Adultery छुटकी - होली दीदी की ससुराल में - Page 64 - SexBaba
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Adultery छुटकी - होली दीदी की ससुराल में

अगली पोस्ट के कुछ अंश

कमल कम उस्ताद नहीं था, जहाँ छिला था, चमड़ी अंदर की छिल गयी थी, रगड़ गयी थी वहीँ पे दरेररते रगड़ते जान बुझ के पेल रहा था.

चिल्लाये ससुरी पूरे गाँव की लौंडियों को मालूम हो जाए , बीच बीच में चंदा के चूतड़ पे हाथ भी लगा रहा था, चटाक .

चूतड़ पे दर्जन भर कमल के फूल छप गए थे। कभी पूरा बाहर निकाल के जब अपनी कमर की पूरी ताकत से जड़ तक पेलता गाँड़ का छेद चौड़ा होकर फैल जाता, और दर्द से चंदा की चीख पूरी बगिया में फ़ैल जाती।

हिना को दबोचे, सुगना और गुलबिया समझ रही थीं, उनकी भी देख के सुरसुरा रही थी, इसी दर्द में तो मजा है, मरद कौन जो दरद न दे।

इसी दर्द को घूँट घूँट पीने में, अंजुरी में लेकर रोम रोम में रगड़ने मसलने में, ही तो असली मजा है। जब दरद देह का हिस्सा हो जाए, दरद इतना हो की उसी दरद के लिए जिया में हुक उठे, उस दरद देने वाले का इन्तजार करते, देहरी पर खड़े खड़े पलक न झपके, कुछ आहट हो तो लगे वो दरद देने वाला आ गया है

और जब यह अहसास हो जाए तो समझ लीजिये कैशोर्य की चौखट डांक कर, गली में आंगन में ठीकरे से इक्कट, दुक्क्ट खेलने वाली लड़की अब तरुणी हो गयी है,

और हिना को यह अहसास हो रहा था थोड़ा थोड़ा, ..

सुगना और गुलबिया के दुलार की दुलाई में लिपटी अब धीरे धीरे उन जैसी ही हो रही थी।

घुस चंदा के पिछवाड़े रहा था, चीख चंदा रही थी, दुबदुबा हिना की कसी गाँड़ रही थी,लग हिना को रहा था की उसके पिछवाड़े कोई मोटा पिच्चड घुसा है जो दर्द भी दे रहा है और मज़ा भी।

सुगना और गुलबिया की आँखे कमल के खूंटे पर लगी थीं लेकिन जाने अनजाने उन दोनों के हाथ अपनी किशोर ननद के उभारों को सहला रही थी बहुत हलके हलके जैसे कोई रुई के फाहे की तरह छू रहा हो. हिना का बदन उसके जोबन पलाश की तरह दहक रहे थे।

हिना का मन चावल चुगती कभी इस मुंडेर पर कभी उस मुंडेर पर फुदकती गौरेया की तरह, कभी चंदा की ख़ुशी में डूबी देह को देखता तो कभी सोचता साल दो साल पहले ही तो इस गाँव के लड़के लड़कियों के साथ बिना हिचक वो खेलती, झगड़ा करती, लड़ती, बारिश आने पे पहली बूँद के साथ ही अपनी इन्ही सहेलियों के साथ कभी अपने आंगन में कभी कम्मो के घर, अरई परई गोल गोल चक्कर काटती, सब सहेलिया देखतीं किसके ऊपर कितनी बूंदे पड़ी , सबकी मायें डांटती, लड़की सब पागल हो गयी हैं का,

सावन आता तो झूला झूलने इसी बगिया में आती, भाभियों की चिकोटियां, किसका झूला कितना ऊपर जाता है बस मन करता सावन को लपेट ले, ओढ़ ले और साल के बारहो महीने सावन के हो जाए, हरे भरे, सावन में पूरे गाँव में उसके अपने टोले में भी नयी नयी सुहागने गौने के बाद पहली बार मायके आतीं और भौजाइयां घेर के उनसे गौने की रात का हाल बार बार पूछतीं, ... चिकोटियां काटतीं और जब हिना ऐसे कुंवारियां भी चिपक के हाल सुनती तो कोई भौजाई उन कुंवारियों को छेड़ती भी

" सुन ले, सुन ले तेरे भी काम आएगा " .

और जब वो लड़कियां बिदा होती, किसी भी पुरवा की, पठानटोली वाली हो या पंडिताने की, जाने के पहले सब से, काकी ताई से भौजी से सब से, मिल के भेंट के, दिन कैसे बीत जाते थे पता ही नहीं चलता,

पिछले सावन ही अजरा उदासी की चादर हटाने के चक्कर में बात बदलने के लिए पंडिताइन चाची से भेंटते हुए छत पर चढ़े कद्दू की बेल को देखते हुए बोली,

" चाची, पिछली बार तो एकदम बतिया थी ये "

" अरे पगली खाली बेटियां थोड़ी बड़ी होती हैं, " पंडिताइन चाची हंसने की कोशिश करते बोलीं और आँचल की कोर से आंसू का एक कतरा पोंछ लिया।
 
I am planning to repost my long story or novel,

Phagun ke din chaar फागुन के दिन चार ( without any change and with very few pics)

should I post it in the erotica, thriller, or other sections? I will be waiting for the reader's suggestions.
 
