Incest Pyaar - 100 Baar - Page 50 - SexBaba
  • From this section you can read all the hindi sex stories in hindi font. These are collected from the various sources which make your cock rock hard in the night. All are having the collections of like maa beta, devar bhabhi, indian aunty, college girl. All these are the amazing chudai stories for you guys in these forum.

    If You are unable to access the site then try to access the site via VPN Try these are vpn App Click Here

Incest Pyaar - 100 Baar

कृपया शांत rahiye..(ye हम बोल रहे है प्रोफेसर अलबूस दुम्ब्लेडोरे नहीं)

.

.

देखिये दोस्तों एक छोटी सी जनमानस की चित्रावली है की हर व्यक्ति एक जैसा न सोचता है न चाहता है और न हे रूचि रखता. किसी को धन तोह किसी को मैं की शान्ति चाहिए. कोई ज्ञान के पीछे रहता है तोह कोई गए## के (आपत्तिजनक शब्द है) और कुछ होते है जिन्हे दोनों चाहिए 😬. ऐसे हे अब सेक्स मतलब च#### , सहवास और अंतरंग समय के पल भी अलग अलग होते है जिनका वर्णन सबको अपने हिसाब से ाचा लगता है. (हाँ भाई ये तोह सचमुच निजी मामला है) लेकिन अब कहानी इमोशंस वाली है तोह ऐसा तभी मुमकिन होगा न जब सभी किरदार एक दूसरे से भिन्न होंगे. ललिता जी और बब्बू डार्लिंग (बिली की एक्स) को तोह खुल्लमखुला प्यार पसंद लेकिन अब जो मुँह से गूंगी और दिल से बोलने वाली होगी वही तोह Fâķîřă को नहीं चाहिए. उसको चाहिए प्यार में सिर्फ प्यार और बहार जीवन सँभालने वाली जिसके पीछे दर्जनों भाई और भी है. मतलब कोई जरुरी नहीं की बस ताबड़तोड़ पलंग हे तोड़े जाए.? तोह वैसे हे है भावनाये जिसमे हर माँ परवाह करती है चाहे फिर मधुलता हो या कौशल्या जी. हर बीटा अपने परिजनों के लिए बेहतर करना चाहता है. हर इंसान चाहता है की उसके परिवार का सम्मान परिवार के साथ सुरक्षित रहे या खोया हुआ लौट सके. (ज्यादा तोह नहीं बोल गया? वो मनीराम के विचार ऐसे बिलकुल नहीं लगते)

हाँ और सबसे ख़ास बात है की अगर आप अपने हे फैंसले पर नहीं टिक सकते तोह वो ऊपर वाला ज्ञान और म्हणत निरर्थक साबित होगी, जिसका कोई औचित्य नहीं.

जब एक व्यक्ति पहले पैन पर हे बोल रहा के वो अकेला बैठा 2020 में अपने जीवन को याद कर रहा है तोह भाई हम या तुम उसको बदल सकते हो? न बताओ जरा के टाइम मशीन, ब्रेन रीइंस्टॉल जैसी टेक्नोलॉजी है हमारे पास? सिर्फ यादों में हे ये पॉसिबल है वो भी उसकी जो अकेला लिख रहा है, लोकेशन अननोन 🙌

.

.

कहानी अगर बदली जा सकती न तोह कसम से मैं गोरा को बचा लेता मुंशी जी की कलम से. मैं कामसूत्र के काम से काम 7 आसान गायब कर देता भाई क्योंकि उनमे से कुछ तोह होने वाले हे नहीं और 2-3 तोह जान भी ले सकते है, ऐसी च#### किसको चाहिए भाई? बिलकुल रिक्स नहीं लेने का.. बूत थिस इस इम्पॉसिबल.

यू can't चेंज व्हाट है बीन आलरेडी हप्पेनेड... यही सच है की हम हो चुकी घटना को नहीं बदल सकते. बेहतर या खराब कर सकते है जिसमे 99% चांस सेकंड वाले के होंगे.

भाई अज्जू मारा न तोह बड़ा दुःख हुआ और हॉस्पिटल वाला सन काटना चाहता था. ऐसा हाल जब बैलबुद्धि मूर्छित हुआ और ऋतू की वो हालत देखि तोह मैं बदलना चाहता था उस दृश्य को. मुझे वैसा हे सन दोहराना था जैसे छोटी के साथ हुआ.. और पसंद की बात है तोह मदुरई, ललिता जी या गुरदीप जैसा कामुक दृश्य दोहराने का दिल बहोत करता है. फिर कोमल भारी पड़ जाती है मंजू और अन्नू के साथ.

अनगिनत विवरण है जो मैं चाहता हु के मेरी इत्छा अनुसार हो लेकिन कहानी तोह वो भाई 2020 में बैठा लिख रहा है जिसकी कहानी है. उसको लिखने दो क्योंकि बदल तोह हम अतीत में जा कर वैसे भी कुछ नहीं सकते. हाँ सवालों का हक़ है क्योंकि ये अधिकार है जब आप पढ़ रहे है. और मैं जरिया हु जो उचित सवाल का सही जवाब देगा (ऊँगली की सम्भावनाओ से इंकार नहीं).

बाकी अब आप लोग समझ हे गए होंगे की 650 अपडेट में 2012 तक जाना है और ज्यादा ा बी स लगा नहीं सकते इतनी बड़ी उपदटेस के साथ. (दिल पे हाथ रख कर स्वीकार करना इस सच को. नहीं तोह मोहर सिंह का सपना आएगा)

.

.

परिवार जैसे इस मंच पर हम सभी एक सामान है चाहे कोई काम बोलता है तोह कोई ज्यादा.. हाँ उनसे अलग इंसान को लोमड़ी 404 जैसे भाई है जो कभी कभी खुद हे अपडेट दे देते है, पोव नारद मुनि की तरह निष्पक्ष रखते हुए 😅

.

.

हंसी मजाक करो, सवाल जवाब भी. आपस में व्यवहार बनता है जब बहार की दुनिया में इतनी परेशानिया हो. बस जिसको ाचा नहीं लगता उसको राम राम नहीं तोह Rahul The Devil aalu Raghav1997 Billi420 Sameer Garg Anil23265 aka3829 XLNC u.sir.name Rahul Kingsingh Gsc Battu भाई जैसे बन्दों के साथ पेच लड़ाई रखो.. ढेर सारे भाई बंधू है जो कहानी के साथ साथ आपस में प्यार मजाक और चर्चा करने में यकीन रखते है और उतने हे भाई है जो सिर्फ कहानी से जुड़े है, पढ़ते है रिव्यु देते है सटीक सवालों के साथ फिर चाहे eternity जी हो या XFORUM नैवेल के Tony stark या Iron Man नहीं तोह अपने विराट कोहली aman rathore . एक ख़ास Professsor भी है जो गायब है इसलिए अनिल भाई का बोझ ज्यादा बढ़ा हुआ. और सिर्फ इतने हे नहीं दुबई, पाकिस्तान, कनाडा, इंग्लैंड के भी अपने भाई बंधू है जो जब भी आते है शुभकामनाओ के साथ रु बा रु होते है. मेरा कहने का यही मतलब है की सब शुरू से साथ है चाहे वो 1 साल बाद आये हो या 3 महीने पहले. अपडेट एक से यहाँ तक वो साथ है Ishwar की कृपा से.

निजी राये अलग बात है जो आप व्यक्तिगत सन्देश में देते है और मैं समय लगने पर उनके जवाब. पर कहानी हे बदल दू तोह भाई ये नामुमकिन होगा फिर चाहे इसको यही रोक कर बस अकेला पढता राहु. इस फोरम पर असंख्य कहानियां है और मैं भी उन्हें अपनी इत्छा अनुसार पढता है, कुछ परिचय तक या कोई अंतिम पैन तक. ये नहीं कहा के मुझे उस कहानी में ये चाहिए, या वो नहीं चाहिए. हाँ कही एक आध जगह वेटिंग लिख देता हु या फिर लेखक का शुक्रिया उस बेहतरीन रचना के लिए.

खैर फ़िलहाल तोह काम का समय हो चला तोह ज्यादा और क्या कहु. भगवन आपका भला करे. 🙏
 
अपडेट 205

अंतिम इत्छा (1)

भावनाये आखिर क्या है और क्यों इनका समावेश हर इंसान में रहता है? कही ज्यादा कही थोड़ा बहोत लेकिन एकाकीपन से भरा इंसान भी khayaalon-chetna और विचारो से खुद को पृथक नहीं कर सकता. और जो रहा हे सबके बीच हो, उसमे भावनाये दुनिया के रंगो से भी कही ज्यादा गहरी या विस्तृत भरी होती है. "फीलिंग्स"

"वो मेरा बीटा था? ये नहीं हो सकता सतीश भाई साहब. देखो कौशल्या ये क्या कह रहे है की वो साधू मेरा बीटा है?", बहोत समय लगा था कुमार महेंद्र के साथ सभी पांच सरपंचो को माहौल शांत करवाने में. प्यारेलाल जी को हे मंच संभालना पड़ा ये बताते हुए की अर्जुन ने जो किया है वैसा उसके पड़ दादा भी करते रहे है (थोड़ा तार्किक था) और वो इंसान जिसके सामने लोग झुके थे वही आखिरी मुजरिम था Raj-darbar का जिसकी तलाश से पहले मोतीलाल जी दुनिया से रुखसत हो गए. बातें और चर्चा तोह jan-maanas में अभी ढेरो होनी थी परन्तु कोमल द्वारा मोतीलाल जी के सपने का जीकर अब दंगल से आगे वाली जनता को भी खामोश करवा गया. कन्या महाविद्यालय वो भी इन 2 बड़े गाँवों के बीच उस अड्डे पर जहा ये दोनों हे पृथक रहे 28 बरस. ऐसा महाविद्यालय जिसमे इन गाँवों के साथ दूर दराज से लड़कियां हर विषय में स्नातक और उस से भी ऊपर शिक्षा प्राप्त कर सकेंगी. इस बात की पुष्टि स्वयं कौशल्या जी ने की और बताया की शिलान्यास स्टेडियम से भी एक दिन पहले ऐतवार को होगा. लोग चाहे उस मंजर को न भूल सकते थे परन्तु ऐसी घोषणा ने बहुतो की आँखों में नमी और ख़ुशी ला दी थी. अभी वो ग्राम कल्याण की बातों को जैसे तैसे निबटा कर माइक विनोद को सुपुर्द करती कोमल के साथ पीछे हुई तोह पूर्णिमा जी की अश्रुधारा देख खुद भी काँप गयी.

"सतीश ये कैसा मजाक हे? आज पहले हे मैं जैसे तैसे अपने पाँव पर कड़ी हु और तुम पूर्णिमा को ये बेमतलब की कहानी बता रहे हो?"

"भाभी मैं मजाक सिर्फ भाई साहब या बचो के साथ कर सकता हु लेकिन एक माँ के साथ नहीं. वो दैत्याकार साधू सा व्यक्ति जब घेरा चीयर कर आगे बढ़ने लगा था तोह उसने मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए इतना कहा के फौजी चाचा, माँ से कहना की हम आज पिता जी की अस्थियां प्रवाहित करने के बाद सीधा हरिद्वार निकलेंगे. गजेंद्र साथ चलेगा हमारे.' अब अस्थियां यहाँ आयी है और गजेंद्र उमेद है जबकि हम फ़ौज में रहे है, ये सब उसको पता था और मुझे तोह उसका चेहरा तक सही से याद नहीं. लेकिन वो सबको जानता था और अर्जुन का गुरु है जिसके बारे में हम में से कोई नहीं जानता.", छोल साहब की बात सुन्न कर पूर्णिमा जी से पहले तोह कौशल्या जी हे ठंडी पड़ गयी थी. उन्हें गिरने से बचाया कोमल ने और स्वयं रानी माँ ने दूसरी तरफ से उन्हें सहारा दिया. कुर्सी पर बैठते हे वो फफक उठी थी जिनके आंसू स्वयं पूर्णिमा पौंछती हुई उन्हें शांत करवाने लगी. कोमल ने पानी आगे किया जिसको पीने से साफ़ इंकार कर दिया था उसकी दादी ने.

"इन्हे बुलवा सतीश और उस अर्जुन को भी.. ये खेल नहीं है.. अब उन दोनों को.."

"भाभी शान्ति से सुनिए.. वो दोनों भी नहीं जानते इस सच को और वो भी उन्हें नहीं बताने वाला क्योंकि पहले वो अपनी माँ से मिलने का ितचुक है. आप दोनों पहले खुद को सम्भालिये, जवाब वो हे देगा. कोमल बिटिया तुम इनके पास हे रहो, मैं पता करता हु के वो लोग कहा है.", छोल साहब वापिस जाने लगे थे लेकिन कोमल की बात ने उन्हें वहॉ रोक दिया.

"आप भी यही रहिये दादा जी, कृष्णेश्वर दादा जी किसी जगतार के साथ उन्हें देखने हे गए है. वो बता रहे थे की उस तरफ नदी है और जंगल वाला रास्ता. अब मुजरिमो को भी साथ लेके गए है तोह आपको ज्यादा पता होगा की उधर क्या होने वाला है.", सौंदर्य जी तोह ख़ामोशी से बस सुन्न हे रही थी ये सब और दिल में उनके भी अलग द्वन्द जारी था जैसे वो भी संभव को जान न चाहती हो.

"दीदी, मुझे ऐसा कहना तोह नहीं चाहिए लेकिन अर्जुन ने आज पंडित जी और हमे जिस मुसीबत से बचाया है उसके बदले में हम सबकुछ दे कर भी ये एहसान नहीं उतार सकते. माँ हम भी है और समझते है की आप दोनों की दशा उस वक़्त भी सही नहीं थी और अब भी ख़ास नहीं है. अर्जुन जानता बहोत कुछ है लेकिन वो ठीक बापू जी जैसे सबकुछ अपने तक हे सिमित रखता है. उसको कोई सजा मैट दीजियेगा, मेरी बिनती है आपसे.", यही एक नाम तोह था जो कौशल्या जी के दर्द को तुरंत समाप्त कर देता था. उन्हें सब याद आ गया की कैसे आज उन्होंने अपने उस बचे को मौत का सामना करते देखे जहा उनकी सभी औलाद और उनके पति तक घेरे से बहार बंधे थे.

"उसके साथ रह कर मैं हे उसको नहीं जान पायी सौंदर्य जी लेकिन लगता है की वो अपने दादा के जख्मो को भरने हे इधर आया है. वो चांडाल मेरे बचे को ऊपरी ताक़त बता रहा था और बाकी सब उसके सामने बेबस क्यों थे? कैसे नियम है जिसमे एक बाप अपने बेटे को बचने नहीं जा सकता? और क्या होता अगर यहाँ आज ऋतू नहीं होती? मैं नहीं जानती इस सबके बारे में लेकिन इनके पिता जी के ऐसे कौनसे अधूरे काम थे जो 2 पीढ़ी न कर सकीय लेकिन ये लड़का उनसे जुड़ा है.?"

"हमारे पास तोह सिर्फ इतनी जानकारी है की वो तांत्रिक हमारे दादा जी से आज्ञा प्राप्त Raj-purohit था जिसके सामने हम सिर्फ झुक सकते थे और पंडित जी भी. अर्जुन उसको जानता है जो हमने भी बाल्यावस्था के बाद सिर्फ आज देखा? नामुमकिन हे होगा न क्योंकि आप भी तोह नहीं जानती और एक अघोरी के सामने ये जनता तोह हमसे भी कमजोर है. छोल जी ने तोह देखा था न की अर्जुन ने उसको किसी आश्रम के नाम से चुनौती दी थी? और जो युवक घुटनो पर बैठा रो रहा था सिर्फ अपनी बहिन के आंसुओ से इतना उत्तेजित हो कर की आज वो हर नियम कुचलने वाला था. अब हम जितना सोच रहे है, उतना ज्यादा उलझन और दुःख में जा रहे है. एक मासूम युवक कैसे इस सबका हिस्सा बन गया?"

"वो ऐसा हे है रानी जी, जो दुःख को हे खोजता रहता है. मैंने भी भाभी जी से थोड़े समय पहले यही कहा था के उसका वजूद ऋतू बिटिया के बिना अधूरा है और उसके साथ तोह पता नहीं ज्यादा बेहतर या खतरनाक. बस आपने जो देखा है वो जरूर याद रखियेगा. उस लड़की की आँखों में आंसू शंकर को भी पिघला देते है लेकिन अर्जुन फिर मेरी आपकी िज्जात्त नहीं करेगा अगर उसके जिम्मेवार हम है. मैंने कई बार पत्थर खाये है अर्जुन से, उसके बचपन में. आज वो उस तांत्रिक को चुनौती दे रहा था तब उसने कहा थे के वो दोनों उस आश्रम के शिष्य है जिसके सबूत उसके हाथ में थे. ये लड़का भाई साहब के नेटवर्क से भी बहार काम करता है. कौनसा आश्रम, कैसा शिष्य और वो raj-purohit उन सिक्को को देख कर मन नहीं कर सका. अर्जुन तैयारी के साथ आया था जो 5 दिन में हे कर ली या वो बहोत पहले से इस सबका ज्ञान रखता था? वो उसका गुरु है जो स्वयं को भाभी का बड़ा बीटा बता रहा था जबकि ऐसा कोई अवसर नहीं जब वो व्यक्ति दिखाई दिया हो आज से पहले. आप भी दुखी है जैसे मेरी दोनों भाभी और बहोत से लोग लेकिन क्या हम में से कोई भी उस शैतान को रोक सकता था जैसे आपने अपनी और भाई साहब की लाचारी बताई? अर्जुन ने किया और वो जब यहाँ से गया तोह वो बुरी तरह जख्मी था लेकिन उसके पास जरूर कुछ ऐसा है जो वो अपने दादा को देने वाला है. भाई साहब ने आज अपने पिता की पगड़ी पहनी थी जिसकी चाहत वो बचपन से रखते थे. अर्जुन उनके पिता के साथ पिता की माता को भी जानता है. उसके पास लिखित में प्रमाण है स्वयं मोतीलाल जी के और भाई साहब ने उसको अपने पिता का दोस्त कहा था. अब अगर सबकुछ समझना और जान न है तोह हमे शांत रहना होगा कुछ वक़्त ये दुःख दर्द भूल कर. राम निकल लिए लक्ष्मण को धरम संकट में छोड़ कर.", छोल साहब के तर्क और सवालों ने काफी हद्द तक इनके आंसू बंद करवा दिए थे और उनकी मज़बूरी वाली बात सुन्न कर कौशल्या जी ने हलके से कान खींचने का अभिनय किया.

"उसको आज कुछ हो जाता न तोह मैंने इन सबकी खाट कड़ी कर देनी थी और साथ में तुम्हारी भी. गाँव एक करते करते अपना परिवार नहीं बिखरा सकती चाहे मुझे स्वार्थी हे समझो लेकिन पहले हे मेरे आँचल पे कई पेबंद लगे है. पता करो इन सबका जो तमाशा करके निकल लिए और वो भी इनके साथ भाग गया. चोट दिखाई दी तोह अब गाँव से सीधा घर जाने वाला है. कोमल ढून्ढ जरा इस ऋतू को.", कौशल्या जी की बात अब विनोद भी सुन्न रहा था जो आश्वासन देता हुआ निचे उतर चला और कोमल भी. लोगो की तालियां ख़तम हो कर अब कबड्डी वाली तरफ रुख कर चुकी थी जबकि प्यारलाल जी अपने मित्र के बारे में थोड़ी जानकारी देने लगे थे अपनी इन बहुओं को.

.

.

"क्या इन तीनो में से कोई कल्पतरु था बाबा? वैसे बाउजी आप तीनो को हे बुला रहे है पापा.", अर्जुन ने बुलाने वाली बात अपनी तरफ से कही थी और उसके आने तक 4 लाशो के ऊपर परदे जैसे वस्त्र लिपटे थे, जिसका मतलब था के ऐसे दृश्य अर्जुन से दूर रखे गए.

"तुम भी चलो योगी जी. या अघोरी बन्न ने का सोच लिया है अब?", नरिंदर जी नदी से हाथ मुँह धो कर आये थे और आते हे उन्होंने अर्जुन की खिंचाई शुरू कर दी.

"बस यही एक उपाए था चाचा जी और मुझे ये शिष्य की पदवी वापिस लौटानी होगी आश्रम को. बाकी मैं आप सभी से माफ़ी चाहता हु उस सबके लिए लेकिन इसके सिवा रास्ता नहीं था. दादा जी बता देंगे आपको इस सबकी वजह. उमेद चाचा, कुछ ख़ास काम भी था न जिसके लिए आप आये the?",Ab उमेद को भी समझ आया था के वो तोह शैतान की जुबान खुलवाना सीखने के चक्कर में अस्थियां तोह भूल हे गया.

"सही याद दिलाया भतीजे, माँ और चची के पास तोह हम में से कोई नहीं है. वैसे इसने कहा था के कल्पतरु की योजना अलग है और वो हाथ नहीं लगने वाला. नुक्सान के बदले बड़ा नुक्सान.", अर्जुन अपने चाचा और पिता की तरफ देखते हुए वही निचे बैठ गया.

"कितनी जल्दी हवेली पंहुचा जा सकता है इधर से? ये दरगाह वाला गाँव हे 4-5 किलोमीटर होगा और उतना हे आगे हमारी हवेली. देवकी दादी खतरे में है पापा. मैं भाग नहीं सकता.", अर्जुन को हताश देखते हे शंकर के कान खड़े हो गए. पूरे गाँव के मर्द तोह मेले में थे और हवेली पर सिर्फ देवकी और मीणा.

"ये कल्पतरु कौन है और वो जानता है हमारा घर? तुमने पहले क्यों नहीं बताया और ये सब बवाल है क्या? मेरे पास तोह सिक्का भी नहीं है और इधर से जाने का रास्ता.", शंकर को भड़कते देख अपनी लाठी सहलाते हुए संभव बाबा ने सटीक जवाब दिया.

"उधर कोई वाहन पंहुचा है चिकित्सक. दौड़ कर जाओ तोह अधिकतम 3-4 मिनट लगेंगे बाकी चलने में तुमसे दक्ष तोह यहाँ कोई है भी नहीं. अर्जुन की यहाँ जरुरत है फ़िलहाल और पंडित जी से कहना की वो फौजी साहब को बता दे हम उनकी प्रतीक्षा रघुवीर जी के आशियाने पर कर रहे है. तुम्हे तुरंत निकलना चाइये नहीं तोह कालपातुरे के निशाँ भी हाथ नहीं लगने वाले.", इतना सुन्न कर जब तक उमेद और शंकर समझते नरिंदर तो दौड़ हे लगा चूका था. अर्जुन द्वारा देवकी का स्पष्ट नाम सुन्न कर वो समझ चूका था के बात कही ज्यादा गंभीर है जिसमे अर्जुन शामिल नहीं हो सकता.

"लपक बे इन्दर को. ये कल्पतरु मेरा शिकार गज्जू और पापा को भनक नहीं लगनी चाहिए. जल्दी मिलता हु तुमसे बड़े भाई और जरा ध्यान रखना मेरे बेटे का, एक हे है हम तीनो का.", शंकर आस्तीन मदद चूका था भागते हुए और संभव ने धीमी आवाज में इतना हे कहा, 'चारो का अनुज, चारो का.'

"पसली टूटने से बच गयी तुम्हारी अन्यथा मामला गंभीर हो सकता था. युद्ध में जब प्रतिद्वंदी बेहतर हो तोह जरुरी नहीं की सिर्फ वार हे करते रहो. प्रहार से नाजुक हिस्से बचाना ज्यादा आवश्यक है. ये वस्त्र उतार कर एक तरफ रखो.", समभाव बाबा अपनी उस 4 फुट की लाठी पर खली हाथ हे नहीं घिस रहे थे, उनकी हथेली में कुछ नरम लेप सा तैयार था. अर्जुन की पसलियों पर 3 नीली लकीरे और उसके गिर्द लाल सूजन बता रही थी श्रीधर के ऐसे 2-3 वार अगर और लगते तोह अर्जुन उठने के काबिल न रहता. उस ठन्डे लेप का स्पर्श अपनी पसलियों पर होते हे अर्जुन की चीख निकल गयी

"ओह्ह्ह्ह बाबा.. ये तोह जैसे आपने हजारो सूई.... चुभा दी गरम गरम.. आह्हः मायआ..", वो हाथ भी इतना बड़ा था जिसने लेप के साथ पसलियों को दबाये रखा. लेकिन हर गुजरते क्षण के साथ जैसे अर्जुन के चेहरे पर दर्द नदारद होता गया. बाबा का हाथ पसलियों पर से अलग हुआ तोह वह बस लेप हे नजर आ रहा था.

"मैं तहखाने से वो सब सामान लेके आता हु बीटा. तुम इस दुष्ट के जिस्म पर वो सूखी लकडिया सजा दो. उनकी मुक्ति इस पिशाच के सीने पर हे होगी जिसको अंजाम तुम्हे स्वयं अपने हाथो से देना है. वापिस वही से लौट जाना जहा से आये थे.", अर्जुन को उसकी हालत पर छोड़ने से पहले बाबा ने तोह मलहम वाला थोड़ा से लेप उसके होंठो के किनारे और बॉहों (एएब्रो) के निचे भी लगाया. अर्जुन उस जलन को बर्दाश्त करता वैसे हे धड़ से निर्वस्त्र इस उमस लेकिन ठंडक भरे खामोश जंगल में बैठा रहा. सब सामान लेके आने में कुछ समय तोह लग्न हे था.

.

.

"गज्जू, तू और पापा यही उतरो भाई और हम जरा छोटे चाचा के साथ जा कर आते है. जगतार बीटा, तुम साथ चलोगे?", नरिंदर जीप की अगली सीट पर बैठा था अपने भाई की बगल में और शंकर ने जैसे उनको कोई बात या चर्चा करने से पहले हे दरगाह के पिछली तरफ उतार दिया था. वो सचमुच हे एक जीवट चालाक था जिसके हाथ हर गाडी को उसकी क्षमता से अधिक ले जाने में दक्ष थे.

"तुम्हारी माँ और बाकी सब?"

"आते है पापा. आप जरा लोगो के बीच रहे जिस से उन्हें लगे की आप हर हाल में उनके साथ है. गज्जू, तुझे उन बड़े भाई साहब ने कुछ कहा था. फौजी मतलब सतीश चाचा. चल भाई, दबा दे पंजा.", जगतार तोह वैसे हे जीप के पिछले हिस्से में बैठा रहा जिसको थोड़ा बहोत तोह अर्जुन के साथ हे पता चल चूका था की मामला गंभीर है. कृष्णेश्वर जी को कुछ समझ नहीं थी और उन्हें कुछ बताये बिना हे शंकर ने जगतार की जीप एक पल को तोह सड़क पर रगड़ हे दी थी. जिस अंदाज़ में वो यहाँ से निकला था दोनों गाँव के बीच पड़ने वाले हाईवे पर भी उसने कोई परवाह नहीं की किसी वाहन या दुर्घटना की. कृष्णेश्वर जी के तोह हलक में सांसें हे रुकने लगी थी इस रफ़्तार और उस चालाक से. नरिंदर तोह बेअसर था जैसे उसको इसकी आदत हो और अपनी पिस्तौल को लोड करने के बाद उसने शंकर के लिए भी वो स्वचालित 10 गोलियों वाली पिस्तौल तैयार कर दी. चौपाल से आगे निकलते हे जैसे ये जगह किसी मरघट सामान दिखने लगी. गाडी के पहिये चींखते हुए रुके थे जबकि उनसे पहले इन्दर कूद कर हवेली में जा घुसा जिसके दोनों कपाट खुले थे.

"यहाँ काण्ड हुआ है भाई लेकिन इधर chhan-bin करने का कोई फायदा नहीं. बस्ती वाली तरफ भगा इस जीप को. ये खून की बूंदे बिलकुल गरम है जैसे अभी कुछ वक़्त पहले हे गिरा हो.", शंकर दरवाजे से भीतर हे आ रहा था की नरिंदर उसको लिए वापिस गाडी में आ बैठा. आँगन से किसी को घसीटे जाने के निशाँ और फिर देहलीज पर उस खून का मुआयना नरिंदर चाँद सेकंड में हे कर चूका था. जो भी कोई था वो इस गाँव की तरफ तोह जाने नहीं वाला था और हवेली सबसे आखिर में थी. शंकर फिर से अदृश्य अपराधी के पीछे बढ़ चला. अब जीप धुल उड़ाती हुई सरपट उस खेतो वाली सड़क पर दौड़ रही थी जिसके ब्रेक एक बार फिर टायर को चींखने पर मजबूर करते हुए लगे. सामने सड़क के बीच में हे दिलबाग और 5-6 मजदूर जख्मी थे लेकिन दिलबाग देवकी के सर पर धोती का कपडा बांधता हुआ उसका खून रोकने में जूता था. वो बेहोश थी.

"ऐ दिलबाग यहाँ हुआ क्या भाई? शंकर देख जरा चची को और जग्गी बीटा तू और चाचा देखो किसी के गहरी चोट तोह नहीं आयी.", नरिंदर तोह उतर गया था बाकी दोनों के साथ लेकिन शंकर के इरादे जैसे कुछ और थे जो फिर से जीप को सड़क से थोड़ा उतार कर आगे निकल चला. बगल वाली सीट पर पिस्तौल मौजूद थी. नरिंदर उसको रोकता लेकिन यहाँ उसकी चची बेहोश और लोग जख्मी थे.

"ाःह.. इन्दर भैया.. बड़ी माँ को कुछ लोग अगुआ करके ले जा रहे थे और इनके मुँह पर कपडा बंधा था. वो मीणा भी उनके साथ थी जो हवेली पर काम करती है. मैंने कोशिश की थी बीच में रेहड़ा लगा कर उन्हें रोकने की. आह्हः.. सालो के पास डंडे तलवार के साथ रिवॉल्वर भी निकली. वो उधर वाले दोनों आदमी उनके हे है लेकिन लगता नहीं ज़िंदा बचे होंगे. मेरे पाली के भी गोली लगी है पर ज़िंदा है वो.. जग्गी किसी को बुला ला रे."

"शठ.. शांत रह दिलबाग और किसी को नहीं बुलाना. कोई इस बात का जीकर किसी से नहीं करेगा. चची के सर पर घाव गहरा है चाचा. जग्गी के साथ हवेली से कार लेके आओ आप. इन्हे हॉस्पिटल ले जाना ज्यादा जरुरी है. उन्हें शंकर देख लेगा.", अभी नरिंदर की बात पूरी हुई और वो लोग जाने भी लगे थे लेकिन दूर कही तेज पटाखे चलने की आवाज आयी जो तक़रीबन 5-6 बार गूंजी.

"आप लोग कार लेके आओ, मैं देखता हु उधर क्या हुआ है.", नरिंदर पिस्तौल मुठी में दबाये इस घनी धुप में हे उस वीराने की तरफ दौड़ गया. जग्गी अकेले कार लेने भगा था क्योंकि दिलबाग की खुदकी हालत बुरी थी. ज्यादा खून बहने से देवकी भी मूर्छित थी.

"अबे तुझे क्या हुआ और ये जीप? सत्यानाश हो..", नरिंदर जबतक उस सूखे पोखर किनारे वाली कच्ची सड़क पर पंहुचा शंकर उसको अपनी हे तरफ आता दिखा. उसकी जीप पोखर में गिर चुकी थी, जग्गी की जीप. शंकर के भी कंधे से रक्त बह रह था.

"बहनचोद साले वो तोह घात लगाए बैठे थे बे. मतलब हम नहीं आते तोह दिलबाग और बाकी सब मारे जाते. मैंने उसको देखा भाई जिसने मुझे जेह्रीला लड्डू दिया था बचपन में. इधर कोई कपडा बांध. वैसे 2 तोह ढेर कर दिए मैंने लेकिन ये साली गोली छो कर निकली और जीप निचे. चची को जल्द लेके जाना होगा, वही होश में आने पे कुछ बता सकती है.", नरिंदर उसकी बात सुनते हुए भी पोखर की तरफ चलता रहा. जीप जहा से निचे गिरी थी उसके 20 कदम आगे हे वो धातु का सफ़ेद पत्र उसके हाथ लगा. काले पटरे पर सफ़ेद रंग से रजत अंकित था.

"राजस्थान से तोह चची का पीहर भी है न रे शंकर.? और ये मीणा हवेली पे चाचा ने राखी था या चची ने? हाथ उठा थोड़ा.. बच गया सिर्फ छू कर निकली है. तेरी जरुरत पड़ सकती है चची के पास, मजबूत जान निकली वो. और अब वो साधू बाबा जिस से तू बचपन में मिला था वही कल्पतरु निकला जिसका जीकर अपने दादा तक था. मतलब चची के पीहर और इस तांत्रिक का आपस में तगड़ा मेल है. होश में रहा कर भाई, हम उन्हें पकड़ सकते थे लेकिन अब उन्हें पकडे या ये सब संभाले? गाँव में बात फैली तोह बहोत पन्गा हो सकता है.", दोनों वापिस घटनास्थल पर पहुंचे तोह शंकर को नरिंदर ने चाचा के साथ कार में भेज दिया. पिछली सीट पर दिलबाग और देवकी के साथ कृष्णेश्वर जी और अगली पर वो पाली जिसके जांघ पर गोली लगी थी.

"यार जग्गी तेरी जीप का थोड़ा नुक्सान हो गया. ज्यादा नहीं बस वो पोखर में गिर गयी.", नरिंदर जी अब उन घायलों को जग्गी के साथ मिल कर दिलबाग के खेत में ले जा रहे थे. जिस्म पर डाँडो की मार भी थी और कुछ तीखे कट भी लगे थे लेकिन ज्यादा गहरे नहीं.

"वो तोह चीज है चाचा, ठीक हो जानी लेकिन दादी की जान बचना जरुरी है. अर्जुन ने कहा भी था के मैं किसी को ले कर इधर चला औ पर वो छोटे प्रधान जी मुझे आप लोगो को ढूंढ़ने ले गए. दिलबाग बाई दिलेरी न दिखता तोह बड़ी दुर्घटना हो जानी थी. वैसे बहार जो 2 मरे पड़े है उनका क्या करना है?", जग्गी के पसीने आ चुके थे कपडे भी कही जगह से खून के धब्बो से भरे.

"उन्हें तोह फेंक देंगे नदी में लेकिन इस बात का जीकर फिलहाल किसी से नहीं करना. और तुम लोग भी भाई. तुम्हारा इलाज और हिम्मत दिखने का शुक्रिया मैं कर दूंगा. वैसे कोई बताएगा की हुआ क्या था?", एक मजदूर जो अपनी कमर पर गमछा बाँधने के बाद मुँह धोने लगा था उसने बताना शुरू किया.

"प्रधान जी, मैंने हे सबसे पहले देखा था जब मैं मुकंदी को बुलाने हवेली जा रहा था. वो लोग बड़ी मालकिन का मुँह बाँध कर सवारी जीप में दाल के भाग रहे थे तोह मैंने दिलबाग भाई जी को उस चौक से हे आवाज लगाईं जिन्होंने जीप के सामने चारे वाला रेहड़ा अदा दिया. 2 लोग बीच के हिस्से से बहार गिरे जिन्हे एक बूढ़े ने गोली मार दी. उनके बाद 2 लोग no डंडे और तलवार से हुम्ला किया लेकिन दिलबाग भाई जी के साथ हमारे ये 4 भाई उनसे भीड़ गए. मैं मालकिन को बचने पंहुचा तोह उस औरत ने पहले उनका गाला रेतने की कोशिश की और फिर मेरे पेट पर वो खंजर चला दिया जो ज्यादा गहरा न लगा. हाँ उस बीच एक बड़ा सा तांत्रिक था जिसने दिलबाग भाई जी के लात मारी और फिर रेहड़े को एक तरफ फेंक दिया. जाने से पहले 2 गोली उस बूढ़े ने और चला दी जो बिषमा की जांघ में और भाई जी के छो कर निकली. आज से पहले वो लोग इधर कभी न दिखे थे और हवेली वाली नौकरानी भी. मुकंदी उनके साथ हे फरार हो गया. हम तोह पुलिस के लफड़े में नहीं पड़ेंगे न मालिक? हमारी 2 बिटिया ब्याहने लायक है."

"न भाई तुमने तोह हमारी हे मदद की है और तुम सबकी जितनी भी बेटियां है सबका विवाह अब हमारी जिम्मेवारी है. वैसे अगल बगल में और मजदूर क्यों नहीं है?", नरिंदर साफ़ कपडे को पट्टी की तरह फाड़ कर उन्हें जख्मी लोगो के हाथ, पाँव पर बांध रहा था जिसमे जग्गी उनका साथ देते हुए सब ध्यान से सुनता रहा.

"मुकंदी के पास हे वो लोग काम करते है न मालिक. ठेकेदार वही तोह था सबका जो आपके खेतो से अलग काम करते है. आज सवेरे हे उसने सबकी छुट्टी करके दारू खर्चा दे दिया था. हम तोह दिलबाग भाई जी के साथ शुरू से बंधे है, 12 महीने. नहीं तोह हम भी नहीं होते इधर. वैसे आपकी जगह हे रहते है और खाना पीना बढ़िया मिलता है मालिक तोह ब्याह वाला मामला हम म्हणत से कर लेंगे. माफ़ करना मालिक छोटा मुँह और बड़ी बात लेकिन ये मुकंदी ससुरा बड़ी मालकिन जी का मुँह लगा था. वो उसके जिम्मे बहोत से काम लगाती रहती थी और प्रधान जी से अलग भी पैसे देती रहती थी. 2 दिन पहले भी वो हवेली से उनके साथ हे चौराहे तक आया था और आशीर्वाद लेने के बाद नोटों की गद्दी गमछे में बांध के जाता देखा. फिर वो सपोला उन्हें हे डांस लिया. यह लाश हम ठिकाने लगा देंगे मालिक जैसा आप कहे वैसा हे नदी में." नरिंदर ने भी मुस्कुरा कर इस व्यक्ति की पीठ पर थपकी दे दी. इंसान बहादुर था और नमक का मान रखने वाला भी.

"बोलै न भाई के अब बेटियां हमारी जिम्मेवारी है. इस मुकंदी की छानबीन करवाओ जग्गी बीटा अपने सी साहब से बोल कर. व्यक्तिगत मामला रहे ये उन्हें बता देना. वैसे अर्जुन इसके बारे में कुछ जानता था या उसको इसकी भनक थी पहले से लेकिन वो लोग दिन दहाड़े ऐसा काम कर देंगे ये नहीं पता होगा. खैर जब ठेकेदार हे हवेली की खबर रखने के साथ इतने लोगो पर हुकूमत चलता हो तोह कुछ भी हो सकता है. जग्गी, अर्जुन से मिलवा देना इन सबको और बता देना की हमने कुछ कहा है. अब हमे चलना चाहिए. हाँ, भाई तुम लोगो के yaar-bhai जो भी हो उनके साथ मिल कर अगले तालाब से वो जीप निकलवा देना. हमारी हे है, ये पैसे रख लो.", नरिंदर ने 100-100 के कई नोट इसी आदमी को थमा दिए थे जीप वाले काम के लिए. अब वो जग्गी को साथ लिए पैदल हे हवेली की तरफ बढ़ चला. वह अब गाडी तोह कोई नहीं थी बस अर्जुन की रानी कड़ी थी जो इन 2 लोगो के लिए बहोत थी. इस सारे मामले को ठीक ऐसे न सही लेकिन अपने पिता को तोह बताना हे था इन्हे. देवकी हे कुछ बता सकती थी लेकिन फिलहाल उसकी बेहोशी ने काम मुश्किल कर दिया था.

.

.

"लो सब वस्त्र और ये सामान अब तुम्हारे पास है. लकड़ियां बढियाँ लगाईं है तुमने और ये घी इन वस्त्रो पर आहुति की तरह देने के बाद शांति पाठ कर देना बीटा. अब मुझे भी निकलना होगा, कोई बरसो से प्रतीक्षा कर रहा है हमारी. बाद में तहखाने में हम स्वयं शुद्धि कर देंगे. बाकी काम तुम्हे जब समय लगे कर देना, बस आज नहीं. चलते है.", संभव बाबा के जिस्म पर अब धोती के साथ उजला कुरता था और चेहरा धुला हुआ. अर्जुन उन्हें प्रशंशा की दृष्टि से देखता हुआ हाथ जोड़ कर उठ खड़ा हुआ.

"तोह अब फिर कब मिलेंगे बाबा?"

"घर तोह हमारा यही है बीटा लेकिन कोशिश करना की जब अत्यधिक जरुरी हो तभी मिलने आना. हमने कहा था न जब तुम विपदा में होंगे हम स्वयं पहुंच जायेंगे, जैसे आज. हमारे एकमात्र शिष्य होने के साथ तुम बेटे भी हो. बेटे के लिए पिता के द्वार पूछ कर नहीं खुलते परन्तु इसको इतना मैट बढ़ने देना की हम आज वाली गलती फिर कर बैठे. कुछ जिम्मेवारियां है, उन्हें पूरा करने के बाद हम जरूर मिलेंगे. चलते है अभी.", संभव बाबा के शिकारी जैसे फिर से गायब हो गए थे अपनी सुरक्षा निभाने में और अर्जुन उन्हें जाते देख कर श्रीधर की शया पर वो एक एक वस्त्र सलीके से बिछाने लगा. उसके होंठो से शांति पथ और आँखों में हलके आंसू थे जो दुःख के नहीं थे. हर वस्त्र को उसने रखने से पहले मस्तक से लगाया था जैसे वो उनसे पहली और आखिरी बार मिल रहा हो. आज उसने मोतीलाल जी के दिल का सबसे बड़ा बोझ काम कर दिया था. कितनी हे देर तक वो इसमें तल्लीनता से जूता रहा और जब हर वस्त्र सुपुर्द कर दिया तोह उस पीतल की मटकी में मौजूद समूचा घी वस्त्रो और लकड़ियों पे उड़ेल कर वो अग्नि भेंट करके नदी किनारे जा बैठा. श्रीधर उर्फ़ सिद्धेश्वर उन्ही मासूम बच्चियां के निचे तड़प रहा होगा जो उसका काल 50 बरस बाद बानी थी. नियति यही तोह है और swarg-narak भी.

"तुमने हमे अपना वास्तविक परिचय नहीं दिया था बेटे? क्या हम सिर्फ संरक्षक हे है?", ये रामेश्वर जी थे जो छोल साहब की जगह खुद वो कार चला कर आये थे जिसमे उसके साथ उमेद, कौशल्या जी और पूर्णिमा जी मौजूद थे. अभी तक उन्हें हवेली की घटना के बारे में कोई सूचना नहीं मिली थी. अपनी कार से स्वयं रानी सौंदर्य और अमृता भी इनके साथ पहुंची थी जिसके चालाक कुमार महेंद्र थे. महल की बगल से जाने वाले रस्ते पर हे इन सबकी भेंट संभव से हुई और उमेद तोह अलग हे बेबसी से बस उस पहाड़ से व्यक्ति को देखता रहा जो उसका बड़ा भाई था.

"ये मेरा भाई कैसे हो सकता है चाचा जी? होगा भी तोह अब ऐसे सामने आएगा और इसको स्वीकार कर लिया जाएगा?", कौशल्या जी ने उमेद का हाथ थाम कर उसको शांत रहने का इशारा किया क्योंकि पूर्णिमा जी के आंसू फिर से शुरू हो चुके थे.

"हमारा वास्तविक परिचय इस से ज्यादा किया होगा पंडित जी की आपके पिता जी हमारा सबकुछ थे और उनके जाने के बाद हम वही कर रहे है जो जिम्मेवारी हमे दी. वचन से क्या सिर्फ आप हे बंधे है? वो भी बंधे थे और हम भी लेकिन आपके भाई साहब ने हे तोह हमे उनके सुपुर्द किया था. हमने न कभी उनसे सवाल किये न आपसे करेंगे. हमने एक माँ को यहाँ वन्न से निहारा और दूसरी की सिर्फ तस्वीर देख कर खुश होते रहे. वो (रघुवीर) तमाम उम्र हमसे एक शब्द सुन्न ने को तरसते रहे जो हमने सिवाए बापू के किसी को नहीं कहा लेकिन ाचे शिकारी थे जिन्होंने अंतिम इत्छा में हमे बीटा बता कर रिश्ता पुख्ता करके शिकार कर हे दिया. हाँ आज हमने बापू जी (मोतीलाल) की एकमात्र इत्छा पूर्ण कर दी तोह आपके भाई साहब की भी करेंगे. हमारे पिता रघुवीर जी की अंतिम इत्छा. गजेंद्र जीवनभर 2-2 माओं की छाया में रहा जो हमारा अनुज है लेकिन हम.. हम 16 बरस बापू जी की आगया अनुसार शिक्षा दीक्षा में लगे रहे हो कभी सुकून से सोये तोह वो भी उनके सीने लग कर. सौंदर्य माँ, आपने तोह हमारा बचपन देखा है न 2 बरस तक, हम वही शिशु है जिन्हे बापू जी ने आपको सौंपा था दाई माँ के साथ. जो सवालों के जवाब दे सकते थे उन्हें कभी आपलोग हे जवाब नहीं दे पाए तोह हम क्या कहते या पूछते.", संभव के ऐसे खुलासे से स्वयं रामेश्वर जी और उमेद की भी नजरे झुक गयी थी लेकिन रानी माँ के चेहरे पर आये ख़ुशी के आंसू बहोत थे संभव को गले लगाने के लिए. हाँ वो पहाड़ जैसा था लेकिन ममता ने झुका दिया.

"हमे गले लग्न नहीं आता माँ और जितना अनुभव है वो सिर्फ अर्जुन के साथ है. चलिए आप तोह अपने बेटे को पहचान गयी.", अब पूर्णिमा जी का धैर्य और दिल जवाब दे गया जो उसके सामने घुटनो के बल हे गिर गयी. उनके रुदन और स्वयं को आहात करने का भाव देख उमेद से पहले संभव हे उनके कंधे थाम कर खड़ा करके अश्रु साफ़ करने लगा. साढ़े 5 फ़ीट की कमजोर सी पूर्णिमा जी और वो दैत्याकार उनका बीटा जिसके हाथ चेहरे से डेढ़ गुना बड़े थे.

"सही सुना था हमने माँ की हमारी तीसरी माँ का हृदय कठोर और दूसरी का जरुरत से ज्यादा नाजुक है. हम गजेंद्र से ज्यादा सौभाग्यशाली है की हमारे पास 3 माँ है अगर आपकी बहिन की शंका दूर होती है तोह.", ये पहला अवसर था जब उमेद मुस्कुराता हुआ आंसू बहा रहा था. कौशल्या जी पहले हे आवेश में थी और ये सच जान कर उनका पारा सब क्षमता पार कर गया जिन्होंने सीधा उस झुके हुए पहाड़ का कान खिंच लिया.

"फिर तू न उतरा उस दंगल में जब तेरा भतीजा माँ खा रहा था? और ये सारे होनी की जड़ है जिनसे तू सवाल नहीं कर रहा. मैं इनके बाप से भी नहीं डर्टी थी और अब वो नहीं है तोह तू रट्टू तोते की तरह बोलेगा. 3 माँ 3 माँ वाला तेरा गण बाद में पहले चल के तेरे बाप की आत्मा को शान्ति दे अगर हो गयी हो अंतिम िचाये पूरी.? और तू उमेद, इस से सवाल कर रहा जिसके जैसा तू खुद दीखता है? इन वचनो ने आधा परिवार मार रखा है. लोग चले गए लेकिन छोड़ गए पीछे वचन. देके देखे अब कोई ये वचन और कसम, मैं करती हु उसका हिसाब. तुम्हारा रोना बंद हो गया हो रानी जी तोह जाओ इनके साथ. आप यही रुकोगे जी इस उमेद के साथ."

"सच कहते थे बापू जी की बड़ी बहु असली मुखिया है, उनके सामने तोह वो स्वयं बच के निकलते थे या देरी से घर जाते थे. आप यहाँ नहीं रुकेंगे, पंडित जी और गजेंद्र को साथ चलना होगा हमारे. हम सामाजिक इंसान नहीं है तोह आप हे समझायेंगे की कैसे सब करना है."

"वैसे मेरा नाम उमेद है और मैं पहले हे तुम्हे बड़ा भाई कह के बुला चूका हु. वो अलग बात है की तब उम्र और ताक़त की वजह से बोलै था. तोह तुम्हे रानी माँ ने पला इसलिए पापा ने ऐसी अंतिम इत्छा राखी थी. मुझे तोह इतने साल यही सोचने में लग गए की कही रानी माँ उनकी जवानी का प्यार तोह नहीं थी. सॉरी कुमार साहब और रानी माँ, लेकिन हमने तोह वो भी स्वीकार कर लिया था इसलिए आपसे बात करने के बाद आ गए इधर.", अब उमेद को क्या पता की वो सब सच हे बोल रहा था और इस बार तोह रामेश्वर जी को भी उसकी बात पर हंसी आ गयी थी जिन्होंने थोड़ा सा तेज थप्पड़ उसके कंधे पर जड़ दिया था.

"तुम तोह समझदार इंसान हो फिर भी ऐसा बोल रहे हो? रानी जी के बारे में ऐसे ख़याल नहीं रखने चाहिए थे तुम्हे. ाची बात है के तुम माफ़ी मांग लेते हो. संभव, बीटा क्या हम तुम्हारे साथ थोड़ा समय बिता सकते है?"

"फ़िलहाल हमे खेद है पंडित जी परन्तु जल्द हे मुलाकात होगी. अस्थियां जरूर यहाँ विसर्जित हो रही है लेकिन इसके बाद हमे सीधा गंगा घात जाना होगा, माँ के साथ. हम चाहते है की वह सिर्फ 3 माँ और गजेंदर, क्षमा कीजिये अनुज उमेद. उमेद साथ चलेंगे. हमे वाहन चलना भी नहीं आता.", संभव 3 स्त्रियों के साथ चलता हुआ हे दुर्लभ जीव दिख रहा था और उसके पीछे आते रामेश्वर जी के साथ उमेद, कुमार और अमृता बस कभी उसको तोह कभी इन 3 महिलाओं को देखते. हाथ अभी तक कौशल्या जी ने थमा हुआ था उसका.

"वो तोह चलेगा हे लेकिन मेरी बात का जवाब न दिया तूने. जब इतना पहाड़ सा है और खुदको अर्जुन का गुरु बताया फिर उसको लड़ने क्यों भेजा?"

"वो शिष्य के साथ हे बापू जी का वारिस है माते. हमारी सीमा बस वो वन्न और नदी वाला क्षेत्र है जिसकी रक्षा हमे सौंपी गयी है. उस से बहार अर्जुन अधिकारी और रक्षक. वैसे भी हम भी चुनौती नहीं दे सकते थे और आपने ध्यान नहीं दिया की अर्जुन बेशक हमसे कमजोर जान पड़ता है लेकिन उसके प्रहार को हम भी झेल नहीं पाए. हम आपसे जरूर कुछ साँझा करना चाहते है परन्तु सिर्फ आपसे. उसके लिए हमे समय मिलेगा.", संभव को ऐसे सोचते हुए बोलता देख कौशल्या जी ने हे उसके अनकहे सवाल का जवाब दे दिया.

"वो जितना समर्थ है ये तुम बेहतर जानते होंगे लेकिन तुम्हे भी ऋतू के बारे में नहीं पता. वही सवाल था न बीटा तुम्हारा?"

"जी माते. जब अर्जुन 9 बरस का था तभी हमे श्री रघुवीर जी ने उसकी अवस्था से परिचित करवाया था जैसा उन्हें आदरणीय पंडित जी ने बताया होगा. वो हमारा खुलासा अपने भाई से भी नहीं कर सकते थे जैसा वचन था उनका बापू जी के साथ. तभी हम मिले थे अर्जुन से. हमे वर्ष में बस एक महीने हे अवकाश मिलता है और उस समय हमने बस अर्जुन को समझने में हे व्यतीत किया. अगले बरस हमे उसकी हालत चिंताजनक लगी और जब किसी बड़ी कक्षा के छात्र ने बहिन के बारे में उसको अपशब्द कहे तोह वो 10 बरस का युवक विद्युत्त परिवर्तित हो गया. उस घटना को श्री रघुवीर जी ने वही बंद करवा दिया था और उसकी पुनरावृति न होने पाए इसलिए हमे नियुक्त किया गया अर्जुन के साथ हर वर्ष 30 दिन व्यतीत करने के लिए. हम नहीं जानते थे की यही वो बहिन है जो उस असीमित ऊर्जा का स्त्रोत है. अब वो खुदको बहोत बेहतर संभाल सकता है परन्तु उस ख़ास पल में जब वो बालिका आहात होगी तोह.. प्रभु ऐसा समय किसी को न दिखाए. इसका हल हमारे पास भी नहीं है माते."

