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Khatta-Meetha (1)
उस खूबसुरता सुबह और हसीं सामीप्य का अंतत दरवाजे पर होने वाली निरंतर छोटी दसतक से हुआ. बड़े बिस्टेर पर अलका बेसुध सी ऋतू की कमर पर हाथ रखे जस की टास सोई पड़ी थी और ठीक वही हाल ऋतू का था जो एकमात्र वस्त्र, सफ़ेद परिधान जो कई जगह से अस्त व्यस्त था उसमे आधी अधूरी लिपटी अर्जुन के जिस्म पर चादर सी चढ़ी थी. अलका को सोये एक घंटे से ज्यादा होने को आया था और ऋतू तक़रीबन 10 मिनट पहले. अर्जुन ने बड़ी हे एहतियात से खुद को ऋतू के निचे से निकला जहा बहोत परेशानी के साथ वो स्वयं भी जैसे इस से दूर होना नहीं चाहता था.
'दादा जी का फ़ोन है ारु और नानी जी नहाने के बाद पूजा कर रही है बहार. इधर मैं देख लुंगी, तुम जाओ.", अर्जुन बोझिल आँखों से अपने सामने कड़ी मासूम से आरती को देख कुछ पल ठिठका रहा जहा आरती अब शर्मसार हो रही थी, जाने किस वजह से. सूखे होंठो से हे आरती के गाल चूम कर जैसे हे अर्जुन घूमा तोह सर पे चपत लगते हुए तुरंत बिस्टेर से निचे गिरी अपनी निक्कर को उठा कर अपने अंग को क़ैद किया जो अभी भी सख्त था.
'ये दादा जी और इनका टाइम.', ऊपर सीना भी टीशर्ट से ढकता हुआ वो मुँह हाथ धो कर हॉल की तरफ चल दिया. रात जैसे काफी म्हणत भरी गुजरी थी उसकी और अधिकाँश म्हणत सिर्फ रेखा के पहलु में हुई.
"Hello. गुड मॉर्निंग बौ जी.", उनींदी आवाज सामने वाले ने भी भली भाँती सुनी थी जो रामेश्वर जी की जगह कौशल्या जी थी.
"मेरा बैलबुद्धि आज 6 बजे तक नींद में कैसे?"
"ओह आप हो, मेरी प्यारी दादी. पहले गाँव में हे इतनी जल्दी उठना पड़ा था दादी, फिर स्टेडियम वाला काम और फिर घर और शहर के. उसके बाद इधर आया तोह सफर हे इतना थकाने वाला था. रात आरती दीदी के साथ देरी तक फिल्म देखि फिर माँ के पास बैठा जिन्हे नींद नहीं आ रही थी और इस सबमे हे 2 ढाई बज गए. आप बताओ दादी, मेरी नींद तोह नाहा कर पूरी हो जायेगी.", अर्जुन अब भी थोड़ी सुस्ती मान रहा था और आरती उसके सामने ठन्डे पानी का गिलास रख गयी be-awaaj खिलखिलाती हुई.
"तू तोह बिना नौकरी अफसर लग गया बीटा जो इतनी जिम्मेवारियां संभल रहा एक साथ. तेरे बाउजी बोल रहे थे की तू तोह अब वापिस भी जाने वाला होगा पर मैंने कहा था की इसकी नानी और बहने ऐसे तोह न जाने देंगी बिना नाश्ता करवाए. और बचा भी तोह सुकून चाहता होगा. हाँ मैंने तोह अभी इसलिए फ़ोन किया था की तेरे उमेद चाचा का अभी अभी फ़ोन आया था. अर्जुन अब थोड़ा ध्यान से सुन्न जो मैं कह रही हु. आज तोह चल नाश्ते के बाद हे निकलेगा पर फिर मेरे भी ध्यान रहे न रहे इसलिए अभी बताना ठीक समझा."
"आप बोलो दादी, नींद में नहीं हु मैं. और चाचा क्या कह रहे थे?"
"हाँ तभी तोह फ़ोन किया. आज माधुरी भी वापिस आने वाली है और कल तेरी ताई भी उसके ससुराल मिलने आएगी तोह जब ललिता खुद तुझे वह से फ़ोन करे तभी तुम अभिषेक के घर जाना जैसा तू चाहता था. और दूसरी बात है उमेद की. उसका ये बिज़नेस वाला दोस्त है अभिषेक के पड़ोस में नरेश, नरेश कपूर. उसकी बिटिया का रिश्ता जमा है जानकार परिवार में हे और उधर भी उमेद का ाचा व्यवहार है. बीटा वो हमारी तरफ भी ब्याह में आये थे और अब उन्होंने उमेद को भी न्योता भेजा है. तू जब कल जाएगा तेरी बहिन के घर तोह जरा जानकारी ले लियो और परसो फिर तुझे हे वह उमेद के स्थान पर जाना है. बढ़िया सा तोहफा लेना मैट भूलना.", अब उसकी दादी को कहा पता था की जिधर जाने के लिए वो अर्जुन को समझा रही है वह तोह वो पहले से आमंत्रित है पर अर्जुन अब इस न्योते से बेहतर महसूस कर रहा था क्योंकि अब वो उमेद सिंह की जगह जाने वाला था.
"सब पता कर लूंगा मैं बड़े जीजा और शिल्पा दीदी से. वैसे अब ताऊ जी की तबियत कैसी है?"
"ठीक है अब पर बुखार आ जा रहा है इसलिए सोच रही थी की ललिता के साथ किसको भेजू."
"पापा से कहना की वो ताई जी को एक्सप्रेस बस पर बैठा दे, उधर से मैं उन्हें ले लूंगा दादी. ताऊ जी की तबियत ठीक नहीं है तोह उन्हें आराम करने दे बाकी काम तोह सभी दीदी देख हे लेंगी.", अभी अर्जुन की बात पर हामी भरने के बाद कौशल्या जी कुछ आगे कहती की फ़ोन रामेश्वर जी ने ले लिया.
"खोट्या, तनु इस टाइम तक वापस जाना स. अब ध्यान से सुन्न मेरी बात जिसके लिए तेरी दादी को फ़ोन मिलाने के लिए मैंने कहा था. कुमार महेंद्र ने सिर्फ एक घंटे के लिए महल पे मिलना है और फिर वो काम से बहार जाने वाला है. अभिषेक बीटा भी पार्टी मीटिंग के लिए दिल्ली गया हुआ और वो कल हे लौटेगा. उनके घर से एक फाइल ले कर तुझे 2 बजे तक महेंद्र के यहाँ पहुचानी है. फाइल शिल्पा बिटिया को पता है पर वो ख़ास है इसलिए मैं किसी और को वो लेने नहीं भेज सकता. तेरा विनोद चाचा भी नहीं है उधर और वह घर पे सिर्फ बिटिया है तोह अनजान का जाना भी ठीक नहीं. आराम से नाश्ता पानी करके तू ठीक वक़्त निकल जाना. हाँ वो उमेद वाला भी बता दिया न तेरी दादी ने?", अब अर्जुन हथियार दाल गया अपने दादा की इस बात पर. कहा तोह वो सोचे बैठा था की थोड़ा और आराम करने के बाद दिन में निकल चलेगा पर अब तोह रामेश्वर जी ने उसको घडी के कांटो से जोड़ दिया था.
"जी बस मैं नहाने के बाद निकलता हु. फाइल महेंद्र जी को हे देनी है न या किसी.."
"सिर्फ महेंद्र को. उसके किसी भी सलाहकार या मैनेजर को नहीं. और तुम्हे मैंने रास्ता इसलिए बताया था की थोड़ा सोच समझ कर हिमाचल के लिए निकलो पर नहीं जनाब तोह सर पे पाँव रख कर दौड़ लिए उधर. घर जाने के बाद कर लेना आराम जितना चाहो.", अर्जुन जानता था की उधर भी आराम नसीब नहीं होने वाला. जसलीन, दीपा भाभी और जीनत तोह घर से बहार है हे पर घर के भीतर आँचल अलग उसका लहू पीने वाली है. बरबस हे अर्जुन घर लफ्ज़ ज़ेहन में आते हे जैसे काल रात से अभी तक के उन दृश्यों में वापिस लौट चला जिनके सिवा उसकी झोली में और कुछ था हे नहीं.
"जी ठीक है बौ जी मैं तैयार होता हु, फिर धुप में सफर भी मुश्किल रहेगा.", अर्जुन ने आगे बात किये बिना फ़ोन रखते हे ऊपर जाने वाली सीढ़ियों का रुख किया. उसके कदमो की चपलता और गंभीर चेहरे को देख आरती सिर्फ यही सोच सकीय की उसके दादा जी ने जरूर अर्जुन के जिम्मे आवश्यक काम सौंपा है. रेखा के कमरे का दरवाजा अभी भी वैसे हे बहार से बंद मिला जैसा उन्हें सुलाने के बाद अर्जुन ने जाते वक़्त किया था. बेआवाज सा वो इस कक्ष में लौटा तोह दिल इस कदर सुकून से भर उठा जैसे अर्जुन का खुद से हे वास्तविक परिचय हुआ हो. वो बिखरा हुआ था जब घर लौटा पर ऋतू ने वो टुकड़े बंटोर कर अर्जुन को पुनः अर्जुन बनाया था. वो दिल है उसका जिसके बिना अर्जुन जीवित तोह रहा पर इस कदर खोखला जैसे बरसो से खाली पड़ा वो घोंसला जिसमे कभी अंडे सेन्चे हे न गए हो. पर ये जो इतने गहरे सुकून में सोई हुई दिव्यात्मा है, आखिर ये कौन है?
सफ़ेद चादर गर्दन तक ओढ़े सोई रेखा ने भीतर अभी तक कोई वस्त्र न पहना था जो कासी हुई चादर और कमरे के अत्यधिक ठन्डे तापमान से बखूबी जाहिर था. इस पल में भी वो बद्र सी घनी और सुलझी हुई जुल्फे एक तरफ सिमटी हुई उस अद्वितीय चेहरे के आकर्षण के करीब आने में भी कटरा रही थी. अर्जुन अपनी माँ को अपना भगवान् मानता था पर ये उसकी तिलोत्तमा थी जिसका अपना एक और सच था. एकांत में हर रिश्ते और दुनिया से परे सिर्फ अर्जुन की तिलोत्तमा. अर्जुन के कदम कब बढे और कब वो रेखा के सिरहाने बैठा उसके गाल पर झुकता हुआ हलके से चूम कर फिर से उस मासूम से खामोश चेहरे को देखने लगा जिसका ये अलग जनम बस अर्जुन के प्रेम और तपस्या का नतीजा था.
'आज मैं क्यों अलग सा लग रहा हु.. शायद मैं जीवन चक्र से आगे निकल आया. पूरा तोह कबका हो चूका था.. आज वापिस कानन कानन सा बिखर गया. ये बिखरना कोई टूटने सा बुरा नहीं है.. ये अनु (एटम) का अनु से जुड़ कर बना एक नया तत्त्व है. पर मैं बना क्या हु..?', बहोत आहिस्ते से वो ये लफ्ज़ बोल रहा था और रेखा के खुमार से भरी अपनी आँखें खोल कर जब ऊपर अर्जुन को ऐसे झुके पाया, जिसकी आँखों में एक अलग हे समंदर क़ैद था पर लुढ़का था उसमे से बस एक आंसू. वो मुस्कुरा रहा था दिल की गहराई से.
"मुझे अभी और सोना है.. उम्म्म्म", रेखा सचमुच हे उस प्रेम सागर की गहराई में डूबी थी जहा उसने खुद के होने का अलग एहसास प्राप्त किया था. अर्जुन को अपने होंठो से जोड़ कर वो उसको भी बिस्टेर पर लाने लगी थी, अपने पहलु में.
"आपको सोना भी चाहिए. बस मुझे अभी जाना होगा और जाना जरुरी है. आप अपना ख़याल रखना और जो बाकी रहा वो वही होगा जहा तिलोत्तमा ने चाहा है. क्या मैं कुछ अलग लग रहा हु?", अर्जुन ने अपनी चाहत पूरी न की थी जबकि न्योता सामने से रेखा ने दिया भी था. उसकी वजह भी वही थी की रेखा वो आनंद खुल कर लेना चाहती थी और किसी बंद कमरे की जगह ऐसे आशियाने में जहा दूर दूर तक बस प्रकृति के बीच यही दोनों हो. अर्जुन के जाने की बात सुन्न कर रेखा ने खड़े होने की कोशिश की तोह सीने से चादर सरकने के बाद दोनों गोल गुम्बद बेपर्दा तोह हुए हे पर जांघो के बीच अत्यधिक मीठी लहर ने होंठो से सीत्कार उगल दी.
"ाःह.. इतनी जल्दी जाना है?", अर्जुन ने बस हौले से हे दोनों पुष्ट स्टैनो को सहलाने के बाद रेखा को वापिस चादर से धक् कर लेता दिया.
"आप 10 से पहले न निचे जाएंगी और न किसी से मिलेंगी. मैं नहाने के बाद नाश्ता कर के निकल रहा हु. वैसे आपने बताया नहीं की क्या मैं कुछ अलग लग रहा हु इस सुबह में.?", अब रेखा भी विवश थी क्योंकि अर्जुन ने ऐसे अधिकार से कहा था जैसे वो उसकी भार्या हो या वो स्वामी रेखा का. चेहरे को गौर से देखती हुई वो भी एकाएक मुस्कुरा दी.
"शायद पहले ध्यान नहीं दिया मैंने पर तुम्हारे चेहरे पर रोयें बढ़ने के साथ ये कच्ची मूछें घनी होने लगी है. तुम सचमुच बड़े हो रहे हो अर्जुन."
"चाहत है की बस तुम्हारी एक इनायत हो.. दूरियां कभी बढे तोह वो नजराने में हो... मुमकिन है की darkhaast-e-ishq दुनिया न समझे.. तुम्हारे पहलु में खो दू एक अक्स, दूसरा दिखावे को जमाने में हो.", अर्जुन टोलिया उठा कर बाथरूम में जाने से पहले बस इतना कह गया वो भी शायराना अंदाज में जिसको सुन्न कर उसकी तरफ करवट बदलती रेखा ने बड़ी हे मासूमियत से जवाब दिया.
"तुम जब पिता बनोगे न अर्जुन, तोह अगर बेटी हुई उसका नाम इनायत हे रखना.", अर्जुन ये सुन्न कर दरवाजा बंद किये बिना हे पानी के निचे निर्वस्त्र खड़ा हो गया. वो अभी भी मुस्कुरा रहा था और धीमी रफ़्तार से गिरती पानी की बौछारे बेहद ठंडी और सुकून देने वाली थी.
"आपको अजीब नहीं लगेगा इस उम्र में फिर से माँ बन ने पर?", रेखा तोह सुन्न कर हे दांग रह गयी और फिर चेहरा शर्म से लाल.
"बेवकूफ तुमने मुझे ऑपरेशन करवाने पर मजबूर कर दिया था जब पहली हे बार में सावधानी नहीं ली थी. और मैं यहाँ माँ नहीं नानी बन्न ने की बात कर रही हु.", रेखा ने एक तरफ समेटे रखा वही रात वाला रेशमी वस्त्र जिस्म पर पहन कर फिर से चादर ओढ़ ली. जिस्म हरकत करने पर भी अर्जुन के जोरदारन संसर्ग का हर गुजरा पल तस्वीर सा चला देता था उसकी नजरो के सामने. अब वो जाने लगा था इतना अत्यधिक सुख देने के बाद और चर्चा भी किसी और दिशा में हो ली थी. अर्जुन तोह पानी के नीचे खड़ा हुआ अब तक गर्भवती की गयी अपनी संगिनियों के बारे में हे विचार करने लगा था. और माँ द्वारा नसबंदी करवाना वो भी उसके संसर्ग की वजह से जरूर उसको हंसा रहा था.
"बोल न खामोश क्यों हो गया?"
"मैं अभी उतना बड़ा नहीं हुआ हु और जब जिम्मेवार बन्न जाऊंगा तब ये इत्छा भी पूरी कर दूंगा आपकी.", अर्जुन के साथ रेखा को ये मस्ती करना बखूभी भा रहा था और वो उसको अभी इतनी जल्दी नहीं छोड़ने वाली थी.
"मंजू तोह प्रेग्नेंट है न? सोचा नहीं कुछ तुमने?"
