अपडेट-9
भौमिक जी जो कुछ बोल क्र गए थे उससे भवर सिंह का परिवार चुप चाप सुनकर खामोश बैठा हुआ था, उस शांति को काम्य ने भांग किया,
काम्य- ये सब भौमिक जी बकवास क्र रहे हैं, उन्हें कुछ नहीं पता, बस उस लड़के के मोह में आकर सब बोले जा रहे हैं, हमने कुछ गलत नहीं किया ह, उस लड़के और उसकी माँ ने अपराध किया ह और उसी की सजा उन्हें मिली ह, अमरावती और सौमित्र ने काम्य का समर्थन किया, भवर सिंह चुप बैठा रहा, लेकिन राजगुरु के चेरे पैर दर और तकलीफ दिख रही थी,
रात में राजगुरु भौमिक जी के पास गए, लेकिन भोमिकजी घर नहीं आये थे, राजगुरु परेशां हो गए,
वही महल में जश्न मनाया जा रहा था, सूरज और अभिजीत ने आयाशी के लिए लड़किया बुवाई हुई थी, वो दोनों मदिरा और लड़की का आनंद उठा रहे थे, वही ज्वाला एक जानवर को काट रहा था और उस पैर अपनी हार का गुस्सा निकल रहा था, अमरावती सौमित्र और काम्य एक साथ बैठी थी,
सौमित्र - वो चला गया लेकिन दोनों माँ बेटे थे तो एक करिश्मा hi,
अमरावती - करिश्मा कैसे
सौमित्र- निहारिका का शरीर सच में बहुत खूब सूरत था, देखने वालो के खड़े हो गए होंगे, पूरी परजा को मजा आ गया होगा, कसम से बड़ी फुर्सत से बनाया उसे उप्पेर वाले ने, और वो देवदूत तुमने उसका हथियार देखा था, मुरझाया हुआ भी कितना बड़ा और मोटा था, मुझे नहीं लगता इतना बड़ा किसी का होता होगा, शरीर तो साधारण सा hi था लेकिन उसका लिंग सच में अजूबा था,
काम्य- तुम उसका लिंग देख रही थी
सौमित्र- अरे दीदी नजर चली गई थी बस
अमरावती- बोल तो सच hi रही ह, था तो बहुत बड़ा उसका, बेचारा कहा कहा भटक रहा होगा,
काम्य- वो इस दुनिया से जा चुक्का ह,
अमरावती- क्या कैसे
काम्य- उसे मरवा दिया गया ह, ये बात किसी को पता न चले, ये राज सबसे छुपा हुआ ह लेकिन महाराज ने उन दोनों माँ बेटो को मरवा दिया ह,
सौमित्र- क्या सच में, ये तो कमल हो गया, मतलब हमेशा के लिए हमारा रास्ता साफ़ हो गया उन माँ बेटो से,
काम्य- है बिलकुल,
अमरावती- उस लड़की और उसके परिवार का क्या हुआ
काम्य- वो परिवार लापता ह, न जाने कहा चले गए सब, और वो लड़की भी गायब ह,
सौमित्र- कही आपने hi तो गायब नहीं करवा दिया उन्हें,
काम्य- नहीं इसमें मेरा हाथ नहीं ह, लेकिन उनका मिलना बहुत जरुरी ह, एक तो इस भौमिक ने आकर सब गड़बड़ क्र दी थी, वो भला हो महाराज ने उसकी बात पैर धयान नहीं दिया वर्ण हमारे सर पैर भी तलवार लटकी मिलती,
अमरावती- लेकिन महारज ने उस पैर धयान क्यों नहीं दिया,
सौमित्र- महाराज गुस्से में रहे होंगे, इसलिए ध्यान नहीं दिया, खैर अब हमे जश्न मानना चाहिए,
तीनो बैठ क्र शराब पिने लगी,
वही चारो बहन एक कमरे बैठी थी और सभी उदास थी,
अमिता- मुझे अब भी यकीन नहीं हो रहा निहारिका माँ ऐसा कर सकती हैं,
सोमिया- हम देव की तारीफ कर रहे थे देखो उसने क्या किया,
