अपडेट 208
मलहम
"तुम्हे नहीं लगता कौशल्या की ये कुछ ज्यादा हो गया? कृष्ण को क्या जवाब डौगी जो बेचारा अपनी बीवी को सुरक्षित छोड़ कर गया था? बेहतर होता अगर कानून के तरीके से सजा दी जाती.", घर लौटने के बाद कुछ चाय नाश्ता ख़तम करके अब रामेश्वर जी पिछले बगीचे की तरफ टहलते हुए आये थे जहा खेत से मंगवाए 2 मजदूर वह के jhaad-kharpatwar साफ़ करने में जुटे थे और एक उन्हें काटते में भरने का काम कर रहा था. बगीचा उतना बड़ा था जितना शहर में इनका घर लेकिन इसकी संभाल न होने से कुछ जंगल सा प्रतीत होने लगा था. मोटर दुरुस्त की जा चुकी थी और बाकी बिजली बल्ब का काम भी. टंकी भूमिगत थी जिसको साफ़ करने का निश्चय अर्जुन ने लिया था जो अभी भोजन के लिए बहार था. कौशल्या जी लाली के माँ को काम समझा कर इधर हे कुर्सी डाले बैठी थी और पूर्णिमा जी भीतर आँचल और मुन्ने के पास.
"आपने कानून घर से बहार रखा है और घर के भीतर तमाम छोटे बड़े निर्णय पहले भी मेरे थे और आज भी. कृष्ण क्या कहेगा या चौपाल क्या कहेगी अगर मैं यही सोचती राहु तोह हो गया काम. आप तोह 302 के भी पक्षधर थे फिर आपका लाडला भाई क्या कहता? बैल करवा देते क्या जज पे किये एहसान के बदले?", अब रामेश्वर जी भी फीकी हंसी देते हुए बगल वाली निवार की कुर्सी पर विराजमान हो गए. सामने घास और पत्तो से भरे 5 काटते एकत्रित हो चुके थे और अभी इतने हे और होने का अंदेशा था.
"तुम जानती हो कौशल्या की मैं इंसान को हमेशा एक मौका देने में विश्वास करता हु. हाँ देवकी को अनगिनत मिले लेकिन अब वो जीवन मौत से बदतर होगा और एक ढलते हुए व्यक्ति को जिस समय अपनी संगिनी की जरुरत होती है, कृष्ण को उसकी कमी खलेगी."
"खलती तोह चंद्रो बहिन जी को भी है और पूर्णिमा को भी. सितारा के पति को गुजरे भी 25 बरस हो लिए और दोनों हवेली के मर्दो को भी चाहे मोहर अभी पूरा हुआ लेकिन था तोह वो भी रंडवा. अपनी जूती पर पैबंद सबका बुरा लगता है पंडित जी लेकिन जब हल न हो तोह क्या उसको फेंक देते है? बड़े आये मेरे कृष्ण वाले. नाम के साथ काम से भी कृष्ण है आपका वो saral-buddhi लेकिन उस मामले में नहीं पड़ती क्योंकि फिर आप ann-jal त्याग डोज. Raaje-rajwaade चले गए पर जनाब आज भी मुखिया है. घर परिवार मुझे देखने दो और आप बस अपने पिता के सपने पूरे करो जी. इधर कॉलेज तोह बहोत लोग देख लेंगे क्योंकि जरुरत उन्हें है लेकिन वो गौशाला वैसी हे रुकी पड़ी है जो दलीप और शंकर के जिम्मे लगाईं थी. रघुवीर भाई साहब की याद में स्कूल बनवाना था जिसके लिए कल रात भी उमेद आपसे चर्चा करने की सोचता रहा. सुनंदा ने अपनी जमीन दान करि लेकिन नीव न राखी जा रही आपसे जबकि पता है के वो समाज के साथ साथ आपके बचो के लिए भी जरुरी है. 6 महीने हो गए डायरी लिखते न दिखे आप मुझे. कल वापिस चलने के बाद आप जितना टाइम लेना चाहो लो पर ये सब चालू करवाओ नहीं तोह आपकी औलादे इधर उधर सींग फंसाये घूमती रहेंगी.", कृष्णेश्वर के मुद्दे पर सपाट जवाब देने के बावजूद उन्होंने उसको पृथक कर दिया बाकी सब रुके कामो की गिनती करवा कर.
"हाँ भगवान् काम तोह और भी बहोत अधूरे पड़े है. इधर आने का तोह purv-nirdharit हे नहीं था. चंद्रो भाभी के आश्रम वाला मामला भी देखना है और मधु की तरफ भी जाना पड़ेगा. घर शहर में ले लिया है अब उन्होंने तोह भाई साहब का बुलावा था हम दोनों के लिए. कल वापिस चलने के बाद देखते है क्या करना है. वैसे कहना क्या है कृष्ण को और बाकी लोगो को?"
"लट्ठ पड़ा था दामिनी के सर पे. दिमाग की चोट है इसलिए क्सक्सक्सक्स रहेगी अब से वो. और अपने लाडले को कह देना की अब थोड़ा कायदे में रहे क्योंकि अर्जुन हवेली की चाबी अपनी चची को सौंप रहा है जैसे मैंने रेखा को दे राखी है. लेकिन यहाँ अधिकार भी अनामिका के पास हे होगा. पढ़ी लिखी और सक्षम महिला है जिसको करमजलों ने दबा दबा के आधा कर दिया. हाँ आप यहाँ आने से पहले किस से बात कर रहे थे फ़ोन पे?", कौशल्या जी के गुस्से और शांत होने का सिलसिला रामेश्वर जी बरसो से देखते आये थे इसलिए उन्होंने फिलहाल उस मुद्दे पर बात हे न की.
