अपडेट 216
प्यार और चाहत (2)
अभी रात के सिर्फ 8 हे बजे थे लेकिन साफ़ मौसम में ठंडक बढ़ने के साथ हे बहार खुली सड़को और आसमान को बर्फ सा कोहरा ढकने लगा था. देश का दिल कहे जाने वाला ये शहर जो देश की राजधानी भी था, इसके मौसम के मिजाज सर्दियाँ शुरू होते हे ऐसे बदलते थे जैसे संसद में बैठे राजनेता. ये स्थान बाकी हिस्से जैसा अत्यधिक व्यस्त तोह नहीं था लेकिन फिर भी thik-thaak चहल पहल थी और आसपास की हरियाली के पीछे हे प्रसिद्ध कॉलेज लगता था जहा से ये 3-4 दुकाने, छोटा सा होटल और ढाबा आबाद थे. लम्बे तगड़े नौजवान के साथ सधी हुई चाल से चलता ये आकर्षक अधेड़ कॉलेज और शहर के आधुनिक युवक युवतियों की भीड़ को पीछे छोड़ कर ढाबे के पीछे हे चारदीवारी से घिरे उस खुले स्थान पर आ पहुंचे जहा बस एक पीला लट्टू रोशन था और लगभग खस्ताहाल सा एक सोफे, 2 कुर्सियां और एक लोहे के पाए वाला लकड़ी के मेज पड़ा था.
"बहोत मुश्किल है भतीजे दिल्ली जैसे शहर में ऐसी जगह मिलना जब यहाँ एक इंच जमीन खाली न मिलती हो. लेकिन बढ़िया ठिकाना है तुम्हारा और कॉलेज के भी ठीक पीछे. वो सब दोस्त थे जिनके साथ तुम खड़े थे वह?", व्यक्ति उस सोफे पर चौकड़ी सी मार के बैठा जिधर युवक ने उन्हें बैठने का आग्रह किया था. आपस में उलझे हुए घुंगराले बाल जिन में उम्र के हिसाब से उतनी सफेदी तोह नहीं थी और जिस्म भी 50 की उम्र में किसी 35 के खिलाडी सा था. सर्दी की वजह से कमीज के ऊपर बंद गले की ऊनी जैकेट और गरम पतलून के निचे सिर्फ मौजे, क्योंकि जूते पहले हे उतर चुके थे. बेतरतीब और घनी दाढ़ी वाला ये हत्ता कट्टा पहलवान तोह ऐसे मौसम में भी सिर्फ लाल रंग की कासी हुई टीशर्ट और सफ़ेद रंग के खिलाडियों वाले महंगे पाजामे में था, निचे 3 लाल पट्टी वाले सफ़ेद जूते. किसी 13-14 बरस के किशोर की जांघ से मोटी तोह इसकी सख्त भुजाएं थी और अपने चाचा के सामने उस काठ की कुर्सी पर बैठते हुए जब कोहनियां मदद कर मेज पर टिकाई तोह युवक के चाचा ने भी उन बड़ी मछलियों पर गौर किया जिन्हे अभी सही से उभरा भी नहीं गया था.
"इधर आसपास ऐसे हे हरा भरा माहौल है चाचा, बेमतलब की न कोई भीड़ और न हे बाकी दिल्ली जैसा बुरा हाल. वैसे दिल्ली में जंगल और हरियाली है लेकिन उधर जाने का दिल नहीं करता यहाँ के लोगो का और जो घूमने आते है उन्हें तोह वही रौनक देखनी होती है जो सुनी और टीवी पर देखि होती है. और चची कैसी है? वैसे आप 3 साल में दूसरी बार आये है और शायद मेरे एडमिशन के बाद पहली बार.", कोहरा इस जगह बेअसर था शायद मुख्या इमारत उसमे बढ़ा रही होगी. अपना जवाब और उसके बाद सवाल पूछ कर युवक ने सफ़ेद रंग की सिग्रत्ते की डिबिया और धातु का लाइटर अपने चाचा की तरफ खिसका दिया जो उसमे से सिग्रत्ते निकाल कर मेज पर फ़िल्टर की तरफ से ठोकने के बाद होंठो में भर के सुलगते हुए एक गहरा काश खींचने के पश्चात वो सफ़ेद धुआं आसमान में ऊपर दीखते कोहरे में शामिल करने लगा. लाल स्वेटर, ढीली से पतलून और पाँव में रबर की चप्पल पहने ये हंसमुख सा काम उम्र लड़का पानी, बर्फ, सोडा और शराब की बोतल इन दोनों के बीच पड़ी मेज पर रखते हुए युवक से मुखातिब हुआ.
"जूनि भैया, वो शकरकंदी वाला तोह नहीं मिला. काले चने की चाट और टिक्का तैयार है. ले औ?", ये जूनि उर्फ़ अर्जुन हे था जिस से नेपाली मूल का ये ऊर्जावान किशोर उसकी मर्जी पूछ रहा था. दोनों हे दुनिया का एक क्रूर उदहारण थे. एक नाबालिग उम्र में ढाबे पर काम करता था और दूसरा विद्यार्थी जीवन में हे दुनिया का हर सुख ले चूका था. सामने जो इंसान बैठा इन्हे देख रहा था वो कोई और नहीं बल्कि अर्जुन का धरम चाचा विष्णु वर्धन था.
"जा ले आ लेकिन टिक्का एक एक सलाई करके लाना और वो mooli-gaajar का सलाद हरी चटनी के साथ. और अगर सरदार या लम्बू में से कोई पूछने आये तोह बोल देना के मैं जरा घूमने गया हु आरफा के साथ.", लड़का इस आखिरी बात पर दिल से मुस्कुराया जैसे उसको सब पता हो इनके बारे में और अर्जुन ने भी 50 का गुलाबी नोट उसकी ऊपर वाली जेब में रखते हुए कन्धा हलके से थापक दिया.
"तुम्हारी चची ने गूंद के लड्डू भिजवाए है, जाते हुए याद से गाडी से निकल लेना. वैसे तुम बहोत बदल नहीं गए कॉलेज में आने के बाद?", विष्णु ने सिग्रत्ते उसकी तरफ बधाई तोह अर्जुन ने स्पष्ट इंकार में सर हिला दिया. दोनों के लिए जाम बनाते हुए भी वो अपने चाचा को देख रहा था और बिना गिलास देखे हे जाम बराबर भरने के बाद एक में बर्फ सोडा और दूसरे में सिर्फ पानी भर के बिना बर्फ वाला गिलास अपने चाचा की तरफ बढ़ा दिया. दोनों ने हलके से जाम टकराया और छोटी छोटी चुस्की ले कर गिलास वापिस मेज पर.
"बाल कुछ छोटे हो गए है और दाढ़ी कुछ ज्यादा बड़ी. बाकी तोह मैं पहले जैसा हे हु. हाँ चची को हमेशा याद रहता है की सर्दी शुरू हो गयी तोह मेरी खुराक मेरे पास पहुचनी चाहिए. वैसे सिर्फ मुझसे मिलने हे आये थे या कोई और प्रयोजन भी था इधर आने का?", अर्जुन अपने होंठो के सामने आती मूंछ को दोनों तरफ ऊँगली से सही करता हुआ जाम को ऐसे हिलने लगा जैसे बर्फ घोल रहा हो. कांच का मोटा गिलास बहार से भी सफ़ेद सा पड़ने लगा. उसकी बात सुन्न कर विष्णु के स्वाभाविक गंभीर से चेहरे पर हलकी सी मुस्कान बन्न पड़ी.
"तुमसे भी मिलना था और गुडगाँव में इन्दर उमेद भाई से भी. तुम्हारे पापा भी साथ हे आये थे लेकिन वो वही रुक गए कोई जरुरी मीटिंग थी शंकर की वह. वैसे ये आरफा कौन है भतीजे? तुम कही किसी आग से तोह नहीं खेल रहे? पहले हे तुम्हारी समस्याएं काम नहीं है जो तुम उन्हें अधिक बढ़ने में लगे हो.", विष्णु को यक़ीनन परवाह थी अपने भतीजे की लेकिन जैसे वो भी अर्जुन के सामने खुल कर कहने से गुरेज कर रहा था जैसे कोई गुस्ताखी न कर बैठे.
"मेरी समस्याएं? मीटिंग में भी कुछ तोह सुना हे होगा आपने नहीं तोह आप उन्हें छोड़ कर मेरे पास नहीं आते. हाँ लड्डू तोह सुबह जाते हुए भी पकड़ा जाते क्योंकि पापा अगर आये है तोह वो रात रुकेंगे हे उधर. तोह कौनसी नयी शिकायत सुन्न ने को मिली मेरे बारे में?", आरफा वाली बात को अर्जुन सिरे से हे ताल गया था क्योंकि कुछ ज्यादा जरुरी पहलु सामने थे. वो लड़का गरम गरम टिक्का, चना चाट और सलाद रख कर ख़ामोशी से निकल गया और इस बार उसने इधर से भीतर जाने वाले उस लकड़ी के जर्जर से दरवाजे को बंद कर दिया था.
"ये बगल में जो रेस्टॉरेंट है, तू जानता है वो किसका है? उसके बहार 2 गाड़ियां धुल चाट रही है, वो किसकी है? एक आदमी है गजेंद्र भल्ला जो यहाँ नहीं होता तोह तेरी ज़िन्दगी और मुश्किलों से भरी होती. अर्जुन जितना समझदार मैंने तुम्हे देखा था न तुम अब उसके उलट होते जा रहे हो. ये अपना शहर नहीं है और न सब हमारे झमेले. उमेद... उमेद को भी तुमने कसम दे कर इधर आने से मन कर रखा है ये जानते हुए भी की वो जान न्योछावर करता है सिर्फ तुम्हारे लिए.", अर्जुन तोह बस मुस्कुरा रहा सब सुन्न कर और एक छोटी प्लेट में टिक्के और चटनी दाल कर अपने चाचा की तरफ बढ़ा दी.
"आराम से 2-3 पेग तोह लगा लो चाचा पहले. और कौन गजेंद्र भल्ला? और वो जिनकी गाड़ियां धुल चाट रही है 8-9 महीने से, 2 दर्जन थे वो लोग और अगर उतनी हे बड़ी टॉप होते तोह आते न फिर से वापिस. होटल पे मेरा नंबर छपा है आजतक और आधा दिन मेरा उसकी बेसमेंट में गुजरता है. यहाँ.. यहाँ रखता हु मैं ऐसे टटपुँजियों को.. भल्ला अंकल से मेरा कोई लफड़ा नहीं है लेकिन उन्हें भी कह चूका हु की मैं उनके रस्ते नहीं आऊंगा और वो मेरे मामले में दखल न दे. ऑप्शन है भी नहीं उनके पास और कोई.. ज्यादा से ज्यादा पापा से मश्वरा करेंगे और आपके सामने भी ऐसी हे बात हुई होगी तभी आपको चिंता हो गयी मेरी. गलत कह रहा हु कुछ? बदला मैं नहीं हु चाचा, मुझे तोह सबने मिल कर और घेर कर बदलने पर मजबूर कर दिया है जबकि बदलाव उन सभी में हुआ है ऐसा करने वालो के.", अर्जुन ने जिस तरह अपनी जांघ थपकी थी हँसते हुए विष्णु ने जाम खाली कर दिया.
