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बचाव (2)
'बादलो में छुप रहा है चाँद क्यों... अपने हुस्न की अदा से पूछ लो......... चांदनी पड़ी हुई है मंद क्यों.. अपनी हे किसी अदा से पूछ लो', मार्किट से वापिस लौट रहे अर्जुन और आँचल रह रह कर एक दूसरे को बड़ी आसक्ति से देख रहे थे इस गाने को सुनते हुए. रात में जीनत के रोकके पर जाने के लिए जो वस्त्र अर्जुन के लिए जन्नत ने पसंद किये थे, उन्हें हे लेने के लिए अर्जुन घर से निकला था और आँचल काम का हवाला देती साथ निकल चली. अभी घरी 3 बजा रही थी पर इनकी ऐसी चाहत भरी ख़ामोशी की वजह वो पल थे जो अब से 3 घंटे पहले शुरू हुए.
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04 जून 1998, समय 11:45 और स्थान पप शर्मा का बंद पड़ा घर.
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"किताबे तोह पिछली बार ले हे गए थे फिर इस बार ऐसा क्या जरुरी रह गया जो लेने आये है?", दफ्तर पर टाला ज्यादा था क्योंकि शर्मा दंपत्ति विदेश भ्रमण पर गए हुए थे, अपने जीवन की एक बार और नयी शुरुआत करने के लिए. दरवाजा खोलने के बाद भीतर से उसकी सांकल लगाती आँचल ने होंठो को गोल करते हुए अपने इरादे स्पष्ट हे कर दिए की वो यहाँ क्या लेने आयी है और आज उसके पास आख़िरकार सही मौका और जगह भी है. अर्जुन ने सर खुजाते हुए कदम भीतर आँगन के तरफ बढ़ा लिए.
"आज तोह तुम्हारे पास कोई बहाना भी नहीं है मिस्टर क्योंकि जहा भी तुमने जाना है शाम को हे जाना है. और मामी को मेरे सामने हे तुमने मन किया था के आज तुम उधर नहीं जा सकते इसलिए वो दीदी के साथ मंदिर हे घूमने चली जाए. एक बार छोटी मामी बीच में आ गयी और दूसरी बार संजीदा दीदी. यहाँ सिर्फ हम दोनों है अब और टाइम की कोई कमी भी नहीं.", दुपट्टा जो इतनी देर से सीने और सर को ढके था, वो अब डाइनिंग टेबल पर फेंकती हुई आँचल बिन आँचल के कड़ी थी. जिस्म तोह विरासत में हे ऐसा मिला था जिसके चाहने वाले अनेक थे और कुछ तोह अब ज़िंदा भी न रहे. 36-38 के बड़े बड़े मांसल चुके, 30 की मखमली कमर और सीने से अनुपात में हे मॉटे और बहार को उभरे हुए लचीले कूल्हे. एक आँचल हे थी कुछ माधुरी दीदी सी शारीरिक काया वाली और व्यक्तिगत जीवन भी कुछ वैसा हे था इसका जो घर के सभी काम खुद करती रही थी jhaadu-paucha से ले कर भोजन बनाने तक. शहरी जीवन पर देहात के साफ़ सुथरे खाने का बेहतरीन परनिअम थी आँचल जिसके रूप यौवन पर अर्जुन भी पहली sukhad-ghatna से विचलित हो चूका था. आज भी उसके समरण में वही लटकते हुए बड़े गोलाकार सतांन और कूल्हों का कामुक कटाव सुसज्जित था.
"मैं तोह आपको खुदसे बचा रहा था लेकिन अगर इरादा बना हे लिया है तोह फिर नेक काम में देरी कैसी? वैसे आपको सिखाने की तोह ज्यादा जरुरत नहीं पड़ने वाली.. बुआ और चची को देख के थोड़ा बहोत तोह सीख हे गयी होंगी.", अर्जुन ने वही डाइनिंग टेबल के करीब हे आँचल की कमर में हाथ डालते हुए उसको अपने सामने चिपकते हुए मजाकिया तंज किया और बदले में आँचल ने भी अपनी गुलाबी जीभ निकाल कर होंठो पर ऐसे फिराई जैसे वो सब स्वीकारती हो.
"मामी का जिस्म ढंग से तोह तुमने हे निखारा है लेकिन मेरी माँ तोह माहिर थी फिर भी चाल बदल दी तुमने उनकी. थोड़ा रेहम करना अपनी बहिन पर... झेल तोह लुंगी आखिर तुमसे बड़ी जो हु लेकिन तुम्हारा कुछ ज्यादा हे बड़ा है और मेरा ये पहली बार. वैसे तुम्हे एक सरप्राइज भी देना है लेकिन वो बाद में.", अर्जुन के सख्त सीने के उठान पर दोनों हाथ फिरती वो एड़ी उठती हुई ऊपर से हे अपना बदन उस से रगड़ती हुई अलग हे मस्ती में बोलने लगी. अर्जुन जानता था की आँचल ऐसा इसलिए कर प् रही है क्योंकि वो इतने दिनों में उसके साथ उन्मुक्त हो चुकी थी. हमेशा नजरे झुकाये रखने वाली और पढ़ाकू सी ये युवती अब बदलने लगी थी.
"चाल तोह आपकी भी बदलेगी और मुझे यही डर है की घर क्या जवाब डौगी. वैसे आपको जबसे बाथरूम में देखा था, दिल मेरा भी मेरे बस में नहीं रहा. ये इतने हसीं दिख रहे थे न वह झुके होने पर की मैं हे जानता हु कैसे खुद को काबू किया. हाँ बुआ के साथ थोड़ा गलत किया मैंने लेकिन जाने दो, उनके बदले का प्यार भी आपको हे कर लूंगा.", कुर्ती ढीली होने के बावजूद सीने पर इस कदर कासी थी की वो बड़े गोले अपना अकार ाचे से बताते दिखे. अर्जुन का हाथ आँचल के कंधे से फिसलता हुआ उन नरम गुब्बारों पर गोलाकार सा चलता उनकी परिधि जांचने लगा. भीतर ब्रा के बावजूद चुचो की नरमी और उनका अकार उसने ाचे से महसूस किया. दूसरा हाथ तोह खुदसे हे चुम्बक की तरह भरी उभरे हुए कूल्हों के निचे जा टिका. आँचल भी अपने जिस्म के दो हिस्सों पर मरदाना मजबूत स्पर्श लेती हुई चेहरा ऊपर उठाने लगी. भरे भरे तराशे हुए होंठो पर अर्जुन ने हे होंठ चिपका दिया. वीरान पड़े शर्म के इस घर में आज उसकी बेटी का हे कौमार्य भांग होने वाला था बेशक बीवी पहले हे औरत बन के आयी थी यहाँ. अर्जुन दाए हाथ से एक सतांन की तलहटी से उठान तक मसलता रहा और दूसरा हाथ आँचल के कूल्हों की जड़ में उसकी रेशमी जांघो और गरम कूल्हों से खेलने लगा. आँचल उसके कंधे थामे पूरी तल्लीनता से ras-swadan का सुख भोगने लगी, जिस्म में जैसे विधूयूट भर उठी हु, kaam-vidhyut.
"आअह्ह्ह.. बड़े बेसब्री हो रहे हो अब तुम. पहले मुझे तड़पते रहे और आज इतने उतावले हो की सांस तक नहीं लेने दे रहे. उम्म्म्म", यही खड़े खड़े हे अर्जुन ने कमीज ऊपर खींचनी चाहि तोह वो मॉटे स्टैनो की चढ़ाई पर हे अटक गयी. सलवार के नाड़े से ऊपर मांसल पेट कुछ बेपर्दा हुआ और उसके ऊपर पतली समीज कुर्ती के साथ खींचती हुई आधे पेट को ढके हुए. आँचल ने हे कुर्ती को झटकते हुए ऊपर खिंचा तोह स्प्रिंग से हिलते दोनों पहाड़ से चुके समीज और काली ब्रा में क़ैद अपनी ख़ूबसूरती से अर्जुन को ललचाने लगे. दिन की रौशनी में उसके सामने कड़ी आँचल का ये रूप जानलेवा हे था. मॉटे उरोजों के रेशमी किनारे आपस में जुड़े एक कामुक नजारा बनाये थे और ब्रा से कुछ निचे तक फांसी समीज को अर्जुन ने एक झटके में हे अपनी नजरो से दूर कर दिया. गोल नाभि के दरमियान नंगा पेट जिसमे लोच और नरम सा उभर हे था. उसके ऊपर स्टैनो का बोझ धोती हुई वो काली ब्रा भी पूरी तरह ऐसे चुचो को समेटने में नाकाम सी. कुछ हिस्सा सीने के बीच नुमाया था और उतना हे ब्रा के किनारो से दोनों तरफ बहार. अर्जुन बाहरी हिस्सों को हाथो में लेते हुए स्टैनो की घाटी में मुँह दबाता उन्हें जीभ से चाटने चूमने लगा. आँचल भी पीछे खिसकती हुई लकड़ी के बड़े टेबल से कमर सताए अर्जुन के हवाले हो गयी. नरम मांस को मुँह में भर के चूसते हुए अर्जुन ने आँचल का रोम रोम उत्तेजित कर दिया. ब्रा के भीतर हे उन छोटी मटकी से गोलों की घुंडियां अकड़ने लगी थी. आँचल उसका सर सहलाती हु टेबल पर हे पीठ के बल झुकती चली गयी.
"मैं बेसब्र भी तोह आपकी हे बदौलत हुआ हु. सचमुच आपके बूब्स बने हे पीने और मसलने के लिए है. हाथ में पकड़ना चाहो भी तोह फिसलने लगते और कितने गोल और बड़े बड़े है. कपड़ो के ऊपर से फिर भी ये उतने बड़े नहीं दीखते जितने ये सचमुच में है और इतने कैसे हुए भी. सोती कैसे हो इनके साथ?", अर्जुन ने सलवार में क़ैद जांघो को थाम कर आँचल का जिस्म टेबल पर पीछे धकलते हुए सही से लिटा दिया. बड़ी बड़ी छातियां इस हरकत पर भी एक ताल में हिलने लगी जिन्हे दोनों हे देख रहे थे. आँचल के चेहरे पर हलकी लाली और शर्म थी वही अर्जुन बस उन्हें be-parda करके निचोड़ना चाहता था.
"ऐसे क्या देख रहे हो? सामने हे तोह हु तुम्हारे और मेरा जो कुछ है उस पर तुम्हारा पूरा हक़ है अर्जुन. मैं भी चाहती हु की तुम मेरे जिस्म के हर हिस्से पर अपनी मोहर लगा कर इसको अपना बना लो. अब तुमसे ज्यादा मेरा सबर जवाब दे रहा है.", आँचल ने कमर उठा कर ब्रा खोलनी चाहि तोह अर्जुन ने दोनों उरोज दबा कर उसको वापिस निचे लिटा दिया. कंधो से दोनों काली पत्तियां खिंच कर बाहों की तरफ खिसकते हुए वो आधे स्टैनो की गोलाई देखने लगा. लेते होने पर भी वो पूरे तन्ने हुए थे और ब्रा बस निप्पल पर अटकी हुई, दोनों तरफ के भूरे गोल सिक्के को थोड़ा थोड़ा दिखती हुई. अर्जुन ने इसके बाद एक झटके में हे ब्रा के दोनों कप निचे उलट दिए.
"ओह्ह्ह्ह.. कितने खूबसूरत है आपके सतांन.. बेजोड़.. किसी कामदेवी की मूरत से.", और वर्णन कही गलत भी नहीं था उस दूध की जोड़ी का. जितने भरी और मॉटे कैसे हुए वो सतांन थे, उतना शानदार उनका केंद्र. मेहँदी से रंग के गोल घेरो के बीच ऊपर उठे हुए गहरे भूरे पर कच्चे चूचक. एक अर्जुन हे तोह था जिसने उनका स्पर्श किया था और निप्पल तोह बढ़ते हे सम्पूर्ण संसर्ग से है. ये कोरे चूचक जैसे हे अर्जुन की उँगलियों ने पकडे, मजे से आँचल ने आँखें मूँद ली. वो अपनी इस बड़ी बहिन के ऊपर आता हुआ एक दूध को ाचा खासा हिस्सा पकड़ कर किशमिश से निप्पल को मुँह में भर के जीभ से सहलाता सा चूसने लगा. अलग सा स्वाद था जैसे कोई रास निकल रहा हो. दूसरे वाले पर भी हथेली रख कर सहलाता हुआ आँचल के जिस्म पर छा चूका था. खुले आँगन में खाने की बड़ी मेज पर आज पकवान की जगह आँचल सजी थी और उसको धीमी रफ़्तार से भोगता अर्जुन. चुचो की लमस इतनी आकर्षक थी की जल्द हे वो उनका मर्दन करता हुआ पागलपन की हद्द तक दोनों शिखर चूस चूस कर कड़े कर गया. अर्जुन द्वारा निप्पल मसलने और दोनों का एक साथ अपने मजबूत हाथो से मर्दन करना हे आँचल के लिए पर्याप्त रहा. टाँगे उठती हुई वो अर्जुन की कमर पर कैंची बनती हुई हलके झटके लेने लगी. सलवार और जीन्स के ऊपर से हे दोनों के निचले अंग एक दूसरे को आनंद दे रहे थे. कुछ समय पहले जो निप्पल अभी उभरने लगे थे वो दोनों हे गहरे रंग और थूक में गीले हो कर आसमान की तरफ तीर से उठे थे.
"ुण्णं.. ाचा लग रहा है.. आह्हः.. मुझे नहीं पता था ये सब इतना मजे से भरा होगा... बस इन्हे थोड़ा आराम से दबाओ.. आह्हः..", अर्जुन को वापिस अपने चुचो पर दबती हुई आँचल सीसीएनए लगी. निचे कुछ मजबूत सा अंग उसको अपनी रास बहती नरम योनि पर दबता लगा. वो जानती थी की ये क्या चीज है और 2 रात पहले हे तोह उसने पहली बार लिंग को हाथ में पकड़ कर होंठो से लगाया था. कितना विशाल अंग है वो, ये सोच कर खुद हे आँचल कमर को आगे पीछे करती हुई अपनी योनि को घिसने लगी. 15 मिनट तक दोनों मॉटे खरबूजे चूसने मसलने के बाद अर्जुन पीछे हो कर मेज पर लेती आँचल को देखने लगा. उसके चेहरे पर हल्का पसीना और हिलते सतांन पहले से कही ज्यादा उभरे हुए. जीन्स पहने रखना अब अर्जुन के लिए मुश्किल हो चूका था और वही जूते खोल कर अपनी जीन्स और निक्कर उतरता वो तुरंत जन्मजात अवस्था में आँचल के सामने खड़ा हुआ और इधर आँचल ने भी सलवार की गांठ खोलते हुए खुद को अर्जुन के समकक्ष बनाया. दोनों मांसल पत् आपस में जुड़ते उसके गदराये जिस्म को अधिक कामुकता प्रदान करते. योनि को छुपाती काली पंतय जिस्म पर बुरी तरह कासी थी जो आखिर जांघो से निचे फर्श पर आ रुकी. भूरे लकीरबन्द यौवन की झलक ने हे लिंग को ऐंठने के साथ 3-4 बार झटका दिया. अर्जुन बस इस कामदेवी को हे निहार रहा था जो कही ज्यादा उत्तजित थी.
"ये हर समय ऐसा हे रहता है?", आँचल हैरत भरी आँखों लिए उस फड़कते हुए तगड़े लुंड के पास आ बैठी. कुछ देर देखने के बाद जिस कुशलता से उसने अर्जुन के विकराल लिंग को जड़ से दबोचा था वो अपने आप में हे आँचल की लालसा बताने को काफी था. चमड़ी पीछे करती हुई वो अर्जुन से ऐसे नजरे मिलाये थी जैसे वो उसके चेहरे पर बदलते भाव बखूबी पहचानती थी. अब समय था अर्जुन को उसके तरीके से आनंद देने का.
"आप हो हे इतनी मस्त तोह ये खड़ा कैसे न हो.? सचमुच आपका बदन हर तरह से बस प्यार करने के लिए बना है. आअह्ह्ह..", आँचल की जीभ गुलाबी सुपडे पर फिसलते हे अर्जुन ने अपना एक हाथ उसके सर पर दबा दिया. वो भी निचे नजरे उठती हुई कामुकता से अर्जुन को देखते हुए सुपडे के निचे वाली खाल से वीर्य छिद्र तक जीभ की नोक गुआंती हुई अपने kaam-gyaan का जलवा दर्शाने लगी. कंप्यूटर का उपयोग या दुरप्रयोग कहिये लेकिन आँचल ने जो भी सीखा था उस से अर्जुन के तगड़े मूसल पर नीली धारियां उभर कर उसको कही ज्यादा खतरनाक दिखने लगी. एक हाथ उसकी मजबूत जांघ पर रख के सहारा लेती आँचल ने पूरे होंठ खोल कर सूपड़ा मुँह में भर लिया. अर्जुन एक हाथ टेबल पर टिकाये इस सुखद एहसास से भरा अपनी कमर हिलता हुआ जैसे आँचल के मुँह को हे छोड़ने लगा. आँचल को थोड़ी परेशानी भी हुई उस अजीब से स्वाद और अर्जुन के धक्को से लेकिन परिपक्व युवती ने एक तिहाई लिंग को ाचे से सहा. ये मुखमैथुन जैसे अभी लम्बा चलने वाला था.