"कुंदन भाई का फ़ोन था मैं बताना हे भूल गया तुम्हे. ये लोग काम कर रहे है तोह इन्हे देखने लगा था जबकि संदेसा तोह तुम्हारे लिए था. कह रहे थे की सुनंदा क्सक्सक्सक्स शहर जा रही है 4-5 दिन के लिए और उसकी इत्छा है की रेखा भी थोड़ा अपनी वसीयत को देख ले अगर आपकी इजाजत हो तोह. मैंने कह दिया के ये सब मामले तोह बड़ी मालकिन देखती है और वो सबको इजाजत दे सकती है लेकिन रेखा बहु को अपने से दूर न भेजने वाली."
"अब ये क्या बोल दिया आपने? बात हे करवा देते काम से काम मेरी. सुनंदा के साथ रहेगी तोह इस से बेहतर क्या होगा और ऊपर से हिमाचल में गर्मी नहीं है इतनी. हाँ ऋतू को भेजना पड़ेगा साथ क्योंकि malham-patti भी हर रोज करनी पड़ती है. पढ़ भी लेगी शान्ति से वह अपनी नानी और माँ के सामने.", कौशल्या जी हाथ भी हिला रही थी बात करते हुए लेकिन रामेश्वर जी आखिर में अपनी हंसी रोक न सके.
"तुम्हारी ऋतू का भी फ़ोन आया था उसके बाद. बोल रही थी की वो अपनी दादी को हिमाचल लेके जा रही है परसो तोह हम लोग कल सवेरे जल्दी आने की कोशिश करे. कुछ दिन उसकी दादी सब झंझटो से दूर रहे तोह उनकी सेहत के लिए ाचा होगा.", अब कौशल्या जी ने अपने माथे पर हाथ रख लिया, मुस्कुराते हुए.
"इनकी मिलीभगत मेरे समझ से तोह बहार है जी. और मैं न जाने वाली कही भी अब. आप बैठो मैं बात करके आती हु. इन सबके लिए भी ठंडा शरबत बनवा देती हु, लगे हुए है गर्मी में.", अपनी बीवी को गलियारे से जाते देख कर रामेश्वर जी भी मुस्कुराते हुए बगीचे की तरफ हे आ गए. एक व्यक्ति उस वृक्ष से झूला खोलने हे वाला था जिसको उन्होंने वही रोक दिया.
"इस पेड़ और झूले से दूर हे रहो भाई. वापिस लपेट दो ये रस्सा और इसकी kaant-chhaant हम खुद देख लेंगे. हाँ ये करोंदे का झाड़ थोड़ा साफ़ कर दो, फल तोह आते है लेकिन नजर आये तोह कोई तोड़े. जमीन थोड़ी नरम कर देना बाद में और बाकी फिलहाल कुछ नहीं करना सावन में देखेंगे क्या लगाना है क्या हटाना है.", अब ये वृक्ष इस हवेली से भी पुराण था जिसके साथ रामेश्वर जी और उनकी छोटी बहिन की यादें थी. एक वजह ये भी थी की इस बगीचे की कभी संभाल न हुई लेकिन आज वो खुद मुस्कुरा रहे थे उस वरिस्ख के तने पर हाथ रख कर खड़े होते.
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आज जैसे पृथ्वी की गति कुछ काम हो चली थी अपनी धुरी पर घूमने की या वक़्त सिर्फ दिलबाग के हे घर इतना धीमा चल रहा था. अर्जुन उस कक्ष से मात्रा चाँद लम्हो के लिए बहार आया था लेकिन वापिस पहुंचने तक जैसे उसकी हृदयगति इतनी बढ़ चुकी थी जैसे वो घंटो चलता रहा हो यहाँ पहुंचने के लिए. कुछ पल देहलीज से खड़ा हे वो ऊपर वाले की इस खूबसूरत कृति को निहारता रहा जिसका चेहरा अभी भी तकिये पर टिका था जैसे वह कोई अदृश्य चित्रकार बैठा हो जिसकी हिदायत पर दीपा भाभी के जिस्म में हलकी सी भी हरकत नहीं थी. तराशी और उभरी हुई एक जोड़ी चिकनी पिंडलियाँ स्पष्ट थी और उनसे आगे वो भरावदार सुघड़ जाँघे जिनके कटाव पर वस्त्र बेतरतीब फैला था. करवट की मुद्रा में उनके गोलाकार कूल्हे बहार और ऊपर की तरफ इस तरह उठे थे की कमर तोह गहरी खाई सी दिखाई हे न दे. गोरी मांसल बाहें एक ख़ास में मुड़ने के साथ हथेली बिस्टेर पर तिकी. अक्सर दुपट्टे में ढके रहने वाले उनके लम्बे बाल आज छोटी की जगह कमर तक बिस्टेर पर फैले थे खुले में सांस लेते प्रतीत हुए.
"आज चकोर पर चाँद मेहरबान है शायद?", इन लफ्जो से अर्जुन खयालो से बहार निकला तोह भाभी की नजरे अभी भी उस से विपरीत बस दिवार को देख रही थी, आइना अर्जुन का अक्स जो दिखा रहा था. वो आगे बढ़ने से पहले दरवाजा ढालने लगा तोह उनकी खनकती आवाज ने फिर से टोका.
"रहने दो. दर्द बंद कमरों में मिला हो तोह kam-as-kam दवा का माहौल तोह घुटन भरा न हो.", अब दीपा भाभी ने आँखें मूँद ली थी जैसे आगे अर्जुन जैसे चाहे इलाज करे. अर्जुन ने कुछ हे समय पहले खुद को भाभी के आकर्षण में बंधा पाया था जब वो निम्बू पानी बनाते हुए सबकुछ भूल बैठा था. अब अर्जुन उसके हे करीब बैठा वो जिस्म निहार रहा था जो अबसे पहले दिलबाग के सिवा किसी और के सामने इतना भी बेपर्दा न हुआ था. मलहम की परत से समूची टाँगे चमक रही थी उन असंख्य नीली लाल लकीरो के साथ जिन्हे अर्जुन मिटाना चाहता था. पर अब जैसे वो दर्द की सूचक न हो कर एक कारीगरी ज्यादा प्रतीत होती थी. पिंडलियों की गोलियों पर हथेली रखते हे हाथ आगे फिसलता चला गया उन भरी जांघो तक जो वस्त्र के भीतर थी. दीपा भाभी के जिस्म में हलकी सी कम्पन्न हुई जब हाथ उन गद्देदार कूल्हों की तलहटी के करीब रुके. अध्भुत्त उठान और मांसलता था उनके कूल्हों की जो बेशक बबिता जैसे विशाल न थे लेकिन उस से कही ज्यादा तराशे हुए.
