Incest Pyaar - 100 Baar - Page 54 - SexBaba
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Incest Pyaar - 100 Baar

अभी जरुरी काम की वजह से शहर से बाहर हु दोस्तों. अपडेट कल हे दे पाउँगा क्योंकि वापसी देर रात या फिर कल सुबह हे होगी. काम थोड़ा आवश्यक है इसलिए निकलना पड़ा. बाकी फ़ोन पर उपलब्ध हु और आप सभी के समीक्षा और सवालों के जवाब देने की कोशिश करूँगा.
 
देखो भाई don't कपट विथ एनीवन. कुछ लोग बोल रहे सांड बेस्ट रीडरशिप और कुछ बोल रहे मनहूस से महान.. इन फ्रंट ऑफ़ प्यार 💯 बार. मैं चैलेंज के हिसाब से नई लिखता दोस्तों. यहाँ सबको प्रमोट भी मैं खुद करता हु और अपनी गलती भी मानता हु.

सब पढ़ो पर एक दिन याद रखोगे तोह प्यार 💯 बार. क्यों?

मेरी दादी

मेरे दोस्त

मेरी शिक्षा.

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मतलब सबकुछ हमारा भाई?. ये हम हैं और हमारे आलू का रायता.

3 लोग अपने घर गए

5 ने परिवार को समझा

50 अब परिवार के साथ है

ये गुस्सा अब वो किसी और पे नहीं निकलते. वो सबसे प्यार से बात करते. उनकी गर्लफ्रेंड उन्हें एनिग्मा देता. और सेक्स से परे.

गूडनिघत गाइस.
 
आज रात उपहार का अगला भाग ठीक 10:30 पर.
 
अपडेट 215

उपहार (2)

'मैं सोया हु, तुम कंप्यूटर चला रही थी.', अर्जुन ने तुरंत हे आँचल का सतांन छोड़ कर निक्कर ऊपर चढ़ा ली और इतने धीमे से सही सुझाव भी दे दिया. बेशक उसकी निक्कर में विशाल तम्बू बरकरार था. आँचल कुछ दरी हुई थी इस एकाएक हुई दस्तक से पर कमरे में होने की वजह भी तोह बतानी हे थी. कंप्यूटर की स्क्रीन को बंद करती हुई वो दरवाजे की तरफ बढ़ गयी.

"ओह तुम यही हो.. तुम्हारे कमरे में अंजलि भी नहीं दिखाई दी इसलिए सोचा तुम दोनों इधर हे होगी. अर्जुन तोह अनामिका जी के कमरे में हे सोया होगा?", ये संजीदा थी जो थोड़े उलझे से बाल और गर्मी से ट्रस्ट जान पड़ती थी.

"नहीं नहीं.. वो सब सो गए थे और आज अंजलि मामी के कमरे में थी तोह मुझे नींद नहीं आयी. इसलिए मैं इधर आ गयी, कंप्यूटर पर समय बिताने.", फिलहाल दोनों हे दरवाजे पर कड़ी थी और आँचल की बात सुन्न कर संजीदा भी एहतियात से उसकी बगल से निकलती हुई कमरे में हे चली आयी.

"कंप्यूटर तोह बंद पड़ा है और यहाँ कौन सोया है?"

"शहहह.. अर्जुन सोया हुआ है दीदी और मैंने मॉनिटर बंद किया था ये देखने के लिए इस वक़्त कौन आ गया. वैसे आप तोह 10 बजे सोने चली गयी थी. नींद नहीं आयी?", आँचल हलकी रौशनी में जैसे अपनी स्थिति का बचाव कर रही थी क्योंकि एक लड़के के कमरे में वो रात में अकेली और कुछ उन्मुक्त वस्त्र पहने थी पर संजीदा तोह उसकी तरफ ध्यान न देती हुई कंप्यूटर के सामने कुर्सी पर आ बैठी और बगल में आँचल को बैठने का इशारा दिया.

"कमरे का फैन हे ऑफ हो गया चलते चलते और शायद कमरे में चूहा है वह. सुबह देखना पड़ेगा और अभी मैं तुम्हारे कमरे में सोने आयी थी. तोह ऐसा क्या कर रही थी जिस वजह से मॉनिटर बंद करना पड़ा? ओह्ह्ह्हह्हह..", संजीदा की तोह आँखें हे चौड़ा गयी बटन दबाने के बाद स्क्रीन का दृश्य देखते हे. वो हैरत से बस उस कमसिन कन्या और काले नंगे हब्शी को हे देखती रही जिसका मोटा लम्बा भुजंग लड़की के होंठो से लगा अपना सफ़ेद रास छोड़ चूका था. आँचल ने तुरंत दरवाजा फिर से लगा दिया. घबरा तोह वो भी रही थी पर संजीदा से लड़का लड़की के सामीप्य की बातें तोह होने हे लगी थी उसकी.

"इसलिए दरवाजा बंद किया था दीदी और अर्जुन एक बार सो गया तोह फिर सुबह 4 बजे हे उठेगा.", अर्जुन आँखें मूंदे हुए आँचल की बात सुन्न कर मंद मंद मुस्कुराने लगा. पर परेशां वो भी था क्योंकि अभी तक संजीदा के साथ उसकी औपचारिक बातचीत हे रही थी, उस से ज्यादा कुछ नहीं. लेकिन अर्जुन ने गौर किया था के संजीदा कभी कभी नजरे बचा कर उसको निहारती जरूर है.

"वो तोह अनामिका जी से पता चल हे गया था की इसकी दिनचर्या का पर ये सब क्या है यार? मतलब तुम यहाँ रात में सेक्सी तस्वीरें देख रही थी वो भी फिरंगी? गलती से अर्जुन की नींद खुल जाती और वो तुम्हे ये सब करते देख लेता तोह?"

"मैं कर नहीं रही दीदी, देख रही हु. वो नहीं उठने वाला क्योंकि हफ्ते से तोह मैं उसका रूटीन देखती आ रही हु. वैसे अगर अब वो उठ गया और आपको ये सब करते देख लिया तोह?", आँचल भी नहले पर दहला मारती हुई अर्जुन के पेट संग अपना पिछवाड़ा सत्ता कर बिस्टेर किनारे ऐसे बैठ गयी की संजीदा की नजर अर्जुन पर न पद सके और न हे उसके तम्बू पर जो आँचल के कूल्हों से चिपक चूका था. पर आँचल की बात सुन्न कर अपने कंधे तक लम्बाई लिए रेशमी बालो को सुलझती हुई संजीदा ने ऐसा जवाब दिया जिसकी कल्पना आँचल के साथ साथ स्वयं अर्जुन को भी नहीं थी.

"तुम्हे देख ले तोह समस्या हो सकती है क्योंकि तुम उसकी बुआ की बेटी हो पर मेरे केस में या तोह ये मुझे गलत समझेगा या फिर वजह पूछेगा. 26 साल पूरे कर चुकी हु यार आँचल और आज से पहले सिर्फ बातें हे सुनी है मैंने शादीशुदा या अपनी रिलेशनशिप में रहने वाली फ्रेंड्स की. चल छोड़ ये सब और तू ये बता के तुझे कंप्यूटर का इतना ज्ञान कैसे है? मुझे बिलकुल नहीं पता था के इस्पे ये सब भी मिलता होगा.", दोनों की बातचीत इतनी धीमी थी की कुछ कदम दूर शायद हे कोई सुन्न पाए. मॉनिटर की रौशनी ठीक संजीदा के चेहरे पर गिर रही थी और आधी अधूरी सी आँचल तक.

"इंटरनेट पर कुछ भी लिख दो तोह वो रिजल्ट दिखा देता है दीदी. मैंने भी वह बस सेक्स लिखा था और जिज्ञासा तोह होनी लाजमी हे है क्योंकि 23 की तोह मैं भी हु. ये वेबसाइट सबसे ऊपर आयी तोह खोल कर देखने लगी. दिन में तोह ये करना मुश्किल है और जब अर्जुन को ऐसे सोया देखा तोह दबे पाँव चली आयी अपनी इत्छा पूरी करने."

"इस से तोह इत्छा बढ़ेगी सिर्फ आँचल, उसका हल नहीं होगा. शादी से पहले सेक्स करना गलत है या सही, इस पर मेरे तोह विचार शुन्य है क्योंकि ये निजी मामला है सभी का पर ये सब देखने के बाद तड़प जरूर बढ़ेगी और हल न मिलने पर शायद कदम बहक भी जाए.", संजीदा ने वो तस्वीर बंद करते हुए इंटरनेट पर कुछ और लिखना शुरू किया. जिसके पश्चात जो सामने आया वो कोई लम्बा लेख या कहानी जैसा था.

"कदम अगर उसके साथ हे बहके जिस से प्यार हो तोह दीदी?"

"वही तोह यहाँ लिखा है जो मैंने पहले भी पढ़ा था, कुछ दिन पहले. जिस्म की आग और दिल की तड़प में बहोत फरक होता है आँचल. हाँ जिस संग दिल लगा हो उसके साथ तुम चाहे जो भी करो पर अगर ये सिर्फ वो आग है जो तुम्हे सोने नहीं दे रही या तड़पा रही है तोह तुम्हे इसको काबू कर लेना चाहिए, समय रहते.", संजीदा की बात से जाहिर था की वो कितनी परिपक्व युवती है. चाहे जीवन में ऐसे अनुभव नहीं थे पर समझ जरूर थी.

"हवस हे होती तोह शायद मैं अबतक ज़िंदा हे नहीं रहती. प्यार है और इतना की उसको जीने में कोई कसार नहीं रखना चाहती. शादी उस से होना नामुमकिन है और जिस से होगी वो घरवालों की मर्ज़ी से. दूसरी बार प्यार होना मेरे लिए तोह मुमकिन नहीं दीदी पर अब जिस से है उसके साथ हर हद्द पार करुँगी और रुस्वा वो मुझे खवाब में भी नहीं करने वाला क्योंकि मेरी अनगिनत पहल के बावजूद उसने हर बार मन किया लेकिन अब हालत जान कर वो मुझे पूरा करना चाहता है. प्यार के दौरान भी आग बहोत भड़कती है दीदी, एक बार करके तोह देखो जान जाओगी. 23 की उम्र तक मुझे भी कोई ऐसा नहीं मिला था पर अब है और जितने साथ है, उतने क्यों न जी हे लिया जाए.", आँचल बिस्टेर से उठ कड़ी हुई क्योंकि अब ऐसे बैठे रहने का कोई मतलब नहीं था.

"अगर बात ऐसी है तोह फिर खुल कर जीना हे सही. चलो तुम्हारे कमरे में हे चल कर सोते है. अंकल या अर्जुन को बोल कर सुबह फैन का रिपेयर करवा लेंगे.", संजीदा ने उठने से पहले कंप्यूटर का पावर बटन सीधा हे बंद कर दिया. हालत आँचल की भी आधी अधूरी सी थी इसलिए एक निगाह अर्जुन पर डालने के बाद वो सोने के लिए निकल गयी संजीदा के साथ. दरवाजा ढलते हे अर्जुन ने एक गहरी सांस भरी, जैसे वो सोने का दिखावा करने की जगह सांस भी रोके हुए हो.

'बाल बाल बच गए आज तोह. अब ये आँचल दीदी का बुखार कैसे भी करके उतरना हे पड़ेगा.', आँचल से प्रथम सम्भोग इस घर में कटाई मुमकिन न था जैसा अर्जुन ने उसको समझाया भी था लेकिन अब इसका हल निकालने पर विचार बनाते हुए आखिर कर कुछ सोचता हुआ वो भी सो गया. सुबह उसकी ताई जी ने भी आना था, जिनके साथ एकांत समय बिताने के लिए स्वयं अर्जुन आतुर था. जीनत ने भी दोपहर का समय पहले हे आरक्षित किया हुआ था जिसका रोक्का भी इसके अगले दिन था.

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"बड़ा खूबसूरत वॉलपेपर है जानू. वैसे मेरी chhui-mooi न तोह अपनी बुआ से मिलने आयी और अब बुआ आयी है तोह ये कमरे में बंद है.", कला रेशमी गाउन और उसके निचे झीनी निघ्त्य पहने ये खूबसूरत महिला जन्नत के निजी कक्ष का द्वार खोल कर जैसे हे भीतर दाखिल हुई, जन्नत बुरी तरह हड़बड़ाई जैसे किसी ने उसको रेंज हाथो पकड़ लिया हो किसी का कतल करते हुए. वो अपने बाथरूम से बस कपडे बदल कर ढीला सा पजामा और बटन वाला कुरता पहन कर मुस्कुराती हुई अर्जुन के साथ अपनी वही ख़ास तस्वीर हे निहार रही थी और इस अप्रत्याक्षित मेहमान ने जैसे उस पर अचानक बर्फीला पानी उड़ेल दिया.

"वो... वो मैं आपके हे पास आ रही थी बुआ. शाम से बिजी थी इसलिए नहाने का टाइम नहीं मिला.. आप.. बैठिये.", लैपटॉप उठा कर जन्नत एक टेबल पर रखती हुई बिस्टेर सही करते हुए भी नजरे चुरा रही थी. मैं हे मैं वो खुदको कोस रही थी की उसने कैसे आज अपने दरवाजे को भीतर से चिटकनी क्यों नहीं लगाईं और ये महिला रवीना जी थी, नरेश कपूर की छोटी और एकलौती बहिन. कंधे तक बड़े हे दिलकश अंदाज में तराशे हुए बाल, चेहरे पर ख़ास नूर और dil-fareb जिस्म के कटाव उसको 40 की उम्र में भी 25 का दर्शाते थे. आखिर वो अपना पूरा ध्यान रखने के साथ साथ एक बड़े औद्योगिक घराने की छोटी बहु भी थी. पर रवीना अनुभवी 40 की उम्र में 50 बरस जैसी थी जो बिस्टेर पर बैठने के साथ हे लैपटॉप गॉड में रख कर उसको खोलते हुए वो तस्वीर बड़े ध्यान से देखने लगी.

"कड़ी क्यों है जानू? यार देख मैं तेरी बुआ तोह सिर्फ तबतक थी जबतक मेरी शादी नहीं हुई थी. मैं तुझे हमेशा अपनी सहेली ज्यादा मानती हु, भतीजी काम. ये देख कर ख़ुशी मिली की आख़िरकार तुझे भी कोई लड़का तोह पसंद आया.", रवीना ने कलाई को पकड़ते हुए जन्नत को अपने बराबर हे खिंच लिया जो कुछ सेहमी और परेशां सी, चेहरा झुकाये अपने बालो को कान के पीछे करते हुए जाने क्या सोच रही थी. रवीना ने हे उसकी ठुड्डी ऊपर करते हुए मुस्कुरा कर देखने के साथ साथ वो स्क्रीन भी जन्नत की तरफ घुमा दी जहा उसके होंठ अर्जुन के गाल से जुड़े थे. न चाहते हुए भी जन्नत के गोर गाल हलके गुलाबी पड़ने लगे जिन्हे रवीना भी देखती हुई गहरी मुस्कान देने लगी.

"तुम दोनों एकसाथ बड़े प्यारे लग रहे हो जानू. लड़के के चेहरे पर जो मासूमियत है और तुम्हारे करीब होने की ख़ुशी, वो साफ़ जाहिर करती है जैसे वो आँखें खोलना हे नहीं छठा. मेरी माँ की गुड़िया भी जैसे पहली बार किसी तस्वीर में ज़िंदा लग रही है. मैं जिनि या भाभी नहीं हु पगली, तेरी रवीना बुआ हु.. तेरी दोस्त.", गाउन की डोरी को खोलने के बाद रवीना अपनी पीठ के पीछे नरम तकिया लगाती अधलेटी सी बैठ गयी और अब तक जन्नत भी कुछ कुछ सहज लगने लगी थी. उसने एक बार तोह अपनी खूबसूरत बुआ के केहर ढाते जिस्म को देखा जहा वो ठोस कबूतर जालीदार पिंजरे में क़ैद हो कर भी अपना भूगोल bhali-bhanti दिखा रहा थे. पर जन्नत भीतर हे भीतर अब खुश हो रही थी जैसे उसकी बुआ ने वो तस्वीर दिल की गहराई सी देखि हो.

"दोस्त है बुआ, सिर्फ दोस्त. ाचा लड़का है और मुझसे 3-4 साल छोटा भी है. आप बताओ, आपकी तोह पार्टीज कुछ काम हो गयी होंगी समर्स में."

"मेहरौली में बहोत से फार्महाउस है जानू, स्विमिंग पूल वाले और हरे भरे. रवीना नंदा की पार्टीज हे तोह उसके जीने का जरिया है, अब वो तोह बंद मैट करवाओ. बाकी तुम्हारा दोस्त तोह तुम्हे दोस्त से कुछ ज्यादा हे मानता है, जैसे तुम. और लगता है की दोनों अपनी अपनी बात कहने की हिम्मत नहीं कर प् रहे. कब से मिल रही हो?", रवीना बेबाक थी कई मामलो में और बेबाकी की वजह से हे जन्नत अपनी इस बुआ को पसंद भी करती थी. बस उत्तेजक वस्त्रो की वजह से तोह सबके सामने उनसे थोड़ा कन्नी काटने लगती थी.

"अभी तक सिर्फ 3 बार हे मिलना हुआ है बुआ इसलिए ये कहना तोह जल्दबाजी हे होगी की किसके दिल में क्या है. अर्जुन मुझे ाचे से ट्रीट करता है, रेस्पेक्ट देता है और जब मैं उसके साथ होती हु तोह लगता है की शायद मैं इंसान के ऐसे पहलु से पहले कभी नहीं मिली. आप दोस्त है न मेरी तोह आपसे नहीं छुपाउंगी, वो मुझे बहोत पसंद है बुआ. मैं तोह अट्रैक्शन जैसा हे समझती थी इस से मिलने से पहले तक लेकिन जिस तरह से ये मेरा ख़याल रखता है और कोई चाहत भी नहीं दिखता, मैं अट्रैक्शन से आगे एक प्यार महसूस करने लगी हु. मैं जानती हु की ये गलत है पर मेरे पास इसका कोई हल नहीं. जो भी देखो सबकी नजरो में भूख और हसरत हे दिखाई देती है लेकिन ये मुझे देखता है तोह लगता है जैसे मेरा अधूरापन पूरा कर रहा हो. ज़िन्दगी में अर्जुन मेरे लिए वो उपहार है बुआ जिसकी तमन्ना तोह जाने कबसे थी लेकिन उम्मीद जरा भी नहीं थी की ऐसा कुछ मुमकिन भी होगा.", रवीना तोह इस लड़की को अटक अटक कर अपनी बात दिल से कहते देख जैसे उसमे हे खो चुकी थी. जिस तरह से जन्नत अपना haal-e-dil और अर्जुन का उसके प्रति नजरिया बयान कर रही थी, हसरत तोह स्वयं रवीना के मैं में भी उठने लगी थी इस युवक को देखने या जान ने की.

