Incest Pyaar - 100 Baar - Page 53 - SexBaba
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Incest Pyaar - 100 Baar

अपडेट 214

Khatta-Meetha (1)

उस खूबसुरता सुबह और हसीं सामीप्य का अंतत दरवाजे पर होने वाली निरंतर छोटी दसतक से हुआ. बड़े बिस्टेर पर अलका बेसुध सी ऋतू की कमर पर हाथ रखे जस की टास सोई पड़ी थी और ठीक वही हाल ऋतू का था जो एकमात्र वस्त्र, सफ़ेद परिधान जो कई जगह से अस्त व्यस्त था उसमे आधी अधूरी लिपटी अर्जुन के जिस्म पर चादर सी चढ़ी थी. अलका को सोये एक घंटे से ज्यादा होने को आया था और ऋतू तक़रीबन 10 मिनट पहले. अर्जुन ने बड़ी हे एहतियात से खुद को ऋतू के निचे से निकला जहा बहोत परेशानी के साथ वो स्वयं भी जैसे इस से दूर होना नहीं चाहता था.

'दादा जी का फ़ोन है ारु और नानी जी नहाने के बाद पूजा कर रही है बहार. इधर मैं देख लुंगी, तुम जाओ.", अर्जुन बोझिल आँखों से अपने सामने कड़ी मासूम से आरती को देख कुछ पल ठिठका रहा जहा आरती अब शर्मसार हो रही थी, जाने किस वजह से. सूखे होंठो से हे आरती के गाल चूम कर जैसे हे अर्जुन घूमा तोह सर पे चपत लगते हुए तुरंत बिस्टेर से निचे गिरी अपनी निक्कर को उठा कर अपने अंग को क़ैद किया जो अभी भी सख्त था.

'ये दादा जी और इनका टाइम.', ऊपर सीना भी टीशर्ट से ढकता हुआ वो मुँह हाथ धो कर हॉल की तरफ चल दिया. रात जैसे काफी म्हणत भरी गुजरी थी उसकी और अधिकाँश म्हणत सिर्फ रेखा के पहलु में हुई.

"Hello. गुड मॉर्निंग बौ जी.", उनींदी आवाज सामने वाले ने भी भली भाँती सुनी थी जो रामेश्वर जी की जगह कौशल्या जी थी.

"मेरा बैलबुद्धि आज 6 बजे तक नींद में कैसे?"

"ओह आप हो, मेरी प्यारी दादी. पहले गाँव में हे इतनी जल्दी उठना पड़ा था दादी, फिर स्टेडियम वाला काम और फिर घर और शहर के. उसके बाद इधर आया तोह सफर हे इतना थकाने वाला था. रात आरती दीदी के साथ देरी तक फिल्म देखि फिर माँ के पास बैठा जिन्हे नींद नहीं आ रही थी और इस सबमे हे 2 ढाई बज गए. आप बताओ दादी, मेरी नींद तोह नाहा कर पूरी हो जायेगी.", अर्जुन अब भी थोड़ी सुस्ती मान रहा था और आरती उसके सामने ठन्डे पानी का गिलास रख गयी be-awaaj खिलखिलाती हुई.

"तू तोह बिना नौकरी अफसर लग गया बीटा जो इतनी जिम्मेवारियां संभल रहा एक साथ. तेरे बाउजी बोल रहे थे की तू तोह अब वापिस भी जाने वाला होगा पर मैंने कहा था की इसकी नानी और बहने ऐसे तोह न जाने देंगी बिना नाश्ता करवाए. और बचा भी तोह सुकून चाहता होगा. हाँ मैंने तोह अभी इसलिए फ़ोन किया था की तेरे उमेद चाचा का अभी अभी फ़ोन आया था. अर्जुन अब थोड़ा ध्यान से सुन्न जो मैं कह रही हु. आज तोह चल नाश्ते के बाद हे निकलेगा पर फिर मेरे भी ध्यान रहे न रहे इसलिए अभी बताना ठीक समझा."

"आप बोलो दादी, नींद में नहीं हु मैं. और चाचा क्या कह रहे थे?"

"हाँ तभी तोह फ़ोन किया. आज माधुरी भी वापिस आने वाली है और कल तेरी ताई भी उसके ससुराल मिलने आएगी तोह जब ललिता खुद तुझे वह से फ़ोन करे तभी तुम अभिषेक के घर जाना जैसा तू चाहता था. और दूसरी बात है उमेद की. उसका ये बिज़नेस वाला दोस्त है अभिषेक के पड़ोस में नरेश, नरेश कपूर. उसकी बिटिया का रिश्ता जमा है जानकार परिवार में हे और उधर भी उमेद का ाचा व्यवहार है. बीटा वो हमारी तरफ भी ब्याह में आये थे और अब उन्होंने उमेद को भी न्योता भेजा है. तू जब कल जाएगा तेरी बहिन के घर तोह जरा जानकारी ले लियो और परसो फिर तुझे हे वह उमेद के स्थान पर जाना है. बढ़िया सा तोहफा लेना मैट भूलना.", अब उसकी दादी को कहा पता था की जिधर जाने के लिए वो अर्जुन को समझा रही है वह तोह वो पहले से आमंत्रित है पर अर्जुन अब इस न्योते से बेहतर महसूस कर रहा था क्योंकि अब वो उमेद सिंह की जगह जाने वाला था.

"सब पता कर लूंगा मैं बड़े जीजा और शिल्पा दीदी से. वैसे अब ताऊ जी की तबियत कैसी है?"

"ठीक है अब पर बुखार आ जा रहा है इसलिए सोच रही थी की ललिता के साथ किसको भेजू."

"पापा से कहना की वो ताई जी को एक्सप्रेस बस पर बैठा दे, उधर से मैं उन्हें ले लूंगा दादी. ताऊ जी की तबियत ठीक नहीं है तोह उन्हें आराम करने दे बाकी काम तोह सभी दीदी देख हे लेंगी.", अभी अर्जुन की बात पर हामी भरने के बाद कौशल्या जी कुछ आगे कहती की फ़ोन रामेश्वर जी ने ले लिया.

"खोट्या, तनु इस टाइम तक वापस जाना स. अब ध्यान से सुन्न मेरी बात जिसके लिए तेरी दादी को फ़ोन मिलाने के लिए मैंने कहा था. कुमार महेंद्र ने सिर्फ एक घंटे के लिए महल पे मिलना है और फिर वो काम से बहार जाने वाला है. अभिषेक बीटा भी पार्टी मीटिंग के लिए दिल्ली गया हुआ और वो कल हे लौटेगा. उनके घर से एक फाइल ले कर तुझे 2 बजे तक महेंद्र के यहाँ पहुचानी है. फाइल शिल्पा बिटिया को पता है पर वो ख़ास है इसलिए मैं किसी और को वो लेने नहीं भेज सकता. तेरा विनोद चाचा भी नहीं है उधर और वह घर पे सिर्फ बिटिया है तोह अनजान का जाना भी ठीक नहीं. आराम से नाश्ता पानी करके तू ठीक वक़्त निकल जाना. हाँ वो उमेद वाला भी बता दिया न तेरी दादी ने?", अब अर्जुन हथियार दाल गया अपने दादा की इस बात पर. कहा तोह वो सोचे बैठा था की थोड़ा और आराम करने के बाद दिन में निकल चलेगा पर अब तोह रामेश्वर जी ने उसको घडी के कांटो से जोड़ दिया था.

"जी बस मैं नहाने के बाद निकलता हु. फाइल महेंद्र जी को हे देनी है न या किसी.."

"सिर्फ महेंद्र को. उसके किसी भी सलाहकार या मैनेजर को नहीं. और तुम्हे मैंने रास्ता इसलिए बताया था की थोड़ा सोच समझ कर हिमाचल के लिए निकलो पर नहीं जनाब तोह सर पे पाँव रख कर दौड़ लिए उधर. घर जाने के बाद कर लेना आराम जितना चाहो.", अर्जुन जानता था की उधर भी आराम नसीब नहीं होने वाला. जसलीन, दीपा भाभी और जीनत तोह घर से बहार है हे पर घर के भीतर आँचल अलग उसका लहू पीने वाली है. बरबस हे अर्जुन घर लफ्ज़ ज़ेहन में आते हे जैसे काल रात से अभी तक के उन दृश्यों में वापिस लौट चला जिनके सिवा उसकी झोली में और कुछ था हे नहीं.

"जी ठीक है बौ जी मैं तैयार होता हु, फिर धुप में सफर भी मुश्किल रहेगा.", अर्जुन ने आगे बात किये बिना फ़ोन रखते हे ऊपर जाने वाली सीढ़ियों का रुख किया. उसके कदमो की चपलता और गंभीर चेहरे को देख आरती सिर्फ यही सोच सकीय की उसके दादा जी ने जरूर अर्जुन के जिम्मे आवश्यक काम सौंपा है. रेखा के कमरे का दरवाजा अभी भी वैसे हे बहार से बंद मिला जैसा उन्हें सुलाने के बाद अर्जुन ने जाते वक़्त किया था. बेआवाज सा वो इस कक्ष में लौटा तोह दिल इस कदर सुकून से भर उठा जैसे अर्जुन का खुद से हे वास्तविक परिचय हुआ हो. वो बिखरा हुआ था जब घर लौटा पर ऋतू ने वो टुकड़े बंटोर कर अर्जुन को पुनः अर्जुन बनाया था. वो दिल है उसका जिसके बिना अर्जुन जीवित तोह रहा पर इस कदर खोखला जैसे बरसो से खाली पड़ा वो घोंसला जिसमे कभी अंडे सेन्चे हे न गए हो. पर ये जो इतने गहरे सुकून में सोई हुई दिव्यात्मा है, आखिर ये कौन है?

सफ़ेद चादर गर्दन तक ओढ़े सोई रेखा ने भीतर अभी तक कोई वस्त्र न पहना था जो कासी हुई चादर और कमरे के अत्यधिक ठन्डे तापमान से बखूबी जाहिर था. इस पल में भी वो बद्र सी घनी और सुलझी हुई जुल्फे एक तरफ सिमटी हुई उस अद्वितीय चेहरे के आकर्षण के करीब आने में भी कटरा रही थी. अर्जुन अपनी माँ को अपना भगवान् मानता था पर ये उसकी तिलोत्तमा थी जिसका अपना एक और सच था. एकांत में हर रिश्ते और दुनिया से परे सिर्फ अर्जुन की तिलोत्तमा. अर्जुन के कदम कब बढे और कब वो रेखा के सिरहाने बैठा उसके गाल पर झुकता हुआ हलके से चूम कर फिर से उस मासूम से खामोश चेहरे को देखने लगा जिसका ये अलग जनम बस अर्जुन के प्रेम और तपस्या का नतीजा था.

'आज मैं क्यों अलग सा लग रहा हु.. शायद मैं जीवन चक्र से आगे निकल आया. पूरा तोह कबका हो चूका था.. आज वापिस कानन कानन सा बिखर गया. ये बिखरना कोई टूटने सा बुरा नहीं है.. ये अनु (एटम) का अनु से जुड़ कर बना एक नया तत्त्व है. पर मैं बना क्या हु..?', बहोत आहिस्ते से वो ये लफ्ज़ बोल रहा था और रेखा के खुमार से भरी अपनी आँखें खोल कर जब ऊपर अर्जुन को ऐसे झुके पाया, जिसकी आँखों में एक अलग हे समंदर क़ैद था पर लुढ़का था उसमे से बस एक आंसू. वो मुस्कुरा रहा था दिल की गहराई से.

"मुझे अभी और सोना है.. उम्म्म्म", रेखा सचमुच हे उस प्रेम सागर की गहराई में डूबी थी जहा उसने खुद के होने का अलग एहसास प्राप्त किया था. अर्जुन को अपने होंठो से जोड़ कर वो उसको भी बिस्टेर पर लाने लगी थी, अपने पहलु में.

"आपको सोना भी चाहिए. बस मुझे अभी जाना होगा और जाना जरुरी है. आप अपना ख़याल रखना और जो बाकी रहा वो वही होगा जहा तिलोत्तमा ने चाहा है. क्या मैं कुछ अलग लग रहा हु?", अर्जुन ने अपनी चाहत पूरी न की थी जबकि न्योता सामने से रेखा ने दिया भी था. उसकी वजह भी वही थी की रेखा वो आनंद खुल कर लेना चाहती थी और किसी बंद कमरे की जगह ऐसे आशियाने में जहा दूर दूर तक बस प्रकृति के बीच यही दोनों हो. अर्जुन के जाने की बात सुन्न कर रेखा ने खड़े होने की कोशिश की तोह सीने से चादर सरकने के बाद दोनों गोल गुम्बद बेपर्दा तोह हुए हे पर जांघो के बीच अत्यधिक मीठी लहर ने होंठो से सीत्कार उगल दी.

"ाःह.. इतनी जल्दी जाना है?", अर्जुन ने बस हौले से हे दोनों पुष्ट स्टैनो को सहलाने के बाद रेखा को वापिस चादर से धक् कर लेता दिया.

"आप 10 से पहले न निचे जाएंगी और न किसी से मिलेंगी. मैं नहाने के बाद नाश्ता कर के निकल रहा हु. वैसे आपने बताया नहीं की क्या मैं कुछ अलग लग रहा हु इस सुबह में.?", अब रेखा भी विवश थी क्योंकि अर्जुन ने ऐसे अधिकार से कहा था जैसे वो उसकी भार्या हो या वो स्वामी रेखा का. चेहरे को गौर से देखती हुई वो भी एकाएक मुस्कुरा दी.

"शायद पहले ध्यान नहीं दिया मैंने पर तुम्हारे चेहरे पर रोयें बढ़ने के साथ ये कच्ची मूछें घनी होने लगी है. तुम सचमुच बड़े हो रहे हो अर्जुन."

"चाहत है की बस तुम्हारी एक इनायत हो.. दूरियां कभी बढे तोह वो नजराने में हो... मुमकिन है की darkhaast-e-ishq दुनिया न समझे.. तुम्हारे पहलु में खो दू एक अक्स, दूसरा दिखावे को जमाने में हो.", अर्जुन टोलिया उठा कर बाथरूम में जाने से पहले बस इतना कह गया वो भी शायराना अंदाज में जिसको सुन्न कर उसकी तरफ करवट बदलती रेखा ने बड़ी हे मासूमियत से जवाब दिया.

"तुम जब पिता बनोगे न अर्जुन, तोह अगर बेटी हुई उसका नाम इनायत हे रखना.", अर्जुन ये सुन्न कर दरवाजा बंद किये बिना हे पानी के निचे निर्वस्त्र खड़ा हो गया. वो अभी भी मुस्कुरा रहा था और धीमी रफ़्तार से गिरती पानी की बौछारे बेहद ठंडी और सुकून देने वाली थी.

"आपको अजीब नहीं लगेगा इस उम्र में फिर से माँ बन ने पर?", रेखा तोह सुन्न कर हे दांग रह गयी और फिर चेहरा शर्म से लाल.

"बेवकूफ तुमने मुझे ऑपरेशन करवाने पर मजबूर कर दिया था जब पहली हे बार में सावधानी नहीं ली थी. और मैं यहाँ माँ नहीं नानी बन्न ने की बात कर रही हु.", रेखा ने एक तरफ समेटे रखा वही रात वाला रेशमी वस्त्र जिस्म पर पहन कर फिर से चादर ओढ़ ली. जिस्म हरकत करने पर भी अर्जुन के जोरदारन संसर्ग का हर गुजरा पल तस्वीर सा चला देता था उसकी नजरो के सामने. अब वो जाने लगा था इतना अत्यधिक सुख देने के बाद और चर्चा भी किसी और दिशा में हो ली थी. अर्जुन तोह पानी के नीचे खड़ा हुआ अब तक गर्भवती की गयी अपनी संगिनियों के बारे में हे विचार करने लगा था. और माँ द्वारा नसबंदी करवाना वो भी उसके संसर्ग की वजह से जरूर उसको हंसा रहा था.

"बोल न खामोश क्यों हो गया?"

"मैं अभी उतना बड़ा नहीं हुआ हु और जब जिम्मेवार बन्न जाऊंगा तब ये इत्छा भी पूरी कर दूंगा आपकी.", अर्जुन के साथ रेखा को ये मस्ती करना बखूभी भा रहा था और वो उसको अभी इतनी जल्दी नहीं छोड़ने वाली थी.

"मंजू तोह प्रेग्नेंट है न? सोचा नहीं कुछ तुमने?"

"वो.. उसका वही जाने और आप क्यों मेरी टांग खिंच रही है? सो जाओ न आराम से. जरुरी तोह नहीं जब कुछ पता हो और उसके बारे में बात की जाए? मंजू की राहें और सपने मुझसे जुड़े जरूर है पर उसकी मंज़िल मैं न पहले था और न आगे बनूँगा. और मैं इस से ज्यादा समझा नहीं सकता क्यूंकि फिर बात उलझ जायेगी.", ये सच भी था क्योंकि मंजू के जीवन को बदलने वाले दलीप और शंकर हे थे, अर्जुन तोह उसकी उम्मीद और एकमात्र मजबूत सहारा था. रेखा उसकी समझदारी पर प्रभावित तोह हुई लेकिन अभी तोह उसको हमाम में ज्यादा निर्वस्त्र करना था जिस से दोनों उस स्तर तक पहुंचे जहा सिर्फ वो हे एक दूसरे को जान ने के लिए बचे.

"अनीता और संगीता? तेरी मामी है वो दोनों पर जरा सी उम्र में तुमने उन्हें भी."

"आपने ऑपरेशन करवा लिया न उस डर से? और जरा नानी से बात कर लेना आप इस मुद्दे पर. दोनों छोटे मां जी जब शादी हे नहीं करना चाहते थे तोह क्यों उनके साथ साथ दोनों मामियों को जंजीर से बाँध दिया. वो भी ऐसी वैसी नहीं, हमेशा अधूरेपन और दर्द से भरी. वह सभी ाचे है लेकिन क्या ाचे लोगो से गलत फैंसले नहीं हो सकते? उन्होंने मुझे पर डोरे नहीं डाले थे और न घर से बहार िज्जात्त खराब की. उन्होंने मुहसे रिक्वेस्ट की थी माँ.. वो अपने दोनों जेठ को पिता की नजरो से देखती है और उनके लिए मैं भांजे से ज्यादा उनका दोस्त हु. दोस्त एक दूसरे का साथ निभाते है माँ, उन्हें मझदार में नहीं छोड़ते. आप खुद हे सोचिये की अपना घर वह से आधा घंटा हे दूर होगा या 40 मिनट लेकिन क्या मैंने उधर आना जाना रखा?"

"मजाक कर रही थी मैं क्योंकि मैं जानती हु की तुमने सिवाए इत्छा पूरी करने के उसका गलत फायदा नहीं उठाया. पर ऐसे हे इतछायें कब क्या रंग ले ले पता नहीं चलता अर्जुन.", अर्जुन अब तोलिये से खुद को पौंछने लगा था पानी बंद करने के बाद.

"मेरी इतछायें बचपन से सिमित हे है माँ. मुझे तब भी आपके साये में रहना था और कोमल didi-Ritu दीदी मेरा ध्यान वैसे हे रखती रहे जैसे बचपन से आजतक रखती आयी है. हाँ प्रीती.. वो बचपन से हे सबके द्वारा बतायी मेरी विदेशी गुड़िया थी और वो आपको तब भी माँ बुलाती थी, आज भी. इस से ज्यादा न मैंने कभी माँगा और न चाहता हु. हाँ जहाँ जहाँ मुझे जिम्मेवारियां उठानी पड़ेंगी और अपना करम निभाना होगा, मैं वो करूँगा.", अर्जुन टोलिया बाँध कर कमरे में आया तोह रेखा ने पलके झपकाते हुए सर तोह हिलाया पर जैसे वो अब उसको जीवन का सार देने वाली थी.

"जिम्मेवारियां और करम. ये सब तुमने ली है या तुम्हे दी गयी है इस पर निर्भर करता है अर्जुन. काम उम्र में हे तुमने उम्मीदों को इतना ऊँचा कर दिया है की आने वाले कल में या तोह तुम उदहारण बनोगे या बस उदहारण बन्न कर रह जाओगे. मैं तुम्हे कभी भी अपने साये से दूर नहीं करना चाहती थी क्योंकि तुम शुरू से हे अलग थे. मैं 3 पीढ़ी बाद साकार हुई तोह तुमने भी अपने से पहले वाली 3 पीढ़ियों के करम अपने जिम्मे उठा लिए. तुम्हारे पास धीरे धीरे जिम्मेवारियों का उतना बड़ा आडम्बर लग चूका है की इसमें तुम खुद तोह रहे हे नहीं. जानते हो ये जिम्मेवारियां तुम्हारे हे हिस्से क्यों आयी?", अर्जुन ने बस ना में सर हिला दिया.

"क्यूंकि तुम समाज के खिलाफ पैदा होने के समय से हो, आज से नहीं. तुम्हे ताक़तवर और जिम्मेवार बहार की दुनिया और सब सुधरने के लिए नहीं बनाया गया.. बेशक तुमने वो खुद कर दिखाया. तुम्हारी लड़ाई तुम्हारे हे साथ होनी सुनिश्चित है ये बड़े लोग जानते है. अब तुम मेरा मात्रा अंश नहीं रहे, सामान तत्त्व है हम दोनों इसलिए तुम्हारे सवाल जवाब से मैं दूर नहीं रहूंगी. मौत को हरा कर तोह तुम दुनिया में आये थे. उसके बाद तुमने अधिकार जमाया मुझ पर और अपनी बहनो पर. संजीव.. उसकी दुनिया सिर्फ तुम हो जो तुम्हे समाज से बचाये रखना चाहता है, सहेज कर पर कुछ हद्द तक वो विफल हो गया जिस पर उसको दुःख नहीं है. वो खुश है की तुम बेहतर हो रहे हो पर वो भी जानता है की तुम बहार की दुनिया में कदम रखोगे, सिर्फ अकेले तुम.. तब बहोत कुछ बदलेगा चाहे तुम्हारी चाहत मुझसे शुरू और प्रीती पर ख़तम होती हो. जीवन को हमेशा समझने से ज्यादा उसको जीना शुरू करो अर्जुन. अतीत और भविष्य तोह मिल कर सुलझाया जा सकता है पर ये जो आज तुम्हारे पास है, जब ये अतीत बदलेगा तब भविष्य रुपी वर्तमान में तुम्हे कोई दुःख नहीं होना चाहिए. बाकी बातें हम अपने स्पेशल वेकेशन पर करेंगे. बस थोड़ा सा आँखों के साथ दिमाग खोल कर रखना, दिल और पतलून खोलने से पहले. सबकी चाहते पूरी नहीं होंगी और जिनकी होंगी वो इसका बखान उनसे जरूर करेंगे जो वंचित रह गए. तुम समझ गए न मैं क्या कह रही हु?"

"बहोत ाचे से माता जी. ऐसे हे मैं मेरा दुश्मन बन जाऊँगा. इसलिए मुझे लगता है की मुझे आपके हे साये टेल रहना चाहिए."

"और जो तुम्हारे साये में रहते है फिर वो इसको हलके में नहीं लेने वाले.. हाहाहा.. जाओ अब कपडे पहन के निकलो अपने सफर पर. इन्तजार रहेंगे आने वाले समय का."

"आपसे ज्यादा मुझे. उमाठ.. Bye bye तिलोत्तमा डार्लिंग.."

"धत्त.. जाओ अब इस से पहले मेरा मूड बदले. पर दिन निकल चूका है और ध्यान से जाना.", रेखा के ाचे से गले लग कर अर्जुन ने भी दोनों आँखों के ऊपर चूम कर सर हिलाया.

"तोह अब मैं बड़ा हो रहा हु न? वैसे लगता है जल्दी हे बड़ा हो गया.", अर्जुन के द्विअर्थी शब्दों पर शर्माती हुई रेखा ने चादर चेहरे तक ओढ़ ली थी. अर्जुन अपना बैग ले कर कमरे को बंद करता हुआ हँसता मुस्कुराता चल दिया नाश्ते के लिए. बस एक हे रात में उसने जहाँ रेखा की चाहत को मुकम्मल किया था वही उसकी राह देखती अलका, आरती और ऋतू संग वो प्रेम के लम्हे बखूबी जिए थे. नानी के साथ नाश्ते का दौर ख़तम करके वो जब यहाँ से रुखसत हुआ तोह दूसरी मंज़िल पर अलका वाले कमरे की खिड़की से रेखा उसको जाते देखती रही और अर्जुन ने गोल आईने से चमक उधर मार कर बता दिया था के वो अब उसके दिल के साथ साथ साये की तरह बहार भी संग है.

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"ये दुनिया कभी भी मेरे या तुम्हारे हिसाब से नहीं चलती शंकर. और जो वह हुआ उसको दिमाग से निकाल कर बस ये सोच की हम जीवन को कैसे बेहतर दिशा दे सकते है. उस इंसान ने जब तुम्हारी पूरी बात सुनी तोह वो aatm-manthan करता आंसू बहा रहा था. उसको यकीन हो गया था की उस हादसे में सिर्फ तुम हे गलत नहीं थे और अगर होते तोह क्या हॉस्पिटल खुद ले कर जाते? क्या मैं उसके सामने अपना हथियार रख कर खुद को उसके हवाले करता? उसके परिवार के साथ बहोत बुरा हुआ था शंकर और जब हमारी गलती नहीं थी फिर भी हम दोषी की तरह उसके सामने थे. वो सेहन नहीं कर सका ये सब क्योंकि इतने समय तक वो अपनी सोच से बहार नहीं आ सका था. वास्तविकता पता लगने पर उसके जीवन का अब कोई उद्देश्य उसको नजर नहीं आया.", नरिंदर शंकर को मेहुल के फार्म से गाडी में बैठा कर घर की और चल दिया था. चलने से पहले दोनों ने वही नाश्ता किया था और नहाना त्यार होना भी.

"तू जानता नहीं बे इन्दर अगर तुझे कुछ हो जाता तोह मैं मर्डर जाता मेरे भाई. वो इंसान भी गलत नहीं था क्योंकि तेरे या मेरे जाने पर माँ की क्या हालत होगी? बाप के कंधे पर बेटे के अर्थी से बढ़ कर क्या बोझा होगा? उस बहिन का जिसने भाई खोने के साथ अजन्मी संतान भी गंवाई. दुनिया के यही पहलु मुझे डरते है भाई और मैं इसलिए सिर्फ वही जुंग लड़ता हु जिसमे सामने वाला दोषी हो और वो सामने हो. मैं बहोत डर गया था मेरे भाई, ये सोच कर हे की मेरे गुनाहो की बलि तू चढ़ने जा रहा था.", शंकर अभी भी थोड़ा भावुक था जिसको देख नरिंदर ने गाडी चलते हुए हे एक हाथ से उसका गाल थापक कर हंसी दी.

"देख लो अंडकोष की बड़ी गोली को, कितनी सूजन है इसमें. हाहाहा.. मैं उसके सामने निहत्था जरूर था मेरे भाई पर मैं भी अपने बाप के कंधे पर वैसा बोझ नहीं बनता. इतना कमतर आँका क्या तूने मुझे? पर एक बात गाँठ बाँध ले शंकर की आइंदा तू अपने हाथ खून से नहीं रंगेगा फिर चाहे वो दोषी हो यो कोई भी. ये तभी करेगा जब मैं तेरे साथ हो या उमेद. तुझे कसम है अज्जू की अगर तूने मेरी बात न मानी तोह.", शंकर अपनी गलती से हे आज नरिंदर की दी गयी सौगंध में फंस चूका था. पर ये उसकी सुरक्षा और चरित्र की वजह से किया गया था जिस से भविष्य में उस पर आंच न आये.

"और मेरे दोस्तों, साले या दलीप के साथ?"

"किसी के भी साथ नहीं डॉक्टर साहब. दिमाग सिर्फ काम पर चलाओ आप और बाकी सब देखने के लिए ये निठल्ला है हे तुम्हारे साथ. खुद सोच शंकर जब तेरे पास मैं हु, गज्जू है और राजेश जैसा कर्मठ इंसान तोह तुझे खुद मुसीबत मोल लेने की जरुरत हे क्या है? संजीव भी बहोत लायक है और बजाये की हम सभी के कंधो का बोझ बेमतलब बढ़ाये, जैसा सरल जीवन चल रहा उसको चलने देते है. कल को क्या तू दादा नाना बनेगा तोह चाहेगा की बचे वैसे हे हालात में बड़े हो जो हमारे बचो ने झेला? लड़कियां अकेली बहार तक न निकल सकीय जवान होने तक. एक को खोया, एक को दूर रखा और तीसरा सब भूल कर बस सुरक्षा प्रहरी बन्न कर अपना हे जीवन खो बैठा. बता न शंकर क्या ऐसा भविष्य देना चाहता है तू?", इस बात ने बहोत गहरा वार किया था शंकर के मैं मस्तिष्क पर. उसके कर्मो की सजा जो इन्दर को मिलने वाली थी और अगर भविष्य में वो उसके हे बचो पर गाज गिरा दे तोह क्या होगा.

"नहीं भाई.. मैं आग लगा दूंगा दुनिया को अगर किसी भी बचे पर आंच आयी तोह."

"ोये तू अग्निशमन कर्मचारी बन्न बे खड्ड दिमाग, आग भड़काने वाला नहीं. परिवार को अब सुरक्षा नहीं खुल कर ज़िन्दगी जीने का मौका देना है. हाँ दीवारे मजबूत कर चुके है हम और जो रूठे थे वो मान चुके है. ऋतू बिटिया अगले बरस विदेश चली जायेगी और अलका भी. तू थोड़ा बहोत छुट्टी ले कर वो दोनों देश घूम फिर के आ. उसके एक साल बाद अपना लाडला भी कॉलेज शुरू करेगा पर उसके जीवन में तू दखल नहीं देगा जैसे हमारे समय पापा ने नहीं दिया. प्रतिस्पर्धी बन्न ने की जगह बस बाप बन, दोस्त तोह तू बस कभी कभी बनता है उसका और वैसे भी बूढ़े शेर को जवान शेर पसंद कहा आते है. हाहाहा..", गहरी नसीहत के साथ नरिंदर ने मस्ती मजाक में बदलते वक़्त की भी तस्वीर रख दी अपने बड़े भाई के सम्मुख जिस पर शंकर के उदासीन चेहरे पर वो परिचित मुस्कान लौटने लगी थी.

"जब वो खुद से कुछ बनेगा तभी उसको पता चलेगा इन्दर की ज़िन्दगी सोने की चम्मच और चांदी की थाली जैसी नहीं है जो उसको पैदा होते हे नसीब हुई. हाँ तेरी ये बात उचित है की बचो को अब जीने के अवसर मिलने हे चाहिए. कभी धर्मवीर चाचा तोह कभी पापा खुद मेरी अनगिनत फाइल्स रुकवाते और बचते आये है. बहोत बार सोचता हु की गलतियां न हो पर हमने सब अपने आप हे तोह सीखा और आज ये मुकाम इतनी आसानी से साथ नहीं छोड़ने वाला."

"तुम फिर गलत हो मेरे भाई और इस सोच को बदलो या न बदलो पर फिर कभी ये मैट कहना की अर्जुन को सोने की चम्मच पैदा होते हे नसीब हुई या तुम और मैं self-made है. पापा तक इस बात से इंकार करते है और उनका कहना है की इंसान कभी भी अकेला कुछ नहीं कर सकता. तुम्हारे और मेरे सर पर उनका हाथ था, बचपन में साइकिल, स्कूटर और फिर जीप तक हमे मिली. तुम्हे तोह बाकी सबसे 50 रुपये तक अधिक मिलते थे और पढाई के साथ जितने काण्ड किये हम दोनों ने अर्जुन ने वैसा एक भी नहीं किया क्योंकि वो हमारा बीटा होने के बावजूद आदरणीय रामेश्वर जी और कौशल्या जी का भक्त है. उसके दिल में जो सबके लिए नरमी है वो उसने उस घर से सीखी है जहा रहने से हम कतराते थे. दुनिया में ऐसा कोई इंसान नहीं होता शंकर जो अपने बूते पर बड़ा हुआ हो और नाम कमाया हो. कही परिवार तोह कही कही शिक्षक और और कुछ नहीं तोह दोस्त जरूर साथ होते है. तुम अब बस अपनी नौकरी, दोस्तों की महफ़िल और समाज कल्याण में योगदान दो भाई. माता पिता की करम अगली पीढ़ियों तक असर दिखते है इसको हमेशा ध्यान में रखना. अर्जुन कामयाब नहीं बन्न न चाहता क्योंकि वो कामयाब है. वो अपने से ज्यादा दुसरो के लिए जीना चाहता है इसलिए तुलना मुमकिन भी नहीं. नाश्ते के बाद तुम्हारा दिल करे तोह ड्यूटी चले जाना.", इतनी देर से अपने भाई की हर बात को गौर से सुनते हुए शंकर को कही न कही एहसास हो गया था की वो बेशक अपने पिता सामान मुकाम पर है पर इसमें सबका योगदान जरूर है. और अब ड्यूटी का जीकर हुआ तोह उसने भी इत्छा प्रकट की.