अर्जुन ने इस क्रम में 5-6 बार पिंडलियों से उनके नितम्बो के कटाव तक मालिश की थी लेकिन जैसे उस से आगे बढ़ने या वस्त्र ऊपर सरकाने का साहस वो जूता न सका. दोनों कूल्हों के उठान से पहले उसकी उँगलियों ने एक अलग सी ऊष्मा महसूस की और संकोच वश उँगलियाँ उस जांघो के बीच वाले जोड़ और गहरी घाटी से पहले हे रुक जाती. दोनों खामोश थे लेकिन एक दूसरे का स्पर्श दिल में गहराने लगा. अर्जुन हिचक रहा था उनके मर्यादित हिस्से को देखने से और भाभी सब उसके हवाले करने के बाद भी उसकी नजरो से बचती रही.
"उफ़..", अर्जुन के होंठो से बस इतना हे निकला जब उसने हिम्मत जूता कर वो सूती चोगा कमर तक पलट दिया. इतने दुर्लभ कूल्हे और उनका बेजोड़ कटाव उस हैरत की वजह न थे बल्कि वह पर तोह जैसे सबसे अधिक अत्याचार हुआ था. अभी तक तोह अर्जुन उस नरम हिस्से को बिना देखे हे सेहला रहा था लेकिन यहाँ तोह निशाँ नीले और काफी अधिक थे. सबसे खूबसूरत हिस्से को देखने की चाह में उसने वैसा किया था लेकिन इनकी हालत देख दिल पसीज सा उठा. अब उन नीले निशानों पर हाथ फेरते हुए जैसे उसका हे दर्द बढ़ रहा था. इतनी दरिंदगी वो भी ऐसी ख़ूबसूरती पर जिसके लिए इंसान दुनिया से भिड़ने को तैयार हो जाए?
"ये बहोत गलत किया है भैया ने और आप भी उतनी हे दोषी हो भाभी जो उन्हें ऐसा करने देती हो. अब ऐसा नहीं होगा..", कमर के पुष्ट हिस्से पर सिर्फ लकीरे हे थी, उजली त्वचा जैसे उनके निचे खो चुकी हो. अर्जुन अब बहोत ज्यादा एहतियात से उस हिस्से पर मलहम से मालिश कर रहा था. दीपा भाभी जहा इस बात से शर्मसार थी की आज वो अर्जुन के सामने इस अवस्था में पड़ी है वही उसकी बात और इतना प्रेम देख वो और संयम न रख सकीय. अर्जुन फिर से मलहम लेने लगा था की उन्होंने उसकी कलाई थाम कर अपनी तरफ खिंच लिया. प्रेम में यही तोह होता है जब सामने वाला कितना हे ताक़तवर या मजबूत क्यों न हो, वो khud-ba-khud खिंचा जाता है. चेहरे के ऊपर झुका उसका चेहरा जिसमे न सवाल थे न वासना का अंश.
"अबसे ऐसा नहीं होगा.", उनका ये संक्षिप्त सा जवाब और लबों को अर्जुन के लबों से जोड़ देना पर्याप्त था अर्जुन की तरह खुदको समर्पित करने का. अब कोई करवट नहीं थी और उनके महकते जिस्म पर खुद अर्जुन रुपी सुरक्षा वस्त्र छ चूका था. दिलबाग से मिले जख्म और अनगिनत निशाँ इस प्रथम प्रेम क्षण के गवाह थे जहा दीपा भाभी ने सब भुला कर अर्जुन से आत्मिक और शारीरक एकाकार होने का फैंसला लिया था. अभी भी वो उसकी कलाई को मजबूती से थामे हुए अपने दूसरे हाथ को अर्जुन के सर पर दबाती हुई शायद अपने जीवन का पहला उन्मुक्त चुम्बन कर रही थी. इस पल में तोह जैसे अर्जुन किसी और हे दुनिया में था जो खुदको भाभी के हवाले किये उनका ये अलग हे जोशीला अवतार महसूस करने लगा. होंठो से होंठो का टकराव जितना आगे बढ़ता उतनी ज्यादा पकड़ मजबूत होने लगती. कमर के निचले हिस्से में वो भारी जाँघे कुछ फैल कर अर्जुन को अपनी गिरफ्त में ले रही थी.
एक दशक से ज्यादा पुरुष संसर्ग से दूर रहने वाली दीपा भाभी ने जब मर्यादा लांघने का विचार बना हे लिया था तोह इतने बरसो की प्यास और अर्जुन के समर्पण में वो बर्फ सी पिघलने लगी. वो कठोर बर्फ जो हिमशिखा सी थी और जाने कितनी परीक्षा ली थी उन्होंने अर्जुन की जिसका परिणाम था ये अंतहीन mukh-milan. अर्जुन भली भाँती उन कठोर गोलाइयों की रचना अपने सीने पर महसूस कर रहा था जिनमे अलग हे आकर्षण था. इतने सख्त और गोलाकार चुके विलक्षण हे थे और कुछ समय पूर्व उनका ख्वाब देखने वाला अब उन्हें सीने से लगाए था. दीपा भाभी का जिस्म और उनकी पकड़ जरा भी ढीली न थी और यही एक अनूठा एहसास था की अर्जुन उनकी गिरफ्त में बरकरार रहा.