अक्षरा- देव ऐसा नहीं कर सकता, आपने सुना न भौमिक जी ने क्या कहा था,
अमिता- लेकिन किसी ने उनकी बात नहीं सुनी,
अक्षरा- सुनी क्यों नहीं ये बड़ी अजीब बात ह, महाराज के समाने इतनी बड़ी बात कही गई और उन्होंने उस पैर धयान नहीं दिया,
सोमिया- रीवा तुम कुछ नहीं बोल रही,
रीवा- क्या बोलू, जिसकी माँ और भाई पैर दुराचार का इल्जाम लगा हो और राजय से बहार क्र दिया गया हो, वो क्या बोलेगी, मैं तो शर्म से मर जाना चाहती हु, लेकिन मुझे यकीन नहीं ह मेरी माँ ऐसा करेगी, और देव का भी यकीन नहीं हो रहा, वो ऐसा नहीं कर सकता,
अमिता- हवस कुछ भी करवा सकती ह रीवा,
अक्षरा- जो हवस हम लोगो के भाइयो में दिखती ह वही हवस न, क्या तुमने अपने अपने सेज भाइयो में वो हवस देखि ह, कभी उनकी हवस के लिए तो तुम लोगो में से कोई नहीं बोलै, और जो इंसान दुनिया की हर औरत लड़की को सम्मान की नजर से देखता था उसके अंदर हवस दिख रही ह, इस राजय में कितनी hi लड़किया हैं जो राजकुमारों के साथ सम्भोग करने के लिए मरी जा रही होती हैं, फिर भी उसने कभी किसी को नजर उठा कर नहीं देखा, जब सूरज और अभिजीत ने उस लड़की के साथ दुराचार किया था तब केवल देव था उनका विरोध करने के लिए, उस समय आप सब में से कोई नहीं बोलै की हमारे भाइयो में हवस ह, उस बेचारी लड़की के साथ गलत हुआ, सिर्फ देव उसके लिए लड़ा और उसी की सजा उसे मिली थी, तब महाराज ने ये सजा सूरज और अभिजीत को क्यों नहीं दी, आज उस मस्सों लड़के को ऐसी सजा दी, और निहारिका माँ, इस राजय में एक से एक सूंदर मर्द हैं उनका मन तब तो नहीं भटका, आज भटेगा वो भी उस प्रताप सिंह के लिए, जिसका चेहरा भी कोई देखना नहीं चाहता, ये सब साजिश ह ये सब उन दोनों को फ़साने की साजिश ह,
अक्षरा की बात से वह ख़ामोशी च गई, सबको याद आया की कुछ समय पहले hi सूरज और अभिजीत ने एक लड़की के साथ ये सब किया था और काम्य ने सब कुछ वही ख़तम करवा दिया था, उन्हें कुछ भी नहीं बोलै गया, जब ये बात हम तक पहुंच सकती ह तो क्या महाराज तक नहीं पहुंची होगी,
सोमिया- सही बोल रही ह अक्षरा,
अमिता- हम उसके बारे इतना क्यों सोच रहे हैं, ये हमारा काम नहीं ह
रीवा का रोना निकल गया वो वह से उठी और बहार भाग गई,
सोमिया- कैसी बात करती ह अमिता तू, जो भी हुआ हो सही या गलत लेकिन रीवा को तो तकलीफ होगी न उसकी माँ और भाई हैं वो,
अमिता- मैंने सोचा hi नहीं, रीवा हमेशा हमारे साथ रहती ह न तो याद hi नहीं रहा इसका कोई रिश्ता भी ह उनसे,
अक्षरा गुस्से में अमिता को देखती हुई रीवा के पीछे चली गई,