"तू शेर है बीटा और ये बात तोह खुद वो सब लोग मानते है जिन्हे तू मेरे सामने हे नंगा कर रहा है और शायद मैं भी उनमे से हे हु. भल्ला तेरी तारीफ हे कर रहा था और रौनकलाल जी भी. बस फ़िक्र करते है थोड़ी क्योंकि तेरे कारनाम्ने उन तक पहुंचते रहते है. इस बार डेढ़ महीना हो गया है तुझे घर आये हुए. तेरी दोनों चची के साथ तेरी माँ और ताई भी तुझे बड़ा याद करती है रे. माँ जी का तोह पूछ हे मैट अगर तेरा जीकर भी कर दो तोह उठ कर चली जाती है. सबसे ज्यादा प्यार उन्होंने अगर किसी से किया है तोह वो तू है जबकि मुझे शंकर या बौ जी लगते थे. ऐसा कितना व्यस्त है तू यहाँ अर्जुन जो 6 हफ्ते में एक बार भी घर आना नहीं हुआ? कुलजीत जब जब तेरी बनाई क्यारी में बैठती है तोह उसकी बातें बस तुझसे शुरू और तुझ पर ख़तम. बोल रही थी की हम सबने एक मासूम को कही दफ़न हे कर दिया. कल शनिवार है, साथ हे चल पद.", विष्णु की बातें सुन्न कर एक पल को तोह अर्जुन की आँखों के सामने वही सब चेहरे घूम गए जिनके बिना उसका अस्तित्व हे नहीं था. फिर एक हलकी मुस्कान क्योंकि कोई और भी था जिसकी हालत उसके हे जैसी थी.
"पहले हे आपके भाई साहब और बौ जी की वजह से 3 पेपर नहीं दे पाया पिछले सेमेस्टर के और ऊपर से 20 दिन hospital/chutti पे रहा वो अलग. ये तोह हिस्ट्री ाची है मेरी कॉलेज में नहीं तोह बहार हे कर देते मुझे. दिवाली पर आऊंगा घर अब और वैसे भी 8 दिन बाद हे तोह है दिवाली. चची के पास भी रुकूंगा एक दिन और बाकी टाइम वो दादी के पास आ जाएँगी जितने मैं उधर रहूँगा. वैसे एक शिकायत तोह है मुझे आप दोनों से चाचा.", अर्जुन उनका जाम उन्हें दे कर इस बार सिर्फ बर्फ में हे अपनी शराब का स्वाद ले रहा था. और शिकायत सुन्न कर विष्णु भी थोड़ा नजदीक चेहरा करके देखने लगा की अब ये जाने कौनसा तंज कसने वाला है क्योंकि इम्तिहान और हॉस्पिटल वाली बात याद दिला कर सर तोह कुछ झुका हे दिया था उसने अपने चाचा का.
"बता बीटा, मैं और तेरी चची हर शिकायत दूर करेंगे अपने बेटे की."
"याद है जब बैठक में मैं और ऋतू घर के सभी बड़ो के सामने अपराधी की तरह खड़े थे? मेरे जीवन की सबसे यादगार होली और तारीख, 20 मार्च 2000. प्यार पर राजनीति हुई थी उस दिन और मेरे सभी संरक्षक एकमत मेरे खिलाफ, हमारे प्यार के खिलाफ. आप 2 लोग भी अगर साथ देते तोह शायद.. शायद मैं खुद को ज़िंदा महसूस कर सकता था. भैया को वह बैठने नहीं दिया गया, उमेद चाचा को बुलाया नहीं, मेरी बुआ को इस से अलग रखा और यहाँ तक की इन्दर चाचा ने पापा की हाँ में हाँ मिलाई और उनके साथ आपने और कुलजीत चची ने भी. मुझे मेरी माँ, चची और दादी को मन करना पड़ा क्योंकि फैंसला और गठबंधन विपक्ष में पहले हे निर्विरोध तये हो चूका था. क्या लगता है बूढ़े शेरो ने ek-jutt हो कर अपने शावक का शिकार किया या प्रतिद्वंदी का? मैं बुरा नहीं मानूंगा लेकिन जानकारी होनी चाहिए या इसके पीछे आपका नजरिया. अगर मैं समाज के इतना हे खिलाफ था तोह विरोध करने वाले सभी दूध के धुले थे? जिनको चाहत, प्यार, हवस और अधिकार में हे फरक न पता हो उनकी अदालत में मैं मुजरिम साबित हुआ.. मैं हुआ सो हुआ लेकिन ऋतू.. उसको भी दण्डित किया और बची तोह प्रीती भी नहीं जिस वजह से रोमिला आंटी वापिस विदेश लौट गयी. मुझे शिकायत नहीं है आपसे चाचा क्योंकि मैं तोह समझ लीजिये आपसे कल हे मिला हु और आपका सम्बन्ध पापा, चाचा और बौ जी से दशकों पुराण है. बस मुझे वजह जान नई है ऐसा करने की और यकीन रखिये मेरे लिए आप हमेशा मेरे वही चाचा रहेंगे जिनकी छाया में मैंने उसके बाद भी पूरा एक बरस गुजरा है.", किसी सम्मानित व्यक्ति के चेहरे पर भिगो को जूता मारा गया हो भीड़ में तोह जैसी उसकी हालत होती है ठीक वैसी विष्णु जी की थी इस निर्जन से प्लाट में. उड़ता कोहरा अब कुछ कुछ निचे भी होने लगा था लेकिन विष्णु का जिस्म ठंडक की जगह अलग सी गर्मी में डूबने लगा. अर्जुन के कहे हर अल्फाज ने उसको वो दृश्य, वो घडी याद करवा दी जहा सभी पहले रंगो का त्यौहार मानते आनंद ले रहे थे लेकिन उसके बाद बंद बैठक में शंकर की गर्जना, पंडित जी को उसको शांत करवाना और फिर 2 प्रेमियों के कबूलनामे से कई चेहरों का रंग उड़ना. उन पर न चाहते हुए भी अभियोग लगाया गया था और तत्काल फैसल भी सुना दिया गया जैसे इसकी जांच दोबारा होना उनके हिट में नहीं होता.
"क्यों इतने समय बाद बीती बातें दोहरा रहे हो अर्जुन? मैं भी इंसान हु और तुम्हारे पापा और दादा भी. हर इंसान समाज से नहीं टकरा सकता और सही गलत का फेर भला सबको समझ आता तोह कानून और समाज की आवश्यकता हे क्यों पड़ती?", अर्जुन ने बस ये सुन्न कर ख़ामोशी से अपने जाम से एक बड़ा घूँट पीने के बाद अलग सिग्रत्ते सुलगा ली जिसके 2 काश लगाने के बाद जमीन पर पाँव के नीचे कुचलता हुआ वो फिर से शराब का घूँट आहिस्ते आहिस्ते गले से निचे गिराने लगा. वो जानता था की विष्णु जी अभी भी बचाव की हे मुद्रा मैं है और विष्णु को पता था की आज वो निरुत्तर है इस युवक के सामने. आखिर वो खुद भी तोह शामिल थे उस फैंसले में जो अर्जुन और ऋतू के विरुद्ध गया था.
"आपकी कलाई पर जो नाम लिखा है, उसके लिए आपने कभी समाज की परवाह की थी चाचा?", इन्दर और अर्जुन हे तोह लिखा था दोनों हाथो पर विष्णु के और यहाँ अर्जुन के सटीक प्रश्न पर विष्णु ने ना में गर्दन हिलाई.
"दोस्ती से कही ज्यादा बड़ा रिश्ता है हम तीनो का चाहे फिर अज्जू आज दुनिया में नहीं लेकिन दिल में हमेशा है. मैं वह होता तोह ऐसा हरगिज नहीं होने देता. लेकिन मैं वह नहीं था और न Inder-Shankar में से कोई. लाशें गिरना सिर्फ अज्जू को हे नहीं आता था, मैं भी उतना हे माहिर हु अगर बात हमारे प्यार और भाईचारे की हो. खैर वो वक़्त जा चूका और बीता वक़्त लौट के नहीं आता.", इस नाम को सुन्न कर एक घूँट में हे विष्णु ने वो पूरा जाम खाली कर दिया था और फिर अपनी बात कही.
"प्यार.. और आप सभी ने मेरे पापा के उस प्यार का भी समर्थन किया जिसने बर्बाद करने के सिवा कुछ न किया. उसकी कीमत भी मुझे हे चुकानी पड़ी जिसका जरा सा भी पछतावा नहीं देखा मैंने उनके चेहरे पर क्योंकि गोली तोह मुझे लगी थी न. कितने बढ़िया दोस्त और प्यार करने वाले है जो अपने गिरेबान को तोह paak-saaf दिखते है लेकिन बाकी हर प्यार उन्हें मैला या समाज के विरुद्ध लगता है. 63 कतल करने वाले आप भी कुछ काम नहीं डॉ शंकर जी से जिनकी गिनती इस से दुगनी हे होगी और घर से बहार अनैतिक सम्बन्ध इसके भी दुगने. श्रीमान नरिंदर जी, आपका दूसरा प्रेम.. उनके अनैतिक सम्बन्ध तोह नहीं लेकिन समाज के विरुद्ध काम अनगिनत रहे है उनके भी लेकिन इतने साफ़ है जैसे बेहटा पानी. ताऊ जी के बारे में तोह कुछ नहीं कहूंगा लेकिन राजेश मां, नाना जी और स्वयं मेरे बाउजी भी खुद को साफ़ साबित नहीं कर सकते इन्साफ के तराजू में. क्योंकि वो खुद चाहत और अधिकारों के बस अधीन है. उन्हें खुद को साबित करना था के वो न्याय हितेषी है फिर चाहे किसी की दुनिया हे उजाड़ जाए. आप तोह भली भांति जानते हो की अगर मैं समाज और परिवार के विरुद्ध होता तोह ये वनवास ऐसे नहीं स्वीकार करता. लेकिन जब आप लोग गलत नहीं तोह मैं कसूरवार कैसे हुआ चाचा?", विष्णु को उसकी बातों में उलझा चूका था उसका भतीजा और यहाँ समाज का जो ज्ञान उन सभी के करम छुआपये था वो सामने रख छोड़ा.
