Incest Pyaar - 100 Baar - Page 48 - SexBaba
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Incest Pyaar - 100 Baar

"भारत भाई, अब आप हे हमारी उम्मीद है और शंकर ने मुझे यहाँ आने से पहले हे आश्वस्त करवाया था की आपसे बेहतर व्यक्ति और कोई नहीं है ऐसे जोखिम भरे काम और जानकारी के लिए. बस आप ये हिम्मत सिंह का जितना जल्दी हो उतनी जल्दी करवा दीजियेगा. विष्णु भी हम है लेकिन पता नहीं ये इंसान देश के किस कोने में होगा. जैसा शंकर ने बताया था की 12 घंटे का एडवांस जमा करवाना पड़ता है, ये पूरे 12000 रुपये.", नरिंदर जैसे तैसे पंहुचा था इस गुप्त ठिकाने पर और पिछले 2 घंटे से भारत भाई नामक इस 55 वर्षीया व्यक्ति ने उसको ज़माने भर के अपने किस्से सुना सुना कर पका दिया था. खास बात थी की वो वर्तमान मामले की भी साड़ी जानकारी लेता रहा और दोनों लगभग एक डिब्बी सिग्रत्ती फूंक गए थे.

जितना अजीब ये दफ्तर था उस से कही ज्यादा अजीब दीखते थे भारत भाई. गर्मी चरम पर थी और इन जनाब ने सफारी सूट पहना हुआ था गंजे सर पे अंग्रेजो के ज़माने की जासूसी टोपी रखे हुए. आम इंसान तोह यहाँ निर्वस्त्र भी गर्मी मानता लेकिन ये आम व्यक्ति थे हे कहा जो इन पर कुदरत का प्रभाव पड़ता.

"ओह शब् तोह शाही (सही) है मिष्टर नरिंदर. बूत 2 कशिश (केसेस) का दुगना लगता है. हमारे लिए शंकर छोटे भाई जैसा, तुम उसका भाई और अब तुम्हारे साथ हमने सिग्रत्ती भी पी लिया तोह हम इतने से हे काम स्टार्ट कर देता है. भारत भाई के लिए ढूंढ़ना मटर करता है, मतलब केस इम्पोर्टेन्ट है मनी नै. कल ठीक 1 बजे हम ऑटो मार्किट में मिलते है. ये विष्णु वर्धन इस स्टेट से बहार हुआ तोह भी इसका पता हम वीथिन ओने वीक लगा लेगा. हाँ उतने टाइम का पूरा पेमेंट भी लगेगा, 12 हॉर्स एवरीडे एंड एव्री ऑवर 2000."

"जी भारत भाई बिलकुल ठीक कहा और मुझे ये मंजूर भी है.", नरिंदर अब खिसकना चाहता था क्योंकि पहले हे इतनी देर हो गयी थी यहाँ और उसको घर पे उमेद से भी कुछ जरुरी बात करनी थी. अभी या भी नहीं पता था के अर्जुन उनकी सभी अटकले ख़तम करता हुआ मनमानी कर चूका है.

"बूत तुम हमको वह ढूंढेगा कैसे? अब तुम्हारा आगे तोह हाईड न सीक का नहीं है भाई."

"सॉरी भारत भाई. आपके सामने नर्वस हो गया था इसलिए पूछना भूल गया."

"ी लिखे योर कॉन्फिडेंस एंड ट्रांसपेरेंट करैक्टर. तुम इंसान बहोत साफ़ है मर नरिंदर. वो वह पर हौंडा का एजेंसी की बगल में एक चना चाट वाला है. वह लंच टाइम बहोत क्राउड रहता तोह हम वह नहीं मिल सकते पर उसका chana-chaat बहोत टेस्टी है इसलिए एजेंसी की बगल से जो गली जाता है हम वही मिलेंगे. 2 प्लेट चाट लेकर तुम वही वेट करना हमारा, राइट ात 1300 हॉर्स माय बॉय. अब तुमको चलना चाहिए और ये 2 सिग्रत्ती यही रहने दो. केस स्टडी करने का टॉनिक है ये.", नरिंदर लाइटर और सिग्रत्ती की डिब्बी उठाने हे लगा था की भारत भाई की बात सुन्न कर क्षमा मांगते हुए उनके साथ दरवाजे तक आया.

"थैंक यू भारत भाई मुझे इतना समय देने के लिए. कल ठीक 1300 हॉर्स पर 2 प्लेट चना चाट के साथ मैं वही मिलूंगा."

"परफेक्ट. सिग्रत्ती नै भूलना.. हाँ.", नरिंदर हामी भरता हुआ निचे चल दिया उन बरसो पुराणी सीढ़ियों से जिन पर धुल अब मिटटी बन चुकी थी और जगह जगह झाड़ उगने लगे थे. भारत भाई अपनी कमीज का कालर वाला बटन खोलने के बाद गर्दन हिलाते हुए सिग्रत्ती जलने लगा, दिया सलाई से.

'आज रात बारिश होने वाला है.', सफ़ेद आसमान में तीखी धुप और कही बादल का नामो निशाँ तक न था. और ये इंसान जाने कहा बारिश करवाने लगा था रात में. नरिंदर तोह जितनी तेज रफ़्तार से निकल सकता था अपने घर के लिए निकल चला, मैं हे मैं शंकर को गालियां देता मतलब अपशब्द कहता हुआ. अगले आधे घंटे में नरिंदर अपने घर की बैठक में था, taro-taja और चेहरे पर परिचित मुस्कान के साथ. यहाँ अभिषेक जी का पूरा परिवार आया हुआ था और दत्त साहब भी. इन परिवारों की महिलाएं घर के भीतर वाले कमरों में थी.

"पंडित जी बता रहे थे माँ जी की आपके पैतृक गाँव में कोई मेला होने जा रहा है? अभिषेक बीटा तुम भी जानकारी रखते होंगे इस बारे में आखिर शहर तोह तुम्हारा भी वही है.?", दत्त साहब ने मेले की चर्चा प्रारम्भ की तोह नरिंदर और उमेद बड़े गौर से ये वार्तालाप देखने लगे जबकि कौशल्या जी तोह गदगद हो उठी दत्त साहब द्वारा माँ जी कहने पर.

"जी मेला तोह जाने कबसे लगता आ रहा है पर मैं उधर कभी गया नहीं. दादी जी बेहतर बता सकती है अंकल या पंडित जी.", अभिषेक पंडित जी को पंडित जी हे पुकारता था जैसा बाकी सभी गाँव और उस शहर में रहने वाले जानकार.

"बात इतनी हे नहीं है बीटा जो तुम्हारे अंकल बता रहे है. ये तोह तुम्हे आमंत्रण दे रहे है वह शामिल होने का क्योंकि मेरे सबसे छोटे पौटे ने उधर के अखाड़े में चुनौती उठाई है. अर्जुन ने अपने परिवार के सम्मान को बरकरार हे नहीं बल्कि ऊँचा करने के लिए वो चुनौती उठाई है जो पिछले 28 बरस में कोई न कर सका. अब मौका इतना ख़ास हो तोह ये भी चाहते है की इनका पूरा परिवार वह साथ हो. जितना में जानती हु सुभाष, वह की दरगाह के मेहता बहोत है. तुम्हे और देविका को जरूर देखना चाहिए. अभिषेक और शिल्पा तोह वह आएंगे हे.", अब कानो से धुआं निकलने की बारी उमेद की थी जबकि अभिषेक जैसे दरगाह मेले के बारे में जानकारी रखता था जो हैरानी से सबको देख रहा था की ये लोग खुश हो रहे है ऐसी दुर्घटना पर.

"जी ये तोह ऐसा हुआ की हम सब काम छोड़ कर भी शामिल होंगे इस पल के दर्शक बन ने के लिए. वैसे मान न पड़ेगा पंडित जी आपके पौटे अर्जुन को. मुझे तोह वो हमेशा से एक शांतचित और घरेलु बचा हे लगा चाहे जिस्मानी तौर पर असाधारण है. अखाड़े कुश्ती तोह अब उतने प्रचलन में भी नहीं रहे. हम जरूर शामिल होंगे माँ जी और बड़ी भाभी जी भी साथ आएँगी निक्की बिटिया को लिए. बेटे कारोबार देख लेंगे एक दिन."

"ये सब इतना भी आसान नहीं है अंकल जी और मुझे नहीं पता की मुझे ये कहना चाहिए या नहीं लेकिन अखाड़े की चुनौती मतलब जंगल में आग. अर्जुन का जोड़ीदार काम से काम शंकर चाचा जितना सक्षम तोह होना हे चाहिए नहीं तोह 10 पहलवानो से इस गर्मी के मौसम में वो मासूम इंसान पार नहीं प् सकेगा. यही तोह चुनौती है और फिर अकेला शेर भी इतने शिकारी कुत्तो से पार नहीं पा सकता. वो सभी पहलवान जमीन कब्जे, रंगदारी जैसे काम करके अपना शरीर और रुतबा बरक़रार रखते है. चेहरे देख कर हे सामने वाले के दिल में खौफ उतर आये लेकिन आप लोग तोह खुश हो रहे है इस अवसर पर.", अभिषेक का वर्णन सटीक था जैसा रामेश्वर जी को पता था.

"हाँ ये हम जानते है और इसलिए परेशां भी है लेकिन हमारी भगवान के विचार अलग है. वैसे शंकर जोड़ीदार नहीं बन्न सकता अर्जुन का क्योंकि दोनों का खून एक हे है और उस से बड़ी मूर्खता हमारे लाडले ने ये कर दी है की ढिंढोरा पिटवा दिया है की वो अखाड़े में अकेला उतरेगा और जो भी चाहे उसके सामने आ सकता है फिर किसी भी ऊँचे पिंड का हो या पंचायत का. ये नियम हमारे पिताजी ने पहले अखाड़े में खुद चुनौती देते हुए कहा था. जाने इतनी गहरी और पुराणी बात उसको कैसे पता चली की जैसे ये शुरू हुआ वैसे हे अर्जुन इसको अंतिम परिणाम देने की कोशिश कर रहा है. तब पिताजी ने 2-2 के जोड़ो में कुल 14 पहलवान पटके थे, सुना यही है हमने.", रामेश्वर जी जैसे यहाँ मौजूद सभी को डरने की कोशिश कर रहे थे और वो लगभग सफल भी रहे.

"छुट्टियां चल रही उसकी और क्या घर में बंद रखने के लिए तगड़ा किया मैंने उसको? आप अपने किस्से अपने हे पास रखो जी मैं कह देती हु. नयी कहानी मेरा पौता लिखेगा जिसकी साक्षी मैं खुद बनूँगी. पता लग हे जाएगा की खून समय गुजरने से कमजोर हुआ है या बेहतर. उमेद तेरी माँ कह रही थी तू और इन्दर 28 को काम से बहार हो? तुम नहीं देखोगे अपने बेटे को इस अवसर पर?", अब तोह सुभाष जी के साथ अभिषेक के भी चेहरे पर हैरत थी. कैसी दादी थी ये जो इतनी शांत और उत्साहित थी.

"ना चची.. अपने बस का नहीं और उस दिन कंपनी का कॉन्ट्रैक्ट सिग्न होना है तोह हम दोनों को दिल्ली रहना पड़ेगा. अर्जुन से मैं बात करूँगा और वो जो कर रहा है बेवजह नहीं कर रहा. खतरा है लेकिन खतरा तोह पानी पीने में भी होता है और सोने में भी लेकिन जरुरी है न वो? भगवन नारायण उसकी रक्षा करेंगे जैसे करते आये है.", उमेद के शांत एवं सकरात्मक जवाब से उन्होंने आशीर्वाद देते हुए कहा.

"देखा आप लोगो ने मेरे इस बेटे का जवाब. ये जानता है की ऐसा करना गलत नहीं है और जरूर वजह है तभी अर्जुन ने फैंसला किया. आप लोग ये बात गौरव और संजीव के सामने मैट कीजियेगा, बाकि घरवाले भी ऐसा नहीं करेंगे मैं बता चुकी हु. शंकर को पीछे घर देखना होगा राजकुमार के साथ. सतीश भी चलेगा उधर जैसा इन्होने बताया है और कृष्णा बहु भी. लड़कियां मन कर रही है सिवाए ऋतू और तारा के. लेकिन ऋतू को तयारी करनी है और तारा की ट्रेनिंग भी चल रही है तोह उनमे से कोई नहीं जाएगा. बचो का काम भी क्या है वह?"

"माँ अर्जुन भी तोह बचा है.", नरिंदर के इस लागु जवाब से कौशल्या जी ने बस नजरो से उसको खामोश करवा दिया.

"बचा है इसलिए मैं खुश हु और तुम लोग ये बचपना आजतक करते आ रहे हो. देखो बीटा मैं फिर से आप दोनों को वह आमंत्रित करती हु और कोशिश करना के इसमें घर से बचे न हे आये, जिनका दिल थोड़ा कमजोर हो. ललिता नहीं देख सकती ये सब और रेखा की हालत भी उतनी बेहतर नहीं है इसलिए उन्हें घर हे रुकना होगा. अर्जुन के ननिहाल से भी उसके नाना नानी को ले कर राजेश शामिल हो रहा है. रजनीश भाई साहब को भी इसके बारे में नहीं बताया नहीं तोह वो काम छोड़ कर शामिल हो जाते है. इतिहास की वजह से हे हमारा वजूद है और उसकी कदर हमको करनी हे होगी. मेरा पौता हार भी जाए कोई परवाह नहीं मुझे लेकिन उसके फैंसले पर ऊँगली उठा कर मैं कभी उसका जीवन खराब नहीं होने दूंगी. पिंकी बीटा, पहले इधर नाश्ता लगवा दे.", कौशल्या जी अंतत में थोड़ी भावुक हो गयी थी और प्रियंका वह बर्तन उठाने आयी तोह वो अपने आंसू छिपाती हुई उठ कर भीतर वाले कमरे में चली गयी इन सबको हैरान छोड़ कर. कुछ पल शांति छायी रही जिक्सो रामेश्वर जी ने हे भांग किया.

"माँ भी है न तोह दिल के किसी कोने में वो चिंता और डर रहना लाजमी है. पर मेरी धर्मपत्नी हे है जो इस घर को घर बना सकीय. मैं गलत फैंसला कर भी दू लेकिन कौशल्या हमेशा सही होती है. खैर अब जो हो रहा है उसको रुकवाया भी नहीं जा सकता क्यूंकि बात तोह raj-gharane तक जा चुकी है इस जंगल में लगी आग की."

"पापा वो त्यार नहीं है जितना मैं समझता हु. जोश अलग बात है और मजबूत शरीर भी ज्यादा कारगर नहीं."

"ये तोह सिर्फ एक नजरिया है बेटे. क्या पता अर्जुन इस मुद्दे को सोच हे न रहा हो जैसे उसके लिए ये सब थके हारे शिकारी कुत्ते हो जिन्हे बाघ का एक पंजा हे मूर्छित या प्राण हरने के लिए बहोत है. एक घटना में सबको उलझा कर अक्सर शिकार कही और अंजाम दिया जाता है जहा कोई सोच भी नहीं सकता. आप लोग नाश्ता करो भाई, मैं जरा पड़ोस से जरुरी कागज़ लेके आता हु. अभिषेक तुम्हे हे वो फाइल ले जानी है उधर. आता हु.", रामेश्वर जी अलग हे पहेलियाँ घुमा गए थे यहाँ से निकलने से पहले और उनके जाने के बाद शंकर भी इस माहौल में शामिल होने चला आया था, सबके साथ मुलाकात और खाने पर. अंदर सभी अपनी अपनी सहूलियत से बैठे थे जहा देविका जी रेखा के कमरे में थी शिल्पा, राजेश्वर और कृष्णा जी के साथ. ललिता जी भी काम देखते हुए यहाँ भी शामिल हो जाती. गौरव और संजीव अपनी अपनी नौकरी और जीवन की बातें कर रहे थे जैसे उन्हें जीवन के और पहलु पता नहीं थे.

रसोईघर को आरती, अलका और रुपाली के साथ सरोज भाभी संभल रही थी जबकि कोमल के साथ मुस्कान सभी मेहमानो की खातिरदारी में जुट चुकी थी प्रियंका के यहाँ से जाने के बाद. ऋतू ने प्रीती को साथ लिए घर में प्रवेश किया तोह वो भी रसोईघर में चली गयी हाथ बांटने. प्रीती कौशल्या जी की तरफ जहा पूर्णिमा जी राधिका को साथ लिए बैठी थी. ऋतू और प्रीती के चेहरे कोमल ने देख लिए थे इधर आते हे.

"ारु से बात हुई तेरी?", पहला सवाल हे यही था कोमल दीदी का जब वो बर्तन धोने की जगह पर ट्रे रख रही थी.

"हाँ लेकिन आपको कैसे पता की मैंने उस से बात की है?", ऋतू थोड़ा चौंकी थी इस अप्रत्यक्ष सवाल से.

"वो गाँव फ़ोन किया था दादी ने अभी जब पूर्णिमा दादी ने बात करने की इत्छा जताई. काण्ड कर दिया न उसने वह जाते हे और अब घर पे भी नहीं था. अनामिका चची ने बताया की वो घंटा पहले हे उठने के बाद तैयार हो कर गया है काम से. अब दोपहर में उसको काम क्या हो सकता है तुमसे बात करने के सिवा? गलत कह रही हु?", आरती और तारा के कान भी इधर हे थे जब कोमल बर्तन साफ़ करते हुए धीमी आवाज में ऋतू की खिंचाई कर रही थी.

"वो मैं हे उसको समझा रही थी दीदी के उसने एक बार पहले सबसे बात करनी थी."

"हाँ तुझे तोह वह के सब नंबर पता होंगे और ये भी की अर्जुन किधर गया होगा जो चची तक को नहीं पता.", अब ऋतू सकपका गयी थी लेकिन कोमल के चेहरे पर ये प्यारी हंसी देख वो एक तरफ से उनसे लिपट कर प्यार जतलाने लगी.

"वो पीसीओ से उसने प्रीती के घर फ़ोन किया था न दीदी और मैं उधर हे थी तोह मैंने भी बात कर ली. बहोत दांत लगाईं मैंने उसको चाहे प्रीती से पूछ लो."

"बताया मुझे रेणुका बुआ ने की कैसी दांत लगा रही थी तुम जो बस फ़ोन पकडे कड़ी थी जबतक रेणुका बुआ इधर नहीं आ गयी. फ़ोन उठाया भी बुआ ने हे था और उसके बाद उनसे लिया तुमने. हाँ बाद में प्रीती ने बात भी की होगी पर अपनी नौटंकी वह दिखाना जहा ये चल सकती हो. तुम दोनों को मैंने ज्यादा संभाला है."

"जानती हो तोह फिर पूछती क्यों हो दीदी और इसलिए तोह मुझे सबसे ज्यादा प्यार आपसे है.", ऋतू ने गाल चूमते हुए अपने चेहरे की लाली छुपानी चाही और कोमल ने भी अपनी छोटी बहिन को ऐसा करने दिया.

"नहीं पूछती लेकिन माँ ने कहा है की ठीक 7 बजे अपने नोट्स और किताबे ले कर उनके कमरे में चली जाना. सुबह 8 से पहले तुम कमरे से बहार नहीं निकलने वाली, 4 घंटे सोना इसमें शामिल होगा. और ये नियम ऐसे हे रहने वाला है. 12 से 1 तुम फ़ोन पे बात कर सकती हो जो बहाना आज बनाया वही करते हुए. अब देविका आंटी से मिल लो, तुम्हे हे पूछ रही थी जब वो आयी थी.", ऋतू के पसीने निकलवा दिए थे कोमल ने इतनी हे देर में उसकी पोल खोलते हुए.

"माँ ने कहा की वो खुद चेक करेंगी मेरी तैयारी?"

"पापा से उन्होंने ये कहा था सुबह की अब ऐसा हे होगा. दादी ने बोलै भी की उन्हें आराम की जरुरत है पर चची ने माँ का हे पक्ष लिया. दोपहर में तुम और अलका मेरे साथ पढ़ने वाली हो और ये मैंने प्लान नहीं किया. अलका ने कहा है की 2 से 6 तक वो ऐसा करेगी. पूछ लो यही पे तोह है."

"ऐ अलका ये क्या मुझसे बिना पूछे हे प्लान?"

"6 से 7 फ्री भी तोह रहना है के नहीं? और सुबह भी इतना खली टाइम रहेगा तोह गर्मी में और क्या करने को है इस घर में.? आरती तोह खुद 8 घंटे का टाइम टेबल बनाये बैठी हुई है रुपाली के साथ. इनसे तोह काम हे है अपना.", अलका के जवाब के पीछे कुछ वजह थी जिस पर बाद में बात करने का बोलती हुई ऋतू पाँव पटकती हुई अपनी दादी की तरफ चली गयी शिकायत करने. इस भरे पूरे माहौल में कुछ लोग अलग हे दुनिया में बैठे थे. माधुरी के साथ आयी गुनगुन उर्फ़ किरण को तारा पूरा घर दिखने के बाद विन्नी दीदी के साथ अपनी पुराणी जगह उस हॉल कमरे में बैठी टेलीविज़न पर गाने देख रही थी जो गुनगुन को बेहद पसंद थे. गुनगुन के साथ रहने का तारा को अलका ने हे कहा था और थोड़ी बातचीत के बाद वो मस्तमौला सी लड़की तारा को पसंद भी आयी. विन्नी का तोह दुःख हे काम होने का नाम नहीं ले रहा था. पहले शादी के माहौल की वजह से अर्जुन से दुरी रखनी पड़ी और अब वो खुद भाग गया था एक महीने के लिए. आज उसको कुछ ाचा नहीं लग रहा था इसलिए वो अर्जुन के बिस्टेर पर हे लेती थी और तारा के आने के बाद उनके साथ मजबूरी में बैठ कर खुश होने का दिखावा करने लगी.

"तारा दीदी, यहाँ एक मेंबर मिसिंग है जितना मैंने देखा है. आपके रूम के साथ वाले रूम में भी उसकी फोटो थी और इधर बड़े भैया (संजीव) वाले रूम में भी टेबल पर उसकी हे फोटो थी. कही बहार पढ़ते है क्या वो?", अर्जुन से वो मिली हे कहा थी और अभी उसने निचले कमरों में ध्यान भी नहीं दिया था जहा कृष्णा जी के कमरे में तोह अर्जुन का बचपन से अब तक सफर दिवार पर टेंगा था.

"अर्जुन सबसे छोटा भाई और मेंबर है इस घर का. हॉलीडेज में वो क्सक्सक्सक्स गया है न जहा हमारा गाँव है. शादी में आती तोह मिल सकती थी.", अब विन्नी भी थोड़ा सतर्क हुई जब अर्जुन का नाम सुना.

"हम्म्म्म. यही तोह हम रहते है और ये विलेज थोड़ी दूर है जिसके बारे में पापा और अभिषेक भैया ने बताया भी है लेकिन मैं इतनी बिजी रहती हु न उधर तोह कभी सिटी से बहार जाना हे नहीं हुआ. आपके छोटे भाई आप जितने हे सुन्दर है मतलब लड़के है तोह हैंडसम कहना ठीक होगा पर दाढ़ी रखते तोह लुक बिलकुल पंजाबी लगती. वह ज्यादातर बॉयज फेसिअल हेयर रखते है चाहे उनके सूट न करे.", गुनगुन तोह इस मामले में गुरदीप की हे सगी वाली थी जो अपनी नन्ही आँखों को नाचते हुए अनगिनत bhaav-mudraye प्रकट करती हुई बस बोलती हे रहती थी. विन्नी से तोह उसका ये सब सेहन हे नहीं हो रहा था.

"कौनसी क्लास में हो गुड़िया आप?", विन्नी से जब रहा न गया तोह वो झूठी मुस्कान के साथ बीच में शामिल हो गयी.

"जी दीदी हम है तोह फर्स्ट ईयर में लेकिन एग्जाम ाचे गए है और अब सेकंड ईयर स्टार्ट होगा हमारा जुलाई एन्ड या अगस्त फोर्ट्स वीक में. वैसे मैं आपसे भी बात करना चाहती थी लेकिन आप सीरियस बैठी थी और शिल्पा दीदी जब आप जैसे मूड में होती है तोह हम उन्हें परेशां नहीं करते. वैसे तोह बहोत प्यार करती है मुझे लेकिन ऐसे मूड में उनका गुस्सा टंग स्लिप करवा देता है उनकी. हाँ तोह तारा दीदी, आप हमारे लिए सूट डिज़ाइन कर सकती है? आपके रूम में इतने दसिग्नस थे की मुझसे रहा नहीं गया.", विन्नी इस मासूम लड़की की बात सुन्न कर अब खुद को हे बहाल बुरा बोल रही थी.

"हाँ क्यों नहीं गुड़िया, तारा नहीं भी करेगी तोह ये तुम्हे इतने सूट दिखा सकती है की डिज़ाइन याद हो जाएंगे. इसके और अलका के पास तोह सूट का भण्डार लगा हुआ जो पता नहीं कहा कहा से खोज कर इन्होने जमा किये है. लेकिन रहना बस निक्कर में होता है.", विन्नी ने मस्ती में तारा की टांग खिंचाई की तोह वो भी हंसने लगी.

"हम्म्म. शार्ट पैन्ट्स ाची लगेंगी हे इन पर और वैसे आप पे भी. लेग्स इतने मैनटैनेड है और स्किन भी. माँ कहती है मैं इस मामले में थोड़ी चब्बी हु और उधर लड़को में क्वालिटी काम है करैक्टर के मामले में तोह ऐसा फैशन एक तोह मुझे सूट नहीं करेगा और दूसरा दांत पड़ने के साथ साथ ये वैसी जगह पर ठीक भी नहीं. आप लोग एक्सरसाइज भी करती है क्या?", गुनगुन हमेशा घर में रहने वाली और कॉलेज बस पढ़ने तक सिमित थी. घर में आने वाली महिला प्रसाधन की किताबे और पत्रिका पढ़ने का बड़ा शुआक था इसको और हर तरह के परिक्षण वो करती हे रहती थी. उसकी साफ़दिली को देख विन्नी ने हे बात को सही तरह से पेश किया.

"अर्जुन जब वह आएगा न माधुरी से मिलने तोह अपनी इस नयी भाभी को बोलना की वो तुम्हे मार्किट ले जाए. ऐसा तब कहना जब घर में गेट्स नहीं हो. माधुरी तुम्हे शॉपिंग करवा देगी जैसी तुम चाहती हो और इस मामले में हमारा अर्जुन भी माहिर है. इतनी बहने है उसकी तोह लड़को से ज्यादा तोह लड़कियों के टास्ते उसको ज्यादा पता है. बात करके दुकानदार को भी पता लेता है वो."

"ये तोह आपने पते की बात करि है दीदी और फिर ऐसा हे करेंगे. माधुरी भाभी ने कल हे मुझे ये वाली ड्रेस और 2 और सूट दिलवाये है. जीन्स भी दिलवा रही थी लेकिन मुझे सूट नहीं करती इसलिए मैंने नहीं ली. तभी एक्सरसाइज के लिए पुछा मैंने की क्या ऐसा कुछ घर के अंदर पॉसिबल है? फिर मुझे प्रॉब्लम नहीं आएगी.", तारा जो अब चुपचाप सुन्न रही थी वो मैं में यही कह रही थी की बस अर्जुन से मत मिलना तुम लड़की. गलती से तुमने उसको या उनसे तुम्हे पसंद कर लिया न तोह वो साड़ी एक्सरसाइज एक बार में हे करवा देगा. और जहा जहा से तुम कुछ भरी हो वह से ज्यादा भरी हो जाओगी. तारा के होंठ हिलते लेकिन बेआवाज देख गुनगुन ने पूछ हे लिया.

"दीदी आप रिमोट से खुद को भी म्यूट कर सकती हो क्या? लिप्स हिल रहे है लेकिन आवाज बहार नहीं आ रही.", विन्नी पेट पकड़ कर हंसने लगी थी और ऐसा करने पर उसके सफ़ीद कमीज के गले से वो तराशे हुए अद्भुत कटाव एक पल को दोनों लड़कियों ने देखे. तारा के तोह कही से भी काम न थे पर गुनगुन के लिए ये दृश्य नया था. उसकी बोलती हे बंद हो गयी थी इस स्थिति में.

"मैं यही कह रही थी गुनगुन की विन्नी दीदी ठीक कह रही है. अर्जुन तुम्हे ठीक कर देगा, ी मैं वो शॉपिंग करवा देगा दीदी के साथ तुम्हे ले जा कर. बस उसको ये कह देना जैसे ड्रेस तारा और विन्नी दीदी को उसने दिलवाये थे वैसे तुम्हे ले दे. बाकी अब बातें बहोत हो गयी है और खाना भी लग चूका होगा. हमे निचे चलना चाहिए. विन्नी दीदी आप चल रही है?"

"नहीं यार, अभी नहीं. थोड़ी देर में आती हु मैं निचे. तुम लोग खाना खाओ.", वो दोनों कमरे से निकल चली तोह गुनगुन बोल उठी.

"अरे तारा दीदी हमने एक मूवी देखि थी और ये दीदी वैसी हीरोइन जैसी हे है और उनकी हालत भी."

"क्या मतलब? कैसी हालत?"

"बुरा मैट मान न पर लगता है इन्हे प्यार हो गया है और इसलिए ये शायद किसी को मिस कर रही है.", गुनगुन की बात से तारा चलते चलते वही रुक गयी. उसको भी पता था के विन्नी अर्जुन के लिए बेचैन है पर ऐसा वो चर्चा ऐ आम नहीं करती थी.

"बहोत इंटेलीजेंट हो लेकिन मैंने भी दुनिया देखि है. प्रूफ क्या है?"

"उनके वह पर जो मार्क था न वो लवर हे दे सकता है. सॉरी ऐसा भी मूवी में हे था और दीदी जब कोहनी टिका के बात कर रही थी तोह वो गलती से दिखा मुझे. पहले से हे वो अलग कमरे में अकेली थी और उन्हें अभी खाना भी नहीं खाना."

"हाहाहा.. तुम तेज हो लेकिन भोली भी बहोत हो गुनगुन. वह पर जो मार्क था वो दीदी के शादी में चोट लगने से बना. लेहंगा पहना हुआ था तोह वो थोड़ा विज़िबल जगह थी. स्लिप होने की वजह से उनके यहाँ कुर्सी का हैंडल जोर से लगा था और फिर सबको पता है इसके बारे में.", तारा मैं हे मैं कह रही थी की लड़की फिल्मो से जो भी सीखी है थोड़ा बहोत सही भी सीखी है लेकिन दिमाग घूमने में इस घर की जासूस मण्डली कही बेहतर थी.

"ओह ी सी.. वही तोह मैं कहु की ऐसा कैसे हो सकता है. इतनी सुन्दर लड़की के लिए लड़का भी तोह वैसा होना चाहिए. हाँ एनवायरनमेंट देख के तोह ये भी लगता है के बॉयफ्रेंड तोह इधर भी मुमकिन नहीं होगा बनाना. समाज, प्रेस्टीज एंड आल. फिल्म भी पता नहीं दिमाग में क्या कुछ भर देती है. सॉरी सब बोलते है की मैं बहोत ज्यादा हे बोलती हु."

"It's ऑलराइट. वैसे तुम भी बहोत सुन्दर हो और ये मत सोचा करो की तुम्हारी बॉडी में कुछ कमी है. क्यूट लगती हो तुम और हेअल्थी होना कोई प्रॉब्लम नहीं.", तारा उसको साथ लिए निचे आ गयी थी. 5 फ़ीट की किरण थी भी चंचल और हंसमुख लड़की जो कूल्हों और सीने से कुछ ज्यादा हे गदरायी थी इस काम उम्र में हे. छोटा कद होना शायद एक वजह थी और साथ हे ाचा खाना पीना भी. यहाँ सभी लोग थे सिवाए प्रियंका और माधुरी के जो अपने पुराने कमरे में बंद थी.

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"वो पहले वाली चमक नहीं दिख रही दीदी जो यहाँ रहते हुए हमेशा दिखती थी तुम्हारे चेहरे पर. कुछ दिक्कत है क्या उधर.", प्रियंका सबसे ख़ास सहेली भी थी माधुरी की और उनमे कुछ भी पर्दा न था. अपनी इस बहिन के सवाल पर माधुरी ने फीकी से मुस्कान के साथ कहा.

"नयी जगह पर एडजस्ट करना थोड़ा मुश्किल तोह होता हे है यार. लेकिन ससुराल उतना बुरा भी नहीं है जैसा पुराणी फिल्मो में होता था."

"आये हाय मैं सड़के जाऊ. तोह सरोज भाभी और प्रिय भाभी को अपना सुहागरात वाला किस्सा सुना दिया मेरे बिना हे? सच बताना कैसा एहसास था, झूठ मत बोलना क्योंकि अब आप हे हो जिसके पास कपरिसों है. तुलना तोह होनी हे है और जीजा जी दिखने में उतने बुरे भी नहीं. हट्टे काटते है चाहे उसके जितने नहीं जो हमारा प्यार है.", अर्जुन का नाम लिए बिना हे प्रियंका ने उसका जीकर करके माधुरी की दुखती राग छेड़ दी थी पर माधुरी समझदार इंसान थी और इस घर में सबसे बड़ी लड़की भी.

"हाँ ये बहोत ाचे है और बाकी बड़े भैया और शिल्पा दीदी भी मेरा बहोत ख्याल रखते है. अब पुराणी बातों के साथ इनको जोड़ कर तोह नहीं जी सकते न पिंकी?"

"झूठ बोलना नहीं आता तोह कोशिश भी नहीं करनी चाहिए दीदी. आप जानती है की अर्जुन कोई अतीत नहीं जो गुजर गया हो. वो आज भी है और कल भी रहेगा. ये तोह गौरव जीजा पर निर्भर करता है की वो तुम्हारे दिल से वो जगह हथिया सकते है या नहीं. बताओ न दीदी क्या मैं गलत कह रही हु?", माधुरी मुस्कुराते हुए भी 2 बूँद आंसू टपका गयी.

"कपरिसों और प्यार का? नामुमकिन है पिंकी और गौरव मेरा सामाजिक सच है हो अब हमेशा रहेगा. लेकिन अर्जुन के लिए भी तुमने सही कहा की वो पास होगा तोह मैं मर्यादा लांघ सकती हु, रुकने की कोशिश तोह रहेगी.", माधुरी के चेहरे को साफ़ करते हुए प्रियंका भी मुस्कुरा रही थी.

"वो जानता है की दिल को कैसे छुए जाता है. सेक्स किये बिना भी उसका एक अनूठा एहसास रहता है जब वो पास हो. चाहे साथ बैठ कर खाना खाते हे क्यों न या फिर उसको काम करते हुए देख कर. जीजा जी उस मामले में तोह तगड़े है जितना लगता है?"

"अरे मेरी बहिन अगर तू मुद्दे की हे बात करना चाहती है तोह सुन्न ले. इन्हे हिम्मत के लिए पहली बार तोह शराब की जरुरत पड़ी और उसके बाद जो हुआ उसमे कही से भी मैं शामिल नहीं थी. दबाया, मसला और दिल की बातें कही जो नशे में मेरे जिस्म तक हे सिमित थी. लेकिन सुबह उठते हे सबसे पहला काम इन्होने जो किया वो था मेरे सामने घुटनो पर बैठ के माफ़ी माँगना. कबूल किया की पहली बार उन्हें नशे की तालाब बस खुदको शांत करने के लिए पड़ी थी और मेरे सामे वो भी काम न किया. उन्हें लगा की जोश में उन्होंने सेक्स करके मुझे दर्द हे दिया जो वह खून की वजह से लगा पर मैं इसका क्या जवाब देती. प्यार से उन्हें गले लगा लिया बस यही बोलते हुए की ये उनका हक़ है."

"ओहो, तोह उस मामले में ज्यादा तगड़े निकले जो खून तक निकाल दिया?", प्रियंका की बात सुन्न कर माधुरी हँसते हुए लोटपोट हे हो गयी. वो बिलकुल अब पहले वाली माधुरी दिख रही थी, इस घर की माधुरी.

"बेवकूफ वो आजतक कच्चे थे और अर्जुन का भी खून निकला था इस वजह से."

"मतलब वो इनका खून था?"

"और नहीं तोह तुझे क्या लगता है मेरी किस्मत इतनी जोरदार है की अर्जुन से आगे जो मिला वो उस से बढ़कर होगा? कल दिन में इन्होने मीठी बातें करते हुए जब संसर्ग किया न तोह ध्यान रखा की बाहरी चिकनाई प्रयोग करे. मुझे खुद को वह से सख्त रखना पड़ा लेकिन तब भी एक बार मुझे ये एहसास नहीं हुआ की कोई तुलना मुमकिन है. लेकिन गौरव इस मामले में थोड़ा संजीदा है तोह जोर शोर तोह लगाया जिस वजह से 8-10 मिनट रेलगाड़ी चली. इनके सामने दर्द और सिसकियों का दिखावा करके जोश मैंने भी बढ़ाया इनकी मर्दानगी मानते हुए. लगभग इनके होने के बाद हे मुझे थोड़ा सा फील हुआ. जबकि मेरा शेर तोह शुरू होने से पहले हे मैदान भिगो कर पिच तैयार करता है. जबतक 3-4 बार मैं न हो जॉन इतने वो रुकता नहीं और उसके बाद पिछली तरफ भी सवारी को तैयार रहता है. हाहाहा.. उसकी तोह तू बात हे न कर. कमीना न लेने आया और न आज यहाँ है जब मैं आयी हु. मुंडका तोह बना हे सकते थे अगर वो होता तोह."

"पागल हो क्या दीदी? और अर्जुन भी तुम्हे उतना हे चाहता है बस मुझे तोह ये डर सत्ता रहा है की अगर वो आपकी तरफ आया तोह आपको देख के वो भी नहीं रुकने वाला. ये खतरनाक बात हो सकती है."

"मुझे तोह लगता है की अर्जुन वह आएगा तोह मुझपे चढ़े न चढ़े पर शिल्पा दीदी जरूर उसके निचे आने का इरादा किये बैठी है. उसके लिए कल उन्होंने मुझसे पूछ पूछ के कपडे ख़रीदे है और जब आज यहाँ आने पर उन्हें पता चला की अर्जुन उधर है तोह वह का नंबर भी लिया दादी से उन्होंने. मान न मान पिंकी, मेरी जेठानी लट्टू है अपने शेर पे. पता नहीं इस कमीने ने क्या काण्ड कर दिया इनके साथ बस शादी के व्यस्त माहौल में?"

"अर्जुन फेरो से पहले उनके हे साथ गया था जब परिवार के लोग खाने पर थे आपके साथ. कह रही थी की उधर अँधेरा है थोड़ा और बेटे को सुलाना है. ये लोग उसके बाद फिर कोई घंटे बाद हे नजर आये थे और तब अर्जुन शायद वेदी के पास ज़ूबी, प्रीती के साथ हंसी मजाक कर रहा था. दिन में भी होटल दिखने अर्जुन हे गया था न आपकी तरफ वाली बरात को? लगता है इन दोनों हे टाइम वो खेल गया अपने पत्ते और तुम्हारी जेठानी हैं भी टक्कर की और खुश मिजाज. मस्ती मस्ती में दोनों कही एक दूसरे को ठीक से तोह नहीं जान गए दीदी?"

"लग तोह यही रहा है और सच बताऊ तोह ऐसा होना चाहिए. शिल्पा दीदी की लाइफ भी बस दिखावा हे है और वो बचा उन्होंने अडॉप्ट किया था जब जेठजी को पुलिस ने बताया की कोई नवजात बचा उन्हें सड़क पर मिला है. दिल की बहोत भली है यार और ये बात उन्होंने मुझे हे बताई है और तू इसको अपने तक हे रखना. गौरव तोह जॉब की वजह से 5 दिन दूर रहते है पर जेठ जी तोह आज सुबाज लौटे कल के गए हुए. दीदी कहती है की महीने में 25 दिन ऐसा होता है और अब इस अकेलेपन में काम से काम मैं तोह हु उनके साथ. अर्जुन अगर उन्हें खुशियां दे सके तोह मुझे ऐतराज नहीं. गौरव इतने भी कमतर नहीं लेकिन उन्हें ज्यादा जरुरत है किसी साथी की. शायद अपने वाला ऐसे हे दिल ढूंढ़ता फिरता है घर से बहार जिनकी चेहरे की हंसी दिल के दर्द बता देती है. चल माँ आवाज दे रही है.", माधुरी ने कपडे सही करते हुए पंजाबी जूती पहनी तोह उनके उभार को प्रियंका ने थोड़ा जोर से मसल दिया.

"ताई की आवाज बहुत जल्दी सुन्न गयी आपको. ये नहीं कहती की हनीमून की तैयारी भी करनी है यहाँ से जाते हे. वैसे ये शिल्पा दीदी को मैं अभी लपेटे में लेती हु अलका और रोमिला आंटी की मदद से.", और प्रियंका उनसे पहले हे हंसती हुई बहार भाग गयी. माधुरी अपने सीने को सहलाती हुई बस इतना हे कह पायी.

'तू ठहर थोड़ा टाइम. अर्जुन को कहूँगी की तू भी दोनों पिच तैयार किये बैठी है.', माधुरी की बात सुन्न कर प्रियंका थोड़ा सा दरवाजे से अंदर झांकते हुए बोली.

"सच है दीदी और ये भी कह देना की जैसे मर्जी. पिंकी बस वेट कर रही है.", और उसके बाद वो सचमुच हे दौड़ती हुई निचली मंजिल पर भाग गयी. माधुरी हँसते हुए खुद को सँवारने के लिए बाथरूम जा चुकी थी. इस हलकी फुलकी चर्चा से हे उसके दिल में अर्जुन को देखने की इत्छा बलवती हो उठी थी और कुछ याद करके वो आईने के सामने खुद हे शर्मा गयी अपने पेट पर हाथ रखती.

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उधर गाँव में अर्जुन उस एकमात्र पीसीओ के लकड़ी वाले खोखे से निकलने के बाद जब 300 रुपये चुकाने लगा तोह दूकान चलने वाला युवक तारीफ भरी नजरो से उसको देख रहा था. एक घंटे से ज्यादा उस बंद खोखे में वो भी गर्मी के वक़्त बैठना तोह मामूली बात हे नहीं थी.

"पाह जी लगदा इश्क़ बहोत ज्यादा हे करदे हो जेहड़ा कमीज गीली हों बाद भी खुश हो? ेहना मैं 4 दिन विच नहीं कमांड पीसीओ तोह इस करके करियाना वि बेचना पैदा.", लड़का भी भला था और उसने कुछ गलत भी नहीं कहा पर अर्जुन ने बात जरा घुमा दी.

"जरुरी तोह नहीं भाई की इश्क़ में हे इतनी बातें हो. एक्साम्स की चर्चा भी तोह कुछ मायने रखती है न बड़े भाई?", वो लड़का थोड़ी हैरानी से देख रहा था अर्जुन को अब.

"हाय वे रब्बा मेरेया ेहननी देर तक गल्लां वि कित्तियाँ तेह ओह वि पढ़ाई दी? पंडत जी, तुस्सी तह सच्ची थोड़े जे हिल्ले लगदे हो. गलत न समझयो पर मेरे कॉल हे बह के गाल कर लेनी स. मैं कागज़ पेन वि दे डंडा लिखाण न."

"भाई, पढ़ना भी मेरा काम है और उसके लिए कागज पेन सामने वाले के पास था. घर पे आवाज होती रहती है न किसी न किसी की इसलिए वह आपके बूथ जैसा माहौल नहीं मिलता. लगभग रोज हे आऊंगा मैं इस टाइम पर अबसे. चलता हु भाई, जल्दी मिलते है.", अर्जुन हाथ मिलाने के बाद उसको खुश करके वह से सीधा हे दिलबाग सिंह के घर निकल चला. पहले वो सोच रहा था की उधर पैदल हे जाए मोटरसाइकिल नजर में न लाने की वजह से पर फिर वो उसको लिए हे उनके घर के बहार जा पंहुचा. बहार बाद के आगे दीपा भाभी की पसंदीदा गाये राणो मजे से चारा चार रही थी और अर्जुन को एक बार देखने के बॉस वो वापिस जुट गयी नांद के मुँह लगाए. सिखर दोपहरी में तोह ये bhara-poora गाँव रेगिस्तान सा शांत था, शायद ऐतवार और लोगो के खेतो में काम करने की वजह से. बाकी सभी तोह ऐसे वक़्त में घर के भीतर हे रहते है.

"Thakk-thakk", 2 पल्लो वाला ये दरवाजा अंदर से बंद था जिसकी सांकल बजाते हुए अर्जुन ने दस्तक दी. उसकी मोटरसाइकिल एक तरफ छाया में कड़ी थी, इस घर की बगल में. वैसे भी यहाँ तोह लोग अपने पशु और गाडी बेखौफ कही भी एक तरफ रख देते थे. ये उसको खुद पंडित जी ने बताया था की गाँव में कभी चोरी नहीं हुई आजतक. अगर कुछ हुआ भी होगा तोह ऐसा नहीं जिसकी शिकायत की गयी हो. एक मिनट से पहले हे चेहरा दुपट्टा से पौंछती हुई दीपा भाभी एक पल्ला खोल कर उसके सामने कड़ी थी.

"ओहो, पंडित जी आप तोह समय के बड़े पाबंद निकले. मुझे तोह लगा था khet-khalihan देखने निकले हो और शाम से पहले न लौटने वाले. आओ अंदर आओ, आपका स्वागत है हमारे गरीबखाने में. ओह मैं भी निरि मुर्ख हु. पहलवान इस एक दरवाजे से कहा निकल सकता है. चलो आ जाओ अंदर.", उन्हें दूसरा दरवाजा भी खोलना पड़ा और आँगन तक इस गलियारे की चौड़ाई उतनी हे थी जितनी दोनों दरवाजो की. गलियारे में हे दोनों तरफ पक्के कमरे बने थे जिनके द्वार भी यही आमने सामने थे. 10 कदम बाद हे खुला आँगन जहा बीचो बीच घाना वृक्ष खड़ा था और उसकी छाया में सुस्ताती हुई भूरी सफ़ेद बिल्ली. काफी बड़ा आँगन था और एकदम साफ़ सुथरा. घर में आने का रास्ता इस आँगन के दूसरी तरफ से भी था जहा लोहे के बड़े गेट पर फ़िलहाल टाला झूल रहा था और कोने में छज्जे टेल खुले तबेले में 2 बहिनसे बंधी सुस्ता रही थी. उनके लिए वह पानी का कूलर लगा था ठंडी हवा फैलता. पूरी दिवार के किनारे छाया करते हुए उनके निचे एक कतार फूल और सब्जियों के पौधे, बेले. 3-4 कमरे इस आँगन के बर्बर बने थे जहा जाने से पहले रसोईघर था. हर चीज अपनी जगह और करने से सजी हुई. यहाँ तक की तजा सूखने के लिए फैलाये हुए कपडे भी एक सार डाले गए थे जिन पर चिमटी लगी थी. इतना सब करने वाली इतने बड़े घर में सिर्फ और सिर्फ दीपा भाभी हे थी?

"कितने ध्यान से हर चीज को संभल कर रखा है आपने भाभी और इतना बड़ा होगा ये घर बहार से पता हे नहीं चलता. आप अकेली रहती हो यहाँ?", अर्जुन रसोईघर से पहले बानी छत पर जाने वाली सीढ़ियों के बहार लगी उन लाल फूल की बेलो को स्पर्श करके देख रहा था की ये वास्तविक है या कुछ और. जमीन से छत तक चढ़ी हुई वो बेले आगे भी दिवार पर सही से त्यागी गयी थी. रासीघर के सामने हे खुला छोटा आँगन, चाट की चाय में बैठने की जगह थी. दीपा भाभी पहले फ्रिज की तरफ गयी फिर कुछ सोच कर उन्होंने उस बड़े मटके से पानी गिलास में भरने के बाद अर्जुन के सामने किया.

"अक्सर जिनके पास करने को कुछ न हो वो यादें सँभालते रहते है अर्जुन. और इस घर में अकेली तोह नहीं हु मैं. एक बेटी है और तुम्हारे भैया लेकिन वो अलग बात है की बेटी पढाई लिखे करके कुछ बन्न न चाहती है और इन्हे सिर्फ खेत और अखाडा पसंद है. वैसे मेरे लिए तोह पूरा गाँव हे घर है मेरा. तुम्हारे जैसो की भाभी, बड़ो की बहु और उनसे बड़ो की pautra-vadhu. लगता है कुदरत से कुछ ज्यादा लगाव है तुम्हे. कही ऐसा तोह नहीं के हमारे नए मुखिया जी भी यादों के बीच ज्यादा रहते है?", अर्जुन बातें सुनता हुआ उस गिलास को जैसे मुँह से अलग हे नहीं कर रहा था. ये पानी अलग था जिसमे हलकी हलकी वो ख़ास सुगंध थी जैसे तजा मिटटी और गले से निचे जाती हर घूँट दिल के रस्ते पेट तक गुजर रही हो. भाभी के तंज़ पर उसने खली गिलास खुद हे उस मटके के सामने करके फिर से भरा और वही जमीन पर हे बैठ गया. न कोई बिछावन लिया न चारपाई.

"यादें तोह सबके पास होती है भाभी लेकिन मेरे पास जीवंत भरा पूरा परिवार है. ऐसा परिवार जो वरदान में भी न मिले. अकेलापन तोह बस मैं तभी महसूस करता हु जब वो किसी रूप में सामने आ जाये. सवाल भी अक्सर वही करते है जो खुद नहीं जानते की जवाब मुमकिन भी है या नहीं. ये पानी का मटका हिमालय से आता है क्या इधर?", अर्जुन फिर से वो प्राकृतिक ठंडा पानी पीने लगा था और दीपा भाभी को उसने निरुत्तर कर दिया अपने जवाब से.

"मुझे ऐसा क्यों बार बार लगता है की तुम मुझे जानते हो अर्जुन? जिस तरह से तुम पहली बार मुझे देख रहे थे मैं नजरे तोह देख पायी लेकिन ऐसा लगा की तुम खुद मेरे पास रुके. बस यही बात है पंडित जी जो मैं कल वह आयी थी और तुमने तोह मुझे हे हैरान कर दिया. फिर भी जवाब मुझे अभी तक नहीं मिला. मैंने तुम्हारे लिए मटर पनीर बनाया है और सूखे aalu-paalak. खा तोह लेते हो न?", दीपा भाभी के जिस्म में किसी तरह की उत्तेजक हरकत नहीं थी इस पल में जैसा एक दो बार प्रतीत हुआ था पहले. वो वही मांजी लगाने के लिए उठ कर जाने लगी तोह अर्जुन ने पहली बार उन्हें स्पर्श किया, कलाई पकड़ कर अपने करीब बैठने का इशारा करते हुए. गिलास वही जमीन पर एक तरफ रखते हुए उसने कहना शुरू किया.

"मुझे सही सही बताये की जब आपने पहली बार मुझे देखा तोह थोड़ा हैरान क्यों थी? और फिर हवेली पर आप मेरे चेहरे को सिर्फ इसलिए तोह नहीं ध्यान से देख रही थी की ये उनसे मिलता है जिन्होंने ये गाँव बसाया? जवाब आपको हे मिल जाएगा भाभी की मैं क्यों आपके पास रुका और मुझे आप अभी तक क्यों ध्यान से देख कर पहचान ने की कोशिश कर रही हो. ज्यादा पुराणी बात नहीं है जितना मुझे लगता है.", अर्जुन ने saag-sabji का तोह जवाब हे न दिया और अब दीपा भाभी अपने पाँव मोड दोनों हाथ कैंची की तरह घुटनो पर बाँध अर्जुन की चेहरे को गहराई से देखने लगी.

"पहले लगा की तुम निहाल के कोई शहरी दोस्त हो और गाँव घूमने आये होंगे. फिर उसने बताया तुम हवेली आये हो तोह लगा विनोद या हवेली के दामाद जी के किसी दोस्त के बेटे होंगे, दिल्ली या चंडीगढ़ से. जिज्ञासा क्यों हुई ये तोह मैं भी नहीं जानती लेकिन जब तुम वह थे मेरे ठीक सामने दामिनी की बगल में तोह मैंने पाया की ये चेहरा बेशक बड़े पड़ती जी से मिलता है लेकिन उन्हें तोह मैंने कभी असलियत में नहीं देखा तोह क्यों तुम्हारी आँखें और चेहरे का कटाव किसी ऐसे जैसा है जिसने मुझ पर एहसान किया हो कोई? आखिर तुम हो कौन अर्जुन और क्या मैं ठीक बता रही हु?"

"मैं आपका नाम पहले से जानता था लेकिन देखा पहली बार कल हे था भाभी. जो दृश्य किसी ने मुझे बताया था सबकुछ वैसा हे मेरे सामने हो रहा था और फिर इंसान नजर आया जो ब्योरे पर सटीक था. उस पल में मैंने आपको पूरी निष्ठां और prem-bhaav से अपनी गाये को भोजन खिलते देखा. ऐसा हे साफ़ और नरम दिल बताया था मुझे मेरे अपने ने. ठीक उसी जगह कुछ हुआ था क्या आपके साथ और कोई था वह आपकी मदद के लिए? मेरी जैसी आँखें या कुछ मेल खता चेहरा?", अर्जुन की बात सुन्न कर पहले तोह दीपा भाभी खामोश रही फिर कांपते होंठो से बोल उठी.

"तुम्ही कैसे पता अर्जुन की मेरे साथ कुछ हुआ था? और जो भी था मेरी रक्षा के लिए वो तुम्हे इतना कैसे बता सकता है की तुम उधर रुक हे गए?"

"किसी किसी में एक हुनर होता है भाभी कलाकारी दिखा कर बातें जीवंत रखने का. जिसने आपको बचाया था वो मेरी बड़ी बहिन है और उन्हें एक ाची आदत है हुनर भी कह लो. वो चित्र बना लेती है अक्सर घटनाओ के. तोह क्या हुआ था उस दिन और कौन था वो?", अब दीपा भाभी डबडबाती आँखों से मुस्कुरायी.

"एक से बढ़ कर एक औलाद है शंकर जी की. बहोत निडर और बिल्ली सी तेज है तुम्हारी बहिन लेकिन मैं उस से हवेली पर कभी न मिली पहले. हाँ तुम दोनों की हे आँखें और बहोत कुछ एक जैसा हे है. शायद वो कही ज्यादा गहरे व्यक्तित्व की है, तुम्हारे जैसे दिल के साथ. पंचायत का नतीजा भी आया था उस दिन तोह लोग अपने अपने तरीके से ख़ुशी मन रहे थे, ज्यादातर गाँव से परे sharab-murge वाली. जैसे तुम मुझे देख रहे थे राणो को खाना खिलते ये मेरा नियम है. उस दिन भी मैं वही कर रही थी और तुम्हारी बड़ी बहिन शायद अपने चित्र के लिए उस पल को संजो रही होगी. जैसे बहार अभी वीराना पसरा हुआ है ठीक उस दिन था और ज्यादा गहरा क्योंकि मुफ्त की दारु गाँव की जमीन से बहार हे बहाई जाती है.", दीपा भाभी कुछ पल शांत हुई तोह अर्जुन ने उनके सामने पानी कर दिया. एक घूँट भरने के बाद उन्होंने नजरो से हे शुक्रिया कहा और बात आगे बधाई.

"बस ये बात यही रेहनी चाहिए अर्जुन."

"निश्चिंत रहिये, जुबान देता हु की मैं इसका जीकर किसी से नहीं करने वाला."

"सरपंच के लड़के नवाब के साथ आकर दूसरे कसबे के कुछ गलत लड़के इधर घूमने फिरने आते रहते है और उस दिन तोह उसका बाप जीता था तोह वह से रंगी पहवान भी आया, जिसकी हवा में नवाब रहता है शहर के कॉलेज में. ये लोग खा पी कर लौट रहे थे और मैं राणो को खिलने के बाद सड़क से दूसरी तरफ वाले पीपल के निचे पक्षियों के लिए पानी रख के वापिस हे लौट रही थी की नवाब ने आदतन हाथ हिला दिया और मैंने भी हमेशा की तरह हँसते हुए उसको जवाब दिया. वो लोग तोह आगे निकल गए गाँव से बहार अपने ठिकाने वाली तरफ पर रंगी मैदान में हल्का होने रुका होगा जिसने मेरी और नवाब की dua-salaam नशे में कुछ और हे समझ ली. जबक मैं सड़क पार करके बहार वाले आँगन तक आती वो मेरा हाथ पकड़ चूका था. मैं डरपोक नहीं हु अर्जुन लेकिन जाने क्यों मेरी आवाज को उस वक़्त लकवा मार गया था. रंगी जिस्म के मामले में तुमसे 21 हे होगा और ऊपर से हैवान सा कला नशेड़ी जानवर. लेकिन वो मेरे सीने पर हाथ डालता उस से पहले हे वो कटे वृक्ष की तरह सड़क पर लुढ़क गया. इतना जोरदार प्रहार हुआ था उसके सर पे की वो चीख भी न सका और डर के मारे जब मैंने ऐसा करने वाले को देखा तोह वो लड़की बस हल्का सा मुस्कुरा कर मुझे देखने के बाद वह से चली गयी. मेरी हालत मैं बयान नहीं कर सकती क्योंकि मेरे सामने एक राक्षस जमीन पर था जिसके सर से खून सड़क को लाल किये जा रहा था और ऐसा करने वाला मुझे बचने के बाद कुछ कह कर भी नहीं गया. याद रही तोह बस तुम्हारे जैसी आँखें और ऐसी हे मुस्कान जो कल मोटरसाइकिल पे भी तुम्हारे चेहरे पर थी.", अर्जुन को ये पूरी कहानी नहीं पता थी. उसने तोह बस इस घर का बहरी आँगन, गाये और उस औरत को देखा था जो बिलकुल दीपा भाभी जैसी थी. हाँ सड़क पर लाल घेरे के रंग ने हे उसको कोमल दीदी से सवाल करने पर मजबूर किया था जिनका जवाब था की ये बहोत प्यारी भाभी है लेकिन इतने बड़े गाँव में भी बिलकुल अकेली.

"किस चीज से मारा था उन्होंने और क्या सही से याद है की उनके साथ कोई और नहीं था.?"

"चौपाल से अगले चौराहे तक एक कुत्ता भी नहीं था उस दोपहर में. और मैं भी हैरान थी तुम्हारी बहिन के हाथ में लोहे का मोटा सब्बल देख के. वो बहार आँगन में हे तोह पड़ा रहता था लेकिन नाजुक सी लड़की ने बस एक हे वार से वो जानवर धराशायी कर दिया था और चेहरे पर डर की जगह बस मुस्कान. फिर वो कभी दिखी हे नहीं और मैं जैसे तैसे घर के भीतर आयी और रात तक दरवाजा नहीं खोला. अगले दिन पता चला के रंगी का एक्सीडेंट हो गया था हमारे हे घर के बहार, ज्यादा नशे में होने की वजह से. वो फिर ठीक होने के बाद भी वापिस कभी इधर नहीं आया पर जानती हु मौका हाथ लगा तोह जरूर वो बदला लेगा पर गाँव में नहीं. तुम बैठे रहो मैं खाना लगाती हु.", खुद को संभालती हुई दीपा भाभी उठ कर खाने के बार वही ला कर रखने लगी और उनको ऐसा करते हुए अर्जुन देख रहा था. न्यास हे उसकी नजरो ने वो भराव लिए उभरी हुई वक्षो की गहरी दरार और उनके खूबसूरत जिस्म पर किसी का दिया हुआ जख्म देख लिया. मैं फिर से व्यथित होने लगा था लेकिन दीपा भाभी जैसे ये समझ रही थी की अर्जुन वह देख रहा है जहा उसकी उम्र के ज्यादातर लड़के.

"नजरे काबू में रखा करो पंडित जी. जब देखो तभी कही डूबे रहते हो लेकिन हर जमीन तुम्हारी नहीं है यहाँ."

"कुछ भी बोलती हो भाभी आप. वैसे मैं कौनसा इस जमीन की रजिस्ट्री अपने नाम कब्ज़ा रहा हु? आपने एक बात सोची की रंगी कही अपना काम आध कर न चूका हो?", अब जो दीपा भाभी थाली रखते हुए झुकी तोह हैरानी से उसी मुद्रा में अर्जुन को देखने लगी. इस बार अर्जुन भी उनके चेहरे को हे देख रहा था.

"कहना क्या चाहते हो अर्जुन?"

"आप यहाँ बैठिये पहले.", अर्जुन ने खुद हे उन्हें सामने बिछी चटाई पर बैठने के बाद पहले उनकी थाली लगाईं और फिर अपनी. दोनों के थाली में रोटी के डिब्बे से रोटी निकल रखने के बाद उसने खाना शुरू किया पर भाभी वैसे हे मूरत बानी रही. अर्जुन ने हँसते हुए अपने हाथो से हे निवाला उनके मुँह पर लगाया तोह इस प्रेम को वो मन न कर सकीय.

"देखो भाभी मैं तोह आपके हाथ से खाने आया था लेकिन चलो ये फिर कभी सही. अब आप मेरी बात बस थोड़ा ध्यान से सुनिए और उसके बाद हे अपना पक्ष रखना. हो सकता है की मैं गलत हो क्योंकि मेरे पास कोई सबूत नहीं है. ये रोटी ख़तम कर लीजिये फिर हे मैं कुछ कहूंगा.", अर्जुन की शर्त मानते हुए दीपा भाभी ने जैसे तैसे रोटी ख़तम की और थाली एक तरफ सरका दी.

"न पनीर में स्वाद आया होगा और न रायते में? इतने प्रेम से आपने बनाया था लेकिन बेमजा हो गया न भाभी? मुझे पसंद आया पर एक बार फिर यही बैठ कर भोजन करेंगे, उस दिन आपको बेहतर लगेगा."

"पहेलियाँ ख़तम और अब बताओ तुम क्या कहने वाले थे. मेरा दिल घबरा रहा है किसी अनिष्ट से अर्जुन."

"मजबूत करो खुदको भाभी नहीं तोह इस बार न कोमल दीदी होंगी और हो सकता है मैं भी अखाड़े से अपने पाँव पर न लूट सकू. लेकिन ये आपका जीवन है तोह आपको हे ये सुधारना होगा. मैं तोह बस कोशिश कर सकता हु अगर आप वैसा चाहो. तोह ये नवाब कबसे दूसरे गाँव के लड़को को यहाँ ला रहा है?"

"पिछली होली के आसपास से. पर पहले भी आने पर कोई मनाही नहीं थी लेकिन इसके साथ ज्यादातर वो लड़के होते है जिन्हे ठीक नहीं समझा जाता. लड़का ठीक है वो जितना मैंने देखा है."

"हम्म्म.. ठीक लड़का और रंगी जैसो की सोहबत में? आप कहना चाहती है की उसने गाँव में कभी ऐसा वैसा कुछ किया नहीं या फिर आपके सामने बात नहीं आयी. जैसे आपको ये नहीं पता की उन लोगो का असली डेरा तोह आपका हे खेत है. दिलबाग भैया को कल शाम भी नवाब हे khel-ghar के बहार से ले कर गया था जब मैं शहीद भैया और निहाल के साथ लौट रहा था. पहले मेरा एक छोटा सा झगड़ा भी हुआ था आपके इस ठीक लड़के से जिसका बाप भला सरपंच है.", अर्जुन ने जो खुलासा किया था वो सटीक वार कर गया दीपा भाभी पर. सीने पर हाथ रखती वो सवालियां नजरो से उसको देख रही थी.

"सच कह रहे हो?"

"और आपके जिस्म पर बने अनगिनत मार के निशाँ क्या कुछ अलग है भाभी? छुपा सकती हो पर कोई ek-aadh तोह नजर आ हे जाता है. जैसे ये पाँव के पास भी छड़ी की मार है. आपकी जुबान को सचमुच पैदाइशी लकवा मारा हुआ है भाभी. दिलबाग भैया बहार तोह ऐसे बिलकुल नहीं है लेकिन वो एकांत में शायद अब अपनी धर्मपत्नी पर संदेह करने लगे है या आप उन्हें किसी बात पर टोकती होंगी जिसके बदले वो औरत होने का आपका सच ऐसे बताते होंगे. घर आपका है और सच मुझसे बेहतर आप जानती है. रंगी ने अपना काम किया या वो इसका बदला आपकी पति से ले रहा है जिसमे नवाब और उस दूसरे गाँव के कुछ नशेड़ी भी कठपुतली या जरिया है. जहा गलत हु वह आप बता दीजिये. वैसे एक और सच सहने की हिम्मत है आपमें?", अर्जुन ने भी थाली एक तरफ खिसका कर बिना पानी पिए हाथ धो कर अपने अंगोछे से पांच लिए. भाभी खुद उसको अपना दुपट्टा दे रही थी साफ़ करने के लिए उसने मन कर दिया.

"इतनी साफ़ सफाई क्यों रहती है इस घर में जानते हो? ताकि सबूत न रहे यहाँ कोई. और टूटा हुआ इंसान और कितना टूटेगा? मैं उन्हें खेत में रातभर रहने से रोकती हु तोह हो जाती है कहासुनी लेकिन ये चोट अपने आप लगी है या कह लो मैंने खुद जुल्म किया है खुद पर."

"बोल लीजिये झूठ और बचा लीजिये टूटे हुए घर को भाभी. शहीद भाई मुझे बता रहे थे की आपकी िज्जात्त पूरा गाँव करता है क्योंकि आप सबके सुख दुःख में शामिल रहती है. लेकिन इस घर के दरवाजे जैसे बहार वालो के लिए बंद है. कोई यहाँ का सच न देख ले लेकिन जानते बहोत से है पर आपकी ख़ुशी के लिए वो भी नहीं बताते. खेत पर ऐसा क्या होता भाभी जिस से आप भैया को वह जाने से रोकती है रात में? आप दूसरे कसबे से ब्याह कर इधर आयी थी न तोह यक़ीनन यहाँ आपकी अग्नि परीक्षा बरसो बाद ली जा रही है और सच जान ने के बावजूद चरित्र हनन. लेकिन आप तोह सब सेहती रहेंगी, ख़ामोशी से. गाँव को खुश रख सकती है लेकिन अपना घर दिखावे के लिए साफ़, अंदर से बिखरा हुआ. चलता हु भाभी और क्षमा चाहता हु की जिस जमीन पर आने का हक़ नहीं था उस पर कदम रखे. दर्द चीज हे ऐसी है जो मुझे अपनी और खींच लेती है चाहे मेरा घर खुशियों से भरा हे क्यों न हो. खून में है न ये मेरे. भोजन के लिए शुक्रिया.", दीपा भाभी को ऐसे समय में जवाब देना चाहिए था लेकिन न वो उसके सामने रो सकीय न कुछ कह सकीय. अंदर हे अंदर वो अर्जुन का हाथ पकड़ कर उसको वही रोकना चाहती थी और फुट फुट कर रट हुए कहना चाहती थी की उसने कुछ भी गलत नहीं कहा. लकवा मार गया था उन्हें फिर से. अर्जुन उन्हें वैसे हे छोड़ कर उठा और चप्पल पहन ने के बाद आगे बढ़ने से पहले आखिरी बात बोलै.

"कोमल दीदी से शिकायत रहेगी की उन्होंने अपने जीवन को जोखिम में भी डाला तोह पहले से मृत आत्मा के लिए. जाता हु, दरवाजा लगा लीजियेगा.", अर्जुन के जाने तक वो संभल न सकीय थी लेकिन उसकी आवाज बंद होते हे जैसे वो बदहवास हो उठी. वो भीगी आँखों से लपकी गलियारे की और लेकिन रानी की रुदन बता गया की अर्जुन जा चूका है उसके saaf-suthre घर की देहलीज छोड़ कर. आज जैसे दीपा भाभी को अपने आंसू देखे जाने की परवाह नहीं थी जो वो देहरी लांघ कर बहार ाँगने में कड़ी हर तरफ उस व्यक्ति को जाता हुआ खोज रही थी. अर्जुन भरी दोपहर में हे khel-ghar जा चूका था. दीपा भाभी के दर्द से ru-ba-ru होने की सजा जैसे उसने दामिनी को भी दी जो उसकी प्रतीक्षा में हर तैयारी किये बैठी थी उस कमरे में, कैमरा के साथ. पर उन्हें कहा पता था के अर्जुन से ज्यादा सतर्क उसकी किस्मत है जो गलत समय में भी कही न कही उसका भला हे करती है.

'इतना आसान है क्या औरत होना? तुमने जो कहा वो सब सच है अर्जुन लेकिन कबूल किया तोह बिखरा हुआ भी नहीं बचेगा मेरे पास. अनाथ होने का एहसास आज हो रहा है जब एक माँ और पत्नी हु. मैं अपना वादा न निभा सकीय लेकिन तुम्हे निभाना होगा यहाँ वापिस लौट कर.', चेहरा साफ़ करने के बाद दीपा भाभी बिना दरवाजा लगाए अपने कमरे के बिस्टेर पर औंधे मुँह आ गिरी. अब वो खुल कर आंसू बहा रही थी जैसे दर्द बहार निकलने का यही एक जरिया हो उनके पास.

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"5 से ऊपर वक़्त हो गया बहु पर ये अर्जुन अभी तक वापिस नहीं आया. दामिनी, तुझे कुछ पता है की ये लड़का कहा गायब है?", पशुओं को मीणा चारा दाल रही थी और आँगन में उसको देखने आयी देवकी जी ने अभी तक अर्जुन की मोटरसाइकिल वह नदारद पायी तोह उन्हें कुछ चिंता हुई. दामिनी अपने जिस्म की गर्मी पानी से ठंडी करने के बाद उतरे चेहरे के साथ इधर आयी तोह रसोई से चाय की ट्रे लिए अनामिका भी वह पहुंची थी. दामिनी ने तोह आज से पहले कभी किसी का इस तरह इन्तजार न किया था और वो sanam-harjaai उसके चंगुल से गायब जाने कहा फिर रहा था. आँचल के लिए भी अनामिका ने दूध बना दिया था और यहाँ आने से पहले वो उसको भी उठा आयी थी.

"पता नहीं माँ जी अर्जुन कहा गया है? शहर से भी फ़ोन आया था उसके लिए लेकिन वो बस यही बोल कर गया था के चौपाल घूमने जा रहा हु और 2 बजे तक आ जाऊंगा.", अनामिका ने खाने वाली बात का जीकर न किया. उसको खुद अब चिंता हो रही थी क्योंकि 5 घंटे से ये लड़का गायब था.

"सेवक को बोल जरा देख के आये दामिनी. कुछ ऊंच नीच हो गयी तोह खामख्वाह बात मेरे सर आएगी लेकिन ये लड़का इतना लापरवाह तोह नहीं है.", देवकी ने चाय का कप उठाया हे था की एक तरफ बहार दरवाजे पर दस्तक हुई जिधर सेवक ने छोटा पल्ला खोल कर देखा और इधर आँचल अपने में हे मगन मुद्दे पर आ कर बैठते हुए बिस्कुट और दूध उठा कर सबको देखने लगी.

"क्या बात हो रही है नानी और सब परेशां क्यों है?"

"अर्जुन नहीं आया अभी तक और सेवक, बहार कौन है?", देवकी के जवाब से आँचल ने गिलास वापिस रख दिया और आधा खाया बिसुईट भी. लेकिन सेवक की तरफ से सकरात्मक जवाब मिला और उसके बराबर से हे निहाल अंदर आ खड़ा हुआ सबको हाथ जोड़ कर अभिवादन करता हुआ.

"बड़ी बेबे जी, ओह अर्जुन बाई जी डा nikkar-baniyan दिया जाए. मास्टर जी ने भेज्या स मन्नू.", अब कही अनामिका को कुछ चैन आया और वो अर्जुन के कपडे लेने भीतर चली गयी. देवकी जी ने निहाल को हाथ से अपने पास बुलाया और सामने बैठा लिया, पानी का गिलास देते हुए.