"तू घर नहीं रहने वाला?"

"नाश्ता करके मैं विष्णु की तरफ जाने लगा हु. थोड़ा आराम करूँगा और फिर उसके साथ पानी की क्यारियां बनानी है उधर. कल तैयार पौधे आये थे खेत पर और मिटटी सुधरने का काम चलता रहा. मशीन से 10 नेहरे सी बनाई है उसने जहाँ पानी रहेगा और उनके बीच वाले ऊँचे हिस्से पर पेड़ लगेंगे. दलीप भाई भी अवकाश पर हे है और राजेश कल रात भी वही महफ़िल जमाये बैठा था दलीप के छोटे भाई और विष्णु के साथ. बहोत रफ़्तार से काम करवाया है दलीप और पल भाई ने वह."

"मैं भी उधर हे चलता हु तेरे साथ नाश्ता करके. काम से फर्लोव मारूंगा पर घर पे यही बोलना की तू मुझे हॉस्पिटल छोड़ के गौशाला जा रहा है."

"हाहाहा.. भाई तू और तेरी फर्लोव. माँ अगर पापा के साथ गौशाला देखने आयी फिर तू क्या बहाना करेगा?", नरिंदर की बात का जवाब जैसे शंकर पहले हे सोचे बैठा था. अब वो अवसाद और पीड़ा भुला कर वापिस पहले सा हे था.

"गौशाला देखने आएंगे तोह देख के चले जाएंगे. और विष्णु से मिलने आये तोह मैं दलीप के खेत में निकल लूंगा पिछले रस्ते से. पर मेरा आज काम पे जाने का दिल नहीं है तोह नहीं है."

"हाँ भाई अब दिल होगा कैसे? रात के 2-3 बजे तक दारु पीयोगे तोह उसके बाद सोना हे है. चल ठीक है तू भी चल बस दारु नहीं मिलेगी उधर. वैसे कल ड्राइवर का इंतजाम करके रखना, ललिता भाभी को माधुरी बिटिया की ससुराल जाना है.", घर के बहार पहुंचते हे नजर गेट के बहार हे खड़े छोल साहब और अपने पिता पर पड़ी जो जैसे इनकी हे प्रतीक्षा कर रहे थे.

"मर्डर गए इन्दर. मैंने बहाना लगाया था की मैं मेहुल के उधर से हे ड्यूटी चला जाऊंगा और अब मैं तेरे साथ आया हु."

"ले स्वाद अब तू और मुझसे पुछा तोह मैं कह दूंगा की तूने तोह मुझे हॉस्पिटल में विवान के समय हे बोल दिया था की सुबह तुझे फार्महाउस से लेता जाऊ.", नरिंदर भी बराबर मजे ले रहा था अपने भाई के और दोनों का वैसा हे स्वागत हुआ.

"हीरा पन्ना की जोड़ी जाती अलग अलग है लेकिन आती एकसाथ. नवाब साहब गाडी कहा कड़ी की तुमने जिसमे बैठ कर घर से निकले थे?", रामेश्वर जी का अंदाज देख शंकर समझ चूका था की अब थोड़ा झेलना हे होगा.

"वो टायर पंक्चर हो गया था कल शाम को हे हॉस्पिटल में. वही लगा दी थी पापा और इन्दर को मैंने शाम को हे बोल दिया था के मुझे सुबह मेहुल के घर से ले ले."

"सही कहानी है बीटा बस जहां से रात को तुमने फ़ोन किया था वो हॉस्पिटल प्रताप का था और गाडी तुम्हारी सदर थाने में सही सलामत कड़ी है जैसी तुमने करि थी. जाओ थोड़ा खाना वाना खा लो भाई उसके बाद फुर्सत मिले तोह फ़ोन कर लेना. मैं जरा तुम्हारे चाचा के साथ गौशाला जा रहा हु. इन्दर, आते हुए अपनी माँ के लेते आना.", अब दोनों घर के भीतर जा रहे थे और नरिंदर मुँह दबा कर हंसी को रोकने की भरसक कोशिश करता आखिर हंस हे दिया.

"भाई अब तू मेरे साथ भी नहीं जा सकता फर्लोव मारने के लिए और घर में गाडी भी नहीं बची कोई. हॉस्पिटल हे छोड़ सकता हु तुझे बस."

"वो ले जाऊंगा मैं जो कपडा ौधा के कड़ी कर राखी. हॉस्पिटल तोह नहीं जाने वाला मैं."

"माँ तुझे स्कूटर की चाबी दे देगी अगर अर्जुन वाली गाडी की तरफ रुख किया तोह. राजू भैया पहले हे गौशाला में कार छोड़ के आये हुए है जिन्हे माँ से झिड़क पड़ने वाली उनके लौटने पर. चल आजा पराठे खा ले फिर सोच लियो के स्कूटर से जाना है या मेरे साथ हॉस्पिटल."

"हाँ उसकी तोह चाबी तक माँ सँभालने लगी अब नहीं तोह कार में हे रहती थी हमेशा. स्कूटर चलाये भी बहोत दिन हुए यार इन्दर. आज ये वेस्पा हे लेके जाता हु. थोड़ा मॉडल टाउन की मार्किट में तफरीह करूँगा और फिर अनाज मंडी वाले दोस्तों की तरफ निकल लूंगा.", अब पिछले आँगन में उनका पहले हे इन्तजार हो रहा था जहा पहुंचते हे दोनों खामोश हो गए अपनी माँ को पहले से उनके लिए प्लेट लगते देख.

"शंकर, फिर तू कहेगा मैं तुझे सबके सामने झाड़ लगाती हु. 8 बजे से पहले का बोलै था मैंने जब बहार रुकना हो तुझे. रात 2 बजे कौन फ़ोन करता है? अब कपडे बदल ले नाश्ते के बाद, फिर मेरे और इन्दर के साथ हे चलियो. और अगले ऐतवार तक रात 8 से पहले हर रोज घर दिखना चाहिए."

"गयी भैंस पानी में. आज दिन हे गलत चढ़ा है जो सोचो उसका उल्टा हे हो रहा भाई.", कौशल्या जी के रसोई में जाते हे शंकर ने बेबसी से जवाब दिया.

"अबे माँ तुझे हॉस्पिटल छोड़ने का नहीं बोली, साथ चलने का कहा है. यही तोह तू चाहता था."

"सोना चाहता था बे मैं उधर जा कर और अब माँ के साथ जाऊंगा तोह हो गया आराम मेरा. चल काम से काम विष्णु तोह मिलेगा उधर.", शंकर ने पहले तोह लस्सी का गिलास भरा और ऐसे हे खाली कर दिया कुछ खाये बिना.

"पापा गए न उधर चाचा के साथ तोह विष्णु भी नसीब नहीं होने वाला. और अब कुछ मैट सोच, माँ से कह दियो की हॉस्पिटल में जरुरी काम है आज तुझे."

"कोई काम नहीं है इसको वह जो तुम सलाह बनाते फिर रहे हो. धर्मवीर भाई साहब का फ़ोन आ चूका है पहले हे और उन्होंने हे कहा है की इसको भी साथ लेते आये वह. अब चुपचाप खाना खाओ और राजू है घर पे. अर्जुन बोल रहा था के ललिता को मैं सीढ़ी बस से हे भिजवा दू कल सवेरे 5 बजे. 9 बजे वो अड्डे से ले लेगा अपनी ताई को. और वो भी गाडी से मन कर रही जबकि एक बैग सामान है बेटी दामाद के लिए."

"भाभी जैसे जाना चाहती है जाने दो माँ. ड्राइवर कहो तोह ड्राइवर मंगवा लेता हु, अपनी गाडी से ले जाएगा. जब भाभी ने आना होगा वापिस तोह ले आएगा."

"उसने रुकना है वह 3-4 दिन, हाथ लगाने नहीं जा रही. बेटी की ससुराल में ड्राइवर और रुकवाने लगो?", कौशल्या जी द्वारा परोसे गरमा गरम पराठे देख शंकर ने तोह ध्यान एक जगह हे केंद्रित कर लिया था पर नरिंदर बातचीत करते हुए खाने लगा.

"कहो तोह मैं हे छोड़ आता हु माँ. 3 घंटे लगने है सारे जाने में.", अभी अचार और रायता ले कर ललिता जी उधर हे आयी थी जिन्होंने अपनी सास से पहले जवाब दिया.

"सवेरे वाली बस कही नहीं रूकती देवर जी और अर्जुन पहले मुझे मार्किट ले कर जाएगा जहा से शगुन का सामान लेना है. वह वो है और उसके पास गाडी भी है तोह फिर क्यों अलग से गाडी ड्राइवर? बस तुम मुझे 5 बजे वाली बस पकड़वा देना.", अब यहाँ अर्जुन और ललिता जी की अलग हे खिचड़ी पाक रही थी जो इनके कहा समझ आती. नरिंदर ने भी हथियार दाल दिए उनके आगे. कोई पक्ष में नहीं था की वो बस से जाए पर अब अर्जुन ने अपनी दादी को सन्देश दिया था और इधर ललिता जी ने अपना पक्ष रख दिया था. पते की बात ये थी की इस सबमे शंकर का ध्यान भांग हो चूका था रात वाली घटना से और अब वो वापिस परिवार के बीच हमेशा जैसा था. नरिंदर के बात सार्थक थी की इंसान अकेला कुछ नहीं बनता, जिसका उदहारण यहाँ सामने हे था की सब एक दूसरे से जुड़े थे, सहयोगी थे और निर्भर भी.

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"फिर मिला टाइम तुझे ारु के साथ?", गौर करने वाली बात थी की सुबह के 10 बजने वाले थे और रेखा अभी तक गहरी नींद में अपने बिस्टेर पर थी. ऋतू ने चाय के लिए दरवाजा खटकाया भी था पर भीतर से यही आवाज मिली की वो दोपहर में हे खाना हे लेंगी. अब तीनो हे अपनी अपनी नींद पूरी करके नाश्ता करती हुई आपस में चर्चा करने लगी थी. सुनंदा जी तोह कुंती को बहार काम समझने में व्यस्त थी तोह अब इनके आसपास और कोई न था.

"तेरे से कब मिलने आया था वो?", ऋतू ने उल्टा आरती से हे सवाल किया.

"3:30 पर और फिर मेरी आँख हे लग गयी उसके साथ लेते हुए. सुबह नानी ने आवाज दी तोह मैं आयी तुम्हारे कमरे में. देख कर तोह लगा की उधर शायद तुम लोग सुबह हे सोई होगी. तुम दोनों उधर एक साथ हे ारु..?", अपनी बात कहते कहते आरती के हे गाल गुलाबी हो गए जैसा उसको ऋतू और अलका के आपसी रेहान सेहन का ाचे से पता था.

"कुछ भी मतलब. मैं तोह इसके पास गयी थी वेट करने के लिए पर मैडम पढ़ती रही और मुझे नींद आ गयी 3 बजे के करीब. बस फिर ऋतू और ारु को हे सोये देखा जब करवट ली तोह. मैं भी हाथ रख कर सो गयी. उस टाइम सरस्वती जी हे जुबान पर होंगी हमारे जब कहा था के उसके साथ सोने को मिले. वही मिला फिर.", अलका के होंठो को मुड़ता देख आरती भी खिलखिला उठी पर ऋतू ने अपने भाव ाचे से छुपा लिए जैसे उसने एक घंटे में हे मनचाहा पा लिया हो. करारी ब्रेड पर मक्खन लगाती हुई वो कॉफ़ी की चुस्कियों के साथ बस वही खा रही थी.

"इस मैडम ने भी जब सोना था तोह फिर बेहतर होता न की मैं भी उधर हे आ जाती. ज्यादा देर सोने को मिलता उसके पास. वैसे बड़ी माँ आज पहली बार इतने समय तक सोई हुई है. तबियत तोह ठीक है न उनकी? वो ारु के जाने पर तोह जगी हुई थी.", आरती ने अब ध्यान रेखा की तरफ करवाया तोह ऋतू ने हे जवाब दिया, अपने होंठो से मक्खन साफ़ करते हुए.

"माँ सोई होंगी 3 बजे के बाद हे और फिर ारु गया है 6:45 पर जब तुमने उन्हें उठा हुआ पाया. कल सवेरे घर से गाडी चला कर वो इधर आयी थी और फिर सारा दिन की bhaag-daud भी उन्होंने हे की. घर पे तोह वो पिछले एक हफ्ते से सोई हे नहीं थी इसलिए तोह ारु उनके पास रुका हम सबके होते हुए भी. छुट्टियों पर आये है यार तोह थोड़ा टाइम अब ये रूल्स और ारु को साइड करके मस्त रहते है. पढ़ने का सिस्टम तोह सेट है हे इधर और माँ ने कहा था के कल हम लोग बोटिंग करने चलेंगे. और वो वह पर हमसे हे सब म्हणत करवाने वाली है.", ऋतू के खुलासे पर बाकी दोनों हे चहक उठी.

"हाँ याद इस झील में तोह नहाने उतर नहीं सकते पर नदी पे चलेंगे तोह फुल मस्ती होगी. चची भी मजेदार इंसान है बस उन्हें जान ने का मौका पहले नहीं मिला. तभी कोमल दीदी कहती थी की हम लोग अभी ाचे से जानते नहीं सीरियस लाइन (गंभीर रेखा) को. हाहाहा.. वैसे एक धमाकेदार खबर बताऊँ?", अब अलका ने उनका ध्यान हंसी के साथ अपनी अधूरी बात पर खींचा. ऋतू उत्सुकता से देख रही थी की ऐसा क्या है जो उसको नहीं पता.

"अब बोल भी दे या सस्पेंस में मारेगी?", आरती ने खली प्लेट एक तरफ सरकते हुआ मेज पर रखे अपने कप को थाम लिया. आलम ये था के आज ये तीनो अभी तक नही भी नहीं थी. मतलब इनका पूरा अवकाश चालु था.

"कल मैं और ारु गए थे न वाक पर रात को. वापिस आते हुए बारिश में उसने मुझे उम्म्म उम्म्म किया.", अलका ने शब्दों की जगह बस होंठो को गोल करते हुए कहा. आवाज इतनी दबी हुई की हॉल तोह क्या मेज से बहार हे न गयी. ऋतू शांत दिखी पर आरती को जैसे उम्मीद नहीं थी.

"कुछ नया बता अब?", ऋतू ने झुंझलाते हुए कहा.

"वो माइड (कुंती) ने देख लिया मुझे.", अलका ने सचमुच हे बम गिरा दिया था इतना बोल कर लेकिन चेहरे से वो शांत हे दिखी, बाकी दोनों के तोह मुँह हे खुले रह गए.

"पागल है?" ऋतू और आरती के स्वर एक साथ हे निकले.

"डरने वाली बात नहीं है जो तुम दोनों ऐसे चौंक रही हो. वो तोह खुद वह नंगी बैठी थी जैसे बारिश में भीगने आयी हो. उसको लगा होगा की इतनी रात को वह कौन आने वाला है तोह मजे से टांगो के बीच कुछ दाल कर हिला रही थी. ारु की नजर नहीं गयी उस तरफ और ये सब मैंने और उस माइड ने बिजली की चमक में देखा. तभी तोह वो मुझे देखते हे सकपका गयी थी थोड़ी देर पहले. पति ठरकी और पत्नी प्यासी. ये तोह वही बात हो गयी की मिया जी बिना गोली की बंदूक और बेगम साहिबा माचिस की डिबिया... हाहाहा..", अलका के उद्धरण पर आरती तोह सब भूल कर मुस्कुरायी पर ऋतू जैसे कुछ सोचने लगी थी.

"वो यहाँ हमारी gair-haajri में अकेली रहने वाली है अलका और ये जगह बहोत संभाल कर दुनिया से बचा कर राखी गयी है. हो सके तोह अपने तरीके से इस बारे में माँ से जरूर बात करना. तुम जानती हो की बात कैसे घुमानी है और मेरी बात का मतलब भी समझ गयी होगी. आरती, जरा पता कर तोह अर्जुन गाँव पहुंच गया क्या.", ऋतू सभी प्लेट एकत्रित करती हुई उठ कड़ी हुई. बर्तन ज्यादा नहीं थे जिन्हे साफ़ करने के बाद ये लोग फिर से बगीचे में समय बिताने वाली थी. आरती ने भी वही रखे रजिस्टर से गाँव का नंबर निकाल का मिला दिया. कुछ समय तक घंटी जाने के बाद जो बात हुई उस से तोह यही पता चला की अर्जुन कपडे बदल कर अनामिका चची के कमरे में थोड़ी देर सोने गया है और 12:30 पर उसने शहर जाना है जरुरी काम से.

"इसके काम जरुरी हे रहते है चाहे वो हो कुछ भी नहीं. इतनी जल्दी ये भगा क्यों यहाँ से अगर तुझे पता हो तोह.?", रसोई में संदेसा मिलते हे ऋतू ने आरती से बाकी जानकारी चाहि.

"सुबह 6 बजे हे दादा जी का फ़ोन आया था और उसके बाद हे वो तैयार हो कर निकल गया था. यही बताया था की दादा जी का हे कोई काम है जिसके लिए उसने पहले माधुरी दीदी की ससुराल जाना है फिर महल.", आरती का जवाब सपाट था पर ऋतू को महल सुन्न कर हे कुछ याद आ गया था

"वो राजकुमारी अमृता देखि थी तुमने शादी में? मुझे लगता है की वो अर्जुन को पसंद करती है. और दादा जी भी उसको वह भेज रहे है जहा अगर गड़बड़ हुई तोह संभाले नहीं सम्भलेगी. कोशिश करना की 1 बजे के आसपास शिल्पा दीदी से बात हो जब अर्जुन उनके यहाँ पहुंचे या उन्हें बता दे की अर्जुन के वह आते हे बात करवा दे, शहर से कुछ लेने का याद करवाना है बस.", ऋतू प्लेट कपडे से साफ़ करती हुई नहाने का बोल कर निकल गयी जबकि आरती अपनी जगह कड़ी अपना सर खुजाती हुई मासूमियत से भरी और उलझ गयी इस झंझट में. उसको ये सब समझ हे कहा आता था. पर इतना जान गयी थी की ऋतू चिंतित है राजकुमारी और अर्जुन के बीच अगर कुछ भी हुआ तोह. और वो चिंतित है मतलब आरती को भी चिंता करनी चाहिए.

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"कुछ ज्यादा हे थके हुए लगते हो? दूध बना कर लौ क्या?", बंद कमरे में अर्जुन चची की गॉड में सर टिकाये हुए आराम से लेता था और उसके सर को सहलाती हुई अनामिका चची खुश थी की वो घर आते हे सबसे पहले उनके पहलु में था. पर वो जानती थी की अर्जुन इतनी सवेरे निकला था और लम्बे सफर के बाद पीठ भी दुखने लगती है दुपहिया पर. यहाँ उनकी बात सुन्न कर अर्जुन ने सीधा ब्लाउज के ऊपर से हे उनका एक कठोर उभार थाम लिया.

"यही पीला दो चची जो सबसे तजा और ताक़त देने वाला है. निक्कू तोह पीटा नहीं तभी गांठे पड़ती रहती है इनमे.", पकड़ने के साथ वो अब उन्हें हलके से भोंपू की तरह दबाने लगा तोह चची के बदन में सुरसुरी सी चलने लगी. पर हाथ हटाने के जगह उन्होंने भी सामने के 3 हक्क खोल कर peele/laal ब्लाउज को ऊपर उठाते हुए एक गोरा सुडोल सतांन उसके हवाले कर दिया. निप्पल सचमुच अकड़ा हुआ था और नीली हरे नस्से बता रही थी की निकेतन ने इसको हाथ तक नहीं लगाया.

"आराम से पीना क्योंकि ज्यादा भरने से दुखता है. वो तोह एक हे तरफ का पीटा है और इस चक्कर में कही दोनों अलग अलग न दिखने लगे. इस्सस.. क्या मस्ती करते हो हर घडी..", अर्जुन के चेहरे पर झुकते हुए उन्होंने वो गुलाबी निप्पल उसके होंठो में खुदसे हे भरा तोह पहले जीभ से सेहला कर अर्जुन ने थोड़ा जोर से हे चूसक लिया.

"इसमें गाँठ दिख रही थी इसलिए रास्ता खोलना पड़ा चची. वैसे रात का क्या विचार है आपका?", अब दूध चुसकने के साथ उसने एक हाथ दूसरे वाले पर पंहुचा दिया, ब्लाउज से रास्ता तोह खुला हे था. इतने चिकने और भरे भरे स्टैनो को मसलने से ज्यादा उन पर हाथ फिरने में अर्जुन को मजा मिल रहा था. और अनामिका चची तोह बस आनंद में डूबी इस स्पर्श का असर जांघो के बीच तक महसूस कर रही थी जिन्हे अब वो आपस में जोड़ भी नहीं सकती थी चौकड़ी मार कर अर्जुन को उस पर लिटाये होने की वजह से. पर इसके साथ हे अर्जुन बड़ी लगन से उनके सख्त हुए दूध भरे सतांन को खाली करते हुए आराम भी दे रहा था. अनामिका चची को बड़ी हैरत हुई जब उन्होंने उसके हाथ को एक जगह स्थिर पाया. अर्जुन का चेहरा देखा तोह वो इत्मीनान से सोया हुआ नींद में हे चूचक चूसक रहा था किसी छोटे बचे जैसे.

'वाह ये है मेरे भोले सैयां जी. सही कहती है बड़ी माँ की ये आज भी कही न कही बचे हे है. चलो अब जब प्यार है तोह मुझे ये रूप भी पसंद है.', अगले 15 मिनट तक अर्जुन सारा दूध ख़तम करके अब शान्ति से गॉड में सोया था जैसे पेट भर गया हो. उस सतांन की अत्यधिक कसावट में भी अनामिका अब हलकपन महसूस कर रही थी और जब एक बूँद अर्जुन के होंठो पर अपने हे दूध की देखि तोह अनजाने हे उसके होंठो को चूम बैठी. उसकी नींद और अपनी हरकत का ध्यान आते हे वो सकुचाती सी अर्जुन के सर के निचे तकिया रखने के बाद उसकी ब्याह भी दूसरे तकिये पर टिकती हुई बिस्टेर से उठी और दरवाजा खोल कर बहार आँगन में आ गयी.

"वो महाराज तोह आते हे सो गए पर उनके चाहने वाले फ़ोन कर रहे है मामी. पहले आरती का फ़ोन था और अब किसी जिनि का. जाने ये कब कहा दोस्त बना लेता है.", आँचल ने एक निगाह बिस्टेर पर सोये अर्जुन पर डाली और फिर अपनी मामी के साथ कंप्यूटर वाले कमरे में दाखिल हो गयी जहा अंजलि संजीदा से कुछ सीख रही थी कंप्यूटर पर.

"इतना सफर करके आया है और कल गया भी था. कितना सोने को मिला होगा उधर अपनी माँ और बहनो से मिलने पर? और दोस्त बनाना तोह ाची बात है न आँचल. मेरी भी पहले सिर्फ तुम्ही एक दोस्त थी और देखो अब अंजलि भी है और संजीदा जी तोह दोस्त के साथ साथ हमारी डॉक्टर सहेली भी.", इधर भी दरवाजा बंद हो गया था जैसे एक दिन में हे बहोत कुछ घटा हो. अपना नाम सुन्न कर संजीदा कुर्सी छोड़ कर इनकी बगल में हे बीएड पर आ बैठी. ढीली सी पटियाला सालार और तंग कमीज में आज वो नैसर्गिक रूप में थी और उतनी हे खुश भी.

"अब सहेली के पति जुल्म कारक चल निकले तोह मेरा भी फ़र्ज़ बनता है न की दर्द की दवा करू. वैसे ये दोनों भी मातुरे है और सब समझती है. कल को इनकी भी शादी होगी जैसा की अंकल जी कह रहे थे की साल या 2 साल में. पर मुझे बस एक बात समझ नहीं आयी अनामिका जी. शादी को हो गए 5 साल और एक बचा होने के बाद भी आपको बुखार आ गया चाल में फरक के साथ? मुझे इस सबका एक्सपीरियंस नहीं है पर हॉस्पिटल में समय बिताया है और काफी विवाहित दोस्त रही है मेरी उधर. कुछ दुगनी उम्र की भी और ऐसी सब बातें आपस में होती रहती थी जहा मैं सिर्फ श्रोता बन्न के सब सुनती थी क्योंकि बताने के लिए मेरे पास तोह बस इतना हे था की कभी कभी खुद को टच करके हीट काम कर लेती थी जैसा सभी करती है. पर कही भी आप जैसा मामला सुन्न ने को नहीं मिला. और वो भी विनोद जी के जाने के एक दिन बाद.", अब दोनों युवतियां तोह एक दूसरे को कनखियों से देखती हुई मंद मंद मुस्कुरा रही थी पर अनामिका निशब्द सी बस उँगलियों में उँगलियाँ उलझाए जवाब सोच रही थी.

"कही उन्होंने अप्राकृतिक सेक्स तोह नहीं किया था आपके साथ? मतलब back-side से. मुझे इसका भी कुछ पता नहीं पर एक सीनियर नर्स कहती थी की ऐसा करवाने पर उन्हें 2-3 दिन तक तकलीफ रहती थी और कुछ को ये भी ाचा लगता था.", संजीदा नाम के अनुसार हे बात कर रही थी पर अनामिका की हालत देख कर आँचल ने हे मामला अपने हाथो में लिया.

"मां और मामी का कुछ रेगुलर नहीं है दीदी. या ये कह लीजिये की इनके प्रेग्नेंट होने के बाद से हे वो सब बंद था. अब 8-9 महीने बाद शायद बॉडी तैयार नहीं हुई होगी इस सबके लिए. और दर्द बढ़ा तभी आपका ध्यान गया और आपने दर्द की दवा दी."

"हम्म्म. सही कहती हो आँचल तुम. वैसे तुम्हे एक्सपीरियंस है क्या? मतलब बॉयफ्रेंड है तुम्हारा वह शहर में?", आँचल अब दिलेर हो चली थी इस सवाल पर.

"गाँव में नहीं हो सकता क्या दीदी जो शहर का जीकर किया आपने? और रही बात एक्सपीरियंस की तोह मेरा बॉयफ्रेंड कहता है की ये सब न धीरे धीरे चलना चाहिए जिस से प्यार बढ़ता रहे और फिर एक बार सेक्स हो गया तोह फिर बस हमेशा वही होता रहेगा. इतने जितना मजे ले सकते हो, एक दूसरे के साथ मस्ती कर सकते हो कर ली जाए. आपने क्यों नहीं बनाया कोई बॉयफ्रेंड?", अब सूई संजीदा पर घूमी तोह वो सकपकायी जैसे उसके मैं में बहोत कुछ चल रहा हो.

"नहीं... ऐसा कुछ नहीं.. वो पहले बस करियर पर ध्यान था और बाद में लोगो के बुरे अनुभव सुन्न सुन्न कर मुझे आदत पड़ गयी काम से काम रखने की. फिर यही लगता था अपनी सहेलियों से सुन्न कर की सभी मर्द बस मतलबी होते है जो पहली मीठी बातें करेंगे और काम हुआ नहीं की नजरे फेर लेते है. यहाँ तक की बहोत से तोह मैरिड डॉक्टर्स और नर्सेज का भी आपस में उल्टा सीधा सन था और वो नर्सेज प्रमोशन या घरवाले से खुश न होने को वजह बताती थी. इसलिए मैं तोह रात की ड्यूटी से दूर हे रहने लगी जब ये सब ज्यादा होता था.", संजीदा मुद्दे की बात ताल कर अलग विवरण दे रही थी पर आँचल कहा पीछे हटने वाली थी और उसकी बातें सुन्न कर अब अंजलि के साथ साथ अनामिका को भी मजा आने लगा.

"मेरा सवाल ये नहीं था दीदी? आपको आजतक कोई लड़का पसंद नहीं आया? मुझसे तोह आप 3-4 साल बड़ी है और आपके बराबर मामी की तोह शादी और बीटा भी है."

"एक डॉक्टर पसंद था मुझे.. मतलब वो ाचा दीखता था और बोलता भी बड़े प्यार से था सबके साथ. घमंड जरा सी भी नहीं था लेकिन वो सबके साथ ऐसा हे था और मैंने कभी हिम्मत नहीं की उसके साथ बात करने की क्योंकि मेरे से कही ज्यादा सुन्दर लड़कियां पहले हे उसके आसपास मंडराती रहती थी. फिर पता लगा के वो अलग नहीं था कुछ. कई इंटर्न्स के साथ उसने रिश्ते बना कर उनसे दुरी बना ली थी. ज्यादातर के साथ सिर्फ के बार और सबसे बड़ी बात जो पता चली थी वो ये की वो शादीशुदा था जिसकी बीवी पहले किसी और शहर में डॉक्टर थी और बाद में वो भी उसके पास चला गया. तभी मुझे ये सब shaadi-pyaar अफेयर से दूर रहना भला लगने लगा.", संजीदा की आपबीती सुन्न कर अनामिका को सचमुच बहोत बुरा लगा था जिसने उसका हाथ थाम कर जैसे दिलासा दिया और बदले में वो मुस्कुरायी.

"पर अब लगता है की हर मर्द एक जैसा नहीं होता. कुछ ख़ास होते है जो अपने से ज्यादा दुसरो के बारे में सोचते है, उन्हें प्यार करते है और अपने से जुड़े हर इंसान को.", ये यक़ीनन उसने अर्जुन का हे परिचय दिया था और बाकी तीन में से 2 ये समझ भी चुकी थी. अनामिका की धड़कन बढ़ी थी पर आँचल ने चुटकी लेते हुए अगला तीर चल दिया.

"ऐसे लड़के.. मतलब मर्द फिर किसी एक के नहीं होते दीदी. क्योंकि वो परवाह और प्यार सबसे करते है. सोचो अगर ऐसा लड़का.. मतलब मर्द आपकी लाइफ में आया भी तोह आप तोह उसको पसंद हे नहीं करेंगी क्योंकि वो एक के साथ कहा होगा जब सबको प्यार करने वाला हुआ तोह?", संजीदा को इतने सपाट जवाब और फिर सवाल की आशा तोह नहीं थी पर जैसे अब बात हाथ पर आ चुकी थी.

"मेरे साथ होने पर वो बस मेरे पास हो दिल और मैं से तोह मुझे कोई परेशानी नहीं. और जरुरी तोह नहीं हर बॉन्डिंग सेक्स पर हे ख़तम हो आँचल?"

"जिसकी तस्वीर आप मैं में बनाये हुए हो न मुझे तोह लगता है की उसकी बॉन्डिंग शुरू हे सेक्स से होती होगी और फिर डूबा देगा प्यार भर भर के. अक्सर ऐसे जो गिने चुने लोग होते है न जिनके बंटवारे पर भी दुःख की जगह खुशनसीबी समझा जाए, वो आपकी बनायी आखिरी सीमा को पहली बना कर उस दुनिया में ले जाते है जहा कोई सीमा नहीं होती. थोड़ा बहार निकलो अपनी सेट लिमिट्स दीदी, तभी पता चलेगा की ये जो प्यार है न इसको मैं में बैठाया जा सकता है पर क़ैद नहीं कर सकते. बच के रहना पहले हे बता रही हु. दर्द और दवा फिर आपको मिलेंगे. हाहाहा..", फ़ोन बजने की आवाज से आँचल हंसती हुई कमरे से बहार निकल चली संजीदा के साथ साथ अनामिका को भी ताज्जुब में छोड़ कर.