"चलो छोडो ये सब बातें चाचा, जवाब इतने भी जरुरी नहीं. मैं भूल गया था के मेरा जनम बस मकसद पूर्णता के लिए हे हुआ था और अब वो हो गए है तोह मेरी परवाह का दिखावा आधी अधूरी जिम्मेवारी से अधिक नहीं. लेकिन अगली सुनवाई पर भी जरूर शामिल होना जब वनवास पूरा होगा और मेरी ज़िन्दगी को मैं उसी बैठक में सबके सामने वापिस पाऊंगा. बड़े जो करते है वो भलाई के लिए हे तोह करते है.", अर्जुन की खरी खरी सुन्न कर विष्णु को भी अपनी वास्तविकता का पूरा एहसास हो चूका था. ये युवक तोह सब सहने के बावजूद आजतक खामोश हे रहा था. उनके साथ भी मुस्कुराया जो गुनेहगार थे और उनसे दूर भी रहा जो इसको दिल से चाहते थे. एक तरह से तोह जैसे इसने प्यार के बदले दर्द से हे रिश्ता जोड़ लिया था.
"माफ़ करना बीटा, गलती तोह हुई है मुझसे और बाकी लोगो ने किसी दबाव में ये सब कर दिखाया. तुम्हारे साथ गलत करने के बावजूद तुमने न सिर्फ मेरी, शंकर और इन्दर की जान बचाई बल्कि अज्जू के कातिल तक को बेपर्दा कर दिखाया जो हम जैसे अत्यधिक सक्षम 30 बरस में न कर सके. तुमने हमेशा परिवार को हे प्रमुखता दी लेकिन शायद हम ऐसे प्यार को समझने की जगह उसको अधिकार और जागीर मान बैठे. फरक नहीं पता न चाहत और प्यार का.. सीखा है तोह बस अधिकार, ताक़त, समाज में प्रतिष्ठा.. इस बीच दिल से सोचना हे भूल बैठे. अंधे अक्सर दीवारों से टकराते हुए यही सोचते रहते है की वो दीवारे टॉड रहे है अपनी टक्कर से.. ये भूल जाते है की वो भले हे मजबूत हो पर है तोह अपने हे अन्धकार में क़ैद. इन्दर कहता था की उसका अर्जुन न सबके दर्द से खुदको जोड़ लेता है इसलिए वो हम सबसे बेहतर है. उसका अर्थ मैं अब समझा जब अज्जू याद आया. वो नहीं था इतना सक्षम.. वो दुःख नहीं झेल सकता था चाहे वो सबसे तुम्हारी तरह हे प्यार करता था लेकिन हाथ से बात मनवा लेता था वो. प्यार की समझ सही से उसको भी नहीं थी जिसका पता 30 बरस बाद चला. जिसको है उसका मैं गुनेहगार बन्न बैठा. सचमुच क्योंकि शंकर ने मुझे विवश नहीं किया था तुम्हारे खिलाफ वोट देने के लिए. भेड़चाल थी बीटा वो और उनके साथ मैं भी ज्यादा हे सामाजिक जानवर बन गया. मेरे लिए तोह वह बहिन भाई खड़े थे लेकिन .. गलत हुआ तुम्हारे साथ.. बस अब तुम कोशिश करना बेटे की खुदको ज्यादा दर्द न दो. अलगाव के बाद जरूर मंज़िल तुम्हारे नसीब में होगी. एक साल बाद हे सही. मैं अब चलना chaunga.",Vishnu का मैं आहात हो उठा था जबकि अर्जुन ने उसका हाथ पकड़ कर वापिस बैठने पर विवश कर दिया.
"मैंने पहले हे कहा था चाचा की मुझे शिकायत नहीं है बस जान न चाहता था की ऐसा किस वजह से किया. अब फैंसला चाहे हक़ में हो या खिलाफ, मान न तोह पड़ेगा हे. बाकी बात परिवार की है और मेरी एकमात्र चाहत की जो मैंने मांगी लेकिन उन्हें परीक्षा लेनी है तोह फिर ये भी सही. हाँ अब इसके बाद अगर कुछ और खेल हुआ तोह फिर बस चाहत हे बचेगी मेरे पास जिसके साथ अगर जी न सका तोह बाकी सबके साथ रहूँगा भी नहीं. चलिए ख़तम कीजिये, अगला बनाते है. आपको शायद ठण्ड लग रही है.", अर्जुन अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए आसमान से गिरते कोहरे का गीलापन साफ़ करके विष्णु जी को देखते हुए बोलै. विष्णु जी तोह गुजरे समय को हे याद कर रहे थे की कैसे अर्जुन अब भी अपने घर आने के बाद नियम से उनके यहाँ ाचा समय गुजरता, सबके बीच हँसता मुस्कुराता रहता लेकिन जितना मुमकिन होता वो घर के हे काम काज में व्यस्त रहता था जो उसकी gair-hajri में अधूरे रहते थे. वह वो ये नहीं देख सके थी की काम तोह पूरे हो जाते थे लेकिन अर्जुन अपने अधूरेपन से झूझने की भरसक कोशिश करता था ऐसा करके.
"ऋतू बिटिया से आखिरी बार कब बात हुई थी तुम्हारी?", सिग्रत्ते का पैकेट उन्होंने अपनी जेब में रखते हुए स्वेटर पर जमी ौस झाड़ने के बाद जाम ख़तम किया और जो बोलै तोह अर्जुन कुछ पल के लिए एक तरफ शुन्य में खो गया. कब बात हुई थी आखिरी बार?
"22 मार्च 2000, दोपहर 12:45 पे. साढ़े 3 साल होने को है अब और उतना हे वक़्त हो गया प्रीती से बात किये हुए.", अर्जुन के इस जवाब से स्वयं विष्णु जी का सर झुक गया और अगला जाम उन्होंने भी बिना किसी पानी और बर्फ के एक सांस में खींचने के बाद स्थान छोड़ दिया.
"इस बार के इम्तिहान के बाद बस 6 महीने और रहेंगे कॉलेज पूरा होने को. तुम्हारी चाहत को तुम्हारा ये चाचा हर हाल में पूरा करेगा भतीजे, चाहे फिर बाकी सबसे किनारा हे क्यों न करना पड़े. कोई जल्दबाजी मैट करना अर्जुन और मेरा इन्तजार करना जब फिर से बैठक में सुनवाई हो. फैंसले समझने काम हे आते है मुझे लेकिन इस बार निर्णय तुम्हारे खिलाफ नहीं होने वाला. उमेद भाई के साथ मैं वह तुम्हारे हक़ में पैरवी करूँगा. जानते हो रेखा भाभी को तुम्हारे पिता से बात किये भी साढ़े 3 साल होने को है? उनका दिल और दर्द मुझे आज समझ आया जिस पर मैं पहले गौर न कर सका. सिग्रत्ते पीना छोड़ दो बीटा और मैं जानता हु के तुम इसके आदि भी नहीं हो. चलो अपने लड्डू ले लो गाडी से.", दोनों हे दरवाजा खोल कर खुले अहाते के बाद ढाबे से गुजरते हुए बिल चुकाने काउंटर पर बैठे सरदार जी के पास पहुंचे जो इनके आने के समय यहाँ मौजूद नहीं थे.
"कितने हुए दार जी? ओह बीटा, बता जरा इन्हे कितना हिसाब बना?", बटुआ निकाल कर 500 के 2 नोट निकालते हुए विष्णु जी ने उसी छोटू को पुकारा जो बहार खुले में सजी टेबल पर आर्डर पहुंचने के बाद भीतर हे आया, कपडे से अपना चेहरा पौंछते हुए. सरदार जी तोह बस मुस्कुरा रहे थे अर्जुन को देखते हुए जैसे वो उनका बहोत करीबी और लाडला हो.
"अंकल जी जूनि भैया का बिल नहीं बनता और पापा जी के सामने तोह कभी नहीं.", छोटू इतना बोल कर भाप निकालती कॉफ़ी मशीन के नीचे स्टील का बड़ा जग रखता अपने काम में जुट गया और विष्णु जी हैरत से अर्जुन को देखने लगे जो कंधे उचकता ऐसे दिखा रहा था के उसका इसमें कोई लेना देना नहीं.
"ओह बाई साब, अपने मूंदे तोह वि जे अस्सी पैसे लें लग्गे तह खास बात दी सरदारी? हूँ तुस्सी ेस्डे चाचा जी हो और यह मेनू तय कहंदा, फेर आप हे दस्सो मैं अपने छोटे वीर कोलो पैसे लेंदा चंगा लग्गू? पहला हे अर्जन (अर्जुन) पुत्तर ने यह जगह घाटे तोह बार कद के मुनाफे विच ला दिति. ऊपर तोह साहड़ा ऐ गांजा (छोटू) सवेरे 8 तोह 1 स्कूल भर्ती कित्ता होया अपने खर्चे तेह, मेनू कसम दिंदे होये. पैसा भोत है वीरे, परिवार मेरा अंदरो कोई नई और बहरो ऐ अर्जन ते मेरा गंजु ने. आप हे सोचो कोई होर इत्थे शराब पींदा दिसदा है? जिसने पीनी ओह परे मैदान विच जावे लेकिन ेदार सिर्फ अर्जन हे बह सकदा ओह वि एसडी ापडी था (जगह) ते.", विष्णु ने अब उनके सामने दोनों हाथ जोड़ दिए और एक नोट उस छोटू की जेब में रख दिया.
"चल बीटा, बिल न सही तेरी जेबखर्ची का हक़ भी दार जी ने दिया है वीरा कह के. आज जल्दी में हु भाई साहब लेकिन कभी सिर्फ आपसे हे मिलने आऊंगा. परिवार तोह मेरा भी अकेले से शूरा हुआ था जो आज बढ़कर एक कमरे से 50 घरो का हो चूका. इजाजत दीजिये."
"रब्ब रखा बाई.. उडीक रहूगी. अर्जन पुत्तर तू वि टाइम नाल हॉस्टल निकल लवी जे नाल नै जौना."
"जी बाबा जी.. बस लम्बू छोटू गयम से आ जाए फिर जाता हु मैं भी कमरे पे.", अर्जुन उनके घुटनो पर हाथ लगता हुआ अपने चाचा के साथ खुली सड़क पर आ गया जहा अब कुछ जायदा हे ठंडक और अँधेरा व्याप्त थे. लगभग खली सड़क पर किनारे लगे बड़े बड़े वृक्षों से गिरे पत्ते पुष्पवर्षा से फैले पतझड़ का संकेत थे और उस पर धीमे कदमो से चलते ये दोनों चाचा भतीजा कुछ पल खामोश रहे जब तक विष्णु की गाडी तक न आ पहुंचे.
"आप पापा के साथ हे आये है चाचा? और वापिस उमेद चाचा की तरफ जा रहे है?", ये कार कभी सिर्फ और सिर्फ अर्जुन की थी लेकिन आज जैसे अर्जुन को इसका त्याग किये भी उतना हे समय हो चूका था जितना अपनी चाहत से बात किये. बोनट पर हाथ फेरते हुए वो देखने को तोह तापमान हे जाँच रहा होगा लेकिन इस काली लांसर के उसके जीवन में कभी क्या मायने थे उसका एहसास विष्णु को नहीं था जो ये कार शंकर से ले कर यहाँ अपने भतीजे से मिले आया.
