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अवसर (ा)
"इन्दर का फ़ोन था पापा. वो कह रहा है की अभी 2 दिन उसको काम की वजह से बहार रहना पड़ेगा.", शंकर बैठक से बहार निकल कर आँगन में आया था और उसके पिता बगीचे में पौधों को पानी देने के बाद अभी सांस दुरुस्त करने में लगे थे. कौशल्या जी ाँ मुस्कान के साथ बबिता के गाँव जाने वाली थी जिस वजह से शंकर इतनी जल्दी तैयार था. अभी सुबह के 6 हे तोह बजे थे.
"हम्म्म. परसो सुबह तक लौट आएगा या उसके ये 2 दिन कल और परसो समेत है? आज राजू को बोल देता हु की वो घर पर हे रहे. मैं ले जाऊंगा तुम्हारी माँ को उधर राममेहर की तरफ. कुछ काम भी है वह और तेरी परेशानी भी काम होगी ऐसे.", रामेश्वर जी कमीज पहन कर बटन लगते हुए शंकर से भी बातचीत कर रहे थे. रुपाली अपनी दादी के साथ वह नाश्ता ले आयी थी जिसको शंकर जी ने 500 रुपये पकड़ा दिए जैसे ये उसकी जेबखर्ची थी. रुपाली को भी अब झिझक नहीं होती थी जिस तरह से कुछ हे समय में वो पूर्ण सदस्य और Shankar-Rekha की वास्तविक बेटी बन चुकी थी.
"कह तोह रहा है की कल रात तक लौट आएगा पर उसकी रात 8 बजे से सुबह 4 के बीच कुछ भी हो सकती है पापा, आप तोह जानते हे है. वैसे कल आप घर भी देरी से आये और आने के बाद बस आधा गिलास दूध पी कर सो भी गए. सब ठीक तोह हैं न पापा?", शंकर ने आज नाश्ते में रूचि न दिखते हुए पहले अपने पिता के मैं को टटोलना बेहतर समझा. जबकि हमेशा की तरह आज भी जवाब दोनों की प्लेट लगाती कौशल्या जी ने हे दिया.
"मुझे आजतक ये समझ नहीं आया की क्यों ये अपने दादा जी के स्वर्गवास वाले दिन ऐसे हो जाते है.? कल उनकी पुण्यतिथि थी शंकर और ये ऐसे दिन भी घर में उनके लिए कोई पूजा पथ हे नहीं करवाते. नाम हे ले लेना चाहिए जी काम से काम. आज बीटा पूछ रहा है तोह इसको हे जवाब दे दो नहीं तोह कल को अर्जुन पूछने लगा तोह आपके नहीं बताने से वो पहोच जाएगा आपके दादा की भी माँ की कोख तक ये पूछने की क्या वजह है.", कौशल्या जी के जवाब पर आज पहली बार था की पंडित जी मुस्कुराये नहीं थे.
"रहने दो न माँ, क्यों सुबह सुबह इस बात को खिंच रही हो. हमने तोह देखा भी नहीं पापा के दादा जी को तोह क्या फरक पड़ता है जब जानकारी हे न हो. होगी कोई वजह या पापा दर्द बांटना नहीं चाहते होंगे.", शंकर को अपनी पैरवी करते देख रामेश्वर जी ने अपनी ख़ामोशी भांग की.
"अब तुमने तोह उन्हें देखा नहीं जो हमारे पिता के भी पिता थे लेकिन हम अपने हे पिता को नहीं समझ पाए कभी. हाँ उनके जैसे हम कभी नहीं बन सकते क्योंकि वो घर की देहलीज से बहार निकलते हे सभी को एक सामान देखते थे, फिर चाहे गली में हम हे क्यों न दिख जाए. मुंशी जी वही jawaab-sawaal कर लेते थे. ऐसा नहीं है के हमारे पिता कठोर थे या ज़िद्दी, वो नरमदिल इंसान थे. हमारे दादा जी का देहांत नहीं हुआ था, बल्कि उनकी हत्या कर दी गयी थी और इसके परिणाम स्वरुप कोई आधा दर्जन शक्क में आने वाले अपनी जान गँवा बैठे. दादा जी की लाश को घर तक भी नहीं लाया गया था और नदी किनारे हे आज के दिन बस संस्कार कर दिया. मैं तोह था भी नहीं वह और न हमारे पंडित जी ने इसकी सूचना तक भिजवाई. पूछने पर माँ ने हे बताया की अपराधबोध है हमारे पिता को जो उन्होंने पंडित हो कर अस्त्र उठा लिया. लेकिन अब हो गया जो होना था पर पिता का पिंड, श्राद तोह दूर की बात है तस्वीरें तक हटा दी अगर वो कही थी भी. लोग हर घर में मरते है पर क्या हम वह टाला जड़ दे? इन्दर ने यही किया था क्या? हवेली पर रघुवीर ने तोह न पहरेदार बिठाये पर ये हमारे पंडित जी जाने किस आत्मग्लानि में फंस गए जो दादा जी की हर निशानी दूर कर दी. हम अपने पिता पर संदेह नहीं कर सकते शंकर. वो सचमुच dev-aatma थे जिनके लिए एक नवजात प्राणी और बुजुर्ग में कोई फरक नहीं था, सेवाभाव दोनों के लिए. जो व्यक्ति हर जीवन का महत्व स्वीकारता हो, वो कैसे इतनी जान ले सकता है? और फिर उसके पश्चाताप में अपने हे पिता से दूर होना? हमे घर में नाम लेने और पूजा पथ की मनाही थी दादा जी की पर घर से बहार हम कर सकते है. हाँ कोई भी स्त्री वैसा नहीं कर सकती इसलिए बचे तोह बस मैं और पिद्दी. वो लाडला भी था उनका चाहे मुझे मेरे दादा अँगरेज़ बोल देते थे गुस्से में लेकिन स्नेह मेरे साथ भी था. अब वजह बता दी भगवान तोह रोटी भी खिला दो?", रामेश्वर जी थे थोड़े गंभीर हे अभी लेकिन कौशल्या जी मंद मंद हंसती हुई उन्हें खाना परोसने लगी.
"बड़ा अजीब फैंसला था उनका और क्या यही वजह है की वो अपनी भी तस्वीर के खिलाफ थे? उधर भी उनकी फोटो नहीं लगी, सिर्फ दादी की है और यहाँ तोह दादी की भी नहीं.", शंकर के सवाल जैसे आज हे शुरू होने थे.
"जा के पूछ ले बीटा तू हे उनसे. तू स्कूल जाने लगा था तब तक वो मेरे कान खिंच देते थे की ये कैसे कर दिया? वो चीज वह से क्यों उठाई? तू इन्दर को समझाता नहीं थोड़ा भी. मैं करता हु क्या तुम्हारे साथ कुछ ऐसा? और वो तोह बड़े थे फिर उन्होंने ये बात न कही इन्दर से. ब्याज ज्यादा प्यारा होता है और उसके बदले बेटे की खिंचाई कर लो."
"आप भी यही करते हो थानेदार साहब. अक्सर बेटे बाप पे हे जाते है.", कौशल्या जी के तंज से अब शंकर भी हंसने लगा था. उसके पिता बहोत काम बार हे ऐसे खीजते देखे थे उसने.
"अरे भगवान, मैं उनके साथ ज्यादा रहा नहीं और जो रहा वो पिद्दी का पिद्दी रह गया. रघुवीर हे बढ़िया था जिसकी एक समय तक उनसे दोस्ती भी हो गयी थी. और इस शंकर ने बड़े झंडे गाड़ दिए. बीटा बाप पे जाता है लेकिन इसने तोह जो औलाद भी पैदा करि वो भी मेरा बाप. मेरी जवानी तक पंडित जी सवाल करते रहे और बुढ़ापे में सोचा था चैन से रहूँगा लेकिन उन्होंने तोह ठान लिया था के चैन नहीं लेने दूंगा. भेज दिया अर्जुन, जो उनके सवाल रह गए होंगे उन्हें ये पूछ पूछ के बचा खुचा चैन ले लेता है. चाय हे पीला दो एक कप कौशल्या.", पंडित जी ने रोटी से पहले हे हाथ रोक दिए.
"हाँ ये तोह आपने आज सच बोल हे दिया. इसलिए कई बार गुस्से में उसको 'मेरे बाप' बोल देते हो और वैसे बात उसकी आ जाए तोह फिर किसी की सुनते भी नहीं हो. हम सबको तोह लगता था के बस दादा पौटे का प्यार है, पर देख ले शंकर आज इन्होने वजह बताई की वो कितना ख़ास है इनके लिए.", माँ बीटा हंस रहे थे और उनके साथ इस बार रामेश्वर जी भी.
"कौशल्या, अम्मा जी एक गल्ल कई वरि केहन्दी हुंडई सी. इंसान दुनिया विच जे अपने दिन लिखवा के आया है तह ोसडा एक हिसाब जरूर रेह्न्दा. ओह जे सुकून विच दुनिया तोह नहीं जांदा ताः ोस्डे मकसद न पूरा कारन लायी, ऊपरवाला किसे ोस्डे हे अपने न वापस भेजदा है दुनिया विच.' मैं मानता नहीं था इस सबको और आज भी इस यकीन नहीं है. बस अम्मा जी कहती थी क्योंकि ऐसा उनका विश्वास था और मुझे ये याद रहा. अर्जुन को देख कर बस उन दोनों की याद आ जाती है. जब बचे में maa-baap हे दिखने लगे तोह फिर कैसे मैं उसको अनदेखा कर दू.? और तुम्हे भी इस बात पर थोड़ी ज्यादा आजादी भी मिली है शंकर. अब तुम माँ बेटो का santri-mantri खेलना हो गया हो तोह 2 निवाले खा सकता हु?", रामेश्वर जी के इतने बेमिसाल जवाब पर कौशल्या जी निरुत्तर हे हो गयी. उनके पति ने जैसे उनकी भी आस्था का सम्मान किया था अम्मा जी वाली बात बता कर और मजाक में हे शंकर को भी चेता दिया की वो बहोत कुछ जानते है लेकिन अब उसको ज्यादा टोकते नहीं. अब गरमा गरम नाश्ते के साथ baap-beto की साधारण सी चर्चा चलती रही और अलका ने अपनी बात हो जाने के बाद कौशल्या जी को टेलीफोन थमा दिया था. अर्जुन उनसे इतनी सुबह हे तोह बात करता था आजकल. और शंकर जैसे ऐसे हे एकांत की प्रतीक्षा में था अपने पिता के समीप.
"इन्दर ने कुछ और भी बताया है मुझे पापा और मुझे लगता है हमको इस बारे में चर्चा करनी चाहिए. अब मुझे भी लगता है की वो दरगाह वाले अखाड़े में बात सिर्फ कुश्ती की हे नहीं है और उसमे कुछ प्रावधान भी है, बहोत ख़ास.", शंकर की बात से रामेश्वर जी ने हमेशा वाला अंदाज हे दिखाया, सहमति में सर हिलना बस.
"वह तोह यही कहा गया था की ये बस 5 बड़े गाँव और उनके भीतर आने वाले 10-11 छोटे गाँव तक हे ये सिमित रहता है. मतलब बस साधारण पहलवान जो इन्ही चुनिंदा गाँव से वास्ता रखते है वही दंगल में भाग ले सकते है, वो भी जैसा नियम है 2 का 5 या उसका उल्टा.", शंकर के जवाब में जो सवाल था उसको सुन्न कर रामेश्वर जी ने पहले अपने हाथ उस साफ़ टोल्ये से पहुंचे और चाय की घूँट लेने के बाद अपने बेटे की तरफ देखा.
"कोई भी व्यक्ति जो raj-darbar में सेवक या ओहदे पर हो या कभी रहा हो, वो चुनौती पेश कर सकता है अकेले हे. फिर सामने हम हो या अर्जुन, उसको चुनौती उठानी हे पड़ेगी. पर ऐसा हमने सिर्फ 2 बार हे होते देखा है वो भी तुम पैदा नहीं हुए थे या कहो हमारी शादी भी नहीं हुई थी. पहली बार तोह हम स्वयं 10-11 बरस के रहे होंगे और ये दरगाह वाला मेला ऐसा नहीं होता था जैसा गाँव बन्न ने के बाद सन्न 1949 से दिख रहा है. तब दूर दराज से भी प्रतिष्ठित लोग, बड़े हुकुमरान आते थे और दृश्य अलग रहता था. जान भी ली जा सकती थी जिसको स्वयं पिता जी ने नियम में बदला. हाँ तोह हम कह रहे थे की 10 बरस से कुछ ऊपर रहे होंगे जब अखाड़े में suraksha-pramukh ने पिता जी को हे चुनौती दे डाली थी. ये जानते हुए भी की वो दंगल नहीं करते. पर उन्हें मैदान में उतरना पड़ा था और तभी हमने देखा थी की क्यों उन्हें बापू जी भी कहा जाता था. उसके बाद हमने 2 बरस मेले में भाग लिया, प्रशिक्षण जांचने के लिए पहली बार और दूसरी बार हमारे रक्त की वजह से. संरक्षक का परिवार चुनौती उठा सकता था और दे भी. संयोग से जिन sena-pramukh ने पिता जी को चुनौती दी थी, ये उनके हे छोटे भाई थे, दूसरी माँ से. रघुवीर थोड़ा सनकी था जिसने वीर सिंह के साथ उसकी टोली को हे बुलवा लिया अखाड़े के भीतर. 5-2 का रिवाज ऐसे शुरू हुआ था लेकिन बस एक हे साल चला क्योंकि रघुवीर कायदे काम हे मानता था. फिर पाबन्दी लग गयी थी हम दोनों पर हे. सुना है के पहले खुली चुनौती होती थी और अखाड़े में खड़ा चाहे विजेता हे क्यों न हो, हुंकार भरी है तोह raj-darbar से ताल्लुक रखने वाले किसी भी व्यक्ति का सामना करना हे पड़ेगा. यही वजह थी की हमने इन्दर को उस दिन सजा दी थी. गनीमत समझो की इन्होने ढोल नहीं बजवाये थे और बात उतनी दूर तक जाने से पहले ये अखाड़े से निकल आये. कोई आ जाता तोह बात गरम हो जाती? सुरक्षा प्रमुख अक्सर इसके लिए तैयार रहते थे.", पूरा विस्तार से वर्णन करने के बाद अब वो शंकर को देख रहे थे जैसे मैं को टटोल रहे हो उसके. आखिर कोई तोह ऐसी बात होगी जो शंकर ने ये जीकर किया या नरिंदर का सन्देश सुनाया.
"ढोल तोह इस बार भरपूर बजे है जिनकी आवाज हिमाचल तक भी जा पहुंची. इन्दर वही गया है किसी काम से और उधर भी कोई छोटा मोटा घराना है या संपत्ति के देखभाल वाले लोग. आप अब क्या कहेंगे अर्जुन की इस बेवकूफी को? क्या माँ उतनी हे खुश रहेगी वह उम्मीद से अलग होने पर?"
"वो बेवकूफ होता तोह घर बैठ कर सवाल करता शंकर या हमारी तरह हाथ पर हाथ रखे कभी बगीचे तोह कभी बाकी दोस्तों में समय बर्बाद करता. वो पिछले हे साल उतर सकता था उस अखाड़े में जैसा नियम है पर वो इस बार गया और उसने ये घोषणा भी समय से पहले हे करवाई की पंडित अर्जुन शर्मा, क्सक्सक्सक्स ग्राम प्रमुख ये चुनौती उठा रहा है. कोई रोकने आना चाहे तोह रोके. इन शब्दों का मतलब समझो शंकर. वो उन्हें हे ललकार रहा है जो अब हैं हे नहीं और अगर कोई भुला बिसरा सामने निकला भी तोह इस अश्वमेध के अर्जुन रुपी अश्व को थाम न सकेगा. हमे चिंता किस बात की थी अगर ये सिर्फ अखाडा हे होता? तुम्हारी कही बात को जानते हुए हे हम असहज थे लेकिन तुम्हारी माँ ने सही कहा की उसके फैंसले का आदर करना चाहिए. और हम अब कर भी रहे है क्योंकि बदल तोह सकते नहीं."
"तोह आप मानते है की आपने उसको वसीयत और अधिकार दे कर कुछ गलती की है? वो नासमझ है और अगर एक प्रतिशत भी ऐसा हुआ की सामने दरदबार से हे कोई टकराने आ गया तोह बात हाथ से भी जा सकती है."
"लगता है तुम्हे हिंदी समझ नहीं आती शंकर. हम पिता जी की वसीयत के कभी भी हक़दार थे हे नहीं, सिर्फ प्रतिनिधि थे. उन्होंने ये वसीयत ऐसे बनी थी जैसे मकड़ी का जला हो कोई. मैं और रघुवीर इसमें सामान अधिकार रखते थे, गवाही तुम्हारे चाचा कृष्ण की थी और तस्दीक खुद महल के पमुख करेंगे की वारिस इस लायक है भी या नहीं. इसमें एक हस्तक्षेप का अधिकार वारिस की माता का भी रखा गया था क्योंकि पिता जी के लिए माँ शब्द की हे परिभाषा भगवन से बढ़ कर थी. जिस वजह से पहले इसमें कौशल्या और पूर्णिमा भाभी का नाम था इक़बालनामा देने के लिए जो तुम्हारी माँ ने रेखा बहु का करवा दिए 4 नालायक और एक maha-nalayak देखने के बाद. तुम उन 4 में हे हो बीटा, वो maha-nalayak सबसे छोटे वाला विनोद है. कोई भी पिता जी और महल की शर्तो पर खरा नहीं उतरा और अर्जुन 13 की उम्र में हे रघुवीर से ये हक़ ले गया. कृष्ण ने तोह पहले हे उस करारनामे पर दस्तक किये है जैसे उसको खुद जल्दी हो की वो मुक्त हो कर अपने खेतो में चिपका रहे. तुम्हारी माँ ने सुशीला की घर वापसी पर हे रेखा से बात करके उसकी सहमति ले ली और हमे खुद रानी सौंदर्य का सन्देश मिला की वो अर्जुन से प्रभावित है और कुछ सवाल चाहती है उस से करने लेकिन पहले मैं वसीयत पे अपनी सहमति दे कर इसकी पुष्टि कर दू. मुझे करना पड़ा वैसा.", शंकर का तोह दिमाग हे काम करना बंद हो गया इतने लम्बे चौड़े नियम और वसीयत की उलझी सी शर्ते सुन्न कर.
"और फिर उन्होंने बात करने से पहले हे मोहर लगा दी? वो है हे कितना बड़ा पापा और चलो समझदार है ये मैं मानता हु लेकिन जिम्मेवारी? इतनी बड़ी जिम्मेवारी सँभालने लायक नहीं है अभी वो."
