Incest JANNAT TERI BAHON (TANGO) MEIN - Page 2 - SexBaba
  • From this section you can read all the hindi sex stories in hindi font. These are collected from the various sources which make your cock rock hard in the night. All are having the collections of like maa beta, devar bhabhi, indian aunty, college girl. All these are the amazing chudai stories for you guys in these forum.

    If You are unable to access the site then try to access the site via VPN Try these are vpn App Click Here

Incest JANNAT TERI BAHON (TANGO) MEIN

दोस्तों अब से कहानी हिंगलिश में HI आएगी. अब इसके बाद आप लोगों को कोई बात नहीं मानूंगा नहीं तो कहानी बेकार हो जाती है. प्लीज मुझे कोई सुग्गेस्टिव मत दीजियेगा. मुझे अपने मन से लिखने दीजियेगा. जिसको कहानी पसंद न ए वो जा सकता है. धन्यवाद. कमेंट जरूर करिये ताकि मुझे हौसला मिले....
 
🏡 घर का नया ड्रामा: पानी का गिलास और फॅमिली की फुट

रात के ऑलमोस्ट 8 बज रहे थे. माणिक और पारी डाइनिंग टेबल पे बैठे थे. पारी +2 में थी और माणिक (का स्टूडेंट होने के नाते) उसको मैथ्स के कॉम्प्लिकेटेड क़ुएस्तिओन्स समझा रहा था. रूम में फुल कंसंट्रेशन था, सिर्फ पेंसिल की स्लो खुरचन और थोड़ी सी ख़ामोशी.

पारी (इर्रिटेटेड हो के): "भैया, यह इंटीग्रेशन वाला क्वेश्चन मेरे दिमाग में नहीं घुस रहा यार. कल कर लेते हैं न प्लीज?"

माणिक (प्यार से): "बस लास्ट स्टेप है बेबी. थोड़ा ध्यान दे, यह f(x) और g'(x) का खेल है. का में इससे भी ज़्यादा डेडली आते हैं, अभी से भागोजी?"

माणिक को सडनली प्यास लगी. एक्साक्ट्ली उसी वक़्त दिव्या, जो अपने मेडिकल नोट्स लेके रात भर जागने की तयारी कर रही थी, किचन से पानी पि के डाइनिंग टेबल के पास से गुज़र रही थी. उसका फेस वैसे hi सीरियस + थोड़ा झिझका हुआ था.

माणिक (बिलकुल कसुआलय, बिना सोचा): "दिव्या! सुन न, ज़रा एक गिलास पानी दे देना."

अरे, यह तोह नार्मल सी बात थी न, जैसे घर में कोई भी बोल देता है, लेकिन दिव्या के कान में यह हुकुम बन के गया. उसके अंदर का साल भर से दबा हुआ गुस्सा – की माणिक उसको “छोटा भाई” और “घर का लड़का” होने के कारन हमेशा नौकरानी समझता है – एकदम से भड़क गया.

दिव्या (पलट के, बिलकुल तानाशाह टोन में): "तुम्हे क्या लगता है माणिक? तेरे haath-pair टूट गए हैं क्या? मैं तुझे हमेशा से नौकरानी लगती हूँ? मैं अपनी इतनी इम्पोर्टेन्ट पढाई छोड़ के तेरा पानी लाऊँ, सिर्फ इसलिए की तू घर का ‘राजा बीटा’ है?"

माणिक (शॉक में): "अरे यह क्या बकवास कर रही है दिव्या? मैंने बस एक गिलास पानी माँगा था! पारी से भी तोह मांग सकता था न? तू हमेशा इतनी आग बबूला क्यों हो जाती है?"

दिव्या: "हाँ! तू हमेशा ऐसा hi करता है! हम लड़कियां घर में सिर्फ तेरे लिए बैठी हैं क्या – तू हुकुम दे और हम तेरे chhote-mote काम करें ताकि तू आराम से का बन जाये और तुझे और ज़्यादा लाड मिले? नहीं! मैं तेरी गुलाम नहीं हूँ!"

💔 पारी की लॉयल्टी और माणिक का इंकार

पारी एक सेकंड में अपने भाई के साइड आ गयी. उसकी आँखों में दिव्या के लिए फुल झिझक थी.

पारी: "दी, रहने दो न तुम. तुम तोह बस लड़ना शुरू कर देती हो. मैं भैया को पानी दे देती हूँ."

माणिक (पारी का हाथ पकड़ के): "नहीं पारी, तू पढाई कर. मैं खुद ले लूंगा."

उसने पारी को शांत किया और दिव्या को एक घूरने वाली निगाह मारी. उससे समझ आ गया था की अब पानी का गिलास सिर्फ पानी का गिलास नहीं रहा, उनके बीच की नफरत और जेएलओसी का सिंबल बन चूका था.

🤬 अनु का गुस्सा और पूरा डिवीज़न

तभी अनु घर में एंटर हुई. वह आलरेडी बहुत स्ट्रेस्ड थी – मल्लिका ने इवेंट रूम में chuuma-chati वाला सन क्रिएट कर दिया था, क्लाइंट के सामने मुश्किल से बचा गया था, पूरा दिन टेंशन में गया.

घर आके यह तमाशा देख के अनु का सबर टूट गया.

अनु (ज़ोर से चिल्लाते हुए): "यह क्या चल रहा है यहाँ?! तुम तीनो ने थान लिया है की यह घर कभी शांत नहीं रहेगा? क्या ड्रामा है यह?"

दिव्या (गुस्से में): "इससे पूछो दी. इसको मुझसे पानी चाहिए था, मैंने मन किया तोह..."

अनु (दिव्या पे चिल्लाते हुए): "क्या बिगड़ा था अगर एक गिलास पानी दे देती?! हाँ? दो मिनट के लिए अपनी ‘डॉक्टर वाली सीरियसनेस’ साइड रख के एक काम कर लेती तोह क्या हो जाता? पानी देना तोह पुण्य hi होता है, और तू इसको इतना बड़ा इशू बना रही है? कितनी narrow-minded हो गयी है तू दिव्या!"

फिर वह माणिक की तरफ घूमी.

अनु (माणिक पे भी): "और तू माणिक! तू खुद से अपना काम नहीं कर सकता? तुझे पता है दिव्या का नेचर कैसा है, फिर भी jaan-boojhkar उसको प्रोवोके करता है? एक गिलास पानी के लिए भी हुकुम चलना ज़रूरी है? तुम दोनों को ज़रा सा भी एहसास नहीं की मैं अभी बहार का सारा टेंशन झेल के आयी हूँ?"

दिव्या को लगा अनु हमेशा की तरह बड़ी बेहेन बांके daant-phatkar कर रही है और साइड ले रही है माणिक का.

दिव्या (और एग्रेसिव हो के): "हमेशा! तू हमेशा बड़ी होने का दिखावा करती है और माणिक का साइड लेती है! तुझे लगता है मैं गलत हूँ, लेकिन तुझे पता भी है मल्लिका तेरे साथ ऑफिस में kya-kya करती है? और तू घर आके मुझपे चिल्लाती है!"

यह सुनते hi अनु के लिए लास्ट स्ट्रॉ था. बहार का टेंशन + घर में यह – वह बिलकुल टूट गयी.

अनु (माथा पकड़ के): "बस! अब और नहीं!"

वह रोने लगी और तेज़ी से अपने रूम में चली गयी, दरवाज़ा ज़ोर से बंद किया.

माणिक, दिव्या, और पारी तीनो वही खड़े रह गए. एक छोटे से गिलास पानी ने पूरे घर के इमोशनल स्ट्रक्चर को हिला के रख दिया.

❤️ दिल का सुकून: सुलह और हंसी की लेहेर

अनु का रूम में जाके दरवाज़ा बंद करना – माणिक और दिव्या दोनों को अंदर तक हिला गया. दोनों को एकदम से रीलीज़ हुआ की उनके रोज़ के झगडे ने अनु दीदी को कितना हर्ट किया, जो आलरेडी ऑफिस के स्ट्रेस में थी.

