Incest Pyaar - 100 Baar - Page 51 - SexBaba
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Incest Pyaar - 100 Baar

अपडेट 209

हमकदम (1)

अर्जुन उस जोरदार संसर्ग के बाद भाभी की बगल में हे लेता उन्हें सेहला रहा था जो कटे वृक्ष सी गिरी बेसुध हे थी. बिस्टेर का निचला हिस्सा उनके कॉमर्स की गवाही दे रहा था जहा गीलेपन के साथ ढेर सारा सफ़ेद वीर्य जमा था. दोनों पसीना सूखते हुए जिस्म से सांस भर रहे थे और दीपा भाभी अपने जिस्म के दुखते पोर पोर में भी अलग सी मस्ती का एहसास लेती उनींदी सी आँखों से अर्जुन को निहारने लगी जो उनके गुदाज पहले हुए कूल्हों पर हाथ फिर रहा था.

"कर ली अपने मैं की मुखिया जी? उतने शरीफ हो नहीं जितने दीखते हो और इसको कुछ दूर हे रखो मुझसे.", अर्जुन का ardh-uttejit लिंग भी साइकिल की तुबे सा मोटा था लेकिन साफ़ रंगत वाला आकर्षक अंग. दीपा भाभी ने जिस तरह से उसके लिंग को छूने का उपक्रम करते हुए सहलाया था उसका साफ़ मतलब था की वो मूसल उन्हें भा चूका है. अर्जुन उन्हें करवट के बल करता अपनी बाहों में ले कर हलके हलके चुम्बन चेहरे पर जड़ने लगा तोह दीपा भाभी को भी उसके सीने से लिपट कर ये हलके फुल्के पल आराम देने लगे.

"बंद कमरों में तोह शराफत कपड़ो सी रहती है भाभी. और इसमें मेरा दोष नहीं जब आप हो हे इतनी बेजोड़. अब दर्द तोह नहीं हो रहा?", उनके चुचो पर बने हलके निशाँ और लाली को सहलाते हुए अर्जुन ने जिस तरह पुछा था दीपा भाभी शर्माती हुई उसके दिल पर हाथ रख कर ना में सर हिलने लगी.

"दर्द.. जाने वो कहा खो गया जब आँख खुली तोह. मुझसे आधी उम्र के हो लेकिन जिस तरह तुमने प्यार किया तोह मुझे अपनी बेशर्मी भी भली लगी. तुमसे पहले इस जिस्म पर निशाँ तोह मिले थे पर उनमे प्यार एक पल भी नहीं था. आज पता लगा की क्यों जस तुम्हारी दीवानी बानी जो दर्द के बाद उस सुख और देखभाल से कही ज्यादा खुश होगी जो तुम दिल से करते हो. मेरे वस्त्र तोह कोई बड़ी बात नहीं थी तुम्हारे लिए उतारना और मैं खुद भी ऐसा कर देती क्योंकि दिल आकर्षित जो था तुम पर लेकिन तुम मुझे प्यार करते हो और इतना ख़याल रखोगे ये जान चुकी होती तोह पहल भी मैं हे कर देती. अब ऐसे हे चिपकाये रखोगे या खाना खाने का इरादा है थोड़ा?", भाभी तोह खुद हे अलग होने का नाम न ले रही थी और अर्जुन ने अपने एक जांघ उठा कर उनके ऊपर राखी तोह लिंग में बढ़ती अकड़न से उनकी पहले से गीली योनि जैसे खुद हे सुपडे से चिपक गयी.

"दिल तोह नहीं है मेरा अलग होने का जैसे आपका नहीं हो रहा. पर बिस्टेर पर एक और घंटा लगाया तोह मैं कोई बहाना बना भी लूंगा पर आपके न काम होंगे और न फिर इधर कोई देखभाल के लिए है. वैसे इरादा तोह मेरा इन पहाड़ो की गहराई में उतरने का था लेकिन जब आपका जिस्म आराम करने के बाद उठेगा तोह उठना मुमकिन नहीं होगा. पता नहीं आपने कैसे इस कुबेर के खजाने को सहेजा हुआ है और वो दिलबाग भैया अकाल से भी अंधे है और नजर से भी.", उठने से पहले अर्जुन ने एक बार उनके कूल्हों की दरार में उँगलियाँ फसायी और मुँह से एक निप्पल को दबा कर चूस लिया. भाभी तोह सीत्कार करती हुई अपनी योनि उसके लिंग पर दबा गयी थी.

"आह्हः.. पक्के जालिम हो तुम जो अलग होते हुए भी आग भड़का रहे हो. और एक पहाड़ सुजा दिए है तोह दूसरे से दूर हे रहो. ये आगे लेने में हे बुरी हालत हो गयी तोह पीछे का सोचना हे पाप है. आह्हः.. सचमुच इनके साथ साथ मेरी कमर और छूट तक दुख दी तुमने.", भाभी खड़े होते हुए अपने पाँव फैला रही थी और उनकी योनि ऊपर तिकोना बालो का हल्का जंगल सहलाते हुए अर्जुन ने भी पजामा चढ़ा लिया.

"इन्हे साफ़ कर लेना भाभी नहीं तोह रगड़ाई से टूटेंगे तोह ज्यादा दर्द होगा. वैसे अब लगता है के उस बेचारे रंगी की भी क्या हे गलती थी जब आपका बदन और ये खूबसूरत चेहरा किसी का भी चैन ख़तम कर दे? ब्रा न भी पहनो तब भी इनमे जरा सी भी लटकन नहीं. अगली बार पहले इन्ही का शिकार करूँगा. उमाहहह.", उन्हें खड़े खड़े हे सीने से लगा कर अर्जुन ने एक गहरा चुम्बन करने के बहाने कूल्हे और स्टैनो का फिर से स्पर्श लिया. भाभी पलट कर गाउन पहनती हुई शर्म और मुस्कराहट के मिश्रित भाव लिए थे. उन्हें अपने जिस्म का एहसास जरूर होगा लेकिन आज गर्व था की अर्जुन इतना प्रभावित हुआ.

"अगली बार के बारे में भी सोच रहे हो? और जिस्म म्हणत हे करता रहे जिसको सँभालने वाला मर्द भी न हो तोह वो ऐसा हे तोह रहेगा. रंगी इसको उजाड़ना चाहता था और तुमने प्यार दिया है."

"कल सवेरे साथ में नहाने का क्या ख़याल है भाभी? नहीं तोह नाश्ते से पहले आपका हे भोगा लगा लूंगा.", टीशर्ट पहन कर अपने बाल और चेहरा दुरुस्त करता वो भाभी को भी लगातार देख रहा था जिन्होंने अब अपने बाल समेत लिए थे. चेहरे पर अर्जुन का प्यार हलके निशाँ दे चूका था और होंठो पर हलकी सूजन. अर्जुन की नाश्ते वाली बात पर वो उसके कंधे पर मुक्का मारती हुई रसोईघर की तरफ बढ़ चली. आज जैसे सचमुच वो लड़की से औरत बानी थी और ये साफ़ झलक भी रहा था जब दोनों एक दूसरे को अपने हाथो से खिलते हुए वासना या काम से इतर बस अपने घर परिवार की बातों में लगे रहे. अर्जुन रुकना चाहता था लेकिन घर पे उसका होना भी जरुरी था अपने दादा दादी की gair-haajri में और आज की दोपहर बस सो कर हे गुजारनी थी.

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"ताई अगर कुछ वक़्त हो तोह क्या बात कर सकता हु अकेले में?", शंकर भी दोपहर के खाने पर चंद्रो देवी की हवेली आया था हॉस्पिटल में आधा दिन गुजार कर. हमेषा की तरह ऋचा अपने पिता के आगे पीछे हे रही और वो भी उसको लाड लड़ने में कोई कसार न रखते हुए अपने साथ लगाए पहले चारपाई पर बैठ भोजन करते रहे और फिर थोड़ी देर में मिलने का बोल अब चंद्रो देवी के कमरे में चले आये. गर्मी की वजह से इधर भी ठंडा कूलर चालु था और चंद्रो देवी अपने साधारण बिस्टेर पर तक लगाए शंकर को भी अपने करीब बैठने का बोल कर वो किताब एक तरफ रखती हुई थोड़ा खुश हुई. मधुलता पिछले आँगन में काम करवा रही थी या उसकी ये नाराजगी थी शंकर से जो बस पहले अपनी बेटी और फिर खाने के बाद उसकी सास के कमरे में जा चूका था. बिजेन्दर आज खेत हे था जहा अनुपमा भी गयी थी उसके साथ सुशीला के कहने पर.

"तू पूछने कबसे लगा रे और आज तोह तेरे दर्शन की भी उम्मीद नहीं थी फिर ये मेहरबानी जरूर काम से होगी?", करीब की नजर का चस्मा कपडे से साफ़ करके डब्बी में बंद करती हुई चंद्रो देवी ने एक तकिया शंकर की तरफ बढ़ा दिया जो अब बिस्टेर पर हे करवट लिए उनके सामने कोहनी के भर लेट चूका था. इस घर में शंकर को असली बेटे का दर्जा देने वाली भी यही महिला थी और शंकर ने भी कभी दिखावा न किया था जो उसके रहने से साफ़ पता चलता था.

"काम तोह हॉस्पिटल में भी नहीं था ताई आज. सारे डॉक्टर मौजूद थे और मेरा जितना काम था मैं करके आ गया. वो इन्दर से बात हो रही थी तोह उसने कुछ बताया लेकिन मेरे पल्ले न पड़ा. आप तोह क्सक्सक्सक्स गाँव से हो न और ताऊ जी से आपका रिश्ता खुद बड़े दादा लेके गए थे उधर?", अब चंद्रो देवी थोड़ा खुल कर मुस्कुराई.

"गाम छोड़ तहसील तक चर्चे थे मेरे और 13 की उम्र बाद तोह किसी ब्याह शादी में भी जाना पड़ता तोह मुँह ढकवा के ले जाते थे मेरे पिता जी. ठेठ जमींदारी वाले गुज्जरो के कुनबे की पहली छोरी थी और सबका लाड प्यार इतना था के aan-jaan से रोकते भी न था इसलिए do-naali बचपन में सीखा दी थी. पिता जी एक पंचायत में थे और वह किसी ने गर्मी दिखानी चाहि 4-5 आदमियों के बूते तोह मैंने भी उसके माथे पर बन्दूक टिका दी थी. मामला सरपंची का और एक छोरी बन्दूक लिए कड़ी हो मर्दो बुधो के बीच तोह सदमे जैसा हो गया था सबके लिए. वही ससुर जी आये होये थे लेकिन रिश्ता रखने की उन में भी हिम्मत न थी. रघुवीर के पिता जी से बातचीत हुई थी उनकी तोह वो आये थे हमारे घर. उनका नाम हे बहोत था और फेर तेरे ताऊ भी चौखे दीखते थे. कर दिया ब्याह लेकिन शर्त यही के मैं बंधन में न रहने वाली और गलत बात पे छोटा बड़ा भी न देखती. ससुर जी ने तोह सब स्वीकार था.", अब जैसे शंकर को सरपंच वाला किस्सा याद आ गया था के कैसे ताई ने अपनी बिल्लो से उसका भेजा हे फाड़ दिया था एक पल में.

"वो तोह जानता हु ताई कौनसा आज से देख रहा हु पर जलवा सरपंच वाला याद आ गया आपकी बन्दूक से. वैसे बात कुछ और थी जो मैं पूछना चाहता था."

"सीरगत (सिग्रेटी) बाल ले तेरी अगर दिल करे है तोह. मैं घाम (दोपहर) में हुक्का न पीती लेकिन तू रोटी के बाद फूंकता है. पूछ ले जो पता होगा वो बता दूंगी.", शंकर ने फिर भी उठने का कोई उपक्रम न किया.

"ये देवकी चची और आपका आपसी रिश्ता है क्या ये एक परिवार वाला रिश्ता है या गाँव वाला?", इस सपाट से सवाल ने एक पल के लिए तोह चंद्रो देवी को हैरान कर दिया लेकिन जैसे उन्हें भी पता था के कभी न कभी तोह ये मुद्दा आएगा हे.

"तेरी माँ से न पुछया तूने?"

"वो तोह गाँव गयी हुई है उधर से कल आएँगी लेकिन आप उन्हें जानती हे हो ताई. वो पूछ लेंगी पर जवाब आजतक दिया उन्होंने किसी बात का. सवाल तोह मेरे बहोत है उनसे लेकिन जाने दो फिर वो मुझे हे शिक्षा दिखा देंगी.", अब चंद्रो देवी हामी भर्ती हुई हंस रही थी.

"कौशल्या है तोह रामेश्वर और इन कुनबों का वजूद है शंकर नहीं तोह फेर तू तोह खुद इस हवेली को खंडहर बना चूका होता. उसके सवाल से तोह मैं खुद बचती हु और एक वही है जिसका सीना मेरी बन्दूक तक की परवाह न करता. देवकी.. मेरे सेज चाचा धनपत की दूसरी बीवी से हुई थी लेकिन तब तक पिता जी ने वो न्यारे कर दिए थे. दादा ने तोह पहले हे मेरे चाचा के नाम पांचवा हिस्सा किया था उसके लक्खण जो माडे थे. पहली लुगाई बहोत बढ़िया था मेरे चाचा की पर आदमी नालायक हो तोह फेर औरत भी बगावत कर हे दे है शंकर. फेर एक तवायफ तकर गयी किसी बदनाम अड्डे पे और उस से ब्याह कर लिया चाचा ने तोह बिरादरी से बहार करना हे था. पिता जी उतने सख्त भी न थे और चाचा की जमीन के बराबर मोल देके भेज दिया इधर से. फेर 4 महीने बाद देवकी पैदा हो गयी दूसरी लुगाई से जिसका बेरा आपसदारी में हे चला. अयाश जुआरी के पास पैसा कितनी देर चलना था और वही हाल हुआ चाचा का. पिता जी ने मदद करनी चाही तोह बिरादरी सामने आ गयी दादा के साथ साथ. 15 बरस फेर कोई जीकर न हुआ घर में और मैं ब्याह के इधर आ गयी. तेरा बाप और रघुवीर साल में 2 बार आते थे इधर और जब रामेश्वर का ब्याह होया तभी पता चला के तेरे छोटे चाचा के साथ देवकी बाँध दी. कृष्ण से उसने मेरे बारे में पता चल गया क्यूंकि पीहर तोह मेरा भी 100 कोस दूर तक पहचान रखे था. पर मैंने बोलचाल न बधाई उसके साथ जबकि वो उस टाइम 3-4 बार आयी भी. कौशल्या को सब बताना जरुरी था और फेर उसने भी नकेल बाँध दी देवकी के. फेर तोह बस वो सुंडी और मुन्नी के ब्याह में हे इधर आयी थी जिसको 25 बरस तोह हो लिए. ये बात कोई और पूछता तोह मैं जवाब न देती लेकिन तू गलत बात न करता शंकर.", चंद्रो देवी ने जितना सब बताया था उस से अब नरिंदर वाली बात की तोह पुष्टि हो गयी थी पर लाजवंती वाला किस्सा कैसे शुरू करे ये उसको समझ न आया.

"ये सरपंच वाली लुगाई फेर दिखाई न दी ताई?"

"ओह.. तेरी धरम सास भी तोह गायब है उसके साथ. बताई ने तेरे पापा जी ने?"

"उनका आपस में क्या रिश्ता था जो दोनों गायब हो गयी? और लता की भी परवाह न की उन्होंने?"

"देख शंकर साफ़ बात सुन्न. मुन्नी पसंद थी सुंडी ने और ब्याह होया था ईश्वर का चरित्र देख के. लाजो अपनी छोरी की ससुराल न आती थी और न मैं उनके कभी गयी. मेरी बहु है और हवेली के भीतर मेरे हाथ के निचे रहेगी. उसकी माँ ने के गुल खिलाये और वो रेशमा क्यों फरार है तोह इसका जवाब 2 लोग हे दे सके है. एक तोह रामेश्वर और दूसरा लाजो खुद.", अब शंकर समझ गया था या उसको समझा दिया गया की इसमें मधुलता शामिल नहीं है और ऐसा क्यों किया ये वो पूछने वाला भी नहीं था लेकिन ख़ुशी थी की उसकी मधुलता वैसी बिलकुल नहीं थी.

"ताई इन्दर कह रहा था के लाजो काकी और देवकी चची में कोई सम्बंद है. आपके हिसाब से तोह चची इधर आयी नहीं और काकी गाँव में हे रहती थी. लेकिन दोनों का अतीत तोह जैसे कही एक दूसरे के आसपास रहा है. इन्दर कोई भी बात बेमतलब नहीं करता और मेरे साथ तोह कभी भी नहीं."

"तोह मैंने कब कहा भाई? देवकी मेरे घर ना आती थी और लाजो के साथ उसका के था वो तू देवकी से हे पूछ ले. मेरा बुढ़ापा चैन से कटान दे शंकर और तू भी थोड़ा घर परिवार का मजा ले. तूफ़ान हर बार न रुकता और अब कौशल्या की भी आराम कारन की उम्र है जिसका ख़याल न तुझे और न इन्दर को. अर्जुन हे लाठी बनेगा क्या अपनी दादी की भी और माँ की भी? ज़िन्दगी सीढ़ी चलती न हजम होती तोह उमेद से हे सीख ले कुछ. चल जा तेरी तिनगरी (बेटी) दरवाजे पे 2 बार चक्कर मार गयी के उसके पापा बेरा न बुढ़िया से क्यों लगे बैठे है. अगली 20 को ऋचा ने ट्रेनिंग पे चले जाना अगर ध्यान हो तोह और अब उसका दिल न लगता हवेली पे जबसे तेरी तरफ से आयी है. हाल तोह सुशीला के भी बदले बदले से है पर उसके सामने मेरा भी मुँह न खुलता. बात करके देख जरा वो अपने हे कमरे में रहती है आजकल.", शंकर ने खड़े होते हुए हाँ भरी जैसे वो ताई की साड़ी बात समझ गया हो. तूफ़ान वाली बात अपनी जगह बिलकुल उचित थी की अब अगर कही घमसान हो गया तोह फिर संधि के लिए लोग भी बचेंगे या नहीं. ताई के कमरे से बहार आते हे ऋचा सामने हे कड़ी थी.

"आप दादी से मिले आये थे?", कमर पर दोनों हाथ रख कर वो नाराजगी दिखा रही थी जिसके बदले हँसते हुए शंकर जी ने सर पर हाथ फेरते हुए ना में सर हिलाया.

"तेरे लिए हे आया था और कपडे रख ले 2 जोड़ी बैग में नहीं तोह शहर से दिलवा दूंगा. बबिता की तरफ भी जाना है तोह चल मेरे साथ, सोमवार शाम को वापिस ले आऊंगा तुझे.", बबिता के नाम पर हे ऋचा खुश हो उठी थी जो तुरंत भीतर अपने कमरे में दौड़ गयी. शंकर ने पिछले आँगन का रुख किया जहा से सुशीला के कमरे का रास्ता था. मधुलता और मल्टी भीगी कनक को धुप में बिछा रही थी सूखने के लिए. चक्की पर पिसवाने से पहले ऐसा हे किया जाता था. नजरो में शिकायत देख शंकर ने बस हलके से सर हिला दिया मधुलता की तरफ जो वापिस अपने काम में जुट गयी.

"के हाल है बेबे? शरीर परेशान करे है या तू बुद्धि हो गयी?", दरवाजा khat-khatane के साथ हे शंकर ने भीतर कदम रखे तोह सर के निचे तकिया टिकाये लेती सुशीला उसको देख कर मुस्कुराती हुई सीढ़ी बैठ गयी. बाल ठीक करने के बाद थोड़ा कमीज दुरुस्त किया और शंकर को सामने सोफे पर बैठने का इशारा देती वो जग से साफ़ गिलास में पानी भरने लगी. सुशीला के चेहरे से हे पता चलता था के वो उदास है या मुरझाई हुई पर मुस्कान से धोखा देना जैसे उसको भी ाचे से आता था.

"मैंने तोह 30 की उम्र के 2 ब्याह दिए डॉक्टर लेकिन तेरी हालत मेरे से ज्यादा करदी होवेगी जड़ तू ब्यावेगा अपने बालक. बात आवे है तन्ने क्यूंकि कोरा हांडे है न. आज बड़ी किरपा करि बेबे के धोरे ाँ की?", सुशीला के हरियाणवी तंज़ भी मजाक से भरे रहते थे और शंकर पानी पीते हुए बस सुन्न रहा था. चेहरे पर एक अलग सी हंसी आ गयी थी गिलास एक तरफ रखते हुए.

"वाई तोह कहु हु के तू बुद्धि तोह होव कोणी फेर खाट किस तरिया पकड़ ली? छोरा (बिजेन्दर) न्यारा तोह कोणी कारन लाग रहा बिंदनी आते हे? वैसे तेरा कालजा तोह बबिता बिना सूखे है."

"ाहो. एक थाप में छोरा टेल मिलेगा जे ेहसि सोच भी राखी तोह. हाँ बबिता की ालबाद तोह याद आवेंगी हे. फ़ोन तोह करि जे है दिन में 3 बार लेकिन ससुराल है उसकी फेर भी टिकन न लाग ऋ. और अर्जुन महाराज के ज्ञान सुना दे शंकर. छोरा ब्याह के पाछे देख्या हे कोणी और तू 2 बार आ गए हवेली.", सुशीला ने 2 बार आने वाली बात ख़ास तरह से कही थी जिस पर शंकर खिसियाता सा लगा जैसे चोरी पकड़ी गयी हो.

"आज तोह ताई धोरे आया था काम से. तू फ़ोन कर लिया कर अर्जुन ने, मेरे दादके है वो 20 जून तक. वापिस आवेगा तोह तेरे और बबिता से मिले बिना तोह रुके कोणी लेकिन तू ब्याह ते अगले दिन दिखी कोणी?", सुशीला क्या बताती की वो तोह बड़ी मुश्किल से माधुरी के पीछे तक आयी थी और फिर अरमान जागते उस से पहले वो वह से निकल चली. अर्जुन का जीकर खुद हे किया था अभी और फिर से दुविधा चेहरे पर दिखने लगी.

"अर्जुन से दिल लग गया न सुशीला? तेरा भी वो दिल से हे करता है जितना मैंने देखा. और बबिता बिजेन्दर के रूप में बड़े भाई बहिन जो उसके साथ खुल कर हँसते बोलते है. अब तोह ऋचा ने भी झिझकना छोड़ दिया उसके साथ. याद है ऐसे हे तू, मैं, राजू और संजय होते थे बचपन में. संजय ज्यादा तेजी में था जो आज गायब हे हो गया और तेरा कसूरवार मैं खुद हु.", बात अर्जुन के किस्से से अतीत में जाने लगी तोह सुशीला ने थोड़ा हलके हाथ से शंकर के सर पर चपत जड़ दी.

"मेरा कोई कसूरवार न है शंकर और अपनी गलती मान ने की जगह उल्टा मैं हे सबसे नाराज हो गयी. 2 महीने में अर्जुन ने 25 साल भर दिए तोह दिल क्यों न मिले उसके साथ? सच कहु तोह ेब उतना तोह तेरे साथ का टाइम भी याद न जितना इसके साथ बिताया पसंद है. बिजेन्दर ने आजतक किसी के साथ थाली सांझी न करि और अर्जुन के खातिर वो छोरा भी बदल गया जो हर टाइम बस अपनी अकड़ में रहे करता. हाँ बबिता 18 की होती तोह मैं ईंट बजा देती नाना के साथ उसका रिश्ता अर्जुन से करवा के हे रहती. हाहाहा.. गोलू आज केहवे था के बबिता अर्जुन के साथ एक फोटो में थी और न्यू लगे था के या तोह भाई बहिन है या ... रेखा से पूछ के बताइये के खुराक ली थी इसके टेम, फेर बबिता की वा हे शुरू होवेगी.", रेखा का जीकर इस घर में थोड़ा अजीब लगता था लेकिन अब वो होता रहता था कभी ऋचा के मुँह से तोह कभी Anupama-Bijender या खुद चंद्रो देवी के.

"माँ से पूछ लियो साड़ी खुराक. और कपडे बदल ले फेर बबिता से मिलवा ल्यौ तन्ने. तेरी माँ की तबियत थोड़ी ढीली है उम्र और अकेलेपन की वजह से. ग्लूकोस लगा के थोड़ी फीस ले आऊंगा. ऋचा भी चल रही साथ और सोमवार मैं हे ले आऊंगा वापिस दोनों को.", शंकर को सितारा देवी तक की फ़िक्र थी और ये सुन्न कर सुशीला के चेहरे पर एक दिलकश सी मुस्कान आ गयी जिसमे बहिन वाला स्नेह था.

"मैडम चंद्रो देवी सोवे है के? ेब पीहर जाना है तोह बताना पड़ेगा?"

"ताई की बात हो चुकी और उन्हें ये भी पता के तुझे मैं लेके जा रहा. चल तू कपडे बदल ले मैं बहार आँगन में हे हु.", शंकर खड़ा हुआ तोह सुशीला छेड़ने से बाज ना आयी.

"सरगट फूंकनी है या nain-mattakka अपनी उम्म्म लता जी से?", शंकर सर पे हाथ रखता तेज कदमो से बहार चल दिया जहा मधुलता उसकी काली चाय लिए तैयार थी और ऋचा अभी भी सँवारने में जुटी थी, कपडे बैग में रखने के बाद. सुशीला ने दरवाजा बंद करने के बाद वो ढीला सलवार कमीज उतार कर अलमारी का रुख किया तोह दिवार पर टंगे शीशे में अपने बढ़ती उम्र के बावजूद इतने उन्नत और बड़े वक्षो पर नजर चल हे गयी. हर मामले में वो बबिता से 2 इंच काम हे थी लेकिन आज भी पेट पर चर्बी का निशाँ न था. शरीर लम्बा चौड़ा और म्हणत की वजह से 51 की उम्र भी आज तक बरकरा. आइना निहारते हे सर झटकती हुई वो अपने सीने को उस असाधारण सी सफ़ेद ब्रा से ढकने लगी.

'कौन समझाए डॉक्टर को उसके पूत के काण्ड. बेटी के चक्कर में माँ पे चढ़ गया और ऐसा चढ़ा नासपीटा की अब हवेली से बहार निकली तोह खुद गलती करुँगी जो उस से अनजाने हे अँधेरे में हो गयी.', बबिता ने ज्यादा समय न गंवाया क्योंकि ये बुखार उस पर दिन में कई बार चढ़ने लगा था उस अँधेरी मुलाकात के बाद से. वो जल्द हे कमरे से तैयार हो कर बहार निकल आयी थी बबिता के पास पहुंचने के लिए और शंकर सिग्रत्ती के साथ काली चाय ख़तम करके इन दोनों के लिए निकल चला इस हवेली से. मधुलता का दिन नहीं था लेकिन वो नाराज जरूर थी. आखिर शंकर आज यहाँ आया भी तोह अपने भाई के कहने पर था जो खुद उत्तर प्रदेश के उस अनजान शहर पहुंचने हे वाला था ढलते हुए दिन के साथ.

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"नाना जी और मौसी लौट आये है. उठ जाओ अब कितना सोना है?", आँचल ने झिंझोड़ कर अर्जुन को उठाते हुए कृष्णेश्वर जी के आने की जानकारी दी. वो दोपहर 3 बजे दीपा भाभी के घर से लौटा था और अब 6 बजने वाले थे. घर आते हे वो हलके कपड़ो में वातानुकूलन चला कर जो सोया था उसकी आँख अब खुल रही थी. कुछ पल तोह वो बस आँचल के चेहरे को देखता रहा जैसे समझने की कोशिश कर रहा हो की हुआ क्या है. अर्जुन को ऐसे खोया हुआ देख आँचल ने हलके से उसके होंठो पर एक पप्पी करके रही सही नींद भी उड़ा दी.

"ओह पागल हो क्या?", कमरे में कोई नहीं था और दरवाजा भी ढलका हुआ. ये देख कर कुछ सुकून मिला लेकिन अब आँचल उसकी गॉड में बैठी थी.

"हीरो बहोत थके थके से आये थे घर और परसो खुद जब मुझे सत्ता रहे थे तब मैंने तोह नहीं कहा के तुम पागल हो. मच्छर ज्यादा काटे है क्या जो इतना खरोच रखा खुदको?", अर्जुन के सीने पर ये निशाँ दीपा भाभी की दें थी चाहे वो हलके हे सही लेकिन नजर आने लायक थे.

"मेरा वो मतलब नहीं था और ये बौ जी भी लौट आये क्या छोटे दादा के साथ साथ?", अर्जुन ने अब प्रेमवश हे बाहों का घेरा आँचल की कमर में दाल लिया था जो पहले तोह खुश हुई फिर उचक कर कड़ी हो गयी.

"कपडे पहन लो कही खामख्वाह मेरी जैसी हालत किसी और की हो जाए. नाना जी हे आये है मां और मौसी के साथ. आयी तोह अंजलि भी है लेकिन वो तोह जाने इतनी खामोश क्यों रहने लगी. बड़े नाना जी बता कर गए थे की तुम संभाल लोगे बात को इसलिए आयी थी मैं.", अब अर्जुन को देवकी का ध्यान आया जो तुरंत उठ खड़ा हुआ और उसके साथ हे निक्कर में उसका विशाल अजगर सर उठाये. आँचल बड़ी हैरत से देख रही थी उस उभार को और फिर तुरंत पलट कर बहार दौड़ गयी.

'ये लड़की मरवायेगी mujhe..Oh तेरी. भाई तू मरवाएगा मुझे उस से पहले. जब देखो मेरे पहले तू खड़ा हो जाता है.", इस्त्री किया हुआ कुरता पायजामा पहन कर भीतर वाले बाथरूम से हे चेहरा दुरुस्त करके वो बहार निकला तोह पहले रौशनी बुआ से मिला जो खुद बड़ी खामोश तबियत की महिला था, शुरू से हे ऐसी. कृष्णेश्वर जी सेवक से कच्चे आँगन में छिड़काव करवा रहे थे और अर्जुन को देख कर वो उधर हे चले आये जहा तखत और चारपाई बिछी थी. लाली की माँ पहले वह लकड़ी का मेज रख गयी और उनके पीछे हे लाली के साथ अनामिका चची सबके लिए chai-paani और अर्जुन का दूध लेती आयी. दूध अंजलि और आँचल के लिए भी था जो चॉकलेट मिला भूरे रंग का बर्फ से ठंडा किया. विनोद बाथरूम से चेहरा धो कर अर्जुन के हे बराबर आ बैठा.

"आज तुम्हारे कान भी तुम्हारे साथ सो रहे थे भतीजे. लगता है नींद पूरी नहीं हो रही.", विनोद के चर्चा शुरू करने से कृष्णेश्वर जी ने बस कप उठा लिया अपनी बात रोक कर. मुन्ना नाहा चूका था जो रौशनी बुआ की गॉड में खेल रहा था.

"कल की थकान थी चाचा जी जो रात में सही से नहीं गयी इसलिए दिन में सो गया. धुप में करना भी क्या था और घर पे लोग भी नहीं थे. अंजलि दीदी का नौ वाला काम हो गया? और घर का क्या करना है?"

"घर तोह ताऊ जी के कहे मुताबिक किराये पर हे देने लगे है. उन्होंने कहा था के ये सामने के दोनों कमरे रौशनी दीदी और अंजलि बिटिया के होंगे और सामान जितना जरुरत होगी उतना गाडी से मंगवा लेंगे. वैसे भी घर में तेरी चची अब अकेली होगी तोह उसके साथ कोई होना जरुरी है.", विनोद ने चाय का कप उठाने से पहले एक कप अपनी बड़ी बहिन को दिया जो ाची बात थी.

"फिर मूड बना लिया आपने नेपाल में होटल देख कर आने का? उमेद चाचा कह रहे थे की दिल्ली की तरफ जो होटल बनाने वाले है वो आप अकेले देखने वाले हो.", अर्जुन ने सबको आश्चर्य में दाल दिया था ये बता कर जबकि विनोद मुस्कुरा रहा था.

"फिलहाल तोह कल नेपाल निकलूंगा भतीजे और उसके बाद कुमार साहब के साथ उमेद भाई की मीटिंग होने पर हे कोई फैंसला लेंगे लेकिन इतना निश्चिंत है की होटल तोह 5 सितारा वही बनेगा. और अकेला नहीं हु मैं उसमे. इन्दर भैया और राजू भैया भी रहेंगे जिनके साथ पुराने लोग भी. हफ्ते में 2 दिन यहाँ रहा करूँगा और 5 दिन उधर.", विनोद की बात अभी ख़तम हुई थी की संजीदा देवकी के कमरे से निकल कर इधर आती हुई कुछ ठिठक सी गयी इतने लोगो को बैठा देख

"आ जाइये सिस्टर आपको इनके साथ हे रहना है. चाचा जी संजीदा जी को बौ जी ने हे ..", विनोद ने उठ कर नमस्ते करने के बाद खुद हे एक कुर्सी उनकी तरफ बढ़ा दी.

"हाँ वो मुझे भी बता चुके है और ये ाचा किया उन्होंने. बैठिये संजीदा जी और आपकी जो भी जरुरत हो वो साफ़ बता देना ऐसा हाई कमांड का आर्डर है. पापा, कॉलेज में ये नर्स विभाग देखने वाली है और ताऊ जी ने इन्हे अपने हे इधर पक्का किया है. वैसे अब तबियत कैसी है माँ की संजीदा जी?", विनोद ने ये बात ऐसे सरल लहजे में कही थी जैसे उसको कुछ पता हे न हो. अर्जुन नजरे झुकाये मुस्कुरा रहा था जिसको कुछ और नजरे भी देख रही थी. संजीदा तोह खुद थोड़ा असहज हो गयी थी लेकिन अर्जुन ने आखें झपका का आश्वस्त किया तोह उन्होंने जानकारी दी.

"दोपहर में उन्हें दलीय और दूध दिया था मैंने. थोड़ी सी अशांत जरूर है लेकिन ऐसा होना लाजमी भी है जब आपकी आँखों की रौशनी चली जाए और आवाज भी. मेरी पंडित जी से बात हुई थी और उन्होंने हे कहा था के वो इन्हे शिफ्ट करवा रहे है कल जब यहाँ से जाएंगे. समय और सही देखभाल से हे सुधार हो सकता अगर कुछ भी मुमकिन है नहीं तोह ये ऐसी हे रहेंगी या हालत बिगड़ सकती है.", अब बारी थी बाकी सभी के होश उड़ने की और रौशनी के तोह हाथ से हे प्याली निचे जा गिरी जिसको आँचल ने हे अपने साथ लगते हुए धनदास बंधाया. कृष्णेश्वर जी के चेहरे पर आया पीलापन भी किसी से न छिप सका.

"जब हम लोग गए तब देवकी पूरी तरह ठीक थी डॉक्टर. ऐसे कैसे दृष्टि और बोलने की क्षमता जा सकती है? और भैया ने क्या कहा की वो मेरी धर्मपत्नी को ले जाएंगे? ऐसे कैसे ये मुनासिब है.?", अब उन्हें नर्स और डॉक्टर का भी फरक न पता था. लेकिन घर के द्वार खुलने पर उनके बड़े भाई साहब जरूर लौट आये थे सफारी लिए. अब सवाल भी बहोत थे और उनके जवाब देने वाला भी लौट आया था जिसको देख कृष्णेश्वर जी बर्फ से ठन्डे हो गए. पूर्णिमा जी तोह पशुओं की तरफ हे चली गयी गाये को गुड़ देने और अपने ताई ताऊ जी के लिए विनोद ने अर्जुन से पहले दिवार से लगी चारपीआई दाल दी. संजीदा ने भी मौका देख कर बताना शुरू कर दिया

"हेड इंजरी मतलब सर पर चोट लगने का प्रभाव अक्सर मौके पर पता नहीं चलता अंकल. आपने कल उन्हें चलते फिरते देखा था?", अब कृष्णेश्वर हाँ तोह नहीं कह सकते थे क्योंकि देवकी तोह बिस्टेर पर हे थी पूरा समय.

"क्या चर्चा हो रही है भाई? कृष्ण, तुम कब लौटे वह से?", रामेश्वर जी के बोलते हे अर्जुन अपने दूध को ख़तम करने में जुट गया.

"ये डॉक्टर कह रही है भैया की अब देवकी न देख सकती है और न बोल. और अगर ऐसा है तोह शंकर बड़ा डॉक्टर है वो अपनी चची को ठीक न करेगा?"

"देख भाई कृष्ण मैं तोह चिकित्सा में हु शुन्य और शंकर के कहने पर हे मैं देवकी को साथ ले जा रहा हु जिस से उसको उचित देखभाल मिल सके डॉक्टर की निगरानी में. यहाँ वो आज दोपहर तक में बिस्टेर से 3 बार गिर चुकी है तोह खुद सोच की क्या 24 घंटे देखभाल मुनासिब है?", अब खामोश बैठी कौशल्या जी ने हे उनसे पहले अपने विचार प्रकट कर दिए.

"तुम भी चलो फिर साथ अगर देवकी के बिना जी नहीं लगता तोह. यहाँ बहु बचा, घर और ये पशु संभाले या उतना करने के साथ देवकी को भी? और संजीदा नर्स है डॉक्टर नहीं. घर को हॉस्पिटल बनवाना है तोह बाकी सबको बहार रहना पड़ेगा फिर. बड़े डॉक्टर तोह दिन का 20 हजार भी लेंगे इधर मौजूद रहने का और उनके नखरे भी बहु और रौशनी सहेंगी तोह फिर कर लिया काम. देवर जी तुम बात तोह सीढ़ी करती हो लेकिन कहा पर alp-viraam और कहा purn-viraam लग्न है तुम्हे नहीं पता.", कृष्णेश्वर को इस बात का कुछ अधिक हे बुरा लगा था और अर्जुन ने आँचल को इशारे से इधर से कमरे में चलने का कहा, बाकी सबको साथ ले कर. आँचल के साथ अंजलि, संजीदा और अनामिका चची भी उनके कमरे में चल दिए जिसका दरवाजा अर्जुन ने ढाल लिया. अब आँगन में घर के बड़े हे थे क्योंकि विनोद ने सेवक और लाली की माँ को भी उनकी जगह भेज दिया था.

"भाभी अर्धांगिनी है मेरी वो और पिता जी ने हे उन्हें हवेली की जिम्मेवारी सौंपी थी. हाँ वो आप जैसी परिपक्व नहीं है और जुबान की कड़वी भी है थोड़ी लेकिन बात अगर पैसो के हे है तोह उसका इंतजाम भी हो जाएगा. विनोद कर देगा सब प्रबंध लेकिन यहाँ गाँव में पगड़ी सबकी उछलेगी जब ये पता लगेगा की हवेली की करता धर्ता को हे देखभाल के लिए बहार भिजवा दिया गया. मैंने न तोह आजतक भैया से हिसाब किया है और न मैं अब झोली फैलाऊंगा.", कृष्णेश्वर समाज की वजह से ये सब बोल रहा था और रामेश्वर जी के न चाहते हुए भी ये बड़ी बात हो हे गयी जब देवर और भाभी का कड़वा टकराव हो गया.

"कौन प्रमुख है हवेली का? तुमने कितना हिसाब और कहा कहा का दिया है पिछले 40 बरस में ये मुझसे भी नाह छिपा. रही बात गाँव के लोग क्या समझेंगे और विनोद के पैसे की तोह मैं न देने देती इसको एक पायी भी और तुम होंगे इनके लाडले लेकिन 65 बरस के होने पर भी तुम न बाप बन सके न परिवार के संरक्षक. तुम्हारे काले सच वो दबाये बैठी है और तुम उसको सिर्फ इस डर से हे बचा रहे हो. सुनो कृष्ण अबसे न बसी वाली जमीन से तुम्हे वो भाड़ा मिलेगा और न 30 किल्ले पार्ले गाँव की जमीन की आमदन. जो नैतिक तौर पर इनका और तुम्हारा हिस्सा था उसमे से 2/3 जमीन तुम बेच चुके हो जिसका आधा भी विनोद और इसकी बहनो को न मिला जिन्हे तुमने वो जमीन बेचने का कारण बताया था. बहोत लगाव है न तुम्हे एक ख़ास नाम से तोह अगर वैसा कुछ दोहराया तोह अपनी बीवी की बगल में मिलोगे, इस बात को दिमाग में बैठा लेना. खेत सँभालने का दिल करे तोह ाची बात है नहीं तोह आराम से रहो यहाँ. सवाल नहीं करने वाली मैं तुमसे अगर कोई गलती न दोहराओ तोह. चल रौशनी बिटिया तू भी कपडे बदल ले और थोड़ा आराम कर. माफ़ करना तेरे सामने वो सब कहना पड़ा.", कौशल्या जी अपनी भतीजी को साथ लिए अपने कमरे में चली गयी जहा पूर्णिमा जी पहले से थी. कृष्णेश्वर के तोह चेहरे पर 12 बज चुके थे शाम के साढ़े 6 बजे हे और विनोद भी अंगड़ाई लेता हुआ खड़ा हो कर बहार की तरफ चल दिया, अर्जुन की रानी लिए.

"तुम्हे लगता है आज तुमने सही सवाल उठाया कृष्ण? देवकी पर कानूनी कार्यवाही होती तोह 2-3 जनम लेने पड़ते सजा पूरी करने के लिए और तुम्हारी भाभी जाने कौनसा तुम्हारा ऐसा सच जानती है की आज उसने हमारी भी परवाह नहीं की. वो 30 किल्ले तुम्हे इसलिए मिले थे की विनोद और दोनों बेटियां अपना हिस्सा खर्च भी कर दे तोह तुम्हारे खाते में हमेशा उचित पैसा रहे लेकिन तुम्हारे खाते में से व्यक्तिगत तौर पर पिछले 3 बरस में 70 लाख रूपया निकला है. पूरी आमदन में भी देवकी को अलग से 5 प्रतिष्ठित मिलता था जिसके खाते में आज की तारीख पर एक नया पैसा नहीं है. अब अपनी गर्दन मैं खुद काट लू या ये नेक काम भी तुम करोगे?", जब दोनों भाई हे यहाँ बचे थे तोह रामेश्वर जी ने ठंडी आह भरते हुए ये एक और कला सच कृष्णेश्वर के सामने रख दिया. कृष्णेश्वर के तोह हाथ जुड़ चुके थे और चेहरा 115 के कोण पर झुका हुआ.

"हम गड़े मुर्दे नहीं उखाड़ रहे कृष्ण क्योंकि वैसा करने पर हमारी हे पीड़ा बढ़ेगी लेकिन वर्तमान का सच भी देखा जाए तोह तुम आभार मनाओ अपनी भाभी का जिसने तुम्हे बक्श दिया. वो हमारे हृदय और तुम्हारे साथ हमारे स्नेह की कदर करती है कृष्ण लेकिन ये दोहरा जीवन जो तुम जी रहे हो इसको तत्काल बंद कर दो. हमारे पिता जी का नाम तुम्हे उनकी इस भूमि पर रह कर बढ़ाना था जबकि वो जिम्मेवारी चौपाल और सरपंच के साथ पूरा गाँव उठा रहा है, हमारे तुम्हारे बिना. अब उसको बढ़ा नहीं सकते तोह काम से काम बरकरार रखना हे बहोत होगा. थोड़ा सोचना और तुम्हे लगे की पलट कर जवाब देने से तुम सही साबित हो सकते हो तोह फिर तुम्हारी मर्जी. मिल लो देवकी से, मैं जरा लाला की तरफ जा रहा हु. वो लोग कल की तैयारियां देख रहे है जिनका तुम्हे भी पता नहीं होगा.", जाते जाते आज रामेश्वर जी भी ये टिप्पणी कर गए थे और व्यथित मैं के साथ अब कृष्णेश्वर को घबराहट भी हो रही थी. पाँव देवकी की तरफ बढ़ना चाहते थे लेकिन उस से पहले अपनी भाभी के कमरे का इल्म था उन्हें जिनके साथ आज आवेश वश वो कुछ ज्यादा हे गलत तरीके से पेश आये जबकि वो चाहती तोह सचमुच कृष्णेश्वर hathkadi-bandh होता.

"पानी पी लीजिये छोटे दादा जी और वो आपकी भाभी है कोई गैर नहीं. दादा जी भी गलती होने पर माफ़ी मांग लेते है और आप तोह सही सलामत है जबकि मैं आपकी जगह होता तोह दादी माफ़ी तोह दूर मुझे घर के आसपास न रुकने देती.", अर्जुन ने ठन्डे पानी का गिलास उन्हें देते हुए खेलघर का रुख किया जहा आज वो थोड़ी कसरत करने की सोच रहा था. प्लास्टिक के लिफाफे में अपने अभ्यास के कपडे लिए वो आज अलग हे जोश से भरा था. शायद अपनी दादी की वजह से या दिन वाली कसरत.

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इधर एक अलग हे प्रदेश के ख़ास हिस्से में नरिंदर कुछ ज्यादा हे लम्बा सफर करके पंहुचा था. इस मामले में वो अपने भाई से भी कुछ बेहतर था जिसको जैसे थकान का असर नहीं था चाहे दिन से रात हो जाए या फिर अगला दिन. पूर्वांचल के इस हिस्से में एक thik-thaak सा होटल देख कर गाडी कड़ी करता वो भीतर आया तोह होटल के रिसेप्शन पर बैठा युवक भी ऊंघ रहा था जैसे ये धंदा इधर कुछ ख़ास न हो. नरिंदर द्वारा उसका मेज ठकठकाने पर वो ुनिन्दा सा हे बोल उठा.

"3 घंटे का 300 और रात का 1000. लड़की ने लफड़ा किया तोह वो मामला तुम देखोगे."

"ओह मेरे भोले बालम. प्यारे हम यहाँ अकेले आये है और 2 दिन रुकने के साथ ाचा भोजन भी चाहते है. और फिलहाल तोह कमरे में जाते हे नहाने का इरादा है.", अब वो युवक उठ खड़ा हुआ इस आकर्षक व्यक्ति को कोहनी तक ास्तें चढ़ाये और चेहरे पर मुस्कराहट लिए देख. नरिंदर व्यक्तित्व के मामले में अपने समकक्ष सभी भाइयों से कही ज्यादा प्रभावित करता था जिसमे सभी की अपनी विशेषता थी लेकिन उम्र का प्रभाव सबसे काम इस व्यक्ति पर हे था. हमेशा चेहरा साफ़ रखना और बाल एक सार से ठीक विनोद खन्ना की तरह.

"सर, हमारी होटल में सिर्फ 2 हे कमरे है जिनके साथ बाथरूम की वयवस्था है. एक तोह मालिक का है और दूसरा 800 रुपये एक रात. वो तोह इधर सैलानी आते है जिनको अपना मजा करना होता है तोह कोई भी कमरा दे देते है लेकिन हर मंज़िल पर 4 बाथरूम और 4 टॉयलेट बने है. हाँ खाने का ऐसा है की होटल में तोह सिर्फ दारु का सामान मिलता है लेकिन सामने ढाबा 24 घंटे चलता है जिसका आहना मटन और खमीरी रोटी चम्पारण से भी बढ़िया मिलेगी. आप जब कहेंगे मैं खुद हे हाजिर हो जाऊंगा आपका आर्डर ले कर.", युवक देखने से गढ़वाल की तरफ का था लेकिन पढ़ा लिखा और जीवन के प्रति सकरात्मक. नरिंदर ने 500 के 4 नोट निकाल कर उसके सामने रख दिए.

"1600 2 दिन का भाड़ा दोस्त और 400 तुम्हारी एडवांस टिप. बहार काली कॉन्टेसा कड़ी है उसको देख लो कहा लगाना है. कमरा दिखा दो बाकी दारू मीट का बता कर तुमने मुझे खुश कर दिया.", अब इतनी बड़ी टिप की आशा तोह उस युवक को सपने में भी नहीं थी लेकिन नरिंदर के अंदाज से वो सम्मोहित होता हुआ खुद हे बैग उठा कर आगे चल दिया हाथ में चाबी लिए.

"थैंक यू सर. यहाँ तोह कस्टमर 200 रुपये का भाड़ा देने के लिए मच मच करता जब 2 घंटे का बताता हु तोह. आप पहले आदमी है जिन्होंने मुझे टिप दिया इसलिए एक टिप मेरी भी ले लीजिये. ये पूरा क़स्बा अफीम खान का है मतलब उसका नाम तोह तौफीक खान है पर धंदा अफीम का है जिस वजह से नाम यही पड़ गया. आपकी गाडी उसको पसंद आयी तोह वो कल उसके घर कड़ी होगी. यहाँ कुल जमा 1600 दुकाने, ढाबे और फड़ी लगती है जो नियम से अपना हफ्ता अफीम खान तक पहुंचते है. और सिर्फ यही क़स्बा नहीं ऐसे 10 कसबे और 2 शहर उसके निचे है. पते की बात बता रहा हु की दूकान वाले से जुबान लड़ाओ, रेहड़ी वाले या आम नागरिक से लेकिन अफीम खान के किसी आदमी से टकराना नहीं, गलती से भी. और वो har-taraf मिल सकते है. वैसे उसका धंदा विलायती शराब और लड़कियों का भी है लेकिन आप समझ हे गए होंगे की वो कितना ताक़तवर इंसान है? पुलिस और प्रशाशन भी उसके साथ है तोह हर तरह के काम में उसका बराबर हिस्सा रहता. आप किसी हीरो जैसे लगते है और आये भी अकेले हो इस छोटे लेकिन भारी बैग के साथ. चलता हु सर ये आपका कमरा है और बाथरूम में साफ़ टोलिया, साबुन शैम्पू सब मिलेगा. 11 नंबर मिला दीजियेगा जब भी कुछ जरुरत हो.", किसी बैरे की तरह सलाम मारता हुआ वो युवक अपना रेडियो बंद करता हुआ उस साफ़ सुथरे कमरे को खोल कर वापिस चल दिया. बैग एक तरफ सोफे के सामने लगे टेबल पर रख दिया था उसने.

'ये बावली गांड विष्णु पक्का इस अफीम खान को हे ठोकने आ रहा है. बताया तोह कोई बाहुबली था अब ये तोह लगता है कई बाहुबली का बाप है जिसके साथ पन्गा लिया. और ये लोंदा भी काम का है जो पैनी नजर रखता है. चल बीटा विष्णु तुझे तेरे हे अंदाज में तारे दिखता हु. जाल तेरा और शिकार मेरा.', दरवाजा बंद करके नरिंदर ने अपने जिस्म से सभी वस्त्र उतार दिए थे. वो ऐसे हे बाथरूम में घुस कर फुहारे के निचे जा खड़ा हुआ और तबतक खड़ा रहा जबतक घडी ने 20 मिनट न गँवा दिए. दरवाजे के दूसरी तरफ बजती घंटी से नरिंदर जैसे वर्तमान में लौटा और कमर पर टोलिया लपेट भीगे बदन हे वो दरवाजा थोड़ा सा खोल कर बहार देखने लगा.

"सर आपके चाहने वाले शायद इधर बहोत है. एक छोटा सा लड़का ये दे कर गया है और बोल गया की इंदरजीत को दे दीजिये, कमरा नंबर 101 वाले को. मैंने तोह अभी तक आपकी एंट्री भी नहीं करि और होटल में बस यही कमरा बुक है अभी.", युवक ने वो बंद लिफाफा देने के साथ हे 555 की सिग्रत्ती की डब्बी भी नरिंदर की तरफ बढ़ा दी जो शायद उसका ब्रांड नहीं था लेकिन उसको लेते हे चेहरे पर आयी ख़ास चमक बहोत कुछ बयान कर गयी.

"धन्यवाद. और वो सचमुच मेरा भाई है जो बहार तक मेरे साथ था बस तुमने देखा नहीं. यहाँ खिड़की से मैंने हाथ हिला दिया था उसको. एक प्लेट मटन, खीरे और प्याज का सलाद, 2 गिलास, सोडा और वैट 69 की बोतल भिजवा देना बस. रुको पैसे लेते जाओ.", मेज पर रखे बैग की जेब से हे 500 के 3 नोट युवक को देते हुए नरिंदर ने आँख मारते हुए विदा किया. दरवाजा फिर से बंद था और बिस्टेर के किनारे बैठ कर वो कागज खोला तोह पहली पंक्ति पर हे हंसी आ गयी.

'तोह अंडकोष की एक हे गोली पधारी है विश्वजीत की तलाश में? चलो दूसरे ने समझदारी दिखाई जो मेरे काम में टांग अड़ाने से बचा. अब तुमने गलती करने का विचार बना हे लिया है तोह भला हम नारायण अवतार क्या करे? अरसा हो गया तुम्हे पटखनी दिए हुए लेकिन पहले हे बता देता हु की अब हाथ से दिल ज्यादा सख्त है तोह लौटना चाहो तोह भलाई होगी. जानता हु की तुम वो अड़ियल खच्चर हो जिसने नाल भी नहीं पहन नई और दुलत्ती मारने से भी नहीं हटना. मेरे काम के बीच अपना कानून मत लाना अफसर. हाँ दोस्त की तरह मिलना चाहो तोह कभी सोनागाछी में प्रभु विश्व पूछ लेना. बढ़िया मछली के साथ संदेश खिला कर गले लगूंगा. रास्ते अलग हो तोह हालात से समझौता कर लेना चाहिए एक पारिवारिक इंसान हो. मैं इंसान नहीं रहा और अगर अभी भी तुम पीछे आने वाले हो तोह अपनी हालत के जिम्मेवार तुम खुद होंगे. मकसद आज भी वही है और हमेशा वही रहेगा बस कानून से जरा 72 का आंकड़ा है मेरा, ऑफिस नरिंदर शर्मा. धुंआ काम उड़ाना और आहना खाये बिना गए तोह सफर बेमजा रहेगा.

तुम्हारा शुब्चिन्तक प्रभु

विष्णु वर्धन'

"तेरी माँ को प्रणाम करू बे. तू क्या सोचता है मैं टांग अड़ाने से पीछे हटूंगा? ऐसा पेलुँगा न की तू खुद गले लगेगा मेरे और आहना तोह तेरे साथ खाऊंगा, अभी बेहोश नहीं होना चाहता. दोस्त, कानून की तरह आना होता तोह तुझे 10 बार थोक चूका होता, भाई की तरह आया हु घर लेने तोह लेके हे जाऊंगा. और तू तेरा हाथ पिछवाड़े में रखना क्योंकि मुझे पटखनी देने के लिए तुझे उनकी जरुरत पड़ेगी पर मैं वो बांधने वाला हु मिलने से पहले. तेरा अफीम खान और तेरा हुम्ला करने की जगह कल से हे मेरी नजर में है. मिलते है सवेरे समय से पहले, मेरी जान झांट के बाल.", नरिंदर ने पहले पैकेट को जांचा और फिर प्लास्टिक हटा कर एक 555 सुलगा ली. भीगे बाल झटकता वो जैसे अब कॉलेज में होने वाले मल्ल्युद्ध से पहले तैयार हो चूका था.
 
अपडेट 209

हमकदम (2)

गाँव की हवेली पर मौजूद चारो हे पुरुष कुछ देरी से दाखिल हो रहे थे जिनमे सबसे पहले विनोद और रामेश्वर जी हे पहुंचे तक़रीबन साढ़े 8 और उनके 5 मिनट बाद आये कृष्णेश्वर जी ने सबसे पहले अपनी बड़ी भाभी से हाथ जोड़ कर क्षमा मांगी, ये भी परवाह किया बिना की उधर बाकी कई लोग मौजोदड है. विनोद ने इस दृश्य को देखते हुए खुद हे अपने पिता के लिए हुक्का त्यार करके उसमे अलाव और तम्बाखू भर दिया.

"कृष्ण बात माफ़ी की नहीं है और सच कहु तोह मुझे तुमसे कभी कोई परेशानी नहीं हुई. जैसा माहौल मिलता है अक्सर वैसी हे सोच बनती जाती है. तुम्हारे पिता जी ने सबको जीवन का सार समझाया लेकिन इनके साथ वो जाने किस वजह से उन्मुक्त नहीं हुए और तुम अपनी अलग दुनिया में खुश थे. दुर्घटनाओं भरा अतीत हो तोह गेहूं के साथ घुँण पिस्ता हे है और तुम्हारे भी सामने है उस अतीत का वो कड़वा सच जो कल अखाड़े के बाद फिर देवकी के रूप में दिखा. वजह थी और उसके जिम्मेवार भी थे चाहे उनमे बेक़सूर हो, वीर या धूर्त लेकिन जाने अनजाने बहुतो ने सहा झेला लेकिन तुम्हे इनका हमकदम बन्न न चाहिए था और हम बेहतर तभी होते है जब हम खुद ऐसी चाह रखे. राजपरिवार से इन्होने सिद्धांत और असूल ले लिए जबकि तुम्हारे हिस्से में सिक्के का दूसरा पहलु आया जिसके जिम्मेवार सारंग, माँ जी और तुम स्वयं हो. ये तुम्हारा घर है कृष्ण, हम सबका घर जहा मैंने इनके साथ 7 फेरे लिए थे. सोचो क्या मेरी कुछ चाहत नहीं होगी जब एक भरे पूरे परिवार से मैं एक कमरे की कुटिया में जा बसी? इन्होने न रघुवीर से एक रूपया लिया और न यहाँ से पर जो आशियाना आज है वो 30 साल में पूरा हुआ. तुम्हारे पास सबकुछ होते हुए भी तुमने आधी म्हणत भी न की अपने छोटे से परिवार को जोड़ कर रखने में. अब तुम अतीत में जाओगे तोह वह दृश्य बदल चूका होगा इस सच को जान लेने के बाद. वह सरल और एकाकी जीवन वाला कृष्ण नजर नहीं आएगा बल्कि अपनी जिम्मेवारियों से भाग कर खेत खलिहान में छिपा एक ऐसा मुखिया होगा जो दर्द से उबरने की जगह उसमे हे जीना चाहता है. जिसके अपराधी सभी है लेकिन क्या वो सच है देवर जी?", कौशल्या जी ने खाट पर अपने देवर की बगल में हे बैठते हुए आज जो जीवन का सार समझाया तोह कृष्णेश्वर की बूढी आँखों से 2 आंसू कच्चे फर्श पर टपक गए. अपन चेहरा साफ़ करते हे उन्होंने अपनी बड़ी भाभी से वो पानी का गिलास लेते हुए सूखे कंठ को टर्र किया.

"मैं बस जीवन में सबसे आसान कार्य हे ढूंढ़ता था भाभी और वो न मिलने पर हर नजर से बचता हुआ खुद के बारे में हे सोचता. मेरे ब्याह की उम्र न थी लेकिन भैया के साथ साथ मुझे भी अग्नि के सामने ला खड़ा किया. गलती हुई थी मुझसे लेकिन वही उठती नजरो के डर से मैं छिप गया. देवकी मेरी कमजोरी ब्याह से पहले हे जान गयी थी जिसने मुझे आजतक आजाद न किया था. अपराधबोध से ग्रसित मैं आज आप पर हे चिल्ला उठा जो मैं सपने में भी नहीं कर सकता. भैया ने तोह सबकुछ खोने के बावजूद जीवन को नयी शुरुआत दी लेकिन मैं.. मैं बस बचता रहा. अर्जुन का शुक्रिया कहने की जगह मैं बस दुआ करता रहा के वो मुझे देवकी से मुक्ति दिलवा दे लेकिन ये भूल गया की वो पिता जी जैसा दीखता हे नहीं ठीक वैसा है. वो अगर विनोद के साथ साथ देवकी के भी पीछे है तोह मैं कैसे बचा रहता उस से.? लेकिन आपकी ये परवरिश पहले जैसे नहीं है. ये सिर्फ सुधार में यकीन रखता है जिसने मुझसे बस इतना हे कहा के मैं तोह भैया की जिम्मेवारी कभी था हे नहीं बल्कि आप ने लिया था मुझे मेरी माँ से. भैया बहोत पहले मुझे सजा देने वाले थे जब इन्हे मेरी सबसे बड़ी असलियत पता चली थी और उसके संस्कार तक पे मैं ब्याह की ख़ुशी में लीं रहा. गुनेहगार तोह मैं आपका हु भाभी क्योंकि माँ का फ़र्ज़ आप हे निभाती रही इनसे मुझे बचते हुए.", अब रामेश्वर जी की भी थोड़ी आँखें भीग चुकी थी क्योंकि ये एक कटु सत्य था और उनके हाथो परिवार का सबसे पहला व्यक्ति सवयं उनका भाई हे था जो बचा और उसके बाद बाकी.

"छोड़ इन सब बातों को अब. तुझे तेरी गलतियां समझ में आ गयी है तोह उनका प्रायश्चित कर बस. जब इंसान अंतिम सांस लेता है तोह वो दुनिया भूल चूका होता है लेकिन खुदको नहीं. उस समय पर तुम्हे लग्न चाहिए की जीवन अगर गलत बिताया तोह उसकी भरपाई करने की भी कोशिश की. बहार की कोई सजा इंसान को नहीं बदल सकती कृष्ण क्योंकि वो सुधरता सिर्फ अपनी सोच से है. और अब कोई माफ़ी नहीं मांगनी तुझे किसी से. विनोद बात देख रहा के कब उसके पापा हुक्का गुदगुदाते हुए चाय की आवाज देंगे जो बहु बना के ला चुकी है. कर लो जी आप में chai-paan और 2 घडी अपने भाई से बात. बिनोद, ये तेरा भतीजा ऐसे हे गायब रहता है क्या हर रोज?", यहाँ अर्जुन का जीकर हुआ तोह कौशल्या जी के करीब हे कड़ी अनामिका चची ने सबसे पहले न में सर हिला दिया.

"6 से 8 लेकिन आज पता नहीं ये कहा रह गया."

"ताई घर पे है भी क्या उसके करने को और जब होता है तोह कुछ न कुछ ठोकता peet-ta रहता है. वैसे वो जग्गी, निहाल और शहीद के साथ हे बैडमिंटन खेल रहा था जब मैं उधर से आया तोह. पहले कसरत कर रहा था जितना मुझे जुग्गी भाई साहब ने बताया. उसमे मेरे वाली गलत आदते नहीं है और इधर उधर बेमतलब नहीं भटकता. अनामिका, देख अगर ice-cream जम्म गयी हो तोह फिर भांजियों के साथ साथ इस लाली को भी दाल दे.", लाली बर्तन उठाने आयी थी इधर और ice-cream के नाम से खुश हुई तोह उसकी कलाई कौशल्या जी ने पकड़ ली.

"Ice-cream तोह मिलेगी लेकिन कान भी खिंच दूंगी जो फिर से ऐसी भूल की. अनामिका, ये लड़की 8 बजे के बाद तेरे कमरे में टीवी देख सकती है पर रसोई की तरफ न दिखे. कल समझाया भी था इसको लेकिन पता न क्या फिरकी फिट है. चल दौड़ जा और मैं कर लुंगी ये सब.", लाली नौटंकी से कंधे उचकती हुई वापिस उधर हे चल दी जहा बाकी लड़कियां और संजीदा टेलीविज़न देख रही थी. सब्जी का जिम्मा आज खुद पूर्णिमा जी ने लिया हुआ था जिनके साथ अब कौशल्या जी जा बैठी थी रसोईघर में. लाली की मा ने देवकी को भोजन करवा दिया था और बाथरूम ले जाने के बाद अब दवा दे कर उसका कमरा बंद करके वो पशुओं को देखने गयी थी. रामेश्वर जी ने भी मुद्दे से अलग कल के बारे में अपने भाई और भतीजे से चर्चा शुरू कर दी. 9 बजने हे वाले थे जब उनके सामने पसीने में लथपथ अर्जुन घर में दाखिल हुआ.

"खोते, तू हुन्न आ रहा?"

"ओह बौ जी आप भी तोह आधा घंटा पहले हे आये हो जबकि मैं तोह कसरत हे कर रहा था. वैसे आपने छोल दादा जी को भी फ़ोन न किया जबसे वो गए है.", जूते एक तरफ उतार कर वो अपनी भीगी टीशर्ट तार पे डालता हुआ निक्कर पहने हुए हे खाली छपाई पर आ बैठा. जिस्म की हर मांसपेशी पसीने से चमकती हुई उसके तगड़े उभार दर्शा रही थी जिन्हे कुछ पल तोह रामेश्वर जी ने भी निहारा. उनका ये पौता सचमुच असाधारण था इस मामले में और उसकी म्हणत भी उतनी हे थी ऐसे शरीर को बेहतर बनाये रखने के लिए. चची ने पसीना सूखने के लिए छोटा टोलिया उसको थमाया और बड़ा टोलिया अंगोछे के साथ तार पर दाल दिया जिसका मतलब था के अर्जुन वही बैठ कर नहाने वाला है.

"तोह तूने मिलाया होगा फ़ोन उधर और बात गलती से सतीश से हुई होगी?", रामेश्वर जी ने प्रीती का नाम लिए बिना हे अर्जुन की खिंचाई कर दी जिस पर वो सर झटकता हुआ अपने चेहरा और बाहें पौंछने लगा. विनोद कभी खुदको तोह कभी अर्जुन को देख रहा था. वो औसत सा इंसान था और उसका भतीजा विशालकाय होने के साथ इतना आकर्षक की हर स्त्री ऐसे व्यक्ति के पहलु में रहना चाहे. बस वो अपने मैं की मैं में लिए मुस्कुराता रहा.