"वो.. उसका वही जाने और आप क्यों मेरी टांग खिंच रही है? सो जाओ न आराम से. जरुरी तोह नहीं जब कुछ पता हो और उसके बारे में बात की जाए? मंजू की राहें और सपने मुझसे जुड़े जरूर है पर उसकी मंज़िल मैं न पहले था और न आगे बनूँगा. और मैं इस से ज्यादा समझा नहीं सकता क्यूंकि फिर बात उलझ जायेगी.", ये सच भी था क्योंकि मंजू के जीवन को बदलने वाले दलीप और शंकर हे थे, अर्जुन तोह उसकी उम्मीद और एकमात्र मजबूत सहारा था. रेखा उसकी समझदारी पर प्रभावित तोह हुई लेकिन अभी तोह उसको हमाम में ज्यादा निर्वस्त्र करना था जिस से दोनों उस स्तर तक पहुंचे जहा सिर्फ वो हे एक दूसरे को जान ने के लिए बचे.
"अनीता और संगीता? तेरी मामी है वो दोनों पर जरा सी उम्र में तुमने उन्हें भी."
"आपने ऑपरेशन करवा लिया न उस डर से? और जरा नानी से बात कर लेना आप इस मुद्दे पर. दोनों छोटे मां जी जब शादी हे नहीं करना चाहते थे तोह क्यों उनके साथ साथ दोनों मामियों को जंजीर से बाँध दिया. वो भी ऐसी वैसी नहीं, हमेशा अधूरेपन और दर्द से भरी. वह सभी ाचे है लेकिन क्या ाचे लोगो से गलत फैंसले नहीं हो सकते? उन्होंने मुझे पर डोरे नहीं डाले थे और न घर से बहार िज्जात्त खराब की. उन्होंने मुहसे रिक्वेस्ट की थी माँ.. वो अपने दोनों जेठ को पिता की नजरो से देखती है और उनके लिए मैं भांजे से ज्यादा उनका दोस्त हु. दोस्त एक दूसरे का साथ निभाते है माँ, उन्हें मझदार में नहीं छोड़ते. आप खुद हे सोचिये की अपना घर वह से आधा घंटा हे दूर होगा या 40 मिनट लेकिन क्या मैंने उधर आना जाना रखा?"
"मजाक कर रही थी मैं क्योंकि मैं जानती हु की तुमने सिवाए इत्छा पूरी करने के उसका गलत फायदा नहीं उठाया. पर ऐसे हे इतछायें कब क्या रंग ले ले पता नहीं चलता अर्जुन.", अर्जुन अब तोलिये से खुद को पौंछने लगा था पानी बंद करने के बाद.
"मेरी इतछायें बचपन से सिमित हे है माँ. मुझे तब भी आपके साये में रहना था और कोमल didi-Ritu दीदी मेरा ध्यान वैसे हे रखती रहे जैसे बचपन से आजतक रखती आयी है. हाँ प्रीती.. वो बचपन से हे सबके द्वारा बतायी मेरी विदेशी गुड़िया थी और वो आपको तब भी माँ बुलाती थी, आज भी. इस से ज्यादा न मैंने कभी माँगा और न चाहता हु. हाँ जहाँ जहाँ मुझे जिम्मेवारियां उठानी पड़ेंगी और अपना करम निभाना होगा, मैं वो करूँगा.", अर्जुन टोलिया बाँध कर कमरे में आया तोह रेखा ने पलके झपकाते हुए सर तोह हिलाया पर जैसे वो अब उसको जीवन का सार देने वाली थी.
"जिम्मेवारियां और करम. ये सब तुमने ली है या तुम्हे दी गयी है इस पर निर्भर करता है अर्जुन. काम उम्र में हे तुमने उम्मीदों को इतना ऊँचा कर दिया है की आने वाले कल में या तोह तुम उदहारण बनोगे या बस उदहारण बन्न कर रह जाओगे. मैं तुम्हे कभी भी अपने साये से दूर नहीं करना चाहती थी क्योंकि तुम शुरू से हे अलग थे. मैं 3 पीढ़ी बाद साकार हुई तोह तुमने भी अपने से पहले वाली 3 पीढ़ियों के करम अपने जिम्मे उठा लिए. तुम्हारे पास धीरे धीरे जिम्मेवारियों का उतना बड़ा आडम्बर लग चूका है की इसमें तुम खुद तोह रहे हे नहीं. जानते हो ये जिम्मेवारियां तुम्हारे हे हिस्से क्यों आयी?", अर्जुन ने बस ना में सर हिला दिया.
"क्यूंकि तुम समाज के खिलाफ पैदा होने के समय से हो, आज से नहीं. तुम्हे ताक़तवर और जिम्मेवार बहार की दुनिया और सब सुधरने के लिए नहीं बनाया गया.. बेशक तुमने वो खुद कर दिखाया. तुम्हारी लड़ाई तुम्हारे हे साथ होनी सुनिश्चित है ये बड़े लोग जानते है. अब तुम मेरा मात्रा अंश नहीं रहे, सामान तत्त्व है हम दोनों इसलिए तुम्हारे सवाल जवाब से मैं दूर नहीं रहूंगी. मौत को हरा कर तोह तुम दुनिया में आये थे. उसके बाद तुमने अधिकार जमाया मुझ पर और अपनी बहनो पर. संजीव.. उसकी दुनिया सिर्फ तुम हो जो तुम्हे समाज से बचाये रखना चाहता है, सहेज कर पर कुछ हद्द तक वो विफल हो गया जिस पर उसको दुःख नहीं है. वो खुश है की तुम बेहतर हो रहे हो पर वो भी जानता है की तुम बहार की दुनिया में कदम रखोगे, सिर्फ अकेले तुम.. तब बहोत कुछ बदलेगा चाहे तुम्हारी चाहत मुझसे शुरू और प्रीती पर ख़तम होती हो. जीवन को हमेशा समझने से ज्यादा उसको जीना शुरू करो अर्जुन. अतीत और भविष्य तोह मिल कर सुलझाया जा सकता है पर ये जो आज तुम्हारे पास है, जब ये अतीत बदलेगा तब भविष्य रुपी वर्तमान में तुम्हे कोई दुःख नहीं होना चाहिए. बाकी बातें हम अपने स्पेशल वेकेशन पर करेंगे. बस थोड़ा सा आँखों के साथ दिमाग खोल कर रखना, दिल और पतलून खोलने से पहले. सबकी चाहते पूरी नहीं होंगी और जिनकी होंगी वो इसका बखान उनसे जरूर करेंगे जो वंचित रह गए. तुम समझ गए न मैं क्या कह रही हु?"
"बहोत ाचे से माता जी. ऐसे हे मैं मेरा दुश्मन बन जाऊँगा. इसलिए मुझे लगता है की मुझे आपके हे साये टेल रहना चाहिए."
"और जो तुम्हारे साये में रहते है फिर वो इसको हलके में नहीं लेने वाले.. हाहाहा.. जाओ अब कपडे पहन के निकलो अपने सफर पर. इन्तजार रहेंगे आने वाले समय का."
"आपसे ज्यादा मुझे. उमाठ.. Bye bye तिलोत्तमा डार्लिंग.."
"धत्त.. जाओ अब इस से पहले मेरा मूड बदले. पर दिन निकल चूका है और ध्यान से जाना.", रेखा के ाचे से गले लग कर अर्जुन ने भी दोनों आँखों के ऊपर चूम कर सर हिलाया.
"तोह अब मैं बड़ा हो रहा हु न? वैसे लगता है जल्दी हे बड़ा हो गया.", अर्जुन के द्विअर्थी शब्दों पर शर्माती हुई रेखा ने चादर चेहरे तक ओढ़ ली थी. अर्जुन अपना बैग ले कर कमरे को बंद करता हुआ हँसता मुस्कुराता चल दिया नाश्ते के लिए. बस एक हे रात में उसने जहाँ रेखा की चाहत को मुकम्मल किया था वही उसकी राह देखती अलका, आरती और ऋतू संग वो प्रेम के लम्हे बखूबी जिए थे. नानी के साथ नाश्ते का दौर ख़तम करके वो जब यहाँ से रुखसत हुआ तोह दूसरी मंज़िल पर अलका वाले कमरे की खिड़की से रेखा उसको जाते देखती रही और अर्जुन ने गोल आईने से चमक उधर मार कर बता दिया था के वो अब उसके दिल के साथ साथ साये की तरह बहार भी संग है.
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"ये दुनिया कभी भी मेरे या तुम्हारे हिसाब से नहीं चलती शंकर. और जो वह हुआ उसको दिमाग से निकाल कर बस ये सोच की हम जीवन को कैसे बेहतर दिशा दे सकते है. उस इंसान ने जब तुम्हारी पूरी बात सुनी तोह वो aatm-manthan करता आंसू बहा रहा था. उसको यकीन हो गया था की उस हादसे में सिर्फ तुम हे गलत नहीं थे और अगर होते तोह क्या हॉस्पिटल खुद ले कर जाते? क्या मैं उसके सामने अपना हथियार रख कर खुद को उसके हवाले करता? उसके परिवार के साथ बहोत बुरा हुआ था शंकर और जब हमारी गलती नहीं थी फिर भी हम दोषी की तरह उसके सामने थे. वो सेहन नहीं कर सका ये सब क्योंकि इतने समय तक वो अपनी सोच से बहार नहीं आ सका था. वास्तविकता पता लगने पर उसके जीवन का अब कोई उद्देश्य उसको नजर नहीं आया.", नरिंदर शंकर को मेहुल के फार्म से गाडी में बैठा कर घर की और चल दिया था. चलने से पहले दोनों ने वही नाश्ता किया था और नहाना त्यार होना भी.
"तू जानता नहीं बे इन्दर अगर तुझे कुछ हो जाता तोह मैं मर्डर जाता मेरे भाई. वो इंसान भी गलत नहीं था क्योंकि तेरे या मेरे जाने पर माँ की क्या हालत होगी? बाप के कंधे पर बेटे के अर्थी से बढ़ कर क्या बोझा होगा? उस बहिन का जिसने भाई खोने के साथ अजन्मी संतान भी गंवाई. दुनिया के यही पहलु मुझे डरते है भाई और मैं इसलिए सिर्फ वही जुंग लड़ता हु जिसमे सामने वाला दोषी हो और वो सामने हो. मैं बहोत डर गया था मेरे भाई, ये सोच कर हे की मेरे गुनाहो की बलि तू चढ़ने जा रहा था.", शंकर अभी भी थोड़ा भावुक था जिसको देख नरिंदर ने गाडी चलते हुए हे एक हाथ से उसका गाल थापक कर हंसी दी.
"देख लो अंडकोष की बड़ी गोली को, कितनी सूजन है इसमें. हाहाहा.. मैं उसके सामने निहत्था जरूर था मेरे भाई पर मैं भी अपने बाप के कंधे पर वैसा बोझ नहीं बनता. इतना कमतर आँका क्या तूने मुझे? पर एक बात गाँठ बाँध ले शंकर की आइंदा तू अपने हाथ खून से नहीं रंगेगा फिर चाहे वो दोषी हो यो कोई भी. ये तभी करेगा जब मैं तेरे साथ हो या उमेद. तुझे कसम है अज्जू की अगर तूने मेरी बात न मानी तोह.", शंकर अपनी गलती से हे आज नरिंदर की दी गयी सौगंध में फंस चूका था. पर ये उसकी सुरक्षा और चरित्र की वजह से किया गया था जिस से भविष्य में उस पर आंच न आये.
"और मेरे दोस्तों, साले या दलीप के साथ?"
"किसी के भी साथ नहीं डॉक्टर साहब. दिमाग सिर्फ काम पर चलाओ आप और बाकी सब देखने के लिए ये निठल्ला है हे तुम्हारे साथ. खुद सोच शंकर जब तेरे पास मैं हु, गज्जू है और राजेश जैसा कर्मठ इंसान तोह तुझे खुद मुसीबत मोल लेने की जरुरत हे क्या है? संजीव भी बहोत लायक है और बजाये की हम सभी के कंधो का बोझ बेमतलब बढ़ाये, जैसा सरल जीवन चल रहा उसको चलने देते है. कल को क्या तू दादा नाना बनेगा तोह चाहेगा की बचे वैसे हे हालात में बड़े हो जो हमारे बचो ने झेला? लड़कियां अकेली बहार तक न निकल सकीय जवान होने तक. एक को खोया, एक को दूर रखा और तीसरा सब भूल कर बस सुरक्षा प्रहरी बन्न कर अपना हे जीवन खो बैठा. बता न शंकर क्या ऐसा भविष्य देना चाहता है तू?", इस बात ने बहोत गहरा वार किया था शंकर के मैं मस्तिष्क पर. उसके कर्मो की सजा जो इन्दर को मिलने वाली थी और अगर भविष्य में वो उसके हे बचो पर गाज गिरा दे तोह क्या होगा.
"नहीं भाई.. मैं आग लगा दूंगा दुनिया को अगर किसी भी बचे पर आंच आयी तोह."
"ोये तू अग्निशमन कर्मचारी बन्न बे खड्ड दिमाग, आग भड़काने वाला नहीं. परिवार को अब सुरक्षा नहीं खुल कर ज़िन्दगी जीने का मौका देना है. हाँ दीवारे मजबूत कर चुके है हम और जो रूठे थे वो मान चुके है. ऋतू बिटिया अगले बरस विदेश चली जायेगी और अलका भी. तू थोड़ा बहोत छुट्टी ले कर वो दोनों देश घूम फिर के आ. उसके एक साल बाद अपना लाडला भी कॉलेज शुरू करेगा पर उसके जीवन में तू दखल नहीं देगा जैसे हमारे समय पापा ने नहीं दिया. प्रतिस्पर्धी बन्न ने की जगह बस बाप बन, दोस्त तोह तू बस कभी कभी बनता है उसका और वैसे भी बूढ़े शेर को जवान शेर पसंद कहा आते है. हाहाहा..", गहरी नसीहत के साथ नरिंदर ने मस्ती मजाक में बदलते वक़्त की भी तस्वीर रख दी अपने बड़े भाई के सम्मुख जिस पर शंकर के उदासीन चेहरे पर वो परिचित मुस्कान लौटने लगी थी.
"जब वो खुद से कुछ बनेगा तभी उसको पता चलेगा इन्दर की ज़िन्दगी सोने की चम्मच और चांदी की थाली जैसी नहीं है जो उसको पैदा होते हे नसीब हुई. हाँ तेरी ये बात उचित है की बचो को अब जीने के अवसर मिलने हे चाहिए. कभी धर्मवीर चाचा तोह कभी पापा खुद मेरी अनगिनत फाइल्स रुकवाते और बचते आये है. बहोत बार सोचता हु की गलतियां न हो पर हमने सब अपने आप हे तोह सीखा और आज ये मुकाम इतनी आसानी से साथ नहीं छोड़ने वाला."
"तुम फिर गलत हो मेरे भाई और इस सोच को बदलो या न बदलो पर फिर कभी ये मैट कहना की अर्जुन को सोने की चम्मच पैदा होते हे नसीब हुई या तुम और मैं self-made है. पापा तक इस बात से इंकार करते है और उनका कहना है की इंसान कभी भी अकेला कुछ नहीं कर सकता. तुम्हारे और मेरे सर पर उनका हाथ था, बचपन में साइकिल, स्कूटर और फिर जीप तक हमे मिली. तुम्हे तोह बाकी सबसे 50 रुपये तक अधिक मिलते थे और पढाई के साथ जितने काण्ड किये हम दोनों ने अर्जुन ने वैसा एक भी नहीं किया क्योंकि वो हमारा बीटा होने के बावजूद आदरणीय रामेश्वर जी और कौशल्या जी का भक्त है. उसके दिल में जो सबके लिए नरमी है वो उसने उस घर से सीखी है जहा रहने से हम कतराते थे. दुनिया में ऐसा कोई इंसान नहीं होता शंकर जो अपने बूते पर बड़ा हुआ हो और नाम कमाया हो. कही परिवार तोह कही कही शिक्षक और और कुछ नहीं तोह दोस्त जरूर साथ होते है. तुम अब बस अपनी नौकरी, दोस्तों की महफ़िल और समाज कल्याण में योगदान दो भाई. माता पिता की करम अगली पीढ़ियों तक असर दिखते है इसको हमेशा ध्यान में रखना. अर्जुन कामयाब नहीं बन्न न चाहता क्योंकि वो कामयाब है. वो अपने से ज्यादा दुसरो के लिए जीना चाहता है इसलिए तुलना मुमकिन भी नहीं. नाश्ते के बाद तुम्हारा दिल करे तोह ड्यूटी चले जाना.", इतनी देर से अपने भाई की हर बात को गौर से सुनते हुए शंकर को कही न कही एहसास हो गया था की वो बेशक अपने पिता सामान मुकाम पर है पर इसमें सबका योगदान जरूर है. और अब ड्यूटी का जीकर हुआ तोह उसने भी इत्छा प्रकट की.