"जुड़ गए न तुम्हारे भी हाथ? इसलिए उसको घर रखते है हम और उसकी बहिन को भी. दोनों साथ है तोह फिर बहार भी चिंता नहीं लेकिन जैसा तुम नहीं होने का कह रहे हो वैसा डर हमे भी रहता है. वैसे रघुवीर भाई साहब ने ये बहोत गलत किया और अगर वो आज सामने होते.."

"तब भी तुम कुछ नहीं कर सकती थी कौशल्या. हमने बताया था न के वो पिता जी के कही ज्यादा करीब था हमसे क्योंकि वो उनके जैसा था. हमे समझ नहीं आ रहा की हम खुश और दुखी, एकसाथ कैसे हो सकते है. वो भी आज इस ख़ास दिन पर. यही है रघुवीर का ठिकाना जहा कुछ भी नहीं सिवाए यादों के और मैं उनसे दूर हे भला. ये सामान ले जाओ उमेद, मैं बहार हे हु.", रामेश्वर जी वही रुक गए थे उस वीरान से घर के बहार जो बंद होने के बावजूद साफ़ सुथरा था. इसकी देखभाल का जिम्मा स्वयं raj-mehal के पास था. उनके साथ हे रानी माँ और उनके बचे रुके तोह इस बार पूर्णिमा जी ने सौंदर्य का हाथ पकड़ा.

"हम अब सामान रिश्ते से बंधे है सौंदर्य, कदम पीछे लेने से वो बदलने वाला नहीं. बचो से अनुमति लेना चाहती हो?", अब कुमार ने हाथ खड़े कर दिए थे और अपनी माँ के झुके सर को देख स्वयं अमृता उनके साथ चल पड़ी.

"अनुमति नहीं ले रहे और इस ये जगह हमारे लिए मंदिर सी पवित्र है क्योंकि इनकी वजह से हमने मातृत्व समझा था जब हम हर रिश्ते से पृथक हो गए थे. न दीदी जीवित थी, न आपकी बड़ी ननद और हमारी भाभी. उनके साथ हमने माँ को भी खो दिया था लेकिन फिर हमे संभव मिला, इनका अंश. उमेद को नहीं पता की हम उसकी पुराणी रिश्तेदार है महल की रानी होने से?", ये बात घर के भीतर जाते हुए सुन्न कर बाकी सबके हे कदम रुक गए थे सिवाए कौशल्या जी, जिन्होंने वो दरवाजा खोला था बगीचा पार करके.

"बदतमीजी के लिए दिल से क्षमा चाहते है हम आपसे रानी माँ. ये तोह खुद कभी पिता जी ने भी नहीं बताया था और न चाचा जी ने. इतना दुःख आपने झेला वो भी अकेले. हाँ वो कभी महल की तरफ आने नहीं देते और गाँव भी आते थे तोह हम लोगो के साथ नहीं. कहते थे की वह कोई वास्ता नहीं उनका. और इसलिए हे चाचा जी ने हमे नहीं बताया होगा. दुःख अक्सर बचो से दूर हे रखे जाते है. वैसे इस तरह तोह हम भी दावेदार हुए महल के?", गंभीरता को ख़तम करने से किया गया ये उपहास सुन्न कर संभव ख़ामोशी से पूर्णिमा जी के साथ भीतर चला गया लेकिन रानी माँ ने जरूर उमेद के सर पे हाथ फिराया.

"माफ़ करना बेटे लेकिन उसका एक अलग सच है. वारिस अर्जुन हे है हमारे जाने के बाद या फिर वो जिसका चुनाव करे, सभी शर्तो पर खरा उतरने वाला उसके समकक्ष. हाँ तुम्हे कुमार के सामान पूरा हक़ है जो आजकल खुद अर्जुन के प्रेम में डूबा है. देख लीजिये अपने पिता का घर, कुछ यहाँ भी ख़ास मिल सकता है.", भीतर साफ़ कपडा बिछाये संभव ध्यान मुद्रा में बैठे थे दिया जला कर और उसके करीब हे अस्थि कलश था. कौशल्या जी और पूर्णिमा जी हर जगह गंगाजल के छींटे दे रही थी, सब खिड़की दरवाजे खोल कर. आज आख़िरकार इस घर से हे रघुवीर जी की अंतिम इत्छा पूर्ण हो रही थी. कई रिश्ते दिखे थे और कई दिखने के बावजूद नजरो में न आ सके. यहाँ से आगे अब रामेश्वर जी को वह जाना था जहा फिलहाल अर्जुन नदी में डुबकी लगता हुआ खुदकी हालत बेहतर कर रहा था. वो लेप असाधारण था जिसने उसके दर्द के साथ निशाँ तक हर लिए थे.

.

.

"पापा अभी तक नहीं लौटे ये बिनोद. बता के गए है की वो लोग किधर निकले है?", मेले में लोगो का हुजूम कही भरी हो चला था और gram-prabandhan यहाँ विजयी टीम के साथ बाकी सभी को सम्मानित करते रहे. विनोद इधर भी अपने पिता और ताऊजी की गैरमौजदगी की भरपाई में लगा था. इस बार उनके हे गाँव की टीम जीती थी 3 बरस के अंतराल बाद. मांजी वाले दार जी ने तोह अपने बेटे को हे कंधे पर उठा रखा था और ऐसा हे हाल बाकी खिलाडियों का था जो दंगल भूल कर सबसे घुलते मिलते ख़ुशी जाहिर कर रहे थे. शहीद यहाँ अपने दोनों बेटो के साथ आया था और जुगराज जी भी हर टीम को बधाई देने के बाद ढोल के थाप पर अपने लड़को के साथ भंगड़ा करने में मसरूफ. बस एक नरिंदर और दूसरे छोल साहब हे थे जिनके चेहरे पर कुछ परेशानी थी. घर की लड़कियां भी अनामिका चची, दीपा भाभी और रौशनी के साथ हे सही सुरक्षा में मेले में मसरूफ थी, चाहे वो मैं से इधर नहीं थी लेकिन सभी के व्यस्त या नदारद होने पर यही उनकी मजबूरी थी. अब नरिंदर जी के दिखाई देने पर वो भी मंच की तरफ हे लौट आयी.

"इन्दर भाई, मैं तोह आपके सामने हे फंसा हुआ हु और ताऊ जी से पूछना मतलब सबके सामने झाड़ खाना. गए हुए भी 2 घंटे होने को आये उन्हें और यहाँ सभी पूछ रहे थे उनके बारे में. उधर दरगाह पर भी अर्जुन ने जाना था लेकिन कोमल बिटिया बता रही थी की वो उधर जाने से भी बच रहा है. वैसे शंकर भैया और पापा नहीं दिख रहे.", अब विनोद के सवाल ने नरिंदर को रहा सहा परेशान कर दिया था लेकिन जैसे भगवान् ने उसकी पुकार सुन्न ली थी जो महल वाली कार से उसके पिता उतारते दिखे और कृष्णेश्वर जी की नीली एस्टीम से शंकर. लेकिन उनसे पहले हे ऋतू अपने पिता की तरफ दौड़ गयी.

"विनोद, क्सक्स हॉस्पिटल में चची एडमिट है भाई और वो खतरे से बहार है. मीणा ने उन पर हुम्ला किया था और शायद वो घर से कुछ चोरी करके भागी है. घबराने वाली बात नहीं है क्योंकि सही समय पर मैं और चाचा पहोच गए थे उनके पास. शाम तक छुट्टी मिल जायेगी तोह तू इन्दर के साथ लेने चले जाना.", शंकर ने ये बात जानबूझ कर अपने पिता के सामने कही थी और कार से बहार निकला अर्जुन भी सब सुन्न कर सकते में आ गया.

"शंकर भैया, मतलब माँ के बहोत ज्यादा चोट लगी है.? वो ठीक तोह है न? मैं अभी जाता हु उनके पास."

"बिनोद, 2-3 घंटे में छूती मिल जायेगी भाई और थोड़ा खुद को संभाल. वो ठीक है बस मीणा ने उनके सर पे कुछ मारा था जिस वजह से बेहोश हो गयी थी और समय रहते हम उन्हें हॉस्पिटल ले गए थे. बड़ी बात होती तोह मैं तुझसे पहले पापा से कहता यार या फिर इन्दर को बताता.", शंकर ने तोह यहाँ अपने भाई को भी बचा लिया था इस काण्ड से.

"दरगाह के बाद मैं खुद जाता हु विनोद के साथ. और तुम दोनों भी निकल जाना वापिस सतीश और ऋतू को लेते हुए. तुम्हारी माँ और चची रात तक हे लौटने वाली है, संभव अपने पिता की शांति के लिए उमेद और उन्हें ले कर गंगा घात गया है.", यहाँ अभी ये लोग पहले सदमे से बहार न निकले थे की ये नया बम फोड़ दिया था इनके पिता ने.

"कौन संभव और वो कौनसे पिता की शांति के लिए गया है जहा हमारी माँ और चची भी चली गयी?", नरिंदर हे सटीक सवाल करता था.

"वही इसका गुरु और तुम्हारा सबसे बड़ा भाई. वही तोह था जिसके हाथो अस्थियां विसर्जित करवाने के लिए रघुवीर ने कहा था. मिल लेना उस से लेकिन सिर्फ सावन में हे हवेली आएगा बाकी 11 महीने नहीं मिल सकते उस से. ओह बैल, चल अब जो काम तू करने आया है वो कर ले. बाद में चला जाइयो तेरी मंडली के पास.", शंकर और इन्दर एक दूसरे को हे हैरत से देख रहे थे और अर्जुन सर खुजा रहा था. विनोद के कंधे पर हाथ रख कर उसका मनोबल बढ़ाते हुए रामेश्वर जी अपने दूसरे हाथ से वो सफ़ेद रुमाल निकाल चुके थे

"मेरा जाना जरुरी है क्या बौ जी? आपके पापा का नाम आप हे लगा दो न.", अर्जुन को पीछे hat-te देख रामेश्वर जी ठिठक गए और उसका हाथ पकड़ कर चलने के लिए कहती कोमल दीदी से भी अर्जुन ने हाथ छुड़वा लिया.

"चला जा अब जो काम तेरे जिम्मे है वो तू हे करेगा. मैंने चुनौती दी होती तोह एक मिनट नहीं लगता वह माथा टेकने में. और नाम भी तू हे लगाएगा इस जगह पर.", शंकर जी के कठोर रुख से भी अर्जुन ने बस सर झुका लिया लेकिन वो आगे नहीं बढ़ा. नरिंदर जी अपने भाई को शांत कर रहे थे पीठ सेहला कर.

"यार चला जा जब इतना सब कर दिया तोह. सोच लियो तेरी माँ भी उधर हे बैठी है. क्यों सबके सामने थानेदार जी से मरम्मत करवाने पर तुला है?", अब भी वो अपने पाँव जमीन पर हे घिसड़ रहा था लेकिन जैसे हे उसके सर पर ऋतू ने साफ़ वस्त्र बंधा और अपने सर पे भी दुपट्टा लिया वो एकटक उसके सरल से चेहरे को देखता रहा जहा निर्मल सी आभा थी और मूक आमंत्रण. उसके बाद न किसी की आवाज सुनाई दी और न वह का शोर हे उसके कानो तक पंहुचा. आगे चलती ऋतू और उसका हाथ पकडे पीछे अर्जुन. 25 कदमो बाद वो उस देहलीज पर था जहा भीतर जाने से पहले उसको अपने दादा की तरह हाथ धोने के बाद शीश झुकना था. वो बस खड़ा रहा और उसके दोनों हाथ स्वयं ऋतू ने हे धुलवाए जैसे वो बचपन में करती थी उसके कपडे खराब होने से बचने के लिए.

"बीटा इधर सर झुकना है, उधर नहीं.", अर्जुन को थोड़ा तिरछा झुकते देख रामेश्वर जी ने हे उसको दिशा दिखाई. भीतर वो रूहानी महक और दरगाह के गिर्द जलती अनगिनत अगरबत्तियां का par-sakoon धूम्रा. मैं स्वयं हे जैसे उसके अधीन हो चला था क्योंकि इस पल में भी उसने अपनी बहिन का बया हाथ थाम कर कुछ मजबूती से पकडे रखा.

"वो बड़े पंडित जी आये थे इधर कभी?", अर्जुन ने इधर भी ये सवाल पूछ हे लिया जिस पर रामेश्वर जी चादर खोलते हुए विनोद के साथ उसको एक सिरे से पकडे थे. दूसरी तरफ ऋतू ने अर्जुन को भी पकड़ने का मूक इशारा दिया तोह बिना हाथ अलग किये उसने एक सिरा थमा और दूसरा ऋतू ने. ठीक ऐसे हे मौके पर सवाल किया था.

"पिता जी आखिरी अखाडा जीतने के बाद हे आये थे इधर. मुझे ख़ुशी है की तुम काम से काम उनके लिए हे सही पर आये तोह. जैसा तुम मानते हो बीटा, ये स्थान भी पवित्र है जो किसी धरम का पर्याय नहीं, सेवा और आपसी सौहार्द का पर्याय है. क्सक्सक्सक्सक्स जी एक फ़कीर कहलाये पर दुनिया को ज्ञान और इंसानियत सिखाई. जैसे मेला सबके लिए है वैसे हे ये स्थान भी. जो सही प्रेरणा दे वो स्थान सबसे पवित्र. वैसे तुम इसके साथ हे रहा करो बेटी, नकेल हमसे तोह नहीं खींचती इस अड़ियल टट्टू की.", इसके हलके फुल्के ज्ञान के बाद रामेश्वर जी ने और कुछ न कहते हुए परिधि पर चक्कर लगाने के पश्चात फिर से शीश नवाया और पावीरे लौ ले कर बहार चल दिए. अर्जुन तोह जिस पल ऋतू से अलग हुआ वो तोह बस उसके हे सजदा करता निहारता रहा. अनजाने हे सही लेकिन वो हे उसके साथ कदम रखती इस जगह आयी थी जैसा अर्जुन का वादा था. दुपट्टे से ढाका वो सर और हाथ जोड़े घुटनो पर बैठी हुई ऋतू के सिवा बस एक ख़ास एहसास था उस पल में.

"सर टेको अब.", ऋतू ने धीमे से आदेश दिया तोह वैसा करते हुए भी अर्जुन नजरे घुमाये उसको हे देख रहा था जिस पर वो गुस्सा होती बहार हे चली गयी.

"ओह बाबा जी अब बुलवा लिया आपने भी लेकिन वो नाराज हो गयी मुझसे. वैसे जगह सचमुच ाची है और अगर मेरी माँ मुझे यहाँ लेके आयी न तोह पक्का थोड़ा वक़्त रहूँगा आपके पास. चलता हु अभी लेकिन आ गया हु तोह आगे भी आऊंगा. हमारे पूजनीय मोतीलाल जी की तरफ से आपको शाट शाट नमन.", अर्जुन वैसे हे सर को ढके उलटे पाँव हे बहार लौट आया जहा ऋतू नहीं दिखी पर दरगाह के बहार वाले उस खली घेरे के करीब नाम पत्रिका और सन्देश लिए उसके दादा जरूर मिल गए. अब तोह उधर panch-sarpanch के साथ Graam-samiti के 6 बुजुर्ग भी थे.

"चलो बीटा अब इसको भी अपने हाथ से वह लगा दो. इस पर लिखा है की मनुष्य अशांत हो तोह किसी नेक की शरण में आये कठोर गलती करने से पहले. ये स्थान सबके लिए है और इसका कोई मालिक नहीं. आभारी आपका सेवक.", उस पर तोह नाम हे नहीं था.

"ये कैसी naam-patrika है बौ जी? और बड़े पंडित जी का नाम कहा है?"

"ये उन्होंने हे लगाया था तोह उनका हे नाम हुआ. अब इधर भी लिख दे क्या पंडित मोतीलाल ? कामकल हो तुम थोड़े. लोग पढ़ते है और जानते है की ये किसने लगाया और हमने हटाया था बस. अब लगाओ अपने हाथो से और माफ़ी मांग लो हमारी तरफ से.", अर्जुन ने भी कहे अनुसार वैसा हे किया और हाथ जोड़ कर पीछे हट गया.

"माफ़ी आप हे मांग लो बौ जी. मुझसे तोह डायरेक्ट बातचीत है उनकी.", अर्जुन को ऐसे हँसते हुए जाते देख स्वयं प्यारेलाल जी और बाकी लोगो के चेहरे पर भी हंसी आ गयी.

"वेख लो चाचा जी, कीड़ा कह के गया अपने padd-daade वास्ते. माफ़ करना पिता जी, जज्बात अक्सर गलती करवा जाते है.", रामेश्वर जी ने भी हंसने के बाद सर झुका कर माफ़ी मांगने में वक़्त न लगाया. दोनों बड़े गाँव की टीम पहले दूसरे स्थान पर आयी थी और हाथ मुँह धोने के बाद वो सभी दरगाह के बहार हे खड़े थे. अपने बुजुर्गो से आशीर्वाद लेने के बाद भीतर शीश झुकना भी अनकही प्रथा बन्न चुकी थी इस खेल मेले की. अर्जुन सभी से हाथ और गले लगने के बाद उस और चल दिया जहा उसने ऋतू को जाते देखा था. वो मेले से बहार हे जा रही थी लेकिन सड़क के दूसरी तरफ जहा वो पीले फूलो का अमलतास का वृक्ष लगा था.

"आओ तुम्हे कुछ दिखाना है.", अर्जुन उस नीली खुली जीप में सवार होता ऋतू के करीब आ रुका था. वो कुछ पल बस उसको घूरती रही वो पील फूल की टहनी पकडे. नाराजगी साफ़ जाहिर थी उसके चेहरे से लेकिन ख़ामोशी से वो बगल वाली सीट पर बैठ हे गयी. जीप गाँव से बहार की तरफ कुछ वक़्त चलने के बाद एक तरफ मुड़ी जहा पुराणी दीवारे हे कड़ी थी और वो लोहे का दरवाजा. उस char-diwari से घिरे बड़े से मैदान के बीचो बीच एक सफ़ेद मूरत बानी थी जो आज ऐसी साफ़ थी जैसे उसको वह आज हे लगाया गया गया हो. उसके निचे हे संगमरमर का 3 फ़ीट का चौकोर बुर्ज जिस पर लिखा था माँ अनुराधा. ऋतू उस मूरत की तरफ स्वतः हे खींची चली गयी जिसके चेहरे को कोई रंग दिए बिना बस बारीकी से तराशा गया था. चाय के लिए उसके ऊपर बना कांसे का चौकोर छात्र. कितनी हे देर वो उसको निहारती रही और खुले दरवाजे के बीच कड़ी जीप में बैठा अर्जुन उसको.

"ये बहोत खूबसूरत है अर्जुन और जैसे मैंने ऐसा कुछ कही देखा है. तुम्हे पता है ये किसकी है?", अर्जुन जीप अंदर लेके आता हुआ ठीक उसके सामने रुका और चस्मा सीट पर रखते हुए ऋतू की तरफ एक आशा से देखने लगा. जिस अंदाज से ऋतू ने उसको बाहों में भरा था वो यक़ीनन एक जीवंत पल था सिर्फ और सिर्फ अलौकिक प्रेम से भरा. अर्जुन उसके अधीन हो चूका था पूरी तरह.

"ये हमारी है और बरसो से इधर हे थी. इनके सामने मैं तुम्हे ऐसे हे मिलना चाहता था ऋतू क्योंकि अर्जुन से पृथक ये रूद्र सिर्फ तुम्हारा है.. सिर्फ तुम्हारा. आज एक वादा और पूरा हुआ, तुम्हे अपनों के सामने हे खुद को तुम्हारे सुपुर्द करने का. बस ऐसे हे तुम मुझे जीवनभर थाम कर रखना, मैं उतना समझदार नहीं हु. तुम्हारा रूद्र आज भी वैसा हे है जैसा पहले था.",

'हमने खुद को हे देखा अपने खवाब में, थोड़ा सा विलायती स्वरुप था लेकिन जीप यही थी जो अभी हमारे पास है. वो बहोत ख़ास पल था क्योंकि जब हम उस से उतरे तोह एक बिलकुल हमारे हे नयन लिए सुंदरी ने हमको आलिंगन में भर लिया. हमको उम्मीद नहीं थी जैसे उनकी और सच में अभी तक हम महसूस कर प् रहे है उस हृदयगति को. अविस्मरणीय और दोनों इतने सामान जोड़ीदार कैसे हो सकते है? वो सुंदरी हम पर हावी थी और पहली बार जीवन में हमने खुद को किसी महिला के अधीन सुरक्षित पाया.' मोतीलाल जी के वो शब्द सार्थक हो चुके थे क्योंकि यही तोह वो युवती थी जिसके अधीन उनका वो स्वरुप था जिसका नाम अर्जुन था.

"मेरा रूद्र.. मुझे वो अर्जुन के सामान हे प्यारा है लेकिन उसके साथ रहने के लिए मुझे अर्जुन की भी जरुरत रहेगी. शायद वो उस तांत्रिक से भी ज्यादा जोखिम भरी राह हो. मेरी चाहत तोह हमेशा से वही है लेकिन अपने प्यार के लिए अपनों से हे झूझना अनैकटी होगा ारु."

"मेरी अंतिम इत्छा उन्हें भी मान नई होगी बस उस समय तक मुझे थाम कर रखना जैसे आज तक किया है. वो सब जानते है की अर्जुन पर कई अधिकार हो सकते है लेकिन इस पर.. ये सिर्फ तुम्हे महसूस करता है.", अर्जुन के सीने पर रखे अपने हाथ पर उसकी धड़कन महसूस करती ऋतू की आँखों में भी ख़ुशी की हलके से आंसू आ चुके थे.

"बुद्धू राम, मार भी जाउंगी न तोह भी तुमसे अलग नहीं होने वाली मैं. बस देख रही थी की तुम सचमुच इस हद्द तक सोचते हो. मुझे अर्जुन नाम हे पसंद नहीं था लेकिन वो तुम्हारा है इसलिए ाचा है. मेरे लिए ारु हे ठीक बाकी जो सबको नहीं दीखता वो तोह मेरा हे है. आज तोह तुमने सबके सामने मनवा दिया की हम दोनों अलग नहीं है. बाकी दादी की इत्छा भी थोड़ी gair-samajik हे है. फिलहाल तुम मुझे थोड़ी इस माँ के बारे में बताओगे.", ऋतू उसके कंधे पकड़ कर जीप के बोनट पर हे आ बैठी थी जो गर्म नहीं था. उसकी बगल में साथ बैठा अर्जुन उसको ये प्यारी कहानी सुनाने लगा जो उसने पढ़ी थी.
 
अपडेट 205

अंतिम इत्छा (2)

"तोह हम लोग मेरी गाडी में साथ हे चलने वाले है? यहाँ जरुरत पड़ी तोह इन्दर?", अर्जुन वापिस लौट आया था ऋतू के साथ, जबकि रामेश्वर जी विनोद और अनामिका बहु के साथ रौशनी को भी ले कर हॉस्पिटल जा चुके थे. मेले के रंग अब कही निखरे दिख रहे थे जिन्हे इस बात का इल्म तक न था के आज पंडित जी के परिवार ने क्या कुछ देख लिया है. अब उस नीली इलो का दरवाजा खोलने से पहले शंकर का ये सवाल अपने भाई से था जिसके जिस्म पर वो ढीली कमीज अर्जुन की थी, हवेली से कपडे बदलने के बाद.

"बोल के तोह गए है की मैं यहाँ नहीं रुकू पर दिल नहीं मान रहा हालात देखते हुए. उन्होंने तोह चाचा को भी हमारे साथ हे लौटने के लिए कहा है. वैसा कुछ दुबारा तोह नहीं होगा पर छानबीन.. शंकर ये बात जैसी दिख रही है वैसी है नहीं भाई क्योंकि तूने खुद तेरे जीवन को खराब करने वाला वो साधू देखा. वैसे तेरी टीम आजकल बेरोजगार हे है न? अब हम भी सामने नहीं आते और इधर का मायाजाल अर्जुन का हे दिख रहा है जो निश्चिन्त है इतना सब होने के बाद भी. चल भाई, घर जा के हे जुगत भिड़ते है कुछ क्योंकि समस्याएं अभी अनगिनत है जिनके बारे में मुझे भी तुझे कुछ बताना है. रात को लौटने के बाद से अभी तक तुझसे तोह बात भी नहीं कर पाया. कोमल को भी ले चल.", नरिंदर जी अपने भाई से चाबी लेते हुए खुद ड्राइवर सीट पर जा बैठे थे. शंकर ने गहरी सांस भरने के बाद पसीना साफ़ किया और दूसरी तरफ देखा तोह कोमल अपने भाई के कान खींचती हुई कुछ समझा रही थी और ऋतू नजरे झुकाये मंद मंद हंसती दिखी. इस पल में अर्जुन के चेहरे पर कही से भी उन दोनों जैसे भाव न थे जैसे सचमुच उसको दांत हे पड़ रही हो. फिर जिस तरह से कोमल ने उसका गाल सहलाने के बाद आंख का जखम जांचा तोह शंकर जी समझ गए की वो बड़ी बहिन क्या हिदायते दे रही होगी.

"चलो पापा, 2 बज चुके है और आप तोह 1 बजे निकलने वाले थे. जानते हो अर्जुन ने हे अभिषेक भैया को इधर आने के लिए मन किया था. तभी उसकी खिंचाई हो रही है और उस बेवकूफ ने वैसा क्यों किया तोह उसका ठीक जवाब भी नहीं है उसके पास. छोटे दादू, चलिए आप भी आ जाइये. बाउजी तोह लगता है अभी 2 दिन यही रहने वाले है.", छोल साहब भी सभी बुजुर्गो से mel-milaap करने के बाद जगतार के दादा जी का भी अभिवादन करते हुए चाँद मिनट उनके साथ बिता कर हे आये.

"शंकर पुत्तर, सब ठीक तोह है न? यार मैं सोच रहा था के भाई साहब को लोड न पड़ जाए किसी की?", छोल साहब नरिंदर की बगल में हे बैठे थे और अब पिछली सीट पर ऋतू के साथ शंकर जी ने बैठने से पहले सफारी से कोमल का सामान वापिस इस कार में रखा. दोनों बेटियों के साथ वो दिखावे के लिए खुश थे और उनकी नजर बराबर अर्जुन पर बानी थी जो सलेटी शिशु से भी भीतर उस चेहरे को देख रहा था जो उसको.

"वह सिर्फ हम हे लोग है चाचा जी पापा के साथ. यहाँ देख रहे हो, ये पूरी जनता उनकी है. वो बड़े परिवार में है और अगर वो नहीं चाहते की हम इधर हो तोह वजह जरूर होगी. इन्दर वो क्सक्सक्सक्स ढाबे पर रोक लिए यार. सुबह नास्ता भी सही से नहीं किया और अब दिमाग भी बोल रहा के खा लेना चाहिए. इन्होने भी कुछ नहीं खाया हमारे चक्कर में.", कार आगे बढ़ने के साथ नरिंदर जी ने अर्जुन को मुस्कुरा कर हाथ हिलाया जिसकी बगल में अब शहीद भाई, निहाल, जग्गी और केवल सिंह खंड थे किसी बात पर हँसते हुए चर्चा में लगे थे. अर्जुन अभी भी कुछ गंभीर था.

"रोक लूंगा भाई रोक लूंगा और ढाबे वाले को भी बोल दूंगा के अगर भरपेट जैसी स्कीम है तोह आज के बाद वो न रहने वाली. भूख तोह इतनी लगी है की बटर चिकन के साथ राडा मटन भी मिल जाए तोह 20 रोटी पक्की. तोह चाचा आपके इरादे भी ऐसे हे है न? ये हमारे घर की लक्ष्मियाँ तोह इस मामले में हद्द पनीर तक हे सिमित है. हाहाहा", माहौल को कैसे खुशनुमा किया जाता है ये नरिंदर को भली भांति पता था और इस बार कार अर्जुन वाले रस्ते हे चल पड़ी थी जिधर से वो अपने शहर से गाँव आया था. नरिंदर ने राणा परिवार, हिम्मत सिंह और अब Devaki-Tantrik वाले मसले पर भी शंकर से खुल कर बात करनी थी जिसके लिए उन्हें अपने पिता से दूर रहना हे बेहतर लगा. इधर अर्जुन के पास ये अलग महफ़िल शुरू थी.

.

.

"Log-baag कहते सुने की तुम तोह बड़े पंडित जी (मोतीलाल जी) से भी कही भयंकर निकले अर्जुन मियां. सच कहु तोह तुम्हे देखने के बाद हमारी कबड्डी की टीम में अलग जान आ गयी थी. पूछ लो नीले से.", शहीद भाई अर्जुन के कंधे पर हाथ रखे निहाल को थपकी मारते हुए थोड़े अधिक उत्साहित से थे और वैसा हे हाल कोच जुगराज जी का भी थी जो भंगड़ा करने के बाद अब इनके हे बीच थे.

"ओह बाई जी, मैं दस् नई सकदा अज्ज की वेख्या अस्सी जिन्हे वि अखाड़े कॉल स. चाहे सबने न देखा हो लेकिन जिसने देखा वो नई भूल सकता अर्जुन बाई. जानते हो फाइनल में अपने भूत ने तुम्हारा हे डाव लगा दिया थे परली तरफ वाले रेडर को. काख में डाली ब्याह और पटक मारा. तुमने कहा था न की डिफेन्स में हे तोह अटैक करना चाहिए, पूरी टीम ने आज बस वही किया. मास्टर जी, अर्जुन बाई को भी 5100 मिलेंगे न कल चौपाल में?", निहाल की ऐसी हे तोह भोली बातें थी और आज ये युवक पूर्ण उत्साहित था इस गर्मी के बावजूद.

"हाहाहा.. ऐ तह गल्ल तू सही कही नीलिया पर इनाम दें वाले न अस्सी किवे कुछ दे सकदे हां. हाँ जे सरपंच साब.. वैसे अर्जुन पुत्तर जी, अज्ज मेरे बापू जी बड़े खुश सन्न. ओह तेरा दंगल वेखे बाद इत्थे नहीं रुके, कहन्दे बापू जी डा चेता हो आया इस करके थोड़ा गुरुघर जा के आना है. बीटा जी तुस्सी पहला हे ख़ास हो साहड़े वास्ते जिद्दा यह पिंड एक धरोहर है ठीक ओस तरिया हे तुस्सी हो. रब्ब नित्त नवी ऊंचाइया देवे इस आप जी दी नेक रूह न. वैसे जग्गी वि बाला गायब रेह्न्दा लगदा मेनू.", उन्होंने शाबाशी देने के बाद जब जगतार को लपेटा तोह वो थोड़ा झिझक गया लेकिन जैसे शहीद भाई इसके लिए तैयार थे.

"ओह जुग्गी भाई जी, जगतार की जीप गिर गयी थी पिछले तालाब में. बस उसके लिए हे बन्दे लगवाने गया था ये इन्दर पाह जी के साथ, नहीं तोह अर्जुन जीप और मोटरसाइकिल थोड़ी न कल्ला लेके आता. दिलबाग ने जीप मांगी थी कुछ बन्दे खेत पहुंचने के लिए और भीष्म ठहरा ट्रेक्टर वाला ड्राइवर, बन्दे कूद गए और जीप उतार दी तालाब में. चोट आयी है भिस्मा और दिलबाग के लेकिन बचाव हो गया बहोत है.", मतलब साफ़ था की दिलबाग वाली saanth-gaanth कोई मौके वाली नहीं थी. ये मिलीभगत थी इन सभी की जो एक टीम की तरह काम कर रहे थे अर्जुन के साथ, अदृश्य टीम जिसमे कुछ गलत साथियों को थोड़ी बहोत सजा उनके कर्म दे रहे थे.

"दिलबाग के वि सत् आयी है? वो चरखा खेत से बहार क्या कर रहा था?", अब जुगराज जी की सोच कहा की तरफ थी ये सिर्फ अर्जुन समझ रहा था और बाकी कोई कुछ बोलता उस से पहले जवाब भी उसने हे दिया.

"कोच साहब, वो खेत के बहार हे थे जब जीप की ब्रेक फ़ैल हुई. उनका दिमाग तोह आप भी जानते हे हो, धर्मेंद्र बन्न जाते है जब ऐसी आफत उन्हें आती हुई दिखाई दे. जीप तोह क्या रुकनी थी, खुद चोट अलग खा बैठे. तभी तोह गाडी थोड़ा सड़क से उतर कर तालाब में गिरी. वैसे जग्गी भाई आप मेरी बुलट ले जाना अपने घर, मैं शाम को ले लूंगा आपसे. अभी जरा जरुरी काम से जरा शहर होक आना है.", अर्जुन ने इजाजत चाही महफ़िल से जाने की लेकिन निहाल जैसे उसको अब अपना सबसे बढ़िया दोस्त मान ने लगा था जिसने उसका हाथ पकड़ लिया.

"पहला बाई जी वादा करो के अज्ज शाम न तुस्सी साड़ियां ने सहदे चूल्हे दी रोटी खानी है. बेबे बापू ने आप हे कहा है की मैं मास्टर जी, शहीद पाह जी, जग्गी वीरे और तुहानू सद्द लू. सरपंच साब न वि ोहना ने आप कहा है, भावे पूछ लो.", अब अर्जुन मुस्कुराते हुए जग्गी और शहीद के भाव देखने के बाद गले लग कर बोलै.

"जरूर निहाल भाई, आप इतने मान से बुला रहे हो जबकि मैं तोह बिना बुलाये भी खाने के लिए चला जाता हु. चाहे जग्गी भाई से पूछ लो या अपने कोच साहब से. चलता हु और शाम को जरूर मिलेंगे.", अर्जुन सबसे हाथ मिला कर जीप की तरफ बढ़ा तोह वो अकेला नहीं था. दूसरी और से रेनम और उसकी माता जी के साथ दीपा भाभी घर के लिए निकल रही थी, निहाल के पिता जी की गाडी में लेकिन वो उन्हें वही रोक कर अर्जुन के करीब आ कड़ी हुई. बीच में बस वो नीली जीप थी दोनों के.

"तुम घर आओगे, मुझे जरुरी बात करनी है तुमसे?"

"फिलहाल तोह भाभी मैं शहर जा रहा हु, थोड़ा जरुरी है और रात को निहाल के घर खाना है.", अर्जुन कमीज की ास्तें मोड़ने के बहाने भाभी की नजरो से बचने की कोशिश कर रहा था. जैसे वो जो बात करना चाहती थी अर्जुन उनके जवाब दे पाने में असमर्थ हो. लेकिन दीपा भाभी ने जीप की सीट पर हाथ रखते हुए थोड़ा नरमी से कहा.

"मुझे उस बारे में कोई दिलचस्पी नहीं अर्जुन जो मैंने देखा. बात मेरे ज़िन्दगी की है और उसके साथ तुम क्या खेल खेलने में लगे हो वो तुम्हे बताना होगा. निहाल के घर 8 बजे जाना है, 7 बजे तुम मेरे यहाँ या फिर उनके घर से मेरे साथ मेरे घर. चलती हु.", अर्जुन ने भी तोह वही सोचा था की भाभी दिलबाग और उनके हे बारे में बात करना चाहती है. जसलीन वाला मुद्दा होता तोह वो उसको बड़े आराम से विवश कर सकती थी. जीप में बैठ कर उसने निकलते हुए भाभी को बस मंद से हामी भरी जो रेनम को दुविधा में दाल गयी जैसे अर्जुन ने उसको हे मुस्कुरा कर अभिवादन किया हो. एक पल में हे उसके गाल गोर से गुलाबी हो चले थे और आँखों में थोड़ा डर जैसे कोई और न देख चूका हो. पता नहीं अब रेनम की क्या कहानी थी क्योंकि सबके सामने तोह उसने अर्जुन की तारीफ कभी की न थी और आज सामने से उसका वो इशारा दिल में अलग सुकून दे गया. अर्जुन जा चूका था और पीछे लोग दोपहर होने की वजह से कही सुस्ता रहे थे तोह कही खाने पीने के स्टाल पर पहोच गए. इसकी रौनक इस शाम को बढ़ने वाली थी और अगले दिन भी लेकिन अर्जुन को उसमे कोई दिलचस्पी नहीं थी.

"सुच्चा सिंह, तू सतवंत भाई के साथ उन मुजरिमो को लेके गया था न? कहा बंद किया उन दोनों को?", केवल सिंह इन सुब इंस्पेक्टर साहब से जोश से मिलने के साथ अपने समकक्ष सरपंच से हाथ मिलता हुआ एक तरफ हो गया था.

"बंद किया? वो तोह खुली दुनिया में आजाद है अब केवल भाई. मैंने तोह उन्हें उधर चौपाल में हाथ बंधवा कर बंद करवाया था लेकिन अभी देखने गया तोह जनाब भी साथ थे और इनसे हे पूछ लो के क्या हुआ?", केवल सिंह के माथे पर बल पड़ गए थे ये सुन्न कर.

"ओह भाई सट्टे, क्या भाग गए क्या वो दोनों?"

"ऊपर पहोच गए केवल भाई. दोनों के 3-3 गोलियां मार दी किसी ने लेकिन आवाज जरा भी न आयी. कमरा भी बंद हे था ताले से. अब इधर वर्दी में तोह हु नहीं और ये मामला कही रिपोर्ट में भी नहीं आया हुआ जो मैं पता करू. सुच्चा भाई अर्जी देते है तोह मैं इधर वाले स्टेशन से बात कर लेता हु की ऐसे 2 नामी बदमाश कोई चौपाल वाले कमरे में मार कर चला गया, सरपंच सुच्चा सिंह जी की पंचायत में."

"ओह भाई बक्शो मुझे और मेरी सरपंची को. मैं न रिपोर्ट करता और न मेरा और पंचायत का इस से कोई लेना देना. वैसे भी तोह उनका ल कटर करते न तुम लोग?"

"एनकाउंटर भाई साहब. और आपको पता है मैं बन्दे को मारने नहीं सुधरने में यकीन करता हु. लेकिन कुछ सिपाही मेरे से अलग सोच रखते है जो सजा देने में वक़्त नहीं लगते. रब्ब का हे कोई बाँदा इनको दे गया होगा मुक्ति. अब आप हमारे हे भाई हो और दार जी के बचे जैसे अपने केवल भाई साहब है. आप पे बात नहीं आने देंगे और उसको बंद हे रहने देना, अँधेरा होते हे साफ़ सफाई हो जायगी उस जगह की. देखो आपको वो विलायत खान जी बुला रहे है, जाने से पहले मिलना होगा.", सतवंत जी की बात सुन्न कर सुच्चा सिंह गदगद होता उनके हाथ को दोनों हाथ में पकड़ शुक्रिया अदा करता गया.

"तोह क्या समझे की शंकर या इन्दर?", केवल सिंह ने बहोत धीमी आवाज में मुस्कुराते हुए पुछा था.

"शंकर भाई जी साफ़ सफाई में यकीन नहीं करते केवल. और इन निशानों को मैं ाचे से जानता हु जो गोली खाने वाले को चीखने का मौका नहीं देते. वाहेगुरु इन्दर पाह जी को ऐसे हे भले कामो में लगाए रखे. चलो पिंड चलते है फिर मैं ड्यूटी पे निकलना. वैसे तोह अर्जन से भी मिलना था लेकिन बाँदा डिमांड है तोह फिर सही."

.

.

"ये सब कैसे हुआ कृष्ण? हवेली में काम करने वाली एक सेविका ऐसा अकेले तोह नहीं कर सकती और जहा तक मुझे ज्ञात है वो तुमने हे राखी थी न?", रामेश्वर जी हॉस्पिटल के गलियारे में अपने भाई के साथ बैठे थे जो बेहद चिंतित था. देवकी को होश आ चूका था और भीतर रौशनी, अनामिका उसका हाल ले रहे थे, विनोद अपने ताऊजी और पिता के लिए जूस लेने गया था.

"अकेले तोह मीणा चारा हे नहीं काट सकती थी भैया और देवकी ने बताया की मुकंदी उसके साथ था. दोनों भाग गए और जो थोड़ी बहोत नगदी उनके हाथ लगी वो ले गए. तक़रीबन 4 साढ़े 4 लाख.", अब यहाँ शंकर क्या गुल खिला के गया था ये रामेश्वर जी को भी मालूम न था क्योंकि देवकी के होश में आने के बाद वो हे उसके साथ बात करके निकला था. दिलबाग की पट्टी करवा के उसको खेत छोड़ता हुआ. भीष्म जरूर भर्ती था जिसके जांघ में गोली लगी थी. विनोद भी दोनों को ठंडा जूस देने के बाद भीतर कक्ष में चला गया अपनी माँ और बीवी को जूस देने.

"पैसे आणि जानी चीज है कृष्ण और मुझे नहीं लगता की सिर्फ इतनी हे रकम के लिए कोई औरत ऐसा जोखिम उठा सकती है. वो मुकंदी हमने कभी भी पसंद नहीं था क्योंकि मजदूरों से दलाली लेने वाला इंसान चरित्र और जुबान से कभी भी फिर सकता है. काम तोह वो भी तुम्हारे लिए करता था और हवेली के दरवाजे तक इजाजत थी उसको. मीणा के बारे में बताओ, बाकी हम खुद देख लेंगे.", अब कृष्णेश्वर के माथे पर हल्का पसीना आ गया था और रामेश्वर जी आराम से संतरे के रास का घूँट लेते हुए कनखियों से सब देख रहे थे.

"वो.. वो देवकी ने हे काम पर लगाईं थी भैया और मुकंदी हे उसको लेके आया था. मीणा को मैंने कभी परदे के बिना नहीं देखा और आपको खुद पता है की मैं कितना हे वक़्त घर रहता हु. सच तोह ये भी है की घर आने हे इसलिए लगा की पौता आया हुआ है. जाली कटी सुन्न न वो भी इस उम्र में? अब बिनोदिया थोड़ा बदल रहा है लेकिन देवकी पहले से बदतर होती गयी. आज मैं इधर आना हे नहीं चाहता था भैया लेकिन इतने बरस तक जीवन निर्वाह किया है तोह कुछ वक़्त और सही. भाभी के सामने ये सभी अपना रंग बदल लेते है लेकिन वो इधर रह तोह नहीं सकती न?", रामेश्वर जी भलीभांति अपने भाई की अवस्था जानते थे और ये रिश्ता खुद उनकी माँ ने हे स्वीकार कर लिया था जब वो विवाद हुआ था. उन्हें हमेशा से हे कृष्ण की चिंता रहती थी और यही एक बड़ी वजह थी की रामेश्वर जी ज्यादा हस्तक्षेप नहीं कर पाते थे.

"कुछ अगला पिछले पता है तुम्हे उस मुकंदी और मीणा के बारे में? बाकी ये बात तोह तुम अपनी भाभी से करो तोह हे बेहतर होगा. देवकी के सर पर 4 टाँके आये है, कुछ दिन ऐसा कुछ मैट कहना जिस से विवाद हो. और शंकर ने समझदारी दिखाई जो बात को फैलने नहीं दिया.", वो गिलास से अंतिम घूँट ले कर उसको रखने लगे तोह गलियारे की शुरआत से अर्जुन आता दिखा. उसकी चाल कही से भी ऐसी नहीं थी की वो यहाँ किसी रिश्तेदार से मिलने आया है.

"नहीं लेकिन देवकी जानती है."

"छोटी दादी को होश आ गया होगा दादा जी?", अर्जुन ने पहला हे सवाल ठीक रामेश्वर जी वाले अंदाज में किया था, कोई लाग लपेट नहीं बस पोलिसिअ अंदाज.

"मैं उस घटना के बारे में हे जानकारी ले रहा था तुम्हारे छोटे दादा से. उधर सब मंगल कुशल रहा न? और तुम्हारे पिता के साथ बाकी सभी चले गए?"

"हाँ, एक घंटे से ऊपर हो गया उन्हें गए हुए दादा जी. फिलहाल आपको मेरे साथ जरा छोटी दादी से मिलना चाहिए. वैसे भी चाचा और छोटे दादा जी तोह अभी घर निकल रहे है रौशनी बुआ के साथ. बुआ और दीदी के सभी डाक्यूमेंट्स वही है और दीदी का दाखिला जाने की कल अंतिम तारीख है, लेट फीस के साथ.", अर्जुन को जवाब देने में अब ये दोनों हे असमर्थ थे और अपने पौटे के साथ देवकी से मिलना उन्हें थोड़ा अजीब लग रहा था पर चाहत तोह खुद की भी थी की वो सच को जान सके.

"ठीक है. बिनि बीटा.. तुम बहु और आँचल बिटिया को हवेली छोड़ कर रौशनी बिटिया के घर चले जाओ. तुम्हारी माँ बिलकुल ठीक है और उसको गाँव ले जाने का प्रबंध हम कर देंगे.", रामेश्वर जी ने विनोद को डॉक्टर के साथ बात करते देख बीच में हे टोक दिया.

"मैं अकेला हे चला जाता हु दीदी को ले कर ताऊ जी. पापा इधर हे रहे, नाहक परेशां होंगे."

"उनकी बेटी को शायद बाप के कंधे की जरुरत हो बीटा. तुम समझदार हो रहे हो लेकिन रौशनी अगर किसी से बात कर सकती है तोह वो तुम्हारे पिता हे है. फिर यही फैंसला करेंगे की वो घर बिटिया के लिए सुरक्षित है या रौशनी हवेली में रहे. एक से भले 2 होते है और कृष्ण उस मामले में एक मजबूत इंसान है.", अब कृष्णेश्वर थोड़ा झेंप रहे थे और ये सच भी था के वो सरल व्यक्ति होने के साथ मेहनती मिटटी से जुड़े इंसान थे और जिस्म कही ज्यादा मजबूत था.

"जैसा आप कहे ताऊ जी. वो बिल का पूछ रहा था मैं इनसे लेकिन ये बोल रहे है की हो गया.", डॉक्टर की तरफ इशारा दिया तोह वो जूनियर डॉक्टर बस हाथ जोड़ कर मुस्कुरा दिया.

"चलो वो सब हम देख लेंगे. सावधानी से जाना और डॉक्टर मरीज बात कर सकता है या नींद की दवा दी हुई है?", अर्जुन बस ख़ामोशी से माहौल को देख रहा था जबकि उसकी चची अपनी ननद और दोनों भांजियों को लिए बहार आ चुकी थी.

"सर, जरुरत हे नहीं थी अनेस्थिसिअ की. वो बेहोश डर से हुई होंगी, चोट उतनी गहरी नहीं है. आप आराम से बात कीजिये, मैं डिस्चार्ज पेपर बनवा कर आधे घंटे में मिलता हु.", डॉक्टर भी चला गया और रामेश्वर जी ने बहु बेटी के साथ बच्चों को भी आशीर्वाद देते हुए विदा किया. कृष्णेश्वर जाने से पहले थोड़ा भावुक होते हुए उनके गाला लग गया था.

"सब सही हो जाएगा कृष्ण, तुझे तेरी भाभी पर यकीन है तोह अब वही सब ठीक करेगी. उसके पास फैंसले का हक़ हमेशा से था बस हमने हाथ बंधे रखे अपनी बीवी के. तुम आराम से जाओ और रात तक तुम्हारी भाभी भी लौट आएगी. सुबह बात करेंगे.", रामेश्वर जी से आश्वस्त होने के बाद वो अर्जुन का भी सर दुलार कर निकल चले. अब उस निजी कक्ष के बहार ये दादा पौटे थे.

"तोह क्या आदेश है महाराज? ये खेल भी आपका हे रचा हुआ दीखता है जिसके बारे में न भोगी को पता है न रोगी को. नाजुक नब्ज़ पे पाँव रखने से पहले जरा दोबारा सोच लेना बीटा.", रामेश्वर जी जैसे उसको चेता रहे थे क्योंकि उन्हें सब मंजूर था बस कृष्ण को दुखी नहीं देख सकते थे और उसके परिवार को सलामत रखना जिम्मेवारी थी.

"खेल तोह बहोत पुराण है दादा जी और उसके रचनाकार खुद दुनिया में नहीं रहे. बस भटके हुए बहोत से मोहरे आज भी जाने किस खोज में जुटे है और क्या उनकी चाहत है ये खुद वो नहीं जानते. आपके हे उसूल और नियम का पालन होगा, यकीन रखिये. बस दिल जरा मजबूत रखियेगा और बात सिर्फ मैं करने वाला हु अंदर.", रामेश्वर जी ने बस मूक स्वीकृति दे दी थी जैसे वो भी उत्सुक थे की ये कौनसा खेल और कौनसे मोहरे है. भीतर आते हे अर्जुन ने दरवाजे की चिटकनी चढ़ा दी और उस सफ़ेद बिस्टेर के सिरहाने तक लगाए बैठी देवकी अपने जेठ को देख घूंगट ढूंढ़ने लगी.

"कोई जरुरत नहीं है छोटी दादी, चोट के ऊपर घूंगट न हे ले तोह सही रहेगा. वैसे अब बेहतर महसूस कर रही है या दर्द ज्यादा है? बैठिये दादा जी, भगवन का शुक्र है की मीणा ने सिर्फ डंडे से वार किया दादी पर. उधर तोह डरती, कस्सी और गंडासी तक थे जो उसको नजर नहीं आये. अब 4 लाख 38 हजार के बदले जान बच गयी बहोत है.", अर्जुन उस स्टील के गोलाकार स्टूल को देवकी की तरफ खींचता हुआ उनका हाथ पकड़ कर वही बैठ गया. देवकी को वातानुकूलित कमरे में पसीना आने लगा था उसकी बात सुन्न कर.

"मैं ठीक हु बीटा.. वो.. वो बस चूक हो गयी थी थोड़ी मीणा को समझने में. कमीनी सऊदी छिपकली थी जिसका पता न चला मुझे. बस सर पे वार हुआ और फिर मुझे याद नहीं कुछ. होश आया तोह इधर थी और शंकर बीटा दूसरे डॉक्टर के साथ मेरा इलाज कर रहा था. जेठ जी, पैसे का हिसाब ये देख लेंगे.", रामेश्वर जी सूख चुके होंठो को खोलते बंद करते अजीब सी पशोपेश में थे क्योंकि अर्जुन को पैसे का पूरा पता था और देवकी के सर पर डंडे से वार हुआ ये भी जानता था.

"पैसे आणि जानी चीज है छोड़ी दादी और मीणा बेचारी जब हवेली से बहार हे नहीं निकलती थी तोह फिर कहा भागती? मेरी छोटी दादी पर वार किया था न उसने तोह मेरा भी कुछ फर्ज बनता है. आप हमारे लिए हमेशा परिवार की हम सदस्य रही है वो अलग है की.. खैर छोडो ये सब लेकिन आपको ये याद नहीं था की शब्बीर मेरे कब्जे में था िन्दु के भाई सतवीर के साथ? सीरत की माँ से आप कल शाम के बाद नहीं मिली थी तोह कैसे पता चलता जो मैं उन्हें रात को बता के आया था.", अर्जुन के गंभीर चेहरे पर अब हलकी मायूसी आ चुकी थी लेकिन जहा रामेश्वर जी उलझन में थे वही देवकी के चेहरे का रंग अब पीला पड़ने लगा था.

"मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा बीटा तू कैसी बातें कर रहा है और वो मीणा हे थी जिसने मुझे मारा. इसके सिवा मुझे कुछ नहीं पता की तू शब्बीर और सतवीर को कब्जे में क्यों लिए है. मेरा उनसे कोई लेना देना नहीं."

