Incest Pyaar - 100 Baar - Page 39 - SexBaba
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Incest Pyaar - 100 Baar

जल्द हे इस कहानी के शुरुवात वाले 20 अपडेट थोड़े एडिट होंगे.
 




Raghav1997 भाई लीजिये हमारे नाम के साथ एक चित्र पेश है
 
अपडेट तोह जरूर आएगा आज क्योंकि काम जितना भी हो अब काम ये कहानी हे है. बहोत टाइम बाद आज व्यस्त रहने के बावजूद ाचा लगा. और ऐसा बिलकुल भी नहीं लगा की मैं यहाँ गुमनाम था और आज लगभग सामने हु. लेकिन फिर भी सभी लोग हम हे तोह हैं. वही प्यार 💯 बार वाले. तोह बस थोड़ा समय दीजियेगा मैं अपडेट पोस्ट करूँगा. साथ हे थोड़ा काम इंटरनेशनल मार्केटिंग का पता करने में लगा हु तोह देरी हो रही
 
अपडेट 182 (बी)

अंताक्षरी

"ये संजीव क्या कह रहा था भोले? इतनी जेटली बातें जो मेरे भी दिमाग के ऊपर से निकल रही थी और वो तुझे समझ आ रही थी?", दिवार की मुंडेर से पाँव लटकाये नरिंदर इस गहरी रात में अपने बड़े भाई से वो सबकुछ जान न चाहता था जो शंकर ने उसको पहले कभी बताया नहीं.

"ये संजीव भी न कभी कभी ज्यादा जज्बाती हो जाता है इन्दर. आज पहले हे ये लकी के साथ आधी बोतल गटके बैठा था और ऊपर से दूसरे ब्रांड की इस बोतल के 3 पेग जल्दी जल्दी खींच कर कुछ भी अंतत शन्तत बोलने लगा. सच तोह ये है की वो अर्जुन के लिए कही ज्यादा हे लगाव रखता है. तेरे इशारे से जैसे उसको लगा की कही विष्णु वाले मामले में अर्जुन न शामिल हो जाए तोह वो अपने दलील के साथ भाई का प्यार हे दिखने लगा. तू भी तोह मेरे लिए ऐसा हे है न?", शंकर कैसे भी करके अपनी बात को सही करना चाहता था क्योंकि कुछ पहलु सचमुच उसने नरिंदर से धक् कर रखे थे वर्तमान हालात में.

"चुटिया जरूर हु भाई लेकिन mand-chutiya नहीं. ये ऋतू वाला मामला क्या है? और अर्जुन क्यों बेहतर है इसकी जांच संजीव ने जिस तरह करके समझाई है उस से लगता है की अभी तक तू भी अपनी औलाद को सही से नहीं जान पाया.", नरिंदर ने हालात को समझते हुए सिर्फ वही 2 सवाल किये थे जिन्हे बताने में शायद शंकर को मुश्किल न होती, काम से काम नरिंदर के सामने तोह नहीं. एक गहरी आह भरने के बाद शंकर ने अनंत आसमान में फैले उस अन्धकार और सितारों को देखा.

"हाँ ये भी एक नस्लीय परिक्षण जैसा हे तोह है इन्दर. कोमल गुणवान है और वो पहली संतान के हिसाब से ज्यादा अपनी माँ पर गयी. ऋतू के मामले में मेरी चाहत एक और बेटी की थी जिस से मेरे गुण उसमे अधिक है लेकिन अर्जुन जब हुआ तोह वो बस दिल की चाहत सी थी की अब एक तोह बीटा हो जो तेरे या मेरे जैसा हो. रेखा भी उस समय हद्द से ज्यादा ज्ञान और साहित्य के बीच रही. समय से थोड़ा पहले हो गया था नहीं तोह तेरे वाले के साथ हे होना था उसने. फिर जैसे वो संगर्ष करता हुआ पैदा हुआ था तोह मृत्यु को शिशु अवस्था में परास्त करके वो साबित करता है की उसमे पहली दोनों सन्तानो से कही ज्यादा हे ख़ास और स्ट्रांग डीएनए है. जानता है उसके एपिलेप्सी अटैक के टाइम मेरे डॉक्टर दोस्त ने क्या कहा था?", शंकर जैसे अब अपने पेशे और समूचे ज्ञान के साथ साथ घटनाओ को भी मद्दे नजर रखता हुआ अपनी बात बताने लगा था.

"क्या कहा था उस वक़्त डॉक्टर ने शंकर जिसने तुझे इतना प्रभावित किया?", नरिंदर भी जैसे बाकी सवाल भूल कर अब ये जान न चाहता था की उसके भतीजे में आखिर क्या विलक्षण है.

"उसकी इम्युनिटी साधारण से 2-3 गुना ज्यादा है भाई. ब्रेन से ऑक्सीजन डिसकनेक्ट होने पर भी अर्जुन आधा पौने घंटा बेहोश रहने के बावजूद झेल भी गया और जिस्म पर कोई गलत प्रभाव भी नहीं पड़ा. माँ भी जैसे उसको हमसे बेहतर समझती है और उनकी वो अध्भुत्त खुराक अर्जुन का जिस्म बड़े आराम से सेहन करके खुद को परिपक्व बनता जा रहा है. ग्रोथ होर्मोनेस कही ज्यादा एक्टिव होने के साथ हे ओवरआल इम्पैक्ट या कहु प्रभाव दे रहे है. वो एकसार है. बस जो समझ नहीं आ रहा है वो है उसका मेन्टल रिएक्शन. क्योंकि वो डिसकसे हे नहीं करना चाहता किसी के सामने. और जो तेरा सवाल था ऋतू वाला तोह उस पर मैं कहूंगा की ऋतू उसके ये सब राज मेरे या उस डॉक्टर से ज्यादा ाचे से जानती है. अर्जुन इमोशनल और मेन्टल लेवल पे जैसे अपनी बड़ी बहिन पर निर्भर भी है और कनेक्टेड भी. तू समझ रहा है न मेरा मतलब इन्दर?", शंकर ने बड़े हे सलीके से सबकुछ पेश किया था अभी तक.

"हैं.. हाँ भाई मैं गौर से सुन्न रहा हु और समझ भी रहा हु. पर संजीव ने ऐसा क्यों कहा की ऋतू असली कृष्ण है? बाद में सुभद्रा कहा जिसका तोह असामाजिक मतलब है और ऐसा हुआ तोह ये माफ़ करने लायक होगा क्या?", नरिंदर ने अपनी बात अब स्पष्ट कह दी थी.

"जब अर्जुन निर्भर हे ऋतू पर है बचपन से और 9 बरस के अंतराल के बाद ऋतू को खुद लगभग एक और साल लगा अर्जुन से व्यवहार सही करने में तोह तुझे क्या लगता है इन्दर की ऐसा व्यक्ति अपनी मानसिक और आंतरिक लगाम किसी अन्य को सौंप देगा? यहाँ फिर से गेन्स हावी है और ऋतू के केस में जैसे मेरा प्रभाव अधिक रहा वही इधर है. तू खुदको और मुझे हे ले. हम दोनों में विवाद क्यों नहीं होता जबकि हम तोह एक जैसे हे है.?", इस बात ने जैसे नरिंदर को सोचने पर हे मजबूर कर दिया था. बहोत हे अटूट और आत्मीय जुड़ाव था शंकर और नरिंदर के दरमियान जिसमे शंकर निर्देशक और नरिंदर करता की भूमिका में होता था. तालमेल भी जैसे खून की वजह से उतना हे बेजोड़ था.