"तू घर नहीं रहने वाला?"
"नाश्ता करके मैं विष्णु की तरफ जाने लगा हु. थोड़ा आराम करूँगा और फिर उसके साथ पानी की क्यारियां बनानी है उधर. कल तैयार पौधे आये थे खेत पर और मिटटी सुधरने का काम चलता रहा. मशीन से 10 नेहरे सी बनाई है उसने जहाँ पानी रहेगा और उनके बीच वाले ऊँचे हिस्से पर पेड़ लगेंगे. दलीप भाई भी अवकाश पर हे है और राजेश कल रात भी वही महफ़िल जमाये बैठा था दलीप के छोटे भाई और विष्णु के साथ. बहोत रफ़्तार से काम करवाया है दलीप और पल भाई ने वह."
"मैं भी उधर हे चलता हु तेरे साथ नाश्ता करके. काम से फर्लोव मारूंगा पर घर पे यही बोलना की तू मुझे हॉस्पिटल छोड़ के गौशाला जा रहा है."
"हाहाहा.. भाई तू और तेरी फर्लोव. माँ अगर पापा के साथ गौशाला देखने आयी फिर तू क्या बहाना करेगा?", नरिंदर की बात का जवाब जैसे शंकर पहले हे सोचे बैठा था. अब वो अवसाद और पीड़ा भुला कर वापिस पहले सा हे था.
"गौशाला देखने आएंगे तोह देख के चले जाएंगे. और विष्णु से मिलने आये तोह मैं दलीप के खेत में निकल लूंगा पिछले रस्ते से. पर मेरा आज काम पे जाने का दिल नहीं है तोह नहीं है."
"हाँ भाई अब दिल होगा कैसे? रात के 2-3 बजे तक दारु पीयोगे तोह उसके बाद सोना हे है. चल ठीक है तू भी चल बस दारु नहीं मिलेगी उधर. वैसे कल ड्राइवर का इंतजाम करके रखना, ललिता भाभी को माधुरी बिटिया की ससुराल जाना है.", घर के बहार पहुंचते हे नजर गेट के बहार हे खड़े छोल साहब और अपने पिता पर पड़ी जो जैसे इनकी हे प्रतीक्षा कर रहे थे.
"मर्डर गए इन्दर. मैंने बहाना लगाया था की मैं मेहुल के उधर से हे ड्यूटी चला जाऊंगा और अब मैं तेरे साथ आया हु."
"ले स्वाद अब तू और मुझसे पुछा तोह मैं कह दूंगा की तूने तोह मुझे हॉस्पिटल में विवान के समय हे बोल दिया था की सुबह तुझे फार्महाउस से लेता जाऊ.", नरिंदर भी बराबर मजे ले रहा था अपने भाई के और दोनों का वैसा हे स्वागत हुआ.
"हीरा पन्ना की जोड़ी जाती अलग अलग है लेकिन आती एकसाथ. नवाब साहब गाडी कहा कड़ी की तुमने जिसमे बैठ कर घर से निकले थे?", रामेश्वर जी का अंदाज देख शंकर समझ चूका था की अब थोड़ा झेलना हे होगा.
"वो टायर पंक्चर हो गया था कल शाम को हे हॉस्पिटल में. वही लगा दी थी पापा और इन्दर को मैंने शाम को हे बोल दिया था के मुझे सुबह मेहुल के घर से ले ले."
"सही कहानी है बीटा बस जहां से रात को तुमने फ़ोन किया था वो हॉस्पिटल प्रताप का था और गाडी तुम्हारी सदर थाने में सही सलामत कड़ी है जैसी तुमने करि थी. जाओ थोड़ा खाना वाना खा लो भाई उसके बाद फुर्सत मिले तोह फ़ोन कर लेना. मैं जरा तुम्हारे चाचा के साथ गौशाला जा रहा हु. इन्दर, आते हुए अपनी माँ के लेते आना.", अब दोनों घर के भीतर जा रहे थे और नरिंदर मुँह दबा कर हंसी को रोकने की भरसक कोशिश करता आखिर हंस हे दिया.
"भाई अब तू मेरे साथ भी नहीं जा सकता फर्लोव मारने के लिए और घर में गाडी भी नहीं बची कोई. हॉस्पिटल हे छोड़ सकता हु तुझे बस."
"वो ले जाऊंगा मैं जो कपडा ौधा के कड़ी कर राखी. हॉस्पिटल तोह नहीं जाने वाला मैं."
"माँ तुझे स्कूटर की चाबी दे देगी अगर अर्जुन वाली गाडी की तरफ रुख किया तोह. राजू भैया पहले हे गौशाला में कार छोड़ के आये हुए है जिन्हे माँ से झिड़क पड़ने वाली उनके लौटने पर. चल आजा पराठे खा ले फिर सोच लियो के स्कूटर से जाना है या मेरे साथ हॉस्पिटल."
"हाँ उसकी तोह चाबी तक माँ सँभालने लगी अब नहीं तोह कार में हे रहती थी हमेशा. स्कूटर चलाये भी बहोत दिन हुए यार इन्दर. आज ये वेस्पा हे लेके जाता हु. थोड़ा मॉडल टाउन की मार्किट में तफरीह करूँगा और फिर अनाज मंडी वाले दोस्तों की तरफ निकल लूंगा.", अब पिछले आँगन में उनका पहले हे इन्तजार हो रहा था जहा पहुंचते हे दोनों खामोश हो गए अपनी माँ को पहले से उनके लिए प्लेट लगते देख.
"शंकर, फिर तू कहेगा मैं तुझे सबके सामने झाड़ लगाती हु. 8 बजे से पहले का बोलै था मैंने जब बहार रुकना हो तुझे. रात 2 बजे कौन फ़ोन करता है? अब कपडे बदल ले नाश्ते के बाद, फिर मेरे और इन्दर के साथ हे चलियो. और अगले ऐतवार तक रात 8 से पहले हर रोज घर दिखना चाहिए."
"गयी भैंस पानी में. आज दिन हे गलत चढ़ा है जो सोचो उसका उल्टा हे हो रहा भाई.", कौशल्या जी के रसोई में जाते हे शंकर ने बेबसी से जवाब दिया.
"अबे माँ तुझे हॉस्पिटल छोड़ने का नहीं बोली, साथ चलने का कहा है. यही तोह तू चाहता था."
"सोना चाहता था बे मैं उधर जा कर और अब माँ के साथ जाऊंगा तोह हो गया आराम मेरा. चल काम से काम विष्णु तोह मिलेगा उधर.", शंकर ने पहले तोह लस्सी का गिलास भरा और ऐसे हे खाली कर दिया कुछ खाये बिना.
"पापा गए न उधर चाचा के साथ तोह विष्णु भी नसीब नहीं होने वाला. और अब कुछ मैट सोच, माँ से कह दियो की हॉस्पिटल में जरुरी काम है आज तुझे."
"कोई काम नहीं है इसको वह जो तुम सलाह बनाते फिर रहे हो. धर्मवीर भाई साहब का फ़ोन आ चूका है पहले हे और उन्होंने हे कहा है की इसको भी साथ लेते आये वह. अब चुपचाप खाना खाओ और राजू है घर पे. अर्जुन बोल रहा था के ललिता को मैं सीढ़ी बस से हे भिजवा दू कल सवेरे 5 बजे. 9 बजे वो अड्डे से ले लेगा अपनी ताई को. और वो भी गाडी से मन कर रही जबकि एक बैग सामान है बेटी दामाद के लिए."
"भाभी जैसे जाना चाहती है जाने दो माँ. ड्राइवर कहो तोह ड्राइवर मंगवा लेता हु, अपनी गाडी से ले जाएगा. जब भाभी ने आना होगा वापिस तोह ले आएगा."
"उसने रुकना है वह 3-4 दिन, हाथ लगाने नहीं जा रही. बेटी की ससुराल में ड्राइवर और रुकवाने लगो?", कौशल्या जी द्वारा परोसे गरमा गरम पराठे देख शंकर ने तोह ध्यान एक जगह हे केंद्रित कर लिया था पर नरिंदर बातचीत करते हुए खाने लगा.
"कहो तोह मैं हे छोड़ आता हु माँ. 3 घंटे लगने है सारे जाने में.", अभी अचार और रायता ले कर ललिता जी उधर हे आयी थी जिन्होंने अपनी सास से पहले जवाब दिया.
"सवेरे वाली बस कही नहीं रूकती देवर जी और अर्जुन पहले मुझे मार्किट ले कर जाएगा जहा से शगुन का सामान लेना है. वह वो है और उसके पास गाडी भी है तोह फिर क्यों अलग से गाडी ड्राइवर? बस तुम मुझे 5 बजे वाली बस पकड़वा देना.", अब यहाँ अर्जुन और ललिता जी की अलग हे खिचड़ी पाक रही थी जो इनके कहा समझ आती. नरिंदर ने भी हथियार दाल दिए उनके आगे. कोई पक्ष में नहीं था की वो बस से जाए पर अब अर्जुन ने अपनी दादी को सन्देश दिया था और इधर ललिता जी ने अपना पक्ष रख दिया था. पते की बात ये थी की इस सबमे शंकर का ध्यान भांग हो चूका था रात वाली घटना से और अब वो वापिस परिवार के बीच हमेशा जैसा था. नरिंदर के बात सार्थक थी की इंसान अकेला कुछ नहीं बनता, जिसका उदहारण यहाँ सामने हे था की सब एक दूसरे से जुड़े थे, सहयोगी थे और निर्भर भी.
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"फिर मिला टाइम तुझे ारु के साथ?", गौर करने वाली बात थी की सुबह के 10 बजने वाले थे और रेखा अभी तक गहरी नींद में अपने बिस्टेर पर थी. ऋतू ने चाय के लिए दरवाजा खटकाया भी था पर भीतर से यही आवाज मिली की वो दोपहर में हे खाना हे लेंगी. अब तीनो हे अपनी अपनी नींद पूरी करके नाश्ता करती हुई आपस में चर्चा करने लगी थी. सुनंदा जी तोह कुंती को बहार काम समझने में व्यस्त थी तोह अब इनके आसपास और कोई न था.
"तेरे से कब मिलने आया था वो?", ऋतू ने उल्टा आरती से हे सवाल किया.
"3:30 पर और फिर मेरी आँख हे लग गयी उसके साथ लेते हुए. सुबह नानी ने आवाज दी तोह मैं आयी तुम्हारे कमरे में. देख कर तोह लगा की उधर शायद तुम लोग सुबह हे सोई होगी. तुम दोनों उधर एक साथ हे ारु..?", अपनी बात कहते कहते आरती के हे गाल गुलाबी हो गए जैसा उसको ऋतू और अलका के आपसी रेहान सेहन का ाचे से पता था.
"कुछ भी मतलब. मैं तोह इसके पास गयी थी वेट करने के लिए पर मैडम पढ़ती रही और मुझे नींद आ गयी 3 बजे के करीब. बस फिर ऋतू और ारु को हे सोये देखा जब करवट ली तोह. मैं भी हाथ रख कर सो गयी. उस टाइम सरस्वती जी हे जुबान पर होंगी हमारे जब कहा था के उसके साथ सोने को मिले. वही मिला फिर.", अलका के होंठो को मुड़ता देख आरती भी खिलखिला उठी पर ऋतू ने अपने भाव ाचे से छुपा लिए जैसे उसने एक घंटे में हे मनचाहा पा लिया हो. करारी ब्रेड पर मक्खन लगाती हुई वो कॉफ़ी की चुस्कियों के साथ बस वही खा रही थी.
"इस मैडम ने भी जब सोना था तोह फिर बेहतर होता न की मैं भी उधर हे आ जाती. ज्यादा देर सोने को मिलता उसके पास. वैसे बड़ी माँ आज पहली बार इतने समय तक सोई हुई है. तबियत तोह ठीक है न उनकी? वो ारु के जाने पर तोह जगी हुई थी.", आरती ने अब ध्यान रेखा की तरफ करवाया तोह ऋतू ने हे जवाब दिया, अपने होंठो से मक्खन साफ़ करते हुए.
"माँ सोई होंगी 3 बजे के बाद हे और फिर ारु गया है 6:45 पर जब तुमने उन्हें उठा हुआ पाया. कल सवेरे घर से गाडी चला कर वो इधर आयी थी और फिर सारा दिन की bhaag-daud भी उन्होंने हे की. घर पे तोह वो पिछले एक हफ्ते से सोई हे नहीं थी इसलिए तोह ारु उनके पास रुका हम सबके होते हुए भी. छुट्टियों पर आये है यार तोह थोड़ा टाइम अब ये रूल्स और ारु को साइड करके मस्त रहते है. पढ़ने का सिस्टम तोह सेट है हे इधर और माँ ने कहा था के कल हम लोग बोटिंग करने चलेंगे. और वो वह पर हमसे हे सब म्हणत करवाने वाली है.", ऋतू के खुलासे पर बाकी दोनों हे चहक उठी.
"हाँ याद इस झील में तोह नहाने उतर नहीं सकते पर नदी पे चलेंगे तोह फुल मस्ती होगी. चची भी मजेदार इंसान है बस उन्हें जान ने का मौका पहले नहीं मिला. तभी कोमल दीदी कहती थी की हम लोग अभी ाचे से जानते नहीं सीरियस लाइन (गंभीर रेखा) को. हाहाहा.. वैसे एक धमाकेदार खबर बताऊँ?", अब अलका ने उनका ध्यान हंसी के साथ अपनी अधूरी बात पर खींचा. ऋतू उत्सुकता से देख रही थी की ऐसा क्या है जो उसको नहीं पता.
"अब बोल भी दे या सस्पेंस में मारेगी?", आरती ने खली प्लेट एक तरफ सरकते हुआ मेज पर रखे अपने कप को थाम लिया. आलम ये था के आज ये तीनो अभी तक नही भी नहीं थी. मतलब इनका पूरा अवकाश चालु था.
"कल मैं और ारु गए थे न वाक पर रात को. वापिस आते हुए बारिश में उसने मुझे उम्म्म उम्म्म किया.", अलका ने शब्दों की जगह बस होंठो को गोल करते हुए कहा. आवाज इतनी दबी हुई की हॉल तोह क्या मेज से बहार हे न गयी. ऋतू शांत दिखी पर आरती को जैसे उम्मीद नहीं थी.
"कुछ नया बता अब?", ऋतू ने झुंझलाते हुए कहा.
"वो माइड (कुंती) ने देख लिया मुझे.", अलका ने सचमुच हे बम गिरा दिया था इतना बोल कर लेकिन चेहरे से वो शांत हे दिखी, बाकी दोनों के तोह मुँह हे खुले रह गए.
"पागल है?" ऋतू और आरती के स्वर एक साथ हे निकले.
"डरने वाली बात नहीं है जो तुम दोनों ऐसे चौंक रही हो. वो तोह खुद वह नंगी बैठी थी जैसे बारिश में भीगने आयी हो. उसको लगा होगा की इतनी रात को वह कौन आने वाला है तोह मजे से टांगो के बीच कुछ दाल कर हिला रही थी. ारु की नजर नहीं गयी उस तरफ और ये सब मैंने और उस माइड ने बिजली की चमक में देखा. तभी तोह वो मुझे देखते हे सकपका गयी थी थोड़ी देर पहले. पति ठरकी और पत्नी प्यासी. ये तोह वही बात हो गयी की मिया जी बिना गोली की बंदूक और बेगम साहिबा माचिस की डिबिया... हाहाहा..", अलका के उद्धरण पर आरती तोह सब भूल कर मुस्कुरायी पर ऋतू जैसे कुछ सोचने लगी थी.
"वो यहाँ हमारी gair-haajri में अकेली रहने वाली है अलका और ये जगह बहोत संभाल कर दुनिया से बचा कर राखी गयी है. हो सके तोह अपने तरीके से इस बारे में माँ से जरूर बात करना. तुम जानती हो की बात कैसे घुमानी है और मेरी बात का मतलब भी समझ गयी होगी. आरती, जरा पता कर तोह अर्जुन गाँव पहुंच गया क्या.", ऋतू सभी प्लेट एकत्रित करती हुई उठ कड़ी हुई. बर्तन ज्यादा नहीं थे जिन्हे साफ़ करने के बाद ये लोग फिर से बगीचे में समय बिताने वाली थी. आरती ने भी वही रखे रजिस्टर से गाँव का नंबर निकाल का मिला दिया. कुछ समय तक घंटी जाने के बाद जो बात हुई उस से तोह यही पता चला की अर्जुन कपडे बदल कर अनामिका चची के कमरे में थोड़ी देर सोने गया है और 12:30 पर उसने शहर जाना है जरुरी काम से.