"ठीक है मान लेता हु की कोई लेना देना नहीं है. मीणा मेरे कब्जे में है, किस्मत से. वो सब बता देगी की उसने किसके कहने पर ये सब किया था और मुकंदी को आपने 4 लड़कियों के बदले 4 लाख रुपये दिए इसका प्रमाण भी मिल जाएगा. नेत्रं की पौती मीणा के साथ अक्सर 3-4 बजे हे तोह मुलाकात होती थी आपकी या कहूं उसके आने के बाद आप फ़ोन करती थी और वो नजर रखती थी. आज सवेरे ऐसा नहीं हो पाया क्यूंकि नींद की गोली ने बढ़िया काम किया था और आखिरी मौके पर जब बात नहीं हो पायी तोह खेल थोड़ा उलझ गया. सबूत तोह भिजवा दिए आपने अपने भाई के पास जो लेने आया था आपको. महाराज बाबा केलं उर्फ़ तांत्रिक कल्पतरु के साथ. वैसे मेरी माँ और मुझे मरवाने की कोई ठोस वजह दे सकती है या आप भी बस एक निर्देशित प्यादा मात्रा है?", अर्जुन क्या बोल रहा था वो सुन्न कर रामेश्वर जी तोह उसके कंधे से हिलाते उठने का बोलने लगे लेकिन उसने ना में सर हिला दिया जब देवकी की आँखें बुरी तरह फैली दिखी.

"जेठ जी ये लड़का पागल है, आप नहीं जानते की इसकी नजर.."

"हाँ मेरी नजर गलत है आपके उस मासूम मोहरे पर जिसको आप हे मेरे पास भेज रही थी. उसने हे मेरी माँ की हथेली काटी जबकि काटने वो उनकी नाड़ी लगी थी. अँधेरे और शादी के शोर में उस जगह एक बेबस सी बहु आपकी उम्मीद से थोड़ी मजबूत निकली और ये मोहरा इतना कमजोर जिसकी अगर आप और खाल उतरने लगी तोह आप खुद माफ़ी लायक नहीं बचने वाली. मैं तोह बस इतना हे कहने आया था के आपसे मेरी दादी बात करेगी और उन्होंने सिर्फ एक हल्का सा इशारा दिया न तोह फैंसला ग्राम प्रमुख अर्जुन रेखा शर्मा करेगा, कानून और ग्राम मुखिया के हिसाब से. अब आप नजरबन्द रहेंगी हवेली में कल सुबह तक. Aatma-manthan या चिंतन जो भी करते रहना लेकिन अब और ऐसे खेल नहीं होंगे जिसमे मासूम लोग मोहरे बने आपकी अदृश्य उँगलियों पर नाचते फिर और आप सबूत जमा करके उन्हें क़ैद रखे. श्रीमती कौशल्या कांशीराम बन्न ने के लिए तपस्या करनी पड़ती है, सबको प्रेम में बाँध के. षडयंत्रो और अपनों की लाश पर कदम रख कर सिर्फ गुनेहगार हे बना जा सकता है. चलिए दादा जी, बहार गाडी आ गयी है इन्हे लेने के लिए.", अर्जुन खड़ा हो कर उन्हें चेतावनी भी दे चूका था के अब कोई भी गतिविधि न होने पाए. देवकी अब खुद शिकार बन चुकी थी उस युवक का जिसको वो रास्ते से हटाने में लगी थी. गलियारे में हे एक सुरक्षाकर्मी और नर्स इनका इन्तजार कर रहे थे. अर्जुन द्वारा सब समझने के बाद वो लोग बड़ी सावधानी से देवकी को इधर से ले चले जिसने जरा भी प्रतिरोध न दिखाया, आँखों में आंसू जरूर थे पर उनका रंग अभी साफ़ न था. रामेश्वर जी ख़ामोशी से अर्जुन के साथ उनके पीछे चलते रहे जबतक की ये दोनों जीप और वो लोग उस काली कार में न बैठ गए.

"तुम जानते हो बीटा की ये सिर्फ पारिवारिक मुद्दा नहीं रहेगा अगर तुम्हारी एक भी बात सच साबित होती है? अर्जुन इसको रोका जा सकता है बेटे अगर तुम ये ुतवालपन और छोटी मोती बातों को बेवजह ऐसे न जोड़ो तोह. वो भला क्यों तुम्हारी माँ पर हुम्ला करवाने का दुस्साहस करेगी? और ये मीणा सिर्फ नौकरानी है जिसके तार तुम जाने कहा कहा जोड़ रहे हो. 4 लाख चोरी हुए है या किसी को दिए लेकिन बदले में लड़कियां? मुझे लगता है की तुम जरुरत से ज्यादा हे किताबे पढ़ने लगे हो.", रामेश्वर जी अब इस जीप में जिस तरह बैठे थे उसमे वो सुबह वाला चमकदार स्वरुप नहीं था. अर्जुन चाबी लगते हुए उस ठंडी पार्किंग से निकलता हुआ उजाले में आया तोह हॉस्पिटल के द्वार से बहार निकलने तक बस खामोश रहा.

"आप दुविध में है दादा जी क्योंकि पहली बार आपका कानून आपके हे घर में जाता हुआ दिख रहा है. इसलिए मैंने फैंसला आपको नहीं मेरी दादी पर छोड़ा है. खुल्लम खुला ये खेल हो रहा होता तोह नेत्रं और कालपातुरे भी मेरी पकड़ में होते. फिर हर गुत्थी सुलझ जाती लेकिन आपको फिर भी एक बात बता देता हु.", अर्जुन उस निर्जन सड़क पर जीप चलते हुए एक हाथ से सीट के निचे लगा लोहे का ढक्कन खोलने लगा. उसकी नजर बराबर सामने हे थी इस दौरान जैसे उसको पता हो की भीतर राखी चीज उसकी पहोच में है. कुछ पल बाद वो सफ़ेद कपडे की बानी गुड़िया निकल कर उसने पंडित जी की गॉड में रख दी. उसने बात बताने का कहा था लेकिन वो ठंडी आह भरता हुआ बस सड़क किनारे ख़ामोशी से जीप चलता रहा. रामेश्वर जी कभी उस गुड़िया को देखते तोह कभी अर्जुन के अशांत चेहरे को. उन्हें कुछ समझ आता उस से पहले हे आँखों से 2 मोटी बुँदे 8-9 इंच की उस खूबसूरत गुड़िया पर गिरी. गुड्डी.. ये उनकी प्यारी छोटी बहिन गुड्डी की गुड़िया था. वो उसको उठाने की कोशिश कर रहे थे लेकिन जैसे उसका बोझ इतना ज्यादा था की रामेश्वर जी के हाथो की उँगलियाँ कांपने लगी. गले से बस रुदन की आवाज निकल पायी थी उनके और उस निर्जन सड़क के किनारे जीप रुक चुकी थी. सर झुकाये रामेश्वर जी उस गुड़िया को चेहरे से लगाए फफक कर रो रहे थे और उनकी हालत देख अर्जुन बस ख़ामोशी से आंसू बहता रहा. अपने दादा की पीठ सहलाते हुए उसने अपने आंसू पांच लिए थे.

"आप एक बेहतरीन बेटे होने के साथ हे हर बहिन की उम्मीद से बढ़कर एक भाई थे बौ जी. मैं तोह 2 महीने पहले हे समझ गया था की आप लोग 2 नहीं 3 संतान थे पंडित मोतीलाल जी की लेकिन ये नहीं पता था के जिस लापता नाम का पता करने मैं निकला हु वो तोह 50 बरस से ज्यादा पहले दुनिया से जा चुकी है. मैं आपकी स्थिति नहीं समझ सकता क्योंकि वो दर्द सिर्फ आप तक सिमित है लेकिन जानते है आपके पिता उस दर्द से आजतक जूझ रहे थे. उन्हें तोह दफ़नाने के लिए उस मासूम बची की लाश तक नसीब नहीं हुई और जब कल मैं वास्तविकता से ru-ba-ru हुआ तोह मैं उस गहरे पानी की तलहटी में हे सांस खो चूका था. गुड्डी जैसी 56 और मासूम बच्चियां अन्धविश्वास और तंत्र की भेंट चढ़ गयी जिनके जिस्म का एक अंश तक न मिला. मिले तोह वो वस्त्र जिनसे मैंने श्रीधर को उनके पास भेज दिया, अंश मात्रा भी वजूद में न रहने दिया उसका भी. लेकिन आपका दर्द मैं काम नहीं कर सका बौ जी, बस ये.. ये एक निशानी जो आपके लिए किसी पगड़ी, माला या सम्मान से भी जरुरी है वो आपको दिए बिना मैं रह न सका. आप मुझे कह रहे है की मैं छोटी मोती हरकतों को बड़ा बना रहा हु, सबूत आपके हाथ में है बौ जी. क्या ये सिर्फ एक कपडे की मामूली गुड़िया है जिसको आप यही फेंक सकते है या अब एक पल में आप फिर से अपनी बहिन के और करीब हो गए है?", अर्जुन के सँभालने और जगह का भान होते हे रामेश्वर जी ने चेहरे साफ़ करते हुए कृतज्ञता से अर्जुन को सर हिला कर धन्यवाद दिया. वो अब उसको अपने सीने से लगये थे जैसे कही अर्जुन वो उनसे छीन न ले. अर्जुन ने उनकी हालत पर हलके से मुस्कुरा कर वो पहले से राखी पानी की बोतल ढक्कन खोल कर उनकी तरफ बढ़ा दी.

"ज्यादा ठंडा नहीं है लेकिन सुकून जरूर देगा बौ जी. ठीक पुराणी यादों की तरह.", गियर दाल कर अर्जुन फिर से आगे बढ़ चला तोह इस बार खुद पर शर्मिंदा होते हुए रामेश्वर जी ने उसका सर सेहला दिया.

"माफ़ करना बेटे, हम अपनी हे औलाद को कम् आंकने की गलती कर बैठे. ये भूल चुके थे की तुम अब हमारे पौटे होने के साथ हमारे पिता के मित्र भी हो. हाँ मेरी बहिन मेरा जीवन थी और आज तक नींद में मैं राम बियर जी सुनता हु तोह फिर सो नहीं पता. अब शायद बेहतर नींद आये जब वो साथ हे महफूज होगी. तुम्हे ये मिली कहा से? क्या उस जगह तुम मुझे ले जा सकते हो?", वो तोह देवकी का मुद्दा हे भूल बैठे थे इस जीवन के सर्वोच्च उपहार को प्राप्त करके.

"अतीत में सिर्फ मैं हे जा सकता हु पंडित जी, जैसी आपके पिता जी की आज्ञा है और आपसे लिया वचन. वैसे उधर अब धुल भी नहीं बची अगर आप कुछ और भी मिलने की आशा लिए है. हाँ कांच की चूड़ियां दे दूंगा आपको जिन्हे मैंने जोड़ा है और एक अंगूठे वाली चप्पल भी. कोशिश कीजियेगा की आप इस दौरान छोटे दादा जी के साथ समय बिताये और दादी को हे फैंसला करने दे जिन्हे बड़े पंडित जी ने स्वयं हवेली की प्रमुख मन था.", जीप में अब बातें कुछ बेहतर तरीके से होने लगी थी जैसे हमउम्र और साफ़ सोच वाले 2 व्यक्तियों के बीच होती है.

"तोह मीणा तुम्हारे पास है?"

"नहीं लेकिन वो है िंखे हे बड़े भाई की पौती या पता नहीं क्या सच है. मामला थोड़ा सा बड़ा निकला मेरी सोच से नहीं तोह नेकीराम तोह शिकंजे में होता और साथ हे वो दूसरा अपराधी तांत्रिक जो श्रीधर जैसा नहीं है."

"ये लड़कियों का मामला क्या है बेटे? क्या हमे इसकी जानकारी होनी चाहिए?"

"बस इतना हे बता सकता हु की उनको अगवाह करके क़ैद रखा गया था. एक लड़की तक़रीबन 35 दिन से और ऐसे हे हर हफ्ते बाद 3 और. मुकंदी ये सब कर रहा था और देवकी जी करवा रही थी, हरेक बदले 1 लाख उसको देते हुए. कल पांचवी लड़की के लिए उन्होंने 50 हजार पेशगी दी थी जिसका राज रात को खुला और तभी मैंने उन पर नजर रखवा दी थी. देवकी दादी के बाद वो लोग उन लड़कियों को भी ले जाने वाले थे अपने साथ. आप ये बात बस अपने तक रखेंगे दादा जी, मैंने फिलहाल ये कानून के संरक्षक की जगह अपने दादा जी को बताया है. आपके पिता बहोत नेकदिल और लोगो की भलाई करने वाले इंसान थे, उनके सुख दुःख में शामिल रहने वाले. बहोत बोझ लिए वो इस दुनिया से रुखसत हुए थे और उन्हें भी देवकी पसंद नहीं थी. वो आपकी माता जी के कारण कुछ कर न सके और उनके बाद आपने भी उनका और अपने भाई का सम्मान रखा लेकिन यहाँ परिवार की मुखिया सही फैंसला लेंगी क्योंकि वो जिम्मेवार है और उन पर कोई वचन या नियम लागू नहीं होता मेरी तरह.", अर्जुन गाँव मुड़ने वाली सड़क के करीब पहोच चूका था और सूरज भी आसमान में कुछ निचे उतरने की अवस्था में.

"बस हम ये विचार कर रहे थे की ऐसे मामले में कितनी धाराएं लग सकती है. अपहरण, हत्यारो का साथ देना, नाबालिगों पर अत्याचार, आपराधिक गिरोह चलना, dhakkeshahi-blackmail और इसमें कही कोई khoon-voon शामिल हुआ तोह.. हमारे परिवार के नाम पर ये एक गहरा धब्बा होगा बेटे और वो भी तब जब हमने सबके सामने अपने पिता को उनका वो सम्मान लौटाया हो."

"आप दोहरा सोच रहे है बौ जी. परिवार में गुनहगारों और वो भी इस दर्जे के हो तोह स्वयं पंडित मोतीलाल जी की नजरो में वो सिर्फ और सिर्फ मृत्यु के हक़दार कहलाते है क्योंकि इंसान जितने बड़े ओहदे पर होता है..

"उसकी नैतिक और सामाजिक जिम्मेवारी भी उतनी हे बड़ी होती है. उसके लिए अगर ऐसा अवसर आये जब किसी अपने को हे दण्डित करना पड़े तोह ऐसा जरुरी है क्योंकि आप गलत नहीं कर रहे, गलत को सजा दे कर उदहारण रख रहे है... हमे भी उनकी ये शिक्षा याद है और वैसे ये तुम्हे हमने हे बताई थी.", रामेश्वर जी ने इस बार स्नेह से उसकी पीठ थपथपाई थी.

"तोह रिश्वत ख़तम हुई या और भी कुछ है जो उनसे जुड़ा हो तुम्हारे पास?", रामेश्वर जी की आशा देख कर अर्जुन ने गाडी चलते हुए हे अपने माथे पर हाथ रख लिया.

"बस अब मैं हे हु जो उनसे जुड़ा हुआ हु दादा जी और मैं पहले से आपके पास हु. कल मिल आना अभिषेक जी से दादी के साथ और परसो सुबह कॉलेज की नीव रख के वापिस अपने बगीचे और संसार में. यहाँ थोड़ी म्हणत करनी बाकी है और फिर आराम भी करूँगा. उधर तोह वो मुमकिन नहीं.", अर्जुन चौपाल से गुजरा तोह विलायत खान जी हुक्का पीते हुए भी उसको हाथ हिला कर मुस्कुराये जिक्से बदले में अर्जुन ने भी ठीक वैसा हे किया.

"बड़े हो गए हो और सच कहु तोह करम से भी हमारे पिता जी जैसे या उनका थोड़ा अनादर करते कहु तोह मेरी सोच से भी बढ़िया. कल्पतरु और इन झंझटो से हम खुद निबट लेंगे. कुमारी अमृता ने हमे बताया है की बिंदिया 2 तारीख को आ रही है और तुमसे मिलने की इत्छा है उसकी. हम तोह वो सब रिश्ते भी बस समझौतों से जोड़े हुए थे जैसे तैसे लेकिन तुमने उन्हें भी साथ ला कर ाचा उदहारण पेश किया. जानते हो उसके बाद हे तुम वारिस बन गए थे.", अर्जुन ने हामी भरी.

"आपने और दादी ने यही तोह सिखाया है की हाथ जोड़ कर आपकी ताक़त का बेहतर पता लगता है. उन्हें खोल कर दुश्मन चाहे जितने मर्जी बढ़ा लो. वैसे एक मजेदार बात बताऊ जो आपको नहीं पता?", हवेली के कपाट सेवक ने हे खोले थे हॉर्न की आवाज पर. उनके पीछे हे वो काली कार यहाँ तक आ पहुंची थी.

"अब कौनसा बम फोड़ रहे हो भाई जो हमे नहीं पता.?"

"कृष्ण दादा जी और सोमबीर सिंह आपस में सहदु भाई लगते है. वो अलग बात है की देवकी जी चंद्रो दादी के चाचा की बेटी है और आपस में इन दोनों की बोलचाल शुरू से नहीं है. बड़े भाई रसूखदार और िज्जात्त को एहमियत देने वाले और छोटा बस दूधवाला और कपटी जिसको बिना म्हणत के राजा सामान बन्न न था और यही उसने बचो के दिमाग में भर दिया. कृष्ण दादा जी भी आपको सबकुछ नहीं बताते लेकिन मैं उगलवा लेता हु अपने तरीके से.", अंदर आते हे उसने खुद अपने दादा की सहायता की उतरने में क्योंकि वो कुछ कमजोरी महसूस कर रहे थे. यहाँ अनामिका को जिस तरह अर्जुन ने बुलाया था वो रामेश्वर जी को बेहद पसंद आया.

"चची, जरा मेहमान कमरे में इनका प्रबंध देख लीजिये. लाली की माँ आ गयी थी न समय से? बस वही इनका खाना लेके जाएंगी और बाकी आप हे देखिये, घर आपका है.", अर्जुन की बात पूरी होते हे तक़रीबन 36-37 बरस की वो महिला पशुओ के बाड़े से निकल कर हाथ धोने के बाद नर्स और देवकी को लिए गलियारे वाले आखिरी कमरे की तरफ चली गयी. Raj-mehal से आये प्रहरी को भी आँचल ने पानी दिया इन दोनों के साथ और सेवक ने वही दरवाजे के पास उसके लिए मांजी लगा दी. अनामिका के चेहरे की भोली ख़ुशी स्वयं रामेश्वर जी को पसंद आयी जिन्होंने पानी का धन्यवाद करने के बाद आशीर्वाद दिया और उस बचे को गॉड में लेते हुए चारपाई पर हे बैठ गए.

"तोह फिर हमारे परिवार की सबसे छोटी बहु अब बीमार नहीं दिखती? एक और सेविका के लिए मैं कृष्ण को.. अर्जुन एक और सेविका बढ़वा दो भाई यहाँ. खर्चा तोह तुम्हे महल से मिलता हे है फिर क्यों हमारी बहु एक हे सेविका पर निर्भर रहे. ये नन्हा निकेतन भी तोह अपने आप में सम्पूर्ण जिम्मेवारी है?", अब चाय बनाने के लिए अनामिका चची मुस्कुराती हुई रसोईघर में दाखिल हुई थी जहा शायद आँचल उनके मजे लेने लगी.

"सोचा भी यही था बौ जी और अब वो पिछले हिस्से वाला बगीचा भी थोड़ा सुधारना है. आपने उधर हर हवेली पर कुत्ते भेंट किये हुए है लेकिन जहा सबसे ज्यादा जरुरत है वह बस गली से 1-2 आ जाते है वो छोटे दादा जी के साथ और दूध पी के चलते बनते है. जग्गी भैया को बोल दिया है मैंने लेकिन आप भी देखना अगर कोई सांगवान अंकल के पास जैसे है वैसा मिले तोह. रौशनी बुआ भी यही रहेंगी, उन्होंने कोमल दीदी को बताया था के वो अपने पापा और परिवार में हे रहना चाहती है.", अर्जुन हर पल अपने दादा को ये एहसास करवा रहा था के इस काम उम्र में वो उनके जैसा हे सोचने लगा है, हाँ चंचल और भावुक तोह था वो पर पहले परिवार हे प्राथमिकता था उसकी.

"जी मुखिया जी. वैसे किसी का फ़ोन आया था क्या आँचल बिटिया?", उन्होंने रसोई से टेलीफोन वाले कमरे की तरफ जाती आँचल से पुछा था.

"नाना जी, बड़ी नानी का फ़ोन आया था के वो लोग कोई मुंडन के लिए जा रहे है और फिर एक घंटे बाद वापिस चलेंगे. उस बात को एक घंटा हो गया है और उन्हें पहोचने में 3 घंटे लगे थे तोह रात 8 बजे तक वो लौट भी आने वाले है. हाँ, लाला जी और हेडमास्टर जी का भी फ़ोन आया था के वो आपकी प्रतीक्षा कर रहे है. मुझे ध्यान हे नहीं रहा क्योंकि आज तोह फ़ोन बहोत आये है और कई आये होंगे जब हम लोग घर नहीं थे.", रामेश्वर जी हँसते हुए वापिस बचे से खेलने लग गए थे और अर्जुन के कपडे टोलिया तार पर टांग कर अनामिका चची वापिस रसोईघर में चली गयी थी.

"वाह बीटा तुम ले रहे हो असली मौज. तोह यहाँ भी तुम कृष्ण जैसे हो गए क्या जो मोटर पर हे नहाने लगे?", अर्जुन उनकी बात सुनते हुए हे कमीज पतलून खोल कर निक्कर पहने उस बड़े से पाइप के निचे जा बैठा. थोड़े बहोत मार के निशाँ दिख रहे थे पर ख़ास नहीं. गर्मी में वो ठंडा पानी जो सीधा धरती के गर्भ से निकलता हुआ उसके जिस्म पर गिर रहा था, पल में हे साड़ी थकान उतार गया.

"दादी ख़याल रखती है मेरा बौ जी. उन्होंने यहाँ सबको पहले हे त्रिनेड कर दिया था के मुझे कैसे रहना पसंद है. विनोद चाचा ने तोह जनरेटर और कंप्यूटर तक लगवा दिया मेरे लिए. अभी देखना बादाम का दूध और खुराक आपकी चाय के साथ हे इधर आने वाली है. अब जिसकी ऐसी थानेदार दादी हो भला उसको क्या जरुरत म्हणत मजदूरी की.", अर्जुन के मजाक पर उन्होंने हे अपने सर पर हाथ रख लिया था. नर्स भी देवकी का कमरा सुचारु करवाने के बाद उसको नींद का इंजेक्शन दे कर इधर खुले आँगन में हे आ बैठी थी जिसकी उपस्थिति देख अर्जुन तुरंत कमर पर टोलिया लपेट कर सरपट अपनी चची के कमरे में दौड़ गया, कपडे उठता. आँचल के साथ स्वयं पंडित जी भी हंस रहे थे और नर्स बस उस युवक की झलक इस अवस्था में देख कर अपने विचारो में. बहोत बड़ा फैंसला लिया जाने वाला था लेकिन उस से पहले माहौल में वो गंभीरता न रही थी जैसी सुबह से dhoop-chaanv की तरह आ जा रही थी. निकेतन ने अपने बड़े दादा के हाथ से वो गुड़िया लेनी चाही तोह उन्होंने हँसते हुए ना में सर हिलाया लेकिन फिर दे भी दी. बचा भी जैसे उस पर अधिकार नहीं रखना चाहता था जिसने वो वापिस उनके चेहरे से लगा दी. अंतिम न सही लेकिन ये भी गुड्डी की इत्छा रही होगी की उसका बड़ा भाई राम एक बार तोह उस से मिले. अर्जुन ने उन्हें फिर से मिलवा दिया था.

.

.

"ये कही से भी इंसान न है माँ. देखो ये गाडी मैंने मेरे हिसाब से तैयार करवाई थी लेकिन इसमें भी ये बस जैसे तैसे फिट हुआ है. बड़े भाई, नयी गाडी लेनी पड़ेगी तुम्हारे लिए.", गंगा घात पर सभी क्रिया पूरी करने के बाद जब ये लोग वापिस गाड़े में बैठने आये तोह अब संभव के लम्बे केश नदारद थे जिनकी जगह सिर्फ एक छोटी बची थी लेकिन दाढ़ी वैसी हे बरकरार. सफ़ेद धोती और वैसे हे कुर्ते में जब वो उस विदेशी बड़ी जीप में अगली सीट पर बैठा तोह एक बार गाडी को भी महसूस हुआ के कोई बैठा है. उमेद सब देख रहा था और उसने ऐसा मजाक में कहा था अपनी माँ, चची और रानी माँ से.

"अनुज, माता कौशल्या जी को बता चुके है की हम पारिवारिक इंसान नहीं है. नए वाहन पर व्यर्थ पैसा मत खर्चना. ये भी एक प्रयोजन था और पिता जी की अंतिम इत्छा जिसका सम्मान समाज से विरक्त भी करता है. माता पूर्णिमा जी के साथ तुम ाचे से जीवन व्यतीत कर रहे हो और उसमे हम कही से भी शामिल होने लायक नहीं.", अपनी तरफ का वो ठंडी हवा फेंकने वाला गोला ढक्कन से बंद करते हुए संभव ने शिक्षा निचे उतार दिया. उनकी ऐसी गंभीर बात ने माहौल थोड़ा ज्यादा हे अजीब बना दिया था.

"मैं फिर से अपने बचे को बड़ा कर सकती हु संभव और अब तोह वचन भी पूरा हुआ. तुम्हे घर चलना चाहिए बेटे और अभी तुम अपने बाकी 3 भाइयों से भी नहीं मिले हो. समय तोह कुमार के साथ भी नहीं बिताया है और न अपने चाचा के. मैं दबाव नहीं दाल रही बीटा लेकिन मेरी स्थिति तुम नहीं समझ रहे. तुम्हे लगता होगा की आज हे मिले हो और 50 बरस का फेर मेरे दिल में होगा, लेकिन मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मैंने तुम्हे आज हे जनम दिया है.", पीछे बैठी पूर्णिमा जी ने जिस तरह उस बाल विहीन सर को सहलाया था संभव की आँखें कुछ पल के लिए मूँद गयी.

"रोने नहीं देंगे आपको परन्तु हम सिर्फ सावन का महीना हे आपके साथ व्यतीत कर सकते है और उसमे भी बहोत शर्ते लागू होंगी माते. वैसे भाइयों के अलावा हमारी एक एक छोटी बहिन आप तीनो से है. जानते है हम रक्षाबंध के बारे में और हम चाहते है की हमारी कलाई पर भी धागा बंधे. उस श्रावण मॉस में हे झूले लगते है और अंतिम समय रक्षाबंधन का त्यौहार भी. 11 मॉस हम वही रहेंगे जहा हमे रहने के लिए कहा गया था. वो भी घर है और उधर भी परिवार है जहा हमारे बचे और दोस्त है.", संभव चलती कार से देख रहा था नीले आसमान ने गहरी होती लाली को और उसके चेहरे पर वो अनूठा तेज उमेद देख कर मुस्कुरा रहा था. वो इसका बड़ा भाई था और एक ऐसा अद्भुत्त इंसान जिसमे लेशमात्र भी कोई चाहत न थी.

"हाँ फिर एक महीने तुम मेरे पास और एक मैं तुम्हारे. लेकिन उस जंगल की जगह तुम वो महीना अपने पिता के घर में रहोगे. और शर्ते भी बता दो जरा अपनी, क्या पता उनमे कुछ बदलाव करवाना पड़े.", कौशल्या जी अपनी बहिन की चालाकी पर मुस्कुरा रही थी. वो खामोश थी उस पल से जब उन्होंने रघुवीर जी के लिए पथ किया था और पूर्णिमा जी ने वह पर संभव के साथ उन्हें शामिल किया, जिस पर रानी माँ को भी ऐतराज न हुआ.

"कई बार हम वही तोह सोते है. नहीं तोह मचान पर, टिल्ले पर या फिर हवेली के प्रांगण में. शर्त ज्यादा नहीं है लेकिन जरुरी है जिसमे से पहली है की हम वनवास आश्रम का निर्वाह करेंगे मतलब विवाह के बारे में सोचना भी पाप है. दूसरी, हम आपसे भोजन और स्नेह के सिवा कुछ नहीं ले सकते और अंतिम शर्त है की हम वह आएंगे तोह अमावस भी हमारे साथ आएगा और हम भूमि पर सोने के आदि है. हाँ बाकी परिवार यही रहेगा क्योंकि वो अपना काम समझते है परन्तु अमावस हमारी gair-maujdgi में बस एक हे स्थान पर बैठा रहता है, ann-jal त्याग कर. इनमे फेरबदल क्या हो सकता है आपकी नजर में?"

"वह पहले हे ghode-bhediye भरे हुए है तोह एक और आ जाए इस से कोई परेशानी नहीं होने वाली. शादी.. अब इसके बारे में मैं क्या कह सकती हु लेकिन माँ जो देना चाहे वो दे सकती है इतना ध्यान रखना."

"इनकी शादी? पता भी नहीं की समकक्ष औरत मिलेगी भी या नहीं. वैसे थोड़ा ज्ञान हम भी रखते है आश्रम और sant-jiwan का. एक माँ अपने हाथ से बना हुआ कुछ भी अपने सन्यासी बेटे को दे सकती है और बड़े भाई तुम सन्यासी नहीं हो वचनबद्ध योगी हो जैसा तुम चची को बता रहे थे. समाज में थोड़ा सा शामिल होते हे तुम भी दिमाग चलने लगे हो. वैसे हिसाब तोह ये बनता है की अगर एक महीना तुम्हे अवकाश रहता है तोह 20 दिन तुम उधर और 10 दिन बुआ के साथ रहोगे, ये भी तोह माँ है न आपकी. और तुम्हारी तरफ भी ऐसा हे होगा. मतलब चची और माँ 20 दिन गाँव आ सकती है और बुआ 10 दिन तुम्हारे पास महल से.", उमेद के ऐसे निर्णय पर रानी माँ ने मुस्कान के साथ उमेद का सर सहलाया था जिन्हे वो आईने से देख कर प्रतिउत्तर में मुस्कुराया.

"इंसान समझदार हो तुम अनुज और हम सहमत है इस बात से. बस उन चिकित्सक महोदय से हम थोड़ी दुरी रखेंगे, जरा उत्तेजक इंसान है वो. और हम घर से बहार नहीं जायेंगे किसी महफ़िल या आयोजन पर."

"सबकुछ एक तख्ती पर लिख के दे देना भाई जिस से याद रहे के क्या कर सकते है और क्या नहीं. तुम भोले से दूर रहने की कोशिश कर सकते हो लेकिन अब वो जान चूका होगा के तुम उसके बड़े भाई हो और वो मुसीबत बिना बुलाये हे गले आ पड़ती है जो फिर जीवनभर साथ रहेगी. देखते है तुम्हे वो क्या क्या बनता है जब उसके पास रहोगे. अगले महीने के बाद आया सावन मतलब तुम्हारा श्रवण मॉस. लेने आ जाऊंगा उस से पहली रात को हे. वैसे तुम 2-3 साल तोह पूछताछ में हे गँवा डोज. क्यों चची? सही कहा न मैंने?", उमेद को इतनी रफ़्तार से गाडी चलते हुए संभव थोड़ा अशांत दिख रहे थे लेकिन कुछ कहा नहीं.

"कोई पूछे तोह सही सवाल मेरे बचे से, हुक्का पानी बंद कर दूंगी चाहे फिर वो तेरे पूजनीय चाचा जी हे हो. और संभव जैसा चाहेगा इसको वैसा हे माहौल मिलेगा. बीटा अब इतना कर सकता है तोह हमे भी इसकी हर ितचा का समर्थन करना चाहिए. बस शंकर इस सब के बीच नहीं आता तोह उसकी जिम्मेवारी मैं नहीं लेती.", उनकी बात पर अब पूर्णिमा जी भी हंस दी थी क्योंकि वो भी अपने इस भोले बेटे को जानती थी जो सबसे ज़िद्दी भी था और सही को उल्टा करने वाला भी, शंकर.

"वैसे हम आ सकते है आपके घर उमेद?", रानी माँ के ऐसे सम्बोधन पर पहली बार पूर्णिमा जी ने एक अदृश्य हक़ से उनके कंधे पर चपत राखी थी.

"आपका भी घर है वो सौंदर्य, बेटे के हिसाब से भी और दूसरे रिश्ते से भी. हम तोह यही कहेंगे की संभव वह 30 दिन रहे अगर आपका मुमकिन हो तोह. महल के तोह करीब हे है ये लेकिन आपको भी उधर बेहतर लगेगा और हमे भी. कौशल्या बस 30 मिनट दूर है हमसे तोह इसका मसला नहीं. वैसे भी अंतिम इत्छा में जो नाम लिखे थे वो सिर्फ उस एक कार्य तक सिमित नहीं थे संभव. उसका अर्थ ये भी था के वो परिवार है. तुम्हे नींद आ रही है बीटा.", पूर्णिमा जी ने बहार वाले शीशे में देख लिया था के उनके सहलाने से संभव आँखें बंद करने लगा था.

"बस थोड़ा सा हे और सेहला दो माते. हमे tivra-gati से अजीब एहसास होता है और 16 बरस की उम्र के बाद हमे इसका ज्यादा अनुभव भी नहीं रहा. हाँ माते ऐसे हे..", वो सचमुच हे शांत हो गया था और उमेद अपने इस पहाड़ से भाई को ऐसे सोये देख गति कुछ काम करता हुआ बस मुस्कुरा दिया.

"माँ तोह जोगी क्या भोगी को भी सही जीना सीखा देती है और ये तोह पैदा हे आज हुआ है.", कौशल्या जी के इस कथन पर बाकी तीनो हंस दिए थे और फिर वापिस खामोश हो गए. उमेद अब पूरी एकाग्रता से गाडी दौड़ा रहा था. रानी माँ को महल छोड़ने के बाद उसने अपनी चची को भी छोड़ना था वापिस घर जाने से पहले. उसके पिता की अंतिम इत्छा में शामिल उस अदृश्य तत्त्व को उसकी माँ ने सही से पढ़ लिया था क्योंकि कुछ बातें अक्सर नहीं दर्शाते, भावनाये बेहतर समझती है.

.

.

अर्जुन पैदल हे उस तालाब के पास जा पंहुचा था जहा मीनाक्षी उस से मिलने आयी थी. लाली ने अपना काम पहले हे कर दिखाया था और उसका इनाम अर्जुन ने फिलहाल तोह सामाजिक रूप में दिया था जबकि व्यक्तिगत तौर पर वो उसके एहसान को चाहे न चूका सकता हो लेकिन शहर घूमने और नए कपडे मीनाक्षी के साथ ले कर जाने का उसने वादा किया था. आज मीनाक्षी track-tshirt की जगह पीले सलवार कमीज, जिस पर सफ़ेद कारीगरी और पंजाबी जूती पहने आयी थी. उसका वो सरल चेहरा आज पहले से हे गोर की जगह सुर्ख दिख रहा था और ये शाम का धुन्दल्का.

"ज्यादा इन्तजार तोह नहीं करवाया मैंने आपको?", अर्जुन तोह बस उसके इस रूप और शारीरिक भाषा को देखता हुआ जड़ सा हो चला था. मीनाक्षी संतुलित शरीर की लम्बी छरहरी युवती थी जिसका निखार कही से भी जीनत जैसी आधुनिक से काम न था बल्कि उसकी सादगी कही ज्यादा प्रभावी.

"शायद मैं और इन्तजार कर सकता था अगर पता होता की आप का आगमन ऐसा होने वाला है. सॉरी... थैंक यू मीनाक्षी जी, मैं नहीं जानता था के वो सब मुमकिन हो भी सकेगा या नहीं लेकिन देखिये इस गाँव में मेरी हर परेशानी आपने हे दूर की. एक गुस्ताखी कर सकता हु?", अपनी ऐसी तारीफ पर मीनाक्षी के दिल की धड़कन हे जैसी उसको रूकती सी लगी. वो इधर आने से पहले 30 मिनट तक सिर्फ इस दुविधा में रही थी की क्या पहने और क्या अर्जुन बस उसको काम के लिए हे बुला रहा है. फिर वो सकरात्मक सोच लिए ठीक पारिवारिक वेशभूषा में आयी जहा कोई मेकअप न था. अब गुस्ताखी ने अलग हे दुविधा में दाल दिया था.

"आपने बहोत कुछ किया है वो भी जिसमे आपका कोई स्वार्थ नहीं था. फिर ये तोह मेरा जन्मस्थान है और आप हमारे मुखिया भी. जानती हु आप कुछ गलत नहीं करेंगे लेकिन अगर वैसा कुछ है तोह भी कोई बात नहीं."

"ओह माँ.. सचमुच ऐसा समर्पण वो भी एक मुसाफिर के प्रति? आप बस अपने आप में हे एक है मीनाक्षी जी. मैं तोह ये गुस्ताखी करने वाला हु की संडे को दादी कॉलेज की नीव रखने वाली है और तब आप उनकी बगल में कड़ी हो. देने के लिए तोह मेरे पास मेरा कुछ नहीं है बस आपको सबके सामने मैं एक मिसाल की तरह लाना चाहता हु. कॉलेज, कोर्स, खेल और फिर सामाजिक योगदान देने वाली लड़की जो उतनी हे आदर्श है जितनी हर इंसान चाहता है. बनेंगी मेरी दादी के साथ उस पल का चेहरा?", मीनाक्षी जहा पहले भौचक्की थी वह अगले हे पल अर्जुन के सीने से जा लगी जब ख़ुशी के आंसू हे बह चले. या दूर दूर तक कोई न था और अगर कोई होता तोह दिख पहले जाता. अर्जुन ने मीनाक्षी को अपने मानुष स्वभाव का ये अनमोल प्रदर्शन करने दिया जिसमे सचमुच उसको सहारे की जरुरत थी. वो जब अलग हुई तोह मुठी में दबाये रुमाल से चेहरे पौंछने लगी.

"सॉरी अर्जुन जी. कभी कभी इमोशंस चाह कर भी नहीं रुक सकते. वो एक्सप्रेस करना भी नहीं आता हमे ज्यादा.", वो आंसू साफ़ करती हुई भी शर्मा रही थी अपनी हरकत पर.

"सच कहु तोह आपका एक्सप्रेस करने का तरीका सबसे स्वाभाविक और ाचा है. काम से काम अकेले तोह खुश नहीं हुई आप?"

"आप अब जो कह रहे है उसका अर्थ समझती हु मैं. आपको अगर बुरा लगा तोह सॉरी और मुझे इतने सम्मान के लायक समझने के लिए थैंक यू. वैसे लाली बहोत खुश थी."

"आप खुश, लाली खुश और गाँव खुश. अपना तोह टारगेट जल्दी हे पूरा हो गया. वैसे मेले में नहीं आयी थी आप?", अर्जुन उसके करीब हे खड़ा था और जाने किस आकर्षण में या अपनी आदतवश उसने उँगलियाँ आपस में उलझती मीनाक्षी के दोनों हाथ अपने हाथ में ले लिए थे. अर्जुन का ध्यान मीनाक्षी से बातों और चेहरे पर था और मीनाक्षी का अपनी हालत को सँभालने में जो अब कुछ बुरी हो चली थी.

"आप वह .. आपको लड़ते हुए नहीं.. देख सकती. सुना जरूर था की आपके भी चोट आयी है और इसलिए मैंने आपसे शाम को एक बार मिलने का कहा था. बस भूल गयी थी आपकी बात सुन्न कर. कहा चोट आयी है आपके?", घबराती हुई मीनाक्षी ने अब खुद पर हे ये वार करवा लिया था चोट की जगह पूछ कर. दिल के करीब हे पसलियों पर उसका हाथ रखते हुए अर्जुन ने कह तोह बड़ी सहजता से दिया.

"यहाँ लेकिन अब बेहतर है.", वो कुछ गलत भी नहीं बोल रहा था लेकिन उस धड़कते दिल को अपनी हथेली पर महसूस करना और अर्जुन द्वारा ये कहना की अब बेहतर है. मीनाक्षी की हिम्मत जवाब दे गयी और वो जो बस दिल में दबाये हुए थी उसके मुँह से तब निकला जब वो उसके सीने से फिर से जा लिपटी लेकिन इस बार ये ख़ुशी का पहले सा इजहार न था.

"मैं जाने कब प्यार कर बैठी आपसे अर्जुन और मुझे नहीं पता था के वो अजीब सा लग्न या आपका इन्तजार करना क्यों मुझे पसंद आने लगा है लेकिन मैं वैसा करती रही और जब आप मेरे साथ थे वह पार्क में तब भी मैं चाहती थी की आप बस एक बार मेरा हाथ पकड़ लो, मेरी और कोई इत्छा नहीं और न कोई चाहत. हमारा कोई मेल नहीं लेकिन बस अब सुकून है की आपने मुझे एक पल के लिए हे सही लेकिन अपनी धड़कन से तोह जोड़ा. थैंक यू सो मच अर्जुन इस पागल की हालत समझने के लिए.", अर्जुन तोह हतप्रभ सा था जो इस पल में इतनी खुश और भावुक हुई इस सरल हृदय युवती को जरा भी ठेस नहीं पंहुचा सकता था.

"हम शायद खुले आसमान के निचे खड़े है मीनाक्षी जी और एक लड़के के साथ ... चलिए मैं आपको घर छोड़ देता हु और कल khel-ghar के बाद मिलते है.", अर्जुन ने अलग होने से पहले बस हलके से उसकी पीठ सेहला कर थोड़ी हिम्मत देने की कोशिश की. मीनाक्षी भी सर झुकाये एकदम से हे अलग हो कर मुड़ी जहा ये शंकर जी की घडी अपना खेल दिखा गयी उसका दुपट्टा फांस कर. वो वापिस मुड़ी तोह नजरे तक न मिला प् रही थी और अर्जुन ने कलाई खुद हे आगे कर दी उस दुपट्टे के किनारे निकले धागे को निकलने के लिए.

"आप मेरी एक इत्छा पूरी कर सकते है?", ये भी मीनाक्षी ने बिना नजरे मिलाये कहा था.

"बस में होगी तोह हर इत्छा पूरी करने की कोशिश करूँगा मीनाक्षी जी."

"चिकोटी काट दीजिये जरा हमारी कलाई पर.", उन आँखों में इस बार जो आंसू थे वो dhara-swaroop थे लेकिन एक मुस्कान के साथ और बस यही ऐसा पल होता था जब अर्जुन खुद बह जाता था सामने वाले के प्रेम में. कलाई घडी से धागा निकलते हाथ को हो पकड़ते हुए उसने मीनाक्षी को अपने बिलकुल करीब खिंच लिया, इतने करीब की उसका सीना अर्जुन के सीने से कुछ निचे स्पर्श होने लगा था. वो नजरे उठा कर अर्जुन की अगली हरकत का इंजतार कर रही थी जहा वो उसके चिकोटी काटे लेकिन वो अपने चेहरे पर झुकते होंठो को देख मीनाक्षी की आँखें बंद होती गयी अर्जुन की दोनों बगलो पर कस्ती मुट्टियों के साथ. प्रथम पुरुष स्पर्श वो भी डूबते सूरज और गहराती शाम में ऐसी निर्जन जगह जहा सिर्फ ये 2 हे लोग थे. चुम्बन से पूरी तरह अनभिज्ञ रही मीनाक्षी के नरम आधार कुछ पल अर्जुन के लबो से जुड़े रहे और सांस लेने के लिए खुले तोह ये पल और गहरा गया. Mukh-ras का बदलना हे हुआ था की मीनाक्षी उसकी गिरफ्त से निकलती हुई अपनी उखड़ी सांसें संयतत करने लगी. अर्जुन के कुछ भी कहने से पहले वो तेज कदमो से अपने घर की तरफ बढ़ चुकी थी जैसे ये उसकी अनकही एक और इत्छा पूरी हो गयी थी और इसके आगे उसका अस्तित्व न था. बस अर्जुन देखता रहा उसको गली में दाखिल होते हुए और उसके बाद खुद को हे लानत देता वो अब जग्गी के घर की तरफ बढ़ चला. रानी के साथ साथ उसने जसलीन का हाल भी लेना था उधर और अब यही थोड़ा समय बिता कर निहाल के घर जाना था जहा एक अलग आफत उसके गले पड़ने वाली थी.
 
अपडेट 206

जांच पड़ताल

नरिंदर जी की गाडी घर के बहार जब पहुंची तोह दिन लगभग ढल चूका था. सामने हे सलीके से कड़ी उस दूसरी इलो को देख कर शंकर जी के चेहरे पर हलकी सी मुस्कान आ गयी थी क्योंकि वो उनके सबसे प्रिय साले की गाडी थी, राजेश की. मतलब वो हर मामले में एक जिम्मेवार व्यक्ति था और अपने जीजा के घर ऐसे समय में सुरक्षा और परिवार का ख़याल उसकी भी प्राथमिकता था. छोल साहब दरवाजा खोल कर बहार निकलते हे चश्मे पर आयी ढूंढ साफ़ करते हुए दोनों से बाद में मिलने का बोल कर अपने घर की तरफ बढ़ गए.

"ये आदमी मुझे इसलिए सबसे ज्यादा पसंद है शंकर. तू न फिर से मोती दान कर दे थोड़े, किस्मत से भी ऐसा भक्त नहीं मिलता किसी जीजा को. ऋतू बिटिया, उठ जाओ. कबतक अपने बाप को तकिया बना के सोई रहोगी?", शंकर को हिलते न देख नरिंदर ने हे पीछे मदद कर हाल देखा तोह उसका बड़ा भाई तोह कोने में दबा हुआ था और कोमल के भी घुटनो के ऊपर पाँव पसरे लम्बी सोई ऋतू को जैसे खबर तक नहीं थी की वो घर पहुंच चुके है.

"कोमल बीटा तुम आराम से निकलो. नींद कच्ची है इसकी.", शंकर जी अपनी इस बेटी के सामने खुद हे जैसे माँ बन्न जाते थे लेकिन कुनमुनाती सी वो लड़की अंगड़ाई लेने लगी तोह हाथ खुले हे नहीं और चेहरा मल्टी वो उठी तोह कुछ पल समझ हे नहीं आया फिर अपने चाचा को हँसते देखा तोह सॉरी बोलती हुई उठ कर सीढ़ी बैठ गयी.

"मेरा शेर बीटा तोह खाना खाते हे नींद में चला गया. चल ाची बात है अब तुम आराम से पढ़ना. देख तेरे ननिहाल से गाडी आयी हुई है और क्या पता मां के साथ मामी भी आयी हो.", नरिंदर जी ने ऋतू को ध्यान दिलवाया तोह वो फुर्ती से कोमल के साथ हे बहार निकल कड़ी हुई.

"मामी से ज्यादा ाचा होगा की नानी आयी हो. मुझे उनसे बहोत जरुरी काम था और थैंक यू पापा, फॉर थी नैनी केयर. चलो दीदी, सामान पापा हे ले आएंगे.", ऋतू उनका हाथ पकड़ कर अंदर हे दौड़ गयी जबकि कोमल अपना बैग लेना चाहती थी.

"सही में तुझे तोह आरती और ऋतू हे ठिकाने लगाती है भाई और उनके सामने तेरे मुँह से भी कुछ नहीं निकलता.", नरिंदर ने सुबह से अब कही पहली सिग्रत्ती जलाई थी और कार को थोड़ा एक तरफ घुमा कर बगल वाले खली प्लाट में लगा लिया था.

"तू इन दोनों के पास ज्यादा रहा है लेकिन इनके रंग तुझे भी नहीं पता इन्दर. जिस दिन इनके तेवर देख लेगा उस दिन तेरे भी हाथ जुड़ जायेंगे. साला आज तोह यार मेरा पैकेट भी पूरा बंद पड़ा है सुट्टे का.", शंकर अगली सीट पर हे आ गया था अपने भाई की बगल में. पिछले शीशे से उसने रोमिला और विवान को अपने घर दाखिल होते देखा जो इनके हे घर से आये थे.

"कॉलेज के बहार एक बार कुछ मनचलो ने आरती से बदतमीजी करनी चाही थी, बताया था न तुझे. वो घबरा गयी थी और ठीक वैसी हे ऋतू है, चंचल है लेकिन उतनी हे भावुक भी. अखाड़े में हे देख लिया था के वो अपने छोटे भाई को जरा भी दर्द या दुःख में नहीं देख सकती. ाचा है न वो हमारी छाया में महफूज समझती है खुद को और इनकी दुनिया कही है भी तोह किताबो और अपने भाई के साथ. मासूम और करियर पर ध्यान देने वाली इसलिए तुझे दोनों ज्यादा पसंद है. मेरी प्यारी गुड़िया तोह हमेशा से हे पिंकी और कोमल रही है. कुछ कहती हे नहीं और सारा काम करती रहती है.", नरिंदर ने सिग्रत्ती शंकर की तरफ बढ़ा दी जो आधी रह गयी थी. शंकर के चेहरे पर कुटिल मुस्कान देख नरिंदर थोड़ा ताज्जुब से जान ने की कोशिश करने लगा की उसका भाई सहमत क्यों नहीं है.

"वो आरती मासूम है? 8-9 इंच लम्बा पेचकस हाईवे पर एक मनचले की जांघ में घोप दिया था उसने तोह समझ ले की उसके कंधे में कितनी जान होगी, बेशक हड्डी के पार न भी हुआ हो लेकिन वो पूरा अंदर करने में ताक़त बहोत लगती है और जिगरा तेरे मेरे जैसा होना चाहिए. और तू ऋतू की बात करता है की वो रोने लगी थी तोह हाँ वो क्या इनमे से कोई भी हमारी बेटी वह होती तोह वैसा हे करती सिवाए पिंकी और कोमल के. ऋतू मब्ब्स कर रही है और उसका सबसे फवौरीते काम है kaat-peet, जरा सा भी हाथ नहीं हिलता उसका. ये नाजुक सी लड़कियां 10 किल्लो वजन से सिर्फ कलाई की कसरत करती है इन्दर, विन्नी बिटिया ने बताया था मुझे अपने घर की लड़कियों वाली गयम के बारे में. तू और मैं भी तोह कभी मासूम हे थे, हाँ तू ज्यादा उत्पाती था अज्जू के जैसे लेकिन एक वक़्त तक हम बस नासमझ शरारते करते थे लेकिन ये बचे बहोत से मामलो में हमसे बेहतर प्रशिक्षित है जिसका भान तक ये हमे होने नहीं देते.", नरिंदर का तोह चेहरे हे शून्यभाव में चला गया जब ये पेचकस वाली और ऋतू के पसंदीदा कार्य का पता चला.

"तू पागल है शंकर?"

"अपनी माँ को हे देख ले जो ऋतू के पीछे बुलेट पर बैठ कर मार्किट जाने लगी है. सीलेंसर के ऊपर सॉकेट में कस्सी का डंडा रहता है जब बुलेट ऋतू लेके जाती है, अर्जुन ने लगवाया होगा जो कभी प्रयोग नहीं हुआ पर साफ़ मतलब है की वो सभी लड़कियां मासूम दिखती है और हैं भी लेकिन उनका स्तर हमारी उम्मीद से कही बढ़कर है. शायद अर्जुन अपनी बहनो को आत्मरक्षा सीखा रहा है क्योंकि उन्होंने पढ़ने के लिए घर से बहार भी जाना है. आरती ने मुझसे बोलै था के वो ये डिग्री करके 2 साल बाद आईआईएम या अमेरिका से ब करना चाहती है. उसकी पढ़ाई का समय भी ऋतू और अलका के बराबर है, किताबे मैंने हे ला कर दी थी दिल्ली से. हम इतने केंद्रित नहीं थे इन्दर अपने जीवन के उस समय में बेशक कॉलेज में पढ़ाई के वक़्त पढ़ाई की पर भविष्य के बारे में कभी नहीं सोचा. तेरी शादी हे देख ले कैसे अचानक हे हो गयी थी मेरे साथ एक हे मंडप में? हम चूतिये थे बहोत से मामले में लेकिन ये बचे अपनी कमर कैसे हुए है सब तैयारियों के साथ.", अब नरिंदर भी सब बस ख़ामोशी से सुन्नता हुआ सर हिला रहा था.

