Incest Pyaar - 100 Baar - Page 52 - SexBaba
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Incest Pyaar - 100 Baar

कल.. आखिर ये कल क्यों आज नहीं होता?

काश.. और जीवन इसके बिना कितना बेहतर होता ...

तुम आओगे फिर वही जहाँ ये जहां काश और कल से अलग होगा..

तुम रह लो कुछ दूर आज पर कल हमारा साथ होगा..

मैं कोई मौसम नहीं न प्यार मेरा..

बस आजाद हो कर आना सरताज..

वह तेरा कोई और न होगा..

बिखरे प्यार को समेटना मैं जानती हु..

टूटे तारों से दुआएं कमजोर चाहते है..

तुम्हारे पहलु में जब कुदरत की प्रीत से ये हरितु होगी..

कुबेर की जागीर खुद आरती तुम्हारी उतारती मिलेगी..

वहाँ बस काश न होगा पार्थ, तुम्हारी सुभद्रा होगी..

चक्रव्यूह अभी से पहले खुद तहस नहस करती..

तुम कुछ मासूम हो और लम्पट भी..

चलता है जब रेखा से घिरे कोमल मधु हो..

पूर्णकार तो हम पहले हे हो चुके..

अब एकाकार होना है ...

हाँ अब समाज से भिड़ंत है.

तुम्हे साकार होना है .
 
XLNC भाई योर थॉट्स ों अबोवे सयिंग? हे aalu क्रैक थिस पोएम विथ सर eternity .. बाकी firefox420 लोमड़ी भी हिंदी जानती है जितना टिनटिन भाई उर्फ़ aka3829 या Anil23265 . हाँ Billi420 और Fâķîřă या Professsor बड़े लोग
 
दोस्तों ऐसा है की अभी शिफ्टिंग चल रही नयी जगह पर और नया बीएड लेके आने पर वो अपने अंगूठे पर गिरा बैठा. रेखा के बसंत स्थान को लिखने के बाद जन्नत का सन बीच में हे रह गया. नाखून तोह फिर नहीं आने वाला पाँव पर लेकिन ये अपडेट मई कल हर हाल में दूंगा. आज के लिए माफ़ी क्योंकि हालात ठीक नहीं
 
अपडेट 212

अरमान

लोहे और लकड़ी से बने इस बड़े से द्वार के सामने जब ये गाडी रुकी तोह शहर से इस घने जंगल तक आते हुए 2 किलोमीटर के सफर में हे सभी लड़कियां विस्मित और आनंदित हो चुकी थी. रास्ता इतना साफ़ था जैसे यहाँ तक की सड़क इनके आने से पहले हे बानी हो और मुख्या मार्ग से 500 मीटर भीतर तक एकमात्र सड़क इस द्वार के सामने हे ख़तम होती थी जहा पूरे रस्ते घने वृक्षों ने दिन में हे अत्यधिक छाया कर रख थी. ये घर तोह कदापि न था क्योंकि जहा तक नजर जाती थी चारदीवारी का सामने वाला हिस्सा हे दीखता था. 15 फ़ीट ऊँची और किसी किले से मोती दीवारे जिनके ऊपर कटीली बाद अलग सुरक्षा देती थी. बस वो द्वार के बाल में बने कमरे से बहार निकल कर हाथ जोड़ने के बाद बेअरिंग लगे दरवाजो को खोलता व्यक्ति उतना मजबूत और तगड़ा न था जिसके सर की सफेदी उसकी उम्र से ज्यादा जान पड़ती थी.

"मालकिन जैसा कहा था वैसे इंतजाम कर दिए है आपके और परिवार के लिए. पहली और दूसरी मंज़िल के 6 कमरे साफ़ करवा दिए है और कुंती 24 घंटा आपकी सेवा में रहेगी. वो भीतर हे है और उसका कमरा भी पिछले हिस्से में दे दिया है.", गाडी से अभी कोई बहार नहीं निकला था और ये बुजुर्ग हाथ जोड़े सुनंदा जी को सब जानकारी दे रहा था जिन्होंने अपनी तरफ की खिड़की का शिक्षा उतार कर प्रतिउत्तर में एक हलकी सी मुस्कान के साथ हामी भरी.

"माँ जी की araam-gaah की तरफ तोह कोई नहीं गया न लाल जी?", ये सुन्न कर चौकीदार ने तुरंत ना में सर हिलाया.

"हम भी सिर्फ चारदीवारी की किनारे हे चक्कर लगते है मालकिन और रात को 5 के 5 कुत्ता खोल देते है. 6 महीने पहले 2 आदमी झील की तरफ से दिवार फांद आये थे जिन्हे उधर हे दबा दिया जब मरे मिले. आपसे दरखास्त थी की जैसे कुंती और दमा को यहाँ काम पे रखा है हमारे bete-bahu का भी कुछ करवा दीजिये. चाहे इधर न सही, कही और देख लीजिये मालकिन."

"कल बात करते है इस बारे में लाल जी. अभी बचे भी सफर से थके हुए है और हम भी. बिजली रहती है यहाँ अब?"

"जी अलग लाइन करवा दिए थे अफसर बाबू जब इन्हे सड़क बानी थी और टेलीफोन का खम्बा भी अब भीतर तक आ गया है. बहार के काम के लिए हमारे दामाद को आदेश दे दीजियेगा, अभी तोह उसको छत्त का सफाई पर लगाए है. भूषण नाम है उसका.", बुजुर्ग एक तरफ हो गया था अपनी बात कहने के बाद और रेखा ने गाडी भीतर दाखिल की तोह खिड़की किनारे बैठी अलका तोह हर तरफ लगे आम और लीची से लाडे वृक्षों को निहारने लगी. जैसे भीतर भी एक जंगल हे था लेकिन तराशा हुआ खूबसूरत बगीचे नुमा जंगल और उसके बीच हर तरफ गुमटी वो चौका पत्थर की 15 फ़ीट चौड़ी सड़क. एक बड़े हिस्से में साफ़ तराशी हे सिलेक्शन घास के बीचो बीच लगा शाही फुजहरा जिसकी मुंडेर पर बैठे असंख्य पक्षी दाना चुगने के साथ अपनी चोंच से जल पीते और क्रीड़ा करते इस वाहन से कोई परहेज करते न दिखे. ये 2 मंज़िला बड़ी सफ़ेद इमारत किसी घनाभ (सुबोइड) सी एक सामान था जिसके हर तरफ phal-phool के बेहद साफ़ बगीचे अलग अलग कक्षा में बने इसकी आभा बढ़ा रहे थे.

"वाओ. ये तोह हम किसी फोर्ट में आ गए जिसके अंदर महल बना हो. बड़ी माँ यहाँ कितने लोग इसकी देखभाल करते है? शायद 25-30 या ज्यादा. नानी यहाँ कितने कमरे होंगे? और ये सबकुछ आपका है?", आरती की बात पर गाडी से निचे उतरती रेखा जी बस मुस्कुराने लगी थी और ऋतू भीतर जाने की जगह उस तरफ चली जहा अमरुद के घने वृक्ष पर फलो के जितने हे टूटते (पररयस) मौजूद थे. एक लगभग 30 वर्षीया महिला घागरे और चोली के साथ सर पे पल्लू लिए उनके सामने हाथ जोड़ कर कड़ी हो गयी.

"हमारी दादी ने इसको कभी महल नहीं कहा बिटिया. उनके लिए बसंत था, बहार हिंदी में लिखा भी था जो तुमने देखा नहीं. इधर तोह दोनों मंज़िलो पर 20-21 कमरे होंगे जो ज्यादातर कभी प्रयोग हे नहीं हुए. पिछले हिस्से में एक और बिल्डिंग है जहा वो grishm-hritu में समय बीत्या करती थी और उनके बाद थोड़ा बहोत हमारी माँ वह रही. फिर वो 50 बरस से बंद हे है बस कभी कभार साफ़ सफाई करवाने के लिए हे खुलवाया जाता रहा लेकिन वो भी अपनी निगरानी में. इधर बाकी प्रॉपर्टी हर हफ्ते साफ़ होती है जो सरकारी जानकार है वो करवाते है. आखिर हमने उन्हें सड़क के लिए हमारी जगह जो दी बिना कोई पैसा लिए. कुंती तुम्हारा पति कहा है?", आरती को सब जानकारी देने के बाद उन्होंने इस सेविका की तरफ रुख किया. रेखा जी तोह उस आलिशान टीक के द्वार से घर के भीतर जा चुकी थी. अलका गाडी के पिछले हिस्से से बैग उतरने लगी तोह उसको सुनंदा जी ने हे रोक दिया.

"जी मालकिन, वो आते हे होंगे. सामान हम ले जाते है छोटी बीबी जी.", अब ऋतू भी लौट आयी थी जिसने अपनी नानी की परवाह न करते हुए खुद हे अपने बैग उतार लिए और ठीक तभी सलेटी कमीज और थोड़ा मैला सा पजामा पहने ये 35-40 बरस का व्यक्ति उनके सामने प्रकट हुआ जिसके कान पर बीड़ी तंगी थी और कंधे पर मैला अंगोछा. उसकी नजर एकटक ऋतू और अलका पर हे तिकी थी जैसे उसको उम्मीद हे न हो की इतनी खूबसूरत लड़कियां वो अपने जीवन में साक्षात् देख सकेगा.

"नजरे नीची रखो लड़के.", अब सभी सुनंदा जी को हे देख रहे थे और वो व्यक्ति जैसे इतनी कड़क आवाज और इस चांदी रंग के बालो वाली महिला को न देख पाने की अपनी गलती पर काँप सा गया था. तुरंत उसने नजरे झुका कर हाथ जोड़ दिए पर अपनी माँ की आवाज सुन्न कर रेखा भी बहार आ चुकी थी जिसके जिस्म पर अब दुपट्टा नहीं था और न हथेली पर वो दस्ताना.

"कब से हो यहाँ पर?", रेखा ने इशारे से माँ और बचो को भीतर जाने का कहा बस ऋतू बाकी बैग उतारने में लगी थी. अलका और आरती 2-2 बैग ले कर अपनी नानी के साथ एक दो बार पीछे मदद कर देखने के बाद उस आलिशान घर में दाखिल हो गयी. सफारी की अगली सीट के सामने बानी दराज से वो रिवॉल्वर निकालने के बाद जिस तरह से रेखा ने उसमे कारतूस भरे थे भूषण के साथ साथ उसकी बीवी कुंती को भी जैसे लकवा मार गया. कहा तोह एक पल के लिए भूषण रेखा की असाधारण ख़ूबसूरती और मीठी आवाज से थोड़ा सम्भला था और अब सीधा बात की जगह सामने पिस्तौल देख कर उसकी घिघि बांध गयी.

"जी.. जी... मालकिन कल हे आये है. कोई गलती हो गयी क्या हमसे?", उसकी लड़खड़ाती जुबान भी जैसे दलील देने के काबिल नहीं थी.

"कल आये हो और 24 घंटे से पहले हे जाने की तैयारी में हो? गेट से कोई आदेश नहीं मिला था तुम्हे या उनके दामाद हो तोह इस जगह के भी मालिक बन बैठे? क्या कहा गया था तुम्हे लाल जी द्वारा यहाँ काम पर रखने से पहले?", पिस्तौल का सुरक्षा पिन हटा कर रेखा उसकी नाली में कारतूस उठा चुकी थी जिसका मतलब था की गोली कभी भी चल सकती है पर आवाज में अभी भी नरमी और चेहरे पर बेहद शान्ति.

"जी हम समझाए थे इन्हे मालकिन की महल के भीतर इनकी मनाही है और बाग़ और जानवरो की देखभाल इनके जिम्मे है. बाबा ने हम दोनों को हमारे काम ाचे से समझाए थे. इस बार माफ़ कर दीजिये, आइंदा गलती का मौका नहीं मिलेगा."

"लगातार गलतियां माफ़ नहीं होती और तुम्हार कान पर जहा बीड़ी तंगी है वही सुराख बना कर बीड़ी घुसा दूंगी आइंदा किसी के भी 100 कदम पास दिखे. उतनी दुरी से भी निशाना अचूक है मेरा और देखना चाहो तोह अभी दिखा देती हु.", रेखा ने लोड की हुई पिस्तौल एक बार तोह भूषण की तरफ हे तान दी थी जिसकी हवा उड़द गयी ये देख और ऋतू इस दृश्य में भी अपनी माँ की सधी हुई ब्याह, पिस्तौल पर पकड़ और उनके सपाट चेहरे को देख रही थी. बस इसके बाद 2 आवाज गूंजी वातावरण में, एक गोली चलने की और दूसरी 100 कदम से ज्यादा दूर लगे उस पोल पर दिन में रोशन लाइट के कांच टूटने की. भूषण दोनों कानो पर हाथ धरे जमीन पर घुटने टिका चूका था और वृक्षों पर बैठे पंछी कोलाहल करते आसमान में इधर उधर उड़ने लगे.

"जब जरुरत होगी तोह तुम तक संदेसा पंहुचा दिया जाएगा और इतने तुम वह प्रवेश द्वार पर रहोगे अगर बहार की साफ़ सफाई से फुर्सत मिले तोह. किसी भी तरह की taank-jhaank या गुस्ताखी के बदले उस बल्ब सा हाल होगा जो बेवजह जल रहा था और अब कभी जल न सकेगा. कुंती, तुम्हे तोह समझने की जरुरत नहीं होगी और तुम लगती भी समझदार हो. रसोईघर में तुम्हारा प्रवेश भी वर्जित है, सिर्फ saaf-safaai और जब जरुरत हो तभी काम. चलो ऋतू, अपना कमरा देख लो.", गाडी के शीशे खुले छोड़ कर हे माँ बेटी भीतर बढ़ चली पीछे इन दोनों को इनके काम समझा कर. गोली की आवाज और फिर अपने दामाद को ऐसे बैठा देख कर इनसे कही दूर खड़े लाल जी ने भी सर पे हाथ रखते हुए ना में सर हिलाया और फिर चेहरा पांच कर अपनी खोली में घुस गए.

"मैं बोली थी की हर तरफ अपनी ठरक मत दिखाया करो और जब इतने समय खाली रहने के बाद इतनी बढ़िया नौकरी और पगार लगी है तब भी अकाल न आयी? गलती मेरी हे है जो अपने बाबा की बात न मान कर तुमसे ब्याह किया और आज तुमने उनका भी सर झुकवा दिया जहा वो 40 बरस से िज्जात्त की ज़िन्दगी जी रहे थे. ये गाँव देहात नहीं है जहा तुम अपनी लार गिरते रहे और मैं आंसू बहती रही. हाथ न जोड़ती तोह भेजा खोल देती मालकिन तुम्हारा और सुहाग उजाड़ जाता हमारा. जाओ अपनी खोली में और खटिया तोड़ो बीड़ी पीते हुए.", कुंती दबी आवाज के साथ आंसू बहती हुई अपने हे पति को कोस रही थी जिसकी ऐसी गलती से उसका और उसके पिता का सर झुका था.

"हम इधर काम हे नहीं करते और तुम भी सामान बांधो और चला इन्हे से. साला बन्दूक और अमीरी का धौंस दिखती है शहरी kutiya..aaahhhhh.", इस बार jhannate-dar थप्पड़ ने उठते हुए भूषण को धरती सुंघा दी थी जो उस नाजुक दिखती आरती ने मारा था जिसकी तरफ भूषण ने गन्दी नजर गड़ाई थी. पक्का घाघ इंसान था जो गलती स्वीकारने की जगह रेखा को हे पीठ पीछे गाली दे रहा था. अब उसके होंठ की किनारे से बेहटा खून और बाए गाल पर छपी 4 उँगलियाँ उस नाजुक लड़की का दम दिख रही थी जिसको वो हलके में ले रहा था.

"बड़ी माँ इधर साथ नहीं आयी होती न तोह मैंने वही तुम्हारी दोनों आँखें निकाल लेनी थी जब तुमने इतने घिनोने तरीके से देखा था मुझे और मेरी बहिन को. और तुम अंदर जाओ, नानी बुला रही है इतने मैं जरा इसका हिसाब ाचे से कर दू.", कुंती क्या कहती जब उसके पति ने काम हे ऐसा किया था पर वो बात को ख़तम करने के उद्देश्य से बोली.

"जाने दीजिये बीबी जी, वैसे हे ये गाँव वापिस जा रहे है. हम तोह बाबा के पास रहने आये थे और ये छोड़ने आये थे हमे. लेकिन बढ़िया नौकरी के चक्कर में इन्होने भी रुकने का मैं बना लिया था. अब ये गाँव लौट जाएंगे."

"जो मर्द अपनी बीवी को हे 2 वक़्त की रोटी नहीं खिला सकता तुम उसको बचा रही हो? वो अंकल का सर झुकता मैंने खुद देखा था खिड़की से. और जमीन की ठंडक का मजा ले रहे हो क्या तुम? 5 मिनट.. 5 मिनट में अपना बोरिया बिस्टेर बांधो और निकलो यहाँ से. अगर तुम भी जाना चाहती हो तोह कोई परेशानी नहीं हमे. सबको काम करना आता है यहाँ.", आरती ने भूषण को अभी तक जमीन पर पसरे देखा तोह झुक कर उसका कालर हे पकड़ा था की दारु की तीखी दुगंध ने उसका दिमाग घुमा दिया.

"छियई.. बड़ी माँ... ", बस अभी उसने इतना हे कहा था गिरेबान छोड़ कर की भूषण पलटी खता हुआ कुछ दूर हुआ और सरपट बहार की तरफ दौड़ लगा दी. एक बार भी उसने पीछे मदद कर न देखा क्योंकि जिसको आरती ने आवाज दी थी वो यक़ीनन उसको गोली हे मारती शराब का पता चलने पर या अभद्रता दोहराने की गलती जान कर. लाल जी ने भी ये सब दुरी से हे देखा था जिन्होंने बड़े द्वार की बगल वाला छोटा फाटक खोलते हुए इस नामुराद को जगह छोड़ने का रास्ता दिखा दिया. द्वार पुनः बंद करता हुआ वो बुजुर्ग धीमे कदमो से इस तरफ हे आने लगा था जहा रेखा भी आ चुकी थी अपनी बेटी की आवाज पर.

"माफ़ करना मालकिन, उस नामुराद को बेहतर जीवन देने की इत्छा थी हमारी क्योंकि बेटी ब्याहने के बाद हम हे खर्चा के पैसे भिजवाते रहे इनके घर. अब हमने मन कर दिया था अपने बीटा को ब्याहने के बाद तोह ये इसको छोड़ने के लिए आया था. सोचा नौकरी करेगा तोह बेटी का घर भी बचा रहेगा. कुंती बहोत मेहनती है मालकिन और बहोत दुःख झेले है हमारी बिटिया ने. इस बूढ़े की पहली और आखिरी गलती समझ कर इसको इधर हे रहने दीजिये चाहे पगार न दे."

"बचे जवानी में अक्सर गलतियां कर देते है बाबा और बेटी अगर गलत व्यक्ति से ब्याही गयी हो तोह बेहतर है की वो वापिस अपने हे घर रहे. लेकिन वो इंसान कही आसपास भी नजर आया तोह कारतूस आपकी बन्दूक में भी है. बाकी हम खुद देख लेंगे. जाओ कुंती तुम आराम करो, शाम को थोड़ा कमरों को एक बार फिर देख लेना. तुम्हारी पगार जो बताई गयी है वो वैसी हे रहेगी बाकी समय समय पर इजाफा होता रहेगा. तुम्हारे रहने की जगह में किसी तरह की कमी हो तोह बताना, हम सुधार करवा देंगे. चलो आरती, कपडे अलमारी में लगा कर अगर नहाना हो तोह ठीक नहीं तोह आराम कर लो. फिर आराम से घूम लेना.", रेखा जाने के लिए मुड़ी हे थी की लाल जी ने क्षमा चाहते हुए अगली बात कही.

"बीबी जी, कुत्ता के पिंजड़ा की तरफ न भेजिएगा. गद्दी नेसल है न थोड़ा जल्दी ताव में आ जाती है. सिर्फ हमको और बड़ी मालकिन के भाई साहब को हे जानते है वो."

"चलो पहले हमे वही ले चलो. आओ आरती बीटा देखे ये कौनसे पालतू है जो मालिक को नहीं पहचानते.", रेखा आगे आगे लाल जी के साथ चलने लगी थी इस इमारत के हे किनारे और पीछे से घुटनो तक की निक्कर और ढीली लम्बी टीशर्ट पहने ऋतू भी दौड़ती चली आयी.

"मैं भी चलती हु घूमने.", हाथ में ब्रेड और जैम का टोस्ट था जो उसने खुद हे बनाया था थोड़ी भूख की वजह से. एक बार रेखा जी ने उसका पहरावा और ख़ुशी देखि फिर मुस्कुराते हुए जवाब दिया.

"घूमने नहीं जा रहे बस यहाँ के सिक्योरिटी गार्ड्स से मिलने जा रहे है. खाते हुए तेज नहीं चलते.", ऋतू ने अभी एक हिस्सा काट कर मुँह में भरा हे था की नसीहत सुन्न कर चाल धीमी कर ली.

"बड़ी माँ और मोटी ये मुझे बोलती है. देखो वह भी इसने पराठे और लस्सी खाये और इधर आते हे ब्रेड जैम शुरू. वैसे डॉग्स को बंद क्यों रखते है बड़ी माँ? वो इर्रिटेट नहीं होते ऐसे?"

"तभी तोह देखने जा रहे है की वो कितने इर्रिटेट है. और ऋतू की डाइट मौसम की तरह है बीटा. न खाये तोह नवरात्रे और खाने लगे तोह भीम. हुन्न्न.. तोह ये पल्टन है जो रात को पहरा देती है? इन्हे खाना कौन देता है बाबा?", छायादार बाड़े में 5 गद्दी नेसल के बड़े बड़े कुत्ते इन्हे देखते हे ऊँची आवाज में भौंकने लगे थे. गले में मोटी जंजीरे और भालू जैसे घने बाल. ये 5 कुत्ते कुछ अधिक हे विशाल और उत्तेजित थे.

"जी मालकिन सुबह और शाम को 2 बार हम हे खाना देते है. शहर से दोनों समय इनके लिए मांस और दूध रोटी होटल वाला पंहुचा जाता है. ये आखिर वाला ज्यादा खूंखार है, कई दफा हमे हे पंजा मार चूका है.", बाड़े में बंद उस काले झबरैले कुत्ते के दांत बहार झलक रहे थे जिसके पाँव की तरफ भूरा रंग था. रेखा ने दोनों लड़कियों को पीछे हटा कर उसी कुत्ते के बाड़े की चिटकनी खोली जिसको लाल जी ने खूंखार बताया था. दोनों पाँव उठता वो बाड़े पर मारने की कोशिश कर रहा था जबकि जंजीर उसको ऐसा करने से रोकती रही.

"शहहह.. आराम से आराम से.. ", रेखा ने वो जाली खोल कर बहोत आहिस्ता आहिस्ता इस गुस्सैल से जान पड़ते कुत्ते की तरफ कदम बढ़ाया तोह वो बस 'गर्डर' गर्डर की धीमी आवाज करता रहा जो जल्द हे बंद हो गयी. रेखा अब ठीक उसके मुँह के करीब कड़ी थी जिसको कुछ पल सूंघने के बाद ये कुत्ता पीछे होता हुआ ईंट के फर्श पर आराम से पाँव पसारता हुआ बैठ गया. बगल के बादो में भी बस एक हे कुत्ता शोर मचा रहा था जबकि 3 उछाल कूद करते या अपनी जगह वापिस बैठ गए. जमीन में गदा लोहे का खूंटा और वो भारी चैन देख कर रेखा ने पहले अपना हाथ इस कुत्ते के मुँह के सामने रख दिया जिसको बस एक बार सूंघने मात्रा से वो अपनी जीभ से चाटने लगा था. रेखा को कुछ वक़्त उसके सामने बैठना पड़ा जिस से वो इसका विश्वास हांसिल कर सके.

"तुम्हे जंजीर पसंद नहीं न? और ये भारी भी है. चलो अबसे इसकी जरुरत नहीं.", वो एक बार हलके से गुर्राया पर उसके सर को सहलाते हुए दूसरे हाथ से रेखा ने पत्ते से जंजीर जुड़ा कर दी. बहार कड़ी दोनों लड़कियां और लाल जी के साथ उनकी बेटी ये सब बड़े गौर से देख रहे थे.

"भागना मत बीटा अगर ये तुम्हारे पास आये तोह. हाथ भी नहीं लगाना जब तक ये कम्फर्टेबले न लगे. यही इनका अल्फा है इसलिए बाकि भी देखो शांत हो गए.", रेखा ने थोड़ी हिम्मत करके उसके जबड़ो को हे सेहला दिया जो श्वान को समझाता है उसके मालिक का हक़. रेखा के उठते हे वो भी मुस्तैदी से साथ हे उठ कर बहार आ गया. झबरैली गोल पूँछ बेहद शानदार थी जिसको हिलता हुआ वो एक बार सभी को सूंघता रहा जहा आरती को थोड़ा डर लगा जिसने ऋतू की कलाई थाम ली थी. पर फिर ये जीव वापिस रेखा की तरफ हे आ रुका.

"सबको खोल देते है. वैसे इसका नाम क्या है बाबा?"

"मालिन नाम नहीं दिए है इन्हे, बस शेरू कह देते है जिस पर सभी समझ जाते है. देख लीजियेगा मालकिन अगर कोई भड़क गया तोह नुक्सान न हो जाए."

"अब नुक्सान नहीं होगा और इन्हे जंजीर मत बांधिएगा आइंदा. इसको छोड़ कर बाकी सभी काम उम्र लगते है?", रेखा ने हे लाल जी के साथ बाकी चारों को खोला जो किसी पर लपकने की बजाये इस बड़े वाले के हे करीब आ कर उसको सूंघने लगे.

"यह इन तीनो का पिता है मालकिन और ये भूरे रंग वाली इनकी माँ है. हाँ कह तोह कुछ नहीं रहे किसी को और ये भूरी इनमे सबसे शांत है मालकिन.", सचमुच वो भूरे रंग की मादा मिलनसार हे थी जिसने ऋतू के हाथो से bread-jam का टुकड़ा लेने के बाद घुटनो से सर रगड़ कर आभार जताया. उसके तीनो व्यस्क बचो ने भी सूंघने के बाद वो छोटे छोटे टुकड़े ग्रहण किये और वापिस खुले पिंजरे में दाखिल हो गए पानी पीने के लिए.

"अब इनकी जाली खुली हे रखियेगा बाकी खाने का भी हम देख लेंगे. कुंती तुम रोटी पका देना, सामान मंगवा देंगे.", रेखा के चलते हे ये सभी पीछे हे चल दिए पर तीन श्वान आगे पीछे दौड़ते हुए आपस में हे खेलते रहे. जबकि उनके माता पिता बस सधी चाल से रेखा के बराबर. लाल जी द्वार की तरफ बढ़ चले स्थिति को इतना सहज देखने के बाद.

"बस यही रहो तुम लोग, अंदर नहीं आना. थोड़ी देर में खाना देते है सबको.", रेखा ने उन दोनों बड़े श्वान को सर पे थपकी देते हुए घर के दरवाजे से पहले हे रोक दिया जहा घनी छाया में वो इधर उधर घूमने के बाद पसर चुके थे.

"वाह माँ, आप तोह एक बार भी नहीं दरी. वैसे ये सचमुच काफी बड़े डॉग्स है. उमेद चाचा के घर भी था एक ऐसा लेकिन वो तोह सोया हे रहता था जब देखा."

"बीटा तुम तोह ाचे से इनका स्वभाव जानती हो. ये सब महसूस करते है इंसानो से 100 गुना बेहतर. और विश्वास जीतने के लिए इनके सामने खुद को समर्पित भी करना पड़ता है. नेसल कोई भी हो, अगर गलत तरह से राखी जाए तोह नुक्सान और सही रखा जाए तोह परिवार का सदस्य. जाओ अब तुम उन्हें पानी दे कर आओ, मैं नहाने के बाद थोड़ा आराम करना चाहती हु. वैसे तुम्हारे चाचा ने गरम जगह पर ऐसी नेसल राखी हुई है जो ठन्डे इलाके में बेहतर बढ़ती है."

"बड़ी माँ, अलका को भी मिलवा देते है नहीं तोह पता लगे बेचारी को काट लिया किसी ने."

"वो खेल खेल में भी काट सकते है बस जोर जबरदस्ती मैट करना. पूँछ के तोह आसपास भी नहीं. जाओ ले जाओ अलका को भी.", हॉल इतना आलिशान बना हुआ था की कोई महल भी तुलना पर 10 बार सोचता. हर तरफ मकराना मोरवादी संगेमरमर और आबनूस की रेशेदार लकड़ी का उत्कृष्ट kaam.Mej, चिमनी, कुर्सियां और दिवार में बने झरोखे खिड़की तक आबनूस के लकड़ी के. फर्श पर लाल कारीगरी वाला सफ़ेद काले और छत्त पर लैंप लगे सुनहरे पंखे. ये जगह भीतर से तोह और भी वैभशाली थी जहा किसी भी बाहरी को आने की इजाजत नहीं थी. बचो की नजर से बचा कर रेखा जी ऊपरी मंजिल पर कमरे में जाते हुए लकड़ी की उस अलमारी से एक मदिरा की बोतल साथ ले गयी थी. शराब से हमेशा दूर रहने वाली स्त्री इसका क्या करने वाली थी.

"ोये तुम दोनों ने बाथरूम देखे क्या? जितना बड़ा कमरा है न उतना हे बड़े बाथरूम है इधर और क्या बाथटब है यार आरती, 2 या 3 लोग भी आराम से बैठ सके.", अलका नाहा कर अभी खिली खिली लग रही थी जिसने गाज्रि रंग की निक्कर के ऊपर सफ़ेद बिना ब्याह की कमीज पहनी थी और हमेशा की तरह तजा गुलाब सी उसकी खूबसूरती.

"तेरे वाले में फिर अलग है यार बाथरूम. तू ऊपर है न माँ की बगल वाले कमरे में? मेरे और आरती वाले कमरों में तोह शावर लगे है पर बीएड बहोत सही है. चल कौनसा कमरे फिक्स है? जहा दिल करेगा वह सो जाएंगे पर ये माँ यहाँ से व्हिस्की की बोतल क्यों लेके गयी?", मतलब ऋतू ने ये देख लिया था जिसका जवाब भी था अलका के पास.

"चची के हाथ में कॉटन और छोटी कैंची भी थी. स्टीट्चेस खोल रही होंगी, हफ्ते से ऊपर हो गया है."

"ओह सहित. यार तुम दोनों जरा बहार डॉग्स को पानी पिलाओ मैं माँ के स्टीट्चेस खोल कर बैंडेज करती हु.", ऋतू तुरंत हे उन बड़ी सीढ़ियों पर सरपट दौड़ गयी. एक बार तोह आरती और अलका ने भी उसके मादक कूल्हों और चिकनी जांघो को निहारा फिर आपस में एक दूसरे को देखती हुई मुस्कुरा दी. अलका को फिर याद आ गया की ऋतू क्या कह कर गयी थी.

"डॉग्स?"

"आजा दिखती हु तुझे भालू जैसे कुत्ते पर बाबा डरना मैट नहीं तोह मैं तुझसे पहले भाग पड़ूँगी.", आरती का डर अभी भी ज्यादा काम नहीं हुआ था जिस पर हंसती हुई अलका उसको आँख मरती हुई अपने साथ हे रसोई की तरफ ले चली. इनका यहाँ आना और आते हे व्यस्त हो जाना भी मजेदार हे था.

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कृष्णेश्वर जी की चौपाल उतरने के बाद अर्जुन उनसे थोड़ी देर बात करता रहा. दोनों स्टेडियम की नीव रखे जाने के कार्यक्रम से लौटे थे जो स्वयं रानी सौंदर्य ने पूर्ण किया था कुमार और अर्जुन के हाथो. सम्मान स्वरुप दोनों गाँव के कुछ खिलाडियों और प्रशिक्षकों को भी सम्मानित किया गया और स्वयं रानी माँ के हाथो मिले सम्मान से सभी अत्यधिक खुश थे.

"तोह बीटा भैया को पता है तुम उधर जा रहे हो? लम्बा रास्ता है बीटा और इतनी धुप में जाने लगे हो?"

"वो बिपास की तरफ से निकलूंगा न दादा जी तोह एक घंटा भी बचेगा और अभी थोड़ा काम भी है. बस आप थोड़ा देख लेना घर पे बाकी बौ जी को मैं हे बता दूंगा. घर से बस तैयार हो कर निकल रहा हु, आप आ जाना हुक्का ख़तम करके भोजन के लिए.", अर्जुन यहाँ से निकल कर दीपा भाभी को भी बहार से हे सूचित करता हवेली आ रुका.

"कैसा रहा प्रोग्राम? पापा नहीं आये क्या बीटा?", रौशनी ने अर्जुन को पानी देते हुए जानकारी लेनी चाही जैसा पता था.

"बुआ वो आ रहे है थोड़ी देर तक और प्रोग्राम ाचा रहा. हाँ मैं लंच नहीं करूँगा और थोड़ा जरुरी काम से बहार जा रहा हु. चची ठीक है अब?", अर्जुन ने गिलास वापिस देने के बाद अपने कमरे का रुख करते हुए हालचाल लेना चाहा.

"हाँ अब तोह चल फिर रही है. संजीदा ने दवा दी थी बुखार और दर्द की. तुम्हारे सभी कपडे उसने हे प्रेस करके कमरे में रख दिए है.", अर्जुन हैरान हुआ की उसके कपडे संजीदा ने इस्त्री किये है. फिर हामी भरता हुआ वो कमरे में दाखिल हुआ तोह हमेशा की तरह आँचल उसके कंप्यूटर के सामने बैठी बड़ी लगन से अभ्यास करती दिखी. अर्जुन ने हलके से गाल थापक कर ध्यान भांग करने के बाद अलमारी से नीली जीन्स और सफ़ेद कमीज निकली तोह आँचल बड़ी लालसा से उसको निहारने लगी थी.

"बहार बुआ है और 5 मिनट के लिए बस कपडे बदलने दीजिये."

"बदल लो यही, मैं कौनसा देख रही हु. माँ इस कमरे में नहीं आने वाली, रसोई में सब्जी राखी हुई है उन्होंने. वैसे तैयार हो कर किधर निकल रहे हो? खाने के बाद तोह टाइम मिलने वाला था.", आँचल कौनसा टाइम बता रही थी ये अर्जुन समझ रहा था और टीशर्ट उतार कर कमीज पहनते हुए उसकी नजरे निरंतर आँचल पर हे बानी रही.

"दिन में सही नहीं है चाहे सभी आराम हे क्यों न कर रहे हो. कल आराम से घूमने चलेंगे न खेतो की तरफ.", आँचल सहमत थी इस तर्क से और खेतो में घूमने का अर्थ उसको भी पता था अब. अर्जुन जीन्स और जूते पहन कर बाल ठीक करने के बाद फिर से अलमारी खोलने लगा तोह कमरे में छोटे छोटे कदम रखती अनामिका चची चली आयी.

"ये सब इधर नहीं रखा होता. वैसे खाना किस ख़ुशी में मन कर रहे हो?", पर्स, घडी, रुमाल उनके हाथ में देख अर्जुन का जैसे दिन अब पूरा हुआ था. आँचल ने कनखियों से देखा था की वो सामान लेने से पहले उनके हाथ थामे हुए था.

"थोड़ा काम है चची, आ कर बताऊंगा आपको. थैंक यू, मुझे लगा की आप आराम कर रही होंगी."

"तोह उस से क्या इनकी जगह जादू से बदल जाती क्या? गाडी से जा रहे हो?"

"नहीं मोटरसाइकिल से."

"धुप का चस्मा निकाल कर दू?"

"नहीं, हेलमेट हे ठीक है. अंधेर में भी चस्मा उतरने का ध्यान नहीं रहता फिर.", अब उसका ये जवाब सुन्न कर चची तोह मंद मंद मुस्कुरायी और जाने लगी पर आँचल खिलखिला उठी.

"ये तोह सचमुच हे बचा है मामी और आप तोह इसका ध्यान भी इतना रखती हो, छोटी से छोटी बात का."

"चची मेरी गर्लफ्रेंड भी है दीदी."

"धत्त.. कुछ भी बोलता है. चल आँचल खाना खाते है मेरे कमरे में.", चची के गाल सुर्ख हो गए थे क्योंकि ने ये बात तीसरे व्यक्ति के सामने बोल कर एक तरह से दोना सच मजाम में हे बता दिया. उनके जाते हे अर्जुन ने वो पितु बैग जांच कर उठाया और बहार चल दिया.

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"यार तुम्हारे गाँव के मुखिया आज तुम्हारे साथ नहीं आये क्या?", जीनत सेण्टर से अपनी सहेलियों के साथ हे बहार निकली थी और आदतन उसने मीनाक्षी की टांग खिंचाई शुरू कर दी अर्जुन का जीकर करते हुए. ऐसा आज पहली बार नहीं हो रहा था और मीनाक्षी ने भी हार मान ली थी उस से दूर रहने की जगह. गगन उसके हे साथ वापिस जाने वाली थी जैसे वो साथ हे आयी थी मीनाक्षी के.

"वो क्या इस सबके लिए हमेशा खाली रहते है क्या? उस दिन भी घर से निकले तोह मुझे इधर छोड़ दिया था. वैसे तुम हर वक़्त क्यों अर्जुन जी के पीछे पड़ी रहती हो? दिल तोह नहीं आ गया उन पर?", मीनाक्षी के जवाब और अंदाज से एक पल के लिए बाकी तीनो चौंकी पर जीनत ने एक मीठी सी आह भरने की नौटंकी करते हुए उसके कंधे पर हाथ रख कर कहा.

"दिल नहीं डार्लिंग जिस्म में हे आग लगने लगती है बस उसको याद करते हे. और तू तोह पीछे बैठी भी बहिन जी की तरह थी उसके नहीं तोह मैं तोह ये अनार रगड़ रगड़ कर लाल कर लेती अगर मौका मिलता बैठने का. चल आजा चौक पर जूस पीते है फिर तू वही से पकड़ लियो ऑटो.", इतनी उन्मुक्त बात सुन्न कर मीनाक्षी के तोह कान हे गरम हो गए और फिर वो अपना पहला चुम्बन न्यास हे जेहन में आ गया जिसके बाद से हे वो अर्जुन से दूर दूर रहने लगी थी. उसकी मरदाना पकड़ में भी कैसा सुखद एहसास था और उसने भी तोह खुद अर्जुन को जकड़ा था अंतरंग होंठो के रसपान में. मीनाक्षी को ऐसे खोया देख अब साक्षी ने चुहल की.