"हहहहहहहह.. तुम जैसे मेरे सीने को निहार रहे थे, वो गलत था.. ऐसे ख़याल सामने वाले पर भी असर करते है अर्जुन... वो उँगलियाँ मैं भी महसूस कर रही थी.. उम्मम्मम", लैब कुछ पल अलग हुए तोह यही सबसे पहली बात कही भाभी ने और उनके होंठ कुछ ज्यादा हे गीले और नरम पड़ चुके थे जैसे अभी रक्त बह निकले. बरसो से बंजर सामान रहा उनका जिस्म आज फिर से हरा होने के आतुर था. अभी भी उनकी ऊपर उठी जांघो और पाँव के बीच अर्जुन के पाँव कैसे थे लेकिन दीपा भाभी ने वो मजबूत अंग महसूस कर लिया था अपने yovan-kund से नाभि तक. अलग होने के पीछे भी अर्जुन के मजबूत पंजो का हे असर था जिन्होंने चुम्बन की मदहोशी में उनके अध्भुत्त चुचो को कुछ ज्यादा हे जोश से दबोच लिया. महीन कपडे की भीतर उन्मुक्त उरोज कल्पना से कही अधिक विशाल और कठोर थे जैसे दिलबाग ने उन्हें ढीला किया हे न हो और दिनभर की bhag-daud कसरत से दीपा भाभी ने उनकी नरमी को कठोरता में बदल दिया.
"मैं जो सोच रहा था उसमे मेरा कसूर नहीं था भाभी. हमेशा ये कपडे और दुपट्टे से ढके रहते थे और आज जब कुछ बेपर्दा हुए तोह इनकी खूबसूरती ने मुझे हे क़ैद कर लिया. मेरा वैसा इरादा न था लेकिन जो देखा वो कल्पना से भी दुर्लभ था. क्या यहाँ भी निशाँ है?", अर्जुन दोनों कुहनिया भाभी की बगल में टिकाये उन छोटी फुटबॉल से गोलों को कभी सहलाता तोह कभी किनारो से दबा कर उनके अकार की कल्पना करता. धड़ से निचले हिस्से में दीपा भाभी का यौवन बेपर्दा हो कर भी अर्जुन की कमर से ढाका था. एक गहरे चुम्बन और ऐसी शारीरिक रगड़ ने उनके कटिप्रदेश के भीतर सोई भावनाये बेलगाम कर दी थी. उन्हें खुद याद न था के जीवन में कभी उन्होंने अपना मदन रास महसूस किया भी था या नहीं लेकिन आज अनंत हलके विस्फोट जिस्म के हर हिस्से में उठने लगे. बहार धुप अपने चरम पर थी और भीतर कूलर की ठंडक में भी ये 2 जिस्म उतने हे गरम. अर्जुन के हाथ जवाब मिलने से पहले हे उन नोकदार केन्डबिन्दुओं पर जा पहुंचे. मटर के दाने जितने दोनों चूचक उस से भी कड़क जान पड़ते थे. एक हलकी सीत्कार लेती दीपा भाभी ने बंद आँखों से हे ना में सर हिला दिया.
"मार सिर्फ कमर से निचे है इस बार. ऊपर तोह 2-3 निशाँ पुराने होंगे.. आह्ह्ह्ह.. तुम्हारी कल्पना बताना चाहोगे.. Umm..",Nagin सी बलखाती हुई वो दोनों हाथो में अर्जुन का चेहरा लिए होंठो से गाल और फिर वापिस होंठो तक भरपूर मदहोशी में चूमती चली गयी. इतने सख्त चुचो का संवेदनशील हिस्सा वो निप्पल हे थे जिन्हे अर्जुन चुभला रहा था. पीठ के बल लेते होने के बावजूद उनके अकार और गोलाई में कही कोई ढीलापन न था. Stann-mardan की किर्या थोड़ी तीव्र हो गयी जब अर्जुन जान गया की इधर दिलबाग की दरिंदगी नहीं थी. भाभी ऊपर उसके चेहरे तोह निचे उसकी कमर को गिरफ्त में लिए ये अजीब सी संसंहत झेलने की कोशिश करने लगी जो उनकी नाभि से योनि तक चलती अब जैसे बहार निकल रही हो. दोनों निप्पल कुछ अधिक हे मस्ती में मसलते हे दीपा भाभी का जिस्म थरथर काँपता हुआ एकाएक ढीला पड़ गया. वो निस्तेज से हो चुकी थी और उनकी अवस्था देख अर्जुन ने भी चुचो को मसलना बंद करते हुए बस हलके स्पर्श से सहलाते हुए गर्दन पर आये हलके पसीने पर होंठ रख दिए. उसकी इस अन्कोखि कामकला से दीपा भाभी का जिस्म कुछ हरकत में आया लेकिन वो बस शुरुआत थी जहा अर्जुन के होंठ और जीभ कंधे की हंसली, गोल चिकने गले का हर रोया चूमते हुए धीमी रफ़्तार से सीने के उठान तक आ पहुंचे. गाउन के इस भाग पर लगे पहले हक्क को खोलते हे चमकदार गोलाइयाँ और उनकी गहरी घाटी नजरो के निचे थी.
