- Joined
- Dec 5, 2013
- Messages
- 31,768
"भारत भाई, अब आप हे हमारी उम्मीद है और शंकर ने मुझे यहाँ आने से पहले हे आश्वस्त करवाया था की आपसे बेहतर व्यक्ति और कोई नहीं है ऐसे जोखिम भरे काम और जानकारी के लिए. बस आप ये हिम्मत सिंह का जितना जल्दी हो उतनी जल्दी करवा दीजियेगा. विष्णु भी हम है लेकिन पता नहीं ये इंसान देश के किस कोने में होगा. जैसा शंकर ने बताया था की 12 घंटे का एडवांस जमा करवाना पड़ता है, ये पूरे 12000 रुपये.", नरिंदर जैसे तैसे पंहुचा था इस गुप्त ठिकाने पर और पिछले 2 घंटे से भारत भाई नामक इस 55 वर्षीया व्यक्ति ने उसको ज़माने भर के अपने किस्से सुना सुना कर पका दिया था. खास बात थी की वो वर्तमान मामले की भी साड़ी जानकारी लेता रहा और दोनों लगभग एक डिब्बी सिग्रत्ती फूंक गए थे.
जितना अजीब ये दफ्तर था उस से कही ज्यादा अजीब दीखते थे भारत भाई. गर्मी चरम पर थी और इन जनाब ने सफारी सूट पहना हुआ था गंजे सर पे अंग्रेजो के ज़माने की जासूसी टोपी रखे हुए. आम इंसान तोह यहाँ निर्वस्त्र भी गर्मी मानता लेकिन ये आम व्यक्ति थे हे कहा जो इन पर कुदरत का प्रभाव पड़ता.
"ओह शब् तोह शाही (सही) है मिष्टर नरिंदर. बूत 2 कशिश (केसेस) का दुगना लगता है. हमारे लिए शंकर छोटे भाई जैसा, तुम उसका भाई और अब तुम्हारे साथ हमने सिग्रत्ती भी पी लिया तोह हम इतने से हे काम स्टार्ट कर देता है. भारत भाई के लिए ढूंढ़ना मटर करता है, मतलब केस इम्पोर्टेन्ट है मनी नै. कल ठीक 1 बजे हम ऑटो मार्किट में मिलते है. ये विष्णु वर्धन इस स्टेट से बहार हुआ तोह भी इसका पता हम वीथिन ओने वीक लगा लेगा. हाँ उतने टाइम का पूरा पेमेंट भी लगेगा, 12 हॉर्स एवरीडे एंड एव्री ऑवर 2000."
"जी भारत भाई बिलकुल ठीक कहा और मुझे ये मंजूर भी है.", नरिंदर अब खिसकना चाहता था क्योंकि पहले हे इतनी देर हो गयी थी यहाँ और उसको घर पे उमेद से भी कुछ जरुरी बात करनी थी. अभी या भी नहीं पता था के अर्जुन उनकी सभी अटकले ख़तम करता हुआ मनमानी कर चूका है.
"बूत तुम हमको वह ढूंढेगा कैसे? अब तुम्हारा आगे तोह हाईड न सीक का नहीं है भाई."
"सॉरी भारत भाई. आपके सामने नर्वस हो गया था इसलिए पूछना भूल गया."
"ी लिखे योर कॉन्फिडेंस एंड ट्रांसपेरेंट करैक्टर. तुम इंसान बहोत साफ़ है मर नरिंदर. वो वह पर हौंडा का एजेंसी की बगल में एक चना चाट वाला है. वह लंच टाइम बहोत क्राउड रहता तोह हम वह नहीं मिल सकते पर उसका chana-chaat बहोत टेस्टी है इसलिए एजेंसी की बगल से जो गली जाता है हम वही मिलेंगे. 2 प्लेट चाट लेकर तुम वही वेट करना हमारा, राइट ात 1300 हॉर्स माय बॉय. अब तुमको चलना चाहिए और ये 2 सिग्रत्ती यही रहने दो. केस स्टडी करने का टॉनिक है ये.", नरिंदर लाइटर और सिग्रत्ती की डिब्बी उठाने हे लगा था की भारत भाई की बात सुन्न कर क्षमा मांगते हुए उनके साथ दरवाजे तक आया.
"थैंक यू भारत भाई मुझे इतना समय देने के लिए. कल ठीक 1300 हॉर्स पर 2 प्लेट चना चाट के साथ मैं वही मिलूंगा."
"परफेक्ट. सिग्रत्ती नै भूलना.. हाँ.", नरिंदर हामी भरता हुआ निचे चल दिया उन बरसो पुराणी सीढ़ियों से जिन पर धुल अब मिटटी बन चुकी थी और जगह जगह झाड़ उगने लगे थे. भारत भाई अपनी कमीज का कालर वाला बटन खोलने के बाद गर्दन हिलाते हुए सिग्रत्ती जलने लगा, दिया सलाई से.
'आज रात बारिश होने वाला है.', सफ़ेद आसमान में तीखी धुप और कही बादल का नामो निशाँ तक न था. और ये इंसान जाने कहा बारिश करवाने लगा था रात में. नरिंदर तोह जितनी तेज रफ़्तार से निकल सकता था अपने घर के लिए निकल चला, मैं हे मैं शंकर को गालियां देता मतलब अपशब्द कहता हुआ. अगले आधे घंटे में नरिंदर अपने घर की बैठक में था, taro-taja और चेहरे पर परिचित मुस्कान के साथ. यहाँ अभिषेक जी का पूरा परिवार आया हुआ था और दत्त साहब भी. इन परिवारों की महिलाएं घर के भीतर वाले कमरों में थी.
"पंडित जी बता रहे थे माँ जी की आपके पैतृक गाँव में कोई मेला होने जा रहा है? अभिषेक बीटा तुम भी जानकारी रखते होंगे इस बारे में आखिर शहर तोह तुम्हारा भी वही है.?", दत्त साहब ने मेले की चर्चा प्रारम्भ की तोह नरिंदर और उमेद बड़े गौर से ये वार्तालाप देखने लगे जबकि कौशल्या जी तोह गदगद हो उठी दत्त साहब द्वारा माँ जी कहने पर.
"जी मेला तोह जाने कबसे लगता आ रहा है पर मैं उधर कभी गया नहीं. दादी जी बेहतर बता सकती है अंकल या पंडित जी.", अभिषेक पंडित जी को पंडित जी हे पुकारता था जैसा बाकी सभी गाँव और उस शहर में रहने वाले जानकार.
"बात इतनी हे नहीं है बीटा जो तुम्हारे अंकल बता रहे है. ये तोह तुम्हे आमंत्रण दे रहे है वह शामिल होने का क्योंकि मेरे सबसे छोटे पौटे ने उधर के अखाड़े में चुनौती उठाई है. अर्जुन ने अपने परिवार के सम्मान को बरकरार हे नहीं बल्कि ऊँचा करने के लिए वो चुनौती उठाई है जो पिछले 28 बरस में कोई न कर सका. अब मौका इतना ख़ास हो तोह ये भी चाहते है की इनका पूरा परिवार वह साथ हो. जितना में जानती हु सुभाष, वह की दरगाह के मेहता बहोत है. तुम्हे और देविका को जरूर देखना चाहिए. अभिषेक और शिल्पा तोह वह आएंगे हे.", अब कानो से धुआं निकलने की बारी उमेद की थी जबकि अभिषेक जैसे दरगाह मेले के बारे में जानकारी रखता था जो हैरानी से सबको देख रहा था की ये लोग खुश हो रहे है ऐसी दुर्घटना पर.
"जी ये तोह ऐसा हुआ की हम सब काम छोड़ कर भी शामिल होंगे इस पल के दर्शक बन ने के लिए. वैसे मान न पड़ेगा पंडित जी आपके पौटे अर्जुन को. मुझे तोह वो हमेशा से एक शांतचित और घरेलु बचा हे लगा चाहे जिस्मानी तौर पर असाधारण है. अखाड़े कुश्ती तोह अब उतने प्रचलन में भी नहीं रहे. हम जरूर शामिल होंगे माँ जी और बड़ी भाभी जी भी साथ आएँगी निक्की बिटिया को लिए. बेटे कारोबार देख लेंगे एक दिन."
"ये सब इतना भी आसान नहीं है अंकल जी और मुझे नहीं पता की मुझे ये कहना चाहिए या नहीं लेकिन अखाड़े की चुनौती मतलब जंगल में आग. अर्जुन का जोड़ीदार काम से काम शंकर चाचा जितना सक्षम तोह होना हे चाहिए नहीं तोह 10 पहलवानो से इस गर्मी के मौसम में वो मासूम इंसान पार नहीं प् सकेगा. यही तोह चुनौती है और फिर अकेला शेर भी इतने शिकारी कुत्तो से पार नहीं पा सकता. वो सभी पहलवान जमीन कब्जे, रंगदारी जैसे काम करके अपना शरीर और रुतबा बरक़रार रखते है. चेहरे देख कर हे सामने वाले के दिल में खौफ उतर आये लेकिन आप लोग तोह खुश हो रहे है इस अवसर पर.", अभिषेक का वर्णन सटीक था जैसा रामेश्वर जी को पता था.
"हाँ ये हम जानते है और इसलिए परेशां भी है लेकिन हमारी भगवान के विचार अलग है. वैसे शंकर जोड़ीदार नहीं बन्न सकता अर्जुन का क्योंकि दोनों का खून एक हे है और उस से बड़ी मूर्खता हमारे लाडले ने ये कर दी है की ढिंढोरा पिटवा दिया है की वो अखाड़े में अकेला उतरेगा और जो भी चाहे उसके सामने आ सकता है फिर किसी भी ऊँचे पिंड का हो या पंचायत का. ये नियम हमारे पिताजी ने पहले अखाड़े में खुद चुनौती देते हुए कहा था. जाने इतनी गहरी और पुराणी बात उसको कैसे पता चली की जैसे ये शुरू हुआ वैसे हे अर्जुन इसको अंतिम परिणाम देने की कोशिश कर रहा है. तब पिताजी ने 2-2 के जोड़ो में कुल 14 पहलवान पटके थे, सुना यही है हमने.", रामेश्वर जी जैसे यहाँ मौजूद सभी को डरने की कोशिश कर रहे थे और वो लगभग सफल भी रहे.
"छुट्टियां चल रही उसकी और क्या घर में बंद रखने के लिए तगड़ा किया मैंने उसको? आप अपने किस्से अपने हे पास रखो जी मैं कह देती हु. नयी कहानी मेरा पौता लिखेगा जिसकी साक्षी मैं खुद बनूँगी. पता लग हे जाएगा की खून समय गुजरने से कमजोर हुआ है या बेहतर. उमेद तेरी माँ कह रही थी तू और इन्दर 28 को काम से बहार हो? तुम नहीं देखोगे अपने बेटे को इस अवसर पर?", अब तोह सुभाष जी के साथ अभिषेक के भी चेहरे पर हैरत थी. कैसी दादी थी ये जो इतनी शांत और उत्साहित थी.
"ना चची.. अपने बस का नहीं और उस दिन कंपनी का कॉन्ट्रैक्ट सिग्न होना है तोह हम दोनों को दिल्ली रहना पड़ेगा. अर्जुन से मैं बात करूँगा और वो जो कर रहा है बेवजह नहीं कर रहा. खतरा है लेकिन खतरा तोह पानी पीने में भी होता है और सोने में भी लेकिन जरुरी है न वो? भगवन नारायण उसकी रक्षा करेंगे जैसे करते आये है.", उमेद के शांत एवं सकरात्मक जवाब से उन्होंने आशीर्वाद देते हुए कहा.
"देखा आप लोगो ने मेरे इस बेटे का जवाब. ये जानता है की ऐसा करना गलत नहीं है और जरूर वजह है तभी अर्जुन ने फैंसला किया. आप लोग ये बात गौरव और संजीव के सामने मैट कीजियेगा, बाकि घरवाले भी ऐसा नहीं करेंगे मैं बता चुकी हु. शंकर को पीछे घर देखना होगा राजकुमार के साथ. सतीश भी चलेगा उधर जैसा इन्होने बताया है और कृष्णा बहु भी. लड़कियां मन कर रही है सिवाए ऋतू और तारा के. लेकिन ऋतू को तयारी करनी है और तारा की ट्रेनिंग भी चल रही है तोह उनमे से कोई नहीं जाएगा. बचो का काम भी क्या है वह?"
"माँ अर्जुन भी तोह बचा है.", नरिंदर के इस लागु जवाब से कौशल्या जी ने बस नजरो से उसको खामोश करवा दिया.
"बचा है इसलिए मैं खुश हु और तुम लोग ये बचपना आजतक करते आ रहे हो. देखो बीटा मैं फिर से आप दोनों को वह आमंत्रित करती हु और कोशिश करना के इसमें घर से बचे न हे आये, जिनका दिल थोड़ा कमजोर हो. ललिता नहीं देख सकती ये सब और रेखा की हालत भी उतनी बेहतर नहीं है इसलिए उन्हें घर हे रुकना होगा. अर्जुन के ननिहाल से भी उसके नाना नानी को ले कर राजेश शामिल हो रहा है. रजनीश भाई साहब को भी इसके बारे में नहीं बताया नहीं तोह वो काम छोड़ कर शामिल हो जाते है. इतिहास की वजह से हे हमारा वजूद है और उसकी कदर हमको करनी हे होगी. मेरा पौता हार भी जाए कोई परवाह नहीं मुझे लेकिन उसके फैंसले पर ऊँगली उठा कर मैं कभी उसका जीवन खराब नहीं होने दूंगी. पिंकी बीटा, पहले इधर नाश्ता लगवा दे.", कौशल्या जी अंतत में थोड़ी भावुक हो गयी थी और प्रियंका वह बर्तन उठाने आयी तोह वो अपने आंसू छिपाती हुई उठ कर भीतर वाले कमरे में चली गयी इन सबको हैरान छोड़ कर. कुछ पल शांति छायी रही जिक्सो रामेश्वर जी ने हे भांग किया.
"माँ भी है न तोह दिल के किसी कोने में वो चिंता और डर रहना लाजमी है. पर मेरी धर्मपत्नी हे है जो इस घर को घर बना सकीय. मैं गलत फैंसला कर भी दू लेकिन कौशल्या हमेशा सही होती है. खैर अब जो हो रहा है उसको रुकवाया भी नहीं जा सकता क्यूंकि बात तोह raj-gharane तक जा चुकी है इस जंगल में लगी आग की."
"पापा वो त्यार नहीं है जितना मैं समझता हु. जोश अलग बात है और मजबूत शरीर भी ज्यादा कारगर नहीं."
"ये तोह सिर्फ एक नजरिया है बेटे. क्या पता अर्जुन इस मुद्दे को सोच हे न रहा हो जैसे उसके लिए ये सब थके हारे शिकारी कुत्ते हो जिन्हे बाघ का एक पंजा हे मूर्छित या प्राण हरने के लिए बहोत है. एक घटना में सबको उलझा कर अक्सर शिकार कही और अंजाम दिया जाता है जहा कोई सोच भी नहीं सकता. आप लोग नाश्ता करो भाई, मैं जरा पड़ोस से जरुरी कागज़ लेके आता हु. अभिषेक तुम्हे हे वो फाइल ले जानी है उधर. आता हु.", रामेश्वर जी अलग हे पहेलियाँ घुमा गए थे यहाँ से निकलने से पहले और उनके जाने के बाद शंकर भी इस माहौल में शामिल होने चला आया था, सबके साथ मुलाकात और खाने पर. अंदर सभी अपनी अपनी सहूलियत से बैठे थे जहा देविका जी रेखा के कमरे में थी शिल्पा, राजेश्वर और कृष्णा जी के साथ. ललिता जी भी काम देखते हुए यहाँ भी शामिल हो जाती. गौरव और संजीव अपनी अपनी नौकरी और जीवन की बातें कर रहे थे जैसे उन्हें जीवन के और पहलु पता नहीं थे.
रसोईघर को आरती, अलका और रुपाली के साथ सरोज भाभी संभल रही थी जबकि कोमल के साथ मुस्कान सभी मेहमानो की खातिरदारी में जुट चुकी थी प्रियंका के यहाँ से जाने के बाद. ऋतू ने प्रीती को साथ लिए घर में प्रवेश किया तोह वो भी रसोईघर में चली गयी हाथ बांटने. प्रीती कौशल्या जी की तरफ जहा पूर्णिमा जी राधिका को साथ लिए बैठी थी. ऋतू और प्रीती के चेहरे कोमल ने देख लिए थे इधर आते हे.
"ारु से बात हुई तेरी?", पहला सवाल हे यही था कोमल दीदी का जब वो बर्तन धोने की जगह पर ट्रे रख रही थी.
"हाँ लेकिन आपको कैसे पता की मैंने उस से बात की है?", ऋतू थोड़ा चौंकी थी इस अप्रत्यक्ष सवाल से.
"वो गाँव फ़ोन किया था दादी ने अभी जब पूर्णिमा दादी ने बात करने की इत्छा जताई. काण्ड कर दिया न उसने वह जाते हे और अब घर पे भी नहीं था. अनामिका चची ने बताया की वो घंटा पहले हे उठने के बाद तैयार हो कर गया है काम से. अब दोपहर में उसको काम क्या हो सकता है तुमसे बात करने के सिवा? गलत कह रही हु?", आरती और तारा के कान भी इधर हे थे जब कोमल बर्तन साफ़ करते हुए धीमी आवाज में ऋतू की खिंचाई कर रही थी.
"वो मैं हे उसको समझा रही थी दीदी के उसने एक बार पहले सबसे बात करनी थी."
"हाँ तुझे तोह वह के सब नंबर पता होंगे और ये भी की अर्जुन किधर गया होगा जो चची तक को नहीं पता.", अब ऋतू सकपका गयी थी लेकिन कोमल के चेहरे पर ये प्यारी हंसी देख वो एक तरफ से उनसे लिपट कर प्यार जतलाने लगी.
"वो पीसीओ से उसने प्रीती के घर फ़ोन किया था न दीदी और मैं उधर हे थी तोह मैंने भी बात कर ली. बहोत दांत लगाईं मैंने उसको चाहे प्रीती से पूछ लो."
"बताया मुझे रेणुका बुआ ने की कैसी दांत लगा रही थी तुम जो बस फ़ोन पकडे कड़ी थी जबतक रेणुका बुआ इधर नहीं आ गयी. फ़ोन उठाया भी बुआ ने हे था और उसके बाद उनसे लिया तुमने. हाँ बाद में प्रीती ने बात भी की होगी पर अपनी नौटंकी वह दिखाना जहा ये चल सकती हो. तुम दोनों को मैंने ज्यादा संभाला है."
"जानती हो तोह फिर पूछती क्यों हो दीदी और इसलिए तोह मुझे सबसे ज्यादा प्यार आपसे है.", ऋतू ने गाल चूमते हुए अपने चेहरे की लाली छुपानी चाही और कोमल ने भी अपनी छोटी बहिन को ऐसा करने दिया.
"नहीं पूछती लेकिन माँ ने कहा है की ठीक 7 बजे अपने नोट्स और किताबे ले कर उनके कमरे में चली जाना. सुबह 8 से पहले तुम कमरे से बहार नहीं निकलने वाली, 4 घंटे सोना इसमें शामिल होगा. और ये नियम ऐसे हे रहने वाला है. 12 से 1 तुम फ़ोन पे बात कर सकती हो जो बहाना आज बनाया वही करते हुए. अब देविका आंटी से मिल लो, तुम्हे हे पूछ रही थी जब वो आयी थी.", ऋतू के पसीने निकलवा दिए थे कोमल ने इतनी हे देर में उसकी पोल खोलते हुए.
"माँ ने कहा की वो खुद चेक करेंगी मेरी तैयारी?"
"पापा से उन्होंने ये कहा था सुबह की अब ऐसा हे होगा. दादी ने बोलै भी की उन्हें आराम की जरुरत है पर चची ने माँ का हे पक्ष लिया. दोपहर में तुम और अलका मेरे साथ पढ़ने वाली हो और ये मैंने प्लान नहीं किया. अलका ने कहा है की 2 से 6 तक वो ऐसा करेगी. पूछ लो यही पे तोह है."
"ऐ अलका ये क्या मुझसे बिना पूछे हे प्लान?"