"तुम जानती हो जानू की मैं ये पार्टी कल्चर में क्यों डूबी रहती हु? क्यों अपने आप को हमेशा वैसे सजाये रखती हु की देखने वाले मेरे रूप और shaan-o-shaukat की हे बातें करते रहते है? क्योंकि मेरी शादी एक कारोबार से बढ़ कर कुछ नहीं. हफ्ते में 2 दिन ये बड़ी बड़ी पार्टीज और वह पर महंगी वाइन और शराब के गिलास हाथ में ले कर अपने सामान अमीर और आधुनिक औरतो के गाल से गाल लगा कर मुस्कुराना, झूटी मुस्कान चेहरे पर सजाये रखना और हर बार एक से बढ़ कर एक फैशन प्रदर्शित करना कारोबार का एक बड़ा हिस्सा है. फॅमिली का नाम बना रहता है, फोटो शनिवार वाले अख़बार के पेज 3 पर आती रहती है और mejbaan/mehmaan रवीना नंदा अपने सामान रईस लेडीज के साथ. इसमें कही भी वो नहीं जो मैंने चाहा था या जो तुम आज महसूस कर रही हो. खुशकिस्मत हो चाहे इन्तजार ज्यादा किया तुमने लेकिन काम से काम तुम खुदको महसूस तोह करने लगी.", चंचल और बेबाक रवीना के मुँह से ऐसी बात का जैसे जन्नत को अनुमान हे न था. वो तोह कबसे देखती आयी थी की उसकी ये बुआ स्कर्ट, गहरे गले के ब्लाउज और जिस्म प्रदर्शित करते महंगे वस्त्रो में लिपटी जाने कितने हे मर्दो और युवको का हाल बुरा करती रहती थी पर वो सब एक दिखावा भर था.

"फूफा जी आपको पूरा समय नहीं देते बुआ? और आपकी mother-in-law को ये सब ाचा लगता है?"

"समय है हे किसके पास जानू? शादी के एक साल बाद ाशी पैदा हो गयी और तुम्हारे फूफा ने अपने पापा के साथ कारोबार बढ़ने में खुदको डुबो लिया. मम्मी जी तोह खुद ऐसी ज़िन्दगी जीती आयी है और आज उनकी हालत तोह ऐसी है की वो ड्रिंक लिए बिना तोह सो भी नहीं सकती. हफ्ते के 6 दिन तुम्हारे फूफा कब घर से निकलते है, ये मुझे पता है पर उनके लौटने का कोई हिसाब नहीं. बड़े घरो में कुछ हे समय बाद पति पत्नी के हे कमरे अलग हो जाते है, फिर बचे भी. ाशी तुम्हारे सामने हे है, जो 19 की उम्र में कब घर आती है कब जाती है सब उसकी मर्ज़ी. दोस्त भी वैसे हे है, बड़े बड़े घरो के सो कॉल्ड High-class किड्स. गरीब होना जरूर एक दुर्भाग्य है पर सुकून की रोटी वो अमीरो से बेहतर खाते है, अपनों के साथ. काम से काम इस मामले में मैं मेघना भाभी की तोह तारीफ हे करती हु जो भैया का काम सँभालने के साथ साथ तुम दोनों के साथ मिलने वाला हर पल बिताने को हे प्राथमिकता देती है. वो सब छोडो यार, कहा मई भी कुछ और हे बात ले कर बैठ गयी. इसका बताओ मुझे तोह और कब मिलवा रही हो अपने इस chit-chor से?", सब कड़वा सच बताने के बाद माहौल को वापिस खुशनुमा करने के इरादे से रवीना ने अर्जुन का जीकर उठाया तोह जन्नत ने अपनी बुआ के चेहरे को गहराई से पढ़ने की अपनी पूरी कोशिश कर डाली. अवसाद और दुःख के चिन्ह वह मौजूद थे पर अभिनय में भी वो उतनी हे माहिर थी.

"परसो मिल लेना आप भी, जिनि के रोकके पर. बाकी पता नहीं ये एडजस्ट भी होगा या नहीं वह के माहौल में पर आएगा तोह जरूर. वैसे बुआ आपके किस्से कुछ ज्यादा हे फेमस है उन पार्टीज की वजह से. और जब आप दिल्ली वाले मेरे शूट पर आयी थी तोह कैमरामैन से ले कर आसपास घूम रहे लड़के भी आपको हे ताड़ रहे थे. बुरा नहीं लगता जब आपको कौगर या फॉक्स बताया जाता है? बुरा मैट मान न बुआ लेकिन मैं वही बोल रही हु जितना मैंने सुना और उन पार्टीज की फोटोज देखि.", जन्नत हिचकिचा रही थी लेकिन उसकी बात सुन्न कर रवीना तोह खिलखिला कर हंसने लगी जैसे उसको ये सुन्न कर कुछ याद आ गया हो.

"बुरा.? पागल तेरे फूफा तोह जब कभी मेरे पास होते है तोह वो तारीफ हे करते है अपनी बीवी की. वैसे जो तुमने देख वो बड़ी हे आम बात है मेरे लिए. मैंने तोह अपना नाम तक सुना है एक लड़के को बाथरूम में हिलाते हुए. हाहाहा.. ये नए नए जवान अमीरजादे लड़कियों से ज्यादा भाभी और औंटीएस को देख ज्यादा गरम होते है. इनकी (रवीना के पति) बहिन का बीटा अभी 21 का है और जब भी हमारे यहाँ आता है तोह बस मेरे हे आसपास मंडराएगा. मैं भी कोई मौका नहीं छोड़ती उसको परेशां और गरम करने का. पार्टीज में जो अपनी माँ और बहिन के साथ आते है उनकी नजरे मेरे ऊपर कहा कहा घूमती रहती है ये उनसे ज्यादा मुझे पता रहता है लेकिन ाचा लगता है जब कोई इतनी शिद्दत से आपको निहारे.. हाहाहा.. कौगर..", बेबाकी ऐसी थी की जन्नत शर्म से लाल हे उठी पर उसके दिल में कही न कही कुछ और भी द्वन्द चलने लगा था.

"मतलब आपका भांजा हे आपके पीछे? और क्या कभी किसी ने लिमिट क्रॉस की है बुआ? वो कोई क्सक्सक्सक्स का मॉडल था जिसके साथ आपकी ..", जन्नत बात कहते कहते खामोश हो गयी जैसे ये वो कहना हे नहीं चाहती थी पर रुक भी न सकीय.

"अजय ग्रोवर.. वो सिर्फ अटेंशन चाहता था और उसका करियर तभी आगे बढ़ता जब वो किसी खबर में हो. मेरी एक फ्रेंड ने मिलवाया था मुझे उस से पर वो खबर से ज्यादा कुछ नहीं था. गेस्ट था और अपने हाथ से एक ड्रिंक देने से ज्यादा कुछ नहीं हुआ था. रही बात लिमिट क्रॉस की तोह पहले कभी 2-3 बार किसी ने जरूर गर्मजोशी से हाथ पकड़ा था मेरा और उस वक़्त मुझे इस कल्चर की आदत नहीं थी. मेरे गुस्से का शिकार होने से ज्यादा वो और कुछ न कर सके. तुम्हारी बुआ आधुनिक है लेकिन खुद को ाचे से संभालना भी जानती है. अपने ऊपर तोह मैं तुम्हारे फूफा को हाथ नहीं रखने देती जिन्होंने किसी समय मुझे मोटी, आलसी और घरेलु औरत तक की उपाधियों से नवाज दिया था. उम्र हे कितनी थी जब मैं माँ बानी? ध्यान नहीं रख सकीय थी अकेली अपना और शरीर भी बदलता हे है. फिर मैंने खुदको साबित किया और आज मुझे उनकी नजरो के साथ अनगिनत आँखों में अपने प्रति चाहत दिखती है पर रवीना को अब किसी की परवाह नहीं. तोह गाल पे किश के आगे भी कुछ किया तुमने या अभी भी उसके हे इन्तजार में हो की वो हे कुछ करे? पता लगे की पार्टी में तुम्हारा ख़ास दोस्त तुम्हारी बुआ पर हे लट्टू हो गया... हाहाहा..", अब जैसे जन्नत को हे मौका मिल गया था खुल कर बोलने का.

"ये तोह वक़्त हे बताएगा बुआ की कौन लट्टू होता है किस पर. अभी तोह आपने ाचे से इसका चेहरा हे नहीं देखा, करैक्टर सामने होगा तब इरादे पलटने लगेंगे. वैसे एक छोटा सा परिचय अभी दे देती हु की ये वही लड़का है जिसके लिए पापा ने उमेद जी से जिनि की शादी की बात चलाई थी. उनका हे भतीजा है और वारिस भी. राजकुमारी अमृता इस से गले लग कर मिलती है और आज उन्होंने खुद मेरे साथ अकेले में कुछ समय बिताया जब अर्जुन मुझे वह किसी काम से ले कर गया था. रही बात कुछ करने की तोह उसके साथ चाहे 2 मिनट राहु या 2 घंटे, मैं उतने में हे खुश हु.", अब एक पल के लिए तोह रवीना थम्म सी गयी थी ये 2 नाम सुन्न कर. उमेद सिंह इन घरानो के बीच कोई अनजान शक्श नहीं था चाहे वजह सिर्फ कारोबारी हो और दूसरा raj-gharane का जीकर. पर अब रवीना कुटिलता से मुस्कुरा रही थी सब जान ने के बाद.

"बचा कर रखना फिर तोह तुम अपने इस अर्जुन को. कही तुम्हारी हॉट एंड सेक्सी कौगर बुआ हे न फांस ले. हाहाहा.. अब तोह देखना हे पड़ेगा की ये क्या बाला है और बाला तोह कुछ बड़ी हे लगता है क्योंकि हमारी जानू पहली बार तोह किसी लड़के की बात कर रही है जो सपने जैसा है सबके लिए. पहले हे बता देती हु की मेरा तोह सिर्फ नाम है लेकिन तुम्हारी चची इस मामले में पक्की दिलफेंक है. अगर ये उसकी आँखों में आया तोह वो यक़ीनन हौद लगा बैठेगी तुम्हारे साथ.", अब जन्नत भी कुछ बेहतर हो चली थी ऐसी बातें जब एकांत में इतनी देर से होती रही.

"गौतमी चची.. हम्म्म्म.. उनका मैं कुछ नहीं कर सकती बुआ और न उनकी बेटी का. वैसे आज अर्जुन ने हे मेरे लिए ड्रेस सेलेक्ट की है और वो उसकी तरफ से पहला गिफ्ट है जैसा उसने कहा. मैं तोह वह गाउन हे पहन ने का सोच चुकी थी अगर जीन्स शर्ट के लिए माँ मन नहीं करती पर अर्जुन ने कहा की मैं जिनि की बड़ी बहिन हु और ये पारिवारिक फंक्शन है तोह मुझे भी खुद को सबके बीच वैसे हे दिखना चाहिए.", जैसे कुछ याद आते हे जन्नत फिर से शर्माने सी लगी थी और अब बात लड़के द्वारा उपहार की हो तोह समझदार महिला तोह इसको बेहतर तरीके से जानती है.

"आये हाय मैं सकदे जावा मेरी जानू. दोस्ती, सिर्फ दोस्त और अब ड्रेस तक उसकी पसंद से? किश विस्स भी हो हे चूका इसका मतलब तुम दोनों में. सच बता अब और कोई ताल मटोल नहीं जानू. साड़ी?", जैसे हे परिधान का नाम लिया शर्माती स जन्नत ने बाल वापिस पीछे करते हुए सर हिला दिया. उसके चेहरे की रंगत हे बहोत थी ये बताने के लिए की इस एक हाँ में 2 जवाब शामिल थे.

"बड़ा हे रोमांटिक बाँदा ढूंढा है यार तूने तोह. आह्हः.. मुझे तोह तेरे फूफा हे कभी अपनी पसंद से साड़ी दिलवाने न ले गए कभी जो मैं पहनती. तेरा फर्स्ट किश था?", जन्नत इतने सीधे सवाल पर जैसे जम्म सी गयी थी क्योंकि 23-24 की उम्र वाली एक आधुनिक ने पहली बार तोह चुम्बन का एहसास प्राप्त किया था और वो भी ऐसा की नाम मात्रा से जिस्म सिहर उठे.

"बस अपने आप हे हो गया था बुआ जब अर्जुन मेरे ऊपर साड़ी लगा कर मुझे दिखा रहा था. मजाक में उसने मेरे सर के ऊपर पल्लू करके देखा तोह... मुझसे रुका हे नहीं गया.. सॉरी.. आप मेरे बारे में क्या सोचेंगी मैं कितनी गलत हु जो.."

"शह्ह्ह्ह.. पागल हो तुम जो अगर ऐसा सोचती हो. एक जवान लड़का जब पहला उपहार हे खुद सजा कर दिखाए तोह बदले में ऐसे हे तोह शुक्रिया कहा जाता है. सच बताना के तुम्हे उस वक़्त कैसा लगा था जब वो तुम्हारे जिस्म पर साड़ी लपेट रहा था? उसकी आँखें कहा कहा घूम रही थी?", सुर्खी के साथ साथ जन्नत की आँखों में भी ख़ुशी के आंसू उभर आये थे और गुलाबी होंठ बड़े धीमे धीमे अपना हाल कहने लगे.

"कैसा लगा? बुआ वो न सिर्फ मुझे देख रहा था.. सामने से भी और आईने में मुझे खुदको दिखते हुए भी. मैंने तोह साड़ी के नीचे भी पूरे हे कपडे पहने हुए थे जो की न होते तोह भी मुझे बुरा न लगता क्योंकि इतने सलीके और प्यार से उसने वो साड़ी मेरी कमर पर लपेटी थी, सिलवाते भी ाचे से बनाई और फिर सीने के सामने होते हुए भी न उसने निचे नजर की और न ये देखा की वो सही पहना रहा है या गलत. मैं जरूर कसमसा रही थी जैसे मैं खुदको जंजीरो में बाँध कर रोकने में लगी हु. फिर उसने जब में कंधे पर हाथ रखते हुए आइना दिखाया तोह मुझसे सबर नहीं हुआ बुआ. पहली बार तोह मुझे कुछ ऐसा मिला जिसके बारे में न किसी ने सोचा था और न कभी दिलवाया. पर कोई और भी ऐसा हरगिज महसूस नहीं करवा सकता था जैसा अर्जुन ने करवाया. मैंने आज खुदका एक और स्वरुप देखा वो भी सिर्फ उसके पहलु में. सही मायने में मैं ... मैं जैसे वह पूरी हुई थी और फिर अर्जुन से पूछे बिना मैंने ऐसे अनमोल गिफ्ट के बदले बस हल्का सा किश उसके लिप्स पर कर दिया. न करती तोह वही फीलिंग रहती की खुदको रोक रही हु और वो मुझे आजाद हे देखना चाहता है."

"वाह.. तुम सचमुच अब बड़ी हो रही हो जानू.. तुमने सही तरह से थैंक यू कहा और लगता है की ये तुम्हे अब हमेशा याद रहने वाला है. हाहाहा.. वैसे लड़के ज्यादा डिमांडिंग होते है पर ये लगता है तुम्हारे छोटे से थैंक यू से हे मान गया.", अब जन्नत ख़ुशी ख़ुशी में खुदकी हे पोल खोल बैठी ये सुन्न कर.

"कुछ मामलो में ये भी वैसा हे है बुआ. उस छोटे से किश के बदले में ... सॉरी."

"बदले में? देख ये चीटिंग है जानू और अगर तूने नहीं बताया तोह फिर मैं तुझसे बात नहीं करने वाली और न तेरे कमरे में कभी आउंगी."

"चीटिंग तोह आप कर रही हो बुआ. दोस्त हो कर ब्लैकमेल."

"बता भी दे न यार. देख मेरी लाइफ तोह तेरे सामने हे है पर तुझे बोलता हुआ सुन्न कर और ये प्यार भरी छोटी छोटी बातें सुन्न कर मुझे बहोत ख़ुशी हो रही है. डिटेल्स मैट दे पर थोड़ा हे सही."

"उसने वही मुझे बाहों में भर कर... मतलब हाँ ाचे से किश किया.. बुटीक मेरी फ्रेंड का था और change-room में बस हम दोनों हे.. जब हम अलग हुए तोह मेरा लिप ग्लॉस उसके .. अर्जुन के लिप्स पर था. मैंने बदले में थोड़ा गुस्सा किया और उसने सॉरी बोलै.. दोनों इस टॉपिक से दूर रहने की कोशिश करते रहे और जब वो वापिस घर छोड़ने आया तोह .. तोह मैंने गेट के बहार हे उसको फिर से किश कर दिया. वापिस मदद कर भी नहीं देखा उसको मैंने. पता नहीं क्या सोच रहा होगा?", जन्नत की पूरी बात सुन्न कर रवीना ने पहले तोह उसके गाल को सहलाया फिर हँसते हुए जवाब दिया.

"भाभी देख लेती तोह क्या जवाब देती तुम? वैसे हैं तोह बाकी लड़को से काम हे जानू, नहीं तोह इतना सबर न दिखता अगर लड़की इतनी खूबसूरत हो और सामने से हे किश करने वाली. फाइनली इश्क़ का तोहफा तुम्हे नसीब हो हे गया. आगे क्या इरादा है?"