"इसके काम जरुरी हे रहते है चाहे वो हो कुछ भी नहीं. इतनी जल्दी ये भगा क्यों यहाँ से अगर तुझे पता हो तोह.?", रसोई में संदेसा मिलते हे ऋतू ने आरती से बाकी जानकारी चाहि.
"सुबह 6 बजे हे दादा जी का फ़ोन आया था और उसके बाद हे वो तैयार हो कर निकल गया था. यही बताया था की दादा जी का हे कोई काम है जिसके लिए उसने पहले माधुरी दीदी की ससुराल जाना है फिर महल.", आरती का जवाब सपाट था पर ऋतू को महल सुन्न कर हे कुछ याद आ गया था
"वो राजकुमारी अमृता देखि थी तुमने शादी में? मुझे लगता है की वो अर्जुन को पसंद करती है. और दादा जी भी उसको वह भेज रहे है जहा अगर गड़बड़ हुई तोह संभाले नहीं सम्भलेगी. कोशिश करना की 1 बजे के आसपास शिल्पा दीदी से बात हो जब अर्जुन उनके यहाँ पहुंचे या उन्हें बता दे की अर्जुन के वह आते हे बात करवा दे, शहर से कुछ लेने का याद करवाना है बस.", ऋतू प्लेट कपडे से साफ़ करती हुई नहाने का बोल कर निकल गयी जबकि आरती अपनी जगह कड़ी अपना सर खुजाती हुई मासूमियत से भरी और उलझ गयी इस झंझट में. उसको ये सब समझ हे कहा आता था. पर इतना जान गयी थी की ऋतू चिंतित है राजकुमारी और अर्जुन के बीच अगर कुछ भी हुआ तोह. और वो चिंतित है मतलब आरती को भी चिंता करनी चाहिए.
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"कुछ ज्यादा हे थके हुए लगते हो? दूध बना कर लौ क्या?", बंद कमरे में अर्जुन चची की गॉड में सर टिकाये हुए आराम से लेता था और उसके सर को सहलाती हुई अनामिका चची खुश थी की वो घर आते हे सबसे पहले उनके पहलु में था. पर वो जानती थी की अर्जुन इतनी सवेरे निकला था और लम्बे सफर के बाद पीठ भी दुखने लगती है दुपहिया पर. यहाँ उनकी बात सुन्न कर अर्जुन ने सीधा ब्लाउज के ऊपर से हे उनका एक कठोर उभार थाम लिया.
"यही पीला दो चची जो सबसे तजा और ताक़त देने वाला है. निक्कू तोह पीटा नहीं तभी गांठे पड़ती रहती है इनमे.", पकड़ने के साथ वो अब उन्हें हलके से भोंपू की तरह दबाने लगा तोह चची के बदन में सुरसुरी सी चलने लगी. पर हाथ हटाने के जगह उन्होंने भी सामने के 3 हक्क खोल कर peele/laal ब्लाउज को ऊपर उठाते हुए एक गोरा सुडोल सतांन उसके हवाले कर दिया. निप्पल सचमुच अकड़ा हुआ था और नीली हरे नस्से बता रही थी की निकेतन ने इसको हाथ तक नहीं लगाया.
"आराम से पीना क्योंकि ज्यादा भरने से दुखता है. वो तोह एक हे तरफ का पीटा है और इस चक्कर में कही दोनों अलग अलग न दिखने लगे. इस्सस.. क्या मस्ती करते हो हर घडी..", अर्जुन के चेहरे पर झुकते हुए उन्होंने वो गुलाबी निप्पल उसके होंठो में खुदसे हे भरा तोह पहले जीभ से सेहला कर अर्जुन ने थोड़ा जोर से हे चूसक लिया.
"इसमें गाँठ दिख रही थी इसलिए रास्ता खोलना पड़ा चची. वैसे रात का क्या विचार है आपका?", अब दूध चुसकने के साथ उसने एक हाथ दूसरे वाले पर पंहुचा दिया, ब्लाउज से रास्ता तोह खुला हे था. इतने चिकने और भरे भरे स्टैनो को मसलने से ज्यादा उन पर हाथ फिरने में अर्जुन को मजा मिल रहा था. और अनामिका चची तोह बस आनंद में डूबी इस स्पर्श का असर जांघो के बीच तक महसूस कर रही थी जिन्हे अब वो आपस में जोड़ भी नहीं सकती थी चौकड़ी मार कर अर्जुन को उस पर लिटाये होने की वजह से. पर इसके साथ हे अर्जुन बड़ी लगन से उनके सख्त हुए दूध भरे सतांन को खाली करते हुए आराम भी दे रहा था. अनामिका चची को बड़ी हैरत हुई जब उन्होंने उसके हाथ को एक जगह स्थिर पाया. अर्जुन का चेहरा देखा तोह वो इत्मीनान से सोया हुआ नींद में हे चूचक चूसक रहा था किसी छोटे बचे जैसे.
'वाह ये है मेरे भोले सैयां जी. सही कहती है बड़ी माँ की ये आज भी कही न कही बचे हे है. चलो अब जब प्यार है तोह मुझे ये रूप भी पसंद है.', अगले 15 मिनट तक अर्जुन सारा दूध ख़तम करके अब शान्ति से गॉड में सोया था जैसे पेट भर गया हो. उस सतांन की अत्यधिक कसावट में भी अनामिका अब हलकपन महसूस कर रही थी और जब एक बूँद अर्जुन के होंठो पर अपने हे दूध की देखि तोह अनजाने हे उसके होंठो को चूम बैठी. उसकी नींद और अपनी हरकत का ध्यान आते हे वो सकुचाती सी अर्जुन के सर के निचे तकिया रखने के बाद उसकी ब्याह भी दूसरे तकिये पर टिकती हुई बिस्टेर से उठी और दरवाजा खोल कर बहार आँगन में आ गयी.
"वो महाराज तोह आते हे सो गए पर उनके चाहने वाले फ़ोन कर रहे है मामी. पहले आरती का फ़ोन था और अब किसी जिनि का. जाने ये कब कहा दोस्त बना लेता है.", आँचल ने एक निगाह बिस्टेर पर सोये अर्जुन पर डाली और फिर अपनी मामी के साथ कंप्यूटर वाले कमरे में दाखिल हो गयी जहा अंजलि संजीदा से कुछ सीख रही थी कंप्यूटर पर.
"इतना सफर करके आया है और कल गया भी था. कितना सोने को मिला होगा उधर अपनी माँ और बहनो से मिलने पर? और दोस्त बनाना तोह ाची बात है न आँचल. मेरी भी पहले सिर्फ तुम्ही एक दोस्त थी और देखो अब अंजलि भी है और संजीदा जी तोह दोस्त के साथ साथ हमारी डॉक्टर सहेली भी.", इधर भी दरवाजा बंद हो गया था जैसे एक दिन में हे बहोत कुछ घटा हो. अपना नाम सुन्न कर संजीदा कुर्सी छोड़ कर इनकी बगल में हे बीएड पर आ बैठी. ढीली सी पटियाला सालार और तंग कमीज में आज वो नैसर्गिक रूप में थी और उतनी हे खुश भी.
"अब सहेली के पति जुल्म कारक चल निकले तोह मेरा भी फ़र्ज़ बनता है न की दर्द की दवा करू. वैसे ये दोनों भी मातुरे है और सब समझती है. कल को इनकी भी शादी होगी जैसा की अंकल जी कह रहे थे की साल या 2 साल में. पर मुझे बस एक बात समझ नहीं आयी अनामिका जी. शादी को हो गए 5 साल और एक बचा होने के बाद भी आपको बुखार आ गया चाल में फरक के साथ? मुझे इस सबका एक्सपीरियंस नहीं है पर हॉस्पिटल में समय बिताया है और काफी विवाहित दोस्त रही है मेरी उधर. कुछ दुगनी उम्र की भी और ऐसी सब बातें आपस में होती रहती थी जहा मैं सिर्फ श्रोता बन्न के सब सुनती थी क्योंकि बताने के लिए मेरे पास तोह बस इतना हे था की कभी कभी खुद को टच करके हीट काम कर लेती थी जैसा सभी करती है. पर कही भी आप जैसा मामला सुन्न ने को नहीं मिला. और वो भी विनोद जी के जाने के एक दिन बाद.", अब दोनों युवतियां तोह एक दूसरे को कनखियों से देखती हुई मंद मंद मुस्कुरा रही थी पर अनामिका निशब्द सी बस उँगलियों में उँगलियाँ उलझाए जवाब सोच रही थी.
"कही उन्होंने अप्राकृतिक सेक्स तोह नहीं किया था आपके साथ? मतलब back-side से. मुझे इसका भी कुछ पता नहीं पर एक सीनियर नर्स कहती थी की ऐसा करवाने पर उन्हें 2-3 दिन तक तकलीफ रहती थी और कुछ को ये भी ाचा लगता था.", संजीदा नाम के अनुसार हे बात कर रही थी पर अनामिका की हालत देख कर आँचल ने हे मामला अपने हाथो में लिया.
"मां और मामी का कुछ रेगुलर नहीं है दीदी. या ये कह लीजिये की इनके प्रेग्नेंट होने के बाद से हे वो सब बंद था. अब 8-9 महीने बाद शायद बॉडी तैयार नहीं हुई होगी इस सबके लिए. और दर्द बढ़ा तभी आपका ध्यान गया और आपने दर्द की दवा दी."
"हम्म्म. सही कहती हो आँचल तुम. वैसे तुम्हे एक्सपीरियंस है क्या? मतलब बॉयफ्रेंड है तुम्हारा वह शहर में?", आँचल अब दिलेर हो चली थी इस सवाल पर.
"गाँव में नहीं हो सकता क्या दीदी जो शहर का जीकर किया आपने? और रही बात एक्सपीरियंस की तोह मेरा बॉयफ्रेंड कहता है की ये सब न धीरे धीरे चलना चाहिए जिस से प्यार बढ़ता रहे और फिर एक बार सेक्स हो गया तोह फिर बस हमेशा वही होता रहेगा. इतने जितना मजे ले सकते हो, एक दूसरे के साथ मस्ती कर सकते हो कर ली जाए. आपने क्यों नहीं बनाया कोई बॉयफ्रेंड?", अब सूई संजीदा पर घूमी तोह वो सकपकायी जैसे उसके मैं में बहोत कुछ चल रहा हो.
"नहीं... ऐसा कुछ नहीं.. वो पहले बस करियर पर ध्यान था और बाद में लोगो के बुरे अनुभव सुन्न सुन्न कर मुझे आदत पड़ गयी काम से काम रखने की. फिर यही लगता था अपनी सहेलियों से सुन्न कर की सभी मर्द बस मतलबी होते है जो पहली मीठी बातें करेंगे और काम हुआ नहीं की नजरे फेर लेते है. यहाँ तक की बहोत से तोह मैरिड डॉक्टर्स और नर्सेज का भी आपस में उल्टा सीधा सन था और वो नर्सेज प्रमोशन या घरवाले से खुश न होने को वजह बताती थी. इसलिए मैं तोह रात की ड्यूटी से दूर हे रहने लगी जब ये सब ज्यादा होता था.", संजीदा मुद्दे की बात ताल कर अलग विवरण दे रही थी पर आँचल कहा पीछे हटने वाली थी और उसकी बातें सुन्न कर अब अंजलि के साथ साथ अनामिका को भी मजा आने लगा.
"मेरा सवाल ये नहीं था दीदी? आपको आजतक कोई लड़का पसंद नहीं आया? मुझसे तोह आप 3-4 साल बड़ी है और आपके बराबर मामी की तोह शादी और बीटा भी है."
"एक डॉक्टर पसंद था मुझे.. मतलब वो ाचा दीखता था और बोलता भी बड़े प्यार से था सबके साथ. घमंड जरा सी भी नहीं था लेकिन वो सबके साथ ऐसा हे था और मैंने कभी हिम्मत नहीं की उसके साथ बात करने की क्योंकि मेरे से कही ज्यादा सुन्दर लड़कियां पहले हे उसके आसपास मंडराती रहती थी. फिर पता लगा के वो अलग नहीं था कुछ. कई इंटर्न्स के साथ उसने रिश्ते बना कर उनसे दुरी बना ली थी. ज्यादातर के साथ सिर्फ के बार और सबसे बड़ी बात जो पता चली थी वो ये की वो शादीशुदा था जिसकी बीवी पहले किसी और शहर में डॉक्टर थी और बाद में वो भी उसके पास चला गया. तभी मुझे ये सब shaadi-pyaar अफेयर से दूर रहना भला लगने लगा.", संजीदा की आपबीती सुन्न कर अनामिका को सचमुच बहोत बुरा लगा था जिसने उसका हाथ थाम कर जैसे दिलासा दिया और बदले में वो मुस्कुरायी.
"पर अब लगता है की हर मर्द एक जैसा नहीं होता. कुछ ख़ास होते है जो अपने से ज्यादा दुसरो के बारे में सोचते है, उन्हें प्यार करते है और अपने से जुड़े हर इंसान को.", ये यक़ीनन उसने अर्जुन का हे परिचय दिया था और बाकी तीन में से 2 ये समझ भी चुकी थी. अनामिका की धड़कन बढ़ी थी पर आँचल ने चुटकी लेते हुए अगला तीर चल दिया.
"ऐसे लड़के.. मतलब मर्द फिर किसी एक के नहीं होते दीदी. क्योंकि वो परवाह और प्यार सबसे करते है. सोचो अगर ऐसा लड़का.. मतलब मर्द आपकी लाइफ में आया भी तोह आप तोह उसको पसंद हे नहीं करेंगी क्योंकि वो एक के साथ कहा होगा जब सबको प्यार करने वाला हुआ तोह?", संजीदा को इतने सपाट जवाब और फिर सवाल की आशा तोह नहीं थी पर जैसे अब बात हाथ पर आ चुकी थी.
"मेरे साथ होने पर वो बस मेरे पास हो दिल और मैं से तोह मुझे कोई परेशानी नहीं. और जरुरी तोह नहीं हर बॉन्डिंग सेक्स पर हे ख़तम हो आँचल?"
"जिसकी तस्वीर आप मैं में बनाये हुए हो न मुझे तोह लगता है की उसकी बॉन्डिंग शुरू हे सेक्स से होती होगी और फिर डूबा देगा प्यार भर भर के. अक्सर ऐसे जो गिने चुने लोग होते है न जिनके बंटवारे पर भी दुःख की जगह खुशनसीबी समझा जाए, वो आपकी बनायी आखिरी सीमा को पहली बना कर उस दुनिया में ले जाते है जहा कोई सीमा नहीं होती. थोड़ा बहार निकलो अपनी सेट लिमिट्स दीदी, तभी पता चलेगा की ये जो प्यार है न इसको मैं में बैठाया जा सकता है पर क़ैद नहीं कर सकते. बच के रहना पहले हे बता रही हु. दर्द और दवा फिर आपको मिलेंगे. हाहाहा..", फ़ोन बजने की आवाज से आँचल हंसती हुई कमरे से बहार निकल चली संजीदा के साथ साथ अनामिका को भी ताज्जुब में छोड़ कर.
"ये लड़की क्या बोल गयी अनामिका जी?"
"मुझे कैसे पता होगा दीदी? मैंने तोह सीधा शादी की और उसके बाद हे प्यार हुआ है. आप उस से हे पूछ लेना, मैं चाय बना के लाती हु.", अनामिका ने भी बातों बातों में अपना सच कह सुनाया था की शादी विनोद से और उसके बाद अब प्यार अर्जुन से. पर पहले से उलझी संजीदा के ये सब कहा समझ आता. एक बार फिर से उधर फ़ोन पर कोई अर्जुन का हे चाहने वाला था और आँचल ने नाम पुकारा तोह वो कोई जन्नत थी, अर्जुन की पहचान वाली. एक घंटे बाद हे अर्जुन उठ कर अब फ़ोन सुन्न रहा था जिसको अपने सामने से गुजरता देख दिल हे दिल में संजीदा को अलग सी गर्मी महसूस हुई.