"दे कौन रहा है उसको जिम्मेवारी? जब तक वो 25 का नहीं हो जाता वो उस वसीयत और उस से होने वाली आमदनी का एक पैसा भी अपने ऊपर नहीं खर्च सकता. हाँ उसको कुछ अधिकार मिल गए है चौपाल में बैठने के, छोटी मोती सजा देने और मामले सुन्न ने के. महल तक बात करने जा सकता है अगर कुछ परेशानी हो गाँव के विकास में. संरक्षक हम हे है उसके फ़िलहाल."
"बहोत सही बात कही आपने. ये फैंसले छोटे मोठे है और जब अधिकार मिलेगा तोह क्या वो महल में जा बैठेगा?"
"हो सकता है, मैं इस पर क्या टिपण्णी दू. जैसे नियम बनाये गए थे उन्हें बस अर्जुन हे पूरा कर पाया और रही बात छोटे होने की तोह वो 8 कक्षा में हे तुम्हारे गज्जू और अपने गुरु को पटखनी दे चूका है. रिश्ता भुला कर कभी अभ्यास करना चाहो तोह यकीन दिलाता हु वो बंद नस्से खोल देगा तुम्हारी. हमारे पिता जी की पीठ जीवन भर कोई मिटटी पर न टिका सका और इसकी भी नहीं टिकने वाली, सामने कागज़ और कलम पड़ी है.", रामेश्वर जी का ये अभिमान था या अर्जुन पर खुद से भी अधिक भरोसा, लेकिन था बेजोड़.
"सामने कागज़ और कलम से क्या होगा?"
"लिख लो भाई हमारी बात को. कल हम न रहे तोह भी तुम्हारे पास सबूत होगा के हम झूठ नहीं बोले थे. वो जब जब घुटने टिका कर सांस भरेगा, सामने वाला जितना बड़ा दैत्य हो फिर अपने पाँव पर खड़ा नहीं रहने वाला. चलो आज के लिए बहोत हो गयी chanda-mama और बेताल कथा. जा कर अपना काम धाम देखो, मैं रिटायर्ड हुआ हु लेकिन काम मुझे भी बहोत है. फिलहाल तोह ड्राइवर की नौकरी मिली है कुछ घंटे की.", रामेश्वर जी भोजन करके अब उठ चुके थे और उन्हें ज्यादा दिलचस्पी अपने पौटे की आवाज सुन्न ने की थी जहा दादी पौटे जाने किस बहस में लगे थे. शंकर भी कलाई घडी में समय देखते हुए भीतर चल दिया. अपनी बीवी के शयन कक्ष से इस मासूम को सुस्त चाल में निकलते देख पहले तोह उसको माथे पर प्यार दिया और फिर खुद कमरे में चले गए. ऋतू अभी और सोना चाहती थी इसलिए दादी के कमरे की तरफ बढ़ गयी.
"आप? नाश्ता लगवाओ आपके लिए? बस कमरा सही करवाया है अभी कोमल से और ऋतू नहाने गयी है.", रेखा खुद भी जैसे नहाने के बाद पूजा करके फारिग हुई थी अभी अभी. कमरे में हे रहना होता था इसलिए साड़ी बदल कर एक साधारण से आधी ब्याह के सूती गाउन में खुद को समेटे थी. जाने क्या राज था इस बेमिसाल ख़ूबसूरती का जो इस व्यथित पल में भी स्फटिक सी चमकती बरकरार थी. अपने पति को सामने देख बिस्टेर से तकिये ठीक करके वो किनारे पर हे बैठ गयी. सामने वाली मेज के करीब राखी कुर्सी पर खुद शंकर जी.
"नहीं, मैंने पापा के साथ कर लिया है और अब निकलने हे वाला हु काम पे. तुमसे कुछ जरुरी बात करनी थी, बाद में पता नहीं याद रहती या नहीं."
"अब जरुरी बात तोह बाद में भी याद रहेगी नहीं तोह फिर जरुरी कैसे हुई जी?", रेखा ने तोह जैसे उन्हें बात शुरू करने से पहले हे भेदना शुरू कर दिया जिस पर वो अनमने ढंग से मुस्कुराये जैसे फ़िलहाल ये उपहास का वक़्त नहीं. दरवाजा बैठे हुए धकेल कर बंद करने के बाद उन्होंने वो जरुरी बात प्रारम्भ की जिसको शायद भूल भी सकते थे.
"हमारी खेती और बगीचे वाली साड़ी जमीन की संरक्षक तुम हो, माँ की तरफ वाली की कोमल, तुम्हारे पिता जी की तरफ से भी तुम, इधर वाले गाँव की संजीव के और किराया देने वाली प्रॉपर्टी पर कृष्णा लेकिन सभी में मालिक अर्जुन हे है. और तुम्हे तोह पता होगा की अब वो गाँव की पूरी वसीयत का भी मालिक है जिसमे एक संरक्षक तुम हो? मुझे इस से लेना देना नहीं की उनका मालिक अर्जुन बना है, बस ये समझ नहीं आ रहा की 80% तुम्हारे संरक्षण में क्यों कर हुई? कोई जवाब नहीं देने वाला मुझे इसका सिवाए तुम्हारे.", रेखा इस सवाल से हलकी सी गंभीर हुई जैसे उसको इसकी उम्मीद हे नहीं थी. आज लगा था के वो उसका हाल पूछने आये है और कल साथ नहीं जा पाने का कारण देने आये होंगे.
"मैंने कभी सवाल नहीं किया जी इस मामले में और पहले ये 20 हे था जिसमे खुद कृष्णा दीदी और संजीव के साथ छोटे पिता जी ने उनकी तरफ से अर्जुन के नाम कर दिया और उसको कुछ हो जाए या वो गलती करे तोह मैं सब वापिस ले सकू क्योंकि मैं उसकी माँ हु और सबको लगता है ऐसा करने से मेरी नजर हमेशा रहेगी अर्जुन पर. मैं हर महीने पूरा ब्यौरा माँ जी को नियमित देती हु एक एक पैसे का और उसके हिसाब से हे सभी के खाते में पैसे भी डलवाती हु, अर्धवार्षिक कमाई वाले भी. हाँ ये काम थोड़ा सा पेचीदा लगता है लेकिन मुझे परेशानी नहीं होती.", रेखा के सरल और स्पष्ट जवाब से के बार को तोह शंकर जी संतुष्ट हो गए पर फिर गाँव वाली बात वापिस उभर आयी.
"लेकिन तुम्हे 8-9 बरस पहले हे पापा ने दादा जी की वसीयत में महत्वपूर्ण सदस्य बना दिया था जो तुमने मुझे बताया हे नहीं. जानती हो न की उसमे सबसे ज्यादा अधिकार अगर कोई रखता है तो वो तुम हो? तुम्हारे बस एक सिग्न से वो काम से काम गाँव को जायदाद किसी के भी नाम हो सकती है और अगले 7 साल तक अर्जुन की सहमति भी जरुरी नहीं ऐसा करने के लिए? वह का भी अकाउंट तुम्ही देखती हो?"
"हाँ मैं हे देखती हु लेकिन उसका हिसाब पिता जी करते है क्योंकि खर्च उस हिसाब से हे गाँव की जरुरत पर होता है, बाकी बची राशि बैंक में सुरक्षित रहती है. सबसे ज्यादा धनराशि उन्ही 2 बैंक खातों में है जिसमे से अर्जुन या बेहतर कहु की मेरे पास 20% व्यक्तिगत के तौर पर है. उसमे सिर्फ जमा हे होते रहे है आजतक, एक पैसा भी नहीं निकला गया.", रेखा भी जैसे इस वक़्त किसी सुलझे हुए अधिकारी की तरह जवाब दे रही थी. शंकर को भी पता था के वो जितनी पढ़ी लिखी है उस से ज्यादा अनुभवी और समझदार है.
"अर्जुन के लिए राजी सिर्फ इसलिए हे हुई थी की इतना सबकुछ उसको मिल रहा था? या तुमको? देखा जाए तोह अब तुम अपने घर और यहाँ के साथ साथ गाँव में भी सबसे ऊँचे स्थान पर हो."
"ये मेरा घर है और वो पीहर है. सोने की थाली में भी इंसान भूख से ज्यादा नहीं खा सकता और उतनी हैसियत तोह रही होगी न मेरी अपने पीहर में? आप तोह बेहतर जानते है क्योंकि मैं वह साल में 2 बार जाती हु लेकिन आप हफ्ते में एक बार हो हे आते है. मुझे ताक़त नहीं एक जिम्मेवारी सौंपी गयी है जिसमे सभी को उनका हक़ नियमित रूप से मिलता रहा और अर्जुन को मालिकाना हक़ भी इसलिए दिया गया है क्योंकि ये उसकी चाहत नहीं थी कभी. वो सबसे एक सामान प्यार करता है और स्वयं से पहले बाकी सभी को उनका हिस्सा देने के बाद जो उसके पास बचता है वो आधा मेरे और बाकी आधा आपके बचत खाते में जिसको आपने के बार भी नहीं देखा. हाँ उसके पास और भी कमाई आती है और मैं उस से नहीं पूछती की वो मंजू को कितने देता है, मेनका का क्या खर्चा बंधा है और किनके बचो को शिक्षा और ख़ुशी दे रहा है. वो हर महीने कागज़ जरूर दे रहा है मुझे पिछले 4 महीनो से लेकिन मैंने एक बार भी नहीं देखा. आप ऊँचे स्थान की बात कर रहे है लेकिन असलियत में यहाँ ऊंच नीच मिटा कर हे ये सब प्रबंध किये गए और देखा जाए तोह स्थान आपका हे ऊपर है.", रेखा के तर्क के सामने शंकर बेबस हो चूका था क्योंकि अनजाने में हे एक बार फिर से उसने अपनी बीवी के सम्मान पर हमला किया था लेकिन वो कभी उकसाने पर भी बुरा नहीं मानती थी.
"अर्जुन को खतरा है, ये जानते हुए भी तुमने उसको इस सबमे पड़ने दिया.? तुम्हारी एक ना उसको बचा सकती थी रेखा."
"उद्देशःया में ना नहीं किया जाता, शामिल होना पड़ता है. जैसे सही राजा सिंहासन पर नहीं बैठाया जाता, जमीन से अवगत करवाया जाता है जिस से वो अपने करम निष्ठां से निभा सके. ठीक वैसे हे अर्जुन अभी सही शिक्षा हे प्राप्त कर रहा है. और खतरा तोह कब नहीं था? मंदिर ले जाते हुए एक बरस के उस बचे को भी था और घर से दूर 10 बरस वाले चिंतित लड़के को भी. वैसे भी मैंने अर्जुन को सिर्फ जन्म दिया है, उसके mata-pita वही है जो आपके है. जो हमसे बेहतर जानते है की अर्जुन के लिए क्या सही है क्या गलत. आप उनसे चर्चा कर सकते है. चाय पीयेंगे?", ये इशारा था की अब आप जा सकते है.
"आपका रुमाल.", रेखा ने उठ कर साफ़ रुमाल उनकी तरफ बढ़ा दिया था. बाकी सब तोह उन्ही के पास था पहले से. लेकिन शंकर आज इस बातचीत से जरूर खुद पर गुस्सा था. वो जिस तरह से बात करना चाहता था अक्सर हो कुछ और हे जाता था. अर्जुन के अतीत वाले पहलु हमेशा हे उसको अफ़सोस करवा जाते थी उस दौरान वो क्यों उसकी सुरक्षा के लिए नहीं था लेकिन दूसरा पहलु भी था जब वो अर्जुन से परेशां हो जाता था. मधु और उसके बीच भी कही न कही अर्जुन हे व्यवधान था लेकिन क्या उसमे अर्जुन की गलती थी? कार में बैठने से पहले हे शंकर ने बिना पानी के वो 2 गोलियां हलक से निचे उतार ली. सर दुखने से पहले हे वो इलाज कर लेना चाहता था क्योंकि दिन सही से शुरू भी नहीं हुआ था आज.
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"दिल लग गया है न बीटा यहाँ पर? माफ़ करना थोड़ा सा व्यस्त होना पद रहा है, कुछ दिन जमीन और काम से दूर था तोह.. समझ हे सकते हु की जमींदारी कितनी जरुरी है जब काम इतना अधिक हो तोह.", नाश्ता यहाँ हवेली पर भी अधिकतर लोगो का हो चूका था और अब आँचल तैयार होने गयी थी तोह अर्जुन अपने छोटे दादा के साथ बातों में लगा था. बात तोह दोनों ने पहले भी की थी लेकिन उसका विषय सामाजिक नहीं था. आज अनामिका चची तोह एक बार भी इनकी तरफ न आयी थी सिवाए अर्जुन जब तैयार हो रहा था तोह उसका रुमाल, बटुआ और घडी पकड़ने के. दोनों ने सुबह की मीठी मुलाकात वही कर ली थी अपने कमरे में.
"दिल लगाने के लिए किसी के पास टाइम होना जरुरी है पापा और अर्जुन तोह इस मामले में जैसे आप और ताऊजी पे हे गया है. आपकी तरह ये साहब भी कब घर आते है कब बहार रहते है, कुछ पता नहीं चलता. अभी देखलो ये शहर जाने लगा है वो भी बेमतलब ऐसे हे काम से और आँचल तोह जैसे तैयार हे रहती है.", दामिनी ने अपने पिता को चाय पकड़ते हुए अर्जुन पर तंज़ कैसा तोह उसने बस सर झुका लिया.
"पता है मुझे की ये दीपा बहु की बिटिया के दाखिले के लिए जा रहा है और हमारी आँचल भी इसके साथ जा कर अपनी किताबे लेके आ रही है जिस से पढाई पर असर न पड़े. क्या आपत्ति है तुम्हे इसमें? साथ जाना चाहती हो तोह चली जाओ, बहु और बाबू को भी ले जाओ. घूम लेना थोड़ा बाजार इस बहाने.", अब जो सुझाव उन्होंने दिया था वो अर्जुन को जरा भी मंजूर न था जिसमे उसने नजरे उठा कर अपने दादा को देखा जो मुस्कराहट से हे उसको आश्वस्त कर रहे थे.
"जब जाना होगा तब मैं खुद चली जाउंगी. आँचल अकेले जा रही है तोह फिर मैं क्यों सबके साथ अपना प्रोग्राम बनाऊ? और बिनोदि आएगा तोह उसकी गाडी में जाउंगी मैं, इन खतरा में न बैठने लगी. तुम्हे चाय चाहिए छोटे प्रधान जी?", दामिनी उखड़ी हुई थी बुरी तरह और वजह भी अर्जुन की करतूत हे थी जो उसको हर बार ज्यादा सताए जा रहा था.
"आपको अभी मेरी पसंद नापसंद सही पता नहीं चली बुआ. मैं चाय नहीं पीटा और नाश्ता करने के बाद तोह अगले 2-3 घंटे कुछ खता भी नहीं. वैसे आज समय से घर आ जाऊंगा, अपनी शिकायते एकत्रित कर लीजिये इतने. चलता हु दादा जी.", अर्जुन ने खड़े होने पर कमीज के बल सही किये और धुप वाला चस्मा आँखों पर लगते हुए मोटरसाइकिल की तरफ बढ़ गया. सेवक ने हे उसको धोने के बाद ाचे से चमकाया था और आँचल भी कासी हुई कुर्ती के निचे पटिआला सलवार पहन कर do-ranga दुपट्टा सर और गले में सही करते हुए दोनों पाँव एक तरफ करती हुई पीछे बैठ गयी. दामिनी से तोह जैसे ये देखा हे न गया जिस तरह से उसकी बेटी ने उसके सामने हे अर्जुन की कमर में एक हाथ लपेट लिया था. बैठी वो सभ्य तरीके से हे थी और उनके बहार निकलते हे वो बड़बड़ाती हुई अपने कमरे की तरफ चली गयी. उसका गुस्सा और kaam-jwar इतना अधिक बढ़ चूका था की ऐसे वक़्त में वो किसी को भी अपने ऊपर चढ़ा लेती पर फिलहाल उसके जेहन में सिर्फ अर्जुन था जिसको वो आज रात हर हाल में पाना चाहती थी. शायद अर्जुन भी इशारा दे गया था के वो भी कदम बढ़ने को तैयार है. अर्जुन इस खिली सुबह मुस्कुराता हुआ दीपा भाभी के घर के सामने पहुंच चूका था. और वो भी पहले से हे बहार कड़ी किसी महिला से बातचीत में व्यस्त थी. अर्जुन की मोटरसाइकिल रुकते हे उस महिला ने भी नजर घुमाई तोह कुछ आश्चर्य और अधिक ख़ुशी से वो खुद हे उसकी तरफ लपकी.
"मेरा सोहना पट अपने पिंड आया होया ते मेनू स्नेहा तक नई दित्ता.?", ये थी जगतार भाई की माता जी, जीने गाँव में कोक्की भें जी के नाम से बेहतर जाना जाता था. दीपा भाभी के साथ आँचल भी उनसे कुछ दुरी पर कड़ी हैरान हो रही थी जैसे उन्होंने अर्जुन को अपने सीने से लगाने के बाद उसके बालो को सहलाते हुए आशीर्वाद दिया. अर्जुन तोह उनके पाँव छूने की कोशिश में था इस से पहले.
"अब आपने भी तोह नहीं बताया की आप इधर आणि वाली है? कुछ कमजोर लग रही है आप, सफर के बाद घर रुकना नहीं हुआ होगा न ज्यादा?"
"दिल हे नहीं लग्न था अभी कुछ दिन उधर. ऊपर से जसलीन ने जग्गी को बता दिया की तू इधर आया हुआ है तोह वो सवेरे गुरुघर के बाद गद्दी उठा के सबको हे इधर ले आया. फिलहाल तोह सोये पड़े है दोनों भाई और जसलीन अपने दादा जी का दमाग खाने में लगी है. ये दीपा है, पिंड की सब्सि प्यारी बहु है और मुझे भें जी से ज्यादा सैस डा सम्मान डंडी है.", दीपा भाभी का तोह आजकल हर व्यक्ति परिचय देता था जबकि ये दोनों कही बेहतर जानते थे एक दूसरे को.
"जेउस से तोह मिलने आना हे पड़ेगा आंटी जी और ये भाभी जी हे वजह है के आपसे मुलाकात हो गयी. इनके हे पास आ रहा था निम्रत का फॉर्म लेने के लिए, लास्ट डेट है न उसके एडमिशन की और दीदी की बुक्स भी लेके आणि है वह इनके घर से. दोपहर को आता हु आपके हाथ का खाना खाने और जग्गी भैया की भी आप थोड़ी खिंचाई कर देना बस दिखावे के लिए.", अर्जुन की बात सुन्न कर आंटी जी भी हंसने लगी और दीपा भाभी ने पैसे और फॉर्म उसकी तरफ बढ़ा दिए. चेहरे पर उनके भी मुस्कान थी, धन्यवाद या शायद कृतज्ञता की. सोच रही होंगी की देखो इस लड़के को खुद हे अपने आपको खाने पर आमंत्रित कर लेता है.