"ये लड़की क्या बोल गयी अनामिका जी?"

"मुझे कैसे पता होगा दीदी? मैंने तोह सीधा शादी की और उसके बाद हे प्यार हुआ है. आप उस से हे पूछ लेना, मैं चाय बना के लाती हु.", अनामिका ने भी बातों बातों में अपना सच कह सुनाया था की शादी विनोद से और उसके बाद अब प्यार अर्जुन से. पर पहले से उलझी संजीदा के ये सब कहा समझ आता. एक बार फिर से उधर फ़ोन पर कोई अर्जुन का हे चाहने वाला था और आँचल ने नाम पुकारा तोह वो कोई जन्नत थी, अर्जुन की पहचान वाली. एक घंटे बाद हे अर्जुन उठ कर अब फ़ोन सुन्न रहा था जिसको अपने सामने से गुजरता देख दिल हे दिल में संजीदा को अलग सी गर्मी महसूस हुई.
 
अपडेट 214

Khatta-Meetha (2)

"उम्म्म्म.. सोने दे न यार.. क्यों परेशां कर रहा है?", गहरी दाढ़ी ने उस सोये युवक के बादामी चेहरे और जबड़े के कटाव को ाचा ख़ासा छुपा रखा था जो करवट के बल घुटने मोड हुए एक सफ़ेद लिहाफ चढ़ा तकिया सीने में दुबकाये जाने किसके मीठे सपनो में खोया था जिस वजह से पतले होंठो पर एक मोहक मुस्कान उभरी हुई थी, कसमसाने से पहले. दिन निकलने वाला था या सुबह बादलो में घिरी थी. खूबसूरत और साफ़ सुथरा सा ये बड़ा कक्ष जहा बिस्टेर और उसके दोनों तरफ छोटे मेज के सिवा अगर इस चमचमाते फर्श पर था तोह वो बस उसके चमड़े के कुछ ज्यादा हे बड़े जूते. बेदाग़ फर्श उतना हे सफ़ेद था जितनी कमरे के तीन दीवारे और खिड़कियों पर चढ़े वो चौड़ी कतरन जैसे मॉटे कपडे के परदे. बिस्टेर के सिरहाने वाली दिवार छत से फर्श तक एक सार सी आधा फ़ीट चौड़ी सफ़ेद लाल पत्तियों से रंगो में इसको एक आधुनिक स्वरुप देती थी. युवक मौसम की ठंडक झेलता बिना चादर लिए जिस तरह दुबक कर मीठी नींद में खोया था, ऐसा तोह एक इंसान अपने व्यक्तिगत कक्ष या माँ के पहलु में आनंद प्राप्त करता है. उसकी नींद में अब दूसरी बार व्यवधान पड़ा जब वो लम्बे साफ़ सुथरे नाखून उसकी अत्यधिक मांसल भुजा पर रेंगते हुए हौले हौले गोलाकार कंधे से आगे गर्दन पर आ रुके. उँगलियों ने कंठ की तरफ उभरे बालो को खिंचा तोह युवक तमतमाता हुआ बंद आँखों से हाथ चलते हुए उस व्यक्ति को दबोच कर अपनी बगल लिया लाया. नरम कलाई का स्पर्श अपनी हथेली में महसूस होते हे उंनींदी आँखें खोली तोह अपनी आँखों का हे प्रतिबिम्ब देख लिया हो. वो युवती हर लिहाज से शब्दों से परे थी जिसको एकटक देखता ये युवक अविश्वास से भर उठा.

"जनाब कॉलेज ख़तम किये 2 साल होने को आये है पर लगता है तुम आज भी समलिंगी हो जो सपने मेरे देखते हो और एहसास दोस्तों का मिलता है.", युवती की आँखों में जो शरारत और चेहरे पर जितनी ख़ुशी तोह उसका एक हे मतलब था की यही उसका सर्वस्व था और उसके यहाँ होने की उम्मीद जैसे उसको स्वयं न थी. युवक जिस्म के ऊपर हिस्से पर जहा सिर्फ एक कासी हुई काली बनियान पहने था वही कंधे से निचे तक के भूरे बल खाते बालो वाली ये अप्सरा एक सफ़ेद कमीज और चुस्त नीली जीन्स में थी जिस से उसकी पतली कमर के बाद जोरदार कूल्हों के अर्धगोलाकार कटा ऐसे प्रतीत होते थे जैसे त्वचा हे गहरी नीली हो. युवक ने भी कलाई छोड़ कर उसकी पीठ पर हथेली रखते हुए खुद के बिलकुल करीब कर लिया.

"समलिंगी और मैं? मेरी बाकी दोनों जान को मर्दो सा प्यार तुम करो लड़की होते हुए और समलिंगी मैं, जो नशे में भी निकला अपने कमरे पे जाने को और पहोच यहाँ गया, 1700 किलोमीटर दूर. अब सेहन नहीं होता तुमसे दूर रहना मुझसे. और कैसा कुत्ता पाल रखा है तुमने, साला काटने की जगह मुझे छाते जा रहा था उछाल उछाल कर. बड़ी मुश्किल से साले को बहार निकला था.. याद नहीं बाकी कुछ.. पर अब याद करने की जरुरत भी नहीं जब तुम करीब हो. उम्मम्मम्म", युवती तोह जैसे इस से भी अधिक बेचैन थी जो बस उसके द्वारा होंठ मिलाने भर से युवक को पलट कर सीधा करती हुई उसके जिस्म पर हे सवार हो गयी. उसके दोनों हाथ सिरहाने की और दबती हुई वो बड़े हे पागलपन से उसके होंठो को चूमती चबाती हुई पूरे चेहरे को हे गीला करना लगी. युवक पलभर में हे बेबस हो चला था पर उन कठोर स्टैनो की जोड़ी और इस अध्भुत्त जोश भरी युवती के प्रेम प्रदर्शन पर उतना हे खुश.

"उन्न्नध्ह्हः.. कमीने हो तुम पूरे के पूरे और तुम्हे याद भी है तुम घर तक आये कैसे हो? मैं गेट खुला पड़ा था, तुम्हारा बैग वही आँगन में और चाबी लगाने के बावजूद तुमने जाली वाले दरवाजे का लॉक हे उखाड़ दिया. 'ह' को पानी के टब में बैठा कर आये हुए हो तुम और वो भी मजे से वही बैठा हुआ है. जब पचती नहीं तोह इतनी पीते क्यों हो पंडित जी?", ये ऋतू हे थी और उसके निचे शर्मिंदा होता हुआ वो परिपक्व युवक अर्जुन, उसका ारु जिसके चेहरे को थाम कर वो बात कहने के साथ मुस्कुरा भी रही थी और उसको लगातार चूमती भी रही.

"ऑफिस से जल्दी फ्री हो गया था जान.. फिर माँ को फ़ोन मिलाया.. एक बार 2 बार.. कई बार और आखिर में उन्होंने नंबर बंद हे कर दिया. बस कदम फिर मयखाने में जो दाखिल हुए, बहार तभी निकले जब ज़ेहन में सिर्फ तुम बची थी. दोस्त ने दिल्ली की फ्लाइट तक साथ दिया और उसके आगे टैक्सीवाला मुझे यहाँ ले आया, शायद मैंने उसको भी परेशान किया होगा पर ाचा आदमी था जो रास्ते में छोड़ कर नहीं भगा.", अर्जुन के चेहेर पर जो उदासी उजागर नहीं थी उस पर हे ऋतू का ध्यान केंद्रित था. सबके बीच हंसने बोलने वाला और अनगिनत परिवारों का लाडला वो लड़का आज अपने हे वजूद की एकाकी जुंग लड़ रहा था. दादा दादी से ले कर माँ बाप, चाचा चाची और सभी बहनो का जीवन संवारने वाले के साथ आज वो रिश्ते भी कही बंद हो चुके थे पर ये अर्जुन था जो टूटने पर कही ज्यादा चमक बिखेरने वाला एक अनोखा सितारा था.

"एक तोह अपनी जान को चेहरा भी 3 महीने बाद दिखा रहे हो और ऊपर से मिलने पहुंचे भी तोह बिना कुछ बताये. पहले पता होता तोह रात को कॉल हे नहीं लेती हॉस्पिटल की.", अर्जुन के हाथ आजाद करती हुई वो अपनी चुस्त कमीज उतार कर एक तरफ रखती हुई सिर्फ सफ़ेद ब्रा और नीली जीन्स पहने उसके ऊपर सुकून से लेट गयी. ऋतू को हमेशा से हे उसके ऊपर, उन मजबूत बाहों के घेरे में सोना पसंद था जो अर्जुन ने बिना कहे उसकी पतली सुघड़ कमर पर लपेट ली थी. उम्र के साथ ऋतू का जिस्म कही ज्यादा निखरा था या शायद वो इतनी व्यस्त jiwan-shaili जी रही थी की जिस्म म्हणत से सांचे में ढल चूका था. धड़कने महसूस होते हे ऋतू भी pur-sukoon से भर उठी. वो हौले हौले अर्जुन के कंधे पर अपने गाल सहलाती जैसे कुछ कहने की हिम्मत जूता रही थी.

"प्रीती से कब बात हुई थी?"

"कल रात को फ़ोन बंद करने से पहले. रोज हे तोह होती है दिन में 3 बार, जितनी तुमसे होती है. मिलने भी तोह आयी थी 2 हफ्ते पहले वह और तब तुम्हारी बात ने हे कितना समय लिया था. माँ से बात हुई तुम्हारी?", अर्जुन प्रीती के जीकर पर मुस्कुराया था और बिना देखे उसकी मुस्कराहट ऋतू भी जान चुकी थी.

"तुम्हारी बिल्ली के मजे है सही में. जब दिल करे तुम्हे बुला लेती है और अगर तुम न पहोच सको तोह खुद हे जा धमकती है तुम्हारे डेरे पर. बोलै तोह था उसको मैंने की इस वीकेंड इधर आ जाए अगर वह कुछ ख़ास नहीं कर रही तोह. उमेद चाचा वाला प्रोजेक्ट करने में जुटी हुई है विन्नी दीदी के साथ लेकिन जानती हु की वो कल पहोच जायेगी यहाँ. तुम्हारा नियम चाहे तुम न निभा सके पर हर फ्राइडे रात वो इधर होती है और मंडे सुबह वापिस. बोल रही थी की पहले मैं क्योंकिएवे (गर्भधारण) करू तुम्हारे साथ कुछ छुट्टियों में कही दूर एकांत में समय गुजार कर उसके बाद हे वो करेगी. तुम अब शिफ्ट क्यों नहीं कर लेते अर्जुन इस तरफ? चाहे इस शहर या हमारे घर मैट करो पर aas-pas हे कर लो. दिल्ली की तरफ तोह तुम्हारा सर्किल भी ाचा ख़ासा है और क्सक्सक्सक्स शहर में भी तोह तुम्हे ाचा ऑफर मिल रहा है. कितनी दूर है इधर से और आखिर हमारा गाँव भी तोह वही पास में है?", अर्जुन पहले जहा इन दोनों की माँ बन्न ने वाली बातों पर हंस रहा था वही घर लफ्ज़ सुनते हे गंभीर हो चला. ऋतू ने लगातार दूसरी बार उसके माँ वाले मुद्दे को दरकिनार किया था, बड़ी सफाई से.

"बैग खोल कर हे देख लेती जब वो बहार मिल गया था."

"अभी ले कर आती हु.", ऋतू उठने लगी तोह उसको वापिस अपने सीने से चिपका कर अर्जुन पीठ पर हौले से थपकी देने लगा.

"लेती रहो सब यही है. माँ ने क्या कहा तुम्हे मेरे बारे में? जब से बॉम्बे गया हु उस दिन से उनका चेहरा तक देखना नसीब न हुआ. तुम और प्रीती भेजती रहती हो उनकी तस्वीरें बस वही देख लेता हु. संजीव भैया कह रहे थे की वो आजकल अपने कमरे से भी ज्यादा बहार नहीं निकलती. कबीर कितना गोलू मोलू हो गया है न? जैसी बचपन में तुम और अलका दिखती थी.. भैया भाभी पिछले संडे वही थे मेरे पास, तुम्हे पता है?", ऋतू ने चेहरा ऊपर उठा कर ना में बड़े हे भोलेपन से गर्दन उठा कर बेआवाज जवाब दिया और उसके बेदाग़ ऊपर सीने से निचे वो गोरी खाई और दोनों मॉटे उभार कुछ पर अर्जुन को दिखे फिर वापिस उसके सीने पर जा दबे. ये मासूमियत और अदाएं ऋतू का अचूक अस्त्र था पर फिलहाल वो भी इन लम्हो में कुछ पल रहना चाहती थी बजाये अर्जुन को सताने के. सामने से स्वयं अर्जुन द्वारा उसको अपने ऊपर रहने का अनुनय भी तोह प्रेम से लबरेज था.

"कबीर सारा दिन जान खता रहता है अपनी तीनो दादी की और बौ जी भी बहोत चाहते है उसको पर दादी के सामने वो भी बेबसी से बस उसको हँसते खेलते देख कर हे मैं को समझा लेते है. वैसे राधिका भाभी से थोड़ा समय निकाल कर मिल हे लिया करो, चाहो तोह वो इधर या जहा तुम कहो खुद आ कर मिल लेंगी. बेचारी बहोत दुखी थी जब मैं उनके पास थी पिछली बार घर जाने पर. उनके लिए तोह कबीर से पहले तुम्ही उनके बेटे हो, भाई भी और देवर भी. यही वजह है की कबीर को भी उनका पूरा प्यार नहीं मिलता और हमारी माँ या चची जी और ताई जी के कमरे में ज्यादा वक़्त बीतता है. पापा के साथ अकेले हे आ गया था इधर मिलने."

"इस घर में वो आये थे?", अर्जुन की ऐसी सार्ड और जबड़े भिंची आवाज सुन्न कर ऋतू सिहर सी उठी पर जैसे उसको भी वजह पता थी अर्जुन के अकस्मात गुस्सा होने की.

"बाबा पापा यहाँ नहीं आये थे.. वो पहले हॉस्पिटल आये थे और फिर उसके बाद ऋचा दीदी की तरफ गए थे मुझे साथ ले कर. वह से वापसी में भी मैं अपने आप हे आयी थी. तुम क्या मुझे इतना भी नहीं समझते ारु? जिस वजह से तुम नाराज हो मैंने वो आज तक नहीं जान नई चाहि और फिर भी मैंने उन्हें कभी इस घर में आने का आमंत्रण नहीं दिया क्योंकि तुम दोनों के बीच कुछ तोह है जो ठीक नहीं. और वो जो भी है तुम्हारे घर पर न जाने की बड़ी वजह भी वही बात है. पर सिर्फ पापा की वजह से तुमने दादा दादी जी के साथ बाकी सबका भी तिरस्कार कर दिया. क्या ऐसा करना सही है? कृष्णा चची तोह बस तुम्हारा जीकर होने की देर रहती है, फिर वो बोलती नहीं थकती. इस बार तोह उन्होंने मुझसे साफ़ हे कह दिया की जल्द से जल्द मैं उन्हें छोटा ारु सौंप दू.", ऋतू की साड़ी नसीहते और सवालों को भुला कर अर्जुन का अशांत मैं पल में हे खामोश हो चला. कृष्णा माँ.. उसकी चाची माँ हे तोह थी जिन्होंने अर्जुन के हाथ में ऋतू का हाथ सौंपा था ये कहते हुए की अगर उनकी बेटी से उसकी शिकायत सुन्न ने को मिली तोह वो अर्जुन की पतलून उतार कर वही आँगन में सुताई करेंगी, जवाब बाद में लेंगी उस वजह का. अर्जुन को खामोश और खयालो में खोया देख ऋतू थोड़ा आगे सरकती हुई फिर से उसके होंठो को चूमने लगी.

"ये चेहरे पर बाल मुझे नहीं पसंद. मवाली लगते हो पूरे."

"खुद हे साफ़ कर देना अगर इतने हे बुरे लगते है तोह. वह बॉम्बे में मेरी सीनियर मैनेजर को तोह मैं इनमे बड़ा हे कूल और वाइल्ड लगता हु."

"यू... उस कुटिया की खाल उधेड़ दूंगी अगर मेरे पति की तरफ आँख उठा कर भी देखा तोह.. जाओ तुम भी उसके हे पास जाओ.. ठन्डे जंगली हे तोह हो तुम बस.", ऋतू कसमसाती हुई उसकी पकड़ से आजाद होने की जोरदार कोशिश कर रही थी और अर्जुन उसके दोनों हाथ पीठ पर टिकाये अब उसकी हालत पर हंस रहा था. इस जोर आजमाइश में जैसे हे ऋतू के चेहरे के भाव बदलने लगे अर्जुन ने तुरंत अपने हाथो में उसका गमगीन चेहरा थाम लिया.

"ऐ.. वचन लिया था मैंने तुम्हारा हाथ थामते वक़्त और हमारी उस पहली रात. मेरे जीवन में शादी से पहले तक जो हुआ सो हुआ पर अब तुम्हारा ारु सिर्फ उसका हे है जिसकी मांग में मेरे नाम का सिंदूर सजा है. और उनमे भी मेरा सुकून सिर्फ तुम और प्रीती हो, बाकी सब मुझे याद तक नहीं. 2 महीने 23 दिन पहले मैं तुम्हारे साथ था और उसके बाद 2 बार मैं और प्रीती एकांत में रहे है जिसमे एक बार ज़िद्द मेरी हे थी नहीं तोह वो मन कर रही थी. इस बीच मैंने किसी को भी स्पर्श तोह दूर, ठीक तरह से जवाब तक नहीं दिया. दिल्ली पहुंचने पर विन्नी दीदी का फ़ोन भी आया था और मैंने उनको भी साफ़ मन कर दिया था की पहले मुझे मेरी बीवी के पास जाना है और मैं एक मिनट भी उधर रुकना नहीं चाहता.", ऋतू की आँखों से जरूर आंसू लुढ़क चुके थे पर इस बीच सब सुन्न कर उसने 2-3 मुक्के अर्जुन के सीने और कंधे पर जड़ दिए. स्टैनो को थिरकता देख अर्जुन तोह उस मार को जैसे दरकिनार कर चूका था पर उसका हाथ अपने के उभार पर महसूस होते हे ऋतू ने हाथ पकड़ कर वही दांत गदा दिए.

"कसम से तुम मुझसे बहोत मार खाने वाले हो. बहोत बुरे हो जो प्यार से 2 पल मुझे सुलाने की जगह सताये जा रहे हो. और विन्नी दीदी को तोह मैं देखती हु अपने तरीके से जो मेरे माल पर अभी भी नजर टिकाये है. जी नहीं भरता उनका?", ऋतू के नखरे और गुस्से को देख अर्जुन ने एक झटके में हे पीठ की तरफ से ब्रा के हक्क खोल कर उसको अपने ऊपर गिरा लिया.

"अब प्यार को अगर सतना कहोगी तोह मुझे मंजूर है ये भी. इस बार तोह ये सर्दियाँ ख़तम होने से पहले तुम्हारी 6 महीने की सरकारी छुट्टी न करवाई तोह मेरा नाम भी ...", अर्जुन कहते कहते बस खामोश हो कर ऋतू की गोरी चिकनी पीठ को सहलाने लगा जैसे वो अपना सही नाम भूल गया हो.

"मेरा नाम तोह ऋतू अर्जुन शर्मा है जी और मैं रेडी हु पाँव भारी करवाने के लिए पर साथ हे तुम्हे कल उस नीली बिल्ली को दबोचना होगा. फिर बारी बारी से हम दोनों हफ्ते हफ्ते की छुट्टियां ले लेंगी जब तुम्हे काम से फुर्सत मिले. बिल्ली के इरादे तोह हर साल बचे पैदा करने के है पर मुझे बस 2 चाहिए वो भी एटलीस्ट 2 साल के गैप में. अरे बातों में ये तोह भूल हे गयी मैं बताना.. अलका भी आने वाली है इस 16 को और मुझे साथ लेके घर भी जायेगी दिवाली के लिए, 1 नोव को है न. तुम कब तक रुक रहे हो यहाँ?"

"जबतक तुम चाहो. अलका ने तारा के साथ काम बंद करने की वजह क्या बतायी थी? मुझसे उसकी उतनी बात नहीं हुई और फिर वो एकदम से उधर का बिज़नेस छोड़ कर वेनिस चली गयी. साढ़े 4 महीने.. तुम इतने समय उस से मिले बिना कैसी रही?", ऋतू के निर्वस्त्र सीने से छेड़छाड़ किये बिना वो वैसे हे उसको अपने ऊपर लिए लेता था.

"तुम्हे लगता है की मैं या वो इतना समय निकाल सकते है? तुम जब मिलने आये थे उसके बाद मैं गयी थी अलका के पास पर उसने बताने से मन किया था और तुमने जब फ़ोन किया था वो कटा नहीं था, लिमिट ख़तम हो गयी थी इन्तेर्नतिओन रोमिंग की वजह से. वीडियो कर लेते है हम हर दूसरे दिन और अब उसका कोर्स भी पूरा हो गया है तोह वो अपना काम शुरू करेगी थोड़ा वक़्त यहाँ आराम करने के बाद. तारा और उसके बीच कोई विवाद नहीं हुआ था बल्कि अलका ने ये सब तोह घर परिवार के बीच कोई प्रॉब्लम न हो इसलिए किया. अगर वो तुम्हे बताती तोह तुमने तोह सोचना बाद में था, उजाड़ पहले देते सबकुछ. वो साहसी होने के साथ समझदार भी है अर्जुन जो बिना वजह बात बढ़ने के जगह कदम पीछे लेना जानती है."

"तारा ने गलत व्यक्ति को चुना जीवनसाथी के रूप में और मैं बस इस वजह से चुप रहा क्योंकि उसमे बुआ के साथ साथ बौ जी और तुम्हारा पापा की सहमति थी. बिना वजह उन्हें तोह फिर से मौका मिल जाना था मुझे मेरी औकात दिखाने का. लेकिन भविष्य में अगर सुशांत (तारा का पति) ने कुछ भी ऐसा वैसा किया या पता लगा की वो खुदको बुआ की जगह पंडित जी के घर का दामाद समझ कर कुछ भी कर सकता है तोह साले की गर्दन उखाड़ कर उसके ससुराल के बहार हे टांग दूंगा. मैं जानता था की अलका ये मुझसे छुपा रही है पर सुनिश्चित करना था बस की मेरी सोच वहां तोह नहीं है. आने दो इस रबर की गुड़िया को, अंजार पंजर ढीले करता हु इसके और फिर उसके बाद तुम्हारे."

"आए.. मेला आलू गुससे में लाल हो लाहा है. सुशांत को उसने ऐसे तोह जाने नहीं दिया होगा. गाल सेकने के बाद घुटना उसकी छोटी सी मर्दानगी पर पूरी ताक़त से मारा था तुम्हारी रबर की गुड़िया ने. लोगो को अपेंडिक्स बताता रहा बाद में पर अलका ने उसको ये भी समझा दिया की वो अपनी बहिन की वजह से बात इधर ख़तम कर रही है. दोबारा कुछ भी ऐसा वैसा किया या इसकी खुन्नस तारा पर उतारी तोह फिर बात करने अर्जुन आएगा, जिसको तारा के मां नाना का भी डर नहीं और वो अर्जुन की जान है. तारा से बात होती रहती है और उसको यही पता है की अलका टेक्सटाइल वाला काम बस एक्सपीरियंस लेने के लिए कर रही थी. हाँ ताऊ जी ने उसकी शादी की बात चलाई थी पर अलका ने ये कह कर मन कर दिया की जब तक वो सेटल नहीं हो जाती वो इस बारे में सोच भी नहीं सकती. वैसे अलका ने बर्थडे गिरफ्त डिमांड किया है मुझसे और तुमसे.", अर्जुन के सीने को सहलाती हुई वो उसको गुजरे समय की हर जानकारी देती रही और इतना कुछ बताने के बावजूद कही भी रेखा का जीकर तक न हुआ उसके मुँह से.

"जो चाहे वो लेले. सब उसका हे तोह है."

"वो हम दोनों के साथ.. एक टाइम पर... और और .."

"माँ भी बन्न न चाहती है?", अर्जुन ने हे बात पूरी की सवाल की तरह और ऋतू ने बदले में बस ठंडी आह भरी.

"मैंने कहा है की अभी उसके जो सपने है वो साथ मिल कर उन्हें पूरा करे. साली बूढ़ी इमोशनल ब्लैकमेल शुरू कर देती है घडी घडी. प्यार से ट्रीट करना जब वो यहाँ हो और ये सब बातें मत करना जो मैंने कही है तुमसे. मुझे ऐतराज नहीं है जैसे आजतक एक सोने का दिखावा करता रहा है तोह इस बार आँखें खोल लेगा.", अर्जुन ने सब समझते हुए हामी भरी थी और वो ऐसा दिल से कह रहा था क्योंकि अलका ऋतू से अलग तोह नहीं थी.

"पर वो घर साथ चलने को बोलेगी तोह तुम मन करोगी उसको मेरे लिए.", अर्जुन की गुजारिश देख कर ऋतू भी हंसने लगी थी.

"कुछ घिस जाएगा अगर उसका दिल रख लोगे? दादी भी तोह कितना याद करती रहती है तुम्हे. शादी के बाद तुम वह बस पहले 2 महीने में 4 बार गए थे और 11 जान को शादी हुई थी और तुम आखिरी बार गए थे 25 मार्च को, होली वाले दिन और जाने कौनसा रंग लगा तुम्हे जो आज 6 महीने से अधिक हो चुके है पर तुम वापिस न गए. 3 दिन बाद यही सब तुमसे अलका भी पूछेगी और वो तुम्हारी सदाबहार गर्लफ्रेंड है जिसके हर सवाल का जवाब उसका बॉयफ्रेंड जरूर देता है. हमारी हे किस्मत अलग थी की आपको तभी पति मान लिया था जब जनाब 10 क्लास पार करके हेट थे."

"मत उलझाओ अपनी इन मीठी बातों में डॉक्टर साहिबा. पिछले एक घंटे से मेरे एक हे सवाल को 3 बार पूछने पर भी इस काबिल पत्नी ने जवाब नहीं दिया. और रही बात होली का वो रंग चढ़ने की जिसकी वजह से मैं पंडित जी के संसार से अलग हो गया तोह इसका जवाब आप स्वयं पूछ लीजियेगा अपने पूजनीय पिता जी या उनके भी पिता जी से. तुम जानती हो ऋतू की मेरे कॉलेज के 4 बरस उन्होंने हे प्रतिबन्ध लगाया था हम दोनों पर और उसके बाद... उसके बाद मुझे घर से ekaant-vaas पर भिजवा कर अपनी हे औलाद से छल करना चाहा..? सबने बचपन से उनकी तारीफ के निर्भीक शेर की तरह की थी जो मेरे man-mastishk में भी वैसे हे बरक़रार रही पर भूल गया था के उनकी सोच भी उस जीव जैसी हे है जो हर जगह बस बेमतलब अपना हे अधिकार चाहता है फिर चाहे सामने वाला नर उनका हे रक्त क्यों न हो. तुम्हे पाने के बाद मुझे लगा था की चलो इनके नियम परिवार की प्रतिष्ठा के हिसाब से मुझे मान ने चाहिए आखिर समाज में उनका भी ओहदा और नाम है. पर उसमे भी खेल गए अपने हे बेटे के साथ.. छोडो उन बातों को जिनका अब कोई मतलब हे नहीं. मेरा तुम्हारे जितना बड़ा दिल तोह नहीं है ऋतू पर मैंने तुम पर भी कभी उनसे मिलने की बंदिश नहीं लगाईं. हाँ इस घर से बस उन्हें दूर हे रखना नहीं तोह एक वचन तुमने भी दिया है जिसके टूटने पर .."

"शठ.. जानती हु तुम अपना दर्द कभी जाहिर नहीं करोगे क्योंकि तुमने उसको अपना लिया है. ऋतू की सांसें टूट सकती है पर ये वचन बरकरार रहेगा. तुम्हे याद है नानी का वो basant-baag और हमारी बातचीत जब मैंने तुम्हे कहा था की तुमने समय से पहले हे खुदको इतना साबित कर दिया है अर्जुन की भविष्य में तुम्हारी कामयाबी और ये दुसरो का दर्द दूर करने की आदत हे तुम्हारी परेशानी बनेगी. सबका बोझ अपने कंधो पर उठा कर तुमने तोह अपना करम बखूबी निभाया पर जब बात तुम्हारे जीवन की आयी तोह बदलते रंगो ने तुम्हारी वो मासूमियत हे छीन ली. पर मैं फिर भी खुश हु क्योंकि इतना सब सहने के बावजूद तुमने प्रतिकार न किया और सबको उनके रिश्ते अनुसार मान दे कर विदा हुए. पर जो तुम्हारे हक़ में थे उनका दर्द?"

"अब थोड़ा सोने भी दो बाबा. अगर मैंने तुम्हे अभी निचे ले लिया तोह चीखती रहोगी और मैं हटने वाला नहीं. मुझे सचमुच तुम्हारी जरुरत है जान.. मुझे शांत कर दो, बहोत भरा हुआ महसूस कर रहा हु.", अर्जुन ने आँखें मूंढ कर ऋतू को खुद में समेत लिया.

"आउच.. जीन्स तोह उतरने दो दुफर.. मैं भी तोह थोड़ा सुकून चाहती हु तुम्हारी बाहों में लिपट कर..", अर्जुन ने हे हाथ बढ़ा कर दोनों की जांघो के बीच वो कैसा हुआ गोल बटन ढीला कर दिया जिसको उतारने में ऋतू को ाची खासी जेहमत उठानी पड़ी पर श्वेत पंतय में उसका जिस्म नजर भर देखते हे अर्जुन की जांघो के बीच हरकत होने लगी थी.

"कण्ट्रोल करो इसको, बाद में यही मन करेगा सर उठाने के लिए. उमाहहह.. 4 बजे है बस और 7 बजे कॉफ़ी बना देना. आह्हः.. बस हाथ रखो और कुछ नहीं करना..", ऋतू ने अर्जुन के जिस्म से भी वो काली बनियान उतरवा दी थी और अब वो उसकी टांग पर टांग चढ़ाये सीने के बीच मुँह दफ़न करती कसके लिपटी हुई थी. झीनी मखमली पंतय के भीतर अर्जुन ने बस एक बार उस मांस से लबरेज चिकने कूल्हों के मसला जो शायद पहले से कही ज्यादा उभर कर अब ज्यादा हे कामुक दिखने लगा था. सुबह के इस वक़्त और अर्जुन की बाहों के बीच ऋतू जल्द हे गहरी नींद में डूब चुकी थी और स्वयं अर्जुन भी, अपनी पत्नी और जीवन के सबसे मजबूत स्तम्भ के सामीप्य में. जीवन खट्टे मीठे पालो से गुजर कर न जाने कितने कड़वे कसैले दौर को पार करता अब जैसे स्थिर होने लगा था.

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"उन्न्नन.. हे.. तुम तोह बड़े ाचे दिख रहे हो बाद बॉय.. नही नही के बाद इतने खुश हो.. ओह्ह्ह.. अपने पापा के साथ घूमना फिरना भी हो गया तुम्हारा?", ऋतू की आँख उस बड़े से कुत्ते द्वारा चादर खींचने से खुली थी जो उसके खूबसूरत जिस्म को ठंडक और बाकी हर निगाह से बचाये था. हर्कुलस उर्फ़ ह नामक वो बड़ा श्वान हर बात समझता हुआ बस हीहठ हीह करता हुआ उछाल कूद मचता रहा जो जाहिर करता था उसकी स्वाभाविक ख़ुशी को और सफ़ेद चादर को अपने कंधो पर किसी लबादे से ओढ़ती ऋतू ने उसके दोनों किनारो को समेत कर गर्दन के पीछे गांठ लगा कर बांध लिया. अर्जुन न इस कक्ष में था और न हे घर में कोई और आवाज सुनाई दे रही थी. बस कॉफ़ी की ऊपर उठती भाप जिसके पीछे फ्रेम में ऋतू और अर्जुन की तस्वीर लगी थी, उसको देख कर ऋतू ने वो बड़ा कप उठा कर पहले उसकी महक ली और उसके बाद एक घूँट भर के वही चादर पांग की तरफ से कमर तक खींचते हुए उसको वह भी कमर के पीछे बाँध लिया. घडी में 8 बज रहे थे और बताये वक़्त से वो एक घंटा देरी से उठी जैसे अर्जुन ये भली भाँती जानता हो.

