नीलू की मस्ती
असली खेल तो अब शुरू होना था, चमेलिया -गुलबिया ने सब देवरों को अपने हाथ दूबे भाभी का पेसल लड्डू खिलाया और खेल शुरू हो गया।
नीलू ने आज मेरी बड़ी हेल्प की थी, सिर्फ नीलू ने क्यों जितनी थोड़ी बड़ी ननदें थीं ११-१२ में पढ़ने वाली, सबने कच्ची कलियों की फड़वाने में उन्हें पटा के समझा बुझा के घर से लाने में तभी आज दर्जन भर से ऊपर ननदों की नथ उतरी और ज्यादा तर की उनके भैया से ही,..
लेकिन नीलू ने खुद चुन्नू के ऊपर चढ़ के मेरे देवर को न सिर्फ चोदा बल्कि उसकी झिझक दूर के उसे चोदू बनाया
और चुन्नू ने अपनी उस बहन बेला के ऊपर जो हर साल उसे राखी बांधती थी, उसके ऊपर चढ़ के उसकी कुँवारी गुल्लक फोड़ दी.
मुझे डर बेला से नहीं थी, लड़कियां हरदम ज्यादा हिम्मत दिखाती थीं परेशानी चुन्नू जैसे लड़कों से थी जिनका मन तो करता है लेकिन अच्छे बच्चे बने रहने के चक्कर में अपने खोल से बाहर नहीं निकलते,
और नीलू से बढ़ कर कौन होती उसकी धड़क खोलने वाली,
मैंने पंकज ( कम्मो के भाई ) और उसको एक दोस्त को ललकारा,
" अरे तीन महीने के बाद तो गौना हो जाएगा, ससुराल में जाके देवर नन्द को खुश करेगी तब तो हमारे देवर, चढ़ जाओ दोनों,..
पंकज नीलू के बराबर का ही रहा होगा दो चार महीने छोटा बड़ा,... नीलू उसे चिढ़ाती बोली,...
" अरे भौजी किससे बोल रही हैं, इसके घर में ऐसा माल था आज तक तो हाथ लगाया नहीं . आज जाके अपनी बहन कम्मो की चिड़िया उड़ा पाया,...वो भी आपके होने से, आप न पीछे पड़तीं इस साले के तो इसकी सगी बहन अब तक कोरी रहती ये दूर दूर से बोलता है , ललचाता है, ये स्साला क्या चोदेगा मैं चोद दूंगी इसे,..."
और हल्का सा धक्का लगाया, बाग़ की घास में पंकज जमीन पर,... उस बेचारे को अंदाज नहीं था की वो इतने जोर से, जैसे भाभियाँ हल्दी चुमावन करते देवर को जरूर धक्का देती हैं और नाउन ठीक से न पकडे तो वो जमीन पर भहराय,...
और नीलू ने सच में चढ़ के उसका खूंटा अपनी बिल में सटा लिया,... गरमा तो वो गयी ही थी,..
पंकजवा था नंबरी चोदू जैसे अपने से पांच छह साल छोटी सगी बहिनिया को सुगना भाभी के सामने रगड़ रगड़ के चोदा था, रुला रुला के झिल्ली फाड़ी थी, अभी तक खून खच्चर कम्मो की जांघ पर मलाई के साथ लगा था, ...
मेरी बुआ मेरे गौने के पहले चिढ़ाती थीं, लेकिन बात उनकी सोलहो आना सच्च थी,
झिल्ली फटने में जितना ज्यादा दर्द हो, लगे जान चली गयी, रोई रोहट हो, खूब खून खच्चर हो, अगले दिन दीवार पकड़ के चलना पड़े,... वो कहती थीं जिस लड़की के साथ पहली बार जितना दर्द से फटेगी, वो उतनी ही बड़ी चुदवासी होगी, अगली चुदाई से उसको इतना मजा आएगा चुदवाने में की जिंदगी क सब मजा झूठ,...
बात उनकी मुझे खुद अपनी गौने की रात ही पता चल गयी, खूब दर्द हुआ, ... कान में बाली पहनी थी छेद करवाया था, नाक भी छिदी थी, उसका १००वा हिस्सा भी दर्द नहीं हुआ था, जितना गौने की रात में हुआ,...
लेकिन उसके बाद कमरे में जाने की जल्दी 'उनसे' ज्यादा मुझे होती थी. सिटकिनी बाद में बंद करती थी, साड़ी उतारना पहले शुरू कर देती थी।
और बुआ एक बार और कहतीं थी,
झिल्ली फटते समय जो दर्द होता है, चीख पुकार मचती है, मरद को औरत का मुंह नहीं बंद करना चाहिए, चीखने से औरत का ध्यान बट जाता है, दर्द से दिमाग हट जाता है और उसी समय मरद को बाकी औजार भी ठेल देता है,
गौने की रात एकदम यही हुआ, मेरे साथ। बाद में भले इन्होने चुम्मा लिया मुंह में जीभ ठेल दी अपनी, लेकिन उस समय तो बस मेरी कलाई पकड़ के दोनों कलाई उनके हाथों के नीचे, ... और आधी चूड़ी तो उसी समय चुरुर चूरूर करके चूर चूर हो गयी थी,...