माणिक (शर्मिंदा होक दिव्या को देखते हुए): "दिव्या, यह सब हमारी वजह से हुआ. दी कितनी स्ट्रिक्ट है लेकिन इतनी जल्दी टूटती नहीं. आज सच में बहुत ज़्यादा स्ट्रेस्ड थी वह."

दिव्या ने धीरे से सर हिलाया. उसको भी बुरा लग रहा था.

🙏 Bhai-Behen की माफ़ी

माणिक और पारी पहले हिम्मत करके अनु के रूम के बहार गए. दरवाज़ा अंदर से लॉक था.

माणिक (धीरे से खटखटाते हुए): "दी... प्लीज दरवाज़ा खोलो न. हम दोनों सॉरी बोलने आये हैं."

अंदर से आवाज़ नहीं आयी तोह पारी रट हुए बोली: "दी प्लीज, हम सच में सॉरी हैं. अब कभी झगड़ा नहीं करेंगे. बहार आ जाओ न."

थोड़ी देर की साइलेंस के बाद अनु ने दरवाज़ा खोला. उसकी आँखें थोड़ी सूजी हुई थी, लेकिन अब शांत थी.

माणिक और पारी ने बिना टाइम वास्ते किये कान पकड़ लिए.

माणिक: "सॉरी दी, आज के बाद कभी ऐसे परेशान नहीं करेंगे. पानी का गिलास क्या, पूरा किचन खुद संभल लूंगा."

पारी (मासूमियत से): "हाँ दी, प्लीज मत रोना. हमे तेरी स्ट्रिक्टनेस hi पसंद है."

यह ड्रामा देख के अनु के होठों पे स्माइल आ गयी. सारा गुस्सा मेल्ट हो गया.

अनु (मुस्कुराते हुए उनके कान छोड़ते हुए): "चलो ठीक है, ज़्यादा नौटंकी मत करो. मुझे पता है अगले हफ्ते फिर लड़ोगे, लेकिन थोड़ा तोह लिहाज रखा करो. जाओ अब, पारी पढाई कर, माणिक तू भी जा के नोट्स देख."

दोनों ख़ुशी से भाग गए. अनु को सच में सुकून मिला.

🤝 दिव्या की सीरियस माफ़ी

थोड़ी देर बाद दरवाज़ा फिर खुला – दिव्या आयी. फेस पे वही सीरियसनेस, लेकिन आँखों में पछतावा साफ़ दिख रहा था.

दिव्या (सीरियस टोन में): "सॉरी दी. सच में मैं वररेक्ट कर गयी. माणिक पे जो मेरा गुस्सा है न, वह chhoti-chhoti बातों पे भी मुझे रियेक्ट करने पे मजबूर कर देता है."

फिर धीरे से बोली: "और... आज मल्लिका दी ने फिर ऑफिस में तंग किया होगा न? तभी इतना टेंशन में थी तू. मुझे उसपे चिल्लाना चाहिए था, तेरे पे नहीं."

अनु को लगा अब पूरा सुकून वापस आ गया. दिव्या ने न सिर्फ सॉरी बोलै, बल्कि उसकी सबसे बड़ी टेंशन को भी समझ लिया.

अनु (रिलैक्स होक): "हाँ दिव्या, बिलकुल सही पकड़ा तूने."

फिर अनु ने पूरा किस्सा बताया – मल्लिका ने इम्पोर्टेन्ट कॉमन रूम को अपने नए बॉयफ्रेंड के साथ chuuma-chati के लिए उसे कर लिया, फाइल्स के बीच में hi हड़बड़ी में सन.

पहले तोह दिव्या ने bura-bhala कहा: "अरे मल्लिका दी को अकाल hi नहीं है क्या? काम और पर्सनल लाइफ अलग नहीं रख सकती?"

लेकिन जैसे hi अनु ने पूरा सन डेस्क्रिबे किया – मल्लिका और रोमित की हड़बड़ी, फाइल्स उड़ते हुए – दिव्या एकदम से हसने लगी.

दिव्या (zor-zor से हस्ते हुए): "अरे यह तोह हद्द hi हो गयी! सॉरी दी, बूत यह सिर्फ मल्लिका दी hi कर सकती हैं! कितनी बोल्डली बेवक़ूफ़ है यह लड़की!"

दिव्या की हसी देख के अनु भी कण्ट्रोल नहीं कर पायी और दोनों बहनें zor-zor से हसने लगी. वह हसी इतनी रिलीविंग थी की सारा दिन का टेंशन, सारा गुस्सा, साड़ी दूरी – सब एक पल में मेल्ट हो गया.



घर में फिर से सुकून आ गया. बहार कितना भी स्ट्रेस हो, आखिर में फॅमिली और bhai-behen का प्यार hi सबसे बड़ा पेनकिलर है. ❤️
 




मल्लिका और उसके बर्फ की चुम्मा छाती
 
🌹 Part 6: फिर वही तड़प: एक झलक, एक सीमा

Agley saptah, daftar mein kaam ka pressure khatm hone ke baad, Anand Mittal ne ek baar phir Savita Grover ko apne cabin mein bulaya. Bahar der shaam ki dheemi roshni thi, aur cabin mein gehri khamoshi chhayi hui thi, jisne unke beech ke ansuljhe tanav ko aur zyada badha diya.

Anand ji apni vishal chair par baithe the, jabki Savita unke saamne khadi thi. Vah aaj neeli aur sunahari Kanjivaram Saree mein thin, jiski sundarta mein ek professional sakhti chhipi thi.

Anand ji ki aankhein udaas thin. Unhone Savita ko apne paas aane ka ishaara kiya.

Anand Ji (dheemi, lagbhag gidgidaati hui aawaz mein): "Savita... aaj phir wahi tanhaai bahut bhaari pad rahi hai. Pichhle hafte jo tumne kaha tha, vah sahi hai. Main tadapta hoon. Main jaanta hoon ki yeh galat hai, lekin main khud ko rok nahin paata."

Savita ne koi jawab diye bina, chupchaap unki mez par rakhi ek report uthaai aur padhna shuru kar diya, jaise vah is personal mahaul se dhyan hatana chah rahi hon.

Anand ji ne bechaini se apni tie dheeli ki. Unhein pata tha ki aage kya hone wala hai. Unhone apne dil ki baat kehne ki koshish ki, ek antim appeal:

Anand Ji: "Savita, please... aaj... aaj sirf haath tak hi nahin. Main aur aage badhna chahta hoon. Main jaanta hoon ki tum bhi... tum bhi akeli ho. Agar hum... agar hum poori tarah se ek-doosre ke ho jaayen, to shayad yeh tanhaai kam ho jaaye. Please, mujhe mana mat karo."

Savita ne report band kar di aur use mez par wapas rakh diya. Unke chehre par koi emotion nahin tha—sirf drढ sankalp aur halki si thakaan thi.

Savita (shaant lekin drढ swar mein): "Anand Ji, mujhe maaf karna. Maine apni seemaayen saaf kar di hain. Main apni sharton par aapki madad kar sakti hoon, aur un sharton mein emotional ya physical completeness shaamil nahin hai. Main aapki is feeling ki kadar karti hoon, par main ise poora nahin kar sakti."

Unki baat sunkar Anand ji ke chehre par phir wahi niraasha aur laachaari utar aayi. Unhein mehsoos hua ki vah ek baar phir haar gaye hain.


🐀𺰠साड़ी का पल्लू और एक झलक

सविता ने देखा की आनंद जी का तनाव और उनकी निराशा तेज़ी से बढ़ रही है. वह जानती थीं की अगर वह अब उन्हें शांत नहीं करतीं, तो यह सिचुएशन और बिगड़ सकती है.