"कोई इरादा नहीं है फिलहाल तोह. कल मुश्किल है मिलना और परसो शाम को वो आएगा भी तोह इतने लोगो के बीच. अकेले में बात करना भी मुश्किल हे रहेगा. फिर 2 दिन मुझे भी दिल्ली जाना है और अर्जुन का अभी कुछ क्लियर नहीं है.", जन्नत ने एक बार घडी की तरफ देखा और फिर एक तकिया बिस्टेर के सिरहाने रखती हुई वो अपनी बुआ की तरफ हे चेहरा किये करवट लेती लेट गयी. रवीना ने तोह वो ऊपर ौधा हुआ गाउन हे खोल कर एक तरफ टांग दिया लेटने से पहले. जिस्म पर चर्बी तोह कही थी हे नहीं और जहा मांस था वो दोनों जगह इतनी कामुक की सचमुच उसकी चर्चा सही होती थी.

"जितना समय मिले, कोशिश करना के सही से बिता सको. ज़िन्दगी से बड़ा सवाल तोह कोई है हे नहीं और अगर इसको सही से जी हे न सको तोह घर में भी बंजारों से हालत रहती है. कल भी टाइम मिले तोह जरूर मिलना और परसो तुम्हारे जिम्मे तोह कुछ काम है नहीं, सोच लेना थोड़ा इस बारे में. वैसे तुम अजीब हो जानू. मॉडल हो कर भी आराम से सोने के समय इतने सारे कपडे पहने रहती हो. मुझसे तोह तुम्हे कोई खतरा नहीं और जिसके लिए इसको छिपाये हुए हो, वो इन्हे उतारेगा तोह तुम कही उसके थप्पड़ हे न मार बैठो.", कमीज और पाजामे की वजह से बुआ का तंज सुन्न कर जन्नत जहा हंसने लगी थी वही आगे की बात सुन्न कर उसने चेहरे कुछ पल तकिये में हे दबाये रखा. कनखियों से बुआ को देखा तोह वो उसको हे देख कर मुस्कुरा रही थी.

"कुछ भी बोल देती हो बुआ आप. अर्जुन ऐसा वैसा कुछ नहीं करने वाला, ये समझो आप. और मैं ऐसे हे कम्फर्टेबले हु. अब आपको ज्यादा हे गर्मी लगती है और शुरू से आप निघ्त्य में हे सोती हो."

"तूने पहले किश खुदसे हे किया था न जानू? तोह आगे भी तुम खुद हे बढ़ेगी, ये तुम अपने दिल और दिमाग में दाल हे लो. तुम भले हे शेरनी जैसी हो पर अभी भी खुद को सही से जानती नहीं. डरना तोह अर्जुन को चाहिए तुमसे क्योंकि तुम्हारी बनायी हुई जंजीरे अब तुम्हे रोक नहीं सकती. पता नहीं वो बेचारा तुम्हे झेल भी सकेगा या .."

"बस करो न बुआ. आपको पता है मुझे ये सब बातें पसंद नहीं और इसमें झेलने वेलने जैसा क्या है? जरुरी तोह नहीं न की इतना आगे बढे? मेरी लिमिट्स मुझे पता है और वो तोह कभी भी हद्द से बहार निकलता हे नहीं."

"और तुम चाहती हो की वो तुम पर हक़ जमाये, हद्द को पार करने के साथ तुम्हे हर वो एहसास करवाए जो पहले कभी न हुआ हो. एक किश से तुम इतना घबरा रही हो जबकि मैंने पहला किश 18 की आगे में कर लिया था. तुम्हारे फूफा से जब सिर्फ मेरी मांगनी हे हुई थी, तभी उन्होंने मुझे बिना कपड़ो के ाचे से देखा था वो भी इस घर में हे. मैं शर्मायी जरूर थी लेकिन कही न कही चाहती थी की मेरा होने वाला पति मेरी तारीफ करे जो उन्होंने की भी. पर वो समय कुछ अलग था और माहौल भी अलग. तुम आज के दौर की एक सक्षम लड़की हो जो खुद को साबित भी कर चुकी है और अपने एक मुकाम पर भी है. अर्जुन के बारे में तुमने जितना बताया है न जानू, वो कभी भी पहल नहीं करेगा पर तुम जैसा करोगी वो तुम्हारा साथ देगा उसमे. टाइम निकाल कर कही लॉन्ग ड्राइव जाओ तुम दोनों, पहाड़ो में या फिर कही ाची जगह. जरुरी नहीं की सेक्स शामिल हो लेकिन ाचा समय और एक दूसरे का साथ. ये 2 मिनट और 2 घंटे तोह न यादें बना सकेंगे और न सुकून दे सकेंगे. किसी सुबह जब तुम इस तकिये की जगह उसकी बाहों पर सर रखे आँखें खोलोगी तोह यकीन करो उस से ज्यादा सुकून तुम्हे कही और नहीं मिलने वाला. शादी करने के तुम्हारे इरादे नहीं दीखते और लड़का अभी जवान है जो शायद कॉलेज के फर्स्ट ईयर में हे होगा. वो दुनियादारी में खो गया न जानू तोह तुम दोनों कोशिश हे करते रह जाओगे. कभी तुम्हारे पास वक़्त नहीं होगा और कभी अर्जुन मसरूफ मिलेगा. विचार करना मेरी बात पर थोड़ा और हो सके तोह दिल्ली वाला 2 दिन का काम 2-3 दिन आगे बढ़ा दो चाहे. मैंने तुम्हे आज पहली बार तोह इतना खुश देखा है और तुम्हारे चेहरे ने साफ़ साफ़ कहा है की तुम्हे अर्जुन के साथ समय बिताने की बहोत जरुरत है. अक्सर बाद में हम सिर्फ सोचते और कोसते रह जाते है. काम से काम तुम ऐसा न करो, बस इतना हे चाहती हु.", अपनी बुआ को इतना गंभीर और खरी बात कहते देख कर जन्नत भी सच को मान ने पर मजबूर हो हे गयी.

"आप भी किसी से प्यार करती थी बुआ?"

"तोह फिर 18 की उम्र में मैंने किश किसको किया था?"

"पापा से बोलती तोह पक्का वो आपकी शादी उस इंसान से नहीं करवा देते बुआ? आपसे तोह पापा सबसे ज्यादा प्यार करते है फिर भी आपने अपने दिल की नहीं कही उन्हें."

"मैं उस वक़्त जिनि जैसी थी जानू. शोख, शरारती और मनमानी करने के साथ आरामदायक ज़िन्दगी की चाह रखने वाली. नीरज, मेरा सीनियर था और लोअर मिडिल क्लास फॅमिली से. मैंने जब उसको बताया की मैं उस से हे शादी करना चाहती हु तोह उसका जवाब था की पहले वो अपने परिवार और माँ बाप को एक बेहतर जीवन देना चाहता है. 2 बड़ी बहने थी उसकी जिनकी जिम्मेवारी नीरज पर थी और उस हिसाब से मुझे काम से काम 6-7 साल इन्तजार करना पड़ता. और ऊपर से वो दोनों परिवारों के बीच वाले आर्थिक फरक को कुछ ज्यादा मानता था इसलिए उसने साफ़ मन हे कर दिया मेरे दोबारा पूछने पर. यही वजह थी जानू की मैंने भैया से मेरी शादी जल्द करवाने का खुद कहा था. तुम्हारे फूफा जैसे भी है लेकिन इंसान ाचे है और बड़ी म्हणत से उन्होंने अपने दादा और पिता के नाम को देश से बहार तक मजबूत किया. मेरी चाहते तोह 22 बरस पहले हे दफ़न हो गयी थी पर मुझे कोई शिकायत नहीं. नीरज के अपने प्लान थे और उनमे मैं सबसे आखिरी नंबर पर. अर्जुन के जीवन में तुम यक़ीनन बहोत मायने रखती हो जो वो तुम्हे इतना महत्व देता है. यहाँ तुम नीरज मैट बन न बेशक अर्जुन रवीना नहीं पर कही न कही उसने तुम्हारे दिल में अपना एहसास तोह भर हे दिया है. ये जीवन का वो उपहार है जानू, जो सबको नहीं मिलता. जिन्हे मिलता है उन्हें इसकी कदर करनी चाहिए."

"और अगर वो लिमिट्स टूटने लगे या करियर दांव पर लग जाए तोह बुआ?"

"लिमिट्स.. हड्डी तोह बनाई हे टूटने के लिए जाती है क्योंकि वो बस एक ऐसा घेरा होती है जिसके भीतर आप घुट्ट कर जीना चाहते हो. ख़ुशी उसके बहार भी मिलती है जहा सीमायें नहीं होती. तुम्हारा करियर तोह मजबूत हे होगा जब तुम्हारे साथ कोई मजबूत इंसान होगा. तुमसे प्यार करने वाला, तुम्हारे दुःख में तुम्हे खुश रखने वाला और जब तुम्हे जरुरत हो तुम्हारे साथ जिस्म या आवाज से साथ निभाने वाला. बताओ अब इसमें सेक्स कहा है? सेक्स तोह बस एक अँधा जोश है जो लोग खयालो में भी कर लेते है और जब करने की बरी आये तोह पिलपिले आम से बिखर जाते है. हाँ जब तुम्हारी वो 'लिमिट्स' ख़तम हो जाए और तुम अपने दिल की करना चाहो तोह वह सेक्स के सिवा सबकुछ होगा. पूरा होने का एहसास, एक दर्द भरी दुनिया से खुशियों भरे आसमान की उड़ान और अपनी चाहत की बाहों में पूरी दुनिया से सुरक्षित. 24 की उम्र में तुम्हारी माँ की गॉड से तुम दोनों बहने उतर चुकी थी. मेरी खुदकी बेटी 3 साल की थी जब मैं 24 की हुई और जिनि के भी पाँव भरी दिखेंगे जब वो 24 की होगी. और तुम अभी तक विचलित हो क्योंकि ज़िन्दगी का पहला किश करने की गलती की है तुमने. मेरी सलाह समाज से थोड़ी अलग हो सकती है पर अगर तुम्हे ये गलत लगती है तोह फिर जो ठीक लगे वो करो."

"मैं तोह .. मैं तोह खुद सोच रही थी बुआ की एक पूरा दिन मैं अर्जुन के साथ राहु. पर.. "

"कल बात कर उस से और मुझे यकीन है की वो तेरे लिए समय निकाल हे लेगा. जिनि के रोकके से फारिग होते हे निकल जा उसके साथ कुछ वक़्त बिताने. थप्पड़ मैट मारना बस उसको."

"हाहाहा.. कुछ भी बुआ? वो तोह बस आँखों में देखता है तभी मेरी धड़कन रूकती सी लगती है. चलो अब सोना चाहिए बुआ, 12 से ऊपर वक़्त हो चूका है और 5 बजे उठना है मैंने."

"हाँ लेकिन मुझे 7 के पहले न उठाना यार. अपने घर तोह काम से काम चैन की नींद लू. कल रात को ाशी और उसके पापा ने आ जाना है. भैया भी आ जायेंगे तोह फिर आराम का सवाल हे नहीं. सपने में कण्ट्रोल रखना थोड़ा खुद पर."

"बुआ.. आप न अब मेरे दिमाग जरूर दाल रही हो ये बोल कर. गूडनिघत."

"गूडनिघत एंड स्वीट किस्सेस.. फ्रॉम अर्जुन.."

"बाआ..", मुँह दबा कर जन्नत औंधे मुँह हे शर्म के साथ साथ मुस्कुरा रही थी. आज उसका दिल बहोत हल्का महसूस कर रहा था क्योंकि अपनी हालत बताने के लिए रवीना बुआ के रूप में एक दोस्त उसके बगल में जो थी. दिन की थकान की वजह से जल्द हे दोनों गहरी नींद में सो चुकी थी पर इस घर में कोई और भी था जो अभी भी सजग था या थी. जीनत, जो एक बनियान जैसी टीशर्ट और छोटी सी निक्कर पहने अपने बंद कमरे में फ़ोन पर अपनी सहेली साक्षी से लगी थी.

"यार अब तू प्लान खराब कर रही है ये शर्म और िज्जात्त वाली बात बोल कर. तेरी भी कच्ची गीली थी और तूने हे उकसाया था मुझे ये करने के लिए. अब जो होगा देखा जाएगा, मैं अर्जुन को बोल चुकी हु कल 2 बजे तेरे हे घर मिलने के लिए.", जीनत बात करते हुए अपनी गोरी मांसल जांघो के बीच उस पहले हुए हिस्से को बड़े आराम से सेहला रही थी. उसका बाकी जिस्म भी दूध सा दमक रहा था जैसे इसको आज हे ख़ास तैयार किया गया हो. जन्नत जहा छरहरी और कुछ ज्यादा हे लम्बी थी वही जीनत औसत से अधिक लम्बी लेकिन भरे भरे कूल्हों और मॉटे स्टैनो वाली कामुक कन्या. जिस्म के हिसाब से साक्षी भी अपनी सहेली से कही से काम न थी पर ये चमक आज कुछ अधिक हे थी जीनत की.

"जिनि, मैं पीछे नहीं हट रही. देख तेरा फर्स्ट टाइम है और वो अकेला होगा. चाहे वो शाम तक रहे लेकिन 2-2 को एक साथ नहीं झेल सकेगा. इजत्त वाली बात का मतलब है की कही वो हमारे ऐसे खुले न्योते की वजह से हमे कॉलगर्ल हे न समझे. मेरा भी दिल है उसके साथ छुड़वाने का और वो सब करने का जैसा हमने फिल्म में देखा है. एक दूसरे के सामने नंगा होने में मुझे कभी हर्ज नहीं लेकिन यार एक लड़के के सामने हम दोनों वो भी एक साथ?"

"छुड़वाना तोह पड़ेगा हे और मुझसे पहले तू हे लेगी उसका क्योंकि तुझे एक्सपीरियंस भी है चाहे 1-2 बार का हे सही. मैंने पहले हे बता दिया है की कल मैं तेरे घर हे रुकने वाली हु रात तक. अंकल आंटी हैं नहीं और मैं खुद एक बार पोर्नस्टार जैसा करके देखना चाहती हु. बाद में फिर कभी ऐसा नहीं होने वाला. तू समझ रही है न? आह्ह्ह्ह...", अब वो गोरा हाथ जीनत अपनी निक्कर के भीतर हे दाल चुकी थी. कुछ वक़्त पहले हे उसने अश्लील फिल्म देखि थी साक्षी के साथ लेकिन तब भी सुकून न मिला था हाथ से मसलने पर लेकिन अभी अर्जुन के साथ खुद को खुल कर सबकुछ करने का सोच वो अधिक गरम हो उठी.

"सचमुच हे रंडी है यार तू तोह.. ऊँगली रगड़ रही है न? तेरी गर्मी नहीं निकलने वाली एक लड़के से कामिनी. घोडा हे चढ़वाना पड़ेगा तेरे ऊपर कोई और जब तेरी फटेगी न तब अकाल ठिकाने आएगी. तेरा पहली बार है और आजतक तूने मुझे भी पूरी ऊँगली न अंदर डालने दी. गलती से अर्जुन का हथियार अगर मेरे एक्स बॉयफ्रेंड से तगड़ा हुआ न तोह हालत बुरी हो जानी है. मैं टाइम बढ़ने वाली गोली का जुगाड़ करती हु अगर तू नहीं मान रही तोह."

"तेरे उस बॉयफ्रेंड की बात कर रही है जिसने ढंग से तेरी रेल हे नहीं बनाई थी और 1 मिनट में खली हो गया था? अर्जुन का हथियार इतना मोटा है डार्लिंग की तेरे मुँह में गया न तोह या तोह होंठ फटेंगे या गाला.. आह्ह्ह्ह.. वही याद कर रही थी मैं और अब तोह यही चाहत है की वो मेरी विर्जिनिटी बुरी तरह से ले.. कुटिया बना कर मेरे ऊपर चढ़ जाए और गाला दबा कर ऐसे पेले की ...आह्हः.. मैं चलने के काबिल न राहु.. और तू भी अपना ड्रीम पूरा कर लियो. तुझे अपने हिप्स बड़े करने है न.. वही घुसवा लियो.. कितना मजा आएगा न जब वो तेरी फाड़ेगा और तू चीख भी न सकेगी..", अब तोह जीनत और तेज तेज उंगलिया रगड़ने लगी थी और दूसरी तरफ भी साक्षी का बुरा हाल हो चला था. वो तोह बिस्टेर पर निचे से नंगी अपनी योनि की उभरी हुई फांको के बीच 2 उँगलियाँ धंसाए तेज तेज अंदर बहार करने लगी.

"कुटिया.. तू सचमुच बहोत ..आह्हः.. कमीनी है जिनि.. अगर उसका उतना बड़ा निकला न तोह पक्का मैंने बून्द मरवा लेनी.. पर यार बात फैल न jaaye..aahhh.."

"मेरी जान, लड़का दिल और लुंड देख कर चुना है मैंने.. उम्म्म.. शरीफ है और मैंने उस से यही गिफ्ट माँगा था की बस एक बार हम करेंगे उसके बाद चाहे तोह वो मिले नहीं तोह न सही. वैसे भी दिल में तोह वो पहली बार देखते हे उतर गया था और तभी सोच लिया था के अपना सपना मैं इसके साथ हे पूरा करूँगा. उम्म्म... साफ़ न बोलती तोह वो भी नहीं मानता क्योंकि प्यार तोह उसको भी नहीं है.. आह्हः.. चल bye.. आह्हः.. अब जागने की हिम्मत नहीं है मुझमे.. कल मिलते है.. उम्म्म", जीनत की टांगें अकड़ चुकी थी और उखड़ी सांसें संभालती हुई वो बिना साफ़ सफाई के वैसे हे पसर गयी.

'पता नहीं.. ये सही है या गलत लेकिन .. उह्ह्ह.. बड़ी हसरत थी की तुम्हारे हे जैसा इंसान हो जिसके साथ मैं लड़की से औरत बनु..'

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"हाँ ठीक है बौ जी मैं समय पर पहुंच जाऊंगा. जी सब सामान भी मार्किट से ले लेंगे.", सुअभ 6 बजे हे अर्जुन नाहा धो कर तैयार हो चूका था. लाली आँगन की सफाई में जुटी थी और अनामिका चची रसोईघर में. फ़ोन बजने पर उसने हे उठाया था जहा वो पिछले 5-6 मिनट से कभी हाँ हु तोह कभी पूरा विवरण देता रहा पूछी गयी बात का. अब रामेश्वर जी ने फिर से ललिता जी की बस के समय पर चेताया तोह अर्जुन ने उन्हें सामान लेने तक का बता दिया. कुछ वक़्त अपनी दादी से बात करने के बाद वो हँसता मुस्कुराता हुआ कमरे से बहार निकला तोह गलियारे से नाहा कर आती रौशनी बुआ से भेंट हो गयी. आज वो सलवार कमीज में थी और हमेशा वाला भोलापन उनके तजा नहाये चेहरे पर.