"अर्जुन कहा है ह?", बहोत आहिस्ता से हे ऋतू ने उस श्वान से पुछा था जो अब ठन्डे फर्श पर पाँव पसरे बैठा ठंडक के मजे ले रहा था. भूरे काले उस श्वान ने भी संक्षिप्त से बस चेहरा बंद दरवज्जे की तरफ घुमा दिया और दिवार से करवट लगता हुआ वो मृत होने का दिखावा करने लगा जिस पर ऋतू भी हांसे बिना रह न सकीय. पर अब वो तारो तजा थी 4 घंटे की बहुमूल्य नींद प्राप्त करने के बाद. अक्सर घर में इतना खुशनुमा माहौल रहता नहीं था. 2 घूँट और भरने के बाद वो कप को वापिस बगल वाले मेज पर रक्तही कड़ी हुई तोह उसके जिस्म पर चादर के नीचे मौजूद सफ़ेद पंतय अब बिस्टेर पर ब्रा की बगल में पड़ी थी. भूरे बालो में हाथ फिरती हुई वो अंगड़ाई लेती हुई इतनी मादक लग रही थी की बस स्टैनो के उठाव और उसके चेहरे की ख़ूबसूरती हे किसी का ईमान गिरवा दे. गोर गुलाबी पाँव ठन्डे फर्श पर एहतियात से रखती हुई वो उस कमरे के भीतर हे दूसरे दरवाजे को खोल उधर दाखिल हुई जहा पतले गलियारे के एक तरफ वासरतो की अलमारी और दूसरी और पूरी दिवार पर दर्पण लगा था. सामने कांच के द्वार पर जमी भाप का मतलब था की अर्जुन गरम पानी के निचे खड़ा है या वो नाहा भी चूका हो. कांच का दरवाजा अपनी और खींचते हे ऋतू के चेहरे और जिस्म के कुछ हिस्सों पर वो गरम वाष्प का सुखद स्पर्श हुआ.

"मेरी तोह साड़ी प्लानिंग हे ख़तम कर दी शर्मा जी आपने. पर नंगे ज्यादा ाचे लगते हो.", ये बड़ा बाथरूम भीतर से भी 2 हिस्सों में बनता था जिसके फुहारे वाली तरफ अपना जिस्म सूखता हुआ 6 फ़ीट 4 इंच का वो मांसपेशियों भरा तगड़ा जिस्म अपनी प्राकृतिक अवस्था में था और दिवार से तक लगाए ऋतू होंठ चबाती हुई अर्जुन के पुष्ट कूल्हों के साथ कमर से पीठ तक उभरी मांसपेशियों और 'व्' की बनावट को निहार रही थी. मजबूत पत्तो के बीच वो सुस्ताता मोटा लम्बा लिंग भी उसकी नजरो में हे था.

"क्या करती हो यार? एक बार तोह डर हे गया था. तुम आजकल ाचे से सो नहीं रही इसलिए उठाना उचित नहीं समझा और सोते हुए वो मासूमियत बहोत दिनों बाद दिखी थी तोह थोड़ा सा लेट मैं भी हो गया. तुम्हारी माइड आयी थी जिसको मैंने आज और कल की छुट्टी दे दी है. बोलने तोह लगा था की अब बीबी जी का नया सेवक आ गया है तोह शायद हे तुम्हारी जरुरत पड़े लेकिन क्यों किसी की जीविका खराब करना.? इरादे क्या है जो टुकुर टुकुर देख रही हो?", ऋतू अभी भी उतने हे कामुक अंदाज में उसको निहार रही थी और जवाब देने की जगह उसने कांच का दरजवा खोल कर अलमारी के निचे से वो लकड़ी का छोटा पर मजबूत स्टूल निकाल कर बाथरूम के भीतर अर्जुन की और सरका दिया.

"इरादे कौनसा बदलने वाले है मेरे noor-e-nazar. आप बस थोड़ा इन्तजार कीजिये फिर आपकी दासी बताती है उसके इरादे क्या है.", ऋतू ने जानबूझ कर अपना पृष्ठ भाग अर्जुन को नजर करवाते हुए बगल वाले हिस्से का रुख किया तोह अपलक उस दृश्य को निहारने मात्रा से हे उसका झूलता लिंग फड़फड़ाने लगा था. सामने से बेशक चादर ने ऋतू का खजाना छिपा रखा था पर इस कदर मदद कर जाने से वो वो पाने गोर मॉटे कूल्हों और उनकी लचक के साथ चिकनी नंगी जाँघे और उनके बीच वो गुलाबी लकीर ऐसे दिखला गयी की सांसें संभालता हुआ अर्जुन अपने सर पे हाथ फिरता हुआ उस काठ के स्टूल पर तशरीफ़ रखता दिवार से तक लगाए आने वाले पल की प्रतीक्षा करने लगा जिसमे ऋतू ने भी अधिक इन्तजार न करवाया.

"जरा सा भी हिले तोह मुझे मैट कहना.. हाँ कह देती हु.. Ohhh..Dekho तोह कैसे पठार से हो गए हो घर से बहार रह कर.", छोटी कांच की स्लैब जो अर्जुन की पीठ का सहारा बानी दिवार पर हे जुडी थी उसके ऊपर शेविंग ब्रश, क्रीम और रेजर रखने के साथ ऋतू भी अपनी टाँगे चौडाती हुई अर्जुन के हिचकोले खाते मूसल पर कूल्हों की दरार और योनि टिकती ऐसे बैठी की मजे से उसकी आँखें हे बंद हो चली.

"ओह्ह्ह.. ये चीटिंग है... जाआनं.."

"उम्म्म.. बेबी चीटिंग तुम करो और इल्जाम हमारे सर. आज शेविंग पूरी होने से तक अगर तुम्हारा डंडा खड़ा रहा तोह तुम्हारी अधूरी चाहत आज रात हे पूरी कर दूंगी.. उम्म्म.. सचमुच अर्जुनंनं.. जो तुम कबसे मांगते आ रहे हो.. वो जो मेरे मॉटे हिप्स के बीच है.. उनकी गहराई में जाने की तुम्हे इजाजत होगी.. आह्हः.. इसको.. जो ये इतना मोटा और तुम्हारी बॉडी से ज्यादा हे सख्त है.. वो पूरा अंदर करने की तुम्हारी चाहत और जैसे चाहो.. जोर से, जमीन पर लिटा कर या मेर हाथ बाँध कर.. कितना गरम है तुम्हारा एललललल ..आह्हः..", ऋतू की ये जानलेवा सरगोशी और गरम सांसें चेहरे, कान के संवेदनशील हिस्से पर छोड़ना अर्जुन को अभी से बेकाबू बना रहा था. गीले ब्रश को उसके गालो पर बड़ी हे कामुकता से चलती हुई वो बीच बीच में हाथ की जगह जब उस 10 इंची मूसल पर अपनी गरम योनि के साथ चिकनी दरार को रगड़ती तोह उत्तेजित लिंग और ऊपर उठने लगता. लाल रंग की तुबे से सफ़ेद क्रीम को ब्रश की जगह अपनी नाजुक उँगलियों से मसलती हुई वो उसके गालो और ठुड्डी से निचे तक गहने बालो को पोतने लगी.

"इस से बढ़िया जगह और काम नहीं मिला अपनी आअह्ह्ह्ह.. आराम से ऋतू.. महीना हो चूका है लगभग.. चाहत भी पूरी करने का कहती हो और शर्त भी रखती हो.. पर जीतूंगा मैं हे.. और सच कहता हु की चलने के काबिल.. उम्म्म्म.."

"ये तुम्हारे हाथ गलत जगह है मिस्टर. बूब्स जब दिखे तभी हाथ लगाना, उस से पहले ाचे बचे की तरह बैठे रहो. उन्नातुराल डिमांड के बदले ऐसी शर्त कुछ गलत तोह नहीं? तुम्हारे एबीएस पर थोड़ा पानी गिर गया जानू.. मैं जरा ये टॉवल से साफ़ कर दू.", चेहरे पर क्रीम पोतने के बाद वो एक बार फिर अपना विलक्षण पिछवाड़ा दिखती हुई उठी और सामने टंगे छोटे तोलिये से अर्जुन के सीने से जांघो तक थोड़ा बहोत गिरा पानी साफ़ करते हुए नाभि और उत्तेजित लिंग पर फूँक मारने से भी न हटी. अर्जुन का वो सुर्ख सूपड़ा पूर्ण उत्तेजित और ऋतू के हलके योनिरस से दमक रहा था. वापिस जाँघे फैला कर वो धीरे धीरे बैठने लगी तोह ऊपर उठे उस लम्बे मॉटे मूसल का सबसे मोटा और खाल से बहार वाला चिकना हिस्सा उसकी योनि के मुहाने आ टिका. ऋतू को भी इसमें आनंद मिलने लगा और इसमें इजाफा करती हुई वो उस पर दबाव बनती हुई अपनी फैलती हुई योनि के छेड़ तक ले चली. अत्यधिक चिकनाहट और इतने नरम मखमली एहसास से अर्जुन के साथ वो भी कांपने लगी थी. 2-3 बार ाचे से वो स्पर्श लेते हुए वो योनि को सुपडे के ऊपरी हिस्से से फिसलती हुई अपनी कूल्हों की गहरी दरार के चिकने और मांस से भरे एहसास का मजा देती हुई पहले सी आ बैठी.

"ओह्ह्ह्हह्हह.. ऐसे तोह तुम मार हे डौगी मुझे.. शेव गयी भाड़ में ..आठ..."

"न न न.. हाथ अपनी जगह मिस्टर... उफ़ ये तुम्हारा चौड़ा सीना.. याद है कैसे इसके नीचे दबा कर मेरे बूब्स को रगते थे तुम.. ओह्ह्ह अर्जुन.. तुम्हारी इतनी ताक़त और मुझे कमर से उठा कर कैसे पूरा अंदर तक भर देते मेरे.. कितनी रातें तोह बस उन्हें याद करते हुए गीली हुई हु मैं. आह्हः.. तुम्हारे सेक्सी गाल जिन पर एक रोयं तक न था, उन्हें चबाने चूमने का वो अलग हे मजा.. जरा आईने में देखो क्या इतना झाग सही है?", बातों और उत्तेजक हरकतों से अर्जुन तोह अलग से हे नशे में था और जब उसने मुश्किल से आइना देखा तोह सफ़ेद झाग की एक इंच से मोटी परत उसके पूरे चेहरे पर चढ़ चुकी थी. लेकिन उसके साथ हे दर्पण में ऋतू भी शोखी से देखती हुई होंठ चबाने लगी. आईने में ऋतू के गोर और मॉटे कूल्हे अर्जुन पर बैठे होने की वजह से फैल कर उसकी लिंग को दबोचे थे.

"जल्दी से पूरा कर दो न जान जो करना है..", अर्जुन ने आईने में देखते हुए दोनों हाथो से ऋतू के नरम कूल्हों का मांस पकड़ कर हल्का सा घर्षण किया तोह ऋतू ने अपना सीने उसके ऊपर दबा दिया. थोड़ा झाग ऋतू की ठुड्डी पर भी लग चूका था.

"बचपन से हे इतने बेसबरे हो क्या? घरवालों ने सबर नहीं सिखाया? चेहरा ऊपर करो नहीं तोह cut-kata गया तोह फिर मुम्मा दीदी करते हुए रट फिरोगे.. उम्म्म.. अरे मेरी जान इसको काबू में रखो नहीं तोह पहले इसकी हे हजामत कर दूंगी और गलत जगह कट गया न तोह ये उठना बंद कर देगा.", ऋतू ने थोड़ा उचक कर लिंग को गर्माहट से आजाद किया तोह अर्जुन को लगा जैसे दुनिया हे उजाड़ गयी हो. पर इस बार ऋतू ने बैठने से पहले तेल सना हाथ उसके सुपडे से जड़ तक 2-3 मसल कर चादर से हे हाथ साफ़ करके पहले वाला क्रम हे दोहरा दिया. सुपडे पर योनि का दबाव और कैसे हुए छेड़ तक उसको दबाना. अर्जुन हाथ उठा कर उसका कन्धा पकड़ने लगा तोह हाथ बीच में रोकती ऋतू ने उसके चिकने सुपडे पर थोड़ा और दबाव बढ़ा कर एक चौथाई सूपड़ा अपनी प्यास छूट के भीतर करवा लिया. एक नशीली सी सीत्कार दोनों के मुँह से निकली, अर्जुन की कुछ अधिक हे तीव्र.

"Aaa..isss.. पूरा बैठ जाओ jaannn....aaahhh.. आज तक उतनी हे कासी हो जितनी पहली बार के वक़्त थी.. आह्हः.. बस तुम्हारे हिप्स और बूब्स ज्यादा सेक्सी और बड़े लगते है.. आह्ह्ह्ह...", ऋतू ने आँखें बंद करके सिसकते अर्जुन को देख कर एक कुटिल मुस्कान दी और लिंग बाहर निकालती हुई फिर से उसकी पूरी लम्बाई को रगड़ कर जड़ पर छूट की गीली फांके दबती हुई आ बैठी. अर्जुन जैसे चरम पर पहुंचते पहुंचते वापिस मझदार में लौट आया.

"बेबी, ऐसी पत्नी मिलेगी तुम्हे जो एक नार्मल से काम को इतना सेक्सी बना दे? वैसे जो तुम्हे सेक्सी लगते है न उनका साइज ऊपर और निचे दोनों तरफ से 2-2 इन्चा बढ़ा चुके हो वो भी मेरे इतने डाइटिंग और एक्सरसाइज के बाद. साढ़े 4 साल तोह वैसे हे मिलना न हुआ और उसके बाद हफ्ते महीनो में और महीने अब साल में नहीं बदलने दूंगी.. अलका .. अलका के साथ तुमने लास्ट टाइम कब किया था अर्जुन..?", शिकायत के बाद वो उसके सीने पर दोनों स्टैनो को चादर समेत रगड़ती हुई ऐसा मजा दे रही थी की अर्जुन बोलने में भी लड़खड़ा रहा था.

"उन्हहहह.. उसको.. एयरपोर्ट के .. आह्ह्ह्ह.. वाशरूम में हे .. आगे और पीछे से.. मेरी वजह से हे उसने .. संजीव भैया और तुम्हे .. भेज दिया था.. वो भी इतना नहीं तड़पाती.. उम्म्म.. ऐसे हे धीरे धीरे हिलती raho..rukna नहीं..", अर्जुन की हालत देख ऋतू ने तुरंत हे उसकी गॉड से अपना वजन उठा लिया. अब वो उसके चेहरे के ऊपर झुकती हुई उस मूसल के सुपाड़ी पर कभी योनि लगाती कभी हटती.. इसके साथ हे वो बड़ी कुशलता से उसके पूरे चेहरे को baal-viheen करती गयी. योनि से भी सुनेहरा रस सुपड पर टपकता हुआ उसको और भिगोने लगा. दाद देनी चाहिए इतने सबर की और यही पर इन दोनों के बीच ऋतू श्रेष्ठ थी सबर और लक्ष्य के मामले के साथ हर छोटी बड़ी बात में.

"शर्म नहीं आयी तुम्हे उस मासूम को ऐसी जगह जहा अनगिनत लोग मौजूद हो, एक छोटे से केबिन जैसे बाथरूम के बीच इस मॉटे डंडे से दर्द देने में. आह्ह्ह्ह.. कितना चीखी होगी वो मजे और दर्द से..? उसके वो रबर जैसे गोल गोल हिप्स उतने हे नाजुक है.. उनके बीच में तुमने ये लललल llu..lund दाल दिया.. आह्हः.. कैसे गया होगा न बेचारी की इतनी टाइट अनुस में.. उफ़.. जरा भी नहीं सोचा की वो तुम्हारा स्पर्म अपने अंदर लिए कैसे फ्लाइट में बैठी होगी? इतनी देर तक ढेर सारा स्पर्म .. vag...chhooot के अंदर या पपपीचे लिए.. उसमे.. अलका को बुरा लगा होगा या.. इसका भी अलग मजा है..? बताओ न अर्जुनंनं.", पूरे चेहरे को चमका कर ऋतू ने वही कॉलेज जाने से पहले वाली शकल दे दी थी और गीले तोलिये से साफ़ करने के बाद वो उसके होंठो पर होंठ टिकाये अपनी भड़की आग और संभाल न सकीय और अर्जुन ने भी उसको कमर से जकड़ते हुए दूसरा हाथ अपनी पकड़ से मॉटे लुंड को ऊपर मचलती छूट के मुहाने लगते हुए जोरदार झटका लगा दिया. मखमली छूट की मोटी लिजलिजी फांको को चौडाता हुआ एक धक्के में हे उसका एक तिहाही लुंड छूट के अंदर जा घुसा. ऋतू ने अपनी चीख रोकने की भी जेहमत न उठाई..

"आअह्ह्ह.. मायआ... निर्दय सैंया.. इतने प्यार और सेवा के बदले .. आह्हः.. ऐसे दर्द डोज.. आठ.."

"थोड़ी देर में तोह मेरी हे चीखने की बारी है जान.. आह्हः.. तुम्हारे ये बूब्स नहीं चुके है.. मॉटे चुके.. अब इनकी सेवा मैं करता हु जैसी तुमने मेरे लुंड की करि है.. और एयरपोर्ट के बाथरूम में मैंने अलका को पहले तोह स्लैब पर लिटा कर कस के पेला था और उसके बाद उसने मुझे.. आह्हः.. ", अर्जुन ने अगले 2 धक्को में जड़ तक नाप दी थी ऋतू की कासी हुई गीली योनि की. गले और कमर की तरफ से चादर की गाँठ खोल कर अर्जुन अब एक सतांन को दबाता हुआ दूसरे गुलाबी निप्पल को ऐसे चुसकने लगा था जैसे ऋतू आज ये आखिरी बार परोस रही है. गोर बेदाग़ स्टैनो की जोड़ी जैसे अब कही पाकी थी, बेशक दोनों में जोरदार अंतरंग पल 1998 से बन रहे थे लेकिन इनका अकार और कसाव अब अपनी परकाष्ठा पर था. इस आधुकणिक और बाहरी ध्वनि से निष्प्रभावी स्नानघर में काठ के स्टूल पर बैठा अर्जुन पूरी कसार निकाल रहा था दोनों चुके मसलता और बारी बारी उनके अकड़े हुए गुलाबी निप्पल मुँह के भीतर खींचता.

"आह्हः... इस्सस.. ऐसे हे .. इन्हे काट खाओ.. उम्म्म.. सीने पर ये बोझ बस तुम्ही हल्का करते हो.. अर्जुनंनं..", इतनी देर से कामुक मस्तियाँ करती ऋतू का साखळीत होना भी जायज था जो अर्जुन का चेहरा अपने दूधिया स्टैनो के बीच दबाती हुई उत्तेजना में बुरी तरह कांपने हे लगी थी. महीनो से जमा उसका कॉमर्स आखिर फूट हे पड़ा था और उसकी बरसात में भीगते अर्जुन के लिंग को भी कुछ सुकून मिला जो इतनी देर से कासी हुई छूट में फँस फँस कर अंदर बहार हो रहा था. तेल शायद पर्याप्त नहीं था इतने गरम माहौल और लगभग 3 महीने बाद हो रहे इस संसर्ग में. ऋतू के कूल्हों को दोनों पंजो दे जकड़े वो मेज से खड़ा हो कर फुहारे के निचे चला आया. देव शरीर का स्वामी अपनी अद्वित्य अप्सरा सरीखी संगिनी को ऐसे उठाये था जैसे वो महज एक खूबसूरत हल्का बादल और अर्जुन उसका आसमान.

"पानी खोल दो. उम्माह..", योनि से रिस्ता तरल लिंग की जड़ पर एकत्रित हो रहा था और बाथरूम में खुशबूदार साबुन, इत्र की महक के बीच अब कॉमर्स भी मिश्रित होने लगा. ऋतू ने अंदाजन हे वो चमकदार धातु का मुठ घुमाया और फिर से वो अर्जुन की गर्दन को जकड़ती उस से चिपट गयी. कुनकुने पानी के निचे उसको अपने साथ भिगोता अर्जुन दोनों हाथो से कूल्हों को पीछे खिंच कर वापिस लिंग पर मारता तोह मजे से दोनों की आहें गूँज उठती. ऋतू कही से भी साधारण युवती कदापि नहीं थी. 5'8" की लम्बाई और ऊपर से उसका इतना भरा हुआ यौवन जिसको अपने जिस्म पर संभाले अर्जुन बदस्तर गीली योनि को भेदते हुए उसके गीले चेहरे, होंठो को उतने हे प्रेम से चूमता हुआ जैसे आज सुबह का अपना व्यायाम कर रहा था, सबसे बेहतर और आनंद देने वाला व्यायाम. गर्भद्वार तक गरम मॉटे सुपडे का टकराना और योनि के होंठो का लिंग के अंतत तक चिपकना अलग सा हे सुख दे रहा था. शुरुआत में ऋतू की हरकतों से तड़पता अर्जुन, अब उसको दूसरे चरम पर ले जाते हुए हुंकारने लगा था. जिस्म की हर मांसपेशी और नस्से उभर का पानी से कही ज्यादा चमक रही थी. एक हाथ ऋतू की पीठ पर वृताकार लपेटे वो उसको दिवार से चिपकता हुआ जोरदार अंतिम प्रहार करने लगा. गरम लावा भी उस जलन पैदा करती योनि को ठंडक देने लगा था और ऋतू हांफती हुई अर्जुन से लिपट कर सुधबुध हे खो बैठी. जाने कितना वक़्त गुजरा होगा और जब ऋतू ने आँखें खोली तोह गीले चमकदार फर्श पर अर्जुन के ऊपर बिछी थी. यहाँ भी अर्जुन ने उसको अपनी सुरक्षा में समेटे रखा था जैसे संसर्ग के बाद कमरे तक की दुरी कुछ अधिक हो. लिंग अभी भी उसकी योनि के होंठो पर दबा था जहा से लगभग सारा कॉमर्स पानी संग बह चूका था.

"ओह hello.. मैं ऐसे नहीं नहाती और तुम कब तक nang-dhadang पड़े रहोगे? जाओ बीएड पर आराम करो, आधे घंटे बाद वही तुम्हारे मुँह में अपने हाथो से बुर्की (निवाला) डालूंगी. मुस्कुरा क्यों रहे हो? जोके सुनाया क्या मैंने? आगे भी तोह तुम्हे बिस्टेर में नाश्ता करवाती रही हु जैसे साहब को पसंद है."

"सुबह तुम मुझे बिस्टेर में तागत बढ़ने का नाश्ता करवाऊंगी और रात में वही ताक़त मैं तुम्हारी गुलाबो की सहेली पर खरचने वाला हु डार्लिंग. इधर तोह ऐसे हे लेता था जैसे पहले हम ऊपर वाले बाथरूम में करते थे या छत पर. तुम मेरे ऊपर एक जोरदार सेक्स के बाद और हमारे ऊपर गिरता पानी. पहले मेरे डंडे पर मालिश की थी न तुमने, अपनी अपनी कर लेना. इधर न तुम्हे बचने के लिए अलका है और चीखें सुन्न ने वाला कोई. शर्त से मुकरना नहीं अब.. Ummmmmmmmmmaaahhh.", अर्जुन करवट लेता हुआ स्प्रिंग की तरह उछाल कर उस गीले फर्श पर उठा तोह निचे बैठी ऋतू पहले शर्मसार थी अब वो उसकी जिस्म को देख उतनी हे चकित.

"मतलब तुम पहले भी कभी ढेर नहीं होते थे.? जब भी हम दोनों करते थे उस टाइम?"

"हमेशा तुमसे पहले मैं हे होश खोता था और आज भी हो जाता अगर तुम पहले से हे गरम न होती तोह. पर कुछ और भी वजह थी ऋतू जैसा मैंने आज यहाँ लेते हुए समझा. तुम्हे दादी के वो लड्डू याद है? उनकी क्षमता और गर्मी सिर्फ तुम्हारे हे साथ पूरी तरह निकलती थी और .. जैसे अब मेरा जिस्म उसके नकरात्मक असर से बहार निकल चूका है.", अर्जुन का कथन सुन्न कर हाथ वाले फुहारे से अपनी योनि को ाचे से साफ़ करती हुई ऋतू ने पलट कर देखा तोह पाया की अर्जुन मजाक नहीं कर रहा था. पर अर्जुन को इस सबके साथ कुछ और भी याद आया था और वो थी उसकी तिलोत्तमा जो अर्जुन की पूरी ताक़त खर्च करवाने के बाद अपने अलग हे जादू से उसको कभी निष्प्राण नहीं होने देती थी. बसंत बाग़ और उसके बाद अनेको बार रेखा के तिलोत्तमा स्वरुप ने अर्जुन को अपने में विलीन किया था जहा वो ऐसे दुष्प्रभावों से बेअसर रहता था.

"कोमल दीदी ने भी यही कहा था की उस खुराक का यही असर दादी को कभी समझ नहीं आया था क्योंकि उनके हाथो सिर्फ तुम्ही डेढ़ साल तक वो झेल सके थे जिसने आज तुम्हारे पूरे जिस्म को तराश कर रख दिया है. ाचा है न की अब तुम मुझे मेरी मनमानी करने डोज.. वैसे तुम मेरे लिए एक बार और विचार नहीं कर सकते दिवाली पर घर चलने के लिए. दादी अब उतनी सक्षम नहीं रही ारु और बौ जी भी बगीचे में हफ्ते 10 दिन बाद जाते है. मैंने उन्हें एक सुबह वही बैठ कर तुम्हारा लगाया पहला वृक्ष सहलाते और आंसू बहते देखा था. बताना तोह नहीं चाहती थी पर तुमने एक हे सवाल 3 बार पुछा था आज सुबह सोने से पहले. क्या तुम्हे लगता है मामला फ़ोन से सुलझ सकता है? समाज से प्रभावित होने की जरुरत नहीं है तुम्हे जैसे तुम पहले रहते है बस वैसे बेधड़क घुस जाओ अपने बौ जी के उसी संसार में. पापा का बस नहीं चलेगा तब क्योंकि उन्हें तुम हे सही साबित कर रहे हो खुद को अलग रख कर. टोलिया पकड़ना जरा.", अर्जुन टोलिया पकड़ने की जगह हाथो में लिए उसमे ऋतू को ाचे से लपेट कर गॉड में उठता हुआ बड़े प्यार से उसके चेहरे को देखता हुआ कदम दर कदम स्नानघर से निकल उस गलियारे को लांघता हुआ वापिस अपनी shayan-kaksh में लौट आया था.

"मैं कहता हु न की हम पति पत्नी जरूर है ऋतू पर तुम हे मेरी वो सुभद्रा हो जो अकेली मेरे साथ हो तोह फिर महाभारत के बाकी सभी धुरंदन एक साथ हे क्यों न आ जाए, मैं हार नहीं सकता. धर्मराज, भीम और स्वयं कृष्ण जी हे क्यों न उस और हो जाए, मेरी सुभद्रा के रहते मैं अजय हु. आने दो अलका को 3 दिन बाद और फिर मैं भी मेरा ये प्रोजेक्ट पूरा करके साथ हे चलूँगा. चाहो तोह हमारी नाराज माँ को संदेसा पंहुचा देना और आदरणीय स्वयंभू शंकर जी को भी. देखे वो भी महाराज दक्ष की तरह हे अपने दामाद का स्वागत करते है या एक उचित संरक्षक की तरह अपने खोये हुए बेटे का. नाश्ता मैंने तैयार रखा था, तुम कपडे पहनो अगर दिल हो तोह मैं लगता हु हमारे लिए."

"नंगे हे जाओगे?", ऋतू ने ख़ुशी से पहले तोह उसके सीने पर अनगिनत चुम्बन जेड फिर होंठो पर भी. और बिस्टेर पर पसरते हे वो उसको निर्वस्त्र हे कमरे से जाता देखने लगी.

"क्या फरक पड़ता है जब थोड़ी देर बाद फिर से उतारने हे है. रात के लिए पिच ाचे से गीली रखनी है, तभी शॉट बढ़िया लगेंगे."

"छी.. लगाने दूंगी तुम्हे मैं हाथ अपने. हाहाहा.. सॉरी बाबा मजाक कर रही थी.. उम्मम्मम"

"ी लव यू ऋतू.. तुम हो तोह मैं हु, नहीं तोह शायद इतना सफर तये न कर पाटा."

"ी लव यू तू रूद्र.. ये सफर तोह तुम्ही मंज़िल तक तये करोगे. ऋतू कही बहार तोह नहीं है. बस याद रखना की वह मेरे आलू रहोगे तुम बाकी सबके सामने. हाहाहा."

"सही है.. उस मानो को भी फ़ोन कर दो, बता देना की चारों साथ हे चलेंगे... बसंत बाग़. हफ्ता उसके साथ और हफ्ता तुम्हारे साथ कुछ ज्यादा लम्बा हो जाएगा, 10 दिन तुम तीनो के साथ उस कुदरत में वापिस लौटना कही बेहतर है जहा मुझे अपने वजूद का पूर्ण एहसास हुआ था. आज मैं अपने हाथो से खिलाऊंगा मेरी रोटलु को.", अर्जुन फिर भी वो ढीला बरमूडा पहन कर बहार निकल चला और बिस्टेर पर निर्वस्त्र पसरी ऋतू ठुड्डी टिकाये औंधे मुँह बस उसको देखती मुस्कुराती रही.

'हम संसार फिर आबाद करेंगे, एक साथ. जानती हु तुमने बहोत कुछ सहा है और वक़्त के साथ लोगो का वो प्यार बदलते भी देखा जिसको तुम कभी अपनी बुनियाद समझने लगे थे. जिन्हे तुम अपनी राधा और मीरा मानते रहे, उन्होंने हे तुम्हारे त्याग का तिरस्कार किया पर जवाब तोह उन्हें भी देना होगा क्योंकि अब सवाल मैं करुँगी जब वो मिलेंगी. मंजूबाला से भी और उस राजकुमारी से भी. अंतिम युद्ध अपना संसार बसने से पहले.', ऋतू एकाएक गंभीर हो उठी थी इस बंद कमरे में अतीत और अर्जुन के जिस्म पर वो निशानिया याद करके जिसमे उसकी अनकही दास्तान छिपी थी.

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वर्तमान

साल 1998, 2 जून

"दीदी, कैसी है आप?", अभिषेक जी के घर के बहार घंटी बजाते हुए अर्जुन को ज्यादा प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी पर उम्मीद से परे दरवाजा किसी सेवक की जगह काले ब्लाउज और पीली सारे में लिपटी शिल्पा जी ने स्वयं खोला था. उनके चेहरे पर ख़ुशी छुआपये न छिप रही थी पर naari-lajja स्वाभिक असर करती है ऐसे खुले वातावरण में जब आप किसी ख़ास की प्रतीक्षा कर रहे हो और वो इन्तजार करवाने के बाद आये भी तोह देहलीज से बहार रह कर.

"एक तोह तुमने पहले हे अपना वादा नहीं निभाया और ऊपर से अपने हे घर के बहार खड़े हो. तेल उतरना पड़ेगा क्या तुम्हे अंदर बुलाने के लिए?", अर्जुन थोड़ा सकपका सा गया था उनके ऐसे निमंत्रण और तंज करने पर. लकड़ी के कई फत्तो से सजा वो बड़ा और ऊँचा लोहे का गेट एक तरफ से खोल कर उन्होंने अर्जुन को उसकी रानी समेत अंदर आने का रास्ता दिया तोह लाल बुलेट को फिर से स्टार्ट करके वो उनके करीब से हे इस खुले आँगन में चला आया. एक तरफ हे लगे उस छायादार वृक्ष के निचे मोटरसाइकिल कड़ी करने के बाद उसने शिल्पा जी के चरण छूने चाहे तोह उन्होंने उस से पहले हे मन करते हुए बड़े हे सलीके का दिखावा करते हुए अपनी बगल से लगाया.