"अलका बिटिया ने वो संजीव वाला बॉक्सिंग किट लगवाया था मुझसे अभी 3-4 दिन पहले ऊपर वाली उस गयम में हे. उसके पंजो पर गरम पट्टी बंधी भी देखि थी जिसका उसने बताया था के वो बस डांस और बैलेंस प्रैक्टिस करती है फिट रहने के लिए. संजीव पिछले घर में kick-boxing करता था ठीक ऐसे हे. मतलब बंद कमरों में बचे पढ़ने के साथ हे खुद को ख़ास बना रहे है? माँ इसलिए इन्हे अलग खुराक और rang-birange जूस देती रहती है? Beda-garak हो हमारा जो बहार दुनिया में जाने क्या क्या ढूँढ़ते रहते है लेकिन अपने हे बचो का पता नहीं."

"ाची बात है भाई के वो इसको जाहिर नहीं करते और सबके सामने वही मासूम से घरेलु बचे है इन्दर. और वो बड़े हो रहे है तोह हमे उनके व्यक्तिगत समय की कदर करते हुए taak-jhaank नहीं करनी चाहिए. मैं अब ऊपर जाता हे नहीं सिवाए सीधा छत्त के. वैसे तू इस सबसे अलग भी बहोत कुछ बताना चाहता था.", सिग्रत्ती का टुकड़ा बहार फेंकते हुए शंकर कार से उतर गया था और नरिंदर भी.

"हाँ लेकिन बात लम्बी चौड़ी है और बोतल खर्च हो जानी है पूरी. साले साहब से मिल लेते है फिर नहाने के बाद बैठते है आराम से खुली छत्त पर.", दोनों घर की और बढे थे जहा राजकुमार जी के साथ हे कुन्दनलाल जी और राजेश उन्हें मिल गए. ससुर का आशीर्वाद लेने के बाद राजेश भी दोनों गले लग कर मिले.

"हम अभी घर में दाखिल भी नहीं हुए और आप लोग जाने भी लगे.", शंकर की बात सुन्न कर राजेश के चेहरे पर तोह सहमति के भाव आये लेकिन कुन्दनलाल जी ने अपनी असमर्थता दर्शा दी.

"तुम साथ चलो बीटा, हम तोह रुक नहीं सकते. कोमल बिटिया भीतर आयी तोह हम समझ गए की आप लोग आ चुके हो. सोहन भाई साहब कुछ आराम पर है फिलहाल तोह मेरा घर और दूकान संभालना जरुरी है. बिट्टू भी काम से बहार है इसलिए पूजा बहु और दोनों पौती जाते हुए हमे साथ लेके जानी है. राजेश आ जायेगा कल तुम्हारे पास अगर तुम आज घर हे रहना चाहते हो.", कुन्दनलाल की बात नरिंदर भली भांति समझ रहा था.

"कल आते है हम दोनों आपके पास. वैसे भी काफी समय से वक़्त नहीं बिताया अपने नोहरे में तोह शाम आपके हे साथ. माँ जी (सुनंदा जी) भी आयी है बौ जी?"

"उन्हें तोह ऋतू बिटिया ने दबोच लिया है भाई और अब naani-naatin के बेच हम कुछ नहीं कर सकते. सुबह आना चाहे तोह भिजवा देना या हम गाडी भेज देंगे."

"नहीं, हम हे लेते आएंगे माँ जी को अपने साथ. शंकर 5 बजे हॉस्पिटल से फुर्सत लेगा तोह मैं इसको वही से ले लूंगा. राजेश यार, दलीप भाई को बोल देना की कल उपलब्ध रहे.", राजेश हामी भरता हुआ खुश था के ये लोग कर उसके साथ होंगे. काली इलो में बैठ कर बाप बीटा निकल चले तोह अब शंकर ने अपने बड़े भाई साहब को लपक लिया.

"राजू भाई, रोटी मैट खाना. थोड़ा फ्रेश हो जाए फिर मार्किट चलते है सामान लेने. बाकी कुछ काम की बात हो तोह बताना फिर."

"हाँ यार ये संजीव की शादी से पहले हे पी थी और अब शरीर भी थोड़ा सुकून मांगता है. मैं तोह धर्मपाल के घर जाने का सोच रहा था क्योंकि वालिए ने उसको और मुझे फ़ोन किया था कल शाम बैठने के लिए. फिर घर पे तुम दोनों हे न रहो तोह मैं भी निकल नहीं सकता. विवान बोलके गया की ऐतवार को वो जा रहा है और कल शाम को बैठते है लेकिन अब जवाब कैसे दू क्योंकि कल तोह पहले हे वालिए मूड बनाये बैठा है. हाँ आज हम तीनो हे बैठते है और तुम दोनों जितने taro-taja होते हो इतने मैं ले आता हु सब सामान.", नरिंदर ने चाबी अपने बड़े भाई के सामने कर दी कार की.

"ये भी ठीक है लेकिन छत्त पर नहीं बैठते. पिछले घर चलेंगे, एक लगा हुआ है उधर और बीवी बचो से ये सब दूर हे रहे तोह बढ़िया. लौट आएंगे 11 तक, अभी 7 भी नहीं बजे.", राजकुमार जी हाँ कहते हुए निकल गए रात का विशिष्ट सामान लेने. घर में सबसे मिलने के बाद ये दोनों चाय पी कर नहाने लगे और उधर ऋतू अपनी माँ के कमरे में उनकी न सुनती हुई अपनी नानी से लिपटी हुई थी. कपडे बदल कर अब अपने आरामदायक वस्त्रो में kaapi-kitab और चश्मे के साथ.

"देख रही हो नानी माँ को आप? इन्हे न आजकल बस कोमल दीदी और रुपाली हे भली लगती है, मुझे तोह बांध के रखती है किताबो से और रात को 12 बजे सोने मिलेगा फिर 4 बजे उठा भी देंगी. आज छुट्टी ली थी मैंने लेकिन अब फिर से किताबे पकड़ा दी.", अलका और रुपाली अभी अभी गयी थी इधर से और कमरे में अब बस ये 3 पीढ़िया हे थी जो जितनी umar-daraaj हुई उतनी हे बेहतर. बेशक सुनंदा जी और ऋतू के बीच वाली रेखा रुपी कड़ी असाधारण खूबसूरत थी लेकिन उनका अंश और खुद उन्हें जनम देने वाली, दोनों भी कमतर नहीं थी, शरीर रेखा से कुछ हल्का जरूर था. अब अपनी बेटी की नौटंकी देखते हुए रेखा जी ने हे उसकी किताबे उठा कर बिस्टेर के सिरहाने रख दी. जिस पर ऋतू अपनी नानी को आँख मारने के बाद माँ से गले लग गयी.

"तू कब बड़ी होगी ये मेरी समझ से तोह बहार है ऋतू और आज तेरी नानी है यहाँ इसलिए मैं ये ढील दे रही हु. माँ सुबह आप भी इसका बचाव नहीं करेंगी. पहले हे सुबह की पढ़ाई इसने अपने भाई से मिलने के लिए गँवा दी.", रेखा जी उठ कर खुद हे कमरे थोड़ा ठीक करने लगी थी. अलका उनकी चाय दे कर गयी थी जो उन्होंने एक कप अपनी माँ को और दूसरा खुद लेते हुए कुर्सी पर बैठना हे बेहतर समझा. ऋतू की कॉफ़ी अभी वो लोग बना रही थी रसोई में.

"तोह अर्जुन क्या कर रहा है उधर? सुना है दंगल जीता आज उसने और गाँव में कुछ काम करवा रहा है. छुट्टियों में भी भाग लिया घर से वो, मेरे पास नहीं आया."

"ओह नानी वो तोह आपकी हे बात कर रहा था और आपने तोह नहीं बताया की वो आपको भी फ़ोन करता रहता है. देख लो माँ, ये नानी नाती हमे नहीं बताते कुछ भी."

"क्या कह रहा था वो? बात एक हे बार हुई थी वो भी 4 दिन पहले लेकिन घर में पता लगा की फ़ोन अर्जुन का है तोह भीड़ जमा कर दी उस स्वाति की बची ने. हालचाल से अलग कुछ बात न हो सकीय मेरी. फिर कल उसका फ़ोन आया तोह मैं घर थी हे नहीं, अनीता बता रही थी की मुझसे बात करने के लिए फ़ोन आया था. रात में मिलाया तोह जनाब बहार. पता नहीं क्या chor-sipahi चल रहा है. रेखा, तुझसे तोह बात करता है न?"

"माँ ने हे नहीं की ारु से बात 2 दिन हो गए. आज भी सुबह उसने फ़ोन मिलाया था लेकिन कल जैसा बहाना आज भी बना दिया माँ ने जैसा उसने बताया. वैसे नानी अगर मैं आपसे कुछ पुछु तोह आप बताएंगी मुझे?", ऋतू ने जिस अंदाज में ये कहा था और दरवाजे पर दस्तक होते हे उसने आरती से कॉफ़ी का गिलास लेने के बाद थोड़ी देर में मिलने का बोलते हुए दरवाजे की चिटकनी हे चढ़ा दी जो रेखा जी बड़े ध्यान से देख रही थी.

"मेरी बची तू कबसे इजाजत लेने लगी? अर्जुन से जुड़ा हुआ है कुछ?", सुनंदा जी ने साड़ी का पल्लू थोड़ा ढीला करने के बाद ऋतू को अपने हे करीब ले लिया. रेखा जी वाइज हे shaant-bhav से वो दृश्य देखती रही और कॉपी पर कलम चलने लगी, कमाल की पकड़ थी उनकी जो वो बिना देखे हे एकसार लिख रही थी.

"वो इतना सीरियस तोह नहीं था लेकिन पूछ रहा था के नानी अपने परिवार में अकेली हे थी क्या जो उन्होंने वसीयत माँ के नाम कर दी? वैसे माँ, आपने अपनी नानी को देखा है मतलब नानी की मम्मी को?", ऋतू के इस सवाल पर सुनंदा जी तोह बड़ी खुश हुई लेकिन रेखा जी लगातार अपनी बेटी को हे पढ़ रही थी. कागज़ पर अब डब्बे बने थे जैसे कोई वंशावली हो और रेखा का दिमाग जैसे स्वयं अर्जुन की क्षमता से भी बहार था और यहाँ वो अलग हे सूत्र लगा रहा थी.

"अब मैंने अपनी नानी को कैसे नहीं देखा होगा? और नाना जी अकेले नहीं थे, उनके भाई मतलब छोटे नाना जी तोह आखिरी समय प्रदेश सरकार के सचिव थे. नानी बहोत ज्यादा खूबसूरत थी, महिमा नाम था उनका और माँ बिलकुल उनके जैसी नहीं दिखती. अब वसीयत इसलिए मेरे नाम हो गयी क्योंकि छोटे नाना पिशोरीलाल जी के साथ उनके बेटे यानि मेरे मां अनंत कुमार जी ने अपना वंश आगे नहीं बढ़ाया. मां तोह अभी भी है लेकिन वो राजनीति से विमुक्त हो कर एकनाटवास में चले गए. क्यों माँ, सही बता रही हु न मैं?", रेखा जी अब उन चौकोर खानो में कुछ न कुछ लिखने लगी थी और 2-3 जगह प्रश्नचिन्ह लगा था.

"हाँ बेटी, मेरी माँ महिमा देवी बड़ी खूबसूरत महिला थी और पिता जी का तोह पंजाब राजनीति में भी बड़ा दखल था. मैं एकलौती थी लेकिन तुम्हारे या तुम्हारी माँ जितनी pooch-taach नहीं करती थी. हाहाहा.. मजाक कर रही थी बिटिया और मैं सचमुच किसी राजकुमारी से काम नहीं थी. पिता जी, बड़े जाने माने ज़मींदार और सियासतदां थे जिनके व्यापार और बाहरी जीवन के बारे में मेरी ज्यादा दखल नहीं थी लेकिन महल जैसे घर में हम पर कोई rok-tok नहीं थी. हर साल गर्मियों में हम सपरिवार हमारे हिमाचल वाले घर जाते थे, कभी देखने चलना और उस वक़्त वो भी पंजाब हे था. पिता जी हमे समझते थे और मुझे राजनीती या udhyog-gharane ख़ास पसंद नहीं थी बस परिवार ाचा हो और पति जो हमे समकक्ष समझे. उस समय के मुताबिक तोह हमारी शादी prem-vivaah जैसी हे हुई. Dur-daraaj के रिश्तेदार तोह नाखुश थे क्योंकि मैं एकलौती थी और उनके पास मेरी शादी के लिए बेहतर और बड़े रिश्ते थे. तुम्हारे नाना उनके हर अनुमान से 100 गुना बेहतर इंसान और उतने हे सच्चे व्यक्ति. जमीन जायदाद तोह इधर भी तुमने देखि है जो बांटने के बावजूद सँभालने के लिए 2 दर्जन लोगो को देखनी पड़ती है. हमारी माँ को बेहतर परिवार मिला और पति तोह ठीक वैसे हे हमे भी और मैं रेखा के लिए भी खुश हु क्योंकि कौशल्या बहिन जैसी माँ इसके पास है और तेरे जैसी प्यारी गुड़िया जो इसको चैन नहीं लेने देती. इस बार ननिहाल आओगी तोह दिखाउंगी तुम्हे मैं मेरी माँ, दादी और नानी तक की तस्वीरें. ज्यादातर तोह मेरे पीहर या उन हवेलियों में हे है लेकिन कुछ मेरे पास भी है. वैसा दिल करे तोह अपनी माँ को मिली वसीयत भी देख आना, हमने तोह खुद ठीक से नहीं देखि.", सुनंदा जी का वो खुश होना इस कमरे को कही ज्यादा हे ऊर्जावान बना रहा था और ऋतू हामी भरने के बाद कॉफ़ी का कप खली करके माँ की और बढाती ये अगला सवाल कर गयी.

"मतलब आपने अपनी दादी और नानी तक की तस्वीरें संभाली हुई है? वाह नानी जी ये तोह विंटेज जैसा हो गया. आप 66 की और उस टाइम को देखा जाए तोह आपकी मम्मी हुई 80 प्लस और उनकी मम्मी तोह 100+. तब कैमरा थोड़ी न होते थे.", ऋतू क्या खेल रही थी इसका अनुमान उसकी सोच से आगे रेखा जी लगा चुकी थी थोड़ा बहोत और अब उस कागज़ पर कुछ और डिब्बे बन्न चुके थे. लेकिन उनकी भोली माता जी तोह अपनी नातिन के साथ भूली बिसरि यादें साँझा करती हुई गदगद हो रही थी.

"इतने गरीब घर से तोह नहीं थे बीटा हमारे पूर्वज. कैमरा.. जानती हो हमारे पैदा होने से पहले से वो ख़ास कैमरा था घर में जिसको सिर्फ हमारे पिता जी चलना जानते थे और उसमे तस्वीर लेने के लिए बहोत देर तक बैठना पड़ता था बिना हिले डुले. हाँ बेहतर लगता था बड़े चित्र चित्रकारों से बनवाना जो तस्वीर से कही अधिक टिकाऊ रहते और ऊँची दीवारों पर जांचते भी थे. हमारी दादी तोह कुछ खड़ूस थी जैसे देवकी बहिन, टोकाटाकी बहोत करती थी पर दादा जी नहीं सुनते थे उनके और मेरे लिए तोह बिलकुल भी नहीं. हमारी नानी.. उनका शायद हे सही वर्णन कर सके हम क्योंकि वो वक़्त से आगे थी और हमारी माँ से तोह बिलकुल हे अलग. हमारी उनके साथ यादें उतनी साफ़ तोह नहीं है लेकिन उनकी एक पेंटिंग हमारे ननिहाल में हमने देखि थी जिसमे वो विदेशी सहेली के साथ टेनिस खेल रही थी. हमारी माँ उनकी एकलौती संतान थी और फिर जब हम कोई 10 बरस के थे, देश आजाद होने में बहोत समय बाकी था की वो हिमाचल वाली आधी संपत्ति पंजाब के किसी मित्र राजा को बेच कर इंग्लैंड जा बसी. आजादी से पहले हे वो भगवान् के पास जा चुकी थी. हमारे नाना के बारे में हमे कुछ याद नहीं बस उनकी कोई तस्वीर या चित्र देखा होगा लेकिन चेहरा याद नहीं बेटी.", इधर रेखा जी ने एक और डिब्बा बना कर उसमे प्रश्नचिन्ह लगा दिया था. ऋतू का चेहरा खुश था लेकिन वो भीतर से संतुष्ट न दिखी.

"वाओ. मतलब आपकी नानी तोह उस टाइम पर मॉडर्न थी जब ब्रिटिश राज करते थे और हिंदुस्तानी औरते घूंगट के बिना तोह चूल्हे तक नहीं जाती थी कमरे से. उनका परिवार सीधा राजा जैसे बड़े लोगो से सम्बन्ध राखत था. लेकिन आधी संपत्ति बेचीं मतलब बाकी आधी नानी?", अब सुनंदा जी ने थोड़ा अपनी बेटी की तरफ देखा और फिर ऋतू के मासूम चेहरे को जिसका सवाल भोलेपन सा लगा उन्हें.

"तिलोतम्मा.. यही नाम था उनसे बड़ी वाली नानी का जो बाकी संपत्ति की मालकिन थी लेकिन वो 14-15 की उम्र में चल बसी थी जितना हमे बताया गया क्योंकि नाम के सिवा उनके बारे में हमे कुछ नहीं पता. हमे क्या हमारी माँ को भी नहीं पता था उनके बारे में तोह क्योंकि जब माँ पैदा हुई तब बड़ी नानी को गुजरे हुए भी 7 बरस हो चुके थे. ाचा याद दिलवाया तुमने ऋतू बिटिया. हमारी बड़ी नानी की संपत्ति का तोह हमारे पिता जी तक को नहीं पता था लेकिन नानी ने हिमाचल वाला एक पुश्तैनी घर धरोहर स्वरुप माँ को और उनसे हमे मिला था. वो आज भी वैसा हे है और हमे लगता है की एक बार तुम्हे वो जरूर देखना चाहिए. हम खुद भी देखना चाहते है क्योंकि उस तरफ जाना हे नहीं हुआ शादी के बाद सिर्फ एक बार गए थे जब कागज बनवाये गए. उस धरोहर को आज भी saaf-suthra और सही निगरानी में रखा गया है तोह ज्यादा जेहमत नहीं करनी पड़ेगी. तुम्हारी दादी वापिस आती है तोह मैं उनसे बात करुँगी. तुम और रेखा मेरे साथ चलना, हम बह देखना चाहते है हमारी पिछली और अगली 2-2 पीढ़ियों के दरमियान खुदको.", ऋतू इस बात पर उनके गले लग गयी थी लेकिन रेखा जी ने रंग में थोड़ा सा भांग दाल हे दिया.

"इसके इम्तिहान से पहले तोह माँ जी भी नहीं जाने देंगी और मेरा जाना जरुरी नहीं माँ."

"दादी तोह खुद बोल रही थी की मैं माँ के साथ कही घूमने चली जाओ. तैयारी तोह वह रह कर और भी ाची होगी न नानी जब प्रकृति के बीच किसी खूबसूरत और शांत कॉटेज में रहेंगे? आप बोलो नाना जी को या मैं हे कह देती हु और माँ खुद अपनी धरोहर देखने जा रही है. उनका हक़ मैं दिलवा कर रहूंगी, हां नहीं तोह. कल हे चलते है मेरी मानो तोह."

"तेरी कोई नहीं मान रहा हक़ की बची. आज पूरा दिन तूने अपने नालायक भाई की वजह से खराब कर दिया और अब तुझे कल उतनी दूर जाना है जिस से एक और दिन खराब हो? कोई कही नहीं जा रहा और मैं खाने का देखने जा रही हु. 8 बज गए है, माँ आप भी अंदर स्टोर या बाथरूम से कपडे बदल लो. ये आपकी लाड़ली 10 बजे अपने कमरे में चली जायेगी."

"आप जाओ चची के कमरे में माँ. मैं तोह यही नानी के पास सोने वाली हु और देखो सुबह होते हे पहले दादी को फ़ोन जाएगा और फिर नाना जी को. दादी संडे वापिस आ रही है मतलब हम लोग मंडे जायेंगे और फिर फ्राइडे से पहले नहीं वापिस आने वाले. पढ़ाई में कमी हुई तोह फिर जो सजा दे मुझे मंजूर लेकिन नानी का सपना मैं पूरा करके रहूंगी. नानी आप थोड़ा सा भी मेरी तरफदारी नहीं करती अपनी बेटी के मामले में. ारु होता तोह आप एक मिनट नहीं लगाती, लड़की हु न मैं.?", अब तोह सुनंदा जी भी समझ गयी थी इस तेज खोपड़ी को. और वो उसके गाल को खींचते हुए हंस रही रही.

"तू लड़की है न इसलिए ज़िद्दी है और वो उल्लू है जो हर बात मान लेता है. मंडे मतलब पक्का मंडे. ये भी कुछ नहीं बोलेगी और तेरे पापा भी. अपनी बाकी बहनो से भी पूछ लेना जो साथ जाना चाहे. अलका और आरती जरूर चलना चाहेंगी, रुपाली का कुछ नहीं कह सकती और Komal-Priyanka नहीं जाने वाली जितना मैं उन्हें समझती हु. रेखा तू बैठ बेटी, मैं हे थोड़ा कृष्णा और ललिता संग रसोई देख लेती हु. तेरा बिस्टेर लग जाएगा इस कमरे में हे और मैं मेरी इस नटखट डॉक्टरनी के साथ हे रहूंगी आज.", रेखा के मन करने के बावजूद सुनंदा जी उन्हें वही बैठा कर खुद बहार चली गयी. अब ऋतू और उसकी माँ दोनों अकेले में एक दूसरे को देख रही थी और अपनी माँ के मूक सवाल पर ऋतू को आखिर जवाब देना हे पड़ा.

"ारु ने कहा की उसने आपको देखा वह महल में और फिर मुझे भी एक प्रतिमा दिखाई माँ जो 65-70 बरस जितनी पुराणी होगी जैसा वो कह रहा था लेकिन बिना ज्यादा बारीकियां बनाये हुए भी वो मार्बल स्टेचू ठीक आपके जैसा हे था. मुझे ज्यादा नहीं पता वो क्या ढून्ढ रहा है लेकिन एक बात तोह साफ़ हो गयी न की जिन्हे वो ढून्ढ रहा है वो नानी की हिस्ट्री से नहीं है. माँ उसके कहने पर बेशक मैंने ये सब पुछा लेकिन मैं नानी और आपके साथ अलग से वक़्त बिताना चाहती हु. आप इस घर से बहार होती हो न तोह आपकी ख़ूबसूरती कही ज्यादा बढ़ जाती है. थोड़ा सा टाइम नहीं निकाल सकती मेरे साथ?", ऋतू बात करती करती अपने माँ के करीब आ कर उनके गले हे लग गयी जबकि रेखा ने वो कॉपी बंद कर दी थी उसको एक हाथ से अपने आगोश में लेते हुए.

"जैसा तुम्हे ठीक लगे वैसा हे करते है. मुझे भी लगता है की, 'मदर एंड डॉटर डेसेर्वे सम क्वालिटी टाइम टुगेदर, अवे फ्रॉम थिस हसल एंड बोस्टल. बूत ी ऍम सूरे योर क़ुएस्तिओन्स विल इनक्रीस वन्स वे रीच तेरे. िफ़ अर्जुन इस आफ्टर समथिंग एंड क्नोविन्ग्लिय हे प्लांटेड यू ात हिज प्लेस, हे इस आलरेडी सूरे अबाउट तहत तेर्रिब्ले रेसेम्ब्लेंस. हे इस जस्ट अड्डिंग सम मोरे विटनेसेस तो हिज रिसर्च बिफोर मेकिंग थे फाइनल डेंट. एंड ी ऍम क्यूरियस तू.", रेखा जी द्वारा ऋतू को अंग्रेजी में अर्जुन का खेल समझाना हे उनकी दूरदृष्टि का एक छोटा सा नमूना भर था. वो जान गयी थी की अर्जुन ने खुद आगे न आ कर ऋतू को हे इसमें सामने कर दिया है और ऋतू ठीक उसके जैसी हे थी खोजबीन में, लेकिन ज्यादा दक्ष जब बात छोटी छोटी कड़ियाँ जोड़ने की हो.

"आप न सचमुच मुझे हर बार हैरान कर देती हो माँ. एंड ी फील बाद फॉर माइसेल्फ अलोंग विथ यू. यू अरे सिम्पली मोस्ट स्किल्ड एंड परफेक्ट आब्जर्वर, ी एवर चामे अक्रॉस. तोह ारु आपसे सवाल करता इसलिए आप उस से बात नहीं कर रही हो? और क्या जैसा वो सोच रहा है ऐसा हो सकता है?"

"मैं बात करती हु उस से लेकिन तब जब वो परेशां हो. और वो बात तब करना चाहता है जब मैं परेशां हो जो की तुम मुझे करती रहती हो. वैसे क्या सचमुच जो तुमने देखा वो मुझ जैसा था ऋतू? और क्या नाम था उनका?", ऋतू ने पहले तोह शरारत से उनका गाल हे हलके से काट लिया जैसा वो बचपन में करती थी और उसके बाद वो अपनी माँ की हे गॉड में आराम से बैठ गयी उनके जख्मी हाथ को अपने हाथ में लेते हुए.

"वो कौन थी इसमें तोह खुद ारु उलझा हुआ है माँ क्योंकि वो 2 औरतो की बात कर रहा था. जो पेंटिंग उसने देखि उसके बारे में रानी माँ तक ने यही कहा के वो देवी थी और इस से ज्यादा किसी को कुछ नहीं पता लेकिन उस पेंटिंग में आपके चेहरे के साथ ारु ने जो अलग समानता देखि वो ये थी. आपके गले से निचे ये टिल जैसा मेरे और ारु के भी है. मेरा थोड़ा ज्यादा राइट साइड है लेकिन आपका और ारु का तोह सेण्टर में है. नानी थोड़ी आपके जैसी लगती है जैसा पॉसिबल है पर इतना भी नहीं मिलते. मेरा मतलब हेयर अलग है आप दोनों के और वो थोड़ी मेरे जैसी है, दुबली. और जो स्टेचू मैंने देखि उसके चेहरे के फितूर तोह ज्यादा स्पष्ट नहीं थी कार्विंग मतलब .."

"मैं समझती हु कार्विंग का मतलब डॉक्टर साहिबा, नक्काशी या उत्कीर्णन."

"व्हाट उत्कीर्णन? ाचा छोड़ो इसको हाँ.. वो जो लेडी थी न आप थोड़ा उनके जैसी हे हो फिगर से या वहां होगा लेकिन लगा के आपके ऊपर हे वाइट पेंट कर दिया जाए तोह शामे लगोगी. उनका नाम अनुराधा बताया था अर्जुन ने जो हमारे दादा जी की दादी थी लेकिन उन्हें खुद दादा जी के पापा ने भी ज्यादा नहीं देखा था क्योंकि जब वो 3-4 बरस के थे तभी उनकी माँ का देहांत हो गया था. फिर उन्होंने हे अपनी याद और कुछ पेंटिंग्स की मदद से वो मूरत बनवाई लेकिन अर्जुन के हाथ वो पेंटिंग्स भी नहीं लगी. वो यही सब उल्टा सीधा काम करने गया है क्या उधर माँ? और वो प्रिंसेस अमृता, बहोत पूछताछ कर रही थी. ारु को बोल देना के दूर रहे उस से. ये raja-rani जितने समाज में शोखी मारते है इनके घर उतने हे ज्यादा ठन्डे.. सॉरी.. मेरा मतलब वो ाची है लेकिन ारु दूर रहे तोह ज्यादा ाचा होगा. मैं आती हु जरा अलका से मिल कर.", जाने से पहले उसने एक बार और अपनी माँ का गाल चूमा, फिर निकल गयी. रेखा ने उस सूत्र के सबसे ऊपरी खली बक्से में लिखे तिलोतम्मा के बराबर हे वैसा हे खाना बना कर वह अनुराधा लिख दिया. इसके निचे जैसे पूरी वंशावली थी और कुछ प्रश्न.

'अर्जुन ने प्रथम प्रेम के समय कहा था मैं तिलोतम्मा हु और उसका वर्णन दिल से निकला था. और इस तिलोतम्मा को तोह मैं भी नहीं जानती, कोई वजह हे नहीं थी. ये अब किसको ढून्ढ रहा है देवी? तिलोतम्मा? अनुराधा?.. शायद इनमे से किसी को भी नहीं, उनसे जुडी किसी घटना को.', रेखा ने एक बार ाचे से उस पैन को दिमाग में बैठने के बाद नजदीक रखे रबर से साफ़ कर दिया था. लेकिन इसके बाद उसके ठीक पिछले पैन को फाड़ कर वो हलके से मुस्कुराई.. 'इनकी पेंसिल अदृश्य सन्देश पढ़ने में माहिर है.'

.

.

8 बज चुके थे जब गाँव में हवेली के बहार उमेद की कार रुकी. उनके पीछे हे स्कूटर की पिछली सीट पर सवार रामेश्वर जी भी पहुंच गए थे, चालाक स्वयं जुगराज जी थे जिनके घर पंडित जी किरपाराम, लाला हक़ीक़त जी और स. सुच्चा सिंह जी के साथ महफ़िल लगाए बैठे थे पिछले 2 घंटे से. अपनी पति को ऐसे स्कूटर से उतारते देख कौशल्या जी वही रुक गयी. जुगराज जी ने उनके चरण स्पर्श किये तोह आशीर्वाद देने के बाद उनका जरुरी तंज़ भी मिला.

"तू इसकी जान लेके रहेगा जुग्गी? तेरे पिता जी चलते थे इसको जब तू स्कूल जाता था और आज तेरे बेटे को भी देखा था मैंने इसकी सवारी करते सवेरे. और आप कहा से दिल्लगी करके पधार रहे हो प्रधान जी? घर पे बचे अकेले होंगे.", जुगराज तोह हँसता हुआ उन्हें प्रणाम करके सुबह अपने घर का न्योता देता निकल गया लेकिन पंडित जी अब पूर्णिमा जी और उमेद से भी घिर गए थे. संभव वही उतर गया था जब रानी माँ को महल छोड़ा गया.

"भगवान, घर पे बहोत लोग है. बहु, बिटिया, नर्स और 2-3 सेवक भी. पहले अंदर तोह चलो और तू गाडी बहार क्यों कड़ी करे हुए है? लगा इसको अंदर चुपचाप. सवेरे बखत से निकल लियो, कही न तेरी हवेली पर इनकम टैक्स वाले राइड मार रहे. वो पंडित जी का लगता कहा रह गया जो तुम लोगो के साथ गया था क्रिया करने?", रामेश्वर जी उमेद के हाथ से थैला लेते हुए घर में दाखिल हुए तोह सेवक ने आँगन में एक और चारपाई लगा दी. पानी से भरा कूलर ठंडी हवा दे रहा था और आँचल यही पालने में निकेतन को लिटाये उसके साथ खेल रही थी. इन लोगो के आने पर वो सबको नमस्ते करते हुए उठने लगी तोह रामेश्वर जी ने हे उसको बैठे रहने का इशारा किया. लाली हे सबके लिए पानी ले कर आयी थी जिसके परिवार को यही हवेली पर हे पिछली तरफ व्यवस्थित करवा दिया था रामेश्वर जी ने. लाली के पिता शीबू काका इनके हे खेत के चौकीदार थे और माँ शोभा अब यहाँ पक्की हो गयी थी जो आज से पहले सिर्फ घर संभालती थी सिवाए फसल कटाई के समय साल में 20 दिहाड़ी करने के.

"देवकी का बताया मुझे आँचल बिटिया ने फ़ोन पर लेकिन तब समझ न आया. बेटी तू स्कूल जाती है?", कौशल्या जी ने लाली को गिलास वापिस देने के साथ हे उसको वही सामने बैठा लिया जहा आँचल थी. उमेद हौदी पर हे मुँह हाथ धोने लगा था और पूर्णिमा जी को अनामिका भीतर वाले बाथरूम ले गयी थी.

"जी बड़ी मालकिन अब नहीं जाती लेकिन 8 तक पढ़ाई की है और उसके बाद वो मीनाक्षी दीदी है न बैंक वाले बाबू की बेटी, वो हमे 10 कक्षा तक की तैयारी करवा चुकी है. कह रही थी की मुक्त विद्यालय से इस बार वो हमारा प्रवेश करवा देंगी. मैं उनके हे घर काम करती हु क्यूंकि उनकी अम्मा जी से होता नहीं और दीदी की माँ भी दूसरे बैंक में काम पर जाती है. आप मुखिया जी की दादी है?", उसके चेहरे की चमक और भोलेपन को देख कौशल्या जी ने गाल को सहलाया जैसे उन्हें ये बची पसंद आ गयी थी.

"वो बस अर्जुन है और तुम भैया कह के बुलाना. मुखिया कोई नहीं है इधर और ये मीनाक्षी लाला जी की पौती है न जी, जिसका नामकरण आपने किया था? समझदार लड़की है उसके माँ बाप भी भले शिक्षित लोग. पैसे के लिए वह काम करती है तोह कल से मैट जाना और अगर यही prem-pyaar है जिसके साथ मीनाक्षी तुझे पद्धति भी है तोह जाना बंद मैट करना. तू कोई काम कर रही थी अभी?", रामेश्वर जी ने तोह हँसते हुए हाँ कह दिया था उस लड़की का नाम सुन्न कर लेकिन लाली अब थोड़ा सा सेहम गयी थी.

"झोपडी से बाबा सामान लाये थे न बड़ी मालकिन, मैं वही लगा रही थी. हाथ धो कर अभी बर्तन हे करने लगी थी फिर माँ ने पानी पकड़ा दिया."

"चल अब तुझे चित्रहार देखना है तोह वो देख या पढ़ना है तोह पढ़ लेकिन 8 बजे के बाद रसोई में नहीं दिखेगी. इतने ाचे सलवार कमीज पर ये आधी टेढ़ी लकीरे सामान उठाने से हे बानी है इसलिए पूछ रही थी. और बड़ी मालकिन नहीं तू दादी हे बुला लिया कर. हाथ मुँह धो के जो करना है कर लेकिन.."

"रसोई में काम नहीं करना."

"हाँ. नाम क्या है तेरा?"

"जी लाली.", उसने थोड़ा मुस्कुरा कर कहा था, भोलेपन के साथ. उँगलियाँ आपस में उलझी और नंगे पाँव नाख़ून से जमीन कुरेदती हुई.

"ये तोह वो नाम हुआ जो सबने बिगाड़ दिया. पूरा नाम बता बिटिया अपना."

"जी वैशाली साहू डॉटर ऑफ़ श्री शिवलाल साहू, विलेज क्सक्सक्सक्स, डिस्ट्रिक्ट क्सक्सक्सक्स, पंजाब. ी ऍम 18 इयर्स ओल्ड.."

"बस बस आकाशवाणी थोड़ा सांस ले ले. इतना ाचा नाम है वैशाली और बिगाड़ के लाली कर दिया. कोई लाली बोले घर से बहार तोह समझा देना के सही नाम ले. नाम इसलिए पुछा की इधर 1 बजे भी कक्षा लगती है न 4 बजे तक चलने वाली? वह तेरा नाम लिखवाना है. गर्मी की छुट्टियों के बाद जाना शुरू कर दियो. चल अब कर जो तेरा दिल करे.", खुश होती हुई लाली जाने लगी तोह थोड़ा आगे जा कर ठिठक गयी.

"बड़ी मालकिन.. सॉरी दादी जी वो पीछे जहा हमको 2 कमरे दिए है उधर एक में तोह लट्टू हे नहीं लगा हुआ. वैसे तोह मैं माँ के साथ हे सोती हु क्योंकि बाबा तोह रात खेत में रहते है लेकिन उधर अँधेरा बहोत है."

"सही कहती है ये बची कौशल्या. गलियारे के उस तरफ ये बगीचा हे नजर नहीं आता और इसका तोह कमरा भी उसके आगे है.", पूर्णिमा जी तोलिये से चेहरा और हाथ पौंछने के बाद उसको तार पर डालने के बाद आँचल के पास राखी कुर्सी पर हे बैठ गयी. स्टूल पर रखा पानी का साफ़ गिलास ले कर वो काफी देर से निर्जला रही अब प्यास शांत करने लगी.

"पता नहीं ये कैसे रहते आये है जो बिजली गलत जगह बहते रहेंगे और जहा जरुरी है वह लगवानी नहीं. आप भी खामोश बैठे हो जबकि ये बात मैं पिछली बार भी बोल के गयी थी की इधर रौशनी हो न हो लेकिन जहा पेड़ पौधे लगे है उधर जरुरी है. वो दर्जा ठीक हुआ या अभी भी फंसता है पूर्णिमा?", इस बार जवाब आँचल ने दिया.

"बड़ी नानी वो तोह अर्जुन ने हे थोक पीट के सुधार दिया था जिस दिन आया था इधर. पिछली तरफ उसने तार तोह दाल दी थी लेकिन होल्डर पुराण था जो बल्ब लगते हे चटक गया. कह तोह रहा था के आज कर देगा ठीक. उधर वाली मोटर भी चालू करवा दी लेकिन अभी चलाई नहीं है, टंकी साफ़ नहीं थी."

"ये आज का आया हुआ लड़का सब थोक पीट रहा है बताओ. चल अब मुखिया हे देखे सब काम, मुझे क्या. जा बीटा, लाइट लग जायेगी कल सवेरे और बाथरूम भी नया करवा देते है. तू मदद कर देना अर्जुन की जब वो बगीचा ठीक करे और हौदी में उतरे तोह.", लाली प्रणाम करती हुई दौड़ गयी थी जिसको उमेद ने 4 लड्डू का पैकेट पकड़ा दिया था. अब सिर्फ यही लोग रह गए थे इधर क्योंकि आँचल भी अपनी मामी की मदद के लिए चली गयी थी मुन्ने के सोते हे.

"अब बताओ जी क्या मसला है इधर और देवकी बंद क्यों कर राखी? चोट आयी तोह नर्स मैं समझ सकती हु लेकिन ये बंदूकधारी तैनात है और आपके मुखिया जी नदारद है. देवकी पर हुम्ला हुआ तोह उसको हे बंद कर दिया?", एक बार तोह रामेश्वर जी ने आँगन की तरफ देखा जहा कोई न था क्योंकि बहु, नातिन और शोभा रसोईघर में जुटी थी. नर्स भी टहलने के लिए छत पर चली गयी थी, बता कर.

"हमारे मुखिया जी तोह नहीं है कोई आपके सिवा. और जो गायब है ये सब उसका हे किया धरा है चाहे वो प्रहरी हो या ये नया सेवक परिवार इस घर की सेवा में. मैंने बात करने चाही तोह चुप करवा दिया ये कह कर की उसकी दादी हे फैंसला करेगी और वो सिर्फ तुमसे बात करेगा इस सब में. अब रिटायर्ड आदमी है इसलिए पूछ ख़तम हो गयी हमारी. क्यों उमेद बीटा गलत कहा क्या मैंने?", रामेश्वर जी का मजाक कौशल्या जी को जरा न पसंद आया और पूर्णिमा जी मुस्कुराती हुई उस चारपाई पर तकिया सही करती हुई लेट गयी. सफर की थकान भी थी और बढ़ती उम्र का असर भी.

"मेरे बेटे को तोह बीच में मत हे घसीटो अपनी पैरवी करने के लिए और अर्जुन ने फैंसला मेरे जिम्मे किया होगा लेकिन घटना की रूपरेखा तोह देंगे रिटायर्ड कोतवाल साहब?", अब रामेश्वर जी के पास कोई चारा नहीं था जब अर्जुन हे गायब हो.

"वो.. वो कह रहा था के तुम जानती हो थोड़ा बहोत देवकी के कारनामे और अब तोह बात देहलीज से बहार निकल चुकी है जिसमे हमारी दखल उसको पसंद नहीं. तुम अभी तोह धीरज रखना कौशल्या.", अब तोह कौशल्या जी का धीरज हे जवाब दे गया जो उठ कर रसोईघर में गयी और वह मौजूद तीनो से कह दिया के वो भीतर हे रहे. दरवाजा लगा कर वो अब रामेश्वर जी के सामने कुर्सी पर बैठी उन्हें घूर रही थी. सुरक्षाकर्मी खुद हे बहार चला गया था टहलने, बीड़ी पीने.

"वो.. रेखा पर देवकी ने हुम्ला करवाया था और अर्जुन को अखाड़े में तांत्रिक से मरवाने की कोशिश भी इसकी हे थी. मीणा नेत्रं की हे कोई सेज वाली थी, वही नेत्रं जो बड़ा भाई है देवकी का. जो नया ठेकेदार बना था बस्ती से, मुकंदी.. वो किसी मकसद के लिए देवकी के कहने पर किशोरियों का अपहरण करके..", इतने में हे कौशल्या जी के जबड़े भींच उठे थे और ये पहली बार था की रामेश्वर जी अपनी बीवी से नजरे चुरा रहे थे और उमेद ने अपनी चची को बगल से बाहों में लेते हुए सँभालने की कोशिश की. वो सचमुच हे कौशल्या जी का बीटा था जैसे इन्दर पूर्णिमा जी का. लेकिन गुस्से के काम होने के बावजूद उनकी आँखों के भीतर हे आंसू रुके रहे.

"मैं.. मैं ये उस वक़्त से कह रही हु जिस दिन.. इसको आपकी माँ ने मेरे पीछे grah-pravesh करवाया था. उस दिन भी पहला कदम रखने की इसकी चाहत ने साफ़ बता दिया था के 15 उम्र में ये 50 की थी, लेकिन कपटी समझदार नहीं. रेखा.. वो बेचारी इस से उलट सब जानते हुए भी इसको बचा रही थी? क्या बोलै आपका पिद्दी अब? और अब आपकी कानून की किताब में मासूम लड़कियों के अपहरण की क्या सजा है एसएसपी साहब?"

"तुम्हारी नाराजगी जायज़ है कौशल्या लेकिन तुम्हारे सामने है की हम परिवार के मसलो में पहले भी शामिल नहीं होते थे और आज भी सब तुम्हारे हाथ है. सजा के हक़दार तोह बहोत से है लेकिन वो तुम्हारे अपने है, मेरे भी लेकिन तुमने उनके लिए तोह सजा की मांग नहीं राखी. आज भी फैंसला तुम्हारे हे हाथ है, हम इस कच्चे आँगन से उस और नहीं जा रहे.", रामेश्वर जी का ऐसे कदम पीछे खींचना कौशल्या जी को और भड़का गया था जबकि अब तोह पूर्णिमा जी ने भी उनका हाथ पकड़ कर ना में सर हिला कर उन्हें रोकने की कोशिश की.

"देख पूर्णिमा तेरे से मेरा रुमाल तक न छिपा और तू जानती है मेरी औलाद गलत नहीं जिन्हे ये दोषी बता रहे है. हाथ मेरे नहीं इनके बंधे रहे और जिसको माँ की जिम्मेवारी की आड़ में दुलारते रहे न उसका हे चूल्हा जंगल जलाता रहा लेकिन दोष मेरी परवरिश का. वो लड़का भी जानता है के ये पीछे हट जायेंगे इसलिए ये उसने मेरे जिम्मे लगाया. वो समझदार है जो अपने baap-chacha की तरह गरम दिमाग नहीं. अब तक तोह वो दोनों मुंडी उतार के चौपाल पर लटका चुके होते और जिस्म इनके बाप की जीप टेल कुचला होता. हालत समझते हो आप अर्जुन की थोड़ी? उसको वही पता लग चूका था के ये काण्ड किसने किया है और उसको इधर आने का पक्का मकसद मिला. रिश्ते और उम्र का लिहाज रखते हुए उसने इसकी सेवा में लोग लगा रखे है जबकि मैं ...", अब जैसे कौशल्या जी का गाला हे सूख गया था जिन्हे 3-4 बार कोशिश करने के बाद उमेद ने एक घूँट पानी पीला हे दिया.

"हम जानते है कौशल्या की हम बेहतर व्यक्ति नहीं है, काम से काम परिवार के सदस्यों के बीच तोह नहीं. हम सजा नहीं दे सकते और यही वजह थी की हमारे पिता की अंतिम इत्छा तक उनकी चौथी पीढ़ी ने पूरी की अर्जुन के रूप में. न मैं, न तुम्हारी कोई औलाद और मेरा भाई तोह वैसे भी ढोर (खच्चर) है जिसको परिवार क्या पत्नी तक का नहीं पता. बहार मैं भी शंकर इन्दर या उमेद की तरह 50 गिरा सकता हु, इस उम्र में भी हाथ नहीं कांपने वाले लेकिन तुम सही कह रही हो की भीतर हमारे हाथ बंधे है. माँ ने तोह यही कहा था न के इसको संभल के रखना, ये सरल है. हमने बस दूर रह कर भी सिर्फ अपने भाई पर ध्यान दिया. उसकी औलादे आज तुम्हारा हे पौता थोक बजा कर सीधी कर रहा है प्यार से. वो न मुझसे ठीक हुए थे और न शंकर के गुस्से, उमेद की समझ से. पूछ लो बिनोदिये के कारनामे बगल में बैठा है ये तुम्हारा बीटा जो जानता है लेकिन ठीक करने वाला कोई बहार से नहीं आया, उसको हम सबने सींचा है कौशल्या और अर्जुन ने उस गंवार को इस लायक बनाया है की वो घर और काम सँभालने लगा है. उसकी बीवी अब हवेली की देहलीज से अंतिम छोर तक व्यवस्थित करने लगी है, जिन्होंने आज सुबह तुम्हारे बेटे को आशीर्वाद दिया था. वो देवकी को दादी बुला चूका है इसलिए सजा नहीं दे सकता, लेकिन सबूत जमा किये है उसने और जो बेक़सूर बीच में पइसस रहे थे उन्हें अलग किया. गेंहू के साथ जरा सा भी घुँण नहीं पीसने देता वो. क्या वो गलत है? और उस पर संदेह है तोह फिर तुम्हारी जूती और हमारा सर.", अब कही जा कर कौशल्या जी के दिमाग की गर्मी कुछ काम हुई लेकिन खीज तोह वो चुकी हे थी.

"वो तांत्रिक इसका सागा था क्या?"

"नहीं उसके बारे में हमारे पिता ने अर्जुन को बताया था. ये जो तुमसे लिप्त बैठा है न तुम्हारा लाल, इसके बड़े भाई ने हे उस जानवर को परलोक पंहुचा दिया और अर्जुन ने चिटा जला दी उसकी. देवकी का तोह वो है जो इधर हवेली पर आया था इसके भाई के साथ. जाने क्या लेके गया है यहाँ से पर वो मीणा अर्जुन ने अपने कब्जे में ले राखी है. 4 लड़कियां गायब करवाई थी देवकी ने मुकंदी की मदद से उस तांत्रिक के लिए जो उन्हें भी लेने आया था पर अर्जुन ने बच्चियों को उनके घर सुरक्षित भिजवा दिया. शंकर और इन्दर ने देवकी को हॉस्पिटल पहुंचने से पहले पीछा किया था उन लोगो का लेकिन जीप उतर गयी थी उनकी तालाब में और 2 को मार गिराया शंकर ने. अर्जुन संभाल रहा था सबकुछ लेकिन उसका मुख्या मकसद तोह बस उन लड़कियों को बचाना था और ek-aadh बन्दे को ज़िंदा पकड़ना. अब निकल गए हाथ से और ये खुद चोट खा कर बिस्टेर पर सोई पड़ी है.", कौशल्या जी इतना सब सुन्न कर चिंता से उमेद को देखने लगी थी जो उनके सर को सेहला रहा था.

"चची, समझो आप चाचा जी की हालत भी. वो अपनी जगह ठीक है और अर्जुन आपके, हमारे सम्मान को बचने के लिए खुद को काबू किये है. उसने अकेले इतना सब कर दिया जिसकी भनक तक नहीं लगने दी. संभव खुद कह रहा था के वो महाभारत वाला अर्जुन नहीं है, कुछ और हे प्राणी है जिसकी क्षमता सिर्फ वो स्वयं हे जानता है. आपका और माँ का दूध भी फीका है थोड़ा उसके सामने. चाचा जी जो कह रहे है मैं ठीक वैसा हे करता क्योंकि मेरी गोली औरत आदमी में फरक नहीं करती ऐसे अवसर पर, शीला काकी सबूत है और वैसा हे इन्दर और शंकर का है. बाकी आपका हे सवाल मेरा है चाचा जी से की वो बड़े दादा जी को कैसे जानता है? उन्हें गुजरे हुए तोह 35 बरस होने को आये और जहा तक याद है वो अनितम समय तोह सबसे हे विमुख हो गए थे.", उमेद की समझदारी भरी बात ने थोड़ा और मलहम लगाया था कौशल्या जी के ाहित मैं पर.

"हम अर्जुन से सवाल नहीं कर सकते इस मामले में क्योंकि उसने हमे पुख्ता सबूत दिया है की वो किस कदर हमारे पिता से जुड़ा हुआ है. ये कालपत्रे, श्रीधर या और बहोत से लोग जो तुम्हारे पैदा होने से भी पुराने है वो सब पिता जी तक सिमित थे और उन्हें ये लड़का बहार निकाल लाया. याद है न संभव ने क्या कहा था? उस हिस्से की रक्षा हे संभव के जिम्मे है जबकि अर्जुन ने असली वसीयत स्वयं हमारे पिता से हांसिल की जिसका संभव को भी कुछ पता नहीं बस अर्जुन उसके लिए एक जिम्मेवारी है हमारे पिता जी द्वारा निर्धारित. उन्होंने हे कहा था की भविष्य से उनका हे कोई आएगा जो हर पहेली हल करेगा, हमसे भी ज्यादा सक्षम. फिलहाल तोह वो तुम्हे धर्मसंकट में दाल गया है कौशल्या जी, हम तोह दायरे से तब भी बहार थे और आज भी.", रामेश्वर जी ने जितना जाना था वो बता दिया था और अब सचमुच कौशल्या जी कुछ दुविधा में थी.

"हैं कहा आपका ये नया मुखिया? अब देवकी के बारे में फैंसला लेने से पहले मुझे उसकी 2 बेटियों और बेटे के बारे में सोचने के साथ गाँव का भी ख़याल रखना होगा. कई बार लगता है की ये उमेद और शंकर वाला हिसाब सबसे बढ़िया है लेकिन अर्जुन सबको जीवन के लायक समझता है, एक आड़ अपवाद छोड़ कर. और क्या कुकर्म है हवेली की छोटी बहु के कोतवाल साहब?"

"फिलहाल तोह वो मंजे वाले के घर दावत पर शामिल होगा, कबड्डी कप जीता है आज 3 बरस बाद गाँव की टीम ने. मेजर का पौता उसके साथ हे जाता दिखा था मुझे मोटरसाइकिल पर जहा अर्जुन बता कर गया था के 10 बज जायेंगे उसको. और कुकर्मो का तोह ऐसा है की जितनी परत खोलते जाओ उतने गहरे और पुराने मिलते जाएंगे. 4 बच्चियों का अपहरण और उन्हें बंदी रखना, raj-mehal से वंचित अपराधी कल्पतरु का साथ देना, हमारी बहु और पौटे पर जानलेवा हुम्ला. 363-307 हे बहोत है 10 साल भीतर रखने के लिए लेकिन उस से पहले raaj-darbar की सजा और उस से भी पहले तुम्हारी. बाकी इस बीच लोग भी मारे गए है तोह बहोत सी धराये बैठ सकती है. अर्जुन तुम्हे ज्यादा खुल कर बता देगा क्योंकि उसने सुबह तुम्हारे साथ हे होना है. फ़िलहाल जरा अपने बेटे और बहिन की तरफ भी देखो. उधर किवाड़ लगाए हुए हो जहा भीतर गर्मी से उनका बुरा हाल हो रहा होगा. नाहा ले उमेद अगर दिल है तोह, सामने हे मोटर लगी है.", कौशल्या जी शांत होती हुई रसोईघर में हे चली गयी थी और रामेश्वर जी थोड़ी बहोत जानकारी रघुवीर जी की क्रिया की लेने लगे.

.

.
 
