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काम्य अपने कमरे के बहार छज्जे पैर कड़ी थी और महल के बहार देख रही थी, एक दम शांत कड़ी थी अभिजीत उसके पास कब आया उसे पता hi नहीं चला,
अभिजीत - क्या हुआ माँ कहा खोई हुई हो,
काम्य- ऊम्मम तू कब आया,
अभिजीत - जब आप कही खोई हुई कड़ी थी, क्या सोच रही हो आप,
काम्य- ये राजय बदल रहा ह, यहाँ के हालत बदल रहे हैं,
अभिजीत- माँ उस राक्षश की वजह से ये सब हो रहा ह,
काम्य- मैंने जो सोचा था सब बर्बाद हो गया, सब ख़तम हो गया,
अभिजीत- क्या ख़तम हो गया,
काम्य- मेरी पूरी योजना बर्बाद हो गई, उस राक्षश ने बिच में आकर सब बिगड़ दिया,
अभिजीत- उसने तो हमे बचा लिया माँ वर्ण वो प्रताप सिंह हमे मार देता,
काम्य ने अभिजीत को देखा लेकिन कहा कुछ नहीं,
काम्य मन में – इस मूरख को क्या समझू इसे राजा बनाने के लिए मैंने क्या कुछ नहीं किया ह,
काम्य- तुझे मेरा एक काम करना होगा,
अभिजीत- क्या
काम्य ने अभिजीत को कुछ समझाना शुरू किया, जिसे सुनकर अभिजीत थोड़ा चौंक गया, लेकिन अपनी माँ की बात पैर सवाल करने की उसकी हिम्मत नहीं थी,
अभिजीत- ठीक ह माँ मैं अभी वह के लिए निकलता हु,
काम्य- ये बात किसी को पता न चले,
अभिजीत – जी माँ
अभिजीत वह से निकल गया, काम्य फिर से अपने खयालो में खो गई,
वही सौमित्र के अंदर की आग उसे झुलसा रही थी, जब से निहारिका और देव वाला कांड हुआ था उसके बाद से भवर सिंह सौमित्र के पास नहीं आया था, और सौमित्र के अंदर इतनी कामवासना थी की वो एक दिन भी चुदाई के बिना नहीं रह सकती थी, और अब तो सौमित्र को महीने बीत गए थे, सौमित्र बिस्टेर पैर पड़ी हुई अपने बदन को रगड़ रही थी, तभी उसकी दासी वह आई,

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Dasi-maharani आपका स्वस्थ्य सही नहीं लग रहा ह, आपके लिए कुछ लौ क्या,
सौमित्र ने दासी को देखा, सौमित्र की आँखे एक दम लाल हो राखी थी, आँखे वासना साफ़ दिख रही थी, सौमित्र ने दासी का हाथ पकड़ा और अपने उप्पेर खींच लिया, दासी एक दम घबरा गई,
दासी- महारानी
सौमित्र- चुप हो जा कुटिया एक दम चुप हो जा वर्ण तुझे कच्ची को खा जाउंगी,
दासी दर गई वो घबरा क्र चुप हो गई, सौमित्र ने उसे अपनी निचे क्र लिया और उसके उप्पेर आ गई, ये पहेली बार था जब दासी सौमित्र के बिस्टेर पैर लेती थी इतना नरम बिस्टेर उसने सपने में भी नहीं सोचा था, सौमित्र ने नशीली आँखों से दासी को देखा, और उसके उप्पेर झुकती चली गई, दासी को कुछ समझ नहीं आ रहा था, और अचानक ऐसा हुआ की दासी को आँखे फैट सी गई, क्योकि सौमित्र के हॉट दासी के होतो से जुड़ गए थे, दासी को यकीन hi नहीं हुआ ये क्या हो रहा ह, किसी औरत के साथ दासी का ये पहला अनुभव था, और वो भी महारानी के साथ, दासी घबराई हुई सी शांत लेती रही लेकिन सौमित्र पुरे जोश में दासी के हॉट चूसने लगी और फिर उसकी गार्डन को चूमने काटने लगी,

जल्दी hi दासी के मुँह से सिसकिया निकलने लगी, फिर सौमित्र ने दासी की चोली को पकड़ा और उसे फाड् दिया, जिससे दासी की चूचिया उभर क्र सामने आ गई, दासी की चूचिया थोड़ी ढीली और लटकी हुई थी, क्योकि दसियो का काम बस महल के मर्दो की सेवा करना और उनके भोग के लिए खुद को बिछा देना यही काम होता था, सौमित्र ने दासी की चूचियों को पकड़ा और जोर से खींच दिया, दासी की चीख निकल गई, सौमित्र ने उसे एक थपड मारा दासी दर क्र चुप हो गई,
सौमित्र- कुटिया रंडी चुप पड़ी रह, वर्ण तेरी इन चूचियों को काट क्र इनमे भूसा भर दूंगी फिर ये लटकी हुई नहीं रहेंगी, दासी और घबरा गई,
सौमित्र ने दासी का घागरा पकड़ा और फाड़ क्र अलग क्र दिया,
सौमित्र- माँ छुड़ानी रंडी तेरी छूट तो एक दम साफ़ ह किसके लिए साफ़ रखती ह इन्हे,
दासी कुछ नहीं बोल प् रही थी,
सौमित्र- बोल रैंड की जनि वानर तेरी छूट में गरम लोहा दाल दूंगी,
दासी- जी वो महारानी महल में वह के बाल साफ़ रखना हम दसियो का नियम होता ह, हमे सीखा क्र यहाँ भेज आजाता ह,
सौमित्र- अच्छा अच्छा तेरी वो गुरु माँ सिखाती होगी,
(असल में महल की दसियो को अलग से तैयार किया जाता था, पहले उन्हें महल के एक वैशल्या में वह की एक गुरु से शिक्षा मिलती थी, वो गुरु भी पहले दासी होती थी तरक्की मिलकर वाओ अहा पहकहति थी और आने वाली नै दसियो को तैयार किया जाता था,)
दासी- जी महारानी
सौमित्र- तो तेरी उस गुरु ने तुझे किसी महारनी को खुश करना नहीं सिखाया,
दासी- जी सिखाया था लेकिन इस महल में कभी जरुरत नहीं पड़ी
सौमित्र- तो भें की लोदी आज जरुरत ह, चल दिखा मुझे तेरी उस गुरु ने क्या सिखाया ह, अगर तू मुझे खुश नहीं कर पाई तो मैं खुद उस वैशल्या में जाकर उस गुरु की गांड मार लुंगी समझी,
अब दासी की गुरु की इज्जत की बात थी, दासी ने घेरि साँस भरी और सौमित्र की कमर में हाथ डाला और उसकी गांड को सहलाती हुई निचे ले गई और सीधे उसकी गांड में हाथ घुसा दिया, और कास क्र पकड़ क्र भींच दिया, सौमित्र की आह्ह्ह्ह निकल गई,
सौमित्र- दिखती कमजोर सी ह हाथ तो तेरे मजबूत हैं,
दासी ने सौमित्र की चोली को पकड़ा और खींच क्र फाड़ दिया, सौमित्र की चूचिया उछाल क्र बहार आ गई, इतनी बड़ी चूचिया देख दासी की आँखे भी खुल सी गई, एक दम गोल और ठोस थी, दासी ने तुरंत सौमित्र की चूचिया को अपने हाथो में पकड़ा और दबाने लगी और फिर अपने हॉट उसकी चूचियों पैर लगा दिए,
सौमित्र के अंदर आग भड़की हुई थी, जिस पैर दासी के ठन्डे हॉट उसे मजा दे रहे थे, सौमित्र ने दासी का सर अपनी चूचियों पैर दबा दिया, फिर दासी ने सौमित्र के घाघरे में हाथ डाला और नाडा खींच क्र खोल दिया,
दासी के लिए ये उसके जीवन का सब हसीं पल था, वो एक महारानी के नरम नरम बिस्टेर पैर लेती हुई थी और उसके नंगे बदन से महारानी का नंगा बदन रगड़ रहा था, दासी महारानी के हॉट और उसकी चूचियों को चूस रही थी, ये पल शायद hi किसी दासी के जीवन में आता हो, आज वो दासी खुद को सबसे भाग्यशाली समझ रही थी,
दासी ने सौमित्र को बिस्टेर पैर लिटाया और उसका घागरा निकल दिया, सौमित्र की बड़ी गांड उसके सामने आ गई, दासी ने तुरंत अपने हॉट सौमित्र की गांड पैर रख दिए, और फिर अपनी जीभ से सौमित्र की गांड और जांघो को चाटने लगी, सौमित्र के चूतड़ चाटने के बाद वो उसकी कमर को चाटती हुई उप्पेर गई और सौमित्र ाको सीधा कर दिया और फिर उसके हॉट चूमते हुए निचे चूचियों पैर आग ागि फिर पेट को चूमती हुई उसकी नाभि को जीभ से चाटने लगी, दासी के हाथ सौमित्र की जांघो को शेला रहे थे, फिर दासी अपनी चूचिया सौमित्र की जांघो पैर रगड़ने लगी और निचे होने लगी और छूट के उप्पेर के हिस्से को चाटने लगी जो बुल्कुल चिकना था,
दासी ने अपनी जीभ निकल क्र सौमित्र की छूट के उप्पेर छठा और फिर निचे की तरफ चली गई, और सौमित्र की जांघो को खोला और अपने हॉट उसकी छूट पैर रख दिए, सौमित्र की सिसकी निकल गई उसने दासी का सर अपनी छूट पैर दबा दिया, दासी समझ गई की सौमित्र कितनी तड़प रही ह, क्योकि उसकी छूट का रास किसी नदी की तरह बह रहा था, दासी ने तुरंत अपनी जीभ सौमित्र की छूट में घुसाई और जीभ से छूट को कुरेदने लगी, सौमित्र ये हुम्ला बर्दास्त नहीं क्र पाई और कुछ hi देर में दासी के मुँह पैर झड़ने लगी, वो अपनी गांड उठा उठा क्र दासी के मुँह पैर रगड़ने लगी, कुछ दे में सौमित्र शांत होने लगी लेकिन दासी रुकी नहीं वो लगातार सौमित्र की छूट चुस्ती रही,

