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हमकदम (1)
अर्जुन उस जोरदार संसर्ग के बाद भाभी की बगल में हे लेता उन्हें सेहला रहा था जो कटे वृक्ष सी गिरी बेसुध हे थी. बिस्टेर का निचला हिस्सा उनके कॉमर्स की गवाही दे रहा था जहा गीलेपन के साथ ढेर सारा सफ़ेद वीर्य जमा था. दोनों पसीना सूखते हुए जिस्म से सांस भर रहे थे और दीपा भाभी अपने जिस्म के दुखते पोर पोर में भी अलग सी मस्ती का एहसास लेती उनींदी सी आँखों से अर्जुन को निहारने लगी जो उनके गुदाज पहले हुए कूल्हों पर हाथ फिर रहा था.
"कर ली अपने मैं की मुखिया जी? उतने शरीफ हो नहीं जितने दीखते हो और इसको कुछ दूर हे रखो मुझसे.", अर्जुन का ardh-uttejit लिंग भी साइकिल की तुबे सा मोटा था लेकिन साफ़ रंगत वाला आकर्षक अंग. दीपा भाभी ने जिस तरह से उसके लिंग को छूने का उपक्रम करते हुए सहलाया था उसका साफ़ मतलब था की वो मूसल उन्हें भा चूका है. अर्जुन उन्हें करवट के बल करता अपनी बाहों में ले कर हलके हलके चुम्बन चेहरे पर जड़ने लगा तोह दीपा भाभी को भी उसके सीने से लिपट कर ये हलके फुल्के पल आराम देने लगे.
"बंद कमरों में तोह शराफत कपड़ो सी रहती है भाभी. और इसमें मेरा दोष नहीं जब आप हो हे इतनी बेजोड़. अब दर्द तोह नहीं हो रहा?", उनके चुचो पर बने हलके निशाँ और लाली को सहलाते हुए अर्जुन ने जिस तरह पुछा था दीपा भाभी शर्माती हुई उसके दिल पर हाथ रख कर ना में सर हिलने लगी.
"दर्द.. जाने वो कहा खो गया जब आँख खुली तोह. मुझसे आधी उम्र के हो लेकिन जिस तरह तुमने प्यार किया तोह मुझे अपनी बेशर्मी भी भली लगी. तुमसे पहले इस जिस्म पर निशाँ तोह मिले थे पर उनमे प्यार एक पल भी नहीं था. आज पता लगा की क्यों जस तुम्हारी दीवानी बानी जो दर्द के बाद उस सुख और देखभाल से कही ज्यादा खुश होगी जो तुम दिल से करते हो. मेरे वस्त्र तोह कोई बड़ी बात नहीं थी तुम्हारे लिए उतारना और मैं खुद भी ऐसा कर देती क्योंकि दिल आकर्षित जो था तुम पर लेकिन तुम मुझे प्यार करते हो और इतना ख़याल रखोगे ये जान चुकी होती तोह पहल भी मैं हे कर देती. अब ऐसे हे चिपकाये रखोगे या खाना खाने का इरादा है थोड़ा?", भाभी तोह खुद हे अलग होने का नाम न ले रही थी और अर्जुन ने अपने एक जांघ उठा कर उनके ऊपर राखी तोह लिंग में बढ़ती अकड़न से उनकी पहले से गीली योनि जैसे खुद हे सुपडे से चिपक गयी.
"दिल तोह नहीं है मेरा अलग होने का जैसे आपका नहीं हो रहा. पर बिस्टेर पर एक और घंटा लगाया तोह मैं कोई बहाना बना भी लूंगा पर आपके न काम होंगे और न फिर इधर कोई देखभाल के लिए है. वैसे इरादा तोह मेरा इन पहाड़ो की गहराई में उतरने का था लेकिन जब आपका जिस्म आराम करने के बाद उठेगा तोह उठना मुमकिन नहीं होगा. पता नहीं आपने कैसे इस कुबेर के खजाने को सहेजा हुआ है और वो दिलबाग भैया अकाल से भी अंधे है और नजर से भी.", उठने से पहले अर्जुन ने एक बार उनके कूल्हों की दरार में उँगलियाँ फसायी और मुँह से एक निप्पल को दबा कर चूस लिया. भाभी तोह सीत्कार करती हुई अपनी योनि उसके लिंग पर दबा गयी थी.
"आह्हः.. पक्के जालिम हो तुम जो अलग होते हुए भी आग भड़का रहे हो. और एक पहाड़ सुजा दिए है तोह दूसरे से दूर हे रहो. ये आगे लेने में हे बुरी हालत हो गयी तोह पीछे का सोचना हे पाप है. आह्हः.. सचमुच इनके साथ साथ मेरी कमर और छूट तक दुख दी तुमने.", भाभी खड़े होते हुए अपने पाँव फैला रही थी और उनकी योनि ऊपर तिकोना बालो का हल्का जंगल सहलाते हुए अर्जुन ने भी पजामा चढ़ा लिया.
"इन्हे साफ़ कर लेना भाभी नहीं तोह रगड़ाई से टूटेंगे तोह ज्यादा दर्द होगा. वैसे अब लगता है के उस बेचारे रंगी की भी क्या हे गलती थी जब आपका बदन और ये खूबसूरत चेहरा किसी का भी चैन ख़तम कर दे? ब्रा न भी पहनो तब भी इनमे जरा सी भी लटकन नहीं. अगली बार पहले इन्ही का शिकार करूँगा. उमाहहह.", उन्हें खड़े खड़े हे सीने से लगा कर अर्जुन ने एक गहरा चुम्बन करने के बहाने कूल्हे और स्टैनो का फिर से स्पर्श लिया. भाभी पलट कर गाउन पहनती हुई शर्म और मुस्कराहट के मिश्रित भाव लिए थे. उन्हें अपने जिस्म का एहसास जरूर होगा लेकिन आज गर्व था की अर्जुन इतना प्रभावित हुआ.
"अगली बार के बारे में भी सोच रहे हो? और जिस्म म्हणत हे करता रहे जिसको सँभालने वाला मर्द भी न हो तोह वो ऐसा हे तोह रहेगा. रंगी इसको उजाड़ना चाहता था और तुमने प्यार दिया है."
"कल सवेरे साथ में नहाने का क्या ख़याल है भाभी? नहीं तोह नाश्ते से पहले आपका हे भोगा लगा लूंगा.", टीशर्ट पहन कर अपने बाल और चेहरा दुरुस्त करता वो भाभी को भी लगातार देख रहा था जिन्होंने अब अपने बाल समेत लिए थे. चेहरे पर अर्जुन का प्यार हलके निशाँ दे चूका था और होंठो पर हलकी सूजन. अर्जुन की नाश्ते वाली बात पर वो उसके कंधे पर मुक्का मारती हुई रसोईघर की तरफ बढ़ चली. आज जैसे सचमुच वो लड़की से औरत बानी थी और ये साफ़ झलक भी रहा था जब दोनों एक दूसरे को अपने हाथो से खिलते हुए वासना या काम से इतर बस अपने घर परिवार की बातों में लगे रहे. अर्जुन रुकना चाहता था लेकिन घर पे उसका होना भी जरुरी था अपने दादा दादी की gair-haajri में और आज की दोपहर बस सो कर हे गुजारनी थी.
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"ताई अगर कुछ वक़्त हो तोह क्या बात कर सकता हु अकेले में?", शंकर भी दोपहर के खाने पर चंद्रो देवी की हवेली आया था हॉस्पिटल में आधा दिन गुजार कर. हमेषा की तरह ऋचा अपने पिता के आगे पीछे हे रही और वो भी उसको लाड लड़ने में कोई कसार न रखते हुए अपने साथ लगाए पहले चारपाई पर बैठ भोजन करते रहे और फिर थोड़ी देर में मिलने का बोल अब चंद्रो देवी के कमरे में चले आये. गर्मी की वजह से इधर भी ठंडा कूलर चालु था और चंद्रो देवी अपने साधारण बिस्टेर पर तक लगाए शंकर को भी अपने करीब बैठने का बोल कर वो किताब एक तरफ रखती हुई थोड़ा खुश हुई. मधुलता पिछले आँगन में काम करवा रही थी या उसकी ये नाराजगी थी शंकर से जो बस पहले अपनी बेटी और फिर खाने के बाद उसकी सास के कमरे में जा चूका था. बिजेन्दर आज खेत हे था जहा अनुपमा भी गयी थी उसके साथ सुशीला के कहने पर.
"तू पूछने कबसे लगा रे और आज तोह तेरे दर्शन की भी उम्मीद नहीं थी फिर ये मेहरबानी जरूर काम से होगी?", करीब की नजर का चस्मा कपडे से साफ़ करके डब्बी में बंद करती हुई चंद्रो देवी ने एक तकिया शंकर की तरफ बढ़ा दिया जो अब बिस्टेर पर हे करवट लिए उनके सामने कोहनी के भर लेट चूका था. इस घर में शंकर को असली बेटे का दर्जा देने वाली भी यही महिला थी और शंकर ने भी कभी दिखावा न किया था जो उसके रहने से साफ़ पता चलता था.
"काम तोह हॉस्पिटल में भी नहीं था ताई आज. सारे डॉक्टर मौजूद थे और मेरा जितना काम था मैं करके आ गया. वो इन्दर से बात हो रही थी तोह उसने कुछ बताया लेकिन मेरे पल्ले न पड़ा. आप तोह क्सक्सक्सक्स गाँव से हो न और ताऊ जी से आपका रिश्ता खुद बड़े दादा लेके गए थे उधर?", अब चंद्रो देवी थोड़ा खुल कर मुस्कुराई.
"गाम छोड़ तहसील तक चर्चे थे मेरे और 13 की उम्र बाद तोह किसी ब्याह शादी में भी जाना पड़ता तोह मुँह ढकवा के ले जाते थे मेरे पिता जी. ठेठ जमींदारी वाले गुज्जरो के कुनबे की पहली छोरी थी और सबका लाड प्यार इतना था के aan-jaan से रोकते भी न था इसलिए do-naali बचपन में सीखा दी थी. पिता जी एक पंचायत में थे और वह किसी ने गर्मी दिखानी चाहि 4-5 आदमियों के बूते तोह मैंने भी उसके माथे पर बन्दूक टिका दी थी. मामला सरपंची का और एक छोरी बन्दूक लिए कड़ी हो मर्दो बुधो के बीच तोह सदमे जैसा हो गया था सबके लिए. वही ससुर जी आये होये थे लेकिन रिश्ता रखने की उन में भी हिम्मत न थी. रघुवीर के पिता जी से बातचीत हुई थी उनकी तोह वो आये थे हमारे घर. उनका नाम हे बहोत था और फेर तेरे ताऊ भी चौखे दीखते थे. कर दिया ब्याह लेकिन शर्त यही के मैं बंधन में न रहने वाली और गलत बात पे छोटा बड़ा भी न देखती. ससुर जी ने तोह सब स्वीकार था.", अब जैसे शंकर को सरपंच वाला किस्सा याद आ गया था के कैसे ताई ने अपनी बिल्लो से उसका भेजा हे फाड़ दिया था एक पल में.
"वो तोह जानता हु ताई कौनसा आज से देख रहा हु पर जलवा सरपंच वाला याद आ गया आपकी बन्दूक से. वैसे बात कुछ और थी जो मैं पूछना चाहता था."
"सीरगत (सिग्रेटी) बाल ले तेरी अगर दिल करे है तोह. मैं घाम (दोपहर) में हुक्का न पीती लेकिन तू रोटी के बाद फूंकता है. पूछ ले जो पता होगा वो बता दूंगी.", शंकर ने फिर भी उठने का कोई उपक्रम न किया.
"ये देवकी चची और आपका आपसी रिश्ता है क्या ये एक परिवार वाला रिश्ता है या गाँव वाला?", इस सपाट से सवाल ने एक पल के लिए तोह चंद्रो देवी को हैरान कर दिया लेकिन जैसे उन्हें भी पता था के कभी न कभी तोह ये मुद्दा आएगा हे.
"तेरी माँ से न पुछया तूने?"
"वो तोह गाँव गयी हुई है उधर से कल आएँगी लेकिन आप उन्हें जानती हे हो ताई. वो पूछ लेंगी पर जवाब आजतक दिया उन्होंने किसी बात का. सवाल तोह मेरे बहोत है उनसे लेकिन जाने दो फिर वो मुझे हे शिक्षा दिखा देंगी.", अब चंद्रो देवी हामी भर्ती हुई हंस रही थी.
"कौशल्या है तोह रामेश्वर और इन कुनबों का वजूद है शंकर नहीं तोह फेर तू तोह खुद इस हवेली को खंडहर बना चूका होता. उसके सवाल से तोह मैं खुद बचती हु और एक वही है जिसका सीना मेरी बन्दूक तक की परवाह न करता. देवकी.. मेरे सेज चाचा धनपत की दूसरी बीवी से हुई थी लेकिन तब तक पिता जी ने वो न्यारे कर दिए थे. दादा ने तोह पहले हे मेरे चाचा के नाम पांचवा हिस्सा किया था उसके लक्खण जो माडे थे. पहली लुगाई बहोत बढ़िया था मेरे चाचा की पर आदमी नालायक हो तोह फेर औरत भी बगावत कर हे दे है शंकर. फेर एक तवायफ तकर गयी किसी बदनाम अड्डे पे और उस से ब्याह कर लिया चाचा ने तोह बिरादरी से बहार करना हे था. पिता जी उतने सख्त भी न थे और चाचा की जमीन के बराबर मोल देके भेज दिया इधर से. फेर 4 महीने बाद देवकी पैदा हो गयी दूसरी लुगाई से जिसका बेरा आपसदारी में हे चला. अयाश जुआरी के पास पैसा कितनी देर चलना था और वही हाल हुआ चाचा का. पिता जी ने मदद करनी चाही तोह बिरादरी सामने आ गयी दादा के साथ साथ. 15 बरस फेर कोई जीकर न हुआ घर में और मैं ब्याह के इधर आ गयी. तेरा बाप और रघुवीर साल में 2 बार आते थे इधर और जब रामेश्वर का ब्याह होया तभी पता चला के तेरे छोटे चाचा के साथ देवकी बाँध दी. कृष्ण से उसने मेरे बारे में पता चल गया क्यूंकि पीहर तोह मेरा भी 100 कोस दूर तक पहचान रखे था. पर मैंने बोलचाल न बधाई उसके साथ जबकि वो उस टाइम 3-4 बार आयी भी. कौशल्या को सब बताना जरुरी था और फेर उसने भी नकेल बाँध दी देवकी के. फेर तोह बस वो सुंडी और मुन्नी के ब्याह में हे इधर आयी थी जिसको 25 बरस तोह हो लिए. ये बात कोई और पूछता तोह मैं जवाब न देती लेकिन तू गलत बात न करता शंकर.", चंद्रो देवी ने जितना सब बताया था उस से अब नरिंदर वाली बात की तोह पुष्टि हो गयी थी पर लाजवंती वाला किस्सा कैसे शुरू करे ये उसको समझ न आया.