"मतलब तू कहना चाहता है की अर्जुन haal-filhaal में जो कर गुजरा है वो सब इसलिए क्योंकि ऋतू उसकी मार्गदर्शिका है?"

"नहीं. वो भी होगा कुछ हद्द तक लेकिन अर्जुन भावुक है, जैसे की तू और ऋतू वास्तविक है जैसे की मैं. आदर सिर्फ रिश्ते में बड़े होने का है इन्दर. लेकिन असल बात वही है घूम फिर कर. उन्दोनो का परस्पर जुड़ाव, जैसा संजीव ने कहा था. और अगर तुझे वो 2 दिन पहले वाला किस्सा याद हो जो लड़का असगर वाले मामले में हमारी देहलीज पे चला आया था तोह तू और ाचे से समझेगा."

"हाँ तोह वह हुआ क्या था सही से तोह शायद पता भी नहीं लगा.?"

"अर्जुन उसको समझाता रहा बिना कोई झगड़ा किया लेकिन जैसे हे उस लड़के ने गलत नजर से ऋतू को देखा तोह सिर्फ एक हाथ पड़ने पर वो लड़का सड़क पे लगभग मूर्छित सा हो गया था, कान पर गहरे कट के साथ. और ठीक अर्जुन के अगले वार से पहले ऋतू का उसका हाथ पकड़ना और अर्जुन का ऐसे शांत हो जाना जैसे वो कभी गरम हुआ भी न हो. जैसे तू मेरी उस बीमारी को ठंडा कर देता है इन्दर, उस से बड़ा कुछ अर्जुन में है और उसकी दवा ऋतू. मेरे मामले में वो समय अधिकतर आता भी तभी था जब तुझ पर कोई बात हो और अर्जुन के मामले में भी.", शंकर की आँखों में जरा भी नींद न थी बेशक सुबह दर्जनों काम थे और जिम्मेवारियां भी.

"ओह... तोह रूद्र वाली बात मजाक नहीं थी जो मुझे कृष्णा ने बताई थी? फिर तोह ये अलग भी नहीं हो सकते क्योंकि अर्जुन ....

"एक्साक्ट्ली. और यही संजीव कहना चाह रहा था. ऋतू समझदार है लेकिन उसके बिना अर्जुन ऐसा जैसे सौरमंडल में कोई उल्का पिंड. बेतहाशा गति से घूमता, क्षति पहुँचता और लक्ष्यहीन उल्का पिंड. बचपन वो क्रोधित होता था जब उसको प्रीती से दूर करते थे या उसकी बात नहीं मानी जाती थी लेकिन तब भी वो ऋतू के पास जाते हे ठंडा. फिर उसका जो भीम वाला हादसा हुआ तोह वह उसने अपनी हद्द तोड़ी थी मेनका की वजह से. मिश्रा के लोंडो और आदमियों की ठुकाई की थी तब भी वजह ऋतू हे रही होगी. सुदर्शन और उसके दोस्तों को खस्ताहाल किया तोह वजह प्रीती या मंजू और वो रुका भी इनके हे रोकने से लेकिन तबाही करने के बाद. ऐसे और भी घटनाक्रम है इन्दर जिनमे अगर अर्जुन शामिल हुआ तोह भावुकता और जुड़ाव की वजह से. लेकिन वो शांत भी अपनों के कहने पर हो जाता है पर कर गुजरने के बाद. सिर्फ उसकी बड़ी बहिन हे है जो उसको तत्काल में हे ठंडा कर सकती है. और मेरे लिए अपने जीवन का सबसे जटिल केस भी मेरे बचे है और एक खामोश तूफ़ान भी.", शंकर के लफ्ज़ो में उभर आये दर्द को तुरंत हे नरिंदर पहचान गया था. खड़े हो कर वो अपने भाई के कंधे पर हाथ रखता हुआ बस इतना हे कह पाया.

"तुझे जो डर लग रहा है न शंकर उसकी परवाह मैट कर मेरे भाई. तू उसको अपनी ताक़त बना के देख और अब मुझे ये कही से भी gair-samaajik नहीं लग रहा. ऐसे प्यार को तोह नाम देने की हिम्मत हम जैसे तुच्छ मनुष्य कर हे नहीं सकते. उनमे जो पारलौकिक जुड़ाव है इसका तोह मान करना चाइये मेरे भाई. हर जगह हमने कानून और नियम की धज्जियाँ उड़ाई, इस समाज की गांड पे हल चलाया लेकिन आज अगर बात अपने हे बचो के भविष्य और उनके भलाई की है तोह फिर तोह दुगनी माँ छोड़नी चाइये इन नियमो की. मेरा बीटा कभी बेलगाम उल्का पिंड नहीं बनेगा. वो चन्द्रमा और धरती वाला कनेक्शन कहना मुझे ज्यादा सही लगता है. अब दिल हल्का कर ले और आजा तेरे सर की मालिश करके मैं तुझे supt-grah ले चालू.", नरिंदर ऐसे माहौल में भी हलकी मस्ती करता अपने भाई को लिए 2 गड्डो की तरफ चला आया. और सचमुच दोनों सोने लगे तोह वो शंकर के बालो में हलके हाथो से ख़ास तरह उंगलिया फिरता जल्द हे उसको नींद के आगोश में भेज चूका था.

'वाह रे उपरवाले. तेरी लाठी में सचमुच आवाज नहीं.', सोने से पहल नरिंदर ने मुस्कुरा कर मैं हे मैं ये कहा और आँखे मूँद ली. दिल अब हल्का हो चूका था सबकुछ जान लेने के बाद.

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अभी दिन निकलने से पहले का अन्धकार हे था जब अलार्म घडी की आवाज से मंजू की नींद उचट गयी. ये आवाज उसके mata-pita के कमरे से आ रही थी. अलसाई सी मंजू ने उठने से पहले रुक रुक कर अंगड़ाई ली तोह कमर से ऊपर एक ख़ास एहसास पाया. स्वतः हे चेहरे पर वो दुर्लभ मुस्कान उभर आयी उसकी कोख को सींचने वाले का चेहरा विचार करते हे.

'बस यही इत्छा है भगवन से मेरी. जब भी ये आँखें खुले तोह तुम्हे ध्यान करू और जब भी बंद हो तोह तुम्हारी हे तस्वीर से.', मंजू ने अपना ढीला सा बास्केटबॉल वाला लम्बा टीशर्ट ठीक करने के बाद निर्वस्त्र टांगो को एक सलवार से ढाका और बाल बनती हुई कमरे से बहार चली आयी. अभी 4 बजने में 5-10 मिनट बाकी थी. घर में एक बार फिर ख़ामोशी छ चुकी थी शायद सरोज जी या दलीप जी ने अलार्म घडी तुरंत हे बंद कर दी होगी.