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"पापा, आज आपने वापिस हॉस्पिटल नहीं जाना? 12 से ऊपर टाइम हो चूका है.", कोमल यहाँ घर पे प्रियंका के साथ घर के सभी काम निबटान एक बाद आखिर में बैठक दुरुस्त करने आयी तोह अपने पिता डॉ शंकर को दीवान पर सोये देख थोड़ी हैरान हो गयी. वो दिन में कभी भी घर पे विश्राम नहीं करते थे. हाँ थोड़ा बहोत आराम करना मुमकिन था लेकिन भोजन किये डेढ़ घंटे से ऊपर हो चूका था इसलिए कोमल ने उन्हें जगाया तोह शंकर जी ने अपनी घडी पर नजर डाली, जो 12:25 बता रही थी.
"ओह.. सही किया बीटा तुमने मुझे उठा दिया. जाने कैसे आँख लग गयी मेरी. एक गिलास पानी देना जरा.", शंकर जी ने सिरहाने की तरफ से दवा की शीशी उठा कर एक गोली मुँह में डालने के बाद कोमल के हाथ से पानी का गिलास लिया और जूते पहन ने लगे. चेहरे पर थोड़े थकान के भाव अभी भी थे जो हैरानी की बात थी उनकी दिनचर्या और सेहत को ध्यान में रखते हुए. आज सुबह वो बिना नाश्ता करे हे घर से निकल गए थे 5 बजे आपातकाल स्थिति की वजह से. दुर्घटना का बड़ा केस था और ऐसे में सभी प्रमुख चिकित्स्कों की जिम्मेवारी थी घायलों का समय पर इलाज करना.
"आप आराम हे कर लीजिये न पापा. हॉस्पिटल फ़ोन कर दीजिये, आज आप थके हुए लग रहे है.", कोमल ने गिलास वापिस मेज पर रखने के बाद बगल वाले सोफे पर बैठते हुए अपने पिता को सलाह दी तोह प्रतिउत्तर में वो मुस्कुराते हुए अपने तस्मे बांधने लगे.
"उम्र बढ़ने के साथ एक न एक दिन तोह प्रभाव पड़ेगा हे बीटा. तुम टेंशन मैट लो, सब ठीक है. वैसे तुम्हारी माँ ने कब वापिस आना है? बात हुई थी क्या आज?", शंकर जी ने फिर से समय देखा और दोनों हाथ दीवान पर टिकाये आराम से बैठ गए. जैसे उनके पास अभी भी कुछ समय था.
"हाँ आपकी बात भी सही है लेकिन ऐसा पहली बार हे देखा है न पापा. वैसे माँ परसो लौटने का बता रही थी पर दादी ने कहा की वो संडे को वह से सीधा क्सक्सक्सक्स हे पहुंच जाए. विष्णु चाचा की शादी में. रात आप उनके हे पास गए थे?", शंकर जी ने है में जवाब दिया और जैसे कुछ सोचने के बाद उन्होंने ये अलग हे बात छेड़ दी.
"तुम्हे ऐसा नहीं लगता की तुम्हारा छोटा भाई कुछ लापरवाह हो रहा है? मेरे पास तोह कभी समय रहा नहीं की उस पर ध्यान दे सकू. घर में बाकी लोग भी अपने अपने काम में व्यस्त रहते है चाहे संजीव हो या तुम्हारा चाचा ताऊ. तुम्हारी माँ का भी मैं समझता हु की घर सँभालने और बचो को पढ़ने के बाद उसके पास समय नहीं रहता. तुम्हे काम से काम अर्जुन की जिम्मेवारी लेनी चाहिए कोमल. कोई उस से पूछता है की वो वह क्या कर रहा है या क्यों? छुट्टियां बिताने गया है तोह ाची बात है लेकिन घर और गाँव से बहार कहा जाता है, किस से मिलता है और क्या जरुरत है? बुरा मैट मान न मेरी बात का लेकिन औलाद और मिटटी एक जैसे होते है. ध्यान दो तोह दोनों सही फल देंगे नहीं तोह जैसे बिना वृक्ष वाली मिटटी पानी या हवा से बह जाती है वैसे हे ध्यान न देने से औलाद. इतना तोह मैं जानता हु की वो तुम्हारी बहोत िज्जात्त करता है और हर बात भी मानता है. लेकिन क्या इतना हे उचित है? अर्जुन के असफल भविष्य जीवन का दोष किसके सर मंधेगा? मेरे और तुम्हारी माँ के लेकिन क्या सच में हम दोनों हे उसके जिम्मवार होने चाहिए?", शंकर जी ने अर्जुन के विषय पर पहले कभी कोमल से इस तरह से बातचीत या सवाल नहीं किये थे और कही न कही मान न था की कोमल हे अर्जुन का ध्यान रख सकती है और फिलहाल जैसे वो अपने छोटे भाई की अनदेखी कर रही थी. अर्जुन के ाचे बुरे करम का बोझ उन्होंने माता पिता का बताने के साथ दोनों की jiwan-dasha का ध्यान भी बखूबी कराया तोह कोमल की नजरे झुक गयी.
"सॉरी पापा. आप ठीक कह रहे है की आप और माँ, दोनों हे सुबह से रात तक अपनी जिम्मेवारियां निभाते रहते है और कभी हमसे कुछ कहा भी नहीं. बदले में.. ", कोमल के सर पर शंकर जी ने स्नेह से हाथ रख कर बात बिच में हे रुकवा दी.
"बीटा, पढ़ना लिखना जीवन का एक जरुरी हिस्सा है और मुझे कभी भी मेरे किसी बचे ने निराश नहीं किया. तुमने तोह कॉलेज के वक़्त हे घर के काम संभल लिए थे अपनी माँ और ताई के साथ. पर इन सबसे ज्यादा जरुरी है अपने छोटे भाई बहिन का भी जीवन संवारना. ऋतू तुम्हारी हर बात मान लेती है लेकिन वो पूरी तरह केंद्रित है अपने लक्ष्य के लिए. मैं अर्जुन को कुछ नहीं कह सकता क्योंकि अगर मैं उसको समझने लगा तोह घर के सभी बड़े मुझे हे घेर लेंगे. उसकी उम्र के हिसाब से उसको खेलना चाहिए, दोस्त बनाने चाहिए और कही आना जाना हो तोह काम से काम घर पे किसी को पता तोह हो की वो है कहा. चलो तुम बताओ की अभी अर्जुन कहा होगा?", शंकर जी ने इस सवाल के साथ हे छोटी मेज पर रखा टेलीफोन भी दोनों के बीच खींच लिया जिसका मतलब साफ़ था की कोमल के जवाब की पुष्टि जरूर होगी.
"आप ठीक कहते है पापा की अर्जुन अभी कॉलेज हे नहीं गया और एक्साम्स तक हमेशा घर रहने वाला मेरा भाई आजकल कहा जाता है, क्यों जाता है ये पहले की तरह सही से पता नहीं होता. मैं भी कुछ नहीं बोलती क्योंकि बौ जी और दादी का कहना है की उसको बहार निकलना चाहिए, दुनिया देखनी चाहिए और फिर वापिस स्कूल शुरू हो जाएंगे तोह 2 साल ारु फिर पढ़ाई और स्पोर्ट्स में लगा रहेगा.", कोमल ने अर्जुन की स्थिति वाली बात को एक पल तोह ताल हे दिया था लेकिन सब सुनते हुए भी शंकर जी का ध्यान वही बना हुआ था.
"ऐसा है बीटा, दादा दादी तोह बचो को थोड़ा ढील देंगे हे, वो जरुरी है लेकिन बचा उसको नाजायज़ हे न ले ले ये जिम्मेवारी अभिभावकों की होती है. कल को मान लो की अर्जुन के साथ कोई ऊंच नीच हो जाए, किसी दुर्घटना का हिस्सा हो या जितना वो नरमदिल है कोई उसका फायदा उठा कर उसका और परिवार का नाम खराब कर दे तोह क्या तब भी यही कहा जाएगा की बचा है घूमने फिरने निकला था.? वैसे तुमने बताया नहीं की तुम्हे अंदाजा है अर्जुन इस वक़्त कहा होना चाहिए? धुप का वक़्त है तोह कही जाना बनता तोह नहीं उसका."
"जी पापा. घर पर हे होगा वो अभी", और इतना सुनते हे उन्होंने गाँव का नंबर मिला दिया. कौशल्या जी बहार आँगन से यही आ रही थी लेकिन बाप बेटी को बातचीत करते देख वो उनसे कुछ दुरी पर बैठ कर माहौल समझने लगी. फ़ोन की घंटी लगते हे शंकर जी ने हैंडल अपनी बेटी को थमा दिया.
"लो तुम हे पता कर लो और पूछना की अगर वो बहार है तोह क्या बता कर गया है.", इधर फ़ोन उठते हे कोमल ने महिला की आवाज सुनी जो अनामिका हे थी. बातचीत होने पर जब अर्जुन के विषय में पुछा तोह सामने से क्या जवाब मिला वो सिर्फ कोमल ने हे सुना और फ़ोन वापिस रख दिया.
"शाम को उमेद चाचा जी ने ारु को किसी कार्यक्रम में जाने का कहा है जिधर वो जाने वाले थे लेकिन बहार होने की वजह से उनकी जगह ारु जा रहा है. उसके लिए हे वो शहर कपडे लेने निकला था घर से साढ़े 11 बजे.", शंकर जी इस जवाब पर ऐसे मुस्कुराये जैसे वो संतुष्ट नहीं थे बेशक उमेद वाली बात सही थी लेकिन हाल में अर्जुन कपडे लेने हे गया है ये नहीं जांचा.
"और वापिस आने का समय बताया उसने?"
"जी बोल के गया था की 4-5 बज तक लौट आएगा.", कोमल जवाब देते हुए मैं हे मैं कुछ और भी सोचने लगी थी और अपनी बेटी को गंभीर देख कर शंकर जी अपनी जगह से उठ खड़े हुए.
"अगर तुम अर्जुन के जवाब से संतुष्ट हो तोह ठीक है बीटा लेकिन तुम उसकी परवाह करती हो तोह फिर तुम्हे पूरी छूट है उस से सख्त व्यवहार करने की, सवाल पूछने की और तुम्हारी दादी यहाँ सामने बैठी है जिनके सामने ये जिम्मेवारी मैं तुम्हे दे रहा हु. वो जहा जाए, उसकी हर छोटी बड़ी बात, वजह और उसमे अर्जुन की जरुरत तुम्हे पता होनी चाहिए. आखिर तुम्हेर माँ से ज्यादा वो तुम्हारे साथ रहा है और घर में उसको अगर डर भी है तोह सिर्फ तुमसे. ये मैट सोचना की मुझे कैसे पता की वो सिर्फ तुम्ही से डरता है बाकी सबकी सिर्फ इजत्त करता है. पता करो अपने भाई का.", शंकर जी मेज पर से अपना चस्मा और बटुआ उठा कर बहार निकल गए और कोमल ने एक नंबर घुमाया बिना अपनी दादी पर ध्यान दिए और वह बात करने पर पता चला की माधुरी दीदी तोह खुद अपनी माँ और जेठानी शिल्पा के साथ बाजार गयी है. अर्जुन ने आज उधर आना नहीं था. कोमल हताश हो उठी थी ये सब सुन्न कर क्योंकि आज पहली बार उसके पिता ने उस से सवाल किये थे उसके छोटे भाई को ले कर और हमेशा अर्जुन का पता रखने वाली कोमल से जिस दिन चूक हुई उस दिन हे ये सवाल जवाब झेलने पड़े थे.
"ज्यादा मैट सोच अपने बाप की बात. शहर गया होगा तोह कही महल या गाँव के काम से निकल गया होगा इधर उधर. शाम को बात कर हे लेगा जब घर आएगा. चल तू आराम कर ले थोड़ी देर, सुबह से लगी हुई है. दोपहर का खाना कृष्णा के साथ रूपाली या कोई भी लड़की बना लेगी. अर्जुन गाँव जाने से पहले तोह हमेशा तेरी नजरो में हे रहा है. अब दूर है तोह थोड़ा.."
"नहीं दादी.. अर्जुन चाहे दिल से ाचा हे सोचता है सबके लिए लेकिन दुनिया उसके जैसी सोच नहीं रखती. वो तोह दीदी के ससुराल भी नहीं गया और कही भी जाता तोह काम से काम पता तोह हो की महल गया है या किसी दोस्त के पास. आपके पास दामिनी बुआ के घर का नंबर है दादी?", कोमल ने जाने ये कैसे पूछ लिया था और शायद यही उसकी छत्ती (6तह) इंद्री थी. कौशल्या जी ने तुरंत हे उठ कर अपने कमरे से वो डायरी ला दी जिसमे नंबर था और कोमल ने एक बार नंबर मिलाया तोह घंटी जाती रही जाती रही लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. कोमल ने र का बटन दबा कर हैंडल फिर से अपने कान से लगा लिया और इस बार सामने से उखड़ी साँसों की आवाज स्पष्ट कान में पड़ी.
"Hello...uhhhhh"
"अर्जुन से बात करवाओ मेरी. बोलना कोमल दीदी है.", दूसरी तरफ एक पल को तोह चुप्पी हे छा गयी क्योंकि अर्जुन निर्वस्त्र खड़ा था जो फ़ोन आने से पहले तक आँचल की छूट मुँह में लिए बस अंतिम कार्य पूरा करने हे वाला था पर फ़ोन उठवा कर उसने अपने हे पाँव पर कुल्हाड़ी मार ली थी. आँचल बेशक बड़ी थी कोमल से लेकिन उसकी सार्ड धीमी आवाज सुन्न कर बदले में वो कुछ और न कह सकीय.
"जी दीदी.", अर्जुन की आँखें इतनी दूर होने के बावजूद निचे झुकी थी और स्वर में जो गलती का एहसास था वो कोमल ने खुद हे जान लिया.
"बता कर नहीं जाना होता की कहा जा रहे हो और किस वजह से? कपडे खरीदने में कितना वक़्त लगता है और तुमने तोह पहले हे नाप दे रखा था फिर वापिस लौटने के लिए 4-5 बजे का बताया? आँचल का सामान ले लिया घर से या कुछ बाकी है? 2 घंटे बाद गाँव वापिस पहुंच कर घर के नंबर से फ़ोन करना.", कोमल ने जिस अंदाज में अपनी बात कही थी अर्जुन का मूसल जवाब देने से पहले हे लटक कर आधा हो गया. उसको समझ हे नहीं आ रही थी की दीदी एकदम से कैसे उस से नाराजगी दिखा रही है? फिर ध्यान गया उनकी बातों पर तोह वो समझ गया की कोमल दीदी को यकीन होगा की अर्जुन वह आँचल के साथ गुल खिला रहा होगा और उन्होंने पहले हे सावधान किया था ऐसा न करने से.
"आप कहती हो तोह मैं घर हे वापिस आ जाता हु.", अर्जुन के मुँह से ये बात निकल तोह गयी लेकिन अब ये उसके लिए हे भारी पड़ने वाली थी.
"Do-tarfa बात करने के लिए नहीं कहा ारु. जब जिस काम के लिए घर से निकलते हो तोह सिर्फ उतना हे करना चाहिए और काम से काम ये जरूर पता हो की तुम क्या कहा और कितने समय के लिए बहार हो. काम से काम तब तोह जरूर जब तुम अपने शहर में नहीं हो. दीदी से मिलने जाना हो या रानी माँ की तरफ लेकिन उसका पता होना चाहिए. शाम के लिए तोह मैंने नहीं टोका क्योंकि फंक्शन का घर पे भी सबको पता है यहाँ. 7 बजे से देर रात तक तुम वह रहोगे लेकिन बाकी अपनी नादानियाँ थोड़ी काम कर लो तोह मैं भी जवाब देने लायक हो जाऊ. घर पहुंच के फ़ोन करना, बाकी बात मैं तभी करती हु.", कोमल ने जिस अंदाज में फ़ोन रखा और उठ कर यहाँ से निकल गयी, कौशल्या जी और अर्जुन की हालत के जैसी थी. दोनों हे अपने अपने सर पे हाथ रखे थे.