"ये सरपंच वाली लुगाई फेर दिखाई न दी ताई?"
"ओह.. तेरी धरम सास भी तोह गायब है उसके साथ. बताई ने तेरे पापा जी ने?"
"उनका आपस में क्या रिश्ता था जो दोनों गायब हो गयी? और लता की भी परवाह न की उन्होंने?"
"देख शंकर साफ़ बात सुन्न. मुन्नी पसंद थी सुंडी ने और ब्याह होया था ईश्वर का चरित्र देख के. लाजो अपनी छोरी की ससुराल न आती थी और न मैं उनके कभी गयी. मेरी बहु है और हवेली के भीतर मेरे हाथ के निचे रहेगी. उसकी माँ ने के गुल खिलाये और वो रेशमा क्यों फरार है तोह इसका जवाब 2 लोग हे दे सके है. एक तोह रामेश्वर और दूसरा लाजो खुद.", अब शंकर समझ गया था या उसको समझा दिया गया की इसमें मधुलता शामिल नहीं है और ऐसा क्यों किया ये वो पूछने वाला भी नहीं था लेकिन ख़ुशी थी की उसकी मधुलता वैसी बिलकुल नहीं थी.
"ताई इन्दर कह रहा था के लाजो काकी और देवकी चची में कोई सम्बंद है. आपके हिसाब से तोह चची इधर आयी नहीं और काकी गाँव में हे रहती थी. लेकिन दोनों का अतीत तोह जैसे कही एक दूसरे के आसपास रहा है. इन्दर कोई भी बात बेमतलब नहीं करता और मेरे साथ तोह कभी भी नहीं."
"तोह मैंने कब कहा भाई? देवकी मेरे घर ना आती थी और लाजो के साथ उसका के था वो तू देवकी से हे पूछ ले. मेरा बुढ़ापा चैन से कटान दे शंकर और तू भी थोड़ा घर परिवार का मजा ले. तूफ़ान हर बार न रुकता और अब कौशल्या की भी आराम कारन की उम्र है जिसका ख़याल न तुझे और न इन्दर को. अर्जुन हे लाठी बनेगा क्या अपनी दादी की भी और माँ की भी? ज़िन्दगी सीढ़ी चलती न हजम होती तोह उमेद से हे सीख ले कुछ. चल जा तेरी तिनगरी (बेटी) दरवाजे पे 2 बार चक्कर मार गयी के उसके पापा बेरा न बुढ़िया से क्यों लगे बैठे है. अगली 20 को ऋचा ने ट्रेनिंग पे चले जाना अगर ध्यान हो तोह और अब उसका दिल न लगता हवेली पे जबसे तेरी तरफ से आयी है. हाल तोह सुशीला के भी बदले बदले से है पर उसके सामने मेरा भी मुँह न खुलता. बात करके देख जरा वो अपने हे कमरे में रहती है आजकल.", शंकर ने खड़े होते हुए हाँ भरी जैसे वो ताई की साड़ी बात समझ गया हो. तूफ़ान वाली बात अपनी जगह बिलकुल उचित थी की अब अगर कही घमसान हो गया तोह फिर संधि के लिए लोग भी बचेंगे या नहीं. ताई के कमरे से बहार आते हे ऋचा सामने हे कड़ी थी.
"आप दादी से मिले आये थे?", कमर पर दोनों हाथ रख कर वो नाराजगी दिखा रही थी जिसके बदले हँसते हुए शंकर जी ने सर पर हाथ फेरते हुए ना में सर हिलाया.
"तेरे लिए हे आया था और कपडे रख ले 2 जोड़ी बैग में नहीं तोह शहर से दिलवा दूंगा. बबिता की तरफ भी जाना है तोह चल मेरे साथ, सोमवार शाम को वापिस ले आऊंगा तुझे.", बबिता के नाम पर हे ऋचा खुश हो उठी थी जो तुरंत भीतर अपने कमरे में दौड़ गयी. शंकर ने पिछले आँगन का रुख किया जहा से सुशीला के कमरे का रास्ता था. मधुलता और मल्टी भीगी कनक को धुप में बिछा रही थी सूखने के लिए. चक्की पर पिसवाने से पहले ऐसा हे किया जाता था. नजरो में शिकायत देख शंकर ने बस हलके से सर हिला दिया मधुलता की तरफ जो वापिस अपने काम में जुट गयी.
"के हाल है बेबे? शरीर परेशान करे है या तू बुद्धि हो गयी?", दरवाजा khat-khatane के साथ हे शंकर ने भीतर कदम रखे तोह सर के निचे तकिया टिकाये लेती सुशीला उसको देख कर मुस्कुराती हुई सीढ़ी बैठ गयी. बाल ठीक करने के बाद थोड़ा कमीज दुरुस्त किया और शंकर को सामने सोफे पर बैठने का इशारा देती वो जग से साफ़ गिलास में पानी भरने लगी. सुशीला के चेहरे से हे पता चलता था के वो उदास है या मुरझाई हुई पर मुस्कान से धोखा देना जैसे उसको भी ाचे से आता था.
"मैंने तोह 30 की उम्र के 2 ब्याह दिए डॉक्टर लेकिन तेरी हालत मेरे से ज्यादा करदी होवेगी जड़ तू ब्यावेगा अपने बालक. बात आवे है तन्ने क्यूंकि कोरा हांडे है न. आज बड़ी किरपा करि बेबे के धोरे ाँ की?", सुशीला के हरियाणवी तंज़ भी मजाक से भरे रहते थे और शंकर पानी पीते हुए बस सुन्न रहा था. चेहरे पर एक अलग सी हंसी आ गयी थी गिलास एक तरफ रखते हुए.
"वाई तोह कहु हु के तू बुद्धि तोह होव कोणी फेर खाट किस तरिया पकड़ ली? छोरा (बिजेन्दर) न्यारा तोह कोणी कारन लाग रहा बिंदनी आते हे? वैसे तेरा कालजा तोह बबिता बिना सूखे है."
"ाहो. एक थाप में छोरा टेल मिलेगा जे ेहसि सोच भी राखी तोह. हाँ बबिता की ालबाद तोह याद आवेंगी हे. फ़ोन तोह करि जे है दिन में 3 बार लेकिन ससुराल है उसकी फेर भी टिकन न लाग ऋ. और अर्जुन महाराज के ज्ञान सुना दे शंकर. छोरा ब्याह के पाछे देख्या हे कोणी और तू 2 बार आ गए हवेली.", सुशीला ने 2 बार आने वाली बात ख़ास तरह से कही थी जिस पर शंकर खिसियाता सा लगा जैसे चोरी पकड़ी गयी हो.
"आज तोह ताई धोरे आया था काम से. तू फ़ोन कर लिया कर अर्जुन ने, मेरे दादके है वो 20 जून तक. वापिस आवेगा तोह तेरे और बबिता से मिले बिना तोह रुके कोणी लेकिन तू ब्याह ते अगले दिन दिखी कोणी?", सुशीला क्या बताती की वो तोह बड़ी मुश्किल से माधुरी के पीछे तक आयी थी और फिर अरमान जागते उस से पहले वो वह से निकल चली. अर्जुन का जीकर खुद हे किया था अभी और फिर से दुविधा चेहरे पर दिखने लगी.
"अर्जुन से दिल लग गया न सुशीला? तेरा भी वो दिल से हे करता है जितना मैंने देखा. और बबिता बिजेन्दर के रूप में बड़े भाई बहिन जो उसके साथ खुल कर हँसते बोलते है. अब तोह ऋचा ने भी झिझकना छोड़ दिया उसके साथ. याद है ऐसे हे तू, मैं, राजू और संजय होते थे बचपन में. संजय ज्यादा तेजी में था जो आज गायब हे हो गया और तेरा कसूरवार मैं खुद हु.", बात अर्जुन के किस्से से अतीत में जाने लगी तोह सुशीला ने थोड़ा हलके हाथ से शंकर के सर पर चपत जड़ दी.
"मेरा कोई कसूरवार न है शंकर और अपनी गलती मान ने की जगह उल्टा मैं हे सबसे नाराज हो गयी. 2 महीने में अर्जुन ने 25 साल भर दिए तोह दिल क्यों न मिले उसके साथ? सच कहु तोह ेब उतना तोह तेरे साथ का टाइम भी याद न जितना इसके साथ बिताया पसंद है. बिजेन्दर ने आजतक किसी के साथ थाली सांझी न करि और अर्जुन के खातिर वो छोरा भी बदल गया जो हर टाइम बस अपनी अकड़ में रहे करता. हाँ बबिता 18 की होती तोह मैं ईंट बजा देती नाना के साथ उसका रिश्ता अर्जुन से करवा के हे रहती. हाहाहा.. गोलू आज केहवे था के बबिता अर्जुन के साथ एक फोटो में थी और न्यू लगे था के या तोह भाई बहिन है या ... रेखा से पूछ के बताइये के खुराक ली थी इसके टेम, फेर बबिता की वा हे शुरू होवेगी.", रेखा का जीकर इस घर में थोड़ा अजीब लगता था लेकिन अब वो होता रहता था कभी ऋचा के मुँह से तोह कभी Anupama-Bijender या खुद चंद्रो देवी के.
"माँ से पूछ लियो साड़ी खुराक. और कपडे बदल ले फेर बबिता से मिलवा ल्यौ तन्ने. तेरी माँ की तबियत थोड़ी ढीली है उम्र और अकेलेपन की वजह से. ग्लूकोस लगा के थोड़ी फीस ले आऊंगा. ऋचा भी चल रही साथ और सोमवार मैं हे ले आऊंगा वापिस दोनों को.", शंकर को सितारा देवी तक की फ़िक्र थी और ये सुन्न कर सुशीला के चेहरे पर एक दिलकश सी मुस्कान आ गयी जिसमे बहिन वाला स्नेह था.
"मैडम चंद्रो देवी सोवे है के? ेब पीहर जाना है तोह बताना पड़ेगा?"
"ताई की बात हो चुकी और उन्हें ये भी पता के तुझे मैं लेके जा रहा. चल तू कपडे बदल ले मैं बहार आँगन में हे हु.", शंकर खड़ा हुआ तोह सुशीला छेड़ने से बाज ना आयी.
"सरगट फूंकनी है या nain-mattakka अपनी उम्म्म लता जी से?", शंकर सर पे हाथ रखता तेज कदमो से बहार चल दिया जहा मधुलता उसकी काली चाय लिए तैयार थी और ऋचा अभी भी सँवारने में जुटी थी, कपडे बैग में रखने के बाद. सुशीला ने दरवाजा बंद करने के बाद वो ढीला सलवार कमीज उतार कर अलमारी का रुख किया तोह दिवार पर टंगे शीशे में अपने बढ़ती उम्र के बावजूद इतने उन्नत और बड़े वक्षो पर नजर चल हे गयी. हर मामले में वो बबिता से 2 इंच काम हे थी लेकिन आज भी पेट पर चर्बी का निशाँ न था. शरीर लम्बा चौड़ा और म्हणत की वजह से 51 की उम्र भी आज तक बरकरा. आइना निहारते हे सर झटकती हुई वो अपने सीने को उस असाधारण सी सफ़ेद ब्रा से ढकने लगी.
'कौन समझाए डॉक्टर को उसके पूत के काण्ड. बेटी के चक्कर में माँ पे चढ़ गया और ऐसा चढ़ा नासपीटा की अब हवेली से बहार निकली तोह खुद गलती करुँगी जो उस से अनजाने हे अँधेरे में हो गयी.', बबिता ने ज्यादा समय न गंवाया क्योंकि ये बुखार उस पर दिन में कई बार चढ़ने लगा था उस अँधेरी मुलाकात के बाद से. वो जल्द हे कमरे से तैयार हो कर बहार निकल आयी थी बबिता के पास पहुंचने के लिए और शंकर सिग्रत्ती के साथ काली चाय ख़तम करके इन दोनों के लिए निकल चला इस हवेली से. मधुलता का दिन नहीं था लेकिन वो नाराज जरूर थी. आखिर शंकर आज यहाँ आया भी तोह अपने भाई के कहने पर था जो खुद उत्तर प्रदेश के उस अनजान शहर पहुंचने हे वाला था ढलते हुए दिन के साथ.
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"नाना जी और मौसी लौट आये है. उठ जाओ अब कितना सोना है?", आँचल ने झिंझोड़ कर अर्जुन को उठाते हुए कृष्णेश्वर जी के आने की जानकारी दी. वो दोपहर 3 बजे दीपा भाभी के घर से लौटा था और अब 6 बजने वाले थे. घर आते हे वो हलके कपड़ो में वातानुकूलन चला कर जो सोया था उसकी आँख अब खुल रही थी. कुछ पल तोह वो बस आँचल के चेहरे को देखता रहा जैसे समझने की कोशिश कर रहा हो की हुआ क्या है. अर्जुन को ऐसे खोया हुआ देख आँचल ने हलके से उसके होंठो पर एक पप्पी करके रही सही नींद भी उड़ा दी.
