अपडेट 179
Fer-Badal (2)
मौसम कोई भी हो लेकिन हर सुबह कुछ ठंडक जरूर समेटे रहती है. 4 बजे हर तरफ अन्धकार हे था और यहाँ खुली छत पर सोया अर्जुन किसी छोटे बचे की तरह अपनी बहिन के सीने में दुबका कूलर की ठंडी हवा से बचने की अथक कोशिश करता लगा. ऋतू के चेहरे पर एक अलौकिक मुस्कान गहराई थी जैसे वो बस अपने हे संसार में हो. नींद में भी उसकी अर्जुन के प्रति परवाह kaabil-e-taarif थी जो वो उसकी तरफ चादर सही करती हुई आराम पूछने लगी.
कुनमुनाता सा अर्जुन थोड़ा और आगे हुआ तोह ऋतू का कमर से निचे का भाग उसके ऊपर आ गया. चादर अब पूरी तरह से अर्जुन के शरीर पर बिच चुकी थी और वो प्रेम की तपिश बाहरी ठंडक से बचाव करती अब आराम दे रही थी.
"ऋतू, सवा 4 बज रहे है. कोमल दीदी या कोई और भी उठ सकता है.", अलका सीढ़ी की तरफ वाले बंद दरवाजे को जांचने के बाद अब बहार आँगन वाली तरफ से इधर आयी. पिछले 10 मिनट वो बस इन दोनों की supt-krida निहारती रही और जब अर्जुन कुछ शांत हुआ तभी उसने हौले से ऋतू को हिलाया
अलसाई सी ऋतू के चेहरे पर अलग हे चमक थी जो इस अन्धकार में भी अलका ने देखि.
"ये 3-4 थपकियाँ देते हे सो गया था और देख अभी भी इसके हाल. कूलर बंद कर जरा और इसको अभी सोने हे देते है.", ऋतू ने तकिया आहिस्ता से अर्जुन की ब्याह के निचे रखा था और उधर अलका ने कूलर का बटन बंद किया. अर्जुन फिर थोड़ा कसमसाया जिसको देख ऋतू उसका सर सहलाने लगी. एक बार फिर से उसके ऊपर ठीक तरह से चादर देती वो गद्दे के निचे से ब्रा निकाल कर बिना टीशर्ट निकले कुशलता से पहन कर कड़ी हो गयी.
"मतलब रात कोई dhama-chaukdi नहीं की तुम दोनों ने?", अलका ने एक रबर ऋतू की तरफ बढ़ाते हुए मस्ती से कहा और ऋतू ने भी अपने खुले बालो को बाँध कर बड़ी मादक सी अंगड़ाई भरी. सीना कुछ पल के लिए यौवन उभार कर फिर से सही हो गया.
"धामा चौकड़ी करने के बाद मैं इसके थोड़ी न सोई होती. इसको आज भी वही दुलार चाहिए होता है जो ये बचपन में चाहता था. तेरे सामने हे है अलका की हम सब तोह फिर भी टाइम मिलने पर आराम और बाकी छोटे मोठे काम हे करते रहते है. इसका रूटीन और लाइफ ज्यादा हे काम्प्लेक्स है. खुदसे तोह ये माँ के पास भी नहीं जा सकता आराम करने और फ़िलहाल बेचारे की इधर ड्यूटी भी हम सबकी वजह से है तोह मुझसे जितना हो सकेगा कोशिश करुँगी ारु नींद तोह सही ले.", दोनों सीढ़ियों से दबे पाँव निचे उतर रही थी और अलका ने भरपूर स्नेह से एक बार ऋतू को गले लगा लिया. अर्जुन को नजर करके वो उसके पीछे हे चल पड़ी.
"बस एक यही तोह फरक है तुझमे और बाकी सभी में. सच कहु तोह मैं भी शायद एक बार तोह इसके साथ करती हे. लेकिन तेरी बात बिलकुल ठीक है यार. रात भी ये 11 के बाद हे आया था और तुम दोनों सोये तोह 12 के बाद हे होंगे. क्योंकि सवाल जवाब तोह तू किये बिना उसको थपकी भी नहीं देने वाली.", अलका ने बहार वाले कमरे के पास लगा नल चलाया तोह ऋतू मुस्कुराती हुई चेहरा धोने लगी. दमकता चेहरा भीगने के बाद अभी कही ज्यादा दिलकश दिख रहा था.
"वही बता रहा था के आजकल क्या चल रहा है. फिर मैंने थोड़ा बहोत उसके रिजल्ट, गाँव और शादी वाले दिन की बातें की. जब लगा की उसका ध्यान भटकने वाला है तोह अपने साथ लगा कर सुला दिया. वैसे आज मुझे आँचल दीदी को मार्किट लेके जाना है. दादी ने कहा था रात में की बेटी की बेटी है और जो सबके लिए लिया है वो उसको भी मिलना चाहिए. तू देख लेना पार्लर वाली को और मैं अलीशा आंटी को भी ले जाउंगी.", ऋतू भी बहार वाले रस्ते हे अंदर चली आयी अलका से बात करती हुई. इन दोनों की उम्मीद से अलग रसोईघर में गुरदीप और कोमल दीदी आ चुकी थी. गुरदीप जैसे अभी चेहरा धो के आयी थी लेकिन कोमल दीदी के कपडे बता रहे थे की वो नाहा चुकी है.