जसलीन हिम्मत वाली निकली थी जिसने dard-niwarak गोली न खा कर दर्द सहना बेहतर समझा था. कुछ घरेलु उपाए करने में स्वयं सुखजीत ने उसकी मदद की थी जब दीपा भाभी गुरुघर गयी सुबह. अपने घर भी उसका नस खींचने का बहाना काम कर गया था और सारा दिन वातानुकूलित कमरे में आराम करने के साथ योनि का ख़याल रखने में बिताया गया. ाची बात थी की दीपा भाभी ने तोह सवाल तक न किया था उस से और फिर शाम को अर्जुन के साथ थोड़ी हलकी फुलकी मस्ती मजाक, जब जग्गी तैयार होने गया था. दिल उसका भी था रेनम के घर जाने का पर खुद को समझा लिया था जसलीन ने थोड़ा और आराम करने के लिए. स्वर्गीय मेजर साहब का घर जितना शांत था उतना हे विप्र्ति नजारा था उस बड़े आँगन वाले खुले डुले घर का जिसका परिचय 'मंजे ाले दी कोठी' के नाम से दिया जाता था. एक तरफ युवा वर्ग अपनी बातों में लगा था और पिछले हिस्से में 5-6 लोग मदिरा महफ़िल जमाये बैठे थे, जिनकी सेवा में खेत का हे एक मुलाजिम लगा था. गाँव के माहौल और अपनी दिनचर्या के मुताबिक खाना भी जल्दी लगवाया गया था लेकिन जग्गी ने पहले हे कह दिया था के वो लोग सबसे बाद में खाएंगे. मुर्गे बकरे की दावत में अर्जुन बस नाम के लिए हे शामिल था जो निहाल के साथ hum-umar और बड़ो को खाना परोसने में जुट गया.

"पुत्तर जी, तुम्हारे वास्ते दीपा ने पनीर और पकोड़े वाली कढ़ी बनाई है. ये भी शाकाहारी है और जग्गी का परिवार भी. वैसे तुम्हे ये सब करने की जरुरत नहीं है.", निहाल की माता जी ने अर्जुन को बातों बातों में टोकना चाहा जो निहाल के पिता जी वाली तरफ खाना खिलने में लगा था. निहाल अपने दोस्तों और खेल मंडली की सेवा में जूता था जिसके साथ जग्गी भी हँसता बोलता हुआ घूम रहा था. ज्यादातर वो शहीद भाई से किसी न किसी मुद्दे पर बात कर रहा था और बीच बीच में अर्जुन को भी देख लेता.

"आंटी जी, मैं तोह मेहमान हु नहीं और उधर अंकल जी वाली तरफ मेरा जाना हे सही है. वैसे भी रोटी का समय तोह मेरा 9 बजे तक हे रहता है और आप 4 लोग इतने लोगो का खाना इस गर्मी में बना रही है तोह मैं और निहाल तोह कुछ भी नहीं कर रहे.", अर्जुन ने बात के दौरान हे दीपा भाभी को नजरो से शुक्रिया कह दिया था शाकाहारी भोजन के लिए. हाँ जग्गी भी ऐसा हे भोजन करता है ये उसको आज हे पता चला था. इस बीच खाने की प्लेट लगाती रेनम का चेहरा बुरी तरह पसीना में भीगा देख अर्जुन ने थालियां उठाने से पहले तार पर टेंगा वो छोटा टोलिया उसकी तरफ बढ़ा दिया. दुपट्टा एक कंधे से तिरछा कमर की तरफ बंधा था सीने को छुपता हुआ. झुक कर अर्जुन ने 2 थालियां उठाई तोह रेनम चेहरा साफ़ करने से पहले बड़े हे आकर्षक अंदाज में उसको निहारती लगी. अर्जुन चला गया था और चेहरा साफ़ करती रेनम को दीपा भाभी से पहले उसकी माता जी ने हे टोका.

"वेख ले समझदारी मूंदे दी. तू ओस दिन की कह रही स इस दे बारे और अज्ज यह मुंडा तेरा पसीना वि नई झल्ल सकया. बीटा जी, मानस दे विचार जाने बगैर ोस्डे लायी राये नहीं बनौनि चाहिदी. मेहमान दे तौर ते बुलाया स पर बेटे वांग लगेया होया. दीपा, सब्जी की कड़ाई उतार दे और बस रोटी सकती जा. एक बार में हे 20 बैठे है.", तंदूर पर शहीद भाई की बेगम लगी थी लेकिन अकेले उनसे भी नहीं हो रहा था. निहाल रोटियां लेने आया तोह इन्तजार करना पड़ा और वैसा हे हाल अर्जुन का था.

"जग्गी भैया, आप आओ मेरे साथ इधर. और भाभी आप इस टेबल पर बैठ के बस पड़े टॉड के देती जाओ.", रोटी पहुंचने वाली परात जग्गी को देते हुए अर्जुन ने कमीज उतार कर एक तरफ टांग दी थी और हाथ धो कर वो लग गया आते के पड़े भीगे हाथो से फ़ैलाने. शहीद भाई की बेगम तोह पहले देखती रही और फिर थोड़े जोश से उन्होंने भी गोल पड़े अर्जुन की तरफ बढ़ने शुरू कर दिए.

"ऐ है मुंडा दिल्ली धाबी वाला भाभी. हाँ वि अर्जुन, तू तोह यार आज शहीद भाई की मार पढ़वाने वाला है.", जग्गी मजे लेने लगा था अब अपनी भाभी के साथ और शहीद हँसता हुआ इनके पास आ गया सलाख उठा कर. अर्जुन अब जितनी तेजी से रोटियां तंदूर में लगा रहा था शहीद भाई वैसे हे पाकी हुई रोटियां बहन निकलने लगे जिन पर जग्गी माखन लगता हुआ निहाल के साथ सबको पहुंचने लगा. 2 महिलाये और एक युवती तोह बस देखती हे रह गयी इन्हे. अगले आधे घंटे में तोह रोटियां जमा होने लगी थी परात में. रेनम हे उठ कर इधर चली आयी और अर्जुन को बनियान समेत पसीने में भीगा देख वही टोलिया उसकी और बढ़ा दिया.

"साफ़ कर लिया जाए पंडित जी. पता नहीं स तुस्सी तन्दूरिये वि रह चुके हो.", उसके मजाक से जहा शहीद भाई थोड़ा हैरान हुए वही जग्गी की हंसी हे न रुकी. अर्जुन भी अब हाथ धोने के बाद हँसता हुआ चेहरे का पसीना पचने लगा था.

"रेनम, बताया था न मैंने की इसका और शहीद भाई का ढाबा था. मतलब ढाबा मेरा था और ये दोनों वह तंदूर सँभालते थे. चाचा जी से पेमेंट लेके जाऊंगा अपने बन्दों की. हाहाहा.."

"हाँ पुत्तर जी, पेमेंट वि मिलेगी पहले जरा खुदको तोह देख जो खड़ा खड़ा हे किलो ककड़ी जातक गया. वे शहीद, हाथ मुँह धो ले पट. कुड़ी ने वि तेरे नाल खाना है. बचे तह टीवी देखदे हे सो चले कमरे विच.", रोटियों को गरम रखने वाले डब्बे में सही से बंद करती हुई निहाल की माता जी ने अब सेवक से साफ़ धूलि प्लेट मंगवाने के बाद इन सभी का खाना परोसना शुरू कर दिया था. लोग खा पी कर जा चुके थे और अब बचे थे तोह बस यही सब. कूलर के सामने हे आँगन में 7-8 लोगो की प्लेट लगवा कर ये सभी बैठ गए थे और यहाँ भी निहाल, शहीद, जग्गी और अर्जुन के बाद गोल घेरे में रेनम आ बैठी. सामने दीपा भाभी, शहीद भाई की बीवी और निहाल की माता जी थे जो हंसी मजाक में इन युवा लोगो से कही भी 19 न थी.

"बेबे, अर्जुन मुर्गा नहीं खता फेर भी तगड़ा है और जग्गी भैया भी देखो.", निहाल की बात का जवाब जग्गी ने हे दिया था जबकि अर्जुन तोह इतने दिन बाद मिली पकोड़े वाली कढ़ी और तंदूरी रोटियों में हे लगा रहा. रेनम ने जरूर 2 चम्मच घी ऊपर से उसकी सब्जी में डाला था जो दीपा भाभी की नजरो से न बचा.

"नीले, खाना अपनी पसंद का होना चाहिए. अब तू यार म्हणत करता है और खुराक इतनी यहाँ उपलब्ध नहीं इसलिए तेरे लिए यही ठीक है. काम तोह दीपा भाभी भी सबसे ज्यादा करती है जिनके पास रेनम या जसलीन, जीती जैसा साथ देने वाला कोई नहीं. खली होती है 2 घडी तोह खुद हे चारा काट देती है जबकि खाली मैंने इन्हे देखा नहीं जबसे होश संभाला है. इनकी खुराक तोह मेरे और अर्जुन से भी कही काम है. बस इंसान खुश रहे न तोह वो 2 सूखी रोटी खा के भी चमकता रहता है. शहीद भाई non-veg खाते है लेकिन तुमने देखा इनके दोनों बेटे दूध और माखन ज्यादा पसंद करते है. और जो पसंद हो वही खाओ. गलत कहा क्या अर्जुन टंडोरिये जी?", इस बार फिर से सबकी हंसी निकल गयी थी और सामने से निहाल की माता जी ने हे जग्गी के पत् पर थप्पड़ जड़ दिया.

"कुछ वि बोलता रहता है. सच में तुम बचो ने तोह थोड़ी हे देर में समस्या निबटा दी. और ये ाची बात कही जग्गी पुत्तर की इंसान खुश रहे और पसंद का खाये तोह उस से बढ़िया कुछ नहीं, म्हणत करता रहे बस. वैसे तेरे पापा और चाचा को मेरे हाथ का मटन बहोत पसंद है अर्जुन बीटा. इस बार उनका रुकना नहीं हुआ लेकिन रुकते तोह वो पीछे वाली महफ़िल रात 11 से पहले न ख़तम होने वाली थी. हाँ फिर वो पीछे नहीं बैठते, ऊपर चौबारा उन्हें पसंद है. चल शहीद तू निवाला टॉड नहीं तोह तेरी सफीना ने ऐसे हे बैठे रहना है.", अब तोह शहीद भाभी की बेगम सिमटने लगी थी जिसको देख भाई हंसने लगे और अर्जुन ने अपनी बात कह दी.

"आंटी जी, सफीना भाभी यहाँ शर्मा रही है लेकिन आप न होती तोह फिर ये ईख उठा लेती अगर भैया रोटी खाने में आनाकानी करते. कुछ भी कहो प्यार हो तोह फिर ऐसा हे हो.", अब शाहिद भाई की सिट्टीपिट्टी गम हो गयी थी क्योंकि उनकी बेगम शर्माने की जगह हैरत से अर्जुन को देखती हुई सवालियां आँखें अपने शौहर पर टिका चुकी थी. बाकी किसी के तोह समझ न आया लेकिन वो प्यार वाली बात पर खुश हुए तोह अर्जुन ने ख़ामोशी से कान पकड़ कर भाभी से गुहार लगाईं की वो खाना शुरू करे.

"जानते हो बीटा, सफीना और शहीद की जोड़ी सबके लिए उदहारण है. अमीना बहिन शहीद से ज्यादा अपनी इस प्यारी बिटिया से ज्यादा लाड रखती थी जिसने उन्हें कभी फिर से खेत न जाने दिया. और शहीद ने अपनी बीवी को खेत सँभालते देख सरकारी नौकरी छोड़ दी. मिया बीवी को ऐसा हे होना चाहिए जो अपने प्रेम को छुपाते नहीं. मैं तोह यही दुआ करती हु की मेरी बेटी को पति मिले तोह या शहीद जैसा या दिलबाग जैसा. बिना बड़ो की छाया के ये दोनों हे बड़े हो गए. मेहनती भी बहोत है और बचो से ले कर बड़ो के बीच ाचा प्यार बनाया हुआ.", एक पल के लिए दीपा भाभी के हाथ रुके जिन्हे अर्जुन ने सर ना में हिलाते हुए संयम रखने का इशारा दिया.

"वैसे अगर शहीद भाई जैसा न मिले तोह तोह तन्दूरिया ढून्ढ लेना चची. रेनम से गर्मी बर्दाश्त न होती चूल्हे की. अभी तक चेहरे लाल है देखो.", अब तोह सचमुच जग्गी ने यहाँ रेनम के अर्जुन को हे लपेट लिया था और सफीना भाभी के मुँह की तरफ जाता निवाला हंसी की वजह से वापिस थाली में आ गिरा. रेनम का घुटना अर्जुन के पाँव से जा मिला घबराहट में.

"अर्जुन बाई दी उम्र घट्ट है जग्गी भाई जी. नहीं तोह दीदी के लिए मेरी तोह पसंद यही था.", अब भोले निहाल ने तोह उसकी माँ को भी हंसने पर मजबूर कर दिया था और दीपा भाभी जो खामोश थी उनकी भी हंसी गूँज उठी. सबका खाना धरा रह गया लेकिन अर्जुन को सकुचाते देख जग्गी ने हे बात संभाली.

"ओह भाई वो भी मुमकिन नहीं था नीले अगर ये बराबर का भी होता तोह. अर्जुन का तोह रिश्ता तभी पक्का हो गया था जब ये निक्कर पहनता था. अपने पंडित जी ऐसे नगीने को खुला छोड़ने की गलती कर सकते है क्या? आज देखा था न वह कैसे पहले इसने रंगी के दोनों हाथ तोड़े और बाद में उस राक्षस जैसे तांत्रिक को पचड़ा? इसको जोड़ीदार भी इसके हे मुताबिक चाहिए और वो लड़की बहोत ज्यादा अलग है जिसके साथ ये बचपन से हे बंधा है. रौशनी से तोह रंग बदलता है चची उसकी आँखों का और सफीना भाभी आप भी न ठहरती सुंदरता में उसके आगे. शहीद भाई बाद में चाहे कूट लेने. जस ने जब आज तस्वीर दिखाई न तोह एक बार तोह लगा के बस कीर्ति को मन कर दू. फिर ध्यान आया के जो खुद इतनी विलक्षण है उसका जोड़ीदार तोह खुद ख़ास हे होगा. वैसे दीपा भाभी आपको तोह जस ने दिखाई होगी न वो एल्बम?", अब यहाँ जग्गी ने अलग हे बम फोड़ दिए था लेकिन अर्जुन के चेहरे पर आयी मुस्कराहट उसकी बात को सही ठहरता था.

"ऐसी भी कोई लड़की हो सकती है जिसकी आँखों का रंग बदलता हो?", ये सवाल सफीना भाभी का था लेकिन रेनम के चेहरे पर अब कुछ अलग हे ख़ामोशी थी.

"ऐसा नहीं है की प्रीती की आँखों का रंग बदलता है भाभी. उसकी आँखें hari-neeli है जो मंद रौशनी में पानी सी लगती है और सवेरे उनकी आभा साफ़ आसमान सी होती है. सामने बैठो तोह लगता है की आप एक दुनिया देख रहे हो, जीवन से भरी हुई दुनिया. और जब वो नाराज होती है तोह वो हरा रंग नीले में खो जाता है जैसे बहार ऑक्सीजन हे ख़तम हो गयी हो. और वो मुस्कुराती है तोह.. वो अक्सर मुस्कुराती हे है तब साफ़ लगता है की आप इस दुनिया में नहीं हो. कब वो सामने वाले को अपने जादू में लपेट ले ये पता हे नहीं चलता. इंद्रधनुष के हर रंग को जैसे उस से लगाव है लेकिन वो तोह उन्हें भी kaale-safed के घेरे में क़ैद करके रखती है. प्रीत हो जाती है भाभी हर नश्वर और अनश्वर को उसके पहलु में.", अर्जुन तोह खाने को हे भूल बैठा था जब जुबान पर प्रीती का नाम चढ़ गया. हर व्यक्ति बस उसको हे देख रहा था और शहीद भाई की तालियों ने ये तन्द्रा भांग की जिसमे दीपा भाभी खो चुकी थी सबसे अधिक.

"न्याय कर पाते हो ऐसे विलक्षण प्रेम के साथ मुखिया जी?", उनका ये सवाल कही से भी पारिवारिक नहीं था और हो भी कैसे सकता है क्योंकि उसका जसलीन से मिलान खुद उन्होंने देखा था. उनके पक्ष में हे रेनम दिखी पर विपक्ष में भाभी और निहाल की माता जी.

"प्रेम किसी एक से सिमित हो तोह फिर न्याय नहीं हो सकता भाभी जी. नदी भी अंत में लौट उस सागर के हे पास जाती है जो उसकी नियति में लिखा हो लेकिन क्या उसकी धाराएं बाँट नहीं जाती, प्यासी जमीन देख कर? प्रेम अगर एक सिमित इंसान तक सिमित हो तोह वो संपत्ति ज्यादा कहलाता है. शहीद भाई को प्रेम है धरती से, आंटी जी के सपनो से, सभी चाहने वालो से और अपने खेल से. क्या सफीना भाभी ने उन्हें रोका की अपना प्रेम बस मुझ तक हे रखो? ऐसा होता तोह मैं इस गाँव में कदम भी नै रखता और मुझे जरुरत हे क्या होती फिर जग्गी भाई के इतने असीम प्यार की, शहीद भाई के रूप में एक सच्चे बड़े भाई की, आपके रूप में देखभाल करने वाली भाभी और निहाल के घर पर अपने घर जैसे माहौल की? रेनम ने वैसे हे मेरी थाली में ध्यान दिया जैसा मुझे मेरे घर पे मिलता है. क्या ये प्रेम नहीं है? जस जवाब बेहतर दे सकती है की प्रेम का सही स्वरुप क्या है? उन तस्वीरों से प्रीती निकाल भी डोज तोह प्रेम जरूर मिलेगा. सुबह आंटी जी ने मेरे सर पे हाथ रख कर जब दुआ दी थी तोह मुझे मेरी माँ की कमी महसूस नहीं हुई और अब भी मेरे सामने ये है. क्या मैं गलत कह रहा हु?", अर्जुन ने हर लफ्ज़ कुछ रुक रुक कर कहा था जिसको हर इंसान सुन्न रहा था और थोड़ा लड़खड़ाते हुए भीतर कमरे में जाते हुए निहाल सिंह के पिता जी ने भी.

"अर्जुन पट, इन्हे तेरा बढ़िया चेहरा और परिवार दिख रहा है फिलहाल. ये सब नहीं जानते की ऐसा भी हो सकता था की आज तुम शमशान में होते. प्रेम या इश्क़ यही तोह होता जिसमे शर्तो के बिना खुद को वार देना जैसे तूने आज सवेरे वह अखाड़े में अपनी दीपा भाभी के लिए रंगी की बाहें टॉड दी, उस तांत्रिक से मार खाने के बाद भी घुटने न तक कर मैदान फ़तेह किया, कबड्डी वालो को गुर सिखाये जिस से वो जीत सके और नीले ने तुझे आराम न करने दिया जिसकी खातिर तू इधर आ के भी काम में जुट गया. प्यार मेरे जैसा अमली मंजे वाला समझ सकता है, पर दुनिया की आँखें सिर्फ सवाल पूंछती है. शहीद बढ़िया बाँदा है और ये जग्गी न थोड़ा तेरे जैसा है बस इसकी दुनिया इसकी बेबे है. बाकी मेरा पुत्तर भोला बहोत है और मेरी लाडो ज़िद्दी. चलदा है दार्नी जी, टाइम नाल सोयं जाए. भुआ (दरवाजा) ला लेयो बचैया दे जाए बाद.", मंजे वाले दार जी तोह सचमुच किसी फ़कीर से हे थे जो इतनी समझ रखते थे की साधारण इंसान शर्मिंदा हो जाए. इसलिए वो प्रख्यात भी थे और उनकी महफ़िल में लोग भी सिमित आते थे. सभी खामोश थे लेकिन अर्जुन ने फुर्ती से उठ कर पहले उनके लिए दरवाजा खोला और फिर पानी का जग उठा कर अंदर हाल में बिछे उनके मंजे के पास रख दिया.

"तू थोड़ी मूछ रख ले पुत्तर. बापू जी न मूछ रखते थे और इसके लिए शुक्रिया. दारु के बाद रात में प्यास लग जाती है लेकिन फिर आलस की वजह से उठता नहीं."

"मैं दाढ़ी भी रखूँगा जब आएगी तोह. आप न थोड़ा मीठा काम खाया करो ड्रिंक करते समय. मुँह ज्यादा सूखता है फिर. पापा नई खाते बिलकुल भी.", अर्जुन उनके मुड़े हुए चेहरे के निचे तकिया सही से रखता हुआ फिर कूलर चालु करके वापिस बहार आ बैठा जहा अब सभी लोग खुदको दोषी मान रहे थे.

"इतना सन्नाटा क्यों हो गया? मेरी दादी तोह इधर नहीं आयी?", अर्जुन ने बैठने के वक़्त रेनम के कंधे का थोड़ा सहारा लिया था और बोइये से गरम रोटी खुद रेनम ने उसकी थाली में रख दी. उसकी आँखों में अब जो भी था वो निश्छल प्रेम था.

"सॉरी यार. मैं तोह तेरे साथ था फिर भी तेरी चोट के बारे में नहीं पुछा.", जग्गी ने पहली कोशिश की थी जिस पर अर्जुन ने हाथ उठा कर मन कर दिया.

"माँ का दर्जा दे दिया फिर भी सवाल कर रही थी थोड़ी झल्ली हु बीटा."

"बेबे, आप न ठीक मेरी माँ जैसी हे हो. जरुआत के वक़्त बोलती हे नहीं. ये कढ़ी इतनी स्वाद है जैसे मेरी दादी ने बनाई हो और पनीर घर का क्योंकि निवाले में घुल रहा है. मैं ये सब इसलिए कह रहा हु क्योंकि अगर समय से घर नहीं पहुंचा तोह मेरी दादी उल्टा टांग देगी मुझे. अंकल जी की बात को ज्यादा मैट सोचना, मैं खतरे में नहीं था. मेरे पापा और बाउजी थे वह चाचा के साथ. थोड़ा भी इधर उधर होता न तोह उन्होंने सीधा गोली मार देनी थी सामने वाले को फिर सॉरी बोल देते.", हँसते हुए अर्जुन ने हे सबकी थाली में रोटी राखी थी जो खुद पर खेद जाता रहे थे लेकिन अब उनके चेहरे पर भी मुस्कान थी.

"वैसे तुम्हारी प्रीती से ज्यादा सुन्दर भी कुछ लड़कियां थी वह एल्बम में?", दीपा भाभी ने ये चर्चा मजाक में शुरू की थी.

"हाँ तोह मैंने कब कहा की मैं या प्रीती शेरस्थ है भाभी? सुन्दर तोह Jass-Renam-Safina भाभी निहाल भी है और जग्गी भाई भी. वैसे हे प्रीती से भी कही बेहतर लोग है परिवार में.", अर्जुन ने आखिरी निवाला ख़तम करने के बाद रोटी डालने की कोशिश करती रेनम का हाथ पकड़ लिया था जो इस स्पर्श से हे सेहम सी गयी थी लेकिन उसने खुद उसका हाथ पकडे रखा.

"कोमल को मैं जान गयी थी लेकि 3-4 लड़कियां और थी वह जिनमे एक विदेशी भी थी. खैर तुम्हारे जैसी जो थी वो तुमसे भी ाची दिखती थी. वैसे तोह अर्जुन की माँ सा भी सुन्दर कोई नहीं दीदी. गलत कह रही हु.?", दीपा भाभी ने ये अलग हुम्ला किया था जब ऋतू का जीकर करने के साथ रेखा जी को भी शामिल कर लिया. जाने वो क्या जुगत भिड़ा रही थी.

"चलता हु आंटी जी 10 बजने वाले है. बौ जी तोह एक पल के लिए मान भी जाएंगे लेकिन दादी ने अगर मेरी माँ को फ़ोन कर दिया तोह उनसे सवाल जवाब नहीं कर सकता. ऋतू दीदी तोह सामने से कुछ सुनती भी नहीं. आज भी माँ से ज्यादा बचा हु न उनके लिए. जो वह था वो उन्हें जानता हे होगा की मैं उनके लिए क्या कर सकता हु. जांच पड़ताल मेरे दादा जी की आदत है जिनसे मुझे बचना पड़ता है. शाहिद भैया सुबह मिलता हु आपसे और जग्गी भैया, रानी आप हे ले जाना.", अर्जुन किसी का जवाब सुने बिना हे उठ कर निकल चूका था वह से. अब दीपा भाभी चाह कर भी अपनी आंसू न रोक सकीय जो दिखने के लिए हाथ धोने वाली तरफ चली गयी.

"इसको ये एकदम क्या हुआ?", सफीना भाभी ने सवाल किया था.

"अर्जुन के सामने गलती से भी ऐसी बातें नहीं करनी जो परिवार से जुडी हो भाभी. वो बदल जाता है जैसे आज मैंने और शाहिद भाई ने देखा था. खैर करो की वो ख़ुशी ख़ुशी गया नहीं तोह वो जो उधर अखाड़े में था उसको देख के 2 बाकी पहलवान भाग निकले. दीपा भाभी ने गलत हे राग छेड़ दिया चाहे उन्हें पता नहीं था और जसलीन ने मुझे बताया भी था के घर पे अर्जुन की मम्मी और दोनों बहनो के सामने ये लड़का सवाल जवाब नहीं करता. मैं भी चलता हु. देखना पड़ेगा की ठंडा घर पहुँचता है या गरम."

"दीपा को लेते जा जग्गी.", दीपा भाभी वापिस आ चुकी थी जो खुद अब स्वयं पर गुस्सा थी.

"चलो भाभी, अर्जुन की हे रानी है. छोड़ देता हु आपको भी इस पर. बाकी ध्यान रखना के मजाक जितना मर्जी लेकिन माँ और बहिन पर वो नहीं सुनेगा. मेरे सामने हे सुच्चा सिंह के लड़को की मंदिर खिंडा दी थी उसने यूनिवर्सिटी में. रंगी का तोह जीकर दार जी ने आपके लिए कर दिया. सोचो उसका आपके लिए प्यार कितना होगा जो कल हे इधर आया है?", जग्गी रानी को इधर से लिए चल निकला लेकिन अर्जुन सीधे रस्ते कहा मिलने वाला था. उसकी jaanch-padtaal अलग थी और घर पे कौशल्या जी अपने हिसाब से लगी थी. हाँ नरिंदर के पास जरूर पड़ताल के बाद बहोत से जवाब थे लेकिन वो ख़तम अर्जुन पर हे हो रहे थे. वो क्या थे वो तोह बस चर्चा से पता लग सकते थे.
 
अपडेट 207

सजा (ा)

"तू आवारा बैल की तरह किधर घूम रहा है इतनी रात को?", इधर हवेली पर भी सब लोग खाने से फारिग हो चुके थे. पूर्णिमा जी तोह सोने भी चली गयी थी जिन्हे वैसे हे निम्न रक्तचाप की परेशानी थी. उमेद ने कुरता तोह अर्जुन का पहन लिया था लेकिन पाजामे की लम्बाई थोड़ी काम होने की वजह से वो धोती बाँध कर यही आँगन में अलग चारपाई पर पसरा हुआ था. कूलर की ठंडी हवा के सामने उसको भी आराम था और रामेश्वर जी भी नहाने के बाद वैसे हे सहूलियत वाले कपड़ो में सोने की तयारी कर रहे थे. बस कौशल्या जी हे थी जिन्हे फिलहाल नींद नहीं थी और आती भी कैसे जब पौता घर से बहार हो.

"बौ जी आपने बताया नहीं था दादी को?", दादी और उमेद के चरण सपर्श करता हुआ वो बाकी कपडे उतार सिर्फ निक्कर में हे पंप के निचे बैठ गया. कौशल्या जी उसकी हे तरफ खाट पर बैठी थी और करवट लिए पंडित जी भी अपने पौटे को देखने लगे जो अब पहले से कही ज्यादा उन्मुक्त और जीवंत लगता था.

"अरे तेरे चोट आयी थी और फिर भी तू घर पे नहीं टिक रहा. मुझे बता दिया था तेरे बुआ जी ने की तू मंजे वाले के घर है लेकिन बीटा जब शरीर ठीक न हो तोह विश्राम करना ज्यादा उचित है. और तू इसकी आदत ाची बिगाड़ रही है अनामिका. साहब तोह सीधा मोटर के निचे और चची रात में अपना बचा छोड़ तेरी खिदमत में.", अनामिका चची तोह सचमुच झेंप गयी क्योंकि ऐसा वो हर रोज हे तोह करती थी बस आज कौशल्या जी के सामने हो रहा था और वो भी जब घूंगट नाम मात्रा रहने लगा.

"चोट वोट न आयी कोई मुझे और आपने इतना कमजोर तोह नहीं बनाया मुझे दादी की थोड़ी बहोत रगड़ लगी नहीं और मैं बिस्टेर पकड़ लू. वैसे भी बाबा ने तभी उपचार कर दिया था जब हम जंगल की तरफ गए थे. ये देखो इधर पसली पर खरोच तक नहीं है. वैसे आप भी दादी दोनों तरफ चलती हो. एक तोह मेरी चची को खुद हे कह के भेजा था मुझे कोई परेशानी न हो और कपडे से ले कर खाने सोने तक का ध्यान ये रखे. और अब चची ऐसा करती है तोह फिर बम मेरे सर फोड़ना आपने, इन्हे सुना कर?", अर्जुन गमछा कमर पर लपेट कर दूसरे तोलिये से जिस्म पौंछने लगा था. चची तोह मुँह झुकाये मुस्कुराती हुई गयी लेकिन अब रामेश्वर जी के साथ कौशल्या जी भी हंस रहे थे अपने पौटे की hajir-jawaabi पर.

"वैसे तुझे पता था के वो मेरे भाई है?", उमेद के सवाल पर अर्जुन सर पौंछते हुए ना में सर हिलने लगा.

"बस ये पता था के वो कोई सिद्ध योगी है जिन्हे आत्मिक और युद्धकला का ज्ञान है. रघुवीर दादा जी ने हे मिलवाया था मुझे उनसे और तब वो हर साल एक महीना रुकते थे उधर. मैं सवाल हे नहीं कर पता था कभी क्योंकि वो सामने होते हे काम पर लगा देते थे. वैसे रघुवीर दादा जी भी उन्हें योगी हे कह कर बुलाते थे चाचा. मैं खुद हैरान हु की वो आपके हे बड़े भाई निकले लेकिन ाची बात है न के पहले उन्होंने शिक्षा दी और फिर आपने. 8तह के बाद तोह उनसे यही मिला था अभी कुछ दिन पहले. वैसे अब आपसे भी कोई लम्बा है घर में. हाहाहा.", उमेद भी अर्जुन के कथन पर हंस दिया जो पहले थोड़ा गंभीर था.

"लम्बा हे नहीं पूरे 4 मैं का है वो दैत्य. कार की स्पीड से डर लगता है उसको.. हाहाहा.. शंकर को बताऊंगा ये मैं, फिर मजा आने वाला है.", उमेद का बचपना देख कौशल्या जी ने हे झिड़की दी.

"बस कर उसको सतना. बड़ा भाई है और जब उसको इस बाहरी दुनिया का पता हे नहीं इतना तोह अजीब तोह लगेगा हे. वैसे तू रुक जा परसो तक उमेद.", कौशल्या जी ने अर्जुन से ध्यान हटा कर उमेद से बातचीत शुरू की. अनामिका चची ने अर्जुन को पजामा टीशर्ट थमाया और वो रसोईघर समेटने लगी. हाँ उमेद और रामेश्वर जी के लिए दूध देना उन्हें याद था.

"चची मैं तोह रात भी नहीं रुकने वाला था और सुबह 4 बजे निकलूंगा तब कही 7 बजे घर और फिर 10 बजे काम पर. पिछले एक महीने में अपनी बेटियों तक से नहीं मिलना हुआ, व्यपार तोह चलो मैनेजर देख लेते है. आप लौट आओगी तोह अगला ऐतवार आपके और चाचा जी के साथ पक्का. वैसे आप परेशां है लेकिन अर्जुन है आपके साथ तोह ज्यादा सोचना बंद कीजिये.", लाली की माँ ने पशुओं का पानी चारा देखने के बाद हवेली के किवाड़ लगा दिए थे और बगल वाले गलियारे से हे वो सोने चली गयी थी.

"ओह बैल, इधर तोह बैठ जरा.", कौशल्या जी ने अर्जुन को चारपाई पर बैठने का इशारा दिया लेकिन उमेद के पास बैठने की जगह वो उघडे सीने हे कुर्सी पर दादी के सामने हे आ बैठा.

"अब ये तूने कौनसी महाभारत खोल के मेरे माथे मांड दी बीटा? मैं तोह पहले न पड़ती थी इस तरफ के लफड़े में और अब तू धकेल भी रहा है तोह जाने कितनो के दिल bura-bhala कहेंगे. Tantra-mantra में पड़ कर इसने खुद का हे सत्यानाश किया है. आज सर उठा कर चलने लायक नहीं है देवकी अपने बचो के हे सामने. तू चाहता है के इसको और बड़ी सजा मिले?", ये थी थानेदारनी जी जो इंसान का मैं कई तरह से टटोल सकती थी. रामेश्वर जी तोह सर के निचे ब्याह मौडे इन दोनों की हे चर्चा सुन्न रहे थे.

"उसको सजा नहीं अपने रस्ते रहना कहते है दादी. चोर का सच उसके घरवालों को पता चल जाए तोह वो उसको पुलिस में न दे कर बस नजर अंदाज कर दे. मतलब भाई तुम जो मर्जी करो, बस हमसे नहीं बोलो. चोर भी बेचारा सदमे में रहेगा. नै? उल्टा उसके पाँव फिर घर से बहार जाने लगते है दादी क्योंकि उसको लगता है बाकी सब भी यही करेंगे. पर वो न चोर है और न मासूम. अब आप ध्यान से सुनिए जो मैं बताने जा रहा हु.", अर्जुन ने एक बार अपने दादा की तरफ देखा और फिर रसोग को बंद करती अनामिका चची को, जिन्हे उसने बस इशारे से हे कमरे में रहने का कहा आँचल के पास. नर्स देवकी वाले कमरे में हे आराम कर रही थी और प्रहरी दूसरी मंज़िल पर आँगन में सोया हुआ था.

"क्या बताने लगा है जो मुझे नहीं पता या तूने दादा जी को नहीं बताया?"

"सबसे पहले हे बम फोड़ देता हु. बौ जी ने बता दिया होगा की चंद्रो दादी इनके ताऊ की बेटी है जिन्होंने इनके पिता को बेदखल कर दिया था और वो फिर अपनी दोनों बीवियों के साथ राजस्थान बस गए? पहली बीवी से नेत्रं और दूसरी से देवकी दादी और इनका भाई जो नर्कवासी हो गया. इन्होने छल से शादी की छोटे दादा जी से जिसका सच बौ जी को भी नहीं पता. जानते है जब वो अनामिका दादी से मिलने गए थे वह उनकी जगह ये मोहतरमा चली आयी और समाज में बड़े पंडित जी की ijatt-sammaan को उनके हे खिलाफ प्रयोग करके ये शादी जबरन हो गयी. बौ जी तोह आपसे शादी को भी त्यार नहीं थे क्योंकि ये ट्रेनिंग से हे तोह लौटे थे. लेकिन फिर एक हे मंडप में बड़े और छोटे भाई की शादी कर दी गयी. स्वर्गीय मोतीलाल जी जानते थे की बौ जी यहाँ रहे तोह कुछ न कुछ आफत हो सकती है और वो वचन आपको भी पता है जिस वजह से ये और रघुवीर दादा जी यहाँ से गए. चलो अब हवेली में आये तोह आये लेकिन सम्मान मिला आपको और मेरे पास लिखित में भी है की उन्होंने इस हवेली का मुखिया आपको घोषित किया हुआ है. ये बात अंतिम समय में वो खोल न सके. वैसे बौ जी आपके पिता जी का देहांत कैसे हुआ था?", अर्जुन ने सचमुच हे बम फोड़ दिया था अपने दादा दादी पर लेकिन अब उसका जो सवाल था वो भी जैसे कुछ पहेली लिए थे.

"दिल का दौरा, उम्र और शायद ज्यादा जिम्मेदारियों के बोझ की वजह से. प्राकृतिक मौत थी उनकी और मैं इधर से 2 घंटे दूर हे तैनात था थाने में उस समय. 4 बजे तड़के उन्होंने आखिरी सांस ली थी जब वो घर लौट कर चाय पीने लगे थे और कृष्ण ने महल से हमे सूचना दी थी ठीक आधे घंटे बाद.", रामेश्वर जी बड़े गौर से अर्जुन को देखते हुए बोल रहे थे जैसे अब कोई नया धमाका न कर दे.

"हम्म्म.. मतलब उसी साल पहले आपकी माता जी का निधन हुआ और फिर आपके पिता जी का.? 1966 में वो 58-59 बरस के हे थे या हद्द 60 के होंगे और इतना मजबूत कलेजे वाला आदमी hridya-aghaat से दम टॉड गया? शायद गमगीन माहौल की वजह से और व्यक्तिगत नुक्सान में जांच नहीं कर पाया कोई. खैर, में उसको छोड़ भी दू तोह पापा को बचपन में वो जहर देने वाला कौन साधू था? मुझे मालूम है की वैसा हुआ था और किसने मुझे बताया इस से फरक नहीं पड़ता. आप घर अकेली थी और रघुवीर दादा जी हे पापा को हॉस्पिटल ले कर गए थे तब. उसके बाद आप नैतिक वाले मामले में बहार chhaan-bin करते रहे लेकिन कुछ हाथ लगा? अज्जू चाचा, जो 50 के सामने घुटने न टेकते वो ऐसे हे मारे गए? ये 2 बातें सिर्फ मेरे कयास है लेकिन पापा वाला नहीं. उसके लिए मैं सुनिश्चित हु और अभी 4 बच्चियों को उठवा कर क़ैद करवाया गया ताकि वो कल्पतरुए कोई अनुष्ठान कर सके. शामिल कौन कौन थे उसमे? इनके भाई साहब नेत्रं, मुकंदी और ये स्वयं. माँ.. माँ के दोषी को बस ऐसे हे जाने दिया जाए दादी? वो रमन सिंह सिर्फ मोहरा था कहने को राजयवर्धन का लेकिन खेल तोह वो देवकी दादी के इशारे पर रहा था. अपने हे सेज भाई की हत्या इन्होने उस रमन द्वारा करवाई क्योंकि वो अलग होना चाहता था, पूछ लेना दामिनी बुआ से आप जो खुद इनके अत्याचारों को जाने कबसे सेहती आयी है. और दादा जी, बड़े हे सरल दिमाग है न आपके छोटे भाई साहब? क्या उन्हें कुछ भी नहीं पता होगा इस सबके बारे में? रुकिए आप लोग मैं कुछ दिखता हु आपको.", सबको सकते में छोड़ कर वो कुर्सी से उठ अनामिका चची के कमरे में चला गया. अब तोह उमेद की भी नींद उड़द चुकी थी ये सब सुन्न कर. कौशल्या जी जहा पहले सदमे में थी अब उनकी आँखों में पानी आ गया था वो भी इस अपनी हे देवरानी के कृत्या सुन्न कर.

"वो बाबा वाली बात सही होगी चची. शंकर से अभी जब बात हुई थी मेरी तोह वो इन्दर के साथ बैठा था और उसने सिर्फ यही कहा के उसने आज वो बाबा देखा जिसने उसको बचपन में ज़हर वाला लड्डू दिया था. अर्जुन भी जिस कल्पतरु की बात कर रहा है वो देवकी चची के साथ इन कुकर्मो में शामिल है. मैं रुक नहीं पाऊंगा यहाँ अब."

"तू बैठ बीटा, इनसे ज्यादा सागा मेरा तू है. अगर तेरी चची आदेश करती है तोह मैं सजा देता हु इन्हे. पहले ये भी देख ले की अर्जुन क्या दिखाना चाहता है. और उसकी पिता जी वाली बात भी कही न कही ठीक है. वो थोड़े अकेले जरूर रहने लगे थे माँ के बाद पर इतने कमजोर नहीं थे. 2 महीने के अंतराल में उनका चला जाना विवादस्पद बात है.", अभी वो आगे कुछ बोलते अर्जुन सफ़ेद पैन लिए उधर आ बैठा.

"ये कॉल डिटेल है इस घर के नंबर की 3 दिन पहले तक की. ये पेन से मैंने घेरे बनाये है जहा जहा वो नंबर ट्रंक कॉल का है राजस्थान में और समय हमेशा हे ठीक 3 बजे का. 2 अलग अलग नंबर है जिन पर बातें हुई है. लड़कियों को भी 35 दिन पहले हे जमा करना शुरू किया गया. एक नंबर तोह क्सक्सक्सक्स जगह का है किसी ढाबे का और दूसरा जिस पे ज्यादा बात हुई है वो मीणा के घर का नंबर है. मैंने खुद रात 12 बजे मीणा के दरवाजे पर रंग दाल कर 4 बजे फिर उसके कदमो के निशाँ देवकी दादी के दरवाजे पर देखे. मैंने हे उन्हें कल रात नींद की दवा दिलवाई थी जिस से बात न हो सके और मैं इन्हे पकड़ सकू.", अर्जुन के इस खुलासे और उन टेलीफोन के नंबर को देखने के बाद रामेश्वर जी ने एक अलग हे सवाल किया.

"फ़ोन तोह वह सामने वाले कमरे में है तोह मीणा वह से भी कर सकती थी."

"कर सकती थी लेकिन वह वाले पर एसटीडी की सुविधा नहीं है. आपने सबसे पहले ये नहीं देखा की इस रिपोर्ट में नंबर हे कितने है जबकि ये 30 दिन की है. उधर अलग फ़ोन है जिसकी घंटी नहीं बजती और ये मुझे बस फुस्फुसाहट से पता चला जो 3 बजे के करीब सुनाई दी थी मुझे. मतलब छोटी दादी तोह फ़ोन लगवा नहीं सकती अलग से और विनोद चाचा ने लगवा कर नहीं दिया. बहार खम्बे से हे दोनों तार इतनी सफाई से भीतर की गयी है की नजर नहीं पड़ती. तोह सवाल आपके छोटे भाई साहब से भी पूछे जा सकते है दादा जी लेकिन उस मामले में तोह दादी भी कुछ नहीं कर सकती क्योंकि वो आपकी जिम्मेवारी है. रही बात आप जो सजा दिलवाने की बात कर रहे थे उमेद चाचा से तोह कई 302 भी जोड़ लीजियेगा उसमे. लेकिन मौत.. मौत सजा नहीं सजा से छुटकारा कहना बेहतर है.", अब जरूर रामेश्वर जी के haath-paanv पहले थे और उनकी झुकती नजरो का दर्द समझ कर कौशल्या जी ने हे उनका हाथ थाम लिया

"सही कहा तुमने बीटा और मैं तेरे बौ जी को भी झुकता नहीं देख सकती. फिलहाल कृष्ण की पूछताछ से पहले देवकी को उसके बचो के सामने करना होगा. वो भी जान ले की उसका सच क्या है और फिर सजा भी वैसी हे मिलेगी जिसमे छुटकारा न मिले और न कभी चैन. रात बहोत हो चुकी है बीटा और कल की सुबह थोड़ी मुश्किल रहने वाली है. मैं तेरी पूर्णिमा दादी के पास जा रही हु, तू भी आराम कर ले. हाँ इस बीच तेरा कमरा ध्यान नहीं रहा तैयार करना."

"मैं चची के कमरे में हे सो जाऊंगा दादी नहीं तोह आँचल दीदी वाले में 2 अलग बिस्टेर है. वैसे छत भी खुली और हवादार है लेकिन फिलहाल थोड़ा निकेतन के साथ खेल लू क्योंकि चची सो जाती है और वो 2 बजे तक जाग कर उन्हें परेशां करता है.", अर्जुन अपने दादा के पाँव दबाने लगा था और उमेद ने भी आँखें बंद कर ली. करीब 20 मिनट बाद वो अपने दादा को सुला कर हे अनामिका के कमरे से तकिया गद्दा ले कर छत पर चला गया सोने पर आज कौशल्या जी नींद की दवा लेने के बावजूद करवाते बदल रही थी.

.

.

"तोह तेरा कहना है के मामला बहोत पुराण है और हमारे पैदा होने से भी पहले का.?", राजकुमार जी तोह कोटा पूरा करने पर निचे जा चुके थे लेकिन नरिंदर और शंकर जैसे अभी शुरू हे हुए थे और इनकी चर्चा पिछले एक घंटे से जारी थी.

"हाँ शंकर और ये रमाकांत अज्जू के वक़्त शामिल था. राणा ने मरने से पहले बताया की अज्जू महल गया था जहा से उसने अज्जू का पीछा शुरू किया. अब ये राणा वीर सिंह राणा का कौनसा रिश्तेदार है तोह मैं इतना हे कहूंगा की हिमाचल में हे इन सबका परिवार fala-phula था और बाद में इसका हे बाप सुरक्षा प्रमुख बना था राजा के दरबार में हमारे दादा जी के वक़्त. प्रभा देवी की हत्या में उसका हाथ होने से इंकार नहीं किया जा सकता लेकिन साला ये तोह हवा में गायब हे हो गया, चाहे उसका बीटा हे हमारे कब्जे में क्यों न हो. मैं ढूंढ़ने हिम्मत सिंह को निकला था लेकिन 8 लाशें सिर्फ हिमाचल में दफ़न की है मैंने. संतोष राणा महल से फरार है जिसको आखिरी बार उसी दिन देखा गया था कुछ मिस्त्री ड्राइवर टाइप के गुंडों के साथ. अर्जुन भी उस दिन महल में हे था जिसका मतलब अर्जुन उसका सच जान गया होगा और वो अर्जुन का सामना नहीं कर सका. लेकिन यदुवंशी ने मुझे एक बड़ी अनोखी खबर दी है भाई.", शंकर के पहले तोह सबकुछ ऊपर से हे जाता रहा लेकिन ये अनोखी खबर वाली बात सुन्न कर उसने जाम एक बार में हे निभता दिया.

"अब ऐसी खबर कौनसी हुई जो अनोखी हो? रमाकांत तोह समझ ले गया मेरे हाथ से, बहनचोद रंडी का बीज मेरे भाई ..", शंकर को गुस्सा करते देख नरिंदर ने उसका हाथ दबा कर शांत किया.

"खबर ये है की अज्जू जिस दिन मारा उस दिन कृष्ण चाचा गाँव में नहीं थे. और 3 दिन पहले अज्जू उनसे मिला भी था किसी विषय में जो मैंने वैसे हे ताल दिया था उस वक़्त क्योंकि वो पागल कही न कही घूमता हे रहता था और चाचा से मिलना तोह कोई नयी बात नहीं थी लेकिन चाचा गाँव में आये ये नयी बात और उस समय के हिसाब से देखा जाए तोह वो रात में उधर पहुंचे कैसे? मतलब वो दिन से हे उधर कही होंगे. लेकिन हम उनसे सवाल नहीं कर सकते तोह ये कड़ी किसी सही बन्दे को देनी होगी. और हाँ गलती से भी राजस्थान का रुख नहीं करना हमे शंकर. घमासान हो जाएगा बिना बात और इधर भल्ला का प्रयोग तोह बिलकुल नहीं होगा.", नरिंदर ने उस अलग सच से वास्ता करवा दिया था जो शंकर कुछ समय के लिए भूला था गुस्से में.

"हाँ.. लेकिन यार अज्जू घुटने टेकने वालो में से नहीं था इसलिए मेरा मैं हमेशा हे कहता है की कोई अपना हे था जिसने उसकी हत्या की. सारंग भले हे गुस्से में उस से गरमा गर्मी कर ले लेकिन वो पापा पर हे हाथ डालना हुआ इसलिए हत्या तोह वो नहीं करने वाला उसकी. रमाकांत घाघ है और कही न कही वो आदमी चाचा और सारंग से जवानी के समय से जुड़ा है. तेरा उस वर्धन वाले मामले का क्या बना भाई?"

"हाँ वही बात मैं करने वाला था शंकर. वर्धन की सूचना है मेरे पास और वो उत्तर प्रदेश में दबिश देने वाला है किसी बाहुबली पर परसो. वो मास्टरमाइंड आदमी है और पहले से कही ज्यादा खतरनाक और निर्मम. थोड़ी बहोत मार खानी पड़ेगी लेकिन मैं उसको मन हे लूंगा. रमाकांत का गेम वही बजायेगा मेरे भाई क्योंकि विष्णु वर्धन के परिवार का खत्म उसने हे करवाया था. और जानता है सारंग का ख़ास सिपसहलहार कौन है?"

"राज्यवर्धन, इंद्रनील तोह देश से बहार है."

"ना.. बलवान. हमारा परम मित्र बलवान अब उसका सेनापति है जो अब इंसान नहीं रहा, आत्मा मर्डर चुकी है उसकी. पिंटू थोड़ा खतरा बन्न सकता है क्योंकि वो दिलेर है और सुरक्षा के वक़्त वो परिवार का साथ देगा. कैसे भी करके पिंटू को घुमवाना है थोड़ा वक़्त के लिए और अर्जुन हे ऐसा कर सकता है. रमाकांत हाथ आ गया तोह बाकी लोग भी आ जाएंगे.", नरिंदर की योजना जरूर मजबूत थी लेकिन उसमे प्रश्न अधिक थे.

"वैसे वो दानव जो अब अपना बड़ा भाई है, उसको भी राजस्थान में भेजा जा सकता है. साला इंसान तोह वो भी नहीं और यकीन मान वो मेरे पागल स्वरुप से भी कही चार पांच गुना ऊपर होगा. कन्धा अभी तक दुःख रहा था दारू पीने से पहले. विष्णु भाई जैसा दोस्त है यार अपना और उसको दांव पर नहीं लगाना. बलवान की नब्ज़ ढूँढ़ते है और रमाकांत की भी जरूर कोई तोह कमजोरी उसको प्रदेश से बहार निकलेगी. मैं कहलू तेरे साथ विष्णु से मिलने?"

"रहने दे भाई. मैं हे मार खा लू तोह ठीक रहेगा. आज तक हम दोनों ने एक साथ पिटाई सिर्फ माँ से हे खाई है और उस पागल को मुझे अकेले हे झेलने दे. भारत भाई खिलाडी आदमी निकले यार शंकर जो उन्होंने सीबीआई फ़ैल कर दी. वैसे तू देवकी चची के बारे में कुछ नहीं सोचता? उन्हें उनकी कामवाली अगवा कर रही थी और उनके साथ वो तांत्रिक था. चची का बड़ा भाई उन्हें क्यों उठवाने लगा और जो मंजर दिलबाग के वह देखा वो थोड़ा सा रचा हुआ लग रहा था जैसे हमे दिखने के लिए किया गया हो? वो खेल पहले हे कोई बेहतर खेल रहा था लेकिन हम उसमे अनजाने शामिल हो गए.", नरिंदर जिस तरह से हादसे को याद करके बता रहा था शंकर भी थोड़ा सोच में पड़ गया.

"वहां होगा यार तेरा. उनके आदमी ने देख लिया होगा और आवाज लगा कर सबको एकठा कर लिया."

"और चची सलामत हाथ लग गयी? शंकर वह मुझे किसी ने जवाब नहीं दिया सिर्फ एक ने पूरी रामकथा ऐसे सुनाई जैसे वो रतवाई गयी हो. उसके भोसड़ी वाले के उलटे हाथ पर ऐसा कट था जैसा हम खुद बचपन में मार लेते थे स्कूल न जाना पड़े इसलिए. और दिलबाग के गोली छु कर निकली जबकि वो भीष्म था उसके जांघ में उधर जहा मांस ज्यादा रहता है. ऐसा नहीं है की उन्होंने मुठभेड़ नहीं की होगी. सामने वालो ने सिर्फ भागना था और 2 वह मरे पड़े थे, 2 को तूने मार दिया. एक ड्राइवर, एक तांत्रिक, वो मीणा और नेत्रं. 8 लोग तोह पहले हे जीप में रहे होंगे तोह वो लोग चची को क्यों ले जाने लगे.? मतलब वो गाडी में थी हे नहीं भाई और इन्होने बेवकूफी की होगी जीप से उलझने की तोह दोनों किनारे वाले लोग हाथ चढ़ गए जिन्हे खुद जीप वालो ने मार दिया जबकि दिलबाग और ये लोग थोड़े हे चोटिल हुए. ऐसा हो सकता है की बस भीष्म के गोली लगी हो और दिलबाग के वो भी नहीं पर मेरा दिल कह रहा है के चची जीप में नहीं थी और होती तोह वो उनके साथ हे जाती. जीप तोह तेरे जाने पर भी दिखी और सामना भी हुआ वो भी 500 कदम की दुरी से तूने उन पर गोलियां चलायी. मतलब वो चची को ले जाना चाहते थे या सकुशल देखना चाहते थे? दिमाग की बंद बजा के रख दी है अर्जुन ने भाई.", नरिंदर की जुबान पर आखिर नाम आ हे गया था अपने बेटे का.