'बचाव करने के लिए ऐसा करना भी ठीक है बेचारी का. अब बाप न जिम्मेवारी ले तोह कोई तोह भुगते और ये बैलबुद्धि गलत मौके पर गुस्से का शिकार हो गया.', कौशल्या जी को कहा पता था के उनका बैलबुद्धि सही मौके पर दबोचा था कोमल ने. नहीं तोह उधर आँचल अर्जुन के निचे होती और किसी के वह पहुंचते हे दोनों का फंसना लाजमी था जैसा वह आँचल और अर्जुन द्वारा कपडे पहनते हे हुआ. बंद लोहे का दरवाजा कोई बाहर से खडका रहा था और ये दोनों एक दूसरे की तरफ देखते हुए हैरान थे की आज पूरी दुनिया उनके बीच आने वाली है क्या?
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"पता नहीं अपनी किस्मत पर हंसु या बाल बाल बचने की ख़ुशी मनाओ.", आँचल ने हे आख़िरकार उस गाने की आवाज काम करते हुए बातचीत आरम्भ की. अर्जुन खुद हे उलझन में था आज कोमल दीदी के व्यवहार पर और उस से ज्यादा खुदसे नाराज क्योंकि समय और हालात को समझने के बावजूद वो आँचल के साथ ये जल्दबाजी कर बैठा. कल रात हे प्रीती ने उसको समझाया था की वो कोई ऐसा काण्ड न करे जिस की वजह से कोई कल को 2 बात कह दे. जिनके साथ परस्पर प्रेम सम्बन्ध है वो उनसे हे संतुष्ट रहे यही बेहतर होगा, वो भी पूरी सावधानी से.
"फिलहाल तोह दुखी होने की ख़ास वजह नहीं है हमारे पास. आप हे सोचो की हमने एक साथ खुल कर इतना समय गुजरा और आपकी गर्मी भी कुछ शांत हुई. दीदी का फ़ोन सही समय पर नहीं आता न तोह हम अपनी सीमा लांघ चुके होते और आपकी चची के सामने जवाब न दिया जाता हमसे. खुद हे सोचो की उन्होंने हमे घर में आते हुए भी देखा और फिर दरवाजा बंद करने पर भी सवाल पुछा. ये तोह मैं था तोह बात भाई बहिन की वजह से संभल गयी. गलती मेरी भी है इसलिए सिर्फ खुद को दोषी मत मानिये. अब जो भी होगा वो ध्यान से और ठीक समय पर. वैसे भी कल मैं घर वापिस जा रहा हु और संडे तक हे वापिस आऊंगा.", आँचल मैं हे मैं पूरी घटना को समझने में लगी थी और अर्जुन बहोत हद्द तक सही भी था की वह घर का चुनाव करके उन्होंने गलती की हे थी और ये सब जल्दबाजी हे थी क्योंकि घर लंगड़ाती हुई आती तोह कोई जवाब नहीं देते बनता. फिलहाल दोनों हे पहले की तरह हलकी फुलकी बातें करते हुए गाँव पहुंच हे गए. अर्जुन पर अब सिर्फ और सिर्फ कोमल दीदी का व्यवहार हे हावी था. नए कपडे अनामिका चची को सुपुर्द करता हुआ वो हाथ मुँह धो कर टेलीफोन वाले कमरे में घुस गया, भीतर से उसको बंद करते हुए.
"आ गया स्वाद तुम्हे फिर से बेवकूफी करके? अब मुझसे उम्मीद मैट करना की मैं बीच बचाव करुँगी. वैसे भी दीदी पिछले एक घंटे से यही बैठी है बुआ के कमरे में.", अर्जुन ने अपने घर की जगह प्रीती के घर फ़ोन मिलाया था जहा पहले से मौजूद कोमल दीदी रेणुका बुआ और प्रीती की माँ के साथ इधर उधर की बातचीत में लगी थी जबकि मकसद उनका भी यही था की वो थोड़ा खुल कर अर्जुन से बात कर सके. अब बात प्रीती के माध्यम से कहलवाई थी तोह अर्जुन बचने के लिए फ़ोन भी उसको हो करने वाला था.
"अरे मेरी माँ, पहले मेरी बात तोह सुन्न लो. मुझे समझ नहीं आ रहा के मैंने बेवकूफी क्या कर दी और दीदी थोड़ा नाराजगी से बोली है. ऐसे तोह वो कभी भी नहीं करती. तुम हे पता करो न की इसके पीछे ऐसी कौनसी वजह है जो उन्होंने समझने की जगह सीधा धमका हे दिया.", इधर अर्जुन गुहार लगा रहा था और प्रीती ने अपनी तरफ आती कोमल दीदी को देखते हुए फ़ोन हे उन्हें थमा दिया बिना अर्जुन की बात सुने. कोमल दीदी भी बेतार फ़ोन को लिए प्रीती के साथ उसके कमरे में हे दाखिल हो गयी. दुपट्टा बिस्टेर पर रखती हुई वो अर्जुन की बात हे सुन्न रही थी जो यही सोच रहा था फ़ोन प्रीती के पास है. प्रीती सर खुजाने लगी जब कोमल दीदी को खामोश देखा.
"हो गयी तुम्हारी फ़रियाद और शिकायत? कुछ बाकी है तोह वो भी बता दो प्रीती समझ कर. सही सही बताना अर्जुन क्या मैंने कभी तुम पर कोई पाबन्दी लगाईं है या जो तुम चाहते हो वैसा नहीं होने दिया? प्रीती तुम कुछ वक़्त के लिए बहार जा सकती हो?", कोमल दीदी ने तोह इतने में हे इरादे स्पष्ट कर दिए थे और प्रीती उनका आदर करती हुई मासूमियत से हामी भर कर बहार गैलरी में निकल गयी, बहार वाले दरवाजे से. अर्जुन भी उधर अकेला था और कोमल दीदी भी इधर.
"मैंने कुछ गलत तोह नहीं किया दीदी सिवाए इसके की मैं आँचल दीदी के साथ उनके घर जा रहा हु ये बताया नहीं घर पे. आप ऐसे गुस्सा कर रही थी जैसे मेरी वजह से आपको किसी ने कुछ कह दिया हो."
"याद है ारु तुम्हे वो समय जब तुम कभी भी मुझसे सवाल जवाब नहीं करते थे और हर बात या तोह मुझे पता होती थी या तुम बता देते थे. आज ऐसा क्या हो गया मुन्ना जो तुम मेरी हे कही बात को इस कदर भुला बैठे हो और एक से बढ़ कर एक गलतियां बस करते हे जा रहे हो? पहले सुशीला बुआ, फिर दामिनी बुआ, हरमन (दीपा) भाभी, अनामिका चची और इतने पे तुम्हारी बस नहीं हुई तोह दीदी की जेठानी के साथ उनके पड़ोस वाली लड़की से सींग उलझा रहे हो. मैं तुम्हे जसलीन और अमृता जी के लिए नहीं टोक रही क्योंकि वो तुम्हारे हाथ नहीं है. पर जरा तुम समझो अर्जुन की आखिर तुम कर क्या रहे हो. आज आँचल.. वो भी उनके हे घर जहा आसपास अनगिनत घर है और उसको तुम्हारे साथ घर वापिस भी आना था. इतने रिश्ते मैट बनाओ ारु की पुराने रिश्ते तुमसे दूर हो जाए. तुम यहाँ वापिस लौट आओगे फिर उनका क्या होगा तुम्हारे पीछे से? ये इंसान की परवाह करना नहीं उसको सजा देने जैसा है. और अगर किसी ने तुम्हारा गलत स्वरुप पेश कर दिया तोह जितने चाहने वाले है घर से बहार, जो तारीफ करते नहीं थकते फिर वही तुम्हे गलत उदहारण की तरह पेश करेंगे. चची दिल की ाची है और उनके साथ जो है मैं एक बार उसको मान लेती हु लेकिन अब और नहीं मेरे भाई.. ध्यान खेल, जिम्मेवारियों और अपने भविष्य पर लगाओ तोह ज्यादा ठीक होगा. प्यार तुम्हारे साथ हमेशा है फिर चाहे घर पे हम सब और बहार जो.. जो तुम्हे अपना सबकुछ मानते है.", अर्जुन कान पर फ़ोन लगाए हुआ जहा पहले दीदी के खुलासो से चक्ति था वही उनके मुँह से खुदकी वास्तविकता सुन्न कर निरुत्तर. आखिर गलतियां तोह जाने अनजाने वही कर रहा था जहा उनकी जरुरत नहीं थी वह भी प्यार बाँटने की.
"वैसे आपको किसी ने कुछ कहा है न दीदी? मैं अब ये नहीं दोहराऊंगा जितना हो चूका उसको ठीक नहीं कर सकता पर आगे ऐसे रिश्ते.."
"मुझे किसने क्या कहा है वो जरुरी नहीं है ारु और तुम चाहे जितनी कोशिश कर लो तुम्हारी जिंदगी में ऐसे लोग आते हे रहेंगे. फैंसला तुम्हे हे करना है की तुम कदम उनकी तरफ बढ़ाते हो या अपनी राह चलोगे. जो तुम्हे दिल से पसंद करेगा वो तुम्हारी परवाह करेगा न की अपने दुःख बता कर तुम्हे उन्हें सुख में बदलने की चाहत रखेगा. अगर कोई ऐसा है जो तुम्हे समझता है, वो खुद से ज्यादा तुम्हारी परवाह करता है और वो ये भी चाहत रखता है की तुम जीवम में एक सफल इंसान बनो तोह वह मेरी बात की परवाह मैट करना. अमृता जी की सोच तोह ऐसी हे है और जिसके बारे में मुझे ऋतू से पता चला उसको भी मान सकती हु लेकिन बाकी जो भी है उनकी तरफ अब अगर तुम्हारे कदम सिर्फ जिस्मानी तौर पर बढ़ते है तोह ये सिर्फ मेरी हे गलती होगी. मेरे प्यार, समर्पण और dekh-rekh की गलती. मैंने तुम्हे कभी भी गलत इंसान का सामना करने से नहीं रोका बल्कि मैं चाहती हु तुम वही करो लेकिन गलत रिश्ते बढ़ने के लिए तुम्हे तब भी समझाया था जब तुम सविता का जीवन खराब करने वाले थे. बाकी तुम इस पर गौर करना अगर पार्टी में जाने से पहले थोड़ा समय मिले तोह. आखिर किसके प्यार में कमी रह गयी और बलिदान कितनो ने दिया. वह माधुरी दीदी पर्याप्त थी लेकिन तुम सब जानते हुए भी बहके. हर बार बचाव मुमकिन नहीं भाई, नहीं है मुमकिन. आखिर में बस इतना हे कहूँगी की अगर तुम अपने लक्ष्य से भटके और ऐसे बेमतलब सम्बन्ध बनाये तोह मैं समझूंगी की मैं कभी तुम्हारी पहली पत्नी नहीं थी.", कोमल ने बातों बातों में आज अर्जुन के mann-mastishk को ऐसा धवस्त किया था की न उस से गुहार लगाते बन्न रहा था और न क्षमा मांगते. अतीत में समझाने के बावजूद उसने Jeenat/Sakshi से सम्बन्ध बनाये, मीनाक्षी के अंतर्मनन को बढ़ावा दिया और अब वो आँचल के साथ साथ शिल्पा जी तक बढ़ने वाला था.
"आइंदा आपको मेरी ये अनचाही गलतियां सुन्न ने को नहीं मिलेंगी दीदी लेकिन ये मैट कहिये की.. मैंने आपके साथ रिश्ता कोई नादानी में बनाया था. आपको खो दिया तोह फिर कुछ और पाने की चाहत हे नहीं रहेगी. आज मैं शर्मिंदा हु क्योंकि आपको दुःख पंहुचा और मेरी वजह से इतना कुछ सुन्न ने को मिला होगा किसी न किसी से. मैं वापिस वही घर पे हे आप सभी के पास रहना चाहता हु..", अर्जुन के लफ्ज़ो में उसकी कमजोर आवाज सुन्न कर कोमल का खुदका दिल तड़प उठा. वो इस सच से भी भली भांति परिचित थी की उसका भाई जैसा भी है उसके स्वभाव में हे कही कमी है और लोग उसकी तरफ आकर्षित होते है तोह वो उन्हें जवाब भी नहीं दे पता.
"मैं तोह साड़ी दुनिया की शिकायत सुन्न लुंगी तुम्हारे लिए. बस 2 हे बात कहना चाहती हु तुमसे और उन्हें समझने की कोशिश करना अर्जुन. जो तुम्हारी चाहत रखता हो उसको िज्जात्त देना और जो मज़बूरी में हो.. असलियत की मज़बूरी में, उसका साथ निभाना पर हद्द में रह कर. रिश्ता सिर्फ जिस्मानी या किसी और भावना से बना हो तोह वो बस गर्त में ले जाता है. लोगो का लालच ख़तम नहीं होगा पर तुम्हे उनसे बचना है. वापिस तोह तुम्हे आना हे है लेकिन जो रिश्ते तुम्हारा दिल स्वीकार करे, बस उन्हें हे इज्जत दो. तुम बौ जी के हे नहीं संजीव भैया, चाचा, नानी, माँ और raj-mehal तक के वारिस हो. आज शाम को तुम्हे जहा जाना है वह लोगो को उमेद सिंह का वारिस देख कर फकर होना चाहिए. उन्हें अर्जुन शर्मा एक अधिक उत्साही या अंतर्मुखी व्यक्ति नहीं बल्कि एक घराने के प्रतिनिधि लग्न चाहिए. कल तुम प्रीती के साथ भी होंगे और समाज में तुम्हारी पहचान एक मजबूत व्यक्ति, जिम्मेवार पति और वचन निभाने वाले इंसान के रूप में होनी चाहिए. भटके हुए मैं, इत्छाओं में दबा खूबसूरत इंसान या दुःख के बदले सुख की प्रवर्ति से नहीं. थोड़ा आराम करो और अपने जीवन में ladkiyon/mahilaon से ऊपर जीवन के लक्ष्य रखो. कॉलेज में तुम्हारे पास कोई नहीं होगा और उस दुनिया में जा कर 2 करैक्टर सर्टिफिकेट मिलते है. एक जो कॉलेज देगा और एक जो तुम कमाओगे. मैं जानती हु तुम समझदार हो और लायक भी बस बहाव के साथ बहते हुए कभी कभी दूर निकल जाते हो और किस्मत ाची है की अभी तक nehar-nadi से वास्ता पड़ा है. उफनते समंदर से सामना न हे हो तोह बिहार है हमारे सबके लिए. खाना खा लो और बाकी जो तुम्हारा आज न हो सका वो तुम्हे कल तुम्हारी बीवी ाचे से देगी. अपना ध्यान रखना ारु.", प्रतिउत्तर में अर्जुन ने बस 'जी' कहा और उसके बाद कोमल दीदी ने हे लाइन काट दी. आँखों में आंसू भी आ चुके थे उनकी लेकिन आवाज पर उनका असर नहीं होने दिया. वो प्रीती को बुलाने से पहले बाथरूम चली गयी खुद को दुरुस्त करने के लिए और अर्जुन आँखें मूंदे उनकी कही हर बात मैं में दोहराने लगा. आज उसको सचमुच खुद पर दुःख हो रहा था. दीदी ने सब जानते हुए भी उसको सिर्फ उन्ही लोगो के लिए मन किया था जो जीवन में जरुरी नहीं थे या उनकी वजह से अर्जुन के चरित्र पर धब्बा लगता. कही न कही कोमल दीदी की बात को साक्षी ने सार्थक कर दिखाया था जिस से फिलहाल अर्जुन अनजान था. कमरे से बहार निकलते हे वो टोलिया उठा कर बाथरूम में जा घुसा. दिमाग को सुकून देने के साथ अपने भागते जीवन पर भी सही लगाम लगानी अब जरुरी थी. दीदी ने उसको संसर्ग से मन नहीं किया था, लोगो की पहचान पहले करने का एक निवेदन किया था और सबकुछ उन्हें पता होना जरुरी हो. जबतक वो नाहा कर बहार निकला, चेहरा कुछ हद्द तक शांत था दिमाग के साथ. भोजन करते हे वो चची के कमरे में हे उनके पहलु में जा लेता. आज अनामिका चची ने भी mamta-swaroop उसको थपकी देते हुए सुकून से सुलाया जैसे वो भी अर्जुन को बेहतर समझने लगी थी.