"बीटा, जग जग जियो. सुना है तू बड़ी लगन से जूता हुआ है गाँव का नाम आगे बढ़ने में? और हमारा अर्जुन वह कुछ म्हणत भी कर रहा है या वैसे हे कही बैठा रहता है?", देवकी ने जितने लाड से कहा था इसकी तोह निहाल को आशा हे नहीं थी. वो तोह उनके सामने खड़े होने से हे कतराता था. दामिनी बड़े ध्यान से सब देख रही थी.

"बड़ी बेबे जी, अर्जुन बाई डा कोई ढिल्ला लगदा. यह मैं नहीं मास्टर जी कह रहे सी जड़ो अस्सी प्रैक्टिस लायी khel-ghar पहुंचे. सरपंच साब कहन्दे की अर्जुन तह ोथे कल्ला हे पसीना बहा रहा स सिखर दुपहरी तोह. हूँ कुछ देर तक ओह सरपंच साब न गल्ला करके शरीर ठंडा करदा पेय की के शहीद पाह जी आ गए नाल 4 मूंदे ले के. जुगराज मास्टर जी ख़ास तैयारी करवा रहे अर्जुन बाई जी दी तेह शहीद पाह जी सब ख़याल रख रहे. कहन्दे की हर बन्दे न चित्त कारन वास्ते अर्जुन न 1 मिंट डा टेम मिलु. कुज वि कहो बड़ी बेबे, बाई है नीरा सिरे डा. कल शहीद पाह जी न उसने हवा विच चुक्क लिया स लेकिन सुट्ट्या नई. 10 मिनट विच 20 वारि ोहना दी पीठ लगा टी स मिटटी विच फेर व् मादा जा पसीना न निकल्या. मन्नू वि कोई खुराक दस् दो बेबे जी.", निहाल के मुँह से Arjun-katha सुन्न कर देवकी बहार से तोह बड़ी खुश हुई और हामी भर के कुछ करने का आश्वासन दिया लेकिन अनामिका के हाथ से निक्कर टीशर्ट दामिनी ने लेते हुए जवाब दिया.

"निहाल मैं वि चलदी है नाल तेरे. कोई तह होना चाहिदा ोस्डे ऊपर ध्यान दें वाला. माँ उसका दूध और खुराक बांध दो साथ में.", दामिनी का ये रूप आँचल को तोह हजम हे न हुआ. वो जानती थी की उसकी माँ का असली चरित्र इस से उल्टा है. अनामिका ने कहने के मुताबिक दूध तैयार कर दिया और 2 लड्डू भी साथ बाँध दिए. देवकी ने भी दामिनी से कोई सवाल जवाब न किया और वो निकल चली निहाल के साथ अर्जुन का सामान लिए. देवकी चाय ख़तम करके पशुओं की और गयी तोह आँचल ने अपनी मामी को कमरे में चलने का इशारा दिया.

"देखो मामी झूठ मैट बोलना क्योंकि मुझे भी थोड़ा बहोत पता है और मैं उनके जैसी नहीं हु. पहले माँ गयी थी बगीचे में अर्जुन के साथ लेकिन दोनों साथ नहीं आये. फिर उन्होंने आपसे घर आते हे 2-3 बार अर्जुन का पुछा की वो आया या नहीं लेकिन अर्जुन नहीं आया और वो जहा भी गया था आपको बता कर गया था. अब माँ ऐसे गयी है जैसे उन्हें अर्जुन की बहोत परवाह हो लेकिन अर्जुन यहाँ आने से हे बच रहा है. बताओ तोह ये क्या चल रहा है? और नानी कबसे इतनी मीठी हो गयी जो अब न तोह आपको फालतू टोकती है और बहार से आये हुए को भी इतने प्यार से पूछ रही?"

"मुझे नहीं पता आँचल की क्या चल रहा है और बड़ी दीदी का वही जाने. लेकिन दिन में अर्जुन मुझे यही बोल कर गया था के वो निहाल और शहीद की तरफ जा रहा है. खाना खा के आएगा वह से पर वो वह गया हे नहीं जैसा निहाल की बात से पता चला. माँ जी का भी वही जाने पर उधर से आने के बाद और वह भी उनमे ये ाचे बदलाव तुमने खुद देखे है. बड़ी माँ जी की वजह से शायद.", अनामिका के भोले जवाब से आँचल संतुष्ट नहीं हुई.

"आप न मामी पता नहीं कुछ देखती भी हो या बस ऐसे हे ज़िंदा हो. कुछ बहोत बड़ा चल रहा है और आपके पति खुद इसका सबूत है. विनोद मां घर के बारे में सोचने लगे है और अर्जुन का कितना ख़याल रखते है. देखना मामी ये सब कोई खेल न हो. बड़ी नानी ने मेरे सामने आपसे कहा था की आप हे अर्जुन का ख़याल रखेंगी क्योंकि उन्होंने आपको अपनी बेटी मन है. वह आप भी खुश रहती थी तोह उस लिहाज से ये आपकी जिम्मेवारी है."

"आँचल तुम दीदी को गलत क्यों समझती हो? क्या पता उन्हें चिंता हो सचमुच?"

"हाँ जैसी बातें आपने आज िन्दु आंटी और माँ की सुनी थी वैसी मैं बहोत बार सुन्न चुकी हु. सोचा शायद आप हिम्मत करेंगी और सही का साथ देंगी लेकिन आप किसी तरफ नहीं है.", आँचल उठने लगी तोह झेंपते हुए अनामिका ने उसको वापिस बैठा लिए बीएड पे.

"सब अर्जुन की जिम्मेवारी है और हमे बस ख़याल रखने का कहा गया है आँचल. बड़ी दीदी को मैं या तुम नहीं टोक सकती, माँ जी की वजह से. अर्जुन खुद संभल लेगा जैसा उसने मुझे भरोसा दिलाया है. बड़ी दीदी को हारने की आदत नहीं है और जिस तरह वो कल से लगातार विफल हो रही है, उनकी बेबसी हे उनसे कबूल करवा लेगी उनका सच. पहले मुझे भी अर्जुन के विचार तार्किक लगते थे पर ये बदल गए आधा दिन ख़तम होने से पहले हे. लेकिन इतना कह देते है की शांत और खामोश व्यक्ति को निस्तेज नहीं समझना चाहिए. मैं अर्जुन के साथ हु लेकिन इसकी कोई परीक्षा नहीं दे सकती. तुम भी शांत रह कर दर्शक प्रतीत करवाओ तोह सही रहेगा. ज्यादा taak-jhaak से नुक्सान उसका हो सकता है. दूध फिर से गरम कर देती हु, बहार हे बैठ जाओ.", अनामिका ने आँचल को हे नया पाठ पढ़ा दिया था जो खुद को खिलाडी समझ रही थी लेकिन उसको ख़ुशी भी थी की अर्जुन के साथ उसकी मामी भी है चाहे वो खामोश हे सही. अब बस पता करना था की उसकी माँ की सूई किस बात पर अटकी है जो अर्जुन के पीछे और अर्जुन उनसे दूर. ये बाघ आखिर इस बकरी को दबोचने की जगह ऐसे उलझा क्यों रहा है. कही वो इस बहाने शिकारी तोह नहीं ढून्ढ रहा जिसने ये बकरी परोसी है.?

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खेल घर में तोह आज भीड़ हे बढ़ती जा रही थी. नया अखाडा अकेले हे खोदने के बाद अर्जुन ने 5 लोगो की चुनौती 2 मिनट से पहले हे निबटा दी थी वो भी किसी को क्षति पहुचाये बिना और बेबस करते हुए. शहीद भाई और जुगराज जी के बुलावे पर कसबे के पुराने नामी लोग बुलवाये गए थे जिनमे दिलबाग सिंह भी था और सरपंचा का छोटा भाई कमलेश भी. बाकी खिलाडी भी अपने अपने अभ्यास पूरे करने के बाद इस तरफ घेरा बांध कर जमघट लगा चुके थे इस अनोखे अभ्यास की जिसमे अर्जुन को एकसाथ 2-2 लोगो से भिड़ना था. पहले के सभी नज़ारे दामिनी ने अपनी आँखों से देखे थे और Dilbaag/Kamlesh को भी यहाँ बुलवाने के पीछे जैसे उसका हे कोई मकसद था. दीपा भाभी तक भी ये बात गयी थी की khel-ghar में आज ाचा खासा जमघट लगा है और दिलबाग कमलेश की जोड़ी ने अर्जुन को mitrata-purvak ललकारा है. दीपा भाभी का यही पर माथा ठनक चूका था जैसे कोई अनहोनी होने वाली हो हंसी मजाक से भरी इस abhyaas-shala में. गहराती शाम में ये कही कुछ वैसा तोह नहीं होने वाला था जैसा उसका दिल न होने की प्रार्थना कर रहा था. सर पे दुपट्टा लेती वो तेज कदमो से उस तरफ बढ़ चली जहा उसके हिसाब से अनहोनी होने वाली थी.
 
अपडेट 197

दोहरा चरित्र

"मैं कुछ कह सकता हु बौ जी?", माधुरी और उसके ससुराल वालो के साथ साथ राधिका के भी माता पिता लौट चुके थे. इधर से हे गौरव और माधुरी अपने हनीमून पर और बाकी लोग अपने घर. आज बगीचे में रामेश्वर जी के साथ संजीव था, पानी का छिड़काव करते हुए कुछ गंभीर. उसकी दादी अभी अभी रौशनी बुआ के साथ मंदिर गयी थी, अपनी आस्था की वजह से. संजीव भी यहाँ इसलिए रुका था की निकलने से पहले वो अपने दादा जी से भी कुछ चर्चा कर सके. रामेश्वर जी थोड़ी नयी मिटटी तैयार कर रहे थे जो उन्होंने नहर किनारे से मंगवाई थी बगीचे में मिलाने के लिए. मिटटी के नरम ढेले तोड़ते हुए वो रुक गए जब संजीव ने उनसे आज्ञा चाही.

"हाँ बिलकुल कह सकते हो भाई. इस देश में ये भी एक अधिकार है जो तुम्हे पूर्ण आजादी देता है अपनी बात रखने या कहने का.", रामश्वर जी कहा सीधा जवाब देते थे लेकिन संजीव भी तोह उनकी छाया में रहते हुए या भली प्रकार जान चूका था. उसने फिर भी चेहरे पर ख़ुशी के भाव प्रकट न किये.

"आपको लगता है की मुन्ना जो कर रहा है वो सही कर रहा है? हाँ मैं उस पर संदेह नहीं कर सकता लेकिन आप ज्यादातर पहलु कानून की नजरो से देखते है और मुझे दिख रहा है तोह बस अपना छोटा भाई जो बहोत सारे कानून और नियम उनकी हे कमजोरी की वजह से बदल रहा है.", रामेश्वर जी सब सुनते हुए खुरपी लगातार उन नरम लोंधो पर चलते रहे. संजीव ने एक तराजू में स्वयं पंडित जी और उनके नियम तोह दूसरे में अर्जुन को खड़ा कर दिया था. वो ये भी जान गए थे की संजीव से बात बची नहीं है जो शायद अर्जुन का हे किया धरा है लेकिन वो फिर भी अपने भाई से दूर जा रहा है जिसमे अर्जुन का हे आग्रह होगा.

"बीटा रेतीली मिटटी में जितना मर्जी पानी उड़ेल दो वो सब सोख कर फिर से प्यासी बन जाती है. मतलब की नियम जितने मर्जी बना लो पर क्या कही वो ख़तम हो सकते है? नहीं न? लेकिन उस रेतीली मिटटी में अगर गार्डा मिला दिया जाए तोह क्या होगा?", संजीव पानी आगे की दिशा में देते हु हर बात ध्यान से सुन्न रहा था.

"संतुलित हो जायेगी ये नयी मिटटी. न ज्यादा पानी सोखेगी और न कीचड़ रहेगी. लेकिन मेरी बात का मतलब तोह मुन्ना और उसकी कारस्तानियों से है न जो थोड़ी बहोत तोह आपको भी पता लगी होंगी?"

"हाहाहा.. यार तुम दोनों भी तोह ऐसे हे हो. खैर जवाब ज्यादा सरल लहजे में देने की कोशिश करता हु. तुम हो कानूनी आदमी और वो है फ़कीर मस्तमौला. जब दोनों के बीच गहरा तालमेल बैठ जाए तोह मेरी क्या बिसात जो मैं कुछ बोल पाउ.", रामेश्वर जी ने तोह यहाँ जवाब देने की जगह जैसे संजीव को हे लपेट लिया था उसके और अर्जुन के तालमेल की वजह से. लेकिन संजीव भी धुन का पक्का था जिसने इस बात पर प्रतिक्रिया देने की जगह फिर से अपना सवाल दोहरा दिया.

"वो कानून तोड़ेगा तोह आप क्या करेंगे बौ जी?", अब तोह पंडित जी ने खुरपी एक तरफ हे रख दी और पानी से हाथ धोने के बाद कुर्सी पर बैठते हुए बगल में संजीव को भी बैठा लिया.

"तुम गलत करते हो कुछ जब ड्यूटी पर होते हो?", उनका ये प्रश्न सचमुच कहने को हे छोटा था पर संजीव आखिर उनका हे खून था और ठीक उनका अनुसरण करने वाला.

"अपने आप को आईने में न देखु बौ जी लेकिन aatma-manthan में क्या करूँगा जब देगा करूँगा? कटाई ऐसा नहीं कर सकता जिस से मेरी वर्दी से पहले आत्मा पर दाग लगे."

"मैं जानता हु मेरे बचे मैं ाची तरह से जानता हु और यही वजह है की हम तुम्हारे हर सवाल पर खुदसे हे चर्चा करते है. संजीव कोई भी बात ऐसे नहीं करता, उसकी वजह होती है और वो इस देहलीज के बहार है तोह ड्यूटी पर है. हाँ अर्जुन साथ हो तोह ड्यूटी अवकाश पर चली जाती है और अवकाश पहले हे हो तोह तुम पर अपने छोटे का भाई का असर हो जाता है. लेकिन दूसरा पहलु जो है मेरे सिक्के का वो इस चेहरे जितना स्पष्ट नहीं है, बस कहने को नंबर है. हेड तुम हो तोह टेल वो लेकिन तुम चेहरा हो और वो... वो पता नहीं क्या क्या है जो हमे भी कई बार समझ नहीं आता. खुद हे देखो की उसकी परिभाषा तोह स्वयं हमारे हे पास नहीं है तोह कोई और क्या देगा? लेकिन जैसे मुझे तुम पर विश्वास है न संजीव, वैसे मुझे उस पर गर्व है. वो कही ज्यादा हे बड़ा रेगिस्तान है भीतर से जो टुकड़ो टुकड़ो में साड़ी गार्डा ढून्ढ ढून्ढ कर अपने भीतर समां लेगा. जैसे वो तुम्हारे गुण ले चूका है, मेरे, अपनी माँ के और कुदरत के.", अर्जुन का उल्लेख करते हुए वो थोड़ा सा रुकते हुए संजीव के चेहरे के बिलकुल करीब आये और धीमी आवाज में कहा.

"ब्लैकहोल है वो लेकिन सिर्फ टूटे गृह और तारे अपने अंदर समाहित करने वाला. बस इस एक नियम को हे मानता है तुम्हारा मुन्ना और मेरे भी हाथ खड़े बीटा है कुछ मामलो में. वो जितना खा चूका है हमे उसकी खबर हे नहीं है और न तुम्हे है, यकीं है हमे क्योंकि वो जिस ताल पे सबको नचा रहा है उसके कुछ अंश हमारे हे अक्स से जुड़े है लेकिन उस ज्ञान को मैंने उपलब्ध नहीं करवाया और और कोई जानता नहीं. अब उल्टा ये हमको हे वह बुलाने में कामयाब हो गया जहा जाना नहीं चाहते थे."

"हाँ आप सही कहते है बौ जी. जब मेरी ब्याह पे सोया होता है तोह लगता है वो आजतक 13-14 साल पहले वाला मेरा नटखट छोटा भाई है पर वो अपनी अनजान ड्यूटी पर होता है तोह उसकी तैयारी पहले हे रहती है. सभी घटनाये, उनसे जुड़े लोग और शायद परिणाम भी. वो बोर्डिंग में हे था न बौ जी?", अर्जुन के विषय में ये सब सुन्न कर खुद रामेश्वर जी अब खामोश रहने का मैं बना रहे थे लेकिन संजीव को परेशां मैं घर से विदा करना उस दादा को सही न लगा.

"वो छोटी छोटी बातो को एहमियत देता है जैसे तुम देते हो. लेकिन वो उनके भी अतीत में घुस जाता है जबतक गहराई न माप ले, मतलब उसको फरक नहीं पड़ता की गणित का फार्मूला समझते हुए वो भौति विज्ञान में जा रहा है और उधर से कोई यूनानी चिन्ह उसको कही और ले जाए. वो खोजता रहेगा जब तक की वो वापिस गणित पर न लौट आये. मैं मतलब जैसे तुम हो वैसा हे था और तुम्हारे रघुवीर दादा थोड़े बहोत ऐसे जैसे अर्जुन, बहोत थोड़े थे मतलब. लेकिन तुम्हारी दादी है बहोत गहरे मैं वाली और बहार से सख्त. ऐसे हे पिता जी थे हमारे, जितना उन्हें समझने की कोशिश करो उतने समझ से बहार और फिर हमे इजाजत भी नहीं थी ज्यादा taak-jhaak की. तुम्हारे पिता, चाचा और मां लोग या जितने भी करीबी है उनका कुछ अलग तोह किरदार है न, विशेषता?", संजीव ने पानी बंद करते हुए बस सर हां में हिलाया.

"ये इनसबके गुण ले रहा है या कईओं के तोह ले भी चूका है जैसे मेरे, तुम्हारे, तुम्हारी दादी के और सबसे हम है रघुवीर सिंह के ख़ास गुण जो उसके बाद थोड़े बहोत तोह शंकर में भी थे लेकिन ज्यादा थे अज्जू में पर अज्जू तुम्हारी दादी से सीख गया था दिमाग को नियंत्रण में रखना. अब अर्जुन वो सभी नियम जान ने के बाद उनकी हे कमजोरी को हमारे सामने ला रहा है और हम सिवाए उसका साथ देने के कर भी क्या सकते है.? लेकिन जिस तरह तुम अपना कर्म कर रहे हो, मुझे भी करते रहना होगा. Tark-sawaal और जहां अवलोकन करने से पहले उसके किसी भी कदम पर संदेह नहीं जताया जा सकता. तोह तुम्हारे लाडले ने तुम्हे नहीं बुलावा भेजा?", अपनी मज़बूरी खुल कर कबूल करने के बाद उन्होंने संजीव के कंधे पर हाथ रखते हु जब अखाड़े की चुनती के सन्दर्भ में पुछा तोह वो सर झुकाये हे मुस्कुरा दिया.

"आप सब जानते हे है बौ जी. वो बताने के बावजूद हाथ भी बांध देता है और उसने इसका जवाब ये कह कर दिया की भैया आप जब वापिस लौटने वाले हो तोह एक बार फ़ोन करना 20 दिन बाद हे मिलेंगे. और मुझे वैसा हे करना होगा.", संजीव उठ खड़ा हुआ सामने नरिंदर चाचा को कार निकले देख. राधिका सबसे मिलने के बाद दादा जी का आशीर्वाद लेने आयी थी जाने से पहले और संजीव उसकी बगल से निकल कर बाकी सदस्यों से मिलने लगा. अब उन्हें भी जाना था अपने नए रिश्ते को मजबूत बनाने और दुनिया एकसाथ देखने.

"बिटिया, खाली हाथ मैट लौटना. ज़िन्दगी अक्सर भागदौड़ में हे निकल जाती है और हम फिर एक समय पर ख़ास यादों की जरुरत रहती है. अपने लिए वैसी हे खूबसूरत यादें जुटाने की ये सही दिशा है. भगवन नारायण तुम्हे खुश रखे और हर मनोकामना पूर्ण हो.", वो पाँव छूने नहीं देते थे इसलिए पास बैठा कर बस सर पे हाथ रखते हुए आशीर्वाद दिया. राधिका देख रही थी की इतने असाधारण प्रतिष्ठा वाले उसके ससुर कैसे नंगे पाँव हे मिटटी साणे पाँव के साथ इस बगीचे में बैठे खुश थे. उसके चेहरे पर भी प्रतिउत्तर में भोली मुस्कान आ गयी.

"जी बाउजी आप भी अपना ध्यान दीजियेगा और ये सब काम काम हे करे तोह सेहत ठीक रहेगी आपकी."

"हाहाहा.. तुम गुड्डू की तरह बात कर रही हो लेकिन इतना ध्यान रखो की मिटटी से लगाव बरकरार न रहे तोह अक्सर बीमारी घेर लेती है. तुम्हारी दादी तुम्हे जाता नहीं देख सकती थी इसलिए तुम्हारी कुशलता की कामना मांगने अपने प्रभु के दरबार चली गयी. पहुंचते हे उनसे बात करना और अब तुम्हे जाना चाहिए.", रामेश्वर जी ने राधिका को ठीक छोटे बचे की तरह समझाया तोह वो भी झेंपती हुई हाथ जोड़ कर वापिस लौट आयी. कार में बैठने से पहले ऋतू ने जरूर उनके कान में कुछ कहा जिस पर वो हैरानी और मुस्कराहट के साथ पहले उसको देखती रही फिर कंधे पर चपत लगाती हुई हंसती हुई पिछली सीट पर बैठ गयी. कई हाथ इन दोनों को विदा कर रहे थे नए सफर पर जाते हुए. और पंडित जी सबको देखने के बाद उनकी तुलना अपने बगीचे से करने लगे. दोनों हे hare-bhare और विविधता से भरपूर थे. बस आज उस पपीते के वृक्ष ने पहला फल दिखाया था और कुछ फूल बता रहे थे की ये तोह बस शुरुआत है.

'तेरी माया तू हे जाने अर्जुन पुत्तर. बिना बीज का फल ऊगा दिया इसने अब पता लगाओ भी तोह कहा से लगाओ की इसकी नेसल में बदलाव कहा से आया?', अपने अंतर्मनन में भी रामेश्वर जी का सोचना पहेलियों से हे भरा था और फिर खुद हे हँसते हुए अपने हाथ पाँव धोने लगे जब अलका वो पानी की पाइप चालु करके उनके सामने आ कड़ी हुई.

"आज तोह आप maal-poode बनाने वाले था दादा जी? देख लो अब तोह सब चले भी गए और आपने टाइम यहाँ क्यारी में लगा दिया.", अलका के शिकायती लहजे और नाराजगी पर रामेश्वर जी ने भी माफ़ी मांगी.

"लक्ष्मी बीटा तू कुछ कहे और मैं वैसा न करू ये कभी हुआ है? पहले रसोई खाली करवा और मुझे बता. मैं कपडे बदल कर आता हु फेर साथ में खीर भी रखते है. मेवे पहले निकाल ले तेरी दादी की बारी से, वो आ गयी तोह फेर उलाहने देने से न हटेगी बप और बीमारी के.", रामेश्वर जी इस से पहले शायद तभी रसोईघर में गए होंगे जब अलका ने फरमाइश की होगी, 1 या डेढ़ साल पहले. लेकिन जो भी बनाते थे फिर उनकी टक्कर का पूरे घर में कोई न था उस पकवान में. आज उनका मैं भी हल्का था और वो कुछ हद्द तक खुश भी थे. अलका भी चहकती हुई निकल भागी और अपने बचो को खुश देख वो भी मुस्कुरा दिए.

'कसोहळ्या देवी ऐसे हे बनाये रखना इस लघु संसार को. सब तुम्हारी हे तपस्या और म्हणत है.'

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"देखो भाई अपने अर्जुन ने कबड्डी वाले खिलाडियों के साथ तोह daav-pench के लिए मन कर दिया जो की सही भी है. तीसरे दिन इनका भी खेल है और ऐसे में बेमतलब किसी के चोट आ जाए तोह खामियाजा पूरी टीम को उठाना पड़ेगा. अब शहीद के तोह हाथ खड़े हो चुके है लेकिन अपने छोटे प्रधान जी आधा कनाल खुदाई करके भी मैदान से हटने का नाम नहीं ले रहे. लेकिन अब कुश्ती की बजाये मैच होने जा रहा है कबड्डी का जिसमे एक तरफ होगा अर्जुन तोह दूसरी तरफ गाँव को 4 बार प्रत्योगिता जीवन वाले हमारे सूरमा. वजह भी इसके पीछे जैसा सरपंच साहब और अर्जुन से चर्चा करने पर मुझे पता चला. टीम पिछले 3 बरस से दूसरे हे स्थान पर रही है क्योंकि पार्ले ऊँचे पिंड वाले कहा हमसे बेहतर है वो कमी दूर करनी होगी.", जुगराज जी सभी खिलाडियों और शामिल लोगो को सम्बोधित करते हुए ऊँची आवाज में बता रहे थे और कबड्डी के नरम मैदान के ird-gird मरकरी लाइट की दूधिया रौशनी में नजारा जोशीला हो चला था. सफ़ेद चाक मिटटी से घेरा बना दिया गया था और एक तरफ अकेला अर्जुन खड़ा था तोह दूसरी तरफ शहीद, दिलबाग, कमलेश, भोला के साथ साथ उनके पुराने साथी जो आज भी लम्बे तगड़े थे और खेतो में म्हणत के साथ कही ज्यादा मजबूत भी.

"मास्टर जी, आपने तोह कहा था के अर्जुन भाई डाव लगाएंगे और वो भी एक साथ 2-2 बन्दों पे.", ये युवक वर्तमान कबड्डी टीम का रेडर था, बिल्ला. Kad-kathi में पहलवान और अर्जुन जितना हे लम्बा. उसकी बात पर कईओं ने समर्थन किया. इस माहौल को एक तरफ तोह दामिनी अपनी सहेली िन्दु के साथ देख रही थी और दूसरी तरफ छोटे से वृक्ष पर हाथ टिकाये सेहमी हुई दीपा भाभी. मिटटी में सना अर्जुन बिलकुल मस्ताए हुए सांड सा खड़ा था उस मैदान में. और ठीक उसके सामने दूसरी तरफ 7 पहलवान सरीखे दुगनी उम्र के महारथी.

"सुन्न तोह लो भाई सब पूरी बात. मकसद है अपनी आज की टीम को राइड और घेराबंदी सीखने का लेकिन इसमें एक बदलाव ये है की अर्जुन को काम से काम 2 लोगो को हाथ लगाना होगा राइड मारते वक़्त और इधर से जो राइड मारने जाएगा उसपे अगर अर्जुन ने डाव न लगाया तोह एक अंक सामने वाली टीम को. हार और जीत पे इनाम भी है जो अपने सरपंच साहब ने घोषित किया.", जुगराज जी ने हँसते हुए अपनी बात को वही बीच में छोड़ा तोह लोगो की उत्सुकता बढ़ गयी. वही दीपा भाभी ने देख लिया था की दामिनी और िन्दु एक तरफ दबे पाँव जा रही थी. दिमाग दो तरफ़ा था अब उनका. पहले वो अर्जुन की चिंता से यहाँ आयी थी और अब इन दोनों को ऐसे जाता देख कोई और बुरा ख़याल मैं में उठने लगा.

"मास्टर जी अब इनाम भी बता दो, क्यों तरसा रहे हो हम बचो को?", ये भूत था लेकिन जाने क्यों उसको ये नाम दिया गया. 6 फ़ीट ऊँचा, थोड़ा पक्के रंग का लेकिन जिस्म से बलिष्ट. कॉलेज तक पढ़ाई के बाद फ़िलहाल नतीजे के इन्तजार और कबड्डी के सिवा कोई काम नहीं था.

"इनाम ये है काका जी की जो भी अर्जुन से एक पॉइंट हांसिल करेगा, बदले में अपने सरपंच जी तुम्हारी टीम को एक खुराक देंगे. 5 पॉइंट का गेम तोह मतलब दिलबाग की टीम अगर 5 अंक अर्जित करती है तोह अगले 3 दिन की खुराक का खर्चा अपने maan-niya सरपंच जी उठाएंगे. दूध, अंडा, मीट, मालिश सबकुछ.", अब तोह केवल सिंह के नाम पर जोरदार तालियां गूंजी. वो भी हाथ उठा कर सबको शांत करते हुए ख़ुशी से हाँ भरने लगे.

"ये तोह एक तरफ़ा इनाम हुआ जी. अर्जुन भाई जीतेगा तोह क्या हमे खुराक सरपंच साहब को देनी पड़ेगी?", भोले निहाल का भोला सा सवाल था और सभी हंस दिए. एक तरफ कुछ लड़कियां भी हाथ में बैडमिंटन लिए खुसर फुसर कर रही थी. Khel-ghar में उनका भी दबदबा था बराबरी की वजह से बेशक लड़कियां ज्यादातर बैडमिंटन तक हे सिमित थी या फिर वो थोड़ा बहोत हैंडबॉल खेलने आती थी. इस बीच दीपा भाभी की नजरो ने कुछ अजीब होते देखा. दिवार के दूसरी और कोई खड़ा था जिसके साथ सर को ढके दामिनी बात कर रही थी और वो शक्श उस तरफ अँधेरे की वजह से साफ़ नहीं दिख रहा था. लेकिन था वो कोई ऐसा जिसकी छवि दीपा अँधेरे में भी पहचान सकती थी. िन्दु कुछ दूर कड़ी जैसे बाकी सब पर ध्यान रख रही थी. दामिनी ने कुछ दिया था उस शक्श को और बदले में उसने भी जो दामिनी ने अपने सीने में छुपा लिया. वो दोनों अब इधर आने की बजाये वही से चलती हुई khel-ghar से बहार निकल चली. दीपा के दिल और मैं को विचलित करके.

"हाहाहा.. ोये नीलिया, अर्जुन की तरफ से ऐसा हे इनाम दांव पे लगाया है अपने लाला जी और दार जी ने, जिस वजह से स्वयं लाला जी यहाँ पधारे है. तोह अब जैसा निर्धारित किया गया है, टॉस के बाद खेल शुरू.", जुगराज जी ने अर्जुन और शहीद को आगे बुलाते हुए सिक्का उछाला तोह जीत शहीद भाई की हुई. दोनों हाथ मिलाने के बाद अलग हो कर अपनी अपनी जगह आ गए, राइड डालने का जिम्मा अर्जुन को दिया गया था.

'डारे तू किनारे ते, भोलेय तू इसदे ठीक पीछे रही. दिलु ओह तेरे हाथ न लगा सके, ध्यान राखी. पहला मौका देना अप्पा अर्जुन न.', शहीद भाई थे भी किसी पहलवान जैसे जो इतने बरसो से अखाड़े से नियमित जुड़े थे. दिलबाग फुर्तीला था कभी जो अब बस मजबूत शरीर वाला रह गया था. उसको थोड़ा पीछे रखते हुए शहीद ने बाकी सभी को उनका काम समझा दिया. अर्जुन मिटटी के हाथ लगता 'kabaddi'kabaddi' बोलते हुए जैसे हे उनके पाले में दाखिल हुआ वो 'स' अकार का घेरा थोड़ा पीछे हुआ. सभी देख रहे थे की अर्जुन बहोत साढ़े हुए कदमो से बस रेखा की किनारे किनारे इधर उधर हो रहा है. जैसे वो इनके कदमो और शारीरिक भाषा का ज्ञान ले रहा हो. कमलेश पुराण खिलाडी था जिसने घेरा तोड़ने से पहले दिलबाग के कान में कुछ कहा और अपने साथ एक और खिलाडी को लिए बायीं तरफ से अर्जुन को घेरने की कवायद करने लगा. और वो अपना प्रयास करता उस से पहले हे अर्जुन उनकी तरफ कदमो का दिखावा करके अपने पीछे खड़े भोलू और डारे के बीच फुर्ती से निकलता वापिस अपने पाले आ खड़ा हुआ. कोई समझा भी नहीं लेकिन भोलू और डरा सर पे हाथ रखते हुए बहार चल दिए.

"लो वि मित्रो, अर्जुन ने राइड पूरी कित्ती. प्लान बने रह गए और बाँदा बाज निकळिया जेहड़ा समझ ऑन तोह पहला हे कम् कर गया दोना दे थपकी मारदा. अर्जुन डा एक पॉइंट.", अब चर्चा का विषय था अर्जुन की उम्मीद से हे ज्यादा फुर्ती और उसका झपटना, जो आँख झपकने से पहले हो गया था. तालियां रुकी तोह इस बार शहीद के साथ दिलबाग ने अर्जुन के पाले में कदम रखा, दोनों विपरीत दिशा से बढे थे. दीपा भाभी जैसे अनजाने डर की वजह से थोड़ा करीब आ कड़ी हुई और इन दोनों को पूरी मुस्तैदी से देख रहा अर्जुन शहीद भाई की तरफ झपट कर उन्हें पटक हे रहा था की दिलबाग ने छलांग लगते हुए उसके पाँव जमीन से उखाड़ दिए. दीपा की सांस हे रुक चली थी ये सोच कर हे की इस प्रहार से यक़ीनन अर्जुन को चोट पहुंची है. उधर अर्जुन तोह शहीद भाई के ऊपर से हे पलटी खा कर मुँह से मिटटी साफ़ करता खड़ा हो गया पर दिलबाग वापिस भाग चूका था.

"दिलबाग ने पॉइंट कमाया तेह अर्जुन ने दांव पूरा कित्ता. मामला बराबर रहा इस करके शहीद खेल विच रहेगा. एक पॉइंट शहीद दी टीम ने क्योंकि अर्जुन ने दोनों बन्दे नहीं गिराए.", जैसा की purv-nirdharit हुआ था की अर्जुन को दोनों रेडर को पटखनी देने पर हे अंक मिलेगा और वैसा न होने पर जो उसको छू कर निकल जायेगा, अंक उस रेडर को प्राप्त होगा. हुआ भी ऐसा हे जब दिलबाग बच निकला लेकिन शहीद को पटकने की वजह से 2 में से एक हे अंक बन पाया. खेल यही से मजेदार हो चला था लेकिन भीड़ भी बढ़ने लगी थी, बात आसपास छुपाल तक जाने से. दीपा चलती हुई कब अगले पाले के किनारे पहुंच गयी उसको भी ध्यान न रहा. ज्यादातर लोग बैठे थे और कुछ खड़े तोह दीपा भाभी फिर भी कुछ दुरी पर हलके अँधेरे में थी. अर्जुन ने होंठ पर आया हल्का सा लहू जीब से हे चाट कर साफ़ करने के बाद राइड शुरू की.

"इस बार धावा बोलना 'प' बना के लेकिन कमलेश तुम और दिलु डंडी पे रहोगे भाई.", शहीद के कहे अनुसार 7 के 7 खिलाडी पंजे मजबूती सी टिकाये इस तरह घूमने लगे जैसे अर्जुन केंद्र बिंदु हो और वो कोई नाग जो उसको कसने के ख्वाहिशमंद हो. इस बार उत्तेजना में भोलू बहार से हे चीखा.

"ओह मिन्दर, गिट्टियां ते जम्प मार इसदे. मेगे, लामक जा पीठ तेह शेती.", वो कह रहा था की एक व्यक्ति जल्दी उसके घुटनो पर छलांग लगाए और दूसरा पीठ पर सवार हो जाए. अर्जुन ने घेरा कसने दिया अपने ird-gird और जैसे हे वो दोनों व्यक्ति उसकी तरफ कूड़े, ठीक सामने तीसरा और शहीद अर्जुन को दबोचने कूड़े. और यही अर्जुन मिन्दर से बचता हुआ मेगे को अपने कंधे पर उठाये अपने पाले की तरफ कूद गया. ये दोनों हे उसने बहार कर दिए थे पर 80-90 किलो के मेगे को उसने जितने आराम से उठाया और फिर अपने पाले में आराम से गिराया था सभी ताली और सीटियां मारते रह गए. अर्जुन सिर्फ और सिर्फ खेल रहा था जबकि दूसरी तरफ वो लोग हाँफते हुए अब इसको गंभीरता से लेने लगे, खासकर कमलेश और दिलबाग.

"ोये बल्ले ओह पड़ता. सिर्रा हे लगता पट तू तह. ऐ स्कूल दे जवाक नै है जिंहानु तू ेहड़ा चूक के पझ जांदा. हाहाहा.. मैं गए पुत्र.", लाला जी ने जुगराज जी द्वारा 1 अंक अर्जुन को प्रदान करने के बाद इस अद्भुत दृश्य से खुश हो कर पास कड़ी उन 5-6 लड़कियों को 50-50 रुपये दिए, खेल में लगन दिखने के एवज में. सामने शहीद की टीम जैसे दो फाड़ हो गयी थी इस राइड के बाद. जहा शहीद 4 खिलाड़िओं को राइड डालने की योजना बता रहा था, वही दिलबाग को कमलेश बुदबुदाते हुए कुछ अलग हे काम बता रहा था, बिना उसकी तरफ देखे जैसे वो इसका पता किसी को लगने न देना चाहता हो. दिलबाग ने बोलने से पहले हर तरफ आसपास बैठे लोगो को देखा और उतनी हे धीमी आवाज में उसने जवाब दिया. उनकी टीम से 2 तगड़े खिलाडी अर्जुन को घेरने निकल चले थे जबकि अर्जुन उन्हें देखने के साथ साथ ये भी ध्यान दे रहा था की सामने एक टीम नहीं बल्कि 2 खेल रही है. छोटी टीम कबड्डी के साथ जैसे और कुछ भी करने का इरादा रखती है. दोनों खिलाडी सतर्कता से अर्जुन की और धीरे धीरे बढ़ रहे थे. अर्जुन कुछ कदम पीछे होता हुआ कभी एक तरफ हो जाता तोह कभी दूसरे वाले को पीछे हटने पर मजबूर करता. कमलेश ने सभी का ध्यान अर्जुन पे लगे देख दिलबाग की जांघ पर ऊँगली चलते हुए ख़ास इशारा दिया और वो उसके आगे हो गया. दिलबाग घेरे की अंतिम लाइन पर था जिधर बस 2 हे लोग थे क्योंकि ज्यादातर तोह पाले के आमने सामने लंबवत बैठ कर ये खेल देख रहे थे. अँधेरे में दिलबाग के हाथ में कुछ पकड़ाया गया और फिर वो व्यक्ति वह से हैट कर भीड़ में जा मिला. दीपा भाभी ने भी ये देख लिया था जिसकी आशंका अब सही साबित होती जा रही थी. उधर अर्जुन उन दोनों को छका रहा था डरते हुए और जैसे हे एक की सांस टूटने लगी अर्जुन ने हाथ का दिखावा उसको पकड़ने का करते हुए पाँव विपरीत दिशा में घुमा कर दूसरे वाले का रास्ता बंद कर दिया. पालक झपकते हे वो अर्जुन के कंधे से घूम कर पोली मिटटी में पीठ के बल गिरा था और जितने दूसरा अर्जुन को छूने की कोशिश करता, उसके बढे हुए हाथ को कंधे पर लाते हुए अर्जुन ने किसी बोरी की तरह घुमा कर बड़ी आहिस्ता से उसकी पीठ भी पहले वाले की बगल में सत्ता दी.

"ओह अर्जुन बाई.. एक नंबर स्पीड है बाई.. मैं गए तेरे दिमाग न. जमा बिल्ली वांग झपटिया.", निहाल ख़ुशी से ताली पीट रहा था और अर्जुन उन दोनों को हाथ दे कर उठाने के बाद अपनी जगह आ कर वापिस खड़ा हो गया. उन दोनों खिलाडियों के मैं से अब गंभीर प्रतियोगिता वाली बात निकल कर अर्जुन के लिए सम्मान बढ़ चूका था जो ख़ुशी ख़ुशी मैदान से बहार किनारे पे जा खड़े हुए. भोलू और डरा फिर से टीम में आ चुके थे उनके बहार होने की वजह से. यही नियम था की सामने 7 बरक़रार रहेंगे.

"मित्र प्यारों, स्कोर है अर्जुन 3 शहीद 1. मतलब बस एक राइड और एक बचाव पूरा करना है अर्जुन ने जबकि इतना हे अगर दूसरी टीम करती है तोह खेल बराबर. और दुगना करने पे वो विजेता. देखना होगा तजुर्बा जीतेगा या जोश.", जुगराज जी ने अंक सुनाये तोह निहाल और उसके दोस्त तालियां पीटने लगे थे पर कुछ और भी थे जो इस से अलग राये रखते थे और वो इनसे अलग अपने हे झुण्ड में थे. उनकी तरफ किसी ने ख़ास तवज्जो भी न दी. दीपा भाभी गौर से देख रही थी की उसका पति क्या करने वाला है घाघ कमलेश के साथ मिल कर. अर्जुन भी देख रहा था की कमलेश शहीद की जगह खुद बाकि खिलाडियों को अपने हिसाब से घेराबंदी करने का कह रहा था. मतलब साफ़ था की इस राइड में अर्जुन के साथ वो नियम से नहीं खेलने वाला था.

'चिल्ला भी नहीं सकती और अगर बता देने पर कुछ न मिला तोह बदनामी के नाम पर जलील अलग करेंगे. वाहेगुरु अर्जुन को बचा लो बस.', दीपा भाभी की स्थिति भी उचित थी. सामने उसका हे पति नियम से विरुद्ध काम करने वाला था जिसका परिणाम पकडे जाने पर भी घातक और अर्जुन के जख्मी होने पर भी. वो चाह कर भी चीख नहीं सकती थी की अर्जुन पर खतरा है. इस अँधेरे में दिलबाग अपनी मुट्ठी में छिपाया हथियार कही भी फेंक कर बच सकता था और घर जाने के बाद वो जो सलूक दीपा के साथ करता, उस से यकीनन जिस्म के जख्म बढ़ने हे वाले थे. अर्जुन घुटनो के बल बैठ कर सर झुकता हुआ जैसे फेफड़ो में प्राणवायु बढ़ा रहा था या कुछ और. उसको इस अंदाज में देख खुद लाला जी और जुगराज जी भी अपना ध्यान उस पर लगाए थे. वो जब खड़ा हुआ तोह चेहरे पर अलग हे मुस्कान थी और आँखों में मंज़िल को पाने की चाहत.

"सुखी, भोलू तुम दोनों डरना नहीं और लाइन में इधर पीछे हटने के बाद जितना हो सके इस लड़के को अंदर लेते आना. जीते तू शहीद के साथ जोड़ी में सामने रह कर कदम पीछे करते जाना जिस से फंदा बन्न सके. कला और मैं भी इधर ऐसा हे करेंगे. कोई गलती नहीं होनी चाहिए इस बार. उसकी सांस न टूटी तोह इस बार हे वो जीत जाना. दिलु, ध्यान नाल.", दिलबाग को कमलेश ने अलग सन्देश दिया था. लेकिन सामने से आता हुआ इंसान जैसे इन छोटे मोठे घेरो की बारे में सोच हे नहीं रहा था. सफ़ेद पट्टी पार करने से पहले उसने जिस तरह दीपा भाभी की आँखों में देखा था वो कुछ समझ न सकीय. उसकी मुस्कराहट देख तोह ऐसा लग रहा था जैसे कोई आशिक़ खुदखुशी करने से पहले आखिर बार चेहरा दिखा रहा हो अपने इश्क़ को.

"फंस गया तह ज़िंदा नहीं बचना मैं कमली. वेख तेरी घेराबंदी तगड़ी है, अप्पा जित्त जाना ेहड़ा वि.", दिलबाग मैं हे मैं डर रहा था और उसकी ये आखिरी कोशिश थी कमलेश को मानाने की. यही दोनों थे सबसे आखिर में दायी तरफ के कोने पर.

"शठ.. बात हार जित की नहीं है दिलु, पूरे पिंड की है. ये बाँदा अखाड़े नहीं जाने देना दरगाह वाले. बस सब जैसे हे इसको दबोचे, कील पत् में या चुत्तड़ पे घुसा दियो."

"सूए का टुकड़ा इसका अखाड़े से न रोक सकेगा.", दिलबाग की मुट्ठी बंद थी जैसे उसमे हे वो सूक्ष्म हथियार था.

"शरीर में ताप चढ़ेगा इसके बस चुभा दियो. वो आ चूका है.", कमलेश ने ये न बताया था के वो बस सुआ नहीं है बल्कि जहर बुझा सुआ है जो कुछ भी कर सकता था अर्जुन के साथ. बहोत हे धीमी रफ़्तार में कबड्डी कबड्डी बोलता हुआ अर्जुन बस शहीद को हे देख रहा था जैसे वो कहना छह रहा हो की सामने मैट आना. 4 कदम आगे बढ़ाते हे जैसा कमलेश ने कहा था ठीक वैसा हे हुआ और परिणाम बिलकुल विपरीत. 2 लोग पीछे से और 2 सामने से कूड़े थे पर शहीद एक तरफ हो गया अर्जुन को खुले सैंड की तरह कन्धा एक तरफ वाले 2 लोगो पर मारते देख. मिटटी को पिछले दोनों पाँव ने ऐसे उदय था की पीछे वाले दोनों अपने चेहरे को ढकने पर मजबूर हो गए. कमलेश झपटा लेकिन इस बार खेल से विरुद्ध अर्जुन ने उसकी गर्दन पकड़ कर जमीन पर ऐसे दे मारा था की आसमान में जो तारे अभी आये न थे वो कमलेश देखने लगा था. दिलबाग के हाथ से वो सूए का टुकड़ा एक तरफ गिर गया जिसको आगे बढ़ते जुगराज जी ने भी देखा, जो अर्जुन को रोकने आ रहे थे. लेकिन देरी हो हे गयी.

"नामर्द हो तुमममम", ये दहाड़ ऐसी थी की हर इंसान काँप उठा और जब तक वो लोग समझने लायक होते दिलबाग अर्जुन के पाँव पे गिर चूका था.

"माफ़ कर दो प्रधान जी .. माफ़ कर दो.. ये कमली ने कहा था के आपको अखाड़े में जाने से रोकने के लिए ये करना जरुरी है. मुझे नहीं पता था के इस एक सूए की मार से आप कैसे जख्मी हो सकते थे.. मुझे माफ़ कर दो..", हाल इ बयान सुनते हुए भी अर्जुन ने पहले तोह कमलेश की टांग पकड़ कर उसको अपने पाले की तरफ उछाल फेंका फिर पाँव उठा कर जैसे हे दिलबाग के झुके हुए सर पे रखने लगा तोह अँधेरे में चमकते उन 2 आंसुओं ने उसका ये वार रोक दिया. अर्जुन पलट कर सरपंच की तरफ चल दिया था.

"हो गया न प्रमाणित सरपंच साहब की आपका शक सही था. अब क्या करना है इनके साथ? दिलबाग को सजा मेरे दादा जी सुनाएंगे और इतने ये व्यक्ति अपने खेत से बहार नहीं निकलेगा. उल्लंघन होने पर khet-khalihaan वापिस. दूसरे को आप अपने तरीके से देखो जो आपके शक पर खरा उतर गया, दुर्भाग्य से.", अर्जुन ने इस बार सरपंच केवल सिंह के चरण स्पर्श किये थे और सभी को सदमे में छोड़ वो निहाल का हाथ पकड़ कर शहीद भैया के साथ यहाँ से चल दिया. लाला जी ने भी घेरे में बचे दोनों के सिवा सभी को वह से अभी के अभी जाने का आदेश दिया तोह दीपा भाभी न चाहते हुए भी भीड़ के साथ यहाँ से चली गयी. अर्जुन घर की तरफ न जा कर khel-ghar की बगल वाली सुनसान गली की और जा रहा था. शहीद भाई ने हे उसको कुछ देर साथ रहने के लिए मनाया था.

"लाला जी, दिलबाग का तोह हिसाब बना गए छोटे पंडित पर हमारे भाई को शायद हम सही सजा नहीं दे पाएंगे. जुगराज भाई, कमलेश के हाथ बाँध दो पीठ पीछे. होश में आएगा तोह जवाब लेंगे इस से.", केवल सिंह लाला जी की कुर्सी के पास हे जमीन पर बैठ गया. आँखों में आंसू थे और दिल में कुछ हल्कापन. दिलबाग ने दोनों की तरफ घुटनो पर गिरे हुए हाथ जोड़े तोह पहली बार मास्टर जुगराज ने नियम कायदे भूलते हुए उसके गाल पर झन्नाटे दर थप्पड़ जड़ दिया.

"बड़ा मान था वे दिल्लेया तेरे तेह साहनु. तू तह अखाड़े डा हे मान न रखिये. कुज कमी रह गयी से सादे प्यार सत्कार विच जो तू पिंड दे मान न हे मितान लगेया की?"

"दार जी, मैं सच कहना है चाहे गुरुघर सौ उठवा लो. मेनू कमली ने कहा स की यह कील अर्जुन दे पत् या पीछे मार के ओसनु मेले विच शामिल हों तोह रोकना. कहंदा की यह पिंड दे मुखिया दी जान डा सवाल है. तुस्सी जांदे हो की इस दिलबाग ने कड़ी कोई गलत कम् नै कित्ता? मैं कमली दे इरादे नहीं स जांदा?", वो सफाई दे रहा था और लाला जी फीकी हंसी देते हुए उसको देख रहे थे. जुगराज ने कमलेश के भी हाथ बाँध दिए थे पीठ की तरफ और जल्द हे वह सुच्चा सिंह जी के साथ साथ, रजनीश जी उर्फ़ मैनेजर साहब घटनास्थल पर पहुंचे 2 युवको को लिए. उन्हें पूरे मामले से खुद सरपंच ने अवगत करवाया. चेहरे पर उनके भी 12 बज गए थे सब सुन्न कर.

"केवल सिंह, तुम्हे कमलेश की जानकारी थी?", ये सुच्चा सिंह जी ने पुछा था जो अब चिंतित भी थे और दुखी भी.

"जी बाबा जी लेकिन सबूत नहीं था मेरे पास. महीने पहले से मैं देख रहा था की ये पार्ले पिंड के कुछ बदमाशों के साथ ज्यादा हे mel-jol बढ़ा रहा है. दिलबाग नहीं जानता था उन लोगो की मंशा लेकिन सब लोग अय्याशी इसके हे खेत पर करते थे. चाहे दिलबाग वह हो या नहीं. अड्डे वाली रंगदारी में भी इसका जीकर हुआ था लेकिन पैसो के दम पर इसने हे बात दबवा दी. कल नवाब की कुछ बातचीत हुई थी अर्जुन से शाम को और उसके बाद वो घर पे अपने इस चचे से हे बात कर रहा था की कैसे उसके दोस्त अर्जुन को ठिकाने लगाना चाहते है. पहले हे मैंने वड्डे दार जी को बताया था की इसका गाँव निकला करवा दो तोह सही होगा लेकिन आपके सामने हे है के मेरी इज्जत उछाल दी इसने वो भी पंडित जी के बचे पर हमले की साजिश सरे आम करते हुए. मैं पदवी छोड़ दूंगा जी लेकिन कल की पंचायत में इसका फैंसला मुझे हे करने दे तोह बेहतर होगा.", इतना खुलासा करने के बाद केवल सिंह एक और बैठ गया. कमलेश के मुँह से खून बह रहा था और वो भी अब दर्द को पीने की कोशिश करता हुआ उठने लगा था पर हाथ बंधे देख हैरानी से सामने बैठे लोगो को घूरने लगा.

"हम्म्म. अर्जुन ने फैंसला तुम्हे हे करने को कहा है तोह ऐसा हे होगा. दिलबाग की सजा क्या होगी ये पंडित रामेश्वर जी निर्धारित करेंगे या हम अभी उनसे बात करने के बाद सुबह पंचायत में हे उनका फरमान बता देंगे. फ़िलहाल दिलबाग तुम्हे जो आदेश मिला है, वही करना है. याद रहे की गाँव निकला नहीं खेत में नजरबन्द की सजा मिली है तुम्हे. 2 वक़्त का खाना तुम्हे वही मिलेगा और अगर तुम saja-khilafi करते हो तोह हत्या के प्रयास में सजा भोगने से पहले संपत्ति कुर्क होगी और गाँव बेदखली अलग. वैसे भाग्यशाली हो तुम जो उस भली आत्मा ने तुम्हे जाने कैसे बक्श दिया. हुम्ला देख कर तोह लग रहा था के घेरे से कोई भी अपने पाँव पर खड़ा होने लायक नहीं बचेगा. वो यहाँ लोगो के मनोरंजन के लिए खेल रहा था तुम सबको औकात दिखा कर की उसके लिए तुम महज मनोरंजन का जरिया हो. फिर भी बाज नहीं आये मूर्खता दिखने से.", लाला जी ने भली भाँती वो चाल और पूरा दृश्य देखा था जिसमे अर्जुन कही से भी अर्जुन न था.

"लाला जी, इस किल तेह ज़हर बुझाया होया जी.", जुगराज कांच के गिलास में डूबा कर वो सूए का टुकड़ा लिए आया तोह पानी का रंग बदल चूका था. दिलबाग तोह ये देखते हे खुद के गाल पर थप्पड़ की बारिश करने लगा जिसको उन 2 युवको ने रोका सुच्चा सिंह जी के आदेश पर.

"यही केस अब कमलेश पर बनेगा केवल सिंह, तुम्हारे पंचायती फरमान के बाद. पंडित जी शायद खुद pooch-tach करना चाहेंगे अब कमलेश सिंह से. ये सबूत और कमलेश को साथ ले चलो Dhiraj-Manjeet. पंचायत में पेश होने के बाद भी ये हमारी निगरानी में रहेगा. केवल, पंचायत बंद कमरे में लगेगी और उसकी मुनादी मैट करवाना. मिलते है सुबह 7 बजे धर्मशाला में. ज़हर वाली बात फैलने न पाए और नवाब से कह देना की या तोह घर रहे या फिर उसको ननिहाल भिजवा दो कुछ हफ्ते. तुमने गाँव को हमेशा पहले रखा है परिवार से तोह इतना तोह तुम्हारे लिए हम भी कर सकते है. दिलबाग, तुम्हारी सजा शुरू हो चुकी है. निकल जाओ और जब बुलावा आये तोह हाजिर हो जाना. चलिए बाबा जी. लाला जी आपको जुग्गी छोड़ देगा.", रजनीश जी के आदमी कमलेश को जीप के पिछले हिस्से में फेंक चुके थे और सुच्चा सिंह जी को अगली सीट पर बैठा कर रजनीश जी वह से निकल गए.

"तुम्हे बुरा लग रहा होगा न केवल भाई?", दिलबाग तोह अँधेरे में जैसे तैसे निकल चला था पर जुगराज और लाला जी सरपंच के साथ वही पर बैठे थे.

"ाचा हे लग रहा है फिलहाल तोह जुग्गी बाई. मेरा बस नहीं चलता नहीं तोह पार्ले पिंड के सारे नशेड़ी दरिया में हाथ बाँध कर फेंक दू. देख लो सांगत का असर. मैं फ़ौज सेवा में रहा और जख्मी लौटा पर हरा नहीं. भगवान्, मंझला है लेकिन मुझसे ज्यादा समझदार और इस पिंड का मान लेकिन ये सपोला खुद तोह बर्बाद हुआ सो हुआ, अपने भतीजे तक को नहीं बक्शा इसने. लाला जी, चौपाल में घोषणा कर देना की सभी खिलाडियों की खुराक मेरे जिम्मे है. इस घटना के बारे में वैसे तोह लोग ज्यादा बात नहीं करेंगे क्यूंकि वो तोह डर हे गए थे उस आवाज और तूफ़ान से लेकिन ये आपने सही किया की पंचायत बंद कमरे में रखवाई. आज्ञा दीजिये, थोड़ा अपने नवाब की भी खैर खबर लेता हु.", सरपंच ने जुगराज से हाथ मिलाया और लाला जी के चरण स्पर्श करने के बाद सीधा अपने घर की तरफ चल दिए, तेज कदमो से.

"क्या लगता है जुग्गी बीटा, उस आंधी को देख कर?", लाला जी जुगराज के स्कूटर की तरफ बढ़ते हुए अब थोड़ा मुस्कुरा रहे थे जैसे उन्हें इस हादसे की अब चिंता न हो. वैसे भी सजा का फरमान तोह दिया हे जा चूका था और वो भी बिना माहौल को गरम किये.

"आप बेहतर बता सकते है चाचा. मैंने तोह बस आज 2 अलग अलग अर्जुन देखे. एक जो पहले हंसी मजाक में सबके साथ खेल खेल रहा था और दूसरा जैसे कोई और हे था. अपनी ताक़त का एक छोटा सा नमूना देता हुआ जंगल का राजा. भोलू और सुखी की तोह हंसली गिर गयी है कन्धा उतरने के साथ. जबकि हालत बाकी दोनों की भी ठीक नहीं थी. कमलेश को देखा न कैसे खून उगल रहा था और इतनी ताक़त किसी में कैसे हो सकती है चाचा? वो सचमुच हे जैसे कुत्ते और शेर वाला मुक़ाबला था. शेर ने मुँह की जगह पंजे से उछाल दिया इस दगाबाज को. पहले ऐसा कुछ देखा है आपने?", जुगराज ने स्कूटर में चाबी लगाने के बाद उनकी तरफ देखा.

"तुलना तोह नहीं कर सकता पर बड़े पंडित जी रहते तोह हमेशा हे शांत और हँसते बोलते थे पर जब उनके गुस्से को देखा तोह तुम्हारे जैसा हे हाल मेरा था. लेकिन उन्होंने सजा उस व्यक्ति को कुचल कर दी थी जबकि अर्जुन ने उनसे विपरीत ksham-daan दिया. वह एक व्यक्ति था जो अपराधी था और यहाँ 7 सामने थे जिनमे से एक खुद पीछे चला गया और 5 खड़े होने लायक न रहे वो भी इतनी जल्दी की किसी को समझ नहीं आया. बस दिखा तोह वही जोर जिसकी तुलना तुम कुत्ते और शेर की ताक़त से कर रहे हो. अखाड़े में हो सकता है पेशेवर लोग हो लेकिन ये इंसान दोहरे स्वरुप वाला है और अगर दूसरा स्वरुप निखार कर सामने आया तोह वह मंजर क़यामत भरा होने वाला है. यही वजह है की रामेश्वर भाई ने ऐतराज नहीं किया. देखा कैसे मौके पर हे सजा सुना दी ठीक अपने दादा जी की तरह? चलो भाई घर छोड़ दो बस, नींद तोह इस लड़के ने उड़ा हे दी है पर आराम तोह करना होगा.", जुगराज भी मुस्कुराता हुआ स्कूटर चालू करने के बाद उन्हें पीछे बैठा कर चलने लगा.

"दोहरा स्वरुप, क्या सही नाम दिया है आपने. लड़का तोह पहले से हे तैयार है और झलकियां भी दिखा रहा है की उसकी नजर और जिस्म सबकुछ समझता है. बचे डर न जाए बस इस घटना से."

"अरे उन्होंने देखा हे कहा सबकुछ और हुआ भी तोह इतनी जल्दी. वैसे भी चर्चा के लिए कुछ तोह होना चाहिए बीटा. खबर होनी चाहिए की शेर आ चूका है.", लाला जी ने आदतन हँसते हुए बात ख़तम की और दोनों निकल चले, चौकीदार को गेट सुबह 5 बजे खोलने का बोलते हुए.

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"भाभी, आप यहाँ रात में अकेली कड़ी हो? आप परेशां है न भाभी?", निहाल अपने घर की तरफ जा रहा था और जैसे हे दीपा भाभी के घर के सामने पंहुचा उसने देखा की भाभी बहार थदड़ी पर अकेली बैठी है मुँह पर दुपट्टा लिए. करीब आने पर निहाल ने पाया की चेहरे पर कुछ गीलापन था जो शायद आँखों या गर्मी की वजह से होगा. उसकी आवाज सुनते हे दीपा भाभी ने हड़बड़ाहट में चेहरा साफ़ करते हुए झूटी मुस्कान दी.

"न वे, मैं तोह बस तेरे पाह जी का इंतजार कर रही थी. आये नहीं न रोटी लेने आज अखाड़े से जाते हुए. तुझे मिले क्या कही?", कितनी सफाई से वो झूठ बोल रही थी जबकि निहाल जैसे उन्हें सच बताने से हे डर रहा था.

"वो भाभी.. मैं पाह जी की तरफ से आ रहा हु शहीद भाई को खेत पे छोड़ के. खाना तोह आपको भी पता है के यार दोस्तों के घर से भी आ जाना. आप गर्मी में बहार न बैठो, मौसम भी घुटा होया. बारिश हुई तोह बीमार पड़ जाना आपने.", निहाल की भोली बातें सुन्न कर अब दीपा भाभी क्या जवाब देती.

"शहीद इनके पास रुकेगा या मिलने गया है बस? और तू अकेला हे आया इतनी दूर से?"

"माफ़ करना भाभी पहले मैंने झूठ कहा के मैं पाह जी के पास से आ रहा हु. मैं और अर्जुन बाई शहीद पाह जी के नाल हे थे काफी देर तक. फेर उनके घर से खाना बंधवा कर पाह जी तोह दिलबाग पाह जी की तरफ निकल गए खेत पे और मैं अभी अर्जुन को हवेली छोड़ के अपने घर जा रहा था. किसी ने आपको कुछ कहा है क्या भाभी?", निहाल डर रहा था के कही उन्हें किसी ने गलती से सच न बता दिया हो. पहले हे बहोत से ऐसे सच थे जो दीपा भाभी के कान तक नहीं पहुंचे थे और आज भी उन्हें ये बताने कोई न आया था के उनके पति ने गलत काम में कमलेश का साथ दिया है. गाँव क्या पूरा परिवार हे था ये जिसमे बचे भी समझदार हे थे ऐसे मामलो में.

"न वे मुझे तोह किसी ने नहीं कहा कुछ और मौसम ख़राब होने की वजह से राणो को अंदर बाँध के आयी थी न तोह बस तुम्हारे पाह जी को उडीक रही थी. अब शहीद उनकी तरफ चला गया है तोह मुझे चिंता नहीं. नहीं तोह तुझे हे भेजती उनका खाना देने के लिए. और ये अर्जुन इतनी देर से जाता है क्या अखाड़े से?"

"दे वि आना सी भाभी मैं आप बस कह दिया करो. अर्जुन बाई डा मूड ठीक स नई कुछ और शहीद पाह जी ने थोड़ा बहोत हंसी मजाक करके सदा डोवा डा मखौल कित्ता तेह ओह खुश हो गया. बड़ा मेहनती मुंडा है भाभी और दिल डा वि चंगा. कह रहा था के कल तोह कही जाना है सवेरे लेकिन शाम को अखाड़े जरूर आएगा. कह रहा था के आज बहोत थकान है छोटे प्रधान जी भी हवेली नहीं है तोह बस टाइम से सो जाएगा. मालिश के लिए मैं बड़ी बेबे को बोल के आया हु बाई की. 2 बजे से 5 तक तोह वो मिटटी हे खोदता रहा कल्ला उधर. फेर प्रैक्टिस और उसके बाद कबड्डी वाली कुश्ती. 8 बज गए.. भाभी 8 बज गए आज तोह घर से बहार. बेबे इधर हे न चली आये, मैं जाता हु जी. रब्ब रखा.", हाथ जोड़ कर ये भोला इंसान चला गया और पीछे छोड़ गया उस इंसान को जो समझ नहीं प् रहा था के उसके जीवन का सार क्या है. आज अर्जुन ने बस उसके आंसुओ को देख कर अपना कदम पीछे ले लिया था जबकि वो खुद दोहरे मैं से एक तरफ वैसा होने देना चाहती थी और दूसरी तरफ अपराधी की बीवी के बोझ से बचना भी. दीपा जानती थी की उसके पति को माफ़ी जरूर मिली होगी. लेकिन अब अर्जुन जैसे उस से और दूर हो गया था. दिन में तोह उसकी आवाज काम से काम सुनी थी लेकिन अब उसका भी वजूद रहना था या नहीं, सब किस्मत पे था. और वो तोह दीपा से तभी रूठ गयी थी जब दिलबाग ने उसको बदचलन बता दिया था पार्ले गाँव के नशेड़ियों की सोहबत में.

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"आज तोह सारा दिन हे बहार बिता दिया बीटा तुमने. और एक दिन में हे इतनी म्हणत करने की क्या जरुरत ाँ पड़ी थी जैसे कल सूरज नहीं निकलने वाला?", अर्जुन अंगोछा लपेटे हुए आँगन की तरफ लगी मोटर के निचे बैठा अपने जिस्म से मिटटी पसीना साफ़ कर रहा था. निर्मल ठंडा पानी जहा जिस्म को सुकून दे रहा था वही कुछ जगह लगी हलकी रगड़ और खरोंचे साफ़ भी. देवकी खुद हे टोलिया उसके करीब तार पर डालने के बाद खाट पर बैठ कर उसको नहाते देख बात करने लगी. उसके जिस्म पर पैनी नजर थी देवकी की जैसे वो कुछ ख़ास देखना चाहती हो पर न देख पाने से निराशा हुई जिसको अलग तरह जाहिर किया.

"दादी, आज संयुक्त अभ्यास था न वह पर तोह टाइम लग गया. दिन हे कितने बचे है अपने गाँव की टीम के पास.? फिर थोड़ा बहोत अखाड़े में खेलने के बाद मैं शहीद भाई की तरफ चला गया और उसके बाद निहाल भाई के साथ टहलने. आज दादा जी नजर नहीं आ रहे अभी तक?", अर्जुन ने खड़े हो कर जिस्म पर थोड़ा सरसों का तेल माला और गीले बदन को हे हलके हाथो से मालिश करते हुए देवकी से बात भी. मीणा अपना काम पूरा करने के बाद दरवाजा बंद करके एक तरफ कड़ी थी जैसे आज्ञा चाहती हो अपने कमरे जाने की.

"ाची बात है बीटा की तुम म्हणत कर रहे हो. थोड़ा संभल के रहना बस, gaanv-dehaat में अक्सर लोग रंजिश के मौके ढूँढ़ते है और तुम तोह उनके लिए अनजान भी नहीं. न घर पे तुम्हारे चाचा है और न दादा. ऐसे में कोई तोह पुरुष यहाँ रहना चाहिए न? खेत से कल हे लौटेंगे अब. और कुछ ख़ास किया आज?", अब कृष्णेश्वर जी का तोह यही था. Khet-khalihaan के बाद गाँव बिरादरी में रहना. घर पे वैसे हे उनके साथ बोलने चलने को लोग हे कितने थे. लेकिन जिस तरह देवकी ने ख़ास बात कहा अर्जुन सर झुकाये दोनों घुटनो से निचे पिंडलिओं तक मालिश करता मंद मंद मुस्कुराया. दामिनी इन दोनों की आवाज सुन्न कर इधर हे चली आयी, जो शायद आज आज में हे तीसरी या चौथी बार नहीं थी. काले रंग का 3 बटन वाला सभ्य गाउन पहने कुछ उन्मुक्त थी घर पे सेवक और पिता की गैर मौजदगी सी. अर्जुन ने उस पर ध्यान न दिया जैसे कोई खबर हे न हो.

"ख़ास बात तोह हुई दादी लेकिन पता नहीं कितनी ख़ास है. कोई शबाना आंटी जी है गाँव में, जिनका बीटा कोई योजना बना रहा था भरी गड़बड़ करने की khel-ghar या मेले में ये तोह साफ़ नहीं हुआ लेकिन वो ऐसा हे करने वाला था और उसके साथ पास के हे गाँव के 2 और लड़के भी थे. रजनीश दादा जी ने वो दोनों लड़के तोह पकड़ लिए पर शबाना आंटी का वो बीटा अँधेरे का फायदा उठा कर निकल गया. हाह... शब्बीर नाम था शायद. अब मैं तोह नया हु यहाँ तोह मुझे क्या पता कौन क्या है और नाम इतने याद भी कहा रहते है? आप जानती है उनको?", ये बात उसने शरीर को पौंछते वक़्त दामिनी की तरफ देखते हुए कही थी जिसके चेहरे पर एकदम से खौफ उभर आया था. लेकिन जांघ पर उसकी माँ का हाथ महसूस करते हे वो अपनी जगह से उठती हुई मीणा को जाने से पहले काम बताने का दिखावा करती एक तरफ चली गयी.

"वो परिवार तोह बहोत भला है बीटा क्योंकि शबाना मेरे सामने तोह ब्याह कर आयी थी इधर. और आना जाना तोह मेरा भी है थोड़ा उनकी तरफ लेकिन शब्बीर और उसके भाई को तोह मैं सरे राह फटकार लगाती रही हु ऐसे गलत मेल जॉल की वजह से. पर योजना मतलब तोह वो कुछ बड़ा करने की फ़िराक में हे होगा जो मैनेजर साहब ने नजर राखी. बहिन सीरत जितनी नेकदिल और संस्कारी, उतना हे निकम्मा और घटिया ये लड़का. जरूर क्सक्सक्सक्स निकल गया होगा बचने के लिए, उधर ननिहाल है न उसका. गाँव की बात है तोह पंचायत से बहार नहीं जाने वाली पर चलो ाचा हुआ की दुर्घटना नहीं हुई. और वो 2 लड़के कौन है कुछ खबर लगी बीटा?", देवकी मच्छर वाली अगरबत्ती को जलने के बाद आँगन में दिवार के करीब रखती हुई जैसे अब अपने कमरे में हे जाने वाली थी. अर्जुन ने ढीला पजामा पहन लिया था नाड़े वाला. अंगोछा तार पर सूखते हुए उसने अपनी छोटी दादी की बात का जवाब दिया.

"परिवार तोह हमेशा हे भले होते है दादी, जितनी मुझे समझ है. बस कोई एक आध निकल हे जाता है जो संतुष्ट नहीं होता. अब सही और गलत तोह सामाजिक तराजू है और उस हिसाब से तोह परिभाषा भी गलत. बाकी मैं नहीं जानता की वो लड़के कौन थे. आप सोने जा रही है दादी?", अर्जुन के ऐसे विचार सुन्न कर देवकी ने ख़ुशी जाहिर की और आशीर्वाद देती हुई बस इतना बोल गयी.

"जग जग जियो बीटा. मैंने तुम्हारी बुआ को बोल दिया था के वो तुम्हारी मालिश कर दे जैसा निहाल ने कहा की तुम्हारे लिए जरुरी है. भोजन के बाद या पहले ये तोह तुम अपनी सुविधा से देख लो. बाकी सभी खा चुके है और बहु के साथ आँचल उसके हे कमरे में होगी. निक्कू आज दिन भर सोया नहीं है तोह बस जब तक वो सोयेगा नहीं, मामी भांजी लगी रहेंगी उसके साथ.", भीतर से हवेली के द्वार पर टाला लग चूका था और देवकी के जाते हे अर्जुन भी अपने कमरे में चला आया. शरीर सचमुच दुःख रहा था लेकिन आज जैसे नींद आणि भी मुश्किल थी इस हालत में. Reh-reh कर उसको याद आ रही थी तोह दीपा भाभी की वो आँखें जिनमे आंसू थे. उसने बहोत कोशिश की थी खुद को रोकने की वैसा न करने से लेकिन उस बंद सड़क जैसी राह पर रास्ता भी कोई और न था. अर्जुन अपने खयालो में डूबा वैसी हे हालत में बिस्टेर के बीच पसरा हुआ था, पाँव बिस्टेर से लटकाये. जैसे जिस्म के साथ मस्तिष्क को आराम दे रहा हो. जाने कितनी हे देर वो इस हालत में रहा और फिर आँख खुली भी तोह किसी के हिलने से.

"कितनी देर से आवाज लगा रही हु तुम्हे और तुम तोह ऐसे पड़े हो जैसे अफीम खा के आये हो. भूख नहीं है तोह काम से दूध हे पी लो थोड़ा. और माँ ने बताया था तुम्हारी मालिश करनी है इसलिए मैं आयी थी.", ये दामिनी थी जो उसकी बगल में बैठी थी, सीने पर झुकी हुई. अर्जुन कुछ पल बस उसको देखता रहा जैसे वो अभी भी समझ न पाया हो फिर हड़बड़ा कर सीधा होने लगा तोह पहले दामिनी सही हुई.