फागुन के दिन चार के शुरूआती भाग के सस्पेंस /थ्रिलर से जुड़े कुछ चुने हुए अंश

मैंने पोजीशन वाला इन्क्लोजर दिखाया। ये लोकेशन हैं जहाँ से फोन होते हैं और उनकी टाइमिंग हैं।

रीत ने थोड़ा जूम किया झुकी और ध्यान से देखा फिर वापस सिर उठाकर बोली- “ये हो नहीं सकता।

“क्यों? मैं और डी॰बी॰ साथ-साथ बोले।

रीत फिर झुकी और मैप में दिखाते बोली- “काशी करवट से लेकर अस्सी तक ये देख रहे हो। पहली काल यहाँ से हुई 8:12 पे दूसरी हुई अब इस जगह से 8:17 पे और तीसरी हुई इस जगह से 8:22 पे। अब सड़क से अगर आप चलोगे। तो इस समय बनारस में इतना जाम होता है की आप किसी तरह पहुँच नहीं सकते।

दूसरी बात मान लो ये बनारस की गलियों से वाकिफ है, मुझसे ज्यादा तो नहीं जानता होगा। गली से भी कोई डायरेक्ट कनेक्शन नहीं है और मोटर साइकिल से भी आओगे तो कम से कम 10-12 मिनट लगेगा…”

हम लोग क्या बोलते। डी॰बी॰ तो बनारस नए-नए आये थे और मुझे भी बनारस की गलियों के बारे में रीत इतना कतई नहीं मालूम था।

रीत फिर कुर्सी से पीठ सटाकर बैठ गई। दोनों हाथ पीछे करके, कोई दूसरा वक्त होता तो मेरी निगाह सीधे उसके कुरता फाड़ उभारों पे जाती पर। एक तो मामला सीरियस था दूसरे सामने डी॰बी॰ बैठे थे। लेकिन फिर भी मेरी निगाहें वहीं पहुँच गई आदत से मजबूर। रीत ने मुझे देखते हुए देखा, आँखों से डांटा और एक बार फिर झुक के एक मिनट के लिए प्लान को देखा।

और फिर सीधे बैठकर मुश्कुराने लगी और बोली- “मैं बेवकूफ हूँ…”

“एकदम। चलो माना तो सही तुमने। तुम दुनियां की पहली लड़की होगी जिसने ये सत्य स्वीकार किया होगा…” मैंने मुश्कुराते हुए कहा।

“पिटोगे तुम और वो भी कसकर…” रीत कोई हथियार खोजते हुए बोली।

“एकदम मेरी ओर से भी…” डी॰बी॰ ने उसी का साथ दिया।

रीत ने मेरी पिटाई का काम टेम्पोरेरी तौर पे स्थगित करते हुए ये रहस्योद्घाटन किया की वो क्यों बेवकूफ है।

“ये देखिये गंगाजी…” वो बोली।

नक़्शे में नदी हम लोगों को भी दिख रही थी।

“तो फोन वाला आदमी अगर नाव पे हो तो इन सारी जगहों पे जो टाइम दिखाया गया है वो पहुँच सकता है हमें जगह देखकर लग रहा था लेकिन लोकेशन तो 100 मीटर के आसपास ही होगी…”

“हाँ एकदम…” और फिर मैंने एक सवाल डी॰बी॰ से किया- “क्या आप लोगों ने फोन चेक करने वाली वैन तो नहीं चला रखी हैं…” मैंने पूछा।

“हाँ करीब 10 दिन से जब से दंगे की अफवाहें आनी शुरू हुई हैं, लेकिन तुम्हें कैसे पता चला। तीन गाड़ियां हैं, और 24 घंटे चल रही हैं…” डी॰बी॰ बोले।

“उनकी रेंज नदी तक है…” मैंने दूसरा सवाल पूछा।

“हाँ और नहीं। घाट और घाट के पास तक का इलाका कवर होगा लेकिन कोई नदी के बीच में या रामनगर साइड में होगा तो नहीं…” वो बोले।

“बस तो ये साफ है। कोई जरूरी नहीं है की उस आदमी को पता हो इन वान्स के बारे में। लेकिन वो कोई प्रोफेशनल है जो पूरी प्रीकाशन ले रहा है और इन फोन की लोकेशन के बारे में और ओनरशिप के बारे में ज्यादा पता नहीं चल पायेगा वो भी मैंने पता कर लिया है। इन दो घंटो के अलावा। इन नम्बरों का पन्द्रह दिनों में और कोई इश्तेमाल नहीं किया गया। ये सिम बहुत पुराने हैं और प्री पेड़ हैं, आशंका है किसी डेड आदमी के ये सिम होंगे और दो घंटो के अलावा सिवाय आज जब होस्टेज वाले टाइम, एक काल आई थी। उनकी लोकेशन भी नहीं पता चल रही है…”

मैंने पूरी इन्फोर्मेशन उनसे शेयर की।

डी॰बी॰ अब पूरी तरह चिंतित लग रहे थे।
 
रीत ने मुझसे सवाल पूछा- “जब बाम्ब एक्सप्लोड हुआ तो तुम लोग कहाँ थे…”

“अरे यार तुम्हें मालूम है, हम लोग सीढ़ी पे थे बाहर से किसी ने ताला बंद कर दिया था। ये तो अच्छा हुआ बाम्ब एक्सप्लोजन से वो दरवाजा टूट गया…”

रीत ने मेरी बात काटी और अगला सवाल दाग दिया, मुझी से- “और पुलिस बाम्ब एक्सप्लोजन के बाद अन्दर गई…”

“हाँ यार…” मैं किसी तरह से अपनी झुंझलाहट रोक पा रहा था“बताया तो था की हम लोग बाहर आ गए एक्सप्लोजन के बाद तब पोलिस वाले, कुछ पैरा मेडिक स्टाफ और फोरेंसिक वाले अन्दर गए थे मेरे सामने…”

डी॰बी॰ ने मेरी ताईद की और अपनी मुसीबत बुला ली।

“अच्छा आप बताइये। जब पुलिस वाले और फोरेंसिक टीम अन्दर गई तो उन्होंने चुम्मन और रजऊ को किस हालत में और कहाँ पर देखा…” रीत ने सवाल दगा।

“वो दोनों बरामदे में थे। पीछे वाली सीढ़ी जिस बरामदे में खुलती है वहाँ… दोनों गिरे हुए थे। रजऊ के ऊपर छत का कुछ हिस्सा गिरा था और चुम्मन के ऊपर कोई अलमारी गिर गई थी। जिस कमरे में बाम्ब था वहां नहीं थे…” डी॰बी॰ ने पूरी पिक्चर साफ कर दी।

“करेक्ट। तो तुम लोग तो सीढ़ी पे थे और वो दोनों बरामदे में और तुमने पहले ही बता दिया था की वो बंम्ब बिना टाइमर के था और रिमोट से भी एक्सप्लोड नहीं हो सकता था…”

रीत अब मेरी और फेस की थी- “तो सवाल है की वो एक्सप्लोड कैसे हुआ?”