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"ऐसा इंतजाम तोह दिल्ली वाले फार्महाउस पर भी न हो पता कपूर. इतनी शानदार प्रॉपर्टी है और जर्रा जर्रा बहोत हे देखभाल से संभाला हुआ. कितनी कीमत होगी इस राजहंस की?", राजहंस के विशिष्ट हॉल में कार्यक्रम से पहले संगीत व्यवस्था की जांच, खाने पीने और मेहमानो के स्वागत इत्यादि के लिए नियुक्त स्टाफ की रिहर्सल इत्यादि होने से नरेश कपूर जब फारिग हुए तोह वो चौड़ी पगडण्डी आलिशान लालटेन जैसी लाइट्स से रोशन हो चली थी. प्रमुख द्वार से हॉल तक का पूरा रास्ता हे किसी दुल्हन सा सजा था और सुरक्षा राजहंस की खुदसे नियुक्त थी. जैसे हे द्वार खुला और काली बंव गाडी भीतर आने लगी तोह आसमान झिलमिल आतिशबाजी से रोशन हो उठा. पारम्परिक शाही वेशभूषा में सजी सेविकाओं ने जीनत और पूरे कपूर परिवार का स्वागत इत्र और गुलाब के फूल बरसते हुए किया. गुलाबी रंग की ख़ास साड़ी और उत्कृष्ट साज सज्जा युक्त जीनत तोह स्वयं किसी पारी सी लग रही थी जिसके लिए सफ़ेद घोड़े वाली बग्घी को वही द्वार पर लगाया गया और किसी राजकुमारी की तरह बड़ी शान से वो और उसकी चचेरी बहिन Aashi-Kittu उसके अगल बगल बैठी हॉल की तरफ जाने लगी. मेहमान भी इनके पीछे हे आरक्षित पार्किंग तक पहुंचने लगे थे और ठीक 10 मिनट के बाद ऐसा हे स्वागत दूसरी लम्बी कार का हुआ जिसमे से पतला लम्बा युवक सफ़ेद pant-coat और नीली कमीज पहने निकला. हेमंत कैंसल. उसके माता पिता तोह ये स्थान और आज की सजावट देख कर हे गदगद हो उठे. इनकी मुलाकात यही पर नरेश कपूर और उनकी खूबसूरत बीवी मेघना से हुई जो काली साड़ी में हमउम्र तोह क्या जवान युवतियों पर भरी दिखी. सब लोग पार्किंग तक जहा गाडी से जा रहे थे, ये 2 दंपत्ति टहलते हुए हरे भरे मैदान, गुलाबी नीली रौशनी के बीच चलते फ़ुहाहारो और दूर दूर बानी उन शानदार इमारतों को निहारने लगे जो राजहंस का प्रमुख हिस्सा थी. यहाँ कांच की दिवार से परे बने उस 5 सितारा स्तर के स्विमिंग पूल पर मसरूफ विदेशी देसी मेहमानो को देखते हुए कैंसल साहब ने राजहंस की कीमत जान नई चाहि तोह उनकी सेवा में नियुक्त कला coat-pant पहने उस खूबसूरत युवती ने हे जवाब दिया.
"सर, वैसे तोह रिसोर्ट की वैल्यू 150 करोड़ मेंशन है रीसेंट वैल्यूएशन में लेकिन रॉयल एंड हेरिटेज प्रॉपर्टी होने की वजह से ये बेचीं नहीं जा सकती. ये आगे दोनों तरफ रेस्टोरेंट्स है अपनी अपनी खासियत से और उधर golf-range के साथ आगे एक लेक भी है. लेफ्ट साइड वो बड़ी बिल्डिंग्स होटल है जहा हर रूम रॉयल टच के हिसाब से फुल्ली ऐरकंडीओनेड है हर लक्सेरी के साथ. एंड हेरे वे अरे. रंगमहल, आपका सेलेब्रिटोन हॉल.", प्रचारिका ने हर छोटी बड़ी बात भी संजह की थी और मर कैंसल तोह सब देख कर, जान कर गदगद हो उठे. चांदी का थाल लिए उस 12 फ़ीट ऊँचे द्वार के दोनों हे तरफ कड़ी सेविकाएं हर मेहमान के तिलक करने के बाद पुरुषो के सर पर उनकी इत्छा अनुसार गुलाबी पगड़ी पहनती या गले में शाही चुन्नट (मफलर). दोनों दंपत्ति एक बार भीतर का शाही नजारा और बैठने की व्यवस्था देख कर एक दूसरे को धन्यवाद देते हुए बहार हे चले आये. मेहमानो का स्वागत भी इन्हे हे करना था.
"ाचा इंतजाम है यार नरेश. संगीत सुकून देने वाला और मेहमानो का स्वागत शाही. सुना है खाना भी ख़ास चुना है तुमने हर लिहाज से और यहाँ तोह शराब परोसने का तरीका भी ऐसा है जैसे किसी रंगमहल में हे बैठे हो. बस कुछ मेहमान वह पार्किंग से इधर तक पैदल आने का बुरा न मान ले.", कैंसल साहब की बात पर अपनी बीवी रवीना संग आये नंदा जी ने उनसे गले लगने के बाद जवाब दिया.
"खूबसूरती तोह गाडी के भीतर बैठ कर नहीं देखि जाती साहब. कुदरत से मिलने तोह हमको हे चलना पड़ेगा. बहोत बहोत मुबारकबाद हो आप दोनों परिवारों को इस एक और मजबूत रिश्ते की. पहले सांझेदार थे और अब सम्बन्धी.", फूलो का एक बड़ा सा गुलदस्ता कैंसल साहब की बीवी को देते हुए रवीना की खूबसूरती खुद कैंसल भी देख रहे थे. सफ़ेद बिना ब्याह की रेशमी साड़ी और चुचो का कटाव दिखती चोली के बाद उनकी गोरी नाभि तक सामने थी. खुले बाल अलग हे खुशबु बिखेर कर हवा में फैले इत्र को फीका साबित कर गए.
"हाहाहा.. बहोत सही बात कही नंदा जी. वैसे उमेश से भी मिल लिए और बचो को भी देख लिया पर हमारी बिटिया जन्नत अभी तक नहीं दिखी. और ये लो भाई ये तोह एक साथ 2-2 धुरंदर आ रहे है. शायद भानु भाई साहब को गजेंद्र के साथ आने सहित अपनी सुरक्षा पार्किंग पर छोड़ना पसंद नहीं आया.", और अब ये सभी लोग मुस्तैद हो उठे जब सफ़ेद कुर्ते पाजामे और अपनी अपनी बीवी बचो के साथ औपचारिक सी बातचीत करते हुए ये विशिष्ट लोग उनके सम्मुख आ पहुंचे. भल्ला जी तोह नंदा, कैंसल और कपूर साहब से गर्मजोशी से मिलने के बाद अपनी बीवी और बेटी का परिचय करवाते हुए उनेह उपहार दे कर भीतर चल दिए पर ये सांवले रंग का दरमियाना सा रईस राजनेता मुस्कुराने के बावजूद गुलदस्ता भेंट करते हुए इंतजाम की मामूली सी चूक पर तंज करने लगा.
"बहोत बहोत मुबारकबाद मेरे दोनों शुभचिंतको को इस शुभ अवसर की. आपको भी भाभी जी और इनसे मिलिए ये हमारी धर्मपत्नी जी है और ये बीटा बेटी. वैसे हमारे नवाब साहब हमसे कही ज्यादा हर छोटी बड़ी बात पर गौर करते है. आज के लिए हे ख़ास 50 हजार की जूती खरीदी थी laat-sahab ने लेकिन इतना पैदल चलने पर थोड़ा बुरा मान गया. भाई नरेश हम तोह मंत्री आदमी है, ये सुरक्षा साथ आने दी लेकिन फिर भी 200 गज दूर रुकवा कर अपने ये बहरूपिये से कर्मचारी साथ लगा दिए तुम्हारे इस होटल वालो ने. बन्दूक वंडूक में गोली तोह है न? हाहाहा.. गजेंद्र तोह हमारे रहते कुछ बोलने की गुस्ताखी करने से रहा. 99 लोग हाँ में हाँ मिलाये तोह एक मुझे हे शिकायत करने दो. क्यों भाभी जी गलत तोह नहीं कहा? वैसे इंतजाम तोह ाचा है.", यहाँ एक खूबसूरत युवती ने जैसे हे उनके ऊपर इत्र छिड़क कर गले में मरदाना दुपट्टा पहनाया तोह भानु जी तोह उसके रूप यौवन को इतने नजदीक देख द्विअर्थी बोल कह उठे. जिसकी बात का किसी ने बुरा नहीं मन. जीनत और हेमंत को भी उनकी चची यहाँ लिवा लायी थी इनके ख़ास आशीर्वाद के लिए जो अपने अपने दोस्तों संग आये थे. आशीर्वाद द्वार पर देते हुए भानु जी ने इस गदराई रूपसी को थोड़ा मर्यादा से देखा लेकिन मैं तोह मचल हे उठा था और उनका बीटा भी लार टपकने की हद्द तक जीनत पर अटका रहा.
"आपका पूरा हक़ है जी और हमारे बड़े तोह आप हे है. हमे खेद है की भतीजे को कष्ट उठाना पड़ा लेकिन आपके लायक यही एक जगह थी और ये नियम जरा देरी से पता चला.", अभी बातचीत के दौरान कैंसल परिवार के साथ साथ कपूर परिवार भी इन्हे घेर चूका था जो भानु की नजर में हम था. पर थी इसी वक़्त उसके मुँह से ऐसी बात निकली जिस पर मेघना जी अपने पति को देखने लगी.
"सभी आये है यहाँ पर. नंदा, भल्ला, धवन, मल्होत्रा और वो पार्षद से नया नया टिकट लिया अभिषेक भी. ये पेट्रोल पंप वाला नहीं दिखा अभी तक जो आजकल लकड़ी बेच कर खुद को दिल्ली का नया वारिस मान रहा है. उमेद सिंह को नहीं बुलाये क्या? हाहाहा. दिल्ली की राजनीति का चेहरा बदलने की चाहत है उस व्यापारी को और वो ये भी ाचे से जानता है की 5 हिस्सों में से 3 पर हमारा वर्चस्व है, एक मित्र पक्ष और सबसे छोटी वाली इस भल्ला के पास. वैसे बड़ी बिटिया ने हमसे मिलने पर आपत्ति जताई है क्या नरेश? हम तोह शुभम को यही कह कर लाये थे की अगर वो बिटिया को थोड़ा जान पहचान ले तोह सम्बन्ध मजबूत हे होंगे हमारे आपस में. वैसे तोह रिश्तो की कमी नहीं और राणा परिवार तोह हमारी हाँ के इन्तजार में बैठा है. उस लैंड्क्रुइसेर से तोह कही बड़ी गाडी और पूरी चमड़े की फैक्ट्री शुभम के नाम करवाने को तैयार है पर अभी बचा जवानी हे नहीं देखे और शादी करवा दे तोह ये भी गलत हे होगा. वैसे चर्चे तोह है समाचारो में जन्नत बिटिया के."
"डैड, फैशन वर्ल्ड में कहिये समाचार साउंड्स तू ओब्सोलेटे.", शुभम अपनी कलाई घडी को दिखते हुए दर्शा रहा था के सोना उसके लिए बड़ी बात नहीं और कपूर साहब अपनी बीवी को देखने लगी.
"जानू अपने दोस्त के साथ आ रही है भाई साहब. उसको यही पता था की प्रोग्राम 8 बजे तक शुरू होगा. आती हे होगी और फिर मिल भी लेंगे बचे.", और यहाँ द्वार पर खड़े ये लोग औपचारिक तौर पर आते हुए मेहमानो से बस ऐसे तैसे हे मिल रहे थे इस परिवार और भानु की वजह से. ठीक मेघना जी की बात ख़तम होते हे यहाँ तक आने वाला वो पूरा मार्ग हे खामोश और सुरक्षाकर्मी मुस्तैद हो गए. एक काली मेरसेदेज़ जीप और उसके पीछे लाल बत्ती लगी सफ़ेद मेरसेदेज़, जिसको नरेश कपूर ने हमेशा बिना बत्ती के हे देखा था वो इनके बिलकुल सामने आ रुकी. राजहंस के भी सभी सुरक्षाकर्मी अगली मेरसेदेज़ वालो की तरह अपनी अपनी बंदूके लिए सफ़ेद कार से कुछ दुरी पर सतर्क खड़े हो गए. ड्राइवर की तरफ का दरवाजा खुला तोह मेघना और रवीना के चेहरों पर चमक आ गयी वही जीनत हैरान जैसे वह खड़े बाकी लोग जो अर्जुन को जानते तक नहीं थे. सवा 6 फ़ीट का वो आकर्षक तगड़ा युवक सफ़ेद चूड़ीदार के ऊपर मोरपंखी बिना ब्याह की जैकेट पहने बिना किसी की तरफ देखता हुआ कार के दूसरी और चला आया. खुदसे हे भीतर बैठी युवती का पर्स और gulaabi-safed-laal रंग के गुलाबो के 2 बड़े गुलदस्ते ले कर दूसरे हाथ से उसको बहार आने में मदद देने लगा. लम्बे बाल ख़ास तरह से सहेजे और लगभग पारदर्शी आसमानी डिज़ाइनर साड़ी के साथ बस स्टैनो को छुपाती हुई चोली पहने जन्नत बहार निकली तोह खुद भानु और नंदा तक की जीभ मुँह से बहार निकल गयी. सब लोग बस अपलक इस जोड़ी को देख रहे थे और अर्जुन जन्नत को अपने साथ लिए उनके सामने आ खड़ा हुआ.
"ये मेरे पापा है, मर नरेश कपूर और ये माँ, मेघना कपूर. ये कैंसल अंकल और आंटी जी है और तुम जिनि को तोह जानते हे हो? और ये हेमंत है हमारी जिनि के वोउल्ड बे. Mom-dad, हे इस माय फ्रेंड अर्जुन, उमेद जी का बीटा और R&R एंटरप्राइज का अपकमिंग ओनर.", जन्नत के परिचय के बाद अर्जुन को पहचानते हुए नरेश जी तोह गले लग कर मिले जिनसे पहले अर्जुन ने बड़े हे सलीके से जीनत और हेमंत को गुलदस्ते देने के साथ गर्मजोशी से हाथ मिला कर शुभकामनाये भी दी. यहाँ उसने कैंसल साहब से हाथ मिलाने के साथ उनकी धर्मपत्नी को हाथ जोड़ कर मान दिया था. आज उसने किसी के पाँव नहीं छुए थे.
"मान गए भाई उमेद की पुरानी आदत को. कैसे भी करके खुदको हर जगह का मालिक साबित करने की कोशिश से बाज नहीं आता. वैसे जान सकता हु की तुम्हारी ये गाड़ियां और laal-batti के साथ सुरक्षा यहाँ तक कैसे आ पहुंची.?", अर्जुन अब तक सबसे मिलने के साथ भानु की श्रीमती जी का भी अभिवादन कर चूका था लेकिन अर्जुन से हाथ न मिला कर उन्होंने सवाल भी ऐसा किया जिस पर अर्जुन गुस्सा करता तब भी उसका कुछ बिगड़ने वाला नहीं था.
"ऐसा है अंकल जी, उनसे मैंने भी ये चीज सीख ली है. ये रिसोर्ट का सिक्योरिटी वाला है न ये भी बता देगा की मेरे यहाँ तक गाडी लाने की वजह क्या है. क्यों भैया हम कौन है?", अर्जुन ने मुस्कुराते हुए रिसोर्ट के हे कर्मचारी से पुछा था लेकिन कोट पंत पहने करीब कड़ी मैनेजर ने हे जवाब दे दिया.
"राजहंस के ओनर है आप, सर."
"जहा पर बुलाया जाए, वो जगह और लोग अपने बना लेने चाहिए. परिवार जैसा लगता है और आप वह के मुखिया. कभी दिल्ली बुलाइयेगा अंकल मुझे, निराश नहीं करूँगा आपको.", अर्जुन ऐसी कटीली मुस्कान दे कर जैसे भानु की सुलगती पूँछ पर पाँव रख कर मस्त हाथी सा चलता भीतर चल दिया. जीनत की बगल में जन्नत और हेमंत के साथ अर्जुन.
"बड़ा दुस्साहसी है ये लोंदा और देखने से भी उस उमेद का हे अक्स लगता है. दिल्ली आये तोह पाँव नहीं जमने दूंगा इसके. चलो आज जाने देते है शुभ अवसर है और हमे ऐसा घमंड बहोत पसंद है कपूर. दम तोह है इस लोंदे में लेकिन तुम्हारी बिटिया इसके साथ. कही उधर भी .."
"नहीं भाई साहब, अर्जुन तोह जानू बिटिया का सिर्फ दोस्त है. एकलौता दोस्त.", मेघना जी तोह लड़के को देख कर खुद हे इनसे बच कर बाकी तीनो महिलओं को लिए भीतर चल दी जहा भल्ला परिवार पहले हे अर्जुन से गले लग के मिल रहा था और उनकी बेटी कनखियों से अपनी चाहत से कुछ दूर कड़ी.
'ये लड़का मुझे पसंद नहीं आया डैड.', शुभम की बात सुन्न कर उसकी बगल में कड़ी बहिन ने अपनी पिता के कान में जो कहा वो सुन्न कर भानु जी ने अपने बेटे की बात अनसुनी करके बिटिया के सर पे हाथ फिर दिया.
"तुम अपनी.. छोडो. राजनीति की समझ हमारी बिटिया को ज्यादा है और यहाँ हमे अवसर मिल गया है.