Khatta-Meetha (1)
उस खूबसुरता सुबह और हसीं सामीप्य का अंतत दरवाजे पर होने वाली निरंतर छोटी दसतक से हुआ. बड़े बिस्टेर पर अलका बेसुध सी ऋतू की कमर पर हाथ रखे जस की टास सोई पड़ी थी और ठीक वही हाल ऋतू का था जो एकमात्र वस्त्र, सफ़ेद परिधान जो कई जगह से अस्त व्यस्त था उसमे आधी अधूरी लिपटी अर्जुन के जिस्म पर चादर सी चढ़ी थी. अलका को सोये एक घंटे से ज्यादा होने को आया था और ऋतू तक़रीबन 10 मिनट पहले. अर्जुन ने बड़ी हे एहतियात से खुद को ऋतू के निचे से निकला जहा बहोत परेशानी के साथ वो स्वयं भी जैसे इस से दूर होना नहीं चाहता था.
'दादा जी का फ़ोन है ारु और नानी जी नहाने के बाद पूजा कर रही है बहार. इधर मैं देख लुंगी, तुम जाओ.", अर्जुन बोझिल आँखों से अपने सामने कड़ी मासूम से आरती को देख कुछ पल ठिठका रहा जहा आरती अब शर्मसार हो रही थी, जाने किस वजह से. सूखे होंठो से हे आरती के गाल चूम कर जैसे हे अर्जुन घूमा तोह सर पे चपत लगते हुए तुरंत बिस्टेर से निचे गिरी अपनी निक्कर को उठा कर अपने अंग को क़ैद किया जो अभी भी सख्त था.
'ये दादा जी और इनका टाइम.', ऊपर सीना भी टीशर्ट से ढकता हुआ वो मुँह हाथ धो कर हॉल की तरफ चल दिया. रात जैसे काफी म्हणत भरी गुजरी थी उसकी और अधिकाँश म्हणत सिर्फ रेखा के पहलु में हुई.
"Hello. गुड मॉर्निंग बौ जी.", उनींदी आवाज सामने वाले ने भी भली भाँती सुनी थी जो रामेश्वर जी की जगह कौशल्या जी थी.
"मेरा बैलबुद्धि आज 6 बजे तक नींद में कैसे?"
"ओह आप हो, मेरी प्यारी दादी. पहले गाँव में हे इतनी जल्दी उठना पड़ा था दादी, फिर स्टेडियम वाला काम और फिर घर और शहर के. उसके बाद इधर आया तोह सफर हे इतना थकाने वाला था. रात आरती दीदी के साथ देरी तक फिल्म देखि फिर माँ के पास बैठा जिन्हे नींद नहीं आ रही थी और इस सबमे हे 2 ढाई बज गए. आप बताओ दादी, मेरी नींद तोह नाहा कर पूरी हो जायेगी.", अर्जुन अब भी थोड़ी सुस्ती मान रहा था और आरती उसके सामने ठन्डे पानी का गिलास रख गयी be-awaaj खिलखिलाती हुई.
"तू तोह बिना नौकरी अफसर लग गया बीटा जो इतनी जिम्मेवारियां संभल रहा एक साथ. तेरे बाउजी बोल रहे थे की तू तोह अब वापिस भी जाने वाला होगा पर मैंने कहा था की इसकी नानी और बहने ऐसे तोह न जाने देंगी बिना नाश्ता करवाए. और बचा भी तोह सुकून चाहता होगा. हाँ मैंने तोह अभी इसलिए फ़ोन किया था की तेरे उमेद चाचा का अभी अभी फ़ोन आया था. अर्जुन अब थोड़ा ध्यान से सुन्न जो मैं कह रही हु. आज तोह चल नाश्ते के बाद हे निकलेगा पर फिर मेरे भी ध्यान रहे न रहे इसलिए अभी बताना ठीक समझा."
"आप बोलो दादी, नींद में नहीं हु मैं. और चाचा क्या कह रहे थे?"
"हाँ तभी तोह फ़ोन किया. आज माधुरी भी वापिस आने वाली है और कल तेरी ताई भी उसके ससुराल मिलने आएगी तोह जब ललिता खुद तुझे वह से फ़ोन करे तभी तुम अभिषेक के घर जाना जैसा तू चाहता था. और दूसरी बात है उमेद की. उसका ये बिज़नेस वाला दोस्त है अभिषेक के पड़ोस में नरेश, नरेश कपूर. उसकी बिटिया का रिश्ता जमा है जानकार परिवार में हे और उधर भी उमेद का ाचा व्यवहार है. बीटा वो हमारी तरफ भी ब्याह में आये थे और अब उन्होंने उमेद को भी न्योता भेजा है. तू जब कल जाएगा तेरी बहिन के घर तोह जरा जानकारी ले लियो और परसो फिर तुझे हे वह उमेद के स्थान पर जाना है. बढ़िया सा तोहफा लेना मैट भूलना.", अब उसकी दादी को कहा पता था की जिधर जाने के लिए वो अर्जुन को समझा रही है वह तोह वो पहले से आमंत्रित है पर अर्जुन अब इस न्योते से बेहतर महसूस कर रहा था क्योंकि अब वो उमेद सिंह की जगह जाने वाला था.
"सब पता कर लूंगा मैं बड़े जीजा और शिल्पा दीदी से. वैसे अब ताऊ जी की तबियत कैसी है?"
"ठीक है अब पर बुखार आ जा रहा है इसलिए सोच रही थी की ललिता के साथ किसको भेजू."
"पापा से कहना की वो ताई जी को एक्सप्रेस बस पर बैठा दे, उधर से मैं उन्हें ले लूंगा दादी. ताऊ जी की तबियत ठीक नहीं है तोह उन्हें आराम करने दे बाकी काम तोह सभी दीदी देख हे लेंगी.", अभी अर्जुन की बात पर हामी भरने के बाद कौशल्या जी कुछ आगे कहती की फ़ोन रामेश्वर जी ने ले लिया.
"खोट्या, तनु इस टाइम तक वापस जाना स. अब ध्यान से सुन्न मेरी बात जिसके लिए तेरी दादी को फ़ोन मिलाने के लिए मैंने कहा था. कुमार महेंद्र ने सिर्फ एक घंटे के लिए महल पे मिलना है और फिर वो काम से बहार जाने वाला है. अभिषेक बीटा भी पार्टी मीटिंग के लिए दिल्ली गया हुआ और वो कल हे लौटेगा. उनके घर से एक फाइल ले कर तुझे 2 बजे तक महेंद्र के यहाँ पहुचानी है. फाइल शिल्पा बिटिया को पता है पर वो ख़ास है इसलिए मैं किसी और को वो लेने नहीं भेज सकता. तेरा विनोद चाचा भी नहीं है उधर और वह घर पे सिर्फ बिटिया है तोह अनजान का जाना भी ठीक नहीं. आराम से नाश्ता पानी करके तू ठीक वक़्त निकल जाना. हाँ वो उमेद वाला भी बता दिया न तेरी दादी ने?", अब अर्जुन हथियार दाल गया अपने दादा की इस बात पर. कहा तोह वो सोचे बैठा था की थोड़ा और आराम करने के बाद दिन में निकल चलेगा पर अब तोह रामेश्वर जी ने उसको घडी के कांटो से जोड़ दिया था.
"जी बस मैं नहाने के बाद निकलता हु. फाइल महेंद्र जी को हे देनी है न या किसी.."
"सिर्फ महेंद्र को. उसके किसी भी सलाहकार या मैनेजर को नहीं. और तुम्हे मैंने रास्ता इसलिए बताया था की थोड़ा सोच समझ कर हिमाचल के लिए निकलो पर नहीं जनाब तोह सर पे पाँव रख कर दौड़ लिए उधर. घर जाने के बाद कर लेना आराम जितना चाहो.", अर्जुन जानता था की उधर भी आराम नसीब नहीं होने वाला. जसलीन, दीपा भाभी और जीनत तोह घर से बहार है हे पर घर के भीतर आँचल अलग उसका लहू पीने वाली है. बरबस हे अर्जुन घर लफ्ज़ ज़ेहन में आते हे जैसे काल रात से अभी तक के उन दृश्यों में वापिस लौट चला जिनके सिवा उसकी झोली में और कुछ था हे नहीं.
"जी ठीक है बौ जी मैं तैयार होता हु, फिर धुप में सफर भी मुश्किल रहेगा.", अर्जुन ने आगे बात किये बिना फ़ोन रखते हे ऊपर जाने वाली सीढ़ियों का रुख किया. उसके कदमो की चपलता और गंभीर चेहरे को देख आरती सिर्फ यही सोच सकीय की उसके दादा जी ने जरूर अर्जुन के जिम्मे आवश्यक काम सौंपा है. रेखा के कमरे का दरवाजा अभी भी वैसे हे बहार से बंद मिला जैसा उन्हें सुलाने के बाद अर्जुन ने जाते वक़्त किया था. बेआवाज सा वो इस कक्ष में लौटा तोह दिल इस कदर सुकून से भर उठा जैसे अर्जुन का खुद से हे वास्तविक परिचय हुआ हो. वो बिखरा हुआ था जब घर लौटा पर ऋतू ने वो टुकड़े बंटोर कर अर्जुन को पुनः अर्जुन बनाया था. वो दिल है उसका जिसके बिना अर्जुन जीवित तोह रहा पर इस कदर खोखला जैसे बरसो से खाली पड़ा वो घोंसला जिसमे कभी अंडे सेन्चे हे न गए हो. पर ये जो इतने गहरे सुकून में सोई हुई दिव्यात्मा है, आखिर ये कौन है?
सफ़ेद चादर गर्दन तक ओढ़े सोई रेखा ने भीतर अभी तक कोई वस्त्र न पहना था जो कासी हुई चादर और कमरे के अत्यधिक ठन्डे तापमान से बखूबी जाहिर था. इस पल में भी वो बद्र सी घनी और सुलझी हुई जुल्फे एक तरफ सिमटी हुई उस अद्वितीय चेहरे के आकर्षण के करीब आने में भी कटरा रही थी. अर्जुन अपनी माँ को अपना भगवान् मानता था पर ये उसकी तिलोत्तमा थी जिसका अपना एक और सच था. एकांत में हर रिश्ते और दुनिया से परे सिर्फ अर्जुन की तिलोत्तमा. अर्जुन के कदम कब बढे और कब वो रेखा के सिरहाने बैठा उसके गाल पर झुकता हुआ हलके से चूम कर फिर से उस मासूम से खामोश चेहरे को देखने लगा जिसका ये अलग जनम बस अर्जुन के प्रेम और तपस्या का नतीजा था.
'आज मैं क्यों अलग सा लग रहा हु.. शायद मैं जीवन चक्र से आगे निकल आया. पूरा तोह कबका हो चूका था.. आज वापिस कानन कानन सा बिखर गया. ये बिखरना कोई टूटने सा बुरा नहीं है.. ये अनु (एटम) का अनु से जुड़ कर बना एक नया तत्त्व है. पर मैं बना क्या हु..?', बहोत आहिस्ते से वो ये लफ्ज़ बोल रहा था और रेखा के खुमार से भरी अपनी आँखें खोल कर जब ऊपर अर्जुन को ऐसे झुके पाया, जिसकी आँखों में एक अलग हे समंदर क़ैद था पर लुढ़का था उसमे से बस एक आंसू. वो मुस्कुरा रहा था दिल की गहराई से.
"मुझे अभी और सोना है.. उम्म्म्म", रेखा सचमुच हे उस प्रेम सागर की गहराई में डूबी थी जहा उसने खुद के होने का अलग एहसास प्राप्त किया था. अर्जुन को अपने होंठो से जोड़ कर वो उसको भी बिस्टेर पर लाने लगी थी, अपने पहलु में.
"आपको सोना भी चाहिए. बस मुझे अभी जाना होगा और जाना जरुरी है. आप अपना ख़याल रखना और जो बाकी रहा वो वही होगा जहा तिलोत्तमा ने चाहा है. क्या मैं कुछ अलग लग रहा हु?", अर्जुन ने अपनी चाहत पूरी न की थी जबकि न्योता सामने से रेखा ने दिया भी था. उसकी वजह भी वही थी की रेखा वो आनंद खुल कर लेना चाहती थी और किसी बंद कमरे की जगह ऐसे आशियाने में जहा दूर दूर तक बस प्रकृति के बीच यही दोनों हो. अर्जुन के जाने की बात सुन्न कर रेखा ने खड़े होने की कोशिश की तोह सीने से चादर सरकने के बाद दोनों गोल गुम्बद बेपर्दा तोह हुए हे पर जांघो के बीच अत्यधिक मीठी लहर ने होंठो से सीत्कार उगल दी.
"ाःह.. इतनी जल्दी जाना है?", अर्जुन ने बस हौले से हे दोनों पुष्ट स्टैनो को सहलाने के बाद रेखा को वापिस चादर से धक् कर लेता दिया.
"आप 10 से पहले न निचे जाएंगी और न किसी से मिलेंगी. मैं नहाने के बाद नाश्ता कर के निकल रहा हु. वैसे आपने बताया नहीं की क्या मैं कुछ अलग लग रहा हु इस सुबह में.?", अब रेखा भी विवश थी क्योंकि अर्जुन ने ऐसे अधिकार से कहा था जैसे वो उसकी भार्या हो या वो स्वामी रेखा का. चेहरे को गौर से देखती हुई वो भी एकाएक मुस्कुरा दी.
"शायद पहले ध्यान नहीं दिया मैंने पर तुम्हारे चेहरे पर रोयें बढ़ने के साथ ये कच्ची मूछें घनी होने लगी है. तुम सचमुच बड़े हो रहे हो अर्जुन."
"चाहत है की बस तुम्हारी एक इनायत हो.. दूरियां कभी बढे तोह वो नजराने में हो... मुमकिन है की darkhaast-e-ishq दुनिया न समझे.. तुम्हारे पहलु में खो दू एक अक्स, दूसरा दिखावे को जमाने में हो.", अर्जुन टोलिया उठा कर बाथरूम में जाने से पहले बस इतना कह गया वो भी शायराना अंदाज में जिसको सुन्न कर उसकी तरफ करवट बदलती रेखा ने बड़ी हे मासूमियत से जवाब दिया.
"तुम जब पिता बनोगे न अर्जुन, तोह अगर बेटी हुई उसका नाम इनायत हे रखना.", अर्जुन ये सुन्न कर दरवाजा बंद किये बिना हे पानी के निचे निर्वस्त्र खड़ा हो गया. वो अभी भी मुस्कुरा रहा था और धीमी रफ़्तार से गिरती पानी की बौछारे बेहद ठंडी और सुकून देने वाली थी.
"आपको अजीब नहीं लगेगा इस उम्र में फिर से माँ बन ने पर?", रेखा तोह सुन्न कर हे दांग रह गयी और फिर चेहरा शर्म से लाल.
"बेवकूफ तुमने मुझे ऑपरेशन करवाने पर मजबूर कर दिया था जब पहली हे बार में सावधानी नहीं ली थी. और मैं यहाँ माँ नहीं नानी बन्न ने की बात कर रही हु.", रेखा ने एक तरफ समेटे रखा वही रात वाला रेशमी वस्त्र जिस्म पर पहन कर फिर से चादर ओढ़ ली. जिस्म हरकत करने पर भी अर्जुन के जोरदारन संसर्ग का हर गुजरा पल तस्वीर सा चला देता था उसकी नजरो के सामने. अब वो जाने लगा था इतना अत्यधिक सुख देने के बाद और चर्चा भी किसी और दिशा में हो ली थी. अर्जुन तोह पानी के नीचे खड़ा हुआ अब तक गर्भवती की गयी अपनी संगिनियों के बारे में हे विचार करने लगा था. और माँ द्वारा नसबंदी करवाना वो भी उसके संसर्ग की वजह से जरूर उसको हंसा रहा था.
"बोल न खामोश क्यों हो गया?"
"मैं अभी उतना बड़ा नहीं हुआ हु और जब जिम्मेवार बन्न जाऊंगा तब ये इत्छा भी पूरी कर दूंगा आपकी.", अर्जुन के साथ रेखा को ये मस्ती करना बखूभी भा रहा था और वो उसको अभी इतनी जल्दी नहीं छोड़ने वाली थी.
"मंजू तोह प्रेग्नेंट है न? सोचा नहीं कुछ तुमने?"