अपनी सख्ती और मर्यादा को बनाये रखते हुए, सविता ने एक पल के लिए अपनी साड़ी के पल्लू को जानबूझकर थोड़ा नीचे गिराया. उनके ब्लाउज की गहराई से, उनकी क्लीवेज का एक स्पष्ट हिस्सा आनंद जी को दिखाई दिया. यह एक जानबूझकर किया गया इशारा था, जो बेहद काम वक़्त के लिए था, लेकिन बहुत असरदार था.

यह छोटी सी फिजिकल झलक, सविता की संपूर्ण बेरुखी के बीच एक तेज़ बिजली के झटके की तरह थी. यह आनंद जी की आँखों में तेज़ी से समां गयी.

इस नज़ारे ने आनंद जी की तड़प को और बढ़ाया, लेकिन साथ hi उन्हें वह उत्तेजना भी दी जिसकी उन्हें इस वक़्त सबसे ज़्यादा ज़रुरत थी. इस अप्रत्याशित सन ने उनके दिमाग पर छाये तनाव को हटा दिया और उन्हें करंट मोमेंट पर फोकस करने में हेल्प की.

जैसे hi सविता ने अपनी साड़ी का पल्लू फिर से संभाला, आनंद जी ने बिना किसी और बहस के, चुपचाप सहमति में सर हिलाया. वह समझ गए की आज भी वही बाउंड्री है, और आज भी वह तड़प जारी रहेगी.

सविता ने धीरे से आगे बढ़कर, अपना वादा पूरा किया. साड़ी के पल्लू की उस झलक ने आनंद जी के दिमाग और इमोशंस को इस तरह एक्साइट कर दिया था की उनका काम बहुत जल्दी पूरा हो गया.

जब यह सब ख़त्म हुआ, तो आनंद जी ठक्कर सोफे पर बैठ गए. उन्हें राहत मिली थी, लेकिन उनकी आत्मा और भी ज़्यादा अधूरी महसूस कर रही थी.

सविता (औपचारिक स्वर में): "अब आप आराम कीजिये, आनंद जी. मैं चलती हूँ."

आनंद जी ने अपनी आँखें बंद राखी. "धन्यवाद्, सविता."

सविता चुपचाप चली गयीं. आनंद मित्तल उस केबिन में अकेले रह गए, अपनी अधूरी इच्छाओं, सविता की बेरुखी और साड़ी के पल्लू की उस छोटी सी झलक की याद के साथ, जिसने उन्हें क्षणिक राहत तो दी थी, पर उनके दिल की तड़प को और भी ज़्यादा तेज़ कर दिया था. वह जानते थे की सविता उन्हें हमेशा ऐसे hi तड़पाती रहेंगी.


🏡 नीरू बुआ का आगमन: बेबाकी और करियर की बहस

आनंद मित्तल के घर में नीरू बुआ का आना हमेशा एक नया तूफ़ान लेकर आता था. नीरू, आनंद जी की छोटी बहन थीं और उनकी उम्र लगभग 35 साल थी. वह स्वाभाव से बेहद बोल्ड, बेबाक और मॉडर्न थीं, जो राजनगर जैसे काल्पनिक शहर की पारम्परिक सोच वाले परिवार के लिए अक्सर थोड़ा ज़्यादा hi हुआ करता था. उनके आने से घर का माहौल तुरंत बदल गया.

नीरू बुआ ने आते hi अपने bhatije-bhatijiyon को गले लगाया और उनकी पढ़ाई और करियर पर सवाल पूछने शुरू कर दिए. लेकिन उनका ध्यान जल्द hi सबसे बड़ी, अनु पर चला गया, जो अपने सख्त स्वाभाव और शादी न करने के फैसले के कारन बुआ की नज़रों में चढ़ी रहती थी.


💬 बुआ का बेबाक सवाल

एक शाम, जब घर का काम ख़त्म हो चूका था, नीरू बुआ अनु के पास आकर बैठीं, जहाँ अनु अपने 'शादी की डोली' के कुछ क्लाइंट कॉन्ट्रैक्ट्स पर ध्यान दे रही थी.

नीरू बुआ (मुस्कुराते हुए, लेकिन बेबाकी से): "अरे वह! हमारी अनु तोह बड़ी बॉस लेडी बन गयी है! सारा दिन फाइल्स और रूल्स. मैं तोह सोच रही थी की इन सब चीज़ों से ब्रेक लेकर ज़िन्दगी को कब मज़ाक़िया बनाएगी?"

अनु (बिना ऊपर देखे): "बुआ, मैं काम कर रही हूँ. अब आप मज़ाक़िया बातें न करें तोह अच्छा है."

नीरू बुआ: "अरे, मज़ाक़ नहीं कर रही. मैं तोह तुम्हारे 'वर्किंग हॉर्स' के बाद के काम की बात कर रही हूँ." उन्होंने जानबूझकर अपनी आवाज़ धीमी की.

नीरू बुआ: "बता, इतने बिजी सचेडूले में कोई बॉयफ्रेंड बनाया या नहीं? कोई है जो तुम्हें रात को फ़ोन करके 'डिअर' कहता हो?"

अनु, जो पहले hi अपनी दोस्त मल्लिका की हरकतों और घर के तनाव से परेशां रहती थी, ऐसे सीधे और पर्सनल सवाल पर अचानक चिढ गयी.

अनु (झटके से ऊपर देखते हुए, सख्त लहज़े में): "नहीं, बुआ. ऐसा कोई नहीं है. और मुझे इन सब चीज़ों में कोई इंटरेस्ट नहीं है."


🥳 जवानी का लुत्फ़

Anu ka seedha inkaar sunkar Neeru Bua ke chehre par koi hairani nahin aayi, balki ek chaudi, mazaaqiya muskurahat aa gayi.

Neeru Bua (hansate hue, laparwah andaaz mein): "Haan! Haan! Mujhe pata hai. Yahi toh aajkal sab ladkiyan kehti hain. Par yeh toh aajkal aam baat hai, Anu! Ismein itna chidhne ki kya zaroorat hai? Tumhari umra kya hai? Pachchees! Yeh umra toh khoobsurat rishte banane, duniya ghoomne aur dil todne-jodne ki hoti hai."

Anu (kheejte hue, drढta se): "Bua, meri priorities alag hain. Mujhe pehle apna career banana hai, 'Shaadi Ki Doli' ko ek bada brand banana hai, aur sabse zaroori—ghar aur bhai-bahno ko sambhalna hai. Abhi in sab cheezon ke liye mere paas time nahin hai!"

Neeru Bua ne bade hi rahasyamay andaaz mein aage jhukkar Anu ki ore dekha.

Neeru Bua (aankh maarte hue): "Time? Arre, time toh abhi hai! Yeh jo jawani ka jalwa hai, yeh baar-baar nahin aata. Yeh waqt hai jab tum bina kisi zimmedari ke, bina kisi bandhan ke apne jeevan ka aur apne jawani ke jalwe ka lutf utha sakti ho."

Unhone Anu ke gaal par pyar se thapki di, "Jab tak tum shaadi karke 'Bahu' nahin ban jaati, tab tak tum aazaad ho. Aur is aazaadi ko sirf files ginne mein barbaad mat karo, meri pyari bhatiji! Main toh kahungi, agar koi achha ladka milta hai, toh use 'date' zaroor karna chahiye, shaadi ke iraade se nahin, balki zindagi ko samajhne ke iraade se."

Anu ko Neeru Bua ki yeh bebaki, unki sankeern soch aur unke sakht discipline ke bilkul opposite lagti thi. Vah unse bahut pyar karti thi, lekin unki baaton ne use aur bhi zyada kheej mehsoos karaai.

Anu (gehri saans lete hue): "Bua, please. Main aapse baad mein baat karti hoon. Ab mujhe yeh contract poora karna hai."