"कही मिनी उसने तेरी बिल्ली तोह नहीं मार दी जो तू लाल हो रही है जिनि की बात सुन्न कर? वैसे तू ऐसा कर नहीं सकती लेकिन वो चीज बड़ी ईमान गिराओ है यार. सचमुच जिनि ने जो कहा न मेरा हाल भी वैसा हे है. गग्गू डार्लिंग तू भी सपने देखती है क्या उसके?"

"धत्त.. मेरा दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं अर्जुन जी के साथ. हाँ आज उन्होंने स्टेडियम की जगह पर पूजा करवानी थी लेकिन हमारी क्लास थी इसलिए नहीं गए. अब हैंडसम तोह है पर मेरे लिए तोह पहले नौकरी और फिर अपने maa-papa की सेवा है. मिनी प्यार करती है पर इसको खुद नहीं पता. 3 दिन से तोह ये अर्जुन से खुद हे दूर है. भैया 4 जूस बना दीजिये, मीठा नहीं डालना.", गगन ने हे दूकान वाले को निर्देश दिया था और वो लोग फिर से थोड़ी दुरी पर छाया में कड़ी हो गयी. आसपास से गुजरते मनचले रफ़्तार काम करके इन्हे ताड़ते पर इनका ध्यान उधर था हे नहीं.

"प्यार व्यार कुछ नहीं है और वो अलग इंसान है जिनि जिनके जीवन का मकसद हम जैसा नहीं है. गगन का मकसद तुम दोनों ने सुन्न लिया, मेरा भी अलग है जैसे कल को टीचर या प्रोफेसर बन्न न. यहाँ सेण्टर पर सिर्फ पर्सनालिटी डेवलपमेंट और लोगो के बीच बोलना सीखने के लिए आती हु जिस से कल को मैं अपनी लाइफ और करियर को बेहतर बना सकू. घरवालों के मर्जी से शादी होगी और उन्हें ऐतराज भी नहीं होगा अगर मुझे को लड़का कुढ़ पसंद आया तोह पर उस सबके लिए अभी वक़्त है. तुम दोनों की लाइफ के गोल्स शायद शादी से पहले अपनी लाइफ को ाचे से जीना होगा क्योंकि फिर घर परिवार में बहोत कुछ बदल जाता है. सबकी अपनी अपनी प्रिऑरिटीज़ होती है और अलग भी एकदूसरे से. अर्जुन जी का इनमे से मुझे कुछ नहीं दीखता चाहे फिर मैं उन्हें पसंद करू या वो मुझे. जब साथ न दिखे तोह ऐसे कदम बढ़ाना बेवकूफी से ज्यादा कुछ नहीं मेरी नजर में. बाकी उनका क्या है वो तोह 3 हफ्ते बाद चले जाने वाले है अपनी अलग मंज़िल पर.", अब कही मीनाक्षी ने खुल कर अपने साथ साथ बाकी सभी के जीवन का सच सामने रख दिया था जिसपर शोख चंचल जीनत भी गंभीर हो गयी.

"हाँ यार साला इसलिए मुझे न ये सोसाइटी और इसके रूल्स पसंद नहीं. पर मैं फिर भी यही कहूँगी की अगर मौका मिला न तोह मैं मेरा ड्रीम अर्जुन के साथ पूरा करुँगी, चाहे वो बस एक बार हे हो. उसके बाद तोह पति ने हे कपडे उतरने है जब उसकी मर्जी होगी. और मुझे यकीन है की जैसा अर्जुन बहार से है वैसा अंदर से भी ख़ास हे होगा. भाड़ में जाए प्यार और बाकी सब. ओह भैया थोड़ा बर्फ एक्स्ट्रा दाल देना एक गिलास में.", आखिरी बात जरा ऊँची आवाज में कही थी जीनत ने और पहले वाले विचार सुन्न कर मीनाक्षी के साथ गगन ने भी अपने मुँह पर हाथ रख लिया था.

"ऐ वो तोह तेरी दीदी की गाडी है न जिनि?", चौक पर घूमने के बाद उसकी आउट से सफ़ेद मेरसेदेज़ सीढ़ी सड़क पर आयी तोह उसको बाकी तीनो ने भी देखा. स्टीयरिंग पर ड्राइवर की जगह स्वयं जन्नत थी, नजरो पर भूरा चस्मा चढ़ाये लेकिन इस से ज्यादा उन्हें और कुछ नहीं दिखा कार की रफ़्तार बढ़ते हे.

"हाँ है तोह और चला भी डीडू रही है जैसा वो बहोत काम करती है. मुझे तोह कह रही थी की वो दोपहर की गर्मी में मार्किट नहीं जाने वाली और अब देखो ड्राइवर बिना हे.. लेकिन उधर तोह शहर की कोई मार्किट भी नहीं.", ओझल हो चुकी कार की और हे देखते हुए जीनत ये सब बोल रही थी थोड़ी हैरत से.

"यार तेरी दीदी तोह किसी एक्ट्रेस जैसी है जिनि?", मीनाक्षी की बात सुन्न कर जीनत ने तिरछी मुस्कान से कहा.

"वो एक्टिंग में नहीं जाने वाली कभी और मॉडलिंग ऐसी करती है की मुर्दे का भी खड़ा कर दे. पूरे कपड़ो में भी डीडू बहोत हॉट है यार. पर मुझे कुछ ठीक नहीं लग रहा.", जीनत ने जूस का गिलास लेते हुए दार्शनिक अंदाज में कहा.

"ओह बेवकूफ, तू हे तोह बोल रही थी की तेरे रोकके के लिए राजहंस सेलेक्ट हुआ है. दीदी को वही न भेजा हो आंटी ने? मार्किट नहीं लेकिन राजहंस रिसोर्ट तोह उधर हे है न?", साक्षी ने पल में हे उसकी गंभीरता उड़ा दी थी.

"सहित. ये बात तोह मैं भूल हे गयी थी. और हाँ मिनी तुमने जरूर आना है थर्सडे को, चाहे अर्जुन को साथ ले आना. इस गग्गू डार्लिंग ने तोह साफ़ ना कह कर मुझे पहले हे हर्ट कर दिया."

"इवनिंग का टाइम है फिर भी घरवाले अल्लोव नहीं करेंगे जिनि पर मैं कोशिश करूँगा की पापा हे मुझे ड्राप कर दे. अर्जुन जी को तुमने बुलाना है तोह बुला लेना, नंबर तुम्हारे भी पास है उनका. मेरा हक़ नहीं बनता कुछ कहने का उन्हें. बाकी गगन के घर मैं मम्मी से फ़ोन करवा दूंगी, एक से भले 2. वैसे तुम्हारी दीदी को देखने के बाद मैं ऐसा कह रही हु नहीं तोह आने के चांस उतने नहीं थे पहले. हाहाहा.", मीनाक्षी की इतनी साफ़ हंसी देख जीनत भी मस्ती की जगह उसके हे अंदाज में बोली.

"डीडू को भी तुम पसंद आओगी, उनके जैसी हे सोच है न तुम्हारी. वैसे माँ डीडू को काम के लिए भेजती तोह ड्राइवर साथ रहता. चलो तुम्हारे लिए भी ऑटो बगल में खड़ा है और हम भी निकलते है.", जीनत ने पैसे देने चाहे पर गगन पहले हे दे चुकी थी. अपनी दोनों सहेलियों को ऑटोरिक्शा पर बैठने के बाद जीनत थोड़ी मस्ती से वापिस सेण्टर की तरफ कड़ी अपनी कार की तरफ चलने लगी.

"तेरे दिमाग में कुछ चल रहा है क्या जिनि?"

"चल तोह बहोत कुछ रहा है और तुझे मैंने बताया भी तोह था कल. अर्जुन परसो पार्टी पे आने को तैयार है, तेरे मेरे साथ पर्सनल वाली पार्टी.", अब साक्षी भी थोड़ा कुटिलता से मुस्कुराई उसकी बात और प्लान सुन्न कर.

"वैसे वो पार्टी का हमारे वाला मतलब नहीं समझा तोह? झेल सकेगी एक लड़के से खुदके लिए ना?"

"वो न नहीं करेगा, विश्वास रख पर मुझे यार एक बात समझ नहीं आ रही. डीडू से अर्जुन कल पहली बार मिला था और वो भी इत्तेफ़ाक़ से हुआ. वो उनका फैन है ये बात उसने मुझे मिलने से पहले हे बता दी थी हमारा घर देख कर. पर बाद में डीडू उसके साथ अलोन टाइम स्पेंड करती रही जब हम दोनों मेरे कमरे में थे और वो फोटो देखि थी न कैसे वो उसमे अर्जुन के गाल पर लिप्स रखे हुए थी? रात उन्होंने मेरे कमरे में ढेरो बातें की थी जहाँ मैंने कोशिश की उनके और अर्जुन के बारे में पता करने की लेकिन उनकी बात से कही भी पता नहीं लगा की उन्हें उसमे ख़ास इंटरेस्ट है. पर मेरा मैं कहता है की अर्जुन उनका फैन है तोह कुछ हाल डीडू का भी उसके जैसा हे है चाहे वो एक्सेप्ट नहीं कर रही. वैसे मुझे जेलस जरूर फील हुआ था वो फोटो देख कर पर सच भी है की वो दोनों परफेक्ट दिख रहे थे एकसाथ. आज अर्जुन तोह बहार जाने वाला था ये अभी याद आया इसलिए दीदी का ऐसे जाना अब मुझे काम हे लगता है. चल बैठ फिर घर पे हे सोचते है कुछ.", दोनों उस एस्टीम कार में सवार हुई तोह साक्षी ने अब अपना पक्ष रखा.

"जानू दीदी के साथ ड्राइवर नहीं था डार्लिंग और वो सिर्फ काम पे जाती तोह no make-up. फॉर्मल ड्रेस में रहती है वो जितना मैंने भी देखा है. और अब तू उन्हें अर्जुन के साथ जोड़ कर हे देख रही है तोह मेरा एक्सपीरियंस कहता है की काम के साथ साथ वो अर्जुन से भी मिलने गयी है. अर्जुन ने क्या कहा था के वो आज सुबह हे शहर से बहार होगा?", कार का स्टीयरिंग घर की तरफ मोड़ते मोड़ते जीनत ने वो गोल चक्कर पर पूरा घूमते हुए उसी और घुमा दी जहा 20 मिनट पहले उसकी बहिन की सफ़ेद कार गयी थी.

"उसने डिनर की बात पर कहा था की वो शहर से बहार होगा. डीडू ने रात को मुझसे अपना फवौरीते nail-paint भी लगवाया था और मॉर्निंग में वो माँ और मुझसे थोड़ा अलग हे थी. ज्यादा एक्सरसाइज और बॉडी ग्रूमिंग करती हुई. पर यार नहीं.. डीडू पब्लिक्ली कभी किसी लड़के से नहीं मिलने वाली और अर्जुन तोह राजहंस जैसी जगह जानता भी नहीं होगा. खामख्वाह दिमाग घुमा दिया तेरे नकली एक्सपीरियंस ने.", जीनत की बात सुन्न कर जैसे साक्षी को भी अपनी सोच गलत हे लगी और कार फिर से वापिस मदद चुकी थी अगली हे लाइट्स से.

"सॉरी यार. कभी कभी न लगता है की मेरी सोच ज्यादा इंटेंस हो जाती है. जानू दीदी बहोत स्ट्रिक्ट है ये भूल गयी थी और राजहंस रिसोर्ट में वो lallu-laal जाने की सोचेगा भी नहीं जब उसको शहर में हे अड्रेस न पता हो अपने रिश्तेदारों का. हाहाहा.. तेरी बातों को सुन्न कर बस मैं भी वैसा हे सोचने लगी. जल्दी करवा यार इस अर्जुन के साथ पार्टी, पंतय गीली रहने लगी है और सेक्स तोह उस पेंडू के साथ हे किया था इतने साल पहले जब मजा काम और दुःख ज्यादा हुआ था अपनी गलती पर.", पर इन दोनों को हे कहा पता था की आज अगर वो उस तरफ पहोच जाती तोह इनकी हर सोच सार्थक रहती या उस से भी बढ़कर कुछ देखने को मिलता अगर वो राजहंस रिसोर्ट में अपनी बहिन को उस व्यक्ति के साथ देखती जिसको lallu-laal बता रही थी.

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राजहंस रिसॉर्ट्स जैसे अपने नाम को पूरी तरह सार्थक करने वाला एक भव्य स्थान था जिसकी बाहरी ऊँची पीली दीवारे और वो पोलिश किया हुआ लकड़ी का 25 फ़ीट ऊँचा द्वार बस एक छोटी सी झलक देता था इस 70-75 एकड़ में फैले स्थान की. बहार हे पाम के ऊँचे वृक्ष कतार से लगे थे और द्वार के दोनों तरफ बंदूके कंधो पर टाँगे शाही से दरबान पूरी मुस्तैदी से अपना कर्त्तव्य निभा रहे थे. खुले द्वारा के बीच हे स्वचालित फाटक आये मेहमानो की जानकारी के बाद हे खुलता था जो इस सफ़ेद कार में बैठी रूपसी को देख अदब से सलाम देते दरबान के बाद उठ चूका था. उस चौड़ी सड़क के दोनों तरफ भी hare-bhoore पाम के वृक्ष कही दूर तक एक सार दिखे जबतक की वो पानी का गोल कृत्रिम झरना न आ गया. खुले साफ़ सुथरे तराशी हुई घास के मैदान जहा वृक्ष भी एक हिसाब और जरुरत से लगे थे. जन्नत द्वार पर आने तक जितनी सहज थी अब अपनी कार को उस मर्यादित स्थान पर रोकते हुए बहार निकल कर दरबान को चाबी देने के बाद उतनी हे असहज दिखाई दी. अरबी घोड़ी की पूँछ सी लम्बी उसकी जुल्फों को बस एक नीला क्लिप हे सर पे थाम था और बदन पर बिना ब्याह का ये नीला और सफ़ेद वस्त्र जो इस जगह के अनुकूल और बेशक कीमती था जिसकी लम्बाई तखनो तक और उसके निचे जन्नत के खूबसूरत गोर पाँव 2 इंच ऊँची ऊँट की खाल से रंग के आकर्षक सैंडिल में सिर्फ उँगलियों के जोड़ को ढके थे.

"मम आपने रेस्ट्रा, कैफ़े या होटल में से कहा जाना है?", दरबान ने भी गाडी की चाबी लेने के बाद बड़े हे अदब से सर झुका कर अभिवादन के साथ इस सुर्ख होती रूपसी से उनकी इत्छा जान नई चाहि.

"नथिंग कनफर्म्ड येत. ी थिंक ी नीड सम फ्रेश एयर.", चेहरे से वो अपनी दशा किसी को दिखाना नहीं चाहती थी लेकिन ये हर गुजरते पल के साथ बढ़ने लगी थी जिसमे थोड़ा इजाफा किया उस सफ़ेद बग्गी ने जिसके आगे 2 घोड़े भी पूरे सफ़ेद जूते थे. पिछले हिस्से से बहार निकल कर सामने कड़ी होती युवती ने दोनों हाथ जोड़ कर जन्नत का स्वागत किया था जो एक पारम्परिक रेशमी साड़ी और ब्लाउज के साथ बेहद शालें ढंग से सजी थी.

"आपकी हे प्रतीक्षा हो रही थी, मिस जन्नत कपूर!!", जन्नत को बग्गी में बैठने के लिए हाथ से इशारा देते हुए जब इस युवती ने उसका सही नाम बताया तोह धड़कते दिल के साथ वो शुक्रिया कहती हुई उस बग्गी की पिछली सीट पर बैठी जिसकी सिर्फ छत पर हे छाया था और चारो तरफ से खुली हुई. इसमें सामने की तरफ भी 2 लोगो के बैठने की सामान सीट लगी थी. ऐसा नहीं था की जन्नत इस जगह पर परिचय की मोहताज थी पर आज पहली बार वो एक लड़के से मिलने यहाँ आयी थी और जिस तरह हर कदम पर उसको नजरे खुद पर गढ़ती महसूस हो रही थी ये उसके लिए एक नया एहसास था.

"आप पहले रिसेप्शन पर थी न.", बग्गी की ख़ामोशी और अपना मैं सहज करने के लिए जन्नत ने हे उस परिचायिका से बातचीत शुरू की.

"जी मिस कपूर पर हमारी डीएस बदलती रहती है, होटल मैनेजमेंट के हिसाब से. वैसे आप यहाँ शूट के लिए तोह नहीं आयी है?"

"क्या यहाँ कोई शूट चल रहा है? मैं सिर्फ लंच करने आयी हु और आपको भी किसी ने भेजा होगा इसलिए?"

"वो देखिये मम, पूल की तरफ सेट लगे है सुबह से और अब वह photo-shoot स्टार्ट हुआ थोड़ी देर पहले. एक ट्रेडिशनल शूट हो चूका है दूसरी मॉडल के साथ होटल एरिया में और अब swim-wear के लिए चल रहा है शायद. मुझे लगा की आपका भी शूट होगा पर आपकी बात भी सही है क्योंकि मुझे 'Bawarchi-Khana' से हे आपको साथ ले कर आने का आदेश मिला था, मैनेजर सर की तरफ से.", जन्नत ने उस चकाचक और आलिशान तरणताल की तरफ देखा जहा किनारो पर रंग बिरंगे गिलास मेज पर सजावट का सामान भर थे और कमर पर दुपट्टे जैसा वस्त्र बांधे एक दिलकश हसीना विभिन्न मुद्रा बनती पीली ब्रा और भीगे बालो के साथ कैमरा के सामने खुश होने का अभिनय कर रही थी. वो कमर से बंधा वस्त्र भी पारदर्शी था जहा धुप में भीतर पहनी पतली सी पंतय और लम्बी जाँघे बखूबी दिख रही थी.

"मैं जगदीश जी के साथ कभी भी काम नहीं करती और न करना चाहूंगी. ट्रेडिशनल इरोटिक समझ आता है पर नुदे नहीं जो इनकी प्राथमिकता ज्यादा रहती है. वैसे क्या हम बावर्चीखाना रेस्ट्रा जा रहे है?", जन्नत की निर्वस्त्र वाली बात सुन्न कर ये युवती भी थोड़ा शर्मीली मुस्कान लिए नजरे भीतर हे रखने लगी क्योंकि तरणताल की तरफ अभद्रता तोह मुमकिन नहीं थी पर वो लड़की सिर्फ ब्रा और पंतय में आ चुकी थी, पानी के किनारे लेती हुई उत्तेजक मुद्रा बनती.

"जी diwan-e-khaas रेस्ट्रा में आपकी टेबल बुक है. हम आ गए है मिस कपूर और आप सचमुच बहोत खूबसूरत है नजदीक से देखने पर. ी ऑलवेज अदमीरे योर ड्रेसिंग सेंस एंड आईटी इस परफेक्ट फॉर ा लंच डेट.", अब इसने भी वो कह दिया था जिस से जन्नत बचती आ रही थी. अपनी ख़ूबसूरती और कपडे पहन ने के सलीके की तारीफ पर वो हलके से मुस्कुरायी या कोशिश की मुस्कुराने की पर प्रेमी के साथ भोजन सुन्न कर हलकी घबराहट फिर से मैं में उठने लगी थी. जन्नत बग्गी के रुकते हे उस युवती के बाद उतरने हे लगी थी की उसकी हथेली उस नरम लेकिन बड़े हे मरदाना हाथ ने हलके से पकड़ते हुए अपनी मदद पेश की. एक पल तोह जिस्म सिहर हे उठा था पर सफ़ेद कमीज पहने वो मुस्कुराता युवक जैसे उसको हर घबराहट और भये से दूर कर गया था इस स्पर्श और अपनी हलकी मुस्कान के साथ.

"शॉल वे प्रोसीड मिस कपूर?", अर्जुन की ऐसी औपचारिक बात सुन्न कर वो खुद हलके से शर्मायी पर सलीके से 2 सीढ़ी उतरती हुई वो दूसरे हाथ में अपना हैंडबैग थामे उसका हाथ पकडे हे उसके सामने कड़ी थी. यहाँ ज्यादा नजरे नहीं थी इन्हे देखने के लिए और वो युवती भी अपनी जगह लौट चुकी थी.

"मान न पड़ेगा की तुम इस जगह को ाचे से जानते हो पर ये Diwan-e-khaas शायद तुमने भी पहले देखा नहीं. थैंक यू.", वो 2 बार अर्जुन को ाचे से देख चुकी थी जो ऐसी जगह जहा लोग कुछ ज्यादा हे पैसो का दिखावा अपने कपड़ो और सेवको के साथ करते है वही अर्जुन के साथ एक बैरा तक नहीं था.

"आप ऐसा इसलिए कह रही है की वह सोमरस भी मिलता है? पर आज सोमवार है मम और इस दिन Diwan-e-khaas में शराब नहीं चलती. आप पर नीला और सफ़ेद सबसे बेहतर दीखता है.", अब कही जन्नत उन्मुक्त हो कर हंसी थी क्योंकि दोनों के हे जिस्मो पर यही 2 रंग थे और कदमो में भी एक सामान तीसरा रंग. Diwan-e-khaas लिखी उस पट्टिका की इमारत भी काले कांच और गहरे रंग के पत्थरो से बानी एक आलिशान जगह थी जिसके भीतर एक अलग सी ठंडक और काली लकड़ी के गोलाकार मेज बड़े हे ख़ास अंदाज में सजे थे. जहा कोई बैठता सिर्फ वही वो पीली रौशनी जगमग होती जो 24 मेज में से सिर्फ एक पर हे रोशन थी, ठीक बीच वाली कतार की दूसरी मेज पर.

"सोमरस.. हाहाहा.. वासी तुम यहाँ पहले कितनी बार आये हो? देखो हम पहली बार मिल रहे है तोह no लाइज एंड चीट. जो बोलना है वो सच और कोई taal-matol नहीं. और मम की जगह जन्नत कहो तोह मुझे ाचा लगेगा अर्जुन.", जन्नत के हाथ से उसका हैंडबैग ले कर उसी मेज पर रखते हुए अर्जुन ने हे वो एक सोफे जैसी आरामदायक कुर्सी पीच खिंच कर बैठने का मूक आवेदन किया. अर्जुन की यही छोटी छोटी बातें जन्नत गौर कर रही थी और उसने पहले से उधर पड़ी मोटरसाइकिल की चाबी और पर्स देख लिया था जो अर्जुन के हे थे. अब अर्जुन भी ठीक उसकी बगल वाली कुर्सी पर हे था जहा से दोनों एक दूसरे को ाचे से देख सकते थे.

"आप एक दिन में सब पूछ लेना चाहती है जन्नत जी और मैंने इस से पहले पूरे 4 साल लगाए आपको जान ने के लिए. मैं यहाँ इस से पहले सिर्फ एक हे बार आया था वो भी बस आधे घंटे के लिए थोड़े दिन पहले. ये जगह शायद नुक्सान में चल रही है, हमारे सिवा कोई बैठा हे नहीं.", अर्जुन ने जवाब के साथ तंज किया था जिस पर जन्नत के पतले होंठो से हलकी सी मुस्कराहट प्रकट हुई और जान ने वाली बात पर थोड़ी सुर्खी.

"सीओ ओनर हो तुम इस प्रॉपर्टी के जो तुमने बताया नहीं लंच पर बुलाते समय. और 4 साल मैंने तोह वेट नहीं करवाया तुम्हे. हाँ फोटोज मैंने भी देखि थी तुम्हारी कुछ दिन पहले और मुझे ये कल बताना चाहिए था तुम्हे. हिसाब बराबर. वैसे लंच मेरी तरफ से पर आर्डर तुम्हे देना पड़ेगा जेंटलमैन.", अर्जुन ने सिर्फ नजरे उठा कर उस तरफ देखा हे था जहा एक बैरा हाथ में खली ट्रे लिए इन्तजार में था. और उसने इनका आर्डर डायरी में लिखा तोह जन्नत ताज्जुब से बस देखती रही. अब वो जा चूका था 20 मिनट का बोल कर.

"मैं क्या खाती हु और क्या नहीं तुम्हे तोह सब पता है."

"बताया तोह है आपको अभी अभी की 4 साल लगे मुझे पर आपने मेरी तस्वीरें कहा देख ली? दीदी के घर?", अर्जुन का टेबल पर टिका हाथ अनजाने हे जन्नत की हथेली के नरम एहसास पर हल्का सा हिला. पर वो बात करती हुई हाथ वैसे हे रखे रही.

"हाँ शिल्पा भाभी से बात होती रहती है जब टाइम मिलता है और माँ का उनके यहाँ ज्यादा aana-jana है. वह शादी में नहीं गए थे तोह एलबम्स देख लिए थोड़े बहोत. तुम्हारी ज्यादा फोटो नहीं थी बस 3-4 जगह दिखे थे लेकिन एक फोटो में तुमने अपनी बड़ी बहिन को गॉड में उठाया हुआ था जहा और लोग नहीं आये उसमे. बहोत प्यार है अपनी फॅमिली से तुम्हे?"

"अब परिवार है और मेरा वजूद भी उनकी वजह से है. ज्यादा प्यार तोह मुझसे सभी pariwar-waale हे करते है क्योंकि मैं तोह एक हु.. हाहाहा. दीदी ने तोह बचपन से हे पला है और जब वो विदा हो रही थी तोह इतना तोह मैं भी कर सकता हु की उन्हें गॉड में उठा कर विदा करू. वैसे लम्बी चौड़ी फॅमिली है मेरी. कई चाचा, ढेरो बहने, 2 ताऊ जी और एक बड़े भैया और भाभी. आपकी फॅमिली में?", अर्जुन को इस तरह अपनी बातें कहते देख जन्नत खुश थी कियोंकि इस युवक में जरा सा भी हम और मिलावट नहीं थी.

"एक चाचा है और एक बुआ. दोनों फैमिलीज़ थोड़ा दूर रहती है और बिज़नेस फैमिलीज़ चाहे ब्लड रिलेशन्स वाली हो पर मिलना भी उनका बिज़नेस की वजह से हे रहता है. जिनि का रोका है 3 बाद तोह आएंगे वो लोग भी, सिर्फ एक रात के लिए या ज्यादा से ज्यादा अगली सुबह तक. बचपन में सब हमारे हे घर एकसाथ दीखते थे और वो टाइम सबसे बेस्ट था. ी माइसेल्फ प्रेफर जॉइंट फैमिलीज़ बूत अब तोह आदत हो चुकी है इसलिए जैसा है चलने दो. सो तुमने करियर के बारे में कुछ सोचा है या ये फॅमिली हेरिटेज हे संभालोगे?", अब जन्नत की हथेली अर्जुन की खुली हथेली पर तिकी थी जहा दोनों का हे ध्यान न था जैसे वो बरसो से जानकार रहे हो एक दूसरे के.

"मेरे पास कोई प्रॉपर्टी नहीं है जन्नत जी, जहा भी देखेंगी सीओ ओनर या मेरे ऊपर गार्डियन मिलेंगे. हाँ करियर का फ़िलहाल इतना हे सोचा है की दिल्ली से एजुकेशन ख़तम करने के बाद मैं जीना चाहता हु. आपको अजीब लगेगा लेकिन लाइफ खुद एक करियर है जिसमे हम ज्यादातर फ़ैल होते रहते है जिम्मेवारियों, पैसे और स्टेटस के नाम पर. मैं कुछ न कुछ तोह कर हे लूंगा 2 रोटी खाने के लिए पर अपने परिवार के साथ बढ़ना और जीना चाहता हु. बाद में यादों की तस्वीरें बेरंग नहीं चाहता जिसमे दुःख और अपनों की कमी हो. वैसे एक ाची तस्वीर तोह आपने भी जोड़ दी है उन यादों में.", अर्जुन की इतनी गहरी सोच और समझ देख कर जन्नत के पास बोलने के लिए कुछ न था पर आखिर में उसने जिस तरह से तस्वीर का जीकर किया था वो खिलखिला उठी.

"सहित.. तुम कुछ भी बोल देते हो. वैसे इतनी बुरी तोह नहीं थी वो."

"मैंने तोह उसको खूबसूरत याद कहा है जन्नत जी. शायद आपको काम पसंद आयी हो.", अब जन्नत ने जवाब देने से पहले उसकी हथेली पर अपनी पकड़ कुछ मजबूत कर ली थी.

"वो मुझे भी नहीं पता लगा कैसे हो गया पर वो तुमसे ज्यादा मेरे लिए मायने रखती है अर्जुन. पता नहीं तुम कैसी मिस्ट्री हो या सामने बैठे हुए भी ऐसे अजनबी जिसको जितना जानती हु उतना ज्यादा डिस्टर्ब होती हु की आखिर सच क्या है और कितना है. फिर बस सब पानी सा शांत जैसे उस फोटो में तुम्हारा चेहरा और बंद आँखें. ज्यादा हो गया. हेहेहे.. गिव में 2 मिनट्स, कम्फर्ट रूम.", बाथरूम जाने का बोल कर जन्नत उठ कड़ी हुई थी जिसकी आँख में शायद कुछ गिरा था.

"वेट. मुझे देखने दीजिये.", अपना साफ़ रुमाल एक हाथ में लेते हुए अर्जुन ने पहली बार जन्नत के गाल का स्पर्श किया था और हलकी रौशनी में दोनों के चेहरे एकदम करीब थे जहा वो जन्नत की बंद आँख को आहिस्ता से खोल कर रुमाल के किनारे से साफ़ करते हुए जांच रहा था. एक लम्बा सा पलकों का बाल रुमाल की जड़ में आते हे अर्जुन ने हौले से फूंक मार कर थोड़ी गर्मी दी तोह जन्नत ने उसकी हथेली पर हे गाल का दबाव बनाते हुए हाथ दोनों हाथ में पकड़ लिया.

"आपकी हे पलके जैसे इन आँखों को सबसे बचाना चाहती है. बस ये एक हे था.", अर्जुन ने रुमाल सामने किया तोह जन्नत ने तुरंत वो अपनी हथेली के पीछे हलके से रगड़ कर उस बाल को वह उतार आँखें बंद करके एक फूँक से उदा दिया.

"हाहाहा. विश मांग रही है आप? ये बचपन में करते थे सब बस मैंने नहीं किया कभी.", अब जन्नत भी उसके साथ हे हंस रही थी लेकिन स्थिति ये थी की उसने अर्जुन की हथेली अब ाचे से थाम ली.

"मैंने भी आज हे तरय किया है क्योंकि जिनि ऐसा अक्सर करती है और उसकी विश पूरी भी बहोत होती है. थैंक यू अर्जुन तुम्हारी वजह से मेरा काजल ज्यादा खराब नहीं हुआ जो हो सकता था वाशरूम में अकेले म्हणत करने से.", और ठीक इनके सामने वाली कुर्सी पर ये 45-50 बरस का भारी भरकम व्यक्ति आ बैठा जिसके सर पर जालीदार हैट और जिस्म पर 3 बटन खुली सफ़ेद ढीली कमीज के साथ गले में मोती जंजीर थी, सोने की.

"तोह जन्नत कपूर अगर औपचारिक खाने पर आयी है तोह काम की बात कर सकते है अगर तुम्हारे बॉयफ्रेंड को बुरा न लगे तोह. वैसे नाचीज को जगदीश जैन उर्फ़ जज कहते है."

"जी जानता हु मैं आपको और ाचा काम करते है आप जो लगभग हर मैगज़ीन में दीखता है. अगर जन्नत इंटरेस्टेड है तोह आप काम की बात कर सकते है.", अब जिस तरह से अर्जुन ने जन्नत का हाथ पकड़ कर उस व्यक्ति के सामने हे उसकी नरम लम्बी उँगलियों के बीच अपनी उँगलियाँ फंसा कर इनका मूक रिश्ता दर्शाया था वो जल्द हे खीज गया था.

"जन्नत इंटरेस्टेड है? जज परमिशन नहीं लेता और अपना ऑफर खुद रखता है. तुम शायद इसके नए नए और पहले बॉयफ्रेंड हो और थोड़े रईस होंगे पर ऐसी अनगिनत मॉडल जज ने बनायीं और शिखर पर पहुंचाई है अपने 25 बरस के करियर में. मेरा काम हर मैगज़ीन अफ़्फोर्ड नहीं कर सकती.", अर्जुन ने दूसरे हाथ से पानी का गिलास भर कर जन्नत के सामने रखा जैसे उसके लिए वो व्यक्ति वह मौजूद हे नहीं था.

"सर मुझे आपके शूट्स में न पहले इंटरेस्ट था और न अब है. वैसे 25 साल में भी आपने मैनर्स नहीं सीखी, थोड़े रईस होंगे और घमंडी भी जिनको इतना भी नहीं पता की जब एक कपल डेट पर है तोह उनके बीच जाने से पहले 10 बार सोचना और फिर अगर जरुरी भी हो तोह ात लीस्ट परमिशन माँगना. जन्नत कपूर आप अफ़्फोर्ड नहीं कर सकते और न वो बिकाऊ है. प्लीज लीव.", इतने कड़े रुख के साथ जन्नत ने सामने वाले को जलील किया था की वो गुस्से में तमतमाता हुआ मेज पर हाथ पटकने हे लगा था जिसको अर्जुन ने वही बैठे हुए हे थाम लिया.

"गुस्सा यहाँ नहीं बहार दिखाए सर. आईटी इस ा रिक्वेस्ट तहत प्लीज दो नॉट क्रिएट ा मेस हेरे ोथेरविसे..", हाथ छुड़ा कर वो व्यक्ति सांसें भरता हुआ उठ खड़ा हुआ था और अब जन्नत से ज्यादा उसको अर्जुन खटकने लगा.

"ए मैनेजर, ये ऐसे ैरे गैर लोग Diwan-E-Khaas में बैठने लगे हो आजकल तुम लोग? लड़की के साथ अकेले बैठने के एक्स्ट्रा दिए है क्या इसने?", सफ़ेद कमीज और लाल टाई लगाए ये व्यक्ति इनके सामने आ खड़ा हुआ जो अर्जुन की तरफ सर झुकाने के बाद जज से मुखातिब हुआ.

"आपने बहार पढ़ा नहीं सर 'No एंट्री' का बोर्ड? ये हमे टिप नहीं देते क्योंकि प्रॉपर्टी इनकी है और हम यहाँ नौकरी पर. आपसे रिक्वेस्ट है की आप आराम से बहार जाए ोथेरविसे सर के कहने से पहले हे आपको बहार पंहुचा दिया जाएगा. एंड सॉरी सर, मुझे दरबान ने शिकायत दी तभी मैं आ गया.", अब उस अधेड़ की बारी थी हैरान होने की.

"कोई बात नहीं और ये बस मैनर्स सिखने आये थे जिसकी प्रैक्टिस ये अबसे करते रहेंगे जब जब मुझे याद करेंगे. ठीक है न कैमरामैन?", अर्जुन के ऐसे जलील करने पर वो पाँव पटकता हुआ बहार निकला जबकि मैनेजर भी हंस दिया था कैमरामैन शब्द से.

"एन्जॉय योर लंच मम एंड थैंक यू सर.", मैनेजर शुक्रिया किस बात का कह कर गया था ये सिर्फ अर्जुन जानता था जबकि जन्नत अभी भी उसका हाथ थामे बड़े हैरानी से उसको देखती हुई बोली.

"उसने तुम्हे मेरा बॉयफ्रेंड कहा और तुमने बदले में सच नहीं बताया? और ये पूरा रेस्ट्रा हम दोनों के लिए रिज़र्व करवाया हुआ था तुमने?"

"देखिये आपने खुद कहा की हम दोनों डेट पर है. अब मैं सामने से क्यों मन करने लगा जब कोई मुझे आपका बॉयफ्रेंड बोले तोह. मन करना चाहिए था क्या? फिर इमेज शायद अलग बनती जन्नत जी क्योंकि आपने उसके सामने हे मेरा हाथ थाम रखा था.", अब बारी जन्नत की थी नजरे चुराने की जो हाथ खींचना चाहती थी पर अब उसको अर्जुन ने थमा हुआ था.

"वो.. वो तोह मैंने ऐसे हे पूछ लिया तुमसे पर ये पूरा रिज़र्व करने की क्या जरुरत थी?", हाथ छुड्ने की जद्दोज़ेहब अब शरारत में बदल चुकी थी जैसे. अर्जुन खोलता तोह वो पकड़ लेती और अर्जुन उस नरम हथेली को सहलाता तोह जन्नत फिर से पीछे खींचने लगती.

"कार से उतारते हुए आप इतना नर्वस थी की मुझे ऐसा करना पड़ा जन्नत जी. शायद आप मेरे साथ पब्लिक्ली दिखना नहीं चाहती या फिर .."

"थर्सडे को मैं तुम्हारे साथ हे अपनी छोटी बहिन के फंक्शन पर एंटर करुँगी नहीं तोह हम फिर नहीं मिलने वाले.", जन्नत का ऐसा जवाब सुन्न कर अर्जुन कोई जवाब देता उस से पहले जन्नत ने कोई परवाह न करते हुए उसका हाथ अपनी तरफ खींचते हुए जैसे अर्जुन को हे नजदीक कर लिया. एक बार उसके चेहरे को ाचे से निहारने के बाद बिना पलके झपकाए जानत ने अपने सुर्ख होंठ बहोत हलके से अर्जुन के होंठो पर रखने के बाद उनका स्थान बदल कर गाल पर गहरा चुम्बन जड़ दिया. वो बैरा खाने की थाली लिए इनसे दूर हे रुक गया था जिसको यहाँ आना अपनी हे गलती लग रही थी.

"मतलब आप मुझसे फिर कभी मिलना हे नहीं चाहती जन्नत जी? मैं उस दिन आने में हे असमर्थ राहु किसी मज़बूरी की वजह से तोह आप वो समझने की जगह बस मेरा आपके साथ उस कार्यक्रम में शरीक होना जरुरी होगा?"

"मेरा मतलब वो नहीं था अर्जुन.. पब्लिक वाली बात.. मैं मेरे वर्ड्स वापिस लेती हु. हाँ मैं नर्वस थी पर उसकी वजह ये बहार की दुनिया नहीं सिर्फ तुम थे. सुबह से मैं ये सोच रही थी की क्या पह्नु, क्या ठीक लगेगा और तुम क्या आज भी मेरे सामने होने पर मुझे इग्नोर करोगे. फिर खुद हे उलझ गयी क्योंकि मैं कभी भी ऐसा नहीं करती और मेरा कॉन्फिडेंस इतना कमजोर नहीं है. मुझे बहार की दुनिया से कभी ज्यादा लेना देना नहीं रहा पर तुम अलग हो. मैं वजह नहीं जानती पर मुझे ये सब कही न कही ाचा लग रहा था."