"अर्जुन? अब वो कहा से इसमें आ गया?"

"जग्गी तक को उसने जाने का कहा था हवेली पर जो चाचा के साथ हमे लेने आ पंहुचा. दिलबाग को सजा के बहाने उसने हे इस सुरक्षा में लगाया हुआ था तोह खेल उसका हे था ये सब बस उसके पास मौके पर उतने लोग नहीं थे जो सामना कर सकते उन सबका. वो जंगल न जाता तोह पक्का उधर हे जाता. मुझे कुछ अजीब सी फीलिंग आ रही है भाई जैसे कुछ बड़ा होने वाला है और जितना शांत अर्जुन उतना तेज उसका दिमाग. लड़ाई की तोह उसको परवाह हे नहीं थी वह अखाड़े में और ताक़त तोह तूने भी देख ली न उसकी? वो भी इस संभव भाई से कमतर नहीं है किसी भी तरह बस दिमाग थोड़ा ज्यादा तेज है. अब ये पहले विनोद के पीछे था जो ठंडा हो चूका फिर पड़ा ये गाँव के पीछे तोह मतलब सब गुल यही खिला रहा है और जिम्मे लगाया होगा आदरणीय थानेदार जी ने.", नरिंदर को उलझन में देख शंकर ने ये आखिरी जाम बिना पानी के हे बना दिया सिर्फ बर्फ के टुकड़े गिरा कर.

"मेरा भी मान यही कहता है की अर्जुन देवकी चची के हे पीछे है. तुझे ध्यान है न रमन के साथ रिश्ता खुद चची ने तये किया था रौशनी का? और उन्हें रौशनी के विधवा होने से ज्यादा दुःख उस सपोले के मरने पे हुआ वो भी पापा के सामने तोह उनकी नजर से ये बचा नहीं. हाँ वो सामने नहीं आने वाले क्योंकि उनके भाई का मामला है और अर्जुन पारिवारिक मामलो में माँ पे ज्यादा निर्भर करता है, पापा की जगह. तभी माँ जो की पहले आज हे वापिस आने वाली थी उनका कार्यक्रम कॉलेज के दिखावे पर कही इस वजह से हे न बढ़ा दिया गया हो. अगर चची किसी बड़े काण्ड में शामिल हुई तोह?"

"वो पहले से हे है भाई. तुझे ये भी नहीं बताया लेकिन बिंदु से बात हुई थी मेरी.", नरिंदर खामोश हो गया था एकदम ये नाम लेते हे.

"भाई तू उसको नैतिक का कातिल समझता था और भूल गया के उसने.. कोई और लफड़ा है न इन्दर?"

"शबनम मेरा खून है शंकर... मेरा और बिंदिया का बस एक रात का सच. थोड़ा जज्बाती हो गया था जो मैंने हे फ़ोन मिला दिया अपनी बेटी से बात करने के लिए. दिल शबनम को गले लगाने का था लेकिन मुस्कान को हे मान कर मन लिया दिल.", ये बात सिर्फ उमेद जानता था क्योंकि आज शंकर के हाथ से गिलास जिस तरह फिसला था वैसा कांपना पहले कभी न हुआ था. शंकर को एक हे पल में वो सब याद आ गया जो उसने शबनम से यातना देते हुए कहा था. वो सचमुच उसकी सगी भतीजी थी, इन्दर का खून मतलब उसका भी खून थी वो. अपने भाई की हालत देख नरिंदर ने उसके दोनों हाथ पास राखी कमीज से साफ़ किये.

"तुझे क्या हुआ बे? झटका तोह मेरे लिए था न तेरे तोह अनगिनत घूम रहे है गली मोहल्लो में.", उसकी वही हंसी में बात उड़ाने वाली अदा भी शंकर के दर्द को कम् न कर सकीय.

"गलती हो गयी भाई मेरे से जो मैंने उस लड़की पर जुल्म ढाया जिसके साथ मेरा भी खून का रिश्ता था. उमेद ने कहा भी था के वो हमारी भतीजी है लेकिन मैं बस हवेली वजह समझता रहा. माफ़ कर दे यार इन्दर बहोत भारी गलती हो गयी बे मेरे से."

"शहहह.. वो गलती नहीं थी भाई अनजान था तू. रात गयी बात गयी. तोह मैं बता रहा था के फ़ोन शबनम से बात करने के लिए मिलाया पर बात हुई मिर्ज़ा साहब से और फिर बिंदिया से. कुछ इधर उधर की होने के बाद जब मिर्ज़ा साहब दूर हुए होंगे तोह बिंदिया ने गजब हे ध दिया बहनचोद. बताते हुए तोह अब बुरा लग रहा है."

"ऐसा क्या बता दिया बे?"

"वो.. कृष्ण चाचा की औलाद है शंकर. अनामिका उर्फ़ दमयंती काकी जिनके पास अज्जू आता जाता था वो महल की राजकुमारी थी जो तुझे सिर्फ सारंग की बहिन तक का पता था लेकिन ये नहीं की हमारे चाचा ने हे उन्हें पेट से कर दिया था. देवकी चची से तोह शादी कभी होनी हे नहीं थी और वही थी जिन्होंने कुमारी अनामिका को गायब करवाया लाजो काकी के साथ मिल कर. तुझे मेरी कसम है शंकर तू लता से इस मामले में बात नहीं करेगा क्योंकि उसको कुछ नहीं पता, कुछ भी नहीं. और उसकी माँ, लाजो गायब है अपनी बहिन रेशम के साथ. रेशमा, सरपंच की बीवी जिस सरपंच को चंद्रो ताई ने थोक दिया था जैसा तूने बताया था. मतलब उन्हें भी नहीं पता था के खेल एक अलग तिकड़ी खेल रही थी जिसमे रेशमा, लाजवंती और तीसरी हुई देवकी चची. जो चची अतीत में वैसा काण्ड कर सकती है तोह वर्तमान में उतनी शरीफ कैसे हो गयी? चची के काम के बदले क्या सामने वाले ने अपने काम नहीं करवाए होंगे उन्हें मुंशी जी के घर की बहु और हवेली की मालकिन बनवाने के बदले? लाजो काकी भी राजस्थान हे छिपी है. मतलब वह असली खिलाडी है और वो सारंग तोह कटाई नहीं क्योंकि पापा उसको चिकना घड़ा बोलते थे. अब तुझे तगड़ा झटका लगा न भाई शबनम से भी बड़ा वाला? एक तरह से तोह देखा जाए मैं बहनचोद हे बन्न गया उस सच को सुन्न ने के बाद लेकिन कोई बात नहीं क्योंकि रिश्ता मेरा बिंदिया का पता था मुझे. चाचा और दमयंती काकी का नहीं. अर्जुन ने फांस लिया है देवकी चची को और अब सचमुच अफरा तफरी मचने वाली है बहोत सी जगह. चल रोटी खाते है फिर मैं कल निकलता हु विष्णु को लेने.", शंकर का तोह दिमाग हे टाइट कर दिया था आज नरिंदर ने जो बेचारा खुद पहले से भरा बैठा था इतना सबकुछ जानकार.

"यार 2 लोगो का जीवन नहीं कईओं का खराब हुआ इस हिसाब से तोह. वो तोह बेचारी साड़ी उम्र विधवा बन्न के रही और फिर मौत भी मिली तोह विधवा की जिसके पास पति का नाम तक नहीं. और ये मुझे लता ने भी कहा था के उसकी माँ ने शादी में टांग अढ़ाई थी जब पापा रिश्ता ले कर गए थे मेरा. वो भोली है न और फिर माँ उसकी भी विधवा. बेचारी ने बहोत समझौते किये होंगे और मैं उसके सुहाग को ख़तम करके भी उसका प्यार हु. लाजवंती काकी को तोह सजा मिलनी चाहिए और अब ये देवकी चची फंस गयी है इसलिए पहले इसको दण्डित करेगी माँ. चाचा बेचारे इसलिए खोये खोये रहते आये है आजतक."

"खोये खोये रहते हुए भी 3 बार खेती उगा गए वो उसी चची पर. अबे मर्द जो भी हो शंकर ब्याह होने के बाद वो दुश्मन बीवी का भी भोग करता है. हमने जो चीज इतने बरसो से न पता लगी वो अर्जुन बिंदिया से जान चूका था मुझसे हे पहले. और वो गाँव की भी जानकारी इकठा किये बैठा है मतलब उनके घर में घुस कर वो उन्हें बेनक़ाब कर चूका. अब तोह बस फैंसला होना बाकी है जो अपने से नहीं छुपने वाला क्योंकि गज्जू भी उधर हे है."

"हाँ, और बिनोदिया भी अब तमीज से रहने लगा है. आज वो हॉस्पिटल ये देखने न गया था के उसकी माँ को चोट आयी है. वो तोह साला ये पूछ रहा था के ये कितने दिन बेहोश रहेंगी और सर पे चोट से yaad-dast जाने के कितने चांस है? लोदु है पूरा और लगता है उसकी नैया भी चची ने हे पार लगाईं होगी पहले."

"हाहाहा.. चल सुधर तोह रहा है अब. मुझे लगता है अब कचरा साफ़ करने के बाद कूड़े का ढेर जला दिया जाएगा. अपनी माँ को बड़ा मजा आता है उस काम में.", दोनों इतनी गंभीर बातों के बावजूद हँसते हुए निचे चल दिए थे और आज इन्हे भूक भी नहीं थी. इन्दर अपनी उलझनों से भीतर से झूझ रहा था और शंकर व्यथित था कुछ ऐसे सच जान कर जो नहीं जानता तोह बेहतर रहता. ये रात इनके लिए भी करवट बदलने वाली हे थी.

.

.

"अक्सर हम अपनी नींद खुद उड़वा लेते है अनजाने या जानबूझ कर.", सुबह होने में अभी एक घंटा था और रात के 3 बजे अर्जुन को यु अपने सामने हे गेट फांद कर आया देख दीपा भाभी चकित रह गयी. वो राणो को सोया देख रही थी खुले ानांग में चारपाई पर बैठी. जबकि अब उनके सामने उनकी हे नींद उड़ने वाला इंसान be-samay खड़ा था.

"तुम.. तुम इधर और वो भी इस तरह चोर रस्ते से?", दीपा भाभी अब कहती भी क्या.

"ऊपर से देख रहा था आपको पिछले एक घंटे से इधर उधर टहलते हुए. वो छत हमारी हे है जहा से आपका आँगन पूरा दीखता है. अब घर में और तोह कोई है नहीं जो यु टहलता रहे. सोने की कोशिश मैं भी कर रहा था लेकिन फिर पानी पीने उठा तोह नींद भी उचट गयी. चाँद देखते देखते साया दिख गया तोह चला आया वजह पूछने.", अर्जुन वही कच्चे आँगन में हे कूल्हे टिकता बैठ गया था. हवा सचमुच रुकी हुई थी जिस वजह से कूलर चालु था दीपा भाभी और रनो के लिए.

"बिजली 12 बजे गयी थी और अब आयी है जब तुम आये. बैटरी से सिर्फ पंखा चलता है और ये आँगन का लट्टू. अब सो जाउंगी मैं."

"ठीक है फिर चलता हु मैं. मुझे लगा कोई और परेशानी होगी क्योंकि गाँव में लोग बिजली आने जाने से ज्यादा परेशां नहीं होते और आपके यहाँ तोह पंखा भी चलता है बैटरी से.", अर्जुन वापिस उठने लगा तोह दीपा भाभी ने उसके कंधे पर हाथ रख दिया. ये मुद्रा ऐसी थी की वो कूल्हे खाट पर टिकाये हुए अर्जुन के चेहरे की तरफ झुकी थी और ऐसे झुकने से उनका भारी सीना अर्जुन के घुटनो के ठीक ऊपर टिक गया. कुछ पल ये ख़ामोशी रही और फिर दीपा भाभी अपनी अवस्था देख वापिस सही हो गयी.

"मुझे लगा था के तुम इस घर में सिर्फ जसलीन के लिए हे आ सकते हो. मेरी नींद उचटना तुमसे ऐसा करवाएगा तोह मैं कुछ दिन पहले से हे जागना शुरू कर देती.", दीपा भाभी का कटाक्ष बता रहा था के अब वो जसलीन वाली बात का भी जीकर खुलकर कर सकती है उसके साथ.

"आप कभी सीधे तरीके से अपना मुद्दा बयान नहीं कर सकती क्या जो कभी निम्रत, कभी मेरी maa-behan तोह कभी दिलबाग भैया और आज जसलीन का बहाना कर रही हो? अनाथ थी पहले जिसको परिवार मिला और शादी के बाद pati-beti के साथ खुद का अलग परिवार. हर समय खुद को अनाथ हे समझती रहोगी तोह फिर भगवन 50 औलाद भी दे दे आपने अपनी हे सोच में फंसे रहना. इंसान ऐसी घुटन से टिल टिल कर मरता है भाभी चाहे फिर आप इस घर की देहलीज से बहार कितना भी चेहरे पर हंसी का नक़ाब ओढ़ लो. समस्या नहीं बताओगी तोह न दिलबाग भैया उसका हल कर सकते न कोई और. अब इस तरह उनसे बातें करती होंगी और वो जाट दिमाग वैसे हे पैदल है जो जख्म तक ऐसे देता है जो कपडे में ढके रहे.", अब जैसे ये तीर अनजाने में हे सटीक निशाने जा लगा था जिसने दीपा भाभी का सर झुका दिया. बहोत देर तक उनकी ख़ामोशी अर्जुन से सेहन न हुई तोह वो उठने लगा जिस पर गीले चेहरे वाली दीपा भाभी ने गुजारिश अंदाज से उसका हाथ थाम कर बढ़ते कदम वही रोक लिए.

"तुम्हारे दिलबाग भैया? वो देख कर इसलिए मारते है की बहार उनका नाम और नक़ाब न खराब हो. निम्मो हुई तोह मैं बहोत खुश थी की अब मेरा सचमुच हे एक परिवार बन्न गया है जिसमे काम से काम ये पारी साथ है चाहे तुम्हारे दिलबाग भैया बस अपने मतलब से हे मेरे पास आते हो जो आना बंद हो गया था उसके होने पर. जहा मैं खुश हुई थी वही घर से बहार ख़ुशी का दिखावा करने वाले तुम्हारे भैया ने मुझे सिर्फ प्रताड़ना दी लड़की पैदा करने पर. फिर भी सब ठीक था और मीठी जुबान दिखा कर इन्होने फिर से कोशिश की लेकिन इस बार गर्भ ठहरने के बाद शहर में पैसे दे कर जांच करवा ली की लड़का है या लड़की. लड़की थी जिसको 20 हफ्ते बाद इन्होने गिरवा दिया. हालत क्या हुई थी मेरी जो दिल से भी टूटी और जिस्म से भी? और सुन्न न चाहते हो? निम्मो स्कूल जाने लगी थी और एक बार फिर उन्होंने वही सब दोहराया, वादा किया की जो होगा मंजूर लेकिन बचे 2 होने चाहिए. कुछ का कुछ बता कर फिर से जांच करवा दी लेकिन मुझे बताया नहीं. ताक़त की दवा बता कर फिर से गर्भ गिरवा दिया मेरा और 10 साल से मैंने उन्हें अपने करीब न आने दिया अर्जुन. अब जाने किसकी बातों में आ कर ये बदचलन तक बताने लगे मुझे, तुम्हारे दिलबाग भैया. कितनो के साथ मेरे नाम जोड़ दिए क्योंकि ये खुद दूसरी बस्ती की लड़कियां पैसे से खेत लाने लगे. तुम्हे लगता है तुमने उन्हें खेत में बंद कर रखा है, ऐसा वो खुद चाहते थे और महीने में 25 रात पहले भी वो वही तोह रहते थे. अरे मेरा हाथ है क्या इसमें की मुझे लड़का पैदा न हुआ? खून मेरा बहा 2-2 बार और अपने अधूरे बचे के टुकड़े मैंने देखे. जिस्म का दर्द तोह साल 6 महीने में चला जाए पर आत्मा पर जो 2 निर्दोष मौत का दुःख है वो तुम दूर कर सकते हो? अब कितना घिरी रहो मैं यादों में और इस शमशान में? इसलिए बहार कड़ी रहती हु या हंस बोल लेती हु जान पहचान में. तुमने तोह बहुतो के दुःख दूर किये और मेरा इतना मान करते हो, कर सकते हो अतीत साफ़? बदल सकते हो उस जानवर को जो सबकी नजरो में गाँव का सम्मान और मेहनती है लेकिन उस हत्यारे और अय्याश इंसान का सच कोई नहीं जानता. सबके दुःख दर्द दूर कर सको, भगवन नहीं हो तुम.", दबी आवाज में अपना हाल सुनती हुई वो निरंतर आंसू बहा रही थी जबकि अर्जुन तोह किसी मूरत सा बस अपनी जगह हे जम्म चूका था. उसको ऐसे जड़ देख कर दीपा भाभी ने हे खड़े होते हुए उसका सर सहलाया.

"कांच के घर अक्सर भीतर से खाली होते है अर्जुन, दुनिया को दिखने के लिए उन्हें ऐसा बनाया जाता है. दिलबाग और मैं ठीक वैसे हे है, दोनों कही न कही एक जैसे जिनका सच अब सिर्फ तुम जानते हो. और मैं ाचे से जानती थी की तुम एक नरम दिल इंसान हो जो सबके साथ ख़ुशी में शामिल न भी हो लेकिन दुःख.. तुम्हे दुःख दूर करने की एक बहोत गलत बीमारी है. या तुम्हे खुद दर्द पसंद है जैसे अभी तुम दर्द में हो सिर्फ मेरा सच जान ने के बाद. बस इसलिए हे वो तंज या बातें कह रही थी जिस से तुम खुद मुझसे दूर रहो."

"अब जुड़ गया हु भाभी और वैसे तोह मैं पहली बार आपको देखते हे जुड़ गया था आपसे लेकिन दिलबाग भैया ने ठीक नहीं किया, बहोत गलत किया है उन्होंने और ..."

"और तुम कोई सजा नहीं दे सकते ऐसे मामले में जिसकी गवाह और भुगतने वाली हे उसको मान ने से इंकार कर दे. कुछ कर सकते हो तोह मुझसे दूर रहना है बाकी मुखिया हो तोह उस तौर पर अपने भैया या मुझे कैसे भी दण्डित कर देना.", अब ये बाण अर्जुन पर असर नहीं करने वाले थे जिन्हे चला कर वो उसको अपने से दूर करना चाहती थी.

"जख्मो पर मलहम लगाने के साथ उन्हें देने वाला जब तक खुद आपसे माफ़ी न मांग ले, तब तक अर्जुन गाँव से तोह क्या आपसे भी दूर न होगा. दूर आप किन्ही और कारणों से भी रहना चाहती है लेकिन वो उतना गंभीर मुद्दा नहीं भाभी. िचाये और प्रेम हे इंसान को इंसान बनाते है. कल दिल में आपका अर्जुन आएगा रोटी पर और सिर्फ हाथ से नहीं गॉड में बैठा कर खिलाना होगा. सवेरा होने वाला है, अपने तीरो पर ाचा ज़हर लगाना लेकिन व्यर्थ हे जाने वाला है वो. अभी तक हाथ थामे हो न मेरा तोह दूर कैसे जा सकता था.", दीपा भाई के गाल को दूसरे हाथ से साफ़ करता हुआ वो अब उनके सामने हे था बिलकुल करीब और उसकी बात सही थी की भाभी का पहले वाला हाथ उसके हाथ को पकडे था और दूसरा उसके कंधे पर. अर्जुन की इतनी गहरी बातें और घर आने का ऐसा न्योता खुदसे देने में हे वो उलझी थी की अर्जुन ने उनका माथा चूम लिया.

"कांच के घरो वाली कहावत बदल लीजिये. अक्सर घरोंदे मिटटी के भी खूबसूरत होते है लेकिन उन्हें देखने के लिए भीतर जाना पड़ता है जैसे मैं आया.", ये बात अर्जुन ने इतने धीमे कही थी की दीपा भाभी ने उसके होंठो का एहसास अपने चेहरे के करीब पाया. चेहरा उठती हुई उसको अपलक देख रही थी लेकिन दिल की अनकही हसरत काबू से बहार जाती हुई अंतत में उसके होंठो से होंठ जोड़ बैठी. सब इतना जल्दी हुई की अर्जुन के जवाब देने से पहले हे वो अलग हो कर भीतर की तरफ कदम बढ़ा चुकी थी.

"भाग लीजिये, अपने हे घर के एक और कोने में लेकिन मेरे जाने के बाद मुझे ज्यादा करीब पाएंगी भाभी. दोपहर का इन्तजार रहेगा फिर सजा सोच लीजियेगा अपनी गुस्ताखी या चाहत की.", अर्जुन जैसे आया था वैसे हे दबे पाँव यहाँ से निकल कर हवेली चल दिया. जाने अब किसकी और कितनी सजा मुकर्रर थी दिन चढ़ते हे.
 
देवकी को क्या सजा मिलेगी और क्या वो समाज की नजरो में आएगी?
 
अपडेट 207

सजा (बी)

"आज तोह तू बड़ी सवेरे हे नाहा लिया? कसरत करने नहीं जा रहा क्या आजकल?", आँगन में जिस समय उमेद और रामेश्वर जी सोये हुए थे और कूलर की आवाज में अर्जुन के नहाने का उन्हें पता तक न चला, कौशल्या जी हलके रंग की साड़ी में गलियारे से आँगन तक चली आयी थी. साढ़े 4 बजे अर्जुन नाहा कर अब शरीर पांच रहा था.

"कसरत तोह छत्त पर हे कर ली थी दादी लेकिन आप खुद आधा घंटा जल्दी हो आज. वैसे नींद नहीं आयी न आपको सही से?", अब बदले में वो बस मुस्कुरा कर उसके सर पे हाथ फेरती हुई पशुओं से विपरीत दिशा वाले हिस्से में चली गयी. इधर भी एक तुलसी का पौधा ककोर गमले में लगाया गया था जहा dhoop-deep सबकुछ एक खाने में सुरक्षित था पर इसमें जैसे सिर्फ सांझ ढले हे दिया होता था और वो भी अनामिका द्वारा. ये एक नियम था जो मोतीलाल जी की धर्मपत्नी ने अपनी दोनों बहुओं को सौंपा लेकिन देवकी जैसे इस छोटे से नियम को बरकरार न रख सकीय या आस्था नहीं थी उसकी. अर्जुन अपने कमरे में दाखिल हुआ तोह पूर्णिमा जी भी वह नहीं थी, मतलब वो दूसरे स्नानघर में त्यार हो रही थी. साफ़ टीशर्ट जीन्स पहन कर जब तक वो बाल व्यवस्थित कर रहा था नर्स द्वारा गेट पर दस्तक देने से उसके हाथ रुक गए. ये बेचारी भी ढंग से न सो सकीय थी और इतनी सुबह जाएगी तोह सिर्फ मुँह धो कर हे इधर चली आयी.

"जी आ जाइये अंदर. जरुरी बात है कोई संजीदा जी?", नर्स और उस सुरक्षा पेहरि को अर्जुन हे लाया था तोह दोनों के नाम और जरुरी जानकारी उसको पहले से थी. जब कल वो यहाँ आयी थी तोह अभी तक अपने उन्ही वस्त्रो में थी, आसमानी सलवार कमीज. सफ़ेद कोट गर्मी और घर की वजह से आवश्यक नहीं था लेकिन तक़रीबन 25-26 वर्ष की संजीदा कंधे तक तराशे बाल और आकर्षक चेहरे मोहरे वाली अंतर्मुखी युवती थी. नर्सिंग जैसे निरंतर गतिमान जीवन की आदि होने के कारण अलसाये समय भी एक अलग हे स्फूर्ति थी संजीदा के चलने और शारीरिक भाषा में. हॉस्पिटल महल के ट्रस्ट से बना था और यही नर्स सौंदर्य जी के मासिक स्वस्थ्य की जाँच करने के लिए नियुक्त थी. पर इस वक़्त अर्जुन उसको देखने की बजाये बिस्टेर के किनारे बैठा जुराबे पहन रहा था. या वो जानबूझ कर ऐसा दर्शा रहा था उसके कंधे से बहार झलकती सफ़ेद पट्टी की वजह से.

"पेशेंट रात में आराम से सोई थी और उन्हें फ्रेश करवा दिया गया है. क्या उन्हें फिर से नींद की दवा देनी होगी? डॉक्टर्स के हिसाब से ये सेहत के लिए बिलकुल भी ठीक नहीं है लेकिन मुझे आपके ऑर्डर्स मान ने की हिदायत दी गयी है तोह जैसा आपक कहेंगे वैसा हे होगा."

"वैसे सेहत का तोह कोई मसला नहीं है लेकिन उन्हें चाय बिस्कुट देने के बाद सोने मैट देना. बैठिये आपकी भी चाय आ गयी है. चची जरा एक चाय और कुछ बिस्कुट भिजवा देना छोटी दादी की तरफ. लाली की मम्मी ले जाएंगी, आप मत जाना.", अर्जुन ने कुर्सी पेश करने के बाद आगे बढ़ कर अनामिका चची से वो ट्रे ले ली जिसमे उसके लिए दूध और नर्स के लिए चाय थी. दोनों चीजों के साथ अपनी खुराक और नर्स के लिए बिस्कुट छोटे से मेज पर रख कर उसने ट्रे वापिस पकड़ा दी. अनामिका चची तोह नाराज होने के बावजूद खिले गुलाब सी महक रही थी जिन्हे बस अर्जुन ने इशारे से हे माफ़ी मांग कर विदा किया.

"आप कुमार है या मुखिया? सॉरी ये सवाल मेरे काम का नहीं है बस.."

"अर्जुन.. सिर्फ अर्जुन और आप यही कहेंगी, बिना आप लगाए. महल वाले थोड़ी ज्यादा िज्जात्त देते है बचे की तरह और इस हवेली से बहार गाँव वाले अपने मुखिया की नजर से देखते है क्योंकि मेरे padd-dada जी जैसा दीखता हु. स्टूडेंट हु और घर का सबसे छोटा.. वैसे मुझसे छोटा चची का बीटा है लेकिन वो तोह .. आपके सामने हे है.", अर्जुन के इस तरह के स्पष्ट और मिलनसार रवैय्ये को देख संजीदा को कुछ रहत मिली क्योंकि कल से हे वो किसी par-niyantrit मशीन सा मान रही थी खुदको और कल अर्जुन से बात करने का अवसर भी नहीं मिला था.

"जी समझ गयी और चाय के लिए आपका धन्यवाद. वैसे मुझे ये नहीं बताया गया की यहाँ कितना समय रहना पड़ेगा. पेशेंट तोह स्वयं चलने फिरने के लायक है.", संजीदा ने चाय की घूँट ली तोह पाया की शहर में हॉस्पिटल वाली चाय और यहाँ घर के तजा दूध की चाय में कितना फरक रहता है. अर्जुन वो काले छोटे लड्डू अब आदत पड़ने पर सही से चबा चबा कर खाने लगा था.

"आपको अभी कहा की मैं अर्जुन हु और आप मुझे बस नाम से हे बुलाये. सिर्फ पेशेंट के लिए तोह आपको यहाँ नहीं लाया गया संजीदा जी. कुछ तोह बताया गया होगा महल से अमृता जी ने?", अर्जुन दूध की घूँट लेने के बाद लड्डू रख कर जैसे कोई जरुरी चर्चा करना चाहता था.

"मम ने तोह बस यही कहा था के जैसा आप.. मतलब तुम कहोगे मुझे वैसा हे करना है. हॉस्पिटल में मेरी उतनी जरुरत नहीं है क्योंकि सैलरी मुझे उनके यहाँ से मिलती है."

"क्सक्सक्सक्स नर्सिंग इंस्टिट्यूट बंद हो रहा है शहर में अगले साल. और कल यहाँ नीव राखी जाने वाली है महिला कॉलेज की जिसमे आपको सेवाएं देनी होंगी. मुझे पता लगा था के आपकी पढ़ाई लिखे तक महल के संरक्षण में हुई है और जिधर फिलहाल आप रहती है उस से बेहतर के हक़दार है. फैंसला आपको हे करना है संजीदा जी मैं सिर्फ प्रस्ताव रख रहा हु और इसमें महल की तरफ से कोई दबिश या एहसान जैसा कुछ नहीं है. आपने आदुनिक शिक्षा ली है और मेहनती भी है. कॉलेज में ये एक अलग डिपार्टमेंट रहने वाला है जिसका सञ्चालन एक वर्ष बाद शुरू हो जाएगा. 8 से 5 की नौकरी, अवकाश के दिन अवकाश और रहना खाना आपका यहाँ हवेली पर. जब शादी कर के अलग घर बसना चाहे तोह इस घर की बेटी सा हे सम्मान मिलेगा लेकिन अमृता जी ने मुझे बताया था की नर्स कॉलेज के लिए आप मानेंगी नहीं और शादी तोह आप करना हे नहीं चाहती. फिर भी अगर आप इस प्रस्ताव को कबूल करती है तोह आपकी लाजमी शर्ते स्वीकारी जाएंगी.", एक हे बार में अपनी पूरी बात ख़तम करके अर्जुन फिर से बचा हुआ दूध ख़तम करने लगा उस आधे लड्डू के साथ. संजीदा हैरत में थी की उस जैसी एक नर्स को ये सामने बैठा युवक कितने आराम से इतना बड़ा प्रस्ताव दे रहा है जिसमे वो उसकी सही शर्ते तक मान ने को तैयार है.

"कल भूमि पूजन होने वाला है कॉलेज का?"

"जी."

"जमीन पर जाने के बाद विचार कर लेंगे. वैसे मुझे इतना ख़ास बनाने के पीछे जरूर मकसद होगा. और बात यहाँ मेरी हो रही है तोह जान ने का हक़ तोह जरूर बनता है मेरा.", अब अर्जुन ने हलके से गर्दन हाँ में हिलाई. चेहरा करीब रखे तोलिये से साफ़ करके अब अर्जुन ने थोड़ी गंभीरता से कहना शुरू किया.

"आपने उस समय अपने माता पिता को खोया जब बचो को समझ तक नहीं होती लेकिन चिकित्सा के अभाव में उनका इस दुनिया से जाना कितना असरकारक था की आपने उस पेशे को चुना जिसके बिना बड़े से बड़ा डॉक्टर अधूरा रहता है. असल में तोह मरीज और जख्मी व्यक्ति ठीक हे नर्स की म्हणत से होता है जो उसका ध्यान रखने के साथ डॉक्टर को भी सचेत रखती है. स्वाभिमानी है जो हॉस्पिटल से 20 लेने की जगह महल से 12 हजार लेती है, 8 हर महीने अपनी पढ़ाई के खर्चे के कटवा कर. वो रकम पूरी हो चुकी है कब की लेकिन रानी माँ से तोह अभी भी आप उनकी मासिक जांच के बदले एक नया पैसा नहीं लेती. 12 घंटे की शिफ्ट कई बार बढ़ जाती है जिस से इंकार भी नहीं और 6-7 बचो को पढ़ना नियम है, जो आपकी तरफ हे रहते है. मकसद तोह आपका है न संजीदा जी, मैं तोह बस माध्यम या जरिया बन्न कर खुश हु. मुख्या कॉलेज में सिर्फ 2 संकाय होने वाली थी पहले, इंजीनियरिंग और सामान्य कॉलेज लेकिन कुमारी अमृता जी ने सुझाव दिया की ज्यादा दिक्कत नहीं आएगी अगर उतनी बड़ी जगह में कुछ सिर्फ नर्सिंग के लिए प्रयोग में ली जाए. वैसे भी हर कोई डॉक्टर नहीं बन्न न चाहता और यहाँ के तक़रीबन 7 गाँव से हे 80-85 लड़कियां हर साल इस पेशे में जाने के लिए नर्स का प्रशिक्षण लेने के लिए बहोत दुरी तये करती है. बाकी जमीन पर जाने के बाद विचार कर लेंगे.", अर्जुन बहार अपनी दादी को किसी से बात करते सुन्न कर उठ खड़ा हुआ था और तबतक लाली हे तेज कदमो से चलती कमरे में आयी और झूठे बर्तन लिए चली गयी. गुड मॉर्निंग उसने दोनों से कहा था.

"जी.", संजीदा के चेहरे पर कृतज्ञता के भाव थे जो मरीज को देखने का बोल कर अर्जुन से पहले हे चली गयी. अर्जुन भी जूते पहन ने के बाद बहार आया तोह दादी के पास पहुंचने से पहले चची ने उसका नया रुमाल, बटुआ और घडी पकड़ा दिए. वो वापिस रसोई में चली गयी थी और बचा अब पूर्णिमा जी के पास था.

"ये कुछ सामान है बीटा जो मुझे चाहिए. क्सक्सक्सक्स पंसारी 6 बजे खुल जाता है पुराने मोहल्ले में. उमेद तुझे ले जाएगा और फिर इसने वापिस निकलना है.", उमेद चाचा को इतनी सुबह नाश्ता करते देख अर्जुन समझ गया था के वो भी जल्दी में है जो थोड़ा लेट हो चुके है शायद.

"नहीं मैं हे ले आऊंगा दादी, चाचा पहले हे लेट हो चुके है. 4 बजे निकलने वाले थे और अब साढ़े 5 बज गए है. मेरे साथ डेढ़ घंटा लगाने की जगह इतने समय में तोह आधी से ज्यादा दुरी तये कर लेंगे ये अपने सफर की. वैसे मुझे संजीदा जी को भी छोड़ने जाना था वापिस अगर उनका काम नहीं है इधर.", अर्जुन ने अपने चाचा के हे करीब बैठ कर वो कागज़ पढ़ने की कोशिश की तोह 3 हे नाम थे उधर जिनकी समझ उसको जरा भी नहीं थी. संजीदा अपना नाम सुन्न कर एक बार ठिठकी लेकिन फिर पिछले हिस्से में बने स्नानघर की तरफ लाली के साथ चली गयी.

"हाँ इसको खुद भी थोड़ा शहर के गली मोहल्ले पता होने चाहिए. वैसे भी उमेद को सचमुच देरी हो गयी लेकिन इसका जिम्मेवार ये खुद है जो अलार्म बंद करके सो गया था वापिस.", रामेश्वर जी ने टांग खींचनी चाहि थी पर उमेद प्लेट एक तरफ रख कर वही बैठे बैठे लौटे से हाथ जमीन की और धोते हुए हंस कर सच बताने लगा.

"इन्होने हे कहा था चची के ये ghun-ghun बंद कर दे भाई, 2 घडी और सोने दो. हाँ हवा ाची लग रही थी इसलिए नींद बढ़िया आयी. चलो भतीजे श्री अब हम विदा लेते है.", उमेद ने खड़े हो कर सबसे पहले पंडित जी का हे आशीर्वाद लिया और फिर अपनी माँ और चची से गले मिलने के बाद अनामिका के बेटे, आँचल और आखिर में लाली को आशीर्वाद देता अपनी जीपनुमा बड़ी कार से निकल चला. चची ने अपने ससुर जी का भी नाश्ता लगा दिया था जिसको कौशल्या जी हे परोसने लगी.

"तोह आप लोग अब क्या करने वाले है?"

"नाश्ता देख कर भी पूछ रहा है?", कौशल्या जी उसकी बात समझकर भी नजरअंदाज करती हुई बोली.

"सही है. और नाश्ते के बाद दादा जी बगीचे में पानी देंगे और आप अपना नाश्ता करने के बाद निकेतन की मालिश. फिर कपडे धुलवाने का काम करना होगा और बाद में छोटे दादा जी और चाचा लोग आ जायेंगे तोह उनके खाने की तैयारी होगी?", अर्जुन उठ कर अपनी रानी को देखने लगा तोह ध्यान आया के वो तोह जग्गी भाई के घर है. अब यहाँ सफारी थी और वो जीप जो मोतीलाल जी का उसको उपहार थी. जीप को देखते हे उसको उनके पत्रों की याद हो आयी लेकिन अभी उन्हें पढ़ने का सही समय नहीं था. कौशल्या जी बड़े ध्यान से अपने पौटे को देख रही थी जो आज मीठे तंज करने के बाद स्वयं उलझन में था.

"मुझे थोड़ा समय अकेले में देवकी से बात करनी है और विनोद थोड़ी देर तक पहुंचने हे वाला है अपने पिता को वही छोड़ कर. उसके सामने बात करना ज्यादा बेहतर होगा. नर्स बिटिया तुम्हारे साथ जा रही है और तुम्हारे दादा जी अपनी प्यारी भाभी और अनामिका बिटिया को दरगाह लेके जा रहे है, आँचल और लाली भी जाएंगी. इतने मेरी बात हो जायेगी जिसके बाद तुम खुद मेरा फैंसला देख लेना, सजा के साथ.", अर्जुन सब सुन्न कर अपने दादा की तरफ देखने लगा जिन्हे उनकी पत्नी ने हे ऐसे वक़्त में घर से बहार हे रहने का मश्वरा दे दिया था, आदेश जैसा.

"हवेली में उनके पास आप अकेली.."

"मेरी चिंता न कर बीटा तू. जिन औलादो से दुनिया खौफ खाती है न उन्हें पैदा करनी वाली मैं कोई अबला बुढ़िया नहीं हु. बस उस समय में मैं थोड़ा अपने तरीके से बात करना चाहती हु. सेवक, दरवाजा वापिस खोल दो. ये विनोद हे आया होगा.", कौशल्या जी का कथन सही था क्योंकि ये एस्टीम कार विनोद की हे थी जिसके साथ दामिनी भी आयी थी, पिछली सीट पर अकेले बैठ कर. कार से उतरने के बाद दामिनी की चाल में वो हलकी लड़खड़ाहट देख सिर्फ अर्जुन हे मंद मंद मुस्कुराया और वो अपने ताई ताऊ जी से मिलने के बाद जब इधर आयी तोह उसके चरण स्पर्श करते अर्जुन की कुटिल मुस्कान ने नजरे झुकवा दी. विनोद भी पूरे शिष्टाचार से मिला था सबसे और संजीदा के आते हे अर्जुन निकल चला यहाँ से विनोद की हे एस्टीम कार लिए. उसके चाँद मिनट बाद हे रामेश्वर जी बाकी लोगो के साथ हवेली से बहार थे जिसके कपाट सेवक को बहार से बंद करके उधर हे पहरे पर रहने के आदेश स्वयं कौशल्या जी के थे.

"सही किया जो दामिनी को साथ हे लेता आया. रौशनी का इस सबसे कोई लेना देना नहीं था तोह उसका दूर रहना हे भला है. मैंने तुझमे और Raju-Shankar या इन्दर में कभी फरक नहीं किया लेकिन यहाँ बात तेरी माँ की है इसलिए तेरी जानकारी में सब होना जरुरी है बिनोद. और ये जो तेरे साथ है माँ तोह वो इसकी भी है चाहे इसके साथ ममता वाला कोई काम न किया हो देवकी ने. अपनी माँ के सामने बैठने की हिम्मत रखेगा?", कौशल्या जी ने बड़े स्नेह से विनोद के सर पे हाथ फेरा था जिसकी आँखों में कही कही हल्का तरल जमा हो चूका था जैसे वो भी बहोत कुछ जान गया हो.

"जी ताई जी.. वैसे दिल मेरा भी कमजोर नहीं और उधर शादी के बाद से हे असली माँ की पहचान हो चुकी है मुझे. बस मैं ये देखना चाहता हु अपनी नजरो से इसलिए मैंने जिद्द की थी आने की. दीदी शायद न झेल सके सारा सच."

"कुछ नया तोह नहीं होने वाला और इसको भी तोह पता चलना चाहिए की ये सजा की हक़दार क्यों नहीं है. चल वो कुर्सी उठा ले.", दोनों हे सर झुकाये इस कमरे में आ चुके थे जिसका दरवाजा कौशल्या जी ने खोला था. भीतर देवकी को चाय नास्ता करवाने के बाद हे कलाई की और से बिस्टेर की पुष्ट पर बांध दिया गया था. आज वो हवेली की बड़ी अम्मा या मुखिया हवेली के भीतर हे क़ैद थी. मुँह से चुन्नी ढीली करने के बाद कौशल्या जी हे उसके सर के करीब कुर्सी खिसकती आ बैठी. दामिनी दरवाजे के करीब हे कड़ी थी लेकिन विनोद अपनी ताई के करीब दूसरी कुर्सी दाल कर आ बैठा. देवकी प्रताड़ित नजरो से इन सभी को ख़ामोशी से देखती रही जैसे कुछ बोलना चाहती हो लेकिन क्या कहे बस यही समझ नहीं आ रहा था.

"तोह पूरा दिन हे आराम कर लिया तुमने देवकी. अब जुबान का लकवा भी ख़तम हो गया होगा तोह बातचीत की जा सकती है? घर में सिर्फ यही दोनों है तुम्हारे और मेरे सिवा. इनमे से किसी को मजबूर कर दो की ये मुझे यही मार दे और तुम इनके राज राज हे रखोगी.", कौशल्या जी का पहला हे तीखा वार देवकी की चुप्पी टॉड गया.

"तुम भी दूध का धूल न हो जीजी चाहे खुदके हाथ खून न लगने दिया लेकिन औलादे तुम्हारी ज्यादा अपराधी और हत्यारी है. जिस शंकर की तुम हुंकार भर्ती हो न.."

"उसको पालतू बनाने के लिए तुमने इतना नीच काम किया देवकी की मैं खुदखुशी कर लेती वैसा सोचने से पहले हे. तुम क्या समझती हो की मैं गांधारी हु जिसकी आँखों पर putra-prem की पट्टी बंधी है और बाकी दुनिया न दिखती? जिन्हे तुम अपराधी बता रही हो वो परिवार के रक्षक है जिनका दिल आज भी मासूम है जो तुम जैसी चरित्रहीन और जहर भरी दुमुंही औरत के भी झांसे में आ जाते है. थोड़ा उस से पुराने किस्सों से शुरू करे देवकी?", कौशल्या जी की बात का स्पष्ट अर्थ था की शंकर और दामिनी के प्रथम मिलान का सच उन्हें पता था और वैसा करवाने वाली देवकी थी ये भी, जो शंकर और दामिनी को भी नहीं पता था क्योंकि उन्हें तोह वो सब एक हादसा हे लगता था. लेकिन देवकी अपनी चाल में मोहरा कटवा बैठी थी.

"मेरी जान नहीं ले सकती तुम कौशल्या और वैसा तुम्हारे ससुर भी न कर सके थे. प्रतिष्ठा, समाज में ये ऊँचा नाम और तुम्हारा हद्द से ज्यादा कमजोर दिल कुछ करवा नहीं सकता. हादसे में मरवा डौगी मुझे? लेकिन कल से हे तुम्हारे उस संसार के तोह बुरे दिन शुरू हो चुके है. कभी भी दुर्घटना हो सकती है.", देवकी के तेवर देख कर कौशल्या जी ने बॉस ना में गर्दन झटकी जैसे वो जानती हो के ये औरत कही ज्यादा हे अड़ियल है.

"चंद्रो की हवेली तोह तू खा गयी और उस से पहले अपने saas-sasur को. उस से जी न भरा तोह शंकर को मारना चाहा लेकिन बचा गया वो उपरवाले के करम से. तुझे भी समझ आ गयी थी की ऐसे तोह पार न प् सकती इसलिए पहले इस बिनोदिये को इसके ताऊ की नजरो में बुरा बनवाया तुमने वो ढील दे करके और उलटी सीधी सांगत में शामिल करवा के. ये घर से बहार न जाता था लेकिन तूने बिगड़वाया जिस से बचो में मतभेद हो और उनका वचन टूट जाए. भूल गयी थी तू की उधर रामेश्वर शर्मा मुखिया नहीं है उनकी बीवी है जिसकी वजह से तेरी कोख से मेरा भतीजा पैदा हुआ. मेरा संसार तेरे किसी तांत्रिक या अनैतिक सम्बन्ध रखने वाले भाई की जागीर नहीं जो वो एक मुठी मिटटी भी वह से उठा ले. हथेली समेत हाथ वही गिरा मिलेगा ऐसा दुस्साहस करने वाले का. और अब इधर के वचन भी ख़तम हुए तोह आ बैठा न तेरा काल तेरे सीने पर. खेल तू रही थी लेकिन मेरी नजरो से बहार तोह तू इस घर की देहलीज में आने के बाद कभी हुई हे नहीं. लाजवंती के साथ मिल कर तुमने हे मेरे बेटे का घर वह न बसने दिया था न जहा वो चाहता था? ाचा किया तूने काम से काम वो काम बहोत बढ़िया किया. वेश्या प्रचलन और शाही शौक अब मर्यादित नहीं कहलाता. वैसे औलाद तोह तू भी कोठे की हे थी लेकिन तेरी माँ गले पड़ गए धनपत के और वो बेवकूफ ghar-baar छोड़ कर दिन में दूधिया और रात को दल्ला बन्न गया, तेरी हे माँ का. कोख खराब नहीं होती देवकी, शिक्षा और माहौल देने वाला खराब या सही होता है. फिर ये बचे गुनेहगार कैसे हो सकते है क्योंकि सब करने धरने वाली तोह तू है और तेरा भाई. माँ भी हो सकती है लेकिन भगवान् उसकी आत्मा को शांति दे.", अब देवकी की छटपटा रही थी जिसके ढीले होते हाथ को दामिनी ने कास के पकड़ लिया और वापिस मजबूती से कपडा बाँध दिया. उसकी खुदकी आँखें अब आग उगल रही थी.

"तू बहोत गलत सलत बोल रही है कौशल्या. मेरे हाथ खुले होते तोह तेरी जुबान के साथ गर्दन अलग कर देती. इस गाँव के सामने यहाँ के मुखिया और उनकी शौकीनी का नंगा सच बताने से मुझे तू भी न रोक सकेगी अब. मैं बिना लाडे सिर्फ अपना हक़ ले रही थी लेकिन न मेरे खसम के बाप ने मुझे लायक समझा और न वसीयत ने मेरे हिस्से कुछ दिया. तेरे बराबर आयी थी इस घर में लेकिन काम करती कमर तुड़वाती मैं रही. इस विनोद के लिए तेरी एहसानमंद थी लेकिन तेरा घमंड आसमान से ऊँचा था न अपनी औलादो के लिए तोह मैं क्यों न उसका पतन करू? मेरी जगह आ के देख और मेरी माँ को वेश्या बोलै न तूने तोह उसको वेश्या बनाने वाला कौन था? ये raaj-gharane हे थे जहा वो काम उम्र में पेट से कर दी गयी और मेरे बाप ने उसको सहारा दिया. सब के सब दोष तुम्हारे है लेकिन अपराधी हम जैसे कमजोर तबके के लोग. फिर क्यों न बदला लू मैं और उस पर से बस हर वक़्त तुम्हारा और तुम्हारी परवरिश का गुणगान. खसम ऐसा मिला जिसके पास किसानी के सिवा कुछ नहीं और उसका हिसाब तक उसका बड़ा भाई लेता रहे.", देवकी जो भी कह रही थी वो भड़ास थी उसकी और जो दिमाग में बचपन से भरा गया वो सब.

"आपने कौनसा फिर सही राह पकड़ ली माँ जो अतीत की दुहाई दे रही हो? अपनी हे बेटी को ब्लैकमेल करती रही और कितने हे काम बनवाये कई घर उजड़वा कर आपने. उस से दिल न भरा तोह अपने हे छोटे भाई की गॉड में बैठा दिया बिना कपड़ो के. क्या आपका भाई आपके साथ यही सब करता था? और इसलिए दादा जी आपको उधर जाने नहीं देते थे और वो इधर नहीं आते थे? लेकिन मिलती तोह रही फिर दादा जी की मिर्त्यु के बाद. वो तोह बिनोद न आया मेरी बात में और अर्जुन ने खुद से वो काम कर दिया जो आप करवाना चाहती थी. भेजा तोह आपने मुझे भी उसके पास था कैमरा ले कर लेकिन वो तोह मेरे साथ साथ आपको भी जान चूका था के हम दोनों हे उसकी माँ के अपराधी है. मुझे तोह उसने सिर्फ इतना कहा के मैं तुम्हारी क़ैद में हु लेकिन तुम्हारे पर वो खुद क़तरेगा. हो गया न सब ख़तम अब और हमारा भी जीवन बर्बाद कर दिया आपने!", गुस्से में भी दामिनी की आँखों से आंसू बह रहे थे जिसने फल काटने के लिए रखा वो चाक़ू हे उठा लिया था जिसका हाथ कौशल्या जी ने मजबूती से थाम लिया. बूढी हड्डियों में कितनी ताक़त होगी इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है की दामिनी की कलाई दबा कर हे उन्होंने चाकू गिरवा दिया था.

"बेवकूफ तुझे किसी ने दोष दिया क्या? मैं कह रही हु की बिनोद और तू खुद इसका शिकार बने जिन्हे दुनिया की समझ हे नहीं थी. कच्ची मिटटी को जैसे अकार में ढाल दो लेकिन कसूर कुम्हार का होता है. शुक्र है की ये उतनी कुशल नहीं थी की इन कच्ची हांडियों को पका पाती. हो गया जितना गलत होना था और मेरे हाथ बंधे थे उस समय. अब नहीं बंधे और ये भी ठीक कहती है की मैं इसको मौत नहीं दे सकती फिर चाहे इसके हाथ कितने हे खून से मैले हो. लेकिन अब मेरा ये बचा सही रास्ते पर है और तेरे सामने भी पूरा जीवन पड़ा है अभी. देख देवकी मैं जान लेने देने में यकीन न पहले रखती थी और न आज. तू चाहे जहा से भी आयी लेकिन है तोह तू इस परिवार का हे हिस्सा. गलती मान कर बस लाजवंती और तेरे बाबा का पता बता दे, तुझे सही तरह ज़िन्दगी जीने का मौका मैं देने को तैयार हु. हाँ इस हवेली में नहीं रहेगी तू फिर.", चाक़ू अब विनोद ने उठा कर एक तरफ रख दिया था, जिसका खुदका चेहरा आंसुओं से भीगा दिखा. कौशल्या जी अब देवकी की बगल में आ बैठी थी जो उन्हें भरपूर घृणा से हे देखती रही.

"मतलब तुम नहीं बोलने वाली? वैसे मीणा अर्जुन के हे कब्जे में है और जिन्हे तुम हत्यारा अपराधी बता रही थी बात उन तक गयी तोह वो फैंसला वही करेंगे जो मैं नहीं चाहती. फ़ोन तोह तुम्हे भी एक और छुपा रखा था अपने कमरे में जहा से मीणा के साथ रात में 3 बजे तुम 2 हे जगह बात करती रही हो जैसा मीणा ने अर्जुन को बताया. तुम खुद को मजबूर दिखा डौगी तोह मैं तुम्हारे पक्ष में बात कर सकती हु लेकिन ये सच तुम्हारे सामने है की सब किया धरा तुम्हारा है और लड़कियों अगवा करने जैसा घृणित कार्य भी. कानून उस मामले में तुम्हे लम्बे समय तक भीतर रखेगा और इस उम्र में सजा तोह न झेल सकोगी.", ये जैसे आखिरी दांव था कौशल्या जी का लेकिन देवकी जैसे हाथ कर हे चुकी थी की ये लोग बस उसको डरा धमका सकते है लेकिन कुछ कर नहीं सकते.