'अब इतनी जड़ली वापिस हे उधर जाना था तोह वही न रुक जाते सब. लेकिन नहीं.', खुद से हे बतियाती हुई मंजू बाथरूम में हलकी होने के दौरान यही सब सोच रही थी. दलीप जी तोह उधर हे रुकने के पक्षधर थे लेकिन सरोज जी ने बहिन का ससुराल वाला हवाला देके ऐसा होने न दिया. कुछ सोच कर मंजू ने एक बार फिर सलवार जिस्म से जुड़ा करके बाथरूम की खूंटी पर चढ़ा दी. अब वो टीशर्ट भी नदारद थी उसके सुत्वा लम्बे चमकदार जिस्म से.

'िष्ठ्हह... जब ये मुआ पेट में नहीं आया था तोह इतनी आग नहीं भड़कती थी लेकिन अब तोह लगता है की हर वक़्त बस इसको सहलाती राहु.', मंजू का जिस्म कामज्वर में तपने लग रहा था जिस पर गिरता ठंडा पानी भी जैसे तपिश भेदने हे लगा. इस मीठी चुभन से खुद हे उसकी लम्बी पतली उँगलियाँ दोनों जांघो के बीच स्थित फूली हुई लम्बी फांको पर चलने लगी. अर्जुन से मिलने से पहले तक वो ऐसी क्रिया को गन्दा समझती थी लेकिन अब हालात ये था की जबतक वो सोने से पहले और उठने के बाद एक बार अपनी मुनिया को रगड़ न लेती, उसका शरीर गर्मी बढ़ता हे रहता.

'उम्म्म..', एक हाथ दिवार पर टिकाये मंजू अपने दूसरे हाथ से लगातार अपनी योनि की गीली फांको को मालिश के अंदाज में मसलती रही. उन्माद भड़ने पर दूसरा हाथ दिवार से हटा कर अपने एक नुकीले निप्पल से सुसज्जित गोल उभर पर रखती वो अब नरम चुके को भी दबाने लगी. अर्जुन ने खासी म्हणत की थी उसके सीने पर जहा अब छोटी मुसमंबियों की जगह बड़े कंधारी अनार विपत थे. उनका कसाव बरकरार था लेकिन एक मुलायम लमस के साथ. हर गुजरते पल के साथ मंजू का चेहरा और लाल होने लगा. न चाहते हुए भी उसकी सिसकियाँ बाथरूम में चलते पानी से तेज होने लगी. छूट ने कॉमर्स को जांघो पर भेजने की भरपूर कोशिश की थी लेकिन बेहटा फुहारे का पानी जैसे किसी भी निशाँ को पनपने नहीं देना चाहता था.

"आअह्ह्ह्ह.. अर्जुनननननन.", निढाल सी होती मंजू सबकुछ भूल कर बाथरूम के संगमरमरी फर्श पर हे पसर गयी. सासें उखड चुकी थी जिन्हे संभालना शायद अभी उसके वश में न था. ऊपर से निरंतर गिरता पानी भी जैसे इन साँसों को झुटलाने में असफल हे रहा. 5 मिनट बाद मंजू की चेतना लौटी तोह वो जैसे तैसे कड़ी हुई. दरवाजे के दूसरी तरफ से जाने कबसे उसकी माँ सरोज किवाड़ थपथपा रही थी.

"आईई.. माआ.. चैन से नहाने भी नहीं देती हो.", फिर से मंजू के चेहरे और आवाज में वही अंदाज लौट चूका था जिसके लिए वो प्रख्यात थी. पहले से बाथरूम में टेंगा टोलिया सीने पर लपेट वो गीली टांगो पर सलवार चढ़ाये बहार निकली तोह उसकी माँ के चेहरे पर अलग हे भाव नजर आये.

"10 मिनट से आवाज लगा रही हु और 100 बार दरवाजा पीटा होगा मैंने. 4 बजे तू अंदर घुसी थी लेकिन अब घडी साढ़े 4 बजा रही है. और थोड़ा ख़याल रखा कर खुदको ठंडा करते वक़्त. बाप भी है घर में लेकिन नहीं तुझे तोह भोपू में नाम बजाना है अर्जुन अर्जुन का. कर लियो वह जा के उसके साथ लेकिन दिन शुरू करे तोह राम का नाम लिया कर अर्जुन का नहीं.", ये सब सरोज बहोत हे धीमी आवाज में कह रही थी जैसे वो कमरे तक अपनी आवाज जाने न देना चाहती हो. मंजू भी ये सब भांप कर हलकी सी शर्म के बावजूद मुस्कुरा रही थी. सरोज ने बेटी के सीने पर सिर्फ टोलिया देख माथा हे पीट लिया.

"बात ऐसी हैं माँ के अब न वो दामाद हे है आपका चाहे लगती उसकी मौसी हो आप. और रही बात उसके पास रहने की तोह वो खुद हे आता जाता रहता है मेरे घर. लेकिन फिलहाल जरा माहौल bhid-bhaad वाला है तोह बस याद हे कर लेती हु. हो जाओ तैयार आप भी अपने मुन्ने से मिलने के लिए और मैं चली अपनी कमरे में.", मंजू ने आँख मार कर सीढ़ियों का रुख किया और कुलांचे मारती सी निकल चली.

'क्या करू इस घोड़ी का अब मैं? एक तोह रिश्ते का कोई नाम भी नहीं रहा और ऊपर से ढिटाई तोह देखो. वैसे इसकी भी क्या गलती है जब वो लड़का प्रेम की चुम्बक हे ऐसी धारण किये है. भगवान् बस इन्हे बुरी नजर से बचाये और सब ठीक करे.', सरोज ममतावश दुआ मांगने से कहा चूकती और फिर अर्जुन का ध्यान आते हे उसके भी चेहरे पर मुस्कान आ गयी. सचमुच वो कोई आसानी से भुलाया जा सकने वाला किस्सा तोह न था. वो तोह सहेज कर रखने के साथ फिर दोहराने वाला prem-snaan था जिसके बारे में सोच कर हे प्रेमिका रास बहाने लगे. इधर दलीप जी भी आँखें खोल चुके थे और प्रतीक्षा में थे की कब उन्हें चाय मिले और दिन शुरू हो.

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छोल साहब के घर के बहार ये टैक्सी नंबर प्लेट वाली गाडी रुकी तब असगर खाली प्लाट में छिड़काव कर रहा था. असगर की भी जैसे दिनचर्या भोर होने से पहले हे शुरू हो जाती थी. रात से जगमग रंगबिरंगी लड़ियाँ अभी भी झिलमिल थी और इधर कार की पिछली सीट से ये छरहरा सा gora-chitta व्यक्ति उतरा तोह असगर लपक कर आगे बढ़ा. आँखों पर बिना डंडी वाला नजर का महंगा चस्मा और चुस्त कमीज पतलून के साथ हे शारीरक भाषा किसी रईस विदेशी हिंदुस्तानी की थी.