“इसका जवाब तो तुम देने वाली थी…” मेरा धैर्य खतम हो रहा था। मैंने थोड़ा जोर से बोला।

“चूहे से…” वो मुश्कुराकर आराम से बोली।

डी॰बी॰ खड़े हो गए।

मैं डर गया मुझे लगा की वो नाराज हो गए।

लेकिन खड़े होकर पहले तो उन्होंने क्लैप किया फिर रीत की ओर हाथ मिलाने के लिए हाथ बढ़ाया। रीत भी उठ गई और उसने तपाक से हाथ मिलाया।

डी॰बी॰ बैठ गए और बोले- “यही चीज मुझे समझ में नहीं आ रहा थी। फोरेंसिक एवीडेंस यही इंडिकेशन दे रहे थे। लेकिन इस तरह कोई सोच नहीं रहा था, ना सोच सकता था। तार पर बहुत शार्प निशान थे, वो चूहे के बाईट मार्क रहे होंगे और लाजिक तुमने सही लगाया, न ये लोग थे वहाँ, ना चुम्मन था और ना पुलिस। तो आखीरकार, कैसे एक्सप्लोड हुआ और फोरेंसिक एविडेंस से कन्फर्म भी होता है। एक मरा चूहा भी वहां मिला…”

“उस चूहे ने बहुत बड़ा काम किया बाम्ब के बारे में पता चल गया…” रीत बोली।

मुझे डर लगा की अब वो कहीं दो मिनट मौन ना रहें।

लेकिन डी॰बी॰ बोले और मुझसे मुखातिब होकर- “यू नो, इट वाज अ परफेक्ट बाम्ब जो रिपोर्ट्स कह रही हैं। मेजर समीर के लोगों ने भी चेक किया और अपने फोरेंसिक वालों ने भी। सैम्पल्स बाईं प्लेन हम लोगों ने दिल्ली सेन्ट्रल फोरेंसिक लेबोरटरी में, हाँ वही जो लोदी रोड में है, भेजे थे। प्रेलिमिनरी रिपोर्ट्स का वाई मेसेज आया है। सिर्फ टाइमर और डिटोनेटर फिट नहीं थे…”

“फिट नहीं थे मतलब…” मैं बोला। ये मेरी पुरानी आदत है की ना समझ में आये तो पूछ लो और इस चक्कर में कई लोग नाराज हो चुके हैं।

“मतलब ये…” डी॰बी॰ मुश्कुराते हुए बोले जैसे टीचर क्लास में ना समझ बच्चों को देखकर मुश्कुराते हैं।

“वो लगाकर निकाल लिए गए थे। इसमें डिटोनेटर टी॰एन॰टी॰ के इश्तेमाल हुए थे जो नार्मली मिलेट्री ही करती है। इसके पहलेकर एक्स्प्लोजंस में नार्मल जो क्वेरी वाले डिटोनेटर्स, पी॰ई॰टी॰एन॰ इश्तेमाल करते हैं वो वाले होते हैं। दूसरी बात, इसमें डबल डिटोनेटर्स लागए गए थे। दूसरा डिटोनेटर्स स्लैप्पर डिटोनेटर्स।

अब बात काटने और ज्ञान दिखाने की जिम्मेदारी मेरी थी।

“वही जो अमेरिका में लारेंस वालों ने बनाए हैं। वो तो बहुत हाई ग्रेड। लेकिन मुझे वहां दिखा नहीं…” मैंने बोला और मुड़कर रीत की तरफ देखा की वो कुछ मेरे बारे में भी अच्छी राय बनाये लेकिन वो डी॰बी॰ को देख रही थी। और डी॰बी॰ ने फिर बोलना शुरू कर दिया।

“बात तुम्हारी भी सही है और मेरी भी की डिटोनेटर्स लगाकर निकाल लिए गए थे। लेकिन इन के माइक्रोस्कोपिक ट्रेसेस थे। और तीसरी बात। इसकी डिजायन इस तरह की थी की फिजिकल बैरियर्स के बावजूद। सेकेंडरी शाक्वेव्स 200 मीटर तक पूरी ताकत से जायेंगी। जिसका मतलब ये की उस समय जो भी उसकी जद में आएगा। सीरियसली घायल होगा। लेकिन डिटोनेटर की तरह शार्पनेल भी अभी नहीं लगे थे बल्की डालकर निकाल लिए गए थे…”
 
I am planning to post it on the second Sunday of February. On every Sunday, depending on the response. Unlike JKG there will be no additions and pics will be one or two, so just CnP.
 
भाग ७८

चंदा का पिछवाड़ा और कमल का खूंटा

Next post soon
 
भाग ७८

चंदा का पिछवाड़ा और कमल का खूंटा

१४,७८, ९२०

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रेनुआ थोड़ी शरमाई, थोड़ा मुस्करायी, और उस झुण्ड से हट के मेरे पास आ गयी,... और कमल से चिपक के बैठ गयी जिससे जो गाँव वालियां उसके भाई को ताना मारती थी, की पहले घर के माल को पटाओ सब को पता चल जाए, माल पट भी गया, सट भी गया और फट भी गया,

और जिस ललचायी निगाह से वो अपने भैया के तने खूंटे को देख रही थी, सब लोग समझ गए थे की जिसके बारे में सोच के कमल की बहिनिया हदस जाती है अब उसी के लिए उस के उस के ऊपर और नीचे दोनों मुंह में लार टपक रही है,...

लेकिन मेरी परेशानी दूसरी थी, इत्ता मस्त खूंटा खड़ा था और कोई स्साली ननद छिनार नज़र नहीं आ रही थी, लेकिन बिल्ली के भाग से छीका टूटा,

और चंदा दिखी,..

"हे मेरे सारे देवरों का खूंटा घोंट चुकी हो, तुम्हारा असली इम्तहान, चढ़ जाओ इस खूंटे पे ,"मैंने चंदा को उकसाया

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और कमल को धक्का देके मैंने जमीन पर लिटा दिया,...