"जा बेटी 2 कप चाय बना ला और विनोद तू अपना चेहरा धो कर थोड़ा आराम कर ले. अब ये यही चाहती है तोह तुम्हारे ताऊ जी फिर पुराने केस और तुम दोनों के साथ अर्जुन मीणा का ikraar-nama भी लिखवा लेंगे. रेखा बयान तोह देगी हे और वो लड़कियां जो अर्जुन ने बचाई है. इतना तोह रसूख बचा है की पहली सुनवाई में हे इसको 10 साल भीतर भेज दिया जाए. होगा नाम खराब तोह कोई गम नहीं, लोग इसको भी उद्धरण हे लेंगे की पंडित जी ने न्याय के लिए अपने छोटे भाई की बीवी तक को सलाखों के पीछे भेज दिया. जा बिटिया फिर अर्जुन भी आता होगा.", इस सब बातचीत और खुलासो में हे 7 से ऊपर वक़्त हो चला था. दामिनी अपनी ताई की इत्छा से थोड़ी अचंभित थी की वो ऐसे माहौल में भी चाय मांग रही है लेकिन सवाल करने की जगह वो चेहरा पौंछती हुई बहार चली गयी और विनोद भी. पशुओं वाले बाड़े की तरफ जा कर वो मुँह धोने के बाद आवेश में सिग्रत्ती पीने लगा था, सबसे आउट में रह कर.

.

.

"आज तुम कुछ बेहतर लग रही हो जस लेकिन रात में तुम क्या कर रही थी?", गाँव में सबके लिए सवेरा 2 घंटे पहले हे हो चूका था और ऐसा हे शहीद मेजर साहब के घर भी था सिवाए जसलीन के कमरे के. उसकी माता जी एक घंटा पहले कॉफ़ी दे गयी थी अपनी लाड़ली को लेकिन उसकी नींद तोह अब खुली थी जब सुखजीत ने उसको झिंझोड़ कर उठाया और वो बिना कुछ कहे पहले सीधा बाथरूम हो कर आयी. ढीले से नीले कमीज और चुस्त सफ़ेद सलवार में अभी ठन्डे पानी से मुँह धो कर वो बहार निकली तोह चाल में एक अलग हे आकर्षण भरा था और चेहरे की चमक जो सुखजीत को भी हैरान गयी. कॉफ़ी का वो बड़ा चीनी मिटटी वाला कप उठा कर जसलीन ने पहले थोड़ा पर्दा हटा कर बहार का नजारा किया लेकिन वापिस बंद करती हुई बिस्टेर पर तक लगाए आ बैठी.

"ओह कुछ बोल तोह सही महरानिये या सिर्फ अदाओं से हे मार देना है?", अपना कप उठा कर सुखजीत भी गॉड में तकिया रखती हुई उसके सामने हे आ बैठी जिस पर जसलीन ने कप एक तरफ कर ऐसी अंगड़ाई ली की उसके जिस्म का हर कटाव न सही लेकिन उन्नत्त माध्यम से चुचो का उठान उस ढीले वस्त्र में भी भरपूर दिखा.

"तू जाग रही थी क्या रात में?"

"जाग तोह नहीं रही थी लेकिन पहले तुम मुझसे चिपकी फिर सीने टटोलने के बाद अलग हो कर उधर मसलने लगी.", उधर से अभिप्राय थे जसलीन की जांघो के बीच मौजूद उस खजाने से जिसका उपयोग करने का अधिकार सिर्फ अर्जुन को था. जसलीन अपनी पोल खुलने से भी ज्यादा न शर्मायी.

"नींद में थी मैं और यार तेरे सामने हे है की सारा दिन आराम किया तोह फिर नींद टूटनी हे थी. सपने में लगा की अर्जुन साथ है तोह मैंने कस लिया लेकिन फिर तेरे सैंट्रो से पता चला के यहाँ तोह कुछ और हे मामला है. तब भी नींद नहीं खुली थी पूरी इसलिए हाथ निचे चला गया और जब काम हो गया तोह उठने की हिम्मत नहीं थी इसलिए सो गयी. तभी तोह तेरे उठाते हे सबसे पहले सलवार हे बदली.", सुखजीत तोह आँखे बड़ी करती हुई बस अपनी इस सबसे ख़ास सहेली और बड़ी बहिन को हे देखे जा रही थी.

"तू पागल तोह नहीं है जस? मैंने तोह खुद सुबह तुम्हारी ये देखि थी और क्या हालत थी उस वक़्त जैसे जहरीली मक्खी ने काट लिया हो उधर. और .. और वो फट गयी है अगर तुम्हे अभी भी ध्यान न हो तोह.", अंग का नाम लिए बगैर दोनों के बीच छूट और चुदाई की चर्चा हो रही थी. दोनों एक जैसी थी बस 2 बरस का अंतर लेकिन गाँव के माहौल में रहने से सुखजीत कही से भी जसलीन से कमतर न थी. यहाँ तक की जिस्म के माप भी एक जैसे थे सिवाए कूल्हों के जो सुखजीत के कुछ भरी थे.

"सुबह देखि थी न तूने लेकिन आराम करने और बर्फ की टकोर ने शाम को हे ठीक कर दिया था. रात सोने से पहले वो क्रम लगाना गड़बड़ कर गया जो हलकी खारिश से हे न रुक पायी मैं. और पहली बार तोह चाहे तू मोमबत्ती कर या फिर सेक्स, फटनी तोह है हे लेकिन मेरी कुछ ज्यादा बुरी हालत हुई क्योंकि उसका डंडा उस से भी ज्यादा बड़ा निकला जितना सोचा था. ऊपर से तूने जो देखा 2-4 मिनट वाला उस लड़के और आंटी का खेल, मैंने सुना था अपनी फ्रेंड्स से की 10-15 मिनट वो भी जब दूसरा राउंड करते हो लेकिन इन साहब ने तोह तबियत से कभी गॉड में बैठाया तोह कभी मेरे ऊपर चढ़ कर रेल चलाई. सच में जीती, एक बार तोह लगा था के मैं ज़िंदा न बचने वाली इस इश्क़ की सजा से लेकिन उसने बहोत सबर से काम लिया मेरा पूरा ख़याल रखते हुए. आखिर में तोह मैं हे पागल हो चली थी मजे में और मेरा उसके ऊपर उछलना हे जैसे मुसीबत बन्न गया नहीं तोह मेरी हालत उतनी बुरी भी न बनती. सपने में भी वही दिख रहा था लेकिन इस बार वो आराम से पीछे लेता मुझे बाहों में लिए धीरे धीरे हिल रहा था, तभी तोह मैं तेरे से चिपक गयी.", सुखजीत तोह सोच में हे पड़ गयी थी की ऐसा अर्जुन का कितना बड़ा होगा और फिर जसलीन ने इसको इतना मजेदार एहसास बताया तोह खुद उसकी जांघो के बीच चींटिया सी चलने लगी थी.

"यार अगर इतना बड़ा था तोह नहीं लेना था न. वैसे पठा है पूरा गबरू और तुझे पता है सवेरे मैं बड़ी बेबे के साथ गुरुघर गयी थी न अभी तोह उधर रेनम मिली थी. मछलियों को सरोवर में हम दोनों दाना खिला रही थी तब उसने कहा के.. ", सुखजीत थोड़ा सा झिझक रही थी ये बात कहने से लेकिन जसलीन के चेहरे पर मुस्कराहट तैर गयी.

"उसको अर्जुन पसंद आ गया है चाहे वो कितना घुमा फिर ले अपनी बात को. दीपा भाभी ने उसके मुँह पर हे कह दिया था के जब अर्जुन उसको पसंद नहीं तोह फिर वो उसकी बात हे क्यों करती है और इतनी पूछताछ किस लिए. वो नहीं सुना था के रेनम अर्जुन को घूर रही थी और अर्जुन उसकी बेबे और दीपा भाभी के पाँव छू कर चला गया तोह ये मोहतरमा उसकी हे नजरो को गलत बता गयी. वो रुकना चाहती है जीती लेकिन अब बात जैसे उसके भी बस से बहार है और रात जरूर अर्जुन उसके दिल में और गहरा उतरा होगा.", अब हैरान होने की बारी सुखजीत की थी लेकिन उसको अपनी बात कहने की भी हिम्मत मिल गयी.

"तुम्हे ये गलत नहीं लगता जस की वो जिस लड़के को पसंद कर रही है वो उसकी हे ख़ास सहेली का बॉयफ्रेंड है? तुम्हारा बॉयफ्रेंड है और तुम दोनों तोह वो भी कर चुके हो जो प्यार करने वाले भी समय लेते है ऐसा कदम उठाने में. जानती हो उसने बात दिल में नहीं राखी और ये कहा की अर्जुन की पहले से एक से ज्यादा गर्लफ्रेंड है तोह फिर वो कोशिश क्यों नहीं कर सकती? और उसकी तोह शादी भी कर रहे न अगली बैसाखी से पहले? ये पागलपन नहीं लगता तुम्हे जस?"

"इश्क़ बेशक 2 लोगो के बीच होता है सुखजीत लेकिन ये कहा लिखा है के दिल सिर्फ 2 हे जुड़ सकते है? अर्जुन सबसे प्यार करता है और सबका ख़याल रखता है. गुरदीप के लिए वो पार्ले पिंड के सरपंच तक से भीड़ गया जिसको वो ठीक से जानता तक नहीं था. यूनिवर्सिटी में जग्गी भी बीच में न पड़ सका क्योंकि दोनों गाँव में गर्मी बढ़ जाती लेकिन अर्जुन.. उसको सिर्फ 2 हे चीज समझ आती है जो चीजे नहीं है. वो लोगो से प्यार करता है और उन्हें दुखी नहीं देख सकता. मैं उसका खून रोकने के लिए ब्याह पर रुमाल बांध रही थी और वो मेरे परेशां चेहरे को देख मुस्कुराता रहा. ऐसा आजाद परिंदा किसी एक पिंजरे में क़ैद नहीं किया जाता सुखजीत क्योंकि तुम उसके पास नहीं, वो तुम्हारे पास पहोचता है. वह उनके घर पे मैंने मेरी जैसी चाहत कई और चेहरों में देखि. और उन्होंने भी मेरी नजरे पढ़ी होंगी लेकिन किसी में बैर या जलन नहीं थी जैसे उनको मेरे से भी बेहतर पता हो अर्जुन के बारे में. चाहत न गुरदीप रोक सकीय, न कीर्ति, न मैं न रेनम... हाँ अब तू क्या करना चाहती है वो मुझे तोह मैट हे बताना लेकिन इतना आसान नहीं है. 50 दिन सिर्फ उसको याद करती रही तब नसीब हुआ और अब मैं माँ या जग्गी के साथ वापिस न जाने वाली हफ्ता 10 दिन तोह.", जसलीन ने तोह सब खोल कर हे रख दिया था सुखजीत के सामने और इस बीच आखिर में उसने खुद सुखजीत की अर्जुन के प्रति बढ़ती उत्सुकता को संदेह में ला खड़ा किया.

"मेरा वैसा कोई इरादा नहीं है और वो तुम्हारा बॉयफ्रेंड है तोह मैं ऐसा सोचने की गलती भी नहीं कर सकती. बस अजीब लगा के इधर शहर में तोह 10-10 लड़के एक हे लड़की के आगे पीछे घुमते रहते है जो उन्हें घास नहीं डालती लेकिन फिर ये इंसान है जिसके लिए जो देखो वो उसका मुरीद.", जसलीन अपना कप खली करके रखती हँसते हुए उठ कड़ी हुई उस अलमारी की तरफ जो सुखजीत की थी. सुखजीत बस देखती रही लेकिन जल्द हे जैसे उसके चेहरे पर अब उत्सुकता की जगह डर के भाव आ चुके थे क्योंकि जसलीन ने उसकी अलमारी के भीतर बना चोर लाकर खोल लिया था जिसकी चाबी जाने कैसे उसके हाथ लग गयी थी. वैसे तोह वह सुखजीत अपने पैसे जमा करने के साथ chain-baali इत्यादि रखती थी लेकिन अख़बार की जिल्द चढ़ी वो किताब उसकी तजा संपत्ति थी.

"तू कुछ ज्यादा हे स्पीड में है मेरे ख़याल से. और ये ले कर तू बाथरूम में गयी थी जबकि मैं इस कमरे में तेरे हे बिस्टेर पर थी.? वैसे कुछ ज्यादा हे रंगीन चीज है ये. मैंने तोह ऐसी खुली फिल्म भी नहीं देखि पर ये किताब किसी भी फिल्म से ऊपर हे लगती है.", जसलीन दरवाजे की कड़ी लगा कर अब फिर से सुखजीत के नजदीक बैठी थी और उस पतली किताब के पहले हे पैन पर गुलाबी कच्ची में हाथ फंसाये वो विदेशी किशोरी अपने दूसरे हाथ से अधपके गुलबाई चुके को कैसे थी. चेहरे पर हे इतने कामुक भाव थे की साधारण इंसान तुरंत अपनी पतलून उतार देता. जसलीन सुखजीत को वो दृश्य दिखने के साथ खुद भी बड़े गौर से इस उजली तस्वीर को निहारने लगी.

"देख तेरे भी इतने हे बड़े होंगे या थोड़े से ज्यादा. लेकिन इसके वह पर रोया तक नहीं है जहा इसका दूसरा हाथ फंसा है. दरवाजा बन्दे किये तू भी ऐसा हे कर रही थी.", अब सुखजीत का गाला सूख गया था जैसे उसकी पूरी हरकत जसलीन को पता चल चुकी हो.

"दीदी ये तोह बस वह भाभी के टीवी वाले कमरे में छत्ती से मेरे हाथ लग गयी. खुद हे देख लो इसका मैला कवर बता देगा की मैंने बस इसको कल हे पहली बार देखा है. और मानती हु की मुझे ये चोरी से नहीं लानी चाहिए थी उधर से पर गलती से दिख गयी तोह मैं ले आयी पूरी देखने के लिए. वापिस रख दूंगी."

"तू यार नाम से हे बुलाया कर मुझे और वापिस क्यों करनी जब खुद भाभी को इसका पता नहीं. ओह बाप रे.. ये तोह कद्द में तुझसे भी छोटी है जीती और देख कैसे इतना बड़ा हाथ में ले कर चूस रही है जैसे कुल्फी हो. कमाल है न कितनी काम उम्र में हे इसकी वो इतनी फूली हुई है और आँखें एक हे जगह जमी है. जब मैं तेरे सामने अर्जुन से chooma-chaati कर सकती हु और हम दोनों हे इंग्लिश फिल्म साथ में देखते है तोह अब इसको देख कर तुझे पसीने क्यों आ रहे है?", वही कमसिन विदेशी बाला अगले दोनों पन्नो पर उस तगड़े मूसल को मुठी में जकड़े थी और फिर होंठो में. लाल भूरे बाल पीछे 2 चोटियों में बंधे थे और चेहरा गोल मटोल सा बेहद खूबसूरत. अब सुखजीत भी थोड़ा हिम्मत करती हुई जसलीन की बगल में आ बैठी.

"वो.. वो क्या दिलबाग भैया भी ऐसा सब करते होंगे भाभी के साथ? ये अगले वाले पर तोह और भी गन्दा फोटो है.", सुखजीत के कहे मुताबित जसलीन ने पन्ना पलटा तोह उस 5 फूटी कमसिन कन्या को ये गठीला 6 फूटा पहलवान उसकी टाँगे फैलाये गॉड में लिए एक चुकी चूस रहा था जबकि दूसरे दृश्य में उसने और भी ऊपर उठा कर अब उस मखमली अक्षत गुलाबी छूट को होंठो में लिया हुआ था. पर इस दृश्य में कुछ अजीब भी था. उसके तगड़े गुप्तांग पर वैसी हे दूसरी कन्या के होंठो की जकड़न थी. जसलीन के तोह होश हे उड़द गए क्योंकि वो दोनों लड़कियां उस से काम उम्र थी लेकिन अंदाज जोरदार.

"सच कहती है तू जीती ये तोह सोच से भी परे है और जो भी कह दीपा भाभी दिलबाग भैया से दूर हे रहती है जितने बरसो से मैं देख रही हु. भैया का एक आध कारनामा मैंने सुना है जो वो बस्ती की लड़कियों को खेत पर बुलाते है रात में. तभी तोह घर नहीं होते कभी और ये किताब सबूत है जो गलती से हे रह गयी होगी छत्ती पर कबाड़ के बीच. यहाँ 2 लड़कियां है और देख जरा कितनी दिलेर है ये."

"क्या अर्जुन का भी इतना हे बड़ा था? अगले पैन पर देखो इस 2 छोटी वाली की हालत.", सुखजीत के भी माथे पर हल्का पसीना आ चूका था जबकि कमरे की खिड़की पर चलता वातानुकूलन 21 की ठंडक फेंक रहा था. पन्ना पलटने की हे देर थी की जसलीन का हाथ उसके हे मुँह पर आ रुका. किताब अब बिस्टेर पर खुली थी उन दोनों के सामने जिसके एक दृश्य में वो गोरी गुलाबी लड़की जैसे दर्द सेहन कर रही थी और उसकी गुलाबी योनि में वो तगड़ा डंडा आधा घुसा हुआ रक्त की कुछ बूंदे निकल चूका था. दूसरी लड़की इस छोड़ने वाली की एक चुकी मसलने के साथ दूसरी चूस रही थी. दूसरे पैन पर अब लुंड जड़ तक भीतर था जिसके बाहर वो गुलाबी मखमली योनि फैली हुई बुरी तरह चिपकी थी लेकिन लड़की आंसू के बावजूद अपने सहेली के होठो से होंठ जोड़े इसका जश्न मानती दिखी.

"उसका तोह इस भी मोटा और बड़ा था क्योंकि इस लड़की के हाथ ाचे से लिपटे है पेनिस से जबकि वो मेरी लम्बी हथेली में भी फिट नहीं आया था. पर है तोह ये भी बड़ा और इन दोनों का तोह अलग हे चल रहा है जैसे आदमी इनका गुलाम हो."

"हाँ गुलाम हे है वो जो आगे देख लेना. लेकिन आपने उसका वो उतना बड़ा पूरा ले लिया था अपने अंदर जैसे ये इस फोटो में लिए है?", सुखजीत की ऊँगली थोड़ी काँप रही थी जब उसने वो छूट की गहराई में उतरे उस लुंड वाली तस्वीर पर ठीक जगह राखी.

"इधर पेट तक महसूस हो रहा था मुझे जब मैंने सारा अंदर लिया तोह. बाथरूम करने की हे आवाज बदल गयी है अब तोह मेरी लेकिन ये दोनों तोह मुझसे छोटी है जिनके निप्पल तक देख कैसे बिंदी जैसे है. तू भी सही कह रही थी की जब इधर से बचा आ सकता है तोह जगह तोह होती हे होगी न अंदर. बस खोलने में म्हणत और दर्द होता है. तू भी झेल लेगी इस हिसाब से तोह. ये देख जरा अगला कारनामा.", जसलीन ने अगला दृश्य देखा तोह एक तस्वीर में छोड़ने वाली लड़की युवक का लुंड चाट रही थी और दूसरी वाली को घोड़ी बनाये वो आदमी उसका गोरा गुदाद्वार जिस पर गोलाई में सिलवटे थी उसको चाटने के साथ अंदर ऊँगली दबाये था. जो अगली हे तस्वीर में ऊँगली की जगह गुलाबी सुपडे ने फैला कर ाचे से बता दिया की उसको गीला करने के पीछे क्या मंशा थी. गुदाद्वार तोह जैसे भीतर हे डाब गया था उस मॉटे सुपडे के साथ. लेकिन लड़की मुँह पीछे करती हुई मुस्कुरा रही थी जैसे उसको इसका अभ्यास हो.

"छियई.. ये इतनी गन्दी जगह चाट रहा था और उधर हे अपना पेनिस दाल दिया. और ये लड़की कैसे खुश हो रही है बून्द में डलवा कर.", सुखजीत के मुँह से पहली बार ये ठेठ पंजाबी शब्द निकला था जिसको हिंदी में गांड भी कहते है. जसलीन ने प्रतिउत्तर में बस एक नजर मुस्कुरा कर देखा और फिर से पन्ना उलट दिया. अब वो व्यक्ति बिस्टेर पर पीठ के बल था जिसके मुँह पर 2 छोटी वाली लड़की छूट को फैलाये बैठी थी और उसका समूचा लिंग दूसरे वाली ने अपने पिछवाड़े में भर रखा था. आमने सामने बैठी वो एक दूसरे को चूम रही थी जबकि आदमी के हाथ बिस्टेर से बंधे थे. इसके बाद guda-maithun करवाने वाली अपने छेड़ से बहते गाढ़े सफ़ेद तरल और दूसरी कमसिन कन्या अपनी छूट के फैल चुके गुलाबी होंठो को खोल कर दिखा रही थी जिसके होंठो पर भी वीर्य की चाँद बुँदे लगी थी. बस इतनी हे तस्वीरें थे उस पतली सी पुस्तक में.

"गन्दी तोह मुझे दिखी नहीं पहले लेकिन बाद में जरूर ये कुछ ज्यादा हो गया. ये गांजा आदमी इनके बाप की उम्र से भी ज्यादा का होगा लेकिन देख जरा उसको कैसे निचोड़ा इन दोनों ने मिल कर. वैसे दुबली पतली नहीं है दोनों, उम्र चाहे काम हो. हार्ट शेप हिप्स इतनी सी उम्र में और बाहें tujhse-mujhse मोती. तू इसमें क्या देख कर एक्साइट हुई थी जीती जो दरवाजा बंद करना तक ध्यान न रहा.?", अब फिर से जसलीन ने उसको घेरा लेकिन मीठी चुहल हे थी बस जिसके जवाब में सुखजीत थोड़ा शर्मायी और वो किताब उठा कर वापिस चोर लाकर में रखने के लिए ले जाती हुई कहने लगी.

"सपने क्या सिर्फ आपको हे आते है? मैंने तोह बस पहला पन्ना हे देखा था और फिर जब तुम जल्दी सो गयी तोह गलती से ये खोल बैठी पर दिल नहीं मन तोह बंद करके फिर लेट गयी. जब मेरा सीना तुम्हारी मुट्ठी से दबा और नींद में तुम्हे हाथ चलते हुए तोह फिर कण्ट्रोल ख़तम हो गया. किताब ले कर गयी तोह कुछ याद नहीं रहा और तब मैंने वही सन देख लिया जब ये पिंक पंतय वाली अपने अंदर लिए थी और दूसरी उसको किश कर रही थी. आँखें बंद की तोह जो सोचा वो गन्दा जरूर था लेकिन फिर तोह बस सब सफ़ेद सफ़ेद हो गया आँखों के सामने जैसे बादलो में उड़द रही हु. उसके बाद बस ये लाकर बंद करना भूल गयी और तुमने शायद सबकुछ देख लिया.", सुखजीत द्वारा किया कबूलनामा जसलीन के चेहरे पर एक प्यारी सी कुटिल मुस्कान ले आया.

"मतलब तूने ख्याल बनाया के उस लड़की की जगह तू थी वो भी अर्जुन के निचे और रेनम तुझे वैसे हे किश कर रही थी?"

"छियई.. मेरी पक्की हमदम तुम हो तोह ये रेनम कहा से आ गयी?", अब जसलीन थोड़ा जोर से खिलखिला उठी अपनी इस भोली शैतान सी बहिन की जुबान फिसलने पर. सुखजीत तोह जल्दी से किताब को अंदर बंद करने लगी थी जैसे अब वो भाग हे जाए.

"बड़ा नेक ख्याल बनाया तूने तोह जीती लेकिन ये नहीं सोचा के मेरी आग जो अब इतनी ज्यादा भड़की हुई है उसमे पहले अर्जुन मेरे साथ होना चाहिए?"

"तुम्हारे लिया तोह वो सोचा न जो दूसरी वाली करवा रही थी अपने हार्ट शेप में. हाहाहा.. सब ख़याल हे है बढ़ती उम्र के और ऐसा कुछ न होने वाला लेकिन दांत जरूर पड़ेगी बड़ी बेबे से आपको. 9 बजने वाले है और पिछले डेढ़ घंटे से हम दोनों यहाँ बंद है. ये जग्गी भैया गए अर्जुन की मोटरसाइकिल ले कर.", डुग डुग की आवाज बंद कमरे में भी हलकी सी सुनाई देने पर सुखजीत ने किवाड़ खोले और जसलीन से पहले हे निचे भाग गयी.

'और हाथ से नहीं मसलती.. आअह्ह्ह. जीती की बची पहले हे रात से इधर बुखार बढ़ा हुआ है और सुबह सुबह तूने ज्यादा हवा देदी. तू ख़याल बुन्न मैं जुगाड़ लगाती हु कुछ न कुछ.', जसलीन अलमारी से कपडे उठा कर फिर से बाथरूम में जा घुसी थी. अब उसने क्या सोचा था ये तोह वही जानती थी लेकिन अर्जुन के पास समय था ये उस से ज्यादा जरुरी बात थी.

.

.

"वो सब क्या मंगवाया था दादी जो हर पंसारी मन कर रहा था? फिर किसी लालचंद ने दिया ये सब और बदले में 3000 ले लिए इन 3 पुड़िया जितने सामान के. चलो मेरा नाश्ता हो गया है तोह अब देवकी दादी से बात करते है नहीं तोह बाउजी आ गए तोह फिर बात न हो सकेगी सही से.", अर्जुन हाथ धोने से पहले अपनी झूटी थाली बर्तन धोने की जगह रखता हुआ बोलै. कौशल्या जी ने हे उसके लिए नाश्ता बनाया था और दामिनी ऊपर वाली मंज़िल पे आराम कर रही थी वही विनोद जरा चौपाल की तरफ निकला था.

"तू हे करके देख ले अपनी लाड़ली दादी से सवाल जवाब. मेरी तोह किसी बात का जवाब न मिला मुझे बस बदले में भड़की बहोत मेरे ऊपर. वैसे तू है थोड़ा kam-akal जब मैं तुझे उमेद के साथ भेज रही थी तोह मतलब वो सामान ऐसे हे थोड़ी कोई तुझे दे देता.", इस बीच देवकी के कमरे से कोई बर्तन शीशी गिरने जैसे आवाजे आयी और फिर इंसान के गिरने की. अर्जुन फुर्ती से उधर लपका तोह देवकी की कलाई में कपडा बंधा था पर बिस्टेर से खुला हुआ. वो फर्श पर लौट रही थी जबकि एक कांच के टुकड़े ने उसके पंजे से रक्त बहार निकाल दिया था. न वो चीख रही थी और न उसका हाथ पाँव पटकना बंद हुआ. अर्जुन हैरान था क्योंकि दर्द के भाव तोह बहोत थे देवकी के चेहरे पर. हिम्मत करके उसने जैसे तैसे देवकी को अपने नियंत्रण में लेते हुए वापिस बिस्टेर पर पटका तोह वो कुछ शांत हो गयी. वो रो रही थी लेकिन जैसे उसकी आँखें एक जगह न ठहर रही हो. नजदीक हे राखी रूई को पाँव के जख्मी हिस्से से कांच का टुकड़ा निकाल वह दबाते हुए अर्जुन दरवाजे पर आ कड़ी हुई अपनी दादी की तरफ हैरानी से देखने लगा.

"देवकी होश आ गया तुझे? अब कैसा लग रहा है? हाथ पाँव भी खुले है तेरे और घर के दरवाजे भी लेकिन तू फिर भी भागी नहीं अपने भाई और मार्गदर्शक बाबा की तरफ?", कौशल्या जी उसके करीब आ बैठी तोह पहले तोह देवकी ने अपने हाथ चलने की कोशिश की जिस पर कौशल्या जी बिना आवाज किये पीछे हट गयी. अर्जुन ने रोकने की कोशिश की लेकिन उसकी दादी ने मन कर दिया की वो देवकी को पकडे नहीं और बस पट्टी बाँध दे. 5 मिनट में हे देवकी की हिम्मतत जवाब दे गयी थी.

"सजा.. ये सजा सिर्फ इतनी नहीं है देवकी जो तुझे अभी महसूस हो रही है. ये बढ़ती रहेगी हर गुजरते पल के साथ और नए दिन के बाद. मृत्युदंड से शैतान को तुरंत मुक्ति मिल जाती है जिसकी पक्षधर काम से काम मैं तोह नहीं. ले पानी पी ले और फिर थोड़ी हिम्मत बची हो तोह और हाथ पाँव चला लियो. फायदा नहीं होने वाला उसका और शोर तू मचा नहीं सकती. कल तेरे सर पे जो वार हुआ था न ये सब उसका हे परिणाम है.", देवकी को वो पानी पिलाने लगी तोह देवकी ने फिर से दुस्साहस किया कौशल्या जी की कलाई पकड़ कर उन्हें क्षति पहुंचने का लेकिन उसकी जेठानी ने बस कान के पीछे की तरफ जैसे कोई अदृश्य बिंदु दबाया और देवकी का हाथ धम्म से बिस्टेर पर आ गिरा. वो होश में थी लेकिन जैसे जिस्म में जान हे न बची हो.

"इन्हे हुआ क्या है दादी? और ये ऐसे व्यवहार क्यों कर रही है जैसे ये देख और बोल नहीं सकती? चेहरा बता रहा था के ये रोना चीखना चाहती है और आखों की पुतलियां टिक नहीं रही एक जगह.", अर्जुन निचे बिखरा सामान समेत कर कांच के टुकड़े बटोरने लगा था.

"इसने बहोत जगह बुरी नजर डाली बीटा और खूब गलत सलत कहा इसलिए ये अपनी 2 इन्द्रियाँ खो चुकी है. बचो और बड़ो को नुक्सान पहुंचाया है इसने इंसानियत को कलंकित करते हुए इसलिए ये खुद हर रोज ऐसा महसूस करेगी की भीतर अनगिनत सईआं चुभ रही हो, वो नरक वाली किले इस दुनिया से बहार नहीं होती बीटा जिसके बारे में कई किताबे उल्लेख करती है की मरने के बाद मनुष्य को ऐसे प्रताड़ित किया जाता है उसके दुराचार की वजह से. वो सब यही होता है बस धरम और समाज इसकी इजाजत नहीं देता. देवकी, धीरे धीरे तुम अपनी बाकी इन्द्रियाँ भी खो डौगी. जिस्म लगभग निष्प्राण होने लगेगा पर तुम मरोगी नहीं, मौत की भीख मांगोगी जिसको कोई सुन्न नहीं सकेगा. लेकिन मैं थोड़ी दरियादिल हु क्योंकि आपसी रिश्ता है हमारा चाहे तुम जितनी भी दुष्ट हो. दवा मिलती रहेगी 2 वक़्त की रोटी और सिमित देखभाल के साथ. आज भर रह लो यहाँ, फिर कल तुम अपने अज्ञातवास में जाने वाली हो जहा हवेली की पूर्व मुखिया की खातिरदारी के लिए ज्यादा बड़ी व्यवस्था नहीं होगी. हाँ अगर तुम्हारे पति ने ऐतराज उठाया तोह वो भी साथ जायेगी इस अंधी की लाठी बन्न कर. लेकिन कृष्ण उतना बेवकूफ नहीं है जो अपने गले में बंधी घंटी के साथ हे जीना चाहे. नंबर उसका भी लगेगा लेकिन फिलहाल समय है उसके पास प्रायश्चित का.", अर्जुन तोह सन्न हे रह गया अपनी दादी के अंदाज देख कर और उनकी ऐसी सजा जिसके बारे में देवकी किसी को कुछ बता भी नहीं सकती थी. और आखिर में उन्होंने कृष्णेश्वर के लिए भी अपनी सोच स्पष्ट कर दी थी.

"ऐसा नहीं लगता के इस पर सवाल उठ सकते है दादी? और ये कृष्ण दादा जी तोह सरल इंसान है जिनकी देखभाल स्वयं दादा जी के जिम्मे है. तोह वो सब औषधि या जड़ी बूटी इस काम के लिए थी?"

"काम तोह वो ाचे भी करती है बीटा लेकिन अलग अलग प्रयोग करने पर. रही बात तेरे छोटे दादा की तोह मैंने घोड़े को भी मुर्गी के बचे खाते देखा है जिस पर लोग शायद हे विश्वास करे. अब तू साथ है न मेरे तोह वजीर का खेल समझ ले, राजा अभी सिर्फ नाम से है तू. जीवन में कठोर निर्णय लेने से बचना चाहिए लेकिन इतना नहीं की खुद का बचाव हे मुश्किल हो जाए. तुझे क्या लगता है तूने दामिनी को मासूम और निर्दोष घोसित कर दिया तोह मैं उसको भी ऐसे जाने दूंगी? मान लिया वो भी मेरी बेटी है लेकिन जब उम्र सोचने समझने की हो तोह खुद का दिमाग भी लगाना चाहिए. शंकर आज तक सर पटकता फिरता है क्योंकि गलती तोह मैंने उसकी भी माफ़ न की थी.", कुछ कुछ अर्जुन के दिमाग में घुस चूका था अपने पिता का जीकर होने पर और देवकी ने पानी भी पी लिया था जिसके बाद वो फिर से neem-behosh हो गयी थी. उसके माथे को जांच कर कौशल्या जी अर्जुन से हे बात करने लगी. दिल तोह उनका भी बहोत आहात था पर सामने बैठा हुआ युवक उसकी मलहम था.

"जानता हु दादी और कुछ गलतियां मुझसे भी हुई है. वैसे विनोद चाचा को सजा मैट देना आप."

"तुझसे गलतियां न हुई बीटा क्योंकि सही राजा अक्सर अपना ओहदा त्याग कर जनता के बीच रहता है. उस दौरान किसी का दुःख दर्द हरने के लिए वो अपराधी को दण्डित भी करता है और समाज से अलग फैंसले भी लेता है. शिक्षा के दौरान जो गलतियां होती है वो शिक्षक की कमी से होती है, विद्यार्थी की नहीं. तोह जिम्मेवार मैं और तेरे दादा जी हुए अगर तुझे कुछ गलत लगा हो तोह. वैसे दामिनी को बड़ी सजा नहीं मिली. वो अब अपने पारिवारिक जीवन को सँभालने के साथ शिक्षा में योगदान देगी, पढ़ी लिखी है और मास्टरनी रह चुकी है. समय समय पर कुछ बचो के जीवन सँवारने में उसको योगदान देना होगा क्योंकि उसकी साड़ी तन्खा उस भलाई में हे जाने वाली है. रौशनी और तुम्हारी वो नर्स अबसे हवेली में हे रहेंगी लेकिन तुम इसका भार अनामिका को दो तोह मुझे ाचा लगेगा. तुम्हारी चची हर तरह से लायक है और वो इस खंडहर को फिर से हरा भरा बना देगी. मुखिया तुम हो अर्जुन बीटा और मेरे फैंसले सिर्फ मेरे घर तक सिमित है. बाकी तुम्हारी इत्छा है चाहे कृष्ण को हवेली सुपुर्द करो या विनोद को. लेकिन घर हमेशा औरत से हे बनता है जिसको म्हणत में सुख मिलता हो. मैं भी राजू को बगल में टाँगे कभी गाये दुहती थी तोह कभी चूल्हा चौका करती लेकिन वो मेरी जिम्मेवारी थी बीटा, कोई बोझ नहीं. तुम्हारे दादा ने मुझसे बेहतर किया लेकिन खुदको वो हमेशा 49 और मुझे 51 रखते है. मैं तोह बेबाक बोल भी पड़ती थी या बरस जाती उन पर लेकिन वो मुस्कुरा कर माफ़ी मांग लेते. अब विनोद ने तोह खुद हे माफ़ी मांग ली अपनी बीवी से तोह उस मासूम की म्हणत रंग लायी न? चाहे तू वजह है इस सबकी लेकिन सुधार ऐसे हे होते है. चल अब तू बुला ला उस नर्स को और बाकी सब भी आते होंगे."

"वैसे मैंने चची से वादा किया था के जिस दिन यहाँ से जाऊंगा न इस हवेली को घर बना कर जाऊंगा जिसकी देखभाल का पूरा जिम्मा उनका होने वाला है. आप तोह ये बात पहले हे सोचे बैठी थी दादी. वैसे मुझे आपका सजा देने का तरीका ज्यादा पसंद आया पापा या दादा जी वाले से.", अर्जुन ने कुर्सी से उठ कर वो हथेली में जमा कांच के टुकड़े एक कागज़ में लपेट लिए. हलकी सी खून की बूँद उसकी भी ऊँगली के सिरे से निकल आयी थी जो कौशल्या जी ने देखि पर उस पर प्रतिक्रिया न दी.

"इन बूढी आँखों को सिर्फ इतनी हे पहचान है बीटा की कौन घर बना सकता है और कौन उजाड़. हाँ कुछ लोग होते है जो मेहनती होते है पर निर्णय लेने में थोड़ा हिचकिचाते है. ये जो यहाँ लेती है वो उजाड़ने वालो का उदाहरण है, तेरी माँ तुझसे और मुझसे बेहतर घर बसने वालो में से और ललिता है साफदिल मेहनती जो झिझकती है स्वयं फैंसले लेने में. हाँ वो मुझे बहोत पसंद है क्योंकि वो हंसमुख है और घर को जीवंत रखती है. कृष्णा बेहद हे समझदार इंसान है बस थोड़ी अधिक संवेदनशील है जो किसी का दर्द नहीं देख सकती और तू तोह कमजोरी भी है उसकी. ये छोटी छोटी बातें होती है अर्जुन जो इंसान को एक दूसरे से अलग बनती है. वैसे ये सजा वजा देना मुझे पसंद नहीं और ना मैंने ऐसा ज्यादा किया है. चल अब तू जा के संजीदा को यहाँ छोड़ जा फिर जो मर्जी कर. दोपहर बाद मैं तेरे बाउजी और विनोद के साथ अभिषेक के यहाँ जा रहे है.", अर्जुन हामी भरता हुआ बहार निकल गया कांच फेंक कर दीपा भाभी के घर से संजीदा को लिवा लाने और देवकी के नींद में हे जिस्म पर हर तरफ पसीना आ चूका था जैसे उसके जिस्म का तापमान बढ़ने के बाद घट्ट गया हो. बहार दरवाजा खुलने की आवाज आयी जिसका मतलब था के परिवार लौट आया है. अब जाने कृष्णेश्वर पर क्या गुजरने वाली थी लेकिन इतना तये था के वो सचमुच सरल जीवन हे चुनन ने वाला था अपनी पत्नी का हाल देखने के बाद.

.

.

"मतलब आप ने अपनी ज़िद्द नहीं छोड़नी? तोह संजीदा को मैंने आपके पास छोड़ा हे क्यों था और ये क्रीम मैं कचरे में फेंकने के लिए लाया था भाभी?", अर्जुन नर्स को घर छोड़ने के बाद सबसे मिल कर आधे घंटे में हे वापिस दीपा भाभी के घर था. उसकी मोटरसाइकिल भी विनोद चाचा हे ले आये थे जिन्हे वो जग्गी ने हे दी थी चौपाल पर और उसके बाद वो अपनी बेबे के साथ काम से शहर चला गया था. गैस वाला चूल्हा होने के बावजूद दीपा भाभी ने लकड़ी वाले पर हे देगची चढ़ाई थी अर्जुन की पसंद के पुलाव बनाने के लिए और खुद अर्जुन लौटे में चीनी घोल रहा था निम्बू पानी के लिए. सफ़ेद सलवार कमीज जिस पर लाल चौकोर छापे बने थे और दोरंगा दुपट्टा सीने पर तिरछा कमर की तरफ बांधे दीपा भाभी फर्श पर पंजो के भार बैठी चूल्हा सुलगाते हुए अर्जुन की बातें सुन्न रही थी.

"अब दर्द नहीं है और अगर निशाँ मिटने वाली ये क्रीम तुम लाये हो तोह इसको मैं खुद भी लगा लुंगी. ऐसे तुम मेरी परेशानी हे बढ़ा रहे हो दुनिया के सामने मेरा सच खोल कर. लेकिन नाराज नहीं हुई मैं इस से जो की होना चाहिए था वैसे.", अर्जुन ने एक नजर उन्हें चूल्हे को गट्टे से पंखी करते देखा और उनकी सुडोल बाहों की बगलो के बीच कमीज पर आया पसीना भी. फिर वापिस चम्मच से चीनी पानी में मिलाने लगा. वो भी वही ईंट के चिकने हो चुके फर्श पर चौकड़ी मारे बैठा था.

"मैंने सिर्फ ये कहा था के भाभी को कुछ दिक्कत है और अगर वो बताये तोह देख लेना. बाकी उन्हें आपसे मेलजोल बनाने के लिए भेजा था, ये कह कर नहीं की आपके जिस्म पर अनगिनत निशाँ है जिनका उपचार वो करे. क्रीम तोह कही भी लगाई जा सकती है न? आप खुलती उनके साथ तोह बात 2 हे लोगो में रहती, मुझे थोड़ा बताती वो. वैसे आपको परेशानी हो रही है गर्मी से तोह खाना मैं बना देता हु या कूलर चला लो, पंखा हवा दे रहा है लेकिन आपको ज्यादा गर्मी लग रही होगी.", एक तरफ रखे उन पके हुए 2 निम्बू को बीच से काटने के बाद उन्हें वो ाचे से दबा कर निचोड़ रहा था. दीपा भाभी घूम कर उसको इतनी लगन से निम्बू पानी बनाते देख मुस्कुरायी. आग जल चुकी थी और देगची को गरम होने में थोड़ा समय लग्न था. उठ कर वो फ्रिज से पानी निकलने लगी तोह अर्जुन का दिल एक बार के लिए तोह मचल सा उठा उनकी सलवार को दो बड़े गोलों के बीच फंसा देख जहा पहले हे वो कासी हुई थी. लेकिन सोच से तुरंत बाहर आते हुए उसने अपनी बात कही.

"पानी घड़े का हे दे दो भाभी, बस 2 टुकड़े बर्फ निकाल लो फ्रिज से.", अर्जुन ने निम्बू के छिलके नजदीक रखे डिब्बे में डालने के बाद हाथ साफ़ किये और जब भाभी झुक कर लौटे में दूसरे लौटे से पानी डालने लगी तोह न्यास हे अर्जुन की नजरे उस दुरलब दृश्य पर अटक के रह गयी जहा 2 बड़े और मांस से भरे सख्त गोले आपस में चिपके थे. उनका आकर्षण वो पसीने की हलकी परत और घाटी में लुप्त होती लकीर ज्यादा बढ़ा रही थी. अत्यधिक सुडौलपन और जिस्म के 2 ख़ास कटाव गवाह थे की सिर्फ वही जगह थी जो भारी थी बाकी जिस्म अत्यधिक मेहनती होने की वजह से charbi-rahit था. भाभी ने उस पर जैसे ध्यान न दिया या फिर जाहिर नहीं किया क्योंकि वो बर्फ की 2 डाली डालने के बाद लौटा रखने पलट गयी थी. अर्जुन सर झटकता हुआ जैसे इस दृश्य को भूलने की कोशिश चम्मच हिला कर कर रहा था पर हाथ में पकड़ा हुआ वो गोल लौटा भी उनके एक सतांन से कुछ छोटा जान पद रहा था. उसके बहार भी जैसे पसीने की परत आने लगी थी ठीक भाभी के स्टैनो जैसी. अपने ख़याल में खोया अर्जुन अब दूसरे हाथ की एक ऊँगली से उस ठन्डे पसीने को सहलाने लगा तोह जैसे वो इसमें भाभी को हे महसूस कर प् रहा था. लौटे को उठाये हथेली उसको कुछ मजबूती से पकड़ने लगी जैसे वो सचमुच एक ठोस सतांन हो जिसको अर्जुन दबा कर जांच रहा हो. और अब दूसरा हाथ किनारे से ले कर मध्य हिस्से तक उस ठन्डे पानी की परत को सहलाने लगा तोह बूंदो के रूप में जमा हो कर ठीक वैसी हे लकीर निचे जा रही थी जैसी उसने अभी भाभी के स्टैनो की घाटी में गायब होती देखि. धड़कन के साथ ट्रैक पाजामे में भी कुछ और भड़ने लगा था अर्जुन के और उसके चेहरे पर आते पसीने के साथ उसकी ख़ामोशी को दीपा भाभी ने हे भांग किया अपने दुपट्टे से हे उसका माथा पौंछते हुए. अब हाथ में वो बेजान लौटा और सामने वो 2 बड़े पके हुए खरबूजे फिर से थे. लेकिन अर्जुन की चेतना लौट चुकी थी जो दिन में हे कैसे ख़याल देखने लगा था. जबकि वो इस मामले में कही ज्यादा संयंम वाला इंसान था और उसका खुद पर नियंत्रण आम व्यक्ति से कही ज्यादा था ऐसी परिस्थियों में.

"गरम करके पीने का इरादा है क्या तुम्हारा?", अर्जुन उन्हें क्या जवाब देता की निम्बू पानी तोह गरम जब होगा तब होगा लेकिन वो जरूर गर्मी माँ चूका था. पर सर झटकते हुए उसने दोनों के लिए गिलास भरे और भाभी ने देगची में घी गरम होने के लिए कड़छी से दाल दिया. अब वो अर्जुन के सामने हे चेहरा किये बैठी थी कुछ खामोश सी और उन्होंने अपनी तरफ बढ़ा वो गिलास थाम लिया. एक छोटी सी घूँट लेते हे चेहरे के भाव प्रशंशा करते दिखे.

"मुझे नहीं मालूम था के सूखा पुदीना और भुना जीरा ऐसा भी कमाल कर सकता है. एक साधारण शिकंजी का तोह जायका हे बदल दिया तुमने. एक घूँट से हे लगता है जैसे जिस्म हे हल्का हो गया."

"आप कभी मेरी माँ के हाथ का aam-panna पी कर देखना भाभी. वैसे उसमे आम की जगह कच्ची कैरी उपयोगी होती है लेकिन जीरा उसकी जान है जो मुझे भी सही मात्रा में मिलाना नहीं आता. निम्बू पानी तोह मुझसे ाचा घर में सभी बना लेते है, यहाँ तक की पापा भी. माँ कहती है की swaad-anusaar कुछ नहीं होता, सही मात्रा हे सही भोजन बनती है. बाकी इंसान की जुबान और िचाये तोह एक दूसरे से मिलती हे कहा है. आप न ज़िद्दी बहोत हो भाभी, किसी लड़की से भी ज्यादा.", अर्जुन ने एकदम से हे बात का रुख अब दीपा भाभी पर घुमा दिया था जो देगची में घी जांचने के बाद फिर से शिकंजी पीने लगी थी लेकिन अर्जुन की बात सुन्न कर आँखें तरेर कर उन्होंने पुछा.

"तुम्हे मैं लड़की लगती हु? मेरी खुदकी एक लड़की है."

"हाँ बाबा हैं आपकी एक लड़की और आप बुढ़िया भी हो चुकी हो. पर मैंने कहा के आप न किसी लड़की से भी ज्यादा ज़िद्दी हो. क्या मिलता है आपको ऐसे हर बात के लिए इंकार करने से?"

"अब तुम बात को कही और ले जा रहे हो और मेरा इस बार कोई इरादा नहीं के तीसरी बार तुम्हे खाने से दूर करू. बहोत बुरा लगा था दोनों वक़्त और मैं खुद नहीं जानती की वैसा क्यों किया मैंने. मुझे तुम ाचे लगते हो लेकिन वो कोई ज़िद्द नहीं थी बस मुझे ाचा नहीं लगता की कोई मेरे आवरण के भीतर दाखिल होने की कोशिश करे. दर्द बांटने से मैं कमजोर नहीं पड़ना चाहती अर्जुन फिर चाहे तुम उसको ज़िद्द समझो."

"मेरी इत्छा के बारे में क्या ख़याल है आपका? आपकी ज़िद्द और आवरण वाली बात मैं मान लेता हु लेकिन क्या मैं इतनी हिमाकत कर सकता हु की वो निशाँ देख सकू जिन्हे आपने अपना खजाना बना रखा है?", इतना खुल कर कहना दीपा भाभी को स्तब्ध कर गया था जिनकी जुबान लरजने लगी थी. और जवाब देते न बना तोह वो देगची में खड़े मसाले डालने लगी. उनके हलके धुए से हलकी खांसी होते हे अर्जुन ने देगची धक् कर भाभी की पीठ थपथपाते हुए साफ़ पानी उनके होंठो से लगा दिया.

"ये धुँआ हानि पंहुचा सकता है इसलिए चेहरा दूर हे रखा कीजिये. वैसे भी लकड़ियां फेफड़ो पर असर करती है अगर उनके इतने नजदीक रहो.", भाभी के आँखों में धुंए की वजह से पानी आ गया था लेकिन अर्जुन द्वारा सहलाना और पानी होंठो से लगाना उन्हें उठने पर मजबूर कर गया. वो आगे कुछ बोलती उस से पहले अर्जुन ने कटी हुई सब्जिया देगची में उलट दी. अब वो खुद कड़छी चलने लगा था और दीपा भाभी एक नजर उसको देख बहार गलियारे की और चली गयी. वह का दरवाजा बंद करके वो स्नानघर में दाखिल हुई, हाथ में टोलिया और कपडे लिए. अर्जुन पूरी तन्मयता से सब्जियां पकाने में लगा था और एक तरफ भीगे रखे चावल का भगोना उठा कर उनका पानी कच्चे आँगन में बहा कर उसने वो भी देगची में उलट दिए. अनुमान से देगची में मटके का पानी दाल कर चूल्हे की आंच काम करने के बाद उसने ऊपर प्लेट ऐसे ढंकी की मुँह थोड़ा खुला रहे और प्लेट में भी पानी भर दिया. चूल्हे से बड़ी लकड़ियां निकाल कर वो उन्हें बुझा चूका था. इस सबमे हे उसको तक़रीबन 10-15 मिनट लग चुके थे और वो वही रखे भाभी के दुपट्टे से चेहरे का पसीना साफ़ करने लगा तोह बगल वाले कमरे से अपना नाम सुनाई दिया. ये दीपा भाभी की आवाज हे थी. अर्जुन उठ कर उस कमरे की तरफ चल दिया जहा से सामने का आँगन खुला दीखता था लेकिन उसने इसको देखा नहीं था पहले. लकड़ी के 2 किवाड़ वाला ये कमरा हे दीपा भाभी का था जबकि बहार की तरफ वाले कमरे बैठक और दिलबाग के टेलीविज़न वाले थे. भाभी उसकी अपेक्षा से विपरीत पाँव तक लम्बे ढीले गाउन में थी, सूती कपडे की बानी मैक्सी जो उसने ज्यादातर घरेलु महिलाओं को शयनकक्ष में पहने हे देखा था. ये कोई उतना आधुनिक नहीं था जैसा उसने रेणुका या मधु बुआ को दिलवाया था और न हे वैसा कैसा हुआ जैसा अक्सर ललिता जी पहनती थी. शायद वो पुराण था जो उसकी ताई जी गदराये जिस्म पर ज्यादा कैसा रहता था उनके अध्भुत्त उठान की वजह से.

"तुम्हारी इत्छा और मेरी ज़िद्द को बरकरार रखते है लेकिन तुम सवाल नहीं करोगे. ये मलहम लाये थे न तोह जितना ठीक लगे खुद हे लगा दो. जैसे मैं तुम्हारे लिए गैर नहीं वैसे तुम मेरे लिए, ये ध्यान रखना इसको लेने से पहले. मुझसे ज्यादा मेरे दर्द को तुमने महसूस किया और आज सुबह तुम्हारा मेरे लिए अँधेरे में देखभाल के लिए आना साफ़ बताता है के मैं गलत नहीं हु तुम्हारे बारे में. दीवारे बहार हमेशा हे वैसी रहेंगी.", अर्जुन को तुबे पकड़ा कर वो खुद उस सूती चोगे में अपने बड़े बिस्टेर पर करवट के बल घुटने मदद कर लेट चुकी थी. बदन कुछ भीगा था पानी की वजह से जिस वजह से कही कही कपडा चिपक रहा था और कमरे में कूलर की आवाज कुछ ख़ास नहीं थी लेकिन हवा उचित. अर्जुन उनके बेदाग़ से खूबसूरत तलवो की तरफ बैठा तोह भाभी ने अपना चेहरा उस से हटा कर तकिये पर टिका लिया, करवट अनुसार.

