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पागलपन और चाहत (2)
दोनों हलके भीगे और उखड़ी सांसें सँभालते हुए घर में दाखिल हुए तोह असामान्य रूप से वह अब कोई भी न दिखा. वीसीआर बंद था और उसके साथ हे रसोईघर भी अँधेरे में डूबा. दोनों no हॉल में जलती मद्दिम रौशनी में एक दूजे को देखा था किवाड़ की आउट लेते हुए बारिश की हलकी बूंदो से नम्म चेहरे करीब आये और एक बार फिर अलका ने हे अपने होंठो को अर्जुन के लबों से मिला दिया. सांस सुधरने का ये तोह कुछ अनोखा हे तरीका था जो जल्द समाप्त हुआ और बड़े दरवाजो को भीतर से हे चिटकनी लगते हुए अर्जुन ने अपनी टीशर्ट उतर कर हाथ में ली तोह बस अलका उसकी नजरो के सामने अल्हड बाघिन सी मटकती हुई अपनी हंसाया के कमरे में दाखिल हो गयी, एक बार देहलीज से चेहरा बहार निकाल कर हवाई चुम्बन अर्जुन की तरफ़ा फेंकती.
'आह्हः.. काश वक़्त बस यही थम्म जाए और इस वन्न से बहार मैं कभी न निकल सकू.', अपनी हे सोच पर खुद के सर पर थपकी मारता हुआ वो बेआवाज कदमो से उन बड़ी सीढ़ियों की गिनती करता हुआ आ पंहुचा अपनी रात की रानी के द्वार. रेखा उर्फ़ तिलोत्तमा आखिर थी भी तोह वैसी हे महकती हुई एक लम्बी श्वेत फूलो से भरी रात की रानी की बैल सी. दिन में उसकी सुगंध से अधिक ध्यान गंतत्व की तरफ जाता था पर दिन ढलने पर अगर सही तलाश लिए भंवरा रुपी सर्प उस बेजोड़ सुगंध के नशे में इस लहराती संगिनी से लिपटने की आस में क़ुर्बान होने तक से न चुके. आज से पहले सिर्फ एक बार वो भी आखिरी मिलान पर हे अर्जुन ने देखा था की उसकी माँ अंतरंग समय में अब स्पर्श के बदले स्पर्श से जवाब देने लगी है. पर अब ये घर से बहार दो प्रेमियों का ऐसा मिलना था जिसमे दोनों जैसे अनगिनत बार आँख मिचोली खेल कर इस रिश्ते को ठहराव देने की सोच चुके थे. हाँ रेखा ने हे तोह बुलाया था अर्जुन को यहाँ और उनका मिलना उन्मुक्त था उतने हे मीठे नमकीन nok-jhonk भरे प्यारे पालो के साथ. अब सूक्ष्म पालो से अधिक की हसरत और चाहत लिए ये पागल अपनी तिलोत्तमा के द्वार पर हलकी से दस्तक देता बाल संवार रहा था. अर्जुन एकदम से अपने आप को सुधार रहा था जैसे वो अपनी इस प्रेमिका के वजूद के सामने 19 नहीं रहना चाहता था. रेखा का प्रभाव था हे ऐसा जहा कोमल ने हमेशा अर्जुन के सामने खुद को प्रस्तुत किया था वही ऋतू उसको बराबर टक्कर देती साथ में होश खोने लगती थी. रेखा.. वो कैसे हावी हो सकती है अर्जुन पर? आजतक तोह बस रेखा ने अर्जुन को समेटा हे था और वो प्रभावित थी उसके द्वारा हर कानन टटोलने पर. पर आज ऐसा नहीं था जो अर्जुन का दिल उसको अनिगिनत बार समझा चूका था. आज ये उनका एकांत था और तड़प दोनों तरफ ऐसी की उसकी आग में इस्पात पिघल जाए.
"ाचे लग रहे हो पर मुझे नहीं लगता की ये एक ाचा तरीका है निचली मंज़िल से हे सीना उघाड़े आना. पहली सीढ़ी के बाद सत्रह (17) कदम हुए होंगे?", दरवाजे के पीछे जिस्म छुपाये जिस तरह चेहरा बहार निकले रेखा ने अर्जुन का स्वागत किया था वो बस उस चेहरे की आकर्षक बनावट, घनी लम्बी पलकों और उस से भी ज्यादा आकर्षक हजारो sawaal-jawaab करती आँखों में खो सा गया. तन्द्रा टूटी जब खुदको अभी भी बाल संवारते और रेखा को मुस्कुराते पाया. भीतर आज मद्दिम रौशनी की जगह झूमर प्रज्वलित था जिसके चमकदार टुकड़े जैसे सितारों की बारिश सी करते लगे रेखा के चेहरे और सामने समेटे लम्बे बालो पर.
"मन के तुम... हो बेहद हसीं.. ऐसे बुरे.. हम भी नहीं..!", अर्जुन ने आहिस्ता से हे ये गीत गुनगुनाया था और वो उतनी हे जगह से कक्ष के भीतर दाखिल होता हुआ बिना रेखा के बदन का अवलोकन किये बिना उसके किवाड़ पर जमे हाथ की कलाई पकड़ कर अपने सीने से लगाए खड़ा हो गया. सवा 6 फ़ीट का ये युवक रेखा का हे तोह अंश था फिर रेखा की तुलना कैसे हो सकती थी. आज नजरे झुकी नहीं थी, उठी और अपनी पीठ से हे रेखा ने द्वार बंद कर दिया. अर्जुन को इतनी ताक़त का एहसास नहीं था जिस तरह से कलाई उसके बस में थी पर रेखा उसको फिर भी खींच कर दरवाजे संग चिपकी एक कशिश से निहारने लगी.
"बुरे तोह हो तुम और नौसिखिये भी.. हाहाहा.. मेरी माँ ठीक निचे वाले कमरे में है और तुम उसकी बेटी के कमरे में वो भी उनके घर. भारी पड़ सकता है तुम्हे.", अर्जुन की धड़कने असामान्य होने लगी थी क्योंकि आज उसकी गिरफ्त में सीने से लगी ये रेखा शर्मा आज से पहले नहीं दिखी थी. इतनी चंचलता और ऐसी बेबाकी तोह स्वयं ऋतू में न थी. लफ्ज़ जुबान पर तब आते जब वो इस आकर्षण से बहार निकल सकता. एक पल में हे जैसे वो निरस्त्र हो चूका था.
"हो न तुम नौसिखिये? हाहाहा.. टूटे खिलोने से मानना चाहते हो?", अर्जुन सिहर हे उठा जब रेखा ने अपने आजाद हाथ की उँगलियों से उसकी गर्दन को मात्रा सहलाते हुए उस के चेहरे को खुद की और हे झुका लिया.
"आखिर आप.. आप हो कौन?", अर्जुन उस अदृश्य पाश से निकलने की कोशिश में अंदाजन हे रेखा की कमर को थाम कर उसके माथे पर माथा टिकाये आँखे मूंदे निवेदन हे कर उठा. ये महक.. ये भीनी मदहोश करती महक उसके नथुनों से भीतर समाहित होती जैसे रक्त में मिलने लगी. आजाद होने की जगह अर्जुन उस नाग की तरह raani-beil से लिपट चूका था. हालत रेखा की भी कुछ कमतर न थी जिसके चेहरे पर अर्जुन चेहरा टिकाये उसके सीने को अपनी चौड़ी छाती की उठान से दबाये खड़ा था.
"उन्न्नध्ह.. तिलोत्तमा.. अर्जुन पर आसक्त उसकी तिलोत्तमा जो दिन के उजालो में उसकी हो न सकीय पर एक वही तोह था जो उसके पूर्ण स्वरुप को देख पाया था. तुम कमतर नहीं हो अर्जुन और न मैं कोई अप्सरा.", अब रेखा खुद अपने जिस्म में एक अध्भुत्त कम्पन्न महसूस करने लगी थी और अपनी गोलाकार ठुड्डी उचका कर उसने सवाल पूछने की कोशिश करते अर्जुन के गीले होंठो से अपने सुर्ख होंठ जोड़ दिए. आह्ह्ह्हह... कितना स्वर्गिक अनुभव था वो जहा मरणसँ विशाल अश्व ने जैसे अमृत चख लिया हो. और ये प्रगाढ़ चुम्बन यही न रुका. अर्जुन का वो हाथ जिस से उसने रेखा की कलाई जकड़ी थी अब उसकी हे पीठ से लगा था और धीमे धीमे दोनों एकसार चलते हुए उस नरम बिस्टेर पर 2 आपस में जुड़े पुष्प से जा गिरे.. अर्जुन के मुख से निकली आह रेखा के कंठ में उतर कर विलीन हो गयी. उसके सीने पर वो मखमल को चुनौती देता अध्भुत्त जिस्म छाया हुआ था जो प्रतिद्वंदी से अधिक एक ऐसा प्रेम था जिसका वर्णन दुर्लभ और एहसास कल्पना से परे. आज रेखा ने पहल की थी और जिस कदर कामुकता से उसने दोनों होंठो से रास खिंचा था अर्जुन ने अपनी जिव्हा भी उसके हवाले कर दी. अर्जुन के सीने और कंधे पर फैले रेखा के गेसू उसका समर्पण हे था. ये चुम्बन भी अर्जुन के कांपने पर रुका और स्थिति का भान होते हे मानिंद आँखें खोल वो अपने ऊपर झुकी रेखा को निहारने लगा. जिस्म पर एकमात्र वस्त्र वही जमुनी छोटा सा परिधान था जिसकी फिसलन रेखा के जिस्म से मेल खाती पानी की बूँद सी थी.
"नीचे मेरी बहने भी है!", अर्जुन ने बस यही कहा था और रेखा उसको बाहों में भर कर मस्ती से किसी नवयुवती की तरह नाक से नाक रगड़ती मुस्कुराने लगी.