"किया तोह पहले घर पे था और वह से पता चला की माँ रोमिला आंटी की तरफ गयी है चची के साथ. परसो प्रीती के पापा ने वापिस जाना है न तोह मदद कर रही थी उनकी. रेणुका बुआ ने बताया के आपका तोह फ़ोन भी नहीं आया उधर जबकि विवान अंकल ने आपसे मिलना भी था. देख रहा हु की गाँव आ कर आप लापरवाह होते जा रहे है थानेदार साहब जबकि मेरी दादी इधर भी रसोई में लगी है आपकी सेवा में.", अर्जुन ने ये तीर जानबूझ के चल्या था जब उसने देखा की दोनों दादी अभी बहार आ रही है. उसकी आवाज उन्होंने साफ़ साफ़ सुनी थी और अब बारी रामेश्वर जी की थी बगले झाँकने की.

"ये तोह बीटा तू मुझसे पूछ. अभिषेक के घर भी चौपाल लगा के बैठ गए थे अपने किस्सों कहंयीओं की और इधर भी अभी तेरे से पहले हे वापिस आये है. वैसे फ़ोन तोह तेरे लिए भी 3-4 आये है आज शाम में हे. बबिता का भी आया था जिसके साथ सुशीला ने भी बात की और फिर मेनका कोई इंटरनेट वाली मेल के बारे में बोल रही थी. हाँ कल तुझे अमृता को लेने जाना है महल. कुमार और उसकी माँ तोह किसी इमरजेंसी की वजह से दिल्ली निकल गए आज. वैसे तेरी खुराक बदलनी पड़ेगी थोड़ी.", मेनका से अर्जुन समझ गया था के वो मंजू हे उसके मजे ले रही होगी और सुशीला बुआ का नाम सुन्न कर वो थोड़ा सा झेंप गया था क्योंकि एक सच उसको बाद में पता चला था और अब उनका सामना करने में दिक्कत होने वाली थी.

"ये राजकुमारी साहिबा खुद भी तोह आ सकती है दादी? वैसे खुराक तोह अब जा कर झेलने लगा था और आप फिर कुछ नया और इस से कड़वा बना डौगी. यही रहने दो न जब इसका असर इतना बढ़िया हो रहा है. जब घर आया था न हॉस्टल से तोह 6 फ़ीट का था और आज में 3 इंच बढ़ चूका हु. ऊपर से अब तोह कमीज टीशर्ट तक फंस जाती है. कुरता फट भी गया काख से मेरा आज.", अर्जुन की बात और ये खुराक सुन्न कर विनोद भी खामोश न रह सका.

"ताई ऐसी कौनसी खुराक दे रही आप इसको जो ये कद खींचने के बाद भी बढ़ रहा? वैसे इसकी टक्कर का शरीर तोह इन्दर भैया का भी नहीं है. मैंने टीशर्ट पहन के देखि इसकी तोह कमर से पौन फ़ीट निचे गयी और ऐसे लग रही थी जैसे 10 साल के बालक को उसके बाप के कपडे पहना दिए हो. वो काले से लड्डू खुराक है क्या?"

"हाहाहा.. इन्दर और शंकर की खुराक साधारण लगती क्या तुझे? एक बिलांत पराठे खा जाते दोनों और साथ में paav-ser माखन एक जग लस्सी. अर्जुन 2 दिन में न खा सकता उतना और इसका शरीर बढ़ तोह अपने आप रहा है लेकिन उस खुराक से ये हर तरफ से बराबर रहेगा. हाँ हर शरीर न झेल सकता इसको, इन्दर भी नहीं. बाकी इसकी गर्मी का बचाव भी कसरत और बादाम का दूध है नहीं तोह ये भी जवाब दे चूका होता अब तक. निकेतन को सर्दी गर्मी की आदत पड़ने दियो बड़ा होते हुए और मिटटी में खेलेगा तोह शरीर बेहतर रहेगा. और तू ये समझ ले अर्जुन की जब ये खुराक अपनी क्षमता दिखा दे तोह उसके बाद इसको बदलना जरुरी है. जेठ (गर्मी का महीना) ख़तम होते हे 3 महीने की अगली खुराक शुरू कर दूंगी तेरी और बस उसके बाद 3 महीने सर्दी के अगली खुराक और फिर कोई जरुरत नहीं.", अर्जुन हैरान था के उसकी दादी ने तोह अगले 6 महीने का पहले से सोच रखा है और वो उसके शरीर को देख कर हे परिणाम बता देती है.

"एक साल का हे कोर्स है क्या दादी?", वो उठ कर मोटर का बटन दबाने के बाद ठन्डे पानी की धरा के निचे जा बैठा. शरीर से पसीना तोह चला गया था लेकिन मिटटी और दुर्गन्ध हटाने के लिए ऐसे पानी की सख्त जरुरत थी.

"10 महीने का और फिर कमी लगी कुछ तोह 6 महीने और पर लगता नहीं नौबत आएगी उसकी. हाँ साधारण खुराक तू बढ़ा ले थोड़ी. जोगिन्दर ने बताया था के तेरा वजन 85 था और कद के मुताबिक 90-95 जरुरी है."

"मैं 5 किलो काम करने में लगा हु दादी और आप बढ़ाना चाहती हो. वैसे कोच साहब से याद आया की मुझे आगे भी बॉक्सिंग हे करते रहना है या खेल बदलना पड़ेगा?", अर्जुन देख अपने दादा जी की तरफ रहा था जो हामी भर रहे थे.

"टाइम टेबल बना रहेगा तेरा अगर स्टेडियम जाता रहेगा तोह. स्कूल शुरू होने के बाद पढ़ाई तोह तेरी ऋतू के हिसाब से हे चलेगी लेकिन खाली समय में तू बिस्टेर तोड़ने से हटेगा नहीं. हाँ बॉक्सिंग नहीं खेलनी तोह कुछ और शुरू कर देना लेकिन तुम ाचा खेलते हो और कॉलेज जाते समय ऐसे खेल के प्रमाण पत्र रहेंगे तोह तुम अन्य गतिविधियों में शामिल रहोगे. शंकर ने कुश्ती के साथ मुक्केबाजी हमेशा राखी थी और फिर कॉलेज में चुनाव किया तोह मुक्केबाजी का जबकि वो कुश्ती में कमतर नहीं था किसी से. खेल जीवन का मार्गदर्शन करते है बीटा और उनसे शरीर भी ठीक रहता है. थोड़े समाज में घुल मिल कर रहोगे तोह तुम्हे ाचा लगेगा. भगवान खाना लगवा दो फिर सोया जाए. सवेरे काम करके फिर घर भी निकलना है समय से.", अर्जुन भी अंगोछा लपेट कर जिस्म पौंछने लगा था और रसोई में रोटी पकने का काम अब रौशनी और अनामिका करने लगी. अर्जुन मैले कपडे धोने की जगह दाल कर अपने कमरे में चल दिया जहा आँचल दबे पाँव पहले हे जा बैठी थी इन सबको व्यस्त और अर्जुन को नाहटा देख.

"आज रात तुम यही सोने वाले हो?", अर्जुन अंगोछा खोलने हे वाला था की दरवाजे की आउट में कड़ी आँचल की आवाज सुन्न कर सकपका सा गया. ये लड़की सचमुच दिलेर ये थी या बेवकूफ लेकिन अभी वो इस कमरे में थी जहा सिर्फ अर्जुन था ऐसी हालत में की कोई देख ले तोह बात सम्भालनि मुश्किल हो जाए.

"ये दादी का कमरा है दीदी और दरवाजा खोल दो प्लीज. मैं बहार हे सोने वाला हु आँगन में.", अर्जुन की बात मान ने से पहले आँचल ने उसके हलके से नम्म जिस्म को पीछे से बाहों में भर लिया. वो भी असहाये हो चली थी अपने दिल के हाथो और अब सामने से उसके द्वारा हे उन्मुक्त पहल करना अर्जुन को भरी पड़ने लगा. वो अछूते पके कंधारी अनार से भी बड़े वक्ष और उनकी नरमी अपनी पीठ पर महसूस करता अर्जुन भी खामोश हो गया. आँचल ने अपने नरम हाथ उसकी पेट पर उभरी मांसपेशियों से ऊपर ले जाते हुए उभरी कठोर छाती की फाड़ो पर दबाये तोह उसकी पकड़ कुछ ज्यादा कस चुकी थी. माधुरी सामान उम्र की ये भरी पूरी युवती पहले जितना इस सबसे दूर थी, अब उतनी ज्यादा वो तड़प रही थी. अर्जुन ने घूम कर उसको अपने आगोश में ले लिया. दोनों हाथ बहार की तरफ उठे नरम कूल्हों पर दबाते हुए झुक कर एक गहरा चुम्बन देता वो अलग हुआ तोह आँचल इस रिश्वत से मान चुकी थी.

"छत पर नहीं सो सकते?"

"फिलहाल एक रात की तोह बात है. फिर जहा कहोगी वह सो जाऊंगा और जैसे कहोगी."

"धत्त.. सॉरी थोड़ा अजीब सी हालत हो रही थी मेरी. खाना मैं मामी वाले कमरे में हे लगा रही हु तुम्हारा, मेरा और अंजलि का. सिस्टर तोह मामी और माँ के साथ हे खाने वाली है.", आँचल के जाते हे अर्जुन ने कपड़ो का ध्यान किया. अंगोछे का अगला हिस्सा उठने लगा था.

'मान जा रे मान जा. दादी की खुराक सबसे ज्यादा तुझ पर हे असर कर गयी जिसका उन्हें भी नहीं पता. पता नहीं दीपा भाभी की क्या हालत होगी, तेल के बिना हे कर दिया था उनके साथ तोह मैंने. और ये आँचल दीदी अलग जान लेने पर तुली है.', दीपा भाभी का ख़याल आते हे वो झटपट कपडे पहन कर विनोद वाले कमरे में आ बैठा. भाभी के पास जाने का उसका उसका भी बड़ा दिल था लेकिन ऐसा मुमकिन न था फिलहाल. लाली फर्श पे बैठी मजे से ice-cream खाती हुई ये फिल्म देख रही थी जहा उसका साथ देने के लिए बिस्टेर पे तक लगाए आँचल और अंजलि भी थी. अर्जुन सोफे पर लम्बा पसर कर इनके साथ शामिल हो गया. अक्सर उसके घर पे ऐसे समय में ऋतू या अलका सबसे बचती बचती अर्जुन ने अठखेलियां करती थी. सोफे पर लेती कोमल दीदी को भी तोह पहला चुम्बन अर्जुन ने टेलीविज़न के सामने हे किया था. ये सब सोचते सोचते उसने आँखें मूँद ली.

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"आप आज सारा दिन दिखाई हे न दी भाभी. माँ भी कह रही थी की शाम को आप गुरुघर भी नहीं आयी.", दीपा भाभी के घर जसलीन के साथ सुखजीत आयी हुई थी, साग ले कर. जसलीन ने आज इधर हे रुकना था जो भाभी के आग्रह पर निश्चित हुआ था. रोटी का बर्तन लिए वो इन दोनों के साथ अपने कमरे में आ बैठी क्योंकि दोनों बहने बिस्टेर या डाइनिंग टेबल पर खाने की ज्यादा आदि थी.

"बस वैसे हे थोड़ी तबियत ठीक नहीं थी और गर्मी ने अलग परेशां कर रखा था. तुम हे आ जाती इधर अगर मैं नहीं दिखी तोह.", अब जसलीन अगर ये कहती की वो आयी थी लेकिन भाभी की हालत उस से मिलने वाली नहीं थी तोह यक़ीनन दीपा भाभी के पास जवाब न होता पर बदले में वो बस मुस्कुरा दी.

"धुप में न निकला जाता भाभी अपने से. और आप दिन में कभी खाली होती हो? बहार आज भी कपडे टंगे है मतलब दुनिया रुक क्यों न जाए पर आपके काम न रुकते. वैसे दिलबाग भैया क्या अब घर आते हे नहीं? जबसे आयी हु उन्हें तोह देखा हे नहीं मैंने.", सुखजीत तोह बिलकुल खामोश बैठी खाने पर लगी इनकी बातें सुन्न रही थी और अब अपने पति का नाम सुन्न कर फीकी मुस्कान देती दीपा भाभी ने ये अलग सा जवाब दिया.

"जा के खेत पर हे मिल ले अगर अपने भैया की फ़िक्र हो रही है. उनका खाना वही पहोच जाता है और तुम्हारे आने से पहले नीला वही लेके गया था. उन्हें पहले तुमने कितना देखा है यहाँ?"

"नहीं मेरा वो मतलब नहीं था भाभी लेकिन पहले तोह फिर भी गाँव में इधर उधर घुमते दिख जाते थे सुबह शाम लेकिन अब तोह जैसे वो अपनी हे दुनिया में मस्त है. आपको बुरा नहीं लगता ऐसे अकेले रहना और निम्मो भी नहीं है अभी तोह. वैसे दिलबाग भैया के बारे में अफवाहे सुनी है कुछ."

"वो अफवाहे सच है जसलीन जिन्हे मेरी वजह से तुम अफवाह बता रही हो. निम्मो के स्कूल बंद है अभी और मैं उसको घर में बंद नहीं रखना चाहती. मेरी बेटी किसी पर निर्भर न रहे और वो सक्षम बने बस. अपनी तोह जैसी तैसी निकल रही लेकिन निम्मो की किस्मत मैं वैसी हे मिटटी से नहीं लिखने वाली. जीती, क्या हुआ?", दीपा भाभी ने अपने दिल की कहने के साथ सुखजीत को पानी पीते देखा तोह उस लड़की ने बड़ी मासूमियत से पेट पर हाथ रखते हुए ना कर दी.

"भाभी, रात में मैं एक रोटी न खाती लेकिन आपके हाथ की थी इसलिए 2 हजम कर गयी. अब मैं चली अपने घर क्यूंकि बेबे ने दीदी को परमिशन दी है मुझे नहीं. पिछले दरवाजे से हे जा रही हु भाभी और जस सवेरे टाइम नाल उठ जावी.", अपनी थाली उठा कर सुखजीत ने खुद हे बहार आँगन में लगी टूंटी के पास रख दी थी. पिछली गली से हे आना जाना था इन दोनों का ज्यादातर क्योंकि वो ठीक इनके घर के पास तक पहुँचती थी. उसके जाते हे अब माहौल थोड़ा खामोश सा हो गया जैसे ये दो लोग बस उसकी वजह से हे बातों में मसरूफ किये थे खुदको. दीपा भाभी को लग रहा था के जस जान गयी होगी की भाभी को उसके और अर्जुन के बारे में पता चल चूका है और वही जसलीन भाभी से भी उनके राज और फिर दिलबाग के बारे में बात करना चाहती थी. चिड़िया की तरह दोनों रोटी से चुग्गा सा तोड़ती और फिर हाथ रुक जाते.

"कुतर के खाना कब से सीख लिया तुमने?"

"आपको देख कर हे सीख रही हु भाभी. वैसे रोटी का दिल नहीं कर रहा गर्मी की वजह से.", जसलीन के दोहरे जवाब को फिलहाल तोह वो न समझ सकीय लेकिन गर्मी वाली बात पर सहमत जरूर हुई.

"दूध ठंडा कर दू क्या बर्फ वाला? जितनी खानी थी उतनी तोह मैंने भी खा ली लेकिन गर्मी की वजह से भूख मेरी भी ख़तम हे है. वैसे तू कुछ सोच रही है न जस?"

"आप भी वही सोच रही है?", जसलीन ने अब सीधा सवाल किया था और दीपा भाभी ने अपनी थाली एक तरफ मेज पर रखते हुए कुछ पल बस जसलीन के स्वाभाविक से चेहरे को देखा और उनके मुँह से जो नाम निकला वो सुन्न कर चेहरे की रंगत हे हरियाली सी हो गयी.

"अर्जुन. तुझे बहोत पसंद है न वो लड़का?"

"पसंद तोह आपको भी बहोत है भाभी और मुझे इसकी ख़ुशी हे है के आप काम से काम उसके साथ तोह खुश रहती है.", जसलीन ने अब बात को ज्यादा घुमाये बिना सीधा मुद्दे की बात की जिस पर दीपा भाभी के चेहरे पर असंख्य रंग आये और गए लेकिन थोड़ा विचार करने के बाद उनके चेहरे ने मुस्कुरा कर सहमति दे हे दी.

"क्या कर सकते है ऐसे मामले में जसलीन जब कोई खुद आपको नर्क से दूर सिर्फ प्यार की दुनिया में ले चले? बाकी तुम तोह मुझे तबसे देखती आ रही हो न जब 5 या 6 बरस की थी? लगता है की मैं कोई कमजोर या मर्यादा से बहार जीने वाली औरत हु?", अब जसलीन ने भी थाली परे रखते हुए भाभी की बगल में हे सिरहाने की तरफ तक लगते हुए खुद को थोड़ा निश्चिंत किया.

"ऐसा कहने वाला इंसान फिलहाल तोह बना नहीं भाभी. इस गाँव में सभी बचे और नौजवान आपसे माँ सा स्नेह रखते है और आप भी. आप की मुस्कराहट देख कर तोह मेरी बेबे भी कहती है की दीपा बीमार न वि भला चंगा कर देवे.. पर वो नर्क वाली बात मेरी समझ में न आयी भाभी. दिलबाग भैया जो भी करते है वो खुलेआम तोह नहीं करते और ख़याल तोह रखते हे होंगे आपका?"

"तुम खुद हे सवाल में जवाब दे रही हो जस. ख़याल रखते तोह वो सब नहीं करते और फिर तुमने कितना देखा है उन्हें यहाँ? हमकदम मतलब जो आपके कदम से कदम मिला कर चले, यही तोह दांपत्य जीवन का उचित मंत्र है. पर बताओ की तुमने उन्हें यहाँ कब देखा और देखा भी तोह अकेले तोह नहीं होंगे. फिर उनके जिस नेक काम को सही ठहरा रही हो की खुलेआम नहीं करते तोह भला कौन अपनी बीवी या प्रेमिका के साथ मांजी खुले में सांझी करता है? उनका कमरा वो बहार वाला है और मेरा ये जो 25 कदम दूर है लेकिन इस से पास उनके खेत और वो बस्ती है जिसके बगैर उनका जीना जैसे मुमकिन नहीं. कल को तुम ब्याह होने के बाद देख सकोगी की तुम्हारा पति वो सब करता फिर रहा है जो खुलेआम तोह क्या सपने में भी नहीं होना चाहिए?", जसलीन के होंठो पर टाला लग चूका था क्योंकि सवाल उसके ऊपर आ चूका था. इंसान भी तोह तभी मुसीबत को समझता है जब वो उसकी झोली में हो. अन्यथा दुसरो को तोह नसीहत या हौंसला देने में बस चाँद लफ्ज़ हे लगते है.

"गर्दन काट के रख दूंगी अगर ऐसा देगा किया मेरे घरवाले ने मेरे साथ. एक तोह अपना सबकुछ छोड़ के उसके घर और उसके हिसाब से चलो, फिर भी उसको चैन नहीं तोह फिर वो हे बदले मैं क्यों. भैया वाली बात मैंने अनजाने में हे किसी से सुन्न ली थी लेकिन लगा की वो सच नहीं या फिर वहां होगा. फिर नीले ने रेनम को बताया न की वो उनका खाना देने गया था शहीद भाई के साथ और मोटर वाले कमरे में 2 लड़कियां सफाई कर रही थी तोह मेरा दिमाग थांनका की रात में 9 बजे कौनसी सफाई और वो भी एक कमरे में 2 लड़कियों की जरुरत पड़े. दिन में बात करने आयी थी मैं आपके पास और जीती का भी कोई काम था लेकिन अर्जुन..", जसलीन ने अपने शब्द रोक लिए थे इस से आगे न कहते हुए.

"तुम गर्दन काट सकती हो लेकिन मैं नहीं कर सकती. मेरी बेटी है जिसको अपने माँ और बाप दोनों चाहिए जो उसका हक़ भी है. और जो तुमने सुना खेत के बारे में वो मैंने तब अपनी आँखों से देखा था जब निम्मो 6 बरस की थी. उसके बाद तुम्हारे दार जी से कह कर मैंने निम्मो के हवाले से जमीन की कमाई 2 हिस्सों में बंटवा ली थी क्योंकि शराब, जुआ और लड़कीबाजी में राजा सदियों से रैंक बनते रहे है. लेकिन उसके बाद तोह जैसे मैं दुश्मन हे हो गयी अपने पति की और उंनका घर वो खेत, मेरा ये जहा हम अभी है. बताओ क्या मैंने गलत किया वैसा करके? गाला काटने से तोह मेरी बची अनाथ होती सो अलग ये गाँव और इतना प्यार देने वाले लोग मुझे क्या समझते? अनाथ ने अपना खून दिखा दिया, ये जरूर कहते. हाँ अर्जुन वैसा नहीं है.. वो किसी के भी जैसा नहीं है और न वो किसी के बारे में राये बनता है न बुरा कहता है. घर आएगा तोह वो मुझे काम करने हे नहीं देगा बस अपने पास बैठा कर ऐसी बातें करता रहेगा की बस सुनते रहो. कल रात भी उसने नीले के उधर रोटी पकने का जिम्मा खुद ले लिया क्योंकि बाकी औरतों का गर्मी से बुरा हाल हो रहा था. वो जानता है की दिलबाग गलत इंसान है लेकिन उसको यकीन है की वो सुधर सकता है. अर्जुन के साथ तुमने मुझे बिस्टेर पर देख लिया जिसके दरवाजे मैंने खुद खुले रखे थे लेकिन उस बिस्टेर पर मैं ऐसे हे न पहुंची थी जस और न अर्जुन आज से पहले मेरे कमरे में दाखिल हुआ था. वो हमकदम न सही लेकिन जीवन का सार तुमसे और मुझसे कही बेहतर जानता है.", उसके बाद दीपा भाभी ने वह अखाड़े वाला वृत्तांत भी कह सुनाया और अंतत में जसलीन के साथ अर्जुन का अंतरंग मिलान भी. अब जसलीन निरुत्तर थी लेकिन उसको ख़ुशी थी की अर्जुन कैसे अपने करीब आये लोगो का ध्यान रखता है जो वो पहले भी जानती थी. दिलबाग का सुन्न कर उसका मैं जरूर उचट गया था लेकिन यहाँ भी भाभी की वो कमाल की मुस्कान उसको सकरात्मक किये रही.

"आसान है भाभी दर्द के साथ मुस्कुराना?", जसलीन की ये पंक्ति जैसे एक विद्वान् मुख से निकली हो. भले हे संक्षिप्त सी लेकिन बहोत कुछ समेटे हुए

"आसान तोह पैदा होना भी नहीं जस. बहोत से जीव तोह कोख का हे सफर तये नहीं कर पाते तोह ज़िन्दगी जीना वो भी इतने बड़े संसार में जहा कौन अपना और कौन पराया ये तक पता नहीं चलता चाहे आप ऐसे अपनों के साथ जीवन गुजार लो जो बहार वालो से ज्यादा बड़ा खतरा हो. लेकिन क्या कोई बेहतर तरीका है तुम्हारे पास? सुख और दुःख ठीक jiwan-mrityu से है लेकिन उनके बीच क्या हम वो मुश्किल से मिलने वाले खुशियों के कतरे छोड़ कर बस उसमे हे उलझे रहे जिस से आत्मा का पोषण न हो? जानती हो हम फिर भी स्वार्थी है जो ख़ुशी की चाहत रखते है. और एक वो है जो दुःख के पीछे पड़ा रहता है जिसका उसके साथ कोई वास्ता भी नहीं. बहोत jaddo-jehad के बाद मैंने सिर्फ अपने दिल की सुनी और मैं अब सही गलत से परे हु क्योंकि उसके साथ सब ाचा हे लगा और अब भी लग रहा है जैसे वो साथ हे हो.", दीपा भाभी ने जिसका जीकर किया था उसके हे तोह इश्क़ में जसलीन सही गलत से आगे जा चुकी थी.

"उस शेर का शिकार तोह जाने कितनी शेरनियां हो चुकी भाभी. बड़ा हे जालसाज इंसान है जो आपको पता भी नहीं चलने देता और आप खुद उसके गुलाम हो जाते हो. वैसे इतना मांझा हुआ निकलेगा जो आप को भी दबोच ले ये नहीं सोचा था.", जसलीन ने माहौल को थोड़ा हल्का करने के हिसाब से ये कामुक सी चर्चा छेड़ दी थी जिस पर दीपा भाभी ने उसके पत् पर हलकी सी चपत लगते हुए अपनी दिलकश हंसी का जलवा दिखा दिया.

"शेर? मुझे तोह वो जंगली घोडा लग रहा है वो भी मांझा हुआ जो तेरे जैसे भोली बकरी को भी फांस गया जिसके पास न दुःख थे और न दर्द लेकिन तुम हो दिलेर जो झेल गयी. चादर उतनी भी गहरी नहीं थी की रंग छुपा लेती. वैसे मेरे जैसी से क्या मतलब था तुम्हारा और उसने कोई दबोचा नहीं था मुझे.", दीपा भाभी शर्मसार होने के बावजूद जसलीन के सामने तिकी हुई थी क्योंकि बात का केंद्र दोनों के बीच एक हे था. खुदको भोली बकरी कहलवाना जसलीन को थोड़ा आखर सा गया.

"वो होगा घोडा लेकिन नकेल मैंने हे डाली थी नहीं तोह आपको क्या लगता है वो मेरे पीछे आता? 50 दिन क़ुर्बान हो गए मेरे और आपने तोह हफ्ता भी न लगाया. वैसे उतनी भी कमजोर नहीं हु मैं बकरी कहो लेकिन हाँ आप जरूर hari-bhari हो भाभी और हैरानी वाली बात है की उसने आपको सिर्फ दबोचा हे नहीं उठा भी रखा था. कितना शोर मचती हो आप लेकिन सचमुच टक्कर देने की भी हिम्मत दिखा रही थी. यही फरक है एक्सपीरियंस और new-comer का. मतलब आप अनुभवी हो और मैं तोह कोरी थी. कोई नहीं इस बार पक्का इंतजाम करुँगी और देखूंगी कितना जोर है उस जंगली घोड़े में."

"तुम इतनी जल्दबाजी में क्यों हो जस? ऐसा साफ़ झलकता है की तुम दिन गईं रही हो और तुमने खुद ये कहा भी की 50 दिन लगे. मतलब क्या था इसका?", दीपा भाभी ने वो कामुक बातें छोड़ ये अलग सा जीकर कर दिया. जसलीन कुछ पल उन्हें ख़ामोशी से देखती रही फिर मुँह पर झूठी मुस्कान लाती बोलने लगी.

"जग्गी का रिश्ता पक्का हो गया है भाभी और मेरा भी. अगली बार गाँव आउंगी तोह अपनी शादी के लिए हे आना पड़ेगा. ये आखिरी छुट्टियां है मेरी इनका जितना मर्जी खिंच लू ये ख़तम तोह दिन के हिसाब से हे होंगी. घरवाले जितने मर्जी खुले दिल के हो पर रोका होने के बाद ज़िन्दगी मेरी भी रुकेगी. अर्जुन हक़ से आ सकता है हमारे घर लेकिन धागा बंधे बाद मेरे लिए वो प्यार के बदले प्यार देना थोड़ा मुश्किल रहेगा. जग्गी की शादी अक्टूबर में और मेरी उसके महीने बाद. अभी ये बात घर से बहार किसी को नहीं पता और आप भी मैट बताना अर्जुन को. वो अभी से दुरी बना लेगा मुझसे लेकिन मैं थोड़ा और जीना चाहती हु उसके साथ. फिर उसके आगे का मैं कुछ सोचना नहीं चाहती.", दीपा भाभी अब सकते में थी ये सुन्न कर.

"और पहली रात को अपने पति को क्या जवाब देगी? अगर तुम उस से संतुष्ट न रह सकीय तोह?"

"सवाल वही करेगा जो खुद गलत हो भाभी और मैंने कहा न की आगे का सोचना नहीं चाहती. जानती हु सतुष्ट तोह मैं अब किसी से होने भी नहीं वाली क्योंकि वो दिल सिर्फ एक के हे पास है जो मुझे पसंद है. छड्डो यह सब गल्लां भाभी, चलो फिल्म वेखदे है सौं तोह पहला. करदी है इस घोड़े डा वि हिल्ला कल न, ज्यादा तेज दौड़ी जाना है."

"वेखि बेकाबू न हो जावे. वैसे वि मैं ोस्डे सामने एक मीठी जी शर्त राखी होई है. जो पहला तेरे नाल होगा ओहि मेरे नाल मैं कारन दवंगी. खैर राखी अगली मुलाकात ते. तू टीवी लगा मैं पानी गैर के ौंडी आ.", भाभी बाथरूम जाने से पहले उसको इशारा कर गयी थी की अर्जुन अब उनके पिछवाड़े की चाहत लिए बैठा है और वो उसको तभी मिलेगा जब जसलीन अपना उद्घाटन करवाएगी. जसलीन मुँह पे हाथ रखती हुई हंसती हुई बहार वाले कमरे की तरफ चल दी.

'लगदा जीती डा किताब वाला काण्ड हे होना लिखेया हूँ. दोनों बहने एक हे बिस्टेर पर एक हे बन्दे के साथ. पता नई ओह किताब अर्जुन ने हे न हवाले किती होव ोस्डे. कांदी आ पक्का, पर मन्नू पसंद है.'

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एक तरफ अर्जुन अपने दादा की बगल में खुले आँगन टेल सोया था, ठंडी कूलर की हवा में वही दूसरी तरफ उसके चाचा रात गहराते हे बिस्टेर पर खाने पीने की चीजे सजाने के बाद खिड़की को परदे से बंद करके दबे पाँव होटल के पिछले हिस्से से अँधेरे में खो गए. जैसे इतने समय में नरिंदर ने इस होटल को ाचे से समझ लिया था. मुख्या सड़क पर आवाजाही लगभग न बराबर हे थी लेकिन कही कही daru-sharaab के अहाते और सिग्रत्ते बीड़ी के ठेले रोशन थे जो इस बात को पुख्ता करते थे की ये जगह रात में कुछ ज्यादा हे काली है. अनजान कसबे सी जगह और घर से इतनी दूर भी नरिंदर इतना सहज था जैसे कोई विडाल. जो जहा जाता है वो जगह उसकी हो जाती है. कोई 15 मिनट चलने के बाद वो उस घुमावदार सड़क पर आ पंहुचा जहा नका लगा था. लाल रंग की पुलिस की जीप में गश्ती पोलिसवाले आराम से ऊँघ रहा था जबकि 2 सिपाही आने जाने वाले ट्रक से 10-10 के नोट पकड़ रहा थे. सब reita-bajri और लकड़ी से लाडे ये ट्रक अवैध हे थे लेकिन एक नामी व्यक्ति की हुकूमत का सच.

"ू होल्डर साब, माचिस मिलेगा तनिक?", नरिंदर की आवाज के साथ लहजा भी जैसे इस जगह से मेल खा रहा था जिसने जानबूझ कर सिपाही को हवलदार कहते हुए अपनी समस्या बताई तोह एक बार उसको ऊपर से निचे तक देख कर सिपाही ने गुटखे की पीक दूसरी और पिचकते हुए अपनी जेब से दियासलाई की डिब्बिया उसकी तरफ बढ़ा दी. सावंडेर की बिना फ़िल्टर वाली सिग्रत्ते को डब्बी पर 3-4 बार ठोकने के बाद नरिंदर ने उसका दम भरा तोह गाढ़ा धुंआ एक गुबार सा उदा.

"जोरदार माल लिए हो बे, तनिक हमको भी काश खिंचवाओ.", सिग्रत्ते का वो लाल गुल सुलगता हुआ बता रहा था के उसमे तम्बाखू के साथ और भी बहोत कुछ शामिल था. ढीली गुलाबी टीशर्ट, गले में अंगोछा, पाँव में अंगूठे वाली चप्पल के साथ नरिंदर देखने से हे यही का कोई बिगड़ैल युवक लगता था जिसके गले में कुण्डल वाली सोने की चैन बताती थी की रईस तोह वो भी है लेकिन नशेड़ी ज्यादा. 2 काश खींचने के बाद उसने सिपाही की तरफ सिग्रत्ते बधाई और एक तरफ राखी पानी की बोतल से एक बढ़िया घूँट गले में उतार लिया.

"इधर का माल ससुरा जमात नहीं रहा होल्डर साब. यह ख़ास नेपाल से मंगवाए है हम, 800 का टोला. 4-5 दम में हे ससुरा दिमाग में कोनो टेंशन न रहता. आप इत्ती रात काहे ड्यूटी बजा रहे, ओह भी 10-10 की खातिर? कोनो मोटा केस लपको और नहीं मिळत रहा तोह हम करते है आपके लिए चकाचक सूमो गाडी का प्रबंध. इतने मेहनती कर्मठ अफसर हो तोह कल को thana-dhyaksh बनोगे तोह रौब भी दिखना चाही के नहीं?", बात कहने के साथ नरिंदर ने अपनी कलाई पर बंधी वो सोने का पानी चढ़ी घडी उस सिपाही के दूसरे हाथ की कलाई पर बांध दी जो कुटिल मुस्कान से बस दम खींचता हुआ उसको देख रहा था. आँखों की चमक बता रही थी की उसको ये अजनबी दिलदार भ चूका है. दूसरा साथी नाके के परली तरफ था जो ज्यादा व्यस्त होने के कारण इन्हे देख न सका.

"इन्हे के तोह नहीं जान पड़ते गुरु तुम लेकिन आदमी पसंद आये इस माल की तरह. कोनो खजाना हाथ लगा है जा नजर में है? हमार नाम है शशिलाल और इन्हे की जितनी खबर हम रखते है उतनी बिधायक साहब और हमारे थानाध्यक्ष का न होगी. कुछ बड़ा मसला है तोह पिरोफिट मोटा मिलने के एवज में हम तुम्हार हर काम करवा सकते. अफीम खान के दरबार तक हमारा पहुंच है. देख नहीं रहे उनके हे ट्रक से वसूली ले रहे है?"

"अकेले में मिलने की चाहत रखते है हम अफीम खान से और जानते है की यह काम सिर्फ होल्डर शशिलाल यादव जी के बस का है. ऐसे हे माचिस के लिए रुक गए का आपके पास? जोरदार काम है और मुलाकात के बदले में आपको ये 8 टोले का चैन, यह बिदेशी घडी और चकाचक टाटा सूमो. हाँ जा ना हमे मंजूर है लेकिन कछु और चाहि तोह हम प्रबंध कर देब. का बोलत हो?"

"नशा किये हो?"

"दोनों किये रहे न अभी अभी. यह मामला भी नसे का हे है साब.", नरिंदर ने वो जंजीर सी मोती चैन निकल कर शशिलाल की हथेली पर रख दी थी जिसके वजन के निचे उसका ईमान तुरंत डाब गया. एक बार उस लाल जीप में सोये अपने अधिकारी और फिर दूसरी और खड़े अपनी साथी को देखने के बाद उसने सर हिला दिया.

"हुंका डील में 2 ताका चाहि, सूमो बराबर पगार न है हमारी. मंजूर तोह एक घंटा बाद हुंका अगली पुलिया पर मिलो नहीं तोह जिधर से आये हो उधर पहुंचने का दिल नहीं है तोह इन्ही थोक देंगे. समझे?"

"एक घंटा बाद उधर पुलिया पर मिलते. आपका अंदाज हमको जाँच गया होल्डर साब. 2 का हम 3 करवा देंगे अगर डील में भी और आपके कंधे पर भी. चलते है, पुलिया पर.", गमछा वापिस घुमा कर आधा चेहरा ढकते हुए नरिंदर किनारे किनारे हे आगे बढ़ गया. इधर उसको देखने वाला और था भी कौन. शशिलाल की किस्मत जरूर इस काली रात में कुछ ज्यादा हे चमकी थी और जितना शातिर वो खुद को समझ रहा था अपनी तारीफ और मनमानी पर, उतना हे कमजोर कड़ी था वो अफीम खान के घेरे की. 50-60 ट्रक गुजरते हे एक घंटा गुजर गया था और अपने साहब के कान में कुछ कह कर वो सड़क के दूसरी तरफ कड़ी अपनी फटफटिया लिए नरिंदर की तरफ बढ़ चला जो इन्तजार करते हुए अपना शरीर गरमा रहा था.

"समय के बड़े पाबंद हो साब."

"बैठो पीछे और इन मामलो में हम ड्यूटी से ज्यादा अनुशासित है. वैसे तोह अफीम खान दिन में किसी से मिलता भी नहीं और रात में वो तभी मिलता है जब यह पार्टी उस से टीम लिया हो. तुम्हार किस्मत बुलंद है. पूछो काहे?"

"आप हे तोह उनका राइट हैंड हो साब. फिर भी पूछ लेते के काहे किस्मत बुलंद है हमार?", नरिंदर उसके पीछे बैठा इस घुमावदार सुनसान सड़क पर जैसे शहर से बहार जा रहा था. इस अन्धकार में सिर्फ उस फटफटिया की चौकोर रौशनी हे थी जो दूर घुमाव तक जाती और उसके साथ हे घूम जाती. ट्रक वाली सड़क से ये अलग रास्ता था.

"हमार ड्यूटी उधर हे था रात 3 बजे के लिए. अभी दुइ घंटा बचता है पत्र इत्ता चलेगा. अफीम खान का हर महीने की 10, 20 और 30 तारिक को माल निकलता है इस अड्डे से. 10 को अफीम, 20 को कट्टा गोली और 30 को .. हाहाहा.. 30 को कमसिन गरम गोश्त. साला यह अफीम खान नाम का हे अफीम है लेकिन ऐसा कोनो धंदा नहीं जिसमे हाथ न हो. दारु, दवा, नकली नोट से ले कर लकड़ी तक नहीं बक्शा. तुम हमको पसंद आये इसलिए ठिकाने तक खुद ले कर जा रहे है नहीं तोह किसी और से ऐसी बात किये होते तोह यह पहले भेजे में पीतल भरता और यह के बाद मुँह पे मूट कर निकल लेता. दिमाग वाला आदमी की कमी है न अफीमवा की फ़ौज में इस लायी तोह हमको सरकार से चार गुना पगार देता है.", नरिंदर की कनपटी गरम हो गयी थी इतना अब सुन्न कर. एक मुजरिम अपना धंदा बढ़ा रहा था और प्रशाशन उसको दबोचने की जगह उसके लिए हे काम करता था. लेकिन वो जोश में होश खोने वाला इंसान तोह नहीं था इसलिए सहज हे रहा बहार से.

"यह तोह हम भी सुने है साब के अफीम खान अपने आप में हे सरकार ठहरे. इसलिए तोह यह छोटी मछली उनके पास जा रही है. काम बना तोह 50 करोड़ हर महीने का धंदा होगा जिसमे मुनाफा 25 और उसका 2 प्रतिशत मतबल 50 लाख आपका. यह गरम गोश्त कोई बिदेशी जानवर रेहत क्या होल्डर साब?", 50 लाख का सुन्न कर तोह शशिलाल एक बार के लिए थरथरा सा गया था ख़ुशी में लेकिन वो एक घाघ पोलिसिअ भी था इस मामले में. अपनी ख़ुशी दबाते हुए उसने प्रतिउत्तर में सवाल दाग दिया छोटे से जवाब के साथ.

"कमसिन गोश्त मतबल लड़की जिनका डिमांड सबसे ज्यादा रहता और मुनाफा तोह अफीम से भी ज्यादा. वैसे तुम बोले थे 3 ताका डोज. 25 लाख अधिक देने में जेब फट रही का तुम्हारी?"

"सौदा बना तोह वो एक ताका खुद अफीम खान देगा आपको. हम कहे थे 2 से 3 करवा देंगे. वैसे यह लड़की का बिज़नेस कैसे मुमकिन है होल्डर साब? मतलब लड़कियां तोह भाग भी सकती और शिकायत दर्ज करवा सकती अपहरण की."

"ऐसा है लल्ला के गाँव देहात से क्सक्स बरस से 18 तक की लोंड़िया इनके लोग उठवा लेते और महीना भर उन्हें ऐसा सुधारा जाता है की फेर वो शिकायत तोह छोडो बोलना भी बंद कर देती. बम्बई ह्यदेरबाद जैसे बड़े शहरों से इनके ख़रीदवान आते जो वह इनसे मनचाहा धंदा करवाते. कोठे से ले कर कामवाली या किसी बूढ़े की जोरू तक का. ज्यादा चमकदार माल हो तोह देश से बहार. वैसे अफसर और मंत्री लोगो की araam-gaah पर भी भिजवाया जाता इन्हे जिस से वो भी मजा उठाते रहते ऐसी कच्ची जवानी का. जलेबी का दूकान खोलने से पहले उसको चखाया जाता है लल्ला, यह जान लो तुम.", नरिंदर जैसे जैसे ये सब सुन्न रहा था वैसे वैसे उसको घिन्न होने लगी थी इंसानो से. क्या मंत्री क्या संत्री, सभी हमाम में नंगे हे नहीं दरिंदे भी थे.

"फिर तोह बड़ा सुरक्छा रहता होगा होल्डर साब उनके इन्हे? ऐसा जोखिम वाला काम और रूपया पैसा का इत्ता बड़ा len-den वाली जगह 25-50 suracha-karmi पहरेदार तोह रहिता हे होगा? वैसे तोह वो खुद हे इन्हे का प्रशासन है और आप जैसे बढियाँ आदमी लोग उनके साथ है."

"सुरछा रेहत रही गोदाम और कारखाने पर जंहा माल बनता और रखा जाता. आर्डर के हिसाब से 10 और 20 को माल अपनी जगह निकल जाता और पेमेंट एडवांस रहता है इस धंदे में. हाँ यह लोंड़ियाँ के धंदे में डील होती इनके इन्हे वाले रेस्टहाउस पे. एक समय में सिर्फ 2 ब्यापारी से हे सौदा रहता और 30 दिन का मतबल 30 लड़की लोग बेचने का उस से ज्यादा नहीं. इस डील में हम हमेसा मौजूद रेहत रहे क्योंकि इसका इंचार्ज हम हैं. जो ब्यापारी आता वो अपना कंटेनर साथ लेके आता पहले से तये लोंड़ियाँ लेने को. इस बार ह्यदेरबाद से सोनू सुल्तान और बम्बई से परेश भाई आया हुआ. कच्ची लड़की का इतना डिमांड है लल्ला उधर की एक लोंड़िया 10 लाख तक जाती. और उनकी कीमत ये ब्यापारी लोग हप्ते हे निकाल लेते. महीने में मुनाफा 3 गुना करके लोंड़िया कोठे पर, साडी ज़िन्दगी बुर कुटवाने वास्ते. हाहाहा.. पत्र अफीम खान सिर्फ 4 जगह हे सौदा करता है क्योंकि 30-35 कोठे खुदके भी तोह आबाद रखने है जो इन्हे पुरबंचल से दिल्ली तक आबाद है. साला आदमी खुद नाड़े का पक्का है जो न अफीम खता और न लोंड़िया."

"तोह 3 बजे ऐसा काम इस लायी करता है के 4 बजे उपरवाले से माफ़ी मांग सके? बढ़िया है होल्डर साब. मतलब उनके इस मामले में सुरछा प्रमुख आप हे हैं.?"

"हाँ साला यह खातिर डिपार्टमेंट में हमको कई चूतिये दल्ला बोलते पीठ पीछे. वैसे अफीम खान को किसी सुरछा की जरुरत नहीं है. आप हे चलता फिरता काल है यह और उसका छोटा भाई मुन्नवर तोह उस से भी बड़ा वाला पागल है. ऐसा जल्लाद आदमी है के हमारे पास हे शब्द नहीं. एक लोंड़ियाँ कैसे कर के भाग निकली थी पिछले महीने लेकिन जाती कहा सब तरफ तोह इनका हे राज है. ससुरी को घसीट कर सब लड़की लोगन के सामने लाया मुन्नवर और उसकी कच्ची बुर में कांच का बोतल थोक कर बुर फाड़ने के बाद यह बोतल भी टॉड दिया. कसाई खानदान से है और उस ज़िंदा तड़पती लोंड़ियाँ के शरीर को भी बकरे सा हलाल कर दिया. हुंका तोह उलटी हो गयी थी इस करके मुँह पर कपडा रख लिए. लो आ गए ठिकाने पर लेकिन पाहिले हे कहत रहे की मुँह सोच समझ कर खोलना. हम तोह उनके सेवक है लेकिन तुम्हार ज़िन्दगी का फैंसला जुबान और जवाब पे निर्भर.", यादव जिस जगह पंहुचा था वो लाल ईंट से बानी ऊँची दिवार और उसके ऊपर कटीली तारो की सुरक्षा में घिरा कुछ फार्महाउस जैसा था. एक पोलिसवाले उस लोहे के द्वार पर के बहार हे अपनी 303 कंधे पर टाँगे मुस्तैदी से खड़ा था और इनकी फटफटिया को देख जिस तरह उसने यादव को सलाम ठोका उसका मतलब साफ़ था की चाहे ये व्यक्ति सिपाही था लेकिन अफीम उर्फ़ तौफीक खान की फ़ौज में बड़े ओहदे वाला.

"ओह बिसंवा, सप्लाई पहुंची इधर?"

"यादव भैया माल तोह आधा घंटा पहले हे आ गया था लेकिन सरकार बोले है की अभी यह मुन्ना भाई जी के साथ जरुरी चर्चा कर रहे इस करके उन्हें किसी ब्यापारी से अभी मिलने का संदेसा न पहुँचाया जाए. यह सज्जन आपके मेहमान है यादव भैया?"

"हाँ हमारी पहचानवाले है और धंदे खातिर जोड़ने लाये है इन्हे तौफीक भैया से मिलवाने. लगाओ जरा घंटी और कहो के हम आये है अपने भाई को ले कर. उनका मुन्ना तोह नुक्सान हे देवत रहा, हम vaare-nyaare करवाने वाले है उनके.", अब नरिंदर कैसे vaare-nyaare करने वाला था अगर इसका थोड़ा भी एहसास यादव को होता तोह वो पहले हे मारा जाता. उसकी सांसें अभी कुछ ज्यादा चलनी थी और बिसंवा ने aadesh-anusaar टेलीफोन घुमा दिया.

"जा सकते है पर इनका चेकिंग करने का बोलै है भैया जी ने.", वो अभी भी हिचक रहा था जबकि नरिंदर ने पीठ की तरफ से कुछ निकलने की हरकत की तोह एक बार के लिए यादव की भी फट गयी कही वो असला हथियार तोह नहीं लिए पर बस एक फाइल थी और नरिंदर ने अपने दोनों हाथ ऊपर उठा दिए

"इसमें वो सौदे का सब डिटेल लिखा है न भैया जी, इस करके कमर में खोंस लिए थे. देख लीजिये ाचा से हमारी पतलून और जांघिया में बाल न मिलेगा. हाँ इस तरफ वाली में सरगट की डिब्बिया है और इन्हे वाली में... यह हमारे फूंकने का माल. पिछली में बटुआ है हमारा जिसमे सत्रह हजार चेह सौ बीस रउअपया है और हमर जोरू का फोटू.", नरिंदर द्वारा नौसकीहिये डरपोक की तरह हाथ उठाने पर अब अपने डर को छिपता यादव दांत दिखा कर हंस रहा था.

"यह लियो ाचे से देख लियो बिसंवा, इसका चढ़ी में बाल भी नहीं है. तुम्हे कैसा पसंद है? हमर भाई है और शरीर से तगड़ा भी, तबियत से खुश करेगा.", अब बिसंवा तोह हाथ जोड़ कर बस उस बड़े द्वार के एक तरफ बना छोटा किवाड़ खोल कर उन्हें बस अंदर जाने का रास्ता देता एक और खड़ा हो गया. तलाशी लेने की तोह कोशिश तक न की उसने. अंदर से ये जगह और भी खुली और आलिशान थी जैसा बहार निर्जन था उस से विपरीत. किसी सरकारी araam-gaah जैसी ईमारत लेकिन चमकदार संगमरमर का फर्श, आजु बाजू में चारो और साफ़ सुथरी कटी घांस के साथ दिवार के किनारे ऊँचे वृक्षों की कतार और तक़रीबन 5-6 सुरक्षा कर्मी जो अफीम खान के ख़ास थे. पक्के आँगन में आते हे नरिंदर को एक तरफ सीमेंट की सड़क पर कड़ी वो 2 बड़ी गाड़ियां दिखी जो ज्यादा दुरी पर वाहन या महंगा सामान लेने में प्रयोग होती थी. यही उन लड़कियों को लेके जाने के साधन थे, आलिशान साधन.

"बात हुई गवा है हमार भैया जी से.", यादव ने वर्दी की कमीज उतार कर एक तरफ कुर्सी पर फेंकते हुए एक आदमी से तमंचा लेते हुए अपनी कमर में खोंस लिया. अब वो अफीम खान की ड्यूटी बजा रहा था और उसके सिपासलार जानते थे की उसके साथ आया व्यक्ति जांच करवा कर हे पंहुचा है इधर.

"जल्दी बात कर लीजियेगा नेता जी. भैया जी डील थोड़ा जल्दी करने वाले है आज और उन्होंने संदेसा भी भिजवाया था आपके नाके पर 10 मिनट पहले. बगल वाले हॉल में माल बंद है और उसके अगले में भैया जी.", खींसे निपोरता ये प्रहरी भी लम्बी दाढ़ी और मजबूत जिस्म का मालिक था बाकी 5 की तरह जो इधर उधर टहल रहे थे, कंधे पर बन्दूक टाँगे. नरिंदर भीतर आया तोह सामने हे सोफे पर 2 अहदेद से बैठे थे जिन्हे यादव ने सलाम ठोका तोह बदले में उन्होंने जाम वाला हाथ उठा कर उसका अभिवादन किया.

"ये परेश और सोनू भाई है. इस धंदे में कोई किसी का ऐतबार नहीं करता और ये साले तोह छूट में ऊँगली घुसा कर पहले जाँच करते है के पति पैक है या खुली, उसके बाद हे माल उठवाते है. 6 बरस से तोह मैं देखता आ रहा हु इन्हे.", साफ़ हिंदी बोलने लगा था यादव भीतर आते हे और नरिंदर दिखावे के लिए उसकी बातें सुनता हुआ हर तरफ पैनी नजर रखे था. जितना सोचा था ये जगह उतनी ज्यादा सुरक्षित न लगी.

"वैसे एक बात कहना चाहते है अगर बुरा न लगे तोह? यह का है दरोगा साब यह जगह पर इतना बड़ा बड़ा काम होता लेकिन सुरक्छा उस हिसाब से थोड़ा काम जान पड़ता है. कही हम गलत अफीम खान के पास तोह नहीं आ पहुंचे?", होल्डर से सीधा दरोगा सुन्न कर यादव ने इस बार थोड़ा ज्यादा ख़ुशी से नरिंदर के कंधे पर थपकी देते हुए कहा.

"लल्ला, यह क्सक्सक्सक्सक्स है और इन्हे के मालिक है अफीम खान. लोगो को उनसे सुरक्छा की जरुरत पड़ती, उन्हें नहीं. और जो बहार तुम 6-6 जानवर देखे न वो इतने शातिर है की अँधेरे में भी उड़ता पंछी निचे गिरा देते एक गोली से. और कोई इधर से भगा तोह वो पुलिया की तरफ निकलेगा जा बीहड़ में जिधर खतरा और ज्यादा है. ेंह अफीम भाई के लोग तोह पीछे से मारेंगे पर दूसरी तरफ से बाघी, वन विभाग और जानवर भी नहीं बक्शने वाले. बाकी पुलिया की तरफ से तोह जांच होने के बाद हे कोई आ सकता है इधर तोह इस से सुरक्छित जगह और कौनसा होगा? अब चोंच को लगाम लगाओ और हमारे इशारे के बाद हे बात शुरू करना. भैया जी को चमचागिरी पसंद नहीं हमारी तरह. ध्यान रहे.", दरवाजे के बहार लगा पीतल का कुंडा 2 बार बजने के बाद यादव ने 'आ जाओ' की आवाज सुनते हे किवाड़ खोल कर सबसे पहले झुक कर सलाम ठोंका. चमड़े के आलिशान सोफे पर सफ़ेद कुर्ते पाजामे में एक काफी मजबूत और hatta-katta व्यक्ति विराजमान था जिसकी बगल में दूसरे सोफे पर और भी दैत्याकार लेकिन ज्यादा जवान. कुर्ते वाला अफीम खान था जिसका रंग भी उतना हे गहरा था जितनी अफीम और उसका भाई मुन्नवर सुर्ख गुलाबी गोरा किसी पठान जैसा.

"क्या धमाका करना चाहते हो यादव और तुम्हे ाचे से पता है की व्यापार की बात हमसे पहले मुन्ना करता है.", आवाज भी उतनी हे रौबदार थी उस व्यक्ति की और उसके कमरे में शेर से ले कर लम्बे सींग वाले हिरन, अजगर तक के जिस्म लटक रहे थे. कांच के आलिशान मेज पर पैसा का खुला बैग और खुली तेजधार तलवार इस दृश्य को और ज्यादा जबरदस्त बनती. मुन्नवर खड़ा हुआ तोह वो सचमुच उमेद जितना हे लम्बा होगा लेकिन चेहरे पर हे घमंड झलक रहा था.

"तोह कौन है ये साहूकार जिसको तुम भैया के सामने खली हाथ लिवा लाये? हाँ तोह परिचय तुम डोज यादव या ये जुबान खोलेगा.?"

"साहब हम इंदरजीत है और पिछले 7 बरस से ganja-charas का धंदा में रहे है. मतलब गली मोहल्ला वाला धंदा नहीं, बढ़िया वाला एक नंबर का. आपका जैसा हे नाम कामना चाहते है और चाहे तोह दिल्ली में खन्ना, सतपाल या बिल्लू बरेली वाले से पूछ सकते की इन्दर उनसे भी बढ़िया कनेक्शन रखता. आप उन्हें माल देते जबकि वो वही माल 10 गुना में बेचते. मैं दुगने पर बेचूंगा लेकिन सप्लाई उनसे दस गुना करके दूंगा. 25 करोड़ का आर्डर मैं अभी लेके आया जिसका डील 50 मैं पहले कर चूका. शशिलाल भाई पहचान वाले मेरी, दिल्ली मिले थे पहले.", नरिंदर ने वो चाँद पन्नो वाली फाइल आगे बढ़ कर कांच की मेज पर राखी तोह एक बार मुन्नवर ने उसको रोकने की कोशिश की लेकिन नरिंदर की दिलेरी और साफ़ बात करने की आदत अफीम खान को भा चुकी थी.

"इतना जानते हो तोह माल तुम्हे और भी कई जगह से मिल सकता था. दिल्ली में तोह धंदा नहीं करने वाले जब वह पहले से इतने दलाल बैठे है. तोह 25 का एडवांस चेक भी ले कर आये हो.", फाइल में सबसे पहले वही दिखा था उसको.

"राजस्थान वाला माल जंचता नहीं तौफीक भाई और सरहद पार से जो आता उसमे रिक्स ज्यादा मुनाफा काम. अपने पास पूरा पंजाब है माल बेचने को और उधर कम्पटीशन में भी कोई नहीं सिवाए पॉलिसियों के. माल तोह महीना बाद लेगा मैं लेकिन बाकी कच्चे का 25 और भिजवा देगा. इसका बिल आप लकड़ी गतका में दिखा देना. बैंक भी जरुरी है न कला पैसा को सफ़ेद करने के लिए?"

"इधर बैठो हमारे पास. तुम्हे हम इतना पैसा हर महीने दे तोह काम करोगे हमारे लिए?", नरिंदर अब तीसरे सोफे पर आ बैठा था जहा यादव हे कभी नहीं पंहुचा था.

"अभी तोह पैसा आप हे दे रहे तौफीक भाई. आपका माल बेच कर हे तोह मैं मुनाफा ले रहा. इधर मार्किट पुराण है और दाम में lafde-baaji. फिर आपका नया ब्रांच Punjab-Haryana में रहेगा तोह काम चाहे मैं करू, नाम और माल आपका हे रहने वाला न भाई? अपने को बस आपके जैसा बन्न न है लेकिन पूरे प्रदेश में. सब सही रहा तोह आपको हे सफ़ेद कपडे पहना देंगे जिस से चेहरा हम रहे और पावर आप. नीचे अगला पन्ना पर देखिये कितना डिमांड है जो हमने जमा किया और उस हिसाब से हर महीना 10 प्रतिशत माल बढ़ाते रहेंगे लेकिन डिमांड पूरा नहीं होगा. लेकिन हम चाहते है की शासी भाई इसमें हमारे भागीदार रहे, माल की डिलीवरी और पैसा के लिए हम आपको कष्ट नहीं देना चाहते.", यहाँ नरिंदर ने यादव को भी पक्ष में लपेट लिया था मुन्नवर को दरकिनार करते हुए.

"जानते हो जो बहार 2 लोग बैठे है वो हर महीने हमे 3 करोड़ देते है जिसमे हमारा नाम ज्यादा खराब होता है मुनाफा काम. तुम आदमी लिखने पढ़ने के साथ दिलेर भी हो जो अकेले हे मिलने चले आये. यादव तुम्हारा इनाम इस डील में 2 ताका रहेगा हर महीने. मुन्ना ये चेक परसो बैंक में लगवा देना, ऐतवार को तोह बंद रहेगा. और तुम भाई इन्दर आज हमारे मेहमान हो तोह यही रहोगे. जरा बहार वालो से विदा ले ले फिर तुमसे ाचे से व्यापार पर चर्चा करते है. यादव तुम साथ चलो और मुन्ना मेहमान का ख्याल रखना. शुकीन आदमी है तोह तुम्हे शराब का जोड़ीदार मिल गया इसके रूप में.", फाइल को बिना आगे देखे अफीम खान उठ कर यादव के साथ बहार चल दिया लेकिन मुन्नवर के हम को ठेस पहुंच चुकी थी. उसने दरवाजा बंद करने के बाद जिस तरह टाला लगाया था इरादे साफ़ थे की वो चर्चा गहरी करने वाला है. कांच की कीमती बोतल से बिना पानी के 2 जाम बनता वो अब नरिंदर के सामने बैठा था.

"फंदेबाज आदमी हो बे तुम तोह. हमारे सामने हमे हे निचा दिखा दिया जैसे भैया के धंदे के लिए हम सही आदमी नहीं. तुम्हारे पीछे कौन है इस झमेले में?", कांच की मेज पर फिसलता हुआ गिलास नरिंदर के ठीक सामने आ रुका था जिसको उठा कर दूर से टकराने का इशारा करके नरिंदर ने एक साँसे में खाली कर दिया.

"फाइल उधर सामने राखी है जिसको तुम्हारा चुटिया भाई पूरी देखे बिना चला गया. धंदा तोह तुम्हारे हे साथ करना था मुझे क्योंकि आदमी ताक़तवर और क्रूर हो तोह लोग दुबके रहते है. कितना माल बेचते हो महीने का और कितना बनता है?", गुस्से में पहले तोह मुन्नवर ने वो जाम खली किया लेकिन फिर नरिंदर की बात समझ कर वो बड़ी कुटिलता से मुस्कुराया.

"सचमुच फंदेबाज आदमी हो बहनचोद. माल तोह 100 करोड़ का भी मिल जाएगा पर बेचने के लिए ये पंजाब हरयाणा छोटे पड़ जाएंगे. बाकी ताज मेरे सर हो तोह ये अफीम छोड़ कर मैं सिर्फ और सिर्फ सफ़ेद पाउडर और लड़कियों का धंदा करू. एक किलो की कीमत हे एक करोड़ है उसकी और लड़कियां तोह सबको लुंड के निचे चाहिए, कच्ची होगी तोह 10 लाख की और कमसिन होगी तोह 5. साला आबादी बढ़ता जा रहा है तोह कण्ट्रोल करना पड़ेगा की नहीं. ये सामने वाला दरवाजा के पीछे हे 30 बंद है लेकिन देश से बहार हरेक की कीमत 50 लाख भी मिल सकती. भेजा नहीं है न तौफीक के पास और उसको बस मंत्री बन्न ने का चस्का है. तू .. तू धोखेबाज..", फाइल को पढ़ कर वो उठता उस से पहले हे गर्दन लहराती हुई अफीम खान वाले सोफे पर जा गिरी. आँखें अभी भी दहशत से खुल बंद हो रही थी जबकि नरिंदर उस तलवार पे लगे खून को जीभ से चाटने के बाद थूक कर बोतल मुँह से लगता हुआ एक ाचा खासा घूँट भर गया.

"मादरचोद का खून भी सफ़ेद पाउडर सा जेह्रीला था. बंद कर इन आँखों को भोस्डिके, ऐसा ताज तेरे भाई को भी दूंगा अभी बस पहले जरा इन बच्चों का इंतजाम कर दू.", गले से गमछा हटा कर लॉकेट में अटकी पिस्तौल निकालने के साथ हे नरिंदर उस कमरे की तरफ चल दिया जिसका दरवाजा इधर भी था. कुण्डी खोलते हे अनगिनत सेहमी नजरे उसको हे देखने लगी. साफ़ सुथरे सलवार कमीज और चेहरा चमका कर उन्हें उम्र से कुछ बड़ा हे बनाया गया था.

"शठ.. चुपचाप इस कमरे में जाओ.", नरिंदर ने एक के सर पर दुलार करने के साथ जैसे कहा था वो लड़कियां कुछ हैरत में पड़ गयी लेकिन एक एक करके वो उधर जाने लगी थी जबकि नरिंदर ये भूल गया था की वह पड़ी सरकती लाश देख कर ये चिल्ला सकती है. सभी उस कमरे में पहुंची हे थी की एक कमजोर दिल ने जोरदार चीख मार हे दी लेकिन बहार से भी गोली चलने की आवाज ने सबके कान खड़े कर दिए थे.

"आ गया झांट का बाल. साला ये कौनसे रस्ते से आता है जो कही भी पहुंच जाता है?", नरिंदर एक हाथ में तलवार लिए दूसरे में पिस्तौल का ट्रिगर ऊँगली से जड़ में लिए जैसे किसी के भीतर आने की प्रतीक्षा में था. बगल वाले कमरे में thapp-thapp की आवाज बता रही थी की अफीम खान उसको खोलने की कोशिश कर रहा है. और इधर परेश के साथ सोनू और यादव दाखिल हो हे रहे थी की परेश की गर्दन फुटबॉल की तरह धड़ से अलग होती हुई कमरे के भीतर घूमने लगी. शरीर रक्त का फुहारा छोड़ता यादव और सोनू पर गिरा था जिनको कुछ समझ आता उस से पहले हे माथे के बीच बिंदी बन चुकी थी.

"ले बीटा तू तेरे 4 ताका ले. साला नौकरी कानून की और सेवा उसके भक्षक की.", बहार 4 बार और गोली चली थी इस दौरान लेकिन कौन किसपे चला रहा था ये नरिंदर को पता नहीं था. पर अब उसके सामने तलवार लिए हे अफीम खान खड़ा था उस हॉल में जिधर से नरिंदर यहाँ दाखिल हुआ था.

"कौन हो तुम?", नरिंदर ने पिस्तौल कमर में खोंस कर तलवार को अपनी पतलून से साफ़ करते हुए ऐसी मुस्कराहट दिखाई की अफीम खान गुस्से से और भी ज्यादा गहरा हो उठा. उसका रंग अब काले और लाल की मिलवट लिए था.

"6 महीने लगे मुझे तेरे सामने पहुंचने में और सवाल भी तू हे करेगा? छह.. छठ.. मौत का कोई नाम नहीं होता तौफीक और एक बार को तोह मैं तुझे हथकड़ी पहना भी देता लेकिन ये मासूम बचो के साथ तेरे भाई और तेरी दरिंदगी ने मुझे मजबूर कर दिया की तुझ जैसे गन्दी नाली के कीड़े सिर्फ बीमारी है जिनका इलाज है उन्हें जड़ से ख़तम कर देना. यहाँ मैं तुझे परलोक भेजूंगा और उधर तेरे संगी साथी संत्री मंत्री सब कानून की पकड़ में होंगे. चल दिखा जरा तेरा कसाई वाला रूप. मैं भी देखु की वो नाम मुझ पर जंचता है या तू लायक है उसके.", बहार रह रह कर अभी भी गोली चल रही थी लेकिन आँगन में 2 शव गिर चुके थे. तौफीक ने वो सामान तलवार एक बार खतरे के निशाँ से लहराने के बाद एक कदम आगे बढ़ते हुए जोरदार प्रहार किया था नरिंदर पर जिसने ें मौके पर उसको रोकने के साथ हे तौफीक की टांग पर गहरा चीरा लगा दिया. तंत्र की जोरदार आवाज के बाद आह्हः की ये दर्द भरी कराह बहोत थी बताने के लिए की तौफीक के सामने असली कसाई था जो जानवर नहीं देखता था बस काट देता था.