"ओह पागल हो क्या?", कमरे में कोई नहीं था और दरवाजा भी ढलका हुआ. ये देख कर कुछ सुकून मिला लेकिन अब आँचल उसकी गॉड में बैठी थी.
"हीरो बहोत थके थके से आये थे घर और परसो खुद जब मुझे सत्ता रहे थे तब मैंने तोह नहीं कहा के तुम पागल हो. मच्छर ज्यादा काटे है क्या जो इतना खरोच रखा खुदको?", अर्जुन के सीने पर ये निशाँ दीपा भाभी की दें थी चाहे वो हलके हे सही लेकिन नजर आने लायक थे.
"मेरा वो मतलब नहीं था और ये बौ जी भी लौट आये क्या छोटे दादा के साथ साथ?", अर्जुन ने अब प्रेमवश हे बाहों का घेरा आँचल की कमर में दाल लिया था जो पहले तोह खुश हुई फिर उचक कर कड़ी हो गयी.
"कपडे पहन लो कही खामख्वाह मेरी जैसी हालत किसी और की हो जाए. नाना जी हे आये है मां और मौसी के साथ. आयी तोह अंजलि भी है लेकिन वो तोह जाने इतनी खामोश क्यों रहने लगी. बड़े नाना जी बता कर गए थे की तुम संभाल लोगे बात को इसलिए आयी थी मैं.", अब अर्जुन को देवकी का ध्यान आया जो तुरंत उठ खड़ा हुआ और उसके साथ हे निक्कर में उसका विशाल अजगर सर उठाये. आँचल बड़ी हैरत से देख रही थी उस उभार को और फिर तुरंत पलट कर बहार दौड़ गयी.
'ये लड़की मरवायेगी mujhe..Oh तेरी. भाई तू मरवाएगा मुझे उस से पहले. जब देखो मेरे पहले तू खड़ा हो जाता है.", इस्त्री किया हुआ कुरता पायजामा पहन कर भीतर वाले बाथरूम से हे चेहरा दुरुस्त करके वो बहार निकला तोह पहले रौशनी बुआ से मिला जो खुद बड़ी खामोश तबियत की महिला था, शुरू से हे ऐसी. कृष्णेश्वर जी सेवक से कच्चे आँगन में छिड़काव करवा रहे थे और अर्जुन को देख कर वो उधर हे चले आये जहा तखत और चारपाई बिछी थी. लाली की माँ पहले वह लकड़ी का मेज रख गयी और उनके पीछे हे लाली के साथ अनामिका चची सबके लिए chai-paani और अर्जुन का दूध लेती आयी. दूध अंजलि और आँचल के लिए भी था जो चॉकलेट मिला भूरे रंग का बर्फ से ठंडा किया. विनोद बाथरूम से चेहरा धो कर अर्जुन के हे बराबर आ बैठा.
"आज तुम्हारे कान भी तुम्हारे साथ सो रहे थे भतीजे. लगता है नींद पूरी नहीं हो रही.", विनोद के चर्चा शुरू करने से कृष्णेश्वर जी ने बस कप उठा लिया अपनी बात रोक कर. मुन्ना नाहा चूका था जो रौशनी बुआ की गॉड में खेल रहा था.
"कल की थकान थी चाचा जी जो रात में सही से नहीं गयी इसलिए दिन में सो गया. धुप में करना भी क्या था और घर पे लोग भी नहीं थे. अंजलि दीदी का नौ वाला काम हो गया? और घर का क्या करना है?"
"घर तोह ताऊ जी के कहे मुताबिक किराये पर हे देने लगे है. उन्होंने कहा था के ये सामने के दोनों कमरे रौशनी दीदी और अंजलि बिटिया के होंगे और सामान जितना जरुरत होगी उतना गाडी से मंगवा लेंगे. वैसे भी घर में तेरी चची अब अकेली होगी तोह उसके साथ कोई होना जरुरी है.", विनोद ने चाय का कप उठाने से पहले एक कप अपनी बड़ी बहिन को दिया जो ाची बात थी.
"फिर मूड बना लिया आपने नेपाल में होटल देख कर आने का? उमेद चाचा कह रहे थे की दिल्ली की तरफ जो होटल बनाने वाले है वो आप अकेले देखने वाले हो.", अर्जुन ने सबको आश्चर्य में दाल दिया था ये बता कर जबकि विनोद मुस्कुरा रहा था.
"फिलहाल तोह कल नेपाल निकलूंगा भतीजे और उसके बाद कुमार साहब के साथ उमेद भाई की मीटिंग होने पर हे कोई फैंसला लेंगे लेकिन इतना निश्चिंत है की होटल तोह 5 सितारा वही बनेगा. और अकेला नहीं हु मैं उसमे. इन्दर भैया और राजू भैया भी रहेंगे जिनके साथ पुराने लोग भी. हफ्ते में 2 दिन यहाँ रहा करूँगा और 5 दिन उधर.", विनोद की बात अभी ख़तम हुई थी की संजीदा देवकी के कमरे से निकल कर इधर आती हुई कुछ ठिठक सी गयी इतने लोगो को बैठा देख
"आ जाइये सिस्टर आपको इनके साथ हे रहना है. चाचा जी संजीदा जी को बौ जी ने हे ..", विनोद ने उठ कर नमस्ते करने के बाद खुद हे एक कुर्सी उनकी तरफ बढ़ा दी.
"हाँ वो मुझे भी बता चुके है और ये ाचा किया उन्होंने. बैठिये संजीदा जी और आपकी जो भी जरुरत हो वो साफ़ बता देना ऐसा हाई कमांड का आर्डर है. पापा, कॉलेज में ये नर्स विभाग देखने वाली है और ताऊ जी ने इन्हे अपने हे इधर पक्का किया है. वैसे अब तबियत कैसी है माँ की संजीदा जी?", विनोद ने ये बात ऐसे सरल लहजे में कही थी जैसे उसको कुछ पता हे न हो. अर्जुन नजरे झुकाये मुस्कुरा रहा था जिसको कुछ और नजरे भी देख रही थी. संजीदा तोह खुद थोड़ा असहज हो गयी थी लेकिन अर्जुन ने आखें झपका का आश्वस्त किया तोह उन्होंने जानकारी दी.
"दोपहर में उन्हें दलीय और दूध दिया था मैंने. थोड़ी सी अशांत जरूर है लेकिन ऐसा होना लाजमी भी है जब आपकी आँखों की रौशनी चली जाए और आवाज भी. मेरी पंडित जी से बात हुई थी और उन्होंने हे कहा था के वो इन्हे शिफ्ट करवा रहे है कल जब यहाँ से जाएंगे. समय और सही देखभाल से हे सुधार हो सकता अगर कुछ भी मुमकिन है नहीं तोह ये ऐसी हे रहेंगी या हालत बिगड़ सकती है.", अब बारी थी बाकी सभी के होश उड़ने की और रौशनी के तोह हाथ से हे प्याली निचे जा गिरी जिसको आँचल ने हे अपने साथ लगते हुए धनदास बंधाया. कृष्णेश्वर जी के चेहरे पर आया पीलापन भी किसी से न छिप सका.
"जब हम लोग गए तब देवकी पूरी तरह ठीक थी डॉक्टर. ऐसे कैसे दृष्टि और बोलने की क्षमता जा सकती है? और भैया ने क्या कहा की वो मेरी धर्मपत्नी को ले जाएंगे? ऐसे कैसे ये मुनासिब है.?", अब उन्हें नर्स और डॉक्टर का भी फरक न पता था. लेकिन घर के द्वार खुलने पर उनके बड़े भाई साहब जरूर लौट आये थे सफारी लिए. अब सवाल भी बहोत थे और उनके जवाब देने वाला भी लौट आया था जिसको देख कृष्णेश्वर जी बर्फ से ठन्डे हो गए. पूर्णिमा जी तोह पशुओं की तरफ हे चली गयी गाये को गुड़ देने और अपने ताई ताऊ जी के लिए विनोद ने अर्जुन से पहले दिवार से लगी चारपीआई दाल दी. संजीदा ने भी मौका देख कर बताना शुरू कर दिया
"हेड इंजरी मतलब सर पर चोट लगने का प्रभाव अक्सर मौके पर पता नहीं चलता अंकल. आपने कल उन्हें चलते फिरते देखा था?", अब कृष्णेश्वर हाँ तोह नहीं कह सकते थे क्योंकि देवकी तोह बिस्टेर पर हे थी पूरा समय.
"क्या चर्चा हो रही है भाई? कृष्ण, तुम कब लौटे वह से?", रामेश्वर जी के बोलते हे अर्जुन अपने दूध को ख़तम करने में जुट गया.
"ये डॉक्टर कह रही है भैया की अब देवकी न देख सकती है और न बोल. और अगर ऐसा है तोह शंकर बड़ा डॉक्टर है वो अपनी चची को ठीक न करेगा?"
"देख भाई कृष्ण मैं तोह चिकित्सा में हु शुन्य और शंकर के कहने पर हे मैं देवकी को साथ ले जा रहा हु जिस से उसको उचित देखभाल मिल सके डॉक्टर की निगरानी में. यहाँ वो आज दोपहर तक में बिस्टेर से 3 बार गिर चुकी है तोह खुद सोच की क्या 24 घंटे देखभाल मुनासिब है?", अब खामोश बैठी कौशल्या जी ने हे उनसे पहले अपने विचार प्रकट कर दिए.
"तुम भी चलो फिर साथ अगर देवकी के बिना जी नहीं लगता तोह. यहाँ बहु बचा, घर और ये पशु संभाले या उतना करने के साथ देवकी को भी? और संजीदा नर्स है डॉक्टर नहीं. घर को हॉस्पिटल बनवाना है तोह बाकी सबको बहार रहना पड़ेगा फिर. बड़े डॉक्टर तोह दिन का 20 हजार भी लेंगे इधर मौजूद रहने का और उनके नखरे भी बहु और रौशनी सहेंगी तोह फिर कर लिया काम. देवर जी तुम बात तोह सीढ़ी करती हो लेकिन कहा पर alp-viraam और कहा purn-viraam लग्न है तुम्हे नहीं पता.", कृष्णेश्वर को इस बात का कुछ अधिक हे बुरा लगा था और अर्जुन ने आँचल को इशारे से इधर से कमरे में चलने का कहा, बाकी सबको साथ ले कर. आँचल के साथ अंजलि, संजीदा और अनामिका चची भी उनके कमरे में चल दिए जिसका दरवाजा अर्जुन ने ढाल लिया. अब आँगन में घर के बड़े हे थे क्योंकि विनोद ने सेवक और लाली की माँ को भी उनकी जगह भेज दिया था.
"भाभी अर्धांगिनी है मेरी वो और पिता जी ने हे उन्हें हवेली की जिम्मेवारी सौंपी थी. हाँ वो आप जैसी परिपक्व नहीं है और जुबान की कड़वी भी है थोड़ी लेकिन बात अगर पैसो के हे है तोह उसका इंतजाम भी हो जाएगा. विनोद कर देगा सब प्रबंध लेकिन यहाँ गाँव में पगड़ी सबकी उछलेगी जब ये पता लगेगा की हवेली की करता धर्ता को हे देखभाल के लिए बहार भिजवा दिया गया. मैंने न तोह आजतक भैया से हिसाब किया है और न मैं अब झोली फैलाऊंगा.", कृष्णेश्वर समाज की वजह से ये सब बोल रहा था और रामेश्वर जी के न चाहते हुए भी ये बड़ी बात हो हे गयी जब देवर और भाभी का कड़वा टकराव हो गया.
"कौन प्रमुख है हवेली का? तुमने कितना हिसाब और कहा कहा का दिया है पिछले 40 बरस में ये मुझसे भी नाह छिपा. रही बात गाँव के लोग क्या समझेंगे और विनोद के पैसे की तोह मैं न देने देती इसको एक पायी भी और तुम होंगे इनके लाडले लेकिन 65 बरस के होने पर भी तुम न बाप बन सके न परिवार के संरक्षक. तुम्हारे काले सच वो दबाये बैठी है और तुम उसको सिर्फ इस डर से हे बचा रहे हो. सुनो कृष्ण अबसे न बसी वाली जमीन से तुम्हे वो भाड़ा मिलेगा और न 30 किल्ले पार्ले गाँव की जमीन की आमदन. जो नैतिक तौर पर इनका और तुम्हारा हिस्सा था उसमे से 2/3 जमीन तुम बेच चुके हो जिसका आधा भी विनोद और इसकी बहनो को न मिला जिन्हे तुमने वो जमीन बेचने का कारण बताया था. बहोत लगाव है न तुम्हे एक ख़ास नाम से तोह अगर वैसा कुछ दोहराया तोह अपनी बीवी की बगल में मिलोगे, इस बात को दिमाग में बैठा लेना. खेत सँभालने का दिल करे तोह ाची बात है नहीं तोह आराम से रहो यहाँ. सवाल नहीं करने वाली मैं तुमसे अगर कोई गलती न दोहराओ तोह. चल रौशनी बिटिया तू भी कपडे बदल ले और थोड़ा आराम कर. माफ़ करना तेरे सामने वो सब कहना पड़ा.", कौशल्या जी अपनी भतीजी को साथ लिए अपने कमरे में चली गयी जहा पूर्णिमा जी पहले से थी. कृष्णेश्वर के तोह चेहरे पर 12 बज चुके थे शाम के साढ़े 6 बजे हे और विनोद भी अंगड़ाई लेता हुआ खड़ा हो कर बहार की तरफ चल दिया, अर्जुन की रानी लिए.