"क्या टाइम हो गया बुआ?", अर्जुन को लगा था के वो शायद घंटे से ज्यादा हे सो गया है और इस कमरे में तोह घडी भी नहीं थी.

"तुम तोह ऐसे पूछ रहे हो जैसे बहोत देर से बिस्टेर पे हो? मैं मीणा के साथ गलियारे के उधर थी जब तुम अपने कमरे में आये और 5 मिनट बाद हे मैं आ गयी. वैसे पौने 9 हो चुके है और माँ तोह सो भी गयी. खाना लगवाओ पहले या फिर मालिश करू?", दामिनी ने मालिश शब्द कहते हुए होंठो को थिरकन दी थी, सचमुच वो अदाओं की धनि कामुक स्त्री थी. बदन पर पहना वो कला गाउन बेशक झीना नहीं था पर सीने पर दबाव बनती 2 उभरी हुई बिंदी साफ़ बताती थी की भीतर सबकुछ आजाद है. अर्जुन का यूँ उसके सीने को देखा जाना दामिनी को गदगद कर गया.

"आप मालिश की जेहमत क्यों लेती हो बुआ, मैं ठीक हु. और निकेतन सोया या नहीं?"

"अभी अनामिका उसको दूध पीला रही है और आँचल उसके कमरे में बैठी अपना पसंदीदा नाटक देख रही है. और मालिश की बहोत जरुरत है तुम्हे, नहीं तोह जोड़ दुखेंगे सुबह. देखा था मैंने कितनी म्हणत कर रहे थे वह और अनामिका को पहले हे बता आयी हु की आधे पौने घंटे बाद हे खाना गरम करे तुम्हारा. चलो अब छाती के बल सीधे लेट जाओ. मैं ना नहीं सुन्न न चाहती.", जितने हक़ और कशिश से दामिनी ने अर्जुन से ऐसा कहा था वो न चाहते हुए भी बिस्टेर पर गिरता हुआ पलट गया. मुँह दिवार की तरफ किये आँखे बंद लेकिन बाहें फैला कर लगभग पूरा बिस्टेर घेरे हुए. दामिनी उसकी तरफ मुड़ते हे बस उस जिस्म पर फिर से हार गयी. क्या कोई युवक इतना आकर्षक और ऐसी अप्रकट मर्दानगी से भरपूर भी हो सकता है जिसके सम्मोहन में आने पर बाकी दुनिया हे फीकी लगे?

'नहीं.', दामिनी मैं हे मैं अपने सवाल के जवाब पर बुदबुदायी और इस बार जो मुस्कराहट थी वो बस इसको पाने की थी, कोई षड़यंत्र या खेल नहीं. गरम करके लाया हुआ jadi-booti वाला तेल जैसे तैसे उसने अपनी हथेली पर गिराया और जब वो अर्जुन की इतनी बलिष्ट और सुघड़ पीठ की तरफ बढ़ी तोह हाथो की कम्पन्न वो खुद हे देख प् रही थी. उसकी हालत उस पतंगे सी थी जो तेज अग्नि की तरफ आकर्षित तोह हो जाता है उसको पाने के लिए, पर ये नहीं जानता की आगे उसका जिस्म और नसीब दोनों फना होने वाले है. तेल को फैलते हुए दामिनी मेरु (रीढ़) के दोनों तरफ के विशाल हिस्सों पर अपने हाथ फिसलती तोह ये चाहत और बल लेने लगती. बस क्षण मात्रा के लिए उसके जेहन में जो पहला शख्स आया था जिसका सुखद एहसास वो आजतक नहीं भूल पायी थी अपने कौमार्य भेदन और उस युवक की ताक़त एवं मर्दानगी का तोह वो शंकर हे था.

अध्भुत एहसास था वो जिसमे शंकर ने एक झटके में हे उसकी अछोटी योनि को चीयर कर वो जादुई दरवाजा सदा के लिए टॉड दिया. बरसीम की हरी धेरी पर जिस तरह उस दिन शंकर ने उसको भोगा था, वो दर्द भुला कर पागलो की तरह बस उसके जिस्म से लिपटी उन नए रंगो को देख रही थी जो पहले कभी जीवन में भरे न थे. पठार सा सख्त शंकर और मांसल नरम कुवांरी दामिनी. पहल संसर्ग जो शंकर की अधीरता और बिन चेहरा देखे हुआ था. पता नहीं वो कितना समय चला था लेकिन जब दोनों अलग हुए तब भी दामिनी बिछड़ना नहीं चाहती थी. भोला शंकर उसको शर्म या डर समझ रहा था लेकिन अलग होने पर ये भाव खुद उसके चेहरे पर थे. दामिनी ने हे अगर आगे बढ़ कर उसके होंठ चूमते हुए ऐसा न कहा होता की 'काश तुम ये पिछली गर्मियों में हे कर लेते तोह आज जितना दर्द न होता'.

"ओह बुआ 2 मिनट खारिश जैसी मालिश करते हुए भी आप थक गयी क्या?", अर्जुन की आवाज से वो एक झटके में हे अतीत की उस याद को वही छोड़ वर्तमान में लौटी. चेहरे पर लाली और दूसरा हाथ खुदके सीने पे था दामिनी का. अर्जुन की चौड़ी पीठ अभी भी आधी हे चिकनी हुई थी तेल में.

"कुछ नहीं अर्जुन, वो ये तेल कुछ देर के लिए ऐसे हे छोड़ना पड़ता है. अब तुम कहोगे की बुआ ने तोह मालिश से हे मार डाला. देखो मेरा कमाल.", दामिनी किसी सूरत में halki-fulki स्त्री नहीं थी. ाची खुराक और कद काठी के साथ साथ गाँव की हवा में पाली बढ़ी और khelne-koodne के साथ आजतक खूब जोरदार काम करती आयी थी, विनोद कहा सेहन कर पाया था उसका बोझ और जोश. ये अर्जुन था यहाँ जो विनोद तोह कटाई न था और शंकर ने कौमार्य लिया था तोह उसकी याद दामिनी के ज़ेहन में मरते दम तक रहने वाली थी, निस्संदेह आजतक वो उसकी तगत के आगे झुकती आ रही थी.

"हहहहहह.. अब लगा की बुआ की आप मेरे पास हो. ज्यादा जोर मत लगा देना फिर कही कल आप चची या दादी से मालिश करवाती दिखो. आपके हाथ नरम होने के साथ थोड़े मजबूत तोह हैं. सचमुच जैसे जिस्म से दर्द गायब होता जा रहा है.", अर्जुन आँखें मूंदे तारीफ करता रहा और दामिनी उसकी कमर से ले कर कंधो तक दोनों हाथ पूरे दबाव से आगे ले जाती और वैसे हे वापिस निचे. एक तरफ से हाथ थोड़ा दूर तक जाने में असमर्थ लगा तोह दामिनी ने सीधा न पूछते हुए अर्जुन को हे उकसाया.

"अर्जुन, अभी जोर लगाया हे कहा है मैंने और अगर तुम हिम्मत रखते हो की सेहन कर लोगे तोह फिर मैं खुल कर अपना मालिश का हुनर दिखती हु. बर्दाश्त कर सकते हो मेरा बोझ?", अब दामिनी की मंशा तोह अर्जुन से छिपी न थी लेकिन अगर वो उत्साहित थी तोह उसने भी टोका नहीं. बल्कि एक कदम आगे हे रहा वो दामिनी की सोच से.

"बुआ आपमें बोझ हे कितना है जो मुझे परेशानी होगी. बस थक्क मैट जाना कही फिर बिमाग हो जाओ. और हो सके तोह ये लाइट बुझा दो, आँखों में जलन होती है जब बाकी जिस्म में आराम मिलता हो. लैंप मेरे हाथ के पास है तोह मैं हे जला देता हु.", अर्जुन ने पढ़ने के लिए बिस्टेर किनारे रखा लैंप चालू कर दिया जो उसकी पहुंच में हे था, 60 वाट का बल्ब भी तेज था पर उसका घेराव सिमित और उसको भी दिवार की तरफ घुमा कर अर्जुन ने कमरे में मालिश की जगह थोड़ा उत्तेजक माहौल बना दिया. दिख सबकुछ साफ़ रहा था, पर अन्धकार के अधिक प्रभाव में. दामिनी की तोह जैसे मैं की मुराद हे पूरी हो गयी थी इस बंद कमरे में जहा वो अर्जुन के करीब थी और ये नाम मात्रा रौशनी.

"सोच लो फिर मैट कहना के बुआ ने बोझ से दबा कर कमर में चणक दाल दी?", अर्जुन को दूसरी तरफ मुँह किये आँखे मूंदे प् कर दामिनी ने आगे बढ़ने से पहले अपने गाउन का ऊपर बटन खोल लिया. वो तोह निश्चिंत कर चुकी थी की आज अर्जुन को चाहे अधूरा हे सही लेकिन भरी पूरी औरत की गर्मी का एहसास जरूर करवा के रहेगी.

"जैसे आपका दिल करे वैसा करो बुआ. कोई रोक टोक नहीं और रही बात बोझ की तोह मैं पहले हे कह चूका हु मेरे लिए तोह आप भी सबके जैसी हे हो. इतना वजन तोह मैं पूरा दिन जिस्म पे लिए रह सकता हु. बस आराम मिल जाए जैसा आप अभी दिला रही thi.",Arjun की स्वीकृति मिलते हे दामिनी ने दोनों तरफ सा अपना चोगा थोड़ा ऊपर उठा कर पाँव उसकी कमर के दोनों तरफ कर लिए बिस्टेर पर चढ़ते हे. इस ऊंचाई से वो ाचे से देख प् रही थी अँधेरे में चमकते उस बलिष्ट जिस्म को जो अब उसके निचे हे था और जल्द हे पूरी तरह बस में भी. सावधानी से दामिनी घुटने मोड़ने के बाद उन्हें बिस्टेर पर टिकती हुई ठीक अर्जुन के कूल्हों पर कूल्हे टिकाये थी. अर्जुन मैं हे मैं मुस्कुरा रहा था अपनी इस बुआ की ख़ुशी पर. उसको भी एहसास हो चूका था रबर से नरम और कही ज्यादा हे फैलाव लिए हुए बड़े नितम्बो का जो अब उसके जिस्म पर विराजमान थे. दामिनी ने दोनों हाथ फिर से उस ख़ास तेल में चुपड़ कर आगे झुकते हुए पूरी तरफ कामुक अंदाज में शरीर का प्रदर्शन करते हुए पहले वाला कार्य जारी किया. 30-32 की कमर वाला अर्जुन सीने की तरफ से 46 से काम न था. इस मुद्रा में तोह पीठ कही ज्यादा हे फैलाव लिए किसी बरगद के विरक्ष सामान फैली हुई.

"आह्हः.. सचमुच आप माहिर हो बुआ.. लगता नहीं की इतने कोमल हाथो में जादू के साथ ताक़त भी होगी. बहोत ाचा लगता है जब आप कंधे तक हाथ ले जाती हो. कस्सी चला चला कर यही सबसे ज्यादा दुःख रहे है.", अर्जुन जैसे उसको और ज्यादा मौका दे रहा था अपनी पीठ पर गिरने का. पतले पाजामे के ऊपर से हे वो ये भी समझ चूका था की दामिनी का गाउन के भीतर क्या हाल है. भाप सा गरम सका छोड़ती उसकी मुलायम उभरी हुई छूट पूरा दबाव बनती जब दामिनी आगे को झुकती हुई अपना जिस्म अर्जुन की पीठ की तरफ बढाती. भरी चुके भी लटकने की वजह से निप्पल के साथ थोड़ा नरम हिस्सा कंधो पर रगड़ देते. दामिनी कमजोर नहीं थी, किसी भी सूरत में आम महिला से ज्यादा ताक़तवर. लेकिन अर्जुन को उत्साहित करने के चक्कर में वो खुद हे गरम होने लगी. हर बार योनि का फैलना सिकुड़ना, हर बार चुचो पर अर्जुन की ठोस पीठ की रगड़ और उनमे बढ़ती सख्ती. किसी बहरी नशे में मसतायी दामिनी हर गुजरते पल के साथ ज्यादा जोश से ये पीठ मालिश का उपक्रम बढाती रही. कमर, पीठ, कंधे और कुछ हद तक अर्जुन की गर्दन और बाहों के जोड़ तक वो थकान को चूस चुकी थी. उसकी हालत से अनजान अर्जुन पिछले 10 मिनट से बस अपने हे खास सपने में खोया मुस्कुरा रहा था और उस मुस्कराहट को देखा दामिनी ने जब वो कंधे तक हाथ ले आयी. मद्दिम रौशनी में भी दमकता आधा चेहरा और वो धनुषाकार मुस्कान.

'फरेबी है पक्का ये लड़का. कैसे मजे लूट रहा है मेरे बदन के और ढिटाई से खुश हो रहा सोने का नाटक करता हुआ.', दामिनी बुदबुदाती हुई कब वही पसर गयी उसको हे होश न रहा. खरबूजे अपना अकार बदल कर अर्जुन की पीठ पर दबाव बना रहे थे. और उस पर लेती दामिनी मालिश भूल कर बस उसके चेहरे को देख कर और ज्यादा गरम. चेहरा अर्जुन के गाल तक झुक गया और उसकी गरम सांसें ाचे से अर्जुन की साँसों से मिलने लगी. अर्जुन की पलके खुलने लगी तोह दामिनी ने अनजाने में हे उसके कंधो को पूरी ताक़त से दबा दिया उठने की हड़बड़ाहट में.

"आह्ह्ह्ह.. ये कहा से सीखा बुआ? बिलकुल सही जगह से दबाया आपने तोह. अब बस कीजिये, नहीं तोह मैं सो हे जाऊंगा इस मजे में.", दामिनी जल्दी हे बहार से संभल कर वही हाथ पीठ पर दबती कमर तक ले आयी.

"अभी तोह सीने और पाँव की भी बाकी है प्यारे. लगता है तुम बोझ उठाने का बहाना बना के बच रहे हो.", वो नहीं जानती थी की उस से भरी गलती होने वाली है ऐसा करने पर. लेकिन अर्जुन जैसे उस खवाब की चाहत में दामिनी की ये बात भी मान गया.

"सीधा होने दो बुआ और जब थक जाओ तब जगा देना मुझे. मैं सो नहीं रहा बस आराम कर रहा हु.", अर्जुन के कहने पर दामिनी एक पाँव उठा कर उतरी तोह वो बिस्टेर पर सीधा पसर गया. लेकिन इस बार अर्जुन ने अपने चेहरे को करीब राखी टीशर्ट से धक् लिया जैसे वो व्यवधान न चाहता हो किसी भी तरह का अपने अंतरंग खयालो में. इस बार दामिनी जरूर झिझक रही थी उसके सीने की मालिश से. लेकिन समय निकल रहा था और जैसे अर्जुन अभी उतना वश में न हुआ होगा जितना वो उसको करना चाहती थी. दामिनी का ख़याल था की वो अर्जुन को अपने जिस्म के जाल में ऐसा फांस ले की वो खुद उसके पास आये और भुला दे उन रिश्तो को जो बंद कमरे से बहार सभी जानते है. दामिनी इस बार अर्जुन के लिंग से कुछ निचे, उसकी सख्त जांघो पर अपना वजन ध्यान से डालते हुए बैठी और हथेलियों को त्यार करने के बाद बड़ी एहतियात से अर्जुन के सख्त सीने को सहलाती हुई मालिश करने लगी. दामिनी इस हिस्से पर जोर की जगह स्पर्श और अनुभव का प्रदर्शन कर रही थी. अभी उसको ये आकर्षक सीना और पसलियां मलते हुए 5 हे मिनट गुजरे थे की आँचल ने उसके जोश को हवा करते हुए आवाज दी.

"अर्जुन, तुम सो गए? दरवाजा खोलो, मामी खाना तैयार कर रही है.", आँचल की आवाज पर अर्जुन के तोह जिस्म में कोई हरकत हे न हुई जबकि दामिनी तुरंत किसी विडाल की सी फुर्ती से बिस्टेर से निचे उतर कर कटोरी लिए दरवाजे की तरफ लपकी. आज अगर यही काम किसी बाहरवाले ने किया होता तोह शायद वो हद्द से गुजर जाती. दरवाजा खुलने पर सामने अपनी माँ को देख कर आँचल भी हैरान रह गयी.

"शोर क्यों मचा रही है तू? वो थका हरा अखाड़े से आया था और नींद में है. माँ ने कहा था के उसकी मालिश कर देना और आराम करने देना.", इतनी सफाई तोह आँचल ने मांगी भी न थी और वो अपनी माँ के जिस्म का कुछ खुला भाग देख कर बेधड़क कमरे में दाखिल हो गयी. अर्जुन तोह मुँह पर तकिया रखे अपने हे मीठे सपनो में खोया था जैसे उसको आज दुनिया से कुछ लेना देना हे न था.

"जब शरीर से इतनी म्हणत हुई हो तोह खली पेट नहीं सोना चाहिए. अर्जुन ने दोपहर से हे कुछ नहीं खाया है और मालिश तोह हो चुकी है जितना मुझे दिख रहा है. आप अपने हाथ साफ़ कर लीजिये, मैं इसको उठा देती हु.", आँचल के इतनी हिम्मत देख दामिनी आगे कुछ बोल न सकीय पर वो समझ गयी थी की उसकी बेटी को खटका तोह हो हे गया है जैसे वो उसके सीने को घूर रही थी.

"हाँ जा रही नहाने, गर्मी वैसे हे बहोत है इसके कमरे में. बोल देना की खाने के बाद वापिस सो जाए.", लाइट अब जल रही थी और आँचल ने चेहरे से टीशर्ट हटाने के बाद अर्जुन को हिलाया तोह वो कुनमुनाता हुआ ऐसे उठा जैसे सवेरा हो गया. सामने आँचल को खड़ा देख बस मुस्कुरा दिया.

"कितना बढ़िया सपना था दीदी और आपने बीच में हे उठा दिया. क्या टाइम हो गया? और कमरे में तोह बुआ थी न?", अर्जुन बदन को अंगड़ाई के अनुसार खोलता हुआ बैठ गया. टीशर्ट बराबर में राखी थी जो अपने ऊपरी निर्वस्त्र भाग देख उसने तुरंत पहनी. आँचल बस हंस रही थी उसके सवालो पर.

"ज्यादा हे थक गए थे आज तुम जो ऐसे हे सो गए. मामी ने कहा है की तुम्हे उठा दू, फिर खाने का टाइम नहीं रहने वाला. 10 बजने वाले है और चलो मुँह हाथ धो के चची वाले कमरे में हे आ जाओ. बड़ी ाची फिल्म आ रही है टीवी पर और उधर एक भी चल रहा है.", आँचल की बात सुन्न कर अर्जुन कमरे में बने स्नानघर हे चल दिया चेहरा धोने. मैं बहोत हल्का था जैसे वो अभी स्वर्ग घूम आया हो. आँचल उसको ले कर हे बहार निकली, लाइट पंखा बंद करने के बाद.

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"फ्लाइट के टाइम पहुंच जायेंगे संजीव और राधिका?", शंकर खाने से फारिग होने के बाद बस कुछ हे वक़्त अपने पिता के पास बैठा था और नरिंदर के घर पे प्रवेश करते हे वो उसको साथ लिए छत पर टहलने लगा. दिन व्यस्त रहा था दोनों हे भाइयों का और उमेद भी अपने व्यापार की वजह से पूर्णिमा जी को हवेली छोड़ कर जा चूका था. नरिंदर के इतने जल्दी लौटने पर सबसे पहला सवाल शंकर ने यही पुछा.

"मैं उन्हें तोह बस ऑरोरे के घर तक छोड़ने गया था. संजीव उसको कुछ काम सौंप के कार से हे निकला है बहु के साथ. अब उनके सफर में मैं क्यों रोड़ा बनु? तू सुना आज का दिन कैसा रहा?", नरिंदर की बात सही लगी थी शंकर को और वो दिवार की मुंडेर पर हाथ टिकाये गली के रोशन घरो की तरफ देख रहा था.

"फिलहाल तोह लग रहा है की सबकुछ ठीक है पर जब जब ऐसा लगता है किसी न किसी की माँ अपने आप छुड़वाने आ जाती है. प्रताप, वो अगले सेक्टर वाला अपना डॉक्टर दोस्त. शाम को बता रहा था के राजस्थान सरहद पे जिस जमीन पर वो हॉस्पिटल बनाने में लगा था, उस पर स्टे लग गया है. सरकारी आदेश नहीं है लेकिन रुकवाने वाला आदमी विभाग से हे है.", शंकर को इतना गंभीर देख नरिंदर समझ गया की इस किस्से में भी उसका भाई कही न कहि शामिल है.

"और इसकी वजह होगी तेरी उसके साथ गहरी दोस्ती और व्यापार में हिस्सेदारी?", शंकर ने ना में सर हिला दिया.

"शालू (शालिनी) के चाचा ससुर से बात की थी मैंने गज्जू से नंबर ले कर. उन्होंने बताया की हाईवे पास होने की वजह से कीमत आसमान जाने लगी है उधर और बड़े बड़े कारोबारी आने लगे है जमीन देखने. प्रताप वाली जमीन है नए नक़्शे में सबसे आगे है और कोने का 4 एकड़ भूखंड है. जो नए रूल के हिसाब से 70-30 रखना होगा. स्टे लगाने वाला लोकल भी है और विभाग में ऊँचा भी. प्रताप से 25 करोड़ की डिमांड की है या फिर ढांचा ऐसे हे खड़ा रहेगा और इजाजत नहीं मिलेगी. जानता है इन्दर सिर्फ ऐसे हे दल्ले लोगो की वजह से मुझे प्रशाशन और उसके नियमो पर गुस्सा आता है. प्रताप ने सबकुछ उधर लगा रखा है और लोन पे काम शुरू हुआ था मुझसे 5 लेने के बाद. दिक्कत नहीं थी अब तक कोई लेकिन अब वो आदमी सड़क पे आ जायेगा ऐसे परजीवियों की वजह से.", नरिंदर जानता था की शंकर दोस्तों का दोस्त है जो उनके लिए किसी हद्द तक गुजर सकता है. वही प्रताप भी एक सज्जन व्यक्ति था स्वाभिमान से भरा. शंकर से वो पैसे लेने नहीं वाला था हिस्सेदारी से ऊपर.

"पापा से यही बात कर रहा था तू निचे?"

"हम्म्म.. बताना तोह जरुरी है की वह ऐसा हो रहा है. मैं कही कुछ कर दू तोह बात उन पर पहले आएगी. लेकिन उन्होंने तोह मुझे दिल्ली पर करने से हे मन कर दिया उस तरफ जाना तोह दूर. बोल रहे थे की या तोह दोस्ती निभा लो या अपने बाप को उसकी जूती पर गिरा दो जिसके मुँह पर उन्होंने जूती मार के बेदखल किया था. अब तोह बात ऐसी हो जायेगी की अगर किसी से उस को समझने के लिए भी कहूंगा तोह बात मुझपे हे आणि है. प्रताप का सबकुछ डाव पे है यार इन्दर."

"माँ को प्रणाम करू मैं उस दल्ले की. तू चिंता न कर शंकर, इसका भी हल है अपने पास. तू इस आदमी की डिटेल ले डॉक्टर से और भल्ले को भिजवा. वो दिल्ली बैठ के हे ये काम कर देगा जितना मुझे उसका रसूख पता चला.", इन्दर की बात पर शंकर सहमत नहीं था जैसे.

"उसकी सेवा क्यों लेनी भाई जब अपने पास जुगाड़ है. और वो तोह खुद अपना एहसानमंद है."

"अब एहसान को उसके दिल में रहने दे शंकर और ये समझ की वो अब पार्टनर है हमारा. उसका लोंदा राजस्थान के बोर्डिंग में क्यों पढता है जानता है? और उसका अपहरण अपने प्रदेश में क्यों हुआ? उमेद ने क्यों भल्ला को इतनी तवज्जो दी और इतने बड़े बड़े काम करने पर भी मुँह नहीं खोला बल्कि उसको मुरीद बनाया. गजेंद्र भल्ला वह रसूख रखता है और अगर उस तरफ कोई है जो उसकी टक्कर का है तोह वो रमाकांत तहसीलदार. दोनों एक दूसरे को पसंद नहीं करते पर भल्ला की जूती कुछ मामलो में उस से ऊपर है और दोनों का सपोर्ट एक हे पार्टी को है. फ़िलहाल वही पार्टी इधर है और दिल्ली में तोह उसको कुछ फरक हे नहीं पड़ता जब उसका हे नाम एक जलवा हो. भल्ला तोह खुस हो जाएगा शंकर की तूने उसको कुछ काम दिया. वो रहता बेशक उमेद के या मेरे साथ है पर जुड़ा तेरे साथ है दिल से.", नरिंदर का इतना भरोसा देख शंकर कुछ शांत हुआ क्योंकि गजेंद्र भल्ला ने सचमुच शंकर को धरम भाई बनाया था, विधि से. और कहने मात्रा से वो 2-2 बार इधर आया था शादी से पहले भी और शादी में भी, परिवार समेत.

"और ये सच है की उसका उतना रसूख है उस रेगिस्तान में?"

"तबादला करवाने के बाद भी वो माफ़ी मंगवाए बिना तोह उस आदमी को जाने नहीं देगा. बाकी हिसाब उसका भी तेरे जैसा है लेकिन वो खुद नहीं मारता किसी को, उसके आदमी लाश पहचान ने लायक नहीं छोड़ते बस इशारा करने की देर है. रात को वैसे भी आजकल वो टाइम से घर आने लगा है. 10 बजने वाले है तोह अभी खाना खा रहा होगा. निचे चलेंगे न सोने तोह कर लियो फ़ोन. सुबह बोल दियो प्रताप को गुड मॉर्निंग. जो सच्चा इंसान है न शंकर, उसका कोई 4 आना नहीं छीन सकता. और जिसने पाप से लंका भी बसा ली हो तोह वो भी देह जाती है. प्रताप साफ़ इंसान है और तेरी नियत भी. और ये सब छोड़ मुन्ना लाल की खबर ली क्या पापा से?", नरिंदर ने बात अर्जुन के मुद्दे पर घुमा दी थी और शनकर जैसे बाकी सब भूल गया.

"माँ आज पूरा दिन खुश है और अभी सोने लगी थी तब भी बस उसका हे जाप करने में लगी थी. याद है इन्दर इस से पहले माँ कब इतना खुश दिखी थी?", शंकर के जवाब भी इतिहास समेटे रहते थे और नरिंदर जैसे जवाब जानता था क्यूंकि इतिहास बहोत बात याद करवाया था शंकर ने उसको.

"जब नैतिक को गॉड में उठाया था माँ ने, जब अर्जुन का नामकरण वाला दिन था और जब पापा रिटायर हुए. वो उन 3 दिन किसी को बोलने हे कहा दे रही थी. संजीव की शादी में तोह फिर भी वो यादों में उलझी थी ख़ुशी के साथ. संजीव जब पैदा होने वाला था तभी हमने थोड़े से टाइम में पूरा नक्शा बदल कर रख दिया. उसकी ख़ुशी मानती या इतना कुछ खोने का दुःख.? ाचा है के माँ आज सारा दिन खुश रही और इसमें पापा का भी पूरा हाथ है जिन्होंने बस बात ख़ुशी वाली हे उन्हें बताई.", नरिंदर ने सब गिनवा दिया था इस जवाब में सिवाए आखिर में बात अधूरी छोड़ते हुए.

"कुछ और भी हुआ क्या आज? और तू भी मुझे बताने वाला था भारत भाई के साथ मुलाकात के बारे में और अर्जुन की निगरानी कैसे कर रहा है?", शंकर इतना तोह समझता था के उसका भाई व्यस्त जीवन तभी रखता है जब वो सचमुच काम पर हो. आज वो संजीव को छोड़ने के बाद भी इतना समय बहार लगा कर आया था.

"भारत दिलचस्प आदमी है लेकिन मुझे इतनी दिलचस्पी की आदत नहीं है शंकर. लेकिन नेटवर्क तोह तगड़ा हे होगा जितना मैंने उसको समझा. मेरे सामने भी 8-9 मुखबिर आये और गए उसके पास. कोई चाय देने, कोई पुराण अख़बार तोह कुछ तस्वीरें. जड़ से जुड़ कर काम करने वाला इंसान है और तजुर्बा भी होगा जब सतीश अंकल से थोड़ा हे छोटा है. वैसे अर्जुन मिया ने उधर कारनामा कर दिखाया वो भी उम्मीद से परे.", शंकर ने हाँ में सर हिला कर जैसे पुष्टि की इस बात की.

"सुछ सिंह अंकल का फ़ोन आया था जिन्होंने पहले माँ से बात की और फिर पापा ने बंद कमरे में. लम्बी बातचीत हुई थी उनकी पर चेहरे से तोह वो भी खुश हे दिखे. बाकी बापू को तोह उम्र निकल गयी तब भी समझ नहीं पाए. हँसते हँसते हे कब बून्द लाल कर देते थे पता हे नई चलता था. हाहाहा.. वैसे तुझे क्या बताया तेरे बन्दे ने?"

"कैसा बाँदा बे शंकर? तू सही कह रहा था के वो जरुरत से ज्यादा चौकस इंसान है. जुगराज से बात कर रहा था एक घंटे से और वो भी पहले अर्जुन गुणगान करता रहा और आखिर में मुद्दे की बात बताई वो भी ऐसे जैसे किसी और को पता न चले. अर्जुन ने मजाक मजाक में कमलेश और उसके 4 साथी कुछ समय के लिए घर में बैठा दिए आज शाम को. कह रहा था के वह बैठे थे उनको हे नहीं पता लगा के लड़का क्या कर गया तोह सामने वालो पर तोह गुजरी थी. 2 के कंधे उतार दिए पसलिया सूजने के साथ और 2 के टखने, कमर की हंसली हिला दी. कमलेश तोह थोड़ी देर पहले तक भी सीना पकड़ के बैठा रो रहा था. खून बहोत निकला उसका मुँह से. और ये हुआ वह हलके फुल्के मुकाबले में.", नरिंदर ने बात आगे बढ़ने से पहले शंकर का रुख देखना चाहा के वो इस बात को कैसे ले रहा है.

"और बस इतने हे थे? लेकिन उसने ऐसे क्यों मारा जब खेल मजाक वाला था? दिमाग तोह नहीं हिल गया इस लड़के का अपने बड़े भाई और चाचा की उम्र के बन्दे कूट दिए सबके सामने?", शंकर गुस्सा नहीं था बस चिंतित था. बात उनके पिता तक जा हे चुकी थी तोह वो क्या कहता.

"जुगराज ने बताया के केवल सिंह ने उसको पहले हे बता दिया था के कमलेश कुछ बड़ा करने वाला है इसलिए उसने हे अपने इस भाई को बुलवाया था मैदान में. और अर्जुन दोपहर से हे इस सरपंच के साथ था. अखाड़े में कमलेश ने हुम्ला करवाया दिलबाग से, वही अपने घर से पहले जो रहता है. फोर्ड वाला दिलबाग, क्या नाम था उसके पिता का?", शंकर को सवालो में उलझा कर वो गुस्सा रोक रहा था उसका क्योंकि हुम्ला और योजना सुनते हे शंकर के ढीले नोट खुल हे जाते थे.

"गुरजंट सिंह, चाचा अमली. लेकिन वो हिम्मत नहीं कर सकता अपने लड़के पे हाथ डालने की. पापा को वो पसंद था कभी और वो आते जाते उसके खेत पे मिलते भी थे. ये कमलेश कहा है? कुछ खबर दी जुगराज ने?"

"रहने दे इस बात में न हे पड़ शंकर. दिलबाग का सच अर्जुन जान गया था इसलिए उसने उसको सिर्फ जमीन पर गिराया. वैसे जुग्गी ये भी कह रहा था के अर्जुन के आसपास और लोग न होते तोह वो शायद मार हे देता एक आधे को. पर लड़के ने समझदारी से काम लिया और दिलबाग को सजा सुनाई खेत पे नजरबन्द रहने की और सरपंच ने कल कमलेश को पंचायत में गाँव निकला देने के साथ साथ 307 का परचा भी डलवा दिया है जैसा घर जाने के बाद सरपंच ने जुगराज को बताया. लाला जी भी फैंसले में थे और इस घटना के वक़्त भी अर्जुन के पास रहे. शहीद ध्यान रख रहा है दिलबाग का जैसा अर्जुन चाहता है लेकिन वो किस जुगत में है ये नहीं समझ आयी. कमलेश को तोह पहले भी एक बार केवल ने झाड़ा था और पापा से भी शिकायत की थी. पापा ने तोह पहली गलती बोल कर छोड़ दिया पर अब सीधा 307 का परचा?"

"वो तोह चल जान से मारे के प्रयास में करवा दिया होगा पर अर्जुन ने दिलबाग को सजा सुनाई? ये बात हुई और तू कह रहा है वह जुग्गी, लाला जी और सुच्चा सिंह जी तक थे. केवल भी बिना पंचायत रखे पक्ष नहीं रखता और उस से पहले दार जी और के साथ ये लाला जी और अपने मौलवी जी विचार करते है. कृष्ण चाचा दखल नहीं रखते पर पापा यहाँ से सन्देश दे देते है उन्हें अगर ऐसी कोई बात हो. पर 8 बजे से अभी तक तोह मैं हे उनके साथ था. सुच्चा सिंह जी का भी फ़ोन 9 के बाद हे आया. हम बहार बहार से नजर भी नहीं रख प् रहे हो और उधर अंदर अलग खिचड़ी पाक रही है. पापा बस जानकारी ले रहे है. अर्जुन सजा नहीं दे सकता इन्दर किसी को भी", शंकर की तोह घडी यही अटक गयी थी. उसको मतलब हे नहीं था के हादसा हुआ, अर्जुन ने इतना को ढीला कर दिया लेकिन मतलब था तोह बस इस बात से की वो दिलबाग को इतने प्रतिनिधियों के बीच सजा देने वाला कौन हो गया. उसके पिता भी अपना पक्ष देते तोह ऐसे मामलो में सुबह होने वाली पंचायत पर छोटे भाई या gram-pratinidiyon में से किसी को से कहलवाते.

"उसने ऐसे हे चुनौती नहीं उठाई बे शंकर. वो दादा की जूती पहन के चौपाल पे गया था. पहले दिन सुबह उसने एक फैंसला लिया और शाम को एक सजा सुना दी, वो भी ऐसे जैसे दिलबाग के जरिये वो कुछ और ढून्ढ रहा हो. मौके पर सजा देने का हक़ सिर्फ दादा जी को था शंकर गाँव के आपसी मसले में. अब अर्जुन वो हक़ ले चूका है जिसका मतलब है की जुगराज भी हमको सिर्फ जानकारी दे सकता है की क्या हुआ पर अर्जुन पर नजर रखने की जरुरत वो नहीं करेगा. वादा खिलाफी होगी ये और ऐसा सिर्फ 2 लोगो की सहमति से हो सकता है, पापा और रानी माँ. लेकिन एक तरफ पापा उसके चुनौती वाले मामले पर उखड़े हुए है और दूसरी तरफ उन्होंने इतना बड़ा फैंसला उसके पक्ष में जाने दिया. हो सकता है की इसमें रानी माँ का प्रभाव हो लेकिन वो 18 का हे है शंकर और इतनी बड़ी जिम्मेवारी?", नरिंदर के अंतर्मनन को शंकर हे समझ सकता था और ऐसे समय पर वो अक्सर थोड़ा बड़ा भाई जिसे व्यवहार भी करता था.

"जितना मैं जानता हु इन्दर, gram-sampatti सिर्फ यही 2 लोग नहीं पारित कर सकते. हाँ अधिकार पापा के पास भी है और मोहर महल से हे लगी होगी. इसमें छोटे दादा, रघुवीर चाचा और रेखा की सहमति रेहनी जरुरी है. रेखा को माँ की जगह शामिल किया गया था और रघुवीर चाचा को गुजरे होने वाले है 5 बरस से ज्यादा. और उसमे भी उनके ाहिरी कुछ बरस एकाकीपन वाले रहे है. फैंसला तोह मतलब बहोत पहले हे कर लिया गया था. और एक बात समझ नहीं आ रही की ये हुआ सो हुआ लेकिन रेखा को हक़दार कैसे बानी.? मैं तोह उस दौरान इधर रहता हे नहीं था और मुझे तोह इसके बारे में यही थोड़ी जानकारी जब अर्जुन के नाम खेती वाली जमीन ट्रांसफर करवाई गयी थी तभी पता चला.", शंकर नया सवाल खोज लाया था इतने बड़े मुद्दे को दरकिनार करता.

"तेरी वजह से घनचक्कर. तू और रख ले ताई की हवेली पर शर्ते माँ के सामने. माँ ने तोह तभी ठान लिया था के वो हमारी जगह बहुओं को बाकी के हक़ देंगी लेकिन रेखा भाभी को उन्होंने छोटे चाचा के यहाँ हे अपना दायित्व सौंप दिया था. पंजीकरण भी खुद पापा ने करवाया था मेरे साथ जा कर. मतलब रेखा भाभी को भी मालूम है की अर्जुन उत्तरादिकारी बनाया गया है? उनके बिना भी तोह संभव नहीं जैसा तू कह रहा है."

"बहार हे रह इस सब से इन्दर नहीं तोह थानेदार के चक्कर में पड़ गए तोह जाने इस बार कौनसी सजा मिलेगी. माँ ने तोह तगड़ी चोट मारी है उस समझौते में मेरी शर्त के बदले. और रेखा तोह मेरी समझ से हे परे है फिर माँ को जाने कैसे समझ आ जाती है. घर का हे तोह ख़याल रखती है वो भी भाभी और कृष्णा के साथ मिल कर. बेटियां साथ देती है सो अलग."

"तू रहेगा लिंग का लिंग. गोटे वाली जगा दिमाग फिट न है तेरा. घर को घर बनाये रखना हे तोह सबसे बड़ी चुनौती है. जानता भी है की बचे कब पढ़ गए और इतने बड़े बड़े विषय में आजतक उन्हें टूशन तक की जरुरत न पड़ी. संजीव तोह सबसे बड़ा उदहारण है इसका तेरे सामने. फिर ये क्यों भूल जाता है की भाभी की सहनशक्ति माँ से भी कही ज्यादा है? ऋतू के समय भी गोली चली थी, अर्जुन गॉड में था तब भी वैसा हे हुआ पर हिम्मत दिखा कर न सिर्फ बेटे को बल्कि हमारी माँ को बचाया था भाभी ने. औरत हो कर भी हमलावर का सामना करने वाली उस नारी की क्षमता तुझे नहीं दिख रही जबकि एक बार गोली तेरे सामने हे उन पर चली और हाथ भी ऐसा कटा की ाचा खासा मर्द बेहोश हो जाए या फिर ज्यादा बुरा भी हो सकता था. भाई तुझमे बस एक यही छोटी सी कमी है की तू बहार की दुनिया बहोत बेहतर जानता है लेकिन एक अंदरूनी जीवन की मेहता तुझे आजतक पता नहीं चली. कोई और होती तोह रिश्ते से इंकार कर देती और ब्याह भी हो जाता तोह एक दिन बात हे अपने घर बैठ जाती.", नरिंदर जैसे बहाव के साथ कुछ ज्यादा हे शंकर को झंझोड़ गया.

"प्यार के सामने किसी से तुलना कैसे की जा सकती है यार? मुझे तोह इस सबकी चाहत हे नहीं थी कभी और तेरे सामने है की प्यार की वजह से मैं तराजू के 2 अलग अलग पलड़ो में अकेला हे संतुलन बनाये जी रहा हु. रेखा ाची है और एक बढ़िया माँ भी लेकिन न तोह हमारी माँ को कभी इश्क़ हु, न बाप को और न हे रेखा को तोह ये लोग कहा समझेंगे प्यार की एहमियत? रिश्तो की शायद ज्यादा समझ रखते होंगे और समाज की पर 2 दिलो के बीच वाले उस प्यार का क्या जिसके सामने पूरी दुनिया भी हार जाने का दुःख नहीं और वो हांसिल न हो तोह पूरी दुनिया भी भरपाई न कर सकती."

"सही कहता है भाई तू. वो 3-3 बचे तोह हवा में उड़द कर आ गए थे जैसे पुराने समय की कहानियां बताती है. बचा माँगा और जा बेटी तुझ पर कृपा हुई. चल बे तू निचे हे चल पता नहीं आज ये इश्क़ की हरियाली कहा देख के आया है जो माँ बापू को तू इश्क़ का दुश्मन बता रहा. वैसे विष्णु की भी जांच में लगा दिया मैंने भारत भाई को.", और इन्दर ने तुरंत हे शंकर का दिमाग नयी जगह घुमा दिया. ऐसे हे वो उलझाए रखता था शंकर को अपने तिकड़म में जिस से वो जल्द हे उसमे शामिल हो जाता था. दोनों सीढ़ियां उतर कर निचे सोने चल दिए क्योंकि 11 बज चुके थे. रेखा के कमरे को छोड़ बाकि हर कमरे में जीरो बल्ब हे जल रहे थे या वो भी नहीं.

"नोट्स के लिए बोल देना अपने पापा को बीटा. तुम्हारी रूचि बुआ बता रही थी की इस यूनिवर्सिटी के कुछ पुराने पेपर और किताबे उनके यहाँ पड़ी है. ऐसे तोह ये पूरी 8 किताबे ख़तम करने में 2 महीने लगेंगे और नोट्स भी बराबर नहीं तैयार होने वाले.", रेखा तक लगाए अपनी बेटी को देख रही जो बराबर बैठी हुई पिछले 4 घंटे से बस पढ़ने में हे जुटी थी. अलका ने हे उसको यहाँ खाना ला के दिए था और अब सोने जाने से पहले कॉफ़ी भी.

"एक सैंपल पेपर तोह है हे न माँ. उस से हे मैच करते टॉपिक्स पढ़ रही हु और मेडिकल चाहे यहाँ को हो यही कही और का, सिस्टम और सब्जेक्ट्स तोह वही रहते है न माँ?"

"फिर तू यही से क्यों नहीं पढाई पूरी कर लेती अगर सबकुछ शामे है? फरक कही ज्यादा है और वह का एदुकतिओन मॉडल भी. चल अब ये किताबे एक तरफ रख और आराम कर ले. वैसे तोह 30 मिनट के बाद 10 मिनट का ब्रेक ले लेना चाहिए लेकिन तुझे पहले से आदत है इसलिए मैंने नहीं टोका. लेकिन सवा 11 हो चुके है और 4 बजे का अलार्म सेट है.", सोने की बात सुन्न कर ऋतू ने तुरंत हे सब सामान समेत कर सामने टेबल पर रख दिया. उसकी फुर्ती देख रेखा भी कुछ शंकित थी के ये एकदम से इसको क्या हुआ लेकिन जैसे हे ऋतू ने जीरो का बल्ब जलने के बाद बिस्टेर पर पाँव की तरफ राखी चादर ऊपर लेने का उपक्रम किया तोह रेखा जी समझ गयी अपनी इस गुड़िया की जल्दबाजी.

"तुझे अपने पास सुलाना मुझे तोह भरी नहीं पड़ने वाला न बीटा?"

"हल्का पड़ेगा माँ, लिखवा लो. और मुझे भी इस से ाची नींद कही नहीं आती.", उनके हाथ से दुरी रखते हुए ऋतू सिमट कर अंदर हे दुबक गयी. बहार बस हलकी सी आवाज आयी तोह वो चैन खुलने की थी.

"शर्म कर बीटा तू 20 की होने वाली है 2 महीने बाद. अगर ये किसी ने देख लिया न तोह मेरी प्रॉब्लम तोह उन्हें समझ आ जायेगी लेकिन तेरे पास जवाब नहीं होने वाला.", रेखा जी उसको समझा रही थी और ऋतू ने तोह अंदर हे उनके ऊपरी वक्ष को अनावृत कर लिया था जरुरत अनुसार.

"बोल देना पैदा होने पर तोह पिया नहीं था, अब कसार पूरी हो रही है. कोमल दीदी और ारु देखो कितने हट्टे काटते है लेकिन मैं तोह दुबली हु उनके सामने. अब सोने दो न माँ?", मतलब सोने से साफ़ था पीने दो न माँ. और रेखा जी जवाब देती उस से पहले हे वो चादर के भीतर हे अपने होंठ जोड़ चुकी थी. ऐसा कुछ समय के अंतराल बाद हो रहा था तोह जो मौली रुकावट उभरी थी dugdh-chhidra पर उसको ऋतू ने जोर से दबा कर खींचते हुए हटाया तोह रेखा जी की हलकी सी चीख निकल गयी.

"ओह.. बीटा तू सचमुच वैसी की वैसी है. तब दूध काम बनता था तोह खून निकाल देती थी और अब भी हाथ वैसा हे है तेरा.. ारु से बात हुई तेरी?", रेखा जी ने प्यार से उसका सर सहलाते हुए पुछा जबकि जवाब में ऋतू ने भीतर हे सर हिलने के साथ उनकी कमर में हाथ दाल लिया.

"वो ठीक है न? मेरी तोह बस सुबह हे एक मिनट के लिए बात हुई थी. लेकिन वो तुझसे जरूर पूछता होगा मेरे और कोमल के बारे में.", ऋतू ने बस आखिरी बार ये जवाब दिया वो भी पुराने अंदाज में हे. और रेखा जी के आखिर सवाल से पहले हे ढेर हो चुकी थी.

'गलती हो गयी इसको बुला कर. मुश्किल से बंद किया था और अब फिर हालत पहले जैसी. पूरा ख़तम करना मेरी गुड़िया.. आराम से..', सर को थपकती हुई वो अपने आप से हे बात कर रही थी. विचारो में अपने बचे हे थे और न्यास हे ध्यान जब अर्जुन और ऋतू पर केंद्रित हुआ तोह सर को झटक कर आँखें बंद हे कर ली. कहा तोह वो सोच रही थी की कुछ समय पहले उस रात दोनों भाई बहिन अपनी माँ की अगल बगल यही सुख ले रहे थे जिसमे ऋतू ने अर्जुन के सोते हे उसकी तरफ भी कब्ज़ा जमा कर उसको परे धकेल दिया था. और फिर ध्यान आया उनके बीच प्यार का वो अनकहा पहलु जिसके लिए उनकी सास तक झलकी दे गयी थी. बचे इतने प्यारे थे और माँ के करीब भी लेकिन इनकी किस्मत में ये कैसा रिश्ता लिखा है जिसका नाम जुबान पर आना हे गुनाह है? रेखा को बस याद रहा तोह अपने बेटे का वो चेहरे जिसमे खुद वो थी. और ये सच तोह उस रिश्ते से भी भरी था जिस पर वो चिंतित थी. सोच को पूर्णविराम देते हुए रेखा ने अपनी बेटी को आगोसेह में लेने का हे फैंसला किया. समय आने पर घर के बड़े हे फैंसला लेंगे, वो बस एक बात ध्यान रखेगी की परिवार टूटने न पाए..

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विनोद के कमरे में इस वक़्त जीरो की नीली रौशनी के साथ टेलीविज़न का अतिरिक्त प्रकाश व्याप्त था. अर्जुन को ज्यादा भूख न होने के बावजूद अपनी चची द्वारा ख़ास उसके लिए बनाया भोजन इतना पसंद आया था की वो आँचल और उनके साथ बातचीत करते हुए पूरा खाना ख़तम करके हे हटा. समय थोड़ा ज्यादा लगा था बातचीत और फिल्म की चर्चा के बीच. निकेतन भी एक की ठंडी हवा में इस वक़्त चैन से सो रहा था बिस्टेर के ठीक बीच.

"आँचल, रात ज्यादा हो चुकी है बेटी. अपने कमरे में चलो, फिल्म तोह एक ख़तम होगी तोह दूसरी शुरू.", दामिनी पिछले डेढ़ घंटे से अपने कमरे में अकेली थी जो अब उठ कर इधर आयी तोह अर्जुन भी अपने रात के सोने वाले कपडे पहन कर कमरे में आ चूका था. आँचल और अर्जुन 3 गद्दी वाले सोफे पर बैठे थे और आँचल अपने जीवन का हे कोई किस्सा फिल्म में चल रहे मजाक से जोड़ कर सुना रही थी. इनके हंसने पर तत्काल रोक लगी दामिनी के आने पर.

"बस उठ रही हु माँ, तुम चलो कमरे में. वैसे भी दिन भर सोना हे होता है. लेकिन आज आप क्यों नहीं सोई अभी तक?", आँचल के ऐसे सवाल पर पहले से हे उखड़ी हुई दामिनी अपना आप हे खो बैठी.

"तुम्हारी ये महफिले और टेलीविज़न के शोर के बीच बहरा भी नहीं सो सकता. माँ का कमरा दूर है और वह कूलर है इसलिए उन्हें आवाज नहीं आती. मैं बगल वाला कमरा छोड़ कर हे रहती हु, ज्यादा दूर नहीं. उठो अभी और चलो सोने. अर्जुन तुम्हे भी तोह जल्दी उठना होगा? अनामिका, तुम तोह बड़ी हो...", दामिनी का लहजा देख आँचल कुछ बोलने हे लगी थी की अर्जुन ने उसका हाथ दबा दिया.

"सॉरी बुआ हमारी वजह से आपको परेशानी हुई. दीदी, बुआ की बात सही है. हम तोह यही है, कल दिन में बैठ जाएंगे. आप जाओ और बुआ को भी अकेले नींद नहीं आ रही होगी.", अनामिका भी क्षमा मांगने के बाद टेलीविज़न बंद करके भीतर वाले स्नानघर में चली गयी. अब दामिनी को अपनी हे हरकत बुरी लग रही थी जब 2-2 लोग माफ़ी मांग रहे थे उस धीमी आवाज के लिए जो कमरे में भी सही से नहीं सुनी जा रही थी और उसकी खुदकी बेटी नाराजगी से पाँव पटक कर उसके सामने से हे निकलती हुई उस कमरे में चली गयी जहा उसने सोना था. अर्जुन वापिस उस गद्दी वाले सोफे पर बैठा तोह दामिनी ने थोड़ी तमीज से पुछा इस बार.

"तुम अभी यही बैठने वाले हो? मालिश के समय तोह तुम्हे नींद आ रही थी."

"हाँ बुआ नींद तोह अभी भी आ रही है लेकिन खाना देरी से खाया है न तोह बिस्टेर पे जाने का मूड नहीं. आप सो जाइए, 11 बज चुके है. सुबह कोई नहीं भी उठाएगा तोह 5-6 बजे तक आँख शोर से खुल हे जाती है.", अर्जुन ने सोफे पर हे चौकड़ी लगा ली थी. दामिनी आगे कुछ न कहती हुई निराश हो कर बहार से शुभकामनाये देती चली गयी. अर्जुन ने उठ कर दरवाजा लगाया और सोफे पे फिर से पसर गया. वो अपने सपने के बारे में हे सोच रहा था जो बिलकुल वास्तविक सा था और दिल को अध्भुत सुख देता. अनामिका जब स्नानघर से कपडे बदल कर गाउन पहने बहार आयी तोह अर्जुन को छत्त की तरफ नजरे जमाये मुस्कुराते देख पहले हैरान हुई फिर उसके सर पे हलकी चपत लगा कर बोलने लगी.

"मुंगेरीलाल जी, खुली आँखों से हे सपने देख रहे हो वो भी सी छोटे से सोफे पर लेट कर.? उधर पूरा बिस्टेर सामने खली पड़ा है और तुम इधर सिकुड़ कर लेते हो. चलो उठो.", अर्जुन शर्माता हुआ उठा जैसे उसकी चोरी साफ़ पकड़ी गयी हो और फिर चची का गुलाबी गीला चेहरा और वैसा हे गाउन देख तारीफ से मुस्कुराया.

"मैं सोच रहा था के या तोह इधर हे मांजी दाल लू आँगन से ला कर नहीं तोह अपने कमरे में चला जाऊ.", अर्जुन की बात सुन्न कर चूड़ियां उतार कर मेज पर रखती अनामिका चची ने पलट कर हैरानी जताते हुए पुछा.

"और तुम ऐसी बेतुकी सोच लाये कब अपने दिमाग में? अभी तोह खुद हे 3 टैक्ये वह रखवाए है और फिर ये manji-apna कमरा कहा से आ गया? बड़ी दीदी की वजह से ऐसा बोल रहे हो तोह रहने दो? मैं सम्मान करती हु इसलिए जवाब नहीं देती पर तुम्हे यहाँ सोने का हक़ खुद तुम्हारे चाचा और मेरे पति ने दिया है वो भी माँ जी और पिता जी के सामने. चलो जाओ उस तरफ अपनी जगह पर.", चची ने बिस्टेर के दोनों तरफ वाले लैंप चालू कर दिए थे जिस से आधे कमरे में भरपूर रौशनी हो चुकी थी.

"मेरी जगह उस तरफ? वाह क्या सरहद बनाई है आपने निकेतन को लिटा कर. वैसे मैं जाने का इसलिए कह रहा था की उनका दिमाग तोह आप भी देख चुकी हो और ाचे से जानती हो की कही..", अर्जुन बिस्टेर के दूसरी तरफ जा कर तक लगते हुए गॉड में एक तकिया लेता बैठ गया.

"मुझे फरक नहीं पड़ता और ये कमरा मेरा है जहा सोने का हक़ तुम्हारा है इनकी gair-hajiri. उधर न तोह वो कूलर चलता है और न एक लगा है. नैतिक भी नींद में किधर भी सरक जाता है और मुझे भी चैन से 2 घडी सोना चाहिए के नहीं?", बिस्टेर पर बैठने के बाद चची अपनी कलाई पर कोई क्रीम लगा रही थी और फिर पंजो के ऊपरी भाग पर भी. अर्जुन देख रहा था की अब चची खुद पर थोड़ा ध्यान देने लगी है. पहली बार मिलने पर तोह उसने पाया था की कलाई पर हलके रोये जैसे बाल साफ़ दीखते थे उनके जिनका गंतत्व भी अधिक था. न nail-polish दिखती थी और न नाखून व्यवस्थित. अब तोह बाहें एकसार और रोये का अंश तक न था. पाँव के पंजे भी उनके रंग जैसे गोर और उनके नख साफ़ तराशे हुए. पायजेब जो अर्जुन ने हे दिलवाई थी.

"क्या टुकुर टुकुर देख रहे हो? मैं नहीं करती थी ये सब सिवाए चेहरा उबटन से साफ़ करने के. तुमने आदत बिगड़ी और उसके बाद तुम्हारी बहनो और Saroj-Priya ने. कल शहर जा रहे हो न तोह जो बताउंगी वो लेते आना, पैसे हैं मेरे पास.", अनामिका चची की बातें सुन्न कर अर्जुन करवट लेता हुआ उनके चेहरे का जूठा नखरा देख बस मुस्कुरा रहा था.

"हे नारी तेरी लीला अपरम्पार है. न नर समझ सके न नारायण."

"अब ये क्या तना दे रहे हो? नहीं ला के देना तोह ठीक है, मन कर दो लेकिन पहले ये सब क्यों दिलवाया था?", मेज पर कमरे में स्नानघर से आते हुए साथ लाया वो मेकअप का डब्बा अर्जुन को उठा कर दिखती हुई वो अब थोड़ी सचमुच नाराज लगी.

"पैसे का क्या बोल रही हो चची, मेरा बटुआ भी आपके पास है और बैग में भी बहोत पड़े है. और जरुरत हुई तोह चेक भी लाया हु साथ या फिर दादा जी को फ़ोन करूँगा तोह मिल जाएंगे. ाचा होगा न आप साथ हे चलो शहर. मोटरसाइकिल पे घुमा के लाऊंगा और महल भी देख लेना मार्किट के साथ. इस golu-molu के भी गर्मियों के कपडे ले लेंगे.", अर्जुन के न्योते पर साफ़ इंकार कर दिया चची ने.

"नहीं जा सकती मैं. तुम याद से बस वो सामान ले आना जो इस बक्से में खली हो गया है या होने वाला है. इसके कपडे पहले हे तुम्हारे साथ साथ बड़ी माँ और बाकी सभी ने बहोत दिए है. रहता तोह ये बनियान निक्कर में हे है सारा दिन."

"हाँ मेरे साथ क्यों जाने लगी आप? चाचा का हे तोह एक हक़ है और हवेली की बहु की तौहीन नहीं होगी अदनी सी मोटरसाइकिल पर बैठने से? हमारी तरफ कोई पहचानता नहीं था और बचे की जरुरत का सामान लेना था तोह साथ जाना पड़ा मज़बूरी में.", अर्जुन भी चुहल करता हुआ औंधा लेता तकिये का सत्यानाश करने में लगा था. लेकिन तुलना वाली बात और फिर हवेली की बहु वाला तना अनामिका से सेहन न हुआ. रूई और महकते तरल की शीशी मेज पर रखते हे वो बिफर उठी.

"एक बार और बोलना जरा ये मज़बूरी, हवेली और अपने शहर वाली बात? मैं तुम्हारे साथ वह भी स्वाभाविक मैं थी और इधर भी वही हु. जानता तोह वैसे भी इस हवेली की बहु को कौन होगा जब न मिलने कोई आया न मैं बहार निकली. तुम्हारे चाचा के सामने haan-hu से जयदा कुछ सुना मुझे कहते? ये छोटा है जो गर्मी में सफर नहीं कर सकता और तुम्हे जहा काम है वह सिर्फ तुम हे जाओ तोह बेहतर होगा. साथ चलूंगी जब माधुरी के ससुराल जाना हो या फिर किसी काम से लेकिन धुप के समय नहीं. और अब कुछ नहीं मंगवाना मुझे तुमसे.", शीशी के साथ डिब्बा पैक करके बिस्टेर के निचे खिसका कर चची अर्जुन और अपने बेटे से मुँह फेर कर लेट गयी. लैंप का स्विच साँझा था जिसको बंद करते हे कमरे में फिर से वही हलकी नीली रौशनी रह गयी. अर्जुन तोह असमंजस में सोचता हे रह गया के ऐसी तोह कोई बात भी उसने नहीं कही थी और चची अपने बेटे तक से मुँह फेर कर सो गयी. कुछ पल इन्तजार करने के बाद वो दबे पाँव उठने लगा तोह जैसे इसकी आहात भी अनामिका को पता चल गयी. ऊपर वाला हाथ वो अपने चेहरे पर लती उस से पहले हे अर्जुन ने हाथ थाम लिया.

"दिल बेहला रही थी आप इतनी देर से? रोने के लिए सुबह हे मन किया था न चची और अब किस बात से व्यथित हो? समझ गया. हवेली में हे रहना पड़ता है और कोई है भी नहीं आपके पास?", अर्जुन की बात पर चची ने सर झुकाते हुए ना में सर हिला दिया. वो उसके सामने रोना नहीं चाहती थी पर जैसे अर्जुन ने उनकी संवेदनशीलता जीवित कर दी थी अपने प्यार और देखभाल से.

"सामान भी ला दूंगा चची और जो कहोगी वो भी. बस ये आंसू मत बहाया करो छोटी छोटी बात पर."

"तुम्हे कोई कुछ भी कह देगा और मेरी मज़बूरी देखो की मैं जवाब भी नहीं दे सकती.", अर्जुन इस बात पर हलके से मुस्कुराता हुआ उनके चेहरे के करीब आया तोह वो पीछे हटने लगी लेकिन माथे को चूम कर वो खुद हे पीच हो गया.

"इतना ध्यान मैट दिया करो ऐसी छोटी मोती बातों पर. वो तोह खुद परेशां थी इसलिए गुस्से में मुँह से निकल गया उनके. चलो अब उधर मुँह करो और मैं अपनी जगह आया.", अर्जन उन्हें ब्याह से धकेलता हुआ पलटने का बोल कर वापिस अपनी जगह आ गया. बस वो अब गहरी नींद सोये निकेतन के बिलकुल करीब था जैसे उसको अपनी छाया में सुरक्षित रख रहा हो. चेहरा साफ़ करके अनामिका भी अपने बेटे को सहलाती हुई पहले तोह खामोश रही फिर धीमी आवाज में बोली.

"मालिश पूरी नहीं हुई न तोह आग बेकाबू हो गयी होगी.", अर्जुन तोह सन्न हे रह गया ये सुन्न कर लेकिन इस हलकी रौशनी में वो साफ़ देख प् रहा था के चची को उसका ये सब करना जरा भी पसंद न आया.

"आपको कैसे पता, कमरा तोह बंद था और आप तोह इधर थी जब मैं मेरे कमरे में गया था?"

"खिड़की तोह बंद नहीं थी न? हवा के लिए खुली छोड़ी होगी पर हवा के साथ उतनी जगह से आँखें भी अंदर जा सकती है. बेशर्मी से पड़े थे न उसके निचे?"

"ओह तोह इसलिए आँचल दीदी को भेजा था आपने खुद आने की जगह? और बड़ी दीदी से सीधा 'उसके', क्या बात है मरस अनामिका शर्मा, ये संस्कार तोह हवेली के नहीं है. गलत संगती में तोह नहीं रहने लगी आप आजकल.", अर्जुन के मखौल से इस बार तोह चची ने उसके कंधे पर नाखून हे गदा दिए.

"बेशर्मी खुद करो और गलत मुझे ठहराओ. बगीचे में खुद घूमो और खुराक लेके भी वो जाए पर बाकी सेवा मैं करू. नहीं बात करनी मुझे तुमसे कोई."

"बटुआ और घडी आपके पास है और उनके साथ मैं भी यहाँ. पागल वो हो रही है जबकि मैं यहाँ आपको मानाने में लगा हु.", अर्जुन ने बड़ी सावधानी से निकेतन को साथ चिपकाये हुए दूसरी तरफ किया तोह अनामिका khud-ba-khud उसकी इस तरफ वाली ब्याह पर सर टिकती हुई लेट गयी.

"अब रात भर हिलना भी नहीं, यही सजा है तुम्हारी. दोहरे चरित्र वाले ढोंगी."

"सचमुच यही मैं कहना चाहता था लेकिन संस्कार बीच में आ गए. अब लगता है की जैसे मैं अपने कमरे में हु.", कमरे वाली बात अर्जुन ने बहोत हे धीमी कही थी जो अनामिका ने फिर भी सुनी. उसके पेट से हाथ गुजर कर वो अपने बेटे को भी जांच रही थी जो अर्जुन से चिपका अब बेहतर स्थिति में था.

"अब ज्यादा ाचे से लगेगा की तुम अपने कमरे में हो.", आँखें मूंदने से पहले अनामिका ने बस हलके से अर्जुन के होंठो और गाल के मध्य चुम्बन दिया और वैसे हे सो गयी. अर्जुन बात मानता हुआ बिना हिले एक तरफ माँ और दूसरी तरफ बेटे को मफूज किये खुली आँखों से फिर वही सपना देखना लगा जिसमे वो swapan-sundari थी, दोहरे चरित्र वाली.

और वो भारत भाई जैसे आसमान के पार देखने वाला व्यक्ति था. आसमान ने भी अपना दोहरा चरित्र दिखा दिया उनके अनुमान को सही ठहरा कर. बहार हलकी bunda-baandi शुरू हो चुकी थी.
 
अपडेट 198

Be-mausam बरसात

रात का जाने कौनसा पहर था, शायद आखिरी पहर हे शुरू हुआ था जब रामेश्वर जी अपने बिस्टेर से उठ कर बैठक की बजाये मेहमान कमरे से होते हुए इस बहार वाले आँगन में चले आये. Tip-tip वाली हलकी बूंदा बांदी अब कुछ रफ़्तार पकड़ चुकी थी लेकिन उतनी भी नहीं की वो घनघोर कहलाती. न तोह इसमें बादलो की गर्जना थी और न jal-bharaav वाला जोर. छत्त से ढके आँगन से थोड़ा बहार निकल कर पंडित जी ने अपनी हथेली आसमान के निचे ऐसे बधाई जैसे एक छोटा बचा पहली बार अपने जीवन में पानी को बरसता हुआ देख जान न चाहता हो की क्या ये सचमुच हे पानी है.

'तपिश गिर रही है, कोई दुष्प्रभाव नहीं.', हाथ पर बस कुछ बुँदे हे एकत्रित करने के बाद वो वापिस पीछे हो गए. नंगे पाँव चलते हुए एक कोने में कड़ी नरम सन्न से बनी चारपाई को एहतियात से आँगन के किनारे लेन के बाद वो उसको वही बारिश से कुछ पहले बिछा कर मेहमान कमरे में चल दिए. एक तकिया लिए वो वापिस लौटे और इस बार चेहरा बरसती बूंदो की और करते हुए चारपाई पर लेते वो मुस्कुरा रहे थे.

'वे राम, कदो दी मैं वाजा मार ऋ हाँ. चल कोठे तोह थल्ले आ, तेरे बापू जी राह वेख रे होने खाने दी.', वो लम्बा छरहरा युवक, जिसके बाल ख़ास तरह से किनारो से छोटे और बाकी हिस्से पर घने लेकिन व्यवस्थित थे जैसे नया नया रंगरूट हो. निचली मंज़िल से आती अपनी माँ की आवाज सुन्न कर तुरंत अपनी लंगर लगी पतंग को डोरी से टॉड कर सीढ़ियों से भाग लिया. पतंग हवा में झूलती हुई जाने कहा गिरने वाली थी.

"अम्मा जी, इस पिद्दी न वि भेज दिया करो कड़े. हर वेले या तह यह चूल्हे कॉल बैठा ठुस्सी जांदा है या मांजी ते चिप्क्या रेह्न्दा है. तेरा नतीजा की रहा पिद्दी? कल तह मैं आया हे सी इस करके नै पुछेया. हूँ पेट दर्द वि नहीं तेह सर वि ठीक लगदा तेरा. जीब दंड थल्ले आ गयी होनी?", अपने बड़े भाई की बात सुन्न कर चूल्हे के पास बैठा वो 11-12 बरस का लड़का लाचारी से अपनी माँ की तरफ देखने लगा. हाथ में चीनी मलाई लिपटी रोटी थी और चेहरे पर उसका अंश लगा था.

"राम, तू अपने छोटे प्रायः न बस झिड़की जाना? ऐ वि पता है की मेरा कन्ना थोड़ा जा भोला है. हाथ दी सब ुंगला बराबर नई हुंडई. रोटी दे नाल यह अब (आम) वि ने, रागगी दे घरो भाई जी ने भिजवाए सी. याद नाल बता दी ोहना न.", माँ तोह माँ हे होती है और बचा छोटा हो तोह उसको प्यार ज्यादा दर्शाएगी. अपने सीने से उस छोटे लड़के लगते हुए उन्होंने अपने बड़े बेटे को आँखों से हे आगे कुछ बोलने से मन कर दिया.

"हाँ अम्मा जी, ुंगला तह बराबर नहीं हुंडई पर ऐ पिद्दी लगदा घिस घिस के चीची उंगल तोह वि छोटा रह गया. इस बारी वि फ़ैल होया होना, पंजवी विच कौन 2 बार फ़ैल हुँदा है तुस्सी आप हे दस्सो?", युवक अपनी माँ से वो कपडे का थैला ले कर हँसते हुए बोलै तोह उसका छोटा भाई माँ से लिपटे हुए बोलै.

"ओह संगी वि होया न फ़ैल एटकि पाह जी. ओह तह मास्टर जी वि राजे तोह दर्दे ने इस करके अगली कक्षा विच करता. सद्दा हर परचा इक्को जेहा स पर बापू जी राजा थोड़ी है.", लड़के की भोली बात और नक़ल करने का स्वीकारना जितना उसके साफ़ चरित्र को बता रहा था उतना हे दर्द भी था शायद उसके मैं में की उसके पिता राजा नहीं थे जो कुछ भी कर सकते.

"पिद्दी, बापू जी दी असल कमाई तोह सब तोह मिलान वाली िज्जात्त और प्यार है. तनु की लगदा ओह यह कम् तेरे वास्ते नहीं कर सकदे स? राजा जी तह आप ोहना न हाथ जोड़ के मिलदे ने. िज्जात्त और सम्मान तोह वड्डा कुछ नहीं छोटे भाई. जा खेद ले अपने बांद्रा नाल, वजा मार रहे तनु लेकिन दिन चिपन तोह पहला घर क्योंकि.."

"बापू जी दे सामने किसे दी नई चलदी. तुस्सी मेरे वास्ते जेहड़ी लिली (नीली) बुर्शट लाये हो लाहौर तोह मैं ओह पा के जावा?"

"गन्दी न करि बस. जा पज्ज जा और संगी होरा दे नाल न ज्यादा घुमेय कर.", बड़े भाई की बात पूरी सुने बिना हे ये लड़का एक कमरे की तरफ दौड़ गया. बहार माँ बीटा बस उसकी ख़ुशी देख है रहे थे. एकाएक उस माँ को जैसे कुछ याद आ गया बेटे द्वारा थैला उठा कर चलने पर.

"राम, तू पट कल हे वापस जाना? सवेरे तेरे बापू जी ने दस्सेया मेनू यह.", माँ की चिंता और प्यार देख युवक ने होंठो को दबाते हुए बस सर हिला दिया.

"माँ डा आशीर्वाद लें तह आउने हे स अम्मा जी. तुहाडे सिवा मेनू समझें वाला होर कौन है?"

"जिसनु तू हूँ मिलान जा रहा है. तेरे बापू जे कह रे स की अगली बैसाखी तेह गठजोड़ हो जाना और उसदे अगले साल लक्ष्य नयी हवेली दी वड्डी दही (बेटी). वेख ले तू मेनू प्यार करदा है जा ओसनु.? बुद्धि कारन तेह लगया न अपनी माँ न?", अब युवक लड़कियों की तरह शर्मा रहा था जैसे उसकी चोरी पकड़ी गयी हो.

"मैं कुछ नई जांदा अम्मा. व्याह दी गल्ल वि बापू जी नाल होई तेह ोहना ने मेनू वि नई स दसिया कल तोह पहला. तुहाडे वास्ते तह तुहाडा राम अपनी जान कदम विच रख देवे. िन्ना प्यार मैं किसे न नई करदा चाहे फेर बापू जी या गुड्डी.", युवक की गंभीरता देख उसकी माँ की आँखों में हलकी नमी आ गयी थी लेकिन फेर वो हँसते हुए चेहरे से उसका चेहरा थपथपाती हुई बोली.

"यह तह समां बताऊ पुत्तर जी लेकिन एक होर है जिसदा तू ना नै लिट्टे. तेह ओह साहड़ी गल्ल सुन्न के थोड़ा गुस्से विच है. ओह मेरा पट राजू कदो डा मुँह फुलाए खड़िया?", देहलीज पर सचमुच हे राम जितना लेकिन कुछ तगड़ा युवक खड़ा था जो नाराजगी दिखता हुआ उसकी माँ के पाँव छू कर एक तरफ मुँह करके गुस्सा जाहिर करने लगा.

"रग्घी वीरे, देखो पाह जी मेरे वास्ते किन्नी सोहनी बुर्शट लाये. वैसे यह एक घडी वि लेके आये ने चमड़े दे पत्ते ाली. र लिखेया ोस्डे ऊपर, सोने दी घडी.", पिद्दी इतना बोल कर बहार दौड़ गया और रग्घी अकड़ के राम के पास आता नजरे फेरे हे उसके गाला लगा और फिर एकदम हे उसको ऊपर उठा लिया.

"घडी तोह कम् नई चलना पड़ता, अम्मा ने तेरे तोह पहले मेनू दस्स्या के मेहँदी लगन वाली है तेरे. अम्मा जी वैसे तुस्सी कुड़ी लेके आणि या यह कुड़ी देके?", और माँ इन दोनों को देख बस मुँह पर हाथ रखती हंसती रही.

"रोटी ठंडी हो जानी, तुस्सी दोना ने फेर मदद के तह अँधेरे तोह पहला आना नै. लेकिन बापू जी डा ख्याल रखो."

"वड्डे जनरल डायर ने ओह. मैं वेखदा अज्ज बापू जी न वि अम्मा. हर वेले दबका मारी जांदे हे सहदे ते. हूँ होर नई सहना, साहड़ी वि कोई ज़िन्दगी है."