"वो.. उसका वही जाने और आप क्यों मेरी टांग खिंच रही है? सो जाओ न आराम से. जरुरी तोह नहीं जब कुछ पता हो और उसके बारे में बात की जाए? मंजू की राहें और सपने मुझसे जुड़े जरूर है पर उसकी मंज़िल मैं न पहले था और न आगे बनूँगा. और मैं इस से ज्यादा समझा नहीं सकता क्यूंकि फिर बात उलझ जायेगी.", ये सच भी था क्योंकि मंजू के जीवन को बदलने वाले दलीप और शंकर हे थे, अर्जुन तोह उसकी उम्मीद और एकमात्र मजबूत सहारा था. रेखा उसकी समझदारी पर प्रभावित तोह हुई लेकिन अभी तोह उसको हमाम में ज्यादा निर्वस्त्र करना था जिस से दोनों उस स्तर तक पहुंचे जहा सिर्फ वो हे एक दूसरे को जान ने के लिए बचे.
"अनीता और संगीता? तेरी मामी है वो दोनों पर जरा सी उम्र में तुमने उन्हें भी."
"आपने ऑपरेशन करवा लिया न उस डर से? और जरा नानी से बात कर लेना आप इस मुद्दे पर. दोनों छोटे मां जी जब शादी हे नहीं करना चाहते थे तोह क्यों उनके साथ साथ दोनों मामियों को जंजीर से बाँध दिया. वो भी ऐसी वैसी नहीं, हमेशा अधूरेपन और दर्द से भरी. वह सभी ाचे है लेकिन क्या ाचे लोगो से गलत फैंसले नहीं हो सकते? उन्होंने मुझे पर डोरे नहीं डाले थे और न घर से बहार िज्जात्त खराब की. उन्होंने मुहसे रिक्वेस्ट की थी माँ.. वो अपने दोनों जेठ को पिता की नजरो से देखती है और उनके लिए मैं भांजे से ज्यादा उनका दोस्त हु. दोस्त एक दूसरे का साथ निभाते है माँ, उन्हें मझदार में नहीं छोड़ते. आप खुद हे सोचिये की अपना घर वह से आधा घंटा हे दूर होगा या 40 मिनट लेकिन क्या मैंने उधर आना जाना रखा?"
"मजाक कर रही थी मैं क्योंकि मैं जानती हु की तुमने सिवाए इत्छा पूरी करने के उसका गलत फायदा नहीं उठाया. पर ऐसे हे इतछायें कब क्या रंग ले ले पता नहीं चलता अर्जुन.", अर्जुन अब तोलिये से खुद को पौंछने लगा था पानी बंद करने के बाद.
"मेरी इतछायें बचपन से सिमित हे है माँ. मुझे तब भी आपके साये में रहना था और कोमल didi-Ritu दीदी मेरा ध्यान वैसे हे रखती रहे जैसे बचपन से आजतक रखती आयी है. हाँ प्रीती.. वो बचपन से हे सबके द्वारा बतायी मेरी विदेशी गुड़िया थी और वो आपको तब भी माँ बुलाती थी, आज भी. इस से ज्यादा न मैंने कभी माँगा और न चाहता हु. हाँ जहाँ जहाँ मुझे जिम्मेवारियां उठानी पड़ेंगी और अपना करम निभाना होगा, मैं वो करूँगा.", अर्जुन टोलिया बाँध कर कमरे में आया तोह रेखा ने पलके झपकाते हुए सर तोह हिलाया पर जैसे वो अब उसको जीवन का सार देने वाली थी.
"जिम्मेवारियां और करम. ये सब तुमने ली है या तुम्हे दी गयी है इस पर निर्भर करता है अर्जुन. काम उम्र में हे तुमने उम्मीदों को इतना ऊँचा कर दिया है की आने वाले कल में या तोह तुम उदहारण बनोगे या बस उदहारण बन्न कर रह जाओगे. मैं तुम्हे कभी भी अपने साये से दूर नहीं करना चाहती थी क्योंकि तुम शुरू से हे अलग थे. मैं 3 पीढ़ी बाद साकार हुई तोह तुमने भी अपने से पहले वाली 3 पीढ़ियों के करम अपने जिम्मे उठा लिए. तुम्हारे पास धीरे धीरे जिम्मेवारियों का उतना बड़ा आडम्बर लग चूका है की इसमें तुम खुद तोह रहे हे नहीं. जानते हो ये जिम्मेवारियां तुम्हारे हे हिस्से क्यों आयी?", अर्जुन ने बस ना में सर हिला दिया.
"क्यूंकि तुम समाज के खिलाफ पैदा होने के समय से हो, आज से नहीं. तुम्हे ताक़तवर और जिम्मेवार बहार की दुनिया और सब सुधरने के लिए नहीं बनाया गया.. बेशक तुमने वो खुद कर दिखाया. तुम्हारी लड़ाई तुम्हारे हे साथ होनी सुनिश्चित है ये बड़े लोग जानते है. अब तुम मेरा मात्रा अंश नहीं रहे, सामान तत्त्व है हम दोनों इसलिए तुम्हारे सवाल जवाब से मैं दूर नहीं रहूंगी. मौत को हरा कर तोह तुम दुनिया में आये थे. उसके बाद तुमने अधिकार जमाया मुझ पर और अपनी बहनो पर. संजीव.. उसकी दुनिया सिर्फ तुम हो जो तुम्हे समाज से बचाये रखना चाहता है, सहेज कर पर कुछ हद्द तक वो विफल हो गया जिस पर उसको दुःख नहीं है. वो खुश है की तुम बेहतर हो रहे हो पर वो भी जानता है की तुम बहार की दुनिया में कदम रखोगे, सिर्फ अकेले तुम.. तब बहोत कुछ बदलेगा चाहे तुम्हारी चाहत मुझसे शुरू और प्रीती पर ख़तम होती हो. जीवन को हमेशा समझने से ज्यादा उसको जीना शुरू करो अर्जुन. अतीत और भविष्य तोह मिल कर सुलझाया जा सकता है पर ये जो आज तुम्हारे पास है, जब ये अतीत बदलेगा तब भविष्य रुपी वर्तमान में तुम्हे कोई दुःख नहीं होना चाहिए. बाकी बातें हम अपने स्पेशल वेकेशन पर करेंगे. बस थोड़ा सा आँखों के साथ दिमाग खोल कर रखना, दिल और पतलून खोलने से पहले. सबकी चाहते पूरी नहीं होंगी और जिनकी होंगी वो इसका बखान उनसे जरूर करेंगे जो वंचित रह गए. तुम समझ गए न मैं क्या कह रही हु?"
"बहोत ाचे से माता जी. ऐसे हे मैं मेरा दुश्मन बन जाऊँगा. इसलिए मुझे लगता है की मुझे आपके हे साये टेल रहना चाहिए."
"और जो तुम्हारे साये में रहते है फिर वो इसको हलके में नहीं लेने वाले.. हाहाहा.. जाओ अब कपडे पहन के निकलो अपने सफर पर. इन्तजार रहेंगे आने वाले समय का."
"आपसे ज्यादा मुझे. उमाठ.. Bye bye तिलोत्तमा डार्लिंग.."
"धत्त.. जाओ अब इस से पहले मेरा मूड बदले. पर दिन निकल चूका है और ध्यान से जाना.", रेखा के ाचे से गले लग कर अर्जुन ने भी दोनों आँखों के ऊपर चूम कर सर हिलाया.
"तोह अब मैं बड़ा हो रहा हु न? वैसे लगता है जल्दी हे बड़ा हो गया.", अर्जुन के द्विअर्थी शब्दों पर शर्माती हुई रेखा ने चादर चेहरे तक ओढ़ ली थी. अर्जुन अपना बैग ले कर कमरे को बंद करता हुआ हँसता मुस्कुराता चल दिया नाश्ते के लिए. बस एक हे रात में उसने जहाँ रेखा की चाहत को मुकम्मल किया था वही उसकी राह देखती अलका, आरती और ऋतू संग वो प्रेम के लम्हे बखूबी जिए थे. नानी के साथ नाश्ते का दौर ख़तम करके वो जब यहाँ से रुखसत हुआ तोह दूसरी मंज़िल पर अलका वाले कमरे की खिड़की से रेखा उसको जाते देखती रही और अर्जुन ने गोल आईने से चमक उधर मार कर बता दिया था के वो अब उसके दिल के साथ साथ साये की तरह बहार भी संग है.
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"ये दुनिया कभी भी मेरे या तुम्हारे हिसाब से नहीं चलती शंकर. और जो वह हुआ उसको दिमाग से निकाल कर बस ये सोच की हम जीवन को कैसे बेहतर दिशा दे सकते है. उस इंसान ने जब तुम्हारी पूरी बात सुनी तोह वो aatm-manthan करता आंसू बहा रहा था. उसको यकीन हो गया था की उस हादसे में सिर्फ तुम हे गलत नहीं थे और अगर होते तोह क्या हॉस्पिटल खुद ले कर जाते? क्या मैं उसके सामने अपना हथियार रख कर खुद को उसके हवाले करता? उसके परिवार के साथ बहोत बुरा हुआ था शंकर और जब हमारी गलती नहीं थी फिर भी हम दोषी की तरह उसके सामने थे. वो सेहन नहीं कर सका ये सब क्योंकि इतने समय तक वो अपनी सोच से बहार नहीं आ सका था. वास्तविकता पता लगने पर उसके जीवन का अब कोई उद्देश्य उसको नजर नहीं आया.", नरिंदर शंकर को मेहुल के फार्म से गाडी में बैठा कर घर की और चल दिया था. चलने से पहले दोनों ने वही नाश्ता किया था और नहाना त्यार होना भी.
"तू जानता नहीं बे इन्दर अगर तुझे कुछ हो जाता तोह मैं मर्डर जाता मेरे भाई. वो इंसान भी गलत नहीं था क्योंकि तेरे या मेरे जाने पर माँ की क्या हालत होगी? बाप के कंधे पर बेटे के अर्थी से बढ़ कर क्या बोझा होगा? उस बहिन का जिसने भाई खोने के साथ अजन्मी संतान भी गंवाई. दुनिया के यही पहलु मुझे डरते है भाई और मैं इसलिए सिर्फ वही जुंग लड़ता हु जिसमे सामने वाला दोषी हो और वो सामने हो. मैं बहोत डर गया था मेरे भाई, ये सोच कर हे की मेरे गुनाहो की बलि तू चढ़ने जा रहा था.", शंकर अभी भी थोड़ा भावुक था जिसको देख नरिंदर ने गाडी चलते हुए हे एक हाथ से उसका गाल थापक कर हंसी दी.
"देख लो अंडकोष की बड़ी गोली को, कितनी सूजन है इसमें. हाहाहा.. मैं उसके सामने निहत्था जरूर था मेरे भाई पर मैं भी अपने बाप के कंधे पर वैसा बोझ नहीं बनता. इतना कमतर आँका क्या तूने मुझे? पर एक बात गाँठ बाँध ले शंकर की आइंदा तू अपने हाथ खून से नहीं रंगेगा फिर चाहे वो दोषी हो यो कोई भी. ये तभी करेगा जब मैं तेरे साथ हो या उमेद. तुझे कसम है अज्जू की अगर तूने मेरी बात न मानी तोह.", शंकर अपनी गलती से हे आज नरिंदर की दी गयी सौगंध में फंस चूका था. पर ये उसकी सुरक्षा और चरित्र की वजह से किया गया था जिस से भविष्य में उस पर आंच न आये.
"और मेरे दोस्तों, साले या दलीप के साथ?"
"किसी के भी साथ नहीं डॉक्टर साहब. दिमाग सिर्फ काम पर चलाओ आप और बाकी सब देखने के लिए ये निठल्ला है हे तुम्हारे साथ. खुद सोच शंकर जब तेरे पास मैं हु, गज्जू है और राजेश जैसा कर्मठ इंसान तोह तुझे खुद मुसीबत मोल लेने की जरुरत हे क्या है? संजीव भी बहोत लायक है और बजाये की हम सभी के कंधो का बोझ बेमतलब बढ़ाये, जैसा सरल जीवन चल रहा उसको चलने देते है. कल को क्या तू दादा नाना बनेगा तोह चाहेगा की बचे वैसे हे हालात में बड़े हो जो हमारे बचो ने झेला? लड़कियां अकेली बहार तक न निकल सकीय जवान होने तक. एक को खोया, एक को दूर रखा और तीसरा सब भूल कर बस सुरक्षा प्रहरी बन्न कर अपना हे जीवन खो बैठा. बता न शंकर क्या ऐसा भविष्य देना चाहता है तू?", इस बात ने बहोत गहरा वार किया था शंकर के मैं मस्तिष्क पर. उसके कर्मो की सजा जो इन्दर को मिलने वाली थी और अगर भविष्य में वो उसके हे बचो पर गाज गिरा दे तोह क्या होगा.
"नहीं भाई.. मैं आग लगा दूंगा दुनिया को अगर किसी भी बचे पर आंच आयी तोह."
"ोये तू अग्निशमन कर्मचारी बन्न बे खड्ड दिमाग, आग भड़काने वाला नहीं. परिवार को अब सुरक्षा नहीं खुल कर ज़िन्दगी जीने का मौका देना है. हाँ दीवारे मजबूत कर चुके है हम और जो रूठे थे वो मान चुके है. ऋतू बिटिया अगले बरस विदेश चली जायेगी और अलका भी. तू थोड़ा बहोत छुट्टी ले कर वो दोनों देश घूम फिर के आ. उसके एक साल बाद अपना लाडला भी कॉलेज शुरू करेगा पर उसके जीवन में तू दखल नहीं देगा जैसे हमारे समय पापा ने नहीं दिया. प्रतिस्पर्धी बन्न ने की जगह बस बाप बन, दोस्त तोह तू बस कभी कभी बनता है उसका और वैसे भी बूढ़े शेर को जवान शेर पसंद कहा आते है. हाहाहा..", गहरी नसीहत के साथ नरिंदर ने मस्ती मजाक में बदलते वक़्त की भी तस्वीर रख दी अपने बड़े भाई के सम्मुख जिस पर शंकर के उदासीन चेहरे पर वो परिचित मुस्कान लौटने लगी थी.
"जब वो खुद से कुछ बनेगा तभी उसको पता चलेगा इन्दर की ज़िन्दगी सोने की चम्मच और चांदी की थाली जैसी नहीं है जो उसको पैदा होते हे नसीब हुई. हाँ तेरी ये बात उचित है की बचो को अब जीने के अवसर मिलने हे चाहिए. कभी धर्मवीर चाचा तोह कभी पापा खुद मेरी अनगिनत फाइल्स रुकवाते और बचते आये है. बहोत बार सोचता हु की गलतियां न हो पर हमने सब अपने आप हे तोह सीखा और आज ये मुकाम इतनी आसानी से साथ नहीं छोड़ने वाला."
"तुम फिर गलत हो मेरे भाई और इस सोच को बदलो या न बदलो पर फिर कभी ये मैट कहना की अर्जुन को सोने की चम्मच पैदा होते हे नसीब हुई या तुम और मैं self-made है. पापा तक इस बात से इंकार करते है और उनका कहना है की इंसान कभी भी अकेला कुछ नहीं कर सकता. तुम्हारे और मेरे सर पर उनका हाथ था, बचपन में साइकिल, स्कूटर और फिर जीप तक हमे मिली. तुम्हे तोह बाकी सबसे 50 रुपये तक अधिक मिलते थे और पढाई के साथ जितने काण्ड किये हम दोनों ने अर्जुन ने वैसा एक भी नहीं किया क्योंकि वो हमारा बीटा होने के बावजूद आदरणीय रामेश्वर जी और कौशल्या जी का भक्त है. उसके दिल में जो सबके लिए नरमी है वो उसने उस घर से सीखी है जहा रहने से हम कतराते थे. दुनिया में ऐसा कोई इंसान नहीं होता शंकर जो अपने बूते पर बड़ा हुआ हो और नाम कमाया हो. कही परिवार तोह कही कही शिक्षक और और कुछ नहीं तोह दोस्त जरूर साथ होते है. तुम अब बस अपनी नौकरी, दोस्तों की महफ़िल और समाज कल्याण में योगदान दो भाई. माता पिता की करम अगली पीढ़ियों तक असर दिखते है इसको हमेशा ध्यान में रखना. अर्जुन कामयाब नहीं बन्न न चाहता क्योंकि वो कामयाब है. वो अपने से ज्यादा दुसरो के लिए जीना चाहता है इसलिए तुलना मुमकिन भी नहीं. नाश्ते के बाद तुम्हारा दिल करे तोह ड्यूटी चले जाना.", इतनी देर से अपने भाई की हर बात को गौर से सुनते हुए शंकर को कही न कही एहसास हो गया था की वो बेशक अपने पिता सामान मुकाम पर है पर इसमें सबका योगदान जरूर है. और अब ड्यूटी का जीकर हुआ तोह उसने भी इत्छा प्रकट की.