"था? मतलब क्या अब ये गलत लग रहा है आपको? और मैं हे इस सबका ख़याल नहीं रखूँगा तोह गर्लफ्रेंड खोने का डर मुझे ज्यादा होगा. मेरी पहली और एकमात्र क्रश जिसको सिर्फ तस्वीरों में देखा और आज वो पास है मेरे. अभी जो इंसान सामने आ बैठा था उसको मैं और ाचे से समझाता अगर यही बात हम पहले कर चुके होते. फंक्शन में मैं क्या पहन कर औ जिस से आपके साथ thik-thaak दिख सकू?", जन्नत का हाथ हलके से चूमने के बाद वो अब उसकी तरफ हे मुँह किये था. जन्नत जैसे शर्म से भर चुकी थी अर्जुन द्वारा स्वीकारे जाने से.

"तुम्हारे साथ शायद मैं thik-thaak लागु. पहले लंच कर लेते है जो इतनी देर से बेचारा वह लिए खड़ा है.", अर्जुन ने भी हाथ छोड़ कर बैरे को परोसने का इशारा दिया तोह वो बड़ी कुशलता से दोनों की प्लेट लगाने के बाद बिना रुके वापिस लौट गया. एक बार फिर जन्नत उसका हाथ थामे थी और अर्जुन दूसरे हाथ से खुद उसको खिलने लगा.

"माँ सरप्राइज नहीं होंगी ज्यादा पर जिनि और डैड के साथ मेरे कौसिन्स मेरे पीछे पड़ने वाले है तुम्हारे साथ देख कर. शायद मेरे पास सही जवाब नहीं होगा उन्हें देने के लिए. और तुम इतना भी पंपएर मत करो की फिर बस ऐसे लंच हे याद आये और खुदसे खा न सकू.", जन्नत ने अर्जुन को भी खाने का कहते हुए खुदसे खाना शुरू कर दिया. दोनों की नजरे टकराती और फिर खामोश. ऐसा अगले 10 मिनट तक चलता रहा और भोजन होने के बाद मेज साफ़ करने का बोल कर अर्जुन जन्नत का हाथ थामे हे बहार चल दिया. उसकी निर्वस्त्र गोरी बाहें अब अर्जुन से पूरी सटी थी ऐसे चलते हुए.

"वो होटल देखा है तुमने? उसके टॉप फ्लोर पर जो सुइट्स है वो किसी महल के कमरों से भी आलिशान है जहा मैंने एक शूट किया था ट्रेडिशनल सरिस का. उनकी स्पेशल परमिशन लेनी पड़ती है पर वह से ये पूरा Raj-hans, इसकी झील और आगे का जंगल तक दीखता है. उस फ्लोर को रेंट पर नहीं देते कभी किसी विजिटर को. हाँ बाकी दस मंजिले और उनके रूम्स, बार सबकुछ खूबसूरत है पर इलेवेंथ फ्लोर जैसा नहीं.", इस रेस्ट्रा से कुछ दुरी पर बानी वो बड़ी ईमारत राजहंस में सबसे नयी थी जहा 11 मंजिलो का आलिशान होटल खड़ा था.

"2 सुइट्स है वह जिसमे से एक मेरा और दूसरा raj-mehal का. जब कभी वह जाने का दिल करे, मैनेजर आशीष जी से कह दीजियेगा. वह की चाबी आपको मिल जायेगी और आप उधर रुक भी सकती है जितना चाहे उतना समय. बस जब रानी माँ इधर होंगी या उनका कोई तभी ये उपलब्ध नहीं होंगे.", अर्जुन हाथ थामे सड़क की जगह घास पर उसके साथ टहलता हुआ वृक्षों की छाँव में चल रहा था. बार बार उसकी नजर जन्नत के बंधे बालो पर जाती जिसको देख कर मुस्कुराती हुई जन्नत ने उन्हें आजाद कर दिया.

"तुमने वो देखे नहीं है न?"

"उनसे बेहतर कुछ देख रहा हु अभी और आप इन्हे जितना सहेज कर रखती है ये उतना खुल कर रहना चाहते है.", अर्जुन ने बस छो कर देखा था उन रेशमी बालो को जो हाथ से तुरंत फिसल गए. जन्नत सुर्ख होने लगी थी ऐसी हरकत से पर इसमें अर्जुन का भी स्नेह शामिल था.

"मैं सुईठे की बात कर रही हु और तुम हेयर में उलझे हो."

"अभी नहीं उलझा और आप पहली हे डेट पर कमरे की बात कर रही है अगर ध्यान नहीं हो तोह."

"पागल कही के.. कुछ भी बोलते हो और जरा सा भी नहीं सोचते. मैं अब तुम्हारे साथ वह बिलकुल नहीं जाने वाली.", जन्नत हाथ छुड़ा कर मस्ती में भागने लगी थी लेकिन वो परिधान ऐसा करने की इजाजत नहीं देता था जिस से वो लड़खड़ाई तोह इस निर्जन उद्यान में उसकी पतली कमर अर्जुन की बाहों के घेरे में थी जिसने कुशलता से संभाल लिया था इस लहराती ख़ूबसूरती को. खुले हुए लम्बे बाल हवा में लटक हुए मंद मंद हिलते रहे जबकि जन्नत कुछ पल अर्जुन को देखने के बाद कदम नियंत्रित करती खुद हे उसके गले लग चुकी थी.

"अब मुझे वापिस जाना चाहिए अर्जुन. इस बार दिल की सुन्न न गलत होगा.", वो अलग हुई तोह अर्जुन ने भी हामी भरते हुए वापसी का रुख किया.

"थैंक यू मेरा खवाब पूरा करने के लिए जन्नत जी. आपके साथ लंच मैंने अब से पहले सिर्फ 2 बार सपने में किया था जो उतना ठीक नहीं रहा था.", जन्नत इस बात पर फिर से खिलखिला उठी थी. अर्जुन माहौल को गंभीर रहने कहा देता था.

"ऐसा क्या लंच था अर्जुन जी.?", उसने जिस तरह 'जी' का प्रयोग किया था अब बारी अर्जुन के हंसने की थी. दोनों बच्चों की तरह इधर उधर चलते हुए एक दूसरे के साथ हंस रहे थे जिनके आसपास कोई न था.

"मैं डर गया था और जूस का गिलास आपके ऊपर गिरा दिया. बदले में आपने मेरे गाल पर हाथ से ऐसा प्यार दिया की 5 लाइन बंद गयी थी उधर. 9तह में था मैं तब और पढ़ा था के आपने किसी के साथ वैसा किया था दिल्ली में. तोह सपने में वैसा होना हे था."

"हाहाहा.. तब बात लंच की नहीं थी बल्कि वो आदमी शूट के नाम पर कुछ गलत ऑफर दे रहा था और मेरे मन करने पर उसने टेबल से जूस के गिलास निचे गिरा दिए तोह थोड़ा मेरी ड्रेस पर गिरा जिसके बाद उसके गाल पर उँगलियाँ छाप गयी. वैसे तुम ऐसा अपने लिए कैसे सोच सकते हो?"

"पता थोड़ी लगता है की कब कौनसी बात बुरी लग जाए. और जवान होते लड़के न आप पूछिए हे मत क्या क्या सोचते है. मेरे भी गाल शायद उसी वजह से लाल हुए थे सपने में. जूस वो कहते हुए हे गिरा था डर की वजह से."

"मैं पूछना भी नहीं चाहती की तुम क्या कह रहे थे और तुमने वैसा कुछ सामने से भी कहा न तोह रिजल्ट शामे होगा. बोल देती हु.", दोनों उस झरने तक आ पहुंचे थे हँसते खेलते हुए और जिस तरह से जन्नत ने तमाचा दिखाया था हँसते हुए अर्जुन ने अपने कान पकड़ लिए थे.

"मतलब सही टाइम पर वार्निंग दे दी आपने मुझे. मैं बस अब वही कहने वाला था आपको.", एकदम से जन्नत की हंसी छु हो गयी और कदम वही रुक गए. बड़ी हे सेहमी से आवाज में बस उसने इतना हे कहा.

"क्या कहने वाले थे अर्जुन?", दोनों के दरमियान शायद फांसला था हे नहीं या ऐसा प्रतीत होता था करीब होने की वजह से.

"मैं कहना चाहता था.. की.."

"की..?", जन्नत अपने सामने उस गंभीर चेहरे को देख और सेहम चुकी थी.

"की आपकी कार यहाँ कड़ी है जन्नत जी. हाहाहा..", अर्जुन तुरंत पीछे होने लगा था ये मजाक करता हुआ पर इस बार जन्नत की आँखों से 2 बूँद आंसुओ के साथ 2-3 हलके मुक्के उसके सीने पर लगे थे. अब वो भी हंसने की कोशिश कर रही थी जबकि आंसू लुढ़क कर गाल तक आये तोह अर्जुन ने उसको फिर से अपनी बाहों में भर लिया. कुछ पल दोनों खामोश रहे और जब अलग हुए तोह अर्जुन उसके चेहरे को रुमाल से सही कर रहा था.

"बहोत बुरे हो सच्ची. इतना सीरियस दिख रहे थे तुम और मैं डर गयी थी."

"किस बात से?", कार छाया में कड़ी थी जहा दरबान नहीं था इसको पहुंचने के बाद. जन्नत अर्जुन का हाथ थामे हुए हे कार तक आ चुकी थी और उसके सवाल से कुछ पल नजरे झुकाये रही फिर बताना शुरू किया.

"मुझे लगा की तुम कोई ऐसी फरमाइश करोगे जो मेरे लिया पूरा करना मुश्किल होगा."

"फिर जान न क्यों चाहती थी आप?"

"क्योंकि.. मुझे तुम पसंद हो लेकिन ये सब.."

"मेरी फरमाइश बस इतनी सी है जन्नत जी की ये सब सोचना बंद कीजिये और आपमें कोई कमी नहीं है जिसको आप कॉन्फिडेंस से छुपाने की कोशिश करती रहती हो. आपका कभी कोई अफेयर नहीं रहा और न कोई बॉयफ्रेंड बनाया आपने. सोशल लाइफ थोड़ी बहोत थी लेकिन इस सबकी वजह से वो ख़तम हे हो गयी शायद. अब ऐसा नहीं है और मुझे सिर्फ आपकी ख़ुशी से मतलब है. मुझे ऐसी 100 लंच डेट्स मंजूर है जन्नत लेकिन कभी कुछ ऐसा नहीं कहूंगा जिसका आपको बुरा लगे. 4 बजने वाले है और मुझे भी कही पहोचना है अँधेरा होने से पहले.", 100 लंच डेट्स सुन्न कर जन्नत ने बड़े प्यार से अर्जुन को देखा था और फिर एक और छोटा सा चुम्बन उसके होंठो पर करती वो अर्जुन द्वारा खोले कार के दरवाजे से भीतर सीट पर आ बैठी.

"प्रिंसेस जैसा फील कर रही हु आज मैं और सिर्फ तुम्हारी वजह से. इन्तजार रहेगा अगले लंच का और ये अँधेरा होने से पहले कौनसी गर्लफ्रेंड से मिलना है? शायद वह डिनर डेट होगी?", चाबी घूमने की कोई जल्दी नहीं थी जन्नत को और अर्जुन बस दरवाजा थामे उसके haav-bhaav देख रहा था जिन्हे वो शब्दों में घुमा कर अर्जुन से बचने में लगी थी.

"माँ के साथ डेट है मेरी जो क्सक्सक्सक्स आयी हुई थोड़े टाइम के लिए. हफ्ते से ऊपर हो गया है उन्हें देखे और ऐसा शायद हे कभी हुआ हो पिछले एक साल में की मैं इतने दिन उनसे दूर रहा हु."

"तुम्हारी माँ क्सक्सक्सक्स रहने आयी है पर उधर तोह ज्यादा कुछ नहीं है सिवाए कुछ छोटे मोठे कत्तागेस या फार्म्स के. कहा रुकी है वो? उनका नाम हे लगते हो तुम अपने नाम के साथ? रेखा शर्मा.. वो यक़ीनन बेहद खूबसूरत होंगी."

"उनसे खूबसूरत कोई नहीं है जन्नत जी मेरे लिए और वो ठहरी है मेरी नानी के एक छोटे से कॉटेज पे 'बसंत' नाम से है कुछ. मैंने कभी देखा नहीं लेकिन सुना है की ाची जगह है.", जन्नत के पाँव स्थिर थे और वो बड़े ध्यान से इस नाम को मैं में खोजने लगी थी जैसे वो जानती हो उस जगह को.

"छोटा सा कॉटेज नहीं वो ब्रिटिश टाइम से हे किसी प्रिंसेस का महल रहा है अगर तुम्हे ये पता नहीं है तोह और तुम कह रहे हो की वो तुम्हारी नानी जी का है. हो सकता है और ये भी की ये दूसरी जगह हो कोई. तुम्हे टाइम लगेगा उधर पहोचने में और पहाड़ो पर थोड़ा केयरफुल रहना, शाम कुछ ज्यादा जल्दी होती है उधर. रात को टाइम लगे तोह फ़ोन कर लेना, नंबर तुम्हारे पास है अब.", अर्जुन ने भी सर हिला कर हामी भरी और दरवाजा ाचे से बंद करते हुए वो हाथ हिला कर विदा करने लगा. जन्नत बेहद हल्का महसूस कर रही थी वापिस जाते हुए जबकि वो आयी थी तब उसकी घबराहट उस पर हावी थी. अर्जुन भी धीमी गति से जाती उस सफ़ेद कार को देखता रहा जिसमे बैठी चालाक शीशे में उसको देखती जा रही थी और द्वार से निकलने से पहले दोनों के चेहरों पर मुस्कान कायम थी. अब अर्जुन भी निकलने लगा था अपने उस सफर पर जहाँ उसकी माँ और वो बहने थी जो उसके जीवन का सबसे मजबूत स्तम्भ थी.

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"तू यहाँ कैसे आया भाई?", शंकर अभी ऑपरेशन थिएटर से बहार हे निकला था हाथ पर खून साणे सफ़ेद दस्ताने पहने पर बगल वाले बाथरूम में जाने से पहले हे सामने खड़े अपने भाई को देख कर ठिठक गया. नरिंदर अक्सर आने पर उसके ऑफिस में बैठता था पर वो आज इस जगह था जैसे कुछ ज्यादा जरुरी बात हो.

"मैं तोह पिछले आधे घंटे से प्रतीक्षा कर रहा हु तेरी लेकिन लगता है सीरियस केस था.", नरिंदर अपने भाई के साथ हे बाथरूम की तरफ बढ़ गया. शंकर ने दस्तानो के साथ मास्क भी वही भीतर रखे डस्टबिन में फेंकते हुए अपने हाथ और कलाई को ाचे से रगड़ना शुरू किया.

"मैं अंदर 1 बजे से था इन्दर और अब 5 बज चुके है. क्रिटिकल केस था और कोशिश के बावजूद 2 में से एक को हे बचा सका. ट्रक वाले ने स्कूटर को टक्कर मारी थी और पीछे बैठी महिला के जिस्म को जोड़ने के बावजूद उसकी सांसें न बचा सका. बीटा बच गया जिसने हेलमेट पहना था और टक्कर में शायद वो लुढ़का इसलिए ज़िंदा है जबकि उसकी माँ उछलने के बाद पेड़ और जमीन से टकराई. अब मैं तोह कोशिश हे कर सकता हु लोगो की गलतियां रोकना तोह मेरे बस में नहीं. वैसे तू यहाँ खड़ा था तोह जरुरी बात हे होगी.", शंकर ने हाथ साफ़ करने के बाद उन्हें छोटे बचे की तरह अपनी कमीज से हे पांच लिया.

"हाँ यार आया तोह जरुरी काम से हे हु और घर पे रहने की बारी आज तेरी है कही पीने न बैठ जाना विष्णु या किसी और ठिकाने पर. मुझे अभी दिल्ली निकलना है और कल हे लौट सकूंगा देर रात तक.", नरिंदर जैसे अभी भी खुल कर बात नहीं कह रहा था जैसे वो जानता था के शंकर अपने काम में जब भी किसी माँ का इलाज करता था और वो उसको न बचा सका हो तोह भीतर हे भीतर परेशां होने लगता था.

"तू जा न भाई फिर और घर पे माँ पापा के पास राजू भैया है तोह सही. मैं आज गुलाटी के फार्महाउस जाने वाला हु लेकिन सही समय तक घर पहोच जाऊंगा."

"चल जैसी तेरी इत्छा भाई पर दारु पी कर तू जिस समय जाएगा न तोह दरवाजा कोई बेटी हे खोलेगी बस इसका ध्यान रखना. गुलाटी बाँदा ठीक है पर तू उसके साथ वो भरी हुई सिग्रत्ते पीटा है न उसको बंद कर दे शंकर.", नरिंदर चलते हुए बहार आ गया था और उसकी गाडी में विवान आराम से सोया हुआ था जिसको दिल्ली से अपनी विदेश यात्रा पर जाना था. शंकर ने उसको सोया देख छेड़ा नहीं और सिग्रत्ते सुलगता हुआ अपने भाई की बात ख़ामोशी से सुनता रहा.

"तुझे पता है यार मैं सिर्फ कभी कभार हे 2 काश लेता हु. दिमाग हल्का हो जाता है उस से लेकिन आज तू कह रहा है तोह नहीं पीटा. वैसे दारु पी कर मैं बैठक में चुपचाप सो जाता हु, बिना दरवाजा खोलने वाले को देखे. रेखा भी चली गयी तोह आज रात बहार का हे सोच रहा था."

"वैसे तू बड़ा रेखा की तरफ जाता रहता है? और उसका भी हक़ है यार साल 6 महीने में अवकाश लेना जो वो खुद हे नहीं लेती. मैं तुझे घर रुकने का इसलिए बोल रहा था के राजू भाई की तबियत खराब है. वायरल हुआ है उन्हें शायद खुराक नहीं ले रहे ठीक से और शरीर में गर्मी बढ़ गयी होगी. फ़िलहाल तोह दवा खा कर बैठक में हे सोये हुए थे वो और तू करीब होगा तोह थोड़े निश्चिंत रहेंगे."

"बात कुछ और है इन्दर और तुझे वो सीढ़ी केहनी चाहिए बजाये के राजू भाई की तबियत के जिनके पास मैंने हे अपने डॉक्टर दोस्त को भेज दिया था 12 बजे. तू मुझे घर रहने का बोल रहा है और तू शहर में नहीं होगा तोह इसका मतलब है की मुझ पर मुसीबत आ सकती है. अब जरा नाम बता उस मुसीबत का जिसको निबटने तू दिल्ली जा रहा है?", शंकर ने सिग्रत्ते अपने भाई की तरफ बढ़ा दी थी जो उसकी बात से सहमत होने के बावजूद गंभीर हे था.

"कुछ शिकारी है भाई तेरी तलाश में और वो सामने आ कर वार नहीं करने वाले. मुझे पक्की खबर है के वो अपने शहर में आ चुके है लेकिन वो तुझे टकराएंगे सिर्फ रात को हे जब शायद तू और मैं भी साथ हो तोह कमजोर पड़ सकते है. सुपारी उठी तोह बहार से है पर देने वाला दिल्ली में है जिसके पीछे मैं जा रहा हु और इस मामले में गजेंद्र भल्ला को सामने लाना उसको भी मुसीबत में दाल सकता है. चिंता की बात ये है की वो नजदीक से नहीं मारने वाले और तू टिक कर बैठने वालो में से है नहीं. घर पे आये तोह अपने लोग संभल लेंगे इसका इंतजाम कर चूका हु मैं संजीव से बात करके. पर उसकी सम्भावना लगभग शुन्य है शंकर. तेरी गाडी में मैंने सामान रखा है, अगर जरुरत पड़े तोह परवाह मैट करना. तू होश में रहता है तोह सबसे काबिल है भाई लेकिन शराब तुझसे सिर्फ चाक़ू ब्लेड चलवाती है जो ऐसे मामलो में किसी काम के नहीं."

"टेंशन न ले भाई. दूर वालो को दूर से मारना भी सीख चूका हु. दीपक रहेगा मेरे साथ अगर ऐसी बात है तोह. चल तू भी निकल फिर दिल्ली में ट्रैफिक बढ़ जाता है रात 8-9 बजे. वैसे आईडिया है कितने लोग हो सकते है?"

"ज्यादा से ज्यादा 3 और काम से काम 2 क्योंकि तू आसान शिकार तोह हैं नहीं किसी के लिए जो एक हे भेजे और वो भी अपने शहर में जहा तुझे लोग पापा से ज्यादा जानते है. चल थोड़ा सावधान रहना बस आज के लिए."

"वैसे एक बात तोह है की मैं अपने घर में पहला इंसान हु जिसकी सुपारी विदेश से उठी है. हाहाहा.. ाचा है न कभी कभी ये आँख मिचोली जैसा भी खेल होना चाहिए इन्दर. पता चलता है की मैं आज भी उतना हे सतर्क जितना पहले था या उम्र सचमुच असर कर रही है. तू ध्यान से जाना क्योंकि मुझसे बड़े खतरे की तरफ तू खुद जा रहा है.", नरिंदर कार से पहले रुक कर उस सिग्रत्ते के बूत को पाँव से कुचलते हुए अब कही मुस्कुराया था.

"इंद्रजीत यही तोह करता है प्यारे. शिकारी को उसकी हे मांड में घुस कर पेलने का जो मजा है न मुझे उस से बढ़ कर सुकून कही न मिलता. वो बेबसी जब आप ताक़तवर हो कर भी अपनी जगह गिड़गिड़ाते हो और कोई saaj-samaan या ताक़त काम नहीं आती. मुझे मजा आता शंकर उन आँखों में झुक कर खुदको देखने में जो mere-hamare या परिवार का बुरा चाहती हो. रही बात उम्र के असर की तोह कसाई उम्र बढ़ने के साथ बेहतर हे होता है बस उसको ध्यान रखना चाहिए अपने बचपने को जो हर छोटी बड़ी बात पर बेहतर तरीके से गौर करना सिखाता है. निशाने आजमाता रहा कर जब भी समय लगे, आज भी 6 में से 3 सटीक नहीं होती तेरी और गज्जू 5 अचूक तक आ पंहुचा है."

"हाँ भाई तुझसे हे तोह सीखता हु वो सब भी और kasaai-pana. बस ये खून पीने वाला मेरे बस का नहीं पर एक दिन जरूर करने की कोशिश करूँगा जब कोई ऐसा टकराएगा जिसने विश्वास तोडा हो. इसको थोड़ा समझा दियो जो भैंस की तरह ऊंघ रहा है. बचपना इसका भी नहीं गया आजतक, इतनी बढ़िया बीवी के बावजूद."

"हाँ कोशिश करूँगा और लगता है तुझसे पहले समझदार हो जाना है इसने. माँ को बता दियो एक बार फ़ोन करके. Bye.", इन्दर भी गाडी को पीछे की तरफ मोड़ता हुआ हाथ हिला कर निकल चला था जबकि शंकर उसको जाते देख खुद से बात करने लगा.

'मेरे बस का नहीं है बे प्यार बाँटना और साला ये जो भी पीछे पड़ा है थोड़े दिन की छुट्टी दिलवा दे तोह मजा आ जाए. मरना तोह उन्होंने है हे बस इस बार मेरी इत्छा है की थोड़ा चोट वोट खा कर देखा जाए कैसा लगता है.', गलियारे से बहार आती लवलीन पर नजर पड़ते हे शंकर सबकुछ भूल गया और उसको पीछे आने का इशारा देता हुआ मुर्दाघर चल दिया जहा दिमाग के साथ उसके लुंड को भी सुकून मिलता था. लवलीन को भी ऐसे अचानक वाले संसर्ग पसंद थे शंकर के साथ और जिस तरह से वो अपना अनुभव दिखता था लवलीन पिछली बार से ज्यादा उसकी मुरीद बनती थी.

और नरिंदर जैसा सजग भाई हे उसकी असली दौलत थी जहा दोनों आजतक जमाने से ज्यादा एक दूसरे की परवाह करते थे. मौत का खेल दोनों के लिए कोई बड़ी बात नहीं थी पर परवाह वैसी हे जैसे बचपन से करते रहे थे.

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"ऋतू यार तूने उस उल्लू को बुला तोह लिया इधर पर चची और नानी का क्या करेगी? और तूने सुना था न गेट पर की 6 कमरे खुलवाए है मतलब वो कमरा अर्जुन के लिए हे होगा और वो ऊपर हे है चची की बगल वाला.", ऋतू और अलका उस खूबसूरत झील में पाँव डाले ढलते सूरज को देख रही थी. दोनों हे इस दौरान आम चूसती हुई अपने हे प्लान को नाकामयाब रहने पर उलझी थी जिसकी वजह उन्हें बाद में समझ आयी. आरती तोह 3 घंटे सोने के बाद अब मार्किट गयी हुई थी अपनी बड़ी माँ के साथ और कुंती इनकी नानी सुनंदा जी के साथ काम में व्यस्त.

"यार अब मूड मिलने का था और थोड़ा टाइम उसके साथ रहने का इसलिए ध्यान हे नहीं गया की माँ भी साथ होंगी. पर मुझे नहीं लगता की वो ज्यादा देर तक जागने वाली है और तूने ठीक किया उन्हें बता दिया की अर्जुन इधर आ रहा है. एकदम से सामने देखती तोह पक्का मेरी क्लास लगा देती की मैंने हे उसको बुलाया होगा परेशां करके. एक तोह माँ नींद की गोली भी नहीं लेती पर टेंशन नहीं, हम दिन में सो चुके है और वो बस रात को हे सोना पसंद करती है 11 बजे. उसके बाद फिर चाहे अर्जुन ऊपर वाले कमरे में हो या निचे. दबोच तोह लुंगी हे उसको नहीं तोह अर्ली मॉर्निंग का भी अलग हे मजा है.", हाथ आमरस से सन्न चुके थे जिन्हे झुक कर पानी में धोती हुई वो खुश थी अपनी सोच पर. अलका उसकी ख़ूबसूरती को देख कर भूल गयी की इसमें भी पन्गा पड़ सकता है जो ऋतू के सीधा होते हे ध्यान भी आया.

"वो अगर चची के कमरे में सोया तोह? और नानी भी सुला सकती है उसको अपने पास और दोनों की नींद भी उतनी गहरी नहीं है ये हम ाचे से जानते है. आरती को लपेट कैसे भी करके. हॉल में वीसीआर रखा है और वो फिल्म का बहाना बनाएगी तोह अर्जुन को अपने पास रोका जा सकता है चाहे तू 11 बजे तक पढ़ती रहना. चची के सामने 3 घंटे पढ़ ले ऋतू, फिर उसके बाद वो आराम करने और हम मजे... पर इधर भी एक मसला है की पहले कौन?"

"वो तोह मैं कर लेती हु अभी से, 3 की जगह 5 घंटे. पर तू एक काम करना की मेरे आने से पहले आरती को थोड़ा टाइम दे देना अर्जुन के साथ. वो थोड़े बहोत अकेले टाइम में लिप्त चिपटी से खुश रहेगी और फिर तू और अर्जुन मेरे कमरे में. तू चाहे तोह लगी रहना जितना दिल करे, मुझे बस उसके साथ सुकून से 2-3 घंटे सोना है लिपट कर."

"हाँ देखा है मैंने तेरा सोना लिपट कर. जिस तरह से ऊपर वाला हिस्सा चिपका रहता है और निचे चप्पू चलता रहता था घंटे भर. तुझे उसके साथ की ज्यादा जरुरत है और मैं नहीं चाहती की तू उसको मिस करे. मेरे पास तोह तू भी है न अगर वो वापिस चला जाएगा तब भी.", चप्पू वाली बात से ऋतू को वो पल याद आ गया जब अलका उनके हे बिस्टेर पर सोये थी जबकि ऋतू अर्जुन एक दूसरे से लिपटे अपनी धीमी गति की चुदाई में रात 3 बजे से सवेरे 4 तक लगे रहे थे.

"कुछ भी बोलती है कामिनी. वही चप्पू तू दोनों तरफ लेती है क्योंकि तुझे एक जगह से पूरा सुख नहीं मिलता. जानती है आरती और अर्जुन में ये मीठी लड़ाई किस वजह से हुई थी?"

"2 नहीं तीनो जगह लेती हु. पहले ओरल, फिर व् (छूट) और लास्ट में उसकी पसंद ा (गुदा). और आरती के साथ हुआ ये था की उसने अर्जुन को प्रॉमिस तोह कर दिया की वो पीछे करवा लेगी पर जब आगे हे काम चल गया तोह उसने दूसरी बार के लिए ये कह दिया की वो ये तभी करवाएगी जब वो उस से शादी करेगा. अर्जुन थोड़ा गुस्सा हो गया था, पीछे के लिए मन करने पर नहीं उसका शादी के लिए कहने पर. फिर दोनों के बीच काफी टाइम कुछ ख़ास नहीं हुआ लेकिन गाँव जाने के बाद जब दोनों की फ़ोन पर बात हुई तोह अर्जुन ने साफ़ कह दिया की वो पहले तुझसे शादी करेगा और फिर प्रीती से. उसके बाद आरती खुदसे कृष्णा चची को मानती है और वो राजी होती है तभी वो उसको बीवी बनाएगा. और कृष्णा चची की कमजोरी है अर्जुन और रेखा चची. अब वो सास को खुश करने में लगी है और लगी रहेगी जबतक की वो कामयाब नहीं हो जाती."

"यार अलका, मेरा हे अभी कुछ निश्चिंत नहीं है फिर अर्जुन परिवार में हे दूसरा जोखिम कैसे लेगा? कृष्णा चची से ज्यादा वो इन्दर चाचा जी पर जान छिड़कता है जिन्हे वो कभी भी शर्मिंदा नहीं देख सकता. आरती भी गलत नहीं है ऐसी सिचुएशन में क्योंकि उसकी लाइफ में तोह बचपन से हे अर्जुन हे सबकुछ है चाहे वो छुट्टियों में उसके साथ खेलना हो या बड़े हो जाने के बाद उसके लिए अपनी शर्म त्याग कर खुद को बदलना. पता नहीं इस सबका क्या अंजाम होने वाला है."

"तू सभी कड़ियों को जोड़ कर देखे तोह ये उतना पेचीदा नहीं होने वाला बस डर ये है की अर्जुन अकेला 3 को कैसे संभालेगा, मैं और तू तोह एक यूनिट है न इसलिए 3 बोल रही हु. शंकर चाचा के लिए इन्दर चाचा सबकुछ है और आरती भी उन्हें तेरे मेरे बराबर अनमोल है. और जितना मुझे पता है वो तेरे और अर्जुन के प्यार के बारे में ाचे से जानते है. अगर मामला तेरे साथ अर्जुन का जमा तोह आरती दिल खोल के रख देगी उनके सामने. रेखा चची अपनी समझ से बहार है और अब तोह मुझे वो कुछ ज्यादा हे खतरनाक लगने लगी है. पर अगर उन्होंने अर्जुन के लिए तुझे कैसे भी कबूल किया तोह वो आरती को उसका हक़ दिलवा कर रहेंगी पर फसेगा फिर से अर्जुन. एक सोच ये भी कहती है के अर्जुन परिवार से जुड़ा हे न हो जाए इस सबके कारण और ये मुमकिन है बाउजी और दादी की वजह से. सम्मान, प्रतिष्ठा और नियम उन्हें सर्वोपरि है जो आज के कामयाब अर्जुन को कल उनके हे सामने विफल साबित कर देंगे.", अलका ने जैसे एक बड़ा आइना दिखाया था इस सब चर्चा का और ऋतू सहमत भी थी.

"फिर मेरे लिए सब बेबुनियाद है अलका. शादी की जगह मैं jiwan-bhar ारु की ऋतू बन्न कर हे खुश हु अगर बात दादी ने उठाई तोह. कुछ हे सपने जलाने होंगे पर जीवनभर अर्जुन के साथ तोह रहूंगी. चल नानी अकेली लगी होगी, थोड़ा उनसे भी बातचीत कर लेते है. वैसे ारु ने इस झील को देखा तोह वो तुझे ले कर इसमें जरूर जाने वाला है. पानी में मछलियों का जोड़ा.. हाहाहा. और असली चप्पू तोह फिर उधर हे चलेगा."

"ठहर जा कामिनी, मैं चलवाती हु तेरे चप्पू. हाहाहा.. वैसे ये भालू जैसे कुत्ते अब क्या हमारे हे आगे पीछे घुमते रहेंगे.?", दोनों के भागने पर सचमुच वो 3 गद्दी कुत्ते जो इनके यहाँ रहने पर बस पसरे हुए थे, वो भी साथ दौड़ लिए. बहोत काम समय में हे वो इनसे ऐसे घुले मिले थे की अब वो बहार के साथ भीतर भी इनके प्रहरी थे. इनके maa-baap मुख्या ईमारत की तरफ मुस्तैद थे जैसी उनकी आदत थी उसको सुरक्षित रखने की. अर्जुन भी आधे से ज्यादा सफर तये कर चूका था सूर्यास्त के इस पल में. उसके सफर की यही मंज़िल थी जहा जाने कितने हे अरमान लिए था हर मौजूद शक्श.
 
अपडेट 213

पागलपन और चाहत (1)

"तुमने तोह जरा भी वक़्त न गंवाया. हम सुबह हे यहाँ पहुंचे है और शाम को तुम अकेले हे इस मोटरसाइकिल पे एक अनजान रास्ता तये करते हुए आ भी गए.", अभी सफारी वापिस हे लौटी थी अपने ठिकाने पर जिसमे से रेखा जी के साथ सामान उतार कर अंदर जाती आरती ने एक बार फिर से वो दरवाजा खुलता देखा तोह आरती को सब सौंप कर रेखा जी अपनी जगह पर रुक कर उस गोलाकार रौशनी को प्रतिपल बढ़ता और निकट आता देख मंद मंद मुस्कुराने लगी. वृक्षों से घिरे इस बसंत में अब कही कही ऊँचे खम्बो पर लगी रौशनी झिलमिल थी और कुत्तो ने भोंकने की चेष्टा की तोह उन्हें हाथ से हे शांत करवाती हुई वो अपने सामने रुके अर्जुन को कुछ पल निहारती रही जो अभी भी मोटरसाइकिल से उतरे बिना, हाथ में हेलमेट थामे बस उन्हें हे देख रहा था. गहराते अन्धकार में जैसे उसके सामने ये चन्द्रमा हे था जिसकी आभा को कोई अन्धकार समेटने में सक्षम न था. उसके हाथो से जब उसकी माँ ने हेलमेट थमा तोह जैसे वो इस हसीं स्वपनलोक से पुनः धरती पर लौटा. स्टैंड लगा कर वो सीधा उनसे गले लग कर मिला था जैसा अक्सर होता नहीं था. और बदले में रेखा ने भी अपने बेटे को कुछ पल खुद में समेटे रखा जैसे वो उसकी थकान को सोख कर ऊर्जा भर रही हो.

"आ तोह मैं सवेरे हे जाता माँ. मैं कौनसा वह बंधा हुआ हु? पर ाचा हुआ न के अन्धकार में आया जहा सिर्फ शीतल चाँद की छटा मौजूद रहती है. गाडी बहोत ाची चला लेती है आप वैसे. हम बराबर थे एक वक़्त लेकिन पहाड़ो में अभी उतना कुशल नहीं. अब आपका हाथ कैसा है?", अर्जुन अब उन्हें एक तरफ से साथ लगाए हेलमेट खुद थामे साथ साथ चल रहा था.

"दर्द तोह पहले भी नहीं था पर जख्म तुमने भर दिया, ज़िद्दी जो हो. वैसे माँ से मिलने आये हो या इधर भी कुछ मिलने की उम्मीद है?", अभी तोह अर्जुन ने कदम हे रखे थे इस घर में और आते हे उसकी माँ ने जैसे उसको ाचे से पढ़ लिया था.

"ऋतू दीदी के बताने से पहले आपने हे तोह कहा था के हफ्ते के लिए आप इधर आ रही है. बहोत दिन हो गए थे आपको देखे.. शायद 8 बरस गुजर गए होंगे हमारी दुनिया में.", अर्जुन ठीक रेखा सा व्यवहार कर रहा था और उसका 'हमारी दुनिया' कहना रेखा की हर सामाजिक और व्यक्तिगत सोच पर भारी रहा. अर्जुन का इतना स्पष्ट बताना की उसके लिए रेखा से दूर 8 दिन 8 बरस के सामान है वो भली भाँती समझ रही थी की ये उसका नाराज प्रेमी हे है जिसके वियोग में खुद वो जैसे 8 बरस दूर रही थी. हॉल में दाखिल होने से पहले अर्जुन ने जिस तरह से उनकी गुदाज सुघड़ कमर पर अपना पूरा हाथ फिराया था, वो काँप सी गयी. लेकिन अपनी माँ को हैरान छोड़ वो सीधा सामने इनकी तरफ पीठ किये बैठी अपनी नानी की तरफ बढ़ गया. बाहों का हार उनके गले डालता हुआ वो उनसे गाल सताते हुए मुखातिब हुआ.

"तोह हमारी प्यारी नानी को यहाँ भी सबने अकेला छोड़ा हुआ? कैसी हो मिस इंडिया?", सोफे पर पीछे से चढ़ता वो अब उनकी बगल में आ बैठा. और सुनंदा जी ने उसके मुसकरुआते चेहरे को देख माथा चूमने के बाद दोनों हाथ थाम कर प्रतिउत्तर में सवाल जड़ दिया.

"मिस वर्ल्ड के लायक नहीं हु क्या? एक महीने की छुट्टियां तू मुझसे दूर वह गाँव में बिताने चला गया और ये भी नहीं सोचा की मेरे कितने दोहते है? अब आया भी है तोह जानती हु की दिन निकले तू वापिस दौड़ जाएगा इसलिए मैंने खाना पहले हे तैयार करवा दिया, 2 घडी तुझे देख सकू हालचाल ले सकू. अलका बीटा भाई के लिए पानी तोह ले आ.", अलका जैसे रसोई में लगी थी, फुल्के बनाने. बाकी सब तैयार हो चूका था. और वो जब ट्रे में गिलास लिए आयी तोह अलग हे अंदाज में थी.

"ओहो तोह नन्हे मुन्ने ारु जी इतनी दूर तक अकेले आने जाने लगे है? नानी जी मैं तोह कहती हु इसको अकेले वापिस हे न जाने दो. हफ्ते बाद हमारे साथ हे वापिस घर ले चलेंगे.", अलका एक हलके से सलवार कमीज में थी और बंधे हुए बाल शायद रसोई की वजह से. किसी की परवाह न करती वो अर्जुन का गाल खींचने के साथ सोफे की पुष्ट पर हे आ बैठी उसका सर सहलाती हुई.