अगले कुछ दिन ऐसे hi काट गए, महल में सनता था, भवर सिंह अपने कमरे से बहार नहीं निकला था, वही राजगुरु भौमिक जी को ढूंढ ढूंढ क्र परेशां हो चुके थे, वो घर नहीं लोटे थे, बाकि परजा में बस देव और निहारिका की बात थे, शुरू में तो उनके कर्मो की बुराई हो रही थी, लेकिन कुछ hi समय में वो बाते उनके शरीर पैर पहुंच गई, राजय के हर मर्द की जुबान पैर निहारिका के शरीर की तारीफ थी, वही जिन जिन औरतो ने देव के लुंड को देखा था वो सब चुप चुप क्र बस उसके बारे में hi बाते कर रही थी, किसी को फरक नहीं पड़ा था उनके साथ क्या हुआ, सही हुआ या गलत वो जिन्दा हैं या मर गए, किसी को फरक नहीं पड़ता था,
राजय के कुछ आयाश लोग, जो वेश्या वर्ती करवाते थे, या लूट पैट पार्टी थे, ऐसे लोगो के कुछ समूह निहारिका को ढूढ़ने निकल पड़े, उनके लिए निहारिका सोने का अंडा देने वाली मुर्गी थी, अगर वो मिल गई तो वो उनकी कमाई का साधन बन सकती थी, वो लोग राजय के आस पास के इलाको में ढूंढ रहे थे, लेकिन किसी को कोई जानकरी नहीं मिली, उनमे से एक लुटेरे ने राजा के सैनिको से अपनी जानकरी बधाई और उनसे खबर निकलवाई, तो पता चला आखरी बार देव और निहारिका को पहाड़ी पैर लेजाया गया था, तो वो लोग उस पहाड़ी पैर ढूंढ़ने लगे, इस खोजबीन में काफी दिन गुजर गए,
और महल का जीवन फिर से पहले जैसे चलने लगा, इन बीते दिनों में सूरज ज्वाला और अभिजीत पूरी आयाशी में लगे थे, वही काम्य अपने भाई से मिलने के लिए रोज उसके कमरे के बहार घूमती रहती थी, सौमित्र की कामुकता उसे परेशां कर रही थी, और अमरावती अपना जश्न मन रही थी राजय के सेना पति के साथ, उसने सेना पति को वादा किया था, प्रतियोगिता के बारे बताने के लिए उसे इनाम देने का और वो इनाम था अमरावती की छूट, राजगुरु और भवर सिंह के व्यस्त होने की वजह से सेनापति को पूरी आजादी मिल गई और उस आजादी का फायदा अमरावती और सेनापति खूब अच्छे से उठा रहे थे,
उधर सौमित्र पूरा दिन अपने कमरे में नंगी घूमती रहती उसके बदन की गर्मी उससे बर्दास्त नहीं हो रही थी, भवर सिंह उसके पास थे नहीं और सौमित्र बिना सम्भोग किये रह नहीं सकती थी,
इस बिच सात्विक की विद्या पूरी हो चुकी थी, और सात्विक इतना विद्वान बन गया की वो कुछ भी करने की शक्ति रखता था, उसे दक्षिण दिशा की तरफ निकलना था लेकिन उससे पहले वो अपने घर अपने भाइयो से मिलने आया, और जब सात्विक घर आया तो उसे भौमिक जी के बारे में पता चला, सात्विक और भौमिक में काफी प्रेम था, सात्विक को बड़ा दुःख हुआ,
राजगुरु- सात्विक तुम कहा चले गए थे, मैं कितना अकेला हो गया था, तुम भी चले गए थे और अब भौमिक भी चला गया,
सात्विक- भैया मैं आ गया हु न अब सब ठीक क्र दूंगा, आप चिंता मत कीजिये और आपके महाराज जो चाहते हैं मैं उसका हल भी लेकर आया हु,
राजगुरु- क्या सच, क्या ऐसा हो सकता ह,
सात्विक- मैं ऐसी विद्याये सिख क्र आया हु जो कुछ भी कर सकती हैं, लेकिन पहले मुझे दक्षिण दिशा की तरफ जाना ह, वह कुछ ऐसा ह जो हमे सफलता दे सकता ह, लेकिन मैं पहले भौमिक को ढूंढूंगा उसके बाद उधर जाऊंगा,