"तुम्हारा पागलपन मुझे भी अपनी हड्डी तोड़ने पर मजबूर कर गया अर्जुन. और सच कहु तोह इस से बेहतर एहसास और कोई नहीं. शायद इसलिए हे कमजोर समाज ने इस पर बंदिशे लगाईं होंगी. मुझे लगता है जैसे मैं आज प्रेम को समझ सकीय हु और चाहती हु तुम जीवनभर मुझे ये समझते रहो.", अर्जुन अब मुस्कुराने लगा था और नजरे चुराती रेखा अपनी स्थिति का भान होते हे नीचे सरकने लगी तोह उसके दोनों पुष्ट नितम्बो पर हथेलिया टिका कर अर्जुन ने वही रोक लिया. अब बारी रेखा की थी सिहरने की क्योंकि अर्जुन ने उन्हें थामने के साथ हे बहोत सा नरम मांस पंजो में क़ैद करते हुए अपने लिंग पर उसका पेडू दबा लिया था.
"तिलोत्तमा अर्जुन की कैसे हुई? उसको देखना तोह स्वयं उसको बनाने वाले के बस का नहीं था. शंकर जी के नेत्र पारवती जी ने स्वयं बंद कर दिए थे बस तिलोत्तमा के वह होने के एहसास भर से. जिसकी ख़ूबसूरती और लावण्या की परिभाषा हे नहीं थी और स्वयं देवराज भी जिसको पा न सके तोह कैसे वो साधारण से अर्जुन की हुई? वो सब पढ़ने के बाद मुझे भी लगता है की आप पर किसी का भी अधिकार नहीं हो सकता. मैं तोह बस prem-dor में खिंचा आता हु और सब काल्पनिक लगता है जब आँख खुलती है. आपसे खूबसूरत न आपका अंश है न आपकी जननी. मैं इतने में हे संतुष्ट हु की आज स्वयं मेरे करीब आयी."
"ऐसे प्रेम ने हे तोह तब तिलोत्तमा को उसके स्त्री होने का एहसास करवाया था अर्जुन जब वो थक चुकी थी अपनी हे छवि और अकेलेपन से. स्वयं शिव से द्वन्द के बाद lahu-luhaan अर्जुन के घुटने न ठीके तोह उसको वो सब मिला जो शिव का था, उनकी ख़ुशी से. Pashupat-astra के साथ विजय नाम एक वरदान था भविष्य में विजय को खंडित करने के लिए. अमरावती में स्वयं देवराज ने अर्जुन को सर्वस्व सौंपना चाहा जिस से इंकार करके वो उन्हें pita-samman देता हुआ उद्यान में आया तोह पहली बार तिलोत्तमा ने महसूस किया की बस यही है जिसमे पाने की हसरत से ज्यादा देने की हिम्मत और समर्पण है. ईर्ष्या से Rambha-Menaka भी कुंठित होती चली गयी जिन्हे अर्जुन ने तिलोत्तमा के सम्मुख नजर तक न किया. वो शर्मायी और हैरान भी हुई की कैसे ये शक्श उसको देख प् रहा है और वो ये बदलाव कैसे महसूस कर प् रही है किसी साधारण मनुष्य सामान. प्रेम का एक कटरा भी सब बदल देता है जैसे एकाकी तिलोत्तमा बदल गयी. वो जीवन तोह बस अर्जुन की चाहत में बीता, उसके समरण और दूर दूर से अवलोकन करके. प्रेम ऐसा हे तोह होता है जिसमे हांसिल से अधिक एहसास का महत्व हो.", रेखा अब पुनः अर्जुन की सबसे बेहतर शिक्षक बन चुकी थी और उसके निचे लेता अर्जुन शिष्य.
"आपने तोह कहा था के तिलोत्तमा अर्जुन की हुई थी? और मुझे इसके बारे में भी नहीं पता था जो आपने बताया है. हाँ थोड़ा बहोत पता है की शिव जी और अर्जुन में न्यास हे द्वन्द हो गया था जिसमे अर्जुन ने उनका धनुष काट दिया था और उसके बाद तलवार से शिव जी ने अनेको घाव बनाये थे उसके जिस्म पर वो न हरा और न रुका. Pashupat-astra मेघनाद के बाद सिर्फ अर्जुन को हे उनसे हांसिल हुआ था."
"3 पीढ़ी बाद. दोनों मिले थे और फिर वो एकसाथ जिए भी. नौसिखिये हो न तुम..? चलो कुछ दिखती हु तुम्हे जो मैंने आज ढूंढा पर तुम कोई आवाज मैट करना और न हे ये राज किसी को जाहिर करना. ऋतू को भी नहीं.", रेखा तुरंत किसी अल्हड लड़की की तरह अर्जुन के ऊपर से उठ कर अलमारी की तरफ लपकी. कूल्हों से कंधे तक हे तोह वो रेशमी वस्त्र था जिसमे उसके वो अध्भुत्त कटाव और जिस्म का हर उतार चढ़ाव सपष्ट था. जल्द हे वो असाधारण जिस्म एक लम्बे गहरे लबादे में छुप गया. रेखा ने अर्जुन की तरफ भी एक कमीज फेंकी और कुछ चाबियों के साथ बैटरी लिए वो प्रतीक्षा करने लगी अर्जुन के तैयार होने की.
"हम इतनी रात में जा कहा रहे है? और निचे ऋतू दीदी जागती मिली तोह?", अर्जुन तैयार था बस कुछ सवालों के साथ.
"नौसिखिये हमेशा बहार से खोजबीन करते है पर उन्हें पहले अपने भीतर तोह लेनी चाहिए. वो दिन भर बहार की ख़ूबसूरती देखने में व्यस्त रही है और जिस काम पे तुमने लगाया था शायद उस तरफ ध्यान गया नहीं, निश्चिन्त थी न वो क्योंकि समय बहोत है 7 दिन. गलियारे एक आखिर में भी एक रास्ता है जो पीछे निकलता है. बस नंगे पाँव चलना और कोई आवाज नहीं.", दरवाजा सावधानी से खोलने से पहले रेखा ने अपनी जुल्फों को समेत कर एक ढीले जुड़े का स्वरुप दिया और अर्जुन हैरत से चुपचाप पीछे चल दिया. ऊपर की इस मंज़िल पर आगे वाले सभी कमरों पर टाला हे ज्यादा था और अंत में एक सीढ़ी ऊपर जाती थी और दूसरी नीचे. यहाँ इतनी ख़ामोशी थी की दोनों एक दूसरे की सांसें तक सुन्न रहे थे. जल्द हे हे वो bhoo-tal पर उस छोटे दरवाजे के सामने खड़े थे जहा टाला ज्यादा था. रेखा जैसे अँधेरे की अभ्यस्त थी और बस एक बार टाला और गुच्छे की वो चाबी देखने के बाद उसने रौशनी बंद कर दी. अब दोनों हे बहार खुले आसमान टेल थे जहा जोरदार बारिश की जगह बस हलकी बूंदे हे इधर उधर गिरती महसूस हुई. कुत्ते भी आसपास नहीं थे और इनसे 50 गज दूर वो 2 कमरे में भी अँधेरे में डूबे थे जहा कुंती रहने लगी थी.
"वो नानी और पड़ नानी की आरामगाह थी. हमे वही जाना है.", रेखा ने कान में सरगोशी की तोह वो उन्नत उभारो का मात्रा छूना हे अर्जुन के पाजामे के भीतर हलचल मचा गया.
"आठ.. हाँ.. चलिए.", वो बेचैन सा होने लगा था और आज वो सचमुच खुदको नौसिखियाँ मान गया जब उसकी माँ ने ऋतू और उसकी मंशा ऐसे खोल कर रख दी थी. पर वो ढून्ढ क्या रही थी ये उन्होंने भी नहीं बताया था. ये एक मंजिला इमारत बहार से बिलकुल बेजान सुनसान थी जिसके द्वार पर झूलते मॉटे ताले को एक लम्बी चाबी से खोल कर रेखा ने किवाड़ खुलने तक की आवाज न होने दी. भीतर जैसे हवा रुकी सी जान पड़ी, बरसो से बंद जो थी ये जगह आज से पहले. अब बैटरी की पीली रौशनी चालू करते हुए रेखा ने दरवाजा ाचे से बंद करने के बाद अर्जुन का हाथ थाम लिया.
"अब बोल सकते हो तुम जैसे चाहो. देखो ये जगह कितनी खूबसूरत है और पूरी लकड़ी से बानी. फर्श, ये बिस्टेर .. उधर देखो.. वो मेरे नाना नानी जी की तस्वीर. नानी का नाम महिमा देवी था और ये बिलकुल माँ के हे जैसी लगती है.", अर्जुन भी रेखा से सत् कर बड़े ध्यान से उस कलाकृति को देखने लगा जहा दोनों पति पत्नी बड़े आकर्षक दिख रहे थे. अर्जुन और रेखा ने पेंटिंग से नजरे हटाई तोह फिर से नजरे एकाकार हुई जहा अर्जुन ने हे उत्सुकता से अपने सामान झुकी हुई रेखा के लबों को चूमने के साथ एक उभार को थाम लिया.
"उफ़.. सबर तोह है हे नहीं तुम में. पहले वो तोह देख लो जिसके लिए यहाँ आएं है.", रेखा को भी ऐसा बेसब्रपन पसंद आया पर वो स्थिति की समझ बेहतर रख रही थी. अर्जुन का हाथ हटा कर खुद भी हल्का चुम्बन देने के बाद वो इसके बगल वाले कक्ष में दाखिल हो गयी. इधर भी एक बिस्टेर और कुछ कुर्सियां हे सजी थी, खिड़की पर गहरे परदे जिस से बहार की रौशनी भीतर आना हे मुमकिन न था.
"ये सामने जो पेंटिंग है न वो माँ की नानी है अनाहिता जी. ये सब इन्ही की जायदाद थी या इनके नाम थी किसी वजह से. तुमने ये चेहरा पहले देखा है कही?", वो सचमुच एक रानी हे लगती थी और महिमा जी से भी खूबसूरत पर शायद ये अर्जुन की तलाश नहीं थी. उसकी नजरो में विफलता देख कर रेखा ने हे उसको अपने सीने से लगा लिया.