"ध्यान से जाना और दार जी ने जीकर तोह किया थे कोई खाने पर आने वाला है दिन में लेकिन नाम नहीं बताया था. तोह उनके छोटे पंडत तुम्ही हो? कोई नई पुत्तर जी, आया जे. दीपा, तनु न कहना पावे हुन्न, घरे टेम दे नाल आ जाई. मंजे वाली न मैं बोल के हे इत्थे आयी है. जग जग जिए मेरा सोहना पट.", आँचल तोह बस दूर से खामोश नमस्ते हे करके रह गयी और अर्जुन उन्हें बगल से गले मिलने के बाद दीपा भाभी की तरफ हलके से सर हिला कर वापिस अपनी रानी पर सवार हो चला. अब आँचल काफी बेहतर थी जैसे जैसे गाँव पीछे जा रहा था.
"भें जी आप कब मिली अर्जुन से पहले? और ये तोह जैसे सब को हे जानता है?", अब जेउस को कुत्ता कह कर तोह दीपा भाभी सम्बोधित नहीं कर सकती थी, जितनी गहरी उनकी पहचान थी जग्गी की माता जी से.
"बड़ा हे बिबा बचा है दीपा और जानती कैसे नहीं? जग्गी के ज्यादा दोस्त नहीं है लेकिन उसने पहली बार किसी को छोटे भाई और दोस्त के रूप में पाया है. उम्र में छोटा और पंडित जी के घर से न होता तोह मैंने अपनी जसलीन व्याह देनी थी इसके नाल. हाहाहा.. फेर वि न व्यहन्दी, बिबा बचा है न और ओह मेरी बिगड़ैल शहजादी. ज़िद्दी बहोत है वो और अर्जुन समझदार बीटा है. 2 बार घर आया था वह शहर में और फेर शादी में जसलीन भी हफ्ता भर लगा के आयी, जिसके गुणगान करती नहीं थक रही. फोटो धुलवा के लायी है कल शाम और आज देखने को मिलेंगी. ाचा है बचे पिंड से वाखरे वाखरे बड़े हुए लेकिन बहार भी आपस में जुड़ रहे है तोह इस से ाचा क्या होगा. वैसे इसके साथ तू hans-bol नहीं रही थी जैसे तेरी आदत है?", यहाँ तोह दीपा भाभी की हे चोरी पकड़ी गयी थी जैसे.
"ध्यान रखना पड़ता है न भें जी छोटे बड़े का. वो आपके लिए पिंड से पहले बीटा बन गया पर यहाँ वो मुखिया बन्न के आया है पूरे पिंड का. सम्मान करता है और सेवाभाव भी है लेकिन वो आसमान और हम जमीन, ये याद रखना जरुरी है न भें जी.?", अब बारी थोड़ा हैरान होने की जग्गी की माता जी की थी.
"जे नया मुखिया है? हाँ ऐसा हो सकता है दीपा, लड़का लायक है और जीवन का गहरा ज्ञान रखता है. पर मुझे नहीं लगता की वो तेरे सामने किसी मुखिया की तरह आया था. उसके उस सच को देख जो उसके व्यक्तित्व में है, ओहदे को तोह जैसे वो खुद नहीं मान रहा. चलती हु, वैसे आसमान कभी जमीन से अलग नहीं होता चाहे हमारी आदत ऊपर देखने की है. वो परत हे है जो सतह से चिपकी होती है, हम हे गर्दन उठाये उसकी ऊंचाई खयालो में बनाते रहे तोह फिर गलती हमारी है.", दीपा भाभी को ये गहरा ज्ञान दे कर वो हंसती हुई चली गयी. अपने अंतर्मनन से जूझती दीपा भाभी ने कुछ समय राणो को चारा खिलते बिताया और फिर घर के भीतर चली गयी
"आप चाहे तोह आज अपनी क्लास भी लगा सकती है. जैसी मुझे समझ है 2 घंटे से ज्यादा की क्लास तोह नहीं रहती कंप्यूटर सेण्टर पर.", अब सपाट हाईवे पर थोड़ा यातायात तोह जरूर दिख रहा था, समय हे ऐसा था जहा शहर काम करने जाने वाले लोग निकल रहे थे. लेकिन इस सबको najar-andaaj करती आँचल तोह अर्जुन से चिपकी हुई आगे देखने के नाटक में अपना चेहरा उसके दाए कंधे पर टिकाये थी, जिसमे थोड़ी मुश्किल भी हो रही थी उसके कद की वजह से.
"मेरा टाइम 12 से 2 का रहता है लेकिन तब भी मुझे कोई दिलचस्पी नहीं. तुम्हे मेरे साथ हमारा शहर घूमने में तकलीफ है कोई?", आँचल की हरकतों से हे अर्जुन जान चूका था की वो ना हे बोलने वाली है. और बदले में सवाल ने उसको हे फंसा दिया.
"नहीं ऐसी बात नहीं है लेकिन आप तोह घर से बुक्स हे लेने आयी है और ये शहर घूमना हमने कब प्लान किया? पहले ये दीपा भाभी वाला काम पूरा कर देते है, धुप में शहर भी देख लेंगे.", अर्जुन ने अनमने ढंग से जवाब दिया था और आँचल हिम्मत बढाती हुई खुदसे हे अपना सीना उसकी पीठ पर दबाते हुए जाने क्या निरिक्षण कर रही थी. अर्जुन समझता था इन नयी नयी उमंगो को लेकिन वो इतनी जल्दी आँचल के साथ बहना नहीं चाहता था.
"आपको डर लग रहा है तोह मैं थोड़ा धीरे चलौ क्या?"
"डर नहीं पर ाचा लग रहा है. धुप में मुझे भी ज्यादा घूमना पसंद नहीं लेकिन जहा ये कोचिंग क्लास है उधर हे मार्किट और मेरा कॉलेज भी है. घर भी गोल चौक से नजदीक हे है लेकिन मैं इतनी जल्दी वापिस नहीं जाने वाली कही तुम ये सोच कर आये हो.", अब जैसे हे आँचल ने अपनी हथेली ठीक अर्जुन के सख्त छाती के फुलाव पर टिके अर्जुन के कान गरम होने लगे. पहले हे वो पिछले 10 मिनट से अपने चुचो का दबाव इतना बढ़ा चुकी थी की खुद उसको समझ आ चूका होगा की उसके ये नरम मॉटे चुके अर्जुन की पीठ से डाब कर बस पिचक हे सकते है, उसमे छेड़ नहीं करने वाले.
"आप 2 दिन से कुछ बदल सी गयी है और आपको नहीं लगता की ऐसी हरकते सवाल उठा सकती है? ये राह गलत मंज़िल की तरफ ले जा रही है और हम भी वही गलती दोहराएंगे तोह फिर हम में और उनमे फरक क्या रहा? आप बड़ी है और ये भी समझती है की ऐसा कुछ करना तोह दूर सिर्फ शक होने की सूरत में हे परिणाम बहोत बुरे हो सकते है.", अर्जुन ने उन सफेदे के लम्बे वृक्षों के किनारे हे ब्रेक लगा दिए थे. मील का पत्थर बता रहा था के शहर 7 किलोमीटर बाकी है. आँचल जैसे उसकी पूरी बात सुन्न कर थोड़ा पीछे हो गयी जैसा अर्जुन को लग रहा था लेकिन वो रानी से हे उतर कर एक तरफ आ कड़ी हुई जिधर सफ़ेद थे. अर्जुन उसके चेहरे पर पड़ती धुप का बस गहरा स्वरुप देख प् रहा था, गहरे चश्मे की पीछे से. लेकिन उसके बाद आँचल ने जैसे पालक झपकने से पहले हे उसके होंठो से होंठ भिड़ा कर चेहरा पीछे किया तोह अर्जुन के पाँव कैंम्प उठे. वो आँचल की तरफ न देख सड़क पर ध्यान देने लगा जैसे ऐसा करते हुए किसी ने दोनों को देख न लिया हो. पर वैसा कुछ नहीं था.
"देख लो ाचे से देख लो की कोई बहार वाला हे सवाल पूछने तोह नहीं आ रहा लेकिन तुम्हे परेशां करने से पहले जवाब मैं दूंगी. आखिर करने वाली भी तोह मैं हे हु न. तुम खुदको समझते क्या हो अर्जुन? यही की तुम सबकी परेशानिया ख़तम कर सकते हो, गलत सही को ढून्ढ सकते हो? किसी को दुखी नहीं देख सकते? कोई भी आ कर अपना काम तुम्हे सौंप दे तोह उसको करके खुश होने का दिखावा कर देते हो? तुम्हारा भी एक सच है जिस से तुम जान कर भी अनजान हो. लेकिन मैंने जो 2 दिन पहले वाली रात में जाना उसके बाद भले हे दुःख ज्यादा हुआ लेकिन खुद के लड़की होने का भी तोह पता चला जहा तुम मेरे साथ थे. वह मुझे लगा था की अगर मैं किसी इंसान के साथ सुरक्षित हु तोह वो तुम हो. अंदर जो लोग थे वो इंसान नहीं थे और जो बहार मेरे साथ था वो चाहता तोह कुछ भी कर सकता था और मैं बस गूंगी बानी रहती. शुरुआत में वही खौफ था न मेरी आँखों में जब तुमने मेरा मुँह बंद किया tha?",Arjun इस बहस को एक अनकहे सच की तरफ जाता देख बस खामोश खड़ा रहा.
"मैंने ये कुकर्म दसियो बार देखा है मेरे घर पर लेकिन उस रात से ज्यादा घिनोना पहले कभी नहीं था. पर तुम साथ थे मेरे, चाहे असल ज़िन्दगी में हम एक दूसरे से अनजान हे है लेकिन वह तुम थे जो मुझे संभाले हुए थे. वही मैंने सोच लिया था की मां या माँ तोह प्लान बनाते रहेंगे पर उनसे पहले मेरा अधिकार मैं तुम्हे दे कर उन दोनों को बता दूंगी की जो चाहते थे वो अब नहीं मिल सकता. और तुमने भी तोह मेरे आँखों पर किश करके कोई वादा किया था न अर्जुन?", अर्जुन तोह इतने स्पष्ट खुलासे से बेबस हे हो चला था लेकिन वो फिर भी एक और कोशिश करना चाहता था क्योंकि आँचल अगर उसके ख़याल में नहीं भी थी तोह उसका साथ देना भी उसके लिए खतरे से काम नहीं था.
"मैं समझ सकता हु लेकिन मेरा इरादा तोह वैसा नहीं था न और ये आप जानती है ाचे से. इस तरह अगर उनका सामना करना होता तोह आपकी जगह ऐसा मैं नहीं करता? आपकी माँ को मैं आपके प्रयोग से न काबू करता? लेकिन इस से बुआ एक बार को तोह बेबस हो जाती हो पर विनोद चाचा का क्या? जो बदलाव मैं विनोद चाचा में लाने की कोशिश कर रहा हु वो बदलने की जगह मुझे हे दुश्मन समझने लगते. बुआ एक पल को मान भी लेती की उनकी चोरी को पकड़ कर अब हम ये सब उनके सामने कर सकते है पर वो जब खाली हाथ उस शक्श के पास जाती जो ये सब घिनोने षड़यंत्र रचे बैठा है तोह वो इसकी सजह उनके साथ साथ आपको भी देता. आपका मेरे करीब आना सिर्फ आपके हे नहीं बहोत से लोगो के लिया परेशानी बन्न सकता है. मैं ये कल रात भी कह सकता था पर शायद मैं समझा नहीं पता उधर."
"तुम अब भी नहीं समझा सकते अर्जुन. तुम मुझे बचने की बात क्यों करते हो? ऐसा क्यों नहीं कहते की मुझे सामना करना चाहिए और मजबूत रहना चाहिए. एक दिन तुम तोह लौट जाओगे, विनोद न सही पर कोई और वही मांग करेगा उनके जैसी. किस्मत से मैं पहले भी एक बार बची हु क्योंकि माँ का प्लान तोह पहले भी एक बार ऐसा हे करने का हुआ था मेरे साथ अपने उस आशिक़ के साथ जिसको तुम नहीं जानते पर तब किस्मत शायद मेहरबान थी की वो आदमी किसी घटना में मारा गया नहीं तोह न माँ इतना वक़्त यहाँ गाँव में रूकती और न मां को वो सपने दिखती. फिर भी तुम्हारी बात मान लेती हु, क्योंकि चाहत एक तरफ़ा हो और उसमे कुछ जबरदस्ती या बेबसी तोह इश्क़ का नाम बदल जाता है. हर बार बचने किस्मत और तुम नहीं होने वाले लेकिन चलो जैसी तुम्हारी मर्जी, सर्वे dukh-harta सर्वे sukh-karta.. अपना न सोचे, न सोचे अपनों का..", ये गुनगुनाहट सबसे तीखा बाण था जो अर्जुन के mann-mastishk पर आँचल की व्यथा, दशा और चाहत से भी अधिक गहरा वार कर गया. इस बार आँचल फिर से अर्जुन के पीछे बैठ चुकी थी लेकिन स्पर्श तोह दूर, उसके वस्त्र का धागा तक अर्जुन के करीब न था. ख़ामोशी के बीच सफर मुश्किल से कटा लेकिन जैसे तैसे पूरा हो गया.
"इधर से लेफ्ट और फिर गोल चक्कर से स्ट्रैट. दूर से हे क्सक्सक्सक्स कोचिंग सेण्टर दिख जाएगा लेफ्ट लाइन में.", अर्जुन को मोटरसाइकिल रोक कर उस कोचिंग सेण्टर का बड़ा इश्तिहार पढ़ते देख ये पहली बात थी जो आँचल नहीं कही थी पिछले 15 मिनट में. और वो भी शुक्रिया कहते हुए जैसे बताया गया वैसे हे चल दिया. खुली साफ़ सड़के और hara-bhara गोल चौक जहा दिन के उजाले में भी फुहारा चल रहा था. Rang-birangi गाइयाँ अपनी निर्धारित या उस से भी काम गति से चलती हर तरफ. कही कही लड़के लड़कियां भी जोड़े के रूप में वृक्षों की छाया में पैदल चलते दिखे जैसे वो लोग भी ऐसे हे संस्थानों पर पढाई करते होंगे. पीली चादर चढ़े काले टेम्पू, जो जगह जगह रुक कर सवारियां बैठा या उतार रहे थे. ताज़ी सब्ज़ीयों की रेहड़ियां, कही नाश्ते के ठेले और दुकानों के आगे पानी का छिड़काव करते दुकानदार या मुलाजिम. अभी से ये बाजार और शहर का ख़ास हिस्सा व्यस्त दिखाई पद रहा था. कई नजरे इन दोनों की भी देखती और बताये पते के करीब हे जैसे लड़कियों का ख़ास प्रशिक्षण संस्थान भी था जहा कई छोटे छोटे झुण्ड अपनी अपनी पहचान और दोस्ती के हिसाब से खड़े थे, सभी लड़कियां. कुछ लड़के जरूर उधर से धीमी रफ़्तार में गुजरते इन्हे देख कर हे खुश हो रहे थे और शायद इनमे से भी 2-4 होंगी जो किसी को मुस्कुरा कर देखती तोह किसी को मुँह बना कर.
"लगदा मुंडा बहार तोह आया. वेख तह सही, माशूक नाल है इस करके नई वेख रहा मेनू नै तह ेहड़ा कड़े होया के किसे ने जीनत न ीगोंरे कित्ता होव?", अर्जुन की दुनिया जैसे ज्यादातर सफ़ेद नीले तक हे सिमटी थी कपड़ो के मामले में और इतने तगड़े और आकर्षक चेहरे वाले युवक को चमचमाती लाल बुलेट मोटरसाइकिल का स्टैंड लगाने के बाद अपने साथ आयी लड़की से कागज लेने के बाद बगल वाले संस्थान में जाते देख करीब हे कड़ी इन खूबसूरत सी बालाओं में से सबसे tej-taraar वाली ने अपने दिल की कह हे दी. आँचल वही इनके करीब मोटरसाइकिल की सीट से तक लगाए थी. ये लड़ियाँ हद्द से ज्यादा हे चंचल और बेबाक जान पड़ती थी जो अब आँचल को हे देख रही थी अर्जुन के जाने के बाद. लम्बी, खूबसूरत और एक जैसे पहरावे में जिनके संसथान का दरवाजा जैसे अभी बंद था जहा लिखा था IELTS/Air होस्टेस.
"इधर का तोह नहीं लगता जीनत लेकिन तेरी बात सही है. हैंडसम है तभी अकड़ू है और कमीने की गर्लफ्रेंड नाराज जान पड़ती है जैसे कही और जाना था लेकिन आ कही और गए.. हाहाहा..", ये वाली भी उतने हे तीखे अंदाज की निकली जो आँचल के बुझे हुए चेहरे का मजाक बना रही थी.
"सीधा बोल न डॉलफिन में जाना चाहती थी पर राँझा इसका दाखिला करने ले आया. कसम से बस ये एक बार हाथ पकड़ ले न तोह बोलने से पहले पंतय उतार दू. जालिम ने तोह देखा तक नहीं नजर घुमा कर. हाय ऋ किस्मत जो सोहना होता है वही फुद्दू क्यों बनाया? मरजाना ट्रेनर लार टपकता फिरता है जिसको कोई देखना नहीं चाहता और फिर ऐसे भी लोग होते है.", तीसरी वाली के तोह इरादे हे स्पष्ट थे जो सीधा बिस्टेर से हे बात शुरू करना चाहती थी.
"ओह रहने दे कमलिये ज्यादा न उड़द. जितना तगड़ा है न तेरी पंतय के साथ कुछ और भी फाड़ देना उसने. देख आया बहार और साथ में ढिल्ला भी आया इसके तोह. जरूर साला किसी बड़े घर की औलाद है नहीं तोह ये मास्टर तोह बस अंदर जाने के बाद शटर गिरा के हे जाता दीखता है.", जीनत की बात पर इन दोनों लड़कियों के साथ साथ इनके विचार सुन्न रही खामोश आँचल भी उधर गलियारे में देखने लगी जो सेण्टर के बहार था. तक़रीबन 45-46 बरस का वो व्यक्ति जिसके सर के बीचो बीच चाँद निकला था लेकिन चेहरे पर रुतबे की चमक थी, अर्जुन का हाथ दोनों हाथ में पकडे हंस हंस कर ऐसे बातें कर रहा था जैसे दोनों हे बचपन के यार हो. अंदर आने जाने वाले बचे और उनके अभिभावकों को रास्ता देते ये दोनों दरवाजे से थोड़ा दूर खड़े हो गए पर इन चारो की नजर के सामने हे रहे.
"ऐ तुम तीनो कहा लगी हो? ट्रेनर और मैडम नहीं आये अभी तक?", ये चौथी लड़की अभी टेम्पू से उतर कर थोड़ी दुरी से चलती हुई सीधा इन तीनो के पास आ रुकी.