बचाव (2)
'बादलो में छुप रहा है चाँद क्यों... अपने हुस्न की अदा से पूछ लो......... चांदनी पड़ी हुई है मंद क्यों.. अपनी हे किसी अदा से पूछ लो', मार्किट से वापिस लौट रहे अर्जुन और आँचल रह रह कर एक दूसरे को बड़ी आसक्ति से देख रहे थे इस गाने को सुनते हुए. रात में जीनत के रोकके पर जाने के लिए जो वस्त्र अर्जुन के लिए जन्नत ने पसंद किये थे, उन्हें हे लेने के लिए अर्जुन घर से निकला था और आँचल काम का हवाला देती साथ निकल चली. अभी घरी 3 बजा रही थी पर इनकी ऐसी चाहत भरी ख़ामोशी की वजह वो पल थे जो अब से 3 घंटे पहले शुरू हुए.
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04 जून 1998, समय 11:45 और स्थान पप शर्मा का बंद पड़ा घर.
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"किताबे तोह पिछली बार ले हे गए थे फिर इस बार ऐसा क्या जरुरी रह गया जो लेने आये है?", दफ्तर पर टाला ज्यादा था क्योंकि शर्मा दंपत्ति विदेश भ्रमण पर गए हुए थे, अपने जीवन की एक बार और नयी शुरुआत करने के लिए. दरवाजा खोलने के बाद भीतर से उसकी सांकल लगाती आँचल ने होंठो को गोल करते हुए अपने इरादे स्पष्ट हे कर दिए की वो यहाँ क्या लेने आयी है और आज उसके पास आख़िरकार सही मौका और जगह भी है. अर्जुन ने सर खुजाते हुए कदम भीतर आँगन के तरफ बढ़ा लिए.
"आज तोह तुम्हारे पास कोई बहाना भी नहीं है मिस्टर क्योंकि जहा भी तुमने जाना है शाम को हे जाना है. और मामी को मेरे सामने हे तुमने मन किया था के आज तुम उधर नहीं जा सकते इसलिए वो दीदी के साथ मंदिर हे घूमने चली जाए. एक बार छोटी मामी बीच में आ गयी और दूसरी बार संजीदा दीदी. यहाँ सिर्फ हम दोनों है अब और टाइम की कोई कमी भी नहीं.", दुपट्टा जो इतनी देर से सीने और सर को ढके था, वो अब डाइनिंग टेबल पर फेंकती हुई आँचल बिन आँचल के कड़ी थी. जिस्म तोह विरासत में हे ऐसा मिला था जिसके चाहने वाले अनेक थे और कुछ तोह अब ज़िंदा भी न रहे. 36-38 के बड़े बड़े मांसल चुके, 30 की मखमली कमर और सीने से अनुपात में हे मॉटे और बहार को उभरे हुए लचीले कूल्हे. एक आँचल हे थी कुछ माधुरी दीदी सी शारीरिक काया वाली और व्यक्तिगत जीवन भी कुछ वैसा हे था इसका जो घर के सभी काम खुद करती रही थी jhaadu-paucha से ले कर भोजन बनाने तक. शहरी जीवन पर देहात के साफ़ सुथरे खाने का बेहतरीन परनिअम थी आँचल जिसके रूप यौवन पर अर्जुन भी पहली sukhad-ghatna से विचलित हो चूका था. आज भी उसके समरण में वही लटकते हुए बड़े गोलाकार सतांन और कूल्हों का कामुक कटाव सुसज्जित था.
"मैं तोह आपको खुदसे बचा रहा था लेकिन अगर इरादा बना हे लिया है तोह फिर नेक काम में देरी कैसी? वैसे आपको सिखाने की तोह ज्यादा जरुरत नहीं पड़ने वाली.. बुआ और चची को देख के थोड़ा बहोत तोह सीख हे गयी होंगी.", अर्जुन ने वही डाइनिंग टेबल के करीब हे आँचल की कमर में हाथ डालते हुए उसको अपने सामने चिपकते हुए मजाकिया तंज किया और बदले में आँचल ने भी अपनी गुलाबी जीभ निकाल कर होंठो पर ऐसे फिराई जैसे वो सब स्वीकारती हो.
"मामी का जिस्म ढंग से तोह तुमने हे निखारा है लेकिन मेरी माँ तोह माहिर थी फिर भी चाल बदल दी तुमने उनकी. थोड़ा रेहम करना अपनी बहिन पर... झेल तोह लुंगी आखिर तुमसे बड़ी जो हु लेकिन तुम्हारा कुछ ज्यादा हे बड़ा है और मेरा ये पहली बार. वैसे तुम्हे एक सरप्राइज भी देना है लेकिन वो बाद में.", अर्जुन के सख्त सीने के उठान पर दोनों हाथ फिरती वो एड़ी उठती हुई ऊपर से हे अपना बदन उस से रगड़ती हुई अलग हे मस्ती में बोलने लगी. अर्जुन जानता था की आँचल ऐसा इसलिए कर प् रही है क्योंकि वो इतने दिनों में उसके साथ उन्मुक्त हो चुकी थी. हमेशा नजरे झुकाये रखने वाली और पढ़ाकू सी ये युवती अब बदलने लगी थी.
"चाल तोह आपकी भी बदलेगी और मुझे यही डर है की घर क्या जवाब डौगी. वैसे आपको जबसे बाथरूम में देखा था, दिल मेरा भी मेरे बस में नहीं रहा. ये इतने हसीं दिख रहे थे न वह झुके होने पर की मैं हे जानता हु कैसे खुद को काबू किया. हाँ बुआ के साथ थोड़ा गलत किया मैंने लेकिन जाने दो, उनके बदले का प्यार भी आपको हे कर लूंगा.", कुर्ती ढीली होने के बावजूद सीने पर इस कदर कासी थी की वो बड़े गोले अपना अकार ाचे से बताते दिखे. अर्जुन का हाथ आँचल के कंधे से फिसलता हुआ उन नरम गुब्बारों पर गोलाकार सा चलता उनकी परिधि जांचने लगा. भीतर ब्रा के बावजूद चुचो की नरमी और उनका अकार उसने ाचे से महसूस किया. दूसरा हाथ तोह खुदसे हे चुम्बक की तरह भरी उभरे हुए कूल्हों के निचे जा टिका. आँचल भी अपने जिस्म के दो हिस्सों पर मरदाना मजबूत स्पर्श लेती हुई चेहरा ऊपर उठाने लगी. भरे भरे तराशे हुए होंठो पर अर्जुन ने हे होंठ चिपका दिया. वीरान पड़े शर्म के इस घर में आज उसकी बेटी का हे कौमार्य भांग होने वाला था बेशक बीवी पहले हे औरत बन के आयी थी यहाँ. अर्जुन दाए हाथ से एक सतांन की तलहटी से उठान तक मसलता रहा और दूसरा हाथ आँचल के कूल्हों की जड़ में उसकी रेशमी जांघो और गरम कूल्हों से खेलने लगा. आँचल उसके कंधे थामे पूरी तल्लीनता से ras-swadan का सुख भोगने लगी, जिस्म में जैसे विधूयूट भर उठी हु, kaam-vidhyut.
"आअह्ह्ह.. बड़े बेसब्री हो रहे हो अब तुम. पहले मुझे तड़पते रहे और आज इतने उतावले हो की सांस तक नहीं लेने दे रहे. उम्म्म्म", यही खड़े खड़े हे अर्जुन ने कमीज ऊपर खींचनी चाहि तोह वो मॉटे स्टैनो की चढ़ाई पर हे अटक गयी. सलवार के नाड़े से ऊपर मांसल पेट कुछ बेपर्दा हुआ और उसके ऊपर पतली समीज कुर्ती के साथ खींचती हुई आधे पेट को ढके हुए. आँचल ने हे कुर्ती को झटकते हुए ऊपर खिंचा तोह स्प्रिंग से हिलते दोनों पहाड़ से चुके समीज और काली ब्रा में क़ैद अपनी ख़ूबसूरती से अर्जुन को ललचाने लगे. दिन की रौशनी में उसके सामने कड़ी आँचल का ये रूप जानलेवा हे था. मॉटे उरोजों के रेशमी किनारे आपस में जुड़े एक कामुक नजारा बनाये थे और ब्रा से कुछ निचे तक फांसी समीज को अर्जुन ने एक झटके में हे अपनी नजरो से दूर कर दिया. गोल नाभि के दरमियान नंगा पेट जिसमे लोच और नरम सा उभर हे था. उसके ऊपर स्टैनो का बोझ धोती हुई वो काली ब्रा भी पूरी तरह ऐसे चुचो को समेटने में नाकाम सी. कुछ हिस्सा सीने के बीच नुमाया था और उतना हे ब्रा के किनारो से दोनों तरफ बहार. अर्जुन बाहरी हिस्सों को हाथो में लेते हुए स्टैनो की घाटी में मुँह दबाता उन्हें जीभ से चाटने चूमने लगा. आँचल भी पीछे खिसकती हुई लकड़ी के बड़े टेबल से कमर सताए अर्जुन के हवाले हो गयी. नरम मांस को मुँह में भर के चूसते हुए अर्जुन ने आँचल का रोम रोम उत्तेजित कर दिया. ब्रा के भीतर हे उन छोटी मटकी से गोलों की घुंडियां अकड़ने लगी थी. आँचल उसका सर सहलाती हु टेबल पर हे पीठ के बल झुकती चली गयी.
"मैं बेसब्र भी तोह आपकी हे बदौलत हुआ हु. सचमुच आपके बूब्स बने हे पीने और मसलने के लिए है. हाथ में पकड़ना चाहो भी तोह फिसलने लगते और कितने गोल और बड़े बड़े है. कपड़ो के ऊपर से फिर भी ये उतने बड़े नहीं दीखते जितने ये सचमुच में है और इतने कैसे हुए भी. सोती कैसे हो इनके साथ?", अर्जुन ने सलवार में क़ैद जांघो को थाम कर आँचल का जिस्म टेबल पर पीछे धकलते हुए सही से लिटा दिया. बड़ी बड़ी छातियां इस हरकत पर भी एक ताल में हिलने लगी जिन्हे दोनों हे देख रहे थे. आँचल के चेहरे पर हलकी लाली और शर्म थी वही अर्जुन बस उन्हें be-parda करके निचोड़ना चाहता था.
"ऐसे क्या देख रहे हो? सामने हे तोह हु तुम्हारे और मेरा जो कुछ है उस पर तुम्हारा पूरा हक़ है अर्जुन. मैं भी चाहती हु की तुम मेरे जिस्म के हर हिस्से पर अपनी मोहर लगा कर इसको अपना बना लो. अब तुमसे ज्यादा मेरा सबर जवाब दे रहा है.", आँचल ने कमर उठा कर ब्रा खोलनी चाहि तोह अर्जुन ने दोनों उरोज दबा कर उसको वापिस निचे लिटा दिया. कंधो से दोनों काली पत्तियां खिंच कर बाहों की तरफ खिसकते हुए वो आधे स्टैनो की गोलाई देखने लगा. लेते होने पर भी वो पूरे तन्ने हुए थे और ब्रा बस निप्पल पर अटकी हुई, दोनों तरफ के भूरे गोल सिक्के को थोड़ा थोड़ा दिखती हुई. अर्जुन ने इसके बाद एक झटके में हे ब्रा के दोनों कप निचे उलट दिए.
"ओह्ह्ह्ह.. कितने खूबसूरत है आपके सतांन.. बेजोड़.. किसी कामदेवी की मूरत से.", और वर्णन कही गलत भी नहीं था उस दूध की जोड़ी का. जितने भरी और मॉटे कैसे हुए वो सतांन थे, उतना शानदार उनका केंद्र. मेहँदी से रंग के गोल घेरो के बीच ऊपर उठे हुए गहरे भूरे पर कच्चे चूचक. एक अर्जुन हे तोह था जिसने उनका स्पर्श किया था और निप्पल तोह बढ़ते हे सम्पूर्ण संसर्ग से है. ये कोरे चूचक जैसे हे अर्जुन की उँगलियों ने पकडे, मजे से आँचल ने आँखें मूँद ली. वो अपनी इस बड़ी बहिन के ऊपर आता हुआ एक दूध को ाचा खासा हिस्सा पकड़ कर किशमिश से निप्पल को मुँह में भर के जीभ से सहलाता सा चूसने लगा. अलग सा स्वाद था जैसे कोई रास निकल रहा हो. दूसरे वाले पर भी हथेली रख कर सहलाता हुआ आँचल के जिस्म पर छा चूका था. खुले आँगन में खाने की बड़ी मेज पर आज पकवान की जगह आँचल सजी थी और उसको धीमी रफ़्तार से भोगता अर्जुन. चुचो की लमस इतनी आकर्षक थी की जल्द हे वो उनका मर्दन करता हुआ पागलपन की हद्द तक दोनों शिखर चूस चूस कर कड़े कर गया. अर्जुन द्वारा निप्पल मसलने और दोनों का एक साथ अपने मजबूत हाथो से मर्दन करना हे आँचल के लिए पर्याप्त रहा. टाँगे उठती हुई वो अर्जुन की कमर पर कैंची बनती हुई हलके झटके लेने लगी. सलवार और जीन्स के ऊपर से हे दोनों के निचले अंग एक दूसरे को आनंद दे रहे थे. कुछ समय पहले जो निप्पल अभी उभरने लगे थे वो दोनों हे गहरे रंग और थूक में गीले हो कर आसमान की तरफ तीर से उठे थे.
"ुण्णं.. ाचा लग रहा है.. आह्हः.. मुझे नहीं पता था ये सब इतना मजे से भरा होगा... बस इन्हे थोड़ा आराम से दबाओ.. आह्हः..", अर्जुन को वापिस अपने चुचो पर दबती हुई आँचल सीसीएनए लगी. निचे कुछ मजबूत सा अंग उसको अपनी रास बहती नरम योनि पर दबता लगा. वो जानती थी की ये क्या चीज है और 2 रात पहले हे तोह उसने पहली बार लिंग को हाथ में पकड़ कर होंठो से लगाया था. कितना विशाल अंग है वो, ये सोच कर खुद हे आँचल कमर को आगे पीछे करती हुई अपनी योनि को घिसने लगी. 15 मिनट तक दोनों मॉटे खरबूजे चूसने मसलने के बाद अर्जुन पीछे हो कर मेज पर लेती आँचल को देखने लगा. उसके चेहरे पर हल्का पसीना और हिलते सतांन पहले से कही ज्यादा उभरे हुए. जीन्स पहने रखना अब अर्जुन के लिए मुश्किल हो चूका था और वही जूते खोल कर अपनी जीन्स और निक्कर उतरता वो तुरंत जन्मजात अवस्था में आँचल के सामने खड़ा हुआ और इधर आँचल ने भी सलवार की गांठ खोलते हुए खुद को अर्जुन के समकक्ष बनाया. दोनों मांसल पत् आपस में जुड़ते उसके गदराये जिस्म को अधिक कामुकता प्रदान करते. योनि को छुपाती काली पंतय जिस्म पर बुरी तरह कासी थी जो आखिर जांघो से निचे फर्श पर आ रुकी. भूरे लकीरबन्द यौवन की झलक ने हे लिंग को ऐंठने के साथ 3-4 बार झटका दिया. अर्जुन बस इस कामदेवी को हे निहार रहा था जो कही ज्यादा उत्तजित थी.
"ये हर समय ऐसा हे रहता है?", आँचल हैरत भरी आँखों लिए उस फड़कते हुए तगड़े लुंड के पास आ बैठी. कुछ देर देखने के बाद जिस कुशलता से उसने अर्जुन के विकराल लिंग को जड़ से दबोचा था वो अपने आप में हे आँचल की लालसा बताने को काफी था. चमड़ी पीछे करती हुई वो अर्जुन से ऐसे नजरे मिलाये थी जैसे वो उसके चेहरे पर बदलते भाव बखूबी पहचानती थी. अब समय था अर्जुन को उसके तरीके से आनंद देने का.
"आप हो हे इतनी मस्त तोह ये खड़ा कैसे न हो.? सचमुच आपका बदन हर तरह से बस प्यार करने के लिए बना है. आअह्ह्ह..", आँचल की जीभ गुलाबी सुपडे पर फिसलते हे अर्जुन ने अपना एक हाथ उसके सर पर दबा दिया. वो भी निचे नजरे उठती हुई कामुकता से अर्जुन को देखते हुए सुपडे के निचे वाली खाल से वीर्य छिद्र तक जीभ की नोक गुआंती हुई अपने kaam-gyaan का जलवा दर्शाने लगी. कंप्यूटर का उपयोग या दुरप्रयोग कहिये लेकिन आँचल ने जो भी सीखा था उस से अर्जुन के तगड़े मूसल पर नीली धारियां उभर कर उसको कही ज्यादा खतरनाक दिखने लगी. एक हाथ उसकी मजबूत जांघ पर रख के सहारा लेती आँचल ने पूरे होंठ खोल कर सूपड़ा मुँह में भर लिया. अर्जुन एक हाथ टेबल पर टिकाये इस सुखद एहसास से भरा अपनी कमर हिलता हुआ जैसे आँचल के मुँह को हे छोड़ने लगा. आँचल को थोड़ी परेशानी भी हुई उस अजीब से स्वाद और अर्जुन के धक्को से लेकिन परिपक्व युवती ने एक तिहाई लिंग को ाचे से सहा. ये मुखमैथुन जैसे अभी लम्बा चलने वाला था.