राजगुरु- कहा धुंडु उसे, मैं उसे कही नहीं ढूंढ पाया
सात्विक- मैं ढूंढ लूंगा, मुझे एक हवन करना होगा
राजगुरु- जो करना ह करो,
सात्विक ने राजगुरु की आज्ञा ली और अपने घर आकर एक तांत्रिक हवन करने बैठ गया, इस हवन से वो किसी भी इंसान को ढूंढ सकता था, तो उसने भौमिक जी को ढूंढ लिया जो अपने धयान में एक पहाड़ी पैर पेड के निचे बैठे हुए थे,
सात्विक ने राजगुरु को खबर भिजवाई की भौमिक जी मिल गए हैं वो उन्हें लेने जा रहा ह, सात्विक भौमिक जी के पास चल दिया,
इधर भवनपुरा में प्रताप सिंह ने हुम्ला कर दिया, उसके अंदर निहारिका को खोने का ऐसा दुःख था जिसे वो बर्दास्त नहीं कर प् रहा था, उसे वडा किया गया था की निहारिका उसकी हो जाएगी, लेकिन निहारिका मर गई, प्रताप सिंह ने अपनी बदनामी करवाई लेकिन निहारिका फिर भी नहीं मिली, प्रताप सिंह इसे अपने साथ धोखा मान रहा था और धोखे का बदला लेने के लिए वो चल दिया हुम्ला करने, उसकी सेना राजय के बहार आ चुकी थी, भवर सिंह को जब पता चला तो उसकी चिंताए बढ़ गई, प्रताप सिंह शक्तिशाली राजा था, उसके पास एक बड़ी सेना थी,
भवर सिंह के कमरे तक ये खबर पहुंचे गई, सेनापति जो अब तक अमरावती की छूट में घुसा पड़ा था वो अपनी सेना को तैयार करने लगा, कुछ hi देर में सभा में सभी जरुरी लोग खड़े थे,
भवर सिंह- ये प्रताप सिंह हम पैर क्यों हुम्ला कर रहा ह, हमने इसे यहाँ से जिन्दा भेज दिया, इस अहसासन का बदला वो युद्ध करके उतरेगा,
राजगुरु- महाराज हमे उससे बात करनी चाहिए, वो हमारा मित्र राजय ह, ऐसे हुम्ला क्यों कर रहा ह,
सेनापति- नहीं हमे हुम्ला करना चाहिए,
राजगुरु- उस सेना पैर हुम्ला करना इतना आसान नहीं ह, वो पूरी तैयारी के साथ आया ह और हमारे योद्धाओ ने काफी समय से युद्ध नहीं लड़ा ह, पूरी सेना को तैयार करने में समय लग जायेगा,
भवर सिंह- आप hi बताइये हमे क्या करना चाहिए,
राजगुरु- हमे उससे बात करनी चाहिए और जाना छाइये वो क्या चाहता ह, क्योकि हुम्ला करने से उसे भी कोई फायदा नहीं होगा, ये बा तवो भी जनता ह वो हमे हरा नहीं सकता, लेकिन नुकसान बहुत कर सकता ह, और इसमें उसका भी नुकसान होगा, और अगर बात चित करने से नहीं मंटा ह तो सेना तो ह hi युद्ध के लिए, जब हम उससे बायचित करते हैं तब तक सेनापति सेना को तैयार करेंगे इससे हमे समय भी मिल जायेगा,
भवर सिंह- ये सही ह, आप अपना दूत भेजिए वह,
काम्य- मैं जाउंगी दूत बनकर
भवर सिंह- नहीं ये नहीं हो सकता हम तुम्हे उस जानवर के पास नहीं भेज सकते,
काम्य- आप मुझ पैर बहरोसा रखिये, मैं hi हु जो बिगड़ती हुई बात को सम्हाल सकती हु,
भवर सिंह- नहीं तुम नहीं जाओगी, राजगुरु जायेंगे
राजगुरु को प्रताप सिंह के पास भेजा गया दूत बना कर,
राजगुरु प्रताप सिंह के सामने खड़े थे,
प्रताप सिंह- भवर सिंह ने आपको भेजा ह शांति के लिए, लेकिन जो मुझे चाहिए उसके बिना शांति नहीं होगी,