"बुआ आज आप ाची दिख रही हो लगता है ठीक से नींद अब कही नसीब हुई है.", अर्जुन के मजाक पर वो भी मुस्कुरा दी. बालो में अभी टोलिया बंधा था जैसे उन्होंने आज केश धोये हो. विधवा होने से पहले भी रौशनी बुआ कभी कोई श्रृंगार नहीं करती थी और इतने साधारण रूप में भी एक बड़ा सुखद सा आकर्षण रहता था. वो दामिनी जैसी tej-tarrar, बेबाक और बड़बोली तोह कभी थी हे नहीं और ऊपर से उनका जीवन हमेशा दबाव में कटा. शायद अब वो इस बदलाव से कही न कही खुश हे थी.

"तुम्ही वजह हो बीटा इस आराम और ाचे जीवन की. मुझे मेरे घर वापिस लाने के लिए तुम्हारा जितना धन्यवाद करू उतना काम है. सचमुच कल ाची नींद आयी क्योंकि अब मैं परेशां जो नहीं हु."

"फिर गोली खाये बिना सोने की कोशिश कीजिये ने बुआ. जानता हु आपने न कभी कुछ माँगा और न कुछ कहा लेकिन बदले में सुख आपको ज्यादा नहीं मिले. छोटे दादा जी भी आपको खुश देख कर खुश रहते है. वो देखिये कैसे मुस्कुरा रहे है.", अर्जुन ने जैसे हे ध्यान दिलवाया रौशनी बुआ ने भी देखा की उसके पिता सचमुच इन दोनों को मुस्कुराता देख खुश थे. अर्जुन के साथ हे चलती हुई रौशनी बुआ खुले आँगन में आ गयी. बालो से टोलिया हटा कर अपने भीगे लम्बे बाल एक तरफ लटकती हुई वो उन्हें तोलिये से सूखने लगी.

"आप भी मुस्कुराते हुए ाचे लगते है पापा और मैंने ये बात बहोत समय बाद नोट की है.", गुलाबी कुर्ती और सफ़ेद सलवार में थोड़ा झुक कर कड़ी रौशनी बुआ अपने पिता की तरफ तोह तिरछी हे थी पर अर्जुन चारपाई पर जहा बैठा था रौशनी बुआ का चेहरा और झुकना उसकी नजरो के सामने हे था. शायद सलवार कमीज उसकी बड़ी बहिन का था जो 2 नंबर ढीला या फिर कुछ अधिक खुले गले का था. हर बार टोलिया झटकने से वो पके नारियल से बड़े गोले हिलते और झुके होने की वजह से उनका गोरा सलोना रूप उस सफ़ेद साधारण ब्रा से आधा बहार झलक उठता. अर्जुन तोह रात से हे अपनी ताई के सुरूर में डूबा था जो इस दृश्य को भी निहारने लगा. दामिनी और रौशनी में बस जिस्मानी तौर पर इतना हे फरक था की जहा दामिनी का जिस्म कुछ अधिक हे खिला था वही रौशनी जैसे अभी तक पूर्ण कामकला से अनभिज्ञ हे थी. खान पान और अपने माता पिता की वजह से जिस्म उतना हे गदराया और मांसल था जितना दामिनी का.

"मेरी बची को भी तोह मैं जैसे बरसो बाद देख रहा हु. अब तुम बस ऐसे हे खुश रहा करो बिटिया और जो भी बात या परेशानी हो कभी अपने दिल में मैट रखना. पहले हे मैं तुम्हारा कसूरवार हु लेकिन अब छोटे मुखिया जी निर्देशक और मार्गदर्शक है हमारे. हाहाहा.. अर्जुन बीटा सचमुच तुम्हारा हरिणी हु मैं और इस गाँव का हर व्यक्ति."

"आप मेरे दादा जी है और ये परिवार है छोटे दादा जी. यहाँ कोई किसी पर एहसान नहीं करता, परवाह और प्यार करते है सबकी. आपने तोह कभी चाह कर गलत नहीं किया न फिर क्यों सोचते है इस सबके बारे में? चची, मेरा नाश्ता मैट बनाना. मैं ताई जी के साथ उधर जाऊँगा तोह .."

"8 बजे निकलना है तुम्हे और आधे घंटे बाद नाश्ता लग जाएगा. फिर ये नहीं केहन की बहार नाश्ता कर लोगे.", अनामिका ने अपने ससुर को चाय देने के साथ अर्जुन के दूध का गिलास और खुराक छोटे मेज पर रखने के बाद अपनी ननद के लिए भी एक कप वही रख दिया. अर्जुन मुँह बना कर उन्हें ऐसे देखने लगा जैसे वो छोटा बचा हो और अनामिका उसकी गुस्सैल माँ. दोनों की स्थिति और बातचीत देखते हुए रौशनी के साथ कृष्णेश्वर जी भी ठहाका लगा बैठे. अनामिका जाते हुए कनखियों से हे अर्जुन को मुँह चिढ़ा गयी थी जो हँसते हुए सर घुमा कर रौशनी बुआ को देखने लगा तोह जिस्म फिर से लरजने लगा. बालो को समेत कर जुड़ा बनती हुई रौशनी बुआ ने एक पाँव चारपाई के ऊपर टिका रखा था और वो अनभिज्ञ थी की ऐसा करके उन्होंने अर्जुन को क्या नजारा दिखा दिया. सफ़ेद सलवार की सिलाई ठीक योनि के ऊपर से उधड़ी हुई उनके रेशमी जंगल और लम्बा गुलाबी चीरा अर्जुन की नजरो को परोस गयी. अर्जुन और बुआ की नजरे बस एक बार आपस में मिली थी लेकिन रौशनी जैसे कुछ समझी नहीं और टोलिया सूखने के बाद वो वही अर्जुन की बगल में बैठ चाय पीने लगी. आँचल और अंजलि भी नहाने के बाद रओसीघर में दाखिल हो गयी और आँचल के चेहरे से साफ़ था की वो उखड़ी हुई है किसी बात से. कृष्णेश्वर जी के बाद अर्जुन भी नाश्ता करके एक अटैची कार की पिछली सीट पर रखता हुआ ठीक 8 बजे घर से निकल चूका था. लड़कियां तोह अपने कमरे में जा चुकी थी जहा उनके साथ संजीदा भी मौजूद थी. कृष्णेश्वर जी जाने से पहले बोल गए थे मिस्त्री को भेजने का क्योंकि पंखा खराब हो गया था या तार में समस्या थी.

"दीदी ये सूट थोड़ा ढीला है आप पर. मैं लाली को बोल देती हु वो दर्जन (टेलर) को बुलवा लाएगी आपका माप लेने के लिए. 20 से ज्यादा salwar-kameej सिलवाए बिना हे रखे है पति में. आप सलवार कमीज में ाची लगती हो और साड़ी से ज्यादा आरामदायक भी है ये. जो जो पसंद आये वो सिल्वा लेना आप और संजीदा भी बोल रही थी की उसको भी सूट सिलवाने है.", दोनों के लिए नाश्ता प्लेट में लिए अनामिका ने रौशनी को अपने हे बिस्टेर पर बुलवा लिया. निकेतन नहाने के बाद लड़कियों के कमरे में हे था. अनामिका की बात सुन्न कर रौशनी ने बड़ी शालीनता से मन किया.

"बात तोह तुम्हारी ठीक है अनामिका लेकिन सलवार कमीज बस कभी कभी ठीक रहते है और साड़ी पहनते मुझे इतना समय हो गया है की अब इनकी आदत नहीं रही. ये भी मुझे दामिनी दीदी की अलमारी से मिल गया और आज मेरा दिल नहीं था ब्लाउज पेटीकोट पहन ने का. वैसे तू क्यों नहीं कभी सलवार कुर्ती पहनती? ऐसा तोह नहीं है की कोई मन करेगा?", अब अनामिका इसका क्या हे जवाब देती क्योंकि 5 साल तोह वो घूंगट में हे रही थी लेकिन सुझाव उसको भी पसंद आया.

"पहले माँ जी की वजह से घूंगट रखना पड़ता था और अब बचा दूध पीटा है इसलिए ब्लाउज में सुविधा भी रहती है और पल्लू से धक् भी लेती हु. पर अब आप कह रही है तोह मैं भी सोच रही हु की 2-3 सूट सिल्वा लेती हु. घर में हर वक़्त साड़ी पहन कर रखने से गर्मी भी ज्यादा लगती है और सलवार कमीज में काम करना आसान भी रहेगा.", अनामिका जिस तरह बिस्टेर पर मुश्किल से बैठ प् रही थी, ये रौशनी ने भली भांति देखा और यही उदहारण बहोत था की साड़ी में कितनी कठिनाई होती है पर एकाएक अनामिका की आँखें सामने स्थिर रह गयी जब उसकी ननद ने सही से चौकड़ी लगते हुए कुर्ती को थोड़ा ऊपर खिंचा. रौशनी ने भी नजरो का पीछा किया तोह दिल धक् से रह गया. इस तरह सलवार का वो उध्दा हिस्सा तोह उनकी योनि और बालो के झुरमुट को कही बेहतर दर्शा रहा था.

"माफ़ करना अनामिका, बाथरूम में मुझे पता हे नहीं चला के सिलाई ुध्दि हुई है झोली से. मैं बदल कर आती हु.", रौशनी उठने लगी तोह अनामिका ने बस उनकी कुर्ती को सामने झोली पर फैला दिया.

"बैठी रहिये दीदी, नाश्ते के बाद बदल लीजियेगा. मैं हे सिलाई कर दूंगी और वैसे भी यहाँ कौनसा कोई पुरुष मौजूद है.", हाथ पर दबाव देने से रौशनी बैठी तोह रही पर चेहरे पर शर्मिंदगी के भाव बरकरार थे.

"पुरुष तोह अभी नहीं है लेकिन इसको पहने 2 घंटे हो चुके है. मैं बहार बाल सूखा रही थी जब पापा और अर्जुन वह बैठे थे. उन्होंने देखा होगा तोह जरूर गलत समझ रहे होंगे."

"कितना ज्यादा सोचती हो आप दीदी जबकि अगर ध्यान दो तोह पापा जी की पीठ थी आपकी तरफ और ये तोह पाँव खुलने पर हे पता चलेगा वो भी कुर्ती ऊपर हुई तोह. हाँ आप बाल बांध रही थी तब पाँव मंजे पर था आपका. अर्जुन.. लेकिन जाने दो, वो बचा हे है.", अनामिका खुद ाचे से जानती थी की अर्जुन कैसा मर्द है पर भोली रौशनी को भी तोह समझाना हे था. अनामिका के सुलझे हुए जवाब से वो कुछ सहज हुई लेकिन मैं में अर्जुन का वैसे देखना अभी तक उथल पुथल मचा रहा था.

"अर्जुन बचा नहीं पुरुष है अनामिका चाहे रिश्ते में भतीजा लगता है पर वो छोटा नहीं है. उसको दिन दुनिया के साथ इस सबकी भी समझ जरूर होगी. जाने क्या सोच रहा होगा अपनी बेवकूफ बुआ के बारे में?"

"आप खाना खाओ दीदी और अर्जुन को अगर इतनी हे समझ है तोह वो बस यही सोच रहा होगा की उसकी ये प्यारी बुआ तोह वह पर जंगल उगाये रखती है. हाहाहा.. थोड़ा ध्यान रखा कीजिये वह का. ज्यादा बाल परेशानी पैदा कर सकते है.", अनामिका ने पहली बार इस तरह खुल कर बात की थी अपनी इस बड़ी ननद से जो गराई तोड़ते हुए भी झेंप रही थी ये सब सुन्न कर.

"परेशानी तोह होती है लेकिन कोई बात नहीं. वैसे भी अब .. छोडो ये सब बातें अनामिका. मुश्किल से तोह दिमाग सम्भला है कुछ.", एक निवाला जैसे तैसे मुँह में डालती हुई रौशनी ने बात को ख़तम हे करना चाहा.

"वैसे भी अब किसके लिए करू? आप यही कहना चाहती थी लेकिन इसका भी साफ़ सा जवाब है दीदी. अपने लिए कीजिये और गर्मी में कैंची से म्हणत करने की जरुरत नहीं है. मैं क्रीम दे दूंगी आपको, बस लगा कर कपडे से साफ़ कर लेना 5 मिनट बाद. फिर नाहा लेना जैसे हर रोज दिन में नहाती है. आप खुश रहा कीजिये और जरुरी नहीं की जीवन ऐसा हे रहने वाला है. ज़िन्दगी में कब क्या बदलाव आ जाए ये कोई नहीं जानता. पापा भी आपके साथ खुश थे आज और अर्जुन भी आपके खिले हुए चेहरे को देख खुदसे आपके पास आया था बात करने के लिए. बड़ी माँ ने कहा था न के आप विधवा नहीं है, अपनों के किये हुए गलत फेंसलो की बलि चढ़ी मासूम है. मुझसे पहले ये घर आपका है दीदी और अगर आप खुश दिखेंगी तोह अंजलि भी अपने दायरे से बहार निकल कर हंसने बोलने लगेगी. पापा की जान बस्ती है आप में, उनकी खातिर हे सही.", योनि के बालो से शुरू हुई बात अब ख़ुशी और जीवन पर आ रुकी थी.

"तुम सचमुच बहोत समझदार हो अनामिका और ताई जी इसलिए तुम्हे बहोत मान देती है. जबकि मैं तोह यहाँ तुमसे मिलने आते हुए भी वक़्त न बिता सकीय तुम्हारे साथ. मेरी न तोह कोई बहार सहेली थी और न घर में दामिनी दीदी तक से ज्यादा बातचीत कर पायी क्योंकि मैं उनके जैसे उन्मुक्त नहीं बन्न सकीय. बुलवा लेना मास्टरनी को, सूट हे सिल्वा लेते है आज."

"तोह अब अर्जुन के मामले को याद नहीं करेंगी न?", अनामिका ने जैसे हे चुटकी ली रौशनी निवाला तोड़ते हुए हे खिलखिला उठी.

"बेशरम भी हो तुम. भतीजा हे तोह है वो कौनसा बहार का है."

"हाहाहा... ऐसे हे najar-andaaj करना सीखिए दीदी छोटी छोटी बातों को. चलिए नाश्ता ख़तम कीजिये, फिर मैं लाली को भिजवाती हु मास्टरनी जी के घर.", बातों के सिलसिले में ऐसी हे खट्टी मीठी चर्चा करके अनामिका ने आज रौशनी को जीवन का एक बढ़िया पहलु दिखाया था लेकिन अब वो अर्जुन के इन्तजार में थी जिसने शाम को आने का कहा था.

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"ओह मेरी प्यारी ताई जी.. आप कैसी हो और कोई परेशानी तोह नहीं हुई आपको आने में?", अर्जुन तोह बस के रुकते हे उसके दरवाजे के सामने आ खड़ा हुआ. पीली साड़ी और लाल ब्लाउज पहने उसकी प्यारी ताई जी हाथ में बैग लिए पहली सीढ़ी पर हे पहुंची थी की उनसे बैग लेने के बाद पाँव जमीन पर लगते हे अर्जुन ने उन्हें बाहों में भर लिया. ललिता जी तोह उसका इतना प्यार देख कर गदगद हे हो उठी जो उसके गाल पर हाथ लगाती हुई जैसे सेहत का अंदाजा लगाने लगी.

"लल्ला तेरे दादा जी का घर नहीं बस अड्डा है ये जो तू मुझे ऐसे पकडे हुए है. सेहत का ध्यान नहीं रखता क्या अपनी? गाल अंदर धंसने लगे है.", अर्जुन उन्हें बगल में लगाए बैग उठा कर हँसता हुआ उस एस्टीम कार की तरफ बढ़ चला जो कृष्णेश्वर जी की थी.

"पता था के आप न आते हे पहले सेहत की बात करोगी. 10 दिन में हे दुबला हो गया क्या मैं? वह रोज सामने हे रहता था न इसलिए फरक लग रहा है आपको. वैसे बड़ा इन्तजार करवाया आपने मुझे?", अर्जुन ने पिछली सीट पर कपड़ो का बैग रखने के बाद ताई जी को अगली सीट पर बैठने के लिए दरवाजा खोलते हुए नाराजगी दर्शाई.

"हाँ मैंने हे इन्तजार करवाया न तुझे? भाग के तोह तू आ गया इधर अकेला हे और इल्जाम भी मुझ पर. माधुरी परसो आ जाती तोह मैंने कल हे आ जाना था. अब आ तोह गयी हु तेरे कहने पर लेकिन बेटी का ससुराल है लल्ला इधर.", अर्जुन चस्मा उतार कर बक्से में रखने के बाद कार चालू करके बहार निकल चला.

"हम कौनसा दीदी की ससुराल में जाने वाले है सीधा. आपकी याद में तोह कल से हे बुरा हाल हो रखा मेरा.", अब ललिता जी के गाल सेब से लाल हो चले थे. 5 फ़ीट की ललिता जी का पूरा जिस्म से गाल से पाँव तक एक ख़ास अंदाज में ढला था. मॉटे भरे हुए गाल, भारी विशाल सीना, गोरा हल्का सा उभरा पेट और सीने से ज्यादा घेराव लिए उनका मांस से लबरेज पिछवाड़ा. कद काम होने से उनकी भरी लेकिन चिकनी जाँघे भी उतनी हे आकर्षक और मादक थी जितना बाकी जिस्म. अर्जुन को अपनी तरफ बार बार देखते पा कर ललिता जी ने भी उसको तड़पाने के इरादे से आँचल सीने से निचे ढलका दिया. लाल ब्लाउज इतना कैसा हुआ था दोनों गोल पर्वतो पर की एक गोरी घाटी उनसे बहार झलक रही थी.

"अब तेरी दीदी के ससुराल नहीं जाना तोह फिर क्या गाँव लेके जाएगा? सामान भी लेना है वह शगुन में देने के लिए और 11 बजे तक तोह फ़ोन भी कर देंगी माँ जी उधर.", ललिता जी वाकिफ थी की अर्जुन यक़ीनन उनके साथ एकसार होने की जुगत लगाए बैठा है जो उसकी पतलून में जांघ पर बढ़ते उभार से साफ़ झलक रहा था.

