Incest Pyaar - 100 Baar - Page 57 - SexBaba
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Incest Pyaar - 100 Baar

अपडेट 217

बचाव (2)

'बादलो में छुप रहा है चाँद क्यों... अपने हुस्न की अदा से पूछ लो......... चांदनी पड़ी हुई है मंद क्यों.. अपनी हे किसी अदा से पूछ लो', मार्किट से वापिस लौट रहे अर्जुन और आँचल रह रह कर एक दूसरे को बड़ी आसक्ति से देख रहे थे इस गाने को सुनते हुए. रात में जीनत के रोकके पर जाने के लिए जो वस्त्र अर्जुन के लिए जन्नत ने पसंद किये थे, उन्हें हे लेने के लिए अर्जुन घर से निकला था और आँचल काम का हवाला देती साथ निकल चली. अभी घरी 3 बजा रही थी पर इनकी ऐसी चाहत भरी ख़ामोशी की वजह वो पल थे जो अब से 3 घंटे पहले शुरू हुए.

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04 जून 1998, समय 11:45 और स्थान पप शर्मा का बंद पड़ा घर.

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"किताबे तोह पिछली बार ले हे गए थे फिर इस बार ऐसा क्या जरुरी रह गया जो लेने आये है?", दफ्तर पर टाला ज्यादा था क्योंकि शर्मा दंपत्ति विदेश भ्रमण पर गए हुए थे, अपने जीवन की एक बार और नयी शुरुआत करने के लिए. दरवाजा खोलने के बाद भीतर से उसकी सांकल लगाती आँचल ने होंठो को गोल करते हुए अपने इरादे स्पष्ट हे कर दिए की वो यहाँ क्या लेने आयी है और आज उसके पास आख़िरकार सही मौका और जगह भी है. अर्जुन ने सर खुजाते हुए कदम भीतर आँगन के तरफ बढ़ा लिए.

"आज तोह तुम्हारे पास कोई बहाना भी नहीं है मिस्टर क्योंकि जहा भी तुमने जाना है शाम को हे जाना है. और मामी को मेरे सामने हे तुमने मन किया था के आज तुम उधर नहीं जा सकते इसलिए वो दीदी के साथ मंदिर हे घूमने चली जाए. एक बार छोटी मामी बीच में आ गयी और दूसरी बार संजीदा दीदी. यहाँ सिर्फ हम दोनों है अब और टाइम की कोई कमी भी नहीं.", दुपट्टा जो इतनी देर से सीने और सर को ढके था, वो अब डाइनिंग टेबल पर फेंकती हुई आँचल बिन आँचल के कड़ी थी. जिस्म तोह विरासत में हे ऐसा मिला था जिसके चाहने वाले अनेक थे और कुछ तोह अब ज़िंदा भी न रहे. 36-38 के बड़े बड़े मांसल चुके, 30 की मखमली कमर और सीने से अनुपात में हे मॉटे और बहार को उभरे हुए लचीले कूल्हे. एक आँचल हे थी कुछ माधुरी दीदी सी शारीरिक काया वाली और व्यक्तिगत जीवन भी कुछ वैसा हे था इसका जो घर के सभी काम खुद करती रही थी jhaadu-paucha से ले कर भोजन बनाने तक. शहरी जीवन पर देहात के साफ़ सुथरे खाने का बेहतरीन परनिअम थी आँचल जिसके रूप यौवन पर अर्जुन भी पहली sukhad-ghatna से विचलित हो चूका था. आज भी उसके समरण में वही लटकते हुए बड़े गोलाकार सतांन और कूल्हों का कामुक कटाव सुसज्जित था.

"मैं तोह आपको खुदसे बचा रहा था लेकिन अगर इरादा बना हे लिया है तोह फिर नेक काम में देरी कैसी? वैसे आपको सिखाने की तोह ज्यादा जरुरत नहीं पड़ने वाली.. बुआ और चची को देख के थोड़ा बहोत तोह सीख हे गयी होंगी.", अर्जुन ने वही डाइनिंग टेबल के करीब हे आँचल की कमर में हाथ डालते हुए उसको अपने सामने चिपकते हुए मजाकिया तंज किया और बदले में आँचल ने भी अपनी गुलाबी जीभ निकाल कर होंठो पर ऐसे फिराई जैसे वो सब स्वीकारती हो.

"मामी का जिस्म ढंग से तोह तुमने हे निखारा है लेकिन मेरी माँ तोह माहिर थी फिर भी चाल बदल दी तुमने उनकी. थोड़ा रेहम करना अपनी बहिन पर... झेल तोह लुंगी आखिर तुमसे बड़ी जो हु लेकिन तुम्हारा कुछ ज्यादा हे बड़ा है और मेरा ये पहली बार. वैसे तुम्हे एक सरप्राइज भी देना है लेकिन वो बाद में.", अर्जुन के सख्त सीने के उठान पर दोनों हाथ फिरती वो एड़ी उठती हुई ऊपर से हे अपना बदन उस से रगड़ती हुई अलग हे मस्ती में बोलने लगी. अर्जुन जानता था की आँचल ऐसा इसलिए कर प् रही है क्योंकि वो इतने दिनों में उसके साथ उन्मुक्त हो चुकी थी. हमेशा नजरे झुकाये रखने वाली और पढ़ाकू सी ये युवती अब बदलने लगी थी.

"चाल तोह आपकी भी बदलेगी और मुझे यही डर है की घर क्या जवाब डौगी. वैसे आपको जबसे बाथरूम में देखा था, दिल मेरा भी मेरे बस में नहीं रहा. ये इतने हसीं दिख रहे थे न वह झुके होने पर की मैं हे जानता हु कैसे खुद को काबू किया. हाँ बुआ के साथ थोड़ा गलत किया मैंने लेकिन जाने दो, उनके बदले का प्यार भी आपको हे कर लूंगा.", कुर्ती ढीली होने के बावजूद सीने पर इस कदर कासी थी की वो बड़े गोले अपना अकार ाचे से बताते दिखे. अर्जुन का हाथ आँचल के कंधे से फिसलता हुआ उन नरम गुब्बारों पर गोलाकार सा चलता उनकी परिधि जांचने लगा. भीतर ब्रा के बावजूद चुचो की नरमी और उनका अकार उसने ाचे से महसूस किया. दूसरा हाथ तोह खुदसे हे चुम्बक की तरह भरी उभरे हुए कूल्हों के निचे जा टिका. आँचल भी अपने जिस्म के दो हिस्सों पर मरदाना मजबूत स्पर्श लेती हुई चेहरा ऊपर उठाने लगी. भरे भरे तराशे हुए होंठो पर अर्जुन ने हे होंठ चिपका दिया. वीरान पड़े शर्म के इस घर में आज उसकी बेटी का हे कौमार्य भांग होने वाला था बेशक बीवी पहले हे औरत बन के आयी थी यहाँ. अर्जुन दाए हाथ से एक सतांन की तलहटी से उठान तक मसलता रहा और दूसरा हाथ आँचल के कूल्हों की जड़ में उसकी रेशमी जांघो और गरम कूल्हों से खेलने लगा. आँचल उसके कंधे थामे पूरी तल्लीनता से ras-swadan का सुख भोगने लगी, जिस्म में जैसे विधूयूट भर उठी हु, kaam-vidhyut.

"आअह्ह्ह.. बड़े बेसब्री हो रहे हो अब तुम. पहले मुझे तड़पते रहे और आज इतने उतावले हो की सांस तक नहीं लेने दे रहे. उम्म्म्म", यही खड़े खड़े हे अर्जुन ने कमीज ऊपर खींचनी चाहि तोह वो मॉटे स्टैनो की चढ़ाई पर हे अटक गयी. सलवार के नाड़े से ऊपर मांसल पेट कुछ बेपर्दा हुआ और उसके ऊपर पतली समीज कुर्ती के साथ खींचती हुई आधे पेट को ढके हुए. आँचल ने हे कुर्ती को झटकते हुए ऊपर खिंचा तोह स्प्रिंग से हिलते दोनों पहाड़ से चुके समीज और काली ब्रा में क़ैद अपनी ख़ूबसूरती से अर्जुन को ललचाने लगे. दिन की रौशनी में उसके सामने कड़ी आँचल का ये रूप जानलेवा हे था. मॉटे उरोजों के रेशमी किनारे आपस में जुड़े एक कामुक नजारा बनाये थे और ब्रा से कुछ निचे तक फांसी समीज को अर्जुन ने एक झटके में हे अपनी नजरो से दूर कर दिया. गोल नाभि के दरमियान नंगा पेट जिसमे लोच और नरम सा उभर हे था. उसके ऊपर स्टैनो का बोझ धोती हुई वो काली ब्रा भी पूरी तरह ऐसे चुचो को समेटने में नाकाम सी. कुछ हिस्सा सीने के बीच नुमाया था और उतना हे ब्रा के किनारो से दोनों तरफ बहार. अर्जुन बाहरी हिस्सों को हाथो में लेते हुए स्टैनो की घाटी में मुँह दबाता उन्हें जीभ से चाटने चूमने लगा. आँचल भी पीछे खिसकती हुई लकड़ी के बड़े टेबल से कमर सताए अर्जुन के हवाले हो गयी. नरम मांस को मुँह में भर के चूसते हुए अर्जुन ने आँचल का रोम रोम उत्तेजित कर दिया. ब्रा के भीतर हे उन छोटी मटकी से गोलों की घुंडियां अकड़ने लगी थी. आँचल उसका सर सहलाती हु टेबल पर हे पीठ के बल झुकती चली गयी.

"मैं बेसब्र भी तोह आपकी हे बदौलत हुआ हु. सचमुच आपके बूब्स बने हे पीने और मसलने के लिए है. हाथ में पकड़ना चाहो भी तोह फिसलने लगते और कितने गोल और बड़े बड़े है. कपड़ो के ऊपर से फिर भी ये उतने बड़े नहीं दीखते जितने ये सचमुच में है और इतने कैसे हुए भी. सोती कैसे हो इनके साथ?", अर्जुन ने सलवार में क़ैद जांघो को थाम कर आँचल का जिस्म टेबल पर पीछे धकलते हुए सही से लिटा दिया. बड़ी बड़ी छातियां इस हरकत पर भी एक ताल में हिलने लगी जिन्हे दोनों हे देख रहे थे. आँचल के चेहरे पर हलकी लाली और शर्म थी वही अर्जुन बस उन्हें be-parda करके निचोड़ना चाहता था.

"ऐसे क्या देख रहे हो? सामने हे तोह हु तुम्हारे और मेरा जो कुछ है उस पर तुम्हारा पूरा हक़ है अर्जुन. मैं भी चाहती हु की तुम मेरे जिस्म के हर हिस्से पर अपनी मोहर लगा कर इसको अपना बना लो. अब तुमसे ज्यादा मेरा सबर जवाब दे रहा है.", आँचल ने कमर उठा कर ब्रा खोलनी चाहि तोह अर्जुन ने दोनों उरोज दबा कर उसको वापिस निचे लिटा दिया. कंधो से दोनों काली पत्तियां खिंच कर बाहों की तरफ खिसकते हुए वो आधे स्टैनो की गोलाई देखने लगा. लेते होने पर भी वो पूरे तन्ने हुए थे और ब्रा बस निप्पल पर अटकी हुई, दोनों तरफ के भूरे गोल सिक्के को थोड़ा थोड़ा दिखती हुई. अर्जुन ने इसके बाद एक झटके में हे ब्रा के दोनों कप निचे उलट दिए.

"ओह्ह्ह्ह.. कितने खूबसूरत है आपके सतांन.. बेजोड़.. किसी कामदेवी की मूरत से.", और वर्णन कही गलत भी नहीं था उस दूध की जोड़ी का. जितने भरी और मॉटे कैसे हुए वो सतांन थे, उतना शानदार उनका केंद्र. मेहँदी से रंग के गोल घेरो के बीच ऊपर उठे हुए गहरे भूरे पर कच्चे चूचक. एक अर्जुन हे तोह था जिसने उनका स्पर्श किया था और निप्पल तोह बढ़ते हे सम्पूर्ण संसर्ग से है. ये कोरे चूचक जैसे हे अर्जुन की उँगलियों ने पकडे, मजे से आँचल ने आँखें मूँद ली. वो अपनी इस बड़ी बहिन के ऊपर आता हुआ एक दूध को ाचा खासा हिस्सा पकड़ कर किशमिश से निप्पल को मुँह में भर के जीभ से सहलाता सा चूसने लगा. अलग सा स्वाद था जैसे कोई रास निकल रहा हो. दूसरे वाले पर भी हथेली रख कर सहलाता हुआ आँचल के जिस्म पर छा चूका था. खुले आँगन में खाने की बड़ी मेज पर आज पकवान की जगह आँचल सजी थी और उसको धीमी रफ़्तार से भोगता अर्जुन. चुचो की लमस इतनी आकर्षक थी की जल्द हे वो उनका मर्दन करता हुआ पागलपन की हद्द तक दोनों शिखर चूस चूस कर कड़े कर गया. अर्जुन द्वारा निप्पल मसलने और दोनों का एक साथ अपने मजबूत हाथो से मर्दन करना हे आँचल के लिए पर्याप्त रहा. टाँगे उठती हुई वो अर्जुन की कमर पर कैंची बनती हुई हलके झटके लेने लगी. सलवार और जीन्स के ऊपर से हे दोनों के निचले अंग एक दूसरे को आनंद दे रहे थे. कुछ समय पहले जो निप्पल अभी उभरने लगे थे वो दोनों हे गहरे रंग और थूक में गीले हो कर आसमान की तरफ तीर से उठे थे.

"ुण्णं.. ाचा लग रहा है.. आह्हः.. मुझे नहीं पता था ये सब इतना मजे से भरा होगा... बस इन्हे थोड़ा आराम से दबाओ.. आह्हः..", अर्जुन को वापिस अपने चुचो पर दबती हुई आँचल सीसीएनए लगी. निचे कुछ मजबूत सा अंग उसको अपनी रास बहती नरम योनि पर दबता लगा. वो जानती थी की ये क्या चीज है और 2 रात पहले हे तोह उसने पहली बार लिंग को हाथ में पकड़ कर होंठो से लगाया था. कितना विशाल अंग है वो, ये सोच कर खुद हे आँचल कमर को आगे पीछे करती हुई अपनी योनि को घिसने लगी. 15 मिनट तक दोनों मॉटे खरबूजे चूसने मसलने के बाद अर्जुन पीछे हो कर मेज पर लेती आँचल को देखने लगा. उसके चेहरे पर हल्का पसीना और हिलते सतांन पहले से कही ज्यादा उभरे हुए. जीन्स पहने रखना अब अर्जुन के लिए मुश्किल हो चूका था और वही जूते खोल कर अपनी जीन्स और निक्कर उतरता वो तुरंत जन्मजात अवस्था में आँचल के सामने खड़ा हुआ और इधर आँचल ने भी सलवार की गांठ खोलते हुए खुद को अर्जुन के समकक्ष बनाया. दोनों मांसल पत् आपस में जुड़ते उसके गदराये जिस्म को अधिक कामुकता प्रदान करते. योनि को छुपाती काली पंतय जिस्म पर बुरी तरह कासी थी जो आखिर जांघो से निचे फर्श पर आ रुकी. भूरे लकीरबन्द यौवन की झलक ने हे लिंग को ऐंठने के साथ 3-4 बार झटका दिया. अर्जुन बस इस कामदेवी को हे निहार रहा था जो कही ज्यादा उत्तजित थी.

"ये हर समय ऐसा हे रहता है?", आँचल हैरत भरी आँखों लिए उस फड़कते हुए तगड़े लुंड के पास आ बैठी. कुछ देर देखने के बाद जिस कुशलता से उसने अर्जुन के विकराल लिंग को जड़ से दबोचा था वो अपने आप में हे आँचल की लालसा बताने को काफी था. चमड़ी पीछे करती हुई वो अर्जुन से ऐसे नजरे मिलाये थी जैसे वो उसके चेहरे पर बदलते भाव बखूबी पहचानती थी. अब समय था अर्जुन को उसके तरीके से आनंद देने का.

"आप हो हे इतनी मस्त तोह ये खड़ा कैसे न हो.? सचमुच आपका बदन हर तरह से बस प्यार करने के लिए बना है. आअह्ह्ह..", आँचल की जीभ गुलाबी सुपडे पर फिसलते हे अर्जुन ने अपना एक हाथ उसके सर पर दबा दिया. वो भी निचे नजरे उठती हुई कामुकता से अर्जुन को देखते हुए सुपडे के निचे वाली खाल से वीर्य छिद्र तक जीभ की नोक गुआंती हुई अपने kaam-gyaan का जलवा दर्शाने लगी. कंप्यूटर का उपयोग या दुरप्रयोग कहिये लेकिन आँचल ने जो भी सीखा था उस से अर्जुन के तगड़े मूसल पर नीली धारियां उभर कर उसको कही ज्यादा खतरनाक दिखने लगी. एक हाथ उसकी मजबूत जांघ पर रख के सहारा लेती आँचल ने पूरे होंठ खोल कर सूपड़ा मुँह में भर लिया. अर्जुन एक हाथ टेबल पर टिकाये इस सुखद एहसास से भरा अपनी कमर हिलता हुआ जैसे आँचल के मुँह को हे छोड़ने लगा. आँचल को थोड़ी परेशानी भी हुई उस अजीब से स्वाद और अर्जुन के धक्को से लेकिन परिपक्व युवती ने एक तिहाई लिंग को ाचे से सहा. ये मुखमैथुन जैसे अभी लम्बा चलने वाला था.

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"पापा, आज आपने वापिस हॉस्पिटल नहीं जाना? 12 से ऊपर टाइम हो चूका है.", कोमल यहाँ घर पे प्रियंका के साथ घर के सभी काम निबटान एक बाद आखिर में बैठक दुरुस्त करने आयी तोह अपने पिता डॉ शंकर को दीवान पर सोये देख थोड़ी हैरान हो गयी. वो दिन में कभी भी घर पे विश्राम नहीं करते थे. हाँ थोड़ा बहोत आराम करना मुमकिन था लेकिन भोजन किये डेढ़ घंटे से ऊपर हो चूका था इसलिए कोमल ने उन्हें जगाया तोह शंकर जी ने अपनी घडी पर नजर डाली, जो 12:25 बता रही थी.

"ओह.. सही किया बीटा तुमने मुझे उठा दिया. जाने कैसे आँख लग गयी मेरी. एक गिलास पानी देना जरा.", शंकर जी ने सिरहाने की तरफ से दवा की शीशी उठा कर एक गोली मुँह में डालने के बाद कोमल के हाथ से पानी का गिलास लिया और जूते पहन ने लगे. चेहरे पर थोड़े थकान के भाव अभी भी थे जो हैरानी की बात थी उनकी दिनचर्या और सेहत को ध्यान में रखते हुए. आज सुबह वो बिना नाश्ता करे हे घर से निकल गए थे 5 बजे आपातकाल स्थिति की वजह से. दुर्घटना का बड़ा केस था और ऐसे में सभी प्रमुख चिकित्स्कों की जिम्मेवारी थी घायलों का समय पर इलाज करना.

"आप आराम हे कर लीजिये न पापा. हॉस्पिटल फ़ोन कर दीजिये, आज आप थके हुए लग रहे है.", कोमल ने गिलास वापिस मेज पर रखने के बाद बगल वाले सोफे पर बैठते हुए अपने पिता को सलाह दी तोह प्रतिउत्तर में वो मुस्कुराते हुए अपने तस्मे बांधने लगे.

"उम्र बढ़ने के साथ एक न एक दिन तोह प्रभाव पड़ेगा हे बीटा. तुम टेंशन मैट लो, सब ठीक है. वैसे तुम्हारी माँ ने कब वापिस आना है? बात हुई थी क्या आज?", शंकर जी ने फिर से समय देखा और दोनों हाथ दीवान पर टिकाये आराम से बैठ गए. जैसे उनके पास अभी भी कुछ समय था.

"हाँ आपकी बात भी सही है लेकिन ऐसा पहली बार हे देखा है न पापा. वैसे माँ परसो लौटने का बता रही थी पर दादी ने कहा की वो संडे को वह से सीधा क्सक्सक्सक्स हे पहुंच जाए. विष्णु चाचा की शादी में. रात आप उनके हे पास गए थे?", शंकर जी ने है में जवाब दिया और जैसे कुछ सोचने के बाद उन्होंने ये अलग हे बात छेड़ दी.

"तुम्हे ऐसा नहीं लगता की तुम्हारा छोटा भाई कुछ लापरवाह हो रहा है? मेरे पास तोह कभी समय रहा नहीं की उस पर ध्यान दे सकू. घर में बाकी लोग भी अपने अपने काम में व्यस्त रहते है चाहे संजीव हो या तुम्हारा चाचा ताऊ. तुम्हारी माँ का भी मैं समझता हु की घर सँभालने और बचो को पढ़ने के बाद उसके पास समय नहीं रहता. तुम्हे काम से काम अर्जुन की जिम्मेवारी लेनी चाहिए कोमल. कोई उस से पूछता है की वो वह क्या कर रहा है या क्यों? छुट्टियां बिताने गया है तोह ाची बात है लेकिन घर और गाँव से बहार कहा जाता है, किस से मिलता है और क्या जरुरत है? बुरा मैट मान न मेरी बात का लेकिन औलाद और मिटटी एक जैसे होते है. ध्यान दो तोह दोनों सही फल देंगे नहीं तोह जैसे बिना वृक्ष वाली मिटटी पानी या हवा से बह जाती है वैसे हे ध्यान न देने से औलाद. इतना तोह मैं जानता हु की वो तुम्हारी बहोत िज्जात्त करता है और हर बात भी मानता है. लेकिन क्या इतना हे उचित है? अर्जुन के असफल भविष्य जीवन का दोष किसके सर मंधेगा? मेरे और तुम्हारी माँ के लेकिन क्या सच में हम दोनों हे उसके जिम्मवार होने चाहिए?", शंकर जी ने अर्जुन के विषय पर पहले कभी कोमल से इस तरह से बातचीत या सवाल नहीं किये थे और कही न कही मान न था की कोमल हे अर्जुन का ध्यान रख सकती है और फिलहाल जैसे वो अपने छोटे भाई की अनदेखी कर रही थी. अर्जुन के ाचे बुरे करम का बोझ उन्होंने माता पिता का बताने के साथ दोनों की jiwan-dasha का ध्यान भी बखूबी कराया तोह कोमल की नजरे झुक गयी.

"सॉरी पापा. आप ठीक कह रहे है की आप और माँ, दोनों हे सुबह से रात तक अपनी जिम्मेवारियां निभाते रहते है और कभी हमसे कुछ कहा भी नहीं. बदले में.. ", कोमल के सर पर शंकर जी ने स्नेह से हाथ रख कर बात बिच में हे रुकवा दी.

"बीटा, पढ़ना लिखना जीवन का एक जरुरी हिस्सा है और मुझे कभी भी मेरे किसी बचे ने निराश नहीं किया. तुमने तोह कॉलेज के वक़्त हे घर के काम संभल लिए थे अपनी माँ और ताई के साथ. पर इन सबसे ज्यादा जरुरी है अपने छोटे भाई बहिन का भी जीवन संवारना. ऋतू तुम्हारी हर बात मान लेती है लेकिन वो पूरी तरह केंद्रित है अपने लक्ष्य के लिए. मैं अर्जुन को कुछ नहीं कह सकता क्योंकि अगर मैं उसको समझने लगा तोह घर के सभी बड़े मुझे हे घेर लेंगे. उसकी उम्र के हिसाब से उसको खेलना चाहिए, दोस्त बनाने चाहिए और कही आना जाना हो तोह काम से काम घर पे किसी को पता तोह हो की वो है कहा. चलो तुम बताओ की अभी अर्जुन कहा होगा?", शंकर जी ने इस सवाल के साथ हे छोटी मेज पर रखा टेलीफोन भी दोनों के बीच खींच लिया जिसका मतलब साफ़ था की कोमल के जवाब की पुष्टि जरूर होगी.

"आप ठीक कहते है पापा की अर्जुन अभी कॉलेज हे नहीं गया और एक्साम्स तक हमेशा घर रहने वाला मेरा भाई आजकल कहा जाता है, क्यों जाता है ये पहले की तरह सही से पता नहीं होता. मैं भी कुछ नहीं बोलती क्योंकि बौ जी और दादी का कहना है की उसको बहार निकलना चाहिए, दुनिया देखनी चाहिए और फिर वापिस स्कूल शुरू हो जाएंगे तोह 2 साल ारु फिर पढ़ाई और स्पोर्ट्स में लगा रहेगा.", कोमल ने अर्जुन की स्थिति वाली बात को एक पल तोह ताल हे दिया था लेकिन सब सुनते हुए भी शंकर जी का ध्यान वही बना हुआ था.

"ऐसा है बीटा, दादा दादी तोह बचो को थोड़ा ढील देंगे हे, वो जरुरी है लेकिन बचा उसको नाजायज़ हे न ले ले ये जिम्मेवारी अभिभावकों की होती है. कल को मान लो की अर्जुन के साथ कोई ऊंच नीच हो जाए, किसी दुर्घटना का हिस्सा हो या जितना वो नरमदिल है कोई उसका फायदा उठा कर उसका और परिवार का नाम खराब कर दे तोह क्या तब भी यही कहा जाएगा की बचा है घूमने फिरने निकला था.? वैसे तुमने बताया नहीं की तुम्हे अंदाजा है अर्जुन इस वक़्त कहा होना चाहिए? धुप का वक़्त है तोह कही जाना बनता तोह नहीं उसका."

"जी पापा. घर पर हे होगा वो अभी", और इतना सुनते हे उन्होंने गाँव का नंबर मिला दिया. कौशल्या जी बहार आँगन से यही आ रही थी लेकिन बाप बेटी को बातचीत करते देख वो उनसे कुछ दुरी पर बैठ कर माहौल समझने लगी. फ़ोन की घंटी लगते हे शंकर जी ने हैंडल अपनी बेटी को थमा दिया.

"लो तुम हे पता कर लो और पूछना की अगर वो बहार है तोह क्या बता कर गया है.", इधर फ़ोन उठते हे कोमल ने महिला की आवाज सुनी जो अनामिका हे थी. बातचीत होने पर जब अर्जुन के विषय में पुछा तोह सामने से क्या जवाब मिला वो सिर्फ कोमल ने हे सुना और फ़ोन वापिस रख दिया.

"शाम को उमेद चाचा जी ने ारु को किसी कार्यक्रम में जाने का कहा है जिधर वो जाने वाले थे लेकिन बहार होने की वजह से उनकी जगह ारु जा रहा है. उसके लिए हे वो शहर कपडे लेने निकला था घर से साढ़े 11 बजे.", शंकर जी इस जवाब पर ऐसे मुस्कुराये जैसे वो संतुष्ट नहीं थे बेशक उमेद वाली बात सही थी लेकिन हाल में अर्जुन कपडे लेने हे गया है ये नहीं जांचा.

"और वापिस आने का समय बताया उसने?"

"जी बोल के गया था की 4-5 बज तक लौट आएगा.", कोमल जवाब देते हुए मैं हे मैं कुछ और भी सोचने लगी थी और अपनी बेटी को गंभीर देख कर शंकर जी अपनी जगह से उठ खड़े हुए.

"अगर तुम अर्जुन के जवाब से संतुष्ट हो तोह ठीक है बीटा लेकिन तुम उसकी परवाह करती हो तोह फिर तुम्हे पूरी छूट है उस से सख्त व्यवहार करने की, सवाल पूछने की और तुम्हारी दादी यहाँ सामने बैठी है जिनके सामने ये जिम्मेवारी मैं तुम्हे दे रहा हु. वो जहा जाए, उसकी हर छोटी बड़ी बात, वजह और उसमे अर्जुन की जरुरत तुम्हे पता होनी चाहिए. आखिर तुम्हेर माँ से ज्यादा वो तुम्हारे साथ रहा है और घर में उसको अगर डर भी है तोह सिर्फ तुमसे. ये मैट सोचना की मुझे कैसे पता की वो सिर्फ तुम्ही से डरता है बाकी सबकी सिर्फ इजत्त करता है. पता करो अपने भाई का.", शंकर जी मेज पर से अपना चस्मा और बटुआ उठा कर बहार निकल गए और कोमल ने एक नंबर घुमाया बिना अपनी दादी पर ध्यान दिए और वह बात करने पर पता चला की माधुरी दीदी तोह खुद अपनी माँ और जेठानी शिल्पा के साथ बाजार गयी है. अर्जुन ने आज उधर आना नहीं था. कोमल हताश हो उठी थी ये सब सुन्न कर क्योंकि आज पहली बार उसके पिता ने उस से सवाल किये थे उसके छोटे भाई को ले कर और हमेशा अर्जुन का पता रखने वाली कोमल से जिस दिन चूक हुई उस दिन हे ये सवाल जवाब झेलने पड़े थे.

"ज्यादा मैट सोच अपने बाप की बात. शहर गया होगा तोह कही महल या गाँव के काम से निकल गया होगा इधर उधर. शाम को बात कर हे लेगा जब घर आएगा. चल तू आराम कर ले थोड़ी देर, सुबह से लगी हुई है. दोपहर का खाना कृष्णा के साथ रूपाली या कोई भी लड़की बना लेगी. अर्जुन गाँव जाने से पहले तोह हमेशा तेरी नजरो में हे रहा है. अब दूर है तोह थोड़ा.."

"नहीं दादी.. अर्जुन चाहे दिल से ाचा हे सोचता है सबके लिए लेकिन दुनिया उसके जैसी सोच नहीं रखती. वो तोह दीदी के ससुराल भी नहीं गया और कही भी जाता तोह काम से काम पता तोह हो की महल गया है या किसी दोस्त के पास. आपके पास दामिनी बुआ के घर का नंबर है दादी?", कोमल ने जाने ये कैसे पूछ लिया था और शायद यही उसकी छत्ती (6तह) इंद्री थी. कौशल्या जी ने तुरंत हे उठ कर अपने कमरे से वो डायरी ला दी जिसमे नंबर था और कोमल ने एक बार नंबर मिलाया तोह घंटी जाती रही जाती रही लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. कोमल ने र का बटन दबा कर हैंडल फिर से अपने कान से लगा लिया और इस बार सामने से उखड़ी साँसों की आवाज स्पष्ट कान में पड़ी.

"Hello...uhhhhh"

"अर्जुन से बात करवाओ मेरी. बोलना कोमल दीदी है.", दूसरी तरफ एक पल को तोह चुप्पी हे छा गयी क्योंकि अर्जुन निर्वस्त्र खड़ा था जो फ़ोन आने से पहले तक आँचल की छूट मुँह में लिए बस अंतिम कार्य पूरा करने हे वाला था पर फ़ोन उठवा कर उसने अपने हे पाँव पर कुल्हाड़ी मार ली थी. आँचल बेशक बड़ी थी कोमल से लेकिन उसकी सार्ड धीमी आवाज सुन्न कर बदले में वो कुछ और न कह सकीय.

"जी दीदी.", अर्जुन की आँखें इतनी दूर होने के बावजूद निचे झुकी थी और स्वर में जो गलती का एहसास था वो कोमल ने खुद हे जान लिया.

"बता कर नहीं जाना होता की कहा जा रहे हो और किस वजह से? कपडे खरीदने में कितना वक़्त लगता है और तुमने तोह पहले हे नाप दे रखा था फिर वापिस लौटने के लिए 4-5 बजे का बताया? आँचल का सामान ले लिया घर से या कुछ बाकी है? 2 घंटे बाद गाँव वापिस पहुंच कर घर के नंबर से फ़ोन करना.", कोमल ने जिस अंदाज में अपनी बात कही थी अर्जुन का मूसल जवाब देने से पहले हे लटक कर आधा हो गया. उसको समझ हे नहीं आ रही थी की दीदी एकदम से कैसे उस से नाराजगी दिखा रही है? फिर ध्यान गया उनकी बातों पर तोह वो समझ गया की कोमल दीदी को यकीन होगा की अर्जुन वह आँचल के साथ गुल खिला रहा होगा और उन्होंने पहले हे सावधान किया था ऐसा न करने से.

"आप कहती हो तोह मैं घर हे वापिस आ जाता हु.", अर्जुन के मुँह से ये बात निकल तोह गयी लेकिन अब ये उसके लिए हे भारी पड़ने वाली थी.

"Do-tarfa बात करने के लिए नहीं कहा ारु. जब जिस काम के लिए घर से निकलते हो तोह सिर्फ उतना हे करना चाहिए और काम से काम ये जरूर पता हो की तुम क्या कहा और कितने समय के लिए बहार हो. काम से काम तब तोह जरूर जब तुम अपने शहर में नहीं हो. दीदी से मिलने जाना हो या रानी माँ की तरफ लेकिन उसका पता होना चाहिए. शाम के लिए तोह मैंने नहीं टोका क्योंकि फंक्शन का घर पे भी सबको पता है यहाँ. 7 बजे से देर रात तक तुम वह रहोगे लेकिन बाकी अपनी नादानियाँ थोड़ी काम कर लो तोह मैं भी जवाब देने लायक हो जाऊ. घर पहुंच के फ़ोन करना, बाकी बात मैं तभी करती हु.", कोमल ने जिस अंदाज में फ़ोन रखा और उठ कर यहाँ से निकल गयी, कौशल्या जी और अर्जुन की हालत के जैसी थी. दोनों हे अपने अपने सर पे हाथ रखे थे.

'बचाव करने के लिए ऐसा करना भी ठीक है बेचारी का. अब बाप न जिम्मेवारी ले तोह कोई तोह भुगते और ये बैलबुद्धि गलत मौके पर गुस्से का शिकार हो गया.', कौशल्या जी को कहा पता था के उनका बैलबुद्धि सही मौके पर दबोचा था कोमल ने. नहीं तोह उधर आँचल अर्जुन के निचे होती और किसी के वह पहुंचते हे दोनों का फंसना लाजमी था जैसा वह आँचल और अर्जुन द्वारा कपडे पहनते हे हुआ. बंद लोहे का दरवाजा कोई बाहर से खडका रहा था और ये दोनों एक दूसरे की तरफ देखते हुए हैरान थे की आज पूरी दुनिया उनके बीच आने वाली है क्या?

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"पता नहीं अपनी किस्मत पर हंसु या बाल बाल बचने की ख़ुशी मनाओ.", आँचल ने हे आख़िरकार उस गाने की आवाज काम करते हुए बातचीत आरम्भ की. अर्जुन खुद हे उलझन में था आज कोमल दीदी के व्यवहार पर और उस से ज्यादा खुदसे नाराज क्योंकि समय और हालात को समझने के बावजूद वो आँचल के साथ ये जल्दबाजी कर बैठा. कल रात हे प्रीती ने उसको समझाया था की वो कोई ऐसा काण्ड न करे जिस की वजह से कोई कल को 2 बात कह दे. जिनके साथ परस्पर प्रेम सम्बन्ध है वो उनसे हे संतुष्ट रहे यही बेहतर होगा, वो भी पूरी सावधानी से.

"फिलहाल तोह दुखी होने की ख़ास वजह नहीं है हमारे पास. आप हे सोचो की हमने एक साथ खुल कर इतना समय गुजरा और आपकी गर्मी भी कुछ शांत हुई. दीदी का फ़ोन सही समय पर नहीं आता न तोह हम अपनी सीमा लांघ चुके होते और आपकी चची के सामने जवाब न दिया जाता हमसे. खुद हे सोचो की उन्होंने हमे घर में आते हुए भी देखा और फिर दरवाजा बंद करने पर भी सवाल पुछा. ये तोह मैं था तोह बात भाई बहिन की वजह से संभल गयी. गलती मेरी भी है इसलिए सिर्फ खुद को दोषी मत मानिये. अब जो भी होगा वो ध्यान से और ठीक समय पर. वैसे भी कल मैं घर वापिस जा रहा हु और संडे तक हे वापिस आऊंगा.", आँचल मैं हे मैं पूरी घटना को समझने में लगी थी और अर्जुन बहोत हद्द तक सही भी था की वह घर का चुनाव करके उन्होंने गलती की हे थी और ये सब जल्दबाजी हे थी क्योंकि घर लंगड़ाती हुई आती तोह कोई जवाब नहीं देते बनता. फिलहाल दोनों हे पहले की तरह हलकी फुलकी बातें करते हुए गाँव पहुंच हे गए. अर्जुन पर अब सिर्फ और सिर्फ कोमल दीदी का व्यवहार हे हावी था. नए कपडे अनामिका चची को सुपुर्द करता हुआ वो हाथ मुँह धो कर टेलीफोन वाले कमरे में घुस गया, भीतर से उसको बंद करते हुए.

"आ गया स्वाद तुम्हे फिर से बेवकूफी करके? अब मुझसे उम्मीद मैट करना की मैं बीच बचाव करुँगी. वैसे भी दीदी पिछले एक घंटे से यही बैठी है बुआ के कमरे में.", अर्जुन ने अपने घर की जगह प्रीती के घर फ़ोन मिलाया था जहा पहले से मौजूद कोमल दीदी रेणुका बुआ और प्रीती की माँ के साथ इधर उधर की बातचीत में लगी थी जबकि मकसद उनका भी यही था की वो थोड़ा खुल कर अर्जुन से बात कर सके. अब बात प्रीती के माध्यम से कहलवाई थी तोह अर्जुन बचने के लिए फ़ोन भी उसको हो करने वाला था.

"अरे मेरी माँ, पहले मेरी बात तोह सुन्न लो. मुझे समझ नहीं आ रहा के मैंने बेवकूफी क्या कर दी और दीदी थोड़ा नाराजगी से बोली है. ऐसे तोह वो कभी भी नहीं करती. तुम हे पता करो न की इसके पीछे ऐसी कौनसी वजह है जो उन्होंने समझने की जगह सीधा धमका हे दिया.", इधर अर्जुन गुहार लगा रहा था और प्रीती ने अपनी तरफ आती कोमल दीदी को देखते हुए फ़ोन हे उन्हें थमा दिया बिना अर्जुन की बात सुने. कोमल दीदी भी बेतार फ़ोन को लिए प्रीती के साथ उसके कमरे में हे दाखिल हो गयी. दुपट्टा बिस्टेर पर रखती हुई वो अर्जुन की बात हे सुन्न रही थी जो यही सोच रहा था फ़ोन प्रीती के पास है. प्रीती सर खुजाने लगी जब कोमल दीदी को खामोश देखा.

"हो गयी तुम्हारी फ़रियाद और शिकायत? कुछ बाकी है तोह वो भी बता दो प्रीती समझ कर. सही सही बताना अर्जुन क्या मैंने कभी तुम पर कोई पाबन्दी लगाईं है या जो तुम चाहते हो वैसा नहीं होने दिया? प्रीती तुम कुछ वक़्त के लिए बहार जा सकती हो?", कोमल दीदी ने तोह इतने में हे इरादे स्पष्ट कर दिए थे और प्रीती उनका आदर करती हुई मासूमियत से हामी भर कर बहार गैलरी में निकल गयी, बहार वाले दरवाजे से. अर्जुन भी उधर अकेला था और कोमल दीदी भी इधर.

"मैंने कुछ गलत तोह नहीं किया दीदी सिवाए इसके की मैं आँचल दीदी के साथ उनके घर जा रहा हु ये बताया नहीं घर पे. आप ऐसे गुस्सा कर रही थी जैसे मेरी वजह से आपको किसी ने कुछ कह दिया हो."

"याद है ारु तुम्हे वो समय जब तुम कभी भी मुझसे सवाल जवाब नहीं करते थे और हर बात या तोह मुझे पता होती थी या तुम बता देते थे. आज ऐसा क्या हो गया मुन्ना जो तुम मेरी हे कही बात को इस कदर भुला बैठे हो और एक से बढ़ कर एक गलतियां बस करते हे जा रहे हो? पहले सुशीला बुआ, फिर दामिनी बुआ, हरमन (दीपा) भाभी, अनामिका चची और इतने पे तुम्हारी बस नहीं हुई तोह दीदी की जेठानी के साथ उनके पड़ोस वाली लड़की से सींग उलझा रहे हो. मैं तुम्हे जसलीन और अमृता जी के लिए नहीं टोक रही क्योंकि वो तुम्हारे हाथ नहीं है. पर जरा तुम समझो अर्जुन की आखिर तुम कर क्या रहे हो. आज आँचल.. वो भी उनके हे घर जहा आसपास अनगिनत घर है और उसको तुम्हारे साथ घर वापिस भी आना था. इतने रिश्ते मैट बनाओ ारु की पुराने रिश्ते तुमसे दूर हो जाए. तुम यहाँ वापिस लौट आओगे फिर उनका क्या होगा तुम्हारे पीछे से? ये इंसान की परवाह करना नहीं उसको सजा देने जैसा है. और अगर किसी ने तुम्हारा गलत स्वरुप पेश कर दिया तोह जितने चाहने वाले है घर से बहार, जो तारीफ करते नहीं थकते फिर वही तुम्हे गलत उदहारण की तरह पेश करेंगे. चची दिल की ाची है और उनके साथ जो है मैं एक बार उसको मान लेती हु लेकिन अब और नहीं मेरे भाई.. ध्यान खेल, जिम्मेवारियों और अपने भविष्य पर लगाओ तोह ज्यादा ठीक होगा. प्यार तुम्हारे साथ हमेशा है फिर चाहे घर पे हम सब और बहार जो.. जो तुम्हे अपना सबकुछ मानते है.", अर्जुन कान पर फ़ोन लगाए हुआ जहा पहले दीदी के खुलासो से चक्ति था वही उनके मुँह से खुदकी वास्तविकता सुन्न कर निरुत्तर. आखिर गलतियां तोह जाने अनजाने वही कर रहा था जहा उनकी जरुरत नहीं थी वह भी प्यार बाँटने की.

"वैसे आपको किसी ने कुछ कहा है न दीदी? मैं अब ये नहीं दोहराऊंगा जितना हो चूका उसको ठीक नहीं कर सकता पर आगे ऐसे रिश्ते.."

"मुझे किसने क्या कहा है वो जरुरी नहीं है ारु और तुम चाहे जितनी कोशिश कर लो तुम्हारी जिंदगी में ऐसे लोग आते हे रहेंगे. फैंसला तुम्हे हे करना है की तुम कदम उनकी तरफ बढ़ाते हो या अपनी राह चलोगे. जो तुम्हे दिल से पसंद करेगा वो तुम्हारी परवाह करेगा न की अपने दुःख बता कर तुम्हे उन्हें सुख में बदलने की चाहत रखेगा. अगर कोई ऐसा है जो तुम्हे समझता है, वो खुद से ज्यादा तुम्हारी परवाह करता है और वो ये भी चाहत रखता है की तुम जीवम में एक सफल इंसान बनो तोह वह मेरी बात की परवाह मैट करना. अमृता जी की सोच तोह ऐसी हे है और जिसके बारे में मुझे ऋतू से पता चला उसको भी मान सकती हु लेकिन बाकी जो भी है उनकी तरफ अब अगर तुम्हारे कदम सिर्फ जिस्मानी तौर पर बढ़ते है तोह ये सिर्फ मेरी हे गलती होगी. मेरे प्यार, समर्पण और dekh-rekh की गलती. मैंने तुम्हे कभी भी गलत इंसान का सामना करने से नहीं रोका बल्कि मैं चाहती हु तुम वही करो लेकिन गलत रिश्ते बढ़ने के लिए तुम्हे तब भी समझाया था जब तुम सविता का जीवन खराब करने वाले थे. बाकी तुम इस पर गौर करना अगर पार्टी में जाने से पहले थोड़ा समय मिले तोह. आखिर किसके प्यार में कमी रह गयी और बलिदान कितनो ने दिया. वह माधुरी दीदी पर्याप्त थी लेकिन तुम सब जानते हुए भी बहके. हर बार बचाव मुमकिन नहीं भाई, नहीं है मुमकिन. आखिर में बस इतना हे कहूँगी की अगर तुम अपने लक्ष्य से भटके और ऐसे बेमतलब सम्बन्ध बनाये तोह मैं समझूंगी की मैं कभी तुम्हारी पहली पत्नी नहीं थी.", कोमल ने बातों बातों में आज अर्जुन के mann-mastishk को ऐसा धवस्त किया था की न उस से गुहार लगाते बन्न रहा था और न क्षमा मांगते. अतीत में समझाने के बावजूद उसने Jeenat/Sakshi से सम्बन्ध बनाये, मीनाक्षी के अंतर्मनन को बढ़ावा दिया और अब वो आँचल के साथ साथ शिल्पा जी तक बढ़ने वाला था.

"आइंदा आपको मेरी ये अनचाही गलतियां सुन्न ने को नहीं मिलेंगी दीदी लेकिन ये मैट कहिये की.. मैंने आपके साथ रिश्ता कोई नादानी में बनाया था. आपको खो दिया तोह फिर कुछ और पाने की चाहत हे नहीं रहेगी. आज मैं शर्मिंदा हु क्योंकि आपको दुःख पंहुचा और मेरी वजह से इतना कुछ सुन्न ने को मिला होगा किसी न किसी से. मैं वापिस वही घर पे हे आप सभी के पास रहना चाहता हु..", अर्जुन के लफ्ज़ो में उसकी कमजोर आवाज सुन्न कर कोमल का खुदका दिल तड़प उठा. वो इस सच से भी भली भांति परिचित थी की उसका भाई जैसा भी है उसके स्वभाव में हे कही कमी है और लोग उसकी तरफ आकर्षित होते है तोह वो उन्हें जवाब भी नहीं दे पता.

"मैं तोह साड़ी दुनिया की शिकायत सुन्न लुंगी तुम्हारे लिए. बस 2 हे बात कहना चाहती हु तुमसे और उन्हें समझने की कोशिश करना अर्जुन. जो तुम्हारी चाहत रखता हो उसको िज्जात्त देना और जो मज़बूरी में हो.. असलियत की मज़बूरी में, उसका साथ निभाना पर हद्द में रह कर. रिश्ता सिर्फ जिस्मानी या किसी और भावना से बना हो तोह वो बस गर्त में ले जाता है. लोगो का लालच ख़तम नहीं होगा पर तुम्हे उनसे बचना है. वापिस तोह तुम्हे आना हे है लेकिन जो रिश्ते तुम्हारा दिल स्वीकार करे, बस उन्हें हे इज्जत दो. तुम बौ जी के हे नहीं संजीव भैया, चाचा, नानी, माँ और raj-mehal तक के वारिस हो. आज शाम को तुम्हे जहा जाना है वह लोगो को उमेद सिंह का वारिस देख कर फकर होना चाहिए. उन्हें अर्जुन शर्मा एक अधिक उत्साही या अंतर्मुखी व्यक्ति नहीं बल्कि एक घराने के प्रतिनिधि लग्न चाहिए. कल तुम प्रीती के साथ भी होंगे और समाज में तुम्हारी पहचान एक मजबूत व्यक्ति, जिम्मेवार पति और वचन निभाने वाले इंसान के रूप में होनी चाहिए. भटके हुए मैं, इत्छाओं में दबा खूबसूरत इंसान या दुःख के बदले सुख की प्रवर्ति से नहीं. थोड़ा आराम करो और अपने जीवन में ladkiyon/mahilaon से ऊपर जीवन के लक्ष्य रखो. कॉलेज में तुम्हारे पास कोई नहीं होगा और उस दुनिया में जा कर 2 करैक्टर सर्टिफिकेट मिलते है. एक जो कॉलेज देगा और एक जो तुम कमाओगे. मैं जानती हु तुम समझदार हो और लायक भी बस बहाव के साथ बहते हुए कभी कभी दूर निकल जाते हो और किस्मत ाची है की अभी तक nehar-nadi से वास्ता पड़ा है. उफनते समंदर से सामना न हे हो तोह बिहार है हमारे सबके लिए. खाना खा लो और बाकी जो तुम्हारा आज न हो सका वो तुम्हे कल तुम्हारी बीवी ाचे से देगी. अपना ध्यान रखना ारु.", प्रतिउत्तर में अर्जुन ने बस 'जी' कहा और उसके बाद कोमल दीदी ने हे लाइन काट दी. आँखों में आंसू भी आ चुके थे उनकी लेकिन आवाज पर उनका असर नहीं होने दिया. वो प्रीती को बुलाने से पहले बाथरूम चली गयी खुद को दुरुस्त करने के लिए और अर्जुन आँखें मूंदे उनकी कही हर बात मैं में दोहराने लगा. आज उसको सचमुच खुद पर दुःख हो रहा था. दीदी ने सब जानते हुए भी उसको सिर्फ उन्ही लोगो के लिए मन किया था जो जीवन में जरुरी नहीं थे या उनकी वजह से अर्जुन के चरित्र पर धब्बा लगता. कही न कही कोमल दीदी की बात को साक्षी ने सार्थक कर दिखाया था जिस से फिलहाल अर्जुन अनजान था. कमरे से बहार निकलते हे वो टोलिया उठा कर बाथरूम में जा घुसा. दिमाग को सुकून देने के साथ अपने भागते जीवन पर भी सही लगाम लगानी अब जरुरी थी. दीदी ने उसको संसर्ग से मन नहीं किया था, लोगो की पहचान पहले करने का एक निवेदन किया था और सबकुछ उन्हें पता होना जरुरी हो. जबतक वो नाहा कर बहार निकला, चेहरा कुछ हद्द तक शांत था दिमाग के साथ. भोजन करते हे वो चची के कमरे में हे उनके पहलु में जा लेता. आज अनामिका चची ने भी mamta-swaroop उसको थपकी देते हुए सुकून से सुलाया जैसे वो भी अर्जुन को बेहतर समझने लगी थी.

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"ऐसा इंतजाम तोह दिल्ली वाले फार्महाउस पर भी न हो पता कपूर. इतनी शानदार प्रॉपर्टी है और जर्रा जर्रा बहोत हे देखभाल से संभाला हुआ. कितनी कीमत होगी इस राजहंस की?", राजहंस के विशिष्ट हॉल में कार्यक्रम से पहले संगीत व्यवस्था की जांच, खाने पीने और मेहमानो के स्वागत इत्यादि के लिए नियुक्त स्टाफ की रिहर्सल इत्यादि होने से नरेश कपूर जब फारिग हुए तोह वो चौड़ी पगडण्डी आलिशान लालटेन जैसी लाइट्स से रोशन हो चली थी. प्रमुख द्वार से हॉल तक का पूरा रास्ता हे किसी दुल्हन सा सजा था और सुरक्षा राजहंस की खुदसे नियुक्त थी. जैसे हे द्वार खुला और काली बंव गाडी भीतर आने लगी तोह आसमान झिलमिल आतिशबाजी से रोशन हो उठा. पारम्परिक शाही वेशभूषा में सजी सेविकाओं ने जीनत और पूरे कपूर परिवार का स्वागत इत्र और गुलाब के फूल बरसते हुए किया. गुलाबी रंग की ख़ास साड़ी और उत्कृष्ट साज सज्जा युक्त जीनत तोह स्वयं किसी पारी सी लग रही थी जिसके लिए सफ़ेद घोड़े वाली बग्घी को वही द्वार पर लगाया गया और किसी राजकुमारी की तरह बड़ी शान से वो और उसकी चचेरी बहिन Aashi-Kittu उसके अगल बगल बैठी हॉल की तरफ जाने लगी. मेहमान भी इनके पीछे हे आरक्षित पार्किंग तक पहुंचने लगे थे और ठीक 10 मिनट के बाद ऐसा हे स्वागत दूसरी लम्बी कार का हुआ जिसमे से पतला लम्बा युवक सफ़ेद pant-coat और नीली कमीज पहने निकला. हेमंत कैंसल. उसके माता पिता तोह ये स्थान और आज की सजावट देख कर हे गदगद हो उठे. इनकी मुलाकात यही पर नरेश कपूर और उनकी खूबसूरत बीवी मेघना से हुई जो काली साड़ी में हमउम्र तोह क्या जवान युवतियों पर भरी दिखी. सब लोग पार्किंग तक जहा गाडी से जा रहे थे, ये 2 दंपत्ति टहलते हुए हरे भरे मैदान, गुलाबी नीली रौशनी के बीच चलते फ़ुहाहारो और दूर दूर बानी उन शानदार इमारतों को निहारने लगे जो राजहंस का प्रमुख हिस्सा थी. यहाँ कांच की दिवार से परे बने उस 5 सितारा स्तर के स्विमिंग पूल पर मसरूफ विदेशी देसी मेहमानो को देखते हुए कैंसल साहब ने राजहंस की कीमत जान नई चाहि तोह उनकी सेवा में नियुक्त कला coat-pant पहने उस खूबसूरत युवती ने हे जवाब दिया.

"सर, वैसे तोह रिसोर्ट की वैल्यू 150 करोड़ मेंशन है रीसेंट वैल्यूएशन में लेकिन रॉयल एंड हेरिटेज प्रॉपर्टी होने की वजह से ये बेचीं नहीं जा सकती. ये आगे दोनों तरफ रेस्टोरेंट्स है अपनी अपनी खासियत से और उधर golf-range के साथ आगे एक लेक भी है. लेफ्ट साइड वो बड़ी बिल्डिंग्स होटल है जहा हर रूम रॉयल टच के हिसाब से फुल्ली ऐरकंडीओनेड है हर लक्सेरी के साथ. एंड हेरे वे अरे. रंगमहल, आपका सेलेब्रिटोन हॉल.", प्रचारिका ने हर छोटी बड़ी बात भी संजह की थी और मर कैंसल तोह सब देख कर, जान कर गदगद हो उठे. चांदी का थाल लिए उस 12 फ़ीट ऊँचे द्वार के दोनों हे तरफ कड़ी सेविकाएं हर मेहमान के तिलक करने के बाद पुरुषो के सर पर उनकी इत्छा अनुसार गुलाबी पगड़ी पहनती या गले में शाही चुन्नट (मफलर). दोनों दंपत्ति एक बार भीतर का शाही नजारा और बैठने की व्यवस्था देख कर एक दूसरे को धन्यवाद देते हुए बहार हे चले आये. मेहमानो का स्वागत भी इन्हे हे करना था.

