अपडेट 215
उपहार (3)
"उस मैनेजर को कैसे ताड़ रहा था तू? और वो पगली जानती भी नहीं है की इस मासूम चेहरे के धोखे में जो ये भीमसेन उसकी नलकी को पटनाला बना के रख देगा तोह अपने मरद को फिर क्या जवाब देगी.", ललिता जी का यही तोह chir-parichit अंदाज था जिसके दीवाने घर के सभी थे लेकिन ये खुलकर तोह बस अर्जुन के संग एकांत में देखने को मिलता था. कमरा सचमुच हे बड़ा आलिशान था जहा महाराजा बिस्टेर, सोफे कुर्सियां, टेलीविज़न और वातानुकूलन के साथ साथ आधुनिक स्नानघर भी मौजूद था. सफ़ेद बाथटब और कांच के दरवाजे वाला जगमग स्नानघर, जहा ललिता जी का पेटीकोट ढीला करने के बाद अर्जुन उनकी मखमली भरी जांघ को अपने दोनों हाथो से सहलाता हुआ हर तरफ चूमने में जूता था. ऊपरी भाग पर झूलते दोनों खरबूजे से सतांन अर्जुन के क्रियाकलाप से हे सख्त हो कर स्वयं को अपनाने की दुहाई देने लगे. कमाल का बदन था ललिता जी का भी जो 50 बसंत पार होने के बावजूद अत्याधिक निखार लिए भरपूर गदराया हुआ था.
"ओह मेरी प्यारी ताई, मैं तोह बस उसको अपनी शकल याद करवा रहा था जिस से कभी अगली बार आना पड़े तोह पहचान देने की जरुरत हे न पड़े. वैसे ये मेरा भीमसेन आप तोह पूरा निगल लेती हो और फिर भी किसी को पता नहीं चला?", अर्जुन अब उनकी पंतय फर्श पर गिराने के बाद स्टूल पर बैठे हुए हे ललिता जी की दोनों चिकनी और गुदाज टाँगे फैला कर अपने गॉड में बैठते हुए मजे से एक मॉटे चुके को मुट्ठी में भरता हुआ दूसरे का काबुली चने सा चूचक दांतो में पकड़ कर हलके हलके कुतरने सा लगा. ललिता जी तोह मजे की सीत्कार लेती हुई वो ख़ास तेल दोनों हथेली में चुपड़ के उस मॉटे लम्बे लुंड पर कास कर मसलने लगी. बस चूचक तेजी से खींचे जाने पर कुछ तेज सिसकारी उनके होंठो से टपक उठी.
"ओह्ह्ह्ह बावले.. आराम से कर, मैं अभी 3 दिन हु इधर... आठ.. पिछली बार से तेरा ये खम्बा एक उंगल ज्यादा लम्बा हो गया लल्ला.. आईई.. कमीने मुझे दोष क्यों दे रहा तू इसका? मोटा भी है पहले से ज्यादा अब.. बेटी के घर टांग फैला के भेजेगा दुष्ट.", अर्जुन खिलखिला कर हँसता हुआ अब दोनों पके खरबूजों को थोड़ा जोर से मसलने लगा. ताई जी खिसक कर और आगे हो गयी जहा तेल से चमकता सूपड़ा निचे दबा कर वो इस मुद्रा में उनकी लपलपाती योनि से चिपकती हुई बस इस ख़ास स्पर्श को भीतर भरने लगी जो काफी समय से उनसे दूर था. अपनी ताई की आँखें बंद देख और लिंग को योनि मुख से चिपकने के एहसास से अर्जुन भी उनकी हे तरफ लपका. थोड़ा कस एक चुचो को जकड कर अर्जुन ने अपनी ताई के होंठ खुलने से पहले हे मुँह के भीतर भर लिए. भरे भरे होंठो का वही ख़ास स्वाद और इतनी जल्दी तरल बहती योनि का चिकना मुख. ताई की चिकनी पीठ को एक ब्याह के घेरे में लेते हुए अर्जुन ने उन्हें हे अपने लुंड की तरफ दबा दिया. पल भर के लिए ललिता जी का पूरा जिस्म थरथरा सा उठा जब इतना मोटा सूपड़ा कच्छ से उनकी मुनिया को फैलता हुआ गरम गीली सुरंग में 3 इंच जा उतरा. अब तोह ललिता जी भी उसका सर दोनों हाथ से पकड़ती अपनी जिव्हा अर्जुन के मुँह में भरने लगी जिसको अर्जुन भी मजे से चूसता हुआ लगातार दूसरे हाथ से उनके मॉटे चुके को मसलता हुआ अपने लिंग पर दस्ताने सी चिपकी योनि का ख़ास एहसास लेने लगा.
"आअह्हह्ह्ह्ह.. ये लो ताई जी, सम्भालो.. ूंणगगगग.", चुके को छोड़ कर उनके दोनों भरी और विशाल कूल्हों को हाथो में भर के अर्जुन ने अपनी प्यारी ताई की योनि का अंतिम द्वार दूसरे झटके में हे छो दिया. ललिता जी तोह जैसे दर्द और मजे में दोहरी हे हो चली. गॉड में इस तरह बैठा कर अर्जुन उन्हें पहली बार छोड़ रहा था लेकिन उनका अनुमान भी सही था की अर्जुन का लुंड अब 9 इंची कटाई न रहा था और छूट का इस कदर फैलना मतलब वो पहले से कुछ अधिक मोटा भी था पर वो झेल सकती थी क्योंकि ये उनके लल्ला का लिंग था, उनके बेटे का मूसल जिसकी दीवानगी की वजह से हे वो इस होटल में थे.
"निर्दयी लल्ला... आह्ह्ह्हह... क्या सोच के यहाँ लाया है मुझे तू? गाँव में तेरी खातिरदारी करने वाली न मिली कोई तुझे? उफ्फ्फ... बीटा धीरे से डालता न.. महीने बाद छोड़ रहा है, कल रात के बाद नहीं जो एक झटके में बिल फाड़ दिया..", 5 फ़ीट की ललिता जी तोह निढाल हे हो चली थी गर्भ तक इतना मोटा मूसल भीतर जा भिड़ने से. उनका पूरा जिस्म अब अर्जुन से चिपका था जो उन्हें गॉड में लिए, मांस से लबरेज दोनों कूल्हों को भींचता हुआ जैसे स्वर्ग में पहुंच चूका था. दोनों खरबूजे उसके चौड़े सीने से डाब कर बगल से बहार निकल रहे थे.
"आपके लल्ला को तोह बस आप हे झेल सकती हो ताई जी.. आह्ह्ह्ह.. पता नहीं था इतनी कासी मिलोगी.. ऊपर से आपका ये ख़ास तेल तोह लुंड में हे आग लगा देता है.. उम्मम्मम्म... ताऊ जी तोह घर हे थे, फिर भी इतनी आग है अंदर?", अर्जुन ने ललिता जी को गॉड में उठाये हुए पलट कर पीठ के बल उस मजबूत मेज पर हे टिका दिया जिस पर पहले वो बैठा था. 55-60 किलो वजन तोह जैसे उसके लिए कुछ था हे नहीं और इस मुद्रा में ललिता जी की भारी जाँघे फैल कर उसकी कमर पर आ तिकी. निचे पहली हुई गेंहुआ रंगत वाली योनि के becho-beech वो 4 इंची मोटाई वाला खूंटा ऐसे धंसा था जैसे हथोड़े से ठोका हो. 3-4 इंच बहार खींचते हे चमकदार तरल से लिप्त लिंग कही अधिक भयंकर दिखने लगा. छूट की लाल दीवारे कुछ हद्द तक बहार निकली और फिर अगले हे धक्के में अर्जुन के अंडकोष ललिता जी के गोर गोल मटोल से कूल्हों से जा भिड़े. ठप्प की गर्जना के साथ हे भारी चुके दाए बाए हिलने के साथ ललिता जी के चेहरे पर मजे की तरंग दौड़ा गए.