"क्यों, अर्जुन ले जायेगा इन सबको?", अलका ने रसोईग की तरफ देखने के बाद पानी की बोतल खोल कर एक घूँट पिया और फिर ऋतू को पकड़ा दी. फ्रिज से दूध का बर्तन इस तरफ आती कोमल दीदी को देने के बाद वो ऋतू से जवाब की प्रतीक्षा करने लगी. गुरदीप अंदर ट्रे में बिस्कुट और फीकी मट्ठी रख रही थी, उसको खाली चाय की आदत जो न थी.
"अलीशा आंटी से तोह जितना हो सके इसको (अर्जुन) दूर हे रखना है. सरकारी गाडी मिली हुई है तोह कोई दिक्कत नहीं आने वाली और तुझे मैं इसलिए ये सब बता रही हु की यहाँ भी उस बेवकूफ को bin-bulaai आफत से दूर हे रखना है. मेहमान ज्यादा हो गए है और हलकी सी भी गलती नजर न आ जाये." , ऋतू की बात सुन्न कर इस तरफ वापिस दूध रखने आयी कोमल दीदी भी मुस्कुराई जैसे उन्हें भी पता हो के चर्चा का विषय क्या है.
"वो तोह 11 से 2 के शो में जा रहा है. कहे तोह fer-badal कर दे?", अलका की बात हमेशा हे ख़ास अंदाज में होती थी.
"जरुरी है बदलना. सरोज मौसी और पूजा मामी उधर हे रुके है रात में. समय, स्वाति और कंचन हमारे कमरे में है. आज बाकी दोनों मामी भी आने वाली है और शालिनी बुआ भी आ जाएँगी.", ऋतू ने विस्तार से बयान कर दिया था घर और मेहमानो की रूपरेखा. अलका आशंकित थी की विन्नी इस पर क्या प्रतिक्रिया देगी.
"वो तोह मेहंदी से दूर हे रहेगा. वैसे भी गीत हे चलने है आज और बाकी लेडीज की मंडली लगेगी. दीदी की मेहंदी के साथ बाकी लेडीज भी वही सब करवाएंगी. काम पापा लोग देख रहे है जिसके लिए काफी लोग भी लगा दिए है. इसको कैसे व्यस्त कर सकते है?", अलका को भी भान था के अर्जुन को विन्नी दीदी के साथ जाना पड़ा तोह वो कोई न कोई तोह हल निकाल हे लेगा.
"जाने हे दो तोह बेहतर है. मुझे ज्यादा परेशानी वाली बात उसका इधर रहना लगती है. चंद्रो दादी जी भी आएँगी और जाने क्यों मुझे ारु का उनके सामने जाना ठीक नहीं लगता. अब तुम दोनों चाय पी कर फ्रेश हो जाओ बाकी जो सोचा है वैसे हे करना. अलीशा आंटी के साथ ऋतू, रोमिला आंटी को माँ के सिवा कुछ दीखता नहीं और प्रीती अपने आप कर लेगी बाकी सबकुछ.", कोमल दीदी के ऐसे स्पष्ट से जवाब से ये दोनों हे निरुत्तर हो गयी. अब वो जवाब भी नहीं मांग सकती थी क्योंकि कोमल दीदी कभी गलत भी नहीं कहती थी.
"मैं और अफसाना भी चल सकते है क्या ऋतू तुम्हारे साथ?", गुरदीप ने बड़े हे स्नेह से गुजारिश की थी. चाय की जगह वो गरम दूध का गिलास लिए थी और दूसरे हाथ में बिस्कुट.
"अफसाना मेहंदी लगवायेगी गुरदीप, कल हे बता चुकी है वो. और आज उसके ammi-abbu भी आ रहे है तुम्हारे मम्मी पापा के साथ हे. Jasleen-Keerti को ले चलेंगे तुम्हारे साथ साथ. भीड़ भाग से ाचा वह मार्किट में हे मस्ती करेंगे.", ऋतू ने पानी की बोतल रखने के बाद चाय का कप उठा लिया था. कोमल दीदी अब प्रियंका, रुपाली, ऋचा, विन्नी को उठाने चली गयी थी.
"हाँ ये भी ठीक है. वो अफसाना तोह गयी न गयी एक हे बराबर है. उसको रहने देंगे यही लेकिन मुझे न वह फिर से डोसा खाना है.", गुरदीप की बात सुन्न कर अलका ने सर पे हाथ रख लिया और कुछ ऐसा हे किया प्रियंका ने बहार आते हे.