"6 से 7 फ्री भी तोह रहना है के नहीं? और सुबह भी इतना खली टाइम रहेगा तोह गर्मी में और क्या करने को है इस घर में.? आरती तोह खुद 8 घंटे का टाइम टेबल बनाये बैठी हुई है रुपाली के साथ. इनसे तोह काम हे है अपना.", अलका के जवाब के पीछे कुछ वजह थी जिस पर बाद में बात करने का बोलती हुई ऋतू पाँव पटकती हुई अपनी दादी की तरफ चली गयी शिकायत करने. इस भरे पूरे माहौल में कुछ लोग अलग हे दुनिया में बैठे थे. माधुरी के साथ आयी गुनगुन उर्फ़ किरण को तारा पूरा घर दिखने के बाद विन्नी दीदी के साथ अपनी पुराणी जगह उस हॉल कमरे में बैठी टेलीविज़न पर गाने देख रही थी जो गुनगुन को बेहद पसंद थे. गुनगुन के साथ रहने का तारा को अलका ने हे कहा था और थोड़ी बातचीत के बाद वो मस्तमौला सी लड़की तारा को पसंद भी आयी. विन्नी का तोह दुःख हे काम होने का नाम नहीं ले रहा था. पहले शादी के माहौल की वजह से अर्जुन से दुरी रखनी पड़ी और अब वो खुद भाग गया था एक महीने के लिए. आज उसको कुछ ाचा नहीं लग रहा था इसलिए वो अर्जुन के बिस्टेर पर हे लेती थी और तारा के आने के बाद उनके साथ मजबूरी में बैठ कर खुश होने का दिखावा करने लगी.
"तारा दीदी, यहाँ एक मेंबर मिसिंग है जितना मैंने देखा है. आपके रूम के साथ वाले रूम में भी उसकी फोटो थी और इधर बड़े भैया (संजीव) वाले रूम में भी टेबल पर उसकी हे फोटो थी. कही बहार पढ़ते है क्या वो?", अर्जुन से वो मिली हे कहा थी और अभी उसने निचले कमरों में ध्यान भी नहीं दिया था जहा कृष्णा जी के कमरे में तोह अर्जुन का बचपन से अब तक सफर दिवार पर टेंगा था.
"अर्जुन सबसे छोटा भाई और मेंबर है इस घर का. हॉलीडेज में वो क्सक्सक्सक्स गया है न जहा हमारा गाँव है. शादी में आती तोह मिल सकती थी.", अब विन्नी भी थोड़ा सतर्क हुई जब अर्जुन का नाम सुना.
"हम्म्म्म. यही तोह हम रहते है और ये विलेज थोड़ी दूर है जिसके बारे में पापा और अभिषेक भैया ने बताया भी है लेकिन मैं इतनी बिजी रहती हु न उधर तोह कभी सिटी से बहार जाना हे नहीं हुआ. आपके छोटे भाई आप जितने हे सुन्दर है मतलब लड़के है तोह हैंडसम कहना ठीक होगा पर दाढ़ी रखते तोह लुक बिलकुल पंजाबी लगती. वह ज्यादातर बॉयज फेसिअल हेयर रखते है चाहे उनके सूट न करे.", गुनगुन तोह इस मामले में गुरदीप की हे सगी वाली थी जो अपनी नन्ही आँखों को नाचते हुए अनगिनत bhaav-mudraye प्रकट करती हुई बस बोलती हे रहती थी. विन्नी से तोह उसका ये सब सेहन हे नहीं हो रहा था.
"कौनसी क्लास में हो गुड़िया आप?", विन्नी से जब रहा न गया तोह वो झूठी मुस्कान के साथ बीच में शामिल हो गयी.
"जी दीदी हम है तोह फर्स्ट ईयर में लेकिन एग्जाम ाचे गए है और अब सेकंड ईयर स्टार्ट होगा हमारा जुलाई एन्ड या अगस्त फोर्ट्स वीक में. वैसे मैं आपसे भी बात करना चाहती थी लेकिन आप सीरियस बैठी थी और शिल्पा दीदी जब आप जैसे मूड में होती है तोह हम उन्हें परेशां नहीं करते. वैसे तोह बहोत प्यार करती है मुझे लेकिन ऐसे मूड में उनका गुस्सा टंग स्लिप करवा देता है उनकी. हाँ तोह तारा दीदी, आप हमारे लिए सूट डिज़ाइन कर सकती है? आपके रूम में इतने दसिग्नस थे की मुझसे रहा नहीं गया.", विन्नी इस मासूम लड़की की बात सुन्न कर अब खुद को हे बहाल बुरा बोल रही थी.
"हाँ क्यों नहीं गुड़िया, तारा नहीं भी करेगी तोह ये तुम्हे इतने सूट दिखा सकती है की डिज़ाइन याद हो जाएंगे. इसके और अलका के पास तोह सूट का भण्डार लगा हुआ जो पता नहीं कहा कहा से खोज कर इन्होने जमा किये है. लेकिन रहना बस निक्कर में होता है.", विन्नी ने मस्ती में तारा की टांग खिंचाई की तोह वो भी हंसने लगी.
"हम्म्म. शार्ट पैन्ट्स ाची लगेंगी हे इन पर और वैसे आप पे भी. लेग्स इतने मैनटैनेड है और स्किन भी. माँ कहती है मैं इस मामले में थोड़ी चब्बी हु और उधर लड़को में क्वालिटी काम है करैक्टर के मामले में तोह ऐसा फैशन एक तोह मुझे सूट नहीं करेगा और दूसरा दांत पड़ने के साथ साथ ये वैसी जगह पर ठीक भी नहीं. आप लोग एक्सरसाइज भी करती है क्या?", गुनगुन हमेशा घर में रहने वाली और कॉलेज बस पढ़ने तक सिमित थी. घर में आने वाली महिला प्रसाधन की किताबे और पत्रिका पढ़ने का बड़ा शुआक था इसको और हर तरह के परिक्षण वो करती हे रहती थी. उसकी साफ़दिली को देख विन्नी ने हे बात को सही तरह से पेश किया.
"अर्जुन जब वह आएगा न माधुरी से मिलने तोह अपनी इस नयी भाभी को बोलना की वो तुम्हे मार्किट ले जाए. ऐसा तब कहना जब घर में गेट्स नहीं हो. माधुरी तुम्हे शॉपिंग करवा देगी जैसी तुम चाहती हो और इस मामले में हमारा अर्जुन भी माहिर है. इतनी बहने है उसकी तोह लड़को से ज्यादा तोह लड़कियों के टास्ते उसको ज्यादा पता है. बात करके दुकानदार को भी पता लेता है वो."
"ये तोह आपने पते की बात करि है दीदी और फिर ऐसा हे करेंगे. माधुरी भाभी ने कल हे मुझे ये वाली ड्रेस और 2 और सूट दिलवाये है. जीन्स भी दिलवा रही थी लेकिन मुझे सूट नहीं करती इसलिए मैंने नहीं ली. तभी एक्सरसाइज के लिए पुछा मैंने की क्या ऐसा कुछ घर के अंदर पॉसिबल है? फिर मुझे प्रॉब्लम नहीं आएगी.", तारा जो अब चुपचाप सुन्न रही थी वो मैं में यही कह रही थी की बस अर्जुन से मत मिलना तुम लड़की. गलती से तुमने उसको या उनसे तुम्हे पसंद कर लिया न तोह वो साड़ी एक्सरसाइज एक बार में हे करवा देगा. और जहा जहा से तुम कुछ भरी हो वह से ज्यादा भरी हो जाओगी. तारा के होंठ हिलते लेकिन बेआवाज देख गुनगुन ने पूछ हे लिया.
"दीदी आप रिमोट से खुद को भी म्यूट कर सकती हो क्या? लिप्स हिल रहे है लेकिन आवाज बहार नहीं आ रही.", विन्नी पेट पकड़ कर हंसने लगी थी और ऐसा करने पर उसके सफ़ीद कमीज के गले से वो तराशे हुए अद्भुत कटाव एक पल को दोनों लड़कियों ने देखे. तारा के तोह कही से भी काम न थे पर गुनगुन के लिए ये दृश्य नया था. उसकी बोलती हे बंद हो गयी थी इस स्थिति में.
"मैं यही कह रही थी गुनगुन की विन्नी दीदी ठीक कह रही है. अर्जुन तुम्हे ठीक कर देगा, ी मैं वो शॉपिंग करवा देगा दीदी के साथ तुम्हे ले जा कर. बस उसको ये कह देना जैसे ड्रेस तारा और विन्नी दीदी को उसने दिलवाये थे वैसे तुम्हे ले दे. बाकी अब बातें बहोत हो गयी है और खाना भी लग चूका होगा. हमे निचे चलना चाहिए. विन्नी दीदी आप चल रही है?"
"नहीं यार, अभी नहीं. थोड़ी देर में आती हु मैं निचे. तुम लोग खाना खाओ.", वो दोनों कमरे से निकल चली तोह गुनगुन बोल उठी.
"अरे तारा दीदी हमने एक मूवी देखि थी और ये दीदी वैसी हीरोइन जैसी हे है और उनकी हालत भी."
"क्या मतलब? कैसी हालत?"
"बुरा मैट मान न पर लगता है इन्हे प्यार हो गया है और इसलिए ये शायद किसी को मिस कर रही है.", गुनगुन की बात से तारा चलते चलते वही रुक गयी. उसको भी पता था के विन्नी अर्जुन के लिए बेचैन है पर ऐसा वो चर्चा ऐ आम नहीं करती थी.
"बहोत इंटेलीजेंट हो लेकिन मैंने भी दुनिया देखि है. प्रूफ क्या है?"
"उनके वह पर जो मार्क था न वो लवर हे दे सकता है. सॉरी ऐसा भी मूवी में हे था और दीदी जब कोहनी टिका के बात कर रही थी तोह वो गलती से दिखा मुझे. पहले से हे वो अलग कमरे में अकेली थी और उन्हें अभी खाना भी नहीं खाना."
"हाहाहा.. तुम तेज हो लेकिन भोली भी बहोत हो गुनगुन. वह पर जो मार्क था वो दीदी के शादी में चोट लगने से बना. लेहंगा पहना हुआ था तोह वो थोड़ा विज़िबल जगह थी. स्लिप होने की वजह से उनके यहाँ कुर्सी का हैंडल जोर से लगा था और फिर सबको पता है इसके बारे में.", तारा मैं हे मैं कह रही थी की लड़की फिल्मो से जो भी सीखी है थोड़ा बहोत सही भी सीखी है लेकिन दिमाग घूमने में इस घर की जासूस मण्डली कही बेहतर थी.
"ओह ी सी.. वही तोह मैं कहु की ऐसा कैसे हो सकता है. इतनी सुन्दर लड़की के लिए लड़का भी तोह वैसा होना चाहिए. हाँ एनवायरनमेंट देख के तोह ये भी लगता है के बॉयफ्रेंड तोह इधर भी मुमकिन नहीं होगा बनाना. समाज, प्रेस्टीज एंड आल. फिल्म भी पता नहीं दिमाग में क्या कुछ भर देती है. सॉरी सब बोलते है की मैं बहोत ज्यादा हे बोलती हु."
"It's ऑलराइट. वैसे तुम भी बहोत सुन्दर हो और ये मत सोचा करो की तुम्हारी बॉडी में कुछ कमी है. क्यूट लगती हो तुम और हेअल्थी होना कोई प्रॉब्लम नहीं.", तारा उसको साथ लिए निचे आ गयी थी. 5 फ़ीट की किरण थी भी चंचल और हंसमुख लड़की जो कूल्हों और सीने से कुछ ज्यादा हे गदरायी थी इस काम उम्र में हे. छोटा कद होना शायद एक वजह थी और साथ हे ाचा खाना पीना भी. यहाँ सभी लोग थे सिवाए प्रियंका और माधुरी के जो अपने पुराने कमरे में बंद थी.
.
.
"वो पहले वाली चमक नहीं दिख रही दीदी जो यहाँ रहते हुए हमेशा दिखती थी तुम्हारे चेहरे पर. कुछ दिक्कत है क्या उधर.", प्रियंका सबसे ख़ास सहेली भी थी माधुरी की और उनमे कुछ भी पर्दा न था. अपनी इस बहिन के सवाल पर माधुरी ने फीकी से मुस्कान के साथ कहा.
"नयी जगह पर एडजस्ट करना थोड़ा मुश्किल तोह होता हे है यार. लेकिन ससुराल उतना बुरा भी नहीं है जैसा पुराणी फिल्मो में होता था."
"आये हाय मैं सड़के जाऊ. तोह सरोज भाभी और प्रिय भाभी को अपना सुहागरात वाला किस्सा सुना दिया मेरे बिना हे? सच बताना कैसा एहसास था, झूठ मत बोलना क्योंकि अब आप हे हो जिसके पास कपरिसों है. तुलना तोह होनी हे है और जीजा जी दिखने में उतने बुरे भी नहीं. हट्टे काटते है चाहे उसके जितने नहीं जो हमारा प्यार है.", अर्जुन का नाम लिए बिना हे प्रियंका ने उसका जीकर करके माधुरी की दुखती राग छेड़ दी थी पर माधुरी समझदार इंसान थी और इस घर में सबसे बड़ी लड़की भी.
"हाँ ये बहोत ाचे है और बाकी बड़े भैया और शिल्पा दीदी भी मेरा बहोत ख्याल रखते है. अब पुराणी बातों के साथ इनको जोड़ कर तोह नहीं जी सकते न पिंकी?"
"झूठ बोलना नहीं आता तोह कोशिश भी नहीं करनी चाहिए दीदी. आप जानती है की अर्जुन कोई अतीत नहीं जो गुजर गया हो. वो आज भी है और कल भी रहेगा. ये तोह गौरव जीजा पर निर्भर करता है की वो तुम्हारे दिल से वो जगह हथिया सकते है या नहीं. बताओ न दीदी क्या मैं गलत कह रही हु?", माधुरी मुस्कुराते हुए भी 2 बूँद आंसू टपका गयी.
"कपरिसों और प्यार का? नामुमकिन है पिंकी और गौरव मेरा सामाजिक सच है हो अब हमेशा रहेगा. लेकिन अर्जुन के लिए भी तुमने सही कहा की वो पास होगा तोह मैं मर्यादा लांघ सकती हु, रुकने की कोशिश तोह रहेगी.", माधुरी के चेहरे को साफ़ करते हुए प्रियंका भी मुस्कुरा रही थी.
"वो जानता है की दिल को कैसे छुए जाता है. सेक्स किये बिना भी उसका एक अनूठा एहसास रहता है जब वो पास हो. चाहे साथ बैठ कर खाना खाते हे क्यों न या फिर उसको काम करते हुए देख कर. जीजा जी उस मामले में तोह तगड़े है जितना लगता है?"
"अरे मेरी बहिन अगर तू मुद्दे की हे बात करना चाहती है तोह सुन्न ले. इन्हे हिम्मत के लिए पहली बार तोह शराब की जरुरत पड़ी और उसके बाद जो हुआ उसमे कही से भी मैं शामिल नहीं थी. दबाया, मसला और दिल की बातें कही जो नशे में मेरे जिस्म तक हे सिमित थी. लेकिन सुबह उठते हे सबसे पहला काम इन्होने जो किया वो था मेरे सामने घुटनो पर बैठ के माफ़ी माँगना. कबूल किया की पहली बार उन्हें नशे की तालाब बस खुदको शांत करने के लिए पड़ी थी और मेरे सामे वो भी काम न किया. उन्हें लगा की जोश में उन्होंने सेक्स करके मुझे दर्द हे दिया जो वह खून की वजह से लगा पर मैं इसका क्या जवाब देती. प्यार से उन्हें गले लगा लिया बस यही बोलते हुए की ये उनका हक़ है."
"ओहो, तोह उस मामले में ज्यादा तगड़े निकले जो खून तक निकाल दिया?", प्रियंका की बात सुन्न कर माधुरी हँसते हुए लोटपोट हे हो गयी. वो बिलकुल अब पहले वाली माधुरी दिख रही थी, इस घर की माधुरी.
"बेवकूफ वो आजतक कच्चे थे और अर्जुन का भी खून निकला था इस वजह से."
"मतलब वो इनका खून था?"
"और नहीं तोह तुझे क्या लगता है मेरी किस्मत इतनी जोरदार है की अर्जुन से आगे जो मिला वो उस से बढ़कर होगा? कल दिन में इन्होने मीठी बातें करते हुए जब संसर्ग किया न तोह ध्यान रखा की बाहरी चिकनाई प्रयोग करे. मुझे खुद को वह से सख्त रखना पड़ा लेकिन तब भी एक बार मुझे ये एहसास नहीं हुआ की कोई तुलना मुमकिन है. लेकिन गौरव इस मामले में थोड़ा संजीदा है तोह जोर शोर तोह लगाया जिस वजह से 8-10 मिनट रेलगाड़ी चली. इनके सामने दर्द और सिसकियों का दिखावा करके जोश मैंने भी बढ़ाया इनकी मर्दानगी मानते हुए. लगभग इनके होने के बाद हे मुझे थोड़ा सा फील हुआ. जबकि मेरा शेर तोह शुरू होने से पहले हे मैदान भिगो कर पिच तैयार करता है. जबतक 3-4 बार मैं न हो जॉन इतने वो रुकता नहीं और उसके बाद पिछली तरफ भी सवारी को तैयार रहता है. हाहाहा.. उसकी तोह तू बात हे न कर. कमीना न लेने आया और न आज यहाँ है जब मैं आयी हु. मुंडका तोह बना हे सकते थे अगर वो होता तोह."
"पागल हो क्या दीदी? और अर्जुन भी तुम्हे उतना हे चाहता है बस मुझे तोह ये डर सत्ता रहा है की अगर वो आपकी तरफ आया तोह आपको देख के वो भी नहीं रुकने वाला. ये खतरनाक बात हो सकती है."
"मुझे तोह लगता है की अर्जुन वह आएगा तोह मुझपे चढ़े न चढ़े पर शिल्पा दीदी जरूर उसके निचे आने का इरादा किये बैठी है. उसके लिए कल उन्होंने मुझसे पूछ पूछ के कपडे ख़रीदे है और जब आज यहाँ आने पर उन्हें पता चला की अर्जुन उधर है तोह वह का नंबर भी लिया दादी से उन्होंने. मान न मान पिंकी, मेरी जेठानी लट्टू है अपने शेर पे. पता नहीं इस कमीने ने क्या काण्ड कर दिया इनके साथ बस शादी के व्यस्त माहौल में?"
"अर्जुन फेरो से पहले उनके हे साथ गया था जब परिवार के लोग खाने पर थे आपके साथ. कह रही थी की उधर अँधेरा है थोड़ा और बेटे को सुलाना है. ये लोग उसके बाद फिर कोई घंटे बाद हे नजर आये थे और तब अर्जुन शायद वेदी के पास ज़ूबी, प्रीती के साथ हंसी मजाक कर रहा था. दिन में भी होटल दिखने अर्जुन हे गया था न आपकी तरफ वाली बरात को? लगता है इन दोनों हे टाइम वो खेल गया अपने पत्ते और तुम्हारी जेठानी हैं भी टक्कर की और खुश मिजाज. मस्ती मस्ती में दोनों कही एक दूसरे को ठीक से तोह नहीं जान गए दीदी?"
"लग तोह यही रहा है और सच बताऊ तोह ऐसा होना चाहिए. शिल्पा दीदी की लाइफ भी बस दिखावा हे है और वो बचा उन्होंने अडॉप्ट किया था जब जेठजी को पुलिस ने बताया की कोई नवजात बचा उन्हें सड़क पर मिला है. दिल की बहोत भली है यार और ये बात उन्होंने मुझे हे बताई है और तू इसको अपने तक हे रखना. गौरव तोह जॉब की वजह से 5 दिन दूर रहते है पर जेठ जी तोह आज सुबाज लौटे कल के गए हुए. दीदी कहती है की महीने में 25 दिन ऐसा होता है और अब इस अकेलेपन में काम से काम मैं तोह हु उनके साथ. अर्जुन अगर उन्हें खुशियां दे सके तोह मुझे ऐतराज नहीं. गौरव इतने भी कमतर नहीं लेकिन उन्हें ज्यादा जरुरत है किसी साथी की. शायद अपने वाला ऐसे हे दिल ढूंढ़ता फिरता है घर से बहार जिनकी चेहरे की हंसी दिल के दर्द बता देती है. चल माँ आवाज दे रही है.", माधुरी ने कपडे सही करते हुए पंजाबी जूती पहनी तोह उनके उभार को प्रियंका ने थोड़ा जोर से मसल दिया.
