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प्यार और चाहत (1)
"Trinnnnnn-Trinnnnnn", इस बेहद शानदार बंगले की roop-rekha देखता हुआ अर्जुन एक हाथ घंटी पर दबाये हुए धुप झेल रहा था. ये तीसरी बार उसने घंटी बजाई थी लेकिन अभी तोह कोई बहार हे नहीं निकला. सलाखों वाला मजबूत ऊँचा गेट और उसके आगे एक बढ़िया सा बगीचा जिस से कुछ हे दुरी पर छाया में कड़ी एस्टीम कार वो पहचानता था जो जीनत की थी. एक तरफ तोह अर्जुन का ध्यान अभी भी जन्नत पर हे लगा था जिसके पास से वो इधर आया था और दूसरी तरफ वो जीनत की ऐसी फरमाइश पर अभी तक दांग था जो वो न सिर्फ अर्जुन से कर बैठी थी बल्कि उसने इसमें साक्षी को भी शामिल कर लिया. मैं में उथल पुथल होना स्वाभाविक था जब किसी अनजान के घर वो भी 2-2 खूबसूरत युवतियों से पहली बार संसर्ग करना हो. प्यार तोह ऐसे होना नामुमकिन हे था जितनी मुलाकात और बातचीत आपस में हुई थी.
"सॉरी.. तुम शायद काफी देरी से खड़े हो गेट पर. हम लोग ऊपर वाले कमरे में थे और वह door-bell की आवाज सुनाई नहीं देती. खिड़की पर पर्दा करते टाइम तुम्हे देखा. सॉरी अर्जुन.", सफ़ेद कासी हुई निक्कर और धारियों वाली बिना ब्याह की चुस्त टीशर्ट पहने ये मटकती युवती साक्षी थी जिसने दरवाजा खोलते हुए 2-3 बार माफ़ी मांगी. जिस तरह से उसका जिस्म दमक रहा था, यक़ीनन वो खुद को निखारने में व्यस्त थी और गेट खोलने की जल्दी में उसके जिस्म को मात्रा यही 2 वस्त्र ढके हुए थे, जितना मुमकिन था उन छोटे वस्त्रो से.
"It's ऑलराइट. समझ सकता हु की दूसरी मंज़िल तक शायद हे आवाज आती हो. वैसे भी घर ऐसे बनाया है जैसे बहार की आवाज अंदर न आ पाए. गाडी अंदर करना ठीक रहेगा?", अर्जुन ने दरवाजे की आउट में कड़ी साक्षी से पुछा जो अपने खुले बाल जुड़े की तरह लपेटने के साथ धुप से बचने में लगी थी.
"ऑब्वियस्ली. जिनि तोह यही रहेगी आज रात तोह उसके पीछे हे लगा दो तुम.", अब साक्षी ने तिरछी मुस्कान के साथ ये जो लगाने वाली बात कही थी उस से अर्जुन भी ाचे से समझ गया की जीनत से अधिक बेबाक तोह उसकी ये अंतरंग सहेली है जो द्विअर्थी बातें करने में कोई कसार नहीं रखने वाली.
"उसके पीछे लगाने में कही परेशानी न हो जाए. वैसे तुम्हारे पीछे ाची जगह है.. मतलब बगीचा बड़ा है तुम्हारा.", अर्जुन भी प्रतिउत्तर में साक्षी की भाषा में जवाब देता हुआ गाडी में बैठ कर खुले दरवाजे से कार को भीतर लाने लगा. कल रात तक जो साक्षी थोड़ा हिचकिचा रही थी शायद कुछ घंटे जीनत के साथ एकांत में बिता कर वो अब खुल कर इस पल का आनंद उठाने वाली थी. अर्जुन की कार एक तरफ तिरछी कड़ी होते हे साक्षी ने बड़े द्वार को बंद करने के साथ उस पर टाला जड़ दिया. अर्जुन के कार से उतारते हे साक्षी ने हाथ मिला कर उसका अपने घर में स्वागत किया और हाथ थामे हे वो उसको लिए गलियारे से हे भीतर की तरफ चलने लगी.
"अब मेरा बगीचा बड़ा है या छोटा, देखने वाले पर देपेंद करता है मर रोमियो. बाकी मैंने सुना है की बड़े बड़े बगीचे अक्सर सँभालने मुश्किल हो जाते है और जब वो जोड़ी में हो तोह एक माली 2 बगिया के साथ न्याय नहीं कर पता. इस तरफ.", अर्जुन साक्षी की खुली haajir-jawaabi के साथ घर को भी थोड़ा बहोत देखने लगा. दीवारों पर जैसे पैसे हे चढ़ाया हो. लकड़ी की बड़ी बड़ी खिड़कियां और उन पर चढ़े मॉटे कांच, काले चमकदार पत्थर की 10-10 फ़ीट चौड़ी सीढ़ियां जो ऊपरी मंज़िल पर ख़तम होने के बाद सफ़ेद विदेशी पत्थर का हॉल और उसके आगे 2 बड़े बड़े कमरों के अगल बगल काम चौड़ाई के दरवाजे शायद bhandaran-kaksh या बाथरूम थे. साक्षी ने वो भरी और बड़ा दरवाजा खोला तोह उसके आगे खिसकने वाला मॉटे कांच का द्वार ऐसा था जिसके बंद होने पर हवा तोह क्या ध्वनि भी भीतर दाखिल न हो.
"वेलकम मर रोमियो. सॉरी, धुप में इन्तजार करवाया तुम्हे.", आज तोह छोटी बहिन को भी अर्जुन सलवार कमीज में देख रहा था जो बिना किसी औपचारिकता के सीधा उसके गले लग कर मिलते हुए अपने नरम होंठो से गाल चूमने के बाद उसको साथ लिए एक नरम चमड़े के सोफे पर आ बैठी. साक्षी का कमरा तोह अर्जुन और संजीव भैया वाले दोनों कमरों को मिलाने पर भी कुछ बड़ा हे था. बहार देखने के लिए लगी खिड़कियों के करीब लकड़ी के बिना सिरहाने वाले 6-6 फ़ीट के 2 सोफे जो बिस्टेर से हे थे, एक व्यक्ति के लिए. 40 इंच का थॉमसन का टेलीविज़न, छोटा सा पारदर्शी फ्रिज, बड़ी बड़ी लकड़ी की अलमारियां जो दिवार में धंसी थी और एक इतना विशाल बिस्टेर जैसा अर्जुन ने हाल हे में अपनी माँ के कक्ष में हे देखा था. साक्षी का जीवन किसी राजकुमारी सा हे था लेकिन कमतर तोह जीनत का भी निजी कक्ष नहीं था पर अर्जुन ने फिलहाल तोह यही देखा था. कंप्यूटर के ऊपर चढ़ा कवर साफ़ बताता था के वो उतना प्रयोग नहीं होता.
"नाचीज का कमरा सुरक्षित तोह है न? वैसे मान न पड़ेगा की तुम लड़के दिलेर हो अर्जुन जो बिना ज्यादा jaan-pehchaan पहली बार में हे अकेले चले आये. नहीं तोह कुछ लोग तोह पहचान होने पर भी इतना जिगरा नहीं रखते.", संतरे का ठंडा जूस अर्जुन की तरफ बढाती साक्षी भी उसकी दूसरी तरफ हे आ बैठी. इरादे साफ़ थे के ये दोनों खूबसूरत बालाएं इरादा पक्का बनाये बैठी है, अर्जुन को निचोड़ने का.. काम से काम साक्षी का तोह यही मान न था.
"किसी और को भी न्योता दिया था साक्षी जी? और डरना तोह आपको चाहिए क्योंकि घर आपका और मेरी गाडी इस घर के भीतर, वो भी ताले लगे गेट के साथ. दिल से दिया न्योता मैं मन नहीं करता, काम से काम पहली बार तोह बिलकुल नहीं और दूसरी बार शायद आप मुझे बुलाने नहीं वाली.", अर्जुन ने अपनी तरफ देखती जीनत के हे होंठो से वो ठन्डे रास का गिलास लगा कर थोड़ा पीने का इशारा दिया तोह जीनत ने भी भरपूर कामुकता दिखते हुए अपने होंठो को हे गिलास में डुबो दिया. रस से साणे होंठो को खोल कर वो अर्जुन को दिखते हुए एक कोने से अपनी जीभ की नोक दिखते हुई पहले ऊपरी होंठ और फिर निचले को चाटने लगी. उसकी आँखों की शरारत और चेहरे का ये भोलापन एक खतरनाक मिश्रण था.