अभी बस वो तुबे खोलने से पहले उसने थोड़ा सा कपडा पिंडलियों की जड़ तक हे खिसकाया था की हाथ वही रुक गए. सलवार के पहुंचे की जड़ या पायल से ऊपरी हिस्से से हे उन सुडोल पिंडलियों तक हे तक़रीबन 11-12 neeli-laal लकीरे बानी थी दोनों पाँव पे. अर्जुन के हाथ हे काँप उठे उन्हें छूने की कोशिश में और जैसे हे उसका स्पर्श एक लकीर पर हुआ उसने आँखें हे मूँद ली. जब उसको आगे कोई हरकत करते न पाया तोह सर घुमा कर भाभी ने हे उसका चेहरा देखा.

"दर्द जा चूका है उसको वापिस नहीं लाना. मिटने की कोशिश तुम करना चाहते थे तोह वो करो. देखे तुम्हारी मलहम असर करती है या व्यर्थ है."

"ाची बात है की आप मंगलसूत्र नहीं पहनती और मैं उन्हें भैया बुला चूका हु. इस तरह तोह कोई भड़के जानवर पर गुस्सा नहीं उतरता भाभी जबकि आपको तोह बस देखने भर से इंसान अपने दुःख भुला कर सिर्फ प्यार के एहसास से भर उठे. वो हाथ जो एक पशु को भी बचा समझते है, वो इंसान जो खुद को मशीन बना कर बस सेवा में हे दिन गुजार देता है. उसके साथ इतनी हैवानियत वो भी ऐसा व्यक्ति करे जो उसका जीवनभर प्रहरी हो.? नहीं जानता की मैं क्या सोच रहा हु अब लेकिन ये सही नहीं है."

"फिर जो सही है वो करो और ज़िद्द तोह तुम्हारी हे है अब, मेरी इत्छा के साथ.", भाभी ने अब दोनों के हे जवाब उलट दिए थे जिस को सुनते हुए अर्जुन ने वो मलहम अपनी ऊँगली पर लेने के बाद हर लकीर और निशाँ पर बड़ी हे सावधानी से मालनी शुरू कर दी. वो कोई पेंसिल मिटने वाली रबर न था लेकिन अर्जुन द्वारा हर लकीर को सहलाना दीपा भाभी को एक स्वर्गिक सुख दे रहा था. चाँद लम्हो में हे हे उनकी पिंडलियाँ वो मलहम ग्रहण कर चुकी तोह उन्होंने खुद हे थोड़ा सा वस्त्र ऊपर सरका कर घुटनो के ऊपर कर दिया. अर्जुन को अब कुछ ज्यादा हे बड़े निशाँ दिख रहे थे उस गौरवर्ण बालविहीन चमड़ी पर. क्या अकार था उन घुटनो से ऊपर जाती जांघो का जो मांसल होने के साथ भरपूर ठोस और गोर्वरन थी. चाँद मोटी नीली लकीरे उनकी असलियत न छुपा सकती थी और शायद दिलबाग था भी नहीं ऐसे अद्वित्य सौंदर्य की देखभाल के लायक. अब मार की लकीरो की जगह अर्जुन उनकी आधी जांघो को हे मलहम से मालिश करने लगा था जबकि बरसो से अतृप्त और पीड़ित दीपा भाभी के दिल ने उनसे पहले हे इसको भांप लिया. शरीर में अगर कुछ रोयें थे भी तोह वो दिल के समर्थन में उठ खड़े हुए. सिरहाने में दबा चेहरा आंसू टपका चूका था और उसमे क्षमता हे न बची अर्जुन के आगे बढ़ते हाथो को रोकने की. पुष्ट जांघो पर अब उसके दोनों हाथ बहोत हे एहतियात से अपना जलवा दिखा रहे थे. कपडे के भीतर तक कब वो उस कैंची के जोड़ तक आ पहुंचे दोनों को पता न लगा. इस भाग पर लचीला मांस और एक अलग सी लमस सी थी दीपा भाभी के जिस्म में.

'यु दुनिया की हर नार सामान, पर वो कुछ अलग है.

तुम उसके जख्म देखते हो, जख्म हरने की दवा वही है.

काश की वो जाहिर कर सके, या मुसाफिर हे पहल करे,

आज तक दर्द में इश्क़ न डुबोया, चलो ये भी सीख ले.

ज़िद्द की जुम्बिश मेरी हे थी, उसकी इत्छा जान कर अनजान,

हर पहलु से जान गया दुनिया, पर ये नार कुछ अलग है.'

"मैं इस मलहम को एक सजा में बदलना चाहता हु भाभी. क्या मुझे हक़ है इन्हे सोखने का?", अर्जुन ने जिस तरह आहिस्ता से वो वस्त्र उन भरी हुई जांघो के ऊपर तक उठाने के बाद हलके से चुम्बन अंकित करके अपना विचार रखा था एक पल के लिए दीपा भाभी सिहर सी उठी थी.

"अल्फाज गलत कहने कोई तुमसे सीखे. बोझ मैट रखना जब दवा कर रहे हो, दुखी खुद तुम्हारी शरण है. सजा कहा मिलेगी वो मुझे समझ है, हरमन उस पल से तुम्हारी थी जब तुमने चाहा था. दाग तुम नहीं डोज, देगा मुझे मंजूर.", क्या हे खूबसूरत वर्णन किया था दीपा भाभी ने अर्जुन का वो जांघ पर टिका मलहम लगा हाथ हे चूम कर. उनकी आँखों में पीड़ा की जगह एक उम्मीद थी और अर्जुन को ऐसा प्रस्ताव की वो बाकी निशाँ पिघला क्र मिटा दे. वो उठ कर बहार चल दिया था उन्हें हैरत में छोड़ कर. पता नहीं ये कौनसी सजा थी अब उसकी.
 
अपडेट आज दूंगा दोस्तों क्योंकि कुछ गंभीर समस्या थी. बाकी आप लोग क्सस्कूप पढ़ो और जिस दिन मैं अपडेट नहीं देता उस दिन aka3829 SS Hans Landa Professsor Ayush2017 Billi420 Anil23265 के साथ firefox420 Shailesh kumar और बाकी भाइयों के रिव्यु पढ़ा कीजिये. इस कहानी में इंडेक्स पर चलने से फायदा नहीं होने वाला भाई. यहाँ Fâķîřă से Kingsingh तक धुरंधर बैठे है जो अपडेट की कमी को सवाल जवाब से पूरा कर देते. हाँ उस से आगे एक्सेलेंसी मतलब XLNC eternity odin chacha Gsc Guffy जैसे बैठे है जो तभी बोलते जब उन्हें लगता की अब बोलना चाहिए. मतलब कहानी पहले मिनट से हे न आपकी न मेरी. हाँ फिलहाल अपडेट के लिए माफ़ी क्योंकि लैपटॉप का चार्जिंग पॉइंट ठीक करवाने में हे दिन निकल गे. शुभरात्रि
 
अपडेट 208

मलहम


"तुम्हे नहीं लगता कौशल्या की ये कुछ ज्यादा हो गया? कृष्ण को क्या जवाब डौगी जो बेचारा अपनी बीवी को सुरक्षित छोड़ कर गया था? बेहतर होता अगर कानून के तरीके से सजा दी जाती.", घर लौटने के बाद कुछ चाय नाश्ता ख़तम करके अब रामेश्वर जी पिछले बगीचे की तरफ टहलते हुए आये थे जहा खेत से मंगवाए 2 मजदूर वह के jhaad-kharpatwar साफ़ करने में जुटे थे और एक उन्हें काटते में भरने का काम कर रहा था. बगीचा उतना बड़ा था जितना शहर में इनका घर लेकिन इसकी संभाल न होने से कुछ जंगल सा प्रतीत होने लगा था. मोटर दुरुस्त की जा चुकी थी और बाकी बिजली बल्ब का काम भी. टंकी भूमिगत थी जिसको साफ़ करने का निश्चय अर्जुन ने लिया था जो अभी भोजन के लिए बहार था. कौशल्या जी लाली के माँ को काम समझा कर इधर हे कुर्सी डाले बैठी थी और पूर्णिमा जी भीतर आँचल और मुन्ने के पास.

"आपने कानून घर से बहार रखा है और घर के भीतर तमाम छोटे बड़े निर्णय पहले भी मेरे थे और आज भी. कृष्ण क्या कहेगा या चौपाल क्या कहेगी अगर मैं यही सोचती राहु तोह हो गया काम. आप तोह 302 के भी पक्षधर थे फिर आपका लाडला भाई क्या कहता? बैल करवा देते क्या जज पे किये एहसान के बदले?", अब रामेश्वर जी भी फीकी हंसी देते हुए बगल वाली निवार की कुर्सी पर विराजमान हो गए. सामने घास और पत्तो से भरे 5 काटते एकत्रित हो चुके थे और अभी इतने हे और होने का अंदेशा था.

"तुम जानती हो कौशल्या की मैं इंसान को हमेशा एक मौका देने में विश्वास करता हु. हाँ देवकी को अनगिनत मिले लेकिन अब वो जीवन मौत से बदतर होगा और एक ढलते हुए व्यक्ति को जिस समय अपनी संगिनी की जरुरत होती है, कृष्ण को उसकी कमी खलेगी."

"खलती तोह चंद्रो बहिन जी को भी है और पूर्णिमा को भी. सितारा के पति को गुजरे भी 25 बरस हो लिए और दोनों हवेली के मर्दो को भी चाहे मोहर अभी पूरा हुआ लेकिन था तोह वो भी रंडवा. अपनी जूती पर पैबंद सबका बुरा लगता है पंडित जी लेकिन जब हल न हो तोह क्या उसको फेंक देते है? बड़े आये मेरे कृष्ण वाले. नाम के साथ काम से भी कृष्ण है आपका वो saral-buddhi लेकिन उस मामले में नहीं पड़ती क्योंकि फिर आप ann-jal त्याग डोज. Raaje-rajwaade चले गए पर जनाब आज भी मुखिया है. घर परिवार मुझे देखने दो और आप बस अपने पिता के सपने पूरे करो जी. इधर कॉलेज तोह बहोत लोग देख लेंगे क्योंकि जरुरत उन्हें है लेकिन वो गौशाला वैसी हे रुकी पड़ी है जो दलीप और शंकर के जिम्मे लगाईं थी. रघुवीर भाई साहब की याद में स्कूल बनवाना था जिसके लिए कल रात भी उमेद आपसे चर्चा करने की सोचता रहा. सुनंदा ने अपनी जमीन दान करि लेकिन नीव न राखी जा रही आपसे जबकि पता है के वो समाज के साथ साथ आपके बचो के लिए भी जरुरी है. 6 महीने हो गए डायरी लिखते न दिखे आप मुझे. कल वापिस चलने के बाद आप जितना टाइम लेना चाहो लो पर ये सब चालू करवाओ नहीं तोह आपकी औलादे इधर उधर सींग फंसाये घूमती रहेंगी.", कृष्णेश्वर के मुद्दे पर सपाट जवाब देने के बावजूद उन्होंने उसको पृथक कर दिया बाकी सब रुके कामो की गिनती करवा कर.

"हाँ भगवान् काम तोह और भी बहोत अधूरे पड़े है. इधर आने का तोह purv-nirdharit हे नहीं था. चंद्रो भाभी के आश्रम वाला मामला भी देखना है और मधु की तरफ भी जाना पड़ेगा. घर शहर में ले लिया है अब उन्होंने तोह भाई साहब का बुलावा था हम दोनों के लिए. कल वापिस चलने के बाद देखते है क्या करना है. वैसे कहना क्या है कृष्ण को और बाकी लोगो को?"

"लट्ठ पड़ा था दामिनी के सर पे. दिमाग की चोट है इसलिए क्सक्सक्सक्स रहेगी अब से वो. और अपने लाडले को कह देना की अब थोड़ा कायदे में रहे क्योंकि अर्जुन हवेली की चाबी अपनी चची को सौंप रहा है जैसे मैंने रेखा को दे राखी है. लेकिन यहाँ अधिकार भी अनामिका के पास हे होगा. पढ़ी लिखी और सक्षम महिला है जिसको करमजलों ने दबा दबा के आधा कर दिया. हाँ आप यहाँ आने से पहले किस से बात कर रहे थे फ़ोन पे?", कौशल्या जी के गुस्से और शांत होने का सिलसिला रामेश्वर जी बरसो से देखते आये थे इसलिए उन्होंने फिलहाल उस मुद्दे पर बात हे न की.

"कुंदन भाई का फ़ोन था मैं बताना हे भूल गया तुम्हे. ये लोग काम कर रहे है तोह इन्हे देखने लगा था जबकि संदेसा तोह तुम्हारे लिए था. कह रहे थे की सुनंदा क्सक्सक्सक्स शहर जा रही है 4-5 दिन के लिए और उसकी इत्छा है की रेखा भी थोड़ा अपनी वसीयत को देख ले अगर आपकी इजाजत हो तोह. मैंने कह दिया के ये सब मामले तोह बड़ी मालकिन देखती है और वो सबको इजाजत दे सकती है लेकिन रेखा बहु को अपने से दूर न भेजने वाली."

"अब ये क्या बोल दिया आपने? बात हे करवा देते काम से काम मेरी. सुनंदा के साथ रहेगी तोह इस से बेहतर क्या होगा और ऊपर से हिमाचल में गर्मी नहीं है इतनी. हाँ ऋतू को भेजना पड़ेगा साथ क्योंकि malham-patti भी हर रोज करनी पड़ती है. पढ़ भी लेगी शान्ति से वह अपनी नानी और माँ के सामने.", कौशल्या जी हाथ भी हिला रही थी बात करते हुए लेकिन रामेश्वर जी आखिर में अपनी हंसी रोक न सके.

"तुम्हारी ऋतू का भी फ़ोन आया था उसके बाद. बोल रही थी की वो अपनी दादी को हिमाचल लेके जा रही है परसो तोह हम लोग कल सवेरे जल्दी आने की कोशिश करे. कुछ दिन उसकी दादी सब झंझटो से दूर रहे तोह उनकी सेहत के लिए ाचा होगा.", अब कौशल्या जी ने अपने माथे पर हाथ रख लिया, मुस्कुराते हुए.

"इनकी मिलीभगत मेरे समझ से तोह बहार है जी. और मैं न जाने वाली कही भी अब. आप बैठो मैं बात करके आती हु. इन सबके लिए भी ठंडा शरबत बनवा देती हु, लगे हुए है गर्मी में.", अपनी बीवी को गलियारे से जाते देख कर रामेश्वर जी भी मुस्कुराते हुए बगीचे की तरफ हे आ गए. एक व्यक्ति उस वृक्ष से झूला खोलने हे वाला था जिसको उन्होंने वही रोक दिया.

"इस पेड़ और झूले से दूर हे रहो भाई. वापिस लपेट दो ये रस्सा और इसकी kaant-chhaant हम खुद देख लेंगे. हाँ ये करोंदे का झाड़ थोड़ा साफ़ कर दो, फल तोह आते है लेकिन नजर आये तोह कोई तोड़े. जमीन थोड़ी नरम कर देना बाद में और बाकी फिलहाल कुछ नहीं करना सावन में देखेंगे क्या लगाना है क्या हटाना है.", अब ये वृक्ष इस हवेली से भी पुराण था जिसके साथ रामेश्वर जी और उनकी छोटी बहिन की यादें थी. एक वजह ये भी थी की इस बगीचे की कभी संभाल न हुई लेकिन आज वो खुद मुस्कुरा रहे थे उस वरिस्ख के तने पर हाथ रख कर खड़े होते.

.

.

आज जैसे पृथ्वी की गति कुछ काम हो चली थी अपनी धुरी पर घूमने की या वक़्त सिर्फ दिलबाग के हे घर इतना धीमा चल रहा था. अर्जुन उस कक्ष से मात्रा चाँद लम्हो के लिए बहार आया था लेकिन वापिस पहुंचने तक जैसे उसकी हृदयगति इतनी बढ़ चुकी थी जैसे वो घंटो चलता रहा हो यहाँ पहुंचने के लिए. कुछ पल देहलीज से खड़ा हे वो ऊपर वाले की इस खूबसूरत कृति को निहारता रहा जिसका चेहरा अभी भी तकिये पर टिका था जैसे वह कोई अदृश्य चित्रकार बैठा हो जिसकी हिदायत पर दीपा भाभी के जिस्म में हलकी सी भी हरकत नहीं थी. तराशी और उभरी हुई एक जोड़ी चिकनी पिंडलियाँ स्पष्ट थी और उनसे आगे वो भरावदार सुघड़ जाँघे जिनके कटाव पर वस्त्र बेतरतीब फैला था. करवट की मुद्रा में उनके गोलाकार कूल्हे बहार और ऊपर की तरफ इस तरह उठे थे की कमर तोह गहरी खाई सी दिखाई हे न दे. गोरी मांसल बाहें एक ख़ास में मुड़ने के साथ हथेली बिस्टेर पर तिकी. अक्सर दुपट्टे में ढके रहने वाले उनके लम्बे बाल आज छोटी की जगह कमर तक बिस्टेर पर फैले थे खुले में सांस लेते प्रतीत हुए.

"आज चकोर पर चाँद मेहरबान है शायद?", इन लफ्जो से अर्जुन खयालो से बहार निकला तोह भाभी की नजरे अभी भी उस से विपरीत बस दिवार को देख रही थी, आइना अर्जुन का अक्स जो दिखा रहा था. वो आगे बढ़ने से पहले दरवाजा ढालने लगा तोह उनकी खनकती आवाज ने फिर से टोका.

"रहने दो. दर्द बंद कमरों में मिला हो तोह kam-as-kam दवा का माहौल तोह घुटन भरा न हो.", अब दीपा भाभी ने आँखें मूँद ली थी जैसे आगे अर्जुन जैसे चाहे इलाज करे. अर्जुन ने कुछ हे समय पहले खुद को भाभी के आकर्षण में बंधा पाया था जब वो निम्बू पानी बनाते हुए सबकुछ भूल बैठा था. अब अर्जुन उसके हे करीब बैठा वो जिस्म निहार रहा था जो अबसे पहले दिलबाग के सिवा किसी और के सामने इतना भी बेपर्दा न हुआ था. मलहम की परत से समूची टाँगे चमक रही थी उन असंख्य नीली लाल लकीरो के साथ जिन्हे अर्जुन मिटाना चाहता था. पर अब जैसे वो दर्द की सूचक न हो कर एक कारीगरी ज्यादा प्रतीत होती थी. पिंडलियों की गोलियों पर हथेली रखते हे हाथ आगे फिसलता चला गया उन भरी जांघो तक जो वस्त्र के भीतर थी. दीपा भाभी के जिस्म में हलकी सी कम्पन्न हुई जब हाथ उन गद्देदार कूल्हों की तलहटी के करीब रुके. अध्भुत्त उठान और मांसलता था उनके कूल्हों की जो बेशक बबिता जैसे विशाल न थे लेकिन उस से कही ज्यादा तराशे हुए.

अर्जुन ने इस क्रम में 5-6 बार पिंडलियों से उनके नितम्बो के कटाव तक मालिश की थी लेकिन जैसे उस से आगे बढ़ने या वस्त्र ऊपर सरकाने का साहस वो जूता न सका. दोनों कूल्हों के उठान से पहले उसकी उँगलियों ने एक अलग सी ऊष्मा महसूस की और संकोच वश उँगलियाँ उस जांघो के बीच वाले जोड़ और गहरी घाटी से पहले हे रुक जाती. दोनों खामोश थे लेकिन एक दूसरे का स्पर्श दिल में गहराने लगा. अर्जुन हिचक रहा था उनके मर्यादित हिस्से को देखने से और भाभी सब उसके हवाले करने के बाद भी उसकी नजरो से बचती रही.

"उफ़..", अर्जुन के होंठो से बस इतना हे निकला जब उसने हिम्मत जूता कर वो सूती चोगा कमर तक पलट दिया. इतने दुर्लभ कूल्हे और उनका बेजोड़ कटाव उस हैरत की वजह न थे बल्कि वह पर तोह जैसे सबसे अधिक अत्याचार हुआ था. अभी तक तोह अर्जुन उस नरम हिस्से को बिना देखे हे सेहला रहा था लेकिन यहाँ तोह निशाँ नीले और काफी अधिक थे. सबसे खूबसूरत हिस्से को देखने की चाह में उसने वैसा किया था लेकिन इनकी हालत देख दिल पसीज सा उठा. अब उन नीले निशानों पर हाथ फेरते हुए जैसे उसका हे दर्द बढ़ रहा था. इतनी दरिंदगी वो भी ऐसी ख़ूबसूरती पर जिसके लिए इंसान दुनिया से भिड़ने को तैयार हो जाए?

"ये बहोत गलत किया है भैया ने और आप भी उतनी हे दोषी हो भाभी जो उन्हें ऐसा करने देती हो. अब ऐसा नहीं होगा..", कमर के पुष्ट हिस्से पर सिर्फ लकीरे हे थी, उजली त्वचा जैसे उनके निचे खो चुकी हो. अर्जुन अब बहोत ज्यादा एहतियात से उस हिस्से पर मलहम से मालिश कर रहा था. दीपा भाभी जहा इस बात से शर्मसार थी की आज वो अर्जुन के सामने इस अवस्था में पड़ी है वही उसकी बात और इतना प्रेम देख वो और संयम न रख सकीय. अर्जुन फिर से मलहम लेने लगा था की उन्होंने उसकी कलाई थाम कर अपनी तरफ खिंच लिया. प्रेम में यही तोह होता है जब सामने वाला कितना हे ताक़तवर या मजबूत क्यों न हो, वो khud-ba-khud खिंचा जाता है. चेहरे के ऊपर झुका उसका चेहरा जिसमे न सवाल थे न वासना का अंश.

"अबसे ऐसा नहीं होगा.", उनका ये संक्षिप्त सा जवाब और लबों को अर्जुन के लबों से जोड़ देना पर्याप्त था अर्जुन की तरह खुदको समर्पित करने का. अब कोई करवट नहीं थी और उनके महकते जिस्म पर खुद अर्जुन रुपी सुरक्षा वस्त्र छ चूका था. दिलबाग से मिले जख्म और अनगिनत निशाँ इस प्रथम प्रेम क्षण के गवाह थे जहा दीपा भाभी ने सब भुला कर अर्जुन से आत्मिक और शारीरक एकाकार होने का फैंसला लिया था. अभी भी वो उसकी कलाई को मजबूती से थामे हुए अपने दूसरे हाथ को अर्जुन के सर पर दबाती हुई शायद अपने जीवन का पहला उन्मुक्त चुम्बन कर रही थी. इस पल में तोह जैसे अर्जुन किसी और हे दुनिया में था जो खुदको भाभी के हवाले किये उनका ये अलग हे जोशीला अवतार महसूस करने लगा. होंठो से होंठो का टकराव जितना आगे बढ़ता उतनी ज्यादा पकड़ मजबूत होने लगती. कमर के निचले हिस्से में वो भारी जाँघे कुछ फैल कर अर्जुन को अपनी गिरफ्त में ले रही थी.

एक दशक से ज्यादा पुरुष संसर्ग से दूर रहने वाली दीपा भाभी ने जब मर्यादा लांघने का विचार बना हे लिया था तोह इतने बरसो की प्यास और अर्जुन के समर्पण में वो बर्फ सी पिघलने लगी. वो कठोर बर्फ जो हिमशिखा सी थी और जाने कितनी परीक्षा ली थी उन्होंने अर्जुन की जिसका परिणाम था ये अंतहीन mukh-milan. अर्जुन भली भाँती उन कठोर गोलाइयों की रचना अपने सीने पर महसूस कर रहा था जिनमे अलग हे आकर्षण था. इतने सख्त और गोलाकार चुके विलक्षण हे थे और कुछ समय पूर्व उनका ख्वाब देखने वाला अब उन्हें सीने से लगाए था. दीपा भाभी का जिस्म और उनकी पकड़ जरा भी ढीली न थी और यही एक अनूठा एहसास था की अर्जुन उनकी गिरफ्त में बरकरार रहा.

"हहहहहहहह.. तुम जैसे मेरे सीने को निहार रहे थे, वो गलत था.. ऐसे ख़याल सामने वाले पर भी असर करते है अर्जुन... वो उँगलियाँ मैं भी महसूस कर रही थी.. उम्मम्मम", लैब कुछ पल अलग हुए तोह यही सबसे पहली बात कही भाभी ने और उनके होंठ कुछ ज्यादा हे गीले और नरम पड़ चुके थे जैसे अभी रक्त बह निकले. बरसो से बंजर सामान रहा उनका जिस्म आज फिर से हरा होने के आतुर था. अभी भी उनकी ऊपर उठी जांघो और पाँव के बीच अर्जुन के पाँव कैसे थे लेकिन दीपा भाभी ने वो मजबूत अंग महसूस कर लिया था अपने yovan-kund से नाभि तक. अलग होने के पीछे भी अर्जुन के मजबूत पंजो का हे असर था जिन्होंने चुम्बन की मदहोशी में उनके अध्भुत्त चुचो को कुछ ज्यादा हे जोश से दबोच लिया. महीन कपडे की भीतर उन्मुक्त उरोज कल्पना से कही अधिक विशाल और कठोर थे जैसे दिलबाग ने उन्हें ढीला किया हे न हो और दिनभर की bhag-daud कसरत से दीपा भाभी ने उनकी नरमी को कठोरता में बदल दिया.

"मैं जो सोच रहा था उसमे मेरा कसूर नहीं था भाभी. हमेशा ये कपडे और दुपट्टे से ढके रहते थे और आज जब कुछ बेपर्दा हुए तोह इनकी खूबसूरती ने मुझे हे क़ैद कर लिया. मेरा वैसा इरादा न था लेकिन जो देखा वो कल्पना से भी दुर्लभ था. क्या यहाँ भी निशाँ है?", अर्जुन दोनों कुहनिया भाभी की बगल में टिकाये उन छोटी फुटबॉल से गोलों को कभी सहलाता तोह कभी किनारो से दबा कर उनके अकार की कल्पना करता. धड़ से निचले हिस्से में दीपा भाभी का यौवन बेपर्दा हो कर भी अर्जुन की कमर से ढाका था. एक गहरे चुम्बन और ऐसी शारीरिक रगड़ ने उनके कटिप्रदेश के भीतर सोई भावनाये बेलगाम कर दी थी. उन्हें खुद याद न था के जीवन में कभी उन्होंने अपना मदन रास महसूस किया भी था या नहीं लेकिन आज अनंत हलके विस्फोट जिस्म के हर हिस्से में उठने लगे. बहार धुप अपने चरम पर थी और भीतर कूलर की ठंडक में भी ये 2 जिस्म उतने हे गरम. अर्जुन के हाथ जवाब मिलने से पहले हे उन नोकदार केन्डबिन्दुओं पर जा पहुंचे. मटर के दाने जितने दोनों चूचक उस से भी कड़क जान पड़ते थे. एक हलकी सीत्कार लेती दीपा भाभी ने बंद आँखों से हे ना में सर हिला दिया.

"मार सिर्फ कमर से निचे है इस बार. ऊपर तोह 2-3 निशाँ पुराने होंगे.. आह्ह्ह्ह.. तुम्हारी कल्पना बताना चाहोगे.. Umm..",Nagin सी बलखाती हुई वो दोनों हाथो में अर्जुन का चेहरा लिए होंठो से गाल और फिर वापिस होंठो तक भरपूर मदहोशी में चूमती चली गयी. इतने सख्त चुचो का संवेदनशील हिस्सा वो निप्पल हे थे जिन्हे अर्जुन चुभला रहा था. पीठ के बल लेते होने के बावजूद उनके अकार और गोलाई में कही कोई ढीलापन न था. Stann-mardan की किर्या थोड़ी तीव्र हो गयी जब अर्जुन जान गया की इधर दिलबाग की दरिंदगी नहीं थी. भाभी ऊपर उसके चेहरे तोह निचे उसकी कमर को गिरफ्त में लिए ये अजीब सी संसंहत झेलने की कोशिश करने लगी जो उनकी नाभि से योनि तक चलती अब जैसे बहार निकल रही हो. दोनों निप्पल कुछ अधिक हे मस्ती में मसलते हे दीपा भाभी का जिस्म थरथर काँपता हुआ एकाएक ढीला पड़ गया. वो निस्तेज से हो चुकी थी और उनकी अवस्था देख अर्जुन ने भी चुचो को मसलना बंद करते हुए बस हलके स्पर्श से सहलाते हुए गर्दन पर आये हलके पसीने पर होंठ रख दिए. उसकी इस अन्कोखि कामकला से दीपा भाभी का जिस्म कुछ हरकत में आया लेकिन वो बस शुरुआत थी जहा अर्जुन के होंठ और जीभ कंधे की हंसली, गोल चिकने गले का हर रोया चूमते हुए धीमी रफ़्तार से सीने के उठान तक आ पहुंचे. गाउन के इस भाग पर लगे पहले हक्क को खोलते हे चमकदार गोलाइयाँ और उनकी गहरी घाटी नजरो के निचे थी.

"उफ़.. तुम कैसी आग भड़का रहे हो ऑर्डर.. Arrjunnnnnn...aahhhh..", पहले से गीली योनि तोह जैसे अर्जुन के उस भाग से गोंड माफिक चिपक हे गयी थी. दीपा भाभी को तोह जितना ज्ञान था उसमे मर्द बस औरत के दोनों स्टैनो को दबोच कर योनि में लिंग डालने के बाद जबतक जोश रहता है धक्के लगता रहता है और उसके बाद खाली हो कर बिस्टेर के दूसरी तरफ. यहाँ अर्जुन जो खेल खेल रहा था वैसा अब उनकी कल्पना से परे था. जब चुचो से दूसरा हक्क हटा तोह उस नरम दरार में अर्जुन की जीभ के कमाल को वो सेह न सकीय और अपने दोनों हाथो के उँगलियाँ उसके कूल्हों पर दबती जोरो से सिसकने लगी. एक जवान युवक उनसे विपरीत बड़े धैर्य से कामकला दिखा रहा था. पूरा सीना बेपर्दा होते हे अर्जुन कुछ पल ृक्क कर बस उन बेजोड़ स्टैनो को हे निहारने लगा जिनका अकार जितना बड़ा था उनकी चमक उस से भी ज्यादा. कमल के पत्ते से चमकदार और पूरी तरह बहार को निकले वो दोनों हे चुके एक दूसरे का प्रतिबिम्ब थे. उनकी चिकनाहट उस शिखर पर ख़तम होती जहा गहरे भूरे रंग का दरदरा सा छोटा घेरा और सूची मोती सा गोल चूचक. ये पल बहोत था अर्जुन का सबर तोड़ने को.

"ये मेरे ख़याल और कल्पना से भी बढ़कर है भाभी. कितना मुलायम सीना है आपका और ये निप्पल जैसे औंस की बूँद.. उम्म्म", वो उस सतांन को दबा कर पीना चाहता था लेकिन उँगलियाँ बस इतनी धंसी की मांस का पता लग सके. अर्जुन की अधीरता और उसके होंठो की जड़ में अपना निप्पल देख कर दीपा भाभी ने बिस्टेर की चादर हे खिंच ली. ये पहली बार था जब अर्जुन इतनी तल्लीनता से दूध चोसकेंए के साथ उन्हें अपने लिंग का एहसास खुद करवा रहा था. कमर अपने आप हिलने से भाभी उसके पाजामे की रगड़ बर्दाश्त न कर सकीय.

"माहाहहहह.. उधर आराम से अर्जुन.. आह्ह्ह्ह.. ", दूसरे गोले को दबाता वो तुरंत रुक गया. अपनी टीशर्ट और पजामा फर्श पे फेंकता वो इतनी तेजी से वापिस लौटा जैसे भाभी कही अपने दोनों सतांन उसकी नजरो से दूर हे न कर दे. अर्जुन ये न देख सका की उसके पाजामे के agra-bhaag पर भाभी का कॉमर्स इतना चोपड़ा था की वह लेसदार धब्बा बन चूका था. उसके उतावलेपन और तगड़े जिस्म को दीपा भाभी जबतक निहारती वो वापिस उनके ऊपर छ चूका था. लेकिन अब चौकने की बारी दीपा भाभी की थी जिनकी गागर के मुहाने अर्जुन का खूंटा आ टकराया. निर्वस्त्र मूसल की गोलाई हे इतनी अधिक थी की योनि पर टिकते हे उसने वो हिस्सा ढांप दिया.

"ये.. ये.. वह पर लग रहा है.", गाउन तोह बस अब कमर हे ढंके था जबकि ऊपर और निचे से उनका वो गदराया जिस्म उनसे अधिक वस्त्रहीन अर्जुन के आगोश में पीसने लगा. सीने से सीने का स्पर्श इतनी गर्माहट भरा होगा ये भाभी को एहसास न था. लेकिन वो निहाल थी ऐसे बलिष्ट शरीर द्वारा अपने आज तक सहेजे मांसल बदन के पीसने पर. मैं में डर था तोह बस उस विभित्स अंग का जो अब उनकी योनि के रास में लिप्त एक अलग सी रगड़ के साथ आग और भड़का रहा था. दोनों चुचो की मालिश के साथ अर्जुन अब उनके गाल मुँह में भरता हुआ अपने दिल की हर कल्पना पूरी करने लगा. शायद यही ख्वाहिश दीपा भाभी की थी जो जिस हालात में उसका बराबर साथ दे रही थी वो सामाजिक मायने में एक सभ्य नारी की परिभाषा से भिन्न था. खैर समाज तोह उनके जख्मो पर मलहम लगाने भी नहीं आया था और न इतने बरसो से जो उन्होंने झेला उसकी जानकारी लेने. एक का दर्द और दूसरे की चाहत ने इन दोनों को प्रेम में इतना गहरा बाँध दिया था की समाज जैसे अब इनसे कोसो दूर हो.

"वो देख रहा है की आपका पूरा जिस्म हे कोरा है भाभी, यहाँ से भी और वह से भी. एक गन्दी बात कहु अगर बुरा न लगे तोह?", अर्जुन ने दोनों चुचो को आपस में मिलते हुए बारी बारी से निप्पल चूसने के बाद एक भरपूर रगड़ उनकी योनि के पहले हुए हिस्से की दरार के बीच लगा दी. दीपा भाभी की जाँघे अपनी सीमा से अधिक फैल कर इस रगड़ से बचने की कोशिश में थी लेकिन इस जोरदार सिसकारी ने उन्हें अवगत करवा दिया की वो दर्द नहीं है.

"आह्ह्ह्ह.. मैं आज उधर से कुछ अलग हु.. क्या गन्दी बात.. उम्म्म आराम से आह्ह्ह्ह.. क्या गन्दी बात बोलनी है?", अब वो खुद अर्जुन के कूल्हों को आगे करती खुद हे अपनी योनि पर उसका मूसल फिसला रही थी. इतनी चिकनाहट और ऐसी सख्ती के बावजूद ये मजेदार एहसास उन्हें पागल बना रहा था. हल्का हल्का पसीना जैसे दोनों की म्हणत का परिणाम था जिसको अर्जुन कई दफा चूम चूका था.

"आठ.. आपने पहले तोह खुदको इतना बंद रखा लेकिन अब अगर आप एक बार खुली तोह फिर रुक नहीं सकोगी.. उम्म्म्म.. ये उम्र है न आपकी, इसमें बस चिंगारी बहोत होती है दबी हुई आग को भड़काने के लिए. ऊपर से आप हर तरफ से इतनी कमाल हो की ..", अर्जुन आगे कुछ बोलता उस से पहले भाभी ने उसके होंठो को मुँह में बंद करते हुए पूरी शिद्दत से चूसना शुरू कर दिया. चुचो की नोक अर्जुन के सीने से रगड़ती हुई अपनी चरम पर थी और अब वो मांसल सतांन भी इतनी रगड़ाई से गुलाबी हो चले थे. उनके होंठो को के बीच मुँह दबाये अर्जुन ने अपने पहले हुए सुपडे को कमर उचका कर बस योनि के मुहाने हे रखा था की भाभी के कांपते हाथ ने पहली दफा वो मूसल दबोच लिया. डर और हैरत से उनकी पकड़ कुछ ज्यादा हे बढ़ गयी. हथेली ऊपर निचे करती वो इस बाला की पैमाइश कर रही थी की जैसे वो उनका वहां तोह नहीं. सुपडे के उभार पर तोह ऊँगली लगते हे उन्होंने अपनी हथेली छूट और उस मूसल के बीच शटर सी लगा दी.

"इस से खुली तोह मैं ज़िंदा भी बचूंगी? मुझे मेरा बहकना अब गलत लग रहा है अर्जुन.. प्यार से नहीं तुम्हारे इसको देख कर..", भाभी की कनपटी आवाज और सहमे हुए चेहरे को देख अर्जुन हलके से मुस्कुराया. दीपा भाभी के गालो को उसने कुछ ज्यादा हे चूम लिया था जो लाल और गीले हो चले थे. सीने के ऊपर हलके दांत के निशाँ और खड़े निप्पल पर चमकती लार. अपना हाथ उनके गाल से चुचो तक फिरते हुए अर्जुन ने उनका यही डर काम करना शुरू किया.

"जसलीन तोह दुबली पतली है न भाभी और आप तोह परिपक्वा भी हो. और आपके हे घर में जब उसकी हे चीख न सुनाई दी तोह आप उस से कमजोर तोह नहीं? अगली बार आप खुद इसको पकड़ कर मुँह में लेने वाली हो, देख लेना.", अर्जुन की ऐसी खुली बात सुन्न कर शर्म से भाभी ने उसके सीने पर मुक्का मारने के लिए वही हथेली खिसकाई तोह उन्हें अपनी भूल का एहसास हुआ, पर इतना हे समय बहोत था. गीले yoni-mukh पर वो दहकता कठोर सूपड़ा चुम्बन करता हुआ दबा तोह उन्होंने फिर से उस मूसल की गर्दन पकड़ ली. जिस्म में एक तीव्र झुरझुरी उठी, दोनों के. लिजलिजी सी मांसल क्योंकि की चिकनाहट भर फांको से लिंगमुण्ड बुरी तरह चिपका था.

"Ohhhhh..mmmmm.. जस जवान है.. आह्हः.. और मुँह में लेना तोह दूर मैं इसको हाथ में पकड़ती डर रही हु.."

"इसको ऐसे हे सेहलाओ भाभी. मेरी तरफ देखो..", अर्जुन ने निचे से अपने हे हाथ से उनकी हथेली को लिंग की लम्बाई पर चलते हुए थोड़ा आश्वस्त करवाया. उसको खुद भाभी के नरम हथेली का अपने लिंग पर चलना अलग सा सुख दे रहा था. कमर वैसे हे ऊपर उठी थी और अर्जुन के घुटने बिस्टेर पर ठीके जिस्म का धनुषाकार उठाये. सूपड़ा चिकनाहट की वजह से हल्का सा आगे बढ़ कर अब उन गीली फांको को फैलता ठीक छिद्र पर रुका था. इतने में हे कसमस्तति भाभी ने अर्जुन द्वारा चूमे जाने के बदले अपने पाँव फैला दिए. बस इतना बहोत था उस भयंकर लिंगमुण्ड के लिए जो जाने कबसे अकड़ा था और अब भरपूर चिकनाई से चमकता दीपा भाभी के यौवन पटल को भेदने को लालायित. भाभी की हथेली जैसे हे निचे खिसकी अर्जुन का जिस्म भी.

"ुणगगग.. ", वो कसमसाई और मुँह खोल कर अर्जुन को रोकना भी चाहा लेकिन आवाज होंठो से बहार न निकली और सूपड़ा उस बरसो से बंद छेड़ को लगभग फाड़ता हुआ अंदर. इस पल में तोह अर्जुन को भी लगा की जैसे उसके लिंग को किसी रबर में कास कर खून का बहाव हे रोक दिया गया हो. दीपा भाभी की मुट्ठी ने अलग दर्द दिया था पर उसकी परवाह न करता वो उनके दोनों खरबूजे कास कर मसलता हुआ नरम अधरों का रसपान करने लगा. इतने सुडोल गदराये बदन के बावजूद दीपा भाभी योनि से जैसे किसी युवती सी थी जहा हलके रक्त ने इसकी पुष्टि भी की. दिलबाग ने अपना दमखम बरसो पहले दिखाया था और वो भी कही न कही अर्जुन से कमतर हे होगा.

"हो गया न भाभी?", अर्जुन ने फुसफुसाते हुए होंठ अलग करते हुए कहा तोह दीपा भाभी के चेहरे पर बस हल्का सा दर्द बचा था.

"पूरा तोह पकडे हुए हु फिर कहा से हो गया? इनका (दिलबाग) न इतना मोटा था और न ऐसा जो दोनों हाथ में ना आये.. मेरी फट गयी है और तुम्हारा ये पूरा बहार है लगभग.. आह्हः.. अब एक बार में कर दो जो करना है.", भाभी ने खुद हे अपना मुँह बंद करते हुए हथेली हटा ली. दोनों ने हे अबतक एक दूसरे के वो prem-ang नहीं देखते थे जहा मामला बुरी तरह फंसा था. अर्जुन ने भी सांस एकत्रित करते हुए पहले उनके दोनों उभारो पर अपना सीना दबाया और दोनों हाथो से चिकने पत् कब्जे में लेते हुए ये करारा धक्का जड़ दिया. अब सचमुच भीतर जैसे ज्वालामुखी सा फटा हो. भाभी ने अपनी योनि के साथ साथ अर्जुन के होठो से भी रक्त बहा दिया था. शरीर कुछ पल तक एक मुद्रा में अकड़ा और फिर चेहरे जुड़ा हुए तोह वो अर्जुन से कास के लिपट गयी. कामसूत्र की इस garbh-dharan की श्रेष्ठ मुद्रा में अर्जुन का साढ़े 9 इंच लम्बा मूसल 2/3 उस बंद सुरंग को फाड़ता भीतर बैठ चूका था. योनि की गुलाबी फांके 'ो' की मुद्रा में किसी चूड़ी जितनी फैल कर उस कामदण्ड से लिपट गयी. वो दृश्य शायद हे देखना मंजूर होता दीपा भाभी को और हालत थी भी नहीं की वो कुछ देख या समझ सके.

542-1000.gif


"तेज़ाब भर दिया क्या तुमने? ओह माँ बहोत जलन हो रही है अर्जुन जैसे वह से मांस फट गया हो. बहोत बड़ा है तुम्हारा और इतना दर्द तोह पहली रात भी नहीं मिला tha...Aahhhh.. रुक जाओ थोड़ा.", बहोत हिम्मत वाली महिला थी दीपा भाभी जो ये विकराल लुंड पहली बार में हे इतना भीतर ले चुकी थी और आँखों से आंसू न बहने दिए. दर्द भयंकर था और उनकी छूट की हालत भी उतनी हे बुरी. अर्जुन उनके गाल सहलाता हुआ अपनी जगह हे रुका रहा.

"भैया भी तोह तगड़े है भाभी और आपके लिए सेक्स नया तोह नहीं? हाँ टाइट तोह बिलकुल जस जैसी हे हो या थोड़ी ज्यादा जो पता नहीं कैसे मुमकिन है. मेरा भी अंदर फस्स सा गया है. शरीर देख कर तोह लगता था के एक बार में हे पूरा झेल लेंगी... आठ..", भाभी उसके कूल्हों को खरोंचती हुई शांत रहने में जुटी थी जबकि उनके बेदाग़ चुचो को अर्जुन ने इतना रगड़ दिया थी की कुछ दिन ब्रा भी जलन देने वाली थी.

NTPSgcke9j1ypmcg.gif


"इनसे दूध निकाल कर हटोगे क्या? ऐसी मलहम लगने वाली है ये पता होता तोह पहले हे मन कर देती.. मेरी कुछ अलग होगी क्या जब 12 साल से लुंड क्या ऊँगली तक नहीं ली और ये जो तुम्हारा मेरी फुद्दी को फाड़ रहा है इसको बन्दे का लुंड कहना हे गलत होगा... दिलबाग ने तोह मुझे कभी इतना गीला भी नहीं किया था और न मेरे मम्मी मसले थे.. 10 मिनट में वो पलट जाते थे सब करके और तुम आधे घंटे तोह मसलते रहे और अब सीधा फाड़ हे दी मेरी.. जसलीन का खून देखा था मैंने और मुँह दबा लिया होगा जो मुझे फुसला रहे हो. बना दिया न बेशरम मुझे?", अर्जुन उनकी खुली बातें सुन्न कर धीमे से मुस्कुराता हुआ कुछ पीछे सरका और इस बार उसके लुंड ने दीपा भाभी के गर्भ को ठोकर मारते हे झांट से अर्जुन का पेडू मिलवा दिया.

"ऐसे खूंटा गढ़ता है भाभी भैंस का और मैं फिर कहता हु के ये आज पहली बार मैं कर रहा हु लेकिन दूसरी बार मैं आपके निचे होने वाला हु. आपकी गर्मी आज निकलने वाली है जो तबतक ठंडी नहीं होगी जबतक ये खरबूजे ढीले नहीं पड़ते. आह्हः.. अंदर से भी उतनी हे कासी हो..", लेकिन दीपा भाभी का तोह चेहरा हे पलट गया था इस ठोकर से. ठप्प की वो जोरदार आवाज और उनकी छूट का अंतिम सिरा तक इतने मोठे तगड़े लुंड से भरा ाचे ाचे की दुर्गति कर देता. दोनों चुचो को फिर से आपस में चिपका कर अर्जुन जल्द हे धीमे धक्के लगता 2-3 इंच लुंड बहार खिंच अंदर ठेलने लगा. जमे हुए सख्त माखन सी छूट की दीवारे अब पिघलने लगी थी और उनके बहार वाले होंठ हर सूक्ष्म धक्के से उलटने के बाद वापिस भीतर धंसते. केले का छिलका उतरना चढ़ना जैसा ये क्रम अगले 5 मिनट में हे भाभी को दर्द की जगह मस्ती की हलकी आहें भरने पर मजबूर कर चूका था. आखिर उनका जिस्म था हे ऐसे झोटे के लिए जो उन्हें संभाल सके.

"ऊऊओह्ह्ह्ह.. हर बार ये मीठी सी रगड़ .. मुझे कुछ हो रहा है अर्जुनननननन.. कुछ निकलता सा लग रहा है.. आह्ह्ह्ह..", इस बार उनके पत् पीछे मोड़ते हुए अर्जुन ने जड़ से जड़ जोड़ कर भीतर उस गिलगिली अंग पर सूपड़ा भिड़ाया तोह दीपा भाभी ने सखलन के साथ कुछ और भी किया जो दोनों के लिए हैरत से भरा था. एक तीव्र विस्फोट की तरह उनकी छूट से ऐसी बौछार निकली की जबतक अर्जुन लुंड बहार खींचता दोनों के पेडू उस कॉमर्स मिश्रित फुहार में डूब चुके थे. रक्त धोने का ये तरीका जोरदार था जिसमे अर्जुन ने आगे बढ़ कर अपनी हथेली से छूट को रगड़ते हुए ये फुहारा एक बार चलाया. बिस्टेर से 3 फ़ीट दूर तक बौछार हुई थी और उसके थमने से पहले हे अर्जुन ने एक झटके में समूचा लुंड सु बरसती छूट के भीतर उत्तार दिया.

"कमाल हो भाभी आप तोह.. आह्हः.. कहा तोह वो नखरे हो रहे थे और इधर तोह पूरा सावन हे बरसा दिया. उम्म्म्म.. मलाई सा फिसल रहा हु मैं..", अर्जुन की ऐसी बेशर्मी देख अब वो अपने दुपट्टे को उठा कर योनि के पास सफाई करने लगी थी जबकि वो खूंटा अभी तक उनकी छूट को बुरी तरह राउंड रहा था. बस वो बड़े कूल्हे हर धक्के को आराम से झेलने लगे. किसी स्फटिक सी सुरंग में उतरता वो विकराल लिंग अब एकसार चलने लगा. शायद यही वो अवरोध था जो इनके समागम को पहले पीड़ादायक बनता रहा. अब जैसे दीपा भाभी का वनवास इस दर्द से हे रुका था. वो फूली हुई योनि और उसका उभरा हुआ बिंदु हर धक्के पर मचल उठता. अर्जुन की रफ़्तार जल हे उनके मॉटे चुत्तड़ सँभालने लगे. अब ये समागम थोड़ा खुलने लगा था जहा चिकनाहट के साथ ऐसी रवानी थी की दीपा भाभी अर्जुन को खींचती हुई बुरी तरह चिमट कर चूमने की जगह खाने हे लगी थी. वो योनि का दर्द और उस मूसल का अकार अब पीछे रह चूका था. सरपट दौड़ते विकराल लिंग ने आज उन्हें वो रंग दिखाए थे जिनकी कल्पनाये भी न थी. अर्जुन ने लगातार म्हणत से खुद को विरक्त किया तोह एक बार और भाभी भलभला कर झड़ी.

"ये कौनसा जादू कर रहे हो जालिम.. आह्ह्ह्हह.. तुम्हे गन्दा कर दिया न मैंने.?", भाभी इसके आगे कुछ बोल न सकीय जब अर्जुन ने उन्हें पलट कर पहली बार उनकी गीली और फैली हुई छूट को देख कर होंठो से चूम लिया. वह से रिस्ता वो मधुर रास उसको अप्रतिम था. आज सचमुच उसने बबिता के बाद के तगड़ी सवारी की थी लेकिन ये तोह उस से भी रसभरी थी. कूल्हों को कमर में हाथ दाल वो अभी उठा हे रहा था की दीपा भाभी ने खुदसे हे उसका मूसल पकड़ कर लरजती फांको से जोड़ दिया. एक गहरे धक्के के बाद अर्जुन उनके चौड़े कूल्हों से लिप्त अब लटकते दोनों उभर दबोचे अपनी स्थिति बनाने लगा. भाभी की सिसकियाँ कमरे से बहार जाने लगी थी और हुमच कर धक्के लगता वो इस गदराई भैंस के थानों को निचड़ता अपने चरम को बढ़ने लगा. इन दोनों ने ये नहीं देखा की पिछले गेट से दाखिल हुई जसलीन और सुखजीत मुँह पर हाथ रखे ये सीत्कार और चीखें पिछले 15 मिनट से देख रही थी. चमकते कूल्हों के बीच वो इतना मोटा भुजंग हर बार उस गुलाबी छेड़ में घुसता और निकलता. झूलते चुचो को दबा कर निचोड़ता अर्जुन तोह अब बेलगाम था. हर थाप की आवाज के साथ वो उनकी छूट के ाहिरी हिस्से पर वार करता और भाभी उतना हे जोर से सीत्कार लेती.

"भाभी.. आह्ह्ह्हह. बहोत कासी हुई हो लेकिन दिल कुछ और भी कह रहा.", अर्जुन उनके चुके उमेठ कर patt-patt की आवाज करता उन्हें अनगिनत बार झाड़ चूका था. अब उसका लिंग भी फूल कर बच्चेदानी को भेदने लगा तोह भाभी खुद हे अपनी गांड उसकी तरफ मारने लगी.

"पिछवाड़े से ऊँगली हटाओ.. आठ.. मर्डर गयी रे मैं.. तू गलत इंसान है जो मुझे बेहया करके मानेगा.. तेरा ये डंडा .. आह्हः. सब लूट के हे मानेगा? जसलीन की बून्द ले फिर मेरी.. उम्म्म्म", और जसलीन का नाम सुनते हे अर्जुन ने वो सफ़ेद तरल उनकी खोख में भरना शुरू कर दिया.

"जसलीन की बून्द .. वो झेल नई सकेगी भाभी.. आह्हः.. लेकिन मन नहीं करेगी.. आपकी ज्यादा भारी है जो मैं अभी मारने वाला हु.. जब आप मेरा चूस कर खड़ा करोगी.", अर्जुन की बात सुन्न कर सुखजीत तोह मुस्कुराई जो झाड़ चुकी थी जबकि जसलीन तोह छूट से हाथ हटा कर हैरानी से ये हे सोचती रही की भाभी उसकी गांड क्यों मरवाना चाहती है. अब उन लरजती फांको से वो लिंग निकला तोह सफ़ेद तरल बहती हुई फांके काँप रही थी जिन्हे फिर से पेलने का अर्जुन बता चूका था.

610-1000.gif
 
Back
Top