"ओह्ह्ह माँ जी.. आपकी खुराक आपकी बहु झेल रही है इस मुस्टंडे के निचे.. आह्ह्ह्ह.. लल्ला तेरे ताऊ ने तोह कोशिश की थी.. आह्हः.. पर वो नन्दलाल न मुझे संतुष्ट करते और न मुझे उनकी उंगली घिसने जैसे चुदाई पसंद है. तेरा खूंटा जहा घुस चूका हो वह फिर तिल्ली से तोह मेरा कुछ न होने वाला. ऊह्ह्हह्ह.. आराम से लल्ला, गिरा न दियो... ुन्नन", Thap-thap की आवाज इस स्नानघर में तोह गूँज हे रही थी पर उस से अधिक शोर था ललिता जी की खनकती चूड़ियों और दोनों की मजेदार सिसकारियों का. सरपट दौड़ता लिंग और उसकी अभ्यस्त हो चुकी ललिता जी की डबल रोटी सी योनि एक दूसरे से ताल मिला चुके थे. जांघो के दरमियान हाथ निकले अर्जुन उनके उछलते चुचो को दबोच कर कभी ढेर सारा हिस्सा मुँह में भर लेता तोह कभी दोनों को आपस में जोड़ कर भीषण धक्के लगाने लगता. इतनी जल्दी हे ललिता जी दूसरी बार झाड़ चुकी थी और अब कॉमर्स की पतली सी लकीर उनकी हलकी भूरी गुदा तक जाने लगी जो इस मुद्रा में ऊपर उठी हुई थी दोनों बड़े बड़े मांसल कूल्हों के बीच. अर्जुन को उनकी यही गीली रसभरी छूट हे पसंद थी जो shor-sharaba किये बिना उसको मनमानी करने देती थी. बस आज कुछ अलग था तोह ये की उसका सूपड़ा अत्यधिक मोटा हो चूका था तेल की मालिश से और लम्बे धक्के पर वो छूट के अंतिम हिस्से में अटकता तोह दोनों हे मजे से चीख उठते. रबर की गुड़िया की तरह ललिता जी की जाँघे ऊँची उठाये अर्जुन हर बार पहले से लम्बे और जोरदार धक्के जड़ रहा था. भरी भुजाओं पर दोनों तरफ मछलियां उभर कर पसीने से कुछ ज्यादा हे चमक रही थी.
"जैसे आपको ताऊ जी के साथ संतुष्टि नहीं milti...unnnnnhhhh.. मुझे भी बहार किसी के साथ उतना मजा नहीं मिलता... ऊपर से डर अलग उम्म्म्म.. कही लेने के देने न पड़ jaaye...aahhh..", ताई जी के चुचो के ऊपर दांत गाड़ते हुए अर्जुन ने अपना एक हाथ वह से हटा कर उनकी गुदा को टटोलने लगा. सिलवटों वाला वो छेड़ अपने आप हे खुल बंद होता हुआ कॉमर्स को जैसे छले के अंदर भरते हुए अर्जुन के लिए खुद को तैयार किये था. हलके से दबाव पर हे पूरी ऊँगली उस चिकने गरम छेड़ के भीतर जा बैठी.
"उन्न्नन.. अरे बीटा.. गांड कल मार लियो.. उम्म्म्म.. चल मार लियो बस एक बार और होने दे.. आह्ह्ह्ह... वैसे कोई बंद नलकी (कुंवारी छूट) भी खोली या बस अपनी ताई के जैसी kaaki-mausi हे पल्ले पड़ी? आराम से बीटा, बुढ़ापे में तोड़ेगा कमर मेरी? आह्हः.. वैसे .. एक है जिसकी तू आराम से ले सकता...", अब जाने ललिता जी कौनसा बम फोड़ने वाली थी और अर्जुन रफ़्तार धीमी करता बस लम्बे लम्बे धक्के ऐसे मारने लगा जैसे सचमुच बांस से नाली खोल रहा हो. और वो अपनी ताई जी को क्या कहता की अपने घर की तोह लगभग हर काली को वो खिला कर फूल बना चूका है जिसमे माधुरी दीदी तोह शायद पेट से भी हो क्योंकि आखिरी 4-5 बार तोह उन्होंने अंदर हे खली करवाया था अर्जुन को.
"वो पिंकी दीदी की पड़ोसन आयी थी न शादी में, गुरदीप. उसके साथ किया था मैंने ताई जी. पहले पहले तोह उसका बुरा हाल हो गया था पर बाद में बड़ा मजा आया दोनों को हे. शरीर भरी है न उसका और लचक भी कमाल की है. लेकिन जल्दी जल्दी में हुआ था उसके साथ.. आह्ह्ह्ह.. आप किसकी बात कर रही हो?", अर्जुन लगातार धक्को के साथ ऊँगली भी गुदा में अंदर बहार करता रहा. गुरदीप का नाम बताने के पीछे भी ख़ास वजह थी और ललिता जी मजे से सीत्कार करती हुई ये नाम सुन्न कर हैरान होने की जगह मुस्कुरा उठी.
"उम्म्म.. इतनी गदराई हुई घोड़ी हे झेल सकती है तेरा और जैसा तूने कहा उसका बुरा हाल हुआ तोह मतलब एक या 2 दिन तोह वो तेरे पास नहीं आयी होगी... वैसे गाँव में छोड़.. उनननननहहह.. घर में हे काम बन जाना तेरा.. ोुछहहह.. तेरा अंगूठा भी पतले लुंड सा है रे...", अर्जुन ने ऊँगली निकाल कर अपना अँगूठ हे ताई जी की मस्त गांड के भीतर भर दिया ज्यादा खोलने के लिए. छूट में हो रहे लगातार संकुचन से वो समझ चूका था के इस से ज्यादा वो अब और उसका छूट में झेल नहीं सकती. पर घर के भीतर हे कोई है और खुद ताई जी उसको बता रही है, ये उसके दिमाग को घुमा गया. और इसके साथ हे जैसे योनि के भीतर जोरदार बारिश से हो गयी. ललिता जी अपना सर पटकने लगी थी जिसके निचे अर्जुन ने हाथ रख कर उन्हें सहारा दिया और तबतक वो रुका रहा जब तक ललिता जी के गुलाबी चेहरे पर सुकून न लौट आया. सखलन ऐसा था जैसे ललिता जी ने ये जलभराव अर्जुन से संसर्ग के लिए हे एकत्रित करके रखा हो. पुक्क की आवाज से भीगा हुआ मूसल और भी फूला सूपड़ा धारण किया बहार निकला तोह जैसे छूट खोखली हे हो गयी. उन्हें गॉड में उठाये अर्जुन कक्ष के बड़े बिस्टेर पर ले आया. ये नरम भी था और उसके जोरदार धक्को को झेलने में सक्षम.
"ऐसा कौन है ताई जी वह हवेली में?", तेल की शीशी से थोड़ा तेल निकाल कर अपने मूसल पर सुपडे से जड़ तक मसलता हुआ वो बिस्टेर पर पाँव फैलाये लेती उस कामदेवी को निहारते हुए पूछने लगा जिनके अंग अंग में बस काम लहर हे भरी थी. 20 मिनट की जोरदार चुदाई वो भी लकड़ी के मेज पर टांग उठाये झेलने वाली ललिता जी कमजोर तोह कही से भी न थी. और अर्जुन को अपना लुंड लगातार मसलते देख उन्होंने इशारे से थोड़ा तेल अपने गुदाद्वार पर लगाने को कहा.
"तू दिल से ज्यादा सोचता है इसलिए पहले हे बोल रही हु की बुरा न मानियो लल्ला. तेरे शरीर के बदलाव है तोह विलक्षण लेकिन जो तेरा एक बार ले लेगी वो फिर किसी और से संतुष्ट भी नहीं होने वाली. और तू कामकला में अब नौसिखिया भी नहीं रहा पहली बार वाले अर्जुन की तरह. तू पता है के एक औरत कैसे तृप्त होती है और कैसे तेरी गुलाम बनती है. मधु और मैं इसका सबूत है तेरे सामने चाहे तूने मुझे मधु के बारे में इसलिए नहीं बताया क्योंकि उसकी इजत्त की बात है और न तू मेरे बारे में ऐसा कुछ कह सकता है. पर हम भाभी ननद के साथ सहेलियां भी है इसलिए तू इसके बारे में मैट सोच और मैं ऐसा कह कर तुझ पर सवाल नहीं उठा रही क्योंकि तू जबरदस्ती करने वालो में से तोह है नहीं. लेकिन कोई और तेरे साथ जबरदस्ती करे उस से पहले तू उसको अपने बस में कर ले. कहना कुछ नहीं है मुँह से, बस अपने इस अजगर के दर्शन करवा दियो कैसे भी करके.", अर्जुन कुछ पल तोह हैरान हुआ अपनी ताई के मुँह से बुआ का नाम सुन्न कर लेकिन उसको भी लगा के वो सही है.