"एक नए रिश्ते की शुरुआत सच से हे होनी चाहिए, चाहे फिर वो कुछ हे समय के लिए क्यों न हो. अब तुमने पुछा है तोह मैं झूठ नहीं बोलूंगी. बॉयफ्रेंड था मेरा एक कॉलेज में और मुझे बहार से ज्यादा सेफ अपना घर हे लगा मिलने के लिए. मैंने उसको बुलाया तोह वो जिद्द पर ऐड गया की पहले एक बार होटल में या उसकी जगह मिलते है, कोई पास का हे गांव था जिधर वो लेके जाना चाहता था. बूत मैंने होटल जाना हे ठीक समझा और जब उसको इधर आने के लिए फाॅर्स किया दूसरी बारी में तोह वो साफ़ मन कर गया. फिर मैं भी समझ गयी की फत्तू होने के साथ उसका मैं भी साफ़ नहीं इसलिए उसके बाद फिर मैं कभी भी नहीं मिली उस लड़के से. वैसे साक्षी डरने वालो में से नहीं डरने वाले में से है मर अर्जुन. और तुम आपस में नाम से हे बात करो, ये जी और आप की जरुरत नहीं. वैसे ये मोटी कुछ ज्यादा हे तेज नहीं है?", अर्जुन के दोनों पत् पर अपनी दोनों मखमली जाँघे चढ़ती हुई जीनत तोह बातचीत की जगह उसके गले में बाहें दाल के बैठ चुकी थी. कुर्ती इतनी चुस्त थी की जीनत के बड़े बड़े गोले पूरे कसने के बाद कमर तोह ऊपर से देखते समय नजर हे नहीं आयी. अर्जुन ने भी उसकी पीठ से एक हाथ गुजार कर अपने सीने से लगा लिया.
"जीनत को लग रहा है की कही हर बार की तरह मैं फिर से इसको बीच में छोड़ कर न निकल जाऊ. लेकिन जब वादा किया है तोह उसको ाचे से निभाउंगा. वैसे तुम क्यों सहमत हुई इसके साथ? इसका पागलपन तोह मैंने तभी समझ लिया था जब ये पहली बार अपनी अनदेखी से मेरा गुस्सा तुम पर निकाल रही थी.", अर्जुन ने मुस्कुराते हुए जीनत के मखमली गाल से अपनी नाक को इधर उधर रगड़ते हुए नरम गुदाज पेट को भी सेहला दिया. जीनत तोह इतने में हे जैसे अलग एहसास से भर उठी. वो गॉड में हे मचलती हुई अर्जुन की गर्दन चूमने लगी. साक्षी ने स्थिति को समझते हुए अर्जुन के हाथो से आधा भरा गिलास ले कर मेज पे रख दिया. साक्षी स्वयं भी थोड़ा हैरान थी जीनत के ऐसे खुल कर अर्जुन संग प्रेम जताने पर.
"मैं सहमत हुई? ये हम दोनों की हे इत्छा थी की तुम हम दोनों से एकसाथ सेक्स करो. वैसे मणि (साक्षी का पुराण प्रेमी) से पहले हे हम दोनों ने ये सोच लिया था की जो भी हो, हम दोनों का पहला सेक्स एकसाथ हे होगा. इसको वो जरा भी पसंद न आया और मैं... मैं शायद इसके जितना सबर न रख सकीय. अब लगता है की वो मेरी सबसे बड़ी गलती थी. खैर, जिनि जितनी बिंदास है उतनी समझदार भी. तुम्हे तोह फकर होना चाहिए की वो लड़की जिस पर कॉलेज के साथ साथ पहली बार देखने वाला हर लड़का मर mit-ta है उसने तुम्हे चुना अपना सबकुछ सौंपने के लिए. तुमसे अगर यही खुश हो जाए तोह मैं समझूंगी की इसने सही फैंसला लिया. मेरी गर्मी तुमसे नहीं सँभालने वाली.", साक्षी की बात सुन्न कर अर्जुन से पहले जीनत चेहरा सीधा करती हैरानी से अपनी सहेली को देखने लगी और जब अर्जुन की तरफ देखा तोह वो बस मुस्कुराये जा रहा था.
"ोये तू पागल है क्या? देख मैंने अर्जुन को भी पहले हे बता दिया था की इसके साथ पहले तू करेगी और जब तक तू सटिस्फी नहीं होती तबतक मैं बीच में नहीं पड़ूँगी. इतना तोह मैं भी समझती हु की तू कितना कण्ट्रोल रखे बैठी है नहीं तोह एक बार सेक्स हो जाए तोह फिर रुका नहीं जाता. और तू खुद सोच उस चुटिया को मैं कैसे पसंद कर सकती थी जो तुझे हे 2 मिनट नहीं झेल पाया और ऊपर से साला तुझे मोटर पे अपने दोस्तों के साथ बांटने चला था. अर्जुन, तुमने सच कहा की तुम पहली नजर में हे मुझे पसंद आ गए थे और ये भी सच है की तुम्हारी अनदेखी मुझसे सेहन नहीं हुई. पर फिर धीरे धीरे मुझे बहोत कुछ पता चला जिस वजह से मैं खुद तुम्हारी गॉड में बैठी हु. ड्रिंक लोगे?", अर्जुन का गाल चूम कर जीनत बड़ी चपलता से उठ कड़ी हुई और उसके थिरकते कूल्हों पर फांसी पजामी और आधे कूल्हों तक आयी कुर्ती को देखता अर्जुन उतना हे प्रभावित था इन दोनों की दोस्ती से जितना सच उन्होंने उसके सामने कह दिया. लड़कियां तोह अपने राज दिल में दफ़न रखती है लेकिन ये उन्हें साँझा कर रही थी वो भी उस इंसान से जिस से शायद हे भिवष्य में कभी मुलाकात हो, कुछ दिन बाद. अब अर्जुन ने साक्षी की कमर में हाथ डालते हुए उसको अपनी तरफ खिंच लिया. रबर सा नरम और मांसल बदन तुरंत हे अर्जुन से आ लगा. साक्षी के सतांन भी अकार और कसाव में अपनी सहेली से 19 न थे.
"मैं ड्रिंक नहीं करता और वैसे भी फिलहाल मुझे किसी चीज की जरुरत नहीं तुम दोनों के सिवा. वैसे तुम लोग खुल कर एन्जॉय कर सकती हो, तुम्हारी हे पार्टी है.", लम्बी चिकिनी टाँगे मेज पर टिकती साक्षी भी अर्जुन के सीने पर हाथ रखती हुई अपने अरमान पूरे करने लगी. इस तगड़े पहलवान को बस अभी तक दूर से हे देखा था लेकिन आसक्त तोह वो भी अपनी सहेली सामान हे थी अर्जुन पर.
"तुम्हे बुरा नहीं लगेगा मेरे साथ करना? मैं जिनि जैसे वर्जिन नहीं हु. और तुम अकेले 2-2 को नहीं संभल सकोगे, चाहे स्ट्रांग हो बॉडी से.", अर्जुन ने तोह उसकी बात का जवाब ऐसे दिया जिसकी उम्मीद नहीं थी साक्षी को लेकिन कांच के 2 गिलास में पानी सी वोडका के ऊपर कोला उड़ेलती जीनत वो दृश्य देख कर हंसने लगी क्योंकि साक्षी के चेहरे पर एकाएक हैरत या खौफ के भाव उभर आये.
"इसको संभाल लेना बस तुम बाकी सब मुझ पर छोड़ दो. और तुम अकेली नहीं हो इस कमरे में जिसने सेक्स किया हुआ है. सच से रिश्ता वाली बात कही थी न तुमने तोह मैं भी बता देता हु की मुझे thik-thaak एक्सपीरियंस है और यकीन मानो 2 मिनट से ज्यादा टिक सकता हु, बेशक तुम्हे संभालना आसान नहीं. खूबसूरत होने के साथ साथ बगीचा ज्यादा हे हरा भरा है.", बगीचे वाले मजाक से जरूर साक्षी के चेहरे पर कुछ मुस्कान दिखी पर मैं तोह अर्जुन के पत् पर उठे उस उभार पर हे अटक गया जहा उसका हाथ टिका था. मेज पर दोनों के गिलास रखने के बाद मुस्कुराती लहराती जीनत निम्बू और नमक की प्लेट भी गिलास के बीच रख कर इन दोनों के सामने हे कुर्सी खिंच कर आ बैठी.
"ये क्या है?", सवाल का जवाब तोह साक्षी को भी पता था लेकिन उसकी हैरानी पर हंसती जीनत ने गिलास देने के बाद आपस में टकराते हुए एक बढ़िया सा घूँट भरने के बाद जवाब दिया.