सौमित्र को बहुत मजा आ रहा था लेकिन दासी का मुँह अब थकने लगा था, लेकिन महारानी को बिच में कैसे छोड़ सकती थी तो उसने नया तरीका लगाया और उठ क्र बैठ गई और सौमित्र की कमर उठा क्र उसकी छूट को उप्पेर उठा लिया फिर अपने पेअर सौमित्र के पैरो के बिच में डेल और अपनी छूट सौमित्र की छूट पैर रकः क्र बैठ गई, ये सौमित्र के लिए बिलकुल अलग अनुभव था, दासी ने अपनी छूट सौमित्र की छूट पैर रगड़नी शुरू की,

और बिच बिच में वो अपनी छूट सौमित्र की छूट पैर पटक रही थी जैसे कोई मर्द धक्के लगा रहा हो, सौमित्र के मजा दुगना हो गया था, दासी के पेअर जो सौमित्र की चूचियों के बिच रगड़ रहा था, सौमित्र दासी के उस पेअर को चूमने लगी वो मजे में भूल hi गई की ये किसी दासी का पेअर ह, दासी के लिए भी इससे ज्यादा अच्छा दिन और क्या हो सकता था जब एक महारानी उसके पेअर चाट रही थी,

दोनों का मजा काफी देर चला और दोनों एक साथ झड़ने लगी, दासी को लगा सौमित्र शांत हो जाएगी लेकिन सौमित्र दो बार झड़ने के बाद भी दासी को खुद से चिपका रही थी उसकी चूचियों को अपने चूचियों से रगड़ रही थी, दासी को कुछ और सोचना था तो उसने जोश जोश में बड़ा कदम उठा दिया और सौमित्र को घोड़ी बना दिया और उसकी गांड पैर 2-4 थपड मरे, सौमित्र वासना केन ऐश एमए थी उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था, उसे तो मजा आ रहा था, दासी ने सौमित्र के बाल पकडे और उसकी गांड पैर बैठ गई, और अपनी छूट सौमित्र की गांड पैर रगड़ने लगी और दूसरे हाथ से अपनी 3 उंगलिया सौमित्र की छूट में घुसा दी, अब सौमित्र को असली मजा आने लगा था,

दासी उसके बाल पकड़ क्र उसकी गांड पैर कूद रही थी जैसे घोड़ी की सवारी कर रही हो और अपनी उंगलिया सौमित्र की छूट में अंदर बहार कर रही थी, सौमित्र मजे में पागल हुई जा रही थी, दासी को मजा तो आ hi रहा था लेकिन आज वो जॉब hi कर रही थी उससे दासी के अंदर का एक गुस्सा सा निकल रहा था जैसे वो पुरे दासी समाज का बदला सौमित्र से ले रही हो, जैसे इन महल वालो ने दसियो पैर अत्याचार किये हैं उसके बदले आज वो सौमित्र को छोड़ रही थी जलील क्र रही थी,

तभी सौमित्र फिर से झड़ने लगी और इस बार वो इतनी जोर से जड़ी की सौमित्र का मूत निकल गया, और सौमित्र जो एक नंबर की आयाश औरत थी, वो कितने भी वासना के नशे में रहे वो जानती थी कब क्या करना ह, उसने तुरंत दासी को अपने नीच ेलिटाया और अपनी छूट उसके मुँह पैर रख क्र बैठ गई और झड़ने लगी साथ साथ दासी के मुँह में मूतने भी लगी, दासी सौमित्र के सर अपनी जांघो के बिच में दबा क्र बैठी हुई थी जिससे वो हिल भी नहीं प् रही थी, और सौमित्र का मूत दासी के मुँह में जार है था, पिने के अलावा उसके पास कोई और रास्ता नहीं था, सौमित्र न जाने कब तक अपनी छूट दासी के मुँह पैर दबाये बैठी रही, दासी का दम घुटने लगा था, वो अपने पेअर पटकने लगी थी,