"हाँ ये तोह सही कहा तूने अलका. इसको अब वापिस नहीं जाने देते फिर चाहे इसके दादा फ़ोन करे या इसके पापा. बोल देंगे की अगवा कर लिया है हमने इसको.", रेखा जी तोह जाने कहा गायब हो गयी थी इस बीच और अर्जुन इन दोनों से बात करने के बाद कपडे बदलने के लिए उठ खड़ा हुआ. वो पिट्ठू बैग अभी भी उसके कंधे पर हे था.

"ये ऋतू दीदी और आरती दीदी नजर नहीं आ रही नानी.", सवाल बेशक उसने अपनी नानी से किया था पर उसके साथ उठी अलका को निहारते हुए. वो बस कनखियों से देखती मुस्कुरा रही थी अर्जुन की हरकतों पर.

"आरती तोह अभी तेरी माँ के साथ हे आयी है शायद मुँह हाथ धोने गयी हो अपने कमरे में पर ऋतू सब्जी बनाने के बाद वापिस अपने कमरे में पढ़ने बैठी है. कमरों के भीतर बहार की आवाज नहीं आती बीटा. जा मिल ले उस से ये दूसरा कमरा है उसका और पहला मेरा. ऋतू के सामने वाला आरती का है और तेरा ऊपर है तेरी माँ की बगल वाला. चाहे तोह थोड़ा आराम कर ले कपडे बदल कर फिर आराम से बातें करेंगे.", अर्जुन हाँ में सर हिलता हुआ अब ाचे से इस शाही हॉल और हर चीज को देखता हुआ थोड़ा हैरान था की ऐसी संपत्ति और यहाँ अब से पहले लोग रहने नहीं आये. चाँद कदम चलते हे वो उस चौड़े गलियारे में था जहा कोने के दोनों कमरे पार करते हे अब आमने सामने के दूसरे कमरे थे. उलटे हाथ की तरफ ऋतू और सीढ़ी तरफ आरती. सुनंदा जी अलका के साथ रसोईघर में जा चुकी थी खाना देखने और सलाद इत्यादि तैयार करने. अभी वो तये हे कर रहा था की किधर पहले दस्तक दे और सीढ़ी तरफ का दरवाजा खोलते हे आरती ने उसकी कलाई पकड़ कर भीतर खींच लिया. दरवाजा फिर से बंद था और गीले चेहरे के साथ आरती उसको कमरे के भीतर हे दिवार से लगाए ऐसे देख रही थी जैसे वो सपना हो.

"सारा दिन से इन्तजार कर रही थी तुम्हारा.", बस इस मंद सी आवाज और आरती के मासूम चेहरे को देख अर्जुन ने भी उसको बाहों में लेते हुए सीने से लगा लिया. ये समय खुल कर प्रेम दर्शाने का तोह कटाई न था और बंद दरवाजा उस से भी बड़ी मुसीबत. बस एक बार ाचे से दोनों ने एक दूजे को महसूस करने के बाद प्यार भरा चुम्बन किया और दरवाजा वापिस खोल दिया.

"मेरा आना कोई पक्का थोड़ी न था. वह सिर्फ छोटे दादा जी है गाँव वाले घर पे और माँ ने तोह पहले मन हे कर दिया था के मैं इधर न आऊं. जगह पसंद आयी?", वो आरती के बराबर में उस बड़े आलिशान बिस्टेर पर बैठा अब सहज था जैसे सबके सामने बैठे हो.

"जानती हु बड़ी माँ ने पहले हे कहा था के ये 7 दिन बस हम तीनो उनके साथ है. वैसे जगह तोह सुबह देखना तभी पता चलेगा की ये कितनी बड़ी है और खूबसूरत भी. बड़ी माँ तोह पापा और बड़े पापा जैसे गाडी चला लेती है अर्जुन, तुमने उधर देखा होगा जब हम लोग वापिस आ रहे थे."

"हाँ देखा भी और ाचा भी लगा. वैसे यहाँ हॉस्टल जैसी फीलिंग आ रही है मुझे तोह.", अर्जुन का आशय समझ कर आरती भी खिलखिला उठी. उसकी टेबल पर लैंप जल रहा था और ढेरो किताबे सजी थी.

"2-2 वार्डन है इधर और सच कहु तोह अब तोह डर भी लगने लगा बड़ी माँ से. यहाँ निचे नानी के पास मेरा और ऋतू का कमरा है जबकि ऊपर बड़ी माँ के बगल वाला तुम्हारा और इस कमरे के ऊपर वाला अलका का. बहोत प्लान बन रहे थे और अब सब फ़ैल. हाहाहा..", आरती के प्लान का मतलब समझ कर अर्जुन भी साथ हंसने लगा.

"अभी तोह तुमने माँ के हे थोड़े जलवे देखे है जब नानी और दादी के देखोगी तोह डर दिल में पक्का बस जाएगा. माँ फिर भी जाहिर नहीं करती पर दादी तोह पापा और चाचा से भी 10 कदम आगे होंगी. मैं तोह कहता हु की तुम ये पूरा हफ्ता खुल कर जियो और माँ नानी के साथ ाचा समय बिताओ. छोटे सुख की तलाश में अक्सर हम बड़े से महरूम रह जाते है.", इतनी गहरी बात थी पर वो आरती की समझ में भली भांति उत्तरी जो हामी बाहरणे के साथ ऐसे देख रही थी की जैसे वो उमरभर उसका इन्तजार कर सकती है.

"मैं भी चाहती हु की तुम यहाँ जितना समय हो सबके साथ रहो और ज्यादा से ज्यादा बड़ी माँ के. वो कितने दिनों बाद जैसे मैं खुश देखि है. दोपहर में सब सो रहे थे लेकिन वो तुम्हारे लिए आम पन्ना, dahi-bade बनाने के बाद छोले भिगो कर रात की तैयारी कर चुकी थी. जबसे तुम गए हो न तबसे बड़ी माँ शायद ठीक से सोई हे नहीं. ऋतू उनके कमरे में देर रात तक पढ़ती है, कभी कभी उसकी आँख 2-3 बजे खुलती है तोह ज्यादातर बड़ी माँ जगी मिलती है उसको. उनके लिए हे ऋतू ने नानी के साथ मिल कर ये हॉलीडेज प्लान किये थे. नानी माँ ने भी साफ़ मन किया हुआ की वो यहाँ रसोई में नहीं जाएंगी लेकिन तुम्हारे मामले में जैसे वो किसी की नहीं सुनती. ारु को ये नहीं पसंद, ारु ये खता है और न जाने क्या क्या. इतना तोह ऋतू को या मुझे भी नहीं पता होगा. पर वो खुश हैं आज और ऋतू ने उनके स्टीट्चेस भी रिमूव कर दिए, हाथ बेटर है अब उनका.", अर्जुन इस बार भीतर से गदगद होने के साथ थोड़ा अपने आप पर नाराज भी हुआ जैसे इस सबकी वजह वो खुद को मान रहा हो. एकाएक उसको गंभीर और खोया हुआ देख आरती ने बड़े स्नेह से सर सहलाया.

"पहले ऋतू से मिल लो जो कबसे अपना दरवाजा खोले हमारी बातें सुन्न रही है. अब उसका ारु उसके बुलाने पर इतनी दूर आया है तोह सबसे पहले तोह उस से हे मिलना चाहिए था. हाहाहा..", ऋतू की तरफ ध्यान जाते हे वो दूसरा दरवाजा बंद होने की आवाज सुन्न कर अर्जुन भी तेज कदमो से उधर हे लपका.

"कोई हैं क्या जो इस गरीब को दर्शन देगा?", चिटकनी लग चुकी थी भीतर से और अर्जुन द्वारा दी जाती दस्तक सुन्न कर ऋतू भी होंठ दबाये हंसती रही.

"गरीब अपनी जगह रहे. राजकुमारी के कमरे तक आने की सजा कही भरी न पड़ जाये गरीब को.", वो अपना लहजा थोड़ा बदल कर जैसे नकचढ़ी राजकुमारी सा अभिनय कर रही थी जिस पर अर्जुन भी मुस्कुराया.

"सजा भी मंजूर है बस नाचीज को काम से काम गुस्ताखी तोह करने दीजिये राजकुमारी जी. बड़ी दूर से दर्शन की आस लिए आये है आपके."

"न न.. दर्शन अभिलाषी को सुबह तक इन्तजार करना चाहिए अब. राजकुमारी जब vann-bhraman को निकलेंगी तब किसी पेड़ की आउट से देख लेना गुस्ताख़. लगता है तुम हमारे अंगरक्षकों से नहीं मिले महल के बहार."

"उन बिल्ली के बचो को पुचकार कर हे तोह आया हु यहाँ तक. अब आप ऐसा करेंगी तोह मैं सुबह नजर नहीं आने वाला.", आरती अपने कमरे से हे ये सब नौटंकी देख रही थी और सीढ़ियों से निचे आयी रेखा जी भी जिनकी तरफ अर्जुन का ध्यान हे न था. वो कदमो की आवाज का दिखावा करता हुआ जैसे जाने की नौटंकी करने लगा था और कुछ पल सन्नाटे को महसूस करके ऋतू ने भी तुरंत दरवाजा खोला जैसे वो इतने से हे डर गयी. पर अगले हे पल उसको कमर से पकड़ कर ऊपर उठता हुआ अर्जुन गोल घूमने लगा.

"ारु के बचे.. छोड़ मुझे तू.. माँ इसको बोलो की ये मुझसे बात हे न करे.. आये हुए आधा घंटा हो गया लेकिन इसको मेरी परवाह तक नहीं की एक बार मिल हे लू.", मजा ऋतू को भी आ रहा था और इन दोनों को ऐसे हँसता खेलता देख रेखा जी भी मुस्कुराती हुई हॉल की तरफ बढ़ गयी जिनके साथ आरती भी थी.

"तुम हे राजकुमारी बन्न रही थी बीटा. और ये तुमसे भले बात न करे पर घर में आते हुए ये हर तरफ बस तुम्हे देख रहा था जैसे तुम इसको अपनी नानी से गले लगते देख रही थी, चुपके से. अर्जुन जब तेरी बहिन तुझे छोड़ दे तोह ऊपर जा कर फ्रेश हो जाना. मैं जरा बहार खाना दे रही हु.", उन्होंने तोह ये भी देख लिया था के सिर्फ अर्जुन ने हे ऋतू को कमर से नहीं उठा रखा था बल्कि पकड़ ऋतू की मजबूत थी अपने भाई के कंधो पर. दोनों झिझकते हुए कमरे में आ गए जहा ऋतू ने बस उसकी दोनों आँखों को हलके से चूमा और बिस्टेर पर बैठा कर खुद हे उसके जूते खोलने लगी.

"मैं कर लूंगा दीदी.."

"दीदी बोल चाहे ऋतू, मेरा दोनों सूरत में हक़ है ऐसा करने का. सुबह से जूते पहने थे तुम?", एक पाँव से जूता और जुराब उतारते हे उनकी नमी देख कर ऋतू समझ गयी की वो काफी समय से पाँव को क़ैद किये है.

"हाँ थोड़ा काम था तोह सुबह से हे बहार था. स्टेडियम वाला, फिर शहर में और 3 घंटे से ज्यादा इधर आने में लग गए. आप मेरे शूज मत उतरा करो, ाचा नहीं लगता मुझे पाँव के हाथ लगवाना.", अर्जुन अभी भी न नुकुर कर रहा था जबकि ऋतू ने दोनों जूते कमरे में हे बने स्टोर में रख दिए. जुराबे अपने बाथरूम में धोने के लिए. हाथ साफ़ करके वो अब थोड़ा निश्चिंत सी उसके बगल में आ बैठी घुटनो के बल.

"तू न बेमतलब के बहोत काम पकड़ने लगा है आजकल. इंसान को अपना समय भी देखना चाहिए नहीं तोह भले लोग बस तभी याद आते है जब वो दुनिया से जा चुके हो. जीना सीख लेना थोड़ा सा ारु, खुदके लिए जीना. तू लोगो को खुश करता करता ये भी भूल जाएगा की तेरा वजूद है क्या.", और अब उसने खुद हे अपने भाई का सर अपनी गॉड में रख लिया. घडी उतार कर अपने सिरहाने और बटुआ खुद अर्जुन ने पकड़ा दिया. वो हलके हाथो से उसके सर में चम्पी हे करने लगी थी और अर्जुन आँखें मूंदे ऋतू के हवाले हो चूका था.

"जन्नत कपूर याद है आपको?"

"मिल लिया क्या तू उस से? और वो अब भी वैसी हे दिखती है क्या जैसी फेमिना में उसकी फोटो तूने दिखाई थी मुझे?", ऋतू के चेहरे पर एक नटखट मुस्कान थी इस पल में और वो जैसे अर्जुन के लम्बे घुंगराले बालो को अलग अलग करती उनका स्वरुप बिगाड़ने लगी.

"वो मैं माधुरी दीदी का ससुराल ढून्ढ रहा था और जब पता नहीं मिला तोह एक घर के सामने खड़ा हुआ. वो जन्नत का हे घर निकला. आपने ईमेल नहीं देखि कल से शायद. मैंने रात को हे फोटो भेज दी थी आपको. सुन्दर तोह फोटो से ज्यादा है पर लगता है अंदर से हालत बुरी है."

"हाहाहा.. तू अंदर भी पहोच गया?"

"क्या दीदी? मतलब वो सेलिब्रिटी तोह है पर एक तोह उसमे घमंड नहीं है और दूसरा उसके दोस्त या सर्किल नहीं है ज्यादा. पता है दीदी, हम क्यों बेहतर है? क्योंकि मेरे पास आप हो, कोमल दीदी है, प्रीती है और Alka-Aarti, पिंकी दीदी, संजीव भैया.. अनगिनत लोग है जो मेरी परवाह करते है, प्यार करते है मुझसे. सही गलत गलतियां करने से पहले समझा देते है पर इतना ाचा नसीब सबका नहीं होता चाहे उनकी तस्वीरें कितनी भी चमकदार क्यों न हो. रेणुका बुआ, मंजू, तारा इसका सबूत है की वो लोग कैसे अकेले समय में थे और सबके साथ मिलने से आज वो कितने निखरे है. और मैं तोह इस मामले में जैसे सबसे ज्यादा नसीब लेके आया हु.", अर्जुन की ये समझदारी सुन्न कर ऋतू ने एक और बार उसका गाल चूमा जैसा वो उसके बोलने के दौरान कर चुकी थी.

"मौका सबको मिलता है सबके साथ रहने का. बस नीव मजबूत होनी चाहिए जिसमे दरार न पड़े. हम सबका वजूद दादा दादी से है जिन्होंने अकेले हे सब शुरू किया और आज bhara-poora परिवार है जिसमे आज तक एक सूक्ष्म विवाद तक न हुआ. पापा अगर गुस्सा होते है तोह ताऊ जी और चाचा जी उन्हें मन लेते है, शांत रह कर और अगर वो बेमतलब करे तोह फिर दादी सबके सामने हे उनका कान खिंच देती है जिसको वो अपमान नहीं समझते, प्यार मानते है. तारा और तेरी कभी नहीं बानी बचपन में और आज दोनों बड़े होने पर एक दूसरे को समझे क्योंकि माहौल, परवरिश हे ऐसी थी. अलका और मैं बहोत बार सहमत नहीं होती पर क्या हम में विवाद या लड़ाई होती है? कभी नहीं क्योंकि हम एक दूसरे की रेस्पेक्ट करते है और असहमति वाली बात को गहराई से देखते है की हम ने क्या ठीक से नहीं समझा. मतलब गलती चाहे मेरी हो या उसकी, लेकिन हल दोनों मिल कर ढूंढ़ती है. परिवार ऐसे हे मजबूत बनता है ारु जिसमे अगर एक बोल रहा हो तोह दूसरे को सुन्न न चाहिए. हाँ परफेक्ट जैसा कुछ नहीं होता क्योंकि सभी का स्वभाव एक दूसरे से अलग होता है.", अर्जुन हर बात को ाचे से याद कर रहा था जो भी इस भाई बहिन के पल में उसकी बड़ी बहिन समझा रही थी. उसको याद आया की जन्नत ने बताया था की बचपन में उनका एक संयुक्त परिवार था जिसके टुकड़े होने के बाद उसको खुद अकेलेपन की आदत पद चुकी थी.

"आप सही कहती हो और ये बात मैंने भी गौर की है. बाउजी और दादी को हे देख लो वो जैसे चक्की के 2 पात है जिसमे दादी अपनी जगह यानी की परिवार में स्थिर और दादा जी उसको बहार से सुरक्षित रखते है. दोनों समर्पित है और स्वभाव एक दूसरे से बिलकुल अलग. माँ और पापा के मामले में ऐसा क्यों नहीं है ये मुझे बचपन से समझ नहीं आता.", अब न चाहते हुए भी अर्जुन ने एक संवेदनशील सा मुद्दा उठा दिया था और ऋतू के हाथ कुछ वक़्त अपनी जगह रुके रहे फिर वो उसके माथे को सहलाती हुई अपनी राये देने लगी.

"पापा जिस से प्यार करते थे यानी ऋचा की मम्मी, वो उन्हें नहीं मिली. और पापा का स्वभाव है की जो उनको नहीं मिलता वो फिर वैसा दूसरे का भी नहीं होने देते. कॉम्पिटिटिव नेचर है भाई उनकी शुरू से हे और दादी ने एक बात बताया भी था की वो दिल के मामले में थोड़े ज्यादा हे भावुक है जैसे किसी छोटे ज़िद्दी बचे की तरह. तेरे पास मेरा खिलौना है तोह वो मैं टॉड दूंगी ऐसा कुछ. और माँ.. माँ को पहले मैं कभी समझी हे नहीं क्योंकि वो ghar-pariwar और जिम्मेदारियों में इतनी व्यस्त रहती थी की मुझे लगता था उन्हें मेरी फ़िक्र हे नहीं. पापा से मांगो वो मिल जाता था और हर ज़िद्द भी पूरी. पर माँ के बारे में मेरी राये बहोत गलत थी ारु क्योंकि वो शादी के बाद से हे बस सबको सँभालने और बेहतर बनाने में लगी रही. बदले में उन्हें क्या मिला जब ये सोचती हु तोह खुद पर हे शर्म आती है. संजीव भैया को पढ़ते समय वो मुझे और अलका को भी किताबे ले कर वैसे हे पढ़ने लगती थी. भैया को गलती पर सजा मिलती तोह हमे भी और उस टाइम लगता था के वो खड़ूस है. फिर पता हे नहीं चला की कब मैं अनजाने हे करियर के प्रति सीरियस हो गयी. तुम नहीं थी जब मैंने बोर्ड के इम्तिहान दिए थे. माँ रात में 2 बजे कॉफ़ी लेके आती थी मेरे और अलका के लिए. फिर हम 4 बजे सो जाती तोह सुबह किताबे बिस्टेर तक अपनी जगह सही से सेट मिलता. मैं जज्बाती हो कर उनके द्वारा प्रश्नपत्र के पूछे हर सवाल का जवाब देती जैसे उन्हें दिखाना चाहती थी की मैं परफेक्ट हु चाहे वो पढ़ाये या मैं अकेले पढू. मुझे सब आता है. पर वो बदले में बस सर पे हाथ फेर देती. मेरे क्वेश्चन पेपर्स पर उन्होंने जहा जहा जितने नंबर लिखे मुझे उनसे ज्यादा एक भी नहीं मिला जब रिजल्ट आया. फिर तुम आ गए और नोकझोंक ज्यादा बढ़ गयी हमारी तोह माँ की तरफ से ध्यान हट गया मेरा. लेकिन जब हम दोनों उनके सीने से लगे लेते थे तब मुझे समझ आया की दूर तोह हमेशा मैं रहती थी, व्यस्त वो अपने समय पर लेकिन उसके बाद अपने कमरे में जहा मुझे होना चाहिए था उनके साथ जैसे तुम हक़ से सो जाते थे. उन्होंने मेरा वो गुजरा बचपन वैसे हे लौटाया अर्जुन, वैसे हे जैसे मैं चाहती थी पर मानती थी की मुझे दिया नहीं गया. तुम माँ और पापा के रिश्ते की बात कर रहे थे न तोह माँ ने विवाह दादी की बहु के तौर पर किया था. उन्होंने आजतक पापा से कभी कुछ नहीं माँगा और न पापा ने खुद से दिया. पापा गलत नहीं है अगर मैं निष्पक्ष बात करू तोह पर वो एक ाचे पिता होने के साथ उतने ाचे पति नहीं बन सके. माँ समझदार और सहनशील है जो फिर भी पूरी लगन से परिवार को संभाले हुए है. मैं तोह तुझे छोड़ कर केस कर देती अगर तुम ऐसा करते तोह.", अर्जुन को मंद मंद मुस्कुराता देख ऋतू ने उसके गाल पर चूंटी भरी दी.

"आउच.. इसका बदला लिया जाएगा याद रखना. पर मैं घात लगा कर तब बदला लूंगा जब सोई होगी. जो सब अभी आपने कहा न ये मैं जानता हु पर मुझे बस ऐसा लगता था के बाकी लोग इतना नहीं जानते. वैसे माँ है तोह अपने आप में एक पहेली हे जिन्हे जितना समझना चाहो उतना काम लगता है."

"तोह क्या दादी ने ऐसे हे पसंद कर लिया उन्हें और मांग के लिया था. अलका की सिट्टीपिट्टी गुम्म हो गयी थी आज सुबह जब माँ ने एक जाहिल पैर पिस्तौल तान दी थी. हाहाहा.. तुम न उनके जैसे हो बस थोड़े बिगड़ैल घोड़े जिसको रुकना नहीं आता.", अर्जुन अपना मजाक उड़ता देख तुनक कर बोलै.

"इसकी वजह भी हमारी प्यारी दादी हे है जी. शरीर के साथ बहोत कुछ बदल दिया उन्होंने मेरे भीतर. पर आज जैसे मैं बेअसर सा हु और यहाँ इसलिए आया था के माँ को देख सकू और सुबह... सुबह तुम्हे थोड़ा प्यार कर सकू.", प्यार वाली बात अर्जुन ने बहोत धीमे से कही थी ऋतू का गाल अपने हाथ से छूटे हुए. बस इस स्पर्श से हे वो भाई बहिन इस कमरे से अदृश्य हो कर पीछे 2 प्रेमी छोड़ गए. ऋतू पल में हे सुर्ख होती हुई नजरे चुराने लगी थी.

"भाड़ में जाओ तुम और तुम्हारा सुबह वाला प्यार. मेरी माँ ने देख लिया न तोह तुम्हे गोली मार देगी, गुस्ताख़ लड़के.", अर्जुन को वो परे देखेलना चाहती थी जबकि उसने थोड़ा जोर लगा कर चेहरे नजदीक किये और एक सामान उन भूरी आँखों में देखने के बाद लरजते होंठो को जल्दी से चूम कर बहार दौड़ गया.

'लगो तोह सही मेरे हाथ फिर चीखते फिरोगे. सही टाइम चुना है बच्चू.. इधर सभी को गहरी नींद मिलेगी और मुझे तुम्हारा... तुम्हारा प्यार.', ऋतू अपनी हे कल्पना पर शर्माती हुई बाथरूम में बंद हो गयी. आज वो समय से पहले नहाने लगी थी और बहार हॉल में रेखा जी ने अपने बेटे को मीठी झिड़की लगा दी.

"अगर अब ये बैग एक मिनट भी टेंगा दिखा तोह जाते वक़्त ये तुम्हारे साथ नहीं होगा. चलो ऊपर और इसको इसकी जगह रख कर नहाने जाओ. मैं कपडे देती हु तुम्हे.", हॉल में आरती वीसीआर पर सिलसिला फिल्म की कसेट्टी लगा चुकी थी लेकिन उसको रोके रखा था खाने तक. अलका भी नहाने चली गयी सब निबटा कर और अब ऊपर अर्जुन को बगल वाले कमरे की जगह रेखा जी ने अपने कक्ष में हे रुकवाया. ये कमरा सादगी से भरा लेकिन बेहद संतुलित था. गोल किनारो वाला एक बड़ा बिस्टेर, आबनूस की लकड़ी से बना 4 फ़ीट का मेज, 2 शाही कुर्सियां, फर्श से छत तक जाती 3 पल्लो की लकड़ी की बड़ी अलमारी और एक बिना किनारे के 6 फ़ीट लम्बा सोफे. दिवार पर साधारण बल्ब की जगह कांच के लैंप लगे थे और बड़ी कांच की खिड़की के केंद्र में वातानुकूलन.

"वाओ.. ये तोह आपके वह वाले कमरे और स्टोर को मिला दे तब भी कही ज्यादा बड़ा कमरा है माँ. इधर से पीछे का सारा नजर दीखता होगा न जंगल की तरफ? आप इस कमरे में अकेले रह लेंगी?", अर्जुन शर्ट उतार कर कुर्सी पर टांगते हुए पूरा कमरा ाचे से निहारने लगा था. और 24क्ष20 का ये कक्ष था भी कुछ ज्यादा हे बड़ा. शायद निचे और ऊपर के ये पहले पहले कमरे हे इतने बड़े थे. रेखा अपने बेटे के जिस्म को बस एक बार देख कर वो मैली सफ़ेद कमीज उठती हुई एक तरफ राखी टोकरी में डालने के बाद उसका बस्ता खोल कर कपडे निकलने लगी.

"ऐसा नहीं है की मैं इधर अकेली हु पर एकांत भी जरुरी है."

"6 दिन रह लेना अपने एकांत में पर आज तोह आप अकेले नहीं सोने वाली.", अर्जुन की बात सुन्न कर रेखा ने जल्दी से दरवाजा लगा दिया. चेहरे पर ऐसे भाव थे जैसे एक किशोरी ने घरवालों से छिपा कर अपने प्रेमी को घर बुला लिया हो. हाथ अभी भी दरवाजे की उस लम्बी चिटकनी पर हे था और सलवार कुर्ती के ऊपर से हे अर्जुन की बाहों का घेरा उनकी समतल कमर पर कास गया.

"मैंने बता कर गलती कर दी तुम्हे.", रेखा की आँखें बंद थी इतने दिनों बाद अर्जुन की गिरफ्त में खुद को महसूस करके. सिर्फ एक ढीली निक्कर पहने वो उनके पृष्ट भाग से लिप्त अनावृत गोर कंधे को चूमने के बाद ऐसा हे उनके मखमली गाल पर दोहराने लगा.

"आपको मेरा ऐसा करना गलत लगता है क्या? मुझे तोह इस एहसास से बढ़कर कुछ भी नहीं लगता जब आप ऐसे मेरे पास होती है. मेरे कपडे अपनी अलमारी में आप खुद हे रख रही थी, आपके हे बाथरूम में मुझे नहलाने लेके आयी है और सबसे बड़ी बात है की मेरे जाने के बाद से आप सुकून से एक रात भी नहीं सोई. अगर अब भी आप कहती है की आपने गलती की है तोह फिर मैं चला जाता हु. जवाब तोह आपने पहले भी कभी दिए नहीं और आज मैं नहीं चाहता की आप कोई वजह दे जिस से मुझे खुद पर हे संदेह हो.", अर्जुन ने हाथ कमर से ढीले करने के बाद चेहरा हटाया तोह अब बरसने की बारी रेखा की थी जिसने चेहरा थाम कर अर्जुन के लबों से अपने तपते हुए भरे भरे लैब मिला दिए. ढेरो जवाब समेटे था वो प्रगाढ़ चुम्बन जिसमे हावी होती रेखा अर्जुन को दरवाजे से दूर ले जाती हुई जैसे दुनिया से भी परे ले चली थी. अर्जुन उन मीठे अधरों के रास में डूबा कब बिस्टेर पर पाँव लटकाये पसरा और कब रेखा उसके ऊपर बिछ गयी, कोई होश न था. इस अनंत चुम्बन के रुकने का समय भी जैसे रेखा ने हे निर्धारित किया था जिसके गरम अश्रु अर्जुन को अपने चेहरे पर महसूस होते हे उसने अपनी माँ को बाहों में कस लिया.

"यहाँ भी घुटन है क्या आपको? या कोई और बोझ आपके कंधो पर पड़ा है? इतना प्यार करती है और कभी सामने से कहती भी नहीं.", अर्जुन ने वो भीगी आँखों वाला चेहरा ऊपर उठाया तोह उधर एक मोहक मुस्कान सजग थी.

"तुम जवाब जानते हुए भी सवाल करके वक़्त जाय करते रहते हो. नौसिखिये कही के.. मैं बस तुम्हे टटोल रही थी की तुम किसके लिए आये हो. जान तोह पहले हे गयी थी जब तुमने आते हे इरादे बता दिए थे. पर ऐसा है की पहाड़ो में मौसम के साथ इंसान भी बदल जाता है. फिर कही तुम्हारी थकान, एकांत या जासूसी की आदत न हावी हो जाए..", अपनी माँ के इस स्वरुप को देख अर्जुन ने भी हँसते हुए फिर से उन्हें बाहो में भर लिया. दोनों पलकों पर हलके हलके चुम्बन जड़ने के बाद वो कुछ पल ऐसे हे उन्हें अपने ऊपर लिटाये बस महसूस करता रहा इस अध्भुत स्पर्श को जो रोम रोम में अलग हे तेज भरने लगता था.

"वैसे आपको मैं नौसिखिया और मौसम जैसा लगता हु?", अर्जुन ने उद्दंड बचे की तरह उनके उभरे हुए गोलाकार कूल्हों पर हलकी चपत लगाने के साथ हे कुछ हिस्सा पंजे में भर लिया. इतने मुलायम और तराशे हुए कूल्हों का वो मांस भी उसके रक्त का वेग पल में बढ़ा देता था. पर इस हरकत से रेखा के होंठो से भी वो हलकी सीत्कार सी फूटी.

"आउच.. तुम हो नौसिखिये और मौसम से ज्यादा बेईमान भी. वैसे तुम धूर्त भी मेरी सोच से ज्यादा निकले. क्या जरुरत थी गाँव वाले परिवार में वो सब करने की? माँ जी तोह तारीफ हे कर रही थी मुझे डांटने के साथ पर तुम्हे भी थोड़ा सोचना चाहिए था न की वो हमारा हे परिवार है. सबको बदलने के मौका मिलता है अर्जुन, तुमने मुझमे भी बदलाव लाये पर उनके साथ दोहरा चरित्र क्यों?", अर्जुन के चौड़े सीने पर जिस तरह रेखा उँगलियाँ फिर रही थी ये सब उसकी वो चाहत थी जो उम्र के ढलने वाले दौर पर पूरी होने लगी थी. अर्जुन ने जबसे उसको उसके होने का एहसास करवाया था तभी से रेखा के प्रेम जीवन का वही अंकुर और अब वृक्ष बन्न रहा था. अर्जुन भी अब निर्भीक उनके लचीले कूल्हों को सहलाता हुआ अपने ऊपर झुके चेहरे को निहारता रहा.

"मैं आपका प्यार हु या अंश, ये मसला गंभीर है लेकिन मेरे भगवन का स्वरुप भी तोह आपसे हे है. आप सेहन कर सकती है और करती रहेंगी कयोंकि आपको मैं उतना नहीं बदल सकता. पर एक सच ये भी है की आप हे मेरी दुनिया हो और मैं इस मामले में थोड़ा सा लालची और धूर्त भी हु. लालच है अपनी दुनिया खूबसूरत बनाये रखने का और धूर्त ऐसा की सामने वाला खुद गलती करे और उसका परिवार हे उसको सजा दे. आपकी परवरिश गलत होती तोह क्या दामिनी बुआ को मैं ज़िंदा छोड़ता? क्या मेरे मैं में विचार नहीं आये होंगे की किस किस तरीके से मैं देवकी दादी को प्रताड़ित करू? मेरी हालत मैं हे जानता हु जो मैंने खुद को नियंत्रण में रखा. आपने पहले हे अनगिनत दुःख झेले है और उतना हे दर्द अकेले पिया. और मेरे होते हुए अब भी वैसा रहे तोह फिर ऐसा जीवन मुझे ..."

"शठ.. सबसे ज्यादा डर मुझे तुमसे हे लगता है अर्जुन और देहलीज लांघ कर एकमात्र गुनाह भी मैंने तुम्हारे पहलु में किया जिसका मुझे दुःख नहीं बल्कि तमाम हसरते पूरी होने की ख़ुशी है. Shat-pratishat और म्हणता का तमगा ले कर नहीं जीना चाहती क्योंकि वैसा मुमकिन नहीं. मैंने अपनी मर्जी से ये दोहरा रिश्ता पसंद किया जिसमे अब तुम मेरा ख्वाब हो या मेरे प्यारे बेटे."

"आज तोह मैं बिलकुल भी आपका प्यारा बीटा नहीं हु. बैग खोल कर सबकुछ कहा देखा आपने. पहले मुझे नाहा लेना चाहिए, बाकी फिर रात से सूर्योदय तक के वक़्त के लिए बहोत साड़ी हसरते और ाचे प्लान है मेरे पास. इस पैकेट को खोलो जरा.", अर्जुन ने वो सीलबंद कला पैकेट अपने ऊपर लेती हुई रेखा को सौंपते हुए शरारत से कहा जो उत्सुक होने के साथ अब नजरो के वार से थोड़ी शर्मा रही थी. किनारे को दबाने से हे पैकेट पर लगी ज़िप खुलती चली गयी. अर्जुन के चेहरे के ऊपर वो 2 रेशमी से वस्त्र आ गिरे जिनमे शायद वस्त्र ज्यादा नहीं था.

"तुम लड़कियों की मार्किट भी जाने लगे हो? और अपनी माँ से ऐसी फरमाइश रखते हो? छी.. ये सब क्या है?", जालीदार कला बिना ब्याह का कमीज और एक रेशमी काली पंतय जिसमे बस इतना हे वस्त्र था के 4 इंच लंबवत खजाने को छिपा सके. दोनों कपडे मुट्ठी में कस कर भींचने के बाद रेखा ने अर्जुन की पहोच से दूर फेंक दिए.

"ये पसंद नहीं तोह इसको फिर कभी पहन लेना पर ये दूसरा देखिये जरा. इसमें आप सचमुच कमाल की लगने वाली है.", दूसरा पैकेट खोल कर अर्जुन ने हे वो वस्त्र सामने रख दिया जो मुश्किल से किसी महिला का सीने से ले कर कूल्हों के उठान तक का हिस्सा छुपा सकता था. जमुनी रंग का रेशमी परिधान. रेखा ये सब वस्त्र उठा कर तुरंत हे अर्जुन से अलग हो गयी.

"माँ की आवाज आने वाली है कभी भी और उस से पहले जा कर नाहा लो."

"आप नहीं आ रही मेरे साथ?", अर्जुन ने मस्ती में कहा था और इस बार फिर उसने हलके से उनके कूल्हों पर चूंटी काट दी.

"उफ़.. प्लीज.. नाहा लो और मैं निचे जा रही हु.", अर्जुन समय को समझता हुआ उस आलिशान बाथरूम में दाखिल हुआ तोह तीव्र इत्छा जगी अपनी माँ को साथ ले जाने की जो अभी मुमकिन नहीं था क्योंकि रेखा कमरे से नदारद थी सब समेत कर.

'धत्त तेरी की .. कोई बात नहीं रात में कौनसा इस्पे टाला लगने वाला है. आज ये ख्वाहिश भी पूरी करूँगा उनकी.'

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"आज तोह लवलीन को बुला लेता भाई. तेरे वाली भी घर नहीं और मेरे वाली भी मायके गयी हुई. इस जाट के ठाठ है जो भाभी रात को स्वागत करती मिलेगी.", फार्म पर काफी समय बाद तीनो दोस्त जमा हुए थे. आया तोह दीपक और उसका एक साथी भी था इधर लेकिन वो लोग इनसे दूर तरणताल में तैरने के साथ बियर का लुत्फ़ लेने में लगे थे. आज मुद्दा फिर वही पुराने वाला था यहाँ, लवलीन और उसके प्रति गुलाटी की आसक्ति.

"रे पुन्जबै, मेरे वाली जितने लम्बे टाइम खातिर गयी थी न उसमे 50 लाख उजाड़ दिए थे पर कोई उसके जैसी न मिली. वापिस आयी तोह अब वो माँ बापू की बहु है और आजकल तोह बिस्टेर भी न्यारा कर राख्या मेरा. शी साइड मर सांगवान आईटी इस योर रेपेंटाने टाइम एंड मेन्टेन सम डिस्टेंस. देख ले पंडत मेरी हालत और रुस्सियन बीवी के नखरे. पर के कर सकू हु जब किया धरा सब मेरा है. वैसे तू पंजाबी की हसरत पूरी न कर रहा भाई.", जाम जाने कितने ख़तम हुए थे और कौनसा चल रहा था पर तीनो बैठे सुकून से थे. शंकर पुराने जाम में हे अधिक बर्फ दाल कर उसको हिलने लगा.

"मैंने तोह आज भी वो सलवार उतार के पेली भाई पर यु गुलाटी अकेले कोशिश न करता इतने वो इसने दें से रही. देख भाई गुलाटी हमने साथ में लगभग हर पसंद आयी नर्स डॉक्टर का सुख लिया पर उसको पता है के तू उसपे लट्टू है और तू जो भी करेगा मेरे होते करेगा जहाँ वो बिदक जानी. मैंने तोह लपकी भी इसलिए थी की एक तोह मूड खराब था मेरा और दूसरा यहाँ आने के लिए उसको भी कह दू. बोली के वह डॉ मेहुल आपके साथ शुरू हो जाएंगे और ये मुझे ाचा नहीं लगता. जब आप सामने होते हो तोह मैं अपने मंगेतर तक के बारे में नहीं सोचती. अब बता भाई जाट इसका क्या मतलब होया?", शंकर बर्फ पूरी तरह घोल कर एक साँसे में जाम जातक गया था. भूने काजू चखने में चबाते हुए निगाहे परम सांगवान पर तिकी थी जो बेहद हे दूरदर्शिता में विफल व्यक्ति था.

"इसका मतलब होया के पंजाबी का नंबर कट है और कल को वो पेट से भी होगी तोह मंगेतर की जगह बीज पंडत का होगा. पता न साली आजकल की नयी नयी डॉक्टर के स्वाद इतने खराब कैसे हो गए. पटना चाहिए था पंडत का लोंदा और चिपकी है उसके बाप से.", बात बेशक be-sir-pair थी पर तीनो हे हंस दिए..

"भोस्डिके तू न दारु के साथ shakkar-paare न खाया कर. शंकर की बात का मतलब है की वो मेरे साथ भी कर लेगी पर वह बस मैं अकेला राहु. मुझे लगता है शंकर की किसी उसकी सीनियर ने तेरे मेरे मिल के करने के किस्से सुना दिए है उसको. वो डॉ मानसी हे है तेरे हॉस्पिटल में अपनी पुराणी जुगाड़ में से. घबरा गयी होगी की ये दोनों मिल के एक साथ निचोड़ेंगे और मैंने तोह पिछली बार हाथ भी रख दिया था यही पे जब वो तेरी गॉड में उछाल रही थी. ऐसा कर भाई की कल उसको मेरे पास भेज दे इधर, केस भी है और एकांत रहेगा तोह एक बार अकेले में हे करता हु फिर सैंडविच बना लेंगे जब सूट बैठी. वैसे आज ये पोलिसिअ भतीजे कैसे साथ है शंकर?", अपने इरादे जाहिर करने के बाद गुलाटी ने उनसे 200 गज दुरी पर तैरते उन दोनों जवान शक्श के बारे में बात शुरू की.