Neeru Bua (muskurate hue, door hatate hue): "Zaroor, zaroor. Contract bhi zaroori hai. Lekin yaad rakhna, life mein balance hona chahiye! Aur haan, agar boyfriend dhoondhne mein koi 'help' chahiye ho, toh tumhari Bua hamesha haazir hai."

Anu ne maatha pakad liya. Ek taraf Mallika ki laparwahiyan, doosri taraf ghar ke jhagde, aur ab Bua ki bold advice. Use laga ki vah chahe kitni bhi sakht aur sanskari ban jaaye, bahari duniya hamesha uske vichaaron ko challenge karti rahegi. Neeru Bua ke is aagman ne uske man mein ek nai bechaini paida kar di thi—career aur jawani ki ichhaaon ke beech taalmel bithane ki bechaini.
 
🌹 Part 7: फिर वही तड़प: एक झलक, एक सीमा

🫣 माणिक की शर्मिंदगी: बुआ की नज़र में 'अनरोमांटिक'

अनु के रूम से निकलने के बाद, नीरू बुआ अपनी बेबाकी और सवाल पूछने की आदत के साथ सीधे माणिक के रूम की ओरे बढ़ीं. माणिक अपनी मेज़ पर बैठा देर रात तक का के मुश्किल ऑडिट और टैक्स के नोट्स में खोया हुआ था. वह अपने काम के प्रति बेहद समर्पित था, और अक्सर बाहरी दुनिया से कटा हुआ रहता था.

नीरू बुआ ने बिना खटखटाये दरवाज़ा खोला और माणिक की स्टडी चेयर के पास पहुँच गयीं.

नीरू बुआ (खुशमिज़ाज आवाज़ में): "वह! हमारे माणिक बाबू तोह देश के अगलेय 'चार्टर्ड अकाउंटेंट' बनने की तैयारी में हैं! सारा दिन अंकों और कानूनों में उलझे रहते हो."

माणिक (हड़बड़ाते हुए, उठते हुए): "नमस्ते बुआ. आप? मैं... बस एक मुश्किल chapter देख रहा था."

नीरू बुआ: "बैठो, बैठो. मुझे पता है तुम बहुत मेहनती हो. पर मुझे यह बताओ, क्या तुम सिर्फ अंकों के साथ hi डील करते हो या किसी 'अंक की रानी' भी तुम्हारी ज़िन्दगी में है?"

माणिक को बुआ का मतलब समझने में एक पल लगा, और जैसे hi उसे समझ आया, उसके चेहरे पर तुरंत शर्मिंदगी का रंग फैल गया. माणिक ने कभी इस तरह के पर्सनल सवालों का सामना नहीं किया था, ख़ास कर घर में, जहाँ अनु के सख्त नियम और दिव्या की नफरत के बीच प्यार या रोमांस की बात करना तोह दूर, सोचना भी मुश्किल था.

माणिक (शर्माते हुए, नज़रें झुककर): "नहीं, बुआ. मेरी कोई... कोई गर्लफ्रेंड नहीं है. मैं बस... बस अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे रहा हूँ. मेरा फाइनल ईयर है, और का आसान नहीं होता."

नीरू बुआ (हँसते हुए, मानो उन्होंने कोई मज़ाक़िया बात सुन ली हो): "ओह हो! फिर वही बात! तुम और तुम्हारी दीदी अनु, दोनों एक hi रिकॉर्ड बजाते हो! करियर, पढ़ाई, नोट्स... क्या इस घर में सब लोग अनरोमांटिक हैं क्या?"

उन्होंने नाटकीय अंदाज़ में रूम का इंस्पेक्शन किया.

नीरू बुआ: "न कोई लड़की की तस्वीर, न कोई लव लेटर, न कोई खुशबू. सिर्फ बेजान फाइल्स! माणिक, तुम्हारी उम्र क्या है? बाइस साल! यह वक़्त है जब दिल की धड़कनें तेज़ होनी चाहिए, न की सिर्फ बैलेंस शीट का मैचिंग होना चाहिए!"

माणिक (बहुत ज़्यादा शर्मिंदा होकर, सफाई देते हुए): "नहीं, बुआ! ऐसी बात नहीं है. बस... अभी मेरा ध्यान नहीं है. और कॉलेज में भी मेरी ज़्यादा दोस्ती नहीं है, मैं सीधा क्लास के बाद घर आता हूँ."

नीरू बुआ (आँख मारकर): "अच्छा! तोह मान लो अगर कोई खूबसूरत लड़की तुम्हें कॉफ़ी पर बुलाये, तोह तुम क्या करोगे? 'क्षमा करें मैडम, मुझे का का ऑडिटिंग Chapter दोहराना है'?"

माणिक को समझ नहीं आया की वह क्या जवाब दे. वह बस हंसने की कोशिश कर रहा था, लेकिन उसकी शर्मिंदगी साफ़ झलक रही थी. उसे लगा की उसके चेहरे पर जो पसीना आया है, वह सिर्फ रूम की गर्मी की वजह से नहीं है, बल्कि नीरू बुआ के सवालों की वजह से है.

नीरू बुआ ने देखा की माणिक सचमुच बहुत घबरा गया है.

नीरू बुआ (थोड़ा नरम होकर, उसके कंधे पर हाथ रखते हुए): "देखो, मेरा मतलब तुम्हें परेशां करना नहीं है. मैं बस इतना कह रही हूँ की ज़िन्दगी सिर्फ करियर से नहीं बनती. एक अच्छा दोस्त, एक प्यार करने वाला साथी... यह सब तुम्हारी पढ़ाई को बेहतर बनाते हैं, उसे बिगाड़ते नहीं हैं. थोड़ा खुल कर जियो, मेरे बच्चे."

वह मुस्करायीं, "अब जाओ, अपनी बुआ को एक अच्छी सी बहु ढूंढने में मदद करो. कोई नहीं तोह काम से काम एक अच्छी गर्लफ्रेंड तोह होनी hi चाहिए, ताकि तुम्हारी पढ़ाई का बोरियत भरा माहौल थोड़ा रंगीन हो जाए."

नीरू बुआ रूम से बहार चली गयीं, लेकिन उनके पीछे माणिक शर्मिंदगी से लाल होकर बैठा रह गया. उसने तुरंत अपने नोट्स बंद किये. उसे लगा की अब उसे शायद कुछ देर के लिए नोट्स की बजाये, नीरू बुआ की बातों के बारे में सोचना padega—aur शायद, उसे अपनी ज़िन्दगी में सचमुच थोड़ी 'रोमांस' की कमी महसूस हुई.


😳 अनजाने एहसास: पारी और माणिक के बीच की नै रेखा

नीरू बुआ की बेबाक बातें, जिनमें जवानी का लुत्फ़ उठाने और रोमांस को जीवन में जगह देने की सलाह थी, घर के शांत माहौल में किसी अप्रत्याक्षित लहार की तरह फैल गयी थीं. माणिक, जो हमेशा किताबों और बैलेंस शीट्स में डूबा रहता था, उसके अवचेतन (सबकसकीयस) मन पर बुआ की बातों का गहरा असर पड़ा था.

पारी, जो अभी सिर्फ 18 साल की थी और $+2$ की स्टूडेंट थी, फिजिकल रूप से अपनी उम्र से थोड़ी ज़्यादा विकसित (वोलुपतुयस) थी. उसका शरीर थोड़ा भरा हुआ था, ख़ास कर उसकी छाती, जो उसके हलके कपड़ों के नीचे भी स्पष्ट नज़र आती थी. हालांकि, घर में या कॉलेज में इस पर कभी किसी का ध्यान नहीं गया था, क्यूंकि वह अभी भी सबके लिए 'छोटी बच्ची' थी.