"दिलेर हो.. आह्हः.. मौका देता हु चाहे हाथ मैट मिलाओ लेकिन वापिस जा सकते हो. शायद हमारे और भी दुश्मन इस दिन की टाक में थे जो बहार से हुम्ला कर रहे है.", बातें करते हुए उसने फिर से वार किया लेकिन नरिंदर ने उसको दिशा दिखा कर बेकार करते हुए कुछ दुरी बना ली.

"वो मुझसे ज्यादा बेसबर है तेरे जिस्म में छेड़ बनाने को लेकिन आज उसका शिकार मैंने दबोच लिया. वैसे ज़िद्दी तोह तू भी बहोत है जो कंगाल होने के बाद अपनी मौत को लौटने की चेतवानी दे रहा है.", दोनों ने एक बार फिर से वार किया था लेकिन भरी भरकम तौफीक नरिंदर को छु भी पता उस से पहले उसकी तलवार वाली ब्याह कंधे से जुड़ा करके नरिंदर उसके पीछे जा चूका था. तलवार और वो हाथ अब दरवाजे की तरफ था जहा से ये सांवला सा आदमी दरवाजे को ठोकर से टॉड कर भीतर आ चूका था. वो हैरान था सामने तौफीक और अपनी बायीं तरफ 3 लाश देख कर.

"झांट का बाल ऐसे हे अकड़ा रहता है जैसे इस वक़्त तू 90 के कोण पर खड़ा है. तू जिसके लिए इधर आया था उसने यमराज को पहले हे चुनन लिया. जहा से आया है उधर से वापिस जा और वही होटल में मेरा इन्तजार कर. दारु के गिलास भर के आया हु तेरा नशा मिला आहना मटन होटल के मालिक को खिला कर. वैसे तू सचमुच कला होने के बाद झांट जैसा हे लगने लगा है और तेरे बाल तोह आजतक वैसे हे है, झांट जैसे.", नरिंदर विष्णु पर तंज करने के साथ साथ चीखते चिल्लाते अफीम खान के शरीर पर लम्बे चीरे लगा रहा था. विष्णु के चेहरे पर बस कठोर भाव थे और कुछ कहने से पहले उसने जमीन पर पड़ा तौफीक का कटा हाथ उठा का तलवार अलग की और हाथ नरिंदर की तरफ फेंक दिया जिसको उतनी हे तेजी से नरिंदर ने ठीक बीच से काट कर 2 हिस्सों में पृथक कर दिया था.

"तुम्हारी माता जी मेरी माता जी. साले अंडकोष के आधे भाग तूने मेरे किये कराये पर पानी फेर दिया. वो बच्चियां बचानी जरुरी थी इन्दर. कानून से बढ़कर बस मासूम जीवन है.. यह..", इतनी फुर्ती की कल्पना नहीं थी नरिंदर को जिस तरह विष्णु बिजली सा लपका था और इस बार वार भी जोरदार था जिस से नरिंदर तो बचा लेकिन तलवार निचे जाती हुई अफीम खान की दूसरी ब्याह भी काट गयी थी. जोरदार टंकार के साथ नरिंदर की कलाई तक में दर्द जा पंहुचा.

"अबे ओह हब्शी साले.. मैं तेरा भाई हु बे ढक्कन.. जान से मारेगा क्या?", नरिंदर हैरान था लेकिन विष्णु ने फिर से तलवार उलटे दिशा घुमाई जिसको रोकने या बचने के चक्कर में नरिंदर एक तरफ उछाल गया. सोफे पर गिरने के बाद उसने तुरंत वो जाम सुसज्जित लकड़ी और कांच की भारी मेज एक हाथ से हे विष्णु की तरफ उछाल दी थी और अब बारी उसकी थी बचाव करने की लेकिन उस पर अलग हे गर्मी सवार थी जो तलवार से शीसा चकनाचूर करता दूसरे हाथ से उस मेज को दिवार की तरफ फेंकता फिर से नरिंदर की तरफ लपका लेकिन इस बार चूक गया था विष्णु. पसलियों में कंधे की टक्कर से वो हे उछाल कर जा गिरा.

"अबे ओह झंटू कालिये.. बच्चियां सुरक्षित है बे. पहले उन्हें हे बचाया था मैंने. अबे रुक जा और ठन्डे दिमाग से हाथ तोह मिला मेरे भाई. बहोत हुआ चोर पुलिस का खेल.", नरिंदर आगे बढ़ रहा था लेकिन विष्णु की नजरे लगातार एक तरफ हे जमी थी जो नरिंदर हे था उसके सामने या पीछे वो द्वार. कांच का वो तीखा टुकड़ा नरिंदर के चेहरे के पास से गोली की तरह निकला और उस व्यक्ति के सीधा गले में पेवस्त हो गया जिसके निशाने पर नरिंदर था. नरिंदर जैसे हे चीख सुन्न कर पलटा अब वो दूर जा गिरा था.

"कमीने तू .. आह्हः.. एक महीने बड़ा है मुझसे लेकिन अब आयी तुझे मेरी याद? आज भी मैं तेरी जान 2-2 बार बचा चूका हु. साला दोनों के दोनों बस टक्कर मारते है मर्दो जैसे लड़ना भी नहीं आता कमीनो को.. इस माँ को प्रणाम नहीं करूँगा और तू लौट जा साले शकल मैट दिखाना मुझे. इसलिए छोड़ रहा हु क्योंकि तू कह रहा है की बच्चियां सुरक्षित है. झूठ नहीं बोलता तू बस यही ाची बात है..", नरिंदर का चेहरा और पसली दोनों दुःख रही थी क्योंकि चेहरे की टक्कर लकड़ी सी हुई थी जबकि सोफे पसली में लगा था उसके. विष्णु लड़खड़ाता हुआ उस तड़पते आदमी का गले में फंसे कांच को पाँव से दबाता हुआ उस दरवाजे को खोलने लगा तोह बंद पाया. वो यादव की लाश पर पाँव रखता हुआ भीतर चला गया और उसके पीछे हे नरिंदर भी.

"साले तू बहोत उलझ लिया बे विष्णु और बस अब और नहीं. असम में भी तू बच गया था मुझसे जब मैं तुझे ढूंढ़ने आया था. देख सब सुरक्षित है भाई और मैं जानता हु की तू उसी फाइल पर काम कर रहा है जो तेरे हाथ लगी थी, मेरी गलती से. गुस्सा छोड़ न बे झाँटु.", नरिंदर ने अंदर आते हे दरी सेहमी बच्चियों को देखते हुए बंद दरवाजा खोल कर उन्हें शांत रहने का इशारा दिया. विष्णु ने वह कटे हुए सर और धड़ को देखा तोह उसकी हे बगल में जा बैठा.

"तू कभी नहीं सुधर सकता न इन्दर? यहाँ बचे है फिर भी तेरा कसाई पाना न रुका. तूने हे तोह कहा था के जीवन को मकसद दे जब तेरे पास मकसद न हो? कातिल हु और हथकड़ी नहीं लगवाने वाला तुझसे. वैसे तू लगता भी नहीं की हथकड़ी वाला रिश्वतखोर तोंद बढ़ा ठुल्ला होगा. सीबीआई में है न तू?", जाम की जगह बोतल से हे मदिरा का घूँट भरने के बाद रक्त में सनी बर्फ का टुकड़ा विष्णु ने ऐसे मुँह में रख लिया जैसे वो मीठी रसभरी हो. बोतल नरिंदर को थमा कर वो एक बची का सर सहलाने लगा था उस कटे हुए सर को लात से दूर फेंक कर.

"मैं सीबीआई में नहीं हु और न मैं तुझे पकड़ने आया हु. मैंने पहले हे रिपोर्ट भेज दी है की इस बड़े गिरोह और इनमे शामिल बड़े बड़े मंत्री और पुलिसवालो की डिटेल देने के साथ उन तक पहुंचने में मुझे विष्णु वर्धन सुपुत्र रामाराव वर्धन ने मदद की है. भूतपूर्व राष्ट्रीय खिलाडी जो गुमनामी में भी देश के लिए हे लड़ता रहा चाहे खेल बदल गया हो. बहोत कोशिश की थी भाई तुझे ढूंढ़ने के लेकिन जब भी तेरे पीछे आता न तेरे कदमो के निशाँ गायब मिलते और फिर मैं उतना भाग भी नहीं सकता रे अकेले. दूसरा अंडकोष का गोला आज भी वैसा हे है और उसकी मसरूफियत तुझसे मुझसे ज्यादा है. घर चलते है न विशे, गज्जू भी बहोत याद करता है तुझे.", बोतल से घूँट लेने के बाद वो वापिस अपने दोस्त को देते हुए फाइल उठाने लगा जिसको विष्णु ने हथिया लिया.

"तू आज भी ग्रेहकार्य पहले से करके रखता है बे. हाँ तू झूठ नहीं बोलता लेकिन फिर भी कानून का अधिकारी है और मैं विरानो में बहोत खुश हु, होता तोह तू भी साथ हे है.", नरिंदर ने अपना नाम देख लिया था जब वो फाइल खोल कर पढ़ने लगा.

"इन्दर को झुकाने वाला विष्णु साथ हो तोह कसाई बना रहना जरुरी नहीं होगा. पापा ने फाइल क्लियर करवा दी थी तेरी कॉलेज के बाद लेकिन तू बिना कहे हे गायब हो गया और देख लुका छिपकी खेलते हुए कितने बरसो बाद मिल रहे है. तू ढेर सारे बचो का चाचा बन चूका है विष्णु जिसमे ऐसी प्यारी प्यारी 8 गुड़िया है और एक भतीजा जो विष्णु को 3 गईं ने से पहले धुल छठा सकता.", अब विष्णु ने फाइल फाड़ कर माचिस से आग के हवाले करते हुए वापिस मेज पर रख दी थी.

"लालच दे रहा है मुझे अखाड़े का? वैसे मुझे तोह यार किसी लड़की से प्यार भी न हुआ कभी लेकिन भतीजियां और भतीजे को देखने चल सकता हु. रुकने के लिए बस कसम नहीं देगा. नहीं देगा न?"

"न.. नहीं दूंगा लेकिन सब चाहते है की तू लौट आये. शंकर ने लिए तेरे सपने का घर भी बनाया हुआ सेहर से बहार. अपनी चित्रकारी वाला वैसा हे घर जैसा तेरे गाँव में तू बताता था. हाँ वो अपने शहर के पास है तेरी तरफ नहीं."

"आहना वाला तुझे पता चल गया था?", बचो को अपने साथ आने का इशारा देते हुए वो बोतल वही रखता उठ खड़ा हुआ.

"तूने हे तोह बताया था के वो खाना है मतलब नहीं खाना. मैंने तोह दारु भी नहीं खोली क्योंकि काम पे जाते समय बस काम का नशा बहोत है मेरे लिए. वैसे टीम आती होगी जो इन्हे सुरक्षित पंहुचा देगी इनके घर.", लड़कियों के लिए विष्णु वो कंटेनर लेके आने के लिए आगे बढ़ा था पर नरिंदर की बात उचित थी जिसके कहते हे सफ़ेद कमीज पहने कुछ लोग अम्बस्सडोर कार से उतारते हे सलाम थोक कर खड़े हो गए.

"सब साफ़ करवा कर सील करवा देना आदेश. जो भी बरामदगी है उसकी डिटेल कल भिजवा देना. ये बचे अरुणा के हवाले कर देना जो इन्हे घर तक सुरक्षित पंहुचा देगी. कोई भी दखल दे तोह जानते हो न क्या करना है?"

"यस सर. आलरेडी सबकुछ कण्ट्रोल में है और रिपोर्ट कम के साथ मालिक सर तक भिजवा दी गयी है. आपके कहे मुताबिक टोटल 8 यूनिट्स अभी भी काम पर लगी है और मामले में शामिल अधिकतर लोग हमारी पकड़ में है. वैसे आपने तोह सबकुछ साफ़ कर दिया होगा?", अब वो मुस्कुराया था और उसकी पीठ थपथपाते हुए नरिंदर बस 'गुड जॉब' बोल कर उस फटफटिया पर बैठ कर विष्णु को लिए यहाँ से निकल चला. ाची बात थी की इनमे महिला अधिकारी भी शामिल थी और बच्चियां अब सुरक्षित थी.

"तू तोह यार कोई अलग हे अफसर निकला इन्दर. साला अंडकोष की ये गोली ज्यादा बड़ी तोह नहीं हो गयी दूसरी से?"

"वो भी हमकदम है तेरी तरह झाँटु. िब अफसर नरिंदर शर्मा का राज उसको भी नहीं पता और तू राज सीने में दफ़न करके रखता है जैसे मैं झूठ नहीं बोलता."

"मुझे तोह आहना खाना है श्रीमान अधूरे अंडकोष. भाई बंगाल में मच्छी चावल खा खा कर पक्क गया हु. और हाँ दारु वैट69 जो अज्जू चुरा कर लाया था अपने लिए मेरे जन्मदिन पर."

"सब मिलेगा बे अब सब मिलेगा बस तू लिस्ट बनता रहियो सबसे मिलने और प्यार करने के साथ."

"वैसे कृष्णा आज भी सेक्सी लगती तुझे? मुझे समझ नहीं आता के एक बहिन जी जैसी लड़की जो साड़ी पहनती थी वो तुझे सेक्सी कैसे लगती थी?"

"प्यार करके देख लेकिन तू तोह झाँटु है न. वो आज भी सेक्सी है और इन्दर उसके पल्लू से हे बंधा है आजतक."

"तोह तेरा लौंडा तुझसे भी तगड़ा निकला. क्या नाम है उसका?"

"अर्जुनननननन."
 
अपडेट 210

कल्पना और भविष्य (1)

"ुहम्म्म्म.... आठ.. आराम से भाई आअह्ह्ह.. मुझे पकड़ ले आह", ऋतू सिर्फ महीन सी गुलाबी पंतय और काली टीशर्ट पहने जिस तरह से अर्जुन पर उछाल रही थी, अर्जुन तोह पहले हे उसके वशीभूत हुआ मजे से निचे दबा था. जाने कैसे ऋतू हर बार उसका समूचा लिंग सुपडे से जड़ तक भीतर समाहित करती और वापिस उठते समय उसके होंठो को चूसते हुए इतना कसाव बढ़ा लेती की अर्जुन बेबस रह जाता. अभी वो धम्म से उसकी जांघो में गिरी हे थी और अर्जुन से लिपटी वो जाने कौनसी बार साखळीत हुई थी लेकिन इस बार तोह खुद अर्जुन हे हर सेकंड के साथ काँपता हुआ अपना रास उस संकरी kaam-galiyaar के अंतत में फेंकने लगा. वो इतना झाड़ा था जैसे ये पहला और अंतिम समय एकसाथ हो. नजरे आपस में मिली तोह उन घने बालो के घेरे में दोनों के चेहरे सुरक्षित थे. वो पंखुड़ी से गुलाबी आधार और उनकी शहद सी मिठास अर्जुन ने भली भांति महसूस की. चेहरे अलग हुए तोह नजारा दुर्लभ था क्योंकि उसके ऊपर सवार ये युवती सफ़ेद गुलाबी कुर्ती पहने आरती थी. उसके जिस्म की बनावट अस्वाभाविक रूप से ऋतू सी थी लेकिन जहा नरम कूल्हों पर अर्जुन के दोनों हाथ स्थित थे वो मुलायम और ऋतू से कुछ अधिक भरी, जिनका ज्ञान सिर्फ और सिर्फ अर्जुन को था.

"ऐसे क्या देख रहे हो? ारु के ारु.. उमाठ", आरती ने अपनी रेशमी जुल्फों का पर्दा फिर से उस पर गिरते हुए थोड़ा सा योनि का दबाव भी निचे कैसा तोह बची खुची सूक्ष्म बूंदे भी लिंग का साथ छोड़ती उस कासी हुई मुलायम तलहटी में विलीन हो गयी.

"तुम पापा बन्न गए हो मेरे फत्तू.. आह्हः.. अलका दीदी ठीक है अब..", ये हो क्या रहा था जो हर बार झुकने के बाद उठता चेहरा बदल जाता लेकिन इस बार तोह उसके ऊपर कोई न था बस ये आवाज थी जो अर्जुन की धड़कन थी, उसकी प्रीती की आवाज. घनी दाढ़ी, छोटे छोटे हलके घूमे हुए बाल, चौड़ा निर्वस्त्र सीना जिसपे मध्यांश रेखा और छाती के कटाव पर बालो की उत्पत्ति थी लेकिन वो जिस्म कही ज्यादा मजबूत था इस अर्जुन से. ध्यान देने पर दायी आँख के ऊपर की एक बहन किसी चोट की वजह से गायब थी और ऐसे निशाँ कई जगह थे उस तराशे हुए सख्त जिस्म पर. लेकिन सीने का बाय हिस्सा जैसे कुछ वक़्त पहले हे बंद किया गया था, सिलाई और पट्टी के बाद. ये यकीनन हे अर्जुन था लेकिन उम्र में जैसे एक दशक या उस से आगे. Neele-hare परदे और आसपास का माहौल साफ़ बता रहा था के ये कोई आधुनिक हॉस्पिटल का बेहतरीन कक्ष या िक है. हाँ शायद िक हे था क्योंकि युवक के हाथ में चेहरे से उतरा वो ऑक्सीजन मास्क और ये लगातार होती beep-beep की आवाज, santri-laal रंग की टिमटामटी बत्तियां और सामने वो बड़ा दरवाजा खोल कर भीतर आती सफ़ेद कोट की टोली. बस उन आँखों ने इतना देखते हे चेतना त्याग दी. मजबूत कलाई सी छिटक कर वो प्लास्टिक का पारदर्शी मास्क अब हवा में लटक रहा था और सिरहाने के दायी तरफ राखी वो बड़ी मशीन लगातार एक सी आवाज करती हुई उस मॉटे बिंदु के पीछे ओझल लकीर सी भागने लगी.

'ओह साला ये सब क्या था? धत्त तेरी की.. पजामा हे भीग गया. ये ऐसी प्रेमिकाए रहेंगी तोह जीना आसान थोड़ी रहेगा. सपने में भी मैं हे निचे था और उधर खाली करने के साथ असलियत में भी काम करवा दिया मेरा. वैसे दादी कहती है की सपने में मृत्यु दिखे तोह उम्र बढ़ जाती है. अब उन्हें कौन समझाए की ऐसे 3-3 मिल कर उनके लाडले को निचोड़ने लगी तोह सपने सच भी हो जाते. चल बीटा अर्जुन आज खुद हे पजामा धो और अँधेरे में नाहा.', रामेश्वर जी की बगल में हे सोया था वो जो अब उठ कर अपने हे वीर्य से परेशां होता हुआ तार पे टेंगा टोलिया लिए पिछले स्नानघर की और बढ़ चला. यहाँ नाने से उसके दादा की नींद में व्यवधान निश्चित था और अभी तोह कौशल्या जी भी नहीं उठी थी. अर्जुन अपनी हालत पर मंद मंद मुस्कुरा रहा था जैसे उसको ऋतू, आरती और प्रीती से आगे कुछ याद हे न रहा हो. इन कल्पनाओ में हे उसका वीर्य सना लिंग फिर से उठने लगा जिसको दरकिनार करता वो ठन्डे पानी के निचे जा खड़ा हुआ. 4 बजे से पहले लिए जा रहे इस स्नान में जैसे वो अकेला न था. फुहारे से गिरता पानी और उसके निचे भीगता अर्जुन इस वास्तविकता से पृथक थे.

'उननननहहह..', गीला वस्त्र खुलते हे लिंग हवा में झूलता सीधा खड़ा होता स्थिर हो गया. कल्पनाओ में तोह वो जैसे प्रीती की नाजुक हथेली में लिप्त उसके होंठो से गीले गले तक जाता महसूस हुआ. अर्जुन के दोनों हाथ अब दिवार पर टिक चुके थे और सीने के सूक्ष्म चूचक अपने घेरे सहित अकड़ कर अब एक और एहसास देने लगे. पीठ के पीछे निर्वस्त्र लिपटी ऋतू के कठोर स्टैनो का नुकीला हिस्सा दबाव बनता और सामने उसके सीने के दोनों चूचक जैसे वो गोरी उँगलियाँ कभी मसलती तोह कभी कुरेदने लगती. अर्जुन काँप रहा था मजे की अधिकता सा लेकिन ये कल्पना इतनी गहरी हो चली की उसके पानी से भीगे होंठो पर एक और अधरों की जोड़ी आ तिकी. जाने कैसे ये तीसरी बाला अपना सर उसके ऊपर झुकाये बड़ी मदहोशी से उसके होंठो को चूसती और फिर अपनी जीभ से उसके मुख के भीतर अलग सी अठखेलिया करने लगती. वो ठंडा पानी अब इस कामाग्नि के आगे स्वयं बेबस हो चला था.

"ठप्प ठप्प..", एक पल में हे अर्जुन जैसे उस अदृश्य kaam-ghere से वर्तमान में लौटा. जाने वो कितनी देर से वह खड़ा और अब जैसे उसके लिंग का तनाव अपनी चरम पर था जो इस दस्तक से उस पानी सा ठंडा होने लगा.

"ओह बैल, कितनी देर तक नाहटा रहेगा? 5 बार थोक चुकी दरवाजा और अब साढ़े 4 बज चुके है.", अर्जुन ने अपनी दादी की आवाज सुनी तोह तुरंत पानी बंद करता हुआ बोलै.

"आ गया दादी बस एक मिनट.", भीगा पजामा निचोड़ने के बाद कामर पर टोलिया लपेट कर वो भीगे बदन हे बहार निकला तोह सामने कौशल्या जी कड़ी थी.

"पानी से नींद खुलती है लोगो की लेकिन तू घड़ियाल है क्या जो उसमे भी सोना सीख गया? आज कितना काम है और 6 बजे वह शिलान्यास करने के बाद हमको 7 बजे वापिस भी निकलना है लेकिन देख तेरी वजह से पहले हे आधा घंटा देरी हो चुकी. अब तैयार हो कर दूध पी और फिर निकल अम्रतिए को लेने. तेरे बाउजी बहार आँगन में नाहा रहे है.", अर्जुन झेंपता हुआ गीले बदन हे निकल गया. ऊपर वाली मंज़िल के स्नानघर में पूर्णिमा जी थी और इधर खुले आँगन में टोलिया लपेटे उसके दादा जी भी लगभग नाहा चुके थे. अर्जुन को थोड़ी हैरत हुई जब अनामिका चची उतनी सुबह हे उसके कपडे लिए कमरे से बहार निकली.

"आप भी उठ चुकी है चची?", अर्जुन ने उनके हाथो से पहले टोलिया लिया क्योंकि जो उसके पास था वो तोह कमर पर लिप्त था.

"तोह मैं क्या इस घर में नहीं रहती? 4 बजे का अलार्म अभी भी मेरे कमरे में है जो तुमने लगाया था. ये सो रहे है तोह तुम भीतर हे कपडे बदल लो, मैं नाहा लेती हु.", धीमी आवाज में उन्होंने जो कहा था उसके पीछे हलकी सी मुस्कान और शर्म भी थी. वो लोग खुले आँगन से पीछे हे थे इधर जहा उतनी रौशनी न थी जबकि अनामिका चची ने टोलिया देने के दौरान वो उभर हल्का सा अपनी कमर पर महसूस कर लिया था जिसने अर्जुन को परेशां कर रखा था. उन्हें पलट कर कमरे में जाते देख अर्जुन की भी नजर पड़ी थी उन पर और वो गाउन में नहीं थी जैसा वो उसके साथ कमरे में सोते समय होती थी. चची के बाथरूम में जाते हे वो विनोद चाचा से कुछ दुरी पर खड़ा कपडे पहन ने लगा. दोनों बाप बीटा गहरी नींद में थे और 5 मिनट बाद अर्जुन उँगलियों से हे अपने बाल सुलझाता खुले आँगन में आ चूका था.

"उठा तू सबसे पहले और तैयार हो रहा घंटे बाद. किसी दुविधा में हो मुखिया जी?", रामेश्वर जी ने भी अब तक वस्त्र पहन लिए थे जो अपनी बाहों और सर पे हलके हाथो से सरसो का तेल मलने के बाद अतिरिक्त चिकनाई तोलिये से साफ़ कर रहे थे. 7 दशक जीवन के पार करने के बावजूद वो एक मजबूत व्यक्ति थी जैसा ज्यादातर मामलो में मुमकिन नहीं था. उनकी वो तुलसी की माला अभी तकिये पर राखी थी जिसको उठा कर अपनी बगल के जेब में रखते वो अर्जुन पर हे नजर टिकाये थे.

"उठना और आँख खुलना अलग अलग है दादा जी. कल म्हणत कुछ ज्यादा हो गयी थी और फिर कूलर की ठंडी हवा में नींद तोह बढ़िया आयी पर जब उचट गयी तोह अधूरी नींद उतारने में हे समय लग गया. आप तोह 5 बजे नहाते है फिर इतनी जल्दी?"

"क्यों मैं कोई मुर्गा हु जो एक हे वक़्त पे बांग दूंगा? तेरी दादी ने तुझे रात भी बताया था की महूरत 7 बजे का है और उसके बाद हम लोगो को तुरंत निकलना भी होगा. तू छुट्टियां मानाने आया है लेकिन मेरी गुलामी के दिन मुझे आराम की इजाजत नहीं देते. वैसे तुझसे कुछ पूछना था यार.", रामेश्वर जी द्वारा अपनी दयनीय स्थिति बताने के बाद दोस्त की तरह बात करना अर्जुन को कुछ जांचा नहीं लेकिन मंशा तोह वो उनकी जानता हे था. वही चारपाई पर उनके सामने बैठता हुआ वो अपने गीले बालो को पीछे करता मुस्कुरा रहा था जबकि आसपास भी कोई न था जिस से रामेश्वर जी को अपनी बात कहने में कोई हिचक हो.

"कहिये बाउजी ये बैलबुद्धि हर मुमकिन सवाल का जवाब देने की कोशिश करेगा या फिर जो आप कहेंगे वैसा करूँगा."

"ये माला देख रहे हो, ये हमारी माँ ने हमको दी थी जो इसलिए ख़ास है क्योंकि इसको तैयार भी उन्होंने हे किया था. ऐसी एक तुम्हारे गुरु के पास है जो पिता जी ने दी होगी क्योंकि वो उनकी थी लेकिन एक तीसरी माला भी थी, नीली गांठ और फंदे वाली. वो मुझे मिली नहीं कही भी. हर तरफ खोजै ढूंढा पर असफल रहा. तुम महल जाते रहते हो तोह सोचा बस एक वही जगह बची है और क्या पता तुम वो ...", रामेश्वर जी से आगे कुछ कहते न बना और जाने किस भाव में वो इतना भी अपने पौटे से कह गए थे लेकिन अब उनके चेहरे पर आत्मग्लानि के भाव उभरने लगे.

"आपको नहीं लगता इस रिश्वत की उम्मीद आप गलत इंसान से कर रहे है बौ जी? वैसे आपके पास आप वाली तोह है हे और वो तीसरी माला जिसको दी होगी उसके पास हे रेहनी चाहिए. इतने बड़े महल में एक तुलसी की माला का क्या काम और क्या वो आज तक सलामत भी होगी?", अर्जुन सब जानते हुए भी अनजान बना हुआ था और रामेश्वर जी गंभीर उतरे हुए चेहरे से हामी भरते हुए उसके सामने बैठ गए. रौशनी बुआ हे अर्जुन के लिए दूध ले आयी थी जबकि रामेश्वर जी अपनी बीवी द्वारा तुलसी में अर्घ देने के बाद हे कुछ ग्रहण करने वाले थे.

"बस बीटा मुझे लग रहा था के इतना कुछ तुमने मुझे सौंपा जिसकी मुझे कल्पना तक नहीं थी तोह थोड़ा लालच आ गया. उसके बारे में तुम भला कैसे जान सकते हो और सच कहु तोह अब उसकी जरुरत भी नहीं. हमे ऐसी चाहत नहीं रखनी चाहिए थी जिसके मायने हे न हो. मान लेना की ये चर्चा हमारे बीच कभी हुई हे नहीं."

"जी जैसा आप कहे. आप बैठिये मैं अपनी खुराक लेके आता हु.", रामेश्वर जी सचमुच व्यथित हो गए थे की कैसे उन्होंने इतनी तर्कसंगत चाहत अपने हे पौटे के सामने रख दी जिसके बारे में वर्तमान में किसी से भी बात करना अनुचित था. अर्जुन अपने कमरे में जा चूका था खुराक के लड्डू लेने और वापिस लौटा तोह कटोरी में वही काले लड्डू लिए था. एक घूँट दूध का पीने के बाद वो अपने दादा को देखने लगा जो क्षितिज में जैसे नभ को धरती में मिलने की कल्पना करते देख रहे थे. उनकी एकटक गाड़ी आँखों के सामने वो नीले धागे में पिरोये मनके झूलने लगे तोह कुछ पल उन्हें जैसे समझ हे नहीं आया के वो भी कल्पना है या सच.

"मैं ये देने के साथ आपको कुछ और भी सौंपना चाहता था बौ जी लेकिन फिलहाल आप इसको रखिये. वैसे लाल और सफ़ेद का जोड़ा होता है और उस हिसाब से तोह ये आप अगर दादी को पहनाये तोह उन्हें भी ाचा लगेगा और ये हमेशा आपके करीब हे रहेगी. बनाई तोह इसलिए हे गयी थी न ये बौ जी? पहले पिता को तुलसी संरक्षक और फिर उनके द्वारा या पुत्र के हाथो उनकी बहु को नीलांश बदले में माता द्वारा ये श्वेतांबरी अपने पुत्र के गले में उसके विवाह की सूचक. आपकी भार्या आपसे दूर तोह नहीं?", अपने दादा की हथेली पर उनकी रिश्वत की आखिरी किश्त रखते हुए अर्जुन ने हे आज उन्हें जैसे अतीत काल से चले आ रहे एक और दर्द से मुक्त कर दिया था. जो अतीत का सच था उसकी कल्पना पर वर्तमान और दांपत्य की तपस्या स्वरुप कौशल्या जी भारी पड़ गयी थी.

"तू जादूगर है क्या? और तुझे क्या लगता है ये मैं किसी और को देने वाला था?"

"जादू तोह मैं मानता हे कहा हु जब पोलिसवाले का पौता हु बौ जी लेकिन आप ये किसी को भी नहीं देने वाले थे ये जरूर सच है. बाकी आपकी मर्जी क्योंकि ये आपकी है और अनजाने हे मेरे हाथ लग gayi.",Arjun छुपा गया था ये बात की अनजाने तोह कुछ नहीं मिलता लेकिन उसकी बात सुन्न कर रामेश्वर जी जरूर समझ गए थे की वो उनके भी अतीत के बारे में थोड़ा ज्यादा जान चूका है. लेकिन चेहरे पर संतोष था की जो चाहत राखी वो पौटे ने पूरी की. फ़ोन की घंटी की आवाज सुन्न कर अर्जुन हे उठ कर उस भीतर वाले कक्ष की तरफ बढ़ चला क्योंकि उसकी दादी भी इधर आ गयी थी हाथ में तजा फूल लिए.

"उम्मीद तोह नहीं थी की फ़ोन तुम उठाने वाले हो.", ये ऋतू हे थी जिसने इतनी सवेरे घंटी घुमा दी थी वो जाने क्या सोच कर. अर्जुन बड़ी मुश्किल से तोह उसके ख्वाबो कल्पनाओ से बचा था अब वो साक्षात् हे फ़ोन पर थी.

"इधर होती तोह उम्मीद से ज्यादा हे प्यार दिखने वाला था मैं.", अर्जुन ने सीधा सा जवाब दिया जैसे वो भरा बैठा हो लेकिन सुकून था के ऋतू की आवाज सुनाई दी. वो दूसरी और दबी आवाज में खिलखिला रही थी.

"कुछ हुआ क्या तुम्हारे साथ?"

"लगातार हो रहा है और पता नहीं क्यों. वैसे ये वक़्त सोने का नहीं था? और चाचा पापा घर नहीं है क्या जो दादी के कमरे से फ़ोन कर रही हो?", अर्जुन को ध्यान आया की उसको दूध ख़तम करके निकलना भी है.

"ोये घोंचू, पापा होते तोह मैं फ़ोन करती क्या? वो निकले है अभी और मैं तुम्हे क्या बताऊ मेरी हालत क्या हो रही है. रात पढ़ाई करते हुए 2 बज गए थे और सोने लगी तोह काम खराब. इसलिए नहाना पड़ा और अब दिल नहीं लग रहा मेरा. तुम कल क्सक्सक्सक्स आ जाओ न, रात रुक कर चले जाना. माँ और नानी होंगी बस और तुम्हारी तरफ से तोह रास्ता भी ज्यादा नहीं. ारूऊ?"

"ठीक है लेकिन मुझे जगह का नहीं पता और अभी मैं थोड़ा बहार जाने लगा हु क्योंकि कॉलेज का शिलान्यास है 7 बजे. पीसीओ से फ़ोन करू फ्री हो kar?",Arjun ने तोह एक बार में हे हाँ कह दी थी जिस वजह से ऋतू के चेहरे पर अलग हे चमक थी.

"रहने दे तुझे प्रॉब्लम होगी और नया रास्ता. दादी को पता चलेगा की तू उधर आया तोह फिर शामत आयी समझ. वैसे कॉलेज का नाम क्या रख रहे है?"

"मुझे तुम्हारी ज्यादा जरुरत है फिलहाल और दादी से निबटना तुम्हारा काम. वैसे अलका, आरती और कोमल दीदी नहीं जा रहे क्या साथ?", कॉलेज का नाम दरकिनार करता वो बस मुलाकात पर हे अटक चूका था जिस वजह ऋतू आँखें नाचती अकेले में हे खुश हो रही थी, या शायद अकेली नहीं थी.

"आरती कहती की तुम उस से नाराज हो और अलका साथ होगी तोह फिर पढ़ाई नहीं होने वाली ऐसा माँ का कहना है. प्रीती से पुछा था लेकिन वो मैडम जबतक तुम नहीं आते वो घर से कही जाने वाली नहीं. हम कल सवेरे जल्दी निकल रहे और नाना जी ने बताया था के 7 घंटे का रास्ता है. तुम्हारी तरफ से भी 3-4 घंटे का होगा. देख लेना."

"सोच तोह ये रहा था के 3 घंटे में उधर हे आ जाऊ लेकिन आज नहीं. कल रात को हे मिलते है बस अभी माँ या नानी को मत बताना. प्रीती से कल घंटे से ज्यादा बात हुई थी मेरी और उसने बताया के 2 दिन से इवनिंग के टाइम स्किप हो रहे है. माँ से बात करूँगा, bye."

"लव यू.", ऋतू ने बहोत हलके से कहा था जो अर्जुन के चेहरे पर ख़ुशी लाने के लिए काफी था.

"में तू. दोपहर को कॉल करता हु.", अर्जुन ने फ़ोन रखा तोह दरवाजे की चौखट पर कौशल्या जी कड़ी दिखी. एक पल के लिए तोह उसकी ख़ुशी घबराहट में बदल गयी लेकिन उनका चेहरा इस तरफ नहीं था. फिर वो पलटी और अर्जुन से मुखातिब हुई.

"दूध ठंडा हो गया तेरा और बड़ा ाचा उपहार दिलवाया है मेरे बेटे ने अपने बाउजी से. चल अब नाश्ता ख़तम कर, फिर बस 2 घंटे मेहनत कर ले उसके बाद मांजी तोड़ता रहियो शाम तक. जरा फ़ोन मिला दे मुझे ललिता से बात करनी है.", अर्जुन ने मैं हे मैं कहा के आवाज दे देती तोह बात हे करवा देता क्योंकि फ़ोन वही से तोह आया था. नंबर मिला कर वो हैंडल दादी को पकड़ता हुआ बहार आ गया. दूसरी तरफ ऋतू थी तोह मतलब अब दादी को भी देरी होने वाली थी. पूरे 10 मिनट बाद हे वो यहाँ से निकल चूका था अमृता को लेने लेकिन पंडित जी के कार ले जाने वाले मशवरे को मन करता हुआ. अमृता साधारणतया शामिल होना चाहती थी और एक दुपहिया से ज्यादा साधारण सवारी क्या होती किसी राजकुमारी की.

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"तुम कब निकलने वाले हो बिनि बीटा?", रामेश्वर जी के साथ चाय पर विनोद, रौशनी, कृष्णेश्वर उपस्थित थे जिनमे विनोद को छोड़ कर बाकी सभी तैयार भी हो चुके थे. संजीदा देवकी को देखने के बाद अब नहाने गयी थी और वैसा हे अंजलि और आँचल ने किया. सेवक अभी से वापसी का सामान और बैग सफारी के पिछले हिस्से में रख रहा था.

"बस आप लोगो के साथ नीव का कार्य होते हे ताऊ जी. इधर पापा है और अर्जुन भी. ये लोग भी व्यस्त रहे तोह सेवक, शिवलाल और संजीदा जी है घर पे रौशनी दीदी और अनामिका के पास. वैसे भी पहले तोह सिर्फ पापा हे होते थे वो भी रात को. आज निकलूंगा तोह कल पहुंच सकूंगा. कुछ जरुरी काम था ताऊ जी?", विनोद को इतना समर्पित देख उन्होंने न में सर हिला दिया.

"हाँ ये भी सही है की घर में अब चहल पहल रहेगी बचो के होने से. सुरक्षित तोह बीटा इस घर से ज्यादा कुछ है भी नहीं देखा जाए तोह. बस तुम अपना ध्यान रखना और कैसी भी परेशानी हो पहले मुझसे बात करना. वैसे अर्जुन और तुम्हारी ताई ने ये हवेली अनामिका बिटिया को सौंप दी है, मुझे लगा के तुम्हे जानकारी होनी चाहिए. ये इस तरफ वाला भाग रौशनी बिटिया के लिए और उधर वाला तोह पहले से निर्धारित हे है. संजीदा बिटिया ने कहा है की उसको थोड़ा एकांत माहौल पसंद है इसलिए ऊपरी मंज़िल पर मधु वाला कमरा अब से वो प्रयोग करेगी. अब तुम नहीं होंगे इधर और इन सबका सामान वैगरह देखना पड़ेगा इसलिए प्रेम (शर्मा) को बोल देना के वो कृष्ण या तुम्हारे भतीजे से बात करता रहे.", रामेश्वर जी ने कितने आराम से कह दिया था के मालिकाना हक़ अब अनामिका के पास है लेकिन उसके साथ बाकी सबका हिस्सा क्या है वो भी जान लिया जाए.

"निश्चिंत रहिये ताऊ जी और वैसे भी जैसा अर्जुन ने मुझे शाम को बताया था मैंने जीजा को वो सब भिजवाने के लिए बोल दिया है. यहाँ मेरे जितने भी दोस्त और जरुरी काम के लोग थे उनसे अर्जुन मिल चूका है तोह काम बस फ़ोन मिलाने भर पर होता रहेगा. वैसे अनामिका को हवेली देना .. मतलब ये तोह पुश्तैनी है न ताऊ जी?"

"बिनोद, हर पीढ़ी में किसी को तोह देखभाल उठानी पड़ती है बीटा और घर औरत के हाथ रहे तभी वो घर बनता है. अनामिका पढ़ी लिखी होने के साथ हर काम में दक्ष है. निकेतन के होने से पहले तोह दूध भी वही निकलती आयी है और मेहँदी पूरी खिलने से पहले रसोई में सका लेने लगी थी ये. अब तोह वैसे भी घर में इतनी उन्नत्ति है तोह आपस में सभी मिल कर काम करेंगी तोह ये आँगन उधर वाले घर से बेहतर बगीचा बनाएगा. चल अब तू नाहा ले और आपने लाला जी की तरफ जाना था याद है न?", कौशल्या जी ने चेताया तोह रामेश्वर जी उठने लगे पर जैसे आज उन्हें ज्यादा भागदौड़ करनी नहीं थी. घर के बहार रुकी कार से लाला जी के साथ उनकी पौती मीनाक्षी, जो बेहद शालीन से पहनावे में थी वो सबको हाथ जोड़ती हुई दाखिल हुई.

"मैं कहा, भाभी जी राम राम. पंडत ने तह वेहलियाँ कहां तोह हटना नई तेह मैं सोचिए की अज्ज मौका चंगा है भाभी दे हाथ दी चा पी लायी जावे. रामेश्वर, यह है मीनाक्षी. कल वि ेस्टो मिलना नहीं हो पाया स तेरा तेह पिछली दफा यह मामे घर सी. पुत्तर जी तुहाडा ना ेहना ने रखिये, दादा जी ने यह मेरे तोह वि पहला.", मीनाक्षी पाँव छूने लगी थी जिसको वही रोक कर आशीर्वाद देते हुए रामेश्वर जी ने अपने हे बगल में बैठा लिया. कौशल्या जी और पूर्णिमा जी ने भी इस युवती को स्नेह से दुलारा था.

"लाला जी, पौती सच्ची मीनाक्षी हे है. पता है बीटा इसका मतलब क्या होता है?", कौशल्या जी के सवाल पर बड़ी मासूमियत से उसने सर हिला कर हाँ में जवाब दिया था.

"जी जिसकी आंखें मछली जैसी सुन्दर हो बीजी (दादी).", कौशल्या जी तोह जहा पहले उसकी सादगी और चलने कर हे बड़ा ध्यान दे रही थी वही उसकी आवाज ने गहरा असर किया था उनके दिल पर. दोनों हाथ एक दूसरे पर बांध कर झोली में रखे मीनाक्षी इस पल में भी बेहद सलीके से थी.

"तुम्हे ये नाम दिया गया क्योंकि इसका मतलब माँ दुर्गा भी है. उनके हे एक स्वरुप को मीनाक्षी कहा गया. बहोत प्यारी और ाची बची हो तुम. लाली बड़ी तारीफ कर रही थी तुम्हारी और अर्जुन ने भी कहा की मैं तुम्हारे साथ हे वह फीता काटू. सच में भाई साहब बची प्यारी भी बहोत है और समझदार भी.", यहाँ अर्जुन का जीकर आते हे मीनाक्षी की धड़कन कुछ बढ़ सी गयी थी. कल भी उसको khel-ghar में देख कर ये चुपके से निकल गयी थी और अब तोह बैठी भी उसके घर थी अपने दादा की वजह से. उसकी नजरो ने कोशिश तोह की उसको ढूंढ़ने की लेकिन लाली नजर आते हे थोड़ी रहत मिली.

"आओ दीदी, आपको मैं हवेली दिखती हु. ले जाऊ न दादी जी इन्हे घर दिखने?", लाली का भी अलग हे हिसाब था जो कौशल्या जी भी ाचा लगता था उसका ऐसे हंसना बोलना और काम हे झिझकना.

"हाँ अब तू चाय पानी की जगह पहले इसको हवेली घुमा दे. जा बेटी घूम ले फिर चाय नाश्ते के बाद निकलते है.", मीनाक्षी भी अपने दादा जी की तरफ से मुँह सहमति मिलते हे लाली के साथ निकल चली. लेकिन ये लाली भी उसको सबसे पहले जिधर ले कर गयी वो कमरा अर्जुन का हे निकला. बहार वो लोग अपने किस्से लिए बैठे थे और इधर कंप्यूटर के बगल में उस मेज पर राखी गुड़िया की और स्वतः हे मीनाक्षी के कदम बढ़ चले.

"ये किसकी है?"

"वापिस रख दो दीदी ये अर्जुन भैया की है और आँचल दीदी को भी हाथ लगाना मन है इसको. मैं तोह इसलिए यहाँ आयी थी की आप वो बम फोड़ने वाली गेम लगा दो जरा इस कंप्यूटर पर. बारी बारी से खेलते है न."

"ये अर्जुन जी का कमरा है लाली? और वो गुड़िया रखते है?", गुड़िया वापिस रखती मीनाक्षी बिना किसी चीज को हाथ लगाए बस हर तरफ देखने लगी थी. अब यहाँ पूर्णिमा जी और कौशल्या जी का सामान तोह था नहीं. अर्जुन की किताबे, कपड़ो का बैग और वो कंप्यूटर के साथ बस गुड़िया हे थी उधर.

"ये उनके पास शुरू से है जैसा मुझे पता लगा और कमरा भी भैया का हे है नहीं तोह इधर इतनी मोती मोती किताबे और ये कंप्यूटर क्या कर रहा होता. ये मैंने बटन दबा दिया दीदी अब आप बाकी सब चालू करो और मैं आपके लिए चाय लेके आती हु.", लाली कुर्सी देने के बाद बहार निकल गयी और मीनाक्षी ने इस बार बड़े ध्यान से उस गुड़िया को देखा जो बार्बी का हिंदुस्तानी संस्करण था.

'इनका सही है. देसी को विदेशी बना दो और विदेशी को देसी. बेशरम इणां कही के. अब नहीं मिलूंगी मैं आपसे बोल देती हु.', मीनाक्षी जिस तरह से बात कर रही थी वो ये मैं की जगह बहार तक बोल रही थी, अनजाने हे सही.

"तुम्हारी तबियत तोह ठीक है न दीदी? कौन बेशरम और किसको क्या बना दिया किसने?", लाली तोह वापिस भी आ कड़ी थी उसके पीछे.

"कुछ नहीं लाली वो बस एक नाटक है कॉलेज में जिसकी लाइन याद कर रही थी. ये ले तू खेल तेरे बम फोड़ने वाली गेम और मैं यहाँ बैठती हु.", अर्जुन के बिस्टेर पर रखे तकिये को अपनी गॉड में रख कर मीनाक्षी से चाय का कप उठा लिया था. लाली तोह बड़ी ख़ुशी से जुट गयी थी उस खेल में झंडे लगाने. मीनाक्षी के साथ दोहरा अंतर्द्वंद चल रहा था. अर्जुन के बगैर वो उसके करीब होना चाहती थी और सामने नजर आने पर उस से दूर जाना. अभी भी उसकी कल्पनाओ में अर्जुन हे था उस तकिये के रूप में जिसको खुद से लगाए जाने वो किस आनंद में लीं थी.

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साटन के सफ़ेद मुलायम गाउन में एक तकिये को सीने से लगाए और दूसरे पर चेहरा करवट से टिकाये सोई अमृता को कुछ खबर न थी की उसके कमरे में इस वक़्त वो अकेली नहीं है. महल में आने का पूर्ण अधिकार प्राप्त था अर्जुन को लेकिन अक्सर बंद रहने वाले इस कमरे को खोलने का साधन भी उसके पास था. एक शातिर चोर की तरह वो दबे पाँव भीतर घुसा था निचे सेविका को ठीक पौने घंटे बाद नाश्ता तैयार रखने का बोल कर. इतने ठन्डे तापमान में मात्रा वो रेशमी झीना सा बिना ब्याह का परिधान पहने सोई अमृता जैसे ऐसी ठंडक के आदि थी. खुली घुंघराली जुलगो की एक लत्त जैसे किसी ने सावधानी से उसके गाल पर रख कर ये दृश्य प्रकट किया हो. अर्जुन करीब लेता उसको ऊपर से निचे तक निहारता रहा. पतली कमर के बाद कूल्हों का उठान और कपडे के ऊपर से हे उनका एकसार घुमाव बताता था की भीतर कोई अंगवस्त्र मौजूद न था. सामने दोनों ठोस उभार आपस में भीड़ कर लगभग आधे बहार झलक रहे थे जिनकी रंगत और चमक अलग हे कशिश से भरी.

'आज मैं अपने पाँव पर कुल्हाड़ी मार रहा हु या ये हर तरफ कुल्हाड़ियाँ बिछी है? बड़ी प्यारी लग रही हो राजकुमारी जी और दिल कहता है बस तुम सोई रहो और मैं देखता राहु लेकिन ऐसे काम नहीं बन्न ने वाला.', अर्जुन तुरंत टीशर्ट उतार कर दूसरी तरफ से अमृता के पीछे आता हुआ उसको आराम से बाहों में लिए गर्दन पे आयी जुल्फें हटा कर उसके जिस्म के महक लेने लगा. इतने में हे उसका वो कामदण्ड अपनी चरम पर पहुँचता अम्रतिए के उभरे कूल्हों के बीच जा टिका. वो हल्का सा कुनमुनाई जैसे ऐसा हे कोई सपना वो नींद में देख रही हो. हलकी सी कामुक मुस्कान अर्जुन ने भी उसके चेहरे पर झुकते हुए देखि तोह कमर कुछ झाड़ा हे सत् चुकी थी. वो रेशमी परिधान उस मूसल के दबाव के साथ भीतर धंसने लगा जिसकी वजह से अमृता ने पीठ के बल होते हुए उनींदी आँखें खोल कर अपने ऊपर छाये इस निर्वस्त्र धड़ लिए युवक को बस एक क्षण देखा और आँखें मूँद कर खुदसे हे अपनी तरफ खिंचा.

'गयी भैंस पानी में', अर्जुन सब भुला कर उस मखमली जिस्म को ढकता हुआ अमृता के मलाई केसर से होंठो को बेहद इत्मीनान से चूमने लगा था. अभी भी अमृता के जिस्म पर बस उसके होंठ और लिंग का हे स्पर्श था जिस वजह से जांघो के बीच कुछ दुरी बनते हे उसका जिस्म झनझना सा उठा और नींद के साथ सपना भी ओझल. जबतक वो अर्जुन को रोकती उसके हाथो ने वो दोनों बहुमूल्य कबूतर जिनकी आद्रता वातानुकूलन की वजह से ठंडी थी उन्हें पंजो में भर लिया था.

"ओह्ह्ह्ह.. उम्म्म्म..", उसकी आवाज का घुटना बहोत था उस चुम्बन पर विराम लगाने को. दोनों चेहरे दूर होते हे एक दूसरे को टटोलते लगे. अमृता योनि पर ठीके उस कठोर अंग की दस्तक भुला कर बस स्थिति समझने में लगी थी और जैसे हे उसके कोमल वक्षो पर सर उठाते चूचक अर्जुन ने सहलाये वो मछली सी तड़पती उसको वापिस खिंच कर खुद से चिपकती हुई चूमने लगी. इस बार ये चुम्बन कही से एक तरफ़ा या स्वप्निल न था. गुलाबी रंगत वाले चुचकों को हलके से सहलाते हुए अर्जुन ने अमृता की अमृत सी मीठी जिव्हा को मुँह में भर कर चूसने का उपक्रम किया तोह उस रेशमी परिधान के योनि सम्मुख क्षेत्र पर ये पहला गीलापन उभर आया. अमृता हस्तमैथुन से अनजान कोई किशोरी न थी लेकिन पुरुष अंग का स्पर्श ये जादू करेगा इसकी कल्पना उसके लिए आज सार्थक हुई. एक पुरुष और वो भी अर्जुन से सम्पूर्ण कामज्ञानि के हाथो की कलाकारी ने उसके amrit-kalsho को बस सेहला कर kaam-gagar को छलका दिया था.

"आह्हः.. गंदे कही के हटो मेरे ऊपर से.. आह्हः..", अर्जुन हटा लेकिन उसके कंधो से वो परिधान निचे सरकता हुआ दोनों अर्धगोलाकार चन्द्रमा से सफ़ेद वक्षो को निर्वस्त्र करने के बाद. अमृता पाँव पसारे अपनी हथेली और कोहनी तक के हिस्से से उस उत्तेजित जोड़ी को छुआपये नाराजगी से अर्जुन को घूरने लगी थी. दूसरा हाथ ठीक योनि के सामने बने उस हलके से धब्बे पर था जहा से वो तजा स्खलित हुई थी. काले घुङ्राले गेंसुओं के साथ वो दूध में गुलाब का आरक मिला हुस्न उस नारजगी की वजह न था जिसको छुपाने की कोशिश करते हाथ की कलाई पकड़ कर अर्जुन ने अमृता को अपने ऊपर हे खिंच लिया. दोनों के हे जिस्म कमर से पर तक निर्वस्त्र एक दूसरे से जुड़े थे लेकिन अमृता की हथेली जैसे अर्जुन से खुद को दूर रखने के लिए एक मामूली सा प्रयास था उनके बीच.

"इतनी मासूम लगती हो न आप सोई हुई की मैं खुदको रोक न सका. वैसे भी पिछली बार हसरत दिल में लिए जाना पड़ा था पर भला हो रानी माँ और कुमार साहब का जो आज हसरत मेरे सीने से लिपटी है.", अर्जुन ने अपने मजबूत पंजे को उस रेशमी परिधान के कूल्हे वाले हिस्से पर रख कर अमृता को निचे से भी अपने जिस्म से सत्ता लिया. एक बार वो भी मछली लेकिन फिर तुरंत हे अर्जुन के कंधे पर दबाव बनती हुई अपनी तेज साँसों की परवाह किये बिना हे बोल उठी.

"हहहह.. अब आ रहे हो फरेबी कही के और ये कोई तरीका है किसी लड़की के कमरे में आ कर ऐसा करने का? बहोत बुरे हो तुम लेकिन .."

"लेकिन आपको ये बुरा हे पसंद है, राजकुमारी जी. तरीका भी आपने हे बताया था और आपका night-gown पे लगी मोहर बताती है की अंदाज पसंद आया noor-e-khaas को. कसम से मुझे भी नहीं पता के क्यों मैं हर हद्द भूल जाना चाहता हु जब आप मेरे करीब होती है.", अर्जुन अब कुछ उन्मुक्तता से उन तराशे हे गोलों का मालिश वाले क्रम में ऐसा मर्दन करने लगा था की उसकी बातों से शर्मसार होने के बावजूद अमृता उसके गले लगती हुई दोनों पाँव फैलाये उसकी गॉड में आ चुकी थी. सर कंधे पर टिकाये अर्जुन की नजरो से बचती हुई वो बस आनंद ले रही थी इस एकांत का.

"करीब रहते क्यों नहीं अर्जुन? अब हमे डर लगता है अकेले सोने में लेकिन नहीं चाहते के तुम्हारे सिवा कोई और दस्तक भी दे. उन्न्हठ.. तुम दिन में 2 पल भी मेरे लिए नहीं निकाल सकते?", अर्जुन का हाथ अपनी जांघो के बीच जाते हे अमृता लकड़ी सी अकड़ गयी. आँखें बंद करती हुई वो पहली बार अपनी योनि मुख पर कोई और स्पर्श महसूस करके जड़ हो चली थी. उन नरम होंटो की roop-rekha को सेहला कर जांचता अर्जुन अमृता के बेदाग़ दमकते कंधे पर एक जोरदार लाल मोहर लगा चूका था अपने होंटो से. हलके से चूसना फिर दबाना और फिर से चूस कर दबा लेना. कॉमर्स की औंस रुपी बूंदो को टटोल कर जैसे हे उसकी तर्जनी ऊँगली ने योनि पटल को खोलते हुए थोड़ा भीतर दस्तक दी अमृता के जिस्म में असंख्य स्पंदन होते हुए उसको दूसरे सखलन पे ले चले. ये अत्यधिक वेग से हुआ था जहा अर्जुन की ऊँगली के साथ हथेली पर भी वो कीमती तरल एकतरती हो गया. अमृता इस से उबारती उस से पहले हे उस योनि रास को योनि पर तेल सा मसलता अर्जुन उसको लिए एक बार फिर से इस नरम बिस्टेर पर उसके ऊपर छ चूका था. पतलून कूल्हों से निचे खिसक चुकी थी और धड़ की तरह अम्रतिए का ये रेशमी वस्त्र अब जांघो को बेपर्दा करता उस पतली कमर पर एकत्रित था. लगातार योनि की फांको की मालिश ने जैसे उसकी फुलावट बढ़ा कर दुगना उभर दिया. इस ख़ामोशी को बरकरार रखते हुए अर्जुन अमृता की दोनों बाहों के निचे हाथो को पंहुचा कर फैली हुई गोरी जांघो के बीच स्थित उस वर्जित क्षेत्र के मुहाने अपना भीषण सूपड़ा भिड़ा गया. अमृता बेसुध सी बस उसको ऊपर खींचती कभी होंठो पर तोह कभी गाल को काटने लगी. वो इस स्पर्श से आज से पहले क्यों अनजान रही बस उसको यही दुःख था लेकिन आज अर्जुन ने आखिर उसका ये अधूरापन ख़तम करने का कदम तोह लिया.

"ी वांट आईटी इनसाइड में राइट नाउ.. आह्ह्ह्हह्ह.. Don't तैसे एनीमोर अर्जुन.. जस्ट पुश आईटी..", ये बात सरगोशी में न कह कर जैसे एक याचना थी, कुछ तेज स्वर में. अर्जुन उन गोल कपोतो को दबोचे बस योनि के होंठो पर हलके दबाव से अपने भीषण लिंग को एक क्रम में निरंतर रगड़ने लगा था. अमृता जैसे इसको हे संसर्ग मान कर ये नया सुख प्राप्त करने लगी. जिस्म हवा सा हो रहा था लेकिन इस हवा को भी क़ैद किये जो सवार था उसको अधूरे मिलान की चाह कटाई न थी. अमृता के होंठो से हट कर अर्जुन गाला, सीना और काख को चूमता हुआ निरंतर घर्षण करता रहा. कभी कभी जब अधिक दबाव से वो फूला हुआ रक्तिम सूपड़ा योनि मुख को फैला कर गलती करने की कोशिश करता, अमृता की सीत्कार में ये दर्द भी शामिल होता जिस से वो अछोटी थी. निरंतर वक्ष दुहन और योनि पर घर्षण से अमृता की सांसें उखाड़ने लगी थी. अर्जुन उसकी बगलो को चूमता हुआ दूसरे हाथ से एक जांघ सेहला कर जैसे अमृता को संभाले रहा. वो खुद भी जैसे काफी समय से भरा बैठा था जिसको अपनी उत्तेजना अमृता को दर्द दिए बिना हे शांत करनी थी. अंतिम समय तक योनि रास में डूबा लिंग फटने की कगार था अकड़ा तोह अमृता ने भी अपनी चीख दबाने की चेष्ठा न की. अर्जुन ने उसके एक वक्ष को कुछ ज्यादा हे जोर से मसला था और अमृता के साथ वो भी साखळीत होता उसके ऊपर देह गया. इस पल में ये अलग हे धीमा चुम्बन था दोनों के बीच. जांघो से ऊपर दोनों kaam-rajj में साणे, एक दूसरे से चिपके सांसें दुरुस्त करते हुए भी होंठ मिलाये रहे.

"मुझे खून नहीं निकला?", अमृता ने बस ये संक्षिप्त सा सवाल पुछा, नादानी भरा.

"जल्द निकलेगा. इतनी सुबह मैं आपको दर्द कैसे दे सकता हु? बस अब नहाना पड़ेगा और अगले 10 मिनट में तैयार हो कर निकलना है.", अर्जुन वैसे हे खड़ा हो कर अपनी हालत सुधरने अमृता के हे आलिशान बाथरूम में जा घुसा. बस इस दौरान हे अमृता की नजर उस झूलते हुए कलाई से मोठे और उसकी हथेली से बड़े अर्जुन के लिंग पर पड़ी. दिल सेहम सा गया उसका अकार देख कर जबकि अर्जुन ने उसकी योनि पर निगाह तक न की थी कही अमृता को बुरा न लगे.

"छी.. तुमने ये क्या चिपचिपा सा लगा दिया गाउन और तुममय पे?", वो वही बैठे हुए हे चिल्लाई थी.

"ये वही है जो आपके और मेरे प्यार का सबूत है. अंदर जाता तोह 9 महीने बाद आप बिन ब्याही माँ बन जाती. आप इतनी नादान है जो सेक्स का भी नहीं पता?", अर्जुन पतलून ऊपर चढ़ा चूका था और तोलिये से गीले पेट को साफ़ करता हुआ अमृता के सामने खड़ा टीशर्ट पहन ने लगा. अमृता ने जैसे तैसे वही गाउन शरीर पर चढ़ा लिया था.

"हाँ जैसे मैं तोह हर वक़्त सेक्स हे करती रहती हु. इतना पता है के तुम्हारा मेरे अंदर जाता है जिस से मजा आता और स्पर्म से बचा हो जाता है. लेकिन इतना सारा स्पर्म अंदर.. छियई.. और वो तुम्हारा पेनिस, उतना बड़ा मेरे उधर कैसे जा सकता है जहा.. जहा फिंगर तक में मुश्किल होती है. तुमसे हे बात कर सकती हु क्योंकि राजकुमारी को निर्वस्त्र करने वाले तुम हे प्रथम और आखिरी पुरुष हो.", जिस तरह से अमृता ने नजरे झुका कर निकलने की कोशिश की थी अर्जुन ने देरी होने के बावजूद उसकी पतली कमर को बाहों में लेते हुए खुद से लगा कर माथा चूम लिया.

"सिर्फ सेक्स हे करना हो तोह वो कही भी किसी के साथ भी हो सकता है लेकिन क्या आपको एक भी बार ऐसा लगा की वह सिर्फ मैं था, उस पल में? हम दोनों लगभग 30 मिनट एक दूसरे के साथ थे और सेक्स को छोड़ कर हमने सबकुछ किया क्योंकि आप मुझे चाहती है और मुझे भी आप पसंद हो, योर हाइनेस. उम्र से कोई बड़ा छोटा या परिपक्व नहीं होता, अनुभव से होता है. आप आज भी एक लड़की है और आपको पूरा हक़ है की वो ख़ास पल आपकी सबसे बेहतरीन यादगार रहे जब लड़की से औरत बने इस प्रथम और आखिरी पुरुष के साथ. क्या इस सफ़ेद चादर और खुली दिन की रौशनी में वो पल ऐसा हे होना चाहिए?", अर्जुन ने हाथो के बंधन में लिए जब इस तरह से अमृता को उसकी चाहत से ru-ba-ru करवाया तोह ख़ुशी के 2 आंसू उन खूबसूरत आँखों से लुढ़क गए जिन्हे अर्जुन ने हे बटोर लिया.

"ी लव यू अर्जुन एंड यस ी वांट तहत मोमेंट मोस्ट स्पेशल. क्या ऐसा मुमकिन है?"

"शर्त नहीं बस प्रार्थना है आपसे, औलाद के पिता का नाम इस महल से बहार न जाए. जानती है स्वयं रानी माँ आपको हमे सौंप चुकी है लेकिन आप माँ तब बनेंगी जब उचित समय आएगा. उस से पहले बस आप मेरी प्रेमिका के रूप में अपनी उस कल्पना को सार्थक कर सकती है जिसमे हमारी पहली रात हो. अगर मंजूर हो तोह अगले संडे हम दोनों हे उस एकांत में होंगे, इस महल से दूर मेरे आशियाने पर.", अमृता कभी हैरत और कभी ख़ुशी से अर्जुन को निहारती रही. एक हाथ उसका भी अर्जुन के गाल पर टिका था जैसे अर्जुन का उसके.

"तुम जानते हो तुम भविष्य का जो वादा कर रहे हो उसका क्या मतलब होता है? हमको सिर्फ प्यार से मतलब है अर्जुन, संतान और raaj-mehal हमारी ज़िन्दगी नहीं. और तुम्हारा एक स्वतंत्र जीवन है जिसमे हम बढ़ा नहीं बन्न न चाहते."

"रानी माँ ने लाल सलवार कमीज दिया होगा आपको, सफ़ेद दुपट्टे के साथ. आज आप मेरे साथ उस भविष्य की राह के पहले कदम पर चलने वाली है अमृता, पीछे बैठ कर. मेरी स्वतंत्रता महल से बहार जहा आप राजकुमारी नहीं और भीतर हमारा वो भविष्य का रिश्ता जिसमे सब अधिकार आपके रहेंगे, सिवाए मुझ पर एकाधिकार के. तभी कहा के आपको मंजूर हो तोह सहमति दीजियेगा बिना raj-pariwar को साक्षी बनाये मैं आपको माँ नहीं बना सकता. और उसके लिए इन्तजार जरूर करना पड़ेगा."

"ये अगर कल्पना भी हो तोह भी इंकार नहीं. और जब तुम्हे ये कबूल है तोह मेरी चाहत तोह है भी वही. उस आने वाले समय से पहले प्यार.."

"बताया न अगले ऐतवार को और उस दिन भी बिना किसी वजह के रानी माँ दिल्ली हे होंगी. कौनसी सरकारी मीटिंग इन दो दिनों में होती है? उनके सामने मैं आपको प्रेमिका की तरह खुले में नहीं ले जा सकता. Gair-haajri में सब मेरा. अब 5 मिनट है आपके पास त्यार होने के लिए. नाश्ता आज हवेली पर हे करना.", इस बार अमृता ने उसका सर निचे झुका कर चुम्बन किया था.

"जी सरताज, आप बस इन्तजार कीजिये जो उम्मीद से ज्यादा नहीं होने वाला. हम भी दुनिया को आपके साथ बिना किसी अतिरिक्त नजर के हे देखना चाहते है. सपनो में तोह आज भी देख रहे थे लेकिन उसको साकार जल्द करेंगे. वैसे माँ ने लाल सूट दिलवा दिया मतलब लाल जोड़ा भी मिलेगा."