"मैंने ऐसा तोह नहीं कहा था की पहले हे हफ्ते मैं आपके यहाँ रुकने आऊंगा, दीदी. काफी बड़ा घर है लेकिन इतनी ख़ामोशी?", अर्जुन ने वो पैकेट में बंद मिठाई का डब्बा और शगुन का लिफाफा उन्हें सौंपने के साथ सब तरफ देखा तोह एक तरफ अलग से बने उस क्वार्टर जैसे मकान के छोटे आँगन में बर्तनो को साफ़ करती वो भरे शरीर की नेपाली मूल की महिला नजर आयी, किरण उर्फ़ गुनगुन की माँ बर्षा.

"हाँ अब तोह तुम अपनी बात में कोई न कोई शर्त तोह शामिल करोगे हे. वैसे इस घर में महीने के 20 दिन तोह ऐसी हे ख़ामोशी रहती है क्योंकि तुम्हारे बड़े और छोटे, दोनों जीजा घर हे कहा होते है. वो बर्षा दीदी है जो मेरे यहाँ आने से पहले से हे सब काम और इनका खाना पीना देखती आयी है. इनके पति, पशुपति भैया घर के बहार और बाजार के काम देखते है अगर वो तुम्हारे बड़े जीजा के साथ कही बहार न गए हो जैसे की आज गए हुए है. माधुरी और गौरव देर शाम तक पहुंचेंगे जो बस आधा घंटा पहले वापसी के लिए चले है देहरादून से. आराम से बैठ तोह जाओ जरा.", भीतर आँगन लांघ कर वो अर्जुन को बैठक में लिए चली आयी थी और उसको सोफे पेश करके खुद भी उसके करीब हे आ बैठी. बिना अतिरिक्त प्रसाधन के भी वो ाची खासी तैयार थी और शिल्पा जी के बदन से उठती वो ख़ास परफ्यूम की महक जैसे अर्जुन के आने से पहले हे सजी थी.

"आपका बीटा सोया हुआ है दीदी?", हॉल में इतनी saaj-sajja को देखने के बाद आखिर अर्जुन की नजरे वापिस शिल्पा जी पर हे आ रुकी जो अब बेहतर मुस्कुरा रही थी और अर्जुन उनकी चमकती आँखों को देख थोड़ा झेंपने लगा.

"वो आज देरी से सोया इसलिए ने नहाने में मुझे देरी हुई और काम हमारी लाड़ली इस गुनगुन को करना पड़ा. गुन्नू, ये है तुम्हारी नयी भाभी के छोटे भाई और मेरे भी, अर्जुन. शरबत लो अर्जुन, धुप में आये हो वो भी इतनी दूर.", ये अगला तंज था उनका जिस पर अर्जुन भी मुस्कुराया और किरण का धन्यवाद करते हुए ट्रे से गिलास उठाया तोह किरण ने ट्रे उनके सामने वाले कांच के टेबल पर हे रख दी.

"अरे भाभी, इनके तोह चर्चे हे बहोत है और हम तोह फोटो देख भी चुके थे जब इनके यहाँ गए थे. हम्म्म्म.. हीरो जैसे लगते हो पर ज्यादा पहलवान.. बॉडी बिल्डर टाइप. अब तुम मुझसे छोटे हो या शायद बराबर होंगे क्योंकि मैं दूसरे साल में जाने वाली हो कॉलेज के. बड़े भैया बता रहे थे की तुमने उधर मेले में सबका नाम ऊँचा किया है. झंडा गाड़ा था क्या वह?", अर्जुन हैरत से शिल्पा जी को देखने लगा इस बातूनी लड़की का पहली मुलाकात में हे ऐसा अंदाज देख कर.

"ये शादी में नहीं आ सकीय थी बीमार होने की वजह से और जब तुम्हारे घर गए थे तोह वह ये सबसे मिली थी. तुम्हारे बड़े जीजा ने भी कोई दिन हे छोड़ा हो जब उनकी जुबान पर तुम्हारा जीकर न हुआ हो. और हमारी गुनु जितना ज्यादा बोलती है उतनी ज्यादा समझदार भी है. गुनु, अर्जुन कल आएगा तब आराम से बात कर लेना. अभी हमे थोड़ा जरुरी बात करनी है बीटा."

"हाँ कर लीजिये और कल कुछ ख़ास है जो ये वापिस आएंगे? ऐटिटूड तोह देखो जनाब का.. हँ..", जैसे आयी थी वो वैसे हे चली गयी अपने मॉटे कूल्हे हिलती हुई लेकिन उसके चेहरे के भोले और नखरे भरे भाव देख कर अर्जुन हांसे बिना न रह सका.

"ये क्या बाला थी दीदी? सवाल भी खुद और जवाब भी खुद. बोलने तक का मौका कहा दिया इसने. माधुरी दीदी के साथ खूब जमने वाली है इसकी तोह."

"जम्म तोह तुम्हारी भी सकती है पर शायद हमारा छोटा सा घर आप जी को पसंद नहीं आया. पहले मुँह मीठा करते है जब बहिन के घर आये हो.", अपने हाथ से हे उन्होंने वो बर्फी का टुकड़ा अर्जुन को खिलते हुए ये बात थोड़ी नाराजगी से कही थी.

"आप भी समझती है दीदी की एक बार मैं माधुरी दीदी के होते हुए ताई जी के साथ औ और सबसे मिल कर सभी औपचारिकताएं निभाऊं. कल आराम से खाना खा कर हे जाऊंगा शाम तक रुकने के साथ. अभी तोह जाना होगा, वो फाइल 2 बजे से पहले देनी जरुरी है.", शिल्पा जी ने भी एक गिलास उठा कर गाला ठंडा करने के बाद बस पलके झपका दी. कुछ पल खामोश रहने के बाद उन्होंने एक निगाह बहार डाली और फिर अर्जुन से ru-ba-ru हुई.

"तुम अगर उस घटना से चिंतित हो और तभी आनाकानी करते हो तोह कोई बात नहीं, सब भुला कर बिना औपचारिकता भी आ सकते हो. कमी तोह कही न कही है हे मुझमे."

"फिर तोह मैं गाँव से बहार निकलता हे नहीं और न आपको अपने आने के बारे में अलग से बताता. शादी की रात जो हुआ वो पहले बेशक हम दोनों की गलती या अनजाने हो गया पर एक दूसरे को देखने के बाद न आपने संकोच किया और मैंने कदम पीछे लिए. बस वह हमारे पास मुकम्मल वक़्त नहीं था और यहाँ ये जगह सही नहीं है. एकदम से नजदकियाना ज्यादा बढ़ना मुझसे ज्यादा आपके और माधुरी दीदी के लिए गलत होगा शिल्पा जी. सोचियेगा जरा इस बारे में और आप कोई आम चेहरा तोह नहीं है जिन्हे मैं फ़ोन करके किसी भी होटल में बुला लू और बंद कमरे का किसी को पता न चले. घर और माहौल को समझना जरुरी है जिसके लिए मेरा थोड़ा बहोत आना जाना सबके सामने हो तोह बेहतर रहेगा. लगती तोह आप हमेशा हे खूबसूरत है और भीतर आने से मैं इसलिए हे कटरा रहा था के नजरो की गुस्ताखी कोई और न देख ले.", शिल्पा जी को अब अपनी जल्दबाजी और गलती का ाचे से एहसास हो चूका था जिन्होंने फिर से बहार देखने के बाद बड़े आहिस्ता से उसके गाल और होंठ पर एक गीला चुम्बन जड़ दिया.

"प्यार व्यार और घर परिवार ठीक से समझा नहीं न कभी मैंने तोह इस मामले में थोड़ी अनादि हु. पर तुम ठीक कहते हो और कल जरा थोड़ी ढील देना मेजबानी करने की.", अर्जुन अपने कंधे वाले भाग से हे उनके खड़े हो कर फाइल लेने जाते हे अपना गाल साफ़ करने लगा. पर लाली गाल पर नहीं चढ़ी थी जिस से वो बस मुस्कुरा दिया. शिल्पा जी की अल्लहड़ अंदाज उसको भी भय था पर यहाँ अपनी बड़ी बहिन की वजह से वो कदम रोके था क्योंकि प्रमुख चाहत तोह आखिर माधुरी दीदी हे थी लेकिन उन तक जाने का raam-baan इस घर की प्रमुख शिल्पा जी, जिनके दुःख का इलाज भी अर्जुन हे था. वो करीब आ कर फाइल वाला पैकेट अर्जुन को देने लगी तोह उनके चुम्बन के बदले अर्जुन ने भी उनके भारी पिछवाड़े को साड़ी के ऊपर से हे पंजे में दबोच कर अपने सीने से सत्ता लिया. एक पल को तोह शिल्पा जी की आँखें हे फैल गयी पर अपने भारी सीने को अर्जुन की मजबूत छाती से लगा देख वो नजरे उठती हुई अपनी ख़ुशी लाल होते गालो से दिखने लगी. अर्जुन अभी भी उनके मांसल कूल्हे की फांको को तबियत से मसल रहा था.

"चले जाओगे आग भड़का कर, फिर तबियत पूछने वाला इधर कोई न होगा. समय पर फाइल पंहुचा दो जहा पहुचानी है और इन्तजार रहेगा कल का."

"कल हम परिवार से मिलेंगे और उसके बाद धीरे धीरे आपस में. उस चुहिया पर नजर रखना आप. चुलबुली है और अक्सर ऐसे लोग दरवाजा खटखटाये बिना अंदर आ जाते है. Bye.", अर्जुन जाने से पहले उनके गाल को सेहला कर एक ाची खासी मुस्कान दे कर अपनी रानी पर बैठता हुआ यहाँ से निकल चला. शिल्पा जी अपने आप को दुरुस्त करती हुई सांसें और साड़ी ठीक करके रसोई की तरफ जाने लगी. अर्जुन के बस इतने से स्पर्श से हे उन्हें वो पल याद आ चला जब मंडप में जाने से घंटा डेढ़ घंटा पहले अनजाने हे वो दोनों अँधेरे में टकराये थे और डर के बाद बहोत कुछ घट्ट गया था इनके दरमियान, बस अर्जुन ने जितना सुख दिया था वो ऊपरी दिया था. 10 दिन होने पर भी वो अभी तक संभल न सकीय थी और खयालो में अर्जुन कही गहरा बैठ चूका था.

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"माँ से क्या कहूँगी?", अर्जुन गली से निकल कर उस मदद पर खड़ा जिसका इन्तजार कर रहा था वो कार की जगह चेहरे पर दुपट्टा बांधे हुए एक चुस्त जीन्स और पूरी बांह की सूती टीशर्ट पहने पैदल हे उसके सामने आ रुकी. धुप की वजह से हाथ में रंगीन छटा लिए ये हसीना जन्नत हे थी जिस से बातचीत होने के बाद हे समय निर्धारित करके अर्जुन गाँव से निकला था.

"सच कह दीजिये, चाहे आधा हे सही. मुझे थोड़ी न समझ है की वह कैसे शामिल होना है और अब तोह मैं उमेद चाचा की जगह आ रहा हु तोह वही कमीज जीन्स में तोह आने से रहा. घर से उनके अलावा तोह मैं बस कुरता पजामा और निक्कर हे लेके आया हु. बाकी आपकी मर्जी, कोई जरुरी थोड़ी न है.", अर्जुन की बातें सुनते हुए पहले इधर उधर देखती जन्नत अब मुस्कुराने तोह लगी थी पर चेहरा ढाका होने से कुछ ख़ास नजर न आया.

"ड्रेस तोह मैंने भी तैयार करवा ली थी एडवांस में हे पर अब वो मुझे पसंद नहीं. पर तुम्हे ये सब इतनी धुप में हे सूझा?"

"धुप में लोग अक्सर हीरे से नजर मिलाने से बचते है. आँखें दुगनी चमक सेहन नहीं करती. लेकिन मुझे भी लगता है की आपको घर हे रहना चाहिए, धुप आपके लिए सही नहीं लगती. ठीक है मैं अब चलता हु, कुछ सही सा मिला तोह ठीक है नहीं तोह .. और अभी थोड़ा काम भी है 10-15 मिनट का. Bye.", अर्जुन ने धुप का चस्मा पहन ने के बाद चाबी घुमाई तोह जन्नत ने हे चाबी वापिस पहले वाली तरफ कर दी.

"ाचा जी.? ऐसे कैसे bye? मैं बर्फ से नहीं बानी जो पिघल जाउंगी. बस प्रसौतिओं ली है है जो जरुरी भी है. तुम रुको यही मैं पर्स उठा कर लाती हु लेकिन माँ को नहीं बताने वाली की कहा जा रही हु. काम से काम जिनि के सामने तोह नहीं जो अभी उनके हे साथ तैयारियों में लगी हुई है."

"जब बताना भी नहीं और चलना मेरे हे साथ है तोह बस बैठ जाइये. पर्स का बोझ बढ़ाना जरुरी है?"

"हाँ ये भी सही है. पर मैं ऐसे कभी निकली नहीं हु घर से.", जन्नत पिछली सीट पर लड़को की तरह हे बैठी थी और छतरी को बंद करते हुए साइड में लटका लिया, बीच में रखना जैसे जांचा न हो. सड़क उतनी हे सुनसान थी जहा चेहरा ढंके अर्जुन के पीछे छिपी जन्नत को अगर कोई देखने वाला भी होता तोह पहचानता कैसे.

"कितना अलग लग रहा है बाइक के पीछे ऐसे खुले में घूमना. मुझे याद नहीं पहले कब ऐसा किया होगा. गर्मी महसूस नहीं हो रही बस धुप है थोड़ी और उसके लिए sun-glasses सुफ्फिसिएंट है.", अनजाने हे जन्नत बेफिकरी से एक हाथ अर्जुन के पत् पर और दूसरा उसके कंधे पर रखे आराम से इधर उधर देखती हुई खुद को आजाद महसूस कर रही थी. आईने से अर्जुन भी उसका ढंका हुआ चेहरा देख लेता.

"अब याद रखिये क्योंकि पहले अगर हुआ भी होगा तोह वो ऐसे चोरी चोरी तोह बिलकुल नहीं किया होगा. दुनिया में 90% लोगो के पास कार नहीं है और 50% के पास अपना साधन भी नहीं. और मुझे भी मेरी रानी इसलिए पसंद है क्योंकि इस पर बैठ कर मुझे भी आजादी महसूस होती है. वैसे पहले एक छोटा सा काम है एक मिनट का, महल की तरफ और उसके बाद आप हे बताना के हमे कहा जाना है.", महल का जीकर सुनते हे जन्नत थोड़ा असहज सी हुई पर अर्जुन ने अपना बयां हाथ उसके अपने पत् पर रखे हाथ पर रखते हुए थपकाया जैसे वो उसको निश्चिंत रहने का कह रहा हो. पर अभी वो गोल चक्कर से मुड़ते हुए महल की तरफ निकलने हे लगे थे की अर्जुन की नजरे उस शख्स से मिली जो उसको हे देख रहा था और साथ हे उसके पीछे बैठी मुँह ढंकी युवती को. नजरो में अलग सी भावना थी उस शक्श के जिसने तुरंत चेहरा घूमते हुए सड़क किनारे खड़े उस ऑटोरिक्शा में शरण ली जो गाँव की तरफ जा रहा था. अर्जुन को भी उसका ऐसा करना अजीब सा लगा और सबसे बड़ी बात थी की इस वक़्त वो यहाँ कैसे.
 
Okay गाइस.. अपडेट कल रात को दूंगा. अभी ब्रेक लगाओ
 
हुआ यु की हम पचता गए ...

जाने क्या कहानी कह गए..

ओह. वो प्यार थी हमारा

और इन्तजार में ादुरा रह गए...

बदलाव लाये या बदला ले..?

आखिर वही तोह अलविदा कह गए

तरन्नुम में गाने हज़ार थे..

कुछ सोच लिए, कई गुनगुना गए

फिर चैन तोह मिला, पर बेचैन भी हुए

वो नज़्मे क्या वो पा गए..?

हाँ गुजरा वक़्त तो न मिला हमे,

तुम्हारी यादों संग दोहरा गए..

होगा भविष्य में क्या गर ये सोचे..

वर्तमान न जी सके, अतीत से घबरा गए.

चौराहे पे बेलिबास हु

संसार में वस्त्र पहना गए

सोच लो आखिर करना क्या है मुजम्मिल?

मैं लिख दू, या तुम घबरा गए?

निशाँ पूरे होंगे हर हाल में..

कहो तोह क़दमों के निशान मिटा दू
 
कॉपीराइट है वो बात, लिखी 63 वि कविता हाजिर
 
अपडेट 215

उपहार (1)

"अर्जुन बाई, अब बस करो यार छिड़ी छीका (बैडमिंटन) खेदना. मेरी प्रैक्टिस भी हो गयी और तुम बाई मेरे साथ चल रहे हो बस.", अर्जुन शहर से लौटने के बाद घर पर फिर से 2 घंटे आराम कर के 6 बजे khel-ghar आया था. हमेशा की तरह इधर कबड्डी और कुश्ती का अब्यास करते गाँव के युवक और उनके कोच आपस में व्यस्त थे और अर्जुन ने भी कुछ पल उन्हें देखने के बाद बैडमिंटन लेके पहुंचे जगतार भाई का आमंत्रण स्वीकार कर लिया. आज वो कसरत की जगह इस खेल पर म्हणत करने का इरादा राखत था. थोड़ा वक़्त दोनों हे हलके हाथो से अभ्यास सा करते हुए बल्ले और छिड़ी का तालमेल बनाते रहे.

"ओह नीलिया, थोड़ा तोह बैठ भाई. तू 5 बजे से लगा हुआ और अपनी प्रैक्टिस होते हे घर जाने की बस पकड़ ली. अभी तोह हमरा हाथ सेट हुआ है, इतने तू घर जा के नाहा धो ले. हम दोनों हे आते है फिर उधर.", जग्गी ने अर्जुन को अब मैच शुरू करने का इशारा कर दिया. तये हुआ की जो पहले 15 अंक अर्जित करेगा वो विजेता और हारने वाला 50 उठक बैठक करेगा. उनकी बात और मैच का सुन्न कर निहाल तोह उत्सुकता से हे उधर बैठ गया एक और लेकिन बगल के नेट में खेल रही चारों लड़कियों में से मीनाक्षी कुछ ज्यादा हे जोश से खेलने लगी जैसे वो गुस्सा उतार रही हो.

"आज जग्गी भैया 50 बार कान पकड़ने वाले है निहाल भाई.. हाहाहा.. इन्हे शटल नजर भी न आने वाली जब मैं सर्वे करूँगा.", अर्जुन ने ये कहते हुए एक बार मुस्कुरा कर मीनाक्षी को जरूर देखा था जिसने पूरी तेजी से अपनी प्रतिद्वंदी की तरफ छिड़ी पहुंचते हुए उसको मौका तक न दिया. निहाल के साथ जगतार भाई भी अर्जुन की बात पर वैसे हे हंसने लगे.

"अभी से 2 पॉइंट की छूट ले ले अर्जुन, बाद में न कहियो के भैया आप तोह खिलाड़ी निकले. शाहिद भाई, आओ और मैच देखो बस. अर्जुन के पत् कुछ कमजोर है तोह इसको दंड पलवाने है हारने के बाद. ले भाई सर्वे संभाल.", जगतार ने बड़े हे ख़ास अंदाज में उलटे हाथ से बल्ला चलाया था और वो हलकी से छिड़ी गोली की तरह जले से बस एक इंच ऊपर निकलती हुई अर्जुन के बल्ले पर लगने के साथ जले में जा फांसी.

"अरे भैया.. मतलब आप तोह सीरियस हे ले गए.. वैसे ाची सर्विस थी.", अर्जुन ने छिड़ी वापिस उन्हें देने के बाद फिर से इन्तजार किया और इस बार उसको दूसरी तरफ दौड़ना पड़ा लेकिन वो पाले के पार पहुंचने में कामयाब हो गया छिड़ी को. इस बार वो सफ़ेद छिड़ी दोनों पालो के बीच saaye-saaye करती एक दर्जन बार घूमी थी और अर्जुन को जगतार ने ाचे से छकाया पर वो भी प्रभवित जरूर था अर्जुन की फुर्ती से. शाहिद गौर से देख रहा था और अब उसके हे बराबर हाथ मुँह धोने के बाद जुगराज जी भी आ खड़े हुए. लड़कियों की तरफ जैसे जोश काम हो चूका था इन दोनों के बीच गंभीर मुकाबले के चलते. अर्जुन ने करारा प्रहार किया था तेहरवी बार जो सन्न से जग्गी के कान के पास से निकलता हुआ सफ़ेद पट्टी से 2 इंच बहार जा गिरा.

"धत्त.. कोई बात नहीं भैया अब स्कोर लेवल करूँगा. 0-2..", अर्जुन ने एक अंक जगतार को दिया था इस जोश की वजह से.

"कोई न अर्जुन पुत्तर ऐसे हे खेल.. जग्गी भागने के जगह तुझे ज्यादा भगा रहा है, ध्यान से.", जुगराज जी ने सलाह बढ़िया दी थी पर जगतार जैसे इस से थोड़ा रुस्ने का दिखावा करने लगा.

"इस से सर्विस तोह टूट नहीं रही जुग्गी पाह जी.. ले भाई अर्जुंन.. हहहहहह..", और ठीक पहले वाले अंदाज में हे जगतार ने सर्विस करि थी पर अर्जुन जले के करीब खड़ा मुस्तैद था जिसने बस बल्ले से छिड़ी को नीचे की दिशा दिखते हुए जग्गी के पाले में उसकी पहुंच से दूर गिरा दिया.

"अक्सर हम ज्यादा जोश में होश खो देते है. आप देख कर अनदेखा कर गए और इसमें गलती मेरी नहीं.", अर्जुन ने जैसे ये सन्देश मीनाक्षी को दिया था जो अब बस नाम के लिए हे खेल रही थी उनके बगल वाले नेट पर. जग्गी ने छिड़ी अर्जुन की तरफ बधाई तोह उसने बड़े हलके अंदाज में सर्विस करते हुए छिड़ी को थोड़ा ज्यादा ऊँचा उछाला. जग्गी ने भी सही से लपका और इस बार फिर दोनों तरफ से एक दूसरे को छकाने का काम शुरू हो गया. दोनों अपने अपने पाले में दाए बाए दौड़ रहे थे पर चूका कोई न. और दौड़ने की जगह अपनी बरी में अर्जुन ने बल्ला दूसरे हाथ में लेते हुए आशा के विपरीत वही छिड़ी को पंहुचा दिया जिधर से जग्गी ने मारने के बाद दिशा बदल ली थी. टप्प से वो जग्गी के पुराने कदमो की तरफ जा गिरी.

"2 आल.. जग्गी मुंडा खेल गया तेरे साथ. ः.."

"शहीद भाई, है तोह ये फाउल अगर मैच के हिसाब से देखा जाए पर इधर कौनसा वर्ल्ड कप चल रहा. बढ़िया शॉट था छोटे ..", अर्जुन ने भी बदले में हाथ हिला कर प्रशंसा ग्रहण की. वही धीरे धीरे करीब खेल रही लड़किया भी पसीना साफ़ करती हुई एक किनारे बैठ गयी दोनों कोर्ट के बीच बानी पट्टी पर बस मीनाक्षी कड़ी कड़ी पसीना पौंछने के साथ कभी अर्जुन को घूरते तोह कभी अपना बाला नाचने लगती. अर्जुन भी कनखियों से उसको हे देख रहा था जो एकदम से बोल उठी.

"के ों जग्गी भैया.. दिखा दो छोटे मुखिया जी को की अन्तर यूनिवर्सिटी चैंपियन कैसे खेलते है.", और इधर टप्प से छिड़ी अर्जुन के कदमो में आ गिरी. सभी ने जग्गी के इस करारे शॉट पर तालियां बजायी और अर्जुन भी हँसता हुआ इशारे से उनकी तारीफ करने लगा. एकके हे उस लड़की ने वह 2 गुट बना दिए थे 3-2 के स्कोर पर. मीनाक्षी की सहेलियां भी उसकी तरह हे जग्गी के पक्ष में थी और निहाल शहीद निष्पक्ष. कबड्डी वाले कुछ लड़के अर्जुन के पाले के पीछे खड़े हो गए जैसे वो उसके साथ हो. अब स्वरुप और जोश हे बदल चूका था इस दोस्ताना मैच का जो बस ये दोनों आपस में खेल रहे थे.

"जग्गी, स्टैमिना ध्यान रखियो लड़के का. तेरे से कही ज्यादा है इसलिए सर्विस और फुटवर्क से हे जीत मिलेगी.", जुगराज जी ने अर्जुन द्वारा एक अंक हांसिल करके स्कोर बराबर करते हे इस बार सलाह जगतार को दी थी. पर अर्जुन के अंक मिलने पर लड़कियों की तरफ से कोई ताली न बजी. फिर से खेल शुरू हुआ और इस बार तोह जैसे ये फुर्ती का खेल ताक़त के नमूने दिखने लगा. जैसे बात अंक की न रह कर उस छिड़ी को मारने की हो और गिरने कोई देना नहीं चाहता था अपनी तरफ. Patt-patt और साईं साईं की हे आवाजे उठ रही थी जिनके साथ बस सबकी नजर पेंडुलम की तरह छिड़ी के साथ साथ. जग्गी के हलक से हहह हहह की ध्वनि बता रही थी की पिछले 2-3 मिनट में हे ाची खासी जान लगा चूका है वो और उतना हे अधिक पसीना अर्जुन के बाहों और गले से टपकने लगा. दोनों के बाल पसीना उछलते हुए उनकी प्रतिस्पर्धा भली भाँती दिखने लगे.

"हूँह्ह्ह..", हुंकार भरते हुए जगतार ने इस बार अबतक का सबसे जोरदार प्रहार किया था छिड़ी पर और वो लगी भी तोह सीधी अर्जुन के गाल पर.

"ोये.. दिखा भाई.. ज्यादा जोर से तोह नहीं लग गयी.? ध्यान नहीं रहा के हम आपस में खेल रहे है.", उम्मीद से परे जग्गी तोह बल्ला फेंक कर तुरंत गाल पर हथेली रखे अर्जुन के सामने आ खड़ा हुआ. जेब से रुमाल निकाल कर वो उसको फूंकता हुआ अर्जुन की आँख से एक इंच नीचे उस जगह पर लगाने लगा जहा छिड़ी का ठोस और गोल हिस्सा बुरी तरह लगा था. जगतार की ऐसी परवाह देख कर

"ऐसा लगा भैया जैसे पठार लगा हो.. हाहाहा.. टेंशन न लो मजाक कर रहा था उठक बैठक से बचने के लिए.", अर्जुन ने उन्हें चिंतित देख कर पीठ पे हाथ रखते हुए प्रतिउत्तर में हे छोटे भाई सा जवाब दिया.

"तुझसे थोड़ी न मैं करवाने वाला था. चल बहोत खेल लिए बैडमिंटन, अब और नहीं. लाल हो गया है इधर से और आँख बची सो अलग.", जग्गी उसको साथ लिए हे दूसरे हाथ में छिड़ी पकड़ कर कोर्ट से बहार आ गया. अर्जुन ने बस एक नजर पलट कर मीनाक्षी को देखा जो अब नजरे चुरा रही थी उस से पर इन दोनों के साथ कोई और भी था जिसने वो देखा जो किसी ने नहीं. शाहिद भाई भी अत्यधिक ठन्डे पानी से भरा गिलास इधर ले आये.

"शेरा ऐसी तोह खरोंचे लगती रहती है. ले ठंडक पंहुचा जरा जहा लगी है. जग्गी तोह तेरी ऐसे परवाह कर रहा है जैसे तू दूध पीटा भाई हो उसका.. हाहाहा.", जुगराज जी की बात पर जगतार तोह थोड़ा शर्मिंदा होने लगा पर शहीद भाई ठन्डे पानी से अर्जुन के गाल की टकोर करने लगे.

"गुरु जी, इनका बस चले तोह ये मुझे गॉड में हे उठा कर चले. पर सभी इतना प्यार नहीं करते मुझसे. Ab..inhe हे ले लीजिये..", अर्जुन ने ऐसा कहने के साथ फिर से मीनाक्षी को देखा था और बाद में निहाल का हाथ पकड़ लिया.

"ये जनाब अपनी प्रैक्टिस करते हे निकल लेते है मुझे साथ ले कर. मोटरसाइकिल भी मुझसे हे चलवाते है, खुद पीछे ऐसे बैठेंगे जैसे मेरी लवर हो लेकिन अगर कोई और बैठ जाए तोह फिर इनका गुसा.", अब अर्जुन दोहरी मार कर रहा था लेकिन ये सुन्न कर शहीद भाई ने भी निहाल की हे खिंचाई की जो ऐसा उनके सामने कर चूका था अर्जुन के साथ पर तीर दूसरी जगह भी जोरदार लगा था. मीनाक्षी इनसे बस 5-6 कदम हे दूर कड़ी थी.

"की गाल मीनू पुत्तर, कोई समस्या?", जुगराज जी ने एकाएक मीनाक्षी से सवाल किया तोह इन सबकी हंसी कुछ पल के लिए थम्म सी गयी.

"चाचा जी, वो मेरे शूज का तलवा खुल गया है. घर कैसे जाओ?"

"जा अर्जुन भाई छोड़ आ मीनाक्षी को, अपने घर के पिछली गली में हे घर है. लाला जी का घर तोह देखा हे है, वही. मैं मोटरसाइकिल नहीं लाया.", जगतार भाई ने अर्जुन से कहा और बदले में अर्जुन ने चाबी उन्हें हे थमा दी.

"इतनी चोट आयी है मेरे चेहरे पर और आप मुझे हे भेज रहे हो? छोड़ आओ न आप हे मीनाक्षी जी को.", अर्जुन के स्पष्ट इंकार से मीनाक्षी की नजरे झुक चुकी थी और जग्गी हँसते हुए चाबी निहाल की तरफ बढ़ता हुआ जमीन पर बैठ कर जूते खोलने लगा.

"नीले वीर, जा छड्ड आ भें न घरे. चल नई होना ेहड़ा ते मेनू बाला पसीना आया होया. चंगी परेड करवाई है इस प्लेयर ने. फेर अपने अड्डे हे आ जावी, अस्सी आधार हे मिलदे है.", निहाल भी ख़ुशी से चाबी लेके उठ खड़ा हुआ.

"मैं केहड़ा दिल्ली जा रहा बाई जी. होने आया 5 मिनट विच दीदी न छड़ के. चलो मीनू दीदी, चलिए अर्जुन दी रानी उत्ते ... डुग डुग करदे होये.", उसके कहने के अंदाज पर सबने सर पीटने के साथ जोरदार हंसी प्रकट की. डुग डुग लफ्ज़ पर तोह जुगराज जी भी पेट पकड़ लिए अपना.

"ोये भोलेय, तू बस सही सलामत पहुंचा आयी बिटिया न. जा मीनू पुत्तर.. यह कमला वि..", जाने से पहले मीनाक्षी ने एक नजर फिर से अर्जुन को देखा जैसे वो निहाल के साथ जाना न चाहती हो पर अर्जुन ने ऐसा दिखावा किया जैसे वह मीनाक्षी हो हे नहीं. निहाल मोटरसाइकिल चालू करके इधर हे ले आया था मीनाक्षी की मज़बूरी समझते हुए.

"अर्जुन बाई, हैंडल कंब्दे (काँप) पाया. तू हे छड़ आ बाई.", अब जगतार ने भी अर्जुन की हे पीठ पर थपकी दी उठने के लिए जो मैं मार कर धीमे कदमो में मोटरसाइकिल की तरफ बढ़ा और निहाल के हटने पर सीट पे सवार हो गया.