"ये वो है जो तुम्हारे उस सो कॉल्ड असली मर्द के पास नहीं था डार्लिंग जिसकी तारीफ के कसीदे पढ़ते तुम थकती नहीं थी. अब मेरी लाइफ में तोह ये पहला हे होने वाला है लेकिन जरा तुम थोड़ा सा डिटेल्स दो अपने एक्सपीरियंस से.", साक्षी ने तोह जाम एक घूँट में हे निबटाने के बाद कासी हुई जीन्स के जोड़ से ले कर लिंग की पूरी लम्बाई का जायजा कांपते हाथो से लिया.
"इसको जीन्स में रखते कैसे हो तुम? जिनि इसके सामने तोह मणि का होना न होना एक हे बात है. सी हाउ हूजे इस थिस मॉन्स्टर. तुम दोनों मजाक तोह नहीं कर रहे मेरे साथ मिल कर?", साक्षी के हाथ खाली हे थे जाम पीने के बाद और उसको बगल से किसी गुड़िया की तरह उठा कर जैसे अर्जुन ने हवा में एक पल घुमा कर अपनी गॉड में ला बैठाया, उसको अपने अनकहे सवाल का भी जवाब मिल गया. अर्जुन उम्मीद से कही ज्यादा हे काबिल और ताक़तवर था.
"ओह जिनि.. ये असली हे है..", अर्जुन के सीने से अपने सतांन दबाये साक्षी ने नरम कूल्हों के निचे फड़कते उस अंग का फड़कना और क्षमता महसूस करते हुए तुरंत हे जवाब दिया.
"एक ड्रिंक और ले ले डार्लिंग, क्या पता अब तेरी ये शर्म कही इरादा न बदल दे. डर तोह नहीं लग रहा न?", महंगी बोतल से कुछ वोडका उलटने के बाद जीनत ने उसमे सिर्फ बर्फ के 2 टुकड़े हे गिराए थे और कोला लेने वो कड़ी हुई की साक्षी ने एक घूँट में जाम गले से निचे उतार लिया. वोडका से जलन तोह बहोत हुई पर जिस्म भी उतना हे गरमाया इस ठंडक भरे कमरे में. अर्जुन ने उसके दोनों तरबूज से चुत्तड़ हथेलियों में भर कर प्यार से मसलते हुए गाल होंठो में भर के कुछ गीला कर दिया.
"अब और मत पीना वार्ना असली एहसास नहीं ले सकोगी. तुम्हारे अतीत की कोई बात मैट करना और यही सोचो की आज जिनि के साथ तुम्हारा भी पहली बार हे है.", जीनत ने तोह स्वयं अपना दूसरा जाम नहीं बनाया था और पहले वाले को हे चुस्की लेते हुए चक्ति वो अपनी सहेली को देख रही थी जिसके रबर से कूल्हों को कासी हुई निक्कर के ऊपर से हे अर्जुन के मजबूत हाथ मसलने में लगे थे.
"मुझे ये देखना है.. बीएड पर चलो बस.. जिनि, अपनी फड़वाने से पहले तू जरा ाचे से सीख ले की तेरी बारी आने पर तुझे क्या करना है.", एक झटके में हे वो धारीदार टीशर्ट उस सफ़ेद सोफे पर जा गिरी जो परदे से ढंकी खिड़की के करीब सुसज्जित था. अर्जुन के सामने कड़ी साक्षी का ऊपरी हिस्सा अब निर्वस्त्र था और उसके पहाड़ से तने दोनों मॉटे चुके आपस में टकराते अर्जुन को आमंत्रित करने लगे. जीनत तोह अपनी सहेली की हिम्मत देख गदगग हो उठी, शायद जिस्म और शराब की आग ने उसको बेकरार कर छोड़ा था. बिस्टेर पर साक्षी चढ़ती उस से पहले हे अर्जुन ने पीछे से उसकी चुस्त निक्कर दोनों तरफ से पकड़ कर निचे खिसका दी. एक घुटना मोड अर्जुन ने बिस्टेर पर झुकी साक्षी के कूल्हों पर चुम्बन करने के साथ पीछे से हाथ उसके सीने की तरफ बढ़ाते हुए एक रेशमी एहसास भरे मॉटे सतांन को पकड़ कर निप्पल सेहला दिया. अर्जुन का चुम्बन कूल्हों से पतली कमर और फिर चिकनी पीठ पर कई जगह अपनी छाप छोड़ गया. अब झुकी हुई साक्षी की गर्दन पीछे घूमने लगी थी और उसके कूल्हों पर अपना लिंग दबाये दोनों मॉटे चुचो को मसलता अर्जुन भी उसके होंठो में होंठ भर कर तल्लीनता से रस पीने लगा. जीनत ने तोह गिलास एक तरफ हे रख दिया, जिसके जिस्म पे हजारो चींटियां दौड़ने लगी इस एकदम से हुई कामुक घटना से. अर्जुन ने तोह साक्षी के होंठो का कटरा कटरा तक निचोड़ लिया अगले 2 मिनट में और उसके मॉटे चुचो पर हलके भूरे निप्पल इतनी जल्दी कड़क हो गए जिन्हे ऊँगली और अंगूठे से मसलता अर्जुन साक्षी की हालत देख अलग हो गया. साक्षी पलट कर अपनी सांसें दुरुस्त करने लगी थी लेकिन जांघो के बीच दमकती उसकी मोटी योनि देख अर्जुन ने बहार उभरी शबनम की बूँद को आहिस्ता से चूम लिया. साक्षी के साथ साथ जीनत के भी रोयें खड़े हो गए इस हरकत को देख और हाथ स्वतः हे अपनी चुस्त पजामी के जोड़ पर आ रुका.
"उफ़ यार... आखिर तुम चीज क्या हो? मैं तोह इतने में हे गीली हो गयी और जो तुमने किया... आह्ह्ह्ह.. ऐसा कहा से सीखा?", अर्जुन तोह उसके करीब खड़ा अपने जिस्म पर फांसी टीशर्ट उतारने लगा जिसकी पसलियों, पेट पर उभरी मांसपेशियों के बाद निर्वस्त्र तराशी हुई चाहती और बाजुओं की मछलियां देख जीनत अपनी कुर्सी से उठ कर उसके सामने हे कड़ी हुई. अर्जुन ने पाँव से हे दोनों जूते उतार दिए थे अबतक. जीनत उसके सीने पर उगंलियाँ चलती हुई निचे झुक कर एक चूचक को चूमने के बाद उस से ऐसे लिपट गयी जैसे कोई अमरबेल.
"सच में यार साक्षी.. देख के हे पागल हो रही हु मैं तोह.", और अब अर्जुन ने जीनत का भी कमीज खिंच कर उसके जिस्म से जुड़ा कर दिया. नीचे हलकी बैंगनी जालीदार ब्रा में क़ैद उसके बड़े बड़े गोर सतांन आधे बहार निकले थे जिनका मांस और कटाव लाजवाब था. जीनत के जिस्म पर एक पुरुष का ये पहला स्पर्श था और ऐसी अवस्था भी.
"दूर से देखने की जगह साथ हे आ जाओ. तुमने हे बताया था के आपस में तोह तुम दोनों एक दूसरे से मस्ती करती हे रहती हो. वैसे तुम्हारा होनेवाला पति बड़ी किस्मतवाला है जिनि. तुम सिर्फ प्यार करने के लिए हे बानी हो और मैं किसी और से प्यार करता हु. वार्ना...", अर्जुन ने बिस्टेर पर तिरछी गिरी हुई जीनत के हुस्न और कामुक चेहरे को देखते हुए अपनी जीन्स का बटन ढीला करते हुए धीरे धीरे उसको भी अपने बदन से आजाद कर दिया. चौकोर डिब्बों वाली सूती निक्कर में खड़े अर्जुन के साथ उसका लिंग भी पूर्ण उत्थान पर था जिसकी तरफ साक्षी चपलता से लपकी. जीनत की साँसों के साथ ब्रा में क़ैद उसके 36-डी अकार के चुके भी ऊपर निचे हो रहे थे लेकिन नजरे अर्जुन से जुडी हुई, थोड़े चाहत से भरी. साक्षी ने तोह पलभर में हे अर्जुन का आखिरी वस्त्र सरका दिया जिसके बाद वो तोह उस साढ़े 9 इंच लम्बे मूसल में हे खो गयी, जो रह रह कर फड़क रहा था छत की तरफ देखता.
"वार्ना..", जीनत ने उसका हे शब्द दोहराते हुए जैसे अर्जुन को उसके अंदरूनी सच से अवगत करवा दिया.