लग रहा था कुतुबमीनार आसमान चोद रहा हो,... एकदम खड़ा, फनफनाया,...

तभी चंदा की निगाह मेरे पास, मेरे साथ बैठी रेनू पर पड़ी और ननद कौन जो छिनरपना न करे तो चंदा ने छिनरपना कर दिया, वो देख रही थी, रेनू मेरे साथ बैठी है खूब चिपक के और जिस तरह से अपने भैया से नैन मटक्का कर रही है, समझ गयी और बोली वो मुझसे लेकिन निशाने पर कमल की बहिनिया थी

" भौजी, हाथ भर क खूंटा नहीं होता, ये तो बिजली क खम्भा है, लेकिन भौजी क बात, चढ़ जाएंगे हम,... पर तनी वो खम्भे वाली की बहिनिया से कहिये की अपने भैया के मूसल में चूस चास के,... "

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वो चैलेन्ज था मेरे लिए भी रेनू के लिए भी,...

और में जानती थी कित्त्ता मुश्किल काम था उसके लिए आज पहली बार तो अपने भैया के खूंटे से दोस्ती हुयी, पहली बार चुनमुनिया का घूंघट उठा, और आज सबके सामने ये पहाड़ी आलू ऐसा मोटा , अपने भैया का सुपाड़ा ले के चूसे,...

लेकिन वो समझ रही थी नाक का सवाल था और सिर्फ उसकी नहीं मेरी भी,... और थोड़ी देर पहले ही उसने नीलू को उसके भैया का कमल का खूंटा मुंह में लिए देखा था, और मैंने भी इशारा किया, पहले जीभ निकाल के अपने होंठों को चाट कर खूब थूक लगा कर, और फिर बड़ा सा मुंह खोल के,...

भाइयों के मामले में उनकी बहने तुरंत समझ जाती हैं और रेनू भी समझ गयी मुंह में ढेर सारा थूक भर के पहले उसने बड़ी देर तक अपने भैया सुपाड़े को खूब प्यार से थूक लगा लगा के चाटा और फिर जैसे मैंने बड़ा सा मुंह खोल के दिखाया था उसी तरह पूरी ताकत से मुंह खोल के सुपाड़े को,

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लेकिन बहुत ही मोटा था, और जहाँ सबसे मोटा था बीचोबीच जा कर अटक गया,... ताना मारने का मौका कौन ननद छोड़ती है तो चंदा भी चिढ़ा के बोली, बात उसने रेनू की की,....लेकिन निशाना कही और था,

" अरे भौजी उसकी बहिनिया तो इतना चाकर मुंह खोल के नहीं घोंट रही है तो,... "

और मेरे अंदर की भौजाई जागृत हो गयी. मैंने रेनू का सर पकड़ के कस के दबाया,....

वो गो गो करती रही, गाल उसका एकदम फूल गया आँखे बाहर उबल रही थीं, लेकिन सिर्फ मैं ही नहीं दबा रही थी, रेनू भी अपनी ओर से पूरी तरह कोशिश कर रही थी,... थोड़ी देर बस थोड़ी ताकत और लगा मैं हलके हलके बोल के रेनू की हिम्मत बढ़ा रही थी,... अभी एक बार सबके सामने घोंट लेगी तो फिर झिझक और हदस दोनों निकल जायेगी,...

एक एक सूत अंदर जा रहा था,...

और गपाक

पूरा सुपाड़ा अंदर,...

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और उसके आगे का चर्म दंड तो उससे कम ही चौड़ा होगा, मैंने जोर और बढ़ाया आधे से ज्यादा अंदर हो गया था, ६ इंच के करीब,... और अब सुपाड़ा हलक में अटका था, बस इसी बात का चक्कर था गैग रिफ्लेक्स, वो हुआ भी

रेनू की हालत बहुत ख़राब थी, लेकिन मैंने प्रेशर कम नहीं किया, और थोड़ी देर में वो भी पार हो गया,... मैंने सर पर से हाथ हटा दिया

और रेनू अभी भी चूस रही थी एक हाथ से अपने भाई कमल का लंड पकडे, मुंह से लार गिर रही थी, चेहरा एकदम लाल हो गया था,...

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मैंने विजयी भाव से चंदा की ओर देखा,

अब वो क्या करती, ... रेनू ने मुंह हटा लिया, उसका भैया प्यार से, तारीफ़ से अपनी छोटी बहन को देख रहा था,...

चंदा तो सदाबर्त चलाती थी सबको बांटती थी,... दोनों हाथों से अपनी चूत की फांको को फैला के सुपाड़े से सटा दिया लेकिन मैंने आँख से कमल को इशारा कर दिया था की वो नीचे से धक्का जरा भी न मारे और ऐन मौके पे कमर हिला के लंड सरका दे,...

वही हुआ, चार पांच बार कोशिश कर के भी वो नहीं ले पायी, तो फिर मैंने बड़े प्यारसे समझाया,

" अरे यार कुछ नहीं चल मैं और रेनुआ भी तेरी हेल्प करते हैं , मेरे देवर और उसके भाई का फायदा है तो हमारी भी तो जिम्मेदारी है, बस एक बार हट के दुबारा सटाओ और रेनू तुम नीचे से खूंटा पकड़ लो और चंदा के छेद में सटा देना, और मैं ऊपर से जोर लगाउंगी,"

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हुआ वही लेकिन चंदा जोर से चिल्लाई,

मेरी और रेनू की मिली जुली बदमाशी. बदमाशी तो मेरी थी और रेनू मेरे इशारे पर काम कर रही थी लेकिन मन उसका भी कर रहा था, अब वह एकदम अपने भैया की तरफ से सोच रही थी,

मैंने आँख से इशारा किया और रेनू ने अपने भैया का खूंटा, चंदा के बजाय अगवाड़े के पिछवाड़े के छेद पर सेट कर दिया, दोनों हाथों से छेद भी फैला दिया, और मैंने उसी समय अपनी पूरी ताकत चंदा ननदिया के कंधे पर लगा दिया, पूरी ताकत से प्रेस कर आंख मार के कमल को भी इशारा किया.