📐 मैथ्स की क्लास में भटकाव

आज रात, माणिक हमेशा की तरह पारी को मैथ्स के कठिन सवाल समझा रहा था. वह दोनों डाइनिंग टेबल पर aamne-saamne बैठे थे. माणिक का ध्यान आम तौर पर किताबों के अंकों पर होता था, लेकिन नीरू बुआ की बातों ने उसकी एकाग्रता को भांग कर दिया था.

माणिक (सवाल समझाते हुए): "देखो, पारी, यह $क्ष^2 + य^2$ को हम $र^2$ से रेप्लस करेंगे, ताकि हम इंटीग्रेशन आसानी से कर सकें."

पारी (माणिक की ओरे झुककर, सवाल को समझने की कोशिश करते हुए): "भैया, मुझे लगता है यहाँ $य$ की वैल्यू हमें $2\sin\theta$ लेनी चाहिए..."

जैसे hi पारी आगे की ओरे झुकी, उसके कपड़ों के नेकलिने के पास से माणिक की नज़र अचानक नीचे चली गयी. माणिक ने हमेशा पारी को अपनी छोटी, शरारती बेहेन के रूप में देखा था, लेकिन आज, नीरू बुआ की 'जवानी के जलवे' वाली बातों के कारण, उसकी नज़रें अनजाने में पारी की छाती पर चली गयीं.

वहां एक पल के लिए उसकी नज़रें अटक गयीं.

माणिक को तुरंत एक झटका लगा. यह पहली बार था जब उसने अपनी बेहेन को एक पुरुष की नज़र से देखा था, और उस क्षणिक झलक ने उसके अंदर कुछ अंजना सा हलचल पैदा कर दिया. उसका दिल तेज़ी से धड़कने लगा.


🔥 अनजाने एहसास की गर्मी

माणिक ने तुरंत अपनी नज़रें हटायीं, जैसे उसने कोई बहुत बड़ी गलती कर दी हो. उसके कान गरम हो गए. उसे लगा की पारी ने शायद देख लिया होगा, लेकिन पारी तोह पूरी तरह से इंटीग्रेशन के सवाल में खोई हुई थी.

माणिक की आवाज़ लड़खड़ा गयी.

माणिक: "हाँ... हाँ... $2\sin\theta$ भी ले सकते हैं... पर... पर तुम इसे... पहले इस तरह से... हल करो."

'हल' शब्द उसके मुँह से मुश्किल से निकला.

माणिक को अपने अंदर एक अजीब सी गर्मी महसूस हुई, जो पढ़ाई के तनाव या रूम की गर्मी की वजह से नहीं थी. यह एक अनजाना, अपरिचित एहसास tha—jo शायद नीरू बुआ के 'रोमांस' वाले विचारों का परिणाम था. वह अपनी बेहेन की ओरे देख रहा था, लेकिन उसके दिमाग में अचानक एक अस्पष्ट, वर्जित विचार आ गया था.

उसे तुरंत खुद पर बहुत गुस्सा आया. 'यह क्या सोच रहा हूँ मैं? यह मेरी बेहेन है! छोटी पारी है! मुझे सिर्फ अपनी पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए.'

उसने तेज़ी से माथा पूंछा और अपनी एकाग्रता वापस लाने की कोशिश की.

माणिक (गंभीरता से): "पारी, अब तुम यह सवाल खुद करो. मैं किचन से पानी लेकर आता हूँ."

वह तेज़ी से डाइनिंग टेबल से उठा और किचन की ओरे बढ़ गया. पानी पीते हुए, वह खुद को कोस रहा था. नीरू बुआ की बातों ने एक ऐसा दरवाज़ा खोल दिया था जिसे वह हमेशा बंद रखना चाहता था.

उसे महसूस हुआ की अब उसे सिर्फ का की किताबों से नहीं, बल्कि अपने hi मन के अंदर उठ रहे इन अनजाने, वर्जित एहसासों से भी लड़ना होगा. घर में सब उसे मासूम और पढ़ाई में लीं समझते थे, लेकिन आज रात, माणिक ने अपने भीतर एक नै, जटिल और शायद खतरनाक भावना को जागते हुए महसूस किया था. उसके और पारी के बीच की 'Bhai-Behan' वाली रेखा अचानक धुंधली पढ़ गयी थी.
 
🌹 Part 8: नीरू बुआ का खतरनाक खेल: एक अनअपेक्षित खुलासा



😳 माणिक की शर्मिंदगी: बुआ की नज़र में 'अनरोमांटिक'

माणिक, किचन से पानी पीकर लौटा और डाइनिंग टेबल पर वापस बैठा hi था की उसके दिमाग में अभी भी पारी की वह फ्लीटिंग इमेज और अपने भीतर की अनजानी हलचल चल रही थी. वह खुद को मज़बूत करने की कोशिश कर रहा था की वह अपने काम पर ध्यान दे और इन 'बुआ वाली' बातों को भूल जाए.

वह अभी पारी को $g'(x)$ फंक्शन समझा hi रहा था की दरवाज़े पर कोई हलचल हुई.

अचानक, नीरू बुआ उनके रूम में दाखिल हुईं. वह हमेशा की तरह बिना किसी औपचारिक दस्तक के आयीं, लेकिन इस बार उनका अंदाज़ बेहद खतरनाक और मज़ाक़िया था.



👚 बुआ का बोल्ड अवतार

माणिक ने जैसे hi नीरू बुआ की ओरे देखा, वह पल भर के लिए ठिठक गया. नीरू बुआ घर में थीं, लेकिन उन्होंने अपनी सामान्य साड़ी या सलवार कमीज के बजाये, एक बेहद मॉडर्न और Deep-Neck T-shirt पहनी हुई थी. T-shirt का गाला इतना ज़्यादा गहरा था की उनके स्तन (बूब्स) का आधा से ज़्यादा हिस्सा साफ़ दिखाई दे रहा था. वह बिलकुल भी असहज नहीं लग रही थीं, बल्कि aatma-vishwas से भरी थीं.

माणिक की नज़रें एक पल के लिए बुआ की क्लीवेज पर अटक गयीं. उस बोल्ड नज़ारे ने उसके अंदर की गर्मी को और बढ़ा दिया, जो अभी कुछ देर पहले पारी को देखने के कारण उठी थी. उसके पुरुषत्त्व (मनहुड) में तुरंत एक तेज़ हलचल होने लगी.



👀 मैंने सब देखा

नीरू बुआ धीरे से चलकर माणिक की चेयर के पास आयीं. उन्होंने मुस्कुराते हुए, बेहद साज़िश भरे अंदाज़ में, माणिक को आँख मारी.

नीरू बुआ (फुसफुसाते हुए, गंभीर और चंचल स्वर में): "Hello, मर. का. क्या चल रहा है? मैथ्स मुश्किल लग रहा है या कोई और... सब्जेक्ट?"

माणिक (चौंककर, लड़खड़ाते हुए): "बुआ... आप? नहीं... मैं बस पारी को समझा रहा था..."

पारी तोह अभी भी सवाल में उलझी थी और उसने इस माहौल पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया. नीरू बुआ ने पारी के सर पर हाथ फेरा और पारी को बहार जाकर Ice-cream खाने को कहा, ताकि वह माणिक से अकेले में बात कर सकें. पारी, ice-cream के लालच में तुरंत बहार चली गयी.

जैसे hi पारी रूम से बहार निकली, नीरू बुआ झुककर माणिक के कान के पास आयीं. उनके शरीर की खुशबू और T-shirt से दिख रहे उनके वक्षस्थल की नज़दीकी ने माणिक की धड़कनें बढ़ा दिन.

नीरू बुआ (अत्यंत धीमी आवाज़ में, आँखों में शरारत): "माणिक... तुम मुझे इतना बेवक़ूफ़ समझते हो? मैंने abhi-abhi सब देखा. तुम पारी को $क्ष^2 + य^2$ नहीं, बल्कि कुछ और hi ताड़ रहे थे."