"मिनी उधर देख जो सामने है, ट्रेनर कही कुलचे छोले ठूस रहा होगा. मैडम न आने वाली 10 से पहले.", अपनी सहेलियों को उस युवक पर आँखे गड़ाए देख ये लड़की थोड़ा सा पीछे हो गयी.
"ोये, तुम पागल तोह नहीं जो sare-aam बेशर्मो की तरह अर्जुन को देख रही हो. उन्होंने देख लिया तोह मेरी शामत आ जानी है.", ये लड़की जैसे ाचे से अर्जुन को जानती थी, या गाँव की हे थी.
"अर्जुन नाम है उसका?"
"धीरे बोल जीनु, ये दीदी जो इधर कड़ी है न वो इनके नाना छोटे प्रधान है. अर्जुन उनका पौता है और वो खेल मेले में इन्होने हे चैलेंज दिया है.", उसकी हालत देख ये लड़कियां भी थोड़ा पीछे सरक गयी पर मुद्दा अभी भी अर्जुन हे था.
"मतलब ये दोनों bhai-behan है? और तू नाम ले कर बात कर रही है पर 'इन्होने' भी कह रही है. वैसे ये चैलेंज करे तोह मैं कुछ भी करने को त्यार हु. बात करवा दे बस एक बार और जैसी पार्टी कहेगी वैसी दूंगी. लाइन साफ़ है जब ये भाई बहिन हुए तोह."
"ोये वो उम्र में साल 2 साल छोटे है और नाम लेने के लिए उन्होंने हे कहा पर पिंड के मालिक है एक तरह से. और तुम लोग अपने मैं से कुछ भी सोच बैठी थी इन दोनों के बारे में?", अभी ये मिनी कुछ और कहती उस से पहले वो केंद्र प्रमुख और अर्जुन टहलते हुए मोटरसाइकिल तक चले आये. आँचल का परिचय करवाते समय अर्जुन की नजर इस देखि हुई लड़की पर गयी तोह वो उन दोनों को वही छोड़ इसके करीब चला आया.
"तोह हमारी मीनाक्षी जी यहाँ से फ्लाइट अटेंडेंट का कोर्स कर रही है? कल आपका बैडमिंटन मैच ज्यादा नहीं देख सका उसके लिए सॉरी, काम था कुछ तोह शहीद भैया के साथ जाना पड़ा. वैसे अपनी फ्रेंड्स से नहीं मिलवाएंगी.", अर्जुन को अपने सामने खड़ा देख बाकी तीनो को तोह सांप हे सूंघ गया पर ये मीनाक्षी हलके जोश के साथ मुस्कुराई अर्जुन द्वारा इतना सम्मान दिए जाने पर.
"जी ये जीनत है, ये गगनदीप कौर हमारे सामने वाले पिंड से है और ये साक्षी है. साक्षी और जीनत यही सिटी से हे है और तीनो मेरी बातचमते के साथ साथ कॉलेज से हे फ्रेंड्स है. और आप है अर्जुन शर्मा जी, बाकी तोह मैं बता हे चुकी हु जैसा तुम लोग पूछ रही थी.", अब अर्जुन अकेला हंस रहा था और वो तीनो नजरे झुकाये मैं हे मान अपनी सहेली को गालियां दे रही थी. मीनाक्षी भी अर्जुन को अपने साथ खड़ा देख हलके से मुस्कुराई.
"It's ऑलराइट एंड सॉरी सोज़ I'm इन हुर्री देय तो सम इम्पोर्टेन्ट वर्क बूत we'll मीट एंड कैच उप सून, डेफिनाटेली ात ा बेटर प्लेस. अल्लोव में मीनाक्षी एंड कीप थिस 'जी' आसीदे. ब्बये जीनत, गगन एंड साक्षी जी.", और जाने से पहले अर्जुन ने मीनाक्षी से औपचारिक हाथ मिलाया जो उसकी सहेलिया देख रही थी. आँचल इधर देखने के साथ उन महाशय से भी थोड़ी बहोत जानकारी ले रही थी जो अर्जुन के आते हे समाप्त हुई.
"आपका बहोत बहोत शुक्रिया गोयल सर और कॉलेज वाली बात हम संडे को करते है. नरिंदर चाचा जी ने फाइल तोह पास करवा पहले हे करवा दी थी और कल मैं शाम को यही लेता आऊंगा कुमार साहब के इधर से.", अर्जुन ने जैसे ये बात आपसी जानकारी में कही थी जो इन दोनों को हे समझ आयी.
"यार तुम आने का कष्ट मत करना, मैं थोड़ा पहले निकल लूंगा सेण्टर बंद करके. वैसे ये काम इतना जल्दी होने की उम्मीद किसी को नहीं थी लेकिन वो कहते है न की 'होप एंड स्कोप अरे बियॉन्ड प्रोबेबिलिटी'. हाहाहा. जल्दी मिलते है बस फ़ोन कर देना."
"वैरी ट्रू सर. लेकिन हम कल हे मिलते है और ठीक 5 बजे मैं हे आता हु आपके पास. कुछ इम्पोर्टेन्ट हुआ तोह संडे से पहले एक बार दादा जी से डिसकस कर लेंगे.", अब सामने वाले ने बस सर झुका दिया हँसते हुए और उन्हें अलविदा कहता अर्जुन भी आँचल के साथ निकल लिया यहाँ से आगे.
"तू तोह बड़ी छुपी रुस्तम निकली मिनी और ये कौनसा मैच दिखा रही थी तू इस अंग्रेज को? मिलने का बोल कर गया है और नहीं मिलने आया तोह मैं हे आ जाउंगी तेरे घर. हाय उसने तोह तेरा हाथ भी पकड़ा और मुझे सही से देखा भी नहीं. पक्का चक्कर हैं न तेरा कोई.?", जीनत तोह उनके जाते हे मीनाक्षी के पीछे हे पड़ गयी थी. बदले में मीनाक्षी की हलकी मुस्कान और शर्म जैसे उनकी बात को आधा सच भी बता रही थी.
"कल योनेक्स का राकेट गिफ्ट किया था जैसा तुम्हे पता है की मैं रोज बैडमिंटन खेलने जाती हु हमारे स्पोर्ट्स सेण्टर पर. और वह बहोत सा नया सामान लगवाया है जिस से बाकी लोग भी एक्सरसाइज कर सके या खेल सके. मैं खुश थी इसलिए पूछ लिया था के राकेट टेस्ट करने के लिए. साथ नहीं खेले पर थोड़ा मैच देख कर चले गए अपने काम से. और तुम जैसा सोच रही हो वैसा नहीं है.", मीनाक्षी की चाहत और उसकी बातें एक दूसरे का साथ नहीं दे रही थी और ये उसकी सहेलियां भी जान गयी जब कनखियों से वो जा चुके अर्जुन को तलशती लगी.
"पता नहीं अब तू हमारे साथ खेल रही है या तेरा दिल उसके साथ खेलना चाहता है? उसने अपने हाथो से पहला गिफ्ट तोह दे दिया है तुझे अब तू उसको गिफ्ट देती है या उस से पहले मैं हे पार्टी दे दू?", जीनत ने अपनी इस खोयी हुई सहेली से ये कहने के साथ बाकी दोनों को आँख मार कर साथ देने का इशारा दिया.
"हाँ यार ज़ालिम सच में दिल ले गया और अब पंतय मैं उसको खुद दे दूंगी.. मतलब पार्टी. मिनी का तोह कुछ है नहीं ऐसा वैसा.", ये वही दूसरी खूबसूरत बाला थी जिसका नाम साक्षी था. जहा ये जीनत और साक्षी आधुनिक होने के साथ थोड़े बिंदास स्वभाव की थी वही गगनदीप एक भरे जिस्म की ज्यादा आधुनिक तोह नहीं बेबाक जरूर थी. मीनाक्षी इनसे अलग थी बातचीत के मामले में लेकिन उसका शांत सा आकर्षण भरी पड़ता था बाकी तीनो पर.
"अभी बस दोस्ती है जिसके लिए पूरी रात और अगला दिन कैसे कटा ये सिर्फ मैं जानती हु. और हिम्मत करके दोस्ती की पहल की तोह किस्मत ने इशारा भी ऐसा दिया की ज़ालिम तोहफा दे गए नजराने में. तुम चाहे पार्टी दो या पंतय, किस्मत यही मेहरबान हुई तोह बाहें मेरी होंगी और वजूद इनका उसके दरमियान. चल तेरा ख़ास ट्रेनर आ गया, छोले कुलचे ठूस के.", मीनाक्षी इनसे आगे चलती हुई केंद्र में दाखिल हुई तोह ये धीमी गति से उसके पीछे.
"उसको प्यार करने दे, मैं तेरे साथ वो पंतय वाली पार्टी का प्लान बनती हु. गग्गू डार्लिंग, तेरे अनार भी पक्क चुके है. पहलवान सारा रस निचोड़ देगा बस दिखने की देरी है.", जीनत की ऐसी बेशर्मी भरी बात पर साक्षी तोह उसके साथ हे हंस दी लेकिन गगनदीप अपने कमीज को व्यवस्थित करती हुई उभरे सीने को छुपाने लगी.
"अगर वो प्यार करने लगी है तोह मैं उसके लिए खुश हु यार. अनार वही निचोड़ेगा जो इनका एकलौता मालिक बनेगा. दूसरी सच्चाई ये भी है जो मुझे पहले नहीं पता थी की अर्जुन ने खेल में चैलेंज दिया है और हमारा तोह पूरा पिंड हे जैसे पागल हुआ पड़ा जब से ये खबर उठी है. मैं नहीं जानती की वो सब क्या है और लड़कियों के बीच इसकी चर्चा भी नहीं होती पर बड़े बुजुर्ग कहते है की असली राजा लौटा है जो मेले के साथ सबके जीवन में रंग भर देगा, अगर जीता तोह. भगवान् वैसा हे करे.", गगन की बातें इन्हे कितनी समझ आयी ये तोह कहना मुश्किल था क्योंकि वो भीतर जा चुकी थी और ये दोनों एक तरफ बाथरूम में.
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"तुम यही बैठो, मैं पानी लाती हु.", घर के बहार हे एक ऑफिस था जिसका शटर बंद देख कर आँचल ने उस लोहे के गेट पर लगा टाला खोलने के बाद अपने घर में प्रवेश करने के बाद वापिस दरवाजा लगा दिया. पप शर्मा का घर शहर में था और वो भी ाचे इलाके में. 250 गज के इस घर में हे बहार उसने अपना एक ऑफिस बनाया हुआ था और गाडी बहार हे कड़ी की जाती थी ऑफिस के आगे बने शेड के निचे. अर्जुन इस चौड़े गलियारे और छत्त की छाया में चलता हुआ बस ख़ामोशी से हे कभी आँचल को तोह कभी इस घर की संरचना को देखता रहा. गलियारा ख़तम होते हे ये खुला आँगन था जिसके ऊपर छत्त और एक तरफ दूसरी मंज़िल के लिए सीढिया बानी थी. बहार वाले ऑफिस में जाने का दरवाजा इधर भी था और हॉल के उस पार रसोई और आगे कमरे. हॉल बेहद व्यवस्थित था जहा कालीन, सोफे, टेलीविज़न और खाने की मेज जिसके साथ 6 कुर्सी लगी थी. रसोईघर और कमरों से पहले लाल रंग का रेफ्रीजिरेटर था जिसका बटन चालू था.
"नहीं पानी की जरुरत नहीं है, अगर आपने पीना है तोह ठीक है. बस अपने कपडे और जरुरी किताबे पैक कर लीजिये.", अब तक आँचल ट्रे में पानी ले कर बहार निकल आयी थी और अर्जुन के मन करने पर गिलास वही टेबल पर रखती हुई वापिस रसोई में जाते हुए बोली.
"मैं वापिस नहीं जा रही उधर. वैसे भी कल मां ने वह जाना है तोह इधर पापा अकेले होंगे और 3 दिन मैं क्लास हे लगा लुंगी. तुम जा सकते हो.", अर्जुन को देखे बिना वो दुपट्टा फ्रिज के पास हे खूंटी पर टांग कर कमरे में चली गयी. जैसे घर की saaf-safaai शुरू करने वाले हो. अर्जुन कुछ पल तोह इस अनदेखी को झेलता रहा फिर अपने आप हे उसके कदम सामने वाले कमरे की और बढ़ चले जहा अभी तक कोई लाइट नहीं जाली थी. कदमो की आहात न होने की वजह से आँचल तोह उसको आते न देख सकीय पर वो उस शयनकक्ष के एक कोने में बस कपडे से कुछ साफ़ कर रही थी, दरवाजे की तरफ पीठ किये. अर्जुन का साया जबतक दिखाई देता उसकी कमर और स्टैनो के बीच वाला हिस्सा अर्जुन की बाहों में क़ैद था. कांपते हाथो ने वो सजावट का सामान निचे गिरा दिया. आँचल की भीगी आँखों में देखने से पहले अर्जुन ने अपने होंठ उस निर्वस्त्र गले पर रखते हुए कुछ गिरफ्त भी मजबूत कर दी.
"आपको मैं सबसे महफूज रखने की कोशिश कर रहा था लेकिन देख लीजिये ऐसा करना कितना मुश्किल कर दिया है खुद आपने. बचाव की जगह सामना करने की बात तोह कह दी, लेकिन किसका सामना करना है ये समझी नहीं. मैं आपको खुद से दूर नहीं कर रहा बस इतना चाहता हु की आप इस सबसे बहार रहे. फिर जैसा आप चाहती है अर्जुन वही करेगा. लेकिन ऐसे सबकी नजरो से दूर बस हमारे एकांत में.", अर्जुन की सरगोशी से आँचल ने अपना गाल हे उसके होंठो पर लगा दिया. अर्जुन का इतना मजबूत स्पर्श और ऐसे चिपकना आँचल को सबसे नया एहसास दे गया जिसमे आख़िरकार वो तनहा नहीं थी. मुलायम गालो पर अर्जुन का चुम्बन और उसके आगे फिसलते जाना. आँचल ने खुद हे अपने होंठ उसके होठो से जोड़ दिए. कितना अध्भुत्त था इतने मजबूत और बड़े जिस्म का उसको अपने में समेत लेना.
"आठ. क्या कर रहे हो? पापा आ सकते है. कपडे पर निशाँ?", अर्जुन तोह उसको गॉड में उठा बिस्टेर पर हे ले आया था. उसको अपने ऊपर छाया देख आँचल ने चेहरा घुमा लिया जैसे शुतुरमुर्ग शिकारी को देख अपनी आँख बंद करके समझे की वो सुरक्षित है. उन मॉटे स्टैनो पर अर्जुन की हथली का वजन पड़ते हे आँचल ने चेहरा उसके सामने कर लिया. बस इतने में हे उसकी हालत ख़राब हो चुकी थी और इस बार अर्जुन ने उन लाल अधरों को जी भर के निचोड़ा जब तक स्वयं आँचल ने हे अपनी जीभ उसके मुँह में क़ैद न कर दी. कमर की तरफ से अर्जुन ने अपना जिस्म उस से दूर हे रखा था लेकिन स्टैनो की नरमी और गोलाई का अनुभव लेने के लिए पकड़ मजबूत करते हे आँचल पलट गयी.
"जानता हु की अभी आने वाला तोह कोई नहीं पर आप जो चाहत रखती है वो भी इस तरह शुरू नहीं होती. घर चलते है न. प्यार से हर रोज कुछ समय साथ बिताने का वादा मेरा लेकिन वो नया बदलाव बस मेरे तक और मेरे लिए. घर में किसी के सामने कुछ नहीं. उन्हें दिखना ये चाहिए की हमारी दोस्ती होने लगी है. फिर खुद फैसला करना की सूट की फ़िक्र करनी है या नया सूट लेना है.", अर्जुन ने उठने से पहले आँचल को बाहों में ले कर थोड़ा और प्यार दिया, बाल सही करने के साथ हलकी सी चपत कूल्हों पर लगते हुए. उसके सुलझे हुए अवतार और ऐसी समझदारी पर आँचल ने गलती स्वीकार कर ली. अब उसको यु अर्जुन के पहलु में लेटना किसी सपने सा हे लग रहा था.
"मुझे वो भी करना है और तुम सब प्यार से करोगे. कोई फरेब नहीं की मुझे मन लिया तोह फिर दूर भागते रहोगे.", आँचल की उत्सुकता और चाहत सुन्न कर अर्जुन हलके से हँसते हुए उसके दोनों गाल हाथो में ले कर जवाब देने लगा.
"सूट नया दिलवाने का मेरा मतलब वही था. लेकिन जब एहसास ज़िन्दगी में पहली बार हो रहा हो तोह उसको लम्बा जीना चाहिए. मंज़िल पाने के बाद अक्सर उसकी कदर काम कर देते है इंसान. दोस्ती, थोड़ा प्यार और सबकी िज्जात्त, चाहे वो लायक हो या न हो. नहीं तोह फिर बाथरूम तोह है हे."
"छी.. तुम भूले नहीं उस बात को?"
"खूबसूरत पल याद रखने चाहिए और इस बार हर दिन ऐसा एक न एक पल तोह मैं देने हे वाला हु. अब कपडे और बुक्स पैक करो, निकलते है.", अर्जुन उठ कर कपडे सही करने लगा तोह इस बार आँचल ने उसको बाहों में लेते हुए चूमा.
"जैसा तुम कहोगे वैसा हे होगा. नहीं सामना करती माँ का और न वो सब. बस वो लोग ाचे नहीं है और तुम मां को जान चुके हो न."
"वो मेरी सरदर्दी है और इन मां जी को तोह कल हे ठीक कर देंगे, देखती जाओ. चलते है अब.", कूल्हे पर फिर से थपकी पड़ते हे आँचल तुरंत अलग हो गयी.
"देख रही हु तुम इधर कुछ ज्यादा हे हाथ मारते हो."
"चेक करता हु की बड़ी हो गयी हो या टाइम लगेगा. बड़ी हो गयी हो.", आँचल हंसती हुई इस से भी अगले कमरे में चली गयी. अब वो ख़ामोशी और गुस्सा नहीं था जो सफर शुरू होने पर हुआ था. अगले 5 मिनट बाद दोनों हे वापिस चल निकले थे. अर्जुन रस्ते याद करता हुआ हर तरफ ध्यान दे रहा था और आँचल उसके पीछे इस बार दोनों पाँव अलग दिशा में करके ठीक प्रेमिका की तरह चिपकी बैठी थी. बैग का बहाना जरूर था जो बीच में रखा था, पर जिस्म चिपकने से वो छोटा सा बैग भी नहीं रोक सकता था. अर्जुन ने आखिर इस प्रेयसी को भी शीशे में उतार लिया था अपने मुताबिक. अबसे वो दामिनी का सामना नहीं करने वाली थी.