"उफ़.. तुम कैसी आग भड़का रहे हो ऑर्डर.. Arrjunnnnnn...aahhhh..", पहले से गीली योनि तोह जैसे अर्जुन के उस भाग से गोंड माफिक चिपक हे गयी थी. दीपा भाभी को तोह जितना ज्ञान था उसमे मर्द बस औरत के दोनों स्टैनो को दबोच कर योनि में लिंग डालने के बाद जबतक जोश रहता है धक्के लगता रहता है और उसके बाद खाली हो कर बिस्टेर के दूसरी तरफ. यहाँ अर्जुन जो खेल खेल रहा था वैसा अब उनकी कल्पना से परे था. जब चुचो से दूसरा हक्क हटा तोह उस नरम दरार में अर्जुन की जीभ के कमाल को वो सेह न सकीय और अपने दोनों हाथो के उँगलियाँ उसके कूल्हों पर दबती जोरो से सिसकने लगी. एक जवान युवक उनसे विपरीत बड़े धैर्य से कामकला दिखा रहा था. पूरा सीना बेपर्दा होते हे अर्जुन कुछ पल ृक्क कर बस उन बेजोड़ स्टैनो को हे निहारने लगा जिनका अकार जितना बड़ा था उनकी चमक उस से भी ज्यादा. कमल के पत्ते से चमकदार और पूरी तरह बहार को निकले वो दोनों हे चुके एक दूसरे का प्रतिबिम्ब थे. उनकी चिकनाहट उस शिखर पर ख़तम होती जहा गहरे भूरे रंग का दरदरा सा छोटा घेरा और सूची मोती सा गोल चूचक. ये पल बहोत था अर्जुन का सबर तोड़ने को.
"ये मेरे ख़याल और कल्पना से भी बढ़कर है भाभी. कितना मुलायम सीना है आपका और ये निप्पल जैसे औंस की बूँद.. उम्म्म", वो उस सतांन को दबा कर पीना चाहता था लेकिन उँगलियाँ बस इतनी धंसी की मांस का पता लग सके. अर्जुन की अधीरता और उसके होंठो की जड़ में अपना निप्पल देख कर दीपा भाभी ने बिस्टेर की चादर हे खिंच ली. ये पहली बार था जब अर्जुन इतनी तल्लीनता से दूध चोसकेंए के साथ उन्हें अपने लिंग का एहसास खुद करवा रहा था. कमर अपने आप हिलने से भाभी उसके पाजामे की रगड़ बर्दाश्त न कर सकीय.
"माहाहहहह.. उधर आराम से अर्जुन.. आह्ह्ह्ह.. ", दूसरे गोले को दबाता वो तुरंत रुक गया. अपनी टीशर्ट और पजामा फर्श पे फेंकता वो इतनी तेजी से वापिस लौटा जैसे भाभी कही अपने दोनों सतांन उसकी नजरो से दूर हे न कर दे. अर्जुन ये न देख सका की उसके पाजामे के agra-bhaag पर भाभी का कॉमर्स इतना चोपड़ा था की वह लेसदार धब्बा बन चूका था. उसके उतावलेपन और तगड़े जिस्म को दीपा भाभी जबतक निहारती वो वापिस उनके ऊपर छ चूका था. लेकिन अब चौकने की बारी दीपा भाभी की थी जिनकी गागर के मुहाने अर्जुन का खूंटा आ टकराया. निर्वस्त्र मूसल की गोलाई हे इतनी अधिक थी की योनि पर टिकते हे उसने वो हिस्सा ढांप दिया.
"ये.. ये.. वह पर लग रहा है.", गाउन तोह बस अब कमर हे ढंके था जबकि ऊपर और निचे से उनका वो गदराया जिस्म उनसे अधिक वस्त्रहीन अर्जुन के आगोश में पीसने लगा. सीने से सीने का स्पर्श इतनी गर्माहट भरा होगा ये भाभी को एहसास न था. लेकिन वो निहाल थी ऐसे बलिष्ट शरीर द्वारा अपने आज तक सहेजे मांसल बदन के पीसने पर. मैं में डर था तोह बस उस विभित्स अंग का जो अब उनकी योनि के रास में लिप्त एक अलग सी रगड़ के साथ आग और भड़का रहा था. दोनों चुचो की मालिश के साथ अर्जुन अब उनके गाल मुँह में भरता हुआ अपने दिल की हर कल्पना पूरी करने लगा. शायद यही ख्वाहिश दीपा भाभी की थी जो जिस हालात में उसका बराबर साथ दे रही थी वो सामाजिक मायने में एक सभ्य नारी की परिभाषा से भिन्न था. खैर समाज तोह उनके जख्मो पर मलहम लगाने भी नहीं आया था और न इतने बरसो से जो उन्होंने झेला उसकी जानकारी लेने. एक का दर्द और दूसरे की चाहत ने इन दोनों को प्रेम में इतना गहरा बाँध दिया था की समाज जैसे अब इनसे कोसो दूर हो.
"वो देख रहा है की आपका पूरा जिस्म हे कोरा है भाभी, यहाँ से भी और वह से भी. एक गन्दी बात कहु अगर बुरा न लगे तोह?", अर्जुन ने दोनों चुचो को आपस में मिलते हुए बारी बारी से निप्पल चूसने के बाद एक भरपूर रगड़ उनकी योनि के पहले हुए हिस्से की दरार के बीच लगा दी. दीपा भाभी की जाँघे अपनी सीमा से अधिक फैल कर इस रगड़ से बचने की कोशिश में थी लेकिन इस जोरदार सिसकारी ने उन्हें अवगत करवा दिया की वो दर्द नहीं है.
"आह्ह्ह्ह.. मैं आज उधर से कुछ अलग हु.. क्या गन्दी बात.. उम्म्म आराम से आह्ह्ह्ह.. क्या गन्दी बात बोलनी है?", अब वो खुद अर्जुन के कूल्हों को आगे करती खुद हे अपनी योनि पर उसका मूसल फिसला रही थी. इतनी चिकनाहट और ऐसी सख्ती के बावजूद ये मजेदार एहसास उन्हें पागल बना रहा था. हल्का हल्का पसीना जैसे दोनों की म्हणत का परिणाम था जिसको अर्जुन कई दफा चूम चूका था.