तभी वह ज्वाला आ गया और अपने माँ को नंगी एक दासी के मुँह पैर छड़ी बीटा देख एक पल के लिए चौंक गया,
ज्वाला- माँ ये मर जाएगी,
सौमित्र ने ज्वाला की तरफ देखा और एक चादर उठा क्र अपने उप्पेर डाली लेकिन उस दासी के मुँह पैर से नहीं उठी,
सौमित्र- इसने मेरे शरीर को छुआ ह और वासना की खुमारी में न जाने क्या क्या किया ह, अब ये बात जाकर पुरे राजय में बताइये अपनी ढींगे हकेगी की इसने महारिणी को घोड़ी बना क्र उसकी सवारी की ह, और मैं महारानी हु मैं कुछ भी कर सकती हम एरा कोईकुछ नहीं कर सकता,
ज्वाला खड़ा हु अहसन लगा और वही उस दासी ने सौमित्र की जांघो के बिच छूट के निचे दबे हु असंस रुकने से दम तोड़ दिया,
दासी के मरने के बाद सौमित्र उसके उप्पेर से उत्तरी और एक सिल्क की चादर अपने उप्पेर लेप्ट क्र ज्वाला के सामने आ गई, वो पसीने से पूरी भीगी हुई थी जिससे चादर उसके नंगे शरीर से पूरी तरह चिपकी हुई थी सौमित्र का ेके क कटाव अलग hi दिख रहा था, उसकी चूचियों के चूचक चादर में साफ़ उभर क्र आ रहे थे, ज्वाला किन अजर सौमित्र के शरीर पैर hi थी, इस पुरे राजय में ऐसे शरीर वाली बहुत hi काम औरते थी, और कोई भी मर्द ऐसे शरीर की औरत को पाने के लिए कुछ भी कर सकता था,
ज्वाला नई नजरे खुद पैर महसूस करके सौमित्र हलकी सी मुस्कुराई लेकिन उसने कुछ भी ढकने की कोशिश नहीं की,
सौमित्र- तू यहाँ क्या कर रहा ह, तुझे पता ह न ये मेरा आराम करने का समय ह इस समय कोई नहीं आता,
ज्वाला- है वो तो मैं देख hi रहा था आप कैसा आराम कर रही थी, लेकिन मैं तो खबर लेकर आया था
सौमित्र- कैसी खबर
ज्वाला- आज अभिजीत काम्य बुआ के कमरे में गया था और जब वह से बहार आया तो तुरंत इस राजय से बहार निकल गया, और अपने साथ किसी को नहीं लेकर गया,
सौमित्र- वो तो अकेला कही नहीं जाता,
ज्वाला- वही तो, वो तो मूतने भी अकेला नहीं जाता तब भी उसके साथ सूरज या कोई और होता ह,
सौमित्र- इस काम्य का कोई भरोसा नहीं ह, ये इस राजय के सबसे खतरनाक ह, मुझे आज तक ये समझ नहीं आया की महाराज ने इसे अपने राजय में रखा क्यों ह, इसे अपने राजय में क्यों नहीं भेजते, और इसका पति कुणाल वो भी अपनी सुसराल में पड़ा हुआ ह उसकी कोई इज्जत नहीं करता फिर भी वो यहाँ ह, इतने सालो से वो यहाँ ह उसकी जरूर कोई साजिश ह, और उसने जो अभी कुछ समय में साजिशे की हैं वो उससे ये hi पता चलता ह की वो हम सबके लिए खतरा ह,
ज्वाला- मैं क्या करू
सौमित्र- उसके पीछे अपने जासूस भेज,
ज्वाला- वो तो मैंने भेज दिए हैं,
सौमित्र- देव हमारे रस्ते से हैट गया ह, अब हमे इस काम्य और अभिजीत को भी हटाना होगा, ये अभिजीत तो इस राजय का ह भी नहीं फिर ये युवाज पद के लिए प्रतियोगिता में उठा था, कोमय के इरादे ठीक नहीं ह,
ज्वाला- इस अभिजीत को तो मैं जब चहु रस्ते से हटा दूंगा, इसके अंदर इतना दम hi नहीं ह जो ये मुझसे टकरा सके, मेरी टक्कर उस सूरज से ह, वो बहुत ताकतवर ह,
सौमित्र- हम सबको रस्ते से हटा देंगे,
दोनों माँ बेटे अपनी hi योजना बनाने में लगे थे,
इधर प्रताप सिंह रेवती के साथ घूम रहा था अपने राजय में,
प्रताप सिंह- रेवती अब तू खुश ह न, तूने बहुत समय तक महल के अंदर जीवन बिताया ह, अब तुझे बहार की जिंदगी देखनी ह न,
रेवती ने डरते हुए है में सर हिलाया,
प्रताप सिंह- अरे दर क्यों रही ह, खुल क्र बोलै कर अब तू हमेशा ेरे साथ रहेगी तेरी हर जरुरत को मैं पूरा करूँगा, तुझे जॉब hi चाहिए मुझस ेबोल दिया कर,
इतना बोल क्र प्रताप सिंह ने रेवती को कमर पैर हाथ रख दिया, ये पहेली बार था जब प्रताप सिंह ने अपनी बेटी को छुआ था, रेवती का दिल अपने पिता के लिए स्नेह से उभर आया लेकिन अगले hi पल वो स्नेह घबराहट में बदल गया जब प्रताप सिंह का हाथ निचे सरकता हुआ रेवती की उभरी hi गांड पैर पहुंच गया, प्रताप सिंह ने हाथ हटाया नहीं वो बस अपना हाथ उसकी गांड पैर रख क्र इधर उधर देखता रहा,
रेवती घबरा गई थी उसकी हिल भी नहीं प् रही थी, उसे यकीन hi नहीं हो रहा था उसके साथ ये क्या हो रहा ह, उसके शरीर को पहेली बार किसी मर्द ने छुआ था ो भी उसके पिता ने और छुआ भी तो उस अंग को जिसे पति के अलावा कोई नहीं छू सकता,
रेवती समझ नहीं प् रही थी वो कैसे प्रतकिर्या दे, वो शांत रही, वही प्रताप सिंह खुश हो गया उसे लगा जैसे रेवती उसका साथ दे रही ह, रास्ता कहब था रथ पैर झटका लगा जिससे प्रताप सिंह ने अपना हाथ हटा लिया और रथ को पकड़ लिया, हाथ हटने से रेवती ने चैन की साँस ली, रेवती दोहरी मानसिकता में थी, एक तो उसके पिता का हाथ उसके शरीर पैर लगा इससे वो बैचैन थी दूसरा उसके शरीर पैर पहेली बार किसी मर्द के हाथ लगे थे तो उसकी जांघो के बिच न चाहते हुए भी हलचल शुरू हो चुकी थी,
रेवती महल आने तक एक दम शांत कड़ी रही और महल में घुसते hi दौड़ती हुई अपने कमरे चली गई, प्रताप सिंह भी तेजी से रेणुका के पास पंहुचा और उसे सब बताया,
रेणुका- आप बहुत ज्यादा उतावले हो रहे हैं, ये आपने ठीक नहीं किया वो लड़की ह उसने कुछ नहीं कहा इसका मतलब ये नहीं ह की वो तैयार ह, आपने हमेषा जबरदस्ती करनी सीखी ह, किसी लड़की को प्यार से अपना बनाया ह क्या कभी,
प्रताप सिंह – उसकी कोई जरुरत hi नहीं पड़ी,
रेणुका- लेकिन यहाँ पड़ेगी, वो आपकी बेटी ह, और अगर उसके साथ जबरदस्ती की और उसने बगावत कर दी तो न आप उसे मार सकते हैं न hi कैद क्र सकते हैं, क्योकि वही आपका सुरक्षा कवच ह, अगर उसे मारा तो आपका कवच टूट जायेगा और उसे कैद किया तो आपको भी उसके साथ कैद होना पद जायेगा,
प्रताप सिंह के चेरे पैर चिंता आ गई,
प्रताप सिंह- तो क्या करू मैं,
रेणुका- उसे थोड़ा प्यार दीजिये और आजादी दीजिये, ताकि वो आप पर विश्वास करे और आपके नजदीक आये, बस किसी मर्द की चाय उस पैर न पद पाए, अगर कोई मर्द उसके करीब हो तो वो बस आप हो, बाकि मुझ पैर छोड़ दीजिये उसके अंदर इतनी वासना भर दूंगी की वो खुद आपके पास चली आएगी,
प्रताप सिंह- बड़ा खुशकिस्मत हु मैं जोट ुम मेर पत्नी बानी,
रेणुका- इस संसार में मेरी क्रूरता बस आप hi पूरी करवा सकते थे, इसलिए आपकी हर इच्छा मैं पूरी करती हु,
प्रताप सिंह- सच में तुम कमल की औरत हो, मैं खुद को hi सबसे क्रूर समझता था लेकिन तुम्हे मेरी ये गलतफहमी दूर कर दी, अब बस जल्दी से रेवती को तैयार क्र दो, मैं उसे अपना बनाना चाहता हु,
रेणुका – अब आप उसे थोड़ी आजादी दीजिये, जवानी में कदम रखा ह उसने जरा उस जवानी का असर उसके यौवन पैर होने दीजिये,
प्रताप सिंह- जैसा तुम कहो, लेकिन आज मैंने जब उसके शरीर को छुआ तो झटका सा लगा, बड़ा कड़क शरीर ह उसका, मैंने आज तक उस पैर धयान क्यों नहीं दिया, बड़ी खूबसूरत ह हमारी रेवती, दुनिया की साडी खूबसूरती मेरी गुलाम होनी चाहिए,