"ओह सरदारनी, तुझे न सपने भी खाने पीने के हे आते होंगे. खा लियो डोसा भी और भठूरे भी. अब दूध पी कर तैयार भी हो जा. 5 बज हे गए है और तू रात 10 बजे से सोई हुई थी.", प्रियंका दीदी ने कपडे दुरुस्त करते कहा और गरुदीप नाक सिकोड़ती हुई वापिस कमरे में चल दी, दूध का गिलास और बिस्कुट की ट्रे लिए.
"कुछ भी कहो पिंकी दीदी, ये बंदी कमाल हे है. इंसान न इतना हे खुश और बेफिक्र रहे तोह बेस्ट है.", ऋतू ने हँसते हुए कहा और फिर शीशे की खिड़की से देखा तोह अर्जुन भी सीढिया उतर चूका था.
"चलो मैं तोह चली अर्जुन के साथ घर पे और आप लोग आ जाना यहाँ सब समेत कर.", अलका ने हाथ हिलाया तोह ऋतू हैरत से देखने लगी.
"कपडे बदल ले पहले नाहा कर. ऐसे हे जायेगी?"
"मेरे कपडे वह भी है और मेरा मूड नहीं इधर नहाने का. तू आ जइयो नाहा के कपडे बदल के. चलती हु पिंकी डार्लिंग.", अलका ने प्रियंका को आँख मारते हुए हाथ भी हिलाया और हिरणी सी फलांग मारती निकल चली. जाने अब उसने अर्जुन से क्या बात करनी थी.
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कृष्णेश्वर जी की बड़ी बेटी दामिनी घर के बहार वाले बाथरूम से अभी नाहा कर हे निकली थी क्योंकि अंदर और ऊपर वाले बाथरूम व्यस्त थे. गीले बाल तोलिये में बांधे वो एक साफ़ सलवार कमीज में अपने मांसल जिस्म को ढकने के बावजूद हर कटाव को दिखती हुई दूसरा टोलिया तार पर दाल कर जैसे हे मुड़ी तोह घर में दाखिल होते शंकर से नजरे 4 हो गयी. उमेद और इन्दर पहले हे अंदर जा चुके थे और इधर सिर्फ शंकर और दामिनी हे थे.
"कैसे हो शंकर भैया?", कजरारे नैनो ने होंठो से अधिक आवाज की थी और एक चमक शंकर की आँखों में भी उभरी.
"अब शायद ठीक नहीं हु.", शंकर ने ऊपर जाती सीढ़ी की आउट में खड़े होते हुए नलके से पानी पीने का उपक्रम किया तोह झुक कर हैंडल चलती दामिनी के वो उभारो की घाटी देख पानी अंजुली से बहने लगा. दामिनी बहोत ाचे से वाकिफ थी अपने इस भाई और उसकी नजरो से. और ये सब कटाई एकतरफा न था.
"मुझे तोह लगा था के डॉक्टर हो आप जो मुझे ठीक कर सकता है. पता होता की आप हे बीमार हो तोह फिर कही और इलाज देखती."
"मुझसे बेहतर इलाज करने वाला मिल गया है क्या कोई?", अब शंकर ने चुल्लू से पानी पीने के बाद दामिनी के करीब होते हुए उसी तोलिये से हाथ साफ़ किये तोह दामिनी के जिस्म में झुरझुरी सी दौड़ गयी. दोनों बहार खुले आँगन में थे इसलिए हरकत तोह मुमकिन न थी.
"जिस डॉक्टर से एक बार रिश्ता बना लिया न दामिनी ने फिर किसी और की देहलीज पर न गयी. आँचल सबूत है इसका जीता जागता. बाकी मुझे लगता है के डॉक्टर रक़ीब हो गया हो तोह फिर मेरी किस्मत हे खराब.", दामिनी हिम्मत करती हुई सबतरफ देख कर बिलकुल सत् हे चुकी थी इस मजबूत जिस्म से. शंकर अगर होनहार डॉक्टर और खतरनाक हैवान था तोह उतना हे आकर्षक व्यक्तित्व का धनि भी. शायद हे कोई stree/mahila जो शंकर के नजदीक आयी हो वो उसके व्यक्तित्व के सम्मोहन से बची हो. दामिनी तोह विवाह से पहले से हे अपना सबकुछ सौंप चुकी थी इस भाई को.
"शादी की जगह दिखा कर लता हु तुम्हे नाश्ते के बाद. बोल देना की कपडे और सामान लेना है.", शंकर ने भी आउट से निकलते हुए दामिनी की गोल नाभि पर हाथ फिर हे दिया था. रात भर ाची खासी शराब ने कुछ ज्यादा हे गर्मी बढ़ा दी बदन में और हॉस्पिटल से दूर होने की वजह से अब किसी को तोह ढूंढा हे था. सुबह सवेरे दामिनी से ये मीठी मुलाकात ने आधा काम तोह कर हे दिया था.
"दामाद और विनोद को फ़ोन लगा दियो दामिनी, टाइम से आ जायेंगे. कल बाटना और संजीव के मेहंदी भी लगनी है और फिर परसो शादी.", कौशल्या जी ने तुलसी में अर्घ देते हुए दामिनी से कहा तोह अपनी हालत दुरुस्त करती वो बस मुस्कुराती हुई बोली.