"तुम्हे लगता है आज तुमने सही सवाल उठाया कृष्ण? देवकी पर कानूनी कार्यवाही होती तोह 2-3 जनम लेने पड़ते सजा पूरी करने के लिए और तुम्हारी भाभी जाने कौनसा तुम्हारा ऐसा सच जानती है की आज उसने हमारी भी परवाह नहीं की. वो 30 किल्ले तुम्हे इसलिए मिले थे की विनोद और दोनों बेटियां अपना हिस्सा खर्च भी कर दे तोह तुम्हारे खाते में हमेशा उचित पैसा रहे लेकिन तुम्हारे खाते में से व्यक्तिगत तौर पर पिछले 3 बरस में 70 लाख रूपया निकला है. पूरी आमदन में भी देवकी को अलग से 5 प्रतिष्ठित मिलता था जिसके खाते में आज की तारीख पर एक नया पैसा नहीं है. अब अपनी गर्दन मैं खुद काट लू या ये नेक काम भी तुम करोगे?", जब दोनों भाई हे यहाँ बचे थे तोह रामेश्वर जी ने ठंडी आह भरते हुए ये एक और कला सच कृष्णेश्वर के सामने रख दिया. कृष्णेश्वर के तोह हाथ जुड़ चुके थे और चेहरा 115 के कोण पर झुका हुआ.
"हम गड़े मुर्दे नहीं उखाड़ रहे कृष्ण क्योंकि वैसा करने पर हमारी हे पीड़ा बढ़ेगी लेकिन वर्तमान का सच भी देखा जाए तोह तुम आभार मनाओ अपनी भाभी का जिसने तुम्हे बक्श दिया. वो हमारे हृदय और तुम्हारे साथ हमारे स्नेह की कदर करती है कृष्ण लेकिन ये दोहरा जीवन जो तुम जी रहे हो इसको तत्काल बंद कर दो. हमारे पिता जी का नाम तुम्हे उनकी इस भूमि पर रह कर बढ़ाना था जबकि वो जिम्मेवारी चौपाल और सरपंच के साथ पूरा गाँव उठा रहा है, हमारे तुम्हारे बिना. अब उसको बढ़ा नहीं सकते तोह काम से काम बरकरार रखना हे बहोत होगा. थोड़ा सोचना और तुम्हे लगे की पलट कर जवाब देने से तुम सही साबित हो सकते हो तोह फिर तुम्हारी मर्जी. मिल लो देवकी से, मैं जरा लाला की तरफ जा रहा हु. वो लोग कल की तैयारियां देख रहे है जिनका तुम्हे भी पता नहीं होगा.", जाते जाते आज रामेश्वर जी भी ये टिप्पणी कर गए थे और व्यथित मैं के साथ अब कृष्णेश्वर को घबराहट भी हो रही थी. पाँव देवकी की तरफ बढ़ना चाहते थे लेकिन उस से पहले अपनी भाभी के कमरे का इल्म था उन्हें जिनके साथ आज आवेश वश वो कुछ ज्यादा हे गलत तरीके से पेश आये जबकि वो चाहती तोह सचमुच कृष्णेश्वर hathkadi-bandh होता.
"पानी पी लीजिये छोटे दादा जी और वो आपकी भाभी है कोई गैर नहीं. दादा जी भी गलती होने पर माफ़ी मांग लेते है और आप तोह सही सलामत है जबकि मैं आपकी जगह होता तोह दादी माफ़ी तोह दूर मुझे घर के आसपास न रुकने देती.", अर्जुन ने ठन्डे पानी का गिलास उन्हें देते हुए खेलघर का रुख किया जहा आज वो थोड़ी कसरत करने की सोच रहा था. प्लास्टिक के लिफाफे में अपने अभ्यास के कपडे लिए वो आज अलग हे जोश से भरा था. शायद अपनी दादी की वजह से या दिन वाली कसरत.
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इधर एक अलग हे प्रदेश के ख़ास हिस्से में नरिंदर कुछ ज्यादा हे लम्बा सफर करके पंहुचा था. इस मामले में वो अपने भाई से भी कुछ बेहतर था जिसको जैसे थकान का असर नहीं था चाहे दिन से रात हो जाए या फिर अगला दिन. पूर्वांचल के इस हिस्से में एक thik-thaak सा होटल देख कर गाडी कड़ी करता वो भीतर आया तोह होटल के रिसेप्शन पर बैठा युवक भी ऊंघ रहा था जैसे ये धंदा इधर कुछ ख़ास न हो. नरिंदर द्वारा उसका मेज ठकठकाने पर वो ुनिन्दा सा हे बोल उठा.
"3 घंटे का 300 और रात का 1000. लड़की ने लफड़ा किया तोह वो मामला तुम देखोगे."
"ओह मेरे भोले बालम. प्यारे हम यहाँ अकेले आये है और 2 दिन रुकने के साथ ाचा भोजन भी चाहते है. और फिलहाल तोह कमरे में जाते हे नहाने का इरादा है.", अब वो युवक उठ खड़ा हुआ इस आकर्षक व्यक्ति को कोहनी तक ास्तें चढ़ाये और चेहरे पर मुस्कराहट लिए देख. नरिंदर व्यक्तित्व के मामले में अपने समकक्ष सभी भाइयों से कही ज्यादा प्रभावित करता था जिसमे सभी की अपनी विशेषता थी लेकिन उम्र का प्रभाव सबसे काम इस व्यक्ति पर हे था. हमेशा चेहरा साफ़ रखना और बाल एक सार से ठीक विनोद खन्ना की तरह.
"सर, हमारी होटल में सिर्फ 2 हे कमरे है जिनके साथ बाथरूम की वयवस्था है. एक तोह मालिक का है और दूसरा 800 रुपये एक रात. वो तोह इधर सैलानी आते है जिनको अपना मजा करना होता है तोह कोई भी कमरा दे देते है लेकिन हर मंज़िल पर 4 बाथरूम और 4 टॉयलेट बने है. हाँ खाने का ऐसा है की होटल में तोह सिर्फ दारु का सामान मिलता है लेकिन सामने ढाबा 24 घंटे चलता है जिसका आहना मटन और खमीरी रोटी चम्पारण से भी बढ़िया मिलेगी. आप जब कहेंगे मैं खुद हे हाजिर हो जाऊंगा आपका आर्डर ले कर.", युवक देखने से गढ़वाल की तरफ का था लेकिन पढ़ा लिखा और जीवन के प्रति सकरात्मक. नरिंदर ने 500 के 4 नोट निकाल कर उसके सामने रख दिए.
"1600 2 दिन का भाड़ा दोस्त और 400 तुम्हारी एडवांस टिप. बहार काली कॉन्टेसा कड़ी है उसको देख लो कहा लगाना है. कमरा दिखा दो बाकी दारू मीट का बता कर तुमने मुझे खुश कर दिया.", अब इतनी बड़ी टिप की आशा तोह उस युवक को सपने में भी नहीं थी लेकिन नरिंदर के अंदाज से वो सम्मोहित होता हुआ खुद हे बैग उठा कर आगे चल दिया हाथ में चाबी लिए.
"थैंक यू सर. यहाँ तोह कस्टमर 200 रुपये का भाड़ा देने के लिए मच मच करता जब 2 घंटे का बताता हु तोह. आप पहले आदमी है जिन्होंने मुझे टिप दिया इसलिए एक टिप मेरी भी ले लीजिये. ये पूरा क़स्बा अफीम खान का है मतलब उसका नाम तोह तौफीक खान है पर धंदा अफीम का है जिस वजह से नाम यही पड़ गया. आपकी गाडी उसको पसंद आयी तोह वो कल उसके घर कड़ी होगी. यहाँ कुल जमा 1600 दुकाने, ढाबे और फड़ी लगती है जो नियम से अपना हफ्ता अफीम खान तक पहुंचते है. और सिर्फ यही क़स्बा नहीं ऐसे 10 कसबे और 2 शहर उसके निचे है. पते की बात बता रहा हु की दूकान वाले से जुबान लड़ाओ, रेहड़ी वाले या आम नागरिक से लेकिन अफीम खान के किसी आदमी से टकराना नहीं, गलती से भी. और वो har-taraf मिल सकते है. वैसे उसका धंदा विलायती शराब और लड़कियों का भी है लेकिन आप समझ हे गए होंगे की वो कितना ताक़तवर इंसान है? पुलिस और प्रशाशन भी उसके साथ है तोह हर तरह के काम में उसका बराबर हिस्सा रहता. आप किसी हीरो जैसे लगते है और आये भी अकेले हो इस छोटे लेकिन भारी बैग के साथ. चलता हु सर ये आपका कमरा है और बाथरूम में साफ़ टोलिया, साबुन शैम्पू सब मिलेगा. 11 नंबर मिला दीजियेगा जब भी कुछ जरुरत हो.", किसी बैरे की तरह सलाम मारता हुआ वो युवक अपना रेडियो बंद करता हुआ उस साफ़ सुथरे कमरे को खोल कर वापिस चल दिया. बैग एक तरफ सोफे के सामने लगे टेबल पर रख दिया था उसने.
'ये बावली गांड विष्णु पक्का इस अफीम खान को हे ठोकने आ रहा है. बताया तोह कोई बाहुबली था अब ये तोह लगता है कई बाहुबली का बाप है जिसके साथ पन्गा लिया. और ये लोंदा भी काम का है जो पैनी नजर रखता है. चल बीटा विष्णु तुझे तेरे हे अंदाज में तारे दिखता हु. जाल तेरा और शिकार मेरा.', दरवाजा बंद करके नरिंदर ने अपने जिस्म से सभी वस्त्र उतार दिए थे. वो ऐसे हे बाथरूम में घुस कर फुहारे के निचे जा खड़ा हुआ और तबतक खड़ा रहा जबतक घडी ने 20 मिनट न गँवा दिए. दरवाजे के दूसरी तरफ बजती घंटी से नरिंदर जैसे वर्तमान में लौटा और कमर पर टोलिया लपेट भीगे बदन हे वो दरवाजा थोड़ा सा खोल कर बहार देखने लगा.
"सर आपके चाहने वाले शायद इधर बहोत है. एक छोटा सा लड़का ये दे कर गया है और बोल गया की इंदरजीत को दे दीजिये, कमरा नंबर 101 वाले को. मैंने तोह अभी तक आपकी एंट्री भी नहीं करि और होटल में बस यही कमरा बुक है अभी.", युवक ने वो बंद लिफाफा देने के साथ हे 555 की सिग्रत्ती की डब्बी भी नरिंदर की तरफ बढ़ा दी जो शायद उसका ब्रांड नहीं था लेकिन उसको लेते हे चेहरे पर आयी ख़ास चमक बहोत कुछ बयान कर गयी.
"धन्यवाद. और वो सचमुच मेरा भाई है जो बहार तक मेरे साथ था बस तुमने देखा नहीं. यहाँ खिड़की से मैंने हाथ हिला दिया था उसको. एक प्लेट मटन, खीरे और प्याज का सलाद, 2 गिलास, सोडा और वैट 69 की बोतल भिजवा देना बस. रुको पैसे लेते जाओ.", मेज पर रखे बैग की जेब से हे 500 के 3 नोट युवक को देते हुए नरिंदर ने आँख मारते हुए विदा किया. दरवाजा फिर से बंद था और बिस्टेर के किनारे बैठ कर वो कागज खोला तोह पहली पंक्ति पर हे हंसी आ गयी.
'तोह अंडकोष की एक हे गोली पधारी है विश्वजीत की तलाश में? चलो दूसरे ने समझदारी दिखाई जो मेरे काम में टांग अड़ाने से बचा. अब तुमने गलती करने का विचार बना हे लिया है तोह भला हम नारायण अवतार क्या करे? अरसा हो गया तुम्हे पटखनी दिए हुए लेकिन पहले हे बता देता हु की अब हाथ से दिल ज्यादा सख्त है तोह लौटना चाहो तोह भलाई होगी. जानता हु की तुम वो अड़ियल खच्चर हो जिसने नाल भी नहीं पहन नई और दुलत्ती मारने से भी नहीं हटना. मेरे काम के बीच अपना कानून मत लाना अफसर. हाँ दोस्त की तरह मिलना चाहो तोह कभी सोनागाछी में प्रभु विश्व पूछ लेना. बढ़िया मछली के साथ संदेश खिला कर गले लगूंगा. रास्ते अलग हो तोह हालात से समझौता कर लेना चाहिए एक पारिवारिक इंसान हो. मैं इंसान नहीं रहा और अगर अभी भी तुम पीछे आने वाले हो तोह अपनी हालत के जिम्मेवार तुम खुद होंगे. मकसद आज भी वही है और हमेशा वही रहेगा बस कानून से जरा 72 का आंकड़ा है मेरा, ऑफिस नरिंदर शर्मा. धुंआ काम उड़ाना और आहना खाये बिना गए तोह सफर बेमजा रहेगा.
तुम्हारा शुब्चिन्तक प्रभु
विष्णु वर्धन'
"तेरी माँ को प्रणाम करू बे. तू क्या सोचता है मैं टांग अड़ाने से पीछे हटूंगा? ऐसा पेलुँगा न की तू खुद गले लगेगा मेरे और आहना तोह तेरे साथ खाऊंगा, अभी बेहोश नहीं होना चाहता. दोस्त, कानून की तरह आना होता तोह तुझे 10 बार थोक चूका होता, भाई की तरह आया हु घर लेने तोह लेके हे जाऊंगा. और तू तेरा हाथ पिछवाड़े में रखना क्योंकि मुझे पटखनी देने के लिए तुझे उनकी जरुरत पड़ेगी पर मैं वो बांधने वाला हु मिलने से पहले. तेरा अफीम खान और तेरा हुम्ला करने की जगह कल से हे मेरी नजर में है. मिलते है सवेरे समय से पहले, मेरी जान झांट के बाल.", नरिंदर ने पहले पैकेट को जांचा और फिर प्लास्टिक हटा कर एक 555 सुलगा ली. भीगे बाल झटकता वो जैसे अब कॉलेज में होने वाले मल्ल्युद्ध से पहले तैयार हो चूका था.