"हाँ भाई और तेरी चची भी उधर हे घर पे रुकी है माँ जी की तरफ. वैसे तोह kaam-kaaj से फुर्सत उतनी मिलती नहीं लेकिन जब मौका लगता है तोह मैं चूकता नहीं. वैसे संजीव तोह आता रहता है तुम्हारे पास?", कार से एक बड़ा सा डब्बा जो थैले में था, निकाल कर अर्जुन को देते हुए उन्होंने एक और पैकेट उसको दिया जिसमे रेखा जी ने उसके लिए कुरता पजामा भिजवाया था. अर्जुन थैला कलाई में टांग कर उन वस्त्रो पर हाथ फिरने लगा जो वो पहन ने भूल हे चूका था लेकिन उसकी माँ को याद था की अर्जुन को ये सबसे अधिक पसंद है.
"भैया और भाभी दोनों हे आते रहते है जब मौका मिलता है उन्हें. बाकी घर पे भी तोह मिलता हे उनसे और शास्त्री दादा जी भी आये थे परसो. उनके साथ हे दिवाली की छुट्टियों पर घर आने वाला हु क्योंकि इतने समय वो भी इधर हे व्यस्त है. उमेद चाचा से कहना की जब समय मिले तोह मेरे नंबर पर बात कर ले. वैसे जब वो खाली होते है तब मैं व्यस्त रहता हु और मेरे समय में उन्हें काम रहता है इसलिए फ़ोन नहीं करता. ध्यान से जाना चाचा, आजकल थोड़ा सख्ती है यहाँ शराब पी कर गाडी चलने पे. थोड़े समय पहले हे किसी अमीर नवाब ने दुर्घटना कर दी थी जो अभी तक सुर्ख़ियों में है.", अर्जुन उनको बैठने के बाद खुद दरवाजा बंद करते हुए बोलै तोह विष्णु ने बात हवा में उड़ा दी.
"तेरा चाचा एक वक़्त में ऐसा चललैया था मेरे लाल की हिमाचल से असम तक की पुलिस की नाक के निचे रह कर भी हाथ न आया उनके. ये तोह फिर भी अपना है इलाका है. फ़ोन मेरे पास भी है और कैमरा वाला. चल अपना ध्यान रखना और कोई भी बात हो, मुझसे कर लिया कर. अक्सर बड़े भी गलतियां कर देते है लेकिन सुधारा जा सकता है उन्हें दोहराने की जगह. बाकी आज चाहत और प्यार समझने के लिए शुक्रिया अर्जुन. देख रहा हु की यहाँ भी तुम्हारा अपना हे एक प्यार भरा संसार है. इजत्त और दौलत तोह बहोत कमाई लेकिन ये हुनर नहीं है हम से किसी में जो तेरी ताक़त और पहचान है. वैसे आरफा चाहत है या बस दोस्त?", गाडी चालु करते हुए ये जो नाम विष्णु ने लिया था इस से स्पष्ट था के उसकी yaad-dasht इतनी कमजोर भी नहीं थी और बात को ध्यान में रखना एक हम खासियत.
"वो दोस्त नहीं समझती और मैं चाहत नहीं मानता. थोड़ा सा काम्प्लेक्स सिचुएशन है लेकिन दोनों को इसके सिवा भी बातचीत करना और साथ घूमना ाचा लगता है. आरफा तरन्नुम, फारुख मिर्ज़ा क्सक्सक्सक्सक्स इंडस्ट्रीज के मालिक की सबसे छोटी बेटी है. इसकी हे बहिन की शादी में पिछले साल सदी के महानयक ने ठुमके लगाए थे. हाहाहा...", ये नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं था और इसको सुन्न कर विष्णु के चेहरे पर अप्रत्यक्ष से भाव उभर आये जैसे अर्जुन ने मजाक किया हो.
"इसको लपेटने के लिए मैं चरखी नहीं लाया भतीजे और सर्दियों में पतंग भी गीली हो जाती है इसलिए ऐसे मैट उदय कर. जानता है ये वो घराना है जिस तक पहुंचने के लिए उमेद भाई और भल्ला जी काफी म्हणत कर रहे है. जनपथ पर विदेशी होटल आ रहा है मिर्ज़ा परिवार का जिसमे हिस्सेदारी की चाहत है तुम्हारे चाचा और भल्ला की. और तुम उसकी ek-matra अविवाहित बिटिया से नयन लड़ाई हुए हो?"
"आगे बढ़ते हुए हम अक्सर अतीत भुला देते है चाचा और इस मामले में हे मैंने उमेद चाचा से बात करनी थी. डील होने में कोई समस्या नहीं है बल्कि वो खुद भी ऐसा चाहते है लेकिन कुछ शर्ते है उनकी और उनमे से एक है की मीटिंग में उमेद चाचा के साथ सिर्फ मैं मौजूद राहु. आपको भी देरी हो रही है और वो गाडी भी मेरा इन्तजार कर रही है पिछले 2 घंटे से.", अर्जुन ने हाथ उठा कर सामने की तरफ इशारा दिया तोह बड़ी बड़ी चौकोर हेडलाइट रोशन हो उठी. रर लिखी चांदी रंग की प्लेट वाली वो बेशकीमती कार अर्जुन की बात को पुख्ता कर गयी जिसका नंबर 0404 था.
"तुम sheh-maat का खेल सबसे बेहतर जानते हुए भी हार क्यों गए?", ये बहोत गहरी बात कही थी विष्णु ने जिसके जवाब में अर्जुन ने बस इतना हे कहा.
"कुछ बाजियां हारना हे बेहतर है चाचा. उन्हें अकेला राजा जीत ले तोह बाकी फ़ौज इसको खुदका अपमान समझ लेती है, ख़ास कर वजीर और हाथी. ऐसी शतरंज में सभी मोहरे एक हे रंग के रहते है इसलिए सब इसको खेल नहीं सकते. चची से कहना की बगीचे के लिए ख़ास पौधे लेके आऊंगा मैं जो मेरी क्यारी में तोह दम टॉड गए लेकिन उन्हें फिर से खिलाना जरुरी है, चाहे घर से बहार हे सही.", अर्जुन उस neeli-silver रंग की बड़ी गाडी का शानदार दरवाजा खोल कर ड्राइवर के बगल में जा बैठा और विष्णु अपने भतीजे की गहरी बातों का अर्थ समझने की कोशिश करता अपने राह चल निकला.
"घर पे एक घंटे का बता कर निकले थे हम और आपने 2 घंटे तोह हमे सिर्फ इन्तजार करवा दिया. अब आपको अपनी अगली महफ़िल में शामिल होना होगा.", पूरी आस्तीन का गुलाबी जालीदार कमीज जो सिर्फ बाहों पर से हे त्वचा दिखता था, कमर से निचे पंजाबी सलवार और सर पे शालीन दुपट्टा जिसको गले में सही से घुमाये वो बाला सी हसीं युवती अर्जुन को ऐसे देख रही थी जैसे पहली और आखिरी चाहत बस वही हो. इतनी मासूमियत के साथ कुछ अलग और ख़ास भी था इस युवती में, उसकी neeli-hari आँखें और कंधारी अनार से सुर्ख वो उभरे हु कटीले होंठ. माँ सी चमक और फक्क गोरा रंग जिसमे केसर का हल्का सा गुलाबीपन इस अप्सरा को यक़ीनन हिंदुस्तानी प्रकृति से अलग करता था. अर्जुन के मुख से आती शराब की महक भी इसको बर्दाश्त थी और वो आज उसको ठीक वैसे हे देख रहा था जैसे आरफा हमेशा चाहती थी. नजरे शर्म से झुकी तोह अर्जुन ने हे उसकी गोल पतली ठुड्डी ऊपर उठाते हुए आँखों के दोनों और चूम लिया.
"आज मैं नहीं जा रहा कही भी. शबनम को बोल देता हु वो तुम्हारी अम्मी से बहाना लगा देंगी की तुम उनके यहाँ रुक रही हो."
"जनाब आप होश में दीखते हुए भी मदहोश जान पड़ते है. नाचीज पर आज इतनी मेहरबानी की ख़ास वजह? वैसे आप ये तोह जानते हे है अर्जुन की हम अम्मी से झूठ नहीं बोल सकते.", गाडी धीमी गति से आगे बढ़ने लगी थी जैसे वो ढूंढ में डूबना चाहती हो दुनिया की नजरो से दूर. भीतर अर्जुन हे गियर बदल रहा था चाहे स्टीयरिंग आरफा के नाजुक हाथ संभाले थे. कुछ तोह अलग सा जुड़ाव था जो इनके बीच ख़ास तालमेल था.
"फर्जी (आरफा), तुम्हारी अनदेखी मैंने कभी नहीं की लेकिन तुमसे कुछ छिपाया भी नहीं है. जिस चाहत की कोई मंज़िल हे न हो उसपे बेवजह रुस्वा होना बेवकूफी नहीं तोह क्या कहे? पसंद तोह तुम हो मुझे और मैंने ये पहले भी कहा है. मैं तुम्हे खुशियां नहीं दे सकता तोह दुःख भी नहीं देना चाहता. रही बात तुम्हारी अम्मी से झूठ बोलने की तोह वो भला हम बोलेंगे हे क्यों. शबनम का जन्मदिन है कल और उसके अजीज सिर्फ हम 2 हे तोह है उसकी कहानियों के बाद.", अर्जुन की पूरी बात सुन्न कर आरफा ने अपना बाय हाथ उसकी हथेली में रख दिया जिसको अर्जुन ने भी पूरे एहतियात से थमा जैसे जिस्म कुछ ठंडा हो रहा हो. गाडी की तेज रौशनी में रास्ता ाचे से दिख रहा था बहते कोहरे के बावजूद.
"मंज़िल.. हमसफ़र.. बेवकूफी.. आपकी तबस्सुम (बेशकीमती मुस्कान) की खातिर हमे हर सफर मंजूर और बेवकूफी करने की उम्र में इस से बचना तोह बेमानी होगा न? आप न इंकार करते है और न कबूल करते है. मुझे मंजूर जो मेरी चाहत का मुकद्दर होगा.. प्यार आपसे हे हुआ है पहली बार, आपसे हे 100 बार होगा.", अर्जुन उस खनकती हुई आवाज के हर लफ्ज़ में शामिल be-inteha प्यार को महसूस करता आरफा की हथेली अपने दिल से लगा बैठा. कार 20 की गति पर एक सामान चल रही थी उस चौड़ी निर्जन सड़क पर लेकिन भीतर बैठे 2 दिल आज अपनी चाहत शब्दों के साथ साथ दिल की आवाज से भी बता बैठे.
"तुमने जिस टूटे हुए जूनि को समेटा था वो भी तुम्हे चाहता है फर्जी. बस.."
"रहने दीजिये बीता वक़्त याद दिलाना. जिस से जीना सीखा उसको समेटने वाले हम कोई noor-e-khaas नहीं. शबनम आपि के लिए क्या उपहार लेके चले?", अब बातें इश्क़ से अलग हो चली जब इजहार दोनों तरफ से हो गया. बहार से अलग भीतर इन दोनों के बीच कोई पुराण कोहरा छत्त चूका था जिस वजह से आरफा के चेहरे की रंगत कुछ ज्यादा हे रोशन और सुर्ख थी.