"बापू जी मैं ऑन हे लगेया स जी." राम ने घबराते हुए दरवाजे की तरफ देख कर ये कहा तोह रग्घी के भी टूटते उड़द गए जिसने डर के मारे अपने दोस्त को छोड़ कर अम्मा जी का हाथ थाम लिया. दरवाजे पर तोह कोई था हे नहीं.

"हाहाहा. वेख लो अम्मा इस वड्डे भगत सिंह न. कहंदा स आजाद भारत है. किथे गयी काका जी आप जी दी ओह दलेरी? चल हूँ, पहला रोटी फेर शिकार.", घर से दोनों हे हँसते हुए बहार निकले तोह पीछे उन्हें देखती हुई माँ ने नजर उतारी चूल्हे में कुछ लाल मिर्चे झुलसते हुए.

"डाटा जी, खुश रखियो बचैया न बस.", माँ तोह बस दुआएं हे मांगती है अपने बचो के लिए, सभी बचो के लिए. और वो दोनों युवक टहलते हुए कुछ हे दुरी पर स्थित उस आकर्षक महल की तरफ बढ़ने लगे जिसकी सफ़ेद ईमारत और उस से पहले लम्बा चौड़ा उद्यान बना था. Motor-car और घोड़े एक तरफ बंधे थे जो प्रार्थी या जमिंदाऔर के थे महल दरबार में आये हुए.

"राम तू अब लाहोरिया है या फौजी?"

"इम्तिहान की वजह से लाहौर रहना पड़ा भाई लेकिन उस से पहले 4 महीने जम्मू था. तुझे तोह चिट्ठी भी भेजी थी मैंने, जवाब नहीं आया.", राम साइकिल का हैंडल पकडे चल रहा था और राघे कंधे पर एक नाली वाली बन्दूक और साइकिल के पीछे रखा थैला पकडे हुए.

"तेरे बापू जी ने मेरी भी ढिबरी टाइट करवा दी बे. जीजी का ब्याह क्या हुआ, पिता जी ने कारखाने भेजना शुरू कर दिया मुझे. आज सवेरे खुद बापू जी बोल के गए थे पिता जी को तेरे आने पर वो मुझे कारखाने न भेजे. चिठ्ठी की बात करता है तू भाई, मैं तोह उसको हर रोज पढता हु."

"तू कबसे ऐसा हो गया बे लोमड़? इश्क़ तोह नहीं हो गया किसी गुजारी या बकरी चराने वाली से? हाहाहा..", राम के मजाक पर राघे भी मुस्कराया लेकिन थोड़ी गंभीरता फिर भी चेहरे पर थी.

"ोये बोल न क्या परेशानी है भाई? मैं करता हु बात पिता जी, तू विलायत चला जा जैसे तू चाहता था."

"अब नहीं चाहता बे मैं कही भी जाना. और जागीरदार रघुवीर सिंह के इतने बुरे दिन नहीं आये के वो ग्वालनो से इश्क़ लड़ाई. लेकिन हो तोह गया है भाई.", उसकी बात सुनते हे राम हैरत से अपनी जगह पर हे रुक गया साइकिल पकडे. थोड़ी आगे पंहुचा राघे उर्फ़ रघुवीर जिस तरह से मुस्कुराया था उसमे दर्द ज्यादा और ख़ुशी काम हे थी.

"सच भाई? तू परेशां मैट हो. मैं सब सही कर दूंगा और तू कुछ भी मत करियो. मैं कैसे भी करके तेरे घर वो रिश्ता पूछा हे दूंगा. लेकिन देख पहले बोल देता हु की बैसाखी तक कुछ वि उलटी सीढ़ी हरकत मैट करियो. वैसे हैं कौन ये साहिबा जिन्होंने हमारे भाई को इतना बदल दिया की वो काम पर जाने के बहाने खुद बनता है और नाम पिता जी का?"

"मैं जानता हु के तू ऐसा कर सकता है राम पर तूने बैसाखी तक समय लिया है तोह मैं नाम होली पे बताऊंगा. वैसे सुना है लाहौर की मुटियारें विलायती मेमो से भी सुन्दर दिखती है?"

"मैं उन्हें देखने गया तह क्या? और अगर तू जान न हे चाहता है तोह सुन्न ले भाई की उनके जैसी हे इधर है. बस थोड़ी आजादी है उधर वाले कॉलेज में जैसे हमने राजधानी में देखा था कुछ उस तरह हे. मेरा जहा इम्तिहान था वह भी 30 में से 5 लड़कियां हे थी. इधर तोह मैंने नहीं देखा की कोई 8 जमात से ऊपर लड़कियों को भेजता हो. हाँ यहाँ अमीरो के घर शिक्षक खुद पढ़ने चले जाते है तोह उन्हें जरुरत भी क्या बहार भेजने की."

"आये हाय मेरी रमिया. तू तोह बड़ी बातें करने लगी 2 शहर देखने के बाद. ठिकाने पर मिलता हु तू इतने इस रजनीगंधा को साफ़ कर, मैं बापू जी को रोटी देके अंदर वाले रस्ते से आया 15 मिनट में.", राघे वो कपडे में बंधी बन्दूक राम को सौंप कर थैला लिए सीधे रस्ते हो लिया, अपने दोस्त का जवाब सुने बिना.

'तेरी मर्जी. वैसे तोह कहता रहता है बापू जी से सामना हे न हो और यहाँ आते हे जाने क्यों पाँव नहीं रुकते. चल रजनी आज बड़े दिनों बाद हाथ लगी है, 10 बार चलने से पहले तोह तुझे भी नहीं छोड़ने वाला.', साइकिल पर सवार होता राम बड़े उत्साह से अपने कंधे पर तंगी उस बन्दूक से बात करता हुआ महल के किनारे वाले कच्चे रस्ते पर तेज पैदल मारता हुआ जाने लगा. इस रस्ते से हे तोह वो जंगल आता था जिधर दोनों भाई घंटो मटरगश्ती करते थे, दुनिया की नजरो से दूर रह कर. बचपन से हे बस यही एक शौक था दोनों को जो एकांत का साथी और समय बिताने का बेहतरीन जरिया था. महल की दिवार पीछे रह जाने पर भी ये ये विशाल बाग़ कही ज्यादा बड़ा था जिसमे साइकिल सवार राम दाखिल हुआ. इसको पार करने पे हे वो घाना जंगल आता था जहा एक तरफ नदी और उसके आगे इस तरफ से भी घाना जंगल, जानवरो और जंलगी फलो के वृक्षों से भरा. बीच में 3-4 सिपाही जरूर मिले थे पर उन्होंने सलाम किया कुछ पूछताछ करने की जगह. ये सभी जानते थे इस युवक को और उनके पिता का रसूख भी.

"ेशर जी.", अभी वो घने बाग़ में दाखिल होता थोड़ा आगे हे आया था की इस करीब से आयी आवाज पर साइकिल के दोनों ब्रेक दबा दिए. मुँह को ढके ये जवान दासी उसकी परिचित हे थी.

"जी कोसी जीजी? आप यहाँ अकेली?", राम हर तरफ देखने के बाद थोड़ी दुरी से हे पूछ रहा था. अक्सर यहाँ महल की राजकुमारिअ भ्रमण या khel-krida के लिए आती थी. और उनकी मौजदगी में पुरुष तोह क्या स्वयं शाही सेवक का भी उधर आना मन था. यही वजह थी राम द्वारा इस जगह की पड़ताल करने की.

"उधर अगले बनेरे नजर करते जाना आप. हम छोटी मालकिन के साथ गए थे लेकिन वापिस आने से पहले थोड़ा जल्दी में निकले थे. वह छोटी मालकिन की कोई खास चीज खो गयी है. आप देख आये जरा, हम इधर इन्तजार करते है."

"बहोत ाची बात है. मैं आता हु अभी लौट कर.", राघे ने तोह समय लगाना था और राम किसी को कभी मन भी नहीं करता था इसलिए सबसे उसको प्यार और िज्जात्त मिली थी. साइकिल के पैदल फिर से चालू थे और कुछ दुरी पर वो बनेरा जो की घने वृक्षों का एक bhul-bhullaya हे था जहा महल की युवतियां अक्सर luka-chhipi खेलती थी अपनी सेविकाओं के साथ. साइकिल एक तरफ गिराने के बाद राम उस बनेरे में सतर्कता से दाखिल हुआ तोह उसका यहाँ भेजने वाली दासी आँचल में मुँह छिपाये मुस्कुराने लगी. वो दोनों रास्तो पर नजर भी रखे थी जैसे अब उधर किसी को जाने नहीं देगी.

'ये कोसी जीजी भी हमेशा कुछ न कुछ उल्टा सीधा काम बता देती है. इन झाड़ियों में क्या खख मिलेगा कुछ?', खुद से उलझता हुआ राम इस साफ़ सुथरी जगह के साथ करीने से कटे 8 फ़ीट ऊँचे झाड़ के टेढ़े मेढ़े दिवार से bhul-bhulaiyya के ज्यादा हे भीतर चला आया. कीमती वास्तु तोह क्या यहाँ कंकर पत्थर भी न था.

"माफ़ी चाहते है आपको परेशां करने के लिए.", इस मीठी आवाज ने राम के दिल को जैसे अथाह ठंडक से भर दिया. आँखें मूँद कर जैसे वो ये जांचना छह रहा था के कही ये पास उसके अंतर्मनन की हे तोह आवाज नहीं. आँखें खुलने पर सामने जो था वो सच हे था. शाही ओढ़नी में चेहरे के आगे पर्दा करती उन माँ सी नाजुक मुलायम उँगलियों का हे दीदार हुआ था. दूसरा हाथ पल्लू में उँगलियाँ कसता जैसे जाहिर कर गया की हालत इनकी भी कुछ ठीक नहीं पर चाहत कुछ अधिक थी इस शर्म के सामने.

"आप.. आप हमसे माफ़ी मांग कर हम दोनों को शर्मिंदा कर रही है राजकुमारी जी. आप भी वही मूल्यवान वास्तु ढूंढ़ने आयी थी?", राम 2 कदम पीछे हो गया था और ऐसा होना लाजमी भी था जब सामने महल की सबसे बड़ी राजकुमारी कड़ी हो.

"आप भी उपहास करेंगे हमारा? पिता जी ने हे सन्देश भिजवाया था के आप वापिस आये है कल.", परदे के पार वो झुकी हुई घनी और लम्बी पलके जितनी खूबसूरत थी उतना हे वो चेहरा. राम ने बस एक पल हे ये देखने की जेहमत की और नजरे फिर से उनसे दूर.

"जो वास्तविकता है वो तोह नहीं बदली जा सकती राजकुमारी जी. हम महल के मुलाजिम के सुपुत्र है और आप वह की मालकिन. पिता जी आपके पास संदेसा पहुंचने की जेहमत क्यों की?"

"जैसे आप जानते नहीं? रिश्ते से पहले तोह आप हमारा उपहास उड़ाने से नहीं चूकते थे और आज जब हम आपके हो चुके है तोह ये मुलाजिम और राजा वाली बात कहा से आ गयी? हमने राजा साहब को पिता जी नहीं कहा था, जानकारी के लिए बता देते है.", राम दिल हे दिल खुश हो रहा था अपनी इस होने वाली बीवी की बात सुन्न कर.

"बैसाखी सिर्फ 10 महीने दूर राजकुमारी जी. रिश्ता तभी पक्का होगा और हम चाहते है की ये 10 महीने कल हे पूरे हो जाए तोह बेहतर होगा."

"ये बात बिलकुल शराफत वाली नहीं है आपकी. कायदे के हिसाब से तोह उस दिन भी बस रसम हे होगी. आपने हमारे पिता जी से वचन जो ले लिया है शिक्षा पूरी करने के बाद हे हमे यहाँ से ले कर जायेंगे. पहली कभी आपकी याद नहीं आयी हमे, पर अब हमे यहाँ कुछ ाचा नहीं लगता. 2 वर्ष पंखा लगा कर नहीं उड़ते और हम इतने मजबूत भी नहीं के इतना समय यहाँ रह पाए जब आपके हो हे चुके है. आपका वचन हमारी जान...", उन आँखों में आंसू आने की देरी हे थी की राम ने raaj-dharam, समाज के नियम और बुनियादी असूल पृथक करते हुए इस राजकुमारी को अपनी बाहों में भर लिया. पहली बार दोनों ने एक दूसरे का दिल महसूस किया था और वो हलकी हलकी बूंदा बांदी जिसकी उम्मीद हे नहीं थी पहले, दोनों के प्यार की साक्षी थी इस एकांत में.

"तुम हमारी हो लक्ष्य और हम तुम्हारे. ये जीवन उस दिन हे हमे सौंप दिया गया था जिस दिन हमने इसको सुरक्षित किया था. Raaj-adhikri के बाद ये रिश्ता तभी मान्य हो सकता है जब विवाह sena-pramukh से हो. हमने ये सिर्फ आपको पाने के लिए किया है लक्ष्य, सिर्फ आपको. वादा करो की हम किसी भी बरसात में उसकी तपिश महसूस न करे. तुम्हारे आंसू ये कुदरत भी नहीं देख सकती तोह ये Rameshwar..Ye रामेश्वर तोह इस पूरा हे तुमसे हुआ है. ये कैसे सेहन कर सकता है अपनी अर्धांगिनी की सजल आँखें?"

"आपको दण्डित किया जा सकता है, हमे हाथ लगाने की हिमाकत पर!", स्थिति का भान होते हे राजकुमारी फिर से शर्म का लबादा ओढ़े अलग हो गयी. बारिश की बूंदो का इन दोनों पर हे कोई असर न था.

"हम गुनाह कबूल कर लेंगे और कह देंगे की सजा में हमारी लक्ष्य हमारे साथ भेज दीजिये."

"हाहाहा.. हम नहीं जाने वाले फ़क़ीर के साथ. आपके दादा जी की हवेली से बरात लेके आओगे तभी हमारा हाथ मिलेगा. लाहौर से हमारे लिए तोह कुछ लिया नहीं होगा?"

"बरात भी आएगी और तुम्हे लेके भी जायेंगे. लाहौर से ये लेके आया था मैं, कलाई का अकार तोह नहीं पता पर अंदाजे से.", कमीज के भीतर हाथ डालने के बाद जिस्म से बांध कर छिपाये वो खूबसूरत स्वर्ण कंगना की जोड़ी लक्षिका की हथेली पर राखी तोह वो परदे की आउट से कभी राम तोह कभी उन कंगना को देखने लगी.

"ये बहोत महंगे है और हम इन्हे कैसे ले सकते है? ये लिए कैसे आपने? इतने पैसे? साइकिल बेच दी न आपने?", लगातार सवालों से बचने के लिए राम ने सच बोल हे दिया.

"वजीफा मिला था और 8 महीने की तनख्वाह भी जोड़ कर राखी. उसमे भी दोनों नहीं मिल रहे थे तोह साइकिल बेचनी पड़ी. अब उसकी जरुरत भी नहीं है, फ़ौज में साइकिल मिली है हमे और एक घर पे पहले से है. पर जबतक ये शाही कलाई में नहीं होंगे इतने इनकी कीमत कुछ भी नहीं."

"पहना दीजिये. क्या हम एक दिया को दे सकते है? कायदे से तोह हक़ है उसका भी और हमे एक कलाई की हे आदत है."

"जो दिल करे वो करो. सब तुम्हारा हे है लक्ष्य और दिया से हमे भी लगाव है. जानती हो उस पगली ने हमे पिछली मुलाकात में 'जीजा जी' की आवाज हे लगा दी थी. भला हो की आसपास कोई था नहीं. तुम्हारे हाथ कुछ ज्यादा हे नाजुक है लक्ष्य."

"हाथ पकड़ने के बहाने अभी से शुरू."

"हमने पहल नहीं की थी और ये लीजिये राजकुमारी लक्षिका जी, आपके सेवक ने काम पूरा किया. अब आप दूसरी तरफ से निकालिये और हम यही से वन्न की और जा रहे है. याद आये तोह पत्र लिख देना, कन्ना या रघु मुझ तक पंहुचा देंगे. चलते है.", राम जाने के लिए मुदा तोह इस बार लक्षिका ने हे हाथ थाम लिया.

"लिख नहीं पाएंगे पर कोशिश करेंगे. आप जल्दी आना और एक बार फिर सोच लीजियेगा दीपावली तक."

"जरूर लेकिन वचन नहीं टॉड सकते. महल में आने की इजाजत हांसिल कर सकते है आपके लिए. दीपावली पर मुलाकात होगी. वैसे कोसी जीजी को क्या कहना है?"

"ये देखिये हमारी कलाई में एक है और दूसरा दुपट्टे में. हमने आपसे पहले ढून्ढ लिया जो खोया था. इन्तजार रहेगा.", लक्षिका नजरो से पल में हे ओझल हो गयी थी क्योंकि ये जगह उसका दूसरा घर थी. राम सर कुज्हता कभी हँसता तोह कभी कुछ सोचता हुआ बहार निकला तोह सामे शिला पर बैठे राघे को देख हैरान रह गया.

"तुम यहाँ कैसे?"

"भाभी ऐसे हे मिलने चली छोटे पंडित? अरे तुम अपने वचन देते रेहान लेकिन हम तोह बिना कहे पूरे कर देते है. देख लेना बे राम, तेरी शादी में आसमान को गोलियों से चलनी करके बारिश न करवा दी न तोह मेरा नाम भी रघुवीर नहीं."

"चल बे शेखचिल्ली, ऐसे बारिश हो जायेगी क्या? उसके लिए बादल होने जरुरी है पानी से भरे. गोली वाली वह तक मार नै कर सकती."

"अबे आज भी तोह बादल नहीं है पर ये बारिश क्यों हो रही है? माँ कहती है प्रेत की शादी होती है जब ऐसा होता है. कही तू और भाभी .. हैं बोल देना भाई पहले हे.. हाहाहा.."

"अबे ठहर तू जरा तेरे प्रेत मैं उतरता हु. वैसे ये बारिश गरम है यार और तेज भी नहीं. ऐसा कैसे होता?"

"न तूने विज्ञान पढ़ा और न मैंने. अबे बरस रहे है भोसड़ी वाले तोह बरसने दे न बे."

"तू गाली मत दिया कर भाई. किसी दिन दण्डित कर देंगे पिता जी या बापू, अगर उन्हें पता लगा."

"और वो जो पीने के बाद मधुर संगीत सुनते रहते है. ोये राम आज दारु पीयेगा? कल तोह तू जाने हे वाला क्यों न .."

"जिस दिन तू सबसे ज्यादा खुश होगा न भाई, उस दिन हे मैं एक बार तेरे लिए इस बुरी बाला को हाथ लगाऊंगा. आज तू परेशां है और इसका इलाज शराब नहीं शिकार है. और बारिश में तोह ऐसा करने में माहिर है.", राम आगे बढ़ा हे था की जैसे किसी गहरी खाई में जा गिरा. अँधेरे से निकलने की असफल कोशिशों में लगा वो जाने कितनी देर तक गिरता रहा और फिर एकदम सामने हलकी रौशनी जहा बारिश नहीं थी. ये कोई घर था और सामने बगीचा.

"कबसे आवाज लगा रही हु जी, आप जाग रहे हो या सो रहे हो? अंदर इतनी गर्मी भी नहीं थी जो यहाँ खुले में के पसर गए वो भी खाट पे न दरी न चादर. 4 बजे उठी थी लेकिन आप दिखे नहीं तोह सोचा बाथरूम गए होंगे पर कपडे ले कर इधर आयी तोह आपको सोये पाया. आप ठीक हो न जी?", अपनी अर्धांगिनी के चिंतित से चेहरे को देख रामेश्वर जी मुस्कुराये जिसका मतलब था के वो ठीक है.

"पहले बाथरूम जाने की वजह से नींद खुल गयी थी भगवान और फिर वापिस जाने लगा तोह बनवारी या दिवार के साथ खड़ा दिखा. लिटा लिए साले साहब को और करने लगे तुम्हारी शिकायत. कब नींद आयी फिर पता नहीं लगा और देखो आज हम पहली बार तुम्हारे बाद उठ रहे है. वैसे बारिश ाचे से नहीं हुई."

"आप और आपका बनवारी. और इसको बारिश बोलते है? नासपीटी काम से काम बगीचा हे भिगो देती लेकिन उतना भी न हुआ. चलो आप जाओ नहाने, मैं पहले रख दू उधर. आपने कही फ़ोन भी करना था 5 बजे.", कौशल्या जी अपने भाई के जीकर पर खुश होती हुई बहार वाले बाथरूम की तरफ चल दी पर पीछे चारपाई पर बैठे रामेश्वर जी ने अनजाने हे हाथ आगे आसमान में बढ़ाया तोह जान कैसे वो 2 टपके हथेली पर आ गिरे. शायद आसमान या दिवार में अटके रह गए होंगे.

'ठन्डे हो चुके है जैसे कही ज्यादा हे गहराई से निकले हो. सुच्चा सिंह मानो भाई तुम हुकुम अपने नए मुखिया का. हम तोह चले नहाने.', दोनों बुँदे अपने सर पे वार कर पंडित जी चारपाई वापिस उसकी जगह कड़ी करने के बाद तकिये कमरे में पहुंचते हुए नित्यक्रम में मसरूफ हो गए.

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गाँव में 3 बजे जहां अंधकार हे था और इस तरफ bunda-bandi हलकी न हो कर कुछ तेज हुई थी लेकिन घंटा भर रफ़्तार से बरसने के बाद अब बस हलके छींटे हे आसमान से गिरते जमीन की बची खुची तपिश मिटा रहे थे. जहां सन्नाटे में हर घर उतना हे खामोश था और कुछ हद्द तक वैसा हे हाल इस हवेली में था. दामिनी अथक प्रयास के बाद करीब 12 बजे सोई थी और उस से कुछ पहले हे आँचल. मीणा ने जरूर एक बार पशुओ के बाड़े की जांच की थी उस दौरान लेकिन अब ये सभी लोग अपनी मीठी नींद पूरी करने में जुटे थे. बस एक शक्श था जिसकी आँख कुछ हरकत होने की वजह से खुल चुकी थी. अनामिका को अपनी ब्याह पर सुलाए अर्जुन को उठना हे पड़ा जब निकेतन ने नींद में हे बिस्टेर गीला कर दिया.

'अरे यार तू सचमुच खतरनाक इंसान है. चल अब तेरी मम्मी की नींद मत खराब करना रो रो कर.", अर्जुन ने पाया की बिस्टेर उतना गीला नहीं था बस निकेतन का निचला कपडा एक तरफ से ज्यादा भीगा था. अनामिका उसकी बाहों में सुखद नींद लेती जैसे इस सबसे बेखबर थी और कब उसके सर के निचे तकिया लगा कर अर्जुन निकेतन को गॉड में लिए बाथरूम चल दिया, वो बेखबर रही. वैसे भी बेचारी अकेली हे सारा दिन इतनी बड़ी हवेली के अनगिनत काम बिना सवाल करती रहती थी और एक छोटे बचे में माँ होने के नाते ये अपने आप में एक अकेले इंसान के वश का नहीं था. कभी कभी तोह गनीमत से ऐसी नींद मिलती थी और अगर उसमे हे खलल पड़ जाये तोह फिर क्या जीवन.

'तेरे सुसु का हे समझ नहीं आता. नींद में भी तुझे करवाया था और उस से पहले भी तू हँसते हुए टंकी खली गया था अपनी माँ की गॉड में. अबे ित्तु सा तोह तू है फिर भी सारा दिन जब देखो एक हे काम.', अर्जुन जिस तरह से उसके साथ धीमी आवाज में बातें करता हुआ गीले तोलिये से साफ़ करने के बाद वस्त्र बांध रहा था, वो छोटा बचा अपने पाँव हिलता हँसते हुए किलकारियां मारने लगा.

'मजा आता है तुझे सबको काम में लगाए रखने में? शैतान कही. तेरी मम्मी पे तरस खाया कर थोड़ा, हाँ दादी और बुआ पे जितना मर्जी कर. अब तुझे भूख लग गयी होगी? पहले पेट भरो, फिर खली करो. सही काम है तेरे पास. चल अब शोर नहीं करना..', अर्जुन दबे पाँव उसको वापिस कमरे में तोह ले आया लेकिन अब वो करे तोह करे क्या. एक तरफ तोह जगह थोड़ी गीली थी और दूसरी और अनामिका चैन से सोई हुई.

'माफ़ करना चची लेकिन अपने लिए नहीं कर रहा.', अर्जुन ने बड़ी आहिस्ता से गाउन के सामने का भाग अनावृत किया जहा वो dugdh-bhare सतांन थे लेकिन बहरपुर कोशिश की थी की वो उधर न देखे. कपडा बस इतना हे हटाया था की ये बचा अपने bhojan-sthal को पहचान सके और उसको तकिये पे लिटाने के बाद खुद उस गीली जगह से बचते हुए बिस्टेर के किनारे पसर गया. जगह बस इतनी हे थी की वो करवट से लेट पाया. निकेतन शरारत करता हुआ दूध चुसकने के साथ अपनी नन्ही नन्ही उँगलियों से कभी अनामिका का चेहरा खींचता तोह कभी वो सीने का वस्त्र जो मुँह पर आ रुकता. अर्जुन ने सतांन आजाद हे कहा किये थे? अनुमान से हे बस चैन खोल कर उभरे agra-bhaag से कुछ निचे का हिस्सा खोला था.

"नहीं करो न अर्जुन, सोने दो.", अब ये आवाज सुन्न कर पलट के लेता अर्जुन चौंक उठा. अनामिका समझ रही थी की अर्जुन उसके साथ अठखेलियां कर रही है. लेकिन वो फिर भी नहीं पलटा और जब निकेतन अपनी कोशिश में सफल होने के बाद इत्मीनान से पूरा निप्पल होंठो में दबाता दूध चुसकने लगा तोह अनामिका ने नींद में हे उस उभर को बहार करते हुए अपने बेटे को ाचे से अपने सीने से लिप्त लिया. अर्जुन ने आगे कोई आवाज सुनाई न देने पर चैन की सांस लेते हुए आँखें मूँद ली. 10 मिनट हे गुजरे थे और अनामिका ने जैसे हे स्टैनो पर हरकत बंद पायी उसने आँखें खोल ली. बचा सो चूका था जैसे उसको बस इतनी हे भूख थी. लेकिन अर्जुन को इतनी दूर और वो भी थोड़ी सी जगह में सिमट कर मुँह फेरे सोये देख अनामिका को ऐसा लगा जैसे ये 3 फ़ीट की दुरी न हुई हजारो मील हुए. निकेतन को सावधानी से एक तरफ सुलाने के बाद बिस्टेर चढ़ने वाली और तकिया लगाने के बाद वो दोनों के बीच आयी तोह बिस्टेर छोटी सी जगह पर नमीयुक्त था. उसकी परवाह न करते हुए अनामिका ने अर्जुन को अपनी तरफ हलके से हे दबाया तोह वो सीधा हो गया. आँखे हलकी सी खोलते हुए अनामिका को पूरी तरह जगा देख वो हैरान था और उसका यु उस पर झुकना? गले से निचे वस्त्र अभी तक बंद न था जहा बिना पिंजरे के दोनों कबूतर आजाद थे और उनकी कुछ झलक उसके सामने.

"आपको उठाना नहीं चाहता था. निक्कू सो गया?"

"मुझे नींद कैसे आती फिर? वो सो गया अब मुझे सोना है.", अनामिका ने पाँव सीधे करते हुए एक हाथ अर्जुन के सीने पर गिराया और अब फिर से वो उसके आगोश में थी.

"आपके जहा सोई है वह कुछ गीलापन है. इसलिए मैंने इधर करवट ली थी. और सॉरी, मुझे वो करना पड़ा जो शायद ठीक नहीं था पर यकीन कीजिये मैंने उधर नजर नहीं की.", अर्जुन सफाई देने के साथ थोड़ा व्यवस्थित होते हुए अनामिका को पूरी जगह दे रहा था. बचा ज्यादा दुरी पे नहीं था इनसे.

"तुमने वह भी यही किया था मेरी नींद की वजह से और तब उसको भूख नहीं थी और सोया रहा. आज भी ज्यादा भूख नहीं थी पर नींद तभी आती है अगर ज्यादा गीला हो जाए. वैसे तुमने तब जो किया वो सही था लेकिन अभी नजरे मुझे पर नहीं थी.", अनामिका अपनी हे बात कहने के बाद अर्जुन की ब्याह पर मुँह दबाने लगी थी. जैसे नींद के असर से वो अभी तक बहार नहीं निकली थी और ये जान कर की उसने क्या बोल दिया है, स्वाभिक शर्म से वो चेहरा छुपा रही थी.

"आप ऊपर झुकी हुई थी और मैं जाग रहा था इसलिए हो गया बस. फिर भी सॉरी."

"बहोत माफ़ी मांगते हो लेकिन गलतियां बढ़ती जा रही है. इतनी आदत मत बिगाड़ो मेरी नहीं तोह पहले वाली ज़िन्दगी में भी लौटने के काबिल नहीं रहूंगी.", अनामिका की टांग अब अर्जुन के ऊपर आ चुकी थी एक तरफ से और जिस्म लगभग एक तरफ से उसके सीने और पसलियों पर टिका था. आवाज कान के इतने करीब महसूस करके अर्जुन भी जैसे खुद को सँभालने की कोशिश करने लगा. एक ख़ास एहसास और रिश्ता तोह पनप हे चूका था इन दोनों के दरमियान जिसका नाम न अनामिका रख सकती थी और न अर्जुन के वश में था. मूक स्वीकृति थी जिसमे झिझक, अपनापन और आहात प्रेमिका सी थी. अर्जुन वो वृक्ष था जिसने एक मृत बैल को अपने सान्निध्य में लेते हुए punar-jivit किया था. वही अनामिका दिन प्रति दिन उसको अपने दिल में और ज्यादा गहराई से समाने लगी थी. उसका अर्जुन का ख़याल रखना, हर छोटी बड़ी बात और जरुरत को उसके कहने से पहले हे तैयार करना इस एकांत से कुछ अलग था पर उसमे भी निस्वार्थ प्रेम या प्रतिफल था जो अर्जुन ने उसके लिए किया उसके बदले.

"कभी कभी बात वह तक पहुंच जाती है जहा फिर माफ़ी भी मायने नहीं रखती. आईने में जरूर हम दोनों अपना अक्स एक साथ देख सकते है पर हकीकत बहोत अलग है. और आपकी बात भी ठीक है. जीवन इतना संवारते संवारते अगर आपस में जुड़ गए तोह न आप वापिस पहले जैसे हो सकेंगी न जो चाहती है वो.", अर्जुन अब दूसरे हाथ से अनामिका के चेहरे और अपने सीने पर आयी उसकी कुछ खुली जुल्फों का रेशमी एहसास लेने के बाद उन्हें वापिस सही जगह पहुंचने लगा. कुछ क्षण की ख़ामोशी के बाद अनामिका ने हे चुप्पी तोड़ी.

"जानते हो जिस दिन तुम यहाँ आये थे न उस रात हे मैंने तुम्हारे चाचा से कह दिया था के उनके जाने के बाद अर्जुन से कह देना की वो यहाँ सो जाएगा. मैंने 5 साल में इतनी लम्बी बात उनके साथ कभी नहीं की जिसमे मैंने कुछ माँगा हो. उन्होंने खुद सामने से कहा की तुम निक्कू का ध्यान बेहतर रखते हो और इस वजह से मैं निश्चिंत सो सकती हु. कमरे से बहार जाते हे उन्होंने ये तुमसे कहा. तुम क्या मैं खुद भी नहीं जानती अर्जुन के मेरे जीवन में तुम्हारे क्या मायने है. एक औरत को उसका उचित स्थान, वो पारिवारिक प्रेम, हर छोटे बड़े पल में भागीदार और परिवार का एक चलित सदस्य तुमने बनाया है. शुरू शुरू में ये जब भी कमरे में दाखिल होते तोह शराब की दुर्गन्ध और बस करवट बदल के सो जाना. कितने साल ये चलता रहा और जब घर का दबाव बढ़ा तोह कुछ वक़्त एक खामोश सा रिश्ता जोड़ने की कोशिश जिसका परिणाम हमारे पीछे सुकून से सो रहा है. लेकिन अब तोह दबाव भी चला गया इसलिए फिर वही सब या उस से भी ज्यादा. बस एक तुम हो जिसके नाम लेने भर से इन्हे (विनोद) नाराज नहीं देखा. वार्ना एक बार हिमाक़त करके सिर्फ तीज वाले समय अपने घर जाने का पूछ बैठी थी. 5 दिन तक कमरे में भी घूंगट हटाने की हिम्मत नहीं हुई. क्या यही सच्चा रिश्ता है पति पत्नी का? यही पति धरम है? ख्वाहिश जाहिर कर देना अपराध है अगर मैं हवेली की बहु हो तोह? ये नियम बेटी पर लागु नहीं होने चाहिए? और तुम क्यों ये धरम निभाते जा रहे हो जिसके भविष्य वाले परिणाम मुझे सुना कर तुम खुदको अपराधी महसूस करवाओ?", अनामिका का सम्पूर्ण वर्णन और आपबीती सुन्न कर अर्जुन के हे दिल में तीस सी चुभने लगी. सच हे तोह था की 27-28 बरस की ये महिला उस व्यक्ति से ब्याही गयी थी जो 10 साल बड़ा था और उसके साथ साथ ज़माने का कोई ऐसा दुरुगुण नहीं था जो विनोद में न हो. और बहु एवं बेटी के बीच इतने बड़े फरक तोह खुद उसकी हे समझ से बहार थे.

"चुप क्यों हो अब? हवेली के मालिक शायद यहाँ चौपाल जैसा तत्काल फैंसला लेने में घबरा रहे है. आखिर बात परिवार की जो है और एक तरफ अगर स्वर्ग है तोह दूसरी तरफ आपके नियम क्यों काम नहीं करते? शायद मैं बहक गयी हु उस प्रेम और सुकून की वजह से जो मैंने तुम्हारे साथ पाया. बढचल..", अनामिका आगे कुछ बोलती उस से पहले हे अर्जुन ने उसके व्यथित चेहरे की तरफ बढ़ते हुए दोनों पतले होंठ मुँह में भर लिए. उसकी आँखें बंद थी लेकिन अनामिका ने सुखद एहसास में डूबने से पहले देखा की उन बंद आँखों के दोनों तरफ से आंसू की छोटी छोटी बुँदे बह निकली थी. जिस ब्याह पर लेती थी, उसके हे सहारे अर्जुन ने अब पूरी तरह अनामिका को अपने जिस्म पर ओढ़ लिया था. बहोत एहतियात और ख़ामोशी से वो बस अनामिका को अपने मूक प्यार का एहसास दिलाने लगा था. दोनों हाथ अनामिका की पीठ से निचे आपस में जोड़े अर्जुन जाने कितने लम्हे गुजार गया उस स्थिति में. खुद अनामिका ने हे आज जाना था की उसकी समझ से भी ज्यादा प्यार करता था अर्जुन लेकिन कहना गुस्ताखी थी और ये हवेली पहले कभी भी उसके अधीन नहीं थी जिसका मालिक अब वो था.

"ये शब्द आइंदा जुबान पर नहीं आने चाहिए. काम से काम उसकी तरफ तोह देख लीजिये जो हमारे पहलु में है. जरुरी नहीं हर बात को कह कर बताया जाए. मैं कितना जहां देखता हु इसका आपको थोड़ा एहसास तोह हो हे गया होगा और बाकी मैं अभी बता देता हु. आपने देखा विनोद को, जो 5 बरस में अपनी अर्धांगिनी को बस एक सुख दे पाया और उसपे भी अभिमान लेकिन खुदका सच जानते हुए भी और बड़ा गुनाह करने को आमादा है. वो औरत जो कल सुबह से मुझसे खेल रही है और खेल इतना खतरनाक हो गया है की वो अब हद्द से गुजरने वाली है ये भूल कर भी की उसकी माँ उस से कुछ अलग चाहती है. और वो माँ, जिसने खुद अपनी इस बेवकूफ लेकिन ताक़तवर बेटी का अनगिनत बार प्रयोग किया वो इतना मजबूत नक़ाब ओढ़े हुए है की उसको उतरने से पहले या तोह मैं सबकुछ मिटा दू या थोड़ा सबर करू. ये जानते हुए भी की दामिनी ने मेरी माँ की जान लेनी चाही मैं खामोश हु. मैं जान रहा हु की यहाँ ऐसे बहोत से लोग है जिनके अंदरूनी चेहरे कही से भी इंसानियत वाले नहीं है. इस सबके बीच आखिर मेरे पास अगर कोई है जिसके पहलु में मैं आराम कर सकता हु तोह आप हो... वो ये मासूम है जो जब बड़ा होगा तोह इनके जैसा नहीं बनेगा. मैं अपना प्यार जाहिर करके किसी को ये नहीं बताना चाहता की आप मेरी कमजोरी हो. फिर मैं खामोश नहीं रह पाउँगा अगर किसी ने गलती कर दी इस प्यार तक आने की. लेकिन हारना पड़ेगा न मुझे फिर.?", अर्जुन ने जिस तरह से सबकुछ खोल कर अनामिका के सामने रख दिया था वो तोह हतप्रभ हे रह गयी. अपनी सास का घिनोना सच तोह जैसे उसको भी उतना नहीं पता था. वो अभी भी उसके जरुरत से बड़े जिस्म पर लेती हुई थी बस चेहरा थोड़ा ऊपर उठाये.

"इतना कुछ जानते हो और फिर भी यहाँ अकेले आ गए? ये लोग चाहते क्या है और तभी तुम वो सब कर रहे हो जो ये चाहते है?"

"आपको अपना सच भी तोह नहीं पता. मैं तोह बस अपने होने का कर्त्तव्य निभा रहा हु लेकिन आप एक आशिक़ की सनक का परिणाम हो. खूबसूरती भी वैसी हे जैसी उन्हें याद होगी और नाम तोह है हे अनामिका. इसके सिवा कोई दूसरी वजह नहीं है की आप हवेली की बहु हो. और मैं सिर्फ ये बाहरी आवरण को जानता हु, इसकी गहराई में जाने वाले जो रस्ते है उनका शायद इन लोगो को भी नहीं पता. हवेली की बहु आप हे रहोगी लेकिन इतने वो तपिश अंदर हे रखना जिसमे झुलस रही हो. मेरा प्यार भी उसको पूरा सुकून नहीं दे सकेगा. जैसे आजतक रहती आयी हो, वही कुछ समय बरकरार रखना बस.", अर्जुन ने इस बार ाठचे से अनामिका को अपने आलिंगन में भर लिया. Khud-ba-khud अनामिका भी उसके सीने से लिपट गयी. वो इंसान था भी हक़दार को उसका हक़ देने वाला जिसके खुदके रास्ते अभी स्याह गहरे अन्धकार से भरे थे लेकिन वो जानता था की जल्द हे एक कड़ी हाथ लगने वाली है. कुछ वक़्त अनामिका उसकी बाहों में सुकून से लेती रही.

"मुझे आज नाश्ते पर महल जाना है. जब आप उठने लगे तोह मुझे भी जगा देना.", अर्जुन करवट करते हुए अनामिका को वापिस बिस्टेर पे ले आया सीने से. लेकिन वो अलग होने की जगह अपने गाल उसके होंठो पर बहोत आहिस्ता से सहलाने के बाद चेहरा ठीक सामने ले आयी.

"मुझे किश करना सिखाओगे जैसे अभी किया?", और अर्जुन ना में गर्दन हिलता मुस्कुराते हुए मन करने का दिखावा करने लगा तोह खुद अनामिका ने हे ये जोखिम उठाया. लेकिन इस चुम्बन में तड़प के साथ साथ मौन स्वीकृति थी की अनामिका इस खामोश जुंग में हमेशा उसके साथ है और पास भी. अर्जुन जितना उसके पहलु में खोने लगा, अनामिका की चाहत उतनी ज्यादा बढ़ती गयी. अर्जुन का हाथ पीठ से सरक कर कपडे के ऊपर से अनामिका के पुष्ट कूल्हे पर आया जो पाँव वो उसके ऊपर रखे थे, खुद अनामिका ने अपने हाथ से उसका हाथ वह मजबूती से दबा लिया. न कोई हरकत करने दी न अलग किया. विनोद सचमुच अँधा था जो इतनी बेहतरीन प्रेमिका को न प् सका जो 7 फेरो से उसकी बीवी तोह बानी पर उसके दुराचार ने बस जख्म हे दिए थे, प्यार अर्जुन ने सिखाया.

"उम्म्म", ये पहली आवाज थी और अब होंठो की जुंग जिव्हा द्वन्द तक बढ़ गयी. मजबूत बड़े पंजे में अपने कूल्हे का मांस जकड़े जाने से हे अनामिका कांपने लगी. वो खुद को हे अर्जुन में समाहित करने का प्रयास करने लगी थी जैसे वो इस दुनिया में अब अस्तित्व रखा हे न चाहती हो. जल्द हे वो शांत हो कर अर्जुन के सीने में फिर से दुबक गयी. हाथ सिर्फ अर्जुन का हे अब उस ख़ास जगह था.

"तुम्हे उसके साथ नहीं देख सकती बस इतना ध्यान रखा. मज़बूरी में हो सकता है वो तुम्हारे लिए जरिया हो आगे बढ़ने का पर कोशिश करना की वैसा इस घर में न होने पाए.", अर्जुन ने भी ये सुन्न कर एक बार स्थिर सोये बचे को देखा और अपना हाथ नितम्ब से हटा कर अनामिका के गाल पर रख दिया, सहलाते हुए.

"जलन हो रही थी मुझे उसके साथ देख कर?"

"बर्दास्त नहीं हो रहा था लेकिन कैसे दूर कर सकती थी उसको? वो न बीवी बन्न पायी, न बेटी और न इंसान. अपने भाई की गॉड में निर्लज्जता से बैठ कर कैसे khule-aam अपनी मासूम बेटी को दांव पर लगा दिया उसने? ऐसा पहली बार तोह नहीं हो रहा होगा न? सुना था के वो संस्कारी भाई किस उपाधि से पुकार रहा था बड़ी बहिन को? एक पल के लिए तोह मैं किसी को भी तुम्हारे पहलु में बर्दाश्त कर लू पर ऐसे मानसिक बीमार को नहीं जो एक रिश्ता भी न निभा पाए. एक से बढ़ कर एक हैवान है यहाँ लेकिन तुम मासूम हो चाहे जानकारी जूता कर आये हो. इनका सामना अकेले नहीं कर पाओगे."

"वो हैवान इनसे कही बड़ा है जो मेरे अंदर रहता है अनामिका. समय आने दो, तुम हे शांत करके इनका जीवन बचने वाली बनोगी. वो उपकार इन्हे तुम्हारे कदमो में लेने के लिए काफी होगा.", अर्जुन ने हलके से माथे को चूमने के बाद अनामिका को बाहों में लिए हे आँखें बंद कर ली. अनामिका फिर से एक छोटी नींद लेने से पहले काफी हद्द तक सुकून में थी. वो नहीं जानती थी अर्जुन किस हैवान की बात कर रहा था लेकिन इस मासूम हैवान का बड़ा दिल और सच्चा प्यार बहोत था उसको अपने बेटे के साथ बाकी जीवन बिताने के लिए. इस बार की ये नींद बहोत sukoon-daayi थी जो 5 बजे हे टूटी जब मीणा ने बाड़े में जाने से पहले बहार दरवाजे पर दस्तक दी. अर्जुन सोया रहा और उसके चेहरे की मासूमियत दिल में भर कर अनामिका पीछे होने लगी तोह खुद हे शर्म से दोहरी हो गयी. सीना बेपर्दा था लेकिन गनीमत अर्जुन सोया हुआ था. बिस्टेर से उठते हे एक बार फिर वो हवेली की बहु बन गयी थी जो तैयार होने के बाद जब कमरे से बहार जाने लगी तोह समय साढ़े 5 हो चूका था.

"अर्जुन नहीं उठा बहु?"

"ज्यादा थकान होगी माँ जी शायद कल अभ्यास की वजह से. 6 बजे उठा देती हु. फिर अर्जुन ने शहर जाना है 7 बजे जैसा मुझे बताया.", चाय की ट्रे रखने के बाद अनामिका दूध की बाल्टी उठती रसोईघर में जा चुकी थी. यही जीवन था उसका और इस तपिश में अर्जुन ठीक वैसी हे बरसात बांके आया था जो बीती रात हुई. उम्मीद से परे और गर्मी सोखने वाली.

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"आज तोह 6 बजे हे तत्काल पंचायत लगी थी और सुना है सरपंच जी ने अपने हे भाई को बेदखल करने के साथ साथ उसके हिस्से को गाँव सुधार में लगाने का फैंसला दिया. वो तोह शारीरिक सजा देने का भी फैंसला सुना रहे थे लेकिन दार जी ने पहली सजा हे मुक़र्रर की है.", ये मंजे वाले की धर्मपत्नी थी, निहाल की माता जी जो गुरुघर से बहार निकलते वक़्त दीपा के साथ बतिया रही थी. दीपा भाभी के तोह चेहरे से हे पता चल रहा था के गुरुघर आने के बाद भी वो अशांत है. निहाल की माता जी के साथ उनकी बेटी भी थे, रेनम कौर. थोड़ी संजीदा और काम बोलने वाली 21 वर्षीया युवती जो अपने छोटे भाई से एक साल हे बड़ी थी.

"शब्बीर की भी खबर लगी मुझे बहिन जी. सुना है उसकी तलाश हो रही किसी मामले में? और क्या हुआ पंचायत में? चौपाल पर लगती तोह जानकारी भी मिलती लेकिन आज तोह चौपाल पे एक भी बाँदा नहीं दिखा."

"दिल्ली ने नई बताया तुझे? मुझे भी इनकी बातें सुन्न कर हे पता चला. पंचायत से तेरे जेठ के साथ दिलबाग और शहीद भी आये थे पर शहीद अंदर आये बिना हे निकल गया शहीद के हे साथ. कोई मसला हुआ है क्या उसका तेरे साथ?"

"नहीं बहिन जी ऐसी तोह कोई बात नहीं है. बस आपको पता हे है के कुछ महीनो से घर आने का इनका समय हे नहीं. पहले भी तोह अपनी मर्जी के आप हे मालिक थे.", दीपा भाभी कल से हे जान न चाहती थी लेकिन पूछने की हिम्मत भी नहीं थी. पर निहाल की माता जी की जगह रेमैन ने जवाब दिया जिसको सुन्न कर दोनों महिलाये ठगी रह गयी.

"वो कोई नए प्रधान जी पर हुम्ला किया था कल अखाड़े में कमलेश चाचा ने, जान लेने की कोशिश थी भाभी पर सफल न हुए. पाह जी (दिलबाग) किसी दबाव में उसका साथ दे रहे थे इसलिए उन्हें सिर्फ इतनी सजा मिली है की वो 2 हफ्ते खेत में नजरबंद रहेंगे. शब्बीर और रंगी की तलाश चल रही है कुछ मामलो में और दोनों अक्सर पाह जी के हे खेत पर आते जाते थे देर रात. नीला सही कहता है की ये अर्जुन प्रधान समझदार इंसान है जिसने ऐसी सजा सुनाई नहीं तोह आप हे जानती हो की जान लेने की हिमाकत वो भी पिंड के मालिक की तोह बदले में जान हे लेनी थी. लेकिन इतना साफ़ है के पाह जी को बहकाया गया था. नीला हर टाइम आजकल अर्जुन ये अर्जुन वो हे करता रहता है. जाने कैसा सूरमा है और 2 दिन हुए नई, 2 पंचायत करवा दी.", रेनम बात कहते कहते हे खामोश हो गयी जब धीमी गति से वो खुली जीप चलती हुई ठीक उनके सामने आ रुकी. सफ़ेद कमीज, सलेटी पतलून और पाँव में शाही मोजरी पहन हुए वो युवक अपने भूरे चश्मे घडी बंधे हाथ में लेने के बाद दीपा भाभी का आशीर्वाद लेने के बाद निहाल की माता जी से भी वैसा करके रेनम को बस नमस्ते करने के बाद वापिस गाडी में बैठ निकल गया. उस अद्भुत आकर्षण और उसकी शक्शियत देख रेनम तोह भौचक्की हे रह गयी.

"आया स कल निहाल दे नाल. बड़ा हे साहू मुंडा है दीपा और समझदार भी. देख रेनम ने बताया न की दिलबाग की पहले जांच करि फिर उसको सजा भी ऐसी दी जो कही से भी सजा नहीं. रब्ब बस इस नेक बन्दे का ख़याल रखे. खबर सुनी है के आज कोकि बहिन जी वि आ रही है?", अपनी माँ को किसी का गुणगान करते देख रेनम से रहा न गया दीपा भाभी का जवाब सुन्न ने तक.

"ये मुंडा कौन था बेबे? जुबान नई थी इसके मुँह में और गाडी बस मुझे ताड़ने के लिए रोकी तोह आपने भी सर पे हाथ रख दिया?"

"ओह चुप कर कमलिये, थोड़ा सोच के बोलै कर. इसकी तोह बात तू सुना रही थी हमारे साथ. अर्जुन पुत्तर था वो और तू शायद कल मिल न सकीय इस से जब ये घर आया था. निहाल का वजीफा मंजूर हो जाना मेले में पाँव रखते हे जो इसकी वजह से हो रहा. दीपा का घर भी ये दिलदार बचा गया और तेरे सामने हे इसके पाँव छू कर बता भी गया की वो बन्दे की कदर करता है अपने रुतबे की नहीं. बोलने से पहले सोचा कर थोड़ा.. ताड़ना की हुँदा?", अब रेनम लाजवाब थी जिसके अंतर्मनन ने पुष्टि कर दी थी की असलियत में हुआ इसका उल्टा था. वो हे देख रही थी उस युवक को इतने ध्यान से और उसके देखने की वजह से हे वो रुका था जब उसने मुँह बना कर फेरा था.

"हवेली डा मुंडा है, गिरगिट वि निकल सकदा. अँधा विश्वास न किया करो बेबे. मैं चलती हु घर, आप जाओ भाभी के घर. इन्हे भी तोह बातचीत करनी होगी आपसे.", रेनम वही से अपने घर की और निकल दी क्योंकि आगे दीपा भाबी का हे घर था. जो इतनी देर से खामोश रह कर यही सोच रही थी की अर्जुन किस मिटटी का बना है. गाँव की सड़के इस तरह से बानी थी की जितनी मर्जी बारिश हो पानी ढलान से होता हुआ इर्द गिर्द बने 3 जोहड़ों में हे एकत्रित होता था. और रात वाली बारिश ने तोह बस मौसम बेहतर किया था कीचड़ करने की जगह. रेनम अपनी हे धुन्न में जा चुकी थी और अब ये दोनों महिलाये अपने एकांत में थी.

"तू कुछ बोल नहीं रही दीपा. देख मेरी सहेली होने से पहले मैं तेरी चची भी लगती हु. कुछ ऐसा है जो तू अपने में हे रखे हुए है तोह बोलने से दिल हल्का हे होगा. आज राणो तक बहार नहीं निकली जबकि तू खुद कहती है की अंदर वो खुश नहीं रहती."

"ध्यान हे नहीं रहा बहिन जी. ये बाँदा पता नहीं कौन है असलियत में? जान लेने वाले को कोई कैसे माफ़ कर सकता है? और ये जानते हुए भी मैं उस इंसान की ब्याहता हु वो मेरा सम्मान करके गया, आपके सामने.?"

"लोग तोह 2 हे तरह के होते है हरमनदीप, ाचे और बुरे. फिर ऐसे नसीब से दीखते है जो ैछै और बुराई को एक तरफ करके इंसान को इंसान मानते है. निहाल सही कहता है उसके लिए की वो बाँदा सबकी कदर करता है. नहीं तोह जान लेना कौनसा मुश्किल काम है इनके लिए? हवेली से कितने बरसो बाद कोई मुखिया निकला है नहीं तोह बड़े प्रधान जी और छोटे प्रधान जी हे सुन्न रहे थे वड्डे पंडत जी के बाद, जैसा दार जी ने बताया. ख़ास इंसान समय तोह लेते है आने में लेकिन वो अपनों का दुःख दूर करके फिर लौट जाते है. दिलबाग उसकी नजर में साफ़ है तोह खुद हे सोच की वो लड़का कितना गहराई वाला होगा. तुझे शायद पसनद भी करता है, सम्मान था तेरे लिए उसकी आँखों में.", दीपा का तोह दिल ये सुन्न कर हे ठंडा पड़ गया की अर्जुन अब उस से कभी जुड़ा नहीं हो पायेगा चाहे वो मिलने आये या न. अपने चरित्र और अनकहे वाडे से हे वो उसके दर्द को सोख कर दिल में उतर चूका था जिसका इम्तिहान जाने वो कैसे लेने वाला क्योंकि एक वादा तोह वो भी करके गया था.

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"कौन हो साहब? अंदर नहीं आ सकते जबतक मुलाकात का purv-byora न हो.", अर्जुन जीप में बैठा हुआ उस सुरक्षाकर्मी की बात सुन्न कर मुस्कुरा रहा था. इस बड़े सफ़ेद महल के चारो तरफ हे घने बगीचे थे जैसे दर्जनों माली सिर्फ इन्हे सजाने में हे दिनरात लगे रहते हो. यहाँ तक पहुंचने में भी उसको ज्यादा समय नहीं लगा था और न परेशानी हुई.

"देखो रजिस्टर पे कही क्सक्सक्सक्स गाँव से किसी के आने का लिखा है? या फिर ऐसा नाम जो पहले न सुना हो?", अर्जुन चस्मा लगाए इत्मीनान से सीट पर बैठा था और उसके हावभाव देख ये व्यक्ति मुलाकात के लिए बताये लोगो के नाम देखने लगा.

"साहब सिर्फ एक नाम है आज के लिए क्योंकि आज रानी माँ या कुमार साहब किसी को समय नहीं देते. आपका नाम क्या है.?"

"गेट खोलो भाई वो मेरा हे नाम है. पंडित अर्जुन शर्मा.", जिस तरह से आज पहली बार खुद अर्जुन ने अपना परिचय दिया था खुद उसको मजा आ गया ऐसा बोलने में और वो व्यक्ति एक आदमी को इशारा करते हुए तुरंत दरवाजे के सामने आ कर उसके कपाट खोलने लगा. नहीं तोह गाडी अंदर ले जाना साफ़ मन था.

"धन्यवाद भैया."

"मालिक स्पष्ट हिदायत थी की आप आ रहे है और आपके सिवा किसी को आने न दिया जाए. कुमार अर्जुन शर्मा जी के नाम से परिचय दर्ज है और हिदायत है की आपको मुख्यभाग तक सेवक हे ले कर जाए.", वो व्यक्ति तोह भयभीत हे हो गया था पर अर्जुन सामने उन गोलाकार फुहारों को देख रहा था जो बेमतलब चल रहे थे जबकि उनके पानी से किसी का भला नहीं हो रहा था. उनसे आगे हे इस 30 फ़ीट चुआड़ी गुलाबी पत्थरो की सड़क पर वो प्रवेशद्वार था जहा से महल में प्रवेश किया जाना था.

"जो जिस काम पे है उसको करने दो भैया. हम खुद रास्ता जानते है और दरवाजा खोल कर आपने पहले हे मदद कर दी है.", अर्जुन ने अंदर जाने से पहले अभी देखा था की एक तरफ बहार हे सुरक्षाकर्मियों का बनकर बना था जिसको वो नजरअंदाज कर आया था. वो गाडी की जाँच करने आगे बढ़ हे रहे थे के पहले वाले ने उन्हें हाथ हिला कर ऐसे मन किया जैसे गलती मैट करो. अर्जुन हँसता हुआ जीप का गियर दाल उस चमचमाते दरवाजे की और बढ़ चला जहा नाश्ते के बाद उसकी खोजबीन शुरू होने वाली थी. आज हे वो इस से पहले पड़ती उस खंडहर हवेली में जाने का इरादा बना चूका था जिसके बारे में भैया ने बताया था.

"हाँ जी बड़ी जल्दी में दिख रहे हो. ये बरसो पुराणी जीप और रसूख जैसे यहाँ के मालिक हो. बीटा गाडी महल से बहार रहती है. उन हरामखोरो ने बताया नहीं?", सफ़ेद और भूरे घोड़े पर सवार ये व्यक्ति कुछ पक्के रंग का और ज्यादा हे घमंडी था. तक़रीबन 40 बरस का और शरीर उम्र के हिसाब से बेहतर, शायद घुड़सवारी और कसरत वजह होगी ाचे खानपान के साथ.

"आपका परिचय जनाब?", अर्जुन उसके आदेश की अवहेलना करता हुआ जीप से उतर कर घोड़े का सर सहलाने के साथ वो ढीली लगाम देखते हुए बोलै. जीप सचमुच ठीक द्वार के सामने एक तरफ कड़ी की थी उसने.

"कुमार संतोष सिंह, साम्राज्ञी रानी साहिबा सौंदर्य जी के भांजे लगते है हम. और तुम हमसे हमारे हे महल में परिचय मांग रहे हो."

"ाचा लगा आपसे मिल कर संतोष जी. नाचीज को पंडित अर्जुन शर्मा के नाम से पहचान लीजिये. भविष्य में मुलाकात अक्सर होती रहने वाली है.", अर्जुन उसको वही घोड़े पर सवार असमंजस में छोड़ द्वारपाल की तरफ बढ़ गया. उसके बोलने से पहले हे उस घनी मुचो वाले vardi-bandook धारक ने अदब से सर झुकाते हुए लकड़ी का 10 फ़ीट ऊँचा द्वार खोल दिया, हाथ अंदर जाने के लहजे में लहराते हुए.

"वीरभान, ये युवक बिना तलाशी के तुमने अंदर जाने दिया.?", अर्जुन संगमरमर के उस विशाल दरबार में जा चूका था जहा कभी सुनवाई होती थी लेकिन समय के साथ ये बस एक राजघराने का हॉल मात्रा था.

"आदेश है हुजूर की कुमार अर्जुन जी को परेशानी होने पर तत्काल प्रभाव से बर्खास्तगी का. कल से सब तैयारी इनके हे लिए तोह हो रही थी.", वीरभान द्वारा उचित परिचय मिलते हे ये व्यक्ति तुरंत घोड़े को आजाद करता दरवाजे की तरफ लपका.

"अबे पहले बता देता उल्लू के पट्ठे. ये सचमुच इधर आ पंहुचा और मैं इसको हे धमका रहा था.?"

"हुजूर, देख के तोह नहीं लगा के आप पर ध्यान भी दे रहे थे. सोमवार को यहाँ आज से पहले तोह कोई नहीं आया जबसे मैं नियुक्त हुआ हु. और इस जलवे से तोह स्वयं राज्यपाल जी भी नहीं आते की बड़े कुंवर साहब की जगह गाडी कड़ी कर दे. आज्ञा थी की कोई रोकटोक न हो. पता नहीं जिसने नाम पुछा था उसकी नौकरी रहेगी भी या नहीं.", यहाँ तोह दरबान हे संतोष पर भरी पड़ गया था जो उसकी बात से उत्तेजित होने के बाद जब भीतर दाखिल हुआ तोह पहली बार एक अलग नजारा था उसके सामने. रानी माँ सौंदर्य को गले लग के मिलता ये पहलवान सा पंडित उसके बाद वैसे हे अमृता और कुमार महेंद्र से भी. विभिन्न तरह के फूल तोह बरसाए जा चुके थे इतनी जल्दी हे और खुद रानी माँ उसके माथे को चूमने के बाद उसका तिलक कर रही थी.

"आओ संतोष आओ और इनसे मिलो. आप है कुमार अर्जुन, हमारे एकमात्र नूर और कुमार महेंद्र समकक्ष. अर्जुन ये हमारे मां जी के पौत्र है संतोष, नालागढ़ प्रान्त के संरक्षक के पुत्र. आजकल हमारी सेवा के लिए यहाँ व्यस्त है.", इस परिचय ने तोह संतोष के झांट हे सुलगा दिए थे. लेकिन जब स्वयं रानी माँ ने परिचय दिया हो और उसके बा कुमार महेंद्र ने अर्जुन को दोनों हाथो से maanik-mayaan वाली शाही तलवार सौंपी तोह वो समझ गया के कुछ भी गलत नहीं कहा गया.

"क्षमा चाहते है हमारे व्यवहार के लिए कुमार. आपने अधूरा परिचय दिया था बहार और हम किसी पंडित से वाकिफ नहीं है. भूल हो गयी."

"भूल तुमने फिर से की है संतोष. पंडित जी सर्वेसर्वा रहे है जिनका प्रमुख अंश आपके सामने रहा है. हम उनका नाम लेने की गुस्ताखी नहीं कर सकते. दीवारे खुद बयान करती है की वो हमारे लिए पिता तुल्य है. ध्यान रहे ऐसा फिर न होने पाए.", रानी माँ की मीठी झड़क सिर्फ इस वजह से थी क्योंकि अर्जुन अभी भी उनको एक तरफ से अपने साथ लगाए था जैसे वो सचमुच उनका हे एक अंश हो. अमृता तोह इस पल में भी महंगे कैमरा से ये तस्वीरें ले रही थी.

"क्षमा चाहते है रानी माँ. पंडित जी परिचय के मोहताज नहीं है. कुमार अर्जुन आपसे भी हमे ksham-daan की आशा रखते है."

"अब आप जरूर गलत कर रहे है. मैं आपसे छोटा हु और आपका हक़ है कहने का. बस ये देख लीजिये की बेवक़्त घर में सिर्फ वही आ सकता है जो आपका अपना हो. गलत तोह नहीं कहा न मैंने दादी जी?", अर्जुन ने उन्हें रानी माँ की जगह स्पष्ट दादी कह दिया था. यही एक पल था जब वो उसके सीने से जा लगी.

"तरस रहे थे की तुम ऐसा कहोगे हमे. लेकिन दिल यही कहता था की वचन पंडित जी का है, सुकून दे कर हे जाएगा. मेरे व्रत आज पूरे हुए मेरे बचे.. पूरे हुए मेरे व्रत. अमृता, उद्यापन की तैयारी करो. आप सभी नाश्ता कर सकते है लेकिन हम आज अपने बचे को खिलने के बाद ये व्रत खोलेंगे. प्रभु शिव, मान हे गए आखिर."

"नारायण कहिये दादी जी. वो मान गए इसलिए शिव माने लेकिन मैं उन दोनों के सम्मुख नहीं बैठने वाला. आपके सामने बैठ कर इन्तजार करूँगा और व्रत का उद्यापन तभी पूरा होगा जब मैं अपने हाथो से खिलाऊंगा. फिर साथ में खाते है.", अर्जुन जैसे चाँद मिनट में हे यहाँ अधिकार जमा चूका था जो सामने वालो ने भी स्वीकार किया.

"सभी सेवक महल से बहार जा सकते सिवाए खानसामा के. हम पूजघर जा रहे है और मिलते है आप सभी से कुछ समय उपरान्त.", अर्जुन को अपने साथ ले जाते हुए रानी माँ ने स्वयं हे उसकी कलाई पर अपने रुमाल से निकाल कर तुलसी की माला पहना दी. जो जाने कबसे उनके पास थी. उनके आदेश पर खुद महेंद्र और अमृता मुस्कुरा दिए लेकिन एक दूसरे को हाथ ऊपर उठा कर दिखते वो व्यक्तिगत हॉल की और चल दिए. संतोष आदेश बताने जा चूका था सबको.

"इसकी क्या मेहता है दादी माँ?"

"ये बड़ी दीदी की थी. ऐसी हे एक तुमने अपने वह भी देखि होगी. दोनों को अम्मा जी ने हे दी थी ये पवित्र तुलसी. दीदी ने अपनी मुझे पहना दी और देखो वही दुनिया से चली गयी इसको देने के बाद. छोडो वो सब दर्दभरी बातें. आज मेरा बचा घर आया चाहे वो या रहने वाला नहीं लेकिन आया तोह है. आज दिन भर तुम मेरे साथ हो.", यहाँ न पहले वाला वो कुमार सन्दर्भ था और न शाही सम्मान. मातृत्व से भी अधिक स्नेह था जैसे गरम ताप्ती जमीन पर बारिश हो गयी हो. अर्जुन ने ऐसी हे माला अपने दादा जी के पास देखि थी और इसको धारण करते हे उसने हलके से चूम लिया. जबतक ये दोनों उस मंदिर तक पहुंचते वह काम तेजी से चल रहा था. अर्जुन पहले हे रुक गया और उसके साथ हे रानी माँ.

"वैसे अपनी पसंद से रिश्ता कर रहे हो या नियति है इसमें भी.? हम उस लड़की के बारे में पूछ रहे है जिसकी आँखें कुछ ऐसी थी?", रानी माँ के सवाल पर अर्जुन हे झेंप गया और वो उसकी मोहक मुस्कान देख जैसे उन्मुक्त मुस्कुराई.

"अब कुछ भी कहिये दादी माँ, भगवन नारायण और शिव के अंश धारण करने लिखे हे है तोह नियति सही या नियम. धारण तोह करने हे है."

"उत्तम. जानते हो हम कब से ये व्रत रख रहे है?"

"जबसे सारंग यहाँ से गया और दादा जी कभी इधर आये नहीं. मैं आ गया हु न अब तोह आप अपने जीवन को बंधनो से आजाद पाएंगी.", अर्जुन के ऐसे गंभीर जवाब का तोह उन्हें अंदेशा हे नहीं था. कुमार सारंग नाम लेने की हिमाकत तोह उनके बचो ने भी नहीं की थी और यहाँ अर्जुन उसको सारंग कह के बुला रहा था.

"राजा है वो अब."

"भोगदे राजा को यही लेके आना है. देखते है उसकी नियति में उद्धार आपके शंकर करेंगे या मेरे नारायण. बस ध्यान रखियेगा की आपकी वजह से इस देहलीज पर आया हु और आगे भी आऊंगा जबतक ये हमारे बीच रहे. नहीं तोह कदम दुबारा इस ..

"नहीं बीटा.. नहीं.. मैंने बस जीवन गुजरा है अब और नहीं. तुम जो कहो वो मंजूर लेकिन इस अभागिन को और दुःख मत देना. ये व्रत दुबारा रखने की क्षमता नहीं है बेटे."

"आपके दर्द से हे तोह बंधा हु मैं. बहोत बार देखा है मैंने आपको दुआ मांगते बस चेहरा याद नहीं रहता था. आप आज भी वैसी हे है जैसी रघुवीर दादा जी ने बताया था. खूबसूरत, शालीन और सिमित, बस वो चंचलता नहीं दिख रही जो उनकी यादों में कायम थी अपनी दिया के लिए.", अर्जुन की रहस्यमयी मुस्कराहट और इस वृत्तांत को सुनते हे रानी माँ के हाथो से वो थाली निचे जा गिरी जो अभी उठाई हे थी.

"Tum..Tum हो कौन?"

"आपका वही अर्जुन माँ.. Raghu-Ram वाला अर्जुन. पहले वाला थोड़ा सा नासमझ था जो आपके पास आया होगा तोह भी जान न सका के वो क्यों यहाँ आया. मारा गया.. नहीं वो घेरा गया था माँ लेकिन इस बार.. इस बार.. वैसा नहीं होगा. इस मंदिर में हे आऊंगा मैं वापिस उस कंगन को ले कर जो कभी आपकी कलाई पर था. बस वो चक्रव्यूह का अंदरूनी घेरा नहीं दिख रहा जिस का डर आपके साथ जाने कितनो को है. वो भी मिलेगा चाहे 2 बरस लगे या 10. माँ कहा है तोह वादा भी निभाउंगा. आज तक उन अस्थियों को बहाया नहीं गया. हम साथ बहाएंगे. आप करेंगी ऐसा?"

"मेरे बचे.. तू इतना बड़ा हो गया. तू सब जानता है और तूने कभी मुझ तक आने की कोशिश भी नहीं की?"

"आपकी नियति और ये भगवान्. खेल तोह आप भी रही थी न जो 18 का होते हे मुझे गाँव में बांधने लगी थी. ये भूल कर की इस नाम की वजह क्या है? जैसा चल रहा है वैसा चलने दीजिये. बहार आप रानी माँ है मेरे लिए और गलती से भी बात पंडित जी तक नहीं जानी चाहिए. जाने से पहले हम हवेली की चाभी की चाहत रखते है.", अर्जुन ने सामने मंदिर में तैयारी पूरी होती देख कदम पीछे लिए तोह रानी माँ भी उसके साथ इस कोने में आ कड़ी हुई. इस पूरे वार्तालाप में कही कोई आसपास न था क्योंकि ये मंदिर उनके शयनकक्ष से पहले था और उस से पहले सिर्फ गलियारा.

"सब तुम्हारा हे तोह है बीटा."

"गलत. बेशक आपने बचे गॉड लिए और दिखावे के पति जो इंग्लैंड से कभी लौटे नहीं, उनसे उनका हक़ मैट छीनिये. महेंद्र जी सही इंसान है और अमृता जी भी उतनी हे शालीन जैसी कभी आप थी. आखिर में तोह मैंने ऐसे किस्से सुने है न की बता दू तोह आप यहाँ रुकने वाली भी नहीं. रघुवीर दादा जी सचमुच बढ़िया शिकारी थे."

"हट बदमाश कही के.. दादी हु मैं उस हिसाब से तुम्हारी."

"अब रानी माँ नहीं है आप हमारे लिए. उनके राजदार एकलौते हम हे है."

"अज्जू के साथ बुरा हुआ बीटा. वो नेक तबियत था और जब आखिरी बार हमारी उनसे बातचीत हुई थी तब यही पता लगा था के वो कॉलेज जाने लगा है. फिर एक दिन वो इधर आया था और हमारी बजाये जल्दबाजी में सेविका से मिल कर चला गया. ऐसे किसी के सामने आ नहीं सकते थे उस वक़्त."

"उस सेविका की तोह मौत हो गयी होगी?"

"वो वापिस हे नहीं लौटी उस समय के बाद. बस इन्होंहे (रामेश्वर) ने शौक सन्देश दिया था और फिर हमने खुद को अलग कर लिया अपनी मनहूसियत की वजह से."

"करो पूजा आप अपने इष्टदेव की. मैं जानता हु की यहाँ सिर्फ प्यार मिल सकता है सबूत नहीं. खाने की मेज पर तबतक उनका दिमाग खता हु.", अर्जुन जाने लगा तोह भावुक हो कर रानी माँ ने उसको फिर से अपने सीने से लगा लिया.

"ये वाला नहीं मरेगा माँ. इसने माँ को ढून्ढ लिया है और अब जरूर वो लोग सामने आएंगे जो इस सबके मोहरे है. घर में हे रहना शुरू कर दीजिये बस.", अर्जुन ने भी प्रतिउत्तर में उनका माथा चूमा और उस हॉल को पार करते हुए पैनी निगाहो से सब देखने के बाद हे कुमार महेंद्र और अमृता के पास आया. अमृता ने तोह खुद हे उसके लिए बराबर वाली कुर्सी खिंच कर जताया की वो उसका पंसदीदा है महेंद्र से ज्यादा लेकिन कही गर्मी बढ़ चुकी थी इस शेर की दस्तक से.

"ोये कुत्ते के पिल्लै, तू तोह कहता था के राजशाही का कोई वारिस नहीं और जो होगा वो कभी आने वाला नहीं.", ये संतोष था जो किसी पर बुरी तरह भड़का रहा था महल से कुछ दूर एक पीसीओ पर.

"नामुमकिन तोह नहीं कहा था चूतिये. थोड़ा तमीज से बात कर हम तुम्हारे बाप की उम्र क हैं"

"ये तमीज उस से तोह ज्यादा है जितना जलील मैं 2 मिनट में हो गया. लेकिन तुमने कहा था के वो नहीं आ सकता फिर ये मुस्टंडा बेधड़क घुस आया महल में और वो रानी.. वो उसको छाती से चिपकाये अपने शयनकक्ष ले गयी मुझे 10 बात सुना कर. ऐसा हुआ न तोह फिर देख लेना की मैं सबकुछ भोंक दूंगा. ये वारिस मुझे मंजूर नहीं रमाकांत जी.", संतोष ने ये नाम ले कर पुष्टि कर दी थी की वो किस फिराग में है.

