टेर तक आया था और उसके बाद वो बस बुरी तरह लिपट कर कितनी हे देर तक रोटा रहा. देवकी षड़यंत्र रच रही है इस बात को वो जानता था लेकिन वो वही काण्ड कर रही है जो काली हवेली में हुआ था, ये सोचता हुआ जब वो सीढ़ियां उतर कर निचे आ रहा था तोह वही मासूम बच्चियों की आवाजे उसके कान में गूंजने लगी. उसकी हालत देख कर अनामिका का कलेजा हे बहार आ निकला लेकिन अगर वो भी कमजोर पड़ी तोह.

"नहीं नहीं.. सब ठीक है अर्जुन.. तुम आराम करो बस.. शांत.. मैं हु तुम्हारे पास बीटा.. मैं हु..", बीटा.. अर्जुन जैसे खुदको मोतीलाल जी की गॉड में पा रहा था.. आँखें हलकी मुस्कान और बहते आंसुओं से धीरे धीरे बंद हो गयी थी अनामिका द्वारा लगातार थपकने से.

'ये मासूम है और लगता है कुछ गहरा असर कर गया इसके दिमाग पर. रात इन्तजार करती हु नहीं तोह इन्हे फ़ोन करुँगी..', अनामिका बेचारी तोह पूरी रात उसके सर को गॉड में लिए जागती रही. पलके झपकती तोह वो खुद के हे चूंटी काट लेती या फिर निकेतन को एक तरफ सतान्नपान करने लगती. लेकिन वो जागती रही जब तक के दिन निकलना शुरू न हो गया. अर्जुन के चेहरे पर आंसुओ के सूखने के निशाँ थे और आँखें खोलने से पहले वो मुस्कुराते हुए बोलै.

'आप सही कह रहे है मोतीलाल जी, दुष्ट स्त्री है ये देवकी. लेकिन अब हम आ गए है न, लक्ष्मी नारायण भी भला नहीं करेंगे इनका.'

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"खबर हे सुनी है या कुछ कर भी रहे हो भाई साहब? लगता है गुजरते समय और अनगिनत बार मुँह की खाने से अब हिम्मत नहीं बची आपमें?", ये महिला 65-70 बरस की होने के बावजूद आकर्षक चेहरे और chaal-dhal से एकदम चुस्त थी. विदेशी माहौल के बावजूद एक अलग हे नूर था बेशक बाल चांदी से सफ़ेद हो चले थे. 15 फ़ीट लम्बी मेज के दूसरे छोर पर बैठा उतनी हे उम्र का वो व्यक्ति जबड़े भींचने के बाद झूटी मुस्कान दिखता हुआ उठ कर इसके करीब चला आया.

"ज़हर उगलती रहोगी ज़िन्दगी भर तुम वैदेही लेकिन हम दूर रह कर भी वह की पूरी खबर रखते है. खबर रखने के साथ और भी बहोत कुछ करते है चाहे 10 में से 5 बार शिकस्त हे क्यों न मिली हो."

"10 में से 9 बार भाई साहब और खबर तोह मेरे पौता पौती भी दुनिया की रखते है लेकिन मैं उन्हें नियम में रखती हु. इसलिए वो आपके इस आलिशान महल जैसे घर में सिर्फ तभी आते है जब आप मौजूद न हो. नयी खबर तोह ये है की सौंदर्य दीदी को वारिस दिख गया है और उसने ठीक बापू जी की तरह अपना जलवा भी दिखा दिया. परसो वो मेले में जोहर दिखने के बाद राजा बन्न ने का हक़दार होगा. राम भाई का पौता.. पंडित अर्जुन शर्मा... नाम ाचे से याद कर लो क्योंकि आप राम भैया और सौंदर्य के मरने का इन्तजार करते रह गए और यहाँ उन्होंने असली वारिस खड़ा कर दिया. Chu-chu-chu.. मेले प्याले बाले भैया .. तुमाल पलितं", इतनी उम्र के बावजूद जिस तरह का इनका ये बचो जैसा अंदाज था, कोई भी देखता तोह हंस हंस के इनका मुरीद हो जाता लेकिन सामने वाले शख्स ने तोह मेज पर बिछा कपडा खींचते हुए महंगी saaj-sajja हे तहस नहस कर दी. Cheeni-mitti से ले कर कांचा का सामान फर्श पर बिखर चूका था.

"क्यों.. क्यों आती हो तुम आग लगाना वैदेही? रामेश्वर भी मरेगा और ये कुटिया भी जैसे उसकी बड़ी बहिन को मरवाया था मैंने. और ये आज का पैदा हुआ क्या नाम लिया.. अर्जुन.. चुटकी में मसल कर रख दूंगा इस नाजायज़ वारिस को. तुम मुझे उस अखाड़े के बारे में इतनी रात को आयी थी न तोह सुनो. वही मरेगा वो ठीक उसी अखाड़े में और सभी देखेंगे कैसे एक राजा इन कीड़े मकोड़ो को दूर से हे मसल देता है. मैं चाहे एक दिन के लिए राजगद्दी पर बैठु वैदेही, पर राजा बन कर हे दुनिया से विदा लूंगा. और न मुझे सारंग रोक सकता है जो अब उधर दखल देने से भी रहा और ना ये Rameshwar-Saundarya. इनके मरने के बाद मुझे बस वह जाना है और सब मेरा.", कुछ अँगरेज़ और हिंदुस्तानी मूल की सेविकाएं वह बिखरे सामान को उठा कर saaf-safaai करने लगी थी और व्हीलचेयर पर बैठी इस बहोत ज्यादा हे उम्रदराज महिला को एक अलग सेविका यहाँ इन दोनों के करीब ले आयी.

"किसको नाजायज़ बुला रहे थे तुम प्रीतम? हमे दिखाई ठीक से नहीं देता लेकिन सुनाई इस उम्र में भी दे जाता है. हम तोह इस आस से वह से दूर हुए थे की तुम लोग सलामत रहो. बिटिया समझदार है लेकिन तुम जैसे अपने दादा पर अधिक चले गए. बताओ जरा किसको नाजायज़ बुला रहे थे?"

"उस रामेश्वर के पिल्लै अर्जुन को.. आप तोह दूसरी ऑप्शन थी न माँ हमारे पिता जी के लिए. प्यार तोह उन्हें बस प्रभा देवी से था."

"Raame..Jaante हो तुम एक बार के लिए नाजायज़ हो सकते हो अगर दर्जे की बात है तोह. दूसरी रानी के बेटे हो तुम लेकिन राम कौन है? बड़े महाराज की बड़ी रानी का पौत्र. अनुराधा माँ की तस्वीर हमेशा से raani-galiyare में लगी रही है और आज भी मौजूद होगी चाहे राम ने कभी वह कदम न रखा हो. अब तुम अपने इस छोटे से दिमाग में ये बात बैठा लो की वो युवक जो कोई भी है वो सबसे ज्यादा जायज़ है अगर वो राम का पौता है. वैदेही, तुम्हे कोई तस्वीर मिली इस बचे की?", ये महाराजा बलविंदर जी की दूसरी रानी थी, ज्योत्सना जी. जिन्हे उन्होंने इनकी मर्ज़ी और अपने रसूख की वजह से यहाँ विदेश में स्थानांतरित करवा दिया था. एक बेहतर ज़िन्दगी के और जरुरत से ज्यादा संसाधनों के साथ.

"हाँ हैं न माँ तभी तोह आपके पास आयी थी इतनी रात को. भैया से उम्मीद काम थी मिलने की लेकिन दिख गए तोह हालचाल पूछ लिया. महेंद्र ने भिजवाई थी ख़ास आपको दिखने के लिए.", महेंद्र की मौसी लगती थी वैदेही. और जब उन्होंने तस्वीर बधाई तोह व्हीलचेयर थामे सेविका ने नज़र का दूसरा चस्मा उन्हें थमाया.

"साक्षात जेठ जी है ये तोह बस मूछ अभी कच्ची सी है या निकली नहीं उतनी. उनसे बेहतर मुस्कान और चमक जैसे इसके पास पूरी दुनिया हो. भगवान् ने हमे ये दिन दिखाया हम शुक्रगुजार है उनके. हर रणन फ़तेह करो बीटा, तुम्हारी पड़ दादी की दुआ है ये. वैदेही बेटी भगवान् है और अब तुम ये खुद देख रही हो.", रानी अपने सजल नेत्र साफ़ करती हुई उस तस्वीर को अपने साथ हे भीतर ले गयी.

"तोह भाई साहब, आपको आज माँ ने आखिर बता हे दिया न के आपकी औकात क्या है. मुझे पता थी लेकिन सोचा 10 में से 10 हार बहोत बुरी लगती है. नै? लेकिन ये आत्मघाती गोआल.. वो रीवा बोलती है न फुटबॉल देखते हुए सुसाइड गोआल आपने खुद किया है. थोड़ी बहोत मर्दानगी बची हो इस सो कॉल्ड रॉयल ब्लड में तोह जो बैक एंड सरेंडर. रामेश्वर जी कुछ होने नहीं देंगे आपको.", साफ़ था के माँ और बेटी सही जीवन जी रही थी बिना किसी शिकायत के लेकिन ये जनाब तोह हाथ हे उठाने लगे थे.

"तुम्हरी ये.."

"भाई हो हमारे और कानून से हमे डर भी लगता है थोड़ा सा. जब आप पतलून पहन न सीख रहे थे हम तब से इस खिलोने से खेल रहे. जो आपका सबसे कमजोर हिस्सा है वह छेड़ कर देंगे अगर हम पर हाथ उठाने की चेष्टा भी की. 5 मिनट बड़े है, ये भी याद रखियेगा नहीं तोह .. चलते है, बचो के साथ डिनर पे बहार जाना है आज रात. ओह सॉरी, आपके तोह बचे भी नहीं है.. ी मैं शादी भी तोह नहीं हुई. जाओ कमरे में जा कर थोड़ा सा रो लो आप, मैं हल्का हो जाएगा.", ये कमाल की महिला थी जो हैंडबैग में आलिशान रिवॉल्वर लिए घूमती थी और निकलने में एक सेकंड तक नहीं लगता था.

"देख लेना वैदेही, तुम्हारा भी ये शाही फण्ड बंद न करवाया तोह मेरा नाम भी राजा प्रीतम नहीं."

"उमाठ.. कुमार 2-3 जगह कुछ बेवकूफ लोगो को फ़ोन करके वह मरने भेज देना. और रोना अकेले में, बूढ़े हो गए हो न मुझसे भी पहले तोह ाचा नहीं लगता. चलो अब हम नयी बुरी खबर ले कर हे आएंगे इधर, आपके लिए बुरी. गूडनिघत एंड स्टेल्ला कीप ान ऑय ों योर हाइनेस. हे इस डेफिनाटेली इन नीड ऑफ़ सम अल्कोहल.", जिस अदा से ये पारी आयी थी उस से कही बेहतर इनके जाने का तरीका था. कुमार प्रीतम बस अपनी जगह खड़े जबड़े भींचते हे रह गए और उधर अर्जुन निकल चूका था हवेली से देवकी को समझा कर की अनामिका साड़ी रात नहीं सोई है बचे की वजह से. उसको जगाये नहीं, जिसमे उसका समर्थन करने वाले 2 और लोग थे.. आँचल और कृष्णेश्वर. अर्जुन अब हर तरफ मार करने वाला था, बस प्रीतम खुद चल पड़ा था उसकी और जैसे मीनाक्षी निकल चुकी थी, समय से एक घंटा पहला.
 
अपडेट 202 (1)

परीक्षा पूर्व

"आपने इतनी जल्दी आने के लिए क्यों कहा था? वैसे तोह घर पे किसी ने कुछ पुछा नहीं लेकिन पहली बार मुझे झूट बोलना पड़ा.", अभी समय हुआ हे कितना था जहा शहर में मार्किट बाजार ठीक से खुले हे नहीं थे. मीनाक्षी गोल चौक से पहले हे टेम्पू से उतर कर अर्जुन की प्रतीक्षा कर रही थी जिसने ज्यादा इन्तजार न करवाया. घडी में सवा 8 हे बजे थे और ये जगह सुरक्षित नहीं थी जहा उनकी तरफ से शहर आने वाले लोग देख भी सकते थे.

"ऐसा करवाने के लिए माफ़ी चाहता हु मीनाक्षी जी लेकिन मैं किसी और से मदद नहीं ले सकता था. आप चेहरे पर दुपट्टा कर लीजिये, फिलहाल यहाँ से निकलना जरुरी है.", मीनाक्षी झिझकते हुए दोनों पाँव एक तरफ फुटरेस्ट पर रखते हुए अर्जुन के पीछे बैठ गयी. जैसा उसने कहा था ठीक वैसे हे चेहरा दुपट्टे से ढंकती हुई और बैग अपनी गॉड में लिए. अर्जुन को बस सामने नहीं जाना था और इस जगह से परिचित न होने की वजह से बेहतर लगा मीनाक्षी से चलते हुए हे जानकारी ली जाए.

"देखिये आप बिलकुल भी मैट डरिये और मैं क्लास के समय से पहले हे आपको सेण्टर छोड़ दूंगा. वैसे ये क्सक्सक्सक्स आश्रम कहा है कुछ पता है आपको?", अर्जुन की बात सुन्न कर मीनाक्षी भी बेचैनी के बावजूद धीमे से मुस्कुरायी और जो पता वो पूछ रहा था उसके बारे में लोग बात करने से बचते हे थे.

"क्सक्सक्सक्स गाँव की तरफ जो सड़क जाती है बस उसके आगे हे ये आश्रम है अर्जुन जी. लेकिन ये पता तोह आप किसी से भी पूछ सकते थे. क्या आप मुझे भी उधर लेके जाने वाले है?", हलकी परेशानी जरूर हो रही थी इस लड़की को लेकिन अर्जुन के साथ जैसे वो वह भी जाने को तैयार थी.

"मैं इतनी बड़ी बेवकूफी कैसे कर सकता हु मीनाक्षी जी? और यही वजह भी है की मैंने इसका जीकर किसी से नहीं किया. मुझे आपसे कुछ और भी जानकारी लेनी थी. क्या हम आसपास किसी ऐसी जगह पर बैठ सकते है जहा डिस्टर्ब करने वाला कोई न हो? मेरा मतलब है की बात थोड़ी ख़ास है और ये भी अगर मैं किसी और से पता करूँगा तोह शायद जवाब की जगह कुछ और हो जाए.", पहले तोह मीनाक्षी की धड़कन हे बंद होने लगी थी अकेले में समय बिताने की बात सुन्न कर लेकिन फिर अर्जुन के गंभीर चेहरे को आईने में देख वो कुछ सहज हो गयी.

"मैं शहर के बारे में तोह जानती हु लेकिन ऐसे कभी नहीं आयी पहले. माँ पापा के साथ हे आना होता है नहीं तोह कॉलेज और सेण्टर के बाद सीधा घर. ये यहाँ एक पार्क है उधर आगे लेकिन इधर जाना ठीक होगा या नहीं?", इस दौरान मीनाक्षी का जिस्म पहली बार हल्का सा अर्जुन की पीठ से छुआ था. अर्जुन को तोह इसकी भनक तक न थी लेकिन ये युवती जैसे इस पर हे शर्मा गयी. अर्जुन ने देखा की ये पार्क वैसा नहीं था जहा वो अपने शहर में घूमने जाता था. इधर तोह जगह जगह झाड़ और घने वृक्ष से थे लेकिन अकार कही ज्यादा हे बड़ा और दूर तक फैला हुआ. मोटरसाइकिल लगते समय उसने ये भी देखा की इधर तोह दूर दूर तक अंदर कोई नहीं है. शुरुआत में हे 3-4 हरे रंग के लोहे के बेंच थे लाल फूलो वाले वो घने गुलमोहर के वृक्ष हर तरफ. अर्जुन कुछ शंकित सा हुआ इतने बड़े शहर में ऐसा पार्क वीरान देख लेकिन उस लोहे के घूमने वाले द्वार से वो अंदर दाखिल हुआ तोह बैग कंधे पर टाँगे मीनाक्षी धीमे कदमो से उसके पीछे.

"बड़ी अजीब बात है, इधर इतनी ाची जगह पर लोग नहीं है. वैसे ाचा हे है जब बात भी जरुरी करनी हो तोह इस से ाचा माहौल क्या मिलेगा? आओ हम ये छाया वाले बेंच पर बैठते है.", अर्जुन तोह उस और चल दिया लेकिन मीनाक्षी के कदम तोह ऐसे उठ रहे थे जैसे उन पर 20-20 किलो का वजन बांध दिया हो. वो जैसे तैसे बेंच तक पहुंची तोह अर्जुन को अपना एक हाथ पीठ वाली तरफ बेंच पर फैलाये देख वो बस कड़ी रही.

"ओह सॉरी. हाथ थोड़ा सीधा कर रहा था. आप बैठिये और चाहे तोह डिस्टेंस पर बैठ सकती है.", मीनाक्षी को ाचा लगा था के अर्जुन उसके प्रति सजग था. ये छोटी छोटी बातें हे एक पुरुष में ऐसी लड़कियां देखती है. वो अभी भी गॉड में बैग लिए थे और अर्जुन ने बात शुरू की.

"वो निचली तरफ मजदूरों की बस्ती जैसा गाँव है मीनाक्षी जी, मुझे पता लगा की उधर के खेत आपके है.", अर्जुन ने उम्मीद से बिलकुल हे अलग बात शुरू की थी पर मीनाक्षी को ये भी मंजूर था. दुपट्टे से सिर्फ उसकी वो गहरी चमकदार आँखे हे दिख रही थी और अर्जुन को जवाब देने के लिए अब ये दुपट्टा हटाना जरुरी हो गया था. इतने करीब से और वो भी ऐसी लड़की को जो कभी अकेली किसी लड़के के साथ कॉलेज में भी नहीं मिली थी, आज सुनसान जगह थी. झिझक, सतर्कता और मानसिक द्वन्द अभी तक दिख रहा था मीनाक्षी के भोले से चेहरे पर. कल शाम तोह वह चंचलता थी.

"जी वो जमीन हमारी है लेकिन उसको सँभालते और खेती मुकुन्दी काका करते है. साल में 2 बार वो दादा जी को 2 हिस्से देते है और बाकी एक वो खुद रखते है. बस्ती के प्रमुख भी है वो एक तरह से, आपके इधर तोह उनका आना जाना कही ज्यादा है तोह ये बात आप उनसे हे पूछ सकते थे.", अर्जुन देख और समझ रहा था इस युवती की हालत और उसको थोड़ा मजा भी आ रहा था इस पल में.

"कहा न के मैं किसी और से पूछ नहीं सकता था इसलिए तोह आपको अनजान इंसान से भी दूर लेके यहाँ बैठा हु. तोह कैसा व्यक्ति है ये मुकुंद काका और मैंने तोह अभी तक देखा नहीं इसको हवेली पर."

"परसो तोह जब मैं khel-ghar जा रही थी तब वो हवेली की तरफ से आ रहे थे शायद और दादी (देवकी) जी भी उनके साथ कुछ बात करती हुई जा रही थी लेकिन वो सबसे बात कर लेती है. उसके बाद वो सीरत दीदी के घर चली गयी थी और मुकंदी काका को राम राम कह कर मैं अपनी प्रैक्टिस के लिए. आप भी तोह वही आये थे थोड़ी देर बाद. कुछ ठीक नहीं है क्या अर्जुन जी?", अब अर्जुन समझा था के क्यों देवकी उसके हाथ में दूध देखते हे निकलती थी और उस से पहले सेवक निकल जाता था. लेकिन अब मीनाक्षी के सवाल पर उसको भी जवाब तोह देना हे था.

"हाँ बस्ती में कुछ तोह ठीक नहीं है जैसा मुझे पता लगा है मीनाक्षी जी लेकिन आप गलती से भी बस्ती या हमारी बात का जीकर किसी से मैट कीजियेगा. आपकी जमीन है इसलिए मैंने ये बात आपसे जान नई चाही और अगर मैं ये आपके दादा या किसी और से पूछता तोह मुकंदी तक बात जरूर जाती. मामला बिगड़ सकता था इसलिए आपको चुना. माफ़ कीजियेगा मेरे इस स्वार्थ पर."

"आप कह कर तोह देखिये एक बार अर्जुन जी, आपको भी बस्ती पर नजर नहीं रखनी पड़ेगी और जो जान न चाहते है वो मैं पता करके दे सकती हु. बाकी अगर मुझे उस आश्रम भी चलने के लिए कहेंगे तोह मैं तैयार हु.", मीनाक्षी का इस तरह सहयोग भावना दर्शन फिर से अर्जुन को थोड़ा परेशां कर रहा था. ये मासूम थी और जीवन में ज्यादा अनुभव उसको नहीं था. लेकिन इसका समर्थन उसने हँसते हुए ना में किया.

"नहीं उस जगह तोह बस मुझे हे जाना होगा जिसका नाम तक बताने में लोगो के चेहरे बदल जाते है. ये बस्ती के बारे में कैसे पता कर के दे सकती है आप?"

"लाली 10 से 6 बजे तक हमारे हे घर काम करती है और पिछले 5 साल से. मुझसे 2 साल छोटी है लेकिन समझदार और प्यारी लड़की है लाली. बस्ती में मुकंदी काका के बाद उसके हे पिता थोड़ा नाम है. पहले वही प्रमुख थे लेकिन अब बस वो आपके हे खेतो में चौकीदारी करते है, शीबू काका कहते है उन्हें. और ये लाली मेरी सबसे ज्यादा विश्वासपात्र है बस थोड़ी ज्यादा हंसमुख है क्योंकि उसको बस्ती से ज्यादा तोह हमारा घर अपना लगता है. बताये क्या पूछना है, मैं बात कर लुंगी उसके साथ और वो नहीं भी पता होगा तोह पता कर देगी.", अर्जुन विचार कर रहा था मीनाक्षी की बातों पर और कही दूसरी तरफ से ये स्कूल और कॉलेज जाने की उम्र वाले 6-7 लड़के उनसे कुछ हे दुरी पर विकेट गाड़ने लगे. छुट्टियां चल रही थी और ऐसी छायादार जगह से बेहतर क्रिकेट कहा खेल सकते थे. उन्हें नजरअंदाज करते हुए अर्जुन ने मीनाक्षी की तरफ देखा तोह अब वो थोड़ा चिंतित दिख रही थी. अर्जुन ने बस हाथ के इशारे से हे निश्चिन्त रहने का कहा और खुद थोड़ा पीछे हो गया, पहले हे दोनों के बीच एक आदमी से ज्यादा जगह थी

"आप ऐसी गलती मैट करना भूले से भी. अगर मुमकिन हो सकता है तोह क्या लाली को उसके घर लौटने के समय से थोड़ा पहले आप वह तालाब की तरफ लेके आ सकती है? बात ऐसी है मीनाक्षी जी की यहाँ कुछ लोगो की ज़िन्दगी का सवाल है लेकिन मैं उन्हें भी नहीं जानता पर वो यक़ीनन बस्ती और साथ लगते banjaro/lohar वाली बस्ती से भी हो सकते है. और उनका बुरा करेने में कौन शामिल है ये भी सही से कहना मुश्किल है. एक चूक और आप या मैं बहोत बड़ी मुश्किल में फंस सकते है. और सॉरी मैंने वो लड़की कल आपके घर देखि थी जो दादी से बात करने के बाद चली गयी थी. लाली, यही नाम बताया न आपने? वो मैंने उधर भी देखि थी जिधर हमारे खेत है लेकिन थोड़ा समय से पहले."

"हाँ क्योंकि वह उसके पिता चौकीदारी करते है और लाली हमारी तरफ आने से पहले उन्हें खाना देने जाती है. क्या सचमुच इसमें इतना बड़ा जोखिम है अर्जुन जी? फिर तोह आपको भी दूर रहना चाहिए इस सबसे. पहले हे पार्ले पिंड वाले कुछ लड़के दूसरे रस्ते से बस्ती में गलत काम की वजह से घुमते रहते है और बंजारों वाली बस्ती से आगे तोह थोड़ा बुरा मैंने भी सुना है. लेकिन इतना नहीं की पुलिस या पंचायत तक बात आये. या आती नहीं होगी पैसे और ताक़त की वजह से. आपका ये बस्ती वाला मटर और ये आश्रम कही लिंक तोह नहीं आपस में?", मीनाक्षी अपनी बात पूरी हे कर रही थी की अर्जुन तेजी से उसके चेहरे के सामने आ गया लेकिन नजरे बायीं तरफ. वो लाल रंग की गेंद अर्जुन ने एक हाथ दूरी पर हे पकड़ ली थी जो सीधा मीनाक्षी के चेहरे पर लगती.

'सॉरी पाह जी. मूंदे ने बहरो सुट्टी स. भाभी जी सॉरी.", 17-18 साल का ये युवक कुछ सेहम सा गया था और उसके प्रयास को अर्जुन ने भी देखा था गेंद लपकने के लिए. पर मीनाक्षी तोह घबरा हे गयी थी और उसके बाद उस लड़के द्वारा भाभी कहना.

"कोई बात नहीं भाई, हम हे थोड़ा गलत जगह बैठे है. स्टंप्स की निशाँ हे बता रहे के ये आप लोगो के खेलने की जगह है. It's ऑलराइट.", अर्जुन ने खड़े होते हुए इस वाले की जगह बॉल को उधर फेंका जहा से दूसरा लड़का बोलिंग कर रहा था. हाथ के इशारो से हे एक दूसरे का अभिवादन हुआ हलकी मुस्कान के साथ.

"हाँ तोह हम कहा थे मीनाक्षी जी?"

"भाभी पर.", उसके इस मासूम से जवाब पर अर्जुन की साड़ी गंभीरता गायब हो गयी. और मीनाक्षी को जब समझ आया की वो क्या बोल गयी है, बेचारी नजरे तक न मिला सकीय.

"It's ऑलराइट. डर किसी भी वजह से लग सकता है जैसे एकदम से मेरा आपके सामने आना और वो बॉल. वैसे मैं कह रहा था के आप बस शाम को 5:30 बजे के बाद और 6 से पहले लाली को तालाब के पास लेके आने की कोशिश कर दीजिये. वो लड़की हे मुझे जानकारी दे सकती है और उस जगह सब सुरक्षित रहेंगे. अब शायद इस गब्रहत को आप अपनी सहेलियों के बीच दूर करना चाहेंगी? लाली आती है या नहीं, वो सब बाद की बात है. आपको कुछ नहीं होने दूंगा और आप इस सबसे दूर भी रहेंगी. रहेंगी न मीनाक्षी जी?", वो तोह बस सर 2-3 बार हिलने के बाद चलने के लिए कड़ी हे हो गयी.

'जनाब एक पंछियां डा जोड़ा इथे भी है. चलो तुस्सी laila-majnu, हूँ जनाब करांदे तुहानू आश्कि.', ये अब नया बवाल उठा खड़ा हुआ था जहा पार्क की भीतर वाली पटरी पे 2 हवलदार लड़का लड़की की जोड़ी को दूर से लेते हुए आये थे और अब उनमे से एक यहाँ अर्जुन और मीनाक्षी के पास चला आया था. मीनाक्षी तोह जैसे यही सोच रही होगी की दिन शुरू हुआ नहीं और परेशानियां आज हे होनी थी. वो घबराहट में अर्जुन के पीछे हे जा कड़ी हुई, चेहरा दुपट्टे से ढंकते हुए.

"बुला हे लो फिर अपने जनाब जी को यहाँ भाई. आश्कि के साथ थोड़ा कानून की चर्चा भी कर लेते है. आराम से बैठो मीनाक्षी, मैं हु."

"तू किथे डा शो लगेया? Fuddi-deya chup-chaptie ओह जिप्सी विच जा के बह जा, छड़ देना तनु और तेरी माशूक न घर दिया न बुलाएं दे बाद.", ये सिपाही या हवलदार जो भी था, था थोड़ा कड़ियल.

"वर्दी न होती तुम्हारे जिस्म पर तोह पका वही दाल देता जहा से निकले हो. लड़की के सामने बात करने की तमीज है या रंडवे हो? एक और बार मुँह से अपशब्द कहो, जिस्म से वर्दी उतरवाने के बाद वो हाल करूँगा की दुबारा मुँह खोलने से पहले मेरा चेहरा याद रहेगा.", अब सचमुच हे माहौल गरम हो चूका था और अर्जुन जिस तरह से इस व्यक्ति के सामने खड़ा था, कभी भी उसका धैर्य जवाब दे सकता था. क्रिकेट खेल रहे उन लड़को में से भी 2-3 अर्जुन की उम्र या कुछ बड़े यहाँ चले आये थे. पढ़े लिखे और समझदार थे.

"रुक तू काका, तेरे तोह पत्ते वि मैं हे लौ. बस एक बार जनाब जी न तू तेरा कानून समझा दे. साले धंदे वालियां..", बस यही कह कर इस व्यक्ति ने अपनी शांत बुला ली थी और आज अर्जुन ने वर्दी पर दूसरी बार हाथ डाला था लेकिन ये वाला जोरदार. थप्पड़ के साथ हे ये लम्बा मुलाजिम गाल पर दोनों हाथ रखता उसी बेंच पर जा पसरा जहा थोड़ी देर पहले ये दोनों बैठे थे. उसका साथी भी हरकत में आता इधर दौड़ा और बहार से ड्राइवर के साथ इनके जनाब भी, बहार निकली तोंद के साथ हफ्ते हुए.

"जिन्दर, फाड़ साले न. कानून तेह हाथ चुक्कैया तू काका? तू नहीं बछड़ा.", वो लड़के अर्जुन के कुछ कहने से पहले हे सामने ऐड गए.

"तुहाडी माँ बहिन ने जे अस्सी गाला दिए, तुस्सी मन करो फेर होर ज्यादा दिए.. पानी हे होना अंकल जी तुहाडे खून विच जे तुस्सी ताः भी चुप रहो. पाह जी भरजाई दे नाल अपनी गल्लां कर रहे स तेह ेहना न जे तुहाडा बाँदा पैसे दे बदले गलत कम् वाली कह के बुलावे ताः? मैं ताः गट्टा हे ला देना स जे मेरी भें जा माँ बारे कोई ेहड़ा बोल दावे, पाह वे फेर वड्डा कमिश्नर हे क्यों न होव.", खिलाडी था और बात के साथ जिस्म में उतनी हे अकड़.

"ेहना न वि पाओ अंदर. परचा बनु सारिया तेह.", 4 पोलिसवाले और यहाँ 4 युवक. मामला गरम तोह हो हे चूका था लेकिन अर्जुन ने उस युवक को िज्जात्त के साथ शांत रहने का कहते हुए अब इन जनाब का रुख किया.

"ड्यूटी के वक़्त आप और ये साथ जो खड़ा है, दोनों हे नशे में हो. लेडी पुलिस होनी चाहिए अगर कही ऐसी जगह छपा मार रहे हो जहा महिला होने के चान्सेस है, जो आप लोगो के आसपास भी नहीं कड़ी रह सकती देख कर हे पता चलता है. सर्किल इंस्पेक्टर ने नाके की लिस्ट में ये भी बताया होगा की असामाजिक तत्वों को अगर पकड़ना है तोह उनकी निशानदेही या रिकॉर्ड जरूर हो? ये पब्लिक प्लेस है और उधर भी आपने जिन दोनों लोगो को पकड़ा वो व्यस्क और शायद कानून से डरने वाले लोग है. नशे में पब्लिक प्लेस पर लड़की की इज्जत पर हाथ डालना वो भी अपने अधिकारी की मौजदगी के साथ साथ आदेश पर, सजा सस्पेंशन से आगे बढ़ चुकी है गुरपाल जी, यही नाम है न आपका जो लिखा है? ये बगल में जो सिपाही खड़ा है ड्राइवर है और इसकी जेब से बहार कुछ नोट झलक रहे है मतलब नाके से बोहनी करके अब कॉलेज और पढ़ने वाले yuvako-ladkiyon को डरा धमका के कमाई बढ़ानी थी जिसमे व्यवधान आ गया क्योंकि आज बहोत गलत दिन था इसके लिए. डिसकीप्लीनरी एक्शन तोह लिया हे जाएगा आपके खिलाफ गुरपाल जी लेकिन तत्काल प्रभाव से सस्पेंशन और आधा दर्जन चार्ज अलग लगने वाले है.", अर्जुन द्वारा आगे बढ़ते एक सिपाही को वही रोक कर इन जनाब को उनकी वास्तविकता से परिचित करवाना हे चारो के लिए भरी पड़ गया था.

"मेनू सब पता लेकिन तू होने जांदा नई की सी गुरपाल सिंह, बन्दे न बाँदा नई रेहान डंडा."

"सिविल लाइन्स थाने में हे मिलना मुझे अबसे ठीक 20 मिनट बाद. फिर देखता हु कौन किसको बाँदा बनता है. मीनाक्षी इनके नाम और बेल्ट नंबर नोट करो. बताओ गुरपाल जी, ओह ये तोह सामने हे है.", अर्जुन ने अब असली पुलिसिया भसह प्रयोग की थी जिसको सुनते हे हवलदार और सिपाही अपन जनाब को देखने लगे. वो लड़के वही थे और उनकी पकड़ bat-stump पर पूरी कासी हुई. जैसे कोई भी अगर गलत हरकत करेगा तोह जवाब जोरदार देने वाले हो.

"चलो ोये."

"हिलना भी मैट.. पहले अपने इस चेले से कहो की माफ़ी मांगे इस मासूम लड़की से.", ये आजकल कई बार होने लगा था जब अर्जुन के चेहरे के भाव बदल जाते थे और उसकी मजबूत पकड़ अपनी बाजू पर देख सी वही जड़ हो गया. आँखों में अलग हे खौफ था जब वो अर्जुन के चेहरे को देख कर अपने उस अभद्र सिपाही की तरफ सर हिलने लगा.

"भें जी, कहा सुण्या माफ़ होव. मैं तह गलती मैं लायी लेकिन आपड़े लाग्दर जी दे विचार नहीं लगदे. हाथ उठाया न मेरे ते.", ये सचमुच हे कड़ियल इंसान था जिसकी माफ़ी भी वैसी हे थी.

"20 मिनट में थाने नहीं मिले तोह वायरलेस जरूर उठा लेना. नहीं तोह सबको सुनाई देगा की फजीहत कैसे होती है. या तोह यही घुटने के बल नहीं तोह जितना जोर लगाना है अपनी वर्दी बचने का उतना लगा लो. कोई मदद नहीं करने वाला जब पता चलेगा की काण्ड क्या किया गया और विटनेस के साथ विक्टिम अपना बयान संधू जी को खुद देगा. अब गुरपाल जी, आप इसको नशे या अपनी धौंस की वजह से हजम नहीं कर प् रहे लेकिन ऐसा होने वाला है. थैंक्स भाई, फिर मिलता हु. चलो मीनाक्षी जी.", अर्जुन आगे बढ़ने लगा तोह इस सी ने अपनी अकड़ी हुई जुबान खोली.

"ना की बताया तू अपना काका?"

"वही पूछना चाहिए था सबसे पहले लेकिन चलो बता देता हु, कुमार अर्जुन. रानी माँ का फ़ोन अब किसके पास जाता है, ये आप सोचिये लेकिन वर्दी .. वो देखते है.", अर्जुन जिस तरह से मुस्कुराया था वो हंसी एक तीख प्रहार थी. जैसे फ़िलहाल उसके सारे काम एक तरफ और अब इन सी साहब की सेहत दुरुस्त करवानी सबसे जरुरी. मीनाक्षी तोह बहार निकलने तक हे सदमे से बहार आ चुकी थी.

"ऐ की बोल के गया मिट्ठिया?"

"कुमार अर्जुन मतलब राजे डा मुंडा जनाब. ओह तह व्याहे नै जिन्ना मई सुनिया. तेह रानी माँ होई महारानी जी, मुंडा लगदा वि तीच स जनाब. वेखयो मैं ड्राइवर बाँदा है मालको."

"ओह जनाब जी, पार्षद अभिषेक शर्मा जी दे प्रायः डा साला है मुंडा तेह सौर पास अपनी रानी जी डा परवर तेह ोठे डा मुख्यमंत्री वि आये होये स ेहना दे व्याह विच. एहने भरे व्याह विच कमांडो कुत्त तह स फेर तुस्सी तह शकल तोह हे अमली हो. हाँ एसएसपी पंडित जी है ेहड़े दादा जी. सोच्या बता देवा तुहानू, भावे बढ़ने तुस्सी सारे माडे हे हो. चलो बाई, मैच शुरू करो. खेदन आला खेद गया, हूँ बोलिंग करेगा ओह तेह विकेट ेहना दी खाड़कू.", ये वही तगड़ा युवक था जो अर्जुन के पक्ष में खड़ा हुआ था.

"मीथेय पहंचो गद्दी निकाल तेह वेख कित्थे गए हो. सच्ची नौकरी गयी वे लगदा. ऐ सतवंत सी दे पिंड डा नवा मालक स अर्जन. सुनिया स लेकिन खाती पीती विच याद वि नई रहा. तुस्सी धोवे ेहदर हे बून्द मरवाओ.", जनाब तोह गुस्से और डर में फुफकारते हुए बाकी दोनों सिपाहियों को झाड़ लगते ड्राइवर से भी तेज अपनी जिप्सी की तरफ बढे और पीछे से ये दोनों बस यही कह सके., 'पर जनाब'

अर्जुन अब निकल चूका था मीनाक्षी को सेण्टर छोड़ने और वह पहुंचने से पहले उसका मैं हल्का करवाना भी जरुरी था. ऐसे हादसे अक्सर मासूम लड़कियों पर गहरा असर कर जाते है. अभी दोनों के पास हे कुछ समाया था और मीनाक्षी की दशा देख कर अर्जुन ने तजा फलो के जूस काउंटर के सामने ब्रेक लगा दिए.

"यहाँ क्यों?"

"बस वैसे हे. सोचा इतनी म्हणत की आपने उन्हें वह धमकाने में तोह गाला सूख गया होगा. अब क्लास भी लगनी है तोह थोड़ी ताक़त तोह रेहनी चाहिए न? भैया 2 मिक्स लगा दो, मीठा बिलकुल नहीं.", अर्जुन उस बड़ी लाल छतरी के निचे मीनाक्षी के साथ खड़ा था और फलो पर मोटी धुप लगते हुए जूस वाले ने भी मुस्कुरा कर हाँ कहा. हाथो को धोने के बाद वो बड़ी हे सफाई से अपने काम में जुट चूका था, ये पहले ग्राहक थे अभी उसके. और मीनाक्षी अब खुद हे वह जो हुआ उसको याद करके झेंप रही थी, अपने दब्बू और डरपोक व्यवहार की वजह से.

"वो.. ऐसा कभी हुआ नहीं और वो पोलिसवाले थे. थोड़ा सुना था की वो पार्क बदनाम है लेकिन जिसने भी बताया था वो दोपहर और शाम का जीकर कर रही थी. माँ और पापा को वो लोग इन्फॉर्म करते तोह.."

"शठ.. आप सही कह रही हो और हर इंसान इस वर्दी से डरता है, आखिर रौब हे ऐसा बन चूका है न मैं में. लेकिन एडल्ट लोगो को कही बैठने से तोह कानून भी नहीं रोक सकता और जिस वजह से वो पार्क बदनाम हुआ होगा उसमे कपल्स की गलती नहीं है लेकिन 2-3 गलत लोग माहौल ख़राब कर देते है तोह शिकायत होने पर पुलिस अपना काम तोह करेगी पर सिर्फ pooch-tach तक. वैसे जब पता था तोह बता देना चाहिए था न."

"बोलने से पहले हे तोह आपने उलझा दिया था और ऊपर से पहली बार मैं किसी के पीछे बैठी थी, डर तोह लगेगा हे न? और सुना सिर्फ दोपहर और शाम के बारे में था. इतनी सुबह थोड़ी न.. वैसे आप सचमुच उनकी रिपोर्ट करने वाले है? ऐसे तोह उनकी फॅमिली पर भी असर होगा न अर्जुन जी. और वो रानी माँ वाला क्या जबरदस्त फेंका न आपने. हाहाहा.", अर्जुन जैसे इस हंसी के हे इन्तजार में था और मीनाक्षी को अब खुश देख कर जैसे वो भी अपनी गलती समझ रहा था.

"नहीं वैसा कुछ नहीं करने वाला मैं. जैसा आपने कहा क्या सही फेंका तोह मैंने बस थोड़ा जोश में ऐसे हे बोल दिया. मेरे घर के लोग तोह फिर भी ज्यादा कुछ नहीं कहते लेकिन आपके परिवार वाले बड़े हे सरल लोग है और बात गाँव की. तोह बस यही सब ध्यान रख कर वैसा करना पड़ा. अब खुद हे सोचो पंजाब में कोई न कोई तोह संधू होगा हे पुलिस में, इसलिए मैंने वो भी जोड़ दिया. हाहाहा..", जूस से भरे वो 2 लाल गिलास ट्रे में युवक ने आगे बढ़ाये तोह पहले अर्जुन ने गिलास मीनाक्षी को थमाया. वो हैरत से उसको देख कर फिर से हंसने लगी.

"आप तोह सचमुच बहोत पहुंचे हुए हो और ाची बात है की कॉन्फिडेंस बहोत है. वैसे D.S. संधू जी दिग है यहाँ के. अब co-incidence देख लो या फिर आप पक्का उन्हें जानते होंगे. लेकिन उस सिपाही पर जब आपने हाथ उठाया तोह मुझे लगा की अब सब ख़तम. वैसा नहीं करना चाहिए था आपको. ये पोलिसवाले किसी के नहीं होते और इनसे दुश्मनी मतलब पूरे डिपार्टमेंट से. अब वो बदला जरूर लेंगे."