"बहोत कुछ लाल मिलने वाला है एक लाल या लाली के साथ. अब कुलांचे मारना बंद करके जल्दी आइये, मैं हॉल में इन्तजार कर रहा हु.", अर्जुन ने आज इस सुबह को अमृता के लिए इतना ख़ास बना दिया था की उसकी हर कल्पना फीकी थी इस सच को सुन्न कर. अब जैसे अमृता को उसके नाम से पुकारने का हक़ अर्जुन ने प्राप्त कर लिया था दिल पहले से उसका था.

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आज 2 बड़े बड़े गाँव एक हो कर शामिल थी इस भूमि पर जो बेवजह विवादित रही थी जबकि दोनों गाँव एक हे शक्श की संपत्ति पर स्थापित थे. भीड़ की जगह लोग बेहद व्यवस्थित थे और इस लम्बे पंडाल में अधिकांश बड़े बुजुर्ग और महिलाये कुर्सियों पर आसीन सामने मंच की तरफ मुखातिब. रामेश्वर जी दोनों gram-chaupal के एक होने और उसमे भी अधिकीरत निर्णायक 6 सदस्यों वाली पुराणी पीठ की वजह से अब दोहरे प्रधान बने थे, या बड़े प्रधान जिनकी जिम्मेवारी इन गाँवों को एकजुट करके बेहतर विकसित कसबे का दर्जा दिलवाने की थी. मंच पर उन 6 निर्णयको के साथ पार्ले गाँव के सरपंच सुच्चा सिंह, इधर के सरपंच केवल सिंह, कौशल्या जी, पूर्णिमा जी और दरगाह के बाबा शाह जी aasan-seen थे. माँ सरस्वती की प्रार्थन करते हुए कौशल्या जी ने हे वो ऊँचा दीपक मीनाक्षी के हाथो प्रज्वलित करवाया. आज मंच पर बेशक प्रमुख लोग थे लेकिन सबसे अग्रिम पंक्तिया सिर्फ कन्याओं और महिलाओं को आरक्षित थी जिनमे सबके बीच बैठी सुर्ख लाल सलवार कमीज में अमृता अलग हे रौनक बना चुकी थी. वो सबके सामने अर्जुन के साथ उसकी मोटरसाइकिल के पीछे हे बैठ कर यहाँ पहुंची थी और इस वक़्त भी वो jan-sadharan के हे बीच रही.

"कन्या.. कहने को तोह बस एक शब्द है और देखे तोह इंसान के जीवन का ardh-swaroop जो कही से भी आधा नहीं बल्कि पूर्ण है और श्रेष्ठ भी. माफ़ कीजियेगा मैं पंजाबी ाची बोल सकता हु लेकिन शायद दिल से न्याय नहीं कर पाऊंगा उस मीठी बोली में. वैसे तोह ये स्पीच मेरे बौ जी और दादी को देनी चाहिए लेकिन मुझे लगता है की हम हमारे शिक्षकों को भी थोड़ा आराम दे तोह वो बेहतर होगा. हाँ जे कोई गलती होव ताः जरूर ओह विच सुधार सकदे हैं पर मैं चौंदा है के पहले थोड़ा जा आप हे समझ लाइए की अस्सी किथे गलत हैगे तेह किन्ना को गलत ने.", अर्जुन उस माइक के सामने इतना सहज खड़ा था जहा इतनी भीड़ को देख ाचे ाचे पसीना बहा देते लेकिन जिस तरह से उसने बात को शुरू किया था वह माहौल शांत हो गया बेशक बाद में कुछ हंसी की आवाजे आयी.

"हम देखते है की लड़कियों और महिलाओं को आरक्षण मिलता है चाहे वो बस हो, ट्रैन या स्कूल कॉलेज. कहते तोह है की वो हमारे बराबर है लेकिन फिर आरक्षण क्यों? क्योंकि हमने उन्हें आजतक बराबर मन हे कहा है. बस की 50 सीटों में से 7 पर महिला लिखा होगा पर मिलेंगे वह भी पुरुष जो करीब कड़ी महिला या युवती को देख कर अपना सर सामने वाली सीट पर ऐसे टिका लेंगे जैसे शुतुरमुर्ग शिकारी को देख कर करता है. जबकि शिकारी ये पुरुष है उस वक़्त क्योंकि उस जगह को वो दबोचे हुए है जो उसकी है हे नहीं. ऐसा हे मामला स्कूल कॉलेज, उद्योग और संस्थानों में है जहा या तोह माता पिता लड़की को नहीं भेजते उसकी क्षमता काम आंक कर यहाँ उन्हें काम पर हे नहीं रखा जाता क्योंकि वो मर्दो जितनी क्षमता नहीं रखती. फिर ये आरक्षण क्यों और क्यों उन्हें पूजने का झूठा दिखावा हर तरफ? हॉस्पिटल में मोती तनख्वाह पाने वाले 90% डॉक्टर पुरुष मिलेंगे जिसमे से मेरे पिता भी है एक लेकिन 99% नर्स मतलब सिस्टर जो बहिन की तरह मरीज का ध्यान रखती है वही कूड़ा करकट से ले कर सब काम करती है क्योंकि मानसिकता है की उनका काम बस देखभाल हे है. कल्पना कीजिये जो आप में से पुरुष है वो गर्भधारण करे, बुरा लग सकता है ये सुन्न कर.", अर्जुन की बात पर दबी छिपी आवाज में महिलाये तोह हंसी लेकिन पुरुष थोड़े गंभीर हो चले थे क्योंकि वो उत्तेजित नहीं समझदार लोग थे.

"9 महीने में जितने बदलाव एक महिला सेहती है उतने पुरुष नहीं सेहन कर सकता चाहे वो जिस्मानी तौर पर कितना हे मजबूत क्यों न हो और बचा पैदा करने पर तोह वो शायद मर्डर हे जाए क्यूंकि वो दर्द लगभग उतना हे होता है जितना जिस्म की 6 हड्डियां एक साथ टूटने पर. तोह क्षमता किसकी काम है और अधिकार किसके पास ज्यादा? बेशक जननी के पास लेकिन हम उन्हें देते नहीं. मेरे पड़ दादा स्वर्गीय पंडित मोतीलाल शर्मा जी का कहना था के एक देवी से ताक़तवर तोह पूरी हुकूमत नहीं अगर उसको अवसर मिले तोह. और यही वजह है की हमारे गाँव में लड़कियों के 2 अलग विद्यालय है लड़को का एक जिसमे भी लड़कियां पढ़ सकती है. ये उनका सपना था और यही आगे मेरे दादा जी का भी और मेरे पिता जी का भी. मैं एक पुरुष हु और अवसर परास्त भी जबकि स्त्री सुअवसर को समझती है दीर्घ काल तक. और अब वो सपना हक़ीक़त बन्न रहा है जिसके साक्षी आप सभी है क्योंकि ये आप कर रहे है, अपनी बेटियों के लिए और आने वाली बेटियों के लिए. मैं ज्यादा उदहारण नहीं दूंगा कामयाब स्त्री की इस नीव पूजन से पहले लेकिन 3 लोग मैं आपके सामने रखना चाहता हु जो यहाँ पे समकक्ष पुरुषो से बेहतर है. पहली है मेरी दादी पूर्णिमा जी और कौशल्या जी चूंकि ये दोनों एक हे है बस जिस्म अलग दिख रहे है आप लोगो को लेकिन इन्होने जो किया और देखा उसको यहाँ बैठे बड़े बुजुर्ग बेहतर जानते समझते होंगे. दूसरी है इनसे बाद की पीढ़ी कुमारी अमृता. राजमहल से इतर इन्होने विदेश से पढ़ाई करने के बाद किसी भी पुरुष व्यवसायी से कही बेहतर मुकाम हांसिल किया क्योंकि ये महिला है और आप लोग जरूर जानते होंगे इस बारे में क्योंकि ये मंडी भी तोह लाला जी के साथ इनकी हे लगवाई हुई है सही जगह पर और हर छोटी बात को ध्यान रखते हुए. महिलाएं इसलिए ख़ास होती है क्योंकि वो नमक तक की मात्रा पर ध्यान देती है, पुरुषो की तरह कड़ाई में घी का कनस्तर नहीं उलट देती. तीसरा जीवंत उदहारण है मीनाक्षी जी. कॉलेज के इम्तिहान में ये जिले पर पहले स्थान पर रही है, हर लड़के को पीछे छोड़ती हुई और ऐसा हे प्रदर्शन इनका समाज सेवा मैं है चाहे सर पे हाथ आदरणीय लाला जी का होना एक पक्ष वाली बात है. सिमित रहने वाले ये युवती बैडमिंटन के खेल में भी कमजोर नहीं तोह हवाई जहाज में उड़ने के काबिल भी है. मैं मंच पर बोलते वक़्त अक्सर कल्पनाओ की बात करता हु, मुद्दों से हट कर क्योंकि वो होनी जरुरी है क्योंकि इस कॉलेज की भी कल्पना हे हुई थी किसी ऐसे हे मंच पर. आप सभी से गुजारिश है की एक बार जोरदार तालियों से हर कन्या, हर स्त्री और हर जननी का धन्यवाद कीजिये क्योंकि अगर वो नहीं है तोह इंसान के भविष्य की कल्पना भी नहीं हो सकती. धन्यवाद.", इस बार जो तालियों की gad-gadahat थी वो महिलाओं से ज्यादा उनके बेटे, पति और परिवार की तरफ से थी. हजारो हाथो के इस शोर के बीच अर्जुन हाथ जोड़ता हुआ मंच से निचे उतरा तोह उसकी दोनों हे दादी साथ आ रही थी. लोग खड़े हो कर उस लाल कपडे से ढके शील को देख रहे थे जिस से पर्दा हटा कर इस कॉलेज का नामकरण होने वाला था. इस पल की तस्वीर लेने के लिए अखबारों तक के रिपोर्टर मौजूद थे चाह्वानो के साथ.

'देवी अनुराधा महिला महाविद्यालय'

काले चमकदार शील पर सुनहरे अक्षरों से यही अंकित था जिसके दोनों तरफ पूर्णिमा जी और कौशल्या जी कड़ी थी. पुष्पवर्षा के साथ इसका भव्य स्वागत किया गया था और नारियल फोड़ने का मुश्किल कार्य करवाया गया दीपा भाभी से. ये कल्पना थी स्वर्गीय मोतीलाल जी की और इसको उनकी चाहत अनुसार पूरा करवाया था उनके भविष्य मित्र अर्जुन रेखा शर्मा ने, जिसका नाम पत्थर के सबसे निचले हिस्से पर ऐसे हे अंकित था.
 
ये जिस भाई ने 2100 वाला कमेंट किया है इन्हे प्राइम बनाओ भाई . मैं तोह 2012 तक लिखने वाला था पर आईडिया ाचा है
 
अपडेट 210

कल्पना और भविष्य (2)

"ऐ तू इधर हे पड़ गयी? चल नाहा धो के नाश्ता कर ले फिर अपने कमरे में सो जाना अगर नींद पूरी न हुई हो तोह.", ये ललिता जी थी जो ऋतू को कौशल्या जी के बिस्टेर पर औंधे मुँह लेते देख उसके कूल्हों पर चपत मार कर उठाते हुए मुस्कुराने लगी जब ऋतू ने वो दर्द का दिखावा करते हुए अपने कूल्हों को मसला.

"ओह ताई जी अब नाहा के हे तोह लेती थी मैं और भूख नहीं है अभी. माँ के सामने रहो तोह वो फिर से किताब पकड़ा देंगी. तारा की छुट्टी है तोह वो अलग शोर मचाये हुए है ऊपर. मैं यही ठीक हु बस आप ये लाइट बंद करती जाना, कोमल दीदी जान बूझ के इसको जला कर गयी है.", ऋतू वापिस तकिये में मुँह दुबका कर सोने लगी थी लेकिन तारा को भी इधर आया देख उसने गहरी सांस भरी.

"आप जाओ मामी जी इसको मैं देखती हु. तुझे पता है न के आज नाश्ता हिमानी के घर है लेकिन फिर भी ये घिसे पुराने पाजामे में यहाँ पसरी हुई है."

"यार तारा तू चली जा न बाकी सबको ले कर. मैं साड़ी रात न सो सकीय और अब सर दुःख रहा मेरा. प्रियंका दीदी को ले जा मेरी जगह.", तारा भी समझ गयी की ऋतू को आराम की ज्यादा जरुरत है नहीं तोह वो तोह उस से पहले तैयार रहती थी हिमानी की तरफ जाने के लिए.

"रुपाली और आरती जा रही है मेरे साथ लेकिन अलका नहीं जा रही. हाँ पिंकी तैयार हो चुकी है इसलिए तुझे देखने आयी थी की तेरा इरादा क्या है. चल तू रेस्ट कर फिर दोपहर को साथ में मूवी देखेंगे. मामी को मैं देख लुंगी अगर उन्होंने फिर से पढ़ने के लिए बैठाया तुझे. वैसे नानी कब तक वापिस आ रही?", तारा ने एक और तकिया ऋतू की तरफ बढ़ाते हुए जाने से पहले पूछ लिया.

"बोल तोह रही थी की महूरत के बाद बस नास्ता करना होगा. अब बौ जी गाडी चला कर आएंगे तोह 4 घंटे काम से काम और पूर्णिमा दादी को छोड़ने चले गए तोह फिर शाम से पहले न आने वाले. वैसे जाएंगे नहीं छोड़ने क्योंकि पापा ने जाना था उधर. चल अब निकल तू कमरे से, कितना तेज परफ्यूम लगाया है जैसे बॉयफ्रेंड के पास चली हो बन्न ठान के.", ऋतू ने मस्ती में तारा को टोक तोह दिया लेकिन उसने भी करारा वार करते हुए जिस तरह आँख मारी ऋतू समझ गयी की गलत जीकर कर दिया प्रेमी वाला बोल कर.

"सांझे चूल्हे पर रोटियां सकती अपनी तोह डार्लिंग. फिर क्या तेरा और क्या मेरा? वैसे कमी महसूस हो रही थी लेकिन पिंकी ने साथ दे कर कुछ गर्मी तोह निकाल दी लेकिन उसको आने दे फिर उसका परफ्यूम उडेलूँगी अपने ऊपर. तू ले उसके सपने और मैं चली मस्ती करने. देख लियो अगर ज्यादा प्रॉब्लम हो रही है तोह तेरे पास प्रीती है.", ऋतू जब तक उठ कर उसको दबोचती तारा दरवाजा बंद करती कमरे से फुर्र हो चुकी थी.

'कामिनी बेशरम कही की. कोई न वो जलवे दिखायेगा तुझे जब अपनी मर्जी मनवाएगा. आह्हः.. ऐसे तोह नींद भी नहीं आने वाली.', ऋतू जैसे तैसे फिर से औंधे मुँह लेट चुकी थी. हालत उसकी भी अर्जुन के हे सामान थी लेकिन उसके पास ढेरो हल थे जबकि ऋतू ने तोह खुदसे हाथ लगाना भी बंद कर दिया था. वो अब आराम कर रही थी और बाकी सब लोग अपने अपने कामो में व्यस्त थे. तारा के साथ आरती, प्रियंका और रुपाली निकल चुकी थी घर से आचार्य जी की तरफ. वही दूसरी तरफ इन सबसे कही दूर नरिंदर जी अभी अभी उठ रहे थे घंटा भर सोने के बाद. उनका धरम भाई आज चैन से सो रहा था उनकी बगल में, देर रात से सुबह तक शराब पीने के बाद.

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दोनों गाँव ने मिल कर chai-nashte का भी पुख्ता इंतजाम करवाया था कॉलेज की नीव स्थापना के अवसर पर और आज वह स्थाई बस अड्डे का भी फैंसला हुआ था. अबसे वह सड़क की वो काल्पनिक सरहद नहीं रहने वाले थी. सभी लोग आपस में बातचीत करते हुए chai-thande का आनंद ले रहे थे और उनसे इजाजत ले कर पंडित जी सपरिवार घर की तरफ चलने लगे.

"ये आपने भी देखा जी या अब आप जान कर भी नजरअंदाज कर रहे हो? देखो एक राजकुमारी साधारण युवक के पीछे दुपहिया पर बैठ रही है वो भी इतने हुजूम के सामने.", अर्जुन वाहन खड़े करने की जगह से अपनी रानी को निकल कर बहार कड़ी अमृता के करीब रुका तोह वो सुर्ख सलवार कमीज पहने खूबसूरत बाला सर को सफ़ेद दुपट्टे से ढकने के बाद उसके हे कंधे पर हाथ रखती हुई बड़ी सहजता से दोनों पाँव एक तरफ करती ऐसे बैठी थी जैसे ये सब आम बात हो और अर्जुन उसका premi/pariwar या करीबी. अपनी बीवी द्वारा तोके जाने पर रामेश्वर जी ने गौर किया था और ऐसा बहोत से लोग देख रहे थे. उनके चेहरे पर तोह बस एक मुस्कान हे आयी ये देखते हुए.

"वो उसको jann-maanas के बीच शामिल कर रहा है कौशल्या जी और आप भूल जाती है के आपका पौत्र घर और हमारे साथ बेशक बैलबुद्धि हो लेकिन ये 2 गाँव उसकी संपत्ति है और महल में वो पिता जी की जगह बैठा है. अमृता ख़ास है लेकिन अर्जुन.. अर्जुन अपने आप में एक बदलाव का हवा है जिसके मुरीद यहाँ मौजूद लोगो के साथ जाने कितने और होंगे. देख लेना इस बार अमृता चुनाव का चेहरा होने वाली है और जीतना सुनिश्चित है. चलो आप भी प्यार उड़ेल लेना अपनी इस राजकुमारी पर नाश्ते के वक़्त. मुदा तोह गाँव की तरफ हे है ये छोकरा.", रामेश्वर जी ने गाडी में बैठते हुए कौशल्या जी को अनगिनत सच और बता दिए थे जो वो पहले न समझ सकीय थी.

"मतलब ये हुआ की रानी अपनी सीट बेटी को देने वाली है? और अर्जुन इस सबमे तोह नहीं पड़ने वाला न जी?"

"भगवान वो इस सबसे दूर है और रानी शहर की सीट पर बरकरार रहेगी. जानती हो ग्रामीण हलके में आजतक महल की तरफ से कोई खड़ा नहीं हुआ लेकिन अब होगा और मला ंप की जगह बात मुख्यमंत्री पड़ तक जाने वाली है चाहे वो कुमार बने या अमृता. हाँ तुम्हारा लाडला अजाने हे अपनी ताक़त को उस हद्द तक बढ़ा चूका है की इस हाथी ने शिक्षा देख लिया तोह ये जंगल के जाने कितने बड़े शिकारी राउंड देगा. इसको रघुवीर बन्न न पड़ेगा अगर खतरों से सावधान रहना है तोह.", इनकी सफारी के पीछे हे विनोद अपनी कार में बाकी लोगो को ला रहा था. यहाँ उनके साथ पिछली सीट पर पूर्णिमा जी, आँचल, रौशनी बैठी थी. रघुवीर जी का जीकर होते हे अब कौशल्या जी हैरत से अपने पति और फिर पीछे बैठी उनके सामान हालत वाली पूर्णिमा जी को देखने लगी.

"आपको पता भी है आप क्या कह रहे हो जी?"

"जीना सीखना चाहता है मैं उसको कौशल्या जी, जीना जो उसका अधिकार है. साड़ी उम्र तोह आप उसको पल्लू से बंधे रख नहीं सकती और न आप अमर हो. ये भी तोह बड़ा होगा और दुनिया में बहार निकलेगा. गलत कह रहा हु क्या भाभी? और आपसे तोह रघुवीर कुछ छिपता भी नहीं था चाहे कभी भूले भटके बचो को सब न बताया हो. वो श्रेष्ठ इसलिए था क्योंकि साहस के साथ वो लोगो के बीच उनके रंग में रंगता था. उसने तोह न कभी कम की परवाह की न कमिश्नर की और जब ऐसे लोग महफ़िल में होते थे तोह वो रघुवीर जैसे हो जाते थे, ज़िन्दगी खुल कर जीने वाले. क्या उस से कभी परिवार पर परेशानी आयी?"

"सही कहते हो आप और वो ठीक ऐसे हे थे. आज में जीने वाले लेकिन कल का भी उन्हें भेद रहता था चाहे ज्यादा सोचते नहीं थे. परिवार में हम सबके साथ ठीक वैसे हे जैसे आप रहते हो. जितने दोस्त थे उतने दुश्मन लेकिन शक्शियत हे ऐसी हो गयी थी की वो उनसे बुलंद थे जैसे आपके सामने न चाहते हुए भी वो सर झुक जाते है जो कही न कही बैर रखते हो मैं में. कौशल्या तुम्हे समझना चाहिए देवर जी की बात को. और मुझे तोह लगता है की... अर्जुन को वो भी सीखना चाहिए.. मतलब जो मुझे या तुम्हे पसंद नहीं है पर उसके पास उमेद, अज्जू, शंकर, इन्दर और उनके सामान दोस्तों का अभाव है या वो किसी को शामिल नहीं करना चाहता. वो खुद कहते थे की राम पत्तो की हरकत से हवा में शिकार ढून्ढ लेता है. भगवान् न करे की कभी ऐसी नौबत आये लेकिन अर्जुन को ये सीखना चाहिए और वही लायक है क्योंकि न उमेद सीख सका था और न शंकर क्योंकि धारिया का अभाव जो है उनमे. बाकी दोनों उनके पीछे हे रहते थे तोह शेरो का झुण्ड मजबूत था. जैसे ये अनजाने हे अपना कद बढ़ा चूका है ना चाहते हुए भी 4 लोग तोह नजर लगाएंगे कौशल्या.", अब दबे छिपे लफ्ज़ो में स्वयं पूर्णिमा जी ने वो बात कह दी थी जो रामेश्वर जी कहने में हिचकिचा गए थे. और औरत की बात औरत हे बेहतर समझती है जैसा कौशल्या जी को समझ आया. कुछ हे समय में ये लोग हवेली आ पहुंचे थे जहा अर्जुन हाथ मुँह धो रहा था और अमृता लाली के साथ गाये और उसके बछड़े को सहलाती हुई गर्वित हो रही थी. रामेश्वर जी ने गाडी एक तरफ कड़ी करते हे अर्जुन का अनुसरण करने के बाद जल्दी नाश्ते और देवकी के कपडे पैक करने का फरमान सुना दिया था.

"मैं क्या कह रहा था बौ जी की बस्ती वाले लोगो के पहचान पत्र हे बनवा दीजिये. इस से एक तोह सभी लोगो का पंजीकरण हो जायेगा और दूसरा सब नजर में रहेंगे. डिपो से सस्ता राशन तेल मिलने लगेगा उन्हें तोह कुछ बचत भी कर सकेंगे. लाली ने बताया था के उधर 70-80 परिवार है और उतने हे बंजारा बस्ती में.", अर्जुन चारपाई पर पंडित जी के सामने हे पालथी मारे बैठा था और अनामिका ने पहले उनके और कृष्णेश्वर जी के लिए नाश्ता लगाया. अमृता ने पहले तोह मन कर दिया था लेकिन फिर थोड़े समय बाद कौशल्या जी के साथ हे खाने की हामी भर दी. इधर अपने पौटे की बात सुन्न कर रामेश्वर जी थोड़ा सोच विचार करने लगे थे.

"ऐसा है भाई के ये पहले भी करने का प्रयास किया गया था लेकिन वही लोग नहीं चाहते की उनका इधर पंजीकरण हो. हाँ जिधर से वो लोग आये है उनका वोट उधर भी किसी का बना किसी का नहीं. बाकी तुम भी कोशिश कर के देख लो और बात बनती नजर आये तोह जुगराज को बता देना. फिर लाला देख लेंगे मास्टर के साथ मिल कर. वैसे अगर ऐसा हो जाए तोह बेहतर रहेगा. हाँ जरा समय निकाल कर अभिषेक की तरफ भी चले जाना भाई. शिकायत है उन्हें तुमसे की इधर आये हफ्ता हो गया लेकिन एक बार भी उनकी तरफ नहीं गए. वैसे तोह परसो माधुरी बिटिया भी गौरव के साथ लौट आएगी और तुम्हारे ताऊ भी बचो से मिलने आएंगे अगले दिन लेकिन थोड़ा आना जाना रखना चाहिए तुम्हे.", रामेश्वर जी ने अर्जुन की बात सुन्न ने के साथ हे अपनी तरफ से ये अलग सलाह भी दे दी जिसको सुन्न कर अर्जुन के चेहरे पर मिश्रित से ख़ुशी और सोच के भाव उभर आये. कौशल्या जी और पूर्णिमा जी को उनके कमरे में हे नाश्ता परोसा गया तोह कौशल्या जी खुद हे अमृता को अपने साथ भीतर ले गयी. अर्जुन चाह कर भी अभी अमृता से नजरे हटाए हुए था.

"हाँ जाना तोह था उधर भी लेकिन आपके सामने हे है बौ जी की जबसे आया हु समय मिल हे नहीं रहा. वैसे आप छोटी दादी को कहा रखने वाले है?", अर्जुन ने सेवक को गाडी में देवकी का सामान रखते देख पुछा था. विनोद स्वयं हे जरुरी सामान संजीदा के कहे अनुसार पिछले हिस्से में तरीके से रख रहा था.

"वो रास्ते में हे सही जगह है एक जहा इलाज और देखभाल के साथ ढेरो लोग भी रहते है. तुम जरा ये पिछले बगीचे में बानी टंकी का भी काम करवा देना. हाँ कल तुम्हारी नानी क्सक्सक्सक्स जा रही है और उनके साथ तुम्हारी माँ और बहिन भी कुछ दिन वह रहेंगे. घूमने का दिल हो और उनसे मिलने की इत्छा तोह हो आना उस तरफ. तुम्हारे नाना ने हे कहा था मुझसे की अर्जुन को देखना चाहिए वो सब भी. ये अपने खेत से पहले जो सड़क है न वो शहर से बहार हे निकलती है बस नदी का किनारा मैट छोड़ना. 150 किलोमीटर पड़ता है उधर से जबकि हाईवे से 210 और ट्रैफिक भी ज्यादा रहता है. ठन्डे समय निकलो तोह 3-4 घंटे में पहुंच गए और 4 बजे वापिस चले तोह 8 से पहले वापिस. मैं उस तरफ बहोत जाता था तुम्हारे रघुवीर दादा के साथ जब भी छुट्टियां मिलती थी. तब मुख्या रास्ता यही नदी किनारे वाला हे होता था. लीची, चौसा आम, लोकाट, आड़ू और खुबानी बहोत होती थी उधर उस समय. अगली छुट्टियों में कुछ दिन वह गुजरना तुम्हे ाचा लगेगा. हाँ कुंदन की जगह मैंने भी नहीं देखि लेकिन वो शहर टुकड़ो टुकड़ो में फैला है तोह पैदल घूमना भी लुभाता है.", यहाँ तोह अर्जुन को स्वयं रामेश्वर जी ने हे दिशा दिखा दी थी उस जगह की जहा वो कल जाने के बारे में ऋतू से दोपहर में बात हे करने वाला था.

"कैमरा ले लेना चाहिए फिर तोह बौ जी मुझे अगर इतनी हे खूबसूरत जगह है वो? आप चलेंगे कभी मेरे साथ उधर?", विनोद लौट रहा था इधर हे जिसने कैमरा वाली बात सुनी थी.

"कैमरा मेरी अलमारी में रखा है भतीजे, एकदम नया है और इम्पोर्टेड भी. देख लेना एक बार और वो कंप्यूटर से भी जुड़ सकता जिसमे तस्वीर धुलवाने का झंझट भी नहीं रील वाला. वैसे ताऊ जी बात तोह अर्जुन की भी सही है, आपको भी थोड़ा बहोत काम से अवकाश लेने का हक़ है.", विनोद हाथ धो कर वही बैठ गया था नाश्ते के लिए. बस अर्जुन हे था जो अभी भोजन नहीं कर रहा था.

"तू चलेगा बिनि? सर्दियों से पहले चलते है 2 दिन के लिए. आज तोह थोड़ा लेट चल रहे है समय से और अब निकलना हे होगा. हाँ अर्जुन, अपने चाचा की अनुपस्थिति में ध्यान रखना हर चीज का. तुम्हारे छोटे दादा दिन में तोह खेत देखेंगे लेकिन रात रहेंगे घर इसलिए दिन के काम तुम्हारे जिम्मे है.", तोलिये से हाथ पांच कर वो उठ खड़े हुए थे और बस कुछ हे समय में अपनी बीवी और भाभी के साथ साथ देवकी को ले कर पंडित जी घर से निकल चले. आज उन्होंने अमृता को शगुन के साथ वस्त्र भी दिए थे जो अनामिका के पास पहले से थे ऐसे हे अवसर के लिए. सबसे मिलने के बाद विनोद भी अपनी अटैची कार में रखता हुआ हवेली से चल दिया और जाने से पहले अपने पिता को भी खेत तक छोड़ कर कुछ बातें वो उनसे भी करता गया.

"आज तुम्हारी दादी जी ने हमे ये कंगन पहनाये है ऐसा बोल कर की कलाई खाली नहीं होनी चाहिए. लेकिन सोने के कंगन ऐसे नहीं दिए जाते अर्जुन.", अर्जुन सबसे फारिग हो कर अपने कमरे में आया तोह वह कंप्यूटर पर आँचल कोई गण चलाये बैठी थी और उसके करीब हे कुमारी अमृता. अर्जुन के लिए नाश्ता लेने आँचल बहार निकली तोह अमृता ने अपनी दोनों कलाई उसको दिखते हुए थोड़ा गंभीरता से कहा.

"अब चची के हाथ से बौ जी ने आपको साड़ी उपहार में दी है तोह इसका भी कोई मतलब निकाल लीजिये. शगुन देख लीजियेगा, 5100 का भी मतलब होता होगा कुछ.", अर्जुन समझ रहा था के अमृता कहा बोल रही है लेकिन अपने दादा दादी की मंशा उसने साफ़ कर दी थी.

"तोह सोने के कंगन कोई ऐसे तोह नहीं देता न?"

"आप उनकी कुछ नहीं लगती क्या? वो आपको बेटी हे मानते है और उनके घर में आप पहली बार आयी है. सोना शगुन मन जाता है जो माँ अपनी बेटी को देती है. भाभी अपनी ननद को वस्त्र देती है और पिता तोह जितना चाहे उतना दे सकते है. तोह आज दादी ने अपने हाथो से खिलाया न आपको?", अर्जुन की बात से अब वो खुश थी की इस सबका सकरात्मक और सही अर्थ क्या था लेकिन हाथ से खिलने वाली बात पर हैरान हुई.

"तुम तोह नहीं थे यहाँ फिर कैसे कहा?"

"वो भी माँ है और उन्हें ाचा लगा के आप उनके साथ खाने की प्रतीक्षा कर रही थी. आपने वह भी पानी तक नहीं पीया था क्या उन्होंने देखा नहीं होगा.? घर परिवार ऐसे हे होते है राजकुमारी जी जहा हर इंसान एक दूसरे की परवाह करता है और उसके साथ रहता है सुख दुःख में. मैं आपको इसलिए बहत साधारण तरह से लाया था की ये सब देख सके. आप निकेतन को गॉड में लिए थी तोह उस फीलिंग को समझा सकती है?", आँचल अर्जुन के सामने खाना रखने के बाद लस्सी का लौटा करीब रखे छोटे स्टूल पर रखती इन्हे बातचीत करने का समय देती वापिस निकल गयी.

"अजीब नहीं था और ाचा हे लगा. बचो से मैं मिलती रहती हु लेकिन ये छोटा भी है और ... वो बार बार मेरी ऊँगली पकड़ के मुँह में लेता तोह उसकी हंसी .. वो मैं अभी तक महसूस कर रही हु.", अमृता ने कुछ बताया और कुछ दिल में रख लिया था. अर्जुन के लिए गिलास में लस्सी डालते हुए उसका वो थोड़ा सा झुकना और उस समय हे कमीज के गले से दिखती वो हलकी सी गोरी घाटी पर अर्जुन की नजरो का वार. तुरंत हे वो शर्माती हुई सीढ़ी हो गयी.

"3 साल बाद 21 का हो जाऊंगा मैं और इतने आपको भी ाची प्रैक्टिस हो जायेगी फिर लेती रहना वो फीलिंग जो आपने बताई नहीं अभी. वैसे आप एक बेहतर माँ बनेंगी.", अर्जुन ने जिस तरह से उन्हें गर्भवती करने का बताया था अमृता नजरे चुराने लगी. लेकिन मैं में शंकाये तोह उसके भी थी.

"40 को हो जाऊंगा मैं और क्या उतनी उम्र में वो ठीक रहेगा? चान्सेस काम हे होते है और ऊपर से बचा 40 साल छोटा."

"आप किसी और से शादी कर सकती है?", अर्जुन ने सिर्फ इतना हे कहा था की अमृता के जिस्म में एक तेज सिरहन से हो उठी. कुछ पल वो बस उसको देखती रही फिर आँखों में आती नमी को अर्जुन ने तुरंत भांप लिया.

"मेरा मतलब है की सिर्फ नाम के लिए क्या किसी पुरुष को अपना पति बना सकती है? फिर मुझे 3 साल इन्तजार नहीं करवाना पड़ेगा आपको."

"सिन्दूर नाम का नहीं होता अर्जुन और फिर चाहे be-aulaad हे क्यों न राहु लेकिन जिस कल्पना को मैंने जीवंत होने का सपना संजो लिया है उसके लिए 3 क्या और 30 क्या. आइंदा ऐसा कुछ मैट कहना जिस से मुझे घुटन होने लगे. मैं महल की कोई परदे में जीने वाली रानी नहीं हु अब. आज तुमने अधिकार लिया है जो जीवनभर का है और इसमें ... इसमें किसी राजा महाराजा के कानून से भी बदलाव नहीं होने वाला."

"प्यार हो न अमृता जी तोह हर सपना पूरा होता है. आप देख लेना जब भी आपके कक्ष में दाखिल हुआ करूँगा हर बार वजन बढ़ा कर हे बहार निकलूंगा आपका. और मैं भी जानता हु के आपके नाम के साथ कोई और नाम नहीं जुड़ने देंगी आप लेकिन सोचा की अगर आपको 3 वर्ष इन्तजार नहीं करना तोह कोई हल निकाल दू. ये आंसू बहार निकलने से पहले हे साफ़ कर लीजिये नहीं तोह इस घर में लोग मेरे कान खिंच देंगे एक राजकुमारी को सताने के लिए.", अर्जुन ने अपने हाथो से हे एक निवाला खिलाया तोह अमृता ने मन नहीं किया. दुपट्टे से हे आँखों को हलके से साफ़ करती वो मुस्कुरा रही थी. अर्जुन के कहने पर लस्सी का गिलास झूठा करके वापिस रखा तोह उसके होंठो की चाप पर हे होंठ रखता हुआ वो उन्हें दिखा कर ये अलग सा चुम्बन करने लगा.

"मार खाने वाले हो तुम. अब हमे वह से गाडी बुलानी है या भेजने का प्रबंध करोगे?"

"लेके आया हु तोह छोड़ के भी आऊंगा आपको. शहर में थोड़ा काम भी है मुझे तोह बस निकलते है 10 मिनट तक."

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"ये शंकर तोह बड़ा आदमी बन गया बे इन्दर जितना नाम कमा रखा उसने. डॉक्टर का धंदा इतना जोरदार भी हो सकता है इसकी कल्पना तक न थी.", कार अपनी रफ़्तार से दौड़ रही थी जिसका स्टीयरिंग नरिंदर के हाथ था और बगल में सिर्फ देसी कच्चा पहने विष्णु ऐसे बैठा था जैसा गाँव देहात में कोई नदी किनारे नहाने से पहले. इन्हे होटल से निकले 3 घंटे हो चुके थे और घडी दिन के 11 बजा रही थी.

"वो जितना काबिल डॉक्टर है न विष्णु उतनी हे ज्यादा डिमांड है शंकर की. फिर भी वो अपनी ऊपरी कमाई को घर से दूर हे रखता है और ज्यादातर भलाई के काम में हे लगती है. हाँ तुझे वो दिल्ली में उमेद के साथ काम करने का ऑफर देने वाला है जिसके लिए तुझ पर कोई दबाव नहीं. एक तरह से उमेद और शंकर परिवार को सुरक्षित करने के साथ इतना मजबूत बनाने की कोशिश में लगे है की जैसा कॉलेज के समय हुआ था वैसा फिर न होने पाए. अर्जुन के घर लौटने से पहले तक भी हादसे होते रहे है और वही लड़का है जिसने सोमबीर ताऊ के परिवार को फिर से जोड़ दिया चाहे हमारी बदले की आग में थोड़ा वो भी झुलसा लेकिन उसने सजा देने की जगह लोगो को बदला और उसकी कल्पना स्वयं पापा तक को नहीं थी."

"तेरा बीटा भी कही न कही उस झगडे की भेंट चढ़ गया भाई. मुझे पता नहीं था के तेरी नवजात औलाद के साथ ऐसा हुआ. सचमुच भाभी मजबूत दिल की है नहीं तोह बचे की मृत्यु तोह शेरनी को भी कमजोर कर देती है और वो तोह इंसान है, बहोत संवेदनशील इंसान. तोह ये लड़का पैदाइशी हे ख़ास है या तूने और शंकर ने तैयार किया है अर्जुन को? तैयार किया तोह भी जितना तूने बताया वैसा मुमकिन नहीं लगता.", विष्णु बैठे हुए बात करने के साथ माचिस की तिल्लियों को एक ख़ास क्रम में डिब्बियां में सजाने जूता था. साफ़ था के इतने गंभीर इंसान में आजतक कुछ बचपना भी मौजूद था.

"अर्जुन तोह पैदा हुआ तब बचने की गुंजाइश भी काम थी. लेकिन जैसे वो तभी से लड़ना सीख गया था और उसको सबकुछ खुद हे सीखने और समझने की आदत है. अभी परसो हे उसके जलवे देखे है मैंने जब 7 फ़ीट के जानवर को उसने जनता के बीच हे अखाड़े में तहस नहस कर दिया. ये हड्डी इधर चूल्हो से जोड़ थी उसने सिर्फ लात के वार से. पढ़ा है न तूने की जांघ की हड्डी कितनी मजबूत होती है और इसको तोड़ने के साथ लिंग वाले हिस्से तक खिसका देना गाडी की टक्कर से मुमकिन है, शरीर से नहीं. संजीव की शादी पर हम लोग आपस में चर्चा कर रहे थे अखाड़े की तोह शंकर ने बोलै की आजतक उसकी पीठ किसी ने सबसे जल्दी टिकाई है तोह वो सिर्फ तू और अज्जू हे थे. और यकीन मान विष्णु की ये वाला अर्जुन तुझे और मुझे एकसाथ धुल छठा सकता है जबकि वो मात्रा 18 का हुआ है अप्रैल में. उमेद उसका धरम पिता है चाहे बाप का दर्जा मेरा और शंकर का हो. उसमे सभी के गुण है जितना मैंने समझा और तुझसे मिलेगा तोह तू भी उसके शीशे में उतरने से नहीं बचेगा. कृष्णा मार हे जाती अगर उसकी गॉड में शंकर अर्जुन न रखता. वैसे रेखा ने सौंपा था अर्जुन को जब वो 6 माह का हे था शायद. बचे ने असर दिखाया और उसने दोनों माँ का दूध पीया उस समय. गज्जू ने तोह पहली औलाद के बाद हे कह दिया था के वो अब बेटे की चाहत नहीं रखेगा और न दूसरी औलाद को जनम देगा जब उसके बेटी हुई थी, विनीता नाम है भतीजी का. फिर निकेतन और अर्जुन पैदा हुए तोह दोनों के नामकरण में पिता की जगह वो आ बैठा. अब अर्जुन उधर भी उसका वारिस है जिसके बाकायदा कागज़ तक बनवा चूका है वो हाथी.", विष्णु इतना सब सुन्न कर हैरत में पड़ चूका था के ये एक हे लड़का सबको बाँध चूका और उमेद ने इतना बलिदान दिया तोह उसकी बीवी की क्या सोच रही होगी इस पर.

"गज्जू की लुगाई न बोली फेर इस बारे में? औरत का दिल समझना चाहिए था गज्जू को चाहे प्यार है आपस में सबका और उतना तोह थंडर और उसके ब्याप्य में भी था. हमको तोह यही पता था के वो दोनों भाई है और तुम चारो. लेकिन औरत का दिल थोड़ा अजीब न होता इन्दर भाई? वो अपने खून को प्राथमिकता देती है. कृष्णा और रेखा वाले मामले में तोह समझ आता है क्योंकि वो भी बहने हे है और तुम दोनों सेज भाई होने के साथ अंडकोष की जोड़ी.", विष्णु ने मस्ती में हे ये जोड़ी कितनी मजबूत है उसका उदहारण खोल दिया था.

"राजेश्वरी भाभी ने खुद ऑपरेशन करवा लिया था भाई और वो चाहे अंतर्मुखी है लेकिन अर्जुन से स्नेह उन्हें भी बहोत है. विन्नी तोह बचपन से हे उसको गॉड में उठा कर परेशां करती रहती थी. अर्जुन kendra-bindu है जिसको सब कमजोरी समझते रहे और वो असलियत में सबको जोड़ने वाला स्तम्भ है जिस पर पूरे परिवार की छत तिकी है चाहे नीव पापा और माँ हो. अब तू आजा यार स्टीयरिंग पे, मैंने काश लगाने है."

"न तू उधर बैठ के पी लियो, मैं जलाता हु. वैसे उस पर शंकर का थोड़ा असर है या उन मामलो में कोरा है?"

"हाहाहा.. शंकर का बाप हे लगता है कभी कभी तोह वो मुझे. बीटा न होता न तोह मैंने मेरी हे लाडो ब्याह देनी थी उसके साथ. मार्किट में जब कभी मैंने ध्यान दिया न तोह आसपास वाली लड़कियां क्या औरते भी देखती है अपने लाडले को. सवा 6 फ़ीट का है और गज्जू से भी चौड़ा लेकिन चेहरा जवानी वाले शंकर से कही ज्यादा रोबीला. छोल चाचा याद है तुझे? उनकी विदेशी पौती से उसका रिश्ता हो रखा है, प्रीती नाम है और बेटे की टक्कर की बिटिया है वो. कॉलेज ख़तम करेंगे तोह कर देंगे उनका ब्याह और क्या पता तेरा भी हो जाए उस से पहले. आज भी लोंदा हे पड़ा तू कच्चा.", विष्णु सिग्रत्ते सुलगा कर हँसते हुए नरिंदर को पकड़ा कर अपना चेहरा देखने लगा शीशे में.

"न भाई मेरी रहने दे तू लेकिन एक हे लड़का है और उसका रोका करवा दिया तोह कल को कोई समस्या हुई फेर? मतलब उसको कॉलेज में कोई और पसंद आ गयी तब इस लड़की को बलि देनी पड़ेगी या भतीजे को अपनी जवानी के प्यार की? शंकर का बस चलता तोह वो किसी राजा की तरह रंगशाला हे बना लेता 50-60 हूर जमा करके. वैसे अब तोह गर्मी ठंडी हुई होगी उसकी या टाइम निकाल लेता वो? फ़ोन पे तोह बड़ा चहक रहा था लोमड़."

"चालु है उसका अभी तक और जबतक घोडा दौड़ने लायक हो वो बूढा न कहलाता. वैसे आज घर पहुंचते हे पहले तू अपने आशियाने को देख लेना, साथ हे दलीप भाई के खेत है और गौशाला भी है उधर. लोग मजदूर होंगे जिन्हे जैसा आदेश देगा वो सब तैयार कर देंगे. सामान सब है उधर जितनी घर में जरुरत होती है. एक जीप और मोटरसाइकिल भी है जिसका मालिक तू हे है."

"वो बाद की बात है लेकिन तू ये बता के वो घुन्ना कहा है, बलवान? साला सबका जीकर हो गया पर वो तोह इधर हे था न फिर उसके साथ संपर्क नहीं है क्या किसी का?", अब नरिंदर थोड़ा गंभीर हो गया था इस मुद्दे पर. सिग्रत्ते की राख बहार झाड़ते हुए कुछ पल सोचा और फिर बोलना शुरू किया.

"वो अब कुमार सारंग , जो राजा है न क्सक्सक्सक्सक्स का उसके लिए काम करता है. उसको पता था के सारंग ने हे तेरे परिवार के साथ वो सब करवाया था और शायद उसके भी लेकिन आज वो उसका सबसे ख़ास मैनेजर है जो किसी भी कमजोर बेसहारा या पीड़ित व्यक्ति का गाला काटने में एक पल नहीं लगता. सारंग से पापा का पुराण रिश्ता है और दुश्मनी भी जिस वजह से न वो लोग इधर आ सकते न हम उनके पास जा सकते.", अब सारंग का जीकर और परिवार की बात होते हे विष्णु के सख्त चेहरे पर भी थोड़े दर्द के भाव उभर आये.

"मतलब जख्म देने के रहनुमा हो गए वो जो कभी हमारे रहबर रहे. सही है भाई कलयुग में ऐसा मुमकिन हो सकता है. बलवान को हमेशा से हे सबसे ताक़तवर बन्न न था और तुझसे पार तोह पा न सका इसलिए मजबूत दुश्मन का कुत्ता बन्न न मंजूर किया. वैसे मेरे पर रोक नहीं है उधर जाने की और सारंग चाहे राजा हो या सक ग्रुप का मालिक, उसकी गर्दन पर पाँव टिकाये बिना तोह मैं भी न मरने वाला. फिलहाल माहौल जैसा है वैसा बनाये रखना बेहतर है फिर देखते है उसकी क्या कमजोरियां है. अर्जुन ऐसे लफड़ो में तोह नहीं पड़ता न बे इन्दर?"

"वो इस से भी ज्यादा लफड़ो में पड़ा है जिसकी मुझे कोई जानकारी नहीं बस कभी कभी खुद हे वो प्रदर्शन करके हैरान कर देता है. मेरे दादा के समय दफ़न मुर्दे खोद रहा जिनकी मुझे तोह क्या पापा तक को खबर नहीं. तेरा पता लगा लिया देख मैंने लेकिन अगर मैं उसके पीछे जाता हु तोह वो मेरे पीछे और आगे होगा. और तेरी बात सही है की अभी बस जैसे चल रहा है चलने देते है और उनकी तरफ से गलती की प्रतीक्षा तोह मुझसे ज्यादा शंकर कर रहा है. मैं तोह फिर भी रुक जाऊंगा लेकिन उसको मौका मिला तोह फिर पापा सोचते रह जाएंगे और पागल शेर निकल चूका होगा."

"शेर काहे का है वो नीरा सांड है. न मैडम बक्शी न कोई बराबर वाली सहपथिका और इस्पे भी बस न हुई तोह प्रिंसिपल की लुगाई तक पेल गया. रहा किसी के साथ उनमे से? शेर के बारे में बहोत ज्ञान मिला मुझे दुनिया घूम कर. वो चाहे 10 से सम्बन्ध बनाये पर रखता सबको अपने पास है. वैसे मेरा दिल तोह यार खेती करने का है इन्दर और पैसे भी है मेरे पास तोह जमीन दिलवा दियो थोड़ी. आम आंवले के वृक्ष लगाऊंगा और मौसमी सब्जियां. बड़ा दिल है यार की जैसे बड़े वर्धन जी जीवन यापन करते थे मैं वही करू. शाम को पानी की मुंडेर पर बैठ के कभी तेरे साथ सोमरस तोह कभी चूल्हे पर सालन पकौ. जीवन प्रकृति के बीच बस उस किसान सा जीना चाहता हु भाई जो सुकून में हो की आज दिन में पसीना बहाया कुछ पैदा करने के लिए. मेरी औलाद तोह वही वृक्ष होंगे न जिन्हे मैं सींच कर फल देने लायक बना सकू.? ऐसा नहीं है के मैं कही भी ज्यादती होते देखूंगा, मैं उसको रोकूंगा लेकिन 45 पार हो गया भाई और अब तू आ गया है न मेरे साथ तोह थोड़ा जीना चाहता हु. इधर नारियल के पेड़ तोह नहीं लगेंगे लेकिन अपना bagicha-khet तोह कही भी बनाया जा सकता."

"वह सब तेरे मुताबिक़ हे है भाई और पैसे की बात कहा से आ गयी इस सबमे. जो तेरा वो मेरा और जो मेरा वो तेरा. जानता हु तू ऐसे नहीं लेगा इसलिए फसल का तीसरा हिस्सा तू पापा को दे दिया करियो. चल अब देख सिखर दोपहर हो चली है. ढाबे पे रुक कर थोड़ा आराम करते है और रोटी खाते है."

"तू मेरी तरफ आजा बे, रोटी अब हरयाणा में हे खाएंगे और यहाँ से अब दुरी सिर्फ 300 किलोमीटर है. 4 घंटे में नाप दूंगा सड़क खाली है.", चलती गाडी में हे विष्णु स्टीयरिंग पकड़ता हुआ खड़ा हो गया था और इन्दर उसके निचे से खिसक कर मुस्कुराता हुआ बगल वाली सीट पर आ बैठा.

"जानता था के तू नहीं सुधर सकता. स्कूटर पर तू और शंकर ऐसे हे आगे पीछे हो जाते थे और मेरी फटने लगती थी की साला ये तोह उछाल जाएंगे और बीच में बैठा मैं मरूंगा."

"हाहाहा.. अंडकोष टूट जाते.. शुक्रिया मेरे भाई.", नरिंदर ने जिस हाथ से उसकी जांघ थपकी थी विष्णु ने वही हाथ थाम कर चूमने के बाद दिल से धन्यवाद किया.

"देरी हो गयी लेकिन तू जानता है की मैं तेरे करीब हे था. और नारियल न सही पपीते ऊगा लेना खेत में..", विष्णु सामने देख कर मुस्कुराता हुआ हामी भरने लगा. अब वो इनके शहर से पहले रुकने के मूड में कटाई न था जो कार की बढ़ती गति से साफ़ था.

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अमृता को सकुशल महल पहुंचने के बाद अर्जुन शहर की मार्किट से जाने क्या क्या खरीदता रहा था और जब उसकी विशेष तालिका (लिस्ट) पूर्ण हुई तोह सब सामान उसके कंधे पर एक आकर्षक मरदाना पिट्ठू बैग में था. पेट्रोल पंप से रानी की टंकी भरवा कर वो कुछ समय इस शहर को देखता जानता हुआ भटकता रहा. आज जैसे उसके पास यही समय था जिसमे वो व्यस्त नहीं था लेकिन ऐसा समय हर रोज होगा ये निश्चित कहा था. फिर शिल्पा जी का नाम जेहन में आते हे उसकी रानी इस गंतव्य की तरफ मदद चली जिसकी राह वो आज देख रहा था. चेहरे पर शास्त्री जी द्वारा भेंट किया हुआ वो विदेशी हेलमेट और कंधे पर मुसाफिर सा बैग लिए वो इस सेक्टर में पंहुचा जहा माध्यम वर्ग और रईसों का बोलबाला था. सड़क किसी mukhya-marg सी चौड़ी और हर घर के बहार हे बगीचे क्यारियां. कुल मिला कर ये हिस्सा बेहद saaf-suthra और ाची रिहायश से भरपूर था जहा लगभग हर दूसरी गली में हरे भरे पार्क मौजूद थे.

'25 नंबर बांग्ला था उनका लेकिन इधर तोह 101 के पहले के नंबर हे नहीं है.', हर गली मदद पर नीले रंग के तीर पर उस गली में मौजूद घरो के जारी और अंतिम नंबर लिखे थे जिन्हे पढता वो लगभग अपनी मंज़िल तक आ पंहुचा था. हेलमेट उतार कर वो इस नन्हे सफ़ेद फूल झाड़ते नीम के निचे खड़ा चेहरे का पसीने पांच हे रहा था की चमचमाती एस्टीम कार उसके सामने बने बड़े घर के galiyare-gate से होती हुई ठीक उसके सामने रिवर्स में आती गयी. एक पल के लिए गाडी में बैठी महिला चालाक और अर्जुन की नजरे टकराई जिस पर अर्जुन ने तोह गौर न किया की स्टीयरिंग के पीछे कौन है बस जो भी था वो मुर्ख या रईस था जिस तरह से कार को इस रफ़्तार पर उलटी लेके आया था. गाडी अपनी जगह कुछ वक़्त स्थिरर रही और अर्जुन आसपास नजर दौड़ता हुआ वो गली देखने लगा जो उस से बच गयी हो.

"Hello मिस्टर, मेरा पीछा कर रहे हो?", इस खुले बालो और ऊँगली में चाबी घूमती हुई घमंड की देवी को देख एक पल तोह अर्जुन हैरान हुआ फिर मुस्कुराते हुए ना में सर झटक दिया. ये जीनत थी जो 'व्' गले का कमर से ऊपर तक का लाल टॉप और चुस्त आसमानी जीन्स पहने एक हाथ रानी के माथ पर रखे कड़ी उसके सामने थी.

"Hi.. मुझे नहीं पता था के आप इधर रहती है. Kapoor's आपका घर है?"

"हाँ मैं इधर हे रहती हु और घर भी मेरा है. जीनत कपूर. बहार ऐसे गर्मी में क्यों खड़े हो और कंधे पर ट्रैवेलिंग बैग? इरादा क्या है मिस्टर किसी को ले कर भागने लगे हो क्या? वैसे मुझे लगा के तुम्हारा मिनी के साथ सन है.", अर्जुन उसकी बात पर ना में सर हिलता फिर से हंसने लगा था. जीनत एक सम्पूर्ण आधुनिक थी और थोड़ी घमंडी रईस जो की अर्जुन के सामने विपरीत मिलनसार.

"एक गाँव से है और वो ाची लड़की है मेरी नोन फॅमिली से. और मैं ये सन वैगेरह में यकीन नहीं रखता. वैसे आप मिल गयी तोह शायद मुझे मेरी मंज़िल भी मिल जाए. जीनत जी आपके सेक्टर में 1 से 100 तक नंबर नहीं है क्या घरो के.?", इतनी हे देर में जीनत के दूध से चेहरे पर सुर्खी बढ़ चुकी थी दोपहर की गर्मी की वजह से. पर उसके सामने जो खड़ा था उसकी चाहत इस गर्मी के वार से कही ज्यादा थी इस युवती को.

"क्यों उधर से किसी को भागने वाले हो? हाहाहा.. सॉरी सॉरी. देखो ये सेक्टर थोड़ा सा अजीब से प्लांड है और तुम शायद गलियों में लगे हाउस नंबर्स देख कर इधर चले आये.", अर्जुन ने हाँ में सर हिला दिया था उसकी चंचल मुस्कान देखते हुए लेकिन गले से फिसलती पसीने की धार जिधर जा डुबकी थी वो उभार सामने आते हे उसने नजरे झुका ली. जीनत इस सबसे लापरवाह अपनी टीशर्ट को हे उचकती हुई सीना और गर्दन साफ़ करने लगी तोह उसके समतल गोर पेट के साथ उसकी गहरी नाभि उस झुकी नजर के सामने. जैसे ये लड़की उसकी परीक्षा ले रही हो.

"हमारे घर का नंबर है 101 और इसकी बक्सीडे में है 1 लेकिन उधर कही लिखा नहीं हुआ मदद पर. वैसे पिछली गली में हे जा रही थी मैं मेरी सहेली के पास."

"आप कार से पिछली गली में जा रही थी?", अर्जुन ने जैसे गलती से पूछ लिया था जबकि वो जानता था की लड़की चाहे अमीर है पर बहार जितनी धुप है उस हिसाब से तोह कार हे बेहतर थी.

"इस धुप में पैदल जाओ? पीछे है पर पास नहीं है. वो जिधर से तुमने इधर आने के लिए टर्न लिया था वह से राइट मुड़ने के बाद इतना हे स्ट्रैट चलना और फिर अंदर गली में."

"ओह.. वो सचमुच ज्यादा हे दूर हो गया. फ्रेंड का घर है.?"

"हाँ कल फाइल सबमिशन है तोह उसकी फाइल कॉपी करने के लिए दी थी जो वापिस करने जा रही थी बस. उसने खुद कम्पलीट नहीं की हुई. वैसे तुम्हे कहा जाना है उधर? मुझे थोड़ा बहोत तोह पता हे है वह का तोह बाइक कड़ी कर दो अगर साथ चलना चाहो तोह."

"थैंक यू मैंने कही जाना नहीं बस वो पार्षद है इधर अभिषेक जी, उनके यहाँ परसो किसी काम से आना है तोह सेहर आया था सोचा घर पहले हे देख लू, कही बाद में फॅमिली के साथ आना हुआ तोह कहा पूछते फिरूंगा. आप किस्मत से अगली बार तोह नहीं मिलने वाली जो रास्ता समझा दे.", जीनत ने अलग हे अंदाज में उसको कुछ पल निहारा और फिर गाडी का दरवाजा खोल कर वो मॉटे कवर वाली फिला उठती हुई बेधड़क उसके पीछे मर्दो की तरह आ बैठी.

"आगे खिसको थोड़ा मैंने भी आना जाना हे करना था.", अर्जुन हैरान था के ये लड़की खुद बा खुद गले कैसे आ पड़ी. लेकिन कंधे से बैग को आगे टांगो के बच्च रखता वो किक दबा कर ख़ामोशी से मुड़ने लगा.

"तुम्हारा नाम है अर्जुन शर्मा और फादर डॉ शंकर शर्मा, गवर्नमेंट सर्विस पे है. परिवार का नाम सिर्फ तुम्हारे शहर नहीं हमारे शहर तक भी ाचे से लिया जाता है. रिसेंटली तुम्हारी कजिन सिस्टर की मैरिज गौरव शर्मा से हुई है जो अभिषेक भैया के यंगर बरोथेर है. तुम फिलहाल अपने विलेज आये हुए हो जहा के एक तरह से ओनर भी तुम्ही हो और आज वही पर तुमने कॉलेज के लिए जमीन दी है. वैसे कनेक्शन तुम्हारा राजहंस तक है मतलब महल तक लेकिन कैसे ये मुझे नहीं पता और शायद किसी और को भी नहीं पता होगा. तुम्हारी कजिन बड़ी सुन्दर है जिनसे मैं खुद भी मिल चुकी हु बस शादी में इसलिए नहीं गयी की मुझे आईडिया नहीं था उस जगह का. यहाँ से राइट लो और मैंने ये फाइल उस आखिरी घर पे देनी है जबकि तुमने जहा जाना है वो ठीक ओप्पोसिए उधर है जहा बहार बड़ा सा ट्री लगा है. एहने वि कमल नई हैगे अर्जुन जी जिन्हे तुस्सी सोच रहे स. वेख्या साहड़ी सीड न?", अब जिस तरह उतारते हुए जीनत ने अपनी टीशर्ट को उसके सामने थोड़ा ऊपर खिंच कर जैसे कालर उठाने का अभिनय किया एक बार फिर उसके स्टैनो और गोर पेट पर अर्जुन की नजर अनजाने हे जा तिकी. इस बार जीनत को भी एहसास हुआ था के उसने क्या किया है लेकिन वो फिर भी खुश थी.

"मान गए जी आपकी सीड को लेकिन मैं सिर्फ काम से शहर आया था इसलिए जाने से पहले घर देखना चाहता था. दीदी और जीजा जी अभी बहार है और परसो वापिस आएंगे तोह तभी उनसे मिलने आना है. आप यही रुकने वाली है?"

"ोये ठहरो, ये मुझे वापिस नहीं छोड़ने वाली. बस गेट पर फाइल देके आयी मैं फिर वापिस छोड़ के चाहे तोह चले जाना नहीं तोह मेरे घर रुक सकते हो कॉफ़ी या कोल्ड ड्रिंक के लिए.", वो तेज कदमो से घर के द्वार की तरफ भड़ी और घंटी पर हाथ रखे तबतक दबती रही जबतक की सामने से दरवाजा खुल न गया. ये उस घर की कामवाली थी और उसको फाइल दिखा कर वही बुर्ज पर रखती जीनत इतनी फुर्ती से लौटी कही अर्जुन निकल हे न जाए उसको छोड़ कर.

"आराम से आराम से. मैं आपको ड्राप करके हे जाने वाला हु क्योंकि धुप तोह आपसे जरा भी सेहन नहीं होती जो दिख रहा है."

"तुमसे भी कहा हो रही है लेकिन चाहो तोह लंच मेरे घर कर सकते हो देखो अब हम दोनों एक दूसरे को जानते भी है."

"हाँ आप मुझे जानती है लेकिन आपसे मेरी पहचान अभी ाचे से नहीं हुई. वैसे भी आपने पार्टी देनी है मुझे और तब आराम से जान पहचान बढ़ा लेंगे. आज थोड़ा जल्दी में हु इसलिए घर पे पानी फिर कभी. आउच..", गली से बहार निकलने से पहले हे अर्जुन ने रानी के ब्रेक एकदम कसके मार दिए जब कोने वाली घर से वो छोटा सा सफ़ेद कुत्ता ठीक सामने आ रुका जिसके साथ 2 बचे भी थे. गति 20 की भी नहीं थी लेकिन एकदम ब्रेक लगने से जीनत भी उसकी पीठ से लगी, कुछ दर्द उसके भी सीने में हुआ था लेकिन ये पहला स्पर्श उसने थोड़े डर और बाकी ख़ुशी से अपना लिया.

"आंटी जी, देखो ये तोह मोटरसाइकिल थी और स्पीड भी काम लेकिन कार होती तोह इन्हे चोट लग सकती थी.", अर्जुन ने घबराई हुई उस अधेड़ महिला से मुस्कुराते हुए कहा जो हाथ जोड़ चुकी थी.

"बचे शैतान है पुत्तर और कामवाली वि गेट खुल्ला छड्ड गयी. मैं वेखदे हे लपकी सी ेहना दे मूर बस बचे सुंदे किथे है. धन्यवाद पुत्तर जी ओहदा वि हे पराये परिवार दी निशानी ने, गले दी फांस बन जाना स जे खरोच वि आ जांदी."

"कोई गल्ल नई बीजी, बचे ेंज हे करदे ने बस काम ाली न समझा देयो के मादा जा ध्यान रखे बुआ खोल्दे बंद करदे समां. चंगा जी.", अर्जुन भी हाथ जोड़ कर गली से बहार आ गया.

"तू तह चंगी पंजाबी बोल लेंदा फेर अप्पा ेहनी देर तोह ोंज हे aap-ji कह रहे सी? फेर हूँ दोस्ती हो गयी होव था ेहना वि दस् दो के पार्टी कदो लेनी?"

"कल मैं छल्लेया किसे काम तोह बहार और ोस्डे अगले दिन मैं एत्थे होना. हुन्न तुस्सी दस्सो पार्टी कदो करनी? हाँ इंडस्ट्रियलिस्ट मर नरेश कपूर दी छोटी कुड़ी किथे सस्ते विच न तर्क दावे. आप जी दे सिस्टर मिस इंडिया रनर उप रह चुके यह वि जांदा है. वैसे व्याह हो गया ोहना डा..", अब बारी जीनत की थी हैरान होने की जिसको अर्जुन ने उसके हे पिता और बहिन का परिचय दे दिया था.

"ओह तोह खेल रहे थे मेरे साथ? कोई नहीं इसका बदला मैं लेके रहूंगी और पार्टी मुझे डीडे करनी है तोह फिर जगह और टाइम मैं परसो हे बताउंगी जब तुम अपने जीजा जी के घर आओगे. दीदी से मिले हो तुम?"

"मिला तोह मैं अंकल जी से भी नहीं लेकिन उन्हें शादी में देखा जरूर था. हाँ आपकी दीदी का एक फोटो आपके घर के सामने भी था जो मैगज़ीन में छपा था तभी याद आया जन्नत कपूर और जीनत कपूर बहने हे हुई.", अर्जुन फिर से उनके घर के सामने उस छायादार वृक्ष के निचे रुक चूका था और इस बार जीनत उसके और भी करीब कड़ी बड़ी गौर से उसको सुनती देखती रही.

"मतलब मेरी दीदी पे क्रश होगा तुम्हे जो इतने ध्यान से उनकी फोटोज देखि जो 4 साल पुराणी होंगी. काम से दिल्ली गयी है वो किसी शूट के लिए और आज शाम तक वापिस लौट आएँगी. साथ बैठ के फोटो ले लेना उनके और इस बहाने हमारे घर भी आओगे.", इतना बड़ा घर और अभी भी गलियारे में पूर्ण ख़ामोशी जहा बस एक कार कपडे से ढकी थी. आसक्ति वाली बात सुन्न कर अर्जुन थोड़ा झेंप गया था.

"हाँ बोर्डिंग में था तब पहले न्यूज़ देखि थी और फिर वो सभी मैगजीन्स जिसमे उनकी फोटो छपी. स्क्रैपबुक जैसा कुछ बनाया था मैंने जिसमे सिर्फ उनकी हे फोटोज चिपकायी थी कलेक्ट करके. वैसे आपको भी तरय करना चाहिए था.", अर्जुन ने जिस तरह से तारीफ की थी मैं हे मैं जीनत को वो थोड़ा पसंद न आया लेकिन आखिर में उसकी भी तारीफ सुन्न कर उसने बाकी सब दरकिनार कर दिया.