"सामान तोह मेरी बगल में बैठा है जिसको मैं दुनिया से दूर लेके जा रहा हु. वैसे शगुन का सामान पिछली सीट पर पड़ा है जिसको लेने में पूरे 2 घंटे लगे थे मुझे. अब वो 2 घंटे आप मुझे लौटने वाली हो.", गाडी को एक तरफ रोक कर अर्जुन तुरंत उस पीसीओ की तरफ दौड़ गया जो सड़क किनारे हे पीले खोखे से में बानी थी. ज्यादा बातचीत किये बिना वो अपनी ताई को लेने और मार्किट जाने का सन्देश दे कर जल्द हे वापिस लौट आया.

"बोल दिया जी आपकी सासु माँ को. अभी आपको लिया है और शहर में सारा सामान लेने में हमको 2 ढाई घंटे लगेंगे. वैसे मुझे तोह लगता है की आपका मैं नहीं है.", अर्जुन फिर से कार को आगे बढ़ाते हुए अपनी प्यारी ताई जी के मजे लेने लगा तोह उन्होंने अपना वो छोटा सा मुलायम हाथ सीधा हे अर्जुन के उभरे भुजंग पर टिका दिया.

"लल्ला, तू प्लान न भी बनता न तोह मैंने खुद कह देना था तुझसे की एक आध घंटा देरी से चलेंगे. हालत बस से बहार है क्योंकि अब आदत तूने हे बिगाड़ी है मेरी जो तेरे ताऊ से तोह ठीक होने से रही. पर देख कुछ ऐसा न करियो की बात घर की िज्जात्त पर आ जाए.", अर्जुन के उभार को पूरी लम्बाई जांच कर ललिता जी भी गरम हो चुकी थी. अर्जुन भी इस स्पर्श की आस में हे था क्योंकि ललिता जी और माधुरी दीदी हे तोह थी जो उसके साथ खुल कर संसर्ग करती थी, बेबाकी और उत्तेजक शब्दों संग. कार चौड़ी मुख्या सड़क पर बिपास की और बढ़ चली. यहाँ कुछ बढ़िया होटल थे और 2-3 तीन सितारा भी.

"हम कहा के रहने वाले है ताई जी? क्सक्सक्सक्स के न और लम्बे सफर पर निकले है तोह बढ़िया होटल में आराम करने के लिए तोह रुक हे सकते है. वो क्सक्सक्सक्स रीजेंसी नया होटल है और बढ़िया भी. बस अपना कपड़ो वाला बैग साथ लेके चलना पड़ेगा.", अर्जुन के कहे मुताबिक़ ललिता जी भी सहमत हो गयी. उन्हें ख़ुशी थी की अर्जुन हर बात का इतना ध्यान रखता है.

"मैं इधर 3 दिन रुकने वाली हु तोह हर रोज होटल तोह नहीं आ सकते.", गाडी उस 6 मंज़िला सफ़ेद चमचमाते होटल के अहाते में प्रवेश कर चुकी थी.

"हम कौनसा एक हे होटल में आने वाले है. पहचान पत्र पर पता हमारे शहर का है और इस शहर में दर्जनों बढ़िया होटल है 4 हाईवे पर. चलिए अब आप मेरी इतनी म्हणत का उपहार देने के लिए तैयार हो जाइये.", अर्जुन गाडी को एक तरफ आरक्षित पार्किंग में लगाने के बाद, कपडे वाला बैग और अपना बताऊ ले कर कांच के बड़े दरवाजे से होटल के प्रांगण में दाखिल हो गया. ललिता जी भी सहजता से हे सभ्य माँ की तरह पल्लू और पर्स लिए उसके पीछे पीछे.

"रूम फॉर 2.", पहचान पत्र काउंटर पर रकते हुए वो उस bhoore-sunehri बालो वाली दूध सी गोरी परिचायिका से रु बा रु हुआ जो अर्जुन के चेहरे के बाद काउंटर पर उसके द्वारा रखे पहचान पत्र और काले चश्मे को देख बड़ी ख़ूबसूरती से मुस्कुरायी.

"हमारे पास सेमि लक्ज़री और लक्ज़री रूम्स है सर. सेमि 1200 पैर डे और फुल्ली लक्ज़री 1500.", अर्जुन ने ललिता जी की तरफ देख कर कहा.

"माँ 1500 देना.", और उन्होंने भी तुरंत हे 500 के 3 नोट बढ़ा दिए.

"देखिये गाडी पार्किंग में हे है और हमारा लगेज भी."

"सर आप रिसेप्शन पर कॉल कर दीजियेगा जब भी आपको जरुरत हो. रूम सर्विस आपका सामान कमरे में हे पंहुचा देंगे."

"थैंक यू. रूम आप दिखाएंगी?", लड़की अर्जुन की मुस्कान और कहने की अदा से थोड़ी शर्मायी लेकिन उसकी दिलकश मुस्कान ज्यादा प्रभावी थी. पर उसने ये भी देखा की युवक की माँ थोड़ा गौर से ये सब देख रही थी.

"सर्वं, सर को 601 दिख दो. आपको कोई भी परेशानी हो या जरुरत, आप 001 पर कॉल कर दीजियेगा.", अर्जुन भी बदले में हामी भर के उस औसत कद के व्यक्ति के साथ कांच की लिफ्ट की तरफ बढ़ चला. ललिता जी भी उसके साथ हे थी जो इस शानदार होटल की सजावट से ज्यादा बस अर्जुन को हे देख रही थी. अब जाने वो कैसा उपहार देने वाली थी लेकिन इतना तये था की आलिशान कमरे का नक्शा बदलने वाला था कुछ हे घंटो बाद.
 
चौराहा पर अपडेट दे दिया है भाई लोग. पेज नंबर 53 पर 2 भाग में. इंडेक्स में ऐड भी कर दिया है. शुभरात्रि
 
भाई लास्ट अपडेट पर मैंने शायद यही कहा था की अगला अपडेट थर्सडे को आएगा?

कल हे तोह चौराहा पर अपडेट दिया है
 
दोस्तों मैं कहानी बंद थोड़ी न का रहा हु. मैंने तोह अपना पहलु सामने रखा है की हालात सभी के अलग अलग बेशक हो पर जिम्मेवारी भी सबके कंधो पर है. किसी के काम और किसी के ज्यादा. 2 हफ्तों से मैं खुद मान रहा हु की मैंने 5 अपडेट दिए होंगे क्योंकि समय का अभाव है पर लिखना बंद नहीं किया चाहे कितना भी मैं सफर में राहु, परिवार के साथ या अपने कार्य पर.

अब व्यापारी वाली टिप्पणी आप जानबूझ के करोगे तोह भाई इंसान मैं भी हु. नजरअंदाज हर बार तोह नहीं किया जा सकता जब सामने से व्यक्तिगत पहलु पर सवाल उठाये जाए. कहानी में कुछ पसंद नहीं आया तोह बताओ. कुछ गलत लिखा तोह कहो.. और अगर सबकुछ ठीक है तोह ऊँगली बेमतलब की तोह बिलकुल न करो क्योंकि ये नाम और काम मेरा है. फिर ढंग से ऊँगली करूँगा क्योंकि मैं आनंद भाई जितना सहनशील नहीं हु जो ख़ामोशी से थ्रेड हे छोड़ कर चले गए थे ऐसे हे कटाक्ष सुन्न कर.

कहानी कितनी लम्बी चलेगी, कौनसे चरक्टेर्स आएंगे जाएंगे, किसके साथ गलत हुआ सही हुआ ये तोह आप राये दे सकते हो लिखेगा तोह लेखक हे. और इसके बाद आप ये कहो की आपका ध्यान कही और है, व्यापारी मानसिकता है.. सीज़ .. तोह इतना निवेदन है की अगली बार शब्द मर्यादित नहीं रहेंगे. और बोलने के बाद मैं बुरा भी नहीं मानूंगा. जैसे सब लिख कर कह दिया की गलत लगा हो तोह माफ़ी चाहूंगा.
 
11:30 पर अपडेट के साथ साथ ललिता जी भी दिखेंगी. तेल की जगह जेल उसे करना भाई हिलने के लिए. 🤣
 
अपडेट 215

उपहार (3)

"उस मैनेजर को कैसे ताड़ रहा था तू? और वो पगली जानती भी नहीं है की इस मासूम चेहरे के धोखे में जो ये भीमसेन उसकी नलकी को पटनाला बना के रख देगा तोह अपने मरद को फिर क्या जवाब देगी.", ललिता जी का यही तोह chir-parichit अंदाज था जिसके दीवाने घर के सभी थे लेकिन ये खुलकर तोह बस अर्जुन के संग एकांत में देखने को मिलता था. कमरा सचमुच हे बड़ा आलिशान था जहा महाराजा बिस्टेर, सोफे कुर्सियां, टेलीविज़न और वातानुकूलन के साथ साथ आधुनिक स्नानघर भी मौजूद था. सफ़ेद बाथटब और कांच के दरवाजे वाला जगमग स्नानघर, जहा ललिता जी का पेटीकोट ढीला करने के बाद अर्जुन उनकी मखमली भरी जांघ को अपने दोनों हाथो से सहलाता हुआ हर तरफ चूमने में जूता था. ऊपरी भाग पर झूलते दोनों खरबूजे से सतांन अर्जुन के क्रियाकलाप से हे सख्त हो कर स्वयं को अपनाने की दुहाई देने लगे. कमाल का बदन था ललिता जी का भी जो 50 बसंत पार होने के बावजूद अत्याधिक निखार लिए भरपूर गदराया हुआ था.

"ओह मेरी प्यारी ताई, मैं तोह बस उसको अपनी शकल याद करवा रहा था जिस से कभी अगली बार आना पड़े तोह पहचान देने की जरुरत हे न पड़े. वैसे ये मेरा भीमसेन आप तोह पूरा निगल लेती हो और फिर भी किसी को पता नहीं चला?", अर्जुन अब उनकी पंतय फर्श पर गिराने के बाद स्टूल पर बैठे हुए हे ललिता जी की दोनों चिकनी और गुदाज टाँगे फैला कर अपने गॉड में बैठते हुए मजे से एक मॉटे चुके को मुट्ठी में भरता हुआ दूसरे का काबुली चने सा चूचक दांतो में पकड़ कर हलके हलके कुतरने सा लगा. ललिता जी तोह मजे की सीत्कार लेती हुई वो ख़ास तेल दोनों हथेली में चुपड़ के उस मॉटे लम्बे लुंड पर कास कर मसलने लगी. बस चूचक तेजी से खींचे जाने पर कुछ तेज सिसकारी उनके होंठो से टपक उठी.

"ओह्ह्ह्ह बावले.. आराम से कर, मैं अभी 3 दिन हु इधर... आठ.. पिछली बार से तेरा ये खम्बा एक उंगल ज्यादा लम्बा हो गया लल्ला.. आईई.. कमीने मुझे दोष क्यों दे रहा तू इसका? मोटा भी है पहले से ज्यादा अब.. बेटी के घर टांग फैला के भेजेगा दुष्ट.", अर्जुन खिलखिला कर हँसता हुआ अब दोनों पके खरबूजों को थोड़ा जोर से मसलने लगा. ताई जी खिसक कर और आगे हो गयी जहा तेल से चमकता सूपड़ा निचे दबा कर वो इस मुद्रा में उनकी लपलपाती योनि से चिपकती हुई बस इस ख़ास स्पर्श को भीतर भरने लगी जो काफी समय से उनसे दूर था. अपनी ताई की आँखें बंद देख और लिंग को योनि मुख से चिपकने के एहसास से अर्जुन भी उनकी हे तरफ लपका. थोड़ा कस एक चुचो को जकड कर अर्जुन ने अपनी ताई के होंठ खुलने से पहले हे मुँह के भीतर भर लिए. भरे भरे होंठो का वही ख़ास स्वाद और इतनी जल्दी तरल बहती योनि का चिकना मुख. ताई की चिकनी पीठ को एक ब्याह के घेरे में लेते हुए अर्जुन ने उन्हें हे अपने लुंड की तरफ दबा दिया. पल भर के लिए ललिता जी का पूरा जिस्म थरथरा सा उठा जब इतना मोटा सूपड़ा कच्छ से उनकी मुनिया को फैलता हुआ गरम गीली सुरंग में 3 इंच जा उतरा. अब तोह ललिता जी भी उसका सर दोनों हाथ से पकड़ती अपनी जिव्हा अर्जुन के मुँह में भरने लगी जिसको अर्जुन भी मजे से चूसता हुआ लगातार दूसरे हाथ से उनके मॉटे चुके को मसलता हुआ अपने लिंग पर दस्ताने सी चिपकी योनि का ख़ास एहसास लेने लगा.

"आअह्हह्ह्ह्ह.. ये लो ताई जी, सम्भालो.. ूंणगगगग.", चुके को छोड़ कर उनके दोनों भरी और विशाल कूल्हों को हाथो में भर के अर्जुन ने अपनी प्यारी ताई की योनि का अंतिम द्वार दूसरे झटके में हे छो दिया. ललिता जी तोह जैसे दर्द और मजे में दोहरी हे हो चली. गॉड में इस तरह बैठा कर अर्जुन उन्हें पहली बार छोड़ रहा था लेकिन उनका अनुमान भी सही था की अर्जुन का लुंड अब 9 इंची कटाई न रहा था और छूट का इस कदर फैलना मतलब वो पहले से कुछ अधिक मोटा भी था पर वो झेल सकती थी क्योंकि ये उनके लल्ला का लिंग था, उनके बेटे का मूसल जिसकी दीवानगी की वजह से हे वो इस होटल में थे.

"निर्दयी लल्ला... आह्ह्ह्हह... क्या सोच के यहाँ लाया है मुझे तू? गाँव में तेरी खातिरदारी करने वाली न मिली कोई तुझे? उफ्फ्फ... बीटा धीरे से डालता न.. महीने बाद छोड़ रहा है, कल रात के बाद नहीं जो एक झटके में बिल फाड़ दिया..", 5 फ़ीट की ललिता जी तोह निढाल हे हो चली थी गर्भ तक इतना मोटा मूसल भीतर जा भिड़ने से. उनका पूरा जिस्म अब अर्जुन से चिपका था जो उन्हें गॉड में लिए, मांस से लबरेज दोनों कूल्हों को भींचता हुआ जैसे स्वर्ग में पहुंच चूका था. दोनों खरबूजे उसके चौड़े सीने से डाब कर बगल से बहार निकल रहे थे.

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"आपके लल्ला को तोह बस आप हे झेल सकती हो ताई जी.. आह्ह्ह्ह.. पता नहीं था इतनी कासी मिलोगी.. ऊपर से आपका ये ख़ास तेल तोह लुंड में हे आग लगा देता है.. उम्मम्मम्म... ताऊ जी तोह घर हे थे, फिर भी इतनी आग है अंदर?", अर्जुन ने ललिता जी को गॉड में उठाये हुए पलट कर पीठ के बल उस मजबूत मेज पर हे टिका दिया जिस पर पहले वो बैठा था. 55-60 किलो वजन तोह जैसे उसके लिए कुछ था हे नहीं और इस मुद्रा में ललिता जी की भारी जाँघे फैल कर उसकी कमर पर आ तिकी. निचे पहली हुई गेंहुआ रंगत वाली योनि के becho-beech वो 4 इंची मोटाई वाला खूंटा ऐसे धंसा था जैसे हथोड़े से ठोका हो. 3-4 इंच बहार खींचते हे चमकदार तरल से लिप्त लिंग कही अधिक भयंकर दिखने लगा. छूट की लाल दीवारे कुछ हद्द तक बहार निकली और फिर अगले हे धक्के में अर्जुन के अंडकोष ललिता जी के गोर गोल मटोल से कूल्हों से जा भिड़े. ठप्प की गर्जना के साथ हे भारी चुके दाए बाए हिलने के साथ ललिता जी के चेहरे पर मजे की तरंग दौड़ा गए.

"ओह्ह्ह माँ जी.. आपकी खुराक आपकी बहु झेल रही है इस मुस्टंडे के निचे.. आह्ह्ह्ह.. लल्ला तेरे ताऊ ने तोह कोशिश की थी.. आह्हः.. पर वो नन्दलाल न मुझे संतुष्ट करते और न मुझे उनकी उंगली घिसने जैसे चुदाई पसंद है. तेरा खूंटा जहा घुस चूका हो वह फिर तिल्ली से तोह मेरा कुछ न होने वाला. ऊह्ह्हह्ह.. आराम से लल्ला, गिरा न दियो... ुन्नन", Thap-thap की आवाज इस स्नानघर में तोह गूँज हे रही थी पर उस से अधिक शोर था ललिता जी की खनकती चूड़ियों और दोनों की मजेदार सिसकारियों का. सरपट दौड़ता लिंग और उसकी अभ्यस्त हो चुकी ललिता जी की डबल रोटी सी योनि एक दूसरे से ताल मिला चुके थे. जांघो के दरमियान हाथ निकले अर्जुन उनके उछलते चुचो को दबोच कर कभी ढेर सारा हिस्सा मुँह में भर लेता तोह कभी दोनों को आपस में जोड़ कर भीषण धक्के लगाने लगता. इतनी जल्दी हे ललिता जी दूसरी बार झाड़ चुकी थी और अब कॉमर्स की पतली सी लकीर उनकी हलकी भूरी गुदा तक जाने लगी जो इस मुद्रा में ऊपर उठी हुई थी दोनों बड़े बड़े मांसल कूल्हों के बीच. अर्जुन को उनकी यही गीली रसभरी छूट हे पसंद थी जो shor-sharaba किये बिना उसको मनमानी करने देती थी. बस आज कुछ अलग था तोह ये की उसका सूपड़ा अत्यधिक मोटा हो चूका था तेल की मालिश से और लम्बे धक्के पर वो छूट के अंतिम हिस्से में अटकता तोह दोनों हे मजे से चीख उठते. रबर की गुड़िया की तरह ललिता जी की जाँघे ऊँची उठाये अर्जुन हर बार पहले से लम्बे और जोरदार धक्के जड़ रहा था. भरी भुजाओं पर दोनों तरफ मछलियां उभर कर पसीने से कुछ ज्यादा हे चमक रही थी.