"हाँ भाई और तू आज आया भी सरकारी गाडी में. कोई लफड़ा है क्या शंकर? ये तोह चल अपने हे बचे है जो कभी भी आये पर तुझे इस सबकी जरुरत न पड़ती.", सांगवान का भी वही सवाल था और गुलाटी जान बनाने के बाद सिग्रत्ती खाली करने लगा तोह शंकर ने मन कर दिया.

"आज ये मत बना मेहुल भाई, घर पे इन्दर भी नहीं है गेट खोलने के लिए और मुझे 11 बजे हर हाल में वह होना है. राजू भाई की तबियत भी थोड़ी ढीली है तोह बेटी हे गेट खोलने आएँगी. दीपक और सुनील भी ख़ास वजह से संजीव ने मेरे साथ भेजे है. पता नहीं कौनसे के दिन पूरे होये है दिल्ली की तरफ जिसने मेरी सुपारी उठवा दी बहार से. आज का प्रतिबन्ध लगाया है इन्दर ने मेरे ऊपर और इतना मैं कर भी सकता हु.", शंकर की बात सुन्न कर दोनों को थोड़ा ताज्जुब हुआ पर गुलाटी ने वो सिग्रत्ते टॉड कर घांस पर हे मसल दी.

"सावधानी हे तोह हमारे हाथ है भाई. चूक तोह न ऑपरेशन में करते और न जीवन में. वैसे अगर मामला इस तरह हुम्ला करवाने का है तोह ये तेरा कोई जानकार दुश्मन हे है शंकर क्योंकि वही तेरी क्षमता जानता है की भीड़ और भाड़े के गुंडों से तोह तुझसे पार न पाया जा सकता. साला तेरे नमूने देख कर तोह हमारी फटी हुई भी वक़्त के साथ सील गयी. आज इस भुप्पी को फ़ोन किया था तोह वो भी कुछ दुर्घटना के बारे में बता रहा था. उसको लगता है की हम चारो पर जल्द हे हुम्ला हो सकता है और शायद धर्मवीर चाचा जी पर भी. ऐसा कौनसा पैदा हो गया यार शंकर जो हम पांचो को इतने ाचे से जानता है जितना भुप्पी ने बताया?", अब जैसे शंकर के दिमाग की बंद बत्ती जागने लगी थी जब गुलाटी ने ऐसी दुर्घटना इतने लोगो के साथ होने की बात कही.

"हॉस्पिटल.. भाई जाट, मेहुल की बात कही न कही सही है. देख जैसा इन्दर ने बताया उसमे भी हुम्ला और सुपारी मेरी हे थी जबकि अगर दुश्मन पारिवारिक मुठभेड़ वाला होता तोह वो अर्जुन या पापा को भी चुनता और आज की तारीख में इतने शुभचिंतक बचे नहीं है जो ऐसा करना तोह दूर सोचने की भी सोचे. ये साला कोई वाइट कालर हे हमारी तरह और वजह भी है उसके पास क्योंकि चाचा अब पुराने हॉस्पिटल्स में से सिर्फ 5 अपने पास रख रहे है और बाकी बेच कर दिल्ली की तरफ 3 बड़े हॉस्पिटल बनवा रहे है जिस से उथल पुथल मचनी स्वाभाविक है. लेकिन अगर 5 लोगो की सुपारी उठती तोह इन्दर मुझे बाकी सबका भी बताता. भुप्पी की जानकारी का स्त्रोत क्या बताया उसने मेहुल?", बात बस अब यही उलझ रही थी की ऐसी तिकड़म कोई कर रहा है तोह फिर सिर्फ शंकर निशाने पर कैसे.

"दिल्ली से हे खबर लगी है उसके हाथ जैसा उसने बताया. वो भी यही अनुमान लगा रहा था के safed-posh व्यापारी डॉक्टर और उसका कोई अमीर साथी हे ऐसा करवा सकता है. भुप्पी डॉक्टर से ज्यादा जासूस हे तोह शंकर और कुछ दिनों से वो अंदर खाते की हे जानकारी जूता रहा है जबसे उधर उमेद ने हॉस्पिटल बनवाने का काम पकड़ा है. ऐसे लोग सीधा हुम्ला करने की कभी गलती नहीं करते क्योंकि समाज में उनकी प्रतिष्ठा कही ज्यादा है. लेकिन हम सबमे से अगर किसी एक पर निशाना लगा कर बाकी सबको झुकना हो तोह वो सिर्फ तू है शंकर. चाचा umar-daraaj है और उनके पास ाची खासी सुरक्षा भी है. मैं एक आम जीवन जीने वाला डॉक्टर और jaat-ram खुद ज्यादा सामाजिक इंसान नहीं. तू डॉक्टर होने के साथ साथ एक ताक़तवर शख्सियत भी है और खुला सांड भी. हम में से कोई भी जाए उस से उतना फरक नहीं पड़ेगा जितना तेरे पर हुम्ला होने से. बात आज रात की है तोह ऐसा कर भाई की तू यही रुक जा और ये लोग भी रह लेंगे."

"गांड मरए वो लोग पर शंकर पहले भी सड़क किनारे मूट करता था और आज भी करेगा. बर्फ भर दे भाई मेरे गिलास में और सोऊंगा तोह अपने हे घर पे.", दोनों के मानाने के बावजूद शंकर ने 2 जाम और लेने के बाद दीपक और सुनील को तैयार होने की आवाज दी. अब वो कुर्सी से उठकर सिग्रत्ते सुलगने लगा तोह सांगवान की नजर पतलून में खांसी स्वचालित पिस्तौल पर पड़ी.

"मतलब तू आज शिकारी के शिकार करने के फीलिंग ले कर हे इधर आया था पंडत? देख रे पंजाबी इसकी कमर पे भी एक रुस्सियन लटकी है.", शंकर ने धुंआ उड़ाने के बाद आँख मारते हुए कहा.

"भाई का तोहफा है एक रात के लिए. इन्दर के पास ऐसी एक दर्जन होंगी पर वो किसी को भी ये रखने के लिए न देता. आज मिली है तोह मेरी बड़ी इत्छा है भाई की चलाई पिस्तौल थाम कर किसी भेजा उड़ाने की. दिलेर दिखा तोह कार से उतर कर छाती में मारूंगा साले के."

"पूरा यकीन है भाई की मुठभेड़ होगी?", ये बात मेहुल ने कही थी जो शरीर से आराम की मुद्रा में कुर्सी पर पसरा था.

"इन्दर ने कहा था के ऐसा होने की सम्भावनाये 99% से ज्यादा है और होगा ये आज रात को हे. जब मैं इधर आया तोह गाडी सड़क किनारे कड़ी करते हुए भी ऐसा लग रहा था के कोई तोह पीछे है पर तब ट्रैफिक भी था और उजाला भी. वह से हम लोग इस बिना बत्ती की अम्बस्सडोर में आये है और यकीन है की वो जो भी है यहाँ तक आ कर अब इन्तजार में होगा. मैं उसको पीछे आने दूंगा, क्योंकि इन्तजार करवाना मुझे भी पसंद नहीं. तुम दोनों यही रुकना और इस जाट ने घर भी जाना हो तोह मेरे जाने के आधा पौन घंटे बाद. खामख्वाह कही मेरे नसीब वाला पीतल इसके बदन में न बैठ जे.", शंकर कमीज पतलून से बहार निकाल कर उस भरी गाडी में जा बैठा, स्टीयरिंग के पीछे. बाकी दोनों से विदा ले कर दीपक और सुनील भी अपनी अपनी जगह बैठ चुके थे जहा सुनील पिछली सीट पर ऐसे पसरा था जैसे कार में बस 2 हे लोग हो. वह लेता वो पेरिस्कोप से पीछे नजर रखे था. उनकी गाडी निकलते हे मेहुल ने सर आधा घुमा कर चलने का इशारा दिया अपने साथी को.

"रिस्क लेना चाहता है पंजाबी? घर बता के न आया हु भाई मैं."

"भाई है वो अपना और वो मन करते रहे पर हमे उसके साथ रहना है हमेशा. दूसरे रस्ते से एस्कॉर्ट निकाल सलेटी वाली और लाइट बंद रखियो जाट. उसमे असला रखा है. मैं स्कूटर उठता हु हेलमेट के साथ.", मेहुल जाने क्या प्लानिंग कर बैठा था लेकिन उसके तंज़ से सांगवान की भी शराब उतर चुकी थी. उनके दोस्त की जान को खतरा था जो सावधानी की जगह खुदको हे अज्ञात हमलावरों के निशाने पर ले जा रहा था.

"पंजाबी, तेरी लुगाई घर न है तोह इतना ख़याल रखियो की आज हे तेरी आखिरी रात न हो. मैं पंडत से आगे रहूँगा और तू सबको निशाने पर रखियो. पक्की बात है के घेरा तोह ठंडी सड़क पे हे होवेगा. वही साला अँधेरा और सुनसान पसरा रहता है.", कमीज की आस्तीन उठता हुआ परम फार्म के दूसरी और चल दिया जबकि मेहुल उस शेड के निचे जहा एक पुराण लेकिन आज तक चमकदार हरा प्रिय स्कूटर खड़ा था. 2 किक में हे उसके इंजन में पेट्रोल दौड़ने लगा था और उसकी सामने वाली डिक्की से निकला तमंचा मेहुल की कमर में ठीक नाभि के पास थोड़ा सुस्ताने लगा, एक अनचाही मुठभेड़ से पहले.

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"हेमंत तुम्हे पसंद तोह है न जिनि? वैसे तुम भी तोह मिली हो जानू बीटा हेमंत से. जक भाई साहब तोह इतने उत्साहित हैं की रोकके पर हे अपनी होने वाली बहु के लिए इम्पोर्टेड टोयोटा मंगवाई है गिफ्ट में देने के लिए. चंडीगढ़ वाला उनका पुश्तैनी बांग्ला भी फिर से तैयार हो रहा है जहा हेमंत और जिनि एक साथ नया जीवन शुरू करेंगे.", दोनों बहने अपनी माँ के हे कमरे में थी रात के भोजन के बाद. जीनत बड़ी खुश हो कर आज शाम को मार्किट से ख़रीदे अपने अनगिनत कपडे दिखा रही थी और जन्नत दोनों के साथ इस आनेवाला कार्यक्रम की चर्चा में. मेहगना कपूर ऐसे समय पर अपने कमरे में एक बिना ब्याह के ढीले गाउन में बालो को सुलझती हुई अपनी दोनों बेटियों से ज्यादा खुश दिख रही थी.

"मुझे तोह कैंसल अंकल की मॉडर्न सोच और उनकी फॅमिली का खुलापन पसंद है माँ. कोई फालतू टोकाटाकी नहीं और आपने देखा नहीं की अंकल आंटी एक साथ हर टूर पे घुमते फिरते है जैसे रिसेंटली मैरिड हो. आप तोह जाया आंटी से हर मामले में बेटर हो चाहे ब्यूटी या ब्रेन लेकिन मैंने तोह कई साल से आपको और पापा को एकसाथ कही हॉलीडेज पर या वर्क असाइनमेंट्स पे जाते नहीं देखा. मेरी सभी फ्रेंड्स कहती है की मैं चाहे जितनी भी सुन्दर हु पर आपके सामने मैं उन्हें नजर नहीं आती. मेरा तोह साफ़ है की हेमंत साल में 4 बार फॉरेन टूर्स पे नहीं लेके गया तोह मैं अकेले हे वर्ल्ड टूर पे निकल जाउंगी. पर वो lallu-laal 4 की जगह 6 बार लेके जाने वाला है. हाहाहा..", मजाक मस्ती में हे जीनत ने एक पल के लिए तोह अपनी माँ की दुखती राग पर हाथ रख दिया था पर उसके बचपने पर वो भी हंसने लगी.

"बीटा जी मेरी 2-2 जवाब बेटियां है और जल्द हे मैं सास भी बन जाउंगी. घूमने फिरने के वक़्त मुझे तुम्हारे पापा के साथ मिल कर वो बिज़नेस खड़ा करना पड़ा जो पहले से डूबा हुआ मिला था. फिर उनके तोह और भी ढेरो काम है पर मेरी ये 2 प्यारी बेटियां भी तोह है जिनके साथ मुझे जितना वक़्त मिलता है मैं बिताना चाहती हु किसी टूर पे जाने से ाचा. अब बस जानू भी अगर कोई लड़का पसंद कर ले तोह 2-3 साल बाद मैं दोनों के बचो को अपने पास रख लुंगी.", जन्नत के मैं में तोह बहुत कुछ उठा ये सुन्न कर लेकिन चेहरे पर साधारण भाव रखते हुए उसने अपना पक्ष दिया.

"माँ, जिनि को जैसा पसंद है वैसा मिल रहा है और मुझे मेरी लाइफ में अभी भी बहोत कुछ करना है. एक लड़का पसंद करके मैं उसकी इतछाये पूरी करने के चक्कर में अपने आप से समझौता नहीं कर सकती. और जो लड़का मुझे पसंद करेगा वो मुझे समझेगा और मेरे करियर को. शादी कोई फाइनल स्टॉप तोह नहीं लाइफ का? आप कितना कोम्प्रोमाईज़ करती है क्या ये मुझे नहीं पता? डैड से ज्यादा समझ आपको है बिज़नेस की लेकिन फॉरेन टूर्स वो करते है बिज़नेस के नाम पर जबकि बेस आप संभालती है. कल को मैं किसी ऐसे मॉडल या एक्टर से शादी कर लू जो मुझे तोह पसंद करे पर करियर पे फुल स्टॉप लगवा दे तोह क्या मैं उसके साथ जी सकुंगी? 99% लोग मुझे ट्रॉफी वाइफ या बहु की तरह देखते है जिसमे जक अंकल भी एक है. उन्होंने अपने भतीजे के लिए जब पापा से मेरे लिए बात की थी तोह याद है न उनके सो कॉल्ड ram-charitra भतीजे ने क्या कहा था के वो मुझे खुश रखेगा और किसी तरह की कमी नहीं होने देगा. हाँ बड़े परिवार की बहु ये मॉडलिंग करती ाची नहीं लगती. मेरे एक सवाल का जवाब था ये. जिनि वह खुश रहेगी क्योंकि घर तोह दोनों एक जैसे हे है.", अब कुछ पल तोह बाकी दोनों हे खामोश रही क्योंकि जन्नत स्पष्ट बात करती थी और वो उतना हे प्यार भी करती थी अपनी माँ और बहिन से.

"वैसे डीडू आप मेरे रोकके पर भी pant-shirt या टिपिकल फुल लेंथ गाउन पहन ने वाली हो क्या? यार आप उस दिन तोह काम से काम थोड़ा सेक्सी बन्न न, मेरी फ्रेंड्स भी होंगी उधर. माँ आप हे कुछ सिखाओ इन्हे चाहे आपके जैसे हे कोई हॉट ट्रेडिशनल साड़ी या लेहंगा चोली टाइप. वैसे माँ ये पहन ने वाली है डीडू.", जीनत की बात सुन्न कर मेहगना ने तोह अपनी बेटी का गाल खिंच दिया था हँसते हुए पर जन्नत थोड़ा सुर्ख होने लगी जैसे कुछ याद आ गया हो पहन ने की बात पर. अर्जुन ने हे पुछा था दिन में की वो क्या पहने जिस से वो जन्नत के साथ thik-thaak दिख सके. पारम्परिक कुर्ते पाजामे और जूती वाली तस्वीर हे थी वो शादी वाली जिसको जन्नत भूल न सकीय थी. फिर ध्यान वर्तमान स्थिति पर आया तोह जीनत एक बेहद आकर्षक काले रंग की साड़ी और उसके साथ चोली की तरह पहने जाने वाला चांदी रंग का डोरी वाला ब्लाउज. मेघना जैसी आकर्षक और भरे हुए शरीर की महिला ऐसे परिधान में यक़ीनन बड़ो के साथ युवाओं के भी अंग खड़े कर सकती थी.

"थिस इस सो ब्यूटीफुल माँ. ये आपने कब खरीदी? और मौसम के हिसाब से इसका कपडा भी कितना समूठ और हल्का है. बूत .. ये ब्लाउज कही लोगो का ईमान न डलवा दे. हाहाहा.. देख लेना जिनि वह पर तेरी टक्कर माँ से हे होने वाली है. माँ की बैक (पीठ) उम्र के साथ ज्यादा अट्रैक्टिव और स्मूथ है. गुड चॉइस माँ."

"वो एक मैगज़ीन में हे देखि थी ये और वह पता भी लिखा था की दिल्ली में ये कहा मिलेगी. बस खरीद ली थी पर कभी मौका हे नहीं मिला पहन ने का. वैसे तुम सिर्फ साड़ी और लेहंगा चोली photo-shoot तक हे पहनती रहोगी? जिनि के इतने ख़ास दिन पर तुम्हे भी दिखाना चाहिए की हमारे घर की ये पारी अपनी माँ और बहिन से ज्यादा अट्रैक्टिव और सेक्सी है. हाहाहा.. ये जिनि के साथ रहने से इसका असर मुझपे भी होने लगा.", जीनत तोह सब कपडे एक तरफ खिसका कर अपनी माँ की हे गॉड में सर रख लेट चुकी थी. ढीले रात्रि पहनावे वाली कमीज और पाजामे के भीतर जैसे सबकुछ आजाद था उसका.

"चलो इस बार जीन्स शर्ट पहन लेते है माँ. आप बस दोनों कपट करो, मैं इस सबसे बहार हे ठीक हु. वैसे रवीना बुआ और गौतमी चची के जलवे भी पक्का दिखेंगे. बुआ तोह आज भी स्कर्ट टॉप में ज्यादा दिखती है, दिल्ली की पार्टी में तोह वो उम्मीद से भी बढ़ कर दिखी थी माँ. हाँ चची को आदत है नैवेल से निचे साड़ी बांधने की और ऊपर से छुपाना काम दिखाना ज्यादा रहता है उनका. मुझे तोह लगता है की एक मैं हे हु जो ऐसा सिर्फ काम पर करती हु बाकी सब पब्लिक लाइफ में खुल कर.", अब जिस अंदाज में जन्नत गंभीर सी दिखती बोली थी उसकी माँ ने हलकी सी झिड़क हे लगा दी.

"तुझे भी ऐसे रहना चाहिए जानू बीटा. छोड़ लड़के या शादी की बात पर जब कभी कभार ऐसे उत्सव हो या शादी ब्याह का समय तोह चाहे बुआ की तरह कपडे पहन या तेरी चची जैसे. जबतक तैसे नहीं करेगी, तबतक एअसे फील नहीं करेगी. हाहाहा.", अब जन्नत झेंप चुकी थी अपनी माँ के कथन पर और जीनत माँ से ताली मारती हंसने लगी.

"तैसे आपकी इस लाड़ली को हे करने दो माँ. अपनी जैसे चल रही वैसे हे ठीक."

"माँ, दीदी वैसे तोह मॉडल है लेकिन सच कहु तोह ये रेगुलर लाइफ में नार्मल से भी ज्यादा शर्मीली है. आप खुद बताओ क्या आपने कभी दीदी को कपडे चेंज करते देखा जैसे मैं आपके और डीडू के सामने हे बदल लेती हु. हम तोह फ्रेमलेस है न और आपने तोह दोनों को हे बड़ा किया है बचपन से. लेकिन डीडू शॉर्ट्स भी सिर्फ अपने रूम में हे पहनती है."

"हाँ इस मामले में तोह मैं तेरी बात से सहमत हु. रवीना इसके कमरे में चली गयी थी तोह इसने खुद पर चादर ओढ़ ली थी जबकि शॉर्ट्स और टैंक टॉप पहना था बस. तुझे इतनी शर्म क्यों आती है जानू? शूट्स पर कैसे मैनेज करती है और मिस इंडिया टाइम तुम स्विमिंग कस्टम में थी तोह वो फोटो मुझे नहीं लगता किसी मैगज़ीन में सलामत रही होगी. लड़के तोह उसको खजाना मान कर सहेजे होंगे.", अब जन्नत थोड़ा सुर्ख हो गयी थी अपनी माँ द्वारा खुल कर उसका अंतर्मुखी जीवन बताने पर.

"कैमरा के सामने मुझमे फीलिंग्स नहीं होती माँ, वो प्रोफेशनल है और मैंने आज तक वह भी सिर्फ िन्नेर्स में सेशन नहीं करवाए. मिस इंडिया टाइम पर बात कुछ और थी जहा कम्पटीशन mind-set था. पता नहीं मुझे अजीब लगता है चाहे फिर बुआ सामने हो या जिनि. लड़के तोह पूरे कपड़ो के बावजूद ऐसे देखते है जैसे मैंने कुछ पहना हे न हो. आज मार्किट में भी यही हाल था पर शुक्र है की ज्यादा अटेंशन इस शरारती पर थी उनकी."

"देख लेना डीडू एक न एक दिन आप अपनी सोच बदल लेंगी जब कोई ऐसा आपको मिलेगा न जिसकी बस एक नजर के लिए आप सब भुला देंगी. फिर न गर्दन से पाँव तक कपडे ध्यान रहेंगे न ये शर्म वरं. आपके मामले में हे ऐसा होगा क्योंकि जो रिज़र्व होता है न वही सबसे ज्यादा सेक्सी बनता है जब उसको किसी उस ख़ास के साथ समय बिताना हो. वह पर न दुनिया दिखती है और न camera/sharam या सोसाइटी. एंड I'm सूरे तहत पर्सन वोउल्ड बे थे लुककीएस्ट गाए ों थिस प्लेनेट. माँ, चची, बुआ या मैं जितने जलवे दिखा ले या जितने सेक्सी कपडे पहन ले पर उस मोमेंट पर सबकी नजरे आप पर होंगी लेकिन आपकी अपने साथी पर.", जीनत से तोह ऐसे वर्णन की उम्मीद स्वयं मेघना तक को न थी और जिस तरह से उसने 'उस ख़ास' का जीकर किया था भरसक रोकने के बावजूद जन्नत की आँखें शर्म से झुक गयी. वो बिस्टेर की चादर मुट्ठी में भर्ती हुई खुद को सहज करने में जुटी थी जबकि मेघना की अनुभवी नजरे ये सब बड़े ध्यान से देखने में लगी रही.

"जा जिनि, तू अपने कमरे में ये सब कपडे रख और आराम कर ले. सुबह तेरी पार्लर वाली ने भी आ जाना जिसके साथ तेरा आधा दिन निकलने वाला है. मैं जरा जानू से थोड़ा रिसोर्ट और मेनू का डिसकस कर लेती हु.", जीनत भी अपनी माँ और बड़ी बहिन के गाल पर पप्पी करके सब कपडे सीने से लगाए इधर से दौड़ती चली गयी. ढीले पाजामे में भी उसके लहराते मॉटे मॉटे कूल्हे अपना जोहर ाचे से दिखा रहे थे. मेघना ने भी एक बार ये देखा और न चाहते हुए जन्नत ने भी.

"जब लड़की जवान हो जाए तोह उसकी सबसे ख़ास सहेली उसकी माँ हे होती है जानू बीटा. देख रही है ये तेरे से एक साल हे छोटी है पर ये तैयार है अपना नया जीवन शुरू करने के लिए. माँ सब जानती है की बेटी ने कब शमीज छोड़ कर पहली ब्रा पहनी और फिर कब कब उनका अकार बदला. जिनि परिपक्व हो चुकी है और वो खुदसे शादी के लिए राजी हुई. और एक तुम हो जो अपने दिल का थोड़ा सा भी एहसास साँझा नहीं करती. आज भी तुम्हारा शरीर वैसे नहीं खिला जैसे इस उम्र में होना चाहिए. खूबसूरत तोह तुम सबसे ज्यादा हो और इसको बनाये रखने के लिए तुमने म्हणत भी बहोत की है पर वो ट्रॉफी वाइफ वाला जैसा उदहारण तुमने दिया था उसको सार्थक तुम खुद करती हो बेटी. मेरी गॉड में 4 साल की जिनि थी जब मैं तुम्हारी उम्र की थी. तुम्हारी बुआ को हे देख लो अगर मेरा जीवन तुम्हे काम आकर्षक या बेरंग दीखता है तोह. 19 बरस की बेटी होने के बावजूद वो tadak-bhadak की जगह वो पहनती है जो उसको पसंद आता है. मैं मार कर नहीं जीती की कोई क्या सोचेगा या ऐसा न पह्नु क्योंकि लोग देखेंगे. काम से काम उस ख़ास के लिए हे खुद को बदल लो जिसने तुम्हे शर्माना और अकेले घर से निकलना सीखा दिया.", मेहगना ने खड़े हो कर अपना दरवाजा लगा दिया था, वातानुकूलन चालु करते हुए. बालो को नरमी से सर पे जुड़े के रूप में लपेट कर वो अपनी बेटी की बगल में आ बैठी जो मानसिक द्वन्द में व्यस्त थी सब सुन्न कर.

"आपको अजीब लगेगा माँ पर मैं वो अट्रैक्शन फील करने लगी हो जो कभी मेरी प्रायोरिटी नहीं थी. और जिसके लिए ऐसा फील करती हु उसके साथ जीवन कितना और कैसे चलेगा इस सबका कुछ मालूम नहीं माँ. वो आया तोह ऐसा लगा जैसे मैं शेरनी हु और वो एक मासूम सा हिरन जो दोनों के सामान रंग की वजह से बस करीब आ खड़ा हुआ लेकिन घबराहट सी थी उसके चेहरे पर उस वक़्त जो मुझे बहोत पसंद आयी. इतनी पसंद आयी की किरदार कब आपस में बदल गए ये मुझे समझ हे नहीं आया. आप दोपहर में मेरी तारीफ कर रही थी न लेकिन मुझे चिंता थी की क्या मैं उसको पसंद आउंगी. दिल मजबूत करके मैं जैसे तैसे उस से मिलने की जगह पहुंची पर वह मेरा जिस्म ठंडा होने लगा था और ये सब उस से ज्यादा नर्वस्नेस थी जब मेरा फाइनल ऑडिशन था. और एकदम से सबकुछ बदल गया जब मैंने खुद को कल्पनाओ से बादलो में उड़ते पाया. उसका वो मुझे हाथ थाम कर बग्गी से उतरना, किसी प्रिंसेस की तरह ट्रीट करना.. यहाँ तक की पहले मेरे लिए चेयर एडजस्ट की, मेरे बारे में बातें की, उस बड़े हॉल में मुझे कोई डेट पर देख न सके उसके लिए पूरा रेस्ट्रा रिज़र्व रखा. तबतक मैं सिर्फ उस से इम्प्रेस हो रही थी पर फिर उसने खाना भी मेरी पसंद का मंगवाया और खिलाया भी खुदसे. वो घटिया इंसान जज अपना रसूख दिखने मेरे पीछे उधर भी चला आया तोह उसने न सिर्फ मुझे प्रोटेक्ट किया बल्कि उस घटिया इंसान को उसकी औकात भी ऐसे दिखाई की वो लाइफ में कभी फिर से सामने नहीं दिखने वाला. उस पल में जब मैं उसका हाथ थामे थी तोह उन नजरो में मेरे लिया कही भी कोई आरजू या सेक्स जैसा नहीं था. मैं उसका हाथ पकडे इतनी आजादी से राजहंस में घूम रही थी जैसे सिर्फ बचपन में हुआ होगा. वह एक भी नजर ने न मेरा पीछा किया न सामना. वो जैसे मुझे मुझसे बेहतर जानता है माँ और इतना सब करने के बाद भी जब मैंने गलती से ये पूछ लिया की अगली बार क्या करने का इरादा है तोह जानती है उसने क्या जवाब दिया?", अपनी बेटी को जैसे उन ख़ास पालो डूबा और विवरण देते देखा तोह मेघना की आँखें ख़ुशी से नम्म हे हो गयी. आज पहली बार तोह जन्नत ने एक लड़के और अपने जीवन के बारे में उसके साथ इतनी बात की थी. सर को सहलाते हुए उन्होंने भी पूछ लिया.

"तोह क्या जवाब दिया तुम्हारे उस ख़ास ने जानू?"

"हे साइड वे विल हैवे ानोथेर लंच. 100 बार लंच करेंगे और वो हर बार मुझे बस इतना हे खुश देखना चाहता है. उसकी और कोई चाहत नहीं है माँ मुझसे. राजहंस का रॉयल सुईठे मैं जब दिल करे उसे करू और जितना वह रहना चहु वह राहु, ऐसा उसने कहा और जब मैंने बोलै की हमको साथ में देखना चाहिए क्योंकि खुद उसने मालिक होने के बावजूद वो नहीं देखा तोह जवाब मिला की नहीं.. हाँ थोड़ा मजाक में ये कहा था के क्या मैं उसको फर्स्ट लंच पर हे रूम में लेके जा रही हु.. हाहाहा.. तहत वास् हिज ट्रू सेंस हो ह्यूमर माँ. जहाँ पर पापा की गाडी नहीं जा सकती उस से आगे उसने मेरी कार धुप को ध्यान रखते हुए ग्रीन आराम में कड़ी करवा राखी थी और दरवाजा तक उसने हे खोला मुझे बैठने के लिए. वो 2 घंटे शायद मेरी बाकी लाइफ से ज्यादा अनमोल बन गए है. आपको वीयर्ड तोह नहीं लग रहा न माँ ये सुन्न कर.? ाचा लड़का है वो और जरा सा भी ईगो या show-off नहीं. हाँ मेरे लिए उसने जो भी किया देखा जाए तोह आपको लगेगा show-off पर वो मेरी पर्सनल लाइफ की कदर करता है."

"तोह जिनि इसकी हे बात कर रही थी मेरी बेटी के मामले में. क्या ये अर्जुन शर्मा हे है?"

"और कौन होगा माँ? पता नहीं ये कैसा अर्जुन है जिसके पीछे गौर बिल्डर्स तक सोमनाथ अंकल से सिफारिश करवाते रहे और मेरे पापा उमेद जी से. आप कहती हो की उसकी फॅमिली इसको लाइमलाइट में नहीं आने देती, वो बच भी नहीं सकता आने से चाहे जितनी कोशिश कर ले."

"एक बात कहु अगर तुझे बुरा न लगे तोह?"

"एक क्या 2 बात कहिये माँ. आपकी बात का बुरा नहीं लगता और न आप ऐसा कुछ कहती है कभी. क्या ये अर्जुन से जुडी है?"

"हाँ अर्जुन से हे जुडी है तभी तोह बता रही हु. जब शिल्पा वो शादी का एल्बम दिखा रही थी न तोह वो मेरी नजर भी उस लड़के पर हे रुक गयी थी. मैं तेरी बगल में बैठी हुई अपनी बेटी के लिए वैसा हे लड़का चाह रही थी पर तस्वीरों से कहा किसी को जान सकते है. शिल्पा से बातचीत हुई थी मेरी और अर्जुन का उल्लेख करते हुए वो भी चमक रही थी. फिर मैंने बात जाने दी और तुम्हारे पापा से बातचीत में पता भी चल गया की वो कौन है, कैसा है और क्या बात बन्न सकती. ये लड़का ाचा है बेटी पर सबके चाहने के बावजूद उसका रिश्ता तुमसे नहीं हो सकेगा."

"शादी रिश्ता नहीं होता माँ और न हे वो एक सुखद जीवन की गारंटी भी नहीं. मुझे 100 लंच मंजूर है और उतने में हे 5-10 साल बढ़िया निकलेंगे. जब किसी का साथ पसंद हो तोह समय समय पर साथ जीना बढ़िया है बजाये की जीवनभर एक दूसरे के बोझ को धोते रहना. बाकी कल न आप जानती है और न मैं."

"और बीटा जी कोई ऊंच नीच हो गयी तब? फिर समझौते भी करने पड़ते है और शादी भी. तब शायद तुम्हारी सामान सोच या तुम्हे बेहतर समझने वाला अर्जुन कही भी सामने नहीं होगा. सुना और देखा न की वो खुद अभी से कितना प्रभावी बनता जा रहा है? शाही परिवार में उसकी दखल, 2 बड़े गाँव उसकी संपत्ति और baap-dada का ऐसा रसूख. शायद रिश्ते को नाम दिए बिना तुम्हे 100 लंच करने में 20 साल लगेंगे जितना व्यस्त वो लड़का ऐसे जीवन में रहने वाला है. और कोई जरुरी नहीं की सिर्फ तुम अकेली हे उसके जीवन में हो. गिनती एक से कही ज्यादा भी हो सकती है. सेहन कर सकती हो इतना कुछ? यहाँ समझौते नहीं होंगे जानू?"

"ऊंच नीच तोह प्रकृति का नियम है माँ जो कभी न कभी तोह हो कर हे रहता है बस हम उसको सही समय तक टालते रहते है. अर्जुन के साथ ये 20 साल वाला सुझाव मुझे भी ज्यादा ाचा लगा, मतलब साल में हम 5 बार मिलेंगे एक दूसरे से और बातें करने के लिए बहोत कुछ होगा हमारे पास. रही बात उसकी लाइफ में कितनी लड़कियां है और कितनी हो सकती है तोह इस से इंकार करके मैं खुद का मैं बेहला नहीं सकती. उसके करीब जो भी होगा न माँ, वो उसको ख़ास होने का हे एहसास कराएगा. आपके सामने हे आपकी ये बेटी है जो कल तक इस बात से हे चिढ़ती थी पर मैं खुद कायल हु उस इंसान की तोह मुझसे पहले और बाद में क्या कोई और नहीं होगी?", अब जन्नत के सवाल पर खुद उसकी माँ हे हर बात को मैं में दोहराने लगी थी. अर्जुन चरित्र उसको पहले सिर्फ naam-matra पता था पर आज उसकी बड़ी बेटी सब बता रही थी और उसकी ख़ुशी देख कर वो इतना तोह समझ चुकी थी की इसमें वासना या मिलावट जैसा कही कुछ न था.

"चल देख लेते है तुम्हारे इस chitt-chor को भी जिसने गरम रेत पर जीवन की आशा तोह पैदा की. वो तुम्हारे बुलाने से आएगा क्या जिनि के रोकके पर?", उस उदाहरण से जन्नत के गाल और सुर्ख होने लगे थे जो थोड़ा सुधरे थे हलकी बातचीत से.

"मिल तोह आप परसो भी सकती है उस से अगर टाइम मिले तोह. उसकी दीदी और गौरव हनीमून से वापिस लौट रहे है कल और वो परसो उनके घर आने वाला है. हाँ अगर समय नहीं मिला तोह फिर जिनि के प्रोग्राम पर मैं खुद उसको आपसे मिलवाउंगी. अपनी लाड़ली भनी और भतीजियों से कह देना की ज्यादा फ्रैंक होने की कोशिश न करे बस. उसके बुलाने पर मैं लंच पे जा सकती हु तोह मेरे कहने से वो रोकके पर क्यों आने से मन करेगा? बस पापा के सर्किल को कह देना की इस सबको लिघ्टलय ले, वो दोस्त है मेरा."

"और पापा के सर्किल के बहार क्या बताना है बीटा?", अब मेघना उसकी टांग खिंच रही थी छेड़ते हुए.

"माँ.. स्टॉप थिस तैसिंग. अभी हम बस एक बार मिले है ढंग से वो भी 2 घंटे के लिए और मैं उसको थैंक्स के रूप में यहाँ डिनर पर बुलाने वाली थी पर वो अपनी माँ से मिलने निकल गया. हाँ आप और पापा क्सक्सक्सक्स कई बार जा चुके हो न माँ?", एकदम से जन्नत के चेहरे पर जैसे अलग सी गंभीरता आ गयी. और उसके सवाल पर मेघना भी थोड़ा हैरान हुई की इतनी बढ़िया बातचीत के बीच ये हिमाचल की इस जगह का नाम कहा से आया.

"हाँ पर अब वह क्या हुआ? हाईवे कनेक्ट हुआ तोह हम वह जमीन देखने के सिलसिले में गए थे पर परमिशन नहीं मिली शहर से बहार इंडस्ट्रीज के लिए. गवर्नमेंट ने तोह उस रीजन में शहर से पहले जगह ऑफर की भी थी पर जिधर कनेक्टिविटी ाची है और जगह थोड़ी समतल वो साड़ी लैंड प्राइवेट है इन्क्लूडिंग फारेस्ट एरिया. तुम वह घूमने जाना चाहती हो या उधर कोई शूट ऑफर हुआ है? एक आधा किलोमीटर की सड़क के दोनों तरफ हे बस मार्किट और लोग रहते है उधर. हाँ आगे 40 किलोमीटर बाद शहर है जिधर रास्ता इस मौसम में भगवन भरोसे."

"नहीं माँ मैं तोह ये पूछ रही थी की आप लोग वह रुके भी थे न, कोई बस्नेत कॉटेज जैसी जगह थी क्या? गयी तोह मैं भी हु उधर एक बार आपके साथ और एक बार जब हम सभी गए थे वो फिशिंग के लिए. तब हम गवर्नमेंट गेस्ट हाउस में रुके थे और ये नाम मैंने वह कई लोगो से सुना था. बसंत महल, Basant-baag पर कॉटेज.."

"नहीं कॉटेज सिस्टम नहीं है उतना और जो भी है कोई बसंत नाम से नहीं है. साड़ी जगह तोह देखि भाली है वो पर जो एकमात्र बसंत है वो किसी रानी का हे महल जैसा है और उनकी हे वो प्रॉपर्टी है जहा तुम्हारे पापा फैक्ट्री डालने के सोच रहे थे. साइट से हमने देखा था वो किले जैसा Basant-baag. पर ओनरशिप की जानकारी निकलवाने लगे तोह अफसर ने बस इतना हे कहा के उन्होंने हे हाईवे के लिए अपनी प्रॉपर्टी में से जगह दी है हिमाचल सर्कार को जिस से सामान्य वर्ग का जीवन आसान हो सके. वैसे तुम्हे अचानक ये Basant-baag का क्या ध्यान आया इतनी प्यारी बातों के बीच?", प्यारी का मतलब जन्नत भी समझ रही थी जिसके चेहरे पर हलकी सी शर्म फिर से छाने लगी.