रेणुका- और उस गुलाम खूबसूरती को मुझे कुचलने में मजा आता ह,
दोनों पति पत्नी हसने लगे,
फिर रेणुका रेवती के पास गई और देखा रेवती अपने बिस्टेर पैर उलटी लेती हुई ह और उसकी गांड का आकर बड़ा hi खूबसूरत लग रहा ह,
रेणुका मुस्कुरा दी,
रेणुका मन में- बड़ी खूबसूरत गांड ह किसी का भी दिल आ जाये इस पैर तो,
किसी के आने की आहात से रेवती उठ गई अपनी माँ को वह देख क्र डार्क र कड़ी हो गई,
रेवती- माँ आप यहाँ
रेणुका- अरे तू ऐसे दर क्यों गई तेरी माँ hi तो हु, ाचा ये बता तू खुश ह न तुझे महल से बहार निकलने का मौका मिला ह कैसा लग रहा ह,
रेवती- माँ मुझे ख़ुशी ह की आपने और पिता जी ने मुझे बहार निकलने का मौका दिया,
रेणुका- अब तू चिंता मत क्र तेरा जो दिल करे वो hi किया कर, और जो चाहिए वो मुझसे या अपने पिता से खुल क्र बोल दिया कर,
रेवती खुश हो गई, लेकिन उसके दिमाग में आज की घटना घूम रही थी उसे समझ नहीं आ रहा था ो अपनी माँ से कैसे कहे कही रेणुका नाराज हो गई तो क्या होगा, इसी दर से वो चुप रह गई,
रेणुका- तुझे बस एक बात का ख्याल रखना ह किट ेरे पिता के सिवा दुनिया का कोई मर्द तेरे आस पास भी न आये और किसी किन अजर तुझ पैर न पड़े और न hi तू किसी और मर्द को देखे,
रेवती की इस बात का मतलब तो ठीक से समझ नहीं आया लेकिन उसने अपनी माँ को मन है कर दिया की ऐसा hi होगा, लेकिन आप सब जानते हैं जिस चीज के लिए हमे रोका जाता ह हमारा डिंगा हमसे वो काम जरूर करवाता ह, दुनिया की कोई ताकत उस काम को करने से नहीं रोक पति, वैसे hi रेवती के दिमाग में जिज्ञाषा जग गई,
रेवती- माँ मैं हमारे उपवन में जाना चाहती हु, वह भेटे पानी में नहाना चाहती हु,
रेणुका- है है चली जाना कल सुबह चली जाना, बस ख्याल रहे तेरे अलावा कोई दासी भी उस उपवन के अंदर नहीं आणि चाहिए,
रेवती- ठीक ह माँ,
वही प्रताप सिंह का सबसे बड़ा बीटा जो अपने आप में hi एक जानवर था, उसके अंदर प्रताप सिंह का खून का पूरा असर था, और बेसुमार ताकत थी, प्रताप सिंह उसी की वजह से कभी कोई युद्ध नहीं हरा था, जब से उसे युवराज बनाया गयाथा तब से वही सभी युद्ध लड़ता था, जिस युद्ध में वो उतर जाता सामने कोई भी सेना उसका सामना नहीं करती थी, जब से उसे इस बात का पता चला था की किसी राक्षश ने उसके पिता पैर हुम्ला किया ह तब से वो पागलो की तरह उस राक्षश को ढूढ़ने में लगा हुआ था, उसने राक्षश की जानकरी देने वाले को इनाम की भी घोषणा कर दी थी, और दूसरी तैयारी वो भवर सिंह के राजय पैर हुम्ला करने की कर रहा था, जहा उसके पिता का अपमान हुआ, जिन लड़कियों से उसकी शादी रुक गई अब वो उस राजय को hi तबाह करके वह की हर राजकुमारी को अपना गुलाम बनाना छटा था,
खैर ये सब चल रहा था, सभी उस राक्षश को ढूढ़ने में लगे हुए थे,
अगली सुबह रेवती अपने उपवन में पहुंच गाइट hi जहा वो कभी अपने माँ के साथ एक या दो बार hi आई थी, यहाँ उसने रेणुका को बुल्कुल नंगी कोकर नहाते देखा था, भेटे हुए पानी में खुले आसमान ने निचे उसने अपनी hi माँ से नंगे होकर नहाने की बड़ी तारीफ सुनी थी, और जब उसके माँ बाप उस पैर इतने महरबान थे तो उसने सबसे पहले वही मांग लिया जिसके बारे में उसने अपनी माँ से सुना था, उसे साथ जो दसिया आई थी वो उपवन के बहार hi रुक गई, रेवती अकेली hi उपवन के अंदर गई और इतनी खूबसूरती देख क्र अकेली hi खुश हो रही थी, लेकिन आप सब जानते hi होंगे वो ख़ुशी कुछ hi देर की होती ह जिसे बाटने के लिए कोई न हो, कुछ hi देर में रेवती अकेले पैन से उदास सी होने लगी, फिर उसने नहाने का विचार किया और अपने कपडे उतरने लगी लेकिन न जाने क्या सोच क्र रुक गई और रानियों के लिए बने तालाब में घुस गई, पानी में भीगने से रेवती के कपड़ ेउसके शरीर से चिपक गए थे,
रेवती ने जब अपने शरीर को देखा और अपने उभरी हुई चूचियों पैर चिपके हुए कपड़ो को देखा तो वो कामुक होने लगी और अपनी hi चूचियों पैर हाथ फिरन ेलगी, तभी उसे पास को फुलवारी में कुछ हलचल महसूस हुई उसने डार्क र उधर देखा तो वह कोई नहीं था, वो कुछ देर इधर ुधा रदेखति रही, जब कुछ नहीं दिखा तो फिर से नहाने लगी, और जैसी hi उसने पानी के अंदर डुबकी लगाई और उप्पेर आई तो उसके समाने एक बहुत hi खूसूरत लड़का खड़ा था, वो इतना खूबसूरत था की शायद hi दुनिया में कोई उसे देख क्र उससे नजर हटा सके, और वो रेवती के बिलकुल सामने पानी में hi खड़ा था, रेवती को यकीन hi नहीं हुआ कोई लड़का उसके इतने करीब खड़ा,
कुछ पल तो रेवती उसे निहारती रही लेकिन जैसे hi लगा ये अनजान मर्द ह तो वो चीखने वाली थी तभी उस लड़के ने रेवती के मुँह पैर अपना हाथ रख दिया और उसे खुद से चिपका लिया, रेवती का भीगा हुआ शरीर उस लड़के से चिपक गया, रेवती की चूचिया उस लड़के के सीने में डाब गई, पानी के अंदर चूचिया वाइस ेभी थोड़ा सा फूल जाती हैं जो इस समय रेवती की भी फूली हुई थी और वो थोड़ी कामुक भी थी,
रेवती दर गई लेकिन उस लड़के की ताकत इतनी ज्यादा थी की रेवती जरा सी हिल तक नहीं पाई, उस लड़के ने रेवती के हाथो को पकड़ लिया और पानी के अंदर ले गया और रेवती को अपनी बहो में भर लिया,
काम्य अपने कमरे के बहार छज्जे पैर कड़ी थी और महल के बहार देख रही थी, एक दम शांत कड़ी थी अभिजीत उसके पास कब आया उसे पता hi नहीं चला,
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काम्य- ऊम्मम तू कब आया,
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काम्य- मैंने जो सोचा था सब बर्बाद हो गया, सब ख़तम हो गया,
अभिजीत- क्या ख़तम हो गया,
काम्य- मेरी पूरी योजना बर्बाद हो गई, उस राक्षश ने बिच में आकर सब बिगड़ दिया,
अभिजीत- उसने तो हमे बचा लिया माँ वर्ण वो प्रताप सिंह हमे मार देता,
काम्य ने अभिजीत को देखा लेकिन कहा कुछ नहीं,
काम्य मन में – इस मूरख को क्या समझू इसे राजा बनाने के लिए मैंने क्या कुछ नहीं किया ह,
काम्य- तुझे मेरा एक काम करना होगा,
अभिजीत- क्या
काम्य ने अभिजीत को कुछ समझाना शुरू किया, जिसे सुनकर अभिजीत थोड़ा चौंक गया, लेकिन अपनी माँ की बात पैर सवाल करने की उसकी हिम्मत नहीं थी,
अभिजीत- ठीक ह माँ मैं अभी वह के लिए निकलता हु,
काम्य- ये बात किसी को पता न चले,
अभिजीत – जी माँ
अभिजीत वह से निकल गया, काम्य फिर से अपने खयालो में खो गई,
वही सौमित्र के अंदर की आग उसे झुलसा रही थी, जब से निहारिका और देव वाला कांड हुआ था उसके बाद से भवर सिंह सौमित्र के पास नहीं आया था, और सौमित्र के अंदर इतनी कामवासना थी की वो एक दिन भी चुदाई के बिना नहीं रह सकती थी, और अब तो सौमित्र को महीने बीत गए थे, सौमित्र बिस्टेर पैर पड़ी हुई अपने बदन को रगड़ रही थी, तभी उसकी दासी वह आई,