"वार्ना कुछ नहीं.. रिश्ता और शादी सब तुम्हारी हे तोह मर्जी से हो रहा है और मैं जिस से प्यार करता हु वो बचपन से साथ है.", अर्जुन ने भले हे बात को ताल दिया था हालात और स्थिति के साथ साथ साक्षी की मौजदगी की वजह से पर जीनत संतुष्ट नहीं थी क्योंकि अर्जुन ने आज बिना कुछ ख़ास किये हे उसको ख़ास होने का एहसास करवाया था. इधर साक्षी ने जैसे हे उस लहराते मूसल पर हथेली लपेटी, स्वयं सीत्कार उठी. लम्बी उंगलिया उस मजबूत डंडे को घेरने में नाकाम थी और थोड़ा निचे सहलाते हे वो सुरक सूपड़ा उसके चेहरे के सामने था. किसी बड़े कुकुरमुत्ते सा लेकिन चमकदार laal-gulabi. साक्षी ने उसकी महक लेने की कोशिश ऐसे की जैसे वो दुर्गन्धित होने पर ज्यादा न सहनी पड़े लेकिन अंदाजा गलत था उस गेंहुए मॉटे कामदण्ड के बारे. जितना saaf-suthra था उतनी हे साफ़ महक थी उसके लिंग की. अब जीनत ने भी अपनी सहेली की तरफ देखा और आँखें उसकी भी फैल गयी उस भयंकर अंग को देख जिसके ऊपर एक तरफ से झुकती साक्षी ने गुलाबी होंठो से चुम्बन जड़ दिया.
"मर्डर जायेगी तू पागल.. ये.. ये सचमुच बहोत बड़ा है साक्षी..", साक्षी ने एक बार पलट कर अपनी सहेली को देखा जिसने साक्षी की आँखों में लाल डोरे हे तैरते पाए और चाहत उस लिंग के प्रति. अपनी क्षमता तक होंठो को खोलती साक्षी ने पूरा सूपड़ा हे मुँह में भर लिया. उसका फूला हुआ मुँह और अर्जुन की मजे से निकली आह बताने को पर्याप्त थी की साक्षी के दिल और दिमाग में बस अब काम हे भरा था. दोनों लटकते चुचो का भार अपने हाथो में उठता अर्जुन उन्हें ाचे से मसलने लगा और साक्षी का लिंग को चूसना पहले से तीव्र. इस मुद्रा में उसके भरी कूल्हे बिस्टेर पर उस और उठे थे जहाँ से सिर्फ जीनत हे देख उन्हें निहार सकती थी. दिल की आकृति में उभरे दोनों बड़े चुत्तड़ और उनका लचीला मांस जिसके तलहटी में रास बहती तजा निखरी रसभरी योनि.
"कभी तुम दोनों ने आपस में ओरल किया है?", अर्जुन साक्षी का सर अपने लुंड पर थोड़ा थोड़ा आगे दबाता हुआ एक तिहाई लम्बाई भीतर धकेल गया जिसको अब साक्षी ने नशे की वजह से बखूबी सेहन भी किया पर उसकी बात सुन्न कर जीनत कुछ शर्म से नजरे फिरती हुई करवट के बल हो चली. अर्जुन ने एक हाथ सतांन के निचे से हटा कर जीनत के हे कूल्हे को पजामी के ऊपर से जकड लिया. साक्षी की तुलना में ये कही ज्यादा हे नरम और उभरे थे, जैसे माखन में उंगलिया धंसने लगी हो.
"आह्हः.. अभी इसके साथ करो जो करना है.. मुझसे तुम्हारे सामने कुछ नहीं होगा.. तुम पता नहीं क्या सोचोगे...", अर्जुन का हाथ अपने कूल्हों पर हे दबाये जीनत चेहरा बिस्टेर पे छुपाने लगी. जिस्म कुछ और कह रहा था उसकी जुबान से जिसने अपने कूल्हे थोड़े और अर्जुन की तरफ खिसका दिए. पजामी उस गहरी दरार में धंसने लगी जहा अर्जुन दबाव दे रहा था. मखमल सी गहराई और गरम दरार के बीच डेढ़ पूरे तक उंगलिया जा फांसी. अर्जुन साक्षी को भुला कर कमर उचकते हुए जीनत के मॉटे नितम्बो में हे खो गया. अब जीनत की सीत्कार बढ़ने के साथ साक्षी की हालत भी बिगड़ने लगी जिसके गले में आधा लिंग ठोकर देने लगा.
"ुणगगग.. ख़ूऊणं खुंन्नं.. बड़े बेरहम हो यार.. आह्ह्ह्ह.. इतना मोटा कोई मुँह में ऐसे ठूँसता है? पहली बार सकिंग कर रही हु मैं.. रंडी नहीं हु..", आँखों में पानी लिए वो मुस्कुरा रही थी और अर्जुन समझ गया की साक्षी इस चुदाई में कुछ ख़ास हे चाहत रखती है. थूक से चमकता लिंग अब औकात पर अकड़ा तैयार था मुठभेड़ को.
"चलो फिर जैसे तुम चाहती हो वैसे हे करते है. चिकना करू तुम्हे भी?", अर्जुन ने जीनत को छोड़ कर साक्षी की रेशमी टाँगे उठाते हुए एक नजर उसकी योनि पर की जहा कॉमर्स ऐसे लगा था जैसे ब्रेड के 2 टुकड़ो के बीच मक्खन. गदराया बदन होने की वजह से छूट भी अत्यधिक फूली और लम्बे चीरे वाली थी, बालविहीन.
"बून्द नै मरौं लग्गी जेहड़ा तेल छौना. फुद्दी पहला हे रौंदी पायी आ ते यह मुस्टंडा (लुंड) लिश्कारे मार रहा. धक् दे पूरा एक्को वरि विच अंदर.. आह्ह्ह्हह..", बेशर्मी से अपनी छूट को मसलती हुई साक्षी ने पंजाबी में हे कहा की छूट के अंदर पहले हे चिकनाई है और ये गांड तोह है नहीं जहा तेल डालना पड़े. जीनत तोह उसकी बेशर्मी पर अर्जुन की वजह से नजरे चुराती दोनों से थोड़ी दूर खिसक गयी. वो हैरान थी अपनी सहेली के ऊपर जो इतने बड़े लुंड से डरने की जगह अपने अंदर पूरा डालने का बोल रही थी. पर क्या अर्जुन ये सब समझा था.
"मैं ताः एसडी शकल ी बिगौड़ देनी, बाद विच आप जी दी हे लत्ता नयी सीढिया होनी. लूंण है लुल्ली नयी जेहड़ी एक्को वारि विच धक् दू. लगदा वोडका शेती छड्ड गयी जा गर्मी बाली आ तेरे विच. जिनि, ओह टोलिया फडाई जेहड़ा सामने तंञ.", अर्जुन ने छूट के अंदर एक ऊँगली उतार कर कसाव का जायजा लिया तोह साक्षी मचल हे उठी. ऊँगली, मोमबत्ती उसके लिए रोजमर्रा का हे काम था पर मर्द की ऊँगली से छूट जैसे जायदा हे कस गयी. अर्जुन का जवाब सुन्न कर हंसती हुई जीनत ने वो बड़ा टोलिया उठा कर उसको पकड़ाया और देखने लगी जब अर्जुन ने टोलिया उसकी सहेली की गांड के निचे ाचे से बिचा दिया.
"ये किसलिए दाल रहे हो? साक्षी वर्जिन नहीं है और कैंडल मार्कर लेते हुए तोह इसको मैंने खुद देखा है."
"खुद हे देख लेना किसलिए ऐसा किया है.", अर्जुन ने जैसे हे सूपड़ा छूट की फांको पर फिराया तोह जीनत बड़े गौर से उन दोनों अंगो की तुलना करने लगी. छूट का नन्हा सा छेड़ उस मॉटे सुपडे के पीछे हे खो गया जिसके एहसास से साक्षी का बदन मचलने लगा. मॉटे चुके इधर उधर दोल रहे थे और घुटने मदद कर वो अर्जुन को आगे खींचने लगी.