"ाचा इंतजाम है यार नरेश. संगीत सुकून देने वाला और मेहमानो का स्वागत शाही. सुना है खाना भी ख़ास चुना है तुमने हर लिहाज से और यहाँ तोह शराब परोसने का तरीका भी ऐसा है जैसे किसी रंगमहल में हे बैठे हो. बस कुछ मेहमान वह पार्किंग से इधर तक पैदल आने का बुरा न मान ले.", कैंसल साहब की बात पर अपनी बीवी रवीना संग आये नंदा जी ने उनसे गले लगने के बाद जवाब दिया.

"खूबसूरती तोह गाडी के भीतर बैठ कर नहीं देखि जाती साहब. कुदरत से मिलने तोह हमको हे चलना पड़ेगा. बहोत बहोत मुबारकबाद हो आप दोनों परिवारों को इस एक और मजबूत रिश्ते की. पहले सांझेदार थे और अब सम्बन्धी.", फूलो का एक बड़ा सा गुलदस्ता कैंसल साहब की बीवी को देते हुए रवीना की खूबसूरती खुद कैंसल भी देख रहे थे. सफ़ेद बिना ब्याह की रेशमी साड़ी और चुचो का कटाव दिखती चोली के बाद उनकी गोरी नाभि तक सामने थी. खुले बाल अलग हे खुशबु बिखेर कर हवा में फैले इत्र को फीका साबित कर गए.

"हाहाहा.. बहोत सही बात कही नंदा जी. वैसे उमेश से भी मिल लिए और बचो को भी देख लिया पर हमारी बिटिया जन्नत अभी तक नहीं दिखी. और ये लो भाई ये तोह एक साथ 2-2 धुरंदर आ रहे है. शायद भानु भाई साहब को गजेंद्र के साथ आने सहित अपनी सुरक्षा पार्किंग पर छोड़ना पसंद नहीं आया.", और अब ये सभी लोग मुस्तैद हो उठे जब सफ़ेद कुर्ते पाजामे और अपनी अपनी बीवी बचो के साथ औपचारिक सी बातचीत करते हुए ये विशिष्ट लोग उनके सम्मुख आ पहुंचे. भल्ला जी तोह नंदा, कैंसल और कपूर साहब से गर्मजोशी से मिलने के बाद अपनी बीवी और बेटी का परिचय करवाते हुए उनेह उपहार दे कर भीतर चल दिए पर ये सांवले रंग का दरमियाना सा रईस राजनेता मुस्कुराने के बावजूद गुलदस्ता भेंट करते हुए इंतजाम की मामूली सी चूक पर तंज करने लगा.

"बहोत बहोत मुबारकबाद मेरे दोनों शुभचिंतको को इस शुभ अवसर की. आपको भी भाभी जी और इनसे मिलिए ये हमारी धर्मपत्नी जी है और ये बीटा बेटी. वैसे हमारे नवाब साहब हमसे कही ज्यादा हर छोटी बड़ी बात पर गौर करते है. आज के लिए हे ख़ास 50 हजार की जूती खरीदी थी laat-sahab ने लेकिन इतना पैदल चलने पर थोड़ा बुरा मान गया. भाई नरेश हम तोह मंत्री आदमी है, ये सुरक्षा साथ आने दी लेकिन फिर भी 200 गज दूर रुकवा कर अपने ये बहरूपिये से कर्मचारी साथ लगा दिए तुम्हारे इस होटल वालो ने. बन्दूक वंडूक में गोली तोह है न? हाहाहा.. गजेंद्र तोह हमारे रहते कुछ बोलने की गुस्ताखी करने से रहा. 99 लोग हाँ में हाँ मिलाये तोह एक मुझे हे शिकायत करने दो. क्यों भाभी जी गलत तोह नहीं कहा? वैसे इंतजाम तोह ाचा है.", यहाँ एक खूबसूरत युवती ने जैसे हे उनके ऊपर इत्र छिड़क कर गले में मरदाना दुपट्टा पहनाया तोह भानु जी तोह उसके रूप यौवन को इतने नजदीक देख द्विअर्थी बोल कह उठे. जिसकी बात का किसी ने बुरा नहीं मन. जीनत और हेमंत को भी उनकी चची यहाँ लिवा लायी थी इनके ख़ास आशीर्वाद के लिए जो अपने अपने दोस्तों संग आये थे. आशीर्वाद द्वार पर देते हुए भानु जी ने इस गदराई रूपसी को थोड़ा मर्यादा से देखा लेकिन मैं तोह मचल हे उठा था और उनका बीटा भी लार टपकने की हद्द तक जीनत पर अटका रहा.

"आपका पूरा हक़ है जी और हमारे बड़े तोह आप हे है. हमे खेद है की भतीजे को कष्ट उठाना पड़ा लेकिन आपके लायक यही एक जगह थी और ये नियम जरा देरी से पता चला.", अभी बातचीत के दौरान कैंसल परिवार के साथ साथ कपूर परिवार भी इन्हे घेर चूका था जो भानु की नजर में हम था. पर थी इसी वक़्त उसके मुँह से ऐसी बात निकली जिस पर मेघना जी अपने पति को देखने लगी.

"सभी आये है यहाँ पर. नंदा, भल्ला, धवन, मल्होत्रा और वो पार्षद से नया नया टिकट लिया अभिषेक भी. ये पेट्रोल पंप वाला नहीं दिखा अभी तक जो आजकल लकड़ी बेच कर खुद को दिल्ली का नया वारिस मान रहा है. उमेद सिंह को नहीं बुलाये क्या? हाहाहा. दिल्ली की राजनीति का चेहरा बदलने की चाहत है उस व्यापारी को और वो ये भी ाचे से जानता है की 5 हिस्सों में से 3 पर हमारा वर्चस्व है, एक मित्र पक्ष और सबसे छोटी वाली इस भल्ला के पास. वैसे बड़ी बिटिया ने हमसे मिलने पर आपत्ति जताई है क्या नरेश? हम तोह शुभम को यही कह कर लाये थे की अगर वो बिटिया को थोड़ा जान पहचान ले तोह सम्बन्ध मजबूत हे होंगे हमारे आपस में. वैसे तोह रिश्तो की कमी नहीं और राणा परिवार तोह हमारी हाँ के इन्तजार में बैठा है. उस लैंड्क्रुइसेर से तोह कही बड़ी गाडी और पूरी चमड़े की फैक्ट्री शुभम के नाम करवाने को तैयार है पर अभी बचा जवानी हे नहीं देखे और शादी करवा दे तोह ये भी गलत हे होगा. वैसे चर्चे तोह है समाचारो में जन्नत बिटिया के."

"डैड, फैशन वर्ल्ड में कहिये समाचार साउंड्स तू ओब्सोलेटे.", शुभम अपनी कलाई घडी को दिखते हुए दर्शा रहा था के सोना उसके लिए बड़ी बात नहीं और कपूर साहब अपनी बीवी को देखने लगी.

"जानू अपने दोस्त के साथ आ रही है भाई साहब. उसको यही पता था की प्रोग्राम 8 बजे तक शुरू होगा. आती हे होगी और फिर मिल भी लेंगे बचे.", और यहाँ द्वार पर खड़े ये लोग औपचारिक तौर पर आते हुए मेहमानो से बस ऐसे तैसे हे मिल रहे थे इस परिवार और भानु की वजह से. ठीक मेघना जी की बात ख़तम होते हे यहाँ तक आने वाला वो पूरा मार्ग हे खामोश और सुरक्षाकर्मी मुस्तैद हो गए. एक काली मेरसेदेज़ जीप और उसके पीछे लाल बत्ती लगी सफ़ेद मेरसेदेज़, जिसको नरेश कपूर ने हमेशा बिना बत्ती के हे देखा था वो इनके बिलकुल सामने आ रुकी. राजहंस के भी सभी सुरक्षाकर्मी अगली मेरसेदेज़ वालो की तरह अपनी अपनी बंदूके लिए सफ़ेद कार से कुछ दुरी पर सतर्क खड़े हो गए. ड्राइवर की तरफ का दरवाजा खुला तोह मेघना और रवीना के चेहरों पर चमक आ गयी वही जीनत हैरान जैसे वह खड़े बाकी लोग जो अर्जुन को जानते तक नहीं थे. सवा 6 फ़ीट का वो आकर्षक तगड़ा युवक सफ़ेद चूड़ीदार के ऊपर मोरपंखी बिना ब्याह की जैकेट पहने बिना किसी की तरफ देखता हुआ कार के दूसरी और चला आया. खुदसे हे भीतर बैठी युवती का पर्स और gulaabi-safed-laal रंग के गुलाबो के 2 बड़े गुलदस्ते ले कर दूसरे हाथ से उसको बहार आने में मदद देने लगा. लम्बे बाल ख़ास तरह से सहेजे और लगभग पारदर्शी आसमानी डिज़ाइनर साड़ी के साथ बस स्टैनो को छुपाती हुई चोली पहने जन्नत बहार निकली तोह खुद भानु और नंदा तक की जीभ मुँह से बहार निकल गयी. सब लोग बस अपलक इस जोड़ी को देख रहे थे और अर्जुन जन्नत को अपने साथ लिए उनके सामने आ खड़ा हुआ.

"ये मेरे पापा है, मर नरेश कपूर और ये माँ, मेघना कपूर. ये कैंसल अंकल और आंटी जी है और तुम जिनि को तोह जानते हे हो? और ये हेमंत है हमारी जिनि के वोउल्ड बे. Mom-dad, हे इस माय फ्रेंड अर्जुन, उमेद जी का बीटा और R&R एंटरप्राइज का अपकमिंग ओनर.", जन्नत के परिचय के बाद अर्जुन को पहचानते हुए नरेश जी तोह गले लग कर मिले जिनसे पहले अर्जुन ने बड़े हे सलीके से जीनत और हेमंत को गुलदस्ते देने के साथ गर्मजोशी से हाथ मिला कर शुभकामनाये भी दी. यहाँ उसने कैंसल साहब से हाथ मिलाने के साथ उनकी धर्मपत्नी को हाथ जोड़ कर मान दिया था. आज उसने किसी के पाँव नहीं छुए थे.

"मान गए भाई उमेद की पुरानी आदत को. कैसे भी करके खुदको हर जगह का मालिक साबित करने की कोशिश से बाज नहीं आता. वैसे जान सकता हु की तुम्हारी ये गाड़ियां और laal-batti के साथ सुरक्षा यहाँ तक कैसे आ पहुंची.?", अर्जुन अब तक सबसे मिलने के साथ भानु की श्रीमती जी का भी अभिवादन कर चूका था लेकिन अर्जुन से हाथ न मिला कर उन्होंने सवाल भी ऐसा किया जिस पर अर्जुन गुस्सा करता तब भी उसका कुछ बिगड़ने वाला नहीं था.

"ऐसा है अंकल जी, उनसे मैंने भी ये चीज सीख ली है. ये रिसोर्ट का सिक्योरिटी वाला है न ये भी बता देगा की मेरे यहाँ तक गाडी लाने की वजह क्या है. क्यों भैया हम कौन है?", अर्जुन ने मुस्कुराते हुए रिसोर्ट के हे कर्मचारी से पुछा था लेकिन कोट पंत पहने करीब कड़ी मैनेजर ने हे जवाब दे दिया.

"राजहंस के ओनर है आप, सर."

"जहा पर बुलाया जाए, वो जगह और लोग अपने बना लेने चाहिए. परिवार जैसा लगता है और आप वह के मुखिया. कभी दिल्ली बुलाइयेगा अंकल मुझे, निराश नहीं करूँगा आपको.", अर्जुन ऐसी कटीली मुस्कान दे कर जैसे भानु की सुलगती पूँछ पर पाँव रख कर मस्त हाथी सा चलता भीतर चल दिया. जीनत की बगल में जन्नत और हेमंत के साथ अर्जुन.

"बड़ा दुस्साहसी है ये लोंदा और देखने से भी उस उमेद का हे अक्स लगता है. दिल्ली आये तोह पाँव नहीं जमने दूंगा इसके. चलो आज जाने देते है शुभ अवसर है और हमे ऐसा घमंड बहोत पसंद है कपूर. दम तोह है इस लोंदे में लेकिन तुम्हारी बिटिया इसके साथ. कही उधर भी .."

"नहीं भाई साहब, अर्जुन तोह जानू बिटिया का सिर्फ दोस्त है. एकलौता दोस्त.", मेघना जी तोह लड़के को देख कर खुद हे इनसे बच कर बाकी तीनो महिलओं को लिए भीतर चल दी जहा भल्ला परिवार पहले हे अर्जुन से गले लग के मिल रहा था और उनकी बेटी कनखियों से अपनी चाहत से कुछ दूर कड़ी.

'ये लड़का मुझे पसंद नहीं आया डैड.', शुभम की बात सुन्न कर उसकी बगल में कड़ी बहिन ने अपनी पिता के कान में जो कहा वो सुन्न कर भानु जी ने अपने बेटे की बात अनसुनी करके बिटिया के सर पे हाथ फिर दिया.

"तुम अपनी.. छोडो. राजनीति की समझ हमारी बिटिया को ज्यादा है और यहाँ हमे अवसर मिल गया है.
 




हैप्पी बर्थडे बड़े भाई. समझ लीजिये अमेरिका से विश कर रहा जिधर आज भी 31 जुलाई है. आपका नाम प्यार 💯 बार किताब पर है और यही मेरी गुरुदक्षिणा.
 
भाई लोग मेरा न एक बड़ा बीटा है फ्रैंक जर. कल सुबह से उसको खून की उलटियां लगी थी और मैं उसके साथ हॉस्पिटल रहा. आज भी सुबह 9 से शाम 5:35 तक मैं वही था और घर लौटने के बाद लिखने की क्षमता भी नहीं थी. चौराहा वाला तोह इसलिए नहीं दे सका क्योंकि कल मानसिक हालत सही नहीं थी जबकि अपडेट लिखा हुआ था.

दुनिया है भाई और ऐसी परेशानिया आती रहती है. इलाज अभी हफ्ता चलेगा लेकिन अपडेट यहाँ कल जरूर दूंगा. मैं भी आप लोगो को प्रतीक्षा करवा कर दुखी होता हु जब अपडेट नहीं दे पता. पर चाहे वो वक श्वान है लेकिन है बड़ा बीटा मेरा. उसके साथ हु तभी वो हिम्मत रखे है.

बाकी सभी को प्रणाम और शुभरात्रि. कल रात मिलते है.
 
अपडेट 218

वारिस (1)

"हम न कह रहे थे बीवी जी की आपको एक ख़ास इंसान से मिलवाना है? ये है अर्जुन शर्मा, जिसने aapke-hamare प्यार को न सिर्फ बचाया बल्कि गजेंद्र भल्ला को एक उचित पाठ भी पढ़ा दिया. अर्जुन बीटा ये तुम्हारे इस अंकल की jaan-e-bahaar तुम्हारी आंटी आशा है और साहिल से तोह तुम वाकिफ हे हो.. ये... ये हमारी पारी कहा गायब हो गयी भाई?", अर्जुन से गजेंद्र भल्ला गले लग कर मिले थे और उनकी बीवी के अर्जुन ने चरण स्पर्श करने चाहे तोह उन्होंने हाथ थाम कर बस स्नेह से देखते हुए ना कहा. भल्ला जी का गोल मटोल बीटा तोह अर्जुन के साथ साथ जन्नत को देख रहा था. दोनों ने हाथ मिलाये और जन्नत ने भी उनसे मुलाकात करने के बाद अर्जुन से कुछ समय माँगा. आखिर उसकी बहिन का रोक्का था और रिश्तेदारों से मिलना भी जरुरी. भानु जी की दृष्टि रह रह कर अर्जुन पर आ रूकती बेशक वो यहाँ भी कुछ कारोबारियों से घिरे अपनी पहुंच का gun-gaan करते नहीं थक रहे थे.

"मैं अभी इतना बड़ा नहीं हुआ अंकल की कुछ सीखा सकू और साहिल है हे इतना प्यारा की इसको भला मुसीबत में कोई कैसे देख सकता है. क्यों साहिल, ऐसे खली खड़े हो न हाथ में cold-drink और न स्नैक्स.", अर्जुन ने साहिल से हाथ मिलते हुए उसके कंधे और गाल सहलाते हुए पुछा तोह पहले तोह वो मुस्कुराया और फिर अपने माँ बाप की तरफ नाराजगी से देखने लगा जो खुद मुस्कुरा रहे थे.

"मुम्मा डाइटिंग करवा रही है भैया मुझसे. आप बताओ क्या मैं मोटा हु? और यहाँ अगर किसी ने किडनैप कर लिया मुझे तोह आपको फिर से परेशानी होगी.", अर्जुन ने उतने हे प्यार से हँसते हुए जवाब दिया.

"यहाँ तुम अपने भैया के घर हो साहिल और आज फंक्शन में तोह अंकल आंटी तुम्हे मन नहीं करेंगे. पर ये सब सिर्फ तभी जब घर से बहार आना हो. मॉटे नहीं हो, हेअल्थी हो लेकिन हो भी सकते हो इसलिए डाइटिंग के लिए कहा होगा अंकल आंटी ने. वैसे आज तुम्हे अल्लोवेद होगा, थोड़ा बहोत और यहाँ तुम सेफ भी हो. क्यों अंकल?", अर्जुन की बात पूरी होने पर साहिल संशय से अपने पिता की तरफ देख रहा था और भल्ला जी ने भी मुस्कुराते हुए अपने बेटे के पीठ पर थपकी जड़ कर इजाजत दे हे दी. अर्जुन को शुक्रिया कहता वो गोल मटोल बचा खाने और कोला के काउंटर की तरफ जा भगा.

"तुम इंसान ाचे होने के साथ साथ स्थिति अनुकूल रहने वाले व्यक्ति हो अर्जुन. मेरी बात तुम्हारे अंकल को खटक सकती है लेकिन आम समाज में इसको विद्रोही स्वभाव भी कहा जाता है. चलो कोई तोह दिखा जो चाह कर भी अपने रसूख पर घमंड नहीं करता.", आशा जी की बात सुन्न कर एक क्षण के लिए तोह भल्ला जी कुछ सोचते हे रह गए और अर्जुन एक महिला द्वारा अपना उचित चरित्र सुन्न कर हैरानी से उस मुस्कुराती हुई पंजाबी खुशमिजाज महिला को देखने लगा जिसको अपनी समीक्षा का जवाब सही मिल चूका था.

"ये बात एक बार उठी थी.. नहीं कई बार हुई है लेकिन जवाब हर बार एक हे मिला था की अर्जुन पर न कोई दबाव दिया जा सकता है और न वो सिर्फ एक जिम्मेदारी निभा सकता है. जानते हो बीटा तुम मुझे अपने भावी दामाद के रूप में पसंद थे और मैं उमेद भाई का धन्यवाद हे करता हु जिन्होंने वास्तविकता मुझे पहले हे बता दी की तुम्हे बंधा नहीं जा सकता. शंकर भाई के अनुसार तोह तुम्हे परिवार के किसी भी धंदे या जायदाद में रूचि नहीं लेकिन सब तरफ वारिस तुम हे. यहाँ भी असंख्य निगाहें तुम्हे हे देख रही है और जिसके साथ तुम इधर आये थे वो लड़की तुम्हारी दोस्त है, पर अटकले फिर भी लगेंगी. वैसे बता सकते हो की वारिस तुम्हे क्यों बनाया गया?", ये लोग बात कर रहे थे और पास रुके वेटर से 2 जूस के गिलास उठा कर अर्जुन ने मिया बीवी की और बढ़ा दिए. एक कतार पीछे हे अभिषेक जी भी कुर्सी पर बैठे ये सब देख सुन्न रहे थे जिनके करीब कुछ घनिष्ट लोग विराजमान थे.

"आपने सही कहा अंकल की har-taraf वारिस मुझे हे बनाया गया है और ये राजहंस भी ऐसी हे एक संपत्ति है. वारिस का मतलब ये तोह नहीं की मैं उसका मालिक हो गया. हाँ देखभाल करना और उस संपत्ति की कमाई को सही से उस पर निर्भर परिवार के सदस्यों तक पहुंचना मेरा कर्त्तव्य है. उमेद चाचा जी ने मुझे अपना वारिस चुना क्योंकि उनके अनगिनत ट्रस्ट्स है, sewa-aashram है और कन्याओं की देखभाल और शिक्षा के होस्टल्स है. आने वाले समय में मुझे उनका कारोबार नहीं संभालना, बस वो सब चलता रहे जो उन्होंने समाज की सेवा और उन पर आश्रित लोगो के लिए शुरू किया. विरासत में मुझे बहोत कुछ मिला है लेकिन ज़िन्दगी में मुझे अपने लिए क्या करना है वो सिर्फ मेरी म्हणत से साबित होगा. वह न मैं रर एंटरप्राइज का एक रूपया ले सकता हु और न परिवार के किसी और बिज़नेस से. वारिस तोह परिवार को आगे ले कर चलता है, बिज़नेस और दौलत हिस्सेदार बना देती है जो न मेरे पापा चाहेंगे और न दादा जी. वैसे आंटी जी आप शादी में भी आये तोह ज्यादा बात नहीं हो सकीय और यहाँ आये है तब भी हमारी बातचीत ज्यादा नहीं होने वाली. आपको घर आना चाहिए अंकल और साहिल के साथ. माँ, चची और दादी को ख़ुशी होगी आपसे मिल कर.", आशा जी अपने पति को देखने लगी जो अर्जुन की सोच और 'विरासत' पर उसके दृष्टिकोण से पशोपेश में हे पड़ चुके थे.

"पहले तुम्हे हमारे घर आना होगा क्योंकि 2 बार तोह हम तुम्हारी तरफ हे आये है. जिस दिन तुमने हमारे घर नाश्ता लिया, तुम्हे घर तक छोड़ने हम खुद आएंगे. बताओ फिर दिल्ली कब आ रहे हो?", सचमुच कुछ लोग भल्ला जी की प्रतीक्षा कर रहे थे और आशा भल्ला जी को उनकी महिला मित्रो की टोली अलग पुकार रही थी जिनमे गौतमी, रवीना के साथ कुछ और भी खूबसूरत बालाएं थी. इस बीच भल्ला जी की बड़ी संतान, आशिमा कही नजर न आयी.

"फिर तोह एक दो दिन में हे तैयारी कर लीजिये मुझे घर वापिस छोड़ने की. कल हे दिल्ली जाना है, जितना अभी तक लग रहा है. अंकल आपकी वेट हो रही है और आपको मिल लेना लेना चाहिए सबसे. खाना मैं आप लोगो के हे साथ करूँगा.", भल्ला जी ने कंधे को थपकते हुए हामी भरी और उनके जाते हे रवीना जी मरस भल्ला का हाथ थाम कर ले जाते वक़्त अर्जुन को आँख मार गयी जैसे वो जन्नत और अर्जुन के बीच कोई खिचड़ी समझ चुकी हो. अर्जुन सादे पानी का गिलास उठा कर इस भीड़ से एक तरफ चल दिया. धीमा संगीत, लोगो का pariwar-dosto के साथ गोल बड़ी मेज के गिर्द जमघट लगाए बैठ कर पकवान और सूरा का मजा लेना, कही कही राजनीति की चर्चा तोह कही व्यापार को बढ़ने पर बातचीत. जवान लड़को का खूबसूरत लड़कियों को निहारना और सबसे ज्यादा जमघट उधर जहा हेमंत संग जीनत विराजमान थी. जन्नत को भी अपने पिता और माँ के साथ वही पर लोगो से मिल कर उनके उपहार समेटने पड़ रहे थे. पर अपनी छोटी बहिन के रिश्ते वाले कार्यक्रम में अधिकाँश नजरे उस पर हे तिकी थी, भानु जी के सुपुत्र शुभम के साथ साथ.

"सर, आपको इंतजाम ठीक तोह लगा न? वैसे कुमार सर भी आपसे मिलने आना चाहते थे लेकिन कुछ जरुरी काम की वजह से उन्हें बहार जाना पड़ा.", ये राजहंस का प्रमुख मैनेजर हे था जो अर्जुन के हॉल से बहार आते हे हाथ मिलते हुए मिला. बहार भी खुले में कुछ लोग थोड़ी थोड़ी दुरी पर अपने अपने झुण्ड में खड़े शराब और बियर की चुस्किया लेते दिखे. इस कार्यक्रम के सिवा यहाँ आज कोई और आयोजन नहीं था. जैसे सिर्फ कपूर परिवार को उचित निजता दी गयी हो.

"बेहतरीन इंतजाम किये है आपने भैया और लोगो के चेहरे से ये साफ़ पता चलता है जो ऐसी उम्मीद काम हे लाये थे अपने साथ. बस थोड़ा सावधानी रखना क्योंकि लोग बेशक 150 है पर ज्यादातर रसूख दिखाने वाले है और रईस जवान भी. बाकी कुमार साहब से संडे को मिलना हे है. बाकी यहाँ कोई मुझे पूछे तोह बुला लेना. मैं पीछे फाउंटेन के पास हे बैठा हु. और खाने पीने का सामान मैट भिजवाना, प्लीज. वैसे कुर्सी लगी है न उधर?", मैनेजर सब सुन्न कर अपनी प्रशंशा पर मुस्कुराया और उसके करीब आयी वो खूबसूरत परिचायिका भी जो भीतर प्रमुख मेहमानो का ध्यान रखने एक साथ हे राजहंस की एक कर्मठ seh-sanchalak थी.

"वो अब वही पर फिक्स है सर, रिजर्व्ड की प्लेट के साथ. सॉरी, आप लोगो की बातचीत में आने के लिए पर मैनेजर सर से थोड़ी बातचीत करनी थी सर. स्टेज पर कपूर जी ने बुलवाया है.", अर्जुन ने काले कोट पर नाम की पट्टी पढ़ कर जाना की इनका नाम सुनयना माथुर था. तरीके से कटे पीठ तक आते सीधे बाल, सफ़ेद कमीज के ऊपर गहरा coat-pant जिसके नीचे चमकदार कुछ ऊँची एड़ी वाले जूते.

"धन्यवाद सुनयना जी. आप लोग पार्टी सम्भालिये, मैं कुछ वक़्त में आता हु.", अर्जुन अपनी बात कह कर तेज कदमो से हॉल के पीछे की तरफ चल दिया. वो कुछ पल के लिए खुद पर तिकी हर नजर से बच कर थोड़ा सुकून चाहता था जिसके लिए एक ख़ास जगह थी रंगमहल के पीछे बानी झील. वह बिजली की लालटेन से जगमग एक लकड़ी की मेज और उसके दाए बाए राखी 2 कुर्सियां.

"वैसे किस्मत हो तोह ऐसी हो मिश्रा सर. मैं यहाँ 4 साल से हु और आप तोह मुझसे भी 4 पहले से लेकिन राजहंस में नियम बदलने वाले ये नए मालिक एक हफ्ते पहले तक कभी सुनाई तक नहीं पड़े थे और आज कुमार साहब तक इनकी कही बात पर कोई सवाल नहीं उठाते. आखिर ये अर्जुन जी है कौन और पहले क्यों नहीं दिखे कभी अगर ये प्रॉपर्टी भी इनकी हे है?", सुनयना बहोत धीमी आवाज में बोल रही थी जिस पर मैनेजर साहब ने चेहरे से गंभीरता उतारते हुए जवाब दिया.

"3 महीने पहले तोह वो 18 के हुए है, पहले कहा से दिखाई पड़ते सु? पर मैंने इन्हे कभी महल की तरफ भी नहीं देखा जैसे अर्जुन जी को महफूज रखा गया हो बाकी सबसे. और तुम्हे तोह ख़ुशी माननी चाहिए की 4 साल में तुम कभी रेस्ट्रा से बहार नहीं निकली और अब सीधा co-manager रंगमहल की. इंसान में बात तोह जरूर है जो अंदर पार्टी में फंक्शन से ज्यादा इनकी हे बातें हो रही है. चलो, मिलते है कपूर जी से. वो मंत्री जी हे न कोई शिकायत कर रहे हो अब.", इधर ये दोनों हे हॉल में दाखिल हो गए लेकिन सुनयना के चेहरे के भाव कुछ अलग थे और मैं में ढेरो विचार.

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"ारु कल दिल्ली जा रहा है माँ? दादी बोल रही थी की वो कल अपने घर आ रहा है और वह से फिर बाउजी भी उसके साथ दिल्ली जाने वाले है. कही एडमिशन के लिए तोह नहीं ले जा रहे उसको?", ऋतू ने अपने कमरे के भीतर सिर्फ गुलाबी बनियान सी टीशर्ट और आसमानी रंग की आरामदायक निक्कर हे पहनी हुई थी. भोजन बन्न ने अभी वक़्त था और वह सुनंदा जी के साथ पहले रेखा जी थी और अब अलका. आरती कुत्तो को भोजन खिलने गयी थी तोह रेखा जी ने ये समय अपनी बिटिया का हालचाल पूछने को दिया. यहाँ पर उनकी वेशभूषा भी कुछ हद्द तक आरामदायक थी लेकिन उतनी उन्मुक्त नहीं. पाँव तक लम्बाई वाला सूती गाउन जिसके निचे उनके अंतःवस्त्र भी मौजूद थे. कमरे में आते हे पहले उन्होंने ऋतू के जखम देखे जहा चेहरे पर बस मामूली नील था पर एक ब्याह पर पट्टी करनी हे पड़ी. सीना बनियान से ढाका था जिधर नजर करना उन्हें भी अनुचित लगा.

"तुम्हारे दादा जी किसी हाल में उसको दिल्ली नहीं भेजनेवाले पढ़ने के लिए. जितनी परेशां तुम हो रही हो उस से ज्यादा वो खुद और माँ जी होंगी अगर ारु दिल्ली गया तोह. वो बस उनके साथ जा रहा है 2 दिन के लिए और मैंने पुछा नहीं क्यों. बाकी तुम्हे तोह वो बता हे देगा चाहे किसी को बताये न बताये.", तेल की शीशी उठा कर उन्होंने फर्श पर एक गलीचा डालने के बाद ऋतू को बिस्टेर से तक लगा कर निचे बैठने को कहा. ऋतू भी पहले शर्म से मुस्कुराई और फिर अपनी माँ का प्यार देख. रेखा जी ने उसके भूरे लम्बे बालो से रबर निकाल कर एक और रखने के बाद कपाल पर तेल की धार उडेलनि शुरू कर दी.

"वो न बताये तोह मैं क्या छोड़ दूंगी उसको? उसकी हर बात पता होनी चाहिए क्योंकि वो मेरा हक़ है. हाँ पर आज उस उल्लू की ाची क्लास लगाईं है कोमल दीदी ने और ये बात भी आपको यक़ीनन पता होगी.", रेखा ये सुन्न कर थोड़ा सा निराश हुई लेकिन जाहिर नहीं किया. निचे लटकते लम्बे बाल सर के ऊपर गिरे तेल पर मलते हुए उन्होंने 'हहहह' कहा जैसे उन्हें पता हो.

"कोमल ने जो किया वो तुम और मैं नहीं कर सकते. ारु भी उसमे कही न कही तुम्हे और मुझे हे देखता है जिस वजह से वो कोमल की कही बात का ताल नहीं सकता और न कोमल उसके लिए गलत चाहती है. कोशिश करना की इंग्लैंड जाने तक तुम अर्जुन को थोड़ा परिपक्व बना सको. उसके दोस्त नहीं है, वो सबके साथ सामान व्यवहार रखता है और उसकी बाहरी दुनिया बस उतनी हे है जहा जिम्मेवारियां मिली हो. मैं भी कोशिश करुँगी पर तुम और कोमल ये बेहतर कर सकती हो. तुम कोमल से ज्यादा ाचे से क्योंकि लगभग तुम दोनों एक जैसे हो और ... तुम्हारा हक़ भी तोह है उस पर.", रेखा ने जिस अंदाज से हक़ कहा था गर्दन झुकाये मालिश का आनंद लेती ऋतू ऐसे शर्मायी जैसे उसकी सासु माँ ने पहली मिलान की बात छेड़ दी हो. स्टैनो की जोड़ी घुटनो में दबी कुछ बनियान से बहार झाँकने लगी तोह ऋतू ने एक हाथ उनके ऊपर रख लिया.

"थोड़ा ये घर के बेमतलब काम काम होंगे तभी वो दोस्त बना सकेगा माँ. बाकी हक़ तोह उस पर सबका हे है बस मेरा थोड़ा सा ज्यादा क्योंकि... वही तोह है जिसको गॉड में उठाना मुझे पसंद था और उसको चम्मच से सेरेलक खिलाना भी. गोल मटोल तोह नहीं था लेकिन प्यारा बहोत था ारु.", ऋतू ने कनपटी माँ की तरफ करते हुए उधर मालिश करवानी शुरू की तोह अर्जुन के बचपन का चेहरा रेखा के समरण में भी उभर आया.

"हाँ.. तुम पौने 4 किलो की थी और वो 2 किलो 800 ग्राम का. एक तोह वो ऊपर का खता हे नहीं था और हर वक़्त भूख लगती रहती थी उसको तोह मुझे काम नहीं करने देता था. सचमुच वो तुम्ही थी ऋतू जिसने ारु में पहला बदलाव लाया और उसकी देखभाल की. 2 साल का होने पर तोह वो अपना डब्बा हे तुम्हारे पास लेके आ जाता था, सेरेलक बनवाने के लिए. और उस समय तक वो बिलकुल तुम्हारे जैसा दिखना शुरू हो गया था. अब तुम दोनों साथ खड़े होते हो तोह..", कुछ सोच कर रेखा ने आगे बात को अधूरा हे छोड़ कर थोड़ा तेल कनपटी पर गिराया और कपडे से ऋतू का गाल साफ़ करने लगी.

"साथ खड़े होते है तोह माँ?"

"ाचे लगते हो."

"आप कहना चाहती थी की हम एक जैसे लगते है, ख़ास कर हमारे चेहरे का कटाव और होंठ आपके जैसे और आँखें पापा के जैसी. कोमल दीदी की आईज आपके और पापा के कलर्स के बीच की है और दीदी आपके जैसे ज्यादा दिखती है, खूबसूरत भी."

"हाहाहा.. इस बात से मैं और कोमल दोनों हे इंकार करेंगे. अब देखो जरा खुदको सामने.", रेखा ने स्वयं हे अपने हाथ से ऋतू की नजर पर चढ़ा चस्मा उतार कर एक तरफ रखा जो मालिश करने पर हे पता चला था डंडी की वजह से. दर्पण में फर्श पे बैठी ऋतू और उसकी मालिश करती रेखा का स्पष्ट प्रतिबिम्ब था. ऋतू एक पल खुदको देखने के बाद थोड़ा शर्मायी क्योंकि सीने पर हाथ रखने के बावजूद उसके उभारो की गोलाई स्पष्ट थी लेकिन जैसे हे अपनी माँ का चेहरा ध्यान से देखा, एक ठंडी आह निकल गयी.

"आपके हे अंश है तीनो तोह कोई कपरिसों हे नहीं माँ. इंकार बेशक करती रहो क्योंकि मानोगी तोह कभी नहीं लेकिन सच यही है की आपसे खूबसूरत औरत मुमकिन हे नहीं. दादी अकेले ऐसे हे तोह नहीं जाने देती आपको कही. ताई जी और कृष्णा चची तक aas-pados में या सेक्टर वाली मार्किट चले जाते है. बुआ भी घूम लेती है जब इधर होती है लेकिन जितनी खूबसूरत आप हो न, दादी खुद फकर महसूस करती है इस पर. और उनकी नजर न लग जाए वाली सोच आपको कही अकेले जाने नहीं देती. कोई कह सकता है की आप 44 की हो गयी है? मैं आपकी उम्र तक अगर पहुंची भी तोह आसपास नहीं दिखूंगी. आपके हाथ हे देख लो माँ, चेहरे पर तोह दीदी से ज्यादा चमक है. बाहें एकदम साफ़ और इनमे लोच या लटक हे नहीं जबकि मधु बुआ भी थोड़ी नरम लगती है और वो आपसे 5 साल छोटी है. हम तीनो बहिन भाई उतने ख़ास नहीं होते अगर.."

"बस कर अब.. वैसे कुछ बात जनराशंस में होती है. अलका, माधुरी, पिंकी, तारा और आरती.. सब ख़ास है क्योंकि पुराणी पीढ़ियां मजबूत और ाची रही है. तुम्हारे नाना नानी भी वैसे हे है तोह उनसे आगे मैं बानी. और ख़ूबसूरती उम्र के पैमाने पर नहीं, दिल से मापी जाती है. तुम्हारा दिल मुझसे और कोमल से भी बेहतर है अगर तुम्हे समझ आये तोह. वैसे इंग्लैंड में रह लोगी तुम अकेली और ाचे बुरे लोग हर तरफ होते है."

"मुझे वह पढ़ने जाना है माँ और न तोह वह अकेली होउंगी, न मुझे ाचे बुरे लोगो से कोई लेना देना है. ाचे मिले तोह ाची बात है और बुरे जो होंगे उनकी बुरी किस्मत की वो ऋतू शर्मा के सामने क्यों पड़े. इरादे तोह प्रीती के भी ऐसे हे थे जैसे मेरे और अलका के. उसको एडमिशन भी मिल जाता Italy-France में लेकिन.. उसको आपके हे पास रहना है.", ऋतू ने जैसे हे बात पलटी रेखा ने हलके से उसके गाल पर थपकी दी.

"जानती हु चाहे बोलती नहीं मैं. वो क्यों यहाँ रहने वाली है और तुम क्यों जा रही हो, मुझे सब पता है. वैसे ारु के बोर्डिंग जाने पर सबसे ज्यादा दुखी और गुस्सा तुम्ही हुई थी. अब तुम्हारे जाने पर अगर वो ऐसा कुछ करे तोह?", रेखा की बात महज मजाक थी और उँगलियों के पोरो से वो सही से जड़ो तक तेल पहुँचती हुई ऋतू को आराम हे दे रही थी.

"नहीं जाउंगी.. ारु कह दे की मैं न जाऊ लेकिन वह जाने के लिए मेरा इरादा उसने हे बनाया है. वो चाहता है की मैं सिर्फ ाची डॉक्टर नहीं बल्कि सबसे ाची बनु. दादी ने भी कहा था की मेजर कार्डियक में करू जो वह आलरेडी मब्ब्स में हे है. आपको क्या लगता है मैं घर से दूर जा सकती हु? आप कह रही थी न की सिर्फ कोमल दीदी हे ारु को समझा या दांत सकती है तोह सही कहा आपने. मैं उल्टा उसके झांसे में आ जाती हु और इसलिए वो मुझे इंग्लैंड भेज रहा है.", ऋतू इसमें खुश थी या व्यथित, उसके अंदाज से बता पाना मुश्किल था. रेखा जी तोह पशोपेश में थी की अब वो इस पर क्या कहे लेकिन एक कटु सत्य उनके हिस्से भी था. थे तोह कई सारे कड़वे सच लेकिन न वो कह सकती थी और न ऋतू उस पर कुछ प्रतिक्रिया देने के लायक.

"मुझे ख़ुशी होगी अपनी बेटी को ऐसे मुकाम पर देख कर. ारु हमेशा तुम्हे हे अपना बेहतर रूप मानता है और तुम हो भी. कहने को तोह सबने उसको हे अपना वारिस बनाया लेकिन मैं जानती हु की उसकी असली दौलत वो सब नहीं. वैसे तुम्हारे जाने के बाद घर सूना हो जाने वाला है जिसकी भरपाई तुम्हारा छोटा भाई भी नहीं कर सकेगा.", ऋतू के बाल अब गहरे और चमकदार हो चले थे इतने वक़्त की मालिश से हे. रेखा हर एक लत्त को हाथो में लेती और ध्यान से सुलझा कर तेल लगाती हुई विभिन्न चिंतन में भी लगी थी. आने वाला समय कैसा होगा और क्या हो सकता है ये सब सिर्फ उसके हे जेहन में था.

"ये सब छोडो माँ, घर पे अकेली ताई जी हे बहोत है दिल लगाने के लिए और मैं चाहे एग्जाम अभी क्लियर करू या दिसंबर, जाना तोह सेकंड ईयर कम्पलीट करने के बाद हे है. आपकी पापा से शादी कैसे हो गयी? मतलब मैं ऐसा नहीं कह रही की आप दोनों हे अलग अलग है दूसरे से पर दादा जी ने आपको ढूंढा कैसे और नाना जी की आप एकलौती संतान है तोह क्या उन्होंने जांच पड़ताल नहीं करि होगी?", जैसे ये सवाल अप्रत्याक्षित था जिसको सुन्न कर अब आईने में रेखा का खोया सा प्रतिबिम्ब नजर आया. चेहरे पर ढेरो भाव बने और फिर वो अचानक मुस्कुरा उठी.

"माँ जी को तोह मैं तबसे हे जानती हु जब मैं 8 बरस की थी. हाँ उस से पहले की यादें मुझे नहीं मालूम लेकिन तुम्हारे दादा दादी जी अक्सर आते रहते थे उधर. सुना तोह ये भी है की मेरे पापा की शादी पर भी तुम्हारे दादा जी मौजदूद थे. स्कूल से आने के बाद मैं बड़े पापा की जगह दूकान देखती थी पापा के साथ क्योंकि बड़े पापा (सोहनलाल) सरकारी कर्मचारी थे और छोटे पापा खेत खलिहान तक हे सिमित. घर से स्कूटर चला कर मैं खुद हे मंडी जाती थी और ऐसे हे 2-3 बार तुम्हारे दादा जी ने मुझे वह हिसाब किताब करते देखा. बिट्टू भैया और राजेश के साथ मैं भी अभ्यास करती थी तलवार, बन्दूक और पिस्तौल का जो पापा सिखाते थे हमे. जानती हो सबसे पहले मेरे हाथ में पिस्तौल किसने दी थी?", अपनी माँ की साड़ी बात सुन्न कर ऋतू के ये तोह समझ में आ गया था की क्यों उसकी दादी उसकी माँ से इतनी प्रभावित रहती है पर उस समय के हिसाब से ये बहोत विशिष्ट बात भी थी. स्वयं कौशल्या जी को naari-shakti खासी प्रभावित करती थी और वो इसका जीवंत उदहारण खुद भी थी.

"दादा जी ने हे दी होगी क्योंकि वो तोह पुलिस में थे और आपने हे बताया था की वो आते रहते थे उधर.", ऋतू की बात पर उसकी माँ ने ना में सर हिलाते हुए जवाब दिया.

"दादा जी तोह वो भी लगते थे लेकिन वो थे स्वर्गीय रघुवीर सिंह जी, तुम्हारे उमेद चाचा के पिता. उस वक़्त घर में सिर्फ do-naali हुआ करती थी और मेरी उम्र रही होगी कोई 14-15 बरस. मतलब 30 साल पहले की बात है और बिट्टू भैया घर के पिछले हिस्से में पहले जहा खेत थे वह पापा और रघुवीर जी की निगरानी में उस बड़ी बन्दूक से निशाना सीख रहे थे. मैं थोड़ी ज़िद्दी थी और ये देख कर मैंने ज़िद्द करि की मुझे भी निशाना लगाना है. पापा ने पहली बार डांटा था मुझे पर रघुवीर जी ने अपनी जेब से एक बहोत चमकदार रिवॉल्वर मेरी हथेली पर रखते हुए कहा की बिट्टू से ज्यादा मुझे सीखने की ज्यादा जरुरत है. और पापा के सवाल उठाने पर उन्होंने यही कहा की पुरुष तोह फिर भी झुण्ड जमा कर लेते है मुसीबत पड़ने पर लेकिन बिटिया अक्सर घर परिवार बसने पर पीछे अकेली रह जाती है. समाज के जानवरो से लड़कियों, महिलाओं को ज्यादा खतरा है. फिर एक तरफ बिट्टू भैया कंधे पर बन्दूक उठाये थे और उनकी बगल में मुझे खड़ा करके तुम्हारे दूसरे दादा जी ने मुझे गोली चलने से पहले सही मुद्रा, निशाने की गति और हथियार से दोस्ती करना सिखाया. और पहली बार में हे मैंने 30 गज दूर लटकता घड़ा फोड़ दिया था. हाँ थोड़ा डर भी गयी थी उस आवाज और रिवॉल्वर की ताक़त से लेकिन उसके बाद कॉलेज में दाखिला लेने तक मेरे पास 3 रिवॉल्वर और पिस्तौल आ चुकी थी. भैया और राजेश तोह प्रैक्टिस निरंतर नहीं रखते थे लेकिन मैंने 3 साल तक शायद हे कोई दिन छोड़ा होगा.", रेखा शादी के बजाये इस चर्चा पर किसी युवती सी खुश होती अपने राज अपनी बेटी को सुना रही थी और ऋतू हैरान एक साथ अपनी माँ पर गर्वित थी.

"आपने कभी बौ जी के साथ मुकाबला किया था क्या माँ? हाहाहा.. पॉसिबल नहीं लेकिन सुना है वो ाचे निशाने लगते है और आज भी जब वो दिग अंकल के साथ जाते है तोह छोल दादा जी भी उनके साथ शूटिंग प्रैक्टिस करते है."

"4 बार और एक बार तोह खुद रघुवीर जी भी शामिल हुए थे. उन्हें मैं चौधरी अंकल बुलाती थी और तुम्हारे दादा जी को पंडित ताऊ जी. दोनों हे पापा से बड़े थे और दोस्ती गहरी, वो भी बड़े पापा तक के साथ. पहली बार तोह तुम्हारे दादा जी ने मन किया की बचो के साथ ये सब सही नहीं है लेकिन रघुवीर जी ने कहा के बची का दिल रखने के लिए हे कर लो अभ्यास. फिर उनके चेहरे पर जो हैरानी थी वो मुझे आज भी याद है. बाद में 3 बार वो ख़ास आये सिर्फ मेरे साथ निशाने की हौद लगाने. सतीश अंकल भी थे 2 बार उस वक़्त और फिर मेरा कॉलेज का आखिरी साल ख़तम होने वाला था की तभी तुम्हारी दादी जी एक दिन वह आयी और मुझसे हे कहा की आज वो मेरे हाथ का खाना खाने हे आयी है. मुझे तोह ज्यादा इस बारे में कुछ पता नहीं था और अक्सर तुम्हारे दादा जी के लिए भी मैं हे चाय बनती थी पर उस दिन माँ ने भी रसोई में कदम नहीं रखा और मैंने 10 लोगो का खाना अकेला पकाया. घर से विदा लेने से पहले माँ जी ने मेरी कलाई में सोने के कड़े पहना दिए और झोली में कपडे नेग रखते हुए कहा की 'रेखा, अब तुम हमारे घर की वारिस हो जैसे अब तक यहाँ की रही. मुझे इस से भी ऐतराज नहीं की आने वाले समय में भी तुम इधर की वारिस रहो लेकिन अपनी इस ताई के घर को संवारना तुम्हारे हाथ है.', मुझे कुछ समझ नहीं आया था एक पल के लिए पर जब तुम्हारे दादा जी को चेहरा साफ़ करते देखा तोह उनकी पीड़ा मुझसे सेहन नहीं हुई. वो जैसे कही न कही मेरे लिए चिंतित थे पर मेरे पापा को तोह तुम्हारे पिता के रूप में वो मिला जिसकी ख्वाहिश उन्हें हमेशा से रही. उस वक़्त जाने कैसे मैंने ये मजाक में हे बोल दिया की 'पंडित ताऊ जी, आप 4 बार हारे है मुझसे इसलिए फिर कभी हम मुकाबला नहीं करेंगे'. मेरी सहमति मिल गयी थी उन्हें मेरे इस जवाब से. फिर तुम्हारे पापा ने हॉस्पिटल ज्वाइन कर लिया और कृष्णा दीदी के साथ मेरे भी फेरे एक हे मंडप में हो गए. मास्टर्स पूरी करने के समय कोमल एक बरस की हो चुकी थी.", ऋतू को आज जितना बुरा अपनी माँ के लिए लग रहा था उतना कभी उसको अर्जुन के दूर जाने पर न लगा था. आँखों से मोतियों से आंसू लुढ़कने लगे तोह रेखा ने हे अपनी बेटी का चेहरा साफ़ करते हुए इंकार में सर हिलाया.

"तुम दुखी हो क्योंकि तुम्हे लगता है मेरा रिश्ता सही नहीं हुआ और तुम थोड़ा अपने पापा के बारे में जानती हो इसलिए मेरे लिए चिंतित हो. मेरी चाहत हमेशा हे हमारा परिवार है ऋतू और मेरे ये इतने समझदार बचे जिन्होंने अभी से खुदको साबित कर दिखाया है. वैसे भी मेरी बराबरी का वर तोह ढूंढ़ने से नहीं मिलने वाला था और तुम्हारे पापा मुझसे कही ज्यादा दक्ष और परिवार के लिए समर्पित व्यक्ति है. हाँ थोड़ा बहोत khinch-taanch तोह पति पत्नी में चलती हे रहती है और 24 बरस भी हो चुके है शादी को. कल को तुम्हारी शादी होगी तोह मुझे तुम्हारे पति का पक्ष लेना पड़ेगा. शेरनी के सामने तोह वो बकरा हे लगेगा. हाहाहा..", रेखा ने अपनी बेटी को खुश करने की कोशिश की तोह ऋतू उनकी बगल में आ बैठी, गले में हाथ दाल कर.

"आपको कभी प्यार नहीं हुआ? मैं जानती हु की आपको भी ऋचा दीदी वाला सच पता है और पापा के प्यार के बारे में भी. मैंने आपको जबसे देखना शुरू किया है आप सुबह 5 बजे हे तैयार हो जाती है और सबसे पहले चूल्हा आप हे जलाती है, रात को रसोईघर बंद भी आपके हाथ होता. आपकी ज़िन्दगी आपके घर पर जैसी थी तोह यक़ीनन कही न कही तोह आपको भी कोई ाचा लगा होगा न माँ. College-school या शहर में?"

"नहीं.. सिर्फ सपनो तक हे सब सिमित था लेकिन प्यार का एहसास हुआ जब कोमल को जनम दिया, जब तुम मुझसे दूर दूर रहती थी और फिर ारु के ज्यादा हे दूर जाने पर. पर वारिस को थोड़ा बहोत तोह सहना हे पड़ता है लेकिन भगवान् उसका फल जरूर देते है. आज तुम्हारे सामने हे है की तुम मुझे कुछ होने नहीं दे सकती और तुम्हारा भाई बस बताने भर से मुझसे मिलने आ जाता है. मधुलता.. उसको तुम्हारे पिता से कभी प्यार नहीं था लेकिन मैं इजत्त करती हु तुम्हारे पापा की क्योंकि उन्होंने सच्चा प्यार किया और उन्होंने मुझे भी धोखे में नहीं रखा. दुःख जरूर हुआ था लेकिन जैसा कहा की मुझे प्यार का एहसास हे नहीं था और इतना ाचा परिवार मिला तोह ज़िन्दगी तोह जैसी अपने घर थी वैसी यहाँ मिली. तुम वैसे ज्यादा खुशकिस्मत हो इस मामले में.", रेखा के तंज़ पर ऋतू ने बस अपनी माँ का गाल चूम लिया. कुछ पल खामोश रहने के बाद उसने एक बढ़िया धमाका किया जो रेखा को दूर दूर तक अपेक्षित न था.

"रघुवीर दादा जी ने आपको सबसे पहले पहचान लिया था पर उन्होंने इसका जवाब आपको तब दिया जब आप उनसे आखिरी समय से पहले मिली थी. आप कौन हो इसका जवाब तोह आपके और उनके भी पास नहीं था लेकिन ारु सभी कड़ियाँ जोड़ चूका है माँ और मैंने हे उसको वो बताया जो आपसे पढ़ा नहीं गया था तहखाने में मिले कागजो से. वह वो पेंटिंग बिलकुल आपके जैसी है और वैसी हे ठीक एक ारु के साथ साथ रघुवीर दादा जी ने देखि थी महल के भीतर. महल में दादा जी तोह कभी उस तरफ नहीं गए थे लेकिन रघुवीर दादा जी जरूर गए थे जिसकी जानकारी ारु को अभी कुछ समय पहले मिली थी. रघुवीर दादा जी ने हे मेरी दादी को सुझाया था की सिर्फ आप हे काबिल है बिखरे हुए संसार को फिर से समेटने में. माँ अनुराधा और आपके बीच 3 पीढ़ियां और रही लेकिन वो आजतक बस एक पहेली हे थी जिनके अस्तित्व के बारे में उनके अपने भी नहीं जान सके. राजमहल की असली मालिक और पंडित मोतीलाल शर्मा जी को जनम देने वाली माँ अनुराधा हे राजा बलविंदर की भी माँ थी. उन्होंने सब छोड़ कर सिर्फ मोतीलाल जी को चुना और उनकी हत्या भी उन्होंने हे की जो उनकी संपत्ति पर कुंडली मार कर राजा से महारजा बन्न बैठे. भूपेंद्र और जुगलाल... अनुराधा जी ने प्यार किया था जिसकी सजा उनकी गुमनामी, कमजोर राजा को उनके हिस्से की संपत्ति और जायदाद अपने रजवाड़े में मिला कर उसको मजबूत करने की लालसा. पर उनकी बहिन जानती थी सच और अंतिम पत्र अनुराधा जी ने इसी पते पर भिजवाया था जिसके बाद उनकी बहिन विदेश जा बसी, अनाहिता नाम था उनका. ारु तोह और भी बहोत कुछ जानता है जो वो मुझे भी नहीं बताने वाला लेकिन थोड़ा थोड़ा करके उसने सबको कब्ज़ा लिया है चाहे वो दादा जी हो या रानी सौंदर्य. एक तरह से तोह वो उचित वारिस हुआ raj-mehal का क्योंकि उसमे दोनों खून शामिल है और आपका उत्तराधिकारी भी तोह वही है. किस्मत सचमुच कभी कभी वही ले आती है जहा से शुरुआत हुई हो, फिर चाहे घटना 100 साल पुराणी हे क्यों न हो.", ऋतू साफ़ देख रही थी अपनी माँ को हैरान और चिंतित होता हुआ. रेखा को तोह ये सब कोई काल्पनिक कहानी सी जान पड़ती थी क्योंकि अगर ये असलियत है तोह बहोत से रिश्तो के समीकरण बदलने वाले थे.