"जी ताई जी, मैं 9 बजे बात कर लुंगी. वैसे ये आज शाम तक आने का हे कह रहे थे कल जब बात हुई तोह. विनोद का कुछ होटल में मसला था नहीं तोह कल हे वो लोग यहाँ होते.", दामिनी ने एक नजर बगीचे से बहार देखा जहा रामेश्वर जी कुछ लोगो के साथ टहल रहे थे, चर्चा करते हुए. अर्जुन और अलका भी अपने दादा जी से मिल रहे थे और फिर वो दोनों घर में दाखिल हुए.
"ाची बात है अगर जरुरी काम था तोह. ओह बैल, तू कहा गायब रहता है रे? तेरे दोनों चाचा तोह अभी फिर से बिस्टेर टॉड रहे है और शंकर राजकुमार बाकी काम देखने में लगे है. तैयार हो कर शालिनी को लेने चला जा. बिटिया भी रस्मो में बैठेगी और बाकी तोह मुझे कोई दिख नहीं रहा जो काम का हो.", कौशल्या जी ने तोह अर्जुन को आते के साथ काम पे लगा दिया था. अर्जुन ने गर्दन हिलने के बाद अपनी दामिनी बुआ को भी नमस्ते की और दादी के करीब हे खड़ा हो गया.
"वो अगर हवेली आयी होंगी तोह फूफा जी भी तोह साथ हे आये होंगे न दादी.", अर्जुन का जवाब सुन्न कर उन्होंने अपने सर पे हाथ रख लिया.
"तभी तुझे बैल कहती हु रे मैं. घर में बिटिया को खुद लेके आया जाता है जब वो पति के साथ न आयी हो. तेरे फूफा शादी वाले दिन हे आएंगे और शालिनी 6:30 पे आने वाली एक्सप्रेस से लेके आना है.", अब अर्जुन को समझ आया था की हवेली की जगह उसको अपने हे शहर वाले स्टेशन से लेके आना है.
"जमा बुधुराम है रे तू तोह. भला वो हवेली आती तोह इधर आने में क्या संकट था उसको? टाइम देख ले और doodh-khuraak लेके चले जाना टाइम से. बाकी अब फिर तेरे लायक कोई काम नहीं. पटाके ले लियो भाई की घोड़ी के आगे चलने के लिए शादी में.", कौशल्या जी ने लाड से ऐसा कहा था और अर्जुन भी खुश हुआ के अब वो सबसे अलग अपनी मर्जी से वो सब करेगा जो उसने शादी के लिए सोच रखा था.
"वैसे मेहंदी सिर्फ लड़की के हे लगती है क्या दादी?", अर्जुन एक बार फिर चलते चलते ठिठक गया था और अपने पौटे की ऐसी बात पर दादी भी हंसने लगी.
"तेरे भाई के भी लगेगी रे. बस वो बनना है तोह पहले उसके कल बाटना लगेगा, फिर उसके मेहंदी लगाई जायेगी. माधुरी के आज करेंगे ये मेहंदी का शगन क्योंकि जब घर में एक साथ 2 विवाह हो तोह एक हे दिन दोनों बचो के मेहंदी की रसम नहीं करते. ाचा, वो विनीता का जो लेहंगा दिल्ली से लाये थे न उसका भी कुछ काम करवाना है तोह टाइम लगे फिर उसको मार्किट ले जाइयो.", कौशल्या जी ने तोह स्वयं से हे सब कार्यक्रम बना दिया था. अर्जुन मैं हे मैं कुछ गुनगुनाता हुआ अंदर चल दिया.
घर में अभी से रिश्तेदार और परिवार के लोग नजर आने लगे थे और भीतर वाले आँगन में तोह उसको ढेरो चेहरे दिखे. अभी वो अपनी खूबसूरत ताई जी और चची कृष्णा जी को हे निहार रहा था की उछलती कूदती स्वाति उसके सामने आ रुकी. दोनों एक पल तक बस स्थिर रहे और फिर स्वाति उसके गले जा लगी.
"तू न बहोत गन्दा है कालू.", स्वाति ने ऐसा बड़े स्नेह और मजाक से कहा था और अर्जुन ने भी उतने हे प्यार से अपनी इस ममेरी बहिन काम दोस्त को बाहों में भरते हुए सीने से लगा लिया.
"तू खुद हे देख ले हम दोनों का रंग. फिर बता देना कौन कला है. वैसे ाचा हुआ तू आ गयी, अब तैयार हो जा फिर आधे घंटे बाद मेरे साथ हे चलना.", अर्जुन ने स्वाति के सर पे हौले से हाथ फिरते हुए कहा. स्वाति की साफ़ बड़ी बड़ी आँखें बहोत से सवाल लिए थी, प्यार और तड़प के साथ. पर ऐसा तोह कुछ मुमकिन भी नहीं था.