"आप फिर भी इतनी पहेलियाँ बुझा रही हो ताई जी?", अर्जुन ने बिस्टेर किनारे खड़े होते हुए उनका एक पाने ऊपर करके अपने सीने पर टिकाया और हथेली से हे छूट के निचे उस सिवत भरे छेड़ पर ाचे से तेल चुपड़ने लगा. 2 उँगलियाँ एक दूसरे पर चढ़ा कर वो अंदर भी ठेलता जिस से ललिता जी मजे से उचक जाती. अब वो खुद भी अपने एक हाथ से गीली छूट को सहलाने लगी थी जैसे बातों से वो फिर गरम होने लगी हो.
"दामिनी और Roshni...aahhh.. देख मेरे पास ठोस वजह है इसके पीछे.. दामिनी लुंड की भूखी है और रिश्ते के मायने उसके लिए कुछ भी नहीं. मैंने खुद उसको गाँव के हे एक लड़के साथ लगे देखा था साल पहले. एक बार उसको बता दे की असली मरद कैसा होता है. फिर मुँह मारना छोड़ देगी कामिनी बहार. और रौशनी इतनी सीढ़ी है की कोई भी उसको पटक के छोड़ सकता है. कोई और करे उस से पहले ये काम तू कर दे अर्जुन, नहीं तोह वो दूसरी दामिनी बानी तोह काम ज्यादा ख़राब हो सकता है. विनोद का एक दोस्त रौशनी के साथ ऐसी हरकत कर रहा था और वो विरोध में बस मुँह फेर रही थी. मतलब घर से बहार वो थोड़े समय के लिए भी सुरक्षित नहीं है अकेले होने पर. लेकिन तू सिर्फ चुदाई नहीं करेगा, उसको हिम्मत देगा प्यार करते हुए. मुश्किल है मैं जानती हु लेकिन अब वो अकेली है और जवान बेटी की माँ भी. ऐसे तोह कितने हे उसके दब्बू स्वभाव की वजह से भोग लेंगे.", इस दलील से जैसे अर्जुन सहमत नहीं था लेकिन सुबह रौशनी बुआ की योनि और झांटे न्यास हे दिमाग में उभर आयी.
"चुदाई से अकाल भी आती है क्या ताई जी?", मुस्कुराते हुए उसने अपना तेल से चिकना मोटा सूपड़ा नरम कूल्हों के बीच उस बंद छेड़ पर टिकते हुए ताई के ऊपर झुक कर सही आसान बनाया और ललिता जी ने भी गहरी सांस लेने के बाद कूल्हों के निचे रखा तकिया सही करते हुए उसकी आँखों में देखा.
"छोड़ने से तोह ऐसी अकाल आती है लल्ला की डॉक्टर बन्न के भी नहीं आती. औरत का जीवन अजीब होता लल्ला, जो थोड़े से ाचे माहौल में उसको अपनी पहचान और भरपूर विश्वास देता है. ज्यादा खुले माहौल में असंतुष्ट औरत कोई देहलीज नहीं देखती और उसको सुधरने के लिए उसको ऐसा संतुष्ट करना पड़ता है की वो फिर और किसी के बारे में सोच भी न सके. फिर आती रौशनी जैसी बेबस और दब्बू, जिन्हे न घर पे कभी तवज्जो मिली और न ससुराल में. उधर भी बस दबा कर बंद रखा गया तोह वो गूंगी विरोध भी कैसे करे? पहले किस्से में महिला घर पे हे संतुष्ट थी, दूसरे में सुधारना पड़ा क्योंकि पाँव बहार जाने लगे और तीसरे में बचाना है क्योंकि बहार वाला घर भी आ सकता है और ये मुँह नहीं खोलने वाली."
"समझ गया मेरी प्यारी ताई जी.. लो फेर इस घर में रहने वाली को संतुष्ट कर दू.. आआह्ह.."
"तेरी तुह्हह्ह्ह्ह.. कमीने गांड है.. आअह्ह्ह मायआ... ", दबाव बना कर जैसे हे सुपडे का मुँह थोड़ा भीतर घुसा अर्जुन ने करारा धक्का जड़ते हुए रबर से चले को पूरा चौड़ा करते हुए एक धक्के में हे 2/3 लुंड नरम कूल्हों के बीच थोक दिया. ललिता जी तोह ऊपर हे उछाल पड़ी इस करारे वार से और जब पीछे होने लगी तोह कंधो पर अर्जुन की जकड से बस सर पटक कर हे रह गयी. गुदाद्वार तोह नजर हे नहीं आ रहा था और लिंग ऐसे धंसा था जैसे वो उनके कूल्हों का हे कोई हिस्सा हो. अब ललिता जी की हर बात आसुरी करता हुआ वो अर्जुन बुरी तरह से उत्तेजित होता हुआ पूरा लुंड उनके चिकने पिछवाड़े के भीतर तेल कर होंठो को चूसते हुए अपने सीने से हे उनके चुके मसलता हुआ इस अत्यधिक कसाव का मजा उठाने लगा. अर्जुन उन्हें बखूबी सँभालने का वक़्त देता हुआ अपनी अलग बात बताने लगा.
"ताई जी... उन्ह्ह.. एक तोह आपकी स्किन न इतनी मुलायम और चिकनी है की दिल करता है बस इसको सहलाता और मसलता हे राहु. और कोई स्त्री नहीं होगी जो आपके टक्कर की हो इस उम्र में भी.. वैसे कुछ बताना था मुझे आपको..", ललिता जी तोह अपने पिछवाड़े से पेट तक आ चुके उस भीषण लिंग को महसूस करके लगातार छूट को मसल रही थी. जहा अधिकतर महिलाएं गुदामैथुन के विरोध में होती है और उन्हें इस से सुख की अनुभूति नहीं मिलती वही ललिता जी जैसे इस तरफ से भी संवेदनशील और ऐसे संसर्ग की हितेषी थी. जब जब अर्जुन ने उनके साथ अप्राकृतिक संसर्ग किया था वो छूट से अधिक इसमें जोशीली दिखती थी. अभी भी उन्होंने हे अपने कूल्हे थोड़ा पीछे करते हुए उस मूसल को 2 इंच बहार निकाल अर्जुन को अपनी तरफ झटक लिया था. पूरा लिंग फिर से भीतर लेती वो टाँगे उठाये उन्मुक्त हो कर अर्जुन का सीना सहलाती उसके गाल और गर्दन को चूमने लगी. विशाल कूल्हे हवा में उठे थे जिनके बीचो बीच फंसा मोटा कामदण्ड हलके घर्षण जल्द हे देने लगा. चिकनाई जरुरत से भी अधिक हे थी जिस वजह से भूरा चला बहार खींचते वक़्त अलग हे चमक झलकता. भीतर से सफ़ेद मांस बहार निकलता और फिर वापिस अंदर जाते हुए भूरा चला भी साथ ओझल हो जाता. मटर से निप्पल और भरी चुके तोह पहले हे अर्जुन ने चूस और मसल कर लाल कर दिए थे लेकिन अब तोह वो भी सूज कर फूलने लगे. गुदा की गहराई में गरमाहट की अधिकता और चले द्वारा लिंग को कसने से सूपड़ा तोह फटने की कगार पर जा चूका था.
"आह्हः.. आह्ह्ह्ह.. ऐसे हे पेल लल्ला.. मैं ऊपर से हे मन करती हु रे तुझसे छुड़वाने के लिए पर जबतक तू पिछवाड़ा न भर दे मुझे भी चैन नहीं मिलता... अब बता तोह क्या कह रहा था... आह्ह्ह्ह.. चुके मत रगड़ बीटा, ब्लाउज पहन न मुश्किल हो जायेगा और तेरी दीदी के घर परेशानी होगी मुझे. उम्मम्मम.. जोर से मार लल्ला.. तेरे ताऊ का न घुसता इस रास्ते... आह्हः..", अब जब इतने मॉटे ढोल से कूल्हों की दरार हे 2 इंच गहरी हो तोह 4-5 इन्चा का लुंड भला कैसे गहराई मापता इस गद्दे की? अर्जुन तोह ऊपर से उनकी टाँगे अधिक से अधिक चौड़ी करके जड़ तक अंदर उतारने वाले धक्के पेल रहा था. टाँगे फ़ैलाने पर भी उनका गुदाद्वार आसानी से नहीं दीखता था और उस छोटे से छेड़ में इतना मोटा मूसल अब सरपट दौड़ रहा था.