"बात जब सम्मान और किसी भी औरत की िज्जात्त की हो न मीनाक्षी जी, फिर वो सिर्फ बात नहीं रहती. और ये ज्यादा बढ़ जाती है जब आप स्वयं सुरक्षाकर्मी हो. रही बात उनके बदले या डिपार्टमेंट वाली तोह वो अब तक जान चुके होंगे की मैं कौन हु और यकीनन वो स्टेशन के बहार हे खड़े इन्तजार कर रहे होंगे की मुझे अंदर जाने से पहले रोक कर बात ख़तम कर ले. दलबीर सिंह संधू जी दादा जी के ाचे दोस्त है और शादी में मैं मिला भी था उनसे. अब आप निश्चिंत हो कर बस जूस पीये और क्लास के बाद घर जा कर आराम से लाली से बात कीजियेगा.", मीनाक्षी ने गिलास अभी आधा हे खली किया था और अर्जुन तोह मुँह पांच कर पैसे भी दे कर फारिग था.

"मैं ले आउंगी लाली को और वो वैसा हे करेगी जैसा आप कहेंगे. और जब संधू जी वाली बात सच है तोह मतलब रानी माँ वाली भी झूठ नहीं होगी."

"अब जानती है तोह बस बोल दिया उनके सामने. कुमार लगाने से अर्जुन शंकर शर्मा वही रहेगा जो हैं. अर्जुन शंकर शर्मा. और अब ये 'आप' और 'जी' से मुक्ति दीजिये न."

"वो नहीं मिल सकती जी. वैसे यहाँ से आगे मैं चली जाउंगी. और जहा आप जाने का विचार बना रहे है, वो जगह पब्लिक पार्क से कही ज्यादा खतरनाक है. लोग इसलिए उसके बारे में बात तक नहीं करते."

"इसलिए तोह मैंने लोगो से बात नहीं की मीनाक्षी जी. और इतनी दूर साथ आ गए है तोह आपको मंज़िल तक भी छोड़ देता हु. वही से तोह आगे जाना है, क्सक्सक्सक्स वाले रस्ते पर.", अर्जुन का प्रतिकार तोह जैसे ये लड़की कर हे नहीं सकती थी. वो पहले झिझक रही थी किसी वजह से पर मोटरसाइकिल चालू होते हे वो गॉड में बैग रख कर जब इस बार पीछे बैठी तोह एक हाथ अर्जुन के कंधे पर टिका था. आईने में उसका वो शर्मीला चेहरा देख कर अर्जुन सर हलके से झटकता हुआ उधर चल दिया जहा कल वो आँचल के साथ आया था. आज भी कुछ और लड़कियों के साथ साथ कल वाली तीनो वही कड़ी थी और अर्जुन की मोटरसाइकिल से मीनाक्षी को उतारते देख कर Jeenat-Sakshi तोह बस एक दूसरे को हे देखती रह गयी और अर्जुन बिना समय लगाए मीनाक्षी को हाथ हिलता हुआ सीधा अपनी इस अनजान सी मंज़िल की तरफ निकल चला.

"वाह.. ये तोह 24 घंटे में हे तस्वीर बदल गयी साक्षी. मिनी मैडम तोह कल तक दोस्त भी नहीं थी और आज पहली बार किसी लड़के के पीछे बैठ कर आयी है, वो भी जिसके साथ कुछ भी ऐसा वैसा नहीं था.", जीनत ऊँगली में अपनी कार की चाबी घूमती हुई मीनाक्षी के सामने हे आ कड़ी हुई जो ना में गर्दन हिलती हुई तीनो से हाथ मिलती हुई सफाई देने में जुट गयी.

"अर्जुन ने शहर हे आना था जरुरी काम से और पिछले चौक पर हे वो मिल गए और इधर ड्राप कर दिया. ऐसा कुछ भी नहीं, जैसा तुम सोच रही हो जीनु. वैसे आज तोह तुम लोग कासुअल में हो?", जीनत तोह साक्षी को आँख मार रही थी लेकिन मीनाक्षी ने बात बदल दी और ठीक उनके पीछे हे वो पुलिस जिप्सी आ रुकी जिसमे से सी गुरपाल बिना माहौल देखे मीनाक्षी के हे पास आ खड़ा हुआ, दोनों हाथ जोड़ते हुए.

"बिबा जी, पार्क विच जो वि होया ओस तेह मिटटी पाओ जी. कुमार साहब किथे ने? ोहना न सादो (बुलाओ), गुरपाल आप तोह वि माफ़ी मांग रहा है तेह ोहना दे सामने वि धों (गर्दन) निवि हे रहेगी. नका तह छदो जी ऐसी laila-majnu पार्क वाल वेखना वि नै. संधू साहब ने तह ससपेंड हे करना बिबा जी, महल ाले तह पता वि नई कारन गए. बुला दी बिबा जी आप दे सरताज न.", अब तोह खासा मजमा हे लग गया था इस hairat-angez दृश्य को देखते हुए. वर्दी में एक सी इस लड़की से गुहार लगा रहा था लेकिन मीनाक्षी सेहमी होने के बावजूद समझदार लड़की थी. गुरपाल सिंह के जुड़े हुए हाथ देख उसने खुद हे हाथ जोड़ दिए.

"अंकल जी, मैंने पहले हे उन्हें बोल दिया था की वो ऐसा कुछ नहीं करे. आप लोगो की भी फैमिलीज़ है और जो हो गया वो होगा न अंकल जी? वो भी अपने काम से चले गए है, कंप्लेंट नहीं करेंगे वो. ये मेरा सेण्टर है अंकल जी और लोग देख रहे है.", अब गुरपाल ने पहले लड़की को देखा और फिर हालात को. कुछ संभालता हुआ सहज होने का दिखावा करता हुआ वो झूठी मुस्कान देते हुए बोले.

"माफ़ करना बिबा जी, ओह बास्ते दे ऊपर ना सी इस जगह डा लेकिन मैं भूल गया स के होर वि बचे पढ़ें ौंदे होने तुहाडे नाल. यह गल्ल पक्की है न जी के ओह रिपोर्ट नहीं कारन वाले? परिवार ाली हे गाल है बिबा जी. Bhul-chook होई ओहदे लिए.. बाकी तुस्सी जवान लोग चेंज घर तोह हो, हूँ परेशानी नहीं होनी.", मीनाक्षी ने भी हाथ जोड़ कर ये मुलाकात ख़तम करनी चाही और जाते जाते गुरपाल एक बार और भी वही बात दोहरा गया. उसके जाते हे अब मीनाक्षी एक बार फिर से घिर चुकी थी लेकिन अब जवाब देने की हिम्मत तोह उसमे जरा भी नहीं थी.

"ये लोग पार्क भी चले गए और सत्राज? बल्ले ओह तेरे मिनी बिल्लो. गगन देख ले तेरी गवंडी न, शहर दी कुड़ियां तह आंखों बिछाई रह गयी ऐ पार्क वि घूम आयी."

"जीनु, ओह ॉडी लाइफ है यार. जरूर कोई होर गाल होनी, वेख्या न ओह डिस्टर्ब सी और पोलसा आप हे तह हाथ जोड़ रहा स. मतलब ोहना ने कुछ गलत कित्ता होना. अप्पा न तह यार अपनी फ्रेंड डा ख़याल रखना चाहिदा."

"सही बात है गगन, चल देखते है और लगता है बात बड़ी हे होगी कुछ. नहीं तोह मिनी कबि किसी लड़के के पीछे नहीं बैठती और ऐसे पोलिसवाले माफ़ी मांग रहा था मतलब उसने कुछ गलत किया और अर्जुन ने पोलिसवाले के खिलाफ कोई एक्शन लेने की बात की होगी. जान गए होंगी की लड़के की ाची पहुंच है. गाँव का मामला है और अर्जुन मुखिया भी तोह बना है जैसा मिनी ने बताया. जीनु, सिचुएशन समझा कर तू भी.", साक्षी जाने अब इसमें क्या फायदा देख रही थी लेकिन मीनाक्षी के लिए उसके दिल में कुछ गलत नहीं था और न जीनत के.

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ये जगह तोह सचमुच ऐसी थी की जैसे कोई और हे दुनिया हो. अर्जुन को यहाँ तक पहुंचने में हे एक घंटे से ऊपर लग गया था और जब वो इस निर्जन जगह पंहुचा तोह ठीक वही नदी इधर से भी गुजरती थी जो काली हवेली के पीछे थी. बहार की लाल ईंट से बानी दिवार तोह ज्यादा पुराणी नहीं थी लेकिन जैसे हे उसने भीतर कदम रखा 2 पुराने खंडहर सी इमारत जिनका बहार वाला हिस्सा बस आँगन जैसा था और जगह जगह पीपल और नीम आदि के विरक्ष. कही कही कच्चे कुंड से उठता धूनी का धुआं और वृक्षों पर बंधी गोल मटकियां. यहाँ नदी वाली तरफ तोह दिवार हे नहीं थी. अभी वो ये सब देख हे रहा था की 2 देसी श्वान बुरी तरह से भोंकते उसकी तरफ लपके और उनकी उग्रता देख अर्जुन के कदम स्वयं हे प्रवेश करने वाले खुले द्वार से पीछे हो गए. काले रंग के वो डॉन हे कुत्ते जैसे जंगली हे थे लेकिन गले में उनके जो धागा बंधा था मतलब उनका भी कोई मालिक जरूर था.

"तुम कही के भी मालिक हो सकते हो पर इस स्थान पर प्रवेश करने से पहले परिचय देना अनिवार्य है. शांत.", हाथ में साफ़ पानी से भरा कमंडल लिए ये मजबूत जिस्म और घनी daadhi-jataaon वाले साधु के प्रकट होते हे दोनों श्वान एक तरफ हट गए और अर्जुन ने भी सर झुका कर हाथ जोड़ दिए.

"मैं कोई जागीरदार या रजवाड़े का मालिक नहीं बाबा. भटका हुआ मुसाफिर हो जिसकी अदृश्य मंज़िल इन साधारण नजरो से वो देख नहीं प् रही.", अर्जुन के समकक्ष हे कद्द था उनका लेकिन जिस्म कुछ ज्यादा चौड़ा और एकसार भरा हुआ. ऐसे इंसान की उम्र का हे क्या अंदाजा लगाना जो खुद इसका चाहवान न हो. अर्जुन के चेहरे को देखने के बाद इन्होने भीतर आने का रास्ता दे दिया.

"जब कोई चाहत या मकसद हो, तोह हर ओहदा त्यागना हे पड़ता है. भटके हुए तोह नहीं हो मुसाफिर. इस मंज़िल पर अक्सर हवा के सिवा कोई नहीं आता. बगल वाले घात पर जरूर लोगो जीवन पूरा करके नयी मंज़िल की आस में जिस्म स्वः करवाते है, अपनों से या अनजान से. लो जल ग्रहण करो और अपने जूते यही उतार दो.", अर्जुन ने वैसा हे किया और बिना सुरक्षा वाली जगह ऐसे हे उन महंगे जूते की जोड़ी उतरने के बाद हाथ धोते हुए चुलु से वो निर्मल जल ग्रहण किया. दोनों कुत्ते अब जैसे अर्जुन से कोई वास्ता नहीं रखते थे जो दौड़ लगते हुए आगे घने जंगल की तरफ खेलते हुए विलीन हो गए. ये साधू बाबा अर्जुन के साथ हे उस तरफ बढ़ रहे थे जहा वो बड़ा सा खँडहर जैसा खुला हॉल था. इधर भी गीली मिटटी और वृक्ष के निचे कुछ कुत्ते आराम से सो रहे थे जिन्हे किसी की परवाह नहीं थी.

"प्रयोजन नहीं बताया तुमने मुसाफिर?", आँगन में बिना हे दरवाजे का बस एक हे बड़ा कमरा था जिधर पद्मासन की मुद्रा में जो इंसान बैठा था उसकी दाढ़ी तक में जटाओं जैसी गांठे थी और लम्बाई फर्श तक. केश इतने लम्बे की जमीन पर फैले हुए भी उतने हे लम्बे जितने सर से जमीन तक. जिस्म पर वस्त्र के नाम पर भभूति हे लिपटी थी और जननांग के ऊपर सफ़ेद कोपीन.

"तांत्रिक वज्रनन्द जी से मिलना था बाबा."

"हाहाहा... सचमुच तुम गलत स्थान पर आये हो बालक. यहाँ तंत्र नहीं होते, प्रभु भूतनाथ की साधना होती है. यहाँ मनुष्य जीवन के काले करम अपना रत्ती भर अस्तित्व नहीं रखते और तुम यहाँ तांत्रिक की खोज में आये हो? या तोह तुम नादान हो बालक या बेवकूफ. द्वार उधर है.", हाथ का इशारा उधर हे था जिधर से अर्जुन यहाँ तक आया था.

"माफ़ करना सम्बोधन गलत हो गया बाबा. जिस परछाई के पीछे भाग रहा हु वो दीखता अघोरी है लेकिन बताया तांत्रिक जाता है. बहोत परेशानी में हु बाबा, आप मुझे बाबा व्रजरनंद जी से मिलवा दीजिये. अगर आप हे हैं तोह एक बार फिर क्षमा चाहता हु, मेरा इरादा आपके स्वाभिमान को ठेस पहुंचने का नहीं था.", अर्जुन अभी हाथ जोड़ कर घुटने मोड़ता झुकने हे लगा था की बाबा ने उसको वैसा करने से रोक लिया. खंडहर के पिछली तरफ से 2 और साधू सिर्फ कमर पर भगवा लपेटे हुए गीले बदन इधर चले आये. इतने हे विशाल और गहरे रंग के. आँखें नहाने की वजह से लाल थी या कैसे पता नहीं, और आँगन में उस गरम धूनी को प्रणाम करते हुए उन्होंने अपनी जटाओं में वो मलने के बाद मस्तक और बाहों पर भी लगाईं.

"ये बालक कौन है जीवा? गुरु जी अभी साधना में है और तुम इसको उनकी देहलीज पर ले आये?", ये साधू जैसे पहले वाले से अनुभव और शिक्षा में ऊपर था, ऐसे हे तोह स्थान बढ़ता है इनके jiwan-sangat में.

"गुरु जी ने हे कहा था के मेहमान आया है उसको आँगन में ले आया जाए. प्रश्न का जवाब मिले और kohil-mohil से ये न डरे तोह वो मिलना चाहेंगे इस से.", अब अर्जुन हैरान था के ये व्यक्ति जो भीतर बैठा था साधना में उसने अर्जुन को दरवाजे पर आने से हे पहले भांप लिया था. और आँखें अभी भी बंद थी, दोनों हाथ घुटनो पर ध्यान मुद्रा में फैलाये.

"हम्म्म.. विशेष हो तुम बचा. कपिलेश्वर आगंतुकों का अभ्यस्त नहीं है और हैं तोह सभी इसके जैसे लेकिन इसको पंछियों की आवाजे और जंगल का संगीत सुन्न न पसंद है. तुम्हारी वजह से ये नदी से शीघ्र बहार आ गया. आओ भीतर, प्रभु चरणों में बैठ कर चर्चा करते है.", तीसरे साधू महाराज, धूनी के भीतर से वो जलता बड़ा अंगारा चिमटे से खोज कर उठाते हुए एक छोटे चौकोर पत्थर पर रखने के बाद उस पर कुछ सूखे लकड़ी के बुरादे को डालने के साथ अर्जुन से भी बात कर रहे थे. पलभर में हे एक अलग सी महक भर उठी थी इस माहौल में. दिमाग और दिल को सुकून देने वाली अलग सी मीठी महक.

"माफ़ करना बाबा आपको मेरे आने से व्यवधान हुआ. और आपने प्रभु चरणों में निमंत्रित किया उसके लिए धन्यवाद लेकिन मैं वह जाने में असमर्थ हु.", अर्जुन द्वारा मन किये जाने से अब ये तीसरे वाले की भी भृकुटि खिंच गयी थी. एक अघोरी को जैसे ये सबसे नागवार लगता था जब उनकी हे जगह कोई आने के बाद उनका आमंत्रण अस्वीकार कर दे. अर्जुन के लिए हे तोह उन्होंने वह की धूनी के महक को ख़तम करके ये सुगंध भरी थी.

"ये ऐसा हे है तारकनाथ, हमको हे बहार बुला लिया इसने और मेहमान की बात कभी कभी मान लेनी चाहिए. तोह कहिये जजमान, ये बूढा तांत्रिक वज्रनन्द आपके लिए क्या कर सकता है?", अर्जुन तोह इन गुरु जी को देख कर हैरत से आँखें ऊपर उठाये कुछ पल जड़ हे हो गया. ये तोह इतने लम्बे थे की अर्जुन को नजरे उठा कर देखना पड़ रहा था. शरीर उतना भारी नहीं था लेकिन मजबूत और वो जतायें 7 फ़ीट ऊंचाई से भी कच्चे फारस पर आधा फ़ीट बिछी हुई थी. और उनकी सुन्न ने की क्षमता इतनी अधिक होगी वो भी इतनी ज्यादा उम्र में, ये तोह अर्जुन की सोच से भी परे था.

"आसान लगाए गुरु जी?", जीवा ने हाथ जोड़ कर इनसे जान न चाहा तोह बाबा ने हाथ उठा कर मुस्कुराते हुए मन कर दिया.

"आप यहाँ बैठ कर भी उतनी दूर की आवाज सुन्न प् रहे थे बाबा? और आपको कैसे पता की मैं आपकी देहलीज पर आया हु और इसकी कोई ठोस वजह होगी? जैसे मेरे अंदर कमरे में आने से मन करने का भी आपको पता चल गया?", अर्जुन की बात सुनते हुए वो 2 कदम दुरी पर हे उस पीपल के वृक्ष की छाया में बने चबूतरे पर हे बैठ गए. बाकी तीनो तोह ये देख कर वही कच्चे पर हे आसान लगा बैठे. अर्जुन को इशारे से अपनी बगल में बुला कर बैठते हुए उन्होंने जो जवाब दिया था वो उसके सभी सवालों से अलग था.

"बरसो पहले तुम जैसा हे कोई मुसाफिर आया था, जो खुद को वजीर बता रहा था. एक हाथ से ज्यादा लम्बी तलवार लिए परन्तु सवाल चेहरे पर वही थे जिनके समाधान की तलाश में तुम यहाँ आ पहुंचे. संयोग तोह नहीं हो सकता इसलिए विधाता की मर्जी मान लेते है. तुम नरम हो, इसलिए सम्मान के हक़दार भी. वो हाथी था और सख्त भी, जैसे दुर्घटना से चरित्र हे बदल गया हो. इसलिए तोह तुम्हे आना पड़ा बीटा, सख्त अक्सर असफल रहते है. वो अदृश्य वायु, आकारहीन जल, सजीव अग्नि और भूमि की विवधता का ज्ञान खो चूका था और ek-matra तत्त्व के साथ पर्याय हल नहीं होते बस समय निकल सकता है. बेहतर इंसान हालात से घिरने के बाद सिमित हो जाता है लेकिन तुम किसके शिष्य हो जो संयमती भी हो और हावी भी? हमे किसी ने ऐसे बहार आने पर विवश नहीं किया.", ऐसे इंसान को इंसान तोह कहा भी नहीं जा सकता था जिसको देखने मात्रा से साधारण इंसान काँप उठे लेकिन मुस्कराहट इतनी विनम्र जैसे टेसू का फूल खिली रौशनी में.

"माँ.. वो निराकार है, उचित शिक्षा और ठहराव लिया अंतर्मन वायु से कही अधिक अदृश्य जिसका एहसास वायु की तरह तुरंत नहीं हो जाता, अग्नि से अधिक सजीव है वचन जो बहरी प्रकृति पर निर्भर नहीं रहते और उनमे बंधा व्यक्ति इसको वंश दर वंश जीवट रख सकता है. भूमि से विविध है चरित्र, जो हर परिदृश्य से भिन्न दीखता है परन्तु होता भूमि की तरह स्थिर हे है. जो आपके सम्मुख आये थे वो व्यथित थे और मानसिक द्वन्द मजबूत इंसान को भी समझदारी से पृथक कर सकता है.", अर्जुन ने गुरु का भी वर्णन वैसे हे दिया जैसे इन बाबा के सवाल थे. पास हे तंगी मटकी को उठा कर उन्होंने उसमे भरा जल तबतक पीया जबतक वो समाप्त न हो गया.

"उत्तम.. तोह भूतनाथ की भूमि पर आ सकते हो लेकिन उनके सम्मुख नहीं? कहो किस तांत्रिक से व्यथित हो कर यहाँ पचुचे हो?", ये साफ़ स्पष्ट सवाल था और यही बहोत था इनकी dur-drishti समझने के लिए.

"सिद्धेश्वर और कल्पतरु. कौन थे ये लोग? अघोरी- तांत्रिक या शैतान?", इन 2 नामो को सुन्न कर तोह सामने बैठे तीन साधुओं में से 2 एक दूसरे को हैरत से देखने लगे. अर्जुन के मुख से इन नामो की उन्हें कोई आशा न थी.

"थे? वो आज भी है लेकिन अघोरी कह कर ये घोर दर्द हमे मैट दो बीटा. तपोवन में हरितु, प्रकृति, परिस्थिति से परे और इंसान की लालसाओं को त्याग कर उस भोले भूतनाथ की शरण में रहने वाले अघोर दुष्ट नहीं होते. क्रोधित और उग्र हो सकते है, यदाकदा अस्त्र उठाने की भी चूक भी हो जाती लेकिन अमावस्या की रात्रि में भी जैप भोलेनाथ के सिवा किसी का नहीं करते. सिद्धेश्वर न इंसान है न अघोर, एक अंध साधक और उपासक है उस काली शक्ति का जिसका अस्तित्व हमारे जेहन में तोह नहीं है. कही ये इशारा तोह नहीं किसी टकराव का?"

"ठीक कहते है आप बाबा, वो लोग पिशाच और हैवान तक को शर्मिंदा कर चुके है और करते भी होंगे. 1947 के आसपास 57 अक्षत बालिकाओं की अस्मत लेने के बाद सबको मार दिया उसने और उसके 4 शिष्यों ने जिसमे से एक कल्पतरु भी था. 55 के तोह शव दूर, जिस्म का हिस्सा तक नहीं मिला. इसमें कुछ बड़े लोग भी शामिल थे और मुझे यकीन है की ऐसा कुछ अभी भी चल रहा है लेकिन पता नहीं ज्यादा इस बारे में. हाँ उस हवेली में हादसे की जगह देखने के बाद मैं उन आवाजों को ऐसे सुन्न सकता है जैसे मैं बस वही बैठा हु. सिद्धेश्वर को उचित दंड देने के साथ साथ मैं उन सभी को मुक्त करना चाहता हु लेकिन कोई सम्भावना हे नहीं दिख रही. ये कैसा अनुष्ठान रहा होगा बाबा जिसमे मासूम बच्चियों की .. ", अर्जुन आगे बोल तक न सका और उसकी हालत देखते हुए इन बाबा ने उसके सर पर हाथ रखते हुए अपने शिष्य से सवाल किया.

"तारकनाथ, कैसा अनुष्ठान है ये जिसमे इतना वीभत्स कृत्या अंजाम दिया जाता है?"

"Sehasra-Vipaash गर्भ अनुष्ठान गुरुदेव. 99 अक्षत कौमार्य जो तरुणी से अधिक न हो, उन्हें अनुष्ठान स्थल के गर्भ गृह में दूषित करने के पश्चात भूमि और जल की संधि में विलीन कर दिया जाता है, जैसे पानी में नमक. इस आयोजक स्वयं तांत्रिक नहीं हो सकता गुरुदेव परन्तु बालक ने संख्या उचित बताई है. एक प्रमुख और कालजयी तंत्र विद्या का ज्ञाता हे इसको अंजाम दे सकता है जिसमे 4 अन्य तांत्रिक क्रिया करते है, अर्थार्त दुष्कर्म. बालक ने संख्या गलत बताई है, 57 सही योग नहीं है. 49 और 50 पर आयोजक को अपने रक्त से उत्पन्न तरुणी अर्थार्त अपनी बेटी या पोतियों को अक्षत कौमार्य और बलि में भेंट करना पड़ता है. 99 से पहले ये क्रम जोड़े में रहता है और 99 के साथ इस से भी विक्षिप्त आहुति दी जाती है, गर्भवती स्त्री की. इस तरह से गणना 101 हो जाती है. ऐसा दुष्ट कृत्या हमारे संज्ञान में तोह कोई भी व्यक्ति करने में समर्थ नहीं हो सकता परन्तु सिद्धेश्वर इस अनुष्ठान की पूर्ति के लिए 60 से ज्यादा बरस से भटक रहा है जितनी चर्चा हमने सुनी है. कहा जाता है की एक समय वो इसको पूर्ण करने के करीब हे था परन्तु विघ्न पड़ने के साथ उसके 3 सहायक भी नरकलोक पधार गए. इतनी संख्या में 10-15 बरस की कन्याये तोह सिर्फ कोई raaj-pariwar हे जूता सकता है परन्तु ऐसा कुकर्म तोह वो भी करने से पहले हजार बार विचार करेंगे और फिर भी स्वीकार नहीं करेंगे. हमे इस बालक की बात पर यकीन है की ऐसा हुआ होगा और ये वही घटना भी है जिसकी चर्चा कुम्भ में नागा Gunn-naath ने की थी. वो भी सिद्धेश्वर से भीड़ चुके है पूर्व में और उसका घाव आज तक उनके जिस्म पर एक हाथ की gair-maujdgi के रूप में है. वो शैतान, पिश्चाच या तंत्रकी के परिभाषा से भी बढ़ कर है. ये बालक सामना नहीं कर सकता उस हैवान का गुरुदेव.", अर्जुन के साथ जीवनाथ और कपिलेश्वर तक हैरान थे. अर्जुन तोह अपनी हे 2 बच्चियों को सम्मिलित करने वाली बात सुन्न कर सदमे जैसी स्थिति में पहुंच चूका था.

"और इसका प्रयोजन तारकनाथ? विश्व में इस से घिनोना कृत्या असंभव है परन्तु ऐसा है तोह करने के पीछे मंशा क्या रहती है इस अनुष्ठान की? ये प्रश्न हमारे मुसाफिर का है, हमारा नहीं.", अब अर्जुन जैसे होश में लौटा जब पीठ पर थपकी पड़ी.

"जी. ऐसा करने की क्या वजह हो सकती है बाबा?"

"ये प्रमाणित नहीं है परन्तु जो वजह बताई जाती है उस हिसाब से आयोजक अपने वंश और उस से बहार सहस्रा garbh-daan करने में समर्थ हो जाता है, सभी मौजूद पुरुष एवं उनकी नर सन्तानो को kaal-garbh भेज कर. चाहे वो पुत्र हो या पौत्र. स्पष्ट शब्दों में कहु तोह कामदेव का एक गहरा स्वरुप जिसकी छाया में आणि वाली हर तरुणी, तनूजा, प्रागाढ़ महिला और यहाँ तक की बाँझ भी इस व्यक्ति के सामीप्य में स्वयं को आमंत्रित कर लेती है. इंसानियत तोह अनुष्ठान में हे bhoo-tal से निचे रह जाती है परन्तु अनुष्ठान पूर्ण होने के बाद विकृत मानसिकता का ऐसा आयोजक हर नारी को चाहे वो स्वयं के रक्त से उत्पन्न संतान हो या अन्य, सभी में अपने अंश को रोपित कर देता है. इस से कही बढ़कर प्रयोजन रहता है इस घृणित अनुष्ठान की सिद्धि करने वाले तांत्रिक का, 99 अक्षत भोग और अंतिम संसर्ग एक गर्भवती के साथ करने के बाद उसकी बलि दे कर वो कालजयी होने की प्राप्ति का मार्ग मानता है. अपराजय और अमरत्व के सामान. हमने पहले हे बताया है की इसका प्रमाण नहीं है और ऐसे अमरत्व से तोह मृत्यु बेहतर. सिद्धेश्वर 80 वर्ष का एक मानसिक रूप से विक्षिप्त हैवान हे है जिसका कुकर्मियों के बीच prabhu-tulya सम्मान है. क्षमा भोलेनाथ. एक प्रचलित वृत्तांत है इस तांत्रिक के बारे में. पाँव की ठोकर मार्त्र से इस बालक से अधिक समर्थ योगी का मेरु जिस्म से बहार निकाल दिया था. अनुष्ठान सत्य से परे है परन्तु उसकी मानसिक और जिस्मानी ताक़त की कोई इकाई नहीं है. अपनी काली दुनिया से वो जब जब समाज में लौटा है, सुरक्षा घेरे और पहले से अधिक वेह्शी बन्न कर आया है. 4 बरस पहले हम आश्रम से बहार निकले थे उस समय ज्ञात हुआ था की वो सुजानगढ़ में एकांत अखाडा लगाए है पिछले 6-7 बरस से. कल्पतरु उसका वर्णक है जो दुनिया की हर खबर अपने इस haivaan-guru तक पहुँचता है. फिलहाल वो भी मरुस्थल में कही दबा होगा, रात्रिचर दिन में नहीं निकलते और जब निकलते है तोह नियमो से खेल कर भूमि पर लहू बिखेर कर हे वापिस laut-te है. अगर ऐसा अनुष्ठान होने भी जा रहा है तोह फिलहाल 48 किशोरिया एकत्रित करनी होंगी उन्हें, वर्तमान में ये नउम्किन हे है.", तारकनाथ को जीवनदर्शन का खासा अनुभव था और ये बात उनके साथ पहली भेंट में हे अर्जुन समझ चूका था जब उन्होंने क्रोधित होने की जगह उसका स्वागत हे किया था. और अर्जुन इस खुलासे से अब भूपेंद्र सिंह और जुगलाल जी को सिद्धेश्वर से भी बड़े पिशाच के रूप में देख रहा था. मतलब जो षड़यंत्र में ladd-bhidd कर अपनी जान गँवा गए थे या दूर हुए, वो खुद मोहरे थे इन 2 कुकर्मियों के.

"प्रभु भोलेनाथ इन दुराचारियों को अपने सामीप्य में बुलाये और बेहतर सजा दे. Taaraknath-Kapileshwar, जिस्म से धूनी त्याग कर आओ. शास्त्रार्थ ज्ञान बहुत हुआ, अब शारीरिक बल का ज्ञान दर्शाने का समय है. प्रज्वलित सूर्य एवं ममतामयी भूमि के सेहन में हमारे इस नरम मुसाफिर को भी ज्ञान के बाद इस अभ्यास की अत्यधिक आवश्यकता है. जीवा, अंगवस्त्र दो हमारे मेहमान को. शरीर निर्मल करने के पश्चात ये इसको धारण करके अपने सामर्थ्य को साबित करे की हम इसका मार्गदर्शन करके भूल तोह नहीं कर रहे.", तारकनाथ के चेहरे पर असमंजस के भाव थे वही कपिलेश्वर जैसे उग्र स्वाभाव की वजह से इसमें दिलचस्पी ले रहे थे. अर्जुन ज्ञान की खोज में आ तोह गया था पर इतने विशाल और अनुभवी 2-2 अघोरियों के साथ मुकाबले से संदेह में था. जीवा बाबा स्वयं हे अर्जुन को साथ लिए नदी की और चल दिए. गुरुदेव अपने स्थान पर हे बैठे हुए अब दूसरी हांडी से भोजन निकाल कर इन आधा दर्जन श्वानो की भूख शांत करते हुए प्रभु नाम का जाप करने में व्यस्त.

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"दोपहर के 2 बजने वाले है बहु और ये अर्जुन अभी तक नहीं लौटा. कुछ बता कर गया था क्या कहा जा रहा है? दामिनी के बुखार आया हुआ है, अब उलटे सीधे समय नहाती रहेगी तोह ये तोह होना हे था.", देवकी जी अभी मीणा से रसोई का काम करवाने के बाद अनामिका के कमरे में दाखिल हुई थी. अनामिका खाना बनाने के बाद स्नानघर से नाहा कर वस्त्र पहन कर अपने बेटे को दूध हे पिलाने लगी थी और सास की सवाल जवाब पर थोड़ा सोच में पड़ गयी.

"शहर में कॉलेज का कुछ काम बताया था अर्जुन ने और ये बात तोह पिताजी को बताई थी माँ जी इसलिए मुझे इतना हे पता है. बड़ी दीदी की मैं मालिश कर देती हु, बाबू को दूध पिलाने के बाद. आराम मिलेगा बुखार दर्द में.", अनामिका ने ये बात अपने से हे कही थी जबकि अर्जुन ने तोह बस यही कहा था की वो जल्दी लौट आएगा शहर से. और कॉलेज का जीकर उसने कल शाम को किया था जब दोनों ने ratri-bhojan साथ किया था. दामिनी जैसे तैसे सवेरे अर्जुन द्वारा दी दवा खाने के बाद अपने कमरे में आयी थी लेकिन उसके बाद उसने अपनी माँ से भी बात नहीं की थी. आँचल को भी अर्जुन समझा कर गया था के वो अपनी माँ के समीप हे रहे जितना हो सके. देवकी को सही लाचार किया था ऐसा करके.

"मालिश तोह मैं हे कर देती हु, तुम जरा आँचल बिटिया के साथ अर्जुन का कमरा व्यवस्थित कर दो. बड़ी जीजी ने कहा भी था के ये लड़का बड़ा बेध्याना है कमरे में हर चीज व्यवस्थित रखने के मामले में. मीणा से मैंने इसलिए नहीं कहा के वह उसका कोई मूल्यवान सामान भी हो सकता है और वो दूरदर्शन वाली मशीन भी लगी है जिसकी तार हिलने से ईंटें (इंटरनेट) नहीं आता.", देवकी की इस चाल के आगे अनामिका अब बेबस हो गयी थी और जुबान से तोह उसने आजतक कभी किसी काम को ना नहीं कहा था.

"मैं हे कर देती हु माँ जी, आँचल को दीदी के पास हे रहने दीजिये. गर्मी में वो बेवजह परेशां होगी."

"घर के काम ससुराल में भी करने पड़ेंगे उसको, चाहे गर्मी हो या मेघ बरसे. देख रही हु तू इस लड़के के आने के बाद कुछ ज्यादा हे जवाब देने लगी है. जैसा कहा जाए वैसा होना चाहिए. गाँव का मुखिया बनाया होगा इन बुधो ने उसको, यहाँ की मुखिया मैं हु. सवेरे जाता हुआ बोल गया की तुझे सोने दू, परेशां न करू. कल का पैदा हुआ लड़का हुकुम चलने लगा है वो भी तेरे लिए और मेरे खसम के सामने. आयी बात समझ में?", अनामिका का तोह चेहरा हे उतर गया था ये सुन्न कर लेकिन अब एक और आवाज सुनाई दी जिसकी वजह से देवकी को जैसे सांप हे सूंघ गया.

"मेरी बीवी से जुबान संभल के बात किया करो माँ. औरत है वो कोई bhed-bakri नहीं की बाजार से खरीद के ले आये और अब जबतक दुधारू है खून चूसते रहो और नाकारा हो गयी तोह कटवा दी कसाई से. बाबू रातभर सोने नहीं देगा तोह 2 घडी आराम भी नहीं कर सकती ये? अनामिका, मेरे कपडे निकाल दो जरा वो मीटिंग वाले. माँ, अब इस बचे को तोह संभल सकती हो थोड़ी देर या ये दूध पिलाती हुई मेरे काम करे?", विनोद के तेवर देख कर तोह देवकी दांग हे रह गयी. वो जिस तरह आँगन से कमरे तक खरी खोटी सुनाता कमरे में दाखिल हुआ था देवकी से तोह जवाब देते न बना लेकिन लाडला था वो और ऐसा अकेले में बोल लेता था अपनी माँ से पर आज वो बीवी के सामने सुना रहा था उसको.

"ला दे इसको मुझे और कर दे इस राजा को तैयार. थोड़ा आराम से बोल लिया कर मुझसे, माँ हु मैं तेरी.", बचा लेने वो आगे बढ़ी तोह ये भी देवकी से आँचल ने हे ले लिया.

"रहने दो नानी, इसको प्यारे बेबी को मैं खिला लेती हु. अभी सोने वाला नहीं ये.. चलो अर्जुन भैया के कमरे में गाने सुनते हुए खेलते है निक्कू बाबू.", देवकी और विनोद को ये ाचा लगा जिस तरह से आँचल ने निकेतन को इतने प्रेम से गॉड में लेते हुए उसके गाल ऊँगली से सहलाये और वो मां को नमस्ते करती हुई चली गयी. अनामिका तोह वैसे भी पर्दा करके हे सतान्नपान करवा रही थी. वस्त्र ठीक करके वो विनोद को उसके बताये कपडे निकाल कर देने लगी थी.

"ठीक है तुम करो अपना काम, मैं दामिनी के पास बैठी हु. कही जरुरी जाना हो तोह बहु और बेटे को भी साथ ले जाना."

"दामिनी के पास जीजा है, बुखार का बताया था मैंने इसलिए चले आये मेरे साथ. उधर घर पे पक्की कामवाली लगवा दी है दामिनी के लिए और वो लेके हे जा रहे है उसको, मेरे साथ.", ये तोह विनोद ने आखिरी कील थोक दी थी देवकी की उम्मीद के ताबूत पर और उसके दामिनी संग समय बिताने की आस पे.

"यही तोह ज़िन्दगी है मेरी, सबको बस अपने अपने सुख की चिंता है. कहा से बनाऊ फिर जीजी के वह जैसा संसार? करीब रहो कभी और sukh-dukh पचो तोह ये बुढ़िया कुछ चैन में रहे."

"ओह माँ, ताई की बराबरी करने की जगह बस 2 बोल प्यार के सबसे बोल लो तोह एक की जगह 10 हाथ न खड़े रहे तुम्हारे पास? तुम्हारे साथ तोह हमेशा से पापा रहे लेकिन जब उनको हे नहीं समझा तुमने तोह हमसे क्या शिकायत? ताई के साथ तोह ताऊजी भी न थे जबकि इधर तोह मेरे होने तक dada-daadi तक साथ थे लेकिन इतने लोग भी हवेली में 2 सुकून से भरे प्यारे कमरे न बना सके. और एक कमरे से सफर शुरू करने वाली अकेली ताई ने आज bhara-poora परिवार और इस गाँव से 50 गुना बड़ा शहर अपने sukh-dukh का साथी बना लिया. उनको सिर्फ देना आता है चाहे प्यार हो या शिक्षा, लिया है तोह सबका दुःख और रौशनी सबूत है इसका. अब कहा गया आपका नेत्रं भाई और वो जो मारा गया उसकी तोह आपने इस घर में खबर तक न दी. भाई ने तोह बहिन को बताया होगा न के पूर्ण नहीं रहा? वो इंसान जो अपने कमरे में अभी अभी आया है उसको पानी न पूछ लेना आप. पापा कुछ नहीं कहते इसका मतलब आप उनका हालचाल भी नहीं लोगी?", विनोद के खामोश होते हे देवकी पाँव पटकती हुई कमरे से निकल कर उधर हे चली गयी जहा कृष्णेश्वर जी आने के बाद अब सांस ले रहे थे. आज देवकी की आँखों में आंसू थे जिनमे गुस्सा और नाउम्मीदी बड़ी वजह थी. स्वयं कृष्णेश्वर जी ने हे मटके से ठंडा पानी अपनी बीवी की तरफ बढ़ाया जिसको एक सांस में पीने के बाद वो मुँह धक् कर वही कुर्सी पर पालथी मार बैठ गयी.

"जुबान लड़ना सरासर गलत है और विनोद हमेशा से ऐसा हे तोह है देवकी. फिर आज तुम्हे इतनी पीड़ा क्यों हो रही?"

"अरे पीड़ा न होगी तोह फिर क्या होगा? आप तोह उमरभर नन्दलाल बने रहे और इनके खून में मैंने हे गर्मी भरी थी लेकिन आज ये मुझपे निकाल रहा है. इसलिए इसको मैंने दुनिया का सामना करना सिखाया था?", देवकी आंसू साफ़ करती हुई बुरी तरह आहात स्वर में बोल रही थी लेकिन कृष्णेश्वर के चेहरे पर वही सरलता.

"दुनिया का सामना तेज आवाज बोलने से नहीं होता जितना हमने देखा बाकी तुमने 2 लोगो से जीवन के उदहारण लिए और उन्ही दोनों के नकरात्मक पहलुओं को मिश्रण ग्रहण कर लिया. हाँ चंद्रो देवी जी और बड़ी भाभी के मामले में घमंड स्वाभिमान में बदल जाता है. और उन्हें साहसी कहा जाता है दुस्साहसी नहीं. तुमने तोह कुछ नहीं खोया देवकी लेकिन उन्होंने बहोत कुछ खोने के बावजूद अपने परिवार को हर परिस्थति से निकल कर मजबूत किया. वो तेज नहीं बोलती हैं कभी, उनके गुण बोलते है. विनोद ने क्या गलत कहा? एक ठूठ से कमरे उन्होंने अपना ग्रहस्थ जीवन शुरू किया था और रानी तक उनके नाम के साथ जी लगा का सम्बोधित करती है. तुम्हे तोह पिता जी ये हवेली और पूरा गाँव दे कर गए थे, इसको भी बड़े भैया सँभालते रहे और आज उम्र होने पर उन्होंने उस घर का सबसे मूल्यवान सदस्य यहाँ भेज दिया. तुम शिकायत तब कर सकती थी जब विनोद लायक होता और भैया उसकी अनदेखी करते है. आज पहली बार लगा है की विनोद कोशिश कर रहा है और सही सांगत में रहा तोह एक दिन वो जरूर तुम्हारा हमारा नाम समाज में लेने लायक बनाएगा. बेटी जा रही है और दामाद के साथ उसका शगुन करना जरुरी है.", उठते हुए उन्होंने अपने कुर्ते की जेब से 500-500 के 2 नोट निकलने के साथ एक एक के सिक्के भी देवकी की तरफ बढ़ा दिए. देवकी मजबूत औरत थी जो बात को यही ख़तम करती उठ कड़ी हुई.

"आँचल न जा रही वापिस?"