"ये नहीं हो सकता.. ये अगर थोड़ा बहोत भी सच हुआ न ऋतू, सब भिखर जाएगा इस राज के बाहर आते हे. मतलब.. "

"शह्ह्ह्ह.. इतनी बेवकूफी ारु कर सकता है पर मैं उसके साथ हु न माँ.. मैंने इस बात को हथियार नहीं बनाने दिया. आप उर्दू नहीं पढ़ सकती इसलिए आपने उन कागजो को एक तरफ रख छोड़ा. वह आखिरी पत्र में साफ़ लिखा था के अनुराधा जी ने यही पर मोतीलाल जी को जनम दिया था और फिर विवाह के वक़्त भी वो दोबारा गर्भ से थी. मतलब न तोह जुगलाल जी पंडित मोतीलाल जी के पिता थे और न भूयपंद्र जी बलविंदर के. तहखाना भी 2 मंज़िला है जहा आपसे चूक हो गयी क्योंकि आपने मुख्या तहखाना तोह खोज हे लिया था. पर अब ारु और अतीत में नहीं जाने वाला उस शक्श को ढूंढ़ने जो तिलोत्तमा को तब छोड़ गया जब उसको सबसे ज्यादा जरुरत थी. तिलोत्तमा के परिवार ने हे समाज में उसको मृत घोषित कर दिया और उनका दूसरा गुमनाम जीवन था अनुराधा के रूप में या महल की देवी जो एक वारिस दे कर कही खो गयी. आखिर पत्र में ये भी लिखा था की उन्हें धीमा ज़हर दिया जा रहा था और अब वो नाउम्मीद हो कर दुनिया से विदा ले रही है. उनकी चाहत तोह थी की वो अपने दोनों बेटो के साथ जीवन बिता सके लेकिन ऐसा मुमकिन न हो सका. खैर, दुःख तोह मुझे भी बहोत हुआ ये सब जान कर लेकिन अब मुझे चिंता ारु की है क्योंकि आपको और मुझे जितना पता है वो तोह कुछ भी नहीं उसके सामने जिसमे raaj-pariwar के हर व्यक्ति की कुंडली के साथ साथ परिवार के हर बड़े का राज लिखा है. ारु ने हर कबर खोद ली है माँ और उत्तेजना में मैंने भी उसको वो सब बता दिया जो तहखाने में दफ़न था. मैंने सबकुछ दूसरे तहखाने में बंद कर दिया है और अब आप भी गलती से उसका रास्ता मत खोजना.", रेखा अब कर हे क्या सकती थी जब खुद वो सच जान ने को आतुर हो अर्जुन का साथ देने लगी थी और यहाँ उसका बीटा तोह ऐसे ऐसे राज खोजने के बाद किसी जुआरी सा शांत था जैसे वक़्त आने पर वो हर इंसान को घुटनो पर झुका सके अपने एक हे दांव से.

"उसको भी कहा इस सब की उम्मीद होगी. पर वो अपने आप में एकलौता हे है जो कैसे भी करके हर उस जड़ को खोद निकलता है जो जमीन के ऊपर दिखाई तक नहीं देती किसी पौधे या पेड़ के रूप में. और उसने तहखाने में पेंटिंग की जगह मुझे तिलोत्तमा कहा था जैसे वो नाम मेरा हे हो. क्या ारु सचमुच अपने padd-dada जी जैसा दीखता है?", रेखा ने तुरंत बात सँभालते हुए कहना चाहा लेकिन स्वयं के लिए तिलोत्तमा कह कर वो ऋतू को मौका दे हे गयी जो कुछ इस तरह मुस्कुरायी जिस से रेखा खुद हे नजरे चुराने लगी.

"वैसे ये नाम मैंने सबसे पहले ारु की नोटबुक के पीछे लिखा देखा था. बस देख रही थी की वो पढता लिखता है या ऐसे हे. लास्ट पेज पर वैसे हे पेंसिल से एक खूबसूरत आँख बानी हुई थी जिसके निचे लिखा था तिलोत्तमा. मतलब वो इस नाम को जाने कबसे दोहराता रहा है और देखो ये मिला भी तोह किस रूप में. वैसे माँ फ़र्ज़ करो.. मतलब इसको न ऐसे समझो की हम दोनों हमउम्र है और आप अभी 20 की हे है जैसी अपनी शादी के टाइम रही होंगी.", ऋतू अब क्या कहने जा रही थी वो खुद थोड़ा झिझकते हुए बोली पर रेखा उस धमाके से उबारती हुई ये सब सुन्न ने लगी जो उसकी बेटी कहना चाहती थी. हाँ ढेरो सवाल जरूर थे लेकिन उसके जवाब सिर्फ अर्जुन के पास थे और चाँद रोज बाद वैसे भी अर्जुन और रेखा को भरपूर एकांत मिलने हे वाला था. रेखा में सबर हे तोह कूट कूट के भरा था लेकिन अब उसको भी जैसे मजा आ रहा था ऋतू की अधूरी बात सुन्न कर.

"ठीक है मान लिया की मैं 20 की हु और तुम मेरी सबसे ख़ास दोस्त. आगे?", ख़ास दोस्त कहने का लहजा भी ठीक वैसा जैसे अलका हे बोल रही हो. ऋतू ने इसको स्वीकार करते हुए बात जारी की.

"अब आप हो नाना नानी जी के घर और रिश्ता ले कर वह दादा दादी जी आये है."

"इसमें मान न क्या है? यही तोह हुआ था फिर रिपीट करने से क्या फायदा?"

"अरे माँ.. सुनो तोह सही पहले. यही तोह मजेदार बात है. हाँ तोह यहाँ दादी जी के दो बेटे है और दोनों कुंवारे लगभग एक हे उम्र के.", ऋतू के बोलने से रेखा मुँह बनाने लगी जैसे ऐसा तोह तब भी था.

"नरिंदर चाचा नहीं माँ.. देखो यहाँ आपकी मर्जी हे चलेगी की आपको उन दोनों में से कौन चुनन न है. आपने उस समय वाले शंकर जी भी देखे है आज के टाइम वाला अर्जुन भी. यही दोनों विकल्प है और आप दोनों को हे जानती है ाचे से, ये सहूलियत के हिसाब से हुआ. आप बताओ किसको चुनन टी.?", रेखा विस्मय से अपनी बेटी को देखने लगी जो अब बनियान के ऊपर आधी ब्याह की सफ़ेद कमीज पहनती हुई मंद मंद मुस्कुराये जा रही थी.

"ये कैसा बेतुका सा सवाल है?"

"पूरा सन तोह समझो माँ. बस जवाब हे देना है और कौन सा इस से कुछ फरक पड़ने लगा है जो आप नर्वस हो रही हो. मतलब आप इतने समय से पापा को जान रही है और ारु को भी. अब रोले थोड़ा चेंज है की वो दोनों हे शादी लायक है और आप वही 20 की रेखा शर्मा. दादी बिना जोर दिए बस आपको बहु बनाना चाहती है और मर्ज़ी आपकी है अपना वर निर्धारित करने की. किसको चुनोगी?", ऋतू यहाँ फिर से खेल गयी थी क्योंकि उसने चुनोगी कहा, चुनती नहीं. पर रेखा तोह इस से पहले हे सोच में पड़ गयी जैसे अतीत और वर्तमान में तुलना करनी पड़ रही हो.

"अर्जुन.. तुमने कहा की मैं दोनों को जानती हु उसके बाद चुनाव करना है तोह यक़ीनन सिर्फ अर्जुन. तुम मेरे सामान हो न तोह अगर यही सिचुएशन तुम्हे मिले तब तुम क्या जवाब देती?", ऋतू बिस्टेर से कड़ी हो कर मुस्कुरा रही थी और माँ का सवाल सुनते हुए उसने दरवाजा खोलने से पहले होंठो को गोल करके निचे हथेली लगते हुए उन्हें हवाई चुम्बन भेजा और अपनी बात से फिर उन्हें निरुत्तर कर गयी.

"मैं इस मामले में थोड़ी सी अलग हु माँ और चुनाव का हक़ भी मुझे हमेशा मिला है और ओप्तिओंस तोह न मैंने करियर में राखी और न फ्यूचर लाइफ के लिए. हाँ जवाब हम दोनों का हे शामे है वैसे. डिनर पे आने से पहले जरा चेहरे की चमक काम कर लेना आप. पता लगे नानी आपको दमकता देख कही लाइट हे न बंद कर दे.", ऋतू इतना सब बोल कर जैसे हे बहार भागी रेखा उसको डांटने के लिए उठती हुई वापिस धम्म से बिस्टेर पर हे बैठ गयी. दरवाजा भी बंद हो चूका था लेकिन दर्पण में रेखा खुद अपने सुर्ख होते गोर चेहरे को देख चकित थी और कानो में अर्जुन द्वारा पुकारा जाता उसका नाम.. 'तिलोत्तमा'.. बातों बातों में उसकी बेटी ने अतीत से वर्तमान में उलझा कर उसके मुँह से वो नाम उगलवा हे लिया था पर ाचा खेल था.

'अब इतिहास तोह दोहराया नहीं जानेवाला और जब मेरी बेटी विकल्प हे नहीं रखती जीवन में तोह ये मेरी हे जिम्मेवारी है की रिश्तो को और गहराई से समझना होगा. तिलोत्तमा अकेली थी और सामने 2-2 परिवारों के साथ समाज. मामला यहाँ भी कुछ ऐसा हे है लेकिन शायद परिवार कही ज्यादा. वारिस एक लेकिन काबिल. सब उसका हे है तोह समय के साथ ढालना हे सही.'

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"इतनी देर से क्या देख रही हो अँधेरे में उधर? अकेली आयी हो क्या यहाँ फंक्शन में? कुछ भी कहो, पार्टी में तोह सबकुछ फीका हे दिखा लेकिन असली ख़ूबसूरती यहाँ मेरे सामने कड़ी है.", काली कमीज और नीली जीन्स पहने ये 6 फ़ीट लम्बा युवक आकर्षक भी था और रईस भी जो उम्र में 22-23 का रहा होगा लेकिन आधुनिक और दिलफेंक. हाथ में बियर भरा पतली डंडी वाला गिलास और आँखों में ख़ास चमक. वो laal-neele आधुनिक परिधान में क़ैद खूबसूरत लड़की तोह इस आवाज और ऐसे व्यवहार से हड़बड़ाती हुई 4 कदम पीछे हे हट गयी. गोरी बाहें वस्त्र न होने से बेपर्दा थी और चेहरे की मासूमियत कुछ डर से भरी जैसे किसी ने उसको रेंज हाथो पकड़ लिया हो.

"It's नोने ऑफ़ योर बिज़नेस सो जस्ट लीव.", लड़की ने कुछ हिम्मत दिखते हुए युवक को जवाब दिया तोह टेढ़ी मुस्कान देते हुए उस सजीले युवक ने एक हाथ से अपने बालो को दुरुस्त किया और फिर एक घूँट बियर पीने के बाद एक कदम आगे बढ़ने के साथ अपने सीधा हाथ भी आगे किया.

"बोल्ड हो ब्यूटीफुल होने के साथ. ाची बात है और मैं तोह खुद अंदर बोर हो रहा था इसलिए बहार टहलने लगा. माइसेल्फ सुशांत अग्निहोत्री, अग्निहोत्री हैंडलूम्स, अग्नि स्टील्स का वारिस और तुम्हारी तरह दिल्ली से हे हु. तुम्हे एक बार पहले भी देखा था पर हमारी मुलाकात नहीं हो सकीय थी क्योंकि तब तुम अपनी माँ के साथ थी ी गेस.. क्सक्सक्सक्स फार्म पर वो पार्टी मेरे अंकल की हे थी.", सुशांत अग्निहोत्री को अपने रसूख और व्यक्तित्व पर भरपूर नाज था लेकिन लड़की ने पीठ दिखा कर मुड़ने की कोशिश की तोह जैसे ये उस व्यक्ति से सेहन नहीं हुआ. उन्माद में उसने वो नाजुक कलाई थाम ली जैसे उसको यहाँ एकांत में किसी का डर हे न हो.

"बात हे कर रहा हु और तुम ऐसे भाव दिखा रही हो जैसे कही की महारानी हो. अरे यार बोर हो रहा हु, कंपनी हे दे दो.", लड़की अभी कुछ कहती उस से पहले हे अपने से 3 इनके लम्बे और कही ज्यादा तगड़े युवक द्वारा वो हाथ ऐसे पकड़ कर खोलना जैसे कागज़ की परत हो, देख कर सुशांत के चेहरे पर गुस्से के भाव उभर आये.

"मैं भी यहाँ अकेला बोर हे हो रहा था दोस्त. मुझसे हे बात कर लो, लड़की को अकेलापन पसंद है तोह जाने देना चाहिए. आप एन्जॉय कीजिये मिस और चाहे तोह वह जो कुर्सी लगी है उधर बैठ कर झील का नजारा ले सकती है. मैं सर्विस भिजवा देता हु आपके लिए.", ये अर्जुन हे था जिसने अभी तक सुशांत का हाथ थाम रखा था और वो लड़की बड़ी मासूम सी मुस्कराहट के साथ नजरो में हे धन्यवाद करती हुई कुछ इठलाती सी उस और चल दी जहा पीली लालटेन मेज पर पड़ी थी.

"तुम जो कोई भी हो, बीच में न हे पदों तोह बेहतर होगा. वो मेरी पहचान वाली है और तुम बेवजह हीरो बने जा रहे हो. जानते नहीं मुझे और अगर जानते तोह सुशांत अग्निहोत्री का हाथ रोकने से पहले हे माफ़ी मांग लेते."

"किस्मत तुम्हारी आज ाची है दोस्त की तुम एक ख़ास फंक्शन में आये हुए हो और मैं चाहता हु ये ाचे से निबट जाए. वार्ना मैं jaan-pehchaan बढ़ने में जरा भी यकीन नहीं रखता अगर सामने वाले के ऐसे नेक इरादे दिखे. दोबारा गलती दोहराई तोह तुम जिस किसी के भी बेटे हो, वो भी तुम्हे हे पाँव पकड़ने की गुहार करेगा. ये जगह मेहमानो के लिए नहीं है अगर ये बोर्ड पढ़ लिया होता तोह जान जाते. मैंने रिज़र्व करवाई है तोह इधर कदम नहीं पड़ना चाहिए.", अर्जुन ने जिस तरह से उसको हड़काया था सुशांत जबड़े भींचता हुआ पहले उस बोर्ड को देखने लगा जहा "रिजर्व्ड" लिखा था और फिर अपना आधा भरा गिलास एक तरफ फेंक कर तेज कदमो से भीतर जाने के लिए बढ़ गया. अर्जुन ने भी पीछे मदद कर उस लड़की को देखने की जगह भीतर का हे रुख किया.

"कहा रह गए थे तुम यार? चलो अब फॅमिली से मिलवाती हु तुम्हे. सब तोह खाने पीने में लगे है और जवान लोग डांस फ्लोर पर.", अर्जुन को ढूंढ़ती हुई जन्नत रस्ते में हे टकरा गयी जिसने बड़े अधिकार से उसका हाथ पकड़ा और साथ ले जाने लगी.

"आपके साथ चलने से लोग जाने क्या सोच रहे होंगे. वैसे हे आज कुछ ज्यादा हे जलवा हो गया है आपकी गाडी पर laal-batti रखने से."

"मुझे इनसे कोई लेना देना नहीं और फॅमिली में पता है की तुम मेरे दोस्त हो. वैसे बत्ती ाची तोह बहोत लग रही है वाइट मेरे पर. एक सपना तोह पूरा हो गया मेरा. हाहाहा..", जन्नत के तराशे हुए से एकसार सफ़ेद दांत और सुर्खी लगे होंठ से बनती मुस्कान देख अर्जुन भी खुद पर गर्व महसूस करने लगा. भीतर तोह नजारा पहले से कही ज्यादा हे रंगीन दिख रहा था. मंच के करीब हे माध्यम आवाज में चलते गांव की दुंन पर जगमग फर्श पर युवक युतियां और कुछ जोड़े बड़े हे रूमानी अंदाज में नाच रहे थे. गोलाकार 3 दर्जन से अधिक मेज पर कही पुरुषो की महफ़िल जमी थी तोह कही महिलाओं के कहकहे सुनाई पड़ते. ख़ास बात थी की यहाँ पुरुषो के साथ हे कुछ महिलाएं और युवतियां भी बियर, जूस मिली वोडका का स्वाद चखती दिखी. 20 से अधिक वेटर तोह इनकी सेवा में हे लगे थे और कई रसूखदार मेज की जगह खड़े हो कर नाचते ठुमकते जवान लोगो को देखते हुए शराब की चुस्कियों संग बातचीत करते दिखे. अर्जुन ने देखा की ऐसा हे एक झुण्ड उसकी तरफ हे नजरे किये था.

"Hello मीनाक्षी जी. आप कब आयी? जन्नत जी, ये मीनाक्षी जी है. ओह आप तोह जानती हे होंगी क्योंकि जीनत इनकी ख़ास दोस्त है.", अर्जुन ने यहाँ मीनाक्षी से हाथ मिलाया था और उसके साथ गगन से भी. बात आगे होती उस से पहले हे साक्षी इन दोनों को हे खिंच कर नाचने वाली जगह ले गयी जिधर हेमंत के साथ जीनत सहजता से नाच रही थी.

"मीनू बुलाती है जिनि इसको. ाची लड़की है और आज हे मिली हु मैं इस से. ये है मेरे चाचा जी मर उमेश कपूर और ये मेरी चची गौतमी जी. अर्जुन से मिलना था न आपने तोह मिल लीजिये. और ये मेरी प्यारी बुआ और उनकी लाड़ली बेटी, मेरी कजिन ाशी.", अर्जुन ने चाचा चची को हाथ जोड़े तोह गौतमी ने तोह आगे बढ़ कर गर्मजोशी से हाथ मिलाया जिसके बाद रवीना बुआ तोह सीधा गले लग कर मिली. अर्जुन के माथे पर हल्का पसीना उभरता देख उमेश जी हंस दिए उसकी हालत पर.

"बीटा, तुम पहली बार मिल रहे हो लेकिन परिवार के लिए परिचय की जरुरत नहीं है. वैसे जानू की चची और बुआ में अक्सर ऐसा हे चलता है. पार्टी में तुम आ कर भी पार्टी से गायब कैसे हो यार?", ाशी तोह कभी अपनी माँ और जन्नत को देखती तोह कभी अर्जुन को. फिर जन्नत ने हे आँखों से इशारा किया तोह उसने बड़े सलीके से हाथ मिलाया.

"अंकल जब फंक्शन जीनत और हेमंत का है तोह बेवजह मैं सेण्टर ऑफ़ अट्रैक्शन क्यों बनु. सुना नहीं था उन मंत्री जी को ये ाचा नहीं लगा था. आप लोगो से तोह मैं अब घर पे भी मिल सकता हु लेकिन यहाँ आये मेहमान और रिश्तेदार ज्यादा जरुरी है. देखिये अब फिर से कोई मेहमान आपसे मिलने आ रहा है.", अर्जुन की बात सुन्न कर उमेश जी ने एक तरफ देखा तोह उनके चेहरे पर मेजबान वाले भाव उबार आये इन महाशय को देखते हुए.

"Hello अग्निहोत्री जी. सॉरी, वो जरा बचो में आ गया था. चलिए वही चल कर गपशप करते है.", उमेश जी की बात पर इस 50 वर्षीय सभ्रांत दीखते महानुभाव ने झूठी मुस्कान दिखते हुए जवाब दिया.

"अरे नहीं भाई ऐसा ाचा नहीं लगता बीच में दखल देना. वो तोह मुझे जरा आपके इन ख़ास मेहमान के चाँद मिनट चाहिए थे अगर इजाजत हो तोह. वो क्या है न की सुशांत ने अभी बताया के ये हमारे जानकार है. बस 5 मिनट.", ये 5 मिनट उन्होंने जन्नत की तरफ देख कर कहा था और अर्जुन आँखों से हे उसको आश्वस्त करने के बाद अग्निहोत्री जी के साथ यहाँ से 20 कदम दूर चल दिया जहा ऊँचे काउंटर के करीब इन लोगो की महफ़िल कड़ी थी.

"ये अग्निहोत्री अंकल को अर्जुन से क्या काम पड़ गया चाचू? इनकी आदत नहीं बदलती क्या बीच में धमकने की?"

"जानू बीटा, मेहमान है और क्या पता जानते हो अर्जुन और उसके परिवार को. जानते हे होंगे नहीं तोह वो भी ऐसे मुस्कुराते हुए नहीं जाता.", जन्नत को जवाब देने के बाद उन्हें कोई और ले गया लेकिन यहाँ उसकी चची और बुआ अब जन्नत को हे घेर रही थी मस्ती मजाक करती हुई. वही अर्जुन वह पंहुचा तोह अधिकतर चेहरे अनजान हे मिले सिवाए सुशांत के जो अब काउंटर पर पीठ टिकाये अपने पिता की बगल में आ खड़ा हुआ था.

"बचे, किसी और की महफ़िल में क्यों सरवाले बन्न रहे हो? जब किसी को ढंग से जानते न हो तोह पहले जानकारी लेनी चाहिए और फिर ऐसी हिमाकत करने के बारे में सिर्फ सोचना चाहिए. करने की कोशिश तोह होगी भी नहीं कुछ जब जान जाओगे की हम कौन है. हमारे बेटे के हाथ पर हलकी सी सूजन के बदले मैं तुम्हे बहोत कष्ट पंहुचा सकता हु, माफ़ी मांग लो तोह बेहतर रहेगा.", दबी आवाज इतनी भी धीमी नहीं थी की वो करीब खड़े 6-7 लोग हांसे बिना रह जाते. जन्नत दूर कड़ी ये देख खुश हो रही थी की जैसे अर्जुन उन सभी को जानता है.

"माफ़ कर दीजिये अंकल जी. मुझे हाथ दबाना नहीं चाहिए था. अँधेरा था इसलिए देख नहीं पाया. बर्फ लगा दीजिये इसके हाथ पर, थोड़ी देर में हे ठीक हो जाएगा.", अर्जुन इतना बोल कर जाने लगा तोह अग्निहोत्री साहब ने उसके ऊँचे कंधे पर हाथ रखते हुए ना में सर हिलाया.

"माफ़ी के लिए या तोह कान पकडे जाते है या घुटने टिका कर नाक रगड़ी जाती है. छोटी गलती के लिए कान और जो तुमने की है उसके लिए बस घुटनो पर बैठ जाओ पहलवान."

"आप मेरे पिता की उम्र के नहीं होते और हम कही और मिले होते न अंकल जी तोह जितने ये khi-khi कर रहे है उनके जबड़े और आपके घुटने जमीन पर ला देता. अपने कपूत को कायदे में रखने के साथ खुद की अकड़ पर भी लगाम लगाए. हकार तोह बड़ो बड़ो का हे नहीं रहा और मैंने तोह आज तक ये अग्निहोत्री नाम सिवाए एक हीरोइन के किसी का सुना नहीं. पार्टी का मजा लो और अब मैं भी आपकी हे बात कहूंगा. जिसके बारे में जानकारी न हो, उसकी जानकारी लीजिये और फिर सोचने तक की कोशिश नहीं करेंगे, सपने में भी. करना तोह बहोत दूर की बात है.", अर्जुन की बात पर एक 40-45 बरस का आदमी गिलास रख कर उसकी तरफ बढ़ा हे था की किसी ने पीछे से उसका कन्धा ऐसा दबाया की पूरा झुण्ड हे अर्जुन को भूल गया.

"उमेद जी.. आप..", अग्निहोत्री के साथ बाकी सबका यही सवाल था और अर्जुन के करीब भल्ला, रौनकलाल जी आ खड़े हुए.

"ऐसी बात है बामन लाला के ये जिस शेर को तुम यहाँ घेरे खड़े हो न, इसकी दहाड़ उमेद पर भी भारी है. अगर मेरे सामने नजरे मिलाने की ताक़त नहीं रखते तोह मेरे बेटे की परछाई से तोह दूर हे रहना. बहोत देर से देख रहा हु की ये खुदको काबू किये हुए है कपूर और कैंसल परिवार के इस शुभ कार्यक्रम को मद्दे नजर रख कर. नहीं तोह अब तक उमेद सिंह बस लाशें उठवा रहा होता यहाँ से. दुनिया के लिए ये अर्जुन शर्मा है, शंकर शर्मा की औलाद लेकिन उसी दुनिया में ये अर्जुन सिंह भी है.. मेरा सिंह और मेरा वारिस. इस बार व्यापार वाली बात न है जो गज्जू सिर्फ दण्डित करके बक्श दे. इधर हे गाड़ दूंगा एक एक को और प्रशाशन खुद मदद करेगा.", उमेद सिंह सबको छोड़ कर अर्जुन को अपनी बगल में लगते हुए खड़ा हुआ तोह दोनों को एकसाथ देख कर अग्निहोत्री का तोह गाला हे सूख गया. वही उनको भल्ला और रौनकलाल भी खड़े दिखे तोह रही सही कसार भी पूरी हो गयी.

"जवान लड़के है उमेद जी...", अग्निहोत्री की जगह ये बात उस व्यक्ति ने कही थी जो इस सारे घटनाक्रम का गवाह था और इन सभी का हे व्यपारी बंधू. शकल से थोड़ा भरा हुआ और हलकी तौंद लिए पेट का स्वामी.

"प्रकाश तू तोह समझदार आदमी है और कपूर का ख़ास दोस्त भी. लड़के जवान है तोह जोश उन्हें आपस में निकाल लेना चाहिए और जब गूदा न हो तोह बाप के पिछवाड़े पर लात खिलवाने से बढ़िया की माफ़ी मांग ले. कान और घुटने टेकने की जरुरत भी नहीं, सिर्फ बोल भर दे की गलती हो गयी. चल मेरे चाँद, जरा मेजबानों से मिल ले. वैसे भल्ला जी यहाँ तोह ये भानुमति का लाडला (भानु) भी आँखें सेक रहा. ऊँगली किये बिना कैसे रह गया ये आपके साथ.?", अर्जुन ने एक बार जन्नत की तरफ देखा और एक बार अपने हँसते मुस्कुराते दैत्याकार चाचा की और जो नीली कमीज और ताम्बे रंग की पतलून के साथ घनी दाढ़ी में चहु और नजर आ रहे थे. कमर पर होल्स्टर में बंद रिवॉल्वर संकेत था की यहाँ अब उनकी भी दखल है अपनी सौंदर्य मौसी की वजह से.

"अर्जुन को घूमने देते उमेद. यहाँ कपूर भाई के बचे भी इसके दोस्त है और इसकी आंटी भी उनके हे बीच बैठी है. भानु पहले हे खार खाये हुए है अर्जुन से.", उमेद ये सुन्न कर हँसता हुआ ठीक भानु के पास हे आ रुका और सामने से हाथ मिलते हुए जिस तरह से उसने भानु को देखा भानु समझ गया था के अब पलड़ा बराबर हो चूका है.

"बचा अभी से सब dekh-samajh ले तोह बढ़िया है न गजेंद्र भाई साहब. वैसे अपने भानु जी इस बार हमारा मार्गदर्शन करने वाले है दिल्ली में. मतलब आपको जितवाने के लिए ये पूरी म्हणत करेंगे. लीजिये भानु जी, पार्टी की तरफ से आपकी पदोन्नति का पत्र हम स्वयं हे लिए आ पहुंचे. आप हमारे बड़े है और हमारे प्रदेश से दिल्ली में सब आपके हे कंधो पर तोह है. पार्टी ने दिल्ली का प्रभारी बना दिया है आपको, खबर कल दैनिक अखबार और पार्टी मुख्यालय से जारी हो जायेगी. उमेद सिंह कभी अपनों का बुरा नहीं करता.", भानु तोह वो लिफाफा खोल कर भीतर रखा पत्र खड़े खड़े हे पढ़ने लगा. पार्टी में आतंरिक कलह की वजह वो खुद था जो अकेला दिल्ली जीतना चाहता था बस भल्ला के क्षेत्र में उसकी दखल नहीं थी. यहाँ तोह उसको जमीनी राजनीति से हे हटवा कर दफ्तर में भठवा दिया गया था.

"धन्यवाद उमेद सिंह. और मुझे भी ख़ुशी होगी अगर भल्ला कार्यप्रणाली को सुचरी चलते हुए संसद का सदस्य बने. रौनकलाल जी जैसे महानुभाव साथ है तोह संदेह करना उचित नहीं. वैसे तुम्हारा सुपुत्र तुम्हारे हे जैसे तेवर रखता है. ये दिल्ली हरयाणा नहीं है, मित्रवत कह रहा हु. बचा अब घर का हे है."

"दिल्ली आया तोह आपके साथ फिर हम भी बेरोजगार न हो जाए भानु जी. वैसे इस प्रान्त में सरकार, प्रशाशन और ताक़त सिर्फ इसके हे पास है जिसको आपने देख कर अनदेखा किया होगा. जा बीटा तू अब अपने दोस्तों में khel-kood कर, मैं जरा महफ़िल का आनंद उठा लू थोड़ा. 2 घंटे बाद निकलना है.", अर्जुन का माथा चूम कर उमेद ने सबके सामने उसको अपने सीने से लगा कर फिर आजाद कर दिया. अर्जुन जानता था की ऐसा सिर्फ वो उसके हे साथ करते है, चाहे आसपास कोई भी हो.

"वैसे आपसे बात करनी है मैंने और उस हिसाब से एक घंटा फ्री रखियेगा."

"वो मैं पहले से जानता हु इसलिए आज ड्राइवर लाया हु.", उमेद ने अर्जुन को जवाब देने के बाद कपूर जी की तरफ रुख किया जहा वो भानु, भल्ला और रौनकलाल जी को भी साथ लेके गए. अर्जुन मुद मुद कर उन्हें देखता हुआ वापिस जन्नत की तरफ लौट रहा था लेकिन उस पर नजर अग्निहोत्री जी भी बरक़रार थी. चेहरे पर दर्द और अपमान का असर तोह था हे लेकिन उस से ज्यादा व्यथित थे वो अपने बेटे की मूर्खता पर. कही न कही चोट तोह लगी थी अंतर्मनन पे लेकिन वो क्या असर दिखने वाली थी ये न उन्हें खबर थी और न अर्जुन को.

"आप उनसे कुछ काम तोह नहीं डैड फिर भी आपके साथ साथ न अंकल कुछ कह सके और न आपके सब पार्टनर्स. हैं कौन ये लड़का?", आवेश में सुशांत इतना कुछ बोल गया था जिसकवा जवाब इनमे से तोह किसी के पास नहीं था लेकिन जाम परोसने वाले के साथ इधर आयी सुनयना ने जैसे इनकी चर्चा का विषय समझ लिया था.

"आप जिनके बारे में लड़का या कुछ भी अनाप शनाप बोल रहे है वो राजहंस के ओनर है सर. हे इस ओने अमंग था रॉयल्स. सब विरासत उनकी हे है और आज इस रंगमहल के नियम से आगे बढ़ कर इतनी बड़ी पार्टी रखवाना भी उनके ऑर्डर्स से हुआ है. आप अगर इरादे गलत रखते है तोह मैं बताना चाहूंगी की यहाँ जो भी सिक्योरिटी है वो सिर्फ उनकी हे है. और किसी की तोह गाडी तक पार्किंग एरिया से आगे नहीं आ सकती. हैवे ा प्लेअसेन्ट इवनिंग सर.", होंठ बिचकाती हुई सुनयना ने अलग हे जख्मो पर नमक लगा दिया था इन सभी के, अर्जुन का बचा हुआ परिचय देते हुए.

"ये raaj-pariwar का वारिस है? उमेद का भी और..."

"और प्रमुखता से अर्जुन है डॉ शंकर शर्मा का सुपुत्र और पंडित रामेश्वर जी का पौता. सावधानी रखियेगा अग्निहोत्री साहब, सुना है उनकी आँख में जो एक बार खटक गया वो सदा के लिए लटक गया. कानून और राजनीति भी फिर कोई मदद नहीं देने वाले. आप सज्जन व्यक्ति है इसलिए सोचा समझा दे. चलते है.", इनके करीब वाली गोलाकार मेज पर बैठे ये महानुभाव जाने कौन थे और इन्होने सारा घटनाक्रम ख़ामोशी से यही बैठे हुए देखा सुना था. हाथ में 555 सिग्रत्ते का पैकेट थामे वो जैसे बिना दस्तक दिए आये थे वैसे हे निकल लिए.

"अरे बीटा.. थोड़ा तोह अकाल से काम लेता. एक बार को ये उमेद सिंह फिर भी समझ सकता है लेकिन वो तोह आदमी हे नहीं जिसका ये बीटा है. माफ़ी तक न बोलने दी और ऐसे चले गए जैसे मौका दिया हो. चल अब यहाँ से निकलना हे बेहतर है और जितने पूरी जानकारी हाथ नहीं आती, इतने ख़ामोशी हे भली.", अपने बेटे का हाथ पकड़ कर अग्निहोत्री जी तोह बिना हे भोजन किये निकल लिए इस जवान होती रात में. पहले उन्हें अर्जुन ने शर्मसार किया था और फिर उमेद का एकाएक वह प्रकट होना. अब जानकारी भी मिली तोह बूते से बहार लेकिन व्यापारी आदमी था इसलिए कदम पीछे ले कर जीवित रहना हे बेहतर समझा.

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"दिल्ली कब आ रहे हो फिर हमसे मिलने?", यहाँ गोल मेज पर एकलौता पुरुष बस अर्जुन हे था और घेरे में बाकी 7 महिलाएं या लड़कियां. बगल में जन्नत का होना तोह लाजमी हे था पर अब दूसरी तरफ उसकी छोटी बहिन जीनत थी, हेमंत अपने होने वाले ससुर जी और बाकी गणमान्य व्यक्तियों में जो शामिल था. मीनाक्षी को इस पार्टी में गगन के साथ साथ कुछ और संगी सहेलियों का साथ मिल चूका था जिनमे साक्षी भी शामिल थी. यहाँ मेज पर सवाल रवीना जी ने किया था और उनके समीप बैठी आशा जी ने हे अर्जुन से पहले जवाब दिया, जैसे वो यहाँ उसकी संरक्षक हो.

"दिल्ली तोह ये एक या 2 दिन में आने हे वाला है पर लगता नहीं तुमसे मिल पायेगा. पहला प्रॉमिस हम ले चुके है रवीना और उसके बाद अर्जुन को घर छोड़ने की रिवायत भी पूरी करेंगे.", अब जन्नत ने कनखियों से अर्जुन को देखा जैसे इसके बारे में उसने जन्नत को क्यों नहीं बताया. वो तोह यहाँ भी उसकी ख़ूबसूरती की हे तारीफ कर रहा था आँखों हे आँखों में. लेकिन जीनत भी जैसे अलग हे दुनिया में थी जिसने अर्जुन का हाथ थाम कर अपनी गॉड में ला रखा.

"दिल्ली कही दूर तोह नहीं है आंटी जी और वैसे भी मुझे वह घर के जरुरी काम से जाना है. अब घरवालों को तोह आशा आंटी जी का हे पता है और इन्होने हे मेरे साथ घर आना है. हाँ अगली बार मैं जन्नत जी का शूट देखने आऊंगा न दिल्ली तोह आपसे भी मुलाकात रहेगी. आजतक असलियत में फोटोशूट नहीं देखा इसलिए जन्नत जी से रिक्वेस्ट की थी. वैसे मैं आगे की पढ़ाई दिल्ली से हे करने की इत्छा रखता हु, 2 साल बाद. यही छुट्टियां थी मेरे पास और इनके पूरा होते हे मार्च 2000 तक बस diwali-holi या नए साल पर हे घर से निकलना होगा.", अर्जुन की बातें स्पष्ट और साधारण थी जो गौतमी को अजीब लगी तोह वही रवीना और आशा जी खासी प्रभावित दिखी. जन्नत ने भी एक हाथ मेज पर कोहनी टिकते रखा और दूसरा हाथ अर्जुन के गॉड में रख लिया उसके दूसरे हाथ की उँगलियों में उँगलियाँ फंसते हुए. नजरे ऊपर हे थी सबके बीच.

"पार्टीज का शौक नहीं रखते तुम? तुम्हारी आगे के योंग्सटर्स तोह राजधानी में सिर्फ night-clubs और 5 स्टार होटल्स के बार में जाना पसंद करते है. थोड़े मॉडर्न है और लाइफ स्पीड से जीने में यकीन रखने वाले. हाँ हर कोई उतना रईस नहीं हो सकता पर तुम्हे थोड़ा बहोत तोह.. ी मैं ाचा लगेगा तुम्हे.", गौतमी ने बात तोह कहने को कह दी पर जन्नत के बोलने से पहले अर्जुन ने हाथ दबा कर उसको रोक लिया था.

"ऐसा है आंटी जी मेरी भी रफ़्तार थोड़ी ज्यादा हे तेज हो चली थी जिस वजह से आज हे इस पर ब्रेक लगे है. हाँ मैं धुंए भरे बंद क्लब और होटल्स की जगह खाली सुनसान सड़क, नदी, पहाड़ो और भीड़ से दूर जीना ज्यादा पसंद करता हु. बाकी अभी तोह क्या कह सकता हु आने वाले समय के बारे में. क्या पता जैसा आपने कहा वैसा भी करू. इंसान को अगर क्लब में ख़ुशी मिलती है तोह वह जाना ठीक और अगर ख़ामोशी में सुकून मिलता है तोह वो भी इतना बुरा नहीं. वैसे आपका कभी दिल करे तोह बताइयेगा मुझे. जन्नत जी और इनके बुआ जी से तोह मेरा एक ट्रिप फाइनल हो चूका है बसंत बाग़ का. एक महीने बाद मेरी पढ़ाई शुरू होने वाली है तोह उस से पहले इनका प्रोग्राम है वह घूमने का. जो भी चलना चाहे साथ चल सकता है.", यहाँ वेटर ने 2 और कुर्सियां लगा दी और दूसरे वेटर ने टेबल साफ़ करने के बाद सबकी पसनद के ठन्डे, बियर और खाने का सामान सजा दिया. नए शामिल चेहरे में मेघना जी और श्रीमती कैंसल थी जिनके बगल में बैठने से पहले हे जीनत ने अर्जुन क हाथ छोड़ दिया. पर ये मेघना जी की नजरो से न बचा था जिस पर उन्होंने अपनी छोटी बेटी को घूरा तोह उसने नजरे झुका ली. अर्जुन तोह और कही देख हे नहीं रहा था गौतमी जी को जवाब देते हुए.

"ये कौनसे बसंत बाग़ की चर्चा चल रही है यहाँ जवान लोगो के बीच? वैसे आशा कही तुम तोह नहीं जा रही गजेंद्र भाई साहब के साथ?", श्रीमती कैंसल जी के कथन पर सबकी हंसी निकल गयी थी और इस से साफ़ था के वो महिला हसमुख होने के साथ mel-jol रखने वाली इंसान थी.

"कुछ नहीं दीदी मैं तोह बस सुन्न कर हे खुश हो रही थी की मेरी भतीजी घूमने जा रही है. अब ये बसंत बाग़ नाम से कोई दूसरा होटल खुला होगा शायद जो महल वाले की कॉपी होगा. उधर जाने की कोई बात करता तोह मैंने अभी सिग्न करवा लेने थे कोरे कागज़ पर.", गौतमी की बात पर मेघना जी अपनी बड़ी बेटी को टेबल से हे झुक कर देखने लगी, हँसते हुए जिस पर जन्नत भी हंस रही थी और रवीना जी भी.

"कोई ख़ास जगह है क्या ये बसंत बाग़ गौतमी?"

"आशा दीदी, वो प्राइवेट प्रॉपर्टी है किसी राजघराने की और उनकी हे वजह से हिमाचल में उस तरफ कोई प्रोजेक्ट नहीं लगाया जा सकता क्योंकि साड़ी जमीन हे उनकी है. हाईवे के लिए जगह दी है बस उन्होंने पर तस्वीरों में देखा था की असली महल और baag-bagiche कैसे दीखते होंगे. पता नहीं किसका है और ये लोग कहा जाने का प्लान कर रहे hai.",Gautmi के इतना कहते हे जन्नत हंस हंस कर दोहरी हो गयी जिसको अर्जुन ने हे गिलास बढ़ा कर पानी पिलाया तोह कई नजरो ने इन्हे देखा.

"अब आपने बात हे ऐसी कर दी चची की क्या हे कहे? बसंत बाग़ की मालकिन अर्जुन की माँ है और ये हे वह का वारिस है. हाँ उसी का जिधर पापा को भी प्रोजेक्ट के लिए जगह नहीं मिली थी. ाची बात है न की नहीं मिली और वो आज भी उतना हे hara-bhara और खूबसूरत है. हैरान होने की जरुरत नहीं है चची क्योंकि अभी भी इसके माँ और सिस्टर्स वही हॉलीडेज स्पेंड कर रहे है. बुआ ने कहा की इन्हे वो अंदर से देखना है और मेरा दिल था की उस जगह एक शूट सिर्फ अपने लिए किया जाए. और अर्जुन ने परमिशन ले ली अपनी माँ से.", अब यहाँ श्रीमती कैंसल जी ने भी बड़े गौर से अर्जुन को देखा और फिर मेघना को.

"अब है तोह वो घर हे न आंटी. क्या फरक पड़ता है की उसका नाम क्या है और अगर आपकी इत्छा है उसको देखने की तोह उसकी कोई टिकट तोह है नहीं. बस मम्मी से पुछा था दोपहर में और उन्होंने कह दिया की वो अर्रंगे करवा देंगी रहने और खाने के हिसाब से.", अर्जुन ने इतनी देर बाद कही जूस का गिलास उठाया था उस पानी के एक गिलास के बाद जो डेढ़ घंटे पहले पिया था.

"अब तोह हमने भी देखना है लेकिन सर्दियों की छुट्टियों में. गुड़िया की टूशन चल रही है और गोलू भी घर आया हुआ है तोह जाना मुमकिन नहीं. रेखा दीदी के साथ हे जाउंगी वह पर.", आशा भल्ला जी ने यहाँ अर्जुन की माँ का नाम लिया और उनके अपनेपन पर अर्जुन भी खुश था जैसे इन सबके बीच उसका एक अलग सा रिश्ता बन चूका हो आशा जी से. अर्जुन ने सहमति में मुस्कुराते हुए हामी भर के इसकी पुष्टि करि थी.

"मुझे पता नहीं था और वो होटल वाले मजाक के लिए माफ़ करना मुझे.", गौतमी ने जैसे सबके सामने माफ़ करना कहा तोह अर्जुन ने थोड़ी हैरानी से उन्हें देखा.

"यहाँ तोह आप सब भी परिवार जैसे हे आंटी और मेरे कौनसा चेहरे पर लिखा है की उस जगह से मेरा कोई लेना देना होगा. माफ़ी के बदले अब आपको भी साथ हे चलना चाहिए.", अर्जुन ने ये कहा तोह ऐसे हे था लेकिन रवीना ने यहाँ उसको हे लपेट लिया.

"हाँ गौतमी भाभी, तुम भी साथ हे चलना काम से काम मेरे हे लिए. वह जा कर जानू को मैं दिखने वाली नहीं और ये जनाब तोह तुम खुद हे देख लो कैसे गोपियों से घिरे बैठे है. इनके जादू भी ऐसे है जो एक एक करके सामने आते है पर उसके लिए इनका भी होना जरुरी है. पार्टी भी तोह इनकी हे जगह चल रही है. यकीन न हो तोह बड़ी भाभी से हे पूछ लो.", अब अर्जुन थोड़ा सा झेंपने लगा था और उसकी हालत देख कर जन्नत ने हे उठते हुए कहा.

"माँ, अर्जुन ने थोड़ी हे देर में निकलना है उमेद अंकल के साथ. मैं जरा इसको डिनर करवा दू तोह ठीक रहेगा."

"हाँ वैसे भी कहा हमने तुम्हे बात करने दी है तुम्हारे... अर्जुन.. ी मैं दोस्त से.", रवीना ने जैसे हे अगली फिरकी ली जन्नत के जाने से पहले हे मैनेजर ने अर्जुन के करीब आ कर कान में कुछ कहा.

"10 मिनट में आता हु चाचा जी से मिल कर. फिर डिनर करते है.", अर्जुन ने भी बड़े हे प्यार से जन्नत से कहा था जो किसी और ने तोह नहीं सुना पर देखा की कैसे वो जन्नत के करीब खड़ा था. जानत ने भी चमकती आँखों से हामी भरी और वापिस अपनी जगह आ बैठी.

"मेघना, लड़का भी कही से काम नहीं है. मैं तोह पहली बार जानू बिटिया को किसी के साथ ऐसे उन्मुक्त देख रही हु. बात कर ले अगर मुमकिन हो तोह. इसकी और हेमंत की जहा करनी है वैसे हे इन दोनों की हो जायेगी. Kad-kaathi, बोलने का सभ्य अंदाज और अपनापन है बचे में और ऐसा लड़का नसीब से हे मिलता है.", अब कौन जवाब देता कैंसल मैडम को इस मामले में लेकिन किसी को तोह कुछ कहना था और ये बात आशा जी ने हे राखी. जन्नत ने तोह अभी भविष्य के ख्वाब देखे हे कहा थे.

"दीदी, लड़का तोह जैसे आपको पसंद आया वैसे हे मुझे भी अपनी आशिमा के लिए भ गया था. और मेरी बिटिया से ज्यादा जानू बिटिया की जोड़ी इसके साथ ाची दिखती है लेकिन मेरे, आपके या मेघना जी के चाहने से रिश्ता होता तोह हमसे पहले हे वो किसी और के घर का दामाद बन चूका होता. जानते है ये जो दिख रहा है वो बहोत काम है इसके व्यक्तित्व के हिसाब से. मुझसे पूछो कैसे इसने मेरा संसार बिखरने से बचा लिया चाहे मेरे पति का नाम कितना हे मजबूत हो.", इसके बाद 5 मिनट में आशा जी ने अर्जुन के किरदार का जो विवरण प्रस्तुत किया उसको सुन्न कर वह बैठी हर महिला के साथ जीनत और जन्नत भी भौचक्की रह गयी. अर्जुन तोह उन्हें बस एक भला और पारिवारिक जिंदादिल इंसान हे दिखा था जिसमे घमंड naam-matra नहीं था पर वो क्या कुछ करने का दम रखता है वो भी एक बाहुबली की बीवी खुद बता रही थी, जान कर कइयों के पसीने निकल गए.

"आंटी, इसने अकेले हे साहिल की जान बचाई वो भी उसको अनजान जगह से ढून्ढ कर और बाद में किडनैपर्स मारे भी गए.? सब अकेले ने हे किया?"

"नहीं दीदी अर्जुन भैया न किसी की जान नहीं लेते पर हैं वो हीरो. बहोत पिटाई की थी उन्होंने सबकी और जब मुझे होश आया था तब तोह वो सभी बाद मॉन्स्टर्स बेहोश हो चुके थे. आपने उनके मसल्स नहीं देखे न कभी, इसलिए उनकी पावर नहीं जानती. डॉक्टर चाचू ने डैड को बताया था की एक बहोत बड़ा मॉन्स्टर (तांत्रिक) था कही जिसको अर्जुन भैया ने अकेले हे फिनिश कर दिया. हे इस रियली स्ट्रांग एंड बाद हीरो. नहीं बाद नहीं गुड हीरो हे है और मेरे हीरो भी.", साहिल हाथ में कोला लिए अपनी माँ की गॉड में हे आ बैठा था और वही खूबसूरत सी लड़की laal-neele परिधान वाली आशिमा थी जो नजरे झुकाये सब सुनती हुई बस मुस्कुरा रही थी.

"हम्म्म. फिर तोह वो बाद हीरो सचमुच नहीं है. लेकिन फाइट करना ाची बात तोह नहीं है न साहिल?", जन्नत ने माहौल को समझते हुए ये चर्चा बाद में हे करनी बेहतर समझी थी.

"बूत फॉर ा गुड पर्पस आईटी इस अक्सेप्टबले दीदी. डैडी बोलते है मैं डाइटिंग करूँगा तोह भैया जैसा बन सकता हु पर भैया बोलते है की अभी मैं छोटा हु और पिज़्ज़ा बर्गर मेरे लिए अभी ठीक है."

"झूठे.", इतनी देर में आशिमा ने पहला शब्द कहा था और सभी खिलखिला उठे इन भाई बहनो को देख जहा साहिल का मासूम चेहरा और आशिमा की सुर्ख रंगत हे भाई बहिन का प्रेम था.

"आज के लिए दीदी, बस आज के लिए. वो मुम्मा हम तोह भूल हे गए बताना की पापा डिनर के लिए बुला रहे है आपको. फिर चलना भी है और अर्जुन भैया पापा के साथ हे है.", साहिल की बात सुन्न कर आशा जी ने एक बार फिर से मेघना जी के समस्त परिवार को मुबारकबाद दी और अपने दोनों बचो को लिए वो भी इस हरी भरी टेबल से विदा लेती हुई उठ गयी.

"मैंने तोह पहले हे कहा था की अर्जुन कुछ और भी है. आपके साथ वो अलग है, हमारे साथ भी पर उसकी अपनी लाइफ है दीदी. आप तोह ऐसे टेंशन ले रही हो जैसे उसने कोई कसम टॉड दी हो.", कैंसल जी अपनी बीवी को बुलाने आये थे और उनके जाते हे जीनत ने ये राग छेड़ दिया. अब इनके बीच साक्षी और मीनाक्षी भी आ बैठी थी.

"नहीं मेरा उस से कोई कंसर्न नहीं है जिनि. लेकिन ऐसे जान खतरे में डालना तोह ठीक नहीं वो भी प्रोफेशनल किडनैपर्स के सामने अकेले हे."

"अगर आप यहाँ अर्जुन जी की बात कर रही है तोह फिर मैं भी कुछ बताना चाहती हु जन्नत दीदी. उनके लिए परिवार, अपने लोगो और अनजान भले इंसान की कीमत भी सबसे ऊपर है. जहा raaj-pariwar और खुद उसके परिवार के बड़ो के सर झुकने लगे थे वही अर्जुन ने अकेले हे उस काले राक्षस से तांत्रिक को टॉड कर रख दिया जिसके सामने 16 गाँव में कोई बोलने का साहस न कर सका. गांव में आये हफ्ता भर हुआ तोह उसने उन लोगो की हड्डियां टॉड दी जो आने वाली पीढ़ी की नसों में जहर भरते थे, लड़कियों औरतो के साथ जबरदस्ती करने के साथ हत्या तक के जुर्म उनके सर थे. भले हे अर्जुन जी चेहरे से मासूम है और दिल के भोले भी लेकिन मेरे दादा जी, लाला जी कहते है उन्हें सब. उनका कहना है की अर्जुन जी का जीवन उद्देश्य हे यही है और उनकी विरासत में उन्हें जो मिला है उसमे दौलत से ज्यादा तोह जिम्मेवारियों का वो बोझ है जिसको और कोई नहीं देख सकता. जो ऐसी चाहत रखते थे वो पंडित मोतीलाल जी थे, महल के मुंशी लेकिन आचरण से यहाँ के राजा. अगर कभी आप पर मुसीबत आयी तोह दुनिया भले हे कुछ न कर सके लेकिन अर्जुन जी जरूर उसमे शामिल हो जाएंगे. कहते है न विरासत में दौलत से अनमोल लोग मिलते है और वो ऐसे वारिस है जो हर करीबी को अपनी दौलत मानते है. आपने कल मिलने का समय दिया, उसके लिए थैंक यू कहना था दीदी. मैं चलती हु बस जिनि को विश करने रुकी थी. सॉरी अगर कुछ गलत कहा हो तोह.", हाथ मिला कर मीनाक्षी ने बाकी सबका अभिवादन किया और इन्तजार करती गगनदीप के साथ इस पार्टी से निकल चली.

"हम्म्म्म.. बड़ा मल्टीकलरोड इंसान निकला ये तुम्हारा दोस्त जिनि.", साक्षी ने अर्जुन को उसका दोस्त कहा तोह जीनत तुरंत ना करती हुई बोली.