"मुझे वो सब पसंद नहीं और करियर का ऐसा है की कॉलेज जाने से घर का अकेलापन दूर रहता था और सेण्टर जाती हु तोह घूम फिर लेती हु अपनी सहेलियों के साथ. माँ और डैड को बिज़नेस से फुर्सत नहीं और मेरी दीदी चाहे भी तोह घर पे मुश्किल से 10 दिन रुक पाती है महीने में. हाँ उनकी कोशिश रहती है की रात वो घर हे रहे लेकिन पापा के बिज़नेस के साथ ंगो भी है जिन्हे वो देखती है. कल तुम बहार जा रहे हो नहीं तोह कल हे मिल लेते बाकी मैं उन्हें बता दूंगी की उनका एक फैन है जो पहचान वाला हे है अगर देखा जाए तोह."

"थैंक यू और अगर उन्हें बुरा न लगे तोह फिर कल जाने से पहले हे मिलना चाहूंगा उनसे. मुझे शाम को 4 बजे निकलना है तोह जो टाइम आपको सूट करे. अब फैन हु तोह इस बात से इंकार नहीं करूँगा.", अर्जुन ने चाबी घुमाई हे थी की वो सफ़ेद चमचमाती मार्कएडेस ठीक उनकी बगल में आ रुकी जिसको उसी रंग की वर्दी पहने ड्राइवर चला रहा था. घर के प्रवेश से पहले हे एस्टीम कार बाधक थी और उसके सामने ये दोनों. जीनत का तोह ध्यान हे अर्जुन पर था तोह उसको वो गाडी नजर तभी आयी जब वो बराबर आ रुकी. ड्राइवर से पहले हे काली चुस्त कमीज और जिस्म पर चिपकी सफ़ेद bell-bottam पंत के साथ ऊँची एड़ी की सांडले पहने हे किसी विदेशी अभिनेत्री सी युवती उनके सामने प्रकट थी. चेहरे पर भूरी डंडी का आकर्षक धुप का चस्मा और ाची लम्बाई के साथ कोई 25-26 कमर और 34 का seena/nitamb.

"सुर्प्रिसिंग. तोह मोटो ने बॉयफ्रेंड बना लिया और अपनी बस्ती तक को इसकी भनक नहीं लगने दी? वैसे डेट के लिए ये जगह उतनी ाची नहीं है बाकी जनाब शायद थोड़ी फिल्मी लगते है जो सिखर धुप में घने पेड़ के निचे ठंडी छाया में अपनी हीरोइन के साथ मीठी बातों में दुनिया भुलाये है. BTW I'm.."

"जन्नत कपूर, मिस इंडिया runner-up 1994. मिस फोटोजेनिक, मिस स्विमसूट एंड ब्यूटी विथ ा ब्रेन. वाइटल 32-26-32 और उतना हे कमाल का लिखती भी है आप. मैं वीकली कॉलम पढता था फिर आपने लिखना हे बंद कर दिया. आप शाम को आने वाली थी.", ये पहली बार हुआ था के अर्जुन जैसे किसी को सामने देख कर इस कदर खोया था की वो मोटरसीले के दोनों तरफ पाँव रखे खड़ा था इस रूपवती को इतने करीब देख कर. जन्नत के जिस्म से उठती वो हलकी मीठी सी परफ्यूम की महक और जैसे एक एक बाल उसका घंटो लगा कर सजाया गया हो जो थोड़ा भी हिलता तोह वो वापिस उसको सही कर देती. पर अब वो भी अपने से आधा फ़ीट ऊँचे इस युवक को देख रही थी जो अपलक बस उसको हे देखे जा रहा था.

"वाओ.. छोटी बहिन के सामने बड़ी की तारीफ भरी पड़ सकती है मिस्टर.. एंड यू अरे किते लकी जीनत.", अब झेंपने की बारी अर्जुन की थी जब वास्तविकता से पला पड़ा तोह और जीनत तोह हँसते हुए ना में सर हिलने लगी.

"ये आपका बड़ा वाला फैन है दीदी और मेरा बॉयफ्रेंड नहीं है. मतलब थोड़ी सी पहचान है अर्जुन से मेरी क्योंकि सेण्टर पर मिनी को ड्राप करने आया था ये और आज अभिषेक भैया का घर नहीं मिल रहा था तोह मैं बहार मिल गयी. वैसे आप 4 बजे तक का बोल रही थी आने का."

"स्टैंड लगा दो मिस्टर अब जरा हम भी अपनी खुल कर तारीफ करावा लेते है जब जिनि का तुमसे सीरियस कनेक्शन हे नहीं. भैया, जिनि की कार अंदर लगा दीजिये पहले फिर ये वाली. और तुम बैग वग ले कर कही मेरी बहिन को तोह भागने नहीं निकले थे मिस्टर.. अर्जुन.. ाचा नाम है", इस युवती के मात्रा आ जाने भर से वो निर्जन सा बड़ा घर रोशन हो चला था जिसके साथ हिचकिचाता हुआ अर्जुन कभी कनखियों से इस अप्सरा को देखता तोह कभी नजरे फिर लेता. ये सच था की बोर्डिंग में जो लड़की उसने पत्रिकाओं में देखि थी आज वो उसके सामने थी लेकिन ये घटना जिस तरह घाटी थी उसको अभी भी खुली आँखों का सपना लग रहा था. चेहरे के सामने चुटकी बजते हे जैसे वो वर्तमान में लौटा तोह उस ऊँचे लकड़ी के दरवाजे को खोल कर कड़ी जन्नत मुस्कुरा रही थी जिसकी आँखों पर अब धुप का चस्मा नहीं था. वही हलकी bhoori-saleti सी आँखें जो रंगीन किताब के पन्नो से उतर कर उसके जेहन में बस चुकी थी.

"तुम तोह यार ऐसे घबराये लग रहे हो जैसे हमने तुम्हे किडनैप कर लिया हो. बैग इधर रख दो और आराम से बैठो. श्यामा दीदी, एक गिलास नार्मल पानी और एक ठंडा.", इस आलिशान हॉल में दिवार पर हे जन्नत और जीनत की काफी बड़ी तस्वीर तंगी थी जहा बाहों के घेरे में अपनी छोटी बहिन को लिए जन्नत सामने ऐसे देख रही थी की तस्वीर देखने वाले के दिल पर उतरती लगी. जीनत एक लम्बे बालो वाले छोटे से विदेशी कुत्ते को गॉड में लिए इनके करीब हे आ बैठी जो इतनी जल्दी सिर्फ के निक्कर में थी, जीन्स की जगह.

"योर हाउस इस रियली ब्यूटीफुल जीनत.", अर्जुन तोह जैसे जन्नत से हे नजरे चुरा रहा था और घर की तारीफ भी उसने जीनत से हे कही. जन्नत ने अपने लम्बे सपाट से रहस्मई बालो को मुठी में लेते हुए रबर से बंधा तोह न्यास हे फिर से अर्जुन उसके रूप को देखने लगा था.

"ओह दीदी ये सदमे में आ गया है आपको सामने देख कर. वैसे ऐसा हाल न इसको देख के मेरे सेण्टर की सभी लड़कियों का था और तब ये महाराज खुद एक सुन्दर लड़की के साथ सबको इग्नोर कर रहे थे."

"हाहाहा.. तुझे भी इग्नोर करने की गलती की थी क्या अर्जुन ने?", अब अर्जुन ख़ामोशी से बस वो कांच का गिलास लिए एक घूँट में खाली करने के बाद थोड़ा राहत महसूस कर रहा था. जन्नत सैंडिल उतार कर उसकी बगल में हे बस थोड़े से फांसले पर बैठी उस कुत्ते को सेहला रही थी जो उसकी बहिन की गॉड में था. जहा बड़ी बहिन लम्बी छरहरी थी वही छोटी मांसल जिसकी दूधिया जाँघे तक उस निक्कर से आधी दिख रही थी. कहा से कहा पहुंच चूका था अर्जुन इस छोटे से सफर में हे.

"अरे ये तोह आप आयी हो तब अंदर आया आपके साथ नहीं तोह हम 5 मिनट मुश्किल से बात कर पाए थे और जाने हे लगा था. अब खिंचवा भी लो दीदी के साथ फोटो. उस बहाने प्रिंट लेने फिर से आओगे घर."

"माफ़ करो फिलहाल मेरी हालत नहीं है कैमरा के सामने आने की. वैसे तुम भी मॉडलिंग करते हो क्या अर्जुन? मैं ज्यादा ध्यान नहीं देती मेरे शूट्स के सिवा लेकिन देख कर तोह यही लगता है. हमारे शहर में हे रहते हो?"

"जी मैं क्सक्सक्सक्स से हु और अभी पढ़ रहा हु. थोड़ा स्पोर्ट्स में होने की वजह से आपको वैसा लगा होगा और इधर क्सक्सक्सक्स गाँव में हे हमारा पुश्तैनी घर है. अभिषेक जी के भाई के साथ मेरी दीदी की इसी 21 तारीख को शादी हुई है और वो लोग 1 को वापिस आने वाले है तोह आज बस उनका घर देखने आया था जो जीनत जी की वजह से मिला नहीं तोह घूम मैं बहोत देर से रहा था. आप हर टाइम ऐसी हे दिखती है?", अब चौकने की बारी जन्नत की थी लेकिन फिर वो दोनों बहने खिलखिला उठी.

"अरे बाबा अब आदत हो गयी है मुझे ऐसे रहने की और जैसी हु वैसी हे दिखती हु. वैसे अभिषेक भैया से तोह ज्यादा बातचीत नहीं हुई मेरी लेकिन शिल्पा भाभी से मुलाकात होती रहती है जब टाइम मिलता है. 21 मई.. डैड भी गए थे मैरिज में? हाँ.. यार तुम्हारी फॅमिली से हे तोह रर एंटरप्राइज एंड इंडस्ट्रीज है जो पापा को मटेरियल देते है."

"जी उमेद जी मेरे चाचा है जिनकी कंपनी है रर एंटरप्राइज. वैसे आप शादी में नहीं आयी?", अर्जुन की बात सुन्न कर जन्नत का बड़ा मजा आ रहा था क्यूंकि वो जिस तरह से झिझकने के बावजूद उसको देखता था और कुछ भी बोल देता था उस से साफ़ था के वो बहोत खुश था उसको अपने करीब देख कर.

"पता नहीं था के वह पर तुम मिल सकते थे.. हाहाहा.. यू अरे सो क्यूट.. हमारी जिनि थोड़ी ज्यादा शरारती है तोह घर पे माँ, डैड या मुझे इसके पास रुकना पड़ता है नहीं तोह फिर कोई न कोई पन्गा हुआ मिलता है. वैसे भी ट्रैवेलिंग से थक चुकी हु तोह जब भी घर रहने का मौका मिले तोह वो छोड़ना मुश्किल है. तोह यहाँ गाँव में हे रहते हो फिलहाल?"

"ये मालिक है उस गाँव का दीदी और वैसे तोह सामने वाला भी गाँव इसका है. आज तोह कॉलेज गिफ्ट किया है अर्जुन ने सिर्फ लड़कियों के लिए पहला इंजीनियरिंग और multi-subject मास्टर्स लेवल तक का कॉलेज. मिनी है न मेरी फ्रेंड वो बता रही थी मुझे फ़ोन पे. पंजाब में आ कर बुलेट पसंद आ गयी है इसको नहीं तोह अपने शहर में पता नहीं क्या ड्राइव करता होगा."

"साइकिल.. वह मेरे पास मेरी साइकिल हे है और ये बुलेट मेरे दादा जी ने बर्थडे पर गिफ्ट दी थी. अब कही अकेले जाना होता है तोह यही ठीक है. और मैं गाँव का मालिक नहीं हो जीनत जी, वो जमीन कभी मेरे पड़ दादा जी होती थी और उन्होंने वह अपना एक पढ़ा लिखा समझ बनाने का सपना देखा था जिसके लिए सबने योगदान दिया. कॉलेज गिफ्ट करने वाला मैं कौन होता हु क्योंकि म्हणत तोह वो कर रहे है जो यहाँ रहते है. मैं लौट जाऊँगा वापिस अपने घर, अपने संसार में 20-22 दिन बाद और शायद फिर अगले साल हे औ. फिलहाल तोह मेरी पर्सनल आइडेंटिटी सिर्फ इतनी है के मेरे पिता एक बहोत काबिल और नामी डॉक्टर है और दादा जी पुलिस अधिकारी रह चुके है जिन्होंने बहोत इज्जत कमाई है. लेकिन मैं आपसे बहोत प्रभावित हु मम. आपने कॉलेज के साथ साथ करियर बनाया जो बिज़नेस एम्पायर से बिलकुल डिफरेंट था. स्ट्रगल किया तभी तोह नेशनल और इंटरनेशनल कवरेज में हो. वो बहार जो वाइट मेरसेदेज़ कड़ी है ये आपको क्सक्सक्सक्स स्कूल ने अपना ब्रांड अम्बस्सडोर बनाये जाने पर गिफ्ट की थी और वो आज कॉलेज भी बन चूका है."

"बड़े दिलचस्प आदमी हो यार तुम तोह. जिनि शयामा दीदी से कह दो की तीन लोगो का लंच बना दे."

"सॉरी लंच आज मुमकिन नहीं होगा मम, थोड़ा काम से आया था इधर और पहले हे देरी हो चुकी है."

"कॉफ़ी.. कॉफ़ी तोह पी सकते हो अगर लंच नहीं करना तोह? मेरा सोशल सर्किल ऑलमोस्ट जीरो है और अगर किसी से बातचीत भी होती है तोह 2-3 कॉलेज फ्रेंड्स है जिनकी शादी हो चुकी या आसपास के पहचान वाले. बाकी मेरी बेस्ट फ्रेंड ये मेरी जिनि है. वैसे बुरा न मानो तोह ये बताओगे की मैं तोह क्राउन भी नहीं जीती थी फिर भी तुम ने मिस इंडिया से ज्यादा तीसरे नंबर पे आने वाली को जान न चाहा? बोल दो शर्माओ मैट वैसे भी यहाँ लोग नहीं है ज्यादा और चाहो तोह अजनबी समझ कर बोल दो."

"अजनबी.. यही तोह कविता थी आपकी मम. कल्पनाओ के शहर में तुम अजनबी मिले, फिर नए शहर हम साथ बनाते चले. उस पार तुम खामोश अपनी जिरह में, इस और हम वही कल्पनाओ के शहर में. उठती नजरो से सवेरा जैसे ृत्त दीप्ती लिए, ढलती शामो का गेहराना उन पलकों टेल. काश कल्पनाओ के शहर आबाद हो पाते, हम अजनबी फिर अपना संसार बना पाते. कल्पनाओ के के शहर में तुम अजनबी मिले."

"बहोत खूब.. तुम्हे ये पूरी याद है? जानते हो मैंने इसको एक महीने में पूरा किया था क्योंकि अल्फाज स्याही से हर बार सही नहीं बिखरते. लेकिन ये कविता तोह बहोत बाद में कॉलम में लिखी थी मैंने. तोह तुमने कैसे गौर किया मुझ पर? वैसे तुम मम की जगह जन्नत बोल सकते हो या.."

"जानू बोल सकते हो.. दीदी का घर का नाम जानू हे तोह है. हाहाहा.. कॉफ़ी बन रही है.", धम्म से सोफे पर जीनत ऐसे बैठी थी की वो अर्जुन को अपनी तरफ आकर्षित कर सके. ये लड़की अलग आफत थी जो शायद इस बार भीतर से ब्रा निकाल आयी थी जिस तरह से उसके दोनों उभर स्प्रिंग की तरह उछले. नजरे मिली और अर्जुन ने ध्यान फिर से बदल लिया.

"जी आपकी आईज.. वो फोटो close-up थी जिसमे आपका हाफ फेस था फेमिना मैगज़ीन में. पता नहीं कैसे पर मैंने पहली बार लाइब्रेरी से कोई बुक चुराई थी और फिर वो फोटो काटने के बाद वापिस रख आया. ज्यादा समझ नहीं थी और फिर मैं हर नेवसपपेर और मैगज़ीन देखता और यही करता. वो फोटो बुक आज भी मेरे पास है मेरे घर पे. हाँ पिछले एक साल से उसको देखा नहीं है मैंने.", अब जीनत के साथ जन्नत भी बड़े गौर से सब सुन्न रही थी और जन्नत थी भी तोह अपने नाम स्वरुप जिसकी पानी सी आँखों के घेरे भूरा किनारा लिए थे.

"यार तुम अगर मेरे साथ मेरे कॉलेज में होते न तोह पक्का मैं तुम्हारी गर्लफ्रेंड होती. ऐसे तोह मैंने क्या मेरे माँ डैड ने भी मेरी फोटोज नहीं संभाली होंगी. आज लंच न सही डिनर साथ करते है? डैड तोह वैसे भी 3 दिन मलेशिया है और माँ कल आएँगी. ऐसा हे होता है यहाँ पर, फॅमिली टाइम सबका एक साथ तोह महीने में 2 बार मुश्किल से होता होगा, एक्चुअली पापा ज्यादातर बहार और मेरा सचेडूले भी 12-13 दिन बिजी. क्यों जिनि, शाम को डिनर पर बहार या घर?"

"हाउ अबाउट डे आफ्टर टुमारो? बताया न की उधर घर पर कोई और मेल मेंबर नहीं है तोह मैं रात को नहीं आ सकता. ऊपर से अगर यहाँ बड़े जीजा जी ने देख लिया तोह वो अपने घर ले जाएंगे.", अभी बात हो हे रही थी की बहार घंटी बजने पर कामवाली की जगह जीनत हे उठ कर गयी जैसे उसने शीशे से हे देख लिया था आने वाले को.

"वो साक्षी आयी है डीडू, आप मिलना चाहती है उस से.?"

"नहीं यार बहोत दिमाग खाती है. तू उसको अपने कमरे में हे क़ैद रख और तुम्हारी बातें बस तुम तक हे रखना.", शायद ये भी बेहतर जानती थी इन दोनों लड़कियों के किस्से. मुँहफट और बिंदास कुछ भी बोल देती थी और जन्नत इस मामले में इनसे ज्यादा आधुनिक होने के बावजूद थोड़ी सिमित और अनुशाषित युवती थी. अब यहाँ बस यही दोनों बैठे थे जो आधा घंटा पहले तक एक दूसरे से कभी मिले तक न थे. वो छोटा सा कुत्ता उस एक सीट वाले सोफे पर हे ऊंघ रहा था जिसको लड़की की तरह सजाया हुआ था.

"परसो किसने देखा है जब कल का हे नहीं पता. ी अंडरस्टैंड तुम बिजी हो क्योंकि यहाँ तुम्हे वो इंसान इन्विते कर रहा है जिसकी फोटोज तुम कलेक्ट करते रहे और उसको इंकार ऐसे हे तोह नहीं कर रहे होंगे. कल माँ के आते हे दिन बस आराम करने में निकलने वाला है और तुम्हे उनके सामने बुलाया तोह तुम इन पंजाबी माओं को नहीं जानते.", अर्जुन को इस बात पर अन्नू की माता जी याद आ गयी जिस पर एक मीठी मुस्कान उसके होंठो पर तैरती खुद जन्नत ने देखि. वो भी समझ गयी थी की अर्जुनको जैसे कुछ याद आ गया.

"तोह कौन थी वो पंजाबी मम्मी जिस से पला पड़ चूका है.?"

"हाँ.. आंटी है मेरे पड़ोस में रहते है जिनके साथ मैं घंटो लूडो और चैस खेलता रहता हु. कभी उनके लिए चाय बनाना तोह कभी राजसी में साथ खाना पकाते हुए उनकी वो साड़ी बातें सुन्न न जो हर पंजाबी माँ अपनी जवान बेटी और फिर पति मोहल्ले के बारे में करती है. सच बताओ तोह मैं आप जैसा हे थोड़ा इंट्रोवर्ट दीखता हु मतलब अंतर्मुखी लेकिन ऐसा है नहीं. न आपके मामले में न मेरे. फिलहाल तोह मैं आपकी माँ से भी नहीं मिलूंगा जितने अपने जीजा जी और दीदी से न मिल लू लेकिन कल दोपहर में लंच साथ कर सकते है, घर से बहार.", अब उसकी बात सुन्न कर जन्नत जिस तरह से हंसी थी ये पहला क्षण था के अर्जुन उसकी हंसी को तब तक निहारता रहा जबतक वो खुद हे झेंप न गयी. उठ कर वो उस अलमारी की तरफ बढ़ चली जो दिवार में बानी थी. उसकी चाल में एक अलग सा आकर्षण था जो साधारण लड़कियों की चाल से कही आकर्षक एक विडाल जैसी थी, Cat-walk

"डेट के लिए हे पूछ लिया जबकि घर पे डिनर करने से मन कर रहे थे? तुम्हारी थोड़ी बहोत दोस्त की बड़ी बहिन हु मैं मिस्टर और शायद तुम्हारी क्रश भी.", अब उसके हाथ में चमड़े के केस में बंद एक विदेशी कैमरा था शायद जापानी जिसको लिए वो फिर से अर्जुन के पास आ बैठी थी, बिलकुल करीब. श्यामा की परवाह न करते हुए जो दोनों को देखने के बाद कॉफ़ी के साथ सूखे मेवे भी रख गयी थी. उस कैमरा को केस से निकाल कर वो अर्जुन के कंधे पर हाथ रखती बैठी तोह जैसे अर्जुन की हृदयगति हे बढ़ गयी. वो थोड़ी हैरानी से उस चेहरे को देखने लगा था जिसकी आज से पहले बस तस्वीरें देखि थी. पर आज वो उसके करीब था और तस्वीरों से कही ज्यादा खूबसूरत.

"ऐसे क्या देख रहे हो? तुम्हे फोटो नहीं खिंचवानी?"

"हहह. हैं."

"मजाक कर रही थी डेट वाली बात पर यार. चलो लेंस की तरफ देखो बस.", ऐसा कहते हुए अब जन्नत के गाल उसके चेहरे से बस 2-3 इंच दूर थे और फिर बस कैमरा की आवाज हे सुनाई दी जो 3-4 बार हुई और आखिर में तोह जो तस्वीर जन्नत ने खींची उस वक़्त जाने कैसे दोनों की नजरे एक बार मिली और अर्जुन वापिस कैमरा देखने लगा था जहा आवाज हुई लेकिन उस पल में जन्नत ने जाने अनजाने उसके गाल पर अपने पतले गुलाबी होंठ टिका दिए थे.

"जिनि को सताने के लिए ऐसा किया. सॉरी अगर तुम्हे बुरा लगा हो तोह. ये डिजिटल कैमरा है और चाहो तोह मैं फोटो ईमेल कर दूंगी.", अब वो थोड़ा पीछे खिसक गयी थी अर्जुन को ऐसे देख जो तुरंत संभल गया था.

"कोई बात नहीं लेकिन क्या लास्ट वाली फोटो भी ईमेल कर देंगी आप?"

"हाहाहा.. जरूर. कॉफ़ी लो नहीं तोह गरम होने के बाद ाची नहीं लगेगी.", अगले 5 मिनट अर्जुन ने थोड़ी बहोत हे बात की थी और फिर तये हुआ था के वो 1 बजे कहा लंच पर मिलने वाले है. विदा लेके वो बैग उठा कर चल दिया था जबकि खिड़की से जन्नत एकटक उसको देखती रही.

'कल्पनाओ के शहर में तुम अजनबी... इस बार कल्पनाओ से बहार निकलना हे होगा. तस्वीर में तुम भी बहोत खूब लगते हो पर करीब से जैसे काल्पनिक. आइंदा तस्वीर की जरुरत नहीं पड़ने दूंगी चाहे फिर शिल्पा भाभी को बुरा लगे या ाचा.', इस मूक मंथन से ये तोह साफ़ था की जन्नत भी अर्जुन से वाकिफ थी चाहे मिले न हो कभी और उसके दिल में क्या था वो तोह भविष्य के गर्भ में क़ैद था जिसकी फिलहाल कल्पना नहीं थी.

"दीदी, अर्जुन चला गया?", ये आवाज सुन्न कर जन्नत पलटी तोह उसकी बहिन अपनी सहेली के साथ कुछ दुरी पर कड़ी थी.

"हाँ, बताया था न उसने की उसको देरी हो रही है. बोल रहा था के परसो वो शिल्पा भाभी के घर आएगा तोह तुमसे भी मिल लेगा. वैसे कोई सीरियस मसला है क्या उसके साथ? क्यों साक्षी, तुम तोह इसके साथ साये की तरह रहती हो अर्जुन के बारे में तुम्हे भी पता होगा."

"वो तोह हम दोनों की फंतासी है दीदी लेकिन प्यार व्यार वाला सिस्टम न इसको समझ आता है और न मुझे. था न आपकी टक्कर का? सेण्टर पे आजकल चर्चा का विषय है वो और मिनी ने बताया था की पुलिस से ले कर पहलवानो तक को धुल छठा चूका वो गबरू. बस लड़कियों से पता नहीं क्या एलर्जी है. आप हे टिप्स दे दो कोई उसको पटाने के, जिनि से ज्यादा तोह मुझे जल्दी है."

"जब प्यार व्यार न हो तोह ऐसे लड़को से दूर रहना चाहिए जो हर छोटी बड़ी बात पर ध्यान देता हो. उसको तोह ये भी पसंद नहीं आया की तुम्हारी सहेली कैसे रिझा रही थी उसको मेरे हे सामने. तुम्हे पहले इंसान को जान लेना चाहिए तभी पहल करना. अभिषेक भैया खुद रिश्ता ले कर जिस फॅमिली में गए थे वो इसकी फॅमिली थी और पापा ने बताया था के वह ये छोटे नवाब कम और रानी जी से ज्यादा छाये हुए थे. वो मोटरसाइकिल वाला फिक्र कैसा था न तुम्हारी सहेली ने जबकि उसका जवाब था की उसके पास साइकिल है. शिल्पा भाभी के घर माँ ने भी जिस लड़के पर ऊँगली टिकाई थी फोटो में ये वही था और जिस इंसान के पास सबकुछ होने के बावजूद घमंड न हो और वो तुम्हारी िज्जात्त करे उसके साथ वैसे हे पेश आओ. जवानी आती सबको है पर संभालती सबसे नहीं."

"पर कुछ भी कहो जानू दीदी, गबरू है बहोत अफीम जैसा. ये तोह मुझे देरी से पता चला नहीं तोह मैंने आपकी परवाह भी न करनी थी अगर पता होता की वो आया हुआ है. डोले शोले नहीं देखे आपने और कितना क्यूट फेस है. आप मॉडल हो न तोह फीलिंग्स काम है आप में लेकिन मेरी तोह पंतय गीली हो जाती है. और इसने तोह वो उतार भी दी.", अब जन्नत ने अपने सर पे हाथ रख लिया था उनकी बा सुन्न कर.

"ओह मुझे माफ़ करो तुम दोनों. इतनी बड़ी हो गयी हो और आजतक तुम्हे समझ नहीं आयी की क्या बोलना है. जिनि, कैमरा वापिस रख दो प्लीज.", और जीनत ने वो कैमरा उठा लिया था जो केस से बहार था.

"मतलब आपने उसके साथ फोटो ली है डीडू?"

"तुमने कहा था न लेने के लिए. परसो खुद हे ईमेल कर देना तुम लेकिन अभी कैमरा दो इसमें मेरी भी फोटोज है जो मैंने कॉपी नहीं की."

"देख के दे दूंगी, बहिन से क्या शर्माना और वैसे भी आप कौनसा सेक्सी शूट करती हो. ओह तेरी.. ये तोह कंप्यूटर पर देखनी पड़ेगी. वाह दीदी, हमे ज्ञान दे रही थी और साक्षी ये देख जरा कितना प्यारा मोमेंन्ट है. दीदी की आईज क्लोज और लिप्स अर्जुन के गाल पर जिसके खुद हाल बुरे है.. और दोनों कैसे चीक तो चीक टच किये कैमरा को देख रहे. नॉट बाद.. ये तोह माँ को.. सहित.."

"फोटो देख लिए न अब जाओ तुम दोनों. माँ से बता देना और फिर ये भी बताना के वो घर में तुम्हारे साथ अकेला क्यों था. जब वो जा रहा था तभी मैंने तुम दोनों को देखा न?", अब जीनत निरुत्तर थी.

"खुद ने मजे ले लिए और मेरी बारी में मुझे हे फंसा दो. कोई बात नहीं डीडू, आपसे भी शेयरिंग मंजूर अगर लाइफ में आपको भी लड़के पसंद आने लगे है तोह.", पाँव पटकती हुई जीनत साक्षी के साथ वापिस भीतर चली गयी थी और जन्नत बिना देरी किये अपने लैपटॉप वाले बैग को उठाये अपने कमरे की तरफ. ये तस्वीरें वो जल्द से जल्द महफूज करने वाली थी.

.

.

"इस बैग में क्या ले कर आये हो?", अर्जुन को घर वापिस पहोचते हुए समय 3 से ऊपर हो चूका था. और घर में सबको अपने कमरों में आराम करता देख वो सावधानी से चची के कमरे में दाखिल हो गया जो जैसे उसकी हे प्रतीक्षा में थी.

"ाचे से तैयार हो जाना शाम को. और इसको ज्यादा मत सोने देना दिन में, नहीं तोह रात को इसकी घंटी पहले बज जानी है.", अर्जुन निकेतन को गौड़ में उठा कर दुलार करने के बाद बिस्टेर पर हे पसर चूका था जैसे अब यही उसका कमरा था. अनामिका चची ने बैग खोला तोह सबसे ऊपर हे लाल साड़ी और उनके माप का ब्लाउज, ब्रा पंतय और एक नहीं सफ़ेद रेशमी चादर के साथ हे श्रृंगार का तमाम सामान भरा हुआ था. चेहरे पर शर्म के साथ ख़ुशी की लाली देखते हे बनती थी उनके. निहायती खूबसूरत और सरल दिल वाली इस युवा महिला को आखिर अर्जुन ने अपना हे लिया था.

"ये सब जरुरी था क्या? और मैंने बताया तोह था के मेरे पास इस रंग के है."

"ये मैं ले कर आया हु आपके लिए, हमारे लिए. ये सब मेरी कल्पना का एक अनिवार्य हिस्सा है चची जिसको मैं ऐसे हे साकार करना चाहता हु. ख्वाहिश तोह ये भी थी की खुले आँगन में बारिश टेल आप मेरे ऊपर हो लेकिन चलो पहले इसको पूरा कर ले, सावन अभी दूर है और तब आप शहर आ जाना. उधर भी खुली छत है अपने घर पे."

"धत्त.. कुछ भी बोलते रहते हो. वैसे बदले में मैं कुछ मांग सकती हु?"

"उस वक़्त मांग लेना अभी तोह बस दरवाजा बंद कर के इधर मेरे पास आ जाओ. थोड़ा सोना चाहता हु."

"पहले खाना खा लो, मैंने भी नहीं खाया."

"पता था मुझे और आइंदा आप खा लिया कीजिये इन्तजार करने की जगह.", हाथ मुँह धोने के लिए खड़ा होते हे उसने चची को कमर से अपने आगोश में भर लिया था जो हटने की हलकी कोशिश कर रही थी लेकिन उनके चेहरे पर आयी हंसी इसके विपरीत जैसे अर्जुन एक सीने से लगने की थी और आखिर हुआ भी वही.

"आपको जो चाहिए वो मैं जानता हु. हर रोज कोशिश करनी पड़ेगी मेरे साथ उसके लिए. कर सकोगी?"

"क्या कल्पनाये सिर्फ तुम हे कर सकते हो? उमाठ", खुदसे हे अर्जुन के होंठो को चूम कर उन्होंने बता दिया था के वो अब उस से ज्यादा तैयार है.

"बस फिर आज रात से आपकी नींद उड़ाने में जुट जाऊंगा. वैसे बदले में मैं भी कुछ मांगने वाला हु."

"जहा पर हाथ रख कर दबा रहे हो वो नहीं मिलने वाला. हेहेहे.."

"चची ये गलत बात है. और अब भाग नहीं सकती."

"देखेंगे.. पहले दिन तोह ढलने दो. जाओ हाथ मुँह धो लो फिर खिलाना मुझे अपने हाथ से.", चची दरवाजा खोल कर अपने लचकदार कूल्हे हिला कर जैसे और तरसा गयी थी अर्जुन को. आखिर वही तोह वो मांगने वाला था उनसे.

'कोई बात नहीं बस शाम को दीपा भाभी से हे प्रैक्टिस करके आऊंगा.'
 
अपडेट 211

रिश्ते (1)

"बैठो डॉक्टर साहब, शुक्र है आपके दर्शन तोह हुए. सुना है तड़के 5 बजे हे घर से निकल लिए थे और अब 12 घंटे बाद पहुंच रहे हो.", रामेश्वर जी दोपहर में हे घर पहुंच गए थे और भोजन के बाद 2 घंटे आराम करने के पश्चात जब अपने बगीचे की तरफ गए तोह धुप देख कर वापिस भीतर जाने लगे थे की शंकर की कार घर में दाखिल हो गयी. वो भी अपने पिता से बगल से गले लग कर मिलने के बाद कमीज के 2 बटन खोलते हुए उनके साथ अपनी माँ के कमरे में चला आया. यहाँ वो हमेशा की तरह उन्हें बाहों में भर के मिला था. कौशल्या जी ने भी आँचल से शंकर का चेहरा साफ़ करने के बाद उसको पानी दिया तोह पिता कुर्सी सामने रखते बैठ गए.

"अब ड्यूटी का टाइम कहने को हे फिक्स है पापा. वो अपने प्रेम जी है न ढाणी वाले, उनके बहु बेटे ने सल्फास खा ली थी आपसी बहस के बाद. पहले तोह हॉस्पिटल से फ़ोन आया था फिर उनका खुद आ गया तोह जाना पड़ा. बहु तोह खतरे से बहार है अब लेकिन बेटे को ऑब्जरवेशन में रखा है. परम देख लेगा एक बार शाम को नहीं तोह समस्या हुई तोह मैं चला जाऊंगा टाइम निकाल कर.", रामेश्वर जी को अपने बेटे की यही बात सबसे पसंद थी की जब मरीज की जान पर बानी हो तोह शंकर सब भूल कर बस उसको यमराज से बचने में जुट जाता था.

"रोटी खायी तूने बीटा? ऐ कोमल तेरे पापा का खाना लगा और कपडे भी दे जा इसके.", उन्होंने वही से बैठे आवाज लगा दी थी पिछले आँगन में कपडे समेत रही कोमल को. उन्हें पता था की शंकर ने न तोह सही से नाश्ता किया होगा और न बाद में दोपहर का भोजन.

"इस टाइम खाने का क्या फायदा माँ और आप न घर से जाया मत करो. मेरा दिन सही न जाता फिर."

"इस से पहले जब तू बहार रहता था तब देखभाल कौन करता था तेरी? हाँ ऐसे आवश्यक काम हो तोह थोड़ा बहु को और बिटिया को बता दिया कर. खाना तोह वही बनती है न?"

"बनती नहीं बौ जी खिला के भेजा था सुबह पापा को लेकिन इन्हे मजा नहीं आता न जबतक आप और दादी साथ न बैठे हो. इसलिए सिर्फ 6 पराठे हे खाये थे और मुझे सुना भी दिया के मैं बहोत स्लो हु.", ये ऋतू थी जो अभी तक आरामदायक कपड़ो में हे थी बस गले में दुपट्टा था उसके. अपने दादा दादी को चाय देने के साथ उसने पिता के लिए पहले से हे प्लेट त्यार राखी थी.

"मतलब तू फ़ोन करके चला था की आते हे खाना खायेगा? बड़ा ड्रामेबाज है बीटा तू. ऋतू बस एक फुल्का और देना है फिर रात की भूख नहीं रहने वाली इसको.", कौशल्या जी ने तोह कान हे खिंच दिए थे जिस पर अब शंकर के चेहरे पर साफ़ मुस्कान थी और माँ ने अपने सीने से फिर से लगाया तोह उन्हें एहसास हुआ की शंकर भी अपनी जगह ठीक हे है. दिनचर्या तोह खराब होती हे है. ऋतू वापिस चली गयी थी और कोमल ने इस्त्री किये उजले वस्त्र वही मेज पर रख दिए थे अपने पिता के लिए.

"वो दूसरा जोड़ीदार कहा है तेरा? कुछ बता कर गया है या उसकी आवारागर्दी वैसी हे चल रही है.?"

"इन्दर गौशाला देख रहा है पापा और मैं भी तैयार हो कर उधर हे जाऊंगा. हमारा एक कॉलेज का दोस्त भी आया हुआ लेकिन अभी दोनों गौशाला में व्यस्त है फिर शाम को दलीप, राजेश ने भी मिलने आना है. राजू भाई नहीं दिख रहे?"

"पहले 2 काम थे और अब तीसरा भी इनके साथ हो लिया. आता होगा वो भी घूम घुमा के. निकले तोह 2 घंटे हो चुके उसको पूर्णिमा को छोड़ने गया था. अब जितने अपने 10 वेहले गंजो से मिल न लेगा इतने उसकी शाम न होने वाली. और तेरा कौनसा कॉलेज का दोस्त आया है शंकर जो इन्दर के साथ है?", कौशल्या जी के ताने ऐसे हे होते थे.

"आप नहीं जानती माँ लेकिन पापा जानते है. विष्णु नाम है उसका, विष्णु वर्धन. बड़ा मेहनती इंसान है और अब 25 बरस बाद मिलूंगा उस से. राजू भैया भी कह रहे थे की धर्मपाल भाई साहब और वालिए जी साथ चलना चाहते है गौशाला की तरफ. तोह अब चची कैसी है?"

"ठीक है भली चंगी."

"सच बताओ न माँ?", शंकर जैसे जानता था के कुछ न कुछ तोह काण्ड हुआ हे होगा.

"तेरी माँ ने उसकी देखने बोलने की शक्ति छीन ली बीटा और अब वो jan-kalyaan भवन में है, इसकी हे निगरानी में. तभी तुझे समझाता रहता हु के थोड़ा जीवन को सही दिशा में रखा कर, इधर उधर भटकता है तेरा मैं और फिर तू सुनता भी नहीं किसी की. जितने प्यार से ये रोटी खिलाती है न उतने प्यार से तुझे सजा भी दे देगी.", अब शंकर जहा हैरान था फिर हँसते हुए इस बात को हवा में उड़ा दिया.

"मतलब चची ने बहोत बड़ा अपराध किया और वो माँ को पता चल गया. ऐसा क्या हुआ माँ के तुम्हे इतना बड़ा कदम उठाना पड़ा?"

"मैं न उठती तोह तू कुछ कर गुजरता और अर्जुन ने मुझे सामने कर दिया सब pol-patti खोल कर तोह जब बचे इन्साफ के लिए बड़ो की तरफ देखे तोह उन्हें संतुष्ट करवाना हमारी जिम्मेवारी है. देवकी ने घपले और साजिशे तोह बहोत करि लेकिन सबसे बड़ी बात पता है जो अर्जुन ने बताई? तेरे दर्द की वजह भी वही थी और रेखा पर हमले की भी. वो तांत्रिक के बारे में जानती थी इसलिए उसने अर्जुन को अखाड़े में भेजा जिस से वो मर्डर जाए. तेरे बेटे ने 4 मासूम ज़िन्दगी उसके कब्जे से बचाई जिन्हे वो दूसरे तांत्रिक से बलि पे चढ़वाना चाहती थी. वो भागना चाहती थी लेकिन अर्जुन ने वो भी न होने दिया. लेकिन वो बड़ी दीठ और मजबूत औरत है शंकर जिसके दिल में सिर्फ नफरत है सबके लिए फिर चाहे वो तेरे चाचा हो या तेरी बहने. हाँ रेखा और अर्जुन को मारने के प्रयास का जवाब नहीं मिला मुझे. पता नहीं जैसे वो कुछ बड़ा जानती है जो अर्जुन को भी नहीं पता.", शंकर के टूटते उड़द चुके थे सब सुन्न कर.

"आप जानती हो न माँ के अर्जुन सिर्फ 18 का है और वो इस सबमे शामिल था? चची उस हद्द तक जा सकती है तोह उनके लिए अर्जुन.."

"अर्जुन के लिए वो भी सिर्फ एक मोहरा है शंकर और जिसको तुम 18 का बता रहे हो आखिर वो ऐसा क्या करे की तुम्हारी नजरो में उसकी कुछ एहमियत बन सके.? हर बार दोहराना पड़ेगा क्या हमे की वो सबसे अलग है जिसको समाज से ज्यादा इंसान समझ आते है. अतीत में हमारे पिता और उनके परिवार तक जा पंहुचा वो और क्या तुमने संभव को नहीं देखा? वो स्वयं कहता है की अर्जुन को वो सबसे बेहतर जानता था उस दिन से पहले लेकिन जो अर्जुन उस तांत्रिक की जंघा को टॉड रहा था और संभव तक को उछाल फेंका वो उसने भी नहीं देखा था. उसको मैं खुद आजाद करना चाहता हु शंकर. वो दुनिया देखे और साधारण जीवन में अपने लिए कुछ करे. पर वो रुकने की कोशिश भी करे तोह कुछ है जो उसको निरंतर चलाये रखता है. उसने कॉलेज को हमारे पिता की जगह उनकी माता जी का नाम दिया जबकि हमारी दादी की हमारे पास कोई याद नहीं है और ना पिता जी के पास थी. देवी अनुराधा आँगन हमे पता था क्योंकि पिता जी उस देवी के सामने घंटो समय बिताते थे लेकिन वही उनकी माँ थी और ये हमारे पिता की चाहत स्वयं उन्होंने कभी जाहिर न की मुझसे या रघुवीर तक से. अर्जुन से की न उन्होंने और उन्होंने स्वयं कहा की 'अजनबी मित्र तुम हमारे जैसे हो'. और ये मेरे पास लिखित में है जो अर्जुन ने दिया मुझे, बहोत कुछ बेशकीमती यादों के साथ. देखना बीटा कही तुम्हारे करम हे न भारी पड़ जाए उस पर.", रामेश्वर जी इस से ज्यादा कुछ न बोल सके और चाय का आधा प्याला वैसे हे छोड़ कर बहार चल दिए.

"मतलब खुद पापा या आपको भी इस बारे में नहीं पता था की वो वह क्यों जा रहा है? और वो इतना सब कैसे जान गया जबकि दादा जी से पहले तोह छोड़िये उनके हमउम्र तक जीवित नहीं. दार जी और मौलवी जी तोह खुद थोड़ा बहोत जानते है जो अर्जुन को वो भी नहीं बताने वाले क्योंकि उसने देखा हे कहा था दादा जी को. माँ ये लड़का आपकी खुराक से अलग बन्न रहा है या वो संभव भाई?"

"खुराक भी तोह सही जिस्म पर लगेगी न शंकर. और मुझे भी ज्यादा नहीं पता लेकिन मैं हमेशा कहती हु की वो इनसे चोर पुलिस खेलता हुआ आज इनकी भी सोच से ज्यादा गहरा इंसान बन चूका है. बिनोदिये को प्यार से ाचा इंसान बना दिया तेरे बेटे ने और तू उसकी क्षमता पे सवाल उठा रहा है? रेखा के दर्द की वजह से वो देवकी के पीछे गया था और जैसा मैं कहती हु की धागे का एक सिरा उसके हाथ लगा नहीं की वो कपास के निचे वाली मिटटी खोद कर वह भी पता करके आएगा की वो धागा इधर की उपज है या कही और की. वो सबसे निस्वार्थ प्यार करता है और सबसे अधिक तेरे पापा और अपनी माँ से. यही 2 लोग तोह है जिन्होंने अपने बारे में कभी न कुछ कहा न किया. जो अपनी चाहत न बताये शंकर समझ ले की उसकी चाहत हम पूरी भी नहीं कर सकते. आज तेरे पिता खुश है और उनके पास अपने पिता की धरोहर है जो उन्होंने इनके लिए संजोयी थी. दे न सके तोह अर्जुन ने सौंपी. कल को वो ऐसा रेखा के लिए भी करेगा चाहे वो तेरे पापा से भी सख्त है लेकिन अर्जुन निकलेगा हल जिस से वो भी जीना सीख सके."

"कैसे बातें करती हो माँ आप भी? पापा को चलो दादा जी की धरोहर मिल गयी जैसा आप कह रही लेकिन उनके पास सबकुछ है. और रेखा के पास भी कोई कमी नहीं है बस वो अंतर्मुखी है और इंसान का स्वभाव तोह बदला नहीं जा सकता. चलो मैं नाहा के तैयार होता हु फिर कल सवेरे हे आऊंगा नाश्ते के समय. राजू भाई भी आ गए हैं बहार.", शंकर कपडे उठा कर तेज कदमो से बहार वाले बाथरूम की तरफ निकल गया लेकिन कौशल्या जी अपने बेटे के जवाब से चिंतित हो उठी.

'जिसके पास पहले हे 'सबकुछ' हो उसको हम तुम क्या दे सकते बीटा. तू समझता तोह पता लगता की इंसान की इतछाये धन दौलत से परे होती है जब उसके लिए परिवार हे सर्वोपरि हो, खुद से भी ज्यादा.' अपने मैं में बुदबुदाती हुई वो उठ कर भीतर वाले हिस्से की और चल दी. प्रियंका और तारा ने रसोई में बर्तन संभल रखे थे और रुपाली चूल्हा साफ़ करने में जुटी थी. अब इस घर में लड़कियों ने हे बिना किसी के कहे सब संभाल लिया था जिसको देख कर कौशल्या जी के चेहरे पर अलग सा सुख दिखा.

"तू कभी तोह मुझे सबसे समझदार लगती है और कभी अर्जुन से भी छोटी. अब तेरा मुँह क्यों पहला है?", ऋतू अपनी माँ के हे कमरे में कुर्सी पर बैठी थी जैसे वो उनसे नाराज हो और अपनी सास को देख कर ललिता जी के साथ कृष्णा जी उठने लगी तोह उन्होंने उन्हें वही बैठे रहने का इशारा देते हुए ऋतू की बगल वाली कुर्सी हे ग्रहण की.

"यही मैं बोल रही थी माँ जी और इसको तोह गुस्सा भी हर घडी आता है बस टोकना नहीं. अभी इतने नए कपडे लिए है लेकिन इसके पापा को पता था की ये कल जा रही है तोह वो इसको मार्किट नहीं लेके गए. पढ़ने का बोल दो तोह सुबह से अभी तक ये अपने टाइम टेबल से 3 घंटे काम पढ़ी है आज लेकिन पहले से 2 अलमारी भाई कपडे काम लगते है इसको.", रेखा जी ने तोह स्पष्ट हे ऋतू की क्लास लगा दी थी और उसको बचने यहाँ न अलका आयी न कोमल.

"चल तैयार हो जा और तारा को भी बोल दे के वो कपडे बदल ले. अब घर से बहार जायेगी तोह शादी ब्याह के लहंगे पहन के जायेगी भला? और शंकर का अपना कॉलेज न ख़तम होने को आ रहा तोह वो क्या ध्यान रखेगा. तुम तीनो भी चलो साथ बाकी लड़कियां देख लेंगी घर.", यहाँ ऋतू तोह अपनी दादी के गले जा लगी थी क्योंकि उसकी हर इत्छा वही पूरी करती थी अगर पापा से रह जाए तोह.

"मैंने भैंस के पत्थर मारा क्या दादी जो सिर्फ ये महारानी जायेगी? मैं तोह जरूर जाउंगी और कपडे मुझे भी लेने है क्योंकि वह मैं और अलका भी जा रहे है इसके साथ.", आरती कमर पर दोनों हाथ रखे, नजरो का चस्मा लगाए ठीक ऋतू वाले लहजे में थी जिसको बोलता देख कर कौशल्या जी ने अपने पास बुला कर दूसरी तरफ से साथ लगा लिया.

"तू इस से अलग है क्या बस तू बोलती नहीं और ये हक़ लेके रहती है. अब ऐसे पाजामे में हे चलेगी या ढंग का कुछ पहनेगी?", ऋतू ने आरती को आँख मार के जैसे मोहर लगा दी थी की उनका प्लान काम कर गया.

"देखो दादी बात ऐसी है की माँ तोह जाने नहीं वाली और उनके साथ बड़ी माँ भी नहीं लेकिन ताई जी को साथ लेके चलेंगे. इनके साथ मजा आता है जब ये हंसी मजाक करती है. वैसे मैं ऋतू को यही बोलने आयी थी की अलका ने इसके और मेरे कपडे प्रेस कर दिए है मार्किट चलने के लिए. अब आप भी अपना बड़े वाला बटुआ उठा लो नहीं तोह मैं दादा जी से पूछ लेती हु की उनकी पेंशन कहा पड़ी है.", कौशल्या जी ने सब सुन्न कर अपने सर पे हाथ रख लिया था.

"मैं तोह समझू थी की ये हे एक आफत है पर पता न था के खरबूजे के साथ दूसरा खरबूजा भी रंग बदल चूका. तेरे मुँह में जुबान कब निकली बस ये बता दे बेटी?", अब कृष्णा जी के साथ ललिता जी भी हंस रही थी और आरती शर्माती हुई हंसने लगी.

"ये मोटी बहोत छंतो है दादी आपको नहीं पता. नानी को कह के भेजा है की उधर से सिर्फ वही आएँगी, उनकी कोई पौती या बहु साथ न आये. और रुपाली बोली की वो तोह गाँव जायेगी आपके साथ तोह इसने उसको भी ताका सा जवाब दे दिया के अब दादी अगले 2 महीने कही न जाने वाली. ऊपर से तारा ने भी उसको परेशां कर दिया ये बोल कर की देख ये तीनो तोह भाग रही है, अब सारा काम उसको और रुपाली को हे करना पड़ेगा. बताओ भला कोमल दीदी और प्रियंका दीदी से ज्यादा कोई काम करता है? ऊपर से ताई जी और चची वैसे भी ज्यादा काम नहीं करने देती लेकिन ये मोटी बाज नहीं आती. अभी पापा की जेब से 8 हजार लिए है इसने, हाँ.", ऋतू ने सब खोल कर रख दिया था और आरती उसके सर पे चपत लगाती बहार दौड़ गयी तैयार होने.

"हाहाहा.. तुम्हे न सचमुच किसी बहार की सहेली की जरुरत हे नहीं है और मुझे बड़ा सुख मिलता है बीटा ये सब देख कर. घडी के कांटो को सीखना नहीं पड़ता की किसको कैसे चलना है लेकिन वो साथ जुड़े रहते है चाहे देखने वाला उन्हें सेकंड, मिनट या घंटे और लम्बाई के हिसाब से देखे. रेखा, थोड़ा सख्ती काम रखियो बचो पर वह. इम्तिहान कोई कुम्भ का मेला नहीं जो 8 बरस में एक बार आते है. जब कही घूमने निकलो तोह फ़िक्र को वही छोड़ जाओ जहा से चले थे. मेरी बची को मैं ाचे से जानती हु जो अपने सपनो के लिए किसी से बेहतर म्हणत करती है क्योंकि वो इसके है. चल ललिता, तेरे हंसी मजाक हे सुनते है आज. अपनी माओं से तोह ये इसलिए बच रही की ये वह toka-taaki करेंगी लेकिन तू इन्हे और सुझाव देगी जो पसंद है. तू भी अपने लिए कपडे देख लियो और बेटी दामाद के लिए भी. वैसे भी नगद लेके आये है फसल का तोह पहले लक्ष्मी अपनी देवियों पर हे भेंट करते है.", कौशल्या जी उठने लगी तोह ऋतू ने उन्हें वही रहने का कहा.

"देखो दादी आप यहाँ से उठी तोह मेरी खैर नहीं. मैं तैयार हो जाऊ फिर आपको आवाज दूंगी. माँ को बोल दो की ये सब आप अपनी तरफ से दिलवा रही हो.", ऋतू को जैसे अभी भी माँ की चिंता थी.

"वो कुछ न कह रही और तू मजे लेना बंद कर अब. तेरे आलू को बता दिया क्या तुम लोग हफ्ते भर छूती पर जा रहे हो?"

"मेरे से पहले तोह बौ जी ने हे बता दिया उसको और वो लड़ रहा था सौतेले की तरह. हम उसको कभी साथ नहीं लेके जाते.. फलाना ढिमका. क्या सड़ियल सी औलाद है न माँ की दादी? वैसे वो वही ठीक है उधर गाँव देहात में."

"ज्यादा न बोल फिर तेरा हे जी सबसे पहले घटने लगता जब आधा दिन भी उस से बात न हो. तेरे बाउजी ने बस ये बताया के वो जगह कितनी सुन्दर है और वो उसके साथ कभी उधर जाएंगे समय मिलते हे. उधर फ़ोन हैं न रेखा?"

"जी माँ जी फ़ोन है लेकिन ये नहीं पता के वो खराब मौसम में काम करता है या नहीं और शायद उस पर एसटीडी की सुविधा नहीं है. वैसे भी ये वह सुकून से पढ़ने जा रही है.", रेखा जी के शायद पर कौशल्या जी भी मुस्कुरा उठी जैसी माँ अपनी बेटी से शरारत करने को तैयार थी वह. कुछ ऐसी हे आपसी बातों के दरमियान कौशल्या जी भी मार्किट के लिए निकल चली अपनी पोतियों और नाती को लिए जिनके साथ ललिता जी भी थी.

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"कौन है भाई और लगातार दरवाजा पीटने से क्या ये अपने आप खुल जाएगा?", अर्जुन ट्रैक पजामा और टीशर्ट पहने khel-ghar जाने की जगह दीपा भाभी के द्वार आ खड़ा हुआ था. अभी थोड़ी देर पहले हे उसने संजीदा का कमरा दुरुस्त करवाया था सामान आने पर. रौशनी बुआ का भी कुछ सामान इधर आ गया था और अंजलि ने अलग रहने की जगह आँचल के कमरे में हे अपने कपडे और सामान रखा था जिस से वो भी अकेला महसूस न करे. थोड़ी मीठी हलकी फुलकी अठखेलियां अनामिका चची के साथ दोपहर में करके अर्जुन ने आराम भी किया था उन्हें साथ लगाए और अब लगातार दीपा भाभी का दरवाजा पीटने पर जब वो खुला तोह दोनों मुस्कुरा उठे. मलमल का दुपट्टा सीने पर लिए सफ़ेद सलवार कमीज में भीगे हाथ कड़ी दीपा भाभी को भी जैसे इसकी उम्मीद न थी.

"भाभी, आज तोह शाम हुई नहीं और दरवाजा बंद कर रखा है आपने. गाँव के लोग यही है कही और नहीं गए."

"अंदर आ जाओ पहले.", अर्जुन भीतर आया तोह ब्याह हलकी सी उन उभरे हुए खरबूजों को स्पर्श करती निकली. भाभी ने वो दोनों किवाड़ फिर से सांकल से बंद कर दिए थे. और इसका जवाब भी अर्जुन को सामने दिख गया जहा नल के निचे लोहे का बड़ा टब पानी का भरा था और तार पर तजा धूलि 2 चादर डाली थी.

"इस समय कपडे धो रही थी आप?"

"अभी शुरू हे किये थे धोने, दिन में तोह कोकि बहिन जी की तरफ जाना पड़ा और सवेरे तोह तुम्हारे सामने हे थी मैं उधर. 2 दिन से कपडे नहीं धुले थे और अभी मौसम में धुप काम हुई तोह सोचा खली बैठे ये भी निबटा लू. क्या लोगे?", दीपा भाभी ने अब वो दुपट्टा उतार कर एक तरफ दिवार में लगी लकड़ी की खूँटी पर टांग दिया था. घुटनो तक भीगी उनकी चुस्त सालार लगभग पारदर्शी हो चली थी और पुराणी होने की वजह से वो चुस्त कुर्ती जितनी सीने पर कासी थी उस से अधिक उनके गदराये मॉटे कूल्हों पर. ये बड़ी ख़ास बात थी उनके कूल्हों की जो चौड़ाई में उतने फैले हुए न थे जितना भरा हुआ उनका जिस्म था लेकिन बहार की तरफ उनका उभार गदराये शब्द को भी फीका करता था. अगर उनका सीना 40 था तोह वो कैसे हुए gosht-bhare कूल्हे भी 40 से कही काम न थे.

"घर से 50 कदम तोह आया हु भाभी. वैसे दरवाजा तोह आप कभी बंद नहीं करती फिर क्या सिर्फ कपडे धोने की वजह से ऐसा किया?", अर्जुन उनके सामने हे उस घने वृक्ष के निचे बने चबूतरे पर आ बैठा जहा से दीपा भाभी 5 कदम दूर कपडे खंगाल रही थी. उनकी सुडोल बाहें आपस में जुड़ती तोह जैसे अर्जुन को अपने सवाल का जवाब दे गयी. वो भारी उरोज आपस में सत् कर चूचक की शुरुआत से पहले तक बहार झलक रहे थे. शायद ये वस्त्र उस समय के थे जब भाभी का शरीर इतना भरा हुआ न होगा. एक बार दोनों की नजरे मिली तोह भाभी शर्माती हुई सीढ़ी हो कर एक तरफ को चल दी. वापिस लौटी तोह हाथ में नील की डिबिया थी जिसमे से वो नीला पाउडर हथेली में लेती वो उस बड़े टब में हाथ को घूमते हुए घोलने लगी. अब वो घुटनो के बल थी जिस से उनके असाधारण कूल्हों का भयंकर कटाव अर्जुन पर ज्यादा जुल्म ढाने लगा.

"वैसे तोह घर के भीतर कोई आता नहीं है लेकिन दरवाजा खुला हो तोह नीला या कोई पहचान का पहले आँगन में आएगा फिर आवाज देगा. तोह आज तुम्हारी बड़ी चर्चा हो रही थी वह भी और जसलीन के घर पे भी.", भाभी ने एक तरफ रखे सफ़ेद मैले वस्त्रो को इस पानी में भिगोते हुए गीले हाथ से हे गर्दन पर आयी पसीने के हलकी बूंदो को साफ़ करने की कोशिश की तोह अब अधिक पानी की वजह से उन्होंने ये कोशिश भी त्याग दी. हर बार कुछ पानी उनके सीने पर गिरता जब जब वो टब पर झुकती हुई कपड़ो को आपस में रगड़ती. जैसे वो भरी भरकम खरबूजे उस गोलाकार टब के किनारो पर टिकना चाहते हो.

"अब ऐसा मैंने क्या कर दिया भाभी जो चर्चा दोनों तरफ हो रही थी? भाषण इतना बुरा था क्या मेरा?", अर्जुन की नजरो में बढ़ती चाहत भाभी से छुपी न रह सकीय जो उनके दबते उठते मॉटे स्टैनो की बंद दरार के बीच उस पानी की लकीर को जाता देख रहा था. जिस्म पर बहती लकीर को हटाने के लिए अनजाने हे भाभी ने फिर से भीगा हाथ स्टैनो के उठान पर फिराया तोह अब वो हिस्सा ज्यादा चमकने लगा था. उनका शरीर भी जैसे अर्जुन की नजरो की तपिश महसूस करता उसकी सुन्न ने लगा. बाए उभार पर पानी की कुछ बूंदे ठीक उस निप्पल पर गिरी जो बादामी रंग का और थोड़ा अकड़ा दिख रहा था.

"भाषण की चर्चा तोह बड़े बूढ़े ज्यादा कर रहे थे लेकिन औरते और लड़कियां तोह तुम्हारी जोड़ी राजकुमारी से बना कर देखने लगी थी. कुछ का कहना था के इसमें कोई बड़ी बात नहीं जब वो दरगाह पर आ सकती है तोह ऐसी जगह तोह आना ज्यादा बनता है जहा लड़कियों की बात हो. लेकिन पार्ले पिंड की कई लड़कियां कह रही थी की राजकुमारी तुम पर फ़िदा है और जरूर कोई खिचड़ी पक्क रही है. उनको हवा चढ़ा दी सफीना ने, जिसने बोल दिया की अर्जुन क्या किसी राजकुमार से काम है और वो अपनी मोटरसाइकिल गाँव की किसी भी लड़की या औरत के सामने कर दे तोह उसके कहने से पहले बैठ जाएंगी. हाहाहा.. तुम नहीं जानते जवान लड़कियां और औरते क्या क्या बातें करती है?", अब अर्जुन मुस्कुराता हुआ अपनी जगह से उठ कर खुश दुरी पर रखा तजा हरा चारा छाज में भर कर रनो के ठान में उलटने लगा जो भूखी थी लेकिन दीपा भाभी जैसे वो काम बीच में भूल गयी थी.

"किसी ने ये न कहा के राजकुमारी मुझसे दुगनी उम्र की है?", दीपा भाभी ये सुन्न कर तोह अपने मुँह पर हाथ रखती हैरानी से देखने लगी. उन्हें ये तोह पसंद आया की अर्जुन ने उनकी लाड़ली को चारा डाला पर उम्र वाली बात जैसे उन्हें भी पता न थी. अब वो हाथ धोने उनके टब के ऊपर चलते नल की तरफ आया तोह भाभी अपनी हथेली धार के निचे करती उसके हाथो तक पानी पहुंचने लगी.

"वो सचमुच इतनी उम्र की है या तुम मुझे बना रहे हो? रेनम भी साल 6 महीने बड़ी दिखती है उनके सामने तोह? वैसे किसी ने भी गलत न कहा था पर जसलीन की हालत देखने वाली थी जब यही बात उसकी बेबे ने उसके सामने कही... बदमाश कही के..", अर्जुन ने अंजुली में भरा साफ़ पानी उनके चेहरे की तरफ उछाला था जिसका अधिकतर भाग भाभी की ठुड्डी और गर्दन के साथ सीने को भिगो गया. वो हंसती हुई अपने चेहरे को ढकने लगी थी लेकिन अर्जुन आगे कुछ न करता बस उनके सामने बैठा अब कपड़ो में हाथ घूमने लगा.

"तुम बहोत ज्यादा शरारती हो और अब ये क्या पानी से खेलने लगे?"

"तोह क्या कहा जसलीन की मम्मी ने फिर?", नील लगने के बाद भाभी टब को खिसकने लगी तोह जैसे वो थोड़ा मुश्किल था उनके लिए सवा 100-डेढ़ 100 लीटर पानी और वो लोहे का टब. अर्जुन ने हे उसको ऐसे बैठे हुए सरका दिया और खली बाल्टी नल के निचे लगा कर एक कपडा हल्का निचोड़ कर उस साफ़ पानी में भिगो दिया. दीपा भाभी बस उसको टुकुर टुकुर देख रही थी. अर्जुन की ताक़त का उन्हें भली भाँती संज्ञान था और अब उनकी कल्पना में जैसे टब की जगह वो खुद थी.

"कहा खो गयी आप?"

"ाररी.. होली गए 2 महीने से ऊपर हो चले. वो बोल रही थी की अर्जुन की जोड़ी वैसे भी किसी और के साथ नहीं जमने वाली. जसलीन ने थोड़ा तल्खी से कह दिया की क्या वो उस राजकुमारी से काम दिखती है. फिर क्या था खूब टांग खिंचाई हुई उसकी और जग्गी ने तोह इतना परेशां किया न के बेचारी अपने कमरे में हे बंद हो गयी. वैसे ये मेरा काम है तोह मुझे करने दो.", भाभी अर्जुन को कपडा खंगालते देख खुद भी दोनों हाथ बाल्टी में डाले जैसे उसको रोकने लगी थी पर कुछ पल दोनों की उंगलिया आपस में उलझी और फिर मिल कर उस वस्त्र को एक एक सिरे से निचोड़ने लगे. इस दौरान जिस तरह वो दोनों एक दूसरे को देखते, बिना कहे हे बहोत कुछ चल रहा था.

"वैसे मैंने आपके साथ होली नहीं खेली और अब तोह 9 महीने बाद हे आने वाली है.", अर्जुन ने टब में भिगोये बाकी 3-4 वस्त्र भी साफ़ पानी में डुबोते हुए ये खेलने वाली बात इस अंदाज में कही थी की भाभी थोड़ा पीछे खिसकने लगी जिनके दोनों हाथ अब कलाई से अर्जुन की गिरफ्त में थे. अब वो भी जैसे जोर लगाने की जगह उसके हाथो को थामे पानी के बाल्टी में डुबोने लगी थी. वो वक़्त भी आ पंहुचा जब दोनों घुटनो के भार बाल्टी के गिर्द बैठे थे और दरमियान बस उतना हे फांसला जितनी चौड़ी बाल्टी. नल की शीतल धरा की परवाह न करते हुए अर्जुन ने भाभी के भी आगे बढ़ते चेहरे को ठीक पानी के निचे अपने होंठो से छू लिया. हलके से होंठो का उस जलधारा के बीच मिलना उन्हें भी भिगोने लगा जिस से बेपरवाह वो एक दूजे के सामने बैठे पानी मिश्रित लबों का रस adaan-pradaan करने लगे. बाल्टी ऊपर तक भर कर पानी निचे उड़ेलने लगी तोह पहले भाभी अलग हुई.