वो मेरी और रेनू की बदमाशी समझ गया, और मुस्करा के उसने कस के अपने दोनों हाथों से चंदा की कमर पकड़ के अपनी ओर पुल करना शुरू किया और उसी जोर से नीचे से धक्का लगाया, ... रेनू ने कस के अपने भाई का खूंटा चंदा के पिछवाड़े सटा रखा था

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जोर से चंदा चीखी,.. जबतक वो समझी आधे से ज्यादा सुपाड़ा अंदर था, और ऊपर से मेरा पुश करना और नीचे से कमल का चंदा की कमर पकड़ के पुल करना जारी था,
 
घुस गया, धंस गया, अड़स गया

बैठ गयी चंदा खूंटे पे

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मैंने आँख से इशारा किया और रेनू ने अपने भैया का खूंटा, चंदा के बजाय अगवाड़े के पिछवाड़े के छेद पर सेट कर दिया, दोनों हाथों से छेद भी फैला दिया, और मैंने उसी समय अपनी पूरी ताकत चंदा ननदिया के कंधे पर लगा दिया पूरी ताकत से प्रेस किया कर आंख मार के कमल को भी इशारा किया,

वो मेरी और रेनू की बदमाशी समझ गया, और मुस्करा के उसने कस के अपने दोनों हाथों से चंदा की कमर पकड़ के अपनी ओर पुल करना शुरू किया और उसी जोर से नीचे से धक्का लगाया, ... रेनू ने कस के अपने भाई का खूंटा चंदा के पिछवाड़े सटा रखा था

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जोर से चंदा चीखी,.. जबतक वो समझी आधे से ज्यादा सुपाड़ा अंदर था,

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और ऊपर से मेरा पुश करना और नीचे से कमल का चंदा की कमर पकड़ के पुल करना जारी था,

" अरे रानी आधा सुपाड़ा गाँड़ में घुस गया है अब लाख रोओ गाओ बिन गाँड़ मरवाये बचत नहीं है,... आराम से गाँड़ ढीली करो अभी तो बित्ता भर पूरा बाकी है "

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बेचारी, चुदी तो बहुत थी, लेकिन ये मुझे मालूम था की पिछवाड़े ज्यादा कुदाल नहीं चली थी इसलिए वो रास्ता टाइट था. और आज एकदम मोटा मूसल,... और अब चंदा भी मान गयी थी की बच नहीं सकती,... तो वो भी थोड़ा जोर लगा रही थी,... तिल तिल करके मूसल अंदर जा रहा था और रेनू अपने भैया का खूंटा मस्ती से पकड़े नीचे से ठेल रही थी. कभी जिसका नाम लेके भी कोई भौजाई छेड़ देती थी तो वो मुंह फुला लेती थी वो,.. आज उसी को खुद पकड़ के चंदा की गंडिया में नीचे से ठेल रही थी, लेकिन हम सबके कोशिश करने पे भी ज्यादा नहीं घुस पाया, ५-६ इंच अंदर हो गया था पर अभी भी एक तिहाई से ज्यादा बाकी था

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और गाँड़ मारने में जब तक बॉल्स तक न घुसे तो का मजा,...

और उस परेशानी का हल ढूंढा खुद कमल ने, बिना बाहर निकाले,... बड़ी ताकत थी स्साली रेनुआ के भाई में,...

लिएदिए उठा और वहीँ आम के पेड़ के नीचे निहुरा के,... चंदा ने भी आम का मोटा तना कस के पकड़ लिया,...अब चंदा निहुरी हुयी थी, एकदम कातिक की कुतिया बनी और गांड मारने में सब मर्दों का फेवरिट आसन इसलिए की ताकत पूरी जोर से लगती है और दोनों चूँची पकड़ के निहुरा के गाँड़ मारने का मजा ही अलग है।

और कमल ने ऑलमोस्ट सुपाड़े तक बाहर निकाल लिया, फिर चंदा की दोनों चूँची कस के पकड़ी और किस ताकत से पेला,

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चंदा को छोड़िये,.. आस पास बैठी सब भौजाइयों की चीख निकल गयी,... सब मस्ती बंद करके सब भौजाइयां भी आँखे फाड़े चंदा की भीषण भयानक गाँड़ मराई देख रही थीं,... और मैं भी सोच रही थी की इसलिए तो रेनुआ हदसी थी, उसने ऐसे ही अपने भाई को किसी को पेलते देखा होगा,

लेकिन सबसे ज्यादा मस्ती रेनुआ ही ले रही थी, कुतिया बनी चंदा की गाँड़ में से अपने भैया का लंड अंदर बाहर होते देखते,... दरेरते, रगड़ते,... और साथ में अपने भाई को ललकार भी रही थी,...

" हाँ भैया हाँ ऐसे ही, रोने बिसूरने दो ससुरी को,... कुछ देर में खुदे धक्का मार मार के घोंटेंगी, पेलो पूरी ताकत से चीथड़े चीथड़े कर दो गाँड़ को, पता चले यह आम की बाग़ में रेनुवा के भाई से मरवाई थी, बीसो से मरवाई होगी और आज हमरे भैया की बारी बिसूर रही है, साली नौटंकी, ... "

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बात रेनू की एकदम सही थी,...

बीस क्या पचासों से लेकिन अब उसने गिनना छोड़ दिया था लेकिन ज्यादातर लौंडे चुनमुनिया में झंडा गाड़ना चाहते है और चंदा भी उसी में,... तो चुदी तो पता नहीं कितनों से थी लेकिन पिछवाड़े चार पांच बार ही,.. वो भी आखिरी बार महीना चल रहा था तो किसी ने, छह सात महीने पहले, और वो भी स्साला केंचुआ छाप था,.. तो फिर वो सिकुड़ के एकदम टाइट हो गयी थी,...