"नाती है हमारी और उसके अवकाश है अभी. तभी तोह किताबे कपडे लायी थी यहाँ और अर्जुन पढ़ा रहा है जो वो सेण्टर पर पढ़ती थी. बची पहली बार तोह सही से नाना नानी के घर रहने के लिए आयी. चलो, थाली तैयार करो इतने मैं दामाद जी से मिल लेता हु.", देवकी को तोह दूर दूर तक ये आशंका नहीं थी की इस हवेली को स्वयं अर्जुन ने सुधरने का ठेका उठा लिया. आज जो भी देवकी के साथ हुआ था और होने वाला था सबकी वजह अर्जुन हे था. वो देवकी को उसके हे मोहरो से घेर रहा था और रौशनी के घर भेजने के पीछे भी सुनिश्चित रूप से उसका हे हाथ था. मुख्या परीक्षा से पूर्व वो अपनी कक्षा से 2 कक्षा आगे की तैयारी करके रहने वाला युवक इनके समझ नहीं आने वाला था.
 
अपडेट 202 (2)

परीक्षा पूर्व

"ये mall-yudh का अखाडा नहीं है मुसाफिर. ये snayu-tantra और पांच इन्द्रियों के पश्चात तुम्हारे पास अतिरिक्त क्या है, इसकी परीक्षा है. इस धूनी में स्वयं पंचतत्वों के साथ अनेको तप का फल शामिल है हमारे कर्मठ शिष्यों एवं गुरुओ का. सिद्धेश्वर उर्फ़ श्रीधर अपने प्रथम शिक्षाकाल में एक लालकवान और समर्पित शिष्य था हमारे गुरु जी का. अब इसमें उतरने से पहले गुरुदक्षिणा स्वरुप वो भेंट करो जिसने तुम्हे यहाँ की राह दिखाई.", अघोरी बाबा वज्रनन्द अपने जतायें समेत कर सही से सर पर बांधने के बाद लोहे के त्रिशूल को लिए खंडहर के पीछे बने इस अखाडेनुमा स्थान पर चले आये जहा उनके दोनों प्रमुख शिष्य अखाड़े के भीतर जा चुके थे. अर्जुन सिर्फ कमर पर वही एक वस्त्र लपेटे थे जो लंगोट से कही अधिक छोटा था. अब जिस गुरुदक्षिणा की वज्रनन्द जी ने बात कही थी अर्जुन सर हिलता हुआ अपने वस्त्रो की तरफ बढ़ गया. पतलून की जेब से वही सिक्का बहार निकला जिसने घोर अन्धकार में अर्जुन का मार्ग प्रशस्त किया था.

"आपको यकीन था की ये मेरे पास होगा बाबा?", अर्जुन ने घुटना मदद कर जिस तरह से ये सिक्का उनके सम्मुख किया था वो इस तरह मुस्कुराये जैसे अर्जुन से अभी सही परिचय प्राप्त न हुआ हो. फ़िलहाल उन्होंने बस वो दक्षिणा अपने हाथ में लेते हुए आँखे बंद करके उस सिक्के को टटोला.

"ये उस हाथी राजा के भी पास था मुसाफिर जो सही 51 बरस पहले प्रभु को ललकारने आ पंहुचा था. असीम बल, क्रोध और पीड़ा से फुंफकारता वो इंसान स्वामी भूतनाथ के उस भुजंग सामान था जो वे स्वयं हे शांत कर सकते है अपने गले में हार की तरह धारण करके. पहले वह कपाट थे जिन्हे अपनी ठोकर से ध्वस्त करते हुए वो समाधान की जगह इस जगह को हे मिटाना चाहता था. गुरुदेव के मात्रा हलके प्रहार से वो भूमि पर गिरा तोह चक्षु खुलने हे थे. यहाँ कोई किसी का अनिष्ट नहीं करता और ऐसा सोचना भी समस्त तपस्या व्यर्थ करना है. ये मुद्रा (सिक्का) उसके हाथ से हे गिरी थी जिसको दिखा कर वो ऐसे सवाल कर रहा था ऐसे स्वामी भी उसके गुलाम हो. जवाब कैसे मिल सकता था? परन्तु यही प्रतीक है सिद्धेश्वर और इस स्थल के साथ उसके अतीत में बन्न कर टूटे रिश्ते का.", अर्जुन बड़े गौर से सब सुन्न रहा था और दोनों व्यक्ति इस गोलाकार घेरे के बहार आ रुके तोह अर्जुन ने भीतर जाने से पहले ये एकमात्र सवाल पुछा.

"इसकी हे वजह से वो raaj-darbar में सेवक बन्न पाया था न बाबा?"

"तब ये स्थल इतना खामोश और वीरान नहीं होता है मुसाफिर. अघोर तप पर जाने से पहले व्यक्ति को इस संसार में अपना सामाजिक योगदान देना आवश्यक होता था. मानसिक, शारीरिक और आत्मिक शिक्षा के पहले चरण पूर्ण करने के बाद इनको समाज में अपनी रूचि अनुसार प्रकट करने के लिए भ्रमण करना पड़ता था. शिक्षा का सही औचित्य तोह यही है की इसको ग्रहण करने के बाद विस्तार करना. सिद्देश्वर की रूचि गहरे एवं अनसुल्हझे विषयो पर अधिक रहती थी परन्तु शारीरिक शिक्षा में भी उसके सामान naam-matra हे शिष्य थे गुरुदेव के. स्वयं महाराजा ने उसका चयन rann-niti और bhed-chakra के जानकार होने की वजह से दरबार में आतंरिक सुरक्षा प्रमुख के तौर पर किया था. कुछ वर्ष बाद वो वापिस लौटा जैसा की अनिवार्य था परन्तु 8 बरस बाद वो जब निकला तोह दरबार में pad-aaseen होने के साथ महाराजा का निजी सेवक बन्न बैठा. ये मुद्रा धरोहर है इस स्थल की और अब सिद्देश्वर का यहाँ से कोई रिश्ता नहीं रहा इसके वापिस लौटने पर. जाओ और जैसा हमने कहा था अपनी खासियत पहचानो वो इस धूनी में रामी होगी. समर्थ हुए तोह स्वयं वो तुम्हे ढून्ढ लेगी. आत्मा तुम भी अभेद हो मुसाफिर लेकिन वो दोनों अक्सर हमे हैरान करते रहते है अपनी लगन और तपस्या से.", जीवा बाबा ने अर्जुन के चरणों और हाथो को एक बार फिर से नहलाया जब उसके कदम उस पवित्र राख पर जाने लगे थे.

"गुरुदेव ये अभ्यास परीक्षा नियमानुसार नहीं दिख रही.", घेरे से बहार जीवा वज्रनन्द जी से आशंकित स्वर में पूछने लगे जब भीतर जाने पर अर्जुन ने उस अखाड़े की saleti-kaali राख दोनों हाथो में मसलने के बाद पहले तारकनाथ की तरफ mall-yudh का आह्वान किया. सामान कद्द लेकिन तारकनाथ का जिस्म कुछ ज्यादा हे भारी और चूडा था अपने प्रतिद्वंदी के इस्पात से मांसल छरहरे शरीर के सामने.

"तुम्हे अभी मनन परीक्षा उत्तरीन करनी है जीवा और उसके बाद तुम तारक और कपिल के समकक्ष हो पाओगे. परन्तु ये जीव जो अभी तुम्हारे सामने है ये bhoot-saadhak है, जो तुम तीनो की शिक्षा में अगला पड़ाव होगा मनन परीक्षा समाप्त करने के पश्चात.", भीतर दोनों दैत्याकार जिस्म आपस में दसो उँगलियाँ उलझते हुए शारीरिक बल की जानकारी जुटाने में लगे थे. कपिलेश्वर पंजे मुद्दे घुटनो के भार बड़े ध्यान से दोनों पर टकटकी लगाए था.

"Bhoot-saadhak? गुरुदेव ये तोह साधारण मुसाफिर है बेशक लालच और घमंड से परे एक मजबूत युवक. ये bhoot-saadhak कैसे हो सकता है वो भी बिना शिक्षा के और इतनी kam-umar में.?", तारकनाथ ने अपना बल बढ़ाते हुए अर्जुन की भुजाएं पीछे करनी शुरू कर दी थी. 50 इंच के लगभग चौड़ा उनका सीना अब ज्यादा भयंकर दिख रहा था और वही अर्जुन के जिस्म की हर मांसपेशी अपना अकार बढाती लगी. जल्द हे अर्जुन का एक पाँव पीछे होने के साथ अगला घुटना झुकने लगा था जैसे तारकनाथ उसपर हावी हो चुके हो.

"स्वयं जान जाओगे जीवा. वो तारक की क्षमता जान चूका है लेकिन तारक के साथ हम स्वयं नहीं देख प् रहे की इस मुसाफिर के अध्भुत्त बल का स्त्रोत क्या है. वो जो इसके भीतर है या उस से अधिक भीतर जिनसे भूत भी साध लिया है. बाए कंधे में अधिक बल बढ़ रहा है जो अक्सर कमजोर होता है. ये तारक से हे खेल रहा जीवा, उसको कष्ट नहीं देना चाहता.", भीतर सचमुच तारकनाथ अब उग्र होने के साथ पूरा दम झोंक चुके थे, आँखों में लाली अत्यधिक बढ़ कर भयंकर स्वरुप दिखा रही थी इन बाबा का और यही अर्जुन ने अपनी ऊर्जा का बेजोड़ नमूना दिखा दिया जब खुद पर छाये प्रतिद्वंदी को उसके हे जोर लगाने की दिशा में अपने जिस्म के ऊपर से गुजार कर पीठ के पीछे फेंक दिया. तारक इसके लिए भी त्यार था जो पलटी खाने के बावजूद पीठ न लगने देते हुए पंजो और हाथ के बल भूमि पर ऐसे खड़े हुए जैसे ऊंचाई से गिरने के बावजूद एक सुरक्षित बिलाव.

"अध्भुत्त. तारकनाथ जी अक्सर हमे 100 की गणना से पहले पराजित कर देते है गुरुदेव लेकिन ये इनका सबसे बेहतर सुरक्षा डाव था जबकि मुसाफिर तोह जैसे प्रभावहीन है उनके बल से."

"ये गुण ले रहा है जीवा, ये तारक के गुण ग्रहण कर रहा है. इस मुसाफिर की नजर तारक से पहले उसके गिरने और सँभालने की दिशा में थी. देखो अब जिस्म गरमा रहा है मुसाफिर का. अब ये ताक़त प्रदर्शन करेगा.", भीतर ठीक वैसा हे हुआ था. अर्जुन तारकनाथ के साथ ठीक प्रारम्भ वाली स्थिति में हथेली से हथेली भिड़ाये जोर लगा रहा था लेकिन इस बार भुजाएं प्रतिद्वंदी की पीछे जा रही थी. अर्जुन को ज्यादा समय नहीं लगा तारकनाथ के घुटने भूमि से लगवाने में लेकिन तभी एक तरफ बैठे कपिलेश्वर बाज की तरह अर्जुन पर झपटे और कमर की तरफ से पकड़ कर उसको पूरी ताक़त से पीछे उछाल दिया. वो गिरा लेकिन ठीक वैसे हे जैसे तारकनाथ शरीर को पलटी खिलने के बाद पंजो और हाथ के बल भूमि पर संतुलन बना गए थे. अब सामने 2 प्रतिद्वंदी थे और अर्जुन के भीतर भी तोह 2 हे थे जिसमे से अभी तक उग्र स्वरुप तोह बहार आया हे नहीं था.

"ये अत्यधिक प्रशिक्षित है परन्तु इतनी स आयु में गुरुदेव?"

"कुछ शिक्षा जनम से हे हम साथ लिए आते है जीवा और इस मुसाफिर का अभी तक का जीवन सरल नहीं प्रतीत होता हमे. दुःख, पीड़ा, पर्त्याग और अकेलेपन को kam-umar से हे अपना शत्रु न बना कर उन पर विजय प्राप्त की है इसने. एक से अधिक आत्मिक गुरुओ के साईं में रहा है परन्तु bhoot-saadh सकने के लिए तोह mahirsh-yogi हे सर्वोपरि है. जितना हमको ज्ञात है पिछले 25 बरस में हमने किसी महिर्ष योगी के बारे में नहीं सुना जो समाज में सेवनियुक्त हो. अध्भुत्त..", अपनी बात बीच में हे रोकते हुए उन्होंने वो दृश्य देखा जहा कपिलेश्वर से सामना करते अर्जुन को उसकी पीठ से जकड़ते हुए तारक ने उछलने की जगह जमीन से उठाते हुए एक तरफ पटखनी दी. हुआ फिर उम्मीद से विपरीत जहा तारक स्वयं पीठ के बल उस राख में गिरे थे, अर्जुन और कपिलेशर के जिस्म साथ हे उठने की वजह से और उनकी बगल में कपिलेश्वर. दोनों के मध्य बैठा अर्जुन अपनी ऊँगली पर राख मॉल रहा था, दर्द की वजह से.

"ये अभ्यास नहीं कर रहा गुरुदेव. और अब आप हे सिखाये इसको.", दोनों अपना जोश और गुस्सा भुला कर मुस्कुराते हुए उठ खड़े हुए. अर्जुन के चेहरे पर ाचे से वो मुलायम राख पॉट दी थी तारकनाथ जी ने, गुस्सा जो शांत कर दिया था उन्हें थक कर अर्जुन ने.

"ये मुद्रा और कमंडल पकड़ो जीवा. आज अखाड़े में सचमुच हे बड़ा जीव चला आया है जिसने पहले तोह हमे dhyaan-shivir से बहार बुलवा लिया और आज 10 बरस बाद अभ्यास घेरे में. देखे जरा अब ये मुसाफिर खेलता है या ये स्वयं की परीक्षा लेना चाहता है.", जीवा के समीप हे अब बाकी दोनों बाबा आ बैठे थे. वज्रनन्द जी को जैसे jal-abhishek की जरुरत नहीं थी और वो साढ़े कदमो से अर्जुन के सम्मुख आ खड़े हुए. ये लम्बाई में असाधारण होने के साथ हे कही अधिक तेजस्वी और ठहरे पानी से शांत थे. अपनी सीधे हाथ की हथेली से उन्होंने झुकते हुए अर्जुन को मल्ल्युद्ध जारी करने का इशारा दिया और इनसे हथेलिया मिलते हे अर्जुन को ऐसी गर्माहट महसूस हुई जैसे उसकी पकड़ में कोई गरम किया हुआ चटक पत्थर हे आ गया हो. चेहरे से शांत लेकिन इतना अत्यधिक शारीरिक बल वो भी उम्र के ऐसे पड़ाव पर. बहार बैठे हुए तीनो साधू बहोत गहराई से इस पल को देख रहे थे जहा पहली बार उन्हें अर्जुन के मस्तक पर बल पड़ते दिखे और उनके गुरुदेव अपना बल बढ़ाते हुए इंच दर इंच अर्जुन को पीछे धकेलते जा रहे थे. वो पीछे खिसकना एक समय पर रुका और अब जैसे दोनों हे धुरंदरों के पाँव इनके शारीरिक बल की क्षमता से राख में दबते गए.

"कपिलेश्वर जी आप देख प् रहे है जो हम देख रहे है? ऐसा लगता है जैसे 2 बहोत बड़ी ऊर्जा के स्त्रोत अपने स्थान पर ठहरने के बाद उसका प्रभाव बहार गिरा रहे रहे. गुरुदेव निश्चित रूप से इस बालक से कही अत्यधिक सक्षम है और वो इसकी अध्भुत्त ऊर्जा के अंतिम कानन तक जान ने का पर्यटन कर रहे है. परन्तु ये मुसाफिर युवक इतना कमतर भी नहीं है.", तारकनाथ की बात सुन्न कर जीवा ने भी अपनी सहमति दी परन्तु कपिलेश्वर जी तोह ना में सर हिलाते हुए सामने हे देखते रहे.

अर्जुन के पीठ पर उभर आयी असंख्य सूक्ष पसीने की बूंदे बता रही थी की उसको भी आज हे अपनी समस्त शमता का पता चलने वाला है. चेहरा purn-tarah से अपने से पौन फुट लम्बे और असीम ताक़त से भरे उस शक्श पर था जिसके चेहरे पर ज्यादा भाव नहीं थे लेकिन मस्तक पर बल तोह पड़ने शुरू हो चुके थे. जिस तरह से अर्जुन का दाया पाँव बेहद हे धीमे प्रभाव से उनकी और बढ़ रहा था, ठंडी राख में से मानो हल्का ज्वलन धुआं सा उठने लगा. इस समय में अर्जुन के सीने के कटाव और उभार अत्याधिक फूल कर उसके जिस्म का पहली बार इतना उत्कृष्ट वर्णन करते दिखे जैसा न कभी किसी व्यायामशाला में हुआ था और न किसी मुकाबले में. व्रजरनंद जी के पंजे ने भी अर्जुन की तरफ ठीक वैसे हे रुख किया जैसे दियासलाई हौले से रगड़ती हुई जलने से पहले धुआं करती हो. दोनों की पेशानी से पसीने की मोटी मोटी बुँदे रख में टपक कर गिरती हुई वैसा दृश्य दिखा रही थी जैसे बारिश की रुकी हुई बुँदे ठहरे हुए पानी पर गिरती उसको छलकने लगती है.

"याआआह्ह्ह्हह्ह..", और इस ुद्धघोष से बहार वाले तीनो के साथ साथ स्वयं वज्रनन्द जी के भी कदम उखड गए और उन्होंने देखा वो भूत जिसको अर्जुन साध चूका था. लेकिन ये पहले सिर्फ मुस्कुराता था अपने दुश्मन से भिड़ते समय. आज इसने विस्फोट करते हुए वज्रनन्द को एक तरफ घुमा कर ऐसे उछाल दिया था जैसे माहिर पल्लेदार कनक से भरी सवा मैं की बोरी को ट्राली में फेंकते है, सही जगह. राख पर 15 फ़ीट दूर जा कर गिरते वज्रनन्द जी के पाँव तक जैसे स्वयं के वजन और राख की रगड़ में झुलस उठे थे. उनका एक हाथ जमीन पर और दूसरा ठीक उस त्रिशूल पर था जिसको भीतर आने से पहले उन्होंने घेरे के बहार गाड़ा था. चेहरे पर भाइये और हैरानी के साथ क्रोध था उस तपस्वी के सामने जो अबसे पहले बर्फ मानिंद शांत था. त्रिशूल की मध्य नोक से ऊँगली पर चीरा लगते हुए वज्रनन्द ने पहली बूँद पवित्र राख पर टपकाई, दूसरी अपने ललाट पर लंबवत तिलक की तरह एक कान से दूसरे कान की दिशा में और हाथ को झटकते हुए किसी कुशल धावक की तरह अर्जुन की तरफ लपके. वो सचमुच जैसे एक भूचाल हे था, 7 फ़ीट से लम्बा भूचाल खुली जटाओं के साथ उस तरफ दौड़ता जहा उन्हें तिनके की तरह उछलने वाला दृढ बरगद के वृक्ष सा खड़ा था. ये सब सेकंड के आधे हिस्से में हुआ था जिसको साधारण चक्षु तोह दर्ज हे न कर पाते अपने मस्तिष्क में.

"आअह्ह्ह्ह... भोलेनाथ..", अर्जुन के दाए कंधे पर मजबूत मुष्टि प्रहार करने में सफल रहते हुए भी वज्रनन्द स्वयं को बचा न सके इस मुसाफिर के जोरदार प्रतिउत्तर से. राख का गुबार सा उठ गया था पूरे अखाड़े में और उसमे लिपटे अंतमिम छोर पर जा रुके वज्रनन्द जी ने घुटनो के बल होते हुए हाथ खड़े कर दिए.

"शांत मुसाफिर.. शांत. तुम्हे तुम्हारी मंज़िल पर पहुंचने से कोई नहीं रोक सकता.. कोई भी नियम से चलने वाला महारथी तुम्हारे सम्मुख नहीं टिक सकता. हमे आभास हो गया था जब तुमने वह खड़े रह कर हमे 2 बार विभिन्न व्यक्तित्व से देखा था. हमने भरसक कोशिश की उसको साक्षात् देखने की परन्तु असफल रहे. हमने बस क्षमता जांचने के लिए तुम्हे मानसिक कष्ट पहुंचने का दुस्साहस किया, उसके लिए माफ़ी चाहते है.", वज्रनन्द जी के ऐसा कहते हे अर्जुन घुटनो के भार धम्म से राख की सतह पर गिर गया. हाथ उसके जुड़े हुए थे और उसके बाद सर भी राख पे रखता वो अपनी गलती की क्षमा मांग रहा था, बेआवाज. वज्रनन्द जी उठ कर लड़खड़ाते हुए उसके करीब आये और उसका चेहरा उठाते हुए बड़े स्नेह से सर सेहलय जहा सिर्फ आंसू और राख थी.

"सामने तोह कोई 51 बरस से हे नहीं आया फिर अब कैसे मुमकिन है बाबा? मैं अर्जुन शर्मा उन्ही का वंशज हु जो आपके द्वार पर तलवार लिए मदद की आस से आये थे, बस उन्हें मदद मांगनी नहीं आती होगी. मैं जहा भी अँधेरे में वो टूटे धागे ढून्ढ कर किसी दिशा में बढ़ने निकलता हु, आगे और अंधकार मिलता है जहा पहला धागा टूटा हुआ और और आगे एक और नया सिरा जिसका परिणाम भी पहले वाले जैसा. बहोत बोझ बढ़ चूका है इस अंतर्मनन पर लेकिन मैं हारना नहीं चाहता. मेरी माँ ने हमेशा यही कहा है की सही ज्ञान हे टूटी कड़ियों को मिला सकता है. आप जोड़ सकते है उन बिखरे हुए अधूरे धागो को?", वज्रनन्द जी के शिष्य जहा पहले उत्तेजित थी अब वो अलग हे दर्द महसूस कर रहे थे जब ये लड़का उनके गुरु की जांघ पर सर टिकाये पसरा हुआ था.

"हम तोह सिर्फ खुदको परमात्मा से जोड़ने की कोशिश में लगे रहते है पुत्र परन्तु तुम्हारी माँ ने जो कहा है और जिस श्रद्धा से हमारे पास आये उसका अनादर हम अघोरी भी नहीं कर सकते. भोलेनाथ और माँ हे तोह सर्वेसर्वा है. हमे भान हुआ था के तुम उस वृक्ष की हे मजबूत शाख हो जो यहाँ उत्तेजना में चला आया था और वो suraksha-prehri अपने कर्त्तव्य में ये भूल कर बैठा की समाधान के लिए समर्पण जरुरी है. इसलिए तोह वो हार गया और तुम इन धागो तक पहुंच गए. जिसने तुम्हे आत्मिक ज्ञान और अपनी दूसरी पहचान को साधना सिखाया क्या उसने मदद नहीं की?"

"उनका वचन सिर्फ एक दायरे के रक्षा में और मुझे सँवारने तक हे सिमित है बाबा. खुद को मैंने नहीं मेरे हे बेहतर संस्करण ने साधा है. वही मुझे सिखाती है है बहार से ज्यादा अंधकार भरे अपने अंतर्मन से जोड़ बनाना. उसके सम्मुख तोह मैं आवेशित हो भी जाऊ तोह स्पर्श मात्रा से निष्क्रिय हो जाता हु. इस मंज़िल पर वो साथ नहीं बाबा है, ये मेरी विरासत है सिर्फ मेरी."

"धन्य हो प्रभु. इस बचे को विरासत भी सौंपी गयी तोह अथाह दुःख और वेदना से भरी. इतनी जुंग तोह 9 मॉस गर्भ में रहने वाला नवजीवन भी नहीं लड़ता जिसको दुनिया में लाने के सभी विरुद्ध हो सिवाए माँ के. तुम्हारा उद्देश्य वही श्रीधर उर्फ़ सिद्धेश्वर के अनुष्ठान के काले इतिहास से जुड़ा है बीटा?", अर्जुन ने आँखें झपका कर हामी भरी. चेहरे पर वो राख आंसुओ के वजह से जम्म कर गहरी हो गयी थी. अब आंसू भी थम्म चुके थे और वो आग भी.

"तारकनाथ, पुत्र को ज्ञान देने का वक़्त है और तुम स्वयं अशांत हो. गर्भ संगम स्थल नहीं ले जाओगे अपने मित्र को? अर्जुन, हम धागे नहीं जोड़ सकते क्योंकि हमारा बाहरी दुनिया से जुड़ाव सिमित है. ये तुम्हारी खंडित विरासत है जिसको कायम तुम्हे हे करना होगा. खाली हाथ नहीं भेजेंगे हम अपने इस मोहक मुसाफिर को. उस अनुष्ठान से किसी विक्षिप्त तांत्रिक और आयोजक को कुछ हांसिल नहीं होता, सिवाए हैवानियत और आसुरी प्रवर्ति के. तुम्हे जो हांसिल है वो फल तोह ऐसे इंसान से हे मिल सकता है जो इस अनुष्ठान को पूर्णतया की देहलीज पर खंडित कर चूका हो. तुम ऐसी बातों पर विश्वास नहीं करोगे परन्तु जिस तरह बुरे करम वंश बढ़ने के साथ दोष आगे बढ़ाते है वैसे हे पुण्य कर्मो का फल भी अतीत से भविष्य तक उस सही व्यक्ति को हांसिल होता है जिसका जुड़ाव रहा हो. ये धागा हम नहीं सुलझा सकेंगे, माँ मदद करेंगी. हो सकता है ये हमारा विचार संशय मात्रा हो लेकिन इंसान तुम असाधारण हो जो विरासत में कुछ अमूल्य गुण भी लिए है. तारक, तुम्हे कुछ शंका तोह नहीं हमारे इस मुसाफिर पर?", अर्जुन को समझने के साथ एक नयी उलझन भी दे डाली थी वज्रनन्द जी ने जो कही से भी परेशानी वाली नहीं थी. तारकनाथ जी भी घेरे के भीतर आ चुके थे.

"तोह क्या वो अनुष्ठान अतीत में करने की कोशिश सत्य है गुरुदेव? हमने सिर्फ ये सुना था परन्तु इस बालक की क्षमता सूचक है की ये भी प्रहरी है और पीड़ित भी. तुमने हमारे साथ krida-abhaas किया है इसलिए मित्र सामान हो हमारे परन्तु आज चिंतित महसूस कर रहे है स्वयं को.", तारकनाथ द्वारा भूमि पर बैठे अर्जुन का सर दुलारना भी अलग हे दृश्य था.

"2 बार ये प्रयास हुआ है तारक, सिद्धेश्वर इतना ज्ञान नहीं रखता था इस अनुष्ठान के बारे में और प्रथम घटना के समय तोह वो दुनिया में हे नहीं आया था. सर्वप्रथम ऐसा दुस्साहस जिसने किया था उसका अंतत ठीक करम अनुसार हे हुआ परन्तु वो असुर 99 अक्षत गर्भ और तरुणी उस अनुष्ठान में भेंट कर चूका था अंतत समय तक. अंतिम आहुति गर्भवती तनूजा की दी जानी थी और फिर भोलेनाथ एवं माँ जगजननी की भी sehan-shamta ख़तम हो गयी. आयोजक के पहुंचने से पहले हे तनर्तिक मरिकस्वामी और उसके 3 सहायको के सर वही गर्भ में धड़ से अलग कर दिए स्वयं उस गर्भवती तनूजा ने जिसको मूर्छित करके धोखे से वह लाया गया था. वन्न में स्थित उस अनुष्ठानशाला और गर्भगृह को स्वयं उस देवी ने अग्नि के सुपुर्द कर दिया था जिसको ये nar-pishaach सिर्फ एक कमजोर गर्भवती स्त्री समझने की भूल कर बैठे थे.", ख़ामोशी से ये कथा सुनता अर्जुन अपने कानो पर विश्वास करने के लिए खुदके के सर पे थप्पड़ जड़ने लगा तोह उसका हाथ वज्रनन्द जी ने हँसते हुए पकड़ लिया.

"गुरुदेव अगर अनुष्ठान अंतिम आहुति पर खंडित किया जाता है तोह उसके दंड स्वरुप ऐसा फिर से दोहराना पड़ता है उसी आयोजक को. Sehasra-Vipaash गर्भ अनुष्ठान के खंडित होने पर पचासवीं आहुति में तांत्रिक की जगह आयोजक... आयोजक अपनी नस्ल के साथ कुकर्म करने के बाद बलि देता है. और ये मामला उस एक हे ..", तारकनाथ को इशारे से बीच में हे वज्रनन्द जी ने खामोश करवा दिया.

"कुरीतिया अक्सर ऐसे हे बरक़रार राखी जाती है. इनके नियम ऐसे बनाये गए है की इनको पुनरावृति न हो तोह दोष और पतन का डर आयोजक के दिमाग में बैठा कर उसको टॉड दिया जाता है. मरिकस्वामी का वो एकलौता चेला हे सिद्देश्वर का गुरु बना था, तंत्र की दुनिया में. गुरुदक्षिणा स्वरुप उसने सिद्देश्वर को यही अनुष्ठान उन आयोजक के लिए दोहराने का वचन लिया और दुष्ट तोह हमेशा हे ऐसे अवसरों के लिए तैयार रहते है. परन्तु इस बार समय पहले जैसा नहीं था और नयी पीढ़ी में कुछ सजग प्रहरी भी थे. जैसा अर्जुन ने कहा 57 भेंट के पश्चात् हे विघ्न में विघ्नेश्वर आ पधारे. वही जो हमारे द्वार पर आये थे तांत्रिको की तलाश और अपने सवालों के जवाब लेने. संख्या 57 थी ये ज्यादा इसका हमे भान नहीं लेकिन दोनों व्यक्तियों में मार्मिक संवेदनाये और दर्द भरा था उन बेक़सूर देवियों का जिन्हे तरुण जीवन पूरा करने से पहले हे नष्ट कर दिया गया. अक्सर इसतरह की मुठभेड़ के परिणाम बहोत बुरे होते है और वैसा हुआ भी होगा, यक़ीनन बहोत से अपने खोये होंगे. यही तोह विरासत में मिला है इस धुल में साणे कमल को. अब तुम इसको हमारी हैसियत मुताबिक garbh-gyaan देने की कोशिश करो तारक, हम ध्यान की तैयारी करते है. मुसाफिर जाने से पहले अपनी शिक्षा का प्रमाण पत्र लेते जाना.", वज्रनन्द जी इनसे पहले हे उठा कर चल दिए और उनके दोनों चेले भी पीछे. अर्जुन के कंधे पर हाथ रखे और दूसरे हाथ में त्रिशूल उठाये तारकनाथ जी इस दोपहर के आखिर समय में घने वृक्षों की कतार से जुडी नदी तक आ पहुंचे. अर्जुन के कुछ कहने समझने से पहले हे उन्होंने त्रिशूल वही जमीन पर गाड़ कर अर्जुन की आँखों पर अंगरखा बाँध दिया.

"चलो, गर्भ में कुछ दिखाई नहीं देता. महसूस करना पड़ता है और यहाँ पर हम तुम्हारी माता का स्थान ले रहे है, जगतजननी की इजाजत से.", छपाक के तेज आवाज के साथ वो अर्जुन को जकड़े हुए विशाल चट्टान की तरह गहरे पानी माँ गिर गए, हाँ ठीक जैसे गिरा जाता है शरीर को ढीला छोड़ कर. ये अंतिम सबक था अर्जुन की शिक्षा का उसकी आनेवाली परीक्षा पूर्व.

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"माँ जी, आपके और पिता जी के कपडे रख दिए है 2 दिन के हिसाब से और रौशनी की भी पैकिंग हो गयी है. साथ और कौन जा रहा है? शंकर भाई साहब या बड़े जेठ जी?", कृष्णा जी ने इस्त्री करने के बाद अपने saas-sasur के कपडे एक अटैची में लगा दिए थे. पहले जहा सिर्फ आना जाना हे करना था अब ये लोग रौशनी और अंजलि को भी उनके घर छोड़ने जा रहे थे. बहोत कुछ वह भी देखना था और रौशनी ऐसे हे तोह यहाँ आ गयी थी. बेटी का कॉलेज और घर संभालना जरुरी था. कुछ फैंसले लिए गए थे जिन पर वही विचार किया जाना था. रामेश्वर जी तोह अपनी भाभी को लेने गए थे और अब वापिस लौटने वाले हे थे.

"कोमल को बोल दे कृष्णा, 2 जोड़ी कपडे वो भी रख लेगी रात में पहन ने वालो कपड़ो से अलग. लेके तोह मैं उस नकचढ़ी को जाने वाली थी जो 3 बार फ़ोन मिलाने के बाद भी संतुष्ट नहीं हु. तेरे पिता जी की एक खुराक निकाल दे बाकी साथ हे रख दे कपड़ो के. शंकर कुछ कह के गया था के कब तक आएगा आज? इन्दर का तोह फ़ोन आ गया था की वो देर रात का लौट आएगा.", कौशल्या जी मैं में असंख्य विचार चल रहे थे. उन्हें हवेली से पता चला था के अर्जुन कॉलेज वाले काम से निकला था सुबह पर अर्जुन ने यहाँ कुछ और बताया था. अब 4 बजने वाले थे और उसकी कोई खबर तक नहीं थी. वो लापरवाह नहीं था फिर भी कौशल्या जी की उसके साथ दादी पौटे से अलग ख़ास ममता भी थी और उनके लिए वो हमेशा से मुन्ना हे था, बैलबुद्धि.

"जेठ जी तोह है हे माँ जी घर. शंकर भैया चाहे आज न आये या नरेन् को देरी हो जाए, आप लोग तोह सुबह हे निकलने वाले है. वैसे कोमल से बेहतर आप ऋतू को हे ले जाए. 2 दिन की तोह बात है और ये लड़का उसको जानबूझ के परेशां करता है तोह ऐसे में वो पढ़ने से रही."

"न कृष्णा, कोमल जायेगी तोह ऋतू व्यस्त रहेगी और अर्जुन कर लेगा थोड़ी देर तक फ़ोन. उसको चैन कहा मिलता जितने ऋतू से प्रवचन न सुन्न ले. इन्दर या शंकर में से कोई साथ चलता तोह ज्यादा बेहतर रहता, पता नहीं क्यों लेकिन लग रहा है की कोई अनिष्ट न होने पाए वह. बाकी सतीश जा हे रहा है तोह देखा जाएगा. रेखा को नींद की दवा दी थी तुमने दोपहर के खाने के बाद? वो पगली रात को सो नहीं रही आजकल, ऋतू ने भी बताया और मैंने खुद भी देखा 3:45 हुए थे सुबह जब मैं जाएगी थी और रेखा कुछ पढ़ने में लगी हुई थी ऋतू को बगल में सुलाए.", कौशल्या जी की चिंता भी व्यर्थ न थी. आज वो भी समय से कुछ पहले हे उठी थी और उन्होंने देखा था रेखा के कमरे का आधा खुला दरवाजा और लैंप की रौशनी में कुछ पढ़ती हुई अपनी बहु को.

"वो ऐसी हे तोह है माँ जी. बोलती नहीं है लेकिन कल से कुछ परेशां है वो. अर्जुन ने फ़ोन किया तोह कहलवा दिया की आराम कर रही है, कल बात कर लेगी. उसकी बेचैनी दिखती नहीं लेकिन इतने बरस साथ रहते हुए उसको ाचे से समझती हु. तोह आप लोग रौशनी को घर पहुंचने के बाद आएंगे या रुकना होगा कुछ वक़्त?"

"नहीं कल तोह सारा समय इन्होने गाँव में रहने का कहा है और परसो सुबह बखत से रौशनी की तरफ निकल लेंगे. पूर्णिमा अलग बेचैन सी है जैसे राजेश्वरी ने बताया और ये भी रात को आजकल सोने का नाटक करते रहते है. घर के लड़के पहली बार सभी बाहर आज और ये भी. यही सब सोच कर मुझे भी इन्होने बेचैनी दे दी. अर्जुन तुझसे तोह खुल कर बात करता है कृष्णा. कही वो किसी और हे मसले में तोह नहीं जूता हुआ?", इस बार तोह कृष्णा जी के पास स्वयं जवाब न था चाहे अर्जुन पहले उन्हें सब बता भी देता था, जितनी जानकारी होनी चाहिए.

"नहीं माँ जी उस से शादी के माहौल में बात हे कहा हो सकीय लेकिन इन्होने चिंता जताई थी की अर्जुन जो करने जा रहा है वो सिर्फ दरगाह वाले मेले की साधारण सी कुश्ती नहीं है. और इसकी घोषणा अर्जुन ने जिस तरह से करवाई है मतलब वो खुद ये बात जितनी दूर हो सके उतनी दूर पहुंचना चाहता था. मेरे पापा को तोह किसी ने नहीं बताया और न कुंदन चाचा को, लेकिन आप सोचो की उन्हें ये बात पता चल गयी. हो सकता है अपने हे जानकार ने बताई हो और aadhat-kisani के काम में एक दूसरे की तरफ भी व्यापारी दोस्त है पर वो ऐसा क्यों कर रहा है और नरेन् कभी चिंतित नहीं होते और अगर हो तोह फिर वो उसके लिए प्रयास करते है. इस बार बात भी अर्जुन की है तोह वो इस सबसे दूर अपने हे बिज़नेस में व्यस्त होने का दिखावा कर रहे है."

"उसको पता है न के तेरे पिता जी है अर्जुन के साथ तोह वो और उसका भाई क्यों बीच में पड़ने लगे. लेकिन अखाड़े में तोह बस 16 गाँव के चुने हुए खिलाडी हे भाग ले सकते है न और अर्जुन मालती के सांड जैसे बेटे को धुल छठा सकता है तोह कोई थोड़ा तगड़ा भी हुआ तोह वो संभल लेगा. ये बिनावजह की गर्मी क्यों बढ़ा राखी है इन सभी ने? मुझे और टेंशन दे रहे है.", कौशल्या जी ने अपनी दवा का डिब्बा भी कृष्णा जी को थमा दिया, अटैची में रखने के लिए.

"ये बता रहे थे की raj-darbar के पहले वाले मुलाजिमों के साथ वर्तमान के भी अखाड़े में अर्जुन को चुनौती दे सकते है, गाँव वालो से जीतने के बाद. वह जब कोई है हे नहीं तोह ये परेशां क्यों है? कह रहे थे के अगर कोई शाही परिवार के हे रिश्तेदार आ निकले तोह अर्जुन के जीतने के बावजूद बात बढ़ सकती है. वो है तोह सिर्फ gram-pramukh हे. हार का बदला कही..."

"बस कर बीटा ऐसा कुछ नहीं होनेवाला. वो सौंदर्य के हाथ से खाना खा रहा है अब और महेंद्र उसको भतीजे के साथ अपने ख़ास दोस्त के रूप में देखता है तभी विनोद को वो नेपाल वाले अपने बड़े होटल को देखने भेज रहा है. हाँ ऐसा हो सकता है जो लोग raj-pariwar में सिर्फ 3 चेहरों को देख कर कुछ अहित करने का सोच रहे हो उन्हें अर्जुन के रूप में जरिया दिख रहा होगा. और उस पवित्र भूमि पर goli-hathiyaar तोह दूर, पुलिस तक की मनाही है. अखाड़े में जो आएगा उसको सामने से हे मुकाबला करना पड़ेगा और अर्जुन के करीब उसके दादा दादी मोझूद होंगे पूरे गाँव के साथ. इन्दर इस मामले में जिस वजह से डरता है वो ये चुनौती नहीं उसका प्यार है अर्जुन के लिए. देख लगता है तेरे पिता जी और पूर्णिमा आ गए.", बहार गाडी के भीतर आने की आवाज के साथ हे कृष्णा जी अटैची बंद करती हुई कड़ी हुई तोह आरती और अलका थोड़ा सामान लिए अंदर दाखिल हुई.

"भूल गयी थी की ये दोनों भी हवेली घूमने गयी है अपने दादा के साथ. हाँ उनकी लक्ष्मी कुछ कहे तोह फिर वो कहा मन करने वाले. मोटी तू भी अपनी बारी से बच के निकल गयी थी इसके साथ?", कौशल्या जी ने आरती को छेड़ते हुए कहा तोह वो मुँह बनती हुई उनके सामने हे धम्म से बैठ गयी. वो हर तरह ऋतू जैसी हे थी सिवाए भरी हुई जांघो और कुछ उभरे हुए गालो के. लेकिन ये उसपर जांचते भी थे, पंजाबी झलक दिखती थी मासूम चेहरे पर.

"ऐसे फेरे शुरू करवाए है कौशल्या की एक दिन उधर तोह अगले दिन इधर. कृष्णा जरा पानी पीला बेटी.", पूर्णिमा जी जब कमरे में दाखिल हुई तोह उनके हाथ में वो ताम्बे का ढककर लगा कलश देख कौशल्या जी ने अचानक हे बाकी सबको जाने का इशारा दिया. पानी उन्होंने खुद हे स्टूल पर औंधे रखे कांच के गिलास में भर कर अपनी इस सखी की तरफ बढ़ा दिया. अलका भी मुँह चिढ़ाती हुई निकल गयी अपनी दादी को जिस पर उन्होंने ख़ास तवज्जो न दी. रामेश्वर जी बैठक में हे किवाड़ लगा कर कपडे बदलने लग गए थे जूते खोल कर.

"फेरे तोह तेरे ऐसे हे लगते रहेंगे, घर तेरा हे है ये. पर इनके फेरे तू क्यों लगवा रही है आज? कही तू वही करने का तोह नहीं सोच रही जैसा मुझे लग रहा है.?", कौशल्या जी ने वापिस गिलास ले कर एक तरफ रखने के बाद 2 तकिये पूर्णिमा जी की तरफ बढ़ा दिए. कलश अब कांच की बारी में उन्होंने रख दिया था.