हमकदम (1)
अर्जुन उस जोरदार संसर्ग के बाद भाभी की बगल में हे लेता उन्हें सेहला रहा था जो कटे वृक्ष सी गिरी बेसुध हे थी. बिस्टेर का निचला हिस्सा उनके कॉमर्स की गवाही दे रहा था जहा गीलेपन के साथ ढेर सारा सफ़ेद वीर्य जमा था. दोनों पसीना सूखते हुए जिस्म से सांस भर रहे थे और दीपा भाभी अपने जिस्म के दुखते पोर पोर में भी अलग सी मस्ती का एहसास लेती उनींदी सी आँखों से अर्जुन को निहारने लगी जो उनके गुदाज पहले हुए कूल्हों पर हाथ फिर रहा था.
"कर ली अपने मैं की मुखिया जी? उतने शरीफ हो नहीं जितने दीखते हो और इसको कुछ दूर हे रखो मुझसे.", अर्जुन का ardh-uttejit लिंग भी साइकिल की तुबे सा मोटा था लेकिन साफ़ रंगत वाला आकर्षक अंग. दीपा भाभी ने जिस तरह से उसके लिंग को छूने का उपक्रम करते हुए सहलाया था उसका साफ़ मतलब था की वो मूसल उन्हें भा चूका है. अर्जुन उन्हें करवट के बल करता अपनी बाहों में ले कर हलके हलके चुम्बन चेहरे पर जड़ने लगा तोह दीपा भाभी को भी उसके सीने से लिपट कर ये हलके फुल्के पल आराम देने लगे.
"बंद कमरों में तोह शराफत कपड़ो सी रहती है भाभी. और इसमें मेरा दोष नहीं जब आप हो हे इतनी बेजोड़. अब दर्द तोह नहीं हो रहा?", उनके चुचो पर बने हलके निशाँ और लाली को सहलाते हुए अर्जुन ने जिस तरह पुछा था दीपा भाभी शर्माती हुई उसके दिल पर हाथ रख कर ना में सर हिलने लगी.
"दर्द.. जाने वो कहा खो गया जब आँख खुली तोह. मुझसे आधी उम्र के हो लेकिन जिस तरह तुमने प्यार किया तोह मुझे अपनी बेशर्मी भी भली लगी. तुमसे पहले इस जिस्म पर निशाँ तोह मिले थे पर उनमे प्यार एक पल भी नहीं था. आज पता लगा की क्यों जस तुम्हारी दीवानी बानी जो दर्द के बाद उस सुख और देखभाल से कही ज्यादा खुश होगी जो तुम दिल से करते हो. मेरे वस्त्र तोह कोई बड़ी बात नहीं थी तुम्हारे लिए उतारना और मैं खुद भी ऐसा कर देती क्योंकि दिल आकर्षित जो था तुम पर लेकिन तुम मुझे प्यार करते हो और इतना ख़याल रखोगे ये जान चुकी होती तोह पहल भी मैं हे कर देती. अब ऐसे हे चिपकाये रखोगे या खाना खाने का इरादा है थोड़ा?", भाभी तोह खुद हे अलग होने का नाम न ले रही थी और अर्जुन ने अपने एक जांघ उठा कर उनके ऊपर राखी तोह लिंग में बढ़ती अकड़न से उनकी पहले से गीली योनि जैसे खुद हे सुपडे से चिपक गयी.
"दिल तोह नहीं है मेरा अलग होने का जैसे आपका नहीं हो रहा. पर बिस्टेर पर एक और घंटा लगाया तोह मैं कोई बहाना बना भी लूंगा पर आपके न काम होंगे और न फिर इधर कोई देखभाल के लिए है. वैसे इरादा तोह मेरा इन पहाड़ो की गहराई में उतरने का था लेकिन जब आपका जिस्म आराम करने के बाद उठेगा तोह उठना मुमकिन नहीं होगा. पता नहीं आपने कैसे इस कुबेर के खजाने को सहेजा हुआ है और वो दिलबाग भैया अकाल से भी अंधे है और नजर से भी.", उठने से पहले अर्जुन ने एक बार उनके कूल्हों की दरार में उँगलियाँ फसायी और मुँह से एक निप्पल को दबा कर चूस लिया. भाभी तोह सीत्कार करती हुई अपनी योनि उसके लिंग पर दबा गयी थी.
"आह्हः.. पक्के जालिम हो तुम जो अलग होते हुए भी आग भड़का रहे हो. और एक पहाड़ सुजा दिए है तोह दूसरे से दूर हे रहो. ये आगे लेने में हे बुरी हालत हो गयी तोह पीछे का सोचना हे पाप है. आह्हः.. सचमुच इनके साथ साथ मेरी कमर और छूट तक दुख दी तुमने.", भाभी खड़े होते हुए अपने पाँव फैला रही थी और उनकी योनि ऊपर तिकोना बालो का हल्का जंगल सहलाते हुए अर्जुन ने भी पजामा चढ़ा लिया.
"इन्हे साफ़ कर लेना भाभी नहीं तोह रगड़ाई से टूटेंगे तोह ज्यादा दर्द होगा. वैसे अब लगता है के उस बेचारे रंगी की भी क्या हे गलती थी जब आपका बदन और ये खूबसूरत चेहरा किसी का भी चैन ख़तम कर दे? ब्रा न भी पहनो तब भी इनमे जरा सी भी लटकन नहीं. अगली बार पहले इन्ही का शिकार करूँगा. उमाहहह.", उन्हें खड़े खड़े हे सीने से लगा कर अर्जुन ने एक गहरा चुम्बन करने के बहाने कूल्हे और स्टैनो का फिर से स्पर्श लिया. भाभी पलट कर गाउन पहनती हुई शर्म और मुस्कराहट के मिश्रित भाव लिए थे. उन्हें अपने जिस्म का एहसास जरूर होगा लेकिन आज गर्व था की अर्जुन इतना प्रभावित हुआ.
"अगली बार के बारे में भी सोच रहे हो? और जिस्म म्हणत हे करता रहे जिसको सँभालने वाला मर्द भी न हो तोह वो ऐसा हे तोह रहेगा. रंगी इसको उजाड़ना चाहता था और तुमने प्यार दिया है."
"कल सवेरे साथ में नहाने का क्या ख़याल है भाभी? नहीं तोह नाश्ते से पहले आपका हे भोगा लगा लूंगा.", टीशर्ट पहन कर अपने बाल और चेहरा दुरुस्त करता वो भाभी को भी लगातार देख रहा था जिन्होंने अब अपने बाल समेत लिए थे. चेहरे पर अर्जुन का प्यार हलके निशाँ दे चूका था और होंठो पर हलकी सूजन. अर्जुन की नाश्ते वाली बात पर वो उसके कंधे पर मुक्का मारती हुई रसोईघर की तरफ बढ़ चली. आज जैसे सचमुच वो लड़की से औरत बानी थी और ये साफ़ झलक भी रहा था जब दोनों एक दूसरे को अपने हाथो से खिलते हुए वासना या काम से इतर बस अपने घर परिवार की बातों में लगे रहे. अर्जुन रुकना चाहता था लेकिन घर पे उसका होना भी जरुरी था अपने दादा दादी की gair-haajri में और आज की दोपहर बस सो कर हे गुजारनी थी.
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"ताई अगर कुछ वक़्त हो तोह क्या बात कर सकता हु अकेले में?", शंकर भी दोपहर के खाने पर चंद्रो देवी की हवेली आया था हॉस्पिटल में आधा दिन गुजार कर. हमेषा की तरह ऋचा अपने पिता के आगे पीछे हे रही और वो भी उसको लाड लड़ने में कोई कसार न रखते हुए अपने साथ लगाए पहले चारपाई पर बैठ भोजन करते रहे और फिर थोड़ी देर में मिलने का बोल अब चंद्रो देवी के कमरे में चले आये. गर्मी की वजह से इधर भी ठंडा कूलर चालु था और चंद्रो देवी अपने साधारण बिस्टेर पर तक लगाए शंकर को भी अपने करीब बैठने का बोल कर वो किताब एक तरफ रखती हुई थोड़ा खुश हुई. मधुलता पिछले आँगन में काम करवा रही थी या उसकी ये नाराजगी थी शंकर से जो बस पहले अपनी बेटी और फिर खाने के बाद उसकी सास के कमरे में जा चूका था. बिजेन्दर आज खेत हे था जहा अनुपमा भी गयी थी उसके साथ सुशीला के कहने पर.
"तू पूछने कबसे लगा रे और आज तोह तेरे दर्शन की भी उम्मीद नहीं थी फिर ये मेहरबानी जरूर काम से होगी?", करीब की नजर का चस्मा कपडे से साफ़ करके डब्बी में बंद करती हुई चंद्रो देवी ने एक तकिया शंकर की तरफ बढ़ा दिया जो अब बिस्टेर पर हे करवट लिए उनके सामने कोहनी के भर लेट चूका था. इस घर में शंकर को असली बेटे का दर्जा देने वाली भी यही महिला थी और शंकर ने भी कभी दिखावा न किया था जो उसके रहने से साफ़ पता चलता था.
"काम तोह हॉस्पिटल में भी नहीं था ताई आज. सारे डॉक्टर मौजूद थे और मेरा जितना काम था मैं करके आ गया. वो इन्दर से बात हो रही थी तोह उसने कुछ बताया लेकिन मेरे पल्ले न पड़ा. आप तोह क्सक्सक्सक्स गाँव से हो न और ताऊ जी से आपका रिश्ता खुद बड़े दादा लेके गए थे उधर?", अब चंद्रो देवी थोड़ा खुल कर मुस्कुराई.
"गाम छोड़ तहसील तक चर्चे थे मेरे और 13 की उम्र बाद तोह किसी ब्याह शादी में भी जाना पड़ता तोह मुँह ढकवा के ले जाते थे मेरे पिता जी. ठेठ जमींदारी वाले गुज्जरो के कुनबे की पहली छोरी थी और सबका लाड प्यार इतना था के aan-jaan से रोकते भी न था इसलिए do-naali बचपन में सीखा दी थी. पिता जी एक पंचायत में थे और वह किसी ने गर्मी दिखानी चाहि 4-5 आदमियों के बूते तोह मैंने भी उसके माथे पर बन्दूक टिका दी थी. मामला सरपंची का और एक छोरी बन्दूक लिए कड़ी हो मर्दो बुधो के बीच तोह सदमे जैसा हो गया था सबके लिए. वही ससुर जी आये होये थे लेकिन रिश्ता रखने की उन में भी हिम्मत न थी. रघुवीर के पिता जी से बातचीत हुई थी उनकी तोह वो आये थे हमारे घर. उनका नाम हे बहोत था और फेर तेरे ताऊ भी चौखे दीखते थे. कर दिया ब्याह लेकिन शर्त यही के मैं बंधन में न रहने वाली और गलत बात पे छोटा बड़ा भी न देखती. ससुर जी ने तोह सब स्वीकार था.", अब जैसे शंकर को सरपंच वाला किस्सा याद आ गया था के कैसे ताई ने अपनी बिल्लो से उसका भेजा हे फाड़ दिया था एक पल में.
"वो तोह जानता हु ताई कौनसा आज से देख रहा हु पर जलवा सरपंच वाला याद आ गया आपकी बन्दूक से. वैसे बात कुछ और थी जो मैं पूछना चाहता था."
"सीरगत (सिग्रेटी) बाल ले तेरी अगर दिल करे है तोह. मैं घाम (दोपहर) में हुक्का न पीती लेकिन तू रोटी के बाद फूंकता है. पूछ ले जो पता होगा वो बता दूंगी.", शंकर ने फिर भी उठने का कोई उपक्रम न किया.
"ये देवकी चची और आपका आपसी रिश्ता है क्या ये एक परिवार वाला रिश्ता है या गाँव वाला?", इस सपाट से सवाल ने एक पल के लिए तोह चंद्रो देवी को हैरान कर दिया लेकिन जैसे उन्हें भी पता था के कभी न कभी तोह ये मुद्दा आएगा हे.
"तेरी माँ से न पुछया तूने?"
"वो तोह गाँव गयी हुई है उधर से कल आएँगी लेकिन आप उन्हें जानती हे हो ताई. वो पूछ लेंगी पर जवाब आजतक दिया उन्होंने किसी बात का. सवाल तोह मेरे बहोत है उनसे लेकिन जाने दो फिर वो मुझे हे शिक्षा दिखा देंगी.", अब चंद्रो देवी हामी भर्ती हुई हंस रही थी.
"कौशल्या है तोह रामेश्वर और इन कुनबों का वजूद है शंकर नहीं तोह फेर तू तोह खुद इस हवेली को खंडहर बना चूका होता. उसके सवाल से तोह मैं खुद बचती हु और एक वही है जिसका सीना मेरी बन्दूक तक की परवाह न करता. देवकी.. मेरे सेज चाचा धनपत की दूसरी बीवी से हुई थी लेकिन तब तक पिता जी ने वो न्यारे कर दिए थे. दादा ने तोह पहले हे मेरे चाचा के नाम पांचवा हिस्सा किया था उसके लक्खण जो माडे थे. पहली लुगाई बहोत बढ़िया था मेरे चाचा की पर आदमी नालायक हो तोह फेर औरत भी बगावत कर हे दे है शंकर. फेर एक तवायफ तकर गयी किसी बदनाम अड्डे पे और उस से ब्याह कर लिया चाचा ने तोह बिरादरी से बहार करना हे था. पिता जी उतने सख्त भी न थे और चाचा की जमीन के बराबर मोल देके भेज दिया इधर से. फेर 4 महीने बाद देवकी पैदा हो गयी दूसरी लुगाई से जिसका बेरा आपसदारी में हे चला. अयाश जुआरी के पास पैसा कितनी देर चलना था और वही हाल हुआ चाचा का. पिता जी ने मदद करनी चाही तोह बिरादरी सामने आ गयी दादा के साथ साथ. 15 बरस फेर कोई जीकर न हुआ घर में और मैं ब्याह के इधर आ गयी. तेरा बाप और रघुवीर साल में 2 बार आते थे इधर और जब रामेश्वर का ब्याह होया तभी पता चला के तेरे छोटे चाचा के साथ देवकी बाँध दी. कृष्ण से उसने मेरे बारे में पता चल गया क्यूंकि पीहर तोह मेरा भी 100 कोस दूर तक पहचान रखे था. पर मैंने बोलचाल न बधाई उसके साथ जबकि वो उस टाइम 3-4 बार आयी भी. कौशल्या को सब बताना जरुरी था और फेर उसने भी नकेल बाँध दी देवकी के. फेर तोह बस वो सुंडी और मुन्नी के ब्याह में हे इधर आयी थी जिसको 25 बरस तोह हो लिए. ये बात कोई और पूछता तोह मैं जवाब न देती लेकिन तू गलत बात न करता शंकर.", चंद्रो देवी ने जितना सब बताया था उस से अब नरिंदर वाली बात की तोह पुष्टि हो गयी थी पर लाजवंती वाला किस्सा कैसे शुरू करे ये उसको समझ न आया.