"चल लल्ला तेरा दूध ले और स्वाति बिटिया, तुम्हारा भी माल्टोवा तैयार है.", ललिता जी ने इतने व्यस्त समय भी दोनों के लिए दूध के गिलास टेबल पर रखने के साथ खाने का भी सामान लगते हुए कहा. कृष्णा जी भी तब तक चाय के 2 कप लिए रेखा के कमरे में जा चुकी थी. अर्जुन और स्वाति अभी बैठे हे थे की अनामिका चची, आँचल और दामिनी बुआ भी उनके सामने वाली तरफ आ बैठी. ललिता जी ने उन्हें भी चाय और बिस्कुट परोसे पर तीनो के चेहरों पर भिन्न भिन्न भाव थे. अनामिका तोह हमेशा की तरह अर्जुन को देख मुस्कुरा रही थी वही आँचल अपने इस भाई से अभी तक ठीक से मिली भी न थी और अंतर्मुखी होने की वजह से वो बात करने से हिचक भी रही थी. दामिनी ने हे चर्चा शुरू की, जो अर्जुन को जान ने की ितचुक दिखी. शायद उसके पिता की वजह से.
"तुम मुझे पहचानते हो beta?",Swati भी इस आवाज पर दोनों तरफ देखने लगी क्योंकि उसके लिए तोह ये अजीब हे था.
"जी बुआ. क्सक्सक्सक्स आप वह रहते है न और कृष्णेश्वर दादा जी के सबसे बड़ी बेटी है. ये आँचल दीदी भी आपकी बेटी है. बस इस से ज्यादा नहीं मालूम और माहौल की वजह से बात भी नहीं हो सकीय आप लोगो से.", अर्जुन क्या कहता की वो तोह उनके पिता तक की जन्मकुंडली दबाये बैठा है. पर इनसे कोई man-mutaav तोह था नहीं.
"बहोत ाचे लेकिन सच कहु तोह मैं तुम्हारे बारे में सिर्फ नाम हे जानती हु. कुछ शंकर और इन्दर भैया जैसे हे लगते हो लेकिन जिन्होंने मेरे दादा जी को देखा है वो बता सकता है की तुम ज्यादा उनके जैसे ho.",Damini ने चाय का एक हल्का सा घूँट लिया और अनामिका की तरफ भी नजर की जिसके चेहरे पर इस बात से आश्चर्य आया हुआ था.
"फॅमिली में बचे बड़ो पर हे जाते है न बुआ जी? अब papa-chacha दादा जी जैसे दीखते है और थोड़े फीचर्स दादी जैसे है उनके. लेकिन कुछ केसेस में जनरेशन स्किप हो कर फोट्र्स dada-nana या pad-dada पर भी जा सकते है. वैसे आँचल दीदी इतनी चुप हे रहती है क्या हमेशा?", आँचल थोड़ा सकपका गयी थी क्योंकि वो अपनी माँ के करीब तोह कभी थी हे नहीं और पिता के साथ कुछ लगाव था लेकिन वो भी सिमित. अपने आप में रहने वाली इस लड़की ने बस एक पल के लिए अर्जुन को देखा और अपनी मामी अनामिका की तरफ सरक गयी.
"ये बात तुमने ठीक कही. ऐसा हो जाता है जैसा तुम कह रहे हो और मेरी बेटी कुछ इंट्रोवर्ट हो गयी है बड़ी होने के साथ साथ. और ये प्यार लड़की कौन है?", दामिनी का लहजा मिलनसार था अभी और अर्जुन ने भी स्वाति को इशारे से बात करने को कहा. वो अपनी खुराक थोड़ी थोड़ी चबाते हुए इधर उधर भी देख रहा था. आज तोह बाकी सभी बस नहाने और काम में हे लगे नजर आ रहे थे इनके सिवा. स्वाति की बगल में हे राजेश्वरी चची जी भी आ बैठी, अर्जुन के सर को सहलाती हुई. हमेशा की तरफ खिले हुए गुलाब सी और एक आकर्षक साड़ी में.
"जी मैं स्वाति शर्मा हु, अर्जुन के मां जी की बेटी. यही बड़े पापा (तेजपाल) के पास रह कर कॉलेज कर रही हु आंटी जी.", स्वाति ने जरुरी जवाब हे दिया और फिर खाली कप उठा कर वह से चल दी. अर्जुन के बताये अनुसार उसको अब तैयार भी होना था.
"आपसे तोह हमारी पुराणी पहचान है हे भाभी. वैसे पता लगा के ये जनाब तोह आपके भी बेटे है.", दामिनी जाने क्यों आज इतने सवाल कर रही थी लेकिन उसके ऐसा कहने पर राजेश्वरी जी ने एक बार फिर अर्जुन के सर को सहलाते हुए उसके कान के पीछे काजल का टिका लगाया और मुस्कुरा कर बोलने लगी.