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अवसर (ा)
"इन्दर का फ़ोन था पापा. वो कह रहा है की अभी 2 दिन उसको काम की वजह से बहार रहना पड़ेगा.", शंकर बैठक से बहार निकल कर आँगन में आया था और उसके पिता बगीचे में पौधों को पानी देने के बाद अभी सांस दुरुस्त करने में लगे थे. कौशल्या जी ाँ मुस्कान के साथ बबिता के गाँव जाने वाली थी जिस वजह से शंकर इतनी जल्दी तैयार था. अभी सुबह के 6 हे तोह बजे थे.
"हम्म्म. परसो सुबह तक लौट आएगा या उसके ये 2 दिन कल और परसो समेत है? आज राजू को बोल देता हु की वो घर पर हे रहे. मैं ले जाऊंगा तुम्हारी माँ को उधर राममेहर की तरफ. कुछ काम भी है वह और तेरी परेशानी भी काम होगी ऐसे.", रामेश्वर जी कमीज पहन कर बटन लगते हुए शंकर से भी बातचीत कर रहे थे. रुपाली अपनी दादी के साथ वह नाश्ता ले आयी थी जिसको शंकर जी ने 500 रुपये पकड़ा दिए जैसे ये उसकी जेबखर्ची थी. रुपाली को भी अब झिझक नहीं होती थी जिस तरह से कुछ हे समय में वो पूर्ण सदस्य और Shankar-Rekha की वास्तविक बेटी बन चुकी थी.
"कह तोह रहा है की कल रात तक लौट आएगा पर उसकी रात 8 बजे से सुबह 4 के बीच कुछ भी हो सकती है पापा, आप तोह जानते हे है. वैसे कल आप घर भी देरी से आये और आने के बाद बस आधा गिलास दूध पी कर सो भी गए. सब ठीक तोह हैं न पापा?", शंकर ने आज नाश्ते में रूचि न दिखते हुए पहले अपने पिता के मैं को टटोलना बेहतर समझा. जबकि हमेशा की तरह आज भी जवाब दोनों की प्लेट लगाती कौशल्या जी ने हे दिया.
"मुझे आजतक ये समझ नहीं आया की क्यों ये अपने दादा जी के स्वर्गवास वाले दिन ऐसे हो जाते है.? कल उनकी पुण्यतिथि थी शंकर और ये ऐसे दिन भी घर में उनके लिए कोई पूजा पथ हे नहीं करवाते. नाम हे ले लेना चाहिए जी काम से काम. आज बीटा पूछ रहा है तोह इसको हे जवाब दे दो नहीं तोह कल को अर्जुन पूछने लगा तोह आपके नहीं बताने से वो पहोच जाएगा आपके दादा की भी माँ की कोख तक ये पूछने की क्या वजह है.", कौशल्या जी के जवाब पर आज पहली बार था की पंडित जी मुस्कुराये नहीं थे.
"रहने दो न माँ, क्यों सुबह सुबह इस बात को खिंच रही हो. हमने तोह देखा भी नहीं पापा के दादा जी को तोह क्या फरक पड़ता है जब जानकारी हे न हो. होगी कोई वजह या पापा दर्द बांटना नहीं चाहते होंगे.", शंकर को अपनी पैरवी करते देख रामेश्वर जी ने अपनी ख़ामोशी भांग की.
"अब तुमने तोह उन्हें देखा नहीं जो हमारे पिता के भी पिता थे लेकिन हम अपने हे पिता को नहीं समझ पाए कभी. हाँ उनके जैसे हम कभी नहीं बन सकते क्योंकि वो घर की देहलीज से बहार निकलते हे सभी को एक सामान देखते थे, फिर चाहे गली में हम हे क्यों न दिख जाए. मुंशी जी वही jawaab-sawaal कर लेते थे. ऐसा नहीं है के हमारे पिता कठोर थे या ज़िद्दी, वो नरमदिल इंसान थे. हमारे दादा जी का देहांत नहीं हुआ था, बल्कि उनकी हत्या कर दी गयी थी और इसके परिणाम स्वरुप कोई आधा दर्जन शक्क में आने वाले अपनी जान गँवा बैठे. दादा जी की लाश को घर तक भी नहीं लाया गया था और नदी किनारे हे आज के दिन बस संस्कार कर दिया. मैं तोह था भी नहीं वह और न हमारे पंडित जी ने इसकी सूचना तक भिजवाई. पूछने पर माँ ने हे बताया की अपराधबोध है हमारे पिता को जो उन्होंने पंडित हो कर अस्त्र उठा लिया. लेकिन अब हो गया जो होना था पर पिता का पिंड, श्राद तोह दूर की बात है तस्वीरें तक हटा दी अगर वो कही थी भी. लोग हर घर में मरते है पर क्या हम वह टाला जड़ दे? इन्दर ने यही किया था क्या? हवेली पर रघुवीर ने तोह न पहरेदार बिठाये पर ये हमारे पंडित जी जाने किस आत्मग्लानि में फंस गए जो दादा जी की हर निशानी दूर कर दी. हम अपने पिता पर संदेह नहीं कर सकते शंकर. वो सचमुच dev-aatma थे जिनके लिए एक नवजात प्राणी और बुजुर्ग में कोई फरक नहीं था, सेवाभाव दोनों के लिए. जो व्यक्ति हर जीवन का महत्व स्वीकारता हो, वो कैसे इतनी जान ले सकता है? और फिर उसके पश्चाताप में अपने हे पिता से दूर होना? हमे घर में नाम लेने और पूजा पथ की मनाही थी दादा जी की पर घर से बहार हम कर सकते है. हाँ कोई भी स्त्री वैसा नहीं कर सकती इसलिए बचे तोह बस मैं और पिद्दी. वो लाडला भी था उनका चाहे मुझे मेरे दादा अँगरेज़ बोल देते थे गुस्से में लेकिन स्नेह मेरे साथ भी था. अब वजह बता दी भगवान तोह रोटी भी खिला दो?", रामेश्वर जी थे थोड़े गंभीर हे अभी लेकिन कौशल्या जी मंद मंद हंसती हुई उन्हें खाना परोसने लगी.
"बड़ा अजीब फैंसला था उनका और क्या यही वजह है की वो अपनी भी तस्वीर के खिलाफ थे? उधर भी उनकी फोटो नहीं लगी, सिर्फ दादी की है और यहाँ तोह दादी की भी नहीं.", शंकर के सवाल जैसे आज हे शुरू होने थे.
"जा के पूछ ले बीटा तू हे उनसे. तू स्कूल जाने लगा था तब तक वो मेरे कान खिंच देते थे की ये कैसे कर दिया? वो चीज वह से क्यों उठाई? तू इन्दर को समझाता नहीं थोड़ा भी. मैं करता हु क्या तुम्हारे साथ कुछ ऐसा? और वो तोह बड़े थे फिर उन्होंने ये बात न कही इन्दर से. ब्याज ज्यादा प्यारा होता है और उसके बदले बेटे की खिंचाई कर लो."
"आप भी यही करते हो थानेदार साहब. अक्सर बेटे बाप पे हे जाते है.", कौशल्या जी के तंज से अब शंकर भी हंसने लगा था. उसके पिता बहोत काम बार हे ऐसे खीजते देखे थे उसने.
"अरे भगवान, मैं उनके साथ ज्यादा रहा नहीं और जो रहा वो पिद्दी का पिद्दी रह गया. रघुवीर हे बढ़िया था जिसकी एक समय तक उनसे दोस्ती भी हो गयी थी. और इस शंकर ने बड़े झंडे गाड़ दिए. बीटा बाप पे जाता है लेकिन इसने तोह जो औलाद भी पैदा करि वो भी मेरा बाप. मेरी जवानी तक पंडित जी सवाल करते रहे और बुढ़ापे में सोचा था चैन से रहूँगा लेकिन उन्होंने तोह ठान लिया था के चैन नहीं लेने दूंगा. भेज दिया अर्जुन, जो उनके सवाल रह गए होंगे उन्हें ये पूछ पूछ के बचा खुचा चैन ले लेता है. चाय हे पीला दो एक कप कौशल्या.", पंडित जी ने रोटी से पहले हे हाथ रोक दिए.
"हाँ ये तोह आपने आज सच बोल हे दिया. इसलिए कई बार गुस्से में उसको 'मेरे बाप' बोल देते हो और वैसे बात उसकी आ जाए तोह फिर किसी की सुनते भी नहीं हो. हम सबको तोह लगता था के बस दादा पौटे का प्यार है, पर देख ले शंकर आज इन्होने वजह बताई की वो कितना ख़ास है इनके लिए.", माँ बीटा हंस रहे थे और उनके साथ इस बार रामेश्वर जी भी.
"कौशल्या, अम्मा जी एक गल्ल कई वरि केहन्दी हुंडई सी. इंसान दुनिया विच जे अपने दिन लिखवा के आया है तह ोसडा एक हिसाब जरूर रेह्न्दा. ओह जे सुकून विच दुनिया तोह नहीं जांदा ताः ोस्डे मकसद न पूरा कारन लायी, ऊपरवाला किसे ोस्डे हे अपने न वापस भेजदा है दुनिया विच.' मैं मानता नहीं था इस सबको और आज भी इस यकीन नहीं है. बस अम्मा जी कहती थी क्योंकि ऐसा उनका विश्वास था और मुझे ये याद रहा. अर्जुन को देख कर बस उन दोनों की याद आ जाती है. जब बचे में maa-baap हे दिखने लगे तोह फिर कैसे मैं उसको अनदेखा कर दू.? और तुम्हे भी इस बात पर थोड़ी ज्यादा आजादी भी मिली है शंकर. अब तुम माँ बेटो का santri-mantri खेलना हो गया हो तोह 2 निवाले खा सकता हु?", रामेश्वर जी के इतने बेमिसाल जवाब पर कौशल्या जी निरुत्तर हे हो गयी. उनके पति ने जैसे उनकी भी आस्था का सम्मान किया था अम्मा जी वाली बात बता कर और मजाक में हे शंकर को भी चेता दिया की वो बहोत कुछ जानते है लेकिन अब उसको ज्यादा टोकते नहीं. अब गरमा गरम नाश्ते के साथ baap-beto की साधारण सी चर्चा चलती रही और अलका ने अपनी बात हो जाने के बाद कौशल्या जी को टेलीफोन थमा दिया था. अर्जुन उनसे इतनी सुबह हे तोह बात करता था आजकल. और शंकर जैसे ऐसे हे एकांत की प्रतीक्षा में था अपने पिता के समीप.
"इन्दर ने कुछ और भी बताया है मुझे पापा और मुझे लगता है हमको इस बारे में चर्चा करनी चाहिए. अब मुझे भी लगता है की वो दरगाह वाले अखाड़े में बात सिर्फ कुश्ती की हे नहीं है और उसमे कुछ प्रावधान भी है, बहोत ख़ास.", शंकर की बात से रामेश्वर जी ने हमेशा वाला अंदाज हे दिखाया, सहमति में सर हिलना बस.
"वह तोह यही कहा गया था की ये बस 5 बड़े गाँव और उनके भीतर आने वाले 10-11 छोटे गाँव तक हे ये सिमित रहता है. मतलब बस साधारण पहलवान जो इन्ही चुनिंदा गाँव से वास्ता रखते है वही दंगल में भाग ले सकते है, वो भी जैसा नियम है 2 का 5 या उसका उल्टा.", शंकर के जवाब में जो सवाल था उसको सुन्न कर रामेश्वर जी ने पहले अपने हाथ उस साफ़ टोल्ये से पहुंचे और चाय की घूँट लेने के बाद अपने बेटे की तरफ देखा.
"कोई भी व्यक्ति जो raj-darbar में सेवक या ओहदे पर हो या कभी रहा हो, वो चुनौती पेश कर सकता है अकेले हे. फिर सामने हम हो या अर्जुन, उसको चुनौती उठानी हे पड़ेगी. पर ऐसा हमने सिर्फ 2 बार हे होते देखा है वो भी तुम पैदा नहीं हुए थे या कहो हमारी शादी भी नहीं हुई थी. पहली बार तोह हम स्वयं 10-11 बरस के रहे होंगे और ये दरगाह वाला मेला ऐसा नहीं होता था जैसा गाँव बन्न ने के बाद सन्न 1949 से दिख रहा है. तब दूर दराज से भी प्रतिष्ठित लोग, बड़े हुकुमरान आते थे और दृश्य अलग रहता था. जान भी ली जा सकती थी जिसको स्वयं पिता जी ने नियम में बदला. हाँ तोह हम कह रहे थे की 10 बरस से कुछ ऊपर रहे होंगे जब अखाड़े में suraksha-pramukh ने पिता जी को हे चुनौती दे डाली थी. ये जानते हुए भी की वो दंगल नहीं करते. पर उन्हें मैदान में उतरना पड़ा था और तभी हमने देखा थी की क्यों उन्हें बापू जी भी कहा जाता था. उसके बाद हमने 2 बरस मेले में भाग लिया, प्रशिक्षण जांचने के लिए पहली बार और दूसरी बार हमारे रक्त की वजह से. संरक्षक का परिवार चुनौती उठा सकता था और दे भी. संयोग से जिन sena-pramukh ने पिता जी को चुनौती दी थी, ये उनके हे छोटे भाई थे, दूसरी माँ से. रघुवीर थोड़ा सनकी था जिसने वीर सिंह के साथ उसकी टोली को हे बुलवा लिया अखाड़े के भीतर. 5-2 का रिवाज ऐसे शुरू हुआ था लेकिन बस एक हे साल चला क्योंकि रघुवीर कायदे काम हे मानता था. फिर पाबन्दी लग गयी थी हम दोनों पर हे. सुना है के पहले खुली चुनौती होती थी और अखाड़े में खड़ा चाहे विजेता हे क्यों न हो, हुंकार भरी है तोह raj-darbar से ताल्लुक रखने वाले किसी भी व्यक्ति का सामना करना हे पड़ेगा. यही वजह थी की हमने इन्दर को उस दिन सजा दी थी. गनीमत समझो की इन्होने ढोल नहीं बजवाये थे और बात उतनी दूर तक जाने से पहले ये अखाड़े से निकल आये. कोई आ जाता तोह बात गरम हो जाती? सुरक्षा प्रमुख अक्सर इसके लिए तैयार रहते थे.", पूरा विस्तार से वर्णन करने के बाद अब वो शंकर को देख रहे थे जैसे मैं को टटोल रहे हो उसके. आखिर कोई तोह ऐसी बात होगी जो शंकर ने ये जीकर किया या नरिंदर का सन्देश सुनाया.
"ढोल तोह इस बार भरपूर बजे है जिनकी आवाज हिमाचल तक भी जा पहुंची. इन्दर वही गया है किसी काम से और उधर भी कोई छोटा मोटा घराना है या संपत्ति के देखभाल वाले लोग. आप अब क्या कहेंगे अर्जुन की इस बेवकूफी को? क्या माँ उतनी हे खुश रहेगी वह उम्मीद से अलग होने पर?"
"वो बेवकूफ होता तोह घर बैठ कर सवाल करता शंकर या हमारी तरह हाथ पर हाथ रखे कभी बगीचे तोह कभी बाकी दोस्तों में समय बर्बाद करता. वो पिछले हे साल उतर सकता था उस अखाड़े में जैसा नियम है पर वो इस बार गया और उसने ये घोषणा भी समय से पहले हे करवाई की पंडित अर्जुन शर्मा, क्सक्सक्सक्स ग्राम प्रमुख ये चुनौती उठा रहा है. कोई रोकने आना चाहे तोह रोके. इन शब्दों का मतलब समझो शंकर. वो उन्हें हे ललकार रहा है जो अब हैं हे नहीं और अगर कोई भुला बिसरा सामने निकला भी तोह इस अश्वमेध के अर्जुन रुपी अश्व को थाम न सकेगा. हमे चिंता किस बात की थी अगर ये सिर्फ अखाडा हे होता? तुम्हारी कही बात को जानते हुए हे हम असहज थे लेकिन तुम्हारी माँ ने सही कहा की उसके फैंसले का आदर करना चाहिए. और हम अब कर भी रहे है क्योंकि बदल तोह सकते नहीं."
"तोह आप मानते है की आपने उसको वसीयत और अधिकार दे कर कुछ गलती की है? वो नासमझ है और अगर एक प्रतिशत भी ऐसा हुआ की सामने दरदबार से हे कोई टकराने आ गया तोह बात हाथ से भी जा सकती है."
"लगता है तुम्हे हिंदी समझ नहीं आती शंकर. हम पिता जी की वसीयत के कभी भी हक़दार थे हे नहीं, सिर्फ प्रतिनिधि थे. उन्होंने ये वसीयत ऐसे बनी थी जैसे मकड़ी का जला हो कोई. मैं और रघुवीर इसमें सामान अधिकार रखते थे, गवाही तुम्हारे चाचा कृष्ण की थी और तस्दीक खुद महल के पमुख करेंगे की वारिस इस लायक है भी या नहीं. इसमें एक हस्तक्षेप का अधिकार वारिस की माता का भी रखा गया था क्योंकि पिता जी के लिए माँ शब्द की हे परिभाषा भगवन से बढ़ कर थी. जिस वजह से पहले इसमें कौशल्या और पूर्णिमा भाभी का नाम था इक़बालनामा देने के लिए जो तुम्हारी माँ ने रेखा बहु का करवा दिए 4 नालायक और एक maha-nalayak देखने के बाद. तुम उन 4 में हे हो बीटा, वो maha-nalayak सबसे छोटे वाला विनोद है. कोई भी पिता जी और महल की शर्तो पर खरा नहीं उतरा और अर्जुन 13 की उम्र में हे रघुवीर से ये हक़ ले गया. कृष्ण ने तोह पहले हे उस करारनामे पर दस्तक किये है जैसे उसको खुद जल्दी हो की वो मुक्त हो कर अपने खेतो में चिपका रहे. तुम्हारी माँ ने सुशीला की घर वापसी पर हे रेखा से बात करके उसकी सहमति ले ली और हमे खुद रानी सौंदर्य का सन्देश मिला की वो अर्जुन से प्रभावित है और कुछ सवाल चाहती है उस से करने लेकिन पहले मैं वसीयत पे अपनी सहमति दे कर इसकी पुष्टि कर दू. मुझे करना पड़ा वैसा.", शंकर का तोह दिमाग हे काम करना बंद हो गया इतने लम्बे चौड़े नियम और वसीयत की उलझी सी शर्ते सुन्न कर.
"और फिर उन्होंने बात करने से पहले हे मोहर लगा दी? वो है हे कितना बड़ा पापा और चलो समझदार है ये मैं मानता हु लेकिन जिम्मेवारी? इतनी बड़ी जिम्मेवारी सँभालने लायक नहीं है अभी वो."