"ओह्ह्ह्ह ताई जी.. इतनी गरम हो आप.. देखो छूट बहने लगी फिर से..."
"उम्म्म्म.. ये दुखी थी रे तेरे बिना.. आह्हः मेरे लल्ला.. अब खुश हो चुकी और आह्ह्ह्हह्ह.. तू बता रे..", छूट के ऊपरी होंठो और दाने को रगड़ती हुई ललिता जी अपना सखलन सेहन करती हुई अर्जुन को लगे रहने के लिए उकसाती रही. अब वो धीमी चुदाई घनघोर रूप ले चली जिसमे अर्जुन सब भुला कर सुपडे तक लिंग बहार खींचता और फिर पत् से आवाज देता उनके मोटे कूल्हों से लगता. ललिता जी के चेहरे के साथ साथ मॉटे चुत्तड़ भी लाल हो चले थे. रात से हे भरा बैठा अर्जुन 40 मिनट से लगा हुआ था जो अब पागल घोड़े से गुर्राता सब छोड़ कर उनकी भारी जांघो को लगाम की तरह थामे अपने ताई जी का सर और कन्धा हे बिस्टेर पर टिकाये तूफानी झटके मारने लगा. यहाँ तोह ललिता जी की भी किलकारियां गूँज उठी जब उन्होंने लैंड की जड़ को अपने छेड़ पर भिड़ते पाया. सूपड़ा तोह भीतर कही पतली आँतड़ियों में ठोकर मारने लगा था जिस वजह से उनका होश हे खोने लगा. आजतक की ये सबसे बुरी गांड चुदाई थी लेकिन इसमें भी उन्हें नया मजा मिल रहा था. जल्द हे अर्जुन ने उनका निचला जिस्म लगभग अपने संग हे जोड़ लिया. वो झटके खता हुआ ऊपर से निचे की तरफ अपना गधा वीर्य ललिता जी की गहराई में किसी पंप की तरह खाली करने लगा था और मजे से ललिता जी की आँखें हे पलटने लगी. इस पल में सचमुच हे अर्जुन ने अपना सम्पूर्ण लिंग उनके भीतर भर रखा था और जिस्म पर ऐसी मजबूत पकड़ की वो हिल तक न सकीय. इतनी अधिक मात्रा में वीर्य निकला था की भीतर सूपड़ा हे जैसे उसमे डूबा हो.
'पुक्क' ये आवाज जैसे हर बार हे आती थी जब जब अर्जुन का लिंग उनकी गुदा से बहार निकला था. क्योंकि चुदाई शुरू होने के बाद वो निकलता हे सखलन के बाद था और शरीर बिस्टेर पर गिरते हे ललिता जी बेसुध सी आँखें बंद किये वैसे हे लेती रही. अर्जुन के चेहरे पर अब जैसे एक सुकून सा था लेकिन वो थकान नहीं दर्शा रहा था.
"आप आराम करो, मैं नाहा कर आता हु ताई जी.", अर्जुन इतना बोल कर खुले दरवाजे हे बाथरूम में जा घुसा. ललिता जी तोह निहाल हे हुई जा रही थी अपना बदन इतनी बुरी तरह तुड़वा कर. अगर ऐसी चुदाई अर्जुन किसी युवती की करता तोह यक़ीनन वो चीख चीख कर मोहल्ला इकठ्ठा कर लेती या फिर दोबारा कभी उसको हाथ तक न लगाने देती. गुदाद्वार पर कही कही सक्षम रक्त की बूंदे उभरी थी जिन के ऊपर भीतर से बह कर निकलता सफ़ेद तरल मलहम लगाने लगा.
'मार दिया रे आज तोह इस घोड़े ने. ऐसे ये ब्याह के बाद अपनी लुगाई की तोह नहीं ले सकता. कमरा sound-proof है यहाँ लेकिन घर पे तोह पूरा परिवार उठ खड़ा होगा अगर इसने ऐसा प्रीती के साथ किया तोह. न उसके साथ ये बहोत प्यार से हे करेगा. फूल सी है और उतनी हे प्यारी भी.', अपने हे विचारो में आँखें मूंदे लेती ललिता जी की आँख हे लग गयी ऐसी जिस्म तोडू दोनों तरफ की चुदाई से.
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"ये बैग ले कर कहा जा रही हो जिनि?", कार की चाबी ऊँगली में घूमती हुई सुर्ख सलवार कमीज में सजी जीनत सचमुच एक bhari-poori युवती दिख रही थी और ख़ास बात थी की इतने भरी सीने पर कोई दुपट्टा नहीं था. श्रृंगार के नाम पर आँखों में ख़ूबसूरती से सजा काजल और होंठो पर बैंगनी सुर्खी सजाये खुले बालो में वो इतनी क़यामत दिख रही थी की स्वयं मेघना जी ने अपनी बिटिया के कान के पीछे नजर का टीका लगाया उसकी तारीफ करने के बाद. नजरो में हे रवीना बुआ ने भी अपनी भतीजी को बता दिया था के वो कितनी कमाल दिख रही है. लेकिन उसके हाथ में कला चमड़े का बैग देख कर ये सवाल जन्नत ने किया, जो कल के आयोजन के लिए मेहमानो को फ़ोन करने के बाद अपनी माँ और बुआ के लिए ब्यूटी पार्लर वालो को जल्द आने का सन्देश दे कर घर की बैठक में अपनी माँ को सब बताने आयी थी.
"ओह डीडू, मेरी दौड़ कहा तक की रहती है? आज मेरा स्टे साक्षी के हे घर है और इसमें मेरे कपडे है. रात को सोने के समय बदलने के लिए और शाम को एक पार्टी है जो साक्षी ने राखी है मेरे लिए. 4-5 सहेलियां जो राजहंस नहीं आनेवाली वो उसके घर हे आ रही है. आप बताओ अगर आपने भी चलना है तोह?", जीनत की उद्दंड मुस्कान देख कर प्रतिउत्तर में उसकी माँ के साथ साथ बुआ और जन्नत भी मुस्कुरा उठी लेकिन जन्नत जैसे उसके जवाब से संतुष्ट नहीं थी. पर वो उसको टोकना भी नहीं चाहती थी क्योंकि जीनत में भी एक ख़ास बात थी की वो चाहे कुछ भी कहे अगर वो कही जा रही है तोह वो बताई जगह हे जाती थी.
"अभी तोह सिर्फ रोक्का है जिनि तोह तेरे ये हाल है. सगाई और शादी पर तू क्या करने वाली है?"
"सगाई पर तोह डीडू फार्महाउस पर बियर पार्टी रहेगी जिसमे आपको भी आना पड़ेगा लेकिन बड़े लोग अल्लोवेद नहीं होंगे. शादी से पहले और लेडीज संगीत के बाद मैं बैचलर पार्टी रखूंगी और उधर आप भी अल्लोवेद नहीं होगी. हाँ बुआ को ले जाऊंगा वह अपने साथ.", बिंदास स्वाभाव वाली जीनत की ऐसी बातें सुन्न कर जन्नत तोह लाजवाब हे रह कर हंसती रही पर रवीना बुआ उसकी बगल में आ कड़ी हुई.
"ये करि न मेरी भतीजी ने सही बात. वैसे तेरी मम्मी को पता नहीं है बैचलर पार्टी का. इन्हे भी साथ ले चलना?", अब हंसने की बारी मेघना जी की थी और झेंपने की जीनत की जो अपने बुआ से बड़े हे सलीके से गले लगने के बाद हाथ हिलती हुई बहार निकल चली. चेहरे पर शर्म, चाल में शौखी और जाने की जल्दी. श्वेता का घर भी यहाँ से कुछ ज्यादा दूर नहीं था लेकिन कुछ एकांत में हे था और इतना हे बड़ा जितना मर कपूर का ये बांग्ला. रवीना जी का ध्यान पूरी तरह से जीनत पर हे रहा जब तक वो अपनी कार में बैठ न गयी और द्वारपाल ने गेट न खोल दिया.