"जैसे आपको ताऊ जी के साथ संतुष्टि नहीं milti...unnnnnhhhh.. मुझे भी बहार किसी के साथ उतना मजा नहीं मिलता... ऊपर से डर अलग उम्म्म्म.. कही लेने के देने न पड़ jaaye...aahhh..", ताई जी के चुचो के ऊपर दांत गाड़ते हुए अर्जुन ने अपना एक हाथ वह से हटा कर उनकी गुदा को टटोलने लगा. सिलवटों वाला वो छेड़ अपने आप हे खुल बंद होता हुआ कॉमर्स को जैसे छले के अंदर भरते हुए अर्जुन के लिए खुद को तैयार किये था. हलके से दबाव पर हे पूरी ऊँगली उस चिकने गरम छेड़ के भीतर जा बैठी.

"उन्न्नन.. अरे बीटा.. गांड कल मार लियो.. उम्म्म्म.. चल मार लियो बस एक बार और होने दे.. आह्ह्ह्ह... वैसे कोई बंद नलकी (कुंवारी छूट) भी खोली या बस अपनी ताई के जैसी kaaki-mausi हे पल्ले पड़ी? आराम से बीटा, बुढ़ापे में तोड़ेगा कमर मेरी? आह्हः.. वैसे .. एक है जिसकी तू आराम से ले सकता...", अब जाने ललिता जी कौनसा बम फोड़ने वाली थी और अर्जुन रफ़्तार धीमी करता बस लम्बे लम्बे धक्के ऐसे मारने लगा जैसे सचमुच बांस से नाली खोल रहा हो. और वो अपनी ताई जी को क्या कहता की अपने घर की तोह लगभग हर काली को वो खिला कर फूल बना चूका है जिसमे माधुरी दीदी तोह शायद पेट से भी हो क्योंकि आखिरी 4-5 बार तोह उन्होंने अंदर हे खली करवाया था अर्जुन को.

"वो पिंकी दीदी की पड़ोसन आयी थी न शादी में, गुरदीप. उसके साथ किया था मैंने ताई जी. पहले पहले तोह उसका बुरा हाल हो गया था पर बाद में बड़ा मजा आया दोनों को हे. शरीर भरी है न उसका और लचक भी कमाल की है. लेकिन जल्दी जल्दी में हुआ था उसके साथ.. आह्ह्ह्ह.. आप किसकी बात कर रही हो?", अर्जुन लगातार धक्को के साथ ऊँगली भी गुदा में अंदर बहार करता रहा. गुरदीप का नाम बताने के पीछे भी ख़ास वजह थी और ललिता जी मजे से सीत्कार करती हुई ये नाम सुन्न कर हैरान होने की जगह मुस्कुरा उठी.

"उम्म्म.. इतनी गदराई हुई घोड़ी हे झेल सकती है तेरा और जैसा तूने कहा उसका बुरा हाल हुआ तोह मतलब एक या 2 दिन तोह वो तेरे पास नहीं आयी होगी... वैसे गाँव में छोड़.. उनननननहहह.. घर में हे काम बन जाना तेरा.. ोुछहहह.. तेरा अंगूठा भी पतले लुंड सा है रे...", अर्जुन ने ऊँगली निकाल कर अपना अँगूठ हे ताई जी की मस्त गांड के भीतर भर दिया ज्यादा खोलने के लिए. छूट में हो रहे लगातार संकुचन से वो समझ चूका था के इस से ज्यादा वो अब और उसका छूट में झेल नहीं सकती. पर घर के भीतर हे कोई है और खुद ताई जी उसको बता रही है, ये उसके दिमाग को घुमा गया. और इसके साथ हे जैसे योनि के भीतर जोरदार बारिश से हो गयी. ललिता जी अपना सर पटकने लगी थी जिसके निचे अर्जुन ने हाथ रख कर उन्हें सहारा दिया और तबतक वो रुका रहा जब तक ललिता जी के गुलाबी चेहरे पर सुकून न लौट आया. सखलन ऐसा था जैसे ललिता जी ने ये जलभराव अर्जुन से संसर्ग के लिए हे एकत्रित करके रखा हो. पुक्क की आवाज से भीगा हुआ मूसल और भी फूला सूपड़ा धारण किया बहार निकला तोह जैसे छूट खोखली हे हो गयी. उन्हें गॉड में उठाये अर्जुन कक्ष के बड़े बिस्टेर पर ले आया. ये नरम भी था और उसके जोरदार धक्को को झेलने में सक्षम.

"ऐसा कौन है ताई जी वह हवेली में?", तेल की शीशी से थोड़ा तेल निकाल कर अपने मूसल पर सुपडे से जड़ तक मसलता हुआ वो बिस्टेर पर पाँव फैलाये लेती उस कामदेवी को निहारते हुए पूछने लगा जिनके अंग अंग में बस काम लहर हे भरी थी. 20 मिनट की जोरदार चुदाई वो भी लकड़ी के मेज पर टांग उठाये झेलने वाली ललिता जी कमजोर तोह कही से भी न थी. और अर्जुन को अपना लुंड लगातार मसलते देख उन्होंने इशारे से थोड़ा तेल अपने गुदाद्वार पर लगाने को कहा.

"तू दिल से ज्यादा सोचता है इसलिए पहले हे बोल रही हु की बुरा न मानियो लल्ला. तेरे शरीर के बदलाव है तोह विलक्षण लेकिन जो तेरा एक बार ले लेगी वो फिर किसी और से संतुष्ट भी नहीं होने वाली. और तू कामकला में अब नौसिखिया भी नहीं रहा पहली बार वाले अर्जुन की तरह. तू पता है के एक औरत कैसे तृप्त होती है और कैसे तेरी गुलाम बनती है. मधु और मैं इसका सबूत है तेरे सामने चाहे तूने मुझे मधु के बारे में इसलिए नहीं बताया क्योंकि उसकी इजत्त की बात है और न तू मेरे बारे में ऐसा कुछ कह सकता है. पर हम भाभी ननद के साथ सहेलियां भी है इसलिए तू इसके बारे में मैट सोच और मैं ऐसा कह कर तुझ पर सवाल नहीं उठा रही क्योंकि तू जबरदस्ती करने वालो में से तोह है नहीं. लेकिन कोई और तेरे साथ जबरदस्ती करे उस से पहले तू उसको अपने बस में कर ले. कहना कुछ नहीं है मुँह से, बस अपने इस अजगर के दर्शन करवा दियो कैसे भी करके.", अर्जुन कुछ पल तोह हैरान हुआ अपनी ताई के मुँह से बुआ का नाम सुन्न कर लेकिन उसको भी लगा के वो सही है.

"आप फिर भी इतनी पहेलियाँ बुझा रही हो ताई जी?", अर्जुन ने बिस्टेर किनारे खड़े होते हुए उनका एक पाने ऊपर करके अपने सीने पर टिकाया और हथेली से हे छूट के निचे उस सिवत भरे छेड़ पर ाचे से तेल चुपड़ने लगा. 2 उँगलियाँ एक दूसरे पर चढ़ा कर वो अंदर भी ठेलता जिस से ललिता जी मजे से उचक जाती. अब वो खुद भी अपने एक हाथ से गीली छूट को सहलाने लगी थी जैसे बातों से वो फिर गरम होने लगी हो.

"दामिनी और Roshni...aahhh.. देख मेरे पास ठोस वजह है इसके पीछे.. दामिनी लुंड की भूखी है और रिश्ते के मायने उसके लिए कुछ भी नहीं. मैंने खुद उसको गाँव के हे एक लड़के साथ लगे देखा था साल पहले. एक बार उसको बता दे की असली मरद कैसा होता है. फिर मुँह मारना छोड़ देगी कामिनी बहार. और रौशनी इतनी सीढ़ी है की कोई भी उसको पटक के छोड़ सकता है. कोई और करे उस से पहले ये काम तू कर दे अर्जुन, नहीं तोह वो दूसरी दामिनी बानी तोह काम ज्यादा ख़राब हो सकता है. विनोद का एक दोस्त रौशनी के साथ ऐसी हरकत कर रहा था और वो विरोध में बस मुँह फेर रही थी. मतलब घर से बहार वो थोड़े समय के लिए भी सुरक्षित नहीं है अकेले होने पर. लेकिन तू सिर्फ चुदाई नहीं करेगा, उसको हिम्मत देगा प्यार करते हुए. मुश्किल है मैं जानती हु लेकिन अब वो अकेली है और जवान बेटी की माँ भी. ऐसे तोह कितने हे उसके दब्बू स्वभाव की वजह से भोग लेंगे.", इस दलील से जैसे अर्जुन सहमत नहीं था लेकिन सुबह रौशनी बुआ की योनि और झांटे न्यास हे दिमाग में उभर आयी.

"चुदाई से अकाल भी आती है क्या ताई जी?", मुस्कुराते हुए उसने अपना तेल से चिकना मोटा सूपड़ा नरम कूल्हों के बीच उस बंद छेड़ पर टिकते हुए ताई के ऊपर झुक कर सही आसान बनाया और ललिता जी ने भी गहरी सांस लेने के बाद कूल्हों के निचे रखा तकिया सही करते हुए उसकी आँखों में देखा.

"छोड़ने से तोह ऐसी अकाल आती है लल्ला की डॉक्टर बन्न के भी नहीं आती. औरत का जीवन अजीब होता लल्ला, जो थोड़े से ाचे माहौल में उसको अपनी पहचान और भरपूर विश्वास देता है. ज्यादा खुले माहौल में असंतुष्ट औरत कोई देहलीज नहीं देखती और उसको सुधरने के लिए उसको ऐसा संतुष्ट करना पड़ता है की वो फिर और किसी के बारे में सोच भी न सके. फिर आती रौशनी जैसी बेबस और दब्बू, जिन्हे न घर पे कभी तवज्जो मिली और न ससुराल में. उधर भी बस दबा कर बंद रखा गया तोह वो गूंगी विरोध भी कैसे करे? पहले किस्से में महिला घर पे हे संतुष्ट थी, दूसरे में सुधारना पड़ा क्योंकि पाँव बहार जाने लगे और तीसरे में बचाना है क्योंकि बहार वाला घर भी आ सकता है और ये मुँह नहीं खोलने वाली."

"समझ गया मेरी प्यारी ताई जी.. लो फेर इस घर में रहने वाली को संतुष्ट कर दू.. आआह्ह.."

"तेरी तुह्हह्ह्ह्ह.. कमीने गांड है.. आअह्ह्ह मायआ... ", दबाव बना कर जैसे हे सुपडे का मुँह थोड़ा भीतर घुसा अर्जुन ने करारा धक्का जड़ते हुए रबर से चले को पूरा चौड़ा करते हुए एक धक्के में हे 2/3 लुंड नरम कूल्हों के बीच थोक दिया. ललिता जी तोह ऊपर हे उछाल पड़ी इस करारे वार से और जब पीछे होने लगी तोह कंधो पर अर्जुन की जकड से बस सर पटक कर हे रह गयी. गुदाद्वार तोह नजर हे नहीं आ रहा था और लिंग ऐसे धंसा था जैसे वो उनके कूल्हों का हे कोई हिस्सा हो. अब ललिता जी की हर बात आसुरी करता हुआ वो अर्जुन बुरी तरह से उत्तेजित होता हुआ पूरा लुंड उनके चिकने पिछवाड़े के भीतर तेल कर होंठो को चूसते हुए अपने सीने से हे उनके चुके मसलता हुआ इस अत्यधिक कसाव का मजा उठाने लगा. अर्जुन उन्हें बखूबी सँभालने का वक़्त देता हुआ अपनी अलग बात बताने लगा.

"ताई जी... उन्ह्ह.. एक तोह आपकी स्किन न इतनी मुलायम और चिकनी है की दिल करता है बस इसको सहलाता और मसलता हे राहु. और कोई स्त्री नहीं होगी जो आपके टक्कर की हो इस उम्र में भी.. वैसे कुछ बताना था मुझे आपको..", ललिता जी तोह अपने पिछवाड़े से पेट तक आ चुके उस भीषण लिंग को महसूस करके लगातार छूट को मसल रही थी. जहा अधिकतर महिलाएं गुदामैथुन के विरोध में होती है और उन्हें इस से सुख की अनुभूति नहीं मिलती वही ललिता जी जैसे इस तरफ से भी संवेदनशील और ऐसे संसर्ग की हितेषी थी. जब जब अर्जुन ने उनके साथ अप्राकृतिक संसर्ग किया था वो छूट से अधिक इसमें जोशीली दिखती थी. अभी भी उन्होंने हे अपने कूल्हे थोड़ा पीछे करते हुए उस मूसल को 2 इंच बहार निकाल अर्जुन को अपनी तरफ झटक लिया था. पूरा लिंग फिर से भीतर लेती वो टाँगे उठाये उन्मुक्त हो कर अर्जुन का सीना सहलाती उसके गाल और गर्दन को चूमने लगी. विशाल कूल्हे हवा में उठे थे जिनके बीचो बीच फंसा मोटा कामदण्ड हलके घर्षण जल्द हे देने लगा. चिकनाई जरुरत से भी अधिक हे थी जिस वजह से भूरा चला बहार खींचते वक़्त अलग हे चमक झलकता. भीतर से सफ़ेद मांस बहार निकलता और फिर वापिस अंदर जाते हुए भूरा चला भी साथ ओझल हो जाता. मटर से निप्पल और भरी चुके तोह पहले हे अर्जुन ने चूस और मसल कर लाल कर दिए थे लेकिन अब तोह वो भी सूज कर फूलने लगे. गुदा की गहराई में गरमाहट की अधिकता और चले द्वारा लिंग को कसने से सूपड़ा तोह फटने की कगार पर जा चूका था.

"आह्हः.. आह्ह्ह्ह.. ऐसे हे पेल लल्ला.. मैं ऊपर से हे मन करती हु रे तुझसे छुड़वाने के लिए पर जबतक तू पिछवाड़ा न भर दे मुझे भी चैन नहीं मिलता... अब बता तोह क्या कह रहा था... आह्ह्ह्ह.. चुके मत रगड़ बीटा, ब्लाउज पहन न मुश्किल हो जायेगा और तेरी दीदी के घर परेशानी होगी मुझे. उम्मम्मम.. जोर से मार लल्ला.. तेरे ताऊ का न घुसता इस रास्ते... आह्हः..", अब जब इतने मॉटे ढोल से कूल्हों की दरार हे 2 इंच गहरी हो तोह 4-5 इन्चा का लुंड भला कैसे गहराई मापता इस गद्दे की? अर्जुन तोह ऊपर से उनकी टाँगे अधिक से अधिक चौड़ी करके जड़ तक अंदर उतारने वाले धक्के पेल रहा था. टाँगे फ़ैलाने पर भी उनका गुदाद्वार आसानी से नहीं दीखता था और उस छोटे से छेड़ में इतना मोटा मूसल अब सरपट दौड़ रहा था.

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"ओह्ह्ह्ह ताई जी.. इतनी गरम हो आप.. देखो छूट बहने लगी फिर से..."

"उम्म्म्म.. ये दुखी थी रे तेरे बिना.. आह्हः मेरे लल्ला.. अब खुश हो चुकी और आह्ह्ह्हह्ह.. तू बता रे..", छूट के ऊपरी होंठो और दाने को रगड़ती हुई ललिता जी अपना सखलन सेहन करती हुई अर्जुन को लगे रहने के लिए उकसाती रही. अब वो धीमी चुदाई घनघोर रूप ले चली जिसमे अर्जुन सब भुला कर सुपडे तक लिंग बहार खींचता और फिर पत् से आवाज देता उनके मोटे कूल्हों से लगता. ललिता जी के चेहरे के साथ साथ मॉटे चुत्तड़ भी लाल हो चले थे. रात से हे भरा बैठा अर्जुन 40 मिनट से लगा हुआ था जो अब पागल घोड़े से गुर्राता सब छोड़ कर उनकी भारी जांघो को लगाम की तरह थामे अपने ताई जी का सर और कन्धा हे बिस्टेर पर टिकाये तूफानी झटके मारने लगा. यहाँ तोह ललिता जी की भी किलकारियां गूँज उठी जब उन्होंने लैंड की जड़ को अपने छेड़ पर भिड़ते पाया. सूपड़ा तोह भीतर कही पतली आँतड़ियों में ठोकर मारने लगा था जिस वजह से उनका होश हे खोने लगा. आजतक की ये सबसे बुरी गांड चुदाई थी लेकिन इसमें भी उन्हें नया मजा मिल रहा था. जल्द हे अर्जुन ने उनका निचला जिस्म लगभग अपने संग हे जोड़ लिया. वो झटके खता हुआ ऊपर से निचे की तरफ अपना गधा वीर्य ललिता जी की गहराई में किसी पंप की तरह खाली करने लगा था और मजे से ललिता जी की आँखें हे पलटने लगी. इस पल में सचमुच हे अर्जुन ने अपना सम्पूर्ण लिंग उनके भीतर भर रखा था और जिस्म पर ऐसी मजबूत पकड़ की वो हिल तक न सकीय. इतनी अधिक मात्रा में वीर्य निकला था की भीतर सूपड़ा हे जैसे उसमे डूबा हो.

'पुक्क' ये आवाज जैसे हर बार हे आती थी जब जब अर्जुन का लिंग उनकी गुदा से बहार निकला था. क्योंकि चुदाई शुरू होने के बाद वो निकलता हे सखलन के बाद था और शरीर बिस्टेर पर गिरते हे ललिता जी बेसुध सी आँखें बंद किये वैसे हे लेती रही. अर्जुन के चेहरे पर अब जैसे एक सुकून सा था लेकिन वो थकान नहीं दर्शा रहा था.

"आप आराम करो, मैं नाहा कर आता हु ताई जी.", अर्जुन इतना बोल कर खुले दरवाजे हे बाथरूम में जा घुसा. ललिता जी तोह निहाल हे हुई जा रही थी अपना बदन इतनी बुरी तरह तुड़वा कर. अगर ऐसी चुदाई अर्जुन किसी युवती की करता तोह यक़ीनन वो चीख चीख कर मोहल्ला इकठ्ठा कर लेती या फिर दोबारा कभी उसको हाथ तक न लगाने देती. गुदाद्वार पर कही कही सक्षम रक्त की बूंदे उभरी थी जिन के ऊपर भीतर से बह कर निकलता सफ़ेद तरल मलहम लगाने लगा.