"सबका हे तोह है ये दीदी. इसके चाचा (उमेद) ने जब ये खुशखबरी दी थी की अर्जुन के वो भी दत्तक पिता है उसके बाद हमने दूसरे बचे की कोशिश हे नहीं की. मिली जरूर मैं इस से 9 साल बाद थी फिर. जैसी मेरे लिए विन्नी है वैसा हे ये लेकिन अब इतने हक़दार है मेरे इस बेटे के की मेरी ममता का नंबर जरा दूर हो गया है.", राजेश्वरी जी की इतने अपनेपन से भरी बात सुन्न कर अर्जुन को भी एहसास हुआ था के वो ज्यादा बोलती नहीं थी पर उन्होंने हमेशा हे उसको ख़ास दर्जा दिया था. हमेशा हे अपने एकांत में रहने वाली वो थोड़ा बहोत किसी से बोलती भी थी तोह उसमे एक नाम अर्जुन का भी था.
"मतलब तोह फिर ये इस घर का विनोद हुआ.? हाहाहा..", दामिनी ने तोह जैसे ये बात ऊपरी तौर पर कही थी लेकिन अनामिका को झटका लगा ऐसी तुलना सुन्न कर और अगले हे पल सभी खामोश हो गए जब ये सख्त और हिदायत से भरी आवाज सुनाई दी.
"तुलना करना तोह ाची बात है दामिनी लेकिन बस व्यक्तित्व में कुछ समानता होनी चाहिए. इस घर में दो बेटे है और वो दोनों अपने लिए नहीं, परिवार के maan-ijjatt को प्राथमिकता देने वाले है, निस्वार्थ समर्पण के साथ. विनोद तुम्हारा एकलौता सागा है लेकिन इस घर में तुम भी इसकी बुआ हो, मधु भी और बाकी जो लगती है सो लगती है. यहाँ एकलौता जैसा कुछ नहीं होता जैसे राजेश्वरी बहु ने कहा न की अर्जुन उनका भी बीटा है.", ये थे राजकुमार जी, जो कुछ काम से अपनी माँ के कमरे से हो कर इधर आये थे.
"सॉरी राजू भैया, मेरा वो मतलब नहीं था. विनोद बस वह घर में अकेला लड़का है न और बेध्यानी में मुझे याद नहीं रहा संजीव बेटे का.", हमेशा खामोश तबियत राजकुमार जी की बात सुन्न कर एक पल को तोह दामिनी के साथ साथ आँचल भी सिहर गयी थी. लेकिन अनामिका को जैसे ये ाचा लगा था.
"मेरे प्यारे ताऊजी, बुआ तोह मजाक हे कर रही थी. अब मिल जल कर बैठे है तोह ऐसे हे बात करके पहचान बनाते है न? आपको न ताई जी बुला रही थी वैसे.", अर्जुन अपनी जगह से उठ कर अपने ताऊ जी के करीब आ गया. वो भी उसके हँसते चेहरे को देख मुस्कुराये और फिर दामिनी के बालो को हल्का से हिला कर चलते हुए बोले.
"मजाक मैं भी कर लेता हु बीटा बस ये अंदाज कुछ समय के लिए बंद किया हुआ था. दामिनी को भी पता है की मैं गुस्सा मजाक में हे होता हु.", अब दामिनी तोह मुस्कुराई हे लेकिन अपने पति को ऐसे देख आज ललिता जी के चेहरे पर ज़माने भर की ख़ुशी आ गयी थी. बरसो हे बीत गए थे जैसे राजकुमार जी को ऐसे देखे.
"आप तोह चलो जरा मेरे साथ. यहाँ 2-2 बचो की शादी होने लगी है आपके और आपका मजाक शुरू हो गया. संधान से करना ये सब बातें.", मुहफट्ट ललिता जी ने नकेल दाल दी थी ऐसा बोल कर पर राजकुमार जी के इरादे जैसे कुछ और हे थे.
"2-2 बचो के ब्याह की मुझे तुमसे ज्यादा ख़ुशी है ललिता देवी. 2-2 संधान भी तोह मिलेंगी इस बहाने और सुना है देविका तोह आज भी तुम्हारी टक्कर की है.", यहाँ जोरदार ठहाका आँगन में आती सरोज मौसी ने लगाया अरु झेंपती हुई कृष्णा जी भी हंस रही थी. हंसी की आवाजे सुन्न कर कौशल्या जी भी चली आयी और एकाएक अपने बेटे के करीब जा कर उन्होंने उसका माथा चूम कर दुआएं दी.
"अरे मेरे बचे, तू घर में ये आज बरसो बाद पता लगा. लगता है तेरे पापा के साथ कल रात रहना काम कर गया. ललिता, मेरे बेटे की मोजरिया निकाल के दे आज. पता लग्न चाहिए के राजू घर का बड़ा राजकुमार है. और तू बीटा ये कपडे की हंट उतार दे कलाई से, चल मेरे साथ अंदर.", कौशल्या जी उतने हे अधिकार और प्यार से अपने बड़े बेटे को लिए अंदर चल दी, राजकुमार को राजकुमार बनाने. ललिता जी की आँखों में अर्जुन के प्रति अब कही ज्यादा हे वात्सल्य और आभार था.