"मेरा दोस्त नहीं है वो और है भी तोह बस नाम का हे. दोस्त तोह वो दीदी का है और अब पक्का अर्जुन की क्लास लगने वाली है.", जन्नत तोह अर्जुन को करीब आता देख तेज कदमो से उसकी हे तरफ बढ़ गयी थी. शायद उसका मानसिक दबाव बढ़ चूका था सबकुछ जान कर लेकिन थी तोह असलियत. आखिर वारिस भी ऐसे तोह नहीं बना जाता.
 
अपडेट 218

वारिस (2)

"अभी तक जाग रही हो बीटा? तुम तोह कह रही थी की कल जल्दी उठना है.", छोल साहब के घर अक्सर 10 बजने तक सभी सदस्य सक्रिय रहते थे सिवाए उनके. फ़ौज के समय से हे उनकी दिनचर्या एक समयसारिणी से बरकरार थी जिसमे सही समय पर सोना और उठना एक नियम था. आज भी वो अपने कक्ष में सोने जा चुके थे और पारवती भी यहाँ रसोई समेटने के ऊपर अपने कमरे में थी. घर का मुख्या दरवाजे का टाला लगा कर भीतर आती रोमिला ने कुछ परवाह से प्रीती के कमरे का दरवाजा खोला तोह अपनी बेटी को एक हाथ से बाल संवारते और दूसरे से कलम चलते पाया. काली बनियान और सफ़ेद निक्कर में उसका या प्राकृतिक स्वरुप बेहद मोहक था. अपनी माँ की आवाज सुन्न कर उसने चेहरे ऊपर उठाया तोह वही neeli-hari आँखें और धनुषाकार गुलाबी होंठो के साथ चेहरे पर ख़ास चमक विराजमान थी.

"बस माँ ये थोड़ा तवो पॉइंट पर्सपेक्टिव समझ रही थी. मतलब वो कोमल दीदी से आज स्ट्रुक्टर आसानी से कैसे बनाया जाता है वही सीखा था और सोने से पहले बस एक बार तरय करके देख रही थी. आप आज बोर हो रही है?", रोमिला एक गहरी नीली निघ्त्य पहने दोनों हाथो से बालो को समेत कर प्रीती के करीब हे रख टेबल से रबर उठा कर अपनी जुल्फें बांधती हुई अपनी बेटी की हे बगल आ बैठी. यही खासियत थी दोनों माँ बेटी की जिन पर कुदरत का हर रंग क़यामत हे लगता था. बेरंग होने पर तोह उनका खुदका नूर हे कही ज्यादा प्रभावी था. प्रीती के सामने राखी कोरे पन्नो की फाइल को उठाते हुए रोमिला ने वो दो मंज़िला ईमारत का चित्र देखा जिसमे हर लकीर जीवंत सी जान पड़ती. बगीचे, गाडी और यहाँ तक की आसमान का स्वरुप तक ऐसे उकेरा गया था जैसे कोई मचिनी काम हुआ हो. रोमिला स्वयं के विख्यात चित्रकार थी, व्यापार सँभालने में सक्षम होने के साथ.

"वाह.. कोमल मुझसे तोह कभी कुछ शेयर नहीं करती लेकिन उसने तोह तुम्हे थोड़े समय में हे कॉलेज के तीसरे साल आने वाला सब्जेक्ट समझा दिया. कहा कैसी लाइन्स और कितनी बोल्ड या किस एंगल पर बनेंगी सबकुछ बहोत साफ़ है. तुमने स्केल उसे किया है क्या बीटा?", रोमिला बिस्टेर भी देख रही थी जैसे प्रीती के जवाब की पुष्टि कर सके.

"दीदी कहती है की जो आपके हाथ में हो वही मापने के औजार है. फिर चाहे वो पेंसिल हो या पेन या फिर पेंट ब्रश. आर्ट में तोह ज्योमेट्री उसे नहीं होती लेकिन उनका ये भी मान न है की प्रैक्टिकल लाइफ में हमको इतना तैयार रहना चाहिए की अगर कोई अपना आईडिया बताये तोह टूल्स की जगह बस ब्रेन और एक पेंसिल से कनेक्ट हो जाओ. पता है माँ ये मेरा पहला वर्क है जो इतना साफ़ बना है पिछले 10 दिन में. उनका हाथ तोह मुझसे भी कही ज्यादा स्टेबल है. नहीं ऋतू दी से भी कही ज्यादा. सर्किल, चउरवे और कैसी भी लाइन हो कोमल दीदी बहोत स्मूथ और परफेक्ट बना देती है.", रोमिला को अपने अनुभव से तोह यही लगा की कोमल को कुछ ाची समझ है इस गणित की क्योंकि अपनी चित्रकारी तोह कभी कोमल ने सार्वजानिक की हे नहीं थी सिवाए करीबी के.

"सही कहती है वो लेकिन हायर स्टडीज के टाइम तुम्हे किट और सब्जेक्ट प्रोटोकॉल्स हे फॉलो करने पड़ेंगे बीटा. वह डिफरेंट आर्किटेक्चर और उतना हे अलग उन्हें दिखने के लिए कलर्स, वैल्यूज और डाइमेंशन्स की जरुरत पड़ेगी. थोड़ा बहोत आर्टिस्ट टच रहेगा तभी 90स स्कोर कर सकती हो और काम से काम इतना जरुरी भी है अगर किसी बड़े फर्म में ट्रेनिंग करना चाहती हो तोह. ये ाचा काम है वैसे."

"आपको लगता है की कोमल दीदी को सिर्फ सब्जेक्टिव नॉलेज है माँ? उन्होंने आपके ार्टवर्क्स देखे है और तारीफ भी की थी. उन्हें आपकी फोटोग्राफी भी पसंद आयी जो मेरे कंप्यूटर में सेव थी लेकिन आपको भी दीदी के स्केच देखने चाहिए. रुकिए 2 है मेरे पास जिनमे से एक तोह उन्होंने आज हे बनाया था जब मैं उधर प्रैक्टिस कर रही थी.", प्रीती जानती थी की उसकी माँ इन मुद्दों पर ज्यादा बातचीत नहीं करती क्योंकि उनके काम की समझ यहाँ भला कैसे कोई रखता होगा. प्रीती उठ कर अपनी अलमारी से कुछ निकलने के बाद वापिस रोमिला के सामने बैठी और उस फाइल से एक सफ़ेद पन्ना उनकी तरफ बढ़ा दिया. पन्ना कुछ मोटा और साधारण कॉपी से बड़ा हे था. रोमिला ने जहा सिर्फ एक नजर पहले वाली ईमारत को देखा था वही इस बार वो उस चित्र को देखती हे रह गयी जो नीले ball-pen से बनाया गया था. Hu-ba-hu वो उसकी बेटी प्रीती हे थी जो गंभीरता से पढाई करते हुए एक हाथ कान के पीछे किये जैसे आगे आते बालो को संभल रही थी और दूसरे हाथ में पेन था. खासियत ये थी की उस चित्र में उनकी बेटी के चेहरे का हर भाग और उस पर पड़ती छाया को भी aadhi-tedhi लकीरे सो बखूबी दर्शाने के साथ कान के महीन टोपस और गले की चैन के फंदे तक एकसार बने थे. प्रीती के बालो पर रौशनी, छाया के साथ एक एक लत्त स्पष्ट उकेरी गयी थी. निचे उसका परिधान बेहद सदा लेकिन उभारो और कटाव को बयान करता. रोमिला के चेहरे पर हैरानी देख प्रीती जिस तरह से मुस्कुराई थी उस से साबित होता था की कोमल को उसकी माँ ने कमतर आंक कर भूल हे की थी.

"वाओ.. सिम्पली वाओ प्रीती.. थिस इस सो नेट एंड परफेक्ट. ये कोमल ने लाइव बनाया था और वो भी डायरेक्ट पेन से..? मेरा मतलब कोई पेंसिल से पहले ..."

"नहीं माँ.. कोई अंडरलाइन या करेक्शन नहीं की दीदी ने. मैंने तोह बस 30-35 मिनट वो डिज़ाइन बनाया था और उतने हे टाइम दीदी मुझे ड्रा करती रही. वो घर के काम और खुदकी पढ़ाई में बिजी जरूर रहती है लेकिन हर दूसरे तीसरे दिन कोई न कोई स्केच या पेंटिंग बना लेती है जब अकेली होती है. बहोत बार तोह उन्होंने सिर्फ yaad-dasht से हे बड़ी कॉम्प्लिकेटेड ड्राइंग की है. बड़े दादा जी के हॉल में जो पेंटिंग है लार्ड कृष्णा की, वो दीदी ने हे की थी. हाँ तब वो शायद 15 की रही होंगी. आपको याद है मैं जब इधर रहने आ गयी थी तब मेरी क्या आगे थी?", प्रीती ने अब अपनी माँ पर हे सवाल दे मारा जबकि वो तोह उस तस्वीर का बारीकी से निरिक्षण करने में हे उलझी हुई थी.

"हाँ तुम 8 की थी और तुम्हारे दादा जी से ज्यादा तुम रेखा की तरफ रही हो और फिर तुम चंडीगढ़ चली गयी. मुझे सब याद है."

"फिर ये देखो अगर मेरा चेहरा थोड़ा भूल गयी होंगी तोह. वैसे ऐसी कोई फोटो है नहीं क्योंकि अर्जुन यहाँ से जा चूका था जब मैं इधर आयी थी. लेकिन इसमें हम दोनों है और वो भी जब हम 8-9 साल के रहे होंगे. ये बनाई तोह दीदी ने अर्जुन के बर्थडे पर उसको देने के लिए थी लेकिन उन्होंने ये मुझे गिफ्ट कर दी. देखिये न माँ ये इस ड्राइंग में भी गुस्सा है और मेरा हाथ पकडे हुए वैसे हे रो रहा है जैसे शुरू से रोटा था जब हम वापिस जाने लगते यहाँ कुछ दिन रहने के बाद.", सचमुच वो एक जीवंत चित्रकारी का नायाब नमूना था. Gol-matol से गुलाबी चेहरे वाली एक विदेशी गुड़िया सी लड़की जिसने कंधे पर पतली पट्टी वाली नीली फ्रॉक पहनी हुई थी और हाथ में लकड़ी की खुलने वाली गुड़िया. दूसरे हाथ से वो उस hum-umar लड़के की सफ़ेद कमीज पकडे उसका गाल चूम रही थी जो उत्तेजित और गुस्से से भरा दूसरी तरफ देख रहा था. उसके हाथ में सलेटी पठार और कमर पर नीली निक्कर थी. लड़की के सुनहरी और गहरे कठै से बाल 2 छोटी चोटियों में बंधे और लड़के के कुछ काले और कुछ भूरे घुंगराले. निचे लिखा था ारु की विलायती गुड़िया. रोमिला की तोह आँखों में ख़ुशी के आंसू हे चले आये. वो यक़ीनन उसकी हे बेटी थी जिसकी याद कही बाकी थी तोह वो तसवीरे किसी एल्बम में बंद कही ट्रंक संदूक में दफ़न हे होंगी. और अर्जुन कैसा दीखता था उस दौरान ये उसको जरा भी याद नहीं था. पर इस चित्र में साफ़ था की वो उसकी बेटी के लिए बचपन से पागल था और उतना हे प्यार था प्रीती को अपने अर्जुन से.

"अर्जुन और तुम बने हे एक दूसरे के लिए हो बीटा. पता नहीं ये कैसे हुआ लेकिन यही सच है की मैं खुद अपनी बेटी के लिए इस से बेहतर इंसान कभी ढून्ढ हे नहीं सकती थी. तुम मुझसे लिखवा लो प्रीती की जब तुम माँ बनोगी ये ऐसे रोने लगेगा. हाँ ख़ुशी भी होगी और तुम्हारे दर्द से इसको भी दर्द होगा. क्या बोलता है वो तुम्हे अकेले में, मानो... मतलब बिल्ली.. हाँ वो नीली आँखों वाली सबसे खूबसूरत बिल्ली जिसका पोस्टर इस घर में लगा होता था जब तुम छोटी थी.", अपनी माँ को इतना खुश और उस पेंटिंग की बजाये उन दोनों की बात करने पर प्रीती सिकुड़ने लगी थी और आँखें साफ़ करके मुस्कुराती रोमिला ने अपनी बेटी का खूबसूरत हाथ पकड़ कर हथेली चूमते हुए यही दुआ मांगी की उनका कहा सार्थक हो.

"अभी उसके स्कूल ख़तम नहीं हुए और मेरा कॉलेज शुरू नहीं हुआ माँ और आप देखो कैसी बातें कर रही हो. कोई ये सब बोलता है क्या?" प्रीती को ऐसे झेंपते और गुलाबी होते देख रोमिला ने उसको अपने सीने से चिपका लिया. वो भी अपनी माँ से लिपट कर शर्म छिपाने लगी पर कामयाब न हो सकीय.

"अपनी माँ के देश में तुम दोनों होते तोह अब तक तोह तुम भी माँ बन चुकी होती फिर चाहे स्कूल जाती या कॉलेज. और मैं गलत क्या कह रही हु? शादी होगी तोह बचे भी होंगे और सभी को अपना अंश ज्यादा हे प्यारा लगता है लेकिन अर्जुन.. उसको औलाद से ज्यादा तुम हे पसंद रहोगी. वैसे वो तुमसे अभी से हे दबता है और मैंने खुद देखा है की तुम जैसे अब शर्माने का ढोंग कर रही हो, उसके उलट करती हो तुम उसके साथ. यही तोह प्यार है प्रीती जिसमे दोनों का तालमेल इतना खूबसूरत और समर्पित हो की उन्हें उसके सिवा कुछ प्रभावित हे न कर सके. रेखा कहती है की वो तुम्हारी बेटी को अपने पास हे रखेगी. मैंने कहा था के बीटा होगा तोह उसने साफ़ इंकार कर दिया. वो कहती है की उसके मुन्ना की चाहत हे इतनी ज्यादा है मेरी गुड़िया से की गुड़िया हे होगी. खुद हे सोचो बीटा तुम कितनी खुशकिस्मत हो जो तुम्हारे प्यार का एहसास हर उस इंसान को है जो तुम्हारे करीब है. वैसे अर्जुन ने कभी ऐसी इत्छा जताई है? बोल सकती हो मुझे क्योंकि इस उम्र से सिर्फ तुम हे नहीं गुजर रही. अक्सर 2 प्रेमी अपनी चाहत आपस में बताते जरूर है. और वो इतना भी शरीफ नहीं है.. हाँ तुमसे तोह ज्यादा शरीफ है लेकिन .. बोलो क्या चाहा उसने?", प्रीती मचलती हुई दूर होना चाहती थी लेकिन उसकी माँ ने वैसे हे आगोश में दबोचे रखा अपनी लाड़ली को.

"माँ.. स्टॉप आईटी.. इस सबका.. कोई मतलब nahi..Mujhe सोना है और जल्दी उठना भी है."

"मुझे पता है की तुम्हे क्यों जल्दी उठना है और तुम्हारे कमरे का बहार वाला दरवाजा अंदर से बंद भी नहीं है. जवाब दे दो फिर मैं चली जाउंगी.", प्रीती अपनी माँ के आंकलन पर हैरत से ऐसे देखने लगी जैसे इस छोटी सी बात का मतलब क्या है और उन्हें ये दिखा कैसे.

"वो आ रहा है न वापिस और थोड़ा पहले जिस से वो तुमसे मिल सके. दिवार कूदना भी ाची बात है और मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं. वैसे भी वो इस घर का बीटा और दामाद है. पर अब जवाब दो की अर्जुन ने तुमसे क्या चाहत राखी."

"हाँ.. जो रेखा माँ ने कहा वही बोलै था उसने.. और वो बेवकूफ है जिसको अभी से इस सबकी पड़ी है, पढ़ाई के पूरे 6 साल बाकी है लेकिन नहीं आपको नानी बन्न न है और रेखा माँ को दादी. माँ मेरे पास अभी आगे बहोत टाइम है पढ़ने और फिर कुछ करने का. ी मैं .. आप ठीक कह रही हो और ये भी है की शादी होगी तोह बचे भी होंगे.. पर अभी ये सब बात करना जरुरी है? मेरा फोकस क्यों खराब करना"

"मुझे कह रही हो की हमे जल्दी है और खुद बचा की जगह बचे बोल रही हो. दिल से तोह तुम हो हे ग्रीक.. वह भी यही मन जाता है के जबतक माँ बनती रहो, ख़ूबसूरती बानी रहेगी. मुझे क्या है, जितने चाहे करना लेकिन इस घर को वारिस भी तुमने हे देना है. जोएल इधर नहीं लौटने वाला. चलो अब सो जाओ अगर बंद आँखों से हे तुम्हे अर्जुन का इन्तजार करना है तोह. वैसे नींद तोह नहीं आती लग रही तुम्हे. और इस कपल ड्राइंग को फ्रेम करवा लो, बाद में बचो से भी मैच कर लेना जब वो होंगे.", प्रीती तुरंत हे उनकी पकड़ से छूट कर बाथरूम में जा घुसी. दरवाजा बंद करके वो खुद को सँभालने की कोशिश कर रही थी और इस हालत की वजह खुद उसकी माँ थी जो हंसती हुई कुछ समय बाद कमरे से बहार निकल गयी. अब रोमिला भी कही न कही कोमल की मुरीद बन चुकी थी जिसके हाथ में अपनी बेटी का वही चित्र था जो आज हे कोमल ने बनाया था.

'तुम आओ बच्चू.. मैं ढिंढोरा पिटवाती हु तुम्हारा तोह.. हद्द है.. माँ को हे बता दिया ये sab..',Preeti की तोह हालत ऐसी थी की अभी अगर अर्जुन सामने होता तोह पक्का कान पकड़ कर उसके कदमो में बैठा होता. पर वो अभी तोह कुछ दूर था अपनी मानो से.

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"पापा, वो अंकल आपको जानते है क्या?", यहाँ जीनत के रोकके पर अब लोग अपने अपने परिवार और दोस्तों के बीच भोजन का आनंद लेने लगे थे और ज्यादातर वही गोल टेबल्स पर विराजमान जबकि कुछ सीधा दूसरे हॉल में टहलते हुए अपनी सुविधा अनुसार विभिन्न पकवान का आनंद लेते हुए ऐसे बढ़िया जायके की तारीफ में व्यस्त दिखे. इन सबके हे बीच ये साक्षी थी जो अपने पिता और माँ के साथ एक अलग टेबल के गिर्द बैठी बिरयानी और जूस का मजा ले रही थी. इस महफ़िल में साक्षी पर भी कई जवान और अधेड़ लोगो ने आँखें सेंकी थी जिसकी वजह उसके कामुक परिधान के गले से नजर आती वो gori-gehri घाटी के साथ चेहरे की ख़ास चमक थी. यहाँ उसने सवाल अपने पिता प्रकाश जी से किया था और जिसके सन्दर्भ में पुछा था वो उमेद सिंह थे.

"वो नहीं मैं उनको जानता हु कहना सही रहेगा बीटा. वैसे उनका नाम उमेद सिंह है और तुम्हारे कपूर अंकल के साथ साथ उनकी कंपनी मुझे और यहाँ मौजूद दर्जन बुसिनेस्स्में को मटेरियल देती है. कही तुम इस वजह से तोह नहीं पूछ रही की उनका बीटा नरेश की बड़ी बेटी के साथ हे दिख रहा है यहाँ?", साक्षी ने ये सुन्न कर एक बार दूसरे हॉल में उस तरफ देखा जहा अर्जुन प्लेट हाथ में लिए था और उस से बातचीत करती जन्नत उसी प्लेट से खा रही थी. साक्षी को बेशक ये जोड़ी जरा न भाई पर वह मौजूद हर इंसान ने तारीफ तोह की थी, दबे छिपे हे सही.

"वो अर्जुन शर्मा है और इनका नाम आपने उमेद सिंह बताया. वीयर्ड. वैसे मुझे उस लड़के में इंटरेस्ट नहीं है पर जानू दीदी कुछ ज्यादा घुलमिल रही है उस से. फॅमिली नोन है शायद जैसे आप जानते है उन्हें.", साक्षी की बात पर उसकी माँ ने भी एक नजर वही देखा जहा बस 2 लोग बातें करते हुए खाना हे खा रहे थे पर प्लेट एक हे थी. ठीक तभी अर्जुन ने अपने रुमाल से जन्नत के होंठो के निचे कुछ साफ़ किया और वो मुस्कुरायी. दोनों वापिस खाना खाने लगे.

"कुछ भी कहो, जानू बिटिया अगर 20 है तोह लड़का 19 तोह नहीं है जी. मेघना और जिनि ने भी यही कहा के वो दोनों दोस्त है और जानू हमेशा की तरह अपने काम पर हे ध्यान देने का इरादा रखती है. वैसे साक्षी जो कह रही है क्या वो भी सही है.?"

"हाँ वो भी सच है लेकिन रर एंटरप्राइज के हर बिज़नेस का वारिस अर्जुन शर्मा हे है और बाकयदा कागज़ है इस बात के जिसमे उमेद जी ने अर्जुन को अडॉप्ट किया हुआ बीटा बताया है. इतने बड़े लोगो से हम लोग सीधा कुछ पूछ भी नहीं सकते और जरुरत भी क्या है. बाकी लड़का ाचा है चाहे बैकग्राउंड कितना भी पावरफुल हो या लोग कितने हे डेंजरस. सुलझी सोच वाले लड़का लड़की दोस्त क्यों नहीं हो सकते?", खतरनाक कहा था उसके पिता ने अर्जुन के परिवार को और साक्षी ने यही बात पकड़ ली.

"डेंजरस मतलब? गलत बिज़नेस जैसा कुछ पापा?"

"तुम धीरे बोलो बीटा.. कोई गलत बिज़नेस नहीं है लेकिन अगर किसी ने गलती की तोह वो दोबारा दिखाई हे नहीं देता. छोटा मोटा परिवार नहीं है ये जिसमे santri-mantri और सरकार के साथ जाने कौन कौन शामिल है. लोग सामाजिक है पर ताक़तवर भी. जानती हो भगवान नरेश (कपूर) ने जब अपनी बेटी का रिश्ता इनकी तरफ चलाया तोह पता लगा की अर्जुन पहले हे रोका जा चूका है. ऐसा होता भी क्यों नहीं जब बड़ा भाई अफसर हो और उसके बाद यही एकलौता पीछे बाकी हो. जैसे तुम कह रही हो की जानू बिटिया उसके संग ाची लग रही है पर रिश्ता मुमकिन नहीं तोह सोचो की वो लड़की कैसी होगी जिसको परिवार के साथ इस युवक ने खुद पसंद किया होगा? चलो भाई, मेरा तोह खाना हो गया. तुम लोग भी जल्दी निबटाओ फिर घर चलते है. भागदौड़ में आराम भी जरुरी है.", हाथ कपडे से साफ़ करते प्रकाश जी तोह जाने से पहले कपूर और कैनाल जी से मिलने चले गए जो एक बड़ी पारिवारिक मेज पर देखरेख हे कर रहे थे और उनके सेज सम्बन्धी, बचे, भतीजी भांजी वही मौजूद थी.

"अब तुम्हारा चेहरे क्यों उतर गया बीटा?", साक्षी की माँ ने अपनी बेटी को खाना अधूरा छोड़ कर बैठे देखा तोह पूछे बिना रह न सकीय.

"माँ, मुझे लगता था के हम लोग बड़े बिज़नेस पर्सन है और कपूर अंकल भी हमारे बराबर है लेकिन उनके रिश्ते को कैसे ठुकरा सकता है कोई?"

"तुम कहना क्या चाहती हो साक्षी? कही तुम भी उस लड़के के बारे में तोह नहीं सोच रही? गलती मैट करना कुछ भी ऐसा वैसा करने की बीटा. तुम जिधर बार बार देख रही हो वो मंज़िल दूर से देखना हे उचित है. तुम इसलिए सब पूछ रही थी न की कैसे भी तुम अपनी बात रख सको अपने पापा के सामने? बिज़नेस थोड़ा बहोत मैं भी देखती हु और इतना समझ लो की जहा 4-5 खानदान में एक हे वारिस हो उधर कोई भी छोटी सी गलती तुम्हारे साथ तुम्हारे परिवार पर भी मुसीबत ला सकती है. इस पार्टी में तुम्हे सिवाए यहाँ की सिक्योरिटी के किसी के भी पास पर्सनल बॉडीगार्ड या सेफ्टी नहीं दिखी होगी. जवानी वाली गलतियों और तुम्हारी आजादी पर हमने कोई रोक नहीं लगाईं कभी पर इस बात का ख़याल रखना की हमे ऐसा करने की सजा न मिले. मैं भी मेघना और उसकी संधान से मिल कर आती हु. फिर चलते है घर.", साक्षी ने जो भी तिकड़म लगाए थे वो काम न करते लगे और अपने परिवार द्वारा हे जब उसको सावधानी रखने की हिदायत मिली तोह उलझन में बस वो जूस का गिलास खली करके सीधा उस तरफ बढ़ चली जहा अर्जुन और जन्नत थे. उनका खाना तोह होंगे की रफ़्तार से धीमा चल रहा था और बीच बीच में जन्नत मुँह बनती तोह साक्षी को ये भी गंवारा नहीं लगा.

"जानू दीदी, आपको आंटी जी बुला रही है. मम्मी पापा भी जाने लगे है तोह मिल लेते आप.", जन्नत ने एक बार के लिए साक्षी को देखा और फिर चम्मच प्लेट में रखते हुए अर्जुन को.

"तुम साथ हे चलो..", वो अर्जुन से ऐसे पूछ रही थी जैसे अपने पति को कह रही हो की अलग क्यों रहना. अर्जुन के जवाब से पहले साक्षी हे बोल उठी.

"मैं अर्जुन को यहाँ कंपनी दे देती हु इतने.", जन्नत उसकी बात पर अर्जुन को देखने लगी जिसने सर हाँ में हिलाया तोह वो बस 5 मिनट का बोल कर तेज कदमो से चली गयी. अब अर्जुन वो प्लेट उचित स्थान पर रखने के बाद पानी हे पीने लगा था की साक्षी की शब्दों ने उसको झकझोर सा दिया.

"एक बहिन को उसकी सहेली के साथ निचे ले आये और दूसरी को प्यार से फांस रहे हो. तुम तोह बड़े पहुंचे हुए निकले मर अर्जुन."

"तुम्हे पता है साक्षी तुम क्या बोल रही हो? और ये जगह ऐसी बात करने के लिए ठीक नहीं है."

"क्यों? इजत्त का डर है क्या तुम्हे? पर जानू दीदी को तोह काम से काम पता होना चाहिए न की जिस पर वो लट्टू हुई पड़ी है वो वैसा है नहीं जैसा दिखावा कर रहा है.", अर्जुन साक्षी के नए और ऐसे नकरात्मक चरित्र की कल्पना तक से दूर था लेकिन वो ये सब उसके सामने बोल रही थी.

"तोह तुम्हारा मतलब साफ़ है की तुम जीनत की हमराज होने से ज्यादा उसके कंधे पर अपना उल्लू साध रही थी? क्या चाहती हो?"

"मैं चाहती हु की जब भी मैं चाहु तुम मेरे बुलाने पर मेरे आओ. और ऐसा करके मैं अपनी दोस्त को निचा नहीं दिखा रही. गलत इंसान तुम हो जो पहले से रिश्ता किये बैठा है किसी लड़की से और उसके बावजूद तुमने जिनि के साथ साथ मेरे साथ भी करने को इंकार नहीं किया. अब तुम उस खेल जब इतने माहिर हो तोह जानू दीदी को कैसे छोड़ सकते हो? और मेरी दूसरी शर्त यही है की तुम उनसे दूर रहो. होंगे तुम किसी बड़ी फॅमिली से लेकिन उन्हें जब मैं तुम्हारा रूप दिखाउंगी तोह िज्जात्तदार लोग क्या फैंसला लेंगे?", अर्जुन के चेहरे पर अब एकदम सार्ड और सख्त भाव उभर आये थे इतनी बड़ी बात और ऐसी शर्ते सुन्न कर. साक्षी अपनी हे गलती को अर्जुन पर थोप रही थी बिना ये सोचे की इसमें उसकी हे सहेली की इजत्त खराब होगी.

"बोल चुकी तुम तोह अब मेरी बात सुनो गौर से. वो सामने कपूर अंकल के पास जो खड़े है वो तुम्हारे पापा है न साक्षी? उन्हें अपनी बेटी का भी सच पता चलना चाहिए. जब तुम जिनि और मेरी इजत्त उछलने को तैयार हो तोह फिर खुद कैसे गंगा बानी रह सकती हो? अगर तुमने अपने दिल की बात प्यार से की होती तोह मैं सोच भी लेता पर नहीं तुम सीधा ब्लैकमेल करने चली आयी तोह फिर हर बात को हम लोग हे कबूल कर ले यही ठीक रहेगा. और बात यही ख़तम नहीं होने वाली अगर तुम सोच रही हो की इतना करना हे काफी रहेगा. आग लगेगी तोह झुलसना तुम्हे भी साथ हे है. देखते है अब तुम्हारे पापा अपनी बेटी के कारनामो पर क्या फैंसला लेते है और तुम्हारी बेस्ट फ्रेंड जिसके महत्वपूर्ण दिन पर भी तुम्हे अपना स्वार्थ हे नजर आया.", अर्जुन ने हाथ में पकड़ा गिलास एक तरफ रख कर अपने कदम उधर हे बढ़ा दिए जहा मुख्या मेजबान उपस्थित थे. साक्षी के तोह जिस्म को जैसे लकवा हे खा गया था जो स्तब्ध सी अपनी जगह कड़ी यही सोचती रही की आखिर दांव उसके ऊपर हे कैसे आ गिरा और ये गलती वो अपनी ख़ास सहेली के इतने ाचे अवसर पर कैसे कर गयी. जबतक वो संभालती तब तक अर्जुन प्रकाश जी और नरेश कपूर तक पहुंच चूका था. साक्षी सब भूल कर लगभग उस तरफ दौड़ हे पड़ी. चेहरे पर ठन्डे माहौल में भी पसीने छु ने लगा था और धड़कन जैसे दिल से अभी जुड़ा हुई.

"आपसे कुछ बात करनी थी अंकल जी. अगर आपके पास 2 मिनट है तोह.", अर्जुन के सपाट चेहरे पर कोई ख़ुशी या दुःख नहीं था. एक ऐसा लहजा जैसे वो कोई पेशेवर जुआरी हो. वह मौजूद कपूर जी का घर परिवार और स्वयं जन्नत उसको देख रही थी जो साक्षी के पिता से मुखातिब था. और अर्जुन को अपने सामने देख स्वयं प्रकाश जी भी पहले अपने दोस्त और फिर इस ऊँचे तगड़े युवक को देखने लगे जिसके साथ बातचीत की उन्हें कटाई उम्मीद नहीं थी.

"हहह.. हाँ बीटा.. कहो मेरे से जो बन्न पड़ेगा वो मैं जरूर करूँगा. वैसे मुझे नहीं पता था के तुम मुझे भी जानते होंगे."

"आप साक्षी के पापा है न और वो जीनत की ख़ास दोस्त है बचपन से. मेरी भी पहचान जीनत ने हे करवाई थी साक्षी से.", इधर दोनों मेज से कुछ दुरी पर हुए थे ये बातचीत करते हुए और प्रकाश जी तोह अभी से अपना चमकता तकला साफ़ करने लगे की जाने ये लड़का अब इतनी गंभीरता से क्या इरादे लिए आया है. वही साक्षी यहाँ पहुंची तोह इस बहरे पूरे माहौल में सबको खुदकी तरफ देखते पाया और अपने पिता को अर्जुन के साथ एक तरफ.

"वो अर्जुन आपसे परमिशन लेना चाहता है पापा. जिनि और जानू दीदी एक ट्रिप पर जा रहे है और ये मुझे भी बोल रहा था चलने के लिए तोह मैंने कहा की पापा की परमिशन के बिना मैं शहर से बहार नहीं जा सकती.", एक सांस में वो जो दिल में आया वही बोल गयी और अर्जुन पलट कर उसको ऐसे घूर रहा था जैसे आज के बाद वो सामने पड़ी तोह वो आखिरी मुलाकात होगी. भीतर हे भीतर जहा साक्षी उस बदलते चेहरे को देख सेहमी हुई मरने सी हालत में जा रही थी वही उसके पिता मेजबान परिवार की तरफ देख कर हँसते हुए अर्जुन के कंधे पर हाथ रख कर खुद को सँभालने लगे. साक्षी का चेहरा जिस तरह से झुका था वो जीनत ने बखूबी देखा और वो भोली लड़की भी समझ गयी की बात ये नहीं है जो साक्षी बोली थी बल्कि अर्जुन तोह गंभीर था.

"इसमें परमिशन वाली क्या बात है बीटा? जहा हमारी 2 बेटियां जा रही है वह तीसरी को हम जाने से क्यों रोकने लगे? और तुम कोई अनजान तोह नहीं हो अर्जुन. लोग चाहे खून से न जुड़े हो पर आपसी अपनापन हे बहोत होता है प्यारे सम्बन्धो के लिए. तुमने यहाँ जिनि बिटिया की ख़ुशी के लिए नियम और कानून बदलवा दिए बिना स्वार्थ के और इतनी सी बात के लिए मुझसे पूछने चले आये. जहा घूमने जाना है जरूर जाओ, सावधानी और एक दूसरे का सम्मान रखते हुए."

"बात तोह आपने बहोत सही की है अंकल लेकिन मेरे अनुभव हर बार एक जैसे नहीं रहे इसलिए मैं तोह सीढ़ी हे बात कहने में यकीन रखता हु. सम्मान करना और सबका ख़याल रखना तोह मुझे परिवार ने ाचे से सिखाया है लेकिन खट्टे अनुभवों से ये भी जान लिया की सच्ची दोस्ती पर मुखौटा नहीं होता. आज्ञा दीजिये.. ाचा अंकल आंटी जी, आप सभी से मिल कर बहोत ाचा लगा. थैंक यू जीनत एंड कोंग्रटुलतिओन्स वन्स अगेन.", यहाँ अर्जुन की मुस्कान साफ़ झूठी थी और वो सबकी तरफ ऐसे हाथ जोड़ कर मुखातिब हुआ था जैसे ये उन लोगो से उसकी आखिरी भेंट हो. कोमल दीदी ने जितना समझाया था वो एक न एक दिन तोह सच होना हे था भले हे साक्षी अपने बचाव में वो दुर्घटना ताल गयी लेकिन अर्जुन को एक गहरा जखम दे हे गयी थी. अर्जुन अकेला हे बहार की तरफ चल दिया जबकि उमेद जी अभी अपने दिल्ली वाले एक मित्र संग भोजन कर हे रहे थे. उन्होंने भी अपने लाडले को तेज कदमो से जाते देखा पर अपनी जगह बैठे रहे, एक सुरक्षाकर्मी को बस चेहरे से इशारा दे कर. यहाँ जीनत अपनी जगह से उठ कर साक्षी का हाथ पकड़ कर बाथरूम जाने का बोलती दूसरी तरफ निकली और रवीना बुआ ने जन्नत को कोहनी मारी क्योंकि अर्जुन जा रहा था.

"ोये ये क्या तरीका हुआ भला? ऐसे हाथ जोड़ कर चले जाओगे?", जन्नत बहार उस काली मेरसेदेज़ का दरवाजा खोलते अर्जुन के कंधे पर हाथ रखती हुई बरस उठी. उसके आने से पहले अर्जुन गुस्से में बाकी suraksha-karmiyon को वही रहने का बोल कर गाडी से दूर कर चूका था. ये सभी उमेद सिंह के हे लोग थे जो गाडी ले कर आये थे अर्जुन के लिए.

"आईने पे कुछ ज्यादा हे धुल जमा थी जन्नत और जब वो साफ़ हुआ तोह अपना चेहरा हे बुरा लगा. मैं एक गलत इंसान हु और आप ऐसे इंसान से दूर रहे तोह आपके लिए बेहतर होगा. आज इतने ाचे अवसर पर मैं दिल दुखने वाली कोई भी बात नहीं करना चाहता था इसलिए यही ठीक लगा की आपके हँसते खेलते परिवार के बीच कोई परेशानी न होने दू. आपको अंदर जाना चाहिए और वैसे भी मैंने गाँव से अपना सामान ले कर वापिस घर हे निकलना है.", अर्जुन ने फिर से दरवाजा खोलना चाहा तोह जन्नत ने गुस्से में वो वापिस धकेल कर बंद कर दिया. अर्जुन की कलाई थामे वो इस जगह से उसको लगभग खींचती हुई हॉल की बगल वाले खुले और निर्जन हिस्से की तरफ ले चली.

"हर फैंसला तुम हे नहीं कर सकते इस दोस्ती में. कौन गलत है और सही, ये दोस्ती में मायने नहीं रखता अगर दोनों एक दूसरे के लिए साफ़ दिल हो. कोई बात बुरी लगी है तोह तुम्हे मुझे कहना चाहिए. ऐसे भाग नहीं सकते मुझसे.", वो जहा पहुंचे थे उनसे कुछ दूर आगे हे साक्षी के साथ जीनत भी एक आउट में कड़ी थी. जीनत जिस मजबूती से साक्षी का हाथ थामे थी वो कटाई दोस्ताना सलूक न था और उसने हे इशारे से साक्षी को खामोश रहने को कहा.

"फैंसला लेना आता हे कहा है मुझे. इंसान के नाम पर जानवर से भी गया गुजरा हु मैं जन्नत.. जिसको हर खूबसूरत लड़की अपनी चाहत दिखती है और आजतक जाने कितनी ज़िंदगियाँ खराब की होंगी. मैं तुम्हारी दोस्ती के काबिल इसलिए नहीं हु क्योंकि... क्योंकि सच जान कर तुम खुद हे अपनी गलती की सजा खुदको डौगी."

"मुझे कोई फरक नहीं पड़ता की तुम्हारे किस से और कितनो से सम्बन्ध है अर्जुन.. नहीं फरक पड़ता मुझे क्योंकि तुम जो खुद को गलत दिखा रहे हो वो एक बहाना है मुझसे दूर होने का.. जानती हु मैं हर लड़की की तरह उतना खुल कर बेहवे नहीं करती पर तुम कहोगे तोह जैसे आज हम साथ थे वैसे हर जगह मैं तुम्हारे करीब रहूंगी. मैं तुम्हे कुछ करने से भी नहीं रोकूंगी अकेले में और चाहो तोह तुम यही जो करना है कर सकते हो लेकिन इतना गलत मत कहो.", जन्नत के खूबसूरत चेहरे पर आंसू फिसलने लगे थे जिन्हे देखने से बचता हुआ अर्जुन मुँह फेरे खड़ा था.

"अपनी बहिन के साथ मुझे वो सब करने डौगी?".. 'चत्ताकककक' की ये आवाज 3 बार गूंजी थी और उसका स्त्रोत था अर्जुन का चेहरा और जन्नत के नाजुक लम्बे हाथ. वो ये लफ्ज़ उस इंसान के मुँह से सुन्न कर जैसे अपना सच हे भुला बैठी थी और अर्जुन बिना कुछ कहे या पलट के देखे इस अँधेरे से निकल कर जा चूका था. जन्नत वही घुटनो के भार घास में धम्म से गिरी, जैसे अब उसके जीवन में यही अँधेरा बचा था.

"दी.. दी प्लीज खड़े हो जाओ. आपकी हालत देख कर सब लोग सवाल करेंगे.. प्लीज दी..", अपनी बहिन की ऐसी बेबस पुकार और अपना हाथ पकडे जाने पर जन्नत जैसे तैसे खुद के पाँव पर कड़ी हुई और आंसू पौंछने के बाद करीब कड़ी दोनों लड़कियों को देखा तोह उस से कही ज्यादा आंसुओं से भीगा चेहरा तोह जीनत का था. साक्षी अपना सर झुकाये अपराधबोध में ऐसे कड़ी थी जैसे उसको अपने करम की बड़ी सजा मिलने वाली हो.

"Mom-dad से कुछ मैट कहना जिनि. शायद मुझे हे गलतियां करने की आदत पड़ चुकी है. मेरी हालत पर तुम्हे नहीं रोना चाहिए, सवाल तुमसे भी कर सकते है अंदर.", अपनी बहिन का चेहरा साफ़ करते हुए वो किसी माँ से काम नहीं लगी और यही पल था जब जीनत उस से लिपट कर फफक फफक कर रोने लगी.

"बहोत बड़ी गलती हो गयी मुझसे दी.. बहोत बड़ी गलती कर दी मैंने.. अर्जुन बहोत ाचा है दीदी और मैं ये भी जानती हु की वो आपसे सच्चा प्यार करता है... वो तोह आपको किसी गलत नजर से भी नहीं देखता लेकिन मेरी गलती ने सब बर्बाद कर दिया दी.. सब बर्बाद कर दिया. मैं बहोत बुरी हु दी..", जन्नत जहा अभी अभी हुई इतनी बड़ी दुर्घटना से हे नहीं उभरी थी, अब अपनी छोटी बहिन द्वारा खुदको गुनेहगार मान ने पर ठंडी पड़ने लगी.

"जिनि.. तुम क्या कहना चाहती हो.? मेरी बहिन, तुम नहीं जानती अर्जुन ने मुझसे क्या मांग लिया था?"

"उसने सिर्फ खुदको गलत साबित करना चाहा दी, मेरी गलती को छुपाने के लिए. इस साक्षी ने आज अर्जुन के ऊपर हमारी हे गलती दाल कर ब्लैकमेल करने की कोशिश की थी और वो यही बात अपने मुँह से अंकल को कहने आया था वह. मैं बहक गयी थी दी और अर्जुन से मैंने वो मांग लिया जिस पर मेरा कोई हक़ नहीं था."

"तुमने क्या किया है जिनि? और कैसा ब्लैकमेल साक्षी? मतलब वह तुम गलत सोच ले कर आयी थी और इसलिए मुझे अर्जुन के पास से भेजा था?"

"दी, मैंने हे जिनि को फिजिकल रिलेशन के लिए बहकाया था और जब अर्जुन से मुलाकात हुई थी कोचिंग के बहार. दोस्ती के बाद मैंने हे इसको कहा था की वो अर्जुन से गिफ्ट में वो मांग ले जो ऐसे पॉसिबल नहीं था. मुझसे बाद में देखा नहीं गया की वो कितने प्यार से जिनि का ख़याल रख रहा था जबकि किया तोह मैंने हे था उसके साथ पहले. मेरा लालच मुझसे वो सब करवा गया दी जिस से अर्जुन का दिल दुख. वो तोह साफ़ दोस्ती निभा रहा था लेकिन मैंने हे फायदा उठाने की कोशिश की जिसके बदले ये सब हो गया.", साक्षी को पछतावा था पर जैसे उसको आज रोने की भी इजाजत नहीं थी.

"तुम जा सकती हो साक्षी. अभी और कोई बात नहीं करनी..", जीनत ने बेहद नरमी से ऐसा कहा था क्योंकि न वक़्त सही था और न हालात ऐसे थे. साक्षी ने पलट कर देखा भी लेकिन जीनत ने ना में गर्दन हिलाते हुए उसको मन कर दिया कुछ कहने या रुकने से. जन्नत खुदको कोस रही थी जिसने अर्जुन का दिल समझने की जगह उसके उकसाने पर बिना सोचे समझे हाथ हे उठा दिया. जीनत अपनी बहिन को संभल रही थी खुद को दुरुस्त करते हुए.

"तुम कैसे कर सकती हो ऐसा जिनि?", यही बस एक सवाल था और जीनत ने सर झुकाये हे जवाब दिया.

"क्यों दी? कोई आपको खुश रखे, ख़याल करे और जैसा साक्षी ने कहा की अर्जुन मुझे दर्द की जगह, मर्दानगी दिखने की बजाये मेरी परवाह कर रहा था तोह कैसे न प्यार करू? हाँ गलती ये है की मुझे उसको नहीं तोह काम से काम आपसे ये बात शेयर करनी चाहिए थी. अपनी बात से तोह पीछे नहीं हट सकती थी न हेमंत से शादी करने वाली.? वो इंसान की कदर करता है तोह क्यों मैं खुद को झूठी तसल्ली दू की मुझे वो पसंद नहीं. हाँ वो आपके साथ जितना ाचा और खुश दिख रहा था मैं अब फिर उसके साथ कुछ दोहराने नहीं वाली थी. इस पागल ने सेक्स की आग में सब खराब कर दिया. मुझे थोड़ा भी पता होता तोह मैं रोक लेती पर साक्षी उसको बस में करना चाहती थी सिर्फ अपने लिए. और आपने भी तोह कोई कसार नहीं छोड़ी दी. वो जाना चाहता था तोह क्यों रोकने गयी जबकि लौटना तोह उसको था हे कुछ दिन बाद? उसने कहा की वो मेरे साथ वो सब करना चाहता है और आप में बड़ी बहिन जाग गयी. अर्जुन आपको जानता है दी और वो जैसे गया है अब नहीं लौटने वाला. कैसे कोई साफदिल इंसान अपने आप को उस इंसान की नजरो में गिरा हुआ देख सकता है जो उस से प्यार करता हो? मत कहना की आप दोनों सिर्फ दोस्त हो दी... न वो आपको दोस्त समझता है और न आपके मैं में सिर्फ दोस्ती है. वो प्यार हे था जिस हक़ से आपने उसको मारा और उसने बिना जवाब दिए आपकी मार भी स्वीकार की. मैं ऐसा नहीं कर सकती कभी भी.", जीनत अपनी बड़ी बहिन को लिए पीछे बाथरूम की तरफ चलने लगी. अंदर जाने से पहले दोनों को अपनी हालत भी ठीक करनी थी. रोक्का तोह होना है वो हो चूका था पर जिसको रोकना चाहिए तोह उसको खुद जन्नत ने जाने दिए.

"उसने मुझसे वादा किया था की वो मेरा साथ नहीं छोड़ेगा.. हमे तोह अभी बहोत बार मिलना है.. उसने पहले हे बता दिया था की उसके सम्बन्ध है कुछ और लड़कियों से और मैं हे सब कबूल करने के बाद वो अधिकार दिखा गयी जैसे वो सिर्फ मेरा हो. गलती तोह मुझसे भी हुई है जिनि.", गीले रुमाल से जीनत खुद हे अपनी बहिन का चेहरा ठीक करने के बाद उसकी साड़ी की परत सुलझा कर अपना चेहरा भी दुरुस्त कर रही थी. चेहरे का मेकअप और काजल बह जाने से उनके वास्तविक खूबसूरत चेहरों का दर्द साफ़ दिखने लगा. इस क्षण में उनके पास कोई था तोह बस एक दूसरे का साथ.

"सुना है अर्जुन के परिवार में वादा निभाना एक असूल है दी. गलती तोह सबसे हे हुई है कही न कही और जिसने कुछ किया हे नहीं, वो अगर अब भी वाडे निभाए तोह मेरी तरफ से भी पाँव पकड़ लेना उसके. अब हमे अंदर चलना चाहिए दी और घर पर आप मेरे साथ अकेले में बात कर सकती है. क्या पता कोई सही रास्ता मिल जाए."

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"तुम इस वक़्त निकलने लगे हो वह (अर्जुन के शहर) के लिए? रात को जाना ठीक नहीं है अर्जुन.", घर पे लगभग सभी अपने अपने कमरों में थे जब अर्जुन वह पंहुचा. गाडी घर के बहार हे कड़ी करने के बाद वो दरवाजे तक पंहुचा हे था जो खटकने से पहले हे अनामिका चची ने बेआवाज खोल दिया. अर्जुन के अंदर आते हे छोटा दरवाजा बंद करती वो उसके पीछे हे चल दी. आँगन में कृष्णेश्वर जी तोह दुनिया से बेखबर चैन से सोये थे और सलवार कमीज में किसी अल्हड़ युवती सी चलती अनामिका चची कमरे में दाखिल हुई तोह अर्जुन ने ये दरवाजा ढाल कर उन्हें बाहों में भर कर दोनों गालो पर गहरी पुप्पी देने के बाद होंठो को भी ाचे से चूमा. चची तोह उसके अंदाज से हे दांग थी और उधर उसको अलमारी से बैग निकलते देखा तोह पूछ बैठी.

"ओह मेरी प्यारी चची, रात को जाना हे ठीक है बस आप उन्हें फ़ोन करके ये मत बताना की मैं इस वक़्त निकला था. थोड़ा काम है और उसके बाद सही वक़्त पर मैं वह घर पर मिलूंगा. ये बैग थोड़ा ख़ास है और इसका कोड क्सक्सक्सक्स है. इसको संभल के रखना जितने मैं वापिस नहीं आता. वैसे तोह उमेद चाचा भी आते हे होंगे इसलिए पहले हे तैयारी कर रहा हु.", अर्जुन को अपने कपडे रखते देख वो उसके कमरे में चली गयी. लौटी तोह उनके हाथ में वही गुड़िया थी जिसके बिना अर्जुन खुदको अधूरा मानता था. चची से वो लेते हुए उसके चेहरे पर अलग सी ख़ुशी छ गयी.

"तुम्हारे होंठ के किनारे से खून निकला था क्या?", चची ने अर्जुन का चेहरा अब गौर से देखा और जबतक वो चेहरा पलटने लगता उन्होंने उसको थाम लिया था. गाल पर गहरे लाल निशाँ उभरे देख चची की साड़ी ख़ुशी गुस्से में बदल गयी.

"ये हिम्मत किसने दिखाई अर्जुन? मुझे ये मंजूर नहीं.. और तुम निशाँ ले कर जा रहे हो मतलब वापिस नहीं आने वाले. कौन थी वो?", अनामिका चची ये तोह समझ हे गयी थी की अर्जुन पर कोई पुरुष तोह हाथ उठा नहीं सकता और अगर किसी लड़की ने ऐसा किया है तोह जरूर अर्जुन को दर्द हे मिला होगा.

"आऊंगा न चची, आपसे गिफ्ट जो लेना है. रही बात की वो कौन थी और ऐसा क्यों किया तोह इसका जवाब सिर्फ वही दे सकती है. और जब देगी तोह आप उसको खुद सजा दे दीजियेगा जैसा मैं करे. मैं दुखी नहीं हु चची और सच कहु तोह मुझे जल्दी इस बात की है की वह मेरा प्यार मेरी राह देख रहा है. मेरे पास तोह यहाँ आप हो, 2 बहने है और इस गाँव के कितने हे लोग है जो दोस्त भी है और मेरा ध्यान भी रखते है. उसकी ज़िन्दगी में तोह बस मैं हे हु न? 13 दिन वो मुझे देखे बगैर रही है और कल तोह मुझे दिल्ली भी जाना पड़ेगा. बस कुछ हे घंटे है मेरे पास जिसमे सफर के साथ उसको भी मिलना है. क्या उसके सामने ये सब मायने रखता है की किसने क्या किया और क्यों? बताओ अगर मैं आपके पास महीनो बाद औ तोह आप सवाल करेंगी या प्यार? ुमाःह्ह्ह.. अपना और इस शरारती निक्कू का ख़याल रखना. जल्दी आऊंगा वापिस.", अर्जुन ने तोह प्यार की परिभाषा और इंसान का महत्व समझा कर अनामिका को निरुत्तर हे कर दिया था. उसके एक और गहरी चुम्बन पर वो खुद हे अर्जुन से कस के लिपट गयी. अर्जुन ने भी हलकी मस्ती में उनके कूल्हों को थोड़ा जोर से मसल कर बता दिया की ये उधार है अभी.

"मेरे लिए बस तुम मायने रखते हो और सवाल रहने देते है जब समय आने पर सजा भी तुम मेरे हवाले कर रहे हो. मुझे आदत लगा कर जा तोह रहे हो पर..."

"शहहह.. आदत नहीं इसको जीना कहते है जो आप सीख चुकी हो. मेरी रानी पर कपडा ुधा देना और अगर मेरे लिए किसी का भी फ़ोन आये तोह उसको वह का नंबर मैट देना. बस कह देना की मैं बहार गया हु, लौटने पर आप मुझे बता देंगी किसका फ़ोन आया था. चलता हु, दरवाजा लगा लीजिये.", इस बार वो गले लगने के बाद सीधा बहार की तरफ चल दिया. घर के बहार हे उमेद जी की गाडी आ पहुंची थी और उनके आदमी उस बड़ी गाडी से निकले तोह उनमे से एक को काली गाडी की चाबी पकड़ा के अर्जुन उस बड़ी टोयोटा की पिछली सीट पर जा बैठा. अनामिका ने बस एक बार ये देखा की वो अकेला नहीं था और फिर दरवाजा लगा लिया.

"किसी से वह नाराजगी तोह नहीं हुई मेरे लाल?", उमेद जी उस लम्बी सीट पर जैसे पसरे थे ठीक उस अंदाज में हे अर्जुन बैठा. यहाँ इनके बाद अब तीसरे इंसान के लिए तोह जगह हे न बची थी. दोनों के हे ऊपरी वस्त्र के 2-2 बटन खुल चुके थे और आस्तीन मदद कर कोहनी तक. अर्जुन ने वो बैग वही बगल में हे रखते हुए मुस्कुराते हुआ कहा.