"हैंडल तोह हिलना हे है निहाल भाई. आपने 3 गियर निकले है इसको रोकने के बाद और इतनी जल्दी 3 गियर दाल भी दिए 10 कदम की दुरी पर.", अर्जुन की बात सुन्न कर निहाल सर खुजाने लगा और बाकी सब हंस दिए उसके भोलेपन पर

"सरदारा तू न सच्ची पूरे पिंड छड़, शहर विच वि अपने आप डा एक्को हे है. चंगी गाल है जो साहड़े कॉल है इस लायी साम लेने है. हाहाहा.. अर्जुन, अस्सी नीले दे घर तोह पीछे मिलेंगे.", जग्गी भाई के कहने पर अर्जुन ने हामी भरी और मीनाक्षी बड़े हे सलीके से थोड़ी दुरी बना कर उसके पीछे बैठ गयी. एक हाथ में बैडमिंटन का बल्ला और दूसरे हाथ से मोटरसाइकिल का पिछले हिस्सा थामे. दोनों ख़ामोशी से खेलघर से निकल कर उसके घर की तरफ बढ़ चले. जग्गी और मंडली अभी भी वैसे हे बैठे थे वह जैसे उन्हें पता हो की कितनी देर तक अर्जुन पहुंचने वाला है. मोटरसाइकिल पर कुछ पल तोह ख़ामोशी बरकरार रही फिर उस चुप्पी को मीनाक्षी ने हे भांग किया, वो भी बड़े हे याचना भरे स्वर में.

"I'm रियली सॉरी. बस ये नहीं पता की आप मुझे अब बुरे क्यों लगने लगे हो."

"मतलब इतना बुरा हु की चेहरे पर मोटा कंकर मार देंगी.? वैसे जान सकते है इतने प्यार की वजह क्या थी?", अर्जुन द्वारा प्यार लफ्ज़ पर जोर देने से मीनाक्षी की धड़कन हमेशा की तरह बढ़ने लगी जब वो उसके करीब होती थी. और आज वो 4 दिन बाद उसके पीछे बैठी थी. आज से पहले ऐसी हे एक शाम वो अर्जुन के आगोश में उस से होंठ जोड़े एकांत में थी, सबसे दूर. मैं भारी होने लगा था मीनाक्षी का सब सोचते हुए और उसने भरे गले से हे अर्जुन को जवाब दिया.

"वही ले चलो जहा मिले थे. मुझे बात करनी है तुमसे.", आज उसने 'तुमसे' कहा था जैसा अभी तक तोह पहले नहीं कहा था मीनाक्षी ने और अर्जुन ने भी उसकी गली की जगह जगतार के घर के सामने वाली सड़क चुनी जहा naam-matra घर थे और जैसे उसको पता था की जसलीन भी बहार नहीं दिखने वाली. चाहे सफर थोड़ा हे था पर अर्जुन ने ये भी कुछ उचित रफ़्तार में तये किया और एक बार फिर दोनों उस पोखर और हरे भरे वीराने में खड़े थे. दिन ढलने लगा था और आसमान नीले से बदल कर सलेटी जो जल्द कला हो जाता. इस दरमियान अर्जुन ने तोह कोई सवाल जवाब न किया और मीनाक्षी वैसे हे अपनी सोच में सिमट कर खम्सः बैठी रही. रानी के रुकने का भी उसको एहसास न हुआ और अर्जुन की आवाज सुनते हे वो मोटरसाइकिल से उतर कर आसपास देखने लगी.

"लीजिये मीनाक्षी जी, जैसा आपने कहा हम आ गए वही. अब कहिये आप किस बात से इतना परेशां है जो आपको मेरा यहाँ होना भी खटकने लगा? आप बस कह दीजिये की अर्जुन ये बात है और तुम इतने बुरे हो, मैं दोबारा आपके रास्ते या जहा आप हो वह आने की गुस्ताखी नहीं करूँगा.", अर्जुन अभी भी रानी पर हे बैठा था और उसके करीब सर झुकाये कड़ी मीनाक्षी कुछ कहने की जगह टप्प टप्प आंसू गिराने लगी अपने झुके सर के साथ.

"मैं बहोत .. बुरी.. हु अर्जुन.. मैं ऐसी नहीं थी पहले पर अब मुझे कुछ समझ नहीं आता. प्लीज मुझे माफ़ कर दो.. मैं उस वक़्त जाने क्यों सेहन न कर सकीय तुम्हारे पीछे किसी और लड़की का बैठना.. वह सेण्टर पर भी मेरी फ्रेंड्स तुम्हारी हे बातें कर रही थी.. और उसके बाद आज ट्रीट टाइम भी जिस वजह से मैं लेट हुई और तुम्हे वह उस लड़की के साथ देखा.. मुझे समझ नहीं आ रहा अर्जुन की मैं ऐसे क्यों रियेक्ट कर रही हु.", मीनाक्षी को इस पल में अर्जुन ने जरा भी सँभालने या दिलासा देने की कोशिश न की. बस उसने उसके झुके हुए रट चेहरे को देखा.

"आपके सवालों के जवाब भला मैं कैसे दे सकता हु मीनाक्षी जी और जरा आप इसमें मेरी गलती बता दीजिये और फिर ाचे से सजा दीजिये जो दिल करे. मुझे तोह अगर कुछ याद है तोह वो इतना की मैंने फूल बढ़ाये थे आपकी तरफ उस स्मृति पत् पर चढाने के लिए लेकिन अनदेखी तोह आपने हे की थी मेरी. वह मंच पर मेरे शब्दों में आप भी एक प्रेरणा थी, फिर नारजगी भी मुझसे. क्या ये सब मेरी बुराई या कमी है? वो लड़की कौन थी, क्यों थी और आपको उस से जलन क्यों हुई इसके जवाब बातचीत से मिलते या मुझ पर गुस्सा दिखा कर?"

"सॉरी बोलै न maine..Haan?", अब मीनाक्षी ने हे अर्जुन का हैंडल पर रखा हाथ अपने दोनों हाथो में थाम लिया जिस पर अर्जुन ने भी मोटरसाइकिल का स्टैंड लगा का उस भोले और खूबसूरत चेहरे के सामने आयी जुल्फों को हटते हुए दोनों आँखों से गिरते आंसू दूसरे हाथ से बड़े हे प्यार से पौंछते हुए कहा.

"पर वो तोह नहीं बोलै जो इस सबकी वजह है? इधर देखो मीनाक्षी, मेरी तरफ देख कर बात करो.", अर्जुन ने दोनों पाँव एक और करते हुए मीनाक्षी की कमर पर अपने दोनों हाथ रख कर उसको अपने सामने खींच लिया. वो भी कदम रोके बिना उसके फैले घुटनो के दरमियान सत् कर कड़ी थी. रोने की वजह से चेहरा कुछ लाल हो रहा था और नाक हलकी गीली. नजरे उठाने में भी मीनाक्षी को खासी हिम्मत जुटानी पड़ी पर अब वो अर्जुन के चेहरे के ठीक सामने चेहरा किये थी. उसके भोलेपन को देख कर अर्जुन ने भी कमर से हाथ पीछे ले जा कर उसको बिलकुल अपने संग हे लगा लिया था.

"क्या बोलू अब मैं? न मुझे तुम पसंद हो न तुमसे दूर रहना. मैं तुम्हारे बारे में कुछ नहीं सुन्न न चाहती और जब कोई बोलता है तोह लगता है की उसको कोई हक़ नहीं तुम्हारा नाम लेने का. लाली अलग ृत्त लगाए रहती है हर वक़्त.. अर्जुनंन अर्जुनंन.. मैं सो नहीं प् रही और जितना दूर जाती हु तुम उतना ज्यादा सताने लगते हो. क्यों ऐसा कर रहे हो मेरे साथ तुम अर्जुन? मत प्यार करो मुझे... तुम मेरी मंज़िल नहीं हो... उम्मम्मम्मम्म", फिर से आंसू बहती मीनाक्षी इतना सब बोलने के बाद उसका सर थाम कर खुद हे अपने होंठ जोड़ बैठी अर्जुन से. ऐसी कशिश और दीवानगी जिसकी कल्पना तक न थी अर्जुन को. वो स्तब्ध सा बस उसकी गिरफ्त में खुद को सौंप हे बैठा. दुरी ख़तम करती हुई मीनाक्षी उसके सीने से अपना सीना दबती हुई अर्जुन का सर पीछे करती हुई बस पूरे पागलपन से उसके होंठो को चूमती और चूसती रही. उसके आंसू, गीली नाक और बालो ने अर्जुन का चेहरा भी अपने में समां लिया. अर्जुन के जिस्म में उत्तेजना क्षणिक मात्रा न थी पर वो मीनाक्षी के उस अनकहे प्रेम को भली भाँती पहचान चूका था जिसको कबूल करने की जगह वो प्रदर्शित कर रही थी. अपने मुँह में अलग सा स्वाद घुलता महसूस करके मीनाक्षी ने चुम्बन ख़तम करके अर्जुनका चेहरा हाथो में लिए हे होंठो को देखा तोह वह से लहू रिस रहा था. अर्जुन के साफ़ करने से पहले मीनाक्षी ने हे उसका निचला होंठ मुँह में भर कर बड़े हे प्यार से चूम कर वो लहू साफ़ करने की कोशिश की.

"आह्हः.. इतनी मीठी दुश्मनी है तुम्हे मुझसे? पता होता तोह गुस्ताखियां पहले हे कर चूका होता. अगली सजा क्या देने वाली हो अगर पहल बता दो तोह मैं उस से बड़ा कारनामा करने की कोशिश करूँगा.", अर्जुन अभी भी मीनाक्षी को अपनी बाहों में भरे संग लगाए था. उसकी बात सुन्न कर हलके हाथो से सीने पर मुक्का मारती वो फिर से रोने लगी पर इस बार दुखी नहीं थी.

"छल करते हो तुम.. पक्के छलिये हो एक नंबर के.. भोली भली सी मैं जाने कैसे दिल दे बैठी तुम्हे जबकि पता है की हम मिल नहीं सकते.."

"और मैं भी तुम्हे मैला नहीं कर सकता मीनाक्षी. इस प्यार को एक खुशनुमा याद की तरह सहेजना चाहता हु पर हद्द पार नहीं कर सकता. तुम जितनी मासूम और साफ़ दिल की हो, मैं उतना हे फरेबी और छलिया. अनगिनत लड़कियों से मिलता हु, समय बीतता हु और ये समाज सेवा के नाम पर अपनी छवि को उस से ज्यादा साफ़ दिखता हु जितनी वो मैली है. पिछली बार यहाँ पर मैं बस तुम्हे करीब से देखना चाहता था और उस पल में तुम्हारी पहल से मैंने सीमा लांघ दी. तुम्हारा गुनेहगार नहीं बन्न न चाहता, दोस्त बन सका तोह बहोत होगा.", अर्जुन का ऐसा बयान सुन्न कर मीनाक्षी ने उसके गाल पर गाल रखते हुए बड़े हे नरम और धीमे स्वर में कहा.

"खयालो में तुम सब कर चुके हो पर वो मुझे जरा भी मैला नहीं लगा. लोग तुम्हारी बातें करते है मेरे सामने, तुम लोगो की बात नहीं करते. पर मेरी भी मजबूरियां है अर्जुन चाहे मैं जितना इंकार करू की मैं तुमसे प्यार करती हु. तुम वो मंज़िल नहीं हो.", अभी भी मीनाक्षी उसकी नाक के ऊपर नाक टिकाये थी जैसे उसको अब दुनिया से कुछ लेना देना हे नहीं था. अर्जुन के हाथ कमर से ढीले होने लगे तोह स्वयं मीनाक्षी ने हे उसका हाथ पकड़ कर अपनी कमर और पुष्ट कूल्हे के ऊपर दबा दिया. कुछ पल वो वैसे हे हाथ दबाये रख कर सुनिश्चित करने लगी थी की अर्जुन हाथ अलग न करे.

"मैं तोह ये पहले से जानता हु की तुम्हारी मंज़िल मैं नहीं वो सपना है लाला जी का जिसको पूरा करने की ललक उन्होंने सिर्फ तुम में देखि है मीनाक्षी. वो कॉलेज क्या ऐसे हे तुम्हारे हाथो दिया प्रज्वलित होने से शुरू हुआ? तुम्हारा लक्ष्य मुझे कही बड़ा और बेहतर है जिसमे मैं बस वो मील का पत्थर भर हु जहा से तुम्हारी मंज़िल की तरफ का सफर शुरू होता है. जरुरी तोह नहीं की प्यार बस हांसिल करने पर पूरा हो? वह भी तुम मुझे हमेशा पाओगी चाहे एक एहसास की तरह जिसमे हम दोनों शामिल थे. वैसे तुम्हारी सहेलियां तारीफ सिर्फ मेरी नहीं, तुम्हारी भी करती है. उन्हें भी जलन होती है जब वो तुम्हे मेरे साथ देखती है पर मुझे तोह ख़ुशी मिलती है जब तुम्हारे साथ होता हु.", अब अर्जुन ने शरारत से मीनाक्षी के होंठो पर फूँक मारने के साथ साथ दोनों हे हाथो से उसके पुष्ट कूल्हे हलके से दबा दिए. उनका वो मांस और लचीलापन स्पष्ट तारीफ करता था मीनाक्षी के छिपे खजाने और उसकी कड़ी म्हणत का. वो और भी कसके उसके गले लग चुकी थी पर चेहरा कंधे पर रखती. मीनाक्षी के अछूते जिस्म पर वो मरदाना स्पर्श उसके कौमार्य पर भी सटीक हुआ लेकिन वो अलग होने की जगह कही ज्यादा चिपकी थी उसके चौड़े बदन से. हलकी गरम से आह न चाहते हुए भी होंठो से पहूँती पर वो स्वाभाविक था.

"तुमने मुझे माफ़ किया?"

"अगर ऐसा रोज करोगी तोह रोज माफ़ करूँगा."

"उमंन्त्र.. गंदे हो तुम.. और मैं इतनी सुन्दर नहीं जितनी मेरी शहर वाली वो पागल सहेलियां जिनि और साक्षी है. देखा था न तुमने उन्हें कितनी मोड़ और हॉट है वो?"

"कैसे देखता जब तुम इतने करीब थी वह, मेरे साथ?", अर्जुन के उठते कामदण्ड को अपनी जांघो के बीच उस नरम हिस्से के ठीक निचे महसूस करके मीनाक्षी हलके हलके कांपने लगी थी लेकिन उसको ये जरा भी खबर न थी की ये कम्पन उसका चरमसुख है. बस पकड़ कुछ बढ़ सी गयी थी और इस बीच उसने अनजाने हे अर्जुन के कान की लौ पर होंठ टिका दिए. उत्तेज्जन तोह स्वाभाविक तौर पर अर्जुन की भी बढ़ चुकी थी जिसने थोड़ा जोर से उस फिसलन भरे पाजामे के ऊपर से हे मीनाक्षी के दोनों उभरे हुए मांस से भरे कूल्हों को थोड़ा कस कर दबाते हुए ाचे से अपने लिंग को उसकी योनि के मुहाने रगड़ते हुए टिका दिया.

"इस... पागल.. ये क्या कर दिया? आह्ह्ह्ह.. ऐसा तोह बस नींद में होता है.. पर ये ज्यादा .. आह्ह्ह्ह... ाचा है..", मीनाक्षी का बस चलता तोह वो अर्जुन की कमर पर हे पाँव लपेट देती लेकिन इस मुद्रा में और भीतर कहा समां सकती थी. बस वो अपने पाँव फैला कर उस खीरे से भी मॉटे उभर को पूरी जगह देती हुई टांगो में कस कर कड़ी रही. इस बार दोनों हे एक दूसरे के होंठो का रास पीने लगे थे जबकि अर्जुन के हाथ जिनमे शायद अपना अलग हे दिमाग था उन्होंने इलास्टिक के भीतर समाते हुए हलके नम्म कूल्हों का निर्वस्त्र हिस्सा स्पर्श किया. अनगिनत रोयें मीनाक्षी के चिकने गद्देदार कूल्हों पर उभरे थे जिन्हे टटोलते हुए वो हाथ पंतय से जितना बहार मांस मौजूद था उसको हे प्यार से सहलाने लगे.

"तुम्हे देरी हो रही है मीनू?", मीनाक्षी की जगह अर्जुन ने भी उसको मीनू कह कर पुकारा था जो अलग हे नशे में थी इस समय. अर्जुन पहला शक्श था जिसने उसके जिस्म पर स्पर्श किया था और वो भी ऐसी जगह जहा खुद मीनाक्षी देखने से कतराती थी. पर वो इस नशे में बरकरार रहना चाहती थी.

"बाबा, शहर गए है दादी को ले कर. मुम्मा पापा भी उधर हे है जो 8 बजे तक लौटेंगे.. जिनि.. वो जीनत बहोत कुछ बोलती है तुम्हारे लिए.. ऐसा जो कोई लड़की कभी भी चाहते हुए न कह सके. मुझे आग सी लग जाती है पर मैं बस सुन्न कर चुप रहती हु.", आँखें मूंदे मीनाक्षी जैसे सहारा चाह रही थी और अर्जुन ने भी उसके कूल्हों की तराई में हाथ बैठते हुए उसको ऊपर उठा लिया. तखत से ढके उस मजबूत हौद (टंकी) पर बैठता वो वही पीठ के बल आ लेता. मीनाक्षी अब उसके ऊपर सवार थी इस बढ़ते अन्धकार और प्रकृति के झुरमुट के बीच. हाथ वही उसके गुदाज नितम्बो पर.

"क्या कहती है.. जन्नत.. ?", अर्जुन भी मीनाक्षी को पूरा खोल रहा था जिस से वो आइंदा हिचकिचाहट न रखे. अब वो उसके ऊपर लेती हलके हलके जांघो के बीच वाला नरम हिस्सा उस कठोर लंबवत उभर पर रगड़ती हुई अपने स्टैनो को भी वैसे हे घिस रही थी. वो यकिनँत नौसिखिया थी पर जो भी कर रही थी वो उसको आनंद दे रहा था.

"आह.. तुम थोड़ा ठीक से हाथ नहीं रख सकते वह? हहननन.. ऐसे.. आठ.. बड़ा अलग सा और ख़ास एहसास है जैसे.. जिनि बहोत कुछ करना चाहती है तुम्हारे साथ.. आठ.. मुझे रोक लो अर्जुन..", वो निस्तेज हो चुकी थी उसके ऊपर लेती हुई और इस बार सखलन से पंतय के साथ उसकी नमी अर्जुन अपने लिंग तक महसूस कर रहा था. एक हाथ कमर पर और दूसरे से मीनाक्षी की पीठ सहलाता हुआ वो खुद को भी सहज करने लगा. जीनत ने आज फ़ोन पर साफ़ कहा था की वो कल उसके साथ प्राइवेट पार्टी के लिए तैयार रहे. जानता तोह वो भी था की जीनत क्या चाहती है और अब वो उसकी कसक भी ख़तम करने वाला था पर मीनाक्षी के साथ इस से आगे नहीं बढ़ना था. कुछ पल उसको अपने ऊपर समेटे वो बस इन्ही खयालो में खोया मीनाक्षी को सहलाता रहा, संभालता रहा. अपनी हालत का ज्ञात मीनाक्षी को भी 10 मिनट बाद हुआ जो अब नजरे चुराने लगी.

"It's नार्मल थिंग. घर चले मीनाक्षी जी या कोई और सजा भी देनी है मुझे?"

"सजा?", शर्माती हुई वो बस यही कह सकीय.

"जहा से आप रो रही हो उधर में मैं तोह अकड़ा हुआ हु. थोड़ा रेहम करो न मुझ गरीब पर अगर हो सके तोह."

"मदद करू?", वो शर्मिंदा होने के बावजूद ये तोह जानती थी की अर्जुन कहा से सख्त है.

"घर चलते है हम अब और वह जग्गी भैया 100 सवाल करेंगे मुझसे देरी के लिए. आधे घंटे से ज्यादा हो गया है हमे यहाँ शिकवा शिकायत करते हुए लेकिन आप अभी तक मानी नहीं जैसे."

"आप नहीं मीनू.. और मैं तोह मानी मनाई हे हु बस थोड़ा सुधर जाओ. मुझे तुमसे ज्यादा जल्दी है घर जाने की."

"पता है क्योंकि ख़ुशी के आंसू बहार तक आ चुके है आपके जो मुझे भी वह से गिला कर रहे है."

"छियई.. मैं नहीं मिलती अब तुमसे. बिगाड़ के रख दिया मुझे भी.. जाओ अब अकेले हे.", वो उठ कर निचे कड़ी हुई तोह पाँव अभी भी हवा में महसूस हो रहे थे पर जांघो के बीच गीलापन उस से अधिक था. अर्जुन को अपनी तरफ देखता प् कर जल्दी से उसके होंठो को चूमा और जमीन पर गिरा अपना बल्ला ले कर वो अँधेरे में हे कुलांचे मारती हिरणी सी दौड़ गयी अपने घर की तरफ.

'कोमल दीदी आप हे राह दिखाओ अब मुझे. और नहीं झेल सकता मैं अब ये सब. भागना पड़ेगा यही हाल रहा तोह. उधर दिन में जन्नत ने जन्नत दिखा दी और यहाँ ये मत्स्य कन्या चिकनाहट गिरा कर निकल भागी. दोनों हे ऐसी है की मेरा हाथ लगाना हे भारी पड़ेगा मुझे. और अब घर जाऊंगा तोह उधर पहले से मेरी बंद बजने वाली है. मोतीलाल जी, इसलिए बुलाया था क्या मुझे आपने? ाची ज़िन्दगी जी रहा था अपनी Ritu-Preeti के साथ लेकिन आपसे भी मेरा सुकून न सेहन हुआ जो यहाँ ला फंसाया. चची तोह पहले हे तैयार मिलेगी उधर पर ये आँचल के साथ संजीदा मैडम भी मीठी निगाहों से देखने लगी है. दादी हाथ जोड़ता हु, लड्डू हे बंद कर दो मेरे. न ये खड़ा हो और न मैं लगा राहु सबके साथ... ताई.. कल इन्होने भी आते के साथ मुझे जांचना है. बुरे फंसे भाई बहोत बुरे. सबको सच बोलता हु के मैं बुरा हु और मेरे पहले से चक्कर है अनगिनत पर नहीं.. यही पसंद है.. हहहहह...', बड़बड़ाता हुआ अर्जुन जैसे तैसे अपनी रानी पर सवार हुआ लेकिन अब उसकी गति इतनी धीमी थी जैसे वो कही जाना हे नहीं चाहता था इस वीराने से. मीनाक्षी के प्यार ने जैसे उसकी आत्मा को छेड़ दिया था जिसके साथ वो खुद दूर रहना चाहता था क्योंकि मासूम का सच्चा प्यार कितना असर करता है ये वो भली भाँती जानता था. जीनत साक्षी का तोह स्पष्ट हे था के वो उपहार मांग चुकी थी बिना किसी रिश्ते के.

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शाम के 8 बजने वाले थे और आज पंडित जी के घर की बैठक में एक अप्रत्याक्षित सा कार्यक्रम चल रहा था पर माहौल ख़ुशी का हे था जहा बड़े सोफे पर पंडित जी और कौशल्या जी के बीच पूरी ास्तें की आसमानी कमीज और सलेटी पतलून पहने विष्णु थोड़ा असहज सा बैठा किसी महिला सा शर्मा रहा था. बाल तराशे हुए, चेहरा साफ़ सिवाए बढ़िया से सँवारी हुई मूछ के. देख कर हे वो किसी अफसर सा लग रहा था और ऊपर से उसका आकर्षक व्यक्तित्व. कांच और लकदकी के मेज पर मिष्ठान, नमकीन इत्यादि के साथ ठंडा शरबत परोसा गया था और सामने वालिए जी के साथ उनकी बगल में ये आकर्षक व्यक्तित्व की बहरे पूरे शरीर वाली गौरवर्ण पंजाबी महिला. आसमानी कुर्ती और सफ़ेद पजामी के साथ सर और सीने को दुपट्टे से ढके हुए. दीवान पर शंकर इन्दर बैठे मुस्कुरा रहे थे और वही 3 कुर्सियों पर वालिए जी के परिचित रिश्तेदार था, पति पत्नी और उनका एक जवान बीटा. चर्चा अपना रुख पकड़ती उस से से पहले हे प्रियंका को साथ लिए वालिए जी की धर्मपत्नी चाय की ट्रे और सभी के लिए प्लेट में बड़े सफ़ेद रसगुल्ले लिए पधारी. वो युवक भी एक बार भरपूर निगाह प्रियंका पर डालने के बाद माहौल की वजह से सतर्क हो कर वापिस पहले सा हो गया.

"देखो बीटा, तुम्हारे बड़े भाई साहब मेरे लिए राजकुमार बेटे के सामान है और रिश्ता आज का नहीं बल्कि इसके विवाह से पहले से है. तुमसे भी हमारी भेंट हुई थी तक़रीबन 17-18 बरस पहले जब तुम्हारे यहाँ जाना हुआ था और उस से पहले न हम ठीक से मिल सके थे और न तुम्हे याद होगा. अब बात निकली है तोह मैं भी स्पष्ट हे बात करूँगा क्योंकि मेरे इस छोटे बेटे से अधिक फ़िक्र मुझे तुम्हारी है.", बात पंडित जी ने हे शुरू की थी और छोटे बेटे से उनका आशय शर्माए घबराये विष्णु से था जिसकी हालत देख कर Inder-Shankar के साथ स्वयं वालिए दंपत्ति भी मुस्कुराते रहे. ये महिला कुलजीत कौर थी जो सर हिलती हुई उतने हे सहज तरीके से उनकी बात सुन्न रही थी.

"जीवन हर व्यक्ति अपने हिसाब से हे जीना चाहता है पर एक उम्र बाद हम इसको अकेले जीने में थोड़ा असमर्थ महसूस करते है और फिर बदलाव की चाहत हमेशा रही है. तुम बड़ी मेहनती और स्वाभिमानी बिटिया हो और इसलिए हम भी बात खुल कर हे सामने रखना चाहते है. फैंसला भी तुम्हारा होगा क्योंकि जीवन चर्चा भी यहाँ तुम दोनों की हो रही है. वो खेत खलिहान जो तुमने यहाँ आने से पहले देखे थे वो चाँद रोज पहले सिर्फ बंजर भूमि थी सिवाए कुछ वृक्षों के. पर विष्णु का अपना एक अलग हे सपना था जब भी ये अपना परिवार सफर शुरू करे. मिटटी, फसल के साथ अपने हाथो उगाये और बड़े किये फलदार वृक्ष और सुकून से रहने के लिए उनके बीचो बीच अपना छोटा सा आशियाना. इस से ज्यादा न इसके सपने है न चाहत और ये जो भी करता है वो पूरे मैं से करता है. जीवन तुम्हारा भी कुछ कुछ ऐसा हे है पर बहोत पहले से. पर हमारे जनाब कभी उतने सामाजिक इंसान नहीं रहे है तोह अत्यधिक शर्मीले है और झिझक आज भी 60 के दशक वाली. इसका जो तोह वो तुम देख चुकी हो और ये घर भी. बस इसने एक हे मांग राखी है की इस जीवन संगिनी इसके साथ उस जगह को वैसा हे हरा भरा स्वर्ग बनाने में सहायता करे जैसा ये चाहता है. बाकी दोनों समझदार हो तोह घर गृहस्थी के विचार आपस में कर सकते हो. उस से पहले जरुरी है तुम्हारा सहमत होना और इतना तुम भी समझ रही होगी की हमने हमारी बिटिया जैसे बेटे को तुम्हे देखने को बुलाया है, जो कही ज्यादा गुनी और सक्षम है विष्णु से.", कुलजीत कौर के चेहरे पर हलकी से शर्म के साथ एक मोहक सी मुस्कान भी छ गयी थी. औरत होने के बावजूद कलाई में सिर्फ एक लाल धागा पहने थी वो गले में कुछ नहीं. अपनी भाभी द्वारा राखी ट्रे से खुद उसने हे एक प्याली उठा कर विष्णु से हे पुछा.

"आप शक्कर कितनी लेंगे?", पंडित जी एक साथ कौशल्या जी भी मुस्कुरायी क्योंकि विष्णु के पसीने भरे माथे पर अब हड़बड़ाहट उभर आयी थी जैसे वो इनके बीच घिरा एक शिकार हो और कुलजीत इनकी प्रमुख. कंठ को सहज करने की कोशिश करते हुए वो बस इतना हे कह सका.

"बिना शक्कर के पीटा हु जी.", शंकर तोह ताली बजाते हुए हंसने लगा था उसकी हालत पर और किसी की परवाह किये बिना कुलजीत ने शक्कर की प्याली से वो एक छोटी चम्मच चाय में मिलाने के बाद प्याली बड़ी हे सहजता से विष्णु की तरफ बढ़ाते हुए ऐसा दर्शाया जैसे वह और कोई मौजूद हे नहीं.

"आदत दाल लीजियेगा थोड़ा मीठा पीने की, कलेजा साध्ना जरुरी नहीं. नाल मैं यह कहना स बौ जी के तुसी मेनू जिन्ना मान दित्ता ोहना कोई ापडी दही (बेटी) न नयी डंडा. मैं ओस वेले बस जमीन नहीं स वेख राई, मैं ोहते एक बन्दे दी म्हणत तेह जीन दी आस वेख रही स. बाँदा कमरों (कमर) ऊपर पानी विच दुबेया बड़ी आस नाल आप दे लगाए बूटियां न वेख रहा स जेहड़े हूँ प्यासे नहीं रहने. तुस्सी, मैं या कोई होर ोठे है जा नहीं, उस नाल कोई मतलब नयी स. अज्ज तक बड़े वीर जी तेह बलबीर पाह जी ने कई बन्दे सद्दे स मेरे लायी पर तुस्सी मेनू सदया तेह अपने बेटे तोह पहला तुस्सी ोसडा कम्, चरित्र बिना ओहनू दस्से मेरे सामने पेश कित्ता. गल्ल सही है की जीन लायी कोई तह होना हे चाहिदा पर ओह एक्को जी हे सोच रखड़ा होव नाल बराबरी सम्मान दे तह इस तोह वध होर कुज नहीं चाहिदा किसे कुड़ी न. मेनू वि हूँ चा है चूड़े पौन डा पर ेहना न पूछ लियो के कचेहरी विच व्याह नई करवाङा मैं. गुरुघर फेरे लेने पैने मेरे नाल (आनंद कारज), तेह ोठे सर निवा रखें दी लोड नई. लगदा ेहना दे पंजाबी पल्ले नई पेंदी.", कुलजीत ने हे बात कहने के दौरान ट्रे से चाय की एक एक प्याली पंडित जी और कौशल्या जी को त्यार करके दी थी जो इस महिला की बात और सोच से खासे प्रभावित थे पर विष्णु ने अब कही मुँह खोला जैसे उसको चुनौती मिली हो अनकहे हे.

"ेहड़ा नयी आ जी के मेनू पंजाबी नयी ौंडी जा मैं बोल लिख नहीं सकदा. एही कह रहे स के तुहाडी मंजूरी मिलदे सन्न कचेहरी विचो 2 लोका दी मौजदगी विच व्याह करवा देना. ेहना दे आपड़े व्याह तह चेंज चा नाल होये तेह मेरी वारि विच ेहना न लगदा मेरी वड्डी उम्र नाल अरमान घट्ट होने. चाचा मैं सेहरा बन्न न तेह चची ापडी नूह पिंडो लेके आएगी भावे बन्दे अस्सी 4 चलिए. जेहड़े हंसदे पाए ोहना न मैं जमा नई लेके जाना.", विष्णु को इतनी मासूमियत से बोलते देख कौशल्या जी ने उसको अपने साथ लगा लिया.

"लो बीटा जी, मेरी बिटिया भी मान गयी. अब तुमने लड़की हो कर इस से ज्यादा दुनिया देखि है और ये बेचारा तोह आजतक बेटी का हे स्वरुप देख सका है या बहिन का. वालिए पुत्तर, अपनी सलाह भी बता दो जरा. मुझे ऐतराज नहीं मेरे बेटे की बरात लेके जाने से और 4 नहीं 40 लेके जाउंगी और होगा आनंद कारज हे."