"वैसे न ताई जी, संधान वंधन कुछ नहीं होगी आपके सामने. शर्त लगा सकता हु के आपकी टक्कर बस आप हे हो.", अर्जुन मस्ती करता उनके गाल चूम कर ऊपर दौड़ गया और जाते हुए मौसी के गाल भी सेहला गया. बाकी सभी हंस रहे थे या हैरानी से बस उसकी कारस्तानी देख रहे थे.
"ऐ रेखा, संजीव से पहले इस लल्ला को चढ़ा रे घोड़ी. निगोड़ा अपनी ताई और मौसी को भाभी मान रहा है. पक्की घोड़ी न मिल रही तोह कोई काम चलौ हे देख ले.", ललिता जी के ऐसे मजाक पर तोह सबका हंस हंस के बुरा हाल हो चूका था. आँचल को भी ये सब बड़ा ाचा लगा था. इतना khush-haal परिवार भी हो सकता है उसने कल्पना तक न की थी कभी.
"बीटा, इसलिए मुझे इधर आना और रहना ाचा लगता है. यहाँ कोई भी किसी को नजरअंदाज नहीं करता. अपनी अनामिका मामी को हे देख लो, ये पहले से ज्यादा हे खुश दिख रही है न?", राजेश्वरी जी ने उठ कर रेखा के कमरे की तरफ जाने से पहले ये बात आँचल से कही थी जो अब थोड़ा झेंप गयी थी लेकिन उसकी माँ के चेहरे पर भरपूर ख़ुशी थी.
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"तोह जीजा, अब आप हे बताओ के क्या करना है? शंकर का सामना करने की हिम्मत नहीं है मुझमे.", सुबह के इस वक़्त आदत से विपरीत विनोद जल्दी उठ कर होटल के आलिशान कमरे में 2 कप में चाय भरता हुआ अपने जीजा पप शर्मा से बात कर रहा था. शर्मा के उल्टे हाथ की पूरी हथेली पर पट्टी बंधी थी, राजेश द्वारा दिए गहरे जखम की वजह से. रात इन्होने ाची खासी शराब पी थी लेकिन शायद उसका भी उतना असर न हुआ था.
"शंकर घर से बहार के हादसे कभी परिवार के बीच नहीं लेके जाता साले साहब. एक तरह से तोह देखा जाए तोह वो मामला अँधेरे में बस मिशन जैसा था. उन्होंने वो किया जो वो करने आये थे लेकिन हम तोह ज़िंदा है न? पर्दा उन्होंने भी रखा है विंडो तोह यही हमने करना है. जाना तोह होगा हे और नहीं गए तोह शायद वो मकसद भी कभी पूरा न हो पाए जिसकी कसम तुमने उठाई थी.", शर्मा ने चाय का कप उठाने से पहले कपडे सही से पहने और विनोद के सामने वाली कुर्सी पर आ बैठा.
"वैसे मेरे जितना या ज्यादा नुकसान तोह उन सबने आपका भी किया है. ख़ास कर शंकर भाई और राजेश ने. देखा जाए तोह आप शंकर के भी जीजा लगते हो और राजेश तोह आगे उसका भी साला है.", विनोद के कमजोर दिमाग में जाने क्या हे खिचड़ी पक्क रही थी और शर्मा की आँखे कुछ छोटी हो गयी.
"कहना क्या चाहते हो इस 'ज्यादा' नुक्सान से.? भागीदार तोह हम बराबर हे है न हर चीज में?", चाय का कप वैसे हे रखा था क्यूंकि विनोद ने बात जो इस तरह शुरू की थी. वो नौटंकी करता थोड़ा गंभीर चेहरा बनाते हुए अपने जीजा को देखने लगा.
"कहना तोह नहीं चाहिए क्योंकि इजत्त तोह मेरी भी खराब होगी ये बात बताने से.", विनोद ने अगली पहेली बुझाई तोह शर्मा से सेहन न हुआ.
"तू सीधा बोल न विनोद, ऐसे अधूरी बातें करनी है तोह फिर रहने दे."
"जीजा, शंकर भाई और दामिनी का सम्बन्ध है. शादी से पहले से है जो मुझे बस उस दिन हे पता चला जब आप आँचल को उसके कंप्यूटर सेण्टर छोड़ने गए थे. और ऐसा हे कुछ राजेश का भी है.", विनोद ने ये धमाका हे कर दिया था, चाहे आधा झूठ हे सही. लेकिन वो जैसे ठान चूका था की अब अगर बर्बाद होना है तोह फिर साम, दाम, दंड और भेद के साथ कलंकित भी करना पड़े तोह वो करेगा हे. शर्मा की तोह आँखों में खून हे उतर आया था ये सुन्न कर. उसने गुस्से में विनोद का गिरेबान पकड़ा तोह अपने साले के चेहरे पर दुःख देखते हुए जबड़े भींच कर हाथ हटा लिया.
"तू होश में नहीं है विनोद. ये बहोत गन्दी बात कही है तुमने और अगर इसके पीछे तुम्हारी कोई अलग हे मंशा है तोह साफ़ हे कह देते. दामिनी का चरित्र गिराने की जरुरत नहीं थी."