"ये सरपंच वाली लुगाई फेर दिखाई न दी ताई?"
"ओह.. तेरी धरम सास भी तोह गायब है उसके साथ. बताई ने तेरे पापा जी ने?"
"उनका आपस में क्या रिश्ता था जो दोनों गायब हो गयी? और लता की भी परवाह न की उन्होंने?"
"देख शंकर साफ़ बात सुन्न. मुन्नी पसंद थी सुंडी ने और ब्याह होया था ईश्वर का चरित्र देख के. लाजो अपनी छोरी की ससुराल न आती थी और न मैं उनके कभी गयी. मेरी बहु है और हवेली के भीतर मेरे हाथ के निचे रहेगी. उसकी माँ ने के गुल खिलाये और वो रेशमा क्यों फरार है तोह इसका जवाब 2 लोग हे दे सके है. एक तोह रामेश्वर और दूसरा लाजो खुद.", अब शंकर समझ गया था या उसको समझा दिया गया की इसमें मधुलता शामिल नहीं है और ऐसा क्यों किया ये वो पूछने वाला भी नहीं था लेकिन ख़ुशी थी की उसकी मधुलता वैसी बिलकुल नहीं थी.
"ताई इन्दर कह रहा था के लाजो काकी और देवकी चची में कोई सम्बंद है. आपके हिसाब से तोह चची इधर आयी नहीं और काकी गाँव में हे रहती थी. लेकिन दोनों का अतीत तोह जैसे कही एक दूसरे के आसपास रहा है. इन्दर कोई भी बात बेमतलब नहीं करता और मेरे साथ तोह कभी भी नहीं."
"तोह मैंने कब कहा भाई? देवकी मेरे घर ना आती थी और लाजो के साथ उसका के था वो तू देवकी से हे पूछ ले. मेरा बुढ़ापा चैन से कटान दे शंकर और तू भी थोड़ा घर परिवार का मजा ले. तूफ़ान हर बार न रुकता और अब कौशल्या की भी आराम कारन की उम्र है जिसका ख़याल न तुझे और न इन्दर को. अर्जुन हे लाठी बनेगा क्या अपनी दादी की भी और माँ की भी? ज़िन्दगी सीढ़ी चलती न हजम होती तोह उमेद से हे सीख ले कुछ. चल जा तेरी तिनगरी (बेटी) दरवाजे पे 2 बार चक्कर मार गयी के उसके पापा बेरा न बुढ़िया से क्यों लगे बैठे है. अगली 20 को ऋचा ने ट्रेनिंग पे चले जाना अगर ध्यान हो तोह और अब उसका दिल न लगता हवेली पे जबसे तेरी तरफ से आयी है. हाल तोह सुशीला के भी बदले बदले से है पर उसके सामने मेरा भी मुँह न खुलता. बात करके देख जरा वो अपने हे कमरे में रहती है आजकल.", शंकर ने खड़े होते हुए हाँ भरी जैसे वो ताई की साड़ी बात समझ गया हो. तूफ़ान वाली बात अपनी जगह बिलकुल उचित थी की अब अगर कही घमसान हो गया तोह फिर संधि के लिए लोग भी बचेंगे या नहीं. ताई के कमरे से बहार आते हे ऋचा सामने हे कड़ी थी.
"आप दादी से मिले आये थे?", कमर पर दोनों हाथ रख कर वो नाराजगी दिखा रही थी जिसके बदले हँसते हुए शंकर जी ने सर पर हाथ फेरते हुए ना में सर हिलाया.
"तेरे लिए हे आया था और कपडे रख ले 2 जोड़ी बैग में नहीं तोह शहर से दिलवा दूंगा. बबिता की तरफ भी जाना है तोह चल मेरे साथ, सोमवार शाम को वापिस ले आऊंगा तुझे.", बबिता के नाम पर हे ऋचा खुश हो उठी थी जो तुरंत भीतर अपने कमरे में दौड़ गयी. शंकर ने पिछले आँगन का रुख किया जहा से सुशीला के कमरे का रास्ता था. मधुलता और मल्टी भीगी कनक को धुप में बिछा रही थी सूखने के लिए. चक्की पर पिसवाने से पहले ऐसा हे किया जाता था. नजरो में शिकायत देख शंकर ने बस हलके से सर हिला दिया मधुलता की तरफ जो वापिस अपने काम में जुट गयी.
"के हाल है बेबे? शरीर परेशान करे है या तू बुद्धि हो गयी?", दरवाजा khat-khatane के साथ हे शंकर ने भीतर कदम रखे तोह सर के निचे तकिया टिकाये लेती सुशीला उसको देख कर मुस्कुराती हुई सीढ़ी बैठ गयी. बाल ठीक करने के बाद थोड़ा कमीज दुरुस्त किया और शंकर को सामने सोफे पर बैठने का इशारा देती वो जग से साफ़ गिलास में पानी भरने लगी. सुशीला के चेहरे से हे पता चलता था के वो उदास है या मुरझाई हुई पर मुस्कान से धोखा देना जैसे उसको भी ाचे से आता था.
"मैंने तोह 30 की उम्र के 2 ब्याह दिए डॉक्टर लेकिन तेरी हालत मेरे से ज्यादा करदी होवेगी जड़ तू ब्यावेगा अपने बालक. बात आवे है तन्ने क्यूंकि कोरा हांडे है न. आज बड़ी किरपा करि बेबे के धोरे ाँ की?", सुशीला के हरियाणवी तंज़ भी मजाक से भरे रहते थे और शंकर पानी पीते हुए बस सुन्न रहा था. चेहरे पर एक अलग सी हंसी आ गयी थी गिलास एक तरफ रखते हुए.
"वाई तोह कहु हु के तू बुद्धि तोह होव कोणी फेर खाट किस तरिया पकड़ ली? छोरा (बिजेन्दर) न्यारा तोह कोणी कारन लाग रहा बिंदनी आते हे? वैसे तेरा कालजा तोह बबिता बिना सूखे है."
"ाहो. एक थाप में छोरा टेल मिलेगा जे ेहसि सोच भी राखी तोह. हाँ बबिता की ालबाद तोह याद आवेंगी हे. फ़ोन तोह करि जे है दिन में 3 बार लेकिन ससुराल है उसकी फेर भी टिकन न लाग ऋ. और अर्जुन महाराज के ज्ञान सुना दे शंकर. छोरा ब्याह के पाछे देख्या हे कोणी और तू 2 बार आ गए हवेली.", सुशीला ने 2 बार आने वाली बात ख़ास तरह से कही थी जिस पर शंकर खिसियाता सा लगा जैसे चोरी पकड़ी गयी हो.
"आज तोह ताई धोरे आया था काम से. तू फ़ोन कर लिया कर अर्जुन ने, मेरे दादके है वो 20 जून तक. वापिस आवेगा तोह तेरे और बबिता से मिले बिना तोह रुके कोणी लेकिन तू ब्याह ते अगले दिन दिखी कोणी?", सुशीला क्या बताती की वो तोह बड़ी मुश्किल से माधुरी के पीछे तक आयी थी और फिर अरमान जागते उस से पहले वो वह से निकल चली. अर्जुन का जीकर खुद हे किया था अभी और फिर से दुविधा चेहरे पर दिखने लगी.
"अर्जुन से दिल लग गया न सुशीला? तेरा भी वो दिल से हे करता है जितना मैंने देखा. और बबिता बिजेन्दर के रूप में बड़े भाई बहिन जो उसके साथ खुल कर हँसते बोलते है. अब तोह ऋचा ने भी झिझकना छोड़ दिया उसके साथ. याद है ऐसे हे तू, मैं, राजू और संजय होते थे बचपन में. संजय ज्यादा तेजी में था जो आज गायब हे हो गया और तेरा कसूरवार मैं खुद हु.", बात अर्जुन के किस्से से अतीत में जाने लगी तोह सुशीला ने थोड़ा हलके हाथ से शंकर के सर पर चपत जड़ दी.
"मेरा कोई कसूरवार न है शंकर और अपनी गलती मान ने की जगह उल्टा मैं हे सबसे नाराज हो गयी. 2 महीने में अर्जुन ने 25 साल भर दिए तोह दिल क्यों न मिले उसके साथ? सच कहु तोह ेब उतना तोह तेरे साथ का टाइम भी याद न जितना इसके साथ बिताया पसंद है. बिजेन्दर ने आजतक किसी के साथ थाली सांझी न करि और अर्जुन के खातिर वो छोरा भी बदल गया जो हर टाइम बस अपनी अकड़ में रहे करता. हाँ बबिता 18 की होती तोह मैं ईंट बजा देती नाना के साथ उसका रिश्ता अर्जुन से करवा के हे रहती. हाहाहा.. गोलू आज केहवे था के बबिता अर्जुन के साथ एक फोटो में थी और न्यू लगे था के या तोह भाई बहिन है या ... रेखा से पूछ के बताइये के खुराक ली थी इसके टेम, फेर बबिता की वा हे शुरू होवेगी.", रेखा का जीकर इस घर में थोड़ा अजीब लगता था लेकिन अब वो होता रहता था कभी ऋचा के मुँह से तोह कभी Anupama-Bijender या खुद चंद्रो देवी के.
"माँ से पूछ लियो साड़ी खुराक. और कपडे बदल ले फेर बबिता से मिलवा ल्यौ तन्ने. तेरी माँ की तबियत थोड़ी ढीली है उम्र और अकेलेपन की वजह से. ग्लूकोस लगा के थोड़ी फीस ले आऊंगा. ऋचा भी चल रही साथ और सोमवार मैं हे ले आऊंगा वापिस दोनों को.", शंकर को सितारा देवी तक की फ़िक्र थी और ये सुन्न कर सुशीला के चेहरे पर एक दिलकश सी मुस्कान आ गयी जिसमे बहिन वाला स्नेह था.
"मैडम चंद्रो देवी सोवे है के? ेब पीहर जाना है तोह बताना पड़ेगा?"
"ताई की बात हो चुकी और उन्हें ये भी पता के तुझे मैं लेके जा रहा. चल तू कपडे बदल ले मैं बहार आँगन में हे हु.", शंकर खड़ा हुआ तोह सुशीला छेड़ने से बाज ना आयी.
"सरगट फूंकनी है या nain-mattakka अपनी उम्म्म लता जी से?", शंकर सर पे हाथ रखता तेज कदमो से बहार चल दिया जहा मधुलता उसकी काली चाय लिए तैयार थी और ऋचा अभी भी सँवारने में जुटी थी, कपडे बैग में रखने के बाद. सुशीला ने दरवाजा बंद करने के बाद वो ढीला सलवार कमीज उतार कर अलमारी का रुख किया तोह दिवार पर टंगे शीशे में अपने बढ़ती उम्र के बावजूद इतने उन्नत और बड़े वक्षो पर नजर चल हे गयी. हर मामले में वो बबिता से 2 इंच काम हे थी लेकिन आज भी पेट पर चर्बी का निशाँ न था. शरीर लम्बा चौड़ा और म्हणत की वजह से 51 की उम्र भी आज तक बरकरा. आइना निहारते हे सर झटकती हुई वो अपने सीने को उस असाधारण सी सफ़ेद ब्रा से ढकने लगी.
'कौन समझाए डॉक्टर को उसके पूत के काण्ड. बेटी के चक्कर में माँ पे चढ़ गया और ऐसा चढ़ा नासपीटा की अब हवेली से बहार निकली तोह खुद गलती करुँगी जो उस से अनजाने हे अँधेरे में हो गयी.', बबिता ने ज्यादा समय न गंवाया क्योंकि ये बुखार उस पर दिन में कई बार चढ़ने लगा था उस अँधेरी मुलाकात के बाद से. वो जल्द हे कमरे से तैयार हो कर बहार निकल आयी थी बबिता के पास पहुंचने के लिए और शंकर सिग्रत्ती के साथ काली चाय ख़तम करके इन दोनों के लिए निकल चला इस हवेली से. मधुलता का दिन नहीं था लेकिन वो नाराज जरूर थी. आखिर शंकर आज यहाँ आया भी तोह अपने भाई के कहने पर था जो खुद उत्तर प्रदेश के उस अनजान शहर पहुंचने हे वाला था ढलते हुए दिन के साथ.
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"नाना जी और मौसी लौट आये है. उठ जाओ अब कितना सोना है?", आँचल ने झिंझोड़ कर अर्जुन को उठाते हुए कृष्णेश्वर जी के आने की जानकारी दी. वो दोपहर 3 बजे दीपा भाभी के घर से लौटा था और अब 6 बजने वाले थे. घर आते हे वो हलके कपड़ो में वातानुकूलन चला कर जो सोया था उसकी आँख अब खुल रही थी. कुछ पल तोह वो बस आँचल के चेहरे को देखता रहा जैसे समझने की कोशिश कर रहा हो की हुआ क्या है. अर्जुन को ऐसे खोया हुआ देख आँचल ने हलके से उसके होंठो पर एक पप्पी करके रही सही नींद भी उड़ा दी.