"पता नहीं कौशल्या 2 दिन से बड़ा अजीब सा लग रहा है और इनकी हे बातें सुनाई देती रहती है जब जब हॉल में बैठती हु और ये अस्थियां नजर आती है. जीवनभर उन्होंने कभी घर में कोई अनुचित बात नहीं कही थी और बचो को तोह झिड़कने की जगह भादवा दे कर खुश हे रहखते थे. फिर उन्होंने ऐसा क्या कह दिया था देवर जी को की ये आजतक विसर्जित न हुई? मैंने आज पूछ हे लिया तोह कहने लगे की साथ ले चलो. और उमेद को भी इन्होने फ़ोन मिला दिया की चाहे जितना भी जरुरी काम कर रहा हो कल सुबह गाँव में दिखना चाहिए. मैं उधर जाने के लिए हमेशा तैयार रहती हु पर तुम्हारे देवर वह सिर्फ अपने ताऊ जी के हे पास जाते थे मिलने. क्यों वो सब अब याद आ रहा है कुछ दिनों से? शादी में उनके लिए पाठ करने के बाद से तोह नहीं ऐसा हो रहा?"

"नहीं भाभी, रघु कभी आपसे दूर हुआ है क्या जो आप ऐसी वजह बता रही है? वो तोह आज तक मुझे अपने साथ हे महसूस होता है. कल सौंदर्य ने हे उमेद से फ़ोन करके माफ़ी मांगी जब उसको पता चला के रघुवीर किस वजह से फिर कभी महल नहीं गया था. महल क्या वो सेहर हे नहीं गया था उसके बाद. उमेद जान गया था के उसके पिता का अपमान राजा बलविंदर से अनजाने में हो गया था उस हादसे की वजह से. दोनों हे पीड़ित और सदमे में थे वो घटना होने के बाद. रघु और मैंने बहिन खोयी थी और उसका जायज सवाल था इसकी कानूनी जांच करवाने का. पिता जी वह रहते तोह वैसा नहीं होने वाला था लेकिन दुर्घटना हो जाती है ऐसे हालात में. रानी सौंदर्य ने सब जान ने के बाद स्वयं हे उमेद से काफी देर तक बात की और उमेद ने माफ़ी स्वीकार करते हुए रघु की आखिरी इत्छा पूरी करने का मुझे वादा दिया है. उमेद भी जानता था रघु की अंतिम इत्छा लेकिन वो अपनी ज़िद्द पर कायम था और हमे वो गलत भी नहीं लगता.", रामेश्वर जी ने तोलिये से चेहरा साफ़ करने के बाद कुर्सी की पुष्ट पर हे टांग दिया.

"ऐसी क्या अंतिम इत्छा थी जिसकी वजह से ये इतने बरस तक मुक्ति न प् सके देवर जी? मैंने जब जब ये सवाल किया आपने और उमेद ने एक जैसा जवाब दिया की सही समय पर ऐसा होगा, इन्तजार कर सकते है बस."

"इत्छा तोह वो लिख कर हे गया था भाभी जो आजतक मेरे पास सुरक्षित है. मैं वजह तोह नहीं पूछ सका वैसा करने की लेकिन रघुवीर की अजीब सी चाहत थी. जहा वो पैदा हुआ था, उस घर में दिया जलने के बाद सबसे बड़ी संतान के साथ इन अस्थियों को आप और रानी सौंदर्य आधा वही नदी में प्रवाहित कर दे और आधा हिस्सा मैं हमारी ख़ास जगह पर, जहा हम दोनों का बचपन और जवानी का खुशनुमा समय एकसाथ गुजरा है. उस जगह मेरे साथ अर्जुन को भी जाना होगा. हैं न कुछ ज्यादा हे अजीब सी अंतिम इत्छा भाभी?", पूर्णिमा जी तोह ठंडी हे पड़ गयी थी ये सब सुन्न कर और सबसे ज्यादा प्रभाव हुआ था रानी सौंदर्य के शामिल होने वाली बात का.

"मिनाक्षी जी का भी prem-pyaar था सौंदर्य के साथ और रघुवीर भाई साहब को लगता होगा की उस परिवार में सिर्फ वही बाकी रह गयी है तोह उन्हें ये न लगे की उनका परिवार नहीं है. पिता जी ने थोड़ा बहोत तोह बताया था मुझे भी उनकी बड़ी बहिन के बारे में. पूर्णिमा अगर इतने बरस बाद उमेद और सौंदर्य के बीच भी स्थति सुधर गयी है तोह ऐसा करने में हर्ज हे कैसा? हाँ ये अर्जुन मेरे पल्ले यहाँ भी नहीं पड़ा.", अभी वो बात आगे करती उस से पहले हे फ़ोन घनघना उठा जिसका नंबर देख कर हे रामेश्वर जी समझ गए की ये महल से है.

"सौंदर्य का हे फ़ोन लगता है.", हैंडल उठाते हुए उन्होंने अपने आंसू पौंछती पूर्णिमा जी को देखा. कुआशालय जी ने हाथ से हे उन्हें बात खुद करने का कहा.

"ोये खोते तू वह क्या कर रहा है?", आवाज सुनते हे उन्होंने अनुमानित जवाब दिया क्योंकि ये अर्जुन था दूसरी तरफ. उसकी बात को सुनते हुए आगे रामेश्वर जी बस सर हिलाते रहे हँ हाँ के साथ. और फिर फ़ोन अपनी बीवी की तरफ बढ़ा दिया कल आने वाली बात बता कर. दादी पौटे में भी khati-meethi नोकझोक के बाद थोड़ा वार्तालाप हुआ जिसको कौशल्या जी ने laghu-viraam देते हुए ऋतू को आवाज लगा दी. घंटी बजने के बाद से हे वो दरवाजे के दूसरी तरफ कड़ी थी और अपना नाम सुन्न कर कुछ पल इन्तजार किया और अंदर दाखिल होते हे शुरू हो गयी.

"हाँ दादी, मैं पढ़ रही थी. कुछ काम था क्या?", कौशल्या जी समझ गयी की अब बात अर्जुन को daant-dapat कर हे शुरू होने वाली.

"ये अर्जुन का फ़ोन है तेरे लिए, मार्किट में टाइम लग गया था इसको तेरे लिए राजकुमारी वाली ड्रेस लेने में. अब तुझसे हे बात करनी है, मुझे तोह साफ़ कह दिया के ये मेरा टाइम नहीं है उसकी दीदी का है."

"हँ..", ऋतू फ़ोन उनके हाथ से लेते हे बैठक में जा घुसी और अगले 3-4 मिनट बस उसके हे बरसने की आवाज आती रही जिसके सामने पूर्णिमा जी भी दर्द भूल कर मुस्कुरा उठी. अर्जुन को 10 मिनट से ऊपर हे लग गए इसको मानाने में और जब फ़ोन वापिस रखने आयी तोह इस बार उसको पूर्णिमा जी ने दबोच लिया.

"तू बड़ी भी होगी या हमेशा वही बची रहने वाली है जिसका खिलौना दिखाई न दे तोह मिलने पर टॉड कर हे hat-ti थी. इतना लायक लड़का है और तेरा सबसे ज्यादा ख़याल रखता पर तू तोह उस से सीधे मुँह बात हे नहीं करती."

"ओह्ह्ह... दादी आप उसकी तरफदारी कर रही हो? 12 बजे फ़ोन करना था उसने लेकिन देखो 5 बज रहे है. और कोई मासूम नहीं है वो, आपने सिर्फ मेरी सुन्न कर ऐसा कहा. मुझसे ज्यादा तोह वो बोल रहा था. वैसे दादी आपने कहा की मेरे लिए फ़ोन किया था फिर 18 मिनट बात कैसे हुई और वो भी घर वाला नंबर नहीं था. वो आवारागर्दी करता घूम रहा है लेकिन आप उल्टा उसको बचती नहीं थक रही. बौ जी, आप बोलोगे कुछ?", ऋतू ने कमर पर हाथ रखते हुए अब पंडित जी की तरफ मुँह किया तोह उन्होंने हाथ हे जोड़ दिए

"एक बार के लिए तेरे बाप से बात कर सकता हु पर मुझे बक्श दे कौशल्या जूनियर. अर्जुन को सुना दिया मतलब मुझे भी मेरे हिस्से का मिल गया. ये तेरी दादी देख ले क्या करती फिर रही है.?", अब जैसे उन्हें भी मौका मिल गया था अपनी बीवी से बदला लेने का. कौशल्या जी ने उनके सामने हे बताया था के कोमल भी आ रही है.

"मैं बोल रहा था के 2 दिन से कोई फरक नहीं पड़ता ऋतू की पढ़ाई से पर ये कोमल को लेके जा रही है. कहती है के तुम्हे थोड़ी सजा मिलनी चाहिए अर्जुन से ऐसे बात करने के लिए.", ऋतू उनकी बात सुनती हुई अपनी दादी को हे देखे जा रही थी.

"न आग लगाओ बौ जी, ऐसा मैंने कहा था दादी को जब इन्होने मुझसे पुछा था. हाँ कोमल दीदी का मुन्ना कमजोर हो गया होगा इसलिए वो परेशां है तोह उनका जाना समझ में आता है. देख लो दादी अब आप हे. मैं चलती हु और जो राजकुमारी वाली ड्रेस उसने ली है वो आपके लिए ली है.", ऋतू आँख मारती हुई अपनी दादी को हंसा के हे गयी थी जबकि रामेश्वर जी तोह अपनी जगह से हे उठ खड़े हुए.

"निकल लिए थानेदार साहब. चलो इस केस की सुनवाई तोह वही करेंगे आपके साथ."

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जब अर्जुन महल पंहुचा था तोह वो जैसे किसी नयी ऊर्जा से भरा था. चेहरे पर ख़ास चमक जैसे जाने क्या हे पा लिया हो और मैं आज इतने दिनों बाद पूर्णतया शांत. कुमार महेंद्र और उनके मैनेजर के साथ विनोद की मीटिंग में शामिल होने की जगह उसने अपना समय सिर्फ कुमारी अमृता के कक्ष में बिताया था, हल्का नाश्ता और जूस पीने के साथ. एक घंटे से अधिक समय वह बिताने और कुमार महेंद्र के फारिग होने पर हे वो गोयल जी वाली मुलाकात और चर्चा करके सीधा गाँव के लिए निकल चला. आज अघोरी वज्रनन्द बाबा ने उसको वो गर्भ ज्ञान दे दिया था जिस से अगर सभी धागे नहीं जुड़ सकते थे तोह कुछ महत्वपूर्ण घटनाये तोह वो सुलझाने हे वाला था. कल के बाद वो मासूम चीखें उसके कान में नहीं गूंजने वाली थी और अर्जुन ने पवित्र राख में जैसे कुछ और भी प्राप्त किया था जिसका अलग हे तेज था नदी वाली शिक्षा धारण करने के बाद और उस वीराने से निकलने के बाद. पूरे 15 मिनट बाद वो ठीक उसी जगह जा पंहुचा था जहा उसने मीनाक्षी की सहायता से लाली से मुलाकात करनी थी.

"शुक्रिया यहाँ आने के लिए मीनाक्षी जी. लाली, क्षमा चाहता हु ऐसे आपको बात करने के लिए बुलवाया. बस थोड़ा जरुरी था और मीनाक्षी जी ने आश्वासन दिया है की आप इनकी सबसे ख़ास है और राजदार भी. आशा करता हु की ये बरकरार रहेगा भविष्य में भी.", मेहँदी से भी कुछ गहरे रंग का साफ़ सुथरा सलवार कमीज पहने, पतली छरहरी लाली कही से भी उस माहौल की झलक नहीं देती थी जैसा बस्ती के बारे में अर्जुन ने सुना था. मीनाक्षी जरूर बदली बदली सी लगने लगी थी कुछ समय से और अब वो आधी ब्याह की ढीली सफ़ेद टीशर्ट और नीले ट्रैक पंत के साथ अपने खेलने वाले जूते पहने थी. बालो को सिर्फ एक रबर से सर की तरफ बांधे. अर्जुन के करीब आते हे उसकी रंगत कुछ गुलाबी दिखती और एक झिझक जैसे वो हर बार अपनी बात कहते कहते खुदको हे रोक लेती हो. लाली जैसे बताया गया था ठीक वैसी हे थी.

"दीदी ने तोह पहले हे बता दिया था और आप तोह ऐसे बात कर रहे है जैसे सरकारी बाबू हो. लाली पूरे 85 घरो की खबर रखती है चाहे ज्यादा दीदी के घर हे क्यों न रहती हो. वैसे आप हे नए प्रधान जी हो न और आपकी जमीन पर हे मेरे बाबा चौकीदारी करते है. इसलिए आपकी हर बात मान न तोह मेरा भी फ़र्ज़ है. वैसे बड़ी अम्मा उन निखट्टू मुकंदी काका को बेमतलब पैसे देती रहती है और मेरे बाबा की पगार 5 साल से 45ू है, हाँ प्रधान जी उन्हें खर्ची और अनाज सब्जी देते रहते है. वो भले आदमी है.", अर्जुन बस इसकी बातें सुनता हुआ मुस्कुराता रहा. मैं कह रहा था के इतनी मासूम सी चंचल लड़की का उपयोग न करे पर अगर कोई ये काम कर सकता था बिना शक तोह बस यही लड़की थी.

"मीनाक्षी जी, आप भी गौर से सुनियेगा जो मैं कहने वाला हु.", अर्जुन ने नजरे निचे किये बैडमिंटन का बल्ला घूमती मीनाक्षी का ध्यान इधर दिलाया तोह वो एक कदम आगे आती हुई लाली और अर्जुन के करीब हे आ कड़ी हुई.

"लाली, तुम्हारी उम्र जान सकता हु?"

"18 पूरे किये है मैंने मुखिया जी पिछली दिवाली पर. अब बताओ अगर उम्र उचित लगी है तोह.", ये सचमुच तीखी हे थी लेकिन साफदिल.

"हाँ बाबा अब तुम सही हो इस काम के लिए. वैसे तुमने बताया की बस्ती में 85 परिवार रहते है तोह आबादी होगी 250 के आसपास?"

"उह्ह्ह.. इतने लोग तोह सिर्फ खेत में हे काम करते है मुखिया जी. और ज्यादातर उनमे औरते हे होंगी. 200 से ज्यादा तोह gaanv-shehar में मिस्त्री मजदूरी और चौकीदारी के काम करते है. 15 कच्ची दुकाने चलते है और 150 से ज्यादा बचे तोह यही के स्कूल में पढ़ने आते है. फिर वो सूखे तालाब की तरफ बाजीगरों वाली बस्ती है जिसमे 50 से ज्यादा परिवार और 400 लोग होंगे. उनके उधर ज्यादा लड़कियां हे है और जो लड़के है वो इधर काम हे रहते है. मतलब मान के चलो की 1000 लोग से ज्यादा हे होंगे, 8 तक तोह मैं भी पढ़ी हु.", लाली उम्र और उम्मीद से ज्यादा हे जानकारी रखती थी और उनसे तोह मुख्या नाम भी बता दिए थे जिनकी दूकान, लोहार और ऐसे हे अपने काम थे.

"बहोत ाचे. मुकंदी काका कैसे आदमी है?"

"वो तोह उनको भी नहीं पता होगा जी. दारू पी कर तोह तालाब किनारे भी सोये पड़े रहते है कई बार और वैसे वो दलाली खाते है 50 से ज्यादा मजदूरों से जो ऊके लिए काम करते है. उनकी 3 बेतिया और 1 छोटा बचा है. दूसरे वाली बेटी एक महीने से अपने ननिहाल गयी हुई है जबकि नानी तोह खुद उनके घर रहती है. अब बताओ कोई क्या जान सकता है ऐसे आदमी के बारे में? कुछ ख़ास पता करना है?"

"कल तोह तुम्हारी काम से छुट्टी होगी मेले की वजह से? कोशिश करना ये पता चले की ऐसी कितनी लड़कियां है जो कुछ महीने से अपने रिश्तेदारों के यहाँ गयी हुई है. अगर तुम्हे पहले से हे पता है तोह अपनी मीनाक्षी दीदी के घर बैठ कर सबके नाम कागज़ पर लिख लेना. फिलहाल हमको यहाँ से अलग अलग निकलना होगा. शाम को यही मिलेंगे ठीक इस वक़्त. और तुम्हारे बाबा की तनख्वाह आज से 2 हजार बढ़ गयी है. अनाज और बाकी सब भी बेहतर मिलता रहेगा.", लाली की तोह बड़ी बड़ी आँखें ख़ुशी से और भी बड़ी हो गयी जिसको देख अर्जुन ने इशारे से उसको शांत रहने का कहा.

"तुम्हारी मीनाक्षी दीदी जल्द हे तुम्हे शहर घूमने वाली है. अब शांत रहना और ये बात अपने बाबा से भी मैट कहना. खुद प्रधान जी उन्हें बता देंगे. अब जिदर से आयी हो वही से आप दोनों जाओ. मैं यहाँ जगतार भैया की तरफ जा रहा हु.", अर्जुन दोनों को धन्यवाद कहता हुआ निकल चला तोह बेबाक सी लाली ने अब मीनाक्षी को हे लपक लिया.

"दीदी ये अर्जुन भैया तोह बड़े भले आदमी निकले और आप इतनी चुप क्यों रही? दिनभर तोह आपकी अम्मा जी आपको चुप रहने का बोलती रहती है और मेरे साथ भी आप इतना बता रही थी, समझा रही थी की कैसे बात करनी है कैसे नहीं. देखो ये तोह कोई अकड़ू नहीं दिखे जैसे आपने बताया था और न हे गुस्से वाले."

"हाँ ठीक है ठीक है. लेकिन तुम या तोह उन्हें भैया बुलाओ या फिर मुझे दीदी."

"ओह.. आप हे दीदी ठीक हो फिर तोह. भैया अजीब लगता है बोलना मुखिया जी है आखिर. लेकिन वो आपको आप और आप उन्हें आप बुला रही थी. ऐसे तोह आपकी मम्मी जी और पापा जी बात करते है न दीदी?"

"तू चल लाली यहाँ से और जुबान तेरी कैंची जैसी चलती रहती है. मुझे भी देरी हो रही है और तू भी समय से पहुंच जा.. काम सावधानी से, बात जिम्मेवारी है लाली, तेरी दीदी की िज्जात्त का सवाल है."

"वो तोह आप भैया जी को हे देना.. मतलब मुखिया जी को जिन्हे आप और जो आपको आप कहते है. दो नॉट बोररय, लालता कैन हैंडल."

"वो वोर्री होता है शैतान और चल अब तू इधर से जा, मैं चली खेलने.", मीनाक्षी अपना सर झटकती हुई शर्म के मारे ज्यादा जवाब भी न दे सकीय लेकिन लाली ने उसकी ाची टांग खिंचाई कर दी थी जो बताता था के इनका परस्पर प्यार jaat-paat और ameeri-gareebi से कही ज्यादा हे परे था. अर्जुन इनसे कही पहले हवेली के आँगन में रानी को खड़ा करके मुँह हाथ धोने में लगा था. विनोद चाचा भी बहार हे अपने पिता के साथ बैठे हंसी मजाक करते हुए अपने बेटे से खेलने में लगे थे और इनके लिए चाय अनामिका चची लायी थी. देवकी पशुओ वाली तरफ मीणा से काम करवाती हुई जैसे अपने गुस्से को ख़तम करने में जुटी हुई थी. आज अर्जुन को टोलिया देने आँचल आयी थी और उसका ये दबा छुपा होंठो का ईशर देख अर्जुन झेंपता हुआ अपने कमरे में हे चल दिया कपडे बदलने.

"आँचल, अर्जुन के धुले हुए कपडे बिस्टेर पर रखे है. वो पकड़ा देना उसको.", अनामिका की आवाज कितने दिनों बाद हे सुनी थी इस हवेली के आँगन ने. वो दूध की बाल्टी लेने चल दी थी आँचल को अनजाने हे ये बढ़िया अवसर देती हुई. रात को जसलीन से निबटना तोह अभी दूर था, अर्जुन फ़िलहाल आँचल के हे चंगुल में फंस गया था अपनी चची की इस भोली गलती से.
 
अपडेट 203

रात का हमसफ़र

"अमृता, कब तक अपने कक्ष में रहने वाली हो बेटी? खाना यही भिजवा दू?", सौंदर्य जी अपनी व्यस्त दिनचर्या और कार्यो से फारिग हो कर 7 बजे लौटी थी और अपने बेटे से बात करने के बाद थोड़ा विश्राम और वस्त्र बदल कर उन्होंने समय देखा तोह साढ़े 8 बज रहे थे. अक्सर 8 बजे उनका और दोनों बचो का खाने का समय निर्धारित रहता था लेकिन महेंद्र अपने समय से भोजन करके उद्यान में टहलने गया था और अमृता की सेविका ने रानी माँ को बताया की छोटी रानी तोह दोपहर से हे अपने कमरे से बहार नहीं निकली. माँ को चिंता होना लाजमी हे था जिस वजह से उन्होंने अमृता के कमरे के दरवाजे पर दस्तक दी, जो भीतर से बंद था.

"ओह माँ, मुझे भूख नहीं है. आप डिनर कर लीजिये, हम थोड़ा सोना चाहते है.", अमृता भीतर कमरे में औंधी करवट लिए तिथिल आँखों के साथ मुस्कुरा रही थी उस तस्वीर को अपने चेहरे के पास देख कर. आज वो वस्त्र बदले हे बिस्टेर पर थी जो थोड़ा ast-vyast भी था जैसे वो अनगिनत करवट लेती रही हो बिस्टेर पे. सामने मेज पर रखा आधा खली जूस का गिलास जिसके किनारे पर स्वयं अमृता के होंठो से उत्तरी कॉफ़ी के रंग स लाली लगी थी. मुस्कुरा कर अपने चेहरे के आगे हे ब्याह करके वो जैसे फिर वही सपने देखने जाने वाली थी जिन पर उसकी माँ की आवाज ने विराम लगा दिया था लेकिन ये इतना आसान भी नहीं था.

"दरवाजा तोह खोलो जरा अमृता. नहीं है खाने का दिल तोह कोई बात नहीं पर बात सुनोगी हमारी? तुमसे सलाह करना जरुरी है एक मामले में.", अब अमृता बिना हे अपनी दशा देखे खीजती हुई उस दिशा में चल दी दरवाजा खोलने. और अपनी बेटी को ऐसे अलसाया सा अस्त व्यस्त देखने के बाद रानी माँ ने वो अलग सा नूर भी देखा जो इस अवस्था में भी अमृता का अबतक का सबसे खूबसूरत चित्रण कर रहा था. ऐसा उन्होंने स्वयं कभी नहीं देखा था लेकिन ये जो सामने थी आज बिलकुल भी anushasit-shaleen और सलीके से नहीं थी. कुर्ती कही से ऊपर निचे, जगह जगह चुन्नट पड़ी हुई और वो घुंगराले केश जिन्हे अक्सर अमृता बंधे रखती थी या dupatte-saree के पल्लू से वो छिपे रहते थे, आज कही चेहरे के सामने से सीने तक तोह कही दूसरे गाल पर कंधे से आगे. चेहरे पर आलस सिर्फ नजरो में था जबकि चमक और अलग सी सुर्खी.

"देखती रहोगी माँ? आ जाओ अंदर या रहने दो आपके कमरे में हे चलते है आज तोह?"

"शठ. हमे भीतर आने दो और हमारे कक्ष में हमने बुलाया नहीं और न तुमने वह दस्तक दी थी. हे राम.. ये राजकुमारी का कमरा हे है न या हम किसी स्कूली बचे के कमरे में पहुंच गए है? सिरहाने फर्श पर, चादर देखो और ये तुम्हारा दुपट्टा वह कुर्सी पर.. किताबे मेज से निचे गिरी हुई.. अमृता कही तुमने शराब तोह नहीं पी?", रानी माँ के तोह मुँह पर हे हाथ चला आया था और अमृता अब कही ये सब देख रही थी जो उसकी माँ ने बताया. चेहरे पर शर्म और पकडे जाने का डर लेकिन वो अपनी माँ के सामने भी आजकल चंचलपन दिखने से बाज नहीं आती थी.

"हम सोये थे और वो बड़ी खिड़की खुली थी माँ. कोई बन्दर आया होगा जिसने ये सब किया और चला गया. देखो वह पर फ्रूट्स भी रखे हुए थे ढेर सारे लेकिन अब थोड़े हे बचे है.", रानी माँ तकिये बिस्टेर पर रखने के साथ खुद हे उस उजली हुई सफ़ेद चादर और एक फ़ीट ऊँचे नरम गड्डो को व्यवस्थित करने लगी. अमृता मुँह छुपाती हुई किताबे वापिस टेबल पर टिकती हुई तुरंत बिस्टेर की तरफ लपकी जहा उसकी माँ पहुंचने हे वाली थी. एकमात्र पहले से पड़े तकिये के निचे से वो 3क्ष5 की फोटो निकाल कर वो पलटी तोह अब माँ बिस्टेर की तरफ आगे न बढ़ती उसके सामने कड़ी थी.

"ये कौनसा बन्दर था बिटिया जो ट्रे केले और पापाया छोड़ गया? और हमारी आलसी राजकुमारी ने ऐसी फुर्ती जिस कागज़ के लिए दिखाई है, कोई षड़यंत्र तोह नहीं वो जिसमे तुम और तुम्हारा बन्दर शामिल हो?", अब वो माँ हे थी जो बचे को हंसी मजाक में हे रेंज हाथ पकड़ लेती थी चाहे बचे कितने भी बड़े क्यों न हो जाए.

"ऐसा कुछ भी नहीं है माँ. वो तोह बस ये जरुरी कागज़ है और आप बीएड ठीक कर रही थी जिस से कही ये दिवार वाली तरफ न सरक जाता. हाँ और हम बन्दर से दोस्ती करने वाले लगते है क्या आपको? अब उसको क्या पसंद है क्या नहीं, ये उसकी मर्जी. आप आजकल बेमतलब बहोत से अनुमान लगाने लगी है.", अमृता आसानी से हार स्वीकार करने वालो में से नहीं थी और अपनी गलती पर तोह बिलकुल भी नहीं जो रानी माँ ाचे से जानती थी. जूस का गिलास उठा कर उन्होंने बस एक बार सही से देखा और उसको छोटी मेज पर राखी ट्रे में रख दिया. ट्रे में पहले से हे कॉफ़ी का कप पड़ा था जिसको हाथ तक नहीं लगाया गया था और सैंडविच जिसका एक हिस्सा हे खाया गया था लेकिन वह भी थोड़ी सी गहरे भूरे रंग की परत थी, मामूली सी. अपनी माँ को ऐसे वो सब गौर से निरिक्षण करते देख अमृता ने अपने बाल सही करने के साथ थोड़ा जिस्म को भी व्यवस्थित किया. पता नहीं अब वो क्या पूछ ले और अर्जुन का बताना भी पड़ेगा और खुद को बचाना भी.

"कमरे में और कौन आया था...

"अर्जुन नहीं आया था माँ. मतलब आया था पर चला गया था.", जल्दबाजी में अमृता ने सवाल सुन्न ने से पहले हे जवाब दे दिया था. उसको यही लग रहा था के माँ पूछने वाली है 'कमरे में अर्जुन आया था'

"हाँ चला तोह गया है क्योंकि हमे भी थोड़ा बहोत दिखाई देता है लेकिन ये बन्दर महल के नियम कानून तोड़ने के साथ अब भीतर भी उत्पात मचने लगा है. कड़ी सजा मिलेगी इस बन्दर को हाथ लगने पर."

"ये सब अर्जुन ने नहीं किया माँ.", अमृता के चेहरे पर परेशानी देख कर रानी माँ बस हलके से मुस्कुरायी फिर वापिस गंभीर.

"हमने कब कहा की अर्जुन को सजा देंगे? हम तोह उस बन्दर के लिए कह रहे है जो आजकल महल में उत्पात मचने के बाद हमारे shayan-kaksh तक आ पहचा. बोल देते है प्रेहरियो को गोली मार दे या जाल में पकड़ कर फिर जंगल में हे छोड़ आये. हमारी बेटी का झूठा सैंडविच तक नहीं छोड़ा उस बन्दर ने.", अब अमृता अपने दोनों हाथ मुँह पर रखती धम्म से बिस्टेर पर बैठ गयी और उसकी हालत देख कर सौंदर्य जी भी स्नेह से उसके सर पे हाथ फेरते हुए बगल में.

"हमने तोह पहले हे कहा था बेटी की वो मनमोहन तुम जीना सीखा देगा. वो इन सामाजिक या शाही नियमो से कही परे है और सभी से प्रेम करता है चाहे बदले में सामने वाला उसका अहित हे क्यों न चाहे. तुम चाँद देखते देखते उसके करीब हे पहुंच गयी. कही पा तोह नहीं लिया न उस चाँद को?", ममता के स्पर्श से तोह पठार भी बोल उठते है और यहाँ तोह ये चंचला थी जो अपनी माँ और भाई की आँख का सबसे बहुमूल्य नूर. अमृता अपनी माँ की बगल से लगती हुए अपना चेहरा उनके कंधे पर रखती हुई शुन्य में जैसे जवाब ढूंढ़ने लगी. आसान नहीं था सब समझाना चाहे माँ खुद समझती थी ऐसे हाल को.

"चाँद किसी एक का नहीं होता माँ लेकिन ये चाँद भी नहीं है. हाँ आप ठीक कहती है की उसका आकर्षण किसी अदृश्य डोर सा है जिसमे मुझ जैसी 37 बरस की आधी अधूरी दुनिया की समझ रखने वाली और हमेशा niyam-daayro में रेहनी वाली ऐसी औरत जो कई सर झुका सकती है वो खुद उसके कदमो में गिरने लगी. वो अलग बात है की उसने गिरने से पहले हमे सुरक्षित संभाल लिया. मुझे ऐसे मामलो की समझ नहीं है माँ लेकिन मैं ये नया बदलाव पसंद करती हु. उसके साथ बचपन लौट रहा है और वो समय जिस से अनजान बस मैं कॉलेज और उत्तराधिकाओ में हे रह गयी थी. मनमोहन तोह लफ्ज़ हे सही नहीं उस फरेबी के लिए. हाँ वो आपको ऐसी ऐसी दुनिया में ले जाता है जो वास्तविकता से परे लगती है, एक मीठा फरेब. हम गलत कर रहे है रानी माँ लेकिन हमे पछतावा क्यों नहीं हो रहा? क्यों ऐसा लगता है की हमने पहली बार इंद्रधनुष का सपर्श कर लिया है. उसके वो रंग हर अंधकार को खुद में सोख कर हमे रात में भी निहारिका (नाब्युला) सा दिखते है. कितना खूबसूरत लगता है जब उसके जाने के बाद भी हम उसकी परछाई को अपने आसपास हे महसूस करते है. जानते है ये कही से भी सामाजिक नहीं है लेकिन अगर घुटन दूर हो रही है तोह फिर हमे इसके बदले हर सजा मंजूर है. उसको पाने की गुस्ताखी नहीं कर सकते, कभी कभी बस 2 घडी मिलना बहोत होगा.", उस शुन्य में खोयी अमृता के चेहरे पर इतने भाव आ रहे थे की कोई चित्रकार उनको चित्रपट पर उतारने के काबिल न था. मुस्कुराते हुए अपनी बेटी के वर्णन को सुनती हुई रानी माँ के नेत्र भी सजल हो उठे थे हर लफ्ज़ को सुन्न और महसूस करके.

"Divya-pram किसी रिश्ते का मोहताज नहीं होता बेटी और जब ये इतना गहरा हो तोह फिर क्या नियम और क्या उन्हें बनाने वाले हम और ये समाज. ऐसा तोह हमने महसूस करना तोह दूर विश्व की किसी पुस्तक या ग्रन्थ में नहीं पढ़ा. वो तुमने कहा न निहारिका... इंग्लैंड में हमने कुछ चित्र देखे थे अजयबघर में, वो किसी निहारिका के हे थे और हम विस्मृत थे की क्या कुदरत ऐसे रंग भी दिखा सकती है. वह उस घने अन्धकार में तोह टूटे तारे समाहित हो जाते है फिर ये इंद्रधनुषी रंग जो अट्ठहास करते उस अंधकार को भी अपना गुलाम बनाये थे. अर्जुन हमेशा से हे ख़ास है ठीक वैसे हे दुर्लभ. हम बूढ़े हो चले है अमृता, तुम्हारी बहिन होते न तोह प्रतिस्पर्धी होते इस मामले में. हाहाहा..", चेहरा साफ़ करती हुई वो जिस तरह मुस्कुराई थी अमृता भी उतनी आकर्षक न लगती. उम्र के इस पड़ाव पे जहा बाल चंडी से उजले हो चले थे, चेहरे पर झुर्रियां तक न थी और हर दांत हीरे सा तराशा एक सार. अपने नाम पर सौंदर्य आज तक बरकरार थी चाहे उनकी बेटी हजारो दिलो की स्वप्निल चाहत हो पर सौंदर्य, उन्हें तोह अतीत में कभी जनता के सामने न लाया जाता था.

"फिर तोह वो आपका हो के हे रह जाता माँ, आज काम से काम वो आजाद परिंदा तोह है. वैसे एक बात पूछे? अर्जुन से हे जुडी हुई है और अगर आप जवाब देना चाहे तोह हमे ाचा लगेगा.", अमृता ने उठ कर बिस्टेर पर दोनों के तकिये लगाए और माँ को अपने करीब हे लेटने की प्यारी अर्ज़ी लगाईं. सौंदर्य जी जाने किन विचारो में खोयी खुश थी की हाँ कर बैठी अपनी बेटी के बगल में सही करवट से लेती.

"अर्जुन और बापू जी को तोह हमने कपड़े करके देखा और थोड़ा समझा. वो समझ आ सके थे लेकिन ये मस्तमौला सा है और बहोत अलग भी उनसे बिलकुल उलट. बापू जी गंभीर इंसान थे जितना हमे पता और सुना, वो हँसते बोलते होंगे पर नियम और वचन उनके लिए सर्वोपरि थे. अपने नाम के साथ माँ का नाम लिखते थे और इस वजह से हे उन्होंने कभी चरित्र पर आंच न आने दी. अर्जुन आपको उनके जैसा कहा से लगा? वो तोह छलिया है न? और पंडित जी जैसे न तोह संरक्षक और न किसी वचन में बंधा. फिर वो बापू जी का वारिस बना कैसे जबकि इन्दर भैया तोह कही ज्यादा इस मामले में बापू जी जैसे है."

"किसने कहा के अर्जुन वचन में नहीं बंधा हुआ? वो आजाद दीखता है लेकिन हम और तुम उसके सिर्फ अंश मात्रा से परिचित है. स्वयं पंडित जी अर्जुन का मान करते है चाहे वो कहते या दिखते नहीं. बापू जी स्वयं वारिस नहीं थे बेटी बस उन्होंने विरासत सुपुर्द कर दी थी और वारिस बन्न ने के नियमो पर कोई खरा नहीं उतरा चाहे वो उमेद हो, शंकर, इन्दर, विनोद या कुमार हे क्यों नहीं. हाँ कुमार भी बन सकता था उनकी विरासत का मालिक पर वो उन शर्तो पे खरा नहीं उतरा जो बापू जी ने अपने दिल से लिखी थी. अर्जुन ने स्कूल के साथ साथ अनधिकृत शाही शिक्षा भी ग्रहण की जैसा हमारे समय के बाद नहीं हुआ. वो आत्मिक, बौद्धिक और शारीरिक बल की परीक्षा स्कूल ख़तम करने से पहले उत्तरीन कर चूका है. उसको सीखना नहीं सिर्फ बताना पड़ता है और वो वैसा कर देता. सबसे ख़ास है उसके रक्त में दया का भाव जो स्वयं पंडित जी में भी कभी कभी नहीं होता. बाकी सबके तोह हाथ भी खून से रेंज है.", सोचते हुए रानी माँ कुछ बेचैन से होने लगी थी और अमृता ने ये भी भांप लिया.

"आप उसके बारे में ये सब जानती है लेकिन कुछ ऐसा है जो आप चाह कर भी बोल नहीं पा रही माँ. वो खून तोह शंकर भैया का हे है और आगे पंडित जी और फिर बापू जी. तोह वो दुर्लभ कैसे है माँ? और अब हमारा एक और सवाल है जिसका जवाब हम चाहते है आपकी बेटी होने के तौर पर. आज अर्जुन पुराने रानीघर में आया था हमे खोजने और वह उसकी माँ की तस्वीर थी. ये इत्तेफ़ाक़ नहीं हो सकता माँ क्योंकि 100 बरस पुराणी पेंटिंग का चेहरा आज की रेखा जी जैसी कैसे हो सकती है? और ये अर्जुन बापू जी जैसा दीखता है मतलब वो औरत.. वो उनकी माँ थी जिनकी पेंटिंग वह धुल में बंद थी?", अब अमृता परेशां थी और रानी माँ खामोश.

"अर्जुन ने कैसे देखा उस तस्वीर को अमृता? और उसकी क्या प्रतिक्रिया थी?"

"वो बस हम... उसके साथ शरारत करते हुए भाग रहे थे.. और हमारे पीछे भागते अर्जुन का गलियारे में पाँव फिसल गया, गिरने से बचने के लिए उसने वो पर्दा थाम लिया जिस से पेंटिंग ढंकी हुई थी. लेकिन वो गिर गया था और पेंटिंग उसकी आँखों के सामने आ गयी. पर उसने ज्यादा उत्साह नहीं दिखाया शुरू में हैरान होने के बाद. वो कह रहा था की थोड़ी बहोत उसकी माँ उस पेंटिंग वाली औरत जैसी है. और वो उसको उतार कर देखने लगा लेकिन कोई नाम नहीं मिला. न पेंटिंग बनाने वाले का न उस औरत का. कह रहा था के वो आपसे बात करेगा उसके बारे में. लेकिन अर्जुन ताल गया पर आप तोह जानती होंगी न उसके बारे में क्योंकि नजर तोह आप भी अर्जुन की माँ से चुरा रही थी. वो बहोत खूबसूरत है, आपसे भी लेकिन वो बस बहु है पंडित जी के परिवार की, है न माँ? कोई और वजह तोह नहीं है न इसके पीछे?"

"कोई वजह नहीं है बेटी, तुम्हारी कसम ये सब संयोग हे है और हमे नहीं पता की ये अब क्यों दोहराया जा रहा है. वो तस्वीर हमारे जनम के पहले से हे उधर रही है और उनके बराबर किसी की भी नहीं लगाईं गयी. माँ से पूछते थे तोह वो यही कहती थी की वो देवी है और पिता जी तोह हमेशा दरबार में जाने से पहले उनके सामने हाथ जोड़ कर जाते थे लेकिन उन्होंने भी यहाँ बताया की ये उनके जनम से हे उधर है किसी ख़ास की. तब भी उस तस्वीर पर सांझ ढलते पर्दा हो जाता था और सुबह हटाया जाता था. हमने वो चेहरा बचपन से देखा था और हर रोज देखा. जब हम पंडित जी के परिवार से मिले थे तोह पहली बार रेखा को देखते हे हम सेहम गए जाने किस वजह से. वो शंकर की बीवी है, यही परिचय मिला था. अर्जुन को तोह हमने स्वय तुम्हारे साथ हे वह विवाह अवसर पर देखा जो उस वक़्त आभास दिलाता था बापू जी के व्यक्तित्व का. जिस दिन वह से वापिस लौटे हमने भरसक कोशिश की इस कड़ी को समझने और सुलझाने की लेकिन रेखा उधर हे अगले शहर से, संपन्न परिवार जो पंडित जी का पुराण साथी रहा है इनके विवाह से भी पहले से. हमे पता है की हमने गलत तरह से छानबीन करवाई पर हमारी परेशानी भी निरर्थक नहीं है अमृता."

"हाँ हो भी कैसे सकती है माँ जब आपने इतने बरस वो चेहरा देखा जिक्से बारे में कोई जानकारी हे नहीं और इस उम्र में वो साक्षात् सामने आ खड़ा हो तोह डर भी लगेगा. अर्जुन भैया और पंडित जी की जगह बापू जी जैसा दीखता है और रेखा जी उस बरसो पुराणी पेंटिंग जैसी. आपस में अर्जुन और रेखा जी का रिश्ता माँ बेटे का है. बापू जी की माँ तोह नहीं है वो पेंटिंग वाली?"

"मुमकिन नहीं है ऐसा होना बेटी. उनकी तस्वीर यहाँ कैसे हो सकती है जहा स्वयं बापू जी का प्रवेश वर्जित था.? पर उन्हें देवी कहा जाता था और रेखा के लिए ऐसे विचार स्वयं कौशल्या जी के है. देखा नहीं वारिस में स्वयं रेखा संरक्षक है और एक माँ ने स्वयं बेटे को वचन के सुपुर्द कर दिया. इतना बड़ा दिल हर माँ का नहीं होता और वो भी जब पहले से हे एक नवजात खो चुके हो परिवार में. खैर आये तोह थे तुमसे अलग बात पर चर्चा करने लेकिन पहले तुम्हारे बन्दर ने हमे हैरान कर दिया और अब अतीत ने जिसके जवाब तोह देने वाला हे कोई ज़िंदा नहीं बचा."

"कर लीजिये जो बात करनी है माँ. वैसे भी 3 घंटे सोये है हम अभी."

"उसको सोना नहीं सोचना कहते है, खयालो में सोचना. अर्जुन हमारे ककसक में सन्देश छोड़ कर गया था जाने से पहले की कल मैं और तुम महेंद्र के साथ वह दरगाह पर आये. उसकी गुजारिश है मुझसे लेकिन तुम दोनों नहीं गए तोह वो इधर नहीं आने वाला फिर. देख लो कैसे फरेब करता है ये तुम्हारा फरेबी. साफ़ नहीं कहा के मुझसे भी नहीं मिलेगा, क्योंकि उसके लिए भी इधर हे आना पड़ेगा और हम अपनी बेटी को अकेले भेजने नहीं वाले. पहले हम कभी ऐसे मंच पर नहीं गए अमृता और जब अर्जुन में अपने बेटे को देखते है तोह ममता पर डर हावी होने लगता है."