"दे कौन रहा है उसको जिम्मेवारी? जब तक वो 25 का नहीं हो जाता वो उस वसीयत और उस से होने वाली आमदनी का एक पैसा भी अपने ऊपर नहीं खर्च सकता. हाँ उसको कुछ अधिकार मिल गए है चौपाल में बैठने के, छोटी मोती सजा देने और मामले सुन्न ने के. महल तक बात करने जा सकता है अगर कुछ परेशानी हो गाँव के विकास में. संरक्षक हम हे है उसके फ़िलहाल."
"बहोत सही बात कही आपने. ये फैंसले छोटे मोठे है और जब अधिकार मिलेगा तोह क्या वो महल में जा बैठेगा?"
"हो सकता है, मैं इस पर क्या टिपण्णी दू. जैसे नियम बनाये गए थे उन्हें बस अर्जुन हे पूरा कर पाया और रही बात छोटे होने की तोह वो 8 कक्षा में हे तुम्हारे गज्जू और अपने गुरु को पटखनी दे चूका है. रिश्ता भुला कर कभी अभ्यास करना चाहो तोह यकीन दिलाता हु वो बंद नस्से खोल देगा तुम्हारी. हमारे पिता जी की पीठ जीवन भर कोई मिटटी पर न टिका सका और इसकी भी नहीं टिकने वाली, सामने कागज़ और कलम पड़ी है.", रामेश्वर जी का ये अभिमान था या अर्जुन पर खुद से भी अधिक भरोसा, लेकिन था बेजोड़.
"सामने कागज़ और कलम से क्या होगा?"
"लिख लो भाई हमारी बात को. कल हम न रहे तोह भी तुम्हारे पास सबूत होगा के हम झूठ नहीं बोले थे. वो जब जब घुटने टिका कर सांस भरेगा, सामने वाला जितना बड़ा दैत्य हो फिर अपने पाँव पर खड़ा नहीं रहने वाला. चलो आज के लिए बहोत हो गयी chanda-mama और बेताल कथा. जा कर अपना काम धाम देखो, मैं रिटायर्ड हुआ हु लेकिन काम मुझे भी बहोत है. फिलहाल तोह ड्राइवर की नौकरी मिली है कुछ घंटे की.", रामेश्वर जी भोजन करके अब उठ चुके थे और उन्हें ज्यादा दिलचस्पी अपने पौटे की आवाज सुन्न ने की थी जहा दादी पौटे जाने किस बहस में लगे थे. शंकर भी कलाई घडी में समय देखते हुए भीतर चल दिया. अपनी बीवी के शयन कक्ष से इस मासूम को सुस्त चाल में निकलते देख पहले तोह उसको माथे पर प्यार दिया और फिर खुद कमरे में चले गए. ऋतू अभी और सोना चाहती थी इसलिए दादी के कमरे की तरफ बढ़ गयी.
"आप? नाश्ता लगवाओ आपके लिए? बस कमरा सही करवाया है अभी कोमल से और ऋतू नहाने गयी है.", रेखा खुद भी जैसे नहाने के बाद पूजा करके फारिग हुई थी अभी अभी. कमरे में हे रहना होता था इसलिए साड़ी बदल कर एक साधारण से आधी ब्याह के सूती गाउन में खुद को समेटे थी. जाने क्या राज था इस बेमिसाल ख़ूबसूरती का जो इस व्यथित पल में भी स्फटिक सी चमकती बरकरार थी. अपने पति को सामने देख बिस्टेर से तकिये ठीक करके वो किनारे पर हे बैठ गयी. सामने वाली मेज के करीब राखी कुर्सी पर खुद शंकर जी.
"नहीं, मैंने पापा के साथ कर लिया है और अब निकलने हे वाला हु काम पे. तुमसे कुछ जरुरी बात करनी थी, बाद में पता नहीं याद रहती या नहीं."
"अब जरुरी बात तोह बाद में भी याद रहेगी नहीं तोह फिर जरुरी कैसे हुई जी?", रेखा ने तोह जैसे उन्हें बात शुरू करने से पहले हे भेदना शुरू कर दिया जिस पर वो अनमने ढंग से मुस्कुराये जैसे फ़िलहाल ये उपहास का वक़्त नहीं. दरवाजा बैठे हुए धकेल कर बंद करने के बाद उन्होंने वो जरुरी बात प्रारम्भ की जिसको शायद भूल भी सकते थे.
"हमारी खेती और बगीचे वाली साड़ी जमीन की संरक्षक तुम हो, माँ की तरफ वाली की कोमल, तुम्हारे पिता जी की तरफ से भी तुम, इधर वाले गाँव की संजीव के और किराया देने वाली प्रॉपर्टी पर कृष्णा लेकिन सभी में मालिक अर्जुन हे है. और तुम्हे तोह पता होगा की अब वो गाँव की पूरी वसीयत का भी मालिक है जिसमे एक संरक्षक तुम हो? मुझे इस से लेना देना नहीं की उनका मालिक अर्जुन बना है, बस ये समझ नहीं आ रहा की 80% तुम्हारे संरक्षण में क्यों कर हुई? कोई जवाब नहीं देने वाला मुझे इसका सिवाए तुम्हारे.", रेखा इस सवाल से हलकी सी गंभीर हुई जैसे उसको इसकी उम्मीद हे नहीं थी. आज लगा था के वो उसका हाल पूछने आये है और कल साथ नहीं जा पाने का कारण देने आये होंगे.
"मैंने कभी सवाल नहीं किया जी इस मामले में और पहले ये 20 हे था जिसमे खुद कृष्णा दीदी और संजीव के साथ छोटे पिता जी ने उनकी तरफ से अर्जुन के नाम कर दिया और उसको कुछ हो जाए या वो गलती करे तोह मैं सब वापिस ले सकू क्योंकि मैं उसकी माँ हु और सबको लगता है ऐसा करने से मेरी नजर हमेशा रहेगी अर्जुन पर. मैं हर महीने पूरा ब्यौरा माँ जी को नियमित देती हु एक एक पैसे का और उसके हिसाब से हे सभी के खाते में पैसे भी डलवाती हु, अर्धवार्षिक कमाई वाले भी. हाँ ये काम थोड़ा सा पेचीदा लगता है लेकिन मुझे परेशानी नहीं होती.", रेखा के सरल और स्पष्ट जवाब से के बार को तोह शंकर जी संतुष्ट हो गए पर फिर गाँव वाली बात वापिस उभर आयी.
"लेकिन तुम्हे 8-9 बरस पहले हे पापा ने दादा जी की वसीयत में महत्वपूर्ण सदस्य बना दिया था जो तुमने मुझे बताया हे नहीं. जानती हो न की उसमे सबसे ज्यादा अधिकार अगर कोई रखता है तो वो तुम हो? तुम्हारे बस एक सिग्न से वो काम से काम गाँव को जायदाद किसी के भी नाम हो सकती है और अगले 7 साल तक अर्जुन की सहमति भी जरुरी नहीं ऐसा करने के लिए? वह का भी अकाउंट तुम्ही देखती हो?"
"हाँ मैं हे देखती हु लेकिन उसका हिसाब पिता जी करते है क्योंकि खर्च उस हिसाब से हे गाँव की जरुरत पर होता है, बाकी बची राशि बैंक में सुरक्षित रहती है. सबसे ज्यादा धनराशि उन्ही 2 बैंक खातों में है जिसमे से अर्जुन या बेहतर कहु की मेरे पास 20% व्यक्तिगत के तौर पर है. उसमे सिर्फ जमा हे होते रहे है आजतक, एक पैसा भी नहीं निकला गया.", रेखा भी जैसे इस वक़्त किसी सुलझे हुए अधिकारी की तरह जवाब दे रही थी. शंकर को भी पता था के वो जितनी पढ़ी लिखी है उस से ज्यादा अनुभवी और समझदार है.
"अर्जुन के लिए राजी सिर्फ इसलिए हे हुई थी की इतना सबकुछ उसको मिल रहा था? या तुमको? देखा जाए तोह अब तुम अपने घर और यहाँ के साथ साथ गाँव में भी सबसे ऊँचे स्थान पर हो."
"ये मेरा घर है और वो पीहर है. सोने की थाली में भी इंसान भूख से ज्यादा नहीं खा सकता और उतनी हैसियत तोह रही होगी न मेरी अपने पीहर में? आप तोह बेहतर जानते है क्योंकि मैं वह साल में 2 बार जाती हु लेकिन आप हफ्ते में एक बार हो हे आते है. मुझे ताक़त नहीं एक जिम्मेवारी सौंपी गयी है जिसमे सभी को उनका हक़ नियमित रूप से मिलता रहा और अर्जुन को मालिकाना हक़ भी इसलिए दिया गया है क्योंकि ये उसकी चाहत नहीं थी कभी. वो सबसे एक सामान प्यार करता है और स्वयं से पहले बाकी सभी को उनका हिस्सा देने के बाद जो उसके पास बचता है वो आधा मेरे और बाकी आधा आपके बचत खाते में जिसको आपने के बार भी नहीं देखा. हाँ उसके पास और भी कमाई आती है और मैं उस से नहीं पूछती की वो मंजू को कितने देता है, मेनका का क्या खर्चा बंधा है और किनके बचो को शिक्षा और ख़ुशी दे रहा है. वो हर महीने कागज़ जरूर दे रहा है मुझे पिछले 4 महीनो से लेकिन मैंने एक बार भी नहीं देखा. आप ऊँचे स्थान की बात कर रहे है लेकिन असलियत में यहाँ ऊंच नीच मिटा कर हे ये सब प्रबंध किये गए और देखा जाए तोह स्थान आपका हे ऊपर है.", रेखा के तर्क के सामने शंकर बेबस हो चूका था क्योंकि अनजाने में हे एक बार फिर से उसने अपनी बीवी के सम्मान पर हमला किया था लेकिन वो कभी उकसाने पर भी बुरा नहीं मानती थी.
"अर्जुन को खतरा है, ये जानते हुए भी तुमने उसको इस सबमे पड़ने दिया.? तुम्हारी एक ना उसको बचा सकती थी रेखा."
"उद्देशःया में ना नहीं किया जाता, शामिल होना पड़ता है. जैसे सही राजा सिंहासन पर नहीं बैठाया जाता, जमीन से अवगत करवाया जाता है जिस से वो अपने करम निष्ठां से निभा सके. ठीक वैसे हे अर्जुन अभी सही शिक्षा हे प्राप्त कर रहा है. और खतरा तोह कब नहीं था? मंदिर ले जाते हुए एक बरस के उस बचे को भी था और घर से दूर 10 बरस वाले चिंतित लड़के को भी. वैसे भी मैंने अर्जुन को सिर्फ जन्म दिया है, उसके mata-pita वही है जो आपके है. जो हमसे बेहतर जानते है की अर्जुन के लिए क्या सही है क्या गलत. आप उनसे चर्चा कर सकते है. चाय पीयेंगे?", ये इशारा था की अब आप जा सकते है.
"आपका रुमाल.", रेखा ने उठ कर साफ़ रुमाल उनकी तरफ बढ़ा दिया था. बाकी सब तोह उन्ही के पास था पहले से. लेकिन शंकर आज इस बातचीत से जरूर खुद पर गुस्सा था. वो जिस तरह से बात करना चाहता था अक्सर हो कुछ और हे जाता था. अर्जुन के अतीत वाले पहलु हमेशा हे उसको अफ़सोस करवा जाते थी उस दौरान वो क्यों उसकी सुरक्षा के लिए नहीं था लेकिन दूसरा पहलु भी था जब वो अर्जुन से परेशां हो जाता था. मधु और उसके बीच भी कही न कही अर्जुन हे व्यवधान था लेकिन क्या उसमे अर्जुन की गलती थी? कार में बैठने से पहले हे शंकर ने बिना पानी के वो 2 गोलियां हलक से निचे उतार ली. सर दुखने से पहले हे वो इलाज कर लेना चाहता था क्योंकि दिन सही से शुरू भी नहीं हुआ था आज.
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"दिल लग गया है न बीटा यहाँ पर? माफ़ करना थोड़ा सा व्यस्त होना पद रहा है, कुछ दिन जमीन और काम से दूर था तोह.. समझ हे सकते हु की जमींदारी कितनी जरुरी है जब काम इतना अधिक हो तोह.", नाश्ता यहाँ हवेली पर भी अधिकतर लोगो का हो चूका था और अब आँचल तैयार होने गयी थी तोह अर्जुन अपने छोटे दादा के साथ बातों में लगा था. बात तोह दोनों ने पहले भी की थी लेकिन उसका विषय सामाजिक नहीं था. आज अनामिका चची तोह एक बार भी इनकी तरफ न आयी थी सिवाए अर्जुन जब तैयार हो रहा था तोह उसका रुमाल, बटुआ और घडी पकड़ने के. दोनों ने सुबह की मीठी मुलाकात वही कर ली थी अपने कमरे में.
"दिल लगाने के लिए किसी के पास टाइम होना जरुरी है पापा और अर्जुन तोह इस मामले में जैसे आप और ताऊजी पे हे गया है. आपकी तरह ये साहब भी कब घर आते है कब बहार रहते है, कुछ पता नहीं चलता. अभी देखलो ये शहर जाने लगा है वो भी बेमतलब ऐसे हे काम से और आँचल तोह जैसे तैयार हे रहती है.", दामिनी ने अपने पिता को चाय पकड़ते हुए अर्जुन पर तंज़ कैसा तोह उसने बस सर झुका लिया.
"पता है मुझे की ये दीपा बहु की बिटिया के दाखिले के लिए जा रहा है और हमारी आँचल भी इसके साथ जा कर अपनी किताबे लेके आ रही है जिस से पढाई पर असर न पड़े. क्या आपत्ति है तुम्हे इसमें? साथ जाना चाहती हो तोह चली जाओ, बहु और बाबू को भी ले जाओ. घूम लेना थोड़ा बाजार इस बहाने.", अब जो सुझाव उन्होंने दिया था वो अर्जुन को जरा भी मंजूर न था जिसमे उसने नजरे उठा कर अपने दादा को देखा जो मुस्कराहट से हे उसको आश्वस्त कर रहे थे.
"जब जाना होगा तब मैं खुद चली जाउंगी. आँचल अकेले जा रही है तोह फिर मैं क्यों सबके साथ अपना प्रोग्राम बनाऊ? और बिनोदि आएगा तोह उसकी गाडी में जाउंगी मैं, इन खतरा में न बैठने लगी. तुम्हे चाय चाहिए छोटे प्रधान जी?", दामिनी उखड़ी हुई थी बुरी तरह और वजह भी अर्जुन की करतूत हे थी जो उसको हर बार ज्यादा सताए जा रहा था.
"आपको अभी मेरी पसंद नापसंद सही पता नहीं चली बुआ. मैं चाय नहीं पीटा और नाश्ता करने के बाद तोह अगले 2-3 घंटे कुछ खता भी नहीं. वैसे आज समय से घर आ जाऊंगा, अपनी शिकायते एकत्रित कर लीजिये इतने. चलता हु दादा जी.", अर्जुन ने खड़े होने पर कमीज के बल सही किये और धुप वाला चस्मा आँखों पर लगते हुए मोटरसाइकिल की तरफ बढ़ गया. सेवक ने हे उसको धोने के बाद ाचे से चमकाया था और आँचल भी कासी हुई कुर्ती के निचे पटिआला सलवार पहन कर do-ranga दुपट्टा सर और गले में सही करते हुए दोनों पाँव एक तरफ करती हुई पीछे बैठ गयी. दामिनी से तोह जैसे ये देखा हे न गया जिस तरह से उसकी बेटी ने उसके सामने हे अर्जुन की कमर में एक हाथ लपेट लिया था. बैठी वो सभ्य तरीके से हे थी और उनके बहार निकलते हे वो बड़बड़ाती हुई अपने कमरे की तरफ चली गयी. उसका गुस्सा और kaam-jwar इतना अधिक बढ़ चूका था की ऐसे वक़्त में वो किसी को भी अपने ऊपर चढ़ा लेती पर फिलहाल उसके जेहन में सिर्फ अर्जुन था जिसको वो आज रात हर हाल में पाना चाहती थी. शायद अर्जुन भी इशारा दे गया था के वो भी कदम बढ़ने को तैयार है. अर्जुन इस खिली सुबह मुस्कुराता हुआ दीपा भाभी के घर के सामने पहुंच चूका था. और वो भी पहले से हे बहार कड़ी किसी महिला से बातचीत में व्यस्त थी. अर्जुन की मोटरसाइकिल रुकते हे उस महिला ने भी नजर घुमाई तोह कुछ आश्चर्य और अधिक ख़ुशी से वो खुद हे उसकी तरफ लपकी.
"मेरा सोहना पट अपने पिंड आया होया ते मेनू स्नेहा तक नई दित्ता.?", ये थी जगतार भाई की माता जी, जीने गाँव में कोक्की भें जी के नाम से बेहतर जाना जाता था. दीपा भाभी के साथ आँचल भी उनसे कुछ दुरी पर कड़ी हैरान हो रही थी जैसे उन्होंने अर्जुन को अपने सीने से लगाने के बाद उसके बालो को सहलाते हुए आशीर्वाद दिया. अर्जुन तोह उनके पाँव छूने की कोशिश में था इस से पहले.
"अब आपने भी तोह नहीं बताया की आप इधर आणि वाली है? कुछ कमजोर लग रही है आप, सफर के बाद घर रुकना नहीं हुआ होगा न ज्यादा?"
"दिल हे नहीं लग्न था अभी कुछ दिन उधर. ऊपर से जसलीन ने जग्गी को बता दिया की तू इधर आया हुआ है तोह वो सवेरे गुरुघर के बाद गद्दी उठा के सबको हे इधर ले आया. फिलहाल तोह सोये पड़े है दोनों भाई और जसलीन अपने दादा जी का दमाग खाने में लगी है. ये दीपा है, पिंड की सब्सि प्यारी बहु है और मुझे भें जी से ज्यादा सैस डा सम्मान डंडी है.", दीपा भाभी का तोह आजकल हर व्यक्ति परिचय देता था जबकि ये दोनों कही बेहतर जानते थे एक दूसरे को.
"जेउस से तोह मिलने आना हे पड़ेगा आंटी जी और ये भाभी जी हे वजह है के आपसे मुलाकात हो गयी. इनके हे पास आ रहा था निम्रत का फॉर्म लेने के लिए, लास्ट डेट है न उसके एडमिशन की और दीदी की बुक्स भी लेके आणि है वह इनके घर से. दोपहर को आता हु आपके हाथ का खाना खाने और जग्गी भैया की भी आप थोड़ी खिंचाई कर देना बस दिखावे के लिए.", अर्जुन की बात सुन्न कर आंटी जी भी हंसने लगी और दीपा भाभी ने पैसे और फॉर्म उसकी तरफ बढ़ा दिए. चेहरे पर उनके भी मुस्कान थी, धन्यवाद या शायद कृतज्ञता की. सोच रही होंगी की देखो इस लड़के को खुद हे अपने आपको खाने पर आमंत्रित कर लेता है.