"मुझसे नाराजगी और वो भी आपके रहते? इतना रिस्क लेने वाला मुझे तोह वह कोई दिखा नहीं चाचा. वैसे आप हो बड़ी पहुंचे हुए जो भरी महफ़िल से आदमी हे गायब करवा दिया और अब वो ड्राइवर भी नहीं है इन सबमे जो आपके साथ हे आया था लेकिन अपना काम करने के बाद दिखा नहीं.", अर्जुन की सजगता और नजर से उमेद भी गच्चा खा गए. गाडी चलने वाला व्यक्ति हमेशा की तरह उमेद का ख़ास हे था और ये गाडी आज हे ली गयी थी दिल्ली से.

"तुम तोह वह ढेरो लोगो में व्यस्त थे फिर ये कैसे देखा की कौन हमारा ड्राइवर है और वो क्या करने आया था? तुम जानते थे की वह मैं मौजूद हु?", उमेद जी ने अब एक हाथ अर्जुन के कंधे पर रख लिया था और गाडी गाँव से बहार हाईवे पर आ पहुंची. काली जीपनुमा मेरसेदेज़ अब उनके आगे हे थी लेकिन रफ़्तार 90-100 पर.

"पहली बात तोह ये की आप शहर में कुछ टाइम से मौजूद थे और आपकी ये वाली गाडी तोह बाद में आयी जबकि राजहंस में आप मौजूद थे मुझसे भी पहले से. मैंने शाम को महल फ़ोन किया था और आप हे लौटे थे कुमार साहब के साथ दिल्ली से. वह सुनयना ने मुझसे कहा की कुमार साहब भी आना चाहते थे लेकिन वो आज बहार है, मतलब ये सन्देश आपने हे भिजवाया होगा. और उसके बाद आप खुद सरदार जी बन कर पूल की तरफ बैठे थे. वह से कोई उठ कर गया था जब मैं रंगमहल के बहार खड़ा उन मंत्री जी से उलझ रहा था और उसके पीछे वही आपका ड्राइवर था. हाँ उसके बाद मुझे ज्यादा कुछ पता नहीं चला लेकिन मैंने आपके ख़ास ड्राइवर को उस टेबल पर बैठे देखा जहा और कोई नहीं था सिवाए ढेर साड़ी बोतल और ट्रे के. साधारण सी चौकोर प्रिंट की कमीज, नीचे गहरे रंग की पंत और चाल कही से भी ड्राइवर की नहीं थी. बाल थोड़े पुराने अंदाज के मतलब वो विग था और जबड़े थोड़ा अलग दिख रहे थे चेहरे की दाढ़ी से जिसका मतलब वो भी नकली थी. ह्म्म्मम्म.. आदमी आँखें बार बार तभी झपकते है जब आँखों में लेंस पहने हो और वो ठंडक में बैठा हो. लेकिन एक ऐसी भीड़ भरी जगह में किसी को किडनैप करना सबके बस का नहीं बेशक आज की तारीख में राजहंस की सुरक्षा आपका भी कहना मानती है. तोह इतना मुस्तैद और मजबूत इंसान जो कोई गलती किये बिना, सहज रह कर ये कर गुजरे वो तोह आपके ततकथित श्रीमान नरिंदर जी उर्फ़ इन्दर चाचा के सिवा कौन होगा.", अर्जुन द्वारा कही हर बात ध्यान से सुनते उमेद जी ने आखिर में उसके कंधे थपथपा हे दिए. उन्हें सचमुच फकर था अपने इस हीरे पर.

"इन्दर बोल रहा था के आज तोह उसको सीड भी पहचान नहीं सकती और देखो तुमने एक बार फिर से हर छोटी बात पर गौर करते हुए अपने चाचा को पहचान हे लिया. तभी शायद वो तुम्हारे आसपास कुछ करने से हिचकिचाता है लेकिन ये मामला थोड़ा जरुरी था बीटा और मैं चाहता तोह था की ये तुम करो लेकिन पता चला की वह तोह तुम्हे पहले हे बुलवाया जा चूका है करीबी दोस्त द्वारा. खैर.. अब तुम दिल्ली जा रहे हो और गाडी वही लेके जाओगे जो तुम्हे हमेशा पसंद थी. वह मुझे तुम्हारी मदद चाहिए और काम ज्यादा समय नहीं लेगा बस वो करना हम बुधो के बस की बात नहीं. इन्दर व्यस्त न भी होता तब भी ये काम वो नहीं कर सकता था और मैंने इस बारे में किसी से बात भी नहीं की. चाचा जी से ये तोह पता चल गया है की तुम उधर 2-3 रहने वाले हो और उसमे से बस तुम्हे 3 घंटे हे निकलने है.", अर्जुन सब बड़े गौर से सुन्न रहा था और उसको हमेशा हे चाहत रहती थी की कब उसके ये चाचा काम बताये.

"Maar-dhaad वाला है या वही एजेंट टाइप जिसमे पेजर पेजर खेलना पड़ेगा?"

"अब तुम वो सब करने की उम्र से आगे निकल चुके हो. थोड़ा जोखिम ज्यादा है इसमें लेकिन मुझे नहीं लगता नौबत झगडे तक पहुंचेगी. यहाँ तुम्हे वही करना है जो न करने के बावजूद तुमसे होता रहता है.", उमेद जी यहाँ थोड़ा हिचकिचा रहे थे लेकिन अर्जुन समझ चूका था के वो उसके ख़ास हुनर की बात कर रहे है जो बस व्यक्तित्व का भाग ज्यादा था. अब बाप बेटे जैसा इनका रिश्ता हर मामले में उन्मुक्त था सिवाए pram-prasang या लड़कियों की चर्चा के.

"किसी को किडनैप करना है क्या चाचा जी? मतलब किसी लड़की को?"

"पगले ऐसे काम करना होता तोह मेरे पास जाने कितने भाड़े के टट्टू बैठे रहते है, जो बस एक बार कहने भर से किसी को भी गायब कर दे. यहाँ काम प्यार और दिमाग से करना है प्यारे और जिस से मुलाकात करनी है वो night-club की मालकिन है. रईस, dikhawa-pasand और मजबूत जवान खूबसूरत लड़को को पसंद करने वाली. पते की बात ये है की उसने एक लड़के से मिलने के बाद दोबारा उसको आसपास भी फटकने नहीं दिया. और दूसरी हम बात है की अगर किसी ने कोशिश की तोह वो दुनिया में दोबारा नहीं दिखा. मतलब जान नहीं ली पर दुर्गति काम भी नहीं की. उसके खिलाफ कोई केस नहीं है और न कोई रिपोर्ट है.", अर्जुन को अब ये मामला कुछ ज्यादा हे रोमांचक नजर आ रहा था. एक औरत जो पसंद करती है खूबसूरत और तगड़े लड़को को लेकिन किसी अमीरजादी के कपड़ो की श्रृंखला जैसे वही कपडा दोबारा नहीं पहनती

"चाचा जी ये मैडम इतनी संगीन है तोह फिर इनसे उगलवाना है या ..."

"नहीं.. बस ऐसा कुछ करना है की तुम पहले इंसान बनो जिस से ये दोबारा मिलने का वक़्त मांगे. हमे कोई रंजिश नहीं है उस से लेकिन बिना उसके हमारे पाँव भी दिल्ली में मजबूती से नहीं टिकने वाले. नाम है अर्शी सहाये और ये एकलौती औलाद है V.C. सहाये की. वो इंसान अपनी मर्ज़ी के बिना तोह कम को भी समय नहीं देता लेकिन अपनी बेटी के लिए वो कम हिलने का मादा रखता है. राजनितिक कोशिश तोह असफल हे रही और गजेंद्र भाई से उसकी कुछ जमती नहीं क्योंकि सहाये थोड़ा रूढ़िवादी और नियम पसंद व्यक्ति है. फिलहाल तोह मेरे पास समय है पाँव ज़माने का लेकिन कैसे भी करके तुम इस आदमी को अपना मुरीद बना लो तोह आनेवाले समय में हमे कोई परेशानी नहीं होगी. तुम सोच रहे होंगे की मैं इस काम को दूसरे तरीके से भी अंजाम दे सकता हु लेकिन यहाँ हाथ भी मैले नहीं करने और सबको साथ भी रखना है. लोधी रोड पर 8 कनाल में महल है सहाये का और इसकी बेटी की सुरक्षा में लगभग एक दर्जन लोग रहते है. क्लब में वो सिर्फ बुधवार और शनिवार हे जाती है. बाकी दिन और वक़्त घर के सिवा वो कहा जाती है कोई खबर नहीं.", अर्जुन सब सुन्न कर इस बात से तोह खुश था के उसके चाचा दिल्ली में जो कारोबार जमा रहे है उसमे वो किसी भी तरह का कोई टेढ़ा कदम नहीं ले रहे. मतलब था की उमेद सिंह अपनी साफ़ छवि बरकरार रखना चाहता था लेकिन लड़की के रस्ते किसी रईस सनकी से मिलना था तोह जोखिम भरा काम.

"3 घंटे का अनुमान कैसे लगाया आपने चाचा जी? मतलब मैं क्लब में गया भी तोह जरुरी तोह नहीं की वो मुझे देखते हे बुलवा ले? और मेरी उम्र? शराब को तोह हाथ लगाने की सोचूंगा भी नहीं."

"हाहाहा.. बीटा यही सब तोह वजह है की तू सबसे सटीक बैठता है इस मामले में. अर्शी सहाये शराब का बार जरूर चलती है क्लब में लेकिन वो खुद हाथ तक नहीं लगाती. दूसरी जरुरी बात ये है की जितनी मुझे समझ आयी वो बात ये थी की जो भी लड़के वह गए, उनका मसकद ऐश करना और अर्शी से मुलाकात का हे रहा. मतलब वो इस रईस सनकी के सामने टिकने वाले तोह कटाई न थे. तीसरी बात है की 30 की होने के बावजूद उसका अविवाहित होना. हफ्ते में सिर्फ एक दिन वो क्लब में दिखने वाले सबसे बढ़िया युवक को हे मिलने के लिए चुनती है और फिर दोबारा उस से कभी नहीं मिलती. मतलब सनकी तोह है और जैसे कुछ ख़ास ढून्ढ रही है. 3 घंटे मैंने इसलिए कहे अर्जुन क्योंकि क्लब अपने चरम पर होता है रात 11 से 2 बजे तक. और अर्शी वह से निकलती है 4 बजे के करीब. तुम जरूर उसकी नजर में आने वाले हो क्योंकि इस बार सामने वाला उसकी टक्कर का रहेगा. न जेब से कंगाल, न शरीर से कमजोर. बाकी मैं तोह फिल्म भी नहीं देखता जबकि तुम तोह अंग्रेजी भी बढ़िया बोल लेते हो.", अर्जुन समझ चूका था के उसको दिल्ली जा कर अब कैसा अवतार दिखाना है लेकिन यही उसको जन्नत याद आ गयी और हाथ गाल पर आ रुका.

"चाचा, देख लेना कही बात वो न हो जाए की ये सनकी हमारे घर हे आ पहुंचे. दादी तोह घर से निकाल देगी मुझे."

"वो सब मुझ पे छोड़ दे मेरे लाल. तू पहली सीढ़ी पार कर गया तोह उसके बाद मैं खुद संभाल लूंगा. जानता हु की ये रास्ता भी कायदे से ठीक नहीं है लेकिन दूसरे रस्ते कही ज्यादा गलत है अर्जुन और V.C. सहाये को साधना हर किसी के बस का नहीं जैसे शास्त्री जी तुम्हारे मुरीद है पर तुम से पहले तक कोई और उनके करीब न आ सका. और वह पेजर पेजर नहीं खेलेंगे इस बार. एक सेलुलर फ़ोन है तुम्हारी गाडी के glove-box में उसके चार्जर के साथ. दिल्ली जाते हे उसको चालू कर लेना बस. अर्शी तुमसे दूसरी बार मिलने की चाहत खुद करे तोह बाकी हम फिर से बात करके तये करेंगे आगे क्या करना है."

"वो सब आप मुझ पर छोड़ दो चाचा जी. अगर बात इतनी जरुरी है तोह फिर निराश तोह किसी हाल में नहीं करूँगा पर यहाँ मुझे उसकी थोड़ी जानकारी और एक तस्वीर चाहिए होगी."

"वो भी गाडी में हे है जहा फ़ोन है. मैं इधर से हे दिल्ली निकलता हु, तुम अकेले चले जाओगे न?"

"हाँ पर .."

"घर फ़ोन नहीं करूँगा तुम्हारे लिए जबतक तुम खुद हे न कर लो.", उमेद सिंह के ऐसा कहने पर अर्जुन उन्हें हैरत से देखने लगा.

"बाप नहीं हु लेकिन अपने बेटे को ाची तरह समझता हु की जब वो बेसमय घर के लिए निकल रहा हो और वह सन्देश दिए बिना तोह मंज़िल कही आसपास हे होगी. ध्यान रखना और.."

"आप बेहतर जानते है मुझे चाहे पैदा वह हुआ लेकिन पिता मेरे आप भी है, गुरु के साथ.", उमेद ने खुद हे अपने इस वारिस के लिए दूसरी गाडी का दरवाजा थमा था और उनके सुरक्षाकर्मी उनकी गाडी के पिछले हिस्से में जा बैठे, एक अगली सीट पर ड्राइवर की बगल में. अर्जुन उस काली गाडी में सवार होने से पहले अपने चाचा से गले लग कर मिला और फिर उमेद जी तब तक उस चौक पर खड़े रहे जबतक अर्जुन की गाडी अपनी रफ़्तार पकड़ती हुई आँखों से ओझल न हो गयी.

"अपने आप में बस एक हे है ये हीरा. चलो भाई, वक़्त से पहले पहुंच कर इंतजाम भी देखने है.", उमेद जी अपने आप से हे बात करते हुए गाडी में अपनी जगह आ बैठे और यहाँ से वो उस बड़े हाईवे की तरफ निकल चले जो उनकी अगली मंज़िल पर जाता था.

.

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एक घंटे से कुछ अधिक वक़्त लगा था अर्जुन को अपने घर की गली में दाखिल होने को जहा से उमेद चाचा ने उसको अकेला भेजा था. समय 2 से ऊपर था और डंडा पटक कर चलता चौकीदार उस धीमी चलती हुई बिना रौशनी की गाडी को देख रुका भी तोह पंडित जी के घर के ठीक सामने. इतनी बड़ी गाडी घर के सामने कड़ी करना तोह कही से भी उचित न था और दोनों घरो के बीच वाले प्लाट से बेहतर कुछ अर्जुन को सूझा नहीं. सावधानी से गाडी पूरी अंदर पंहुचा कर अभी वो उतरा हे था की चौकीदार उसके सामने खड़ा मिला.

"ओह काका, क्यों डरते हो ऐसे एकदम सामने टपक कर.", यही वो महाशय थे जिनके सामने अर्जुन ने 4-4 हथियारबंद लोग पास्ट किये थे. अर्जुन को ऐसे मुँह पर ऊँगली रख कर शांत रहने का इशारा करते देख वो भी मुस्कुरा उठे.

"क्या बात है बीटा? अपने हे घर में सेंध लगाने वाले हो क्या?"

"अरे काका, उन्हें पता नहीं है न की मैं बहार हु घर से. आप थोड़ा गेट पर नजर रखना मैं बगीचे से अंदर जाता हु.", चौकीदार भी बढ़िया इंसान था और अर्जुन से खासा प्रभावित भी.

"यही उम्र है बीटा फिर तोह ब्याह होने के बाद ये मौज मस्ती के दिन बस याद हे रह जाएंगे. ध्यान से जाना कही मिटटी साथ लेते जाओ भीतर.", चौकीदार अपना मश्वरा दे कर आगे बढ़ा और इधर अर्जुन अपने घर की बजाये छोल साहब की प्लाट से लगती दिवार पर एक हाथ रख कर अगले हे पल दिवार फांद कर उनके आँगन में जा उतरा. चौकीदार ने मदद कर पीछे देखा और फिर बगीचे में लेकिन अर्जुन का तोह कही साया तक न दिखा. तेज रौशनी वाली बैटरी से प्लाट और उसके आगे छोल साहब के घर तक नजर मारी लेकिन वह भी कोई संकेत न मिला किसी के होने का.

'लड़का है या प्रेत है ये पंडित जी का पौता.? ससुरा कसिए आता है कैसे जाता है पता हे नहीं चलता.', पता तब चलता जब वो 15 कदम चलते हुए पीछे भी देखता. और उधर अर्जुन तोह दबे पाँव दरवाजा खोल कर उस मद्दिम नीली रौशनी भरे कमरे में आ पंहुचा. सफ़ेद चादर ओढ़े इस ठंडक भरे कमरे में उसकी प्रेमिका ऐसे सोई थी जैसे अर्जुन का आना उसको याद हे न रहा हो.

'मानो.. मेरी बिल्ली.. उठो तोह..', अर्जुन जूते उतार कर उसकी पीठ पीछे आ लेता. जैसे हे उसने अपना हाथ कमर पर रखने के लिए बढ़ाया वैसे हे फुर्ती से चादर ओढ़े प्रीती उसके ऊपर आ चढ़ी.

"उठु तोह तब न जब सोई हो.? तुम अपने बैडरूम में कपडे पहन के बीएड पे आते हो? मैंने तोह नहीं पहने..", प्रीती ने पेट के दोनों तरफ घुटने टिकाये वो चादर एक तरफ उछाल दी. गुलाबी कठोर सतांन और उसका वही शरारती चेहरा अर्जुन के ठीक सामने था जिसका मतलब था की चूहा बिल्ली दबोच चुकी थी.
 
अपडेट 219

बंधन (1)

"तुम्हे कोई और देखे, तोह जलता है दिल..

बड़ी मुश्किलों से फिर... संभालता है दिल..

क्या क्या जातां करते है.. तुम्हे क्या पता..

है दिल बेकरार कितना..

"तुम्हारी हिंदी तोह मुझसे भी ाची हो गयी मानो.", अर्जुन के सीने पर लेती प्रीती जाने कितने वक़्त तक उसके होंठो और चेहरे को चूमती रही. उतना हे प्यार प्रतिउत्तर में अर्जुन ने भी जाहिर किया और अब वो उसको अपनी बाहों में भरे सुकून से लेता था की उनके बीच पसरी ख़ामोशी को प्रीती ने एक विख्यात गीत की चाँद पंक्तियाँ गुनगुनाते हुए तोडा. बेशक चलचित्र में ये सम्बोधन पुरुष द्वारा किया गया था पर जो प्रीती ने कहा था वो स्थिति पर उसकी तरफ से सटीक रहा. अर्जुन के चेरहे पर हलकी सी मुस्कान उभरी और जो वो कहना चाहता था, वो कह न सका.

"मेरा क्या क्या ाचा और खराब हुआ है, वो तुम्हे बिलकुल नहीं पता. तुम्हे याद है हम आखिरी बार कब ऐसे साथ थे? कब तुमने मुझे अपने दिल से लगा कर ऐसे बाहों में लिया था? फ़ोन पर थोड़ी बहोत बात और इंटरनेट से मैसेज बस तुम्हारे होने का एहसास देते है अर्जुन लेकिन अकेले में जब मैं अपने इस बीएड पर होती हु तोह आँखें बंद करते हे मुझे वही शाम याद आती जब तुम साइकिल पर थे और मैं तुम्हारी बगल में स्कूटी पर. वही सुनसान खामोश सड़क और तुम्हारा मुझे पहली बार किश करना. कैसे तुमने मुझे इस कमरे में गलती से िन्नेर्स में देख लिया था और मुझसे ज्यादा शर्म तुम्हे आयी. मेरा तुम्हे मन करना और तुम मजाक में मुझे पकड़ कर सताने की कोशिश करते हुए. वो बहते हुए पानी में दुनिया से दूर सिर्फ हम दोनों.. मुझे बहोत मुश्किल होती है अर्जुन, जब तुम्हारी जरुरत हो और तुम पास नहीं.", प्रीती अपनी बात कहते हुए नजरे मिलाने की हिम्मतबहि न जूता सकीय और वही अर्जुन भी उसकी कही बातें सुन्न कर जैसे वापिस उस सफर की शुरुआत में जा पंहुचा.

"पता है मानो, जब मैं हॉस्टल में था तोह एक दिन ऐसा नहीं गुजरा था जब मुझे वो विदेशी गुड़िया याद न आयी हो. तुमसे मेरी आखिरी मुलाकात उस वक़्त वो थी जब मैं तुम्हे लेने आयी गाडी पर पत्थर मारने लगा था. मेरी प्रीती यही रहेगी, मेरे घर. और तुमने मेरा गाल चूम कर कहा था की तुम कल आओगी. हमे उस वक़्त कल हे तोह बोलना आता था. फिर वो पत्थर निचे गिर गया जब तुमने मुझे एक तरफ से अपनी बाँहों में भर के फिर से किश किया. मैं धुप में बहार खड़ा तुम्हे जाता देखता रहा. उस दिन ऋतू दीदी बार बार कहती रही की ारु अंदर चलो, प्रीती शाम को वापिस आएगी. मैं नहीं मन और आखिर में मेरे हे घर से गाडी निकली और ले गयी मुझे. मुझे याद नहीं की तुम जाते हुए कार में रो रही थी या नहीं लेकिन हम अपनी अपनी गाडी में पीछे एक हे घर को देख रहे थे. तुम तोह फिर भी लौट आयी पर मैं वापिस न आ सका. और जब लौटा तब बहोत कुछ बदल चूका था ज़िन्दगी में. मैं हे वैसा नहीं रहा था और हमारे घर, ये गली और इसमें रहने वाले लोगो के चेहरे तक बदल चुके थे. यहाँ तक की ऋतू दीदी और मेरे बीच भी अनकही दुरी बन गयी जिसमे वो डर की वजह से मेरे करीब नहीं आयी और मैं उनके आवरण में जा न सका. फिर अँधेरे में तुम्हारा छत पर आना और मेरा तुम्हे न पहचान पाना. वह स्टेडियम में भी मुझे बार बार यही एहसास होता था की तुमसे मेरा कुछ तोह जुड़ा है. शायद तुम भी इस बार मुझे पूरा समय देना चाहती थी जिस से मुझे पता लग सके की हम दोनों है कौन. और मेरे जीवन में सबसे ज्यादा खूबसूरत पल लौटे तोह उसमे ख़ास था होली का दिन और दूसरा मल्होत्रा अंकल के घर की छत पर तुम्हारा हाथ पकड़ना. एक बार फिर से वही निकला न मेरे मुँह से 'मेरी प्रीती'. बदला कुछ नहीं है मानो, बस हम दूर रह कर एक दूसरे की कमी को ज्यादा महसूस करने लगे है. ऐसा अब नहीं होगा. मेरी प्रीती.. उम्मम्मम", प्रीती का ऊपरी होंठ कुछ ज्यादा हे ख़ास और पसंद था जैसे अर्जुन को. और उसके द्वारा पहल करते हे प्रीती ने भी उतने हे प्यार और धीमे लहजे में अर्जुन के होंठो के बीच अपनी जीभ दाखिल कर दी. इस मामले में वो बिलकुल ऋतू जैसी हे थी जो अर्जुन एक कदम बढ़ने पर 4 कदम बढाती थी. किसी पुरुष की तरह अपने दोनों हाथ अर्जुन की बाहों के निचे ला कर प्रीती लगभग अर्जुन को खाने हे लगी. वो कसमसाया और फिर खुद को ढीला छोड़ कर बस प्रीती के कूल्हों पर हाथ रख उन्हें सहलाने लगा. मद्धिम रफ़्तार से हिलती प्रीती की कमर और अर्जुन की जिव्हा का रस दांतो में दबा कर खींचना पूर्ण अभिव्यक्ति थी अपने हक़ की.

"माँ से तुमने क्या कहा है हमारे बारे में?", प्रीती एकदम से अर्जुन के होंठो को छोड़ कर अपने गीले होंठ उसके हे सीने पर साफ़ करती हुई अपने सुघड़ निर्वस्त्र कूल्हे अर्जुन की जांघो के ऊपर दबती हुई बैठ गयी. अपने ताम्बे बालो को गालो के दोनों तरफ से पीच करती वो अब उसकी चौड़ी छाती पर ऐसे हाथ रखे थी जैसे गलत जवाब मिलने पर वो अर्जुन को बढ़िया सजा देने वाली हो. उसके लम्बे नाखून कुछ वैसी हरकत भी कर रहे थे, अर्जुन के दोनों चूचक कुरेदते हुए. वो मचलने लगा और प्रीत ने भी गोल कूल्हों को हिला कर उसके लिंग को लंबवत अपनी गहरी दरार में फांस कर थोड़ा दबाव बढ़ा दिया. चेहरा देखने लायक था अर्जुन का जैसे प्रीती ने उसके मजबूत लिंग की हेकड़ी सिर्फ कूल्हों की ताक़त से निकाल दी हो.

"ओह्ह्ह.. थोड़ा रेहम करो.. मैं तुम्हारी माँ से क्या बात कर सकता हु भला?"

"तुमने उन्हें ये नहीं बताया की तुम मुझसे पहली औलाद बेटी चाहते हो? गंदे कही के.. यहाँ अभी सगाई तक नहीं हुई और तुम अपनी सास से ऐसी अश्लील बातें करने लगे उनकी बेटी के बारे में.", अश्लील शब्द सुन्न कर न चाहते हुए भी अर्जुन की हंसी निकल गयी जो फिर से दर्द में बदली जब प्रीती ने उसके एक चूचक को कास के मसल दिया. अर्जुन बदले में अपने सामने सर उठाये खड़े दोनों गोर स्टैनो को पकड़ने लगा लेकिन दूसरे हाथ से प्रीती ने उसका ये प्रयास भी बेकार कर दिया. बड़ी चाहत से अर्जुन उन बड़े कटोरे से गोल और सख्त उरोजों को देख रहा था जिनको ब्रा की जरुरत हे नहीं पड़ती थी. वो गुलाबी तीखे निप्पल कैसे भी अर्जुन अपने होंठो में लेना चाहता था पर यहाँ उसके बस में कुछ नहीं था सिवाए जवाब देने के.

"मेरी माँ.. मैंने तुम्हारी माँ से ऐसा कुछ न कहा. उन्होंने कहा था के इंडिया में तोह लोग बस लड़का हे चाहते है औलाद के रूप में और मैंने जवाब दिया था के मुझे तोह बेटियां ज्यादा बेहतर लगती है बेटो से. प्रीती को हे देख लो कितनी समझदार है.. आअह्ह्ह.."

"झूठे.. तुम मुझे समझदार कह हे नहीं सकते और माँ भी नहीं मानेंगी.. ुह्ह्हह्ह..", प्रीती अनजाने में हे उस दहकते चिकने सुपडे पर अपना मलमल सा नरम और रेशमी एंड दबा बैठी. कुछ ख़ास कशिश थी इस स्पर्श में जो अर्जुन भी उत्तेजित होता उसको अपने ऊपर खिंच कर प्रीती की महकती गर्दन चूमने लगा. इस बार तोह प्रीती ने भी कोई मनाही न की बल्कि अपनी रेशमी कनक की गीली लकीर और कामुकता से घिसने लगी. उसके सतांन अपनी कठोरता से अर्जुन का सीना भेदते हुए घिसने लगे. सबको बिस्टेर में पास्ट करने वाला अर्जुन तोह उसके अंदाज और जिस्म के निचे खुद हे बेबस हो चला. हथेली से प्रीती के purn-goalkaar नितम्बो को सहलाते हुए वो इस से ज्यादा कुछ कर भी न सका. प्रीती ने चेहरा थोड़ा उचकते हुए अर्जुन की आँखों में पढ़ने की कोशिश की जैसे वो देखना चाहती हो की अर्जुन क्या इस रात में कुछ ख़ास चाहत रखता है.

"मुझे बस तुम्हारे साथ सोना है मानो.. घर पे सभी होंगे और हम दोनों आगे बढे तोह याद नहीं रहने वाला."

"हाथ से कर दू?", प्रीती ने भी नजरे जोड़े हुए हे कहा था और अर्जुन ने गर्दन न में हिलाते हुए करीब राखी चादर दोनों के ऊपर फैला ली. भीतर जैसे वो अब एक टेंट में थे, चादर से बना वो टेंट जिसमे बस उसके ऊपर लेती उसकी मोहब्बत्त. कुछ हलके कुछ गहरे चुम्बन के बाद प्रीती ने थोड़ा पीछे सरक कर अपना चेहरा उसके सीने पर रख लिया.

"मुझे भी इस रात बस तुम्हारे ऊपर सोना है. प्यार तोह वैसे भी मुझे बाथरूम में पसंद है. वह तुम्हारी चीखें बहार नहीं निकलती.", हलके से अर्जुन का निप्पल काट कर वो हंसने लगी और आउच कहता अर्जुन भी उसके बाद हंसने के साथ प्रीती की पीठ थपकने लगा. उसके बाद दोनों के जिस्मो में कोई हरकत न हुई. चादर के भीतर बस प्रीती के खूबसूरत जिस्म की ख़ास महक और अर्जुन का उसमे विलीन होना हे बहुत था. लिंग तोह कबका शांत हो चूका था जिसका एक हे मतलब था, उनके बीच सिर्फ अटूट प्यार. बहार अँधेरे में कड़ी रोमिला ने भरसक कोशिश की थी की वो अपनी बेटी के अंतरंग पालो को न देखे लेकिन कुछ चिंता और उस से अधिक दो जवान जोड़ो की अठखेलिया उसको खींच हे लायी. पर अब वो खुश थी इनका ऐसा प्रेम देख जिसमे जवान और सक्षम होने के बावजूद Arjun-Preeti एक दूसरे की चाहत हे रखते थे, सम्भोग से अधिक.

'ठीक हे किया जो इतने पर हे रुक गए. मेरी बेटी सिर्फ ग्रीक नहीं है और होती तोह रूकती नहीं. भगवन दोनों को ऐसे हे साथ रखे.', रोमिला मैं में हे दोनों के लिए दुआ करती दबे पाँव अपने कमरे में चली गयी. अब ये घर पूर्णतया खामोश था और रोमिला ने 4:30 का अलार्म लगा कर खुद भी बिस्टेर पकड़ लिया. डेढ़ घंटे की नींद अपर्याप्त जरूर थी लेकिन अपने बचो के लिए वो सजग थी, ख़ास कर अर्जुन के प्रति क्योंकि उसके घर तोह सूर्योदय के साथ हे आधे लोग बिस्टेर छोड़ देते है.

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"कैसे हो छोटे मुखिया जी? नीम अँधेरे हे निकल पड़े थे क्या? और ये कुरता उल्टा पहन के आये हो, लाइट नहीं थी उधर?", अर्जुन हाथ में बैग उठाये घर के भीतर दाखिल हुआ तोह उसके दादा जी स्नान से फारिग हो कर सर पौंछते हुए सफ़ेद पजामा और आधी ब्याह की बनियान पहने उसके सामने हे मिले. अर्जुन जैसे अभी भी आलस में भरा था क्योंकि नींद गहरी होते हे तोह बिस्टेर छोड़ना पड़ा. खुद पर नजर डाली तोह पाया की जल्दबाजी में सचमुच कुरता उल्टा हे पहने था. दादा जी चरण स्पर्श करने के बाद बैग एक तरफ रखते हुए उसने कुरता वही उतार दिया. निचे बनियान भी नदारद थी जबकि वो घर से चला था तोह बनियान जिस्म पर थी. अंगदादि लेते हुए वो वही आँगन में कुर्सी पर हे बैठ गया.

"यहाँ मैं आपका बैलबुद्धि हे हु बौ जी, कोई छोटा मुखिया नहीं. वह से चलते हुए अँधेरे में हे कुरता पहना था इसलिए ध्यान हे नहीं दिया. और आपने कहा भी तोह था की टाइम से आ जाना, तोह आ गया.", अर्जुन ने इस दौरान एक बार बगीचे को देखा जहा वृक्षों की kaant-chhaant होने वाली थी और जमीन उतनी नम्म न लगी जितनी ग्रीष्म हरितु में इस समय उसको जरुरत थी. एक तरफ उसकी गाडी चादर के निचे ढंकी थी और उसकी बगल में पिता की एस्टीम कार ऐसे कड़ी थी जैसे शंकर जी ने घर आने के बाद उसको पलट के देखा हे न हो. शिक्षा खुला था ड्राइवर की तरफ से और फिर ध्यान आया की उसकी रानी वाली जगह तोह खली थी. हाँ वो तोह गाँव में हे थी न.

"हो गया निरिक्षण तोह अपनी दादी से भी मिल लो. तुम्हारे ताऊ और चाचा तोह काम से बहार है और शंकर अभी नहाने गया है. थोड़ा सोना चाहो तोह सो सकते हो लेकिन पहले कुछ नाश्ता कर लेना.", इतने में कौशल्या जी भी तुलसी में आरक देने के लिए अपनी सफ़ेद सूती साड़ी में सर को ढके बहार निकली और अपने पौटे को देखते हे ताम्बे की गड़वी एक तरफ रखती उसको अपने सीने से लगाए सर दुलारने लगी.

"देख लो भाई अपनी दादी का प्यार. भगवन के रस्ते चलते हुए भी ये तुम्हारे लिए रुक जाती है."

"परिवार से बढ़कर तोह भगवन नहीं जी? और तू इतना कमजोर और थका हुआ कैसे लग रहा है? इन्होने तुझे इतनी जल्दी बुला लिया? जा मुँह हाथ धो ले, मैं तेरे लिए दूध बनती हु, फिर 2-3 घंटे आराम से सोना.", माथा चूम कर वो तुलसी की तरफ बढ़ी लेकिन अपने पति को घूर कर जो खिसियाते से अर्जुन को देखने लगे.

"मैंने कहा था के 7 बजे तक पहोच जाना. अब ये उल्लू 2-ढाई घंटे पहले आ गया तोह इसमें मेरा क्या दोष. और बीटा तू आया कैसे है? तेरी मोटरसाइकिल?", रामेश्वर जी ने घर के बहार नजर की लेकिन उधर तोह सब साफ़ था.

"वो उमेद चाचा ने मुझे गाडी दी है और बोले थे की दिल्ली भी वही लेके जाना. बगल वाले प्लाट में कड़ी है बाउजी. वैसे दिल्ली कब निकलना है?", अर्जुन पाँव से जूती निकाल कर दिवार के पास रखते हुए उँगलियों को सहलाने लगा. गाडी बेशक नंगे पाँव हे चलाई थी पर फिर भी जकड़न सी थी कुछ. रामेश्वर जी को pooja-path के लिए देरी भी हो रही थी.

"पहले तुझे मल्होत्रा जी के यहाँ जाना है 9 बजे और बात बस तुम्हारे तक हे रहे. मुझे भी मत बताना. अगर थोड़ी देर बातचीत करनी है तोह इन्तजार करो, मैं 15 मिनट तक आता हु."

"नहीं. आप आराम से जपो राम जी का नाम. मैं तोह मेरे कमरे में हे जा रहा हु सोने. दादी, 7 बजे तक उठवा देना मुझे.", अर्जुन को यही लगा की घर के भीतर अभी बाकी लोग सो रहे होंगे और वो अपनी दादी के करीब से हे ऊपर वाली सीढ़ियों पर चढ़ता हुआ अपने कमरे में चल दिया. आज भी वो बहार से हे बंद मिला और खोलने पर बिस्टेर इतना साफ़ जैसे अभी अभी चादर बिछाई हो. हर चीज व्यवस्थित और धुल मिटटी का नमो निशाँ तक नहीं. भीतर हॉल में खुलने वाला दरवाजा इधर से हे बंद था मतलब ये काम कोमल दीदी का हे था. उसकी पढ़ने वाली टेबल पर हमेशा की तरह pen-stand में सभी kalam-pencil और एलिमेंट्स ऑफ़ फिजिक्स की किताब के बीच राखी पेंसिल जो अर्जुन उतनी हे पढ़ कर ऐसे रख गया था.

'कमाल हो दीदी आप भी.', अर्जुन 2 तकियों को बगल में रखता उनके साथ हे जुड़ कर जा लेता. आखिर वो आज अपने कमरे में लौट आया था और अभी आँखें बंद हे होने लगी थी की दरवाजा बंद करके कोई उसके पीछे आ लेता. नरम स्टैनो की जोड़ी पीठ पर दबने से हे अर्जुन उनकी मालकिन पहचानते हुए बोलै.

"आज तुम इतनी जल्दी कैसे उठी हुई हो तारा?", अर्जुन ने बिना पालते हे उसका कोमल हाथ पकड़ कर अपने पेट पर दबा लिया. सचमुच वो तारा हे थी जो कसरत करके लौटी थी और अर्जुन द्वारा ऐसे प्यार से अपने साथ लगाने पर उसका गाल चूम कर उसके सामने आ लेती. चेहरा थोड़ा लाल और kaam-devi सी मूरत सामान उसके जिस्म के कटाव अर्जुन की बोझिल सी नजरो के सामने.

"4 बजे हे उठ जाती हु आजकल और अगर तुम पास होते तोह 8 बजे भी आँख नहीं खुलने वाली थी. मुझे मिस किया?", तारा ने उसका हाथ अपने सीने पर रख के बताया की तड़प उसकी कुछ ज्यादा हे बढ़ी थी. अर्जुन ने बदले में नमकीन गाल और होंठो को चूम कर उसको करीब खिंच लिया.

"थोड़ी देर साथ हे सो जाओ. मिस तोह तब करता जब दूर होता. अब आया भी तोह इसलिए हे हु की इतने टाइम से जो तुमने नहीं दिया वो ले हे लू.", कूल्हों को कस के भींचते हे तारा चित्तक कर पीछे हट गयी.

"कमीने हो पूरे के पूरे. वैसे भी अभी कुछ पॉसिबल नहीं और मैं यहाँ इसलिए आयी थी की तुम तोह ये बीच वाला दरवाजा खोल कर एक ों करोगे नहीं और ऐसे गर्मी लगेगी क्योंकि कूलर भी हटा दिया है तुम्हारी गैलरी से. सो जाओ, जब उठोगे तोह साथ में नहाते है. उमाहहहह..", अर्जुन के चेहरे पर बंद आँखों पे हे मुस्कान आ चुकी थी. तारा भी दूसरी तरफ से दरवाजा खोलने से पहले कमरे के सभी परदे सही करते हुए कमरे में अँधेरा करके hall-kamre में चली गयी. वह की लाइट जलाये बिना हे एक चालू करके दूसरी तरफ के भी दोनों दरवाजे बहार से लगाती हुई वो जा चुकी थी. यही तोह वो घर था जहा अर्जुन का ख़याल आज भी किसी छोटे बचे जैसा रखा जाता था. वो खुदसे क्या करेगा, क्या नहीं.. ये सब जानते थे और इसलिए हे तारा आयी थी की अर्जुन कुछ वक़्त ाची नींद ले सके.

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"अर्जुन की आवाज थी न अभी कुछ वक़्त पहले?", शंकर जी आँगन में हे खड़े अपने मजबूत जिस्म पर कमीज पहन रहे थे. पतलून के अंदर कमीज डालने के बाद बेल्ट बांधते हुए उन्होंने भी आँगन में देखा जैसे वो अर्जुन की मोटरसाइकिल देख रहे हो. कोमल अपने पिता और दादा जी के लिए chai-nashta लिए आयी और उनकी बात सुन्न कर उसने भी वही सब किया जैसा उसके पिता ने जान ने की कोशिश की थी.

"आया था अभी थोड़ी देर पहले और अभी अपने कमरे में सो रहा है. सोने हे देना क्योंकि 3 घंटे गाडी चला के आया है तोह रात एक डेढ़ बजे निकला होगा. उस से पहले वो उमेद के किसी व्यापारी दोस्त के उधर हाजरी भी लगाने गया था. तुम आज हे निकल रहे हो क्या इन्दर की तरफ?", शंकर जी कुर्सी खिंच कर उसपे बैठते हुए चाय का कप प्लेट में रखते हुए पराठे को गोल करने लगे. निचे बैठने पर सिलवट पड़ सकती थी उनकी पतलून पर.

"मैंने उस से क्या टिंडे लेने है जगा के. बस ये देख रहा था के वो आया कैसे क्योंकि उसकी बुलेट तोह दिख नहीं रही. और सभी वह चले जायेंगे तोह विष्णु अकेला अपनी बरात लेके आएगा पापा? कोमल बीटा थोड़ा अचार लाना गाजर का.", शंकर जी की बात सुन्न कर अपने दादा जी की प्लेट लगाती कोमल ने हामी भरी.

"बहार वो काले रंग का हठी खड़ा है उमेद ने जो इसके नाम किया. उस से भी सबर नहीं हुआ जो गांव में हे गाडी भिजवा दी और ये चरखा इतनी बड़ी गाडी लेके अँधेरे में इधर आ भी पंहुचा. मैंने आज दिल्ली निकलना है और शायद कल वापसी हो पाए शाम तक. वैसे तोह राजू या इन्दर में से कोई लौट आये शाम को पर तुम कही निकलना नहीं शाम के बाद."

"गज्जू का भी समझ से हे बहार है पापा जो इतना बेताब रहा इस तक गाडी पहुंचने के और वैसे वो गाडी ये नींद में भी चलाये तोह सेफ हे रहेगा. वैसे दिल्ली आप जा रहे हो तोह पीछे अर्जुन तोह घर पे हे रहेगा. मैं सोच रहा था की.."

"तू सिर्फ सुन्न बीटा, सोच मत. उसको घर की रखवाली करने नहीं बुलाया मैंने इतनी दूर से. वो भी दिल्ली जा रहा है और उसको शायद थोड़ा रुकना भी पड़े उधर. वैसे तोह तुम्हारी माँ के रहते मुझे कोई चिंता नहीं की तुम घर आओ या नहीं लेकिन आजकल तुम्हारी गाडी शहर से कुछ ज्यादा हे बहार जाने लगी है. अब तुम बचे नहीं रहे शंकर जो एक हे बात बार बार समझनी पड़े. उधर भी अब बचे ब्याह कर चुके है तोह तुम्हे दुनियादारी समझनी चाहिए. विष्णु की तरफ जाने पर कोई मनाही नहीं और चाहो तोह उसको यहाँ बुला लेना या तुम रुक जाना वह.", शंकर जी समझ गए थे की वो लाख इंकार करे लेकिन उनके पिता जानते है की उनका बीटा चंद्रो देवी की हवेली निर्धारित दिनों से ज्यादा जा चूका है. कोमल भी गरम पराठे और अपने पिता के लिए अचार लिए आ चुकी थी.

"वो अपने भाई से पूछना की मेरसेदेज़ की चाबी कहा है? दिल्ली अपने दादा जी के साथ जा रहा है तोह अपनी कार से हे जायेगा. मैं ले जाता हु ये आज.", शंकर जी ने कहने को तोह कह दिया पर रामेश्वर जी ने कोमल को रोकते हुए अपने बेटे की हे कक्षा लगा दी.

"क्यों बरखुरदार सरकारी हॉस्पिटल में तुम्हे उस गाडी की क्या जरुरत पद गयी? और वो भी अब अर्जुन की है जिसको उमेद ने इस वजह से दिया है की वो दिल्ली जा रहा है. अपनी एस्टीम की चाबी कभी खुदसे दी थी अर्जुन को और जब वो सो रहा है तोह उठाना जरुरी है तुम्हे? 48 के हो गए हो पूरे और हरकते वही कॉलेज वाली. वैसे तुम तोह ये गाडी पलट रहे थे न किसी नए मॉडल से?", शंकर जी को जरा भी ये बात पसनद नहीं आयी की उनके बेटे के पास अब 2-2 गाड़ियां थी चाहे वो उन्हें चलाये या न चलाये लेकिन उनके पिता वो किसी और को हाथ लगाने तक नहीं दे रहे थे.

"जो लेने वाला था वो तोह आपने उसको पहले हे ले दी. मैंने सोचा घर में रहेगी तोह मैं भी प्रयोग कर लूंगा पर आप तोह उसपे से भी कपडा उतरने नहीं देते और ये वाली गज्जू ने दी है तोह अब इस्पे भी सिर्फ उसका हे हक़. माँ, मुझे नयी गाडी लेनी है और वही ले कर जाऊंगा मैं विष्णु के ब्याह पर.", कौशल्या जी अभी आयी थी उधर और कोमल अपने पिता की ये बचो जैसी जिद्द सुन्न कर दबे मुँह हंसने लगी लेकिन वो हैरान भी रह गयी जब कौशल्या जी ने एक पल न लगाया अपने बेटे की बात मान ने में.

"तोह मन कब किया मैंने? मेरे भले तोह तू हॉस्पिटल बाद में जा और गाडी पहले उठवा ले. इन्दर भी बोल के गया था के तुझे कोई मजबूत गाडी लेके देनी चाहिए. पर 20-22 लाख की गाडी महंगी नहीं रहगी बीटा?", कौशल्या जी का साफ़ मतलब था की वो इतना रूपया दे रही है शंकर को.

"ये चली जाएगी 3 में और बाकी काम पड़े तोह मैं देख लूंगा. पर मुझे आज हे नयी गाडी लेनी है, आप चेक काट दो बस.", शंकर अपने पिता की तरफ ऐसे देख रहे थे जैसे कोई महायुद्ध जीत लिया हो और रामेश्वर जी ना में सर झटक कर फिर से नाश्ते पर केंद्रित हो गए.

"जेहो जी कोको ओहो जे कोको दे बचे.. गाडी क्यों, जहाज दवाओं आप जी न. मूंदे नाल हे रीसा करदा रहना हर वेले.", अपने पिता की पंजाबी में ऐसी कहती मीठी डपट सुनते हुए शंकर जहा खुश था वही कौशल्या जी ने उठते हुए आदतन वैसा हे जवाब दे डाला.

"अब खाते में पड़े है तोह खर्चने दो. उमेद उसको न देता तोह कॉलेज जाते हे आपके अर्जुन ने लेनी तोह वही गाडी थी. ऊपर से बचो की सुरक्षा जिसमे हो चीज वही लेना ठीक."

"अर्जुन कॉलेज में जाएगा तोह वही लाल फटफटिया लेके जाएगा थानेदारनी जी और आपकी ये करामाती औलाद न चाहे साइकिल से सड़क पर चले, सुरक्षा सड़क पे बाकी लोगो को रखनी पड़ती है. अब जहाज दिलवा हे रही हो तोह लोगो में पैराशूट भी बाँट दो, क्योंकि ये नवाब साहब तोह सड़क पर ऐसे चलते है जैसे वो इनके अकेले के लिए बानी हो. बिगाड़ो, मेरा क्या जाता है."

"बोलने से न हटना कभी. तू ठहर बीटा, मैं चेक लेके आती हु और रंग सफ़ेद हे लियो क्योंकि तुझ पर वही जंचता है.", नाश्ता होने तक शंकर जी के हाथ में चेक भी आ चूका था और चेहरे पर गहरी मुस्कान भी. जाने से पहले कोमल को 500 रुपये पकड़ा कर वो कुछ हिदायते भी देते गए. पंडित जी भी तैयार हो कर 2 जगह फ़ोन करने के बाद पैदल हे घर से निकल चले. अर्जुन अभी तक आराम से सोया हुआ था और कौशल्या जी ने उसकी नींद में तब तक व्यवधान न पहुंचने दिया जबतक कृष्णा जी के साथ साथ बाकी लड़कियों का भी नाश्ता न हो गया. तारा ने दिवार घरी की तरफ देखा तोह उधर 7:15 हो चले थे और कृष्णा जी कपडे बदलने बाथरूम में जा चुकी थी, काम और गर्मी की वजह से जल्दी हे पसीने में भीग गए थे. रुपाली बर्तन समेत कर रसोई में रखते हुए प्रियंका के साथ वही काम करवा रही थी. अब यहाँ सिर्फ सबसे आखिर में नाश्ता करने बैठी कोमल और कौशल्या जी हे उपस्थित थे.

"नानी, आज मुझे ऑफिस अर्जुन छोड़ देगा. 8 बजे निकलना है तोह मैं उसको जगा देती हु, सवा 7 बज रहे है घरी में और नहाने में उसको समय भी लगेगा.", कोमल वैसे हे चेहरा निचे किये अपने नाश्ते के ाहिरी निवाले ख़तम कर रही थी और कौशल्या जी का खाना समाप्त हो चूका था.

"तेरे पास अभी बहोत टाइम है और ऐसा कर रुपाली को अपने साथ ले जा मॉडल टाउन वाले मंदिर और वह से पुजारी जी को अपने साथ लेती आ. परसो तेरे विष्णु मां की बरात जानी है और घर ज्यादा रस्मे न सही लेकिन थोड़ा पूजा पथ तोह करवाना हे पड़ेगा. अभी तेरे नाना भी इधर हे है और बाद में उन्होंने निकल जाना है, उनके रहते हे बात हो जाए तोह सही होगा.", तारा अब ये भी नहीं कह सकती थी की किसी और को भेज दो या अर्जुन बाद में चला जाएगा. और दिल इतना मचल रहा था अर्जुन के लिए वो ये बात कह नहीं सकती थी.

"दादी मैं भी चली जाऊ इनके साथ? वो सुबह मंदिर की तरफ ताजे फल और सब्जियां मिल जाती है. वैसे भी पहले अर्जुन के साथ चले जाते थे या ताऊ जी खुद हे ला देते थे. गली में तोह वही सब मिलता है जो एक दो दिन पुराण बचा हुआ ho.",Priyanka हाथ साफ़ करके जल्दी से इधर आयी और कुर्सी पर टेंगा अपना हरा दुपट्टा उठाते हुए सीने को धक् लिया. तारा ये देख कर अब अपने इरादे वही गिरा बैठी.

"ाची बात है और अगर तुम्हे भी साथ चलना है तोह चलो कोमल. जहा ये दोनों जा रही है तोह तुम पीछे क्यों रहो. काम तोह सारे हो हे चुके है.", तारा ने अपनी आस्तीन वाले गोल गले के टॉप को कोहनी तक ऊपर चढ़ाया और अपने बालो को रबर में बंदति हुई उठ गयी.

"कोमल ने उस बैलबुद्धि का नाश्ता बनाना है और वो उतने नहाने नई वाला जितने उसके कपडे बाथरूम में न रखे जाए. जा कृष्णा तू चली जा इनके साथ और थोड़े फल अलग से भी ले लियो, मंदिर और पूजा में रखने के लिए. हाँ paani-gari वाला नारियल मिले तोह 2 ले लियो. ले पिंकी ये पैसे रख और अगर कोई सामान ख़तम हो तोह देख लियो. पीछे अब तेरे दादा जी भी नहीं होने वाले और अर्जुन ने भी 2-3 घंटे बाद निकल जाना. मैं अपने कमरे में हे हु.", कौशल्या जी प्रियंका को पैसे देने के बाद सलवार कमीज पहने बाथरूम से बहार निकली कृष्णा जी को भी बचो के साथ जाने का आदेश देती हुई अपने कक्ष में चली गयी. अगले 10 मिनट तक कोमल ने रसोई में बचे बर्तन धो दिए थे और कृष्णा जी भी ाचे से तैयार हो कर बाकी तीनो लड़कियों संग घर से निकल गयी. दरवाजा बंद करके कोमल पहले अपनी दादी की तरफ आयी और उनकी बप की दवा के साथ पानी पकड़ा के मैले उछाड़ तकियो से उतरने लगी तोह कौशल्या जी ने उसको मन कर दिया.

"अभी ये कल हे तोह चढ़ाये है और आज मशीन लगाने के लिए रहने दे बीटा. देख साढ़े 7 हो गए है और तेरे बौ जी ने 9 बजे तक वापिस भी आ जाना. अर्जुन तैयार न मिला तोह खामखा पंजाबी बोलने लगेंगे. काम तोह अब उतना है हे कहा जब आधा घर हे खाली हो. उसके कपडे रखती आना उठाने के बाद नहीं तोह वो बैलबुद्धि कीड़ी की तरह तैयार होता रहेगा.", अपने छोटे भाई की आदत के बारे में सुन्न कर कोमल के चेहरे पर भी एक मासूम सी मुस्कान तैर उठी. आज आसमानी ढीली सी सूती कुर्ती और पटिआला सफ़ेद सलवार में कोमल का नैसर्गिक सौंदर्य बिना की अतिरिक्त saaj-sajja के भी चरम पर हे था. अक्सर वो ढीले वस्त्र हे पहनती थी जिस्म की संरचना को बखूबी छिपाने के लिहाज से सिवाए किसी ख़ास अवसर पर साड़ी के, जिसमे उसके सामने बाकी सभी बहने 19 हे लगती थी.

"ारु वापिस कब आएगा दादी? मेरा मतलब है की दिल्ली का काम पूरा करने के बाद वो इधर आएगा या वापिस गाँव.?"

"तू उसकी चिंता में क्यों वजन घटा रही है? मेरा बस चले तोह मैं उसको घर से कही जाने हे न दू पर वो खुद और उसके दादा जी जाने क्या तिकड़म लगते फिरते है. वैसे वो कही घूम के आने की बात भी कर रहा था परीक्षा के इनाम में. गाँव का टालने की कोशिश करुँगी अगर तेरी माँ माने तोह. चल मैं थोड़ा आराम कर रही हु, तेरे बाप के देरी से आने पर सोई भी 1 बजे थी रात.", कौशल्या जी ने अपने साड़ी आदतन थोड़ी सही करने के बाद सर तकिये पर रख लिया. कोमल ने भी कमरे से जाने से पहले जीरो का बल्ब बुझाने के बाद जाली वाला दरवाजा भी लगा दिए.