"मैं सोच रहा हु के हम वह कुछ समय बाद चलते है. मौसम ाचा है और जगह सुनसान. तुम्हे ठण्ड भी लग रही होगी..", अर्जुन की बात सुन्न कर आरफा ने बड़ी तेजी से अपना हाथ उसकी पकड़ से छुड़ाते हुए स्टीयरिंग मजबूती से थाम लिया. धड़कन बढ़ चुकी थी उस आमंत्रण और इरादे से जो अर्जुन ने जाहिर किया. गाडी दोनों के बीच ख़ामोशी बरकरार रहने से चाँद लम्हो के बाद किनारे रुक गयी. अर्जुन गंभीरता से उस चेहरे को देखता रहा जिसके गोर चेहरे पर इतनी ठण्ड में हल्का पसीना उभर आया था कुछ हे पल में. आहिस्ता से चेहरा उसकी और घूमती आरफा ने आँखें मूँद कर अपना चेहरा अर्जुन की तरफ बढ़ाया दोनों हाथ अपनी गॉड में रखे. अर्जुन को इस असीम मर्यादित युवती से ऐसे समर्पण की कोई उम्मीद नहीं थी लेकिन आरफा की पहल को समझते हुए उसने अपने दोनों हाथ में वो काँपता चेहरा थाम कर माथे के बाद दोनों गाल पर चुम्भन अंकित करते हुए उसको अपने सीने से लगा लिया.
"कोई अग्नि परीक्षा नहीं ले रहा तुम्हारी.. मजाक था फर्जी.. चाहत जैसे तुम्हारी दिल से है वैसी हे मेरी. जिस्म का मिलना तोह पहली मुलाकात में हे हो जाता अगर ऐसी हे बात होती तोह.", अलग होने पर जब वो खूबसूरत चेहरा नजर किया तोह बंद आँखों से आंसू प्यारे चेहरे पर लुढ़कने लगे थे, काजल मिले. जिन्हे हाथो से हे पांच कर अर्जुन ने सर से सर मिला कर उसको अपने प्यार से फिर से रोशन सा कर दिया.
"बड़े आये पहली मुलाकात वाले.. वैसे बड़ी अजीब मुलाकात थी हमारी वो. हमे तोह लगा था उन लड़को से बचने वाला इंसान खुद हे हमारी अस्मत लूट लेगा.. फिर हमारी रोटी आँखों में देख कर आपका ये कहना की 'चली जाओ इस से पहले की जानवर जंजीरे टॉड दे..' हम कितना हे वक़्त उस हादसे को याद करके डरते रहे लेकिन वो डर हमारे अकेलेपन में आपके इस चेहरे से जुड़ चूका था जो आज हमारे पास है. फिर तोह आप अनजान हे नहीं रहे और आज ..", अर्जुन ने होंठो पर ऊँगली रखते हुए आरफा को बड़े हे प्यारे अंदाज में खामोश करा दिया.
"उपहार तुम हो मेरे जीवन में फर्जी. चलो चल कर हमारे रिश्तेदार की जान लेते है जो पार्टी से बचने के लिए फ़ोन बंद किये बैठी है. वैसे वह रात रुकने के लिए बैडरूम एक हे है.", अर्जुन की बात का मतलब समझते हुए आरफा शर्म के साथ मुस्कुराती हुई इस बार कुछ तेज रफ़्तार से कार आगे बढ़ा चली.
"आप मेहमान कमरे में रात गुजार सकते है. हमे तकलीफे होती है सोफे पर."
"शबनम मन नहीं करेगी अगर मैं भी साथ सोना चाहु तुम दोनों के."
"तौबा.. काम से काम हमारे सामने तोह आप ऐसी बात मत कीजिये. शबनम आपि तोह वैसे भी यही चाहेंगी और आज तोह उनकी सालगिरह है क्या पता इसलिए आप उपहार नहीं लेना चाहते."
"हाहाहा.. ऐसा कुछ नहीं है फर्जी बेगम.. शब्बो डार्लिंग है अपनी और ख़ास दोस्त. तुम्हारे बहोत से सीक्रेट उसने मुझसे शेयर किये है और उनमे से एक यही था मेरे साथ सोने वाला.", आरफा होंठो से दांत काट टी हुई अब गाडी 100 के पार ले जा चुकी थी.
"वो हमने ख्वाब साँझा किया था उनसे और आप अब ये बात यही रोक देंगे. वैसे बातों बातों में हम भूल हे गए आपको बताना. अबू कल घर आ रहे है और उन्होंने आपसे मुलाकात की इत्छा जताई है. गुलनार आपि भी घर आयी है आज, आपसे मिलने की ख्वाहिश उन्हें भी है."
"कल रात हॉस्टल से बहार रहना मुश्किल है फर्जी."
"हमने कब कहा के आप वह रुकिए. और ऐसा हम चाहते भी नहीं गुलनार आपि के मौजूद रहते.", अभी अर्जुन जवाब देता उस से पहले दोनों की बातचीत पर फ़ोन की घंटी ने विराम लगा दिया. मुस्कुराते हुए अर्जुन ने जेब से mobile-phone निकला तोह नंबर देखते हे गहरी सांस ली.
"मर्डर गए फर्जी बेगम.", अर्जुन की बात सुन्न कर आरफा ने भी अपनी नजर टिमटिमाते फ़ोन पर डाली जहा लिखा था 'कसाई'
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'उम्मम्मम.. आअह्ह्ह्हह..', जीनत का वो गोरा गुलाबी बदन अर्जुन के मजबूत जिस्म के ऊपर लहरा रहा था जहा बाथरूम से शुरू हुई उनकी हलकी फुलकी chhed-chaad अब सभी हाडे पार करती आगे बढ़ चुकी थी. बिस्टेर की चादर दोनों के गीले बदन सूखा कर खुद गीली थी और अब अर्जुन वो मांसल तराशा हुआ मखमली बदन अपने ऊपर लिटाये जीनत के मॉटे निर्वस्त्र कूल्हों को दोनों हाथ से भींचता मसलता हुआ उसके होंठो के साथ साथ गोर गालो को भी मुँह में भर कर पूरी शिद्दत से प्रेम दर्शा रहा था. 36-डी के वो पके खरबूजे से चुके इस जिस्मो की रगड़ से कुछ ज्यादा हे अकड़े हुए अर्जुन के सीने पर रगड़ते आगे पीछे होते रहे. असली चुम्बन और एक kaam-kala में माहिर पुरुष बिना सम्भोग के हे क्या कुछ कर सकता है ये जीनत का पूरा जिस्म आज जान रहा था.
"ुण्णं.. ये.. ये कैसा नशा है अर्जुन..", जीनत को पलट कर अब अर्जुन उस बड़े बिस्टेर पर अपने नीचे ले आया. हाथ उन दोनों बड़े गोल गुब्बारों से चुचो को थामे उनकी कसवत और ख़ूबसूरती को जांचने लगे. चेहरे के ऊपर झुका निर्वस्त्र अर्जुन भी एक अलग से एहसास से उत्तेजित जीनत के साथ इस प्रेम मिलान को एक कदम आगे ले जाना चाहता था. दोनों स्टैनो के गुलाबी निप्पल लगातार उँगलियों से रगड़ता वो उन्हें सूई सा उभार कर कुछ पीछे होता एक निप्पल के साथ नरम मांस का हिस्सा होंठो में भर के शिद्दत से पीने लगा. जीनत के पाँव मदद कर ऊपर उठने लगे इस मजेदार एहसास से. गुलाबी फांके इतने में हे रस से चिकनी हो चली थी जिनके मुहाने अर्जुन का कामदण्ड लगातार चुम्बन जड़ता रहा. बस ऐसी हलकी छुहान से हे जीनत अपना दूसरा दूध खुदसे दबती हुई कमर पीछे धकेलने लगी. किसी चुम्बक की तरह उसका कौमार्य लिंग की और उछाल रहा था. अर्जुन के मजबूत हाथ द्वारा एक सतांन का मसलना और चूचक चूसना कुछ हे समय में जीनत को चीखने पर मजबूर कर गया.
"मार हे डाला यारररर... आह्हः..", चेहरे पर पानी के कतरे अब पसीने में बदल चुके थे और पिछले आधे घंटे से चलता उनका चूमना छूना जीनत की सहनशक्ति ख़तम कर गया.
"अभी कहा कुछ किया है जीनु.. हूऊऊह्ह्ह.. तुम अपना पहला सेक्स मेरे साथ करना चाहती थी न, मैं इसको तुम्हारे लिए यादगार बनाना चाहता हु. पहली बार जो भी तुम महसूस करो उसकी सिर्फ ाची यादें बन नई चाहिए. पछतावा नहीं.", अर्जुन उठ कर उसकी फैली हुई दोनों गोरी चिकनी जांघो के बीच आ बैठा. बड़े बड़े चुचो से निचे जीनत का समतल गोरा पेट, छोटी सी नाभि और कुछ उभर लेते पेडू के बाद गोरी गुलाबी रास बहती अक्षत छूट सचमुच किसी खजाने से काम न था. लम्बे बाल बिस्टेर पर जीनत के जिस्म के निचे दोनों तरफ फैले थे और सांस लेने के साथ भरी चुचो का ऊपर निचे होना अलग हे कामुक दृश्य जिसमे हर पुरुष अपना धारिया खो बैठे. अर्जुन की उँगलियाँ चुचो से फिसलती हुई कुछ वक़्त उसके चिकने पेट को गुदगुदाती रही और फिर जब फूली हुई तजा चिंकी की गयी योनि पर रुकी तोह उस हिस्से का इतना मुलायम एहसास और छूट के ऊपर बानी सिलवाते अर्जुन को ललचाने लगी. जीनत का जिस्म बुरी तरह से ऐंठने लगा था लेकिन वो भी यही चाहती थी की अर्जुन उसके साथ आज सबकुछ कर गुजरे. और अर्जुन ने prem-muheem आगे बधाई भी अपना सर निचे झुका कर उस कौमार्य महक उड़ाती योनि के रसीले होंठो को चूमते हुए.