राजगुरु- क्या चाहिए तुम्हे,
प्रताप सिंह- जो मुझे चाहिए था वो तो तुम लोगो ने पहले hi ख़तम क्र दिया, मेरा अपमान हुआ ह इस महल में, मैं इस महल को तबाह क्र दूंगा,
राजगुरु- ये तो आप भी जानते हैं महाराज आप हमसे जीत नहीं सकते,
प्रताप सिंह- लेकिन नुकसान तो इतना बड़ा कर सकता हु के ये राजय कभी उभर नहीं पायेगा,
राजगुरु- इससे आपका भी नुकसान होगा, ऐसा रास्ता निकाइये जिससे दोनों को फायदा हो नुकसान नहीं,
प्रताप सिंह- भवर सिंह से कहना मुझे उसकी बेटियों से शादी करनी ह,
राजगुरु – बेटियों से, या किसी एक बेटी से,
प्रताप सिंह- नहीं दो बेटियों से,
राजगुरु- और वो कोण कोण हैं,
प्रताप सिंह- निहारिका की परछाई रीवा और दूसरी जिसे भवर सिंह चाहे,
राजगुरु- ये गलत ह, एक राजकुमारी से विवाह मन जा सकता ह लेकिन दो नहीं,
प्रताप सिंह- मेरी ये hi शरत ह, वर्ण युद्ध झेलो और तुम्हारी परजा को ये भी बता दूंगा की कैसे उस निहारिका को ख़तम किया था तुम सबने,
राजगुरु के चेरे पैर चिंता आ गई,
राजगुरु- ठीक ह मैं महाराज से बात करता हु,
राजगुरु ने वापस आकर भवर सिंह को सब बताया, अब भवर सिंह के पास कोई रास्ता नहीं था, लेकिन रीवा को तो आदेश देना आसान था क्योकि अब उसके लिए बोलने वाला कोई नहीं था वो तो खैर पहले भी नहीं था, लेकिन अब तो वो अनाथ जैसी थी, लेकिन बाकि तीनो राजकुमारियों में से किसे तैयार किया जाये, कोण प्रताप सिंह से शादी करेगी, क्योकि तीनो की माओ को मानना मुश्किल था,
लेकिन ये रास्ता खुद काम्य ने आसान क्र दिया उसने आगे बढ़ क्र अपनी बेटी का नाम बोल दिया, अक्षरा को जब पता चला उसकी माँ ने उसका नाम प्रताप सिंह से शादी करने के लिए बोलै ह तो उसे यकीन hi नहीं हुआ, इधर रीवा जो अपनी माँ और भाई को खो क्र उस प्रताप सिंह से बची थी, अब फिर उसी कैद में जाने वाली थी,
भवर सिंह ने प्रताप सिंह को सन्देश भिजवा दिया की वो शादी के लिए तैयार ह, लेकिन शादी की तरीक वो खुद तय करेंगे,
प्रताप सिंह खुश हो गया,
इधर सात्विक भौमिक जी को ढूंढता हुआ पहुंच गया उस जगह जहा भौमिक जी धयान में बैठे हुए थे, भौमिक जी को देख क्र सात्विक की आँखों में नाम आ गाइट hi, भौमिक जी की हालत hi ऐसी थी, जब से देव मारा था भौमिक जी ने कुछ नहीं खाया पिया था वो भूके प्यासे hi धयान में लगे हुए थे,
सात्विक भौमिक जी के पास बैठ गया,
सात्विक- भैया
सात्विक की आवाज सुनकर भौमिक जी ने आँखे खोल दी,
भोनिक जी- सात्विक मेरे भाई तू आ गया, कहा चला गया था तू, मैं कितना अकेला पद गया था,
सात्विक- तुमने ये क्या हालत बना राखी ह अपनी,
भौमिक जी- मैं अपनी जिमेदारियो में नाकाम रहा,
भौमिक जी ने सात्विक को साडी घटनाये कह सुनाई,