"भाभी, मुझे तोह लगता है जिनि की शादी न 2 साल पहले हे कर देनी चाहिए थी. उसके सामने ये जानू तोह बकरी हे लगती है चाहे लम्बी ज्यादा हो ये उस से. शादी के लिए इसने हे हाँ की थी न या अपने किसी बॉयफ्रेंड के बारे में बताया नहीं.?", सेविका गरम कॉफ़ी की ट्रे लिए भीतर चली आयी थी और जन्नत के लिए निम्बू पुदीने का ठंडा तरल. मेघना जी एक सोफे पर बैठी हुई कोई लिस्ट देखने लगी थी और ये सुन्न कर उन्होंने हँसते हुए ऐसा मुँह बनाया जैसे ये बात अजीब हो. अपनी बुआ की बगल में बैठी जन्नत बस मुस्कुरा रही थी पहले थोड़ा गुस्सा दिखा कर.
"इसकी आदत है की सुबह उठते हे बाकी काम बाद में और खुद का वजन तोलना पहले. पूरे दिन में 3 से ज्यादा रोटी नहीं खाती और non-veg सिर्फ वही जो तंदूर का हो या sea-food. हाँ phal-fruit और जूस के सहारे चलती रहती है सारा दिन इसलिए पिछले 5 साल में एक किलो न बढ़ा इसका और वो महारानी जी क्रीम रोल, बटर चिकन, दूध, माखन और मार्किट का हर टाला भुना खाना खाती रहती है. ध्यान वो भी रखती है अपनी सेहत का लेकिन खाने की शौक़ीन है अपने पापा की तरह. थोड़ा असर है अपनी बड़ी बहिन को जो कसरत कर लेती है और पेट न होने की वजह से सीना और बैक भारी दीखते है उसके."
"दीखते नहीं माँ उसके भारी है. मेरी 26 वैस्ट है तोह उसकी 30, मेरी ब्रैस्ट 32 है और उसकी 36 वो भी डी.. बैक का तोह पूछो हे मैट क्योंकि एक तोह बिस्टेर बहोत पसंद है और ऊपर से बैठे रहना. मार्किट गए तोह बड़ी मुश्किल से उसके साइज की जीन्स मिली थी क्योंकि 30 वैस्ट पर 34 हिप्स तोह आ जाते है लेकिन इसके 36-37 होंगे. पता नहीं वो मरियल सा लल्लू हेमंत इसके साथ खड़ा हुआ कैसा लगेगा? सिर्फ कद हे लम्बा है लेकिन जिनि कद में भी कोई एवरेज थोड़ी न है. जो सूट इसने आज पहना है न ये पिछली से पिछली दिवाली पर लिया था और तब ये लूसे था लेकिन अब ये ढीला करवाने के बाद भी कितना टाइट दिख रहा था. मेरा तोह जब बढ़ाना होगा मैं बढ़ा लुंगी पर इतना थोड़ी न ाचा लगता है.", जन्नत को अपने पतले होने पर पहली बार थोड़ा फिकरमंद देख कर मेघना मंद मंद मुस्कुरा रही थी क्योंकि यहाँ उसने अपनी छोटी बहिन के साथ खुद का साफ़ साफ़ समीकरण किया था और हर जगह वो काफी पीछे थी.
"जानू, मर्द तोह kaam-kaaji जीवन में पतले हे होते है लेकिन उन्हें लड़कियां हमेशा भरे पूरे शरीर वाली पसंद आती है. भाभी को हे देख ले तू, जब भैया ने इन्हे देखा तोह किसी से बिना पूछे हे कह दिया था के शादी तोह मैं इनसे हे करूँगा. हाँ उस समय ये जिनि जितनी तोह भरी हुई नहीं थी लेकिन तेरे पैदा होने के बाद उस से भी ज्यादा सेक्सी लगने लगी थी. थी तोह तू भी gol-matol जब तक छोटी थी. इवन जिनि पैदा हुई तोह पौने 3 किलो की थी और तू पूरे 4 किलो की. और अब भी अपनी माँ को देख ले, तुम दोनों को पूरी टक्कर देती है.. तुझे नहीं क्यों की तू रेस से हे बहार है. हाहाहा..", रवीना बुआ की बात सुन्न कर जन्नत का तोह चेहरा हे लटकने लगा था और अपनी ननद की जांघ पर हाथ मार कर हंसती हुई मेघना अपनी तारीफ पर शर्मा भी रही थी.
"कुछ भी बोलती हो तुम रवीना. गौतमी और जाया (हेमंत की माँ) के सामने भूल से भी ये सब न कहना, बड़ा मजाक बनती है फिर वो दोनों. और मेरी ये बची अलग रेस की है, हम सभी से कही बेहतर और खूबसूरत. याद नहीं तुझे जब तेरे मिया जी के नए ऑफिस की ओपनिंग पर पार्टी राखी थी? सबसे ज्यादा लोगो ने जानू के बारे में हे पुछा था और आज भी दबे छिपे कई लोग इसके रिश्ते की बात करते है क्योंकि ऐसी खूबसूरत पारी आखिर कौन नहीं चाहेगा?", जन्नत अभी भी कुछ नौटंकी कर रही थी जबकि अंदर हे अंदर उसको भी लग रहा था के वो कुछ ज्यादा पतली है.
"माँ वैसे बुआ ने कुछ गलत भी नहीं कहा. एक तजा एक्साम्प्ले हे देख लो आप. कहा तोह गौरव भैया कभी शादी के लिए हे तैयार नहीं थे और फिर जब उन्होंने वो माधुरी को देखा तोह गर्मी में हे शादी कर ली. फोटोज में हे देखा है लेकिन वो जिनि से भी ज्यादा हेअल्थी लग रही थी या बराबर होंगी पर काम नहीं. दिखने में भी खूबसूरत है. तोह इसका मतलब यही हुआ न के मलेस को मोस्टली हेअल्थी लड़कियां हे पसंद आती है?", जन्नत की बात का जवाब इन दोनों के पास हे था और दोनों हे जानती थी की वो किसको सोच कर ऐसा बोल रही है.
"अर्जुन.. तुम्हारा दोस्त अर्जुन क्या कहता है इस बारे में?", रवीना कुछ हैरान रह गयी क्योंकि उसने तोह सिर्फ अर्जुन हे कहा था लेकिन जन्नत की माँ ने तोह आगे पूरा नाम के साथ सवाल भी जोड़ दिया. और दोनों एक दूसरे को देखती हुई फिर जन्नत को देखने लगी जो शर्म को छिपाने की भरसक कोशिश करती हुई मुँह बनाते हुए बोली.
"वो मुझसे भी छोटा है तोह उसकी राये मायने थोड़ी न रखती है. और वो हेमंत जैसा दुबला पतला भी नहीं है की जिनि के सामने अजीब लगे. सेव 6 फ़ीट का है और ऊपर से मसल्स ऐसे की दोनों हाथो में पूरा न आये.", इतने विवरण को सुन्न कर अब ननद भाभी दोनों हे हंसने लगी थी और फिर अपनी बेटी को घूरता हुआ देख मुँह पर हाथ रखती हुई अपनी हंसी दबाने लगी.
"मुस्कले भी नाप लिए है? वाह.. ये सही दोस्त है तेरा जानू. वैसे भाभी, जरा हमे भी मिलवाओ गौरव की बहु से और अर्जुन से तोह ये कल सबको मिलवा हे देगी."
"सबको कब कहा बुआ मैंने? और वो बस दोस्त है.."
"चल शिल्पा के हे घर चलते है रवीना. फ़ोन आया था उसका थोड़ी देर पहले की 12 बजे हमारा खाना उधर हे है. गौरव कल लौट आया था हनीमून से और आज उसकी सास भी आयी हुई है कुछ दिन बचो का घर देखने के लिए. उस वक़्त तोह पहुंची नहीं थी घर लेकिन अब आ गयी होंगी. शादी में जाना न हुआ लेकिन अब तोह मिल हे आते है उनसे. तू चलेगी क्या जानू?", अपनी हे उलझन में लगी जन्नत ने तोह जैसे आधी हे बात सुनी थी और गौर भी नहीं किया ज्यादा.