"ऐ तू विवा लेना बंद कर यार.. आह्हः.. अंदर दाल दो अर्जुन अपना.. और नहीं सहा जाता..", ऐसी चुदाई की तड़प तोह अर्जुन ने सिर्फ काजल में हे देखि थी वो भी एक बार छोड़ने के बाद दूसरे संसर्ग पर इस तरह हे तड़प रही थी अर्जुन को खुद में समाहित करवाने को. लिंग को थोड़ा सा आगे पीछे करते हुए अर्जुन ने सुनिश्चित किया की साक्षी तैयार है या अतिरिक्त चिकनाई की जरुरत पड़ेगी. लेकिन उसकी योनि के भीतर तोह गर्मी के साथ साथ कॉमर्स की चासनी बुरी तरह भरी थी. एक पत् को पीछे उठाते हुए अर्जुन ने अपना जिस्म भी साक्षी के ऊपर बिस्टेर पे जाने दिया. मोटा सूपड़ा जिस कदर उस मांस में धंसता हुआ एक पल योनि मुख पर रुका तोह जीनत बड़े गौर से ये देखती हुई सेहम सी गयी और अगले हे पल कक्ष में 2 चीखें गूंजी. छूट उस भीषण सुपडे से फटने पर हलाल हुई बकरी सी साक्षी सर पटकने लगी तोह जीनत उसकी योनि के बदलते रंग और फिर छोटे से छेड़ को फाड़ कर भीतर जाते मॉटे लुंड के हमले से. जीनत ने तोह मुँह पर हे हाथ रख लिया लेकिन अर्जुन उसकी सहेली का एक मोटा चुका जोर से दबाये अपना आधा मूसल भीतर करके हे रुका. उस तरफ से जीनत को तोह नहीं दिखा लेकिन साक्षी और अर्जुन को पता था की छूट से रक्त की पतली धार रिसने लगी है.
"Aaaaaiiiiiiiiiii.. माआआआ.. बहार निकालो... मुझे नहीं छोड़ना .. बहोत बड़ा है तुम्हारा अर्जुननननन.. फाड़ दी मेरी.. आअह्ह्ह्ह.. मर्डर गयी मैं जिनि.. बचा le..aaahhhh..", अर्जुन ने उसको दर्द की अभिव्यक्ति करने दी कुछ पल और फिर पैट को सहलाते हुए उसका हाथ साक्षी के दूसरे सतांन तक रेंग गया. आंसू बहती साक्षी के होंठो को बड़े हे प्यार से चूमता चूसता अर्जुन दोनों चुचो को उमेठ कर ठन्डे होते शरीर को फिर से गर्माने लगा. लुंड तोह अपनी जगह ऐसे फंसा था जैसे हथोड़े से खूंटा थोक दिया हो मिटटी में. अर्जुन को स्थिर रह कर अपनी सहेली को चूमते सहलाते देख जीनत की तन्द्रा लौटी और वो आगे बढ़ कर उसके सर और बाहो को सहलाती हुई दिलासा देने लगी.
"ोये हो तोह गया जो होना था... तू ज़िंदा है कोई न मरी.. हिम्मत रख.. तेरी जगह मैं होती तोह पक्का मर्डर जाना था मैंने तोह.. अर्जुन तुमने पूरा दाल दिया एक बार में? थोड़ा तोह तरस खाते जब इसने खुद हे बताया था की आज सिर्फ सेकंड टाइम है और ऊपर से इतना बड़ा डंडा है तुम्हारा, घोड़े सा. बेचारी देखो कैसे रो रही है..", जीनत के चेहरे पर इतनी फ़िक्र देख अर्जुन ने अपना चेहरा ऊपर उठाया तोह जीनत झेंप सी गयी क्योंकि साक्षी खुद हे अर्जुन के हाथो अपने चुके मसलवा रही थी और गले पर चूमने लगी चुम्बन टूटने से.
"जितना अंदर है न जिनि, उतना हे बहार है अभी लेकिन ये पूरा ले भी लेगी और अब रोयेगी भी नहीं. तुम्हारे साथ तोह मैं थोड़ा अलग हे करूँगा, आखिर गिफ्ट माँगा है और बदले में गिफ्ट दे भी रही हो मुझे. ये तोह एक हे बारी में पूरा डालने को बोल रही थी और तेल तक के लिए मन कर दिया. अपने बाकी कपडे मैट उतरना अभी.", अर्जुन ने थोड़ा और ऊपर उठ कर एक हाथ से जीनत की गर्दन अपनी तरफ खिंच कर उसके होंठो पर जीभ फिरने के साथ साथ कई हलके चुम्बन जड़ कर बता दिया की वो जीनत के साथ सबकुछ प्यार से हे करने वाला है. कपडे उतरने वाली बात पर वो खिसक कर पीछे होती मुस्कुराने लगी. फिर से साक्षी के स्टैनो को मसलते हुए अर्जुन ने थोड़ा सा लिंग बहार निकाल कर फिर से भीतर ठेला तोह इस बार साक्षी के आवाज में उतना दर्द न था. टाँगे पूरी फैलाये वो आहिस्ता आहिस्ता आधे लुंड की अभ्यस्त होने लगी. दर्द सहना इतना आसान नहीं था लेकिन 2 पेग ने ाची मदद की थी उसकी. तक़रीबन 5 मिनट में हे उसकी छूट आंसू बहाने लगी तोह साक्षी 'उनननननहहहह', आअह्ह्ह्हह करती हुई अर्जुन को अपनी तरफ दबाने लगी. उसके मुलायम चुके लाल पड़ने के बाद अब चौड़ी छाती से कुचलने से लगे थे और जीनत अपनी आँखों के सामने इतना सब होते देख हौले हौले छूट को कपडे के ऊपर से सहलाने लगी तोह अर्जुन ने उसकी कलाई थाम कर ऐसा न करने का इशारा दिया.
"उफ्फ्फ... आराम से जालिम.. अभी कितना बाकी है? एआईईईई... ", अर्जुन ने चिकनाहट से भरी छूट में एकाएक जोरदार धक्के से लगभग 8 इंच की दुरी माप दी और सूपड़ा जैसे भीतर अपनी हद्द से जा भिड़ा. इतनी गर्माहट और कसाव के बीच उसकी भी हालत बुरी हो चली थी लेकिन दर्द साक्षी को हुआ जिसको फिर से सहलाती जीनत तोह हैरान थी की इतनी देर से वो उसकी सहेली को छोड़ रहा है लेकिन अभी भी वो चीख पड़ती है.
"बस हो गया जितना दर्द होना था.. आअह्ह्ह... सच कहु तोह तुम कुछ जायदा हे टाइट हो साक्षी.. आह्हः.. लेकिन पूरा लुंड नहीं ले सकती.. अंदर महसूस हो रहा है न ये कहा लग रहा है.. फिर भी बहार है 2 इंच jitna..unnhhh..", अब ज्यादा परवाह किये बिना अर्जुन आधी लम्बाई तक लुंड निकल कर अंदर ठेलने लगा था और यहाँ पहली बार उसने उन भूरे निप्पल्स को होंठो में भर के choosna/peena शुरू किया तोह साक्षी मचलती हुई अपनी टाँगे और ऊपर उठाने के साथ उसके सर को हे चुचो पर दबाने लगी.
"आअह्ह्ह्हह.. मजा आ रहा है.. ऐसे हे पीयो... ऐसा लग रहा है जैसे मेरे मुम्मो में से कुछ बहार निकल रहा हो.. आईई मम्मी.. आह्ह्ह्ह.. जिनि.. इसका सत्ता बहोत तगड़ा है यार... छूट तोह फटी पर आह्ह्ह्हह.. तेरी वजह से मैं जैसे आज हे पूरी हुई हु.. पेट तक लगता है इसका.. आह्हः.", सच भी था जब ऐसी कासी हुई छूट जिसने खून बहाया हो वो झेलने के बाद गुलाम होना निश्चित थी इस मूसल का. पर सहने के पीछे अर्जुन का सबर और वोडका का नशा भी बड़ी वजह थी.
"अब घोड़ी बनो, देखते है कितना झेलती हो मुझे.", अर्जुन ने जैसे हे लुंड पूरा बहार खिंचा, छूट का छेड़ देख कर जीनत के आँखे फैल गयी. वो खुल बंद करती फांके एक डेढ़ इंच चौड़ा छेड़ दिखा रही थी और आखिर में तोह खून मिश्रित छूट का पानी अलग चमकता दिखा.