सात्विक- इसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं ह, जो होना ह वो होकर hi रहेगा, तुम एक लड़के के लिए इतना परेशां हो और वही मैंने इतनी बड़ी उपलब्धि प् ली ह, मैंने ऐसी ऐसी विद्याये प्राप्त क्र ली हैं जिससे मैं कुछ भी कर सकता हु, उन्ही विद्याओ की वजह से मैं आपको ढूंढ पाया,
भौमिक जी- ये विद्याये उस राजा को अमरता देने के लिए हैं न जिसने ये सब किया ह, वो अत्याचारी राजा और उसका परिवार, उनके लिए तुम ये सब कर रहे हो,
सात्विक- नहीं भौमिक मैं तो ये सब भैया के कहने पैर क्र रहा हु, और अब खुद के लिए, हमारे लिए, मुझे कुछ ऐसी बाते पता चली हैं जिससे सब बदल जायेगा, मैं दक्षिण दिशा की तरफ जा रहा हु, जब वह से वापस आऊंगा तो देखना मैं सब बदल दूंगा, इस संसार में मेरा नाम विख्यात होगा,
भौमिक जी- मुझे बड़ी ख़ुशी होगी, तुमने किसी को ढूंढ़ने की विद्या पाई ह, क्या तुम मेरा एक काम कर सकते हो,
सात्विक- बोलो
भौमिक- तुम देव का पता लगा सकते हो वो कहा ह,
सात्विक- ये विद्या मरे हुआ का पता नहीं लगा सकती,
भौमिक- मेरा दिल कहता ह वो जिन्दा ह, तुम कोशिश तो करो,
सात्विक- ठीक ह तुम्हारे लिए जरूर करूँगा,
सात्विक ने वही पैर आसान लगाया और धयान में बैठ गया, भौमिक जी को कुछ सामान मंगवाया और हवन करने लगा,
काफी म्हणत करने के बाद भी वो देव को नहीं ढूंढ पाया,
भौमिक जी- क्या हुआ वो मिले
सात्विक- कुछ ह जो मुझे उनके पास तक जाने से रोक रहा ह, एक तेज रौशनी ह जो मुझे आगे देखने नहीं दे रही, ये कहना मुश्किल ह की वो जिन्दा ह या मर गए, क्योकि ये रौशनी उप्पेर वाले की ताकत भी हो सकती ह जो आत्मा का पता नहीं लगने देती, जो आत्माये मोक्ष प् जाती हैं उनके बारे में जान पाना नामुमकिन होता ह, या तो वो मर चुके हैं और मोक्ष प् चुके हैं,
सात्विक की बात से भौमिक जी का दिल रो पड़ा वो हताश हो गए, और जमीन पैर बैठ गए,
सात्विक- भाई आप इतने बड़े ज्ञानी हैं, किसी के जाने पैर ऐसे दुःख मन रहे हैं, इतना तो कोई अपनी संतान के लिए भी नहीं तड़पता, आप अपने परिवार को छोड़ क्र यहाँ भूके प्यासे दुःख मन रहे हैं वो भी एक अनजान राजकुमार का, ये अच्छे ज्ञानी की पहचान नहीं ह,
भौमिक जी- मैं नहीं जनता मेरा क्या रिश्ता ह उससे लेकिन ऐसा लगता ह बस वही अपना था मेरे लिए, उसके जैसी अच्छे मैंने किसी में नहीं देखि,
सात्विक- आप घर चलिए और अपने परिवार के बारे में सोचिये, बाकि सब उप्पेर वाले पैर छोड़ दीजिये, मैं अपनी मंजिल की तरफ बढ़ता हु, वापस आकर देखता हु क्या कर सकता हु आपके लिए,
सात्विक भौमिक जी को घर ले आया, और खुद अपनी मंजिल की तरफ निकल गया,
इधर महल में शादी की तैयारी शुरू हो गई, प्रताप सिंह संतोष तो नहीं था लेकिन उसे सकूं था निहारिका न सही उसकी बेटी तो उसके पास आ रही ह, भवर सिंह ने 15 दिन बाद शादी का समय रख दिया,