"उफ़.. ये गन्दा लगेगा... आह्ह्ह्हह..", जीनत के शब्द उसके जिस्म से खिलाफ थे जहा अर्जुन द्वारा उसका योनि को चूमना, जीभ से कुरेदना जीनत को जल्द हे उत्तेजना के चरम पर ले जाने लगा. गुलाबी चूचक ख़ुशी से फूलने लगे तोह जीनत मचलती हुई उन्हें हे दोनों हाथो से मसलने लगी. चिकनी जांघो के बीच उसने अर्जुन का सर लगभग जकड हे लिया, जो जीनत को अपना वो हुनर दिखा रहा था जिसकी आशा तक नहीं थी किसी भारतीय पुरुष से उसको. जब जब अर्जुन उसकी नरम छूट के दोनों होंठ मुँह में भर कर भींचता जीनत अपने कूल्हे ऊपर उठा लेती. योनि का फुलाव कुछ अधिक हे था, जिस्म मांसल होने पर और ये मुखमैथुन योनि से होता हुआ जब उस से आधा इंच निचे अक्षत गुदाद्वार पर पंहुचा तोह मदहोश होती जीनत ने चीखते हुए अपनी छूट को अर्जुन के चेहरे पर दबा लिया. वो कांपती हुई लगातार झड़ने लगी जैसे जिस्म की साड़ी ऊर्जा कॉमर्स स्वरुप बह चली हो. पर अर्जुन तोह यहाँ भी वो चिकनाहट भोगता हुआ एक लकीर में जीभ योनि की पूरी लम्बाई में चलता हुआ कूल्हों के जोड़ की गहराई तक नापने लगा.
"उन्न्नन्नन्न.. बस बस.. आह्ह्ह्ह.. और नहीं सेह सकती.. पागल .. रुको.. अर्जुनननननननन", जीनत ने अपनी कैंची से अर्जुन को आजाद करते हुए जिस्म पीछे खिंचा और हाफने लगी. सर और आधी पीठ बिस्टेर के सिरहाने टिकाये वो निरंतर बस अर्जुन को देख रही थी. गोर चुचो का रंग निप्पल सामान गुलाबी पड़ गया जो अब स्प्रिंग से हिलते हुए बखूबी जीनत की हालत बयां करने लगे. अर्जुन घुटनो के भर बैठा मुस्कुरा रहा था और उसके होंठो पर अपना योनिरस सोच कर हे जीनत ने अपनी छूट के ऊपर हथेली टिका ली. पर जब गौर किया तोह वो कामदण्ड अपनी क्षमता तक पत्थर सा अकड़ा किसी दहकते लोहे सा लगा. जीनत और अर्जुन बस एक दूसरे को हे देखे जा रहे थे और फिर एक तरफ पड़ा नरम तकिया उठती जीनत ने उसको अपने भरी कूल्हों के निचे लगते हुए टाँगे फैला दी.
"समां जाओ अब.. पहले मुझे लगा था की मैं सिर्फ छोड़ना चाहती हु किसी तगड़े इंसान से जो मेरी चाहत पूरी करके हमेशा के लिए चला जाए. फिर तुम इधर आये तोह फैंसला हे गलत लगा क्योंकि अगर अपना सर्वस्व किसी को सौंपना हे है तोह क्यों वो बस एक बार मिले? मैं तुम्हे मन करना चाहती थी लेकिन साक्षी से वादा था की उसकी आग ठंडी जरूर होने दूंगी. लेकिन मैं तुम्हे उसके साथ देख कर खुद को हे कोसने लगी की आखिर क्यों मैंने सिर्फ अपनी एक चाहत के लिए तुम जैसे इंसान को चुना जो हर इंसान से सिर्फ प्यार हे करना जानता है. मेरी गलती के लिए माफ़ करना मुझे पर अब जीनु को अगर औरत बन न है तोह सिर्फ तुम्हारे साथ. तुम उसके बाद वापिस जाओ या जब दिल करे मेरे पास आओ, मुझे सब मंजूर है अर्जुन. ज़िद्द में मैंने वो प्यार नहीं देखा जो तुमने मेरे एक बार कहने भर से ये कह कर दे दिया की तुम मेरी एक चाहत पूरी करोगे. शायद मैं तुम्हारा साथ मांग लेती अगर आँखों पर पर्दा न पड़ा होता.", अपनी बात कहते कहते अर्जुन के सामने बिछी जीनत की गहरी स्याह आँखों से आंसू बिस्टेर की और दौड़ने लगे थे और अर्जुन उसके ऊपर आता हुआ बिस्टेर पर दोनों और कोहनी टिकाये गालो को चूमता हुआ अपने प्यार से एक बार फिर जीनत का रोम रोम जगाने लगा. अनजाने हे सही लेकिन इस आधुनिक चंचल सी युवती ने ज़िद्द स्वरुप हे जीवन में प्यार का ज्ञान प् हे लिया. अब अर्जुन के सीने के निचे दबते उसके ठोस मॉटे चुके भी अर्जुन से लिपटने लगे.
"पता है तुम ज़िद्दी हो इसलिए पसंद हो. ये नखरा सभी पर नहीं जंचता जीनु, लेकिन तुम इसके बिना अधूरी लगोगी. इंसान बस यही ग़लतफहमी रखता है की ज़िन्दगी में उसको सच्चा प्यार एक बार हे होगा या फिर कभी होगा हे नहीं. एक लम्हे में किसी का अपनेपन से हाथ पकड़ लेना भर भी जीवनभर याद रहता है और अक्सर ज़िन्दगी गुजार कर भी वैसा एहसास दोबारा नहीं मिलता. दुनिया में हर रंग मौजूद है, किसी एक को पसंद करके हम बाकी सबको नजरअंदाज करने की बहोत बड़ी गलती करते है. तुम्हे फिर से प्यार होगा, अगर अपनी चाहते से पहले दायरे बढ़ाओ. दुनिया में फिर तुम्हे हर तरफ प्यार हे दिखेगा, जितना चाहे बटोर लेना.", इस बार उसकी बात पर जीनत ने हे सर को अपने होंठो पर खींचते हुए अर्जुन को पूर्ण आसक्ति से चूसना शुरू कर दिया. निचे वो अपनी दोनों टाँगे ऊपर उठा चुकी थी अर्जुन को जकड़ने के लिए. बस हल्का सा हे दबाव उस चिकने सुपडे का अपनी गीली फांको के बीच हुआ और जीनत ने चुम्बन तोड़ते हुए जवाब दिया.
"भर दो इस ज़िद्दी को अपने प्यार से अर्जुन.. मेरी इत्छा है की तुम मेरे साथ अब हर हद्द पार कर दो. जानती हु तुम्हारा लेने के बाद मैं कुछ वक़्त चलने के काबिल नहीं रहने वाली लेकिन मैं वही तोह महसूस करना चाहती हु. आअह्ह्ह्ह..", अर्जुन ने भी हामी भरते हुए खुद को जीनत से अलग किया और ड्रेसिंग की तरफ चल दिया जहा ढेरो क्रीम और सौंदर्य प्रसाधन मौजूद थे. एक चीज देख कर उसके चेहरे पर अलग हे चमक छ गयी. वो इस तुबे को भली भांति पहचानता था जिसको डॉक्टर जेली कहते थे, आम भाषा में. ताई जी और माधुरी दीदी ने यही तोह उपयोग की थी guda-maithun का दर्द काम करने के लिए.
"तुम्हारी सहेली इस कमरे में बहोत कुछ करती है न? शायद कभी कभी तुम भी साथ देती होगी.", तुबे अर्जुन के हाथ देख कर जीनत का चेहरा गुलाबी हो गया लेकिन उसने नखरे से मुस्कुराते हुए ना कहा.
"बड़ी पहुंची हुई चीज हो तुम. ये भी पता है ये किस काम की है? साक्षी.. जब कभी रोलर हैंडल बक्सीडे में लेती है तोह यही उसे करती है. उसकी बड़ी तमन्ना है की कोई उसको पीछे से.. मतलब जोरदार प्यार करे.. जेली से आसानी रहती है न इसलिए वो उसे करती है. वैसे तुम इसको अपने उस पर क्यों लगा रहे हो? आअह्ह्ह्ह.. उम्म्म्म", अर्जुन ने जवाब देने से पहले अपना सूपड़ा और बाकी हिस्सा भी पूरी तरह उस चिकनाहट से टर्र कर लिया था और 2 उँगलियों पर जेली गिरा कर जीनत की गुलाबी छूट के होंठो और छेड़ पर उसकी मालिश सी करने लगा.
"तुम न ज़िद्दी के साथ वैसे हे बोलो जैसे बोलती हो. मुझे तुम्हारा खुल कर बोलना भी पसंद है. इसको क्या कहते है पंजाबी में?", अर्जुन उसकी कासी हुई छूट के छेड़ में ऊँगली से जेली भरने लगा तोह जीनत मचलने के साथ हे शर्म से हंसने भी लगी.
"फ़फ़फ़फ़.. फुद्दी.. बूत मैं इसको किटी बोलती हु.. आह्हः.. इस से आगे nahi..aahh.. वह सीधा अपना ये मोटा डंडा हे पेलना.. साक्षी तोह और भी गन्दा बोलती है.. उननननहहह.. बूब्स को मम्मी बुलाती है वो लेकिन मैं इन्हे हेडलाइट.. आह्ह्ह्ह.. और बून्द को डिक्की.. तुम बोल रहे थे न मेरे पीछे लगाओगे तोह मुझसे लिया नहीं जाएगा और उसका बगीचा हरा भरा है.. मैंने स्लाइडर से सुना था वो.. उम्म्म्म", उन्मुक्त होती हुई जीनत अब थोड़ा खुलने लगी थी और छूट फिर से कॉमर्स बहाने लगी तोह अर्जुन ने उसकी दोनों टाँगे अपने कंधो की तरफ उठा कर चमकता सूपड़ा फांको के बीच ऊपर निचे रगड़ा तोह जीनत की आँखें हे बंद हो चली.
"मुझे तोह तुम्हारा बगीचा हे पसंद है इसलिए तोह मेरी गाडी तुम्हारे पीछे कड़ी है निचे.. और हेडलाइट सचमुच कुछ ज्यादा हे बड़ी है. इतनी सबकी नहीं होती. उननननननहहहह..", अर्जुन ने खुद को स्थिर करने के लिए एक हाथ से मोटा दूध दबोचा और दूसरे से लुंड को पकड़ कर मोटी फांको को खोलते हुए सूपड़ा उस नन्हे से गुलाबी छेड़ पर टिकाया तोह दोनों की हे सीत्कार फूट गयी.
"मेरी डिक्की तुम्हारी टोपे (केनन) नहीं ले sakti..aahhh.. ये मेरी किटी को हे न मार दे कही.. आह्हः.. थोड़ा धीरे करना यार.. मुझे nahi..aaaiiiii माआआआ मर्डर .. गयी..", बातों में व्यस्त करके अर्जुन ने जैसे हे सही मौका देखा वैसे हे एक बार वो मोटा सतांन दबाया और कमर को आगे धकेल दिया. सूपड़ा एक पल छेड़ पर अटका और फिर छूट को फाड़ता हुआ अधिक चिकनाई की वजह से एक झटके में झिल्ली बंधता हुआ आधा अंदर जा घुसा. मखमली छूट अगर इतनी त्यार न की होती तोह जीनत की चींख aas-pados तक सुनाई देती. अर्जुन ने एक बार निचे देखा जहा दोनों जांघो के बीच बस उसका मोटा मूसल हे फंसा नजर आया और दूसरी तरफ तड़पती हुई जीनत. इस अवस्था में उसके ऊपर झुकता तोह नरम छूट में उसका मूसल ज्यादा दर्द देता.