"तुम जिसको खोज रहे हो, वो भी यही है पर कहा था न के तिलोत्तमा ऐसे नहीं दिखती. ये कुर्सी हटाओ और उसके नीचे का कालीन भी.", अर्जुन हैरान था जैसे उसकी माँ ने ये उपहार उसके लिए हे तैयार रखा हो. अब उसके हाथ और कदम अपनी क्षमता अनुरूप चल रहे थे. लकड़ी के फर्श पर ये 4क्ष4 का पल्ला था जिसको खोल कर नीचे गर्भ में जा सकते थे.
"आपने ये कैसे ढूंढा?"
"इतनी बड़ी जगह में बस एक यही कालीन अलग और छोटा था. इतना दिमाग तोह है मुझमे की जो अलग दिखे उसकी जांच कर सकू. तुम उतरो, मैं टोर्च दिखती हु.", अर्जुन गदगद था अपनी माँ के जवाब और दिमाग पर. उस दरवाजे को उलट कर फर्श के दूसरी और हे टिका दिया. ये लकड़ी की सीढिया आज भी खासी मजबूत थी जिन्हे पार करता अर्जुन जब नीचे आया तोह जैसे यहाँ वो हलकी ठंडक और हवा महसूस कर प् रहा था. पर सब तरफ अँधेरा था और ऊपर देखने पर अपनी माँ को कुशलता से सीढ़ियां उतारते पाया. अंतिम सीढ़ी पर उनका पाँव पड़ने से पहले हे अर्जुन ने पीछे से उन्हें अपनी बाहों में उठा लिया. दुनिया से परे इस तहखाने में वो कुछ पल तक उन्हें अपनी बाहों में भर कर जिस्म से लगाए पीठ और गाल पर चूमता हे रहा. अचानक से उस पर कामुकता अत्याधिक हावी हो उठी जिस पर हँसते हुए रेखा ने पहले तोह अपने मादक कूल्हों को हे उसके उठान पर ाचे से रगड़ा और फिर खिलखिलाती हुई उसकी पकड़ से दूर आ कड़ी हुई.
"तुम पूरे पागल हो तुम्हे शायद पता नहीं. पहले जिस काम से आये है वो तोह कर ले, सुबह होने में तोह अभी साढ़े 4 घंटे बाकी है. उम्माह..", अर्जुन को प्यार से पकड़ कर फिर से हल्का सा चुम्बन जड़ कर जैसे उन्होंने उसकी उत्तेजना बाँध दी.
"सॉरी. पता नहीं बस कण्ट्रोल नहीं हो रहा जब से आपके साथ हु. और ये जगह मैं को कुछ ज्यादा हे भा रही है जैसे इसके हर कानन में आपका हे समावेश हो.", रेखा ने एक तरफ चलते हुए पलट कर देखा और मुस्कुराते हुए वो खटका दबा दिया. एकदम से तहखाने में भरपूर दूधिया उजाला फ़ैल उठा. ये जगह ऊपर की तरह उतनी साफ़ नहीं थी पर कही कोई मिटटी या गंदगी भी नहीं. बस कुछ जले लगे थे छत और दिवार के जोड़ो पर. इधर बस कुछ बंद संदूक, एक लकड़ी का बड़ा हे मेज जो जाने यहाँ कैसे लाया गया होगा क्योंकि आने का रास्ता तोह 4क्ष4 फ़ीट का हे था. पर दीवारों पर 3 बड़ी चित्र लटक रहे थे लकड़ी के फ्रेम वाले. अर्जुन के कदम स्वतः हे उस और चल उठे. अब उसकी धड़कन जैसे फिर से बढ़ने लगी थी क्योंकि ये पहली हे पेंटिंग उसको अपनी हे तरफ खींचती महसूस हुई. कमल पुष्प पर झुकती वो रूपवती यौवना अर्जुन को सम्मोहित कर चुकी थी जिस पर हाथ फेरते हुए बस वो इतना हे कह सका.
"देवी Anuradha..Uff.."
"तिलोत्तमा.. अनाहिता की बड़ी बहिन और मेरी पड़ नानी. होश उड़द गए न इनकी ख़ूबसूरती देख कर? ये तब 16 बरस की हुई थी, उनकी आखिरी तस्वीर होगी शायद.", रेखा भी अर्जुन की बगल में कड़ी अपने हे जवान प्रतिबिम्ब को निहार रही थी. आँखों में प्रशंशा के भाव और एक सुकून.
"ये तिलोत्तमा नहीं है माँ.. यही तोह पंडित मोतीलाल जी की माता जी है. देवी अनुराधा और इनकी hu-ba-hu वैसी हे पेंटिंग जैसी आप कॉलेज में दिखती थी वह महल में भी थी जिसको सभी देवी बुलाते है पर कोई उनके बारे में जानता नहीं. ये नानी की बड़ी नानी थी जो 16 बरस की उम्र में मृत्यु को प्राप्त हुई तोह फिर कैसे इनका वजूद Anuradha/Devi के रूप में अगले 5-6 साल तक बरकरार रहा.? स्वयं पंडित जी को उनकी माँ का बस इतना हे स्वरुप याद रहा और वो 4 बरस के थे जब उनकी माँ का देहावसान हुआ. ऐसा लगता है जैसे ये हमे देख रही हो.", अब बारी रेखा की थी ताज्जुब में पड़ने की.
"मतलब.. मतलब ये संपत्ति अनाहिता की थी हे नहीं बस वो संरक्षक थी इसकी. वो फिर विवाहित भी किसी raaj-gharane में हुई थी लेकिन देश से बहार. पर ये कैसे मुमकिन है जब माँ ने खुद हे बताया था की तिलोत्तमा .."
"उन्होंने जो बताया वो उन्हें बताया गया था. 16 बरस की उम्र में जब तिलोत्तमा उर्फ़ अनुराधा देवी मौजूद हे नहीं थी तोह उनकी छोटी बहिन तोह तब कुंवारी हे होंगी. मैं सही सोच रहा था जब मैंने इनकी तस्वीर वह देखि और रानी सौंदर्य जी का आपको देख कर असहज होना. जानती हो माँ, ये भी आपके हे जैसी थी. अकेले हे गर्भवती होने के बावजूद 4 तांत्रिको को जहन्नुम पंहुचा दिया था इन्होने. इनके पति कहने को तोह जुगलाल जी थे पर वो इंसान तोह हरगिज़ नहीं थे और न हे उनका वो राजा मित्र या भाई भूपेंद्र सिंह. जुगलाल जी के साथ न हे पंडित लिखा मिला कही और न हे सिंह. पर वो दोषी थे इनकी मृत्यु के. आपने इन संदूक को खोल कर chhaan-bin की क्या माँ? मुझे लगता है की सब राज इधर हे बंद है."
"इनकी चाबी ढूंढ़नी पड़ेगी अर्जुन और रात में ताले तोडना ठीक नहीं. मैं इधर हे हु और यकीन करो इस बार तुम्हारे सवालों के जवाब मैं खोज कर रहूंगी. वैसे थी तोह बहोत हे दक्ष और हिम्मतवाली. इनके साथ बहोत हे बुरा हुआ होगा जिस वजह से इनका अस्तित्व या तोह रहा नहीं और जो रहा वो टालो में इतना गहरा दफ़न है की कोई पहुंच न सका. देखो कैसे अपने कंधे पर कला झबरैला श्वान उठाये है जो खुश जान पड़ता है.", अगले बड़े चित्र में अनुराधा उर्फ़ तिलोत्तमा का अलग हे स्वरुप था जहा वो पतलून कमीज पहने उस श्वान को एक कंधे पर लटकाये थी. इतनी मोहक मुस्कान जिस पर वो जीव भी फ़िदा था.
"ये भेड़िया है माँ और आप स्वयं हे देखिये की कितनी निर्भीक रही होंगी अपने समय में समय से भी आगे. शायद purush-pradhaan समाज और शाही घराना तक इनसे ट्रस्ट रहा होगा. आदत नहीं है न उन्हें इतनी क्षमता वाली महिला के सामने घुटने टेकने की. और ये दोनों बहनो की एक साथ वाली तस्वीर. एक तरह से तोह जैसे ये अपनी छोटी बहिन के लिए भाई हे रही होंगी. अध्भुत्त.. माँ, आपको अब मेरा साथ देना हे होगा. आखिर अब सवाल हमारी तिलोत्तमा के अतीत से भी जुड़ा है.", पीछे से अपनी माँ की कमर को घेरे में भरते हुए अर्जुन ने अपना चेहरा उनके कंधे पर रख लिया.
"तुम्हारी तिलोत्तमा का. मुझे तोह खुद अजीब सा लग रहा है ये सब तुम्हारे से जान ने के बाद. कितना खतरा था वह जहा तुम घबराये हुए थे?"
"इतना की आप मेरे साथ न होती तोह मैं ज़िंदा ..."
"शठ.. इस बार तुम्हे कुछ नहीं होगा अर्जुन.. अतीत में जो भी हुआ हो.. मामला मुझे अधूरे प्रेम का हे लगता है लेकिन इस बार कोई बलि नहीं चढ़ेगा समाज के हाथो. चलो अब यहाँ से चलते है कही मेरे विचार न बदल जाए एक ख़ास रात तुम्हारे साथ बिताने के. फिर तुम तोह 3 हफ्ते मिलने नहीं वाले."
"मैं हर रात दिवार फांद के आ सकता हु, बस कह कर देखिये."
"वो भी कभी करेंगे पर होश अकेले में भूलने है, बहार नहीं. उम्म्म्म", अर्जुन ने जिस तरह से दोनों बाहों में उन्हें उठाया था रेखा ने हे उसकी गर्दन में ब्याह दाल कर अपना चेहरा उसके होंठो से जोड़ लिया. चलते चलते वो इस प्रगाढ़ चुम्बन में तल्लीनता से डूबे रहे. एक बार फिर तहखाना अंधकार में डूब चूका था और ऊपर की मंज़िल फिर से ताले से बंद. जरुरत के जवाब तोह फिलहाल दोनों को मिल चुके थे और बाकी जिम्मा अब रेखा ने अपने कंधो पर ले लिया था, अर्जुन का बोझ काम करते हुए.