"मैं साबित कर दूंगा जीजा और खुद हे चुपके सुन्न लेना जब दामिनी कबूल करेगी मेरे सामने. मैं ये इसलिए कह रहा हु क्योंकि ये सिर्फ बस पैसे की लड़ाई नहीं रही, इजत्त और मर्दानगी का भी सवाल बन्न चुकी है. ठन्डे दिमाग से हे चलना होगा क्योंकि आमने सामने की जुंग में तोह हम एक मिनट न टिक सकेंगे. मैं शंकर की जड़ पकड़ता हु आप राजेश की. लेकिन पहले मैं साबित करूँगा जिस से आपको अपने साले पर थोड़ा विश्वास तोह हो.", विनोद ने अब चाय का कप खुद हे शर्मा के सामने कर दिया जो सदमे में बैठा था.
"जीजा, उस परिवार की एक कमजोरी मेरी समझ में आयी है और शायद उसने मेरी औरत को भी अपवित्र कर दिया है. कैसे भी करके सिर्फ वो इंसान गायब हो जाए तोह उनके बड़े बड़े 2 परिवार आधे ख़तम हो जाएंगे. अर्जुन जहा शंकर का बीटा है वही वो राजेश की तरफ भी वारिस है, कोई और लड़का उनके खानदान में न होने से. चाहे जितना भी समय लगे, हमको बस इस नाम को बड़ी सफाई से हटाना है.", विनोद ने अपने इरादे अब खुल कर जाहिर कर दिए थे जिस पर शर्मा ने सहमति जताई.
"अगर ऐसी बात है तोह वो शमशान (कंट्री फार्म) जमीन बेच कर आदमी लगा विनोद. इस लड़के की हर छोटी से छोटी बात और समय की खबर जमा करके शंकर की नेसल हे ख़तम करते है. बस ध्यान रखना की इस बार ये इस तरह होना चाहिए की कोई कड़ी हमसे न जुडी मिले. बदले के लिए अब 1 करोड़ का 10 भी लग जाए तोह गम नहीं. ये लड़का अब राख बनेगा चाहे इसमें 10 दिन लगे या फिर 10 महीने.", विनोद को शायद ऐसे हे जवाब की उम्मीद थी और वो अंदर हे अंदर खुश हो रहा था. जैसे उसने ठान लिया था के अब वो कुछ ऐसा करेगा की नुक्सान किसी का भी हो पर वो साफ़ बना रहे.
"बस फिर हम आज यहाँ से निकलते हे ख़ामोशी से इस पर लग जाते है जीजा. लेकिन पहले मैं सबूत दूंगा और फिर हे आप मेरा साथ देना.", कुटिलता में जैसे विनोद एकदम हे उचाई पर जाने लगा था.
"नहीं, दामिनी का जो भी है मुझे अब परवाह नहीं. नुक्सान के बदले बड़ा नुक्सान करके हे रहेंगे. तुम करो तैयारी चलने की और तोहफे ऐसे लेना की सब देखते रह जाए. चाहे 5 लाख लगे या 10 लेकिन उन्हें लग्न चाहिए की हम परिवार में हे है.", शर्मा सिग्रत्ते सुलगा कर बाथरूम की तरफ चल दिया. और विनोद बस बैठा अंदर हे अंदर हंस रहा था.
'जीजा, तेरी बीवी भी जायेगी, तू भी और वो शंकर का पिल्ला भी. लेकिन विनोद का दिल इतने से नहीं भरने वाला. आँचल को रंडी बना के रखूँगा अपनी और अब तोह जब तक जिन्दा हु शंकर का पूरा परिवार ऐसी दुर्घटनाये देखता रहेगा, साल दर साल.', विनोद ने खड़े हो कर अलमारी से 500-500 के नोटों की गड्डियां निकाल कर बिस्टेर पर फेंकी और कपडे बैग में भरने लगा. वो एक हे हादसे के बाद जैसे पूरी तरह बदल चूका था और उसका तरीका भी. परिवारों के बीच कुछ तोह बड़ा होना हे था चाहे विनोद को हे हानि हो और इसका मतलब था रामेश्वर और कृष्णेश्वर के बीच पक्की दरार. बस विनोद को जो ज्ञात न था तोह वो ये की शादी के बाद खुद अर्जुन हे उसके घर आने वाला था. ऐसे fer-badal की दूर दूर तक उसको आशंका न थी.
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यहाँ आज बहोत कुछ घटने जा रहा था. अर्जुन अपने साथ स्वाति को लिए निकल चूका था शालिनी बुआ के लेने, शंकर अपना कार्यक्रम बना चूका था दामिनी के साथ, कुछ बड़े मेहमान पहुंचने वाले थे पंडित जी के निवास पर और एक तरफ सारंग के परिवार में भी कुछ उथल पुथल हो चुकी थी. आने वाले समय में बहोत कुछ होने वाला था जिसकी प्रतीक्षा थी या फिर कोई उम्मीद भी नहीं.