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और बाकी सब लड़कियों की तरह कमल को उसने भी साफ़ साफ़ मना कर दिया था, ... घर में माल है तो पहले उसका नंबर लगा दो फिर आना

और आज कमल ने अपनी बहन का, रेनू का नंबर लगा दिया था अगवाड़े का भी पिछवाड़े का और वो भी मेरे सामने, मैं गवाह थी। सुबह से दो कोरी गाँड़ फ़ाड़ चुका था पहले अपनी बहन रेनू की फिर कच्ची कली कमसिन हिना की।

थोड़ी देर में चंदा को भी मजा आने लगा वो भी चूतड़ से पीछे की पर धक्का मार मार के कमल का साथ दे रही थी,

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अब चंदा को भी गाँड़ मरवाने में मजा आने लगा था भले ही जब बाकी लड़कियां सहेलियों से झांटों के आने का मतलब पूछती हैं चंदा गन्ने और अरहर के खेत में घोड़ी बन रही थी,

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लेकिन एक तो पिछवाड़े का मजा उसने कम लिया था, ज्यादातर लड़के चुनमुनिया के ही चक्कर में रहते थे

और दूसरे उसे अफसोस हो रहा था की उसने भी बाकी लड़कियों की तरह कमल को यह कह के मना कर दिया था की पहले घर के माल पे हाथ साफ़ करो, अब लग रहा था घाटा उसे ही हुआ। गाँव में क्या अगल बगल के गाँवों में शायद ही कोई बचा होगा जिसका उसने न खाया होगा लेकिन आज उसका अपनी टक्कर का सांड़ मिला था, सांडों में सांड़। कमल.

कमल पिछवाड़े का पहलवान था। एक एक इंच उसे मालूम था कहाँ करने से मरवाने वाला/वाली चिल्लाने लगती है कब मजे से पागल हो जाती है. और अब वो चंदा को तड़पा रहा था, उसे पता चल गया था की अब चंदा को मरवाने में मजा आ रहा है, बस उसने ऑलमोस्ट बाहर निकाल लिया और रुक गया,

चंदा सब मेरी ननदों की तरह जनम की चुदवासी, सात पुश्त की रंडी, पैदायशी छिनार, गाँड़ में मोटे मोटे चींटे काट रहे थे, तड़प के बोली

" डालो न , रुक काहे गए,... "

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" का डालूं,... " उसे चिढ़ाते हुए कमल बोला,
 
बड़ा मजा पिछवाड़े में

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कमल पिछवाड़े का पहलवान था। एक एक इंच उसे मालूम था कहाँ करने से मरवाने वाला/वाली चिल्लाने लगती है कब मजे से पागल हो जाती है. और अब वो चंदा को तड़पा रहा था, उसे पता चल गया था की अब चंदा को मरवाने में मजा आ रहा है, बस उसने ऑलमोस्ट बाहर निकाल लिया और रुक गया,

चंदा सब मेरी ननदों की तरह जनम की चुदवासी, सात पुश्त की रंडी, पैदायशी छिनार, गाँड़ में मोटे मोटे चींटे काट रहे थे, तड़प के बोली

" डालो न , रुक काहे गए,... "

" का डालूं,... " उसे चिढ़ाते हुए कमल बोला,

खीझ के चंदा बोली, " अरे अपनी बहिनी क भतार, आपन लंड, पेल न, बहुत मज़ा आ रहा था, ... डालो न अंदर पूरा। "

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रेनू तो एकदम सट के अपने भैया से बैठी थी, अपने भैया का मोटा मूसल चंदा के पिछवाड़े घुसते निकलते देख रही थी , जवाब उसी ने दिया चंदा को छेड़ते

" हाँ छिनार, हमार भैया है हमार भतार हैं, यार हैं, हमार सैंया हैं ऐसा हमारे भैया क मोट औजार चाही तो खुदे काहे नहीं धक्का मार के घोंट लेती। "

और रेनू ने साथ में अपने भैया को भी बोला

" मत पेलना भैया, मारेगी धक्का यही "

रेनू खुल के गाँव की छोरियों को बता देना चाहती थी, ये भैया भी मेरा है, सैंया भी मेरा है, यार भी है और भतार भी और इसका खूंटा भी मेरा है।

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रिंग साइड सीट पर सिर्फ रेनू ही नहीं थी, हिना भी थी, और अब सुगना भाभी से उसकी पक्की दोस्ती हो गयी थी। ननद भाभी के रिश्ते के साथ साथ सहेली भी बन गयी थीं दोनों। सुगना भाभी की पिलानिंग लांग टर्म थी, एक बार हिना को लंड का शौक लग गया, खुद ही लंड खोर हो गयी तो अपनी इज्जत बचाने के लिए खुद ही बाकी पठान टोली वालियों की,टांग फैलवायेगी।

हिना भी कुछ ललचायी निगाह से कभी कमल के मोटे खूंटे को देखती तो कभी मजे से भरे चंदा के चेहरे को, मस्ती से भरी चंदा की देह को जो लंड के धक्के लिए व्याकुल हो रही थी।

सच में बहुत मोटा था लेकिन चंदा की गाँड़ भी चौड़ी होके उसे इस तरह दबोचे थी जैसे इस जनम में तो नहीं ही छोड़ेगी.

और उस मोटे लंड को ललचायी नजरो से देखती हुयी हिना को देखती, सुगना भौजी की अनुभवी आँखों बहुत कुछ सोच समझ रही थीं। हिना के कान में फुसफुसाते बोली ,

" हिना देख चंदा को कैसे बौराई है खूंटे के लिए जैसे बछिया हुड़कती है सांड़ के लिए "

"एकदम भौजी पगलाई हुयी है "

हलके से मुस्कराते हुए हिना भी उसी तरह फुसफुसाते बोली।

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" देख जो मजा चोदने और मारने में लौंडो को आता है न उससे कई गुना ज्यादा मजा हम सबको चुदवाने और मरवाने में आता है बस मजा लेना आना चाहिए,... और स्साले लौंडो को भी मालूम हो न की लौंडिया नाड़ा खोलने के लिए तैयार है तभी तो वो चक्कर काटेंगे। अब देखो बछिया हुड़कती है तभी तो सांड़ आता है चढ़ने के लिए उसके ऊपर। तो अगर मजा लेना है तो पहली चीज सरम लिहाज पिछवाड़े डालो। "