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"शंकर से बात करवाना मेहुल भाई.", फार्महाउस पर रखा बेतार फ़ोन बजते हे गुलाटी ने जाम एक तरफ रखते हुए सामने वाले की आवाज सुनते हे फ़ोन शंकर की तरफ बढ़ा दिया जो ज़िंदा बचे हमलावर का सर पानी में डुबोये अपना पाँव उसके ऊपर रखे था.
"कौन है."
"नरिंदर भाई है.", शंकर ने तुरंत हे पाँव हटा लिया फ़ोन लेने के साथ. वो खून से लथपथ हमलावर बुरी तरह से हांफ रहा था जिसके चेहरे पर तक़रीबन दर्जन भर महीन गहरे घाव शंकर बना चूका था.
"हाँ इन्दर इतनी रात को और तुझे पता था मैं यहाँ मिलूंगा?"
"अमली के दो ठिकाने, या ठेके या थाने. कर हे ला तुमने अपनी मनमानी भाई? और तुझे कुछ हो जाता तोह मेरा क्या होता? एक रात और वो भी सिर्फ कुछ घंटे कहा था तुझे आराम से घर रहने के लिए पर नहीं तू तोह बेलगाम हो जाता है अगर मैं तेरे से थोड़ा दूर राहु तोह.", नरिदर इस वक़्त किसी बड़े घर में बैठा वही से फ़ोन मिलाये था. चेहरा पर चिंता की जगह भाई की लिए परवाह और प्रेम था बस.
"हाँ बाद में पता लगा के तू सही कह रहा था. वो दीपक थोड़ा जख्मी हो गया पर ये पंजाबी ज़िंदा है साला, गांड में दूसरा सुराख बन गया इसकी.", शंकर के मजाक पर इधर गुलाटी उसके जांघ पर थपकी मारने लगा और उधर सांगवान ज़िप खोल कर उस हाँफते हमलावर के चेहरे पर mutra-visarjan हे करने लगा था जिसको देख कर सुनील बेचारे ने तोह नजरे हे हटा ली पर डॉ परताप ठहाके लगा रहा था.
"इस बात से हे तोह डर लगता है भाई क्योंकि तेरा दिमाग न do-tarfa है. एक जहा तू बस ठान लेता है और दूसरा तुझे फिर गलती का एहसास तोह हो जाता है पर तू उसके बाद अगली गलती के लिए जगह तैयार रखता है. वैसे जानता है तुझ पर हुम्ला किसने और क्यों करवाया? और जो चीख रहा है उस माँ के लाडले को शांत कर दे पहले. वो कुछ नहीं जानता.", शंकर ने बस सामने राखी पिस्तौल परताप को थमा दी इशारे से इस चीखते चिल्लाते आदमी को हमेशा के लिए दर्द से मुक्त करने के लिए. परताप भी सफ़ेद पॉश डॉक्टर होने के साथ हे इनके जैसा है sakht-dil था जिसने मुस्कुराते हुए ठीक आँख और फिर मुँह के बीच 2 गोलियां मारी.
'अरे ओह बावले, अभी मूट ख़तम न होया था और तन्ने तोह यु ठंडा हे कर दिया. चल ब्लीडिंग साफ़ करते है दोनों भाई मिल के अपने अपने प्राकृतिक डेटोल से.", मूत्र थामने के बाद सांगवान फिर से उस निर्जीव के चेहरे को टर्र करने लगा जिसका साथ परताप ने भी दिया. पर शंकर अब थोड़ा गंभीर था फ़ोन पर.
"कौन मादरचोद पैदा हो गया इन्दर जो इतना बड़ा हो गया? धंदे की वजह से उसने किया न तोह साले को मैं वही आ कर ठोकूंगा और लटकाऊँगा अलग उसके बिल्डिंग से."
"शांत हो कर पहले बात तोह सुन्न ले भाई फिर तू हे बोल देना की किसको लटकाना है और किसको ठोकना.", नरिंदर के शब्दों की गहराई समझ कर शंकर अपना जाम उठा कर इन सबसे थोड़ा दूर चल दिया.
"हाँ अब बोल भाई ये माजरा क्या है? बड़े शातिर शिकारी भेजे थे सुपारी देने वाले ने."
"तुझे तेरा हर पागलपन याद है क्या शंकर? अगर है तोह बस इतना बता के क्या कभी तेरे हाथो दोषी के साथ निर्दोष मारा गया है? मैं जानता हु तू दिल का उतना हे नरम है पर क्या ऐसा हुआ है तुझसे.?", एक पल के लिए तोह शंकर का दिल बैठ सा गया जब 'निर्दोष' उसके मैं से होता हुआ दिल तक पंहुचा. हाथ से वो सुलगती तजा सिग्रत्ती घांस पर गिर चुकी थी.
"मैंने कोशिश की थी इन्दर उस लड़के को बचने की. शायद वो 24-25 बरस का रहा होगा, सड़क पार कर रहा था और एकदम से वो सामने आ गया. नहीं वो सामने नहीं आया था इन्दर, मेरी हे गाडी सड़क के दूसरी और चली गयी थी. योगराज वो Lok-dal वाले का टट्टू, उसने गोली चलाई थी मुझ पर और मैंने सामने न देखते हुए जवाब में गोलियां चलाई. खाली सड़क थी और जब मैंने होश संभाला तोह उन लोगो को तोह मैं मार चूका था पर एक युवक और था जिसकी सांसें चल रही थी, वो मेरी गाडी से टकरा कर फुटपाथ पर भिड़ा था शायद. मैं उसको क्सक्सक्सक्स के करीबी हॉस्पिटल में भी ले कर गया था. इलाज के दौरान हे उसकी सांसें साथ छोड़ गयी भाई. वो कह रहा था के.. उसका घर जाना जरुरी है.. मैंने जानबूझ कर नहीं किया उसके साथ पर मैं उसको बचा लू... हेड इंजरी थी और उस सरकारी हॉस्पिटल में तोह ढंग का ओट हे नहीं था भाई. मेरे से आजतक बस एक वही निर्दोष मारा है जिसको मैंने नहीं मारा. गलती उस से बड़ी ये हुई थी की मैं उसके सिरहाने सिर्फ अपना कार्ड छोड़ के आया क्योंकि sare-raah गोलियां चलने का एक भी गवाह मिलता तोह कही न कही बात आ हे जाती. 4 साल से ज्यादा हो गए इस बात को. पर मैं भूला नहीं हु और अगर प्रायश्चित का मौका मिले तोह मैं सबकुछ करने को तैयार हु इन्दर, सबकुछ."
"मेरे बेटे के बदले मैं तुम्हारे भाई की जान ले रहा हु डॉक्टर शंकर शर्मा, मब्ब्स मस. पिस्तौल भी नरिंदर शर्मा की और मौत भी. हाँ इसके जिम्मेवार भी तुम हे होंगे डॉक्टर क्योंकि ये मुझे मारने आया था तुम्हारी सुपारी देने के लिए.", ये सार्ड सी आवाज पिघले कांच की तरह शंकर के हृदय को भेदती गयी जब सुना की खुद उसका भाई अपने आप को ऐसे व्यक्ति को सौंप चूका है जिसका कसूरवार शंकर था.
"ऐ.. ऐ भाई... तुम जो भी.. सुनो. थोड़ा समझो मेरी बात. तुम्हारा कसूरवार मैं हु और चाहो तोह तुम मुझ पर फिर से हुम्ला करवा दो मैं सड़क के बीच खाली हाथ करके खड़ा रहूँगा. जितनी गोलियां मारनी हो.. मुझे मार लेना.. वो मेरा छोटा भाई.. मेरी गलती की सजा उसको मैट दो.. मैंने तुम्हारे बेटे या जो भी वो युवक लगता था उसको टक्कर नहीं मारी थी. मेरी गाडी एक्सीडेंट से दूसरी तरफ उतरी थी और वो युवक हँसता हुआ पीछे देखता हुआ सड़क पार कर रहा था. मेरे भाई को बक्श वो कभी कुछ गलत नहीं करता. खुद हे देख लो की वो मेरी जगह तुम्हारे सामने आ बैठा. बहोत प्यार करता है वो.. मैं उमरभर तुम्हारी गुलामी करने को तैयार हु.. जितना पैसा चाहिए वो भी दूंगा.. सबकुछ लेलो.. इन्दर को जाने दो भाई.", शंकर आखिर में अपने आंसू हे न रोक सका जब स्पीकर पर चलते व्यक्ति ने कुछ कहने की बजाये पिस्तौल लोड की. वो स्पष्ट आवाज थी और 2 सांसें घुलती मिलती फ़ोन से इधर आ रही थी.
"डॉक्टर तुम बेहद प्यार करते हो अपने भाई से और ये शायद तुमसे भी ज्यादा जो इतनी बड़ी दिल्ली में भी मुझे तक पहोच गया. इसने व्हीलचेयर पर बैठे हुए इस बेबस आदमी पर गोली चलने की जगह सिर्फ इतना हे पुछा की मैंने इसके भाई की सुपारी क्यों दी. अब तुम सही जवाब देना डॉक्टर क्योंकि गलत जवाब का मतलब मौत हे होगा. दिल मजबूत तोह है न तुम्हारा?", आज शंकर का दिल कटाई भी ऐसा दर्द झेलने के काबिल नहीं था. उसके दोस्त भी करीब आ चुके थे जिन्हे घुटनो पर बैठा शंकर दूर रहने का इशारा करता हुआ फ़ोन को कान से चिपकाए रहा.
"मैंने.. मैंने मतलब शंकर शर्मा ने आपके बेक़सूर बेटे की जान ली. मैंने अनगिनत जाने ली है अपने जीवन में पर वही एक ऐसा था जिसका मुझसे कोई लेना देना नहीं सर. वो मेरी वजह से मारा गया. आप बस आदेश करो, पिस्तौल मेरे भी पास है और मैं इसको कनपटी पर लगा लेता हु. आपको अगर मेरी मौत से हे सुकून मिलेगा तोह फिर ऐसा हे सही. मेरे भाई के माथे से पिस्तौल हटा लीजिये. उसके बचे छोटे है, बीवी बीमार है और मेरे माँ बाप के साथ भी वो ज्यादा नहीं रहा. मैं ख़तम करा हु न खुद को.", शंकर ने भी पिस्तौल को लोड कर लिया था.