"बून्द नहीं मारना बस...", जीनत को दूसरी हैरानी हुई की साक्षी दर्द से कराहती हुई भी घोड़ी बन्न गयी अर्जुन के कहने पर और उसके बड़े बड़े चुत्तड़ो के पीछे आ कर अर्जुन ने 2-3 बार छेड़ पर लुंड फिराया और फिर एक धक्के में हे पहले जितना अंदर पेल दिया. साक्षी की दबी दबी चीख फूटी पर उस पर ज्यादा ध्यान न देते हुए अर्जुन ने निचे हाथ दाल कर दोनों लटकते स्टैनो को पकड़ते हुए सधी रफ़्तार से गहरे धक्के जड़ने शुरू कर दिए. गदराये शरीर की साक्षी भी औसत से अधिक लम्बी थी लेकिन सवा 6 फ़ीट के पहलवान के निचे वो भी दुधारू बकरी हे दिखने लगी जो उसके उअप्र सांड सा चढ़ कर छूट के अंतत तक मूसल भरता हुआ लगभग बंद छूट को ऐसा खोल रहा था की आइंदा वो किसी मंझे हुए प्रेमी से हे तृप्त हो सकती थी, साधारण से नहीं.
"उम्मम्मम्मम.. मैं गयी.. अर्जुनननननन.. आह्ह्ह्हह... ामममममममम..", 5 मिनट हे ashwa-mudra में साक्षी उसको झेल सकीय और चुचो सहित जिस्म बिस्टेर पर आ गिरा. चुदाई में thapp-thapp की आवाज अब fach-fach होने का मतलब भी यही था की सखलन से पानी ाचा खासा बहाया था साक्षी ने. गांड ऊपर उठाये वो सोच रही थी की अर्जुन रुक जाएगा लेकिन वो बिना लुंड निकले वैसे हे खड़ा रहा. साक्षी गहरी सांसें भर्ती हुई आँखें खोल कर जीनत को देखने लगी.
"इसका तोह हो हे नहीं रहा जिनि.. मेरा 4-5 बार हो चूका और अब मेरी हिम्मत नहीं है.. तू आजा इसके निचे यार.."
"तुम तृप्त हो गयी न साक्षी..? चलो अब मैं भी हो जाता हु, फिर जिनि को आराम से प्यार करूँगा.. ", अर्जुन ने लिंग बहार निकाल कर साक्षी को आराम से पलट दिया जो कुछ कहती उस से पहले हे एक धक्के में उसकी छूट फिर से मूसल ने बुरी तरह भर दी. अब वो मन करती हुई 20-30 धक्को के बाद खुद हे कूल्हे निचे से उछालती अर्जुन का साथ देने लगी और ऐसे व्यवहार को जीनत ने पहली बार हे देखा था. दोनों हे इस बीच कुछ न कहते हुए बस चुदाई में लगे थे जहा साक्षी की छूट सूजने के बावजूद लुंड से अलग न हुई. एक बार फिर से झड़ने के बाद साक्षी चीखने हे लगी थी लेकिन जल्द हे अर्जुन का जिस्म झटके लेने लगा और अपना विकराल लिंग, जो साक्षी के कॉमर्स से बुरी तरह लिथड़ा था उसको हाथ से 2-3 बार हिलाते हे सफ़ेद वीर्य की धारे हवा में उड़ती हुई साक्षी के गले, चुचो और चुचो की घाटी तक गिरी. इसके बाद भी 2-3 बौछार पिचकारी सी निकल कर पति और योनि से कुछ आगे गयी..
"ओह बाप रे.. तुम्हारे अंदर स्पर्म मशीन लगी है क्या जो इतना निकला और देख साक्षी सब तेरे ऊपर हे गिराया है अर्जुन ने.. हाहाहा..", साक्षी तोह आँखें मूंदे ऐसी अवस्था में थी की कुछ भी कहना उसके बस का नहीं था.
"तेरी सहेली इतनी बुरी तरह से चूड़ी है कामिनी की पेट तक दुःख रहा है. मैं तोह अब अपनी शादी तक न गरम होने वाली.. खाली कर छोड़ा तेरे इस पहलवान ने.. चूड़ी हुई छूट से खून निकाल दिया कामिनी ... आह्हः..", उसी तोलिये से अर्जुन ने साक्षी का लाल जिस्म साफ़ करने के बाद अपना लिंग पौंछा और नंगा हे सोफे पर जा बैठा. 40 मिनट में उसने सचमुच हे उस कोरी छूट का भुर्ता बना दिया था. साक्षी टाँगे फैलाये जरा भी न हिली तोह जीनत बिस्टेर से उठ कर अर्जुन के सामने हे कुर्सी पर आ बैठी.
"बड़े हे बेरहम निकले तुम तोह sanam-harjaai."
"ये खुद साक्षी की चाहत थी जीनु.. मैंने सिर्फ उसकी मर्जी पूरी की है लेकिन उसको अब आराम की जरुरत पड़ेगी और उठने के बाद जब नशा काम होगा तोह दर्द भी होगा. पर तुम्हारी बात अलग है.", जीनत को जिनि की जगह नया उपनाम जीनु दिया था अर्जुन ने और अब वो जिस्म पर निक्कर पहन कर सामने रखा साफ़ जूस एक घूँट पीने के बाद हाथ से हे उसको अपने करीब बुलाने लगा. जीनत आज जैसे वो लड़की नहीं थी जिसके इरादे पक्के और लोगो से जुड़ाव न बराबर होता था. अर्जुन के करीब रहना और उसको देखना जैसे अब हसरते बढ़ने लगा. वो बगल में बैठने की जगह उसकी गॉड में हे चली आयी. लम्बी रेशमी जुल्फें एक तरफ करते हुए अर्जुन ने बड़ी हे चाहत से उसकी गहरी आँखों के परदे पर बरी बारी से चुम्बन करके अपनी बाहों में समेत लिया.
"हम कुछ गलत तोह नहीं कर रहे अर्जुन? मैं अब जेलस फील कर रही हु..", साक्षी तोह जैसे नींद में डूब चुकी थी थकान और इतने सुखद संसर्ग से.
"हो सकता है अगर ये तुम दिल से कह रही हो. मैं भी तुम्हे दर्द नहीं दे सकता, जाने क्यों लेकिन प्यारी बहोत हो तुम. वो घमंड तुम पर जंचता है जो आज दिख नहीं रहा.", प्रतिउत्तर में जीनत ने भी चेहरा उठा कर अपने आधार उसके होंठो से जोड़ दिए. पहली बार उसने अपनी जीभ अर्जुन के मुँह में दाखिल की थी जिसका रस पीटा अर्जुन उसकी पीठ सहलाने लगा. दोनों कुछ अंतराल बाद थोड़ा अलग हुए तोह जीनत नजरे मिलाने से बचने लगी.
"साथ में नहाये जीनु?", अर्जुन ने जैसे हे उसकी वो हलकी बैंगनी रंग की महंगी ब्रा जिस्म से जुड़ा की, जीनत ने दोनों हाथ से अपने गोर दूध धक् लिए. गले में पहना वो छोटा सा peela-laal लॉकेट हे ऊपर जिस्म पर मौजूद था, काले धागे में उसको नजर से बचने के लिए. अर्जुन उसके मॉटे दूध की किनारो को स्पर्श करता बारम्बार गाल चूमने लगा, दोनों तरफ.
"आह्हः.. इतनी जल्दी तुम रेडी हो? पर इसके सामने नहीं.."
"अभी सिर्फ मुझे तुम्हे देखना है और साथ नहाना. जो करेंगे आराम से और अकेले में."
"साथ वाले कमरे में चलते है पर तुम बाथरूम में सेक्स नहीं करोगे.."
"प्यार हे करूँगा क्योंकि उसके सिवा तुम्हारे साथ और कुछ मुमकिन भी नहीं.", अर्जुन ने दोनों हाथ थाम कर स्टैनो को बेपर्दा किया तोह गुलाबी चूचक देख कर आहिस्ता एक उन पर होंठ लगा बैठा. जीनत बस कांपती रही और दोनों फिर से अलग हुए तोह अर्जुन उसको गॉड में उठाये कमरे से चल दिया.
"बगल वाले कमरे में भी बाथरूम है जैसा इस कमरे में साक्षी का है. कमरा भी शामे है.", अर्जुन बहार की रौशनी में आया तोह मंत्रमुग्ध सा बस इस हूर को देखता हे रह गया जो उस से छिटक कर दूसरे कमरे में दौड़ गयी. जिस्म पर बस बैंगनी रंग की पंतय पहने.
'हाय वे रब्बा.. मार सुट्टेया जानू दी जीनु ने.. ऐ नहीं होना स पर हुन्न पीछे वि नई हटना'
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"तुम्हे पता है न की तुम सही से तैरना नहीं जानती? जो हुआ सो हुआ ऋतू, अब बस तुम कुछ मत सोचो और आराम करो.", ऋतू का बदन बुरी तरह पानी से भीगा हुआ था और आँखे खोलते हे खुद को घांस पर लेते पाया और सामने अपनी माँ का चिंता से भरा चेहरा. उसको जैसे समझ हे नहीं आया की आखिर उसके साथ हुआ क्या है.