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सौमित्र ने दासी को देखा, सौमित्र की आँखे एक दम लाल हो राखी थी, आँखे वासना साफ़ दिख रही थी, सौमित्र ने दासी का हाथ पकड़ा और अपने उप्पेर खींच लिया, दासी एक दम घबरा गई,
दासी- महारानी
सौमित्र- चुप हो जा कुटिया एक दम चुप हो जा वर्ण तुझे कच्ची को खा जाउंगी,
दासी दर गई वो घबरा क्र चुप हो गई, सौमित्र ने उसे अपनी निचे क्र लिया और उसके उप्पेर आ गई, ये पहेली बार था जब दासी सौमित्र के बिस्टेर पैर लेती थी इतना नरम बिस्टेर उसने सपने में भी नहीं सोचा था, सौमित्र ने नशीली आँखों से दासी को देखा, और उसके उप्पेर झुकती चली गई, दासी को कुछ समझ नहीं आ रहा था, और अचानक ऐसा हुआ की दासी को आँखे फैट सी गई, क्योकि सौमित्र के हॉट दासी के होतो से जुड़ गए थे, दासी को यकीन hi नहीं हुआ ये क्या हो रहा ह, किसी औरत के साथ दासी का ये पहला अनुभव था, और वो भी महारानी के साथ, दासी घबराई हुई सी शांत लेती रही लेकिन सौमित्र पुरे जोश में दासी के हॉट चूसने लगी और फिर उसकी गार्डन को चूमने काटने लगी,