"सोचो एक साथ दोनों की मौत से नुक्सान कितना होगा?", शंकर इतना सुन्न कर जड़ हे हो गया था. मतलब वो व्यक्ति नरिंदर को नहीं बक्शने वाला और इधर वो खुद को समाप्त कर लेगा तोह परिवार का क्या होगा.
"तोह उसको जाने दो सर, मैं आता हु आपके पास."
"वह सिर्फ मेरा बीटा हे नहीं मारा था डॉक्टर. नामित हमारा एकमात्र सहारा था जिसकी शादी 2 दिन बाद हे होने वाली थी. शादी.. मेरी बीवी अपने बेटे की लाश देखते हे गिर पड़ी. एक महीना उसने अपने सांस जैसे तैसे संभाले रखे पर होनेवाली बहु ने फंदा लगा लिया न तोह वो बेचारी माँ हो कर कैसे अपना प्यार काम कर सकती थी? सांस रोक लिए उसने भी और मेरी बेटी.. जिसका अथवा महीना चल रहा था, वो अब कभी माँ नहीं बन सकती अपनी संतान खोने के बाद जिसका जनम तक न हो सका. बताओ अब तुम्हारा जवाब सही था डॉक्टर? पर ाचा लगा की काम से काम तुम्हे मेरा बीटा याद तोह था. ऊपरवाला सबका हिसाब इसी जीवन में करता है और तुम्हारा भी होगा, जरूर होगा. उसकी अदालत में तुम बेगुनाह साबित हुए तोह मुझे भी ख़ुशी होगी. अलविदा डॉक्टर.", शंकर कुछ समझ पात उस से पहले हे दूसरी तरफ से जोरदार पटाखे की आवाज सुनाई दी. कुछ पल के लिए जैसे धरती अपनी धुरी पर हे रुक गयी थी जैसे. सबकुछ खामोश हो गया था.
"नहीं नहीं.. इन्दर.. मेरे भाई.. इन्दर..", शंकर दहाड़े मार रहा था और जबतक वो कोई और पागलपन करता सांगवान, मेहुल और परताप ने उसको जकड़ते हुए वो पिस्तौल भी दूर अँधेरे में उछाल दी. निचे गिरे फ़ोन पर कोई बोल रहा था जिस वजह से डरते डरते सुनील ने वो स्पीकर पर कर दिया.
"शंकर मेरे भाई मैं ठीक हु. इन्होने खुद को हे गोली मार ली... देख मैं जानता हु तूने वो सब जानबूझ कर नहीं किया था. अनजाने में हो गया बस. ये अपांग न होता तोह मैंने आते हे गोली मार देनी थी भाई. और इन्होने भी सब सच सुना और मेरे यहाँ आने से पहले हे इनके हाथ में पिस्तौल थी, जैसे ये सोच चुके थे जीवन ख़तम करने का. बस तू अब कुछ मैट सोच, मैं ठीक हु और आ रहा हु वह. इसके पास है क्या कोई?"
"हाँ.. हाँ इन्दर भाई.. मैं, मेहुल और परताप है इधर और सुनील भी है. शंकर हिल नहीं रहा, शायद सदमे से बेहोश हो गया है."
"इसका ध्यान रखना भाई तुम लोग. इसको दौरा पड़ गया है और होश में आते हे बता देना की मैं ठीक हु. शायद इसको याद भी न रहे जो हुआ.. ये दर्द भूल जाता है बस सोने देना, मैं 3 घंटे में पहुँचता हु वह.", नरिंदर ने सोफे के करीब गिरी पिस्तौल उठा कर पतलून में खांसी और उस बुजुर्ग की आँखें बंद करने के बाद चरण स्पर्श करता हुआ बहार निकल चला. उधर शंकर सचमुच शांत घांस पर पड़ा था जिसको तीन लोगो ने उठा कर वही गद्दा बिछा कर उस पर पलट दिया.
"बहनचोद ये सब क्या था बे पंजाबी? शंकर को आज भी दौरे पड़ते है क्या? मैंने तोह 10 साल से नहीं देखा था ऐसा कुछ और आज तोह ये रोया भी बहोत. अगर बावला हो जाता तोह कसम से हम चारो को हे मार देता."
"शंकर घुटने तक देता है भाई जब बात नरिंदर की हो तोह. पर ये कभी भी गलत नहीं करता जितना हम जानते है. कुछ बहोत बड़ी दुर्घटना घाटी है जो नरिंदर बताने से रहा और ये तोह है हे भोला. चल यार परताप, तू घर जा कर आराम कर भाई. हम संभाल लेंगे इसको."
"पंजाबी हु और चुटिया नहीं भाई. यार है अपना और सुख में चाहे न शामिल राहु, दुःख में दामन न छोड़ने वाला. एक काम कर सांगवान, इसका बप चेक कर. कुछ इसके साथ भी बुरा हुआ है कही न कही.", एक इंसान ने आज शंकर को वास्तविकता से परिचित करवा दिया था. उसका वहशीपन, पागलपन सब पृथक करके घुटनो पर ला दिया और करने वाला खुद अपांग था. शंकर की सच्चाई और कबूलनामे को स्वीकार करके उसने माफ़ी तोह दे दी पर एक निर्दोष जीवन के जाने से उसके परिवार पर क्या गुजरती है ये शिक्षा ाचे से सीखा गया था वो इंसान दुनिया छोड़ने से पहले.
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कमरे में लौटने से पहले हे अर्जुन ने बिना कोई परवाह किये बालो का जुड़ा खोलती रेखा को सामने से हे गॉड में उठा लिया. दोनों भारी कूल्हों की तलहटी में पंजे गड़ाए वो इतने आराम से रेखा के गले और कान को चूमता सहलाता हुआ अब जैसे और सबर न कर सका. अपनी हंसी को संभालती रेखा भी दोनों पाँव उसकी कमर में लपेटे उसकी बेसबरी देख उसका हे साथ देने लगी.
"सष्ठ.. पागल हो रहे हो तुम.. बहार कोई देख लेता तोह? और मेरा निघटजोन वही क्यों फेंक दिया?"
"मुझे आपको इसमें हे चलते हुए देखना था. सबर का फल मुझे अब और पसंद नहीं. आप जैसे जैसे कदम बढ़ा रही थी, इनकी थिरकन और लचक अभी तक मेरे जेहन में है. कितनी कमाल की हो आप और अब मैं बस आपको ऐसे हे देखना चाहता हु जब भी हम अकेले हो. उफ़ कितने नरम और गद्देदार हिप्स है आपके. कही कोई रोयं तक नहीं इतने चिकने. चलने पर इनके कटाव की वो थोड़ी थोड़ी झलक और थिरकना.. उम्म्म्म.. मुझे नहीं लगता की आज मैं कोई कण्ट्रोल कर सकूंगा.", होंठो पर लगभग दांत से काट हे लिया था अर्जुन ने. और उसका वर्णन सुन्न ने के साथ हे रेखा उसके हाथो द्वारा अपने भारी कूल्हों की गहराई को उँगलियों से दबा दबा कर फ़ैलाने महसूस करके पानी हो रही थी. अर्जुन की ज़िद्द के साथ उसका खुद भी मैं था हर हसरत को पूरा करना. जमुनी रंग के उस छोटे से परिधान के भीतर न सीने पर कुछ था और न हे कमर के निचे. दरवाजा खोलने के साथ हे उसकी चिटकनी चढ़ा कर अर्जुन ने रेखा को उस बड़े बिस्टेर पर पटकते हे अपनी टीशर्ट और निक्कर एक पल में हे त्याग दी थी. एक घुटना मोड और दूसरा पाँव सीधा किये रेखा खिलखिला कर हंस रही थी अपने बेटे की रफ़्तार देख. अर्जुन की कमर से निचे निगाह पड़ते हे अब रेखा की सांसें भारी हो चली थी. इतनी रौशनी में उसका वो मोटा तगड़ा भुजंग रह रह कर फड़क रहा था जो आजतक के अपने सबसे विशाल स्वरुप में था, रेखा के असर से. जांघो के बीच का baal-rahit पहला हुआ गुलाबी उभर और उसका चीरा देख अर्जुन भी अपनी जगह हे स्थिर रह गया. रेखा के वो अर्धगोलाकार सीने के कलश भी चूचक से ऊपर तक उस रेशमी कपडे से बहार निकले उत्तेजना बढ़ा रहे थे.
"ये.. ये कितनी देर से ऐसा है? उफ़.. कितना सख्त और गरम है ये.", रेखा शब्दों का चुनाव सलीके से करती हुई खिसक कर बीएड के किनारे आ बैठी. अर्जुन का उत्तेजित मूसल, जिस से हर स्त्री और युवती हर मुलाकात में कनपटी थी उसको रेखा ने अपनी नाजुक नरम हथेली से ऐसे दबोच लिया जैसे सपेरा नाग को. सुर्ख सूपड़ा अभी से कॉमर्स से भीगा यथा अधिक फूल चूका था की एक पल को तोह रेखा भी उसके अकार से कुछ हैरत में पड़ गयी. जबकि अर्जुन आँखें मूंदे अपने दोनों हाथ रेखा के रेशमी कंधो पर टिकाये इस स्पर्श से हे अलग नशे में पहुंच चूका था. लम्बे लाल नख और गोरी लम्बी उँगलियों के बावजूद रेखा भी उस मूसल का घेराव पूरा न माप सकीय. सूपड़ा तोह और भी बड़ा था.
"आह्हः.. ये तोह शाम से हे ऐसा है जब मैं इस कमरे में आपके साथ आया था.. आज इसकी गर्मी मुझे हे बेचैन करने लगी है.."