"आठ.. आपने पहले तोह खुदको इतना बंद रखा लेकिन अब अगर आप एक बार खुली तोह फिर रुक नहीं सकोगी.. उम्म्म्म.. ये उम्र है न आपकी, इसमें बस चिंगारी बहोत होती है दबी हुई आग को भड़काने के लिए. ऊपर से आप हर तरफ से इतनी कमाल हो की ..", अर्जुन आगे कुछ बोलता उस से पहले भाभी ने उसके होंठो को मुँह में बंद करते हुए पूरी शिद्दत से चूसना शुरू कर दिया. चुचो की नोक अर्जुन के सीने से रगड़ती हुई अपनी चरम पर थी और अब वो मांसल सतांन भी इतनी रगड़ाई से गुलाबी हो चले थे. उनके होंठो को के बीच मुँह दबाये अर्जुन ने अपने पहले हुए सुपडे को कमर उचका कर बस योनि के मुहाने हे रखा था की भाभी के कांपते हाथ ने पहली दफा वो मूसल दबोच लिया. डर और हैरत से उनकी पकड़ कुछ ज्यादा हे बढ़ गयी. हथेली ऊपर निचे करती वो इस बाला की पैमाइश कर रही थी की जैसे वो उनका वहां तोह नहीं. सुपडे के उभार पर तोह ऊँगली लगते हे उन्होंने अपनी हथेली छूट और उस मूसल के बीच शटर सी लगा दी.
"इस से खुली तोह मैं ज़िंदा भी बचूंगी? मुझे मेरा बहकना अब गलत लग रहा है अर्जुन.. प्यार से नहीं तुम्हारे इसको देख कर..", भाभी की कनपटी आवाज और सहमे हुए चेहरे को देख अर्जुन हलके से मुस्कुराया. दीपा भाभी के गालो को उसने कुछ ज्यादा हे चूम लिया था जो लाल और गीले हो चले थे. सीने के ऊपर हलके दांत के निशाँ और खड़े निप्पल पर चमकती लार. अपना हाथ उनके गाल से चुचो तक फिरते हुए अर्जुन ने उनका यही डर काम करना शुरू किया.
"जसलीन तोह दुबली पतली है न भाभी और आप तोह परिपक्वा भी हो. और आपके हे घर में जब उसकी हे चीख न सुनाई दी तोह आप उस से कमजोर तोह नहीं? अगली बार आप खुद इसको पकड़ कर मुँह में लेने वाली हो, देख लेना.", अर्जुन की ऐसी खुली बात सुन्न कर शर्म से भाभी ने उसके सीने पर मुक्का मारने के लिए वही हथेली खिसकाई तोह उन्हें अपनी भूल का एहसास हुआ, पर इतना हे समय बहोत था. गीले yoni-mukh पर वो दहकता कठोर सूपड़ा चुम्बन करता हुआ दबा तोह उन्होंने फिर से उस मूसल की गर्दन पकड़ ली. जिस्म में एक तीव्र झुरझुरी उठी, दोनों के. लिजलिजी सी मांसल क्योंकि की चिकनाहट भर फांको से लिंगमुण्ड बुरी तरह चिपका था.
"Ohhhhh..mmmmm.. जस जवान है.. आह्हः.. और मुँह में लेना तोह दूर मैं इसको हाथ में पकड़ती डर रही हु.."
"इसको ऐसे हे सेहलाओ भाभी. मेरी तरफ देखो..", अर्जुन ने निचे से अपने हे हाथ से उनकी हथेली को लिंग की लम्बाई पर चलते हुए थोड़ा आश्वस्त करवाया. उसको खुद भाभी के नरम हथेली का अपने लिंग पर चलना अलग सा सुख दे रहा था. कमर वैसे हे ऊपर उठी थी और अर्जुन के घुटने बिस्टेर पर ठीके जिस्म का धनुषाकार उठाये. सूपड़ा चिकनाहट की वजह से हल्का सा आगे बढ़ कर अब उन गीली फांको को फैलता ठीक छिद्र पर रुका था. इतने में हे कसमस्तति भाभी ने अर्जुन द्वारा चूमे जाने के बदले अपने पाँव फैला दिए. बस इतना बहोत था उस भयंकर लिंगमुण्ड के लिए जो जाने कबसे अकड़ा था और अब भरपूर चिकनाई से चमकता दीपा भाभी के यौवन पटल को भेदने को लालायित. भाभी की हथेली जैसे हे निचे खिसकी अर्जुन का जिस्म भी.
"ुणगगग.. ", वो कसमसाई और मुँह खोल कर अर्जुन को रोकना भी चाहा लेकिन आवाज होंठो से बहार न निकली और सूपड़ा उस बरसो से बंद छेड़ को लगभग फाड़ता हुआ अंदर. इस पल में तोह अर्जुन को भी लगा की जैसे उसके लिंग को किसी रबर में कास कर खून का बहाव हे रोक दिया गया हो. दीपा भाभी की मुट्ठी ने अलग दर्द दिया था पर उसकी परवाह न करता वो उनके दोनों खरबूजे कास कर मसलता हुआ नरम अधरों का रसपान करने लगा. इतने सुडोल गदराये बदन के बावजूद दीपा भाभी योनि से जैसे किसी युवती सी थी जहा हलके रक्त ने इसकी पुष्टि भी की. दिलबाग ने अपना दमखम बरसो पहले दिखाया था और वो भी कही न कही अर्जुन से कमतर हे होगा.
"हो गया न भाभी?", अर्जुन ने फुसफुसाते हुए होंठ अलग करते हुए कहा तोह दीपा भाभी के चेहरे पर बस हल्का सा दर्द बचा था.