"एक बार तोह ये दर्द सबको हे मिलता है.. तुम फिर भी हिम्मतवाली हो जीनु जो एक बार में हे आधा झेल गयी. साक्षी से तोह इसका आधा लेना भी मुश्किल हो गया था... सब ठीक है जीनु..", अर्जुन नरम फांको के आगे खुद छूट का वो अधिक कसाव अपने लिंग पर झेल रहा था पर जीनत को हिम्मत देना ज्यादा उचित लगा. कमर को ज्यादा हिलाये बिना वो दोनों चुचो का कामुक मर्दन करता उसका जिस्म गरमाने लगा. जीनत होंठ भींचे तबतक ये दर्द सेहती रही जबतक की उसकी हालत कुछ बेहतर न हो गयी. दोनों सतांन फिर से ठोस होने लगे जो पहले ढीले पड़ने लगे थे. अर्जुन को वैसे हे रुका हुआ और अपनी देखभाल करते देख जीनत दर्द में भी मुस्कुराई.
"उननननहहहह.. ऐसा लगा जैसे जान हे निकल गयी हो. साक्षी ने ये पूरा अंदर लिया था? और पहले कोई कुंवारी इसको झेल कर ज़िंदा बची है क्या? ोोोीी माँ... ब्रा नहीं पहनी जायेगी ऐसे.. आह्हः", उसके मासूम से सवाल सुन्न कर अर्जुन ने पहले तोह उसका मोटा सतांन सही से मसला और फिर कुछ ताक़त से निप्पल मसल दिया. वो उसका दर्द बदलने को ऐसा कर रहा था पर जीनत ने ये भी बखूबी सहा.
"पूरा नहीं ले सकीय थी वो और जितना लिया उसमे हे हालत खराब हो गयी थी उसकी. वो सिर्फ सेक्स चाहती थी इसलिए मैंने भी वही किया लेकिन तुम इसको खुद हे पूरा लोगी. ऐसा नहीं है की सेक्स से कोई नहीं मरता.. जान भले हे न जाए लेकिन अगर जिस्म त्यार हे न हो तोह अंदर चोट लग सकती है. पर मुझे जोर जबरदस्ती करनी हे क्यों है जब इसको लेने के लिए तुम पहले से त्यार थी. बस कुछ हे पल में तुम मेरा साथ देने लगोगी.", और अर्जुन का कथन सच साबित हुआ जब आधे हे लुंड से वो अगले 10 मिनट तक धीमी गति रखे हुए जीनत की योनि का कसाव ढीला करता रहा. ये मंथन वो इतनी एहतियात से कर रहा था की कब दर्द भरी आहें मीठी सिसकियों में बदल गयी, जीनत खुद न जान सकीय. अब घुटनो को आराम देता अर्जुन उसके ऊपर चाय हुआ दोनों स्टैनो को दबोचे चूमने के साथ हर गुजरते लम्हे पर अंश अंश मूसल उस संकरी गीली सुरंग में दाखिल करता चला गया. जीनत कसमसाती, दर्द से सिसकती लेकिन उसकी हिम्मत कुछ ज्यादा हे थी जो 2 बार साखळीत होने तक अपने गर्भाशय तक समूचा लिंग समाहित करवा गयी.
"थोड़ा सांस लेने दो. आह्ह्ह्ह.. अब अजीब सा लग रहा है.. जैसे बॉडी में कुछ बदल सा गया हो..", पसीने में दोनों हे लथपथ थे और दिन के तीसरे सम्भोग से अर्जुन की स्थति भी उसके जैसी हे थी. चुचो को तकिया बनाये वो आधा लिंग पीछे खींचता हुआ उनके ऊपर हे सर रखे लेता रहा. जीनत आँखें मूंदे बड़े प्रेम से उसका सर सहलाने लगी. अर्जुन ने उसको दर्द की बजाये सिर्फ प्यार दिया था वो भी उसकी सहेली को भरपूर तृप्ति के बाद.
"मैं ऊपर आती हु.", अर्जुन ये सुन्न कर तुरंत पलटा लेकिन जीनत सिसक उठी. वजह थी इतनी लम्बी चुदाई के बाद वो फूला हुआ टमाटर सा मोटा सूपड़ा जो पहली दफा बहार निकला था. गोरी जांघो के बीच उसकी पहली हुई योनि का पूरा दायरा रक्तरंजित दिखा.
"रुको.", अर्जुन ने एक तरफ पड़ा वो गीला टोलिया उठा कर बड़ी सावधानी से वो सूजी हुई योनि साफ़ की तोह उसका छिद्र कुछ जख्मी सा दिखा, ऊँगली की जगह इतना मोटा लिंग जो गया था वह. अर्जुन के चेहरे के सामने अपनी नंगी योनि परोसे कड़ी जीनत ने आँखें हे मूँद ली. मैं दोहरा था लेकिन नकरात्मक कही से नहीं.
"हो तोह गयी फिर ये क्रीम क्यों?"
"तुम्हे दर्द नहीं देना. और आराम से बैठना.", अर्जुन ने खुद हे उसके दोनों हाथ थाम कर मदद दी. जीनत ने मुद्रा सही करने के बाद एक हाथ छुड़ा कर लिंग को मजबूती से थमा और अपनी चिकनी योनि को उस लिंगमुण्ड पर टिकते हुए अर्जुन को देखने लगी.
"अजूबा हे है ये फुद्दी तोह. कल तक इसमें ऊँगली नहीं गयी थी और देखो आज पूरी टॉप खा रही है. हाहाहा.. एआईईईई.. दुखता है अभी भी.. थोड़ा सा छोटा होता तोह ज्यादा ाचा रहता.. आह्ह्ह्ह..", भरी कूल्हे निचे करती वो थोड़े से प्रयास में हे पूरा लिंग भीतर ले गयी. अब कूदने की हिम्मत तोह उसमे भी नहीं थी लेकिन नीली फिल्मो के आसान बहोत देखे थे अपने जीवन का पहला संसर्ग करने से पहले. इस बार वो अर्जुन जैसे उसके ऊपर लेती होंठो को चूमते हुए कमर हिलने लगी. हर रगड़ से दोनों चुचो का मसले जाना और खींची हुई योनि के भीतर आधा लिंग अंदर बहार होना 3-3 सुख दे रहा था. जीनत ने आज से पहले बस साक्षी संग हे चुम्बन किया था लेकिन अर्जुन के होंठ उसको कही ज्यादा पसंद आये जिन्हे चूसती हुई वो अपने चरम को भुला कर निरंतर लगी रही. अबतक अर्जुन का जिस्म भी विस्फोट को तैयार होने लगा जिसके सुपडे की बढ़ती मोटाई से जीनत मचलने लगी. हर बार छूट के अंतत में वो कही अटकने लगता.
"उफ्फ्फ्फ़... और .. नहीं ले sakti..Ye बड़ा हो रहा है.."
"मैं भी होने वाला हु जीनु.. उतर जाओ मैं हाथ से कर लेता हु.. आआह्ह्ह..", लेकिन यहाँ तोह जीनत ने अपनी गति हे बढ़ा दी. वो इतने समय से जिस laye-taal से नाच रही थी, उसका भी अंतिम चरण आ पंहुचा. छूट ने लुंड को बुरी तरह भींचा और अपने लम्बे नाखून अर्जुन के कंधे पर दबती हुई वो निढाल से होने लगी. आँखें बोझिल होती बंद हुई और छूट के भीतर गिरता गरम लावा दर्द पर मलहम लगता हुआ छूट की बची खुची जलन भी बुझाने लगा. अर्जुन जैसे आज बुरी तरह निचुड़ चूका था और जीनत को अपने ऊपर लिटाये हुए हे उसकी आँखें भी बंद हो चली. लिंग अभी भी भीतर धंसा था और एकदूसरे से लिपटे अर्जुन जीनत दुनिया से लापरवाह किसी तीसरे के घर सुकून से पड़े थे. इनके मिलान का अंतिम आधा सफर साक्षी ने बखूबी देखा उस अधखुले दरवाजे से जिसको बंद करने की जेहमत इन दोनों न उठाई.
'आखिर हो हे गयी इसकी मर्ज़ी पूरी लेकिन एक बार से तोह मेरा दिल नहीं भरा. कुछ तोह करना हे पड़ेगा जिस से अर्जुन के साथ आगे भी ऐसा मजेदार खेल चलता रहे.', जाने वो क्या चाहत पाले थी लेकिन आँखों की चमक ये बताने को बहोत थी की साक्षी को वासना और प्रेम का फरक पता नहीं था. गलत इरादे उसको भी नुक्सान पंहुचा सकते थे.
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"बिंदिया का फ़ोन था जी, आज हे पिंटू (पुष्पक) के यहाँ पहुंची है और कुछ रसम निभाने के बाद परसो वो इधर मिलने आएगी. कह रही थी की शबनम दिल्ली से आगे पढ़ाई करना चाहती है और मुस्कान को भी कॉलेज दिखने ले जायेगी.", दिन ढलने से पहले रामेश्वर जी बगीचे को पानी देने के बाद अपने sangi-saathi मल्होत्रा जी और छोल साहब के सेहत वही बैठे थे. शंकर घर लौटने के बाद पड़ोस का हे बोल कर निकला था उन्हें. कौशल्या जी 15 मिनट तक फ़ोन पर बातचीत करने के बाद यही बहार बगीचे में आ कर रामेश्वर जी को संदेसा सुनाने लगी तोह प्रीती सबके लिए चाय लिए वह आ पहुंची.
"पिंटू साथ आएगा?", रामेश्वर जी ने प्रीती के सर पर हाथ फेरने के बाद चाय का कप उठाया और फिर मिटटी से साणे उसके काले भूरे पिल्लै की स्थिति दिखाई जो अभी भी गीली मिटटी में लोट रहा था. प्रीती हंसती हुई चाय और नमकीन वह रख कर दोनों हाथ में उस मस्ती करते पिल्लै को उठा कर भीतर चली गयी.
"वो तोह आना चाहता है लेकिन आएगा नहीं. और ठीक भी है क्योंकि परहेज पर है वो थोड़ा. वैसे आपको जाना पड़ेगा उनके साथ क्योंकि एडमिशन तोह हो भी जाएगा लेकिन थोड़ा देखभाल आपको हे करनी है. लड़की ने अकेले हे रहना है उधर और हॉस्टल के लिए मन कर दिया है शबनम ने. भाई साहब, पालक की माँ घर हे है क्या?", रामेश्वर जी को पूरा विवरण देने के बाद उन्होंने मल्होत्रा जी से उनकी धर्मपत्नी की जानकारी मांगी तोह उन्होंने हाँ में सर हिला दिया, चाय का घूँट लेते हुए.
"देख लेना जी जरा मैं मिल के आयी.", कौशल्या जी भीतर कोमल को बुलाने चल दी मल्होत्रा जी घर जाने के लिए और इधर इस सन्देश के बाद छोल साहब ने हे चर्चा शुरू की.