"तुम यहाँ आराम से लेटो, इसकी अकड़न और गर्मी मुझे पर छोड़ दो. ये कितना खूबसूरत है अर्जुन और इसकी ये अलग से महक.", अर्जुन तोह मन्त्रमुद्ध सा उस नरम बिस्टेर पर सीधा पसर गया जिसकी कमर की तरफ घुटने फैलाये बैठी रेखा ने अभी भी उसके लिंग को मजबूती से थमा हुआ था. वो हर हिस्से को पकड़ कर भिन्न भिन्न घेराव माप रही थी. हर बार अर्जुन कसमसा उठता और आखिर में नीची सर्कि खाल के ऊपर स्थित उस गुलाबी कुकरमुत्ते को नरमी से पकड़ कर जब रेखा ने उसके छिद्र के करीब हलके से नाखून से खुरचा तोह अर्जुन जोरो से सिसक उठा. बिना दबाव बनाये रेखा का उसके सुपडे को नाखून से सहलाना अर्जुन को कमर उठाने पर मजबूर कर रहा था.
"ओह्ह्ह्हह्ह. ये क्या कर रही हो आप..? ऐसा पहले तोह कभी नहीं किया.. उम्मम्मम.. आअह्ह्ह्ह..", अर्जुन ने आवेश में सीधा हे रेखा के एक उभार को गले की तरफ से हथेली डालते हुए जकड लिया. उसकी हथेली में बस वो कड़ा निप्पल और सामने का मुलायम हिस्सा हे समां सका पर रेखा ने उसके चेहरे को देखते हुए मुस्कुराकर एक बार सुर्ख सुपडे का पूरा घेराव अपनी गीली जुबान फिर कर छाता और छिदड्रा पर जीभ की नोक से कुछ हरकत करने के बाद समूचा सूपड़ा हे अपने नरम मॉटे होंठो से आगे गीले मुख में भर लिया. लाल लिपस्टिक से सजे होंठ भी अपनी क्षमता तक फैले थे पर रेखा आज अर्जुन से भी ज्यादा कामुक और उत्तेजित थी जिसने अपने आगे बिखरते लम्बे गेसू एक हाथ से पीठ की तरफ से पीछे करते हुए सर थोड़ा और झुका लिया.
"उम्मम्मम्म.. मार दिया आपने तोह .. मजे से.. इतनी मेहरबानी.. पहले पता होता तोह ... आह्ह्ह्हह..", रेखा कंठ में फंसते मोठे सुपडे के बावजूद एक कामुक मुस्कान से अर्जुन को ऐसे निहार रही थी की वो मचल हे उठा. अभी वो पीठ उचका कर उसके स्टैनो को ाचे से मसलने की कोशिश हे कर रहा था की उसकी तरफ वाले अपने खाली हाथ को उसके सीने पर रखती रेखा ने अर्जुन को वापिस चित्त लेता दिया. नाक से कुछ सांस भर कर वो मुख और कंठ को एक सीध में करती इतना झुकी की अर्जुन का वो साढ़े 9 इंची कामदण्ड जड़ तक रेखा के मुख और गले में उतर गया. गोर सुराहीदार गले के बीच से हे सुअपड़े का उभार स्पष्ट दिख रहा था और वो अविश्वास और कमांड इस सुख को अपने भीतर समेटने लगा. मुट्ठियाँ चादर पर कसता हुआ सर पटकने लगा जब रेखा ने उसी मुद्रा को बरकरार रखते हुए आधा लिंग बहार अंदर करना शुरू कर दिया. हर बार लिंग पहले से ज्यादा रेखा के मुखरास में लिप्त ज्यादा चमकने लगता. ऐसा तोह अलका भी नहीं कर सकीय थी और रेखा ने अभी तक एक बार भी पूरा लिंग बहार निकाल कर सांस नहीं ली. अर्जुन उठने की कोशिश करना हे भूल गया जब रेखा ने उसके छाती पर उभरे बाएं सूक्ष्म से चूचक को मुखमैथुन के साथ हे खुरचना शुरू किया.
"सेहन से परे है ये... आअह्ह्ह्हह्ह्ह्हह...", आज वो पहली बार टिहरी मार झेल रहा था जब रेखा ने उसके अंडकोष पर उभरी लकीरे सेहलनि शुरू कर दी. 5 मिनट में हे वो अपने चरम के करीब था और ठीक तभी रेखा उसका समूचा लिंग आजाद करती उसकी बगल पसारती हुई अर्जुन को बाहों में भर कर लिपट गयी. अर्जुन को उसके हे लिंग का रास चखवाती हुई वो बड़ी अधीरता से उसके होंठो को चूमती, चबाती हुई अपनी गोरी गुदाज जांघ से उसके मूसल को दबती, छोड़ती और स्प्रिंग सा जब वो उछलता तोह फिर से दबा देती. न चाहते हुए भी अर्जुन करवट लेता हुआ कस के रेखा से लिपट गया. वो अध्भुत्त मादक जिस्म जिसके हर कानन में एक अलग हे ऊर्जा और kaam-aanand भरा था, उसको जिस्म से जोड़ते हे अर्जुन के साथ रेखा भी सिसक उठी. इतनी मजबूत पकड़ और उसके भीगे सुपडे का अपनी कासी हुई योनि के उभार पर ठोकर मारना जैसे कामदेव का ख़ास बाण था. रेखा ने अपनी मांसल निर्वस्त्र जांघ खुद हे उसके ऊपर चढ़ाते हुए कमर खिसकानी चाहि पर लिंग रगड़ मारता उसकी नाभि पर आ रुका.
"ुह्ह्ह्ह.. बस मैं यही चाहती हु अर्जुन.. आज हर सीमा लांघ कर मेरे रोम रोम में वो प्यार भर दो जो आज से पहले बस आधा अधूरा मिला है. अपनी तिलोत्तमा को इस रात आजाद कर दो.. आह्हः..", और अर्जुन ने भी उठी हे चिकनी जांघ के बीच अपना ऊपर वाला हाथ फिसलाते हुए बहार को निकले उस दूधिया मांसल कूल्हे को कस के दबोच लिया. कूल्हों का कटाव इतना उभरा था की अर्जुन की ऊँगली के तीनो पूरे उस गहराई में उतरने के बाद हे गुदा और रास बहती योनि की निचली दरार को सेहला सके. उनकी नरमी और मांसलता ऐसी थी की अर्जुन ने रेखा का कुल्हा ऊपर खींचते हुए अनामिका ऊँगली का एक तिहाई हिस्सा उस अधखिले गुलाब सी योनि के रसीले छिद्र में उतार दिया. उसके पौरुष पर रेखा मर्डर मिटी थी लेकिन इस हरकत ने तोह कमर और पीठ को धनुष सा तान दिया.
"आज तोह मैं आपका गुलाम हो गया.. आपके जिस्म की ये कस्तूरी से भी उत्तम सुगंध मुझे हमेशा पागल करती रही लेकिन जिस तरह से आपने मुझे वो अध्भुत्त सुख दिया, मैं उतना तोह नहीं पर कोशिश कर सकता हु की साथ निभा सकू. ुमाःह्ह्ह.", दोनों होंठो को ाचे से चूस कर अर्जुन अपने लहराते मूसल के साथ उठ कर रेखा की दोनों गोरी जांघो के दरमियान आ बैठा. घुटनो के गोर कटोरे चूमता हुआ वो उनके आगे का भरा हुआ चिकना मांस सहलाते हुए रेखा की kaam-gaagar के करीब आ रुका. अब रेखा चेहरा पलटने लगी तोह अर्जुन ने सर ना में हिला कर ऐसा करने से मन कर दिया. उस रेशमी वस्त्र को पूरी तरह कमरे से भी आगे सरका कर अर्जुन ने वो दोनों भारी सुडोल जाँघे ऊपर उठाते हे रेखा के घुटने हवा में कर दिए. अपने प्रेमी के सामने इस भरी पूरी रौशनी में इतनी उन्मुक्त तरह से योनि को प्रकट करना रेखा के जिस्म में हजारो चींटियां दौड़ने लगा. टकटकी लगाए उस फूले हुए मखमली उभर को निहारता अर्जुन उस पर झुकने से पहले रेखा को नजर करना नहीं भूला, जिसके चेहरे पर वातानुकूलन में भी हल्का पसीना और लाली आ चुकी थी. इस जिस्म को निहारने के लिए जैसे इतनी रौशनी की भी जरुरत नहीं थी पर आज कुछ भी अन्धकार में नहीं होना था.
"आह्हः.. धीरे धीरे.. उम्म्म आराम से karo..isshhhhhh", अर्जुन ने एक बार ाचे से योनि की महक लेने के बाद बजाये झुकने के रेखा के हे दोनों कूल्हों को पंजो से दबोच ऊपर उठाते हुए योनि को हे मुँह से लगा लिया. लचीले उभरे मांस को रेखा के होंठ समझ कर पीटा वो अपनी जीब से उस घेरि दरार को भी कुरेदने लगा. योनि की अंदरूनी गुलाबी फांको के बीच बेपनाह रस भरा था जो मात्रा थोड़ी सी म्हणत से हे अर्जुन के मुँह में सामने लगा. अब बिस्टेर खींचने की बारी रेखा की थी जो बुरी तरह कसमसाती हुई अर्जुन के जोश के सामने बेबस पड़ने लगी. वो यही पर कहा रुका और न उसकी जीभ का नुकीला हिस्सा. सूक्ष्म फूल सा हलकी सिलवटों वाला गुलाबी गुदाद्वार तक अर्जुन योनि के संग हे कुरेदने लगा. रह रह कर वो रेखा के भारी कूल्हे मसल देता जब भी उसके होंठ फांको के बीच जोर लगते. रेशमी वस्त्र गोरी गठीली टांगो को अर्जुन के कंधे पर टिका देख स्टैनो तक फिसलता इकठ्ठा हो गया. रेखा ने ऐसा कामज्वर अपने जिस्म में आज हे महसूस किया था और वो कुछ हैरान भी थी अपनी निर्लज्जता पर. और भलभला कर अर्जुन के मुँह में हे झड़ने से पहले वो चीख हे उठी.