जल्दी hi दासी के मुँह से सिसकिया निकलने लगी, फिर सौमित्र ने दासी की चोली को पकड़ा और उसे फाड् दिया, जिससे दासी की चूचिया उभर क्र सामने आ गई, दासी की चूचिया थोड़ी ढीली और लटकी हुई थी, क्योकि दसियो का काम बस महल के मर्दो की सेवा करना और उनके भोग के लिए खुद को बिछा देना यही काम होता था, सौमित्र ने दासी की चूचियों को पकड़ा और जोर से खींच दिया, दासी की चीख निकल गई, सौमित्र ने उसे एक थपड मारा दासी दर क्र चुप हो गई,
सौमित्र- कुटिया रंडी चुप पड़ी रह, वर्ण तेरी इन चूचियों को काट क्र इनमे भूसा भर दूंगी फिर ये लटकी हुई नहीं रहेंगी, दासी और घबरा गई,
सौमित्र ने दासी का घागरा पकड़ा और फाड़ क्र अलग क्र दिया,
सौमित्र- माँ छुड़ानी रंडी तेरी छूट तो एक दम साफ़ ह किसके लिए साफ़ रखती ह इन्हे,
दासी कुछ नहीं बोल प् रही थी,
सौमित्र- बोल रैंड की जनि वानर तेरी छूट में गरम लोहा दाल दूंगी,
दासी- जी वो महारानी महल में वह के बाल साफ़ रखना हम दसियो का नियम होता ह, हमे सीखा क्र यहाँ भेज आजाता ह,
सौमित्र- अच्छा अच्छा तेरी वो गुरु माँ सिखाती होगी,
(असल में महल की दसियो को अलग से तैयार किया जाता था, पहले उन्हें महल के एक वैशल्या में वह की एक गुरु से शिक्षा मिलती थी, वो गुरु भी पहले दासी होती थी तरक्की मिलकर वाओ अहा पहकहति थी और आने वाली नै दसियो को तैयार किया जाता था,)
दासी- जी महारानी
सौमित्र- तो तेरी उस गुरु ने तुझे किसी महारनी को खुश करना नहीं सिखाया,
दासी- जी सिखाया था लेकिन इस महल में कभी जरुरत नहीं पड़ी
सौमित्र- तो भें की लोदी आज जरुरत ह, चल दिखा मुझे तेरी उस गुरु ने क्या सिखाया ह, अगर तू मुझे खुश नहीं कर पाई तो मैं खुद उस वैशल्या में जाकर उस गुरु की गांड मार लुंगी समझी,
अब दासी की गुरु की इज्जत की बात थी, दासी ने घेरि साँस भरी और सौमित्र की कमर में हाथ डाला और उसकी गांड को सहलाती हुई निचे ले गई और सीधे उसकी गांड में हाथ घुसा दिया, और कास क्र पकड़ क्र भींच दिया, सौमित्र की आह्ह्ह्ह निकल गई,
सौमित्र- दिखती कमजोर सी ह हाथ तो तेरे मजबूत हैं,
दासी ने सौमित्र की चोली को पकड़ा और खींच क्र फाड़ दिया, सौमित्र की चूचिया उछाल क्र बहार आ गई, इतनी बड़ी चूचिया देख दासी की आँखे भी खुल सी गई, एक दम गोल और ठोस थी, दासी ने तुरंत सौमित्र की चूचिया को अपने हाथो में पकड़ा और दबाने लगी और फिर अपने हॉट उसकी चूचियों पैर लगा दिए,
सौमित्र के अंदर आग भड़की हुई थी, जिस पैर दासी के ठन्डे हॉट उसे मजा दे रहे थे, सौमित्र ने दासी का सर अपनी चूचियों पैर दबा दिया, फिर दासी ने सौमित्र के घाघरे में हाथ डाला और नाडा खींच क्र खोल दिया,
दासी के लिए ये उसके जीवन का सब हसीं पल था, वो एक महारानी के नरम नरम बिस्टेर पैर लेती हुई थी और उसके नंगे बदन से महारानी का नंगा बदन रगड़ रहा था, दासी महारानी के हॉट और उसकी चूचियों को चूस रही थी, ये पल शायद hi किसी दासी के जीवन में आता हो, आज वो दासी खुद को सबसे भाग्यशाली समझ रही थी,
दासी ने सौमित्र को बिस्टेर पैर लिटाया और उसका घागरा निकल दिया, सौमित्र की बड़ी गांड उसके सामने आ गई, दासी ने तुरंत अपने हॉट सौमित्र की गांड पैर रख दिए, और फिर अपनी जीभ से सौमित्र की गांड और जांघो को चाटने लगी, सौमित्र के चूतड़ चाटने के बाद वो उसकी कमर को चाटती हुई उप्पेर गई और सौमित्र ाको सीधा कर दिया और फिर उसके हॉट चूमते हुए निचे चूचियों पैर आग ागि फिर पेट को चूमती हुई उसकी नाभि को जीभ से चाटने लगी, दासी के हाथ सौमित्र की जांघो को शेला रहे थे, फिर दासी अपनी चूचिया सौमित्र की जांघो पैर रगड़ने लगी और निचे होने लगी और छूट के उप्पेर के हिस्से को चाटने लगी जो बुल्कुल चिकना था,
दासी ने अपनी जीभ निकल क्र सौमित्र की छूट के उप्पेर छठा और फिर निचे की तरफ चली गई, और सौमित्र की जांघो को खोला और अपने हॉट उसकी छूट पैर रख दिए, सौमित्र की सिसकी निकल गई उसने दासी का सर अपनी छूट पैर दबा दिया, दासी समझ गई की सौमित्र कितनी तड़प रही ह, क्योकि उसकी छूट का रास किसी नदी की तरह बह रहा था, दासी ने तुरंत अपनी जीभ सौमित्र की छूट में घुसाई और जीभ से छूट को कुरेदने लगी, सौमित्र ये हुम्ला बर्दास्त नहीं क्र पाई और कुछ hi देर में दासी के मुँह पैर झड़ने लगी, वो अपनी गांड उठा उठा क्र दासी के मुँह पैर रगड़ने लगी, कुछ दे में सौमित्र शांत होने लगी लेकिन दासी रुकी नहीं वो लगातार सौमित्र की छूट चुस्ती रही,