"बीजी, ऐसा तह दही व्योहनी है पर रिश्ता तह अपना माँ पट डा है और जिद्दा तुस्सी कहो. बलबीर भाई, सलाह निकाल के तारीख पक्की करो. मामे के घर से हे डोली निकलेगी और सब प्रबंध मैं खुद देख लूंगा.", वालिए जी ने जिस तरह से अपने रिश्तेदार से कहा था उनकी धर्मपत्नी जी के चेहरे पर सपाट हे भाव थे पर वो व्यक्ति खुश था.

"ेहना ताः मेरा वि फ़र्ज़ है भाई साहब. बहिन जी ने अपना व्याह भावे न करवाया पर मेरी ज़िन्दगी बनाऊं वाली वास्ते हूँ मैं वि तह कुछ कारन जोगा है. वैसे बौ जी, आप हे दस् देयो कदो तक चंगा राहु? अपने तह यह कुंडली पंडत वाला रिवाज नहीं है पर जे आपजी दी कोई फरमाइश है तह सर मत्थे तेह.", अपने पति के भी ऐसे जवाब पर वो महिला और मुँह कस बैठी पर उसका बीटा अब कनखियों से फिर से प्रियंका को देख रहा था जो उसकी माँ ने गौर कर लिया.

"वीरे, अपने हों वाले जीजा जी तोह वि कुज पूछ लेयो, ेहना ने अपनी गल्ल बिना पूछे नयी दासनि.", कुलजीत ने तोह यहाँ भी विष्णु पर निशाना लगा दिया था जो तैयार हे बैठा हो जैसे.

"हाँ तोह चाचा जी आज हो गया मंगलवार जो निकल चूका मतलब. शंकर की छुट्टी रहती है शनिवार और ऐतवार को और गुरुघर में व्याह तोह ऐतवार को हे होते है सबकी छुट्टी की वजह से. संडे दोने है बलबीर जी मेरी तरफ से और दहेज़ के बदले बस व्याह के काम बस हम पर छोड़ दो."

"दहेज़?", बाकी सब तोह हंस रहे थे पर कुलजीत की बोहेन उठ गयी इस बात पर और विष्णु सकपका गया.

"जी आपने मुझसे ब्याह के लिए दहेज़ तोह माँगा नहीं बदले में ब्याह की तैयारियां हे हमे करने दो.", विष्णु की बात में समाज के प्रति एक मीठा कटाक्ष था जिस पर पंडित जी ने हे उसकी पीठ थपथपा दी और कुलजीत की नजरे शर्म से थोड़ी निचे हुई पर वो उस सोच पर मुस्कुरायी अधिक शर्माने से.

"वड्डेयन दे विच कहना तह नयी चाहिदा पर जड़ो साड़ी गाल हों हे लग्गी है तह मैं वि कुछ कहा?", ये देवी जी काफी देर से मुँह सुजाये बैठी थी, बलबीर जी की धारपत्नी.

"हाँ बहु इसलिए तोह सभी बैठे है यहाँ. तुम्हे अपनी कोई राये देनी हो तोह खुल कर दो और सुझाव छोटा बड़ा हर कोई दे सकता है."

"नयी बीबी जी, सुझाव नहीं बस सवाल है जो जरुरी है. कुलजीत बहिन जी व्याह के बाद नाम बदलेंगी जा यही रहेगा? अब गुरद्वारे के लिए तोह राजी हो गए आप और शर्त मान रहे हो. भाई साहब में कोई कमी तोह नहीं या आप धरम जाट में जरा भी नहीं मानते.?"

"रज्जो यह की बोल रही है तू?", उनके पति ने थोड़ा गरम स्वर में कहा था लेकिन औरत पर कोई असर नहीं हुआ और मुँह फेर कर वो कौशल्या जी की तरफ देखने लगी. नजरे वो कुलजीत कौर से भी चुरा रही थी.

"बचो के बीच धरम कबसे आने लगा बहु? इन दोनों का घर बस रहा है, ज़िन्दगी इन्होने एक साथ जीनी है तोह इनकी ख़ुशी में शामिल होने से बड़ा धरम क्या होगा. कमियां किस्मे नहीं होती? मुझ में तोह बहोत सी है और एक है की मैं मुँह पर बोल देती हु लेकिन मैं उसको अलग रंग नहीं देती वो भी ाचे मौके पर."

"फिर कल को अगर आपके घर की बेटी कही और व्याहनी पड़े तोह? फ़र्ज़ करो के मैं अपने गुरजीत के लिए वो आपकी बिटिया का हाथ मांगू तोह आप क्या इतनी आसानी से हाँ कर देंगी?", बात को इस तरह जाते देख विष्णु को बहोत बुरा लग रहा था पर रामेश्वर जी ने उसका हाथ दबा कर बस हलके से मुस्कुरा कर शांत रहने का इशारा दिया

"आप मांग तोह लोगी आंटी जी लेकिन मेरी दादी जी ने पहले तोह मेरी हाँ या न पूछनी है, फिर वो निकलवाएंगी आपके गुरजीत की कुंडली और अगर उसमे कोई भी दोष निकला तोह फिर मेरे बड़े पापा न इसको आपकी गलती की तरह देखेंगे क्योंकि आप अपने बेटे की कमियां जानते हुए भी ऐसा कर गयी. माफ़ करना अगर मेरी बात का बुरा लगा हो आपको, पर फैंसले घर के बड़े हे लेते है यहाँ लेकिन वो मांगते या दबाते नहीं. कितना पढ़ा है जी आपका गुरजीत?", प्रियंका अपने ताऊ जी की बगल में हे बैठी थी और शंकर ये सुन्न कर थोड़ा झेंप सा गया की उसकी लाड़ली ने उनको भी शामिल कर दिया था इसमें लेकिन वो महिला तोह इसको अपना अपमान समझ बैठी क्योंकि जवाब प्रियंका ने दिया था और वो युवक सिटपिटा सा गया.

"12 पास कर चूका है और 18 किल्ले पैली है खुद इसकी. लेकिन तुम तोह बड़ी तेज हो जो बड़ो के बीच बोलने से गुरेज नहीं."

"आपने शायद देखा नहीं की यहाँ जिनके जीवन का फैंसला हो रहा है वो लोग आपस में बात कर रहे है आंटी जी. बड़े तोह यही कह रहे है की ज्यौं उनका और फैंसले भी उनके. और रही बात 12 पढ़ने की तोह मेरी बड़ी माँ खुद इंग्लिश M.A. है और 55 किल्ले जमीन का पैसा हर 6 महीने बाद मेरे हिस्से नियम से मेरा छोटा भाई देता है. 1500 से ऊपर तोह जमीन हे है अगर आप बात लें दें की करना चाहती हो. चाचा जी ने भी दहेज़ लेने नहीं देने की बात करि है. सॉरी चची जी अगर मेरी बात से आपको बुरा लगा हो तोह.", प्रियंका कड़ी हो कर जाने लगी तोह कुलजीत ने हे उसको सोफे की पुष्ट पर अपने पास बैठा लिया.

"मैं तोह इधर तुम्हारे इन ताऊ जी के साथ हे आने लगी थी बीटा पर छोटा भाई भी मुझे उतना हे प्यारा है. हाँ उम्र और समझदारी का आपस में कोई लेना देना नहीं. ऐतवार को तुम हे तोह लेने आओगी मुझे अपने चाचा की बरात संग. मैं बिलकुल तुम्हारे हे जैसी थी और अभी भी हु. बौ जी, कही सुनी माफ़ कित्ती जावे. रही गाल लें दें दी ताः, पिंड मेरा है तोह बापू तुस्सी हो. जिहड़ा चंगा लगे ओहदा करियो पर बाला शोर शराब कारन दी जगह दान पुत्र करिये तोह वढ़िया रहना. टेम (टाइम) वड्डे वीर जी लिखवा लें गए गुरुघर इस ऐतवार डा तेह इस आप जी (विष्णु) कहता विच रेह्न्दा कम् पूरा कर लियो. शनि न ोठे आ के होर वि कम् होने.", वालिए जी ने सहमति जाता दी थी अपनी ममेरी बहिन के साथ और कुलजीत अभी भी प्रियंका को साथ लगाए पंडित जी और कौशल्या जी को देखने लगी.

"थोड़ा सवेरे का टाइम रखवा लेना बीटा उधर. अब 3 घंटे की तोह दुरी है और इंतजाम मिल जल कर हो हे जाएगा. राजू के साथ इन्दर चला जाएगा उधर कल हे सब सभाल लेंगे ये दोनों. कुलजीत बीटा, जितने काम वह तुम्हारे अधूरे हो उन्हें देख लेना और अपने jeth/devar को बता देना. गाँव से विष्णु के पास आ रही हो पर जेड (रूट्स) वह भी बरकरार रेहनी चाहिए. जिस समय तुम्हे देखा था बहु तोह तभी बन चुकी थी तुम, अब रस्मे भी हमारे जिम्मे छोड़ दो तोह हमे ाचा लगेगा. शंकर, अपने दोस्तों को बता देना की वो बरात में शामिल होने को तैयार रहे. बेटे का ब्याह है तोह संगी साथी पीछे न छूटे. पिंकी बीटा, अपनी माँ और बहनो संग खाना लगवाओ फिर मेर सबसे छोटी बहु ने भी निकलना है. सरदारनी, तुम यहाँ आज काम करने नहीं आयी इसलिए बस इधर हे रहो.", उन्होंने वालिए जी की श्रीमती जी को भी इधर हे रहने का आदेश कह सुनाया था और उन महिला को ख़ास तवज्जो या जवाब न दिया जिसको प्रियंका न पहले हे चुप करवा दिया था. शंकर कुछ कान में कह रहा था नरिंदर के और वो देख विष्णु को भी रहे थे.

"ओह चांडाल, आराम से नहीं बैठा जाता किसी दिन? यहाँ तुम्हारे भाई का प्रथम भोज है पर तुम जो कान में कार्यक्रम बना रहे हो उसको शनिवार तक कान में हे रहने दो. उस दिन कर लेना अरमान पूरे अपने.", अब खिसियाने की बार शंकर की थी और विष्णु इन्दर आपस में एक दूसरे को देख मुस्कुराने लगे. वालिए जी के साथ कुलजीत कौर के चेहरे पर भी हलकी मुस्कान थी और वो ये देख के खुश भी थी की यहाँ अधेड़ उम्र भी अपने माँ बाप के सामने बचे हे थे. आखिर पंडित जी ने विष्णु का भी घर बसते हुए पिता का फ़र्ज़ भली भाँती निभाया और अब देखना ये था की इस अनूठे विवाह में शामिल कौन कौन होने वाला था.

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"तोह संधान जी से किस बात की चर्चा हो रही थी इतने समय?", ढीला सा खुला कुरता और आरामदायक वैसी हे सलवार पहने रेखा जी अभी फ़ोन रखने के बाद पानी पी कर सोफे पर पीठ को आराम हे देने लगी थी की उनके सामने कुर्सी खिसका कर सुनंदा जी आ बैठी. लड़कियां तोह हल्का फुल्का भोजन करके अब बहार खुले में अटखेलियां करने में व्यस्त थी, आखिर पूरा दिन वो पढ़ती और घर के काम करती रही थी. सुनंदा जी ने कुंती से घर के सफाई के साथ कपडे इत्यादि भी धुलवाए थे पर रेखा अधिकाँश घर के भीतर हे रही थी सुबह से ले कर दिन ढलने तक.

"चर्चा तोह कुछ ख़ास नहीं हो रही थी माँ और अभी तोह कृष्णा दीदी कोई किस्सा सुना रही थी ललिता दीदी का. कल बड़ी दीदी माधुरी के ससुराल जा रही है haal-chaal लेने. माँ जी ने बताया की इनके (शंकर) कोई दोस्त कॉलेज समय से जिनका विवाह रविवार का सुनिश्चित हुआ है. मुमकिन हो तोह इधर से हे हम लोग पहले विवाह में शामिल हो ले और फिर वही से घर वापिस. अगर और रुकने का दिल है तोह कोई बात नहीं.", रेखा की बात सुन्न कर सुनंदा जी थोड़ा सा अचंभित हुई.

"शंकर के दोस्त का विवाह वो भी इस समय? चलो ब्याह भी देख लेंगे पर रास्ते से शादी का क्या मतलब हुआ?", सुनंदा जी ने समीप राखी फलो की टोकरी से लाल सेब उठा कर छीलने के साथ उसकी एक फांक काट कर रेखा की तरफ बधाई जो मुँह बनाने लगी थी पर माँ का गुस्सा देख कर फिर ले भी ली.

"हाँ विष्णु जी है कोई जिन्हे कृष्णा दीदी जानती भी है और पहले नाम तोह मैंने भी सुना था उनका. शादी भी अपने क्सक्सक्सक्स शहर से पहले ये क़स्बा है उधर हे है. ारु शहर के दूसरी तरफ और ये जगह इस तरफ पड़ती है, कोई आधा पौने घंटा दूर. कह रहे थे की 40-45 लोग हे है अपनी तरफ से और पापा को भी फ़ोन कर दिया गया है. मेरा दिल नहीं है जाने का इसलिए उन्होंने कहा की चहु तोह रुक जाओ या फिर हाजरी लगा के घर चली जाऊ. और आप ये इस वक़्त सेब खिला रही हो?", रेखा के खिलाने वाली बात पर सुनंदा जी ने एक और फांक थमा दी.

"तू अपना ध्यान नहीं रख रही है ठीक से. दोपहर को एक रोटी खायी थी और शाम को दूध भी आधा सिंक में पड़ा था. और अभी 2 चम्मच चावल और दही. कोई परेशानी है या दिल नहीं लग रहा? अर्जुन के सामने तोह तुझसे खाना ाचे से खाया गया और इतना सब तूने बनाया भी खुद हे था उसके लिए. वापिस बुलवा लू इधर अगर वही तेरी खुराक पर ध्यान रखता है? 4 बजे फ़ोन आया था उसका लेकिन तब भी तूने बात नहीं की.", सुनंदा जी द्वारा अर्जुन का जीकर करने से न चाहते हुए भी होंठो पर गहरी मुस्कराहट तैर गयी रेखा के. फिर सोफे पर हे चौकड़ी लगाती वो आराम से उस फांक को खाते हुए जवाब भी देने लगी.

"इसलिए तोह आज थोड़ा ध्यान राखी रही हु माँ क्योंकि कल कुछ ज्यादा हे खाया गया. एक वही है जिसके साथ सभी जबरदस्ती कर लेते और वो मेरे साथ. नींद तक के लिए कसम दे देता है वो और इसलिए थोड़ा दूर हे रहे तोह ठीक. कभी लगता है की मैं उसकी माँ हु और जब वो ऐसे हक़ जमता है तोह लगता है वो मेरी माँ है. हो गयी थी उस से भी बात जब आप बहार लगी हुई थी कुंती संग. ऋतू ने फ़ोन मिला रखा था उसको और फिर मेरे से बात करने लगा. घर पंहुचा था खेल कूद करके और बोल रहा था के गाँव में अब दिल नहीं लग रहा. कल उसकी ताई शहर आने वाली है तोह एक दिन अब वो माधुरी के ससुराल में रहेगा. सबसे ज्यादा उसकी बनती भी तोह ललिता दीदी से है और वो अपने लल्ला के चक्कर में हे आ रही जितना मुझे पता.", अब रेखा खुद हे अपनी माँ से सेब ले कर खाने लगी थी. जब जब होंठो पर ठंडा रस लगता वो अंदर हे अंदर मचल उठती जैसे वो मीठा रस भी उसको सत्ता रहा हो. अर्जुन ने कुछ अधिक हे चूस लिए थे वो सुर्ख होंठ जिन्हे उसके सिवा स्वयं रेखा के पति ने भी नहीं भोगा था. देख तोह सुनंदा जी भी रही थी अपनी बेटी को ऐसे असहज होते और रह रह कर मुस्कुराते हुए जैसे मैं में उथल पुथल मची हो.

"3-3 माँ पायी है उस किस्मत के धनि ने और सच कहु तोह ललिता का प्रेम उसके साथ अपने तीनो बचो से भी अधिक है. तू मेरे पास आती थी तब वो बचपन में भी ललिता के सीने हे लगा रहता था. कृष्णा उसको ले जाती थी अपने साथ और वो उधर भी महीना रह आता था 3-4 बरस की उम्र में हे. तेरे पापा भी अक्सर यही बोलते है की अर्जुन जनम से हे सबको आपस में बांधना सीख के आया है. अब वो पहली बार उधर आया था तोह सब अर्जुन की तुलना उनके साथ करते या शंकर के साथ पर तेरे पापा का कहना था के तुलना व्यर्थ है."

"3 नहीं 4 माँ है उसकी और उनमे भी हम तीनो संग उसका माँ बेटे वाला उतना प्यार नहीं जितना अपनी दादी के साथ है. माँ जी ने भी उसकी वो परवरिश की है जैसी उस वक़्त न कर सकीय जब उनके अपने बचे पैदा हुए. अकेली तोह थी तब वो और घर गृहस्थी के साथ साथ 4-4 बचे कहा एक साथ सँभालते है? उसको कुछ भी चाहिए होता है तोह वो हमेशा उनसे हे कहता है. हमे तोह उल्टा वो अपनी पसंद से कुछ न कुछ देता रहेगा. वैसे लाड प्यार तोह आपका भी उसके साथ कुछ अधिक हे है जैसे नाती न हुआ बीटा या दामाद हो.", रेखा ने कहा तोह ये अपनी माँ के मजे लेने के लिए था पर अब इस एकांत में सुनंदा जी ने ये मौका चूकने न दिया जैसे वो कबसे इस मुद्दे पर बात करना चाहती हो.

"अगर वो कौशल्या दीदी का बीटा हो सकता है तोह मेरा क्यों नहीं? हाँ दामाद वाली बात भी कही न कही तोह फिट बैठती है. अनीता संगीता अब तुझसे आशीर्वाद लेने लगी है, जितना मैंने विवाह पर देखा था. तू उसकी माँ है रेखा लेकिन मैं तुझसे हमेशा खुल कर बात करती रही हु जैसे तुझे समझ लगी थी. तुझे बुरा लगा था क्या वो सब जान कर? काम उम्र और सबसे बड़ी बात की वो तेरा बीटा है, तेरा खून."

"अजीब लग्न तोह लाजमी हे है माँ पर आप जानती है की मैं पहले स्थिति को खुली आँखों से नहीं देखती, वजह पता लगाती हु और फिर उस से जुड़े तमाम धागे. इस मामले में डोर के सिरे मेरे हे छोटे भाइयों की तरफ से टूटे हुए थे और वो दोनों आपके प्रेम से बंधी सब सेहती रही लेकिन माँ बन ने की चाहत कैसे त्याग सकती थी? और जैसा पापा ने आपसे अर्जुन के लिए कहा वही बहोत है इस बात को पुख्ता करने के लिए की वो kam-umar नहीं बल्कि दुनियादारी की बेहतर समझ रखने वाला लड़का है. अगर वो 25 बरस पहले गलती से मेरे साथ कॉलेज होता न माँ, तोह यक़ीनन आपका दामाद होता फिर चाहे antar-jaatiya विवाह होता या भाग कर शादी. हाहाहा...", रेखा के इस कदर बेबाक जवाब से जैसे सुनंदा जी को भी कुछ याद आ गया जो हँसते हुए रेखा के सर पर चपत लगाती हुई कहने लगी.

"कुछ भी बोलती है पागल. वैसे मुझे तुझसे ऐसे हे मुद्दे पर कुछ बात करनी थी रेखा और पहले मैं हिम्मत जूता न सकीय पर अब तुझे अनीता और संगीता का मालूम है तोह ये भी जान ले की अर्जुन की कायल पूजा भी है फिर चाहे दोनों की सहमति से वो सब हुआ हो या अर्जुन का अनीता के साथ सच जान कर पूजा ने दबाव बना कर रिश्ता बनाया हो. तेरी पक्की सहेली है वो भाभी होने के साथ पर उसने ऐसा किया है तेरे बेटे संग. मैंने शादी के समय थोड़ा ध्यान रखा था उस पर और वह वैसा कुछ नहीं हुआ लेकिन अब स्थिति कुछ ऐसी है की पूजा जैसे गुलाम सी है अर्जुन की.", एक पल को तोह रेखा हतप्रभ हे रह गयी ये सच जान कर और ध्यान में वो पल भी उभरा जब पूजा सीढ़ियों से संभल के उतर रही थी चेहरे पर पीड़ा लिए. फिर उसकी माँ का ये कहना की अर्जुन ने मेल जॉल आगे नहीं बढ़ाया.

"बिट्टू भैया इतना प्यार करते है उस से फिर भी वो बहक गयी? प्यार तोह पूजा भी बहोत करती है भैया से जो आजतक दोनों घूमने निकल जाते है कही भी फिर अर्जुन के साथ?"

"2 बेटियों की माँ है पूजा अगर तुझे ये ध्यान हो पर उसके बावजूद उस दिन पूजा के चेहरे पर पहली रात सा निखार और तकलीफ थी. कौशल्या दीदी ने कुछ अधिक हे विलक्षण परवरिश तोह नहीं कर दी अपने अथाह ज्ञान के बदौलत या उन्हें भी इसकी भनक नहीं?", अब इस से अधिक तोह वो क्या हे कह सकती थी खुल कर पर न चाहते हुए भी रेखा थोड़ी शर्मसार सी हो गयी.

"उन्हें कुछ नहीं पता और ये लड़का भी इन मामलो में थोड़ा कच्चा हे है. वैसे बुरा तोह आपको लग्न चाहिए माँ जो वो आपके घर की 3-3 बहुओं को .."

"चौथी कैसे बच गयी मैं तोह ये सोच रही थी रेखा.. तू माँ की तरह देखती है न उसको इसलिए तुझे अर्जुन का आकर्षण प्रभावित नहीं करता पर वो लड़का किसी के साथ एकांत में 5 मिनट हे बतला तोह ाचे खासे मर्यादित मैं को खंडित कर दे. पूजा जितनी मर्जी आधुनिक घर से हो और अपनी तरफ तोह आज तक घूंगट और पल्ले का रिवाज नहीं. न मैंने कभी दुपट्टे तक के लिए टोका क्योंकि दोनों बड़ी बहुएं वफादार होने के साथ साथ परिपक्व और घर सँभालने वाली है. और यही वजह है की अर्जुन कदम पीछे खींच गया जो अपनी नानी के घर कुछ दिन बिताने की जगह पुश्तैनी अनजान गाँव में जा बैठा. सही किया जो इस लड़के का डोरा प्रीती संग बचपन में हे बाँध दिया तूने, खुला होता तोह जाने कितने घर पंडित जी की देहलीज में आ खड़े होते." अब रेखा क्या कहती की अर्जुन के साथ स्वयं उसकी एक अलग और मजबूत डोर जुड़ चुकी है जिसका टूटना सांस थमने से भी बुरा होगा. अर्जुन और तिलोत्तमा का अलौकिक प्रेम समाज के बनाई हर सीमा लांघ कर इतना बलवत हो चूका था की इसके क्या परिणाम हो सकते है भविष्य में वो न हे सोचे जाए तोह बेहतर.

"वो मुझसे मखौल कर रहा था प्रीती के मामले में. कहता की प्रीती मुझे हे माँ कहती है तोह कल को उसके साथ अर्जुन का ब्याह होगा तब वो किसी तरफ hongi?Hahaha.."

"फिर तूने भी जवाब तोह दिया हे होगा. चुप कहा रहने वाली है अगर तेरा बीटा तुझसे अब इतना सब बताता और बोलता है."

"मैंने कह दिया की फिर तोह मैं उसके बचो की नानी बन्न न हे मंजूर करुँगी. दादी बन ने की तमन्ना वो राजेश्वर दीदी की पूरी करे जिनके वो गॉड गया हुआ."

"हट पागल कुछ भी बोलती रहती है. पता नहीं कौशल्या दीदी को तू कहा से समझदार लगी? वैसे उमेद भी अलग हे मिटटी का बना है और जुबान का धनि उस जैसा सचमुच न देखा. कभी कभी बहोत डर लगता है रेखा जब गलती से कोई बुरा ख़याल आता है. एक लड़के पर कितने परिवार ठीके है और ये रुकने की जगह बढ़ते जा रहे है गुजरते समय के साथ.", रेखा भी ये सुन्न कर थोड़ा गंभीर दिखने लगी थी जैसे ये कड़वी वास्तविकता उसको भी परेशां करती हो.

"गलतियां और स्थिति सँभालने के लिए किसी को तोह आगे आना हे पड़ता है माँ और अर्जुन को इसलिए हे सक्षम बनाया गया. मेरा बीटा होते हुए भी अधिकाँश समय उसका मुझसे दूर हे गुजरा. अब वो बड़ा हो रहा है तोह वो उल्टा मेरा ख़याल ऐसे रखता है जैसे मुझे उसका रखना चाहिए था. मुझे भी डर लगता है पर उसकी वजह इतने परिवारों का उसके साथ जुड़ना नहीं बल्कि अनजाने हे उसका परिवार प्रमुख बन जाने से है. पापा के साथ आपने भी तोह वही किया न की जो संपत्ति घर से बहार थी उसका मालिक वो बना दिया और संरक्षक मुझे. अर्जुन को ये सब नहीं चाहिए था पर उसके नाम हो जाने पर अपने हे कई आहात भी हुए है. वो इसको अपनी अनदेखी मान रहे है या अर्जुन बड़ो के नजर में उनसे अधिक परिपक्व बन बैठा. अगर कल को ये बात हे तकरार का मुद्दा बन बैठी फिर अर्जुन be-matlab हे दोषी कहलायेगा. कभी कभी सोचती हु की वो इन सब झंझटो से दूर निकल जाए तभी एहसास होगा की वो कितना जरुरी है और कितना समर्पित था."

"तू रह सकेगी उस से दूर?"

"इस बार तोह मर्डर जाउंगी माँ अगर उसको कही भेजा माँ जी या पिता जी ने. मैंने कितने साल बच उसके बचपन के कपड़ो को अपने साथ रख कर रातें गुजारी है लेकिन इसने जितना प्यार लौटाया है न वापिस आने के बाद, मैं अब वैसा फिर नहीं होने दूंगी. घूमना फिरना अलग बात है पर वो घर रहेगा. कॉलेज की बात पर भी मैंने कह दिया था के वो चाहे पढ़ने के लिए दिल्ली एडमिशन ले पर घर नियम से आया करेगा. उम्र गुजर गयी माँ और अगर अभी भी बचे के साथ समय न मिले तोह फिर क्या फायदा.", रेखा के मैं में सवाल तोह कई थे पर वो अपनी माँ की जगह अर्जुन से जवाब चाहती थी. सुनंदा जी भी अपनी बेटी की दशा भली भाँती समझ रही थी पर कुछ और भी था जो सिर्फ रेखा तक हे सिमित रहा.

"मरे तेरे दुश्मन. अभी डेढ़ साल स्कूल करेगा और ये सारा समय तू उसको अपने पास हे रख. बीटा बड़ा हो गया है तोह जब भी समय मिले, साथ घूम फिर आया करना. शंकर क जीवन अलग है और कौशल्या दीदी कोई पाबंदिया लगाने वाली महिला तोह है नहीं. वैसे तेरी भी कभी लिस्ट होती थी घूमने फिरने की जो तू अपने पापा को बताती रहती थी. जेठानी देवरानी के साथ सभी लड़कियां घर गृहस्थी सँभालने में सक्षम है और स्वयं दीदी ने मुझसे कहा था के 23 बरस में उनकी ये बहु साल में 2 बार पीहर के अलावा कही न गयी. मैं तोह खुद कभी राजेश तोह कभी बिट्टू को ले कर निकल लेती हु अगर तेरे पापा को समय न लगे. और उनके साथ अभी तक गुवाहाटी, कन्याकुमारी, जगन्नाथ तक घूमी हु. तू यहाँ भी इसलिए आयी है क्योंकि इस वीराने में तुझे बस सुकून है. अर्जुन की अभी भी बहोत छुट्टियां पड़ी है, 6 जुलाई तक स्कूल खुलेंगे उसके.", सुनंदा जी जो समझा रही थी चाहत तोह रेखा की भी थी की वो अपने जवानी में बनायी सूची को जीवंत करे पर कैसे शुरुआत करे इसका हल नहीं था.

"वो लिस्ट तब कॉलेज की वजह से बानी थी माँ और अब उसका कोई वजूद नहीं. आदत पड़ चुकी है अब और यही पसंद है मुझे."

"पसंद और आदत दोनों अलग अलग बातें है रेखा. पंडित जी और दीदी क्या हमेशा हे घर और नौकरी में जुटे रहते थे? कृष्णा और ललिता भी कश्मीर, नेपाल और जाने कहा कहा घूम चुकी जिस पर कौशल्या दीदी का मैट ये था की रेखा को समझाना उनके भी बस का नहीं. मैं घर राहु तोह वो जरूर रहेगी मेरे साथ और मैं बहार हु तोह फिर मेरे स्थान पर हो जाती है. अब खुद सोच की ऐसी सास भला कही मिल सकती है जो टोका ताकि की जगह प्रेरित करती है की उनके बहु दुनिया देखे और जीवन दर्शन बस घर तक सिमित न रहे. तेरी लिस्ट में सबसे ऊपर कौनसी जगह थी."

"अल्लेप्पी और मुन्नार. सुना और तस्वीरों में देखा था बस लेकिन लगता है की वो साक्षात् स्वर्ग है माँ. तभी तोह राधिका और संजीव को उपहार में वही भेजा. पर अब घूमने का कोई मैं नहीं और न समय है दिनचर्या से अलग.", अभी रेखा आगे कुछ और बात करती उस से पहले हे दरवाजा खोल कर भगति हुई आरती और अलका उस बड़ी मेज के पीच आ रुकी. ऋतू भी दाखिल हुई और उन्हें पकड़ने लगी पर दोनों हे उसको टेबल के ird-gird चहकती हुई चिढ़ाने लगी थी.

"ओह तूफ़ान की देवियों, तुम्हारी एनर्जी ख़तम नहीं होती क्या कभी?", रेखा जी के सम्बोधन से तीनो हे अपनी जगह रुक गयी जहा आरती और अलका हंस रही थी वही ऋतू नौटंकी करती हुई शिकायत लगाने लगी.

"ये दोनों अपनी बारी आने पर इधर भाग आयी माँ और मेरी कसरत करवाई वो अलग."

"चलो अब तुम लोग मुँह हाथ धो कर आराम कर लो. सवेरे घूमने चलना है की नहीं? मैं भी सोने चली.", उठने से पहले रेखा जी ने बस एक बार तीनो की तरफ देखा जो जवानी से लड़ी हुई यौवनाये घुटनो से ऊपर की निक्कर और बिना ब्याह की टीशर्ट पहने थी, एक जैसी संरचना पर भिन्न रंगो की. तीनो कुछ कुछ एक दूसरी से जुड़ा होने के बावजूद ख़ूबसूरती में अपनी अपनी परकाष्ठा पर थी. एक खूबसूरत महिला इन तीन हसीनाओं को देख गदगद थी क्योंकि तीनो फूल उनकी हे बगिया के थे.

"बड़ी माँ, आपके लिए कोल्ड कॉफ़ी ले कर आ रही हु ऊपर. ारु ने बोलै था के 2 टाइम दूध लाजमी देना है आपको. चल ऋतू तू देख बर्तन और ये मैडम करेंगी सफाई. नानी आपके कमरे में भी पानी मैं हे रख दूंगी, आराम कर लीजिये.", रेखा ने ृक्क कर पहले मुख्या दरवाजा लगाया और फिर आरती के सर पर हाथ फेरती हुई ऊपर की तरफ चल दी.

"चाहो तोह तीनो एक साथ भी सो सकती हो. पढ़ाई ाचे से कर रही हो तोह जैसे ठीक लगे वैसे सो सकती हो. बस ज्यादा शोर नहीं करना.", और वो हलके कदम लेती हुई सीढ़ियां चढ़ कर अपने कमरे में दाखिल हो गयी. आरती को समय लग्न था अभी इसलिए दरवाजा बंद करती हुई वो अपने सलवार कमीज को खोल कर आरामदायक गाउन को अलमारी से निकलने लगी तोह दर्पण पर अकस्मात हे नजर गयी.