"तुम्हे इन्ही कपड़ो में घर भी जाना है और काम के वक़्त बहकना ाची बात नहीं.", वो नजरे चुरा रही थी जबकि अर्जुन ने अकेले हे वो तीन कपडे निचोड़ने के बाद झिड़क कर तार पर फैला दिए थे. दीपा भाभी बस उसके मजबूत लम्बे चौड़े जिस्म और भीगे चेहरे को निहार रही थी जबकि उनकी हालत ज्यादा कामुक थी वो पूरा कमीज सीने तक भीग कर पारदर्शी होने पर. अपने खयालो से वो जबतक बहार आती अर्जुन उन्हें उठा कर उस नील मिले पानी में बैठा चूका था. वो तोह बस उसकी मर्दानगी से हे सम्मोहित थी लेकिन जिस्म कमर तक भीगने पर वो होश में आयी तोह आँखे तुरंत बंद हो चली. उनकी पीठ को गिरफ्त में लिए अर्जुन पूरी तन्मयता से उनके भरे भरे होंठो को पीने में जूता था. बहोत सारा पानी बहार छलका था उनके भीतर बैठने पर लेकिन इन्हे तोह न उसकी परवाह थी न राणो की जो चारा खाती हुई अपने करीब तक बेहटा आया पानी देख कर इसके स्त्रोत को घूरने लगी थी. दीपा भाभी पीछे मुड़ती उस टब के किनारे जा सटी और उनके ऊपर छाया अर्जुन बहार घुटने टेके हुए भी उनकी भारी छातियों पर सीना दबाये बस उनके होंठो का रसपान करता रहा.

"ओह्ह्ह.. इतने बेसब्री क्यों हो रहे हो? देखो मेरी क्या हालत कर दी है तुमने.", भाभी तोह अब स्टैनो के उठान की निचली तरफ से पाँव के पोरो तक भीगी थी और जिस्म जैसे कपडे से भी बेपर्दा.

"सुबह साथ नहीं नाहा सका न आपके और फिर होली याद करवा दी आपने. मैं बिस्टेर से बहार आपको खुली रौशनी में प्यार करना चाहता हु भाभी."

"पिछले दरवाजे पर टाला लगा है आज सुबह से. पूरा घर तुम्हारा है.", उनका इतना हे कहना था की अर्जुन सीधा खड़ा होता अपनी टीशर्ट उतार कर तार पे डालता हुआ भाभी का हाथ थाम कर उन्हें अपने साथ लिए उस वृक्ष के निचे बने चबूतरे की तरफ चला आया. दीपा भाभी के मांसल जिस्म का हर कटाव और उभार एक एक कदम पर नुमाया हो रहे थे. वो खुद को अर्जुन के हवाले कर चुकी थी और आज जैसे जो ख्वाहिश अर्जुन की थी वही उनकी.

"फाड़ने का इरादा है?", उनके भीगे कमीज को दोनों सीरो से पकड़ कर जिस तरह अर्जुन ने ऊपर खिंचा वो मॉटे स्टैनो पर अटका और फिर फिसलते हुए सर से बहार निकला तोह सपाट भरा हुआ गीला पेट, पानी की बूँद लिए वो गहरी गोल नाभि और उस से पौने गीत ऊपर कंपकंपाते हुए मांस से लबरेज दो बेजोड़ गोलाकार बड़े बड़े पुष्ट चुके जिनके निप्पल कड़क हो कर जैसे सिधाई में देख रहे हो. दीपा भाभी ने अपनी हथेली और ब्याह से उन्हें छुआपने की नाकाम कोशिश करि लेकिन अर्जुन तोह अपना पजामा निकाल कर फिर से घुटनो पे बैठा उनके कूल्हों को जकड़े उस पानी की बूँद को चूसने लगा था जो उनकी गोरी गोल नाभि में खुद को मेहफूफ समझ रही थी. ये अकल्पनीय एहसास था उनके लिए. जिस्म के ये kendra-bindu भी ऐसी तरंगे पैदा कर सकता है ये जैसे दीपा भाभी को आज मालूम चला था. स्टैनो से हट कर वो हाथ दूसरे वाले के साथ अब अर्जुन के सर को अपने पेट पर दबाने लगे. पाँव कांपने लगे थे लेकिन जिस मजबूती से अर्जुन उनके नरम कूल्हों को अपनी तरफ दबाये था वो जैसे एक जरुरी सहारा था उन्हें खड़ा रखने में. होंठ फिसलते हुए सलवार के नाड़े तक आये तोह दांतो से उसको खिंच अर्जुन ने बदन से चिपकी वो पारदर्शी सलवार भी निचे गिरा दी. खिसकते हुए समय लगा उन मांसल जांघो से पर पानी का बोझ यहाँ गुरुत्वाकर्षण का नियम समझा रहा था. समतल चिकने पेडू से निचे भीतर को धंसता हिस्सा आज baal-viheen और चिकना था. अब हाथ कूल्हों से फिसल कर मोती जांघो को पीछे से जकड़े एक जगह रोके हुए थे.

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"ये आपने मेरे लिए? कितनी खूबसूरत हो आप यहाँ से भी.", दीपा भाभी तोह कुछ न बोलते हुए बस आँखे मूंदे अर्जुन के सहारे हे निर्वस्त्र कड़ी थी. उनकी जाँघे फैलने पर भी अधिक मांसलता से आपस में चिपकी हे जान पड़ती थी जिनके जोड़ के बीच वो चिकने मॉटे मॉटे होंठ आपस में मिले बस एक गुलाबी सा चीरा दर्शा रहे थे. एक हाथ की ऊँगली से इस हिस्से को सहलाते हुए अर्जुन ने इस तजा चिकनी की हुई फांको को पृथक किया तोह उनके बीच जमा शहद रुपी कॉमर्स देख खुद को रोक न सका. ऊँगली और अंगूठे से उस चीरे को फैलता हुआ वो अपने होंठो को दीपा भाभी की योनि की दरार से चिपकता हुआ जीभ के नुकीले भाग से ऐसे खुरचने लगा था की दीपा भाभी ने खुद हे अपने पाँव फैला दिए. वो इस खुले आँगन में उन्मुक्त निर्वस्त्र कड़ी अपनी योनि पर अर्जुन के होंठो का जादू महसूस करके कतरो कतरो में झड़ने लगी. जिस्म ने एक और झटका खाया जब अर्जुन की जिव्हा सरकती हुई भगनासे से भिड़ने लगी. उसके हाथो की उंगलिया भारी कूल्हों के बीच उस 2-3 इनके गहरी दरार को फैलते हुए गुदाद्वार को कुरेद कर दोहरा असर दिखने लगे. जब दीपा भाभी का जिस्म लगभग गिरने को हुआ तोह अर्जुन ने उन्हें चबूतरे पर बिछी गीली चादर पर हे लिटा दिया. कच्ची जमीन पर दोनों पाँव टिकाये घुटनो से ऊपर तक वो चित्त लेती थी और ऐसे में भी उनके वो बड़े बड़े उरोज जरा से भी बेडोल न हुए.

"मुझे ये देखना है.", उनकी कांपती हुई आवाज और नशे में भरी आँखों को अपने अभी निर्वस्त्र हुए लिंग पर जमी देख अर्जुन निक्कर को एक तरफ रखता हुआ पहले जहा उनकी टांगो के बीच जाने वाला था, अब वो उन्हें उठने के लिए हाथ देता अपने झूलते मूसल को उनके चेहरे के सामने किये थे. उखड़ी साँसों और थिरकते चुचो के साथ दीपा भाभी ने इस शाम के पहले चरण की रौशनी में उस भयंकर अकार के लिंग को हाथ से सहलाया तोह उनके स्पर्श से जैसे वो मोटा बांस सा लिंग थिरक उठा. एक और प्रयास से उन्होंने सुपडे से अर्जुन के पेडू तक उसके असाधारण से अकार को सहलाया तोह वो उसकी चिकनाहट से अभिभूत होती हुई मुट्ठी में पकड़ कर उसकी गर्मी और मोटाई परखने लगी.

"उफ़.. तुम सचमुच घोड़े हो अर्जुन और ये इतना मोटा जो पकड़ में भी नहीं आ रहा मेरे अंदर था कल? तुम मुझे वह से खूबसूरत बता रहे थे लेकिन इसका आकर्षण बहोत ज्यादा है. तुम्हे दर्द तोह नहीं हो रहा?", हलके हाथो से वो उसके सुपडे को पूरा उजागर करती हुई उसके गुलाबीपन पर फ़िदा हो चुकी थी. अर्जुन भी उनके कोमल हाथो के असर से उत्तेजना में भर उठा था.

"सबका ऐसा हे होता है भाभी."

"न.. जो मैंने देखा था वो न इतना मजबूत और बड़ा था और न हे इतना साफ़ सुथरा. उसमे दुर्गन्ध थी बेढंगा होने के साथ लेकिन ये असाधारण है. बस तुम किसी दुबली पतली लड़की से एकसार नहीं हो सकते. वो झेल नहीं पाएगी, जसलीन का शरीर मजबूत और लम्बा है. मैं तोह कल रात भी इसकी याद में बेचैन रही, सपना देखने लगती थी की क्या पता गेट फांद कर तुम फिर आ दबोचो मुझे और सूरज उगने तक अलग न हो. उम्म्म", अब दीपा भाभी ने भी लाज एक तरफ रखते हुए पहले उस मुँह के फैलाव की क्षमता तक मोठे सुपडे को चूमा और फिर जीभ से उसकी तलहटी से लेकर सूक्ष्म छेड़ तक सहलाया. उनके बड़ी बड़ी ऑंखें वही केंद्र्ति थी और इस हरकत से अर्जुन सीत्कार किये बिना न रह सका. वो भाही के निर्वस्त्र कंधो को दोनों हाथ से पकडे उन्हें खेलने दे रहा था मनचाहे अंग से. मुँह में जमा लार उस सुपडे पर उड़ेल कर एक बार फिर उन्होंने उसको होंठो से चूमा और उन्हें पूरा खोलती वो उस गरम खालविहीन हिस्से को अपने मुँह में समां गयी. लिंग की मोटाई इतनी अधिक थी की होंठो के खिंचाव से हे अर्जुन को योनि जैसा एहसास मिलने लगा. जड़ से उस मूसल को थामे दीपा भाभी ने नथुने से साँसे भरते हुए चेहरा और आगे किया तोह एक तिहाई लिंग हे उनके कंठ से टकराता रुक गया. वो अपनी सीमा जान चुकी थी और अब वो उतने हे हिस्से को मुँह के अंदर बहार करने लगी जैसे उन्होंने ऐसा करने का purv-abhyaas किया हो. अर्जुन को ये सुख ज्यादातर माधुरी दीदी, अलका और ऋतू से हे मिला था. कभी कभी उसकी प्यारी ताई जी भी उसके लिंग को ऐसे हे चिकना करती थी भीतर लेने से पहले.

"आह्हः.. आप तोह.. उम्म्म.. आप तोह कल मन कर रही थी की इसको मुँह में लेना तोह दूर और कही भी नहीं लेंगी.. आपने ये कब सीख लिया भाभी? आठ.. ", बस इतने में हे दीपा भाभी की सांसें जवाब दे गयी जो मुट्ठी में पकडे हुए हे जब सुपडे से अलग हुई तोह थोड़ी निराश लग रही थी.

"सॉरी. ये बहोत मोटा है और लगता नहीं की मैं इसको पूरा ले भी सकुंगी.", अर्जुन उनकी बार सुन्न कर उन्हें वापिस गीली चादर पर लिटाते हुए एक बार फिर से उनकी मोटी फांको को चूसने के बाद एक मांसल जानत ऊपर उठता हुआ अपने लिंग को पनियाई छूट की फांको के बीच दबा कर धीरे धीरे निचे झुकता गया.

"आपने जो किया वही बहोत है भाभी. ये बताता है की आप भी अपना प्रेम दिखने में मुझसे पीछे नहीं. अह्ह्ह्ह.. इतनी गरम हो आप."

"उम्म्म.. आराम से अर्जुन.. आह्ह्ह्ह.. तुम्हारा झेलने में मुझे हफ्ते लगेंगे.. उईईईईई..", अभी बस उसका मोटा सूपड़ा हे दीपा भाभी की योनि को फैलता हुआ अंदर दाखिल हुआ था लेकिन अर्जुन द्वारा जांघ को उठाने से योनि ज्यादा फ़ैल कर उतना हिस्सा भीतर समां कर जैसे दम भरने लगी थी. बहोत हे कामुक दृश्य था वो जहा ये दो बेजोड़ जिस्म पूर्णतया निर्वस्त्र और खुले आसमान में इस वृक्ष के साये टेल दीपा भाभी का इस तरह अर्जुन से संसर्ग करना. दूसरे हाथ ने निप्पल को मसलते हुए उमेठा तोह भाभी ने जोरदार सिसकारी भरी और ठीक उसी पल अर्जुन ने अगले धक्के में उनकी कासी हुई और सिर्फ कल हे इस मूसल से चूड़ी योनि को बुरी तरह फैलते हुए आधा लिंग अंदर उतार दिया. वो चीखती उस से पहले हे वो उनके होंठो को कब्जाए ये तीसरा धक्का लगता हुआ अपने अंडकोष तक भाभी के कूल्हों की दरार से भिड़ा चूका था. सही मायने में आज भाभी ने उसके लिंग को अपने गर्भ पर दबाव बनाते महसूस किया. वो तड़प उठी थी लेकिन अर्जुन द्वारा उनके होंठ चूसना और सतांन को मसलना उस दर्द में एक ख़ास एहसास देने लगे. कुछ पल दोनों बस स्थिर रहे और फिर अर्जुन ने कमर बहार खींचने के साथ आधा मूसल बहार निकला तोह वो अब कॉमर्स में सना दमक रहा था. छूट की लाल फांके उसके संग लिपटी बहार आयी और फिर से भीतर समां गयी. ये करारे धक्के और इतना मजबूत आलिंगन जैसे दीपा भाभी से सेहन न हुआ. वो स्खलित होना चाहती थी लेकिन अर्जुन तुरंत उनके ऊपर से उठ खड़ा हुआ. दीपा भाभी अपनी योनि को सहलाती हुई आहें भरने लगी थी जहा अब फांको के बीच ज्यादा दुरी और साफ़ छिद्र सामने था.

"यहाँ निचे कड़ी हो जाओ न भाभी. पीठ छील जायेगी आपकी.", अर्जुन वृक्ष के निचे vriksh-aasan हे करने वाला था और दीपा भाभी दर्द के बावजूद उसकी सहायता से सीधी कड़ी हुई तोह उनका एक पाँव चबूतरे पर रखता वो अपने लिंग के लिए उनकी योनि को उभर चूका था. उनके मॉटे स्टैनो को अपनी छाती से चिपकते हुए उसने एक हाथ से अपना कामदण्ड उनकी छूट की उभरी फांको पर सत्ता कर मुड़े हुए घुटने सीधे कर दिए.

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"आह्ह्ह्ह माँ.. मार डाला निर्दयी.. उफ्फ्फ..", भाभी का मुख अब स्वतंत्र था लेकिन उनकी नरम छूट को बुरी तरह भेदता हुआ अर्जुन का लुंड फिर से उनके गर्भ से जा टकराया. उनके कूल्हों को मसलता हुआ वो अब खड़े हुए हे अपनी कमर एक ख़ास ताल में ऊपर निचे करता हुआ पूरे जोश से दीपा भाभी की जोरदार चुदाई करने लगा था. चौड़े सीने से दबते उनके चुके कल से हे कुछ ज्यादा उत्तेजित थी और आज तोह अर्जुन जैसे बिना रेहम किये उनका समूचा जिस्म हे मसलने लगा. हर झटके पर दीपा भाभी अपने पंजो पर उछाल जाती लेकिन लम्बाई काम होने पर ऐसा करती हुई वो खुद अर्जुन की मदद हे कर रही थी. छूट की फांके तरल से भीगी सरपट दौड़ते उस पौन फुट से बड़े लिंग की इतनी अभ्यस्त नहीं थी जिनमे एक चीज़ सी उठती और इस दौरान उनके पसीने और कॉमर्स से भीगे गुदाद्वार में अर्जुन की ऊँगली का पूरा समां गया. पीठ को जकड़ती हुई वो किसी बारिश सी झड़ने लगी थी और अर्जुन बदस्तर अभी भी उन्हें अपने लिंग की मोटाई का अभ्यस्त बनाने लगा.

"ओह्ह्ह्हह.. थोड़ा आराम से बाबा.. आईइइइइइइ.. उम्म्म्म.. कोई सुन्न लेगा आह्हः.. मुझे संभाल लो अर्जुन.", भाभी की पुकार को मान कर वो ऐसे हे लिंग फंसाये उनकी दोनों जाएंगे को उठता हुआ गॉड में लिए उस सीमेंट की बंद टंकी तक चला आया जिस पर धुप लगवाने के लिए गद्दा बिछा था. 3 फ़ीट ऊँचे उस अड्डे पर भाभी का धड़ टिकता हुआ वो उनके दोनों चुचो को मुठी में भर के मसलने लगा था. लिंग अब तक उनकी योनि में किसी nut-bolt सा कैसा. कामदेवी स्वरुप दीपा भाभी के अमृत कलश गोर से लाल हो चले थे और अब उनके तने चूचक मुँह में भरते हुए अर्जुन ने इस आसान में एक बार फिर से उनकी पनियाई छूट को भेदना शुरू कर दिया. दोनों जैसे दुनिया भुलाये बस एक दूसरे में विलीन थे और हर धक्के पर भाभी का सिसकना अर्जुन को जोश दिलाता रहा. तरल कॉमर्स अंडकोष तक बह कर निचे टपकने लगा. Thapp-thapp का स्वर घर के किसी भी कोने से सुना जा सकता था जिसके साथ दीपा भाभी का मजे से सितकरना और हर धक्के पर 'आह्हः' या 'अर्जुनंन' कहना. दिलबाग बदनसीब था जो अपनी इतनी खूबसूरत और कामुक बीवी को न पहचान सका और न खुश रख सका. अर्जुन ने अपने प्रेम से जैसे दीपा भाभी को एक नया जीवन दे दिया था जिसमे उन्हें जीवन के हर रंग मिलने लगे.

"बस करो.. आह्हः.. मुझे बाथरूम जाना है.. आह्ह्ह्हह्ह... अर्जुननननन.. रुक नहीं सकती अब मैं..", वो उठने लगी थी लेकिन उनकी दोनों जंघे अपने कंधो तक टिका कर अर्जुन तोह योनि के ख़ास हिस्से पर रगड़ देने लगा था जिसे अंग्रेजी में 'ग स्पॉट' कहा गया. कंधो पर टाँगे रखवाए वो भाभी के स्टैनो और गर्दन को चूमता चूसता अपनी नयी मोहर तबतक बनता रहा जब तक दीपा भाभी ने उसकी बाहों पर उँगलियाँ न गदा दी. आँखें बंद किये जैसे वो सचमुच हे mutra-tyaag करने लगी थी जबकि ये उनका ख़ास सखलन था उस ख़ास अंदाज से लिंग की मार करने पर. भलभला के झड़ना और साथ अर्जुन को भिगोना उनके लिए शर्मसार करने वाला पल था लेकिन घोड़े की तरह ऐंठता अर्जुन उनके स्तन का एक हिस्सा मुँह में कसता हुआ इस आखिरी धक्के में जड़ तक जा रुका. वो भी उतने हे वेग से अपना वीर्य उनके गर्भ में गरम पिचकारियों की तरफ फेंकने लगा था. दोनों का एक साथ खाली होना और ऐसी घनघोर चुदाई उन्हें कुछ पल तक निस्तेज करने के लिए बहोत थी. लिंग का भीतर फूलना और रास बहाना जैसे दर्द में दवा का काम कर गया. टंकी की अड्डे पर उसी मुद्रा में कुछ पल जुड़े रहने के बाद अर्जुन उनके सीने को chaat-ta हुआ गर्दन से गालो तक बढ़ चला. उसके मूसल में अभी तक पूर्ण तनाव था जिस पर दीपा भाभी हैरान थी लेकिन इस तरह अर्जुन द्वारा प्यार लूटना उन्हें असली prem-sukh से भर गया. उनकी जीब को अपने मुँह में भर कर चूसने का ये अध्भुत उपक्रम जिस्म में फिर से चींटिया दौड़ाने लगा. अर्जुन ने 5-6 बार कमर को हिला कर अपने हे वीर्य से लबरेज उस संकरी गुफा को भेदा तोह दीपा भाभी के जिस्म ने वो बचा खुचा कॉमर्स भी बहार उड़ेल दिया. दीपा भाभी को एहसास हुआ की अर्जुन की तर्जनी ऊँगली अत्यधिक चिकनाई लिए उनकी गुदा में गहराई तक उतर रही थी. एक बार फिर उनके मुँह से सिसकियाँ फूटी तोह उन्होंने अर्जुन को धकेलना चाहा.

"इंसान तोह नहीं हो तुम.. आठ.. छूट जलन करने लगी है मेरी और तुम पीछे की तैयारी कर रहे हो.. उम्मम्मम.. बस करो नहीं झेल सकती अभी.. चाहे रात को कर लेना या कल दिन में.. अभी तोह इतना झड़े हो मेरे andar...aahh", अर्जुन ने भी उस कासी हुई गुदा से ऊँगली बहार निकलने के साथ छूट को आराम देते हुए अपना अकड़ा हुआ लिंग बहार खिंच लिया. एक बार को तोह जैसे दीपा भाभी की छूट इस खालीपन से दांग रह गयी जैसे अब वो गुफा बन चुकी हो. सफ़ेद तरल एक धार में निचे टपकने लगा.

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"आपसे कहा मैं भरेगा भाभी.. मैं तोह ऐसे लगातार 3-4 बार कर सकता हु अगर आप साथ दो तोह. सचमुच आपकी छूट सूज कर ज्यादा मोती हो चुकी है. अगली बार इसको आराम देंगे.", उन्हें गॉड में ले कर चूमता हुआ वो वापिस उस टब की तरफ चला आया. बाल्टी खाली करके साफ़ पानी भरता वो टब में बैठी भाभी को निहार रहा था जिन्हे थोड़ा सुकून मिला उस ठन्डे पानी में बैठने से. चुचो का फुलाव भी कुछ बढ़ सा गया था अत्याधिक रगड़ाई से. बाल्टी से थोड़ा थोड़ा पानी उन पर गिरता वो शरीर साफ़ करने के साथ 2 उंगलिया छूट में दाखिल करता उधर भी अपने निशाँ मिटने लगा. भाभी को तोह ये हरकत भी सुखद लग रही थी और न चाहते हुए भी उन्होंने अर्जुन का चेहरा पकड़ कर होंठो से होंठ मिला दिए.

"पता है तुम अगर एक बार कहते फिर से करने को तोह मैं मन न करती. ये रोग लगा कर तुम तोह 20-25 दिन में चले जाओगे, फिर मैं क्या करुँगी?"

"आऊंगा न फिर सर्दियों की छुट्टियों में और फिर होली खेलने आपके साथ. वैसे आज तोह आपने होली ज्यादा खेली मेरे साथ. प्यार का एहसास बरक़रार रखना भाभी, आप कभी खुद को कमजोर नहीं पाओगी. आदत तोह मुझे भी आपकी है और याद भी आओगी लेकिन ये मिलना तब और भी खुशनुमा रहेगा जब कुछ अंतराल के बाद आप मुझे ऐसे हे आलिंगन में भर के प्यार लुटाओगी. इन्हे संभाल के रखना, मुझे बहोत पसंद है ये.", दोनों चुचो पर ठंडा पानी दाल कर उनकी लाली काम करता वो बड़े स्नेह से उन्हें सेहला रहा था. दीपा भाभी अब जैसे उसको अपना सर्वस्व मान चुकी थी जो उसकी बेशर्मी पर भी उसके साथ मुस्कुराई.

"तुमने आज सब मेरे अंदर हे खाली किया है और जानते हो ये समय खतरनाक चल रहा है महीने के हिसाब से. जिन्हे तुम संभल के रखने का कह रहे हो, कही ये और बढ़ गए तोह मुझसे घर की देहलीज पार न होगी. तुमसे जिस्मानी सुख तोह अभी मिला लेकिन आत्मा में तुम कही ज्यादा गहरे उतर चुके हो. अब ऐसे हे नंगी बिठाये रखोगे क्या मुझे? चलने की हिम्मत नहीं है मुझ में.", अर्जुन ने उनकी नाक से नाक सत्ता कर दोनों स्टैनो को हलके से मसला और फिर टोलिया ला कर उनके ऊपर जिस्म को ढकता हुआ उठा कर उनके कमरे में आ गया.

"मैं भी पानी दाल के आता हु तब तक आप खुद को पांच लो.", भाभी बिस्टेर के किनारे पर बैठी तोह छूट में हलकी से तीस हुई लेकिन ये मजेदार एहसास था. उनकी हालत देख वो हंसा तोह उसके सीने पर मुक्का मरती वो भी हंसने लगी.

"बहोत बुरे हो तुम. दर्द भी देते हो और ख़ुशी भी. नाहा लो फिर मैं दूध बनती हु."

"दूध तोह आपके अभी नहीं आता और दूसरा पी कर हे आप पर खर्च किया है. आया मैं अभी.", अर्जुन ने भी उनका निप्पल चुटकी से मसल दिया था बदले में और वो हंसती हुई पीछे पसर गयी. अगले 10 मिनट बाद दोनों एकबार फिर से बिस्टेर पर थे लेकिन अर्जुन पजामा पहने भाभी के निर्वस्त्र जिस्म को सहलाता हुआ उनसे बातें कर रहा था. बीच बीच में उनके छोटे चुम्बन और भाभी का उस पर पाँव रख कर लिपटना पर्याप्त था बताने के लिए की ये कक्ष उतना हे अर्जुन का हो चूका है जितना भाभी का था. जाने से पहले उनके जिस्म पर ढीला गाउन पहना कर वो उनके लिए चाय भी बना गया. भाभी इतने प्रेम भरे पालो के बाद चाय से थकान काम करके कुछ पल के लिए सपनो में जा चुकी थी. घर अभी भी वैसे हे बंद था जैसे पहले.

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शाम हलकी गहराने के साथ हे मौसम में अब हवा ठंडी होने लगी थी. उस पर इस खुले बगीचे से हिस्से में 2-3 सफ़ेद रौशनी वाले बल्ब अपना प्रकाश बढ़ने लगे जहा खुले पानी के बड़े टैंक के किनारे धारीदार निक्कर में भीगा बैठा विष्णु अपने पाँव के दबाव से एक ख़ास लाये में ऊपर आते इन्दर को वापिस पानी में दबा देता. जाने ये कैसी कसरत थी इन दोनों की लेकिन दोनों के हे जिस्म अधेड़ उम्र के बावजूद युवाओं से भी बेहतर तराशे हुए और मजबूत जान पड़ते थे. विष्णु की पिंडलियाँ पानी से बहार झांकती तोह उस पर पत्थर सी उभरी मछलियां साफ़ नजर आती. और नरिंदर जैसे एक स्प्रिंग की तरह लंबवत पानी में लेता उसके अनुसार हे कभी सतह पर आता तोह कभी वापिस गहराई में. दोनों बस बीच बीच में मुस्कुरा उठते. एक तरफ मद्दिम आंच पर पतीले में पकते मुर्गे की सोंधी महक हवा में फैलने लगी थी और इन्हे जैसे ज्ञात था के वो अभी थोड़ा और पकने वाला है. लेकिन अगले हे पल विष्णु का जिस्म छपाक की जोरदार आवाज करता उस 5 फ़ीट गहरा पानी में जा गिरा.

"क्यों बे झाँटु, आज तेरे कानो में मैल जमा है क्या जो आहात न सुनाई पड़ी. ओह तेरी की.. तोह ये चरखा तुझे झूला झूला रहा था.", ये शंकर था जो जूते बहोत पहले हे उतार कर शरारती बचे की तरह दबे पाँव इधर आया था. अभी वो हौद के किनारे खड़ा अंदर झाँक कर नरिंदर को देख रहा था की विष्णु दिवार से चिपका हुआ उसको बगल से खिंच कर पानी में पटकता हुआ दूर तैर गया.

"हाहाहा.. क्या पिद्दी और क्या पिद्दी का शोरबा. अबे अंडकोष की बड़ी गोली, तू न सुधरने वाला. साला मैं समझा वो पोलिसिअ कुत्ता मुर्गे की गंध से इधर आया होगा पर ये तोह लोमड़ निकला.. हाँ हैं ये भी थानेदार की फसल.. क्यों कच्चा साथ लाया है या आज भी नंगा बैठने में शर्म नहीं मानता?", शंकर संभल कर अपनी हालत देख रहा था क्योंकि उसका सफ़ेद कुरता पजामा अब किसी काम का न रहा था.

"बहनचोद.. काण्ड कर दिया बे तूने झांट के बाल. मेरी चैन गिर गयी लगता है और वो माँ ने दी थी.", अब विष्णु फुर्ती से डुबकी लगता उधर लपका जिधर शंकर को गिराया था. और यहाँ वो शंकर की चाल में फंसा जिसने उसको कमर से पकड़ कर पीछे उछाल दिया. ाची बात थी की ये पानी का टैंक कोई 25 फ़ीट लम्बा और 20 के लगभग चौड़ा था.

"हाहाहा.. तू सचमुच आज भी दिमाग से पैदल है बे.", शंकर उसको देखने करीब गया तोह विष्णु तुरंत उछाल कर उसके गले लगता साथ हे पानी में डूब गया. चाँद लम्हो में हे दोनों गर्दन तक पानी में डूबे एक दूसरे को कस के जकड़े थे.

"आज भी तेरी गोली बराबर मजबूत है लोंदे. साला ये डॉक्टर काम और पहलवान ज्यादा लगता है इन्दर. मैं तोह सोचा था कोई तकला, चस्मा लगाया हुआ खांसता सा इंसान होगा पर कविता मैडम की कसम ये नीरा सोना पड़ा है आज भी."

"कविता के नाम की मुट्ठ लगाईं क्या तूने कभी? तू तोह पहले से भी बढ़िया दीखता है बे विशि.. जरा देखने तोह दे ाचे से. क्या बात है, आज भी कोटे का खिलाडी हे दीखता है.. Hahaha..Chal तुझे किसी से मिलवाता हु.", विष्णु को साथ लिए वो दिवार तक आया तोह इन्दर ने हे दोनों को हाथ दे कर आराम से आने में मदद की. कमर पे टोलिया लपेट कर नरिंदर तोह भीतर से नंगा हे चलने लगा था पर विष्णु ने कच्चा उतार कर पजामा पहन लिया था जबकि शंकर को कोई परवाह हे न था. पेड़ो के झुरमुट से बहार निकले तोह 3 चारपये बिछी थी जहा दलीप, वालिए जी, राजकुमार जी और धर्मपाल जी जूते खोल कर बैठे थे जो इनके आते हे खड़े हो गए.

"ये तोह मोटा हो गया बे शंकर. दलीप भाई ध्यान है या पेट के साथ दिमाग भी मोटा हो गया. हाहाहा. पैरी पौने दार जी.. राजू भैया चरण स्पर्श. हमारे कृषि प्रमुख धर्मपाल जी... अहो भाग्य के आपसे मुलाकात हुई.", विष्णु ने दलीप से हाथ मिलाने के बाद बाकी तीनो के पाँव छुए थे जिन्होंने उसके भीगे होने के बावजूद दलीप की तरह हँसते हुए गले लगाया. इन्दर भी चारो से मिलने के बाद पीच्चे बने 2 कमरों के घर में घुस गया. वो शंकर के लिए धोती और टोलिया लिए वापिस लौटा और एक हाथ में कांच के 7-8 गिलास.

"अबे इसको सेहत कहते है चूसी हुई गुठली लेकिन yaad-dasht तेरी आज भी नारियल के तेल सी है. पता हे नहीं था के शंकर ये सरप्राइज देने वाला है और देखो वालिए जी ये तोह डुबकी भी मार आये. भाई आया है ये बता दिया होता तोह जश्न थोड़ा जोरदार रखते भाई.", दलीप विष्णु को साथ लिए हे खाट पर बैठ गया जबकि इतनी देर में शंकर ने कपडे उतार कर धोती लपेट ली थी, बिना शर्म किये. राजकुमार जी ने अपने छोटे भाई की मदद करते हुए उस लकड़ी की बड़ी मेज पर बर्फ का डब्बा, ठन्डे पानी का 15 लीटर वाला कनस्तर और सलाद रायता सजा दिया. वालिए जी विष्णु को देख कर उतने हे खुश थे जितने बाकी सभी.

"चलो फिर ऐसी सेहत मेरी भी बनवा देना और जश्न आज मेरी तरफ से ठीक वैसे हे भरवा मुर्गे वाला जैसा सबको पसंद था. दार जी आपके लिए तोह तीतर भी पकाया है. किस्मत बढ़िया थी की रस्ते में हे एक लड़का मिल गया जो तीतर और बटेर बेच रहा था. वैसे धरम भाई साहब, आपकी जरुरत पड़ेगी मुझे इस बगीचे और खेत को हरा भरा बनाने के लिए. अब मेरा ठिकाना यही है जो है.", विष्णु इन्दर को काम करता देख खुद हे परात और पतीला लिए उस तरफ चला गया जहा उसने मुर्गा चढ़ाया हुआ था और एक सलाख पर पूरा मुर्गा सिक रहा था. कपडे की मदद से मुर्गा परात में दाल कर विष्णु ने पल भर में हे उसको बखूबी काट कर ऐसे सजा दिया था जैसे वो 5 सितारा होटल का खानसामा हो. धुआं छोड़ता तजा मुर्गा देख बस उसकी महक से हे वालिए जी विष्णु के मुरीद हो चले थे.

"भाई ऐसा मुर्गा तू रोज खिलायेगा न तोह पल की जगह मैं तेरा खेत सजा दूंगा. हाहाहा.. यार लानत है के तुझसे बरसो बाद मिल भी अपने सेहर रहे है और सेवा भी तुझसे करवा रहे है.", वालिए जी ने एक छोटा सा टुकड़ा चखा तोह बस तारीफ उनके चेहरे पर आयी ख़ुशी ने हे कर दी.

"न न.. दार जी मैं कोई सेवा थोड़ी न कर रहा हु और अब सारा काम ये dhoti-dhari बामन करेगा जिसने कभी कॉलेज टाइम एक तिनका न तोडा. कूलर खिसका ले शंकर और पेग भी तू हे बनाएगा. वैसे इन्दर कह रहा था के शंकर का साला भी आने वाला है.", शंकर ने भी तुरंत एक तरफ स्टैंड पे खड़ा वो कूलर खिसका कर सही जगह करने के बाद चालू कर दिया. वैसे तोह उसकी आवश्यकता न थी लेकिन माखी मच्छर दूर रखने के हिसाब से वो सही था, लगभग be-awaaj.

"राजेश जरा मसरूफ था क्योंकि कल शंकर की सासु माँ और बीवी हिमाचल जा रहे है. वैसे वो करीब हे है और बगल वाले खेत मेरे है जहा पहले महफ़िल लगती रहती थी पर ाचा है के ठिकाना मिल गया. तेरे सारे पौधे कल हे 407 में भर के मैं पंहुचा दूंगा भाई और यहाँ 6 मजदूर भी रहते है गौशाला की तरफ तोह उनके साथ मेरे खेत वाले भी लगा देंगे. वैसे भी मैं आजकल आराम हे कर रहा हु. शंकर थोड़ा देख के डालियो भाई कही घर जाने लायक न राहु.", दलीप ने जब शंकर को एक हे बोतल में 7 पेग बना कर ख़तम करते देखा तोह माथे पर बल पड़ गए.

"4 बोतल है भाई अपने पास और बाकी गाडी में 2-3 मिल जानी अगर काम पड़ी तोह. आज वालिए जी और पल भाई भी घर से छुट्टी ले कर आये है. भाभी जी रिश्तेदारी में गयी है और मास्टरनी जी बचो के साथ पीहर. वैसे गज्जू को फ़ोन किया था मैंने इधर आने से पहले.", शंकर ने पहला जाम फुर्ती से बना दिया था और इतनी हे देरी में नरिंदर 2 प्लेट में तीतर दाल कर ले आया. राजकुमार जी भी अब धारीदार घुटनो तक के कच्चे में थे जिन्होंने कुछ प्याज चील कर पानी भरे भगोने में डुबो दिए.

"गज्जू न आता बे शंकर. पहले हे वो 15 दिन काम पे न गया और 2 दिन में उसने आधा काम भी न देखा होगा. वैसे पल भाई गुड़िया की शादी की तारिख क्या निकली?", नरिंदर ने जो कहा था वो उचित था और शंकर ने भी सबकी तरफ वो ठन्डे जाम सरका दिए. कुछ बोलने से पहले सबने विष्णु के नाम पर ये गिलास टकराये और एक घूँट में आधा ख़तम करते हे मुर्गे तीतर पर टूट पड़े.

"अरे भाई ब्याह तोह 2 महीने बाद का रख रहे थे फिर तारा डूबा हुआ बताया तोह तुम्हारी भाभी ने समधी के घर बातचीत करके नयी तारीख निकलवाई. 10 अक्टूबर को विवाह कार्यक्रम सुनिश्चित हुआ है ज्योति का. अर्जुन को साथ लेके जाना था उधर पर वो गाँव चला गया तोह मैं भी नहीं गया. श्रीमती जी हे बचो के साथ उधर गयी थी और वह से पीहर.", एकाएक इधर भी अर्जुन का नाम सुन्न कर विष्णु पहले इन्दर को देखने लगा फिर जाम का छोटा सा घूँट भरते शंकर को. राजकुमार जी ने हे आज पहली सिग्रत्ते सुलगाई थी जिसको एक काश बाद हे उन्होंने धर्मपाल जी के हवाले कर दिया.

"ओह भाई पल ये अर्जुन इधर होता तोह हमारी श्रीमती जी घर से निकलती क्या? अन्नू बिटिया की कमी एक दिन न खली थी मुझे और सरदारनी को सिर्फ अर्जुन पुत्तर की वजह से. अब आदत बिगाड़ के आप तोह निकल लिया मलंग गाँव घूमने. तोह क्या गुल खिला रहा है वो उधर? सुना है के किसी सिद्ध तांत्रिक को उसने चुनौती दे कर अखाड़े में ाचे से धुलाई कर दी वह.", वालिए जी को भी जानकारी थी थोड़ी बहोत.

"हाँ अब ताक़त बढ़ेगी तोह कही तोह निकलेगी वालिए जी. पर देखने वाला लम्हा था वो जब पहली बार माँ और पापा भी बेबस दिखे थे और जिसको उसने चुनौती दी थी वो शैतान था, 7 फ़ीट ऊँचा और नाग सा कला शैतान. अर्जुन ने माँ और पापा को निराश न किया वालिए जी और मुझे नाज है मेरे बेटे पे जिसने अपने पिता से भी बढ़कर जोहर दिखाया, सिर्फ माँ और पापा के लिए. 2 बड़े गाँव एक कर दिए उधर, खिलाडियों को अंतराष्ट्रीय स्तर का स्टेडियम दिलवा दिया Raj-mehal और पापा की तरफ से, दादा जी का नाम दरगाह पे वापिस लगा दिया और आज तोह कन्या maha-vidhyalaya की नीव भी रख दी उसने जो दादा जी का सपना था पर पूरा न कर सके थे.", शंकर ने एक सांस में हे सबकुछ कह डाला था और फिर जाम खली करके सलाद की प्लेट हाथ में उठा कर khire-kakdi का स्वाद लेने लगा.

"पंडित जी सही कहते है की उसकी क्षमता वो भी नहीं जान पाए और ऊपर से वो चेला भी आचार्य प्रमोद शास्त्री जैसी विख्यात हस्ती का है जिसके लिए लोग महीने प्रतीक्षा करते है पर मैंने उन्हें शादी और उस से पहले लगभग रोज हे अपने इधर देखा. जैसे वो भी मेरे, पल या बाकी सबकी तरह उसके प्रेम बंधन में बांध कर बाकी दुनिया भुला चुके. इंग्लैंड में अन्नू बिटिया को कुछ परेशानी हुई थी जो सही से तोह मुझे नहीं पता लेकिन अर्जुन ने रात के 3 बजे उसको सुरक्षित कर दिया, इतनी दूर बैठे हुए भी. जहा कॉलेज में उसको हॉस्टल न मिल रहा था अब वो उधर हे स्पेशल कमरे में रहती है जहा हर सुविधा है रसोई, फ्रिज, हॉल और बाथरूम जैसी. अन्नू बहोत खुश थी जब मेरी कल बात हुई तोह. राजू का भी अलग लाडला है वो जिसको ये पहले स्कूटर पे आगे खड़ा करके फ्रूटी दिलवाता था फिर दफ्तर जाता था. हर ऐतवार बड़े पार्क में इसकी शाम अर्जुन, अलका और संजीव के साथ होती थी.", वालिए जी यहाँ विष्णु की दर पर भी अतीत और वर्तमान के अर्जुन की चर्चा करने लगे थे.

"मैं न कल रात से ये अर्जुन पुराण सुन्न रहा हु दार जी. अब या तोह इस से मिलवा दो नहीं तोह इसकी चर्चा मैट करो. नशे में मिलने जाना तोह वैसे भी ठीक न लगेगा. इन दोनों ने जाने कौनसे पुण्य कर दिए जो मुझे तोह न दिखे कभी फिर भी ऐसी बढ़िया औलाद नसीब हुई. और दलीप भाई तुम न कुछ बोल रहे अर्जुन की इज्जत में?", अब न चाहते हुए भी शंकर को हंसने के साथ खांसी हो उठी. दलीप सकपका गया लेकिन यहाँ सब उसके अपने हे थे जिनके साथ उसका बचपन, जवानी और वर्तमान बढ़िया काट रहा था. ये परिवार था चाहे घर अलग अलग हे क्यों न थे.

"पानी पी शंकर.. तुझे क्या हुआ ये बात तोह दलीप से कर रहा था और तू ऐसे हंसा जैसे अर्जुन ने अँधेरे में दलीप की मार ली हो.", वालिए जी भी ऐसे माहौल में खुल कर मस्ती कर लेते थे और मार लेने वाली बात सुन्न कर राजकुमार जी और धर्मपाल जी भी हंसने से न बचे.

"उह्ह्ह.. दलीप तू हे बता दे तेरे साथ अर्जुन का मीठा रिश्ता. वालिए जी ये तोह बस अर्जुन अर्जुन हे करता रहता है और वो है की इसके गले नहीं लगता.. हाहाहा..", शंकर मजे लेने के साथ पानी पी कर खुद को भी दुरुस्त कर चूका था पर अब सबकी नजरे दलीप पर जमी थी और नरिंदर भी जैसे जान न चाहता था के ऐसा क्या गज़ब कर दिया अर्जुन ने इसके साथ.

"हंस ले भाई तू भी हंस ले लेकिन हम दोनों जानते है की हमारी गलती को सुधार कर उसके बदले खुशियां देने वाला अर्जुन हे है. एक तरह से मैं तोह बदले के चक्कर में परिवार हे ख़तम कर चूका था लेकिन अर्जुन का जितना जाप करू उतना काम हे है इस बात से इंकार नहीं. आज घर जाता हु तोह बीवी पूरा ध्यान देती है और मेरी बेटी इतना खुश तोह शायद तब भी नहीं थी जब वो स्टेट के लिए चुनी गयी थी. वो काम उम्र में हे परिवार के मामले में यहाँ बैठे सभी लोगो से बेहतर है, बुरा मैट मान न वालिए जी और पल भाई पर ये सच है और आप लोग तोह खुद उसकी कमी महसूस करते है. हाँ बस एक वाकया हुआ था जिस पर ये शंकर मेरे मजे लेता रहता है और वो मेरी हे गलती है की मैं मंजू की निजी जगह पर बिना बताये चला गया. खैर छोड़ वो सब और अब विष्णु तू बता भाई के मेरे घर कब आ रहा है?", बाकी किसी ने भी आगे कोई सवाल न किया था क्योंकि यहाँ बेटी का जीकर हुआ था और परिवार का भी.

"कल हे चलते है और इस बहाने से भाभी और बिटिया से भी मिल लूंगा. पर शाम को तुम हे लेने आना भाई, रास्ता नहीं पता मुझे. वैसे बिटिया खिलाडी है क्या?"

"वो तोह मैं आ हे जाऊंगा जब शाम को खेत पे आना हे है. हाँ पहले बास्केबल्ल की खिलाडी थी और अब वो तैराकी के स्टेट ट्रायल दे रही है. अर्जुन की भावी पत्नी की निगरानी में वो अभी से स्टेट समय के बराबर पहुंच चुकी है. इन्दर जितनी हे लम्बी है और स्वभाव बिलकुल अपनी माँ पे गया है, पल में गरम पल में नरम. वैसे बस खेती का हे विचार है क्या?"

"विचार तोह शुरू से हे खेती और बागबानी का था लेकिन थोड़ा लेट हो गया भाई. अब शंकर और इन्दर ने मेरा सपना मुझे साकार करके दिया है तोह इस 5 एकड़ को अपना खूबसूरत जंगल बना कर हे रहूँगा. पानी की लम्बी कतरो के बीच पपीते के वृक्ष, आम के घने और विविध पेड़, अंगूर की बेले और मौसमी सब्जियां. इधर एक प्राकृतिक घर बनाऊंगा जिसमे कूलर हीटर की दरकार न हो. हाँ.. एक छोटा सा अखाडा भी जहा आपके और इन दोनों गोटो के साथ कभी कभार दंगल करके मिटटी में मिटटी होने का मजा भी लेंगे.", विष्णु का वर्णन सुन्न कर शंकर और इन्दर का उस पर बड़ा नाज हो रहा था. ये इंसान जितना कठोर बना था उतनी हे नरमी से वापिस वैसा हे लौटा था जैसा वो जानते थे.

"ब्याह का इरादा नहीं है क्या? मेरी नजर में है कुछ ाची समझदार महिलायें. एक तोह मेरे अपने नाना की हे सबसे छोटी बेटी है. विवाह हुआ था तक़रीबन 20 बरस पहले लेकिन बरात विदा हुई तभी दुर्घटना में वो विधवा हो गयी थी. नाना नानी तोह रहे नहीं और उसके भाई विदेश जा बेस. बहोत कहा के मेरे साथ यहाँ रह ले लेकिन कहती है की उसके कदम अशुभ है.", वालिए जी ने जाम ख़तम करके रख दिया था जिनके साथ बाकी बचे लोगो ने भी सिवाए विष्णु के जो बड़े गौर से सब सुन्न रहा था.

"मुझे बिना देखे हे पसंद है रिश्ता दार जी. बस मैं व्यवसाय या शहर में नहीं रहना चाहता. उन्हें अगर मंजूर हो तोह बात चलाये फिर देखते है 2 अशुभ मिल कर विज्ञान का सिद्धांत सही करते है या गणित का.", अब हैरान होने की बारी बाकी सबकी थी.

"तू तोह कह रहा था के तुझे शादी ब्याह के चक्कर में हे नहीं पड़ना भाई?"

"ये कहा था के मुझे आजतक प्यार नहीं हुआ और न मैंने naari-sukh की कामना की है. पर जो दार जी ने बताया है न तोह इस से बढ़िया रिश्ता न मिलने वाला पर उसमे सामने वाली की सहमति और मेरी इस एकलौती मांग का समावेश हो तभी कुछ होगा नहीं तोह मैं तोह तभी यही रहूँगा जैसे अब हु. जीवन 50 तक तोह कैसे भी काट जाता है लेकिन उसके बाद कोई तोह होना चाहिए न जिसके साथ अपने बनाये संसार को देख कर खुश हुआ जा सके."

"बहोत खूब विष्णु, बहोत सही बात कही तुमने. मेरी बहिन भी ग्रामीण परिवेश की आदि है अब, नाना के 7-8 किल्ले संभालती है और यही वजह है की वो शहर में जितने मेरी जानकारी के विधुर या अविवाहित थे किसी से रिश्ते के लिए नहीं मानी. जमीन अभी पत्ते पर दी है जब तुम्हारी भाभी उधर गयी है सब jaanch-padtaal करने. इसको संजोग बोलते है छोटे भाई, संजोग. तुम्हारे बिना ये जमीन भी सूनी थी, Inder-Shankar के जीवन में भी कुछ खालीपन था और देखो तुम्हारे बाकी सपनो के साथ बुढ़ापे में किसी अपने के साथ रहने की तमन्ना भी मेल खा गयी. कुलजीत मन नहीं करेगी.", अब इस बात पर शंकर ने तुरंत हे फिर से सबके लिए जाम बना डाले.

"ये जाम मेरे यार के नाम."

"ओह ठहरो मेरे भोले भंडारी.. यार तोह अब आये है और गिलास वो खाली है जो मेरे लिए लाया गया था. तोह आने की जानकारी देने से तोह बच गए श्रीमान प्रभु नारायण स्वामी लेकिन जश्न में शरीक तोह हम हो कर हे रहेंगे. जियो मेरे माटी के मोहन. कैसा है भाई तू.?", उमेद ने जिस तरह से बैठे हुए विष्णु को गॉड में उठा लिया था एक बार जोरदार तालियां बजी थी और उसके मन करने के बावजूद उमेद ने उसको अपने कंधे पर बैठा लिया.

"अबे तू उमेद हे है क्या दानव प्राणी? भाई अभी घर परिवार और मेरी शादी की बात चली है, हाथ पाँव टॉड के लम्बी छूती पर न भेज दियो.", विष्णु को उठाये उमेद ने तोह दूसरा हाथ ऊपर करके भंगड़ा हे दाल दिया था.

"हाहाहा.. हड्डी टूटे मुर्गो की और छुट्टी हम लेके आये है आज. शंकर ने बताया तोह 100 किलोमीटर एक घंटे में पार और इधर तेरा यार. वालिए जी राम रमा. पल भाई दारु को सलाम और राजू जी आप ऐसे हे गटकते रहो जाम. दलीप का काम तमाम, जब भाभी नशे में देख कुटेगी पिछवाड़ा धडाडम धड़ाम. और तू क्या हंस रहा है बे इन्दर, तुझे घोडा बना के मैं लगाऊंगा लगाम.", उमेद ने साड़ी गंभीरता उतार फेंकी थी माहौल की और 8 गिलास खड़े खड़े हे टकराये जहा विष्णु अभी भी उसके कंधे पर बैठा था और एक सांस में ख़तम करके अब सभी लोग उमेद से मिल रहे थे जो अत्यधिक प्रसन्न था.

"मौज कर दी रे दानव तूने तोह सबकी लंका लगा के. मजा आ गया मेरे भाई तुझे देख के."

"मजा हे तोह बचा है बाकी तोह जीवन अंडकोष और जननांग के केशो जैसा है मित्र. हम लिंग है, तगड़े लिंग..", यही नाम रखा गया था आपसी बातचीत में उमेद का. और अब ये साढ़े 6 फ़ीट का दानव सबके साथ शामिल हो कर जश्न को और बढ़ा चूका था. जाम बन्न ने के दौरान हलकी रौशनी में विष्णु के चेहरे पर लुढ़कते उन 2 आंसुओं को सबसे पहले सामने बैठे शंकर ने हे देखा जो उठ कर उसके गाल पर ऊँगली रखता हुआ ऐसे उन्हें साफ़ करने लगा जैसे विष्णु कोई नाजुक बचा हो या शंकर के लिए जटिल ऑपरेशन. विष्णु ने बदले में बस उसका हाथ पकड़ कर पहले होंठो से लगाया और अपने माथे से. एक तरफ से उमेद और फिर इन्दर ने भी उसको अपने आगोश में भर लिया. रुंधे गले से विष्णु बस इतना हे कह पाया.

"माफ़ करना भाई ये परिवार छोड़ कर भागने की गलती करके मैंने तुम सबका दिल दुखाया और आज मैं जब thaka-hara लौटा भी तोह मेरे पास 4 की जगह 8 कंधे है सर रखने के लिए. जानता हु उमेद तुझे भी मेरी जरुरत थी उस पल लेकिन मैंने बस स्वार्थ के चलते अपना हे दुःख देखा. मैं साथ होता तोह क्या पता दुःख उतने न होते मेरे और तुम्हारे हिस्से. शायद बेहतर सेहन कर सकते मिल कर. आज तुमने मुझे मेरे सपनो का घर दिया, वो सभी यादें और दार जी ने तोह बड़े भाई की तरह रिश्ते की बात कर दी. माफ़ करना मेरे भाई.", अब पहली दफा था की मुस्कुराते हुए इन्दर की आँखें भी नम्म थी और कुछ याद करके उमेद की भी. वालिए जी ने बड़े हे स्नेह से विष्णु का सर सहलाया तोह बाकी सब अलग हो गए. राजकुमार जी ने अपने हाथो से उसको पानी पीला कर ठंडा किया.

"अज्जू.. वो कहता था की इन्दर के साथ जितना वो उतना विष्णु. और तेरी इस पट्टी की निचे तू उसका हे नाम छिपाये है न जैसा दूसरे पर इन्दर का दिख रहा है? वालिए जी तोह तब भी अपने बड़े भाई थे और पल भैया के साथ तेरी जमती भी बहोत थी पर तुझे मेरे साथ होना तोह चाहिए था विशि.. अज्जू को खोने के बाद ये शंकर पगला गया था, राजू भैया ने खुद को दुनिया से अलग कर लिया था और इन्दर तोह खुद अभी लौटा है घर वापिस. मैं अकेला था जबकि तुझे जो नुक्सान हुआ उसके भी जिम्मेवार सब थे पर था तू परिवार में हे. ये जमीन कभी भी शंकर या इन्दर नाम नहीं थी, फैरड और कागज़ देख लियो चाहे. रेगिस्टरी वाली जगह मेरे पापा ने तेरा नाम वाला खाना खाली रखा था. गौशाला की जगह शंकर की और बराबर का ये तेरा था तोह हमने तुझे क्या दे दिया बे जब ये तेरा हे था. दुःख का इलाज नहीं है जब वो किसी अपने को खोने से हुआ हो पर एकसाथ रहने से हम नए सिरे से एक बदलाव ला सकते है. जानता है मेरी गाडी शंकर के यहाँ कड़ी है और मुझे चाचा जी छोड़ कर गए है सिर्फ ये सुन्न कर की तू लौट आया है. बस वो तुझसे तभी मिलेंगे जब तेरा दिल करे. जितने नौकरी पर रहे उन्होंने तुझे ढूंढ़ने की कोशिश जारी राखी, फिर वालिए जी ने और अभी संजीव की शादी के समय इन्दर ने साफ़ कर दिया था के वो सबसे पहले तुझे हे लेके आने का वादा किया था. तू अपने हे घर आया है मेरे भाई, अपने घर हम सबके पास. साला तब भी इसका रोना नहीं बंद होता था जब माँ इसके लिए लड्डू भिजवाती थी. माफ़ तोह हमे करना की तुझे ढूंढ़ने में इतनी देरी की. चल अब जाम उठा और ये घर वापसी के नाम, सबके प्यार और अज्जू के नाम.", उमेद ने हे गिलास उठाया था जिसका अनुसरण सभी ने किया. विष्णु झेंपते हुए मुस्कुरा रहा था जब इन्दर को अपनी आँखें साफ़ करते देखा और फिर उसने अपनी कलाई पर बंधी वो आधा इंच चौड़ी पट्टी उतार कर एक तरफ फेंक दी जहा लिखा था अर्जुन.

"मैं क्या कहता हु दार जी और राजू भाई, ये महफ़िल का अड्डा न वो आगे बनाएंगे जहा चारो तरफ पानी होगा और छत्त बांस की. सबके लिए शंकर जैसी साफ़ धोती रखूँगा मैं इधर और जो भी शामिल होगा वो ऊपर से नंगा और निचे धोती. नंगे पाँव पानी की धरा में चलते हुए वह पहुंचेंगे और निम्बू नमक लगा तजा पपीता और अपनी उगाई तजा सलाद. ये गजराज के पास बहोत से संसाधन है न तोह तरणताल जैसा कुछ बना डालेंगे. सामने गैया (काऊ) की सेवा और पीछे भैया की."

"सीधा बोल न के ब्याह होने के बाद तू अपनी जोरू के सामने हमे दारु न पिलाने वाला.", नरिंदर ने टांग खिंचाई शुरू कर दी थी.

"हाहाहा.. वो तोह सोचना पड़ेगा न भाई लेकिन बीवी से कुछ छुपाना नहीं चाहिए. उसके लिए हे तोह वो घर बनाऊंगा जहा से वो मुझे हर तरफ देख सके. पर महफ़िल आज शुरू हुई है ऐतवार वाले दिन तोह हर ऐतवार ये ऐसे हे लगेगी जिसमे सभी आमंत्रित है."

"बस तोह फिर मैं तोह हर महीने 2 बार पक्का हु इधर और मैं आऊंगा तोह पल और राजू भी साथ होंगे."

"मैं तोह हर रोज हे इधर हु भाई, बाकी विष्णु 6 दिन मेरे साथ मेरे खेत पे पी सकता है.", दलीप ने जैसे हे ये कहा इस बार नरिंदर ने उसको लपक लिया.

"और वो बेटी वाली बात अब भूल गए नशे में?"

"सॉरी.. उधर नहीं पी सकते.. हाँ मिल सकते है हर रोज. वो ठिकाना वैसे बेटी नहीं अर्जुन का है और उधर मैं क्या खुद अर्जुन का बाप नहीं जा सकता. तोह भाई मैं तोह महीने के हर ऐतवार पक्का हु बाकी मेरे साथ इन्दर तोह होगा हे."

"किसी किसी दिन हम इसको हमारे ठिकाने भी ले जा सकते है तब आप लोग इसके बिना हे मेहफ़िला सजा लेना. क्यों बे गज्जू, टांग तुड़वाने के बारे में क्या ख़याल है?"

"हाहाहा.. उसके बाद भी इसकी टांग टूटी क्या शंकर?"

"श्रीमान बहनचोद ये वाली टांग 6 बार टूट चुकी है और इधर वाली 2 बार. वैसे मैं भी कुछ बताना चाहता था सबको. मेरा बड़ा भाई अगले महीने यहाँ आने वाला है और भोले तेरी जिम्मेवारी है उसको कैसे भी करके विष्णु के ठिकाने ले कर आने की."

"तेरा बड़ा भाई? तुम तोह खुद दानव हो और ये तुमसे बड़ा कौन हो गया गजराज?", हैरान तोह सभी थे लेकिन विष्णु की बात सुन्न कर इन्दर और शंकर एक दूसरे को देख हंसने लगे थे क्योंकि वो सचमुच बड़ा हे तोह था.

"ओह भाई विष्णु पूछ हे मत तू उसके बारे में. जब आएगा ये सवाल तू खुद कर लियो और अगर मैं दानव लगता हु तोह वो भाई महादानव है, नहीं महापुरुष बोल भाई. साला कही दूर बैठे भी विचार पढ़ रहा होगा तोह दण्डित न कर दे अनुज बोल कर. शंकर का तोह कन्धा अभी भी दुःख रहा जहा उसने बस हलके से दबाया था और हम खुद को भयंकर कुत्ते रख कर जाने क्या समझते है पर हमारे संभव जी तोह भेड़ियों का झुण्ड ले कर घुमते है वो भी बिना किसी को जंजीर पहनाये. बर्फ बढ़ा भाई भोले, अग्रज को याद करने से हे पेग गरम हो गया."

"ये सच कह रहा है वालिए जी और वो अर्जुन का गुरु है जिसके बारे में 2 दिन पहले तक पापा को भी कुछ मालूम न था. पर उसकी विष्णु से जरूर जमेगी क्योंकि दोनों ये ध्यान और योग के साथ युद्ध कौशल के ग्यानी है. शंकर तू इसकी गए... सॉरी इसका पिछवाड़ा ाचे से तोडियो भाई. इसने मुझे टक्कर मारी थी सांड की तरह.", नरिंदर ने फिर से विष्णु को हंसा दिया था ऐसा बोल कर और शंकर ने भी सर से सर भिड़ा कर प्यार से हलकी टक्कर जमा दी.

"अबे तेरी लुगाई कल जाने वाली है और तू रात मेरे पास रुकेगा?"

"हाँ क्योंकि मेरी लुगाई भाई वापिस भी आएगी. शाम को हे मिल के आया हु उस से. तू तेरी वाली के लिए वालिए जी के पाँव दबा, सावन में वैसे भी झींगुर बहोत शोर मचाते है. तेरा नंबर उनमे से न हो."

"अबे शर्म करो तुम दोनों. वो वालिए जी की बहिन है और तुम ऐसी बातें कर रहे हो.", उमेद के झिड़कने पर खुद वालिए जी हंसने लगे थे.

"क्यों भाई उमेद वो बहिन होने से पहले औरत है और ये उसका पति बनेगा तोह क्या मेरी वजह से उस से प्यार नहीं करने वाला? सुबह होते हे बात करता हु और बिना धूम धड़ाके के बस chat-pat तेरा ब्याह विष्णु. फिर तू झींगुर बन या सियार या जो दिल करे बस ज़िन्दगी को जी. इस सड़क पर आगे दलीप और इधर हम है. तू केंद्र है अब हमारा. बना वि डॉक्टर पेग, अज्ज तह रोटी उमेद बनाऊ.", इस मस्ती मजाक में आज बहोत कुछ हुआ था. दर्द, प्यार, गीले शिकवे लेकिन आखिर में बर्फ पिघल कर सिर्फ प्यार हे बचा था, सच्चा प्यार. इस रात में इनमे से कोई भी होश में रहने नहीं वाला था क्योंकि उमेद भी वैट 69 की 4 बोतल लेता आया था.

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जहा गाँव में अर्जुन कृष्णेश्वर जी के साथ समय kaat-ta हुआ बड़ी हे चाहत लिए अनामिका चची को काम में मसरूफ देख रहा था जिनके आसपास रौशनी बुआ, संजीदा जी, आँचल के साथ लाली और उसकी माँ थी, वो बस प्रतीक्षा कर सकता था. लेकिन एक अलग हे नजारा उसके घर पे था रात के 9 बजने पर. मार्किट से खरीदी के साथ साथ बहार का खाना करके लौटी सभी लड़कियां कुछ ज्यादा हे खुश थी. अपने कपड़ो को बैग में रखने के लिए ऋतू दौड़ती हुई ऊपर अपने कमरे में गयी तोह अभी वह और कोई न था. घर पर किसी भी पुरुष की गैर मौजदगी में उसने आनन् फानन में हे ख़ास अर्जुन को दिखने के लिए खरीदी वो पतली डोरियों वाली घुटनो तक की झीनी ड्रेस सभी वस्त्र त्याग कर जिस्म पर पहन ली थी. गौरवर्ण और दुर्लभ शारीरिक काया वाली ऋतू आज पहली बार एक पाश्चात्य परिधान में खुद को देख कर शर्माने हे लगी थी. पतले कपडे के ऊपर सिर्फ अर्जुन के समरण से हे उसके पैने चूचक उभर चुके थे जो इस काले रंग की वजह से उतने अधिक तोह नहीं दीखते थे पर भीतर कोई अन्य वस्त्र न होने से उसके पुष्ट उभार और गोरी बाहें दमकती हुई जैसे ख़ूबसूरती को बमुश्किल शब्दों में बयान करती. अपने बंधे बालो को खोल कर कंधे से सामने रखती वो ऐसा महसूस कर रही थी की ठीक उसके पीछे अर्जुन खड़ा है.

"उफ़.. जान लेने का इरादा है क्या तेरा जालिम? कोई इतना खूबसूरत कैसे हो सकता? तेरा ये जो टिल है न ऋतू, आज पहली बार ऐसे खुला दिख रहा है और तू सलवार कमीज के लिए बानी हे नहीं है. मैंने तुझसे ज्यादा म्हणत की लेकिन कुछ तोह अलग है तुझमे जो म्हणत से भी मुमकिन नहीं. देख ये अर्जुन की दी हुई चैन किन घाटियों के बीच फांसी है.", ऋतू इतना खुद में खोयी थी की कमरे में दाखिल होने के बाद उसको बंद करके पीछे से बाहों में भर के कड़ी अलका को पहले देख हे न सकीय. पर अलका हे तोह अक्स थी उसका जो परवाह से ज्यादा प्यार करती थी इस से. कंधे पर अलका की ठुड्डी तिकी देख वो दर्पण में देखते हुए जैसे शर्मायी तोह उस से एक इंच ऊँची उसकी इस आत्मा ने उसके गोर ठन्डे गालो को आईने में देखते हुए हे चूम लिया.

"अलका.. रहने दे न यार. वैसे क्या ये ारु को पसंद आएगी? कल रात तुझे हे संभालना है, आरती तोह उसको देख के सब भूल जायेगी.", ऋतू के चेहरे पर बढ़ती लाली को देख अलका उसके समतल मुलायम पेट को उस फिसलते वस्त्र के ऊपर से हे सहलाती हुई वक्षो की तलहटी पर आ रुकी.

"तू ारु की बात कर रही है ऋतू? ईमान तोह प्रीती का भी दोल जाए तुझे ऐसे देख ले तोह. मैं हमेशा से हे तुझे और मुझे ऐसे हे देखना चाहती थी. शुक्र है न दादी ने ये देखि नहीं."

"तेरी वाली तोह दिखा जरा पहन कर.", ऋतू ने भी हलके से अपने गाल को अलका के गाल से सहलाते हुए उसके हाथ को वही पकड़ लिया था.