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"सपना है?", दोनों तकियो की जगह अपने हाथ के निचे उस सुघड़ रेशमी कमर के एहसास पर अर्जुन ने आँखें खोली तोह हलके उजाले में उसके चेहरे के करीब जो चेहरा था वो खवाब सा हे था. माथे पर छोटी सी काली बिंदी, बाल पीछे बंधे और गहरी आँखों का अपने चेहरे को निहारते देख वो थोड़ा आगे खिसक कर इस naam-swaroop कोमल जिस्म को अपने करीब करते हुए बोलै. उसके खुदके घुंगराले बाल माथे पर झूल रहे थे जिन्हे पीछे करती कोमल ने ना में सर हिलाया. जिस्म पर वो आसमानी कुर्ती नदारद थी और एक पतली सफ़ेद बनियान सी शमीज में क़ैद उनके दुग्धकलेश एक तरफ से बिस्टेर पर टिकने के बावजूद जैसे वस्त्र फाड़ कर बहार आने को आतुर. उनके ऊपर उभरी 2 नन्ही नोक जाहिर थी ब्रा के न होने से. दूध से रंगत के साथ बदन के वो ख़ास रेशम सी चमक और दोनों उभर के बीच की हलकी सी दरार का वस्त्र से बहार झांकना. गले और सीने के बीच एक कला टिल, जिस पर चुम्बन किये बिना अर्जुन रुकता हे कहा. फिलहाल तोह उसके हाथ कोमल दीदी की चिकनी मेरु पर फिसलते हुए उनके इस ख़ास जिस्म की लमस महसूस कर रहे थे.

"तुम आओगे तोह मैं तुम्हे वैसे हे मिलूंगी जैसे तुम हमेशा से चाहते हो. और मैं अपने वाडे हमेशा निभाती हु. तुम बड़े हो रहे हो, देखो दाढ़ी फूटने लगी है ठुड्डी और किनारो पर.", कोमल ने चेहरे पर प्यार से हाथ फिरते हुए अपनी कही बात याद दिलाई तोह अर्जुन भी चेहरा करीब खिसकते हुए उनकी नाक, आँखों और माथे को चूम कर कस के लिपट गया. वो भारी लेकिन पूर्णकार उरोज उसके निर्वस्त्र मजबूत सीने से आ लगे जिस पर कोमल ने खुद हे अपनी जांघ उसके मजबूत पत् पर रखते हुए अपने नाजुक होंठो को अर्जुन के सूखे लबो से जोड़ दिया. वो इतने नरम और रसभरे थे की अर्जुन जल्दबाजी करने से रुक न सका. हाथ कमर से फिसल कर सीने से अनुपात में उठे उनके लचीले कूल्हों को मसलता हुआ अपने ऊपर लाने लगा. कोमल ने तोह आजतक अर्जुन को किसी बात के लिए इंकार हे कहा किया था. शमीजे के गले से दोनों गुब्बारे से पहले और मॉटे दूध काफी हद्द तक बहार निकल आये. पाजामे के भीतर बना टेंट कोमल दीदी की जांघो को छुपती मखमली पंतय के ऊपर से हे उनकी मांसल योनि पर दबाव देने लगा.

"अभी आपने हे कहा न की मैं बड़ा होने लगा हु. टाइम लगेगा पर सुधर जरूर जाऊंगा. आपसे दूर होने पर हे बहकता हु, पास रख लो.", अर्जुन की बात सुन्न कर वो मुस्कुराते हुए भी सिसक उठी. अर्जुन ने काम हे कुछ ऐसा किया था. अपने होंठो को भरी स्टैनो की घाटी में लगाने के साथ दोनों हाथो से 38 के बहार निकले कोमल के नरम मांस भरे कूल्हों को कस के दबोच लिया. निचे उसकी कमर ने झटका दिया तोह पंतय के उभरा भाग लिंग की सख्ती से भीतर जा दबा. एक हाथ कूल्हों से खिंच कर पीठ सेहलते हुए अर्जुन अपनी इस प्यारी बड़ी बहिन की बगल को शमिज के भीतर से सहलाते हुए उनके नरम सतांन की बहार गोलाई रगड़ने लगा. कठोरता के साथ उनके स्टैनो का भराव भी उतना हे बेजोड़ था. कमर उचकते हुए कोमल ने हे अपनी पंतय को पीछे करना चाहा तोह वो कूल्हों की दरार और योनि के उबार पर हे अटक गयी. यही उनकी इस उठी हुई मुद्रा पर अर्जुन ने दूसरा हाथ निचे सरकते हुए उस दहकते हुए कटाव के ऊपर फिर दिया.

"आह्हः.. आपकी ये तोह पूरी गरम है दीदी.. हाथ भी नहीं लगाया मेरे बिना? वैसे हेअल्थी लग रही है.", अर्जुन ने छूट की फुलावट और कसाव का जायजा लेते हुए कोमल को छेड़ा तोह उसने भी बदले में अर्जुन का गाल हलके से काट लिया. शमीज नीचे ढलकी थी और ठीक इसी पल अर्जुन ने उनका एक मोटा उभर एक पट्टी कंधे से निचे करते हुए बहार निकल लिया. वो इनकी तुलना कभी किसी से करता हे नहीं था और थे भी वो ख़ास जिनकी गोलाई सामान हे उनका हल्का भूरा घेरा और उसके बीचो बीच उभरा कठै तीखा निप्पल जो अभी से अकड़ा हुआ था. खींचने पर भी कोमल के स्टैनो में जरा सी भी लटकन नहीं थी और अपने भाई की चाहत पूरी करते हुए उसने खुद हे वो नुकीला भाग उसके होंठो पर रख दिया. मजे की इंतिहा से दोनों के आँखें बंद हो चली. कोमल का पृष्ट भाग अभी तक ऊपर उठा था जिधर दरदरी सिलवटों और मुलायम योनि के होंठो को सहलाता अर्जुन तल्लीनता से उनका सतांन चूसने लगा. जाने कैसा रास निकलता था जो अदृश्य हो कर भी अर्जुन को उनके प्रति दीवाना बनाये रखता. नरम कूल्हों के बीच उभरी हुई gori-gulabi योनि की लकीर में जल्द हे ौस की बूंदे पनपने लगी और कोमल इस सुख में लीं अर्जुन को बिना रोके तोके कितने हे समय तक उसको अपना सतांन पिलाती रही. अर्जुन ने हे आखिर मुँह हटाया और उन्हें सावधानी से पलट कर अपने निचे ले लिया. एक सतांन बहार और दूसरा आधा झांकता हुआ. कोमल का चेहरा लाल हो चला था पर चेहरा पर वही प्यारी मुस्कान. पंतय आधी के जांघ से उतरी हुई और योनि के सामने रुकी हुई. अर्जुन भी अपना पजामा एक तरफ उतर कर फेंकने के बाद अपनी दीदी की गोल आपस में सटी जांघो को सहलाता, चूमता हुआ उस आखिरी वस्त्र को कूल्हों के निचे से खिंच कर निकलने के बाद अपने sukh-sagar को निहारने लगा. कोमल ने टाँगे जोड़नी चाहि तोह उस से पहले हे अर्जुन ने अपना चेहरा उनके बीच फंसा दिया.

"उफ्फ्फ.. ारु नहीं.. आह्ह्ह्ह..", कोमल आगे क्या टोकती जब उसके चिकने नरम पत् का हल्का पसीना चाटने के साथ हे अर्जुन ने मजबूती से दोनों जंघे थाम कर योनि का पहला हुआ मांस होंठो में भर लिया. कोमल के हाथो में अब बिस्टेर पर बिछी चादर हे थी जो मजे की इन्तहा से कांपते शरीर को थामने की उसकी कोशिश. उसका एकमात्र प्यार भी तोह बस युवक था, जो अपनी बड़ी बहिन के समर्पण मुताबिक हे उनसे बढ़ कर प्रेम दर्शाता जब भी उन्हें एकांत नसीब होता. अर्जुन के हाथ भीतर धंसे चिकने पेट से आगे बढ़ कर उन दोनों पुष्ट स्टैनो को मसलने लगे जिन्हे आखिरी बार जाने उसने कब हाथ लगाया होगा. कोमल अपनी योनि के भीतर रेंगती गीली जीभ से मचल हे रही थी और उसके स्टैनो ने भी पेट में तरंगे बढ़ानी शुरू कर दी. अर्जुन के हाथ मजबूत होने के बावजूद उन पुष्ट गोलों को बड़े प्यार से मसलते, सहलाते और निप्पल को पकड़ कर हलके से रगड़ देने लगते. कोमल कमर को ऊपर उठाने लगी जिसका मतलब यही था की वो चरम पर आने लगी है. अर्जुन तुरंत हे ऊपर उठ गया.

"लगता है हाथ भी नहीं लगाया आपने? लेकिन त्यार तोह ऐसे है जैसे..."

"तुम्हारा इन्तजार तोह तभी शुरू हो गया था जब तुमने कहा की तुम आने वाले हो. ज्यादा टाइम नहीं है?"

"दर्द होगा?", अर्जुन ने अपने लिंग को देखा जो पहले हे प्रीती के पास से आने पर अकड़ा हुआ था और दोबारा गरम होने पर उसकी सख्ती इस कदर बढ़ी थी की कोमल की काली सी बंद ननर आती प्यारी सी योनि यक़ीनन फट हे जाती. एक बार कोमल ने भी उस दहकते हुए लोहे से लाल सुपडे को देखा जो रह रह कर कैंप रहा था. मोटाई पहले से कुछ अधिक थी पर कोमल जैसे इसके लिए भी पूरी तैयार.

"पहली बार में जितना सोचा था उतना तोह नहीं हुआ था. अब तोह नाम भी लिखा है. जितने तुम खाली नहीं होंगे, उतने तुम्हारा ध्यान भी सही से नहीं लगने वाला. और इस बार थोड़ा सा लालच मेरा भी है. हाँ.. मैंने बहोत मिस किया तुम्हे और तुम्हारे साथ को..", कहते हुए कोमल की पलके झुक चुकी थी. वो आदतन ऐसा कभी कुछ नहीं कहती थी और न अपनी मर्ज़ी जाहिर करती थी लेकिन अर्जुन से अलगाव और उसके प्रेम को भली भांति महसूस किया था कोमल ने उसकी gair-maujdgi में. अर्जुन भी आगे कुछ न कह कर अपनी टेबल की दराज से सर्दियों में खुश्क त्वचा पर लगाया जाने वाला लोशन उठा कर दोबारा उनकी जांघो के बीच आ बैठा. ऊँगली फिरने के बाद कोमल की योनि के होंठ फिर से मिल जाते और उनका उभार और लचक देख अर्जुन जैसे उनसे खेलने हे लग पड़ा चिकनाई देते हुए.

"तुम्हे लगता है न मैं सेहन नहीं कर सकुंगी? वैसे भी घर में कोई नहीं है अगल आधे घंटे पर तुम्हे तैयार भी होना है इसलिए टाइम वास्ते मैट करो. और मुझे उस रात जैसा हे पसंद है जब तुम..."

"जब आपने बाद में ऋतू को भेजा.. हाहाहा. कमाल नहीं करती आप दीदी?"

"दीदी? वैसे तोह पहली बीवी बोल रहे थे..", कोमल ने बड़ी चंचलता से कहा था और अर्जुन ने लोशन के साथ अपना लिंग भी उनके सामने कर दिया जिस पर ढेर सारा सफ़ेद तरल गिरती वो अपने नरम हाथो से मलने लगी. करीब से देखने पर उन्हें वो असाधारण लिंग कही जयदा हे प्यारा नजर आया.

"पहली बीवी से मैंने कब इंकार किया है पर दीदी भी तोह हो. यही अगर रात में आप वैसे आती जैसे मैं हमेशा से चाहता हु तोह पक्का सिर्फ बीवी हे बोलता.. दर्द होगा.", अर्जुन उनकी दोनों टाँगे मदद कर योनि पर पूरी तरह चिकना किया मूसल टिकते हुए आगे झुक गया. दोनों के चिकने अंग बखूबी एक दूसरे से चिपक चुके थे और नरम फांको के बीच सूपड़ा छोटे से चिदड्रा पर आ रुका. होंठो को अपने मुँह में भरने से पहले अर्जुन ने उनकी आँखों को देखा जैसे जवाब सुने बिना वो आगे बढ़ने नहीं वाला था.

"उस रात.. वो चाहती थी की हम दोनों एक साथ तुम्हारे पास हो. वो मुश्किल था लेकिन जो किया वो मुमकिन. बस ऋतू की हालत कुछ ज्यादा बुरी थी और उतनी हे तुम्हारी. मैं ठीक थी अगर ध्यान दिया हो. और अभी भी मैं तैयार हु, तुम्हारे तरह हां ना में उलझी हुई नहीं. मुझे तुम चाहिए हो अर्जुन, इस पल सिर्फ tum...aaahhhhh.. उम्मम्मम", और एक करारे धक्के में उनकी पहली हुई गुलाबी योनि खिंच कर 4 इंच के व्यास में फैल गयी. उनकी जांघो में लचक के साथ हे दोनों स्टैनो का थिरकना कही ज्यादा कामुक और अर्जुन की बेजोड़ ताक़त को सँभालने की क्षमता बताता था. अगले 2 धक्को में हे दोनों भाई बहिन एक दूसरे से पूरे चिपके हुए थे. पीछे से नजारा ऐसा था की योनि से निचे अर्जुन के भरी वीर्य भरे वृषण गुदा को ढके थे और योनि किसी सुर्ख रबर सी फैली हुई पूरा लिंग भीतर जकड़े हुए. कोमल दीदी की आँखों के किनारो से 2 बूँद आंसू बह निकले लेकिन उन्हें अपने गर्भ पर उस ठोकर का एहसास इस दर्द से कही ज्यादा सुखद लगा जिसने उनके फूल सी योनि को बुरी तरफ भेंड़ दिया था. अर्जुन उनके होंठो का मधुर रास पीटा हुआ अपने सीने पर निर्वस्त्र नरम उरोजों के स्पर्श के साथ लिंग का इतनी गरम सुरंग में कैसा होना महसूस करके कुछ वक़्त वैसे हे रुका रहा. कोमल दीदी ने हे उसके कूल्हों पर चपत लगते हुए तन्द्रा भांग की.

"आह्हः.. मुझे हे लग रहा है की आपकी इतनी ज्यादा टाइट है दीदी.. आप रो रही है..?"

"नहीं.. तेरे करीब होने की ख़ुशी है.. ारु.. उम्म्म", जिस दिलेरी से उन्होंने खुदको साधारण करते हुए उसका चेहरा थाम कर फिर से चूमा था, चिकनी योनि से 3 इंच लिंग बहार निकल कर फिर से पेवस्त हो गया.. यही योनि तोह वो मयान थी जो अर्जुन की असाधारण तलवार को बखूबी खुद में समां लेती, चाहे दर्द होता था पर उसको सहने की क्षमता भी उतनी हे अधिक. दोनों स्टैनो को आपस में भिड़ा कर बारी से उनके उठे हुए निप्पल चूमता अर्जुन एक तये ताल से इस अत्यधिक चिकनी और गरम योनि की गहराई बार बार मापने लगा. मजबूत बिस्टेर पर ठप्प ठप्प की आवाज के साथ दोनों के पत् आपस में टकराते और कोमल उसको और भी भीतर खींचने लगती. योनि के किनारे आज जलन नहीं कर रहे थे बल्कि हर रगड़ से उनके स्टैनो में कठोरता बढ़ने लगती. कॉमर्स बेहटा हुआ गुलाबी गुदाद्वार को भिगोने लगा और अर्जुन उनकी काख के निचे दोनों हाथ करके अपनी इस फूल सी कोमल बहिन को ऊपर उठाते हुए अब गॉड में ले बैठा. कोमल उसके चेहरे पर हर जगह चूमती हुई खुद हे उछलने लगी, पंजे उसके दोनों तरफ से बिस्तर पर टिकाये. थिरकते चुचो की रगड़ मजबूत सीने पर करंट सी लगती और उनका आपस में पीसना जैसे कोई ऊर्जा उड़ेलता. मॉटे कूल्हों की गहरी दरार कुछ फैल कर योनि के भीतर का गुलाबी मांस दिखलाने लगती जो कॉमर्स से भीग कर लिंग के अंदर बहार होने पर कही ज्यादा कामुक दीखता. हर बार चोट गर्भ पर लगने से जैसे कोमल को उछलने की नयी ताक़त मिलने लगी. अर्जुन पागल सा हो कर उनके होंठो को खाने की कोशिश करता हुआ गुदा से chhed-chhad करने लगा. दरदरा सा वो अछूता छेद आज तक कोरा हे था लेकिन वह स्पर्श होने पर कोमल की योनि ने मजबूत संकुचन पैदा किया. अर्जुन की हे मदहोश आवाज उभरी.

"आअह्ह्ह्ह.. दीदी... थोड़ा आराम से... आह्ह्ह्ह.. टूट न जाए..", कोमल तोह उसके कंधे थामे उसको चूमती हुई फिर से सखलन के बावजूद अर्जुन को चरम तक ले चली. कॉमर्स अर्जुन के अंडकोष से बिस्टेर तक जाने लगा जहा लोशन की सफ़ेद भी योनि से निचे आती अलग सा रंग दिखने लगी. इतनी धुआँधार चुदाई के बावजूद कोमल हे उस पर हावी थी बेशक दोनों मॉटे सतांन रगड़ से लाल और निप्पल बैंगनी हो चले. अर्जुन ने एक सतांन को मजबूती से पकड़ कर अपनी पूरी ताक़त लगते हुए जड़ तक लिंग भीतर ठूंस दिया. ये जैसे वो बचा हुआ आधा इंच था जो इस मुद्रा में हे मुमकिन हुआ छूट के उभरे होने और टांगो के फैलने की वजह से. इस बार तोह कोमल भी अपनी चीख न रोक सकीय क्योंकि अर्जुन की जड़ जैसे योनि मुख पर अटक सी गयी थी. रह रह कर कांपते दोनों के बदन और योनि की गहराई और गर्भ पर होती गरम तरल की बौछार से कोमल उस से लिपटी हुई भीगी आँखों के बावजूद आनंद में डूब चली. योनि को ऐसी हे kaam-varsha की सख्त जरुरत थी जो इतनी गहराई में आज अर्जुन की ताक़त से अधिक उनके खुदके प्रोत्साहन ने मुमकिन की. अर्जुन के लिंग से निकला हर वीर्य का कटरा भीतर निचोड़ती हुई कोमल ने अपनी योनि को कही ज्यादा कस लिया. जब दोनों के होंठ एक बार फिर मिले तोह मजबूती से पाँव बिस्टेर पर टिकाये कोमल सीढ़ी कड़ी हुई. योनि लिंग से जुड़ा होने पर पुक्क की आवाज के साथ हे सफ़ेद गधा तरल एक धार में निचे टपकता हुआ योनि को खली करने लगा. अर्जुन साफ़ देख रहा था की उसकी भीषण चुदाई ने वो कोरी योनि बुरी तरह फैला कर ऐसी खोल दी थी की 3 उँगलियाँ एक साथ भीतर आराम से दाखिल हो जाए. उसकी जांघो के बीच हे ऊपर से टपका वीर्य जमा था और कुछ एक तार सा योनि से चिपका हवा में लटका हुआ.

"मैं बिस्टेर सही करती हु, तुम नाहा लो."

"आप ठीक हो न?,", उनकी योनि और स्टैनो की हालत के साथ सूजे हुए गुलाबी होंठ देख कर अर्जुन को चिंता हुई लेकिन कोमल मुस्कुराती हुई बिस्टेर से निचे उतर कर एक मैले कपडे से वीर्य साफ़ करते हुए अपनी चाल दिखा कर साबित कर चुकी थी की बेशक अर्जुन उस से कही ज्यादा ताक़तवर था लेकिन वो उसको झेल सकती थी. कूल्हों में कम्पन्न जरूर थी और टाँगे थोड़ी फैली हुई.

"इस से ज्यादा बेहतर तोह मैं कभी भी नहीं थी. काम से काम 3 दिन तुम पास तोह रहोगे, हर रात. अब तुम्हे जाना है भी है.", शमीज पहनते हुए उन्होंने अपनी योनि को साफ़ करने की जेहमत न उठाई.

"हमने सेफ्टी नहीं देखि."

"सेफ पीरियड में हु मैं और चिंता मुझे होनी चाहिए जो की है. तुम ठीक हो न?", अर्जुन के लिंग की जड़ पर बना लाल घेरा देख कर उन्होंने ये सवाल किया था और वो भी बिस्टेर से उठ कर चलने लगा तोह एक हाथ से दिवार का सहारा लेते हुए रुक गया.

"मैं तोह सोच रहा था के आपके साथ आज .. पर अगली बार सही."

"हाँ.. और मैं उसके लिए तैयार भी हु अब. लाल कपड़ो में?"

"लाल कपड़ो में.", अर्जुन ने करीब आ कर फिर से उनके स्टैनो को शमीज के ऊपर से हे चूमा और उसके बाद उनके होंठो को. कोमल ने भी एक बार उसको कस के गले लगाने के बाद त्यार होने के लिए बाथरूम तक भेजा और फिर कमरा समेटने लगी. अब उसको भी अपने पेट में दर्द का एहसास होने लगा था पर वो खुश थी ऐसे उन्मुक्त संसर्ग से. पंतय बगल वाले कमरे में हे अलमारी के भीतर रखती हुई वो सिर्फ सलवार पहन कर निचे चल दी. चाल कछुए सी धीमी थी और कूल्हों के साथ स्टैनो में भी कमीज के बावजूद जबरदस्त थिरकन जो अभी से अर्जुन मिलान की उत्तेजना फिर जगाने लगी थी. आखिर वो अपने भाई की चाहत को भली भांति समझती थी और उनका प्यार स्वयं अर्जुन से भी कही गहरा था.

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"तुम जितनी लायक हो, ये बैलबुद्धि उतना हे बड़ा नालायक. अभी से आदत बिगाड़ दो इसकी तुम.", अर्जुन नाश्ता करते हुए अपनी चची से बात कर रहा था और उसकी प्लेट लगाने से ले कर अब दिल्ली जाने के कपडे तक एक छोटी अटैची में पैक करके प्रीती मेज पर रख चुकी थी. कौशल्या जी ने आते के साथ हे सब देखा और फिर प्रीती को गिलास में पानी भर कर अर्जुन के पास रखते हुए भी. उनकी बात सुन्न कर प्रीती तोह रसोई की तरफ बढ़ने लगी पर प्रियंका हे उसके लिए कॉफ़ी ले कर वही आ पहुंची.

"दादी, इसने तोह कोमल को नाश्ता भी बनाने नहीं दिया और माँ को भी कह दिया की वो बैठे अर्जुन के पास 2 घरी, काम ये देख लेगी. मैं तोह कहती हु कॉलेज जाने से पहले हे रस्मे निभा दो इनकी.", प्रियंका अपनी दादी के पास चाय और प्रीती की कफ टेबल पर रख कर अर्जुन के दूसरी तरफ आ बैठी. वो जिस तरह हंस रही थी कृष्णा जी ने हे उसके सर पर चपत लागते हुए चुप करवाया. कौशल्या जी ने सब जान ने के बाद प्रीती को अपने बराबर लगते हुए जवाब दिया

"रस्मे तोह किसी दिन तेरी करवानी पड़ेंगी. ये तोह पहले से आयी ावै है बस अर्जुन हे न पढ़ाई पूरी करने को आ रहा. आज खेत संभाल ले तोह मई ब्याह दू इसको.", ये साफ़ साफ़ तंज हे था उनका लेकिन प्रीती हैरानी से उन्हें देखने लगी जिसको ये बात समझ नहीं आयी थी.

"ये खेत क्यों संभालेगा दादी जी? कॉलेज जाना जरुरी है न?", और इसके बाद खुद अर्जुन भी हंस उठा अपनी मानो की नादानी पर.

"तुम भी न प्रीती. माँ जी तुम्हारी हे खिंचाई कर रही है क्योंकि तुम इसको अगर कुछ करने हे नहीं डौगी तोह ये खेती हे करेगा. वैसे ये कोमल कहा है?", कृष्णा जी के पूछते हे अर्जुन ने तुरंत पानी का गिलास मुँह से लगा लिया. उसको खुद हे पता नहीं था की उसकी दीदी कहा गयी जो आयी तोह नीचे हे थी.

"वो कोमल दीदी से माँ को थोड़ा काम था चची जी, इसलिए मैं इधर आ गयी और वो घंटे तक आती है. अर्जुन ने कब निकलना है?", प्रीती की बात पर अर्जुन ने घरी देखि तोह 9 बज चुके थे. उसको अब मल्होत्रा जी के घर पहोचना था प्रिय दीदी से बात करने के लिए.

"वो तोह पता नहीं लेकिन मैं जरा मल्होत्रा अंकल के घर जा रहा हु दादी. उनसे हे काम है और फिर बौ जी भी आते हे होंगे.", अर्जुन खड़ा हुआ तोह प्रीती ने बेध्यानी में हाथ पौंछने के लिए टोलिया भी आगे बढ़ा दिया. कौशल्या जी ने तोह सर पे हे हाथ रख लिया और बाकी तीनो हंसने लगे. अर्जुन का भी ध्यान प्रीती पर हे था जो हाथ पांच कर बहार चला गया.

"तेरा भी कोई हाल नई बिटिया. यही सब तोह इसकी चची, माँ और बहने करती आयी और आगे से तू भी इसको कुछ न करने दियो. कल से बोलेगा का रोटी टूक भी खुद हे खिला दो तोह तू मुँह में बुर्किया भी डालेगी? भगवान् भला करे.. चल थोड़ी देर दूरदर्शन हे देखते है.", कौशल्या जी प्रीती को आजकल बहोत से मामलो में शिक्षा दे रही थी और ये घर ग्रस्ति के काम जिन पर वो टोक रही थी, बाकायदा उन्होंने हे सिखाया था प्रीती को.

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"अरे भाई आज तोह बड़े लोग हमारे गरीबखाने पर. कही मैं सपना तोह नहीं देख रहा?", ये कपिल भैया थे जिनसे अर्जुन की भेंट घर पर दस्तक देते हे हुई. वो अपनी कार में बैग रखते हुए धागा फैक्ट्री के लिए निकल हे रहे थे और उनकी बगल में हे peele-safee फूलो वाली हरी साड़ी पहने छरहरी गोरी पालक भाभी थी. दोनों के हे चेहरे पर अर्जुन को देखते हे ख़ुशी नजर आयी जहा कपिल भैया के लिए ये एक अप्रत्यक्ष मुलाक़ात थी अपने इस पडोसी छोटे भाई से, वही प्रिय भाभी तोह जाने कबसे हे आकर्षित थी इस सवा 6 फुट के अपने नासमझ देवर पर. संजीव की शादी के दौरान हुई रस्मो में हे उन्होंने भली भांति इस लड़के को जाना और समझा था. वह कोई मौका नहीं छोड़ा था उन्होंने अर्जुन के मजे लेने का और आज वो उनके सामने खड़ा नीली जीन्स और सफ़ेद नीली धरी वाली उजली कमीज पहने.

"आपके सपने तोह वो नहीं देखती थी भैया जो गली में से साइकिल पर गुजरती थी जब आप छत्त पर bat-ball खेलने के बहाने खड़े रहते थे?", अर्जुन ने भी उनके परिहास पर भरपूर मजाक कर डाला जिस पर खिसियाते से कपिल भैया अपनी बीवी को देख कर ना में सर हिलाते हुए अर्जुन के हाथ हे जोड़ने लगे.

"अबे तू तोह भाई इतने टाइम बाद मिल भी रहा है तोह गर्दन कटवाने के हिसाब से. तेरी भाभी ने रात को घर नहीं बढ़ने देना अब मुझे."

"हाहाहा.. अरे भैया आपके और संजीव भैया के ऊपर ये बात कोई नींद में भी नहीं मानेगा. वो तोह भाभी इतना अकड़ के कड़ी थी की मैंने सोचा लगे हाथ मैं भी उनके साथ हाथ मिला लू. वैसे मैं आया और आप निकल रहे हो? आगे तोह आप 10 बजे नहीं निकलते थे?", अर्जुन ने उनसे हाथ मिलाने के बाद गाडी के पास खड़े होते हे बात शुरू की.

"अरे भाई वो टाइम तोह कबका जा चूका जब मैं 10 बजे निकलता था. मिल आजकल din-raat चालू है और कई बार तोह रात में भी घर आना मुश्किल हो जाता है. पालक आयी हुई है तोह फिर भी देर से हे सही लेकिन आ जाता हु घर. एक महीने और यही रूटीन रहेगा क्योंकि आर्डर बड़ी कंपनी का है जो टाइम पर देने से आगे काम मिलेगा. मैं जाऊंगा तोह पापा वापिस आएंगे जो सवेरे जल्दी चले जाते है तक़रीबन 5 बजे हे. तुम सुनाओ भाई संजीव के जाते हे तुम भी गायब हो गए. वो नहीं है तोह कभी कभी इधर भी आ हे सकते हो. प्रिय तोह कह रही थी की तुम बड़े अकड़ू और घमंडी हो.", यहाँ कपिल भैया ने गाडी का सेल्फ मारने के बाद उसको गरमाने के लिए छोड़ने के साथ अपनी बीवी के कंधे से हे बन्दूक चला दी थी.

"कुछ भी बोलते हो आप. मैंने कब कहा की ये घमंडी है? हाँ अकड़ू है जो सरोज के घर जा सकता है, ज्योति के इधर भी हर दूसरे दिन लेकिन हमारे यहाँ पर आने से इसके कद में फरक पड़ता है. अब आपको देरी नहीं हो रही?", प्रिय भाभी ने ताने तोह उचित हे दिए थे और कपिल भैया ने अर्जुन का कन्धा थपथपाते हुए आगे बात बढ़ा दी उसके जवाब से पहले हे.

"झेलो अब तुम अपनी भाभी को और मन लेना नहीं तोह रोटी मुझे हे नसीब नहीं होने वाली तुम्हारी 'अकड़' की वजह से. हाहाहा."

"मतलब कुछ भी? आप जाते हुए इन्हे भड़का के जा रहे हो जिस से उल्टा मैं हे फंसू. कोई बात नहीं, भाभी के साथ होली खेल सकते है तोह दांत भी सेह लेंगे. वैसे सुना तोह मैंने ये था की आप हे भाभी से इतना प्यार करते हो की इन्हे घर से बहार नहीं निकलने देते. और भाभी है भी इतनी सुन्दर की ये डर रहना भी चाहिए. क्या पता कोई देवर भगा हे न ले जाए.", अब प्रिय मुँह दबाये हंसती हुई चेहरा फिरने लगी थी और कपिल भैया भी अर्जुन से हँसते हुए विदा ले कर कार में बैठ निकले तोह अर्जुन ने हे दरवाजा बंद किया.

"ज्यादा हे तारीफ नहीं कर रहे थे तुम, वो भी मेरे पति के हे सामने?", भाभी के छरहरे बदन पर सिर्फ एक क्षण नजर गयी थी अर्जुन की क्योंकि उनका सुत्वा गोरा पेट और गहरी नाभि स्पष्ट थी उस साड़ी से. लेकिन चेहरे के कटाव और चमकती आँखें उनके चंचल व्यक्तित्व में चार चाँद लगते थे. विवाह के इतने समय बाद तक भी वो किसी नवयुवती से हे थी, 32-26-34 की कामुक सरंचना वाली एक लम्बी खूबसूरत महिला.

"अभी तोह शब्दों पर लगाम थी भाभी क्योंकि आपके पतिदेव के सामने ज्यादा तारीफ भी नहीं कर सकता. हाँ शिकायत तोह मुझे करनी चाहिए क्योंकि सबसे ज्यादा मजाक भी आपने मेरा उदय था और देखो बात आज मैं खुद हे करने आया जबकि आपने कभी पहल तक नहीं की.", अर्जुन उनके साथ चलता हुआ आँगन की चाय से बैठक वाले कक्ष में दाखिल हुआ तोह प्रिय भाभी दरवाजे का एक पल्ला खोल कर उसके साथ हे आगे रुक गयी. अंदर आता अर्जुन उनके जिस्म से सत्ता और ब्याह हलके से उनके ऊपर उठे उभर से लगती सी निकली. सबकुछ बहोत जल्दी में हुआ जिसका अर्जुन को तोह ख़ास पता न चला लेकिन प्रिय भाभी उस मजबूत युवक के आकर्षण में फंसने लगी थी, एक बार फिर. बैठक saaf-suthri और व्यवस्थित थी जैसे कई दिनों से कोई यहाँ आया हे न हो.

"क्या लोगे पहले ये बताओ? बिना किसी फंक्शन या त्यौहार के तोह तुम पहली हे बार आये हो यहाँ.", भाभी ने उसको सोफे पर बैठते हुए कंधे पर हाथ रखे हुए हे पुछा जिस पर चेहरा ऊपर उठा कर उन्हें देखते अर्जुन की नजर सबसे पहले उनके गहरे हरे रेंज के कैसे हुए ब्लाउज पर पड़ी और आगे गोरी पतली गर्दन से तीखे नैन नक्श पर. होंठो के निचे वो कला टिल बहोत कामुक था पर ऐसी स्त्री अभी तक कमसिन कैसे है.

"वो.. बस आप एक बार आंटी जी को बता दीजिये की मैं आया हु भाभी. उन्हें जरुरी काम था कोई मुझसे और मैं नाश्ता करके सीधा आया हु.", अर्जुन से अपनी तारीफ तोह प्रिय भाभी नजरो में हे ले चुकी थी लेकिन ये बातचीत इतनी जल्दी विराम लेगी, इस से उन्हें कुछ खेद जरूर हुआ.

"मतलब आज आना भी हुआ तोह माँ जी के काम से? अपनी भाभी से मिलने नहीं आये तुम.", ऐसी शौखी देख कर अर्जुन मंद मंद मुस्कुराया और फिर उनकी नजरो को पढ़ते हुए जवाब दिया.

"ऐसा है न भाभी, एक बार आपकी माँ जी निश्चिंत हो जाए उसके बाद तोह मैं कौनसा दूसरे शहर रहता हु. जैसे आपने कहा की मैं सरोज भाभी के घर जाने का समय निकाल लेता हु तोह यकीन करो उनसे ज्यादा आपसे मिलने आऊंगा. अभी तोह मैं सब छोड़ के गाँव से आने के बाद बस नाश्ता करके इधर हे आया हु.", अब प्रिय भाभी अपने मनमर्जी के जवाब पर मुस्कुराती हुई भीतर की तरफ चली गयी. उनकी चाल में आयी ये नयी लचक देख अर्जुन मैं हे मैं खुदको हे कोसने लगा. जाने अब यहाँ क्या हाल होने वाला था उसका लेकिन इस बार वो कोमल दीदी से जरूर पहले बात करेगा अगर कुछ भी बात राह से भटकती लगी. वो उस बैठक में बैठा हुआ कुछ तस्वीरों और मेडल्स को हे देख रहा था जो पता नहीं किसके थे और तभी सामने से मल्होत्रा आंटी जी अपनी बेटी पालक को लिए आती नजर आयी. आंटी जी तोह हमेशा की तरह घरेलु अवतार में हे थी, बुरी साड़ी के साथ बेमेल ब्लाउज और बाल ऊपर जुड़े में बंधे जबकि पालक बसंती पीले रेंज के चटख चुस्त कमीज और काले पाजामे में आज भी वैसी हे लग रही थी जैसी अर्जुन को तक़रीबन एक साल पहले की याद थी. क्लिप में बंधे उसके सीधे लम्बे बाल, चेहरे पर भोलेपन के साथ कुछ उदासी जिसको छुपाने की कोशिश नाकाम हे थी. अर्जुन ने आगे बढ़ कर आंटी के चरण स्पर्श किये तोह उन्होंने ऊपर से नीचे तक अपने से एक फ़ीट ऊँचे इस पहाड़ को निहारा और आशीर्वाद देने के बाद उसके सामने हे आ बैठी.

"दोनों दरवाजे लगा दे पालक और इधर अपने भाई के पास हे बैठ. बात की गंभीरता को मानते हुए हे मैंने मुन्ना को बुलाया है बीटा और जैसा तू चाहती थी की तेरे पापा या कही बहार ये बात न जाए, तोह मुझे मुन्ना पर कपिल से भी ज्यादा यकीन है.", पालक जैसे कुछ बीमार सी लगने लगी थी अर्जुन के सामने आते हे और उसकी माँ आज भी अर्जुन को मुन्ना से हे सम्बोधित करती है जबकि पालक तोह उस से शर्माती रही थी उनके घर के कार्यक्रम चलते वक़्त. झिझकती हुई वो अर्जुन की बगल में हे एक सीट के फैसले पर बैठ तोह गयी पर नजरे झुकाये और हाथ से हाथ बंधे हुए.

"दीदी, मेरे लिए भी आंटी जी मेरी बड़ी ताई जी हे है. और आपके साथ तोह मेरी ज्यादा यादें नहीं है लेकिन इस घर में मैं इनकी गॉड में भी खेला हु और कपिल भैया के कंधे पर भी. इतना जरूर याद है की आप हाथ पकड़ कर मुझे छत्त से निचे ले कर आती थी जब वो सीढ़ियां पुराणी और ऊँची थी. आज अगर मैं आपका हाथ पकड़ कर मुश्किल सीढ़ियों पर चलने में साथ देने की कोशिश करू तोह क्या ये मदद होगी या मेरा फ़र्ज़? इतना तोह समझता हु की आपकी परेशानी बड़ी है और अगर आप माँ से साँझा कर सकती है तोह हल तोह उनके कहने पर भी बीटा हे करेगा.", अर्जुन की बात सुन्न कर जहा आंटी जी हामी भरते हुए उस पर नाज कर रही थी वही पाँव के अंगूठे से कालीन को खुरचती पालक जाने कब तप तप आंसू गिराने लग पड़ी. जो पानी आंटी जी ट्रे में साथ लायी थी उसमे से एक गिलास उठा कर अर्जुन ने हे पालक की तरफ बढ़ाया.

"जब आप गलत हे नहीं है तोह डरना और दबना किस बात से दीदी? पहले खुद को शांत कीजिये.", अर्जुन ने पालक के होंठो से हे स्टील का गिलास लगते हुए ऐसे सर सहलाया जैसे इस कमरे में सबसे बुजुर्ग व्यक्ति वही हो. हाँ kad-kathi में जरूर वही बड़ा था और कुछ विचारो के साथ सांसारिक ज्ञान में भी. पालक ने एक बार उसकी तरफ देखा और फिर आंसू भरी नजरे अपनी माँ की तरफ देख कर चेहरा निचे झुका लिया.

"लड़की से वजह और उसकी प्रॉब्लम नहीं पूछी जाती. बस जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है, गलती बताई जाती है और ये कही ज्यादा इजत्त और प्रतिष्ठा की बात बन्न जाती है जब वो किसी घर की बहु बन जाए. तब एक तरफ तोह वो अपने हे घर की नहीं रहती और दूसरी तरफ जहा जाती है वह बेटी नहीं कहलाती. बताओ फिर कैसे सामना कर सकती हु?", अब सर झुकाने की बारी उनकी माता जी की थी क्योंकि बेटी ने तोह गलत कुछ कहा हे नहीं था. अर्जुन भी इस से सहमत था लेकिन यहाँ वो इस पर चर्चा करने नहीं आया था की समाज में किसका मूल्य क्या है और कौन जिम्मेवारी निभाता या भागता है.

"आप सही कह रही है लेकिन अब बात किसी परिवार की नहीं है. आपके सम्मान की है दीदी और इसको बरक़रार रखना आपके सिवा किसी और के बस का नहीं. आंटी जी, आप बुरा न माने तोह मैं दीदी से अकेले में बात करना चाहता हु.", उन्हें भला क्या ऐतराज होता जब लड़का उनके घर के सदस्य जैसा था. वो हामी भर कर आँगन की तरफ का दरवाजा खोलने के बाद उसको बहार से बंद करके चली गयी.

"अब बताओ दीदी की पूरी बात क्या है? मुझे ये पता है की कोई है जो आपको परेशां कर रहा है. फ़ोन करता है और जब कोई और उठाये तोह रख देता है सिवाए आपके. नंबर हमेशा पीसीओ के रहते है और आपके ससुराल वाले घर से दूर, नयी नयी जगह से. आप शादी के बाद सिर्फ हनीमून पर हे कही गयी थी जहा आपके पति जयेश जी और आप हे थे. घर में आपके एक जेठ है और जेहतानी. Saas-sasur भी घर हे रहते है लेकिन ऊपरी मंज़िल पर और ये सब शुरू हुआ जबसे जयेश जी देश से बहार गए. आपने उस इंसान की आवाज सुनी है? और किस वजह पर वो आपको ब्लैकमेल कर रहा है? देखिये अगर उसके पास आपके पति के साथ आपकी निजी तसिवरे है तोह बड़ी बात नहीं, अकेले की है तब भी आपको डरना नहीं चाहिए. वो उन्हें सार्वजानिक करते हुए हे पकड़ा जायेगा. जैसा मैंने जाना है आप कही ज्यादा घर से बहार भी नहीं निकली तोह इतना डर और वह से भाग कर इधर रहना कोई हल तोह नहीं?", अर्जुन ने सभी सम्भावनाये बता दी थी और हिम्मत देने की भरसक कोशिश की.

"मैं नहीं जानती की वो आवाज किसकी है क्योंकि वो कभी साफ़ सुनाई हे नहीं पड़ी. हमारा घर गली में कोने पर है और मेरा रूम सबसे पहला जिसके साथ जो बाथरूम है उसकी दिवार भी गली में लगती है. ये (जयेश) जब बहार चले गए तोह एक दिन निचे पानी की प्रॉब्लम थी तप में और मैंने दीदी (जेठानी) जी को बताया की ऐसा है तोह उन्होंने पानी खुद लाने की जगह जेठ जी के हाथ 2 बाल्टी भिजवाई. मैं निघ्त्य में हे थी और जेठ जी शायद नहाने हे वाले थे इसलिए टॉवल लपेटा हुआ था जब वो बाल्टी ले कर आये. फिर उन्होंने बाथरूम में दोनों बाल्टी रखने के बाद शावर चेक किया तोह उसमे से पानी आ गया और मैं निचे हे कड़ी थी. मुझे हटाने के लिए उन्होंने एक तरफ किया और फिर शावर बंद कर दिया. जाने कैसे किसी ने बाथरूम वेंट से उस समय की सभी तस्वीरें खिंच ली. एक दिन मैं पड़ोस की मार्किट में हे गयी थी शाम को और सामान ले कर वापिस स्कूटी की तरफ आयी तोह उसकी जाली में एनवलप रखा था. उसमे वो सभी फोटोज थी लेकिन एक अलग कहानी के साथ. जिसने भी वो सब रखा था वो हमारे घर का नंबर, मेरे जेठ का बिज़नेस एड्रेस और बाकी सब जानकारी रखता था. उसने मैसेज लिखा था की वो 7 बजे मुझे फ़ोन करेगा जो मुझे उठाना है.", पालक हर बात विस्तार से बताने लगी क्योंकि एक बार तोह पहले हे वो अपनी माँ से बात कर चुकी थी और जब अर्जुन यहाँ उसकी मदद के लिए आया था तोह उसने हर छोटी बड़ी बात को सही से उल्लेख किया.

"तोह आपको अपने जेठ जी पर शक नहीं हुआ की कही वो किसी की हेल्प ले कर ये सब नहीं कर रहे?"

"सबसे पहले वही दिमाग में आया था मेरे, अर्जुन. लेकिन फिर दूसरी बार जो हुआ उस से मेरी सोच बदल गयी.", पालक ये कहते हुए फिर से नीचे देखने लगी.

"क्या हुआ था दूसरी बार ऐसा जिस से आपको लगा की ऐसा आपके जेठ जी नहीं कर सकते?"

"पूरी फॅमिली हे बड़ी नार्मल है ऐसे मामलो में चाहे पैसे से ाचे है लेकिन कही कोई रिस्की काम या वैसा नहीं करते. एक दिन मैं दीदी और जेठ जी के साथ हे क्सक्सक्सक्स मॉल तक गयी थी जो घर से थोड़ा दूर है. हम लोग कुछ शॉपिंग करने के बाद पिक्चर देखे के लिए नजदीक थिएटर चले गए. वह जेठ जी और दीदी के बगल में रहते हुए हे पिछली कतार में बैठे हुए एक आदमी ने मेरी गॉड में एक और एनवलप रख दिया. उसमे मेरे हनीमून टाइम की फोटोज थी.", अब वो कैसी तस्वीरें रही होंगी इतना तोह अर्जुन भी समझ चूका था. और इस बात से ये साबित भी हो रहा था के ये जो भी था वो उसका जेठ नहीं था.

"फिर उसने आपको फ़ोन करके क्या डिमांड राखी? मिलने बुलाया कभी या पैसे, कोई ख़ास चीज?"

"रोज रात को 7 के करीब उसका फ़ोन आता जो कभी दीदी उठा लेती तोह आवाज नहीं आती थी और जब एक दिन मैं अकेली थी तोह उसने मुझे कहा की मैं अगले दिन अकेली क्सक्सक्सक्स पार्क औ शाम को 6 बजे. नहीं तोह वो ये सब फोटोज मेरे पति को ईमेल करने के साथ मेरे सास ससुर तक भी पंहुचा देगा. उसने कहा था की मैं ऐसी ड्रेस में औ और मैंने वैसा किया भी क्योंकि उसका वादा था की मेरे इतना करने पर वो दोबारा परेशां नहीं करेगा. लेकिन वह पार्क पहुंचने पर जहा उसने मुझे बुलाया था वह वो नहीं मिला. मैं बेंच पर बैठ कर इन्तजार करती रही लेकिन एक घंटे तक भी कोई बात करने नहीं आया तोह मैं घर लौट आयी."

"आपने किसी को बताया था की आप कहा जा रही है? और उसके बाद फिर उसने आप पर हे इल्जाम लगाया होगा.?"

"और भी बुरा किया उसने मेरे साथ. मैं यही बोल कर निकली थी की दिल्ली में हे मेरी फ्रेंड रहती है उसके घर जा रही हु. वह पार्क में जहा मैं बैठी थी उधर एक और कपल आ कर बैठ गया. अगले दिन मेरे बाथरूम के वेंट से एनवलप गिरा जिसमे उस कपल में जो आदमी था उसके साथ सिर्फ मेरी फोटो थी. वो आदमी तोह वैसे हे बेंच के पिछले हिस्से पर हाथ रखे बैठा था लेकिन जिस एंगल से फोटो थी उसमे यही लग रहा था के मैं उसके साथ हु. उसके साथ वाली लेडी फोटो में आयी हे नहीं. इस बार उसने लिखा था की तुम अपने आशिक़ से मिलने घर से झूठ बोल कर निकलती हो, ये मैं साबित कर सकता हु. उस दिन मैं बहोत डर गयी थी क्योंकि अब उसके पास 3 इंसिडेंट की फोटोज थी जो मुझे हे गलत साबित करती. 2-3 दिन उसके फ़ोन आये जिन्हे मैं उठा नहीं सकीय लेकिन उस दिन शनिवार था और जेठ जी के साथ दीदी बहार गयी हुई थी और जब फ़ोन आया तोह मेरी बात हुई. उसने कहा की मैं क्सक्सक्सक्स इस अड्रेस पर अगले दिन औ और वो मेरे साथ .. मेरे.."

"उसके बदले में.. वो आपको सबकुछ लौटा देने वाला था?", अर्जुन ने रोटी हुई पालक को थोड़ा धनदास बांधते हुए पुछा तोह उसने बस हामी भरी और उँगलियों से आंसू पौंछने लगी पर आंसू बहे जा रहे थे.

"और इतने दिन से आप यही है तोह उसने परेशां नहीं किया?", अर्जुन के इस सवाल पर पालक ने स्वाभाविक लहजे में हे कहने की कोशिश की.

"मैंने उस दिन बता दिया था उसको की रात में हे मुझे मेरे मायके जाना है घर में शादी है तोह मैं कल नहीं आ सकती. पापा खुद लेने आ रहे है. उसने कहा की वो मेरा इन्तजार करेगा. बस आज 15 दिन से मैं यही घर पे हु अर्जुन. कुछ समझ नहीं आ रहा की मैं क्या करू? उसको सिर्फ मुझसे मतलब है क्योंकि अगर वो घर खराब करना चाहता तोह अब तक तस्वीरें दिखा चूका होता. मैं ऐसे किसी का शिकार नहीं बन न चाहती और इस मामले में पुलिस का साफ़ मतलब है की वो लोग सबसे पूछताछ करेंगे और बात सबको पता लगेगी. वह जाती हु तोह हमेशा की तरह शाम को 7 बजे उसका फ़ोन आएगा और उसको खबर रहेगी की मैं उधर आ चुकी हु."

"चलिए, अपना बैग पैक करिये और हम निकलते है. आपकी मर्ज़ी बिना तोह वो आप के ऊपर हाथ भी नहीं रख सकता, इरादे चाहे जो भी हो. वैसे भी दिल्ली देखने की बड़ी तमन्ना थी मेरी और आपकी प्रॉब्लम हल करने के बदले में इतना तोह आप कर हे देंगी की थोड़ी बहोत दिल्ली दिखा दे. मिलते है आपके इस अजनबी चाहवान से. बोल दीजिये आंटी जी को हम आधे घंटे में निकल रहे है लेकिन आपके ससुराल तक ये बात न पता चले की मैं साथ आ रहा हु.", अर्जुन की बात सुन्न कर पालक उसको आश्चर्य से देखने लगी जैसे अर्जुन इसकी गंभीरता समझ नहीं रहा हो.

"क्यों बेवकूफी करना चाहते हो तुम? मुसीबत के पास जाने की हिम्मत मुझमे नहीं है अर्जुन."

"मिटटी में सर दबाये रखने से शुतुरमुर्ग की जान बचती होती तोह फिर वो समझदार कहलता. वैसे ये सिर्फ मुहावरा है जिसको दुनिया बहोत सुनती है लेकिन असलियत में शुतुरमुर्ग शिकारी के पाँव हिला देता है दीदी. और ये तोह मामला उतना संगीन है भी नहीं जितना आप डर रही है. दिल्ली घूमने का वादा याद है न आपको? मैं जरा घर हो के आता हु, आप तैयार मिलना बस. उसके बाद दिल करे मम्मी पापा से मिलने का तोह साथ वापिस भी लेता आऊंगा जिसके चांस काम हे है.", अर्जुन अपनी बात कह कर बैठक का दरवाजा खटखटने लगा जिसको आंटी जी ने हे खोला. पालक को कही बात उन्हें बता कर वो अपने घर चला गया जहा अभी अपने दादा जी से बात करनी थी थोड़ी.

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"तोह बात समझ आ गयी तुम्हारे? जो भी करना है वो सोच विचार के करना बेटे, घर की बेटी का हे मामला समझ कर चलना. मल्होत्रा जी हमारे अजीज है और उनकी जान बस्ती है अपनी बेटी में.", रामेश्वर जी भी घर की बैठक में हे मिले थे और उनसे पहले छोल साहब का आशीर्वाद ले कर अर्जुन अलमारी से एक टेलीफोन का डिब्बा निकल कर बिस्टेर पर रखने के साथ हे दूरबीन, फ़ौज वाला चाक़ू, कैमरा और कुछ जरुरी सामान अलग बैग में भरने लगा.

"मामला तोह उतना पेचीदा नहीं है लेकिन बात वही आ जाती है दादा जी, आपके समाज में औरत की इजत्त वाली. कुछ नादान होती है और डर की वजह से एक के बाद दूसरी गलती अनजाने हे करती जाती है. और जो आपकी परवरिश में बड़ी हुई हो वो पहली बार में हे गलती को जड़ से ख़तम करने में विश्वास रखती है. काश समाज भी दादी जी जैसी सोच रखने वाला होता तोह डर उन्हें रहता जो लड़की को मासूम समझ कर ऐसे जाल बिछाते रहते है जिसमे न घर वाले उन्हें समझ सकते है और ससुराल तोह नाम हे दहेज़ है. किसी की बेटी वह बहु से ज्यादा नहीं बन पाती और किसी की बेटी से ज्यादा वारिस तक हो जाती है. वैसे आप साथ चलने वाले थे मेरे लेकिन आपके इरादे तोह नहीं लग रहे मुझे.", अर्जुन बैग बंद करने के बाद उनके सामने बैठा तोह रामेश्वर जी प्रशंसा से उसको हे देख रहे थे. आज वो उन्हें अपने किसी ख़ास की याद दिला गया था ऐसे तैयारी करते हुए.

"मैं अलग गाडी की सवारी हु बीटा. तेरे ये छोटे दादू कहते है की अर्जुन के रस्ते नहीं चलना हमे और उधर से बिंदिया बिटिया भी कुछ वक़्त तक पहोचने वाली है जिनके साथ हमे अलग मसला हल करना है. पर वह जाने के बाद तुम इस नंबर पर बात कर लेना. ये बिंदिया का हे वो.. मोबाइल सेल फ़ोन का नंबर है. जहा भी जाओ, ये काम करता है और दिल्ली में तोह बेहतर. कोई और जरुरी बात जो कहना चाहते हो?"