"वो जगह भी अर्जुन के परिवार की हे है माँ जहा वो अपनी मुम्मा से मिलने गया है. ी can't बिलीव आईटी. वो पैलेस है माँ और एक पूरा जंगल भी सिर्फ उनका. कही कोई .. क्या इधर वाले shahi-pariwar से अर्जुन का कनेक्शन तोह नहीं माँ? वो इतनी बड़ी हेरिटेज और यहाँ राजहंस में co-owner होने के साथ आजतक प्रिंसेस भी अगर किसी के पीछे बाइक पर बैठी है तोह वो यही लड़का है. पर फादर डॉक्टर, दादा जी रेटड पुलिस अफसर और ... बड़ा कन्फुसिंग है ये सब."

"तुम्हे सिर्फ उसके बारे में सोचना चाहिए जानू और जितना मैंने तुम्हारी बातों से समझा है वो लड़का इस सब की चाहत नहीं रखता नहीं तोह क्या वो ऐसे आजाद होता किसी पंछी की तरह? ऐसा हे है न वो जो एक मोटरसाइकिल पर हे घूमता रहता है..", अब जन्नत के दिमाग में सब शांत हो चूका था. उसकी माँ ने सच हे तोह कहा था की वो अर्जुन से जुडी हर बात पर गौर कर रही थी सिवाए अर्जुन के.

"हाँ माँ. उम्म्म थैंक यू सो मच.", माँ के गले लग कर वो उनका गाल चूमती हुई कुछ पल बस प्यार से उन्हें देखती रही जो खुद भी अपनी बेटी की ख़ुशी में खुश थी. वो खुश थी चाहे बेटी समाज से इतर सोच रखती थी लेकिन ज़िन्दगी में अगर आपके पास सच्ची ख़ुशी हो तोह फिर उसके सामने क्या dhan-daulat और क्या समाज.

"मुझे कहना तोह नहीं चाहिए पर मुझे तुम पर नाज है जानू बीटा. Kam-as-kam तुम वो तोह करती हो जो तुम चाहती हो और बिना किसी की मदद के. नहीं तोह बाकी सब तोह बस दिखावे में इतना डूबे है की सच हे उन्हें देख कर खुद झूठा मान लेता है. तुम्हारे पिता के साथ मैंने म्हणत की लेकिन उन्हें विरासत में तोह बहोत कुछ मिला था. जक भाई साहब ने भी मिला हुआ कारोबार हे संभाला जो एकलौती औलाद हेमंत ने बिना कोई पसीना बहाये संभल लेना. जिनि प्यारी बची है पर राह तोह उसने भी आसान और आराम वाली चुनी. 2 व्यापारी घराने दुनिया के सामने एक हो रहे है तोह इसमें भी लालच है सबके सामने अपनी ताक़त बढ़ने का दिखावा करने का. जैसी तुम हो वैसा तुम्हारा ये अर्जुन जिसके पास हमारी तुम्हारी उम्मीद से कितना ज्यादा है पर उसको कोई परवाह नहीं. आज़ाद परिंदो के सिवा दुनिया की असली ख़ूबसूरती कोई न देख सका... कोई नहीं... पर तुम ऐसी हे रहना बीटा ऐसी हे रहना. नहीं जानती की एक ये एक दिल से निकली दुआ है या एक माँ की अजीब नसीहत पर जीवन वही है जो तुम चुनो, बिना किसी के दबाव में और अपनी ख़ुशी से.", बात पूरी होते हे फ़ोन की घंटी घनघना उठी जिसकी आवाज लम्बी थी बिना अंतराल वाली.

"गूडनिघत माँ एंड लव यू. डैड का फ़ोन है, नंबर बहार का हे है. कर लीजिये बात आप उनसे. मॉर्निंग में मिलते है.", गले लगने के बाद जन्नत कमरे से निकल चली. अब उसका मैं हवा सा हल्का हो चूका था और आज उसने जाना था की जब माँ अपनी बेटी की सच्ची सहेली बनती है तोह उसका एक नया और बेहतरीन स्वरुप सामने आता है.

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"चाचा यार आप बड़े अजीब आदमी हो. मौत सर पर है और आप मजे से दिवार गीली करने में लगे हो. सुनील बोल रहा है की उसने 2 तरफ हरकत देखि है और वो लोग डिस्टेंस मेन्टेन किये थे इतनी देर से. आप खुदको उनके निशाने पर ला रहे हो.", दीपक कार में घबराया हुआ बैठा था, उंगलियां पिस्तौल पर कासी हुई और खुली खिड़की से वो धीमी आवाज में सड़क किनारे दिवार पर mutra-visarjan करते शंकर जी को समझा रहा था. इतने आराम से पेशाब करने के बाद वो दीपक के हाथ से पानी की बोतल लेने मुड़े हे थे की सर्र से बोतल को बंधती हुई ये बेआवाज सी गोली निकली और पानी बौछार की तरह दोनों पर गिरा. गोली चलने वाला इनसे काफी पीछे आउट में था इसी लम्बी दिवार से चिपका हुआ एक लोहे के होर्डिंग के पीछे. दीपक निकलने लगा था पर शंकर ने दरवाजे पर लात दबा कर ताखि वापिस बंद कर दी. इस बार गोली दूसरी दिशा से चली जो शायद इतनी काम रौशनी की वजह से उस तरफ से गाडी की आड़ में खड़े शंकर की निर्वस्त्र ब्याह को गर्मी देती दिवार का थोड़ा प्लास्टर तोड़ती अंदर जा धंसी.

"ये लोग मार्क्समैन है दीपक. हरकत की तोह सामने वाला तुम्हारे भेजे को उदा देगा लेकिन इनकी बंदूके एक बार में एक हे फायर करती है. निचे झुक कर अपने पीछे की हरकत पर ध्यान दो दूसरी खिड़की से और सुनील तुम भी अपना ध्यान उधर हे रखना. मैं जरा इस बोतल फोड़ने वाले को चारा देता हु.", शंकर क्या करने जा रहा था वो इन दोनों को जरा भी भनक न थी पर जो भी था वो एक पागलपन हे था. एक तरफ से उस हलकी नारंगी रौशनी में शंकर पूरी तरह से अम्बस्सडोर की आड़ में खड़ा हुआ और जहा से पहली गोली चली थी ठीक उधर हे मुँह करता हुआ लाइटर अपने शरीर से 3 फ़ीट दूर दिवार की तरफ करके उलटे हाथ से जलने के साथ सीधे हाथ में पिस्तौल से उधर हे निशाना बनाने लगा जहा से पूरी सम्भावना थी अगली गोली चलने की. जैसी पसीने की बूंदे दीपक और सुनील के माथे से चेहरे तक टपक रही थी इस सुनसान ti-raahi सड़क पर शायद वैसा हे हाल उन दोनों का होगा जो यहाँ शंकर का शिकार करने की इत्छा लिए थे. शंकर इतने खुले में भी अपनी सांसें सुन्न सकता था पर चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान बिखेरते हुए उसने सिग्रत्ती लाइटर का खटका दबा दिया. इधर वो आग की लपट उठी और उधर से एक बार और सन्न से चली गोली लाइटर की लपट को चीरती निकले जिसके सिर्फ वेग से वो ज्वलनशील भरा लाइटर हलकी आवाज के साथ हे शंकर की मुट्ठी में फटा. वो निशाने पर आने के बावजूद शंकर की गोली से बाल बाल बच निकला, लाइटर का फटना जैसे उसके हे हिट में रहा.

"बहनचोद. साला ये न जाने वाले दीपक जिस्म में छेड़ बनाये बिना. इतना तोह है की इन्हे हम सही से नजर नहीं आ रहे क्योंकि पहले गोली छाया पर चली थी पर अब तोह इस निशानची ने 2 इंच की फ्लेम का सटीक निशाना लगा दिया. कुछ हरकत मिली तुम्हे?", नरिंदर वाली स्वचालित पिस्तौल में भी उतनी आवाज न थी लेकिन इतनी जरूर थी की इस सन्नाटे में उस से चली गोली को 20-30 फ़ीट दूर चौकन्ने कान सुन्न सकते थे. पर शायद यहाँ दुरी दोनों तरफ से ज्यादा थी.

"ओह चाचा, आप बस गाडी में दीपक वाली जगह बैठ जाओ. ठीक 25-30 गज पीछे इनकी मारुती कड़ी है, काले रंग की. जबतक ये लोग वह पहुंचेंगे हम निकल लेंगे इधर से. अपनी गाडी के शीशे bullet-proof है इसलिए हम बचे रहे इतनी देर से क्योंकि उनको पता है इसका."

"दरवाजा खोलते हे दोनों और से गोली चलेगी मेरे नंदन और पिछवाड़े या पाँव पे गोली मंजूर है पर हाथ या लुंड पे नहीं. साला इस सड़क पर तुम पोलिसवाले गश्त नहीं लगते क्या?", शंकर अपनी जगह इतना जड़ था की उसके जिस्म का वस्त्र तक अपनी जगह स्थित रहा.

"ये जगह दूर दूर तक कोई आबादी है चाचा जो इधर चक्कर लगाए? आप भी तोह पीने के बाद इस रास्ते से इसलिए हे जाते हो क्योंकि ये सुनसान है. आप तोह मूट कर चुके पर मेरा निकल जाएगा. पहले ज्यादा बियर और अब इन ससुरे की फील्डिंग से."

"चाचा, मैं न बैठ सकता भीतर. आप बस खिड़की खुलते हे जब गोली चले तोह मैगज़ीन उसी दिशा में खाली कर देना.", दीपक से अब सेहन नहीं हो रहा था ऐसे बेबसी से कार के भीतर बैठे रहना. दूसरी और से तोह हरकत हे नहीं दिख रही थी उसको.

"न न बीटा. तेरी उम्र अभी बहोत पड़ी है. सुनील, खिड़की से तेरा पेरिस्कोप दूसरी तरफ बहार फेंक. गोली चलेगी तोह दीपक निशाना लगाएगा और फिर दूसरे का हिसाब करते है.", सुनील ने वैसा हे किया लेकिन इस बार खिड़की से वो पेरिस्कोप बहार गिरा हे रहा था की पत् और तन्न की जोरदार आवाज हुई. और उसके बाद दीपक की पिस्तौल ने dhaayen-dhaayen करते हुए सामने कुल 4 गोलियां चला दी जिधर हरकत हुई और एक सायं झाड़ और दिवार की आड़ से बहार निकलता तिराहे की इनसे दूर सड़क पर उतरता दिखा. पर बीच सड़क खड़े उस स्कूटर वाले ने बिना समय गंवाए 10 फ़ीट दूर उस लम्बी बन्दूक थामे साये के जिस्म में एक एक करके कई कारतूस उतार दिए. चीख एक और तरफ से भी गूंजी जब उस होर्डिंग की आड़ से निकल कर अपने साथी को बचने दूसरा शिकारी आड़ से बहार निकला. गोली उसके भी लगी थी लेकिन शायद बन्दूक वाले हाथ पर. एक और साया साढ़े हुए कदमो से उस निचे गिरे हुए निशानची के सर पे आ रुका.

"ओह पंडत.. भोस्डिके ये वाला ज़िंदा है पर निहत्था.. आजा और लेले अपने दोस्तों से क्रिसमस गिफ्ट.", ये परमवीर सांगवान था जिसने उस जहकँइ वाले के दूसरे हाथ पर पाँव रख कर सड़क से दबा दिया था. शंकर ताज्जुब में था के ये दोनों कहा से आ टपके. दूसरा साया यक़ीनन मेहुल हे था.

"चाचा ये डॉक्टर तोह बड़े हरामी टाइप है जो मौके पर प्रकट भी हुए और हमे हे बचा लिया.", अभी शंकर जवाब देता और उधर मेहुल ने स्कूटर की किक लगाने के बाद लाइट हे चालू की थी की एक गोली तन्न की आवाज करती स्कूटर पर लगी और शायद मेहुल के भी जो बीच सड़क पर गिर चूका था. अभी भी स्कूटर की लाइट रोशन थी और ये देखते हे शंकर पूरी रफ़्तार से पिस्तौल ताने गाडी की आड़ से खुली सड़क के बीच आ गया.

"गुलाटी उठियो मैट मेरे भाई.. तू निशाने पे है.", शंकर ने अपनी जान बचने वालो के लिए खुद को भी दांव पर लगा दिया था. सांगवान भी उलझन में फँस गया था की वो गोली चलने वाले की तरफ ध्यान दे या इस पर जो उसकी पकड़ से निकलने को तड़फ रहा था. दीपक ने अम्बस्सडोर को पल में हे चालू करते हुए 180 के कोण पर घुमा दिया हरकत में आते हुए. वो शंकर के सामने ढाल बन्न चूका था और उस एक मात्रा आड़ में छिपे 30-35 गज दूर अदृश्य से व्यक्ति पर पूरी मैगज़ीन खाली कर दी जिसने बदले में सटीक निशाना दीपक की तरफ भी लगाया और ठीक उसी समय सांगवान, सुनील और शंकर की पिस्तौलों ने भी आग उगली शुरू कर दी जब तक बस khatt-khatt की आवाज न आने लगी. तिराहे चौक के उस कोने से वो साया जाने कितनी जगह से जिस्म में छेड़ बनवाये था जो चाँद कदमो के बाद पक्की सड़क पर धम्म से गिरा. कुछ पल के लिए माहौल शमशान सा शांत हो चूका था फिर सभी हरकत में लौटे जहा सांगवान ने उस एकमात्र जीवित हमलावर के दोनों हाथ अपनी बेल्ट से हे उसकी पीठ के तरफ बांधे, गुलाटी ने लड़खड़ाते हुए अपना स्कूटर संभाला और सुनील चीखने लगा.

"चाचा, दीपक के गोली लगी है. देखो सांस चल रही क्या इसकी?"

"मैं ज़िंदा हु बे झांट.. आठ.. चाचा देखियो मेरी कन्धा ठीक है? बहोत कमजोरी महसूस हो रही है मैंने. खून रुक न रहा.", शंकर ने सब भुला कर दीपक का हे रुख किया जिसने उनकी हिफाजत में खुद पर गोली झेल ली थी. कंधे की गोलाई वाली हड्डी को गोली तोड़ती निकली थी जहा से आधा इंच से ज्यादा मांस और हड्डी गायब थी.

"सुनील बीटा, तू सांगवान की गाडी में जा. इसको तुरंत इलाज की जरुरत है.", शंकर ने अपनी कमीज उतार कर कस के दीपक की काख और कंधे पर बाँधी थी जो इतने दबाव से न चाहते हुए भी चीख उठा.

"ओह पंडत, पंजाबी भी साथ ले जा अपने. देख जरा इसकी गांड में 2 छेड़ तोह न हो गए. चाल तोह गाँडमारी गाढ़ी सा रहा है. बीटा सुनील, इसने अपने वाली गाडी में डालने में मदद करो उसके पाछे हम जरा ये हथियारों को भी जमा करके ले चलते है. तित्तर मारने के बहोत काम आएंगे.", यहाँ सबकी फटी पड़ी थी पर सांगवान अपनी हे रौ में था जिसकी बात सुन्न कर दूसरी सीट पर लुढ़कता हुआ दीपक दर्द में भी हंस दिया.

"कसुते यार है चाचा आपके. खसम 2-2 लोग गोली खाये है और सड़क पे 2 लाश गिरी पड़ी पर यु आपका जाट कटाई मरखना है. आह रे माँ.. चाचा ाची बियर पिलाई यार. माँ सही कहे थी की बामन ने दान दिया करे है, उनका लेना न चाहिए.", शंकर के परेशां चेहरे पर भी हलकी मुस्कान उभरी और गाडी मेहुल के पास रोक कर उसको पिछली सीट पर बैठाया.

"डॉक्टर आदमी है न वो और ऊपर से तेरी तरह जाट. टेंशन में ज्यादा मस्ती बहार निकलती. तेरे सच में गांड में गोली लगी है मेहुल?"

"हाँ भोस्डिके वह मैंने स्टील भरा हुआ जो तन्न की आवाज आयी थी. Aahhh...Pindali कटी है मेरी शंकर.. इस खागड को बोल के मेरा स्कूटर इधर से हटवा दे. कल खबरों में काण्ड तोह जरूर आने वाला है और साला ये तीसरा क्या हमारे से भी पीछे था?", शंकर ने एक बार सुनील के पास रुक कर सबकुछ ध्यान से समझाया और परमवीर सांगवान को भी क्या क्या करना है वो बता दिया संक्षेप में. अब गाडी सुनसान सड़क पर सरपट दौड़ रही थी और उसके साथ हे दीपक के आँखें बेहोशी या कमजोरी से बंद. शंकर बार बार उसके चेहरे को देख रहा था और आज उस पर उसके हे चेले ने इतना बड़ा एहसान कर दिया था जिसकी भरपाई वो कैसे भी नहीं कर सकता था.

"इसका ब्याह न हो रखा होता तोह अपना दामाद बना लेता में दीपक को. लड़के ने मेरे पागलपन को अपने ऊपर झेल लिया मेहुल.", शंकर गाडी को उसकी रफ़्तार की सीमा पर ला चूका था और मेहुल के बोलने से पहले आँखें बंद किये हुए दीपक ने हे जवाब दिया.

"ओह चाचा वैसे हे गांड मार लो पर जलील तोह न करू दामाद वाली बात से. चाचा मतलब बाप का भाई और मेरा तोह बाप हे नहीं पर आपने कमी न होने दी कभी बापू की. मेरी छोटी बहने है वो और आप पिता.. जीवन सँवारने वाला जीवन दे कर गायब हो जाने वाले से कही बड़ा होता है. आज ये गोली मेरी छाती में भी लगती न तोह ख़ुशी हे hoti..aahh.. बाकी सच कहते इन्दर चाचा की आप हो बड़े बकचोद.. आठ.. चाचा भतीजे में मजाक तोह चलता है न चाचा.?", अब शंकर ने सेहहर में गाडी कुछ धीमी करते हुए प्यार से दीपक के सर को सहलाया.

"तू मान है मेरा और समझ नहीं आया था बेटे की तुझे कैसे अपने साथ राखु तोह बेमतलब की बात निकल गयी मुँह से. तुझमे और संजीव में मैंने कभी फरक नहीं समझा पर लगता था के कही तू रिश्ते से अलग इसको एहसान तोह नहीं मानता?"

"एहसान मानता तोह वर्दी में होता न चाचा. आअह्ह्ह.. माँ तक बात न जाने देना चाचा.. उसका ड्रामा जानलेवा है अपने आप में. वैसे आज पता चला के बॉर्डर वालो की ज़िन्दगी कितनी खतरे में रहती है. जरा सी हरकत और शरीर निशाने पर.", ये प्रताप वाला वही हॉस्पिटल था जहा अर्जुन भर्ती हुआ था पहले. आज भी गाडी भीतर वाले दरवाजे के सामने रुकी थी जहा कभी तारा को ऐसा करने पर स्टाफ ने चेतावनी दी थी लेकिन आज यहाँ खुद डॉ शंकर आया था जिसने अकेले हे दूसरी तरफ जा कर पहले दीपक को बहार निकला और फिर उसको अपने दोनों हाथो में ऐसे उठा लिया जैसे वो स्ट्रेचर हो. 2 हेल्पर लपके भी पर उन्हें हटते हुए वो खुद हे सीधा ऑपरेशन थिएटर की तरफ चल दिया. पीछे पीछे अपनी हे पिंडली पर कपडा बांधे मेहुल गुलाटी लंगड़ाता आ रहा था.

"सर, परमिशन."

"तेरी माँ की छूट भोस्डिके, परे हो. लगता परमिशन का छोड़ा. फ़ोन कर प्रताप को और बोल शंकर ओट इस्तेमाल कर रहा है अपने बेटे के लिए. बुला किसी अस्सिटेंट को जो डॉक्टर मेहुल की चोट देखे. Hello सिस्टर, हाँ तुम्हे अलग से कहना पड़ेगा क्या?", शंकर ने तोह पल में हे इस लगभग निर्जन से स्थान को सजग कर दिया था. लताड़ खाने वाला जूनियर अपने मैनेजर को शिकायत लगाने गया तोह वो बेचारा तोह सब देख कर ख़ामोशी से वापिस केबिन माँ बंद हो गया. सभी लोग तुरंत हरकत में आये और कुछ हे समय में शंकर के साथ खुद इस हॉस्पिटल का मालिक दीपक का इलाज कर रहा था. मेहुल गुलाटी की पिंडली पर 4 टाँके लगे थे जिसका उसपर अब ख़ास प्रभाव नहीं था.

"प्रताप, इसको स्पेशल रूम में शिफ्ट कर देना और बिल मेरे खाते में. सुबह सारे चेकउप करवा के फुल ट्रीटमेंट देना है फिर चाहे मल्टीप्ल सुरगरिएस हो या बोन फिलिंग. हाथ 100 परसेंट ठीक चाहिए भाई इसका.", शंकर ने दीपक का जखम फ़िलहाल तोह बंद कर दिया था पर वो चिंतित था दीपक की नौकरी के लिए.

"टेंशन मैट हे ले भाई और देख ले मेहुल, आज हमारे बीच पैसे लाने लगा है शंकर. चल आजा ड्रिंक लेते है एक एक, मैं अभी घर पंहुचा था ओट से निकल के और वापिस आ गया. वैसे ये एक्सीडेंट हुआ कैसे?"

"शंकर के चाहने वाले थे प्रताप भाई लेकिन उन्होंने मौके पर शगुन बारातियों को दे दिया दूल्हे की जगह. तू बोतल और पानी उठा ले भाई, उधर jaat-ram अकेला पागल हो चूका होगा. इस पंडत को घर छोड़ के हम दोनों फार्महाउस पे हे चलते है. वो भी घर जाने के मूड में न था और अब तेरे साथ महफ़िल जमेगी तोह बढ़िया रहेगा.", शंकर ने समय देखा तोह रात के 12:30 बज चुके थे जिसका मतलब वो एक घंटा लेट था पर बड़ी बात ये थी की जिस आफत की वजह से इन्दर ने उसको ऐसा करने का कहा था वो ख़तम हो चुकी थी.

"मैं फ़ोन कर रहा हु घर पे तेरे ऑफिस से परताप. साथ हे चलता हु भाई, मेरा कौनसा लुगाई इन्तजार कर रही घर पे. दारु के साथ एक बकरा भी काटना है उधर.", बकरा वही था जिसको सांगवान बांध के ले जा चूका था. अब गुलाटी के साथ प्रताप भी हंस दिया.

"एक एक पेग का पूछना राति काली करवाएगा लगता है."

"ना तेरी रात काली हुई तोह तू आज गांड मार लियो भाई.. गुलाटी के वैसे भी आज दूसरा छेड़ भी बना है.", शंकर मजाक करने के बाद अपने घर फ़ोन मिलाने चल दिया जो उसके पिता हे उठाने वाले थे या बड़ा भाई जो बैठक में सोया था. कुछ बहाने लगा कर वो अब निश्चिंत हुआ वापिस अपने ठिकाने चल दिया था जहा से आते हुए ये सब दुर्घटना घाटी थी.

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समतल इलाको की गर्मी से विपरीत हलके ठंडक भरे मौसम और इस विशाल प्राकृतिक परिवेश में बने महलनुमा Basant-baag के भीतर खासी चहल पहल रही थी रात्रि भोज पर. अपनी बहनो के बीच हँसते बोलते हुए भोजन करता अर्जुन हर परेशानी और विचारो से दूर बस प्यार भरे माहौल में जीवंत महसूस कर रहा था. सफर की थकान तोह वैसे हे सबसे मिल कर दूर हो चुकी थी और यहाँ अपनी पसंद का हरके भोजन जो स्वयं उसकी माँ ने ख़ास उसके आने पर पकाया था, सोने पर सुहागा हो गया. भोजन के बाद जहाँ ऋतू और आरती सब समेटने लगी थी रेखा जी के साथ मिल कर वही सुनंदा जी कुछ वक़्त फिल्म देखने के बाद अपनी दवा खा कर कक्ष में चली गयी.

"माँ, मैं बहार टहलने जा रहा हु. कुछ ज्यादा हे खा लिया आज.", अर्जुन का इशारा समझ कर अलका भी उठ कड़ी हुई.

"मैं भी साथ चलती हु. तुम्हे यहाँ का ज्यादा पता नहीं और टहलने मैंने भी जाना था. चची, मैं बर्तन धो दूंगी आने के बाद. आप आराम करने चली जाना.", ये दोनों अपनी जुगत भिड़ा कर खुश हो रहे थे और वही आरती ऋतू नजरो से हे बातें करती मुस्कुराने लगी.

"अभी 10 बजे अलका और 11 से पहले तुम सोने चली जाना बीटा. बर्तन मैं कर लुंगी, ज्यादा नहीं है. जाओ ऋतू आरती तुम भी अब आराम करो. ये सब छोडो.", रेखा जी की बात सुन्न कर ये प्रेमी जोड़ा हॉल से बहार निकल चला पर ऋतू और आरती कमरे में जाने की जगह उस बड़े रसोईघर में रेखा जी के साथ हे बर्तन धुलवाने लगी. काम 2 हे लोगो का थी इसलिए जल्द हे आरती ने चूल्हा, स्लैब आदि साफ़ करना शुरू कर दिया.

"आराम की तोह आपको भी जरुरत है माँ फिर आप अकेले हे सब करेंगी? 20 मिनट में सब हो जाना है और आरती तुम फ्रिज में बोतल भी लगा देना पानी की.", ऋतू बर्तनो से बचा हुआ खाना एक तरफ एकत्रित करती हुई अपनी माँ को पकड़ने लगी जो उन्हें मांझने के साथ पानी से धो कर एक तरफ रखती रही. ऋतू ने हे हाथ धो कर गीले बर्तनो को सूखे कपडे से साफ़ करते हुए उनकी जगह वापिस रखना शुरू कर दिया. रेखा जी दोनों को परिपक्व होते देख कर मुस्कुराने में कोई कोताही नहीं कर रही थी.

"बड़ी माँ, ारु सुबह जल्दी जाने वाला है क्या?"

"नहीं उसको मैं बिना नाश्ते के थोड़ी जाने दूंगी. पर देर तक जागना नहीं है आज.", रेखा जी ने उतने हे प्यार से जवाब दिया जिसको सुन्न कर आरती नजरे झुकाये खुश हुई जैसे उसको कुछ मनचाहा हांसिल हुआ हो.

"हाँ मैं तोह कहती हु बड़ी माँ की उसको न ये पूरा घर और जगह देखनी चाहिए सुबह. आराम से 12 एक बजे निकले तोह ठीक टाइम पहोच भी जाएगा. वैसे भी उसने तोह अपने कमरे में जाते हे सो जाना जैसी उसकी आदत है बिस्टेर देखते हे पसारने की.", अब वो क्या जुगत भिड़ा रही थी ये बस ऋतू को मालूम था पर वो ख़ामोशी से बस बर्तन हे सूखती रही लेकिन रेखा जी को घेरना तोह इन सबके बस में नहीं था जैसी ये बचकानी कोशिश कर रही थी.

"उसका जब दिल करे वो चला जाए बीटा. हाँ अब इतनी दूर से आया है और थकान भी होगी तोह आराम भी चाहेगा. सुबह जिसका जब दिल करे वो तब उठे, यहाँ कोई अलार्म नहीं है किसी के लिए.", अर्जुन के सोने की बात तोह वो सिरे से हे ताल गयी थी और आरती मायूसी से ऋतू की तरफ देख रही थी जो खुद अभी भी ख़ामोशी से लगी रही.

"वैसे नयी जगह है इसलिए उसने आते हे कह दिया की वो मेरे पास हे सोयेगा. गाँव में भी उसको अकेले सोने की आदत नहीं पड़ी और अपने घर भी तुमने देखा है की हफ्ते में 4 दिन तोह वो कभी संजीव तोह कभी मेरे या अपनी taai-chachi के पास सोता है. फिर भी वो उसका घर है तोह अकेले सोने में भी परेशानी नहीं होती पर है तोह अभी भी बचा हे न?", रेखा जी ने अगला जवाब भी विस्तार से दे दिया था जिस पर ऋतू मैं हे मैं कहने लगी की जिसको वो बचा समझ रही है वो इनको हे नानी बना सकता अगर थोड़ी सी भी ढील मिली तोह. पर अब वो सहज थी क्योंकि अर्जुन ने सुबह के पहले पहर का वादा किया था मतलब वो आज माँ को चैन की नींद सुला के रहेगा. यहाँ सब अब इस जगह की चर्चा में लगे थे और बहार अलका का हाथ थामे टहलता हुआ अर्जुन इनसे सेंकडो कदम दूर पंहुचा उस लकड़ी के बेंच पर आ बैठा था जिधर एकांत और अँधेरा था. झील से विपरीत और इस ठंडक भरे मौसम में जहा चाँद भी आज धरती और आसमान के केंद्र के ठीक बीच उनकी नजरो के सामने दमक रहा था.

"ये क्या करने लगी हो?", अर्जुन ने अभी बगल में बैठा कर अलका के नरम होंठो को चूमा हे था की वो उठ कर कड़ी हो गयी. दिल्ली सी लम्बी टीशर्ट वो उस चांदनी रात में अपने जिस्म से जुड़ा करने लगी थी बिना कुछ कहे. अर्जुन बस चाकूर की तरह इस कायनात को देखने लगा जिसमे जाने कितने चन्द्रम कैद थे. आखिर वो अलका थी, उसकी अंतरंग संगिनी और निश्छल प्रेम से भरी प्रेमिका जो ऊपरी हिस्से पर अब सिर्फ एक कासी हुई ब्रा में अपने यौवन कलश समझल उसके सामने कड़ी थी.

"अब इतनी दूर से मेरा बॉयफ्रेंड आया है और उसमे भी हमे ये थोड़ा एकांत मिला है तोह क्या तुम्हे उपहार भी न दू?", पजामा उतरने से पहले उसने कमर के आगे फंसा वो झीना परिधान निकाल कर एक तरफ रखने के बाद अपने दोनों उन्नत पर्वत भी इस ठंडक भरे वातावरण में आजाद करते हुए गर्मी बढ़ा दी. गोर पुष्ट चुचो पर उभरे वो तीखे गुलाबी चूचक अभी से पैने थे जिन्हे मात्रा दूर से देख कर हे अर्जुन की जांघो में हलचल मच गयी. उसके कंधे का सहारा ले कर झुकती अलका ने जैसे अर्जुन को ललचा दिया अपने उन्नत चुचो की कठोरता चेहरा से सत्ता कर. इतने में हे उसकी आँखें बंद हो चुकी थी और हाथ उन उभारो को पकड़ने बढे तोह अलका फिर से उस से दूर. अब वो पूरी तरह से उसके सामने निर्वस्त्र कड़ी थी जिसकी दिलेरी देख कर अर्जुन हैरान और होंठ लरजने लगे.

"अलका.. ये .. कैसा उपहार है?"

"मुझे ये तुम्हारे हाथो पहन न है जान.. पहनाओगे?", ये वही काला वस्त्र था जो यहाँ आने से पहले अलका ने ख़ास अर्जुन को ध्यान में रखते हुए लिया था. इसके साथ का सफ़ेद परिधान ऋतू की क़ैद में था जिसके जलवे अभी देरी से मिलने वाले थे. अर्जुन वो वस्त्र उठता हुआ अलका के समकक्ष आ खड़ा हुआ जिसके पूरे शरीर पर अनगिनत रोयें उभर चुके थे. प्रेम और ठंडक की मिलावट से. बस निर्वस्त्र जिस्म पर अर्जुन के इस स्पर्श मात्रा से वो उसके बदन से लिपट चुकी थी.

"आह्हः.. मैं बस यही मांग रही थी जाने कब से..", अर्जुन के पहलु में लिपटी वो एक बैल सामान थी जिसके पुष्ट उठाने को सहलाते हुए अर्जुन उन मदभरे होंठो को पीने में इतना खो गया था की समय से परे जा चूका हो. वो रोयें इस गर्माहट से बंद होने लगे. योनि की बंद फैंको ने इतने में हे अपना रास टपका दिया जिस से लज्ज़ती हुई अलका अपनी योनि पर हाथ रखती हुई पलट कर कड़ी हो गयी.

"तुम्हारी परिभाषा के लिए मेरे पास आजतक लफ्ज़ नहीं है अलका. हर एक क्षण में तुम पहले से कही ज्यादा आकर्षक लगती हो. मेरे अरमान और कल्पनाओ से परे, मेरी अलका.", पीछे से दोनों उभारो को हौले से सहलाने के बाद अर्जुन ने वो योनि पर ढाका हाथ हटते हुए जब वो गिलपन महसूस किया तोह ाचे से उस लकीर पर ऊँगली फिर दी. अलका की ये मादक सिसकार गवाह थी की उसकी दीवानगी बेशक मूक थी बाहरी दुनिया में पर प्रेम समर्पण अध्भुत था. आँखें मूंदे वो बस इस पल में हे डूबी रही और जब चेतना लौटी तोह खुद को बिना कंधे के उस कामुक पहरावे में ढाका पाया. वक्षो की घाटियों के बीच चुम्बन करके अर्जुन ने उसको सीने से लगा लिया.

"सुबह मैं ऋतू के कमरे में मिलूंगा और तुम इस ड्रेस में हे मिलोगी जो मैं खुद उतरने वाला हु.", झीने परिधान के ऊपर से हे अलका ने अर्जुन की गॉड में बैठते हुए उस अंग की धड़कन महसूस की जो उसके कूल्हों को गर्मी पंहुचा रहा था. बेंच पर पाँव लंबवत पसरे वो रह रह कर बस अर्जुन के गले में बाहें डाले चूमती रही.

"बटरफ्लाई किस्सेस याद है तुम्हे? मुझे ऐसे किस्सेस वह चाहिए तभी तुम्हे तुम्हारी अलका मिलेगी.", वह से उसका मतलब योनि से था जिस पर अर्जुन ने उसका एक उभर थोड़ा कस कर दबोच लिया.

"दोनों तरफ ऐसे किस्सेस मिलेंगे. तुम्हारी पसंद के साथ मेरी जगह पर भी.", अभी वो ऐसे हे एक दूसरे से ये हलके प्यार भरे पल साँझा करने में लगे थे की चाँद घने बादलो के पीछे छिप गया.

"हमे चलना चाहिए अर्जुन.. बरसात होने वाली है. कितना अलग मौसम है न यहाँ?"

"ये बरसात तब अपने चरम पर होने वाली है डार्लिंग जब तुम्हे उठाने आऊंगा. नींद पूरी करना नहीं तोह माँ सवाल कर सकती है.", अर्जुन अभी उसको लिए खड़ा हे हुआ था की आसमान में जोरदार बिजली चमकी. बादलो की गड़गड़ाहट सुन्न कर दोनों मुस्कुराये.

"चलो फिर देखते है तुम्हारे बादलो में कितना पानी है. बारिश होने लगी है."

"इन कपड़ो में हे चलोगी?", अर्जुन के सवाल पर अलका ने आँख मारते हुए उसके सामने हे बड़ी कुशलता से पहले ब्रा पहनी और उस परिधान के ऊपर हे टीशर्ट और पजामा.

"पंतय?"

"तुम आये तबसे हे गीली हो रही है इसलिए पहनी हे नहीं. अब चलो भागो इस से पहले की कोई बुलाने आये.", दोनों हे कुशल धावक थे पर ऐसी मजेदार दौड़ पहले कभी न घाटी थी जिसमे एक जंगल सी जगह पर 2 मस्ती भरे हिरणो का जोड़ा बरसात में गरम होता अपने ठिकाने पहुंचने लगा हो. बीच में एक बार अर्जुन ने लपक कर खुले आसमान के निचे अलका को पकड़ कर बाहों में भरते हुए चूमा तोह फिर से जोरदार बिजली चमक उठी. उस पलभर के उजाले में इस जोड़े की ऐसी कामुक हरकत वो 2 आँखें देख कर हैरान रह गयी जिन्हे ऐसी कल्पना तक नहीं थी. मजेदार पागलपन था इनका पर किसी और के लिए हैरत भरा.

परन्तु बहार से ज्यादा बिजलियाँ तोह आज उस आलिशान इमारत के एक ख़ास कक्ष में अर्जुन पर गिरने वाली थी जिसके स्नानघर में एक विशाल दर्पण के सामने खुद को अपनी चाहत के लिए तैयार करती वो प्रेयसी अपने आप में एक संसार थी. अर्जुन की तिलोत्तमा

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आज बहोत सोचने और विचार करने के बाद आखिरकार मैंने चौराहा की शुरुआत कर दी है दोस्तों. थ्रेड बना कर चाँद शब्द लिखे है और उसका पहला अपडेट इस रविवार को मिलेगा. प्यार 💯 बार हफ्ते में 3 दिन (तत्स) और चौराहा सिर्फ संडे.

आशा करता हु की जिस तरह आप सभी के साथ यहाँ प्यार भरे पल बिता रहा हु वैसे हे मिल कर डर का सामना करेंगे चौराहे पर. 😅

इन्सेस्ट टैग मुख्या रखा है और वजह आप सभी जानते है की लोग पढ़े और प्रतिक्रिया दे जैसा आप सभी यहाँ करते है. बदलाव उस कहानी में भी नहीं होगा जैसे आजतक ये जारी है. हाँ दृश्यावली 1910 के समय की है तोह घटनाएं और इंसान की मानसिकता भी उसी अनुसार झलकेगी.

शुक्रिया
 
अपडेट 213

पागलपन और चाहत (2)

दोनों हलके भीगे और उखड़ी सांसें सँभालते हुए घर में दाखिल हुए तोह असामान्य रूप से वह अब कोई भी न दिखा. वीसीआर बंद था और उसके साथ हे रसोईघर भी अँधेरे में डूबा. दोनों no हॉल में जलती मद्दिम रौशनी में एक दूजे को देखा था किवाड़ की आउट लेते हुए बारिश की हलकी बूंदो से नम्म चेहरे करीब आये और एक बार फिर अलका ने हे अपने होंठो को अर्जुन के लबों से मिला दिया. सांस सुधरने का ये तोह कुछ अनोखा हे तरीका था जो जल्द समाप्त हुआ और बड़े दरवाजो को भीतर से हे चिटकनी लगते हुए अर्जुन ने अपनी टीशर्ट उतर कर हाथ में ली तोह बस अलका उसकी नजरो के सामने अल्हड बाघिन सी मटकती हुई अपनी हंसाया के कमरे में दाखिल हो गयी, एक बार देहलीज से चेहरा बहार निकाल कर हवाई चुम्बन अर्जुन की तरफ़ा फेंकती.