"तू घर नहीं रहने वाला?"
"नाश्ता करके मैं विष्णु की तरफ जाने लगा हु. थोड़ा आराम करूँगा और फिर उसके साथ पानी की क्यारियां बनानी है उधर. कल तैयार पौधे आये थे खेत पर और मिटटी सुधरने का काम चलता रहा. मशीन से 10 नेहरे सी बनाई है उसने जहाँ पानी रहेगा और उनके बीच वाले ऊँचे हिस्से पर पेड़ लगेंगे. दलीप भाई भी अवकाश पर हे है और राजेश कल रात भी वही महफ़िल जमाये बैठा था दलीप के छोटे भाई और विष्णु के साथ. बहोत रफ़्तार से काम करवाया है दलीप और पल भाई ने वह."
"मैं भी उधर हे चलता हु तेरे साथ नाश्ता करके. काम से फर्लोव मारूंगा पर घर पे यही बोलना की तू मुझे हॉस्पिटल छोड़ के गौशाला जा रहा है."
"हाहाहा.. भाई तू और तेरी फर्लोव. माँ अगर पापा के साथ गौशाला देखने आयी फिर तू क्या बहाना करेगा?", नरिंदर की बात का जवाब जैसे शंकर पहले हे सोचे बैठा था. अब वो अवसाद और पीड़ा भुला कर वापिस पहले सा हे था.
"गौशाला देखने आएंगे तोह देख के चले जाएंगे. और विष्णु से मिलने आये तोह मैं दलीप के खेत में निकल लूंगा पिछले रस्ते से. पर मेरा आज काम पे जाने का दिल नहीं है तोह नहीं है."
"हाँ भाई अब दिल होगा कैसे? रात के 2-3 बजे तक दारु पीयोगे तोह उसके बाद सोना हे है. चल ठीक है तू भी चल बस दारु नहीं मिलेगी उधर. वैसे कल ड्राइवर का इंतजाम करके रखना, ललिता भाभी को माधुरी बिटिया की ससुराल जाना है.", घर के बहार पहुंचते हे नजर गेट के बहार हे खड़े छोल साहब और अपने पिता पर पड़ी जो जैसे इनकी हे प्रतीक्षा कर रहे थे.
"मर्डर गए इन्दर. मैंने बहाना लगाया था की मैं मेहुल के उधर से हे ड्यूटी चला जाऊंगा और अब मैं तेरे साथ आया हु."
"ले स्वाद अब तू और मुझसे पुछा तोह मैं कह दूंगा की तूने तोह मुझे हॉस्पिटल में विवान के समय हे बोल दिया था की सुबह तुझे फार्महाउस से लेता जाऊ.", नरिंदर भी बराबर मजे ले रहा था अपने भाई के और दोनों का वैसा हे स्वागत हुआ.
"हीरा पन्ना की जोड़ी जाती अलग अलग है लेकिन आती एकसाथ. नवाब साहब गाडी कहा कड़ी की तुमने जिसमे बैठ कर घर से निकले थे?", रामेश्वर जी का अंदाज देख शंकर समझ चूका था की अब थोड़ा झेलना हे होगा.
"वो टायर पंक्चर हो गया था कल शाम को हे हॉस्पिटल में. वही लगा दी थी पापा और इन्दर को मैंने शाम को हे बोल दिया था के मुझे सुबह मेहुल के घर से ले ले."
"सही कहानी है बीटा बस जहां से रात को तुमने फ़ोन किया था वो हॉस्पिटल प्रताप का था और गाडी तुम्हारी सदर थाने में सही सलामत कड़ी है जैसी तुमने करि थी. जाओ थोड़ा खाना वाना खा लो भाई उसके बाद फुर्सत मिले तोह फ़ोन कर लेना. मैं जरा तुम्हारे चाचा के साथ गौशाला जा रहा हु. इन्दर, आते हुए अपनी माँ के लेते आना.", अब दोनों घर के भीतर जा रहे थे और नरिंदर मुँह दबा कर हंसी को रोकने की भरसक कोशिश करता आखिर हंस हे दिया.
"भाई अब तू मेरे साथ भी नहीं जा सकता फर्लोव मारने के लिए और घर में गाडी भी नहीं बची कोई. हॉस्पिटल हे छोड़ सकता हु तुझे बस."
"वो ले जाऊंगा मैं जो कपडा ौधा के कड़ी कर राखी. हॉस्पिटल तोह नहीं जाने वाला मैं."
"माँ तुझे स्कूटर की चाबी दे देगी अगर अर्जुन वाली गाडी की तरफ रुख किया तोह. राजू भैया पहले हे गौशाला में कार छोड़ के आये हुए है जिन्हे माँ से झिड़क पड़ने वाली उनके लौटने पर. चल आजा पराठे खा ले फिर सोच लियो के स्कूटर से जाना है या मेरे साथ हॉस्पिटल."
"हाँ उसकी तोह चाबी तक माँ सँभालने लगी अब नहीं तोह कार में हे रहती थी हमेशा. स्कूटर चलाये भी बहोत दिन हुए यार इन्दर. आज ये वेस्पा हे लेके जाता हु. थोड़ा मॉडल टाउन की मार्किट में तफरीह करूँगा और फिर अनाज मंडी वाले दोस्तों की तरफ निकल लूंगा.", अब पिछले आँगन में उनका पहले हे इन्तजार हो रहा था जहा पहुंचते हे दोनों खामोश हो गए अपनी माँ को पहले से उनके लिए प्लेट लगते देख.
"शंकर, फिर तू कहेगा मैं तुझे सबके सामने झाड़ लगाती हु. 8 बजे से पहले का बोलै था मैंने जब बहार रुकना हो तुझे. रात 2 बजे कौन फ़ोन करता है? अब कपडे बदल ले नाश्ते के बाद, फिर मेरे और इन्दर के साथ हे चलियो. और अगले ऐतवार तक रात 8 से पहले हर रोज घर दिखना चाहिए."
"गयी भैंस पानी में. आज दिन हे गलत चढ़ा है जो सोचो उसका उल्टा हे हो रहा भाई.", कौशल्या जी के रसोई में जाते हे शंकर ने बेबसी से जवाब दिया.
"अबे माँ तुझे हॉस्पिटल छोड़ने का नहीं बोली, साथ चलने का कहा है. यही तोह तू चाहता था."
"सोना चाहता था बे मैं उधर जा कर और अब माँ के साथ जाऊंगा तोह हो गया आराम मेरा. चल काम से काम विष्णु तोह मिलेगा उधर.", शंकर ने पहले तोह लस्सी का गिलास भरा और ऐसे हे खाली कर दिया कुछ खाये बिना.
"पापा गए न उधर चाचा के साथ तोह विष्णु भी नसीब नहीं होने वाला. और अब कुछ मैट सोच, माँ से कह दियो की हॉस्पिटल में जरुरी काम है आज तुझे."
"कोई काम नहीं है इसको वह जो तुम सलाह बनाते फिर रहे हो. धर्मवीर भाई साहब का फ़ोन आ चूका है पहले हे और उन्होंने हे कहा है की इसको भी साथ लेते आये वह. अब चुपचाप खाना खाओ और राजू है घर पे. अर्जुन बोल रहा था के ललिता को मैं सीढ़ी बस से हे भिजवा दू कल सवेरे 5 बजे. 9 बजे वो अड्डे से ले लेगा अपनी ताई को. और वो भी गाडी से मन कर रही जबकि एक बैग सामान है बेटी दामाद के लिए."
"भाभी जैसे जाना चाहती है जाने दो माँ. ड्राइवर कहो तोह ड्राइवर मंगवा लेता हु, अपनी गाडी से ले जाएगा. जब भाभी ने आना होगा वापिस तोह ले आएगा."
"उसने रुकना है वह 3-4 दिन, हाथ लगाने नहीं जा रही. बेटी की ससुराल में ड्राइवर और रुकवाने लगो?", कौशल्या जी द्वारा परोसे गरमा गरम पराठे देख शंकर ने तोह ध्यान एक जगह हे केंद्रित कर लिया था पर नरिंदर बातचीत करते हुए खाने लगा.
"कहो तोह मैं हे छोड़ आता हु माँ. 3 घंटे लगने है सारे जाने में.", अभी अचार और रायता ले कर ललिता जी उधर हे आयी थी जिन्होंने अपनी सास से पहले जवाब दिया.
"सवेरे वाली बस कही नहीं रूकती देवर जी और अर्जुन पहले मुझे मार्किट ले कर जाएगा जहा से शगुन का सामान लेना है. वह वो है और उसके पास गाडी भी है तोह फिर क्यों अलग से गाडी ड्राइवर? बस तुम मुझे 5 बजे वाली बस पकड़वा देना.", अब यहाँ अर्जुन और ललिता जी की अलग हे खिचड़ी पाक रही थी जो इनके कहा समझ आती. नरिंदर ने भी हथियार दाल दिए उनके आगे. कोई पक्ष में नहीं था की वो बस से जाए पर अब अर्जुन ने अपनी दादी को सन्देश दिया था और इधर ललिता जी ने अपना पक्ष रख दिया था. पते की बात ये थी की इस सबमे शंकर का ध्यान भांग हो चूका था रात वाली घटना से और अब वो वापिस परिवार के बीच हमेशा जैसा था. नरिंदर के बात सार्थक थी की इंसान अकेला कुछ नहीं बनता, जिसका उदहारण यहाँ सामने हे था की सब एक दूसरे से जुड़े थे, सहयोगी थे और निर्भर भी.
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"फिर मिला टाइम तुझे ारु के साथ?", गौर करने वाली बात थी की सुबह के 10 बजने वाले थे और रेखा अभी तक गहरी नींद में अपने बिस्टेर पर थी. ऋतू ने चाय के लिए दरवाजा खटकाया भी था पर भीतर से यही आवाज मिली की वो दोपहर में हे खाना हे लेंगी. अब तीनो हे अपनी अपनी नींद पूरी करके नाश्ता करती हुई आपस में चर्चा करने लगी थी. सुनंदा जी तोह कुंती को बहार काम समझने में व्यस्त थी तोह अब इनके आसपास और कोई न था.
"तेरे से कब मिलने आया था वो?", ऋतू ने उल्टा आरती से हे सवाल किया.
"3:30 पर और फिर मेरी आँख हे लग गयी उसके साथ लेते हुए. सुबह नानी ने आवाज दी तोह मैं आयी तुम्हारे कमरे में. देख कर तोह लगा की उधर शायद तुम लोग सुबह हे सोई होगी. तुम दोनों उधर एक साथ हे ारु..?", अपनी बात कहते कहते आरती के हे गाल गुलाबी हो गए जैसा उसको ऋतू और अलका के आपसी रेहान सेहन का ाचे से पता था.
"कुछ भी मतलब. मैं तोह इसके पास गयी थी वेट करने के लिए पर मैडम पढ़ती रही और मुझे नींद आ गयी 3 बजे के करीब. बस फिर ऋतू और ारु को हे सोये देखा जब करवट ली तोह. मैं भी हाथ रख कर सो गयी. उस टाइम सरस्वती जी हे जुबान पर होंगी हमारे जब कहा था के उसके साथ सोने को मिले. वही मिला फिर.", अलका के होंठो को मुड़ता देख आरती भी खिलखिला उठी पर ऋतू ने अपने भाव ाचे से छुपा लिए जैसे उसने एक घंटे में हे मनचाहा पा लिया हो. करारी ब्रेड पर मक्खन लगाती हुई वो कॉफ़ी की चुस्कियों के साथ बस वही खा रही थी.
"इस मैडम ने भी जब सोना था तोह फिर बेहतर होता न की मैं भी उधर हे आ जाती. ज्यादा देर सोने को मिलता उसके पास. वैसे बड़ी माँ आज पहली बार इतने समय तक सोई हुई है. तबियत तोह ठीक है न उनकी? वो ारु के जाने पर तोह जगी हुई थी.", आरती ने अब ध्यान रेखा की तरफ करवाया तोह ऋतू ने हे जवाब दिया, अपने होंठो से मक्खन साफ़ करते हुए.
"माँ सोई होंगी 3 बजे के बाद हे और फिर ारु गया है 6:45 पर जब तुमने उन्हें उठा हुआ पाया. कल सवेरे घर से गाडी चला कर वो इधर आयी थी और फिर सारा दिन की bhaag-daud भी उन्होंने हे की. घर पे तोह वो पिछले एक हफ्ते से सोई हे नहीं थी इसलिए तोह ारु उनके पास रुका हम सबके होते हुए भी. छुट्टियों पर आये है यार तोह थोड़ा टाइम अब ये रूल्स और ारु को साइड करके मस्त रहते है. पढ़ने का सिस्टम तोह सेट है हे इधर और माँ ने कहा था के कल हम लोग बोटिंग करने चलेंगे. और वो वह पर हमसे हे सब म्हणत करवाने वाली है.", ऋतू के खुलासे पर बाकी दोनों हे चहक उठी.
"हाँ याद इस झील में तोह नहाने उतर नहीं सकते पर नदी पे चलेंगे तोह फुल मस्ती होगी. चची भी मजेदार इंसान है बस उन्हें जान ने का मौका पहले नहीं मिला. तभी कोमल दीदी कहती थी की हम लोग अभी ाचे से जानते नहीं सीरियस लाइन (गंभीर रेखा) को. हाहाहा.. वैसे एक धमाकेदार खबर बताऊँ?", अब अलका ने उनका ध्यान हंसी के साथ अपनी अधूरी बात पर खींचा. ऋतू उत्सुकता से देख रही थी की ऐसा क्या है जो उसको नहीं पता.
"अब बोल भी दे या सस्पेंस में मारेगी?", आरती ने खली प्लेट एक तरफ सरकते हुआ मेज पर रखे अपने कप को थाम लिया. आलम ये था के आज ये तीनो अभी तक नही भी नहीं थी. मतलब इनका पूरा अवकाश चालु था.
"कल मैं और ारु गए थे न वाक पर रात को. वापिस आते हुए बारिश में उसने मुझे उम्म्म उम्म्म किया.", अलका ने शब्दों की जगह बस होंठो को गोल करते हुए कहा. आवाज इतनी दबी हुई की हॉल तोह क्या मेज से बहार हे न गयी. ऋतू शांत दिखी पर आरती को जैसे उम्मीद नहीं थी.
"कुछ नया बता अब?", ऋतू ने झुंझलाते हुए कहा.
"वो माइड (कुंती) ने देख लिया मुझे.", अलका ने सचमुच हे बम गिरा दिया था इतना बोल कर लेकिन चेहरे से वो शांत हे दिखी, बाकी दोनों के तोह मुँह हे खुले रह गए.
"पागल है?" ऋतू और आरती के स्वर एक साथ हे निकले.
"डरने वाली बात नहीं है जो तुम दोनों ऐसे चौंक रही हो. वो तोह खुद वह नंगी बैठी थी जैसे बारिश में भीगने आयी हो. उसको लगा होगा की इतनी रात को वह कौन आने वाला है तोह मजे से टांगो के बीच कुछ दाल कर हिला रही थी. ारु की नजर नहीं गयी उस तरफ और ये सब मैंने और उस माइड ने बिजली की चमक में देखा. तभी तोह वो मुझे देखते हे सकपका गयी थी थोड़ी देर पहले. पति ठरकी और पत्नी प्यासी. ये तोह वही बात हो गयी की मिया जी बिना गोली की बंदूक और बेगम साहिबा माचिस की डिबिया... हाहाहा..", अलका के उद्धरण पर आरती तोह सब भूल कर मुस्कुरायी पर ऋतू जैसे कुछ सोचने लगी थी.
"वो यहाँ हमारी gair-haajri में अकेली रहने वाली है अलका और ये जगह बहोत संभाल कर दुनिया से बचा कर राखी गयी है. हो सके तोह अपने तरीके से इस बारे में माँ से जरूर बात करना. तुम जानती हो की बात कैसे घुमानी है और मेरी बात का मतलब भी समझ गयी होगी. आरती, जरा पता कर तोह अर्जुन गाँव पहुंच गया क्या.", ऋतू सभी प्लेट एकत्रित करती हुई उठ कड़ी हुई. बर्तन ज्यादा नहीं थे जिन्हे साफ़ करने के बाद ये लोग फिर से बगीचे में समय बिताने वाली थी. आरती ने भी वही रखे रजिस्टर से गाँव का नंबर निकाल का मिला दिया. कुछ समय तक घंटी जाने के बाद जो बात हुई उस से तोह यही पता चला की अर्जुन कपडे बदल कर अनामिका चची के कमरे में थोड़ी देर सोने गया है और 12:30 पर उसने शहर जाना है जरुरी काम से.