माणिक को लगा जैसे उसके सर पर किसी ने ठंडा पानी दाल दिया हो. वह हकलाने लगा.

माणिक: "बुआ! आप... आप क्या कह रही हैं? वह... वह मेरी बेहेन है!"

नीरू बुआ (हँसते हुए): "हाँ, है. मुझे पता है. पर मुझे यह भी पता है की जब जवानी के जलवे का वक़्त आता है, तोह नज़रें कहाँ जाती हैं. ख़ास कर जब घर में सब लोग इतने अनरोमांटिक हों और अपनी ज़रूरतों को दबाकर रखते हों."



⚡️ बुआ की नज़र और पुरुषत्त्व की हलचल

माणिक को लगा की वह अब शर्म और घबराहट से मर जाएगा. तभी, उसने महसूस किया की नीरू बुआ की निगाह तेज़ी से उसकी आँखों से नीचे खिसकी, और सीधे उसके उसी अंग पर जा तिकी, जहां बुआ के बोल्ड अवतार के कारण हलचल महसूस हो रही थी.

माणिक को महसूस हुआ की नीरू बुआ ने न केवल उसकी भावनाओं को पकड़ा है, बल्कि उन्होंने जानबूझकर अपने कपड़ों के माध्यम से उसके पुरुषत्त्व को चुनौती दी है, और अब वह उसकी प्रतिक्रिया को भी देख रही हैं.

माणिक (गले में फंसकर): "बुआ... प्लीज... आप ये सब क्यों कर रही हैं?"

नीरू बुआ (मुस्कुराते हुए, अपनी T-shirt ठीक करते हुए): "मैं तोह बस तुम्हें यह एहसास करा रही हूँ, मेरे बच्चे, की ज़िन्दगी सिर्फ मैथ्स की ेकशन नहीं होती. कुछ चीज़ें सहज होती हैं, और उन्हें दबाना नहीं चाहिए. यह तुम्हारा जवानी का वक़्त है, और इस वक़्त, शरीर की ज़रूरतों को दबाना सेहत के लिए अच्छा नहीं है."

वह माणिक की मेज़ पर एक चॉकलेट रखकर कड़ी हुईं.

नीरू बुआ: "बहार निकलो इन किताबों से, माणिक. और हाँ, अगर तुम्हें कभी कोई मदद चाहिए हो... तोह तुम्हारी बुआ हमेशा हाज़िर है."

वह अपनी बोल्ड T-shirt और रहस्यमय मुस्कान के साथ रूम से बहार निकल गयीं, पीछे छोड़ गयीं एक सदमे में बैठा माणिक. माणिक का दिल तेज़ी से धड़क रहा था. उसे लगा की नीरू बुआ सिर्फ मज़ाक़ नहीं कर रही thin—vah उसे जानबूझकर एक ऐसे रास्ते की ओरे धकेल रही थीं, जिसके बारे में उसने कभी सोचा भी नहीं था. उस पल, माणिक का ध्यान का की किताबों से ज़्यादा, अपनी अधूरी ज़रूरतों और नीरू बुआ के खतरनाक आकर्षण पर था.


🚗 बाजार का सफर: बदली हुई निगाहें और बढ़ती तकरार

नीरू बुआ के बोल्ड आगमन और उनकी बातों ने माणिक के दिमाग में एक ऐसी हलचल मचा दी थी, जिससे वह उबार नहीं प् रहा था. बुआ के जाने के बाद, माणिक को हर महिला के शरीर, ख़ास कर उनके वक्षस्थल (बूब्स) को ताड़ने की एक अनजानी आदत सी पद गयी थी थी. यह उसके लिए नया था, और उसे अंदर से असहज भी कर रहा था, लेकिन वह अपनी निगाहों पर नियंत्रण नहीं रख प् रहा था.

आज, यह नै आदत उसकी और दिव्या की रोज़ की तकरार में एक नया आयाम जोड़नेवाली थी.



🛵 दिव्या की मजबूरी

दिव्या को मेडिकल कॉलेज से जुड़े कुछ ज़रूरी कागज़ात और स्टेशनरी खरीदने के लिए बाजार जाना था. उसे बाइक चलानी नहीं आती थी, और ऑटो या कैब लेने के बजाये वह माणिक के साथ जाना ज़्यादा सेफ और आसान मानती थी.

दिव्या, जो हमेशा माणिक से नफरत और ीरख्या के कारण दूरी बनाये रखती थी, मजबूरी में माणिक के रूम में आयी.

दिव्या (रूखे स्वर में): "माणिक, मुझे मार्किट जाना है. कुछ ज़रूरी सामान लेना है. चल, अपनी बाइक निकाल."

माणिक, जो उस वक़्त अपने नोट्स देख रहा था, उसने ऊपर देखा. दिव्या आज एक साधारण Kurta-Pyjama पहने थी. चूंकि वह हमेशा अपनी पढ़ाई में लीं रहती थी, इसलिए वह अपनी शारीरिक बनावट को लेकर ज़्यादा सतर्क नहीं रहती थी.

माणिक ने जैसे hi दिव्या की ओरे देखा, नीरू बुआ की बातों और उसके अवचेतन में बसी 'ताड़ने' की आदत हावी हो गयी. उसकी नज़रें दिव्या के गंभीर चेहरे से होते हुए तुरंत उसके वक्षस्थल की ओरे चली गयीं. दिव्या का शरीर भी अनु और पारी की तरह भरा हुआ था, और एक पल के लिए माणिक ने खुद को वहीँ अटकते हुए महसूस किया.

दिव्या (झुंझलाते हुए): "क्या हुआ? ऐसे क्या घूर रहा है? तुम्हें मेरे साथ चलना है या नहीं?"

माणिक को तुरंत एहसास हुआ की वह पकड़ा गया, लेकिन उसने तुरंत अपनी नज़रों को संतुलित किया. उसके मन में एक कड़वा ताना आया, जो उसकी पुराणी तकरार को दर्शा रहा था.

माणिक (व्यंग्य से मुस्कुराते हुए): "हाँ, मैं तोह चलूँगा तुम्हारे साथ! मैं तुम्हारी तरह मतलबी नहीं हूँ जो ज़रुरत पड़ने पर मन कर दूँ और कहूँ की मैं तुम्हारी असिस्टेंट नहीं हूँ."

यह ताना सीधे उस वक़्त के झगडे से जुड़ा था, जब दिव्या ने उसे पानी देने से मन कर दिया था.

दिव्या (खीजकर): "तुम हमेशा हर बात का बदला लेते हो! मुझे पता था की तुम्हें ताना मारना ज़रूरी है. रहने दो, मैं तुम्हारा एहसान नहीं लेना चाहती. मैं ऑटो में hi चली जाउंगी."

माणिक, जो अब अपनी बाइक निकालने का नाटक कर रहा था, उसकी नज़रें एक बार फिर दिव्या के वक्षस्थल पर पड़ीं. उसके अंदर बुआ और पारी को ताड़ने के बाद एक अजीब सा साहस आ गया था.

माणिक (उसी व्यंग्यात्मक स्वर में, लेकिन अपनी आँखों में एक नै चमक के साथ): "नहीं, नहीं! अब तुम मुझे 'मतलबी' कहकर और परेशां मत करो. चलो, मैं चलता हूँ. तुम बैठो."



👁️ निगाहों का भटकना

माणिक ने अपनी बाइक की चाबी उठाई और दिव्या के साथ दरवाज़े की ओरे बढ़ गया. पूरे रास्ते, दिव्या अपनी किताबों और कागज़ात को संभालने में व्यस्त थी, जबकि माणिक की निगाहें baar-baar उसके शरीर, ख़ास कर सीधे उसके बूब्स को ताड़ रही थीं.