"मैं नदी में गिर गयी थी माँ? और वो औरत कहा है?", रेखा बस ख़ामोशी से उसके चेहरे को पौंछती रही और जवाब अलका ने दिया जो हाथ मुँह धो कर उसकी हे तरफ आयी थी, होश में बात करते देख.
"तू तोह नदी में गिरी हे ऊपर से मुझे भी डुबो दिया था अपने पीछे. बेवकूफ पागल जो आज तुझे कुछ हो जाता तोह चची का क्या होता? ारु को क्या जवाब देते हम और चाचा या बाउजी बीजी को..? दिमाग पे पर्दा चढ़ गया था तेरे जो पहले 4-4 बन्दे जहन्नुम पहुंचा दिए और फिर उस मासूम सी औरत पे टूट पड़ी.", अलका थोड़ा गुस्से में थी लेकिन करीब बैठ कर उसने भी ऋतू के चेहरे को ाचे से देखने के बाद गीली पट्टी माथे पर उभरे नील पर रख दी. ऋतू के माथे के साथ साथ कंधे और ब्याह पर हे ाची खासी रगड़े और गुम चोट आयी थी, नदी में गिरने और छोटे पथरो से टकराने पर. आरती उसकी निक्कर से निचे गीली टाँगे देख कर उन्हें साफ़ करने लगी. कही कही से थोड़ा खून रिस रहा था.
"मुझसे देखा नहीं गया जिस तरह से वो लोग माँ और तुम्हारे साथ वयवहार कर रहे थे. अगर मैं ऐसा नहीं करती तोह वो लोग यक़ीनन सबको चोट पहुंचते और मार भी सकते थे. पर उस औरत के पीछे जाना शायद मेरी गलती थी. मैं ठीक हु माँ.. आह्ह्ह्ह.. बस अब तैरना सीखें पड़ेगा ाचे से.", ऋतू दर्द में भी मुस्कुरा रही थी और फिर अपनी कमीज के बटन खोल कर वो उनके सामने हे ऊपर से निर्वस्त्र हो गयी, काली ब्रा को एक तरफ रखती. सीने पर भी एक नील बना हुआ था जिसको उसने स्वयं हे सहलाया.
"बैग से इसको कोई ढीली कमीज दे दो आरती.. बेवकूफ लड़की को होश हे नहीं था कुछ. वैसे तुम उस औरत को इसलिए मारना चाहती थी जिस से वो तुम्हारे खिलाफ सबूत न बने और ऐसा होना लाजमी भी है लेकिन पहले ये तोह सोच लेती की वो लोग उसको उठा कर लाये थे, तुमने बचाया था उसको. बड़ी मुश्किल से उसको समझा कर भेजा है मैंने. पास के हे गाँव से थी वो जिसको ये लोग काम दिलाने के बहाने उठा लाये थे जंगल में. इसका जीकर तुम तीनो ारु से भी नहीं करोगी, घर की बात तोह छोडो.", रेखा की चिंता देख कर ऋतू ने अपनी माँ का गाल चूम लिया मुस्कुराते हुए. पहली बार अपनी जवान बेटी के सतांन रेखा ने निर्वस्त्र देखे और अपने जिस्म पर महसूस किये.
"बेशरम, माँ के सामने नंगी बैठी है तू. और जान से मारने की क्या जरुरत थी उन्हें?"
"ये नदी पहाड़ो के बीच है माँ और लोगो को वो मिलेंगी भी तोह हादसा हे मानेंगे सब. रही बात बेशर्मी की तोह मैं आपकी बेटी हु.. आपको शर्म आ रही है तोह मुँह घुमा लो. हाहाहा.. ऐ आलू, यार निक्कर दे दे जरा और देख जूस वाले ice-box में बर्फ पड़ी होगी. अभी टकोर कर लुंगी तोह फिर दर्द नहीं होगा.", ऋतू ने निक्कर भी खोल कर एक तरफ रख दी थी और जिस्म पर बस एक आधुनिक पंतय थी जिसको देख कर अनदेखा करती रेखा ने चेहरा हे घुमा लिया, पर अब वो काफी समय बाद मुस्कुराई थी. मैं हे मैं वो ऋतू पर गर्व भी कर रही थी और उसकी खूबसूरती की कायल भी हो गयी. आरती चलते हुए थोड़ा लड़खड़ा रही थी और ऋतू ने अब गौर किया तोह उसकी माँ के वस्त्र भी पूरे भीगे हुए थे.
"आज बड़ी माँ न होती न हमारे साथ तोह तू और अलका बह गयी थी उन लाशो के पीछे. मुझे मोटी बोलती है पर दिमाग तेरा ज्यादा मोटा है. वैसे तू सीखी कहा से ये प्लास्टिक से गर्दन काटना और चाक़ू चलना?", आरती ने निक्कर खुद हे पहनाई ऋतू को क्योंकि उसके पाँव दुःख रहे थे उठाने से. अलका उसके हाथ से बर्फ ले कर माथे और सीने पर मलने लगी.
"डॉक्टर बन्न ने से पहले ह्यूमन बॉडी हे स्टडी करनी पड़ती है. मैं तोह 10 के करारे नोट से तेरी कलाई हे काट दू अगर तू कहे तोह. प्रैक्टिस, नॉलेज एंड उसे ऑफ़ एव्री अवेलेबल ऑप्शन. सिंपल है मेरे आलूबुखारे... थैंक यू माँ.. आपने आज 2-2 जान बचा ली.. अलका और उस औरत की.. हाहाहा.. सॉरी.. अब गुस्सा छोड़ भी दो न माँ.. मैंने वही किया जो मुझे करना चाहिए था.. आप कहेंगी तोह मैं सरेंडर करने को रेडी हु.. बचाव का अधिकार है लेकिन यहाँ तोह आपकी हे जान संकट में थी और फिर ऐसी रिवॉल्वर रखने का हे क्या फायदा जिसमे कारतूस हे न हो? आप भी तोह उसके चेहरे का निशाना लगा रही थी न?", इस बार ऋतू द्वारा बगल से गले लगने पर रेखा ने भी हामी भरते हुए उसके माथे को चूम लिया. वो भर्राये गले से आगे जो बोली वो सुन्न कर बाकी तीनो सन्न हे रह गयी.
"एक पल को तोह मैं सबको दांव पे लगा सकती हु और सबसे पहले खुदको मेरी बची. लेकिन तुझे कुछ हुआ तोह मैं जीते जी भी ज़िंदा न रह सकुंगी. जो बात तुझे ारु ने मेरे और तेरी बहनो के लिए कही थी वही उसने मुझसे और ख़ास कर तेरे लिए कही थी की तुझे खरोच भी न आने पाए लेकिन देख तेरे जिस्म पर दर्जन छोटे है और उसकी वजह मैं और मेरी खली बन्दूक. क्या कहूँगी अब मैं उसको और गलती से तेरे पापा को पता लगा तोह वो.."
"जाने दो आप सबको परे.. उस उल्लू को कौन बताने वाला है ये सब. वो होता.. नहीं वो जान नहीं लेता क्योंकि मैंने मन किया हुआ उसको.. पर शायद ले भी लेता ऐसी सिचुएशन में. वैसे ाचा हे है न टाइम से प्रैक्टिस हो गयी लाइव सब्जेक्ट्स पर. अब जाने भी दो न.. जो हुआ सो हुआ.. आपको तोह नहीं लगी न माँ? और तू ठीक है अलका?", ऋतू ने अपने हाथ से हे बर्फ सीने पर लगते हुए बगल में बैठी अलका को देखा जिसकी ब्याह पर आरती टकोर कर रही थी लेकिन वो मुस्कुरा कर हामी भर कर अपना चेहरा दोनों तरफ से दिखने लगाई जहा ख़ास निशाँ नहीं दिखे.
"वैसे अब तोह मुझे भी लगता है के तू जो भी सीखती है न सही सीखती है ऋतू. देख आज न रिवॉल्वर काम आयी और न मेरे में हिम्मत हुई की चाक़ू से उन्हें रोक सकू. तू ये सब ारु को भी सिखाती है?", आरती ने भी उठ कर चलते हुए अपनी टीशर्ट उतार कर निचोड़ने के बाद बैग से साफ़ टीशर्ट निकाल कर ब्रा उतार कर फिर से जिस्म धक् लिया. पर ये सब उसने भी रेखा के सामने हे किया जो इन लड़कियों की बातचीत के साथ ऐसे उन्मुक्त ang-pradarshan पर हैरान हे थी लेकिन थी तोह ये तीनो हे बाला सी खूबसूरत तितलियाँ जिन्हे मासूम कहना तोह अपराध हे था.