"ताई की आवाज बहुत जल्दी सुन्न गयी आपको. ये नहीं कहती की हनीमून की तैयारी भी करनी है यहाँ से जाते हे. वैसे ये शिल्पा दीदी को मैं अभी लपेटे में लेती हु अलका और रोमिला आंटी की मदद से.", और प्रियंका उनसे पहले हे हंसती हुई बहार भाग गयी. माधुरी अपने सीने को सहलाती हुई बस इतना हे कह पायी.
'तू ठहर थोड़ा टाइम. अर्जुन को कहूँगी की तू भी दोनों पिच तैयार किये बैठी है.', माधुरी की बात सुन्न कर प्रियंका थोड़ा सा दरवाजे से अंदर झांकते हुए बोली.
"सच है दीदी और ये भी कह देना की जैसे मर्जी. पिंकी बस वेट कर रही है.", और उसके बाद वो सचमुच हे दौड़ती हुई निचली मंजिल पर भाग गयी. माधुरी हँसते हुए खुद को सँवारने के लिए बाथरूम जा चुकी थी. इस हलकी फुलकी चर्चा से हे उसके दिल में अर्जुन को देखने की इत्छा बलवती हो उठी थी और कुछ याद करके वो आईने के सामने खुद हे शर्मा गयी अपने पेट पर हाथ रखती.
.
.
उधर गाँव में अर्जुन उस एकमात्र पीसीओ के लकड़ी वाले खोखे से निकलने के बाद जब 300 रुपये चुकाने लगा तोह दूकान चलने वाला युवक तारीफ भरी नजरो से उसको देख रहा था. एक घंटे से ज्यादा उस बंद खोखे में वो भी गर्मी के वक़्त बैठना तोह मामूली बात हे नहीं थी.
"पाह जी लगदा इश्क़ बहोत ज्यादा हे करदे हो जेहड़ा कमीज गीली हों बाद भी खुश हो? ेहना मैं 4 दिन विच नहीं कमांड पीसीओ तोह इस करके करियाना वि बेचना पैदा.", लड़का भी भला था और उसने कुछ गलत भी नहीं कहा पर अर्जुन ने बात जरा घुमा दी.
"जरुरी तोह नहीं भाई की इश्क़ में हे इतनी बातें हो. एक्साम्स की चर्चा भी तोह कुछ मायने रखती है न बड़े भाई?", वो लड़का थोड़ी हैरानी से देख रहा था अर्जुन को अब.
"हाय वे रब्बा मेरेया ेहननी देर तक गल्लां वि कित्तियाँ तेह ओह वि पढ़ाई दी? पंडत जी, तुस्सी तह सच्ची थोड़े जे हिल्ले लगदे हो. गलत न समझयो पर मेरे कॉल हे बह के गाल कर लेनी स. मैं कागज़ पेन वि दे डंडा लिखाण न."
"भाई, पढ़ना भी मेरा काम है और उसके लिए कागज पेन सामने वाले के पास था. घर पे आवाज होती रहती है न किसी न किसी की इसलिए वह आपके बूथ जैसा माहौल नहीं मिलता. लगभग रोज हे आऊंगा मैं इस टाइम पर अबसे. चलता हु भाई, जल्दी मिलते है.", अर्जुन हाथ मिलाने के बाद उसको खुश करके वह से सीधा हे दिलबाग सिंह के घर निकल चला. पहले वो सोच रहा था की उधर पैदल हे जाए मोटरसाइकिल नजर में न लाने की वजह से पर फिर वो उसको लिए हे उनके घर के बहार जा पंहुचा. बहार बाद के आगे दीपा भाभी की पसंदीदा गाये राणो मजे से चारा चार रही थी और अर्जुन को एक बार देखने के बॉस वो वापिस जुट गयी नांद के मुँह लगाए. सिखर दोपहरी में तोह ये bhara-poora गाँव रेगिस्तान सा शांत था, शायद ऐतवार और लोगो के खेतो में काम करने की वजह से. बाकी सभी तोह ऐसे वक़्त में घर के भीतर हे रहते है.
"Thakk-thakk", 2 पल्लो वाला ये दरवाजा अंदर से बंद था जिसकी सांकल बजाते हुए अर्जुन ने दस्तक दी. उसकी मोटरसाइकिल एक तरफ छाया में कड़ी थी, इस घर की बगल में. वैसे भी यहाँ तोह लोग अपने पशु और गाडी बेखौफ कही भी एक तरफ रख देते थे. ये उसको खुद पंडित जी ने बताया था की गाँव में कभी चोरी नहीं हुई आजतक. अगर कुछ हुआ भी होगा तोह ऐसा नहीं जिसकी शिकायत की गयी हो. एक मिनट से पहले हे चेहरा दुपट्टा से पौंछती हुई दीपा भाभी एक पल्ला खोल कर उसके सामने कड़ी थी.
"ओहो, पंडित जी आप तोह समय के बड़े पाबंद निकले. मुझे तोह लगा था khet-khalihan देखने निकले हो और शाम से पहले न लौटने वाले. आओ अंदर आओ, आपका स्वागत है हमारे गरीबखाने में. ओह मैं भी निरि मुर्ख हु. पहलवान इस एक दरवाजे से कहा निकल सकता है. चलो आ जाओ अंदर.", उन्हें दूसरा दरवाजा भी खोलना पड़ा और आँगन तक इस गलियारे की चौड़ाई उतनी हे थी जितनी दोनों दरवाजो की. गलियारे में हे दोनों तरफ पक्के कमरे बने थे जिनके द्वार भी यही आमने सामने थे. 10 कदम बाद हे खुला आँगन जहा बीचो बीच घाना वृक्ष खड़ा था और उसकी छाया में सुस्ताती हुई भूरी सफ़ेद बिल्ली. काफी बड़ा आँगन था और एकदम साफ़ सुथरा. घर में आने का रास्ता इस आँगन के दूसरी तरफ से भी था जहा लोहे के बड़े गेट पर फ़िलहाल टाला झूल रहा था और कोने में छज्जे टेल खुले तबेले में 2 बहिनसे बंधी सुस्ता रही थी. उनके लिए वह पानी का कूलर लगा था ठंडी हवा फैलता. पूरी दिवार के किनारे छाया करते हुए उनके निचे एक कतार फूल और सब्जियों के पौधे, बेले. 3-4 कमरे इस आँगन के बर्बर बने थे जहा जाने से पहले रसोईघर था. हर चीज अपनी जगह और करने से सजी हुई. यहाँ तक की तजा सूखने के लिए फैलाये हुए कपडे भी एक सार डाले गए थे जिन पर चिमटी लगी थी. इतना सब करने वाली इतने बड़े घर में सिर्फ और सिर्फ दीपा भाभी हे थी?
"कितने ध्यान से हर चीज को संभल कर रखा है आपने भाभी और इतना बड़ा होगा ये घर बहार से पता हे नहीं चलता. आप अकेली रहती हो यहाँ?", अर्जुन रसोईघर से पहले बानी छत पर जाने वाली सीढ़ियों के बहार लगी उन लाल फूल की बेलो को स्पर्श करके देख रहा था की ये वास्तविक है या कुछ और. जमीन से छत तक चढ़ी हुई वो बेले आगे भी दिवार पर सही से त्यागी गयी थी. रासीघर के सामने हे खुला छोटा आँगन, चाट की चाय में बैठने की जगह थी. दीपा भाभी पहले फ्रिज की तरफ गयी फिर कुछ सोच कर उन्होंने उस बड़े मटके से पानी गिलास में भरने के बाद अर्जुन के सामने किया.
"अक्सर जिनके पास करने को कुछ न हो वो यादें सँभालते रहते है अर्जुन. और इस घर में अकेली तोह नहीं हु मैं. एक बेटी है और तुम्हारे भैया लेकिन वो अलग बात है की बेटी पढाई लिखे करके कुछ बन्न न चाहती है और इन्हे सिर्फ खेत और अखाडा पसंद है. वैसे मेरे लिए तोह पूरा गाँव हे घर है मेरा. तुम्हारे जैसो की भाभी, बड़ो की बहु और उनसे बड़ो की pautra-vadhu. लगता है कुदरत से कुछ ज्यादा लगाव है तुम्हे. कही ऐसा तोह नहीं के हमारे नए मुखिया जी भी यादों के बीच ज्यादा रहते है?", अर्जुन बातें सुनता हुआ उस गिलास को जैसे मुँह से अलग हे नहीं कर रहा था. ये पानी अलग था जिसमे हलकी हलकी वो ख़ास सुगंध थी जैसे तजा मिटटी और गले से निचे जाती हर घूँट दिल के रस्ते पेट तक गुजर रही हो. भाभी के तंज़ पर उसने खली गिलास खुद हे उस मटके के सामने करके फिर से भरा और वही जमीन पर हे बैठ गया. न कोई बिछावन लिया न चारपाई.
"यादें तोह सबके पास होती है भाभी लेकिन मेरे पास जीवंत भरा पूरा परिवार है. ऐसा परिवार जो वरदान में भी न मिले. अकेलापन तोह बस मैं तभी महसूस करता हु जब वो किसी रूप में सामने आ जाये. सवाल भी अक्सर वही करते है जो खुद नहीं जानते की जवाब मुमकिन भी है या नहीं. ये पानी का मटका हिमालय से आता है क्या इधर?", अर्जुन फिर से वो प्राकृतिक ठंडा पानी पीने लगा था और दीपा भाभी को उसने निरुत्तर कर दिया अपने जवाब से.
"मुझे ऐसा क्यों बार बार लगता है की तुम मुझे जानते हो अर्जुन? जिस तरह से तुम पहली बार मुझे देख रहे थे मैं नजरे तोह देख पायी लेकिन ऐसा लगा की तुम खुद मेरे पास रुके. बस यही बात है पंडित जी जो मैं कल वह आयी थी और तुमने तोह मुझे हे हैरान कर दिया. फिर भी जवाब मुझे अभी तक नहीं मिला. मैंने तुम्हारे लिए मटर पनीर बनाया है और सूखे aalu-paalak. खा तोह लेते हो न?", दीपा भाभी के जिस्म में किसी तरह की उत्तेजक हरकत नहीं थी इस पल में जैसा एक दो बार प्रतीत हुआ था पहले. वो वही मांजी लगाने के लिए उठ कर जाने लगी तोह अर्जुन ने पहली बार उन्हें स्पर्श किया, कलाई पकड़ कर अपने करीब बैठने का इशारा करते हुए. गिलास वही जमीन पर एक तरफ रखते हुए उसने कहना शुरू किया.
"मुझे सही सही बताये की जब आपने पहली बार मुझे देखा तोह थोड़ा हैरान क्यों थी? और फिर हवेली पर आप मेरे चेहरे को सिर्फ इसलिए तोह नहीं ध्यान से देख रही थी की ये उनसे मिलता है जिन्होंने ये गाँव बसाया? जवाब आपको हे मिल जाएगा भाभी की मैं क्यों आपके पास रुका और मुझे आप अभी तक क्यों ध्यान से देख कर पहचान ने की कोशिश कर रही हो. ज्यादा पुराणी बात नहीं है जितना मुझे लगता है.", अर्जुन ने saag-sabji का तोह जवाब हे न दिया और अब दीपा भाभी अपने पाँव मोड दोनों हाथ कैंची की तरह घुटनो पर बाँध अर्जुन की चेहरे को गहराई से देखने लगी.
"पहले लगा की तुम निहाल के कोई शहरी दोस्त हो और गाँव घूमने आये होंगे. फिर उसने बताया तुम हवेली आये हो तोह लगा विनोद या हवेली के दामाद जी के किसी दोस्त के बेटे होंगे, दिल्ली या चंडीगढ़ से. जिज्ञासा क्यों हुई ये तोह मैं भी नहीं जानती लेकिन जब तुम वह थे मेरे ठीक सामने दामिनी की बगल में तोह मैंने पाया की ये चेहरा बेशक बड़े पड़ती जी से मिलता है लेकिन उन्हें तोह मैंने कभी असलियत में नहीं देखा तोह क्यों तुम्हारी आँखें और चेहरे का कटाव किसी ऐसे जैसा है जिसने मुझ पर एहसान किया हो कोई? आखिर तुम हो कौन अर्जुन और क्या मैं ठीक बता रही हु?"
"मैं आपका नाम पहले से जानता था लेकिन देखा पहली बार कल हे था भाभी. जो दृश्य किसी ने मुझे बताया था सबकुछ वैसा हे मेरे सामने हो रहा था और फिर इंसान नजर आया जो ब्योरे पर सटीक था. उस पल में मैंने आपको पूरी निष्ठां और prem-bhaav से अपनी गाये को भोजन खिलते देखा. ऐसा हे साफ़ और नरम दिल बताया था मुझे मेरे अपने ने. ठीक उसी जगह कुछ हुआ था क्या आपके साथ और कोई था वह आपकी मदद के लिए? मेरी जैसी आँखें या कुछ मेल खता चेहरा?", अर्जुन की बात सुन्न कर पहले तोह दीपा भाभी खामोश रही फिर कांपते होंठो से बोल उठी.
"तुम्ही कैसे पता अर्जुन की मेरे साथ कुछ हुआ था? और जो भी था मेरी रक्षा के लिए वो तुम्हे इतना कैसे बता सकता है की तुम उधर रुक हे गए?"
"किसी किसी में एक हुनर होता है भाभी कलाकारी दिखा कर बातें जीवंत रखने का. जिसने आपको बचाया था वो मेरी बड़ी बहिन है और उन्हें एक ाची आदत है हुनर भी कह लो. वो चित्र बना लेती है अक्सर घटनाओ के. तोह क्या हुआ था उस दिन और कौन था वो?", अब दीपा भाभी डबडबाती आँखों से मुस्कुरायी.
"एक से बढ़ कर एक औलाद है शंकर जी की. बहोत निडर और बिल्ली सी तेज है तुम्हारी बहिन लेकिन मैं उस से हवेली पर कभी न मिली पहले. हाँ तुम दोनों की हे आँखें और बहोत कुछ एक जैसा हे है. शायद वो कही ज्यादा गहरे व्यक्तित्व की है, तुम्हारे जैसे दिल के साथ. पंचायत का नतीजा भी आया था उस दिन तोह लोग अपने अपने तरीके से ख़ुशी मन रहे थे, ज्यादातर गाँव से परे sharab-murge वाली. जैसे तुम मुझे देख रहे थे राणो को खाना खिलते ये मेरा नियम है. उस दिन भी मैं वही कर रही थी और तुम्हारी बड़ी बहिन शायद अपने चित्र के लिए उस पल को संजो रही होगी. जैसे बहार अभी वीराना पसरा हुआ है ठीक उस दिन था और ज्यादा गहरा क्योंकि मुफ्त की दारु गाँव की जमीन से बहार हे बहाई जाती है.", दीपा भाभी कुछ पल शांत हुई तोह अर्जुन ने उनके सामने पानी कर दिया. एक घूँट भरने के बाद उन्होंने नजरो से हे शुक्रिया कहा और बात आगे बधाई.
"बस ये बात यही रेहनी चाहिए अर्जुन."
"निश्चिंत रहिये, जुबान देता हु की मैं इसका जीकर किसी से नहीं करने वाला."
"सरपंच के लड़के नवाब के साथ आकर दूसरे कसबे के कुछ गलत लड़के इधर घूमने फिरने आते रहते है और उस दिन तोह उसका बाप जीता था तोह वह से रंगी पहवान भी आया, जिसकी हवा में नवाब रहता है शहर के कॉलेज में. ये लोग खा पी कर लौट रहे थे और मैं राणो को खिलने के बाद सड़क से दूसरी तरफ वाले पीपल के निचे पक्षियों के लिए पानी रख के वापिस हे लौट रही थी की नवाब ने आदतन हाथ हिला दिया और मैंने भी हमेशा की तरह हँसते हुए उसको जवाब दिया. वो लोग तोह आगे निकल गए गाँव से बहार अपने ठिकाने वाली तरफ पर रंगी मैदान में हल्का होने रुका होगा जिसने मेरी और नवाब की dua-salaam नशे में कुछ और हे समझ ली. जबक मैं सड़क पार करके बहार वाले आँगन तक आती वो मेरा हाथ पकड़ चूका था. मैं डरपोक नहीं हु अर्जुन लेकिन जाने क्यों मेरी आवाज को उस वक़्त लकवा मार गया था. रंगी जिस्म के मामले में तुमसे 21 हे होगा और ऊपर से हैवान सा कला नशेड़ी जानवर. लेकिन वो मेरे सीने पर हाथ डालता उस से पहले हे वो कटे वृक्ष की तरह सड़क पर लुढ़क गया. इतना जोरदार प्रहार हुआ था उसके सर पे की वो चीख भी न सका और डर के मारे जब मैंने ऐसा करने वाले को देखा तोह वो लड़की बस हल्का सा मुस्कुरा कर मुझे देखने के बाद वह से चली गयी. मेरी हालत मैं बयान नहीं कर सकती क्योंकि मेरे सामने एक राक्षस जमीन पर था जिसके सर से खून सड़क को लाल किये जा रहा था और ऐसा करने वाला मुझे बचने के बाद कुछ कह कर भी नहीं गया. याद रही तोह बस तुम्हारे जैसी आँखें और ऐसी हे मुस्कान जो कल मोटरसाइकिल पे भी तुम्हारे चेहरे पर थी.", अर्जुन को ये पूरी कहानी नहीं पता थी. उसने तोह बस इस घर का बहरी आँगन, गाये और उस औरत को देखा था जो बिलकुल दीपा भाभी जैसी थी. हाँ सड़क पर लाल घेरे के रंग ने हे उसको कोमल दीदी से सवाल करने पर मजबूर किया था जिनका जवाब था की ये बहोत प्यारी भाभी है लेकिन इतने बड़े गाँव में भी बिलकुल अकेली.
"किस चीज से मारा था उन्होंने और क्या सही से याद है की उनके साथ कोई और नहीं था.?"
"चौपाल से अगले चौराहे तक एक कुत्ता भी नहीं था उस दोपहर में. और मैं भी हैरान थी तुम्हारी बहिन के हाथ में लोहे का मोटा सब्बल देख के. वो बहार आँगन में हे तोह पड़ा रहता था लेकिन नाजुक सी लड़की ने बस एक हे वार से वो जानवर धराशायी कर दिया था और चेहरे पर डर की जगह बस मुस्कान. फिर वो कभी दिखी हे नहीं और मैं जैसे तैसे घर के भीतर आयी और रात तक दरवाजा नहीं खोला. अगले दिन पता चला के रंगी का एक्सीडेंट हो गया था हमारे हे घर के बहार, ज्यादा नशे में होने की वजह से. वो फिर ठीक होने के बाद भी वापिस कभी इधर नहीं आया पर जानती हु मौका हाथ लगा तोह जरूर वो बदला लेगा पर गाँव में नहीं. तुम बैठे रहो मैं खाना लगाती हु.", खुद को संभालती हुई दीपा भाभी उठ कर खाने के बार वही ला कर रखने लगी और उनको ऐसा करते हुए अर्जुन देख रहा था. न्यास हे उसकी नजरो ने वो भराव लिए उभरी हुई वक्षो की गहरी दरार और उनके खूबसूरत जिस्म पर किसी का दिया हुआ जख्म देख लिया. मैं फिर से व्यथित होने लगा था लेकिन दीपा भाभी जैसे ये समझ रही थी की अर्जुन वह देख रहा है जहा उसकी उम्र के ज्यादातर लड़के.
"नजरे काबू में रखा करो पंडित जी. जब देखो तभी कही डूबे रहते हो लेकिन हर जमीन तुम्हारी नहीं है यहाँ."