और इसी का नतीजा था की बाहर कान पारे, दरवाजे से चिपकी ननदों को मालूम हो गया था,
इनकी भौजाइयां साढ़े आठ बजे इन्हे कमरे में छोड़ गयी थीं, बोल गयीं थी बारह घंटे के लिए दरवाजा बंद रहेगा बाहर से,... और ठीक आठ चवालीस पर मेरी चीख निकली,...
नीलू भी उन में से थीं जो बाहर चिपकी थीं, दरवाजे से सट कर ... अब तक सब चिढ़ाती हैं, भौजी याद रखियेगा ये टाइम जिंदगी भर ८. ४४
लीला चिढ़ाती है काहें भौजी दरवाजा बंद होने के चौदह मिनट के अंदर,... तो मैं उलटे जवाब देती तेरे भैया ही इतने बौराये थे, और नीलू प्यार से मेरे गाल पे चिकोटी काट के बोलती,
" अरे लीला हमरे भौजी क जोबन ही इतना जबरदस्त है, भैया को छोडो पूरे गाँव में आग लगी है, भौजी के देवर सब का भौजी क जोबन सोच के टनटना जाता है, "
लीला नीलू दोनों से गौने की रात से ही पक्की दोस्ती हो गयी थी मेरी असली ननद, से बढ़कर,...
लेकिन अभी जिस तरह नीलू पंकज के ऊपर चढ़ी थी मैं मान गयी अपनी ननद को, तीन महीने के बाद गौने के बाद अपने मरद को जम के सुख देगी। दूल्हा ससुरारी आता है घोड़ी पे चढ़ के लेकिन गौने के बाद चक्कर में रहता है दुलहिनिया कब घोड़े पे चढ़े उसके
और इस मामले में नीलू पक्की घुड़सवार थी, ... पकजवा उसका समौरिया होगा एक -दो साल बड़ा, .... उसी पट्टी का पक्का उसकी बिल में घुसा होगा दोस्ती भी थी दोनों में
जिस तरह से चढ़ी वो टांग उठा के पंकज के ऊपर, उसका खड़ा खूंटा अपनी बिल से एक हाथ से सटाया एक हाथ से अपनी फांके फैला के ( जिसमे अभी भी चुन्नू की मलाई भरी थी ) सुपाड़े को सेट किया, और पहले धक्के में ही सुपाड़ा अंदर और पंकजवा को गरियाया,..
" स्साले तू का चोदेगा मुझे, कम्मो तेरी बहिनिया ऐसी कच्ची कली नहीं हूँ ,... आज मैं पेलूँगी और तू पेलवायेगा, एक धक्का भी अगर तूने नीचे से लगाया, बहनचोद तो तू पूरे गाँव के सामने बन गया , मैं मान जाउंगी की तू मादरचोद भी है चुप चाप नई लौंडिया की तरह चुदवा। "
खूब ताकत थी नीलू में दोनों हाथों से अपने नीलू ने नीचे लेटे पंकज के दोनों हाथों को उसने कस के दबोच रखा था. और मैं समझ रही थी अपनी चूत में घुसे सुपाड़ा को कस के निचोड़ भी रही थी. एक धक्का जोर से नीलू ने मारा और अबकी आधा खूंटा अंदर था
लेकिन मेरी ननद के तरकस में बहुत तीर थे, नीलू के जोबन जबरदस्त खूब गोल गोल एकदम कड़े, कपडे के अंदर से दुपट्टे के नीचे से भी जोर मारते थे, बस अपनी गोल गोल चूँची वो पंकज के मुंह के पास ले गयी और चिढ़ाया,
" अरे पंकजवा बोल चाहि जुबना क रस "
" हाँ " पंकज मुंह खोल के बोला और नीलू ने अपनी कमर के जोर से कस के धक्का मारा, एक इंच पंकज का खूंटा उसके अंदर,
पंकज के प्यासे खुले होंठ से रगड़ के नीलू ने अपने गोल गोल उभार दो इंच दूर हटा दिया और मुझे देख छेड़ते बोली,
" मिली मिली, लेकिन पहले बोला की हम सब के सामने, अभिन आज ही एही बाग़ में नयकी भौजी को रगड़ रगड़ के चोदबे की ना, हम सब ननदन के सामने तब मिली वरना तड़पा, "
पंकज कुछ बोल पाता की मैं ही हंस के अपने देवर की ओर से बोली, " हाँ बोल दे पंकजवा हाँ देवर भौजी के बीच में नंदों का क्या काम "
और पंकज ने हाँ बोल दिया लेकिन नीलू इतनी आसानी से थोड़ी छोड़ने वाली थी झुक के उसके मुंह पे चुम्मा ले के बोली
" हाँ का , आपन महतारी चोदबे ओकरे लिए हाँ बोल साफ़ साफ़, केके चोदबे आज यही बाग़ में हम सब लड़कियन के सामने। "
और पंकज ने बोल दिया " हाँ चोदब नयकी भौजी के और अभी तोहनन के सामने आजे यही बगिया में "