माणिक का दिमाग उसे चेतावनी दे रहा tha—'Yeh तेरी बेहेन है, माणिक! यह गलत hai!'—lekin बुआ के बोल्डपण और पारी की नज़दीकी ने उसके भीतर जो पुरुषवादी हलचल शुरू कर दी थी, उसे रोकना मुश्किल हो रहा था.

दिव्या अपनी पढ़ाई और मेडिकल करियर की महत्वाकांक्षाओं में इतनी उलझी थी की उसने माणिक की आँखों में आयी इस नै, अवांछित चमक को महसूस नहीं किया. उसने बस यही समझा की माणिक हमेशा की तरह उसे ताना दे रहा है.

दिव्या (बाइक पर बैठते हुए): "बस, जल्दी चलो. मेरे पास ज़्यादा वक़्त नहीं है."

माणिक ने बाइक स्टार्ट की, लेकिन उसकी नज़रें एक आखिरी बार दिव्या के शरीर को ताड़ गयीं, जो उसके सामने बैठी थी. उसे यह एहसास हुआ की नीरू बुआ का असर सिर्फ बातों तक सीमित नहीं रहा था. उसने अनजाने में hi अपनी बहनों और बुआ के वक्षस्थल को ताड़ना शुरू कर दिया था. यह एक खतरनाक विकास था, जो मित्तल परिवार के रिश्तों में एक नया और अनैतिक तनाव पैदा कर सकता था.

बाजार का सफर शुरू हो चूका था, लेकिन माणिक के दिमाग में अब सिर्फ सड़क नहीं, बल्कि उसकी बेहेन का अपरिचित आकर्षण और उसकी आँखों का भटकना था.
 
Part -9⚠️ जानबूझकर ब्रेक: अनैतिक स्पर्श और मानिक का आनंद

मानिक और दिव्या बाज़ार के लिए निकल चुके थे। बाइक पर, दिव्या पीछे बैठी थी और दोनों के बीच की दूरी बहुत कम थी। मानिक के दिमाग़ में अभी भी नीरू बुआ की बातें, परी की छवि, और उसकी अपनी आँखों का भटकाव चल रहा था। इन सबने मिलकर उसके अंदर एक अनैतिक साहस और जिज्ञासा पैदा कर दी थी।

मानिक को अपनी बाइक चलाने की आदत थी, और वह जानता था कि किस तरह ब्रेक लगाने पर पीछे बैठे व्यक्ति का शरीर आगे की ओर झुकता है। आज, उसके दिमाग़ में एक ख़तरनाक विचार आया—वह जानबूझकर दिव्या के शरीर के स्पर्श का अनुभव करना चाहता था।

🛑 ब्रेक, बार-बार ब्रेक

सड़क पर ट्रैफ़िक सामान्य था, लेकिन मानिक ने अचानक, बिना किसी ज़रूरी वजह के, तेज़ ब्रेक लगाया।

मानिक की पीठ पर तुरंत दिव्या का शरीर ज़ोर से टकराया। दिव्या के हाथों ने अचानक मानिक की कमर को कसकर पकड़ लिया, और इससे पहले कि वह ख़ुद को संभाल पाती, उसके स्तन (Boobs) मानिक की पीठ से टकरा गए।

दिव्या (हड़बड़ी में): "अरे मानिक! क्या कर रहा है? ध्यान से चला!"

मानिक (सामान्य आवाज़ में, नाटक करते हुए): "सॉरी, सॉरी! वो सामने से अचानक एक कुत्ता आ गया था।"

मानिक ने थोड़ा आगे बढ़कर फिर से बिना किसी स्पष्ट कारण के हल्का-सा ब्रेक लगाया। इस बार टकराव उतना ज़ोरदार नहीं था, लेकिन दिव्या का भरा हुआ शरीर, ख़ासकर उसके वक्षस्थल, एक बार फिर मानिक की पीठ को छू गया।

मानिक को तुरंत एक गहरा, अनैतिक आनंद महसूस हुआ। यह स्पर्श वर्जित था, अनैतिक था, और उसे पता था कि वह अपनी बहन के साथ ग़लत कर रहा है, लेकिन उसके शरीर में एक अजीब सी उत्तेजना दौड़ गई थी। नीरू बुआ की बातों और यौन तड़प ने उसे इस स्तर तक धकेल दिया था।

🧠 दिव्या की अनभिज्ञता

दिव्या, जो अपनी पढ़ाई और जल्दी बाज़ार पहुँचने की चिंता में थी, पूरी तरह से अनभिज्ञ थी कि मानिक यह सब जानबूझकर कर रहा है। उसे लगा कि मानिक हमेशा की तरह लापरवाह ढंग से बाइक चला रहा है, या फिर ट्रैफ़िक ज़्यादा है।

दिव्या (थोड़ा झल्लाते हुए): "मानिक, थोड़ा ध्यान दो न! अगर मुझे कुछ हो गया तो? वैसे भी, तुम हमेशा जल्दबाज़ी में रहते हो।"

मानिक (मन ही मन मुस्कुराते हुए): "हाँ, हाँ, सॉरी दीदी! अब ध्यान रखता हूँ।"

लेकिन उसका 'ध्यान' सड़क पर कम और अगली बार ब्रेक लगाने के मौक़े पर ज़्यादा था।

बाज़ार तक के छोटे से सफ़र में, मानिक ने न जाने कितनी बार अनावश्यक ब्रेक लगाए। कभी किसी रिक्शे के पास आने का बहाना, कभी किसी गड्ढे से बचने का बहाना। हर ब्रेक पर, दिव्या का शरीर, उसके वक्षस्थल के साथ, उसकी पीठ से टकराता रहा।

मानिक को यह स्पर्श एक गुप्त खेल जैसा लग रहा था। यह एक अनैतिक जीत थी, जहाँ वह अपने छोटे भाई होने का फ़ायदा उठा रहा था, और उसकी बड़ी बहन, जो हमेशा उसे नफ़रत करती थी, अनजाने में उसे एक अनैतिक आनंद दे रही थी।

मानिक की पीठ से टकराने वाले हर स्पर्श पर उसके दिल की धड़कन बढ़ जाती थी। उसे यह भी महसूस हो रहा था कि यह कितना भयानक और ग़लत है, लेकिन शरीर की अनियंत्रित इच्छाएँ उसके विवेक पर हावी हो रही थीं।

🛑 बाज़ार में रुकावट

जब वे बाज़ार पहुँचे और मानिक ने बाइक रोकी, तो दिव्या राहत की साँस लेकर उतरी।

दिव्या (गुस्से से): "शुक्र है! तुम तो ऐसे चला रहे थे जैसे आज ही मुझे अस्पताल पहुँचाना है। अगली बार मैं ऑटो ले लूँगी, तुम्हारा यह एहसान नहीं चाहिए।"

मानिक (मासूमियत का नाटक करते हुए): "अरे, दीदी! मैं तो बस तुम्हें सुरक्षित ले आया। ट्रैफ़िक ही ऐसा था।"

उसने अपनी पीठ पर हाथ फेरा, जहाँ अभी भी दिव्या के शरीर का दबाव महसूस हो रहा था। दिव्या को ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि वह अपने भाई की गुप्त अनैतिकता का शिकार हुई है।

मानिक को लगा कि नीरू बुआ के बोल्‍ड विचारों ने उसके अंदर की जो वर्जित इच्छाएँ जगाई थीं, उसने आज अपनी बहन के साथ उस पर एक गंदी मुहर लगा दी थी। मानिक को यह अहसास हो रहा था कि वह एक ख़तरनाक रास्ते पर चल पड़ा है।

🛍️ बाज़ार में निगाहों का पीछा और दिव्या का अनजाना एहसास

बाज़ार पहुँचकर, दिव्या जल्दी से एक बड़ी स्टेशनरी की दुकान में घुस गई, जहाँ उसे मेडिकल की ज़रूरी किताबें और कुछ उपकरण ख़रीदने थे। मानिक बाइक पार्क करके दुकान से थोड़ी दूर, एक चाय वाले की दुकान के पास खड़ा हो गया।