"मैं नहीं झेल सकती और.. आह्ह्ह्हह माआआ...", लेकिन अर्जुन तोह उस madhur-rass को और भीतर तक साफ़ करने का इरादा किये था. रेखा को कंधे और सर के बल बिस्टेर पर टिकाये वो योनि का कैसा हुआ चीरा होंठो से दाए बाएं रगड़ कर जिव्हा उस गुलाबी छिद्र में हे उतरने लगा. योनि का भगनासा जो कुछ वक़्त पहले लकीर के भीतर हे बंद था, अब उभर कर पतली गुलाबी फांको के साथ खिलने लगा. लगातार वह जीभ की रगड़ से रेखा तुरंत हे फिर से झड़ने लगी. आधा मिनट में 2 बार सखलन उसके लिए भी अविश्वसनीय था पर सिवाए आनंद में सिसकने और मचलने के वो उस मजबूत पकड़ के आगे कुछ न कर सकीय. अंतत में तोह अर्जुन ने कूल्हे के दोनों पत् चौडाते हुए गुदाद्वार भी kaam-ras से सरोबार कर दिया. रेखा का जिस्म धम्म से उस बिस्टेर पर गिरा और फैली हुई टांगो के बीच बैठे अर्जुन के चेहरे पर मुस्कान देख रेखा ने शर्म त्याग कर वो वस्त्र एक झटके में उतार फेंका.
अतुलनीय.. अकल्पनीय.. असाधारण.. बस या अलफ़ाज़ थे अर्जुन के जेहन में उस पल जब श्वेत कैनवास रुपी बिस्टेर पर वो tri-ayaami कलाकृति सी रेखा अपने प्राकृतिक स्वरुप में उसकी आँखों के सामने नजर आयी. बद्र से घने जुल्फ, चमकता हुआ ललाट जहा कही कही महीन पसीने के बिंदु, विलक्षण कटाव लिया चेहरा जहा एक जोड़ी सृष्टि से नयन, सुत्वा हलकी उठी हुई नाक और उसके निचे खिले सुर्ख होंठ.. मजबूत फिसलन भरे कंधो से निचे बेजोड़ और बड़े स्टैनो की ऐसी दुर्लभ जोड़ी जो इस उम्र में भी dugdh-purn और सम्पूर्ण बिना हलकी सी लटकन के. उनका केंद्रे किसी भी मापने की इकाई से एक सामान और वो कड़े और उत्तेजिट चूचक चुम्बकीय ऊर्जा से भरपूर. गोलाइयाँ जहा से उठान लेती वही से पेट भीतर धंसता हुआ एक गहरी नाभि से सुसज्जित.
"ऐसे क्या देख रहे हो?", रेखा ने पीठ ऊपर उठाते हुए अर्जुन के करीब आना चाहा तोह उसने हे हाथ थाम कर रेखा को बिस्टेर से हे उठा लिया. फर्श पर दोनों निर्वस्त्र खड़े एक दूसरे को पूर्ण आसक्ति से निहार रहे थे और अर्जुन का हाथ रेखा के सीन्स से फिसलता हुआ एक गुम्बद पर आके रुका तोह स्टैनो के साथ स्वयं रेखा भी पंजो पर ऊपर उठने लगी. एक हाथ कूल्हे को और दूसरा उस पुष्ट सतांन को मसलता हुआ रेखा को खुद हे उकसा रहा था अगला कदम लेने को. अर्जुन के मुँह से मुँह जोड़ कर अपने नरम हाथ से बुरी तरह तन्नाए लिंग को निचे दबाते हुए रेखा ने अर्जुन को भी कुछ निचे झुका लिया. दोनों कोमल और आपस में सटी जांघो के बीच अब वो मूसल फंसा हुआ ऊपर योनि की गरम वाष्प से मचलने लगा था. अर्जुन अधरों के रास और स्टैनो को सहलाने मसलने में हे खोया था और रेखा ने उचक कर ऊपर उठते लिंग मुंड को उसकी मंज़िल से सत्ता दिया. मोटी नरम फांको के बीच अपने सुपडे को दबता देख अर्जुन ने भी रेखा की उस नितम्भ वाली जांघ को ऊपर उठाते हुए खड़े खड़े हे एक जोरदार झटके में आधा लिंग उस ताप्ती गीली योनि को बुरी तरह फैलते हुए भीतर पेवस्त कर दिया. रेखा जैसे इतने जबरदस्त जवाब के लिए तैयार नहीं थी.
"ुणगगगग... मार डाला.. रुको .. आठ.", पर इतनी देर से सबर करते अर्जुन को तोह जैसे जन्नत की वो राह मिल चुकी थी जहा आगे बढ़ते हुए अब कुछ सुनाई देना बंद हो चूका था. दर्द में सिसकती रेखा ने दोनों हाथो से उसकी गर्दन थाम कर खुदसे हे उसको बढ़ावा दे दिया. दूसरे कूल्हे को ाचे से मसल कर जैसे अर्जुन ने मूक सन्देश दिया की आगे क्या होने वाला है पर उस भयंकर मोटाई से हे अभी रेखा संभालती की उसकी ऊपर होती दूसरी टांग के निचे ब्याह फंसा कर अर्जुन ने पहले पूरा नियंत्रण में लिया और अगले धक्के में रेखा के गर्भ तक का सफर तये कर डाला. इस बार रेखा से रहा न गया जो उसकी कमर से टाँगे लपेटे हवा में झूल रही थी. धक्का खाने के बाद अपने कूल्हे कुछ पीछे खींचते हुए उसने अर्जुन की गर्दन पर 8 उँगलियों के नाखून त्वचा में धंसते हुए कंधे पर भी दांत कस दिए. तिलोत्तमा के गहरे नशे में डूबा अर्जुन तोह इस दर्द में भी अध्भुत मजा ले रहा था. आँखे मूंदे वो रेखा को गॉड में उठाये और लगभग पूरा लिंग उन कासी हुई फांको के बीच घुसाए उस तरफ चल दिया जहा बड़े बड़े कांच की खिड़कियों ने दो तिहाई दिवार को कब्जाया हुआ था. काले आसमान में बार बार चमकती वो बिजलियाँ उसको shwet-jaamuni रंग में भर देती. ठन्डे कांच पर अपनी पीठ लगते हे रेखा सिसक उठी जैसे फिर से होश में आया हो. और बस उस कुदरत के साथ रेखा को निहारता अर्जुन अब एक हे जगह स्थिर बहोत धीरे धीरे अपने लिंग बहार खींचता हुआ अंदर ढकने लगा. दर्द सेहती रेखा ने दोनों हाथ उसके गालो पर टिकते हुए पूरे उन्माद में जीभ चेहरे, होंठ और गर्दन पर फिर कर उसका साथ देने प्रारम्भ किया. वो लाजवाब थी अर्जुन की ताक़त देख, जिस तरह बिना जल्दबाजी किये वो एक जगह स्थिर खड़ा उसके साथ ये prem-sansarg कर रहा था. हर बार हलके धक्के पर रेखा खुद उसको अपनी तरफ खिंच लेती. अर्जुन बस बहार खींचता और रेखा उसको फिर से समां लेती. Prem-taal को बखूबी समझ लिया था उसने और अर्जुन की ताक़त को भी. स्वयं हे अधिक मजे की चाहत में रेखा ने अर्जुन का एक हाथ कूल्हे से हटा कर अपने उभर पर पंहुचा दिया. वो अब क्षमता में भी उसकी संगिनी थी जो अपने भार को खुद समेटे हुए गहरे योनि मंथन में कमर चलती हुई अर्जुन को हर वो सुख दे रही थी जिसकी चाहत लिए वो आया था.
"आअह्ह्ह्ह.. आप यहाँ मेरे साथ भी हो और उधर आसमान में भी.. ऐसा लगता है जैसे ये दोहरा मिलान हो. हमारा प्रतिबिम्ब कुदरत में और इस कमरे के भीतर एकसार हो रहा है. ुह्ह्ह्ह.. अधिक दर्द दिया मैंने?"
"वो विद्युत भी तुम में हे खोयी है अर्जुन और मैं खुद भी.. आअह्ह्ह.. कितना अजीब और सुखदायी है ये सब, एक सपने सा.. आज तुमने आखिर अपनी तिलोत्तमा को पा हे लिया अर्जुन.. मुझे अपनी चाहत के हर सफर पर ले चलो, जैसे चाहो. दर्द के बाद मिलने वाले इस अध्भुत सुख को मैं माँ के रूप में न पा सकीय थी पर आज .. आह्हः.. आज जैसे मेरा दूसरा जनम हुआ है.. इतना पूर्ण मैं आजतक नहीं थी.. उम्म्म्म", आसमान को जी भर के देखने के बाद एक बार फिर वो लबों को चूमती चूसती हुई अर्जुन के साथ और रफ़्तार से आगे बढ़ने लगी. अर्जुन तोह कुछ और हे सोचे बैठा था जिसने बड़ी खिड़की का पल्ला पूरा सरकते हुए बहार बरसती बूंदो और ठंडी हवा को इस कमरे में शामिल करने के बाद रेखा का जिस्म उस 8 इंची बनेरे पर हे टिका दिया. जोखिमभरा कदम था लेकिन इस पागलपन में रेखा स्वयं शामिल थी जहा उसका कमर से आगे का जिस्म बहार बरसते पानी और खुले आसमान में बस गर्दन के निचे हाथ रखे अर्जुन की गिरफ्त में सुरक्षित था. रेखा के स्टैनो को ाचे से चूसता हुआ अर्जुन भी आधे धड़ तक कमरे से बहार था पर उसके धक्के और गहरे हो चले. रेखा और अर्जुन न घर के भीतर थे न पूरी तरह प्रकृति के आगोश में. वो उस सरहद के दोनों तरफ झूलते हुए इस अकल्पनीय मुद्रा में एक दूसरे में समाते हुए बस इस पल को यादगार बना चुके थे. योनि में हर बार 8-9 इंच तक kaam-dand रस में सरोबार डूबता निकलता पर रेखा इसके आनंद को रोकने की जगह खुल कर सीत्कार रही थी. अर्जुन द्वारा उसके मॉटे स्टैनो को चूसना काटना पीड़ा से अधिक मजा दे रहा था. उसका जिस्म झटके लेने लगा जैसे kaam-visphot होने से पहले ईंधन एकत्रित हो रहा हो.