"ओह पागल हो क्या?", कमरे में कोई नहीं था और दरवाजा भी ढलका हुआ. ये देख कर कुछ सुकून मिला लेकिन अब आँचल उसकी गॉड में बैठी थी.
"हीरो बहोत थके थके से आये थे घर और परसो खुद जब मुझे सत्ता रहे थे तब मैंने तोह नहीं कहा के तुम पागल हो. मच्छर ज्यादा काटे है क्या जो इतना खरोच रखा खुदको?", अर्जुन के सीने पर ये निशाँ दीपा भाभी की दें थी चाहे वो हलके हे सही लेकिन नजर आने लायक थे.
"मेरा वो मतलब नहीं था और ये बौ जी भी लौट आये क्या छोटे दादा के साथ साथ?", अर्जुन ने अब प्रेमवश हे बाहों का घेरा आँचल की कमर में दाल लिया था जो पहले तोह खुश हुई फिर उचक कर कड़ी हो गयी.
"कपडे पहन लो कही खामख्वाह मेरी जैसी हालत किसी और की हो जाए. नाना जी हे आये है मां और मौसी के साथ. आयी तोह अंजलि भी है लेकिन वो तोह जाने इतनी खामोश क्यों रहने लगी. बड़े नाना जी बता कर गए थे की तुम संभाल लोगे बात को इसलिए आयी थी मैं.", अब अर्जुन को देवकी का ध्यान आया जो तुरंत उठ खड़ा हुआ और उसके साथ हे निक्कर में उसका विशाल अजगर सर उठाये. आँचल बड़ी हैरत से देख रही थी उस उभार को और फिर तुरंत पलट कर बहार दौड़ गयी.
'ये लड़की मरवायेगी mujhe..Oh तेरी. भाई तू मरवाएगा मुझे उस से पहले. जब देखो मेरे पहले तू खड़ा हो जाता है.", इस्त्री किया हुआ कुरता पायजामा पहन कर भीतर वाले बाथरूम से हे चेहरा दुरुस्त करके वो बहार निकला तोह पहले रौशनी बुआ से मिला जो खुद बड़ी खामोश तबियत की महिला था, शुरू से हे ऐसी. कृष्णेश्वर जी सेवक से कच्चे आँगन में छिड़काव करवा रहे थे और अर्जुन को देख कर वो उधर हे चले आये जहा तखत और चारपाई बिछी थी. लाली की माँ पहले वह लकड़ी का मेज रख गयी और उनके पीछे हे लाली के साथ अनामिका चची सबके लिए chai-paani और अर्जुन का दूध लेती आयी. दूध अंजलि और आँचल के लिए भी था जो चॉकलेट मिला भूरे रंग का बर्फ से ठंडा किया. विनोद बाथरूम से चेहरा धो कर अर्जुन के हे बराबर आ बैठा.
"आज तुम्हारे कान भी तुम्हारे साथ सो रहे थे भतीजे. लगता है नींद पूरी नहीं हो रही.", विनोद के चर्चा शुरू करने से कृष्णेश्वर जी ने बस कप उठा लिया अपनी बात रोक कर. मुन्ना नाहा चूका था जो रौशनी बुआ की गॉड में खेल रहा था.
"कल की थकान थी चाचा जी जो रात में सही से नहीं गयी इसलिए दिन में सो गया. धुप में करना भी क्या था और घर पे लोग भी नहीं थे. अंजलि दीदी का नौ वाला काम हो गया? और घर का क्या करना है?"
"घर तोह ताऊ जी के कहे मुताबिक किराये पर हे देने लगे है. उन्होंने कहा था के ये सामने के दोनों कमरे रौशनी दीदी और अंजलि बिटिया के होंगे और सामान जितना जरुरत होगी उतना गाडी से मंगवा लेंगे. वैसे भी घर में तेरी चची अब अकेली होगी तोह उसके साथ कोई होना जरुरी है.", विनोद ने चाय का कप उठाने से पहले एक कप अपनी बड़ी बहिन को दिया जो ाची बात थी.
"फिर मूड बना लिया आपने नेपाल में होटल देख कर आने का? उमेद चाचा कह रहे थे की दिल्ली की तरफ जो होटल बनाने वाले है वो आप अकेले देखने वाले हो.", अर्जुन ने सबको आश्चर्य में दाल दिया था ये बता कर जबकि विनोद मुस्कुरा रहा था.
"फिलहाल तोह कल नेपाल निकलूंगा भतीजे और उसके बाद कुमार साहब के साथ उमेद भाई की मीटिंग होने पर हे कोई फैंसला लेंगे लेकिन इतना निश्चिंत है की होटल तोह 5 सितारा वही बनेगा. और अकेला नहीं हु मैं उसमे. इन्दर भैया और राजू भैया भी रहेंगे जिनके साथ पुराने लोग भी. हफ्ते में 2 दिन यहाँ रहा करूँगा और 5 दिन उधर.", विनोद की बात अभी ख़तम हुई थी की संजीदा देवकी के कमरे से निकल कर इधर आती हुई कुछ ठिठक सी गयी इतने लोगो को बैठा देख
"आ जाइये सिस्टर आपको इनके साथ हे रहना है. चाचा जी संजीदा जी को बौ जी ने हे ..", विनोद ने उठ कर नमस्ते करने के बाद खुद हे एक कुर्सी उनकी तरफ बढ़ा दी.
"हाँ वो मुझे भी बता चुके है और ये ाचा किया उन्होंने. बैठिये संजीदा जी और आपकी जो भी जरुरत हो वो साफ़ बता देना ऐसा हाई कमांड का आर्डर है. पापा, कॉलेज में ये नर्स विभाग देखने वाली है और ताऊ जी ने इन्हे अपने हे इधर पक्का किया है. वैसे अब तबियत कैसी है माँ की संजीदा जी?", विनोद ने ये बात ऐसे सरल लहजे में कही थी जैसे उसको कुछ पता हे न हो. अर्जुन नजरे झुकाये मुस्कुरा रहा था जिसको कुछ और नजरे भी देख रही थी. संजीदा तोह खुद थोड़ा असहज हो गयी थी लेकिन अर्जुन ने आखें झपका का आश्वस्त किया तोह उन्होंने जानकारी दी.
"दोपहर में उन्हें दलीय और दूध दिया था मैंने. थोड़ी सी अशांत जरूर है लेकिन ऐसा होना लाजमी भी है जब आपकी आँखों की रौशनी चली जाए और आवाज भी. मेरी पंडित जी से बात हुई थी और उन्होंने हे कहा था के वो इन्हे शिफ्ट करवा रहे है कल जब यहाँ से जाएंगे. समय और सही देखभाल से हे सुधार हो सकता अगर कुछ भी मुमकिन है नहीं तोह ये ऐसी हे रहेंगी या हालत बिगड़ सकती है.", अब बारी थी बाकी सभी के होश उड़ने की और रौशनी के तोह हाथ से हे प्याली निचे जा गिरी जिसको आँचल ने हे अपने साथ लगते हुए धनदास बंधाया. कृष्णेश्वर जी के चेहरे पर आया पीलापन भी किसी से न छिप सका.
"जब हम लोग गए तब देवकी पूरी तरह ठीक थी डॉक्टर. ऐसे कैसे दृष्टि और बोलने की क्षमता जा सकती है? और भैया ने क्या कहा की वो मेरी धर्मपत्नी को ले जाएंगे? ऐसे कैसे ये मुनासिब है.?", अब उन्हें नर्स और डॉक्टर का भी फरक न पता था. लेकिन घर के द्वार खुलने पर उनके बड़े भाई साहब जरूर लौट आये थे सफारी लिए. अब सवाल भी बहोत थे और उनके जवाब देने वाला भी लौट आया था जिसको देख कृष्णेश्वर जी बर्फ से ठन्डे हो गए. पूर्णिमा जी तोह पशुओं की तरफ हे चली गयी गाये को गुड़ देने और अपने ताई ताऊ जी के लिए विनोद ने अर्जुन से पहले दिवार से लगी चारपीआई दाल दी. संजीदा ने भी मौका देख कर बताना शुरू कर दिया
"हेड इंजरी मतलब सर पर चोट लगने का प्रभाव अक्सर मौके पर पता नहीं चलता अंकल. आपने कल उन्हें चलते फिरते देखा था?", अब कृष्णेश्वर हाँ तोह नहीं कह सकते थे क्योंकि देवकी तोह बिस्टेर पर हे थी पूरा समय.
"क्या चर्चा हो रही है भाई? कृष्ण, तुम कब लौटे वह से?", रामेश्वर जी के बोलते हे अर्जुन अपने दूध को ख़तम करने में जुट गया.
"ये डॉक्टर कह रही है भैया की अब देवकी न देख सकती है और न बोल. और अगर ऐसा है तोह शंकर बड़ा डॉक्टर है वो अपनी चची को ठीक न करेगा?"
"देख भाई कृष्ण मैं तोह चिकित्सा में हु शुन्य और शंकर के कहने पर हे मैं देवकी को साथ ले जा रहा हु जिस से उसको उचित देखभाल मिल सके डॉक्टर की निगरानी में. यहाँ वो आज दोपहर तक में बिस्टेर से 3 बार गिर चुकी है तोह खुद सोच की क्या 24 घंटे देखभाल मुनासिब है?", अब खामोश बैठी कौशल्या जी ने हे उनसे पहले अपने विचार प्रकट कर दिए.
"तुम भी चलो फिर साथ अगर देवकी के बिना जी नहीं लगता तोह. यहाँ बहु बचा, घर और ये पशु संभाले या उतना करने के साथ देवकी को भी? और संजीदा नर्स है डॉक्टर नहीं. घर को हॉस्पिटल बनवाना है तोह बाकी सबको बहार रहना पड़ेगा फिर. बड़े डॉक्टर तोह दिन का 20 हजार भी लेंगे इधर मौजूद रहने का और उनके नखरे भी बहु और रौशनी सहेंगी तोह फिर कर लिया काम. देवर जी तुम बात तोह सीढ़ी करती हो लेकिन कहा पर alp-viraam और कहा purn-viraam लग्न है तुम्हे नहीं पता.", कृष्णेश्वर को इस बात का कुछ अधिक हे बुरा लगा था और अर्जुन ने आँचल को इशारे से इधर से कमरे में चलने का कहा, बाकी सबको साथ ले कर. आँचल के साथ अंजलि, संजीदा और अनामिका चची भी उनके कमरे में चल दिए जिसका दरवाजा अर्जुन ने ढाल लिया. अब आँगन में घर के बड़े हे थे क्योंकि विनोद ने सेवक और लाली की माँ को भी उनकी जगह भेज दिया था.
"भाभी अर्धांगिनी है मेरी वो और पिता जी ने हे उन्हें हवेली की जिम्मेवारी सौंपी थी. हाँ वो आप जैसी परिपक्व नहीं है और जुबान की कड़वी भी है थोड़ी लेकिन बात अगर पैसो के हे है तोह उसका इंतजाम भी हो जाएगा. विनोद कर देगा सब प्रबंध लेकिन यहाँ गाँव में पगड़ी सबकी उछलेगी जब ये पता लगेगा की हवेली की करता धर्ता को हे देखभाल के लिए बहार भिजवा दिया गया. मैंने न तोह आजतक भैया से हिसाब किया है और न मैं अब झोली फैलाऊंगा.", कृष्णेश्वर समाज की वजह से ये सब बोल रहा था और रामेश्वर जी के न चाहते हुए भी ये बड़ी बात हो हे गयी जब देवर और भाभी का कड़वा टकराव हो गया.
"कौन प्रमुख है हवेली का? तुमने कितना हिसाब और कहा कहा का दिया है पिछले 40 बरस में ये मुझसे भी नाह छिपा. रही बात गाँव के लोग क्या समझेंगे और विनोद के पैसे की तोह मैं न देने देती इसको एक पायी भी और तुम होंगे इनके लाडले लेकिन 65 बरस के होने पर भी तुम न बाप बन सके न परिवार के संरक्षक. तुम्हारे काले सच वो दबाये बैठी है और तुम उसको सिर्फ इस डर से हे बचा रहे हो. सुनो कृष्ण अबसे न बसी वाली जमीन से तुम्हे वो भाड़ा मिलेगा और न 30 किल्ले पार्ले गाँव की जमीन की आमदन. जो नैतिक तौर पर इनका और तुम्हारा हिस्सा था उसमे से 2/3 जमीन तुम बेच चुके हो जिसका आधा भी विनोद और इसकी बहनो को न मिला जिन्हे तुमने वो जमीन बेचने का कारण बताया था. बहोत लगाव है न तुम्हे एक ख़ास नाम से तोह अगर वैसा कुछ दोहराया तोह अपनी बीवी की बगल में मिलोगे, इस बात को दिमाग में बैठा लेना. खेत सँभालने का दिल करे तोह ाची बात है नहीं तोह आराम से रहो यहाँ. सवाल नहीं करने वाली मैं तुमसे अगर कोई गलती न दोहराओ तोह. चल रौशनी बिटिया तू भी कपडे बदल ले और थोड़ा आराम कर. माफ़ करना तेरे सामने वो सब कहना पड़ा.", कौशल्या जी अपनी भतीजी को साथ लिए अपने कमरे में चली गयी जहा पूर्णिमा जी पहले से थी. कृष्णेश्वर के तोह चेहरे पर 12 बज चुके थे शाम के साढ़े 6 बजे हे और विनोद भी अंगड़ाई लेता हुआ खड़ा हो कर बहार की तरफ चल दिया, अर्जुन की रानी लिए.