धीमे धीमें सुगना भौजी बोलीं हिना से। वो उसे ज्ञान दे रही थीं और चारा भी डाल रही थी।

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हिना और सुगना भौजी दोनों चंदा से बस हाथ भर की दूरी पर थीं और हिना ललचायी नजर से कमल के मोटे तगड़े कड़क खूंटे को देख रही थी जो एकदम अटका हुआ था चंदा के पिछवाड़े बॉटल में डाट की तरह।

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सुगना भौजी समझ रही थीं जिस दिन से हिना लंड देख के बजाय हदसने के, गुस्सा होने के,... ललचाने लगेगी, उसका मन खुद करेगा घोंटने का तो समझिये आधा काम हो गया, और इस लिए वो जान बुझ के इस तरह से हिना के साथ बैठीं थी की हिना की निगाह कमल के मोटे मूसल से हट नहीं रही थी।

और जिस तरह चंदा घोंटने के लिए तड़प रही थी अब हिना भी समझ रही थी जिंदगी के असली मजे से वो दूर थी। अच्छा हुआ लीना की बात मान के आ गयी।

चंदा ने एक बार फिर बोला लेकिन अबकी रेनू से चिरौरी की

" रेनुआ यार तू तो हमार पक्की सहेली हो तुंही बोलो न भैया को, ... पेल दें न काहें तड़पा रहे हैं "

" कर दूंगी यार तू भी क्या बात कर रही है, लेकिन भैया चार पानी झड़ चुके हैं दो बार मेरे अंदर दो बार हिना के, अब इतनी जल्दी नहीं झड़ेंगे, तू ही मार न दो चार धक्का एक बार आधा घोंट ले तो बस बाकी का काम मैं बोल दूंगी भैया से। "

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हिना को विशवास नहीं हो रहा था अपनी आँखों पर, चंदा जिस आम के पेड़ को पकड़ के झुकी थी बस एक बार फिर से कस के पकड़ा उस पेड़ के तने को और पीछे की ओर धक्का लगाना शुरू किया। साफ़ लग रहा था चंदा कितनी कोशिश कर रही है कितनी ताकत लगा रही है। कमल ने कस के एक हाथ से चंदा की पतली कमर को पकड़ रखा था और दूसरे हाथ से उसकी चूँची दबा रहा था, लेकिन धक्का नहीं लगा रहा था।

पर चंदा के धक्को से ही धीरे धीरे बहुत धीरे सरकते सरकते सूत दर सूत होते हुए कमल का मोटा गदहा छाप लंड चंदा की गाँड़ में घस रहा था।

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चंदा के चेहरे पर जो ख़ुशी व्याप्त थी वो देख देख कर हिना को भी लग रहा था लड़की पैदा होने का असली सुख इसी मोटे डंडे में है और बिना हिचक लोक लाज भूल के आम की बगिया में दिन दहाड़े घोंटने में न की सात पर्दो में उस बिल को छुपाने में जिसे बनाने वाले ने बनाया सिर्फ इसीलिए को वो मर्दों का घोंटे। यहाँ तक की लड़कियों के लिए मूतने का छेद भी अलग है और इस छेद का सिर्फ काम यही है।

लेकिन उधर मामला अटक गया था, चंदा के धक्क्को से सुपाड़ा तो चंदा की कसी गाँड़ घोंट गयी लेकिन मामला गाँड़ के छल्ले पर अटक गया, जैसे पतली गले की कोई बोतल हो और उसमे कुछ अटक जाए,

सुगना भौजी ने हिना से कहा, हिनवा अब देख असली खेल.

और अब कमल से भी नहीं रहा गया, उसने कस के चंदा के दोनों जोबना पकड़ के क्या धक्का मारा, गाँड़ के छल्ले को दरेरते रगड़ते घिसते कमल का मोटा लंड चंदा की संकरी गांड फैलाता फाड़ता अंदर घुस रहा था

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और हिना कुछ आश्चर्य से कुछ मजे से चंदा के रोम रोम से, चेहरे से छलकती चमकती ख़ुशी देख रही थी. देख के ही उसकी हिना की गाँड़ दुबदुबाने लगी, कभी सिकुड़ती कभी फैलती,... बहुत मजा आ रहा था, लेकिन वो मजा ले नहीं सकती थी बदनामी के डर से, खास तौर से शबनम के लेकिन सुगना भौजी ने उसका जो इलाज बताया था वो बस हो जाए,

आधे से ज्यादा अंदर था लेकिन कमल ने एक ही झटके में पूरा निकाल के ठोंक दिया

चंदा के मुंह से सिसकी और चीख एक साथ निकली और वो झड़ने लगी। पूरी देह तूफ़ान में पत्ते की तरह काँप रही थी , आँखे बाहर उबल के आ रही थीं. चंदा कुछ बोलने की कोशिश कर रही थी लेकिन मस्ती के कारण कुछ भी साफ़ नहीं बोल पा रही थी। जैसे बारिश में बढ़ी नदी में आंधी के कारण एक के बाद एक लहरें, आती हैं तट से टकराकर चूर चूर हो जाती हैं और फिर एक नयी लहर,

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चंदा की हालत भी वही हो रही थी और हिना की भी हालत बिना मरवाये भी देख देख कर सोच कर, उसकी चुनमुनिया दुबदुबा रही थी.
 
हिना की हालत खराब

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आधे से ज्यादा अंदर था. लेकिन कमल ने एक ही झटके में पूरा निकाल के ठोंक दिया

चंदा के मुंह से सिसकी और चीख एक साथ निकली और वो झड़ने लगी। पूरी देह तूफ़ान में पत्ते की तरह काँप रही थी , आँखे बाहर उबल के आ रही थीं. चंदा कुछ बोलने की कोशिश कर रही थी लेकिन मस्ती के कारण कुछ भी साफ़ नहीं बोल पा रही थी। जैसे बारिश में बढ़ी नदी में आंधी के कारण एक के बाद एक लहरें, आती हैं तट से टकराकर चूर चूर हो जाती हैं और फिर एक नयी लहर,

चंदा की हालत भी वही हो रही थी और हिना की भी हालत बिना मरवाये भी खराब थी। देख देख कर, सोच सोच कर, उसकी चुनमुनिया दुबदुबा रही थी.