"कुछ भी बोलती हो भाभी आप. वैसे मैं कौनसा इस जमीन की रजिस्ट्री अपने नाम कब्ज़ा रहा हु? आपने एक बात सोची की रंगी कही अपना काम आध कर न चूका हो?", अब जो दीपा भाभी थाली रखते हुए झुकी तोह हैरानी से उसी मुद्रा में अर्जुन को देखने लगी. इस बार अर्जुन भी उनके चेहरे को हे देख रहा था.
"कहना क्या चाहते हो अर्जुन?"
"आप यहाँ बैठिये पहले.", अर्जुन ने खुद हे उन्हें सामने बिछी चटाई पर बैठने के बाद पहले उनकी थाली लगाईं और फिर अपनी. दोनों के थाली में रोटी के डिब्बे से रोटी निकल रखने के बाद उसने खाना शुरू किया पर भाभी वैसे हे मूरत बानी रही. अर्जुन ने हँसते हुए अपने हाथो से हे निवाला उनके मुँह पर लगाया तोह इस प्रेम को वो मन न कर सकीय.
"देखो भाभी मैं तोह आपके हाथ से खाने आया था लेकिन चलो ये फिर कभी सही. अब आप मेरी बात बस थोड़ा ध्यान से सुनिए और उसके बाद हे अपना पक्ष रखना. हो सकता है की मैं गलत हो क्योंकि मेरे पास कोई सबूत नहीं है. ये रोटी ख़तम कर लीजिये फिर हे मैं कुछ कहूंगा.", अर्जुन की शर्त मानते हुए दीपा भाभी ने जैसे तैसे रोटी ख़तम की और थाली एक तरफ सरका दी.
"न पनीर में स्वाद आया होगा और न रायते में? इतने प्रेम से आपने बनाया था लेकिन बेमजा हो गया न भाभी? मुझे पसंद आया पर एक बार फिर यही बैठ कर भोजन करेंगे, उस दिन आपको बेहतर लगेगा."
"पहेलियाँ ख़तम और अब बताओ तुम क्या कहने वाले थे. मेरा दिल घबरा रहा है किसी अनिष्ट से अर्जुन."
"मजबूत करो खुदको भाभी नहीं तोह इस बार न कोमल दीदी होंगी और हो सकता है मैं भी अखाड़े से अपने पाँव पर न लूट सकू. लेकिन ये आपका जीवन है तोह आपको हे ये सुधारना होगा. मैं तोह बस कोशिश कर सकता हु अगर आप वैसा चाहो. तोह ये नवाब कबसे दूसरे गाँव के लड़को को यहाँ ला रहा है?"
"पिछली होली के आसपास से. पर पहले भी आने पर कोई मनाही नहीं थी लेकिन इसके साथ ज्यादातर वो लड़के होते है जिन्हे ठीक नहीं समझा जाता. लड़का ठीक है वो जितना मैंने देखा है."
"हम्म्म.. ठीक लड़का और रंगी जैसो की सोहबत में? आप कहना चाहती है की उसने गाँव में कभी ऐसा वैसा कुछ किया नहीं या फिर आपके सामने बात नहीं आयी. जैसे आपको ये नहीं पता की उन लोगो का असली डेरा तोह आपका हे खेत है. दिलबाग भैया को कल शाम भी नवाब हे khel-ghar के बहार से ले कर गया था जब मैं शहीद भैया और निहाल के साथ लौट रहा था. पहले मेरा एक छोटा सा झगड़ा भी हुआ था आपके इस ठीक लड़के से जिसका बाप भला सरपंच है.", अर्जुन ने जो खुलासा किया था वो सटीक वार कर गया दीपा भाभी पर. सीने पर हाथ रखती वो सवालियां नजरो से उसको देख रही थी.
"सच कह रहे हो?"
"और आपके जिस्म पर बने अनगिनत मार के निशाँ क्या कुछ अलग है भाभी? छुपा सकती हो पर कोई ek-aadh तोह नजर आ हे जाता है. जैसे ये पाँव के पास भी छड़ी की मार है. आपकी जुबान को सचमुच पैदाइशी लकवा मारा हुआ है भाभी. दिलबाग भैया बहार तोह ऐसे बिलकुल नहीं है लेकिन वो एकांत में शायद अब अपनी धर्मपत्नी पर संदेह करने लगे है या आप उन्हें किसी बात पर टोकती होंगी जिसके बदले वो औरत होने का आपका सच ऐसे बताते होंगे. घर आपका है और सच मुझसे बेहतर आप जानती है. रंगी ने अपना काम किया या वो इसका बदला आपकी पति से ले रहा है जिसमे नवाब और उस दूसरे गाँव के कुछ नशेड़ी भी कठपुतली या जरिया है. जहा गलत हु वह आप बता दीजिये. वैसे एक और सच सहने की हिम्मत है आपमें?", अर्जुन ने भी थाली एक तरफ खिसका कर बिना पानी पिए हाथ धो कर अपने अंगोछे से पांच लिए. भाभी खुद उसको अपना दुपट्टा दे रही थी साफ़ करने के लिए उसने मन कर दिया.
"इतनी साफ़ सफाई क्यों रहती है इस घर में जानते हो? ताकि सबूत न रहे यहाँ कोई. और टूटा हुआ इंसान और कितना टूटेगा? मैं उन्हें खेत में रातभर रहने से रोकती हु तोह हो जाती है कहासुनी लेकिन ये चोट अपने आप लगी है या कह लो मैंने खुद जुल्म किया है खुद पर."
"बोल लीजिये झूठ और बचा लीजिये टूटे हुए घर को भाभी. शहीद भाई मुझे बता रहे थे की आपकी िज्जात्त पूरा गाँव करता है क्योंकि आप सबके सुख दुःख में शामिल रहती है. लेकिन इस घर के दरवाजे जैसे बहार वालो के लिए बंद है. कोई यहाँ का सच न देख ले लेकिन जानते बहोत से है पर आपकी ख़ुशी के लिए वो भी नहीं बताते. खेत पर ऐसा क्या होता भाभी जिस से आप भैया को वह जाने से रोकती है रात में? आप दूसरे कसबे से ब्याह कर इधर आयी थी न तोह यक़ीनन यहाँ आपकी अग्नि परीक्षा बरसो बाद ली जा रही है और सच जान ने के बावजूद चरित्र हनन. लेकिन आप तोह सब सेहती रहेंगी, ख़ामोशी से. गाँव को खुश रख सकती है लेकिन अपना घर दिखावे के लिए साफ़, अंदर से बिखरा हुआ. चलता हु भाभी और क्षमा चाहता हु की जिस जमीन पर आने का हक़ नहीं था उस पर कदम रखे. दर्द चीज हे ऐसी है जो मुझे अपनी और खींच लेती है चाहे मेरा घर खुशियों से भरा हे क्यों न हो. खून में है न ये मेरे. भोजन के लिए शुक्रिया.", दीपा भाभी को ऐसे समय में जवाब देना चाहिए था लेकिन न वो उसके सामने रो सकीय न कुछ कह सकीय. अंदर हे अंदर वो अर्जुन का हाथ पकड़ कर उसको वही रोकना चाहती थी और फुट फुट कर रट हुए कहना चाहती थी की उसने कुछ भी गलत नहीं कहा. लकवा मार गया था उन्हें फिर से. अर्जुन उन्हें वैसे हे छोड़ कर उठा और चप्पल पहन ने के बाद आगे बढ़ने से पहले आखिरी बात बोलै.
"कोमल दीदी से शिकायत रहेगी की उन्होंने अपने जीवन को जोखिम में भी डाला तोह पहले से मृत आत्मा के लिए. जाता हु, दरवाजा लगा लीजियेगा.", अर्जुन के जाने तक वो संभल न सकीय थी लेकिन उसकी आवाज बंद होते हे जैसे वो बदहवास हो उठी. वो भीगी आँखों से लपकी गलियारे की और लेकिन रानी की रुदन बता गया की अर्जुन जा चूका है उसके saaf-suthre घर की देहलीज छोड़ कर. आज जैसे दीपा भाभी को अपने आंसू देखे जाने की परवाह नहीं थी जो वो देहरी लांघ कर बहार ाँगने में कड़ी हर तरफ उस व्यक्ति को जाता हुआ खोज रही थी. अर्जुन भरी दोपहर में हे khel-ghar जा चूका था. दीपा भाभी के दर्द से ru-ba-ru होने की सजा जैसे उसने दामिनी को भी दी जो उसकी प्रतीक्षा में हर तैयारी किये बैठी थी उस कमरे में, कैमरा के साथ. पर उन्हें कहा पता था के अर्जुन से ज्यादा सतर्क उसकी किस्मत है जो गलत समय में भी कही न कही उसका भला हे करती है.
'इतना आसान है क्या औरत होना? तुमने जो कहा वो सब सच है अर्जुन लेकिन कबूल किया तोह बिखरा हुआ भी नहीं बचेगा मेरे पास. अनाथ होने का एहसास आज हो रहा है जब एक माँ और पत्नी हु. मैं अपना वादा न निभा सकीय लेकिन तुम्हे निभाना होगा यहाँ वापिस लौट कर.', चेहरा साफ़ करने के बाद दीपा भाभी बिना दरवाजा लगाए अपने कमरे के बिस्टेर पर औंधे मुँह आ गिरी. अब वो खुल कर आंसू बहा रही थी जैसे दर्द बहार निकलने का यही एक जरिया हो उनके पास.
.
.
"5 से ऊपर वक़्त हो गया बहु पर ये अर्जुन अभी तक वापिस नहीं आया. दामिनी, तुझे कुछ पता है की ये लड़का कहा गायब है?", पशुओं को मीणा चारा दाल रही थी और आँगन में उसको देखने आयी देवकी जी ने अभी तक अर्जुन की मोटरसाइकिल वह नदारद पायी तोह उन्हें कुछ चिंता हुई. दामिनी अपने जिस्म की गर्मी पानी से ठंडी करने के बाद उतरे चेहरे के साथ इधर आयी तोह रसोई से चाय की ट्रे लिए अनामिका भी वह पहुंची थी. दामिनी ने तोह आज से पहले कभी किसी का इस तरह इन्तजार न किया था और वो sanam-harjaai उसके चंगुल से गायब जाने कहा फिर रहा था. आँचल के लिए भी अनामिका ने दूध बना दिया था और यहाँ आने से पहले वो उसको भी उठा आयी थी.
"पता नहीं माँ जी अर्जुन कहा गया है? शहर से भी फ़ोन आया था उसके लिए लेकिन वो बस यही बोल कर गया था के चौपाल घूमने जा रहा हु और 2 बजे तक आ जाऊंगा.", अनामिका ने खाने वाली बात का जीकर न किया. उसको खुद अब चिंता हो रही थी क्योंकि 5 घंटे से ये लड़का गायब था.
"सेवक को बोल जरा देख के आये दामिनी. कुछ ऊंच नीच हो गयी तोह खामख्वाह बात मेरे सर आएगी लेकिन ये लड़का इतना लापरवाह तोह नहीं है.", देवकी ने चाय का कप उठाया हे था की एक तरफ बहार दरवाजे पर दस्तक हुई जिधर सेवक ने छोटा पल्ला खोल कर देखा और इधर आँचल अपने में हे मगन मुद्दे पर आ कर बैठते हुए बिस्कुट और दूध उठा कर सबको देखने लगी.
"क्या बात हो रही है नानी और सब परेशां क्यों है?"
"अर्जुन नहीं आया अभी तक और सेवक, बहार कौन है?", देवकी के जवाब से आँचल ने गिलास वापिस रख दिया और आधा खाया बिसुईट भी. लेकिन सेवक की तरफ से सकरात्मक जवाब मिला और उसके बराबर से हे निहाल अंदर आ खड़ा हुआ सबको हाथ जोड़ कर अभिवादन करता हुआ.
"बड़ी बेबे जी, ओह अर्जुन बाई जी डा nikkar-baniyan दिया जाए. मास्टर जी ने भेज्या स मन्नू.", अब कही अनामिका को कुछ चैन आया और वो अर्जुन के कपडे लेने भीतर चली गयी. देवकी जी ने निहाल को हाथ से अपने पास बुलाया और सामने बैठा लिया, पानी का गिलास देते हुए.
"बीटा, जग जग जियो. सुना है तू बड़ी लगन से जूता हुआ है गाँव का नाम आगे बढ़ने में? और हमारा अर्जुन वह कुछ म्हणत भी कर रहा है या वैसे हे कही बैठा रहता है?", देवकी ने जितने लाड से कहा था इसकी तोह निहाल को आशा हे नहीं थी. वो तोह उनके सामने खड़े होने से हे कतराता था. दामिनी बड़े ध्यान से सब देख रही थी.
"बड़ी बेबे जी, अर्जुन बाई डा कोई ढिल्ला लगदा. यह मैं नहीं मास्टर जी कह रहे सी जड़ो अस्सी प्रैक्टिस लायी khel-ghar पहुंचे. सरपंच साब कहन्दे की अर्जुन तह ोथे कल्ला हे पसीना बहा रहा स सिखर दुपहरी तोह. हूँ कुछ देर तक ओह सरपंच साब न गल्ला करके शरीर ठंडा करदा पेय की के शहीद पाह जी आ गए नाल 4 मूंदे ले के. जुगराज मास्टर जी ख़ास तैयारी करवा रहे अर्जुन बाई जी दी तेह शहीद पाह जी सब ख़याल रख रहे. कहन्दे की हर बन्दे न चित्त कारन वास्ते अर्जुन न 1 मिंट डा टेम मिलु. कुज वि कहो बड़ी बेबे, बाई है नीरा सिरे डा. कल शहीद पाह जी न उसने हवा विच चुक्क लिया स लेकिन सुट्ट्या नई. 10 मिनट विच 20 वारि ोहना दी पीठ लगा टी स मिटटी विच फेर व् मादा जा पसीना न निकल्या. मन्नू वि कोई खुराक दस् दो बेबे जी.", निहाल के मुँह से Arjun-katha सुन्न कर देवकी बहार से तोह बड़ी खुश हुई और हामी भर के कुछ करने का आश्वासन दिया लेकिन अनामिका के हाथ से निक्कर टीशर्ट दामिनी ने लेते हुए जवाब दिया.
"निहाल मैं वि चलदी है नाल तेरे. कोई तह होना चाहिदा ोस्डे ऊपर ध्यान दें वाला. माँ उसका दूध और खुराक बांध दो साथ में.", दामिनी का ये रूप आँचल को तोह हजम हे न हुआ. वो जानती थी की उसकी माँ का असली चरित्र इस से उल्टा है. अनामिका ने कहने के मुताबिक दूध तैयार कर दिया और 2 लड्डू भी साथ बाँध दिए. देवकी ने भी दामिनी से कोई सवाल जवाब न किया और वो निकल चली निहाल के साथ अर्जुन का सामान लिए. देवकी चाय ख़तम करके पशुओं की और गयी तोह आँचल ने अपनी मामी को कमरे में चलने का इशारा दिया.
"देखो मामी झूठ मैट बोलना क्योंकि मुझे भी थोड़ा बहोत पता है और मैं उनके जैसी नहीं हु. पहले माँ गयी थी बगीचे में अर्जुन के साथ लेकिन दोनों साथ नहीं आये. फिर उन्होंने आपसे घर आते हे 2-3 बार अर्जुन का पुछा की वो आया या नहीं लेकिन अर्जुन नहीं आया और वो जहा भी गया था आपको बता कर गया था. अब माँ ऐसे गयी है जैसे उन्हें अर्जुन की बहोत परवाह हो लेकिन अर्जुन यहाँ आने से हे बच रहा है. बताओ तोह ये क्या चल रहा है? और नानी कबसे इतनी मीठी हो गयी जो अब न तोह आपको फालतू टोकती है और बहार से आये हुए को भी इतने प्यार से पूछ रही?"
"मुझे नहीं पता आँचल की क्या चल रहा है और बड़ी दीदी का वही जाने. लेकिन दिन में अर्जुन मुझे यही बोल कर गया था के वो निहाल और शहीद की तरफ जा रहा है. खाना खा के आएगा वह से पर वो वह गया हे नहीं जैसा निहाल की बात से पता चला. माँ जी का भी वही जाने पर उधर से आने के बाद और वह भी उनमे ये ाचे बदलाव तुमने खुद देखे है. बड़ी माँ जी की वजह से शायद.", अनामिका के भोले जवाब से आँचल संतुष्ट नहीं हुई.
"आप न मामी पता नहीं कुछ देखती भी हो या बस ऐसे हे ज़िंदा हो. कुछ बहोत बड़ा चल रहा है और आपके पति खुद इसका सबूत है. विनोद मां घर के बारे में सोचने लगे है और अर्जुन का कितना ख़याल रखते है. देखना मामी ये सब कोई खेल न हो. बड़ी नानी ने मेरे सामने आपसे कहा था की आप हे अर्जुन का ख़याल रखेंगी क्योंकि उन्होंने आपको अपनी बेटी मन है. वह आप भी खुश रहती थी तोह उस लिहाज से ये आपकी जिम्मेवारी है."
"आँचल तुम दीदी को गलत क्यों समझती हो? क्या पता उन्हें चिंता हो सचमुच?"
"हाँ जैसी बातें आपने आज िन्दु आंटी और माँ की सुनी थी वैसी मैं बहोत बार सुन्न चुकी हु. सोचा शायद आप हिम्मत करेंगी और सही का साथ देंगी लेकिन आप किसी तरफ नहीं है.", आँचल उठने लगी तोह झेंपते हुए अनामिका ने उसको वापिस बैठा लिए बीएड पे.
"सब अर्जुन की जिम्मेवारी है और हमे बस ख़याल रखने का कहा गया है आँचल. बड़ी दीदी को मैं या तुम नहीं टोक सकती, माँ जी की वजह से. अर्जुन खुद संभल लेगा जैसा उसने मुझे भरोसा दिलाया है. बड़ी दीदी को हारने की आदत नहीं है और जिस तरह वो कल से लगातार विफल हो रही है, उनकी बेबसी हे उनसे कबूल करवा लेगी उनका सच. पहले मुझे भी अर्जुन के विचार तार्किक लगते थे पर ये बदल गए आधा दिन ख़तम होने से पहले हे. लेकिन इतना कह देते है की शांत और खामोश व्यक्ति को निस्तेज नहीं समझना चाहिए. मैं अर्जुन के साथ हु लेकिन इसकी कोई परीक्षा नहीं दे सकती. तुम भी शांत रह कर दर्शक प्रतीत करवाओ तोह सही रहेगा. ज्यादा taak-jhaak से नुक्सान उसका हो सकता है. दूध फिर से गरम कर देती हु, बहार हे बैठ जाओ.", अनामिका ने आँचल को हे नया पाठ पढ़ा दिया था जो खुद को खिलाडी समझ रही थी लेकिन उसको ख़ुशी भी थी की अर्जुन के साथ उसकी मामी भी है चाहे वो खामोश हे सही. अब बस पता करना था की उसकी माँ की सूई किस बात पर अटकी है जो अर्जुन के पीछे और अर्जुन उनसे दूर. ये बाघ आखिर इस बकरी को दबोचने की जगह ऐसे उलझा क्यों रहा है. कही वो इस बहाने शिकारी तोह नहीं ढून्ढ रहा जिसने ये बकरी परोसी है.?
.
.
खेल घर में तोह आज भीड़ हे बढ़ती जा रही थी. नया अखाडा अकेले हे खोदने के बाद अर्जुन ने 5 लोगो की चुनौती 2 मिनट से पहले हे निबटा दी थी वो भी किसी को क्षति पहुचाये बिना और बेबस करते हुए. शहीद भाई और जुगराज जी के बुलावे पर कसबे के पुराने नामी लोग बुलवाये गए थे जिनमे दिलबाग सिंह भी था और सरपंचा का छोटा भाई कमलेश भी. बाकी खिलाडी भी अपने अपने अभ्यास पूरे करने के बाद इस तरफ घेरा बांध कर जमघट लगा चुके थे इस अनोखे अभ्यास की जिसमे अर्जुन को एकसाथ 2-2 लोगो से भिड़ना था. पहले के सभी नज़ारे दामिनी ने अपनी आँखों से देखे थे और Dilbaag/Kamlesh को भी यहाँ बुलवाने के पीछे जैसे उसका हे कोई मकसद था. दीपा भाभी तक भी ये बात गयी थी की khel-ghar में आज ाचा खासा जमघट लगा है और दिलबाग कमलेश की जोड़ी ने अर्जुन को mitrata-purvak ललकारा है. दीपा भाभी का यही पर माथा ठनक चूका था जैसे कोई अनहोनी होने वाली हो हंसी मजाक से भरी इस abhyaas-shala में. गहराती शाम में ये कही कुछ वैसा तोह नहीं होने वाला था जैसा उसका दिल न होने की प्रार्थना कर रहा था. सर पे दुपट्टा लेती वो तेज कदमो से उस तरफ बढ़ चली जहा उसके हिसाब से अनहोनी होने वाली थी.