दिव्या, अपने काम में व्यस्त थी। वह किताबें पलट रही थी, सेल्समैन से बात कर रही थी और लिस्ट मिला रही थी।

👁️ मानिक की अनियंत्रित निगाहें

मानिक को अपनी बाइक पर जानबूझकर ब्रेक लगाने से मिला अनैतिक आनंद अभी भी महसूस हो रहा था। अब दूर खड़े होकर, उसकी नज़रें बार-बार दिव्या की ओर जा रही थीं। स्टेशनरी की दुकान में काफ़ी रोशनी थी, और दिव्या जब भी आगे झुककर किताबों के रैक से कुछ देखती, या सेल्समैन को कुछ समझाती, तो उसके कुर्ते की बनावट के कारण, उसके वक्षस्थल की बनावट और भी ज़्यादा स्पष्ट हो जाती थी।

मानिक की निगाहें अब पूरी तरह से अनियंत्रित हो चुकी थीं। नीरू बुआ के बोल्डपन और पिछले कुछ दिनों की वर्जित जिज्ञासा ने उसे एक ऐसे 'ताड़ने' वाले व्यक्ति में बदल दिया था, जो अपने विवेक को पूरी तरह से खो चुका था। मानिक अपने भाई-बहन के रिश्ते को भूलकर, सिर्फ़ एक उत्तेजित युवा के रूप में दिव्या के शरीर को घूर रहा था।

उसे अंदर ही अंदर अपने इस बर्ताव पर घिन आ रही थी। 'यह मेरी बहन है! मुझे क्या हो गया है?' वह ख़ुद से कहता, लेकिन अगले ही पल, उसकी आँखें फिर से दिव्या के शरीर पर चली जाती थीं।

मानिक को यह भी डर था कि कहीं कोई उसे ताड़ते हुए न देख ले, ख़ासकर दिव्या के दोस्तों में से कोई।

शाम के सात बज चुके थे। सूरज डूबने को था। मानिक ने दिव्या को बाइक पर बिठाया और शहर से बाहर की तरफ़ निकल गया। दिव्या को लगा शायद कोई अच्छी जगह ले जा रहा है – नदी किनारा या कोई ढाबा।

लेकिन मानिक का इरादा कुछ और ही था।

वो शहर से 20-25 किलोमीटर दूर एक सुनसान रोड पर पहुँचा, जहाँ दूर-दूर तक कोई इंसान नहीं था। सिर्फ़ बड़े-बड़े पत्थर, जंगल का किनारा और हल्की सी धुंध।

बाइक रोकी। इंजन बंद किया। चारों तरफ़ सन्नाटा।

दिव्या (हँसते हुए, अभी भी मूड अच्छा था):

“अरे वाह… ये तो बिलकुल फिल्मी जगह है। अब बताओ ना, क्या प्लान है?”

मानिक ने कुछ नहीं बोला। उसकी आँखें लाल थीं। साँसें तेज़। उसने एक झटके में दिव्या का हाथ पकड़ा और उसे अपनी ओर खींचा।

दिव्या (हैरान):

“मानिक… क्या कर रहे हो?”

मानिक ने उसका मुँह अपने हाथ से बंद किया और उसकी होंठों पर अपने होंठ रख दिए। ज़ोर का, जबरदस्ती का, बिना इजाज़त का चुम्बन।

दिव्या ने दोनों हाथों से उसे धक्का देने की कोशिश की।

“छोड़ो… मानिक… पागल हो गए हो क्या??”

लेकिन मानिक ने नहीं छोड़ा। उसने दिव्या को पास के बड़े पत्थरों की ओट में ले गया। वहाँ अंधेरा था, सिर्फ़ चाँद की हल्की रोशनी।

उसने दिव्या को पत्थर से सटा दिया। एक हाथ से उसके दोनों हाथ ऊपर कर पकड़ लिए, दूसरा हाथ सीधा उसके कुर्ते के अंदर।

दिव्या की आँखें फैली हुई थीं। डर। गुस्सा। अविश्वास।

“मानिक… रुक जाओ… ये गलत है… मैं तेरी बहन हूँ…”

मानिक (फुसफुसाते हुए, पागलपन भरी आवाज़ में):

“बस एक बार… बस आज… मैं पागल हो रहा हूँ दी… तेरे बिना मर जाऊँगा…”

उसने दिव्या का कुर्ता ऊपर खींचा। ब्रा को एक झटके में ऊपर किया। दोनों बड़े-बड़े स्तन बाहर आ गए। मानिक ने उन्हें ज़ोर-ज़ोर से दबाना शुरू कर दिया।

दिव्या रोने लगी।

“नहीं… छोड़ो मुझे… मैं चिल्लाऊँगी…”

लेकिन चारों तरफ़ सन्नाटा। कोई नहीं था।

मानिक ने अपना पैंट खोला। अपना खड़ा हुआ लंड बाहर निकाला। दिव्या की सलवार का नाड़ा खींचा। उसकी पैंटी नीचे की।

दिव्या ने आखिरी बार ज़ोर से धक्का मारा, लेकिन मानिक का जोश उसकी ताकत से कहीं ज़्यादा था।

उसने दिव्या को पत्थर पर लिटाया। दोनों टाँगें चौड़ी कीं। और बिना कुछ सोचे, बिना कंडोम, बिना सहमति – अंदर घुस गया।

दिव्या की चीख़ जंगल में गूँज गई… लेकिन किसी ने नहीं सुनी।

पहले कुछ धक्के में दिव्या सिर्फ़़ रोती रही, हाथ-पैर मारती रही।

“नहीं… बाहर निकाल… मानिक प्लीज़…”

लेकिन दस-पंद्रह धक्कों के बाद… कुछ बदला।

दिव्या की साँसें तेज़ हो गईं। उसकी आँखें बंद हो गईं। उसका शरीर ढीला पड़ने लगा।

मानिक ने महसूस किया – दिव्या ने विरोध करना बंद कर दिया। अब उसके कूल्हे अपने आप हिलने लगे।

दिव्या (धीमी, काँपती आवाज़ में):

“कमीने… हरामी… धीरे से…”

मानिक ने और ज़ोर से शुरू किया। दोनों पत्थरों के बीच, चाँदनी में, भाई-बहन का ये पाप पूरा हो रहा था।

दिव्या ने अब पूरी तरह से साथ देना शुरू कर दिया। उसने मानिक का सिर पकड़ा और अपने स्तनों पर दबाया। मानिक ने उन्हें चूसा, काटा।

फिर मानिक ने उसे उठाया। दिव्या ने खुद ही घुटनों पर बैठ गई। मानिक का लंड उसके मुँह में।

दिव्या ने पहले हिचकिचाया… फिर आँखें बंद कीं और चूसने लगी। जैसे सालों से ये करना चाहती हो।

मानिक का शरीर काँप उठा। वो दिव्या के मुँह में ही झड़ गया।

दोनों पत्थर पर लेट गए। साँसें तेज़। पसीना। चुप्पी।

कुछ देर बाद…

दिव्या (रोते हुए, लेकिन अब गुस्सा नहीं था):

“तूने मेरे साथ बलात्कार किया… मैं कभी माफ़ नहीं करूँगी।”

मानिक (सिर झुकाए):

“मैं… मैं खुद को माफ़ नहीं कर पाऊँगा दी… लेकिन मैं रोक नहीं पाया।”



दिव्या ने अपना कुर्ता ठीक किया। आँखें पोंछीं। फिर अचानक वो मुस्कुराई – और फिर जोर जोर से हंसने लगी। फिर अचानक उसने उसे पीठ पर धक्का मारा और माणिक डर गया!
 
Back
Top