"आप अपनी ममता से बंधी रहिये लेकिन मुझे वो पहले हे मन चूका है आने के लिए और पंडित जी से भी कहलवा दिया है जब उसने घर फ़ोन किया था यहाँ आने के बाद.", अमृता को वापिस चहकते देख रानी माँ मुस्कुराती हुई ना में सर हिलती हुई खुश हो रही थी.

"तुम्हे वो कैसे मनाएगा जब तुम पहले हे maani-manaai हो. मुझे भी जाना पड़ेगा बेटी, वो तोह महल आने नहीं वाले लेकिन मिलना जरुरी है. बस यही पूछने आयी थी की तुम चलोगी? मुझे ाचा लगता तुम्हारी हाँ से पर तुम पहले हे उसको हाँ कर बैठी जो फिर भी हमसे इजाजत ले रहा था. चलो, तुम आराम करो या फिर वो कागज निकल कर चेहरा निहारो. मैं अपने कमरे में जा रही हु और तुम्हारा भोजन सेविका यही पंहुचा देगी जब इत्छा हो. वैसे bhookh-pyaas वाली बातें सुनी थी लेकिन आज यकीन हो गया. शुबरात्रि.", अब अमृता कैसे कहती की आज तोह अर्जुन ने बस थोड़े हे prem-rang बरसाए थे लेकिन वो उतने को भी तैयार न थी पर फिर भी उसके साथ बह गयी. आज उसके होंठो की सुर्खी इसी बिस्टेर पर वो फरेबी ाचे से साफ़ करके गया था जिसके बस कच्चे ख्वाब हे देखे थे अमृता ने और वो कहने की कोशिश करती उस से पहले हे वो मैं पढ़ चूका था. किसी फूल की तरह अपने पहलु में उठाये आज अर्जुन ने बिस्टेर, मेज और यहाँ तक की दिवार से लगा कर अमृता के अछूते बदन पर हर तरफ स्पर्श किया था सिर्फ 2 ख़ास अंगो को महफूज रखते हुए, जिन्हे वो जल्द हे तसल्ली से देखने और प्यार करने वाला था.

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"खाने के वक़्त तोह आज सबके साथ बड़े चहक रहे थे लेकिन यहाँ हालात बिलकुल अलग है. और कमरा बंद क्यों किया था?", रात गहराने के साथ हे अर्जुन भोजन के बाद सबसे थोड़ी बहोत बातें करके विनोद चाचा के साथ टहलने चला गया था. ये लोग करीब एक घंटे बाद लौटे थे और चाचा कपडे बदल कर अपने कमरे में सोने चले गए और अर्जुन अपना पिटारा लिए इस कमरे में बंद हो गया. आँचल के आने पर उसने वापिस बक्सा बंद करते हुए उसको अलमारी में रख कर दरवाजा खोला. एक बार तोह वो भी थोड़ा सेहम गया था क्योंकि आँचल का उसके कमरे में ऐसे रात में आना किसी को भी खटक सकता था लेकिन अब आ गयी थी और वो खुश दिख रही थी.

"कोई हालात नहीं बदले है बस थोड़ी देर पढ़ने के बाद सोने हे वाला था. सुबह जल्दी तैयार होना है और फिर वह देखो ये लोग मेरे साथ क्या करते है. वैसे आप खुश लग रही हो, आओ थोड़ी देर बैठते है फिर पढ़ाई कर लूंगा.", अर्जुन ने रास्ता दिया तोह आँचल ने भीतर दाखिल होते हे हलके से उसका गाल चूम लिया. वो भरपूर चंचलता से धम्म से बिस्टेर पर जा पसरी जैसे ये कमरा इन nav-dampatti का हो. अर्जुन के साथ बहोत हद्द तक फुर्सत पा चुकी थी आँचल चाहे उसकी शर्म कुछ हावी होती लेकिन दिल में अर्जुन कही ज्यादा गहरा बैठ चूका था.

"आपकी नानी और नाना में से कोई देख लेता तोह पता है क्या होता?", अर्जुन चलता हुआ बिस्टेर के दूसरी तरफ तक लगते हुए पसर गया. दरवाजा चिटकनी लगाए बिना बंद किया था फिलहाल जो आँचल देखते हुए मुँह बना चुकी थी.

"नानी तोह न उठने वाली सुबह 5 बजे से पहले और लेट भी हो सकता है. और नाना कोई सोये भी एक घंटा हो चूका तोह फ़िक्र किस बात की? और गाल पे हे तोह किश किया है, बड़े आये परेशां होने वाले.", अर्जुन ाचे से आँचल के चेहरे और फिर उसके कैसे हुए बिना ब्याह के टॉप और चुस्त पाजामे को देखता हुआ मुस्कुरा भर दिया. आँचल भरपूर जवान और आकर्षक युवती थी चाहे बहरी दुनिया में काम दिलचस्पी रखती रही लेकिन देखने वाला तोह बस ऐसी हे संगिनी और प्रेमिका की कामना करता था. यौवन के भरपूर उठान और पतली कमर के साथ उसके चेहरे की अलग सी सादगी और तराशे हुए भरे भरे होंठ. अर्जुन पास खिसक कर उसके समतल पेट पर हाथ रखते हुए हौले से सहलाने लगा तोह आँचल की सानें अनियंत्रित हो चली और हाथ वही दबा लिया.

"अब पता लगा जब खुद पर आयी? दादी सोई है लेकिन उनकी नींद कच्ची बहोत है. और 2 कमरों के बाद चाचा का कमरा है जो अभी जागे भी हो सकते है. वैसे देख रहा हु की तुम अभी अभी नाहा कर आयी हो और ये कपडे कही से तुम्हारी नानी के मापदंड पर खरे नहीं utarte.",Ab आँचल हलके से हँसते हुए उसके कंधे पर मारने लगी थी.

"उन्हें नींद की गोली खिलाई है नाना जी ने. कह रही थी की थकान महसूस कर रही है पर नींद भी नहीं आ रही. फिर मैंने वही गोली उनके दूध में भी मिला दी. गोली चबा के खाती है न तोह क्या हे दूध का स्वाद पता चलता. और मां अपने काम में लगे होंगे अगर नहीं सोये तोह. वैसे पहले वो बोल रहे थे के तुम एक में सो जाओ उनके कमरे में लेकिन मामी ने कहा के अर्जुन अपने कमरे में सोयेगा. उसको पढ़ना होता है. बड़ा ध्यान रहता है मामी को तुम्हारा. नहीं?", अर्जुन समझ रहा था के आँचल कहा इशारा कर रही है चाहे मजाक में सही लेकिन उसने भी बात का रुख बदल कर उस कासी हुई टीशर्ट के पेट वाली तरफ से अंदर उँगलियाँ पंहुचा दी. मखमल सा नरम वो नाभि वाला हिस्सा अभी नहाने की वजह से अलग सी ठंडक भरा था लेकिन अर्जुन के इस स्पर्श से आँचल ने अपनी टाँगे कस ली. वो वही हौले हौले उस चिकनी त्वचा को सहलाते हुए थोड़ा आगे बढ़ रहा था और आँचल खुद हे अपना चेहरा अर्जुन के गले पर रखती उसको चूमने लगी. ज्यादा समय नहीं गुजरा जब वो खुद उसके पेट पर बैठी बड़े प्यार से ये ढिमरे चुम्बन कर रही थी. कभी अर्जुन उसके एक होंठ को मुँह में भरते हुए चूसता तोह कभी आँचल ये दोहराती. बदन पर छिपी टीशर्ट के भीतर अर्जुन के हाथो का सपर्श जैसे हे उन भरे हुए चुचो की जड़ में महसूस हुआ, आँचल कांपती हुई अर्जुन से कास के लिपट गयी. वो उत्तेजना के चरम पर थी और ये भी परवाह नहीं की कोई उन्हें देख भी सकता है चाहे खिड़की दरवाजे बंद हे सही, चिटकनी नहीं लगी थी.

"ओह्ह्ह.. तुम जानबूझ के ऐसा करते हो न? शाम को जब आयी थी तब भी ऐसे हे तड़पा के छोड़ दिया और अब भी..", अर्जुन के हाथ अपनी पीठ को सहलाते देख आँचल की चेतना लौटी. अर्जुन ने वक्षो को पकडे बिना हे हाथ खिंच लिए थे लेकिन आँचल की गर्मी 10 मिनट के इस हलके स्पर्श और गहरे चुम्बनों से हे अपनी चरम पर जा पहुंची थी जिसको अर्जुन ने एकदम हे ठंडा कर दिया, हरकते बंद करके. आँचल के चेहरे को अपने सामने देख अर्जुन ने चेहरे पर आया पसीना अपने हाथ से सेहला कर हटते हुए जवाब दिया.

"कहा था न की सब आराम आराम से और प्यार से. जानता हु आपको कुछ ज्यादा हे जल्दी है लेकिन आपकी वो बड़ी वजह तोह मैंने दूर कर हे दी न? न या आपकी माँ है और न अब विनोद चाचा आपको उस दृष्टि से देखते है. जब दिल भी मेरा और आप भी, तोह इतना बेसबर नहीं होना. हाँ थोड़ा जानबूझ के किया लेकिन क्या ये सब ाचा नहीं लगा?", आँचल अब शर्म से नजरे चुराती हुई उसके सीने को कुरेद रही थी.

"ाचा भी लगा और बुरा भी. उस दिन के बाद मुझे सबकुछ अजीब सा लगता है अर्जुन. अकेले सोने पर वही दीखता है और फिर तुम्हारा चेहरा. उसके बाद बस यही लगता है की तुम वैसे हे मुझे थामे रहो और कोई हद्द न हो. नींद खुलती है तोह खुद की सोच पर हे झुंझला जाती हो लेकिन फिर वही हालत जब तुम सामने आते हो और दिल वही चाहत जाहिर कर देता है. अपना लो न मुझे, वो चाहत बहोत मुश्किल है हर रात सम्भालनि.", अर्जुन का हाथ खुद हे आँचल ने अपने उभरे हुए सीने पर टिका दिया था. उनका वो एहसास और अकार शब्दों में बयान करने लायक न था. कपडे के भीतर ये गोल उभर बिना किसी पिंजरे के खुले थे लेकिन उनकी सख्ती और गोलाई अध्भुत्त. अर्जुन उन्हें अगर अभी मसलता तोह यक़ीनन वो खुद समय से पहले इस रात हे आँचल को लड़की से औरत बना देता. वैसे भी वो माधुरी दीदी की हमउम्र थी लेकिन kaam-gyaan लगभग शुन्य. जो भी देखा था वो बस घिनोना वासना का खेल जो उसकी माँ का हे रहता था विभिन्न साथियों संग. वो उत्तजित जरूर थी लेकिन वासना में अंधी नहीं.

"कल का दिन दो मुझे आँचल, उसके बाद पहल मैं हे करूँगा. मुझे भी पल भुलाये नहीं भूलता जब तुम्हे बाथरूम में देखा था. आने वाली दूसरी रात बस हम दोनों होंगे आँचल और सुबह होने तक मैं तुम्हे सोने नहीं देने वाला. खवाहिश है एक, फिर से तुम्हे वैसे हे देखने की लेकिन उस रात.", आँचल तोह शर्म से दोहरी हो चली थी वो दृश्य याद करते हुए जहा अर्जुन ने उसका एक तरफ से आधा वक्ष और पिछले समूचा हिस्सा देखा था, पानी से भीगा और जिस्म पर एकमात्र वस्त्र बस पंतय थी, भीगी हुई.

"ऐसा बोलो न की आज की रात भी सोने नहीं डोज मुझे. चलती हु, तुम पढ़ लो. ज्यादा besir-pair की ख्वाहिशे मैट बताया करो.", इस बार उसके उठने से पहले अर्जुन ने मजबूती से दोनों सुघड़ लचीले नितम्भ पकड़ कर दबाते हुए अपने होंठ फिर से आँचल से चिपका दिए थे. इस बार आँचल ने वो अंग अपनी अछूती जुगनी के निचे महसूस किया था जो उकसी कल्पना और दामिनी के सांसर्गियों वालो के औजार से कही ज्यादा हे भीषण था. हल्का आभास तोह उसको अर्जुन ने उसके घर हे करवा दिया था पर अभी वो उसके ऊपर बैठी थी जो कपडे के ऊपर से हे अपनी सख्ती और गर्मी से उसकी क्योंकि को चेतावनी दे रहा था लेकिन उसकी योनि के इरादे तोह विपरीत हे थे जो मिलने के लिए अभी से आंसू टपकने लगी थी. आँचल चुम्बन समाप्त होते हे बिस्टेर से उछलती हुई बिना अर्जुन को देखे दरवाजा खोल कर अपने कमरे में बंद हो गयी. अर्जुन ख़ामोशी से हंस रहा था अपनी बनियान पर आँचल द्वारा छोड़ी उस गीली चाप को देखते हुए. लिंग नाभि की तरफ अकड़ा हुआ उस से भी आगे थे.

'शांत रहा कर थोड़ा. यहाँ पहले और भी जरुरी काम है लेकिन तू सर उठा ले पहले. आज जस डार्लिंग मिलने वाली है तुझसे, फिर 2 दिन परेशां मैट करियो यार.', अर्जुन अपने लिंग को सही करता हुआ जैसे उसको मन रहा था खुश करने के साथ. लेकिन अपने कमरे के भीतर क़ैद हुई आँचल तोह पजामा उतार कर बाथरूम में हे घुस चुकी थी. आज उसका इतने से हे सखलन हो गया था जो पंतय न होने की वजह से पतले कपडे से बहार तक महसूस हुआ.

'बड़े पंडित जी, अब जरा आपकी भी सुन्न ले थोड़ी, फिर हमको भी सुकून लेने जाना है क्योंकि चैन तोह आप लेने नहीं देते.', दरवाजा इस बार ाचे से बंद कर दिया था अर्जुन ने क्योंकि अब वो किसी आहात से भी हिलने नहीं वाला था.

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"लिखना भी एक कठिन कार्य है और अब हम समझते है क्यों कृष्ण विद्यालय जाने से कतराता था. आज हमे घर गए हुए 5 दिन हो चुके है परन्तु ग्रेह्स्थी से कुछ बढ़कर सामाजिक दायित्व और प्रान्त की सुख शांति है. इसको भांग करने वाले भी अपने हे हो तोह मुश्किलें और ज्यादा. पहले हे इन अपनों ने पीठ ढकने लायक नहीं छोड़ी और उस से उबार सकते लेकिन प्रभु नारायण जैसे इसकी इजाजत नहीं देते. बलविंदर के साले साहब वो ज्योत्सना के भाई सुमेध ने गहरी साजिश रची थी जिसमे सरकारी हस्तक्षेप जुड़वाँ कर वो अलग मनसूबे पाले बैठा था. बलविंदर पर हे हुम्ला करवा दिया जब वो सुरक्षा बिना जनता के बीच था. क्षेत्र कुछ सरहद से बहार था और वह के प्रशाशन ने तोह लिखा पढ़ी तक से इंकार कर दिया. मैं तोह पहले से हे राणा के खिलाफ था उसको सुरक्षा अधिकारी बनाने के लेकिन बलविंदर कभी कभी dil-dimaag से नहीं चलता. घायल हुआ पर बच गया गनीमत है. दरबार, जनता और यहाँ की जिम्मेवारियों के साथ बलविंदर की भी देखभाल भी जरुरी है. हाँ 4 लोग ढून्ढ कर काट दिए हमने और एक को वह जीवित छोड़ दिया और एक को साथ ले आये. जीवित इसलिए की सुमेध को मालूम रहे की हमारी तलवार किसी सरहद और प्रशाशन अनुसार नहीं चलती. इसको हमारे हाथ चलते है जब जब कोई हमारे अपने को ठेस पहुंचने की हिमाकत करता है. राणा सबसे पहले अदृश्य हो गया खबर मिलते हे. जाने देते है उसको अभी नहीं तोह विदेश बैठी ज्योत्सना पहली बार हमे अपशब्द कहेगी. परसो कृष्ण आया था भोजन ले कर साइकिल से, पागल है थोड़ा जो गर्मी भी नहीं देखता. बता रहा था के घर पे बड़ी बहु और बचे आये है. देवकी बहु की तबियत ठीक नहीं है, गर्भवती होने की वजह से.

अब क्या कहे इस हमारे saral-buddhi को? इनकी माँ ने कहलवा भी भेजा की अगर महल का खाना इतना हे पसंद है तोह उनकी हवेली 10 कोस दूर क्यों बनवा दी हमने. खैर वो तोह ऐसे हे कभी कभी शिकायत करती है जिस से हमे ध्यान रहे की उनके हाथो का भोजन हमारी हर परेशानी, थकान और भूख शांत कर देता है. देवकी की भाई आये थे उसको लिवाने के लिए पीहर और जब हमे इसकी जानकारी मिली तोह स्पष्ट न कर दी हमने. चालबाजों को तोह नींद में भी पकड़ लेते है फिर ये तोह अब रिश्तेदार हो चुके है. कैसे हमारे घर की संतान उस नरक में पैदा होने दे? भुनभुनाती है तोह होती रहे लेकिन वापिस पीहर तोह जाने नहीं देंगे. हमारे नालायक बेटे को देवकी ने हे फंसा था अपने इस नेत्रं के कहने पर और ये कैसा भाई हुआ जो बहिन को हे gair-mard के निचे नीरवग्ग्स करवा दे? आजतक कृष्ण ने हमे ये नहीं बताया की वो आखिर किस से मिलने गया था और उसकी प्रेयसी की जगह ये कलावती कैसे उसके पहलु में आ बैठी. अब ये आदिकाल तोह नहीं जहा लड़का लड़की बिना वस्त्रो के देखे जाए तोह सामान्य लगेगा. ऊपर से जनता में वो मुंशी के सुपुत्र है और बीसियों लोग दृश्य के गवाह बन्न गए. उस दिन ाचा रहता की संगी हे उसके साथ होता या वो कोई कतल कर देता. कतल तोह दूर की बात है इस पिद्दी से कीड़ी का दर्द नहीं देखा जाता. अब वो प्रशिक्षित अभिनेत्री रो कर शोर मचाएगी तोह बेचारा घबराएगा हे. दूसरे प्रांत की पंचायत से फैंसला आया की मुंशी मोतीलाल जी के सुपुत्र अगर ऐसा उदहारण पेश करेंगे तोह कैसे बहु बेटियों का कल्याण होगा? इनकी माता जी तोह माँ महिमा है जिन्होंने बोल दिया के मेरे बेटे ने उसको हाथ लगाया है तोह अब वो उनकी बहु हुई. इस हिसाब से हमारी तोह 15 और बनती है लेकिन क्या वो हमे ऐसा करने देंगी? भूल कर भी इसका संज्ञान हुआ तोह न मुंशी रहेंगे न वजीर, फ़कीर बन्न न पड़ेगा. अक्सर हम सरल इंसान दिल से फैंसले ले लेते है उन लोगो को सम्मान देने के लिए जिनके मैं में विपरीत विचार और उद्देश्य रहते है. बड़े बेटे की भी शादी करवानी पड़ी और उनके इस पिद्दी की भी साथ हे, उम्र से पहले ये भी कर लिया हमारे छोटे सुपुत्र ने लेकिन 5 बरस कटा कटा रहा अपनी इस अनचाही बीवी से. अब पाँव भरी कर दिए तोह सबसे बचता फिरता है जैसे कोई सवाल न पूछ ले इस जादू का जो उसने कर दिखाया. हाहाहा.. बहोत हे भोला है मेरा ये बचा और हमारी चिंता भी यही है की हमारे जाने के बाद अगर राम इसका ध्यान न रख सका तोह सब बर्बाद भी हो सकता है.

बीते सावन में राम ने बड़ा अजीब काम करवाया जब 8-10 लोगो को लिए वो पुराने घर के मलबे को साफ़ करवाने लगा. पिछले हिस्सा गिरवा दिया था हमने और बाद में बनवाया हुआ है उसमे महल के प्रमुख सेवको के 5 परिवार रहते है अब. राम से वजह पूछी तोह पहले तोह कहता रहा के वो बस साफ़ सफाई करवा रहा है लेकिन फिर रात में जब लौटा तोह ये गाँव वाली हवेली में इसने झूला डाला था सबसे पहले, हवेली तोह बाद में बानी. उस झूले को कभी हिलता तोह कभी रोक लेता. हम गलियारे में बैठे इन जनाब की ये पागल हरकत देखते रहे जबतक सेहन हुआ. जब उठ कर करीब गए तोह वो हड़बड़ा गया, आँखें भीगी हुई और गुड्डी 5 बरस वाले कपड़ो में रूई भर के ये उसको झूला झूला रहा था. एक वही तोह थी जिसको कमर पे टांग के ये कहानिया सुनाता हुआ मोहल्ले में घूमता रहता था. गुड्डी ने कहा के िढाल घोला बनो तोह रस्ते में भी झुक जाता था अपनी बहिन के लिए. विद्यालय से आने के बाद सबसे जरुरी कार्य तोह यही होता था न की गुड्डी को गॉड में उठाना है चाहे फिर वो 3 साल हे छोटी थी लेकिन राम का सर्वस्व हे थी उसकी बहिन और हमारी गुड्डी. रघु भी उतना हे करता था लेकिन वो इजहार काम क्योंकि मजबूत व्यक्ति है. राम नौकरी पर या जीवन में सख्त इंसान है लेकिन वो संवदनशील है ठीक अपनी माँ की तरह. पकडे जाने पर रात को हे निकल गया अपने बीवी बचो के पास. 5 घंटे बाद भी जाना था लेकिन चलो अब क्या कह सकते है जब हम खुद हे उसके मित्र न बन्न सके. यहाँ आते है तोह दर्द के साथ ये अनुभूति भी रहती है की हम अपनी बेटी से उसकी सालगिरह पर मिलने आ रहे है. वैसे वो akshya-tritya को जन्मी थी पर छटा साल है न उसको गए हुए आज हे के दिन तोह यही सोच लेते है की गुड्डी के बहाने अपनी अनजान उम्मीद से भी दिल का हाल बयान कर देंगे. हम तहखाने में उतरने की हिम्मत एक बार जूता सकते है लेकिन उस कक्ष की तरफ लालटेन भी नहीं दिखा सकते.

उस रात के बारे में बलविंदर ने हमसे पहली बार सवाल किये थे जैसे उसको संदेह हुआ हो की हम कुछ जानते है. पिता जी और भूपेंद्र जी का शव उतारते हुए कुछ टुकड़े तोह प्रहरियों के हाथो में हे आ गिरे थे और 4 लोग बेहोश हुए सो हुए. इस हवेली के भीतर अनिगिनत कटे फाटे शव देख कर उस वक़्त के suraksha-pramukh ने उलटी हे कर दी थी, कितना दिलेर है न राणा? तभी तोह भाग खड़ा हुआ सामना करने की जगह. अब कैसे कहते बलविंदर से की हमारी जगह वो होता तोह उसकी रूह भी काँप उठती. लेकिन मारा जाता वो अगर हमारी जगह होता. आज भी हम खुदसे सवाल करते है की क्यों हम धैर्यवान न बने और दिमाग से काम लेते तोह श्रीधर को पिछले द्वार से भागने न देते. घिर गए थे हम और तहखाने से आती चींखों ने श्रीधर को हमसे बचा लिया. सुना था के उसमे असीम बल है और उस से निडर कोई नहीं. सामना करता तोह हम उस दुष्ट को सच्चे सेवक की ताक़त से परिचित करवाते, बेशक जीवित न रहते पर ये बोझ भी दिल पर नहीं रहता की वो जीवित है. हाँ वो कही से भी इंसान नहीं है, न शरीर से और न सोच से. जब उसको दरबार से मुक्ति दे दी गयी थी तोह हमारे हे पिता ने उसको maha-gyata और साधक बता कर raaj-kosh सहायता सुचारु रखवाई. ऐसे तोह प्रभु भोलेनाथ के उपासक नहीं होते. जो होते है उन्हें हमने हे रुस्वा कर दिया. आजतक हमारे सीने के ऊपरी हिस्से में कभी कभी दर्द होता है 6 साल होने को आये लेकिन हम उस पवित्र आत्मा के मात्रा हलके हे धक्के से दूर जा गिरे थे. वो होता पराक्रम और क्षमता साधना की जिसमे सिर्फ और सिर्फ परमेश्वर और जनकल्याण की भला करने की ताक़त होती है. गए थे शैतान का पता पूछने और उनको गुस्सा दिला बैठे जो मदद कर सकते थे. रूठे हुए साधक के पास लौटने की गलती नहीं करेंगे, इन्तजार कर लेंगे हम उस दिन का जब श्रीधर अपने dum-kham सहित लौटेगा, वो सही वक़्त पर जरूर आएगा अगर उसको अपनी ताक़त पर इतना हे घमंड है. पर है पक्का षड्यंत्रकारी और घाघ जिसको किसी की परवाह नहीं सिवाए अपने नाम और असीम ताक़त की.

तुम बस इतना कर देना मित्र अगर सकुशल तहखाने तक पहुंच सको, इन बच्चियों को मुक्ति दिलवा देना. हम ऐसा नहीं कर सकते क्योंकि हमारे खुदके हाथ खून से रेंज है और इधर वही आ पायेगा जिसके दिल में दूसरे के दर्द को अपना दर्द बनाने का सहस हो. तुम यहाँ आओगे तोह खुद हे जान जाओगे की तुम क्यों हमसे बेहतर हो. मैं आनेवाली पीढ़ी में कोई वजीर नहीं देखना चाहता और न हे कोई vyapari-santri-mantri.. मैं इंसान देखना चाहता हु, एक ऐसा इंसान जो रक्षा करने पर आये तोह 10 श्रीधर भी झुका दे और 20 मोतीलाल भी. दिल में प्रेम, क्षमादान, दूसरे के दर्द में दर्द और दुसरो की ख़ुशी में भले हे शामिल न हो सको लेकिन खुश रहो. संपत्ति तोह विद्वान् रावण की भी नहीं रही लेकिन उनके ज्ञान को देवता भी मानते थे. मैं वैसी हे भविष्य की पीढ़ी चाहता हु जो समाज के बेमतलब नियम भले न माने पर समाज में उदहारण बने, परिवार को समय दे और उसको जोड़ कर रखे. हमने सुना है हमारी माँ ऐसी हे थी, थोड़ा हे सुना है और बाकी कुछ धुंदली यादें है. उन्होंने इंसान को इंसान समझा, हर जीव को पुण्य आत्मा और हर जरूरतमंद पर अपने औचित्य अनुसार मदद. हाँ कुछ मामलो में उन्होंने ज्यादा मदद भी की होगी और वो समर्थ थी. हमसे बहोत प्यार करती थी और बीटा तुम, तुम जितना हो सके अपनी माँ को वक़्त देना जब भी समय हो इतने व्यस्त जीवन में. वो कभी गुजारिश नहीं करेगी और न कहेगी की उसको तुम्हारे समय की जरुरत है. व्यस्त होने का दिखावा करेगी जिस से तुम अपना समय अपनी मर्जी अनुसार जी सको. पर यकीन करो, अकेलेपन और दर्द में सबसे पहले स्मरण भी हे आती है.. आठ माँ.. ये लफ्ज़ हे नहीं पूरी दुनिया है जिस से तुम दुनिया में आये हो. फिर चाहे पूरी दुनिया हांसिल कर लो लेकिन अगर माँ का साया नहीं है न तोह वो बेमतलब है. तुम्हे तुम्हारी भार्या (बीवी) समझ सकती है, बहिन स्नेह दे सकती है ख़याल रखने के साथ या वो लोग जो तुमसे प्यार करते है वो sukh-dukh में खड़े हो सकते है साथ. लेकिन 'मैं यही हु बीटा' लफ्ज़ कह कर तुम्हे अपने सीने से किसी भी उम्र में लगा लेने वाली माँ हर दुःख और दर्द का रामबाण है. दुनिया में सबसे बड़ा सुख और दर्द मातृत्व है और वो महिला को हे मिला क्योंकि पुरुष ताक़तवर हो सकता है, शरीर से मजबूत भी लेकिन सहनशक्ति की परकाष्ठा अगर कोई है तोह वो बस माँ. हमे हे देख लो, घर पे माँ इन्तजार नहीं कर रही है इसलिए तोह आवारा है 50 के होने पर भी. वो प्यार से कान पकड़ कर जब नाराजगी दिखती है न बीटा तोह बस चेहरे को याद करते हे हम इस दुनिया से काट जाते है. बाबा कहते है की हमारी माँ का नाम अनुराधा इसलिए रखा गया था क्योंकि वो उस नक्षत्र में हे पैदा हुई थी और उनकी आभा किसे चमकते सितारे सी थी, जैसे सूर्य भी एक सितारा है. हमारी समझ में तोह ये एक देवी का नाम था जितना pustak-purano में पढ़ कर नाम के पंडित बने, काम तोह कसाई से भी बुरा है.

इस हवेली को गिरना मैट बीटा, समाज में ऐसे कला धब्बा भी मौजूद रहना चाहिए. वैसे तोह हमने इसकी साफ़ सफाई करवा दी थी जितनी मुनासिब थी लेकिन हम चाहते है की तुम अपना काम करने के बाद इसको ऐसे हे छोड़ देना. प्रकृति स्वयं इसकी किस्मत लिखेगी. नदी किनारे इतने खूबसूरत जगह जहा से हम बचपन में छत पर खड़े रह कर हिरण, खरगोश, हरियाली और इस खूबसूरत नदी का अवलोकन करते थे. ये खूबसूरती कुकर्मो ने हे भांग की है इसका सबूत रहना चाहिए. कभी भीतर ना आ सको तोह उन बच्चियों के हिसाब से बहार वृक्ष रोपित कर देना, वो स्वयं बड़े और छायादार होने के साथ इस हवेली को प्रकृति में मिला लेंगे. बारिश तूफ़ान में जंगली जानवर शरण लेने लगे है इधर जो ाची बात है. कीमती यहाँ कुछ नहीं है अब सिवाए तहखाने के दर्द और रुदन के. चलते है बीटा, आज घर हे निकलते है. सीने में हल्का सा दर्द है और महल के कमरे shayan-kaksh सिर्फ नाम से है. उनके सुकून नहीं और आज हम सोना चाहते है. लड्डू मतलब शंकर आया हुआ है और वो अपनी माँ को बहोत परेशां करता है जबकि बड़ी बहु की गॉड में इन्दर है लेकिन ये साहब उसको हटा देते है जैसा सप्ताह पहले हमने देखा. 6 दिन हो गए बचो को देखे तोह सुबह उनके साथ रहूँगा. राजू गलत दादा की सांगत में रह रहा है लेकिन क्या कहे अब. कृष्ण को भी वो बहोत पसंद है और दोनों गूंगे आपस में बात करते है. चलते है बीटा, प्रभु नारायण तुम्हारी रक्षा करे और देवी लक्ष्मी अपना आशीर्वाद बनाये रखे.

नाम लिख देना किसी वृक्ष पर की हम कौन हैं या थे. निचे अपना रिश्ता और नाम. इस तरह हम एक हो जाएंगे और मिल भी लेंगे. वो भी तोह जीवन हे है.

प्रतीक्षा में,

पंडित मोतीलाल अनुराधा शर्मा

25/05/1953"

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"क्या बड़े पंडित जी, आज तोह आपने सचमुच माँ की कमी महसूस करवा दी. मैं भी हमेशा उनके साये में हे रहना चाहता हु लेकिन आप जैसे महनुभव है जिनके साथ एक अटूट रिश्ता और विरासत मिली है तोह दूर होना पड़ता है. वह उनके करीब होता हु तोह पहले से दावेदार बहोत है, सबसे बड़ी तोह वही जिसके लिए समाज पहले हे डाव पर लगा बैठा हु. आज जितनी किस्मत मेहरबान है न मेरी, उतनी हे बुरी होने वाली है भविष्य में और फिर देखूंगा आपके राम मेरा साथ देते है या नहीं. उस से पहले कही माँ हे न बेड़ापार कर दे, वैसे भी खामोश इंसान से खतरनाक कोई नहीं होता. आप जो भी थे इंसान बहोत सच्चे थे बड़े पंडित जी लेकिन वो 15 वाली बात पर मैं कुछ बता देता हु आपको, ये आंकड़ा अभी से दुगना होने वाला है मेरा. और इसका पता किसी को चला तोह मैं तोह फ़कीर भी नहीं रहूँगा.", अर्जुन पढ़ने के बावजूद उस पत्र में जैसे कोई चेहरा देखता हुआ बात कर रहा था. वो इतना लीं था उसमे की उसके haav-bhaav ऐसे बदल रहे थे जैसे सामने सचमुच कोई गहरा मित्र बैठा हो, राजदार.

"ये देवकी न आपसे सम्भली और न अब मेरे बस की है. आपकी बड़ी बहु को हे जिम्मे लगाना पड़ेगा इन्हे सुधरने के और सजा भी वही देंगी, मैं जरा कमजोर हु इन मामलो में. वैसे मैं भी shahi-khaandan में फसल बढ़ने की सोच रहा हु, बुरा लगे तोह कोई बात नहीं. आपकी भी बहोत सी बातें बुरी लगी लेकिन मैं शिकायत नहीं कर रहा. आप भी मैट करना और इसमें प्रेम शामिल है बोल देता हु की एकतरफा नहीं है. कल देखो आपके लायक सुपुत्र जी को कैसे अखाड़े के बाद मीठी पटखनी देता हु मैं. उन्हें भी तोह थोड़ी ख़ुशी मिलनी चाहिए न बड़े बौ जी? एक बहिन जो दुनिया हो उसको खोने का दर्द तोह ऐसे संवेदना भरे भाई के दिल में jiwan-paryant रहता है. और वो मेरे भी सबकुछ है जिनकी आवाज मुँह से चाहे न निकलती हो पर दिल से मैं सुन्न लेता हु की वो क्या चाहते है. उन्होंने हे तपस्या की है जो मैं इस लायक बन्न रहा हु की उस हवेली में पौधे लगा सकू, माली बनाने वाली तपस्या नहीं बल्कि जीवन को इतना प्रगाढ़ बनाने की. उनके 3 बेटे है पर म्हणत सबसे ज्यादा मुझपर की और मैं उन्हें असफल होने नहीं दे सकता. लेकिन एक वादा करता हु आपसे, माँ के साये में रहूँगा अंतिम समय तक. थोड़ा चिंतन कर लेते है, आज garbh-gyaan के वक़्त तोह जैसे मरने हे वाला था.", अर्जुन अब वो पल याद करते हे जैसे उसमे हे खो गया.

"बहोत भले इंसान है वज्रनन्द जी और आज उन्होंने जो जीवन ज्ञान दिलवाया न मुझे बाबा तारकनाथ जी से, असविमरणीय अनुभव रहा. आज पता लगा की तत्त्व में तत्त्व प्रकृति कैसे मिला देती है और अन्धकार में भी बाहरी भारी आवरण में डूबा जीव कैसे सब महसूस या देख सकता है चाहे आँखें बंद हो. वो बच्चियां इसलिए नहीं मिली बड़े बाउजी क्योंकि उन्हें हाथ पाँव बाँध कर ज़िंदा हे अग्नि के सुपुर्द कर दिया गया. वो मुँह पर बाँधने वाले फंदे कुकर्म के साथ साथ इस कार्य के लिए भी थे. और गर्भ में मतलब नदी की तलहटी में 2-2 के जोड़ में उन्हें hawa-paani और भूमि में विलीन करवा दिया गया. पता है ये करने वाले कौन थे? आयोजक. आपके पिता और भूपेंद्र जी, महाराज. ऐसे अन्धविश्वास से उन्हें वो सब प्राप्त भी हो जाता तोह उद्देश्य क्या रहता? आपको भी रस्ते से हटा कर वो दोनों पिशाच महल की हर महिला और बची में अपना अंश देते. 60-65 के तोह रहे होंगे न वो .. ? नीव ये थी हमारी?", अर्जुन ने धिक्कार से कहा तोह सामने नाम दिखा पंडित मोतीलाल अनुराधा शर्मा.

"माफ़ कीजियेगा, वो नपुंसक हे होंगे जितना प्रतीत होता है. कोई जड़ीबूटी दी होगी श्रीधर ने जिस से क्षमता मिली तोह जोश गरीब सेविकाओ पर दिखा दिया. वंश उनका नहीं हो सकता क्योंकि अब हमे सारंग भी गलत नहीं लगता और प्रीतम भी. और न आपके सरलबुद्धि गलत है. भटकाया गया उन्हें और अक्सर जवान होते युवक नए अनुभवों के प्रति आकर्षित हो जाते है. अनामिका दादी प्यार थी उनका और दोनों हे सरल. कैसे गलत हो सकते है ऐसे इंसान जो किसी को दुखी नहीं देख सकते.? हाँ सारंग माफ़ी के लायक नहीं है पर गलती किसकी थी? ये बूढ़े लक्कड़बग्घे हवेली में बंद हो कर तंत्र मंत्र के साथ जवान सरल बुद्धियों की बुद्धि भ्रष्ट करते रहे और उन्हें कैसे कैसे सपने दिखा दिए होंगे जो वो हटायरे, बढ़ले की भावना वाले और प्रतिद्वंदी बन्न गए. मंशा तोह यही थी न के सभी पुरुष और लड़के साफ़ हो जाए और फिर ये शाशन के साथ दुशाशन भी बन्न जाए. आप सफल रहे बड़े पंडित जी आप सफल रहे और अब मैं इनकी अकाल ठिकाने लगाऊंगा अतीत में आपसे भी पीछे जा कर. वक़्त चाहे जितना मर्जी लगे साल या 10 साल. इनकी मांड में घुस कर वो भी बदल दूंगा जो बस धुंदला नाम रह गया. सही किया ऐसे इंसान का नाम तक आपने मितवा दिया. चलते है थोड़ा विश्राम करने. फिर मिलने जाना है. शुभरात्रि. अर्जुन रेखा शर्मा. नाम वजनदार है इसलिए प्रयोग नहीं करते.", अर्जुन ने उस खत के निचे वैसे हे अपना नाम और तारीख लिख दी थी. वो देख कर सब विचार भूल बैठा जब माँ का नाम अपने नाम के साथ देखा. वो कभी दूर होता हे कहा था अपनी माँ से, दिल आपस में इतने जुड़े थे की रेखा ऋतू की बगल में बैठी भी उसका नाम हे समरण कर रही थी. कल उसके बेटे की परीक्षा थी जिस पर अनगिनत लोग पहले सवाल उठा चुके थे.

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ठीक 12 बजने में 10 मिनट पहले अर्जुन अपने कमरे से दबे पाँव निकला हाथ में कुछ लिए. वो पिछले आँगन में किनारे से होता हुआ बड़ी सतर्कता से पंहुचा था और जहा मीणा का कमरा था ठीक उसके दरवाजे के सामने उस पैकेट से ये रंग जैसा पाउडर सही से फ़ैलाने के बाद वो उतनी हे सावधानी से बहार निकलने वाले दरवाजे को खोल कर हवेली के पीछे जा पंहुचा. दरवाजा यहाँ से लगाने के साथ हे वो पहले हे भीतर आने का दूसरा प्रबंध भी कर चूका था. सुनसान और एकांत गली में आगे बढ़ता वो चाँद कदमो बाद हे दिलबाग भाई के घर के पिछले हिस्से आ पंहुचा था. लोहे के दरवाजे के जोड़ किनारे कड़ी जस्मीन ने चुटकी की हलकी आवाज से उसको अपने वही होने का एहसास करवाया तोह पाँव की आवाज दिए बिना हे वो अगले हे पल दूसरी तरफ था. यहाँ आते हे उसने जसलीन को गॉड में उठाते हुए सीधा इधर वाली सीढिया का रुखा किया. माहौल इतना शांत था की अर्जुन जसलीन की हृदयगति भी सुन्न पा रहा था. रात्रि के अंतिम पहर अब वो अपनी इस संगिनी संग रहने वाला था उस बड़ी परीक्षा वाले दिन के शुरू होने तक.
 
अपडेट 204

वारिस

जसलीन किसी हलके फूल सी अर्जुन के बाहों में सिमटी हुई इस खुली छत पर आयी तोह नजरे एकटक बस भरपूर चाहत से अँधेरे में भी अर्जुन के चेहरे पर तिकी थी. आज से पहले हर रात जिसके अरमान और सपने वो लिए थी, कैसे वो उसको अपनी दोनों बाहों में सहेजे था. एक ऐसी जगह पर जो दोनों की हे कल्पना से परे थे पर उन्मुक्त आसमान के टेल और टिमटिमाते तारो की गवाही में. अर्जुन के आने से पहले हे जसलीन ने छत के इस समतल भाग, जो बहार से हरेक नजर से दूर था और पहली सीढ़ियों से भी, वह रूई से भरा गद्दा और गहरी चादर पहले से बिछा राखी थी. इतनी लम्बी खामोशी के बाद जब जसलीन अर्जुन के पाश से अलग हुई तोह खुदको उसी गद्दे पर पाया.

"तोह फिल्म समय से पहले ख़तम हो गयी?", अर्जुन ने जसलीन के सर के निचे तकिया लगाने के बाद उसकी कमर में हाथ लपेट कर चेहरा अपने सामने कर लिया. साँसों की मीठी महक और 3-4 इंच की दुरी. जसलीन ने जवाब देने से पहले अपना एक पाँव अर्जुन की जांघ पर चढ़ाते हुए ये गहरा चुम्बन ज्यादा जैसे उसकी प्यास अब बर्दाश्त से बहार हो. आज वो बेसबर थी और ये पहला मौका मिला था जब वो अर्जुन के इतना करीब और दुनिया से दूर थी. जसलीन के दिल का हाल कौनसा अर्जुन से छुपा था और उसके लिपटने पर अर्जुन ने भी अपने ऊपर आये पाँव के अनितम जोड़ से आगे उठे उन गोल कूल्हों को मजबूती से थाम लिया. ऐसी अवस्था में जसलीन के माध्यम अकार के पुष्ट गोले एक दूसरे से कुछ दुरी बना कर अपना बेहतर अकार बता रहे थे. होंठ अलग हुए पर कमर की तरफ दोनों अब पहले से ज्यादा जुड़ चुके थे.