जितना अजीब ये दफ्तर था उस से कही ज्यादा अजीब दीखते थे भारत भाई. गर्मी चरम पर थी और इन जनाब ने सफारी सूट पहना हुआ था गंजे सर पे अंग्रेजो के ज़माने की जासूसी टोपी रखे हुए. आम इंसान तोह यहाँ निर्वस्त्र भी गर्मी मानता लेकिन ये आम व्यक्ति थे हे कहा जो इन पर कुदरत का प्रभाव पड़ता.
"ओह शब् तोह शाही (सही) है मिष्टर नरिंदर. बूत 2 कशिश (केसेस) का दुगना लगता है. हमारे लिए शंकर छोटे भाई जैसा, तुम उसका भाई और अब तुम्हारे साथ हमने सिग्रत्ती भी पी लिया तोह हम इतने से हे काम स्टार्ट कर देता है. भारत भाई के लिए ढूंढ़ना मटर करता है, मतलब केस इम्पोर्टेन्ट है मनी नै. कल ठीक 1 बजे हम ऑटो मार्किट में मिलते है. ये विष्णु वर्धन इस स्टेट से बहार हुआ तोह भी इसका पता हम वीथिन ओने वीक लगा लेगा. हाँ उतने टाइम का पूरा पेमेंट भी लगेगा, 12 हॉर्स एवरीडे एंड एव्री ऑवर 2000."
"जी भारत भाई बिलकुल ठीक कहा और मुझे ये मंजूर भी है.", नरिंदर अब खिसकना चाहता था क्योंकि पहले हे इतनी देर हो गयी थी यहाँ और उसको घर पे उमेद से भी कुछ जरुरी बात करनी थी. अभी या भी नहीं पता था के अर्जुन उनकी सभी अटकले ख़तम करता हुआ मनमानी कर चूका है.
"बूत तुम हमको वह ढूंढेगा कैसे? अब तुम्हारा आगे तोह हाईड न सीक का नहीं है भाई."
"सॉरी भारत भाई. आपके सामने नर्वस हो गया था इसलिए पूछना भूल गया."
"ी लिखे योर कॉन्फिडेंस एंड ट्रांसपेरेंट करैक्टर. तुम इंसान बहोत साफ़ है मर नरिंदर. वो वह पर हौंडा का एजेंसी की बगल में एक चना चाट वाला है. वह लंच टाइम बहोत क्राउड रहता तोह हम वह नहीं मिल सकते पर उसका chana-chaat बहोत टेस्टी है इसलिए एजेंसी की बगल से जो गली जाता है हम वही मिलेंगे. 2 प्लेट चाट लेकर तुम वही वेट करना हमारा, राइट ात 1300 हॉर्स माय बॉय. अब तुमको चलना चाहिए और ये 2 सिग्रत्ती यही रहने दो. केस स्टडी करने का टॉनिक है ये.", नरिंदर लाइटर और सिग्रत्ती की डिब्बी उठाने हे लगा था की भारत भाई की बात सुन्न कर क्षमा मांगते हुए उनके साथ दरवाजे तक आया.
"थैंक यू भारत भाई मुझे इतना समय देने के लिए. कल ठीक 1300 हॉर्स पर 2 प्लेट चना चाट के साथ मैं वही मिलूंगा."
"परफेक्ट. सिग्रत्ती नै भूलना.. हाँ.", नरिंदर हामी भरता हुआ निचे चल दिया उन बरसो पुराणी सीढ़ियों से जिन पर धुल अब मिटटी बन चुकी थी और जगह जगह झाड़ उगने लगे थे. भारत भाई अपनी कमीज का कालर वाला बटन खोलने के बाद गर्दन हिलाते हुए सिग्रत्ती जलने लगा, दिया सलाई से.
'आज रात बारिश होने वाला है.', सफ़ेद आसमान में तीखी धुप और कही बादल का नामो निशाँ तक न था. और ये इंसान जाने कहा बारिश करवाने लगा था रात में. नरिंदर तोह जितनी तेज रफ़्तार से निकल सकता था अपने घर के लिए निकल चला, मैं हे मैं शंकर को गालियां देता मतलब अपशब्द कहता हुआ. अगले आधे घंटे में नरिंदर अपने घर की बैठक में था, taro-taja और चेहरे पर परिचित मुस्कान के साथ. यहाँ अभिषेक जी का पूरा परिवार आया हुआ था और दत्त साहब भी. इन परिवारों की महिलाएं घर के भीतर वाले कमरों में थी.
"पंडित जी बता रहे थे माँ जी की आपके पैतृक गाँव में कोई मेला होने जा रहा है? अभिषेक बीटा तुम भी जानकारी रखते होंगे इस बारे में आखिर शहर तोह तुम्हारा भी वही है.?", दत्त साहब ने मेले की चर्चा प्रारम्भ की तोह नरिंदर और उमेद बड़े गौर से ये वार्तालाप देखने लगे जबकि कौशल्या जी तोह गदगद हो उठी दत्त साहब द्वारा माँ जी कहने पर.
"जी मेला तोह जाने कबसे लगता आ रहा है पर मैं उधर कभी गया नहीं. दादी जी बेहतर बता सकती है अंकल या पंडित जी.", अभिषेक पंडित जी को पंडित जी हे पुकारता था जैसा बाकी सभी गाँव और उस शहर में रहने वाले जानकार.
"बात इतनी हे नहीं है बीटा जो तुम्हारे अंकल बता रहे है. ये तोह तुम्हे आमंत्रण दे रहे है वह शामिल होने का क्योंकि मेरे सबसे छोटे पौटे ने उधर के अखाड़े में चुनौती उठाई है. अर्जुन ने अपने परिवार के सम्मान को बरकरार हे नहीं बल्कि ऊँचा करने के लिए वो चुनौती उठाई है जो पिछले 28 बरस में कोई न कर सका. अब मौका इतना ख़ास हो तोह ये भी चाहते है की इनका पूरा परिवार वह साथ हो. जितना में जानती हु सुभाष, वह की दरगाह के मेहता बहोत है. तुम्हे और देविका को जरूर देखना चाहिए. अभिषेक और शिल्पा तोह वह आएंगे हे.", अब कानो से धुआं निकलने की बारी उमेद की थी जबकि अभिषेक जैसे दरगाह मेले के बारे में जानकारी रखता था जो हैरानी से सबको देख रहा था की ये लोग खुश हो रहे है ऐसी दुर्घटना पर.
"जी ये तोह ऐसा हुआ की हम सब काम छोड़ कर भी शामिल होंगे इस पल के दर्शक बन ने के लिए. वैसे मान न पड़ेगा पंडित जी आपके पौटे अर्जुन को. मुझे तोह वो हमेशा से एक शांतचित और घरेलु बचा हे लगा चाहे जिस्मानी तौर पर असाधारण है. अखाड़े कुश्ती तोह अब उतने प्रचलन में भी नहीं रहे. हम जरूर शामिल होंगे माँ जी और बड़ी भाभी जी भी साथ आएँगी निक्की बिटिया को लिए. बेटे कारोबार देख लेंगे एक दिन."
"ये सब इतना भी आसान नहीं है अंकल जी और मुझे नहीं पता की मुझे ये कहना चाहिए या नहीं लेकिन अखाड़े की चुनौती मतलब जंगल में आग. अर्जुन का जोड़ीदार काम से काम शंकर चाचा जितना सक्षम तोह होना हे चाहिए नहीं तोह 10 पहलवानो से इस गर्मी के मौसम में वो मासूम इंसान पार नहीं प् सकेगा. यही तोह चुनौती है और फिर अकेला शेर भी इतने शिकारी कुत्तो से पार नहीं पा सकता. वो सभी पहलवान जमीन कब्जे, रंगदारी जैसे काम करके अपना शरीर और रुतबा बरक़रार रखते है. चेहरे देख कर हे सामने वाले के दिल में खौफ उतर आये लेकिन आप लोग तोह खुश हो रहे है इस अवसर पर.", अभिषेक का वर्णन सटीक था जैसा रामेश्वर जी को पता था.
"हाँ ये हम जानते है और इसलिए परेशां भी है लेकिन हमारी भगवान के विचार अलग है. वैसे शंकर जोड़ीदार नहीं बन्न सकता अर्जुन का क्योंकि दोनों का खून एक हे है और उस से बड़ी मूर्खता हमारे लाडले ने ये कर दी है की ढिंढोरा पिटवा दिया है की वो अखाड़े में अकेला उतरेगा और जो भी चाहे उसके सामने आ सकता है फिर किसी भी ऊँचे पिंड का हो या पंचायत का. ये नियम हमारे पिताजी ने पहले अखाड़े में खुद चुनौती देते हुए कहा था. जाने इतनी गहरी और पुराणी बात उसको कैसे पता चली की जैसे ये शुरू हुआ वैसे हे अर्जुन इसको अंतिम परिणाम देने की कोशिश कर रहा है. तब पिताजी ने 2-2 के जोड़ो में कुल 14 पहलवान पटके थे, सुना यही है हमने.", रामेश्वर जी जैसे यहाँ मौजूद सभी को डरने की कोशिश कर रहे थे और वो लगभग सफल भी रहे.
"छुट्टियां चल रही उसकी और क्या घर में बंद रखने के लिए तगड़ा किया मैंने उसको? आप अपने किस्से अपने हे पास रखो जी मैं कह देती हु. नयी कहानी मेरा पौता लिखेगा जिसकी साक्षी मैं खुद बनूँगी. पता लग हे जाएगा की खून समय गुजरने से कमजोर हुआ है या बेहतर. उमेद तेरी माँ कह रही थी तू और इन्दर 28 को काम से बहार हो? तुम नहीं देखोगे अपने बेटे को इस अवसर पर?", अब तोह सुभाष जी के साथ अभिषेक के भी चेहरे पर हैरत थी. कैसी दादी थी ये जो इतनी शांत और उत्साहित थी.
"ना चची.. अपने बस का नहीं और उस दिन कंपनी का कॉन्ट्रैक्ट सिग्न होना है तोह हम दोनों को दिल्ली रहना पड़ेगा. अर्जुन से मैं बात करूँगा और वो जो कर रहा है बेवजह नहीं कर रहा. खतरा है लेकिन खतरा तोह पानी पीने में भी होता है और सोने में भी लेकिन जरुरी है न वो? भगवन नारायण उसकी रक्षा करेंगे जैसे करते आये है.", उमेद के शांत एवं सकरात्मक जवाब से उन्होंने आशीर्वाद देते हुए कहा.
"देखा आप लोगो ने मेरे इस बेटे का जवाब. ये जानता है की ऐसा करना गलत नहीं है और जरूर वजह है तभी अर्जुन ने फैंसला किया. आप लोग ये बात गौरव और संजीव के सामने मैट कीजियेगा, बाकि घरवाले भी ऐसा नहीं करेंगे मैं बता चुकी हु. शंकर को पीछे घर देखना होगा राजकुमार के साथ. सतीश भी चलेगा उधर जैसा इन्होने बताया है और कृष्णा बहु भी. लड़कियां मन कर रही है सिवाए ऋतू और तारा के. लेकिन ऋतू को तयारी करनी है और तारा की ट्रेनिंग भी चल रही है तोह उनमे से कोई नहीं जाएगा. बचो का काम भी क्या है वह?"
"माँ अर्जुन भी तोह बचा है.", नरिंदर के इस लागु जवाब से कौशल्या जी ने बस नजरो से उसको खामोश करवा दिया.
"बचा है इसलिए मैं खुश हु और तुम लोग ये बचपना आजतक करते आ रहे हो. देखो बीटा मैं फिर से आप दोनों को वह आमंत्रित करती हु और कोशिश करना के इसमें घर से बचे न हे आये, जिनका दिल थोड़ा कमजोर हो. ललिता नहीं देख सकती ये सब और रेखा की हालत भी उतनी बेहतर नहीं है इसलिए उन्हें घर हे रुकना होगा. अर्जुन के ननिहाल से भी उसके नाना नानी को ले कर राजेश शामिल हो रहा है. रजनीश भाई साहब को भी इसके बारे में नहीं बताया नहीं तोह वो काम छोड़ कर शामिल हो जाते है. इतिहास की वजह से हे हमारा वजूद है और उसकी कदर हमको करनी हे होगी. मेरा पौता हार भी जाए कोई परवाह नहीं मुझे लेकिन उसके फैंसले पर ऊँगली उठा कर मैं कभी उसका जीवन खराब नहीं होने दूंगी. पिंकी बीटा, पहले इधर नाश्ता लगवा दे.", कौशल्या जी अंतत में थोड़ी भावुक हो गयी थी और प्रियंका वह बर्तन उठाने आयी तोह वो अपने आंसू छिपाती हुई उठ कर भीतर वाले कमरे में चली गयी इन सबको हैरान छोड़ कर. कुछ पल शांति छायी रही जिक्सो रामेश्वर जी ने हे भांग किया.
"माँ भी है न तोह दिल के किसी कोने में वो चिंता और डर रहना लाजमी है. पर मेरी धर्मपत्नी हे है जो इस घर को घर बना सकीय. मैं गलत फैंसला कर भी दू लेकिन कौशल्या हमेशा सही होती है. खैर अब जो हो रहा है उसको रुकवाया भी नहीं जा सकता क्यूंकि बात तोह raj-gharane तक जा चुकी है इस जंगल में लगी आग की."
"पापा वो त्यार नहीं है जितना मैं समझता हु. जोश अलग बात है और मजबूत शरीर भी ज्यादा कारगर नहीं."
"ये तोह सिर्फ एक नजरिया है बेटे. क्या पता अर्जुन इस मुद्दे को सोच हे न रहा हो जैसे उसके लिए ये सब थके हारे शिकारी कुत्ते हो जिन्हे बाघ का एक पंजा हे मूर्छित या प्राण हरने के लिए बहोत है. एक घटना में सबको उलझा कर अक्सर शिकार कही और अंजाम दिया जाता है जहा कोई सोच भी नहीं सकता. आप लोग नाश्ता करो भाई, मैं जरा पड़ोस से जरुरी कागज़ लेके आता हु. अभिषेक तुम्हे हे वो फाइल ले जानी है उधर. आता हु.", रामेश्वर जी अलग हे पहेलियाँ घुमा गए थे यहाँ से निकलने से पहले और उनके जाने के बाद शंकर भी इस माहौल में शामिल होने चला आया था, सबके साथ मुलाकात और खाने पर. अंदर सभी अपनी अपनी सहूलियत से बैठे थे जहा देविका जी रेखा के कमरे में थी शिल्पा, राजेश्वर और कृष्णा जी के साथ. ललिता जी भी काम देखते हुए यहाँ भी शामिल हो जाती. गौरव और संजीव अपनी अपनी नौकरी और जीवन की बातें कर रहे थे जैसे उन्हें जीवन के और पहलु पता नहीं थे.
रसोईघर को आरती, अलका और रुपाली के साथ सरोज भाभी संभल रही थी जबकि कोमल के साथ मुस्कान सभी मेहमानो की खातिरदारी में जुट चुकी थी प्रियंका के यहाँ से जाने के बाद. ऋतू ने प्रीती को साथ लिए घर में प्रवेश किया तोह वो भी रसोईघर में चली गयी हाथ बांटने. प्रीती कौशल्या जी की तरफ जहा पूर्णिमा जी राधिका को साथ लिए बैठी थी. ऋतू और प्रीती के चेहरे कोमल ने देख लिए थे इधर आते हे.
"ारु से बात हुई तेरी?", पहला सवाल हे यही था कोमल दीदी का जब वो बर्तन धोने की जगह पर ट्रे रख रही थी.
"हाँ लेकिन आपको कैसे पता की मैंने उस से बात की है?", ऋतू थोड़ा चौंकी थी इस अप्रत्यक्ष सवाल से.
"वो गाँव फ़ोन किया था दादी ने अभी जब पूर्णिमा दादी ने बात करने की इत्छा जताई. काण्ड कर दिया न उसने वह जाते हे और अब घर पे भी नहीं था. अनामिका चची ने बताया की वो घंटा पहले हे उठने के बाद तैयार हो कर गया है काम से. अब दोपहर में उसको काम क्या हो सकता है तुमसे बात करने के सिवा? गलत कह रही हु?", आरती और तारा के कान भी इधर हे थे जब कोमल बर्तन साफ़ करते हुए धीमी आवाज में ऋतू की खिंचाई कर रही थी.
"वो मैं हे उसको समझा रही थी दीदी के उसने एक बार पहले सबसे बात करनी थी."
"हाँ तुझे तोह वह के सब नंबर पता होंगे और ये भी की अर्जुन किधर गया होगा जो चची तक को नहीं पता.", अब ऋतू सकपका गयी थी लेकिन कोमल के चेहरे पर ये प्यारी हंसी देख वो एक तरफ से उनसे लिपट कर प्यार जतलाने लगी.
"वो पीसीओ से उसने प्रीती के घर फ़ोन किया था न दीदी और मैं उधर हे थी तोह मैंने भी बात कर ली. बहोत दांत लगाईं मैंने उसको चाहे प्रीती से पूछ लो."
"बताया मुझे रेणुका बुआ ने की कैसी दांत लगा रही थी तुम जो बस फ़ोन पकडे कड़ी थी जबतक रेणुका बुआ इधर नहीं आ गयी. फ़ोन उठाया भी बुआ ने हे था और उसके बाद उनसे लिया तुमने. हाँ बाद में प्रीती ने बात भी की होगी पर अपनी नौटंकी वह दिखाना जहा ये चल सकती हो. तुम दोनों को मैंने ज्यादा संभाला है."
"जानती हो तोह फिर पूछती क्यों हो दीदी और इसलिए तोह मुझे सबसे ज्यादा प्यार आपसे है.", ऋतू ने गाल चूमते हुए अपने चेहरे की लाली छुपानी चाही और कोमल ने भी अपनी छोटी बहिन को ऐसा करने दिया.
"नहीं पूछती लेकिन माँ ने कहा है की ठीक 7 बजे अपने नोट्स और किताबे ले कर उनके कमरे में चली जाना. सुबह 8 से पहले तुम कमरे से बहार नहीं निकलने वाली, 4 घंटे सोना इसमें शामिल होगा. और ये नियम ऐसे हे रहने वाला है. 12 से 1 तुम फ़ोन पे बात कर सकती हो जो बहाना आज बनाया वही करते हुए. अब देविका आंटी से मिल लो, तुम्हे हे पूछ रही थी जब वो आयी थी.", ऋतू के पसीने निकलवा दिए थे कोमल ने इतनी हे देर में उसकी पोल खोलते हुए.
"माँ ने कहा की वो खुद चेक करेंगी मेरी तैयारी?"
"पापा से उन्होंने ये कहा था सुबह की अब ऐसा हे होगा. दादी ने बोलै भी की उन्हें आराम की जरुरत है पर चची ने माँ का हे पक्ष लिया. दोपहर में तुम और अलका मेरे साथ पढ़ने वाली हो और ये मैंने प्लान नहीं किया. अलका ने कहा है की 2 से 6 तक वो ऐसा करेगी. पूछ लो यही पे तोह है."
"ऐ अलका ये क्या मुझसे बिना पूछे हे प्लान?"