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"पापा, आज आपने वापिस हॉस्पिटल नहीं जाना? 12 से ऊपर टाइम हो चूका है.", कोमल यहाँ घर पे प्रियंका के साथ घर के सभी काम निबटान एक बाद आखिर में बैठक दुरुस्त करने आयी तोह अपने पिता डॉ शंकर को दीवान पर सोये देख थोड़ी हैरान हो गयी. वो दिन में कभी भी घर पे विश्राम नहीं करते थे. हाँ थोड़ा बहोत आराम करना मुमकिन था लेकिन भोजन किये डेढ़ घंटे से ऊपर हो चूका था इसलिए कोमल ने उन्हें जगाया तोह शंकर जी ने अपनी घडी पर नजर डाली, जो 12:25 बता रही थी.
"ओह.. सही किया बीटा तुमने मुझे उठा दिया. जाने कैसे आँख लग गयी मेरी. एक गिलास पानी देना जरा.", शंकर जी ने सिरहाने की तरफ से दवा की शीशी उठा कर एक गोली मुँह में डालने के बाद कोमल के हाथ से पानी का गिलास लिया और जूते पहन ने लगे. चेहरे पर थोड़े थकान के भाव अभी भी थे जो हैरानी की बात थी उनकी दिनचर्या और सेहत को ध्यान में रखते हुए. आज सुबह वो बिना नाश्ता करे हे घर से निकल गए थे 5 बजे आपातकाल स्थिति की वजह से. दुर्घटना का बड़ा केस था और ऐसे में सभी प्रमुख चिकित्स्कों की जिम्मेवारी थी घायलों का समय पर इलाज करना.
"आप आराम हे कर लीजिये न पापा. हॉस्पिटल फ़ोन कर दीजिये, आज आप थके हुए लग रहे है.", कोमल ने गिलास वापिस मेज पर रखने के बाद बगल वाले सोफे पर बैठते हुए अपने पिता को सलाह दी तोह प्रतिउत्तर में वो मुस्कुराते हुए अपने तस्मे बांधने लगे.
"उम्र बढ़ने के साथ एक न एक दिन तोह प्रभाव पड़ेगा हे बीटा. तुम टेंशन मैट लो, सब ठीक है. वैसे तुम्हारी माँ ने कब वापिस आना है? बात हुई थी क्या आज?", शंकर जी ने फिर से समय देखा और दोनों हाथ दीवान पर टिकाये आराम से बैठ गए. जैसे उनके पास अभी भी कुछ समय था.
"हाँ आपकी बात भी सही है लेकिन ऐसा पहली बार हे देखा है न पापा. वैसे माँ परसो लौटने का बता रही थी पर दादी ने कहा की वो संडे को वह से सीधा क्सक्सक्सक्स हे पहुंच जाए. विष्णु चाचा की शादी में. रात आप उनके हे पास गए थे?", शंकर जी ने है में जवाब दिया और जैसे कुछ सोचने के बाद उन्होंने ये अलग हे बात छेड़ दी.
"तुम्हे ऐसा नहीं लगता की तुम्हारा छोटा भाई कुछ लापरवाह हो रहा है? मेरे पास तोह कभी समय रहा नहीं की उस पर ध्यान दे सकू. घर में बाकी लोग भी अपने अपने काम में व्यस्त रहते है चाहे संजीव हो या तुम्हारा चाचा ताऊ. तुम्हारी माँ का भी मैं समझता हु की घर सँभालने और बचो को पढ़ने के बाद उसके पास समय नहीं रहता. तुम्हे काम से काम अर्जुन की जिम्मेवारी लेनी चाहिए कोमल. कोई उस से पूछता है की वो वह क्या कर रहा है या क्यों? छुट्टियां बिताने गया है तोह ाची बात है लेकिन घर और गाँव से बहार कहा जाता है, किस से मिलता है और क्या जरुरत है? बुरा मैट मान न मेरी बात का लेकिन औलाद और मिटटी एक जैसे होते है. ध्यान दो तोह दोनों सही फल देंगे नहीं तोह जैसे बिना वृक्ष वाली मिटटी पानी या हवा से बह जाती है वैसे हे ध्यान न देने से औलाद. इतना तोह मैं जानता हु की वो तुम्हारी बहोत िज्जात्त करता है और हर बात भी मानता है. लेकिन क्या इतना हे उचित है? अर्जुन के असफल भविष्य जीवन का दोष किसके सर मंधेगा? मेरे और तुम्हारी माँ के लेकिन क्या सच में हम दोनों हे उसके जिम्मवार होने चाहिए?", शंकर जी ने अर्जुन के विषय पर पहले कभी कोमल से इस तरह से बातचीत या सवाल नहीं किये थे और कही न कही मान न था की कोमल हे अर्जुन का ध्यान रख सकती है और फिलहाल जैसे वो अपने छोटे भाई की अनदेखी कर रही थी. अर्जुन के ाचे बुरे करम का बोझ उन्होंने माता पिता का बताने के साथ दोनों की jiwan-dasha का ध्यान भी बखूबी कराया तोह कोमल की नजरे झुक गयी.
"सॉरी पापा. आप ठीक कह रहे है की आप और माँ, दोनों हे सुबह से रात तक अपनी जिम्मेवारियां निभाते रहते है और कभी हमसे कुछ कहा भी नहीं. बदले में.. ", कोमल के सर पर शंकर जी ने स्नेह से हाथ रख कर बात बिच में हे रुकवा दी.
"बीटा, पढ़ना लिखना जीवन का एक जरुरी हिस्सा है और मुझे कभी भी मेरे किसी बचे ने निराश नहीं किया. तुमने तोह कॉलेज के वक़्त हे घर के काम संभल लिए थे अपनी माँ और ताई के साथ. पर इन सबसे ज्यादा जरुरी है अपने छोटे भाई बहिन का भी जीवन संवारना. ऋतू तुम्हारी हर बात मान लेती है लेकिन वो पूरी तरह केंद्रित है अपने लक्ष्य के लिए. मैं अर्जुन को कुछ नहीं कह सकता क्योंकि अगर मैं उसको समझने लगा तोह घर के सभी बड़े मुझे हे घेर लेंगे. उसकी उम्र के हिसाब से उसको खेलना चाहिए, दोस्त बनाने चाहिए और कही आना जाना हो तोह काम से काम घर पे किसी को पता तोह हो की वो है कहा. चलो तुम बताओ की अभी अर्जुन कहा होगा?", शंकर जी ने इस सवाल के साथ हे छोटी मेज पर रखा टेलीफोन भी दोनों के बीच खींच लिया जिसका मतलब साफ़ था की कोमल के जवाब की पुष्टि जरूर होगी.
"आप ठीक कहते है पापा की अर्जुन अभी कॉलेज हे नहीं गया और एक्साम्स तक हमेशा घर रहने वाला मेरा भाई आजकल कहा जाता है, क्यों जाता है ये पहले की तरह सही से पता नहीं होता. मैं भी कुछ नहीं बोलती क्योंकि बौ जी और दादी का कहना है की उसको बहार निकलना चाहिए, दुनिया देखनी चाहिए और फिर वापिस स्कूल शुरू हो जाएंगे तोह 2 साल ारु फिर पढ़ाई और स्पोर्ट्स में लगा रहेगा.", कोमल ने अर्जुन की स्थिति वाली बात को एक पल तोह ताल हे दिया था लेकिन सब सुनते हुए भी शंकर जी का ध्यान वही बना हुआ था.
"ऐसा है बीटा, दादा दादी तोह बचो को थोड़ा ढील देंगे हे, वो जरुरी है लेकिन बचा उसको नाजायज़ हे न ले ले ये जिम्मेवारी अभिभावकों की होती है. कल को मान लो की अर्जुन के साथ कोई ऊंच नीच हो जाए, किसी दुर्घटना का हिस्सा हो या जितना वो नरमदिल है कोई उसका फायदा उठा कर उसका और परिवार का नाम खराब कर दे तोह क्या तब भी यही कहा जाएगा की बचा है घूमने फिरने निकला था.? वैसे तुमने बताया नहीं की तुम्हे अंदाजा है अर्जुन इस वक़्त कहा होना चाहिए? धुप का वक़्त है तोह कही जाना बनता तोह नहीं उसका."
"जी पापा. घर पर हे होगा वो अभी", और इतना सुनते हे उन्होंने गाँव का नंबर मिला दिया. कौशल्या जी बहार आँगन से यही आ रही थी लेकिन बाप बेटी को बातचीत करते देख वो उनसे कुछ दुरी पर बैठ कर माहौल समझने लगी. फ़ोन की घंटी लगते हे शंकर जी ने हैंडल अपनी बेटी को थमा दिया.
"लो तुम हे पता कर लो और पूछना की अगर वो बहार है तोह क्या बता कर गया है.", इधर फ़ोन उठते हे कोमल ने महिला की आवाज सुनी जो अनामिका हे थी. बातचीत होने पर जब अर्जुन के विषय में पुछा तोह सामने से क्या जवाब मिला वो सिर्फ कोमल ने हे सुना और फ़ोन वापिस रख दिया.
"शाम को उमेद चाचा जी ने ारु को किसी कार्यक्रम में जाने का कहा है जिधर वो जाने वाले थे लेकिन बहार होने की वजह से उनकी जगह ारु जा रहा है. उसके लिए हे वो शहर कपडे लेने निकला था घर से साढ़े 11 बजे.", शंकर जी इस जवाब पर ऐसे मुस्कुराये जैसे वो संतुष्ट नहीं थे बेशक उमेद वाली बात सही थी लेकिन हाल में अर्जुन कपडे लेने हे गया है ये नहीं जांचा.
"और वापिस आने का समय बताया उसने?"
"जी बोल के गया था की 4-5 बज तक लौट आएगा.", कोमल जवाब देते हुए मैं हे मैं कुछ और भी सोचने लगी थी और अपनी बेटी को गंभीर देख कर शंकर जी अपनी जगह से उठ खड़े हुए.
"अगर तुम अर्जुन के जवाब से संतुष्ट हो तोह ठीक है बीटा लेकिन तुम उसकी परवाह करती हो तोह फिर तुम्हे पूरी छूट है उस से सख्त व्यवहार करने की, सवाल पूछने की और तुम्हारी दादी यहाँ सामने बैठी है जिनके सामने ये जिम्मेवारी मैं तुम्हे दे रहा हु. वो जहा जाए, उसकी हर छोटी बड़ी बात, वजह और उसमे अर्जुन की जरुरत तुम्हे पता होनी चाहिए. आखिर तुम्हेर माँ से ज्यादा वो तुम्हारे साथ रहा है और घर में उसको अगर डर भी है तोह सिर्फ तुमसे. ये मैट सोचना की मुझे कैसे पता की वो सिर्फ तुम्ही से डरता है बाकी सबकी सिर्फ इजत्त करता है. पता करो अपने भाई का.", शंकर जी मेज पर से अपना चस्मा और बटुआ उठा कर बहार निकल गए और कोमल ने एक नंबर घुमाया बिना अपनी दादी पर ध्यान दिए और वह बात करने पर पता चला की माधुरी दीदी तोह खुद अपनी माँ और जेठानी शिल्पा के साथ बाजार गयी है. अर्जुन ने आज उधर आना नहीं था. कोमल हताश हो उठी थी ये सब सुन्न कर क्योंकि आज पहली बार उसके पिता ने उस से सवाल किये थे उसके छोटे भाई को ले कर और हमेशा अर्जुन का पता रखने वाली कोमल से जिस दिन चूक हुई उस दिन हे ये सवाल जवाब झेलने पड़े थे.
"ज्यादा मैट सोच अपने बाप की बात. शहर गया होगा तोह कही महल या गाँव के काम से निकल गया होगा इधर उधर. शाम को बात कर हे लेगा जब घर आएगा. चल तू आराम कर ले थोड़ी देर, सुबह से लगी हुई है. दोपहर का खाना कृष्णा के साथ रूपाली या कोई भी लड़की बना लेगी. अर्जुन गाँव जाने से पहले तोह हमेशा तेरी नजरो में हे रहा है. अब दूर है तोह थोड़ा.."
"नहीं दादी.. अर्जुन चाहे दिल से ाचा हे सोचता है सबके लिए लेकिन दुनिया उसके जैसी सोच नहीं रखती. वो तोह दीदी के ससुराल भी नहीं गया और कही भी जाता तोह काम से काम पता तोह हो की महल गया है या किसी दोस्त के पास. आपके पास दामिनी बुआ के घर का नंबर है दादी?", कोमल ने जाने ये कैसे पूछ लिया था और शायद यही उसकी छत्ती (6तह) इंद्री थी. कौशल्या जी ने तुरंत हे उठ कर अपने कमरे से वो डायरी ला दी जिसमे नंबर था और कोमल ने एक बार नंबर मिलाया तोह घंटी जाती रही जाती रही लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. कोमल ने र का बटन दबा कर हैंडल फिर से अपने कान से लगा लिया और इस बार सामने से उखड़ी साँसों की आवाज स्पष्ट कान में पड़ी.
"Hello...uhhhhh"
"अर्जुन से बात करवाओ मेरी. बोलना कोमल दीदी है.", दूसरी तरफ एक पल को तोह चुप्पी हे छा गयी क्योंकि अर्जुन निर्वस्त्र खड़ा था जो फ़ोन आने से पहले तक आँचल की छूट मुँह में लिए बस अंतिम कार्य पूरा करने हे वाला था पर फ़ोन उठवा कर उसने अपने हे पाँव पर कुल्हाड़ी मार ली थी. आँचल बेशक बड़ी थी कोमल से लेकिन उसकी सार्ड धीमी आवाज सुन्न कर बदले में वो कुछ और न कह सकीय.
"जी दीदी.", अर्जुन की आँखें इतनी दूर होने के बावजूद निचे झुकी थी और स्वर में जो गलती का एहसास था वो कोमल ने खुद हे जान लिया.
"बता कर नहीं जाना होता की कहा जा रहे हो और किस वजह से? कपडे खरीदने में कितना वक़्त लगता है और तुमने तोह पहले हे नाप दे रखा था फिर वापिस लौटने के लिए 4-5 बजे का बताया? आँचल का सामान ले लिया घर से या कुछ बाकी है? 2 घंटे बाद गाँव वापिस पहुंच कर घर के नंबर से फ़ोन करना.", कोमल ने जिस अंदाज में अपनी बात कही थी अर्जुन का मूसल जवाब देने से पहले हे लटक कर आधा हो गया. उसको समझ हे नहीं आ रही थी की दीदी एकदम से कैसे उस से नाराजगी दिखा रही है? फिर ध्यान गया उनकी बातों पर तोह वो समझ गया की कोमल दीदी को यकीन होगा की अर्जुन वह आँचल के साथ गुल खिला रहा होगा और उन्होंने पहले हे सावधान किया था ऐसा न करने से.
"आप कहती हो तोह मैं घर हे वापिस आ जाता हु.", अर्जुन के मुँह से ये बात निकल तोह गयी लेकिन अब ये उसके लिए हे भारी पड़ने वाली थी.
"Do-tarfa बात करने के लिए नहीं कहा ारु. जब जिस काम के लिए घर से निकलते हो तोह सिर्फ उतना हे करना चाहिए और काम से काम ये जरूर पता हो की तुम क्या कहा और कितने समय के लिए बहार हो. काम से काम तब तोह जरूर जब तुम अपने शहर में नहीं हो. दीदी से मिलने जाना हो या रानी माँ की तरफ लेकिन उसका पता होना चाहिए. शाम के लिए तोह मैंने नहीं टोका क्योंकि फंक्शन का घर पे भी सबको पता है यहाँ. 7 बजे से देर रात तक तुम वह रहोगे लेकिन बाकी अपनी नादानियाँ थोड़ी काम कर लो तोह मैं भी जवाब देने लायक हो जाऊ. घर पहुंच के फ़ोन करना, बाकी बात मैं तभी करती हु.", कोमल ने जिस अंदाज में फ़ोन रखा और उठ कर यहाँ से निकल गयी, कौशल्या जी और अर्जुन की हालत के जैसी थी. दोनों हे अपने अपने सर पे हाथ रखे थे.