"फिल्म को मारो गोली.. वो तोह बस बहाना था रात तुम्हारे पास रहने का. शाम से ये अजीब सा बुखार चढ़ा हुआ है और Jeeti-Renam 2 पिक्चर देखने के बाद भी तीसरी आधी देख कर सोई. भाभी ने जब घर बंद किया और सोने गयी तभी मैं निकल पायी उनके कमरे से.. आठ.. बदन पूरा दुःख रहा है अर्जुन, आज इसका ये दर्द ख़तम कर दो.. उम्मम्मम्म", अर्जुन आश्वस्त होते हे जसलीन के पाँव फैलाये उसके ऊपर आ गया, ज्यादा वजन गिराए बगैर. उसके बंधे बालो को रबर से आजाद करता हुआ वो एक हाथ से जसलीन की सुडोल चिकनी जांघ सहलाते हुए कुछ ऊपर उठाये था. अभी से उसका विकराल लिंग अपनी औकात पर आया जसलीन की जांघो के बीच दबाव बनाने में लगा था. उस ख़ास जगह से जसलीन बाकी जिस्म की तरह पतली छरहरी कटाई न थी. पाजामे के भीतर आजाद योनि का फुलाव किसी hari-bhari यौवना सा मांसल और नरम था. हलके दबाव से अर्जुन जान चूका था की ये लड़की इस हिस्से से बहोत ख़ास है, ताजा सफ़ेद माखन की लोई सी नरम और भरी हुई.

"सचमुच आग उगल रही हो वह से...", अर्जुन का आशय समझ जसलीन ने उसको अपनी बाहों में कस के जकड लिया. 32 अकार के उसके वो सख्त सतांन इतने विशाल जिस्म के अयस्क सामान सीने से दबते हुए जसलीन की गर्मी और बढ़ने लगे. उन स्टैनो की कील सी नोक पर्याप्त थी अर्जुन को समझने के लिए, पहला दौर जल्द हे शुरू करना पड़ेगा.

"सेहन नहीं हो रहा.", जसलीन धीमी पर रुआंसी आवाज में लगभग गिड़गिड़ा हे पड़ी थी. अर्जुन के मूक इशारे से उसने शिकंजा ढीला किया तोह थोड़ी सी कमर उचकने पर उसका ऊपरी जिस्म पूरा बेपर्दा था. अँधेरे में तोह बस वो मुट्ठी से थोड़े बड़े लेकिन पूरी तरह अकड़े नारियल के कटोरे दिख रहे थे जिनके चूचक 2 आँखों की तरह अर्जुन के सामने. नरम गद्दे पर फिर से जसलीन की पीठ लगाए अर्जुन दोनों उरोज मालिशाना अंदाज में सहलाता हुआ धीरे धीरे कमर हिलने लगा. निचले वस्त्रो के ऊपर से हे वो जसलीन को अभी और गरमाना चाहता था जिस से वो उसको झेलने में समर्थ हो सके. जसलीन बेशक छरहरी थी लेकिन लम्बी और मजबूत युवती जिसके शरीर का लोच तोह उसकी ख़ूबसूरती को कही ज्यादा निखरता था. यही वजह थी की अर्जुन ने पहली मुलाकात में हे उसकी तुलना उन विदेशी युवतियों से की थी जो अक्सर वो महंगी पत्रिकाओं में विख्यात प्रसाधन और कपड़ो का प्रदर्शन करती है. दोनों के निर्वस्त्र सीने कुछ पर एक दूसरे से चिपके उस कलकतमक चुम्बन में जहा अर्जुन की जिव्हा जसलीन आधी के लगभग मुँह में लिए चूसने लगी थी. उसका अंदाज कुछ हे अंतरंग पालो में कही ज्यादा अनुभवी हो चला था.

"तैयार हो जस? क्रीम या आयल होता तोह ज्यादा ाचा होता.", अर्जुन अलग हो कर अपना आखिरी वस्त्र निकलने के बाद गद्दे पर घुटने मदद कर गहरी सांसें लेती जसलीन के भी पाजामे को इलास्टिक के किनारो से खींचता हुआ अपने सामान हालत में ला चूका था. मुलायम रेशमी पिंडलियाँ और आगे और मांसल होती baal-viheen चिकनी जांघो को सहलाता हुआ वो कमर के नजदीक बैठे हुए उस sandhi-sthal पर पंहुचा तोह जसलीन के साथ उसका बदन भी हिला. तर्जनी ऊँगली से कुछ लम्बा वो योनि का बाहरी हिस्सा कमाल का था. इतनी नरमी की बस ऊँगली रखने भर से वह का मांस अंदर डाब गया. लकीर के बाहरी हिस्से पर हलकी उभरी दरारे वह का सौंदर्य अँधेरे में हे बयान कर रही थी. अर्जुन ने काम्पटी ऊँगली से इस प्रभुद्ध क्षेत्र की तलहटी का जायजा लेने की कोशिश की तोह आँखें दोनों की हे बंद हुई. तरल योनिरस अंतिम चूर पर एक बूँद सा जमा था जबकि भितरारी फांके उतनी हे नरम आपस भी चिपकी हुई. उस बूँद से हे ऊँगली का पूरा चिकना करते हुए अर्जुन ने दबाव बनाया तोह एक पूरा दाखिल होने के बाद उस योनि की फुलावट उस छिद्र पर ख़तम हुई जो पहले से हे रस बहा रहा था. जसलीन ने मचलते हुए अपना सर तकिये में दबा लिया और एक हाथ अर्जुन की कलाई को कसता हुआ जैसे उसको बीच मझदार रुकने को बोल रहा हो..

"ओह्ह्ह्हह.. मेरी चीख निकली तोह फंस जाएंगे.. आह्हः बड़ा अजीब सा लग रहा है यार.. लेकिन ाचा भी.. इधर बॉडी लोशन की बोतल पड़ी है.. सोने से पहले लगाती हु. सोचा था काम आ सकती है...", अर्जुन ने jaanch-padtaal करने के बाद वो सफ़ेद बोतल सीधा योनि के सामने उठाते हुए ाचा खासा वो चिकना तरल पेडू और योनि पर टपका दिया. उस बोतल को वापिस गद्दे के किनारे रखता वो पहले सी मुद्रा में जसलीन के बगल आ लेता जो ऐसी उम्मीद न कर रही थी.

"करोगे नहीं?"

"श.. चीखना बंद करवाना जरुरी है. रात को अखाडा लड़ने का अनुभव नहीं है मुझे अगर लोगो ने घेर लिया तोह. पाँव यहाँ ऐसे रखो.", अर्जुन ने उस नरम जांघ को थपकते हुए जसलीन को निचे से अपने करीब कर लिया. पेट से फिसलता उसका ऊपरी हाथ अब जसलीन की फैली हुई टांगो के दरमियान उस ढेर साडी कृत्रिम चिकनाई को नरम पेडू और उभरी योनि पर हलके से मसलने लगा था. कुछ ज्यादा हे लोशन अर्जुन ने योनि के निचले हिस्से पर पहुंचते हुए ऊपर निचे के क्रम में गहरी दरार तक पंहुचा दिया. ऐसी अध्भुत रगड़ तोह जसलीन ने कभी हस्तमैथुन करते समय न की थी. उसकी सिसकियों को होंठो से बंद करता वो निरंतर उस कोरी जमीन को अपने मजबूत हल से खोदने के लिए तैयार करता रहा. उत्तेजना में जसलीन ने भी दोनों के बीच थिरकते हुए kaam-dand को पकड़ा तोह वो दुगना कसमसा उठी. अर्जुन के होंठो का हल्का सा लहू उसके स्वाद में शामिल हो चूका था. योनि से आगे एक ऊँगली ने गुदाद्वार पर हरकत की तोह जसलीन का जिस्म बुरी तरह से अकड़ने लगा जिसको अर्जुन ने तुरंत छोड़ दिया. वो सखलन के करीब आ चली थी और मदहोशी में उसने खुद हे योनि मसलनि चाही थी अर्जुन ने यहाँ भी उसके हाथ को जकड लिया.

"अभी नहीं.. पहले इसको तैयार करो.. जैसे मैंने किया?", अर्जुन ने घूम को वो लोशन की छोटी बोतल जसलीन को थमा दी. अब वो चित्त लेता था और जसलीन aadhi-adhuri प्यासी वो करने लगी थी जो अर्जुन ने कहा. उसके लहराते भुजंग को पकड़ते हुए भी जसलीन कुछ घबरा रही थी लेकिन जल्द हे सुपडे से जड़ तक मालिश करना और उसकी सख्ती को हर तरफ से दबा कर देखना उसको आनंद देने लगा. दोनों हथेली लपेटने के बाद भी ढाई इंच हिस्सा उस अत्यधिक मॉटे सुपडे समेत जसलीन के पहुंच से बहार था.

"देखो मैं मरूंगी तोह नहीं न? ये मेरे अंदर फिट नहीं होने वाला और हो भी गया तोह पेट न फाड़ दे. आराम से करना जितना हो सके. मर्डर गयी तोह ऐसी हालत में घरवालों को मेरा मिलना .."

"ओह पागल.. इस से मरने लगती तोह आधी दुनिया की औरते तोह ज़िंदा हे नहीं होती. प्यार से करूँगा और ये घरवालों वाली बात कह कर अब तुम मुझे डरा रही हो..", अर्जुन के मजाक से वो भी मुस्कुराती हुई उस मूसल को आजाद करने से पहले एक बार जोर से दबा कर देखने लगी.

"सच्ची कहु तोह मैंने पेनिस देखे है, 2-3 मगज़ीन्स में, एक बार फिल्म में और एक बार रियल. फिल्म वाला तोह उम्मीद नहीं थी पर मैगज़ीन में जो देखे थे वो थोड़े बेढंगे से थे और ज्यादा हे बाल इस जगह. रियल वाला तोह इतना था.", जसलीन वैसे हे पूरी नंगी अब अर्जुन के ऊपर बैठने लगी तोह अर्जुन ने हे उसको मुस्कुराते हुए पकड़ कर बगल में लिटा लिया.

"मरने का इरादा है तोह कोई बात नहीं लेकिन दोनों को मारना चाहती हो? तुम्हे क्या लगता है तुम्हारी वो शार्पनर है और ये पेंसिल जो फिट हो जायेंगे आपस में? हाँ.. ऐसे जैसे पहले लेती हुई थी मेरी तरफ मुँह करके. बस थोड़ा सा ऊपर हो जाओ. बस इतना.. तोह वो रियल वाला कहा देखा था?", अर्जुन ने उसके सर के पीछे अपना हाथ रखते हुए चेहरा करीब कर लिया. एक टांग वैसे हे कास के अपनी जांघ पर टिकाये वो मोटा सूपड़ा जसलीन के फैली हुई जांघो के बीच उस गरम चिकनी योनि के मुख पर भिड़ाये वो ऐसे रगड़ रहा था जिस से लकीर के होंठ बेहतर खुल सके. जसलीन अभी से पहले वाली स्थिति में जाने लगी थी. इतना मोटा और मजबूत अंग अभी सिर्फ योनि के बहार से मसल रहा था, अंदर जाने पर क्या मजा देगा इसकी उम्मीद अलग थी.

"Ummm..wo गलती से नजर पड़ गयी थी.. आह्ह्ह्ह. ये बहोत मोटा है अर्जुन.. तुमने देखा न गृप में भी नहीं आ रहा तह और मेरी वो.. मैं वर्जिन हु.. दीपा भाभी बता रही थी की मेरे जैसी लड़की के तोह ज्यादा खून निकलता है अगर मर्द तगड़ा हो toh..uuuiiii.", अर्जुन ने बातों में लगा कर अभी बस सूपड़ा उन लचीले होंठो के बीच योनि के छेड़ पर दबाया हे था की जसलीन को इतनी चिकनाई के बावजूद दर्द हुआ. वैसे ये उसका डर ज्यादा था.

"दीपा भाभी ने Ph.D. की है क्या इसमें? तुम लम्बी और फ्लेक्सिबल हो जस.. मेरी तरफ देखो और बताओ क्या तुम्हे मुझसे डर लगता है?", अर्जुन अपने लिंग को उसकी मंज़िल के बहार टिकाये जसलीन के निर्वस्त्र कूल्हे को मसलने लगा. कोई जल्दबाजी नहीं और आँखों में सिर्फ जसलीन का गहरा अक्स.

"प्यार में डर थोड़ी लगता है और मैगज़ीन में तोह मेरे से कही छोटी लड़कियां ये कर रही थी. हाँ भाभी की कोई सहेली होगा.. उम्मम्मम.. गुणगुणं", और वो जब फिर से डर भूल कर बातों में उलझी तोह अर्जुन ने थोड़ा बहोत सुन्न ने के बाद उसके कूल्हे अपनी तरफ सरकने के साथ साथ खुद भी झटका लगा दिया. होंठ से होंठ बंद होने पर जसलीन की चीख बस मिमियाना बन्न गयी और सर के पीछे रखे हाथ ने उसको अलग न होने दिया. इतनी अत्यधिक चिकनाई और दोनों के एक सामान शरीर के झटके से पहले धक्के में हे वो मोटा सूपड़ा और उसके आगे एक इंच तक अर्जुन का लिंग जसलीन के कौमार्य को भेद कर दाखिल हो चूका था. आख़िरकार मख्हन 2 फाड़ हो हे गया था. अर्जुन वैसे हे जसलीन को अपने आगोश में लिए कमर मजबूती से थामे सर का पिछले हिस्सा सहलाने लगा. वो साड़ी उत्तेजना और khatti-meethi बातें खामोश थी कुछ वक़्त. आँखों का गीलापन स्वयं अर्जुन ने अपने चेहरे पर महसूस किया था और कुछ उतना हे गरम तरल योनि से अपने लिंग पर.

"तुम पूरी तरह काबिल हो जसलीन.. सचमुच मेरी उम्मीद से भी ज्यादा. देखो तुम ज़िंदा हो और वो तुम्हारे अंदर.", अर्जुन ने दिलासा देने के लिए 5 मिनट तक इन्तजार किया था क्योंकि नाक से सांस लेना भी दूभर हो चला पर जसलीन अब शांत थी.

"मा... ऐसे दुःख रहा है .. आह्ह्ह्ह.. जैसे वह पर कुछ फटा हो और वो अभी भी दर्द दे रहा है. क्या ऐसा हे दर्द सबको होता है Arjun?",Bheege चेहरे से इस मासूम सवाल को पूछती जसलीन की सादगी एक बार फिर अर्जुन को दीवाना कर गयी थी. होंठो से उसके आंसू साफ़ करता हुआ कुछ पल उसको अपने सीने से लगाए रहा. कई बार वो खुद सोचता था के उसका अंग इतना बड़ा भी नहीं होना चाहिए था. तारा, रेणुका और आकांक्षा तोह 2-3 मिलान तक इसको जड़ तक झेल न सकीय थी क्योंकि हद्द हे ख़तम हो जाती थी. और अब तोह ये उस समय से भी कुछ बड़ा और ज्यादा मोटा प्रतीत होता था. अंतरंग जिस्मानी कसरत का असर था या उस खुराक का लेकिन ये सच था की अनुभवी या भरी शरीर वाली हे इसको सही से हजम कर पाती थी. जसलीन ख़ास थी क्योंकि उसकी योनि बाकी शरीर की तुलना में काफी पुष्ट और लचीली थी, फिर भी ये बस पहला हे तोह अनुभव था. पीठ और नितम्भ सहलाते हुए अर्जुन ने जसलीन को काफी हद तक संभाल लिया था.

"ये दर्द सिर्फ एक बार वाला है जसलीन जो कुछ समय ख़तम हो जाना है. लेकिन इसकी वजह से तुम्हे ये मिलान बेहतर याद रहेगा और हमारे उठने से पहले तुम दर्द की जगह सुकून में होगी. अभी थोड़ा बर्दाश्त करना बस.", अर्जुन वैसे हे बाहों में लिए अब जसलीन के ऊपर आ गया था. कंधे को एक हाथ से पकडे उसने जैसे हे दूसरे हाथ से जसलीन की एक जांघ हवा में उठाते हुए फैलाई, कुछ हिस्सा और आगे योनि में उतर गया. जसलीन ने दांतो के बीच अपनी हथेली हे दबा ली थी जबतक अर्जुन ने उसको सही आसान में न कर दिया. कंधे वाले हाथ से जसलीन का हाथ अलग करता वो होंठो पर झुकने के साथ कमर भी निचे दबाता चला गया. जितना दर्द एक बार दे सकता था वो उतना हे देना चाहता था लेकिन जसलीन की मालिश ने भी हम किरदार निभाया अर्जुन को गहराई मापने में. वो बंद चिकनी अँधेरी सुरंग हर क्षण कुछ ज्यादा हे फ़ैल कर खुलती गया और जसलीन की आँखें भी. 7 इंच के लगभग गहराई में उतरने के बाद अर्जुन ने अपने हाथो का हुनर दिखाना शुरू किया जिस से जसलीन दर्द से जल्द बहार आ सके.

"Ummmmm..nnnggg..", बस ऐसी हे हलकी आवाज निकल रही थी जसलीन के मुँह और नथुने से जब अर्जुन उसके एक चुके को मसलता हुआ दूसरे हाथ से गुदाद्वार को कुरेदने लगा. जसलीन का दर्द कुछ बाँट सा गया जब अर्जुन ने उस चिकने बंद छेड़ में थोड़ी ऊँगली दबा कर उतार दी. योनि की मांसपेशिया ढीली होते हे 2-3 इंच वो भीषण रक्तरंजित लिंग बहार निकल अर्जुन ने वापिस धकेल दिया. जोश और दर्द में जसलीन अब अर्जुन की बाहें और कंधे खरोचने लगी थी लेकिन ज्यादा देर नहीं. वो अपने बदन में नया संचार महसूस करने लगी जब उसकी योनि ने खुद को उस मूसल के हवाले कर दिया. सूपड़ा किसी बाण की तरह जब पीछे होता तोह कुछ मांस बहार ले आता लेकिन गहराई में जाता तोह एक मीठी रगड़.

"ओह्ह्ह्हह.. अर्जुन.. आह्हः.. आराम से करो.. आई.. उम्म्म सॉरी.. आह्हः. ये तोह नैवेल तक फील हो रहा है. आठ .. तुमने पूरा दाल दिया?", गलती से जसलीन थोड़ा सा तेज चीख उठी थी लेकिन इतना की साधारण आवाज बस. अर्जुन इतने आराम से आगे पीछे हो रहा था की उसका बदन दंड पेलने वाली कसरत सामान इस मेहनत से पसीने में नाहा गया. आखिर उसने बड़ी सावधानी से और 15-20 मिनट लगा कर जसलीन को बोलने के काबिल बनाया था. छूट में अभी तक वो मोटा बांस पूरा नहीं उतरा था और न अर्जुन को ऐसी चाहत थी. वो इस खुशनमा एहसास और कासी हुई योनि के इतने सफर से हे खुश था. अब जसलीन के चुके भी दर्द भूल कर पहले से अकड़ने लगे थे, चूचक ज्यादा हे फूल कर मॉटे और सख्त.

"तुम्हारी ख़ास बात पता है तुम्हे जस? ये पेल्विस एरिया चौड़ा है और यहाँ वागिना की बगल वाली बोनस कुछ दूर. तभी हिप्स इतने ाचे है तुम्हारे और ये पहली बार में तुमने बिना ज्यादा दर्द झेल लिया. अब ज्यादा दर्द तोह नहीं है न तुम्हे?"

"मीठा सा तोह है.. और जब अंदर जाता है.. आह्ह्ह्ह.. उम्म्म्म.. थोड़ी जलन होती है लेकिन उम्म्म.. ये बहोत ाचा लग रहा है जब पेट के अंदर टच होता है.. पेनिस का हेड.. उफ़.. आज मेरे ब्रेअस्ट्स निचोड़ के हटोगे क्या? उम्मम्माह्ह्ह..", उत्तीजन अब ाचे से हावी हुई थी और इसका पता चलता था छूट के भीतर वापिस बनती उस प्राकृतिक चिकनाई से जो जसलीन मजे में उड़ेल रही थी. उस खूबसूरत योनि का बस मुहाना और आगे का कुछ इंच तक हे हिस्सा जरुरत से ज्यादा कैसा था और उसकी रगड़ dard-maje की मिश्रण सी जसलीन और अर्जुन को अलग हे सफर पे ले चली. दोनों टंगे उठाये वो जसलीन के नितम्बो को उभार चूका था जिस से अब सिधाई में लिंग ज्यादा भीतर अंदर बहार होने लगा, जलन काम करते हुए. इतनी म्हणत के बाद अर्जुन ने आज पहली बार जसलीन के एक सतांन को मुँह में भरा जो स्वयं जसलीन के लिए बड़ा कामुक एहसास था. टाँगे उठा कर उनके गिर्द से दोनों हाथ स्टैनो पर लाया अर्जुन कास के धक्के जड़ता हुआ बरी बरी से उन कोरे चुचो का कच्चा रस निचोड़ता रहा. जसलीन सिसकियाँ रोकने की नाकाम कोशिश करती थक्क गयी तोह उसने वैसा करना हे बंद कर दिया.

"उम्म्म.. आह खा जाओ इन्हे... आह्हः.. अर्जुन ये कुछ निकल रहा है निचे.. आह्हः... इतनी म्हणत और इस तगड़े चरमसुख के बावजूद छूट और लुंड से वो fach-fach या thapp-thapp की आवाज न निकली थी अभी तक. ये तोह तभी मुमकिन था जब हवा निकलने की सूक्ष्म सी जगह भी देता वो वीकृ लिंग या जड़ तक उतरने के बाद दोनों के जिस्म टकराते. अर्जुन के साथ अब जसलीन भी पसीने से tar-batar थी पर उसको जैसे तगड़ा नशा हो चला था इस चरम का और अर्जुन के रुकने का उसको कुछ पता न था.

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'यह जसलीन वि न शहर विच रह के ज्यादा शहरी हो गयी है. सौं डा वि सही समां नई है इस डा भावे रहना खाना पहले वांग है.', दीपा भाभी जैसे अंगो पर अदृश्य जलन की वजह से उठी थी. उनके पति दिलबाग ने आज दिन में थोड़ा समय बिताया था साथ और हमेशा की तरह बात ghoom-fir कर पारस्परिक सम्बन्धो के पार जाती हुई बंद कमरे में अपनी बीवी के जिस्म पर चाँद और निशाँ देने पर ख़तम हुई. जाने कैसा रिश्ता था जिसमे दिलबाग सिर्फ अपनी बीवी से नाखुश था और उसकी ये भोली बीवी इस उत्पीड़न को भी ख़ामोशी से बर्दाश्त करती बहरी दुनिया में मुस्कुराती रहती. अब घर में मेहमान लड़कियां थी जिस वजह से वो अपने तजा निशाँ कपडे में छिपा कर सोई थी और अब नींद उचट गयी चाहे शाम हंसी ख़ुशी मस्ती में बीती, ाचा खाना खाने के साथ वीसीआर पर पिक्चर देखते हुए. घडी में समय देखा तोह 1 बजने को आया था लेकिन जसलीन के सिवा रेनम और सुखजीत यहाँ गहरी नींद में सुकून से सोई दिखी.

'वैसे तोह कहती है की फिल्म का इतना चाव नहीं और अब लगता है सबके सोने की वजह से टाइम नहीं निकल रहा होगा. देखु बैठक में है या कहा.", दीपा भाभी की कलाई में न चूड़ियां थी न पाँव में पायजेब. नंगे पाँव वो गदराया जिस्म उस कच्ची सतह पर कोई आवाज भी पैदा नहीं कर रहा था. उनींदी से वो बहार वाले कमरे में आयी तोह टेलीविज़न बंद था पर बिस्टेर पर नजर पड़ी तोह गद्दा और सिरहाना गायब. अब वो समझ गयी की जसलीन सोने के लिए छत्त पर गयी होगी और वो अपनी पहले वाली सोच पर मुस्कुराती हुई वापिस खुले आँगन में चली आयी. पशु भी आराम से ऊंघ रहे थे और वो बिली जैसे अपनी किसी विशिष्ट जगह दुबक कर सोई होगी. लोहे के स्टैंड पर रखे मटके से पानी पीने के बाद दीपा भाभी ने अपनी ब्रा खोल कर वही तार पर टांग दी. रेनम के साथ बातें करती हुई वो इसको पहने हुए हे सो गयी थी और अब ध्यान आया तोह जिस्म को कुछ आराम देने के इरादे से खुले आसमान के निचे हे वो वस्त्र निकाल कर कपडे धोने वाली जगह मैले कपड़ो में मिला दिया. इतने सन्नाटे में बस ये धीमी से आवाज सुनाई पद रही थी जैसे कोई तेज सांसें ले रहा हो और फिर फुसफुसाने की आवाज. आसपास देखा तोह इतनी रौशनी तोह इस रात में भी थी की सबकुछ ाचे से नजर आ सके.

'जसलीन की तोह तबियत खराब नहीं या सांस की बीमारी हो? कही ये लड़की.. देख तोह बचपन से रही हु लेकिन ऐसे काम नहीं करती अकेले में. पता नहीं कही उस लुच्ची फिल्म ने हे दिमाग न खराब कर दिया हो. उम्र भी है और ाची बात है की इतनी समझ है पर्दा रखने की.', मैं में हे वो बात करती हुई बस इस सोच से हे थोड़ा उत्सुक हो गयी. आजतक ऐसा कुछ करते किसी दूसरे को देखा नहीं था और अगर किस्से बातें होती थी तोह वो बस हंसी मजाक वाली. जसलीन को परेशां करे बिना दीपा भाभी जैसे अपनी इस उत्सुकता के साथ जिस्म की जलन से भी कुछ निजात पाना चाहती थी. दबे पाँव वो इस कोने वाली तरफ से हे सीढ़ियां चढ़ती हुई ये ध्यान रख रही थी की उनका परचावा भी कही न पड़े. सीमेंट की ये दिवार वाली सीढ़ियां बैठे हुए इंसान को ाची आड़ देती थी जिसका फायदा उठती वो किसी कौतहूल से भरी जिज्ञासु विद्यार्थी की तरह जैसे जैसे ऊपर चढ़ती की गयी, अपनी धड़कन के साथ अब वो उस आवाज को भी थोड़ा बेहतर सुन्न रही थी. वो बस सिसकना मात्रा नहीं था, दबी आवाज में ाहने और बातचीत भी थी. एक पल को तोह दीपा भाभी को हे घबराहट होने लगी थी बस ये सोच कर हे के कही कोई उनके हे घर इस लड़की को दबा डरा के तोह कुछ नहीं कर रहा. उनकी आशंका पर विराम तोह लगा पर ऐसा दृश्य देख कर एक बार के लिए तोह वो वापिस चेहरा पलट कर मुँह पर हाथ रखे खुद को सँभालने लगी.

'ये दोनों..', बस इतना सोच कर वो वापिस जाते जाते जाने क्यों रुक गयी और आखिर की तीसरी सीढ़ी पर हे दुबक कर वो बनेरे की दिवार से झाँक कर चांदनी रात में खुले आसमान टेल हो रही ये जोरदार क्रीड़ा देखने लगी. जसलीन ने अर्जुन को पाँव की कैंची में क़ैद किया हुआ था और वो पहाड़ सा जिस्म उसको पूरी तरह समेटे हुए लगातार गहरे धक्के देता जसलीन के कभी होंटो को रास चूसता तोह कभी थोड़ा उचक कर उसके चुचो को मुट्ठी में भर कर पीते हुए और लम्बे धक्के देता. ऐसे हे वक़्त पर वो सिसकारियां निकलती थी जिनमे मजा और प्यार भरा था. जैसे जैसे आँखें उन्हें देखती रही, वो काले जिस्म अब बेहतर दिखने लगे और आवाज भी साफ़ चाहे धीमी सही.

'ओह्ह्ह्ह.. अर्जुननननन... अब बूब्स छोडो.. निप्पल दर्द करने लगे है और इनमे से दूध नहीं निकलना..'

'वो भी निकलेगा कभी न कभी.. उम्माह्ह्ह.. देखना निप्पल जैसे तुम्हारे होंठ भी सूजे दिखेंगे सुबह. तुम हो भी बहोत मीठी.. आठ.. इतनी देर से लगा हुआ हु लेकिन अभी तक टाइट हो... आह्हः.. ऊपर आओ, साडी म्हणत मैं नहीं करने वाला.. वैसे महीना भर यहाँ रही न तोह 32 से 34 हो जाएंगे ये. उमाहहहह..", और अर्जुन ने अलग होने से पहले जैसे गद्दे पर लेती जसलीन को छोड़ते हुए हे काख के निचे हाथ दाल कर उठा लिया था दीपा भाभी की तोह सांस हे अटक गयी. वो दोनों तोह होंठ जोड़े दुनिया से अलग थे लेकिन दीपा भाभी ने तोह ऐसा कुछ कभी न देखा था. और उसके बाद जो अक्स नजर आया उसको देख कर तोह उन्हें अपने मुँह को खुद हे दबाना पड़ा. अर्जुन ने जैसे हे अपना वो भयंकर मूसल बहार खिंचा तोह वो धीमी बोतल खुलने जैसी आवाज और जसलीन की कराह बड़ी साफ़ सुनाई दी उनसे 5 कदम दूर डुबकी दीपा भाभी को. लिंग पहली बार तोह अर्जुन ने बहार निकला था जो इतनी कसरत से कुछ ज्यादा हे फूल कर और भयंकर दिख रहा था. उसके गद्दे से खड़े हो कर जसलीन की जगह जाने के दौरान दीपा भाभी ने जो देखा था वो कल्पना से भी परे था और उस से ज्यादा अचरज इस बात से की वो इतना लम्बा नाग chhui-mooi सी जसलीन अपनी कोरे पिटारे में झेल रही थी, जाने कितनी देर से.

'ओह माँ.. ऐसा किसका होता है? और ये नाजुक सी लड़की रोने की जगह बस सिसक रही है. पूरा नहीं ले सकती, फट जायेगी.', अब उन्हें कौन बताता की वो देरी से आयी है जब रोना धोना हो चूका और असली चुदाई शुरू हुई है. अर्जुन के लेटने के बाद जसलीन में निर्वस्त्र खड़े होते हुए मस्ती में अपना पाँव उसके सीने पर रखते हुए कहा.

'बहोत दर्द दिया है तुमने आज और पहले इतना तड़पाया है. जबतक हिसाब बराबर नहीं होता, जाने नहीं दूंगी.', वो नग्न आकृत और उसके कच्चे लेकिन सख्त उभार के साथ पतला तराशा हुआ शरीर. अर्जुन ने सीना उठा कर जिस तरह उसके कूल्हों को पकड़ कर जसलीन की छूट पर चुम्बन किया था दीपा भाभी के तोह चींटियां सी रेंगनी लगी. दबी हंसी हंसती हुई वो टाँगे फैलाये थोड़े धीमे चलते हुए जैसे जैसे उस मूसल की तरफ झुकने लगी, हल्का दर्द जरूर हुआ पर 2-3 बार स्खलित पनियाई छूट को टिकती वो धीरे धीरे नीचे होती गयी. अर्जुन के मुँह की सीत्कार बता रही थी की वो इस अदा से कितने मजे में है जबकि जसलीन ने भी मुँह पर एक और जमीन पर सहारे के लिए दूसरा हाथ टिका लिया था. उसको तोह ऐसा महसूस हो रहा था जैसे पेट में लुंड की जगह बचा हिल रहा है. पर उनसे अजीब हालत तोह दीपा भाभी की थी जिन्हे जसलीन को खोजना हे अपने जीवन की सबसे भारी गलती लग रही थी. अनजाने हे वो हंसमुख महिला अपने दूसरा हाथ जांघो के बीच रख बैठी.

'उन्न्नध्ह.. बहोत बड़ा है अर्जुन ye..isshhh..', जसलीन का हलके से कराहना और फिर धीरे धीरे अपने कूल्हे अर्जुन की जांघो पर टिकने के बाद उसके ऊपर लेट जाना एक अध्भुत दृश्य था. सचमुच वो विकराल लिंग असाधारण था जिसको जसलीन का प्यार हे सहने की क्षमता दे पाया. दोनों एक दूसरे को चूमते सहलाता हुए इस मंथन को आगे बढ़ाते रहे और जसलीन के मादक कूल्हों का ऊपर निचे होना दीपा भाभी के मैं में अलग हे एहसास भर रहा था. अगर ये भरपूर उजाला होता तोह उन्हें साफ़ दीखता की उसकी योनि किस कदर उस मूसल ने फ़ैलाने के बाद भी अपने ऊपर दूसरी खाल सी चिपका राखी है. अर्जुन दोनों नरम कूल्हों को मसलता हुआ जसलीन को सहारा दे रहा था. इतनी म्हणत के बाद हे अब वो हलकी थप थप की ध्वनि निकली जब आधे से ज्यादा लिंग को जसलीन बहार निकाल कर वापिस अंदर समां लेती. दीपा भाभी का जिस्म स्वयं हे तपने लगा ऐसे कामुक मिलान का दर्शन करके. उनके सुडोल सीने में स्वतः हे कसावट बढ़ने लगी थी और बरसो से अछूते चूचक अकड़ कर अपनी परिधि कठोर कर चुके थे. अभी भी वो उस सम्मोहन में बंधी अपनी जांघो के बीच वाले पहले हिस्से को हलके हलके रगड़ रही थी. अब उन्हें कोई आवाज सुनाई नहीं दे रही थी या वो जैसे स्वयं को वह देख रही थी जहाँ जसलीन थी. निरंतर 5 मिनट उछलने के बाद जसलीन की हिम्मत जवाब दे गयी जो पेट पकडे एक तरफ लुढ़क गयी. अर्जुन एक बार फिर से उसके ऊपर था और इस बार उनका द्वन्द कुछ ज्यादा हे जोरदार दिखा. जसलीन लगभग चीख हे पड़ी थी जिसके मुँह पर हाथ रखता अर्जुन अपने लिंग बहार निकाल हाथ से हे हिलने लगा. वो गरम तरल जसलीन के पूरे जिस्म पर बिखरा जिसके बाद अर्जुन उसकी बगल में लेता बड़े प्यार से जसलीन को चूमता हुआ अपने सीने से लगा कर शांत करने लगा.

'ये जिस्मानी रिश्ता तोह नहीं है सिर्फ.', अर्जुन द्वारा जसलीन को सही से गद्दे पर लिटाने के बाद अपनी हे बनियान गीली करके उसका पूरा बदन साफ़ करते देख दीपा भाभी कुछ शर्मिंदा महसूस करने लगी थी. बेशक आज उनके यौवन कुंड ने भी पानी छलका दिया था. अर्जुन जैसे जैसे योनि को साफ़ करता जसलीन थोड़ा मचल उठती, दर्द तोह होना हे था चाहे जिस्मो की आपसी गर्मी से वो उस वक़्त होश खो बैठी पर ऐसे हे लिंग से प्रथम मिलान और इतने लम्बे समाया तक. जब दोनों के बदन साफ़ हुए तोह जसलीन को पानी पिलाने के बाद अर्जुन ने स्वयं निक्कर पहनी और उसके ऊपर हिस्से पर ढीली टीशर्ट. दोनों कुछ हलके चुम्बन जरूर कर रहे थे लेकिन अर्जुन उसको बाहों में लिए बस ऐसे ख़याल रख रहा था जैसे वो उसकी सबकुछ हो. कितनी देर तक जसलीन शिकायत लगाती रही और फिर चिपक कर नींद के आगोश में चली गयी. अर्जुन इस दौरान उस आकृति को देख चूका था जिसका परचावा सीढ़ी के 3 फुट के स्तम्भ से सामने वाली दिवार पर उजागर हो रहा था. दीपा भाभी को भी एहसास हो गया था के वो आँखें जैसे उन पर हे तिकी है. चाहे अर्जुन ये न जान सका हो की वो आकृति किसी है लेकिन अब वो स्वयं पर नाराज थी और खुद को दोषित साबित करती हुई वो उठ कर आराम से निचे चल दी. अर्जुन मुस्कुराता हुआ जसलीन से लिपट कर वही सो गया.

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"सब सामान रख लिया न बेटी? इन्दर तू सो जा बीटा, अभी हम लोग देख लेंगे.", अँधेरा हे था और समय 3 के करीब. छोल साहब तैयार हो कर पंडित जी के घर आये तोह गाडी पहले हे तैयार कड़ी थी, सफारी. कौशल्या जी ने बीच वाली सीट पर रौशनी के बैठते हे उसके सामान की जानकारी लेनी चाही जो पिछले हिस्से में रखवा दिया गया था जहा कोमल और अंजलि मौजूद थी. रामेश्वर जी अभी आगे बैठने लगे थी की नरिंदर ने ड्राइवर सीट संभल ली. वो रात को 12 बजे हे लौटा था और अब नाहा धो कर तैयार भी था.

"साड़ी ज़िन्दगी हे सोये है माँ और ऐसे सफर पर पापा या चाचा गाडी चलाये हमारे होते हुए तोह ये क्या उचित है? चाचा जी आप आओ मेरी बगल में और पापा आप माँ को झेलो 3 घंटे. रेखा भाभी, आप निश्चिन्त रहना और आराम करो बस. मैं लौट आऊंगा रात तक.", नरिंदर ने अपनी बीवी के साथ भाभी को भी समझा दिया था जिनके चेहरे पर वैसे भी कोई चिंता के भाव न था बस अब मुस्कुरा जरूर दी थी.

"कोमल, अंजलि मेरी गाडी में आ जाओ तुम दोनों. आप लोग तोह मेरी चची को हे भूल गए थे.", शंकर पूर्णिमा जी के साथ बहार आया था जो कब तैयार हुआ किसी को दिखा हे नहीं. लेकिन उसकी गाडी की अगली सीट पर ऋतू पहले से विराजमान थी, मुँह पर दुपट्टा रखे नौटंकी करती हुई.

"यार कोई बताएगा की चल क्या रहा है? जाना मैंने और सतीश ने था अब ये पल्टन तैयार हो गयी. और तेरी गाडी में पहले से कौन बैठा है?", यहाँ रामेश्वर जी सवाल करते रह गए और रौशनी को कौशल्या जी ने शंकर की तरफ भेज दिया. अब बीच वाली सीट पर उनके साथ पूर्णिमा जी और फिर उनके पतिदेव. शंकर हँसते हुए रौशनी, कोमल और अंजलि को पिछली सीट पर बैठता हुआ इनसे पहले हे बहार निकल चला.

"ये खोते डा पुत्तर राति किन्ना ड्रामा कर रहा स के मैनु कम् है जरुरी, इन्दर न ले जायो. हूँ सहदे तोह पहला गद्दी खिंच गया.", भनभनाते हुए रामेश्वर जी ने फिर अपनी बगल में दोनों को देखा तोह पूर्णविराम लग गया जुबान पर. नरिंदर के साथ छोल साहब भी हंस रहे थे और गाडी आगे बढ़ता हुआ नरिंदर हे अपने पिता को जवाब देने लगा. घर के दरवाजे स्वयं ललिता जी ने बंद कर दिए थे इनके निकलते हे. अभी उठने का तोह वक़्त नहीं था इस वजह से ये कुछ देर और सोने वाले थे पर ऋतू के जाने से जरूर रेखा जी थोड़ा नाराज थी.

"ओह पापा आपने हे तोह रात को कहा थे के गज्जू आ रहा है उधर. फिर शंकर कैसे रुकता घर पे और राजू भाई है पीछे, खजाना नहीं दबा जिसकी सुरक्षा सिर्फ आपके प्रिय शंकर हे कर सकते है. समझाया करो चाचा थोड़ा इन्हे. बगल में बीवी और भाभी बैठी है लेकिन उनसे बात करके सफर का मजा नहीं लेना, बस भड़कना है.", अब नरिंदर के सर पे स्वयं कौशल्या जी ने चपत लगाईं थी हँसते हुए.

"जुबान न चला, गाडी चला तू. आया बड़ा मजे करवाने वाला. आप भी ठन्डे रहा करो, फिर बप बढ़ गया तोह अखाड़े की जगह लाला के आँगन में पसर जाओगे. वैसे हे रात से इनके बहाने सुनती रही हु जब तक सोने नहीं चले गए. मैं दरगाह नहीं जाऊंगा, मुझे चौपाल पे छोड़ देना.. पहले तोह सीधा दरगाह हे जाने वाले थे पर लाडले ने बोलै की घर से उसको यही लेके साथ जाए तोह प्लान बदल दिया. इतने पर बस न हुई तोह अब रौशनी के भी घर जा के आना है इन्हे. चलो जहा भी जाना है लेकिन नौटंकी बंद करो.", पंडित जी ने तोह हाथ हे जोड़ दिए थे क्योंकि हंसी ज्यादा हे बढ़ गयी थी बाकी तीनो की.

"बक्श दो हमे, गलती मान ली. बीटा तू गाडी की स्पीड बढ़ा ले और थोड़ी रूई पड़ी हो बक्से में तोह देना भाई सतीश.", एक बड़े दिन की शुरुआत हे पारिवारिक हंसी मजाक से हे हुई थी और नरिंदर जब mata-pita के करीब होता था तोह उन्हें अकेले जाने भी नहीं देता था कही. शहर पार करते हे मीटर पर सूई 100 पे अटक गयी थी. यही सीमा रहती थी इस बड़ी गाडी को mata-pita के साथ चलते हुए नरिंदर की. सुनसान खामोश सड़क पर 2 जोरदार रौशनी गिरती हुई ये गाडी काफी पीछे रह चुकी थी शंकर की कार से. वो तोह बस मौका देखता था जब ऐसा खामोश और सुनसान सफर मिले. 120 पर सरपट भागती उस कार के भीतर कही ज्यादा halla-gulla था.