"भाई साहब, अब सब ठीक हो रहा है तोह फ़र्ज़ समझ कर ये भी कर देते है. वैसे उधर एक छोटा सा घर है अपना अगर आपको याद हो तोह. पहले तोह सोचा था के अर्जुन उधर जाएगा तोह हॉस्टल से बेहतर वही रह लेगा लेकिन लड़की के हिसाब से वो घर ज्यादा बेहतर है और जगह है भी ाची. सुरक्ष, संपर्क और मार्किट को ध्यान में रखते हुए. बस कमरे 2 हे है रसोई और बाथरूम के साथ. वैसे भी दिल्ली तोह जाना हे था हमे थोड़ा पहले हे सही.", रामेश्वर जी कुछ सोच रहे थे ये सब सुनते हुए लेकिन मल्होत्रा जी ने कुछ और हे सुझा दिया.
"क्सक्सक्सक्स महिला कॉलेज सबसे बेहतर है पंडित जी और मेरे भाई को तोह आप बरसो से हे जानते हो. उसका एक ओने रूम सेट कॉलेज के बिलकुल सामने है बढ़िया सोसाइटी में है. हॉल है, 24 घंटी की बिजली सुविधा है उधर और लिफ्ट के साथ भीतर हे पार्क, राशन की दूकान से ले कर सभी जरुरी सुविधाएं है. पालक भी रही है उधर डिग्री के समय और बीएड, सोफे, पंखे, एक सबकुछ पहले से लगा है. दिल्ली को देखा जाए तोह अकेली लड़की के लिए ये माहौल बेहतर रहेगा और चाहे तोह वह अपने साथ बाद में किसी सहेली या जैसा बताया छोटी बहिन भी है तोह उसको रख ले. कहा सामान लाते फिरेंगे और जब एडमिशन लेना हे है तोह मैं छोटे को बोल दूंगा, आप किसी को क्यों मौका देते है सेवा का जब सब अपने पास हे है.", मल्होत्रा जी की बात सुन्न कर स्वयं छोल साहब ने भी समर्थन दिया.
"हाँ वो फ्लैट मैंने भी देखा था जब हम रुके थे भाई साहब पिछली बार. जगह तोह सचमुच ाची है और कॉलेज भी कुछ हे दुरी पर है. आसपास का माहौल भी पारिवारिक और सभ्रांत है.", रामेश्वर जी अभी भी कुछ खामोश थे जो चाय की चुस्की लेते हुए सब सुनते रहे और दोनों के खामोश होने पर मुँह खोला.
"भाई हम पहले जिस मुद्दे पर बात कर रहे थे वो ज्यादा जरुरी है. इसका समाधान तोह तुम दोनों ने कर हे दिया, अब तोह बस औपचारिकता पूरी करनी है. पालक बिटिया वाला मामला चिंताजनक है जिसको सुलझाना ज्यादा जरुरी है. वैसे मल्होत्रा यार ये बात तुम्हे पता किस से चली की उसके जीवन में ये सब घटित हो रहा है? कोई पारिवारिक या जानकार व्यक्ति हे होगा. बिटिया का मामला है और इसमें कानून तोह शामिल नहीं कर सकते.", माहौल फिर से पहले जितना गंभीर हो गया जैसा कौशल्या जी की दखल से पूर्व था. माथे का पसीना साफ़ करते हुए मल्होत्रा जी ने हे धीमी आवाज में बताना शुरू किया.
"दामाद तोह बहार है काम की वजह से और पालक की ससुराल में लोग हे 5 है पंडित जी. इसके saas-sasur के साथ जेठ और जेठानी के साथ बस उनका क्सक्स साल का बीटा जो दूसरी कक्षा में तोह पढता है. ाचा सभ्रांत घर है और माहौल भी बढ़िया है. पालक शादी के बाद पहले तोह दामाद के साथ महीना भर बहार हे थी और उसके जाने के बाद घर के भीतर हे रही. मुझे तोह पता भी नहीं चलता अगर कल रात मैं अपनी बीवी के साथ बिटिया की बातचीत नहीं सुनता. ाची बात है की उसने अभीतक ये बात उधर नहीं बताई और इतने दिन बाद अपनी माँ से कही. आपके पास आने का मेरा भी मंतव्य यही था पंडित जी की ये मामला आप थोड़ा अपने तरीके से देखे जो बहार दुनिया में न आये."
"अरे यार मल्होत्रा, अब भाई साहब ने तोह खुद हे कहा है की कानून इसमें शामिल नहीं करना. लेकिन अगर मामला संगीन है और ब्लैकमेल पैसे की जगह गलत मंशा लिए है तोह बिटिया के साथ कोई सक्षम इंसान हे होना चाहिए. वैसे बिटिया ने कुछ बताया की वो कब वापिस जाना चाहती है.", छोल साहब के विचार सुन्न कर रामेश्वर जी ने भी वही जानकारी चाहि जिस से उन्हें वक़्त मिल सके.
"वो तोह वापिस जाना नहीं चाहती जितने मामला न सुलट जाए. पर ज्यादा समय यहाँ रुकना भी मुमकिन नहीं और मेरी उम्मीद आपसे शुरू हो कर आप पे हे ख़तम है भाई साहब. एक हे बेटी है और उसका जीवन शुरू होने से पहले अगर ..", मल्होत्रा जी के कंधे पर थपकी देते हुए रामेश्वर जी ने ना में सर हिला कर उन्हें कुछ भी कहने से रोक दिया.
"मैं पहले तोह सोच रहा था के संजीव से बात करू लेकिन यहाँ किसी ऐसे की जरुरत है जो बिटिया के साथ अगर वह जाए भी तोह ज्यादा परेशानी न हो. जो भी है उसकी मंशा सामने आने की तोह कटाई नहीं है और वो डर से हे अपनी मंशा पूरी करना चाहता है. बेटी से बात करना कही भी ठीक नहीं चाहे हम जानते हे क्यों न हो. पालक बिटिया से कह दो की वो परसो ससुराल जाने का कह दे घर पे. मैं कौशल्या से बात करके बिटिया को अर्जुन के साथ भेजता हु. छोटा भाई है और 2-3 दिन बहिन के घर रहने के साथ शहर भी घूम लेगा.", रामेश्वर जी के पास अब जैसे कोई बेहतर विकल्प नहीं था और अर्जुन की काबिलियत से वो बखूबी वाकिफ थे जिसने उन्हें उनकी सोच से भी बढ़ कर कारनामे कर दिखाए थे हाल फिलहाल में.
"अर्जुन.. वो तोह.. भाई साहब आप इसको हलके में तोह नहीं ले रहे?"
"मल्होत्रा भाई, मैं तुम्हे अपना brahm-astra सौंप रहा हु और तुम संदेह जाता रहे हो? हाहाहा.. जानते नहीं न तुम उसका पूरा चरित्र. यकीन करो, वो बिटिया को सभी परेशानी दूर करने के साथ साथ उसको मानसिक रूप से मजबूत भी बना देगा. यहाँ पर अपनी श्रीमती जी का प्रयोग करना पड़ेगा जिस से अर्जुन को मामले में फिट किया जा सके", रामेश्वर जी की बात सुन्न कर अनमने भाव के बावजूद उन्होंने पूरी बात बताने को कहा.
"जो तुमने सुना है वो अपनी श्रीमती जी से साँझा करना और बताना की तुम पिता हो इसलिए सामने नहीं आ सकते लेकिन ये बात वो अर्जुन से करे जब वो बिटिया को घर लेने आये ससुराल ले जाने के लिए. वह हो सके तोह पालक का शामिल रहना भी जरुरी होगा जिस से वो अर्जुन का साथ दे सके. मानता हु यही सबसे मुश्किल काम होगा लेकिन अर्जुन उन्हें अपनी ताई सा मान देता है और पालक बड़ी बहिन है उसकी. राखी का कर्त्तव्य भाई सुरक्षा दे कर हे पूरा करते है. उधर परिवार में भी कोई आपत्ति नहीं करेगा और ऐसे मामले कानून से बहार सुलझाना अर्जुन के हे बस का है. बाकी सभी तोह दरिंदे है जो मुजरिम ढूंढ़ने से पहले जाने कितनो को मार गिराए और बिटिया का घर खराब होगा वो अलग. कारगुजारी तोह यक़ीनन किसी करीबी की है उधर या दामाद के जानकार की.", छोल साहब ने इनके बाद जो कहा उसको सुन्न कर मल्होत्रा जी ने अपना गाला गीला करने के लिए एक घूँट में हे चाय के ऊपर से पूरा गिलास पानी जातक लिया
"भाई बात ऐसी है मल्होत्रा जी, भाई साहब सिर्फ इसलिए परेशां थे क्योंकि इन्होने आजतक अर्जुन को जो भी काम दिया वो अप्रत्यक्ष रूप से दिया है. और प्यार भी सबसे ज्यादा करते है इसलिए उसके लिए चिंतित थे. तुम्हे तोह खुश होना चाहिए के इन्होने अपना सबसे काबिल व्यक्ति इस काम पर लगाया. बाकी किस्से तुम्हे मैं सुना दूंगा थोड़ी देर बाद जब पीने बैठेंगे. जरा घर हो आता हु मैं इतने भाई साहब के साथ चर्चा कर लो.", यहाँ छोल साहब के जाते हे कुछ वक़्त दोनों के बीच गुफ्तगू होती रही और दिन ढलने पर रामेश्वर जी से विदा ले कर मल्होत्रा साहब अपने घर चल दिए उनका कहा पूरा करने और इधर रामेश्वर जी ने बैठक में जाते हे गाँव के घर का नंबर घुमा दिए. घडी में साढ़े 7 हो रहे थे जिसका मतलब था की अर्जुन वही होगा. बस वो उसको ऐसे बीच में बुलाना नहीं चाहते थे लेकिन दोस्त के साथ साथ एक लड़की के जीवन का सवाल था जो इन्हे भी बौ जी हे कहती थी.
"ऐसा है बौ जी कल तोह मैं नहीं आने वाला अगर परसो जाना है तोह. हाँ.. जी.. परसो आ जाऊंगा सवेरे हे.. कोई बात नहीं एक बार बात कर लेने दीजिये फिर जैसे कहेंगे ठीक है.. सब ठीक है... रखता हु.", 10 मिनट तक वह अर्जुन सिर्फ अपने दादा की हे सुनता रहा और आखिर में उसने बस इतने से हे जवाब दिए टुकड़ो टुकड़ो में. अचानक हे उसके जीवन में ये 2-3 दिन का काम ाँ पड़ा था जिसकी जानकारी सबसे पहले तोह जन्नत को हे देनी थी. जाने लोगो की चाहत उस से क्या क्या करवाने वाली थी और रामेश्वर जी इस बात से अनभिज्ञ थे की जिसको वो मामला सुलझाने भेज रहे है, वो जाने क्या क्या सुलझाने वाला है बिना कुछ किये.