"ध्यान से जाना और दार जी ने जीकर तोह किया थे कोई खाने पर आने वाला है दिन में लेकिन नाम नहीं बताया था. तोह उनके छोटे पंडत तुम्ही हो? कोई नई पुत्तर जी, आया जे. दीपा, तनु न कहना पावे हुन्न, घरे टेम दे नाल आ जाई. मंजे वाली न मैं बोल के हे इत्थे आयी है. जग जग जिए मेरा सोहना पट.", आँचल तोह बस दूर से खामोश नमस्ते हे करके रह गयी और अर्जुन उन्हें बगल से गले मिलने के बाद दीपा भाभी की तरफ हलके से सर हिला कर वापिस अपनी रानी पर सवार हो चला. अब आँचल काफी बेहतर थी जैसे जैसे गाँव पीछे जा रहा था.
"भें जी आप कब मिली अर्जुन से पहले? और ये तोह जैसे सब को हे जानता है?", अब जेउस को कुत्ता कह कर तोह दीपा भाभी सम्बोधित नहीं कर सकती थी, जितनी गहरी उनकी पहचान थी जग्गी की माता जी से.
"बड़ा हे बिबा बचा है दीपा और जानती कैसे नहीं? जग्गी के ज्यादा दोस्त नहीं है लेकिन उसने पहली बार किसी को छोटे भाई और दोस्त के रूप में पाया है. उम्र में छोटा और पंडित जी के घर से न होता तोह मैंने अपनी जसलीन व्याह देनी थी इसके नाल. हाहाहा.. फेर वि न व्यहन्दी, बिबा बचा है न और ओह मेरी बिगड़ैल शहजादी. ज़िद्दी बहोत है वो और अर्जुन समझदार बीटा है. 2 बार घर आया था वह शहर में और फेर शादी में जसलीन भी हफ्ता भर लगा के आयी, जिसके गुणगान करती नहीं थक रही. फोटो धुलवा के लायी है कल शाम और आज देखने को मिलेंगी. ाचा है बचे पिंड से वाखरे वाखरे बड़े हुए लेकिन बहार भी आपस में जुड़ रहे है तोह इस से ाचा क्या होगा. वैसे इसके साथ तू hans-bol नहीं रही थी जैसे तेरी आदत है?", यहाँ तोह दीपा भाभी की हे चोरी पकड़ी गयी थी जैसे.
"ध्यान रखना पड़ता है न भें जी छोटे बड़े का. वो आपके लिए पिंड से पहले बीटा बन गया पर यहाँ वो मुखिया बन्न के आया है पूरे पिंड का. सम्मान करता है और सेवाभाव भी है लेकिन वो आसमान और हम जमीन, ये याद रखना जरुरी है न भें जी.?", अब बारी थोड़ा हैरान होने की जग्गी की माता जी की थी.
"जे नया मुखिया है? हाँ ऐसा हो सकता है दीपा, लड़का लायक है और जीवन का गहरा ज्ञान रखता है. पर मुझे नहीं लगता की वो तेरे सामने किसी मुखिया की तरह आया था. उसके उस सच को देख जो उसके व्यक्तित्व में है, ओहदे को तोह जैसे वो खुद नहीं मान रहा. चलती हु, वैसे आसमान कभी जमीन से अलग नहीं होता चाहे हमारी आदत ऊपर देखने की है. वो परत हे है जो सतह से चिपकी होती है, हम हे गर्दन उठाये उसकी ऊंचाई खयालो में बनाते रहे तोह फिर गलती हमारी है.", दीपा भाभी को ये गहरा ज्ञान दे कर वो हंसती हुई चली गयी. अपने अंतर्मनन से जूझती दीपा भाभी ने कुछ समय राणो को चारा खिलते बिताया और फिर घर के भीतर चली गयी
"आप चाहे तोह आज अपनी क्लास भी लगा सकती है. जैसी मुझे समझ है 2 घंटे से ज्यादा की क्लास तोह नहीं रहती कंप्यूटर सेण्टर पर.", अब सपाट हाईवे पर थोड़ा यातायात तोह जरूर दिख रहा था, समय हे ऐसा था जहा शहर काम करने जाने वाले लोग निकल रहे थे. लेकिन इस सबको najar-andaaj करती आँचल तोह अर्जुन से चिपकी हुई आगे देखने के नाटक में अपना चेहरा उसके दाए कंधे पर टिकाये थी, जिसमे थोड़ी मुश्किल भी हो रही थी उसके कद की वजह से.
"मेरा टाइम 12 से 2 का रहता है लेकिन तब भी मुझे कोई दिलचस्पी नहीं. तुम्हे मेरे साथ हमारा शहर घूमने में तकलीफ है कोई?", आँचल की हरकतों से हे अर्जुन जान चूका था की वो ना हे बोलने वाली है. और बदले में सवाल ने उसको हे फंसा दिया.
"नहीं ऐसी बात नहीं है लेकिन आप तोह घर से बुक्स हे लेने आयी है और ये शहर घूमना हमने कब प्लान किया? पहले ये दीपा भाभी वाला काम पूरा कर देते है, धुप में शहर भी देख लेंगे.", अर्जुन ने अनमने ढंग से जवाब दिया था और आँचल हिम्मत बढाती हुई खुदसे हे अपना सीना उसकी पीठ पर दबाते हुए जाने क्या निरिक्षण कर रही थी. अर्जुन समझता था इन नयी नयी उमंगो को लेकिन वो इतनी जल्दी आँचल के साथ बहना नहीं चाहता था.
"आपको डर लग रहा है तोह मैं थोड़ा धीरे चलौ क्या?"
"डर नहीं पर ाचा लग रहा है. धुप में मुझे भी ज्यादा घूमना पसंद नहीं लेकिन जहा ये कोचिंग क्लास है उधर हे मार्किट और मेरा कॉलेज भी है. घर भी गोल चौक से नजदीक हे है लेकिन मैं इतनी जल्दी वापिस नहीं जाने वाली कही तुम ये सोच कर आये हो.", अब जैसे हे आँचल ने अपनी हथेली ठीक अर्जुन के सख्त छाती के फुलाव पर टिके अर्जुन के कान गरम होने लगे. पहले हे वो पिछले 10 मिनट से अपने चुचो का दबाव इतना बढ़ा चुकी थी की खुद उसको समझ आ चूका होगा की उसके ये नरम मॉटे चुके अर्जुन की पीठ से डाब कर बस पिचक हे सकते है, उसमे छेड़ नहीं करने वाले.
"आप 2 दिन से कुछ बदल सी गयी है और आपको नहीं लगता की ऐसी हरकते सवाल उठा सकती है? ये राह गलत मंज़िल की तरफ ले जा रही है और हम भी वही गलती दोहराएंगे तोह फिर हम में और उनमे फरक क्या रहा? आप बड़ी है और ये भी समझती है की ऐसा कुछ करना तोह दूर सिर्फ शक होने की सूरत में हे परिणाम बहोत बुरे हो सकते है.", अर्जुन ने उन सफेदे के लम्बे वृक्षों के किनारे हे ब्रेक लगा दिए थे. मील का पत्थर बता रहा था के शहर 7 किलोमीटर बाकी है. आँचल जैसे उसकी पूरी बात सुन्न कर थोड़ा पीछे हो गयी जैसा अर्जुन को लग रहा था लेकिन वो रानी से हे उतर कर एक तरफ आ कड़ी हुई जिधर सफ़ेद थे. अर्जुन उसके चेहरे पर पड़ती धुप का बस गहरा स्वरुप देख प् रहा था, गहरे चश्मे की पीछे से. लेकिन उसके बाद आँचल ने जैसे पालक झपकने से पहले हे उसके होंठो से होंठ भिड़ा कर चेहरा पीछे किया तोह अर्जुन के पाँव कैंम्प उठे. वो आँचल की तरफ न देख सड़क पर ध्यान देने लगा जैसे ऐसा करते हुए किसी ने दोनों को देख न लिया हो. पर वैसा कुछ नहीं था.
"देख लो ाचे से देख लो की कोई बहार वाला हे सवाल पूछने तोह नहीं आ रहा लेकिन तुम्हे परेशां करने से पहले जवाब मैं दूंगी. आखिर करने वाली भी तोह मैं हे हु न. तुम खुदको समझते क्या हो अर्जुन? यही की तुम सबकी परेशानिया ख़तम कर सकते हो, गलत सही को ढून्ढ सकते हो? किसी को दुखी नहीं देख सकते? कोई भी आ कर अपना काम तुम्हे सौंप दे तोह उसको करके खुश होने का दिखावा कर देते हो? तुम्हारा भी एक सच है जिस से तुम जान कर भी अनजान हो. लेकिन मैंने जो 2 दिन पहले वाली रात में जाना उसके बाद भले हे दुःख ज्यादा हुआ लेकिन खुद के लड़की होने का भी तोह पता चला जहा तुम मेरे साथ थे. वह मुझे लगा था की अगर मैं किसी इंसान के साथ सुरक्षित हु तोह वो तुम हो. अंदर जो लोग थे वो इंसान नहीं थे और जो बहार मेरे साथ था वो चाहता तोह कुछ भी कर सकता था और मैं बस गूंगी बानी रहती. शुरुआत में वही खौफ था न मेरी आँखों में जब तुमने मेरा मुँह बंद किया tha?",Arjun इस बहस को एक अनकहे सच की तरफ जाता देख बस खामोश खड़ा रहा.
"मैंने ये कुकर्म दसियो बार देखा है मेरे घर पर लेकिन उस रात से ज्यादा घिनोना पहले कभी नहीं था. पर तुम साथ थे मेरे, चाहे असल ज़िन्दगी में हम एक दूसरे से अनजान हे है लेकिन वह तुम थे जो मुझे संभाले हुए थे. वही मैंने सोच लिया था की मां या माँ तोह प्लान बनाते रहेंगे पर उनसे पहले मेरा अधिकार मैं तुम्हे दे कर उन दोनों को बता दूंगी की जो चाहते थे वो अब नहीं मिल सकता. और तुमने भी तोह मेरे आँखों पर किश करके कोई वादा किया था न अर्जुन?", अर्जुन तोह इतने स्पष्ट खुलासे से बेबस हे हो चला था लेकिन वो फिर भी एक और कोशिश करना चाहता था क्योंकि आँचल अगर उसके ख़याल में नहीं भी थी तोह उसका साथ देना भी उसके लिए खतरे से काम नहीं था.
"मैं समझ सकता हु लेकिन मेरा इरादा तोह वैसा नहीं था न और ये आप जानती है ाचे से. इस तरह अगर उनका सामना करना होता तोह आपकी जगह ऐसा मैं नहीं करता? आपकी माँ को मैं आपके प्रयोग से न काबू करता? लेकिन इस से बुआ एक बार को तोह बेबस हो जाती हो पर विनोद चाचा का क्या? जो बदलाव मैं विनोद चाचा में लाने की कोशिश कर रहा हु वो बदलने की जगह मुझे हे दुश्मन समझने लगते. बुआ एक पल को मान भी लेती की उनकी चोरी को पकड़ कर अब हम ये सब उनके सामने कर सकते है पर वो जब खाली हाथ उस शक्श के पास जाती जो ये सब घिनोने षड़यंत्र रचे बैठा है तोह वो इसकी सजह उनके साथ साथ आपको भी देता. आपका मेरे करीब आना सिर्फ आपके हे नहीं बहोत से लोगो के लिया परेशानी बन्न सकता है. मैं ये कल रात भी कह सकता था पर शायद मैं समझा नहीं पता उधर."
"तुम अब भी नहीं समझा सकते अर्जुन. तुम मुझे बचने की बात क्यों करते हो? ऐसा क्यों नहीं कहते की मुझे सामना करना चाहिए और मजबूत रहना चाहिए. एक दिन तुम तोह लौट जाओगे, विनोद न सही पर कोई और वही मांग करेगा उनके जैसी. किस्मत से मैं पहले भी एक बार बची हु क्योंकि माँ का प्लान तोह पहले भी एक बार ऐसा हे करने का हुआ था मेरे साथ अपने उस आशिक़ के साथ जिसको तुम नहीं जानते पर तब किस्मत शायद मेहरबान थी की वो आदमी किसी घटना में मारा गया नहीं तोह न माँ इतना वक़्त यहाँ गाँव में रूकती और न मां को वो सपने दिखती. फिर भी तुम्हारी बात मान लेती हु, क्योंकि चाहत एक तरफ़ा हो और उसमे कुछ जबरदस्ती या बेबसी तोह इश्क़ का नाम बदल जाता है. हर बार बचने किस्मत और तुम नहीं होने वाले लेकिन चलो जैसी तुम्हारी मर्जी, सर्वे dukh-harta सर्वे sukh-karta.. अपना न सोचे, न सोचे अपनों का..", ये गुनगुनाहट सबसे तीखा बाण था जो अर्जुन के mann-mastishk पर आँचल की व्यथा, दशा और चाहत से भी अधिक गहरा वार कर गया. इस बार आँचल फिर से अर्जुन के पीछे बैठ चुकी थी लेकिन स्पर्श तोह दूर, उसके वस्त्र का धागा तक अर्जुन के करीब न था. ख़ामोशी के बीच सफर मुश्किल से कटा लेकिन जैसे तैसे पूरा हो गया.
"इधर से लेफ्ट और फिर गोल चक्कर से स्ट्रैट. दूर से हे क्सक्सक्सक्स कोचिंग सेण्टर दिख जाएगा लेफ्ट लाइन में.", अर्जुन को मोटरसाइकिल रोक कर उस कोचिंग सेण्टर का बड़ा इश्तिहार पढ़ते देख ये पहली बात थी जो आँचल नहीं कही थी पिछले 15 मिनट में. और वो भी शुक्रिया कहते हुए जैसे बताया गया वैसे हे चल दिया. खुली साफ़ सड़के और hara-bhara गोल चौक जहा दिन के उजाले में भी फुहारा चल रहा था. Rang-birangi गाइयाँ अपनी निर्धारित या उस से भी काम गति से चलती हर तरफ. कही कही लड़के लड़कियां भी जोड़े के रूप में वृक्षों की छाया में पैदल चलते दिखे जैसे वो लोग भी ऐसे हे संस्थानों पर पढाई करते होंगे. पीली चादर चढ़े काले टेम्पू, जो जगह जगह रुक कर सवारियां बैठा या उतार रहे थे. ताज़ी सब्ज़ीयों की रेहड़ियां, कही नाश्ते के ठेले और दुकानों के आगे पानी का छिड़काव करते दुकानदार या मुलाजिम. अभी से ये बाजार और शहर का ख़ास हिस्सा व्यस्त दिखाई पद रहा था. कई नजरे इन दोनों की भी देखती और बताये पते के करीब हे जैसे लड़कियों का ख़ास प्रशिक्षण संस्थान भी था जहा कई छोटे छोटे झुण्ड अपनी अपनी पहचान और दोस्ती के हिसाब से खड़े थे, सभी लड़कियां. कुछ लड़के जरूर उधर से धीमी रफ़्तार में गुजरते इन्हे देख कर हे खुश हो रहे थे और शायद इनमे से भी 2-4 होंगी जो किसी को मुस्कुरा कर देखती तोह किसी को मुँह बना कर.
"लगदा मुंडा बहार तोह आया. वेख तह सही, माशूक नाल है इस करके नई वेख रहा मेनू नै तह ेहड़ा कड़े होया के किसे ने जीनत न ीगोंरे कित्ता होव?", अर्जुन की दुनिया जैसे ज्यादातर सफ़ेद नीले तक हे सिमटी थी कपड़ो के मामले में और इतने तगड़े और आकर्षक चेहरे वाले युवक को चमचमाती लाल बुलेट मोटरसाइकिल का स्टैंड लगाने के बाद अपने साथ आयी लड़की से कागज लेने के बाद बगल वाले संस्थान में जाते देख करीब हे कड़ी इन खूबसूरत सी बालाओं में से सबसे tej-taraar वाली ने अपने दिल की कह हे दी. आँचल वही इनके करीब मोटरसाइकिल की सीट से तक लगाए थी. ये लड़ियाँ हद्द से ज्यादा हे चंचल और बेबाक जान पड़ती थी जो अब आँचल को हे देख रही थी अर्जुन के जाने के बाद. लम्बी, खूबसूरत और एक जैसे पहरावे में जिनके संसथान का दरवाजा जैसे अभी बंद था जहा लिखा था IELTS/Air होस्टेस.
"इधर का तोह नहीं लगता जीनत लेकिन तेरी बात सही है. हैंडसम है तभी अकड़ू है और कमीने की गर्लफ्रेंड नाराज जान पड़ती है जैसे कही और जाना था लेकिन आ कही और गए.. हाहाहा..", ये वाली भी उतने हे तीखे अंदाज की निकली जो आँचल के बुझे हुए चेहरे का मजाक बना रही थी.
"सीधा बोल न डॉलफिन में जाना चाहती थी पर राँझा इसका दाखिला करने ले आया. कसम से बस ये एक बार हाथ पकड़ ले न तोह बोलने से पहले पंतय उतार दू. जालिम ने तोह देखा तक नहीं नजर घुमा कर. हाय ऋ किस्मत जो सोहना होता है वही फुद्दू क्यों बनाया? मरजाना ट्रेनर लार टपकता फिरता है जिसको कोई देखना नहीं चाहता और फिर ऐसे भी लोग होते है.", तीसरी वाली के तोह इरादे हे स्पष्ट थे जो सीधा बिस्टेर से हे बात शुरू करना चाहती थी.
"ओह रहने दे कमलिये ज्यादा न उड़द. जितना तगड़ा है न तेरी पंतय के साथ कुछ और भी फाड़ देना उसने. देख आया बहार और साथ में ढिल्ला भी आया इसके तोह. जरूर साला किसी बड़े घर की औलाद है नहीं तोह ये मास्टर तोह बस अंदर जाने के बाद शटर गिरा के हे जाता दीखता है.", जीनत की बात पर इन दोनों लड़कियों के साथ साथ इनके विचार सुन्न रही खामोश आँचल भी उधर गलियारे में देखने लगी जो सेण्टर के बहार था. तक़रीबन 45-46 बरस का वो व्यक्ति जिसके सर के बीचो बीच चाँद निकला था लेकिन चेहरे पर रुतबे की चमक थी, अर्जुन का हाथ दोनों हाथ में पकडे हंस हंस कर ऐसे बातें कर रहा था जैसे दोनों हे बचपन के यार हो. अंदर आने जाने वाले बचे और उनके अभिभावकों को रास्ता देते ये दोनों दरवाजे से थोड़ा दूर खड़े हो गए पर इन चारो की नजर के सामने हे रहे.
"ऐ तुम तीनो कहा लगी हो? ट्रेनर और मैडम नहीं आये अभी तक?", ये चौथी लड़की अभी टेम्पू से उतर कर थोड़ी दुरी से चलती हुई सीधा इन तीनो के पास आ रुकी.