इधर सूरज और अभिजीत सुगंधा और उसके परिवार को ढूंढ रहे थे, कस्तूरी भी गायब थी, सूरज सिंह सुगंधा को बर्बाद करना चाहता था, क्योकि उसने भीड़ में से देव की मदद की थी, ये बात सूरज से बर्दास्त नहीं हो रही थी, वही ज्वाला युवराज बनने के लिए खुद को मजबूत क्र रहा था,
रीवा और अक्षरा अपनी किस्मत पैर रो रही थी लेकिन उन्हें बचने वाला कोई नहीं था,
अमरावती और सौमित्र एक बात नहीं समझ प् रही थी की काम्य अपनी बेटी की शादी प्रताप सिंह से करने के लिए क्यों मान गई, अक्षरा तो उसे सबसे ज्यादा प्यारी थी, फिर उस जानवर के पास क्यों भेज रही ह, उसकी कोई चल तो नहीं इस सब में,
क्योकि राजमहलों में कोई भी बिना कारन कुछ नहीं करता, और काम्य जैसी औरत इतना बड़ा कदम क्यों उठाएगी, और प्रताप सिंह कोई जवान लड़का भी नहीं था जिसके साथ अक्षरा का कोई भीतर भविष्य हो, वो भवर सिंह से भी बड़ा था उम्र में,
वही भवर सिंह को जो सकूं मिलना छाइये था वोन hi मिल रहा था, उसकी परेशानिया ख़तम hi नहीं हो रही थी, उसके लिए देव परेशानी थी लेकिन अब तो देव भी नहीं था, वो कभी समझ hi नहीं पाया की असली परेशानी उसकी महत्व कंषा ह, वो सब कुछ पाना चाहता था, अब उसका मन इस एक राजय से संतुष्ट नहीं हो रहा था, उसे और बड़ा राजा बनना था, जिसमे प्रताप सिंह सबसे बड़ा खतरा था, और वो खतरा अब उसके घर ताका ा चुक्का था, अपनी बेटियों का सोडा करके उसने इसका थोड़ अहल तो निकलना चाहा लेकिन प्रताप सिंह पैर विश्वास करना नमूमिक था, क्योकि प्रताप सिंह को भी बड़ा राजा बनना था, दूसरे राजाओ पैर भी राज करना था,
महल को सजा दिया गया था शादी के लिए, भवर सिंह की पत्नी और बेटे को मरे हुए अभी बस महीना भर हुआ था लेकिन उसे उनका कोई दुःख नहीं था, पुरे राजय में hi कोई दुःख नहीं था, कोई दुखी था तो वो थी रीवा और अक्षरा और एक और लड़की जो जंगलो में एक झोपडी में बैठी हुई आंसू बहा रही थी, उसके सर पैर एक आदमी ने हाथ फिराया- मत रो सुगंधा, मत रो
ये थी सुगंधा और आचार्य जी,
सुगंधा- पिता जी वो ऐसा नहीं ह, उसके साथ गलत हुआ ह,
आचार्य जी- मुझे भी यकीन नहीं होता वो ऐसा करेगा, लेकिन कस्तूरी झूट क्यों बोलेगी,
सुगंधा- अगर वो झूट नहीं बोल रही थी तो उसने आपको या घर में किसी को क्यों कुछ नहीं बताया, और वो ह कहा, उस दिन से गायब क्यों ह, और उसके साथ माँ भी गायब ह,
आचार्य जी- मैं खुद परेशां हु, लेकिन धुन्धु भी तो कहा, हम दोनों खुद समाज की नजरो से छिपे हुए यहाँ जी रहे हैं, हमे जरूर राजा के लोग दूध रहे होंगे, हमारी वजह से उनका बीटा और पत्नी को महल से निकल दिया गया,
सुगंधा- वो लोग कभी देव को न प्यार देते थे न hi सम्मान, उन्हें फरक नहीं पड़ता देव के साथ क्या हुआ, और आप कभी उस पैर शक मत करना, सूर्य अपना रास्ता बदल सकता ह लेकिन देव ऐसा कुछ नहीं कर सकता, एक बार ये कस्तूरी मिल जाये तब सच का पता चले,