"फिलहाल तोह कुछ नहीं जब नंबर आ हे गया है. रुकने का कुछ देखना पड़ेगा अगर परेशानी लगी लेकिन वो मैं देख लूंगा. बाकी वही मिलते है फिर.", अर्जुन उनसे आशीर्वाद लेने के बाद अपनी दादी और चची से भी मिला. सबसे आखिर में प्रीती के घर रोमिला, रेणुका और अपनी प्यारी कोमल दीदी से भी जिन्होंने उसको कुछ समझाया और बाकी वह पहोचने के बाद बात करने को कहा. प्रीती कुछ वक़्त उसके साथ हे उस बड़ी गाडी में बैठी रही जैसे यहाँ फिर से वो दुनिया से दूर थे. इस बार अर्जुन ने उसके उतरने से पहले बिल्ली पर हे झपट्टा मार कर चूम लिया था.

"इस बार सोने नहीं आऊंगा."

"और इस बार सोने भी नहीं दूंगी, तुम्हारे हे कमरे में. ी लव यू."
 
जिस व्यक्ति की कुंडली किसी दूसरे से नहीं मिलती हो तोह कृपया उसके साथ haas-parihaas, मजाक या कटाक्ष न कीजिये. आप सभी को अपनी बात कहने, समीक्षा करने और सवाल पूछने का पूर्ण अधिकार है लेकिन अगर कोई आपके साथ शामिल नहीं होता या वो स्वयं केंद्रित है तोह आप ऐसे व्यक्ति का सम्मान न कर सके तोह कृपया उन पर तंज़ भी करने से बचिए.

जो रीडर्स आपस में खुश है वो ठीक लेकिन बाकी आप समझदार है. मेरे लिए साइलेंट रीडर भी उतना हे जरुरी है जितना अपनी राये रखने वाला फिर चाहे सवाल करे या समीक्षा. इस सूत्र पर लगभग सभी सक्रिय पाठक एक परिवार जैसे है और यही वजह है की मैं कहानी इतनी लिख पाया.

आपने जिस किसी से भी व्यक्तिगत चर्चा या सन्देश आदान प्रदान करना हो, कृपया व्यक्तिगत सन्देश भेजे या बातचीत के लिए बने थ्रेड पर.

यहाँ सब कुछ जायज है सिवाए माहौल को खराब नुक्सान पहुंचने के. हम बहाव में अपनी सीमायें भूल कर कुछ ज्यादा हे व्यक्तिगत हो जाते है जो की ऐसे मंच पर कुछ ठीक नहीं. मैं इस बार सभी से विनती कर रहा हु क्योंकि मैं यहाँ गलतियां बताने नहीं बैठने वाला. आइंदा से कही भी व्यक्तिगत छींटाकशी या माहौल प्रभवित करने की कोशिश होने पर मैं अनिश्चित काल के लिए इस कहानी से अवकाश ले लूंगा. 2 साल होने वाले है 2 हफ्ते बाद लेकिन मैंने ऐसे कठोर शब्द कभी नहीं कहे. यहाँ तक की मैं आप लोगो के हे साथ बातचीत में शामिल रहता हु और कमैंट्स डिलीट पर भी ऐतराज़ नहीं. परन्तु जो कल हुआ है उस घटना के दोहराये जाने पर अपनी यहाँ से हमेशा के लिए राम राम होगी सभी pariwar-jan को. 🙏
 
अपडेट 219

बंधन (2)

"आप इतनी खामोश और उदास है की जैसे मैं हे आपको ब्लैकमेल कर रहा हु. अंकल तोह कितने खुश थे और आंटी जी कैसे आपको गले से लगा कर प्यार दे रही थी.", पिछले 20 मिनट से ये आलिशान गाडी ख़ामोशी से दौड़ती रही. इंसान द्वारा बनाया शहरी जंगल अब पीछे छूट चूका था जिसके बाद सड़क किनारे लगे वृक्ष जैसे चलती गाडी से प्रतिस्पर्धा करने लगे. बहार के बढ़ते तापमान के हिसाब से गाडी के भीतर वातानुकूलन भी आगे बैठे दोनों व्यक्तियों पर ठंडी हवा फेंक कर यहाँ का तापमान पूर्णतया विपरीत किये था. पालक के जिस्म पर अब सलवार सूट की जगह सुर्ख रंग की साड़ी जिसके किनारे रेशमी हरे और सुनहरी थे और उनसे मेल खता कुछ हद्द तक आधुनिक सा ब्लाउज जो उसकी गोरी पतली बाहें पूर्णतया उजागर किये था. कार में होने की वजह से मासूम खूबसूरत चेहरे पर पल्लू तोह नहीं था लेकिन चिंताए जरूर ओढ़े थी. अर्जुन द्वारा ये चुप्पी भांग करने पर पालक ने अपनी घनी पलके झपकते हुए उतनी हे मासूमियत से उसके चेहरे को देखा जो सड़क पर केंद्रित था.

"ब्लैकमेल हे तोह किया है जो ऐसे एकदम हे मुझे वापिस छोड़ने जा रहे हो जहा मैं जाना नहीं चाहती. और वो मेरा घर है जहा मेरे पापा मम्मी मेरी हर छोटी से छोटी बात का ख़याल रखते है, मेरी भाभी मुझे बहिन से भी ज्यादा प्यार करती है और भैया चाहे जितने बिजी हो लेकिन मेरे लिए रात को हमेशा खाने पर मौजूद रहे. वो घर जहा मैं बड़ी हुई, सबने प्यार दिया और आज भी वो मेरे खुश होने पर खुस रहते है, दुखी होने पर उनसे खाना भी नहीं खाया जाता."

"और आप ऐसे प्यार करने वाले अपने परिवार को दुःख पंहुचा कर खुश थी? एक पिता जो अपनी बेटी का विवाह इतनी धूमधाम से करे और बेटी वापिस घर पे आ बैठे ससुराल छोड़ कर. वो माँ जो खुद अपना एक परिवार छोड़ कर आयी, घर संभाला, बचे पैदा करने के साथ उन्हें पला और सही जीवन दिया.. उन पर क्या हे गुजरेगी जब उनकी बेटी अपना आशिया न संभल सके? प्यार तोह वो हमेशा हे करते रहेंगे क्योंकि संतान से मोह ख़तम नहीं होता. पर आप खुद सोचिये की आप उन्हें बदले में ख़ुशी दे पायी? और वैसे तोह कुछ भी सोचिये हे मैट. अब न आपको अपने ससुराल में घबराहट होगी और न अंकल आंटी कभी परेशां होंगे. आपकी शादी से पहले मैंने आपको मेहन्दी वाले दिन देखा था जब मैं सामान देने घर आया था.", अर्जुन ने पालक को उसकी एकतरफा ख़ुशी के बाद वास्तविकता दिखाई तोह वो फिर से उदास होने लगी थी. और अर्जुन ये नहीं चाहता था की वो पालक को ऐसे उदास रहने दे. बात को उसके विवाह के समय ले जाते हुए वो अधूरे में हे रुक गया जिस पर रुमाल से चेहरा साफ़ करती पालक एक बार फिर उसको देखने लगी.

"उस से पहले नहीं देखा था मुझे? और मेहंदी वाले दिन ऐसा क्या हुआ था?"

"उस से पहले... उम्म्म.. याद नहीं सच कहु तोह चाहे आप हमारे घर आती थी और माधुरी दीदी आपकी ख़ास सहेली भी है लेकिन मैंने तोह बस आपको उस दिन हे देखा था जब आपके मेहन्दी लगाईं जा रही थी और आंटी जी मेहमानो और रिश्तेदारों में लगी हुई थी. आँगन में आप प्रिय भाभी के साथ साथ अपनी सहेलियों के बीच घिरी थी. कभी आप खिलखिला कर हंसती दिखी तोह कभी मुँह बनती हुई जैसे कोई छोटी बची हो. आप उस वक़्त अपने पाँव पर मेहंदी लगवाते हुए दोनों हाथ ऊपर उठा कर किसी को दिखा भी रही थी, उस वक़्त वो ख़ुशी और चेहरे की चमक बहोत ख़ास थी.", अर्जुन ने अपनी बात कहने के साथ हे गियर से पहले बने चौकोर से बक्से को खोल कर उसमे से सफ़ेद नीले आवरण वाली 'डेरी मिल्क' चॉकलेट निकल कर पालक की तरफ बढ़ा दी. वो ये सब बिना इधर देखे कर रहा था और सड़क उतनी व्यस्त भी नहीं थी दोपहर होने से. पालक उस महीन गट्टे के आवरण वाली चॉकलेट को अपनी तरफ बढ़ा देख कुछ क्षण वैसे हे रही और फिर अर्जुन ने सर उचका कर उन्हें लेने को कहा तोह इस बार वो किसी बची की तरह निचे सर झुकाये मुस्कुराते हुए उसके हाथ से ले कर चॉकलेट देखने लगी.

"तुम्हे ये भी पता है की मुझे क्या पसंद था? अभी तोह कहा की पहले मुझे देखा हे नहीं मेरी मेहँदी वाले दिन की सिवा. उस दिन भाभी मुझे परेशां कर रही थी लेकिन सहेलियों के साथ मजाक तोह हमेशा से होता रहा और उस दिन ज्यादा खुश थी क्योंकि मुझे मेहंदी का शौक था और मम्मी लगाने नहीं देती थी. कभी लगा लेती थी चोरी से तोह उन्हें हाथ दिख जाते और वो बहोत गुस्सा करती."

"हाँ क्योंकि उन्हें अपनी बेटी हमेशा हे वैसी पसंद होगी जैसी घर का सबसे छोटा सदस्य. एक माँ का दिल भी अजीब हे होता है. जबतक रिश्ता न हो जाए बेटी का तब तक वो उसको बची के रूप में हे देखना चाहती है और उसके बाद स्थिति अलग. और चॉकलेट हे तोह खा रही थी आप उस दिन जब सब लोग संगीत में खुशिया मन रहे थे और आप फ्रिज के साथ कड़ी रसोई से बहार देख रही थी. खोल लीजिये, अभी आप ससुराल में नहीं है और ये ब्लैकमेलर चॉकलेट नहीं मांगने वाला.", अर्जुन के प्रयास रंग ला चुके थे जिसका सबूत था पालक के चेहरे पर खिली वो हंसी और फिर उसका शरमाते मुस्कुराते हुए चॉकलेट को खोलना.

"सरोज भाभी सही कहती है की तुम न हर छोटी से छोटी बात को पकड़ लेते हो. और तुमने मुझे भले हे नजरअंदाज किया लेकिन जब भी मैं तुम्हारे घर आती थी तुम कभी बगीचे में दीखते तोह कभी किताबो के साथ. मैंने तोह तुम्हे बहार गली में किसी के साथ बोलते खेलते हे नहीं देखा. माधुरी कहती थी की तुम मिलनसार और ाचे हो लेकिन थोड़ा काम बोलने वाले. मुझे उल्टा लगता था जैसे तुम बहार पढ़ कर आने के बाद खुद को बड़ा समझने लगे हो सबसे. कहा तोह एक हाथ से हमेशा अपनी निक्कर पकडे रहते थे और जरा जरा इस बात पर बड़े छोटे किसी से लड़ पड़ते थे और बाद में घर आने के बाद एक साल से ज्यादा गुजरने पर भी तुम्हारे होने न होने का पता हे नहीं चला. कभी कभी दिख जाते थे सुबह पसीना सूखते हुए पैदल घर आते हुए या साइकिल से. ये लो..", पालक ने चॉकलेट का टुकड़ा उसके चेहरे की तरफ बढ़ाया तोह अर्जुन ने ना में सर हिलाया.

"मीठा नहीं.. ओह्ह्ह्हह."

"दिअबैतेसे नहीं होगी इतना सा खाने से. मैं गलत सोचती रही इतने टाइम.", अपने हाथ से हे अर्जुन को एक टुकड़ा खिलने के बाद बाकी पूरी चॉकलेट को थोड़ा सा कुतर के पालक बहार देखने लगी. एक तरफ उसके चेहरे पर पड़ती सुनहरी रौशनी देख अर्जुन ने उसकी तरफ का धुप अवरोधक निचे कर दिया. जिस से आँखों और चेहरे पर गिरती रौशनी तभी बंद हो गयी. एक बार फिर पालक ने हलकी सी मुस्कान से उसको देखा जो खुद भी खुश था और सड़क के साथ पालक पर भी ध्यान दे रहा था.

"तब निक्कर हे घरवाले ऐसी दिला देते थे की अगले साल तक चले. Kameej-tshirt अंदर दाल देते थे जिस से वो टाइट लगती थी लेकिन खेलने से टीशर्ट बहार तोह निकलती हे थी. निक्कर न पकडू तोह .. पता नहीं क्या सोच कर ऐसे कपडे लेते थे की बचा खेलने से ज्यादा गिरती निक्कर को पकडे रखे. वैसे रोज सुबह मैं घूमने जाता था तोह वापिस आते हुए आपकी नजर पड़ती होगी. लेकिन वो मेरे घुलने मिलने वाली बात पर आप गलत नहीं सोचती थी. मैं इतना टाइम घर से दूर रहा, सबको तब देखा था जब वो निक्कर वाला समय था जिसके बाद 9 साल में बचपन और आगे का समय अलग हे दुनिया में निकला. हिम्मत हे नहीं होती थी किसी से बात शुरू करने की, उन्हें बताने की की मैं कौन हु और ज्यादातर चेहरे तोह इतने बदल चुके थे की मुझे नहीं पता था की मैं उन्हें पहचान प् रहा हु या नहीं. आप.. शायद 9तह में थी उस टाइम और मशरुम कटाई रहती थी आपकी. लड़को जैसे कमीज पहन न और स्कूल में भी पंत पहनती थी न आप? और अब देखो अपने आप को.. आप को इसलिए मेहंदी वाले दिन गौर से देखा क्योंकि मैं हैरान था की ये पल्ली है?", जैसे अर्जुन ने पालक को सब बताने के बाद उसका वो नाम लिया जो अब यदाकदा सिर्फ उसके पिता मल्होत्रा जी हे लेते थे, उसने हँसते हुए उसकी ब्याह पर घूँसा जड़ दिया.

"अरे .. जो था वही बोलै न.."

"तुम अब ज्यादा हे याद नहीं दिला रहे? मैं तब भैया की नक़ल करती थी और मुझसे लड़कियों वाले कपडे नहीं पहने जाते थे. बाल तोह कॉलेज में बढ़ने शुरू किये थे क्योंकि तब.. तब मुझे लगने लगा की मैं लड़का नहीं हु. और तुम आज भी उतने हे रोटलु या गुस्से वाले हो क्या? तुम्हारी वजह से सबको हे दांत पड़ती थी उस टाइम. कोमल, माधुरी या गलती से मेरी कॉपी तुम्हे दिख जाती तोह तुम उनके पैन बीच से निकाल लेते थे, किश्ती और जहाज बनाने के लिए. नहीं बनता था तोह जिसकी कॉपी उस से हे झगड़ा. 'मैं अब कभी नहीं आऊंगा.' और फिर एक दो दिन बाद किसी न किसी को साथ लिए आ हे जाते थे वापिस. तुम चले गए तोह कुछ दिन तोह ाचा लगा था की स्कूल और घर में दांत नहीं पड़ती, तुम्हारा गुस्सा नहीं झेलना पड़ता था और फिर कभी कभी संजीव भैया छत्त पर bat-ball खेलने आते कपिल भैया के साथ तोह ध्यान आता की तुम्हे वो लोग भी मिस करते है और कही न कही मई भी. उनकी प्लास्टिक की बॉल तुम ले कर दौड़ते हुए मेरे पीछे छिपने लगते थे और वो अलग हे खेल था. भैया बॉल का डिब्बा रखते थे अपने साथ लेकिन उन्हें भी तुम्हारा ये रोना धोना और बॉल ले कर भागना पसंद था."

"निक्कर उतार देते थे मेरी और फिर वही बॉल मार के मैं भाग जाता था. बड़े थे न उस टाइम वो लोग."

"रट हुए भागते थे और फिर सीढ़ियां उतरने के लिए मुझे देखते. ऋतू अगर तुम्हे लेने आ जाती तोह मुझे भी मार कर अंगूठा दिखा कर चिढ़ाने लगते थे. तुम्हारी सबसे ज्यादा जमती भी ऋतू के हे साथ थी. हाँ... अलका के साथ भी. वो तोह हमेशा हे एक साथ रहती थी. पर तुम्हारे जाने के बाद मैंने उन्हें भी ज्यादा घर से बहार नहीं देखा.", यादें जब एक एक कर के खुलने लगती है तोह कितनी परत निचे चले जाते है ये हमे खुद याद नहीं रहता. यहाँ भी गाडी में बैठते वक़्त जो उदास पालक थी अब वो दार्शनिक और हंसमुख बन चुकी थी. अर्जुन भी अपनी रफ़्तार पर चलने के साथ उसका पूरा ख़याल भी रखता रहा. जरुरी था की पालक सहज रहे और उसका साथ दे सके उस मामले को सुलझाने में जो उसकी ज़िन्दगी पर गहरी अमावस सा ग्रहण लगाने की कोशिश कर रहा था. ऐसे हे भूली बिसरि बातें याद करते हुए ये लोग आधा फैसला पार कर चुके थे. और अब पालक भी अपना पल्लू थोड़ा ढीला करके बस एक तरफ कंधे पर रखे हुए अपने कॉलेज और उसके बाद की बातें सुना रही थी. अभी पीछे हे एक शहर और पर हुआ था जिसके बाद अर्जुन ने मील के पत्थर पर ध्यान दिया तोह राजधानी अभी डेढ़ या 2 घंटा दूर थी. गति सीमा में गाडी रखे हुए हे वो चल रहे थे जैसे कोई जल्दी नहीं थी.

"आप एकदम से कुछ परेशां क्यों लग रही है? गाडी की सीट सही नहीं है क्या?", अर्जुन की बात पर पालक ने मुस्कुराने की कोषसिंह करते हुए मन किया और बहार देखती हुए बोली.

"गाडी की तोह मैंने तारीफ हे नहीं की. ऐसे गाडी मैंने सिर्फ आज से पहले देखि हे थी लेकिन बैठने का सौभाग्य भी मिलेगा ये नहीं पता था. घर से चले तोह इस तरफ ध्यान हे नहीं गया.", पालक दीदी की बात पर अर्जुन ने गाडी की रफ़्तार कुछ धीमी करने के बाद एक समतल से मैदान की तरफ उतार दी जहा एक देसी धभा जैसा बना था और एक साधारण सा 3 मंज़िला होटल. गाडी उन दोनों के हे बीच छाया में रुकी तोह पालक थोड़ा हैरानी से अर्जुन को देखने लगी की उसने गाडी सड़क से उतार कर इधर क्यों रोकी.

"आपको बाथरूम जाना है और इतनी सी बात कहने की जगह बेमतलब परेशां हो रही है. ये होटल सही जगह है और आपको कुछ हल्का फुल्का खाना है तोह दोनों तरफ सुविधा है. फ्री हो जाइये नहीं तोह सारे रस्ते परेशां रहेंगी और दिल्ली में आपका घर कौनसा जाते हे आ जायेगा.", अर्जुन द्वारा अपनी परेशानी बिना कहे जान ने पर पालक के भोले से चेहरे पर पहली दफा एक naari-sulab शर्म की लाली दिखी. पिछली सीट से अपना हैंडबैग उठा कर वो बिना कुछ कहे गाडी से उतर गयी. अर्जुन ने भी शीशम की दरख्त की छाया और aas-pas जगह जगह लगे छायादार वृक्ष देख कर शीशे निचे उतार लिए.

"साहब, 50 रुपये में भरपेट खाना है. साथ में ठंडा, लेमन, मानगो, लस्सी और बोतल का पानी भी हमारे ढाबे पे मिलता है. खा के देखो साहब फिर हर बार यही रुकोगे.", कंधे पर अंगोछा रखे ये युवक हाथ में मेनू लिए अर्जुन के पास हे आ खड़ा हुआ. 20-22 बरस का लेकिन मेहनती युवक था और ढाबे पर भी 8-10 चारपाई जिनके बीच लकड़ी का फटता सजा था, उन पर ाची खासी भीड़ दिखी. तंदूर पर एक पतला सा युवक धड़ाधड़ रोटियां लगा और निकाल रहा था लोहे की सलाख से. बड़े बड़े एलुमिनियम के पतीले जो दर्जन भर थे उनमे से सब्जी निकाल कर थाली लगता हुआ एक अधेड़ और गरम रोटियों को चुपड़ कर वही थाली ले कर चारपाई पर बैठे ग्राहकों की तरफ जाते 2 और जवान लड़के बहुत ज्यादा हे व्यस्त थे. 13-14 गाड़ियां, 2 ट्रक और कुछ दुपहिया वाहन समतल जमीन पर एक तरफ खड़े थे इन भोजन करने आये लोगो, परिवारों के.

"अभी थोड़ी देर में बता देता हु दोस्त. मूड जान ने के बाद हे कुछ कह सकूंगा."

"मूड के लिए पिछली तरफ कला तीतर, 5000, गाड़फाथेर की ठंडी बियर भी मिलेगी साहब. पर ढाबे पर नहीं पी सकते लेकिन मैं इधर हे ला देता हु. 40 की बियर और 10 रुपये मेरे."

"भाई मैं पीटा नहीं और मेरे साथ जो हैं उनसे पूछना पड़ेगा की उन्हें भूख है या नहीं. मैं बुला लूंगा तुम्हे अगर जरुरत होगी तोह.", युवक सर हिलता हुआ उस तरफ चला गया जहा एक मारुती कार आ कर रुकी थी. 4 लोग थे ग्रामीण वेशभूषा में. 2 जवान व्यक्ति कुर्ती पाजामे में जिनके सर पर पगड़ी नहीं थी और 2 अधेड़ घनी मूछे और सफ़ेद पगड़ी के साथ उजले कुर्ते और धोती पहने. अर्जुन ऐसे हे कौतहूल से उन 2 अधेड़ व्यक्तियों को देखने लगा जिन में से एक के कान में सोने के कुण्डल भी थे और वो दोनों हे एक वृक्ष की चाय में अपने लिए ख़ास बिछाई गयी बड़ी सी चारपाई पर आ बैठे जूती उतार कर. जग से पानी चुल्लू में दाल पहले कुल्ला किया और फिर मूछे और दोनों हाथ धोने के बाद सफ़ेद अंगोछे से हे सूखने लगे. पता लगता था के वो लोग ख़ास और आसपास के इलाके में नामी होंगे. ढाबे का मालिक खुद उनके करीब आया था जैसे जी हजूरी कर रहा हो, हाथ जोड़ कर उनकी इत्छा पूछते हुए.

"बड़ी भारी गाड़ी है जे तोह. कड़े (कहा) से खरीदी है लात साब?", वो 2 युवक इधर हे खींचे चले आये उस काली और चमचमाती ऊँची मेरसेदेज़ के आकर्षण में. दूसरे वाला तोह ऊंचाई जांचते हुए छत्त के किनारे तक हाथ फिरने लगा. आगे की तरफ से जीप जैसा चेहरा उसको प्रभावी लगा तोह थोड़ा दूर खड़े हो कर पूरी गाडी देखने लगा.

"दिल्ली से ली थी पिछले साल.", अर्जुन ने भी उस युवक को भीतर झाँकने के लिए सीट से लगते हुए जगह दी तोह वो सर हिलने लगा जैसे ये सब पहली बार देख रहा हो. दूसरे वाला अब गाडी से अलग उधर देखने लगा जहा से धुप की वजह से सर के आगे हाथ से चाय देती हुई पालक बड़े साढ़े कदमो से आ रही थी. बेशक गाडी तक की दुरी होटल के द्वार से 20 कदम हे रही हो पर इतने में हे उसके रूप और शालीन परिधान की वजह से युवक गाडी भूल बैठा. अर्जुन ने सिर्फ पालक को हे देखा और उसके लिए दरवाजा खोला तोह वो भी हलके से मुस्कुराती हुई उसको बैग थमा कर सीट पर आ बैठी.

"भाभी जी राम राम. माँ खा के भाई एकला ऐसी सुथरी गाडी में बैठ्या है तोह बात जाची कोन्या. ेब बेरा पत्या के भाभी ऐसी सुथरी हो तोह फेर गाडी तोह काली आरर ऊँची हे जंचेगी. राम राम भाई जी, रोटी टूक खाना है तोह आ जो. बो महरो बापू से, आते को सरपंच ार ढाबा भी आपने हे से.", स्पष्ट था की युवक ऐसे गाडी देख कर खींचे जरूर आये थे पर इस व्यक्ति की बात में जरा सी भी अमर्यादित भाषा नहीं थी. उल्टा वो मेहमानवाजी से पूछ रहा था. पालक को तोह आधी हे बात समझ आयी और उस पर वो हैरान भी हुई लेकिन अर्जुन ने माहौल को समझते हुए जवाब दिया

"एब्बी तोह टॉवल (जल्दी) से बड़े भाई दिल्ली पूछन (पहुंचने) की. आदि बार जरूर डाटूंगा आरर रोटी लासी भी खाऊंगा. राम राम.", अर्जुन ने हाथ मिलाया तोह इस युवक ने उसके हाथ पर दूसरा हाथ रख कर सही मेजबान सा स्नेह दिखाया.

"दुगनी राम राम से भाई, आरर भाभी गेल्या (साथ) ाइयो. महारे ढाबे की कढ़ी खान तोह दिल्ली ाले भी रुके है.", दूसरे युवक ने भी दूर से राम राम की, जो इनकी बातें हे सुन्न रहा था. गाडी पीछे करते हुए चलने से पहले अर्जुन ने हाथ से bye का इशारा दिया और अपनी तरफ की सड़क पर धीरे धीरे आगे बढ़ लिया. अभी भी पालक उसको मुँह बाएं देख रही थी जैसे वो असमंजस में हो की यहाँ ये सब क्या था.

"तुमने उन्हें कुछ भी बोलने दिया? और ऐसे हे अनजान लोगो से बात करने लग जाते हो कही भी?", अर्जुन ने ठन्डे पानी की बोतल पालक दीदी की तरफ बढ़ा दी जैसे अब उन्हें पानी की जरुरत हो. वो ढिटाई से मुस्कुरा रहा था इस दौरान.

"Gaanv-dehaat में ये लोगो का प्यार हे होता है जो वो किसी अजनबी को पानी और रोटी के लिए पूछते है. देखा नहीं आपने की वो लोग पहले अपने पिता चाचा को भोजन शुरू करने की प्राथमिकता दे रहे थे और उनके बाद उन्होंने मेहमान के हिसाब से मुझसे पुछा. बोर्डिंग टाइम पर मैंने ये बहोत करीब से हे देखा है वह के आसपास के गाँव कस्बो में. वैसे मुझे लगा हे था की आपको वह बैठना ठीक नहीं लगेगा इसलिए खाने के लिए पुछा नहीं.", पालक ने चलती गाडी में होने की वजह से अपने सुर्खी लगे होंठ लगते हुए हे पानी पीया और वो अर्जुन की बात भी सुनती रही जिसमे वो मुद्दा था हे नहीं जिस पर पालक सवाल पूछ रही थी.

"वो तोह मुझे न समझाओ की अतिथि सम्मान और गाँव के लोगो का प्यार. देख तोह उसका भाई मुझे भी घूर के हे रहा था. लेकिन तुमने उन्हें जवाब नहीं दिया की मैं उनकी भाभी नहीं लगती.?"

"फिर उनकी आप क्या लगती? और घूर के देखना तोह बनता हे है क्योंकि गाँव में लड़कियां या भाभी इतनी खूबसूरत और भरी साड़ी पहने कही दिखती है बहार? ऊपर से सुन्दर भी हो आप थोड़ी बहोत. उसने भाभी कहा तोह आपको इतना बुरा क्यों लग रहा है?", अर्जुन थोड़ी गंभीरता दिखते हुए ऐसे कह रहा था जैसे कुछ गलत घटना हुई हे न हो.

"तुम बता सकते थी की मैं तुम्हारी बीवी नहीं हु. और मैं थोड़ी बहोत हे सुन्दर हु?"

"उन्हें मेकअप भी ाचा लगता है न फिल्म की वजह से तोह ख़ूबसूरती वही है उनकी नजर में और ऐसी साड़ी फिल्म में हे तोह भाभी जैसे किरदार पहनते है. वैसे किसी ने भी ये तोह नहीं कहा था के आप मेरी बीवी है?", अर्जुन कैसे उलझा रहा था ये खुद पालक हे न समझ सकीय जबकि उसने तोह ख़ूबसूरती का श्रेया भी पालक की saaj-sajja को हे दे डाला जो पालक को समझ आया.

"मुझे तुमसे तोह ऐसी उम्मीद नहीं थी. मैंने सिर्फ काजल, बिंदी और लिपस्टिक हे लगाया है और ये 6-6 चूड़ियां जो शादी की वजह से है और गले में भी सिर्फ ये पतला सा मंगलसूत्र. साड़ी कहा से फिल्मी दिखी तुम्हे और ये बात घुमा रहे हो की उन्होंने मुझे तुम्हारी बीवी कब कहा? तुम्हे भैया बोलै और मुझे भाभी, जिसका तोह यही मतलब होता है न की उन्होंने मुझे हे तुम्हारी बीवी कहा.", अर्जुन ने दिखावे के लिए गहरी सांस भरने के साथ चलती गाडी में हे स्टीयरिंग छोड़ कर हाथ जोड़े और फिर आगे देखने लगा. पालक के चेहरे पर जहा पहले शिकायत थी अब वह मुस्कान आ गयी.

"आप थोड़ी बहोत नहीं बेहद खूबसूरत है और कही से भी 21 से ज्यादा नहीं लगती. अब लाल साड़ी में कोई आपको देखेगा और फिर मुझे आपके साथ तोह सबसे पहले यही विचार हे आएगा न की हम कपल है और शायद हाल हे में शादी हुई है? उन लोगो के सामने मैं ज्यादा बात नहीं करना चाहता था क्योंकि उनकंफर्टबले लगता आपको और उनसे कौनसा हमारी पुराणी पहचान थी जो सफाई देता. लंच कहा करना है बता देना क्योंकि दिल्ली में आपके घर पहुंचने से पहले कुछ सामान भी लेना है और थोड़ी तैयारी भी करनी है.", अब अर्जुन सचमुच हे कुछ गंभीर था और अपनी तारीफ सुन्न ने के बाद दोनों की स्थिति समझ कर पालक ने भी अपने से 5-6 बरस छोटे अर्जुन को देखा जो कही ज्यादा हे परिपक्व और बड़ा लगता था 18 की उम्र से. एक अलग सी तिरछी मुस्कान उसके चेहरे पर आयी जो अर्जुन को न दिखते हुए वो बहार देखने लगी.

"दिल्ली बाईपास पे एक ाचा होटल है, वही लंच करेंगे. वैसे सफर का पता हे नहीं चला तुम्हारे साथ और देखो बस 60 कम है यहाँ से दिल्ली.", इसके बाद पालक ने हे वो म्यूजिक सिस्टम धीमी आवाज में चालू कर दिया जिस पर उमेद जी की पसंदीदा कद पहले से लगी थी. मद रफ़ी की वही परिचित मीठी आवाज और फिल्म कन्यादान का बेजोड़ गीत चालू हो गया.

'लिखे जो खत तुझे, जो तेरी याद में.. हजारो रंग के नज़ारे बन्न गए... सवेरा जो हुआ तोह फूल बन्न गए.. जो रात आयी तोह सितारे बन्न गए..'

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"अर्जुन को फ़ोन मिला रही हो दी? ऐसे कोई फायदा नहीं बेवजह फ़ोन मिलते रहने से.", ये जीनत थी जो अपने चाचा चची को विदा करके घर के बिहतर आयी तोह अपनी बड़ी बहिन को फ़ोन का हैंडल रखते देख जन्नत के हे बगल में आ बैठी. इनकी बुआ सवेरे हे चली गयी थी अपने पति और बेटी के साथ. अब नरेश जी भी कही काम से निकले थे और घर में इन दोनों के सिवा बस इनकी माँ मेघना जी हे बची थी जो रसोई में जायजा लेने गयी थी. जन्नत के चेहरे पर सपाट हे भाव थे जैसे न वो खुद को जाहिर करना चाहती थी और न किसी से कोई बात.

"तुम्हे क्यों लगता है की मैं उसको हे फ़ोन लगा रही थी? फ़ोन आया था शूट के लिए और मैंने उन्हें हाँ बोल दिया की मैं आज शाम को हे निकल रही हु, कल सुबह थोड़ा अर्ली टाइम शूट है. अर्जुन जिस तरह से गायब हुआ है तोह सही है न की ऐसे लापरवाह इंसान से दोस्ती ठीक समय हे टूट गयी. उसकी चची को पता नहीं था के वो कहा गया है और यही बताया की जब वो लौट आएगा तोह वो मेरा सन्देश दे देंगी अर्जुन को. बाकी वो अपने घर भी नहीं गया.", जन्नत अर्जुन को टालने के बावजूद उसकी हे बात कर रही थी और जीनत ये देख कल रात के बाद अभी मुस्कुराई लेकिन जैसे ये स्वाभाविक मुस्कान नहीं थी.

"दोस्ती तोडना कोई मुश्किल नहीं दी, वो तोह माइए भी आज सुबह हे साक्षी से टॉड ली चाहे वो कितनी हे माफ़ी मांगती रही लेकिन अब पारिवारिक jaan-pehchaan से ज्यादा हमारे बीच कुछ नहीं. लेकिन कभी ये सुना है की प्यार टॉड दिया हो? प्यार नहीं टूट सकता क्योंकि वो हमेशा दिल में हे रहता है चाहे इंसान उसको चेहरे पर आने न दे. फ़ोन पकड़ना जरा.", जीनत ने जो भी कहा था उसने जन्नत पर पूरा असर किया जैसे उसकी छोटी बहिन उतनी भी मस्तमौला नहीं थी, परिपक्वता उसमे भी थी. जन्नत ने बिना जवाब दिए फ़ोन उसको पकड़ाया तोह एक पर्ची पर लिखे कोड और टेलीफोन नंबर डायल करके जीनत अपनी बहिन की तरफ देखने लगी. उधर घंटी जा रही थी और इधर जन्नत ये देख रही थी की उसकी बहिन आखिर ऐसे मुस्कुरा क्यों रही है.

"hello..Namastey आंटी जी. जी मैं जीनत बात कर रही हु मर नरेश कपूर की बेटी. उमेद अंकल.. जी आंटी जी.", जीनत ने बात करनी शुरू की तोह जन्नत आँखें बड़ी करती हुई दोनों हाथ फैला कर उस से बेआवाज पूछने लगी की आखिर उसने ये कहा फ़ोन मिला दिया.

"नहीं ऐसी कोई बात नहीं है आंटी. बस वो अर्जुन कल पार्टी में अपने शेड्स.. धुप के चश्मे भूल गया था उधर. महंगे है तोह मैंने सोचा की पूछ लू की पोस्ट से भिजवा दू या वो गाँव वापिस आएगा?", जीनत के दिमाग देख कर जन्नत आज खुद को हे छोटा मान रही थी और उधर से तोह जैसे जो भी महिला बोल रही थी वो उस से हंस कर बात करती हुई बताने लगी.

"जी आंटी जी. थैंक यू.. हाँ उधर का नंबर है मेरे पास और मैं एक बार मंडे को फ़ोन कर लुंगी.. जी.. पहले आपको हे कर लुंगी जिस से कन्फर्म हो जाए. ठीक है आंटी जी. जी सब ठीक है यहाँ. ाचा रखती हु जी.. शुक्रिया आंटी.", जीनत बात करते हुए अब मुस्कुराये जा रही थी और जन्नत जो पहले ऐसे दिखा रही थी की उसको कोई फरक हे नहीं पड़ता वो फ़ोन रखने की प्रतीक्षा में दोहरी होने लगी. आखिर जीनत ने फ़ोन रखते हे गहरी सांस लेते हुए अपने सीने पर हाथ रख कर ऐसे दिखाया जैसे कितना भारी काम किया हो.

"ओह बाप रे.. दी ये अर्जुन की दादी जी भी बड़ी हे पहुंची हे इंसान है और उन्हें पापा क्या चाचा का भी नाम पता है. देखो बस यही पुछा था की गॉगल्स कहा पहुंचने हे और वो तोह सबका हे पूछने लगी. फिर मुझे भी मुबारकबाद दी मेरे रिश्ते की और कभी गाँव आएँगी तोह जरूर फ़ोन करेंगी मिलने के लिए.", जीनत दिखावा करती हुई टेबल पर रखा गिलास उठा कर पानी पीने लगी और जन्नत का जैसे सबर का बांध हे टूट गया जो उठ कर पाँव पटक कर जाने लगी तोह जीनत ने कलाई खिंच कर उसको अपनी गॉड में बैठते हुए कमर से हे बाहों में भर लिया.

"उसने कभी ये नहीं कहा के आप गुस्से में बिलकुल गुलाब लगती हो? ओह बेचारे ने गुस्सा एक हे बार देखा था और तब कुछ कह नहीं सकता. कांटे जो झेलने पड़े इस गुलाब के. ः. पता है आपका दोस्त... कहा है?", जन्नत ने कुछ भरी आँखों के बावजूद मुस्कुराने की कोशिश के साथ सर हलके से ऊपर किया जैसे अब बोलने की ताक़त हे न रही हो. जीनत ने भी प्रतिउत्तर में अपनी बड़ी बहिन का गाल हौले से चूमा.

"साहब दिल्ली गए है अपने दादा जी के साथ और चस्मा जो की कोई है हे नहीं वो इसलिए भूला होगा क्योंकि वो सुबह 4 बजे हे घर पहुंच चूका था. पार्टी से गाँव गया होगा और फिर 2 कपडे ले कर सबको bye-shy भी तोह बोलै होगा? 2-3 दिन में लौट आएगा लेकिन ये पक्का नहीं है की वो गाँव फिर से रहने आएगा या नहीं पर एक या 2 दिन के लिए जरूर आएगा. टेंशन नहीं लेनी चाहिए और वो कौनसा आपको कुछ बोल कर गया था. वैसे उसको वापिस नहीं आना था पर अर्जुन ने बताया है अपनी दादी को की वह थोड़ा जरुरी काम बाकी है और उसकी मोटरसाइकिल भी इधर से वापिस लेके जानी है. अब दिमाग ठंडा कर लो थोड़ा.", जीनत ने थोड़ा कस कर अपनी बड़ी बहिन को साथ लगाया तोह जन्नत ने भी कुछ वक़्त तक उसको अपनी बाहों में भरे रखा. जब अलग हुई तोह ये नया सवाल पूछ लिया.

"दिल्ली का हे नंबर ले लेती जिनि. मैं वही मिल लेती न जब वो वह 2-3 रुकेगा?", जीनत तोह टेढ़ा मुँह बनती उठ कर कमर पे हाथ रख जन्नत के भोले चेहरे को देखने लगी. उधर मेघना जी भी हॉल के दरवाजे पर कड़ी इन दोनों को ख़ामोशी से देखने लगी.

"वो उसकी दादी है दीदी, कोई दोस्त नहीं. आप भी 2 दिन दिल्ली घूम आओ और इतने वो भी लौट आएगा. अब थोड़ा तोह सबर रखो जब पता चल हे गया की वो का से गया है. हाँ ये कद अपने लैपटॉप पर लगा कर देखना, क्या पता ाचा लगे और हो सकता है बुरा भी पर जिसको देखने का दिल है वो भी है इसमें.", जीनत एक कागज़ में बंद कद पकड़ा कर अभी पलटी हे थी की अपनी माँ से भेंट हो गयी. जन्नत को मेघना जी ने नहीं टोका लेकिन अपनी इस लाड़ली को हाथ पकड़ कर बिना ज्यादा बात किये अपने कमरे में ले चली. उनकी कुछ महत्वपूर्ण चर्चा बाकी थी रात से और जन्नत ने भी अपने कमरे में पहोच कर दरवाजा भीतर से लगा लिया. कद को कागज़ से निकाल कर लैपटॉप की ट्रे में भरने के बाद वो बिस्टेर से हे तक लगाए उसके खुलने की प्रतीक्षा करने लगी. एक वीडियो और 2 तस्वीरें हे थी उसमे जिन्हे देख जन्नत ने सबसे पहले फोटो पर क्लिक किया और जैसे हे वो बड़ी हुई, जन्नत की आँखें भी वैसे हे बड़ी हो गयी ये दृश्य देख कर.

'ओह..', वो यही कह सकीय जब स्क्रीन पर निगाह जमी. अर्जुन के चौड़े सीने और एक मजबूत ब्याह की पहली हुई मछली के साथ हे वह उसकी छोटी बहिन निर्वस्त्र उसके ऊपर लेती थी. वो बड़े बड़े गोर सतांन पूरी तरह अर्जुन के सीने पर दबने से उनका पूरा विवरण नहीं मिल रहा था लेकिन जीनत बड़े सुकून में थी और अर्जुन जैसे उसका सर सेहला रहा हो. जन्नत ने कांपते हाथो से दूसरी तस्वीर लगाईं तोह यहाँ उसकी बहिन के झूलते बड़े बड़े उभार और गुलाबी अकड़े हु निप्पल उन्मुक्त थे और वो अर्जुन की आँखों में हे देख रही थी जो जीनत के उभरे हुए मोठे कूल्हों पर एक हाथ और दूसरा जो तस्वीर में पीछे था, वो जीनत के गाल पर. जैसे वो उस से कुछ पूछ रहा हो. जन्नत ने आज से पहले किसी को भी अंतरंग नहीं देखा सिवाए गिनी चुनी हॉलीवुड फिल्म के दृश्यों में लेकिन यहाँ तोह उसकी बहिन हे साक्षात् जन्मजात अवस्था में थी पर उस से ज्यादा ध्यान जन्नत का कही था तोह वो सिर्फ अर्जुन के जिस्म और उसके हर कटाव पर. सब देख कर हे उसकी धड़कन अनियंत्रित हो चली जैसे वो प्रेम बंधन अब अनचाहे हे आगे बढ़ना चाहता था.

'पागल लड़की है और ये भी पूरा बेवकूफ. ऐसे कौन नंगा let-ta है किसी और के घर?', जन्नत को लगा की उस वीडियो में भी कुछ ऐसा हे प्यार भरा दृश्य होगा लेकिन उसको चालू करते हे वो खुद हे लैपटॉप से पीछे हो गयी. यहाँ शुरुआत में हे एक दैत्याकार purush-ang थाम कर उसकी बहिन सर झुकाये उस पर बैठती हे चली गयी. चेहरा छोड़ कर सबकुछ साफ़ था जीनत का और उसके हिलते स्टैनो को थामने वाला अर्जुन जल्द हे उन्हें पीने लगा था. जन्नत की टांगो के बीच ये अजीब से आग बढ़ने लगी ऐसा दृश्य देख कर और वो हैरान थी की उसकी बहिन इतना बड़ा purush-ang कैसे अपने भीतर लेने के बाद ऊपर निचे उछाल रही थी. आवाज सुनाई नहीं दे रही थी जैसे उसको दुरी से रेक्रेड किया हो पर अर्जुन को इतनी लगन से जीनत के मॉटे चुके चूसते दबाते साफ़ देखा जा सकता था. योनि और लिंग की तरफ अँधेरा था इस कोण से जैसे मकसद सिर्फ अर्जुन को हे क़ैद करना रहा हो. 50 सेकंड में हे वीडियो बंद हो चूका था जैसे बनाने वाले का मकसद पूरा खेल रिकॉर्ड न करने की जगह सिर्फ अर्जुन को हे दिखाना था. कांपते हाथो से जन्नत ने वीडियो को 5 सेकंड के अंतराल पर हे रोक कर वापिस देखा जो तस्वीर सा उसके सामने था. जीनत की मुट्ठी से भी बहार था वो लिंग और लम्बाई के लिए तोह काम से काम 2 मुट्ठियां और लगती. चमक से जाहिर था की वो पहले हे जीनत की kaam-gufa की सैर करके बहार निकला था. जन्नत ने अब उसको बिलकुल शुरुआत में ला रोका. यही बस जीनत का चेहरा थोड़ा दिख रहा था पर उतना साफ़ भी नहीं लेकिन अर्जुन के चेहरे पर स्पष्ट था की वो कुछ थका हुआ सा है पर मुस्कान जैसे जीनत की इत्छा पूरी करने की वजह.

'ये लड़की पूरी पागल है और उतना हे.. क्या हे कहु अब इसको.. पर इंसान तोह नहीं है.', तभी दरवाजे पर हलकी सी दस्तक हुई तोह लैपटॉप बंद करते हुए जन्नत ने जल्दी से दरवाजा खोला. उसने ये भी ध्यान न दिया के इतनी हे देर में उसका जिस्म पसीने से भर चूका था और वो पतला सा टॉप जिस्म के कटाव साफ़ दिखा रहा होगा. सामने कड़ी उसकी छोटी बहिन झट्ट भीतर चली आयी और लैपटॉप एक बार फिर से खोल लिया जिस अब पासवर्ड की दरकार थी. जन्नत कुछ हैरान थी और दरवाजा बंद करके जब वापिस बिस्टेर पर आयी तोह जीनत टाला खोल कर वीडियो चालू कर चुकी थी.

"तुम्हे मेरा पासवर्ड कैसे पता चला?", स्क्रीन वही रुकी थी बिलकुल शुरुआत में और जीनत ने मुस्कान देते हुए जो शकल दिखाई तोह जन्नत एक तरफ पीठ टिकाये ऐसे शर्माने लगी जैसे वीडियो उसका हे हो.

"इश्क़ में अक्सर हम यही तोह गलती करते है, अपने नाम के साथ उनका नाम जोड़ लेते है. मैंने रात को देख लिया था जब आप ईमेल खोलने के लिए लैपटॉप ले कर मेरे कमरे में आये थी. ारजंन.. अर्जुन प्लस जन्नत का शार्ट. वैसे यही सब था उस साक्षी के पास जो उसने माफ़ी मांगने के साथ हे मुझे दे दिया. कैमरा खाली था उसका और कंप्यूटर से हे उसने ये ट्रांसफर की थी कद में तोह वह सेव हे नहीं की. कैसा लगा आपको अपना अर्जुन? मैंने मेरा तोह सबकुछ आपको बिना कहे दिखा दिया और आपने एक फोटो भी नहीं दिखाई थी उस दिन. अब मेरी डीडू भी जब ऐसे हे अर्जुन के ऊपर होगी.."

"छियई.. बंद कर इसको. और मैं क्यों ऐसा करुँगी? तेरी जितनी बेशरम नहीं हु मैं."

"मुझसे ज्यादा बनोगी, लिखवा लो मुझसे. मैं तोह फिर भी बंद कमरे में थी लेकिन आप पक्का एडवेंचर करोगी. हाहाहा... वैसे आपने ये देखा? जान निकल गयी थी मेरी तोह जब बस एंटर हे हुआ और खून निकला वो अलग. वोडका ने हेल्प करि और बाकी इसके प्यार ने. जानवर जैसे करता तोह मर्डर हे जाती दी. लेकिन ..", निर्लज्जता से अपनी बात बयान करके जीनत ने हे वो कद खाली कर दी. अब उसके और अर्जुन के बीच बने सम्बन्ध का कोई सबूत नहीं बचा था और अपनी बात के आखिर में वो कुछ कहते हुए एकदम से हे रुक गयी. जन्नत को भीतर हे भीतर जैसे ये ाचा नहीं लगा था जो जीनत ने किया. पर उसके लेकिन ने फिर से जन्नत को चर्चा में शामिल कर हे दिया.

"इतना सबकुछ करने के बाद फिर ये 'लेकिन'? मुझे लगता था की अर्जुन और लड़को से अलग होगा लेकिन ये सच मेरे सामने था जिसमे वो मेरी हे बहिन के साथ हमबिस्तर हुआ. आखिर वो भी वैसा हे निकला न जैसे हर मर्द..?"

"यही तोह आप गलती कर रही हो दी. जो हुआ वो मेरा माँगा हुआ गिफ्ट था जिसके लिए अर्जुन से हाँ तक नहीं कहा जा रहा था. वो मन जैसे तैसे लेकिन सबकुछ करने के बाद मैंने महसूस किया की क्यों अर्जुन मेरे साथ कुछ भी करना नहीं चाहता था. उसका मैंने वो रूप बाद में हे समझा जिसमे उसको मेरी परवाह थी, वो मेरे दर्द को काम करने के साथ सब सही गलत समझते हुए मुझे खड़े रहने के काबिल बना रहा था. लेकिन सबसे ख़ास बात थी उसका ये कहना की 'आज मैं खुद अपने आप को एक वैश्य जैसा महसूस कर रहा हु. ज़िद्द और तुम्हारी ये सब ख्वाहिश न होती तोह मैं जन्नत से इतना बड़ा धोखा नहीं करता. एक न एक दिन उन्हें पता लगेगा और सब बिखर जाएगा. तब तुम मेरे होते हुए कुछ न कहना, बदले में मैं यही मांगता हु'. आप हे सोचो दी वो मेरी ख़ुशी के लिए ऐसा कर गुजरा तोह आपसे कैसे नाराज हो सकता है? आप कितना समय रही है उसके साथ, क्या कभी आपको लगा की वो आपसे बस सेक्स हे करना चाहता है? मीनू (मीनाक्षी) की बात भी याद होगी आपको? उसके कंधे कोई काम बोझ नहीं उठाये हुए फिर भी वो आपके लिए पूरा दिन निकता है, जो आप चाहती है वैसा करता है और मैंने खुद देखा है की वो सिर्फ और सिर्फ आपकी इजत्त और प्यार करता है आपसे. अब आपकी बारी है खुदको साबित करने की.", जीनत ने लैपटॉप की स्क्रीन पर लगी तस्वीर पर ऊँगली करते हुए अपनी बड़ी बहिन को उसका अनकहा सच सामने दिखते हुआ कहा.

"मैंने उस पर हाथ उठा कर बहोत बड़ी गलती कर दी जिनि. मुझे पता था.. मतलब अर्जुन ने बताया था की उसकी लाइफ में ढेरो लोग है जो उस से प्यार करते है और वो भी उनसे उतना हे प्यार रखता है. बस मैं..."

"मेरे लिए सुन्न न सकीय? जानती हु मैं ये और उसने भी जानबूझ कर हे वैसा किया. थप्पड़ के बदले अब आप उसकी गॉड में हे बैठ जाना दी. बर्फ सा पिघल न जाए तोह मेरा नाम बदल देना. हाहाहा.. मेरी हॉट न सेक्सी दी की वाइल्ड साइड मुझसे 10 गुना ज्यादा होगी, मुझे यकीन है. उमाहहह.. और पहले पहले दर्द भी होगा चाहे आपको एक्सपीरियंस हे क्यों न हो.", आखिरी बात जानबूझ कर कहते हुए जीनत ने आँख मारी और जन्नत ने उसको पकड़ कर अपने निचे दबा लिया.

"यू.. मैं अभी तक वर्जिन हु.. और मुझे कुछ नहीं करना उसके साथ.. आयी बड़ी हॉट न सेक्सी वाली...", ऐसे में जीनत का चेहरा अपनी बहिन के सुडोल सीने के निचे दबा तोह उसने मुँह खोल कर हलके से सतांन को काटने का उपक्रम किया. जन्नत तुरंत हे अलग होती हैरत से देखने लगी. अपना हाथ मोसम्बी से उरोजों के ऊपर रखती.

"हाहाहा.. जानती हु की आप न peti-pack हो.. और मुझे भी उधर हाथ लगाने का हक़ नहीं जहा आपके ारजंन सीधा मुँह लगाएगा.. कपडे उतार कर. बहोत म्हणत की है न आपने अपनी बॉडी पर, वो तबियत से ढीला करेगा और आप फ्लेक्सिबल भी पूरी हो.. हाय काश मैं होती आपकी जगह.."

"अब तू मार खायेगी मुझसे.. छी.. कैसी कैसी बातें करती है तू जिनि.. जा अभी मेरे कमरे से बहार जा..", जन्नत की नाराजगी में भी कोई जोर न था और ये देख कर जीनत भी अपनी दोनों बाहों को स्टैनो के किनारे से दबा कर उन्हें पहला कर दिखती हुई नखरे से उठी और दरवाजे पर रुक कर बोली.

"सहलाने से काम बिगड़ेगा दीदी अगर अकेले में वही करने वाली हो तोह. इन्तजार हे कर लो उसका जो पक्का इलाज करना जानता है. उमाहहह.", जन्नत तकिया उठा कर उसकी तरफ फेंकती उस से पहले हे जीनत खिलखिलाती हुई बहार भाग चली. दरवाजा बंद किये बिना हे धम्म से बिस्टेर पर बैठती हुई जन्नत ने जैसे हे अपने सीने पर ध्यान दिया, वह तीखी निप्पल साफ़ उभरे हुए मिले. वो मुँह बिस्टेर में दबाये ख़ामोशी से लेट गयी. आज उसकी धड़कने ज्यादा हे अनियंत्रित थी और जिस्म में ये अजीब सी हलचल कुछ अधिक हे उत्तेजक. जाने आगे अब क्या होने वाला था?