"क्या नाम बताया तुमने इस वारिस का संतोष.?"

"बताया हे कहा था अभी. साला अर्जुन है कोई.. पंडित अर्जुन कहो या कुमार अर्जुन. देखने से हे हे पुष्पक से तगड़ा है पर काम उम्र."

"वो इधर भी वारिस बन्न चूका है संतोष. पुष्पक ने हे उसको अपना वारिस बना दिया है. पता नहीं साला कैसी किस्मत ले कर पैदा हुआ है जो पिछले 18 बरस से चैन से न सो सका एक दिन भी और ये आ भी गया दोनों तरफ."

"उधर भी आ गया क्या वो तेहशीलदार?"

"समझ लो की साले साहब भी नहीं रोक सकते उसको आने से. अनामिका की वसीयत बराबर थी बिंदिया और पुष्पक में इसलिए उन्हें हटाया था पर ये साला उन दोनों का वारिस हो गया. 21 का होते हे ये इधर भी ताल थोक देगा. 10 करोड़ दिए इसको साफ़ कर दे नहीं तोह कुछ नहीं मिलने वाला."

"इतने के लिए तोह मैं तुम्हे भी मार दूंगा. एक हफ्ते का टाइम दो पर इधर मेरा हिस्सा 50 रहेगा बुढ़िया के जाते हे."

"सारंग तक बात नहीं जानी चाहिए. बाकी मिल कर देख लेंगे. रामेश्वर के इस पिल्लै को हटाओ.", तहसीलदार ने फ़ोन काट दिया था इसके बाद और संतोष वह से निकल कर अपनी आलिशान गाडी में बैठ अब आगे का सोचने लगा था. प्रेत लौट आया था उसके जीवन में be-mausam बरसात की तरह जिसकी उम्मीद हे नहीं थी.
 
अपडेट 199

प्रेत

Raj-mehal के भोजन कक्ष में जैसे आरसे बाद कहकहे लग रहे थे. महेंद्र और अमृता को तोह लग हे नहीं रहा था के वो अर्जुन से आज पहली हे बार ठीक तरह से मिले है. उनके लिए तोह जैसे वो हमेशा से हे उनके साथ था या फिर वो आज कही अपने जीवन में शाही जीवनशैली के वनवास रूपी समय से बहार निकल कर सामाजिक हुए थे. अमृता तोह थी हे चंचल और हंसमुख लेकिन खामोश तबियत और अपनी माँ की आज्ञा सिवा कुछ बात न करने वाला महेंद्र हंसना बोलना सीख रहा था.

"भैया जब इंग्लैंड गए तोह इन्हे एक लड़की ने पसंद कर लिया और वो बार बार इनसे बात करने आये लेकिन ये कभी इधर तोह कभी उधर. आखिर में जब सामने से माँ आयी तोह जा छिपे उनके पीछे. अपनी हालत तोह क्या बताते ऊपर से ये कह दिया की ये लड़की किसी मकसद से ऊके पीछे है. हाहाहा... असलियत सामने आयी तोह वो माँ की जानकारी वाले परिवार से थी. अब इंसान खुद भी तोह मन कर सकता है न? लेकिन इनके तोह क्या हे कहने.. कुमार महेंद्र जी.. हाहाहा..", अमृता जिस तरह से खिलखिला रही थी खुद उसके बड़े भाई को ऐसा लग रहा था के आज वो जीवित महसूस कर रहा है. इतनी मोहक और स्वाभाविक हंसी वो भी इस महल के भीतर. अर्जुन भी किस्से सुनता हंस रहा था और अमृता बार बार उसका हाथ पकड़ कर दूसरे हाथ से मेज थपथपाती तोह वो भी जैसे इस चेहरे का हे वजूद पता पूरे महल में. जैसे अमृता हे यहाँ की आत्मा हो जो हंसती है तभी जीवन मुमकिन होता है.

"एनवायरनमेंट बोलते है इसको जी. वैसे मैं आपको चाचा और इनको बुआ कहूंगा या फिर 'जैसा चल रहा है वैसा चलने दीजिये कुमार.", अर्जुन ने अभी रानी माँ की नक़ल में ये पंक्ति कही तोह दोनों भाई बहिन अपना पेट पकड़ कर हंसने लगे थे उसके साथ और फिर एकाएक महेंद्र के चेहरे पर वही गंभीरता आ गयी. रानी माँ हाथ में प्रसाद की थाली लिए जो दाखिल हो चुकी थी इधर.

"अब आपको एकदम से क्या हुआ टिपिकल कुमार महेंद्र जी? हाहाहा.. कही सर्वेसर्वा महारानी जी सौंदर्य माँ तोह नहीं दिख गयी? हेहेहे..", अमृता अपनी हे मस्ती में जब ये बात बोल कर हटी तोह अगली आवाज से उसकी भी वही हालत थी.

"तहजीब भूल गयी है शायद आप कुमारी अमृता?.. जैसा चल रहा है वैसा चलने दीजिये.. तुम हंसती हुई सचमुच आफरीन लगती हो बिटिया.. सचमुच हमे माफ़ कर देना और इस से बेहतर कुछ नहीं हो सकता जब मेरे बचे इन खली कमरों को अपनी हंसी से भर दे. तुम पर हमे नाज है बेटी. बस जरा इस धीर गंभीर महेन्द्रू से भी कह दो की ये नक़ाब बस इस पारिवारिक माहौल से बहार वाली दुनिया में हे पहने रखे. रंग पक्क गया है थोड़ा लेकिन मुस्कराहट ाची लगती है तुम पर.", अमृता का गाल चूमने के बाद उन्होंने सबसे पहले प्रशाद उसको हे दिया जो हैरानी से अपनी माँ को देख रही थी. महेंद्र भी हैरत में था लेकिन माँ ने जब उसके करने से व्यवस्थित बालो को बिगाड़ते हुए वो ममतामयी आलिंगन देने के बाद खुदसे हे प्रसाद खिलाया तोह आज जैसे पहली बार उस पत्थर से सख्त और नियम सर्वोपरि व्यक्ति की आँखों में पानी आ गया.

"ऐ भाई तुम तोह रोने हे लगे. माँ मैं न कहती थी की ये आपकी बेटी है अंदर हे अंदर और हम बेटे? अर्जुन तोह बस कोहनी टिकाये माँ और बेटे के इस खूबसूरत पल को देख रहा था और जेहन में जैसे हे उसकी माँ की तस्वीर उभरी, आसपास की हंसी को भुला कर वो चेहरा निचे करते हुए बस वही पहुंच गया जहा वो आज भी छोटे बचा था उनके पहलु में चैन से सोता हुआ. उसकी माँ ने भी तोह कभी ये एहसास तक नहीं होने दिया की वो उनसे भी बड़ा हो चूका है. हमेशा वो उसको अपनी ब्याह पर या सीने से लगा के चाँद मिनट में चैन की नींद तक ले जाती थी.

"अर्जुन बीटा, तुम ठीक हो?", प्रसाद अपने हाथ से उसको खिलने आयी रानी माँ ने उसके सर को स्पर्श किया तोह अर्जुन तुरंत पहले सा हो गया.

"जी रानी माँ हम बिलकुल ठीक है.", अर्जुन के ऐसे जवाब पर वो नाराजगी दिखती हुई अपना हाथ पीछे ले जाने लगी तोह अर्जुन ने लपक कर वो हाथ पकड़ लिया.

"हम तुमसे बात नहीं कर रहे."

"मैट कीजिये क्योंकि खाते समय बात करनी भी नहीं चाइये. आए कजिये.. हाँ ऐसे. अब यहाँ बैठिये और हमारी मजाक मस्ती के लिए खेद प्रकट कर सकते है पर माफ़ी नहीं मांगने वाला हम तीनो में से कोई भी.", अर्जुन ने वो प्रसाद उन्हें हे खिलाया अपने हाथो से. जितना हक़ आज इस युवक ने घंटे भर में दे दिया था या ले लिया था ऐसा न अतीत में हुआ था न अब किसी और के लिए भविष्य में मुमकिन था. इस बार आँखें नम्म होने की बारी रानी माँ की थी. लेकिन मुस्कान के साथ अर्जुन का माथा सहलाते हुए.

"हम भी नहीं चाहते के वो दिन आये जब तुम्हे ऐसा गुनाह करना पड़े. महेंद्र, खानसामा को बोल दो की भोजन लगवा दिया जाए और आज हम अपने बेटे के साथ खाने वाले है, एक थाली में. कल से इस पारिवारिक जगह पर काम की बातें नहीं होंगी और अमृता आप अपने शयनकक्ष में संगीत बजाये या धमाका करे, हम नहीं टोकेंगे. नियम देहलीज से बहार पहले वाले हे रहेंगे."

"यार तुम पहले क्यों नहीं आ गए थे.? हमारी तोह ज़िन्दगी के सुनहरे दिन भी ढल चुके तब आये हो. चलो काम से काम आ तोह गए. वैसे मैं क्या कह रही थी माँ, अर्जुन यही रहने वाला है तोह थोड़ा बक्श दो इसको अभी. अभी नाश्ते पर ये मेरे साथ है, दोपहर को भाई के साथ होगा और शाम में कर लेना अपनी ममता की बारिश इस पर."

"नहीं बुआ, मुझे 12 बजे वापिस भी निकलना है. वैसे मैं मिलने के साथ साथ आपको आमंत्रित करने भी आया हु.", ये दोनों बातें सुन्न कर अमृता का चेहरा हे उतर गया.

"आप बुआ कहने से नाराज हो गयी तोह चलो कुमारी अमृता जी कह लेंगे.", अर्जुन ने फिर से मस्ती करनी चाही तोह जवाब महेंद्र ने दिया अपने बहिन को उस तरफ देखते प् कर.

"जबसे पता चला है की तुम उस दंगल में चुनौती उठा चुके हो, माँ और अमृता उस दिन से हे परेशां है. मुझे भी लगता है की जैसे तुमने खुद हे उन लोगो को सही अवसर दे दिया जो इस पल की प्रतीक्षा में बरसो थे. राजपरिवार से उधर कोई जा नहीं सकता लेकिन .."

"लेकिन वेकिन बाद में देखेंगे चाचा जी. आप को तोह बुला हे सकता हु न क्यूंकि कुमारी अमृता जी तोह अभी 18 की हुई है, जिन्हे ऐसा कह कर हम शर्मिंदा नहीं करना चाहते आइंदा. हाँ तोह मैं कह रहा था के ये सिर्फ एक मुक़ाबला है जो मेरे लिए नियमित अभ्यास से कुछ ज्यादा नहीं जितना मैंने गाँव के अखाड़े में देखा. कौनसे दुश्मन और क्या इन्तजार.? एक न एक दिन तोह इस सब पर विराम लग्न हे था तोह इस बार हे क्यों न वो विराम लगा दिया जाए.? उसके बाद फिर मैं व्यस्त हो जाऊंगा और दादा जी ऐसे छोटे मोठे काम की जगह मुझे किताब कॉलेज में हे बंद कर देंगे.", अर्जुन जिस तरह से ये सब गंभीर बातें हंसी मजाक में कर रहा था रानी माँ उसके सर को सहलाती हुई ख़ामोशी से उसके साथ बैठी रही.

"जितना हमने सुना है न अर्जुन, वह कितने हे सियार बहरूपियों की तरह घात लगाए बैठे होंगे. सब बहोत शांत चल रहा है और ये शांति टूटने पर परिणाम बहोत घातक हो सकते है. तुम नहीं जानते की इस बड़े महल में भी जब दिन में 2-2 बार पहरेदार बदलने पड़ते है तोह कैसा लगता है. माँ ने बताया था के कैसे तुम्हारा एक भाई नवजात समय हे... अर्जुन जो गुजर चूका है उस से निकलना जरुरी है. इतिहास में अक्सर षड़यंत्र और गुमनाम कदमो के निशाँ हे मिलते है या दर्द. तुम नहीं जान सकते की वो कौन होंगे या कितने. और हमने तुम्हारा वो परिवार देखा था जहा सिर्फ खुशिया हे थी. उनकी खुशियों से निकल कर इन अनजान शिकारियों से भिड़ना खुदखुशी होगी.", अमृता कहने से रोक न सकीय जो उसके दिल में भरा था. लेकिन अपना दर्द जुबान पर लाने के बाद जब उसने अर्जुन का चेहरा देखा तोह वो कही ज्यादा हैरत में पड़ गयी. वो जैसे कोई और हे था जिसकी सार्ड मुस्कान सीधा भये पैदा करती थी.

"सबको उनके बिल से बहार निकाल कर हे रुकूंगा. वो खुशिया जो आपने देखि थी या जो भये आज भी सबके दिल में है.. ये ज्यादा बड़ा खतरा है. इन्तजार करता राहु की फिर मेरी माँ पर गोली चले, मेरा एक भाई और कुर्बान हो जाए.. कब महेंद्र चाचा की पीठ में छुरा भोंक दे कोई अपना हे सिर्फ राजपाट या जमीर बेच कर? सब.. niklenge..apne बिल से... उस दिन मेरा परिवार चैन से सो पायेगा.. मेरे दादा जी कोई सलाह नहीं देंगे.. आप बिना पहरेदार के बहार निकल सकेंगी और अखाड़े में सिर्फ खेल को खेल की तरह लिया जाएगा. और मैं छोटा नहीं हु, जिस दिन मेरे पिता ने ये कहा था की मुझे घर से बहार अपनी नजर से दुनिया देखनी होगी, अपना मुकाम खुद बनाना होगा तब मुझे समझ नहीं आया था वो क्या कह रहे है लेकिन 3 बरस बाद पता चल गया था और जब बड़ा हुआ तोह आपके सामने हु. अब हम माँ के साथ भोजन ग्रहण कर सकते है आपकी आगया हो तोह, आदरनियाँ मल्लिका इ raaj-mehal कुमारी अमृता जी?", अर्जुन फिर से पुराने अंदाज में आ गया था बात ख़तम करते हुए. लेकिन अमृता ने हलकी सी मुस्कान के साथ बस सहमति में सर हिला दिया बाकी दोनों को हँसते देख.

"चलिए आज मैं आपको खिलता हु. खुदसे तोह एक वक़्त आप खाती हे होंगी.", अर्जुन के प्यार और तंज के सामने रानी माँ ने भी हथियार दाल हे दिए थे और जिस तरह से वो एक एक निवाला ध्यान से उन्हें खिला रहा था बाकी दोनों भी देखते रहे. अखाड़े पर फिर चर्चा न हुई और जब रानी माँ ने बस का इशारा किया तोह अर्जुन ने ना में सर हिला दिया.

"खुराक नहीं लेंगी तोह चलेंगी फिरेंगी कैसे आप? मेरी दादी आदरणीय कौशल्या जी कहती है की खाना जरुरी है और अगर उसमे प्रेम मिला हो तोह भूख से थोड़ा ज्यादा भी खा लेना चाहिए. अब रानी होने के बावजूद खाना भी चुग्गे की तरह खाएंगी तोह फिर लोग संदेह करेंगे. थोड़ा पानी पीजिये साथ में.", अर्जुन कांच के गिलास को उनके होंठो पर लगाने के बाद साफ़ रुमाल से होंठ पांच कर फिर से खिलने लगा तोह ये आखिरी निवाला भी उन्होंने जैसे तैसे खा लिया.

"माँ को एक रोटी से अधिक खाते आज देख रहा हु अर्जुन. यार तुम नाश्ते पर आ हे जाया करो.", महेंद्र के मजाक पर ये दोनों मुस्कुराये लेकिन अमृता तोह प्लेट में चावल के दोनों से जाने क्या चित्रकारी किये जा रही थी. वो अपनी हे सोच में खोयी रही और सबका नाश्ता होने के बाद जब रानी माँ का ध्यान उस पर गया तोह उन्होंने कन्धा हिलाते हुए पुछा.

"तुम खाना नहीं खा रही बेटी? कहा खोयी हो?"

"वो कुछ नहीं माँ.. बस पहले फलाहार कर लिया था भूक लगने पर. अब बस इसलिए शामिल हो गयी की सभी यही है. सेविका से कहते है के मेज समेत दे. अर्जुन माफ़ करना, थोड़ा सर दुःख रहा है इसलिए बाद में बात करते है.", अमृता ने फीकी मुस्कराहट से विदा ली और भीतर वाले हॉल को लगती हुई उन घुमावदार सीढ़ियों को चढ़ती हुई अपने कमरे में चली गयी.

"कोई बात नहीं, आप नाराज मैट होइए. सर कभी भी दुःख सकता है. वैसे आप भी आराम कीजिये दादी माँ, मैं कुछ देर चाचा के साथ बहार टहलने जा रहा हु. आपको सन्देश भिजवा दूंगा सेविका से वापिस आने पर.", अर्जुन भी उठ गया था और बाकी दोनों भी. 2 सेविकाएं बर्तन समेटने के साथ कपडा भी लगाने लगी थी उस काली ठीक के बड़े टेबल पर, जो अपने आप में जैसे साड़ियां देख चूका था लेकिन आज भी चमक पहले सी.

"ऊपर दूसरा कक्ष हमारा है बीटा. किसी से सन्देश भिजवाने की जगह खुद हे आ जाना. ये तुम्हारा भी तोह घर है, नहीं?"

"जी दादी माँ. वैसे सुबह पूरी भी नहीं हुई और महल घर में तब्दील हो गया.", अर्जुन बहार जाने से पहले ये मजाक में बोलै था और उन्होंने उसके सर पर हलके से चपत रखते हुए जवाब दिया.

"जहा परिवार हो वो घर हे होता है. हाँ महलो में मैंने बहोत समय गुजरा लेकिन मुझे घर ज्यादा पसंद है. प्रतीक्षा रहेगी आने की और आप इन्हे घुमा लाये इस घर से आगे वाले महल में महेंद्र. महल उस हॉल से शुरू होता है.", इशारा उधर था जहा एक चौड़ा हॉल लांघने के बाद दरबार था जिसके कपाट इस तरफ से अभी बंद थे. अर्जुन हँसता हुआ जल्द आने का बोल कुमार महेंद्र के साथ इस महल भ्रमण पर निकल चला.

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"जिसकी वजह से हमारी बेटी बहाना करके अपने कक्ष में आ कर बैठ गयी, देख अभी भी उसको हे रही. बताना नहीं चाहती तोह हम इसका सम्मान हे करेंगे लेकिन हम हमेशा से आपकी माँ है अमृता और जितने रंग हमने हमारी बेटी के चेहरे पर उन चाँद लम्हो में देख लिए इतने 38 बरस तक उसको बड़ा करते हुए भी नहीं देख पाए? हो सकता है हम अनजान हो आपके अंतर्मनन के द्वन्द से लेकिन कुछ हद्द तोह सही हो सकते है.", उस कांच लगी आदमकद खिड़की से एकटक बाहर देखती अमृता अपने में हे खोयी थी जो shayan-kaksh में आयी इस मीठी आवाज से सकपका कर पर्दा लगाने हे लगी थी खिड़की पर लेकिन उस से पहले एक माँ ने अपनी बेटी का हाथ अपने दोनों हाथो में ले लिया. पहले तोह रानी माँ ने ये बिना देखे हे कहा था फिर जब उस बड़े उद्यान में सचमुच उजली कमीज और ास्तें कोहनी तक मोड उस आकर्षक युवक को अपने बेटे के साथ देखा तोह होंठो पर गहरी मुस्कान तैर गयी. अमृता नजरे झुकाये बैठी थी जैसे उसके पास या तोह उचित शब्द नहीं थे या वो खुद गहरे विचारो के बीच उलझी थी.

"जानती हो ये लड़का बापू जी से भी ज्यादा आकर्षक है अमृता. उनके किस्से प्रचलित थी दबी छिपी आवाज में लेकिन ये जो खुद सबको नजर लगाने की दावत देता बेपरवाही से घूम रहा है, ये असाधारण है.", रानी माँ की नजरे अभी भी अर्जुन पर हे तिकी थी जो घोड़े को अपने हाथो से घांस खिलता हुआ महेंद्र से किसी बात पर हँसते हुए चर्चा कर रहा था. वो भी अर्जुन की पीठ थपथपते हुए गहरे दोस्त की तरह आगे इशारो से कुछ बताने लगा.

"आप इतना स्पष्ट कैसे बोल सकती है माँ? और हमे ये आकर्षक नहीं लगता. पंडित जी के पिता के बारे में थोड़ा बहोत जानते है जितना आपने बताया और बाकी लोगो ने. तुलना नहीं की जा सकती इतने आरसे के बीच 2 अलग अलग इंसानो की."

"स्पष्ट कह देना हे तोह सीखा है हमने इस जीवन में. और ये तुलना तोह हर वो व्यक्ति करेगा जिसने दोनों को हे देखा है. अकेले बैठ कर हे देखना चाहती है तोह हम इसमें बढ़ा नहीं बनेंगे. वैसे भी हमारे हृदय से जयरा गहरा प्रभाव तोह अर्जुन ने आपके ऊपर किया था उस दिन जब पहली बार सामना हुआ था. लेकिन वो पहली बार नहीं था जिस तरह तुम्हारी आँखें किसी से बातचीत के बावजूद उस पर हे तिकी थी. चलते है और ज्यादा खलल पैदा नहीं करेंगे हमारी बेटी के निजी पालो में.", रानी माँ उठने लगी तोह खुद अमृता ने उनका हाथ थोड़ा दबाव से पकड़ लिया.

"आपको भी सच पता है और मैं भी हकीकत की समझ रखती हु माँ. फिर भी आप वो बात कह रही है जो नामुमकिन है.", अमृता ने इस बार फिर से हिम्मत करते हुए सामने देखा तोह दोनों शक्श कुछ कदम दूर जा खड़े हुए थे. अर्जुन घोड़े के छोटे से बचे से खेलते हुए कोई बात कह रहा था.

"आकर्षण में क़ैद होना किसी के वश में तोह नहीं? आसमान में निकला वो चाँद दिल को सुकून देता है लेकिन उसको पाया नहीं जा सकता पर क्या इस वजह से उसका दीदार भी नहीं किया जा सकता? खैर ये तोह उतनी दूर नहीं है लेकिन कुछ हद्द तक तुम भी सही हो. पर अगर नियति में कुछ होना होगा तोह तुम बदल नहीं सकोगी, दिल में चेहरा बैठ जाने के बाद निकलता नहीं आसानी से. वो बदल सकता है, इतना हम पहली बार इस चेहरे को देखते हे जान गए थे.", रानी माँ की पहेलियाँ कुछ तोह समझ में आयी कुछ ऊपर से गयी अमृता के. लेकिन दिल वाली बात कह कर उन्होंने अमृता के गाल हलके सुर्ख जरूर कर दिए थे.

"वैसे आपके ये बापू जी उर्फ़ बड़े पंडित जी इतने प्रतिष्ठित और संस्कारी होने के साथ जब अनुशाषित एवं नियमो के पूरक थे तोह फिर उनके किस्से मतलब क्या वो गलत नहीं था?", अमृता ने जान बूझ कर बात अब मोतीलाल जी पर घुमा दी थी. वो जैसे अर्जुन के मामले को ज्यादा से ज्यादा अपने तक रखना चाहती थी. ऐसा स्वाभिविक हे था जब पहली बार माँ और बेटी के बीच पसंद की बात चल रही हो.

"हम इस पर राये नहीं दे सकते की क्या गलत था क्या सही लेकिन उनके चरित्र पर कभी कोई सवाल नहीं उठा था. जो किस्से थे उनमे भी ये बात ज्यादा रहती थी की उन्हों ने दुखी को जीना सिखाया. हम तोह हमेशा हे उनकी लिए नन्ही दिया बिटिया रहे जबतक वो स्वर्ग न सिधारे, तोह चरित्र आंकलन नहीं कर सकते हम. शांत स्वाभाव लेकिन जब भड़क जाते थे तोह ये भी नहीं देखते थी सामने वाला कौन है बस अपराध उसूल से बड़ा हुआ तोह जान ले लेते थे, हाथो से हे. ज्यादा तोह याद नहीं लेकिन अक्सर जब वो महल के इस ऊपरी गलियारे से गुजरते थे तोह छोटी माँ भी परदे के पीछे से बस उन्हें हे देखती रहती थी. वैसा तुम भी कर रही हो और सचमुच ये कही बेहतर दीखता है.", अतीत के पालो से निकल कर फिर दोनों माँ बेटी वही दृश्य देख रही थी.

"हमने कुछ और भी देखा था माँ. आपने जैसा बताया की बापू जी, शांत और गुस्सैल दोनों भाव रखते थे मैंने निचे अर्जुन का अलग रूप देखा. वो कुछ अलग था जब मैंने दुश्मनो की बात कही और परिवार की हंसी ख़ुशी वाली, उस एक पल में सचमुच मेरा मैं घबराया था. आप तोह सुन्न कर खुश हो रही थी लेकिन मैं चेहरा देख रही थी जिसमे सचमुच वो व्यक्ति था जो मासूम नहीं था. कुछ पक्के इरादे वाला लेकिन मकसद से भरपूर और खतरनाक. सब बोलते है की ये 18 का है पर लगता क्यों नहीं?"

"इतनी जल्दी चिंतित भी हो गयी? हमारे वक़्त में तोह ऐसा ख़याल महीने ले लेता था... हाहाहा.. उपहास कर रहे है बस. वो ख़ास है तभी पंडित जी ने उसको हमेशा अपने करीब रखा. वो बहार निकला है तोह मकसद से हे और पूरी तैयारी करके जिसका खुद पंडित जी या किसी को भी नहीं पता. लेकिन मकसद ऐसा जिस से सबकी खुशियां और जीवन जुड़ा है जो इनके साथ शामिल है. दिल डरता है हमारा भी लेकिन दूसरा पहलु ये भी है की पंडित जी इसमें शामिल है तोह वो इसको कुछ होने नहीं देंगे. और खबर हम भी रखते है थोड़ी बहोत जनाब की. कल हे 6 पेहलानो की पसलियां चटकायी है इसने अकेले वो भी दर्शको को समझ आ सके उस से भी काम समय में. बापू जी हमारे पिता को एकांत में हमेशा नाम से बुलाते थे जो प्रेम भी था आपसी. ठीक वैसे हे रंग इन जनाब के है जो राजा सारंग को सीधा tu-tadaak और भगोड़ा तक बोल गए. एक दिलेर इंसान जो अपने लिए न सोचता हो और हमेशा दुसरो की छोटी से छोटी ख़ुशी की परवाह करे, उस से बेहतर खजाना कोई नहीं होता बेटी. लेकिन उस पर किसी एक का अधिकार भी नहीं हो सकता. अर्जुन बापू जी से 2 मामलो में तोह कही ज्यादा बेहतर है. दिमाग प्रयोग करने के दायरे और दुश्मन को पता लगे बिना घेरने में. आमने सामने की जुंग में तोह तुम जैसी राजकुमारी दिल हार गयी फिर इन पहलवानो की तोह बिसात हे क्या. चलते है और हमने बता दिया था अर्जुन को की वो सीधा ऊपर से दूसरे कक्ष में बेधक आ जाए. मैं हल्का हो जाए तोह हमारे कक्ष में भेज देना. जरुरी बात भी करनी है हमे.", अब तोह अमृता जैसे जैसे सुनती गयी वैसे हे दिलचस्पी भी गहराती गयी लेकिन आखिर में रानी माँ ने जाने से पहले जो झटका दिया तोह वो स्तब्ध कड़ी उन्हें जाते देखने लगी.

"हैरान क्यों हो रही है आप? गलत कहा क्या हमने कुछ? वो भी स्पष्ट बात करेगा पर समझ नहीं आने वाली इसलिए एक बार फिर से मिलना पड़ेगा. पर्दा कर दो, वो लोग आते हे होंगे.", आज सचमुच जैसे रानी माँ के दिल या दिमाग पर कोई चोट लगी थी या वो हंसना सीख चुकी थी. अमृता जल्दी से दरवाजा बंद करके दर्पण के सामने जा कड़ी हुई. जबसे अर्जुन आया था उसका मैं और दिल अलग अलग दिशा में जा रहे थे. मैं समाज के नियम और शाही रुतबे के उलाहने देता तोह दिल बस जी भर के उसके साथ वक़्त बिताने का. अमृता ने एक बार फिर से अपनी माँ की बातों को मैं में दोहराया और फैंसला किया की ये चाँद चाहे नसीब न हो पर जितना मुमकिन है उतना दीदार जरूर करुँगी. अगले हे पल बिस्टेर पर ढेरो खूबसूरत परिधान पड़े थे जिनमे से जो सबसे ज्यादा लुभाया वो पहन कर अमृता ने खुद को ाचे से तैयार किया. कुछ देर पहले की तरह सर पे शाही तहजीब वाला सपाट चेहरा, ढके हुए बाल और फीका रेशमी परिधान जिस्म पर नहीं था. हलके घुंगराले बाल खुली हवा में साँसे लेते पीठ की तरफ थे, सर के दोनों तरफ अदृश्य से 2 पिन लगाने के बाद. गुलाबी होंठो पर कॉफ़ी के रंग की लाली और कानो में पतले कांटे, जो किसी महीन चूड़ी से थे. गहरी आँखों के बहार भी अमृता ने गीले काजल से कला घेरा जहां कर लिया था और ठुड्डी का टिल जैसे अब जीवंत हुआ.

'बहोत सी बातें करनी है लेकिन तुम समझ रहे होंगे की मैं कुछ ऑर्थोडॉक्स टाइप की टिपिकल लड़की हु. हाँ शादी नहीं तोह लड़की हे हु, चाहे 37 बसंत पूरे हो गए मेरे. हम्म्म. तुम पर वाइट शर्ट जंचती है लेकिन देखो ब्लैक ब्लाउज और ये लॉन्ग स्कर्ट तुम्हारे जितना न सही पर प्रिंसेस अमृता को बराबर खड़े होने लायक तोह बनाते हे है. बँगलेस? नौपे.. जस्ट ओने इन बोथ वरिस्ट्स विल दो.", अमृता सचमुच किसी जवान लड़की सी हरकते कर रही थी. इतनी उम्र उसकी लगती नहीं थी किसी हाल में. अत्यधिक हे गोरा रंग, कोई 26 के आसपास कमर और सीना 32 से एक रत्ती ज्यादा नहीं था. घुड़सवारी, तैराकी और nape-tule khaan-paan के साथ एक सजग दिनचर्या और कमाल के हुस्न की हर मुमकिन देखभाल से वो कॉलेज जाने वाली युवती से अधिक नहीं थी. चौखट पर पीठ लगाए अर्जुन सब सुन्न रहा था जो उसके तैयार होने के बाद से हे इधर खड़ा मुस्कुरा रहा था. लम्बी स्कर्ट को पीछे से देखने के लिए अमृता ने जैसे हे घुअमाव लिया वो बर्फ सी जम्म गयी. अर्जुन जाने कबसे खड़ा था वह और उसने ये भी नहीं सोचा की वो अब अर्जुन की क्या प्रतिक्रिया होगी.?

"दरवाजा नॉक करना एक ाची आदत कहलाती है और कमरा किसी लेडी का हो तोह ये जरुरी भी है.", अब वो फिर से मुद्दा बदल कर उल्टा अर्जुन को हे शिक्षा देने लगी थी जो मुस्कुराता हुआ बिना कुछ जाने के लिए पलटा तोह अमृता ने जल्दी से पुकारा.

"जवाब दिए बिना जा रहो हो.. ये ज्यादा गलत बात होती है और मैं तुमसे बड़ी हु, हाँ बुआ नहीं.", अर्जुन एक कदम बाद हे रुक गया था. और इस बार वो पाँव से चेहरे तक अमृता को देखने का बाद चेहरे पर हे रुक गया. अब जैसे अमृता की बारी थी नजरे झुकाने की.

"पहले से दरवाजा खुला हो तोह शायद फिर से बंद करना चाहिए? नहीं प्रिंसेस अमृता जी? ये आदत इतनी जल्दी नहीं पड़ने वाली जिसका दिखावा किया जा रहा है. वैसे मैं आया तोह रानी माँ से मिलने था लेकिन अपना नाम सुन्न कर कदम अपने आप हे ठहर गए. आप कॉलेज जाने की तयारी कर रही है?", अर्जुन का अर्थ समझते हे इस बार अमृता ने मुँह बनाते हुए जवाब दिया जैसे वो कोई छोटी बची हो.

"फिर भी अंदर आने से पहले आवाज देनी चाहिए थी. और हमे कॉलेज पूरा किये 15 वर्ष हो चुके है इसलिए ये फिरकी तोह मैट हे लो. खड़े हे रहोगे?"

"ये राजकुमारी साहिबा बिलकुल भी महल के नियम नहीं मानती. ऐसा तभी ज्यादा होता होगा न जब रानी माँ महल से बहार हो या देश से? पुराने समय में जरूर होता था की राजा वेश बदल कर प्रजा में घुमते थे लेकिन वो ऐसा अपने राज्य की असलियत जान ने के लिए करते थे. आप का उद्देश्य तोह हमे बिलकुल भी वैसा नहीं लग रहा था.", अर्जुन इस बेहद आलिशान और साधारण से 4-5 गुना बड़े कक्ष के भीतर आते हुए कुर्सी की जगह उस नरम बिस्टेर के किनारे आ बैठा था. और उसकी बात सुन्न कर अमृता फुर्ती से दरवाजे की और लपकती हुई उसको बंद करने के बाद दरवाजे से हे पीठ टिका कर कड़ी हो गयी. चेहरे पर थोड़ा भये था लेकिन ज्यादा आश्चर्य.

"शहहह.. हमे मरवाना चाहते हो माँ से? और तुम खेल रहे थे हमारे साथ ये जानते हुए भी की हम कौन है? और बता देते है की हम पीछा नहीं कर रहे थे. काम से गए थे वह और ऐसा अक्सर करना पड़ता है जब माँ अनुपस्थित हो.", अमृता जो भी कह रही थी शायद अर्जुन उस से सहमत नहीं था.

"महंगी कारे (कार्स) इस नाचीज का पीछा न के बराबर हे करती है और जहा मुझे कोई जानता हे न हो वह तोह बिलकुल भी ऐसा मुमकिन नहीं. रात की वजह से उस खूबसूरत ड्राइवर को तोह पहले सही से नहीं देख पाया था लेकिन कार खुद हे अँधेरे में रोशन रहती है. पहले पूरी घटना देखि, फिर पुलिस को भेजा, शायद जानकारी लेने के लिए क्योंकि केस तोह दर्ज हुआ नहीं जैसा हो सकता था और उसकी वजह ये भी हो सकती है की वो थानेदार जी चाचा से परिचित थे. ऐसा क्या ख़ास दिखाई दिया आपको जो इन्तजार भी किया और फिर घर तक पीछा भी? अगले दिन वही गाडी मॉडल टाउन मार्किट की पार्किंग में कड़ी थी और इस बार शायद संयोग हे था जो मैं फिर से दिखाई दिया. गुरुघर में दुआ कबूल हुई थी या सचमुच उम्मीद थी की वैसा होगा?", अर्जुन समय लगते हुए हर बात रुक रुक कर जैसे बता रहा था अमृता की नजरे झुकती गयी. लेकिन उसके खामोश होते हे अमृता ने अपने लम्बी पलके ऊपर उठाते हुए इस बार भोलेपन से जवाब दिया जिसकी दोनों को हे उम्मीद नहीं थी.

"हम ऐसे बिलकुल नहीं है जैसा तुम शायद हमारे बारे में विचार बना चुके होंगे. सब बिलकुल ठीक कहा तुम्नसे सिवाए कुछ बातें जाने बिना. बुखारा महेंद्र भैया की मिलकियत है है और उस शाम हम वही से निकल रहे थे जब हमने वो मंजर देखा जो कटाई सामाजिक नहीं था. और न उस वक़्त तक हमको खबर थी की वह कौन है. इसलिए हमने नजदीकी चौक पर खड़े पुलिस कर्मचारी को उधर भेजा. हमारी एक दोस्त नजदीक हे कुछ शॉपिंग कर रही थी और वो पुलिस कर्मचारी खुद हमारी गाडी वही खड़े देख हमारे पास वापिस आये. हम वेश नहीं बदलते जैसे तुमने कहा अर्जुन और वह भी उन्होंने हमे जानते हुए खुद जानकारी दी थी घटना की. उसमे कुछ ख़ास नहीं था सिवाए इस बात के की एक भाई अपनी बहनो की हिफाजत कर रहा था जिसमे शायद 3 बदमाश जख्मी हुए थे. लेकिन कानून तोह जांच के बाद हे फैंसला करता है न के निर्दोष कौन है? यही हमने पुछा था.", और ऐसा कह कर अमृता ने एक पल का विराम लिया और स्वयं हे लकड़ी की शाही कुर्सी खींचते हुए अर्जुन के करीब उस पर बैठ गयी. दोनों एक दूसरे के सामने थे, चाँद फांसले पर.

"उनका जवाब था की वो उस लड़के पर हाथ नहीं दाल सकते चाहे हम उनकी शिकायत हे क्यों न कर दे आला अधिकारीयों से. और उस लड़के का सच जान कर हम भी वही करेंगे क्योंकि वो पंडित रामेश्वर जी का पौता है, क्सक्सक्सक्स के प्रधान जी और पूर्व एसएसपी. नहीं जानते की हम क्यों इतने उत्साहित हुए थे इस व्यक्ति को देखने के लिए. शायद माँ से सुने किस्से कहानिया, पंडित जी का वो हमेशा हे हमारे लिए पिता सा प्यार. पहले हम पूरे परिवार से भी मिले थे यही इस शहर में लेकिन जो पौत्र हमने देखा था वो सभ्य और कानून का हितेषी था. ये आवारा लड़का कौन पैदा हो गया उनके घर में जिसकी खबर हे नहीं हमे? इसलिए हम उनके साथ हे तुम्हे देखने आये थे पर तुम उधर नहीं मिले. इन्दर भैया की मोटरसाइकिल वही कड़ी थी जिसको पुलिस कर्मचारी भी पहचानते थे और हम भी. बस उनसे इजाजत ले कर हम वापिस अपनी सहेली की तरफ चल दिए और वो अपने स्टेशन. उस दिन जाने क्यों हम पहली बार किसी का इन्तजार कर रहे थे वो भी 30 मिनट से ज्यादा और जब तुम उस मोटरसाइकिल पर सवार हुए तोह हम अपनी कार को बंद करके बस देखते रह गए उस इंसान को जो मुस्कुरा रहा था अपनी बहनो के साथ हँसता बोलता."

"और फिर उसके बाद घर तक पीछे आने का उद्देश्य राजकुमारी जी? आपको नहीं लगता की किसी par-purush का ऐसे पीछा करना भी उतना हे गलत है जितना बिना दरवाजे पर दस्तक दिए अंदर आना, और पीछा अगर एक सभ्य राजकुमारी करे तोह ये तोह कही ज्यादा गलत बात होती है.", अर्जुन वैसे हे अमृता को परेशां कर रहा था जैसे उसने किया था जब अर्जुन दरवाजे पर खड़ा था कमरे में भीतर आने से पहले. अमृता इस बार किसी नवयौवना सी शरमाई थी लेकिन हँसते हुए.

"तुम्हारा पीछा करने के साथ सवाल जवाब का भी अधिकार हम रखते है चाहे उस वक़्त वो सब अपने आप हुआ हो. शायद तुम संरक्षक और shahi-khandaan का कायदा नहीं जानते, ये वो वचन है जो पंडित जी और इस शाही परिवार को एक दूसरे से जोड़ कर रखे हुए है, बरसो से.", अमृता बेशक अनजाने हे ये बात बोल गयी थी क्योंकि जीवन में ऐसी स्थिति कभी बानी हे नहीं थी की जब दिल की बात इजहार से प्रकट करनी पड़ी हो. लेकिन अर्जुन नाराज होने की जगह शांत रहा.

"मैं न किसी वचन से बंधा हु और न मुझ पर शाही कायदे और कानून लागु होते है राजकुमारी जी. आप बेशक ये बात रानी माँ से पूछ सकती है. साफ़ साफ़ लिखा मिलेगा की वचन पंडित रामेश्वर जी और महाराजा साहब के बीच हुआ था. जानता हु की मैं छोटा मुँह और बड़ी बात कहने जा रहा हु लेकिन यहाँ महल में मुझे आने के लिए विवश नहीं किया गया, मैं अपनी मर्ज़ी से आया हु. जिस तरह मेरे दादा जी संरक्षक है, वैसे हे कायदे से इधर भी एक संरक्षक होगा. उनसे मैं सवाल जवाब कर सकता हु क्योंकि वो हक़ मुझे खुद आपके इस महल और पंडित जी ने सौंपा है. लेकिन मैं इन संधि, नियमो और कानून को समझने में असमर्थ हु राजकुमारी जी. मुझे बस इंसान दीखते है जो दर्द में हो, कमजोर, बेबस या फिर शातिर. इनमे से आप सिर्फ कमजोर और बेबस है. कमजोर इसलिए की जो बात आपको केहनी चाहिए वो कहने की हिम्मत नहीं है, वजह है आशंकित मैं, समाज और परिणाम. बेबसी इन नियमो और कायदो की वजह से क्योंकि राजकुमारी उनके दायरे में जो आती है. अब आप अपनी बात आगे कहिये, जाने से पहले मैं आपकी उलझन का हल करके हे जाऊंगा.", अर्जुन सच कह रहा था की अब उस पर नियम लागू नहीं हो सकते थे और जिस तरह से उसने राजकुमारी को ये एहसास करवाया था उसके पिंजरे और अर्जुन के आज़ाद परिंदे सामान जीवन का अम्रतिए उस कुर्सी पर बैठी कुछ ज्यादा हे सिमट गयी थी. चेहरा झुक गया था अपना सच किसी और के मुँह से सुन्न ने के बाद. अर्जुन ने वो आपस में उलझती नरम पतली उँगलियों के आपसी फंदे अलग करते हुए अमृता के दोनों हाथ अपने हाथो में ले लिए. ऐसा करके उसने अमृता को एहसास दिलवाया की वो वही है, उसके पास.

"हम..

"मैं.. ऐसे बात कहिये, थोड़ा बेहतर लगेगा."

"हन्नन.. मैं बस पता करना चाहती थी की आखिर तुम्हे आजतक इस परिवार से मिलवाया क्यों नहीं गया? और करीब से बस देखना चाहती थी. उतनी दूर से है haav-bhaav से यही लगा के आपस में हंस बोल रहे है.. तुम्हारे जाने के बाद हम.. मतलब मैं कुछ दुरी बनाते हुए अगली मार्किट और फिर मॉडल टाउन तक पीछा करती रही लेकिन वह लाइट हो जाने की वजह से तुम्हे खो दिया, हम घर तक नहीं आये थे.. मतलब मैं नहीं आयी थी. रात हमारे होटल में बिताने के बाद सुअभ जल्दी निकलना था यहाँ वापिस आने के लिए. अवनि, मेरी सहेली है दिल्ली से जो उस दिन साथ थी. वो पास वाले गुरुघर गयी थी अरदास के लिए जैसा वो अक्सर करती है और मैं वापिस कार की तरफ लौट रही थी जब तुम किसी बुजुर्ग को पैसे दे रहे थे और फिर डॉग्स को ब्रेड बिस्कुट खिलने लगे. एक बार तोह मुझे भी लगा था की तुमने मुझे देखा है पर लगा वहां होगा. तुम इस बार मोटरसाइकिल की जगह ब्लैक मित्सुबिशी में थे. मैं अनजाने हे अपनी दोस्त और महल के कायदे भूल कर तुम्हारे पीछे आने लगी पर तुम्हे पार्क के अंदर जाते देख बिना रुके वापिस लौट आयी. नहीं जानती की ऐसा क्यों किया लेकिन हमे ऐसा करके पछतावा भी नहीं था. कुछ वक़्त आजाद महसूस किया था और खुश भी. बस इतना हे था हमारे पास बताने को."

"और रानी माँ से मिलने के वक़्त मेरी फोटो लेने की ख़ास वजह, वह शादी में? कार के अंदर अँधेरा हो सकता है लेकिन खिड़की पर टिका कैमरा बहार की रौशनी से साफ़ दीखता है राजकुमारी जी, इसलिए आप शातिर तोह बिलकुल भी नहीं है. Aur'bas इतना हे था हमारे पास बताने को',", अर्जुन ने ऐसा दूसरी बार किया था जब अमृता के पहले कही बात उसने दोहराई हो. अपनी चोरी पकडे जाने से वो अब बैठने की भी हिम्मत नहीं कर प् रही थी. ये सब बहोत जल्दी हुआ था और अर्जुन उसके हे महल में आने के बाद अब उसके कमरे में उसका हे हाथ पकडे जिस तरह सवाल और हक़ जाता रहा तोह, अमृता ने पहली बार खुद को सचमुच बेबस पाया.

"तुम्हारी नहीं ली थी, वो दृश्य खूबसूरत था और हमने ज्यादा विवाह समारोह नहीं देखे है. मतलब मैंने. तुम्हे क्यों लगा की तुम्हारी फोटो लेंगे? उतने ख़ास भी नहीं हो.", अमृता बस कैसे भी अब अर्जुन से बचना चाह रही थी. ये पहला हे तोह अवसर था किसी पुरुष के साथ एकांत बातचीत का और वो भी उसके खुदके कमरे में. अमृता के खड़े होने पर अर्जुन ने भी हथेलिया छोड़ दी. दिखावे के लिए अमृता कुछ कदम चल कर उस बड़ी अलमारी में taak-jhaak करने लगी. जैसे कुछ ढून्ढ रही हो.

"ठीक है नहीं ली होगी और सचमुच मैं ख़ास भी नहीं हु. आप ख़ास हो और ये ब्लैक ड्रेस भी आपको ज्यादा सूट करती है, ठीक इन ear-rings और खुले बालो के साथ. साथ में खड़ा हो कर ये तोह देख हे सकता हु न की मैं कुछ हद्द तक ठीक लग रहा हु या नहीं? ये हिमाकत आपके भाई साहब के सामने करता तोह गर्दन अलग हो चुकी होती अब तक मेरी.", अमृता की सांसें हे अटक गयी थी जैसे हे खुद को अर्जुन के आलिंगन में पाया, जो पीछे खड़ा एक हाथ उसकी कमर और दूसरे से बालो को पीछे करके अमृता के दाए तरफ के झुमके के साथ साथ चेहरा भी देख रहा था. बड़े दर्पण पर नजर पड़ते हे अमृता सहमने की जगह शर्माती हुई नजरे झुकाने लगी. सचमुच shwet-shyaam रंगो में ये जोड़ी उत्कृष्ट थी. अर्जुन ने अगली हिमाकत करते हुए हलके से अमृता का गाल चूम लिया.

"सजा सोच लीजियेगा क्या देने वाली है इस आम इंसान को इतनी बड़ी गुस्ताखी करने की. जो आप चाहती थी मैंने बस वही किया है और अब चलता हु, रानी माँ से भी मिलना जरुरी है. अमृता..", अर्जुन ने जिस तरह उसके नाम की सरगोशी की थी, अमृता ने आँखें बंद करते हुए उसका हाथ अपनी पतली कमर पर कस के दबा लिया. जुल्फे एक बार फिर से गालो को धक् चुकी थी.

"हमे नाम से पुकारने की गुस्ताखी..

"बस अकेले में करूँगा, जब आप चाहेंगी. बुआ नहीं है न आप मेरी. Bye.", अर्जुन जैसे रेत की तरह उसकी हथेली से फिसलता अलग हो चूका था. अमृता में अब बिलकुल हिम्मत नहीं थी इस गुस्ताख़ को रोकने की. वो कुछ वक़्त वही कड़ी रही और जब खुद को आईने में अकेले देखा तोह उसको भी परदे से धक् दिया.

'अब दृश्य अधूरा है. फरेबी कही का..' अमृता अपनी हे ख़ुशी पर शर्माती हुई बिस्टेर पर औंधे मुँह लेट गयी. आज उसका सुकून खो चूका था और अर्जुन ने जो कहा था वो अमृता के हे दिल में छिपे जज्बात थे. अगले 2 घंटे अर्जुन उसकी माँ के हे कक्ष में बंद रहा था जहा जाने की अनुमति किसी को भी नहीं थी सिवाए सेविका और अमृता के लेकिन जरुरी काम से सिर्फ.

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"पढाई नहीं कर रही तुम? और फ़ोन कहा मिलाया था?", कौशल्या जी कमरे में दाखिल हुई तोह ऋतू बस हैंडल रख कर उठने हे लगी थी.

"वो.. पढ़ हे रही थी दादी लेकिन प्रीती के घर थोड़ी डिस्टर्बेंस थी आज इसलिए यही पढ़ रही थी. ारु का फ़ोन नहीं आया था इसलिए गाँव वाले नंबर पे कॉल लगाया लेकिन वो व्यस्त है.", ऋतू के चेहरे पर उसका बारीक डंडी वाला चस्मा और एक हाथ में पेन देख कौशल्या जी भी समझ गयी की वो सच कह रही है.

"अब तूने क्या उसके साथ टाइम पक्का किया हुआ है जो 12 बजते हे बात करनी जरुरी है? वैसे भी घूम फिर रहा होगा इधर उधर. मुझसे तोह साढ़े 6 बजे हे बात हो गयी थी सवेरे. बोल रहा था के आज कुछ काम से शहर जा रहा है, khel-ghar का सामान भी लेना है उधर. बाकी लौटने पे तोह फ़ोन करेगा हे. मैं बात करवा दूंगी तेरी. ारु का फ़ोन नहीं आया...", बिस्टेर से अखबार समेत कर एक तरफ रखते हुए कौशल्या जी भी उसके मजे लेने से नहीं चूक रही थी. ऋतू कुछ असहज होती हुई कमरे से जाने हे लगी थी की बैठक से आते अपने दादा जी और छोल साहब को देख रुक गयी.

"वो खोता (गधा) महल घूमे पे निकला हुआ है बिटिया. वह नजर रखने वाली तू और मैं नहीं है न तोह उसकी मनमानी ज्यादा हो रही है अब. शाम को खबर लेता हु मैं उसकी ाचे से.", अभी कौशल्या जी ने बिस्टेर समेटा और वो उस पर जा बैठे. एक कुर्सी खुद छोल साहब ने खिसका ली थी ऋतू के हे करीब. कौशल्या जी उन्हें कुछ कहने लगी थी की फ़ोन की आधी घंटी बजते हे ऋतू ने हैंडल उठा के अपने कान से लगा लिया. दूसरी तरफ से आवाज शायद पूरी सुनाई हे न दी की वो भड़क उठी.

"तू ये महल घूमने के लिए उधर गया है? और अकेले जाने की जरुरत हे क्या थी वह पर? दादी को भी तू शहर का बहाना करके गया लेकिन ये नहीं बताया की पहले तेरा महल भ्रमण पूरा होगा फिर बाकी जरुरी काम. पहोच के भी फ़ोन कर सकता था न जैसे अभी किया?", ऋतू की बात सुन्न कर कौशल्या जी ने तोह अपना हे सर पीट लिया और रामेश्वर जी उसके कंधे पर थपकी देते हुए शांत करवाने लगे.

"अरे बीटा थोड़ा नरमी से.. तू तोह लगता है गोली भी चला देगी लाइन पे हे. वो बता कर हे गया था और तेरी दादी तुझे परेशां करने के लिए वैसा कह रही थी. जा बैठक में आराम से बात कर ले और डांटना बंद कर.", अर्जुन दूसरी तरफ हँसते हुए लोटपोट हो रहा था उधर की बातें सुनता हुआ और इधर ऋतू फ़ोन उठा कर लम्बी तार खींचती दूसरी तरफ चली गयी. अब वो हाँ -हूँ कर रही थी और अर्जुन उसको सब बता रहा था.

"ये बचपन से हे उसके लिए कुछ ज्यादा हे फिकरमंद है सतीश. तुम्हारे भाई साहब हे बोल सकते थे इसको, मेरी भी नहीं सुनती जब उस बचे को ये ऐसे धमकाती है. अब तोह वो मेरी नजरो में भी बड़ा हो रहा है लेकिन इसके लिए वो शायद आज भी मुन्ना का मुन्ना है. पता नहीं वो बेचारा कैसे सेहन करता होगा, बोलता भी नहीं पलट कर.", कौशल्या जी की बात सुन्न कर छोल साहब तोह हंस रहे थे वही पंडित जी हाथ के इशारे करते यही कह रहे थे की क्या कर सकते है.

"भाभी जी, वो बड़ी जरूर है अर्जुन से लेकिन दोनों जैसे एक दूसरे की हे परछाई है. अर्जुन भी उसका ऐसे हे ख़याल रखता है जैसे वो उसकी छोटी बहिन हो. बस जिसने गलती करि, दूसरे को मौका मिल गया. हाँ परेशानी वाली बात तोह की इतना लगाव अनजान व्यक्ति तोह सेहन नहीं कर सकता. कोमल बिटिया से ek-ek प्याली चाय हे मंगवा दीजिये. रेनू यही है सुबह से और पारवती आज मुकेश के साथ बाजार गयी हुई है. इसलिए इधर लौट आये हम दोनों.", छोल साहब की लगाव वाली बात बहोत हद तक सच थी पर उन्हें कहा भविष्य पता था. कौशल्या जी रहस्यमयी मुस्कान अपने पति को देती हुई खुद हे रसोईघर चली गयी. ऋतू अभी भी दूसरी तरफ फ़ोन से चिपकी हुई थी.

"वैसे अर्जुन अकेला महल कैसे चला गया भाई साहब? कोई साथ तोह भेजना चाहिए था उसके. अनजान शहर है उसके लिए और सौंदर्य जी बेशक उसका भरपूर ख़याल रखेंगी लेकिन ... आप समझ रहे है न भाई साहब?"

"क्या कहु सतीश इस मुद्दे पर? मैं तोह अभी भी मेले में उलझा हुआ हु और जब खुद सौंदर्य ने उसको बुलावा भेजा तोह वो अकेला हे गया. सोमवार वाले दिन तोह कभी हम हे मुलाकात नहीं कर पाए और ये चौधरी तोह पिता जी की जीप ले कर ठाट से वह जा पहुंचे जैसे इनके बाप की संपत्ति हो. हाँ बाप के दादा की है और अब इसकी हे हो गयी. मुझे भी नहीं बताता ज्यादा कुछ और शायद वो ठीक भी कर रहा है. तुम्हारी भाभी ने कहा था के उसको फैंसले लेने चाहिए खुद से और मुझे ज्यादा toka-taaki नहीं करनी चाहिए जबतक की वो गलत न हो. परसो के लिए विवान को बता दिया है न?"

"सही कहा भाई साहब आपने. अर्जुन सचमुच हे अपने आप में ज्यादा रहने लगा था और बहार निकलने से ये बदलाव उसको निखारेंगे हे. रही बात बताने या छुपाने की तोह वो लड़का आपसे अलग नहीं है. विवान 30 तारीख को वापिस जा रहा है और बता रहा था के इन्दर के प्रस्ताव पर विचार जरूर करेगा. रोमिला प्रीती के कॉलेज जाने तक यही रहेगी, फिर थोड़े वक़्त के लिए काम देखने के साथ साथ जोएल के साथ समय बिता कर लौट आएगी. उसका मैं इधर लग गया है जो उम्मीद नहीं थी पर ाची बहु होने के साथ साथ घर की देखभाल भी पूरी रखती है. गाँव के लिए हम लोग 3 बजे निकले तोह बेहतर होगा भाई साहब. 7-8 बजे तक पहुंच जाएंगे और जब आप कहेंगे हम वापिस चल देंगे. अखाडा 8 बजे हे लग्न है न?"

"3 बजे हे बेहतर रहेगा लेकिन अखाड़े के समय 7 बजे का है सतीश. पहोच जाएंगे तब तक आराम से. तुम्हारी भाभी की हसरत हमारे लिए कुछ नियमो से बढ़कर है. बेटे तोह सभी व्यस्त है और रेनू को नहीं लेके जाएंगे चाहे वो जाना भी चाहे. लो भाई चाय भी आ गयी और साथ में हमारी पसंद की मेथी नमकीन भी.", रामेश्वर जी ने चाय से पहले प्लेट से नमकीन उठाई तोह अपनी बीवी का चेहरा देख कर वापिस रखने हे लगे थे.

"एक या ज्यादा से ज्यादा 2. तेल मन है आपको. ये ऋतू अभी भी फ़ोन पे हे लगी है? बचे की जान हे ले कर रहेगी लगता है."

"तुम्ही पर गयी है, हम क्या कह सकते है इस मामले में.", रामेश्वर जी के इस तंज पर कौशल्या जी घूरने के बाद उस तरफ चली गयी जहा ऋतू बात सुनते हुए ऐसे खोयी थी की दादी के आने का पता न चला. कभी वो होंठ काटने लगती कभी गंभीर और फिर वापिस वही मुस्कान. कौशल्या जी ने स्पीकर वाला लाल बटन हे दबा दिया जिस पर ऋतू हड़बड़ा कर कड़ी हो गयी.

"हाँ सच बोल रहा हु, मजाक नहीं. तुम.."

"दादी बात करना चाहती है तुमसे ारु. फ़ोन स्पीकर पर डाला है मैंने.", ऋतू हड़बड़ाने के बावजूद अगले हे पल संभल गयी थी जैसे दोनों हे फंसने वाले हो. और कौशल्या जी कुछ कहती उस से पहले हे वो निकल चली इधर से, उन्हें आँख मार कर. जैसे कह रही हो की तुम सेर, हम सवा सेर.

"तू इसको तुम कह के बुलाने लगा है?"

"ओह नहीं दादी मैं तोह ऐसा कह रहा था की तुम्हारे लिए ड्रेस पसंद की है मार्किट में जिसमे बिलकुल राजकुमारी लगोगी. दीदी बोली की मजाक बंद करो तोह मैंने कहा की सच बोल रहा हु, मजाक नहीं. तुम्हारे लिए अब लेके हे आऊंगा तोह देख लेना.", कौशल्या जी ने फ़ोन वापिस हैंडल पे लेते हुए अपनी बताई अब अपने इस बैलबुद्धि को.

"बाल ऐसे हे सफ़ेद नहीं हुए बीटा मेरे. उसने तोह मुँह से कुछ न कहा जो तू अपने आप से लगा रहा है. और ऐसी कौनसी ड्रेस देख ली तूने वो भी सिर्फ इसके लिए? महल में दूकान खुली हुई क्या दरजी की? पूछती हु तेरे दादा से के वो जमीन किराए पे देके खर्चा चलने लगे, ऐसे क्या दिन आ गए उनके. कब निकल रहा है तू वापिस?", अर्जुन की तोह बोलती हे बंद कर दी थी उसकी दादी ने.

"जी बस दोपहर के खाने के बाद मार्किट जाऊंगा और फिर सीधा गाँव. ड्रेस मैंने यहाँ रानी माँ के पास हे देखि थी दादी जो 40 से ज्यादा साल पुराणी है लेकिन आजतक वैसे हे बंद थी. अब देख ली है तोह वैसे बनवा भी लेंगे, एक आपके लिए भी. देखना कमाल की लगोगी आप भी.", अब कौशल्या जी उसकी बातों में फंस कर खुद हंसने लगी थी.

"तेरी माँ को पहनाइयो बड़ा आया मुझे राजकुमारी बनाने. चल फ़ोन रख अब, अपने घर नहीं बैठा. और सुन्न.. ये ज्यादा khola-faroli मैट किया कर बीटा, ाची बात नहीं होती."

"ठीक है दादी, रात में बात करता हु. वैसे ड्रेस लेके आऊंगा आपके लिए."

"चल अब बहोत हुआ. मैं बताती हु तेरे बौ जी को तेरी बातें."

"रंग उनकी मर्जी का हे लेंगे चिंता मैट कीजिये.", अर्जुन हंसी दबाते हुए ज्यादा मजे लेने लगा था.

"ाजजी सुनते हो.."

"ाचा bye दादी. रात में बात करता हु और जैसा आप कह रही हो वैसा हे करूँगा. ध्यान रखना अपना.", अर्जुन ने दादा जी को जाती आवाज सुनते हे एक सांस में ये सब कहा और फ़ोन रख दिया. कौशल्या जी हँसते हुए वापिस कमरे में चली आयी.

"क्या कह रहा था तुम्हारा लाडला जो हमे आवाज लगाई जा रही थी.?"

"उसकी वही मसखरी करनी की आदत जो आपसे मिली है. ाचा ख़याल रखा सौंदर्य जी ने उसका."

"वो उस लायक है भगवान और बचो से सभी प्रेम करते है चाहे महल हो या झोपडी. बताया कब वापिस जा रहा है वह से?"

"हाँ बस खाने के बाद मार्किट निकलेगा और सामान ले कर सीधा गाँव. Be-taar फ़ोन भी ले लो जी घर के लिए 1-2. इतने बड़े घर में यही एक फ़ोन है जिसको कभी इधर खिसकाओ तोह कभी उधर.", अब ये जाने उन्होंने क्यों कहा था पर पंडित जी सहमत न दिखे.

"उस पर सुन्न ने के भी पैसे लगते है मोहतरमा. और अभी सिग्नल की समस्या चल रही है, जब कीमत काम होंगी और सेवा सुचारु मिलने लगेगी तब विचार करेंगे इस बारे में. वैसे ये इन्दर नजर नहीं आ रहा. राजू लेके गया था रेखा बहु को बड़ी बहु के साथ.", रामेश्वर जी चाय की खली प्याली रखने के बाद उठ चुके थे जैसे कही जाना हो उन्हें.

"बोल रहा था के काम है कुछ शहर में और उसके बाद अगर कमा पूरा हुआ तोह फिर दिल्ली निकलेगा. आया तोह थोड़ी देर में आ जायेगा नहीं तोह फिर कल. नया नया काम है और पता नहीं क्या करते फिर रहे है. राजू तोह इधर हे रहेगा न अब?"

"हाँ, वो फ़िलहाल यही है जितने संजीव नहीं आ जाता. फिर वो भी इन्दर के साथ काम संभालेगा पर घर आना जाना नियमित रखते हुए. हम जरा चंदू के पास जा रहे है, गेस्ट हाउस पे बुलाया था और खाना वही है हम दोनों का. बहोत दिन हुए उस से मिले और शादी में न आने की फटकार भी लगनी है.", रामेश्वर जी अभी चलने हे लगे थे और उन्हें रुमाल बटुआ पकड़ने के साथ आज तोह खुद कौशल्या जी ने उनकी रिवॉल्वर होल्स्टर समेत सामने रख दी थी.

"शगुन सबसे पहला उसका हे आया था आपके पुराने मित्रो में. मुझसे भी फ़ोन पर बात की थी सुषमा और चंदू ने. ताश खेलने बैठे तोह उसकी शामत नहीं, कह देती हु."

"हाँ मालकिन जी जानते है ताश घर का सत्यानाश. उमेद का काम हो गया है और उस सिलसिले में हे बात करनी है उसके साथ. दिल्ली में इसके जिम्मे कुछ काम लगाने है और थोड़ी अपनी बातें भी. आते है 5 बजे तक और अर्जुन का फ़ोन न आये तोह खुदसे 5 बजे मिला लेना."

"8 बजे करेगा वो फ़ोन, अखाड़े के बाद. जाओ आप लोग अब, मैं भी कृष्णा के पास जाती हु.", कौशल्या जी उनके जाने के बाद बैठक का दरवाजा लगा कर पिछली तरफ चली गयी. आज नरिंदर को भी आख़िरकार हिम्मत सिंह और उसके ऊपर वाले की पूरी खबर मिल चुकी थी. भारत भाई उम्मीद से भी ज्यादा बढ़कर निकले थे, बेशक चना चाट के बाद एक डिब्बी सिग्रत्ती हजम की लेकिन काम पूरा करने के बाद.

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गहरे बादलो भरे आसमान में अमृता ऊपरी मंज़िल से बहार देख रही थी छज्जे वाले हिस्से पर कड़ी. अर्जुन उस से जाते वक़्त मिलने भी नहीं आया था और वो खुद भी जैसे उसके सामने आने से कटरा रही थी. जीप में बैठने से पहले अर्जुन ने रानी माँ और महेंद्र जी को गले लगाया था और उन्होंने भी नजर उतरने के बाद माथा चूम कर विदा किया. जीप को कुशलता से घुमा कर जबतक वो उस बड़े गेट से बहार न निकल गया, ये 3 लोग उसको देखते हे रहे. रानी माँ भीतर चली आयी और महेंद्र अपने मुनीम के साथ एक तरफ बने दफ्तर बढ़ गया. लेकिन जैसे हे अर्जुन की जीप उस कच्चे रस्ते की तरफ जाती देखि जहा आगे घने झाड़ और जंगल साथ, अमृता के चेहरे पर सार्ड भाव उभर आये. किसी अनहोनी की आशंका से उसका दिल हथोड़े की तरह dhad-dhad करता धड़कने लगा था. वो जीप जैसे अब खो चुकी थी उस ast-vyast से भूखंड में लेकिन आगे जो था वो बस बरसो से खंडहर बड़ी हवेली. समय की मार ने उसको कही कही से kshat-vikshat कर दिया था और दीवारे लाल से काली पड़ चुकी थी. लेकिन जैसे वो बड़ा कला साया आज भी मजबूती से खड़ा अम्रतिए का हे उपहास उदा रहा था. वो चेहरे पर पसीना लिए तेज कदमो से भीतर भागी.

"ये आपने क्या अनर्थ कर डाला माँ? अर्जुन.. अर्जुन को आपने उस श्रापित खंडहर का पता दे दिया, ये जानते हुए भी की वो जगह कितनी मनहूस है और जब से हम पैदा हुए है हमने भी किसी को उस तरफ जाते नहीं देखा. आपने हे तोह बताया था की वो रास्ता सबके लिए खुद आपके पिता जी बंद करवा दिया था फिर आज अर्जुन को आपने वह जाने दिया?", अमृता बस जैसे अभी रो देगी. अपनी बेटी की हालत देख उस माँ ने उसको अपनी बाहों में भर लिया.

"मैं ऐसा कैसे कर सकती हु बेटी? वो लड़का ख़ास मकसद पे चल रहा है जिसको उसके रहनुमा तक न रोक पाए फिर मैं कैसे रोक सकती हु. वो जानता है उस हवेली के बारे में जिसकी कहानियां भी हम जुबान पर नहीं ला सकते. जाने क्यों ये आजतक सलामत कड़ी है और क्या रहस्य भरा है इसमें जो अर्जुन को इधर खींच लाया. तुम निश्चिंत रहो अमृता, चाबी भी सक्षम नहीं उसके कपाट खोलने में. देख कर हे चला जाएगा वो, ज़िद्द है न.", दिल तोह स्वयं रानी माँ का भी घबरा रहा था पर वो ये डर अपनी पहले से दरी बेटी को नहीं देना चाहती थी.

"माँ, भैया को पता है की अर्जुन उधर गया है? उसको रोकना होगा माँ नहीं तोह उसके साथ कुछ भी हो सकता है. रेहमत काका का शरीर वही जंगलात में कितनी बुरी हालत में मिला था और राकेश सिंह तोह फौजी था फिर भी चेहरा और कंकाल हे बचा था न उनका? मैंने कहा भी था के गिरवा दो उस मनहूसियत को लेकिन किसी के कानो पर जून भी नहीं रेंगती. मैं बोलती हु भैया को वह जाने के लिए. जितने सुरक्षाकर्मी है सबको ले जाए आपने साथ."

"प्यार में होश नहीं खोते बिटिया और इसमें दोनों का जीवन समझना जरुरी होता है. वो लोग अपनी गलती से जान खो बैठे थे, किसी लालच या हादसे में. और अर्जुन ने पहले हे हमे कसम दे कर बाँध दिया है की उसके पीछे मैं किसी को नहीं भेजू. और अगर मैंने किसी को बताया तोह फिर कभी हमारी देहलीज पर नहीं आएगा. हमने समझाया और आखिर तक मानते रहे लेकिन उसकी कसम ने रोक हे दिया हमे. भगवान् शिव उसका अहित नहीं होने देंगे. तुम अपने कक्ष में आराम करो, हम भी जाते है.", रानी माँ द्वारा पूरी बात तफ्सील से बताने पर अमृता ख़ामोशी से अपने कमरे में बंद हो गयी. आँखों में आंसू थे और हाथो में अर्जुन की वो तस्वीर जो विवाह से आने के वक़्त अमृता ने चुपके से खींची थी.

'कह कर तोह गए थे की मेरी कमजोरी और बेबसी ख़तम कर डोज.. ये नहीं बताया की उसके बाद ऐसा फरेब करने वाले हो हमारे साथ. तुम्हे कुछ हो गया न तोह हम सचमुच तुम्हेर जान ले लेंगे अर्जुन.. हम फिर कभी मुस्कुरा न सकेंगे ... कायर कसम में बांध गए न?..', तकिये में चेहरा दबाये अमृता आगे ख़ामोशी से उसके लिहाफ को आंसुओ में भिगोने लगी थी. बहार आसमान में बादल ज्यादा गहरे हो चले थे लेकिन हवा जैसे पूरी तरह थम्म गयी. उस खंडहर की तरह आज इतनी ख़ामोशी नहीं थी.

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'ये तोह रास्ता हे बंद हो गया आगे का?', अर्जुन कुछ एक किलोमीटर भीतर आ पंहुचा था उस ubad-khaabad से कच्चे रस्ते पर, गनीमत थी की इस जीप में जान भी थी और ऐसे रस्ते की आदत लेकिन सामने सीमेंट के पिलर और कटीली तारो से आगे का पूरा रास्ता बंद था. वो काली हवेली जिसको अमृता श्रापित बता रही थी, अभी भी कोई 500 गज दूर थी लेकिन रास्ता और ज्यादा घाना. कुछ सोच कर अर्जुन ने जीप के पिछले हिस्से को खंगाला तोह सीट के पीछे हे मजबूत लकड़ी का बना वेल्चा मिल गया, जो शायद जमीन खोदने के काम लाया जाता था. आसमान की तरफ देखते हुए उसने जीप की दराज से माध्यम अकार का खंजर और बैटरी निकाल लिए. ये सामान विनोद चाचा के कमरे से हे लिया था उसने और आज किस्मत से काम आने वाले थे दोनों. कमीज की आस्तीन वापिस कोहनी तक चढ़ाता हुआ वो उन तारो से अंदर आया तोह जुंग लगा लोहे का इश्तिहार उस रस्ते के बीच खड़ा पाया जिसके अक्षर कुछ कुछ साफ़ थे.

'प्रवेश निषेध' और उर्दू उसको पढ़नी नहीं आती थी लेकिन मतलब यही था.

'अरे जुगलाल जी ऐसा क्या कान कर दिया था आपने की हवेली के रस्ते पर हे बोर्ड गाड़ना पड़ा? दादा जी यहाँ 50 से ज्यादा सालो से नहीं आये मतलब उस से पहले आते रहे होंगे. रानी माँ कह रही थी की यहाँ उनके दादा और दादा जी के दादा बहार लटके हुए मिले थे. बताओ महल के इतनी पास हे राजा और मुंशी दोनों के बाप मार के कोई टांग गया और इन्होने हत्यारा ढूंढ़ने की जगह इस बेचारी पर हे टाला जड़ दिया... तेरी माँ.. इस.. अबे बहोत कांटे है इधर तोह.. कोई बात नहीं जुगलाल जी, हम आ गए है आपकी आत्मा की मुक्ति के लिए.. ये छोटे मोठे कांटे तोह दूर, पंडित जी की मार खाना भी मंजूर है बस राह दिखा देने अपने इस .. पता नहीं कौनसे पौटे को लेकिन आपके हे वंश है हम.', अर्जुन अपने आपसे हे बातें करता हुआ अकेलापन काम करने की कोशिश के साथ आगे बढ़ता रहा.