"Aaahhhhhhhhhhhhhhh..", इस चीख को अर्जुन ने भी दिल की गहराई तक मसहूस किया था और उसके लिंग पर बहार से अधिक बरसात योनि रास की. रेखा के पीठ दोनों हाथो में संभाले वो उसको लिए अब वापिस बिस्टेर पर आ पंहुचा. शरीर रह रह का काँपता हुआ और चेहरा बारिश में भीगने से और भी कामुक. वो रेखा से उसका ये पल छीन न नहीं चाहता था इसलिए बस चेहरे को सहलाते हुए वैसे हे रुका रहा.
"उम्म्म्म.. तुम अर्जुन हे हो?", रेखा ने जैसे अदृश्य मदिरा का बड़ा प्याला पिया हो, ऐसी बोझिल और नशीली आँखों से वो अर्जुन को प्रशंसा से देखती हुई बोल उठी. गोरी लम्बी टांगो के बीच अभी तक वो भरी भरकम लिंग पेवस्त था. रेखा को जवाब देने से पहले अर्जुन ने दोनों स्टैनो को प्रेमी के हक़ से दबोच कर मसलते हुए पूरा लिंग बहार निकाल एक झटके में हे भीतर उतार दिया. ये अबतक की सबसे जोरदार ठोकर थी पर पनियाई योनि के साथ मांसल कूल्हों ने हिलते हुए इसको बखूबी झेला. सीने पर दूध बहने लगा था और रेखा की एक गहरी कामुक सीत्कार.
"ये वाला तोह सिर्फ आपका हे है जो आज सम्पूर्ण हुआ. आअह्ह्ह.. मुझे उम्मीद नहीं थी मैं आपके सामने टिक भी सकूंगा. पर आप तोह मुझे अंतरंग मिलान में भी हराना नहीं चाहती, जीवन में जीतने के साथ. मुझे कोई शिकवा नहीं की ये पहले क्यों न हुआ. वो सब रातें जिनमे आप मेरी कल्पनाओं में मेरी संगिनी थी, वो आपने आखिर पूरी कर हे दी. अब मैं भी हारना चाहता हु तिलोत्तमा... आह्हः..", अर्जुन के जवाब पर रेखा जैसे फिर से जी उठी जिसने उसको बाहों में भर कर खूब हे पाँव ऊपर उठा लिए. अब जैसे दोनों तरफ से घनघोर ताक़त और प्रेम का प्रदर्शन शुरू हुआ. स्टैनो को सीने से पिस्ता हुआ अर्जुन उन मोटी उभरी फांको के बीच अब तक के सबसे जोरदार धक्के जड़ रहा था जो उसके जिस्म की क्षमता अनुसार थे. ठप्प ठप्प की आवाज मधुर न हो कर किसी गर्जना सी थी जहा रेखा के कंधे दबाता हुआ वो होंठ गाल ठुड्डी तक चूमता kaat-ta हुआ असाधारण रफ़्तार पर रेखा को रौंदने में जूता था. पर एक वही तोह थी जो इसको झेल सकती थी, खुद में समां सकती थी और अर्जुन की haar-jeet सब उसके नियंत्रण में था. कमरे में अर्जुन की हुंकारे और रेखा की सिसकियों के साथ वो भारी कष्ट से बना बड़ा बिस्टेर तक हिलने लगा. योनि का कसाव लिंग पर बढ़ने लगा था और पसीने में नहाया अर्जुन अधिक उग्र.
"आअनंगगगगगग..", वो इतनी जोरर से गुर्राया था की स्टैनो पर उसकी पकड़ से दुग्ध की धाराएं बौछार सी बरसने लगी जिन पर उसकी मजबूत पकड़ कासी थी. रेखा ने उसके उठते जिस्म को वापिस अपने सीने से जकड कर अर्जुन के साथ हे अपने कॉमर्स का बाँध भी पूरा खोल दिया. गर्भद्वार पर अनगिनत गरम वीर्य की धाराएं बरसता हुआ अर्जुन निस्तेज हो चला. आंखें मूंदे रेखा बस उसको सेहला कर खुद में समेटे रही. बिस्टेर के किनारे से लिंग से भरी योनि महीन सफ़ेद धार फर्श तक पहुँचती रही और अर्जुन का जिस्म अलग हो कर रेखा की बगल में लुढ़कते हे योनि मुख से गधा तरल इतना बहा जैसे 3-4 संसर्ग का जमा अब निकला हो. रेखा के गोर कूल्हे भी योनि की तरह लाल पड़ चुके थे पर खिड़की पर लेटने के बावजूद अर्जुन ने वह खरोंच तक न आने दी थी. रेखा ने एक बार बड़े हे प्यार से आँखें मूंदे हुए अर्जुन को देखा और फिर उसको बिस्टेर पर सही से लेता कर वो बाथरूम में नहाने चली गयी. ऐसा घनघोर संसर्ग स्वयं रेखा के लिए एक यादगार बन चूका था जिसमे उसको खुदके होने तक का एहसास न था. कुछ था तोह 2 आसक्त और bandhan-mukt प्रेमियों का चाहत भरा पागलपन जिसका गवाह ये बिस्टेर था जो अंतिम पालो में अपने स्थान से आधा पौने फ़ीट खिसक चूका था.
'पागल नौसिखिया.. आह्हः.. नौसिखिया नहीं रहा बस पागल जरूर है. क्या हालत करि है पूरे जिस्म की.. इस्सस.. तिलोत्तमा का अर्जुन.. उमाहहह.. शुक्र है सो गया नहीं तोह लग तोह रहा था की आज वो पीछे से भी नहीं बक्शने वाला.', संगमरमर के वाशबेसिन के सामने दर्पण में खुद का निर्वस्त्र बदन साफ़ करती हुई रेखा नहाने के बाद अब कही ज्यादा चमक रही थी. जगह जगह अर्जुन के prem-prahaar अपनी छाप छोड़ चुके थे जिन पर क्रीम लगते हुए हे रेखा सीत्कार उठती. अभी भी उसके खूबसूरत वक्ष अर्जुन को पुकार रहे थे जिनके निप्पल मसलने और चूसे जाने की वजह से सख्त रहने वाले थे कुछ घंटे. कुछ सोच कर रेखा आगे झुकते हुए अपने रसभरे होंठो पर लाली लगाने लगे. इस दृश्य में उसके बहार को निकले हुए गोलाकार कूल्हे बेहद मोहक लग रहे थे जिनके बीच वो गुलाबी फांके बूँद के रूप में गुलाब का आरक फिर से बनाने लगी.
'अभी सोया रहे तोह हे ठीक है. इतना पागलपन और दीवानगी वो भी मेरे लिए.. उसकी तिलोत्तमा.. हाँ हमारे एकांत में तोह उसने एक बार भी माँ नहीं कहा.. बस अब गले लग कर मैं उसकी बाहों में हे सोना चाहती हु जैसे उसका दिल कह रहा था.', बाथरूम की बत्ती बुझा कर दबे पाँव वो कमरे में दाखिल हुई और वह भी बड़ी रौशनी बंद करके छोटा लैंप जगा दिया. कपडे पहन ने का तोह सवाल हे नहीं था जैसे अर्जुन निर्वस्त्र था. हाथ में 2 सोने की चूड़ियां और चांदी के पायजेब पहने वो बालो को थोड़ा समेत कर सफ़ेद चादर दोनों के ऊपर करके अर्जुन के करीब हे हुई थी और किसी बाज सा वो फिर से रेखा के जिस्म पर पलट गया. रेखा खिलखिलाती हुई करवट के बल हो कर बचने की कोशिश करने लगी थी जिसके चेहरे के निचे एक हाथ फंसा कर दूसरे हाथ से पुष्ट कूल्हों को दबोच अर्जुन ने ऊपर वाला सतांन सीधा मुँह में भर लिया.
"आअह्ह्ह.. सोये नहीं थे? क्या इरादा बनाये लेते थे अबतक?", अर्जुन इतना सुन्न कर सतांन को आजाद करते हुए हलकी भीगी काख का जीभ से चाटने के बाद कूल्हे वाले हाथ को रेखा की गहरी दरार में दबाते हुए सरगोशी करता हुआ कहने लगा.
"एक गहराई में उतरना बाकी है अभी. कहा था न रोम रोम पर मैं मोहर लगा दू तोह बस आपको taro-taja होने का वक़्त दे रहा था. 2 बजे है और अभी एक घंटा अपनी तिलोत्तमा की चाहत पूरी करने में बिताना चाहता हु. आप खुद तैयार हो कर आयी है.", अर्जुन की ऊँगली गुदाद्वार पर लगते हे एक पूरा भीतर दाखिल हो चूका था.
"इस्सस... पागल.. सुबह माँ पक्का सवाल करेंगी."
"डर लग रहा है?"
"तुमसे सवाल करेंगी जब छुहारे जैसी शकल देखेंगी इतनी मेहनत करने के बाद. मैं यही हु, जाना तुमने है.", रेखा की आँखों में शरारत और होंठो पर लाली देख अर्जुन उन्हें सीधा करता हुआ पूरे जिस्म पर हे आ लेता. कुछ पल वो बस अपनी तरफ देखते चेहरे को निहारता रहा और रेखा ने हे पलके झपकते हुए सहमति भर दी.
"इस बार और कोई निशाँ नहीं दूंगा."
"मुझे हर तरफ चाहिए हो तब भी? गले से निचे जहा दिल करे जितना दिल करे. सुबह तुम जा चुके होंगे जब मैं उठूंगी. इसके बाद मैं सोना चाहती हु अर्जुन, तुम्हारे बाहों में चाहे कुछ देर हे सही."
"जरूर. फिर यहाँ से जाने के बाद हे मिलेंगे."
"तभी कहा निशाँ देने और कुछ पल अपने सीने पर सुलाने के लिए.", एक बार फिर दोनों के होंठ आपस में जुड़ गए.