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"वह पर अकेले रह लोगो शबनम बिटिया? और इस प्यारी गुड़िया को तोह पहले हे भाभी जी अपना मान चुकी है, ये दिल्ली आयी तोह उन्हें यक़ीनन बुरा लगेगा.", सफ़ेद लम्बी कार दिल्ली जाने वाले हाईवे पर चल रही थी जिसके स्टीयरिंग के पीछे शबनम खुद हे थी और बगल में अगली सीट पर बैठे छोल साहब ने गंभीर मसलो के बाद ये कॉलेज वाली बात शुरू करते हुए इसमें कौशल्या जी का जीकर करते हुए मुस्कान को भी शामिल किया. मुस्कान पिछली सीट पर बैठी खिड़की से बहार देख रही थी और अब उसके प्यारे चेहरे पर भी नाम स्वरुप मुस्कान बन्न गयी. उसकी बगल में सर पे दुपट्टा और जिस्म एक सहूलियत वाले सलवार कमीज में क़ैद किये बिंदिया इन दोनों बड़ी लड़कियों की माँ कही से भी नहीं लगती थी. आज भी उसके चेहरे की चमक aam-khaas युवतियों से कही ज्यादा और प्रभावी थी. रामेश्वर जी दूसरे किनारे बैठे एक फाइल को देखते हुए इस बात पर हलके से मुस्कुराये.

"मुस्कान वैसे भी पापा की लाड़ली है दादू, और मोहतरमा शहरी भीड़ से वैसे हे फांसला रखती है तोह दिल्ली बालने पर भी नहीं आनेवाली. वैसे भी अम्मी इसको अपने साथ ले जा रही है 20 दिन के लिए. और अगर इसका कभी दिल करेगा तोह खुद आने की बजाये ये मुझे हे बुलाने वाली है अपने कॉलेज. दादा जी, हॉस्टल में रहना जरुरी है क्या?", शबनम ने पीछे देखने वाले आईने में ये बात रामेश्वर जी से पूछी तोह बिंदिया भी अपनी बड़ी बेटी की तरफ देखने लगी जिसकी आँखों में अलग हे ख़ुशी थी जैसे उसके पक्ष में फैंसला होने जा रहा हो.

"बीटा वो तोह तुम्हारे ऊपर है अगर तुम्हे वीमेन हॉस्टल में रहना है तोह. बाकी कॉलेज में जितना टाइम अतिरिक्त पढ़ना चाहो पढ़ सकती हो और जो घर तुम्हारे लिए तुम्हारे छोटे नाना ने देखा है वो सुरक्षित भी है और कॉलेज से दूर भी नहीं है. खाना बनाने में दिक्कत नहीं आती हो तोह एकांत और अपने घर में रहना ज्यादा सही रहेगा. बाकी बिंदिया बिटिया जैसे चाहे. एडमिशन तोह हो हे चूका है जब तुमने पहले से कॉलेज देख रखा है और घर पे बात भी हो गयी थी की सिर्फ पुराने कॉलेज के कागज़ देने है और तुम्हारे 10 मिनट चाहिए होंगे वह."

"दीदी, हॉस्टल से ज्यादा ठीक तोह फिर ये घर हे है अगर मुझे या मम्मी को भी कभी आना होगा तोह रुक तोह सकते है. वैसे बौ जी, ये घर कैसा है? मतलब kirayedar-makaan मालिक वाला सिस्टम है या सिर्फ एक कमरा जो स्टूडेंट्स के लिए लोग दे देते है?", मुस्कान अपनी माँ का हाथ थामे अब पंडित जी से मुखातिब थी जबकि जवाब छोल साहब के पास था जिन्होंने वो जगह देखि हुई थी.

"बीटा वैसा कुछ भी नहीं है. चारदीवारी वाली सोसाइटी है ये और ओने बैडरूम का पूरा सेट है तीसरी मंज़िल पर. एक बड़ा कमरा, हॉल, रसोई, 2 बाथरूम और एक स्टोर के साथ साथ कमरे और रसोई के बहार ाचा गलियारा है.. वो क्या कहते है बालकनी.. स्टोर भी इतना है की बीएड लगाया जा सकता है और हॉल तोह कमरे से बड़ा है. वही अंदर भी पार्क और दूकान है राशन इत्यादि की. बहार निकलते हे सरकारी और प्रतिष्ठित लोगो के घर, टहलने के लिए उचित पार्क और मदद पर हे पुलिस स्टेशन के साथ बहोत बड़ी मार्किट है जहा दुनिया भर की दुकाने है. मुख्या सड़क पार करते हे तुम कॉलेज के सामने.", छोल साहब द्वारा तफ्सील से हर बात बताने पर शबनम ने हामी भर दी बिना हे जगह देखे जबकि उसकी माँ अभी आश्वस्त नहीं थी.

"पर अंकल अकेली लड़की.. दिल्ली जैसी जगह और फिर हॉस्टल में तोह सहूलियत भी रहती है सामान की उतनी जरुरत नहीं पड़ती."

"बिटिया, वह पर सबकुछ पहले से हे लगा है. बीएड, सोफे, पंखे, लाइट और रसोई में चूल्हा सिलिंडर तक. और रही बात अकेले रहने की तोह शबनम समझदार लड़की है. उल्टा वह के कॉलेज जितने ाचे है हॉस्टल उस हिसाब से सही नहीं. अकेले रह कर पढ़ने के लिए सही माहौल भी मिलेगा और जैसा मुस्कान बिटिया ने कहा की कोई घर से मिलने आया तोह वो रुक भी सकता है. एक भी लगा है और टेलीविज़न, फ्रिज भी है. हाँ गाडी का प्रबंध कॉलेज शुरू होने तक कर देंगे.", छोल साहब की पूरी बात सुन्न कर शबनम ने रहस्यमयी मुस्कान से अपनी छोटी बहिन को देखा जो अब अपनी माँ की आड़ में सीट से सर टिकाये जाने क्या सोच रही थी.

"आप लोग हे है यहाँ पर पीछे सब देखने वाले उनले. मेरा आना जाना तोह साल 6 महीने में हे हो पायेगा. बस थोड़ी चिंता ..", बिंदिया की बात का अर्थ पंडित जी समझ रहे थे और इसके आगे उन्होंने हे जवाब दिया.

"जो अहित चाहते थे अब वो अतीत की बात बन चुके है बेटी. दिल्ली तोह उनके लिए वैसे भी पहुंच से बहार है पर अब तोह वो अपनी चारदीवारी में हे रहने की दुआ मांगते है. हम गुजरा समय तोह नहीं सुधार पाए लेकिन वर्तमान में एक इंसान है जो भविष्य तक सुरक्षित रखने का माद्दा रखता है. वैसे भी तुम मिलने हे वाली हो उस से और स्कूल ख़तम करते हे वो भी दिल्ली हे पढ़ने आएगा. इधर उमेद के साथ राजू, इन्दर और बाकी बचो का भी आना जाना निरंतर है तोह तुम वह रह कर इधर की चिंता मैट करना. शबनम का जब दिल करेगा, हमारे यहाँ आ जाएगी अपने किसी भी चाचा संग बैठ कर. वैसे शबनम के दाखिले के बाद वापिस अपने मां (सारंग) की तरफ जाना है?"

"जाना तोह है लेकिन पहले मौसी (सौंदर्य) से मिलना है. रात पिंटू ने हे बात करवाई थी अमृता से और फिर मौसी से भी हुई तोह उन्हें मन नहीं कर सकीय. आज दिल्ली रुक कर कल उनकी तरफ निकल लेंगे आपका काम पूरा होने के बाद. आप क्यों नहीं आते कभी इंग्लैंड? वो (मिर्ज़ा साहब) देश से बहार नहीं जाते लेकिन आपको तोह मिलने आना चाहिए. बेटी नहीं लगती मैं आपकी?", अब रामेश्वर जी भी सच स्वीकार कर चुके थे दमयंती का जो राजकुमारी अनामिका थी, बिंदिया की स्वर्गीय माँ.

"कैसे नहीं आऊंगा? पहले बेटी ने कभी बुलाया हे नहीं और एक पंथ 2 काज हो जाएंगे. ऋतू बिटिया के वह एडमिशन के सिलसिले में जाना तोह था हे किसी न किसी को और अर्जुन को अकेले भेजना खतरे से खाली नहीं. इस बहाने मैं और उसकी दादी विदेश भी देख लेंगे.", अर्जुन का नाम आखिर आ हे गया था चर्चा में और शबनम फिर से मुस्कान की तरफ रह रह कर देखने लगी जो लाख कोशिश के बावजूद अपनी मुस्कराहट न रोक सकीय.

"वैसे दादा जी.. ी मैं नाना जी ये अर्जुन हमसे मिलेगा भी या वो अपने अलग हे बिजी है?", शबनम की बात सुन्न कर रामेश्वर जी ने हामी भरी.

"दिल्ली पहोच कर फ़ोन लगा लेना उसको. वो तोह पहोच भी चूका होगा और यहाँ का काम पूरा करने के बाद वो भी क्सक्सक्सक्स हे जाएगा. बोल तोह रहा था की उधर 2-3 दिन और रुकेगा कुछ काम बाकी है कुमार के साथ और गाँव में. अगले महीने के बाद तोह वैसे भी उसका वही रूटीन वापिस. स्कूल, स्टेडियम और घर. वैसे मुझे पता नहीं था के वो बिंदिया बेटी से संपर्क में था."

"वो सबके हे कांटेक्ट में रहता है नाना जी. चलो ाची बात है अगर वो भी क्सक्सक्सक्स वह जाएगा तोह वही मिल लेंगे. यहाँ अपने काम में बिजी होगा तोह क्यों परेशां करना.", ये बात अब फिर से शबनम ने मुस्कान को तंग करने के लिए कही थी. खाली सड़क से आगे अब कुछ आबादी दिखने लगी और hare-safed मील पठार पर लिखा था दिल्ली 10 कम, जबकि सड़क के ऊपर बड़ा सा ऊँचा बोर्ड दिल्ली में स्वागत कर रहा था. दोपहर के 3 बजने वाले थे और शबनम ने बढ़िया रफ़्तार से गाडी चलाई थी. अब उसके दाखिले का कार्य करने के बाद हे इन्होने जलपान करना था.

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"इतना सबकुछ क्या ले लिया तुमने? घर से कपडे नहीं लिए थे क्या रुकने के लिए?", पालक के घर से पहले हे एक बड़ी मार्किट से अर्जुन ने उसके साथ हे कुछ खरीदी की थी एक विख्यात शोरूम से और बाकी जरुरी सामान भी लिया अपने काम के मुताबिक. दोनों एक बार फिर से उस आलिशान गाडी में बैठ कर आगे बढ़ लिए. Bheed-bhaad भरे रास्तो पर अर्जुन को उतनी भी परेशानी नहीं हुई लेकिन बार बार गाडी बत्तियों पर रोकने से समय कुछ ज्यादा हे खर्च हुआ. ाची बात थी की जहा पालक का ससुराल था, यहाँ सड़के चौड़ी होने के साथ साफ़ भी थी और वृक्षों का अभाव भी नहीं था. हर छोटी बड़ी मार्किट के आगे हे ाची खासी पार्किंग और फिर फुटपाथ जो मुख्य सड़क और इनके बीच अवरोध थे. कही ऊँची रिहायशी इमारते तोह अगले हे पल बड़े बड़े घरो वाली कॉलोनी जैसा नजारा. ये लोग अब ऐसे इलाके में थे जहा सिर्फ बड़े घर और छायादार सड़के हे थी. कहने का मतलब था की पालक का विवाह उनके पिता मल्होत्रा जी ने एक खाते पीते परिवार में हे किया था.

"अब दिल्ली आया हु तोह कुछ न कुछ लेना तोह बनता हे था. वैसे आपके ससुराल में Jeth-jethani और सास ससुर के अलावा और कौन कौन है? और ये जेठ जी करते क्या है?", अर्जुन ने गाडी एक पार्क के पास हे छाया में रोक दी. जैसे कुछ जरुरी बातचीत अभी बाकी रह गयी थी.

"उनका नाम प्रजुल चोपड़ा है और दीदी का नाम सोनाली है. एक बीटा है क्सक्स साल का जो अभी अपनी बुआ के घर गया हुआ है हॉलीडेज में. जेठ जी और जयेश जी तोह पहले पापा जी का हे ठेकेदारी का बिज़नेस देखते थे लेकिन इन्होने ब के बाद थोड़ा समय बहार लगाया और बाद में इम्पोर्ट एक्सपोर्ट का अपना अलग बिज़नेस जमा लिया. अभी भी वो कंपनी के काम से हे बहार है, 2 हफ्ते काम से काम लगेंगे उधर. मम्मी जी स्वभाव की बहोत ाची है लेकिन वो और पापा ज्यादातर समय आपस में हे रहते है. ज्यादातर समय तोह पाठ पूजा और धरम करम में लगे रहते है जिस वजह से घर से बहार भी जाना रहता है. टोका ताकि जरा भी नहीं करते कभी. वो ज्यादा बात न करे तोह कुछ गलत मत समझना. दीदी भी ाची है बस उन्हें शॉपिंग ज्यादा पसंद है घर के काम करने से. और कुछ?", पालक ने जैसे और कुछ कहा था अर्जुन की तरफ मदद कर, उसके उठे हुए गुलाबी आधार कुछ ज्यादा हे करीब थे. अर्जुन ने ना में गर्दन हिलाई और स्टीयरिंग पर हाथ रख कुछ सोचने के बाद बोलै.

"आपने बताया की निचे आपका कमरे गली के साथ लगता है तोह बाकी सभी लोग भी घर के निचले हिस्से पर हे रहते है? मेरा मतलब आपके जेठ जेठानी से है. घर में नौकर नहीं है जब इतना ाचा बिज़नेस है?"

"ओह हां.. काम करने के लिए एक लड़की है पर वो निचली मंज़िल पर बस साफ़ सफाई हे करती है और रहती ऊपर हे है, मम्मी पापा के साथ. ऊपर 3 कमरे है, 2 का एक सेट जो मम्मी पापा का है रसोई के साथ और सीढ़ियों से ऊपर जाते हे पहले रूबी का. निचे भी 2 हिस्से है, एक तरफ दीदी और जेठ जी. दूसरी साइड 2 कमरे जिसमे से बड़ा बैडरूम मेरा और जयेश का जबकि एक कमरा सिर्फ जयेश अपने काम के लिए उसे करते है. हॉल कॉमन है दोनों साइड्स के बीच और किचन दीदी वाली तरफ हे है. अब ऐसे समझ नहीं आने वाला और जा रहे है तोह तुम खुद हे देख लेना.", पालक को भी एहसास हुआ था के वो चहकते हुए कुछ ज्यादा हे करीब आ पहुंची थी अर्जुन के और इतने दिनों में ये पहला दिन था जब उसके चेहरे पर उदासी या डर की जगह ख़ुशी थी. अर्जुन के साथ बातें करना, उसका मजाक करने का तरीका और हर बात का ख़याल रखना जैसे पालक के उतरने से पहले दरवाजा खोलना, सामान खुद उठाना और खाने के वक़्त भी सबकुछ उसकी हे पसंद का लिया गया था.

"मैं अभी तोह आपको घर के बहार हे उतार दूंगा. आप यही बताना की छोटा भाई साथ आया था और जरुरी काम की वजह से क्सक्सक्सक्स नगर गया है. काम हो गया तोह वापिस घर चला जाएगा, नहीं तोह रुकने आ सकता है. कब आएगा ये मैट बताना और 7 बजे कोशिश करना की फ़ोन आप हे उठाओ. वैसे आसपास यहाँ कोई छोटी मोती दूकान है?", अर्जुन ने बात कहते हुए पालक की तरफ देखा और फिर जाने क्या दिमाग में आया की वो उस व्यक्ति के बारे में पूछने लगा जो फ़ोन करता है, पार्क की तस्वीरें और वो पता जहा उसने पालक को मिलने बुलाया था. पालक ने भी हर बात विस्तार से बताई जबकि अब वो उतनी परेशां नहीं दिखी जितनी सुबह वो इस विषय की शुरुआत से ले कर तब तक रही थी जब तक अर्जुन ने बचपन की बातें शुरू नहीं की थी. अब वो मैं हे मैं कुछ सोच चूका था और फिर उसने पालक को सावधानी से अपने घर जाने के लिया कहा. सावधानी इसलिए की कही वो मदद कर पीछे न देखने लगे.

"घर के पास आ कर कह रहे हो की अंदर नहीं आऊंगा?"

"मन करो आप, जरुरी है ऐसा करना. और ऐसे हे रहना जैसे आज मेरे साथ थी सुबह से. जो भी बात वो ब्लैकमेलर करे, हाँ बोल देना.", पालक ने अब सवाल नहीं किया था और वो बस दिल से ऐसे मुस्कुरायी जैसे अर्जुन ने आज उसको नया जीवन दिया हो. हौले से हाथ मिलाने के बाद वो गाडी से उतरने लगी.

"वो कौन वाला घर है सबसे आखिर में जहा गुलाबी फूलो के ऊँची बैल दिवार पर चढ़ी है. बराबर से गली है और दूसरी तरफ जो ग्रिल लगी है वो कोई सरकारी बंद पड़ी जमीन है. अब समझ गए होंगे की फोटो कहा से ली गयी होगी? 3-4 दुकाने है इस पार्क के आखिर में राइट टर्न करने पर.", अर्जुन ने गाडी उधर हे आगे बधाई जिधर पार्क के बराबर में एक गली थी. पालक का घर वह से 20 कदम हे सीधा था. गाडी पार्क की और मदद कर उसने पिछली सीट से बैग उठा कर पालक को पकड़ाया पर वो खुद बहार नहीं निकला. पालक वो पहियों वाला बैग स्टील के हैंडल से पकडे हुए अपने घर की तरफ बढ़ने लगी और अर्जुन एकटक बस उसको हे देखता रहा. गाडी के शीशे चढ़े थे और इधर वाले कोने के घर के बड़े आँगन में 2-3 छोटे बचे खेलते हुए इस गाडी को भी देख रहे थे जो महज सड़क के उस पार हे कड़ी थी. हर करीब तक़रीबन 400-500 गज का था यहाँ और उनके बहार व्यवस्थित बगीचे. अभी पालक ने उस बड़े काले सफ़ेद गेट की घंटी हे बजाई थी और छत पर टहलते हुए एक बुजुर्ग ने निचे देख कर हाथ हिलाया. यही उसके ससुर जी थी और ये गेट घर के ठीक मध्य बना था जहा पालक कड़ी मुस्कुरा रही थी. द्वार खुलते हे एक खूबसूरत सी 34-35 बरस की महिला जो चुस्त पाजामे के ऊपर बिना ब्याह की तंग कुर्ती पहने थी नजर आयी. कंधे तक आधुनिक तरीके से कटे बाल, बदन पर ख़ास चमक और पालक से वही गले लग कर मिलने का उसका अंदाज देख अर्जुन कुटिलता से मुस्कान लगा. वो वही खड़े हुए इधर उधर देखने लगी जैसे वो कुछ खोज रही हो पर ऊपर खड़े बुजुर्ग ने कुछ कहा और वो पालक को भीतर दाखिल करने के बाद एक बार फिर से बहार की तोह लेती लगी. उसकी नजर अर्जुन पर नहीं पड़ी और अपने गाल पर आयी थोड़ी से कुछ नीची जुल्फें वापिस पीछे करती वो भी ओझल हो गयी.

'हर तराशा हुआ नग्ग हीरा होता तोह कांच कही भी बिखरा नहीं मिलता. सोनाली मैडम तोह कुछ ज्यादा हे प्यारी है.', अर्जुन अपनी उस बेआवाज ऊँची गाडी को आगे बढ़ा कर कभी पार्क के भीतर देखता जहा बचो के साथ साथ कुछ व्यस्क भी खेल रहे थे और कही कुछ लोग घास पर हे बैठे बातें कर रहे थे. एक कतार बड़े बड़े घरो की जहा उतनी चहल पहल नहीं थी जितने आलिशान वो दीखते थे. करीब 10 घर हे थे उस लम्बी गली में और फिर चौराहा जो एक तरफ पार्क के गेट पर जाता था और के सीधा जबकि तीसरी दिशा में सड़क किनारे हे वो 4 दुकाने नजर आयी जिनके बहार हे chaat-paapdi, कुल्फी और सब्जियों की कुछ रेहड़ी सजी थी. आने जाने वाले लोग वह रुक भी रहे थे और सामने वही दिवार थी जो पालक के घर की बगल से निकलती थी उस खामोश गली में. अर्जुन कुछ वक़्त एक दूकान पर लगाने के बाद वापिस गाडी लिए चल निकला. अब वो उस गली में खड़ा था जहा से इक्का दुक्का हे लोग उसको नजर आये. अपने पालतू कुत्तो को घूमते या सिग्रत्ते फूंकते हुए, घर की नजरो से बच कर.

"अरे बाप रे.. ये तोह कोई अलग हे प्रजाति है अपने आप में. ये काम है या मेरी परीक्षा ले रहे हो चाचा?", अर्जुन ने दूकान से चार्ज किया हुआ वो मोबाइल फ़ोन चालू करके एक तरफ रखा और कागज़ का बंद लिफाफा खोलते हे नजर उस लाल बालो वाली बेतहाशा खूबसूरत बाला को देखने लगा जिसने नाक में बाली कुछ ख़ास अंदाज से पहनी हुई थी, ठीक बीचो बीच और होंठो से एक कम ऊपर. आँखों पर kayi-ranga काजल और बोहेन इतनी कटीली जैसे पास एक महीन काली लकीर हो. तस्वीर में हे उसकी आँखें जैसे जलती हुई आग की लौ सी लगी और चमकते कंधो के दोनों तरफ बिना ब्रा के पहने हुए वस्त्र की बनियान से भी पतली पट्टी. इस तस्वीर में बस अर्शी सहाये का इतना हे बदन दिख रहा था जो अपने आप में अध्भुत.

'कंधे पर गोदना करवाया हुआ है? ाचा हे लग रहा है इस पर तोह.', वो एक तत्तो था जो अर्शी के गोकार चमकते कंधे पर काली स्याही से बना ब्याह तक जाता था. अर्जुन ने उसके बाद वाली तस्वीर देखि जो पूरी लम्बाई की थी लेकिन इसमें 2-3 लोग और भी नजर आये जो उसके सुरक्षाकर्मी हे थे. Lambe-patle पर देखने में हे मजबूत जिनकी कमर पर होल्स्टर में बंद रिवॉल्वर पर्याप्त थी उनकी ताक़त बताने के लिए. पृष्टभाग में 4 छल्ले वाली विदेशी गाडी साफ़ नहीं थी जबकि अर्शी ने महीन सा ऐसा वस्त्र पहना था जो सिर्फ सीने पर हे ब्रा जैसा कैसा था और चिकनी गोरी टांगो पर पत् को आधा ढकते हे ख़तम. ऊँची एड़ी वाले वो जूते भी विशिष्ट थे जिनकी ऊंचाई अर्शी की चिकनी पिंडली से पहले ख़तम थी. देखने से हे किसी पश्चिमी चलचित्र की आधुनिक नायिका सी लगती थी वो और उतनी हे कड़ी सुरक्षा. साफ़ था की दोनों हे तस्वीरें एक समय पर ली गयी है और किसी प्रशिक्षित द्वारा बहोत एहतियात और दुरी से. दोनों तस्वीरें देखने के बाद लिफाफे में मौजूद जानकारी पढ़ने में ज्यादा समय नहीं लगा. वो कहा रहती है, क्लब में किस समय अक्सर आती है और जाने का समय सब लिखा था. उसके पिता की भी तस्वीर मिली जो अपनी बेटी सी कही विपरीत एक गंभीर और साधारण जान पड़ते थे. पतली आकर्षक मूंछे, चेहरा भी चमकदार लेकिन जैसे हर रोज दाढ़ी बनाने वाला व्यक्ति और पहरावे से खानदानी व्यवसाई. V.C. सहाये कहा कहा दखल रखता था ये पढ़ने में अर्जुन को उसकी बेटी के विवरण से 3 गुना समय लगा और निष्कर्ष यही निकला की बाप सचमुच हे टेढ़ी खीर है.

"कल मिलने से पहले अगर आज रात हे इसके घर के बहार चक्कर लगा लू? उल्टा गाडी पहचान में जरूर आ जाएगी.. और वही तोह सही रहेगा... सिक्योरिटी.. बहार हे न निकली तोह वैसे हे रात काली करूँगा. हम्म्म.. पहले बिंदिया काकी से हे बात करता हु फिर चोपड़ा निवास की फ़ोन लाइन में सेंध लगते है आराम से.", अर्जुन खुद से बातें करते हुए उस नीली स्क्रीन वाले मोबाइल फ़ोन के नंबर मिलाने लगा. पर्ची हाथ में रही हरा बटन दबाने तक और जैसे हे नंबर जुड़ा 3 घंटी पर हे ये खनकती हुई आवाज सुनाई पड़ी.

"Hello."

"Hello. मरस फरज़ाना मिर्ज़ा से बात हो सकती है हमारी?", अर्जुन ने थोड़ी आवाज बदल कर ये नाम लिया था जैसे कोई umar-daraaj व्यक्ति बोल रहा हो. उधर फ़ोन उठाने वाली बिंदिया ऐसे अपना परिचय सुन्न कर उस घर में घुसने से पहले हे गलियारे में रुक गयी. छोल साहब और पंडित जी शबनम का दाखिला पक्का करवाने के बाद अब रहने की जगह देखने आये थे और वो लोग अंदर दाखिल हुए हे थे जब हैंडबैग में रखे फ़ोन की घंटी बज उठी.

"सलाम. हम पहचाने नहीं आप कौन साहब बोल रहे है. हम फरज़ाना हे बोल रहे है. आपका नंबर ..."

"हमारा नंबर हमारे मिजाज जैसा हे है जो कभी एक सा नहीं रहता. बहोत खूबसूरत लग रही है वैसे आप. साथ में आपकी बहिन है क्या?", जैसे अर्जुन ये दिखा रहा हो की वो उन्हें देख रहा है और शबनम अपनी माँ को बुलाने हे आयी थी पर बात करते देख बगल में आ कड़ी हुई. बिंदिया के तोह चेहरे पर परेशानी और हैरानी हे थी जो फ़ोन थोड़ा दूर करती हुई ईमारत से बहार देखने लगी पर ऐसा कोई इंसान नजर हे न आया जो फ़ोन पकडे हो.

"कहा taak-jhaak करने लगी है आप? हम ऐसे नज़र आने वाले होते तोह रौच्दले फार्म पर हे न मुलाकात हो जाती? दूर तक फैली कुदरत और हिरणो का झुण्ड जिसको देखती ये खूबसूरत जन्नत की मल्लिका कितनी शाम वह बैठी रहती थी.", अब बिंदिया का सबर हे जवाब दे गया क्योंकि ये जो कोई भी था उसका कहना बिलकुल ठीक था लेकिन वो ख़ूबसूरती की जो तारीफ कर रहा था वो सहनी मुश्किल थी. अपनी माँ को हैरान देख कर शबनम ने फ़ोन उनके हाथ से ले कर अपने कान पर लगा लिया.

"ओह मजनू की औलाद, सुधर जाओ नहीं तोह जब मिलोगे न तोह तुम्हारा chu-chu का मुरब्बा बना दूंगी. क्यों मेरी प्यारी माँ को परेशां करे जा रहे हो अर्जुन?", शबनम में बस दूसरी तरफ से अपनी माँ का नाम हे सुना था जो अभी अर्जुन दोहरा हे रहा था की उसने अर्जुन की बात बीच में काट दी. अब बिंदिया ने सुना तोह पहले चेहरा ऐसा बनाया के 'इस लड़के का क्या किया जाए' और फिर अपनी बेटी के साथ साथ वो भी हंसने लगी. सचमुच अर्जुन ने गलत विवरण न दिया था बिंदिया का. चमकते सफ़ेद एकसार दांतो की पंक्ति के बहार वो होंठ हे इतने मादक बनाये थे उपरवाले ने की बिंदिया किसी आम के लिए तोह बस एक सपना हे थी.

"सॉरी.. सॉरी... आपकी इतनी प्यारी hello सुनी जिसमे आप अनजान सी लगी तोह रुक नहीं सका मस्ती करने से. और मुझे लगा की साथ हे शबनम दीदी होंगी तोह तुक्का मार दिया. देखो मैं गलत तोह नहीं था?"

"हाँ पर तुम ये रौच्दले वाली बात कैसे जानते हो और मेरा पूरा नाम.. नाम तोह चलो कोई बात नहीं लेकिन एक बार तोह सचमुच मुझे टेंशन में हे दाल दिया था तुमने. कैसे हो?"

"थका हुआ क्योंकि सुबह अँधेरे में घर पंहुचा था और अब वह से दिल्ली की सड़को पर. दीदी का एडमिशन हो गया न?"

"हाँ बाकी अगस्त से क्लास शुरू होंगी तब वापिस आएगी इधर. फिलहाल तोह कॉलेज के पास हे इसके लिए अपार्टमेंट देखने आये है, अंकल जी है साथ. आ जाओ इधर अगर तुम्हारे पास समय है तोह?", बिंदिया और अर्जुन के बीच अभी तक एक दूसरे के लिए कोई सटीक सम्बोधन नहीं हुआ था जैसे chachi/bua या कुछ भी. और इसकी वजह बस इन्हे हे पता थी या कोई वजह थी भी नहीं.

"बौ जी को तोह आज रात को किसी से मिलने भी जाना है और शायद वो वही रुके. कल भी उन्हें थोड़ा टाइम लगेगा जितना मुझे पता है. आप और दीदी चाहे तोह मैं आपके लिए 5 स्टार में रूम बुक करवा सकता हु. आराम रहेगा क्योंकि दिन भर सफर में कटा है और कल फिर से आप लोग वापिस जाने वाले है."

"नहीं होटल की जरुरत नहीं है. हम तीनो यही रुकेंगी रात में और नजदीक हे मार्किट है तोह परेशानी भी नहीं होगी. तुमने नहीं बताया की तुम मिलने आ रहे हो या नहीं? ये क्सक्सक्सक्स कॉलेज के सामने हे क्सक्सक्सक्स नगर है. रोड के साथ हे सोसाइटी है जहा 3 नंबर टावर की दूसरी मंज़िल पर 204 नंबर अपार्टमेंट है.", शबनम ने हॉल में बैठ कर बात करती अपनी माँ से दूर मुस्कान के कान में बता दिया की फ़ोन किसका है. और मुस्कान उसको आँखों से हे दोनों दादा जी के होने का बताने लगी तोह उसने भी खुले दरवाजे से बहार का रास्ता दिखाया बात करने के लिए. बिंदिया तोह जैसे बात करना बंद हे न करती लेकिन शबनम ने माँगा तोह उसने तुरंत फ़ोन आगे कर दिया अर्जुन का जवाब सुने बिना. मुस्कान अपनी बड़ी बहिन द्वारा फ़ोन देने पर शर्माती हुई बाहर निकली और अब बरी बिंदिया की थी हैरान होने की.

"ये सब क्या चल रहा है?"

"वो सबसे पहले उसका हे तोह ख़ास दोस्त है. छोडो आपको कई बार बताया है लेकिन आप हर बार भूल जाती हो. अब देखना की कैसे मन करता है वो. वैसे अपार्टमेंट ाचा है. मुझे लगा था के छोटा सा हे कमरा और वैसा हे हॉल होगा. यहाँ तोह दीवान भी लगा है और 3 सोफे टेबल के बाद भी आने जाने के लिए इतना रास्ता है. उधर बैडरूम में भी अलमारी ाची बानी है और बीएड के दोनों तरफ ाची जगह है. आपको पसंद आया?", बिंदिया तोह असमंजस में थी और बेटी के सवाल पर बस नींद से जागने जैसा जवाब दिया.

"हाह.. कुछ ऐसा वैसा तोह नहीं?"

"ओह मेरी प्यारी माँ.. मुस्की लट्टू है उस पर और वो भी पूरा ख़याल रखता है उसका. वो कुछ कहती नहीं और जब कहती है तोह वो पूरा कर देता है. ाचा कनेक्शन है दोनों के बीच में और होगा भी क्यों नहीं? वो तोह आप पे भी लाइन मारता है चाहे आपकी उम्र हो चली. हाहाहा..", मुस्कान अंदर आयी और फ़ोन पंडित जी को दे कर फ्रिज देखने लगी जो साफ़ था और भीतर से खाली. रसोई में हे पानी साफ़ करने की छोटी मशीन लगी थी जहा से पीने का पानी भरा जाता था. अपने साथ लायी बिसलेरी की बोतल को टूंटी के निचे लगा कर भरने के बाद वो उसको बर्फ ज़माने वाले खाने में रख कर सोफे पर अपनी माँ के सामने हे आ बैठी.

"क्या कहा अर्जुन ने? बिजी लग रहा था?"

"वो नजदीक हे है अम्मी, 3-4 गली दूर बताया है. बोल रहा था के डिनर पर उसका इन्तजार कर ले अगर पॉसिबल है तोह. 9 बजे तक यहाँ पहोच जाएगा.", यहाँ मुस्कान ने तोह न सिर्फ आने बल्कि रात्रिभोज तक के कार्यक्रम का जीकर कर डाला. शबनम मंद मंद मुस्कुरा रही थी जिसको देख कर मुस्कान उठ के बालकनी की तरफ चली गयी.

"कहा था न आपको? ये आपकी भोली मुस्की उतनी भोली भी नहीं. इसने कहा होगा की अगर वो डिनर करने नहीं आया तोह ये बात नहीं करेगी और कोई 3-4 गली दूर नहीं है वो. ये क्सक्सक्सक्स नगर और नाना जी ने कहा था के अर्जुन इधर से आधा घंटा दूर होगा. लेकिन अब वो जरूर आएगा और ाचा हे है न आपकी हे तारीफ करता रहेगा उतने वक़्त.", बिंदिया से कुछ कहते न बना और पंडित जी ने भी बात करके फ़ोन शबनम को पकड़ा दिया. मुस्कान ने उनके लिए 2 गिलास में पानी डाला और रामेश्वर जी ने वही बताया जो अर्जुन ने बिंदिया को कहा था.

"आप कार ले जाए नानू, हमे कोई जरुरत नहीं है. क्यों किसी और से मंगवानी है जब निचे अपनी हे कड़ी है.", मुस्कान के जवाब पर बिंदिया ने भी हामी भरी और छोल साहब को शबनम ने हे कार की चाभी पकड़ा दी. जबकि पंडित जी फिर से एक फ़ोन लगाने का बोल रहे थे गाडी मंगवाने के लिए.

"कही आना जाना पड़ा तोह?"

"कही नहीं जाना सुबह तक तोह. होटल और दूकान पास हे है और खाने के बाद बस सोना हे है. इधर जगह भी पूरी है और बाकी सबकुछ तोह है हे.", बिंदिया के कहने पर रामेश्वर जी ने कुछ सलाह दी और फिर चले गए. अर्जुन से उनकी जरुरी बातें हो चुकी थी जो दूसरी तरफ उमेद चाचा से बात करने के बाद अब गाडी उस घर की गली में लगा चूका था जिधर पालक रहती थी.

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"Ding-Dong", घंटी की आवाज सुनते हे उस बड़े से घर के भीतर ये दरवाजा खुला और बरामदे की लाइट जला कर बिना ब्याह का आसमानी गाउन पहने ये चमचमाती हुई महिला संगेमरमर के फर्श पर बड़े हे कातिलाना अंदाज में चलती हुई लोहे के ऊँचे गेट तक आ पहुंची. भीतर एक तरफ हरा भरा बगीचा था और दूसरी और 2-3 गाडी आराम से कड़ी करने की जगह जहा पर अभी एक हे कार कड़ी थी, लाल रंग की ओपल और उसकी बगल में कला काइनेटिक हौंडा. झाँकने वाले झरोखे को खोल कर बहार देखा तोह ये ऊँचा लम्बा खूबसूरत सा युवक नजर आया गेट के दोनों तरफ जगमग सफ़ेद लैंप की रौशनी में. समय तक़रीबन सवा 10 रहा होगा.

"जी किस से मिलना है?", आवाज में उतना मीठापन नहीं था जैसे उसको अनजान लोगो से ख़ास बातचीत पसंद न हो.

"जी मैं पालक दीदी का भाई अर्जुन. आप सोनाली जी है न? शादी में देखा था आपको लेकिन आपने पहचाना नहीं शायद.", अर्जुन के ऐसा कहने पर फीकी मुस्कान देते हुए सोनाली ने अब एक तरफ का दरवाजा भीतर की तरफ खोला और जैसे हे उस बड़ी गाडी पर नज़र पड़ी उसकी आंखें तुरंत बदल गयी.

"ओह अर्जुन.. सॉरी वो दूर की वजह से तुम ठीक से नजर नहीं आये न. कैसे हो तुम? पर्सनालिटी तोह हीरो जैसी बना ली है तुमने. आओ अंदर आओ और बैग मुझे पकड़ा दो. वैसे इतनी महंगी गाडी रेंट पर लेने की क्या जरुरत थी? तुम बोल देते बस पालक को और मैं खुद तुम्हे अपनी गाडी में लेने आ जाती.", जाने ये कैसी महिला थी जो गेट से बहार इस लगभग अजनबी युवक से ऐसे बात कर रही थी जैसे अर्जुन उसका कोई बिछड़ा हुआ दोस्त हो. वही रेशमी गाउन के ऊपर बने 2 गोल दाने पर्याप्त थे ये बताने के लिए की सोनाली ने उस वस्त्र के भीतर और कुछ नहीं पहना. जिधर से दरवाजा खोल कर ये बहार निकली थी, उस से विपरीत दिशा में भी घर का आधा सामान प्रतिबिम्ब था और वह से दरवाजा खोल कर बहार देखती पालक कुछ वक़्त अपनी जगह हे कड़ी रही. उसके चेहरे पर हल्का तनाव था अभी लेकिन अर्जुन अपना बैग पकड़ा कर वापिस गाडी में जा बैठा और इस युवक के लिए इतने बड़े घर की बड़ी बहु खुद दूसरी तरफ का दरवाजा पूरा खोल कर गाडी की जगह बनाने लगी. अर्जुन ने भी उस चौड़े फर्श पर हे गाडी एक तरफ लगाने के बाद सोनाली का धन्यवाद करते हुए बैग वापिस लिया.

"दीदी को इसमें हे ले कर आया था सोनाली जी और ये रेंट पर नहीं ली, अपनी हे है. वैसे आपकी पर्सनालिटी के सामने तोह मैं कुछ भी नहीं. Hello पालक दी, सॉरी थोड़ा लेट हो गया और काम परसो हे होगा. आप लोगो को परेशानी तोह नहीं हुई मेरे आने से.?", अर्जुन के ऐसे उन्मुक्त व्यवहार और दीदी न बुलाने पर सोनाली को खुद की ख़ूबसूरती पर बड़ा गर्व हो रहा था.

"कैसी बात करते हो अर्जुन? अब तुम पालक के छोटे भाई हो तोह मेरे भी कुछ लगते हे हो. और अपनों के घर पर परेशानी नहीं स्वागत किया जाता है.", सोनाली की बात सुन्न कर अर्जुन को कुछ याद आया और तुरंत उसने गाडी की बीच वाली सीट की तरफ का दरवाजा खोलते हुए चमचमते लिफाफे में लिपटे कुछ उपहार निकाल कर सोनाली के हाथो में पकड़ा दिए. अब उसका बैग पालक के पास था जो मुस्कुराने की कोशिश कर रही थी.

"सॉरी, आपके लिए तोह ख़ास तौर पर हे फ्रेंच परफ्यूम लाया था और बाकी मुझे कुछ पता नहीं था इसलिए बस स्वीट्स और चॉकलेट्स है. अंकल आंटी जी के लिए ये कपडे है कुछ और ये आपके बेटे के लिए sports-watch है. आप शायद आराम कर रही थी और मेरे बेल्ल बजा देने से डिस्टर्ब हो गयी. कल सुबह मिलता हु आपसे सोनाली जी. अंकल आंटी जी भी शायद सो गए होंगे और आपके हस्बैंड शायद आज बहार है.", अर्जुन अब इतना कुछ देने के बाद गाडी की चाभी पालक को पकड़ने के बाद बैग ले कर उन दोनों के साथ हे आगे आँगन तक आया तोह सोनाली ने हलके से होंठ काटा पालक की नजरो से बच कर.

"वो तोह अभी थोड़ी देर पहले हे गए है बिज़नेस की वजह से और तुमने डिस्टर्ब नहीं किया बल्कि मैं तोह बोर हो रही थी क्योंकि पालक लाउन्ज से उठ कर सोने के लिए चली गयी. अभी बस नहाने हे जा रही थी और सही टाइम पर तुमने बेल्ल रिंग कर दी. मैं तुम्हारे लिए डिनर लगा देती हु अगर पालक आराम करना चाहे तोह कर सकती है. क्यों पालक?"

"सोनाली जी मैं डिनर बहार करके आया हु और वैसे तोह मेरा यहाँ आना भी कन्फर्म नहीं था लेकिन काम अब परसो सुबह होगा इसलिए आप लोगो को डिस्टर्ब कर दिया. दूध ले लूंगा अगर थोड़ा गरम मिल जाए, बिना शक्कर का. तब तक मई जरा कपडे चेंज कर लू. दीदी, गेस्ट रूम कहा है?", पालक को इतने सलीके से उसने दीदी कह कर पुकारा था की सोनाली समझ गयी की अर्जुन उसके सामने बात करने से जरूर हिचकिचाता होगा.

"बस तुम जितने फ्रेश होते हो, उतने मैं भी शावर ले लेती हु. लाउन्ज में मिलते है आफ्टर तेन मिनट्स. वैसे दोनों साइड 2-2 बेडरूम्स है, जयेश का ी थिंक क्लोज होगा पर तुम मेरी तरफ वाले में सो सकते हो. वो स्पेयर रूम है और बैडरूम के साथ हे आत्ताच बाथरूम है उधर."

"नहीं दीदी, अर्जुन मेरे हे बैडरूम में सो जाएगा. आपको तोह पता हे है की अकेले मुझे भी थोड़ा डर लगता है सोने में. भाई रहेगा तोह ठीक रहेगा. और दूध मैं गरम कर देती हु, आप शावर ले लीजिये."

"सो मैं आपके कमरे में जाऊंगा पर दूध थोड़ा रुक कर पीना है और मुझे अभी नींद भी नहीं आ रही दीदी. सोनाली जी 15 मिनट बाद मिलते है, लाउन्ज में.", अर्जुन ने पालक से आड़ ले कर जिस अंदाज में ये कहा था उसने जाहिर किया की वो शर्मा तोह रहा है पर दीदी की वजह से. सोनाली भी okay कहती हुई अपनी तरफ वाले हिस्से में चली गयी तमाम उपहार उठाये और पालक मुँह बना कर अर्जुन को ऐसे देखने लगी जैसे उसने कोई गलती कर दी हो. आगे आगे चलती हुई वो दरवाजा खोल कर अर्जुन को भीतर आने का रास्ता देने के बाद एक पल रुकी और फिर दरवाजा भीतर से बंद कर लिया. ये भी एक छोटे हॉल जैसा हे था और फर्श इतना चमकदार की इंसान चलने से पहले सोचे. एक तरफ चमड़े के महंगे सोफे और लकड़ी की ट्राली पर बड़ा सा टेलीविज़न जो बंद था. सलेटी रंग का ऊँचा बड़ा फ्रिज जिस से बोतल निकाल कर साफ़ गिलास में पानी दाल कर अर्जुन को देते हुए पालक ने अपनी चुप्पी तोड़ी.

"इतनी तेज तोह गाडी का मीटर नहीं बढ़ता जितनी स्पीड से तुम मेरे सामने हे दीदी को मक्खन लगा रहे थे. और ये आने का टाइम है कोई? मुझे लगा था की डिनर टाइम से पहले लौट आओगे और साथ हे करेंगे. दिल्ली की हवा आते हे लग गयी तुम्हे.", अर्जुन बस मुस्कुरा रहा था और इस हिस्से को देखता रहा जहा एक संगमरमर के छोटे चौकोर टेबल पर बुद्धा की ऊँची मूर्ति सजी थी. छत पर झूमर वाला सुनहरी पंखा और ठीक सामने हे 2 कमरे थे जिनमे से एक का दरवाजा तोह दिखा लेकिन दूसरा शायद विपरीत दिशा में था और यहाँ बीच में हे लकड़ी की दिवार सी थी जिसमे दरवाजा लगा था पहिये वाला.

"आपकी दीदी को मक्खन लगाए बिना उन्हें सेक भी तोह नहीं सकता. वैसे मैं इधर भी सो सकता हु लेकिन कपडे बदलने के लिए बाथरूम की जरुरत रहेगी. घर तोह आपका बहोत ाचा है.", अर्जुन की बातें पालक के सर के ऊपर से गयी और वो उसको लिए अपने कमरे में दाखिल हुई तोह दिवार की तरफ कोई 4 फ़ीट ऊँचा काली लकड़ी के सिरहाने वाला शाही बिस्टेर जिसके दोनों तरफ मेज थे. कांच का शोकेस, एक कंप्यूटर और दिवार में बानी लड़की की 3 अलमारियां. कुल मिला कर एक उत्कृष्ट शयनकक्ष था पालक का. बैग बिस्टेर पर रख कर पालक ने चैन हे खोली थी की अर्जुन ने हाथ का इशारा करते हुए रोका और एक टोलिया, कुरता पेजमा निकाल कर वापिस बंद कर दिया.

"ाचा कमरा है और लगता है जयेश जी का टास्ते भी बढ़िया है. वैसे ये बहार जो पार्टीशन बना हुआ है, इसकी क्या जरुरत है?", अर्जुन का गिलास एक तरफ रख कर पालक बिस्टेर के किनारे हे बैठ गयी. बैग भी उसने टेबल पर हे रख दिया था. इस वक़्त हे अर्जुन ने ध्यान दिया था की पालक ने अब साड़ी की जगह एक बड़ा हे आरामदेह हल्का गुलाबी गाउन पहना हुआ था जिसमे वो कही ज्यादा हे प्यारी लग रही थी. बाल अब बस एक ढीले जुड़े में बंधे थे और गोरी बाहें बेपर्दा.

"पता नहीं टास्ते कैसा है उनका? जबसे शादी हुई है लगता है उनका काम कुछ ज्यादा हे बढ़ गया. वो पार्टीशन इसलिए है क्योंकि उधर लाउन्ज और हॉल है, tv-speaker की आवाज बहार नहीं जाती उतनी. जयेश का ऑफिस छुम रूम का दूर भी उधर हे खुलता है जहा वो ज्यादा समय रहते है रात में. सिर्फ सोने हे आये तोह आये नहीं तोह नींद उन्हें उधर भी आ जाती है. शादी के बाद घर पे रहे हे कितना है? वैसे तुम दीदी के बारे में क्या कह रहे थे?", पालक की बात सुनते हुए अर्जुन हाथ का इशारा करते हुए अभी आने का बोल कर बाथरूम में घुस गया. मुँह हाथ धोने के बाद वो सही 2 मिनट में हे वापिस कमरे में था, पाजाम और बनियान पहने. बाकी उतरे हुए कपडे तेह लगाते हुए उसने बैग में रखते हुए बात शुरू की.

"आपके लिए ठीक समय पर हे फ़ोन आया था न आज?"

"तुम्हे कैसे पता? हाँ आया था और वही टेंशन बढ़ा रहा है मेरी. इसलिए तोह मैंने आने से मन कर रही थी मैं यहाँ वापिस. मैंने तुम्हारी बात मान कर हाँ तोह कर दी लेकिन तुम नहीं जानते मुझे कैसे कैसे ख़याल आ रहे है. वो आज मुझसे बड़ी हे गन्दी भाषा में बोलै जैसे मैं कोई राह चलती हुई.. चीई.. अब तोह उसकी हिम्मत ऐसी बढ़ी हुई थी की अगर मैं कल उसके पास नहीं गयी..."

"वो पार्क वाले आदमी की तस्वीर दिखाना जरा. और ये जब फ़ोन आया तोह घर में कौन कौन मौजूद था?", अर्जुन ने बात को बीच में हे काट कर हौले से पालक के गाल पर आये आंसू लुढ़कने से पहले हे साफ़ कर दिए. वो कुछ गंभीर था और ऐसा करने के बाद पालक का हाथ अपने दोनों हाथो में थाम कर दिलासा देने लगा. पालक भी 1 मिनट की इस ख़ामोशी के बाद उठ कर अलमारी तक गयी और उसका टाला खोलने के बाद एक और चाबी से कोई लाकर जैसी दर्ज खोल कर बिना सोचे भोरे रंग का फोल्डर अर्जुन की तरफ बढ़ा दिया. अब देर हो चुकी थी ऐसा करते हे क्योंकि अर्जुन के हाथ में सभी फोटो थे जिसमे सबसे ऊपर वाले में हे फुहारे के निचे आँखें मूंदे पालक निर्वस्त्र कड़ी नाहा रही थी. पके संतरे जितनी उसकी गोरी दूधिया चूचिया बेहद हे खूबसूरत थी जिनके कठै तीखे निप्पल तक स्पष्ट थे.

"सॉरी.. ध्यान नहीं रहा.", चील की तरह झपट्टा सा मारा पालक ने और पीठ अर्जुन की तरफ पलट कर उन दर्जन तस्वीरों में से 3 उसकी तरफ बढ़ा कर खुद को व्यस्त दिखती हुई नजरे चुराने लगी. बाकी तस्वीरें फिर से लाकर में बंद हो चुकी थी जबकि अर्जुन तोह स्तभ्द सा वैसे हे बैठा raha.Is चुप्पी को देख कर बिस्टेर पर अर्जुन से कुछ दुरी पर बैठते हुए पालक ने हे नजरे झुकाये कहा.

"परेशान थी इसलिए ध्यान नहीं रहा. तुम गलत समझ रहे होंगे?"

"न.. नहीं.. मतलब आप सुन्दर हो.. मतलब की नहीं मैं कुछ नहीं समझ रहा. हो जाता है... हाँ मैं पूछ रहा था के जब इसका फ़ोन आया तब घर में कौन कौन था.?", अर्जुन ने साफ़ यही कहा था की 'इसका फ़ोन आया' और पालक भी हैरान रह गयी ये सुन्न कर. वो तुरंत उसकी तरफ खिसकी और फोटो हाथ में ले कर देखने लगी.

"तुम्हे कैसे पता की इस आदमी ने हे फ़ोन किया था? और जब फ़ोन आया तब मैंने ध्यान नहीं दिया की घर में कौन है लेकिन दीदी पार्क में गयी हुई थी टहलने के लिए. रूबी छत्त पर कपडे उतार रही थी जब फ़ोन से पहले मैं चाय देने गयी थी. बताओ न तुमने ऐसा क्यों कहा की फ़ोन इस आदमी के किया था.?", पालक अनजाने हे अब अर्जुन की ब्याह को पकडे हुए थी.

"मेरे मुँह से निकल गया क्योंकि ध्यान उस फोटो पर हे था. सॉरी.. पर अब आप आराम करो, मुझे ये एक फोटो चाहिए बस. बाकी आप चाहो तोह जला दो, फाड़ दो.. अपनी हे फोटो रखने का कोई फायदा नहीं, बेमतलब किसी के हाथ लग गयी तोह गलत समझेगा. मैं बहार सोफे पर हे सो जाऊंगा, दूध पीने के बाद.", अर्जुन खड़ा होने लगा तोह पालक ने ना में सर हिलाते हुए उसका हाथ थाम लिया.

"अब मुझे इस घर में अकेले नींद नहीं आती अर्जुन. तुम चाहो तोह मैं जमीन पर मैट्रेस्स लगा लुंगी, तुम यही कमरे में सोना."

"मैं सो जाऊंगा यही पर और मैट्रेस्स की भी जरुरत नहीं. जैसे बचपन में मैं दिवार बनता था न तकियों से वैसे हे बस आप बॉर्डर बना लेना, मुझे अपनी नींद बहोत पसंद है लेकिन आपकी लात खाने का डर अभी भी उतना हे है. आता हु थोड़ी देर में, जरा सोनाली जी का दूध पी लू.", पालक ने हँसते हँसते एकदम से हे आँखें बड़ी करते हुए अर्जुन को अविश्वास से देखा की वो ऐसा कैसे बोल सकता है.

"क्या बोले तुम?"

"यही की आता हु थोड़ी देर में, जरा सोनाली जी से बात कर लू दूध पीते हुए. आपको क्या लगा?", अर्जुन ने बात दोहराई लेकिन पालक ने मुँह बिचकाते हुए यही कहा.

"कायदे में रहना जरा. मेरी जेठानी है वो और कुछ ऊंच नीच हुई तोह.."

"उस बुढ़िया से ज्यादा सुन्दर तोह पल्ली है. मैं इतना भी अँधा नहीं हु. टेंशन को खिड़की से गली में फेंक कर आराम करो. मैं बस आधे घंटे में आया.", अर्जुन ने यहाँ पालक की तारीफ़ ऐसे की थी की अब वो हैरान काम और खुश ज्यादा हुई.

"जल्दी आना और वो थोड़ी मॉडर्न सोच रखती है पर जाने कब बिदक जाए."

"आज नहीं बिदकने वाली. मैं ultra-modern हु और आपकी जेठानी को समझ चूका हु ाचे से.", अर्जुन को उस स्लाइडर दूर तक छोड़ कर पालक वापिस कमरे में चली आयी. दूसरी तरफ आलिशान सोफे के आगे कांच की टेबल और बड़ा टीवी जिसके दोनों तरफ ऊँचे स्पीकर लगे थे. मत्व चल रहा था और विदेशी गाने जो धीमी आवाज के बावजूद कोने कोने में संगीत बिखेर रहे थे. सचमुच कुछ ज्यादा हे आधुनिक थी सोनाली जो ऐसे गाने देखती थी जहा वस्त्रो के नाम पर बस पंतय ब्रा हे थे.
 
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