'नहीं नहीं.. सत्यानाश हो इस हवेली के रखवालो का.. ', हवेली के सामने कुछ भाग जैसे कभी समतल रहा होगा, जिधर लम्बी घास के सिवा कुछ नहीं था. अर्जुन वह पंहुचा हे था की मुँह पर रुमाल रखते हुए नजरे घुमा ली. कोई कमजोर होता तोह उलटी करने के बाद बेहोश हे हो जाता. पता नहीं वो किसी जानवर का हिस्सा था या इंसान का. हड्डियों से भी आधी जगह मांस गायब था और दुर्गन्ध ऐसी की सांस लेना लगभग नामुमकिन. रास्ता बदल कर अर्जुन इधर से आगे बढ़ा तोह लोहे का दरवाजा और झाड़ियों से घिरी चारदीवारी सामने थी.

'अब ये तोह आधे से ज्यादा मिटटी में धंसा है, खुलेगा खाख. चल भाई अर्जुन ले पंडित जी का नाम और दिवार के पार.. ओह माँ.. साला बहार से तोह 4 फ़ीट और अंदर 8... बचा गया नहीं तोह अपना हे खंजर अपने हे जिस्म में गया होता और इधर साला बचने की जगह कोई खाने हे पहुंच जाता. हहहह.. ये कुछ बेहतर है पर सुरक्षित नहीं.', दिवार कूद कर अर्जुन सीधा जमीन पर हे गिरा था. चाकू से हथेली पर मामूली चीरा आया पर ज्यादा गहरा नहीं. यहाँ हालत बहार से बेहतर थी जैसे हवेली के बाहरी हिस्से में कुदरत ज्यादा प्रवेश न कर सकीय हो. एक तरफ गाये बांधने का तबेला था जहा छत्त गिर चुकी थी लेकिन बांस गलने के बावजूद जमीन पर खड़े थे. ाक और झाड़ियां अलग सी दिवार बनाये थी हवेली की दिवार से. कही कही दरारों से पीपल की जेड और पत्ते 8-10 फ़ीट ऊँचे तक निकल चुके थे. अर्जुन यहाँ तक आते आते हे पसीने में बुरी तरह भीग चूका था. वेल्चा जमीन में गाड़ कर वो सामने इस ईमारत को देखता रहा जिसके बंद होने के पीछे वाली बड़ी वजह तोह रानी माँ ने बता दी थी पर न ज्यादा उन्हें कुछ पता था और न किसी और को. अर्जुन समझ चूका था के यही वजह होगी की दादा जी के पिता ने क्यों किसी भी बचे को फिर इधर जाने नहीं दिया. लेकिन इतनी बड़ी हवेली वो भी दूसरे घर से कोई ज्यादा दूर न थी फिर अकेले जुगलाल जी हे क्यों इसमें रहते थे? और ऐसे कोई 2-2 बड़ी हस्तियों का कतल कर्कटे उन्हें टांग गया फिर भी खोजबीन नहीं हुई.

'दादा जी बुरा फसा मैं तोह.. शबनम से शुरू हुआ था और पांच पीढ़ी पीछे पंहुचा दिया मुझे आपकी परेशानी ने. बस अब ये दरवाजा खुल जाए किसी तरह. खिड़कियों पे तोह सलाखे इतनी मोती लगी है जैसे जेल हो koyi.',Arjun पतलून की जीभ से खंजर जितनी हे बड़ी चाबी निकाल कर खस्ताहाल 4 सीढ़ी चढ़ता हुआ इस 12 फ़ीट ऊँचे दरवाजे के सामने रुका. पीतल की भरी सांकल तोह कुछ मशहाककट से खुल गयी लेकिन अब ये चाबी कहा लगनी थी. हर तरफ देखने के बाद दरवाजे के सामने हे उगे उस छोटे से पौधे पर ध्यान गया तोह पहली बार उसने जीवन में किसी पौधे को उखाड़ा था, इस से पहले तोह बस लगता हे रहा था.

'इत्ता बड़ा दरवाजा और चाबी देखो, जड़ में लगती है. जरूर इसको कोई सेवादार हे खोलता होगा. वैसे अगर कोई औरत खोलती होगी तोह कितना अजीब लगता होगा na?',Arjun अपनी हे सोच पर शर्मिंदा होने लगा और फिर पलट कर सीढ़ियों से दूसरी तरफ देखा तोह वो मैदान जैसे बैठने के लिए भी हो सकता था.

'ठरकी सोच क्यों आ रही है इस वक़्त मुझे.? वैसे वह पे कोई बैठा हो और औरत ये चाबी लगाए तोह यक़ीनन बहोत गलत नजारा होगा. पता नहीं ऐसे समय ये क्या विचार आने लगे. ऊपर से गर्मी ने अलग लहू पी रखा.. अरे घूम जा कामिनी.. लगता है जुंग लग गयी इसको. मदद हे गयी.. धत्त', अब अर्जुन बेबसी से इधर उधर देख रहा था जैसे कुछ तोह मिल जाए अंदर जाने के लिए. रानी माँ की सोच सही थी की दरवाजा नहीं खुलने वाला लेकिन ये अर्जुन था जो अब आ गया था तोह खली हाथ जाने से रहा. और इसके जैसे इरादे किसी और के भी थी. अर्जुन आशा की उम्मीद से भरा वेल्चा जमीन से उखाड़ हवेली की छाया में आगे बढ़ने लगा. जैसे वो कोई चोर रास्ते की उम्मीद लगाए हो.

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"ऐ लोटन, इधर आ जरा.", महल से बहार जाते रस्ते पर संतोष सड़क किनारे खड़ा था और उसके सामने हवेली का ये नौकर था जो शायद इसका खासमखास था.

"जी मालिक. आपका हे इन्तजार कर रहा था. जैसा आप कहे हम नजर रखते रहे लेकिन ज्यादा पता नहीं कर सके."

"जो पता लगा वो बता बीटा, तुझे मालामाल कर दूंगा अगर एक भी बात काम की निकली.", संतोष ने हरे हरे 10 नोट उसकी जीभ में भरते हुए गाल थपथपा कर कहा तोह लोटन भी होंठो से पीक साफ़ करके जानकारी देने लगा.

"हॉल के भीतर तोह हम नहीं जा पाए थे मालिक क्योंकि बड़े कुमार साहब गर्दन अलग कर देंगे ऐसा करने पर. लेकिन अस्तबल साफ़ करते समय हमने थोड़ा बातचीत सुनी थी उन दोनों की. 28 को सुबह बड़े कुमार साहब क्सक्सक्सक्स दरगाह जाने वाले है जहा ये नए मालिक की कोई कुश्ती होने जा रही है. और कोई पंडित जी भी आने वाले है वह. दरगाह पे पंडित जी का क्या काम मालिक?", लोटन का सवाल सुनते हे संतोष ने अपने गुस्से को जैसे तैसे काबू किया.

"अरे माँ की.. छोड़ पंडित को लेकिन ये बात काम की है. आगे बता क्या हुआ? और वो कोई नया मालिक नहीं बस ऐसे हे है."

"बड़ी रानी माता जी ने तोह कभी किसी को हाथ तक नहीं मिलाने दिए मालिक और ये पहलवान उन्हें न सिर्फ गले लगाए बल्कि गाडी में जाने से पहले गॉड में हे उठा लिए थे और वो हंसती जा रही थी. आप लोगो का मामला, हम तोह बस आपके सेवक है."

"लुंड काट के कुत्तो को खिला दूंगा अगर और बेमतलब बात की तोह. वैसे हे इस साले ने कई जगह हाथ फंसा रखे है.."

"जी मालिक देख हे लगता है हरामी इंसान है और तगड़ा भी. पर आप जितना नहीं होगा."

"अबे तू मेरी हे गांड मार रहा है हरामी बोल कर.."

"ताक़तवर बोले मालिक. हरामी तोह यह पहलवान को बोले हम. आप शाही राजकुमार है और वो तोह बचा है आपके सामने. हाँ याद आया, वो कोई फाइल भी दिए बड़े कुमार साहब को अस्तबल से महल वापिस जाते समय. फिर बहुत देर तक तोह वो रानीघर में रहे जिधर आप भी नहीं जा सकते. और उसके बाद जीप को दौड़ते निकल लिए. पर वो इधर नहीं गए मालिक.. लगता है आपने उन्हें बद्दुआ दी होगी जो वो खुद हे मरने काली हवेली वाले जंगल में घुस गए. फौजी की तोह उधर सिर्फ मुंडी हे मिली थी मालिक, इनका जाने क्या बचेगा."

"अबे छूट.. लोटन ये सबसे ज्यादा काम की बात बताई रे तूने. मैं भी उस हवेली के बारे में दिन रात सोचता हु. उसका रास्ता जानबूझ कर बंद करवाया है इन लोगो ने. वह कोई भूत प्रेत नहीं है जितना मैं जानता हु. 3 दिन पहले हल्का धुआं सा देखा था उधर. जरूर शाही खजाना सरकार और दुनिया से बचा कर वह छिपाया हुआ है इन कमीनो ने. ये एक हजार और रख अपने पास. मेरा काम होते हे ऐसे ऐसे 1000 नोट दूंगा तुझे लेकिन कायदा जानता है न ाची तरह? और फुलवा को बोल देना के आज रात मालिक आएंगे तेरे गरीबखाने पे. Daru-murga लेता आऊंगा बाकी वो तैयारी करके रखे. चल अब तू निकल और अब महल की तरफ मत जाना. कोई सेवक आये तोह फुलवा से कहलवा देना की बीमार है.", इधर संतोष गाडी में बैठ कर तेजी सेकहि निकल चला जैसे जीवन में नयी उम्मीद भर आयी हो और लोटन उसको गाली देता अपने रस्ते हो लिया.

'हट तुहरी माँ का भोंसड़ा. लुगाई हमारी और रगड़ो तुम.. साली फुलवा भी रंडी कैसे मालिक मालिक करती रात भर उछलती रहती है... Jhaant-maari की बुर में आग भी ज्यादा है.. चलो हमको का मतबल.. दारु मिल गयी बहोत है.. बस हमर बिटिया बक्श देना भोसड़ीवाले मालिक.', लोटन अपने पारिवारिक जीवन में जैसे पगलाया हुआ था जैसे वह उसकी कदर हे न हो लेकिन आज 2000 रुपये हाथ लगे थे और मौसम भी गहराया हुआ था, कदम सबसे पहले ठेके पर हे जा रुके. दूसरी तरफ संतोष जैसे पहले हे तैयारी किये बैठा था अर्जुन पर आज हे हुम्ला करने की. बस अब वो ये काम सड़क दुर्घटना न दिखा कर उस हवेली में हे अंजाम देने की कोशिश थी. जिस वक़्त रमाकांत से उसकी बात हुई थी, तभी से संतोष महल से बहार अपने कुछ आदमी एकत्रित करके अर्जुन का काम निबटने की तयारी कर रहा था.

"प्लान चेंज है गंजे. अब तुम लोग उस लड़के को वह ख़तम करोगे जहा उसको खोजने भी कोई गया तोह वो यही मानेगा की ये किसी जानवर या गिरोह का काम है.", ये 6 लोग थे और ज्यादातर के पास इस्पात की रोड या खंजर. वैसे भी उन्हें तोह अर्जुन की गाडी को हे टक्कर मारनी थी इस नए प्लान से पहले.

"ऐसी कोनसी जगह आ गयी जहा लोग जाना नहीं चाहते मालिक? बॉडी की तरफ या शमशान.. हाहाहा.."

"जंगल वाली हवेली गया है वो लड़का.", संतोष के इतना कहते हे उनमे से एक आदमी थोड़ा पीछे हट गया.

"क्यों मजाक करते हो मालिक? रिक्स है उधर और हम लोग ड्राइवर लूटेरे है जो maar-peet कर सकते. आपके लिए उसको road-accident में भी मारने को तैयार क्यूंकि 30 लाख से हम सभी के घर परिवार संभल जायँगे. पर उस खंडहर में तोह बाद में पहुंचेंगे पहले कोई जानवर या प्रेत हमे हे ऊपर पंहुचा देगा. 5 लाख के बदले में जेल मंजूर पर जान नहीं दे सकते."

"खतरा तोह है मालिक और दूसरी बात है की उस तरफ जाना हे मुमकिन नहीं. राजमहल की सड़क पर घुसने से पहले हे पुलिस नका पार करना पड़ेगा. आगे भी सुरक्षाकर्मी मिलने निश्चित जैसा होना हे है और आप तोह सामने आने नहीं वाले. रत्न ठीक बोलता की रिक्स बराबर है. गाडी वाला काम जमेगा और कोई पॉब्लेम हे नै.", ये इनमे सबसे समझदार और कुछ मजबूत व्यक्ति था. पक्के रंग का और 6 फ़ीट ऊँचा जिसके चेहरे पर भी 2-3 लम्बे निशाब उसकी ताक़त का परिचय देते थे.

"मैं करने को तैयार है पर पेमेंट डबल करते हो तोह मालिक. ये बाजू में नदी की तरफ से शॉर्टकट उधर जो डायरेक्ट जंगल और हवेली पे निकलेगा. महल की तरफ जाने का भी नहीं पर अभी निकले तोह भी 30-40 मिनट लगने वाले गाडी नहर पे रख कर भी. साफ़ जान का रिक्स है और सड़क पे शायद कोई लफड़ा भी हो जाए पर खंडहर से तोह चीख भी बहार नहीं जाने वाली. क्या बोलते भाई लोग, जानवरो का पेट भरके थोड़ा पुण्य कमाया जाए? सोच लो सेठ, मैं रेडी पर जो भी काम करेगा उसको 10 लाख.", गंजे ने भी इस वाले की हाँ में हाँ मिले और आखिर में रतन को छोड़ कर बाकी सब काम करने को त्यार हो गए.

"तोह रतन, काम नहीं करेगा फिर इसको या तोह मरना पड़ेगा नहीं तोह.."

"नहीं सेठ, ये भाई है और साथ ये भी जायगा. इसका डर वाजिब है और वैसे भी ये गाडी के पास निगरानी करेगा. टेंशन नै रत्न, हम पांचो 1-1 लाख तुझे देंगे. बस गाडी के साथ रहना."

"ठीक है फिर तोह 50 लाख तुम्हारे और बदले में मुझे उस लड़के की जान चाहिए. 10 लाख कार में है, अभी ले लो और बाकी तुम्हे वही मिल जाएंगे जहा तुम हमसे मिलते रहते थे. ऐसा कुछ मैट करना की बात अभी फ़ैल जाए. कोई aag-goli नहीं .. लड़का मजबूत है पर तुम भी खिलाडी लोग हो इस काम में. रात को लोटन के वह.", और गांजा पैसे का बैग डिक्की से उठा कर अपने सेंटर में डालने के बाद निकल चला बाकी साथियों को ले कर.

'श्रापित हवेली का श्राप एक बार फिर से सफल होने वाला है. हाहाहा.. महेंद्र फिर तुझे हटाऊँगा और तेरी बहिन से ब्याह करके मैं राजा. हाहाहा'

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क्रमश
 
जारी

"इधर तोह अलग हे माहौल है. लगता है जैसे यहाँ कोई आया होगा कुछ समय पहले.", अर्जुन हवेली के पिछले हिस्से में जब पंहुचा तोह एक तरफ कच्चा चूल्हा बना हुआ था जिसकी राख एकदम ठंडी लेकिन पूरी तरह अपनी जगह. कुछ हिस्से में साफ़ सफाई थी और इंसानी कदमो के साथ साथ किसी बड़े कुत्ते के भी पद चिन्ह कही कही धुंदले से थे जिसका मतलब जो भी आया था वो कुछ दिन पहले हे आया होगा. हवेली की दिवार के पीछे हे जंगल और नदी थी जहा से नमी वो साँसों से हे महसूस कर प् रहा था. एक बड़ी खिड़की से लोहे की 2 सलाखे गायब थी और उसके अकार को देख अर्जुन समझ गया था की यही एक रास्ता है अंदर जाने का. 4 फ़ीट चौड़ी और उतनी हे लम्बी खिड़की में बस एक सलाख और थी जिसको हटाने के लिए अर्जुन ने जोर लगाया तोह वो टास से मास्स न हुई.

'भाड़ में जाए, इतना रास्ता हे बहोत है. लेकिन ऐसा आदमी कौन होगा जिसने साला ये सलाख उखाड़ दी? पाँव का पंजा तोह मुझसे भी बड़ा है तोह होगा कोई..', वेल्चा उस सलाख में आदते हुए उसकी सहारे अर्जुन ऊपर चढ़ने के बाद दिवार के बहार देखने की कोशिश करने लगा. हरियाली हे थी बस हर तरफ. लेकिन हवेली के भीतर बस हलकी सी रौशनी और जैसे वह की हवा भी आज तक बरसो पुराणी हो कर अजीब सी. भीतर छलांग लगते हे धप्प की आवाज कई हिस्सों में अलग अलग सुनाई पड़ी.

'अरे कही सचमुच हे प्रेत न हो? हाहाहा.. होगा तोह खुश हे होगा के चलो कोई तोह बात करने आया. Hello.. hello .. प्रेत जी.. Hahaha..bada सही माहौल है इधर तोह.. एक आवाज लगाओ तोह ऊपर निचे दाए बाए सभी जगह सुनाई पड़ती है.. ओह.. ये क्या गया पाँव के ऊपर से.?', अर्जुन को खुद नहीं पता था के वो हवेली के किश हिस्से में पहुंच चूका है और इधर अँधेरा बढ़ चूका था. बैटरी की रौशनी एक तरफ डालने पर वो दांग रह गया उस नज़ारे को देख. वो चूहा कही से भी मामूली न था और उसके मुँह में जो चीज थी वो भी. अर्जुन ने अभी यहाँ प्रवेश करते हे जीवन का सबसे अजीब दृश्य देख लिया था जहा एक बड़ा जंगली चूहा किसी सांप या उसके बचे को मुँह में दबाये एक पल रुका और फिर घने अँधेरे में विलीन हो गया.

'अब हवेली इतने बरसो तक बंद रहेगी तोह कुछ तोह अजीब होगा हे. बस भगवान् तू चाहे प्रेत दिखा दे लेकिन ये सब नहीं. अब आवाज भी नहीं गूँज रही. हो क्या रहा है इधर.? ये सीढिया ऊपर जा रही है और ये इधर कितने सारे कमरे है?", अर्जुन थोड़ा अभ्यस्त हो चूका था इस गहरे अन्धकार का. उसकी सांसें भी साफ़ सुन्न प् रहा था वो इधर उधर तलाशी लेता. दीवारों पर बड़ी बड़ी तस्वीरें धुल से सन्न चुकी थी जिन तक हाथ पहुंचना हे नामुमकिन था लेकिन हैरानी वाली बात थी की किसी भी कमरे के बहार टाला नहीं था. सावधानी से वो जिस भी कमरे को खोलता वो सिर्फ अँधेरे से भरा मिलता जैसे वह कोई कभी रहा हे न हो. सर खंजर से खुजाता हुआ वो पसीने में भीगा हुआ 5 कमरे देख चूका था लेकिन सिवाए धुल या एक कमरे में राखी चारपाई के बाकी सभी कोरे साफ़ थे. इस मंजिल पर बस एक हे कमरा बचा था जिधर बढ़ते हुए वो अपने कदमो की आहात में आये बदलाव से थोड़ा शंकित हुआ. लेकिन फिर आखिरी कमरे को खोलने पर देखा वह रखा हुआ एक बड़ा बिस्टेर और खिड़की के सामने पर्दा. इधर भी हाल वैसा हे था लेकिन ये कमरा साफ़ सुथरा और धुल नाम मात्रा भी नहीं. गोलाकार छोटे मेज पर ताम्बे का जग था, खली और पर्दा हटाने पर वही हरियाली जो हॉल वाली खिड़की से अर्जुन ने देखि थी पर वो ये देख प् रहा था के हवेली के पिछले दरवाजे के उस और पुराण घात जैसा कुछ था और नदी की बस झलक जो घनी झाड़ियों के बीच से हे दिख रही थी.

'जुगलाल जी आपकी बीवी नहीं रहती थी क्या यहाँ? 6 कमरे, इतना बड़ा हॉल और 2-2 रसोईघर लेकिन कही कुछ नहीं. आपके बेटे ने लगता है साफ़ करवा दिया होगा आपके जाने के बाद.', अर्जुन कमरे से निकलने हे लगा था की फिर से दिवार पर रौशनी डालने पर वह कुछ अजीब सा लगा. वो आँखों के सामने आया पसीना साफ़ करता हुआ उस जगह के सामने आया तोह ये दिवार के रंग का हे लकड़ी का पल्ला था जैसे छोटी अलमारी. खंजर फंसा कर उसको खोलते हे वो हैरत में पड़ गया. सामने कपडे की छोटी सी गुड़िया, 2 चूड़ियां, एक अजीब सा कपडा जिसको खोलने पर वो शायद कोई निक्कर जैसा कुछ था लेकिन बनियान जैसे कपडे का. अर्जुन ने कपडे की गुड़िया जेब में रख ली. अब इधर और कुछ नहीं था लेकिन वो जान गया था के ऐसे चोर खजाने दीवारों में छिपे मिल सकते है. एक घंटा तोह उसको इधर हे लग गया था और अभी तोह ऊपर भी एक मंज़िल थी लेकिन जो मिलना था वो सामने नहीं मिलने वाला था. हवेली खली की जा चुकी थी या ये ऐसी यह थी बस सामान हटा दिया होगा.

'सर दुखने लगा इस दुर्गन्ध से तोह. अजीब सी है मिटटी हे जाली हुई हो और ठंडी भी..', अर्जुन जैसे जैसे उन चौड़ी सीढ़ियों पर चढ़ता हुआ ऊपर जा रहा था घुटन बढ़ने लगी थी. इधर तोह निचे हॉल जितनी भी रौशनी नहीं थी. ठीक उतने हे कमरे यहाँ थे लेकिन यहाँ हॉल में दीवारों पर जंगली जानवरो के सर लटके थे और 2 पुराणी बन्दूक भी. अर्जुन बन्दूक के करीब गया तोह इस दिवार में भी हल्का सा जला लगा था जैसे निचले कमरे में मिली गुप्त दराज के पास था. वो सही सोच रहा था क्योंकि एक ाले को यहाँ भी गुप्त रखा गया था.

'अरे जुगलाल जी आप आदमी थे या रहस्य और ये खजाना है कोई? ये तोह किसी लड़की की ब्रा जैसा कुछ है पर हक्क नहीं है इस्पे. ये शीशी अजीब है और ये क्या है? ड्राइंग.. नंगी लड़की, लड़की कहना तोह गलत हे होगा इसको ये तोह.. बहनचोद.. ये किस हरामी के काम है.. ? कोई और भी रहता होगा जुगलाल जी के साथ और जो भी था सनकी इंसान हे होगा.', अर्जुन वो सबकुछ वही छोड़ कर बस उस कपडे को जेब में डालने के बाद आखिर वाले कमरे में घुसा जो निचे बिस्टेर वाले कमरे के ऊपर था. इधर बुरा हाल था जैसे कोई छोटा मोटा जानवर हफ्ते पहल मारा हो. बाकी वो खली हे था जिस से अर्जुन दरवाजा बंद करता हुआ तुरंत बहार निकला. बाकी सबका भी हाल उम्मीद मुताबिक हे निकला, कही कुछ नहीं सिवाय एक कमरे में दिवार पर टंगे धोती कुर्ते के. वो सेवादार के हे रहे होंगे जैसी उनकी हालत थी और चारपाई पे वही सोता होगा. अँधेरे में इतनी देर से भटकते हुए अब तोह उसके पाँव भी थकने लगे थे. लेकिन जिस्म में एकदम से बिजली भर उठी जब उसको कुछ याद आया.

'बेसमेंट होगी वह.. देखता हु जरूर कोई चोर रास्ता होगा उधर जाने का. ये कमरे भी इतनी ऊंचाई पर बने है तोह वो आवाज वहां नहीं थी.", अर्जुन फुर्ती से नीचे दौड़ा जैसे रास्ता याद हो चूका हो. एक बार गिरने से बचा लेकिन हांफता हुआ वो इस कोने में था जहा घुप्प अँधेरे में चलते हुए उसने thak-thak महसूस की थी. हर तरफ जमीन पर रौशनी मारता हुआ वो मुख्या द्वार तक आया लेकिन फर्श समतल. रसोईघर इस कोने से निकलते हे उलटे हाथ की तरफ था जिधर अर्जुन जैसे जाना भूल गया था कमरा न होने की वजह से. और यही वो मोटा कालीन जैसे उस रस्ते का पहरेदार बना हुआ था.

'बड़ी म्हणत करवा रहे हो जुगलाल जी. देखने से तोह लगता है की यहाँ कुछ भी नहीं पर दीवारे बहोत कुछ सुना रही है. हम्म्म.. इतने बड़े आदमी और बेसमेंट में जाने की जगह पर ये लकड़ी का टुकड़ा लगवाया हुआ? नहीं यहाँ ये निशाँ तोह जैसे सीढ़ियां इधर भी जाती थी. फिर बंद क्यों की?', अर्जुन ने ऊपर जाने वाली सीड़खियों को देखा और फिर उन निशानों को जहा लकड़ी जमीन में धंसी थी, फर्श के सामान स्तर पे. 6 फ़ीट से ज्यादा लम्बा कट था ये निचे जाने वाले रस्ते का. सीढ़ी पर उतारते हे हलकी घबराहट सी होने लगी थी अर्जुन को और निचे अँधेरा भी इतना था की बैटरी की लाइट बस कुछ दुरी पर हे ख़तम.

'माँ, कुछ सही नहीं लग रहा. माफ़ कर देना अगर कुछ गलत हो जाए.', अपनी माँ को जैसे उसने यही से सन्देश दिया की कुछ बड़ा होने जा रहा हो जैसे. सावधानी से वो जैसे जैसे निचे जाता गया वैसे वैसे उस अँधेरे में विलीन हो गया. यहाँ naam-matra भी धुल नहीं थी और एक चौड़ा हॉल ठीक ऊपर जैसा जिसके दोनों तरफ कुछ लकड़ी की अलमारियां थी. अर्जुन बस सीधा चलता रहा जैसे कोई उसको उस और खींच रहा हो. यहाँ बस 2 हे कमरे थे और एक पर मोटा टाला. अर्जुन ने इस घनघोर अँधेरे में जैसे हे वो दरवाजा धकेले, बरसो से जमा ठंडी हवा ने उसका पसीना एक पल में सुकः दिया. कुछ बूंदे जमीन पर टपकी तोह इनकी आवाज स्पष्ट सुनाई दी. आज वो पहली बार जीवन में इस तरह घबराया था जैसे ये उसका आखिरी समय हो और उसका जिस्म यही खो जाने वाला था. अंदर एक बिस्टेर था जिसकी चादर जगह जगह से अस्त व्यस्त थी जैसे कोई चाहता था के वो खोजने वाले को वैसी हालत में हे मिले. अर्जुन मुश्किल से देख प् रहा था लेकिन करीब आने पर वह कपडे के कुछ टुकड़े थे जैसे उन्हें फाड़ा गया हो. अब गाला सचमुच सूख रहा था इस जगह की ख़ामोशी और हालत देख.

'हे भगवान्..", अर्जुन ने मुँह पर हे हाथ रख लिया जब बिस्टेर के दूसरी तरफ टूटी हुई चूड़ियां, बिस्टेर पर बिखरे उन कत्रो का समूचा वस्त्र और सफ़ेद कपडे पर वो गहरा दाग देखा जो समय के साथ इस वक़्त कला दिख रहा था. यक़ीनन यहाँ बहोत बुरा हुआ था जो इस हवेली के नाम को आज सच करता था, काली हवेली. परदे को खंजर से हटाया क्योंकि जिसने पूरी हवेली साफ़ कर दी उसने ये जगह ऐसी क्यों छोड़ी? जरूर वो इंसान चाहता था की ये इस हालत में हे मिलने चाहिए. परदे के दूसरी और अनगिनत वस्त्र थे जो काम उम्र लड़कियों के हे थे ज्यादातर. अर्जुन की आँखों से आंसू अपने आप हे बहने लगे थे और वो कपडा खुद बा खुद उसने उठा लिया जो कही से भी किसी किशोरी का नहीं था. जो भी इंसान यहाँ हैवानियत करता होगा वो इंसान तोह हो हे नहीं सकता. नासमझ तक को नहीं बक्शा था उस व्यक्ति ने. अर्जुन को घुटन होने लगी थी जैसे कोई उसका गाला दबा रहा हो. लेकिन इस दर्द के साथ जैसे कुछ रिश्ता था जो उसको यहाँ रोके हुए था. अलमारी के ऊपरी भाग पर पुराने कागज़ से थे जैसे उस वक़्त के रुपये, वो किसी काम के नहीं थे. लेकिन हाथ लगने से कोई धातु का सिक्का जरूर निचे गिरा. अर्जुन ने उसको देखे बगैर उठा कर जेब में दाल लिया. कपडे से बने फंदे और वैसी हे वस्तुए थी वह बस. अर्जुन कमरे से बहार आते हे रौशनी बंद करके दिवार सहारे बैठ गया. इतना भयानक घटनास्थल इस धरती पर क्या उसके हे नसीब में देखना लिखा था?

'नहीं.. वो कुछ और भी दिखाना चाहता है मुझे.. दर्द के साथ हे दवा होती है.. इस कमरे में कुछ hai..',Arjun आंसू पोंछने के बाद फिर से हरकत में आया और इस बार ताले को हाथ से खींचते हे वो खुल गया जैसे बस फसा कर छोड़ दिया गया. इस कमरे के बहार टाला और भीतर कुछ भी नहीं.. ऐसा नहीं हो सकता था.. जो भी था वो इतनी आसानी से ये सबूत नहीं सौंपने वाला था मतलब कबीली इंसान हे ये कर सकता है.

'दादा जी, आपने कहा था की अब मैं अँधेरे से नहीं डरूंगा. आप हमेशा मेरे साथ रहोगे.. देखो मैं डर नहीं रहा.. लेकिन यहाँ रौशनी भी नहीं है और आगे बढ़ने का रास्ता भी नहीं.. कोई मारा गया है इधर.. नहीं बहोत से मासूम .. अनगिनत मासूम चीटीख रहे है मेरे कान में बौ जी...", इस बार अर्जुन पूरी जान लगा कर चीख उठा था जैसे वो बुरी तरह जख्मी हुआ हो. घुटनो पर गिरता वो पागलो की तरह हर तरफ हाथ मारता रहा जैसे उसका कुछ खो गया हो. कोई उसकी ऐसी हालत देख लेता तोह यक़ीनन खुद भी डर जाता. बदहवास सा वो अँधेरे में पूरे फर्श पर हे रेंग रहा था और जब हिम्मत ख़तम होने लगी तोह जमीन पर चेहरा टिकाये सिसकने लगा. ऊपर वाली जेब से सिक्का जमीन पर गिरता हुआ इस खोमईश में किसी अन्य धातु से टकराया तोह अर्जुन को विश्वास हे न हुआ. ये इशारा था जैसे की वो यहाँ अकेला नहीं है. बैटरी जाने कहा गिरी थी लेकिन अंधेर में फर्श टटोटले हुए अर्जुन दरवाजे के करीब पंहुचा तोह वो सलामत मिली. तुरंत उसको चालू करता हुआ वो कमरे के इस कोने में आया जहा से अलग सी आवाज सुनाई पड़ी थी. वो चमकदार सिक्का जहा था वही दिवार में ये एक फ़ीट का धातु से बना दरवाजा था. कांपते हाथो से अर्जुन ने उसको टटोला तोह कोई किनारा हे नहीं मिला.

'चाक़ू.. चाक़ू कहा रह गया? बहार बैठते समय हाथ में था.. ', बुदबुदाता हुआ वो बहार निकला तोह खंजर ठीक उसी जगह था जहा वो इधर आने से पहले बैठ कर रोया था. अब वो जैसे बिजली से चल रहा था ऑक्सीजन की जगह. दिवार और उस धातु के बीच खंजर फसते हे उसने पूरी जान लगा दी और 2 आवाज लगातार हुई. खंजर टूट चूका था और उस तिजोरी का दरवाजा भी. अंदर बस कुछ कागज़ थे जिन्हे अर्जुन ने पालक झपकते हे उठा लिया. बाकी तिजोरी को टटोला तोह कुछ ताबीज सा हाथ लगा और कुछ नहीं. कागज़ बंद करके जेब में रखता हुआ वो एक पल और इस जगह नहीं रुका जैसे उसको सबकुछ मिल गया हो. बहार वाली अलमारियों पर भी निगाह न की क्योंकि वो सब तोह वैसे भी खुली थी, कपड़ो से भरी. जेब में कागज़ और वो ताबीज रख कर उन्हें हाथ से दबाये वो सीढ़ियों से गिरता भिड़ता बहोत जगह चोट खा चूका था लेकिन आख़िरकार वो हलकी रौशनी में बहार निकल हे आया था उस भयानक मंजर से. उस अँधेरे को पीछे छोड़ आया था जहा एक पल तोह उसकी सांस हे अटक गयी थी. लेकिन चैन से सांस ले पता उस से पहले हे पीठ के पीछे ये जोरदार प्रहार हुआ.. अर्जुन झुका हुआ हे फर्श पर गिर चूका था और उसके पीछे खड़े थे 5 प्रेत.

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"ये तोह एक वार में हे लुढ़क गया गंजे. लेकिन ये भाग क्यों रहा था? नीचे कुछ है क्या?", अर्जुन को फर्श पे गिरा देख इनमे सबसे मजबूत व्यक्ति ने पहले अर्जुन को हिलाया और फिर तहखाने में रौशनी मारी.

"भाई उधर जैसे कोई अलमारी है. खजाना होगा जरूर. मैंने सुना है की बंद हवेलियों में अक्सर खजाने भी दबे होते है. इसको तुम तीनो देखो, मैं और भीरु भाई जरा इधर तलाशी ले आये. साला बाकी हवेली तोह ऐसे खाली पड़ी है जैसे सचमुच कभी प्रेत हे रहा हो जिसकी कोई जरुरत हे नहीं होती.", अर्जुन को वो लोग मूर्छित समझने की गलती कर चुके थे जो ख़ामोशी से बस खुद को संयमित कर रहा था. दोनों व्यक्ति तेज बैटरी और रोड लिए जैसे हे सीढ़ियों से निचे उतरे, पीछे रह गए तीन में से एक ने अर्जुन के जिस्म पर रोड लगते हुए उसकी जांच ली.

"बेहोश है ये दिनु. साले की कमीज उतार, मालिक को दे देंगे निशानी.", दिनु ने भी हाँ कहते हुए जमीन पर झुक कर अर्जुन को पलटने की कोशिश की तोह जैसे उसकी ताक़त हे ख़तम हो गयी.

"बहनचोद आदमी है या पहाड़ है ये? साला मर्डर तोह नहीं गया एक वार में हे?"

"इतनी जल्दी कैसे मर्डर सकता हु मैं? सरिये से कुत्ते बिल्ली मरते होंगे, रूद्र बन्दूक से भी नहीं मरने वाला. गलती कर बैठे न यहाँ आ कर?", अर्जुन जिस तरह से आँखें खोले उसको देखते हुए मुस्कुरा रहा था वो आदमी डर के मारे पीछे हे लुढ़क गया.

"प्रेत.. इसमें कोई ऊपरी आत्मा है बे शांतु.. उन दोनों को बुला रे ....आह्हः.", बाकी दोनों अपने दोस्त को हे देख रहे थे सहमे हुए और जबतक वो हरकत करते उनका दिनु तहखाने में जा गिरा. निचे बहोत कुछ गिरने और टूटने के साथ कई चीखे निकली लेकिन उन्हें यहाँ कौन सुनता इनके अलावा. सर पे हाथ रख कर बाल संवारता हुआ अर्जुन इतने धीमे उन दोनों की तरफ बढ़ रहा था जैसे सचमुच बाघ ने शिकार का रास्ता बंद कर दिया हो. एक के हाथ में सरिया और दूसरे के खंजर था लेकिन चेहरे पर डर.. सामने वाले के चेहरे पर अगर एक तरफ लहू था तोह होंठो पर हैवानियत.

"ऐ पीछे रहो.. मैं मार दूंगा.. आगे मैट आना एक कदम भी.."

"मार देगा? डरपोक अपनी हालत देख.. तू तोह खुद मरने वाला है..", अर्जुन को करीब आया देख सरिये वाले ने पूरी जान लगा कर वार किया था जो अर्जुन से टकराया भी लेकिन ऐसे जैसे सरिया खुद उसकी हथली में जाना चाहता हो.

"पीठ पे हमला करते हो कायरो.. ये लो फिर उसकी सजा.. ", और खंडहर में इतनी विध्वंसक चीख शायद हे पहले सुनाई दी हो. सरिया मजबूत जांघ के aar-par था और वो व्यक्ति जमीन पर lot-pot होता तड़पने लगा. चाकू वाले ने अपना काम किया जान बचने के लिए और वो सफल भी हो जाता अगर वार सही होगा. ब्याह पर चीरा हे दे सका था और अब उसकी गर्दन थी अर्जुन के हाथो में. नीचे तहखाने में भी हलचल हुई जैसे कोई उठ कर आने लगा हो ऊपर लेकिन अर्जुन तोह इस आदमी को जमीन से 3 फ़ीट ऊपर उठा चूका था. आँखें उबाल कर बहार आने वाली थी और वो आवाज निकलने में भी बेबस.

"छोड़ दे उसको बहनचोद.. तेरी माँ..", पीछे से गांजा अर्जुन की और लपका था लेकिन 5 कदम दूर खड़े इस हैवान और अपने आदमी की हालत देख दोनों हाथो से सामान छोट कर जमीन पर जा गिरा. बैटरी और वो मोटा सरिया जिस से उसने अर्जुन पर वार किया था. उसके साथी को अर्जुन ने किसी कपडे की तरह दिवार में दे मारा था जो चीखने से पहले हे मूर्छित हो गया सर फटने के साथ. अब एक बार फिर यहाँ ख़ामोशी थी जिसमे अपनी ब्याह पर बहते खून को चूसता हुआ अर्जुन इस शक्श को ऐसे देख रहा था जैसे वो ऐसा हे उसके साथ करने वाला है.

"ऐ.. गलती हो गयी भाई.. वो संतोष .. नालागढ़ वाला संतोष है न उसने .. पैसे दिए थे.. देख बही मेरे बाल बचे है.. उनकी कहती जाने दे.. नाम भी बता दिया मैंने और पैसे चाहिए तोह वो भी लेले.. नहर पार हमारा साथ ..आअह्हह्ह्ह्हह बचाऊऊऊ.", जांघ और पेट के बीच जोरदार प्रहार से गांजा उस मजबूत स्तम्भ से जा टकराया.. हड्डियां टूटने की आवाज ने उस रट हुए आदमी को भी खामोश करवा दिया जिसकी जांघ में 3 फ़ीट का सरिया घुसा हुआ था.

"सबका परिवार होता है.. सभी परिवार से प्यार करते है लेकिन .. जब गलत काम करते है तोह फिर उनकी दुहाई दे कर बचने की भीख क्यों मांगते ho..Kyunn..?", चीखते चिल्लाते हुए रूद्र ने सामने गिरे गंजे को एक बार फिर से उठा कर तहखाने से निकलते दोनों आदमियों पर दे मारा और फिर से वो तीनो वही पहुंच गए थे जहा से निकल कर आये थे. इस बार वैसा मुमकिन न था जैसे वो चीखे.. अर्जुन उस तड़पते सरिये से बिंधे आदमी के करीब हे पंहुचा था की पीछे से एक भरी हाथ उसके कंधे पर आ टिका. कौन था जिसके कदमो तक की आहात अर्जुन के तेज कान न सुन्न सके. जो भी था उसने गलत इंसान के कंधे पर गलत समय हाथ रख दिया. वो आदमी कुछ बोलता उस से पहले हे अर्जुन ने घूम कर पूरी ताक़त से उस पर प्रहार किया.. लेकिन वो तोह उस से बेअसर अर्जुन के मुक्के को हे मुट्ठी में दबोचे खड़ा था. चेहरे पे शांत मुस्कराहट, अर्जुन की रूद्र हंसी से विपरीत.

"चलो अब यहाँ से चलते है बीटा. तुम सफल रहे और हमे ख़ुशी है की जिस दर्द से इंसान बीमार हो कर घुटने लगता है या पागल हो सकता है, तुमने उसको साध कर अपना कवच बना लिया. देखो आसमान साफ़ हो गया है, जैसे कोई परत खुल गयी हो. अक्सर कई टालो की चाबी नहीं होती, दिल का मंत्र उन्हें खोल लेता है. जो बहार से बंद प्रतीत होता है अक्सर उसको खोलने के लिए भीतर से प्रयास करना पड़ता है. ये राह तुम्हे सही जगह पंहुचा देगी अर्जुन. अब इधर वापिस मैट आना.", अर्जुन तोह किसी छोटे बचे की तरह अपने से कही ज्यादा विशाल इन स्वामी जी की ऊँगली पकडे चल रहा था. हवेली का दरवाजा उन्होंने हाथ लगते हे खोल दिया था जो बहार से बंद था और फिर से बंद कर दिया गया. स्याह काले रंग और पीली आँखों वाला ये कुत्ता भी अजीब था जो उन्हें देखते हे सतर्कता से खड़ा हो कर बराबर चलने लगा.

"वो लोग जो अंदर थे बाबा?"

"उन्हें उचित सजा तोह दे हे चूका है तुम्हारा दर्द. जान लेने से मुसीबत का हल होता तोह आज तुम्हे दर्द क्यों हुआ था अँधेरे में? बड़े फैंसले करने पड़ते है परन्तु उनके साथ जीना तुम जैसे मासूम के लिए मुमकिन नहीं. जिन्हो ने लिए थे वो भी चले गए और जिसने अपराध किया वो भी. तुम्हे जितना उचित लगे बस उतना हे ज्ञान देना उस इंसान को. वस्त्र बदल लेना बीटा, ये दूषित हो चुके है.", अर्जुन नयी ऊर्जा से भरा मुस्कुरा रहा था उनका हाथ पकडे चलता हुआ. जहा वो कटीली बाद लगी थी, उसको भी आसानी से खोल कर उन्होने अर्जुन को उसकी जीप तक सुरक्षित पंहुचा दिया.

"अब आप कहा जाएंगे बाबा? और फिर मुलाकात तोह होगी न?"

"इस बार तोह तुमने हमे प्रतीक्षा करवाई है देरी से आ कर. लेकिन सही समय पर हम स्वयं मिलने आएंगे. ये तोह किसी अन्य की परेशानी है, तुम्हारा वक़्त आएगा तोह आना हे पड़ेगा. प्रभु तुम्हे और तुम्हारे प्रेत को सलामत रखे. बहार दुनिया में तोह प्रेत रहते हे नहीं, इंसान के भीतर उनका अस्तित्व है. साध लिया तोह शक्ति, हार गए तोह मुक्ति. शिव जी, कृपया बरकरार रखे.", अर्जुन को भेज कर वो वापिस उस तरफ चल दिए जहा से आये थे लेकिन इस बार हवेली की जगह वो नदी की और गए थे अपने उस विचित्र से श्वान के साथ. अर्जुन उन्हें तबतक देखता रहा जबतक वो ओझल न हो गए. घडी में 4 बज चुके थे और सचमुच उसकी हालत बुरी थी. कपड़ो की तोह कही ज्यादा हे बुरी. लेकिन अब लहू बहना बंद हो चूका था और जहा खंजर से घाव हुआ था वह सफ़ेद कपडा जाने उन बाबा ने कब लपेट दिया. जीप की दराज में बटुआ देखने के बाद अर्जुन उसको लिए वापिस मदद चला. महल की छत्त से उसको जाता देखती उन आँखों में आंसू और चेहरे पर मुस्कराहट लौट चुकी थी.

अगले डेढ़ घंटे बाद पहले जैसे लेकिन जाये कपड़ो में अर्जुन आँखों पर वही गहरा चस्मा लगाए अपनी रफ़्तार से गाँव वाले रस्ते निकल चूका था, अनामिका चची का सामान लेने के साथ. उसका प्रेत उसकी शक्ति था जिसकी मारक क्षमता संतोष तक जा पहुंची थी. वो भी महल से निकल चूका था अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिए. प्रेत से पला जो पड़ चूका था और उसकी क्षमता उम्मीद से कही ज्यादा हे थी.
 
अपडेट 200 (ा)

उम्मीद से परे

"चल रेखा, घर चलते है तेरे जेठ जी आ गए बहार. कही कुछ ऐसा है जिस पर बात करके मैं हल्का करना चाहती हो?", ललिता जी आज हमेशा की तरह खुश दिखने की जगह थोड़ी सी चिंतित थी. रेखा के हाथ की जांच करवाने के पश्चात उसने खुद हे अपनी जेठानी से कुछ वक़्त इस बड़े मंदिर के प्रांगण में व्यतीत करने की इत्छा जताई थी. राजकुमार जी को भी मार्किट में थोड़ा काम था इसलिए उन्हें भी ये बात सही लगी. जैसा अक्सर होता है की दोपहर के समय मंदिर के कपाट बंद रहते है, इधर भी वैसा हे था. लेकिन अगल बगल में असंख्य घने वृक्ष और उनके निचे विराजमान भगवान् के प्रतीक बहोत थे रेखा के लिए. ललिता जी बहार गरीब बचो को खाने पीने का सामान भेंट करने के बाद कुछ वक़्त वही एक वृक्ष की छाया में बैठी अपनी इस ज्यादातर शांत रहने वाली देवरानी से अधिक छोटी बहिन को हे देखती रही.

रेखा जाने क्या वार्तालाप कर रही थी उस तुलसी से एक तरफ छाया में स्थित थी. लाल पवित्र धागे और कुछ दिए अगल बगल थे उस पवित्र पौधे के जिसकी मेहता हरेक व्यक्ति जानता समझता था. समय गुजरने के साथ अपनी जेठानी की आवाज से रेखा की ये मूक वार्तालाप और तन्द्रा भांग हुई. अब चेहरे पर कुछ हद्द तक संतोष और सहजता के भाव थे.

"कुछ ऐसा हुआ तोह सबसे पहले मैं आपसे हे बात करुँगी दीदी. बस हाथ में थोड़ा दर्द ज्यादा होने लगा था और घबराहट भी. आप जानती हे है की मुझे भीड़ और ये हॉस्पिटल वाले वातावरण की बिलकुल भी आदत नहीं. दम घुटने लगता है ऐसी जगह फिर चाहे हमारी देखभाल आम लोगो से बेहतर क्यों नहीं हो.", रेखा के साथ सहमति जताती हुई ललिता जी इस लम्बे रस्ते पर चलते हुए मंदिर के बहार कड़ी कार को हे देखते हुए अपनी बात कहने लगी.

"मैं जानती हु रेखा की तुम कई मामलो में पुरुषो से भी मजबूत हो लेकिन उतनी हे ज्यादा संवेदनशील भी. उस छोटे बचे का जख्म और रुदन तुमसे सेहन नहीं हुआ न? हथेली तुम्हारी आधी अलग हो सकती थी, जिस पर तुमने हल्का सा भी दर्द न दर्शाया पर बस एक बचे और उसके छोटे से जख्म ने तुम्हे कितना विचलित कर दिया जिस वजह से तुम यहाँ अपना दर्द हल्का करने आ पहुंची. तुम्हे मैं 24 बरस में न समझ पायी रेखा की आखिर उपरवाले ने तुम्हे किस गलत मिटटी से बना दिया इस कलयुग में?", ललिता जी ने ठीक उस बड़ी बहिन की तरह रेखा जी को जाना था जो एक दूसरे की पूरक हो. और उनके इस वर्णन पर स्वयं रेखा जी मुस्कुराने से न रुक सकीय.

"जीवन का एहसास सबको रहता है दीदी और हम महिलाओं पर तोह जैसे भगवन की कुछ अधिक हे मेहर है जो सक्षम होती है और कई जीवन इस दुनिया में लाने के लिए. क्या वो दर्द होता है? नहीं न दीदी. वो परीक्षा होती है जिसको पास करने का फल एक नया जीवन, जो आपसे हे जीवंत हुआ हो. फिर उस अंश का दर्द तोह हर उसके सामान जीवन से हमको जोड़ देता है. वो बचा पीड़ा में थे और माँ सबकुछ देख सकती है उस पीड़ा को नहीं. जवाब मुझसे बेहतर आपको पता है. अर्जुन और संजीव में भेदभाव भी तोह आप हे करती आयी है.", रेखा के जवाब से जहा ललिता जी खुश थी वही उस तुलना ने उन्हें हैरत में दाल दिया. आजतक तोह रेखा ने ऐसा कभी नहीं कहा था बचो के लिए.

"मैं ऐसा सपने में भी नहीं सोच सकती रेखा. मेरा लल्ला मुझे संजीव से कही ज्यादा प्यारा है. बोल देती हु आइंदा कुछ भी अनाप शनाप कहा तोह."

"देख लिया दीदी आपने हे खुद मेरी बात सच साबित कर दी. संजीव माधुरी के वक़्त तोह आप उन्हें समय दे न सकती घर और जेठ जी का दायित्व पूरा करते हुए. अलका और ऋतू तोह साथ में पाली बढ़ी, चाहे एक को माँ जी ने ज्यादा गॉड उठाया और दूसरी को पिता जी ने. वो दोनों उस दौरान न मेरे करीब हुई न हे आपके. पर अर्जुन.. वो तोह आपके सीने पर भी सोया है और मेरे भी. लेकिन हर रोज उसको नहलाना, मालिश सब आप हे करती रही. आप नहीं रोई थी जब वो कृष्णा दीदी के पास चला गया था? वापिस आया तोह 2 हे लोग थे घर में जो उसको लेने के लिए उम्र का अंतराल भी भुला बैठे. ऋतू और आप. उसकी ज़िद्द यहाँ पूरी नहीं होती थी तोह वो पिछले घर पहुंच जाता था क्योंकि उसकी आयी जी (ताई जी) उसको सब दिलवा देंगी. सच तोह यही है न की वो आपकी कोख से भले पैदा न हुआ पर सबसे ज्यादा ममता आपको उसके साथ हे मिली? आज भी वो घर में सबके सामने सिर्फ आपके हे साथ मस्ती करता है चाहे आपका मूड हो या न हो. आप भी तोह उसके लिए ये सांसारिक और आत्मिक बंधनो से परे जा चुकी है. होता है न उसका दर्द आपको महसूस?", अब ललिता जी लाजवाब हो चुकी थी जैसे उन्हें रेखा के दर्द का भी समझ आ चूका हो. ललिता जी जहा इस दर्द में कुछ सिमित दायरे में थी वही रेखा इसको हर तरफ महसूस कर लेती थी.

"तू अभी जवान पड़ी है और मेरी मान तोह एक और कोशिश कर ले शंकर के साथ. इसका तोह ब्याह मैं हे करुँगी रेखा फिर चाहे कृष्णा भी बुरा माने. दूसरा कर लेगी तोह तुम दोनों उसको देख लेना पर मेरा लल्ला मैं हे ब्याहूँगी.", अब रेखा ने पहली बात तोह सिरे से हे नजरअंदाज कर दी क्योंकि इस पावन जगह पर जो ख़याल आने लगा था वो तोह कही ज्यादा हे अनैतिक था. लेकिन दूसरी बात का जो जवाब दिया वो ललिता जी न समझ सकीय.

"हाँ मुझे भी यही लगता है दीदी की उसकी जिम्मेवारी आप हे लेंगी. मैं और कृष्णा तोह बस कन्यादान हे कर सकते है. चलो बाकी रात में बात करते है, ये आरती जाने क्या क्या ले आयी अपने ताऊ जी के sath.",Dono पिछली सीट पर बैठी तोह आगे राजकुमार जी की बगल में आरती ढेरो सामान लिए थी. उसको खुश देख मैं हे मान रेखा जी भी अपना दर्द भुला कर बस देखती रही की वो कितनी प्यारी है. जैसे ऋतू का हे एक और संस्करण. और वो तोह कहती भी इन्हे बड़ी माँ थी जैसे शंकर जी को बड़े पापा. कार वापिस घर की तरफ चल पड़ी थी और आजकल तोह राजकुमार जी भी सबसे बातचीत का मजा लेने लगे थे. शाम होने में थोड़ा हे वक़्त बाकी था इस साफ़ आसमान और तपिश के काम होने से.

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"आज कुछ ज्यादा हे समय लग गया बीटा तुम्हे? सब खैरियत तोह है न? बड़ी जीजी का फ़ोन आया था अभी और पूछ रही थी की गाँव आये या नहीं वापिस शहर से? उन्हें तुमने 8 बजे का बोलै होगा अखाड़े के बाद बात करने का इसलिए मैंने बताया की सेवक को भेक कर पता करवा लेती हु. पहले पानी पी लो बीटा.", देवकी तोह आज सचमुच हे ममता बरसा रही थी जैसे अर्जुन की चिंता में वो निर्जला रही हो. अभी ये बस भीतर आया हे था के सवाल पर सवाल जो अनामिका के पानी लेकर आने पर हे ख़तम हुए. अर्जुन जहा अनामिका को मुस्कुरा के देख रहा था वही वो कुछ उखड़ी सी लगी.

"वह सभी से मिलने मिलाने में हे आधा दिन निकल गया दादी और उसके बाद अनजान शहर में घूम फिर कर सामान लेना थोड़ा मुश्किल भरा काम था पर अब थोड़ा जान गया हु शहर को. वैसे आज अभ्यास तोह नहीं करूँगा लेकिन थोड़ा टहलने जरूर जाना है उधर. छोटे दादा जी क्या आज भी नहीं आये?", अर्जुन ने पानी का गिलास ट्रे में रखने के बाद हाथ मुँह धोया तोह चची पहले से हे टोलिया लिए कड़ी मिली. वो आज अलग हरकते कर रही थी लेकिन जुबान हमेशा की तरह खामोश. पर इन हरकतों को सिर्फ अर्जुन हे समझ रहा था कुछ हद्द तक. देवकी के लिए तोह उसकी बहु का ये फ़र्ज़ मात्रा था.

"तेरे दादा जी को तोह मैं आज तक समझने की कोशिश कर रही हु बीटा, इस घर में जब से आयी थी वो ऐसे हे देखे है. दोपहर में करीब 12-1 बजे आये थे और रोटी बंधवा कर फिर से खेत निकल गए. जमीन समतल करवा रहे है, जाने वह से क्या सोने के कलश निकलने वाले है. और महल में सब कुशल मंगल है बीटा?", देवकी जानकारी ले रही थी और आँचल रसोईघर से उनकी चाय, अर्जुन और खुद के लिए दूध लिए चली आयी. अर्जुन ने मुस्कुरा कर आँचल को देखा और प्रतिउत्तर में उसने भी वैसा हे किया. आज आँचल भी कुछ उन्मुक्त दिख रही थी, सलवार कमीज की जगह लम्बी ढीली टीशर्ट और ढीला नरम कपडे का एलसीक वाला पजामा. बाल ऐसे हे खुले जिन्हे बस रबर से बांध कर समेटा हुआ था. देवकी ने भी अपनी नातिन को एक निगाह देखने के बाद चाय की प्याली उठा ली. चेहरे से तोह वो खुश हे थी इस वक़्त.

"हाँ थोड़ा बहोत बौ जी ने बताया था इस बारे में की छोटे दादा जी ज्यादातर बस khet-jameen या चौपाल पर हे समय गुजरते है लेकिन बातचीत फिर भी नहीं करते उतनी. मुश्किल होता होगा न दादी ऐसे taal-mel बैठना? आप बड़ी हिम्मतवाली है जो अकेले हे इस बड़ी हवेली और फिर bacho-bahu तक को ाचे से रखती आयी है. उधर महल में तोह पहली बार हे जाना हुआ था इसलिए यही कह सकता हु की वह ढेरो नियम, अंशाशित माहौल और raaj-shahi और आम इंसान में आज भी फांसला है. लोग भले है और महेंद्र जी ने अपना ाचा समय दिया मुझे. बाकी तोह बस इतना बड़ा महल घूमने फिरने में वक़्त पता नहीं चला. आप कभी गयी है उधर दादी?", अर्जुन ने जिस तरह बहु का ख़याल वाली बात कही थी अनामिका पाँव पटकती हुई जीप से सारा सामान निकाल कर अपने कमरे में हे बंद हो गयी. अर्जुन उसकी खिंचाई कर रहा था जबकि ऐसा वो करना चाहती थी. इधर महल का जीकर हुआ और दामिनी अपना पल्लू घूमती हुई हंसती बोलती हुई िन्दु और दीपा के साथ हवेली के भीतर चली आयी. लगता था कुछ ज्यादा हे खुश थी वो आज पर दीपा भाभी का आना अर्जुन को थोड़ा खटका, फिर भी सम्मान से उसने सभी की तरफ बस हाथ जोड़ दिए. दामिनी ने खुद हे चारपाई सीधी करके सामने बिछा ली थी और बाकी दोनों महिलाओं ने पहले देवकी जी के चरण सपर्श करके आशीर्वाद लिया.

"मैं तोह इस गाँव से भी अगर कभी बहार निकली हु बीटा तोह बरसो पहले अपने पीहर गयी थी और या फिर तुम्हारे शहर. ज्यादा से ज्यादा इस दामिनी के घर तक निकलना हुआ है वो भी महारानी इस बुढ़िया से काम करवाती है इसलिए. गाँव की भी विचित्र कहानी है बीटा जहाँ हर आदमी निकल कर शहर जाता है और औरत गाँव में घर की चारदीवारी में रह जाती है. चलो, मेरे मामले में इतना सबकुछ तोह नहीं है. ड्राइवर, गाडी है अपने पास तोह आना जाना कर सकते है कही भी लेकिन फिर जो तुमने कहा वो बात भी है. हवेली और बचे सँभालने के साथ ढेरो जिम्मेवारियां. रात नींद काम और बेहोशी ज्यादा हावी रहती है. हाहाहा.. दूध ठंडा हो रहा है और आज तुम देरी भी हो गयी. और दीपा, सब कुशल मंगल है बेटी? आज तुम भी िन्दु के घर हे थी क्या इनके साथ?", यही सवाल तोह अर्जुन के मैं में था जो अब उन लोगो की तरफ न देख आराम से दूध पीने का उपक्रम करता हुआ बस आँचल से थोड़ी नजरे लड़ा रहा था. अनामिका ने रसोईघर में जाने से पहले अपने बचे को सास की गॉड में दे दिया, जो जाग चूका था. देवकी भी जैसे बहोत ज्यादा मोह रखती थी अपने इस पौटे से जिसको लेते हे वो बस उसको खिलने में हे लग गयी.

"बड़ी माँ जी, मैं आपके हे पास आ रही थी और घर के बहार हे दीदी मिल गयी यहाँ आती हुई. घर में आपकी दया से सब ठीक कुशल मंगल है बस आपसे कुछ मांगने आयी थी अगर आपकी मेहरबानी हो तोह.", दीपा भाभी की 'दया' वाली बात अर्जुन ने भी सुनी और उन्होंने ये कहा भी एक बार अर्जुन की तरफ देख कर था. आँचल जैसे अर्जुन की दूरदर्शन थी फिलहाल.

"तुम हमारे लिए कही दामिनी रौशनी से काम हो क्या दीपा? एक बार को तोह मैं इस िन्दु के कान खिंच दू लेकिन तुम हक़ रखती हो बेझिझक बात करने का. जो मुझसे बन पड़ेगा वो मैं जरूर करुँगी अपनी बची के लिए. बताओ क्या परेशानी है बेटी?", देवकी और ये उसका दिलदार रूप. अर्जुन तोह नाकाम हे था इस घाग को समझने में लेकिन दीपा बेचारी सचमुच हे बहोत भोली और साफदिल महिला थी.

"बड़ी माँ जी, आपका बहोत शुक्रिया और मैं इसलिए हे आपके पास आयी हु. ये खेत पे हे व्यस्त है और इनसे कहने का कोई फायदा भी नहीं होगा. कल निम्मी की टूशन भरने की आखिरी तारीख है उधर शहर के बड़े सेण्टर पर और इसकी बुआ भी आज तड़के निकल गयी काम की वजह से नहीं तोह वो हे नाम लिखवा देती पैसे भरने के साथ, निम्मी को वो साथ ले गयी. ग्यानी जी टेम्पू ठीक करवाना देके आये है और नीले को परेशां करना ठीक नहीं लगा. आप छोटे प्रधान जी से या अपने हे किसी को भिजवा दीजिये न माँ जी. बची का साल खराब हो जाएगा, पैसे और परचा भर के तैयार है मेरे पास. कल 9 से 12 का हे समाया बस.", दीपा भाभी की बात सुन्न कर एक पल तोह अर्जुन हे चाहता था के वो बोल दे की हो जाएगा लेकिन यहाँ बात देवकी जी से की गयी थी.

"अरे ये कैसी मांग है बिटिया भला? निम्मो क्या हमारी बची नहीं है? अर्जुन बीटा, 8:30 पे दीपा के घर से कागज ले के शहर चले जाने, घंटा भर नहीं लगने वाला इसमें और बिटिया गैरो को ऐसा काम क्यों कहेगी हमारे होते हुए. दीपा, मेरा पौता कर देगा सब और वैसे भी इसने कल शहर जाना भी था आँचल के साथ उसकी किताबे लेने. भेज तोह सेवक को भी देती या बिनोद को हे फ़ोन कर देती लेकिन परचा तेरे पास है तोह बिनोद को इधर आना पडत और वो बाबू जी ऐसा करते नहीं. सेवक है मेरी तरह, अंगूठा छाप. तू चाय पी और अपने बड़ी बहनो से बतिया निश्चिंत हो कर. मैं जरा बाबू को घुमा के आती हु. ऐसी छोटी मोती बात सबसे पहले मुझसे किया कर, कह देती हु.", दीपा ने सर झुकाने के साथ हाथ जोड़ कर उनका धन्यवाद किया. अनामिका यहाँ इनके लिए चाय रख गयी थी और अर्जुन भी आँचल को अभी कपडे बदल कर आने का बोल चची के कमरे में चला गया.

"तोह आँचल बिटिया, इस बार तोह हवेली में मैं लग रहा होगा? साथ में भाई भी अब तोह यहाँ?", दीपा ने चर्चा शुरू की क्योंकि िन्दु अलग गुफ्तगू कर रही थी गाँव के किसी मुद्दे पर दामिनी के साथ.

"जी आंटी जी पहले से तोह कुछ ठीक है लेकिन मेरा ये भाई टिकता हे कहा है घर पे. सुबह दिन निकलने के साथ गया था और अब दिन ढले वापिस आया है. अभी भी देखना ये टिकने वाला नहीं, निकल लेगा गाँव घूमने. पर इसकी वजह से कंप्यूटर आ गया है जिस पे काम कर लेती हु और रात में थोड़ा हंस बोल लेते है आपस में. आप भी तोह पढ़ी लिखी हो आंटी जी और निम्रत भी अब बड़ी क्लास में आ गयी है, कंप्यूटर आप भी लगवा लो. मैं तोह चची को भी सीखने में लगी हु, उन्हें मुश्किल तोह हो रही है पर गाने चला लेती है वो.", आँचल और दीपा भाभी के वार्तालाप पर तोह जैसे बाकी दोनों का ध्यान हे न था. और दीपा भाभी भी आँचल से ये जानकारी ले रही थी जैसे उन्हें थोड़ा पता हो इसके बारे में.

"वो कोक्की बहिन जी के घर भी देखा था मैंने कंप्यूटर. उनके बचे इधर आते है तोह चलते है. टेलीविज़न के हे जैसा था देखने में तोह पर निम्नो कह रही थी की आगे उसको भी जरुरत पड़ने वाली है. पता किया था इन्होने शहर से तोह 50 हजार का बताया था उस वक़्त. अब फसल बिक चुकी है तोह इतने पैसे तोह होंगे की लिया जा सके. देखते है ये क्या जवाब देते है नहीं तोह थोड़ा टाइम बाद सही.", दीपा भाभी ने अब आँचल से हे बात करना बेहतर समझा क्योंकि वो काम की बात कर रही थी और अर्जुन जैसे उस की नजरो से खुद को दूर किये था. बाकी दोनों के किस्से भी जैसे ख़तम होने को नहीं आ रहे थे लेकिन अनामिका के कमरे में ज्यादा बातचीत के बिना भी बहोत कुछ हो रहा था.

"ऐसे उखड़ी उखड़ी सी क्यों दिख रही है आप? आपने जो भी बताया था वो मैं सब लेके आया हु. अगर फिर भी कुछ रह गया तोह कल जाने वाला हु न फिर से, बता देना जो कहेंगी ले आऊंगा.", अर्जुन ने अलमारी समेटने का दिखावा करती चची से बात शुरू की तोह उन्होंने कोई जवाब दिए बगैर अर्जुन का सामान दराज के भीतर सुरक्षित रख दिया. अपने सामान को तोह देखने तक की कोशिश न की थी अनामिका ने. और कभी वो एक तरफ के कपडे उठा कर दूसरी तरफ रखती तोह फिर दुबारा वही. अर्जुन ने एक बार आधे ढलके दरवाजे की तरफ देखा और फिर हिम्मत जूता कर chhui-mui सी अनामिका को पीछे से अपनी बाहों के घेरे में ले लिया. समतल gora-chikna पेट जो बमुश्किल 28 होगा, उस पर अर्जुन की ये पकड़ और पूरा वजूद अर्जुन के जिस्म से चिपकने पर अनामिका की सांसें हे उखड गयी. वो खुश होना चाहती थी लेकिन इतनी जल्दी भी नहीं.

"हम कौन होते है जिसकी परवाह तुम्हे हो.? काम करने दो हमे अर्जुन, मूड ठीक नहीं है हमारा. वैसे भी हमारा ख्याल तोह माँ जी ाचे से हे रखती है.", अर्जुन समझ गया था के नाराजगी तोह जरूर है लेकिन फिलहाल ये ऐसे हे रहना चाहती थी. अर्जुन ने चेहरा निचे झुकाते हुए अनामिका चची के कंधे के थोड़े निर्वस्त्र हिस्से को चूम लिया.

"मैं कहा रोक रहा हु चची आपको. लेकिन ऐसे नाराज रहना तोह गलत है न? जानती हो मुझे तोह 8 बजने वाले थे लेकिन आपकी याद मुझे जल्दी घर ले आयी.", अर्जुन शरारत से उनकी नाभि की तरफ हाथ ले जाने लगा तोह अनामिका पहले तोह नजरे नीची करती मुस्कुराई फिर वापिस दिखावे के लिए उसका हाथ हटा दिया.

"कहा न काम करने दो और जहा जाना है वह जाओ. तुम्हारी अपनी ज़िन्दगी है और तुम कहा याद करते हो उन्हें जो तुम्हारी चिंता करते है.?"

"कसम से चची, अब आप न ज्यादा हे बोल रही है. देखो क्या मेरा प्यार झूठा है या मैं सम्मान नहीं करता aapka?",Arjun उनके कहने पर अलग हुआ तोह अनामिका ने पलट कर उसका गिरेबान हे पकड़ लिया.

"अंधे नहीं है.. सुबह वाले कपडे कहा है? नए ले लिए तोह क्या दिखाई नहीं देगा? कपडे खोलो अभी के अभी.", अनामिका ध्यान रख रही थी की उसकी आवाज बस यही तक रहे और उसकी बात सुन्न कर अर्जुन का सर झुक गया.

"ऐसा ाचा थोड़ी लगता है चची? बहार बुआ और आँचल के साथ 2 और भी लोग है.", अर्जुन के जवाब ने तोह अनामिका का पारा चरम पर हे पहुंचा दिया.

"कमीज उतरो मतलब उतरो. और कोई आएगा तोह यही देखेगा न की तुम धोने के लिए कमीज दे रहे हो. वैसे भी भागने तोह तुम वाले हो हे खेल का बहाना बना कर. गलत कहा क्या? चलो ाचे बचे की तरह कमीज उतार दो और फिर बस एक सवाल का जवाब दे देना.", अर्जुन समझ गया था के चची ऊपर से नंगा करके हे मानेगी अब क्योंकि 3 बटन तोह खोल हे चुकी थी वो. अर्जुन ने बाकी 3 बटन खोल कर जैसे हे कमीज उतरने का प्रयास किया बस एक पल के लिए उसके चेहरे पर हल्का दर्द उभरा जो अनामिका को भी परेशां कर गया. ब्याह पर एक इंच चौड़ी तजा पट्टी बंधी थी, जो ज्यादा मोती न थी. चौड़ा सीना नयी बनियान में हे उसके सामने था.

"घूम जाओ तोह जरा.", अर्जुन बेबसी से घूमा तोह अनामिका ने धड़कते दिल से वो बनियान ऊपर करनी शुरू की. और अभी वो उस लकीर को आधा हे देख सकीय थी की वापिस धक् दिया. अर्जुन हैरान हुआ की अचानक चची की आवाज कहा चली गयी. मुड़ने के बाद जब नजर पड़ी तोह वो मुँह पर हाथ रखे बस आंसू बहा रही थी. अर्जुन का भी दिल पसीज गया इस प्रेम और aatma-sambandh को देख. उसने बस चची को अपनी बाहों में लेते हुए सीने से लगा लिया.

"जानता था की कुछ भी कर लू पर आप पहचान लेंगी. हर बात का इतना ख़याल जो रखती है मेरी. मैं आपको दुखी नहीं करना चाहता था चची और सोचा भी की घर अँधेरा होने पर हे औ लेकिन फिर भी आना तोह आपके हे पास था न लौट कर? मैं जितना आपके साथ खुश रहना चाहता हु उतना आपको दुखी करने लगा हु. कुछ दिन के लिए कही और रहने चला जाऊ? महल या खेत में? निशान शायद कुछ और भी बढ़ सकते है जो मैं आपको दिखाना नहीं चाहता."

"थप्पड़ लगा दूंगी ये कही और की बात कही तोह रहने वाली. अब पूछ नहीं सकती तोह इसका ये मतलब तोह नहीं की दर्द महसूस न कर सकू? जीप से निकल रहे थे तब भी घुटना सीधा करते हुए तुम्हे दर्द हुआ था. जानती हु तुम महल के बाद कही न कही कोई गुल खिला कर आये हो पर इलाज तोह करवा लेते थोड़ा. पीठ देखो जरा अपनी. कोई भी पहचान लेगा की किसी ने बहोत बुरी तरह मारा है तुम्हे. जो भी था वो हैवान हे था..", रोने के साथ साथ अनामिका अर्जुन के सीने से लगी ध्यान रख रही थी की वो उसको ज्यादा दर्द न दे सके.

"मुझसे बड़ा हैवान नहीं था वो.. नौसिखिये से थे 2-3 जिन्होंने अँधेरे में बस पीठ पे हल्का सा वार कर दिया. वो नहीं चलने वाले महीने या 2 महीने से पहले. रात को इतना कष्ट कर देना मेरी प्यारी चची, पीठ की सिकाई जिस से निशाँ चला जाए. दादी ने देख लिया तोह वापिस ले जाएंगी अपने साथ. कर देंगी न?", अर्जुन ने फिर से फंसा लिया था बेचारी अनामिका चची को.

"थोड़ा ध्यान रख लेने से कुछ चला जायगा? अभी अखाड़े में जाओगे तोह भी ये ब्याह पे जो लगवा के आये हो ये दिखेगा और दर्द भी होगा. जाने नहीं दूंगी तुम्हे वापिस, चाहे बड़ी माँ से मुझे हे बहाना करना पड़े."

"हाँ हमेशा अपने फायदा का हे सोचती हो आप. रात को आप आराम से सो सको और मैं निक्कू की निक्कर बदलता राहु. अब इतना तोह करना हे पड़ेगा आखिर उसकी माँ इतनी प्यारी जो है. वैसे मैं अखाड़े में नहीं जा रहा आज और ये तोह मामूली सी चोट है, गर्मी की वजह से पट्टी बांध ली इन्फेक्शन न हो. कर देंगी न रात में मालिश?", अर्जुन जैसे उन्हें सताने के साथ थोड़ा उत्साहित भी हो रहा था जो उसके हाथ अनामिका के नरम कूल्हों पर फिसल आये.