'बचाव करने के लिए ऐसा करना भी ठीक है बेचारी का. अब बाप न जिम्मेवारी ले तोह कोई तोह भुगते और ये बैलबुद्धि गलत मौके पर गुस्से का शिकार हो गया.', कौशल्या जी को कहा पता था के उनका बैलबुद्धि सही मौके पर दबोचा था कोमल ने. नहीं तोह उधर आँचल अर्जुन के निचे होती और किसी के वह पहुंचते हे दोनों का फंसना लाजमी था जैसा वह आँचल और अर्जुन द्वारा कपडे पहनते हे हुआ. बंद लोहे का दरवाजा कोई बाहर से खडका रहा था और ये दोनों एक दूसरे की तरफ देखते हुए हैरान थे की आज पूरी दुनिया उनके बीच आने वाली है क्या?
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"पता नहीं अपनी किस्मत पर हंसु या बाल बाल बचने की ख़ुशी मनाओ.", आँचल ने हे आख़िरकार उस गाने की आवाज काम करते हुए बातचीत आरम्भ की. अर्जुन खुद हे उलझन में था आज कोमल दीदी के व्यवहार पर और उस से ज्यादा खुदसे नाराज क्योंकि समय और हालात को समझने के बावजूद वो आँचल के साथ ये जल्दबाजी कर बैठा. कल रात हे प्रीती ने उसको समझाया था की वो कोई ऐसा काण्ड न करे जिस की वजह से कोई कल को 2 बात कह दे. जिनके साथ परस्पर प्रेम सम्बन्ध है वो उनसे हे संतुष्ट रहे यही बेहतर होगा, वो भी पूरी सावधानी से.
"फिलहाल तोह दुखी होने की ख़ास वजह नहीं है हमारे पास. आप हे सोचो की हमने एक साथ खुल कर इतना समय गुजरा और आपकी गर्मी भी कुछ शांत हुई. दीदी का फ़ोन सही समय पर नहीं आता न तोह हम अपनी सीमा लांघ चुके होते और आपकी चची के सामने जवाब न दिया जाता हमसे. खुद हे सोचो की उन्होंने हमे घर में आते हुए भी देखा और फिर दरवाजा बंद करने पर भी सवाल पुछा. ये तोह मैं था तोह बात भाई बहिन की वजह से संभल गयी. गलती मेरी भी है इसलिए सिर्फ खुद को दोषी मत मानिये. अब जो भी होगा वो ध्यान से और ठीक समय पर. वैसे भी कल मैं घर वापिस जा रहा हु और संडे तक हे वापिस आऊंगा.", आँचल मैं हे मैं पूरी घटना को समझने में लगी थी और अर्जुन बहोत हद्द तक सही भी था की वह घर का चुनाव करके उन्होंने गलती की हे थी और ये सब जल्दबाजी हे थी क्योंकि घर लंगड़ाती हुई आती तोह कोई जवाब नहीं देते बनता. फिलहाल दोनों हे पहले की तरह हलकी फुलकी बातें करते हुए गाँव पहुंच हे गए. अर्जुन पर अब सिर्फ और सिर्फ कोमल दीदी का व्यवहार हे हावी था. नए कपडे अनामिका चची को सुपुर्द करता हुआ वो हाथ मुँह धो कर टेलीफोन वाले कमरे में घुस गया, भीतर से उसको बंद करते हुए.
"आ गया स्वाद तुम्हे फिर से बेवकूफी करके? अब मुझसे उम्मीद मैट करना की मैं बीच बचाव करुँगी. वैसे भी दीदी पिछले एक घंटे से यही बैठी है बुआ के कमरे में.", अर्जुन ने अपने घर की जगह प्रीती के घर फ़ोन मिलाया था जहा पहले से मौजूद कोमल दीदी रेणुका बुआ और प्रीती की माँ के साथ इधर उधर की बातचीत में लगी थी जबकि मकसद उनका भी यही था की वो थोड़ा खुल कर अर्जुन से बात कर सके. अब बात प्रीती के माध्यम से कहलवाई थी तोह अर्जुन बचने के लिए फ़ोन भी उसको हो करने वाला था.
"अरे मेरी माँ, पहले मेरी बात तोह सुन्न लो. मुझे समझ नहीं आ रहा के मैंने बेवकूफी क्या कर दी और दीदी थोड़ा नाराजगी से बोली है. ऐसे तोह वो कभी भी नहीं करती. तुम हे पता करो न की इसके पीछे ऐसी कौनसी वजह है जो उन्होंने समझने की जगह सीधा धमका हे दिया.", इधर अर्जुन गुहार लगा रहा था और प्रीती ने अपनी तरफ आती कोमल दीदी को देखते हुए फ़ोन हे उन्हें थमा दिया बिना अर्जुन की बात सुने. कोमल दीदी भी बेतार फ़ोन को लिए प्रीती के साथ उसके कमरे में हे दाखिल हो गयी. दुपट्टा बिस्टेर पर रखती हुई वो अर्जुन की बात हे सुन्न रही थी जो यही सोच रहा था फ़ोन प्रीती के पास है. प्रीती सर खुजाने लगी जब कोमल दीदी को खामोश देखा.
"हो गयी तुम्हारी फ़रियाद और शिकायत? कुछ बाकी है तोह वो भी बता दो प्रीती समझ कर. सही सही बताना अर्जुन क्या मैंने कभी तुम पर कोई पाबन्दी लगाईं है या जो तुम चाहते हो वैसा नहीं होने दिया? प्रीती तुम कुछ वक़्त के लिए बहार जा सकती हो?", कोमल दीदी ने तोह इतने में हे इरादे स्पष्ट कर दिए थे और प्रीती उनका आदर करती हुई मासूमियत से हामी भर कर बहार गैलरी में निकल गयी, बहार वाले दरवाजे से. अर्जुन भी उधर अकेला था और कोमल दीदी भी इधर.
"मैंने कुछ गलत तोह नहीं किया दीदी सिवाए इसके की मैं आँचल दीदी के साथ उनके घर जा रहा हु ये बताया नहीं घर पे. आप ऐसे गुस्सा कर रही थी जैसे मेरी वजह से आपको किसी ने कुछ कह दिया हो."
"याद है ारु तुम्हे वो समय जब तुम कभी भी मुझसे सवाल जवाब नहीं करते थे और हर बात या तोह मुझे पता होती थी या तुम बता देते थे. आज ऐसा क्या हो गया मुन्ना जो तुम मेरी हे कही बात को इस कदर भुला बैठे हो और एक से बढ़ कर एक गलतियां बस करते हे जा रहे हो? पहले सुशीला बुआ, फिर दामिनी बुआ, हरमन (दीपा) भाभी, अनामिका चची और इतने पे तुम्हारी बस नहीं हुई तोह दीदी की जेठानी के साथ उनके पड़ोस वाली लड़की से सींग उलझा रहे हो. मैं तुम्हे जसलीन और अमृता जी के लिए नहीं टोक रही क्योंकि वो तुम्हारे हाथ नहीं है. पर जरा तुम समझो अर्जुन की आखिर तुम कर क्या रहे हो. आज आँचल.. वो भी उनके हे घर जहा आसपास अनगिनत घर है और उसको तुम्हारे साथ घर वापिस भी आना था. इतने रिश्ते मैट बनाओ ारु की पुराने रिश्ते तुमसे दूर हो जाए. तुम यहाँ वापिस लौट आओगे फिर उनका क्या होगा तुम्हारे पीछे से? ये इंसान की परवाह करना नहीं उसको सजा देने जैसा है. और अगर किसी ने तुम्हारा गलत स्वरुप पेश कर दिया तोह जितने चाहने वाले है घर से बहार, जो तारीफ करते नहीं थकते फिर वही तुम्हे गलत उदहारण की तरह पेश करेंगे. चची दिल की ाची है और उनके साथ जो है मैं एक बार उसको मान लेती हु लेकिन अब और नहीं मेरे भाई.. ध्यान खेल, जिम्मेवारियों और अपने भविष्य पर लगाओ तोह ज्यादा ठीक होगा. प्यार तुम्हारे साथ हमेशा है फिर चाहे घर पे हम सब और बहार जो.. जो तुम्हे अपना सबकुछ मानते है.", अर्जुन कान पर फ़ोन लगाए हुआ जहा पहले दीदी के खुलासो से चक्ति था वही उनके मुँह से खुदकी वास्तविकता सुन्न कर निरुत्तर. आखिर गलतियां तोह जाने अनजाने वही कर रहा था जहा उनकी जरुरत नहीं थी वह भी प्यार बाँटने की.
"वैसे आपको किसी ने कुछ कहा है न दीदी? मैं अब ये नहीं दोहराऊंगा जितना हो चूका उसको ठीक नहीं कर सकता पर आगे ऐसे रिश्ते.."
"मुझे किसने क्या कहा है वो जरुरी नहीं है ारु और तुम चाहे जितनी कोशिश कर लो तुम्हारी जिंदगी में ऐसे लोग आते हे रहेंगे. फैंसला तुम्हे हे करना है की तुम कदम उनकी तरफ बढ़ाते हो या अपनी राह चलोगे. जो तुम्हे दिल से पसंद करेगा वो तुम्हारी परवाह करेगा न की अपने दुःख बता कर तुम्हे उन्हें सुख में बदलने की चाहत रखेगा. अगर कोई ऐसा है जो तुम्हे समझता है, वो खुद से ज्यादा तुम्हारी परवाह करता है और वो ये भी चाहत रखता है की तुम जीवम में एक सफल इंसान बनो तोह वह मेरी बात की परवाह मैट करना. अमृता जी की सोच तोह ऐसी हे है और जिसके बारे में मुझे ऋतू से पता चला उसको भी मान सकती हु लेकिन बाकी जो भी है उनकी तरफ अब अगर तुम्हारे कदम सिर्फ जिस्मानी तौर पर बढ़ते है तोह ये सिर्फ मेरी हे गलती होगी. मेरे प्यार, समर्पण और dekh-rekh की गलती. मैंने तुम्हे कभी भी गलत इंसान का सामना करने से नहीं रोका बल्कि मैं चाहती हु तुम वही करो लेकिन गलत रिश्ते बढ़ने के लिए तुम्हे तब भी समझाया था जब तुम सविता का जीवन खराब करने वाले थे. बाकी तुम इस पर गौर करना अगर पार्टी में जाने से पहले थोड़ा समय मिले तोह. आखिर किसके प्यार में कमी रह गयी और बलिदान कितनो ने दिया. वह माधुरी दीदी पर्याप्त थी लेकिन तुम सब जानते हुए भी बहके. हर बार बचाव मुमकिन नहीं भाई, नहीं है मुमकिन. आखिर में बस इतना हे कहूँगी की अगर तुम अपने लक्ष्य से भटके और ऐसे बेमतलब सम्बन्ध बनाये तोह मैं समझूंगी की मैं कभी तुम्हारी पहली पत्नी नहीं थी.", कोमल ने बातों बातों में आज अर्जुन के mann-mastishk को ऐसा धवस्त किया था की न उस से गुहार लगाते बन्न रहा था और न क्षमा मांगते. अतीत में समझाने के बावजूद उसने Jeenat/Sakshi से सम्बन्ध बनाये, मीनाक्षी के अंतर्मनन को बढ़ावा दिया और अब वो आँचल के साथ साथ शिल्पा जी तक बढ़ने वाला था.
"आइंदा आपको मेरी ये अनचाही गलतियां सुन्न ने को नहीं मिलेंगी दीदी लेकिन ये मैट कहिये की.. मैंने आपके साथ रिश्ता कोई नादानी में बनाया था. आपको खो दिया तोह फिर कुछ और पाने की चाहत हे नहीं रहेगी. आज मैं शर्मिंदा हु क्योंकि आपको दुःख पंहुचा और मेरी वजह से इतना कुछ सुन्न ने को मिला होगा किसी न किसी से. मैं वापिस वही घर पे हे आप सभी के पास रहना चाहता हु..", अर्जुन के लफ्ज़ो में उसकी कमजोर आवाज सुन्न कर कोमल का खुदका दिल तड़प उठा. वो इस सच से भी भली भांति परिचित थी की उसका भाई जैसा भी है उसके स्वभाव में हे कही कमी है और लोग उसकी तरफ आकर्षित होते है तोह वो उन्हें जवाब भी नहीं दे पता.
"मैं तोह साड़ी दुनिया की शिकायत सुन्न लुंगी तुम्हारे लिए. बस 2 हे बात कहना चाहती हु तुमसे और उन्हें समझने की कोशिश करना अर्जुन. जो तुम्हारी चाहत रखता हो उसको िज्जात्त देना और जो मज़बूरी में हो.. असलियत की मज़बूरी में, उसका साथ निभाना पर हद्द में रह कर. रिश्ता सिर्फ जिस्मानी या किसी और भावना से बना हो तोह वो बस गर्त में ले जाता है. लोगो का लालच ख़तम नहीं होगा पर तुम्हे उनसे बचना है. वापिस तोह तुम्हे आना हे है लेकिन जो रिश्ते तुम्हारा दिल स्वीकार करे, बस उन्हें हे इज्जत दो. तुम बौ जी के हे नहीं संजीव भैया, चाचा, नानी, माँ और raj-mehal तक के वारिस हो. आज शाम को तुम्हे जहा जाना है वह लोगो को उमेद सिंह का वारिस देख कर फकर होना चाहिए. उन्हें अर्जुन शर्मा एक अधिक उत्साही या अंतर्मुखी व्यक्ति नहीं बल्कि एक घराने के प्रतिनिधि लग्न चाहिए. कल तुम प्रीती के साथ भी होंगे और समाज में तुम्हारी पहचान एक मजबूत व्यक्ति, जिम्मेवार पति और वचन निभाने वाले इंसान के रूप में होनी चाहिए. भटके हुए मैं, इत्छाओं में दबा खूबसूरत इंसान या दुःख के बदले सुख की प्रवर्ति से नहीं. थोड़ा आराम करो और अपने जीवन में ladkiyon/mahilaon से ऊपर जीवन के लक्ष्य रखो. कॉलेज में तुम्हारे पास कोई नहीं होगा और उस दुनिया में जा कर 2 करैक्टर सर्टिफिकेट मिलते है. एक जो कॉलेज देगा और एक जो तुम कमाओगे. मैं जानती हु तुम समझदार हो और लायक भी बस बहाव के साथ बहते हुए कभी कभी दूर निकल जाते हो और किस्मत ाची है की अभी तक nehar-nadi से वास्ता पड़ा है. उफनते समंदर से सामना न हे हो तोह बिहार है हमारे सबके लिए. खाना खा लो और बाकी जो तुम्हारा आज न हो सका वो तुम्हे कल तुम्हारी बीवी ाचे से देगी. अपना ध्यान रखना ारु.", प्रतिउत्तर में अर्जुन ने बस 'जी' कहा और उसके बाद कोमल दीदी ने हे लाइन काट दी. आँखों में आंसू भी आ चुके थे उनकी लेकिन आवाज पर उनका असर नहीं होने दिया. वो प्रीती को बुलाने से पहले बाथरूम चली गयी खुद को दुरुस्त करने के लिए और अर्जुन आँखें मूंदे उनकी कही हर बात मैं में दोहराने लगा. आज उसको सचमुच खुद पर दुःख हो रहा था. दीदी ने सब जानते हुए भी उसको सिर्फ उन्ही लोगो के लिए मन किया था जो जीवन में जरुरी नहीं थे या उनकी वजह से अर्जुन के चरित्र पर धब्बा लगता. कही न कही कोमल दीदी की बात को साक्षी ने सार्थक कर दिखाया था जिस से फिलहाल अर्जुन अनजान था. कमरे से बहार निकलते हे वो टोलिया उठा कर बाथरूम में जा घुसा. दिमाग को सुकून देने के साथ अपने भागते जीवन पर भी सही लगाम लगानी अब जरुरी थी. दीदी ने उसको संसर्ग से मन नहीं किया था, लोगो की पहचान पहले करने का एक निवेदन किया था और सबकुछ उन्हें पता होना जरुरी हो. जबतक वो नाहा कर बहार निकला, चेहरा कुछ हद्द तक शांत था दिमाग के साथ. भोजन करते हे वो चची के कमरे में हे उनके पहलु में जा लेता. आज अनामिका चची ने भी mamta-swaroop उसको थपकी देते हुए सुकून से सुलाया जैसे वो भी अर्जुन को बेहतर समझने लगी थी.