सौमित्र को बहुत मजा आ रहा था लेकिन दासी का मुँह अब थकने लगा था, लेकिन महारानी को बिच में कैसे छोड़ सकती थी तो उसने नया तरीका लगाया और उठ क्र बैठ गई और सौमित्र की कमर उठा क्र उसकी छूट को उप्पेर उठा लिया फिर अपने पेअर सौमित्र के पैरो के बिच में डेल और अपनी छूट सौमित्र की छूट पैर रकः क्र बैठ गई, ये सौमित्र के लिए बिलकुल अलग अनुभव था, दासी ने अपनी छूट सौमित्र की छूट पैर रगड़नी शुरू की,

और बिच बिच में वो अपनी छूट सौमित्र की छूट पैर पटक रही थी जैसे कोई मर्द धक्के लगा रहा हो, सौमित्र के मजा दुगना हो गया था, दासी के पेअर जो सौमित्र की चूचियों के बिच रगड़ रहा था, सौमित्र दासी के उस पेअर को चूमने लगी वो मजे में भूल hi गई की ये किसी दासी का पेअर ह, दासी के लिए भी इससे ज्यादा अच्छा दिन और क्या हो सकता था जब एक महारानी उसके पेअर चाट रही थी,

दोनों का मजा काफी देर चला और दोनों एक साथ झड़ने लगी, दासी को लगा सौमित्र शांत हो जाएगी लेकिन सौमित्र दो बार झड़ने के बाद भी दासी को खुद से चिपका रही थी उसकी चूचियों को अपने चूचियों से रगड़ रही थी, दासी को कुछ और सोचना था तो उसने जोश जोश में बड़ा कदम उठा दिया और सौमित्र को घोड़ी बना दिया और उसकी गांड पैर 2-4 थपड मरे, सौमित्र वासना केन ऐश एमए थी उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था, उसे तो मजा आ रहा था, दासी ने सौमित्र के बाल पकडे और उसकी गांड पैर बैठ गई, और अपनी छूट सौमित्र की गांड पैर रगड़ने लगी और दूसरे हाथ से अपनी 3 उंगलिया सौमित्र की छूट में घुसा दी, अब सौमित्र को असली मजा आने लगा था,

दासी उसके बाल पकड़ क्र उसकी गांड पैर कूद रही थी जैसे घोड़ी की सवारी कर रही हो और अपनी उंगलिया सौमित्र की छूट में अंदर बहार कर रही थी, सौमित्र मजे में पागल हुई जा रही थी, दासी को मजा तो आ hi रहा था लेकिन आज वो जॉब hi कर रही थी उससे दासी के अंदर का एक गुस्सा सा निकल रहा था जैसे वो पुरे दासी समाज का बदला सौमित्र से ले रही हो, जैसे इन महल वालो ने दसियो पैर अत्याचार किये हैं उसके बदले आज वो सौमित्र को छोड़ रही थी जलील क्र रही थी,

तभी सौमित्र फिर से झड़ने लगी और इस बार वो इतनी जोर से जड़ी की सौमित्र का मूत निकल गया, और सौमित्र जो एक नंबर की आयाश औरत थी, वो कितने भी वासना के नशे में रहे वो जानती थी कब क्या करना ह, उसने तुरंत दासी को अपने नीच ेलिटाया और अपनी छूट उसके मुँह पैर रख क्र बैठ गई और झड़ने लगी साथ साथ दासी के मुँह में मूतने भी लगी, दासी सौमित्र के सर अपनी जांघो के बिच में दबा क्र बैठी हुई थी जिससे वो हिल भी नहीं प् रही थी, और सौमित्र का मूत दासी के मुँह में जार है था, पिने के अलावा उसके पास कोई और रास्ता नहीं था, सौमित्र न जाने कब तक अपनी छूट दासी के मुँह पैर दबाये बैठी रही, दासी का दम घुटने लगा था, वो अपने पेअर पटकने लगी थी,