झड़ चंदा रही थी लेकिन हालत हिना की भी अच्छी नहीं थी।

उसकी आँखे बस चंदा के पिछवाड़े चिपकी थीं, दुबदुबाते चंदा के पिछवाड़े के छेद में आधा घुसा. आधा निकला आधा धंसा कमल का लम्बा मोटा भाला, और देख रही थी चंदा कैसे सिर्फ गाँड़ मरवा के झड़ रही थी, कितनी ख़ुशी थी चंदा के चेहरे पर, उसकी देह मस्ती से काँप रही थी,

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और उसी मस्ती से महरूम कर रखा था हिना ने अपने को, ... उसकी पठानटोली में तो खैर एक भी लड़के थे नहीं, लेकिन उसकी सहेलियों के भाई तो थे और अब सुगना भौजी ने तो साफ़ कह दिया था हिना को,

"जब चाहे तब, जिससे चाहे उससे,...सुगना भौजी हैं न, जहाँ मन करे वहां।

हिना सुबह की धूप ऐसी गोरी, नरम गरम, गाल देख के गुलाब की पंखुड़ियां शरमा जाएँ, बड़ी बड़ी कजरारी आँखे, लेकिन सुगना भौजी ने ठीक कहा, ...

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क्या फायदा ऐसी आयी जवानी का, ऐसे आये जोबन का जब बुरके में छिपा के रखे, किसी को पता ही न चले की कैसे एक मस्त कली खिल रही है, कौन भौंरा चक्कर काटेगा,

और सुगना भौजी, कमल का मूसल देखते हिना की ललचाती, प्यासी आँखों को देख रही थीं, जैसे कोई छोटे बच्चे को गोदी में दुबकाता है एकदम उसी तरह इन्होने दुलराते हुए हिना को भींच लिया और उसके कच्चे टिकोरों को दबोच लिया। इसी को स्साली सात तह किये दुप्पट्टे में छिपा के रखती थी और ऊपर से काला मोटा बुरका, ... घुंडी घुमाते हुए हिना ननदिया को चिढ़ाया,

" हैं न खूब लम्बा मोटा, कड़ा,... "

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हिना की निगाहें अभी भी कमल के कमाल खूंटे से चिपकी थीं, अपने आप उसके लब खुले और बेसाख्ता निकला,

" सच में भाभी, खूब मस्त कैसा फनफनाया है "

" क्या चीज, ननद रानी जब तक बोलोगी नहीं, छोडूंगी नहीं " और खिलखिलाती हुयी सुगना ने कचकचा के नौंवी में पढ़ने वाली ननद के गाल काट लिए,

" छोड़ न भौजी, अच्छा बोलती हूँ ओह्ह,... " हिना हँसते हुए बोली लेकिन सुगना ने अबकी अपनी कच्ची ननद के दोनों निचले होंठ दबौच लिए और दोनों फांकों को पकड़ के मसलने लगी, ... " बोल बोल नहीं तो मुट्ठी पेलती हूँ कौन चीज मस्त "

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" वो ल,... ल,... लंड ,... " थूक घोंटती हुयी हिना बोली।

" अरे बोले में इतना टाइम लगाओगी तो घोंटने में पूरा इन लग जाएगा और लौंडा कही और जाके ठोंक देगा "

गुलबिया, हमारे नाउन की बहू हिना के दूसरी ओर आके बैठ गयी थी, उसने समझाया,

" एकदम ननद रानी जो दिखता है वो बिकता है और लौंडे सब न, कोई ज्यादा नखड़ा की न तो बस, तू नहीं और सही,... तो तानी लाज शरम छोड़ के मजा लो , जोबन आया है जवानी है काहें को " सुगना भौजी ने समझाया, हिना के जोबन गुलबिया और सुगना ने बाँट लिए थे ऐसी कच्ची अमिया मिलती भी मुश्किल से थी.

लेकिन अब तीनों निहुरी हुयी चंदा का खेला देख रही थीं।

चंदा सदाव्रत चलाती थी, किसी को मना नहीं करती थी. देती थी और खुल के देती थी।

लेकिन आज कहते हैं न की ऊंट पहाड़ के नीचे आ गया था, बस वही हाल थी। कमल का खूंटा खूब मोटा था और गाँड़ मारने में जिला टॉप था ऊपर से उसकी बहन रेनू उसे उकसा भी रही थी, यही चंदा सबके आगे बिन कहे टांग फैला लेती थी लेकिन उसके प्यारे भाई के आगे सिकोड़ लेती थी आज आयी है नीचे,

कभी दोनों हाथों से चंदा की कमर पकड़ के, कभी दोनों हाथों से अपनी बहन की समौरिया उसी के साथ इंटर में पढ़ने वाली, चंदा की बड़ी बड़ी गदरायी चूँची पकड़ के हचक के लंड गाँड़ में पूरी ताकत से ठोंक रहा था

" उय्य्यी नहीं , कमल भैया थोड़ा रुक जाओ, ओह्ह्ह नहीं लगता है " चंदा चीख रही थी।

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लग रहा था गाँड़ अंदर से जगह जगह से छिल गयी थी, लेकिन कमल कम उस्ताद नहीं था वहीँ पे दरेररते रगड़ते जान बुझ के पेल रहा था, चिल्लाये ससुरी पूरे गाँव की लौंडियों को मालूम हो जाए , बीच बीच में चंदा के चूतड़ पे हाथ भी लगा रहा था, चटाक, चूतड़ पे दर्जन भर कमल के फूल छप गए थे। कभी पूरा बाहर निकाल के जब अपनी कमर की पूरी ताकत से जड़ तक पेलता गाँड़ का छेद चौड़ा होकर फैल जाता, और दर्द से चंदा की चीख पूरी बगिया में फ़ैल जाती।

हिना को दबोचे, सुगना और गुलबिया समझ रही थीं, उनकी भी देख के सुरसुरा रही थी, इसी दर्द में तो मजा है, मरद कौन जो दरद न दे।
 
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