"छोड़ेगी तोह तरय करुँगी. वैसे तारा और आरती तोह माँ के साथ चची के कमरे में चली गयी. ये मेरे वाली सफ़ेद है ठीक तेरे स्टाइल में.", अलका तोह ऋतू के सामने उस से भी कही अधिक हे दिलेर थी जिसने कुर्ती के साथ ब्रा को भी बिस्टेर पर फेंक दिया. कितने उन्नत और सख्त उरोज थे उसके, ठीक ऋतू जैसे और दोनों के चूचक भी पतले गुलाबी उभरे हुए किसी नश्तर से तीखे. कमर ऋतू से भी 2 इंच काम लेकिन कूल्हे 2 इंच ज्यादा. सलवार उतार कर वो बस उस झीनी लाल पंतय में कड़ी अपने कूल्हों तक लम्बे बालो से रुब्बार निकाल रही थी जबकि ऋतू की आँखें वैसे हे उसके कठोर स्टैनो के हिलने डुलने पर केंद्रित. सफ़ेद परिधान धारण करते हे वो किसी विदेशी पारी सी जान पड़ती थी जिसके पंख अदृश्य थे. ऐसी कमनीय काया पर सिर्फ सीने से कैसा हुआ वो घुटनो तक का मादक परिधान पहने वो पलटी तोह खुद ऋतू ने हे उसकी लम्बी जुल्फों को अपने जैसे बाएं वक्ष के सामने सजा दिया. इधर भी वो कमर तक हे लम्बे थे, कुछ ज्यादा हे रेशमी और घने. अलका मुस्कुरा कर दोनों को हे आईने में निहारने लगी जहा कला सफ़ेद मिल कर दुनिया पूरी करता था जिस पर सिर्फ और सिर्फ अर्जुन का अधिकार था.

"तुम्हारा मुकाबला तोह मैं क्या प्रीती भी नहीं करती. ये कर्व्स किसी भी बैलेरिना को तुम्हारे सामने फीका कर दे अलका. और मुझसे ज्यादा तुम जंचती हो ऐसे ओने पीेछे में. कितना तराश लिया है न तुमने खुद को.", ऋतू आईने की जगह अब अलका की कमर से हाथ फिसलती हुई उसके गुदाज लचीले कूल्हों पर टिकाये थे. उनकी लज्जात्त थी हे ऐसी की अर्जुन हमेशा अलका के पीछे चिपका रहता था और यहाँ ऋतू भी उन्हें दबती हुई जैसे हर हिस्से का जायजा लेने लगी. अलका शुरुआत में हे हावी होती थी उस पर लेकिन बाद में खेल हमेशा हे ऋतू के हाथो में रहता था. गले पर ऋतू की सांसें और उसका इतने मजबूती से कूल्हों को थामना अलका को दर्पण में अर्जुन दिखने लगा था. खुले सीने पर उभरी वो गोलाकार स्टैनो की उठान पर एकाएक ऋतू के गीले चुम्बन ने अलका को उसके गले लगने पर मजबूर कर दिया.

"ओह्ह्ह्हह्ह.. बस कर ऋतू.. यहाँ अर्जुन नहीं है और टाइम भी गलत.. प्लीज..", ऋतू ने उसकी बात से इंकार करते हुए दोनों कूल्हों को पृथक करते हुए कान की लो पर जिव्हा टिका दी. अलका के माथे और सीने पर हल्का पसीना उभर आया था बस इतनी से हरकत से.

"तू ारु की बात करती है, उस से पहले तू मेरी है न अलका? क्या ये गलत है?"

"इस्सस.. नहीं.. बस .. उम्मम्मम्म", अलका ने खुद हे अपने होंठ ऋतू से जोड़ कर उसके कूल्हों को भी थाम लिया. दोनों लगभग सामान kad-kaathi और काल्पनिक से जिस्मो के मालकिन जब आपस में जुडी तोह जैसे बिजली का कनेक्शन पूरा हो गया. ये कुछ ज्यादा हे जोरदार संपर्क था जो दरवाजे पर लगातार होती दस्तक के बावजूद तभी टूटा जब उनके नाम पुकारे गए. अलका मदहोश सी बस ऋतू को निहार रही थी जिसने अलग होने से पहले बस उसके माथे को चूमा और बाथरूम का इशारा दे दिया.

"चेंज कर रही थी यार. क्या हुआ?", ऋतू ने दरवाजा खोला तोह सामने कोमल दीदी को खड़े पाया जिनके चेहरे पर कोई ख़ास भाव नहीं थे.

"तुम वो सब कर रही थी?", उनका मतलब हस्तमैथुन से था जिस पर ऋतू ने झेंप कर न में सर हिला दिया.

"पता नहीं फिर मेरे हे कान बज रहे होंगे जिन्होंने ये सुना की बस ारु.. और नहीं.", ऋतू की तोह सीतिपत्ति हे गुम हो चुकी थी ये सुन्न कर और सामने बिस्टेर पर उसके antar-vastro के ऊपर अलका के पड़े थे. कोमल दीदी ने माथे पर हाथ रख लिया दरवाजा बंद करते हुए.

"एक रात का भी सबर नहीं तुम में?"

"वो.. वो बस ड्रेस पहन कर देख रही थी फिर .."

"रख लो इसको संभाल कर और अलका से बोलना की अपने बैग को ले कर निचे आ जाए. थोड़ा ध्यान रखा करो चाहे सबके कान उतने तेज न हो पर परदे से दिख सकता है.", अब ऋतू को समझ आ चूका था के कोमल दीदी ने सुना नहीं पर जो अंदाजा लगाया वो गलत भी नहीं था और जाते हुए वो जिस तरह से मुस्कुराई थी खुद ऋतू को शर्म आ गयी.

"चल निचे चलते है. तेरा बैग माँ के कमरे में ले चल और ये ड्रेस मेरे बैग में रख ले पहले.", ऋतू की बात सुन्न कर अलका मुस्कुरा रही थी.

"तू किसी दिन अर्जुन की वजह से चाहे न निकले पर हम दोनों को निकलवा कर मानेगी."

"वो तोह होना हे है बस तू काम धंदा जमा लियो नहीं तोह मेरी डिग्री के भरोसे रोटी मिलने से रही.", ऋतू अभी भी मस्ती में थी और अलका उसकी सोच को सुन्न कर शर्मिंदा.

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थ्रेड के सभी रीडर्स मेरे से पहले छूती पे चले गए क्या?



 
अपडेट 211

रिश्ते (2)

खाना खाने और रसोई समेटने में हे रात के 10 बज चुके थे लेकिन लगता था के अभी भी शुभ महूरत में समय बाकी था. अर्जुन आस भरी नजरो से अनामिका चची को देखने के बाद एक घंटे का इशारा मिलते हे अपने कमरे में जा बैठा. कृष्णेश्वर जी के साथ अंजलि और आँचल को भी निवाया दूध दे कर चची रौशनी बुआ के साथ कुछ पारिवारिक चर्चा में लगी थी और उनके कमरे में हे संजीदा भी समय बिताने के लिए टेलीविज़न देखने के साथ उस छोटे बचे से खेल रही थी जिसने अभी अभी सतान्नपान किया था. अर्जुन आरामदायक कपडे पहन कर कंप्यूटर के सामने बैठा इंटरनेट चालू करने लगा.

"ईमेल नहीं देखि अभी तक मर एनिग्मा?", याहू मैसेंजर पर ये सन्देश उभरा जो शाम को करीब 6 बजे भेजा गया था और यहाँ खुद के लिए प्रयोग हुए उस शब्द को देख अर्जुन के चेहरे पर हलकी सी मुस्कान उभर आयी. ये सन्देश जन्नत का हे था जिसकी अर्जुन को अपेक्षा नहीं थी की वो इतनी जल्दी हे उसको ईमेल भेजने के साथ व्यक्तिगत सन्देश देगी. फ़िलहाल उस खांचे के किनारे नारंगी बत्ती का मतलब था के जन्नत व्यस्त है. ईमेल खोल कर जांच की तोह कुछ बेमतलब संदेशो के बाद दोपहर 3:30 पर हे Jaanu.K94 से जन्नत का ईमेल वह मौजूद था. अर्जुन ने उसको खोला तोह कुछ पल उस पहली हे तस्वीर को देखता रहा जो सिर्फ जन्नत की हे थी. बिना ब्याह के आसमानी टॉप और गुथी हुई आधुनिक छोटी के साथ काजल लगी खूबसूरत आँखें और चमकदार लाल लिपस्टिक लगे वो धनुषाकार होंठ.

'ये तोह यादगार हे भेज दी मम आपने.', अर्जुन ने उसको अपने कंप्यूटर में हे सुरक्षित कर लिया था और उसके बाद अगली 3 फोटो वही थी जो जन्नत ने अर्जुन के साथ खींची थी जहा वो अपने हे चेहरे पर mile-jule भाव देख कर झेंप गया. परन्तु सबसे आखिरी तस्वीर में दोनों की हे आँखें बंद और जन्नत के होंठ गोल होते हुए उसके गाल पर ठीके थे. कंप्यूटर के ऊपर हे अर्जुन हाथ रख कर जन्नत के गाल का स्पर्श लेने लगा जैसे वो साक्षात् वह हो. आज दिन में उसके इतना करीब होने के बावजूद वो हाथ तक न मिला सका था उस से पर जन्नत ने तोह खुद हे ये कमी पूरी कर दी थी.

"ोये तुम ऑनलाइन हो?", एक कोने से ये सन्देश उभरा जो प्रीती का था और ईमेल निचे करके अर्जुन ने ख़ुशी से प्रीती का सन्देश बड़ा कर दिया.

"मेरी बिल्ली मुझे हे ढूंढ़ती रहती है क्या? अभी आधा घंटा तोह फ़ोन पर चिपकी हुई थी शाम को."

"फ़ोन क्या मैं तोह तुमसे भी चिपक सकती हु और चिपकूंगी भी वो भी ज़िंदगीभर.. उमाहहह.", और उस सन्देश के साथ पूरी स्क्रीन हे गुलाबी हो गयी जहा एक बड़ा सा लाल होंठो का जोड़ा चमक उठा.

"तोह कौन रोक रहा है मेरी मानो को? कहो तोह रात को हे दिवार कूद के आ जाऊ?"

"धत्त.. जानती हु तुम ऐसा कर भी सकते हो पर अभी नहीं. वैसे तुमने अभी क्या पहना है?", प्रीती उसके मजे लेने का इरादा बनाये थी जैसे.

"ये बात तोह मुझे पूछनी चाहिए थी और तुम्हे क्या मिलेगा ये जान कर की मैंने क्या पहना है?"

"पूछी नहीं लेकिन मैं बता देती हु. सिर्फ तुम्हारी वाइट वेस्ट (बनियान) और ...", प्रीती ने फिर से वो दिल और होंठ वाला सन्देश भेज दिया. अर्जुन मैं हे मैं बोल रहा था के ये उसको मरवा के मानेगी जिस तरह खुल कर इजहार करती थी.

"और?"

"और कुछ नहीं.. उम्म्म्म.. तुम भी कुछ मत पहनो और .. बस मेरे निचे आ जाओ..", इस बार अर्जुन के रोयें खड़े हो चुके थे ये सोच कर हे की प्रीती का वो फक्क गुलाबी गोरा जिस्म और उसकी बालविहीन नाजुक योनि उसके मजबूत जिस्म के निचे हो और दोनों का वो कामुक चुम्बन.

"निक्कर गीली हो गयी क्या मेरे फत्तू? देखा सिर्फ इतना बोल कर हे मैं तुम्हारे पसीना निकाल देती हु. शादी के बाद निचोड़ लुंगी ाचे से.. हाहाहा.."

"मतलब तुम मेरे मजे ले रही थी?"

"तुम्हे पता है न मैं रात को कंप्यूटर नहीं चलती? बस माँ के कुछ डाक्यूमेंट्स ईमेल किये है उस, उनका लैपटॉप कुछ प्रॉब्लम दे रहा था. तुम इतनी रात को क्या कर रहे हो कंप्यूटर पर बैठे?", प्रीती की दिनचर्या वो कही बेहतर जानता था और उसमे ये आदत भी शुमार थी.

"कुछ नहीं 2-3 दिन से इमेल्स नहीं देखे थे और दिन में टाइम भी कहा मिलता है. सोने से पहले बस वही सब देख रहा था की तुमने हालत खराब कर दी.", अर्जुन की निक्कर में उभार साफ़ था जो सिर्फ प्रीती के बारे से सोचने से हे सर उठाने लगा था.

"संभाल कर रखो बच्चू उस मुस्टंडे को. कॉलेज जाने से पहले पूरी रात वो मेरे साथ रहने वाला है, तब उसकी साड़ी अकड़ निकालूंगी. बहोत परेशां कर रखा उसने मुझे."

"सचमुच तुम ऐसा करने वाली हो? फिर वो पहला दिन उस रात के 2 दिन बाद आएगा मानो. हाहाहा.. वैसे मैंने तोह गिफ्ट दे दिया था लेकिन तुम्हारी तरफ कुछ पेंडिंग है.", अर्जुन का मतलब प्रीती के कूल्हों के गहराई में छिपे उस गुलाबी पुष्प से था जिसको चाकहए बिना हे प्रीती उसको निचोड़ लेती थी.

"ये अपनी बड़ी बीवी से मांगो जरा. उन्होंने दिया तोह फिर वही गिफ्ट मैं तुम्हारे ऊपर आ कर दूंगी. उमाठ..", प्रीती ने क्या रास्ता निकला था खुद को बचने का और अर्जुन जानता था के ऋतू के मामले में उसकी एक नहीं चलती तभी तोह आजतक वो वह उपनि ऊँगली तक न रख सका था. बस अलका हे थी जो खुद इसके लिए तैयार रहती थी.

"वो मुमकिन नहीं फिलहाल. वैसे तुम क्यों नहीं उनसे बात करती?"

"हाहाहा.. फत्तू हे रहोगे तुम. चलो टेक केयर, कल पापा ने जाना है और तुम्हारी विक्की भी आज इधर हे है. साथ हे सोने वाली है मेरे और अब मिल लेना तुम उस से भी जब आओगे तोह. गूडनिघत लव."

"गूडनिघत मेरी मानो. ी लव यू तू.", अर्जुन उसको बंद करके कुछ पल बस कुर्सी से तक लगाए प्रीती के खयालो में खोया रहा और जब वर्तमान का आभास हुआ तोह स्क्रीन पर जन्नत के लगातार 3 सन्देश थे और समय 10:48. मतलब वो प्रीती की याद में लगभग आधा घंटा खोया रहा. सामने वो सन्देश पढ़ने लगा.

"ऑनलाइन हो?

वो फोटो आज से पहले सिर्फ मेरे तक था.

नर्वस थे तुम जब साथ बैठे थे.", अब अर्जुन ने भी कीबोर्ड पर जवाब देना शुरू किया.

"आपकी वो तस्वीर हे शायद आपकी असली ख़ूबसूरती के करीब है. पहले वाली किसी भी तस्वीर से ज्यादा.", यहाँ भी ये सब लिखते हुए वो थोड़ा असहज सा महसूस कर रहा था लेकिन वो बात करना चाहता था जन्नत से. दूसरी तरफ अपने लैपटॉप के सामने बिस्टेर पर लेती जन्नत के चेहरे पर अलग हे नूर था. उसका भी एक सच था की आजतक जिस भी इंसान या पुरुष से उसकी मुलाकात हुई था, चाहे काम पर या सामाजिक वो सभी उसको भोगने की वास्तु की तरह देखते थे लेकिन छोटी उम्र से हे जन्नत मानसिक रूप से परिपक्व हो चुकी थी. अपने अनुशासित और पेशेवर बर्ताव की वजह से उसने बेशक बहोत सी बड़ी पेशकश खोयी थी लेकिन कभी भी खुदको भोगने की वास्तु की तरह पेश नहीं किया था. और आज हालात ये थे की कई ाचे नाम उसकी बेहतरीन छवि और पेशे के प्रति ईमानदारी की वजह से उसके मुरीद थे और वो इतने में हे संतुष्ट थी. फिलहाल नीली बनियान और एक बटन वाली सलेटी आधी पंत में लेती वो बेहद ख़ुशी से अर्जुन के साथ ये छोटे छोटे संदेशो में बातचीत का लुत्फ़ ले रही थी. अर्जुन जो भी कह रहा था उसमे मिलावट या बेमतलब चाहत नहीं थी.

"तुम नर्वस क्यों थे उस समय? वैसे मुझे भी सिर्फ वही एक तस्वीर आज से पहले पसंद थी क्योंकि वो सिर्फ मेरी थी.", उसका आशय साफ़ था की उसका जीवन जैसे खुद को दूसरे के लिए मार्का की तरह प्रस्तुत करने से था.

"आज से पहले मतलब? और नर्वस कैसे नहीं होता? मैंने सिर्फ आपको तस्वीरों और खबरों में हे देखा था, कई साल तक. मैं तोह तभी बर्फ हो गया था जब आपने मेरी मोटरसाइकिल पर हाथ रखते हुए मुझे देखा. होश तोह तब आया जब मैं आपके यहाँ से निकल कर बाबर मोटरसाइकिल पर बैठा.", अब थोड़ा चौंकने के बारी जन्नत की थी जो उकडू होती हुई जैसे अर्जुन के चेहरे को देखने की कोशिश करने लगी थी. नीली छोटी से बनियान में से बस उन दूधिया गोलाइयों की एक मादक दरार और उनका सफ़ेद हिस्सा नजर था. बारीक सी सुनहरी चैन अब पेंडुलम सी झूलने लगी जिसको जन्नत ने उँगलियों से उन वाक्सो के बीच दबा कर शांत करवाया.

"दूर जाने पर तोह याद आती है मिस्टर. तुम्हे होश कैसे आया?"

"आईने में एक गुलाबी दिल दिख गया था जो विश्वास दिलाने के लिए बहोत था की आपका स्पर्श और आप सच है.", अर्जुन ने लिख तोह दिया पर अब वो जवाब से पहले हे पसीने बहाने लगा था. वो लिंग की उत्तेजना तोह कबकी काफूर हो चुकी थी इस बातचीत के दौरान. लेकिन ऐसा हाल सिर्फ उसका हे नहीं था, सामने वाले ने भी रुक रुक कर 3 बार उस पंक्ति को पढ़ा और वो लम्बी पलके शर्म से कितनी हे बार झुकी. एक बार तोह जन्नत तकिये में हे मुँह दबाये जैसे उस पल को अपनी नादानी या बस उत्सुकता की तरह देख रही थी पर उसने वो तस्वीर खोल कर फिर से देखि जो पूरी स्क्रीन को भर रही थी. हॉल की एकमात्र रंगीन दिवार के सामने रखे उस सफ़ेद चमड़े के सोफे पर अर्जुन से लगभर चिपक कर बैठी वो अपने होंठो को गोल किये उसके गाल पर रखे थे. अर्जुन जैसी घनी और लम्बी पलके ज्यादातर पुरुषो में नदारद रहती है. उसके सुर्ख होंठ जो साफ़ बताते थे की वो धूम्रपान के आसपास भी नहीं था. और वो 5-6 कुण्डल लिए उसके लम्बे बाल उसकी मासूमियत से वफ़ा करते कितना आकर्षक बनाते थे. अगर उसकी बहिन अर्जुन को अपना प्रेमी या बॉयफ्रेंड बता देती तोह शायद जन्नत उसके इतने करीब बैठने की कोशिश भी न करती. उस तस्वीर को हे अपने लैपटॉप का prisht-bhaag बना कर उसने sandesh-manch देखा जहा अर्जुन का अगला सनेश उभरा था.

"सॉरी अगर मेरे बताने पर आपको बुरा लगा हो तोह. शायद मॉडलिंग में ये सब आम बात होगी मम लेकिन मैंने वो दिल से फील किया, बेशक आपके पास से जाने के बाद."

"तुम ये मम और मिस कहना बंद कर सकते हो प्लीज? मुझे बुरा लगता तोह क्या मैं वैसा करती और फिर फोटो भी भेजी मैंने तोह. कही उसको अब तुम दुनिया के सामने दिखने की तोह नहीं सोच रहे? जैसे तुमने कहा की मेरे प्रोफेशन में ये सब नार्मल होगा लेकिन इसकी तस्वीर आजतक नहीं छपी. तुम उसका फायदा उठाओगे?", जन्नत ने जिस तरह से मजाक मस्ती करते हुए इतने सवाल बरसाए थे उन्हें पढ़ कर अर्जुन दांग रह गया. उसको हलकी अजीब से ठण्ड लगने लगी थी.

"आपकी हर तस्वीर को नियम भुला कर समेटने वाला इंसान क्या ऐसी यादगार को सार्वजानिक करेगा जिसमे वो खुद अपनी कल्पना के सार्थक होने का गवाह हो? मैं अभी डिलीट कर देता हु उन तस्वीरों को ईमेल और कंप्यूटर से."

"तुम्हारी मर्जी. मैंने तोह उसको अपना वॉलपेपर बना लिया है. तुम्हारी कल्पना को हम भी तोह देखे वो तुम्हारे साथ लंच पे जाने लायक है भी या नहीं? और कंप्यूटर से डिलीट करने की जो धौंस दे रहे हो, दिमाग और दिल से वैसा कर सकते हो क्या?", अब अर्जुन के हाथ वही रुक गए थे उन तस्वीरों को मिटने से पहले हे. जन्नत का ऐसा जवाब पढ़कर वो जैसे ठहरे हुए पानी सा शांत हो गया बस एक प्यारी सी मुस्कान जवाब के लिए बहोत थी.

"मतलब आप सचमुच मेरे साथ लंच पर चल रही है? मुझे लगा वह मैं आपके पास बैठा वो सब अपने मैं में सोच रहा था की आपने मुझे लंच का पुछा और हमने ढेरो बातें की."

"क्या पह्नु मैं फिर? पंत शर्ट या स्कर्ट टॉप में मैं कम्फर्टेबले रहती हु लेकिन क्या पता तुम्हे वो ठीक न लगे. वैसे मैंने तोह ये भी नहीं सोचा की लंच पर जाना कहा है, गोल चौक पर मिलने का तोह कह दिया.", वो अर्जुन से पूछ रही थी की वो क्या वस्त्र पहने और ये पढ़ कर अर्जुन के पास जवाब न था. बस मंद मंद मुस्कुराता वो जगह और कपड़ो के लिए कुछ ऐसा जवाब देना चाहता था की जन्नत खुद हे विचार कर ले.

"सुना है बिपास की तरफ राजहंस रिसोर्ट एक ाची जगह है और लंच पर pant-shirt कम्फर्टेबले तोह नहीं लगती."

"मैंने कुछ शूट किये है उधर और वो सचमुच एक खूबसूरत जगह है बस कभी वह का मेनू नहीं देखा पर थोड़ा महंगा नहीं है?", अब जन्नत ये महंगा बोल कर अर्जुन के फिर से मजे ले रही थी और उसको ख़ुशी थी की अर्जुन ने ऐसी ख़ास जगह का चुनाव किया जहा बेमतलब की भीड़ नहीं रहती थी. वो रिसोर्ट कुमार महेंद्र की संपत्ति थी जहा vishwa-ster की सुविधाएं मौजूद थी बेहतरीन रेस्ट्रा के साथ साथ झील, 5 सितारा कमरे, गोल्फ और घुड़सवारी जैसे महंगी सुविधाएं वह रुकने वालो के लिए.

"आपने मेरा सपना हक़ीक़त में बदल कर जो किया है उसके बदले क्या मैं सिर्फ ये छोटा सा लंच नहीं करवा सकता? इतनी सेविंग्स तोह हैं मेरे पास की 3-4 लंच झेल सकू. वैसे अब आपको आराम करना चाहिए, ट्रेवलिंग के बाद इतनी रात तक जागने से डार्क सर्कल्स होने की सम्भावनाये रहती है."

"एक शर्त पर, अगर लंच मैं पाय करुँगी तभी हम चलेंगे.", 3-4 लंच जितनी सेविंग्स की बात पर जन्नत को एहसास हुआ की वो एक पढ़ने वाले युवक से बात कर रही है और जिस जगह वो जाने वाले है वह 5-10 हजार का खर्चा आम बात थी.

"मुझे मंजूर है अगर वो आपसे पैसे लेने को तैयार होते है तोह. कल मिलते है, ठीक 1 बजे सीधा राजहंस. गूडनिघत Jaanu.K94.", और अर्जुन ने जवाब की प्रतीक्षा करने से पहले हे जन्नत को हैरत में दाल कर वो sandesh-patal बंद करके कंप्यूटर भी 'shut-down' कर दिया. उसके दरवाजे पर भी हलकी दस्तक हो चुकी थी, अनामिका चची की ठीक 11:30 पर.

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"जिनि, तुम सो गयी थी क्या?", जन्नत अब एक बनियान निक्कर की जगह कमीज और पजामा पहने थी. बहार गेट जांचने और वह सुरक्षा कर्मी को देख कर उसने वो सफ़ेद खतरनाक कुत्ता भी खोल दिया जो दिन के वक़्त बस घर के पिछले हिस्से में आराम करता रहता था. Maa-baap घर पे न हो तोह हर छोटी बड़ी चीज पर ध्यान देना जन्नत का नियम बन चूका था. वैसे तोह उनका ड्राइवर और सुरक्षाकर्मी भी वफादार व्यक्ति थे लेकिन घर के भीतर उनकी भी दखल मंजूर न थी और उस कुत्ते की भी यही खासियत थी की वो सिर्फ 4 लोगो को जानता था और आदेश सिर्फ जन्नत और उसके पिता के. अब वो अपनी बहिन के आलिशान कमरे में दाखिल हुई थी जो 3-4 बार थपकने पर खुला. जीनत धुले चेहरे के साथ सिर्फ एक लाल झीनी पंतय और पतला सा टॉप पहने कड़ी थी. कमरे में भरपूर ठंडक के बावजूद उसका शरीर इतने काम वस्त्रो में इस सबका अभ्यस्त था.

"नहीं डीडू, वाशरूम में थी. साक्षी के जाने के बाद बस फाइल पूरी की है और थोड़ा टीवी देखने के बाद 1-2 बजे हे सोऊंगी. वैसे आपने घडी नहीं देखि क्या? 11:30 तक आपको सोये भी आधा घंटा हो जाता है.", जीनत अपनी बहिन को छेड़ रही थी जो कमरे में दाखिल होने के बाद हर तरफ इतनी खूबसूरत सजावट को देखती हुई फिर रिमोट से ठंडक को थोड़ा काम करके उसके स्प्रिंग वाले नरम बिस्टेर पर तक लगाती हुई बैठ गयी. अपनी बड़ी बहिन को इतना खामोश देख कर जीनत ने भी पहले एक रेशमी ढीला पजामा पहना और एक तकिया सीने पर लगाए वो उनके सामने हे सीने के बल आ लेती.

"आप आज मेरे बैडरूम में है लेकिन इतनी चुप और खोयी हुई पहले तोह नहीं दिखी. फिर से किसी ने सेक्सी ईमेल तोह नहीं भेज दी आपको कॉन्ट्रैक्ट के बदले?", अब जन्नत उसके सर को सहलाती हुई सोच से बहार निकल कर ाचे से मुस्कुराई.

"अब मैं वो जन्नत कपूर नहीं जो 19 साल की थोड़ी डरपोक लड़की थी. हर एजेंसी तभी कांटेक्ट करती है जब क्लाइंट और ब्रांड काम की बात करे नहीं तोह इमेज उनकी खराब होती है जैसे पास्ट में हुई भी है. तोह तुम बस टाइम पास के लिए एयर होस्टेस ट्रेनिंग ले रही हो?"

"अब कॉलेज ख़तम हो चूका है और घर पे बिस्टेर तोड़ने से ाचा तोह बहार लड़को को खुदको हे ताड़ने दू न? इस बहाने अपनी फ्रेंड्स के साथ भी 3-4 घंटे स्पेंड कर लेती हु और थोड़ी बहोत शॉपिंग भी. आप शादी नहीं करने वाली और पापा को चुप भी करवा दिया है अपनी सक्सेस से लेकिन मेरा केस आपसे अलग है. वो लास्ट टाइम पार्टी में उन्होंने जक अंकल के बेटे से मेरा इंट्रो करवाया था जिसका बाद में पता चला की उन्हें मैं पसंद हु. वो नैनसुख अभी फाइनल ईयर में है बिज़नेस की डिग्री के तोह अगले साल mangni-shaadi जैसा जो भी होगा करवा देंगे.", अपनी बहिन की बात सुन्न कर जन्नत को बहोत हैरानी हुई थी और ये सच भी था के बाप बेटी के दरमियान एक अदृश्य दिवार जरूर बन चुकी थी जिसकी वजह कपूर का हम और बेटी का खुद को सक्षम साबित करना था. हाँ परिवार के माहौल पर इसका कोई प्रभाव नहीं था और बाप बेटी के समबंदो में कोई खटास नहीं थी.

"क्या नाम है उसका हेमंत कैंसल? पर ये बात तुमने और mom-dad ने मुझे पहले तोह नहीं बताई. हम दोनों में 1 साल का फरक है लेकिन तुम अभी उतनी भी बड़ी नहीं हुई की शादी कर दी जाए."

"आज माँ ने हे तोह फ़ोन पर बताया मुझे की जब पापा मलेशिया से आएंगे वेडनेसडे को तोह थर्सडे को वो लोग मेरा रोका करने वाले है इसलिए माँ कल सवेरे जल्दी आ रही है. खैर अब मैं 23 की होने वाली हु डीडू और शादी साल डेढ़ साल बाद होनी है तब 24 पार हो चुके होंगे. वैसे वो नैनसुख उनका एकलौता बीटा है और न उसकी कोई choti-badi सगी बहिन. मौज हे करुँगी शादी के बाद.", जीनत आँख मारती हुई हंस रही थी जिसका मतलब जन्नत ाचे से समझती थी.

"तेरा दिमाग हमेशा सेक्स की तरफ हे रहता है क्या? कॉलेज तोह 5 साल मैंने भी किया लेकिन मेरा एक बॉयफ्रेंड नहीं रहा और तेरे हर महीने बदले है जितना तेरी और साक्षी के बातों से पता चला. ये मैटेलिक ब्लू नेलपेंट पास कर जरा.", जन्नत ने बिस्टेर के दूसरी तरफ रखे प्रसाधनों के ढेर में अलग से दीखते मोरपंखी से रंग की nakh-polish मांगी तोह जीनत ने भी हँसते हुए खिसक कर जब वो उठाई तोह उसका पजामा भी बड़े कूल्हों के बीच तक सरक गया. मॉटे दूध दबने के बाद गले से आधे के लगभग बहार थे. जीनत ने अपनी बहिन को पोलिश उतरने वाला तरल, रूई और पोलिश पकड़ा दी पर अपने वस्त्र ठीक करने की कोई कोशिश न की. जन्नत ने भी उसके भरे भरे जिस्म को निहारा जो उसके अकार से कही ज्यादा भारी थे और ढीले वस्त्र भी kulho-seene पर पूरे कैसे हुए.

"वो बॉयफ्रेंड नहीं बस टाइम पास थे डीडू और इतने नहीं की हर महीने बदलती रही. आजतक सिर्फ 6 लड़के हे दोस्त बनाये है मैंने जिसमे बस एक वो अंकित बे बॉयफ्रेंड बन ने के लायक दीखता था पर एक नंबर का ठरकी था कमीना. उसकी बात भी मान ली थी मैंने और सोचा चलो अब 18 पार किये भी 2 साल हो गए है तोह ये मजा भी लेके देखे पर हाथ में लेते हे उसकी नुनु लीक हो गयी. हालत देखने वाली थी उसकी और दूसरा चांस माँगा तोह मैंने भी तरस खा कर दे दिया. उसके बाद बस हाथ से 1 मिनट हे सहलाया था उसका पेनिस और साले ने मेरी जीन्स के ऊपर हे उलटी कर दी. ये जो सड़को पर मजनू घुमते है न हर लड़की को ऐसे देखते हुए की उनसे बड़ा मरद कोई नहीं, वो बिस्टेर पर जाने से पहले हे ताये ताये फिस्स हो जाते है जब सामने वाली मुझ जैसी मिल जाए तोह. I'm स्टिल वर्जिन बी थे वे.", अब जीनत ने अपना टॉप खिंच कर थोड़ा सही किया और अपनी बहिन का वो खूबसूरत हाथ अपनी हथेली पर रखते हुए खुद हे उसके लम्बे और तराशे हुए नाखून पर वो रंग सावधानी से लगनी लगी. जन्नत के हाथो की उंगलिया गुलाबी और माँ सी थी जिन पर बस जरुरत जितना मांस चढ़ा था. अपनी छोटी बहिन के कारनामे सुन्न कर वो मुस्कुरा रही थी.

"साक्षी तोह सीरियस थी एक के साथ सेकंड ईयर में? और अर्जुन तुम्हे उस नजर से नहीं देखता क्या?", न चाहते हुए भी वो अपनी बहिन के साथ अर्जुन का नाम जोड़ कर उसकी प्रतिक्रिया देखना चाहती थी.

"साक्षी सीरियस थी लेकिन वो पेंडू 3 महीने तोह दिखावा करता रहा और फिर जब एक बार सेक्स हो गया तोह वो उसको फाॅर्स करने लगा की साक्षी उसके दोस्त के साथ भी करे. साक्षी ने यहाँ तक कहा था के वो उसकी किसी फ्रेंड से बात करवा देगी लेकिन जानती हो उस पेंडू ने क्या जवाब दिया?", अब बड़ा ताज्जुब हो रहा था जन्नत के ये सब सुन्न कर.

"क्या?"

"बोलता की एक नहीं उसके 2 और दोस्त है जो एक साथ उसके साथ करना चाहते है क्योंकि वो उन्हें साक्षी के साथ चुदाई का बता चूका है. मैंने तोह बस इतना हे सुना जब वो रोटी हुई मुझे सब बता रही थी और दसप आंटी थे उन्हें लगा दिया फ़ोन. साले फिर नहीं दिखे कभी. एक से संभालती नहीं न ऐसी गरम जवानी तोह साले 3-4 मिल के मजे लेना चाहते थे. पर अर्जुन को देख कर तोह उल्टा मेरी पंतय गीली हो जाती है डीडू. उसके डोले शोले हे नहीं सामान भी बहोत भारी है. आज वो इंसिडेंट हुआ था न पिछली गली में जो मैंने बताया था आपको, बस तभी झटके से मेरा हाथ फिसल का वह जा टिका और मैंने थोड़ा कस के पकड़ा तोह जैसे मेरी आवाज हे चली गयी थोड़ी देर के लिए. शायद वो भी उन बचो की वजह से ध्यान नहीं दे सका या इग्नोर कर दिया होगा पर वो ढीला भी अंकित के खड़े हुए से डबल मोटा था. मैंने साक्षी को बताया तोह वो कामिनी मेरे सामने हे उसका नाम ले कर मसल के गयी है अपनी. पता नहीं उसमे किस बात की अकड़ है जब सामने से इतनी सुन्दर लड़की उसको सीधा लाइन दे रही है के आओ और चढ़ जाओ फिर भी नखरे दिखा रहा है.", बुधवार वाली पार्टी की बात वो अपनी बहिन से गोल कर गयी थी क्योंकि पहले बता देने से बात बिगड़ सकती थी और अर्जुन के मामले में अब वो अपने इरादे बताना नहीं चाहती थी. लेकिन जो विवरण उसने अपनी बड़ी बहिन को दिया था उसकी जरुरत जन्नत को कटाई न थी.

"मतलब थोड़ा बहोत भी तेरे पास उसके लिए फीलिंग्स नहीं है सिवाए लस्ट के? वैसे दिखने में बुरा नहीं है और थोड़ा रिज़र्व फॅमिली से है तभी झिझकता है. घर परिवार तोह thik-thaak है उसका जितना लगता है और सुना है."

"आपको लगता है मैंने मजाक किया था क्या की वो क्सक्सक्सक्स और क्सक्सक्सक्सक्स गाँव का मालिक है? वो कॉलेज वाली बात भी सच है डीडू और आपने शिल्पा भाभी से नहीं सुना था की वह दूसरी शादी भी हुई थी जो क्सक्सक्सक्स फार्मा के ओनर की डॉटर के साथ इन नयी भाभी के भाई की हुई? जहा कम और रॉयल फॅमिली तक बिना सिक्योरिटी घूम रहे हो तोह आप खुद हे सोचो न के ये फॅमिली कैसी होगी. बस ये अर्जुन मेरी समझ में नहीं आया जो एक बुलट पर हे घूमता दिखा है.", अब जन्नत ने इन सभी बातों पर गौर किया था और अभिषेक भैया की फॅमिली भी तोह वही सब बता रही थी जिसको उसने उस वक़्त ज्यादा तरजीह नहीं दी थी.

"शायद उसको अपनी फॅमिली के रुतबे का घमंड हे नहीं है और न खुदके स्टेटस का. ी मैं इतने बड़े विल्लगेस अगर उसकी प्रॉपर्टी है तोह वो बजाये उन्हें एसेट्स मान ने के उल्टा उनको हे डेवेलोप कर रहा है. पर मुझे ऐसा क्यों लगता है की कुछ और भी ख़ास बात है?", यहाँ वो जीनत को टटोल रही थी क्योंकि दिमाग में राजहंस वाली बात पर अर्जुन का जवाब घूम रहा था. एक हाथ के नाखून सज चुके थे और अब वो दूसरे को आगे तकिये पर रख चुकी थी.

"भाड़ में जाए सबकुछ डीडू पहले हे बड़ा कम्पटीशन फील हो रहा है और अब आप भी उसकी बात ले कर बैठ गयी. आपको तोह लड़को में इंटरेस्ट हे नहीं था. ाचा तोह अपने फैन से इम्प्रेस हो आप? क्या पता दिखावा कर रहा हो टाइम पास के लिए."

"कैसा कम्पटीशन? तू और साक्षी तोह ऐसे मामलो में सीरियस नहीं होती."

"हाँ पर अर्जुन खास फ्रेंड है मेरी फ्रेंड मिनी का जो उसके हे गाँव में रहती है लेकिन मिनी बता रही थी की आज प्रिंसेस उसके बुलट के पीछे बैठ कर वह कॉलेज साइट पर गयी थी और फिर उनके घर भी. बाद में वो शहर आया था तोह उन्हें महल छोड़ने के बाद हे इधर आया होगा. क्या मैं सेक्सी नहीं हु डीडू? आपके ये 32 बी मेरे 36 डी के सामने तोह दीखते भी नहीं और जितने लड़के मिले सब मेरी बैक को घूरते है पर अगर मैं सेक्सी हु तोह ये लड़का क्या चाहता है?"

"अरे जिनि तू तोह सबसे ज्यादा सेक्सी है बस लगता है अर्जुन थोड़ा रिज़र्व टाइप का है क्योंकि फॅमिली प्रेशर और इमेज भी तोह कोई चीज होती है न पब्लिक में. रही बात प्रिंसेस अमृता वाली तोह अब उसका भी कोई न कोई कनेक्शन हो हे सकता है. अब वो दोनों विलेज बड़े भी है और पोलिटिकल स्टंट के लिए वो लोग पब्लिक के सामने ऐसा कर सकते है. हर चीज को बहार से नहीं देखना चाहिए, क्या पता 32-बी थोड़ा ज्यादा टाइम तक मेन्टेन रहे और 36-डी बाद में लटक कर 40-इ बेडोल बन्न जाए. थैंक यू फॉर थिस ग्रूमिंग कीड़ो. गूडनिघत.", वो पहली बार इस दौरान अपनी बहिन को छेड़ रही थी.

"हाँ सही कहा आपने. ये भी तोह ंप है और बिज़नेस वुमन इलेक्शन में कड़ी होगी तोह कॉलेज के नाम पर भी वोट मिलेंगे. आप सचमुच ब्यूटी विथ ब्रेन हो डीडू लेकिन ये जब ढीले होंगे तब होंगे, आप स्टेचू जैसी बानी रहो बस. उम्र हो गयी है आपकी भी थोड़े मजे लेने की और वो निकल गयी न फिर पेज 3 पे आएगा की 35 साल की सुपर मॉडल ने की 60 साल के रिच टाइकून से शादी. न वो इन्हे मसल कर 34 कर सकेगा और न आप उस का खड़ा कर सकोगी. हाहाहा.", इतनी खुली बात सुन्न कर जन्नत उसके सर पे चपत लगाती हुई कमरे से बहार निकल गयी.

"तू और तेरे एक्साम्प्लेस. तेरे से सिर्फ एक साल बड़ी हु मैं. चल अब गूडनिघत एंड wet-dreams.", जन्नत अपने कमरे में आते हे मुस्कुराती हुई दरवाजा बंद करके अपने बड़े बाथरूम जा घुसी. चेहरा ठन्डे पानी से साफ़ करती हुई वो अपने नाखून पर ये आकर्षक रंग देखने के साथ अपनी आँखों को भी गौर से निहार रही थी. कुछ याद कर उसकी मुस्कराहट लम्बी हो गयी. कमीज को उतार कर हक्क पर लटकाया तोह उसके आकर्षक सीने पर वो दोनों गोरी गोलाई एक आकर्षक नीली ब्रा में क़ैद आपस में जुडी थी जो अगले हे क्षण आजाद हो गयी. उन्हें देख कर खुद हे जन्नत की नजरो में शर्म उतर आयी क्योंकि वो इनको बरकार रखने के लिए भरसक म्हणत करती थी पर इस नजर से आजतक नहीं देखा था. तुरंत उन्हें पहले वाली नीली बनियान के पीछे चिपटी वो बाथरूम बंद करके बिस्टेर पर आ लेती. अब बड़ी लाइट की जगह बस एक लैंप जगमग था उस कक्ष में.

'लोग मुझे कहते है की मैं उनकी समझ से बहार हु और आज तुम मिले हो जो ऐसे मिले हो की दिमाग से न जा रहे हो न तुम्हे समझ प् रही हु. जिनि जैसी खूबसूरत लड़की नजरअंदाज करते हो, प्रिंसेस तुम्हारे पीछे बैठती है और तुम मेरे साथ नर्वस थे? पता नहीं कल मिलने तक मेरे पास कितने सवाल होंगे और तुम कितनो के जवाब डोज, अजनबी. गाल पर दिल अनजाने हे बन्न गया पर अब ये बेचैनी तुमसे मेरी तरफ क्यों आ रही है? क्या रिश्ता है अर्जुन ये जो मुझे बेबस कर रहा है?', छत पर घुमते उस 4 ताड़ी के पंखे को निहारती वो खुदसे हे बातें कर रही थी और ये सबकुछ जन्नत के जीवन में आज पहली बार घटित हो रहा था. फिर एकाएक हे उसको अर्जुन की कही बात याद आयी.

'आपकी हर तस्वीर को नियम भुला कर समेटने वाला इंसान क्या ऐसी यादगार को सार्वजानिक करेगा जिसमे वो खुद अपनी कल्पना के सार्थक होने का गवाह हो?', और ये याद आते हे जैसे जन्नत को सबसे जरुरी जवाब मिल चूका था. लेते हुए हे जन्नत ने हाथ बढ़ा कर बिस्टेर पर पड़ा वो लैपटॉप चालू कर दिया जिसकी जगमग स्क्रीन पर सिर्फ वही तस्वीर थे और उसकी रौशनी बंद करने का समय 'नेवर' करके वो करवट के बल होती बस खुदको उसके गाल पर होते रखे देखती रही.

'मेरा पहला किश जो अनजाने में हे सबसे बड़ी यादगार बन गया. थैंक यू जिनि इस अकड़ू से मिलवाने के लिए. कुछ भी हो पर काम से काम एक प्यारा दोस्त तोह बनेगा, फैन मैं हु अब शायद.', और आँखें बंद करने से पहले जन्नत ने इस बार तस्वीर पर उसके होंठो को बड़ी सावधानी से चूमा था जैसे कही कोई देख न ले या अर्जुन तस्वीर में हे आँखे न खोल दे. फिर शर्म से उसने एक बार ये जांचा और तकिये पर गाल टिकाये उसको देखते हुए हे नींद में चली गयी. आज जाने अनजाने हे वो खुद को एक डोर में बंधा पा रही थी जिसका भविष्य और रिश्ता कुछ पता नहीं था.

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ठीक मध्यरात्रि के समय पंडित मोतीलाल जी की ये हवेली किसी भरे बादल से पहले रुकी हवा सी शांत और खामोश थी. हर कक्ष का द्वार बंद और सभी गहरी निंद्रा में अपने अपने बिस्टेर पर. बस ये विनोद का हे कक्ष था जहा आज विद्युत प्रकाश की बजाये मिटटी के तेल भरी कांच की लालटेन दीपित थी. उस laal-naarangi रौशनी से जगमग बड़े बिस्टेर के एक हिस्से में बेहद अविस्मरणीय दृश्य chal-yaan था. लाल वस्त्रो में लिपटी अनामिका जाँघे फैलाये अर्जुन के एक पत् पर बैठी उसके मुख से मुख जोड़े एक नए रिश्ते की और अग्रसर थी. लाल चोली का कसाव एक हाथ से काम करते हुए अर्जुन ने सीने का वस्त्र ऊपर खिसका दिया था. अपने इस कामपुरुष के आगोश में अनामिका पूर्ण सहज और सामने से शामिल खुद हे उसकी हथेली को अपने दूध भरे उस मोठे उभार पर टिकती फिर से उसके चेहरे को थाम बड़ी हे तल्लीनता से जिव्हा रसपान करती रही. साढ़े 5 फ़ीट की chhyi-muyi सी अनामिका का तराशा हुआ जिस्म इस पल में कही से भी अर्जुन की टक्कर का बेशक न था लेकिन उसके अरमान और समर्पण भली भांति उसको अर्जुन के समक्ष बना रहा थे.

"सेहलाओ.. उम्", एक जगह रुके अर्जुन के हाथ को सुचारु करने के लिए वो बस धीमे से उसके कान में फुसफुसाती हुई अर्जुन कान की लो पर होंठ फिर कर उसको हे दांतो से दबाने लगी. पिछले हाथ से अनामिका के 36 के मांसल कूल्हों को कमर पर लिपटी साड़ी के ऊपर से हे मसलते हुए अर्जुन ने भी अपने दूसरे पंजे में उस मॉटे सतांन को दबा कर पिचकाया तोह सफ़ेद रास की नन्ही बूँद उभर कर फिसलती चली गयी. अनामिका सतांन मर्दन से अभिभूत होती हुए गिरे हुए पल्लू को दरकिनार करती हुई अर्जुन की दोनों जांघो पर पाँव फैलाती उसके सामान मुख कर बैठी. साड़ी इस मुद्रा में सरक कर गोरी सुडोल जांघो के मध्य तक चढ़ गयी. इस सामान मुद्रा में उनके दोनों उभर मसलता हुए अर्जुन गाल, गले और prem-majja को चूमता उस रसभरे कलश पर आ रुका.

"सब मेरा है?", किसी पौराणिक योद्धा सा वो विशाल पुरुष अपने आलिंगन में सवार इस कामुक दुल्हन से सर्वस्व की कामना लिए था और अनामिका ने भी उसके सर को अपने दाहिने उभार पर दबाते हुए हलकी सीत्कार के बाद जवाब दिया.

"सब आपका हे है.. आह्हः.. सबकुछ.. उम्म्म..", तजा निवाये दूध के पतली मीठी धार जिस तरह से अर्जुन चुसकने लगा अनामिका ने दोनों हाथो से उसका सर अपने सतांन पर हे दबा लिया. कभी जीभ से कुरेदना और कभी दांतो में भर कर हलके से काट लेना. इतने खूबसूरत स्टैनो पर ऐसा प्यारा आक्रमण तोह सिर्फ वही कर सकता था. गोरी पिंडलियाँ अर्जुन की पीठ से चिपकी उसको कैंची से बांधे थी और इस बंदन का भरपूर असर अनामिका की रास बहती नाजुक पहली हुई योनि पर अविश्वसनीय केहर ढाने लगा. साढ़े 9 इन्चा का वो अत्यधिक मोटा मूसल योनि पर लिपटे झीने से वस्त्र की परवाह न करता ऊष्मा का मूक adaan-pradaan कर रहा था. अनामिका परिचित थी उसके असाधारण अकार से लेकिन आज वो उसका था, आज अर्जुन का सबकुछ उसका था इस मिलान में. एक सतांन का चूचक सूजने के पश्चात अब दूसरे की बारी थी और वैसा करते हुए अर्जुन उस चिकनी पीठ से दोनों ऊपरी वस्त्रो को खोल कर अनामिका का धड़ निर्वस्त्र कर चूका था. उसके बेदाग़ चमकते बदन को इस अवस्था में निहारने के लालच से अर्जुन खुद को रोक न सका और अपने प्रेमी की अनकही चाहत को पूरा करती अनामिका भी उसके कंधो को पकडे वृक्ष की बहार निकली दाल सी पीछे लहरा गयी.

"आह्हः.. आप बेमिसाल हो.", दोनों उभार छत को देखते पूरे उठान पर थे और अनामिका की कमर को थामे अर्जुन उस स्वर्णिम प्रकाश में दमकते अनामिका के चेहरे से अन्दर धंसे पेट तक अवलोकन करता इस खूबसूरती को मैं के चित्रपट पर समेटने लगा था. दोनों गोलाकार उभर किसी समय बस मोसम्बी से रहे होंगे पर मातृत्व ने उन्हें आज रसभरे लाल चकोतरे सामान बना दिया था, जरा सा भी लटकाये बिना. दोनों वक्षो की तलहटी में होंठ दबाये अर्जुन अब अनामिका की पसलियों से हाथ फिसलता हुआ उस समूचे सतांन की प्रक्रिमा माप कर उभरे चूचक को मसलने लगा.

"ये आजतक कोरे है... आह्ह्ह्ह.. इनका दर्द ख़तम कर दो.. अर्जुनंनं..", वापिस अपने स्थान पर आती अनामिका ने उसके चेहरे को दोनों वक्षो पर दबा लिया. उचकने के बाद फिर से उसकी गॉड में निचे होते हुए अनामिका ने उस भीमकाय लिंग को सुपडे से तलहटी तक अपनी योनि की फांको से इस कदर रगड़ा था की दोनों के मुख से एक मीठी कराह फूट पड़ी. पके चकोतरा को दोनों हाथो से मसल कर उनका रस निकलता हुआ अर्जुन अपने जीभ से सम्पूर्ण सीने को चाटने लगा. एक कटरा भी वक्षो की गोलाई से अनामिका के पेट तक न पहुंच सका, इतना लालायित और केंद्रित था अर्जुन.

"थोड़ा ऊपर उठिये न.", अर्जुन ने एक वक्षो को मसलते हुए दूसरा हाथ उस फिसलन भरी मांसल जांघ पर सहलाते हुए अनामिका की कच्ची की डोरी पर टिकते हुए ये सरगोशी की. अनामिका तोह जैसे उस लिंग से अपनी गीली योनि हटाने को तैयार हे न थी लेकिन उसका अर्थ समझती वो पंजो की गिरफ्त अलग कर ऊपर उठने लगी तोह उसके नितम्बो के कटाव को सहलाता अर्जुन एक बार कस कर उस मांस के बड़े गोले को मुट्ठी में जकड़ने के बाद कच्ची को खिसकता हुआ निचे ले चला. वो एक झटके में उसको पृथक भी कर सकता था परन्तु ये उनके पहले पूर्ण मिलान की यादगारो का हिस्सा थी और अनामिका ने भी एक पाँव से सिरा निकाल कर वैसा हे दूसरी तरफ दोहराया. साड़ी ने दोनों गोरी टांगो पर्दा करने की कोशिश की लेकिन अर्जुन ने दोनों निर्वस्त्र कूल्हों को थाम कर अनामिका को निचे अपने चेहरे पर खिंचा तोह खुद अनामिका ने हे ये लाल वस्त्र समेत कर ऊपर उठा लिया.

"आह्ह्ह्हह्ह.. इस्स्स्सस्स...", ये कामुक सीत्कार अर्जुन द्वारा उन नरम फांको को मुँह पर रखने के बाद रास बहती योनि के मुख पर जिव्हा टिकने से निकली. लिजलिजे से maans-bhare योनि के होंठ उसके मुँह पर डाब कर खुद हे रास्ता दे रहे थे और काम गागर को ाचे से चखता अर्जुन आज अनामिका को हर वो सुख दे रहा था जो आज से पहले अनामिका की kaam-kala की पुस्तक में अनुपस्थित रहा. गीली योनि की फांको को चीयर कर ऊपर निचे चलती जीभ हर कतरे को मुख में समां लेती. अर्जुन के असाधारण ताक़त का ये छोटा सा प्रमाण हे था जो दो हाथो से अनामिका के कूल्हों को दबोचे उसको अपने मुख पर बिठाये योनि पटल का हर हिस्सा चूम चाट रहा था. जब गागर का बाँध टूटा तोह अनामिका कांपती हुई चीखना चाहती थी पर इस घर में अभी इतनी आजादी न थी की वो अपनी ख़ुशी की चीखे देहलीज से बहार पंहुचा सके. तप तप करती उन बूंदो का कोई शोर तोह न था पर उनके बहने से अर्जुन के कंधो पर अनामिका के नख जैसे मांस को भेद कर भीतर सामना चाहते हो. गहरी सांसें भर्ती हुई अनामिका की चेतना तभी लौटी जब उसने खुद को बिस्टेर पर चित्त पाया. कमर से वो लाल वस्त्र उतर कर एक तरफ पड़ा था और बेशर्मी से घुटने मोड वो अपनी योनि पर अर्जुन की हथेली का आनंद लेती निहाल होती रही. अर्जुन का उसके प्रति इतना समर्पण और प्रेम देख काजल भरी आँखों से छोटे छोटे तरल मोती लुढ़कने लगे थे.

"ये आंसू थोड़ा देरी से निकलने वाले थे और आपको ज्यादा हे जल्दी रहती है.", अर्जुन ने एक पिंडली को चूम कर योनि वाले हाथ से हे उन चिकनी जांघो का हिलता मांस सहलाते हुए जिस तरह अनामिका को देखा था वो अपनी मुस्कान रोक न सकीय.

"सब तुम हे करोगे? ये कितना परेशां है, क्या इसको प्यार की जरुरत नहीं.", अर्जुन के मॉटे लिंग को मुट्ठी में भरने के चेस्टा करती अनामिका ने ये बात आँखों में आँखें दाल कर कही थी, एक कुशल अर्धांगिनी या समर्पित प्रेयसी की तरह. उसकी नाजुक छोटी सी छूट इस लिंग के सामने भले हे बेबस दिखती पर चाहत तोह उसकी भी यही कामदण्ड अपने भीतर सामने की थी. अनामिका की पकड़ अब लिंग की हलकी मालिश में बदलती हुई हथेली से उसकी जड़ और सुपडे का सफर बेहद नरमी से करने लगी. दोनों एक दूसरे के गीले होंठो को बारम्बार चूमते चूसते हुए अपने अपने हाथो से विपरीत jann-nango की मालिश करते रहे. जब जब अर्जुन अपने अंगूठे से अनामिका की योनि की फांको पर उभरे काम बिंदु को सहलाता, वो और मजबूती से उसके लिंग को जकड लेती. योनि की फांको पर कही ज्यादा चिकनाहट भरने लगी थी.

"इस से मालिश करो, तभी थोड़ी आसानी होगी.", अर्जुन ने लालटेन के समीप राखी वो तुबे अनामिका को खोल कर थमने से पहले खुद की ऊँगली पर भी वो पारदर्शी क्रीम उड़ेल ली थी. योनि की बहरी दीवारों पर मसलने के साथ अब वो एक ऊँगली से अनामिका की कासी हुई योनि को भेद कर चिकनाहट भरने लगा. मात्रा की परवाह न करती अनामिका ने तुरंत हे ढेर सारा अप्राकृतिक गधा तरल हथेली पर लेते हुए उस कामदण्ड का वो टमाटर सा सूपड़ा जकड लिया. एक ऊँगली के घर्षण से हे वो अपने कूल्हे हिलती अर्जुन से चिपकने लगी थी. लिंग उस अत्यधिक चिकनाहट से शीशे सामान चमकता हुआ किसी आग में दहकते गोलाकार इस्पात सा लगने लगा जिसका उद्देश्य अनामिका की भट्टी को भेद कर उसे अपने काबिल बनाना था. अर्जुन जानता था की मामूली नाखून की गलत रगड़ भी योनि की अंदरूनी दीवारों को कष्ट पंहुचा सकती है.

"जल्दी करो.", अर्जुन उन्हें सही मुद्रा में लिटन हे लगा था की वो उसको अपने ऊपर खींचती हुई खुद हे बोल उठी. और अगले हे पल दोनों मुस्कुरा उठे, अनामिका थोड़ी शर्म से.

"पता है आप इतनी खूबसूरत और कामुक लग रही हो की इस पल में आपकी खींची तस्वीर हे किसी भी पुरुष को नाकारा कर देती. ये भरे हुए गाल आज से पहले मैंने इतने चमकते नहीं देखे थे और आपके बूब्स तोह जैसे पहली बार इतना खुल कर हवा में सांस ले रहे है बाकी जिस्म की तरह. इतनी पतली कमर और ये प्यारी छोटी सी नाभि.. सुबह यक़ीनन आपसे ढेरो सवाल होने वाले है अनामिका.", अर्जुन ने अपनी स्थिति सही करते हुए दोनों चूचक चुभलाने के बाद अनामिका की आँखों और गाल पर भी ढेरो चुम्बन जड़ दिए. अनामिका ने स्वयं हे अपने हाथ से उसका वो अत्यधिक मोटा सूपड़ा अपने योनि पटल पर टिकते हुए प्रतिउत्तर में एक जोरदार चुम्बन जड़ते हुए लगभर उसके होंठ हे चबा डाले.

"आग अभी लगी है सवाल सवेरे होने है. पहले उन सवालों के जवाब ढूंडू या अपनी चाहत पूरी करू? तुम नीरे अनादि हे हो मेरे प्यारे कन्हैया.. आह्हः.. एक घंटे से ऊपर ऊपर से लगे हुए हो और अब बातें करके सवेरे होने की प्रतीक्षा करोगे क्या?", अनामिका की बात सही थी और उसके कहने के अंदाज से अर्जुन भी अपनी हथेलियां उनके पीठ की तरफ खिसकता हुआ उन्हें अपनी जकड में भरने लगा. अनामिका ने आँखें मूँद कर थोड़ा सख्ती से वो भीषण सुअपड़ा अपनी फैंको के बीच yoni-chhidra पर दबा लिया.

"मुझे न 4 साल पहले हे गाँव आ जाना चाहिए था.", अर्जुन ने अनामिका की गर्दन के पीछे तक हाथ पंहुचा दिए थे उसके ऊपर छाए हुए हे. और एक बार ाचे से mukh-swaad लेते हुए उसने हल्का सा दवाव बढ़ाया तोह क्रीम की चिकनाहट और योनि की भरपूर मालिश की वजह से फांके फैलने लगी.

"आअह्ह्ह्ह.. तब तोह दोनों जेल में होते.. आह्हः. चची ने किया नाबालिग भतीजे का बलात्कार.. पंडित परिवार हुआ शर्मसार.. आईईईई माआआअह्ह्ह्ह.", वो मस्ती में हंसती हुई एकदम से अथाह दर्द से भर उठी जिसकी चीख बस इतनी हे बहार निकली जितनी शब्दों में थी. एक माध्यम से धक्के में हे वो छतो सी योनि बुरी तरह फैलती हुई सुपडे से आगे 1 इंच अधिक लिंग भीतर खिंच चुकी थी. हर वक़्त इंसान म्हणत करता रहे तोह जिस्म बहोत सी जगह से कस जाता है जिसका प्रमाण अनामिका की योनि थी. अर्जुन भी अपने सुपडे को एक अछूती सी गुफा में जकड़े महसूस कर रहा था. दोनों सतांन उसके सीने में डाब कर स्वतः हे दुग्ध उत्पादन में लगे थे, मालिक की पीड़ा को अनदेखा करते. अनामिका हिम्मतवाली थी जिसने जल्द हे अर्जुन के होंठो को चूस कर अपना जिस्म फिर से हरकत में ला दिखाया. टाँगे ऊपर उठाने की कोशिश करती वो तैयार थी अगले आघात के लिए. अर्जुन ने भी एक हाथ बहार निकाल कर उनकी कोमल जांघ ऊपर उठाते हुए इसकी पुष्टि कर दी. लालटेन की अधिक रौशनी भी दोनों के निचले हिस्से पर हे केंद्रित थी जहा मांस के रबर सी फैली हुई अनामिका की योनि में वो भीषण लिंग एक तिहाही समाहित था. ऐसा प्रतीत होता था जैसे एक अक्षत यौवना पर सचमुच जंगली घोडा सवार हो. लिंग थोड़ा बहार निकला तोह योनि कपाट भी उसके संग खींचे आये. तरल की तार सी अनगिनत डोरी लिए. और अगले हे क्षण वो निचले कूल्हों की जद्दी पानी से गुब्बारों सी थरथराने लगी जिनके केंद्र में वो मांसल चला पूरी तरह चौडाता 7 इंच तक उस कष्ट सामान सख्त लिंग को लील कर 2-3 रक्त्रीम रंग बहार टपका गया.

"बस अनामिका.. शहहह.. हिम्मत रखो.. हो गया.. ", माथे पर अनगिनत पसीने की बूंदे, चेहरे पर काजल फैलते आंसू और दर्द में सर पटकती अनामिका के निचले होंठो को थामे अर्जुन ने इन्तजार किया और जब 2-3 मिनट के अंतराल पर अनामिका ने अपने चक्षु आहिस्ता से खोले तोह दोनों बस एक दूजे को ख़ामोशी से देखने लगे. उसके गालो को साफ़ करते हुए अर्जुन ने वो सारे आंसू और पसीना होंठो से पांच दिए. जिस्म में गर्मी लौटने लगी थी और वो दोनों हाथ से उसका चेहरा थामे बस लगातार चूमती रही, मूक शुक्रिया कहती हुई जैसे वो आज जा कर कही पूर्ण हुई. अर्जुन भी उनकी वो जांघ संभाले अब उस तरफ के सतांन को मसलने लगा था जो पूरा दूध में भीगा ख़ुशी से कैसा हुआ था.

"अब दर्द नहीं है.. बस ऐसा लगा जैसे मैं आज हे औरत बानी हु अर्जुन.. तुमने कितनी कोशिश की लेकिन मैं थोड़ी कमजोर हु न. आइंदा तुम्हारी अनामिका तुम्हे शिकायत का मौका नहीं देगी... उम्मम्मम", टुकुर टुकुर देखते अर्जुन को जितने प्यार से अनामिका ने जवाब दिया था उसका दिल खुद भी पीड़ित हो उठा.

"मैं उस दिन पहली कोशिश पर हे जान गया था के आपको बहोत दर्द होने वाला है इसलिए तोह इस होनी को टालने की कोशिश करता था.. वैसे अब भी पंडित जी का परिवार शर्मसार हो सकता है अगर ये बहु बोल दे भतीजे ने बलात्कार कर दिया.", अनामिका उसके कंधे पर नाखून गदति हुई दर्द में भी हंसने लगी थी.

"चालु हो पूरे तुम.. धूर्त कही के.. आह्हः.. अब बस मुझे ये पूरा एहसास करवाओ की मैंने तुम्हे पा लिया है अर्जुन.. हाँ मेरा एकमात्र प्यार तुम्ही तोह हो जबसे हम मिले थे. वो बगावत या बेशर्मी नहीं थी जब तुम्हारे सीने पर मेरा बीटा और इन बाहों में मैं थी. वो चुम्बन धन्यवाद नहीं मेरी चाहत थी तुम्हारे प्रति, तुम्हारे प्यार और उस आत्मिक सुरक्षा के प्रति जो सिर्फ मैंने तुमसे पाया. ुह्ह्ह्ह..", 2 इंच का हे घर्षण एक मादक कराह निकलवा गया इस खुलासे के बाद. थोड़ा निचे झुक कर अर्जुन ने दूसरे सतांन को मुँह में भर कर बस इतने लघु धक्को को आहिस्ता आहिस्ता सुचारु कर दिया. अनामिका हर रगड़ पर कसमसाने लगती और जैसे आज उसको ज्ञात हुआ हो की सही लिंग उस जैसी महिला की छूट को भी कोरी सा एहसास करवा सकता है. दुग्ध कलश खुद हे उसके अधीन हो कर अपना रास पिलाने लगे थे जो सचमुच अपने आप बहने लगा था. अनामिका ने अपनी दूसरी जांघ भी उठानी चाही तोह अर्जुन ने उसको भी थाम लिया. थोड़ी रमा होती छूट अभी भी गरम थी और कसाव पहले सा बस अत्यधिक चिकनाई लिए. अनामिका के कूल्हों इस मुद्रा में ऊपर उठने लगे थे जब दोनों पाँव अर्जुन की बाहों में घिरे ऊँचे हो गए. धक्को की गहराई प्रतिपल बढ़ने लगी जहा 5-6 इंच तक लिंग अंदर बहार होता हुआ योनि के घेरे को भी एक सामना लाये में कभी भीतर तोह कभी बहार दिखने लगता. महीन कॉमर्स की धरा बहती हुई उस हलके भूरे से बंद छेड़ पर जमा होने लगी जहा से अनामिका अक्षत थी, उसके गुदाद्वार पर. दोनों अब खुल कर आहें भरते हुए एक दूसरे को जहा दिल करता वह चूम लेते. स्टैनो की जोड़ी उन मजबूत पंजो में लगातार खुदको मसलवा रही थी जिनके चूचक धातु से कठोर हो चले.