"लाइए साहब, आपका सामान मैं निकल चलता हु.", असगर ने इस व्यक्ति को कार की सीट से बड़ा बैग निकलते देख आगे बढ़कर खुद हे मदद की. एक पल के लिए इन साहब ने बड़ी कृतघ्यता से असगर को देखा जिसकी deel-dol तगड़ी होने के बावजूद चेहरे से साफ़ जाहिर होता था के वो नेक मेहनतकश व्यक्ति है. टैक्सी के ड्राइवर ने डिक्की का टाला खोल कर 2 बैग और बहार निकले तोह असगर ने उनमे से भी एक बड़ा वाला उठा लिया.

"थैंक यू दोस्त. तुम्हे पापा ने सिक्योरिटी पे रखा है या ताऊ जी ने? वैसे मेरा न विवान पूरी है और मैं छोल सतीश पूरी का बीटा हु.", ड्राइवर को 500-500 के कुछ नोट देने के साथ हे इन साहब ने एक बड़ी सी गुड़िया अपने हाथ में लेने के साथ हे दूसरा बैग भी कंधे पर दाल लिया. ये थे प्रीती के पिता जो अमेरिका से दिल्ली और अब दिल्ली से सीधा इधर पधारे थे. उनकी बात पर असगर अदब से मुस्कुराते हुए बोलै. विवान जी तब तक गेट की तरफ चलने लगे थे और उनके पीछे असगर.

"जी सर, मैं यहाँ shubh-utsav पर खानसामा हु और पंडित जी के साथ साथ आपके पिता जी ने भी हमारी बहोत मदद की है. आप जरूर हिंदुस्तान से बहार रहते है.", असगर ने एक नजर वापिस जाते taxi-wale को देखा और फिर गलियारे से चलते आये छोल साहब को. टाला खोलने के बाद छोल साहब बड़ी हे गर्मजोशी से अपने बेटे से गले लग कर मिले थे. असगर ने दोनों बैग अंदर वाले दरवाजे के पास सावधानी से रख कर बहार का रुख किया तोह उसको भी उन्होंने रोक लिया.

"अरे असगर मिया, भाई तुम सभी को खाना खिलते हो तोह कभी एक प्याली चाय हमारे घर की भी पी लो. ये विवान है, हमारा बीटा और विवान आदत के अनुसार तुम तोह जरूर मिल हे लिए होंगे असगर से?", असगर ने दोनों हाथ जोड़ दिए थे और तबतक अंदर से रोमिला भी saaf-suthre परिधान में इधर आ चुकी थी.

"नहीं साहब, आपकी ये चाय की प्याली उधर रही हम पर. पानी का छिड़काव करने के लिए आया था और अभी नहाने के बाद वापिस आऊंगा. झूठे मुँह चाय पीना किसी भी रसोइये के लिए गलत है. इजाजत चाहता हु जी और छोटे साहब, अगर कुछ खास भी बनाना हो तोह बेझिझक कहियेगा. कॉन्टिनेंटल में भी हाथ बराबर चलता है मेरा.", असगर ने विदा लेने से पहले फिर से दोनों को प्रणाम किया और घर से निकलते हुए दरवाजा वापिस ढाल दिया.

"तोह फ्लाइट में कोई परेशानी तोह नहीं आयी? तुम तोह बरखुरदार 2 दिन पहले आने वाले थे लेकिन लगता है अमेरिका कुछ ज्यादा हे रास आ रहा है. चलो बाकी बात कॉफ़ी पर करते है.", विवान ने अभी तोह वो ढाई-3 फ़ीट की गुड़िया अपने सीने से हे लगा राखी थी और उनके पिता एक तरफ तोह दूसरी तरफ रोमिला साथ थी.

"सफर तोह आपको पता हे है पापा इन कनेक्टिंग फ्लाइट्स का. परसो हे आ जाता लेकिन वो कृष्णा भाभी के कुछ रिपोर्ट्स लेने थे जिस वजह से थोड़ा समय लगा. आप तोह जैसे पहले थे अब उस से भी कही ाचे दिख रहे हो. और ये मैडम एडजस्ट हो गयी क्या?", अपनी बीवी का कन्धा प्यार से दबाते हुए विवान ने थोड़ी मसखरी करनी चाही लेकिन रोमिला ने मुँह बनाते हुए हाथ झटक दिया. स्वाभाविक triya-charitra जब पति को निचे लाना हो अपने. तीनो हे अब तक हॉल में आ चुके थे. मुकेश सारा सामान अब रोमिला के कमरे में रखने लगा था.

"रोमिला तोह प्रीती से भी जल्दी एडजस्ट हुई है यहाँ. और मैंने एक भी शिकायत नहीं सुनी अपनी बहु से की उसको किसी प्रकार की तकलीफ हुई हो. बाकी अब तुम आ गए हो तोह तुम्हारी संतुष्टि का ध्यान जरूर रखेंगे भाई. खैर, कॉफ़ी पीने के बाद कुछ आराम करना चाहो तोह कर लेना. बाद में व्यस्त होना हे पड़ेगा.", अपने ससुर द्वारा तारीफ करने पर खूबसूरत रोमिला के चेहरे पर कही ज्यादा हे चमक आ चुकी थी. वही पारवती ने टेबल पर तीनो के लिए कॉफ़ी के कप रखने के साथ हे बहार से लाया हुआ अख़बार छोल साहब को थमा दिया.

"वैसे लगता है अब आर्मी वाले असूल थोड़े ढीले हो गए है आपके, पापा. नहीं तोह 5 बजे तक तोह घर में सब जाग हे जाते थे पहले."

"बरखुरदार, तुम जब यहाँ रहते थे तब घर में army-man था. अब यहाँ इतने बरसो से एक पौती का दादा रहता है जिसकी दुनिया बस अपनी उस पारी के ird-gird हे है. वो जब उठेगी तब उठेगी लेकिन तुम अभी भी यहाँ नियम फॉलो करोगे.", छोल साहब ने हँसते हुए हे चेता दिया था के जिस घर की यादें विवान उन्हें याद करा रहा है वो दशकों पुराणी बात है.

"जी सर.", मजाक में विवान ने थोड़ा जोश में कहने के साथ हे सलूट मारा तोह इस बार रोमिला ने उन्हें चुप रहने का इशारा करके घुड़की दी.

"बचे सो रहे है विव. और भाभी के साथ विक्की भी अपने कमरे में सोई है. कुछ गेस्ट्स भी है यहाँ तोह थोड़ा ध्यान रखो.", रोमिला ने वो बड़ी सी गुड़िया उठा कर प्रीती के कमरे का रुख किया. यहाँ विवान अब साधारण होता हुआ कॉफ़ी की चुस्की लेने लगा.

"मतलब ये सच है की शंकर भैया के बेटे के साथ हे प्रीती अब जीवन व्यतीत करेगी? मतलब ऐसा नहीं है की मैं कोई सवाल कर रहा हु लेकिन बस थोड़ा क्लियर करना था आपसे.", विवान ने वही एक पिता वाला सवाल किया था जिस पर छोल साहब मुस्कुरा दिए.