शादी का समय नजदीक आता जा रहा था, प्रताप सिंह ने एक सेना तैयार की हुई थी जिसमे 500 सैनिको को अलग से तैयार किया गया था, जो इस काबिल थे की वो 500 सैनिक 10000 की सेना को आराम से मार गिराए, बहुत hi खूंखार थे वो,
शादी के दो दिन पहले hi प्रताप सिंह की बारात भवर सिंह के महल में आ चुकी थी, और प्रताप सिंह उन सैनिको को बाराती बना क्र महल के अंदर ले आया था, उसे अंदर डार्ट है कही भवर सिंह धोखा न कर दे, पुरे राजय में खुशिया मनाई जा रही थी, प्रताप सिंह के महल में आते hi सबसे पहले काम्य ने उसका स्वागत किया, अमरावती और सौमित्र भी खुश थी, क्योकि उनकी बेतिया बच गाइट hi, वही सूरज और अभिजीत भी प्रताप सिंह के स्वागत में लगे हुए थे, लेकिन ज्वाला वह से गायब था,
रात में काम्य प्रताप सिंह के पास पहुंची अकेले में,
प्रताप सिंह- आओ आओ काम्य जी, आपको देख क्र हमारा दिल खुश हो जाता ह,
काम्य- इसीलिए अपनी बेटी को भेज रही हु, ताकि आप उसे देख क्र खुश होते रहे,
प्रताप सिंह- हमारी इच्छा तो आपको ले जाने किट hi, लेकिन लगता ह अब आपकी बेटी से hi सबर करना पड़ेगा,
काम्य- लगता ह आपको कुँअरि लड़कियों की जगह हम जैसे भरे बदन की औरतो की चाहत ह,
प्रताप सिंह- सभी औरतो किन hi, आपकी चाहत ह बस
काम्य- और निहारिका की, उसकी चाहत नहीं थी,
प्रताप सिंह- क्यों जले पैर नमक छिड़क रही हो काम्य जी, उस औरत को पाने के लिए मैं दुबारा जनम भी ले सकता हु, मुझे हैरत ह की इतने वर्षो तक वो औरत मेरी नजरो के सामने क्यों नहीं आई, कसम पैदा करने वाले की उसे पाने के लिए मैं पूरा राजय उजाड़ देता,
काम्य- हहहहह शायद इसीलिए उप्पेर वाले ने उसे आपसे बचा क्र रखा था,
प्रताप सिंह- खैर उसकी बेटी भी उससे कुछ काम नहीं ह, लेकिन निहारिका होती तो कुछ अलग hi होता,
काम्य- निहारिका की बेटी और मेरी बेटी दोनों से आपकी शादी हो रही ह, लेकिन मेरी बेटी की तुलना उसके साथ मत करना, वाओ अहा रानी की तरह रही चाहिए, और वो रीवा नौकरानी की तरह,
प्रताप सिंह- अच्छा आप इसलिए यहाँ आई हो, आप जानती हो मेरी पहले से 4 रनिया ह, जिनमे से 2 तो काफी उम्र की हो चुकी हैं, फिर भी रनिया तो वही हैं, उनके बराबर का सम्मान तो इन दोनों को hi नहीं मिलेगा, उन रानियों से अलग भी न जाने कितनी hi राजकुमारी मेरी गुलाम हैं, मेरी चारो रानियों से 10 बच्चे हैं, और नाजायज कितने हैं ये तो मुझे गिनती भी नहीं ह, मेरे अंदर इतना वीर्य भरा हुआ की मन करता ह पुरे राजय की औरतो को अपने बच्चो की माँ बना दू, अब ये दोनों भी मेरे लुंड की सवारी करेंगी, और मेरी औलाद पैदा करेंगी, इनके बच्चे बड़े होकर मेरे राजय की सेवा करेंगे, फिर भी मैं आपकी बात का धयान रखूँगा, लेकिन उसमे मेरा क्या फायदा होगा,
काम्य- क्या चाहिए आपको
प्रताप सिंह ने मुस्कुरा कर काम्य को देखा,