"पूरा तोह पकडे हुए हु फिर कहा से हो गया? इनका (दिलबाग) न इतना मोटा था और न ऐसा जो दोनों हाथ में ना आये.. मेरी फट गयी है और तुम्हारा ये पूरा बहार है लगभग.. आह्हः.. अब एक बार में कर दो जो करना है.", भाभी ने खुद हे अपना मुँह बंद करते हुए हथेली हटा ली. दोनों ने हे अबतक एक दूसरे के वो prem-ang नहीं देखते थे जहा मामला बुरी तरह फंसा था. अर्जुन ने भी सांस एकत्रित करते हुए पहले उनके दोनों उभारो पर अपना सीना दबाया और दोनों हाथो से चिकने पत् कब्जे में लेते हुए ये करारा धक्का जड़ दिया. अब सचमुच भीतर जैसे ज्वालामुखी सा फटा हो. भाभी ने अपनी योनि के साथ साथ अर्जुन के होठो से भी रक्त बहा दिया था. शरीर कुछ पल तक एक मुद्रा में अकड़ा और फिर चेहरे जुड़ा हुए तोह वो अर्जुन से कास के लिपट गयी. कामसूत्र की इस garbh-dharan की श्रेष्ठ मुद्रा में अर्जुन का साढ़े 9 इंच लम्बा मूसल 2/3 उस बंद सुरंग को फाड़ता भीतर बैठ चूका था. योनि की गुलाबी फांके 'ो' की मुद्रा में किसी चूड़ी जितनी फैल कर उस कामदण्ड से लिपट गयी. वो दृश्य शायद हे देखना मंजूर होता दीपा भाभी को और हालत थी भी नहीं की वो कुछ देख या समझ सके.
"तेज़ाब भर दिया क्या तुमने? ओह माँ बहोत जलन हो रही है अर्जुन जैसे वह से मांस फट गया हो. बहोत बड़ा है तुम्हारा और इतना दर्द तोह पहली रात भी नहीं मिला tha...Aahhhh.. रुक जाओ थोड़ा.", बहोत हिम्मत वाली महिला थी दीपा भाभी जो ये विकराल लुंड पहली बार में हे इतना भीतर ले चुकी थी और आँखों से आंसू न बहने दिए. दर्द भयंकर था और उनकी छूट की हालत भी उतनी हे बुरी. अर्जुन उनके गाल सहलाता हुआ अपनी जगह हे रुका रहा.
"भैया भी तोह तगड़े है भाभी और आपके लिए सेक्स नया तोह नहीं? हाँ टाइट तोह बिलकुल जस जैसी हे हो या थोड़ी ज्यादा जो पता नहीं कैसे मुमकिन है. मेरा भी अंदर फस्स सा गया है. शरीर देख कर तोह लगता था के एक बार में हे पूरा झेल लेंगी... आठ..", भाभी उसके कूल्हों को खरोंचती हुई शांत रहने में जुटी थी जबकि उनके बेदाग़ चुचो को अर्जुन ने इतना रगड़ दिया थी की कुछ दिन ब्रा भी जलन देने वाली थी.
"इनसे दूध निकाल कर हटोगे क्या? ऐसी मलहम लगने वाली है ये पता होता तोह पहले हे मन कर देती.. मेरी कुछ अलग होगी क्या जब 12 साल से लुंड क्या ऊँगली तक नहीं ली और ये जो तुम्हारा मेरी फुद्दी को फाड़ रहा है इसको बन्दे का लुंड कहना हे गलत होगा... दिलबाग ने तोह मुझे कभी इतना गीला भी नहीं किया था और न मेरे मम्मी मसले थे.. 10 मिनट में वो पलट जाते थे सब करके और तुम आधे घंटे तोह मसलते रहे और अब सीधा फाड़ हे दी मेरी.. जसलीन का खून देखा था मैंने और मुँह दबा लिया होगा जो मुझे फुसला रहे हो. बना दिया न बेशरम मुझे?", अर्जुन उनकी खुली बातें सुन्न कर धीमे से मुस्कुराता हुआ कुछ पीछे सरका और इस बार उसके लुंड ने दीपा भाभी के गर्भ को ठोकर मारते हे झांट से अर्जुन का पेडू मिलवा दिया.
"ऐसे खूंटा गढ़ता है भाभी भैंस का और मैं फिर कहता हु के ये आज पहली बार मैं कर रहा हु लेकिन दूसरी बार मैं आपके निचे होने वाला हु. आपकी गर्मी आज निकलने वाली है जो तबतक ठंडी नहीं होगी जबतक ये खरबूजे ढीले नहीं पड़ते. आह्हः.. अंदर से भी उतनी हे कासी हो..", लेकिन दीपा भाभी का तोह चेहरा हे पलट गया था इस ठोकर से. ठप्प की वो जोरदार आवाज और उनकी छूट का अंतिम सिरा तक इतने मोठे तगड़े लुंड से भरा ाचे ाचे की दुर्गति कर देता. दोनों चुचो को फिर से आपस में चिपका कर अर्जुन जल्द हे धीमे धक्के लगता 2-3 इंच लुंड बहार खिंच अंदर ठेलने लगा. जमे हुए सख्त माखन सी छूट की दीवारे अब पिघलने लगी थी और उनके बहार वाले होंठ हर सूक्ष्म धक्के से उलटने के बाद वापिस भीतर धंसते. केले का छिलका उतरना चढ़ना जैसा ये क्रम अगले 5 मिनट में हे भाभी को दर्द की जगह मस्ती की हलकी आहें भरने पर मजबूर कर चूका था. आखिर उनका जिस्म था हे ऐसे झोटे के लिए जो उन्हें संभाल सके.