"तुम्हारी माँ की इत्छा थी बेटे की उसकी पौती या पौता भाई साहब के घर से हमारा ऐसा रिश्ता बरक़रार रखे जिस से कभी भी परिवार अलग न हो. खैर मैंने ये सब थोपा नहीं है और नहीं हे उस बचपन वाले किस्से पर भाभी जी ने कोई जोर दिया था. दोनों बचे एक दूसरे के साथ हे खुश रहते है विवान और तुम अर्जुन से मिलोगे तोह अगर वो तुम्हे ठीक न लगा तोह मैं जरूर भाई साहब से चर्चा करूँगा. आखिर तुम हे तोह अकेले शुब्चिन्तक हो प्रीती के.", इस जवाब पर विवान जैसे झेंप सा गया था और नजरे झुकाये वो कॉफ़ी की भांप लेता रहा. रोमिला अपनी बेटी के कमरे से बहार आ चुकी थी, दरवाजा बंद करके.

"ऐसा है विव की तुम अर्जुन से काबिल लड़का अगर ढून्ढ दो तोह मैं पूरी उम्र तुमसे कोई सवाल नहीं करुँगी. लेकिन उस से भी जरुरी बात है एक bhara-poora सुलझा हुआ परिवार जिसमे हर इंसान को उसका व्यक्तिगत स्वरुप स्वतंत्रता से मिलता है. एक पल के लिए अर्जुन को भुला भी दो तोह ये तोह नहीं भुला सकते न की प्रीती ने मेरे बाद एक माँ का सुख रेखा में हे पाया है. रेणुका पे तुमसे ज्यादा हक़ शंकर जताता है भाई के रूप में.", अभी रोमिला कुछ और भी बोलती की विवान कप एक तरफ रख के जोर जोर से हंसने लगा.

"हाहाहा.. तोह फाइनली तुम्हारे सभी सवाल और शक ख़तम हो हे गए न रोमा? यू वेरे था ओने हु वास् हेसितांत एंड वरीड. ी वास् सूरे एंड ी विल रेमें फॉरएवर. ताऊ जी तोह हैं हे एक गहरा समंदर जो खुदके पास कुछ न रखते हुए सबकुछ बाँट देते है. शंकर भाई, इन्दर और यहाँ तक की मधु भी जिसको दिल से एक बार मान लेते है फिर उसका साथ नहीं छोड़ते. ताई जी ने तोह खैर कभी मुझे हे ये एहसास नहीं होने दिया की मैं उनका बीटा नहीं हु. पापा को उन्होंने हे मनाया था जब मैं बहार जाना चाहता था. और अर्जुन, रेखा bhabhi-Shankar भैया का बीटा. उस से बेहतर क्या हे होगा मेरी पारी के लिए? ये दोनों शायद इसलिए हे अगल बगल में पैदा हुए होंगे की बाद में बीच वाला प्लाट कब्ज़ा सके.", विवान की बात पर अब छोल साहब भी खिलखिला कर हंस रहे थे और अपने गले के गिर्द ये मुलायम से हाथो का घेरा महसूस करते हे एक बाप का दिल जोरो से धड़क उठा. ये उसकी बेटी हे तोह थी जिसका स्पर्श मात्रा बता रहा था के वो इस व्यक्ति का हे अंश है. कुर्सी से खड़े हो कर विवान ने तुरंत हे अपनी बेटी को बाहों में भर लिया.

"ओह पोप्स.. ी रियली मिस्ड यू ा लोट.", प्रीती लम्बे कद्द की होने के बावजूद अपने पिता के गले तक हे आ रही थी और उसको अपने सीने से लगाए विवान के जैसे जज्बात हे जवाब दे गए. वो कुछ पल अपनी बेटी को महसूस करने के बाद वो आवेग, वो दूर रहने का दर्द और इस स्नेह से बस रोने हे लगा था. कांच के पीछे से उन भूरी आँखों में आंसू अपने आप हे बहने लगे. बाप और बेटी का निश्छल प्यार शायद maa-bete से भी ज्यादा हे होता होगा लेकिन ये दोनों बलिदानी हे रहते है इसलिए कमतर हे आँका जाता है. कुछ ऐसा हे हाल था प्रीती का जिसने अपने पिता की कमीज पर गरम पानी की छाप छोड़नी शुरू कर दी थी.

"मेरी पारी मेरी गुड़िया.. तुझे भी बहोत मिस किया मैंने. बस अब कमीज गीली मैट कर क्योंकि तेरे आंसू पक्के रंग वाले है.", इस भावुक पल में विवान ने साबित कर दिया था के वो जीवन के प्रति हमेशा हंसमुख दृष्टिकोण हे रखता है. बाप बेटी अलग हुए तोह विवान ने नजाकत से प्रीती का माथा चूम कर अगला मजाक शुरू कर दिया.

"पड़ोस में हे तोह जाना है एक दिन. दिन में 3-4 बार तोह जाती हे होगी अभी. फिर ये रोना धोना तू रहने हे दे मेरी पारी. तेरी माँ रोई थी जब मैं इसको ग्रीस से यहाँ लेके आया था. हाहाहा", विवान की आवाज सुन्न कर अब तोह अलीशा भी जाग चुकी थी और उसके आते हे रोमिला राजसी की तरफ चल दी. प्रीती भी गुड मॉर्निंग मामी बोलने के बाद अपने कमरे में वापिस. यहाँ विवान थोड़ा असहज हुआ लेकिन अलीशा से गले लग कर मिलता हुआ वो नहाने का बोलते हे खिसक लिया. कुछ तोह था जो फिलहाल नजर नहीं आ रहा था लेकिन विपत था इन तीनो के बीच हे. अलीशा, रोमिला और विवान के बीच. फिलहाल कौन गलत था और कौन सही इसका फैंसला तोह न्यास करना मुमकिन भी न था.

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"ओह चाचा... यार ये क्या पिलाया था रात में?", संजीव सर पकडे बैठा था जब नरिंदर जी दंड पेलने के बाद पसीने से tar-batar पानी का जग लिए उसके हे गद्दे पर आ बैठे. अपनी बनियान से हे वो शरीर का पसीना साफ़ करते हुए मुस्कुरा रहे थे. दूसरे हाथ से पानी एक गिलास में डालने के बाद उन्होंने वो संजीव को थमते हुए कहा.

"ऐसा है बीटा के तुम चाहे पोलिसिअ अफसर बन्न गए हो लेकिन एक चीज नहीं सीखे.", नरिंदर जी की बात सुन्न कर संजीव ने एक सांस में हे पूरा गिलास हलक में उड़ेल लिया. अब वो प्लास्टिक की पन्नी से कटे हुए निम्बू, जो शायद कुछ देर पहले हे वो रसोई से ले कर आये थे गिलास में निचोड़ने लगे.

"क्या नहीं सीखा चाचा जी? साला इतना तोह पी भी नहीं थी जितना गाला सूख रहा है और सर भारी हो रहा है."