"ये प्यार रखो अपने पास और थोड़ा हाथ हटाओ वह से अपने. मख्हन पसंद नहीं है मुझे. कपडे बदल लो, मैं रात में फिटकरी के पानी से सिकाईं कर दूंगी. और निक्कू तुम्ही देखो, मुझे भी सोना होता है."

"हाथ उधर से हटा कर कहा राखु आप हे बता दो?"

"श.. हटो न प्लीज.. रसोई में जाना है और आँचल भी आ सकती है. नहाने के बाद पट्टी मैं बदल दूंगी, सामान रखा है मेरे पास. अब कपडे बदल कर बहार जाओ, वैसे भी आँचल उलटे सीधे सवाल पूछ रही थी आज मुझसे. अब हटो.", अनामिका ने अर्जुन को परे धकेलने के साथ जल्दी से उसके कपडे सामने क्र दिए. वो अब शर्म रही थी और जैसे हे अर्जुन ने नजरो का पीछा किया, वो सर खुजाता हुआ पजामा और टीशर्ट लिए कमरे से निकल गया. तगड़ा उभार टांगो के बीच बन ने लगा था, इस हलकी फुलकी मस्ती और आलिंगन से. अनामिका को सिमित सा अनुभव था संसर्ग का लेकिन जैसा स्पर्श उसने अर्जुन के सामीप्य में उस पुरुषांग का किया था वो कही न कही विरोधाभासी विषय था. अर्जुन तैयार हो कर जब बहार आँगन में आया, अनामिका अपने काम में लग चुकी थी और आँचल उसके हे साथ थी रसोईघर.

"Khel-ghar की तरफ हे जा रहे हो न अर्जुन? दीपा और िन्दु को भी साथ लेते जाओ. दीपा फिर भी पड़ोस में हे रहती है पर िन्दु का घर खेत वाली सड़क पे है.", दामिनी के स्वर में भी उम्मीद से ज्यादा मिठास देख अर्जुन मैं हे मैं शंकित हुआ के आज माँ बेटी ने चाशनी तोह नहीं जातक ली. वो जवाब में बस हाँ में सर हिलता हुआ उन दोनों के साथ हो लिया. जहा हल्का सा जख्म हुआ था वो पट्टी टीशर्ट से पूरी तोह जाहिर नहीं हो रही फिर भी सफ़ेद चुस्त टीशर्ट से उसका कुछ भाग जरूर दिख रहा था जो दीपा भाभी ने गौर किया. कुछ अजीब बात थी पैदल चलते वक़्त. दीपा भाभी एक तरफ तोह िन्दु अर्जुन की बगल में. जबकि होना चाहिए था उन दोनों महिलाओं को एक साथ.

"पहली बार आ कर क्या बहार से हे चले जाओगे अर्जुन?", अर्जुन को अब ज्यादा हैरानी हुई जब दीपा भाभी ने 'पहली बार' कहा और अर्जुन से पहले िन्दु ने जवाब दे दिया.

"हाँ आएगा क्यों नहीं दीपा? कल आना तोह है हे इसने, और शाम हो रही है तोह पहले मुझे घर छोड़ आये. कल नाश्ता तुम करवा देना इसको. क्यों अर्जुन बीटा?"

"ह.. हाँ भाभी मैं कल सुबह आता हु. चलिए िन्दु आंटी.", अर्जुन को सकपकाते देख दीपा ने भी ज्यादा कोशिश न की लेकिन दिल में हजारो सवाल थे जिनकी वजह से वो आज हवेली तक जा पहुंची थी. िन्दु तोह जैसे कुछ और हे ठान के निकली थी हवेली से जो अर्जुन अब समझने लगा था. दीपा भाभी से विदा लेने के बाद दोनों चौपाल से पहले हे एक तरफ जाती सड़क पर हे मुड़े थी िन्दु की कमर में ज्यादा हे लचक आ गयी. दामिनी की सहेली थी और हरकतों के साथ साथ जिस्म भी वैसा हे बस रंग गेंहुआ था लेकिन ये कमी िन्दु अपने जलवो से पूरी करती थी जो अब उसने दिखने शुरू कर दिए.

"तोह कैसा लगा दामिनी का बाग़? और दीपा भाभी, मैं आंटी.. इन्साफ नहीं कर रहे प्रधान जी आप.", िन्दु ने जैसे अपने दुपट्टे को सर पे करने के बाद सीना सामने किया अर्जुन उसकी हिमाकत देख हैरान हे रह गया. ऊपर से इतने स्पष्ट सवाल.

"वो सिर्फ बुआ का हे बाग़ नहीं है आंटी, परिवार का है. हाँ ाचे से सभाल कर रखा गया है और नहर के पास तोह दृश्य भी खूबसूरत था. वैसे दीपा भाभी को निहाल भाभी बुला रहा था तोह मैंने भी वही कहा. लेकिन आप बुआ की सहेली है तोह आंटी कहना ठीक नै क्या?"

"हाँ तुम bhed-bhaav तोह करोगे हे, अकेले तुम हे नहीं जिन्हे जवान औरते पसंद न हो. लेकिन इतनी बूढी भी नहीं हुई हु मैं की मुझे नजरअंदाज हे कर दो.", अर्जुन बस खुद को कैसे भी शांत कर गया था इस तुलना पर.

"न मैंने कब कहा के आप बूढी है. और दीपा भाभी से मैं मिला हे कितनी बार हु? 2 बार हवेली में सामना हुआ, एक बार चौपाल पर और एक बार दिलबाग भैया का खाना देने गया था निहाल के साथ तोह उनके घर से लिया. लेकिन लगता है आप कुछ ज्यादा जवान होती जा रही है.", अर्जुन ने घर जाने वाली बात को इस तरह से घुमा कर बता दिया था जिस से अगर िन्दु सवाल भी करना चाहे तोह न कर सके.

"वो तोह कह रही थी की तुम घर आये हे नहीं अभी तक. वैसे मेरी जवानी दामिनी की टक्कर की है, बता देती हु.", कुछ खली प्लाट और आगे सुनसान सी गली. सरपंच का घर पिछली गली में था और उसकी सांझी दिवार थी अगले मदद पर बने िन्दु के घर से. यही सड़क आगे सुनसान हो जाती थी जहा सिर्फ खेत हे थे.

"आपके घर में दाखिल हो कर मैं वापिस चला जाऊ तोह क्या इसको आना कहेंगी आप? उनका मतलब chai-paani से हे था लेकिन मुझे नहीं लगता की आप सीधे सीधे कुछ समझने वाली है. जो चाहती है वो बोल दीजिये और यकीन कीजिये की बात हमारे बीच हे रहेगी. मैं ये भी जानता हु की बुआ को आपके इन इरादों की खबर तक नहीं.", अर्जुन ने उस भरी सीने को बेशर्मी से ताड़ने के बाद िन्दु के चेहरे पर नजरे टिकाये अपनी बात कही तोह एक पल को तोह िन्दु की बोलती हे बंद हो गयी. फिर वो हिम्मत करके बोल हे उठी.

"शब्बीर और मेरा छोटा भाई सतवीर कहा हैं? मुझे नहीं पता के उन्होंने वो सब क्यों किया लेकिन इतना जरूर कह सकती हु की उन दोनों से तुम्हारा जरूर लेना देना है. गाँव वालो की नजरो में तोह कहलवा दिया की शब्बीर भगोड़ा हो गया पर मैंने अपनी आँखों से देखा था तुम्हे उसको कंधे पर दाल के ले जाते हुए. मैंने किसी को नहीं बताया इस बारे में और शब्बीर को तुम मार के फेंक भी दो चाहे लेकिन मेरा छोटा भाई... सतवीर घर लौट आना चाहिए. तुम मुझे नहीं जानते की मैं किस हद्द तक जा सकती हु?", िन्दुए अब कामुक की जगह गुस्से में भड़क रही थी लेकिन आवाज को धीमा रखते हुए.

"इतना करने दिया वही बहोत नहीं है तुम्हारे लिए? मैं जानता था के तुम वही थी और बुआ को तुमने हे भेजा था शब्बीर के पास वह जाने से पहले. पेशाब करने गयी थी और वापिस लौटी तोह न शब्बीर मिला न अपना छोड़ू भाई. ओह.. सतवीर के बारे में तोह तुमने अपनी ख़ास सहेली के साथ घरवालों को भी नहीं बताया होगा न की क्या गुल खिलाती हो तुम उसके साथ? वैसे तुम नवाब का शिकार करने वाली थी न जल्द हे? और भी बताऊ तुम्हारे हर 2 महीने बाद मायके आने की वजह या आज के लिए इतना काफी है? तुम्हे सत्तू की भी जरुरत नहीं है िन्दु देवी, उन तस्वीरों की है जो उसके पास थी और उस रात वो अपना काम करने के बाद तुम्हे लौटने वाला था. खैर तुम्हारी बुरी किस्मत और मेरी किस्मत तोह जरुरत से कुछ ज्यादा हे तेज है. शब्बीर की जरुरत किसी और मामले में थी लेकिन ाचा हुआ के तुम और तुम्हारा भाई साथ लपेटे गए. मैंने फिलहाल निहाल और शहीद भाई को इस बारे में जानकारी नहीं दी है. लेकिन एक पते की बात बताता हु तुम्हे. जिस समय उन दोनों को दबोचा था उस से पहले मैंने और मेरे दोस्तों ने तुम्हारी पुराने और नए आशिक़ की दिल की बात सुनी थी. तुम्हारी बेशर्मी और आग का भुगतान तुम्हारी बेटी करने वाली थी. अक्सर लोग ताश में पत्ते लगा लेते है एक या 2 बाजी जीतने के लिए लेकिन मैं पूरी ताश बदल देता हु.", अर्जुन ने िन्दु के पाँव के निचे से पूरी जमीन हे गायब कर दी थी इन सभी घटनाओ को खोल कर और उनमे शामिल लोगो के. उस रात वो शहीद भाई के साथ यही तोह कर रहा था अखाड़े से जाने के बाद.

"वो लोग ऐसा नहीं कर सकते.. देखो मेरा परिवार उजाड़ जाएगा अर्जुन अगर वो तस्वीरें किसी के हाथ लगी थो. शब्बीर से मैंने जो भी किया वो सहमति से किया लेकिन शब्बीर ने सतवीर को इसमें शामिल करने का कहा तोह मैं उस से भी दूर हो गयी. लेकिन वो तस्वीरें उसने मेरे भाई को दे कर मुझे मजबूर कर दिया इसलिए मैंने एक बार अपने भाई को भी खुश किया. उस रात उन दोनों ने आखिरी बार का वास्ता दे कर बुलाया था मुझे जिसके बाद शब्बीर इधर कभी आने नहीं वाला था और सतवीर आगे सिर्फ मेरी मर्जी से शामिल होना चाहता था, फोटो देने के बाद. वो अपनी भांजी के साथ ऐसा नहीं कर सकता.", अर्जुन मैं हे मैं सोच रहा था के कमाल की सहेलियां थी दोनों. किस्मत से दोनों के छोटे भाई भी उनके हे जैसे निकले.

"बहोत बड़ी बड़ी बात कह रही थी अभी तुम. जवानी दिखा डौगी, मैं तुम्हे नहीं जानता.. किस हाड तक जा सकती हो.. दामिनी बुआ से बातों में तुमने मेरी जानकारी निकलवा ली और सोचा की ये तोह पके आम सा झोली में आ गिरेगा और डरा दबा के त्रिया चरित्र से काम निकलवा लुंगी. आइंदा किसी के बारे में भी ोुचि या गलत बात तुम्हारे मुँह से निकली तोह मैं आगे जो करूँगा वो तुम देख नहीं सकोगी. ब्लैकमेल नहीं कर रहा, साफ़ बता रहा हु सामने से. मेरी बुआ से दूर रहना और निकल लो सुबह अपने पति के घर. तुम्हारा भाई फ़िलहाल कड़ी म्हणत कर रहा है अपने पापो को धोने के लिए. पहोच जाएगा 2 दिन बाद घर और अब वो गलती भी नहीं करने वाला किसी लड़की.. अपनी बीवी तक को नहीं छेड़ने वाला. मैंने जो कहा तुम वो करो, जो तुम चाहती हो वो मैं करूँगा. हर काम के लिए कपडे उतारने जरुरी नहीं होती िन्दु जी और न कोरी धमकी से कुछ हो सकता है. तुमने मुझे नहीं बल्कि मैंने इंजतार किया था की तुम मुझे देख सको यहाँ से जाते हुए. भाई तोह तुम्हारा पहले हे छोड़ आया था सही जगह. मेरे पास आ कर समस्या बताती तोह खुद की नजरो में शर्मिंदा नहीं होना पड़ता. चलता हु और अर्जुन शर्मा अपने वाडे का पक्का है.", अर्जुन बीच की गली पकड़ता हुआ खेल घर की तरफ हो लिया िन्दु को वही सदमे में छोड़ कर. पंचायत में तोह सिर्फ पार्ले गाँव के 2 लड़को का हे जीकर हुआ था लेकिन उनके साथ ये 2 लोग पहले हे दिलबाग के खेत में क़ैद कर दिए गए थे. िन्दु जहा पहले अर्जुन द्वारा ऐसे pol-patti खोले जाने से भयभीत थी, वही उसकी पूरी बात सुन्न ने के बाद सचमुच उसको खुद से हे घृणा होने लगी थी. अर्जुन तोह नजरो से ओझल हो चूका था उसको तिराहे पर छोड़. फैसल िन्दु को हे करना था की वो फिर उसी रास्ते पर जाए या अर्जुन ने दिखाया है. तीसरा तोह बंद हे था, अँधेरे से भरा.

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"तू ारु से कब बात कर रही थी?", यहाँ आरती और अलका पढ़ने में लगी थी जब ऋतू अपनी किताबे उठाये इस ऊपर वाले कमरे में चली आयी जहा पहले अलका और वो हे रहते थे. दिन में कोमल दीदी ने ऋतू को कब्जे में लिया हुआ था इसलिए अभी एक घंटे के लिए वो आजाद थी पर किताबे साथ. ऋतू की आवाज सुन्न कर अलका ने तोह तुरंत मुंडी न में हिला दी पर आरती मुस्कुराते हुए चस्मा चढ़ाये कुछ लिखने में व्यस्त रही.

"अरे इस से बात कर रही हु मैं जो नौटंकी कर रही है लिखने की. बोल ऋ मोटो, आज तू पीसीओ तक कैसे चली गयी और नंबर कहा से मिला?", ऋतू आरती को दबोच कर उसके गाल खींचने लगी तोह वो अलका से गुजारिश करती दिखी छुड़ाने की. पर हंस वो भी रही थी.

"बोल दे आरती नहीं तोह ये छोड़ने नहीं वाली.", अलका ने भी गुदगुदी करते हुए आरती को घेर लिया जो बेचारी वैसी हे काम बोलती थी.

"ाचा बाबा.. बताती हु.. हाहाहा.. छोड़ दे न ऋतू.. गन्दी कही की.. हाहाहा.. सॉरी...", ऋतू उसके ऊपर हे सवार हो कर बगल में गुदगुदी के बाद जैसे हे उभारो पर हाथ ले जाने लगी आरती ने हाथ जोड़ दिए.

"वो नंबर इसके पीछे हे लिखा था, विलेज पीसीओ अर्जुन के नाम से. मैंने दिन में वह फ़ोन करके कहा था के अर्जुन से बोल देना की मैं शहर से बोल रही हु और 6:30 बजे फ़ोन पे हे मिले. लड़का भला था जो 'ाचा भें जी, स्नेहा दे दवंगा प्रधान जी न.' बोल कर मान गया. दादी के साथ मंदिर गयी तोह बस तरय किया और बात हो गयी. वैसे तू इतनी जासूसी क्यों कर रही है? बात नहीं हुई क्या तेरी?", आरती चस्मा हटा कर अब मुस्कुराते हुए ऋतू को देख रही थी.

"देख ले इस आरती को अलका, तेरे बॉयफ्रेंड पे डाका दाल रही है वो भी कितनी हिम्मत से. तूने गाँव के पीसीओ पर मैसेज दिया? हाहाहा.. वाह आरती.. अलका जीत हे गयी फिर? मुझे लगा था के नंबर दिखने से भी तू कुछ न करने वाली लेकिन .. बताओ इस लड़की ने पीसीओ से पीसीओ पर हे मैसेज दे दिया. लेकिन कुछ भी कहो वो लड़का भी नेक इंसान हे होगा जो अर्जुन को बुला भी लाया. और क्या कह रहा था मेरा ारु, अपनी ारु को? बोल दे मोटो.. ज्यादा हे खिल रही है तू..", आरती तोह दिल से शुक्रिया हे कर रही थी ऋतू को और उसके मुँह से 2 बार ारु सुन्न के अनजाने हे मुस्कराहट के साथ उसकी आँखें नम्म हो गयी.

"ये रोटलु है ऋतू और तू अब इस से कहानी पूछेगी तोह बेचारी ने रोटी भी नहीं खानी. गलती से कल रात मैंने इसको पकड़ लिया था नींद में तोह उठ कर अंदर वाले कमरे में चली. कहती मुझे वह हाथ मत लगाओ, ये सिर्फ ारु कर सकता है.".

"छियई.. ये झूठ बोल रही है ऋतू.. अलका की बची, मैंने बस ऐसा कहा था के सोने दे लेकिन पूरी बात नहीं बता रही की तू मेरे ऊपर हे लेट गयी थी. और वो ारु वाली बात अपने से हे लगा रही है ये. मैं यही सोई थी बस बीच में तकिया लगाना पड़ा. ये लड़की बहोत खतरनाक है, तू जाने कैसे इसके साथ सो जाती है.", आरती चेहरा साफ़ करते हुए हंस भी रही थी जैसे उसने अर्जुन वाली बात से उनका ध्यान हटा दिया हो. अलका तोह उसके साथ हे हंस रही थी पर ऋतू थोड़ा निचे झुकते हुए धीरे से बोली.

"ाचा बता न क्या बात की उसके साथ जो इतना चमक रही है? नहीं तोह आज रात मैं सोने वाली हु तेरे साथ और पूछ ले अलका से की मेरे साथ ये तकिये चादर भी काम नहीं आते.", ऋतू होंठो को करीब ले जाने लगी तोह आरती के आँखे हे बड़ी होने लगी थी जबकि अलका मुँह को हाथ से दबाये हंसी रोक रही थी इस खेल को देखते हुए.

"तुझे मेरी कसम है, किश नहीं ऋतू प्लीज.. बस थोड़ी चिंता हो रही थी मुझे जबसे सुना है maa-papa को बात करते हुए. माँ परेशां थी ये सुन्न ने के बाद की वह ारु की जान खतरे में है. लोग रेसलिंग के नाम पर उसके साथ गलत भी कर सकते है. और अलका से पूछ ले के रात मैं सोई नहीं ये सब सुन्न ने के बाद. बस इसलिए एक बार बात करने का दिल था. तू गुस्सा तोह नहीं है मेरे ऐसा करने से?"

"उल्लू की दम फिर मैं हे तुझे नंबर क्यों देती? दादी और अंजलि दीदी के साथ कोमल दीदी या तारा जाते है लेकिन तारा नहीं गयी क्योंकि तुझे भेजना था. जितना उसकी परवाह मैं या ये अलका करते है, तू थोड़ी सी ज्यादा करती है. दिन में मैंने भी कहा था उसको की तुझसे बात कर ले एक बार तोह बोलै था गाँव के पीसीओ से कर लेगा शाम को. ज्यादा हे सेंसिटिव है तू और आइंदा बहार जाने की जगह इधर से हे कर लिया कर फ़ोन नहीं तोह प्रीती.. न यही से कर लिया कर. दादी को मैं लगा लिया करुँगी अपने साथ. वैसे तू कभी तोह फूलन देवी दिखती है तोह कभी वही हमेशा रो के बात मनवाने वाली. और क्या कहा फिर ारु को ारु ने? पर्सनल है तोह रहने दे.."

"है रहने हे देते है और तू मेरे ऊपर से उठ पहले. मुझे मोटी बोलती है लेकिन वजन तेरा मुझसे हे ज्यादा होगा. वैसे और भी कुछ सुना है मैंने, अलका को बताने वाली थी पर इसने कहा के तू आ जाये पहले.", आरती को थोड़ा चिंतित देख कर ऋतू तुरंत उसके ऊपर से उठ कर सामने हे बैठ गयी.

"ऐसा क्या सुन्न लिया जो तू टेंशन में आ गयी? और ये तूने कब सुना जरा ये भी बता?", ऋतू को लगा की आरती उसको देरी से बताने वाली है जो भी बात है. पर अलका ने उसका हाथ दबा कर सहज रहने का इशारा दिया.

"दादी बड़ी माँ (रेखा) से बात कर रही थी कुछ वक़्त पहले मंदिर वाले कमरे में. बड़ी माँ ज्योत जला रही थी उधर और दादी कमंडल रखने गयी. उन्हें लगा की हम लोग पीछे नहीं आये उनके कमरे तक.", आरती थोड़ा सोच सोच कर बोल रही थी.

"हाँ, माँ थोड़ा डिस्टर्ब है वो मैंने सुबह नोट भी किया पर लगा की हाथ में चोट की वजह से दर्द हुआ होगा. वो 3 बजे भी जाग रही थी लेकिन मुझे उठा हुआ देख फिर मेरे साथ सो गयी. हाँ फिर वो सचमुच सो गयी थी घंटे भर के लिए. लेकिन मुद्दे की बात कर न, मैं हे बताये जा रही हु.", ऋतू भी कही न कही तार जोड़ के मामले को देख रही थी.

"दादी कह रही थी की 'अब तोह बोल दे रेखा, भगवन के सामने बैठी है. तू उस इंसान को नहीं जानती तोह हुलिया हे बता दे.', जिसके जवाब में बड़ी माँ ने सिर्फ इतना कहा की, 'माँ जी, अभी तकलीफ नहीं है लेकिन फिर सबकी बढ़ जायेगी. वैसे वो सब जानता है और आपकी परवरिश गलत नहीं है. वो कर देगा ठीक.' और दादी वही बैठ गयी थी बड़ी माँ के पास. थोड़ा साफ़ सुनाई नहीं दिया लेकिन उन्होंने कुछ कहा की दादा वचन से मुक्त होने के बाद भी और वचनो में बंधे है लेकिन पौटे पर नियम लागू नहीं है. कुछ बड़ा होने वाला है जो कोई नहीं जानता पर समय रहते रोका जा सकता था. तेरी (रेखा) संतान भी डाव पे.. और बड़ी माँ ने उनका हाथ पकड़ कर ना में गर्दन हिलाई बस. ज्योत करने के बाद बड़ी माँ ने कहा की अगर अतीत भविष्य तक पीछे रह कर बेचैन करे तोह उसकी शान्ति के लिए हर संतान साथ देगी, पर यही बहोत है.", आरती एकदम चुप हो गयी थी जैसे उसको साड़ी बात खुद हे समझ में न आयी हो और इन्हे आती भी कहा से जब पूरा अतीत खुद रामेश्वर जी को हे नहीं पता था आजतक. उनके तोह पास कुछ ऐसे गम थे जो सामने से मिले थे, खोजबीन से पहले तोह उन्हें हे जंजीरो में बांध कर विदा कर दिया गया था.

"ये दादा पौटे तोह अर्जुन और बौ जी है. माँ पे हुम्ला किया था दामिनी बुआ ने जो बेवकूफ औरत है मतलब उसको साइड में हे रखो. वचन.. ये वचन के बारे में तोह तुझे पता होगा न अलका?", ऋतू ने दामिनी का नाम जितनी आसानी से ले दिया था आरती तोह आँखे फाड़ के उसको ऐसे देख रही थी जैसे उसने बम गिरा दिया हो लेकिन अलका ने हाँ में सर हिलाया.

"वचन तोह बहोत सारे है अगर आरती की बात को समझा जाए. मुझे जो पता है वो ये की गाँव वाले घर में दखल नहीं देने के लिए दादी ने बौ जी से वचन लिया था. शादी के बाद हे वो लोग इधर आ गए थे पर कुछ दिन पहले अपनी इमोशनल दादी के इमोशंस से दादा जी खेल गए और उन्होंने वचन वापिस ले लिया. लेकिन बौ जी अब भी जैसे आजाद नहीं हुए और पता नहीं ये रानी माँ वाला किरदार थोड़ा सा अजीब लग रहा है. बौ जी इसमें कहा फिट बैठते है? मिले तोह हम सभी है 2-3 बार पर हमेशा गाँव या उनके शहर वो भी बस देखा दिखाई तक और बौ जी उनके साथ अलग बातचीत करते थे. तू तोह इनके पड़ोस वाले शहर में थी आरती, कुछ सुना कभी चाचा से या गयी है तू महल? इतना हे पता है की pad-dada जी मुंशी थे लेकि वो सब तोह गुजर चूका फिर .. "

"पापा वह जाते थे कभी कभी और जो वो अंकल थे तीखी मूछ वाले (महेंद्र), एक बार वो घर के बहार तक पापा के साथ आये थी फिर बहार से हे चले गए. पापा ने कभी कुछ बताया तोह बस यही की पुराणी jaan-pehchan है और आपस में काम होता रहता है फिर चाहे वो raj-pariwar से क्यों न हो. लेकिन ये दामिनी बुआ साली.."

"श.. शांत रह मेरे गोलगप्पे.. इसलिए मैं नाम नहीं ले रही थी पर अपना ारु गया है पीछे तोह वो अपने आप कोई स्कीम लगा लेगा. लेकिन ये माँ कबसे ऐसे मामलो में पड़ने लगी और बताओ कितने शातिर है ये भोले भाले लोग जो नाम लिए बिना आपस में इतनी कहानी कह गए जितनी करमचंद न कह सकता. ारु आज महल गया था न और सुबह से हे उधर था. रानी माँ के कमरे से हे तोह फ़ोन किया था उनसे मुझे जबकि रानी माँ खुद उसके लिए मिल्कशेक बनवाने गयी थी, मतलब उसने भेजा था. Raj-mehal में औरत के कमरे में बहार का तोह क्या घर के पुरुष भी नहीं जा सकते.. मतलब ये.. अलका सचमुच मामला बहोत बड़ा है बहिन क्योंकि अपना ारु कभी इतने बड़े लोगो पर हाथ नहीं डालने वाला और दादा जी उन लोगो को बहोत मान देते है ठीक किसी सेवक की तरह.", अब वाकई ऋतू के साथ साथ बाकी दोनों भी परेशां थी लेकिन आरती किसी और वजह से शायद.

"रानी के कमरे में जा सकता है तोह पक्का ये राजकुमारी के भी गया होगा.. कमीने को बस यही तरीका आता है क्या कुछ भी पूछने के लिए?", आरती का दुःख सुन्न कर दोनों ने हे सर पीट लिया था.

"ऐ चुप कर पागल लड़की कुछ भी बोलती है. रानी अपनी दादी से भी बड़ी होगी शायद और राजकुमारी, वो तोह कामिनी लगती भी विन्नी दीदी जैसी है. माँ बेटी नहीं लगती और तू पूरी तरह से गलत भी नहीं है आरती है. ये सुबह से दोपहर तक उन कमरों में रहे और सामने वाले को लाड प्यार से न लपेटे ऐसा तोह हो नहीं सकता. पर इस सबका आपस वाला कनेक्शन नहीं बन्न रहा कुछ. यार अलका हमको कहानी कौन सुना सकता है raja-rani वाली?", ऋतू को अभी भी सहज और सवाल करते देख आरती तोह लगभग रुआंसी हो चली थी जिसके सर पे अलका ने हलके से थप्पड़ लगा दिया.

"इसकी जान सुख रही है की वह इसका ारु मुसीबत न फंस गया हो और तू कहानी के पीछे पड़ी है. तू एक काम कर, प्रीती को पकड़ ऋतू. उसको समझा के बौ जी और दादी के सामने भेज. वो कहानी सुन्न लेगी तारीफ और सवाल करके. दादी तुझे और मुझे तोह इस बात पे नेड़े (करीब) भी न लगने देगी लेकिन वो मासूम बिली है जिसका उन्हें जरा भी नहीं पता. आरती भी मासूम है लेकिन ये तोह बोलते हे पकड़ी जानी क्योंकि ये उधर बैठती हे कितना है. प्रीती रेसलिंग का जीकर करके रानी और महल तक आराम से चली जायेगी और दादी तोह उसको बस देखते हे बाकी सब भूल जाती है लेकिन वो भी नहीं जानती की असली करमचंद तोह वही है.", अब ऋतू को भी बात जाँच चुकी थी लेकिन आरती जैसे उबार हे नहीं प् रही थी अपनी सोच से.

"यही करते है कल दोपहर को. बाकी तू कोशिश कर ारु को बहलाने की और मोटी, अगर उसने वैसा कुछ किया न तोह मैं उसकी टाँगे टॉड दूंगी. टेंशन मत ले अब."

"अरे, बुक में पढ़ा था के अगर कोई इतनी हिमाकत raj-mehal में कर दे तोह उसको mrityu-dand तक मिल सकता है."

"ऐ बहार निकल तू उन घटिया किताबो से. वो तोह अर्जुन को ऐसे देख रही थी जैसे शादी में कोई है हे नहीं. दंड ारु दे सकता .. गन्दा वर्ड है ये. सजा इस बेटर.. हाँ दंड ारु हे देगा और शाम को वो जैसे महल से आ गया वैसे हे आगे भी आता रहेगा. तू थोड़ा फोकस कर और ध्यान रखा कर ये छोटी मोती बातो का. माँ पे नजर नहीं रख सकते, दादी पर भी नहीं लेकिन इनकी बातें सुन्न ने का प्रबंध करना पड़ेगा यार. मैं चलती हु पढ़ने निचे और आज अलका तू नहीं बचने वाली. ये गर्मी तुझ पर निकलेगी.", ऋतू दरवाजा बंद करती हुई तेजी से भाग कड़ी हुई और अलका ने हे आरती को चूम लिया.

"उसको ये पता है के खरबूजा छुरी पर गिरे या छुरी खरबूजे पर, कटेगा तोह..?"

"खरबूजा हे. लेकिन तेरे पास छुरी नहीं है डार्लिंग."

"ओह बेवकूफ तू ऋतू की बात कब समझने लगेगी? राजकुमारी अर्जुन के फंसे या अर्जुन राजकुमारी के, खरबूजा राजकुमारी हे है. सही किया तूने जो दिमाग नहीं लगाया. पता नहीं क्या बोलती है.. छी.. मेरे छुरी .. हट कामिनी. कितना गन्दा बोलती है तू."

"मैंने तोह यही कहा न के तुम्हारी छुरी नहीं है. वैसे ऋतू ने पहले कहा के दंड तोह गन्दा वर्ड है उस से ाचा तोह सजा लगता है फिर उसने रिपीट क्यों किया दंड.?"

"वही छुरी है बस और वो कहा बाज आती है ? चल अब रोटी बनाते है. पिंकी दीदी और तारा तोह छुट्टी पर है और ये रुपाली मुस्कान एक महीने में हे अगले सारे पेपर देने वाली है जितने लाइफ में होंगे."

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"Hello, तहसीलदार जी.", ये संतोष था जो जाने इस समय कौनसे शहर या कसबे में था पर चेहरे से पसीना पांच कर वो इस सुनसान स पीसीओ से नंबर मिलाने के बाद घंटी ख़तम होते हे सामने वाली की आवाज सुनते हे बेसब्री से पूछने लगा.

"अरे.. कुमार संतोष जी इतना घबराये हुए है और इतनी िज्जात्त से तोह मत बुलाओ इस नाचीज को.", ये रमाकांत हे था दूसरी तरफ जो ढिटाई से मुस्कुरा रहा था इस आवाज को सुन्न कर.

"मजाक नहीं बड़े भाई, मैं मुसीबत में हु. कोई ठिकाना बताओ जहा सुरक्षित रह सकू. वो साला तोह काली हवेली से बचा और ऊपर से मेरे सारे आदमी भी गायब है सिवाए एक के जो मिला भी तोह बेहोश. महल वापिस गया तोह महेंद्र हे गोली मार देगा और अपनी तरफ गया तोह मेरा बाप. ऊपर से वो लड़का साधारण नहीं है. कुछ करो भाई साहब."

"तुमने हमे चुटिया समझा था जब हमने कहा था की पुष्पक ने उसका अपना वारिस बना दिया है और रामेश्वर की जगह आज वो बड़े पंडित का उत्तराधिकारी है? काली हवेली से हमारे हे जाने कितने आदमी ज़िंदा नहीं लौटे और ये वह से भी आ गया साथ में तुम्हारे आदमियों की पिलाई की होगी सो अलग. देखो पंजाब से भाग कर तुम अब न हिमाचल जा सकते हो और न हरयाणा. सारंग तोह किसी हाल में तुम्हे पनाह नहीं देने वाला अगर उसको पता चला की तुम रामेश्वर से उलझ कर इधर आये हो. ये पता नोट करो.. सरहद पे हे क्सक्सक्सक्स शहर से पहले गाँव पड़ता है. क्सक्सक्सक्स ढाबे पर बताना के ललिया से मुलाकात करनी है, सुरक्षित रहोगे. बदले में समय अनुकूल होते हे 10 करोड़ का उधार है तुम पर, वो चूका देना. पिता जी के पास बिल भिजवाना ठीक नहीं लगेगा तुम्हारे. साला उधर बचे थोड़ी पैदा होते है, जानवर है 2 पैरो वाले रामेश्वर के कुनबे में. गांड सलामत तोह लुंड हजार. रखते है.", संतोष का था मैं हे विचलित हो गया था. अर्जुन से अभी आमना सामना नहीं हुआ था और जान के लाले पड़ चुके थे. उल्टा छुप कर जीने की कीमत अलग से 10 करोड़ गले पड़ गयी.

'अरे बहनचोद पुराण प्लान हे ठीक रहता अगर गाडी से उड़वा देता. नहीं मरना थे ये साला वह भी जैसे उधर नहीं मारा. अब 150 किलोमीटर जान सलामत रहे बस. फिर इस तहसीलदार की तोह गांड जरूर मारूंगा.', संतोष कार की तरफ बढ़ा तोह होश हे उड़द गए उसके. वह उसकी गाडी हे गायब थी.

"ऐ भाई, यहाँ मेरी कार कड़ी थी. कहा गयी?", वो पास खड़े राहगीर से पूछने लगा जो किसी बस का इन्तजार कर रहा था. शकल से हे घाघ और हरामी व्यक्ति था जो भी था.

"हम माँ छुड़ाए खातिर निगरानी करेंगे बे तुहार गद्दी का? ले गया कोनो भोंसड़ीवाला, हम तोह सरकारी रोडवेज से चालत रहे हमेशा. आखिरी बस आनेवाली 10 मिंट में, चढ़ जियो. पूरा पिंड हरामी इधर का. लड़का लड़की न देखत, गुल्ला घुसा देते पिछवाड़े में.", संतोष kad-kathi में मजबूत इंसान था लेकिन उसकी हालत जैसे ये घाघ पहचान गया था के फ़िलहाल उसके पल्ले कुछ नहीं.

"तुम हमे जानते नहीं, कुमार संतोष है हम. बदतमीजी के बदले जान ले सकते है तुम्हारी. वो गाडी 30 लाख की थी और उसमे 10 लाख नगद रखे थे. बस से चले जाए? अरे कोई बताएगा की हमारी गाडी गयी किधर?", वो आदमी तोह पीक थूकता बस ढिटाई से हंस रहा था अपनी जांघो के बीच हाथ से सहलाता हुआ. 2 लोग जरूर संतोष के पास चले आये.

"क्या हुआ बाबू? कोई परेशानी है क्या?"

"अरे भाई, फ़ोन करने गए थे और 2 मिनट में हे वापिस आये तोह हमारी गाडी हे गायब मिली. हमे कही बहोत जल्दी पहुंचना है और इधर तोह car-taxi तक नहीं दिख रही. लोकल हे हो तुम?"

"जीप चलेगी साहब? वैसे इधर कोई भी अपनी गाडी खुले में नहीं कड़ी करता. 10 साल का लोंदा भी कान से मेल निकल लेगा और खबर तक न होगी. अब इस तरफ गयी होगी तोह क्सक्सक्सक्स में खोल के बेच दी जायेगी और उधर गयी होगी तोह सलामत मिलेगी पर आधा दाम देना पड़ेगा नहीं तोह बाबू भाई भैंसो के बीच कटवा कर किलो के भाव बेच देंगे आपको. बोलो जीप चलेगी?", अब संतोष मरता क्या न करता. पहले हे 3 घंटे से वो 120 से ज्यादा रफ़्तार से कार दौड़ता हुआ इस राजस्थान के जाने कौनसे हिस्से आ पंहुचा था और रात भी गहराने लगी थी. उस पहले वाले घाग ठरकी ने इन्हे बातचीत में व्यस्त देख संतोष के चुत्तड़ो को मुठी में पकड़ कर दबाने के बाद छोड़ दिया.

"ओह भोस्डिके.. तेरी माँ की..", संतोष पिल पड़ा उस पर और उसके साथ हे बाकी दोनों भी. वो अजीब आदमी था जो इनसे मार खाने के बाद भाग कर थोड़ी दूर जा रुका.

"गांड बहोत मजबूत है बाबू तुहार. 5 मिनट बचे है देख लो, तबियत से ठंडा कर दूंगा. हेहेहे.."

"जाने दो साहब साला तैर में है ये. न दर्द होगा न समझ है इसको. बोलो गाडी निकले लेकिन mol-bhav कर लो पहले."

"क्सक्सक्सक्स जगह जाना है, मेरे हिसाब से 150 किलोमीटर होगा. वह पंहुचा दो और टैक्सी का भाड़ा ले लो. खाने का भी देने को तैयार हु मैं बस जितनी जल्दी पंहुचा सको उतना बेहतर."

"ये चैन के बदले में जहा कहोगे वह पंहुचा देंगे. देखो साहब, साफ़ पता लगता है के तुम कोई लफड़ा करके निकला है. रस्ते में भी कुछ हो सकता है तोह सोच लो. हाँ दारु और खाना हमारी तरफ से. क्सक्सक्सक्स ढाबा अपने हे दोस्त का है उधर. बोलो मंजूर? 10 मिनट बाद इधर कुत्ता भी नहीं मूतने आएगा. दोनों तरफ का तोह आपको बता हे चुके है.", आदमी जो भी थे इस वक़्त वही सहारा थे संतोष का.

"चलो भाई, लेकिन चैन वही जाने के बाद दूंगा. और मुझे भी उसी ढाबे पर जाना है."

"खुद हे देना साहब, गलत काम में भी हम लोग शराफत रखते. वो ढाबे पर हे जाना है तोह लड़की भी दिलवा देंगे, फ्री में. बहोत करारी है उधर की कबीले वाली. चल बे जुगनू, निकल अपनी जुगनी.", उस युवक ने अपने साथी को आदेश दिया और 2 मिनट बाद हे संकरी गली से वो खतरा सी जीप उनके सामने आ रुकी.

"इसमें जाना है."

"ऐसा मत देखो साहब, रेगिस्तान में ऊंट बैठ सकता है पर अपने जुगनू की ये जुगनी, 40 सवारी उठा कर भी हवा में उड़ती जाती है. पसर के बैठो बीच वाली सीट पे. घंटे बाद पिलाते आपको शाही गुलाब.", संतोष के साथ काम से काम ये तोह सुखद घटना हुई थी. नहीं तोह पहले सर से महल की छत, फिर उसके आदमी और बाद में कार और पैसा भी जा चुके थे. रही सही कसार उस हरामी आदमी ने उसकी गांड दबोच कर पूरी कर दी थी. ये लोग इस छोटे से सफर का उस से हजार गुना जरूर वसूल रहे थे पर काम तोह आये.

'ये दिन याद रखूँगा मैं पंडित अर्जुन.'

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"आदमी तुम जरा टेढ़े हो अर्जुन मिया. आज अभ्यास की जगह फ़ोन पर हे चिपके हुए थे. इश्क़ चलो एक से हो सकता है या 2 से, 5-5 जगह कौन नंबर घूमता है वो भी एक के बाद एक.", ये शहीद भाई थे जिनके साथ अभी अर्जुन उनके घर से निकल कर खेत वाली तरफ जा रहा था. आज उसने थोड़ा वक़्त यही उनके घर बिताया था शहीद भाई के जुड़वाँ बेटो और उनकी बेगम सफीना से हंस बोल कर. बेहद हे प्यारा परिवार था शहीद भाई का और अर्जुन द्वारा इतना maan-samman देने के साथ साथ जिस तरह से वो उनके घर में उन्मुक्त रहा था, इस बात से शहीद भाई का लगाव भी उस के साथ और बढ़ चूका था. उनके सवाल पर अर्जुन मुस्कुराते हुए जवाब देने लगा.

"जैसा सोच रहे है न आप वैसा हरगिज नहीं है. पहले जिनका फ़ोन था वो क्लासमेट है, रिजल्ट की चर्चा कर रहे थे थोड़ी. फिर घर का नंबर मिला लिया क्योंकि यही समय होता है की बात कर सकू उनके साथ. बाद में भी बस दोस्तों को यही बताया की अभी घर नहीं हु तोह वह मैट जाना. दादा जी बाल की खाल निकल लेते है और वो बेचारे खामख्वाह पकडे जाने."

"ईद हमने तुमसे कुछ ज्यादा हे देखि है बरखुरदार. सब मान लिया लेकिन वो क्लासमेट वाला फ़ोन जनाब की बेगम का हे था. सफीना से हमारी पहली मुलाकात हमारे मां के गाँव में हुई थी. फ़ोन वाला समय नहीं था वो और न क्लासमेट वाला जैसा तुम्हे आजादी है आजकल. लेकिन इश्क़ हमने भी फ़रमाया है पंडित जी.", शहीद भाई की बात सुन्न कर अर्जुन हैरानी से उन्हें देखने लगा. वो कही से भी आशिक़ तोह नहीं लगते थे पर गंभीर भी नहीं रहते थे हर वक़्त.

"वाह. मतलब सफीना भाभी से आपका निकाह आपकी मर्ज़ी से हुआ था? और जितने बड़े आपके दोनों बेटे है, मतलब 15-16 बरस पहले ऐसा मुमकिन हो गया?"

"भाई ऐसे किस्से तोह हजारो सालो में होते रहे है और हमारा तोह बस एक नजर का था जिसमे शहीद पल में शहीद हो कर रह गया.", शहीद भाई को इस तरह देख कर अर्जुन मान गया था के यक़ीनन ये बाँदा तगड़ा आशिक़ रह चूका है.

"तोह बताना चाहेंगे haal-e-khoobsurat दुर्घटना हमे?"

"हाहाहा.. क्यों नहीं भाई. वैसे तोह ये वाकया मेरे हमउम्र सभी दोस्तों को पता है पर तुम्हे भी बता देते है. उस समय हम अपने मामू के यहाँ थे क्सक्सक्सक्स ज़िले में गाँव है उनका, बड़ा हे खूबसूरत गाँव है. नजदीक के गाँव में दंगल जीतने के बाद हम लोग वापिस घर आ रहे थे मां के, तभी हमारी पीठ पैर इन मोहतरमा ने लाठी मार दी घर से कुछ पहले." शहीद भाई ने तोह बिना lag-lapet एक लाइन में हे बात कह दी. अर्जुन हैरत से देखने लगा के ये कैसा किस्सा था.

"अरे भैया ये कैसी मुलाकात हुई जिसमे पीठ पर हे लाठी खाने को मिली? भाभी तोह कही से भी ऐसी नहीं लगती.", अर्जुन हँसते हुए जैसे आगे जान न चाहता था क्योंकि ये किस्सा तोह सचमुच दिलचस्प था.

"ईख.. मतलब गणना बहोत होता है उधर. हम 5 लोग थे और पैदल हे उस गाँव से अपनी तरफ लौट रहे थे. घर के करीब वाले खेत तक हमारे दोनों मामू और उनके 2 बेटे थोड़ा आगे निकल गए थे और गणना देख कर हमसे रहा नहीं गया तोह उस अनजान खेत से टॉड लिए 2 गन्ने. अब हमको क्या पता था के गणना नहीं आफत मोल ली है. इन्होने देख लिया था जैसे ये वह अपने वालिद (पापा) को दोपहरी में खाना पहुंचने गयी थी. अभी चौखट तक भी नहीं पहुंचे थे की पीठ सेक दी गयी. हमारी चीख सुन्न कर जब मां दौड़े आये तोह उन्होंने देखा की हाथ में गणना हमारे भी है और जिसने हमे मारा उनके भी. लेकिन वो हंसने लगे और जब पीछे मदद कर देखा तोह बस ऐसा लगा की कोई 5-6 बार और मार्के हमे इस जन्नत से बहार निकल दे. अब कहते भी क्या और वो जब बोली तोह मार की जरुरत हे न पड़ी."

"ऐसा क्या बोलै था भाभी जी ने जो आपको ज्यादा दर्द हुआ? हाहाहा.. मजेदार रहा होगा न की एक तरफ मां और दूसरी तरफ अनजान लड़की."

"अरे वो तोह उस वक़्त शोले पिक्चर वाली बसंती हे बन गयी थी. कहती की उस्मान चाचा ये लड़का पहले हमारे खेत से ईख चुरा लाया और इतनी देर से आपका पीछा कर रहा है. नियत गलत है इस चोर की और देखो अब फंस गया तोह जुबान नहीं खुल रही. बांध के मारते है इस be-gairat पहलवान चोर को. ऐ ऐसे क्या घूर रहे हो?' और भाई मां टाइम से न बोलते तोह फुलझड़ी सचमुच हमे जला देती. उन्होंने हँसते हुए हमारा परिचय दिया की हम क्सक्सक्सक्स में रहते है और उनकी बड़ी बहिन के एकलौते बेटे है. अपनी बेटी के पीछे उनके वालिद साहब भी आ चुके थे जो जानते होंगे इनके तेवर और जिस तरह ये आयी थी हमारे पीछे तोह साफ़ पता चल गया होगा. उन्होंने तोह आते हे मामू से माफ़ी मांगी लेकिन मोहतरमा के तोह अभी तक नाक पर गर्मी बरकरार थी."

"फिर क्या हुआ शहीद भाई?"

"ये बोली के इसका मुँह नहीं है जो इत्ती देर से घूरे जा रहा है. नाम बता देता तोह भला क्यों मारती? 4 आने का गणना तोह चाचा होता भी कुछ नहीं लेकिन बोल के लेना चाहिए था न.' अर्जुन मियां हम तोह बस सुने जा रहे थे और जब वो बोलना बंद करती तोह उनके धुप में सुर्ख हो रहे चेहरे से बांध जाते. लेकिन जब बोले तोह फिर वह बाकी सब चुप हो गए.", शहीद उस तिराहे आ चूका था जहा से अर्जुन ने हवेली और उन्होंने खेत निकलना था.

"गड़बड़ कर दी होगी जरूर और फिर तोह मां के साथ लड़की के पिता ने धोया होगा?"

"काश ऐसा होता.. हमने कहा की मां हमे तोह इनके साथ हे निकाह पढ़वाना है, एक गणना के बदले हम हमारा पूरा जमीन देने को त्यार है इन्हे. बस फिर क्या था, इन्होने तोह फिर से गणना उठा लिया मारने के लिए और मां हमे घसीट कर घर में ले गए. लेकिन पता नहीं कैसे उस शाम इनके वालिद साहब हमारे घर आये और कहा के सफीना को रिश्ता मंजूर है शहीद के साथ. अमीना खला (शहीद की अम्मी) से बेहतर कोई हमारी बची को रख भी नहीं सकता. और उन्होंने फैंसला हमारे दोनों मामू और अम्मी पर छोड़ दिया. जिन्होंने रिश्ता मंजूर भी कर लिया.", शहीद ने बात जैसे हे पूरी की आदतन अर्जुन के सवाल सामने थे.

"ये कैसे हो सकता है भैया? आपके मां तोह आपको ले गए थे और उधर भाभी भी अपने पापा के साथ चली गयी फिर ये रिश्ता एकदम से कैसे कबूल हो गया? फिल्म की कहानी सुना रहे हो आप तोह?"

"हाहाहा.. हमे भी यही लगा था के ये सब कैसे हो गया फिर बाद में पता चला की अम्मी और मामू उनके घर गए थे जहा उन्होंने साड़ी बातें की, मेरे और हमारी आमदनी के जरिये की. गाँव भी कुछ मायने रखता है और उन्हें तोह खुद सफीना देखते हे पसंद आ गयी थी. सफीना ने भी अम्मी को पसंद कर लिया था लेकिन दिखावे के लिए ऐसा किया की वो रिश्ता लेके हमारे घर आये. एक साल के बाद जा कर हमारा निकाह हुआ पर उस एक साल में हमने सफीना को साबित किया की वो हमारे लिए कितनी ख़ास है. घर के बड़े हमेशा हे बचो के बारे में पहले सोचते है, अपने बारे में बाद में. तोह अब क्लासमेट से बात आगे बढ़ने वाले हो या ..?", अर्जुन ने हाथ खड़े कर दिए थे उनके सवाल पर.

"अभी तोह मैं स्कूल में हे हु शहीद भैया और क्लासमेट सिर्फ दोस्त है. जिस दिन कोई मेरी पीठ पर लाठी मारेगी तब सोचूंगा इस बारे में. चलता हु अब, खाना खा लीजियेगा दिलबाग भैया के साथ.", अर्जुन को भागते देख शहीद भाई भी हँसते हुए अपने रस्ते निकल लिए. हर इंसान की तरह उनकी भी एक कहानी थी, जिसमे दुःख भी थे तोह ऐसा प्यार भी. कही न कही एक मजबूत रिश्ता पनपने लगा था अर्जुन और शहीद भाई के दरमियान.

घूमता फिरता हुआ अर्जुन और भी ढेरो बातें सोचता हुआ हवेली में दाखिल हुआ तोह 8 से ऊपर वक़्त हो चूका था. देवकी जी के साथ दामिनी भी भोजन से फारिग थी जो बहार चारपाई पर बैठी जैसे उसका हे इन्तजार करती लगी. कहने को वो देवकी जी से बातें कर रही थी पर जिस तरह भीतर दाखिल होते अर्जुन को उसने देखा, आँखों में हलकी सी चमक खुद अर्जुन ने देखि.

"आ गया बीटा? थोड़ा समय घर पे रहा कर अपनी बहिन बुआ के साथ. चल हाथ मुँह धो ले, बहु खाना लगा देती है तब तक.", आशा अनुरूप देवकी जी ने वही बात कही जो केहनी बनती थी. अर्जुन हाथ मुँह धोने के लिए नल के सामने आया तोह इस बार भी चची टोलिया रख कर चली गयी उसके सामने.

"थोड़ा घूम फिर रहा था दादी गाँव में. अब आया हु तोह पता भी होना चाहिए के आसपास क्या कुछ है, लोग कैसे है और उनके विचार जान न भी जरुरी है. खाना थोड़ा देरी से खाऊंगा और चची से कह दीजिये की वो आराम कर ले. जब भूख होगी तोह मैं खुद हे ले लूंगा. एक घंटा पढ़ लेता हु पहले, कई दिन से किताबे देखि भी नहीं.", दामिनी का चेहरा तोह ये सुनते हे उतर गया और रसोईघर में गयी अनामिका चची से साफ़ थाली वैसे हे वापिस रख दी थी अर्जुन की बात सुन्न कर. कृष्णेश्वर जी आज रात भी घर से बहार थे. अर्जुन को अनामिका के कमरे में जाता देख दामिनी भी उठा कड़ी हुई.

"आज मैं छत पे सोने जा रही हु माँ. मौसम खुल गया है न बारिश के बाद और शाम से हवा भी ाची चल रही है.", दामिनी ने जिस तरह से ये सुनाया था देवकी के चेहरे पर क्षण मात्रा के लिए कुटिल मुस्कान दिखी लेकिन उसको देखने के लिए वह था हे कौन इन दोनों के सिवा. ये इशारा था की अर्जुन भी ऊपर सोने आये. जैसा भीतर कमरे से उसने जवाब भी दिया.

"हाँ बुआ, मैं भी सोच रहा हु की ऊपर हे सोउ लेकिन 12 के बाद हे सोना होगा मेरा तोह. थोड़ा अभी पढूंगा फिर खाने बाद. मेरा बिस्टेर लगवा देंगी आप ऊपर? बस एक दरी और 2 तकिये.", अनामिका ने तोह अपनी थाली भी पलट दी थी उसकी बात सुन्न कर. सर झुकाये कुछ वक़्त वो भीतर हे बैठी रही. जब दामिनी अर्जुन को बता कर सीढ़ियों से ऊपर चली गयी और देवकी अपने कमरे में तभी अनामिका वह से उठी. उसके कमरे में अर्जुन अब कपडे बदल चूका था. ढीली सी टीशर्ट और घुटने से कुछ ऊपर तक की सूती निक्कर, जैसी वो अक्सर पंत के निचे भी पहन कर रखता था. निकेतन आँचल के पास था उसके कमरे में और इस वजह से अनामिका को फिर से मौका मिल गया अर्जुन की खातिरदारी करने का.

"जाओ जहा जाना है और आइंदा रोटी भी वही परसो देंगी जिनकी बगल में तुम्हे ाचे से सोने को मिलेगा. घूम फिर के अब बहार लोग नहीं बचे तोह तुम्हारी आदरणीय बुआ मौजूद है हे.", अनामिका इतने हे काम समय में अर्जुन की आदि होने के साथ अधिकार भी जताने लगी थी. या शायद वो दामिनी का सच जान ने के बाद से ज्यादा व्याकुल रहती थी. अभी भी वो बिस्टेर से अर्जुन के कपडे उठा कर सही से समेटने के बाद अलमारी में रख रही थी.

"खाना साथ हे खाएंगे, मैं जानता हु नहीं खाया आपने भी. और मैं कही नहीं जा रहा, बस उनके मजे ले रहा था. फोल्डर निकल के देंगी जरा?", अर्जुन ने तोह इतने में हे अनामिका को शांत कर दिया था, बेशक एक बार फिर से वो पीछे से उन्हें आलिंगन में भरे था, सिर्फ आलिंगन में.

"मैं देख रही हु तुम्हे ऐसा करने में ज्यादा मजा आने लगा है आजकल. और जब ऊपर सोने नहीं जाओगे तोह जवाब भी देना पड़ेगा इसका? तुम्हे कैसे पता की मैंने खाना नहीं खाया?", अनामिका अलमारी के भीतर हे बानी उस दराज को चाबी से खोल कर चमड़े का छोटा बैग निकल कर अर्जुन को देने लगी तोह इस बार दोनों के चेहरे आमने सामने थे. नजरे स्वतः हे झुका ली अनामिका न अर्जुन के मुस्कराहट देख कर.

"जानती हो इसमें क्या है?", 3 अंको वाला टाला लगा था उस बैग पर जो चची ने उसको पकड़ाया था.

"जान न भी नहीं चाहती लेकिन ये ख़ास है और तुम इसको सुरक्षित रखना चाहते हो इसलिए नंबर वाला टाला लगा है. यहाँ ये सुरक्षित है जितने तुम रखना चाहो.", अनामिका के जवाब पर अर्जुन ने बदले में हलके से उनका हाथ चूमा और कुछ समय बाद आने का बोल कर अपने कमरे में दाखिल हो गया. इस हवेली में आने के बाद उसने खुदसे पहली बार इस कमरे को बंद किया था, खिड़की और बाथरूम के दरवाजे समेत.

'जुगलाल जी, देखो सच कहता हु अब और जलवे तोह मैट हे दिखाना. बहोत मुश्किल से संभल रहा हु खुदको और दिल नाजुक है थोड़ा कुछ मामलो में.', अर्जुन ने कमरे में सिर्फ उस लैंप की रौशनी राखी रही थी जो पढाई करने के लिए लगाया गया था. कपडे की गुड़िया निकाल कर वो कुछ पल उसको घुमा फिर कर देखता रहा. जिसने भी वो बनाई थी, बड़े प्यार और कुशलता से बनाई गयी थी. कुछ मैली थी लेकिन सफ़ेद कपडे, धागो नसे छोटी, आँखें और मुँह उकेरा गया था. सलवार कमीज दर्शाने के लिए भी ऐसे हे रंगीन धागो की कारीगरी थी उस गुड़िया में.

'ये jaadu-tona वाला तोह कही से भी नहीं है फिर इसको इतना सुरक्षित रखने की कोई ख़ास वजह? और ये किसी बचे का अंडरवियर जैसा है लेकिन गाँव में वो भी उस समय पर बचे पहनते भी होंगे ये सब? गुड़िया से लड़कियां खेलती है तोह ये यक़ीनन उसी लड़की की होनी चाहिए जिसकी गुड़िया होगी. पर ये सलामत है और बिलकुल साफ़ भी. माजरा क्या है ये और जैसे ये छुपाई गयी थी मतलब जो भी था वो इस लोलिता के लिए पागल हम्बर्ट था. और रानी माँ ने बताया की वह ज्यादा दखल नहीं दी जाती थी क्योंकि दादा जी के दादा जी और बड़े राजा साहब अधिकतर इधर हे रहते थे. कुछ ख़ास सेवको के साथ. और ये शीशी में जो चीज है वो तेल नहीं है. उस ब्रा जैसे कपडे में हलकी महक थी केमिकल की और ये उसके साथ. बाद में देखते है इसको. पहले ये सबसे ऊपर वाला कागज पढ़ा जाए अगर पढ़ने लायक हुआ तोह.', अर्जुन ने सामान वापिस बैग में भरने के बाद उन साफ़ सुथरे कागजो को बहार निकला जो साधारण कागज़ से कुछ मोठे थे और जेब में रखने की वजह से कही कही उन पर बल पद गए थे. पहले हे कागज को सामने रखा तोह वो काली स्याही से हिंदी में हे लिखा गया था.

'आज ये शायद हमारा अंतिम लेख होगा. 1947 से हम हर साल इस हवेली में इस मनहूस तारीख पर हे आते रहे है. 13 वर्ष गुजर चुके है उस काली रात को गुजरे हुए और आज भी सब वैसा का वैसा है इस हवेली में. कुछ लोग जरूर गलत भावना से इसके भीतर आने की कोशिश में अपनी जान गँवा बैठे और उनकी मौत ने जैसे इस मनहूस जगह को और ताक़तवर कर दिया. आज हमे पछतावा हो रहा है क्यों हमने अपने सबसे लायक पुत्र को ऐसे वचनबद्ध करवाया की वो इस जगह के साथ अपनी माँ और मिटटी से भी दूर हो गया. बहोत खालीपन सा महसूस होता है जीवन में जब अपने उस हँसते खेलते परिवार को याद करके वर्तमान से तुलना करता हु. रामेश्वर के हम गुनहगार है लेकिन हमारा बीटा आज भी जब मिलने आता है तोह हमेशा की तरह कभी चरणों से आगे नहीं बैठा. एक बेहतरीन सिपाही और आदर्श बीटा होने के साथ अब वो खुद एक बेहतरीन पिता भी है 4 प्यारे बचो का. गुड्डू.. बिलकुल ठीक वैसी हे नटखट सी है जैसे राम की लाड़ली गुड्डी होती थी. अपनी बहिन की याद दिल से निकाल नहीं पाया वो और कैसे निकल सकता था? ये वाली 5 बरस की होने पर ठीक उसके जैसी हे है. बलविंदर (महाराजा) तोह कहता है के राम और राघे यहाँ भी एक सामान निकले. शालू बिटिया बस थोड़ी नाजुक है और उसको देख कर आँखें नम्म हो गयी थी बेचारे की. अब रिश्ता है तोह है चाहे वक़्त कितना भी बदल जाए.

शंकर बोलता है की वो बड़ा हो कर डॉक्टर बनेगा और जब हमने वैध कहा तोह मुझे हे समझने लगा के हम तोह अनपढ़ है. वैध तोह उसकी माँ भी है पर डॉक्टर कोतवाल से भी ताक़तवर होता है. बहोत भोला है लेकिन उतना हे प्यारा भी. हमारी बड़ी बहु कौशल्या भी समझदार स्त्री है जिसने हमारे बिखरे हुए रामेश्वर को फिर से आबाद कर दिया. वो हमें भी समझती है और रामेश्वर की माँ को भी. देवकी वैसी नहीं है और न हम उस विवाह के लिए राजी थे. किरशन बहोत भोला भला है जो जालसाजी का शिकार हो गया हमारे साथ साथ. रामेश्वर सही कहता था की पिद्दी माँ के पास हे सुरक्षित है और संगी से दूर रहे तोह बेहतर. हम भगवन थोड़ी है जो सबकुछ हमारे अनुसार हे हो. वैसे भी अब हम थक चुके इस दुनियादारी से. ज्यादा सोचते है तोह लगता है हम जीवन भर मुर्ख हे रहे जो प्रदेश की शांति बरक़रार रखने में ऐसे व्यस्त हुए की अपनों पर ध्यान हे नहीं गया. बलविंदर का भी हाल मेरे हे जैसा है और आजकल तोह वो ज्यादा हे गमगीन रहने लगा है. एक बोझ हम अपने उस होनहार बेटे पर और दाल रहे है जिसके लिए बुलावा भेज दिया था कल हे. राजा बन्न ने से तोह उसने तभी इंकार कर दिया था जब बलविंदर ने खुद उसके पाँव पकड़ कर मानाने की कोशिश की थी. हाथी है न थोड़ा इस मामले में लेकिन उसको भी नहीं पता की वो सब अपने हे है. आएगा तोह नयी वसीयत पढ़ेगा लेकिन इस बार हम सामने रहेंगे तोह मन नहीं करेगा. उसकी माँ के भी कर्क रोग हो गया है, बहोत साथ दिया हमारा हमारी धर्मपत्नी ने और हम हे जिम्मेवार है उनकी हालत के. पहले मासूम गुड्डी को खोया और फिर अपने राम से भी दूर हो गयी. क्या कहता की ये वक़्त सही नहीं है हमारे इस बेटे के लिए? वो और रघु दोनों हे मारे जाएंगे तोह क्या सेहन कर सकेंगी? इस हवेली के षड़यंत्र और दर्दनाक चीखों से तोह आजतक नहीं निकल पाए है तोह कैसे देख ले हम अपने बचो की दुर्दशा? मनीराम, तांत्रिक श्रीधर, राणा के साथ साथ महल के हे काले चेहरे इनके हमारे खून के प्यासे है. सब लकड़बग्घे है जो अंधेर और झुण्ड में शिकार करते है. खोजबीन करवा रहे है लेकिन फ़िलहाल तबियत भी नासाज है और हालात भी.

इस बीच हमने सारंग के मां को मार कर बलविंदर की राह भी आसान कर दी और अपने कुछ दुश्मन और बढ़ा लिए. गुमराह इंसान राजा नहीं बन सकता और सारंग तोह खुद एक चिकना घड़ा है जिसने अपनी छोटी बहिन तक को लापता करवा दिया. जाने हमारी अनामिका बिटिया किस हाल में होगी और जीवित भी होगी या नहीं? कोशिश करेंगे रामेश्वर से इस पर अलग तरह से चर्चा कर सके. काबिल इंसान करिश्मे कर देते है और उसके साथ रघुवीर भी है. कुछ न कुछ तोह करेंगे हे, अपनों के लिए. हमारी धर्मपत्नी बता रही थी की बड़ी बहु से छोटी बहु ने लड़का होने की दवा मांगी है. सबको उत्तराधिकारी हे चाहिए और जो लायक है वो बन्न न नहीं चाहते. अब हमारी भी उम्मीद टूट स गयी है राह देखते देखते उस काबिल इंसान की जो इस हवेली के दर्द को सुने, महसूस करे और उन चीखो का शोर बंद करे जिन्हे हम भी खामोश नहीं कर पाए. हम में हिम्मत नहीं थी की ये राज उजागर कर सके. Shahi-sewak है तोह इतनी आजादी भी नहीं है हमे. आज सदा के लिए तिजोरी बंद करके हम जा रहे है यहाँ से. चाबी नदी में फेंक कर. जीवन की सांसें जाने कब रुक जाए पर दिल कहता है की कोई अपना, कोई मेरा हे यहाँ पहुंच पायेगा. तुम मेरे कोई अपने हो तोह बीटा, इस हवेली को गिराने से पहले बगल वाले कमरे से उन मासूम आत्माओं की चीखें जरूर सुन्न न. तुम्हे फिर भी मेरा कृत्या गलत लगे तोह ये ध्यान रखना की उस बिस्टेर पर उन असंख्य मासूम बच्चियों में से एक स्वयं हमारी प्यारी बिटिया गुड्डी भी थी. न शरीर मिला न कुछ और, बस उसकी वो छोटी कांच की चूड़ियां और कमीज हे था उधर. हम उसके करीब से गुजरते हुए भी अपनी सांसें रूकती महसूस करते है. मनीराम, ललिया, श्रीधर तोह बच निकले लेकिन बाकी सभी को हमने खुद हे mrityu-daan दिया अपने इन्ही हाथो से. कुछ और लोग भी इस बीच हमारा शिकार हुए होंगे लेकिन थे वो सभी अपराधी, जिस वजह से हमे इसका कोई शिकवा नहीं. मरने के पश्चात भी हमे मोक्ष नहीं मिलेगा जबतक कोई यहाँ नहीं पहुँचता. उनका दर्द मेरी आत्मा में रम चूका है जो शरीर त्यागने मात्रा से नहीं दूर होगा. कुछ पत्र हम यहाँ से हटा रहे है, उत्तेजित मैं से लिख दिए थे बरसो पहले. कुछ बातें परदे में हे रहे तोह सबके लिए बेहतर होगा. अब haal-e-dil कही और कह भी तोह नहीं सकते और आगे कभी कह भी न सकेंगे. रामेश्वर पर हमे पूर्ण विश्वास है की वचनबद्ध होने के बावजूद हमारा ये बीटा अपने कर्त्तव्य का पूरी निष्ठां से पालन करेगा. चलते है, इस अँधेरे से बहार भी अन्धकार हो चूका है. अब नहीं लौटेंगे.

Lakshmi-Narayan तुम पर कृपा करे

एक हरा हुआ पिता और बेमिसाल वजीर,

पट मोतीलाल अनुराधा शर्मा

25/05/1960

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"अरे बाप रे बाप, ये सब क्या था? और ये तोह आज भी 25 मई हे है मतलब मैं उनके हे निर्धारित दिन पर वह पंहुचा? जिस तरह से ये महराजा के बारे में बता गए इसका मतलब रिश्ता कुछ और हे था दोनों का. और वो रिश्ता लिख दिया होगा उन कागज़ पर जिन्हे वापिस ले गए? और गुड्डी दादी भी.. हे प्रभु.. बुरा फंसा तू अर्जुन.. और ये ललिया, मनीराम और तांत्रिक के साथ साथ राणा कौन हो गया जो आजतक सुनाई हे नहीं दिया पहले? हालात इतने खराब थे और ये दादा जी वचन हे निभाते रह गए? हाँ कर भी क्या सकते थे जब कुछ पता हे न हो. अभी तोह एक हे पढ़ा है और ये 7 और भी बाकी है. हवेली तोह इनके पिता जुगलाल जी की थी फिर ये इतने लोग वह कैसे? जुगलाल जी, आप कही गलत निकले न तोह.. मैं कर हे क्या सकता हु. काण्ड करवा दिए ज़माने भर के और खुद निकल लिए. अरे मेरी भी कोई अपनी ज़िन्दगी है या नहीं? बहोत ाची वसीयत छोड़ी है मेरे नाम और जब खुद पता था के छोटी बहु कैसी है तोह ऐसे क्या विवश हुए मोतीलाल जी की हवेली की मुखिया बना दी?", अर्जुन तोह मैं की जगह अब जैसे स्पष्ट हे खुदसे बातें कर रहा था जैसे उसने अपने रूद्र को भी दोस्त बना कर बगल में बैठा लिया हो. कागज पर उसके चेहरे से टपकते पसीने ने याद दिलवाया के वो यहाँ बिना पंखा चलाये हे बैठा है पिछले एक घंटे से.

'ये गुड़िया कही ऐसी जगह छिपता हु जहा से मैं किसी के सामने इसको निकलू. हो न हो छोटे दादा लपेटे में जरूर आएंगे इस तरह. और हवेली जाने से मन किया है, नदी किनारे तोह नहीं. कुछ तोह ऐसा है जो मैं पीछे छोड़ आया या नजर नहीं गयी. जिन 2 कमरों से नदी और वो घात दीखता था निचले वाले में बिस्टेर था और ऊपर वाले में किसी जानवर के अवशेष. एक तोह हुआ तांत्रिक.. दूसरा ठरकी.. अगला देखते है क्या कहता है? चलेंगे इस क्रम में हे जैसे ये रखे गए है.", अर्जुन अभी दूसरा कागज उठता उस से पहले हे आँचल की तेज आवाज सुनाई दी. जल्दी जल्दी उसने सारा तामझाम बास्ते में भरा और बंद करके खड़ा हो गे.

"अर्जुन, सो तोह नहीं गए? 10 बज चुके है और खाना खा लो."

"आया, 2 मिनट बस."

'ये इतनी जल्दी 10 भी बज गए? फ़िलहाल अखाड़े पर ध्यान देना होगा. इन्हे बंद रहने देना हे ठीक है. पता नहीं अब कौनसा धमाका कर दे. और थे बड़े हे जुल्मी. बताओ सारंग को राजा बनाने के लिए उसके हे मां को टपका दिया और हस्ताक्षर से पहले मुंशी की जगह वजीर. सच लिखना हे पड़ता है मोतीलाल जी जब दर्द की दवा चाहिए हो. कोई नई, आपका राज मेरे साथ सुरक्षित है फिलहाल. और आप हारे हुए पिता नहीं हो, अपने थानेदार जी का तगड़ा रुतबा है. चलो आपको भी ठिकाने लगा दू. सॉरी आपके लिखे इन दिमाग घुमाओ jiwan-darshno को.', अर्जुन बाथरूम से चेहरा धोने के बाद वो बस्ता लिए जा पंहुचा अपनी चची के कमरे में. आँचल बिना ब्याह की टीशर्ट पहने जैसे बैठी टेलीविज़न देख रही थी, अर्जुन खुद सकपका गया. ये लड़की उसका दिमाग अलग खराब कर रही थी, अनजाने हे सही. जैसे वो कोहनी के भार झुकी हुई थी, आधे नारंगी तोह स्पष्ट दिख रहे थे. अर्जुन तुरंत सोफे पर जा बैठा.

"आप सोने नहीं गयी अभी तक? बुआ कही कल की तरह फिर न भड़क जाए.", अर्जुन कोशिश कर रहा था आँचल से नजरे दूर रखने की लेकिन टेलीविज़न की तरफ देखते हुए भी ये गलती हो रही थी. सलेटी चुस्त पजामा जिस कदर आँचल के परिपक्व कूल्हों का कटाव उभार के साथ दिखा रहा था, आज सचमुच वो कुछ विचलित सा होने लगा था. एक तरफ जिस्म का दर्द, दूसरा मानसिक क्षति उन घटना से और चिट्ठी पढ़ने पर लेकिन ये तीसरा दर्द और उभरने लगा था जो उस खुराक का एकमात्र प्रतिकूल प्रभाव था. फिर भी अर्जुन बहार से शांत बना रहा.

"माँ गयी ऊपर सोने के लिए और वैसे मैं भी ऊपर हे जाने लगी हु. ज्यादा पढाई न करनी हो तोह देख लेना 11-साढ़े 11 तक तोह जागती हे हु. लो आ गयी मामी भी. ाचा गूडनिघत मामी, मैं भी चलती हु आप खिलाओ इसको खाना.", आँचल जिस तरह कड़ी हुई थी इस बार अर्जुन के साथ साथ खुद अनामिका चची ने भी वो दृश्य देखा. अंगड़ाई के साथ हे उसकी वो छोटी सी गोल नाभि और दोनों सख्त चुके सामने थे. वो कड़ी हो कर चची की जगह अर्जुन के करीब से गुजरी, जिधर से रास्ता घूम कर बहार जाता था. अनामिका तोह बिस्टेर पर खाना रखने लगी थी पर अर्जुन तोह उसको जाते वक़्त भी देखता रह गया. कूल्हों के बीच की दरार में फंसे पाजामे तक को निकलने की जेहमत आँचल ने न की थी.