'मार दिया रे आज तोह इस घोड़े ने. ऐसे ये ब्याह के बाद अपनी लुगाई की तोह नहीं ले सकता. कमरा sound-proof है यहाँ लेकिन घर पे तोह पूरा परिवार उठ खड़ा होगा अगर इसने ऐसा प्रीती के साथ किया तोह. न उसके साथ ये बहोत प्यार से हे करेगा. फूल सी है और उतनी हे प्यारी भी.', अपने हे विचारो में आँखें मूंदे लेती ललिता जी की आँख हे लग गयी ऐसी जिस्म तोडू दोनों तरफ की चुदाई से.

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"ये बैग ले कर कहा जा रही हो जिनि?", कार की चाबी ऊँगली में घूमती हुई सुर्ख सलवार कमीज में सजी जीनत सचमुच एक bhari-poori युवती दिख रही थी और ख़ास बात थी की इतने भरी सीने पर कोई दुपट्टा नहीं था. श्रृंगार के नाम पर आँखों में ख़ूबसूरती से सजा काजल और होंठो पर बैंगनी सुर्खी सजाये खुले बालो में वो इतनी क़यामत दिख रही थी की स्वयं मेघना जी ने अपनी बिटिया के कान के पीछे नजर का टीका लगाया उसकी तारीफ करने के बाद. नजरो में हे रवीना बुआ ने भी अपनी भतीजी को बता दिया था के वो कितनी कमाल दिख रही है. लेकिन उसके हाथ में कला चमड़े का बैग देख कर ये सवाल जन्नत ने किया, जो कल के आयोजन के लिए मेहमानो को फ़ोन करने के बाद अपनी माँ और बुआ के लिए ब्यूटी पार्लर वालो को जल्द आने का सन्देश दे कर घर की बैठक में अपनी माँ को सब बताने आयी थी.

"ओह डीडू, मेरी दौड़ कहा तक की रहती है? आज मेरा स्टे साक्षी के हे घर है और इसमें मेरे कपडे है. रात को सोने के समय बदलने के लिए और शाम को एक पार्टी है जो साक्षी ने राखी है मेरे लिए. 4-5 सहेलियां जो राजहंस नहीं आनेवाली वो उसके घर हे आ रही है. आप बताओ अगर आपने भी चलना है तोह?", जीनत की उद्दंड मुस्कान देख कर प्रतिउत्तर में उसकी माँ के साथ साथ बुआ और जन्नत भी मुस्कुरा उठी लेकिन जन्नत जैसे उसके जवाब से संतुष्ट नहीं थी. पर वो उसको टोकना भी नहीं चाहती थी क्योंकि जीनत में भी एक ख़ास बात थी की वो चाहे कुछ भी कहे अगर वो कही जा रही है तोह वो बताई जगह हे जाती थी.

"अभी तोह सिर्फ रोक्का है जिनि तोह तेरे ये हाल है. सगाई और शादी पर तू क्या करने वाली है?"

"सगाई पर तोह डीडू फार्महाउस पर बियर पार्टी रहेगी जिसमे आपको भी आना पड़ेगा लेकिन बड़े लोग अल्लोवेद नहीं होंगे. शादी से पहले और लेडीज संगीत के बाद मैं बैचलर पार्टी रखूंगी और उधर आप भी अल्लोवेद नहीं होगी. हाँ बुआ को ले जाऊंगा वह अपने साथ.", बिंदास स्वाभाव वाली जीनत की ऐसी बातें सुन्न कर जन्नत तोह लाजवाब हे रह कर हंसती रही पर रवीना बुआ उसकी बगल में आ कड़ी हुई.

"ये करि न मेरी भतीजी ने सही बात. वैसे तेरी मम्मी को पता नहीं है बैचलर पार्टी का. इन्हे भी साथ ले चलना?", अब हंसने की बारी मेघना जी की थी और झेंपने की जीनत की जो अपने बुआ से बड़े हे सलीके से गले लगने के बाद हाथ हिलती हुई बहार निकल चली. चेहरे पर शर्म, चाल में शौखी और जाने की जल्दी. श्वेता का घर भी यहाँ से कुछ ज्यादा दूर नहीं था लेकिन कुछ एकांत में हे था और इतना हे बड़ा जितना मर कपूर का ये बांग्ला. रवीना जी का ध्यान पूरी तरह से जीनत पर हे रहा जब तक वो अपनी कार में बैठ न गयी और द्वारपाल ने गेट न खोल दिया.

"भाभी, मुझे तोह लगता है जिनि की शादी न 2 साल पहले हे कर देनी चाहिए थी. उसके सामने ये जानू तोह बकरी हे लगती है चाहे लम्बी ज्यादा हो ये उस से. शादी के लिए इसने हे हाँ की थी न या अपने किसी बॉयफ्रेंड के बारे में बताया नहीं.?", सेविका गरम कॉफ़ी की ट्रे लिए भीतर चली आयी थी और जन्नत के लिए निम्बू पुदीने का ठंडा तरल. मेघना जी एक सोफे पर बैठी हुई कोई लिस्ट देखने लगी थी और ये सुन्न कर उन्होंने हँसते हुए ऐसा मुँह बनाया जैसे ये बात अजीब हो. अपनी बुआ की बगल में बैठी जन्नत बस मुस्कुरा रही थी पहले थोड़ा गुस्सा दिखा कर.

"इसकी आदत है की सुबह उठते हे बाकी काम बाद में और खुद का वजन तोलना पहले. पूरे दिन में 3 से ज्यादा रोटी नहीं खाती और non-veg सिर्फ वही जो तंदूर का हो या sea-food. हाँ phal-fruit और जूस के सहारे चलती रहती है सारा दिन इसलिए पिछले 5 साल में एक किलो न बढ़ा इसका और वो महारानी जी क्रीम रोल, बटर चिकन, दूध, माखन और मार्किट का हर टाला भुना खाना खाती रहती है. ध्यान वो भी रखती है अपनी सेहत का लेकिन खाने की शौक़ीन है अपने पापा की तरह. थोड़ा असर है अपनी बड़ी बहिन को जो कसरत कर लेती है और पेट न होने की वजह से सीना और बैक भारी दीखते है उसके."

"दीखते नहीं माँ उसके भारी है. मेरी 26 वैस्ट है तोह उसकी 30, मेरी ब्रैस्ट 32 है और उसकी 36 वो भी डी.. बैक का तोह पूछो हे मैट क्योंकि एक तोह बिस्टेर बहोत पसंद है और ऊपर से बैठे रहना. मार्किट गए तोह बड़ी मुश्किल से उसके साइज की जीन्स मिली थी क्योंकि 30 वैस्ट पर 34 हिप्स तोह आ जाते है लेकिन इसके 36-37 होंगे. पता नहीं वो मरियल सा लल्लू हेमंत इसके साथ खड़ा हुआ कैसा लगेगा? सिर्फ कद हे लम्बा है लेकिन जिनि कद में भी कोई एवरेज थोड़ी न है. जो सूट इसने आज पहना है न ये पिछली से पिछली दिवाली पर लिया था और तब ये लूसे था लेकिन अब ये ढीला करवाने के बाद भी कितना टाइट दिख रहा था. मेरा तोह जब बढ़ाना होगा मैं बढ़ा लुंगी पर इतना थोड़ी न ाचा लगता है.", जन्नत को अपने पतले होने पर पहली बार थोड़ा फिकरमंद देख कर मेघना मंद मंद मुस्कुरा रही थी क्योंकि यहाँ उसने अपनी छोटी बहिन के साथ खुद का साफ़ साफ़ समीकरण किया था और हर जगह वो काफी पीछे थी.

"जानू, मर्द तोह kaam-kaaji जीवन में पतले हे होते है लेकिन उन्हें लड़कियां हमेशा भरे पूरे शरीर वाली पसंद आती है. भाभी को हे देख ले तू, जब भैया ने इन्हे देखा तोह किसी से बिना पूछे हे कह दिया था के शादी तोह मैं इनसे हे करूँगा. हाँ उस समय ये जिनि जितनी तोह भरी हुई नहीं थी लेकिन तेरे पैदा होने के बाद उस से भी ज्यादा सेक्सी लगने लगी थी. थी तोह तू भी gol-matol जब तक छोटी थी. इवन जिनि पैदा हुई तोह पौने 3 किलो की थी और तू पूरे 4 किलो की. और अब भी अपनी माँ को देख ले, तुम दोनों को पूरी टक्कर देती है.. तुझे नहीं क्यों की तू रेस से हे बहार है. हाहाहा..", रवीना बुआ की बात सुन्न कर जन्नत का तोह चेहरा हे लटकने लगा था और अपनी ननद की जांघ पर हाथ मार कर हंसती हुई मेघना अपनी तारीफ पर शर्मा भी रही थी.

"कुछ भी बोलती हो तुम रवीना. गौतमी और जाया (हेमंत की माँ) के सामने भूल से भी ये सब न कहना, बड़ा मजाक बनती है फिर वो दोनों. और मेरी ये बची अलग रेस की है, हम सभी से कही बेहतर और खूबसूरत. याद नहीं तुझे जब तेरे मिया जी के नए ऑफिस की ओपनिंग पर पार्टी राखी थी? सबसे ज्यादा लोगो ने जानू के बारे में हे पुछा था और आज भी दबे छिपे कई लोग इसके रिश्ते की बात करते है क्योंकि ऐसी खूबसूरत पारी आखिर कौन नहीं चाहेगा?", जन्नत अभी भी कुछ नौटंकी कर रही थी जबकि अंदर हे अंदर उसको भी लग रहा था के वो कुछ ज्यादा पतली है.

"माँ वैसे बुआ ने कुछ गलत भी नहीं कहा. एक तजा एक्साम्प्ले हे देख लो आप. कहा तोह गौरव भैया कभी शादी के लिए हे तैयार नहीं थे और फिर जब उन्होंने वो माधुरी को देखा तोह गर्मी में हे शादी कर ली. फोटोज में हे देखा है लेकिन वो जिनि से भी ज्यादा हेअल्थी लग रही थी या बराबर होंगी पर काम नहीं. दिखने में भी खूबसूरत है. तोह इसका मतलब यही हुआ न के मलेस को मोस्टली हेअल्थी लड़कियां हे पसंद आती है?", जन्नत की बात का जवाब इन दोनों के पास हे था और दोनों हे जानती थी की वो किसको सोच कर ऐसा बोल रही है.

"अर्जुन.. तुम्हारा दोस्त अर्जुन क्या कहता है इस बारे में?", रवीना कुछ हैरान रह गयी क्योंकि उसने तोह सिर्फ अर्जुन हे कहा था लेकिन जन्नत की माँ ने तोह आगे पूरा नाम के साथ सवाल भी जोड़ दिया. और दोनों एक दूसरे को देखती हुई फिर जन्नत को देखने लगी जो शर्म को छिपाने की भरसक कोशिश करती हुई मुँह बनाते हुए बोली.

"वो मुझसे भी छोटा है तोह उसकी राये मायने थोड़ी न रखती है. और वो हेमंत जैसा दुबला पतला भी नहीं है की जिनि के सामने अजीब लगे. सेव 6 फ़ीट का है और ऊपर से मसल्स ऐसे की दोनों हाथो में पूरा न आये.", इतने विवरण को सुन्न कर अब ननद भाभी दोनों हे हंसने लगी थी और फिर अपनी बेटी को घूरता हुआ देख मुँह पर हाथ रखती हुई अपनी हंसी दबाने लगी.

"मुस्कले भी नाप लिए है? वाह.. ये सही दोस्त है तेरा जानू. वैसे भाभी, जरा हमे भी मिलवाओ गौरव की बहु से और अर्जुन से तोह ये कल सबको मिलवा हे देगी."

"सबको कब कहा बुआ मैंने? और वो बस दोस्त है.."

"चल शिल्पा के हे घर चलते है रवीना. फ़ोन आया था उसका थोड़ी देर पहले की 12 बजे हमारा खाना उधर हे है. गौरव कल लौट आया था हनीमून से और आज उसकी सास भी आयी हुई है कुछ दिन बचो का घर देखने के लिए. उस वक़्त तोह पहुंची नहीं थी घर लेकिन अब आ गयी होंगी. शादी में जाना न हुआ लेकिन अब तोह मिल हे आते है उनसे. तू चलेगी क्या जानू?", अपनी हे उलझन में लगी जन्नत ने तोह जैसे आधी हे बात सुनी थी और गौर भी नहीं किया ज्यादा.

"जाओ न माँ आप लोग हे जाओ. मैं उधर करुँगी हे क्या और ऊपर से वो गुनगुन दिमाग अलग खाने लगती है. मैं घर हे ठीक हु और पापा का फ़ोन आया क्या?"

"तेरे पापा शाम को 4 बजे तक आएंगे अपने भाई और गौतमी को साथ हे ले कर. वैसे शिल्पा कह रही थी की की माधुरी का भाई भी आएगा जिसके बारे में मैंने उस से पुछा भी था फोटो देखते समय. हाँ.. उसका नाम भी अर्जुन हे है और शिल्पा तोह जैसे उसका नाम लेती हुई ऐसे खुश हो रही थी जैसे उसके सपनो का शहजादा आ रहा हो. खीर, पालक पनीर, भरवा भिंडी और आलू प्याज का रायता ख़ास अर्जुन की पसंद का माधुरी के साथ मिल कर शिल्पा ने बनाया है. पता नहीं कैसा लड़का है जो ऐसे खाने को तरजीह देता है.", अब जैसे जन्नत की धड़कन एकाएक हे तेज हो चली थी लेकिन उसकी माँ तोह जान बूझ कर रवीना से बात करने का दिखावा कर रही थी.

"ऐसा लड़का जो भिंडी पालक खता हो.. युककक. क्या भाभी? मुर्गा शुर्गा होना चाहिए.. ओह अभिषेक की तोह फॅमिली ब्राह्मण है न? पर वो तोह खा लेता है.. चलो खीर हे खा लेंगे और नयी बहु को शगुन भी देते आएंगे. जानू बीटा, वो पार्लर वाली 2 बजे तक आ रही है न? अगर हम लेट हो जाए थदो तोह तू हे अपना कुछ मैनीक्योर पेडीक्योर करवा लेना. चलो भाभी, मैं 5 मिनट में आयी तैयार हो कर. जानू के दोस्त से कल मिल लेंगे, आज इस गौरव के साले से मिल लेते है.", रवीना भी पूरे मजे ले रही थी अपनी भतीजी के जो आँखें बड़ी करती हुई दोनों को हैरानी से देख रही थी.

"आप दोनों मुझे घर में अकेला छोड़ कर जाओगे? और भरवा भिंडी तोह मैं भी खाती हु न, बस रोटी बिना घी की. थोड़ी खीर खाने से मेरा कुछ नहीं बिगड़ने वाला और गौरव भैया की बीवी को मैंने कौनसा देखा है. आप लोग मेरे बिना मैट जाना हाँ.. 10 मिनट वेट करो प्लीज. इतना टाइम लगेगा हे चाहे बुआ 5 मिनट कहे.", आगे कोई जवाब सुने बिना हे जन्नत अपना वैसे हे भरा गिलास टेबल पर रख कर पीछे अपने कमरे की तरफ दौड़ गयी और इधर ये दोनों एक दूसरे को देख मुस्कुरा रही थी.

"तोह ये अलग अलग नहीं है न भाभी?"

"एक हे है और जानू ने भी पहली बार उसको फोटो में मेरे साथ हे देखा था जब मैंने उसको जिनि के लिए पसंद किया. पर बात नहीं बानी और इधर ये पगली उसको बता दोस्त रही है पर मैं इसकी माँ हु और जानती हु के ये प्यार करने लगी है उस से. कल तोह मोटरसाइकिल पर घूम रही थी उसके साथ और जितनी खुश ये उस वक़्त दिख रही थी न रवीना, मेरी बची उतनी खुश मैंने कभी नहीं देखि. चल अब प्यार है और इसको कोई और रिश्ते का नाम जब ये खुद हे नहीं देना चाहती तोह मैं भी अपनी बची की ख़ुशी में खुश हु. तू बस इतना करियो रवीना, रोकके के वक़्त कोशिश करियो की जानू को सताने के लिए ये लड़कियां अर्जुन के आसपास न मंडराए."

"भाभी, उन्हें तोह समझने की जरुरत नहीं क्योंकि इसके गुस्से से वैसे भी सभी दूर हे रहती है. औपचारिक परिचय से ज्यादा क्या होगा? लेकिन एक तोह आपकी देवरानी और दूसरा मेरी लाड़ली, इन्हे कौन समझाए? लड़का स्मार्ट है क्योंकि जानू की पसंद ऐसी वैसी तोह नहीं होगी.", यहाँ भी बुआ ने भतीजी का राज राज हे रखा जबकि वो 3 तस्वीरें देख चुकी थी अर्जुन की.

"गौतमी को खुद समझ आ जाएगी रवीना क्योंकि अर्जुन वह उमेद भाई साहब के स्थान पर भी आ रहा है, जानू के दोस्त के अलावा. और उनके सामने तोह स्वयं तुम्हारे भाई साहब मर्यादा में रहते है और ये यक़ीनन आएगा भी वैसे हे अंदाज में जैसे उमेद भाई साहब आते है. 2 हे बातें तोह उनकी सबसे ख़ास है और सभी उनके मुरीद भी. एक तोह स्पष्ट बोलते है जैसे हर महफ़िल और मीटिंग के मालिक वही हो और दूसरा जहा भी महफ़िल या मीटिंग होती है, जगह उनकी हे रहती है चाहे पार्टी देने वाले कोई भी हो.", मेघना की बात से रवीना पूरा इत्तेफ़ाक़ रखती थी लेकिन जगह का सुन्न कर उसके भी कान खड़े हो गए.

"ये जगह तोह कुमार साहब की है न भाभी? ी मैं राजहंस के ओनर तोह रॉयल परिवार है."