"बीटा तुमने पहले तोह पी वोडका अपने दोस्त के साथ, खाली पेट. ताकि मुँह से दुर्गन्ध न आये लेकिन खाना भी जरुरी होता है. उसके बाद तुमने व्हिस्किए का पव्वा ख़तम किया और फिर बिना हे खाना खाये सो गए. रात में उठे भी थे तुम और टंकी का पानी पी कर वापिस सो गए थे. जानते भी हो रात में तुम क्या कुछ कह रहे थे.?", नरिंदर जी पैनी निगाह से देख रहे थे अपने भतीजे को लेकिन संजीव का सारा ध्यान गिलास में निचोड़ रहे निम्बू पर हे था और उसमे कला नमक गिराने के बाद उसके चाचा ने 2 घूँट पानी डालते हे वो उसके सामने कर दिया. संजीव ने जैसे हे मुँह लगाया तोह खटास से एक पल वो ठिठक गया लेकिन जैसे तैसे पूरा ख़तम करके वो कुछ सहज सा हुआ.

"मैंने कल सचमुच बिना कुछ खाये हे आधी बोतल ख़तम कर दी थी चाचा जी. लकी ने बोलै भी था मुझे और फिर जब आप लोग बैठे तोह मैं तबतक कण्ट्रोल में था जबतक पापा वह था और फिर सिग्रत्ती का काश लगते हे जैसे मुझे कुछ हो गया था. पता नहीं चाचा मेरे साथ क्या हुआ था लेकिन मुझे बस 4 नाम याद है. विष्णु, बलवान, अर्जुन और ऋतू. मैं अर्जुन को कभी कुछ होने नहीं दूंगा. और रातभर मुझे बस बुरे बुरे ख़याल हे आते रहे जैसे कभी एक कार पलट रही है और मैं वह नहीं हु. कोई अर्जुन को मार रहा है लेकिन मैं सोया हुआ हु और जब मैं पानी पीने के लिए उठा तोह मैं बहोत घबराया हुआ था. अर्जुन ने अपने दाए सीने की तरफ हाथ रखा हुआ था और वो मुस्कुरा रहा था चाचा जी लेकिन जैसे हे हाथ हटाया तोह वह गोली का छेड़ था और उसके बाद वो बेहोश हो गया. मैं तब भी उसके पास नहीं था.", ये सब बताते हुए संजीव जैसे सदमे में था और नरिंदर जी के चेहरे पर हमेशा वाली मुस्कराहट.

"शराब का ये भी एक असर है दोस्त. तुम कल अर्जुन के करीब हे होंगे जब लकी के साथ पी रहे थे? और दुनिया में एक वही है जिसके साथ तुम्हारा ऐसा याराना है जिसमे भाई, गुरु, दोस्त, दुश्मन और सलाहकार तक एक हे इंसान हो? ाची बात है की तुम उसकी परवाह करते हो लेकिन शराब के बाद अक्सर ऐसे ख़याल आते है जब आपका इतना ख़ास इंसान आपके करीब हो. चलो अब उठो और थोड़ा सा टहल लो. फिर केले और दूध का मिश्रण ले कर थोड़ा आराम कर लेना, हैंगओवर ख़तम हो जायेगा.", नरिंदर जी ने संजीव की पीठ हलके से थपथपाते हुए कुछ हौंसला दिया. संजीव भी अपनी जगह से उठ खड़ा हुआ क्योंकि आज उसकी हल्दी, मेहंदी और फिर रात में संगीत का कार्यक्रम था. 25-30 दोस्त तोह उसके भी थे जो कल शादी में शरीक होने के लिए आने वाले थे शाम तक.

"वैसे एक बात सांझी करनी थी आपसे. वो क्या है न की अर्जुन ने एक बार ख्वाब देखा था की वो मुझे कंधे पे लिए जा रहा है और मेरे सर से खून बह रहा था उस समय. एक हाथ ने उसका पाँव पकड़ कर उसको रोक लिया था. ये सच हुआ था जब मोहर सिंह ने हुम्ला किया था. आप भी सोचना की शराब वाला संजीव गलत हो भी सकता है लेकिन ऐसे ख्वाब कुछ तोह इशारा करते हे होंगे.", संजीव धीमे कदमो से निचे चला गया था और पीछे छोड़ गया था अपने चाचा को उस गहरी सोच में छोड़ कर जिसके बारे में कभी नरिंदर सोचना भी नहीं चाहता था.

'तुझसे क्या कहु मेरे बेटे की तेरे सपने तोह कुछ भी नहीं. मैंने खुद को देखा है निर्जीव लेकिन चेहरे पर मुस्कान थी की बगल में गिरे मेरे भाई की सांसें कायम थी और मेरे पिता हमसे 100 कदम हे दूर थे, हाथ में पिस्तौल लिए. सेंकडो बार वो ख्वाब मुझे आया है और आज भी आया था.', नरिंदर ने बनियान दिवार पर दाल कर रात की उतरी हुई टीशर्ट पहन ने के बाद उमेद और शंकर को जगाया और फिर ध्यान मुद्रा में जा बैठा. सपनो और वास्तविकता के बीच एक अनकही अंताक्षरी हमेशा हे चलती है जिसमे अक्सर हमको एहसास नहीं होता की हम किस तरफ हारे है. नरिंदर को भान था क्योंकि वो इंद्रजीत भी था और मृत्यु के सामने निडर रहने वाला भी.

आज घर में ढोल शुरू होने वाले थे तोह ये वक़्त कटाई इन बातों का न था. विवाह उत्सव प्रारम्भ.
 
जरा गौर फरमाइयेगा. कहानी क्या होती है?

सही या गलत की पहचान?

अपने और दुसरो का ज्ञान?

अनजाने रिश्तो से पहचान?

नहीं

इसमें वो सच कहा है जिस से हम भागते है?

कमी

सच बात तोह यही है की कमियां हे इंसान दूर नहीं कर पता. मैं जब ये लिखने लगा था तभी सोच कर बैठा था की एक सफर होगा जिसमे हम जान सकेंगे की आखिर दर्द और गलती क्या है. माफ़ करना दोस्तों लेकिन मंशा साफ़ है की मैं इस कहानी के जरिये मनोरंजन के साथ एक भीड़ को वह ले जाना चाहता हु जहा सवाल ख़तम हो जाए. सेक्स सिर्फ अगले 100-150 अपडेट होगा पर उसके बाद 200 अपडेट से ज्यादा ऐसे होंगे जहा दोस्ती की जरुरत रहेगी. इसलिए मैं किसी को खोना नहीं चाहता
 
ठोस हु अरे वेटिंग फॉर अपडेट, I'm सीरियसली सॉरी. कल फुल लेंथ अपडेट दूंगा. आज बेटे का बर्थडे है तोह थोड़ा रेस्ट्रिक्शन्स हो गयी. हे टर्न्ड 4 टुडे. गूडनिघत गाइस. कल भी अपडेट दूंगा और परसो भी . हेक्टिक डे सो ी नीड सम टाइम.
 