'आह्हः.. काश वक़्त बस यही थम्म जाए और इस वन्न से बहार मैं कभी न निकल सकू.', अपनी हे सोच पर खुद के सर पर थपकी मारता हुआ वो बेआवाज कदमो से उन बड़ी सीढ़ियों की गिनती करता हुआ आ पंहुचा अपनी रात की रानी के द्वार. रेखा उर्फ़ तिलोत्तमा आखिर थी भी तोह वैसी हे महकती हुई एक लम्बी श्वेत फूलो से भरी रात की रानी की बैल सी. दिन में उसकी सुगंध से अधिक ध्यान गंतत्व की तरफ जाता था पर दिन ढलने पर अगर सही तलाश लिए भंवरा रुपी सर्प उस बेजोड़ सुगंध के नशे में इस लहराती संगिनी से लिपटने की आस में क़ुर्बान होने तक से न चुके. आज से पहले सिर्फ एक बार वो भी आखिरी मिलान पर हे अर्जुन ने देखा था की उसकी माँ अंतरंग समय में अब स्पर्श के बदले स्पर्श से जवाब देने लगी है. पर अब ये घर से बहार दो प्रेमियों का ऐसा मिलना था जिसमे दोनों जैसे अनगिनत बार आँख मिचोली खेल कर इस रिश्ते को ठहराव देने की सोच चुके थे. हाँ रेखा ने हे तोह बुलाया था अर्जुन को यहाँ और उनका मिलना उन्मुक्त था उतने हे मीठे नमकीन nok-jhonk भरे प्यारे पालो के साथ. अब सूक्ष्म पालो से अधिक की हसरत और चाहत लिए ये पागल अपनी तिलोत्तमा के द्वार पर हलकी से दस्तक देता बाल संवार रहा था. अर्जुन एकदम से अपने आप को सुधार रहा था जैसे वो अपनी इस प्रेमिका के वजूद के सामने 19 नहीं रहना चाहता था. रेखा का प्रभाव था हे ऐसा जहा कोमल ने हमेशा अर्जुन के सामने खुद को प्रस्तुत किया था वही ऋतू उसको बराबर टक्कर देती साथ में होश खोने लगती थी. रेखा.. वो कैसे हावी हो सकती है अर्जुन पर? आजतक तोह बस रेखा ने अर्जुन को समेटा हे था और वो प्रभावित थी उसके द्वारा हर कानन टटोलने पर. पर आज ऐसा नहीं था जो अर्जुन का दिल उसको अनिगिनत बार समझा चूका था. आज ये उनका एकांत था और तड़प दोनों तरफ ऐसी की उसकी आग में इस्पात पिघल जाए.

"ाचे लग रहे हो पर मुझे नहीं लगता की ये एक ाचा तरीका है निचली मंज़िल से हे सीना उघाड़े आना. पहली सीढ़ी के बाद सत्रह (17) कदम हुए होंगे?", दरवाजे के पीछे जिस्म छुपाये जिस तरह चेहरा बहार निकले रेखा ने अर्जुन का स्वागत किया था वो बस उस चेहरे की आकर्षक बनावट, घनी लम्बी पलकों और उस से भी ज्यादा आकर्षक हजारो sawaal-jawaab करती आँखों में खो सा गया. तन्द्रा टूटी जब खुदको अभी भी बाल संवारते और रेखा को मुस्कुराते पाया. भीतर आज मद्दिम रौशनी की जगह झूमर प्रज्वलित था जिसके चमकदार टुकड़े जैसे सितारों की बारिश सी करते लगे रेखा के चेहरे और सामने समेटे लम्बे बालो पर.

"मन के तुम... हो बेहद हसीं.. ऐसे बुरे.. हम भी नहीं..!", अर्जुन ने आहिस्ता से हे ये गीत गुनगुनाया था और वो उतनी हे जगह से कक्ष के भीतर दाखिल होता हुआ बिना रेखा के बदन का अवलोकन किये बिना उसके किवाड़ पर जमे हाथ की कलाई पकड़ कर अपने सीने से लगाए खड़ा हो गया. सवा 6 फ़ीट का ये युवक रेखा का हे तोह अंश था फिर रेखा की तुलना कैसे हो सकती थी. आज नजरे झुकी नहीं थी, उठी और अपनी पीठ से हे रेखा ने द्वार बंद कर दिया. अर्जुन को इतनी ताक़त का एहसास नहीं था जिस तरह से कलाई उसके बस में थी पर रेखा उसको फिर भी खींच कर दरवाजे संग चिपकी एक कशिश से निहारने लगी.

"बुरे तोह हो तुम और नौसिखिये भी.. हाहाहा.. मेरी माँ ठीक निचे वाले कमरे में है और तुम उसकी बेटी के कमरे में वो भी उनके घर. भारी पड़ सकता है तुम्हे.", अर्जुन की धड़कने असामान्य होने लगी थी क्योंकि आज उसकी गिरफ्त में सीने से लगी ये रेखा शर्मा आज से पहले नहीं दिखी थी. इतनी चंचलता और ऐसी बेबाकी तोह स्वयं ऋतू में न थी. लफ्ज़ जुबान पर तब आते जब वो इस आकर्षण से बहार निकल सकता. एक पल में हे जैसे वो निरस्त्र हो चूका था.

"हो न तुम नौसिखिये? हाहाहा.. टूटे खिलोने से मानना चाहते हो?", अर्जुन सिहर हे उठा जब रेखा ने अपने आजाद हाथ की उँगलियों से उसकी गर्दन को मात्रा सहलाते हुए उस के चेहरे को खुद की और हे झुका लिया.

"आखिर आप.. आप हो कौन?", अर्जुन उस अदृश्य पाश से निकलने की कोशिश में अंदाजन हे रेखा की कमर को थाम कर उसके माथे पर माथा टिकाये आँखे मूंदे निवेदन हे कर उठा. ये महक.. ये भीनी मदहोश करती महक उसके नथुनों से भीतर समाहित होती जैसे रक्त में मिलने लगी. आजाद होने की जगह अर्जुन उस नाग की तरह raani-beil से लिपट चूका था. हालत रेखा की भी कुछ कमतर न थी जिसके चेहरे पर अर्जुन चेहरा टिकाये उसके सीने को अपनी चौड़ी छाती की उठान से दबाये खड़ा था.

"उन्न्नध्ह.. तिलोत्तमा.. अर्जुन पर आसक्त उसकी तिलोत्तमा जो दिन के उजालो में उसकी हो न सकीय पर एक वही तोह था जो उसके पूर्ण स्वरुप को देख पाया था. तुम कमतर नहीं हो अर्जुन और न मैं कोई अप्सरा.", अब रेखा खुद अपने जिस्म में एक अध्भुत्त कम्पन्न महसूस करने लगी थी और अपनी गोलाकार ठुड्डी उचका कर उसने सवाल पूछने की कोशिश करते अर्जुन के गीले होंठो से अपने सुर्ख होंठ जोड़ दिए. आह्ह्ह्हह... कितना स्वर्गिक अनुभव था वो जहा मरणसँ विशाल अश्व ने जैसे अमृत चख लिया हो. और ये प्रगाढ़ चुम्बन यही न रुका. अर्जुन का वो हाथ जिस से उसने रेखा की कलाई जकड़ी थी अब उसकी हे पीठ से लगा था और धीमे धीमे दोनों एकसार चलते हुए उस नरम बिस्टेर पर 2 आपस में जुड़े पुष्प से जा गिरे.. अर्जुन के मुख से निकली आह रेखा के कंठ में उतर कर विलीन हो गयी. उसके सीने पर वो मखमल को चुनौती देता अध्भुत्त जिस्म छाया हुआ था जो प्रतिद्वंदी से अधिक एक ऐसा प्रेम था जिसका वर्णन दुर्लभ और एहसास कल्पना से परे. आज रेखा ने पहल की थी और जिस कदर कामुकता से उसने दोनों होंठो से रास खिंचा था अर्जुन ने अपनी जिव्हा भी उसके हवाले कर दी. अर्जुन के सीने और कंधे पर फैले रेखा के गेसू उसका समर्पण हे था. ये चुम्बन भी अर्जुन के कांपने पर रुका और स्थिति का भान होते हे मानिंद आँखें खोल वो अपने ऊपर झुकी रेखा को निहारने लगा. जिस्म पर एकमात्र वस्त्र वही जमुनी छोटा सा परिधान था जिसकी फिसलन रेखा के जिस्म से मेल खाती पानी की बूँद सी थी.

"नीचे मेरी बहने भी है!", अर्जुन ने बस यही कहा था और रेखा उसको बाहों में भर कर मस्ती से किसी नवयुवती की तरह नाक से नाक रगड़ती मुस्कुराने लगी.

"तुम्हारा पागलपन मुझे भी अपनी हड्डी तोड़ने पर मजबूर कर गया अर्जुन. और सच कहु तोह इस से बेहतर एहसास और कोई नहीं. शायद इसलिए हे कमजोर समाज ने इस पर बंदिशे लगाईं होंगी. मुझे लगता है जैसे मैं आज प्रेम को समझ सकीय हु और चाहती हु तुम जीवनभर मुझे ये समझते रहो.", अर्जुन अब मुस्कुराने लगा था और नजरे चुराती रेखा अपनी स्थिति का भान होते हे नीचे सरकने लगी तोह उसके दोनों पुष्ट नितम्बो पर हथेलिया टिका कर अर्जुन ने वही रोक लिया. अब बारी रेखा की थी सिहरने की क्योंकि अर्जुन ने उन्हें थामने के साथ हे बहोत सा नरम मांस पंजो में क़ैद करते हुए अपने लिंग पर उसका पेडू दबा लिया था.

"तिलोत्तमा अर्जुन की कैसे हुई? उसको देखना तोह स्वयं उसको बनाने वाले के बस का नहीं था. शंकर जी के नेत्र पारवती जी ने स्वयं बंद कर दिए थे बस तिलोत्तमा के वह होने के एहसास भर से. जिसकी ख़ूबसूरती और लावण्या की परिभाषा हे नहीं थी और स्वयं देवराज भी जिसको पा न सके तोह कैसे वो साधारण से अर्जुन की हुई? वो सब पढ़ने के बाद मुझे भी लगता है की आप पर किसी का भी अधिकार नहीं हो सकता. मैं तोह बस prem-dor में खिंचा आता हु और सब काल्पनिक लगता है जब आँख खुलती है. आपसे खूबसूरत न आपका अंश है न आपकी जननी. मैं इतने में हे संतुष्ट हु की आज स्वयं मेरे करीब आयी."

"ऐसे प्रेम ने हे तोह तब तिलोत्तमा को उसके स्त्री होने का एहसास करवाया था अर्जुन जब वो थक चुकी थी अपनी हे छवि और अकेलेपन से. स्वयं शिव से द्वन्द के बाद lahu-luhaan अर्जुन के घुटने न ठीके तोह उसको वो सब मिला जो शिव का था, उनकी ख़ुशी से. Pashupat-astra के साथ विजय नाम एक वरदान था भविष्य में विजय को खंडित करने के लिए. अमरावती में स्वयं देवराज ने अर्जुन को सर्वस्व सौंपना चाहा जिस से इंकार करके वो उन्हें pita-samman देता हुआ उद्यान में आया तोह पहली बार तिलोत्तमा ने महसूस किया की बस यही है जिसमे पाने की हसरत से ज्यादा देने की हिम्मत और समर्पण है. ईर्ष्या से Rambha-Menaka भी कुंठित होती चली गयी जिन्हे अर्जुन ने तिलोत्तमा के सम्मुख नजर तक न किया. वो शर्मायी और हैरान भी हुई की कैसे ये शक्श उसको देख प् रहा है और वो ये बदलाव कैसे महसूस कर प् रही है किसी साधारण मनुष्य सामान. प्रेम का एक कटरा भी सब बदल देता है जैसे एकाकी तिलोत्तमा बदल गयी. वो जीवन तोह बस अर्जुन की चाहत में बीता, उसके समरण और दूर दूर से अवलोकन करके. प्रेम ऐसा हे तोह होता है जिसमे हांसिल से अधिक एहसास का महत्व हो.", रेखा अब पुनः अर्जुन की सबसे बेहतर शिक्षक बन चुकी थी और उसके निचे लेता अर्जुन शिष्य.

"आपने तोह कहा था के तिलोत्तमा अर्जुन की हुई थी? और मुझे इसके बारे में भी नहीं पता था जो आपने बताया है. हाँ थोड़ा बहोत पता है की शिव जी और अर्जुन में न्यास हे द्वन्द हो गया था जिसमे अर्जुन ने उनका धनुष काट दिया था और उसके बाद तलवार से शिव जी ने अनेको घाव बनाये थे उसके जिस्म पर वो न हरा और न रुका. Pashupat-astra मेघनाद के बाद सिर्फ अर्जुन को हे उनसे हांसिल हुआ था."

"3 पीढ़ी बाद. दोनों मिले थे और फिर वो एकसाथ जिए भी. नौसिखिये हो न तुम..? चलो कुछ दिखती हु तुम्हे जो मैंने आज ढूंढा पर तुम कोई आवाज मैट करना और न हे ये राज किसी को जाहिर करना. ऋतू को भी नहीं.", रेखा तुरंत किसी अल्हड लड़की की तरह अर्जुन के ऊपर से उठ कर अलमारी की तरफ लपकी. कूल्हों से कंधे तक हे तोह वो रेशमी वस्त्र था जिसमे उसके वो अध्भुत्त कटाव और जिस्म का हर उतार चढ़ाव सपष्ट था. जल्द हे वो असाधारण जिस्म एक लम्बे गहरे लबादे में छुप गया. रेखा ने अर्जुन की तरफ भी एक कमीज फेंकी और कुछ चाबियों के साथ बैटरी लिए वो प्रतीक्षा करने लगी अर्जुन के तैयार होने की.

"हम इतनी रात में जा कहा रहे है? और निचे ऋतू दीदी जागती मिली तोह?", अर्जुन तैयार था बस कुछ सवालों के साथ.

"नौसिखिये हमेशा बहार से खोजबीन करते है पर उन्हें पहले अपने भीतर तोह लेनी चाहिए. वो दिन भर बहार की ख़ूबसूरती देखने में व्यस्त रही है और जिस काम पे तुमने लगाया था शायद उस तरफ ध्यान गया नहीं, निश्चिन्त थी न वो क्योंकि समय बहोत है 7 दिन. गलियारे एक आखिर में भी एक रास्ता है जो पीछे निकलता है. बस नंगे पाँव चलना और कोई आवाज नहीं.", दरवाजा सावधानी से खोलने से पहले रेखा ने अपनी जुल्फों को समेत कर एक ढीले जुड़े का स्वरुप दिया और अर्जुन हैरत से चुपचाप पीछे चल दिया. ऊपर की इस मंज़िल पर आगे वाले सभी कमरों पर टाला हे ज्यादा था और अंत में एक सीढ़ी ऊपर जाती थी और दूसरी नीचे. यहाँ इतनी ख़ामोशी थी की दोनों एक दूसरे की सांसें तक सुन्न रहे थे. जल्द हे हे वो bhoo-tal पर उस छोटे दरवाजे के सामने खड़े थे जहा टाला ज्यादा था. रेखा जैसे अँधेरे की अभ्यस्त थी और बस एक बार टाला और गुच्छे की वो चाबी देखने के बाद उसने रौशनी बंद कर दी. अब दोनों हे बहार खुले आसमान टेल थे जहा जोरदार बारिश की जगह बस हलकी बूंदे हे इधर उधर गिरती महसूस हुई. कुत्ते भी आसपास नहीं थे और इनसे 50 गज दूर वो 2 कमरे में भी अँधेरे में डूबे थे जहा कुंती रहने लगी थी.

"वो नानी और पड़ नानी की आरामगाह थी. हमे वही जाना है.", रेखा ने कान में सरगोशी की तोह वो उन्नत उभारो का मात्रा छूना हे अर्जुन के पाजामे के भीतर हलचल मचा गया.

"आठ.. हाँ.. चलिए.", वो बेचैन सा होने लगा था और आज वो सचमुच खुदको नौसिखियाँ मान गया जब उसकी माँ ने ऋतू और उसकी मंशा ऐसे खोल कर रख दी थी. पर वो ढून्ढ क्या रही थी ये उन्होंने भी नहीं बताया था. ये एक मंजिला इमारत बहार से बिलकुल बेजान सुनसान थी जिसके द्वार पर झूलते मॉटे ताले को एक लम्बी चाबी से खोल कर रेखा ने किवाड़ खुलने तक की आवाज न होने दी. भीतर जैसे हवा रुकी सी जान पड़ी, बरसो से बंद जो थी ये जगह आज से पहले. अब बैटरी की पीली रौशनी चालू करते हुए रेखा ने दरवाजा ाचे से बंद करने के बाद अर्जुन का हाथ थाम लिया.

"अब बोल सकते हो तुम जैसे चाहो. देखो ये जगह कितनी खूबसूरत है और पूरी लकड़ी से बानी. फर्श, ये बिस्टेर .. उधर देखो.. वो मेरे नाना नानी जी की तस्वीर. नानी का नाम महिमा देवी था और ये बिलकुल माँ के हे जैसी लगती है.", अर्जुन भी रेखा से सत् कर बड़े ध्यान से उस कलाकृति को देखने लगा जहा दोनों पति पत्नी बड़े आकर्षक दिख रहे थे. अर्जुन और रेखा ने पेंटिंग से नजरे हटाई तोह फिर से नजरे एकाकार हुई जहा अर्जुन ने हे उत्सुकता से अपने सामान झुकी हुई रेखा के लबों को चूमने के साथ एक उभार को थाम लिया.

"उफ़.. सबर तोह है हे नहीं तुम में. पहले वो तोह देख लो जिसके लिए यहाँ आएं है.", रेखा को भी ऐसा बेसब्रपन पसंद आया पर वो स्थिति की समझ बेहतर रख रही थी. अर्जुन का हाथ हटा कर खुद भी हल्का चुम्बन देने के बाद वो इसके बगल वाले कक्ष में दाखिल हो गयी. इधर भी एक बिस्टेर और कुछ कुर्सियां हे सजी थी, खिड़की पर गहरे परदे जिस से बहार की रौशनी भीतर आना हे मुमकिन न था.

"ये सामने जो पेंटिंग है न वो माँ की नानी है अनाहिता जी. ये सब इन्ही की जायदाद थी या इनके नाम थी किसी वजह से. तुमने ये चेहरा पहले देखा है कही?", वो सचमुच एक रानी हे लगती थी और महिमा जी से भी खूबसूरत पर शायद ये अर्जुन की तलाश नहीं थी. उसकी नजरो में विफलता देख कर रेखा ने हे उसको अपने सीने से लगा लिया.

"तुम जिसको खोज रहे हो, वो भी यही है पर कहा था न के तिलोत्तमा ऐसे नहीं दिखती. ये कुर्सी हटाओ और उसके नीचे का कालीन भी.", अर्जुन हैरान था जैसे उसकी माँ ने ये उपहार उसके लिए हे तैयार रखा हो. अब उसके हाथ और कदम अपनी क्षमता अनुरूप चल रहे थे. लकड़ी के फर्श पर ये 4क्ष4 का पल्ला था जिसको खोल कर नीचे गर्भ में जा सकते थे.

"आपने ये कैसे ढूंढा?"

"इतनी बड़ी जगह में बस एक यही कालीन अलग और छोटा था. इतना दिमाग तोह है मुझमे की जो अलग दिखे उसकी जांच कर सकू. तुम उतरो, मैं टोर्च दिखती हु.", अर्जुन गदगद था अपनी माँ के जवाब और दिमाग पर. उस दरवाजे को उलट कर फर्श के दूसरी और हे टिका दिया. ये लकड़ी की सीढिया आज भी खासी मजबूत थी जिन्हे पार करता अर्जुन जब नीचे आया तोह जैसे यहाँ वो हलकी ठंडक और हवा महसूस कर प् रहा था. पर सब तरफ अँधेरा था और ऊपर देखने पर अपनी माँ को कुशलता से सीढ़ियां उतारते पाया. अंतिम सीढ़ी पर उनका पाँव पड़ने से पहले हे अर्जुन ने पीछे से उन्हें अपनी बाहों में उठा लिया. दुनिया से परे इस तहखाने में वो कुछ पल तक उन्हें अपनी बाहों में भर कर जिस्म से लगाए पीठ और गाल पर चूमता हे रहा. अचानक से उस पर कामुकता अत्याधिक हावी हो उठी जिस पर हँसते हुए रेखा ने पहले तोह अपने मादक कूल्हों को हे उसके उठान पर ाचे से रगड़ा और फिर खिलखिलाती हुई उसकी पकड़ से दूर आ कड़ी हुई.

"तुम पूरे पागल हो तुम्हे शायद पता नहीं. पहले जिस काम से आये है वो तोह कर ले, सुबह होने में तोह अभी साढ़े 4 घंटे बाकी है. उम्माह..", अर्जुन को प्यार से पकड़ कर फिर से हल्का सा चुम्बन जड़ कर जैसे उन्होंने उसकी उत्तेजना बाँध दी.

"सॉरी. पता नहीं बस कण्ट्रोल नहीं हो रहा जब से आपके साथ हु. और ये जगह मैं को कुछ ज्यादा हे भा रही है जैसे इसके हर कानन में आपका हे समावेश हो.", रेखा ने एक तरफ चलते हुए पलट कर देखा और मुस्कुराते हुए वो खटका दबा दिया. एकदम से तहखाने में भरपूर दूधिया उजाला फ़ैल उठा. ये जगह ऊपर की तरह उतनी साफ़ नहीं थी पर कही कोई मिटटी या गंदगी भी नहीं. बस कुछ जले लगे थे छत और दिवार के जोड़ो पर. इधर बस कुछ बंद संदूक, एक लकड़ी का बड़ा हे मेज जो जाने यहाँ कैसे लाया गया होगा क्योंकि आने का रास्ता तोह 4क्ष4 फ़ीट का हे था. पर दीवारों पर 3 बड़ी चित्र लटक रहे थे लकड़ी के फ्रेम वाले. अर्जुन के कदम स्वतः हे उस और चल उठे. अब उसकी धड़कन जैसे फिर से बढ़ने लगी थी क्योंकि ये पहली हे पेंटिंग उसको अपनी हे तरफ खींचती महसूस हुई. कमल पुष्प पर झुकती वो रूपवती यौवना अर्जुन को सम्मोहित कर चुकी थी जिस पर हाथ फेरते हुए बस वो इतना हे कह सका.

"देवी Anuradha..Uff.."

"तिलोत्तमा.. अनाहिता की बड़ी बहिन और मेरी पड़ नानी. होश उड़द गए न इनकी ख़ूबसूरती देख कर? ये तब 16 बरस की हुई थी, उनकी आखिरी तस्वीर होगी शायद.", रेखा भी अर्जुन की बगल में कड़ी अपने हे जवान प्रतिबिम्ब को निहार रही थी. आँखों में प्रशंशा के भाव और एक सुकून.

"ये तिलोत्तमा नहीं है माँ.. यही तोह पंडित मोतीलाल जी की माता जी है. देवी अनुराधा और इनकी hu-ba-hu वैसी हे पेंटिंग जैसी आप कॉलेज में दिखती थी वह महल में भी थी जिसको सभी देवी बुलाते है पर कोई उनके बारे में जानता नहीं. ये नानी की बड़ी नानी थी जो 16 बरस की उम्र में मृत्यु को प्राप्त हुई तोह फिर कैसे इनका वजूद Anuradha/Devi के रूप में अगले 5-6 साल तक बरकरार रहा.? स्वयं पंडित जी को उनकी माँ का बस इतना हे स्वरुप याद रहा और वो 4 बरस के थे जब उनकी माँ का देहावसान हुआ. ऐसा लगता है जैसे ये हमे देख रही हो.", अब बारी रेखा की थी ताज्जुब में पड़ने की.

"मतलब.. मतलब ये संपत्ति अनाहिता की थी हे नहीं बस वो संरक्षक थी इसकी. वो फिर विवाहित भी किसी raaj-gharane में हुई थी लेकिन देश से बहार. पर ये कैसे मुमकिन है जब माँ ने खुद हे बताया था की तिलोत्तमा .."

"उन्होंने जो बताया वो उन्हें बताया गया था. 16 बरस की उम्र में जब तिलोत्तमा उर्फ़ अनुराधा देवी मौजूद हे नहीं थी तोह उनकी छोटी बहिन तोह तब कुंवारी हे होंगी. मैं सही सोच रहा था जब मैंने इनकी तस्वीर वह देखि और रानी सौंदर्य जी का आपको देख कर असहज होना. जानती हो माँ, ये भी आपके हे जैसी थी. अकेले हे गर्भवती होने के बावजूद 4 तांत्रिको को जहन्नुम पंहुचा दिया था इन्होने. इनके पति कहने को तोह जुगलाल जी थे पर वो इंसान तोह हरगिज़ नहीं थे और न हे उनका वो राजा मित्र या भाई भूपेंद्र सिंह. जुगलाल जी के साथ न हे पंडित लिखा मिला कही और न हे सिंह. पर वो दोषी थे इनकी मृत्यु के. आपने इन संदूक को खोल कर chhaan-bin की क्या माँ? मुझे लगता है की सब राज इधर हे बंद है."

"इनकी चाबी ढूंढ़नी पड़ेगी अर्जुन और रात में ताले तोडना ठीक नहीं. मैं इधर हे हु और यकीन करो इस बार तुम्हारे सवालों के जवाब मैं खोज कर रहूंगी. वैसे थी तोह बहोत हे दक्ष और हिम्मतवाली. इनके साथ बहोत हे बुरा हुआ होगा जिस वजह से इनका अस्तित्व या तोह रहा नहीं और जो रहा वो टालो में इतना गहरा दफ़न है की कोई पहुंच न सका. देखो कैसे अपने कंधे पर कला झबरैला श्वान उठाये है जो खुश जान पड़ता है.", अगले बड़े चित्र में अनुराधा उर्फ़ तिलोत्तमा का अलग हे स्वरुप था जहा वो पतलून कमीज पहने उस श्वान को एक कंधे पर लटकाये थी. इतनी मोहक मुस्कान जिस पर वो जीव भी फ़िदा था.

"ये भेड़िया है माँ और आप स्वयं हे देखिये की कितनी निर्भीक रही होंगी अपने समय में समय से भी आगे. शायद purush-pradhaan समाज और शाही घराना तक इनसे ट्रस्ट रहा होगा. आदत नहीं है न उन्हें इतनी क्षमता वाली महिला के सामने घुटने टेकने की. और ये दोनों बहनो की एक साथ वाली तस्वीर. एक तरह से तोह जैसे ये अपनी छोटी बहिन के लिए भाई हे रही होंगी. अध्भुत्त.. माँ, आपको अब मेरा साथ देना हे होगा. आखिर अब सवाल हमारी तिलोत्तमा के अतीत से भी जुड़ा है.", पीछे से अपनी माँ की कमर को घेरे में भरते हुए अर्जुन ने अपना चेहरा उनके कंधे पर रख लिया.

"तुम्हारी तिलोत्तमा का. मुझे तोह खुद अजीब सा लग रहा है ये सब तुम्हारे से जान ने के बाद. कितना खतरा था वह जहा तुम घबराये हुए थे?"

"इतना की आप मेरे साथ न होती तोह मैं ज़िंदा ..."

"शठ.. इस बार तुम्हे कुछ नहीं होगा अर्जुन.. अतीत में जो भी हुआ हो.. मामला मुझे अधूरे प्रेम का हे लगता है लेकिन इस बार कोई बलि नहीं चढ़ेगा समाज के हाथो. चलो अब यहाँ से चलते है कही मेरे विचार न बदल जाए एक ख़ास रात तुम्हारे साथ बिताने के. फिर तुम तोह 3 हफ्ते मिलने नहीं वाले."

"मैं हर रात दिवार फांद के आ सकता हु, बस कह कर देखिये."

"वो भी कभी करेंगे पर होश अकेले में भूलने है, बहार नहीं. उम्म्म्म", अर्जुन ने जिस तरह से दोनों बाहों में उन्हें उठाया था रेखा ने हे उसकी गर्दन में ब्याह दाल कर अपना चेहरा उसके होंठो से जोड़ लिया. चलते चलते वो इस प्रगाढ़ चुम्बन में तल्लीनता से डूबे रहे. एक बार फिर तहखाना अंधकार में डूब चूका था और ऊपर की मंज़िल फिर से ताले से बंद. जरुरत के जवाब तोह फिलहाल दोनों को मिल चुके थे और बाकी जिम्मा अब रेखा ने अपने कंधो पर ले लिया था, अर्जुन का बोझ काम करते हुए.

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"शंकर से बात करवाना मेहुल भाई.", फार्महाउस पर रखा बेतार फ़ोन बजते हे गुलाटी ने जाम एक तरफ रखते हुए सामने वाले की आवाज सुनते हे फ़ोन शंकर की तरफ बढ़ा दिया जो ज़िंदा बचे हमलावर का सर पानी में डुबोये अपना पाँव उसके ऊपर रखे था.

"कौन है."

"नरिंदर भाई है.", शंकर ने तुरंत हे पाँव हटा लिया फ़ोन लेने के साथ. वो खून से लथपथ हमलावर बुरी तरह से हांफ रहा था जिसके चेहरे पर तक़रीबन दर्जन भर महीन गहरे घाव शंकर बना चूका था.

"हाँ इन्दर इतनी रात को और तुझे पता था मैं यहाँ मिलूंगा?"

"अमली के दो ठिकाने, या ठेके या थाने. कर हे ला तुमने अपनी मनमानी भाई? और तुझे कुछ हो जाता तोह मेरा क्या होता? एक रात और वो भी सिर्फ कुछ घंटे कहा था तुझे आराम से घर रहने के लिए पर नहीं तू तोह बेलगाम हो जाता है अगर मैं तेरे से थोड़ा दूर राहु तोह.", नरिदर इस वक़्त किसी बड़े घर में बैठा वही से फ़ोन मिलाये था. चेहरा पर चिंता की जगह भाई की लिए परवाह और प्रेम था बस.

"हाँ बाद में पता लगा के तू सही कह रहा था. वो दीपक थोड़ा जख्मी हो गया पर ये पंजाबी ज़िंदा है साला, गांड में दूसरा सुराख बन गया इसकी.", शंकर के मजाक पर इधर गुलाटी उसके जांघ पर थपकी मारने लगा और उधर सांगवान ज़िप खोल कर उस हाँफते हमलावर के चेहरे पर mutra-visarjan हे करने लगा था जिसको देख कर सुनील बेचारे ने तोह नजरे हे हटा ली पर डॉ परताप ठहाके लगा रहा था.

"इस बात से हे तोह डर लगता है भाई क्योंकि तेरा दिमाग न do-tarfa है. एक जहा तू बस ठान लेता है और दूसरा तुझे फिर गलती का एहसास तोह हो जाता है पर तू उसके बाद अगली गलती के लिए जगह तैयार रखता है. वैसे जानता है तुझ पर हुम्ला किसने और क्यों करवाया? और जो चीख रहा है उस माँ के लाडले को शांत कर दे पहले. वो कुछ नहीं जानता.", शंकर ने बस सामने राखी पिस्तौल परताप को थमा दी इशारे से इस चीखते चिल्लाते आदमी को हमेशा के लिए दर्द से मुक्त करने के लिए. परताप भी सफ़ेद पॉश डॉक्टर होने के साथ हे इनके जैसा है sakht-dil था जिसने मुस्कुराते हुए ठीक आँख और फिर मुँह के बीच 2 गोलियां मारी.

'अरे ओह बावले, अभी मूट ख़तम न होया था और तन्ने तोह यु ठंडा हे कर दिया. चल ब्लीडिंग साफ़ करते है दोनों भाई मिल के अपने अपने प्राकृतिक डेटोल से.", मूत्र थामने के बाद सांगवान फिर से उस निर्जीव के चेहरे को टर्र करने लगा जिसका साथ परताप ने भी दिया. पर शंकर अब थोड़ा गंभीर था फ़ोन पर.

"कौन मादरचोद पैदा हो गया इन्दर जो इतना बड़ा हो गया? धंदे की वजह से उसने किया न तोह साले को मैं वही आ कर ठोकूंगा और लटकाऊँगा अलग उसके बिल्डिंग से."

"शांत हो कर पहले बात तोह सुन्न ले भाई फिर तू हे बोल देना की किसको लटकाना है और किसको ठोकना.", नरिंदर के शब्दों की गहराई समझ कर शंकर अपना जाम उठा कर इन सबसे थोड़ा दूर चल दिया.

"हाँ अब बोल भाई ये माजरा क्या है? बड़े शातिर शिकारी भेजे थे सुपारी देने वाले ने."

"तुझे तेरा हर पागलपन याद है क्या शंकर? अगर है तोह बस इतना बता के क्या कभी तेरे हाथो दोषी के साथ निर्दोष मारा गया है? मैं जानता हु तू दिल का उतना हे नरम है पर क्या ऐसा हुआ है तुझसे.?", एक पल के लिए तोह शंकर का दिल बैठ सा गया जब 'निर्दोष' उसके मैं से होता हुआ दिल तक पंहुचा. हाथ से वो सुलगती तजा सिग्रत्ती घांस पर गिर चुकी थी.

"मैंने कोशिश की थी इन्दर उस लड़के को बचने की. शायद वो 24-25 बरस का रहा होगा, सड़क पार कर रहा था और एकदम से वो सामने आ गया. नहीं वो सामने नहीं आया था इन्दर, मेरी हे गाडी सड़क के दूसरी और चली गयी थी. योगराज वो Lok-dal वाले का टट्टू, उसने गोली चलाई थी मुझ पर और मैंने सामने न देखते हुए जवाब में गोलियां चलाई. खाली सड़क थी और जब मैंने होश संभाला तोह उन लोगो को तोह मैं मार चूका था पर एक युवक और था जिसकी सांसें चल रही थी, वो मेरी गाडी से टकरा कर फुटपाथ पर भिड़ा था शायद. मैं उसको क्सक्सक्सक्स के करीबी हॉस्पिटल में भी ले कर गया था. इलाज के दौरान हे उसकी सांसें साथ छोड़ गयी भाई. वो कह रहा था के.. उसका घर जाना जरुरी है.. मैंने जानबूझ कर नहीं किया उसके साथ पर मैं उसको बचा लू... हेड इंजरी थी और उस सरकारी हॉस्पिटल में तोह ढंग का ओट हे नहीं था भाई. मेरे से आजतक बस एक वही निर्दोष मारा है जिसको मैंने नहीं मारा. गलती उस से बड़ी ये हुई थी की मैं उसके सिरहाने सिर्फ अपना कार्ड छोड़ के आया क्योंकि sare-raah गोलियां चलने का एक भी गवाह मिलता तोह कही न कही बात आ हे जाती. 4 साल से ज्यादा हो गए इस बात को. पर मैं भूला नहीं हु और अगर प्रायश्चित का मौका मिले तोह मैं सबकुछ करने को तैयार हु इन्दर, सबकुछ."

"मेरे बेटे के बदले मैं तुम्हारे भाई की जान ले रहा हु डॉक्टर शंकर शर्मा, मब्ब्स मस. पिस्तौल भी नरिंदर शर्मा की और मौत भी. हाँ इसके जिम्मेवार भी तुम हे होंगे डॉक्टर क्योंकि ये मुझे मारने आया था तुम्हारी सुपारी देने के लिए.", ये सार्ड सी आवाज पिघले कांच की तरह शंकर के हृदय को भेदती गयी जब सुना की खुद उसका भाई अपने आप को ऐसे व्यक्ति को सौंप चूका है जिसका कसूरवार शंकर था.

"ऐ.. ऐ भाई... तुम जो भी.. सुनो. थोड़ा समझो मेरी बात. तुम्हारा कसूरवार मैं हु और चाहो तोह तुम मुझ पर फिर से हुम्ला करवा दो मैं सड़क के बीच खाली हाथ करके खड़ा रहूँगा. जितनी गोलियां मारनी हो.. मुझे मार लेना.. वो मेरा छोटा भाई.. मेरी गलती की सजा उसको मैट दो.. मैंने तुम्हारे बेटे या जो भी वो युवक लगता था उसको टक्कर नहीं मारी थी. मेरी गाडी एक्सीडेंट से दूसरी तरफ उतरी थी और वो युवक हँसता हुआ पीछे देखता हुआ सड़क पार कर रहा था. मेरे भाई को बक्श वो कभी कुछ गलत नहीं करता. खुद हे देख लो की वो मेरी जगह तुम्हारे सामने आ बैठा. बहोत प्यार करता है वो.. मैं उमरभर तुम्हारी गुलामी करने को तैयार हु.. जितना पैसा चाहिए वो भी दूंगा.. सबकुछ लेलो.. इन्दर को जाने दो भाई.", शंकर आखिर में अपने आंसू हे न रोक सका जब स्पीकर पर चलते व्यक्ति ने कुछ कहने की बजाये पिस्तौल लोड की. वो स्पष्ट आवाज थी और 2 सांसें घुलती मिलती फ़ोन से इधर आ रही थी.

"डॉक्टर तुम बेहद प्यार करते हो अपने भाई से और ये शायद तुमसे भी ज्यादा जो इतनी बड़ी दिल्ली में भी मुझे तक पहोच गया. इसने व्हीलचेयर पर बैठे हुए इस बेबस आदमी पर गोली चलने की जगह सिर्फ इतना हे पुछा की मैंने इसके भाई की सुपारी क्यों दी. अब तुम सही जवाब देना डॉक्टर क्योंकि गलत जवाब का मतलब मौत हे होगा. दिल मजबूत तोह है न तुम्हारा?", आज शंकर का दिल कटाई भी ऐसा दर्द झेलने के काबिल नहीं था. उसके दोस्त भी करीब आ चुके थे जिन्हे घुटनो पर बैठा शंकर दूर रहने का इशारा करता हुआ फ़ोन को कान से चिपकाए रहा.

"मैंने.. मैंने मतलब शंकर शर्मा ने आपके बेक़सूर बेटे की जान ली. मैंने अनगिनत जाने ली है अपने जीवन में पर वही एक ऐसा था जिसका मुझसे कोई लेना देना नहीं सर. वो मेरी वजह से मारा गया. आप बस आदेश करो, पिस्तौल मेरे भी पास है और मैं इसको कनपटी पर लगा लेता हु. आपको अगर मेरी मौत से हे सुकून मिलेगा तोह फिर ऐसा हे सही. मेरे भाई के माथे से पिस्तौल हटा लीजिये. उसके बचे छोटे है, बीवी बीमार है और मेरे माँ बाप के साथ भी वो ज्यादा नहीं रहा. मैं ख़तम करा हु न खुद को.", शंकर ने भी पिस्तौल को लोड कर लिया था.

"सोचो एक साथ दोनों की मौत से नुक्सान कितना होगा?", शंकर इतना सुन्न कर जड़ हे हो गया था. मतलब वो व्यक्ति नरिंदर को नहीं बक्शने वाला और इधर वो खुद को समाप्त कर लेगा तोह परिवार का क्या होगा.

"तोह उसको जाने दो सर, मैं आता हु आपके पास."