'पहले हे वो मनाली का बोल चूका है अगर 90% से ऊपर नंबर आते है उसके. और अभी ये हालत की है मेरी तोह वह 5 दिन साथ रहने पर चलने के काबिल नहीं छोड़ने वाला.', ब्रा को ढीला करते हे स्टैनो के ऊपर अर्जुन के होंठो से बने लाल निशाँ और निप्पल की सूजन बरकरार थी. स्टैनो का सख्ती पर अर्जुन द्वारा कहे शब्द याद आते हे बस उनके उठान को हलके से सहलाते हुए रेखा ने जैसे उसको हे महसूस किया जो यहाँ से दूर हो कर भी रेखा के भीतर बस चूका था. जाँघे सताने पर उठती चीज़ की वजह से आज पंतय तक न थी बदन पर. उस मांसल योनि पर इस मुद्रा में बस एक लकीर सी थी, उभार के बेचो बीच लेकिन 2 बार के लम्बे संसर्ग ने वो हिस्सा भी सूजा दिया था. उधर हाथ न लगते हुए रेखा ने जैसे तैसे वो कला गाउन उठाया पर उसके निचे दबा वो रेशमी जमुनी परिधान नजर आते हे एक बार फिर से अर्जुन के सामीप्य ने उसको अपने घेरे में ले लिया. वो हाथ रख कर उस वस्त्र को महसूस करती रही जो उसका बीटा नहीं बल्कि प्रेमी ले कर आया था, ख़ास पल के लिए ख़ास वस्त्र.

'आरती के जाने के बाद हे पहनती हु तुम्हे. काम से काम ये तोह लगेगा की अकेली नहीं हु.', कला लम्बा गाउन पहन कर उस छोटे जमुनी वस्त्र को तकिये के निचे रखती हुई रेखा बाथरूम चली गयी. सोने से पहले चेहरा और दांत साफ़ करना एक अटूट नियम जो था.

"माँ.."

"हां बीटा.", अभी वो चेहरा हे साफ़ कर रही थी की दरवाजे पर दस्तक सुन्न कर वो वैसे हे चली आयी. चिटकनी खोलते हे सामने ऋतू को खुश देख कर वो हैरान तोह हुई पर उनकी बिटिया ने ख़ुशी से माँ को बाहों में लेते हुए जो बात बताई उसके बदले रेखा ने भी उसको बाहों में कास लिया.

"ारु के 92 परसेंट आये है. अभी 10 बजे रिजल्ट खुला था और उसके पास वह इंटरनेट भी है तोह सबसे पहले ये खबर उसने मुझे दी साथ हे आपको बताने का भी बोलै. मैथ में 100 है उसके और साइंस में 98. आपने तोह कमाल हे कर दिया माँ.. I'm सो हैप्पी फॉर हिम."

"मेरी बेटी से तोह फिर भी पीछे हे रहा वो लेकिन ाची बात है की 90 से निचे नहीं रहा. अभी भी फ़ोन पे है क्या?"

"आपको हे बुला रहा है वो और नानी को डिमांड बता रहा है अपनी. मुझे तोह 95 लाने पर सिर्फ ड्रेस दे कर हे ताल दिया था सबने पर इसको ज्यादा कुछ मिला न तोह..", और ठीक इसी पल में ऋतू को कपडे के ऊपर से हे अपनी माँ के अकड़े हुए चूचक महसूस हुए जहा हाथ रखते हे वो फिर से उनकी नन्ही गुड़िया बन्न चुकी थी.

"आज नहीं.. कल साथ सो जाना. मैं ब्रा पहन कर आती हु, तुम चलो."

"ऐसे हे चलो न माँ कौनसा इधर कोई है और मैं आज क्यों नहीं सो सकती आपके पास.?", ऋतू हाथ पकडे पकडे हे उन्हें साथ ले चली. उसकी बात सुन्न कर अब रेखा ये कहती की उसका भाई इनकी दुर्गति करके गया है?

"तुम तबतक नहीं सोने वाली जबतक ये खाली न कर दो और आज फ्लो नहीं है उतना. वैसे इसको पहले अपने दादा जी फ़ोन करना चाहिए था.", दोनों निचे आ कर अब अलग विषय पर बात करने लगी थी. सुनंदा जी ने भी हँसते मुस्कुराते हुए फ़ोन रेखा को दे दिया.

"अब तोह प्रोग्राम पक्का.", अर्जुन ने माँ की hello सुनते हे सबसे पहले यही कहा और रेखा होंठ kaat-ti हुई बस हम्म्म बोल उठी.

"संस्कृत में कितने नंबर आये?", इस सवाल पर अर्जुन भी मुस्कुराया क्योंकि छोटे से 'हम्म्म' का मतलब उसकी तिलोत्तमा ने हाँ कर दी थी पर अब माँ सभी विषयो के अंक पूछने लगी.

"उस से ज्यादा तोह हिंदी में हे आ गए मेरे नब्बे. संस्कृत में 85, सोशल स्टडीज में 87, इंग्लिश में 94, साइंस 98 और मैथ में 100. ऋतू दीदी से 17 नंबर काम और कोमल दीदी से 13 नंबर ज्यादा है. नानी ने कहा था के अगर मेरे 85% आये तोह ये मुझे जो मैं मांगूंगा वो देंगी. अब इन्हे बोल देना की वो मनाली भिजवा दे बस आपके साथ. मैं दादी से नहीं बोलने वाला, पहले कह देता हु.", रेखा ने फिर से बस हम्म कह दिया.

"अपनी दादी जी और पापा को फ़ोन क्यों नहीं किया पहले? वो तोह सोच रहे होंगे की रिजल्ट कल आनेवाला है. प्रीती को रोल नंबर दिया था तुमने?"

"नहीं भी दिया तोह आपको लगता है उसके पास नहीं होगा मेरा रोल नंबर? चलो गूडनिघत और अब तैयार रहना बस. मैं यहाँ गाँव से जल्दी वापिस जाने वाला हु घर. 12-13 तारीख तक."

"ठीक है.", रेखा ने कोई अधिक शुभकामनाये नहीं दी थी और इनकी चाँद शब्दों में हे जाने कितनी बात हो गयी.

"बड़ी माँ, ये अब सबसे डिमांड कर रहा है. नंबर तोह उसके हम तीनो से काम आये है.", आरती तुनक उठी तोह उसके साथ बाकि दोनों भी लेकिन यहाँ निशाना सुनंदा जी थी, रेखा नहीं.

"माँ, अब आप हे देखो इन्हे. अर्जुन को आपने जो भी बोलै है उसके बराबर इन्हे मिलना चाहिए. बाकी अपनी दादी जी से तोह ये कुछ भी करके उसके बर्बर ले हे लेंगी."

"मुझे तोह वही आ कर बताएगा की उसको क्या लेना है. जो उसको दूंगी वो तुम तीनो को या जैसा तुम चाहो."

"ठीक है फिर. चलो भाई हम तोह चले सोने. गूडनिघत माँ, गूडनिघत नानी.", ऋतू के साथ बाकी दोनों भी अर्जुन के अंको की चर्चा करती हुई उसके हे कमरे में चली गयी. आरती कांच का बड़ा गिलास रेखा जी को वही पकड़ा गयी थी.

"तेरी म्हणत सचमुच असरदार है रेखा. नाज होता है जब मैं इन बचो के नंबर सुनती हु जिन्हे स्कूल कॉलेज से बेहतर तुमने पढ़ाया. इतने नंबर लाने के बावजूद ये लड़का घर में चौथे नंबर पे है."

"पांचवे पे है अब तोह माँ. राधिका के भी आरती के बराबर 93 प्रतिशत थे. अलका और ऋतू के दसवीं और बाहरवीं तक में एक जैसे नंबर जबकि बाहरवीं कक्षा में तोह सब्जेक्ट भी अलग थे पर नंबर बराबर. पढ़ाई का चस्का इन तीनो को मैंने नहीं बल्कि कोमल और प्रियंका ने लगाया. ाची बात है की अर्जुन के 90 से निचे नहीं गए क्योंकि उसके पापा इस मामले में नरमी नहीं रखते."

"अर्जुन के हर मामले में हे वो नरमी नहीं रखता और ठीक भी है रेखा. बाप खुद म्हणत से उस मुकाम पर है जहा लोग उसका उदहारण देते है. चल तू ये दूध ले जा, मैं भी सोने चली.", सुनंदा जी भी अपनी बेटी के साथ हे यहाँ से अपने कक्ष की और बढ़ गयी. रेखा जिस सफर का सोच रही थी आखिर अर्जुन ने उस से जीत हे लिया.

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"तेरे सामाजिक शिक्षा में 13 अंक कैसे कटे भाई जरा बताएगा?", रामेश्वर जी बिस्टेर पर बैठे अर्जुन से बात कर रहे थे फ़ोन से. उनके पास हे परचा निकले प्रीती और रेणुका जी भी थी और सामने कुर्सी पर शंकर. नरिंदर विष्णु को छोड़ने गया था अभी जिसने फिर कभी घर पे रुकने का आश्वासन दिया था.

"समाज की शिक्षा थोड़ी काम है न बाउजी. वैसे मेरे इतने भी नहीं आते अगर आप ने मैप और हिस्ट्री न पढ़ाई होती. चलो इस सब्जेक्ट से अब पीछा तोह छूट गया मेरा लेकिन पढता रहूँगा जब टाइम मिलेगा."

"ाची बात है अगर पढ़ते रहो तोह. आगे अब पक्का है न की इंजीनियरिंग हे करनी है ये साल स्कूल के बाद.?"

"बिलकुल पक्का है बौ जी और वो भी कंप्यूटर में इंजीनियरिंग करनी है. वैसे आपने गिफ्ट का वादा किया था मुझसे."

"गिफ्ट बाद में पहले अपने पापा से बात कर ले. ले शंकर.", रामेश्वर जी ने अपने बेटे की मौजदगी में अर्जुन से इस पर चर्चा नहीं की थी और फ़ोन लेते हुए शंकर भी सहज भाव हे दिखे.

"कोंग्रटुलतिओन्स. कभी कभी बाप से भी गिफ्ट मांग लिया करो भाई, मैं तोह मन भी नहीं करता."

"थैंक यू पापा. और आपने तोह एडवांस में हे गिफ्ट दे रखा है जो हर वक़्त कलाई पे देखता रहता हु. वैसे दीदी से काम नंबर आये है मेरे."

"मैथ में उसके 99 थे और तुम्हारे 100 है. जो विषय चुना जाए नंबर उसके हे मायने रखते है. तुम्हे उमेद चाचा वाली गाडी पसंद है न?", शंकर ने कई बार देखा था की अर्जुन को वो काली मेरसेदेज़ आकर्षक लगती थी और आज वो सामने से इतना महंगा तोहफा पेश कर रहे थे अपने बेटे को.

"मुझे आपकी वो रद 350 पसंद है पापा अगर आपको ठीक लगे तोह.", शंकर इस जवाब से कही ज्यादा खुश हुआ था क्योंकि उसके बेटे ने यहाँ भी वही चीज चाहि थी जो शंकर फिर से ज़िंदा देखना चाहता था किसी अपने के पास.

"लेते आना उसको अपने चाचा के घर से, वो भी वह अकेली बंद कड़ी होगी. वैसे सोच लो जो मैंने कहा क्योंकि तुम्हारे चाचा की भी यही इत्छा है."

"आपने एस्टीम अपने पैसे से ली थी न पापा? बस अगली गाडी मुझे भी खुद हे लेनी है और कार तोह पहले से हे घर में इतनी है. आपकी यामाहा कॉलेज में रखना चाहता हु मैं अपने साथ.", शंकर को जान कर ाचा लगा था के पूत के पाँव इस मामले में तोह फिलहाल चादर के भीतर हे है.

"ठीक है भाई, फिर या तोह तुम्ही लेते आना नहीं तोह मैं तुम्हारे चाचा से बोल कर मंगवा लूंगा इधर. जो रिजल्ट लेके आया है उस से भी बात कर लो, बहोत देर से वेट कर रही है अपने नंबर की.", प्रीती तोह सुर्ख हे हो गयी अपना जीकर होता देख, वो भी बाप अपने बेटे से बता रहा था. फ़ोन लेते हुए वो शर्माने लगी तोह शंकर जी ने हे सुझाव दिया.

"बैठक में ले जाओ इसको और आराम से बात करो और अपनी बुआ की भी करवा देना.", शंकर उठ कर अपनी माता के चरणों की और आ बैठे, तलवो की मालिश करने के लिए. रेणुका भी बैठक में चली गयी थी और दरवाजा स्वयं पंडित जी ने हे ढाल दिया जो आराम करना चाहते थे.

"तू तोह बड़ा समझदार हो गया शंकर. मुझे तोह लगा था के तू लताडेगा बेटे को ऋतू से काम नंबर आने पर.", कौशल्या जी भी यहाँ शंकर को टटोल रही थी.

"काम? मुझे तोह लगता था के 80 भी आ जाए तोह बहोत है पर ये तोह अपने बाकी बहनो जैसा हे निकला माँ. वो लिस्ट देखि इसकी क्लास की आपने जो प्रीती साथ निकाल के लायी थी? तनेजा की लड़की हे बस इस से एक नंबर आगे है और ये जनाब 2 पर्चे तोह पूरे भी नहीं करके आये थे जितना ऋतू से पता चला था. हिंदी लिखते हुए हाथ दुखते है और संस्कृत पता नहीं किस वजह से ली. इसको प्रथम आना हे नहीं था जितना नंबर देख के लगता है. 100 और 98 के बाद इंग्लिश में 94 है उसके और इसका मतलब है की वो सिर्फ इन तीन सब्जेक्ट पर हे म्हणत कर रहा था."

"हाँ ये तोह है और इसका पढ़ने का सिस्टम भी अलग हे रहा. वैसे धर्मपाल के लड़के के कितने नंबर आये है? धर्मपाल आप तोह बहोत मेहनती था पढ़ाई में.", यहाँ कौशल्या जी ने संदीप का जीकर किया था.

"68 प्रतिशत और देखा जाए तोह वो भी बहोत है माँ. लेकिन इस बार बचे फ़ैल बहोत हुए है या अधिकतर के कम्पार्टमेंट है. तोह आपसे वो पहले हे इनाम मांगे बैठा है?", अब शंकर भी िट्छुक था जान ने के लिए.

"घूमने जाने का हे कहा था मुझसे तोह और तेरे पापा से वो गाडी ले हे चूका है. अब जहा जाना चाहे चला जाए हफ्ता 10 दिन. उसके बाद तोह फिर स्कूल, पढ़ाई और स्टेडियम. उमेद अपनी गाडी देने का कह रहा था?"

"कह क्या रहा था वो तोह अर्जुन का वोटर कार्ड ले के गाडी नाम भी करवा चूका. उसका कहना है की बीटा लम्बा चौड़ा है और कार साड़ी नीची. अब वो चलाये या कड़ी रखे पर उमेद ने वो इसके नाम कर दी तोह कर दी. वो टेंशन भी तोह बहोत लेता है की कही अर्जुन के चोट वोट न लग जाए.", रामेश्वर जी उनकी तरफ करवट ले कर मुस्कुरा रहे थे सब सुनते हुए.

"हाथी खरीदना आसान है पालना मुश्किल. और अपने हाथ खड़े है डॉक्टर साहब इस मामले में. सरकारी जांच हो गयी तोह बूढ़े को अंदर करवाओगे तुम सारे मिल के. वैसे मैं सोच रहा था के तुम्हारी माँ के साथ मैं और अर्जुन पिछले घर में रहने लगे. पूरा तैयार करवा दिया है और वह कोई रहेगा नहीं तोह फिर खराब हे होगा.", रामेश्वर जी ने जैसे हे अपनी इत्छा जाहिर की शंकर सर खुजाने लगा.

"उधर तोह राजू भाई का रहने का दिल है पापा और वैसे भी वह रहने की जगह बस रात में सोने के लिए बचे या हम लोग जाते रहे तोह वो ज्यादा ठीक."

"राजकुमार क्या वह अकेला रहेगा? ललिता तोह उधर जाने से रही.", कौशल्या जी की इस बात के साथ हे प्रीती दरवाजा खोल कर फ़ोन वापिस रखती हुई सबको शुभरात्रि बोल कर अपने घर लौट गयी, रेणुका बुआ संग.

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"ये अंजलि दीदी तोह इधर हे सो गयी?", अर्जुन जब तक सबसे फारिग हो कर अनामिका के कमरे में लौटा, समय 10:30 हो चूका था. बहार आँगन में कूलर की ठंडी हवा में कृष्णेश्वर जी को सोये भी एक घंटा हो चूका था और इधर कमरे में चची की बगल में टेलीविज़न देखती अंजलि भी वही सोई मिली. अनामिका चची बस निकेतन को सतान्नपान करवा रही थी जो सोने के कगार पर था.

"हाँ और वैसे भी आज क्रीम लगाई हुई है. तुम तोह आराम करने नहीं डोज अगर साथ लेते तोह. पर गिफ्ट भी देना है, तुम्हारी पसंद का.", उनका मतलब अर्जुन की इत्छा से था जिस पर उसने ना में गर्दन हिला दी और चची का गाल चूम कर वो उन्हें आराम करने का बोल कर अपने कमरे में लौट आया.

"इधर आपने डेरा दाल रखा है?", मद्दिम रौशनी में वो कंप्यूटर की स्क्रीन कही ज्यादा रोशन दिखी जिसके सामने बैठी आँचल बाद एक ढीली टीशर्ट और चुस्त पजामा पहने काम में लगी थी. हाल हे में नहाने की वजह से अलग सी तजा महक उसके जिस्म के साथ कमरे में भी कुछ हिस्से में फैली हुई मिली. अर्जुन को सिर्फ निक्कर पहने बिस्टेर पर औंधे मुँह गिरते देख वो भी मुस्कुरायी.

"तुम फ़ोन पर थे और उधर अंजलि मामी के कमरे में सो गयी. संजीदा दीदी भी थोड़ी थकान मान रही थी इसलिए वो भी चली गयी और माँ तोह खुद दवा खा कर टाइम पे सो जाती है. अकेली और क्या करती इसलिए कंप्यूटर का सहारा लेना पड़ा. यार तुम दिखने में तोह जरा भी पढ़ाकू नहीं लगते और नंबर इतने लिए बैठे हो की 2 लड़के पास हो जाए.", एक बार उठ कर आँचल ने दरवाजा ाचे से लगाने के साथ सिवाए एक झरोखे के खिडकियां भी बंद कर दी. अर्जुन बिस्टेर पर मुँह टिकाये हे ये सब देख रहा था और मैं हे मैं सोच रहा था के ये लड़की आज तोह किसी हाल में नहीं रुकने वाली. पर आँचल वापिस कुर्सी पर हे आ बैठी अपने बाल सुलझाती हुई.

"अब घर में जो भी है वो मुझसे ज्यादा पढ़ा लिखा है. न भी पढ़ने का दिल हो तोह कोई न कोई पकड़ के पढ़ने लगता इसलिए आ गए इतने नंबर. वैसे आज बहोत खिल रही हो आप?", अर्जुन चेहरे को देखता हुआ नजरे सीने तक लाया तोह एकाएक धड़कन मचलने सी लगी. ढीली टीशर्ट के ऊपर से भी आँचल के कैसे हुए मॉटे मॉटे चुके और उनके तीखे निप्पल स्पष्ट दिख रहे थे. और वो जान बूझ कर कपडा कमर की तरफ खींचती हुई उन्हें और उभारने लगी. कुछ पल बाद गुलाबी पाजामे के बीचो बीच हाथ रखे वो दूसरे हाथ से इंटरनेट पर कुछ चलने लगी. अर्जुन ने जैसे हे वह देखा उसकी आँखे पूरी खुल गयी.

"ओह बाप रे.. ये सब कहा से ढूंढा आपने?", वर्ल्डसेक्स नामक उस साइट पर एक कमसिन कन्या जिसके कूल्हे और चुके उतने हे मॉटे और बड़े थे जितने स्वयं आँचल के और गुलाबी कासी हुई निक्कर के ऊपर से हे उस कन्या की paav-roti सी पहली हुई छूट खासी उभर कर अपना चीरा तक दिखा रही थी. अगली तस्वीर में उस कच्ची जैसी निक्कर को चीरे के ऊपर से उधेड़ कर एक तगड़ा आदमी ऊँगली भीतर किये था और दूसरे हाथ से एक मोटा चुका अपने मुँह में भर कर ऐसे चूस रहा था की लड़की की आँखें मजे से बंद दिखी.

"मुझे भी नहीं पता था पर ऐसे हे सेक्स लिख कर सर्च किया तोह ये साइट सामने आ गयी. तब तोह देख न सकीय थी इसलिए नाम याद रख कर बंद कर दी. ऐसी बहोत सी फोटोज है इस साइट पर. तुमने ये पहले देखि है?", अर्जुन ने ना में सर हिला दिया पर अगली तस्वीर बड़ी होते हे वो भी चौकड़ी मार के आँचल की बगल में आ बैठा. मोटा कला लुंड उस कमसिन कन्या की नाजुक सी गुलाबी छूट में सुपडे तक भीतर था सिर्फ उस फाटे हुए वस्त्र वाली जगह से. चाँद बूँद खून की लकड़ी के फर्श और लड़की की छूट के निचले हिस्से पर साफ़ साफ़ दिखी.

"इसका तोह बहोत बड़ा है और ये लड़की कैसे मजे से अंदर ले रही है जबकि उम्र तोह मुझसे 6-7 साल छोटी लगती है. इनके क्या वह पर बाल होते हे नई?", आँचल ने अगली तस्वीर बड़ी की तोह अब उस हब्शी का वो तगड़ा मूसल लुंड आधे से ज्यादा उस मखमली छूट के भीतर फंसा हुआ था जिसके गुलाबी होंठ बहार को फैले हुए बुरी तरह लुंड पर कैसे दिखे. पर इसमें अलग बात ये थी की उस आदमी की मोती ऊँगली लड़की के गोर गुदाद्वार में फांसी थी और दूसरे हाथ से बड़ी बेदर्दी से आदमी उसका एक गुलाबी चुका ऐसे दबाये था जैसे कोई पिलपिला गुब्बारा हो. आँचल का जांघो के बीच वाला हाथ थोड़ा थोड़ा हिलता महसूस हुआ जैसे वो अपनी मुनिया को ऊपर से हे सेहला रही हो.

"जितना मर्जी बड़ा हो, जवान लड़की ले सकती है अंदर. बस शुरू शुरू में परेशानी होती है थोड़ी. अब पक्का ये अगली फोटो में इसके पीछे डालने वाला है.", अर्जुन के ऐसा कहने के साथ हे आँचल का सीना अजीब से कम्पन्न करने लगा जैसे उसको सोच कर हे डर लगा हो. पर अगली तस्वीर में वो लड़की जड़ तक उस मूसल को भीतर भरे थे और चेहरे पर दर्द की जगह मुस्कान. जैसे ये तस्वीरें काफी अंतराल पर ली गयी हो. हाँ गुदाद्वार में अब एक नकली लुंड था जो किसी तुरई जितना पतला और गोलाकार था.

"शुक्र है. और देखो इसके ब्रैस्ट कितने लाल कर दिए है इस राक्षश ने. पर ये तोह मजे से खुश हो रही है."

"क्योंकि ये थोड़े टाइम के बाद फोटो ली है जब वो नार्मल हो गयी हो. ब्लड नहीं दिख रहा न अब वह? और ये इसके बक्सीडे को रेडी कर रहा है. वैसे कुछ मामलो में लड़कियों को रफ़ सेक्स पसंद होता है और कुछ लड़को को भी. तभी इसके ब्रैस्ट ऐसे हो गए. वैसे आपकी खुशबु भी साफ़ पता चल रही है.", अब आँचल स्क्रीन को देखती हुई लाल हो रही थी, गरम तोह वो पहले से थी पर अर्जुन ने जब उसकी जांघो के बीच रखे हाथ को पकड़ कर सूंघने के बाद होंठो में लिए तोह इतने से उसकी आँखें बंद हो गयी. माउस क्लिक होते हे तस्वीर भी बदल गयी जो वैसी हे थी जैसा अर्जुन ने तुक्का मारा था. गोरो टांगो को चौड़ा किये हुए वो हब्शी लड़की की अक्षत गुदा का सत्यानाश करता हुआ अपने कला अजगर आधा भीतर फंसाये था. आँचल ने झटके से आँखे खोली तोह दोहरे एहसास से जिस्म कांपने लगा. उसका खुद का पजामा योनि के आगे से उधड़ा हुआ था जो आँचल ने स्वयं किया था पहन ने से पहले पर अब उसकी मोटी फांको के बीच अर्जुन की ऊँगली फिसल रही थी. वो आहिस्ता आहिस्ता योनि की दरार और सिलवटों भरे मांस को सेहला कर अलग सा मजा भर रहा था उसके जिस्म में.

"िस्सशःह्ह्ह.. तुम्हे बुरा नहीं लगा न..? आह्हः.. मेरा कुछ करो प्लीज.. नहीं तोह कोई सब्जी या मोमबत्ती उठानी पड़ेगी mujhe...aahhhh", अर्जुन उसकी हालत देख कर दुविधा में था.

"ऊँगली से या चूस कर फारिग कर देता हु आपको."

"झंडू हो क्या? हर रोज लारे लगा रहे हो और अब भी ऊँगली से करोगे? मैं तुम्हारे लिए गिफ्ट तैयार करे बैठी हु और इसलिए तोह अंजलि को उधर सोने को भेजा. मेनू नहीं पता, अज्ज जो मर्जी होव मैं हुन्न लड़की नाइयो रहना.", अर्जुन जानता था की ये सब एक न एक दिन तोह होना हे है पर आज की रात आँचल जैसे सब तैयारी करके बैठी थी.

"दर्द होगा आपको और घर में लोग भी मौजूद है.", अर्जुन ने अब छूट से भी हाथ हटा लिए थे और बिस्टेर से तक लगा ली. आँचल कुर्सी छोड़ कर उसके फैले हुए पांवो के बीच हे घुटने मदद कर आ बैठी जैसे बिल्ली दूध पर घात लगाए हो.

"माँ गोली खा कर सोई है और मामी का कमरा इस कमरे से 2 कमरे छोड़ कर है. संजीदा दीदी ऊपर वाली मंज़िल पर और नाना जी 4 बजे से पहले किसी हाल में न उठने वाले. जानती हु के तुम्हारा अंदर लेना आसान नहीं पर मैं तोह मामी से भी मजबूत और भारी हु. वो ले सकती है तोह मैं क्यों नहीं?", और अपनी बात कहने के साथ हे आँचल ने वो इलास्टिक निचे सरका दिया जहा तम्बू बना हुआ था. एक बारी को तोह उसका कलेजा हे मुँह को आ लगा क्योंकि स्प्रिंग की तरह उछाल कर वो मोटा डंडा सीधा उठा तोह अर्जुन की खुद की नाभि से भी 3 इंच ऊपर जा पंहुचा. वो हैरत से इस मूसल को अपनी आँखों के इतना करीब देख रही थी. इधर अर्जुन ये जान कर थोड़ा स्तब्ध था की उसका और अनामिका का सच आँचल जान चुकी है. मुँह बंद रखवाने के लिए तोह ये अब और भी जरुरी हो गया था.

"वो तोह गोली खा कर सोई है पर ये अंदर गया तोह आपकी हालत सचमुच की गोली लगने जैसी कर देगा. जानती हो न के इंसान तब कैसे छीकता है? चची अनुभवी थी फिर भी उन्हें अभी तक दर्द है वह. आप सुबह चल न सकोगी.", अर्जुन ने फिर से टालने की कोशिश की और उधर कॉम्पटर पर जो तस्वीर थी उसमे वो नाजुक सी कमसिन कन्या उस मॉटे नाग को होंठो पर लगाए उसका सफ़ेद विष जीभ पर गिराए थी, जो बेहटा हुआ ठुड्डी से निचे टपक रहा था. आँचल का दिमाग बस अब सुन्न हो चला था अपने जिस्म की गर्मी के सामने. हाथ एकाएक लहराया और वो मॉटे बांस सा हिलता कामदण्ड किसी कुशल सपेरे की भाँती आँचल ने हथेली में भर लिया. एक इंच के लगभग तोह वो उसकी पकड़ से हे बहार था और उसकी सख्ती के साथ गर्मी हथेली के भीतर जाती लगी. आँखों में लाल डोरे उभरने लगे थे आँचल की और अर्जुन ने भी उस हथियार को उठाये रखा बाकी गिरते हुए.

"लड़की बड़े बड़ा लुंड ले सकती है जैसा तुमने कहा था अभी और मुझे तोह 18 पार किये भी 5 साल होने को आये. आह्हः.. कितना मोटा और सख्त है ये.. उस कालिये से भी ज्यादा मोटा दिख रहा, शायद लम्बा भी. ये आज रात मुझे हर हाल में अपने अंदर लेना है अर्जुन..", अर्जुन पर भी अलग सा खुमार छ चूका था वो तस्वीरें देखने के बाद और उस से पहले कही और गरमा गरम बातें करने की वजह से. गॉड की तरफ झुकी आँचल का कन्धा पकड़ कर अर्जुन ने उसके चेहरे को सुपडे से सत्ता दिया. नीचे लटकते मॉटे मॉटे चुचो में से एक को कपडे के ऊपर से हे हथेली में भरते हुए वो आँचल से अपनी इत्छा जाता चूका था.

"किश करू?"

"जो दिल करे वो करो.", और आँचल ने हिम्मत एकत्रित करते हुए होंठ खोले हे थे की दरवाजे पर हुई दस्तक के साथ दोनों हे हक्के बक्के से जड़ हो गए.
 
ऐसा है मित्रो की हम तोह ड्राई डे में भी विश्वास नहीं करते और जब कहानी लिखते है और कुछ ख़ास दृश्य सम्मिलित करने हो तोह 4 पेग ग्लेंफिद्दीच 😍 के अवशय लगाते है. ऐसा चित्रकारी के समय भी रहता है क्योंकि तब थोड़ा आजाद सा महसूस होता है. जिस दिन नहीं लिखता उस दिन ठंडी बियर से काम चला लेता हु. नींद न मिल रही हो तोह 1 लार्ज पेग मदद करता है.

अब बात करे ग्लेन सिब्लिंग्स को तोह हमारे जोड़ीदार XLNC भाई को दूसरी ग्लेन पसंद है क्योंकि इन्हे डिटेल्स बहोत पसंद है और एक बढ़िया शराब में 12-18 बरस बाद ऐसी हे डिटेल्स मिलती है लेकिन सबका अलग स्वाद जिसमे बड़े भाई की प्रिय है ग्लेनलेवित 😍

और ग्लेन सिब्लिंग्स के जैसे हम दोनों, पीपर एंड साल्ट बियर्ड. गर्व है हमे अल्कोहल अड्मिरतीओं (आ) पर.

चियर्स. 🥃🌱
 
टी: किशोर डा से बेहतर कोई नहीं?

ा: मुझे तोह कुमार साणु भी पसंद है, नितिन मुकेश भी, रफ़ी साहब और अभिजीत भी.

टी: तुमने 4 नाम लिए है और अगर 4 और भी लेते तब भी किशोर डा अकेले उनकी पूर्ति कर देते. हाँ अपवाद होता गर तुम गुलाम अली खान साहब या नुसरत जी का नाम लेते पर फिर बात अलग होती.

ा: 'बेखुदी में सनम, उठ गए जो कदम' इस से बेहतर शामे सिचुएशन में अपने किशोर साहब का गीत फरमाओ तोह?

टी: बदले में तुम्हे निर्वस्त्र खड़े होना होगा वो सामने वाले लकड़ी के पुल्ल पर.

ा: जीता तब भी होऊंगा, साथ आपको लिए.

टी: कुछ तोह लोग कहेंगे, लोगो का काम है कहना.. वैसे मैं हारने को तैयार हु लेकिन रात गहराने दो. और तुम्हे भी मैं ऐसा नजराना दुनिया को दिखने नहीं देने वाली.

ा: उम्म्म... जानता हु. करने को बहोत कुछ है बस बहाने कुछ काम. "ये शाम मस्तानी' आपके हे किशोर का.

टी: मेरे नहीं.. क्योंकि मेरे सिर्फ तुम हो.. तिलोत्तमा के अर्जुन.. उम्.. ाः..

आओ हुजूर तुमको.. सितारों में ले चालू..
 
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