"वो काटने की जगह तोडना पसंद करता है और मुझे नहीं पता उसको वो किसने सिखाया लेकिन जो उसने मुझे सिखाया उसको मैंने इम्प्रूव कर लिया बस. वैसे माँ पर मुझे पूरा भरोसा था लेकिन रिस्क लेने का दिल नहीं किया मेरा. तू भी कपडे बदल ले अलका.. माँ आपके भी गीले है. अपनी आउटिंग तोह बढ़िया हो गयी आज..", अब चारों हंसने लगी ये सुन्न कर और रेखा ने उसके सर पे हलके से चपत लगते हुए याद करवाया की वो अभी भी ऊपर से नंगी बैठी है.
"मैं बदल लुंगी लेकिन तू काम से काम कुछ तोह पहन ले. क्या तुम तीनो अपने कमरे में ऐसे हे रहती हो?", अब आरती तोह झिझक रही थी लेकिन अलका ने समर्थन किया ऋतू का.
"मैं और ये तोह ऐसे हे रहना पसंद करती है चची लेकिन बंद कमरे में और वो भी सोने के समय. आरती को ाचा नहीं लगता लेकिन आज इसने भी हिम्मत दिखा दी आपके सामने. वैसे ऋतू का रूप अगर दोनों चाचा भी देख लेते तोह सर झुका लेते पक्का. डॉक्टर बनेगी तोह इसके कोट में हर टाइम ब्लेड हे रहने वाला है.", अलका उठ कर एक तरफ चल दी अपनी बात कहती हुई और ऋतू वापिस खुले आसमान की निचे ऐसे हे लेट गयी जिसको रेखा टकटकी लगाए देखती रही जैसे वो अपना समय याद कर रही हो. इतनी उन्मुक्त, निडर और परिपक्व तोह वो भी नहीं थी कभी. और सबसे ख़ास बात थी की उसको अपने जिस्म पर नाज था और कोई शर्मिंदगी नहीं, महिलाओं के बीच.
"क्या.. क्या तुम्हे किसी और ने भी ऐसे देखा है?", रेखा ने शब्द रोक रोक के बड़ी धीमी आवाज में ये कहा था और इस वक़्त आरती तोह नदी पर बने लकड़ी के पुल्ल से दूसरी तरफ जा चुकी थी जबकि अलका कपडे बदलने घने झुरमुट में इनसे दूर. ऋतू आँखें बंद किये बस मुस्कुरा रही थी जैसे उस चेहरे को याद कर रही हो जिसको ऋतू का ये रूप बेहद पसंद था. उसके करीब होने पर वस्त्र तोह अक्सर हे बोझ लगते थे.
"देखने से कुछ बिगड़ जाता है क्या माँ?", अभी भी उसकी आँखें बंद और घुटने मुड़े हुए थे ऊपर की तरफ. नंगे पाँव घांस का स्पर्श लेते हुए उसका दर्द सोख रहे हो.
"बिगड़ भी सकता है अगर कोई तुम्हारे जितना खूबसूरत हो. लेकिन मुझे नहीं लगता की तुम कमरे से बहार कुछ ऐसा कर सकती हो. घर से बहार तुम्हे लड़के परेशां नहीं करते?", रेखा अब कैसे पूछ सकती थी अपनी बेटी से और ये भी सच था की उसको पूरा विश्वास था अपनी बेटी पर लेकिन उसकी मुस्कान देख कर रेखा को वो चेहरा ऋतू की जगह अर्जुन का दिखने लगा. हाँ.. वो एक जैसे हे तोह लगते थे चेहरे के कटाव, आँखों और मुस्कान से. पर क्या ऋतू... माँ जी ने भी तोह साफ़ कहा था के अर्जुन की सुभद्रा खुद उसकी बड़ी बहिन है और उनके प्यार के बीच कोई नहीं आ सकता, सिवाए नियति के.
"क्या सोचने लगी हो आप? मुझे लगा आप हे कुछ बोलोगी. मुझे घर से बहार लोग सिर्फ दूर से देख सकते है, मोटरसाइकिल चलते, कॉलेज जाते या परिवार के साथ. उनकी हिम्मत नहीं है की वो ऋतू शर्मा का रास्ता रोक सके या कुछ बोल सके.."
"अर्जुन.. अर्जुन की वजह से?", जवाब के साथ रेखा ने बात संभाल हे ली क्योंकि उसका खुदका दिल जोरो से धड़कने लगा था इन दोनों को दंपत्ति के रूप में सोच कर हे. थे भी तोह दोनों हे विलक्षण और समाज से परे.
"हाँ.. ारु की वजह से.. बिट्टू मां तक के जूनियर को धमका चूका है वो बीच सड़क में और फिर चाहे यूनिवर्सिटी हो, कॉलेज, स्टेडियम या फिर बदनाम कैंप. ारु की इजत्त हर तरफ बुलंद है. वैसे आपने जवाब ठीक से नहीं दिया जो बोलना चाहती थी.", यहाँ ऋतू हे अपनी माँ को लपेट रही थी जो दोहरे मैं से झूझती हुई आखिर बोल हे बैठी.
"तुम्हे ारु ने देखा है ऐसे?", अब कुछ पल ऋतू के चेहरे से मुस्कान हटी और फिर से बनती हुई कुछ ज्यादा हे बड़ी हो गयी. उसकी बंद आँखों के सामने अर्जुन का हे मुस्कुराता चेहरा था जो इस जवाब से बना था. रेखा कुछ और कहती उस से पहले ऋतू ने हे जवाब दे दिया
"वो ऐसा नहीं कर सकता क्योंकि उसको अपनी हद्द पता है. और अनजाने में देख भी लिया होगा तोह कोई बड़ी बात नहीं. आखिर मल्होत्रा अंकल की बेटी की शादी वाला किस्सा तोह आपको कोमल दीदी ने बताया हे होगा. अंगरक्षक है वो मेरा और उस दिन मैं उसको नहीं रोकती तोह फिर शादी की जगह अर्थियां उठ जाती. अब बताओ मैंने कुछ गलत कहा क्या माँ?", रेखा ने हाली नम्म आँखों से ऋतू के सर पर हाथ फिरते हुए कहा.
"नहीं.. कुछ गलत नहीं कहा तुमने मेरी बची.. जिसने अस्मत बचाने के साथ सबका मान रखा, जो सिर्फ तुम्हारे इशारे भर से झुक सकता है और दुनिया से लड़ भी सकता है उसके सामने क्या पर्दा और क्या बेपर्दा. माफ़ करना ऐसा सवाल पूछने के लिए. प्यार की समझ थोड़ी कम् है न मुझे."
"आपको जितनी समझ है न माँ अगर उसकी आधी भी मुझको हुई, दुनिया ऋतू शर्मा की मिसाल देती रहेगी. त्याग और तपस्या के बाद हांसिल हुआ prem-phal आप रखिये, मैं अपना जीवन सुधार लू इतने. चलो, अब भूक बहोत जोरो से लगी है.", उठ कर वो अब नंगे पाँव हे चलने लगी, वही गीली कमीज निचोड़ कर बदन को ढकती हुई. लेकिन पीछे चलती रेखा स्तब्ध थी उसके जवाब पर. त्याग और तपस्या के बाद का फल? मतलब स्पष्ट था की वो बहोत कुछ जानती थी लेकिन अपनी माँ से प्रेम इतना अधिक था की वो किसी की जान ले भी सकती थी और अपना प्यार बाँट भी सकती थी, बिना सवाल उठाये.
"सुन्न.."
"अरे माँ.. अब कोई सवाल नहीं.. आपसे खूबसूरत इस दुनिया में तोह मैंने किसी को नहीं देखा जो करीब हो और कभी मिला हो. तहखाने में जरूर आपकी पेंटिंग है बस कुछ ज्यादा हे पुरानी.", ये बात बोल कर ऋतू ने मुस्कुराते हुए अपनी माँ को हे पलके झुकाने पर मजबूर कर दिया था. और इस से सुनिश्चित भी था की ये बस उस तक हे सिमित है, अर्जुन को भी नहीं पता.
"तुझे बुरा.."
"बोलै न माँ.. दोनों आपका हे दूध एक साथ पी चुके है और मैं बड़ी हु उस से. माँ पर हक़ मेरा भी है लेकिन उस रोटलु को हे हक़ जताने दो. उसकी नजर में मैं पापा की पारी हे ठीक हु चाहे प्यार आपसे भी उतना हे है."