"तुम्हे लगता है आज तुमने सही सवाल उठाया कृष्ण? देवकी पर कानूनी कार्यवाही होती तोह 2-3 जनम लेने पड़ते सजा पूरी करने के लिए और तुम्हारी भाभी जाने कौनसा तुम्हारा ऐसा सच जानती है की आज उसने हमारी भी परवाह नहीं की. वो 30 किल्ले तुम्हे इसलिए मिले थे की विनोद और दोनों बेटियां अपना हिस्सा खर्च भी कर दे तोह तुम्हारे खाते में हमेशा उचित पैसा रहे लेकिन तुम्हारे खाते में से व्यक्तिगत तौर पर पिछले 3 बरस में 70 लाख रूपया निकला है. पूरी आमदन में भी देवकी को अलग से 5 प्रतिष्ठित मिलता था जिसके खाते में आज की तारीख पर एक नया पैसा नहीं है. अब अपनी गर्दन मैं खुद काट लू या ये नेक काम भी तुम करोगे?", जब दोनों भाई हे यहाँ बचे थे तोह रामेश्वर जी ने ठंडी आह भरते हुए ये एक और कला सच कृष्णेश्वर के सामने रख दिया. कृष्णेश्वर के तोह हाथ जुड़ चुके थे और चेहरा 115 के कोण पर झुका हुआ.
"हम गड़े मुर्दे नहीं उखाड़ रहे कृष्ण क्योंकि वैसा करने पर हमारी हे पीड़ा बढ़ेगी लेकिन वर्तमान का सच भी देखा जाए तोह तुम आभार मनाओ अपनी भाभी का जिसने तुम्हे बक्श दिया. वो हमारे हृदय और तुम्हारे साथ हमारे स्नेह की कदर करती है कृष्ण लेकिन ये दोहरा जीवन जो तुम जी रहे हो इसको तत्काल बंद कर दो. हमारे पिता जी का नाम तुम्हे उनकी इस भूमि पर रह कर बढ़ाना था जबकि वो जिम्मेवारी चौपाल और सरपंच के साथ पूरा गाँव उठा रहा है, हमारे तुम्हारे बिना. अब उसको बढ़ा नहीं सकते तोह काम से काम बरकरार रखना हे बहोत होगा. थोड़ा सोचना और तुम्हे लगे की पलट कर जवाब देने से तुम सही साबित हो सकते हो तोह फिर तुम्हारी मर्जी. मिल लो देवकी से, मैं जरा लाला की तरफ जा रहा हु. वो लोग कल की तैयारियां देख रहे है जिनका तुम्हे भी पता नहीं होगा.", जाते जाते आज रामेश्वर जी भी ये टिप्पणी कर गए थे और व्यथित मैं के साथ अब कृष्णेश्वर को घबराहट भी हो रही थी. पाँव देवकी की तरफ बढ़ना चाहते थे लेकिन उस से पहले अपनी भाभी के कमरे का इल्म था उन्हें जिनके साथ आज आवेश वश वो कुछ ज्यादा हे गलत तरीके से पेश आये जबकि वो चाहती तोह सचमुच कृष्णेश्वर hathkadi-bandh होता.
"पानी पी लीजिये छोटे दादा जी और वो आपकी भाभी है कोई गैर नहीं. दादा जी भी गलती होने पर माफ़ी मांग लेते है और आप तोह सही सलामत है जबकि मैं आपकी जगह होता तोह दादी माफ़ी तोह दूर मुझे घर के आसपास न रुकने देती.", अर्जुन ने ठन्डे पानी का गिलास उन्हें देते हुए खेलघर का रुख किया जहा आज वो थोड़ी कसरत करने की सोच रहा था. प्लास्टिक के लिफाफे में अपने अभ्यास के कपडे लिए वो आज अलग हे जोश से भरा था. शायद अपनी दादी की वजह से या दिन वाली कसरत.
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इधर एक अलग हे प्रदेश के ख़ास हिस्से में नरिंदर कुछ ज्यादा हे लम्बा सफर करके पंहुचा था. इस मामले में वो अपने भाई से भी कुछ बेहतर था जिसको जैसे थकान का असर नहीं था चाहे दिन से रात हो जाए या फिर अगला दिन. पूर्वांचल के इस हिस्से में एक thik-thaak सा होटल देख कर गाडी कड़ी करता वो भीतर आया तोह होटल के रिसेप्शन पर बैठा युवक भी ऊंघ रहा था जैसे ये धंदा इधर कुछ ख़ास न हो. नरिंदर द्वारा उसका मेज ठकठकाने पर वो ुनिन्दा सा हे बोल उठा.
"3 घंटे का 300 और रात का 1000. लड़की ने लफड़ा किया तोह वो मामला तुम देखोगे."
"ओह मेरे भोले बालम. प्यारे हम यहाँ अकेले आये है और 2 दिन रुकने के साथ ाचा भोजन भी चाहते है. और फिलहाल तोह कमरे में जाते हे नहाने का इरादा है.", अब वो युवक उठ खड़ा हुआ इस आकर्षक व्यक्ति को कोहनी तक ास्तें चढ़ाये और चेहरे पर मुस्कराहट लिए देख. नरिंदर व्यक्तित्व के मामले में अपने समकक्ष सभी भाइयों से कही ज्यादा प्रभावित करता था जिसमे सभी की अपनी विशेषता थी लेकिन उम्र का प्रभाव सबसे काम इस व्यक्ति पर हे था. हमेशा चेहरा साफ़ रखना और बाल एक सार से ठीक विनोद खन्ना की तरह.
"सर, हमारी होटल में सिर्फ 2 हे कमरे है जिनके साथ बाथरूम की वयवस्था है. एक तोह मालिक का है और दूसरा 800 रुपये एक रात. वो तोह इधर सैलानी आते है जिनको अपना मजा करना होता है तोह कोई भी कमरा दे देते है लेकिन हर मंज़िल पर 4 बाथरूम और 4 टॉयलेट बने है. हाँ खाने का ऐसा है की होटल में तोह सिर्फ दारु का सामान मिलता है लेकिन सामने ढाबा 24 घंटे चलता है जिसका आहना मटन और खमीरी रोटी चम्पारण से भी बढ़िया मिलेगी. आप जब कहेंगे मैं खुद हे हाजिर हो जाऊंगा आपका आर्डर ले कर.", युवक देखने से गढ़वाल की तरफ का था लेकिन पढ़ा लिखा और जीवन के प्रति सकरात्मक. नरिंदर ने 500 के 4 नोट निकाल कर उसके सामने रख दिए.
"1600 2 दिन का भाड़ा दोस्त और 400 तुम्हारी एडवांस टिप. बहार काली कॉन्टेसा कड़ी है उसको देख लो कहा लगाना है. कमरा दिखा दो बाकी दारू मीट का बता कर तुमने मुझे खुश कर दिया.", अब इतनी बड़ी टिप की आशा तोह उस युवक को सपने में भी नहीं थी लेकिन नरिंदर के अंदाज से वो सम्मोहित होता हुआ खुद हे बैग उठा कर आगे चल दिया हाथ में चाबी लिए.
"थैंक यू सर. यहाँ तोह कस्टमर 200 रुपये का भाड़ा देने के लिए मच मच करता जब 2 घंटे का बताता हु तोह. आप पहले आदमी है जिन्होंने मुझे टिप दिया इसलिए एक टिप मेरी भी ले लीजिये. ये पूरा क़स्बा अफीम खान का है मतलब उसका नाम तोह तौफीक खान है पर धंदा अफीम का है जिस वजह से नाम यही पड़ गया. आपकी गाडी उसको पसंद आयी तोह वो कल उसके घर कड़ी होगी. यहाँ कुल जमा 1600 दुकाने, ढाबे और फड़ी लगती है जो नियम से अपना हफ्ता अफीम खान तक पहुंचते है. और सिर्फ यही क़स्बा नहीं ऐसे 10 कसबे और 2 शहर उसके निचे है. पते की बात बता रहा हु की दूकान वाले से जुबान लड़ाओ, रेहड़ी वाले या आम नागरिक से लेकिन अफीम खान के किसी आदमी से टकराना नहीं, गलती से भी. और वो har-taraf मिल सकते है. वैसे उसका धंदा विलायती शराब और लड़कियों का भी है लेकिन आप समझ हे गए होंगे की वो कितना ताक़तवर इंसान है? पुलिस और प्रशाशन भी उसके साथ है तोह हर तरह के काम में उसका बराबर हिस्सा रहता. आप किसी हीरो जैसे लगते है और आये भी अकेले हो इस छोटे लेकिन भारी बैग के साथ. चलता हु सर ये आपका कमरा है और बाथरूम में साफ़ टोलिया, साबुन शैम्पू सब मिलेगा. 11 नंबर मिला दीजियेगा जब भी कुछ जरुरत हो.", किसी बैरे की तरह सलाम मारता हुआ वो युवक अपना रेडियो बंद करता हुआ उस साफ़ सुथरे कमरे को खोल कर वापिस चल दिया. बैग एक तरफ सोफे के सामने लगे टेबल पर रख दिया था उसने.
'ये बावली गांड विष्णु पक्का इस अफीम खान को हे ठोकने आ रहा है. बताया तोह कोई बाहुबली था अब ये तोह लगता है कई बाहुबली का बाप है जिसके साथ पन्गा लिया. और ये लोंदा भी काम का है जो पैनी नजर रखता है. चल बीटा विष्णु तुझे तेरे हे अंदाज में तारे दिखता हु. जाल तेरा और शिकार मेरा.', दरवाजा बंद करके नरिंदर ने अपने जिस्म से सभी वस्त्र उतार दिए थे. वो ऐसे हे बाथरूम में घुस कर फुहारे के निचे जा खड़ा हुआ और तबतक खड़ा रहा जबतक घडी ने 20 मिनट न गँवा दिए. दरवाजे के दूसरी तरफ बजती घंटी से नरिंदर जैसे वर्तमान में लौटा और कमर पर टोलिया लपेट भीगे बदन हे वो दरवाजा थोड़ा सा खोल कर बहार देखने लगा.
"सर आपके चाहने वाले शायद इधर बहोत है. एक छोटा सा लड़का ये दे कर गया है और बोल गया की इंदरजीत को दे दीजिये, कमरा नंबर 101 वाले को. मैंने तोह अभी तक आपकी एंट्री भी नहीं करि और होटल में बस यही कमरा बुक है अभी.", युवक ने वो बंद लिफाफा देने के साथ हे 555 की सिग्रत्ती की डब्बी भी नरिंदर की तरफ बढ़ा दी जो शायद उसका ब्रांड नहीं था लेकिन उसको लेते हे चेहरे पर आयी ख़ास चमक बहोत कुछ बयान कर गयी.
"धन्यवाद. और वो सचमुच मेरा भाई है जो बहार तक मेरे साथ था बस तुमने देखा नहीं. यहाँ खिड़की से मैंने हाथ हिला दिया था उसको. एक प्लेट मटन, खीरे और प्याज का सलाद, 2 गिलास, सोडा और वैट 69 की बोतल भिजवा देना बस. रुको पैसे लेते जाओ.", मेज पर रखे बैग की जेब से हे 500 के 3 नोट युवक को देते हुए नरिंदर ने आँख मारते हुए विदा किया. दरवाजा फिर से बंद था और बिस्टेर के किनारे बैठ कर वो कागज खोला तोह पहली पंक्ति पर हे हंसी आ गयी.
'तोह अंडकोष की एक हे गोली पधारी है विश्वजीत की तलाश में? चलो दूसरे ने समझदारी दिखाई जो मेरे काम में टांग अड़ाने से बचा. अब तुमने गलती करने का विचार बना हे लिया है तोह भला हम नारायण अवतार क्या करे? अरसा हो गया तुम्हे पटखनी दिए हुए लेकिन पहले हे बता देता हु की अब हाथ से दिल ज्यादा सख्त है तोह लौटना चाहो तोह भलाई होगी. जानता हु की तुम वो अड़ियल खच्चर हो जिसने नाल भी नहीं पहन नई और दुलत्ती मारने से भी नहीं हटना. मेरे काम के बीच अपना कानून मत लाना अफसर. हाँ दोस्त की तरह मिलना चाहो तोह कभी सोनागाछी में प्रभु विश्व पूछ लेना. बढ़िया मछली के साथ संदेश खिला कर गले लगूंगा. रास्ते अलग हो तोह हालात से समझौता कर लेना चाहिए एक पारिवारिक इंसान हो. मैं इंसान नहीं रहा और अगर अभी भी तुम पीछे आने वाले हो तोह अपनी हालत के जिम्मेवार तुम खुद होंगे. मकसद आज भी वही है और हमेशा वही रहेगा बस कानून से जरा 72 का आंकड़ा है मेरा, ऑफिस नरिंदर शर्मा. धुंआ काम उड़ाना और आहना खाये बिना गए तोह सफर बेमजा रहेगा.
तुम्हारा शुब्चिन्तक प्रभु
विष्णु वर्धन'
"तेरी माँ को प्रणाम करू बे. तू क्या सोचता है मैं टांग अड़ाने से पीछे हटूंगा? ऐसा पेलुँगा न की तू खुद गले लगेगा मेरे और आहना तोह तेरे साथ खाऊंगा, अभी बेहोश नहीं होना चाहता. दोस्त, कानून की तरह आना होता तोह तुझे 10 बार थोक चूका होता, भाई की तरह आया हु घर लेने तोह लेके हे जाऊंगा. और तू तेरा हाथ पिछवाड़े में रखना क्योंकि मुझे पटखनी देने के लिए तुझे उनकी जरुरत पड़ेगी पर मैं वो बांधने वाला हु मिलने से पहले. तेरा अफीम खान और तेरा हुम्ला करने की जगह कल से हे मेरी नजर में है. मिलते है सवेरे समय से पहले, मेरी जान झांट के बाल.", नरिंदर ने पहले पैकेट को जांचा और फिर प्लास्टिक हटा कर एक 555 सुलगा ली. भीगे बाल झटकता वो जैसे अब कॉलेज में होने वाले मल्ल्युद्ध से पहले तैयार हो चूका था.