"ये आँचल दीदी ठीक तोह है न चची? मुझे हे अजीब लग रहा है या आपने भी देखा?", अर्जुन दरवाजा लगाने के बाद बिस्टेर के किनारे बैठा तोह अनामिका ने सोये हुए निकेतन को ध्यान से उठा कर पालने में लिटा दिया. ये भी अर्जुन ने अभी देखा था की आज इधर पालना था जो नयी बात थी. चची अब अलमारी से कपडे निकलते हुए जवाब देने लगी थी, उन्होंने पहले अर्जुन वाला बस्ता सुरक्षित किया.

"मैंने कल हे कहा था तुमसे की ये लड़की मुझसे अजीब से सवाल जवाब कर रही थी. आज कल से भी ज्यादा क्योंकि घर पे बस हम दोनों हे थी. लेकिन अभी तोह बात बातों से भी कुछ आगे बढ़ गयी लगती है. खाना शुरू करो, मैं नाहा के आयी अभी. बस पानी हे डालना है.", अनामिका चची हमेशा हे बिस्टेर पर जाने से पहले कपडे बदलती थी. अब सारा दिन शरीर साड़ी में हे बंधा रहता था तोह रात में हे काम से काम कुछ आराम तोह मिलना लाजमी हे है. अर्जुन ने सब्जी की कटोरी ढकने के बाद ध्यान टेलीविज़न पर लगा लिया. पता नहीं ये लड़कियां कैसे कैसे कार्यक्रम देखती रहती थी. यही हाल उसके घर पे था और इधर भी. सामने वाले कार्यक्रम में उस चश्मे वाली लड़की को देखते हे अर्जुन के जेहन में कोमल दीदी, ऋतू और आरती का अक्स उभर आया जो कुछ आगे बढ़ कर आकांक्षा पे जा रुका. सामने जो लड़की थी वो भी बस की खिड़की वाली तरफ बैठी थी, जिसकी भूरी जुल्फे हवा से हिलती हुई वो लड़का ख़ामोशी से देख रहा था जो बगल वाली सीट पर था.

"तुम अभी तक ऐसे हे बैठे हो? और ये क्या देख रहे हो? ये चैनल तोह बंद हो गया.", अनामिका चची वो भीनी भीनी महक बिखेरती कमरे में दाखिल हुई तोह उनकी आवाज से अर्जुन होश में आया. सामने सचमुच सिग्नल बंद हो चुके थे और समय 10:30. मतलब वो पिछले 15 मिनट से बस खयालो में खोया हुआ था? अब चची की तरफ देखा तोह उन्हें देखता हे रह गया. बिना बाक का हरे और काले रंग का गाउन पहने वो अपनी गोरी सुडोल बाहों पर क्रीम लगा रही थी, बाल गीले हो गए होंगे जिस वजह से उन्हें सूखने के लिए खुला रखा था. शरीर की हरकत से सीने की गोलाई थिरकती बता रही थी की अब वो आजाद है भीतर. चची घूम कर आईने के सामने कड़ी हुई और अपनी बाहों के भीतर की त्वचा देखने लगी जो हाल फिलहाल में हे चिकनी की गयी थी जैसे. इस मुद्रा में परिधान के इस हिस्से से उनकी गोरी गोलाई का भरपूर हिस्सा नुमाया हो रहा था. हलकी सी महक वाला इत्र लगाने के बाद उन्होंने इस बार अपने बाल एक तरफ करके थोड़ा झुक कर उन्हें तोलिये से सूखने का उपक्रम किया तोह अर्जुन के कंठ में जैसे हवा हे ख़तम हो गयी. कपडा झूलने की वजह से पहली बार वो साफ़ देख प् रहा था मुठी से दुगने बड़े वो सख्त उभार जिनमे हलकी सी भी लटकन न थी. पानी या दूध की वजह से वो कठै रंग का चूचक ज्यादा हे सख्त जान पड़ता था.

"हाँ? आँचल से ज्यादा तोह मुझे तुम्हारी हरकते अजीब लग रही है. पहले बंद टीवी देख रहे थे दुनिया से बेखबर और अब वो आइना घूर रहे हो या कोना? चोट सर भी लगी थी क्या?", ये क्या चची तोह जलवे दिखा कर अब बराबर भी आ बैठी थी. अर्जुन ने शरमाते हुए ना में सर हिला दिया लेकिन लफ्ज़ मुँह से फिर भी निकल गए.

"बहोत सुन्दर हो आप चची और लगता है इस कमरे में खुद ज़िन्दगी मेरे सामने आ बैठी है.", अर्जुन के सर पे हलकी सी चपत लगते हुए चची सर झटकती हुई एक थाली में हे दोनों के लिए रोटी डालने लगी. उनकी स्वाभाविक मुस्कान और तजा धुला चेहरा इतना खूबसूरत था की किसी प्रसाधन की जरुरत हे नहीं थी. माँ बन्न ने के बाद शरीर ढीला होने की जगह ज्यादा कस गया था और म्हणत तोह वो सारा दिन करती थी.

"खाना शुरू करे zindagi-swami? तोह आँचल में क्या अजीब लगा तुम्हे? फिर मैं बताती हु.", उनकी बात ख़तम होते हे अर्जुन ने पहला निवाला उनके होंठो से लगा दिया जिस पर वो बस उसकी आँखों को देखने के बाद सावधानी से मुँह में लेती हुई नजरे झुकाने लगी. प्रेम का रंग पहली हे बार तोह चढ़ रहा था अनामिका पर और dohre-jiwan में ये झिझक इतनी जल्दी जाने वाली भी नहीं थी, बेशक shayan-kaksh एक करने के बाद अँधेरे में दोनों एक दूसरे को चुम्बन तक कर चुके थे.

"शाम को वो मुझसे अजीब बात कर रही थी और दीपा भाभी को मेरे बारे में जैसे सुना रही थी वो थोड़ा अलग था. पहले तोह हमेशा हे वो सलवार कमीज में दिखती थी चाहे कमरे में टीशर्ट और पजामी पहनती होंगी. आज कल से भी ज्यादा हे आधुनिक अवतार बनाये थी. इतना छोटा टॉप और ऐसी फिटिंग वाला लोअर. बैठने और लेटने का तरीका देख कर तोह मैं हे घबरा गया था. आपसे क्या सवाल जवाब कर रही थी वो?", अर्जुन ने एक निवाला उन्हें खिलने के बाद अब खुद खाने के लिए आगे बढ़ाया तोह उस से पहले चची ने उसको खिला दिया, हाथ थोड़ा हिल रहे थे जैसे ये वही प्रेम वाली भावना थी. अर्जुन ने सावधानी बिलकुल न दिखाई और हलके से उनकी 2 उँगलियों को चूम लिया.

"तुम दोनों साथ थे न उस रात तोह जो तुमने देखा वो उसने भी देख लिया. अब वह चाहे जो भी हुआ हो लेकिन लड़का लड़की वाला सम्बन्ध भी तोह था. 23 की है आँचल और मेरा 28व शुरू हो चूका जिस हिसाब से थोड़ी सहेलियों वाली बोलचाल भी है. लेकिन अब सवाल भी बदल गए है उसके और दुनिया देखने का नजरिया भी. कल तोह यही पूछ रही थी की क्या कभी मेरा बॉयफ्रेंड था? बॉयफ्रेंड के साथ घूमना भी खातर वाला रहता होगा? साधारण कपडे और ख़ास कपडे क्या फरक डालते है लड़को पर? और जाने यही सब पूछ रही थी जिसमे मेरी समझ तोह उस से भी काम थी. बाद में मुझे हे बताने लगी की शादी के बाद तो प्यार व्यार बस बचे तक हे रह जाता है. लाइफ तोह इतने हे बढ़िया तरह से जी सकते है जितने शादी न हो. इतना तोह समझती हे हु के उसके मैं में हलचल हो चुकी है. पर ये पक्का हो गया की उसकी नजर अब सिर्फ तुम पर हे है.", अर्जुन जहा पहले हँसते हुए आँचल वाले सवाल सुन्न रहा था अब ाकाहिरी बात सुन्न कर हाथ मुँह में जाते जाते रुक गया.

"ये आप क्या कह रही है चची? वो जानती है ाचे से के हमारा रिश्ता bhai-behan का चाहे सेज न सही पर काम भी तोह नहीं है. वो ऐसा नहीं करेंगी, शायद गलत फेहमी होगी आपको?", अर्जुन वापिस रोटी का निवाला बनाने लगा तोह चची स्वछंदता से मुस्कुराई.

"रिश्ते रोक सकते है क्या प्यार या आकर्षण होने से? तुम दोनों उस वक़्त एकसाथ थे अर्जुन, जहा शायद आँचल ने भी तुम्हारा स्पर्श महसूस किया होगा लेकिन तुम्हे उन दोनों की तरह कोई सीमा न तोड़ते देख अकेले में विचार भी नहीं कर सकती? वो ये सब समझती है क्योंकि अपनी माँ का सच वो छोटी उम्र से हे जान गयी थी लेकिन तब हर ऐसा सम्बन्ध उसकी नजर में अनैतिक था. अब उसको प्यार और हवस में फरक साफ़ पता है तुम्हारे और मेरे पति के बीच दिन रात जितने अंतर से. मैं भी कह सकती थी की ये मेरा अनुमान है लेकिन उसका तुम्हारी उतरी हुई टीशर्ट की महक लेना, उसको पहन कर बिस्टेर पर लेटना और फिर सबसे बड़ी बात की मुझसे हे पूछ लेना की अर्जुन कितना ाचा है न मामी? भाई न होता तोह मैं शादी हे कर लेती पर उम्र में भी फरक है थोड़ा'. उस kam-akal को ये नहीं पता की मैं बोलती नहीं पर दीखता तोह है मुझे. अभी खाने के लिए तुम्हे बुलाने जाने से पहले हे उसने वो कपडे पहने और देख लेना छत्त पर जाते वक़्त बदल लिए होंगे.", चची ने तोह कहने को ये सब कह दिया पर अर्जुन के चेहरे पर 12 जरूर बज चुके थे.

"ये गलत है चची और ऐसा सोचना हे गलत होगा.", अर्जुन ने यही चाँद शब्द कहे और कोशिश करने लगा जैसे तैसे खाने की.

"फिर तोह मैं भी गलत हु अर्जुन. रिश्ता तोह तुम्हारा और मेरा भी chachi-bhatije वाला है जो maa-bete के समक्ष होता है लगभग. आँचल तोह सिर्फ अभी आसक्त और आकर्षित हे हुई है लेकिन मैं तोह सीमा हे लांघ चुकी हु, मैं से खुदको तुम्हारी मान कर. अब मैं समाज की नजरो में गलत हुई या फिर तुम्हारी?", अर्जुन को अब बहोत अजीब सा लगने लगा था. वो सही जवाब दे कर यही बात ख़तम कर सकता था लेकिन अब चची को समझाना हे था तोह उसने दूसरा रास्ता अपनाया.

"दामिनी क्या चाहती है चची आप जानती है? एक ऐसा मौका जिसमे मैं वो गलती कर जाऊ जो चाचा ने की है. मैं प्यार या आकर्षण से इंकार नहीं कर रहा हु, ये हो सकता है और मैं रोक भी नहीं सकता ऐसा होने से. पर आप खुद उस तस्वीर को देखो जिसमे दामिनी और विनोद चाचा की जगह आँचल और मैं हो, हमे देखने वाले इस परिवार के वही शातिर लोग जिन्हे बस सही मौका चाहिए. आँचल की उन्मुक्त हरकते हे बिना आगे कड़ब बढ़ाये वो मौका दे देंगी. एक लड़की से सवाल जवाब होगा तोह वो या तोह सच बता देगी जिसमे खुद वो सबकी नजरो में गलत साबित हो जायेगी, थोड़ा बहोत मेरा कसूर शामिल रहेगा. अपनी िज्जात्त बचने के लिए वो अगर इंकार करेगी और पलट कर सवाल जवाब कर बैठी तोह जो पहले से गलत है सिर्फ वही उसके साथ फसेगा लेकिन मौका तोह मिल हे जाएगा न.? दामिनी सिर्फ एक बेवकूफ मोहरा है और आँचल कुछ वैसा हे करने जा रही है. एक बार को तोह मेरा और आपका सम्बन्ध खुल भी जाए तोह बात संभाली भी जा सकती है लेकिन यहाँ वो परवरिश और संस्कारो की चोट करेंगे. हो सकता है किसी दबाव में आँचल को मुकरने के लिए भी मजबूर कर दे उसकी किसी कमी से. प्यार करने वाले इंसान को ऐसे भी दुष्कर्मी बना दिया जाता है. बेटी मुझे वह सोने के लिए आमंत्रित कर रही है जहा पहले से हे उसकी माँ घात लगाए मौजूद है. 23 की भले हे हो गयी वो लेकिन कुछ गलत झलकियां गलती से उसके सामने आ गयी तोह ये मतलब नहीं है की वो जीवन का हर पथ सीख चुकी है. बात करना जरा उस से जब समय लगे तोह.", अर्जुन खाना छोड़ कर उठने लगा तोह अनामिका ने बड़े हे प्यार से उसकी कलाई पकड़ ली.

"खा तोह लो अर्जुन स्वामी. तुमने बिलकुल सही बात की है, मैंने हे गलत नजरिया रख दिया बाकी सब सोचे बिना. पर मुझसे और खाने से नाराजगी क्यों? बात तोह हो गयी न अब हमारी?", अर्जुन अब सामने की बजाये उनकी बगल में हे आ बैठा. उनके माथे को चूम कर एक बार अपने साथ लगा कर अब खुद हे उन्हें खिलने लगा था.

"भूल गया था एक यही वक़्त होता है जब आप थोड़ा बहोत खा लेती है. मेरी गलती से अब आप और ये मासूम भूखा रहे तोह फिर भगवन भी माफ़ नहीं करेंगे. और फिर कभी खुदको गलत मत कहना, हर प्यार गलत हो जाएगा वैसा कहने से. आँचल से मैं भी बात करने की कोशिश करूँगा, सुबह शहर जाने पर.", अर्जुन जिस तरह उन्हें अपने एक हाथ से खिलते हुए दूसरे से अपने संग लगाए हुआ था, अनामिका तोह जैसे इतनी खुश कभी हुई हे नहीं थी. खाना ख़तम होने के बाद अर्जुन ने उन्हें वही रहने का फरमान दिया और खुद बर्तन ले कर रसोईघर गया. बहार का टाला जांचने के बाद वो गलियारे तक भी चक्कर लगा आया. सब पूरी तरह शांत था और मीणा के कमरे की बत्ती भी बंद हो चुकी थी. कमरे में वापिस लौटे पर चची को फिर से चेहरा साफ़ करते देख बस मुस्कुरा दिया.

"वैसे आज ये नन्हा मुन्ना शैतान वह अलग सुलाने की ख़ास वजह?"

"साड़ी रात के लिए थोड़ी सुलाया है वह. 10 बजे दूध पीला कर सुलाया है और पालने में ये ज्यादा गहरा सोता है. उठेगा 3-4 घंटे में तोह पकड़ा देना मुझे, कपडे बदल कर.", अनामिका की ये हंसी देख अर्जुन ने झुकते हुए हाथ से 2 बार सलाम फार्म्य.

"जी मालिक, सेवक आपकी उचित खिदमत का वादा करता है. वैसे आज ज्यादा हे नहीं चमक रही आप?", अर्जुन अब तुबेलिघ्त बंद करके बिस्टेर किनारे वाले दोनों लैंप चालू करता दूसरी तरफ आ कर लेट गया था. अनामिका अपने पाँव की मालिश करने के बाद कड़ी होते हुए बोली.

"कोई चमक नहीं रही, बस तुम्हारी आँखें ज्यादा घूमती रहती है. कभी टोलिया पकड़ने आओ तोह देखते रहते हो और नाहा के निकलो तब भी. आईने से तुम्हे हे देख रही थी मैं. अब टीशर्ट उतार कर उलटे लेट जाओ. गरम पानी और टोलिया लेके आती हु मैं.", चची को सचमुच याद था की अर्जुन की पीठ की सिकाई जरुरी है.

"दर्द नहीं है अब."

"चुपचाप लेट जाओ जैसे कहा है. एक बार सिकाई कर दू उसके बाद दर्द देखती हु.", चची बाथरूम में जा चुकी थी और अर्जुन ने जैसे हे टीशर्ट उतरी सचमुच पीठ में अभी भी दर्द था. यहाँ कुछ भी एकतरफा नहीं था इन दोनों के बीच.

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"दिल दुखता है अंकल जी.. आप नहीं समझ सकते इस दर्द को जो अक्सर हमें किसी अपने की गद्दारी से मिलता है. मैं यही सोचता रह गया की ये साला आधा अधूरा इंसान इतने बरस तक ज़िंदा बचा तोह किसकी छाया के निचे रह कर. हर परिवार पर हर मुमकिन खतरा तोह ढून्ढ ढून्ढ कर ठिकाने लगा चुके थे और जो बच भी गए वो नजर में है. गुनेहगार की तलाश उस दर पे ले आयी, जहा अक्सर हम सजदा करते थे.", प्रदेश की सीमा ख़तम होने और दिल्ली से कुछ पहले इस निजी farm-bangle के भीतर वाले हॉल के ठीक बीच में नरिंदर लकड़ी की कुर्सी पर ऐसे बैठा था जैसे ये जगह उसकी हे हो. और असली मालिकाना हक़ रखने वाला वो व्यक्ति अपने हाथ बंधे, सर झुकाये उस सफ़ेद चमड़े के सोफे पर बैठा था. शारीरिक भाषा साफ़ चीख चीख कर कह रही थी की वो अपना मुकद्दर जान चूका है. नरिंदर ने आधा दर्जन सेवक और निजी सुरक्षाकर्मियों के ठीक माथे में घेरा बना दिया था जो अब इधर उधर पड़े थे. एक कोने में जख्मी पाँव को पकडे वो शक्श कराह रहा था जिसका आधा चेहरा झुलसा हुआ और गर्दन पर किसी पुराने जख्म का आधा फ़ीट लम्बा चीरा. यही हिम्मत सिंह था और सामने बैठा इंसान पूर्व जज किशोरी लाल था, पंडित जी का एक ख़ास मित्र.

"यही बात अगर हम कहे तोह तुम क्या कहोगे नरिंदर? पंडित रामेश्वर शर्मा और उनका परिवार कोई ढूढ़ का धुला है? यही दर्द हमे मिला था जब हमारे पिता और 18 बरस के भाई की लाश को कन्धा दिया था हमने. खोलो जरा अपने परिवार का अतीत और करो फिर फैंसला की मैं गलत हु या पंडित परिवार? अरे कोई विवाद था भी अगर हमारे पिता का उस नकली राजा से तोह बैठ कर सुलझाते. क्यों एक 2 कोड़ी के मुंशी ने बातचीत की जगह 2-2 बेरहम कतल कर दिए.? उस दिन हे फैंसला कर लिया था मैंने की ईंट से ईंट बजा दूंगा मैं उस raaj-gharane और मोतीलाल के खानदान की. तुम कसाई हो न उस नाम के राम के? तुम नहीं समझ सकते की बाप और भाई को खोने का क्या दर्द होता है? हाँ मैंने हिम्मत सिंह को पनाह दी क्योंकि ये बहोत कुछ जानता है. और अब तुम मुझे भी मार दो तोह कोई परवाह नहीं. मैं अपनी बाजी खेल चूका हो जो स्वचालित चलने लगेगी मेरे मरते हे.", नरिंदर पहली बार इतना कुछ सुन्न रहा था क्योंकि सामने बैठा इंसान उसके पिता सामान था और वो जानकारी भी लेना चाहता था.

"तेरी स्वचालित बाजी तोह अब पगला कर बिखर भी चुकी है राणा किशोर सिंह उर्फ़ किशोरी लाल. कसाई मेरा भाई है, मैं मौत हु. दिल करता है तोह तड़पता हु नहीं तोह सोचने का समय भी नहीं देता. तुझे दूंगा और खुद बताऊंगा की तेरा खेल कैसे चल रहा था. बस तू नहीं दिखा मुझे. तू पहले खामोश हो साले, तेरी वजह से जाने कितने मारे गए. बाद में गर्दन उतार लूंगा तेरी.", नरिंदर ने हिम्मत सिंह के भी ठीक माथे में सुराख़ कर दिया था और हल्का धुआं छोड़ती उसकी kam-awaaj पिस्तौल अब मेज पर पड़ी थी. किशोरी लाल के माथे पर खौफ का पसीना पहली बार आया था अपनी असलियत सुन्न कर.

"तेरा एक बड़ा भाई भी है न, ंप में उसका कोयले का कारोबार है. हिमाचल में कभी तुम्हारी माँ raaj-pariwar के ख़ास मनोरंजन की वास्तु से अधिक न थी और उनके टुकड़ो पर पलने वाला तुम्हारा बाप उसको मारने के बाद उसकी हे छोटी बहिन से शादी करके महल वालो का ज्यादा पालतू बन्न गया. मेरे दादा जी को तू मुंशी बोल रहा था वो भी 2 कोड़ी का लेकिन अपने पिता के बारे में क्या कहेगा? दल्ला, कुत्ता, जालसाज या हरामी? तेरा बाकी खानदान भी ढून्ढ हे लूंगा जैसे तुझे ढून्ढ लिया. नाजायज औलादे खुद हे अपना खून दिखा देती है. वैसे पिता जी से माफ़ी तोह मुझे मांगनी पड़ेगी, उन्होंने थोड़ी न विश्वासघात किया था. दोस्त मार रहा हु उनका.", और सामने वाला हिलने से पहले हे शांत हो गया था. ठीक दिल में गोली मारी थी नरिंदर ने क्योंकि इस आदमी का यही खराब था.

'कुशल राणा, अब तेरी बारी है.', हिम्मत सिंह की गर्दन सचमुच हे जुड़ा करके प्लास्टिक के थैले में भर ली थी नरिंदर ने. अब जैसे वो अलग हे सफर पे बढ़ चला था पूरा सच जान ने के बाद. उसके हिसाब से तोह बस हिम्मत सिंह हे आखिरी था लेकिन भारत भाई ने तोह हर वो तार उसके हवाले कर दिया था जो इसके साथ जुड़ा था. ये जुंग किस दर ख़तम होने वाली थी ये खुद नरिंदर नहीं जानता था पर अब बात थी कुछ बड़ा रोकने की.
 
अपडेट 200 (बी)

उम्मीद से परे

"ओह माँ..", अर्जुन औंधे मुँह बिस्टेर पर पसरा था जिसकी बगल में बैठी अनामिका चची गरम पानी और फिटकरी की भाप को तोलिये से उस लम्बे निशाँ पर एहतियात सी दबा रही थी. रोड कितनी जानदार रही होगी इसकी कल्पना के लिए वो डेढ़ फ़ीट लम्बा और एक इंच चौड़ा neela-laal निशाँ पर्याप्त था. निशाँ का अंतिम सीरा 'स' के अकार का जख्म लिए थे जहा गरम तोलिये के स्पर्श मात्रा से अर्जुन के मुँह से बस माँ फूट पड़ा. दर्द में भी और प्यार में भी, उसका कोई पर्याय था तोह वो सिर्फ माँ थी. दुःख तोह खुद अनामिका को भी हो रहा था उस नील को देख कर, लेकिन दर्द हे दर्द को ख़तम करता है जैसा अर्जुन ने उन्हें समझाया था ये करने से पहले.

"यहाँ पर एक कट जैसा है अर्जुन. तुम्हे डॉक्टर को दिखा लेना चाइये कल. पर यहाँ से खून निकलने के जगह जमा हुआ है. ऐसा प्रहार तुम्हारा जिस्म झेल कैसे गया अर्जुन? मेरा मतलब ये नहीं है की तुम मजबूत नहीं हो. साफ़ दीखता है की तुम्हारा शरीर असाधारण है लेकिन ऐसी मार लगने पर भी सूजन नहीं है बस नील पड़ गया है.", हाथ लरज रहे थे जिन्हे सँभालने की कोशिश में अनामिका अपना ध्यान ऐसे बता रही थी. हर बार उसकी नजर जख्म से हट कर अर्जुन के चेहरे पर चली आती. वो अब मंद मंद मुस्कुरा रहा था आँखें बंद किये.

"मेरे जिस्म पर घाव ज्यादा देर नहीं रहते चची, खून हे कुछ ख़ास है शायद. और वो जो खुराक आप दे रही हो न मुझे दोनों समय, उसका भी बहोत योगदान है मेरे शरीर को बेहतर बनाने में. बाजू पे जो कट लगा था उसका खून कुछ देर में हे रुक गया था और देख लेना परसो तक वो बंद भी हो जाना, निशाँ रहेगा कुछ दिन तक बस. और दर्द का क्या है, जिस्म से ज्यादा तोह चोट वो होती है जो भीतर लगे. उसके लिए दवा और खुराक काम नहीं करती. बौ जी बताते है की मेरी दादी ने वो खुराक उनके सामने कभी किसी के लिए नहीं बनाई. और मुझे भी ये वाली देने से पहले उन्होंने इस से कुछ काम वाली मुझ पर आजमाई, पूरे 30 दिन तक.", अर्जुन आँखें बंद किये हे इन बातों के बीच जैसे अपने दादा दादी की हे याद कर रहा था. वो प्यार भी उसको हे करते थे सबसे ज्यादा और शायद हे कोई दिन गुजरता होगा जब उसकी दादी उस से बात करे बिना रही हो.

"बात तोह तुम्हारी भी ठीक है लेकिन कुछ ख़ास होगा तभी तोह माँ जी ने तुम्हे हे वो खुराक दी? हर शरीर उसको सेहन कर सकता तोह वो ख़ास नहीं होती. मैंने खुद भी देखा था के तुम कितनी सवेरे निकल जाते थे कसरत के लिए और बाद में मुझे माँ जी ने भी बताया था के तुम जितने पसीना नहीं बहा लेते इतने शांत भी नहीं होते. न तोह किसी खेल में भाग लेते हो और न वैसा कोई मकसद भी लगता है लेकिन इतनी जी जान लगा कर ये शरीर और उस खून को तुमने हे ख़ास बनाया है अर्जुन. कोई खुराक या अखाडा तुम्हे ख़ास नहीं बना सकता जबतक तुम्हारी लगन और म्हणत साधारण से बेहतर न हो. अब शादी के बाद हवेली से उतना बहार नहीं जाना होता तोह इसका मतलब ये नहीं की हमने थोड़ी बहोत भी दुनिया नहीं देखि. बा तक पढ़ाई भी कर राखी है और आगे पढ़ने के लिए दाखिला भी लिया था.", अर्जुन ने अब लेते हुए हे उनका वो खली हाथ अपनी हथेली में भर लिया.

"जानता हु मेरी ये प्यारी चची बहोत समझदार है बस बोलती सिर्फ मेरे हे साथ है. वैसे कितनी दुनिया देखि है और ये कसरत अभ्यास के बारे में कहा से जानकारी मिली मेरी इस शर्मीली स चची को?", अर्जुन द्वारा हथेली कब्जे में लेने से वो सचमुच शर्माने हे लगी थी.

"कॉलेज में खेल भी होते थे हमारे लेकिन मैं उस सबसे दूर हे रहती थी. हाँ कभी क्लास मैदान में लगती थी तोह नजर पद जाती थी अभ्यास करते हुए खिलाडियों पर. सहेलियां और टीचर बताते थे की वो पिछले साल अन्तर कॉलेज जीता है, फलाना ये टूर्नामेंट जीत कर आया है और कोई डिस्ट्रिक्ट लेवल पर रेसलिंग करने लगा है. देख कर लगता भी था के उनकी दुनिया तोह बस वही थी और शरीर अजीब से. मतलब अगर वो चलते भी थे तोह मशीन जैसे दीखते थे उस बेढंगे शरीर की वजह से. लेकिन फिर भी जितना मुझे याद है उनमे से कोई भी तुम्हारे आसपास नहीं है.", चची तोह याद करके बता रही थी लेकिन अर्जुन को मौका मिल गया उन्हें सताने का. मालिश या सिकाई जितनी होनी थी वो हो चुकी थी क्योंकि टोलिया भी अब ठंडा था और पानी भी, जिसमे भाप हे गायब थी.

"मतलब ये हुआ के मैं उनसे भी ज्यादा बेढंगा और मशीन की तरह चलता हु? आखिर सच बोल हे दिया आपने की ये हमदर्दी है आपकी मेरी ऐसी हालत पर.", अर्जुन इतना हे बोलै था और न्यास हे चची न उसका वो हाथ जिसमे अर्जुन ने उनकी हथेली थामी हुई थी, उसको सीने पर रख लिया.

"तुम्हे क्या ऐसा लगा की मैं तुम्हारा मजाक बना रही हु और ये सब हमदर्दी है.? मेरा ये मतलब नहीं था अर्जुन. तुम किसी के भी जैसे नहीं हो क्योंकि तुम ख़ास हो और यही वजह है की तुम्हारी तुलना करके मैं खुदको हे शर्मिंदा नहीं करना चाहती थी. खुद हे देखो न के char-diwari में रहने वाली और एक नवजात की माँ होने के बावजूद मेरा पहला प्यार तुम्ही बने और आखिरी सांस तक तुम्ही रहोगे."

"अरे.. आपका भी फ्यूज ढीला हे है चची.. कहा मैं मजाक कर रहा था आपके साथ और आपका ये प्रेम rudan-program चालू हो गया इतनी सी बात पर. वैसे रो तोह नहीं रही इसलिए एक बात और बतानी थी.", अर्जुन ने उनका उतरा हुआ चेहरा देख कर जब एक और बात कहने के बाद चुप्पी सधी तोह चची ने मुँह बनाते हुए हे हलके से बस बताने का इशारा किया.

"मेरा हाथ न.. कुछ ज्यादा हे ढंग की जगह पर है.", अब उसके इस तरह बेशर्मी से बताने पर चची ने हालत पर गौर किया तोह वो अर्जुन को मस्ती में हे मारने का झूठा नाटक करती हुई लपकी. और चमकते बादल सी अनामिका को अनंत आसमान से अर्जुन ने पलट कर अपने सीने पर ले लिया. मुँह से उफ़ तक न निकला इस करवट और चोट के बावजूद. न अनामिका ने कुछ वक़्त कोई हरकत की उसके सीने पर अपना बोझ टिकाये. उफनती नदी भी समंदर में विलीन हो कर अपनी गर्जना खो देती है.

"हहहहह.", अर्जुन ने हलके से पीठ थपथपाई तोह बस इतना हे जवाब दिया अनामिका ने.

"क्या हहहह..? या तोह ाचे से ऊपर हे लेट जाओ नहीं तोह यहाँ बगल में आ जाओ.", अर्जुन फिर से उन्हें सताने के लिए ऐसा कह रहा था क्योंकि खुद वो अपने एक हाथ से अनामिका चची को कमर की तरफ से अपने ऊपर कर चूका था और वो हलकी गुदगुदी से हिलती हुई जैसे मन कर रही थी. चेहरा जब ठीक अर्जुन के सीने से ऊपर आ टिका तोह वो आँखें कस्ती हुई थोड़ा जोर से लिपट गयी. अर्जुन की हथेली का स्पर्श उन्हें बखूबी अपनी कमर पर हो रहा था, जहा अर्जुन जैसे अनजाने हे कुछ टटोल रहा हो और उसकी हरकत अनामिका समझती हुई हिम्मत हे नहीं जूता सकीय कुछ कहने की. अर्जुन अपनी हे गलती और मजाक में अंतवस्त्रों की तोह लेता हुआ हल्का उत्तेजित हुआ तोह हाथ वही रुक गए. अब उसकी भी हालत कुछ कुछ अनामिका जैसी हे थी. एक बार फिर दोनों हे खामोश थे जैसे ये अदृश्य कोई दिवार थी जिसको पहले कौन लांघे इसका फैंसला दोनों हे करने में असमर्थ हो. अनामिका को ऐसे में भी अर्जुन की हथेली का स्पर्श अपने उभरे हुए नितम्भ पर अलग सा एहसास दे रहा था.

"सो गए क्या?", बस यही 3 शब्दों का सवाल इस चुप्पी को टॉड गया. अर्जुन आँखें मूंदे स्थिर लेता था इतनी देर से और ठीक वैसे हे उसके आलिंगन में जिस्म पर छोटी सी चादर जैसी बिछी अनामिका. अर्जुन ने अपनी पलके खोलते हुए उस चेहरे को अपने इतना करीब देखा तोह बस हलके से ना में सर हिला दिया. सोच से भी परे अनामिका ने खुद हे अर्जुन की ठुड्डी के किनारे पर अपने होंठ लगा दिए. वो नरम और गीला एहसास अर्जुन के रोम रोम में उतर गया चाहे ये हरकत मामूली सी थी, पिछली रात वाले उस जहां चुम्बन के सामने. आगे सरकने के उपक्रम में अनामिका के मखमली बदन की बहोत हलकी सी रगड़ जैसे एक और कदम था उस अदृश्य दिवार पर चोट करने का. अर्जुन के चेहरे को देखते हुए अनामिका ने अपना चेहरा उसका अक्स बना लिया. सांसें एक दूसरे में मिलने लगी थी और अर्जुन की वो निस्तेज हथेली एकाएक हरकत में आती हुई अनामिका के सुडोल पुष्ट नितम्ब का उतना हिस्सा अपने कब्जे में करती उसको प्रोत्साहित करने लगी.

अलग सा कसाव, नरमी और चिकनाहट का समावेश था अनामिका के बदन और उन कटाव लिए कूल्हों में जो शायद हे किसी के नजर में आया हो. 16-17 घंटे तक ये ख़ूबसूरती सर से पाँव तक जब 9 गज के वस्त्र के कई घेरो में लिपटी हो और शयनकक्ष में भी कुछ समय से पहले तक वही रूप बरकरार रहा हो तोह कैसे इस मन्दाकिनी के हुस्न की कल्पना कोई आवारा भंवरा करता. इसके वजूद की गहराई तोह बस वही माप सकता था जो इसको स्वयं के होने का एहसास करवा सके. अथाह जलाशय एक सिमित समय तक हे उस दिवार से रुक सकता है जो खुद पर घमंड करती है पर एक छोटी सी अनदेखी दरार एहसास करवा देती है उस ख़ामोशी के बाद वाली असहनीय ऊर्जा का जो दिवार समेत जाने कितना भूखंड अपने में समाहित कर लेती है. ऐसा जलाशय हे तोह ये मन्दाकिनी थी, अनामिका.

अर्जुन का दूसरा हाथ भी अपने नितम्ब की तरफ बढ़ा कर अनामिका ने दोनों हाथो से उसका चेहरा थाम लिया. सांसें उखाड़ने के बाद अब संभल चुकी थी लेकिन ये एक और कदम था आगे बढ़ने का. बड़े उपवन का आखिरी फूल था अर्जुन का मुख और उसका रास पीने को आतुर जीवन की चह्वाण तितली अनामिका. उस मिठास और तड़प का बेहिसाब असर हुआ था इस युवक पर. अनामिका ऐसे उसको थाम लेगी और इतनी शशक्त पहल? अर्जुन के लबो को जोड़ी बेकरारी से लगभग चूसते हुए अनामिका ने अपनी कमर को उतने हे कामुक अंदाज में आगे पीछे किया. अब वही बड़ी हथेलिया दोनों नरम गोलाकार कूल्हों का लचीला मांस दबाता हुई बिना अनामिका को म्हणत करवाए अर्जुन के बदन पर घिसने लगी थी. झीन रेशमी सूती कपडे की परत के भीतर अनामिका का मधुकुन्द इस लंबवत कठोर गोलाई का भरपूर एहसास ले रहा था. एक पल को जब अनामिका की कमर कुछ ज्यादा हे आगे आने के पश्चात उतनी हे तीव्रता से पीछे हुई, गोलाकार उष्मित पत्थर ठीक जांघो के ख़ास जोड़ से टकराया जिसकी आद्रता रेशम सी मुलायम और लजीले मांस सी थी.

"ohhhhhh..ummm.", बस उस पहली हे हलकी दस्तक ने अनामिका की योनि का बहाव खोल दिया. आपस में उलझी जिव्हा अलग होने पर भी उस गीली लार से जुडी दिख रही थी. अनामिका ने सब भुला कर आज जो mukh-swaad अर्जुन को दिया था, वो अभी तक उसके हे नशे में था. अनामिका के शरीर की कंपन और होंठ जुड़ा होने से अर्जुन ने आँखें खोली तोह अनामिका की हालत बुरी थी. उसकी कमर और दिल की धड़कन के सिवा जिस्म में कुछ भी हरकत न थी. अर्जुन अगर कुछ कर सकता था तोह इतना की इस पल में वो अनामिका का सहयोग करे. कही आत्मग्लानि इस सखलन पर हावी हो कर इस नौसिखिया प्रेमिका के कदमो को पीछे न ले जाए. और अर्जुन ने वैसा हे किया भी. पीठ पर हौले हौले हाथ फिरने के साथ वो दूसरी हथेली से उन गद्देदार कूल्हों को थपकने लगा. कुछ 5-10 मिनट के बाद अनामिका की प्यारी सूरत उस पर हे तिकी थी.

"बहोड़ गंदे हो तुम. रोक नहीं सकते थे?"

"फिर कल तुम कोशिश करना हे बंद कर देती. अब बेहतर महसूस हो रहा है?", अर्जुन की दोनों हे बातें अनामिका की कुछ सम्भली धड़कन बढ़ा गयी थी. वो दिल से यही चाहती थी की जैसा प्यार अर्जुन ने दिया है, वो एक कदम आगे बढ़कर उसको अपनाये.

"महसूस से मतलब?", नजरे मिलाये बगैर अनामिका ने अर्जुन की बगल में नाख़ून गाड़ते हुए उल्टा सवाल हे कर दिया. 'तुम' का तोह जैसे वो हक़ दे हे चुकी थी उसको.

"जो अभी अभी फील करते हुए काँप रही थी उसको चरमसुख कहते है और मैं वही पूछ रहा हु की उसके बाद ाचा लग रहा है न? इंकार करके फायदा नहीं. मेरे हे ऊपर लेती हुई हो और जैसे मेरे लिप्स गीले है, वह भी वैसा हे कुछ मैं फील कर रहा हु, जो तुमने किया है.", अर्जुन और भी कुछ बोलता लेकिन अनामिका ने नाखून का दबाव बढ़ने के साथ हे उसके सीने पर भी दांत गदा दिए.

"हर बात बोलनी जरुरी है क्या? मैं सिर्फ किश कर रही थी जैसे तुमने सिखाया वैसे. उसके बाद सब तुम्हारी गलती है मिस्टर. हाँ मैं बस ऊपर लेती हे थी जैसे अब.", अनामिका के अंतर्मनन की तोह अर्जुन ले चूका था और अब बारी उसकी थी कदम बढ़ने की. जबतक अनामिका कुछ समझती उस से पहले वो उस बड़े बिस्टेर पर पीठ के बल थी और उसके ऊपर विशाल बरगद सा अर्जुन का चूडा जिस्म. चेहरे को छोड़ कर एक इंच भी अनामिका का जिस्म उसकी छाया से बहार न था. अब जिस मूक आमंत्रण से अनामिका उसको देख रही थी उसकी धड़कन अलग राग अलापती लगी.

"डर लग रहा है?", अर्जुन ने दोनों नाजुक बाहों के निचे अपने कोहनी निकल कर ाचे से अनामिका को समेत लिया. अब से पहले तक तोह बस अनामिका हे अर्जुन पर आयी थी पर उसके मजबूत और कटाव लिए सीने के निचे अपना dugdh-kalash दबते देख नाभि से निचे तक ये नयी लहर दौड़ गयी. पर वह तोह अलग हे बाला सर उठाये दस्तक दे रही थी. अनामिका ने बस उस उभार का धुंदला सा स्वरुप देखा था और आज पहली बार लिंगमुण्ड की इस अनोखी कठोरता से वो बुरी तरह भीगी थी. वो कैसा होगा? क्या सचमुच जैसी आभा थी वो उतना भयंकर होगा? ऐसा कैसे हो सकता है किसी इंसान का? यही सब द्वन्द उसके अलग हिस्से को उकसा रहे थे पर उनसे ज्यादा ख़ास तोह ये पल था जिसमे अर्जुन उसके ऊपर आया हुआ कभी माथे को चूमता तोह कभी हलके से उसके होंठो को स्पर्श करता.

"डर बस आज हे नहीं लग रहा. इस से पहले जो ऐसे पल थे उनमे वो सब था हे नहीं जो अब हो रहा है. डर... आज जैसे उसकी कमी से हे मैं खुश हु. तुम्हे तोह कही ऐसा नहीं लग रहा की तुम आगे बढे तोह सब बदल जाएगा? वो पहले हे बदल चूका है अर्जुन... जब तुमने कहा था अनामिका.. उस पल से हे बदल गया था..", अर्जुन ने इसका जवाब इस बार ठीक वैसे दिया जैसा वो चाहता था और अनामिका को आशा न थी. गले और सीने के करीब उस निर्वस्त्र गोर हिस्से को होंठो में भरते हुए अर्जुन ने जिस तरह से चूसा अनामिका की कमर स्वतः हे ऊपर उठती हुई उस असाधारण लिंग से चिपक गयी जिसका डर ाचे ाचे का मैं विचलित कर देता था. अनामिका को न इसका अनुभव था और न वो अब रुकना चाहती थी. अर्जुन के कूल्हों पर नख गाड़ते हुए वो खुद हे उसको निचे खींचने लगी जैसे ये जीवन का उसका पहला मिलान हो और अब गर्मी बर्दाश्त से बहार. इस दौरान अर्जुन सीने से ऊपर 2 निशाँ बना चूका था. अब उसके होंठ बरी बरी से अनामिका के आधार खली करने में जुटे थे. सांस लेने के चेहे जुड़ा हुए तोह अर्जुन ने लरजते हाथों से गाउन की चैन पर उँगलियाँ टिका दी.

"सब तुम्हारा है.", अनामिका ने हे उसके हाथ को गति देते हुए वो वस्त्र सीने से निचे तक खोल दिया. उभार अभी भी परदे में थे जिन्हे निर्वस्त्र करने से पहले अर्जुन बगल से हाथ फिसला कर उस कठोर दूध से भरे मांसल चुके पर रख कर जैसे अनामिका के जिस्म के बचे खुचे तार हिलने लगा.

"ओह्ह्ह्ह.. ये कर क्या रहे हो? वो दूध पीटा है तब भी ऐसा नहीं lagta..Ummm", आवाज रोकने के लिए अर्जुन ने करवट लेते हुए अनामिका को होंठो से हे खामोश करवा दिया. अब अनामिका का वस्त्र उसकी गोरी पिंडलियाँ दिखता ऊपर उठ चूका था एक पाँव अर्जुन पर जाते हे. अर्जुन इस मामले में किसी अनभवी से भी ज्यादा अनुभव रखता था जिसने हलके सतांन मर्दन से हे अनामिका को पागल कर दिया. चेहरा निचे सरकते हुए वो अब सीने के खुले हिस्से की महक लेते हुए हलके चुम्बन करने लगा. एक अलग हे महक थी अनामिका के सीने की और उसकी तरफ खींचता अर्जुन दोनों गोलाइयों के उभरे हिस्से पर आयी नमी चूसता हुआ एक हाथ से अनामिका की चिकनी baal-viheen पिंडली को सहलाता आगे बढ़ता रहा. घुटनो से आगे तोह जैसे जिस्म हे अछूता था. रेशम सी फिसलन और वो ख़ास नर्माहट हर पल बढ़ती जा रही थी. मांसल मखमली जांघो के उठान पर अर्जुन का इतना उत्तेजक स्पर्श और अगले हे पल कपडे से झांकते हुए एक निप्पल का उसके होंठो में जाना.

"आअह्हह्ह्ह्हह.. मुझे बहोत.. आह्हः.. Arjunnn..Ouchhhhh", एक तरफ उस सख्त चूचक से मीठी बूंदे अर्जुन के मुँह में उतरी और दूसरी तरफ उसकी उँगलियों ने अनामिका के लचीले कूल्हों की दरार की गहराई माप ली. उम्मीद से परे हे था अनामिका के कूल्हों का कटाव और नम्म गहराई. वह का मांस हलके से दबाते हुए अर्जुन योनि की नरमी और गर्मी का भी जायजा लेता पूरी लगन से सतान्नपान करने लगा. अनामिका के मुँह से साफ़ शब्द न निकल कर बस मस्ती भरी नयी आवाजे निकलने लगी. 5 बरस विवाहित रहने के बाद ये प्रथम यौवना सुख जैसे आज उसके जिस्म ने पाया था. अर्जुन अपने मजबूत जिस्म की जगह सिर्फ कामुक क्रीड़ाओं से उसको ये सुख दे रहा था. अमरबेल की तरह अनामिका खुद हे उस मजबूत वृक्ष से लिपटी जा रही थी. योनिमुख से बहार तक अनामिका का कॉमर्स अपनी चिकनाई गिराने लगा. वो दूसरी बार झड़ी थी जिसमे अर्जुन ने अभी तक तोह कोई मुख्या हरकत हे नहीं की थी. कपड़ो से बेफिक्र अनामिका अर्जुन के ऊपर हे सवार हो गयी. स्टैनो को उसके चेहरे पर गिराए वो बुरी तरह हांफती हुई कोशिश कर रही थी इस सबको समझने की.

"शहहह.. हो गया बस. अब आप आराम करो. इस से ज्यादा आगे बढे तोह ये रात भी काम लगेगी. और सुबह आप कोई बहाना भी नहीं कर सकती.", अर्जुन ने हे उनके कमर से निचे निर्वस्त्र जिस्म पर वो लबादे जैसे गाउन खिंच कर सही कर दिया. सीने से दोनों उभार अकड़ कर अभी भी बहार थे जिन्हे वो बंद करने लगा तोह अनामिका ने उसका हाथ हे रोक लिया.

"ऐसे कैसे कर सकते हो तुम? चुदाई नहीं करोगे? यही बोलते है न या फिर सेक्स?", अपने कहे शब्द से एक पल तोह वो खुद भी झिझक गयी पर यहाँ उसके साथ वो इंसान था जिसने असली प्यार से ru-ba-ru करवाया था. अंतरंग पालो में भी वो बस अनामिका की हे संतुष्टि पर केंद्रित रहा और अब उसको थकता देख पीछे भी हट रहा था.

"आपकी नार्मल डिलीवरी नहीं हुई थी न?", अर्जुन के ऐसे स्पष्ट सवाल और अनुमान से एक बार तोह अनामिका झेंप गयी पर फिर से उसके सीने पर अपने उभार रखती हुई करीब आ गयी.

"उस से कोई फरक नहीं पड़ने वाला. थोड़ी प्रॉब्लम हुई थी लेकिन मैं 10वे दिन वापिस सारे काम करने लगी थी. ये तोह पी कर आये और फिर बस वह किया 5 मिनट और पलट कर सो गए. आज तुमने मुझे एहसास करवाया है की वो न तोह सुख था और न हे सच. अब तोह अपने बारे में सोचो?"

"आप हे सोच लो चची.", अर्जुन ने उनके सामने मुँह से जवाब देने की जगह अपनी निक्कर खिसकते हुए वो झूलता हुआ भुजंग उनके नरम हाथ में थमा दिया. ये सब इतनी जल्दी हुआ था की अनामिका कुछ पल बस उस मॉटे गरम बांस को समझती रही और फिर एकदम हे अर्जुन के सीने से उतर कर हैरानी से बैठ वो रह रह कर झटके खता भुजंग देखने लगी. 2 लैंप की रौशनी बहोत थी उन्हें वो अविश्वसनीय अंग देखने के लिए. कभी वो अर्जुन के चेहरे को तोह कभी वापिस उस 9 इंच से भी लम्बे मूसल को देखती.

"ये.. ये सचमुच.. ये असली में ऐसा है? मुझे लगा था के कल तुम मुझसे शरारत कर रहे थे जेब में कुछ दाल कर. मुझे लगा था के ये कुछ ज्यादा मोटा है पर इतना बड़ा? और ये ऐसे हे हिलता रहेगा? ये.. ये वह जाएगा कैसे?", अर्जुन उनके सवाल और चेहरे को देख कर कुछ पल बस मुस्कुराता हे रहा और जब वो वैसे हे झिझकती रही तोह उसने निक्कर ऊपर चढ़ा ली. अनामिका अब भी उसको हैरानी से देख रही थी की ये तोह करने को नहीं कहा था.

"अब मैं जादूगर तोह हु नहीं चची की इसको बदल सकता हु. और ये वह भी चला जाएगा जहा के बारे में पहले आप बोल रही थी और अब मैं मन कर रहा है. लेकिन आज रात नहीं चची. सुबह आपको चलने में परेशानी होगी जैसे पहली रात के बाद हुई होगी. नहीं उस से तोह बहोत ज्यादा हे होगी. सुबह बुखार का बहाना कर देने से भी हल नहीं होने वाला क्योंकि एक दिन में बुखार तोह चला जाएगा पर परसो चाचा आ रहे है. गलती से उनका मूड बन्न भी गया तोह एक सेकंड में ख़तम हो जाएगा. आराम से करेंगे न अखाड़े से अगले दिन, शहर चल कर.", अर्जुन ने उनको वापिस अपने साथ लगा कर बाहों में लेते हुए जब वास्तविकता बताई तोह वो अभी भी सहज नहीं लगी.

"मुझे नहीं पता मैंने फील करना है तोह करना है. शहर का तुम्ही देखना और वो जब होगा तब होगा.", अर्जुन ने इस बार कुछ न कहते हुए उनके होंटो पर जोरदार चुम्बन जड़ने के बाद दूसरी तरफ घुमा दिया. मालिश के लिए रखा गरम तेल तोह अब ताख ठंडा हे हो चूका था जिसको अपनी चारो उँगलियों पर लगा कर अर्जुन ने एक बार वो चोगा चची की कमर तक ऊपर उठा दिया. इस दौरान भी वो निचले हाथ से उनका एक सतांन मसलते हुए होंठो को बुरी तरह चूसने में लगा रहा. अर्जुन का दूसरा हाथ अपनी जांघो के बीच जाता महसूस कर के अनामिका ने ऊपर वाली टांग आगे की तरफ मदद कर खुद हे जगह बना दी. इस मुद्रा में उनका पृष्ठ भार और yoni-lab उभर कर बहार आ चुके थे जिन्हे इस अवस्था में अर्जुन देख तोह नहीं सकता था पर उसके हाथ सटीक उस फूली हुई योनि के बाहरी होंटो से जा लगे. निरंतर एक चुके के मर्दन से निप्पल हल्का हल्का दूध बहार उड़ेल रहा था और इतने जोशीले चुम्बन से पागल होती अनामिका योनि पर इस पहले हे प्रहार से पूरी तरह मचलने लगी थी. अर्जुन बहार का नरम हिस्सा तेल से भिगोने के बाद अब उस पतली दरार और गुलाबी चोंच को रगड़ने लगा. अनामिका ने इस बार अपना हाथ पीछे ले जा कर खुद हे वो भुजंग टटोल कर मजबूती से पकड़ लिया. ये साक्षात् kaam-jwar हावी हो चूका था जिसमे वो भूल चुकी थी की जिस अंग को वो पकडे है वो अगर उसके जिस्म में प्रवेश किया तोह असलियत में आज हे उसका पूरा कौमार्य भेदन होगा. अर्जुन ने हे उनका हाथ अलग करके हथेली पर तेल गिरा दिया.

"वैसे हे सेहलाओ बस. उमाहहह", अनामिका को दुबारा न कहना पड़ा और बिना उस अंग को देखे वो अपने ऊपरी हाथ से अब ाचे तरह जड़ से सुपडे तक अपना हाथ घिस रही थी. एक तरह से तोह अर्जुन अपने हे चरम को नजदीक ला रहा था इन कोमल हाथो की हरकत से. चची की योनि के साथ उनके सुडोल कूल्हों की दरार भी चिकनी करने के बाद वो अब उनके पिछले हिस्से से चिपक चूका था. फैली हुई मांसल नरम टांगो के उस ख़ास जोड़ के बीच अभी उसने अपना लिंगमुण्ड हे उतरा था की अनामिका की जोरदार सीत्कार निकल गयी. पहला स्पर्श हे दोनों निर्वस्त्र अंगो का चुम्बन की तरह था.

"आअह्ह्ह.. ाचा लग रहा है... इन्हे मसलो अर्जुन, ये ज्यादा सख्त हो रहे है जाने क्या हो गया है इन्हे.", अपने चुचो का नाम लिए बगैर अनामिका ने उसके दूसरे हाथ को भी अपने मॉटे स्टैनो पर टिका दिया. अर्जुन निचे भी अपनी स्थिति बना चूका था. गरम और चिकने गुदाद्वार के करीब से रगड़ कर योनि को होंठो के बीच फिसलता उसका विशाल लिंग अनामिका को सुधबुध भुलाने लगा. अर्जुन ने ऊपर तरफ से उसको घुमा कर थोड़ा सीधा करते हुए इधर वाले चुके को मुँह में भर लिया. सवा 6 फ़ीट के उस बलिष्ट युवक के पहलु में लगभग एक फ़ीट छोटी और कमसिन सी अनामिका किसी गुड़िया से ज्यादा न लग रही थी. अर्जुन उसको जैसे घूमता वो वैसे हो जाती. कभी कभी जब लिंगमुण्ड सीधा उस कॉमर्स बहती योनि के मुहाने लगता तोह अनामिका अपनी जाँघे कस लेती. 10 मिनट तक अर्जुन वैसे हे अपने मॉटे मूसल को इन कासी हुई जांघो और योनि पर दबा कर रगड़ता रहा. अनामिका की योनि इस रगड़ाई से हे फूल कर और उभर चुकी थी. वो बंद छोटी सी चोंच भी एक कम बहार निकल जैसे लुंड को अपने अंदर बुलाना चाहती थी.

"दाल दू.. आह्ह्ह्ह माँ.. ", सीना बुरी तरह खुदके हे दूध से भीग चूका था और जैसे वो अकड़न अब उन्हें याद तक न थी. अर्जुन उनके हर अंग से उत्साहित होता अपने चरम पर आ पंहुचा था और उस से पहले हे अनामिका फिर से झाड़नी लगी. उसकी इत्छा सुन्न कर अर्जुन ने भी इस बार थोड़ा दबाव भदया तोह सिर्फ आधा लिंगमुण्ड हे उन लचीले होंटो को फैलता हुआ अंदर घुसने हे लगा था और अनामिका की चीख मुँह में घुटी हे रह गयी. अर्जुन वैसे हे अपना लावा उनके अंदर उड़ेलने लगा. एक 2 3.. और ऐसे हे 8 बार उसके लिंग ने वो जर्दार पिचकारी योनिद्वार के भीतर बरसाई जिसके बाद भी अर्जुन वैसे हे चिपका आखिरी कतरे खाली करता रहा. अनामिका के मुँह से हाथ हटते हे उसकी नजर चेहरे पे पड़ी जहा कुछ नमी थी.

"आदमी हो या कुछ और? अंदर बहार जाने कितना वीर्य गिराया है. और ये इतना मोटा अंदर नहीं जा रहा था तोह जोर क्यों लगाया?"

"अंदर डाला हे कहा चची? मुझे तभी पता चल गया था के थोड़ा से भी आगे किया तोह इस हवेली में सब लोग उठ जाएंगे. बस बिस्टेर गन्दा नहीं करना था और आपने भी कहा के दाल दो. चलो साफ़ करवा लता हु.", अर्जुन मुस्कुरा रहा था अनामिका की रोनी सूरत और नखरे से. अगर आज वो योनि के चले पर दबाव बना देता तोह यक़ीनन अनामिका सेहन न कर पाती. उसको ध्यान था इस बात का और इसलिए हे वो परहेज कर रहा था अभी तक.

"जब अभी तक मुझे नहीं देखा तोह गन्दी हालत में मैं तुम्हे देखने भी नहीं दूंगी. आती हु मैं.", अनामिका घुटनो के बल चलती हुई जा रही थी और अर्जुन की बात सुन्न कर एक बार ठिठक गयी.

"अगली बार वह सीधा मुँह लगाऊंगा और फिर खुद हे कहोगी के पहले वही करो."

"लगवाती हु तुम्हारा मुँह. मुँह फेर के सो जाओ अब.. आह सचमुच दर्द है और अगर तुम वो अंदर खाली नहीं करते तोह ज्यादा दर्द रहता.", अर्जुन ने निक्कर पहन ने के बाद सर के निचे तकिया लगा लिया. उसकी भी गर्मी कुछ हद्द तक अब शांत हो चुकी थी लेकिन चची उसकी उम्मीद से भी ज्यादा हे कासी हुई निकली. विनोद सचमुच बहोत बड़ा चुटिया था जो yoni-bhedan के लिए तोह मारा मारा फिरता था पर सही से औरत को youn-sukh कैसे देना है उसकी जैसे परिभाषा हे पता न था उसको. अर्जुन आँखें मूंदे लेता था और एक बार फिर अनामिका उसकी बाहों में आ चुकी थी. हाथ वस्त्र के ऊपर से अभी भी योनि पर हे था. थकान के बावजूद वो संतुष्ट थी और सोने से पहले अर्जुन से लिपट कर ये उन्होंने जाहिर भी किया.

"तुम्हारी शादी हो भी गयी तोह बीवी पास नहीं आने देगी? और वो पागल आँचल खुद नहीं जानती की रास्ता गलत जगह जाता है."

"अब आप ये दुआ दे रही है या bad-dua? हाहाहा.. मजाक कर रहा हु और देख लेना बस 1-2 बार थोड़ा दर्द होगा फिर प्रॉब्लम नहीं होगी. इसलिए तोह मैं आपकी बात नहीं मान रहा था. चलो अब आप आराम करो और मैं भी निक्कू को यही ले आता हु. थोड़ी देर बाद उसको भूख लगेगी भी तोह शायद पूरा खाना न मिले.", अर्जुन का आशय था उनके स्टैनो में खाली किये दूध से.

"तुम दोनों को एक साथ लगा के रख सकती हु. वो वैसे भी इधर वाले से पीटा है, वो भी ज्यादा नहीं. तुमने काम से काम दर्द हल्का तोह किया इनका. अब सो जाओ.", वो अपनी बात पर खुद हे शर्म रही थी लेकिन अर्जुन ने उन्हें आखिर बोलना तोह सीखा हे दिया. एक प्यार भरे चुम्बन के बाद दोनों अलग हुए जबतक अर्जुन अनामिका के बेटे को न ले आया. एक बार फिर वो purv-vat सोये थे, अनामिका उसकी ब्याह पे सर रखे और दूसरी तरफ छोटा निकेतन.

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"आज आने का दिल नहीं था परन्तु इस तारीख पर हमारे कदम स्वयं हमे इधर खिंच लाते है. 12 वर्ष गुजरने के बावजूद यही लगता है जैसे हमने अभी अभी अपनी बिजली को साफे से साफ़ किया है. बिजली.. हमने तोह आजतक हमारे किसी बचे का भी नामकरण नहीं किया और हमारी प्रिय तलवार को भी ये नाम दिया बिटिया ने दिया था. अक्सर जब हम krida-bhawan में सभी बचो को अभ्यास करते देखने जाते तोह उनकी यही मांग रहती थी की मैं उन्हें तलवार चलनी सिखौ. दिल रखने के लिए कभी कभी हम बलविंदर के साथ मिल कर उन्हें थोड़ा बहोत सीखा देते थे पर ये नटखट दिया अक्सर वह आ पहुँचती जहा हम खुद अभ्यास करते थे. 'बापू, आपकी तलवार दिखती नहीं है बस टकराने की आवाज हे आती है जैसे बिजली हो कोई. आप इसको घर क्यों नहीं लेके जाते कभी?', और जिस दिन हमने उसकी बात मानी, तोह हमने वो बिजली सचमुच बरसा दी. क्या करते जब दूसरा कोई हल हे नहीं था हमारे सामने.?

श्रीधर उस मासूम को कंधे पे लिए तहखाने से नदी की और भाग रहा था. तहखाने में 5 लोग मिल कर 2 और मासूम बच्चियों को राउंड रहे थे. और न हमे हमारे पिता वह दिखे और न महाराज. श्रीधर खुद तोह वापिस न लौटा और उसका पीछा करने से पहले हम इन वेह्शी जानवरो से उलझ गए जिनकी सिर्फ एक हे सजा थी, मौत. और हमने उस रात वह मौजूद सभी 17 जानवरो की बलि चढ़ा दी. उन दोनों बच्चियों को बचने का होश जबतक आता हम घुटने टेके आंसू बहा रहे थे. 8-9 बरस उम्र हे क्या होती है? हमने तोह सुना है की संविधान बन चूका है जिसमे 16 वर्ष तोह लिखित उम्र है. अबोध बच्चियों के बलात्कार और बलि से कौनसा देवता खुश होता है? हम ललकारते है उस नामुराद को जो इतने पूजनीय प्रतीक के साथ ये kaam-pipasa को जोड़ कर शैतान की जगह अनजान इष्ट बना कर मासूम लोगो को भयभीत करते है. 12 बरस में तोह खुद श्रीधर न लौटा पर हम इन्तजार करेंगे उसका और उसके चेले पाखंडी कल्पतरु का. अघोरी जैसे पवित्र पद की अवहेलना करने वाले ये nar-pishaach से बुरे तांत्रिक समाज के लिए कही ज्यादा बड़ा खतरा है और उतना हे बेवकूफ है आम इंसान, अपनी कमजोरी इन्हे खुद बता कर फिर उसका निदान भी भीख में मांगता है. घात के उस पार कभी 50 से ज्यादा परिवार रहते थे, म्हणत मजदूरी वाले मेहनती लोग. सबने अपनी औलाद खोयी और उनसे एक कोस दूर रह रहे हमको इसकी सूचना तक नहीं मिली.

गुड्डी का दर्द तोह हम पिता के स्थान पर कैसे भी झेल लेंगे, सबने बाँट कर अपने अपने हिस्से का ले भी लिया है. प्रजा, नैतिकता और अपने अंतर्मन से कैसे उतार पाएंगे ये बोझ जिसमे 57 मासूम बच्चियों के दुष्कर्म और मृत्यु का भार है.? कुछ समय पहले हे हमे ये आंकड़ा उपलब्ध हुआ और हमने जो बन सका उस स्तर से उन सभी की सहायता भी की लेकिन क्या हमने सहायता की या दिखावा करके हर वक़्त हमे मानसिक कष्ट पहुँचती इन आवाजों से बचने की नामुमकिन कोशिश कर रहे है? मुर्दे जीवित नहीं होते और अस्मत फिर से नहीं लौट टी. फिर हमने वो सहायता या कीमत क्यों दी? गरीब होना भी एक श्राप है और हम नहीं चाहेंगे की ऐसी दुर्घटना कभी दुबारा हो. एक प्रयास है बस क्योंकि जिन्हे खो चुके है, वो यादों में ज़िंदा रह सकते है.

रघुवीर, हमारा रक्त न हो कर भी रक्त से काम नहीं. 5 महीने पहले उसने हमारे नाम से कन्या विद्यालय शुरू करवाया है और रामेश्वर ने भी शहर से ठेकेदार भेज कर हमारे गाँव में दूसरा विद्यालय खुलवा दिया. प्यारे और हक़ीक़त अपने अपने दरबार से सीधा बचो को शिक्षा देने पहुंच जाते है. यही तोह 2 इंसान है जिनके साथ हम खुद के होने का एहसास पाते है. क्यों लिख रहे है हम ये सब? कोई 11 बरस से तोह आया नहीं फिर 12 होने के बाद भी नहीं आएगा? आएगा कोई न कोई तोह जरूर आएगा क्योंकि आज हम यहाँ आंसू नहीं बहा रहे. हमे रघुबीर ने एक आशा सौंपी थी, वो आज 11 बरस की हो चुकी है. पागल है पूरा पागल लेकिन प्यार में और इतने दर्द के बावजूद वो वैसा हे नटखट और हंसमुख है. रामेश्वर कभी कभी नरम हो जाता है लेकिन ये संभल लेता है उसको. हम उनसे तोह नहीं कह सकते की अंदरूनी हालत क्या है हमारी और ये पिता का दाइत्व भी है की इजहार होने न पाए. हमने बस इतना कहा था की हम लड़कियों को समाज में वही स्थान देना चाहते है जैसा नवमी तक हर ब्राह्मण और सात्विक इंसान ढोंग करता है. वो पढ़े लिखे लड़के है और उन्होंने वैसा किया भी. रघुवीर तोह यहाँ तक कह गया की जबतक परिवार बरक़रार रहेगा, हर बेसहारा बची और देवी, वो अपनी बेटी स्वरुप गॉड लेगा. कानूनी अड़चने होंगी तोह राम देख लेगा.

ाचे विचार है लेकिन इस से आने वाले वक़्त को सुधारा जा सकता है पर हम तोह यहाँ अतीत में हे बैठे हुए. अब बेवजह तोह सबको नहीं मार सकते न? हो सकता है ये हमारी हे किसी भूल की सजा उपरवाले ने दी हो या पिता का बोझ पुत्र के कंधे वाला प्रचलन. पुत्र से हमे हमारे ये 2 नन्हे शैतान याद आ गए जिनका नामकरण हे गलत कर दिया गया है. एक नरिंदर है और दूसरा अर्जुन, 7 बरस के है लेकिन अभी से नाक में दम किये रहते है सबके. नरो में सर्वोत्तम या उनके राजा को नरिंदर कहा जाता है. और पार्थ जैसा केंद्रित, धैर्यवान और लगन रखने वाला अर्जुन. ये दोनों नाम से प्रतिकूल कही से भी सभ्य और शालीन नहीं है. लगन है भी तोह बस एक हे चीज की है, हर नामुमकिन शैतानी करने की. गाये के टेबल में आग लगा दी दियासलाई से और डर के मारे खुदको हे बंद भी करने लगे थे भीतर. वह गाँव के बहार से नहर गुजरती है, जाने कैसे दोनों पहुंच गए और कूद गए. 7 बरस के वो तैरना जानते है लेकिन 9 बरस के गजेंद्र को बेहला के डुबोने लगे थे. ये विधयलय भी नहीं पहुंचते और अब तोह अवकाश है इनके इसलिए यही काम धाम है इन्हे. व्यस्त रहते है तोह दिन निकल जाता है कैसे भी, पर जैसे हे रात गहराती है हम अपने बचाव में कुछ भी नहीं कर सकते. यहाँ लिखने से मैं हल्का हो जाता है थोड़ा और घर से झूठ बोल कर आ भी जाते है की आज के दिन पिता जी का निधन हुआ था, हत्या हुई थी. भटकने लगते है इधर उधर, बचना चाहते हो जैसे यहाँ आने से लेकिन हमसे पहले हमारा ये अमावस इधर आ जाता है. ये भी उन कमबख़्तो से परेशां है. मेरी तरह इस पर भी बुढ़ापा आ रहा है लेकिन वो इसको कुछ समझते हे नहीं. बुजुर्ग तोह हरेक सम्मान का अधिकारी होता है. पहले वाले अमावस के बाद सोचा था फिर कभी ऐसे चाहने वाले को नजदीक नहीं आने देंगे लेकिन पिता के बाद पुत्र भी हमारे साथ 13 वर्ष निकल गया, शिकायत किये बिना.

2 माह पहले रघुवीर की द्वारा हमे सुपुर्द की हमारी आशा, हमारा संभव, कशी से शिक्षा पूरी करके हमसे मिलने आया था. बड़ा हे दिलेर और शांत बचा है अपनी उम्र के हिसाब से और उतना हे जल्दी बढ़ रहा है. रामेश्वर और रघुवीर के जाने के बाद रघवीर लौटा था एक रात जब उसने हमे वो नवजात सुपुर्द किया ये कहते हुए की 2 बेटो के बदले बस वो इतना हे कर सकता है हमारे लिए. लेना नहीं चाहते थे हम वो पर बात चौखट पर रखने की आयी तोह विवश हो गए. घर पे तोह यही बताया था की पूर्णिमा बहु ने मृत बचे को पैदा जनम दिया है और उसको अकेले दफनाने का कह कर रघुवीर उसको हम तक ले आया. बचे की भूख के आड़े कोई मजहब न आया उस वक़्त और हम आभारी रहेंगे प्यारे और हक़ीक़त के जिन्होंने एक बरस तक उस बचे पर कोई साया न आने दिया. राजमहल में 3 बरस हमारी बिटिया और केशवी दायी ने उसको संभाला जब तक मुमकिन था. हमे मालूम नहीं था हम वैसा क्यों कर रहे है. महाराज ने राह दिखाई की फ़कीर के पास परशुराम हे बड़े होते है. उस दिन से हमने उसको कभी बालक नहीं समझा. अब आया था मिलने तोह अमावस को हे कंधे पर उठा लिया. हमसे एक हाथ ऊपर जाएगा हमारा ये संभव और हमारे जाने के बाद हवेली, raj-mehal की सुरक्षा हम इसके हे हवाले करेंगे. तांत्रिक का टॉड तोह योगी हे हो सकता है, हमारा संभव वही बनेगा. रघुवीर हमारा साथ दे रहा है इसमें भी, मुस्कुराता रहता है बस जीकर नहीं करता.

जाने से पहले बोल कर गया है की बापू, हम भेड़िया लेके आएंगे आपके लिए. दिया के साथ ये भी हमको बापू कहने लगा है. कभी घरवालों के सामने मुलाकात खुल गयी तोह जवाब देते न बनेगा. आज रोने नहीं आया और न मैं अतीत को इतना दोहराना चाहता हु की वापिस घर हे न पहुंच पौन. बचे घर पर है और कौशल्या चाहे पर्दा रखती है हमसे, पर बहु पुलिस वाले हमारे बेटे के साथ रह कर आधे मुजरिम तोह पहचान हे लेती है. तुमसे मिलना न भी हो पाया बेटे तोह बस एक बार हमारे साथ अपना नाम जोड़ कर इतना कह देना की हम गलत नहीं थे. सदा इतने हिम्मतवर हे रहना जिस तरह तुम इनके पास पहुंच चुके होंगे. वजीर अक्सर ऐसे हे राजा की परीक्षा लेते है. चलते है, रात गहरा चुकी है.

लक्ष्मी नारायण तुम्हारा भला करे

पंडित मोतीलाल अनुराधा शर्मा

25/05/1959

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5 बजने का शोर घडी ने किया तोह अर्जुन वर्तमान में लौटा उन जंगल और हवेली से. जैसे वो हे खुद वह बैठा ये सब पढ़ रहा हो या लिख. आज वो डरा नहीं था बस अचंभित था. आज क्यों वो खुदको अपने पड़दादा से तुलनात्मक देख रहा था? उनके दर्द में भी आज कुछ हौंसला था और ये रघवीर जी वाला प्रकरण जैसे उसको पहले से पता था. लेकिन और भी बहोत कुछ था इसमें जैसे उमेद चाचा का इतने कन्या संस्थान चलना, 57 हत्याएं और दुष्कर्म. कैसे हालात रहते होंगे इस सब के बीच और कैसे मोतीलाल जी अकेले हे इतना कुछ करते रहे होंगे. अर्जुन ने एक नजर अलसायी सी उनींदी आँखों से उसको देखती अनामिका को देखा और फिर वो पत्र वापिस बक्से में बंद कर दिया. अनामिका के होंठो को चूमने के बाद वो सबकुछ पहले जैसा सुरक्षित रख कर अपने कमरे की तरफ चला गया. कुछ पहलु तोह उसकी भी उम्मीद से परे थे. अब उसको तैयार भी होना था और ढेरो सवाल थे जो वो कई लोगो से टुकड़ो टुकड़ो में पूछने वाला था. सबसे पहला व्यक्ति तोह खुद हे हवेली में दाखिल हो रहा था, कृष्णेश्वर जी.
 
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