"जाओ न माँ आप लोग हे जाओ. मैं उधर करुँगी हे क्या और ऊपर से वो गुनगुन दिमाग अलग खाने लगती है. मैं घर हे ठीक हु और पापा का फ़ोन आया क्या?"
"तेरे पापा शाम को 4 बजे तक आएंगे अपने भाई और गौतमी को साथ हे ले कर. वैसे शिल्पा कह रही थी की की माधुरी का भाई भी आएगा जिसके बारे में मैंने उस से पुछा भी था फोटो देखते समय. हाँ.. उसका नाम भी अर्जुन हे है और शिल्पा तोह जैसे उसका नाम लेती हुई ऐसे खुश हो रही थी जैसे उसके सपनो का शहजादा आ रहा हो. खीर, पालक पनीर, भरवा भिंडी और आलू प्याज का रायता ख़ास अर्जुन की पसंद का माधुरी के साथ मिल कर शिल्पा ने बनाया है. पता नहीं कैसा लड़का है जो ऐसे खाने को तरजीह देता है.", अब जैसे जन्नत की धड़कन एकाएक हे तेज हो चली थी लेकिन उसकी माँ तोह जान बूझ कर रवीना से बात करने का दिखावा कर रही थी.
"ऐसा लड़का जो भिंडी पालक खता हो.. युककक. क्या भाभी? मुर्गा शुर्गा होना चाहिए.. ओह अभिषेक की तोह फॅमिली ब्राह्मण है न? पर वो तोह खा लेता है.. चलो खीर हे खा लेंगे और नयी बहु को शगुन भी देते आएंगे. जानू बीटा, वो पार्लर वाली 2 बजे तक आ रही है न? अगर हम लेट हो जाए थदो तोह तू हे अपना कुछ मैनीक्योर पेडीक्योर करवा लेना. चलो भाभी, मैं 5 मिनट में आयी तैयार हो कर. जानू के दोस्त से कल मिल लेंगे, आज इस गौरव के साले से मिल लेते है.", रवीना भी पूरे मजे ले रही थी अपनी भतीजी के जो आँखें बड़ी करती हुई दोनों को हैरानी से देख रही थी.
"आप दोनों मुझे घर में अकेला छोड़ कर जाओगे? और भरवा भिंडी तोह मैं भी खाती हु न, बस रोटी बिना घी की. थोड़ी खीर खाने से मेरा कुछ नहीं बिगड़ने वाला और गौरव भैया की बीवी को मैंने कौनसा देखा है. आप लोग मेरे बिना मैट जाना हाँ.. 10 मिनट वेट करो प्लीज. इतना टाइम लगेगा हे चाहे बुआ 5 मिनट कहे.", आगे कोई जवाब सुने बिना हे जन्नत अपना वैसे हे भरा गिलास टेबल पर रख कर पीछे अपने कमरे की तरफ दौड़ गयी और इधर ये दोनों एक दूसरे को देख मुस्कुरा रही थी.
"तोह ये अलग अलग नहीं है न भाभी?"
"एक हे है और जानू ने भी पहली बार उसको फोटो में मेरे साथ हे देखा था जब मैंने उसको जिनि के लिए पसंद किया. पर बात नहीं बानी और इधर ये पगली उसको बता दोस्त रही है पर मैं इसकी माँ हु और जानती हु के ये प्यार करने लगी है उस से. कल तोह मोटरसाइकिल पर घूम रही थी उसके साथ और जितनी खुश ये उस वक़्त दिख रही थी न रवीना, मेरी बची उतनी खुश मैंने कभी नहीं देखि. चल अब प्यार है और इसको कोई और रिश्ते का नाम जब ये खुद हे नहीं देना चाहती तोह मैं भी अपनी बची की ख़ुशी में खुश हु. तू बस इतना करियो रवीना, रोकके के वक़्त कोशिश करियो की जानू को सताने के लिए ये लड़कियां अर्जुन के आसपास न मंडराए."
"भाभी, उन्हें तोह समझने की जरुरत नहीं क्योंकि इसके गुस्से से वैसे भी सभी दूर हे रहती है. औपचारिक परिचय से ज्यादा क्या होगा? लेकिन एक तोह आपकी देवरानी और दूसरा मेरी लाड़ली, इन्हे कौन समझाए? लड़का स्मार्ट है क्योंकि जानू की पसंद ऐसी वैसी तोह नहीं होगी.", यहाँ भी बुआ ने भतीजी का राज राज हे रखा जबकि वो 3 तस्वीरें देख चुकी थी अर्जुन की.
"गौतमी को खुद समझ आ जाएगी रवीना क्योंकि अर्जुन वह उमेद भाई साहब के स्थान पर भी आ रहा है, जानू के दोस्त के अलावा. और उनके सामने तोह स्वयं तुम्हारे भाई साहब मर्यादा में रहते है और ये यक़ीनन आएगा भी वैसे हे अंदाज में जैसे उमेद भाई साहब आते है. 2 हे बातें तोह उनकी सबसे ख़ास है और सभी उनके मुरीद भी. एक तोह स्पष्ट बोलते है जैसे हर महफ़िल और मीटिंग के मालिक वही हो और दूसरा जहा भी महफ़िल या मीटिंग होती है, जगह उनकी हे रहती है चाहे पार्टी देने वाले कोई भी हो.", मेघना की बात से रवीना पूरा इत्तेफ़ाक़ रखती थी लेकिन जगह का सुन्न कर उसके भी कान खड़े हो गए.
"ये जगह तोह कुमार साहब की है न भाभी? ी मैं राजहंस के ओनर तोह रॉयल परिवार है."
"Co-owner अर्जुन रेखा शर्मा है उस जगह का और जानू लंच पर वही गयी थी उसके साथ. पूरा रेस्टॉरेंट सिर्फ जानू के लिए हे बुक था. अंदाज कही से भी उमेद भाई साहब से कमतर नहीं है लड़के का. अब देखना ये होगा की बाकी गेस्ट्स इसको कैसे हजम करने वाले है. कैंसल साहब की फ़िक्र सबसे ज्यादा है मुझे तोह. उनके हे गढ़ में 5 स्टार होटल से ले कर multi-story प्रोजेक्ट तक शुरू कर चुके है उमेद जी वो भी मर गजेंद्र भल्ला जैसे पावरफुल व्यक्ति के साथ. भल्ला जी सपरिवार आने का बता चुके है कल हे तोह देखना इंटरेस्टिंग होगा की वो अर्जुन को कैसे ट्रीट करते है जब उमेद जी की जगह उस से मुलाकात होगी.", अभी इनकी बातें कोई और रुख लेती जन्नत हे इधर चली आयी. खुले बाल जिन्हे अभी ड्रायर किया गया था और चूड़ीदार सफ़ेद सलवार के ऊपर मेहरून रंग का चुस्त कमीज जिस पर सीने तक मोती वाले बटन लगे थे.
"माँ, मेरी येलो बँगलेस नहीं मिल रही. और आप लोग अभी तक ऐसे हे खड़े है?", अब दोनों महिलाओं की निगाह ऊपर से निचे तक इस अप्सरा को निहार रही थी जिसके आँखों में बारीक काजल और माथे पर छोटी सफ़ेद बिंदी के साथ गले में laal-safed दुपट्टा भी बड़े सलीके से सजा था. पाँव में पहली बार पायजेब नजर आयी थी उन्हें और लम्बाई के बावजूद 2 इंच की एड़ी वाली खूबसूरत सैंडिल.
"सलवार कमीज कब लिया तुमने?", मेघना जी ने तारीफ करने की जगह हैरत से बस यही पुछा जबकि हालत खुद रवीना की भी ऐसी हे थी इस लड़की को पारम्परिक परिधान में देख कर.
"मैं रेड हे पहन लेती हु अगर आपको नहीं पता तोह. लेकिन तैयार तोह हो जाओ आप लोग. वैसे ये सूट कल हे लिया है मैंने मेरी फ्रेंड के बौतिके से. ाचा है न बुआ?"