"आअह्ह्ह.. अनामिका... थोड़ा ढीला छोडो मेरे लुंड को..", अर्जुन थोड़ा अधिक उत्तेजित हुआ जब सखलनं के मजे में अनामिका ने दोनों टाँगे उसकी कमर पर लपेटने के बाद छूट को भी बुरी तरह कस लिया. यहाँ गलती उस से भी हुई जब इस अप्रत्याक्षित दुस्साहस के नतीजे में अंतिम 2 इंच भी उसके भीतर उतर गया. गर्भद्वार में सूपड़ा जैसे एक क्षण के लिया फंसा हो. वो झड़ते हुए भी कराह रही थी अपनी इस गलती पर और जब अर्जुन के अल्फाज सुनाई पड़े तोह वो उसकी गर्दन खींचती हुई उसके सीने को काटने लगी. पहले मिलान में हे छूट की धज्जियाँ उड़द चुकी थी, अर्जुन की सावधानी के बावजूद. हवा की aava-jahi के लिए खुला वो छोटा सा रोशनदान जैसे अब धक् चूका था जिधर से 2 आँखें इस कामुक मिलान को हैरत से देखती रही. अर्जुन इस उपयुक्त कॉमर्स के भराव का प्रयोग करता हुआ पूरा लिंग बहार खिंच कर अनामिका को पलटने के बाद अश्व मुद्रा में इस प्यारी घोड़ी के ऊपर आ चढ़ा. दोनों इस दौरान इतना खिसक गए थे की वो बिस्टेर के प्रारम्भ में दोनों गड्डो को घेरे थे. 34-36 से के प्यारे गोलाकार कूल्हों के बीच वो भयंकर लिंग उतरता तोह दोनों कूल्हे फ़ैल कर दूर होने लगते, रबर की तरह हिलते हुए. अनामिका सर बिस्टेर पर टिकाये जैसे निचे से हे इस क्रिया को देखती सिसकती रही. दूध निचोड़ता हुआ अर्जुन अब सरपट उनकी maans-bhari योनि की फांको को चौडाता हुआ अपना मूसल बस सूपड़ा छोड़ कर अंदर बहार करने लगा था. वो आँखें इस अध्भुत संसर्ग को देखती हुई जाने कौनसी कल्पना के सागर में गोते लगाने लगी. इतना भयंकर लिंग, नाजुक सी अनामिका और पहाड़ सा उस पर चढ़ा अर्जुन जो हर धक्के पर अनामिका के जिस्म का जर्रा ज़रा हिला देता लेकिन बदले में अनामिका की होंठो से जो शब्द निकल रहे थे वो उम्मीद से भी परे थे.

"आअह्ह्ह.. उईईई.. और तेज.. इन्हे मसलते रहो.. ूमममम... पूरा नहीं.. आह्हः.. फाड़ दो .. फिर कभी दर्द नहीं देगी.. आह्हः मेरे अर्जुननननन..", और अर्जुन भी कभी धीमा होता हुआ अनामिका की पीठ को चूमता, चुके सहलाता या कूल्हों पर दांत गाड़ने लगता. वो गुलाबी सुरंग उतनी हे कासी थी लेकिन इस जोरदार घर्षण को सहने में उसको अब मजा आने लगा था. अर्जुन अलग हो कर बिस्टेर से निचे आ खड़ा हुआ और बिस्टेर पर चित्त लेती अनामिका अपनी योनि को सहलाती हुई एक और बार इस स्खलन को बर्दाश्त करती अपनी आवाज को दूसरे हाथ से रोके हुए थी. छूट फूल का कॉमर्स में भीगी हुई अपनी महक पूरे कक्ष में भरने लगी.

"अभी तक नहीं हुए क्या? आह... पता नहीं सचमुच सुबह उठ सकुंगी या नहीं.", अनामिका की जाँघे अब कुछ दिन तक सटने नहीं वाली थी. फिर भी वो अर्जुन की तरफ घूमी तोह उसने उन्हें कमर से पकड़ कर किसी बचे की तरह ऊपर उठा लिया.

"अब मैं होना चाहता हु अनामिका लेकिन ऐसे की तुम्हारा पूरा जिस्म मेरे साथ हो.", उसकी बात समझ कर अनामिका ने भी होंठो से होंठ मिलते हुए अपनी टाँगे उसकी कमर पर लपेट ली थी. एक हाथ से लिंग को 2-3 बार योनि की दरार में घिसते हुए अर्जुन ने एक झटके में हे पूरा भीतर उतार दिया. अब उसका सूपड़ा कुछ अधिक हे फूल चूका था जिसने अनामिका की घुटी घुटी सी चीख निकलवा हे दी. जितने आराम से वो उन्हें हवा में लिए अपने लिंग पर सुपडे से जड़ तक उछाल रहा था, इतना दम वो भी इतनी लम्बी चुआड़ी के बाद शायद हे किसी पुरुष में हो. अब ये संसर्ग अपने चरम पर था जहा खुद बा खुद उछलती अनामिका को हर ठोकर अपनी छूट के अंतिम हिस्से पर लगती. अर्जुन का सीना पसीना और उसके दूध से बुरी तरह भीग कर अब अनामिका को भी अपने सामान बना चूका था. कॉमर्स की अत्यधिक महक और दोनों की हलकी आएह्ण इस बंद कमरे से बहार वो 2 आँखें भी रोके हुए थी जो शायद अपने जिस्म को भी सहलाती हुई इनके साथ मजे में शामिल थी. अनामिका इस बार झड़ी तोह अर्जुन ने भी उसकी कमर अपने लिंग पर दबाते हुए वीर्य रास की ऐसी बौछार करि की अनामिका को फिर से चीख रोकने के लिए अर्जुन को हे जखम देना पड़ा. कंधे पर सर टिकाये वो उसके गाढ़े गरम रास की बौछार अपने गर्भ के ऊपर करती लगभग बेहोश हो चली थी. अर्जुन का जिस्म भी लरज रहा था पर वो खुदसे अनामिका को चिपकाए उसकी कोख को भरने के बाद सीधा कमरे में बने बाथरूम में जा घुसा.

'हे राम.. अर्जुन पूरा जानवर है.. और मासूम सी अनामिका मामी कैसे उसके ऊपर मजे से उछाल रही थी..', ये एक नहीं 2 लड़कियां थी जो दबे पाँव वापिस अपने कमरे में बंद हो गयी. आँचल और अंजलि. आँचल तोह अर्जुन से वाकिफ थी लेकिन उसको ये कामकला दिखने वाली अंजलि के तोह चेहरे के रंग हे उड़द चुके थे. अब तक उसका सीना ऊपर निचे उछाल रहा था उनके आधे मिलान को देख कर.

'मां ने कभी मामी का ख़याल नहीं रखा और तू ये मत कह देना की वो शरीफ है. अब थोड़ा सुधरे है नहीं तोह पिछली गर्मी की छुट्टियों में उन्होंने तेरे ये अनार भी तोह दबाये थे. मामी अर्जुन से प्यार करती है और तूने देखा इस बार की वो कितनी खुश रहती है, पहले की तरह हमेशा घूंगट में नहीं.', आँचल खुद भी हैरान थी और उसकी भी छूट ने ढेरो आंसू बहा दिए थे उस काम लीला को देख कर और अब उसने जैसे हे आँचल का उभार दबाते हुए विनोद का जीकर किया तोह वो जवान लड़की भी नजरे झुकाती शर्माने लगी थी.

'वो.. वो मां ने मुझसे माफ़ी मांगी थी इस बार उस टाइम के लिए और मुझे डरा कर मेरी ब्रैस्ट दबाने पर. वो बहोत गंदे थे पहले जब इधर उधर हाथ लगते रहते थे इसलिए हे तोह मैं यहाँ नहीं आती थी और वो हमारे घर आते तोह मैं खुद हे कमरे में बंद हो जाती. माँ ने भी शिकायत की थी उनकी नानी से की वो ऐसा उनके साथ भी करते है. फिर मां ने थोड़ा आना जाना हे काम कर दिया. पर तुझे मामी और अर्जुन का ऐसा करना सही लगता है क्या आँचल? मां गलत है तोह क्या मामी भी बेशरम बन जाए? और वो अर्जुन जो सबके सामने इतना शरीफ बनता है कैसे उनका नाम ले कर बुरी तरह से मामी को मसल रहा था.', अंजलि ने विनोद का सच बताने के साथ जब अनामिका पर सवाल उठाया तोह आँचल ने हौले से उसका चेहरा सहलाते हुए जवाब दिया.

'कहने को तोह उन दोनों न रिश्ता चची और भतीजे का है अंजलि पर दोनों की उम्र ज्यादा अलग नहीं है. 5 साल से ज्यादा हो गए मां के साथ उनकी शादी को और तूने देखा है की वो जैसे आज हे औरत बानी है. कल को तेरी शादी हो जाए किसी मां जैसे आदमी से जो अपनी बीवी को घर में बंद करके बहार दुनिया भर में मुँह मारता फिर तोह क्या तू साड़ी ज़िन्दगी घुट्ट कर जीती रहेगी? हाँ मौसी (रौशनी) को मौसा ने सुख नहीं दिए और वो जैसे शुरू से हे अंतर्मुखी रही. न कुछ माँगा न कुछ चाहा लेकिन फिर भी मौसा उनके साथ जिस्मानी तौर पर तोह जुड़े हे थे. मामी ने क्या कहा ये नहीं सुना तुमने की अर्जुन उनका पहला प्यार है जिसने उनकी देखभाल की, मान सम्मान दिया और तुझे ये सब नहीं दिखा जबसे तू आयी है?', आँचल के तर्क ने उसकी hum-umar बहिन को सोचने पर विवश कर दिया.

'वैसे खुश रहने का अधिकार तोह सबको है आँचल पर ये समाज ऐसे रिश्ते को क्या नाम देगा? अर्जुन की तारीफ हर इंसान करता है और अगर मैं ये कबूल करू की वो मुझे भी पसंद है लेकिन भाई होने की वजह से ऐसा सोच कर भी मुझे खुद पर घिन्न आती है. पता नहीं कैसा प्यार था वो जिसमे मामी को दर्द की जगह ख़ुशी मिल रही थी. वो भी कितनी सुन्दर लग रही थी न आँचल?"

'समाज बंद कमरे में आने लगा तोह फिर ये बची खुची ज़िन्दगी भी किसी काम की नहीं. वो जबसे यहाँ आया है न अपने कमरे से ज्यादा वो मामी के साथ सोया है लेकिन ये सब उनके बीच पहली बार हुआ है जिसका मुझे पूरे यकीन है. भाई वाली बात पे अब तू हे सोच की मां तोह मेरी और तेरी, दोनों की माँ के साथ उनकी मर्जी के बिना बहोत कुछ गलत सलत कर चूका. ऐसा उन्होंने तेरे और मेरे साथ भी किया जबकि वो गलत था पर किसी ने उनके खिलाफ कुछ न किया. अर्जुन ने किया और मां को जेटली का एहसास है इसलिए वो अब वो घर से दूर है. तुझे घिन्न आती है ये सोचने सी की तुझे अर्जुन पसंद है तोह मुझे उल्टा खुद पर नाज होता है की मुझे प्यार भी हुआ तोह ऐसे इंसान से जो जिस्म की चाहत हे नहीं रखता लेकिन जब जिस्म से जिस्म मिलेंगे तोह मामी से ज्यादा खुश मैं महसूस करुँगी. ये सब सोच कर मेरे ये टाइट हो जाते है और पंतय गीली जो अभी भी चिपकी हुई है.', आँचल ने उठ कर बाथरूम में जाते हे पंतय उतार कर योनि को धो लिया, दरवाजा लगाए बिना. पजामा चढ़ा कर वो वापिस आयी तोह बिस्टेर पर उकडू बैठी अंजलि तोह अभी भी सुन्न थी.

'मर जायेगी तू अगर उसका वो अंदर गया तोह. मामी बचा पैदा करने के बाद भी रो रही थी जब मैंने पहले देखा और तभी तुझको बुलाया था. फिर बाद में कितनी अलग अलग तरह दोनों करते रहे न? मैंने न मेरी मम्मी को देखा था पापा के साथ बहोत पहले, वो बस उनके पीछे लेते हिल रहे थे और कपडे पहने हुए हे सब कर लिया. तेरे बारे में अर्जुन को पता है की तू उसके लिए क्या सोचती है?'

'तू यही है न तोह खुद हे देख लियो मेरी बहना जब आज जैसी फिल्म चलेगी लेकिन वह हीरोइन मैं और मेरे ऊपर अर्जुन होगा. कर तोह मेरे घर हे लेते हम दोनों पर वो नहीं मन और अब थोड़ा बहोत किश करने के साथ एक दूसरे के पार्ट्स सेहला लेते है. उसकी गॉड में बैठ कर मैं उसको किश करती हु तोह वो मेरे मम्मी बड़े प्यार से मसलता है. फिर जब उसका खड़ा होने लगता है तोह छोड़ देता है. एक बार ऊपर ऊपर से रगड़ा था उसने और मैं एक मिनट में हे हो गयी थी. पर अब जल्दी हे सब दुरी ख़तम और तू बस देखती रहियो, है तोह तू भी मौसी के जैसी हे.', आँचल ने तकिया ले कर लेटने का उपक्रम किया तोह अंजलि भी उसके करीब हे आ लेती, कमर पर हाथ रखती हुई.

'तेरी शादी नहीं हुई है और ये सब पति के साथ धोखा होगा.'

'मैं पति के धोखे के चक्कर में अपना प्यार कुर्बान कर दू क्या? और अगर मुझे ख़ुशी मिल रही है तोह मैं उन्हें लेने से क्यों पीछे हेतु? पति अगर सचमुच प्यार करने वाला होगा तोह वो भी बस प्यार करेगा, सवाल नहीं. तेरी सहेलियां क्या ऊँगली नहीं करती? हॉस्टल वाली तोह कैंडल, पेन और जाने क्या क्या लेती रहती है फिर सवाल तोह उनसे भी होंगे और सही जोड़ीदार मिला तोह वो तोह खुश हे होगा की उसकी बीवी सेक्स में शर्म नहीं करती.'

'हाँ करती तोह है और कुछ ने तोह बॉयफ्रेंड भी बनाये हुए है पर अब तोह मेरा कॉलेज ख़तम हो जाएगा मास्टर्स के आखिरी साल के बाद. तोह तू अर्जुन के साथ सेक्स करके हे रहेगी जैसे मामी कर रही थी.?'

'जी हाँ और सिर्फ सेक्स नहीं पूरा प्यार जैसे लवर्स करते है. Ghoomna-firna, शॉपिंग, मस्ती और कभी कभी फिल्मो जैसा थोड़ा सबसे दूर.', आँचल ने आँख मरते हुए अंजलि का एक उबार भी मसल दिया जिस पर वो पीछे हट गयी.

'मुझे अलग हे सोना चाहिए तुझसे. पता नहीं रात को मुझे अर्जुन न समझ ले. तेरा हाल देख कर अब मुझे खुद पे हे तरस आ रहा है की मुझे बेमतलब में घिन्न क्यों आ रही थी जबकि सेज भाई बहिन भी नहीं हम तोह. वैसे मामी बड़ी मजबूत दिल की है आँचल नहीं तोह मां का तोह 2 ऊँगली जितना मोटा और उतना हे बड़ा था जबकि अर्जुन का जब उनकी बैक में अंदर बहार हो रहा था तोह कलाई से कोहनी जितना बड़ा लग रहा था और उतना हे मोटा. तू तभी करना जब घर में कोई न हो बहिन वर्ण पंडित परिवार..'

'हाहाहा.. कामिनी चल सो जा. और याद रखियो इसका जीकर गलती से भी मामी से नहीं करना. वो दोस्त है हमारी और दोस्तों का सहारा बनते है उन्हें अपराधी महसूस नहीं करवाते.'

'इतनी भी बुद्धू नहीं हु और अगर वैसी बात होती तोह मैं तुझे क्यों बुलाती. नाना या माँ को उठती की देखो चची भतीजा क्या मजे ले रहे है?'

'और अगर तेरी मम्मी का मूड बन्न जाता तोह अंजलि?'

'कामिनी.. कहा से सीख गयी तू इतना बोलना? मेरी मम्मी ऐसी नहीं है और अगर वो देख लेती तोह मुझे नहीं लगता वो कुछ बोलती. औरत है तोह औरत से बात करती और फिर समझ जाती की मामी की परेशानी क्या है. चल अब सोया जाए यार, तू तोह बिना पंतय के सो सकती है पर मुझे अजीब लगता है.'

'नंगी करके जब अर्जुन तुझे उछलेगा न फिर आदत पड़ जायेगी बिना पंतय के रहने की.'

'प्लीज आँचल... बक्श दे न बहिन और सोने से पहले ये सब बोलना जरुरी है? वैसे भी वही सन तोह दिमाग में बैठ गया की वो कितना तगड़ा है जो मेरे जितनी मामी को कैसे बचो की तरह झूला झूला रहा था. चल अब प्लीज कुछ मत बोल.', अंजलि ने करवट ले कर मुँह फेर कर आँखें बंद कर ली लेकिन आँचल ने उसकी कमीज में हाथ दाल कर पेट सेहलते हुए परेशान किया तोह अंजलि उन उसका हाथ पकड़ कर खुद हे अपनी छूट पर टिका दिया.

'ले मेरी माँ.. तू हे ठंडी कर दे इसको पर प्लीज कुछ बोल मैट.', और आँचल ने भी इंकार न करते हुए बिलकुल उसके साथ चिपक कर हलके हाथ से उसकी योनि को ऊपर से सहलाते हुए हल्का मजा देने की कोशिश की. जल्द हे दोनों सपनो में जा चुकी थी और रात के ढाई बजे दूसरे कमरे में अर्जुन भी अपने ऊपर अनामिका को साफ़ करके सुला चूका था, निर्वस्त्र हे. इस पल में भी अनामिका की टाँगे कुछ फैली हे थी, अत्यधिक प्रेम ग्रहण करने में कष्ट तोह होना हे था.

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"पापा और चाचा तोह आये हे नहीं दादी. आप उन्हें बोल देना की मैं उनसे नाराज हु.", सवेरे 4 बजे हे ऋतू तैयार हो चुकी थी और उसकी दादी भी समय से पहले तुलसी में जल अर्पित करके अपनी पौती के पास बहार आँगन में बैठी उसको वह रहने और जीने का ज्ञान देने में लगी थी. एक पोलिसवाले की बीवी होने के साथ उन्होंने भी दुनिया घूमी थी और कश्मीर से कन्याकुमारी तक अपने बचो, पति संग अवकाश बिताया था.

"ऐसा है की तू नाराज है और वो इधर है नहीं तोह भलाई इसमें हे है की तू खुश हो के जा और अपना सारा समय अपने हिसाब से जी. जब लौट के आएगी तोह पकड़ लियो बड़े डॉक्टर का कालर. सच कहु तोह तेरे बाप का भी दिल न लगने वाला तेरे पीछे से इसलिए उसने फर्लोव मार ली. आएगा तोह फिर नौटंकी करता पूछेगा की उसकी घरवाली और बेटी कहा गयी जबकि सब पता है उसको. तू समझदार है ऋतू और अलका आरती खुद को दुनिया में लड़की की तरह ज्यादा देखती है इसलिए अपनी माँ और नानी के साथ इनका भी ख़याल रखना. जिस तरह पहाड़ो में मौसम का कोई हिसाब नहीं वैसा हे इंसान और उधर बसने वाले जानवरो का भी. कब किसकी मैट फिर जाए कह नहीं सकते.", ऋतू ने अपनी दादी को अपने साथ लगते हुए उतने हे प्यार से जवाब दिया.

"ये मैं जानती हु मेरी प्यारी दादी और जब मैं ारु का ध्यान रख सकती हो जो सबसे बड़ा बैलबुद्धि है तोह फिर अलका कही ज्यादा समझदार है. हाँ आरती देख लेना उधर भी खाना पीना सोना और पढ़ना हे करने वाली है पर उसको कुदरत के करीब रहना ज्यादा पसंद है. आपके पीछे से वही तोह बगीचे का ध्यान रखती थी कृष्णा चची के साथ. वैसे मेरी सिफारिश लगा दो न बौ जी से की एक आध पिस्तौल हे दिलवा दे.", ऋतू की ऐसी नौटंकी सुन्न कर हलके हाथो से उसका गाल थापक दिया कौशल्या जी ने और इधर पंडित जी भी नाहा धो कर साफ़ कुरता पजामा पहने उनके सामने चारपाई दाल कर बैठ गए.

"सुन्न रहे हो अपनी पौती की बात? इसको तमंचा चाहिए अभी से. इसके बाप को तोह आजतक न दिलवाया आपने और ये उसके हे नक़्शे कदम पर है.", पंडित hi भी ये सुन्न कर हंसने लगे थे जबकि ऋतू अपनी दादी से झूटी नाराजगी दिखती हुई मुँह झुकाये बैठी थी.

"डॉक्टर के पास औजारों की कमी होती है क्या भगवान? वैसे गलत तोह नहीं कहा मेरी गुड़िया ने जब ये तुम्हे सारा शहर घुमा देती है दोपहिये पर और तुम्ही नाराज थी जब संजीव इनके लिए स्कूटरी लाया था. बेमतलब न वो प्रयोग हुई और न ये कार जो अर्जुन के बिना वैसी हे कड़ी है. सुरक्षा सबका अधिकार है और आज के ज़माने में लड़कियों का तोह कही ज्यादा. फिलहाल पुत्तर जी कॉलेज पूरा करो, फिर क्या पता छोटी सी पिस्तौल की जगह 10-10 बन्दूक धरी तुम्हारी सुरक्षा में रहे. किसी महान व्यक्ति ने ये कहा है की दिमाग से बड़ा हथियार कोई नहीं लेकिन उसको भावनाओ और गलत उद्देश्यों से दूर हे रखो. दुश्मन सामने हो या अँधेरे में, वो खुद अपनी कमजोरी तुम्हारे हवाले करेगा. गलत कहा क्या कुछ मैंने ऋतू बिटिया?", ये सब ऋतू बड़े ध्यान से सुन्न रही थी और अपने दादा जी के मुख से ये शब्द जैसे उसको उम्मीद नहीं थी.

"अर्जुन ने बताया आपको बौ जी?", उन्होंने हामी भरी और फिर खुद हे आगे हो कर ऋतू के सर को बड़े हे प्यार से सहलाया.

"इंसान बड़ा हो जाए तोह वो सबकी नजरो में आता है पर वो कैसे बड़ा हुआ ये लोग जानते नहीं बीटा. तुम्हारा छोटा भाई यही शिक्षा मुझे दे रहा था क्योंकि वो जब भी डरता था तुम उसको संभाल लेती थी. उसने मुझे स्टेडियम से पहले हुई तुम्हारी और उसकी वार्तालाप का ये छंद ऐसे हे सुनाया था और ये भी बताया की जब वो घिरा हुआ था, हम सबसे दूर अकेला तोह उसको यही याद था के कमजोर वो लोग है जिनके पास हथियार है और ताक़तवर वो खुद क्योंकि सभी उसको घेरे हुए है. तुम्हे हमने कभी किताबो और घर से इतर नहीं देखा फिर ये इतनी गहरी बात?"

"डर... डर सबकुछ दिखा देता है बौ जी पर क्या हमे वो बाँट कर बाकी सबको भी कमजोर करना चाहिए? आपने तोह ऐसा कुछ दादी जी से कभी साँझा नहीं किया होगा जिसमे कभी आपको डर लगा हो. फिर भी आप एक उदहारण है सबके लिए क्योंकि आपने उस डर को उसकी वजह तक वापिस भेजा खुद रखने की जगह. एक शांत दिमाग, माहौल की समझ और शारीरिक भाषा पहला चरण है खुद को आगे बढ़ने का. 8 नोव 1992 और ये बात आपने एक नए नए दसप को बताई थी जो संडे को आपसे मिलने आया था और अगले दिन उसकी जोइनिंग थी. 7 मार्च 1993, होलिका पूजन वाले दिन आप रघुवीर दादा जी के साथ आखिरी बार इस घर में थे और उन्होंने कहा था की अब वो कमजोर है और उन्हें कुछ याद नहीं रहता सिवाए आपके, दोनों दादी और अज्जू के. उन्होंने मुझे शालू कहा था उस वक़्त और यही शब्द कहे थे की बीटा तुम हमेशा याद रखना की दिल से ज्यादा दिमाग को प्राथमिकता देनी चाहिए. ये जो तुम्हारे चाचा है न राम, इसने जो सहा है उसको रखा दिल में लेकिन हालात के सामने दिमाग बंद नहीं होने दिया. दिमाग से काम लेने वाला इंसान ..

"कभी भी हारता नहीं और दिल से सोचने वाला अक्सर टूट जाता है'. सचमुच इतना मुझे भी याद नहीं था बीटा लेकिन तुम्हे तोह दिन और तारीख तक याद है 5-6 बरस पुराणी. कौशल्या अब मानते है की तुम ऐसे हे इस डॉक्टर को उस बैलबुद्धि से ऊपर क्यों रखती हो.", रामेश्वर जी गदगद हो उठे थे अपनी पौती की यादाशत और हर लफ्ज़ को याद करने की काबिलियत पर और उनके बीच अब अलका आ बैठी थी बौ जी की बगल में.

"ये सब मैंने हे तोह सिखाया है इसको बौ जी. अब देखो मजेदार बात मैं बताती हु जिस पर दादी ने भी गौर नहीं किया. आपका जन्मदिन आता है 31 जुलाई को और आप दसप बने थे उसी तारीख को और ठीक उसी दिन आप रिटायर भी हुए 1988 में. लेकिन कुछ और भी हुआ था उस डेट पर अगर ऋतू बता दे तोह मैं मान लुंगी की ये मुझसे बेहतर है.", अलका की नौटंकी पर ऋतू तोह हंस रही थी जबकि इन्हे चाय दे कर पास कड़ी हुई कोमल ने फटाक से जवाब दे दिया था.

"ऋतू एक महीने की हो गयी थी अगर देखा जाए तोह और अगले दिन 1 अगस्त को आरती का जनम हुआ जिस दिन पापा का भी बर्थडे आता है. अब हो गया हो तोह तुम दोनों अपने अपने बैग उठा लाओ, बहार नानी जी की गाडी आ चुकी है. बौ जी मैं और चाय अभी लेके आती हु.", कोमल के जवाब को सुन्न कर रामेश्वर जी ने प्रशंशा से अलका की तरफ देखा जिक्से चेहरे पर 12 बजे हुए थे.

"तोह कोमल ने सही जवाब दिया?"

"उनकी मेमोरी कमाल की बौ जी और यही वजह है की उनके गणित और इतिहास में कभी नंबर नहीं kat-te. हम दोनों दीदी से हे तोह पढ़ती आयी है और बाद में चची से जिनसे अब बच कर रहना पड़ता है. वो किताब पर अंडरलाइन तक के खिलाफ है क्योंकि बाकी लिखने वाला कोई बेवकूफ थोड़ी होगा. ऋतू बहिन मेरा भी बैग लेती आ न.", अलका वापिस बैठ गयी थी अपने दादा जी के कहने पर और ऋतू पहले अपने नाना नानी से मिल कर उन्हें यहाँ तक लाने के बाद भीतर चली गयी.

"आओ आओ कुंदन जी महाराज. अहो भाग्य जो सवेरे सवेरे पंडित जी के दर्शन हुए.", रामेश्वर जी का मूड तोह पहले से हे बढ़िया था और वो गले लग कर अपने समधी से मिले, हाथ जोड़ कर सुनंदा जी से जिन्होंने अलका को गले लगाने के बाद कौशल्या जी से भेंट की.

"देख लो भाभी, इनके तंज. मैंने कहा की जब गौशाला तक आ रहे हो तोह घर भी आ जाओ पर बहाना ये था की आप घर पे नहीं थी. वैसे ये भी सही है की हमे आजादी मिलने तोह लगी जब आप लोग खुद हे बचो को बहार लेके जाने लगे हो. तोह गाँव में सब ठीक से हो गया न?", रात को उमेद को छोड़ने जाने वाली बात को उन्होंने इस तरह घुमा कर बताया था.

"हाँ भाई साहब और अब बचे बड़े हो रहे है तोह उन्होंने दादा दादी तक को निश्चिंत कर दिया है सब बोझ से. बिट्टू वापिस आया क्या?"

"अगले महीने हे आना होगा उसका तोह अब. देर से हे सही पर उसको अपनी पसंद का महकमा तोह मिला और इसकी वजह भी हमारे पंडित जी हे है. वैसे अर्जुन ज्यादा लम्बी छुट्टी नहीं ले रहा?", कोमल ने चाय देने के साथ अपने नाना नानी का आशीर्वाद लिया तोह कुंदन जी ने अपनी जेब से कुछ नोट निकाल कर उसके और अलका के हाथो भर दिए जेबखर्ची का बोलते हुए. सामान आँगन में आरती और ऋतू ने हे रख दिया था जिसको एक पतला सा ड्राइवर उस सफारी गाडी के पिछले हिस्से में रखने लगा जो ये लोग साथ लाये थे. आरती भी सुनंदा जी की बगल में आ बैठी थी जिसको वो ऋतू के समकक्ष हे चाहती थी. अलका के हाथ में पैसे देख उसने खुद हे हाथ आगे बढ़ा दिए जिस पर कुआशालय जी की घूरती आँखों को सुनंदा जी ने हे मन कर दिया.

"अब बचो का समय है और हम हे इन्हे अपना काम काज, धरोहर न दिखाए तोह कल को ये संभालेंगे कैसे. अर्जुन और संजीव हमेशा इस सबसे भागते रहते है इसलिए ये लड़कियां हे लायक है अब सब सँभालने के. आरती को तोह वैसे भी पहाड़ बहोत पसंद है. शिमला जो गयी थी अपने दादा दादी के साथ 3 बार.", सुनंदा जी को भी बचो के बारे में सब पता था और रामेश्वर जी ने भी इसमें सहमति दी.

"तोह ड्राइवर के साथ बड़ी गाडी में ये 5 लोग चले जाएंगे? पिछली सीट उतनी आरामदायक नहीं है इस गाडी की. कल हे पता लगा मुझे तोह जब थोड़ी खराब सड़क पर पिछली सीट पर सामान ast-vyast देखा.", ठीक यही गाडी तोह घर में भी कड़ी थी.

"मैं तोह चाहती थी भाई साहब की रेखा या बच्चियां हे चला ले चले पर पता नहीं ये सब जानती भी है या नहीं और गाडी बड़ी है थोड़ी.", रेखा की गाडी चलने वाली बात पर पंडित जी थोड़ा ताज्जुब कर गए पर कौशल्या जी शान्ति से बस मुस्कुरा भर दी.

"तारा चला लेती है पर उसका अभी ऑफिस जरुरी है. ऋतू का हाथ साफ़ नहीं उतना और गाडी सचमुच बड़ी है. रेखा अकेली तंग हो जायेगी इतने लम्बे सफर पर, हाथ में पट्टी भी बंधी है उसके. कोई बात नहीं ड्राइवर ठीक है जब और कोई हल नहीं तोह.", इधर कौशल्या जी बात पूरी हुई थी की रेखा जी भी अपने सास ससुर का आशीर्वाद लेने लगी जिन्हे पता था की पंडित जी को कन्याओ का झुकना पसंद नहीं इसलिए उनसे हाथ जोड़ कर हे अभिवादन किया. बाप ने भी बेटी को सदा खुश रहो बोल कर वह सबका ध्यान देने का मश्वरा भी जोड़ दिया. बस कुछ अलग बात थी तोह ये की रेखा जी ने साड़ी की जगह एक safed-aasmani रंग का सलवार कमीज पहना था जिसका दुपट्टा सर से सीने तक था. चाय पर थोड़ी बहोत बातचीत के बाद कौशल्या जी ने कुन्दनलाल जी को तोह रोक लिए पति के साथ नाश्ते पर साथ देने के लिए वही सारा सामान रखवाने के बाद जब ड्राइवर को खड़े पाया तोह सभी जाने वालो को समय का भान करते हुए अब निकलने को कहा. धुप बढ़ने पर सफर थोड़ा कष्टदायक हो सकता था.

"अपना ध्यान रखना और पापा का भी. तारा पीछे से रुपाली तुम्हारी जिम्मेवारी है बीटा.", रेखा जी ने गेट के पास हे रुपाली को अपने गले लगते हुए दुलार किया तोह ठीक वैसा हे ऋतू ने भी. कोमल और प्रियंका ने भी ख़ुशी से उन्हें विदा किया था ललिता जी और कृष्णा जी के साथ. कौशल्या जी गाडी के पीछे जल अर्पण करके प्रभु से सफर सुरक्षित रखने की दुआ मांग बिना द्वार बंद किये हे वापिस लौट आयी.

"सोनू बीटा वह चौक वाले ढाबे पर गाडी रोक देना.", सुनंदा जी ने जब ड्राइवर से ये कहा तोह सामने वाली सीट पर बैठी ऋतू थोड़ा हैरानी से देखने लगी पीछे जहा सुनंदा जी के साथ आरती और अलका थी जबकि आखिरी हिस्से में अकेली रेखा जी. गाडी में अभी से एक चालू था और इस सेक्टर से बहार निकलते थे अगले चौक पर मार्किट में बने उस बढ़िया ढाबे के किनारे सफारी के ब्रेक लग गए. ड्राइवर गाडी में चाबी लगी छोड़ कर हाथ जोड़ता हुआ पिछले द्वार खोल कर अपनी मालकिन के बताये ठिकाने चला गया था. पिछले दरवाजा सही से बंद करके अब चालाक सीट पर रेखा जी बैठी थी और दुपट्टा सर से उतर कर बस उनके गले में 'व्' अकार में बंधा उनके चेहरे को साफ़ दिखने लगा. अपनी बेटी को मुस्कुरा कर देखने के बाद उन्होंने गियर आगे की तरफ डालते हुए पंजा दबाया और सफर फिर से शुरू हो चला.

"आप चला लेंगी इतनी दूर तक माँ? और हाथ पर चोट है वो?", एक हाथ की उँगलियों से हे स्टीयरिंग संभालती हुई रेखा जी ने दूसरे हाथ से ऋतू की गॉड में रखा अपना हैंडबैग खोल कर वो गुलाबी कपडे का बना बिना उँगलियों वाला दस्ताना निकाल कर कोहनी स्टीयरिंग पर रखते हुए जिस तरह से पहना था ऋतू के साथ खुद अलका और आरती तक हैरान रह गयी. जल्द हे ये गाडी शहर की खाली सड़क पर 80 पार जा रही थी और भीतर की ख़ामोशी को इतना खींचता देख रेखा जी ने खुद हे धीमी आवाज में वो 8 नंबर वाला चालू कर दिया. 'ज़िन्दगी एक सफर है सुहाना, यहाँ कल क्या हो किसने जाना.'

"अरे बड़ी माँ, आप तोह सचमुच हे मिस्ट्री हो. आपने गाडी चलना कब सीखा और वो भी ऐसे हाथ छोड़ कर?", वैसे यही सवाल उस ड्राइवर का भी होता अगर वो साथ होता जिसने रेखा को स्टीयरिंग पर उस पहचानी हुई गाडी में देखा. पर नरिंदर जी के चेहरे पर मुस्कराहट थी ये देख कर और उनके बाकी दोनों भाई जैसे अपनी हे चर्चा में मसरूफ थे. राजकुमार जी जैसे कुछ देरी से आने वाले थे वालिए जी और धर्मपाल जी के साथ. लेकिन रेखा ने भी वो गाडी बखूबी देख ली थी जो उसके पति की हे थी और चलने वाले उसके देवर.

"आरती बिटिया इसने गाडी तोह तभी सीख ली थी जब तेरे बड़े मां को तेरे नाना जी जीप सीखने लगे थे. हाँ ये बिट्टू से पहले सिख गयी थी शायद 14-15 की उम्र में."

"माँ, सिर्फ चलाई थी उस वक़्त. हाथ तोह मेरा और राजेश का एक साल बाद सही हुआ था जब जीप घर पे रहने लगी थी. मैं चाहती हु की तुम तीनो भी स्कूटर से अब कार पे आओ. जरुरत कभी भी पड़ सकती है और हमेशा तोह ड्राइवर या भाई पापा नहीं होंगे साथ. बस चलना तभी जब ऑप्शन न हो. चाहो तोह वह चल कर मैं थोड़ी हेल्प कर सकती हु. अलका और अर्जुन ने तोह संजीव के साथ प्रैक्टिस भी की है पहले.", ये बड़ी गाडी पुल्ल को पार करते हुए हे 100 के पार जा चली थी लेकिन हल्का सा भी कम्पन्न या राह भटके बिना.

"दादी मन थोड़ी करेगी आपको अगर आप उनको साथ लेकर मार्किट वैगरह जाने लगे तोह. कई बार उन्हें तारा का वेट करना पड़ता है जब और कोई न हो.", ऋतू भी शहर को पार होते हुए देख रही थी और अन्धकार ख़तम होने का इशारा देते उस नीले नारंगी आसमान को भी.

"तोह उन्हें पहले मंदिर या तुम्हारे कॉलेज कौन लेके जाता रहा है.? ारु के स्कूल भी तोह मैं गाडी से हे जाती रही हु. उन्हें पता है पर सिर्फ काम से जाना ठीक है. आज भी वो खुद हे कहती की मैं गाडी ले जॉन अगर हाथ पे पट्टी नहीं होती.", रेखा को देख कर एक पल को तोह खुद ऋतू भी उनकी खूबसूरती के साथ गाडी चलने के अंदाज पर फ़िदा हो चली थी.

"दादी ने नानी के सामने ये कहा भी था और बौ जी को ाचा भी लगा जान कर की आप गाडी चला लेती है. सच कहु तोह चची मुझे भी न इस टूर पर ड्राइवर पसंद नहीं आया था. पर सफर तोह 7 घंटे का है न?", अलका ने अभी से वो पानी का फ्लास्क खोल कर पीना शुरू कर दिया था. आरती ने ऋतू को अपना दुपट्टा उतार कर एक तरफ रखते देखा तोह आप भी वैसा करती हुई अब आराम से बैठ गयी.

"क्सक्सक्सक्स बिपास 1 घंटा और क्सक्सक्सक्स शहर डेढ़ जहा अंदर से जाने की जगह हम हमारे गाँव से पहले हे river-side से दूसरा रूट लेंगे. सब ठीक रहा तोह फिर ढाई घंटे आगे. मतलब 5 लेकिन तुम सबने ब्रेकफास्ट भी तोह करना होगा? हम ाची सी जगह रुकते चलेंगे. माँ आप चाहो तोह थोड़ा सो सकती हो, ये लोग मेरे साथ है फ़िलहाल.", यही नदी वाला रास्ता अर्जुन ने ऋतू को बताया था जो ज्यादा लोगो को पता नहीं था पर उसकी माँ को था.

"चची बस एक गलती हो गयी जो अब ध्यान आया. इस ऋतू के चक्कर में मैं संजीव भैया वाला कैमरा भूल गयी. सामान हे इतना ज्यादा था.", इसका जवाब आरती ने हे दे दिया जबकि ऋतू ने वो दराज वैसे हे खोली थी जिसके भीतर का सामान देख उसने तुरंत हे बंद कर दिया पर उसकी माँ से ये भी न बचा था जो बस हलके से मुस्कुराई और अब ऋतू ने उन्हें देख लिया था जिसके बदले में बस हलके हामी भर दी.

"पता था मुझे इसलिए मैंने रात को हे कैमरा और ढेर साडी बैटरी बड़ी माँ के बैग में रख दिए थे. वैसे नानी वो जगह कैसी है दिखने में? मतलब bheed-bhaad तोह नहीं है न उधर?", सुनंदा जी सीट पर सर टिकाये हलके से मुस्कुरायी.

"भीड़ तोह तुम लगाना चाहो तोह लगा लेना लेकिन उसके एक किलोमीटर आसपास तोह सिर्फ सबकुछ हमारा हे है, कुछ जंगल सरकार ने ले लिए सड़क किनारे वाले पर नदी और झील किनारे सब अपना हे है. तुम्हे वह किसी तरह की कमी नहीं खलेगी मेरी गुड़िया. हाँ शहर थोड़ा 2-3 किलोमीटर दूर है जितना मुझे याद है बाकी 4-5 साल में कुछ बदला हो तोह पता नहीं और उस से पहले मैं तभी गयी थी जब तुम्हारी उम्र की थी और हाँ शादी के बाद भी 2 बार."

"वाओ. बस फिर तोह ये पक्का हो गया के मैं तोह मेरी पढ़ाई पूरी करने के बाद उधर हे रहूंगी और बस अपनी बुक्स लिखूंगी. बड़ी माँ, आप भी मेरे साथ हे रहना क्योंकि ये डॉक्टर तोह विदेश भागने वाली है और अलका जी के विचार है साड़ी दुनिया घूमने के. मुझे ठहराव पसंद है बस जगह ऐसी हे होनी चाहिए जैसी नानी ने बताई. हाँ रात में लाइट की प्रॉब्लम न हो बस, अँधेरे से आजतक डर लगता है मुझे और इतनी बड़ी जगह पर तोह ये और ज्यादा.", अब ऋतू और अलका खुलकर हंसने लगी थी आरती के कबूलनामे पर.

"माँ, आरती ने तोह समस्या हे ख़तम कर दी ये कह कर पर फिर इसके लिए तोह ghar-jamaai न लाना पड़ेगा?", रेखा जी ने तोह बातों बातों में यहाँ आरती को जिस तरह धरा था उसके साथ बाकी दोनों के चेहरे भी खामोश हो गए थे. पर आरती ने थोड़ा तुनक कर जवाब दिया एक आँख ऋतू की तरफ दबा कर जो उसकी नासमझी थी.

"मुझे शादी हे नहीं करनी बड़ी माँ और मुझसे पहले पिंकी दीदी और कोमल दीदी भी है. उनके बाद अलका, ऋतू, रुपाली.. मैं सबसे छोटी हु तोह मुझसे पहले बहोत से बाकी है.", आईने से उनके इस बचकाना इशारे को देख रेखा ने चेहरे पर ज्यादा भाव लाये बिना सामने खली सड़क पर हे ध्यान रखा जहा सिर्फ यही गाडी अपनी गति पर भाग रही थी. डबल हाईवे पर बहार से कोई देखता तोह गाडी साये करती निकलती दिखती जबकि भीतर तोह अगली सीट पर बेल्ट बंधे ऋतू ऊपर चौकड़ी लगाए आराम से बातचीत में लगी थी. 155 पर स्थिर चलती गाडी जैसे रेखा के भी अनुमान से तीव्र थी. आज वो अपनी बेटियों को samaaj-pariwar से दूर ऐसे सफर पर ले जा रही थी जहा वो उनके चरित्र और क्षमता को निखारना चाहती थी खुश रखने के साथ. हलकी फुलकी बातचीत और रेखा जी का उनसे साथ मस्ती मजाक करना तीनो को भ रहा था जबकि सुनंदा जी तोह बचो के साथ खुश होती हुई कुछ हे समय बाद सो चुकी थी. अपनी जवान होती बेटियों के साथ वो एक वैसा हे नया रिश्ता बनाना चाहती थी जैसा उनका अपनी माँ संग था. सिर्फ कोमल हे अभी तक अपनी के कुछ पहलु जान पायी थी उनके साथ ऐसा हे वक़्त बिता कर.

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"मुझे बाथरूम जाना है?", अर्जुन इतनी देर से सोने के बावजूद ठीक साढ़े 4 उठ चूका था और पलने में निकेतन भी जैसे अब अपनी माँ के पहलु में थोड़ा सोना चाहता था सतान्नपान करते हुए. अनामिका चची अभी भी टाँगे फैलाये सोई थी जिनके चेहरे पर एक मासूम सी मुस्कान नींद में भी सजी थी. कमरे में दोनों लैंप जगा कर जब अर्जुन ने अपने जिस्म पर निक्कर पहनी तोह वो कुछ पल तक बस अनामिका चची को हे निहारता रहा. रात को उनके साथ उस स्वछंद संसर्ग के ढेरो निशाँ थे उनके गोर सुघड़ जिस्म पर और साफ़ सफाई के बाद उनकी योनि पर मलहम लगाने के बावजूद उसका रंग बाकी जिस्म के मुकाबले बहार तक गुलाबी था, ाची खासी सूजन के साथ. उनके बचे को उठा कर एक चूचक मुँह में देने के बाद वो नित्यक्रम से निबट कर 15 मिनट बाद हे वापिस लौटा तोह अब बीटा सो चूका था जबकि माँ आँखें खोल कर सामने खड़े अपने प्रेमी को निहारने में लगी थी. अपनी हालत देख एक पल तोह उन्हें शर्म सी आ गयी लेकिन फिर लघुशंका की तीव्रता को सेहन न करते हुए उन्होंने अर्जुन को अपनी असमर्थता बता दी.

"दर्द होगा इसलिए बाद में पानी से धोने के बाद मैं पांच कर ये मलहम फिर से लगा दूंगा. आज पंतय मैट पहन न.", उन्हें बाँहों में उठाये वो भीतरवाले स्नानघर में ले आया पर उसको वही खड़े देख कर अनामिका चची ने शर्म से बहार जाने का इशारा किया.

"जब बुलाऊँ तब आ जाना, ऐसे मुझसे नहीं होगा.", अर्जुन भी दरवाजा ढाल कर बहार आ गया और बिस्टेर पर फैले सभी कपडे समेत कर एक तरफ रखता हुआ बची ख़ुशी निशानियां हटाने लगा. अंदर फर्श पर बैठी अनामिका ने आँखें बंद करके प्रयास किया तोह धीमी गति से mutra-nali से गुजरता गरम तरल थोड़ा सा हे बाहरी हिस्से पर गिरते हे एक तेज चीज़ सी पूरे जिस्म में उठी जैसे उनकी योनि पर लाल मिर्च झोंक दी हो. एक हाथ फर्श पर और दूसरा दिवार पर टिकते हुए उन्होंने हिम्मत से काम लिया. आज जैसे रंग कुछ गहरा जान पड़ता था पर इसकी वजह उन्हें ाचे से मालूम थी. नल चला कर फर्श धोने के बाद जब उन्होंने अपनी योनि पर ठंडा पानी छिड़का तोह वो खुद उसकी रंगत और सूजी फांको को देख विस्मित हो उठी.

'अब ऐसा तोह होना हे था.', वो दर्द में भी मुस्कुरा दी और ाचे से योनि साफ़ करने के बाद उन्होंने अपने पूरे जिस्म को पानी के हवाले कर दिए सिवाए बालो के. चुचो पर भी दर्जन भर निशाँ थे और पानी की हलकी मार भी जिस्म में आग भड़कती लगी. छोटे दर्पण में अपनी वक्षो की जोड़ी को निहारा तोह खुद हे उनके कसाव और अर्जुन द्वारा भरपूर मर्दन को याद करके वो फिर से अंदर हे अंदर गीली होने लगी थी. अर्जुन ने भी पानी की आवाज सुन्न कर जान लिया की वो जिस्म को भी ताजगी दे रही है. तोलिये से पौंछने के बाद जैसे हे कदम बढ़ाये तोह एक बार फिर दरवाजे का सहारा लेना पड़ा.

"इसलिए कह रहा था की मुझे साथ रहने दो. लाओ पीठ पांच दू आपकी और फिर ये क्रीम लगा देता हु.", अर्जुन ने जैसा कहा वो उसकी मानती गयी पर छूट पर उसके स्पर्श से हे वो सिसक उठी. उजाले में जैसे वो उसके सामने ऐसे आने में हे हिचकिचा रही थी और अब तोह वो उनकी योनि को हे हलके हाथो से मसल रहा था.

"बस गाउन पहन लीजिये आप और मैं आँचल या लाली की माँ को बोल देता हु चाय बनाने के लिए."

"नहीं, बस मुझे रसोईघर में छोड़ दो."

"ठीक है उन्हें नहीं उठता मैं पर आप आराम करो. मैं देख लेता हु सबकुछ. कोई पूछे तोह बता देना मासिक की वजह से बुखार आया है.", उन्हें फिर से बिस्टेर पर लिटा कर वो बहार निकल गया. अर्जुन के इतने ख़याल रखने पर हे तोह वो उस से प्यार करनी लगी थी और अब तोह अर्जुन ज्यादा हे ख्याल रखने लगा था. कृष्णेश्वर जी नहाने आये तोह उनके वस्त्र भी चारपाई पर पहले से मौजूद मिले. लाली की माँ को भी पशुओं के पास साफ़ पानी की बाल्टी और मांजी हुई दूध वाली भी त्यार दिखी जहा पशुओं के सामने उनका चारा और साफ़ पानी भी भरा था. वो जब दूध निकलने बैठी तब तक रौशनी बुआ भी उठ चुकी थी जिनके सिरहाने चाय रखता अर्जुन उन्हें सुबह की कामनाये देता हुआ आँचल और अंजलि को आपस में लिपटे देख उन दोनों का चॉक्लेट दूध मेज पर रखने के बाद सिर्फ आँचल को हिला कर बहार चला आया. संजीदा के भी कमरे के बहार ठीक समय दस्तक दी थी जो उठ कर दरवाजा हे खोलने लगी थी.

"वाओ. इतना स्पेशल ट्रीटमेंट."

"क्यों मैं आपके लिए bed-tea नहीं लेके आ सकता?", हरे सफ़ेद गाउन के ऊपर 2 तीखे उभर झलक रहे थे जिनसे नजर हटा कर अर्जुन ने स्पष्ट मुस्कान से जवाब दिया. अभी अभी उठी संजीदा के चेहरे पर एक अलग हे ताजगी थी जैसे यहाँ आने के बाद उसके जीवन में थोड़ी बेहतरी हुई हो. कुछ जुल्फें कान से आगे उसके सीने तक लटकी थी. गोल प्यारी छोटी सी नाक, साफ़ सफ़ेद घेरे में हलकी भूरी आँखें और बादामी कटाव लिए एक प्यारा चेहरा. संजीदा नर्स के पहरावे में जितनी सभ्य थी उतनी हे खूबसूरत इस उन्मुक्त सुबह दिख रही थी.

"बिलकुल ला सकते हो अगर बदले में मुझे भी ऐसी परमिशन हो तोह. पराठे खाते हो?"

"कहेंगी तोह वो भी बना दूंगा."

"मेहमान बना रहे हो न मुझे?"

"सॉरी. मुझे पराठे पसंद है बस घी ज्यादा नहीं. ओह.. दूध रख के आया था गैस पर, भूल गया. थोड़ी देर में मिलते है संजीदा जी.", अर्जुन तुरंत निचे भगा तोह वो उसको ऐसे जाता देख हंसने से न रह सकीय लेकिन हलकी सी चाय छलकने पर निचे देखा तोह उस झीने गाउन पर उभरे दोनों चूचक पहले नजर आये जमीन पर गिरी चाय की बूंदो से.

'हे भगवान्.. वो इसलिए थोड़ा असहज था? ये गन्दी आदत बदलनी पड़ेगी संजू तुझे.', शर्माती हुई वो कमरे में हे बंद हो गयी थी चाय का कप लिए. निचे जबतक रौशनी बुआ नाहा कर तैयार होती हुई रसोई में आती तब तक तोह अर्जुन अपना दूध और खुराक लेने के साथ अनामिका को भी मेवे वाला दूध और कृष्णेश्वर जी को नाश्ता करवा चूका था जो खुद हैरान था पर बदले में बस आशीर्वाद देते हुए सेवक के साथ खेतो पर निकल गए जहा काम जारी थी.

"बीटा मुझे कह देते एक बार अगर अनामिका नहीं उठी थी. मैं पहले पापा को नाश्ता करवा देती सबको चाय देने के साथ. तुमने आता भी गूंद दिया?"

"बुआ जी, कभी कभी आपको भी आराम ले लेना चाहिए. चची को थोड़ी प्रॉब्लम है और बुखार भी इसलिए मैंने हे उन्हें आराम करने पर विवश कर दिया. आप एक बार दोनों दीदी को देख लीजिये, उन्हें दूध तोह दे आया था पर अभी तक कोई बहार नहीं आयी है. मैं दूध की बाल्टी लेके आया.", एक तरफ नल से अपने हाथ धोने के बाद अर्जुन तोलिये से उन्हें सूखा कर बहार चल दिया. कुकर ने भी आलू उबलने की सिटी बजा दी थी और वह कद्दूकस करके राखी मूली, बारीक कटे प्याज और पूरी सफाई देख कर रौशनी बुआ भी अर्जुन की इस अलग क्षमता से प्रभावित हुए बिना न रह सकीय. फिर अपनी बेटी का ध्यान आया तोह वो उनके कमरे में बढ़ गयी जहा दोनों हे taro-taja होने के बाद दूध ख़तम करके बिस्टेर समेत हे रही थी.

"दोनों 6 बजे उठ रही हो और उधर तुम्हारा छोटा भाई घर का सारा काम कर चूका है अकेले हे. मुझे भी नहीं बताया और पापा को तोह नाश्ता करवा कर भेज भी दिया उसने. अनामिका ये सब अकेली करती रही है और आज उसके बीमार होने पर मेरे या तुम्हारे बदले वो लड़का सब कर रहा है.", अब ये दोनों क्या जवाब देती की उसके हे चक्कर में तोह इन्हे सोने में 2 बज गए और नहाने के बावजूद सुस्ती जाने का नाम नहीं ले रही. रौशनी उसके बाद अनामिका के कमरे में दाखिल हुई हाल चाल लेने को और इधर बाल्टी का सारा दूध बड़े पतीले में पलट रहे अर्जुन को देख कर रसोई में आयी संजीदा अपनी जगह हे ठिठक गयी. उसकी वो असाधारण भुजाएं और उन पर उभरी बड़ी बड़ी मछलियां उसकी यादाश्त में शामिल हर इंसान से कही ज्यादा बेहतर और तगड़ी थी. अब संजीदा भी सलवार कमीज में थी जिसको खड़ा देख अर्जुन हौले से मुस्कुराया.

"तयारी कर दी है मैंने और अब बस आप थोड़ी गर्मी सेहन करो, कल एग्जॉस्ट लगवा दूंगा यहाँ. फिलहाल ये खिड़की खोल देता हु.", पीढ़ी पर बैठते हुए संजीदा भी देख रही थी की वो जितने समय में नाहा कर त्यार हुई थी अर्जुन ने उसका हे सारा काम करके रखा था. व् गले के कमीज से वो गोर तजा धुले उभार अपनी हलकी छटा साफ़ दिखा रहे थे जिधर अर्जुन की नजर पड़ते हे दोनों ने एक दूसरे को देखा और वो बिना कहे बहार निकल गया.

'चलो अब इतना सोचूंगी तोह या दुपट्टा सम्भालूंगा या फिर काम करुँगी. जवानी में सभी लड़के यही करते होंगे, आखिर विपरीत लिंग की तरफ आकर्षण स्वाभाविक क्रिया हे है.", जल्द हे संजीदा की मदद को दोनों बहने आ बैठी थी और लाली के माँ आँगन साफ़ करती बाकी काम में जुट गयी. सभी जैसे अब एक दूसरे का हाथ बनते जा रहे थे, कुछ कहती मीठी chhed-chhaad करते हुए. अर्जुन एक बार फिर से नहाने जा चूका था कपडे खुद हे निकाल कर जो अनामिका को ाचा नहीं लगा था पर रौशनी ये देख चुकी थी.

"जानती हु तुम ऐसे बिस्टेर पकड़ने वालो में से नहीं हो अनामिका पर कभी कभी अवकाश ले लेना चाहिए नहीं तोह कुदरत हे करवा देती है. तुम्हे देख कर अर्जुन भी सब सीख चूका है जो चाँद रोज पहले हे आया. पर इतने बरसो यहाँ रही मैं हे नहीं सीख सखी. कल से तुम मुन्ना के साथ कमरे में हे रहोगी 7 बजे तक. नाश्ता और सबकी चाय मेरे जिम्मे. दोपहर को तुम्हारे साथ कोई भी लड़की और रात को सबकुछ मिल बाँट कर."

"वो बड़ी माँ ने साफ़ कह कर भेजा था दीदी की अर्जुन का मैं पूरा ख़याल राखु कपडे से सोने तक. आज मज़बूरी थी पर कल से काम से काम मेरा ये नियम बना रहने दीजियेगा."

"ाची बात है और वो भी तेरा दिल से करता है अनामिका जिसने ये घर हे बदल कर रख दिया. ताई जी ने खुद उसके कहने पर तेरी यही सब खासियत देख तुझे तेरा सही पद दिया है. प्यार के बदले प्यार वाली दुनिया से बेहतर कुछ नहीं होता. चल अब तू आराम कर फिर मैं नाश्ता देखती हु."

"उसकी जरुरत नहीं है आंटी जी, तीनो दीदी ने मुझे भी रसोई से बहार कर दिया. ये लीजिये आपकी दूसरी चाय, नहाने के बाद आप पीती है न और आपकी भी. लाओ मुन्ना बाबू मुझे दे दो, हम थोड़ा आँगन में खेल लेते है जब काम हे नहीं कोई.", लाली दोनों को चाय देती हुई निश्चिंत करवा गयी की रौशनी की भी अब वह जरुरत नहीं खाना पकने में. देखते हे देखते दिन शुरू होने पर सभी का काम समय से पहले हे हो चूका था. संजीदा की सबने तारीफ की थी क्योंकि नाश्ता बना भी तारीफ लायक था जिसके बदले में उसने सिर्फ यही कहा के सारा काम तोह अर्जुन ने पहले हे कर दिया था.

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"आप दिन में फ्री है डीडू?", जन्नत सुबह 6 बजे उठने के बाद से हे एक व्यस्त दिनचर्या में रही थी और ठीक 8 बजे उसकी माँ मेघना कपूर भी घर आ चुकी थी. अभी नाश्ते की मेज पर सिर्फ जीनत और मेघना हे थी जबकि जन्नत अपने गले और चेहरे पर आया पसीना साफ़ करती हुई गुनगुने पानी में निम्बू मिला कर पीती हुई दोनों के सामने आ बैठी. मेघना कपूर कामकाजी महिला होने के साथ ाचे खानपान के साथ 45 बरस में भी अपनी बेटियों के करीब हे थी. खाने की मेज पर एक सफ़ेद ढीली कुर्ती और तखनो तक की हरी स्कर्ट पहने वो बड़े सलीके से जूस पीने के साथ हल्का नाश्ता करती हुई दोनों को देख रही थी.

"तिमेलिने कोई जिनि? माँ आप आते हे फ़ोन पर बिजी थी.", माँ ने बस हाँ में सर हिला दिया लेकिन वो जीनत को मुस्कुरा कर देख रही थी. जन्नत अपने बालो को सामने बाए कंधे पर रख कर कोहनी टेके अपनी चुलबुली बहिन को देखने लगी जो ब्रेड पर मक्खन भी ऊँगली से ऐसे लगा रही थी जैसे उसके मैं में कोई कामुक विचार चल रहा हो. पर ाची बात ये थी की जीनत सेण्टर हमेशा पूरे कपड़ो में हे जाती थी और उसके ये कामुक विचार अपनी सहेलियों तक हे सिमित थे.

"आप आज भी बहार जा रही है क्या डीडू? आज मंडे है और 3 दिन बाद वो लोग आने वाले है. माँ ने वेन्यू फिक्स कर दिया है और कैटरिंग ेट्स भी हो गया लेकिन मेरे कपडे पेंडिंग है जिनके साथ बाकी सबकुछ लेना होगा. आज देखना शुरू करेंगे तोह 2 दिन तोह फाइनल करने में लगेंगे हे न डीडू.", जीनत की बात सुन्न कर जन्नत ने ज्यादा कुछ नहीं कहा पर वो उसको नाराज भी करना नहीं चाहती थी.

"एक छोटा सा विजिट है जिनि 1 बजे. हम इवनिंग में चलते है फिर और तुम्हे कुछ यहाँ पसंद नहीं आया तोह हम दिल्ली चल पड़ेंगे कल. क्सक्सक्सक्स के दसिग्नस हम 2 घंटे में हे ले लेंगे वह पर."

"ठीक तोह कह रही है तुम्हारी बहिन और धुप में कला होने का शौक है क्या? वैसे तुमने अपनी फ्रेंड्स को इन्विते कर दिया? गाथेरिंग 100 लोगो की हे राखी है.", मेघना जी के कहने में कही भी बड़ी बेटी शामिल नहीं थी क्योंकि उसके दोस्त हे नहीं थे. पर जन्नत को ये पसंद नहीं आया था.

"हाँ मैंने इन्विते तोह किया है अपनी 5 फ्रेंड्स को बाकी आपके बिज़नेस फ्रेंड्स हे 50 होने वाले है. डीडू से भी पूछ लीजिये की कोई इनका एक आध फ्रेंड ये बुलवाना चाहे.?", जन्नत ने अपनी बहिन की बात पर भीतर हे भीतर ख़ुशी जताई लेकिन वो अपनी माँ की प्रतिक्रिया देखने के लिए खामोश रही.

"राजहंस पैलेस बुक किया है इसके लिए और जाहिर सी बात है की अभिषेक के साथ उसके पोलिटिकल दोस्त भी आने वाले है. लिस्ट 95 तक तोह अभी पहोच चुकी है जबकि सबको बताया भी नहीं. जानू के दोस्त मैंने लास्ट टाइम क्लास 5तह में देखे थे और उसके बाद इसका पर्सनल सर्किल मैंने तोह नहीं देखा. जानू, हैं कोई तुम्हारा इन्विते.?", ठीक इस वक़्त हे जीनत कार के हॉर्न से बहार भाग चली अपनी बहिन को बाद में बोलने का बोल कर. साक्षी उसको लेने आयी थी आज.

"यस माँ, एक फ्रेंड है और वो डेसेर्वे भी करता है वह आना. आपकी लिस्ट जितना मर्जी बढे पर वो रहेगा. वे कैन over-pay."

"ओवर पाय इशू नहीं है जानू बीटा. ठीक उस दिन हे राजहंस में सेकंड गाथेरिंग भी है और वह पर लिमिट रेस्ट्रिक्शन्स एडविकेड है. 100 मतलब 100. वैसे ये कौनसा दोस्त हो गया जिसकी खबर तक नहीं लगी मुझे? क्या मेरी बेटी को सचमुच कोई लड़का पसंद आ गया है?", मेहगना जी की बात पर वो हंसती हुई उनके हे बगल में आ बैठी.

"प्लीज कीप आईटी विथ यू माँ. बस एक नार्मल दोस्त है बूत शायद आप उसका बैकग्राउंड जानती होंगी. अर्जुन शर्मा नाम है उसका और क्सक्सक्सक्स शहर का रहने वाला और अपने हे इस नेइबोरिंग टाउन से उसकी रूट्स है. बहोत ाचा लड़का है माँ और मैं उसको इन्विते करना चाहती हु. अभिषेक भैया के भाई के साथ हे तोह उसकी कजिन की मैरिज हुई है.", अब तोह मेघना के हाथ से चम्मच हे निचे रह गयी थी और वो हैरानी से अपनी इस अंतर्मुखी बेटी को देखे जा रही थी.

"पंडित जी का पौता अर्जुन? तुम उस से मिली हो जानू? पता है तुम्हारे पापा ने उस लड़के को ले कर मर उमेद से बात की थी जिनि के लिए और उनका जवाब था की उसके बारे में सिर्फ वो खुद फैंसला करेगा. अभिषेक की बीवी आसक्त है उस पर जितना मैंने उसकी बातों से पता लगाया और सच कहु तोह मर सोमनाथ दत्त भी एड़ी छोटी का जोर लगा चुके डॉ शंकर से उनके बेटे को मांगने के लिए गौर बिल्डर्स के दामाद के लिए. वो लड़का किसी से नहीं मिला अभी तक. यहाँ तक की वो अपनी बहिन के ससुराल फेरे पर भी नहीं आया. तुम सचमुच उसको बुला रही हो?", अब जन्नत थोड़ा सोच में पड़ चुकी थी सब सुन्न कर.

"वो मेरा फैन है माँ और मैं उसको दोस्त मानती हु."

"राजहंस का मालिक वही है जानू. सोच लो की वो शक्शियत क्या है जिसको उसके घरवाले तक सबके सामने नहीं रखते. ये देखो फैक्स पर कुमार महेंद्र के निचे किसका नाम है?", अब खिसकी थी जन्नत की हवा जब उसकी माँ ने मेज से पर्स उठा कर वो पर्ची दिखाई. अर्जुन रेखा शर्मा सीओ ओनर राजहंस रिसॉर्ट्स एंड पैलेस. ये कैसा रिश्ता था जिसमे 2 अलग परिवार एक इंसान से जुड़े थे?
 
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