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"ऐसा इंतजाम तोह दिल्ली वाले फार्महाउस पर भी न हो पता कपूर. इतनी शानदार प्रॉपर्टी है और जर्रा जर्रा बहोत हे देखभाल से संभाला हुआ. कितनी कीमत होगी इस राजहंस की?", राजहंस के विशिष्ट हॉल में कार्यक्रम से पहले संगीत व्यवस्था की जांच, खाने पीने और मेहमानो के स्वागत इत्यादि के लिए नियुक्त स्टाफ की रिहर्सल इत्यादि होने से नरेश कपूर जब फारिग हुए तोह वो चौड़ी पगडण्डी आलिशान लालटेन जैसी लाइट्स से रोशन हो चली थी. प्रमुख द्वार से हॉल तक का पूरा रास्ता हे किसी दुल्हन सा सजा था और सुरक्षा राजहंस की खुदसे नियुक्त थी. जैसे हे द्वार खुला और काली बंव गाडी भीतर आने लगी तोह आसमान झिलमिल आतिशबाजी से रोशन हो उठा. पारम्परिक शाही वेशभूषा में सजी सेविकाओं ने जीनत और पूरे कपूर परिवार का स्वागत इत्र और गुलाब के फूल बरसते हुए किया. गुलाबी रंग की ख़ास साड़ी और उत्कृष्ट साज सज्जा युक्त जीनत तोह स्वयं किसी पारी सी लग रही थी जिसके लिए सफ़ेद घोड़े वाली बग्घी को वही द्वार पर लगाया गया और किसी राजकुमारी की तरह बड़ी शान से वो और उसकी चचेरी बहिन Aashi-Kittu उसके अगल बगल बैठी हॉल की तरफ जाने लगी. मेहमान भी इनके पीछे हे आरक्षित पार्किंग तक पहुंचने लगे थे और ठीक 10 मिनट के बाद ऐसा हे स्वागत दूसरी लम्बी कार का हुआ जिसमे से पतला लम्बा युवक सफ़ेद pant-coat और नीली कमीज पहने निकला. हेमंत कैंसल. उसके माता पिता तोह ये स्थान और आज की सजावट देख कर हे गदगद हो उठे. इनकी मुलाकात यही पर नरेश कपूर और उनकी खूबसूरत बीवी मेघना से हुई जो काली साड़ी में हमउम्र तोह क्या जवान युवतियों पर भरी दिखी. सब लोग पार्किंग तक जहा गाडी से जा रहे थे, ये 2 दंपत्ति टहलते हुए हरे भरे मैदान, गुलाबी नीली रौशनी के बीच चलते फ़ुहाहारो और दूर दूर बानी उन शानदार इमारतों को निहारने लगे जो राजहंस का प्रमुख हिस्सा थी. यहाँ कांच की दिवार से परे बने उस 5 सितारा स्तर के स्विमिंग पूल पर मसरूफ विदेशी देसी मेहमानो को देखते हुए कैंसल साहब ने राजहंस की कीमत जान नई चाहि तोह उनकी सेवा में नियुक्त कला coat-pant पहने उस खूबसूरत युवती ने हे जवाब दिया.
"सर, वैसे तोह रिसोर्ट की वैल्यू 150 करोड़ मेंशन है रीसेंट वैल्यूएशन में लेकिन रॉयल एंड हेरिटेज प्रॉपर्टी होने की वजह से ये बेचीं नहीं जा सकती. ये आगे दोनों तरफ रेस्टोरेंट्स है अपनी अपनी खासियत से और उधर golf-range के साथ आगे एक लेक भी है. लेफ्ट साइड वो बड़ी बिल्डिंग्स होटल है जहा हर रूम रॉयल टच के हिसाब से फुल्ली ऐरकंडीओनेड है हर लक्सेरी के साथ. एंड हेरे वे अरे. रंगमहल, आपका सेलेब्रिटोन हॉल.", प्रचारिका ने हर छोटी बड़ी बात भी संजह की थी और मर कैंसल तोह सब देख कर, जान कर गदगद हो उठे. चांदी का थाल लिए उस 12 फ़ीट ऊँचे द्वार के दोनों हे तरफ कड़ी सेविकाएं हर मेहमान के तिलक करने के बाद पुरुषो के सर पर उनकी इत्छा अनुसार गुलाबी पगड़ी पहनती या गले में शाही चुन्नट (मफलर). दोनों दंपत्ति एक बार भीतर का शाही नजारा और बैठने की व्यवस्था देख कर एक दूसरे को धन्यवाद देते हुए बहार हे चले आये. मेहमानो का स्वागत भी इन्हे हे करना था.
"ाचा इंतजाम है यार नरेश. संगीत सुकून देने वाला और मेहमानो का स्वागत शाही. सुना है खाना भी ख़ास चुना है तुमने हर लिहाज से और यहाँ तोह शराब परोसने का तरीका भी ऐसा है जैसे किसी रंगमहल में हे बैठे हो. बस कुछ मेहमान वह पार्किंग से इधर तक पैदल आने का बुरा न मान ले.", कैंसल साहब की बात पर अपनी बीवी रवीना संग आये नंदा जी ने उनसे गले लगने के बाद जवाब दिया.
"खूबसूरती तोह गाडी के भीतर बैठ कर नहीं देखि जाती साहब. कुदरत से मिलने तोह हमको हे चलना पड़ेगा. बहोत बहोत मुबारकबाद हो आप दोनों परिवारों को इस एक और मजबूत रिश्ते की. पहले सांझेदार थे और अब सम्बन्धी.", फूलो का एक बड़ा सा गुलदस्ता कैंसल साहब की बीवी को देते हुए रवीना की खूबसूरती खुद कैंसल भी देख रहे थे. सफ़ेद बिना ब्याह की रेशमी साड़ी और चुचो का कटाव दिखती चोली के बाद उनकी गोरी नाभि तक सामने थी. खुले बाल अलग हे खुशबु बिखेर कर हवा में फैले इत्र को फीका साबित कर गए.
"हाहाहा.. बहोत सही बात कही नंदा जी. वैसे उमेश से भी मिल लिए और बचो को भी देख लिया पर हमारी बिटिया जन्नत अभी तक नहीं दिखी. और ये लो भाई ये तोह एक साथ 2-2 धुरंदर आ रहे है. शायद भानु भाई साहब को गजेंद्र के साथ आने सहित अपनी सुरक्षा पार्किंग पर छोड़ना पसंद नहीं आया.", और अब ये सभी लोग मुस्तैद हो उठे जब सफ़ेद कुर्ते पाजामे और अपनी अपनी बीवी बचो के साथ औपचारिक सी बातचीत करते हुए ये विशिष्ट लोग उनके सम्मुख आ पहुंचे. भल्ला जी तोह नंदा, कैंसल और कपूर साहब से गर्मजोशी से मिलने के बाद अपनी बीवी और बेटी का परिचय करवाते हुए उनेह उपहार दे कर भीतर चल दिए पर ये सांवले रंग का दरमियाना सा रईस राजनेता मुस्कुराने के बावजूद गुलदस्ता भेंट करते हुए इंतजाम की मामूली सी चूक पर तंज करने लगा.
"बहोत बहोत मुबारकबाद मेरे दोनों शुभचिंतको को इस शुभ अवसर की. आपको भी भाभी जी और इनसे मिलिए ये हमारी धर्मपत्नी जी है और ये बीटा बेटी. वैसे हमारे नवाब साहब हमसे कही ज्यादा हर छोटी बड़ी बात पर गौर करते है. आज के लिए हे ख़ास 50 हजार की जूती खरीदी थी laat-sahab ने लेकिन इतना पैदल चलने पर थोड़ा बुरा मान गया. भाई नरेश हम तोह मंत्री आदमी है, ये सुरक्षा साथ आने दी लेकिन फिर भी 200 गज दूर रुकवा कर अपने ये बहरूपिये से कर्मचारी साथ लगा दिए तुम्हारे इस होटल वालो ने. बन्दूक वंडूक में गोली तोह है न? हाहाहा.. गजेंद्र तोह हमारे रहते कुछ बोलने की गुस्ताखी करने से रहा. 99 लोग हाँ में हाँ मिलाये तोह एक मुझे हे शिकायत करने दो. क्यों भाभी जी गलत तोह नहीं कहा? वैसे इंतजाम तोह ाचा है.", यहाँ एक खूबसूरत युवती ने जैसे हे उनके ऊपर इत्र छिड़क कर गले में मरदाना दुपट्टा पहनाया तोह भानु जी तोह उसके रूप यौवन को इतने नजदीक देख द्विअर्थी बोल कह उठे. जिसकी बात का किसी ने बुरा नहीं मन. जीनत और हेमंत को भी उनकी चची यहाँ लिवा लायी थी इनके ख़ास आशीर्वाद के लिए जो अपने अपने दोस्तों संग आये थे. आशीर्वाद द्वार पर देते हुए भानु जी ने इस गदराई रूपसी को थोड़ा मर्यादा से देखा लेकिन मैं तोह मचल हे उठा था और उनका बीटा भी लार टपकने की हद्द तक जीनत पर अटका रहा.
"आपका पूरा हक़ है जी और हमारे बड़े तोह आप हे है. हमे खेद है की भतीजे को कष्ट उठाना पड़ा लेकिन आपके लायक यही एक जगह थी और ये नियम जरा देरी से पता चला.", अभी बातचीत के दौरान कैंसल परिवार के साथ साथ कपूर परिवार भी इन्हे घेर चूका था जो भानु की नजर में हम था. पर थी इसी वक़्त उसके मुँह से ऐसी बात निकली जिस पर मेघना जी अपने पति को देखने लगी.
"सभी आये है यहाँ पर. नंदा, भल्ला, धवन, मल्होत्रा और वो पार्षद से नया नया टिकट लिया अभिषेक भी. ये पेट्रोल पंप वाला नहीं दिखा अभी तक जो आजकल लकड़ी बेच कर खुद को दिल्ली का नया वारिस मान रहा है. उमेद सिंह को नहीं बुलाये क्या? हाहाहा. दिल्ली की राजनीति का चेहरा बदलने की चाहत है उस व्यापारी को और वो ये भी ाचे से जानता है की 5 हिस्सों में से 3 पर हमारा वर्चस्व है, एक मित्र पक्ष और सबसे छोटी वाली इस भल्ला के पास. वैसे बड़ी बिटिया ने हमसे मिलने पर आपत्ति जताई है क्या नरेश? हम तोह शुभम को यही कह कर लाये थे की अगर वो बिटिया को थोड़ा जान पहचान ले तोह सम्बन्ध मजबूत हे होंगे हमारे आपस में. वैसे तोह रिश्तो की कमी नहीं और राणा परिवार तोह हमारी हाँ के इन्तजार में बैठा है. उस लैंड्क्रुइसेर से तोह कही बड़ी गाडी और पूरी चमड़े की फैक्ट्री शुभम के नाम करवाने को तैयार है पर अभी बचा जवानी हे नहीं देखे और शादी करवा दे तोह ये भी गलत हे होगा. वैसे चर्चे तोह है समाचारो में जन्नत बिटिया के."
"डैड, फैशन वर्ल्ड में कहिये समाचार साउंड्स तू ओब्सोलेटे.", शुभम अपनी कलाई घडी को दिखते हुए दर्शा रहा था के सोना उसके लिए बड़ी बात नहीं और कपूर साहब अपनी बीवी को देखने लगी.
"जानू अपने दोस्त के साथ आ रही है भाई साहब. उसको यही पता था की प्रोग्राम 8 बजे तक शुरू होगा. आती हे होगी और फिर मिल भी लेंगे बचे.", और यहाँ द्वार पर खड़े ये लोग औपचारिक तौर पर आते हुए मेहमानो से बस ऐसे तैसे हे मिल रहे थे इस परिवार और भानु की वजह से. ठीक मेघना जी की बात ख़तम होते हे यहाँ तक आने वाला वो पूरा मार्ग हे खामोश और सुरक्षाकर्मी मुस्तैद हो गए. एक काली मेरसेदेज़ जीप और उसके पीछे लाल बत्ती लगी सफ़ेद मेरसेदेज़, जिसको नरेश कपूर ने हमेशा बिना बत्ती के हे देखा था वो इनके बिलकुल सामने आ रुकी. राजहंस के भी सभी सुरक्षाकर्मी अगली मेरसेदेज़ वालो की तरह अपनी अपनी बंदूके लिए सफ़ेद कार से कुछ दुरी पर सतर्क खड़े हो गए. ड्राइवर की तरफ का दरवाजा खुला तोह मेघना और रवीना के चेहरों पर चमक आ गयी वही जीनत हैरान जैसे वह खड़े बाकी लोग जो अर्जुन को जानते तक नहीं थे. सवा 6 फ़ीट का वो आकर्षक तगड़ा युवक सफ़ेद चूड़ीदार के ऊपर मोरपंखी बिना ब्याह की जैकेट पहने बिना किसी की तरफ देखता हुआ कार के दूसरी और चला आया. खुदसे हे भीतर बैठी युवती का पर्स और gulaabi-safed-laal रंग के गुलाबो के 2 बड़े गुलदस्ते ले कर दूसरे हाथ से उसको बहार आने में मदद देने लगा. लम्बे बाल ख़ास तरह से सहेजे और लगभग पारदर्शी आसमानी डिज़ाइनर साड़ी के साथ बस स्टैनो को छुपाती हुई चोली पहने जन्नत बहार निकली तोह खुद भानु और नंदा तक की जीभ मुँह से बहार निकल गयी. सब लोग बस अपलक इस जोड़ी को देख रहे थे और अर्जुन जन्नत को अपने साथ लिए उनके सामने आ खड़ा हुआ.
"ये मेरे पापा है, मर नरेश कपूर और ये माँ, मेघना कपूर. ये कैंसल अंकल और आंटी जी है और तुम जिनि को तोह जानते हे हो? और ये हेमंत है हमारी जिनि के वोउल्ड बे. Mom-dad, हे इस माय फ्रेंड अर्जुन, उमेद जी का बीटा और R&R एंटरप्राइज का अपकमिंग ओनर.", जन्नत के परिचय के बाद अर्जुन को पहचानते हुए नरेश जी तोह गले लग कर मिले जिनसे पहले अर्जुन ने बड़े हे सलीके से जीनत और हेमंत को गुलदस्ते देने के साथ गर्मजोशी से हाथ मिला कर शुभकामनाये भी दी. यहाँ उसने कैंसल साहब से हाथ मिलाने के साथ उनकी धर्मपत्नी को हाथ जोड़ कर मान दिया था. आज उसने किसी के पाँव नहीं छुए थे.
"मान गए भाई उमेद की पुरानी आदत को. कैसे भी करके खुदको हर जगह का मालिक साबित करने की कोशिश से बाज नहीं आता. वैसे जान सकता हु की तुम्हारी ये गाड़ियां और laal-batti के साथ सुरक्षा यहाँ तक कैसे आ पहुंची.?", अर्जुन अब तक सबसे मिलने के साथ भानु की श्रीमती जी का भी अभिवादन कर चूका था लेकिन अर्जुन से हाथ न मिला कर उन्होंने सवाल भी ऐसा किया जिस पर अर्जुन गुस्सा करता तब भी उसका कुछ बिगड़ने वाला नहीं था.
"ऐसा है अंकल जी, उनसे मैंने भी ये चीज सीख ली है. ये रिसोर्ट का सिक्योरिटी वाला है न ये भी बता देगा की मेरे यहाँ तक गाडी लाने की वजह क्या है. क्यों भैया हम कौन है?", अर्जुन ने मुस्कुराते हुए रिसोर्ट के हे कर्मचारी से पुछा था लेकिन कोट पंत पहने करीब कड़ी मैनेजर ने हे जवाब दे दिया.
"राजहंस के ओनर है आप, सर."
"जहा पर बुलाया जाए, वो जगह और लोग अपने बना लेने चाहिए. परिवार जैसा लगता है और आप वह के मुखिया. कभी दिल्ली बुलाइयेगा अंकल मुझे, निराश नहीं करूँगा आपको.", अर्जुन ऐसी कटीली मुस्कान दे कर जैसे भानु की सुलगती पूँछ पर पाँव रख कर मस्त हाथी सा चलता भीतर चल दिया. जीनत की बगल में जन्नत और हेमंत के साथ अर्जुन.
"बड़ा दुस्साहसी है ये लोंदा और देखने से भी उस उमेद का हे अक्स लगता है. दिल्ली आये तोह पाँव नहीं जमने दूंगा इसके. चलो आज जाने देते है शुभ अवसर है और हमे ऐसा घमंड बहोत पसंद है कपूर. दम तोह है इस लोंदे में लेकिन तुम्हारी बिटिया इसके साथ. कही उधर भी .."
"नहीं भाई साहब, अर्जुन तोह जानू बिटिया का सिर्फ दोस्त है. एकलौता दोस्त.", मेघना जी तोह लड़के को देख कर खुद हे इनसे बच कर बाकी तीनो महिलओं को लिए भीतर चल दी जहा भल्ला परिवार पहले हे अर्जुन से गले लग के मिल रहा था और उनकी बेटी कनखियों से अपनी चाहत से कुछ दूर कड़ी.
'ये लड़का मुझे पसंद नहीं आया डैड.', शुभम की बात सुन्न कर उसकी बगल में कड़ी बहिन ने अपनी पिता के कान में जो कहा वो सुन्न कर भानु जी ने अपने बेटे की बात अनसुनी करके बिटिया के सर पे हाथ फिर दिया.
"तुम अपनी.. छोडो. राजनीति की समझ हमारी बिटिया को ज्यादा है और यहाँ हमे अवसर मिल गया है.