"सही जा रही हो बीटा तुम.. सब ाचा है. भाभी मैं भी कुछ पहन लेती हु, चाहे अब सबकी नजर इस से नहीं हटने वाली. जिसने दिलवाया है उसकी तारीफ मैं वही कर दूंगी.", तंज के साथ एक गहरी मुस्कान देती हुई रवीना बुआ तोह अपने कमरे की तरफ निकल चली पर अब मेघना जी को दूसरी बेटी के भी नजर का टिका लगाना हे पड़ा.
"मुझे तोह समझ नहीं आ रहा जे कल तूने ऐसा हे कुछ पहना तोह मैं लोगो के सवालों के क्या जवाब दूंगी. भगवन हर नजर से बचाये मेरी बची को.", हर नजर पर जन्नत ने थोड़ा मुँह बनाते हुए अपनी माँ को देखा तोह वो सर पे हाथ मारती हुई हँसते हुए बात दुरुस्त करने लगी.
"हर बुरी नजर से बचाये और उसकी नजर बानी रहे जिसकी ये चाहती है. उमाहहह.. अब लगता है मेरी जानू गुड़िया बड़ी हो रही है."
"हाँ हो तोह रही हु लेकिन I'm स्टिल नॉट कम्फर्टेबले. पता नहीं ये ear-rings इतने भरी क्यों होते है?", अब कही बाल हटाने पर झुमके सही करती जन्नत के कान दिखे तोह मेघना जी के भी चेहरे पर प्रशंशा के भाव उभर आये.
"ये भी उसने हे दिलवाये है?"
"ये भी से मतलब माँ? सूट मैंने लिया है, हाँ उसने हेल्प की थी पसंद करने में और ये बस बहार वो छोटी मार्किट है न वह से ले लिए थे पायल लेते हुए. चलो आप जा कर रेडी हो जाओ, मैंने थोड़ा लूज़ बांध लेती हु हेयर. खुले ठीक नहीं लग रहे, ज्यादा लम्बे है.", बालो को लहराती हुई वापसी जाने लगी तोह अब माँ की नजर अपनी बेटी के लम्बे बालो के साथ साथ उसके शरीर पर भी थी. गडरायेपन में बेशक वो जीनत से कमतर थी लेकिन ऊँची लम्बी और एक बेहतरीन बनावट थी जन्नत के जिस्म में. गहरे लाल रंग में तोह आज जैसे उसने कुछ देर पहले वाली जीनत को 19 साबित कर दिया था.
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आज अभिषेक जी की निवास स्थल पर उनका पूरा परिवार मौजूद था जैसा अमूमन देखने को नहीं मिलता था. अक्सर वो खुद हे राजनीति की वजह से बहार रहते थे और गौरव की तोह नौकरी हे यहाँ से 100 किलोमीटर दूर थी जहा से वो सिर्फ shaniwar-eitwaar हे घर रहने आता था. पूरे घर और आँगन को सुबह जल्दी हे साफ़ करवा दिया गया था और उसके बाद एक कमरे को किरण ने ाचे से व्यवस्थित किया था जहा ललिता जी रुकने वाली थी. उसकी माँ बर्षा भी रसोईघर में शिल्पा और माधुरी के साथ लग कर बचा खुचा काम निबटवाने में मदद कर रही थी. पशुपति कभी भी घर के इस हिस्से में नहीं आता था सिवाए बैठक और आँगन के. अभी भी वो बैठक के भीतर सभी सोफों पर गड्डियां सजाने के बाद मेज को चमका कर कपडे बदलने अपने क्वार्टर की तरफ गया था. गाडी का हॉर्न बजते हे गेट पर खड़े अभिषेक जी के ड्राइवर ने हे दरवाजा खोला जहा अर्जुन अपनी ताई जी संग इधर सही समय पर आ पंहुचा था. होटल में एक जोरदार मिलान के बाद कुछ सुस्ता कर अब दोनों हे तैयार हो कर तजा दिख रहे थे.
"नमस्ते जीजा जी.", अर्जुन कल हे तोह आया था इधर और भीतर अभिषेक जी की कार के बराबर अपनी गाडी रोकने के बाद सबसे पहले उसने बड़े जीजा के चरण स्पर्श किये जिन्होंने ऐसा करने के बाद उसको गले लगा कर आशीर्वाद दिया. गौरव ने बस हाथ मिलाया और पाँव छूने न दिए. फिर गले लगने के बाद अपने स्वभाव से विपरीत उन्होंने भी अर्जुन की तारीफ की.
"ाचे दिख रहे हो भाई, लगता है गाँव कुछ ज्यादा हे रास आ गया. थोड़ा अपनी दीदी को भी अपने जैसे बना दो यार.", अब अर्जुन से पहले सामान का बैग स्वयं अभिषेक जी ने हे उठा लिया था और गौरव की शिकायत सुन्न कर अपने दामाद को आशीर्वाद देती ललिता जी के चेहरे पर बल पड़ने लगे.
"हाहाहा.. ये मजाक कर रहा है मम्मी जी. वो माधुरी ने घर का हे रट्टा लगाया हुआ था जबसे ये लोग गए थे घूमने. गौरव तोह कल भी रुकना चाहता था लेकिन मोहतरमा इन्हे ले आयी. और सच कहु तोह अब लगता है की ये घर सही मायने में घर बन चूका है. आपको आने में तकलीफ तोह नहीं हुई न मम्मी जी?", ललिता जी बातों का अर्थ समझ कर मुस्कुरायी तोह बारी गौरव की थी झेंपने की क्योंकि उसने तोह अपने साले से जीकर किया था लेकिन बड़े भाई ने हनीमून की पोल खोल कर रख दी.
"तकलीफ का तोह सवाल हे नहीं उठता दामाद जी. मेरा लल्ला सही समय पर मिल गया था और उसके बाद मार्किट में भी कोई परेशानी नहीं होने दी. शहर पहले भी देखा था लेकिन अब ाचे से देखा तोह पता चला के बिटिया रहने के लिए तोह बड़े शहर आ पहुंची है. अभी घर गृहस्थी की आदत नहीं पड़ी होगी न उसको, इसलिए देखने चली आयी की वो क्या गड़बड़ कर रही है.", ललिता जी तोह आदतन एक माँ स्वरुप हे पेश आ रही थी और चिंता होना भी लाजमी था क्योंकि बेटी जो ब्याही थी, वो भी इतनी दूर.
"एक तोह मैं आपका दामाद नहीं हु मम्मी जी तोह आप बस बीटा कहो और ये गौरव भी बीटा हे है. दूसरा ये की घर ग्राहस्थी में जितनी निपुण माधुरी है मुझे नहीं लगता की आपके घर में भी कोई लड़की होगी. शिल्पा तंग आ गयी है उसको बोल बोल कर पर रात में भी खाना उसने हे पकाया और सुबह से भी वो शिल्पा को बस साथ खड़े किये है, काम खुद कर रही है सारा. आओ भाई अर्जुन, इनसे मिलो. ये है हमारी प्यारी गुनु जी, छोटी बहिन भी और बिटिया भी.", गुनगुन की गॉड में शिल्पा जी का बीटा था जिसको ललिता जी ने हे थाम लिया उस प्यारी सी गुड़िया को आशीर्वाद देते हुए.
"कल मिला था जीजा जी मैं इनसे और सच कहु तोह मैंने शोले एक बार हे देखि है लेकिन ये हेमा जी पर भरी पड़ेंगी, लिख के दे सकता हु.", अर्जुन के ऐसे तंज पर फूलो वाला कुरता और पटिआला सलवार पहने कड़ी गोल मटोल सी किरण भी तुनक उठी.
"और भैया, ये उसी फिल्म के रहीम काका है.. इतना सन्नाटा क्यों है भाई? हुंह.. पहली बार आये और मेरे लिए गिफ्ट भी नहीं लाये जबकि कल हे बता दिया था भाभी ने की मैं इस घर की सबसे ख़ास मेंबर हु.", गौरव कुछ बोलना चाहता था जो अपने बड़े भाई और बाकी सबकी तरह हंस रहा था अर्जुन का उपहास होने पर लेकिन बहार आती शिल्पा जी और माधुरी को देख कर खामोश रहना हे ठीक समझा.