तभी वह ज्वाला आ गया और अपने माँ को नंगी एक दासी के मुँह पैर छड़ी बीटा देख एक पल के लिए चौंक गया,
ज्वाला- माँ ये मर जाएगी,
सौमित्र ने ज्वाला की तरफ देखा और एक चादर उठा क्र अपने उप्पेर डाली लेकिन उस दासी के मुँह पैर से नहीं उठी,
सौमित्र- इसने मेरे शरीर को छुआ ह और वासना की खुमारी में न जाने क्या क्या किया ह, अब ये बात जाकर पुरे राजय में बताइये अपनी ढींगे हकेगी की इसने महारिणी को घोड़ी बना क्र उसकी सवारी की ह, और मैं महारानी हु मैं कुछ भी कर सकती हम एरा कोईकुछ नहीं कर सकता,
ज्वाला खड़ा हु अहसन लगा और वही उस दासी ने सौमित्र की जांघो के बिच छूट के निचे दबे हु असंस रुकने से दम तोड़ दिया,
दासी के मरने के बाद सौमित्र उसके उप्पेर से उत्तरी और एक सिल्क की चादर अपने उप्पेर लेप्ट क्र ज्वाला के सामने आ गई, वो पसीने से पूरी भीगी हुई थी जिससे चादर उसके नंगे शरीर से पूरी तरह चिपकी हुई थी सौमित्र का ेके क कटाव अलग hi दिख रहा था, उसकी चूचियों के चूचक चादर में साफ़ उभर क्र आ रहे थे, ज्वाला किन अजर सौमित्र के शरीर पैर hi थी, इस पुरे राजय में ऐसे शरीर वाली बहुत hi काम औरते थी, और कोई भी मर्द ऐसे शरीर की औरत को पाने के लिए कुछ भी कर सकता था,
ज्वाला नई नजरे खुद पैर महसूस करके सौमित्र हलकी सी मुस्कुराई लेकिन उसने कुछ भी ढकने की कोशिश नहीं की,
सौमित्र- तू यहाँ क्या कर रहा ह, तुझे पता ह न ये मेरा आराम करने का समय ह इस समय कोई नहीं आता,
ज्वाला- है वो तो मैं देख hi रहा था आप कैसा आराम कर रही थी, लेकिन मैं तो खबर लेकर आया था
सौमित्र- कैसी खबर
ज्वाला- आज अभिजीत काम्य बुआ के कमरे में गया था और जब वह से बहार आया तो तुरंत इस राजय से बहार निकल गया, और अपने साथ किसी को नहीं लेकर गया,
सौमित्र- वो तो अकेला कही नहीं जाता,
ज्वाला- वही तो, वो तो मूतने भी अकेला नहीं जाता तब भी उसके साथ सूरज या कोई और होता ह,
सौमित्र- इस काम्य का कोई भरोसा नहीं ह, ये इस राजय के सबसे खतरनाक ह, मुझे आज तक ये समझ नहीं आया की महाराज ने इसे अपने राजय में रखा क्यों ह, इसे अपने राजय में क्यों नहीं भेजते, और इसका पति कुणाल वो भी अपनी सुसराल में पड़ा हुआ ह उसकी कोई इज्जत नहीं करता फिर भी वो यहाँ ह, इतने सालो से वो यहाँ ह उसकी जरूर कोई साजिश ह, और उसने जो अभी कुछ समय में साजिशे की हैं वो उससे ये hi पता चलता ह की वो हम सबके लिए खतरा ह,
ज्वाला- मैं क्या करू
सौमित्र- उसके पीछे अपने जासूस भेज,
ज्वाला- वो तो मैंने भेज दिए हैं,
सौमित्र- देव हमारे रस्ते से हैट गया ह, अब हमे इस काम्य और अभिजीत को भी हटाना होगा, ये अभिजीत तो इस राजय का ह भी नहीं फिर ये युवाज पद के लिए प्रतियोगिता में उठा था, कोमय के इरादे ठीक नहीं ह,
ज्वाला- इस अभिजीत को तो मैं जब चहु रस्ते से हटा दूंगा, इसके अंदर इतना दम hi नहीं ह जो ये मुझसे टकरा सके, मेरी टक्कर उस सूरज से ह, वो बहुत ताकतवर ह,
सौमित्र- हम सबको रस्ते से हटा देंगे,
दोनों माँ बेटे अपनी hi योजना बनाने में लगे थे,
इधर प्रताप सिंह रेवती के साथ घूम रहा था अपने राजय में,
प्रताप सिंह- रेवती अब तू खुश ह न, तूने बहुत समय तक महल के अंदर जीवन बिताया ह, अब तुझे बहार की जिंदगी देखनी ह न,
रेवती ने डरते हुए है में सर हिलाया,
प्रताप सिंह- अरे दर क्यों रही ह, खुल क्र बोलै कर अब तू हमेशा ेरे साथ रहेगी तेरी हर जरुरत को मैं पूरा करूँगा, तुझे जॉब hi चाहिए मुझस ेबोल दिया कर,
इतना बोल क्र प्रताप सिंह ने रेवती को कमर पैर हाथ रख दिया, ये पहेली बार था जब प्रताप सिंह ने अपनी बेटी को छुआ था, रेवती का दिल अपने पिता के लिए स्नेह से उभर आया लेकिन अगले hi पल वो स्नेह घबराहट में बदल गया जब प्रताप सिंह का हाथ निचे सरकता हुआ रेवती की उभरी hi गांड पैर पहुंच गया, प्रताप सिंह ने हाथ हटाया नहीं वो बस अपना हाथ उसकी गांड पैर रख क्र इधर उधर देखता रहा,
रेवती घबरा गई थी उसकी हिल भी नहीं प् रही थी, उसे यकीन hi नहीं हो रहा था उसके साथ ये क्या हो रहा ह, उसके शरीर को पहेली बार किसी मर्द ने छुआ था ो भी उसके पिता ने और छुआ भी तो उस अंग को जिसे पति के अलावा कोई नहीं छू सकता,
रेवती समझ नहीं प् रही थी वो कैसे प्रतकिर्या दे, वो शांत रही, वही प्रताप सिंह खुश हो गया उसे लगा जैसे रेवती उसका साथ दे रही ह, रास्ता कहब था रथ पैर झटका लगा जिससे प्रताप सिंह ने अपना हाथ हटा लिया और रथ को पकड़ लिया, हाथ हटने से रेवती ने चैन की साँस ली, रेवती दोहरी मानसिकता में थी, एक तो उसके पिता का हाथ उसके शरीर पैर लगा इससे वो बैचैन थी दूसरा उसके शरीर पैर पहेली बार किसी मर्द के हाथ लगे थे तो उसकी जांघो के बिच न चाहते हुए भी हलचल शुरू हो चुकी थी,
रेवती महल आने तक एक दम शांत कड़ी रही और महल में घुसते hi दौड़ती हुई अपने कमरे चली गई, प्रताप सिंह भी तेजी से रेणुका के पास पंहुचा और उसे सब बताया,
रेणुका- आप बहुत ज्यादा उतावले हो रहे हैं, ये आपने ठीक नहीं किया वो लड़की ह उसने कुछ नहीं कहा इसका मतलब ये नहीं ह की वो तैयार ह, आपने हमेषा जबरदस्ती करनी सीखी ह, किसी लड़की को प्यार से अपना बनाया ह क्या कभी,
प्रताप सिंह – उसकी कोई जरुरत hi नहीं पड़ी,
रेणुका- लेकिन यहाँ पड़ेगी, वो आपकी बेटी ह, और अगर उसके साथ जबरदस्ती की और उसने बगावत कर दी तो न आप उसे मार सकते हैं न hi कैद क्र सकते हैं, क्योकि वही आपका सुरक्षा कवच ह, अगर उसे मारा तो आपका कवच टूट जायेगा और उसे कैद किया तो आपको भी उसके साथ कैद होना पद जायेगा,
प्रताप सिंह के चेरे पैर चिंता आ गई,
प्रताप सिंह- तो क्या करू मैं,
रेणुका- उसे थोड़ा प्यार दीजिये और आजादी दीजिये, ताकि वो आप पर विश्वास करे और आपके नजदीक आये, बस किसी मर्द की चाय उस पैर न पद पाए, अगर कोई मर्द उसके करीब हो तो वो बस आप हो, बाकि मुझ पैर छोड़ दीजिये उसके अंदर इतनी वासना भर दूंगी की वो खुद आपके पास चली आएगी,
प्रताप सिंह- बड़ा खुशकिस्मत हु मैं जोट ुम मेर पत्नी बानी,
रेणुका- इस संसार में मेरी क्रूरता बस आप hi पूरी करवा सकते थे, इसलिए आपकी हर इच्छा मैं पूरी करती हु,
प्रताप सिंह- सच में तुम कमल की औरत हो, मैं खुद को hi सबसे क्रूर समझता था लेकिन तुम्हे मेरी ये गलतफहमी दूर कर दी, अब बस जल्दी से रेवती को तैयार क्र दो, मैं उसे अपना बनाना चाहता हु,
रेणुका – अब आप उसे थोड़ी आजादी दीजिये, जवानी में कदम रखा ह उसने जरा उस जवानी का असर उसके यौवन पैर होने दीजिये,
प्रताप सिंह- जैसा तुम कहो, लेकिन आज मैंने जब उसके शरीर को छुआ तो झटका सा लगा, बड़ा कड़क शरीर ह उसका, मैंने आज तक उस पैर धयान क्यों नहीं दिया, बड़ी खूबसूरत ह हमारी रेवती, दुनिया की साडी खूबसूरती मेरी गुलाम होनी चाहिए,
रेणुका- और उस गुलाम खूबसूरती को मुझे कुचलने में मजा आता ह,
दोनों पति पत्नी हसने लगे,
फिर रेणुका रेवती के पास गई और देखा रेवती अपने बिस्टेर पैर उलटी लेती हुई ह और उसकी गांड का आकर बड़ा hi खूबसूरत लग रहा ह,
रेणुका मुस्कुरा दी,
रेणुका मन में- बड़ी खूबसूरत गांड ह किसी का भी दिल आ जाये इस पैर तो,
किसी के आने की आहात से रेवती उठ गई अपनी माँ को वह देख क्र डार्क र कड़ी हो गई,
रेवती- माँ आप यहाँ
रेणुका- अरे तू ऐसे दर क्यों गई तेरी माँ hi तो हु, ाचा ये बता तू खुश ह न तुझे महल से बहार निकलने का मौका मिला ह कैसा लग रहा ह,
रेवती- माँ मुझे ख़ुशी ह की आपने और पिता जी ने मुझे बहार निकलने का मौका दिया,
रेणुका- अब तू चिंता मत क्र तेरा जो दिल करे वो hi किया कर, और जो चाहिए वो मुझसे या अपने पिता से खुल क्र बोल दिया कर,
रेवती खुश हो गई, लेकिन उसके दिमाग में आज की घटना घूम रही थी उसे समझ नहीं आ रहा था ो अपनी माँ से कैसे कहे कही रेणुका नाराज हो गई तो क्या होगा, इसी दर से वो चुप रह गई,
रेणुका- तुझे बस एक बात का ख्याल रखना ह किट ेरे पिता के सिवा दुनिया का कोई मर्द तेरे आस पास भी न आये और किसी किन अजर तुझ पैर न पड़े और न hi तू किसी और मर्द को देखे,
रेवती की इस बात का मतलब तो ठीक से समझ नहीं आया लेकिन उसने अपनी माँ को मन है कर दिया की ऐसा hi होगा, लेकिन आप सब जानते हैं जिस चीज के लिए हमे रोका जाता ह हमारा डिंगा हमसे वो काम जरूर करवाता ह, दुनिया की कोई ताकत उस काम को करने से नहीं रोक पति, वैसे hi रेवती के दिमाग में जिज्ञाषा जग गई,
रेवती- माँ मैं हमारे उपवन में जाना चाहती हु, वह भेटे पानी में नहाना चाहती हु,
रेणुका- है है चली जाना कल सुबह चली जाना, बस ख्याल रहे तेरे अलावा कोई दासी भी उस उपवन के अंदर नहीं आणि चाहिए,
रेवती- ठीक ह माँ,
वही प्रताप सिंह का सबसे बड़ा बीटा जो अपने आप में hi एक जानवर था, उसके अंदर प्रताप सिंह का खून का पूरा असर था, और बेसुमार ताकत थी, प्रताप सिंह उसी की वजह से कभी कोई युद्ध नहीं हरा था, जब से उसे युवराज बनाया गयाथा तब से वही सभी युद्ध लड़ता था, जिस युद्ध में वो उतर जाता सामने कोई भी सेना उसका सामना नहीं करती थी, जब से उसे इस बात का पता चला था की किसी राक्षश ने उसके पिता पैर हुम्ला किया ह तब से वो पागलो की तरह उस राक्षश को ढूढ़ने में लगा हुआ था, उसने राक्षश की जानकरी देने वाले को इनाम की भी घोषणा कर दी थी, और दूसरी तैयारी वो भवर सिंह के राजय पैर हुम्ला करने की कर रहा था, जहा उसके पिता का अपमान हुआ, जिन लड़कियों से उसकी शादी रुक गई अब वो उस राजय को hi तबाह करके वह की हर राजकुमारी को अपना गुलाम बनाना छटा था,
खैर ये सब चल रहा था, सभी उस राक्षश को ढूढ़ने में लगे हुए थे,
अगली सुबह रेवती अपने उपवन में पहुंच गाइट hi जहा वो कभी अपने माँ के साथ एक या दो बार hi आई थी, यहाँ उसने रेणुका को बुल्कुल नंगी कोकर नहाते देखा था, भेटे हुए पानी में खुले आसमान ने निचे उसने अपनी hi माँ से नंगे होकर नहाने की बड़ी तारीफ सुनी थी, और जब उसके माँ बाप उस पैर इतने महरबान थे तो उसने सबसे पहले वही मांग लिया जिसके बारे में उसने अपनी माँ से सुना था, उसे साथ जो दसिया आई थी वो उपवन के बहार hi रुक गई, रेवती अकेली hi उपवन के अंदर गई और इतनी खूबसूरती देख क्र अकेली hi खुश हो रही थी, लेकिन आप सब जानते hi होंगे वो ख़ुशी कुछ hi देर की होती ह जिसे बाटने के लिए कोई न हो, कुछ hi देर में रेवती अकेले पैन से उदास सी होने लगी, फिर उसने नहाने का विचार किया और अपने कपडे उतरने लगी लेकिन न जाने क्या सोच क्र रुक गई और रानियों के लिए बने तालाब में घुस गई, पानी में भीगने से रेवती के कपड़ ेउसके शरीर से चिपक गए थे,
रेवती ने जब अपने शरीर को देखा और अपने उभरी हुई चूचियों पैर चिपके हुए कपड़ो को देखा तो वो कामुक होने लगी और अपनी hi चूचियों पैर हाथ फिरन ेलगी, तभी उसे पास को फुलवारी में कुछ हलचल महसूस हुई उसने डार्क र उधर देखा तो वह कोई नहीं था, वो कुछ देर इधर ुधा रदेखति रही, जब कुछ नहीं दिखा तो फिर से नहाने लगी, और जैसी hi उसने पानी के अंदर डुबकी लगाई और उप्पेर आई तो उसके समाने एक बहुत hi खूसूरत लड़का खड़ा था, वो इतना खूबसूरत था की शायद hi दुनिया में कोई उसे देख क्र उससे नजर हटा सके, और वो रेवती के बिलकुल सामने पानी में hi खड़ा था, रेवती को यकीन hi नहीं हुआ कोई लड़का उसके इतने करीब खड़ा,
कुछ पल तो रेवती उसे निहारती रही लेकिन जैसे hi लगा ये अनजान मर्द ह तो वो चीखने वाली थी तभी उस लड़के ने रेवती के मुँह पैर अपना हाथ रख दिया और उसे खुद से चिपका लिया, रेवती का भीगा हुआ शरीर उस लड़के से चिपक गया, रेवती की चूचिया उस लड़के के सीने में डाब गई, पानी के अंदर चूचिया वाइस ेभी थोड़ा सा फूल जाती हैं जो इस समय रेवती की भी फूली हुई थी और वो थोड़ी कामुक भी थी,
रेवती दर गई लेकिन उस लड़के की ताकत इतनी ज्यादा थी की रेवती जरा सी हिल तक नहीं पाई, उस लड़के ने रेवती के हाथो को पकड़ लिया और पानी के अंदर ले गया और रेवती को अपनी बहो में भर लिया,
