"ऋतू ने तोह दादी को भी मन कर दिया था के ये नहीं जाने वाली पापा, फिर ये सबसे पहले गाडी में कैसे आ बैठी.?", कोमल के सवाल पर ऋतू तोह मुँह फेर कर बहार देखती हुई हंस रही थी जिसके चेहरे से दुपट्टा खुद कोमल ने हे निचे किया. दोनों हे मुस्कुरा रही थी लेकिन कोमल बड़ी थी और उसकी दांत भी ऐसी हे रहती थी इसके साथ.

"ये तोह सोई पड़ी थी अपनी माँ से लिपट कर. जड़ तैयार होने गया तोह मैंने उठा लिया मेरी बची को. अब वापसी में अकेले तोह नहीं आने वाला मैं और 12-1 बजे वापिस चल देंगे तोह 4 बजे तक घर वापिस. इतना टाइम तोह मेरी बेटी अपने लिए निकाल हे सकती है या हर वक़्त चस्मा लगाए किताबे पढ़ती रहे.?", इनके बीच अब कोमल भी क्या बोलती लेकिन वो फिर भी खुश थी.

"वैसे ऋतू आ रही है ये पता होता तोह मैं रुक जाती माँ के पास."

"इसलिए हे नहीं बताया मैंने दीदी. आपको तोह ारु ने बुलवाया था और माँ से भी चलने का पुछा था लेकिन वो और उनका एक शब्द वाला जवाब. 'नहीं'.. ाचा अब मुझे सोना है पापा, आप चलाओ गाडी लेकिन गाने नहीं बजने चाहिए.", ऋतू ने सीट थोड़ी पीछे करने के बाद वो डुपट्टार फिर से चेहरे पर ओढ़ लिया, आँखों से ऊपर तक. कार के भीतर वाली छोटी लाइट अंजलि ने हे बंद कर दी क्योंकि नींद उसको भी आ रही थी.

"कोमल तुम हे आगे बैठ जाती बीटा. ये आफत तोह ड्राइवर के बगल में सोने लगी."

"आप भी पापा.. इसकी सीट हमेशा से वही है और आप ड्राइविंग टाइम अगल बगल देखते भी कितना है. चाचा वाली गाडी तोह अभी तक नहीं दिख रही पीछे.", कोमल भी पिछली सीट पर पीठ टिका चुकी थी.

"वो हमारे बराबर हे वह पहुंचेंगे बीटा. मैंने पेट्रोल भरवाना है इसलिए थोड़ा डिस्टेंस बढ़ाया. वैसे तुम वह घर पे रुकोगी या अपने भाई के करतब देखने जाओगी?", शंकर जी ने जिस तरह करतब शब्द कहा कोमल ने ना में सर हिला दिया. जवाब उसकी जगह ऋतू ने दिया, वैसे हे सर सीट पर टिकाये.

"पापा सीधा ये नहीं कह रहे की वो खुद अर्जुन को रेसलिंग करते देखना चाहते है. उसके करतब देख कर आप जरूर हैरान होने वाले हो. बस अब थोड़ा सोने दो नहीं तोह सर दुखता रहेगा दिन में.", ऋतू के आदेश की पालना तोह कैसे भी शंकर जी करते. मैं में अलग से ख़याल जरूर आये जब एक नजर अपनी इस बेटी के ढके हुए चेहरे पर की.

'उसके करतब हे तोह परेशां करते है लेकिन उस से ज्यादा तुम्हारे. चलो अब सबसे पहले तुम उसको हे देखना चाहती हो तोह ये भी सही.', यही तोह थी जो बिना कुछ कहे भी शंकर जी को बेबस कर देती थी और अब नजरे सड़क पर टिकाये वो उसी रफ़्तार से अँधेरी सड़क को चीरते हुए बढ़ चले अर्जुन के उन करतब को देखने जिनकी ख़ास चाहत थी मैं में.

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यहाँ सुबह 4 बजे अर्जुन की आँख खुली तोह कुछ वक़्त वो अपने आसपास देखता रहा जैसे कही और न पहुंच गया हो. जसलीन अपने सीने से चिपका देख पूरी रात आँखों के सामने आ गयी और उसके भोले चेहरे को हलके से चूमता हुआ वो अलग हुआ तोह जसलीन का कुनमुनाने. हाथ के निचे तकिया रखने बाद अपनी मैली बनियान देखि जो अब किसी काम की न रही थी, साफ़ सफाई करने की वजह से. जसलीन की निर्वस्त्र फैली हुई जाँघे उसका हाल अलग बयान कर रही थी. सर सहलाता हुआ वो खड़ा हुआ तोह मौसम आज बहोत बेहतर और हलकी ठंडी हवा से भरा था. मुसीबत ये थी की अब जसलीन को आराम करने दे या उठा कर निचे छोड़ आये. पजामा जैसे हे पहनना शुरू किया वो अलसाई से आँखें खोल कर अर्जुन को देखने लगी

'सष्ठ.. लेती रहो बस. मैं जाने लगा हु लेकिन कोई बाद में आया तोह ऐसी हालत में देख कर जान जाएगा की यहाँ बहोत कुछ हुआ है.', अर्जुन ने पजामा जांघो तक चढ़ा दिया और जसलीन ने भी हलके दर्द एक बावजूद उसको एक खुश्क चुम्बन से विदा करके फिर से तकिया दबोच लिया. उसके लिए तोह ये सब सपना हे होगा जिस तरह से आँखें तुरंत बंद हुई थी. अर्जुन दबे पाँव आधी सीढ़ियां उतर कर इधर से हे गली में उतर गया. किसान घर था और दीपा भाभी का कुछ पता नहीं कही आँगन में अपनी राणो को हे खाना पीना दे रही हो. हवेली का ये दरवाजा ठीक वैसे हे बंद मिला जैसा वो करके गया था. खोलने के बाद भीतर दाखिल होते हे पहले मीणा के द्वार के सामने नजर की और फिर ऐसे मुस्कुराया जैसे उसका शक यकीन में बदल गया हो. अब वो थोड़ा निश्चिंत होता हुआ अपने कमरे में चला आया.

'मीणा भले हे एकांत जीवन का दिखावा करती हो पर इसका सच कुछ अलग है. देवकी जी, आप चाहे मुख्या अपराधी न सही लेकिन शतरजनज की जोरदार खिलाडी है. एक खामोश प्यादा सबकी नजरो में रख कर भी उसको ऐसे प्रकट कर रही है जैसे उसका अस्तित्व हे न हो. ये बंद जुबान भी अर्जुन प्यार से हे खोलेगा.', बिस्टेर पर लेता वो करीब घंटा भर आराम करता रहा जबतक बहार कृष्णेश्वर जी की आवाज न सुनाई दी.

"बीटा, उठ चुके हो तोह nitya-kram से निबट लो. दरगाह की तरफ तोह रात से हे तैयारी चल रही है और मुझे भी थोड़ा जल्दी निकलना होगा वह.", उनकी आवाज से अर्जुन अंगड़ाई लेता हुआ सिर्फ निक्कर में हे कमरे से बहार निकला तोह उसके छोटे दादा धोती जैसे वस्त्र से हे अपना ऊपर जिस्म पांच रहे थे. वो नहाने के बाद धोती पहन चुके थे और उनका कुरता और सफ़ेद पगड़ी चारपाई पर मौजूद थी. उनसे आशीर्वाद लेता अर्जुन पिछले बाथरूम की और चला गया. कृष्णेश्वर जी अपने कमरे के भीतर जा कर जब तक तैयार होते अनामिका ने उनकी चाय भी बना दी और अर्जुन के लिए doodh-khuraak भी. आँचल और विनोद अभी तक अपने अपने कमरे में गहरी नींद में थे लेकिन आज तोह स्वयं देवकी भी बिस्टेर पर हे थी, शायद दवा का तगड़ा असर हुआ था उन पर. सबसे ख़ास बात थी वो हलके लाल कदमो के निशाँ उनके दरवाजे के बहार जिस तरफ अभी किसी का ध्यान न गया था. कोई 20 मिनट बाद अर्जुन भी तैयार होने कमरे में लौट आया था जहा उसकी प्यारी चची पहले से हे मौजूद थी.

"आज तुम्हारे लिए बेशक बहोत ख़ास दिन है लेकिन क्यों मेरा दिल घबरा रहा है अर्जुन? तुम ज्यादा जोखिम मत लेना, haar-jeet चलती रहती है. चाहे तोह ..", वो उजली सफ़ेद इस्त्री की हुई कमीज अर्जुन को पकड़ती हुई उसके नजदीक थी और इतने प्यारे चेहरे को चिंता में देख अर्जुन ने हौले से उनका माथा चूमते हुए एक पल बस अपने सीने से लगाया और फिर वस्त्र पहन ने लगा. एक लिफाफे में उसके लिए लंगोट भी रखा था जो दंगल में अनिवार्य था.

"बात haar-jeet की होती तोह मैं कभी जीतना हे नहीं चाहता चची. बात आदर्श, परिवार और पंडित मोतीलाल अनुराधा शर्मा जी के ख्वाब की है जिसमे उन्होंने जैसी अपनी छोटी सी दुनिया को एक बेहतर जीवन देने की चाहत की थी. बात अर्जुन के अस्तित्व की नहीं है क्योंकि मैं उनकी हे वजह से तोह दुनिया में हु, बात है उनके इस समाज की. आपके, मेरे और सबके adhikaro-pehchaan की. मैं यहाँ से जाने के बाद जब मेरी माँ के सामने खड़ा हो तोह उन्हें दिखना चाहिए की उनकी औलाद अपना कर्त्तव्य सही से निभा रही है. इस हवेली को घर और इस गाँव को एक मजबूत परिवार बनाने का सपना था पंडित मोतीलाल जी का और उनकी जूती पहन ने के बाद भला पीछे कैसे मदद सकता हु. मैं मेरी इस प्यारी चची को भी तोह उनकी पहचान लौटना चाहता हु. चलो अब मुस्कुरा दो नहीं तोह मुझे यही दंगल न करना पड़ जाए.", उसके विचार सुन्न कर स्वयं अनामिका चची को फकर महसूस हो रहा था लेकिन यही दंगल वाली बात पर कंधे पर थप्पड़ मारती हुई वो हँसते हुए बहार निकल गयी. 6 बजे तक तोह बाकी लोग भी उठ चुके थे और अर्जुन अपनी खुराक लेने के बाद आँगन में टहल रहा था. ड्राइवर के साथ कृष्णेश्वर जी आयोजन स्थल पहुंच चुके थे जहा अभी से लोग जुटने शुरू हो चले थे. इधर हवेली का दोनों द्वार सेवक ने धकेल कर खोले तोह नीली इलो अर्जुन के ठीक कदमो के सामने रुकी और अंदाज ऐसा की पतलून और बम्पर में बस 2 इंच का फैसला. ये अंदाज था उसके पिता शंकर का जो स्वयं उजली कमीज पहने स्टीयरिंग थामे मुस्कुरा रहे थे. कार से सिर्फ वो बहार निकली जिसके चेहरे पर दुपट्टा था और बेफिक्र वो सीधा अर्जुन के सीने से जा लगी. अर्जुन ने हे दुपट्टा धीरे से खिसकाया तोह वो उसका हे अक्स था.

"क्यों बच्चू दे दिया न सरप्राइज? वैसे बड़े फिट दिख रहे हो.", ऋतू के चेहरे की चमक और उसका कुछ पीछे हो कर अर्जुन को ाचे से निहारना स्वयं अर्जुन को पसंद आया. वो तोह बस हिलते हुए गुलाबी होंठो और उन नाचती आँखों को देखता रहा लेकिन अपने कंधे पर वो भरी हाथ का सपर्श याद दिलवा गया के यहाँ और भी लोग है. झेंपता हुआ वो अपने पिता के पाँव छूने लगा लेकिन उन्होंने बगल से हे उसको अपने साथ लगते हुए हाल चाल लिया.

"मतलब आप सभी लोग पापा. क्या माँ और ताई जी भी आयी है?"

"नहीं बस हम लोग हे है जितने दिख रहे है. दादा जी को ऍन मौके पर प्रोग्राम बदलना पड़ा तोह पापा आ गए.", ऋतू कहा बाज आती थी अर्जुन के मजे लेने से और इस बार तोह कोमल दीदी को देख कर अर्जुन को भी लगा की ये सही कह रही है क्योंकि दीदी और रौशनी बुआ आये है. उसके उतारते चेहरे को देख कोमल ने हे ऋतू का कान खिंच दिया. अनामिका चची ने अपने जेठ को प्रणाम किया और ऋतू ने उनसे उस मुन्ने को ले लिया. विनोद भी तैयार हो कर बहार निकला तोह बड़े उत्साह से अपने बड़े भाई से मिला लेकिन वो भी हैरान था के यही सब लोग आये है.

"भैया ताऊ जी कहा रह गए?"

"यार तेरे ताऊ जी की वजह से तोह मुझे आना पड़ा.", शंकर जी का जवाब सुन्न कर अर्जुन तोह पलट कर फ़ोन हे मिलाने जाने लगा था जिसको कोमल आवाज दे कर रोकने लगी पर वो पहले हे पलट गया जब 2 हॉर्न की आवाज सुनी. सफारी के रुकने से पहले हे वो दौड़ कर अपने दादा की तरफ बढ़ चला था जैसे अब जान में जान आयी हो. रामेश्वर जी भी अर्जुन सामान हे संवेदना में थे और उसको गले लगते हुए कुछ पल वैसे हे खड़े रहे.

"ओह बैलबुद्धि, सिर्फ कोतवाल साहब हे नहीं आये है. तेरे छोटे दादा, दादी और चाचा भी आये है.", अर्जुन झेंपता हुआ सभी के पाँव छूने के साथ गले भी लगा. सेवक ने वही 2 और चारपाई लगा दी थी जबकि मीणा सबके लिए ठंडा पानी ले आयी. महफ़िल जमती देख स्वयं रामेश्वर जी ने हे सचेत किया.

"बहु, चाय रहने देना बेटी. पहले हे वक़्त ज्यादा हो चला है और वह jaan-pehchaan के पता नहीं कितने लोगो से मिलना होगा. जिसने यहाँ रुकना है वो आराम करे, चाय नाश्ते के बाद आराम से मेला देखने आ जाना. बिनि बीटा देख लेना की प्रबंध हो सके. बच्चियां कुछ बाद में हे आये तोह बेहतर होगा.", ऋतू के उतारते चेहरे को स्वयं कौशल्या जी भी न सेहन कर सकीय.

"सब यही रहने वाले है लेकिन ऋतू तू मेरे साथ चल. बहु और कोमल, अंजलि, आँचल बिनोद लेता आएगा. और तू खड़ा क्यों है, वह हमसे पहले तेरा होना जरुरी है. चल अगर कुछ साथ लेना है तोह ले ले.", अर्जुन हामी भरता हुआ कमरे में भाग गया और लंगोट वाला लिफाफा हाथ में लेने के साथ चेहरे पर वही गहरा चस्मा और अपने padd-dada जी की जूती कदमो में. अब उसकी चाल देख कर खुद पंडित जी और छोल साहब तक विस्मित थे. उनके करीब न ृक्क कर वो सीधा उस लकड़ी के फाटक को खोलता उस खुली छत्त वाली नीली जीप का सेल्फ मारता हुआ आँगन में आया तोह खुद नरिंदर जी उसकी बगल में आ बैठे.

"जियो लाला, अब तू लगता है मेरा बीटा. ये आटोमेटिक कार और सफारी फ़ैल है इस लोहे के सामने. चल आज चाचा भतीजा मिल कर अखाडा खेलते है. वैसे भी तेरे पास दूसरा साथ नहीं है.", गाडी के करीब खड़े शंकर जी ने भी हामी भरी थी लेकिन दोनों को हटा कर उनके पिता ने सीट कब्जाई और सटीक जवाब दिया.

"बीटा, तुम आज देखने आये हो दर्शक और पिता की तरह. ये बचो का खेल है और इसको अकेले खेलने दो. सतीश भाई बैठो पीछे, ये लोग बड़ी गाडी में आते है पीछे.", ताका सा जवाब मिलते हे नरिंदर ने थोड़ा मुँह बनाते हुए अपने पिता को देखा जैसे वो कोई 10 बरस के बचे हो और अपनी माँ के पास जा पहुंचे.

"चल माँ, हम इन तीनो से अलग हे बैठेंगे. चची आप भी चल रही हो? ऋतू बीटा बैठ सफारी में तू.", देवकी सबसे मिल चुकी थी और उनसे जाने से मन कर दिया था.

"मेरा जी बहोत कमजोर है इन्दर बीटा और ये लड़ाई जाहगदे वाले खेल मेरे बस के नहीं देखने.", अर्जुन कुछ भूल गया था लेकिन अनामिका किसी की परवाह किया बिना विनोद को साथ लिए अर्जुन के पास आ कड़ी हुई तोह उसको अपनी गलती का एहसास हुआ. जीप से निचे उतारते हे उसने सर पे रुमाल रखा और चची ने कुमकुम का तिलक करके ज्योत घुमाई. विनोद भी आज खुद को सचमुच बड़ा मान रहा था जब उसके भतीजे ने दोनों के पाँव छुए.

"तुम तोह मैदान में उतरने से पहले हे जीत चुके हो भतीजे. मुझे इस बात की सचमुच बहोत ख़ुशी है की तुमने मुझे और अपनी अनामिका चची को इतना सम्मान दिया. वैसे ये ताई जी करती तोह बेहतर होता."

"चाचा जी, यहाँ मेरे अभिभावक आप दोनों है. गलत तोह नहीं कहा न बौ जी?", अर्जुन ने विनोद के बाद चची को भी गले लगा लिया था जो शर्मा कर अब परे देखने लगी थी लेकिन कौशल्या जी दोनों को नेग देने के बाद खुश होती हुई गाडी में जा बैठी. अर्जुन उनकी गाडी से पहले हे बहार निकल चला था उस जीप का गियर डालता. बगल में रखा बड़ा लिफाफा अर्जुन ने अपने दादा की गॉड में रख दिया और फिर से गियर बदलता हुआ चौपाल को पार करता अब अपने रस्ते पर केंद्रित था.

क्रमश...
 
"अब ये कौनसा तोहफा है मुखिया जी?"

"देख लीजिये प्रधान जी, ये आपका हे है और वह कदम रखे तोह लग्न चाहिए न प्रधान जी अपने पौटे के साथ आये है.", उसमे मोतीलाल जी की पगड़ी थी और उनकी हे माला. पंडित जी तोह बस उसको निहारते हे रह गए.

"पहन लीजिये बौ जी, उन्होंने हे कहा था के ये आपके मस्तक पर बेहतर लगती है जैसे बचपन में आप उनके उतरने के बाद पहन कर खुद को देखते थे. वो आँखें मूँद कर अनजान होने का दिखावा जरूर करते थे पर उन्हें ाचा लगता था आपका वैसा करना.", अब हैरानी से पंडित जी अर्जुन को देख रहे थे की ये लड़का कैसे जानता है उनके बचपन की बातें जो किसी को भी नहीं पता.

"तुम्हे ये कैसे पता बरखुरदार? और इसका क्या प्रमाण है की उन्होंने ऐसा कहा था की ये मैं पहन सकता हु?"

"पहन के पहले फीलिंग तोह ले लीजिये बाउजी, प्रमाण भी दूंगा पर जरा अखाडा और कबड्डी ख़तम होने दीजिये. लिखित प्रमाण दूंगा और इसको पुख्ता कर देता हु सिर्फ इस नाम से जिन्होंने कहा था ऐसा करने के लिए. लक्ष्मी नारायण तुम्हारा भला करे, पंडित मोतीलाल अनुराधा शर्मा. 25/05/1960'. अब संदेह मैट कीजिये मेरी बात पर, आजकल मेरी उनसे गहरी दोस्ती हो गयी है.", अर्जुन ने हँसते हुए जिस तरह उनके पिता का वो पूरा नाम लिया था पंडित जी ने उस माला और पगड़ी को चूम कर माथे से लगा लिया. भावुक तोह थे पर फिलहाल उस से कही ज्यादा खुश. माला तोह उन्होंने पहन ली पर पगड़ी को गॉड में ऐसे लिए बैठे रहे जैसे ये उनकी सबसे अनमोल धरोहर हो.

"अरे बाप रे बाप. भाई साहब हम मेले में आये है या चुनावी रैली में? इतने वाहनों का जमघट और ये तोह दूर दूर तक दिख रहे है. अनुमान से कितने लोग होंगे इधर?", छोल साहब ने जैसे हे पार्ले गाँव की सड़क पर कुछ आगे आने के बाद उस विशाल मैदान को देखा तोह हैरत से पूछे बिना न रह सके. सचमुच दृश्य हे ऐसा था उस विशाल मैदान का जहा गिने चुने घने वृक्ष थे एक दूसरे से काफी दूर. बड़े बड़े शामियाने, उनसे आगे ऊँचे झूले और जनता का हुजूम जो पूरी तरह व्यवस्थित था सभी गाँवों के निजी सुरक्षा और पहरेदारी से. कोई वाहन मर्यादित रेखा से बहार नहीं खड़ा था चाहे वो ट्रेक्टर ट्राली हो या 3 खाने वाली जीप. अर्जुन भी बड़े गौर से देख रहा था ऐसे माहौल को जहा स्पीकर पर घोषणाएं हो रही थी.

"ज्यादा नहीं तोह 12-13 हजार लोग तोह होंगे सतीश. 16 गाँव से खिलाडियों के साथ वह के पांच, सरपंच और प्रमुख लोग आते है अपने अपने परिवारों के साथ. लेकिन इतनी भीड़ तोह हमने भी नहीं सोची थी. ज्यादा हे लगते है अनुमान से भी. अर्जुन बीटा ये काली जीप के बराबर लगा दो अपनी गाडी. सी सतवंत सिंह अपना हे बचा है और आज तोह ये भी लगता है छुट्टी ले कर आया है.", अर्जुन ने इस ख़ास जगह पर जीप रोकने के साथ दादा जी की तरफ कदम बढ़ाये और वो पगड़ी लेते हुए उनके सर पर सही से पहनाई जैसे पंडित जी यही चाहते थे. अब उनका व्यक्तित्व हे पूरी तरह से बदल चूका था kurte-pajame के ऊपर पगड़ी पहन लेने से. जग्गी भी उन सरदारजी के हे साथ था जिनसे परिचय होने पर वो पहचान गया था के यही वो पोलिसवाले थे जिन्होंने उसकी रिपोर्ट दर्ज नहीं की थी नरिंदर छकः वाले शहर में. जग्गी भी बड़े जोश से उसके साथ मिला और ये लोग आगे बढे तोह चौपाल से सभी gram-pramukh भी पंडित जी से सत्कार के साथ मिले.

"ओह वि झटया सिंह, लोउंसमेंट करवा दे दरगाह तेह छोटे पंडत जी बाबे डा ना लिखाण वाले है.", अब विलायत खान जी ने मखौल में जिसको झूठा सिंह बोलै था ये इस गाँव का सरपंच था और इसके बेटे की बुरी गाठ बनाई थी अर्जुन ने जब वो लोग आरती, प्रियंका और गुरदीप के साथ गलत करने की योजना बना रहे थे उनके शहर में. वो खिसियाता हुआ सरपंच पहले पंडित जी का आशीर्वाद लेने लगा और फिर अर्जुन से मिला, जो फिलहाल पहलवान की जगह कोई विदेशी ज्यादा दिख रहा था.

"जो हुकुम खान साहब पर ेहड़ा बचैया सामने तोह मखौल न उदय करो अपने पट डा.", जितनी भी अकड़ थी सरपंच सुच्चा सिंह में लेकिन इनके सामने हाथ हे जुड़े रहते थे उसके भी. केवल सिंह भी इधर चले आये थे अपने साथ कुछ आसपास के पांच सरपंचो को लिए. सबसे मेल मुलाकात करते हुए ये लोग उस हरे रंग की रूहानी ईमारत की तरफ बढ़ने लगे तोह अर्जुन ने अपने दादा जी को रोक लिया.

"मैं ये काम जीतने के बाद करना चाहता हु दादा जी. आप कह दीजिये इन बड़े बुजुर्गो से की दरगाह पर तभी कदम रखूँगा जब खुद को साबित कर दूंगा.", पंडित जी ने उसकी बात पर सहमति जताते हुए यही सन्देश भिजवाया और फिर माइक पर ठीक यही शब्द दोहराये गए की 'ऊँचे पिंड तोह पंडत अर्जुन शर्मा ने फैंसला कित्ता है की ओह विजेता बने बाद हे दरगाह क्सक्सक्सक्सक्स तेह अरदास कारन वाले है. लो वि छोटे ते बुजुर्गो, चुनौती पेश कारन वाले ऊँचे पिंड तोह पहलवान अर्जुन शर्मा मेले दी इस पवित्र मिटटी तेह ऑन वाले ने. मैं गुजारिश करदा है मान निया पंडित रामेश्वर जी तोह की ओह मंच तेह अपना स्थान ग्रीन करदे होये आपजी दी निगाह विच मेला प्रतियोगिता शुरू करवाए.", ये सरदार जी तोह जैसे बने हे बोलने के लिए थे और उनकी आवाज 5-6 दूर दूर तक पाइप से बंधे ऊँचे लाउडस्पीकर से हर दिशा में सुनाई दी गयी. Safed-gulabi 20 फ़ीट ऊँचे शामियाने ने अखाडा, कबड्डी का मैदान और तक़रीबन 19-20 एकड़ तक जगह छाया की हुई थी. दरगाह के बहार लम्बी कतार थी जहा लोग अंदर आने से पहले शीश झुका रहे थे. और उसकी बगल में ये ख़ास मंच बना था जिसकी ऊंचाई 6-7 फ़ीट थी. तक़रीबन 40 लोगो के लिए वह आरामदायक कुर्सियां लगी थी और उनके सामने उतनी हे लम्बाई में 15-16 मेज आपस में जुडी हुई. अर्जुन तोह जगतार के साथ एक तरफ चल दिया कपडे बदलने और रामेश्वर जी को मेले के आयोजकों ने सिरोपा, फूलो का गुलदस्ता और माला पहना कर स्वागत किया. इस वक़्त उनके साथ कौशल्या जी और पूर्णिमा जी भी थी छोल साहब उन्हें लाये थे इधर. प्यारेलाल जी की मंडली इस मंच से अलग उधर बैठी थी ठीक सामने जहा तक़रीबन 50 कुर्सियां बढ़ते क्रम में लगवाई हुई थी. उनके साथ सभी गाँवों के पांच सरपंच भी थे और अखाड़े की मिटटी की जांच करने के बाद स्वयं केवल सरपंच अर्जुन की तरफ चले गए.

"सारिया न सूचित कित्ता जांदा है के साढ़े सम्मुख महारानी जी भी आज इस मेले विच पधारे सन्न.. यह पहली वारि हो रहा है के साहड़े अन्नदाता ने इत्थे शिरकत कित्ती है और साहड़ा सब्द मान वधया.", यही एकमात्र गाडी थी जो ठीक मंच से पहले रुकी थी और 2 सुरक्षाकर्मियों ने दोनों तरफ के दरवाजे खोल कर रानी माँ और कुमारी अमृता को बहार आने में मदद की. क्या जवान और क्या अधेड़, सभी खुश और अवाक थे इन हस्तियों का यहाँ देख. अमृता की ख़ूबसूरती और सादगी की चर्चा छुपी दबी आवाज में बहुत से युवक करते लगे जिनकी तरफ देखे बिना वो शालीनता से उस लाल कालीन पर चलती हुई अपनी माँ और भाई के साथ मंच पर चली आयी. यहाँ वही पारस्परिक मेल मिलाप होने के बाद अमृता ने ऋतू के बगल में बैठना पसंद किया. दंगल वाले अखाड़े की तरफ भीड़ बढ़ने लगी थी और लोगो को घेरे से भी 20 फ़ीट दूर व्यवस्थित तरीके से बैठा दिया गया था. उनके पीछे जरूर बहुत से लोग खड़े थे. कबड्डी का खेल 10 बजे शुरू होने वाला था और जैसी उम्मीद थी इस बड़े गाँव के 8 पहलवान एक कतार में अपने कोच और सरपंच सोचा सिंह के साथ यहाँ चले आये. हर युवक 25 से 30 बरस तक का ऊँचा चूडा और भरपूर तगड़ा.

"लो वि अपने ऊँचे पिंड दी टीम अखाड़े विच पहुंच चुकी है. मैं पंडत रामेश्वर जी तोह दरखास्त करदा है के ओह महारनी जी दे नाल फीता काट के इस प्रतियोगिता दी शुरुआत करवाए. एक वारि जोरदार ताड़ियाँ मार देयो मित्र प्यारों.", सचमुच जोरदार हे तालियां बजी थी जहा अखाड के मंच के सामने वाले हिस्से पर 2 पोल के बीच लाल फीता बंधा गया था. पंडित जी ने ये कार्य रानी सौंदर्य जी को हे करने दिया और खुद माइक ले कर उसको थपकने लगे.

"सबसे पहले तोह बस यही कहूंगा की मैं यहाँ पहली बार आ रहा हु, अपना विवाह होने के बाद. हाँ बीच में एक बार और आया था. तब मुझे अपने हे बचो से शिकायत थी की उन्होंने ये चुनौती क्यों दी. आप लोगो से बातचीत करने की जगह मैंने अपने पिता का हे नाम यहाँ से हटा दिया. 28 बरस बाद आज मैं यहाँ पर लौटा हु तोह सिर्फ अपने पौटे की वजह से और इस प्रथा को ख़तम करने के विचार से. आप लोगो ने 27 बरस तक इन्तजार किया क्योंकि आप लोग सही थे. खेल को खेल की तरह हे लेना चाहिए, साफ़ भावना से. मेरे बचे थोड़े जज्बाती थे और वो ये आप लोगो के खिलाफ लड़ने के लिए नहीं कर रहे थे. वजह जो भी थी बस उन्हें पता थी. आज यहाँ से चाहे मेरा पौता जीते या उस से बेहतर खिलाडी, वो विजेता रहेगा इस चुनौती दंगल का और उसके बाद यहाँ सिर्फ और सिर्फ पारम्परिक खुश्ती हुआ करेगी. 27 बरस का हर्जाना तोह नहीं चूका सकते लेकिन जिसने चुनौती दी है उसका भी साथ नहीं दे रहे, चाहे वो हमारा खून है. और इतने बरस बाद आया हु तोह मैं एक छोटी सी दरखास्त हमारी रानी जी से आप लोगो के सामने करता हु की सरपंच सोचा सिंह के गाँव को एक स्टेडियम भेंट किया जाए, बचे होनहार और मेहनती है लेकिन ये हक़दार है बढ़िया प्रशिक्षण और खेल संसाधनों के. स्वर्गीय पंडित मोतीलाल जी की तरफ से बाकी घोषणा उनके वारिस करेंगे, खेल समाप्ति पर.", यहाँ तोह पंडित जी ने ऐसा तोहफा दे दिया था की जो लोग भरे बैठे थे दंगल में अर्जुन को पछाड़ने के लिए वो अब उसके दादा के मुरीद बन चुके थे. सभी पहलवानो ने हाथ जोड़ने के बाद उनसे आशीर्वाद लिया और रानी माँ ने भी माइक हाथ में लेते हुए इस बात की पुष्टि की.

"मालिक यही है इस मैदान और मेले के. जब पंडित जी जमीन देने को तैयार है तोह थोड़ा सा दिल हमारे पास स्टेडियम बनाने का. सोमवार के दिन हम दरगाह क्सक्सक्सक्सक्स के नाम से हे स्टेडियम की नीव रखने का वादा करते है. सभी प्रशिक्षक जिन्होंने ये खिलाडी तैयार किये है, ये सबसे पहले शिक्षक बनेंगे इस स्टेडियम के जिनकी तनख्वाह अगले महीने से हे शुरू कर दी जायेगी. जानकारी रखते है हम थोड़ी बहोत और बचो पर इन्होने अपनी जेब से पैसा खर्च किया है, वो वापिस देना हमारा फ़र्ज़ है. एक तारीख तक 16 गाँव के सभी प्रशिक्षक अपना नाम लिखवा दीजियेगा पंचायत में. आप सभी का धन्यवाद करते है इतने maan-sammaan के लिए.", नौकरी मिलना और वो भी पसंद की तोह हर इंसान चाहता है. तालियां फिर गूंजी हर तरफ से और इस बार लोग खुश थे की ये 2 व्यक्ति आये तोह आये पर इतनी सौगात लाये की मेला सफल हो गया शुरू होने से पहले. फिर भी कुछ लोगो के कलेजे इस मरहम की जगह दंगल में ठन्डे होने वाले थे और जब अर्जुन लंगोट पहने जगतार और केवल सिंह के साथ इधर आया तोह उसके गाँव की तरफ से भरपूर तालियां गूंजी.

'मुंडा तगड़ा है पर थोड़ा कच्चा लगदा केवल बाई.', ये कोच थे इस ऊँचे पिंड की टीम के. खुद भी किसी भैंसे से तगड़े और ठीक उनके जैसे बाकी 8 पहलवान. शंकर और नरिंदर के साथ इस तरफ उमेद भी चला आया था जो अभी अभी पंहुचा था.

"कोच साहब, कच्चा है तोह कोई बात नहीं. आज के बाद पक्का हो जाएगा. क्यों मेरे जिगर के टुकड़े सही कहा न मैंने.?", अर्जुन से यही शक्श था जो गले लगने पर ज्यादा ऊँचा होता था. बोलने वाला तोह उमेद की कदकाठी देख कर हे झेंप गया. निहाल की भी पूरी टीम इधर चली आयी थी शहीद भाई के साथ.

"चाचा, हम बात बाद में करेंगे और जाना नहीं कह देता हु. वैसे कोच सर, यही एक टीम है क्या? कोई और गाँव से भाग नहीं ले रहा?", अर्जुन ने अखाड़े की मिटटी झुक कर छोई और उस व्यक्ति के पाँव भी.

"आवेदन तोह आये है पर वो व्यक्तिगत चुनौती के है. खेलना चाहोगे उनसे? वो नियम वाले खिलाडी नहीं है इसलिए मैंने मन किया पर अर्जी राखी है उधर."

"जरूर. वैसे 10 की जगह 8 है यहाँ.", अर्जुन ने घेरे में आते हुए ये मसखरी की तोह ये कोच साहब भी तंज करने से न चुके.

"और तुम्हे पटखनी देने के लिए 2 हे बहोत है बीटा. चलो उन्हें भी कह देते है की हारने के बावजूद तुम उनसे भिड़ने को तैयार हो.", भीतर रेफरी भी कोई जवान नहीं था. तक़रीबन 55-60 के आसपास का ये व्यक्ति दूसरी टीम को बहार करते हुए सिर्फ 2 को भीतर रखता हुआ माइक पे नियम बताने लगा. विनोद घर से आने वाले लोगो को लिए पहुंच चूका था जहा कोमल मंच की जगह अपने पिता के पास आ कड़ी हुई और आँचल भी. अर्जुन ने आरक्षित हिस्से में पांचो के पीछे निहाल की माता जी के साथ सर पे दुपट्टा लिए दीपा भाभी को भी देख लिया था.

"ये साधारण कुश्ती नहीं है और इसके नियम भी अलग है. सभी जरा गौर से सुनो और आवाज को विराम दो. ऐसी चुनौती और अखाडा 50 बरस पहले हे हुआ करता था लेकिन 28 बरस पहले ठीक आज के हे दिन चुनौती पेश करके ये फिर से वजूद में आया. जैसा maan-niya पंडित जी ने कहा है तोह ये खुला चुनौती अखाडा आज के बाद फिर नहीं होने वाला. पुराने समय में जो चुनौती देता था उसको एक वक़्त में 2 लोग 5 जोड़ी से भीड़ कर पूरा करते थे. अर्जुन ने जोड़ी दर नहीं लिया पर नियम वही माँगा. दिलेरी है या बेवकूफी ये तोह वक़्त बताएगा पर नियम के हिसाब से चुनौती देने वाले को तभी विजेता मन जाएगा जब वो 5 जोड़ी प्रतिद्वंदियों की पीठ मिटटी से भिड़ा दे. कुछ और भी नियम है लेकिन उनका यहाँ लेना देना नहीं क्योंकि शाही ओहदे से कोई सामने नहीं आया है. अब ये 2 खिलाडी इस एक से भिड़ेंगे और कोई भी बेईमानी होने पर हुक्का पानी बंद कर दिया जाएगा दोषी व्यक्ति का. हमारे दार जी से आग्रह है की वो घंटी बजा कर वो खेल प्रारम्भ करे.", और ठीक वैसा हे हुआ जब अर्जुन एक तरफ और बाकी दोनों पहलवान दूसरी तरफ कुछ पीछे हुए. प्यारेलाल जी ने हे पीतल की मोती चादर पर वो हथोड़ा ठोकते हुए खेल प्रारम्भ किया.

"अर्जुन, ध्यान से.", नरिंदर जी ने बस इतना हे कहा और अर्जुन हामी भरता हुआ दोनों घुटने थोड़ा मदद कर उन दोनों की तरफ बढ़ा. एक कुछ ज्यादा हे तगड़ा था जो पहले उसके सामने आया. दोनों के हे हाथ आपस में कास चुके थे जबकि उसका साथी पीछे से अर्जुन को घेरने की फिराक में था.

"गोले, कमर पकड़ इसकी और सोनू ऐसे हे दबोचे रख. एक मिनट का काम भी नहीं है.", ये पहलवान बहार से चीख रहा था और उसकी बात ख़तम होने तक अर्जुन ने पहले इस सामने वाले के हाथ निचे झुकाये और फिर फुर्ती से उसकी कमर को घेरे में लेते हुए अपने पीछे उछाल दिया जैसे तारकनाथ जी ने किया था. पर ये भैंसे जैसा पहलवान तोह धम्म से मिटटी पर हे फैल गया. दूसरा जोड़ीदार अभी अपने साथी को हे देख रहा था की उसकी काख में गिरफ्त बनता अर्जुन उसके कदम जमीन से उखाड़ तकिये की तरह जमीन पर पटक कर हाथ झाड़ता सीधा खड़ा हो गया. अब एक पल को तोह ऐसी ख़ामोशी छ गयी थी जैसे किसी की मौत हे हो गयी हो.

"ओह जियो मेरे लाल. 30 सेकंड में 2 ढेर.. ओह भाई ऐसा करो के थोड़ा वुफ वाला नियम जोड़ दो.", नरिंदर जी ने ख़ुशी में कुछ ज्यादा हे कह दिया लेकिन रेफरी ने इसका भी जवाब दिया 2 नए पहलवानो के अंदर आते हे.

"हाथ के साथ पाँव का इस्तेमाल भी किया जा सकता है. कमर के निचले ख़ास हिस्से, नाक और सर पे चोट नहीं दी जा सकती.", अब नरिंदर जी चुप हो गए थे क्योंकि बात अर्जुन के खिलाफ जा सकती थी अब. लेकिन वो तोह अपनी तरफ तेजी से बढ़ते दोनों पहलवानो को हे देख रहा था. एक ने उसका हाथ दबोचा और दूसरे ने उसकी कमर. बहोत जोरदार थे दोनों क्योंकि अब अर्जुन का एक घुटना निचे टिक चूका था.

'ये अब पकड़ बना रहा है सतीश, देखो जिसने कमर पकड़ी थी उसके हाथ अर्जुन के सीने पर पहोच गए है. दूसरा तोह बेवजह दम लगा रहा है क्योंकि वही पहले जमीन पे गिरेगा.', रामेश्वर जी की बात रानी माँ भी सुन्न रही थी और ठीक अर्जुन ने उस हाथ पकड़ने वाले को हे अपने जिस्म के जोर से ऐसे पटका जैसे धोबी गिला कपडा दिवार पे मारता है. इस दौरान वो खुद भी पीछे की तरफ लुढ़का उस दूसरे वाले के दबाने से लेकिन पीठ टिकने से पहले हे वो हाथ जमीन पर रखता दूसरी और घूम गया. अब एक बहार था और दूसरा अकेला. वो इस बार सांड की तरह आक्रोशित तरीके से अर्जुन को टक्कर मारने की कोशिश में था लेकिन ये डाव अर्जुन को खुद बहोत पसंद था. ऋतू ने तोह मुँह पर हाथ रख लिया था जैसे उसको पता हो की अब इस पहलवान की क्या हालत होने वाली है. जिस गति से वो अर्जुन की तरफ उसको गिराने के इरादे से दौड़ा था, वही गति अर्जुन ने उसके खिलाफ हे लगा दी. टक्कर तोह लगी पर कंधे से कंधे की जिसमे ये पहलवान चीख हे उठा और उसके बाद उसका जिस्म कमर से पकड़ कर अर्जुन ने 6 फ़ीट की ऊंचाई से निचे दे मारा. वो दर्द से दोहरा हो उठा चाहे मिटटी जितनी मर्जी नरम और पोली थी. कन्धा कुछ अर्जुन का भी दुख क्योंकि इधर हे कल वज्रनन्द जी ने मुष्टि प्रहार किया था.

'बड़ी जान है भाई तुम में.. कन्धा हे दुख दिया.', अर्जुन ने उसको हाथ दे कर खड़ा करने में सहायता दी तोह वो दर्द में भी मुस्कुराता हुआ बोलै.