थैंक यू गाइस 🤗

थौघ ी don't बात डेरी बूत फॉर एवरीवन ेल्स. थैंक यू फॉर थे विशेष.
 
अपडेट 183

जीवन के पहलु

सुबह उठने से पहले हे उनींदे से बिजेन्दर ने अपनी भोली भली खूबसूरत बीवी के जिस्म को फिर से अपने निचे ले लिया था. हर गुजरते दिन के साथ इन दोनों के बीच अब बेहतर तालमेल और परिपक्वता आने लगी थी. नादान सी अनुपमा को भी अब एकांत पालो में बिजेन्दर द्वारा भरपूर प्यार करना ाचा लगने लगा था और इस दौरान वो खुद भी उसका साथ देती. दांपत्य के इन्ही अंतरंग पालो ने जैसे अनुपमा की चमक में इजाफा किया था वही बिजेन्दर भी शारीरिक तौर पर कही ज्यादा स्फूर्ति और ताजगी महसूस करता था.

अभी 20-25 मिनट के ऐसे हे prem-milan ने एक बार फिर पूरा बिस्टेर itar-bitar करके रख छोड़ा था. अपने पति के पुरुषार्थ से लबालब योनि को कपडे से साफ़ करती अनुपमा बिस्टेर से उठने लगी तोह बिजेन्दर ने एक बार फिर उसको पकड़ कर अपने ऊपर खींच लिया. अनुपमा के होंठो पर गहरा चुम्बन करके वो बस उसके प्यारे चेहरे को निहार हे रहा था और वही अनुपमा की शर्मीली मुस्कान बहोत कुछ बता रही थी.

"तू बहोत मीठी है रे मेरी जान. दिल न भरता तेरे से और हर रोज उठते के साथ सोचु हु के तावली हे सांझ हो जे."

"बस करो जी ेब. माँ केहवे थे की मर्द न अपनी ऊँगली पे रखे कर नहीं तोह वो अपने खूंटे पे बिठाये रखेगा. इसका के मतबल हो जी?", सचमुच अनुपमा बहोत भोली हे थी और बिजेन्दर उसकी चोली सही करने के बाद बालो को भी संवार कर उसके बराबर हे बैठ गया.

"माँ ने बोल दियो के मेरा खसम मैंने समझे है और मैं उसने. अनुपमा यु जो पति पत्नी का रिश्ता है न इसमें कोई एक दूसरे से कमतर कोन्या होता. तन्ने साइकिल देखि है न?", बिजेन्दर ने जैसे समझने की कोशिश शुरू की और अनुपमा ने अपनी बड़ी बड़ी पलके झपकते हुए हामी भरी.

"बस वैसा हे रिश्ता है यु मिया बीवी वाला. एक पहिये से साइकिल न चलती और हवा भी दोनों में बराबर होव तोह व बराबर चले है. मैं तेरे बिना अधूरा और तू मेरे बिना. माँ तेरे से हंसी मखौल करे थी मेरी चंदा. तू भी उनसे बतलाये कर तभी दिन दुनिया का बेरा चालेगा. ेब एक मेथी (किश) दे और फेर तैयार हो जा. आज शहर वाले घर में चलना है तन्ने मेरे और माँ के साथ. गोदरेज में एक प्लास्टिक का बैग से उसमे तेरी खातिर साड़ी लिया था व है. पहन के दिखाए और बाकी तुम (गहने) भी मैंने माँ टी दिए थे तेरे खातिर. बेरा चालना चाहिए के मरस अनुपमा बिजेन्दर सिंह पधारी है वह.", बिजेन्दर की बातें और कपडे गहनों वाले खुलासे से अनुपमा किसी बची से खुश होने लगी थी. उसने खुद हे जल्दी से उसके होंठो पर होंठ टिकाये और फिर उठ कड़ी हुई. लेकिन दवाजा खोलने से पहले एक बार मुड़ी और फिल्मी अंदाज में हवाई चुम्बन अपने पति को देते हुए बोली.

"थैंक यू है जी आपका. ऋचा सही कहे थी की आप न सबसे ज्यादा ाचे हो.", और बिना बिजेन्दर का जवाब सुने दरवाजा खोलती बहार निकल गयी. अभी भी उसके जैसे सर ढकने की आदत नहीं पड़ी थी और न हे चंद्रो देवी अनुपमा को ऐसा कुछ करने देती थी. उल्टा उन्होंने हे तोह उसको एक बेटी की तरह आजाद रहने को कहा था इस हवेली के दरमियान.

'हाहाहा.. या भी न जमा भोली है. सच केहवे थी बेबे के प्यार तोह दोनों तरफ से हे महसूस होव है. चाल बीटा बिजेन्दर आज फेर दंड बिस्टेर पर हे पेल लिए तोह कसरत और न करके तैयार हे होया जाए.', बिजेन्दर ने एक तरफ रखा अपना ढीला सा कुरता पहना और धोती सही करके वो भी उठ खड़ा हुआ. वही बहार अनुपमा का सामना अपनी सास सुशीला से हो चूका था जो हारे पर ढूढ़ रखने के बाद आँगन में हे चूल्हे की तरफ जा रही थी.

"ऐ तिनगरी (लड़की), आड़े तोह आ.", अनुपमा काख में टोलिया दबाये थी और अपनी सास को औपचारिक राम राम करने के लिए हाथ जोड़े तोह टोलिया निचे जा गिरा. उसको उठती हुई वो झुकी तोह चोली के बीच की खाई थूक से गीली हो कर चमकती साफ़ नजर आयी सुशीला को.

"जी माँ जी. वो बस नहान हे चली थी. इन्होने कहा के मैं नयी साड़ी पह्नु और तैयार हो जाऊ. आपके साथ हम सेहर जा रहे है न आज?", सुशीला ने अपने माथे पर हाथ हे रख लिया और इस बीच गुड्डी भी मुस्कुराती हुई चूल्हे के पास से उठ कड़ी हुई.

"एक सांस में पूरी कहानी गए दी लेकिन यु न बेरा के वह जाना क्यों है? अँगियां बांधनी कोणी आवे और तू साड़ी किस तरिया बंधेगी? आते आ..", सुशीला ने खुद हे टोलिया उसके हाथ से लेते हुए सीने का गिलपनस साफ़ करते हुए उसका सर सहलाया.

"बैठ थोड़ी देर और चा पे ले. बहोत टेम बाकी है अभी. गुड्डी तू हे थोड़ा समझाया कर इसने. समझदार तोह होने लगी है लेकिन शायद कमरे और आँगन में भेद न पता.", सुशीला ने अनुपमा को वही बिछी खाट पर बैठाया और चूल्हे से चाय का पतीला उतार कर जग में छान ने लगी. मधुलता भी नहाने के बाद उजले रंग की ओढ़नी और kameej-ghaghra पहने इधर आ चुकी थी. अपने जेठानियों से ram-ram करके हौदी के पास धुले कप और ट्रे सुशीला के पास रखती हुई वो भी उधर हे बैठ गयी.