"6 से 7 फ्री भी तोह रहना है के नहीं? और सुबह भी इतना खली टाइम रहेगा तोह गर्मी में और क्या करने को है इस घर में.? आरती तोह खुद 8 घंटे का टाइम टेबल बनाये बैठी हुई है रुपाली के साथ. इनसे तोह काम हे है अपना.", अलका के जवाब के पीछे कुछ वजह थी जिस पर बाद में बात करने का बोलती हुई ऋतू पाँव पटकती हुई अपनी दादी की तरफ चली गयी शिकायत करने. इस भरे पूरे माहौल में कुछ लोग अलग हे दुनिया में बैठे थे. माधुरी के साथ आयी गुनगुन उर्फ़ किरण को तारा पूरा घर दिखने के बाद विन्नी दीदी के साथ अपनी पुराणी जगह उस हॉल कमरे में बैठी टेलीविज़न पर गाने देख रही थी जो गुनगुन को बेहद पसंद थे. गुनगुन के साथ रहने का तारा को अलका ने हे कहा था और थोड़ी बातचीत के बाद वो मस्तमौला सी लड़की तारा को पसंद भी आयी. विन्नी का तोह दुःख हे काम होने का नाम नहीं ले रहा था. पहले शादी के माहौल की वजह से अर्जुन से दुरी रखनी पड़ी और अब वो खुद भाग गया था एक महीने के लिए. आज उसको कुछ ाचा नहीं लग रहा था इसलिए वो अर्जुन के बिस्टेर पर हे लेती थी और तारा के आने के बाद उनके साथ मजबूरी में बैठ कर खुश होने का दिखावा करने लगी.
"तारा दीदी, यहाँ एक मेंबर मिसिंग है जितना मैंने देखा है. आपके रूम के साथ वाले रूम में भी उसकी फोटो थी और इधर बड़े भैया (संजीव) वाले रूम में भी टेबल पर उसकी हे फोटो थी. कही बहार पढ़ते है क्या वो?", अर्जुन से वो मिली हे कहा थी और अभी उसने निचले कमरों में ध्यान भी नहीं दिया था जहा कृष्णा जी के कमरे में तोह अर्जुन का बचपन से अब तक सफर दिवार पर टेंगा था.
"अर्जुन सबसे छोटा भाई और मेंबर है इस घर का. हॉलीडेज में वो क्सक्सक्सक्स गया है न जहा हमारा गाँव है. शादी में आती तोह मिल सकती थी.", अब विन्नी भी थोड़ा सतर्क हुई जब अर्जुन का नाम सुना.
"हम्म्म्म. यही तोह हम रहते है और ये विलेज थोड़ी दूर है जिसके बारे में पापा और अभिषेक भैया ने बताया भी है लेकिन मैं इतनी बिजी रहती हु न उधर तोह कभी सिटी से बहार जाना हे नहीं हुआ. आपके छोटे भाई आप जितने हे सुन्दर है मतलब लड़के है तोह हैंडसम कहना ठीक होगा पर दाढ़ी रखते तोह लुक बिलकुल पंजाबी लगती. वह ज्यादातर बॉयज फेसिअल हेयर रखते है चाहे उनके सूट न करे.", गुनगुन तोह इस मामले में गुरदीप की हे सगी वाली थी जो अपनी नन्ही आँखों को नाचते हुए अनगिनत bhaav-mudraye प्रकट करती हुई बस बोलती हे रहती थी. विन्नी से तोह उसका ये सब सेहन हे नहीं हो रहा था.
"कौनसी क्लास में हो गुड़िया आप?", विन्नी से जब रहा न गया तोह वो झूठी मुस्कान के साथ बीच में शामिल हो गयी.
"जी दीदी हम है तोह फर्स्ट ईयर में लेकिन एग्जाम ाचे गए है और अब सेकंड ईयर स्टार्ट होगा हमारा जुलाई एन्ड या अगस्त फोर्ट्स वीक में. वैसे मैं आपसे भी बात करना चाहती थी लेकिन आप सीरियस बैठी थी और शिल्पा दीदी जब आप जैसे मूड में होती है तोह हम उन्हें परेशां नहीं करते. वैसे तोह बहोत प्यार करती है मुझे लेकिन ऐसे मूड में उनका गुस्सा टंग स्लिप करवा देता है उनकी. हाँ तोह तारा दीदी, आप हमारे लिए सूट डिज़ाइन कर सकती है? आपके रूम में इतने दसिग्नस थे की मुझसे रहा नहीं गया.", विन्नी इस मासूम लड़की की बात सुन्न कर अब खुद को हे बहाल बुरा बोल रही थी.
"हाँ क्यों नहीं गुड़िया, तारा नहीं भी करेगी तोह ये तुम्हे इतने सूट दिखा सकती है की डिज़ाइन याद हो जाएंगे. इसके और अलका के पास तोह सूट का भण्डार लगा हुआ जो पता नहीं कहा कहा से खोज कर इन्होने जमा किये है. लेकिन रहना बस निक्कर में होता है.", विन्नी ने मस्ती में तारा की टांग खिंचाई की तोह वो भी हंसने लगी.
"हम्म्म. शार्ट पैन्ट्स ाची लगेंगी हे इन पर और वैसे आप पे भी. लेग्स इतने मैनटैनेड है और स्किन भी. माँ कहती है मैं इस मामले में थोड़ी चब्बी हु और उधर लड़को में क्वालिटी काम है करैक्टर के मामले में तोह ऐसा फैशन एक तोह मुझे सूट नहीं करेगा और दूसरा दांत पड़ने के साथ साथ ये वैसी जगह पर ठीक भी नहीं. आप लोग एक्सरसाइज भी करती है क्या?", गुनगुन हमेशा घर में रहने वाली और कॉलेज बस पढ़ने तक सिमित थी. घर में आने वाली महिला प्रसाधन की किताबे और पत्रिका पढ़ने का बड़ा शुआक था इसको और हर तरह के परिक्षण वो करती हे रहती थी. उसकी साफ़दिली को देख विन्नी ने हे बात को सही तरह से पेश किया.
"अर्जुन जब वह आएगा न माधुरी से मिलने तोह अपनी इस नयी भाभी को बोलना की वो तुम्हे मार्किट ले जाए. ऐसा तब कहना जब घर में गेट्स नहीं हो. माधुरी तुम्हे शॉपिंग करवा देगी जैसी तुम चाहती हो और इस मामले में हमारा अर्जुन भी माहिर है. इतनी बहने है उसकी तोह लड़को से ज्यादा तोह लड़कियों के टास्ते उसको ज्यादा पता है. बात करके दुकानदार को भी पता लेता है वो."
"ये तोह आपने पते की बात करि है दीदी और फिर ऐसा हे करेंगे. माधुरी भाभी ने कल हे मुझे ये वाली ड्रेस और 2 और सूट दिलवाये है. जीन्स भी दिलवा रही थी लेकिन मुझे सूट नहीं करती इसलिए मैंने नहीं ली. तभी एक्सरसाइज के लिए पुछा मैंने की क्या ऐसा कुछ घर के अंदर पॉसिबल है? फिर मुझे प्रॉब्लम नहीं आएगी.", तारा जो अब चुपचाप सुन्न रही थी वो मैं में यही कह रही थी की बस अर्जुन से मत मिलना तुम लड़की. गलती से तुमने उसको या उनसे तुम्हे पसंद कर लिया न तोह वो साड़ी एक्सरसाइज एक बार में हे करवा देगा. और जहा जहा से तुम कुछ भरी हो वह से ज्यादा भरी हो जाओगी. तारा के होंठ हिलते लेकिन बेआवाज देख गुनगुन ने पूछ हे लिया.
"दीदी आप रिमोट से खुद को भी म्यूट कर सकती हो क्या? लिप्स हिल रहे है लेकिन आवाज बहार नहीं आ रही.", विन्नी पेट पकड़ कर हंसने लगी थी और ऐसा करने पर उसके सफ़ीद कमीज के गले से वो तराशे हुए अद्भुत कटाव एक पल को दोनों लड़कियों ने देखे. तारा के तोह कही से भी काम न थे पर गुनगुन के लिए ये दृश्य नया था. उसकी बोलती हे बंद हो गयी थी इस स्थिति में.
"मैं यही कह रही थी गुनगुन की विन्नी दीदी ठीक कह रही है. अर्जुन तुम्हे ठीक कर देगा, ी मैं वो शॉपिंग करवा देगा दीदी के साथ तुम्हे ले जा कर. बस उसको ये कह देना जैसे ड्रेस तारा और विन्नी दीदी को उसने दिलवाये थे वैसे तुम्हे ले दे. बाकी अब बातें बहोत हो गयी है और खाना भी लग चूका होगा. हमे निचे चलना चाहिए. विन्नी दीदी आप चल रही है?"
"नहीं यार, अभी नहीं. थोड़ी देर में आती हु मैं निचे. तुम लोग खाना खाओ.", वो दोनों कमरे से निकल चली तोह गुनगुन बोल उठी.
"अरे तारा दीदी हमने एक मूवी देखि थी और ये दीदी वैसी हीरोइन जैसी हे है और उनकी हालत भी."
"क्या मतलब? कैसी हालत?"
"बुरा मैट मान न पर लगता है इन्हे प्यार हो गया है और इसलिए ये शायद किसी को मिस कर रही है.", गुनगुन की बात से तारा चलते चलते वही रुक गयी. उसको भी पता था के विन्नी अर्जुन के लिए बेचैन है पर ऐसा वो चर्चा ऐ आम नहीं करती थी.
"बहोत इंटेलीजेंट हो लेकिन मैंने भी दुनिया देखि है. प्रूफ क्या है?"
"उनके वह पर जो मार्क था न वो लवर हे दे सकता है. सॉरी ऐसा भी मूवी में हे था और दीदी जब कोहनी टिका के बात कर रही थी तोह वो गलती से दिखा मुझे. पहले से हे वो अलग कमरे में अकेली थी और उन्हें अभी खाना भी नहीं खाना."
"हाहाहा.. तुम तेज हो लेकिन भोली भी बहोत हो गुनगुन. वह पर जो मार्क था वो दीदी के शादी में चोट लगने से बना. लेहंगा पहना हुआ था तोह वो थोड़ा विज़िबल जगह थी. स्लिप होने की वजह से उनके यहाँ कुर्सी का हैंडल जोर से लगा था और फिर सबको पता है इसके बारे में.", तारा मैं हे मैं कह रही थी की लड़की फिल्मो से जो भी सीखी है थोड़ा बहोत सही भी सीखी है लेकिन दिमाग घूमने में इस घर की जासूस मण्डली कही बेहतर थी.
"ओह ी सी.. वही तोह मैं कहु की ऐसा कैसे हो सकता है. इतनी सुन्दर लड़की के लिए लड़का भी तोह वैसा होना चाहिए. हाँ एनवायरनमेंट देख के तोह ये भी लगता है के बॉयफ्रेंड तोह इधर भी मुमकिन नहीं होगा बनाना. समाज, प्रेस्टीज एंड आल. फिल्म भी पता नहीं दिमाग में क्या कुछ भर देती है. सॉरी सब बोलते है की मैं बहोत ज्यादा हे बोलती हु."
"It's ऑलराइट. वैसे तुम भी बहोत सुन्दर हो और ये मत सोचा करो की तुम्हारी बॉडी में कुछ कमी है. क्यूट लगती हो तुम और हेअल्थी होना कोई प्रॉब्लम नहीं.", तारा उसको साथ लिए निचे आ गयी थी. 5 फ़ीट की किरण थी भी चंचल और हंसमुख लड़की जो कूल्हों और सीने से कुछ ज्यादा हे गदरायी थी इस काम उम्र में हे. छोटा कद होना शायद एक वजह थी और साथ हे ाचा खाना पीना भी. यहाँ सभी लोग थे सिवाए प्रियंका और माधुरी के जो अपने पुराने कमरे में बंद थी.
.
.
"वो पहले वाली चमक नहीं दिख रही दीदी जो यहाँ रहते हुए हमेशा दिखती थी तुम्हारे चेहरे पर. कुछ दिक्कत है क्या उधर.", प्रियंका सबसे ख़ास सहेली भी थी माधुरी की और उनमे कुछ भी पर्दा न था. अपनी इस बहिन के सवाल पर माधुरी ने फीकी से मुस्कान के साथ कहा.
"नयी जगह पर एडजस्ट करना थोड़ा मुश्किल तोह होता हे है यार. लेकिन ससुराल उतना बुरा भी नहीं है जैसा पुराणी फिल्मो में होता था."
"आये हाय मैं सड़के जाऊ. तोह सरोज भाभी और प्रिय भाभी को अपना सुहागरात वाला किस्सा सुना दिया मेरे बिना हे? सच बताना कैसा एहसास था, झूठ मत बोलना क्योंकि अब आप हे हो जिसके पास कपरिसों है. तुलना तोह होनी हे है और जीजा जी दिखने में उतने बुरे भी नहीं. हट्टे काटते है चाहे उसके जितने नहीं जो हमारा प्यार है.", अर्जुन का नाम लिए बिना हे प्रियंका ने उसका जीकर करके माधुरी की दुखती राग छेड़ दी थी पर माधुरी समझदार इंसान थी और इस घर में सबसे बड़ी लड़की भी.
"हाँ ये बहोत ाचे है और बाकी बड़े भैया और शिल्पा दीदी भी मेरा बहोत ख्याल रखते है. अब पुराणी बातों के साथ इनको जोड़ कर तोह नहीं जी सकते न पिंकी?"
"झूठ बोलना नहीं आता तोह कोशिश भी नहीं करनी चाहिए दीदी. आप जानती है की अर्जुन कोई अतीत नहीं जो गुजर गया हो. वो आज भी है और कल भी रहेगा. ये तोह गौरव जीजा पर निर्भर करता है की वो तुम्हारे दिल से वो जगह हथिया सकते है या नहीं. बताओ न दीदी क्या मैं गलत कह रही हु?", माधुरी मुस्कुराते हुए भी 2 बूँद आंसू टपका गयी.
"कपरिसों और प्यार का? नामुमकिन है पिंकी और गौरव मेरा सामाजिक सच है हो अब हमेशा रहेगा. लेकिन अर्जुन के लिए भी तुमने सही कहा की वो पास होगा तोह मैं मर्यादा लांघ सकती हु, रुकने की कोशिश तोह रहेगी.", माधुरी के चेहरे को साफ़ करते हुए प्रियंका भी मुस्कुरा रही थी.
"वो जानता है की दिल को कैसे छुए जाता है. सेक्स किये बिना भी उसका एक अनूठा एहसास रहता है जब वो पास हो. चाहे साथ बैठ कर खाना खाते हे क्यों न या फिर उसको काम करते हुए देख कर. जीजा जी उस मामले में तोह तगड़े है जितना लगता है?"
"अरे मेरी बहिन अगर तू मुद्दे की हे बात करना चाहती है तोह सुन्न ले. इन्हे हिम्मत के लिए पहली बार तोह शराब की जरुरत पड़ी और उसके बाद जो हुआ उसमे कही से भी मैं शामिल नहीं थी. दबाया, मसला और दिल की बातें कही जो नशे में मेरे जिस्म तक हे सिमित थी. लेकिन सुबह उठते हे सबसे पहला काम इन्होने जो किया वो था मेरे सामने घुटनो पर बैठ के माफ़ी माँगना. कबूल किया की पहली बार उन्हें नशे की तालाब बस खुदको शांत करने के लिए पड़ी थी और मेरे सामे वो भी काम न किया. उन्हें लगा की जोश में उन्होंने सेक्स करके मुझे दर्द हे दिया जो वह खून की वजह से लगा पर मैं इसका क्या जवाब देती. प्यार से उन्हें गले लगा लिया बस यही बोलते हुए की ये उनका हक़ है."
"ओहो, तोह उस मामले में ज्यादा तगड़े निकले जो खून तक निकाल दिया?", प्रियंका की बात सुन्न कर माधुरी हँसते हुए लोटपोट हे हो गयी. वो बिलकुल अब पहले वाली माधुरी दिख रही थी, इस घर की माधुरी.
"बेवकूफ वो आजतक कच्चे थे और अर्जुन का भी खून निकला था इस वजह से."
"मतलब वो इनका खून था?"
"और नहीं तोह तुझे क्या लगता है मेरी किस्मत इतनी जोरदार है की अर्जुन से आगे जो मिला वो उस से बढ़कर होगा? कल दिन में इन्होने मीठी बातें करते हुए जब संसर्ग किया न तोह ध्यान रखा की बाहरी चिकनाई प्रयोग करे. मुझे खुद को वह से सख्त रखना पड़ा लेकिन तब भी एक बार मुझे ये एहसास नहीं हुआ की कोई तुलना मुमकिन है. लेकिन गौरव इस मामले में थोड़ा संजीदा है तोह जोर शोर तोह लगाया जिस वजह से 8-10 मिनट रेलगाड़ी चली. इनके सामने दर्द और सिसकियों का दिखावा करके जोश मैंने भी बढ़ाया इनकी मर्दानगी मानते हुए. लगभग इनके होने के बाद हे मुझे थोड़ा सा फील हुआ. जबकि मेरा शेर तोह शुरू होने से पहले हे मैदान भिगो कर पिच तैयार करता है. जबतक 3-4 बार मैं न हो जॉन इतने वो रुकता नहीं और उसके बाद पिछली तरफ भी सवारी को तैयार रहता है. हाहाहा.. उसकी तोह तू बात हे न कर. कमीना न लेने आया और न आज यहाँ है जब मैं आयी हु. मुंडका तोह बना हे सकते थे अगर वो होता तोह."
"पागल हो क्या दीदी? और अर्जुन भी तुम्हे उतना हे चाहता है बस मुझे तोह ये डर सत्ता रहा है की अगर वो आपकी तरफ आया तोह आपको देख के वो भी नहीं रुकने वाला. ये खतरनाक बात हो सकती है."
"मुझे तोह लगता है की अर्जुन वह आएगा तोह मुझपे चढ़े न चढ़े पर शिल्पा दीदी जरूर उसके निचे आने का इरादा किये बैठी है. उसके लिए कल उन्होंने मुझसे पूछ पूछ के कपडे ख़रीदे है और जब आज यहाँ आने पर उन्हें पता चला की अर्जुन उधर है तोह वह का नंबर भी लिया दादी से उन्होंने. मान न मान पिंकी, मेरी जेठानी लट्टू है अपने शेर पे. पता नहीं इस कमीने ने क्या काण्ड कर दिया इनके साथ बस शादी के व्यस्त माहौल में?"
"अर्जुन फेरो से पहले उनके हे साथ गया था जब परिवार के लोग खाने पर थे आपके साथ. कह रही थी की उधर अँधेरा है थोड़ा और बेटे को सुलाना है. ये लोग उसके बाद फिर कोई घंटे बाद हे नजर आये थे और तब अर्जुन शायद वेदी के पास ज़ूबी, प्रीती के साथ हंसी मजाक कर रहा था. दिन में भी होटल दिखने अर्जुन हे गया था न आपकी तरफ वाली बरात को? लगता है इन दोनों हे टाइम वो खेल गया अपने पत्ते और तुम्हारी जेठानी हैं भी टक्कर की और खुश मिजाज. मस्ती मस्ती में दोनों कही एक दूसरे को ठीक से तोह नहीं जान गए दीदी?"
"लग तोह यही रहा है और सच बताऊ तोह ऐसा होना चाहिए. शिल्पा दीदी की लाइफ भी बस दिखावा हे है और वो बचा उन्होंने अडॉप्ट किया था जब जेठजी को पुलिस ने बताया की कोई नवजात बचा उन्हें सड़क पर मिला है. दिल की बहोत भली है यार और ये बात उन्होंने मुझे हे बताई है और तू इसको अपने तक हे रखना. गौरव तोह जॉब की वजह से 5 दिन दूर रहते है पर जेठ जी तोह आज सुबाज लौटे कल के गए हुए. दीदी कहती है की महीने में 25 दिन ऐसा होता है और अब इस अकेलेपन में काम से काम मैं तोह हु उनके साथ. अर्जुन अगर उन्हें खुशियां दे सके तोह मुझे ऐतराज नहीं. गौरव इतने भी कमतर नहीं लेकिन उन्हें ज्यादा जरुरत है किसी साथी की. शायद अपने वाला ऐसे हे दिल ढूंढ़ता फिरता है घर से बहार जिनकी चेहरे की हंसी दिल के दर्द बता देती है. चल माँ आवाज दे रही है.", माधुरी ने कपडे सही करते हुए पंजाबी जूती पहनी तोह उनके उभार को प्रियंका ने थोड़ा जोर से मसल दिया.