"इसके काम जरुरी हे रहते है चाहे वो हो कुछ भी नहीं. इतनी जल्दी ये भगा क्यों यहाँ से अगर तुझे पता हो तोह.?", रसोई में संदेसा मिलते हे ऋतू ने आरती से बाकी जानकारी चाहि.
"सुबह 6 बजे हे दादा जी का फ़ोन आया था और उसके बाद हे वो तैयार हो कर निकल गया था. यही बताया था की दादा जी का हे कोई काम है जिसके लिए उसने पहले माधुरी दीदी की ससुराल जाना है फिर महल.", आरती का जवाब सपाट था पर ऋतू को महल सुन्न कर हे कुछ याद आ गया था
"वो राजकुमारी अमृता देखि थी तुमने शादी में? मुझे लगता है की वो अर्जुन को पसंद करती है. और दादा जी भी उसको वह भेज रहे है जहा अगर गड़बड़ हुई तोह संभाले नहीं सम्भलेगी. कोशिश करना की 1 बजे के आसपास शिल्पा दीदी से बात हो जब अर्जुन उनके यहाँ पहुंचे या उन्हें बता दे की अर्जुन के वह आते हे बात करवा दे, शहर से कुछ लेने का याद करवाना है बस.", ऋतू प्लेट कपडे से साफ़ करती हुई नहाने का बोल कर निकल गयी जबकि आरती अपनी जगह कड़ी अपना सर खुजाती हुई मासूमियत से भरी और उलझ गयी इस झंझट में. उसको ये सब समझ हे कहा आता था. पर इतना जान गयी थी की ऋतू चिंतित है राजकुमारी और अर्जुन के बीच अगर कुछ भी हुआ तोह. और वो चिंतित है मतलब आरती को भी चिंता करनी चाहिए.
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"कुछ ज्यादा हे थके हुए लगते हो? दूध बना कर लौ क्या?", बंद कमरे में अर्जुन चची की गॉड में सर टिकाये हुए आराम से लेता था और उसके सर को सहलाती हुई अनामिका चची खुश थी की वो घर आते हे सबसे पहले उनके पहलु में था. पर वो जानती थी की अर्जुन इतनी सवेरे निकला था और लम्बे सफर के बाद पीठ भी दुखने लगती है दुपहिया पर. यहाँ उनकी बात सुन्न कर अर्जुन ने सीधा ब्लाउज के ऊपर से हे उनका एक कठोर उभार थाम लिया.
"यही पीला दो चची जो सबसे तजा और ताक़त देने वाला है. निक्कू तोह पीटा नहीं तभी गांठे पड़ती रहती है इनमे.", पकड़ने के साथ वो अब उन्हें हलके से भोंपू की तरह दबाने लगा तोह चची के बदन में सुरसुरी सी चलने लगी. पर हाथ हटाने के जगह उन्होंने भी सामने के 3 हक्क खोल कर peele/laal ब्लाउज को ऊपर उठाते हुए एक गोरा सुडोल सतांन उसके हवाले कर दिया. निप्पल सचमुच अकड़ा हुआ था और नीली हरे नस्से बता रही थी की निकेतन ने इसको हाथ तक नहीं लगाया.
"आराम से पीना क्योंकि ज्यादा भरने से दुखता है. वो तोह एक हे तरफ का पीटा है और इस चक्कर में कही दोनों अलग अलग न दिखने लगे. इस्सस.. क्या मस्ती करते हो हर घडी..", अर्जुन के चेहरे पर झुकते हुए उन्होंने वो गुलाबी निप्पल उसके होंठो में खुदसे हे भरा तोह पहले जीभ से सेहला कर अर्जुन ने थोड़ा जोर से हे चूसक लिया.
"इसमें गाँठ दिख रही थी इसलिए रास्ता खोलना पड़ा चची. वैसे रात का क्या विचार है आपका?", अब दूध चुसकने के साथ उसने एक हाथ दूसरे वाले पर पंहुचा दिया, ब्लाउज से रास्ता तोह खुला हे था. इतने चिकने और भरे भरे स्टैनो को मसलने से ज्यादा उन पर हाथ फिरने में अर्जुन को मजा मिल रहा था. और अनामिका चची तोह बस आनंद में डूबी इस स्पर्श का असर जांघो के बीच तक महसूस कर रही थी जिन्हे अब वो आपस में जोड़ भी नहीं सकती थी चौकड़ी मार कर अर्जुन को उस पर लिटाये होने की वजह से. पर इसके साथ हे अर्जुन बड़ी लगन से उनके सख्त हुए दूध भरे सतांन को खाली करते हुए आराम भी दे रहा था. अनामिका चची को बड़ी हैरत हुई जब उन्होंने उसके हाथ को एक जगह स्थिर पाया. अर्जुन का चेहरा देखा तोह वो इत्मीनान से सोया हुआ नींद में हे चूचक चूसक रहा था किसी छोटे बचे जैसे.
'वाह ये है मेरे भोले सैयां जी. सही कहती है बड़ी माँ की ये आज भी कही न कही बचे हे है. चलो अब जब प्यार है तोह मुझे ये रूप भी पसंद है.', अगले 15 मिनट तक अर्जुन सारा दूध ख़तम करके अब शान्ति से गॉड में सोया था जैसे पेट भर गया हो. उस सतांन की अत्यधिक कसावट में भी अनामिका अब हलकपन महसूस कर रही थी और जब एक बूँद अर्जुन के होंठो पर अपने हे दूध की देखि तोह अनजाने हे उसके होंठो को चूम बैठी. उसकी नींद और अपनी हरकत का ध्यान आते हे वो सकुचाती सी अर्जुन के सर के निचे तकिया रखने के बाद उसकी ब्याह भी दूसरे तकिये पर टिकती हुई बिस्टेर से उठी और दरवाजा खोल कर बहार आँगन में आ गयी.
"वो महाराज तोह आते हे सो गए पर उनके चाहने वाले फ़ोन कर रहे है मामी. पहले आरती का फ़ोन था और अब किसी जिनि का. जाने ये कब कहा दोस्त बना लेता है.", आँचल ने एक निगाह बिस्टेर पर सोये अर्जुन पर डाली और फिर अपनी मामी के साथ कंप्यूटर वाले कमरे में दाखिल हो गयी जहा अंजलि संजीदा से कुछ सीख रही थी कंप्यूटर पर.
"इतना सफर करके आया है और कल गया भी था. कितना सोने को मिला होगा उधर अपनी माँ और बहनो से मिलने पर? और दोस्त बनाना तोह ाची बात है न आँचल. मेरी भी पहले सिर्फ तुम्ही एक दोस्त थी और देखो अब अंजलि भी है और संजीदा जी तोह दोस्त के साथ साथ हमारी डॉक्टर सहेली भी.", इधर भी दरवाजा बंद हो गया था जैसे एक दिन में हे बहोत कुछ घटा हो. अपना नाम सुन्न कर संजीदा कुर्सी छोड़ कर इनकी बगल में हे बीएड पर आ बैठी. ढीली सी पटियाला सालार और तंग कमीज में आज वो नैसर्गिक रूप में थी और उतनी हे खुश भी.
"अब सहेली के पति जुल्म कारक चल निकले तोह मेरा भी फ़र्ज़ बनता है न की दर्द की दवा करू. वैसे ये दोनों भी मातुरे है और सब समझती है. कल को इनकी भी शादी होगी जैसा की अंकल जी कह रहे थे की साल या 2 साल में. पर मुझे बस एक बात समझ नहीं आयी अनामिका जी. शादी को हो गए 5 साल और एक बचा होने के बाद भी आपको बुखार आ गया चाल में फरक के साथ? मुझे इस सबका एक्सपीरियंस नहीं है पर हॉस्पिटल में समय बिताया है और काफी विवाहित दोस्त रही है मेरी उधर. कुछ दुगनी उम्र की भी और ऐसी सब बातें आपस में होती रहती थी जहा मैं सिर्फ श्रोता बन्न के सब सुनती थी क्योंकि बताने के लिए मेरे पास तोह बस इतना हे था की कभी कभी खुद को टच करके हीट काम कर लेती थी जैसा सभी करती है. पर कही भी आप जैसा मामला सुन्न ने को नहीं मिला. और वो भी विनोद जी के जाने के एक दिन बाद.", अब दोनों युवतियां तोह एक दूसरे को कनखियों से देखती हुई मंद मंद मुस्कुरा रही थी पर अनामिका निशब्द सी बस उँगलियों में उँगलियाँ उलझाए जवाब सोच रही थी.
"कही उन्होंने अप्राकृतिक सेक्स तोह नहीं किया था आपके साथ? मतलब back-side से. मुझे इसका भी कुछ पता नहीं पर एक सीनियर नर्स कहती थी की ऐसा करवाने पर उन्हें 2-3 दिन तक तकलीफ रहती थी और कुछ को ये भी ाचा लगता था.", संजीदा नाम के अनुसार हे बात कर रही थी पर अनामिका की हालत देख कर आँचल ने हे मामला अपने हाथो में लिया.
"मां और मामी का कुछ रेगुलर नहीं है दीदी. या ये कह लीजिये की इनके प्रेग्नेंट होने के बाद से हे वो सब बंद था. अब 8-9 महीने बाद शायद बॉडी तैयार नहीं हुई होगी इस सबके लिए. और दर्द बढ़ा तभी आपका ध्यान गया और आपने दर्द की दवा दी."
"हम्म्म. सही कहती हो आँचल तुम. वैसे तुम्हे एक्सपीरियंस है क्या? मतलब बॉयफ्रेंड है तुम्हारा वह शहर में?", आँचल अब दिलेर हो चली थी इस सवाल पर.
"गाँव में नहीं हो सकता क्या दीदी जो शहर का जीकर किया आपने? और रही बात एक्सपीरियंस की तोह मेरा बॉयफ्रेंड कहता है की ये सब न धीरे धीरे चलना चाहिए जिस से प्यार बढ़ता रहे और फिर एक बार सेक्स हो गया तोह फिर बस हमेशा वही होता रहेगा. इतने जितना मजे ले सकते हो, एक दूसरे के साथ मस्ती कर सकते हो कर ली जाए. आपने क्यों नहीं बनाया कोई बॉयफ्रेंड?", अब सूई संजीदा पर घूमी तोह वो सकपकायी जैसे उसके मैं में बहोत कुछ चल रहा हो.
"नहीं... ऐसा कुछ नहीं.. वो पहले बस करियर पर ध्यान था और बाद में लोगो के बुरे अनुभव सुन्न सुन्न कर मुझे आदत पड़ गयी काम से काम रखने की. फिर यही लगता था अपनी सहेलियों से सुन्न कर की सभी मर्द बस मतलबी होते है जो पहली मीठी बातें करेंगे और काम हुआ नहीं की नजरे फेर लेते है. यहाँ तक की बहोत से तोह मैरिड डॉक्टर्स और नर्सेज का भी आपस में उल्टा सीधा सन था और वो नर्सेज प्रमोशन या घरवाले से खुश न होने को वजह बताती थी. इसलिए मैं तोह रात की ड्यूटी से दूर हे रहने लगी जब ये सब ज्यादा होता था.", संजीदा मुद्दे की बात ताल कर अलग विवरण दे रही थी पर आँचल कहा पीछे हटने वाली थी और उसकी बातें सुन्न कर अब अंजलि के साथ साथ अनामिका को भी मजा आने लगा.
"मेरा सवाल ये नहीं था दीदी? आपको आजतक कोई लड़का पसंद नहीं आया? मुझसे तोह आप 3-4 साल बड़ी है और आपके बराबर मामी की तोह शादी और बीटा भी है."
"एक डॉक्टर पसंद था मुझे.. मतलब वो ाचा दीखता था और बोलता भी बड़े प्यार से था सबके साथ. घमंड जरा सी भी नहीं था लेकिन वो सबके साथ ऐसा हे था और मैंने कभी हिम्मत नहीं की उसके साथ बात करने की क्योंकि मेरे से कही ज्यादा सुन्दर लड़कियां पहले हे उसके आसपास मंडराती रहती थी. फिर पता लगा के वो अलग नहीं था कुछ. कई इंटर्न्स के साथ उसने रिश्ते बना कर उनसे दुरी बना ली थी. ज्यादातर के साथ सिर्फ के बार और सबसे बड़ी बात जो पता चली थी वो ये की वो शादीशुदा था जिसकी बीवी पहले किसी और शहर में डॉक्टर थी और बाद में वो भी उसके पास चला गया. तभी मुझे ये सब shaadi-pyaar अफेयर से दूर रहना भला लगने लगा.", संजीदा की आपबीती सुन्न कर अनामिका को सचमुच बहोत बुरा लगा था जिसने उसका हाथ थाम कर जैसे दिलासा दिया और बदले में वो मुस्कुरायी.
"पर अब लगता है की हर मर्द एक जैसा नहीं होता. कुछ ख़ास होते है जो अपने से ज्यादा दुसरो के बारे में सोचते है, उन्हें प्यार करते है और अपने से जुड़े हर इंसान को.", ये यक़ीनन उसने अर्जुन का हे परिचय दिया था और बाकी तीन में से 2 ये समझ भी चुकी थी. अनामिका की धड़कन बढ़ी थी पर आँचल ने चुटकी लेते हुए अगला तीर चल दिया.
"ऐसे लड़के.. मतलब मर्द फिर किसी एक के नहीं होते दीदी. क्योंकि वो परवाह और प्यार सबसे करते है. सोचो अगर ऐसा लड़का.. मतलब मर्द आपकी लाइफ में आया भी तोह आप तोह उसको पसंद हे नहीं करेंगी क्योंकि वो एक के साथ कहा होगा जब सबको प्यार करने वाला हुआ तोह?", संजीदा को इतने सपाट जवाब और फिर सवाल की आशा तोह नहीं थी पर जैसे अब बात हाथ पर आ चुकी थी.
"मेरे साथ होने पर वो बस मेरे पास हो दिल और मैं से तोह मुझे कोई परेशानी नहीं. और जरुरी तोह नहीं हर बॉन्डिंग सेक्स पर हे ख़तम हो आँचल?"
"जिसकी तस्वीर आप मैं में बनाये हुए हो न मुझे तोह लगता है की उसकी बॉन्डिंग शुरू हे सेक्स से होती होगी और फिर डूबा देगा प्यार भर भर के. अक्सर ऐसे जो गिने चुने लोग होते है न जिनके बंटवारे पर भी दुःख की जगह खुशनसीबी समझा जाए, वो आपकी बनायी आखिरी सीमा को पहली बना कर उस दुनिया में ले जाते है जहा कोई सीमा नहीं होती. थोड़ा बहार निकलो अपनी सेट लिमिट्स दीदी, तभी पता चलेगा की ये जो प्यार है न इसको मैं में बैठाया जा सकता है पर क़ैद नहीं कर सकते. बच के रहना पहले हे बता रही हु. दर्द और दवा फिर आपको मिलेंगे. हाहाहा..", फ़ोन बजने की आवाज से आँचल हंसती हुई कमरे से बहार निकल चली संजीदा के साथ साथ अनामिका को भी ताज्जुब में छोड़ कर.
"ये लड़की क्या बोल गयी अनामिका जी?"
"मुझे कैसे पता होगा दीदी? मैंने तोह सीधा शादी की और उसके बाद हे प्यार हुआ है. आप उस से हे पूछ लेना, मैं चाय बना के लाती हु.", अनामिका ने भी बातों बातों में अपना सच कह सुनाया था की शादी विनोद से और उसके बाद अब प्यार अर्जुन से. पर पहले से उलझी संजीदा के ये सब कहा समझ आता. एक बार फिर से उधर फ़ोन पर कोई अर्जुन का हे चाहने वाला था और आँचल ने नाम पुकारा तोह वो कोई जन्नत थी, अर्जुन की पहचान वाली. एक घंटे बाद हे अर्जुन उठ कर अब फ़ोन सुन्न रहा था जिसको अपने सामने से गुजरता देख दिल हे दिल में संजीदा को अलग सी गर्मी महसूस हुई.