"सादन ेहड़ा हे सींग फंसंदे है भरवा. तू सच्ची लोहे डा है. नै तह मेरी टक्कर साहड़े कोच साब न थल्ले टिका डंडी है. तेरे तह मुद्दा हे दुखिया, मेरी तह कमर वि गयी लगदा.", वो बहार जाता हुआ प्रभावित था अपने प्रतिद्वंदी से लेकिन जो अब अंदर दाखिल हुए थे उनके इरादे अलग थे. दोनों जिस्म से तगड़े होने के साथ ढेरो निशाँ लिए थे जैसे वो maar-peet या बदमाशी में रहे हो.

"ये रंगी है और उसके साथ वाला जिन्दर. ध्यान से अर्जुन.", शहीद भाई ने जिस तरह से अर्जुन को सन्देश दिया था नरिंदर जी उसके कंधे पर हाथ रखते जानकारी जुटाने लगे जैसे उन्हें भी इन दोनों व्यक्तियों से कुछ लेना देना हो. रंगी सचमुच खूंखार भैंसा हे था जैसा दीपा भाभी ने बताया था. अर्जुन उसकी तरफ बढ़ता उस से पहले जिन्दर ने हे अर्जुन पर छलांग लगा दी. ये हुम्ला do-tarfa था जिसको अर्जुन पूरी तरह नाकाम न कर सका. पेट में टक्कर और रंगा के कंधे पकड़ने से पहले उसके सर का ठीक उसी कंधे पर वार जहा 2 बार चोट खा चूका था वो. एक पाँव जमीन से उखड़ते हे वो इनसे दुरी बनाने के लिए विपरीत दिशा में खुद को गिरता हुआ बस पल भर के लिए सम्भला. उसके उठने से पहले हे रंगी ने फिर से कंधे का प्रहार किया लेकिन इस बार उसकी गर्दन अर्जुन काख में दबोच चूका था. जिन्दर ने जरूर उसकी पीठ जोरदार घूंसा जड़ दिया.

"ये सब नियम है क्या?", शंकर की तेज आवाज से बस रेफरी ने सर हिला कर सहमत होने का जवाब दिया. पर रंगी तोह कांपने हे लगा था जो बार बार हाथ ऊपर उठाने की कोशिश करता पर अर्जुन ने गर्दन के साथ उसका वो हाथ भी जकड लिया जो बहार की तरफ था. सीधा हाथ. जिन्दर के 3 मुक्के खाने के बावजूद उसकी गिरफ्त रंगी पर ज्यादा हे बढ़ती गयी जो कोमल बड़े गौर से देख रही थी.

"वो मर्डर जाएगा अर्जुननननन", कोमल की आवाज से बहार खड़े कई लोग चकित थे और अर्जुन ने बस उसके ख़तम होने से पहले हे रंगी को पटकते हुए उसके सीधे हाथ का कन्धा उतार दिया, छत्त और काट की मिली जुली आवाज के बाद वो तड़पता हुआ अपने हाथ को दूसरे हाथ से उठता पीछे खिसक ने लगा. जिन्दर और गुस्से से हुम्ला करने वाला था लेकिन इस बार जैसे उसकी बारी थी. मुक्के वाले हाथ के निचे कोहनी के जोड़ पर अर्जुन ने जोरदार मुक्का जड़ते हुए वो हाथ भी लटका दिया था. था तोह वो भी मुक्केबाज हे और ये बाकी सबको पता नहीं था. दोनों अखाड़े से निकलना चाहते थे लेकिन पीठ लगी नहीं थी जिस वजह से अब रंगी उठने लगता तोह पीठ पर जोरदार लात पड़ती और जिन्दर भागने की कोशिश करता तोह मुँह के बल जमीन पर जा गिरता. अंतत में दोनों ने हे रेफरी के पाँव पकड़ लिए.

"ये खेल नहीं रहा, मार रहा है. आप देख रहे हो उस्ताद जी."

"पीठ लगने तक ये कुछ भी कर सकता है. मैं मुकाबला नहीं रोक सकता ऐसे.", अब दोनों एक दूसरे की तरफ देखते हुए तुरंत पीठ के बल लेटने लगे थे पर अर्जुन रंगी को ऐसे करने कहा दे रहा था. करवट पर हे अपने पाँव से उसने रंगी को वही दबा दिया.

"मेरी भाभी पर हाथ डाला था तुमने और फिरौती रंगदारी जैसे काम करने के साथ नशा भी बेचते हो. क्या सोचा था की यहाँ मेरा शिकार कर लोगे? मैं अर्जुन शर्मा आप सभी के सामने इस अपराधी को सजा दे रहा हु जिसने आप सभी को नुक्सान पहुंचाया है. प्रत्यक्ष या पीछे से. अखाड़े की मिटटी में ऐसे असामाजिक तत्त्व जो बहिन बेटियों की िज्जात्त पर मनचाहा हाथ दाल देते है उन्हें मैं इस जमीन पर सजा देने का पूरा हक़ रखता हु. और सजा है की इसका दूसरा हाथ भी.. सलामत नहीं रहेगाआ..", हाथ का पंजा पकड़ कर जिस तरह अर्जुन ने उसकी काख में लात मर कर जोड़ उतरा था कई नरम दिलो ने तोह चेहरे पर हे हाथ रख लिया था. तत्काल कोच के इशारे पर पंचायत के प्रहरी इन दोनों को घसीट कर बहार ले गए.

"ये सच है जो अर्जुन ने कहा. मेरे 4 खिलाडी जख्मी करके रंगी और जिन्दर ने मुझ पर भी दबाव बनाया था की मैं उन्हें टीम में लू. परिवार की हिफाजत और इनके डर से मुझे ऐसा करना पड़ा. मैं सजा का हक़दार हु."

"आपने जो किया वो उचित फैंसला था और सबके सामने उन्हें ला कर आपने भला हे किया है कोच साहब. मैं सरपंच सोचा सिंह जी से दरखास्त करता हु की वो रंगी और जिन्दर के साथ उनके साथियों पर उचित करवाई करवाए.", सभी पांचो ने जोरदार तालियों के साथ इसका स्वागत किया और इस बड़े गाँव के सरपंच ने भी हाथ जोड़ कर ये जिम्मेवारी उठाने की पुष्टि कर दी. अभी आगे कुछ और खेल होता उस से पहले भीड़ को titar-bittar करते हुए ये 3 साधू भेषधारी लम्बे चौड़े तांत्रिक पूरे घमंड के साथ अखाड़े के सामने आ रुके. कई लोगो ने तोह झुक कर हाथ तक जोड़ दिए थे इनके सामने लेकिन इनके बाद जो आया वो 7 फ़ीट ऊँचा और कोयले सा कला दानव हे था. जतायें लम्बी kaali-safed और हाथ में लोहे का त्रिशूल.

"तुम होते कौन हो सजा सुनाने वाले मूर्ख.? ये अखाडा और ऐसी चुनौती देने का अधिकार तुम्हे किसने प्रदान किया, बुलाओ उस नामुराद को हमारे सामने?", रामेश्वर जी के साथ स्वयं रानी माँ और छोल साहब भी इधर लपके जहा अब कई लोग पीछे हट चुके थे और कई अपनी जगह पर खड़े हो गए. अर्जुन 2 कदम आगे बढ़ा था लेकिन उसके दादा ने वही रोक दिया.

"ये अधिकार हमने दिया है हमारे वारिस को और raaj-gharane के संरक्षक होने का अधिकार स्वयं महाराजा बलविंदर जी ने सौंपा था हमे. अर्जुन ऐसा अधिकार raaj-darbaar से भी रखता है महाराज.", रामेश्वर जी और रानी माँ को इस तांत्रिक के सामने हाथ जोड़ते देख अर्जुन ने हे उनके हाथ निचे कर दिए जो बात इस दानव को पसंद न आयी.

"हाहाहा... तुम अधिकार देने लायक कैसे हो गए और ये निर्लज्ज स्त्री जिसको raaj-mehal की char-diwari में बंद होना चाहिए यहाँ बिना परदे के हजारो के बीच कड़ी है? हम है संरक्षक क्योंकि हमारी पदवी है Raaj-purhoit की जो राजा भूपेंद्र के समय से है. अघोर सिद्देश्वर हैं यहाँ सजा देने के हक़दार. घुटने टिक्वाओ इस मूरख के हमारे सामने अन्यथा ..", बस यही नाम सुन्न न था अर्जुन ने जो अपने दादा को हटने का इशारा ऐसे कर रहा था जैसे वो खुद यही कर देगा अगर वो पीछे न हेट.

"तुम हो हमारे पाँव की जूती शैतान तांत्रिक श्रीधर. इस पदवी की बात कर रहे हो तुम भगोड़े हत्यारे दुष्कर्मी? मैं तुम्हे यही अखाड़े में चुनौती देता हु क्सक्सक्सक्स आश्रम का शिष्य होने की वजह से. अस्वीकार करने पर तुम्हे घुटने टेकने होंगे और फिर raaj-droh के जुर्म में फैंसला कुमार अर्जुन करेगा.", अर्जुन की ये दहाड़ और उसके हाथ में वो 2 सिक्के देख कर सभी हैरत में पड़ गए थे. ये सिक्के वो सिर्फ इसी वजह से यहाँ लाया था जो जगतार को सौंपे थे दंगल करने से पहले. अब तोह रामेश्वर जी हे अर्जुन को शांत कर रहे थे लेकिन उन्हें एक तरफ करता हुआ तांत्रिक जितना बड़ा और ज्यादा हे शांत ये प्राणी अर्जुन के बराबर आ खड़ा हुआ.

"संरक्षक से कैसे बात की जाती है तुम्हे पता नहीं है श्रीधर? चलो ये त्रिशूल हमे दो और आओ अखाड़े में. देखे क्या तुम वही शैतान हो जिसकी ठोकर से किसी व्यक्ति की मेरु पीठ से बहार निकल आयी थी या कोई बेरुपिया हो. और तुम तीनो में से कोई हिला तोह मेरा अमावस तुम्हे आज रात का चाँद देखने नहीं देगा.", जिस तरह संभव ने रामेश्वर जी को संरक्षक और सम्मान देने के साथ पीछे किया था शंकर थोड़ा उत्तेजित हो गया. लेकिन उसके भी कंधे को हल्का सा दबा कर सम्बह्व इंकार में सर हिला दिया.

"अनुज, आप वारिस नहीं है. अपने स्थान पर लौट जाए. और आप सभी अपनी अपनी जगह बैठे रहे, जिनका दिल कमजोर है वो यहाँ से जा सकते है. श्रीधर, अब अगर तुमने हमारी बात नहीं मानी तोह ये रक्षक तुम्हे जीने का दूसरा मौका नहीं देगा. अर्जुन.. तैयार?", शंकर को तोह आज एहसास हुआ था के ताक़त ऐसी अध्भुत भी हो सकती है लेकिन रामेश्वर जी तोह उस तांत्रिक के रूप में अर्जुन का हे बुरा सोच रहे थे. हँसता हुआ वो दांव त्रिशूल संभव को देता हुआ घेरे में आ खड़ा हुआ. रामेश्वर जी ने संभव से इसको रुकवाने की मांग की लेकिन उनकी तरफ से फिर इंकार में सर हिला.

"आप संरक्षक है और हम दोनों रक्षक. अपना स्थान ग्रहण कीजिये पंडित जी और इन जोशीले चिक्तिसक को साथ ले जाए. अर्जुन हमारा शिष्य है जिसकी क्षमता हम भली भाँती जानते है. इस चुनौती में कोई नियम नहीं है, हम फिर दोहरा रहे है. पीठ टिकना हाथ खड़ा करना काम नहीं आएगा.", इस नए खेल को लोग डर और सदमे में हे देख रहे थे, जोश तोह कबका ख़तम हो गया था क्योंकि तांत्रिक के पास सबूत था और इधर अर्जुन ने चुनौती भी दे दी थी उसके बराबर हक़ रखते हुए.

"इसकी जगह मैं लड़ लेता हु साधु महाराज. या आप हे लड़ लीजिये. बचा है वो मेरा.", उमेद की गुहार पर भी उन्होंने बस उसको पीछे जाने का इशारा दिया.

"गजेंद्र, आप अभिभावक है इसलिए चिंतित. जाए दर्शक बने कुछ समय, हम आपसे बाद में मिलते है.", अब बेबसी में सभी बहार जा चुके थे और अखाड़े में सिर्फ 3 हे लोग थे.

"इस बालक की सांस रोकने के बाद हम तुम्हे भी चुनौती देंगे योगी. कोई तोह है जो सिद्देश्वर को कुछ प्रतिस्पर्धा दे सकता है. हाहाहा. ये मेरा इन्तजार कर रहा था और मृत्यु आ गयी इसके सामने.", अट्टाहाहास करता हुआ वो कला दैत्य देखने में भयंकर था. आँखों में लाली, कुछ सादे हुए दांत और पहाड़ से शरीर से आती घनघोर दुर्गन्ध. अर्जुन अपना जिस्म खोलता हुआ भिड़ने से पहले अपने गुरु बाबा संभव का आशीर्वाद लेने लगा.

"आज तुम आजाद हो रूद्र, हम भी तुम्हे नहीं रोकने वाले. जितना दर्द भरा है, सब बहार आने दो. इस घेरे के बहार जितने भी लोग खड़े है वो और किसी को इधर नहीं आने दे.", इस बुलनद आवाज पर तुरंत हे सभी पीछे खड़े लोगो ने अभेद घेरा बना लिया. अखाड़े के भीतर एक तरफ वो मासूम चेहरे लेकिन तगड़े जिस्म का युवक था और दूसरी तरफ इधर उधर टहलता वो पहाड़ सा दानव.

'पापा ारु को बचा लो. पुलिस नहीं आ सकती क्या इधर?', ऋतू तोह अपने पिता की ब्याह से हे लिपट चुकी थी जबकि उमेद और रामेश्वर जी चिंता के साथ चिंतन में भी लगे थे. कोमल की बगल में मुँह ढंके अमृता भी इस दृहस्य को देख रही थी जहा उसकी चाहत अपनी जान दांव पर खुद लगा चुकी थी.

"बीटा यहाँ अब पुलिस तोह क्या ये लोग भी कुछ नहीं कर सकते. इस बेवकूफ ने आज सबकी ज़िदगी डाव पर लगा दी है और वो उसका अनजान सा गुरु भी पागल लगता है मुझे. खुद नहीं लड़ सकता था?", शंकर का हाथ उसके कंधे पर हे था और सबकी तरह आज वो भी चिंतित हो उठा.

"कोई नियम नहीं है इस युद्ध में बालक. तुम आश्रम के शिष्य हो न, वह भी मेरा केहर बरसा था और आज ये सभी बेबस कमजोर लोग तुम्हारी दुर्गति के गवाह होंगे. हमसे जुबान लड़ने वाले को तोह हम वैसे भी जीवित नहीं छोड़ते, तुमने तोह चुनौती हे पेश कर दी."

"दिमाग घूम रहा है मेरे तुझे देख देख कर. आज जिस्म पर 57 जख्म न दिए तोह मेरा नाम भी अर्जुन रेखा शर्मा nahi...Shaitaaaannn.. चल आ.. दिखा तेरा तंत्र और तागत. वो लात जिसके प्रहार से तू रीढ़ की हड्डी बहार निकाल देता है.. आज तेरी रीढ़ से जोड़ दूंगा.", ये गर्जना थी रूद्र की जिसके बदलते चेहरे को तांत्रिक ने देखा और संभव ने दोनों के बीच गदा त्रिशूल उठा कर जुंग शुरू कर दी.

"अबे गज्जू ये क्या मामला है बे.? पापा देखा आपने?", इन्दर इन दोनों को देख प् रहा था और यही उमेद और रामेश्वर जी खड़े थे. अर्जुन का जिस्म अघोर आश्रम वाले समय सा उभर चूका था लेकिन इस बार उसके कदम अपनी जगह रुके हुए न थे. तांत्रिक भी आगे बढ़ता हुए अपनी लात उठा कर अर्जुन के सीने को निशाना बना रहा था, गर्जना करता हुआ. एक जोरदार टक्कर दोनों के जिस्मो की आपस में हुई जब उसकी लात पर भीषण मुक्का जड़ता अर्जुन तांत्रिक के ठीक सीने पर कन्धा मारता हुआ भिड़ा. 2 फौलाद भिड़े थे आपस में और दोनों हे मिटटी में गिरे तोह धम्म की जोरदार आवाज हुई जैसे वृक्ष कट कर गिरा हो कोई. अर्जुन अपने होंठ पर आया खून chaat-ta हुआ मुस्कुरा रहा था और तांत्रिक अपनी टांग में उठे दर्द के साथ साथ सीने को सहलाता हुआ एक बार फिर उसके सामने खड़ा था.

"मेरी समझ से बहार है और हम तोह इस बाबा को भी नहीं जानते जो खुद को रक्षक बता रहा है. लेकिन उसके गले में जो माला है ऐसी 3 थी, 2 मुझे पता है क्योंकि एक मेरे हे पास है लेकिन ये तीसरी पिता जी की थी. माँ ने 3 ली थी और तीनो के धागे अलग अलग रंग के थे. अर्जुन उस तांत्रिक को जैसे बुला रहा था मतलब वो गुनेहगार है पर ये लड़का उसको किस आश्रम के नाम पर चुनौती दे गया?", सवाल तोह रामेश्वर जी के भी बहोत थे और आज पहली बार वो अर्जुन से प्रभावित दिखे जब उसने ये जोरदार टक्कर दी थी. भीड़ में कैसे भी करके सजल नेत्रों से कौशल्या जी भी इधर आ कड़ी हुई.

"मेरे बचे को कुछ नहीं होना चाहिए जी. पुलिस बुलवा लो.", उमेद ने तोह इतना सुनते हे उन्हें अपने सीने से लगा लिया था.

"वो गलत नहीं है चची. अगर कुछ लगा तोह मैं कूद जाऊंगा बीच में मेरे बेटे के लिए. आपको अपनी परवरिश पे शक है.?"

"बीटा परिवरिश इंसानो का सामना करने के लिए की थी.. शैतान जैसा है वो देख तोह सही.."

"Maate..shaant", संभव इतना बोल कर फिर से सामने देखने लगे जहा तांत्रिक अर्जुन के ird-gird गोल गोल घूम रहा था. वो ताक़तवर होने के साथ हे मुस्तैद और तेज भी था, उम्र से प्रभावहीन. इस बार अर्जुन से पहले उसने प्रहार किया था पहले ठोकर से उसकी तरफ मिटटी उछाल कर. यही उसकी सबसे बड़ी गलती साबित हुई. अर्जुन आँखे बंद करे अपने दोनों मुक्के अपने ऊपर कूदते पहाड़ पर जड़ चूका था. और वो इतने पर न रुका जब हड्डी से हड्डी टकराने की जोरदार आवाज हुई. तांत्रिक के सँभालने से पहले हे उसकी ठुड्डी पर आजतक का सबसे जोरदार मुक्का ज्यादा था अर्जुन ने. वो सादे गले से सामने वाले दांत आधा दर्जन से ज्यादा उखड कर खून के साथ बहार निकले जिसके छींटे अर्जुन के चेहरे पर गिरा. गुस्साए दर्द में भरे तांत्रिक ने भी उसकी पसली में वैसा हे प्रहार थोक दिया था और दोनों अपने अपने दर्द की जगह हाथ रखते पीछे हो गए.

"हाहाहा.. प्रेत की भी दर्द हुआ? हाहाहा.. मैं जान गया हु के तुम ऊपरी ताक़त रखते हो लेकिन मेरे सामने वो भी असर नहीं करती.. मैं हे श्रीधर हु.. सबको साधने वाला श्रीधर..", वो जमीन पर खून थूकता हुआ अर्जुन की और अट्टहास करता हुआ भाड़ा जो अभी तक अपनी पसली में दर्द की वजह से वह हाथ रखे खड़ा था या ये भी उसका छल था.

"ये.. ऊपरी नहीं .. अंदरूनी ताक़त है.. दुष्कर्मी दरिंदे.. याहहहहहहह.", बढ़ते हाथ को हे दोनों हाथो में फांसता हुआ अर्जुन छल हे कर गया था और इस बार वो 7 फुट का दानव सूई के कांटे की तरह अपने स्थान से हवा में घूमता हुआ दूसरी और गिरा, कही ज्यादा भयंकर तरीके से, हाथ अभी तक अर्जुन की पकड़ में था और देखने वाले लोगो की तोह सांस हे अटक चुकी थी. बेशक ये घेरा 500-600 लोगो का हे था पर दिल सबका देहल गया. अर्जुन की पसली पर 3 नीले निशाँ उभर आये थे पर वो उनसे बेपरवाह उस लम्बे मजबूत हाथ को मोड़ता हुआ तांत्रिक की पीठ पर पाँव टिका चूका था. पूरी ताक़त लगाने पर भी वो हाथ को और पीछे न ले जा सका तोह अपने गुरु की तरफ देखा. बाबा संभव ने हाथ के इशारे से उसको बताया की किस दिशा में जोड़ को आगे करना है और फिर पाँव से किधर प्रहार करना है. और ठिका वैसा हे अर्जुन ने करके दिखाया जिसका सबूत था 3 हड्डियां चटखने की आवाज. कन्धा उतरने की जगह वह की दोनों हड्डियां और कलाई भी टूट गयी थी. तांत्रिक था बड़ा हे जीवट जिसने इतने अत्यधिक दर्द में अपनी पूरी ताक़त लगा कर पीठ से हे अर्जुन को 5-6 फ़ीट पीछे उछाल दिया था.

"ारूउऊउउउउ..", ऋतू की चीख के साथ उसकी आँखों से आंसू भी जहर जहर गिरने लगे थे अपने भाई को किसी रबर की गेंद सा उछलता देखा. वो भीमकाय तांत्रिक अपना टूटा हाथ पकडे खड़ा हो चूका था जबकि अर्जुन अपने मुँह से मिटटी हटाता हुआ ऋतू की भीगी आँखों को देख अखाड की मिटटी अपनी मुट्ठी में भरता हुआ घुटने टिकाये सर झुकता हुआ ना में सर हिलने लगा. रामेश्वर जी इन दोनों को देख रहे थे और तांत्रिक उस से अब एक कदम दूर था जिसका ऊपर उठता पाँव देख बाबा संभव के जबड़े भी भींच गए. अर्जुन क्या कर रहा था उन्हें भी नहीं पता. लेकिन इस प्रहार से उन्हें भी डर था अपने शिष्य का.

"दुष्ट प्रेत.. तुम कुचलने के लिए हे bane...Aaaoooohhhhhh", वो किसी अलग हे वेदने में चिंगाड उठा जब अर्जुन ने अपने जिस्म की साड़ी ऊर्जा उसकी उठी हुई टांग में हे भर दी. वो उछला जरूर लेकिन पीठ धरती पर टकराते हे उसकी जांघ के जोड़ पर जैसे कोई ट्रक आ टकराया हो. ये प्रहार बहोत था उस तांत्रिक को उसके प्रतिद्वंदी की क्षतमा बताने के लिए. जो अर्जुन ने कहा था ठीक वैसा हे किया था उसने. टांग की सबसे मजबूत हड्डी उसके लिंग तक खिसका दी थी जहा रीढ़, चूले आपस में मिलते थे. आँखों में आंसू भरे उसके ऊपर ऋतू का रूद्र था, वो रूद्र जो सबकुछ देख सकता था सिवाए अपनी बहिन के आंसुओं के.

"तुम्हे इस दुनिया से विदा करने का वक़्त आ गया कमीने.. मेरी बहिन मेरी जान है.. उसकी आँख का एक आंसू मेरे जिस्म के लहू से बढ़ कर है.. आज वो तेरी वजह से रो रही hai...ye ले हैवान..", अर्जुन ने इस बार लात उसके दूसरे कंधे पर जड़ते हुए जैसे वह की हड्डियां हे कुचल दी थी. संभव बाबा बिजली की तरह लपके थे उसकी तरफ लेकिन अब वो शिष्य पीछे रह चूका था. ये ऋतू का रूद्र था जिसके एक धक्के से वो स्वयं अखाड़े की मिटटी में जा गिरे. अर्जुन आंसू बहता हुआ तड़पते हुए इस पहाड़ को अपनी समस्त ऊर्जा से ऊपर उठता चला गया. नसे उभर कर फटने हे वाली थी की रामेश्वर जी के हाथ जुड़ गए ऋतू की तरफ.

"ारु.. रुक जा भाई.. प्लीज..", बस उसके कंधे वही झुक्क गए और घुटनो के बल गिरता हुआ वो अपना सर झुका गया. तांत्रिक तड़प रहा था और अर्जुन के सर पे हाथ फेरते हुए संभव जी ने बस इतना हे कहा.

"शांत रूद्र. बहिन सामने है, बिलकुल स्वस्थ और मुस्कान के साथ.", अर्जुन ने चेहरा उठाया तोह काले तांत्रिक के जिस्म के उस तरफ ऋतू अखाड़े में कड़ी थी. चेहरे पर मुस्कान और हलके गीलापन.

"माफ़ करना बाबा, क्या मैंने आप पर भी हाथ उठाया?"

"वो तुम नहीं थे और वह हम भी नहीं थे. प्यार ऐसा हे तोह होता है, हर समय तुम हमारे शिष्य तोह नहीं? गजेंद्र, अपने भाइयों के साथ उन तीनो को हमारे पीछे ले चलो.", संभव जी ने जिस तरह से तांत्रिक के शरीर को अपने कंधे पर लाड लिया था, लगता था जैसे अब उसमे वजन भी न रहा था. उमेद ने भी शंकर और इन्दर के साथ आगे बढ़ते हुए बाकी तीनो तांत्रिक लपक लिए थे.

"चुनौती पूरी हुई और अब ये अखाडा किसी को चुनौती नहीं देगा. अन्यथा अगली बार हम लौटेंगे और इस चुनौती की वजह भी इस शैतान को दबोचना था, किसी सामान्य नागरिक को ठेस पहुंचना नहीं. हम योगी संभव है, पंडित मोतीलाल जी के संभव और raaj-pariwar के प्रहरी. मेला जारी रखिये, अर्जुन कुछ समय में वापिस लौट रहा है. चलिए संरक्षक जी, आपका साथ चलना जरुरी है. बस अपनी सीमा में रहिएगा.", सभी को वह हैरत में छोड़ संभव अपने साथ अर्जुन और पंडित जो को लिए आगे चलता रहा और उसके पीछे बन्दूक की नोक पर इन्दर, शंकर और उमेद बाकी तीन तांत्रिको को लिए आने लगे, उन्हें खुद नहीं पता था की वो लोग इस बाबा की बात मान क्यों रहे है और ये इन्हे जानता कैसे है. अर्जुन चलते हुए लड़खड़ा रहा था और कोमल दीदी द्वारा पकड़ाए कपडे पहनता हुआ वो थोड़ा पीछे रह गया.

"भाई तू ठीक है न? देख मैं नहीं जानती ये सब क्या है और क्यों हुआ वो सब लेकिन तेरी जान.."

"ये आपकी जान है दीदी, और इसको आप हे बचाये हुए हो. माहौल शांत करवाओ उधर थोड़ी बहोत घोषणा करवा के. जानती तोह आप भी बहोत कुछ है. मुखिया जी, कॉलेज की घोषणा कर दीजिये और दादी को सामने खड़ा कर देना अपने. मैं आता हु और रानी माँ से कहना के वो यही रहे.", अर्जुन ने पतलून पहन कर वो लंगोट दीदी को थमा दिया. बाकी लोग कुछ आगे जा चुके थे जिधर सड़क की जगह रास्ता कच्चा और फिर जंगल था. कोमल ने अपने दुपट्टे से हे अर्जुन का चेहरा साफ़ किया और उसको तेज कदमो से जाते हुए देखती रही.

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"ऐ बड़े भाई, आखिर तुम हो कौन?", उमेद ने ये ख़ामोशी भांग की उस तांत्रिक चेले के सर पर पिस्तौल का बैठत मारते हुए जो कुछ हिल दल रहा था. रामेश्वर जी तोह बस खामोश हे थे.

"बड़ा भाई बोल रहे हो अनुज और फिर पूछ भी रहे हो? हम अर्जुन के तीसरे गुरु है और वही हमारी जिम्मेवारी है इस प्रांत में. ये सामने जो आ रहा है इस से डरना मैट.", संभव को ये लोग हैरानी से देख रहे थे और ज्यादा हैरानी तब हुई जब वो बड़ा सा कला भेड़िया उन घने वृक्षों के बीच से निकल कर इनकी तरफ बढ़ने लगा.

"अरे भाई वो कुत्ता नहीं है, भेड़िया है. गोली नहीं मारना चाहता पर नहीं मारी तोह ये तुम्हे नुक्सान पंहुचा सकता है."

"गजेंद्र श्वान का बहोत शौक है तुम्हे लेकिन हमे यही पसंद है. ये आमवास है, हाँ हमारे बाबा के पास भी एक अमावस था जिसको ये नामुराद शंकर और इन्दर परेशान करते रहते थे. तुम्हारी भी तोह पाँव की हड्डी तोड़ी थी इन्दर और उस शैतान ाजजी ने? बहोत हे प्रकर्मी युवक था सबसे छोटा भाई. बुरा हुआ और हमे इस बात का आज तक खेद है. आओ अब जंगल के भीतर जाना पड़ेगा.", वो भेड़िया अब रामेश्वर जी और संभव के बीच चल रहा था. आदतन रामेश्वर जी ने उसके सर पर हाथ फिर दिया तोह वो उनकी पतलून पर कान रगड़ता हुआ शुक्रिया कहता दिखा. अर्जुन भी अपनी पसली पर हाथ रखता रामेश्वर जी के बगल में चलने लगा था. होंठ और आँख के किनारे हल्का रक्त अभी भी रिस रहा था उसके. वही नरिंदर कान पकड़ता हुआ उमेद से माफ़ी मांग रहा था पर तीनो हैरान थे की ये व्यक्ति पहली बार दिखा है लेकिन इनकी हर खबर है इसके पास. कमर पर बस एक धोती नुमा वस्त्र, सीने तक लम्बी दाढ़ी और हाथ में वो लकड़ी का मोटा लेथ. चलता फिरता अजूबा हे था 7 फुट का संभव लेकिन आवाज विनम्र.

"अर्जुन से कहा मिले थे और इसने भी हमको कुछ नहीं बताया.? पापा को भी तोह नहीं पता तुम्हारे बारे में कुछ.", ये शंकर का स्वर था और उसके सवाल से रामेश्वर जी भी सहमत थे.

"वचनबद्ध था हमारा शिष्य. और हम इस रक्षास की प्रतीक्षा में थे नहीं तोह एक आध बार मिल लेते. गजेंद्र तुम तोह इसके छोटे गुरु हो न तोह सोचो हम कहा मिले होंगे अर्जुन से?", संभव ने प्रतिउत्तर में हे सवाल कर दिया था और अब इन लोगो को थोड़ा परेशानी होने लगी थी उमस से भरे इस जंगल में चलते हुए.

"इसके बोर्डिंग स्कूल में? मतलब वो तुम्ही हो भाई जिसने इसको ये daav-pech सिखाये.? मुझे लगता था के मैंने सिखाया है."

"हमने सिर्फ इसके साथ वक़्त बिताया है गजेंदर और अर्जुन को जीवन की दिशा दी है. ये स्वयं सीखता है और तुमने ाचा काम किया है गुरु के रूप में. हमने कभी मलयुद्ध नहीं किया इसके साथ, बचा था ये उस वक़्त. अब हम बुजुर्ग हो रहे है. जानते है आप लोगो को चलने में कष्ट हो रहा है लेकिन थोड़ा कष्ट उठाने से हे आनंद की प्राप्ति होती है. हम जानते है की ये सभी सवाल पंडित जी पूछ रहे है, इन्होने इस तरह हे तुम तीनो को अपने साथ जोड़ रखा है. वो सामने नदी के उस पार जाना है हमे. जानते हो उस स्थान को?"

"ऐ भाई, तुम तोह यार बहोत ज्यादा हे तेज हो. हमारे साथ साथ हमारे पिता को भी जानते हो लेकिन उधर नदी है तोह हमे क्यों लाये और इन तांत्रिको का क्या करना है?", नरिंदर ने झिझकते हुए सवाल किया था क्योंकि उसको आज पहली बार किसी व्यक्ति से डर लगा था जो इतना लम्बा चौड़ा होने के साथ साथ भेड़िये को पालतू बनाये हुआ था, वो भी बिना रस्सी बंधे.

"नजरे खुली रखो इन्दर, तुम्हे खड़े वृक्षों के बीच हे कुछ गिरे हुए वृक्ष भी दिखने. ये बाँध पार करना है बस और पंडित जी आपको सीमा याद है न आपकी?", अब इन्होने देखा तोह उस शांत बहती नदी के ऊपर ये सपाट पुल्ल जैसा बना था जो लकड़ी का था और उसके ऊपर भी jhaad-jhakhaad उगे थे. इतनी देर में रामेश्वर जी पहली बार बोले.

"हम जानते है वो सामने वाली जगह को. बहोत समय बिताया है हमने उस मचान पर बैठ कर अपने भाई के साथ. 19 बरस जीवन के इधर जहा 5 बरस की उम्र में आने लगे थे हम दोनों और अगले 14 वर्ष आते रहे. तुम्हे सबकुछ पता है?"

"नहीं, सर्वज्ञता तोह आपकी बगल में चल रहा है पंडित जी. हाँ अभी ज्ञान अधूरा है इसलिए सवालों के जवाब नहीं दे सकेगा. जानते हो शंकर इस शैतान का अपराध क्या है? क्यों तुम्हारे पुत्र ने अपनी जान की भी परवाह न की इस से भिड़ने में?"

"नहीं बड़े भाई, न मैं इस दानव को जानता हु न तुम्हे और न अपने बेटे को ाची तरह."

"घर पे रहा करो थोड़ा बहुत. वैसे हम ये बात तुमसे इसलिए पूछ रहे है क्यूंकि इसको सजा अर्जुन नहीं दे सकता. ऐसे कार्य हम या तुम बेहतर कर सकते है. तुम्ही बताना के हमे इसके साथ क्या करना चाहिए. 57 नाबालिगों के साथ दुष्कर्म और उनकी बलि देने का कार्य किया है जिसको बयान करने के लिए हमारे पास भी शब्द नहीं है. सभी क्सक्स से क्सक्स उम्र के बीच थी.", पुल्ल को पार करते हुए जब संभव जी ने ये बात कही तोह बाकी सबके चेहरे पर अविश्वास और गुस्सा उभर आया था.

"पापा है साथ लेकिन मुझे ाचा लगेगा वैसा करना जैसे तुम जान चुके हो बड़े भाई. इन्हे साथ क्यों लाये हो जब सजा हे देनी थी?", शंकर का इशारा अर्जुन और पंडित जी से था.

"अर्जुन उस मचान पर बैठ कर इनसे कुछ बातें करना चाहता है और तुम्हे मेरे साथ थोड़ा आगे चलना है. बस 500 कदम और उस तरफ. पंडित जी की हद्द बस यही तक है. आगे इनके वचन की सरहद कोई और नहीं देख सकता.", अर्जुन भी रामेश्वर जी का हाथ पकड़ कर उस मचान की तरफ चल दिया जो आज भी साफ़ सुथरी थी और वह पानी का मटका और कांसे का लौटा रखा था. ये लोग संभव और अमावस के पीछे चलने लगे. अमावस जैसे 2 और भेड़िये भी अब आगे मिल चुके थे जो इस जंगल और हवेली के प्रहरी थे.

"20 मिनट बाद पहोच जाना अपनी जगह पर मुखिया जी.", संभव का ये इशारा सिर्फ अर्जुन के लिए था जिसने उतनी हे तेज आवाज में हाँ कहा और अब वो उस मचान टेल रामेश्वर जी के साथ बैठ चूका था. पतलून के भीतर की चोर जेब से वो 8 बार मुदा पत्र उसने रामेश्वर जी की तरफ बढ़ा दिया.

"ये क्या है अब? हम तुमसे व्यथित है और बात करने का दिल नहीं है.", रामेश्वर जी ने मटके से पानी उस लौटे में भरते हुए गले में उड़ेलने के बाद पसीना साफ़ किया. वो सचमुच कुछ परेशां थे.

"इसके बाद आपका गुस्सा उदार छू हो जायेगा श्रीमान राम जी. आपके लिए हे तोह ये सब किया है, इसके इनाम में नजागी दिखाएंगे? जो बात यहाँ होगी वो यही रहेगी. पढ़ लीजिये फिर आप खुद कहेंगे की कुछ वक़्त अकेला छोड़ दिया जाए.", अर्जुन के इतना कहने पर उन्होंने वो पत्र पकड़ लिया और ऊपर वाली जेब टटोल कर अपना नजर का चस्मा भी पहन लिया. पहले अक्षर से हे वो अर्जुन से दुरी बना कर बैठ गए थे. अर्जुन कमीज के बटन खोल कर अपने दुखते जख्मो पर वो धातु का ठंडा लौटा लगाने लगा. हर गुजरते समय के साथ पंडित जी के भाव बदल रहे थे और अंतिम पंक्ति में वजीर और नालायक पिता पढ़ते हे उनकी आँखें जवाब दे गयी. बहोत को kaant-chhant थी उस पत्र में लेकिन वो जिसने लिखा था उस इंसान के नजर में उनका राम सचमुच राम सामान था और जितना प्यार उन्हें अपने बेटे से था वो सब उन्होंने इसमें उड़ेल दिया था. पत्र पर कई बूंदे अश्रु की रामेश्वर जी की आँखों से निकल कर टपकी थी. उन्होंने बहरे गले के बावजूद कहा.

"धन्यवाद. मैं तुम्हारा हरिणी हु बेटे और जीवनभर रहूँगा. इस से बहुमूल्य मेरे लिए और कुछ भी नहीं जीवन में, कुछ भी नहीं. तुमने एक बाप बेटे को मिलवा कर मेरे सीने से दर्द उतार दिया. मैं उनके जाने का खुदको दोष देता था जबकि सच वो नहीं है. मैं उन्हें बहोत चाहता था लेकिन जैसे वो न कह सके मैं भी न कह पाया. ये मैं मेरे पास रख रहा हु. जाने इसको इतनी दीमक लगने के बावजूद ये सुरक्षित कैसे रहा और तुम्हे कहा मिला. पर ये मेरे पिता ने हे लिखा है और मैं उनकी नजरो में एक ाचा इंसान था, मेरे लिए इस से बढ़ कर कुछ नहीं. तुमने आज राम को खरीद लिया है बेटे. बीटा हे कहु या अपने पिता का दोस्त?", उनकी भीगी आँखों पर से चस्मा उतार कर अर्जुन ने फिर से उन्हें पानी दिया.

"आजकल तोह वो साथ हे रहते है दादा जी. बड़ी हिम्मत वाले इंसान थे, मैं तोह उनका अंश भी नहीं. मेरे सर पर तोह आपकी छाया और सुरक्षा है, लेकिन वो अकेले थे. वैसे ये तोह बस एक क़िस्त है उस विरासत की जो उन्होंने मुझे आपके लिए दी. घर चल कर बाकी भी देता हु. थोड़ा अपना दर्द काम करके आता हु तब तक. आप फिर से पढ़िए इसको क्या पता और कुछ भी मिल जाए हमारे एसएसपी साहब को. आता हु बौ जी."

"तुम्हे गहरी छोटे आयी है बीटा."

"आपके जखम आज तक हरे है बाउजी और मैं ठीक हु. एक जिम्मेवारी मिली थी विरासत में जिसका दर्द मुझे और देवी अनुराधा जी के सुपुत्र को भी अंतिम समय तक रहा. आता हु, इतने आप जरा मचान के ऊपर से अपनी सहेली उतार लो. वो आज भी सलामत है.", अर्जुन आगे बढ़ चला था जिधर वो काली हवेली थी. ये एक सीधा लेकिन खतरनाक रास्ता था महल और काली हवेली आने का लेकिन संभव को यही पसंद था क्योंकि ये उसकी जगह थी. अर्जुन चलता हुआ नजरो से ओझल हो गया उस जंगल में तोह रामेश्वर जी ने उस मचान के ऊपर taank-jhaank की तोह उन्हें उनकी 'रजनी' वह जल्द हे मिल गयी. एक बार फिर आँखों में पानी आ चूका था और किसी बचे से खुश होते हुए वो उसके अपने सीने से लगाए जैसे उस वक़्त में लौट गए जब उनके साथ यहाँ रघुवीर होता था. आज अर्जुन ने उन्हें उनका दोस्त और पिता, दोनों हे लौटा दिए थे उस अखाड़े की चुनौती की आड़ में श्रीधर जैसे हैवान को दबोचने के साथ. उधर एक तरफ संभव जीवित श्रीधर को रस्सी से लटकाये हुए अपने आधा दर्जन भेड़ियों से नुचवा रहा था और उसका अनुसरण करते हुए इन्दर, शंकर और उमेद उसके चलो को टांग कर उन्हें जगह जगह से काट रहे थे. वो jallaad-kasaai होने के बावजूद आज सीख रहे थे सही दंड की उचित सजा देना. जान लेना तोह बहोत आसान काम था. दूसरी जगह दरगाह में कबड्डी का खेल शुरू होने से पहले कौशल्या जी ने कोमल के साथ मिल कर सभी को चौंका दिया था इस बड़े गाँव और अपने गाँव की सरहद वाली जमीन पर कन्या महाविद्यालय की नीव इस ऐतवार को रखने का बोल कर. सोचा सिंह ने तोह बिना शर्त अपने गाँव की चौपाल भी प्यारेलाल और अर्जुन के अधिकार में कर दी थी. अब उनके गाँव का विकास स्वयं अर्जुन और रानी माँ के अधीन आ चूका था. ये अखाडा तोह पूरा न हो कर भी सबके जीवन को पूरा कर रहा था. यही तोह इत्छा था पंडित मोतीलाल अनुराधा शर्मा की जिसमे उनका पूरा परिवार उदहारण बने और सबको सह ले कर चले. अर्जुन ने वो हैवान दबोच लिया था खुदको वारिस साबित करके.
 
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