"वह सिर्फ मेरा बीटा हे नहीं मारा था डॉक्टर. नामित हमारा एकमात्र सहारा था जिसकी शादी 2 दिन बाद हे होने वाली थी. शादी.. मेरी बीवी अपने बेटे की लाश देखते हे गिर पड़ी. एक महीना उसने अपने सांस जैसे तैसे संभाले रखे पर होनेवाली बहु ने फंदा लगा लिया न तोह वो बेचारी माँ हो कर कैसे अपना प्यार काम कर सकती थी? सांस रोक लिए उसने भी और मेरी बेटी.. जिसका अथवा महीना चल रहा था, वो अब कभी माँ नहीं बन सकती अपनी संतान खोने के बाद जिसका जनम तक न हो सका. बताओ अब तुम्हारा जवाब सही था डॉक्टर? पर ाचा लगा की काम से काम तुम्हे मेरा बीटा याद तोह था. ऊपरवाला सबका हिसाब इसी जीवन में करता है और तुम्हारा भी होगा, जरूर होगा. उसकी अदालत में तुम बेगुनाह साबित हुए तोह मुझे भी ख़ुशी होगी. अलविदा डॉक्टर.", शंकर कुछ समझ पात उस से पहले हे दूसरी तरफ से जोरदार पटाखे की आवाज सुनाई दी. कुछ पल के लिए जैसे धरती अपनी धुरी पर हे रुक गयी थी जैसे. सबकुछ खामोश हो गया था.

"नहीं नहीं.. इन्दर.. मेरे भाई.. इन्दर..", शंकर दहाड़े मार रहा था और जबतक वो कोई और पागलपन करता सांगवान, मेहुल और परताप ने उसको जकड़ते हुए वो पिस्तौल भी दूर अँधेरे में उछाल दी. निचे गिरे फ़ोन पर कोई बोल रहा था जिस वजह से डरते डरते सुनील ने वो स्पीकर पर कर दिया.

"शंकर मेरे भाई मैं ठीक हु. इन्होने खुद को हे गोली मार ली... देख मैं जानता हु तूने वो सब जानबूझ कर नहीं किया था. अनजाने में हो गया बस. ये अपांग न होता तोह मैंने आते हे गोली मार देनी थी भाई. और इन्होने भी सब सच सुना और मेरे यहाँ आने से पहले हे इनके हाथ में पिस्तौल थी, जैसे ये सोच चुके थे जीवन ख़तम करने का. बस तू अब कुछ मैट सोच, मैं ठीक हु और आ रहा हु वह. इसके पास है क्या कोई?"

"हाँ.. हाँ इन्दर भाई.. मैं, मेहुल और परताप है इधर और सुनील भी है. शंकर हिल नहीं रहा, शायद सदमे से बेहोश हो गया है."

"इसका ध्यान रखना भाई तुम लोग. इसको दौरा पड़ गया है और होश में आते हे बता देना की मैं ठीक हु. शायद इसको याद भी न रहे जो हुआ.. ये दर्द भूल जाता है बस सोने देना, मैं 3 घंटे में पहुँचता हु वह.", नरिंदर ने सोफे के करीब गिरी पिस्तौल उठा कर पतलून में खांसी और उस बुजुर्ग की आँखें बंद करने के बाद चरण स्पर्श करता हुआ बहार निकल चला. उधर शंकर सचमुच शांत घांस पर पड़ा था जिसको तीन लोगो ने उठा कर वही गद्दा बिछा कर उस पर पलट दिया.

"बहनचोद ये सब क्या था बे पंजाबी? शंकर को आज भी दौरे पड़ते है क्या? मैंने तोह 10 साल से नहीं देखा था ऐसा कुछ और आज तोह ये रोया भी बहोत. अगर बावला हो जाता तोह कसम से हम चारो को हे मार देता."

"शंकर घुटने तक देता है भाई जब बात नरिंदर की हो तोह. पर ये कभी भी गलत नहीं करता जितना हम जानते है. कुछ बहोत बड़ी दुर्घटना घाटी है जो नरिंदर बताने से रहा और ये तोह है हे भोला. चल यार परताप, तू घर जा कर आराम कर भाई. हम संभाल लेंगे इसको."

"पंजाबी हु और चुटिया नहीं भाई. यार है अपना और सुख में चाहे न शामिल राहु, दुःख में दामन न छोड़ने वाला. एक काम कर सांगवान, इसका बप चेक कर. कुछ इसके साथ भी बुरा हुआ है कही न कही.", एक इंसान ने आज शंकर को वास्तविकता से परिचित करवा दिया था. उसका वहशीपन, पागलपन सब पृथक करके घुटनो पर ला दिया और करने वाला खुद अपांग था. शंकर की सच्चाई और कबूलनामे को स्वीकार करके उसने माफ़ी तोह दे दी पर एक निर्दोष जीवन के जाने से उसके परिवार पर क्या गुजरती है ये शिक्षा ाचे से सीखा गया था वो इंसान दुनिया छोड़ने से पहले.

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कमरे में लौटने से पहले हे अर्जुन ने बिना कोई परवाह किये बालो का जुड़ा खोलती रेखा को सामने से हे गॉड में उठा लिया. दोनों भारी कूल्हों की तलहटी में पंजे गड़ाए वो इतने आराम से रेखा के गले और कान को चूमता सहलाता हुआ अब जैसे और सबर न कर सका. अपनी हंसी को संभालती रेखा भी दोनों पाँव उसकी कमर में लपेटे उसकी बेसबरी देख उसका हे साथ देने लगी.

"सष्ठ.. पागल हो रहे हो तुम.. बहार कोई देख लेता तोह? और मेरा निघटजोन वही क्यों फेंक दिया?"

"मुझे आपको इसमें हे चलते हुए देखना था. सबर का फल मुझे अब और पसंद नहीं. आप जैसे जैसे कदम बढ़ा रही थी, इनकी थिरकन और लचक अभी तक मेरे जेहन में है. कितनी कमाल की हो आप और अब मैं बस आपको ऐसे हे देखना चाहता हु जब भी हम अकेले हो. उफ़ कितने नरम और गद्देदार हिप्स है आपके. कही कोई रोयं तक नहीं इतने चिकने. चलने पर इनके कटाव की वो थोड़ी थोड़ी झलक और थिरकना.. उम्म्म्म.. मुझे नहीं लगता की आज मैं कोई कण्ट्रोल कर सकूंगा.", होंठो पर लगभग दांत से काट हे लिया था अर्जुन ने. और उसका वर्णन सुन्न ने के साथ हे रेखा उसके हाथो द्वारा अपने भारी कूल्हों की गहराई को उँगलियों से दबा दबा कर फ़ैलाने महसूस करके पानी हो रही थी. अर्जुन की ज़िद्द के साथ उसका खुद भी मैं था हर हसरत को पूरा करना. जमुनी रंग के उस छोटे से परिधान के भीतर न सीने पर कुछ था और न हे कमर के निचे. दरवाजा खोलने के साथ हे उसकी चिटकनी चढ़ा कर अर्जुन ने रेखा को उस बड़े बिस्टेर पर पटकते हे अपनी टीशर्ट और निक्कर एक पल में हे त्याग दी थी. एक घुटना मोड और दूसरा पाँव सीधा किये रेखा खिलखिला कर हंस रही थी अपने बेटे की रफ़्तार देख. अर्जुन की कमर से निचे निगाह पड़ते हे अब रेखा की सांसें भारी हो चली थी. इतनी रौशनी में उसका वो मोटा तगड़ा भुजंग रह रह कर फड़क रहा था जो आजतक के अपने सबसे विशाल स्वरुप में था, रेखा के असर से. जांघो के बीच का baal-rahit पहला हुआ गुलाबी उभर और उसका चीरा देख अर्जुन भी अपनी जगह हे स्थिर रह गया. रेखा के वो अर्धगोलाकार सीने के कलश भी चूचक से ऊपर तक उस रेशमी कपडे से बहार निकले उत्तेजना बढ़ा रहे थे.

"ये.. ये कितनी देर से ऐसा है? उफ़.. कितना सख्त और गरम है ये.", रेखा शब्दों का चुनाव सलीके से करती हुई खिसक कर बीएड के किनारे आ बैठी. अर्जुन का उत्तेजित मूसल, जिस से हर स्त्री और युवती हर मुलाकात में कनपटी थी उसको रेखा ने अपनी नाजुक नरम हथेली से ऐसे दबोच लिया जैसे सपेरा नाग को. सुर्ख सूपड़ा अभी से कॉमर्स से भीगा यथा अधिक फूल चूका था की एक पल को तोह रेखा भी उसके अकार से कुछ हैरत में पड़ गयी. जबकि अर्जुन आँखें मूंदे अपने दोनों हाथ रेखा के रेशमी कंधो पर टिकाये इस स्पर्श से हे अलग नशे में पहुंच चूका था. लम्बे लाल नख और गोरी लम्बी उँगलियों के बावजूद रेखा भी उस मूसल का घेराव पूरा न माप सकीय. सूपड़ा तोह और भी बड़ा था.

"आह्हः.. ये तोह शाम से हे ऐसा है जब मैं इस कमरे में आपके साथ आया था.. आज इसकी गर्मी मुझे हे बेचैन करने लगी है.."

"तुम यहाँ आराम से लेटो, इसकी अकड़न और गर्मी मुझे पर छोड़ दो. ये कितना खूबसूरत है अर्जुन और इसकी ये अलग से महक.", अर्जुन तोह मन्त्रमुद्ध सा उस नरम बिस्टेर पर सीधा पसर गया जिसकी कमर की तरफ घुटने फैलाये बैठी रेखा ने अभी भी उसके लिंग को मजबूती से थमा हुआ था. वो हर हिस्से को पकड़ कर भिन्न भिन्न घेराव माप रही थी. हर बार अर्जुन कसमसा उठता और आखिर में नीची सर्कि खाल के ऊपर स्थित उस गुलाबी कुकरमुत्ते को नरमी से पकड़ कर जब रेखा ने उसके छिद्र के करीब हलके से नाखून से खुरचा तोह अर्जुन जोरो से सिसक उठा. बिना दबाव बनाये रेखा का उसके सुपडे को नाखून से सहलाना अर्जुन को कमर उठाने पर मजबूर कर रहा था.

"ओह्ह्ह्हह्ह. ये क्या कर रही हो आप..? ऐसा पहले तोह कभी नहीं किया.. उम्मम्मम.. आअह्ह्ह्ह..", अर्जुन ने आवेश में सीधा हे रेखा के एक उभार को गले की तरफ से हथेली डालते हुए जकड लिया. उसकी हथेली में बस वो कड़ा निप्पल और सामने का मुलायम हिस्सा हे समां सका पर रेखा ने उसके चेहरे को देखते हुए मुस्कुराकर एक बार सुर्ख सुपडे का पूरा घेराव अपनी गीली जुबान फिर कर छाता और छिदड्रा पर जीभ की नोक से कुछ हरकत करने के बाद समूचा सूपड़ा हे अपने नरम मॉटे होंठो से आगे गीले मुख में भर लिया. लाल लिपस्टिक से सजे होंठ भी अपनी क्षमता तक फैले थे पर रेखा आज अर्जुन से भी ज्यादा कामुक और उत्तेजित थी जिसने अपने आगे बिखरते लम्बे गेसू एक हाथ से पीठ की तरफ से पीछे करते हुए सर थोड़ा और झुका लिया.

"उम्मम्मम्म.. मार दिया आपने तोह .. मजे से.. इतनी मेहरबानी.. पहले पता होता तोह ... आह्ह्ह्हह..", रेखा कंठ में फंसते मोठे सुपडे के बावजूद एक कामुक मुस्कान से अर्जुन को ऐसे निहार रही थी की वो मचल हे उठा. अभी वो पीठ उचका कर उसके स्टैनो को ाचे से मसलने की कोशिश हे कर रहा था की उसकी तरफ वाले अपने खाली हाथ को उसके सीने पर रखती रेखा ने अर्जुन को वापिस चित्त लेता दिया. नाक से कुछ सांस भर कर वो मुख और कंठ को एक सीध में करती इतना झुकी की अर्जुन का वो साढ़े 9 इंची कामदण्ड जड़ तक रेखा के मुख और गले में उतर गया. गोर सुराहीदार गले के बीच से हे सुअपड़े का उभार स्पष्ट दिख रहा था और वो अविश्वास और कमांड इस सुख को अपने भीतर समेटने लगा. मुट्ठियाँ चादर पर कसता हुआ सर पटकने लगा जब रेखा ने उसी मुद्रा को बरकरार रखते हुए आधा लिंग बहार अंदर करना शुरू कर दिया. हर बार लिंग पहले से ज्यादा रेखा के मुखरास में लिप्त ज्यादा चमकने लगता. ऐसा तोह अलका भी नहीं कर सकीय थी और रेखा ने अभी तक एक बार भी पूरा लिंग बहार निकाल कर सांस नहीं ली. अर्जुन उठने की कोशिश करना हे भूल गया जब रेखा ने उसके छाती पर उभरे बाएं सूक्ष्म से चूचक को मुखमैथुन के साथ हे खुरचना शुरू किया.

"सेहन से परे है ये... आअह्ह्ह्हह्ह्ह्हह...", आज वो पहली बार टिहरी मार झेल रहा था जब रेखा ने उसके अंडकोष पर उभरी लकीरे सेहलनि शुरू कर दी. 5 मिनट में हे वो अपने चरम के करीब था और ठीक तभी रेखा उसका समूचा लिंग आजाद करती उसकी बगल पसारती हुई अर्जुन को बाहों में भर कर लिपट गयी. अर्जुन को उसके हे लिंग का रास चखवाती हुई वो बड़ी अधीरता से उसके होंठो को चूमती, चबाती हुई अपनी गोरी गुदाज जांघ से उसके मूसल को दबती, छोड़ती और स्प्रिंग सा जब वो उछलता तोह फिर से दबा देती. न चाहते हुए भी अर्जुन करवट लेता हुआ कस के रेखा से लिपट गया. वो अध्भुत्त मादक जिस्म जिसके हर कानन में एक अलग हे ऊर्जा और kaam-aanand भरा था, उसको जिस्म से जोड़ते हे अर्जुन के साथ रेखा भी सिसक उठी. इतनी मजबूत पकड़ और उसके भीगे सुपडे का अपनी कासी हुई योनि के उभार पर ठोकर मारना जैसे कामदेव का ख़ास बाण था. रेखा ने अपनी मांसल निर्वस्त्र जांघ खुद हे उसके ऊपर चढ़ाते हुए कमर खिसकानी चाहि पर लिंग रगड़ मारता उसकी नाभि पर आ रुका.

"ुह्ह्ह्ह.. बस मैं यही चाहती हु अर्जुन.. आज हर सीमा लांघ कर मेरे रोम रोम में वो प्यार भर दो जो आज से पहले बस आधा अधूरा मिला है. अपनी तिलोत्तमा को इस रात आजाद कर दो.. आह्हः..", और अर्जुन ने भी उठी हे चिकनी जांघ के बीच अपना ऊपर वाला हाथ फिसलाते हुए बहार को निकले उस दूधिया मांसल कूल्हे को कस के दबोच लिया. कूल्हों का कटाव इतना उभरा था की अर्जुन की ऊँगली के तीनो पूरे उस गहराई में उतरने के बाद हे गुदा और रास बहती योनि की निचली दरार को सेहला सके. उनकी नरमी और मांसलता ऐसी थी की अर्जुन ने रेखा का कुल्हा ऊपर खींचते हुए अनामिका ऊँगली का एक तिहाई हिस्सा उस अधखिले गुलाब सी योनि के रसीले छिद्र में उतार दिया. उसके पौरुष पर रेखा मर्डर मिटी थी लेकिन इस हरकत ने तोह कमर और पीठ को धनुष सा तान दिया.

"आज तोह मैं आपका गुलाम हो गया.. आपके जिस्म की ये कस्तूरी से भी उत्तम सुगंध मुझे हमेशा पागल करती रही लेकिन जिस तरह से आपने मुझे वो अध्भुत्त सुख दिया, मैं उतना तोह नहीं पर कोशिश कर सकता हु की साथ निभा सकू. ुमाःह्ह्ह.", दोनों होंठो को ाचे से चूस कर अर्जुन अपने लहराते मूसल के साथ उठ कर रेखा की दोनों गोरी जांघो के दरमियान आ बैठा. घुटनो के गोर कटोरे चूमता हुआ वो उनके आगे का भरा हुआ चिकना मांस सहलाते हुए रेखा की kaam-gaagar के करीब आ रुका. अब रेखा चेहरा पलटने लगी तोह अर्जुन ने सर ना में हिला कर ऐसा करने से मन कर दिया. उस रेशमी वस्त्र को पूरी तरह कमरे से भी आगे सरका कर अर्जुन ने वो दोनों भारी सुडोल जाँघे ऊपर उठाते हे रेखा के घुटने हवा में कर दिए. अपने प्रेमी के सामने इस भरी पूरी रौशनी में इतनी उन्मुक्त तरह से योनि को प्रकट करना रेखा के जिस्म में हजारो चींटियां दौड़ने लगा. टकटकी लगाए उस फूले हुए मखमली उभर को निहारता अर्जुन उस पर झुकने से पहले रेखा को नजर करना नहीं भूला, जिसके चेहरे पर वातानुकूलन में भी हल्का पसीना और लाली आ चुकी थी. इस जिस्म को निहारने के लिए जैसे इतनी रौशनी की भी जरुरत नहीं थी पर आज कुछ भी अन्धकार में नहीं होना था.

"आह्हः.. धीरे धीरे.. उम्म्म आराम से karo..isshhhhhh", अर्जुन ने एक बार ाचे से योनि की महक लेने के बाद बजाये झुकने के रेखा के हे दोनों कूल्हों को पंजो से दबोच ऊपर उठाते हुए योनि को हे मुँह से लगा लिया. लचीले उभरे मांस को रेखा के होंठ समझ कर पीटा वो अपनी जीब से उस घेरि दरार को भी कुरेदने लगा. योनि की अंदरूनी गुलाबी फांको के बीच बेपनाह रस भरा था जो मात्रा थोड़ी सी म्हणत से हे अर्जुन के मुँह में सामने लगा. अब बिस्टेर खींचने की बारी रेखा की थी जो बुरी तरह कसमसाती हुई अर्जुन के जोश के सामने बेबस पड़ने लगी. वो यही पर कहा रुका और न उसकी जीभ का नुकीला हिस्सा. सूक्ष्म फूल सा हलकी सिलवटों वाला गुलाबी गुदाद्वार तक अर्जुन योनि के संग हे कुरेदने लगा. रह रह कर वो रेखा के भारी कूल्हे मसल देता जब भी उसके होंठ फांको के बीच जोर लगते. रेशमी वस्त्र गोरी गठीली टांगो को अर्जुन के कंधे पर टिका देख स्टैनो तक फिसलता इकठ्ठा हो गया. रेखा ने ऐसा कामज्वर अपने जिस्म में आज हे महसूस किया था और वो कुछ हैरान भी थी अपनी निर्लज्जता पर. और भलभला कर अर्जुन के मुँह में हे झड़ने से पहले वो चीख हे उठी.

"मैं नहीं झेल सकती और.. आह्ह्ह्हह माआआ...", लेकिन अर्जुन तोह उस madhur-rass को और भीतर तक साफ़ करने का इरादा किये था. रेखा को कंधे और सर के बल बिस्टेर पर टिकाये वो योनि का कैसा हुआ चीरा होंठो से दाए बाएं रगड़ कर जिव्हा उस गुलाबी छिद्र में हे उतरने लगा. योनि का भगनासा जो कुछ वक़्त पहले लकीर के भीतर हे बंद था, अब उभर कर पतली गुलाबी फांको के साथ खिलने लगा. लगातार वह जीभ की रगड़ से रेखा तुरंत हे फिर से झड़ने लगी. आधा मिनट में 2 बार सखलन उसके लिए भी अविश्वसनीय था पर सिवाए आनंद में सिसकने और मचलने के वो उस मजबूत पकड़ के आगे कुछ न कर सकीय. अंतत में तोह अर्जुन ने कूल्हे के दोनों पत् चौडाते हुए गुदाद्वार भी kaam-ras से सरोबार कर दिया. रेखा का जिस्म धम्म से उस बिस्टेर पर गिरा और फैली हुई टांगो के बीच बैठे अर्जुन के चेहरे पर मुस्कान देख रेखा ने शर्म त्याग कर वो वस्त्र एक झटके में उतार फेंका.

अतुलनीय.. अकल्पनीय.. असाधारण.. बस या अलफ़ाज़ थे अर्जुन के जेहन में उस पल जब श्वेत कैनवास रुपी बिस्टेर पर वो tri-ayaami कलाकृति सी रेखा अपने प्राकृतिक स्वरुप में उसकी आँखों के सामने नजर आयी. बद्र से घने जुल्फ, चमकता हुआ ललाट जहा कही कही महीन पसीने के बिंदु, विलक्षण कटाव लिया चेहरा जहा एक जोड़ी सृष्टि से नयन, सुत्वा हलकी उठी हुई नाक और उसके निचे खिले सुर्ख होंठ.. मजबूत फिसलन भरे कंधो से निचे बेजोड़ और बड़े स्टैनो की ऐसी दुर्लभ जोड़ी जो इस उम्र में भी dugdh-purn और सम्पूर्ण बिना हलकी सी लटकन के. उनका केंद्रे किसी भी मापने की इकाई से एक सामान और वो कड़े और उत्तेजिट चूचक चुम्बकीय ऊर्जा से भरपूर. गोलाइयाँ जहा से उठान लेती वही से पेट भीतर धंसता हुआ एक गहरी नाभि से सुसज्जित.

"ऐसे क्या देख रहे हो?", रेखा ने पीठ ऊपर उठाते हुए अर्जुन के करीब आना चाहा तोह उसने हे हाथ थाम कर रेखा को बिस्टेर से हे उठा लिया. फर्श पर दोनों निर्वस्त्र खड़े एक दूसरे को पूर्ण आसक्ति से निहार रहे थे और अर्जुन का हाथ रेखा के सीन्स से फिसलता हुआ एक गुम्बद पर आके रुका तोह स्टैनो के साथ स्वयं रेखा भी पंजो पर ऊपर उठने लगी. एक हाथ कूल्हे को और दूसरा उस पुष्ट सतांन को मसलता हुआ रेखा को खुद हे उकसा रहा था अगला कदम लेने को. अर्जुन के मुँह से मुँह जोड़ कर अपने नरम हाथ से बुरी तरह तन्नाए लिंग को निचे दबाते हुए रेखा ने अर्जुन को भी कुछ निचे झुका लिया. दोनों कोमल और आपस में सटी जांघो के बीच अब वो मूसल फंसा हुआ ऊपर योनि की गरम वाष्प से मचलने लगा था. अर्जुन अधरों के रास और स्टैनो को सहलाने मसलने में हे खोया था और रेखा ने उचक कर ऊपर उठते लिंग मुंड को उसकी मंज़िल से सत्ता दिया. मोटी नरम फांको के बीच अपने सुपडे को दबता देख अर्जुन ने भी रेखा की उस नितम्भ वाली जांघ को ऊपर उठाते हुए खड़े खड़े हे एक जोरदार झटके में आधा लिंग उस ताप्ती गीली योनि को बुरी तरह फैलते हुए भीतर पेवस्त कर दिया. रेखा जैसे इतने जबरदस्त जवाब के लिए तैयार नहीं थी.

"ुणगगगग... मार डाला.. रुको .. आठ.", पर इतनी देर से सबर करते अर्जुन को तोह जैसे जन्नत की वो राह मिल चुकी थी जहा आगे बढ़ते हुए अब कुछ सुनाई देना बंद हो चूका था. दर्द में सिसकती रेखा ने दोनों हाथो से उसकी गर्दन थाम कर खुदसे हे उसको बढ़ावा दे दिया. दूसरे कूल्हे को ाचे से मसल कर जैसे अर्जुन ने मूक सन्देश दिया की आगे क्या होने वाला है पर उस भयंकर मोटाई से हे अभी रेखा संभालती की उसकी ऊपर होती दूसरी टांग के निचे ब्याह फंसा कर अर्जुन ने पहले पूरा नियंत्रण में लिया और अगले धक्के में रेखा के गर्भ तक का सफर तये कर डाला. इस बार रेखा से रहा न गया जो उसकी कमर से टाँगे लपेटे हवा में झूल रही थी. धक्का खाने के बाद अपने कूल्हे कुछ पीछे खींचते हुए उसने अर्जुन की गर्दन पर 8 उँगलियों के नाखून त्वचा में धंसते हुए कंधे पर भी दांत कस दिए. तिलोत्तमा के गहरे नशे में डूबा अर्जुन तोह इस दर्द में भी अध्भुत मजा ले रहा था. आँखे मूंदे वो रेखा को गॉड में उठाये और लगभग पूरा लिंग उन कासी हुई फांको के बीच घुसाए उस तरफ चल दिया जहा बड़े बड़े कांच की खिड़कियों ने दो तिहाई दिवार को कब्जाया हुआ था. काले आसमान में बार बार चमकती वो बिजलियाँ उसको shwet-jaamuni रंग में भर देती. ठन्डे कांच पर अपनी पीठ लगते हे रेखा सिसक उठी जैसे फिर से होश में आया हो. और बस उस कुदरत के साथ रेखा को निहारता अर्जुन अब एक हे जगह स्थिर बहोत धीरे धीरे अपने लिंग बहार खींचता हुआ अंदर ढकने लगा. दर्द सेहती रेखा ने दोनों हाथ उसके गालो पर टिकते हुए पूरे उन्माद में जीभ चेहरे, होंठ और गर्दन पर फिर कर उसका साथ देने प्रारम्भ किया. वो लाजवाब थी अर्जुन की ताक़त देख, जिस तरह बिना जल्दबाजी किये वो एक जगह स्थिर खड़ा उसके साथ ये prem-sansarg कर रहा था. हर बार हलके धक्के पर रेखा खुद उसको अपनी तरफ खिंच लेती. अर्जुन बस बहार खींचता और रेखा उसको फिर से समां लेती. Prem-taal को बखूबी समझ लिया था उसने और अर्जुन की ताक़त को भी. स्वयं हे अधिक मजे की चाहत में रेखा ने अर्जुन का एक हाथ कूल्हे से हटा कर अपने उभर पर पंहुचा दिया. वो अब क्षमता में भी उसकी संगिनी थी जो अपने भार को खुद समेटे हुए गहरे योनि मंथन में कमर चलती हुई अर्जुन को हर वो सुख दे रही थी जिसकी चाहत लिए वो आया था.

"आअह्ह्ह्ह.. आप यहाँ मेरे साथ भी हो और उधर आसमान में भी.. ऐसा लगता है जैसे ये दोहरा मिलान हो. हमारा प्रतिबिम्ब कुदरत में और इस कमरे के भीतर एकसार हो रहा है. ुह्ह्ह्ह.. अधिक दर्द दिया मैंने?"

"वो विद्युत भी तुम में हे खोयी है अर्जुन और मैं खुद भी.. आअह्ह्ह.. कितना अजीब और सुखदायी है ये सब, एक सपने सा.. आज तुमने आखिर अपनी तिलोत्तमा को पा हे लिया अर्जुन.. मुझे अपनी चाहत के हर सफर पर ले चलो, जैसे चाहो. दर्द के बाद मिलने वाले इस अध्भुत सुख को मैं माँ के रूप में न पा सकीय थी पर आज .. आह्हः.. आज जैसे मेरा दूसरा जनम हुआ है.. इतना पूर्ण मैं आजतक नहीं थी.. उम्म्म्म", आसमान को जी भर के देखने के बाद एक बार फिर वो लबों को चूमती चूसती हुई अर्जुन के साथ और रफ़्तार से आगे बढ़ने लगी. अर्जुन तोह कुछ और हे सोचे बैठा था जिसने बड़ी खिड़की का पल्ला पूरा सरकते हुए बहार बरसती बूंदो और ठंडी हवा को इस कमरे में शामिल करने के बाद रेखा का जिस्म उस 8 इंची बनेरे पर हे टिका दिया. जोखिमभरा कदम था लेकिन इस पागलपन में रेखा स्वयं शामिल थी जहा उसका कमर से आगे का जिस्म बहार बरसते पानी और खुले आसमान में बस गर्दन के निचे हाथ रखे अर्जुन की गिरफ्त में सुरक्षित था. रेखा के स्टैनो को ाचे से चूसता हुआ अर्जुन भी आधे धड़ तक कमरे से बहार था पर उसके धक्के और गहरे हो चले. रेखा और अर्जुन न घर के भीतर थे न पूरी तरह प्रकृति के आगोश में. वो उस सरहद के दोनों तरफ झूलते हुए इस अकल्पनीय मुद्रा में एक दूसरे में समाते हुए बस इस पल को यादगार बना चुके थे. योनि में हर बार 8-9 इंच तक kaam-dand रस में सरोबार डूबता निकलता पर रेखा इसके आनंद को रोकने की जगह खुल कर सीत्कार रही थी. अर्जुन द्वारा उसके मॉटे स्टैनो को चूसना काटना पीड़ा से अधिक मजा दे रहा था. उसका जिस्म झटके लेने लगा जैसे kaam-visphot होने से पहले ईंधन एकत्रित हो रहा हो.

"Aaahhhhhhhhhhhhhhh..", इस चीख को अर्जुन ने भी दिल की गहराई तक मसहूस किया था और उसके लिंग पर बहार से अधिक बरसात योनि रास की. रेखा के पीठ दोनों हाथो में संभाले वो उसको लिए अब वापिस बिस्टेर पर आ पंहुचा. शरीर रह रह का काँपता हुआ और चेहरा बारिश में भीगने से और भी कामुक. वो रेखा से उसका ये पल छीन न नहीं चाहता था इसलिए बस चेहरे को सहलाते हुए वैसे हे रुका रहा.

"उम्म्म्म.. तुम अर्जुन हे हो?", रेखा ने जैसे अदृश्य मदिरा का बड़ा प्याला पिया हो, ऐसी बोझिल और नशीली आँखों से वो अर्जुन को प्रशंसा से देखती हुई बोल उठी. गोरी लम्बी टांगो के बीच अभी तक वो भरी भरकम लिंग पेवस्त था. रेखा को जवाब देने से पहले अर्जुन ने दोनों स्टैनो को प्रेमी के हक़ से दबोच कर मसलते हुए पूरा लिंग बहार निकाल एक झटके में हे भीतर उतार दिया. ये अबतक की सबसे जोरदार ठोकर थी पर पनियाई योनि के साथ मांसल कूल्हों ने हिलते हुए इसको बखूबी झेला. सीने पर दूध बहने लगा था और रेखा की एक गहरी कामुक सीत्कार.

"ये वाला तोह सिर्फ आपका हे है जो आज सम्पूर्ण हुआ. आअह्ह्ह.. मुझे उम्मीद नहीं थी मैं आपके सामने टिक भी सकूंगा. पर आप तोह मुझे अंतरंग मिलान में भी हराना नहीं चाहती, जीवन में जीतने के साथ. मुझे कोई शिकवा नहीं की ये पहले क्यों न हुआ. वो सब रातें जिनमे आप मेरी कल्पनाओं में मेरी संगिनी थी, वो आपने आखिर पूरी कर हे दी. अब मैं भी हारना चाहता हु तिलोत्तमा... आह्हः..", अर्जुन के जवाब पर रेखा जैसे फिर से जी उठी जिसने उसको बाहों में भर कर खूब हे पाँव ऊपर उठा लिए. अब जैसे दोनों तरफ से घनघोर ताक़त और प्रेम का प्रदर्शन शुरू हुआ. स्टैनो को सीने से पिस्ता हुआ अर्जुन उन मोटी उभरी फांको के बीच अब तक के सबसे जोरदार धक्के जड़ रहा था जो उसके जिस्म की क्षमता अनुसार थे. ठप्प ठप्प की आवाज मधुर न हो कर किसी गर्जना सी थी जहा रेखा के कंधे दबाता हुआ वो होंठ गाल ठुड्डी तक चूमता kaat-ta हुआ असाधारण रफ़्तार पर रेखा को रौंदने में जूता था. पर एक वही तोह थी जो इसको झेल सकती थी, खुद में समां सकती थी और अर्जुन की haar-jeet सब उसके नियंत्रण में था. कमरे में अर्जुन की हुंकारे और रेखा की सिसकियों के साथ वो भारी कष्ट से बना बड़ा बिस्टेर तक हिलने लगा. योनि का कसाव लिंग पर बढ़ने लगा था और पसीने में नहाया अर्जुन अधिक उग्र.

"आअनंगगगगगग..", वो इतनी जोरर से गुर्राया था की स्टैनो पर उसकी पकड़ से दुग्ध की धाराएं बौछार सी बरसने लगी जिन पर उसकी मजबूत पकड़ कासी थी. रेखा ने उसके उठते जिस्म को वापिस अपने सीने से जकड कर अर्जुन के साथ हे अपने कॉमर्स का बाँध भी पूरा खोल दिया. गर्भद्वार पर अनगिनत गरम वीर्य की धाराएं बरसता हुआ अर्जुन निस्तेज हो चला. आंखें मूंदे रेखा बस उसको सेहला कर खुद में समेटे रही. बिस्टेर के किनारे से लिंग से भरी योनि महीन सफ़ेद धार फर्श तक पहुँचती रही और अर्जुन का जिस्म अलग हो कर रेखा की बगल में लुढ़कते हे योनि मुख से गधा तरल इतना बहा जैसे 3-4 संसर्ग का जमा अब निकला हो. रेखा के गोर कूल्हे भी योनि की तरह लाल पड़ चुके थे पर खिड़की पर लेटने के बावजूद अर्जुन ने वह खरोंच तक न आने दी थी. रेखा ने एक बार बड़े हे प्यार से आँखें मूंदे हुए अर्जुन को देखा और फिर उसको बिस्टेर पर सही से लेता कर वो बाथरूम में नहाने चली गयी. ऐसा घनघोर संसर्ग स्वयं रेखा के लिए एक यादगार बन चूका था जिसमे उसको खुदके होने तक का एहसास न था. कुछ था तोह 2 आसक्त और bandhan-mukt प्रेमियों का चाहत भरा पागलपन जिसका गवाह ये बिस्टेर था जो अंतिम पालो में अपने स्थान से आधा पौने फ़ीट खिसक चूका था.

'पागल नौसिखिया.. आह्हः.. नौसिखिया नहीं रहा बस पागल जरूर है. क्या हालत करि है पूरे जिस्म की.. इस्सस.. तिलोत्तमा का अर्जुन.. उमाहहह.. शुक्र है सो गया नहीं तोह लग तोह रहा था की आज वो पीछे से भी नहीं बक्शने वाला.', संगमरमर के वाशबेसिन के सामने दर्पण में खुद का निर्वस्त्र बदन साफ़ करती हुई रेखा नहाने के बाद अब कही ज्यादा चमक रही थी. जगह जगह अर्जुन के prem-prahaar अपनी छाप छोड़ चुके थे जिन पर क्रीम लगते हुए हे रेखा सीत्कार उठती. अभी भी उसके खूबसूरत वक्ष अर्जुन को पुकार रहे थे जिनके निप्पल मसलने और चूसे जाने की वजह से सख्त रहने वाले थे कुछ घंटे. कुछ सोच कर रेखा आगे झुकते हुए अपने रसभरे होंठो पर लाली लगाने लगे. इस दृश्य में उसके बहार को निकले हुए गोलाकार कूल्हे बेहद मोहक लग रहे थे जिनके बीच वो गुलाबी फांके बूँद के रूप में गुलाब का आरक फिर से बनाने लगी.

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'अभी सोया रहे तोह हे ठीक है. इतना पागलपन और दीवानगी वो भी मेरे लिए.. उसकी तिलोत्तमा.. हाँ हमारे एकांत में तोह उसने एक बार भी माँ नहीं कहा.. बस अब गले लग कर मैं उसकी बाहों में हे सोना चाहती हु जैसे उसका दिल कह रहा था.', बाथरूम की बत्ती बुझा कर दबे पाँव वो कमरे में दाखिल हुई और वह भी बड़ी रौशनी बंद करके छोटा लैंप जगा दिया. कपडे पहन ने का तोह सवाल हे नहीं था जैसे अर्जुन निर्वस्त्र था. हाथ में 2 सोने की चूड़ियां और चांदी के पायजेब पहने वो बालो को थोड़ा समेत कर सफ़ेद चादर दोनों के ऊपर करके अर्जुन के करीब हे हुई थी और किसी बाज सा वो फिर से रेखा के जिस्म पर पलट गया. रेखा खिलखिलाती हुई करवट के बल हो कर बचने की कोशिश करने लगी थी जिसके चेहरे के निचे एक हाथ फंसा कर दूसरे हाथ से पुष्ट कूल्हों को दबोच अर्जुन ने ऊपर वाला सतांन सीधा मुँह में भर लिया.

"आअह्ह्ह.. सोये नहीं थे? क्या इरादा बनाये लेते थे अबतक?", अर्जुन इतना सुन्न कर सतांन को आजाद करते हुए हलकी भीगी काख का जीभ से चाटने के बाद कूल्हे वाले हाथ को रेखा की गहरी दरार में दबाते हुए सरगोशी करता हुआ कहने लगा.

"एक गहराई में उतरना बाकी है अभी. कहा था न रोम रोम पर मैं मोहर लगा दू तोह बस आपको taro-taja होने का वक़्त दे रहा था. 2 बजे है और अभी एक घंटा अपनी तिलोत्तमा की चाहत पूरी करने में बिताना चाहता हु. आप खुद तैयार हो कर आयी है.", अर्जुन की ऊँगली गुदाद्वार पर लगते हे एक पूरा भीतर दाखिल हो चूका था.

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"इस्सस... पागल.. सुबह माँ पक्का सवाल करेंगी."

"डर लग रहा है?"

"तुमसे सवाल करेंगी जब छुहारे जैसी शकल देखेंगी इतनी मेहनत करने के बाद. मैं यही हु, जाना तुमने है.", रेखा की आँखों में शरारत और होंठो पर लाली देख अर्जुन उन्हें सीधा करता हुआ पूरे जिस्म पर हे आ लेता. कुछ पल वो बस अपनी तरफ देखते चेहरे को निहारता रहा और रेखा ने हे पलके झपकते हुए सहमति भर दी.

"इस बार और कोई निशाँ नहीं दूंगा."

"मुझे हर तरफ चाहिए हो तब भी? गले से निचे जहा दिल करे जितना दिल करे. सुबह तुम जा चुके होंगे जब मैं उठूंगी. इसके बाद मैं सोना चाहती हु अर्जुन, तुम्हारे बाहों में चाहे कुछ देर हे सही."

"जरूर. फिर यहाँ से जाने के बाद हे मिलेंगे."

"तभी कहा निशाँ देने और कुछ पल अपने सीने पर सुलाने के लिए.", एक बार फिर दोनों के होंठ आपस में जुड़ गए.
 
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