"मिनी उधर देख जो सामने है, ट्रेनर कही कुलचे छोले ठूस रहा होगा. मैडम न आने वाली 10 से पहले.", अपनी सहेलियों को उस युवक पर आँखे गड़ाए देख ये लड़की थोड़ा सा पीछे हो गयी.
"ोये, तुम पागल तोह नहीं जो sare-aam बेशर्मो की तरह अर्जुन को देख रही हो. उन्होंने देख लिया तोह मेरी शामत आ जानी है.", ये लड़की जैसे ाचे से अर्जुन को जानती थी, या गाँव की हे थी.
"अर्जुन नाम है उसका?"
"धीरे बोल जीनु, ये दीदी जो इधर कड़ी है न वो इनके नाना छोटे प्रधान है. अर्जुन उनका पौता है और वो खेल मेले में इन्होने हे चैलेंज दिया है.", उसकी हालत देख ये लड़कियां भी थोड़ा पीछे सरक गयी पर मुद्दा अभी भी अर्जुन हे था.
"मतलब ये दोनों bhai-behan है? और तू नाम ले कर बात कर रही है पर 'इन्होने' भी कह रही है. वैसे ये चैलेंज करे तोह मैं कुछ भी करने को त्यार हु. बात करवा दे बस एक बार और जैसी पार्टी कहेगी वैसी दूंगी. लाइन साफ़ है जब ये भाई बहिन हुए तोह."
"ोये वो उम्र में साल 2 साल छोटे है और नाम लेने के लिए उन्होंने हे कहा पर पिंड के मालिक है एक तरह से. और तुम लोग अपने मैं से कुछ भी सोच बैठी थी इन दोनों के बारे में?", अभी ये मिनी कुछ और कहती उस से पहले वो केंद्र प्रमुख और अर्जुन टहलते हुए मोटरसाइकिल तक चले आये. आँचल का परिचय करवाते समय अर्जुन की नजर इस देखि हुई लड़की पर गयी तोह वो उन दोनों को वही छोड़ इसके करीब चला आया.
"तोह हमारी मीनाक्षी जी यहाँ से फ्लाइट अटेंडेंट का कोर्स कर रही है? कल आपका बैडमिंटन मैच ज्यादा नहीं देख सका उसके लिए सॉरी, काम था कुछ तोह शहीद भैया के साथ जाना पड़ा. वैसे अपनी फ्रेंड्स से नहीं मिलवाएंगी.", अर्जुन को अपने सामने खड़ा देख बाकी तीनो को तोह सांप हे सूंघ गया पर ये मीनाक्षी हलके जोश के साथ मुस्कुराई अर्जुन द्वारा इतना सम्मान दिए जाने पर.
"जी ये जीनत है, ये गगनदीप कौर हमारे सामने वाले पिंड से है और ये साक्षी है. साक्षी और जीनत यही सिटी से हे है और तीनो मेरी बातचमते के साथ साथ कॉलेज से हे फ्रेंड्स है. और आप है अर्जुन शर्मा जी, बाकी तोह मैं बता हे चुकी हु जैसा तुम लोग पूछ रही थी.", अब अर्जुन अकेला हंस रहा था और वो तीनो नजरे झुकाये मैं हे मान अपनी सहेली को गालियां दे रही थी. मीनाक्षी भी अर्जुन को अपने साथ खड़ा देख हलके से मुस्कुराई.
"It's ऑलराइट एंड सॉरी सोज़ I'm इन हुर्री देय तो सम इम्पोर्टेन्ट वर्क बूत we'll मीट एंड कैच उप सून, डेफिनाटेली ात ा बेटर प्लेस. अल्लोव में मीनाक्षी एंड कीप थिस 'जी' आसीदे. ब्बये जीनत, गगन एंड साक्षी जी.", और जाने से पहले अर्जुन ने मीनाक्षी से औपचारिक हाथ मिलाया जो उसकी सहेलिया देख रही थी. आँचल इधर देखने के साथ उन महाशय से भी थोड़ी बहोत जानकारी ले रही थी जो अर्जुन के आते हे समाप्त हुई.
"आपका बहोत बहोत शुक्रिया गोयल सर और कॉलेज वाली बात हम संडे को करते है. नरिंदर चाचा जी ने फाइल तोह पास करवा पहले हे करवा दी थी और कल मैं शाम को यही लेता आऊंगा कुमार साहब के इधर से.", अर्जुन ने जैसे ये बात आपसी जानकारी में कही थी जो इन दोनों को हे समझ आयी.
"यार तुम आने का कष्ट मत करना, मैं थोड़ा पहले निकल लूंगा सेण्टर बंद करके. वैसे ये काम इतना जल्दी होने की उम्मीद किसी को नहीं थी लेकिन वो कहते है न की 'होप एंड स्कोप अरे बियॉन्ड प्रोबेबिलिटी'. हाहाहा. जल्दी मिलते है बस फ़ोन कर देना."
"वैरी ट्रू सर. लेकिन हम कल हे मिलते है और ठीक 5 बजे मैं हे आता हु आपके पास. कुछ इम्पोर्टेन्ट हुआ तोह संडे से पहले एक बार दादा जी से डिसकस कर लेंगे.", अब सामने वाले ने बस सर झुका दिया हँसते हुए और उन्हें अलविदा कहता अर्जुन भी आँचल के साथ निकल लिया यहाँ से आगे.
"तू तोह बड़ी छुपी रुस्तम निकली मिनी और ये कौनसा मैच दिखा रही थी तू इस अंग्रेज को? मिलने का बोल कर गया है और नहीं मिलने आया तोह मैं हे आ जाउंगी तेरे घर. हाय उसने तोह तेरा हाथ भी पकड़ा और मुझे सही से देखा भी नहीं. पक्का चक्कर हैं न तेरा कोई.?", जीनत तोह उनके जाते हे मीनाक्षी के पीछे हे पड़ गयी थी. बदले में मीनाक्षी की हलकी मुस्कान और शर्म जैसे उनकी बात को आधा सच भी बता रही थी.
"कल योनेक्स का राकेट गिफ्ट किया था जैसा तुम्हे पता है की मैं रोज बैडमिंटन खेलने जाती हु हमारे स्पोर्ट्स सेण्टर पर. और वह बहोत सा नया सामान लगवाया है जिस से बाकी लोग भी एक्सरसाइज कर सके या खेल सके. मैं खुश थी इसलिए पूछ लिया था के राकेट टेस्ट करने के लिए. साथ नहीं खेले पर थोड़ा मैच देख कर चले गए अपने काम से. और तुम जैसा सोच रही हो वैसा नहीं है.", मीनाक्षी की चाहत और उसकी बातें एक दूसरे का साथ नहीं दे रही थी और ये उसकी सहेलियां भी जान गयी जब कनखियों से वो जा चुके अर्जुन को तलशती लगी.
"पता नहीं अब तू हमारे साथ खेल रही है या तेरा दिल उसके साथ खेलना चाहता है? उसने अपने हाथो से पहला गिफ्ट तोह दे दिया है तुझे अब तू उसको गिफ्ट देती है या उस से पहले मैं हे पार्टी दे दू?", जीनत ने अपनी इस खोयी हुई सहेली से ये कहने के साथ बाकी दोनों को आँख मार कर साथ देने का इशारा दिया.
"हाँ यार ज़ालिम सच में दिल ले गया और अब पंतय मैं उसको खुद दे दूंगी.. मतलब पार्टी. मिनी का तोह कुछ है नहीं ऐसा वैसा.", ये वही दूसरी खूबसूरत बाला थी जिसका नाम साक्षी था. जहा ये जीनत और साक्षी आधुनिक होने के साथ थोड़े बिंदास स्वभाव की थी वही गगनदीप एक भरे जिस्म की ज्यादा आधुनिक तोह नहीं बेबाक जरूर थी. मीनाक्षी इनसे अलग थी बातचीत के मामले में लेकिन उसका शांत सा आकर्षण भरी पड़ता था बाकी तीनो पर.
"अभी बस दोस्ती है जिसके लिए पूरी रात और अगला दिन कैसे कटा ये सिर्फ मैं जानती हु. और हिम्मत करके दोस्ती की पहल की तोह किस्मत ने इशारा भी ऐसा दिया की ज़ालिम तोहफा दे गए नजराने में. तुम चाहे पार्टी दो या पंतय, किस्मत यही मेहरबान हुई तोह बाहें मेरी होंगी और वजूद इनका उसके दरमियान. चल तेरा ख़ास ट्रेनर आ गया, छोले कुलचे ठूस के.", मीनाक्षी इनसे आगे चलती हुई केंद्र में दाखिल हुई तोह ये धीमी गति से उसके पीछे.
"उसको प्यार करने दे, मैं तेरे साथ वो पंतय वाली पार्टी का प्लान बनती हु. गग्गू डार्लिंग, तेरे अनार भी पक्क चुके है. पहलवान सारा रस निचोड़ देगा बस दिखने की देरी है.", जीनत की ऐसी बेशर्मी भरी बात पर साक्षी तोह उसके साथ हे हंस दी लेकिन गगनदीप अपने कमीज को व्यवस्थित करती हुई उभरे सीने को छुपाने लगी.
"अगर वो प्यार करने लगी है तोह मैं उसके लिए खुश हु यार. अनार वही निचोड़ेगा जो इनका एकलौता मालिक बनेगा. दूसरी सच्चाई ये भी है जो मुझे पहले नहीं पता थी की अर्जुन ने खेल में चैलेंज दिया है और हमारा तोह पूरा पिंड हे जैसे पागल हुआ पड़ा जब से ये खबर उठी है. मैं नहीं जानती की वो सब क्या है और लड़कियों के बीच इसकी चर्चा भी नहीं होती पर बड़े बुजुर्ग कहते है की असली राजा लौटा है जो मेले के साथ सबके जीवन में रंग भर देगा, अगर जीता तोह. भगवान् वैसा हे करे.", गगन की बातें इन्हे कितनी समझ आयी ये तोह कहना मुश्किल था क्योंकि वो भीतर जा चुकी थी और ये दोनों एक तरफ बाथरूम में.
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"तुम यही बैठो, मैं पानी लाती हु.", घर के बहार हे एक ऑफिस था जिसका शटर बंद देख कर आँचल ने उस लोहे के गेट पर लगा टाला खोलने के बाद अपने घर में प्रवेश करने के बाद वापिस दरवाजा लगा दिया. पप शर्मा का घर शहर में था और वो भी ाचे इलाके में. 250 गज के इस घर में हे बहार उसने अपना एक ऑफिस बनाया हुआ था और गाडी बहार हे कड़ी की जाती थी ऑफिस के आगे बने शेड के निचे. अर्जुन इस चौड़े गलियारे और छत्त की छाया में चलता हुआ बस ख़ामोशी से हे कभी आँचल को तोह कभी इस घर की संरचना को देखता रहा. गलियारा ख़तम होते हे ये खुला आँगन था जिसके ऊपर छत्त और एक तरफ दूसरी मंज़िल के लिए सीढिया बानी थी. बहार वाले ऑफिस में जाने का दरवाजा इधर भी था और हॉल के उस पार रसोई और आगे कमरे. हॉल बेहद व्यवस्थित था जहा कालीन, सोफे, टेलीविज़न और खाने की मेज जिसके साथ 6 कुर्सी लगी थी. रसोईघर और कमरों से पहले लाल रंग का रेफ्रीजिरेटर था जिसका बटन चालू था.
"नहीं पानी की जरुरत नहीं है, अगर आपने पीना है तोह ठीक है. बस अपने कपडे और जरुरी किताबे पैक कर लीजिये.", अब तक आँचल ट्रे में पानी ले कर बहार निकल आयी थी और अर्जुन के मन करने पर गिलास वही टेबल पर रखती हुई वापिस रसोई में जाते हुए बोली.
"मैं वापिस नहीं जा रही उधर. वैसे भी कल मां ने वह जाना है तोह इधर पापा अकेले होंगे और 3 दिन मैं क्लास हे लगा लुंगी. तुम जा सकते हो.", अर्जुन को देखे बिना वो दुपट्टा फ्रिज के पास हे खूंटी पर टांग कर कमरे में चली गयी. जैसे घर की saaf-safaai शुरू करने वाले हो. अर्जुन कुछ पल तोह इस अनदेखी को झेलता रहा फिर अपने आप हे उसके कदम सामने वाले कमरे की और बढ़ चले जहा अभी तक कोई लाइट नहीं जाली थी. कदमो की आहात न होने की वजह से आँचल तोह उसको आते न देख सकीय पर वो उस शयनकक्ष के एक कोने में बस कपडे से कुछ साफ़ कर रही थी, दरवाजे की तरफ पीठ किये. अर्जुन का साया जबतक दिखाई देता उसकी कमर और स्टैनो के बीच वाला हिस्सा अर्जुन की बाहों में क़ैद था. कांपते हाथो ने वो सजावट का सामान निचे गिरा दिया. आँचल की भीगी आँखों में देखने से पहले अर्जुन ने अपने होंठ उस निर्वस्त्र गले पर रखते हुए कुछ गिरफ्त भी मजबूत कर दी.
"आपको मैं सबसे महफूज रखने की कोशिश कर रहा था लेकिन देख लीजिये ऐसा करना कितना मुश्किल कर दिया है खुद आपने. बचाव की जगह सामना करने की बात तोह कह दी, लेकिन किसका सामना करना है ये समझी नहीं. मैं आपको खुद से दूर नहीं कर रहा बस इतना चाहता हु की आप इस सबसे बहार रहे. फिर जैसा आप चाहती है अर्जुन वही करेगा. लेकिन ऐसे सबकी नजरो से दूर बस हमारे एकांत में.", अर्जुन की सरगोशी से आँचल ने अपना गाल हे उसके होंठो पर लगा दिया. अर्जुन का इतना मजबूत स्पर्श और ऐसे चिपकना आँचल को सबसे नया एहसास दे गया जिसमे आख़िरकार वो तनहा नहीं थी. मुलायम गालो पर अर्जुन का चुम्बन और उसके आगे फिसलते जाना. आँचल ने खुद हे अपने होंठ उसके होठो से जोड़ दिए. कितना अध्भुत्त था इतने मजबूत और बड़े जिस्म का उसको अपने में समेत लेना.
"आठ. क्या कर रहे हो? पापा आ सकते है. कपडे पर निशाँ?", अर्जुन तोह उसको गॉड में उठा बिस्टेर पर हे ले आया था. उसको अपने ऊपर छाया देख आँचल ने चेहरा घुमा लिया जैसे शुतुरमुर्ग शिकारी को देख अपनी आँख बंद करके समझे की वो सुरक्षित है. उन मॉटे स्टैनो पर अर्जुन की हथली का वजन पड़ते हे आँचल ने चेहरा उसके सामने कर लिया. बस इतने में हे उसकी हालत ख़राब हो चुकी थी और इस बार अर्जुन ने उन लाल अधरों को जी भर के निचोड़ा जब तक स्वयं आँचल ने हे अपनी जीभ उसके मुँह में क़ैद न कर दी. कमर की तरफ से अर्जुन ने अपना जिस्म उस से दूर हे रखा था लेकिन स्टैनो की नरमी और गोलाई का अनुभव लेने के लिए पकड़ मजबूत करते हे आँचल पलट गयी.
"जानता हु की अभी आने वाला तोह कोई नहीं पर आप जो चाहत रखती है वो भी इस तरह शुरू नहीं होती. घर चलते है न. प्यार से हर रोज कुछ समय साथ बिताने का वादा मेरा लेकिन वो नया बदलाव बस मेरे तक और मेरे लिए. घर में किसी के सामने कुछ नहीं. उन्हें दिखना ये चाहिए की हमारी दोस्ती होने लगी है. फिर खुद फैसला करना की सूट की फ़िक्र करनी है या नया सूट लेना है.", अर्जुन ने उठने से पहले आँचल को बाहों में ले कर थोड़ा और प्यार दिया, बाल सही करने के साथ हलकी सी चपत कूल्हों पर लगते हुए. उसके सुलझे हुए अवतार और ऐसी समझदारी पर आँचल ने गलती स्वीकार कर ली. अब उसको यु अर्जुन के पहलु में लेटना किसी सपने सा हे लग रहा था.
"मुझे वो भी करना है और तुम सब प्यार से करोगे. कोई फरेब नहीं की मुझे मन लिया तोह फिर दूर भागते रहोगे.", आँचल की उत्सुकता और चाहत सुन्न कर अर्जुन हलके से हँसते हुए उसके दोनों गाल हाथो में ले कर जवाब देने लगा.
"सूट नया दिलवाने का मेरा मतलब वही था. लेकिन जब एहसास ज़िन्दगी में पहली बार हो रहा हो तोह उसको लम्बा जीना चाहिए. मंज़िल पाने के बाद अक्सर उसकी कदर काम कर देते है इंसान. दोस्ती, थोड़ा प्यार और सबकी िज्जात्त, चाहे वो लायक हो या न हो. नहीं तोह फिर बाथरूम तोह है हे."
"छी.. तुम भूले नहीं उस बात को?"
"खूबसूरत पल याद रखने चाहिए और इस बार हर दिन ऐसा एक न एक पल तोह मैं देने हे वाला हु. अब कपडे और बुक्स पैक करो, निकलते है.", अर्जुन उठ कर कपडे सही करने लगा तोह इस बार आँचल ने उसको बाहों में लेते हुए चूमा.
"जैसा तुम कहोगे वैसा हे होगा. नहीं सामना करती माँ का और न वो सब. बस वो लोग ाचे नहीं है और तुम मां को जान चुके हो न."
"वो मेरी सरदर्दी है और इन मां जी को तोह कल हे ठीक कर देंगे, देखती जाओ. चलते है अब.", कूल्हे पर फिर से थपकी पड़ते हे आँचल तुरंत अलग हो गयी.
"देख रही हु तुम इधर कुछ ज्यादा हे हाथ मारते हो."
"चेक करता हु की बड़ी हो गयी हो या टाइम लगेगा. बड़ी हो गयी हो.", आँचल हंसती हुई इस से भी अगले कमरे में चली गयी. अब वो ख़ामोशी और गुस्सा नहीं था जो सफर शुरू होने पर हुआ था. अगले 5 मिनट बाद दोनों हे वापिस चल निकले थे. अर्जुन रस्ते याद करता हुआ हर तरफ ध्यान दे रहा था और आँचल उसके पीछे इस बार दोनों पाँव अलग दिशा में करके ठीक प्रेमिका की तरह चिपकी बैठी थी. बैग का बहाना जरूर था जो बीच में रखा था, पर जिस्म चिपकने से वो छोटा सा बैग भी नहीं रोक सकता था. अर्जुन ने आखिर इस प्रेयसी को भी शीशे में उतार लिया था अपने मुताबिक. अबसे वो दामिनी का सामना नहीं करने वाली थी.
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