"ताई की आवाज बहुत जल्दी सुन्न गयी आपको. ये नहीं कहती की हनीमून की तैयारी भी करनी है यहाँ से जाते हे. वैसे ये शिल्पा दीदी को मैं अभी लपेटे में लेती हु अलका और रोमिला आंटी की मदद से.", और प्रियंका उनसे पहले हे हंसती हुई बहार भाग गयी. माधुरी अपने सीने को सहलाती हुई बस इतना हे कह पायी.
'तू ठहर थोड़ा टाइम. अर्जुन को कहूँगी की तू भी दोनों पिच तैयार किये बैठी है.', माधुरी की बात सुन्न कर प्रियंका थोड़ा सा दरवाजे से अंदर झांकते हुए बोली.
"सच है दीदी और ये भी कह देना की जैसे मर्जी. पिंकी बस वेट कर रही है.", और उसके बाद वो सचमुच हे दौड़ती हुई निचली मंजिल पर भाग गयी. माधुरी हँसते हुए खुद को सँवारने के लिए बाथरूम जा चुकी थी. इस हलकी फुलकी चर्चा से हे उसके दिल में अर्जुन को देखने की इत्छा बलवती हो उठी थी और कुछ याद करके वो आईने के सामने खुद हे शर्मा गयी अपने पेट पर हाथ रखती.
.
.
उधर गाँव में अर्जुन उस एकमात्र पीसीओ के लकड़ी वाले खोखे से निकलने के बाद जब 300 रुपये चुकाने लगा तोह दूकान चलने वाला युवक तारीफ भरी नजरो से उसको देख रहा था. एक घंटे से ज्यादा उस बंद खोखे में वो भी गर्मी के वक़्त बैठना तोह मामूली बात हे नहीं थी.
"पाह जी लगदा इश्क़ बहोत ज्यादा हे करदे हो जेहड़ा कमीज गीली हों बाद भी खुश हो? ेहना मैं 4 दिन विच नहीं कमांड पीसीओ तोह इस करके करियाना वि बेचना पैदा.", लड़का भी भला था और उसने कुछ गलत भी नहीं कहा पर अर्जुन ने बात जरा घुमा दी.
"जरुरी तोह नहीं भाई की इश्क़ में हे इतनी बातें हो. एक्साम्स की चर्चा भी तोह कुछ मायने रखती है न बड़े भाई?", वो लड़का थोड़ी हैरानी से देख रहा था अर्जुन को अब.
"हाय वे रब्बा मेरेया ेहननी देर तक गल्लां वि कित्तियाँ तेह ओह वि पढ़ाई दी? पंडत जी, तुस्सी तह सच्ची थोड़े जे हिल्ले लगदे हो. गलत न समझयो पर मेरे कॉल हे बह के गाल कर लेनी स. मैं कागज़ पेन वि दे डंडा लिखाण न."
"भाई, पढ़ना भी मेरा काम है और उसके लिए कागज पेन सामने वाले के पास था. घर पे आवाज होती रहती है न किसी न किसी की इसलिए वह आपके बूथ जैसा माहौल नहीं मिलता. लगभग रोज हे आऊंगा मैं इस टाइम पर अबसे. चलता हु भाई, जल्दी मिलते है.", अर्जुन हाथ मिलाने के बाद उसको खुश करके वह से सीधा हे दिलबाग सिंह के घर निकल चला. पहले वो सोच रहा था की उधर पैदल हे जाए मोटरसाइकिल नजर में न लाने की वजह से पर फिर वो उसको लिए हे उनके घर के बहार जा पंहुचा. बहार बाद के आगे दीपा भाभी की पसंदीदा गाये राणो मजे से चारा चार रही थी और अर्जुन को एक बार देखने के बॉस वो वापिस जुट गयी नांद के मुँह लगाए. सिखर दोपहरी में तोह ये bhara-poora गाँव रेगिस्तान सा शांत था, शायद ऐतवार और लोगो के खेतो में काम करने की वजह से. बाकी सभी तोह ऐसे वक़्त में घर के भीतर हे रहते है.
"Thakk-thakk", 2 पल्लो वाला ये दरवाजा अंदर से बंद था जिसकी सांकल बजाते हुए अर्जुन ने दस्तक दी. उसकी मोटरसाइकिल एक तरफ छाया में कड़ी थी, इस घर की बगल में. वैसे भी यहाँ तोह लोग अपने पशु और गाडी बेखौफ कही भी एक तरफ रख देते थे. ये उसको खुद पंडित जी ने बताया था की गाँव में कभी चोरी नहीं हुई आजतक. अगर कुछ हुआ भी होगा तोह ऐसा नहीं जिसकी शिकायत की गयी हो. एक मिनट से पहले हे चेहरा दुपट्टा से पौंछती हुई दीपा भाभी एक पल्ला खोल कर उसके सामने कड़ी थी.
"ओहो, पंडित जी आप तोह समय के बड़े पाबंद निकले. मुझे तोह लगा था khet-khalihan देखने निकले हो और शाम से पहले न लौटने वाले. आओ अंदर आओ, आपका स्वागत है हमारे गरीबखाने में. ओह मैं भी निरि मुर्ख हु. पहलवान इस एक दरवाजे से कहा निकल सकता है. चलो आ जाओ अंदर.", उन्हें दूसरा दरवाजा भी खोलना पड़ा और आँगन तक इस गलियारे की चौड़ाई उतनी हे थी जितनी दोनों दरवाजो की. गलियारे में हे दोनों तरफ पक्के कमरे बने थे जिनके द्वार भी यही आमने सामने थे. 10 कदम बाद हे खुला आँगन जहा बीचो बीच घाना वृक्ष खड़ा था और उसकी छाया में सुस्ताती हुई भूरी सफ़ेद बिल्ली. काफी बड़ा आँगन था और एकदम साफ़ सुथरा. घर में आने का रास्ता इस आँगन के दूसरी तरफ से भी था जहा लोहे के बड़े गेट पर फ़िलहाल टाला झूल रहा था और कोने में छज्जे टेल खुले तबेले में 2 बहिनसे बंधी सुस्ता रही थी. उनके लिए वह पानी का कूलर लगा था ठंडी हवा फैलता. पूरी दिवार के किनारे छाया करते हुए उनके निचे एक कतार फूल और सब्जियों के पौधे, बेले. 3-4 कमरे इस आँगन के बर्बर बने थे जहा जाने से पहले रसोईघर था. हर चीज अपनी जगह और करने से सजी हुई. यहाँ तक की तजा सूखने के लिए फैलाये हुए कपडे भी एक सार डाले गए थे जिन पर चिमटी लगी थी. इतना सब करने वाली इतने बड़े घर में सिर्फ और सिर्फ दीपा भाभी हे थी?
"कितने ध्यान से हर चीज को संभल कर रखा है आपने भाभी और इतना बड़ा होगा ये घर बहार से पता हे नहीं चलता. आप अकेली रहती हो यहाँ?", अर्जुन रसोईघर से पहले बानी छत पर जाने वाली सीढ़ियों के बहार लगी उन लाल फूल की बेलो को स्पर्श करके देख रहा था की ये वास्तविक है या कुछ और. जमीन से छत तक चढ़ी हुई वो बेले आगे भी दिवार पर सही से त्यागी गयी थी. रासीघर के सामने हे खुला छोटा आँगन, चाट की चाय में बैठने की जगह थी. दीपा भाभी पहले फ्रिज की तरफ गयी फिर कुछ सोच कर उन्होंने उस बड़े मटके से पानी गिलास में भरने के बाद अर्जुन के सामने किया.
"अक्सर जिनके पास करने को कुछ न हो वो यादें सँभालते रहते है अर्जुन. और इस घर में अकेली तोह नहीं हु मैं. एक बेटी है और तुम्हारे भैया लेकिन वो अलग बात है की बेटी पढाई लिखे करके कुछ बन्न न चाहती है और इन्हे सिर्फ खेत और अखाडा पसंद है. वैसे मेरे लिए तोह पूरा गाँव हे घर है मेरा. तुम्हारे जैसो की भाभी, बड़ो की बहु और उनसे बड़ो की pautra-vadhu. लगता है कुदरत से कुछ ज्यादा लगाव है तुम्हे. कही ऐसा तोह नहीं के हमारे नए मुखिया जी भी यादों के बीच ज्यादा रहते है?", अर्जुन बातें सुनता हुआ उस गिलास को जैसे मुँह से अलग हे नहीं कर रहा था. ये पानी अलग था जिसमे हलकी हलकी वो ख़ास सुगंध थी जैसे तजा मिटटी और गले से निचे जाती हर घूँट दिल के रस्ते पेट तक गुजर रही हो. भाभी के तंज़ पर उसने खली गिलास खुद हे उस मटके के सामने करके फिर से भरा और वही जमीन पर हे बैठ गया. न कोई बिछावन लिया न चारपाई.
"यादें तोह सबके पास होती है भाभी लेकिन मेरे पास जीवंत भरा पूरा परिवार है. ऐसा परिवार जो वरदान में भी न मिले. अकेलापन तोह बस मैं तभी महसूस करता हु जब वो किसी रूप में सामने आ जाये. सवाल भी अक्सर वही करते है जो खुद नहीं जानते की जवाब मुमकिन भी है या नहीं. ये पानी का मटका हिमालय से आता है क्या इधर?", अर्जुन फिर से वो प्राकृतिक ठंडा पानी पीने लगा था और दीपा भाभी को उसने निरुत्तर कर दिया अपने जवाब से.
"मुझे ऐसा क्यों बार बार लगता है की तुम मुझे जानते हो अर्जुन? जिस तरह से तुम पहली बार मुझे देख रहे थे मैं नजरे तोह देख पायी लेकिन ऐसा लगा की तुम खुद मेरे पास रुके. बस यही बात है पंडित जी जो मैं कल वह आयी थी और तुमने तोह मुझे हे हैरान कर दिया. फिर भी जवाब मुझे अभी तक नहीं मिला. मैंने तुम्हारे लिए मटर पनीर बनाया है और सूखे aalu-paalak. खा तोह लेते हो न?", दीपा भाभी के जिस्म में किसी तरह की उत्तेजक हरकत नहीं थी इस पल में जैसा एक दो बार प्रतीत हुआ था पहले. वो वही मांजी लगाने के लिए उठ कर जाने लगी तोह अर्जुन ने पहली बार उन्हें स्पर्श किया, कलाई पकड़ कर अपने करीब बैठने का इशारा करते हुए. गिलास वही जमीन पर एक तरफ रखते हुए उसने कहना शुरू किया.
"मुझे सही सही बताये की जब आपने पहली बार मुझे देखा तोह थोड़ा हैरान क्यों थी? और फिर हवेली पर आप मेरे चेहरे को सिर्फ इसलिए तोह नहीं ध्यान से देख रही थी की ये उनसे मिलता है जिन्होंने ये गाँव बसाया? जवाब आपको हे मिल जाएगा भाभी की मैं क्यों आपके पास रुका और मुझे आप अभी तक क्यों ध्यान से देख कर पहचान ने की कोशिश कर रही हो. ज्यादा पुराणी बात नहीं है जितना मुझे लगता है.", अर्जुन ने saag-sabji का तोह जवाब हे न दिया और अब दीपा भाभी अपने पाँव मोड दोनों हाथ कैंची की तरह घुटनो पर बाँध अर्जुन की चेहरे को गहराई से देखने लगी.
"पहले लगा की तुम निहाल के कोई शहरी दोस्त हो और गाँव घूमने आये होंगे. फिर उसने बताया तुम हवेली आये हो तोह लगा विनोद या हवेली के दामाद जी के किसी दोस्त के बेटे होंगे, दिल्ली या चंडीगढ़ से. जिज्ञासा क्यों हुई ये तोह मैं भी नहीं जानती लेकिन जब तुम वह थे मेरे ठीक सामने दामिनी की बगल में तोह मैंने पाया की ये चेहरा बेशक बड़े पड़ती जी से मिलता है लेकिन उन्हें तोह मैंने कभी असलियत में नहीं देखा तोह क्यों तुम्हारी आँखें और चेहरे का कटाव किसी ऐसे जैसा है जिसने मुझ पर एहसान किया हो कोई? आखिर तुम हो कौन अर्जुन और क्या मैं ठीक बता रही हु?"
"मैं आपका नाम पहले से जानता था लेकिन देखा पहली बार कल हे था भाभी. जो दृश्य किसी ने मुझे बताया था सबकुछ वैसा हे मेरे सामने हो रहा था और फिर इंसान नजर आया जो ब्योरे पर सटीक था. उस पल में मैंने आपको पूरी निष्ठां और prem-bhaav से अपनी गाये को भोजन खिलते देखा. ऐसा हे साफ़ और नरम दिल बताया था मुझे मेरे अपने ने. ठीक उसी जगह कुछ हुआ था क्या आपके साथ और कोई था वह आपकी मदद के लिए? मेरी जैसी आँखें या कुछ मेल खता चेहरा?", अर्जुन की बात सुन्न कर पहले तोह दीपा भाभी खामोश रही फिर कांपते होंठो से बोल उठी.
"तुम्ही कैसे पता अर्जुन की मेरे साथ कुछ हुआ था? और जो भी था मेरी रक्षा के लिए वो तुम्हे इतना कैसे बता सकता है की तुम उधर रुक हे गए?"
"किसी किसी में एक हुनर होता है भाभी कलाकारी दिखा कर बातें जीवंत रखने का. जिसने आपको बचाया था वो मेरी बड़ी बहिन है और उन्हें एक ाची आदत है हुनर भी कह लो. वो चित्र बना लेती है अक्सर घटनाओ के. तोह क्या हुआ था उस दिन और कौन था वो?", अब दीपा भाभी डबडबाती आँखों से मुस्कुरायी.
"एक से बढ़ कर एक औलाद है शंकर जी की. बहोत निडर और बिल्ली सी तेज है तुम्हारी बहिन लेकिन मैं उस से हवेली पर कभी न मिली पहले. हाँ तुम दोनों की हे आँखें और बहोत कुछ एक जैसा हे है. शायद वो कही ज्यादा गहरे व्यक्तित्व की है, तुम्हारे जैसे दिल के साथ. पंचायत का नतीजा भी आया था उस दिन तोह लोग अपने अपने तरीके से ख़ुशी मन रहे थे, ज्यादातर गाँव से परे sharab-murge वाली. जैसे तुम मुझे देख रहे थे राणो को खाना खिलते ये मेरा नियम है. उस दिन भी मैं वही कर रही थी और तुम्हारी बड़ी बहिन शायद अपने चित्र के लिए उस पल को संजो रही होगी. जैसे बहार अभी वीराना पसरा हुआ है ठीक उस दिन था और ज्यादा गहरा क्योंकि मुफ्त की दारु गाँव की जमीन से बहार हे बहाई जाती है.", दीपा भाभी कुछ पल शांत हुई तोह अर्जुन ने उनके सामने पानी कर दिया. एक घूँट भरने के बाद उन्होंने नजरो से हे शुक्रिया कहा और बात आगे बधाई.
"बस ये बात यही रेहनी चाहिए अर्जुन."
"निश्चिंत रहिये, जुबान देता हु की मैं इसका जीकर किसी से नहीं करने वाला."
"सरपंच के लड़के नवाब के साथ आकर दूसरे कसबे के कुछ गलत लड़के इधर घूमने फिरने आते रहते है और उस दिन तोह उसका बाप जीता था तोह वह से रंगी पहवान भी आया, जिसकी हवा में नवाब रहता है शहर के कॉलेज में. ये लोग खा पी कर लौट रहे थे और मैं राणो को खिलने के बाद सड़क से दूसरी तरफ वाले पीपल के निचे पक्षियों के लिए पानी रख के वापिस हे लौट रही थी की नवाब ने आदतन हाथ हिला दिया और मैंने भी हमेशा की तरह हँसते हुए उसको जवाब दिया. वो लोग तोह आगे निकल गए गाँव से बहार अपने ठिकाने वाली तरफ पर रंगी मैदान में हल्का होने रुका होगा जिसने मेरी और नवाब की dua-salaam नशे में कुछ और हे समझ ली. जबक मैं सड़क पार करके बहार वाले आँगन तक आती वो मेरा हाथ पकड़ चूका था. मैं डरपोक नहीं हु अर्जुन लेकिन जाने क्यों मेरी आवाज को उस वक़्त लकवा मार गया था. रंगी जिस्म के मामले में तुमसे 21 हे होगा और ऊपर से हैवान सा कला नशेड़ी जानवर. लेकिन वो मेरे सीने पर हाथ डालता उस से पहले हे वो कटे वृक्ष की तरह सड़क पर लुढ़क गया. इतना जोरदार प्रहार हुआ था उसके सर पे की वो चीख भी न सका और डर के मारे जब मैंने ऐसा करने वाले को देखा तोह वो लड़की बस हल्का सा मुस्कुरा कर मुझे देखने के बाद वह से चली गयी. मेरी हालत मैं बयान नहीं कर सकती क्योंकि मेरे सामने एक राक्षस जमीन पर था जिसके सर से खून सड़क को लाल किये जा रहा था और ऐसा करने वाला मुझे बचने के बाद कुछ कह कर भी नहीं गया. याद रही तोह बस तुम्हारे जैसी आँखें और ऐसी हे मुस्कान जो कल मोटरसाइकिल पे भी तुम्हारे चेहरे पर थी.", अर्जुन को ये पूरी कहानी नहीं पता थी. उसने तोह बस इस घर का बहरी आँगन, गाये और उस औरत को देखा था जो बिलकुल दीपा भाभी जैसी थी. हाँ सड़क पर लाल घेरे के रंग ने हे उसको कोमल दीदी से सवाल करने पर मजबूर किया था जिनका जवाब था की ये बहोत प्यारी भाभी है लेकिन इतने बड़े गाँव में भी बिलकुल अकेली.
"किस चीज से मारा था उन्होंने और क्या सही से याद है की उनके साथ कोई और नहीं था.?"
"चौपाल से अगले चौराहे तक एक कुत्ता भी नहीं था उस दोपहर में. और मैं भी हैरान थी तुम्हारी बहिन के हाथ में लोहे का मोटा सब्बल देख के. वो बहार आँगन में हे तोह पड़ा रहता था लेकिन नाजुक सी लड़की ने बस एक हे वार से वो जानवर धराशायी कर दिया था और चेहरे पर डर की जगह बस मुस्कान. फिर वो कभी दिखी हे नहीं और मैं जैसे तैसे घर के भीतर आयी और रात तक दरवाजा नहीं खोला. अगले दिन पता चला के रंगी का एक्सीडेंट हो गया था हमारे हे घर के बहार, ज्यादा नशे में होने की वजह से. वो फिर ठीक होने के बाद भी वापिस कभी इधर नहीं आया पर जानती हु मौका हाथ लगा तोह जरूर वो बदला लेगा पर गाँव में नहीं. तुम बैठे रहो मैं खाना लगाती हु.", खुद को संभालती हुई दीपा भाभी उठ कर खाने के बार वही ला कर रखने लगी और उनको ऐसा करते हुए अर्जुन देख रहा था. न्यास हे उसकी नजरो ने वो भराव लिए उभरी हुई वक्षो की गहरी दरार और उनके खूबसूरत जिस्म पर किसी का दिया हुआ जख्म देख लिया. मैं फिर से व्यथित होने लगा था लेकिन दीपा भाभी जैसे ये समझ रही थी की अर्जुन वह देख रहा है जहा उसकी उम्र के ज्यादातर लड़के.
"नजरे काबू में रखा करो पंडित जी. जब देखो तभी कही डूबे रहते हो लेकिन हर जमीन तुम्हारी नहीं है यहाँ."
"कुछ भी बोलती हो भाभी आप. वैसे मैं कौनसा इस जमीन की रजिस्ट्री अपने नाम कब्ज़ा रहा हु? आपने एक बात सोची की रंगी कही अपना काम आध कर न चूका हो?", अब जो दीपा भाभी थाली रखते हुए झुकी तोह हैरानी से उसी मुद्रा में अर्जुन को देखने लगी. इस बार अर्जुन भी उनके चेहरे को हे देख रहा था.
"कहना क्या चाहते हो अर्जुन?"