"आये हाय मेरी गुनु जी के तेवर तोह देखो जरा. ये नहीं की आते हे पानी पुछु, गिफ्ट पहले मांग लो. कैसे हो मम्मी जी?", शिल्पा जी ने तोह अर्जुन पर कोई ध्यान हे नहीं दिया एक कातर निगाह दाल कर फिर ललिता जी से गले लगी और उसके बाद माधुरी अपनी माँ से थोड़ा कस कर लिपट गयी.
"ऐ दीदी, एक तोह मेरी बड़ी बहिन ने मुझे हे नजर अंदाज कर दिया और ऊपर से दोनों जीजा के साथ उनकी ये फूलन देवी सामने छोड़ दी. कोई तोह मेरा साथ दो.", अर्जुन ने शिल्पा जी को भी लपेट लिया था नखरे से देखती हुई किरण के साथ. और शादी के जोड़े जैसे सलवार कमीज में काली तक लाल चूड़े पहने हलके पसीने में माधुरी ने अपने छोटे भाई को देखा तोह अर्जुन ने हे उन्हें अपनी बाहों में भर लिया. उसके सीने से लग कर माधुरी तोह अपने आंसू हे न रोक सकीय और चेहरा अर्जुन का भी थोड़ा विचलित सा हो उठा, आखिर बड़ी बहिन भी थी और पहला प्यार भी.
"अब ऐसे हे खड़ा रखोगी दीदी या बैग से गिफ्ट निकाल कर अपनी ननद रानी को भी डौगी. पानी वैसे किसी ने नहीं पुछा अभी तक.", अर्जुन ने ये बात कहने के साथ हे माधुरी दीदी को अलग करके उनकी आँखें अपने हे रुमाल से साफ़ की जो गौरव, अभिषेक के साथ किरण और बर्षा जी भी देख रही थी. ललिता जी ने पानी का गिलास खुद पीने से पहले अर्जुन को दिया और ये लोग बैठक में चले आये. अब शिल्पा जी ने पहली बार मुँह खोला.
"मम्मी जी, ये लड़का मुझे जरा भी पसंद नहीं. कल पहली बार घर आया और बिना कुछ खाये चला गया घर से. क्या ये इसका घर नहीं है या मैं सिर्फ नाम की हे बड़ी दीदी हु?", अब पानी से फारिग हो कर अर्जुन फिर से इस बैठक को हे देख रहा था जहा वो कल आया था और शिल्पा जी की बात सुन्न कर उसने अभिषेक जी की तरफ देखा जयस्व जवाब उनके पास हो.
"मैडम, तुम्हारा भाई कल हिमाचल से मोटरसाइकिल पर सीधा इधर आया था वो भी जरुरी फाइल लेने. उस से पहले थोड़ा मसरूफ था लेकिन अब शनिवार तक ये नियमित एक समय का खाना तुम्हारे हाथ का हे खायेगा. मेरे और गौरव की gair-hajri में अर्जुन तुमने कैसे भी करके हर रोज एक बार जरूर आना है इधर.", अभिषेक जी की बात अर्जुन सहर्ष स्वीकारता हुआ हामी भरने के साथ दोनों हाथ शिल्पा जी के चरणों में रखने लगा तोह वो अपनी हंसी न रोक सकीय. अब कुछ समय तक ललिता जी दोनों दामाद और बेटियों के शगुन करने लगी, ठीक एक जैसा और उसमे पहल भी अभिषेक और शिल्पा की रखते हुए. चारों के कपडे, उपहार, शगुन और मिष्ठान मेवे देने के साथ दोनों बेटियों की झोली में अलग से छुहारे और चंडी के shishu-paanv सौंपने के साथ उन्होंने चारो के हे तिलक भी किया. अर्जुन के साथ हे किरण, उसकी माँ भी ये सब देख रहे थे. चारों उनका आशीर्वाद ले कर फारिग हुए तोह अर्जुन ने बैग में से 2 खूबसूरत से सूट, एक लड़कियों की आधुनिक jean-top और लड़कियों की कलाई घडी किरण की हाथो में रख दी.
"मजाक अपनी जगह है जी, आप दीदी की ननद है और ये आपका शगुन जो घर की लक्ष्मी को हे दिया जाता है.", किरण हैरत से उसके गंभीर चेहरे को देख रही थी और अपने हाथो में इतना सामान भी. और ज्यादा हैरानी हुई जब ललिता जी ने पायजेब की जोड़ी के साथ एक खूबसूरत सी सोने की चैन जिसके भीतर 'क' का लॉकेट था वो अपने हाथो से किरण को पहनाई और उसकी माँ के टोकने से पहले हे शिल्पा जी ने बर्षा को मन कर दिया. कुमकुम और चावल का तिलक करके उसको भी नगद शगुन दिया और उसके बाद बर्षा को अपने सामने बैठा कर पति पत्नी के लिए वस्त्र और वैसे हे शगुन के लिफाफे भी.
"माँ जी..", बर्षा कहते कहते हे रुक गयी.
"चारदीवारी के भीतर हर कोई परिवार का हे तोह होता है फिर अनादर करने का पाप हम कैसे कर सकते है.? मुझे कमरा दिखा दो जरा शिल्पा बेटी, हाथ मुँह धोने के लिए. माधुरी बिटिया, सामान अपनी समझ से रखवा देना जहा उचित लगे.", सामान खुद गौरव ने हे उठा लिया था ललिता जी का और अब ये तीनो ललिता जी के साथ निकल चले तोह पीछे बचे अभिषेक जी ने अर्जुन से चर्चा शुरू की. किरण तोह ख़ुशी से पहले हे दौड़ चली थी नए कपडे अपने कमरे में देखने.
"यार तुम कई मायने में ने डॉक्टर अंकल से बहोत अलग हो और उमेद अंकल जैसे ज्यादा दीखते हो."
"हाहाहा.. मतलब अब आप मेरी टांग खिंच रहे है कल पार्टी में मैं उनकी जगह जा रहा हु इसलिए? आप भी तोह आ रहे है वह. वैसे मैं तोह कही से भी चाचा जी जैसा नहीं हु."
"बोलने से ले कर जब तुम किसी को गंभीरता से देखते हो तोह ठीक वैसे हे लगते हो बस तुम्हारे चेहरे पर दाढ़ी नहीं है उनके जैसी. कद्द हे देख लो, तुम बस उनसे कुछ हे काम होंगे लेकिन घर में तोह सबसे हे लम्बे हो. तुम्हे पता है तुमने मेरा कितना बड़ा काम किया है अर्जुन?", अभिषेक जी के गंभीर चेहरे को देख अर्जुन ने ना में सर हिला दिया.
"सब जानते हो फिर भी अनजान. इस बार के इलेक्शन में तुमने हे मुझे सीट दिलवाई है न रानी माँ से?"
"मैंने सिर्फ कहा था जीजा जी और आप उसके योग्य है बस कुछ चापलूस आपको आगे नहीं आने दे रहे थे. पर फिर भी मैं चाहता था के आपको ग्रामीण हलके से टिकट मिलती, वह बस आपके साथ बौ जी खड़े भर हो जाए तोह वोट और कही नहीं जाने वाला. पर अमृता जी स्वयं वह से कड़ी हो रही है."
"सही तोह है अर्जुन और शहर में मेरी भी ाची पकड़ है और ऊपर से खुद कुमार साहब मेरे प्रचार में शामिल रहेंगे. मैं साड़ी रात शिल्पा से यही बात करता रहा जब घर लौटा. पता नहीं तुम कौनसी छड़ी घुमा रहे हो भाई लेकिन सबकुछ बदल कर बेहतर हो रहा है.", अभी वो आगे कुछ बताते की आँगन में थोड़ा हंसी ख़ुशी की आवाज गूंजी. इनमे से सबसे तेज थी किरण की आवाज.
"ओह वाओ... जन्नत दीदी, क्या सरप्राइज दिया है आपने आज. नमस्ते आंटी जी. बड़ी भाभी, कपूर आंटी आये है और आज तोह जन्नत दीदी को भी टाइम मिल गया.
"लो भाई अर्जुन, कल के मेजबान से भी मिल लो. मैं करवाता हु तुम्हारा परिचय.", अब अभिषेक जी को क्या पता था के वह सब परिचित है बस नौटंकी देखनी है कौन बेहतर करता है.