"ऊऊओह्ह्ह्ह.. हर बार ये मीठी सी रगड़ .. मुझे कुछ हो रहा है अर्जुनननननन.. कुछ निकलता सा लग रहा है.. आह्ह्ह्ह..", इस बार उनके पत् पीछे मोड़ते हुए अर्जुन ने जड़ से जड़ जोड़ कर भीतर उस गिलगिली अंग पर सूपड़ा भिड़ाया तोह दीपा भाभी ने सखलन के साथ कुछ और भी किया जो दोनों के लिए हैरत से भरा था. एक तीव्र विस्फोट की तरह उनकी छूट से ऐसी बौछार निकली की जबतक अर्जुन लुंड बहार खींचता दोनों के पेडू उस कॉमर्स मिश्रित फुहार में डूब चुके थे. रक्त धोने का ये तरीका जोरदार था जिसमे अर्जुन ने आगे बढ़ कर अपनी हथेली से छूट को रगड़ते हुए ये फुहारा एक बार चलाया. बिस्टेर से 3 फ़ीट दूर तक बौछार हुई थी और उसके थमने से पहले हे अर्जुन ने एक झटके में समूचा लुंड सु बरसती छूट के भीतर उत्तार दिया.
"कमाल हो भाभी आप तोह.. आह्हः.. कहा तोह वो नखरे हो रहे थे और इधर तोह पूरा सावन हे बरसा दिया. उम्म्म्म.. मलाई सा फिसल रहा हु मैं..", अर्जुन की ऐसी बेशर्मी देख अब वो अपने दुपट्टे को उठा कर योनि के पास सफाई करने लगी थी जबकि वो खूंटा अभी तक उनकी छूट को बुरी तरह राउंड रहा था. बस वो बड़े कूल्हे हर धक्के को आराम से झेलने लगे. किसी स्फटिक सी सुरंग में उतरता वो विकराल लिंग अब एकसार चलने लगा. शायद यही वो अवरोध था जो इनके समागम को पहले पीड़ादायक बनता रहा. अब जैसे दीपा भाभी का वनवास इस दर्द से हे रुका था. वो फूली हुई योनि और उसका उभरा हुआ बिंदु हर धक्के पर मचल उठता. अर्जुन की रफ़्तार जल हे उनके मॉटे चुत्तड़ सँभालने लगे. अब ये समागम थोड़ा खुलने लगा था जहा चिकनाहट के साथ ऐसी रवानी थी की दीपा भाभी अर्जुन को खींचती हुई बुरी तरह चिमट कर चूमने की जगह खाने हे लगी थी. वो योनि का दर्द और उस मूसल का अकार अब पीछे रह चूका था. सरपट दौड़ते विकराल लिंग ने आज उन्हें वो रंग दिखाए थे जिनकी कल्पनाये भी न थी. अर्जुन ने लगातार म्हणत से खुद को विरक्त किया तोह एक बार और भाभी भलभला कर झड़ी.
"ये कौनसा जादू कर रहे हो जालिम.. आह्ह्ह्हह.. तुम्हे गन्दा कर दिया न मैंने.?", भाभी इसके आगे कुछ बोल न सकीय जब अर्जुन ने उन्हें पलट कर पहली बार उनकी गीली और फैली हुई छूट को देख कर होंठो से चूम लिया. वह से रिस्ता वो मधुर रास उसको अप्रतिम था. आज सचमुच उसने बबिता के बाद के तगड़ी सवारी की थी लेकिन ये तोह उस से भी रसभरी थी. कूल्हों को कमर में हाथ दाल वो अभी उठा हे रहा था की दीपा भाभी ने खुदसे हे उसका मूसल पकड़ कर लरजती फांको से जोड़ दिया. एक गहरे धक्के के बाद अर्जुन उनके चौड़े कूल्हों से लिप्त अब लटकते दोनों उभर दबोचे अपनी स्थिति बनाने लगा. भाभी की सिसकियाँ कमरे से बहार जाने लगी थी और हुमच कर धक्के लगता वो इस गदराई भैंस के थानों को निचड़ता अपने चरम को बढ़ने लगा. इन दोनों ने ये नहीं देखा की पिछले गेट से दाखिल हुई जसलीन और सुखजीत मुँह पर हाथ रखे ये सीत्कार और चीखें पिछले 15 मिनट से देख रही थी. चमकते कूल्हों के बीच वो इतना मोटा भुजंग हर बार उस गुलाबी छेड़ में घुसता और निकलता. झूलते चुचो को दबा कर निचोड़ता अर्जुन तोह अब बेलगाम था. हर थाप की आवाज के साथ वो उनकी छूट के ाहिरी हिस्से पर वार करता और भाभी उतना हे जोर से सीत्कार लेती.
"भाभी.. आह्ह्ह्हह. बहोत कासी हुई हो लेकिन दिल कुछ और भी कह रहा.", अर्जुन उनके चुके उमेठ कर patt-patt की आवाज करता उन्हें अनगिनत बार झाड़ चूका था. अब उसका लिंग भी फूल कर बच्चेदानी को भेदने लगा तोह भाभी खुद हे अपनी गांड उसकी तरफ मारने लगी.
"पिछवाड़े से ऊँगली हटाओ.. आठ.. मर्डर गयी रे मैं.. तू गलत इंसान है जो मुझे बेहया करके मानेगा.. तेरा ये डंडा .. आह्हः. सब लूट के हे मानेगा? जसलीन की बून्द ले फिर मेरी.. उम्म्म्म", और जसलीन का नाम सुनते हे अर्जुन ने वो सफ़ेद तरल उनकी खोख में भरना शुरू कर दिया.
"जसलीन की बून्द .. वो झेल नई सकेगी भाभी.. आह्हः.. लेकिन मन नहीं करेगी.. आपकी ज्यादा भारी है जो मैं अभी मारने वाला हु.. जब आप मेरा चूस कर खड़ा करोगी.", अर्जुन की बात सुन्न कर सुखजीत तोह मुस्कुराई जो झाड़ चुकी थी जबकि जसलीन तोह छूट से हाथ हटा कर हैरानी से ये हे सोचती रही की भाभी उसकी गांड क्यों मरवाना चाहती है. अब उन लरजती फांको से वो लिंग निकला तोह सफ़ेद तरल बहती हुई फांके काँप रही थी जिन्हे फिर से पेलने का अर्जुन बता चूका था.