"आप यहाँ बैठिये पहले.", अर्जुन ने खुद हे उन्हें सामने बिछी चटाई पर बैठने के बाद पहले उनकी थाली लगाईं और फिर अपनी. दोनों के थाली में रोटी के डिब्बे से रोटी निकल रखने के बाद उसने खाना शुरू किया पर भाभी वैसे हे मूरत बानी रही. अर्जुन ने हँसते हुए अपने हाथो से हे निवाला उनके मुँह पर लगाया तोह इस प्रेम को वो मन न कर सकीय.
"देखो भाभी मैं तोह आपके हाथ से खाने आया था लेकिन चलो ये फिर कभी सही. अब आप मेरी बात बस थोड़ा ध्यान से सुनिए और उसके बाद हे अपना पक्ष रखना. हो सकता है की मैं गलत हो क्योंकि मेरे पास कोई सबूत नहीं है. ये रोटी ख़तम कर लीजिये फिर हे मैं कुछ कहूंगा.", अर्जुन की शर्त मानते हुए दीपा भाभी ने जैसे तैसे रोटी ख़तम की और थाली एक तरफ सरका दी.
"न पनीर में स्वाद आया होगा और न रायते में? इतने प्रेम से आपने बनाया था लेकिन बेमजा हो गया न भाभी? मुझे पसंद आया पर एक बार फिर यही बैठ कर भोजन करेंगे, उस दिन आपको बेहतर लगेगा."
"पहेलियाँ ख़तम और अब बताओ तुम क्या कहने वाले थे. मेरा दिल घबरा रहा है किसी अनिष्ट से अर्जुन."
"मजबूत करो खुदको भाभी नहीं तोह इस बार न कोमल दीदी होंगी और हो सकता है मैं भी अखाड़े से अपने पाँव पर न लूट सकू. लेकिन ये आपका जीवन है तोह आपको हे ये सुधारना होगा. मैं तोह बस कोशिश कर सकता हु अगर आप वैसा चाहो. तोह ये नवाब कबसे दूसरे गाँव के लड़को को यहाँ ला रहा है?"
"पिछली होली के आसपास से. पर पहले भी आने पर कोई मनाही नहीं थी लेकिन इसके साथ ज्यादातर वो लड़के होते है जिन्हे ठीक नहीं समझा जाता. लड़का ठीक है वो जितना मैंने देखा है."
"हम्म्म.. ठीक लड़का और रंगी जैसो की सोहबत में? आप कहना चाहती है की उसने गाँव में कभी ऐसा वैसा कुछ किया नहीं या फिर आपके सामने बात नहीं आयी. जैसे आपको ये नहीं पता की उन लोगो का असली डेरा तोह आपका हे खेत है. दिलबाग भैया को कल शाम भी नवाब हे khel-ghar के बहार से ले कर गया था जब मैं शहीद भैया और निहाल के साथ लौट रहा था. पहले मेरा एक छोटा सा झगड़ा भी हुआ था आपके इस ठीक लड़के से जिसका बाप भला सरपंच है.", अर्जुन ने जो खुलासा किया था वो सटीक वार कर गया दीपा भाभी पर. सीने पर हाथ रखती वो सवालियां नजरो से उसको देख रही थी.
"सच कह रहे हो?"
"और आपके जिस्म पर बने अनगिनत मार के निशाँ क्या कुछ अलग है भाभी? छुपा सकती हो पर कोई ek-aadh तोह नजर आ हे जाता है. जैसे ये पाँव के पास भी छड़ी की मार है. आपकी जुबान को सचमुच पैदाइशी लकवा मारा हुआ है भाभी. दिलबाग भैया बहार तोह ऐसे बिलकुल नहीं है लेकिन वो एकांत में शायद अब अपनी धर्मपत्नी पर संदेह करने लगे है या आप उन्हें किसी बात पर टोकती होंगी जिसके बदले वो औरत होने का आपका सच ऐसे बताते होंगे. घर आपका है और सच मुझसे बेहतर आप जानती है. रंगी ने अपना काम किया या वो इसका बदला आपकी पति से ले रहा है जिसमे नवाब और उस दूसरे गाँव के कुछ नशेड़ी भी कठपुतली या जरिया है. जहा गलत हु वह आप बता दीजिये. वैसे एक और सच सहने की हिम्मत है आपमें?", अर्जुन ने भी थाली एक तरफ खिसका कर बिना पानी पिए हाथ धो कर अपने अंगोछे से पांच लिए. भाभी खुद उसको अपना दुपट्टा दे रही थी साफ़ करने के लिए उसने मन कर दिया.
"इतनी साफ़ सफाई क्यों रहती है इस घर में जानते हो? ताकि सबूत न रहे यहाँ कोई. और टूटा हुआ इंसान और कितना टूटेगा? मैं उन्हें खेत में रातभर रहने से रोकती हु तोह हो जाती है कहासुनी लेकिन ये चोट अपने आप लगी है या कह लो मैंने खुद जुल्म किया है खुद पर."
"बोल लीजिये झूठ और बचा लीजिये टूटे हुए घर को भाभी. शहीद भाई मुझे बता रहे थे की आपकी िज्जात्त पूरा गाँव करता है क्योंकि आप सबके सुख दुःख में शामिल रहती है. लेकिन इस घर के दरवाजे जैसे बहार वालो के लिए बंद है. कोई यहाँ का सच न देख ले लेकिन जानते बहोत से है पर आपकी ख़ुशी के लिए वो भी नहीं बताते. खेत पर ऐसा क्या होता भाभी जिस से आप भैया को वह जाने से रोकती है रात में? आप दूसरे कसबे से ब्याह कर इधर आयी थी न तोह यक़ीनन यहाँ आपकी अग्नि परीक्षा बरसो बाद ली जा रही है और सच जान ने के बावजूद चरित्र हनन. लेकिन आप तोह सब सेहती रहेंगी, ख़ामोशी से. गाँव को खुश रख सकती है लेकिन अपना घर दिखावे के लिए साफ़, अंदर से बिखरा हुआ. चलता हु भाभी और क्षमा चाहता हु की जिस जमीन पर आने का हक़ नहीं था उस पर कदम रखे. दर्द चीज हे ऐसी है जो मुझे अपनी और खींच लेती है चाहे मेरा घर खुशियों से भरा हे क्यों न हो. खून में है न ये मेरे. भोजन के लिए शुक्रिया.", दीपा भाभी को ऐसे समय में जवाब देना चाहिए था लेकिन न वो उसके सामने रो सकीय न कुछ कह सकीय. अंदर हे अंदर वो अर्जुन का हाथ पकड़ कर उसको वही रोकना चाहती थी और फुट फुट कर रट हुए कहना चाहती थी की उसने कुछ भी गलत नहीं कहा. लकवा मार गया था उन्हें फिर से. अर्जुन उन्हें वैसे हे छोड़ कर उठा और चप्पल पहन ने के बाद आगे बढ़ने से पहले आखिरी बात बोलै.
"कोमल दीदी से शिकायत रहेगी की उन्होंने अपने जीवन को जोखिम में भी डाला तोह पहले से मृत आत्मा के लिए. जाता हु, दरवाजा लगा लीजियेगा.", अर्जुन के जाने तक वो संभल न सकीय थी लेकिन उसकी आवाज बंद होते हे जैसे वो बदहवास हो उठी. वो भीगी आँखों से लपकी गलियारे की और लेकिन रानी की रुदन बता गया की अर्जुन जा चूका है उसके saaf-suthre घर की देहलीज छोड़ कर. आज जैसे दीपा भाभी को अपने आंसू देखे जाने की परवाह नहीं थी जो वो देहरी लांघ कर बहार ाँगने में कड़ी हर तरफ उस व्यक्ति को जाता हुआ खोज रही थी. अर्जुन भरी दोपहर में हे khel-ghar जा चूका था. दीपा भाभी के दर्द से ru-ba-ru होने की सजा जैसे उसने दामिनी को भी दी जो उसकी प्रतीक्षा में हर तैयारी किये बैठी थी उस कमरे में, कैमरा के साथ. पर उन्हें कहा पता था के अर्जुन से ज्यादा सतर्क उसकी किस्मत है जो गलत समय में भी कही न कही उसका भला हे करती है.
'इतना आसान है क्या औरत होना? तुमने जो कहा वो सब सच है अर्जुन लेकिन कबूल किया तोह बिखरा हुआ भी नहीं बचेगा मेरे पास. अनाथ होने का एहसास आज हो रहा है जब एक माँ और पत्नी हु. मैं अपना वादा न निभा सकीय लेकिन तुम्हे निभाना होगा यहाँ वापिस लौट कर.', चेहरा साफ़ करने के बाद दीपा भाभी बिना दरवाजा लगाए अपने कमरे के बिस्टेर पर औंधे मुँह आ गिरी. अब वो खुल कर आंसू बहा रही थी जैसे दर्द बहार निकलने का यही एक जरिया हो उनके पास.
.
.
"5 से ऊपर वक़्त हो गया बहु पर ये अर्जुन अभी तक वापिस नहीं आया. दामिनी, तुझे कुछ पता है की ये लड़का कहा गायब है?", पशुओं को मीणा चारा दाल रही थी और आँगन में उसको देखने आयी देवकी जी ने अभी तक अर्जुन की मोटरसाइकिल वह नदारद पायी तोह उन्हें कुछ चिंता हुई. दामिनी अपने जिस्म की गर्मी पानी से ठंडी करने के बाद उतरे चेहरे के साथ इधर आयी तोह रसोई से चाय की ट्रे लिए अनामिका भी वह पहुंची थी. दामिनी ने तोह आज से पहले कभी किसी का इस तरह इन्तजार न किया था और वो sanam-harjaai उसके चंगुल से गायब जाने कहा फिर रहा था. आँचल के लिए भी अनामिका ने दूध बना दिया था और यहाँ आने से पहले वो उसको भी उठा आयी थी.
"पता नहीं माँ जी अर्जुन कहा गया है? शहर से भी फ़ोन आया था उसके लिए लेकिन वो बस यही बोल कर गया था के चौपाल घूमने जा रहा हु और 2 बजे तक आ जाऊंगा.", अनामिका ने खाने वाली बात का जीकर न किया. उसको खुद अब चिंता हो रही थी क्योंकि 5 घंटे से ये लड़का गायब था.
"सेवक को बोल जरा देख के आये दामिनी. कुछ ऊंच नीच हो गयी तोह खामख्वाह बात मेरे सर आएगी लेकिन ये लड़का इतना लापरवाह तोह नहीं है.", देवकी ने चाय का कप उठाया हे था की एक तरफ बहार दरवाजे पर दस्तक हुई जिधर सेवक ने छोटा पल्ला खोल कर देखा और इधर आँचल अपने में हे मगन मुद्दे पर आ कर बैठते हुए बिस्कुट और दूध उठा कर सबको देखने लगी.
"क्या बात हो रही है नानी और सब परेशां क्यों है?"
"अर्जुन नहीं आया अभी तक और सेवक, बहार कौन है?", देवकी के जवाब से आँचल ने गिलास वापिस रख दिया और आधा खाया बिसुईट भी. लेकिन सेवक की तरफ से सकरात्मक जवाब मिला और उसके बराबर से हे निहाल अंदर आ खड़ा हुआ सबको हाथ जोड़ कर अभिवादन करता हुआ.
"बड़ी बेबे जी, ओह अर्जुन बाई जी डा nikkar-baniyan दिया जाए. मास्टर जी ने भेज्या स मन्नू.", अब कही अनामिका को कुछ चैन आया और वो अर्जुन के कपडे लेने भीतर चली गयी. देवकी जी ने निहाल को हाथ से अपने पास बुलाया और सामने बैठा लिया, पानी का गिलास देते हुए.
"बीटा, जग जग जियो. सुना है तू बड़ी लगन से जूता हुआ है गाँव का नाम आगे बढ़ने में? और हमारा अर्जुन वह कुछ म्हणत भी कर रहा है या वैसे हे कही बैठा रहता है?", देवकी ने जितने लाड से कहा था इसकी तोह निहाल को आशा हे नहीं थी. वो तोह उनके सामने खड़े होने से हे कतराता था. दामिनी बड़े ध्यान से सब देख रही थी.
"बड़ी बेबे जी, अर्जुन बाई डा कोई ढिल्ला लगदा. यह मैं नहीं मास्टर जी कह रहे सी जड़ो अस्सी प्रैक्टिस लायी khel-ghar पहुंचे. सरपंच साब कहन्दे की अर्जुन तह ोथे कल्ला हे पसीना बहा रहा स सिखर दुपहरी तोह. हूँ कुछ देर तक ओह सरपंच साब न गल्ला करके शरीर ठंडा करदा पेय की के शहीद पाह जी आ गए नाल 4 मूंदे ले के. जुगराज मास्टर जी ख़ास तैयारी करवा रहे अर्जुन बाई जी दी तेह शहीद पाह जी सब ख़याल रख रहे. कहन्दे की हर बन्दे न चित्त कारन वास्ते अर्जुन न 1 मिंट डा टेम मिलु. कुज वि कहो बड़ी बेबे, बाई है नीरा सिरे डा. कल शहीद पाह जी न उसने हवा विच चुक्क लिया स लेकिन सुट्ट्या नई. 10 मिनट विच 20 वारि ोहना दी पीठ लगा टी स मिटटी विच फेर व् मादा जा पसीना न निकल्या. मन्नू वि कोई खुराक दस् दो बेबे जी.", निहाल के मुँह से Arjun-katha सुन्न कर देवकी बहार से तोह बड़ी खुश हुई और हामी भर के कुछ करने का आश्वासन दिया लेकिन अनामिका के हाथ से निक्कर टीशर्ट दामिनी ने लेते हुए जवाब दिया.
"निहाल मैं वि चलदी है नाल तेरे. कोई तह होना चाहिदा ोस्डे ऊपर ध्यान दें वाला. माँ उसका दूध और खुराक बांध दो साथ में.", दामिनी का ये रूप आँचल को तोह हजम हे न हुआ. वो जानती थी की उसकी माँ का असली चरित्र इस से उल्टा है. अनामिका ने कहने के मुताबिक दूध तैयार कर दिया और 2 लड्डू भी साथ बाँध दिए. देवकी ने भी दामिनी से कोई सवाल जवाब न किया और वो निकल चली निहाल के साथ अर्जुन का सामान लिए. देवकी चाय ख़तम करके पशुओं की और गयी तोह आँचल ने अपनी मामी को कमरे में चलने का इशारा दिया.
"देखो मामी झूठ मैट बोलना क्योंकि मुझे भी थोड़ा बहोत पता है और मैं उनके जैसी नहीं हु. पहले माँ गयी थी बगीचे में अर्जुन के साथ लेकिन दोनों साथ नहीं आये. फिर उन्होंने आपसे घर आते हे 2-3 बार अर्जुन का पुछा की वो आया या नहीं लेकिन अर्जुन नहीं आया और वो जहा भी गया था आपको बता कर गया था. अब माँ ऐसे गयी है जैसे उन्हें अर्जुन की बहोत परवाह हो लेकिन अर्जुन यहाँ आने से हे बच रहा है. बताओ तोह ये क्या चल रहा है? और नानी कबसे इतनी मीठी हो गयी जो अब न तोह आपको फालतू टोकती है और बहार से आये हुए को भी इतने प्यार से पूछ रही?"
"मुझे नहीं पता आँचल की क्या चल रहा है और बड़ी दीदी का वही जाने. लेकिन दिन में अर्जुन मुझे यही बोल कर गया था के वो निहाल और शहीद की तरफ जा रहा है. खाना खा के आएगा वह से पर वो वह गया हे नहीं जैसा निहाल की बात से पता चला. माँ जी का भी वही जाने पर उधर से आने के बाद और वह भी उनमे ये ाचे बदलाव तुमने खुद देखे है. बड़ी माँ जी की वजह से शायद.", अनामिका के भोले जवाब से आँचल संतुष्ट नहीं हुई.
"आप न मामी पता नहीं कुछ देखती भी हो या बस ऐसे हे ज़िंदा हो. कुछ बहोत बड़ा चल रहा है और आपके पति खुद इसका सबूत है. विनोद मां घर के बारे में सोचने लगे है और अर्जुन का कितना ख़याल रखते है. देखना मामी ये सब कोई खेल न हो. बड़ी नानी ने मेरे सामने आपसे कहा था की आप हे अर्जुन का ख़याल रखेंगी क्योंकि उन्होंने आपको अपनी बेटी मन है. वह आप भी खुश रहती थी तोह उस लिहाज से ये आपकी जिम्मेवारी है."
"आँचल तुम दीदी को गलत क्यों समझती हो? क्या पता उन्हें चिंता हो सचमुच?"
"हाँ जैसी बातें आपने आज िन्दु आंटी और माँ की सुनी थी वैसी मैं बहोत बार सुन्न चुकी हु. सोचा शायद आप हिम्मत करेंगी और सही का साथ देंगी लेकिन आप किसी तरफ नहीं है.", आँचल उठने लगी तोह झेंपते हुए अनामिका ने उसको वापिस बैठा लिए बीएड पे.
"सब अर्जुन की जिम्मेवारी है और हमे बस ख़याल रखने का कहा गया है आँचल. बड़ी दीदी को मैं या तुम नहीं टोक सकती, माँ जी की वजह से. अर्जुन खुद संभल लेगा जैसा उसने मुझे भरोसा दिलाया है. बड़ी दीदी को हारने की आदत नहीं है और जिस तरह वो कल से लगातार विफल हो रही है, उनकी बेबसी हे उनसे कबूल करवा लेगी उनका सच. पहले मुझे भी अर्जुन के विचार तार्किक लगते थे पर ये बदल गए आधा दिन ख़तम होने से पहले हे. लेकिन इतना कह देते है की शांत और खामोश व्यक्ति को निस्तेज नहीं समझना चाहिए. मैं अर्जुन के साथ हु लेकिन इसकी कोई परीक्षा नहीं दे सकती. तुम भी शांत रह कर दर्शक प्रतीत करवाओ तोह सही रहेगा. ज्यादा taak-jhaak से नुक्सान उसका हो सकता है. दूध फिर से गरम कर देती हु, बहार हे बैठ जाओ.", अनामिका ने आँचल को हे नया पाठ पढ़ा दिया था जो खुद को खिलाडी समझ रही थी लेकिन उसको ख़ुशी भी थी की अर्जुन के साथ उसकी मामी भी है चाहे वो खामोश हे सही. अब बस पता करना था की उसकी माँ की सूई किस बात पर अटकी है जो अर्जुन के पीछे और अर्जुन उनसे दूर. ये बाघ आखिर इस बकरी को दबोचने की जगह ऐसे उलझा क्यों रहा है. कही वो इस बहाने शिकारी तोह नहीं ढून्ढ रहा जिसने ये बकरी परोसी है.?
.
.
खेल घर में तोह आज भीड़ हे बढ़ती जा रही थी. नया अखाडा अकेले हे खोदने के बाद अर्जुन ने 5 लोगो की चुनौती 2 मिनट से पहले हे निबटा दी थी वो भी किसी को क्षति पहुचाये बिना और बेबस करते हुए. शहीद भाई और जुगराज जी के बुलावे पर कसबे के पुराने नामी लोग बुलवाये गए थे जिनमे दिलबाग सिंह भी था और सरपंचा का छोटा भाई कमलेश भी. बाकी खिलाडी भी अपने अपने अभ्यास पूरे करने के बाद इस तरफ घेरा बांध कर जमघट लगा चुके थे इस अनोखे अभ्यास की जिसमे अर्जुन को एकसाथ 2-2 लोगो से भिड़ना था. पहले के सभी नज़ारे दामिनी ने अपनी आँखों से देखे थे और Dilbaag/Kamlesh को भी यहाँ बुलवाने के पीछे जैसे उसका हे कोई मकसद था. दीपा भाभी तक भी ये बात गयी थी की khel-ghar में आज ाचा खासा जमघट लगा है और दिलबाग कमलेश की जोड़ी ने अर्जुन को mitrata-purvak ललकारा है. दीपा भाभी का यही पर माथा ठनक चूका था जैसे कोई अनहोनी होने वाली हो हंसी मजाक से भरी इस abhyaas-shala में. गहराती शाम में ये कही कुछ वैसा तोह नहीं होने वाला था जैसा उसका दिल न होने की प्रार्थना कर रहा था. सर पे दुपट्टा लेती वो तेज कदमो से उस तरफ बढ़ चली जहा उसके हिसाब से अनहोनी होने वाली थी.