"Co-owner अर्जुन रेखा शर्मा है उस जगह का और जानू लंच पर वही गयी थी उसके साथ. पूरा रेस्टॉरेंट सिर्फ जानू के लिए हे बुक था. अंदाज कही से भी उमेद भाई साहब से कमतर नहीं है लड़के का. अब देखना ये होगा की बाकी गेस्ट्स इसको कैसे हजम करने वाले है. कैंसल साहब की फ़िक्र सबसे ज्यादा है मुझे तोह. उनके हे गढ़ में 5 स्टार होटल से ले कर multi-story प्रोजेक्ट तक शुरू कर चुके है उमेद जी वो भी मर गजेंद्र भल्ला जैसे पावरफुल व्यक्ति के साथ. भल्ला जी सपरिवार आने का बता चुके है कल हे तोह देखना इंटरेस्टिंग होगा की वो अर्जुन को कैसे ट्रीट करते है जब उमेद जी की जगह उस से मुलाकात होगी.", अभी इनकी बातें कोई और रुख लेती जन्नत हे इधर चली आयी. खुले बाल जिन्हे अभी ड्रायर किया गया था और चूड़ीदार सफ़ेद सलवार के ऊपर मेहरून रंग का चुस्त कमीज जिस पर सीने तक मोती वाले बटन लगे थे.

"माँ, मेरी येलो बँगलेस नहीं मिल रही. और आप लोग अभी तक ऐसे हे खड़े है?", अब दोनों महिलाओं की निगाह ऊपर से निचे तक इस अप्सरा को निहार रही थी जिसके आँखों में बारीक काजल और माथे पर छोटी सफ़ेद बिंदी के साथ गले में laal-safed दुपट्टा भी बड़े सलीके से सजा था. पाँव में पहली बार पायजेब नजर आयी थी उन्हें और लम्बाई के बावजूद 2 इंच की एड़ी वाली खूबसूरत सैंडिल.

"सलवार कमीज कब लिया तुमने?", मेघना जी ने तारीफ करने की जगह हैरत से बस यही पुछा जबकि हालत खुद रवीना की भी ऐसी हे थी इस लड़की को पारम्परिक परिधान में देख कर.

"मैं रेड हे पहन लेती हु अगर आपको नहीं पता तोह. लेकिन तैयार तोह हो जाओ आप लोग. वैसे ये सूट कल हे लिया है मैंने मेरी फ्रेंड के बौतिके से. ाचा है न बुआ?"

"सही जा रही हो बीटा तुम.. सब ाचा है. भाभी मैं भी कुछ पहन लेती हु, चाहे अब सबकी नजर इस से नहीं हटने वाली. जिसने दिलवाया है उसकी तारीफ मैं वही कर दूंगी.", तंज के साथ एक गहरी मुस्कान देती हुई रवीना बुआ तोह अपने कमरे की तरफ निकल चली पर अब मेघना जी को दूसरी बेटी के भी नजर का टिका लगाना हे पड़ा.

"मुझे तोह समझ नहीं आ रहा जे कल तूने ऐसा हे कुछ पहना तोह मैं लोगो के सवालों के क्या जवाब दूंगी. भगवन हर नजर से बचाये मेरी बची को.", हर नजर पर जन्नत ने थोड़ा मुँह बनाते हुए अपनी माँ को देखा तोह वो सर पे हाथ मारती हुई हँसते हुए बात दुरुस्त करने लगी.

"हर बुरी नजर से बचाये और उसकी नजर बानी रहे जिसकी ये चाहती है. उमाहहह.. अब लगता है मेरी जानू गुड़िया बड़ी हो रही है."

"हाँ हो तोह रही हु लेकिन I'm स्टिल नॉट कम्फर्टेबले. पता नहीं ये ear-rings इतने भरी क्यों होते है?", अब कही बाल हटाने पर झुमके सही करती जन्नत के कान दिखे तोह मेघना जी के भी चेहरे पर प्रशंशा के भाव उभर आये.

"ये भी उसने हे दिलवाये है?"

"ये भी से मतलब माँ? सूट मैंने लिया है, हाँ उसने हेल्प की थी पसंद करने में और ये बस बहार वो छोटी मार्किट है न वह से ले लिए थे पायल लेते हुए. चलो आप जा कर रेडी हो जाओ, मैंने थोड़ा लूज़ बांध लेती हु हेयर. खुले ठीक नहीं लग रहे, ज्यादा लम्बे है.", बालो को लहराती हुई वापसी जाने लगी तोह अब माँ की नजर अपनी बेटी के लम्बे बालो के साथ साथ उसके शरीर पर भी थी. गडरायेपन में बेशक वो जीनत से कमतर थी लेकिन ऊँची लम्बी और एक बेहतरीन बनावट थी जन्नत के जिस्म में. गहरे लाल रंग में तोह आज जैसे उसने कुछ देर पहले वाली जीनत को 19 साबित कर दिया था.

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आज अभिषेक जी की निवास स्थल पर उनका पूरा परिवार मौजूद था जैसा अमूमन देखने को नहीं मिलता था. अक्सर वो खुद हे राजनीति की वजह से बहार रहते थे और गौरव की तोह नौकरी हे यहाँ से 100 किलोमीटर दूर थी जहा से वो सिर्फ shaniwar-eitwaar हे घर रहने आता था. पूरे घर और आँगन को सुबह जल्दी हे साफ़ करवा दिया गया था और उसके बाद एक कमरे को किरण ने ाचे से व्यवस्थित किया था जहा ललिता जी रुकने वाली थी. उसकी माँ बर्षा भी रसोईघर में शिल्पा और माधुरी के साथ लग कर बचा खुचा काम निबटवाने में मदद कर रही थी. पशुपति कभी भी घर के इस हिस्से में नहीं आता था सिवाए बैठक और आँगन के. अभी भी वो बैठक के भीतर सभी सोफों पर गड्डियां सजाने के बाद मेज को चमका कर कपडे बदलने अपने क्वार्टर की तरफ गया था. गाडी का हॉर्न बजते हे गेट पर खड़े अभिषेक जी के ड्राइवर ने हे दरवाजा खोला जहा अर्जुन अपनी ताई जी संग इधर सही समय पर आ पंहुचा था. होटल में एक जोरदार मिलान के बाद कुछ सुस्ता कर अब दोनों हे तैयार हो कर तजा दिख रहे थे.

"नमस्ते जीजा जी.", अर्जुन कल हे तोह आया था इधर और भीतर अभिषेक जी की कार के बराबर अपनी गाडी रोकने के बाद सबसे पहले उसने बड़े जीजा के चरण स्पर्श किये जिन्होंने ऐसा करने के बाद उसको गले लगा कर आशीर्वाद दिया. गौरव ने बस हाथ मिलाया और पाँव छूने न दिए. फिर गले लगने के बाद अपने स्वभाव से विपरीत उन्होंने भी अर्जुन की तारीफ की.

"ाचे दिख रहे हो भाई, लगता है गाँव कुछ ज्यादा हे रास आ गया. थोड़ा अपनी दीदी को भी अपने जैसे बना दो यार.", अब अर्जुन से पहले सामान का बैग स्वयं अभिषेक जी ने हे उठा लिया था और गौरव की शिकायत सुन्न कर अपने दामाद को आशीर्वाद देती ललिता जी के चेहरे पर बल पड़ने लगे.

"हाहाहा.. ये मजाक कर रहा है मम्मी जी. वो माधुरी ने घर का हे रट्टा लगाया हुआ था जबसे ये लोग गए थे घूमने. गौरव तोह कल भी रुकना चाहता था लेकिन मोहतरमा इन्हे ले आयी. और सच कहु तोह अब लगता है की ये घर सही मायने में घर बन चूका है. आपको आने में तकलीफ तोह नहीं हुई न मम्मी जी?", ललिता जी बातों का अर्थ समझ कर मुस्कुरायी तोह बारी गौरव की थी झेंपने की क्योंकि उसने तोह अपने साले से जीकर किया था लेकिन बड़े भाई ने हनीमून की पोल खोल कर रख दी.

"तकलीफ का तोह सवाल हे नहीं उठता दामाद जी. मेरा लल्ला सही समय पर मिल गया था और उसके बाद मार्किट में भी कोई परेशानी नहीं होने दी. शहर पहले भी देखा था लेकिन अब ाचे से देखा तोह पता चला के बिटिया रहने के लिए तोह बड़े शहर आ पहुंची है. अभी घर गृहस्थी की आदत नहीं पड़ी होगी न उसको, इसलिए देखने चली आयी की वो क्या गड़बड़ कर रही है.", ललिता जी तोह आदतन एक माँ स्वरुप हे पेश आ रही थी और चिंता होना भी लाजमी था क्योंकि बेटी जो ब्याही थी, वो भी इतनी दूर.

"एक तोह मैं आपका दामाद नहीं हु मम्मी जी तोह आप बस बीटा कहो और ये गौरव भी बीटा हे है. दूसरा ये की घर ग्राहस्थी में जितनी निपुण माधुरी है मुझे नहीं लगता की आपके घर में भी कोई लड़की होगी. शिल्पा तंग आ गयी है उसको बोल बोल कर पर रात में भी खाना उसने हे पकाया और सुबह से भी वो शिल्पा को बस साथ खड़े किये है, काम खुद कर रही है सारा. आओ भाई अर्जुन, इनसे मिलो. ये है हमारी प्यारी गुनु जी, छोटी बहिन भी और बिटिया भी.", गुनगुन की गॉड में शिल्पा जी का बीटा था जिसको ललिता जी ने हे थाम लिया उस प्यारी सी गुड़िया को आशीर्वाद देते हुए.

"कल मिला था जीजा जी मैं इनसे और सच कहु तोह मैंने शोले एक बार हे देखि है लेकिन ये हेमा जी पर भरी पड़ेंगी, लिख के दे सकता हु.", अर्जुन के ऐसे तंज पर फूलो वाला कुरता और पटिआला सलवार पहने कड़ी गोल मटोल सी किरण भी तुनक उठी.

"और भैया, ये उसी फिल्म के रहीम काका है.. इतना सन्नाटा क्यों है भाई? हुंह.. पहली बार आये और मेरे लिए गिफ्ट भी नहीं लाये जबकि कल हे बता दिया था भाभी ने की मैं इस घर की सबसे ख़ास मेंबर हु.", गौरव कुछ बोलना चाहता था जो अपने बड़े भाई और बाकी सबकी तरह हंस रहा था अर्जुन का उपहास होने पर लेकिन बहार आती शिल्पा जी और माधुरी को देख कर खामोश रहना हे ठीक समझा.

"आये हाय मेरी गुनु जी के तेवर तोह देखो जरा. ये नहीं की आते हे पानी पुछु, गिफ्ट पहले मांग लो. कैसे हो मम्मी जी?", शिल्पा जी ने तोह अर्जुन पर कोई ध्यान हे नहीं दिया एक कातर निगाह दाल कर फिर ललिता जी से गले लगी और उसके बाद माधुरी अपनी माँ से थोड़ा कस कर लिपट गयी.

"ऐ दीदी, एक तोह मेरी बड़ी बहिन ने मुझे हे नजर अंदाज कर दिया और ऊपर से दोनों जीजा के साथ उनकी ये फूलन देवी सामने छोड़ दी. कोई तोह मेरा साथ दो.", अर्जुन ने शिल्पा जी को भी लपेट लिया था नखरे से देखती हुई किरण के साथ. और शादी के जोड़े जैसे सलवार कमीज में काली तक लाल चूड़े पहने हलके पसीने में माधुरी ने अपने छोटे भाई को देखा तोह अर्जुन ने हे उन्हें अपनी बाहों में भर लिया. उसके सीने से लग कर माधुरी तोह अपने आंसू हे न रोक सकीय और चेहरा अर्जुन का भी थोड़ा विचलित सा हो उठा, आखिर बड़ी बहिन भी थी और पहला प्यार भी.

"अब ऐसे हे खड़ा रखोगी दीदी या बैग से गिफ्ट निकाल कर अपनी ननद रानी को भी डौगी. पानी वैसे किसी ने नहीं पुछा अभी तक.", अर्जुन ने ये बात कहने के साथ हे माधुरी दीदी को अलग करके उनकी आँखें अपने हे रुमाल से साफ़ की जो गौरव, अभिषेक के साथ किरण और बर्षा जी भी देख रही थी. ललिता जी ने पानी का गिलास खुद पीने से पहले अर्जुन को दिया और ये लोग बैठक में चले आये. अब शिल्पा जी ने पहली बार मुँह खोला.

"मम्मी जी, ये लड़का मुझे जरा भी पसंद नहीं. कल पहली बार घर आया और बिना कुछ खाये चला गया घर से. क्या ये इसका घर नहीं है या मैं सिर्फ नाम की हे बड़ी दीदी हु?", अब पानी से फारिग हो कर अर्जुन फिर से इस बैठक को हे देख रहा था जहा वो कल आया था और शिल्पा जी की बात सुन्न कर उसने अभिषेक जी की तरफ देखा जयस्व जवाब उनके पास हो.

"मैडम, तुम्हारा भाई कल हिमाचल से मोटरसाइकिल पर सीधा इधर आया था वो भी जरुरी फाइल लेने. उस से पहले थोड़ा मसरूफ था लेकिन अब शनिवार तक ये नियमित एक समय का खाना तुम्हारे हाथ का हे खायेगा. मेरे और गौरव की gair-hajri में अर्जुन तुमने कैसे भी करके हर रोज एक बार जरूर आना है इधर.", अभिषेक जी की बात अर्जुन सहर्ष स्वीकारता हुआ हामी भरने के साथ दोनों हाथ शिल्पा जी के चरणों में रखने लगा तोह वो अपनी हंसी न रोक सकीय. अब कुछ समय तक ललिता जी दोनों दामाद और बेटियों के शगुन करने लगी, ठीक एक जैसा और उसमे पहल भी अभिषेक और शिल्पा की रखते हुए. चारों के कपडे, उपहार, शगुन और मिष्ठान मेवे देने के साथ दोनों बेटियों की झोली में अलग से छुहारे और चंडी के shishu-paanv सौंपने के साथ उन्होंने चारो के हे तिलक भी किया. अर्जुन के साथ हे किरण, उसकी माँ भी ये सब देख रहे थे. चारों उनका आशीर्वाद ले कर फारिग हुए तोह अर्जुन ने बैग में से 2 खूबसूरत से सूट, एक लड़कियों की आधुनिक jean-top और लड़कियों की कलाई घडी किरण की हाथो में रख दी.

"मजाक अपनी जगह है जी, आप दीदी की ननद है और ये आपका शगुन जो घर की लक्ष्मी को हे दिया जाता है.", किरण हैरत से उसके गंभीर चेहरे को देख रही थी और अपने हाथो में इतना सामान भी. और ज्यादा हैरानी हुई जब ललिता जी ने पायजेब की जोड़ी के साथ एक खूबसूरत सी सोने की चैन जिसके भीतर 'क' का लॉकेट था वो अपने हाथो से किरण को पहनाई और उसकी माँ के टोकने से पहले हे शिल्पा जी ने बर्षा को मन कर दिया. कुमकुम और चावल का तिलक करके उसको भी नगद शगुन दिया और उसके बाद बर्षा को अपने सामने बैठा कर पति पत्नी के लिए वस्त्र और वैसे हे शगुन के लिफाफे भी.

"माँ जी..", बर्षा कहते कहते हे रुक गयी.

"चारदीवारी के भीतर हर कोई परिवार का हे तोह होता है फिर अनादर करने का पाप हम कैसे कर सकते है.? मुझे कमरा दिखा दो जरा शिल्पा बेटी, हाथ मुँह धोने के लिए. माधुरी बिटिया, सामान अपनी समझ से रखवा देना जहा उचित लगे.", सामान खुद गौरव ने हे उठा लिया था ललिता जी का और अब ये तीनो ललिता जी के साथ निकल चले तोह पीछे बचे अभिषेक जी ने अर्जुन से चर्चा शुरू की. किरण तोह ख़ुशी से पहले हे दौड़ चली थी नए कपडे अपने कमरे में देखने.

"यार तुम कई मायने में ने डॉक्टर अंकल से बहोत अलग हो और उमेद अंकल जैसे ज्यादा दीखते हो."

"हाहाहा.. मतलब अब आप मेरी टांग खिंच रहे है कल पार्टी में मैं उनकी जगह जा रहा हु इसलिए? आप भी तोह आ रहे है वह. वैसे मैं तोह कही से भी चाचा जी जैसा नहीं हु."

"बोलने से ले कर जब तुम किसी को गंभीरता से देखते हो तोह ठीक वैसे हे लगते हो बस तुम्हारे चेहरे पर दाढ़ी नहीं है उनके जैसी. कद्द हे देख लो, तुम बस उनसे कुछ हे काम होंगे लेकिन घर में तोह सबसे हे लम्बे हो. तुम्हे पता है तुमने मेरा कितना बड़ा काम किया है अर्जुन?", अभिषेक जी के गंभीर चेहरे को देख अर्जुन ने ना में सर हिला दिया.

"सब जानते हो फिर भी अनजान. इस बार के इलेक्शन में तुमने हे मुझे सीट दिलवाई है न रानी माँ से?"

"मैंने सिर्फ कहा था जीजा जी और आप उसके योग्य है बस कुछ चापलूस आपको आगे नहीं आने दे रहे थे. पर फिर भी मैं चाहता था के आपको ग्रामीण हलके से टिकट मिलती, वह बस आपके साथ बौ जी खड़े भर हो जाए तोह वोट और कही नहीं जाने वाला. पर अमृता जी स्वयं वह से कड़ी हो रही है."

"सही तोह है अर्जुन और शहर में मेरी भी ाची पकड़ है और ऊपर से खुद कुमार साहब मेरे प्रचार में शामिल रहेंगे. मैं साड़ी रात शिल्पा से यही बात करता रहा जब घर लौटा. पता नहीं तुम कौनसी छड़ी घुमा रहे हो भाई लेकिन सबकुछ बदल कर बेहतर हो रहा है.", अभी वो आगे कुछ बताते की आँगन में थोड़ा हंसी ख़ुशी की आवाज गूंजी. इनमे से सबसे तेज थी किरण की आवाज.

"ओह वाओ... जन्नत दीदी, क्या सरप्राइज दिया है आपने आज. नमस्ते आंटी जी. बड़ी भाभी, कपूर आंटी आये है और आज तोह जन्नत दीदी को भी टाइम मिल गया.

"लो भाई अर्जुन, कल के मेजबान से भी मिल लो. मैं करवाता हु तुम्हारा परिचय.", अब अभिषेक जी को क्या पता था के वह सब परिचित है बस नौटंकी देखनी है कौन बेहतर करता है.
 
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