"9 बजे निकलना है मुन्नी. शगन का सामान 2 बार जांच लिए गाडी में रखने से पहले. माँ (चंद्रो) का तोह बेरा हे है तन्ने. आड़े तोह पूछेगी न लेकिन वह जा के रुकेगी भी कोणी सुनाएं से जो कुछ भूल हो गयी तोह.", सुशीला ने 6 कप चाय के भरते हुए बताया जिस पर मुन्नी ने बस सर हिला दिया.

"तू ेब तक नहाने न गयी बिटिया?", यहाँ मधुलता ने सवाल अनुपमा से किया तोह जवाब भी सुशीला ने हे दिया.

"इसने कौनसा फसल काटनी है. खेलन कूदन दे इसने भी थोड़ा नहीं तोह बाद में यही bhains-chulha ार हवेली के काम हे करती बूढी होवेगी. ले लाडो और खली चा न पीनी. ये घी के बिस्कुट साथ हे खा, तभी शरीर बढ़ेगा.", सुशीला ने एक प्लेट में 4-5 बड़े अकार के वो बिसुईट रखे जो अक्सर दूध घी से बनवाये जाते थे shehar-kasbo से. अनुपमा भी वैसे हे वो कप प्लेट लिए चारपाई पर बैठ गयी. इत्मीनान से चाय में बिस्कुट डुबो कर खाती अनुपमा को इनके साथ साथ बिजेन्दर और दूसरी तरफ से बहार निकलती चंद्रो देवी भी देख रही थी. उनके चेहरे मुस्कुरा रहे थे ये सब देख.

"नजर न लगे इस प्यारी बची को.", आज मधुलता ने चूल्हे के पास से कहलिख ले कर अनुपमा के कान के पीछे लगाई थी और चाय ले कर वो अपनी सास की तरफ चल दी. सुशीला को भी ये देख कर ाचा हे लगा था के उसकी देवरानी मुन्नी काम से काम बचो के साथ और इस परिवार में तोह सही व्यवहार करती थी. बाकी करतूत से उसको फ़िलहाल कोई मतलब न था. ये लोग भी उत्साहित थे आज पंडित जी के घर संजीव की हल्दी और गीत में शामिल होने के लिए. भोर हो चुकी थी और उजाला हर तरफ फ़ैल कर jameen-kudrat को फिर से सींचने लगा था अपनी रौशनी से.

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अभी रेखा अपने कमरे में अकेली हे थी और नहाने के बाद pooja-path करके वो उत्सव अनुसार एक नयी साड़ी से शरीर को सुसज्जित हे कर रही थी की अपने सपाट मखमली पेट पर इन मजबूत हाथो के स्पर्श से कुछ पल सन्न हे रह गयी. वो इस परिचित स्पर्श से उबारती उस से पहले हे एक हाथ से गर्दन को ढके केश परे करके उन होंठो ने वह गहरा चुम्बन जड़ दिया. पूरी काया उस तगड़े मजबूत जिस्म से सटी थी जो कोई और नहीं उनके पति डॉ शंकर शर्मा हे थे.

"उफ़.. आपने डरा हे दिया.", रेखा कुछ असहज हो रही थी क्योंकि इस कमरे में और भी कोई आ सकता था जैसे राजेश्वरी जी या उनकी कोई ननद भी. लेकिन शंकर जी तोह ठहरे बेफिक्रे और अपनी हे धुन में रहने वाले.

"आज आसमानी साड़ी पहनो न रेखा, वही जो गुलाटी के फंक्शन में पहनी थी. सबसे अलग और बेहतरीन दिखती हो तुम उसमे.", एक कठोर उभर को हलके से मसलने के साथ हे किसी के कदमो के आहात पे वो तुरंत हे अलग हो गए लेकिन रेखा का पल्लू उनके कंधे पर हे टिका रह गया जो वो लेने हे लगी थी जब उनके पति ने उन्हें पीछे से जकड़ा था. ओह्ह्ह ओह्ह्ह्ह की आवाज करती ये शैतान उनकी लाड़ली बेटी ऋतू हे थी जो हाथ में कपडे का थैला लिए अपनी माँ से मिलने आयी थी.

"तोह आप लोगो को ये भी बताना पड़ेगा की फ़िलहाल कोई जगह प्राइवेट नहीं है? वैसे ाचे लग रहे हो पापा इस वाइट फॉर्मल में, हमेशा की तरह. लेकिन लाल पल्लू कंधे पे लेने की जगह गुलाबी चुनरी लेते है और वो भी शादी में.", ऋतू ने तोह दोनों को हे लाजवाब कर दिया था अपनी मस्ती से. टेबल पर थाइलर रखती वो अपने पिता के सीने से आ लगी जब शंकर जी सहज हो कर थोड़ा दूर हुए. अपनी बेटी को हृदय से लगा कर उन्होंने भी हँसते हुए उसका माथा चूम लिया.

"तू थोड़ा बड़ी हो जा और इतनी भी नहीं की मेरी माँ हे बन्न जाये. वो तोह मैं तेरी माँ को ये कहने आया था के आज नाश्ता यही मेरे लिए बना दे. असगर के हाथो से पेट हे भरता है, मैं नहीं. थोड़ी देर के लिए हॉस्पिटल जाना है रेखा मुझे, लेकिन 10 बजे तक लौट आऊंगा. और तुम्हारे मुन्ना लाल कही दिखाई नहीं दे रहे डॉक्टर साहिबा.?", रेखा जी भी अब कुछ सही हो चुकी थी अपने सांसें संभल कर और अपने पति द्वारा बताई साड़ी लिए वो स्टोर रूम में चली गई.

"हाँ.. ये डॉक्टर्स और इनकी इमरजेंसी लाइफ. वैसे ाची बात है पापा की लोग आप पे इतना विश्वास रखते है और आप भी अपने काम को सिर्फ प्रोफेशन हे नहीं समझते. बस आपके आसपास भी बन्न सकीय तोह मुझे फकर होगा की .."

"शठ.. तुम डॉ शंकर की बेटी की जगह अपने नाम से जानी जाओगी और मैं डॉ ऋतू के पिता के. ये कोई पेशा नहीं है ऋतू और तुम बहोत ाचे से समझती हो इस बात को. कमिटमेंट है और हम कभी इसको नजर अंदाज नहीं कर सकते. बात तोह किसी की ज़िन्दगी की है और वो अगर आप पर निर्भर है तोह बाकी सभी काम थोड़ा लेट किये जा सकते है. वैसे तुमने बताया नहीं के ये अर्जुन कहा है? इधर इतने मेहमान और रिश्तेदार आये हुए है लेकिन mehman-nawaji वाला हे गायब."

"उसको मैंने हे काम पे लगाया है अभी पापा. सभी गेस्ट्स को उनके रुकने की जगह चाय देने गया है और अगर किसी को कोई सामान चाहिए हो तोह वो भी. धोबी भैया को बोल दिया है के आज गुस्तस के हे कपडे ले नहीं तोह खैर नहीं उनकी. वैसे मुझे भी मार्किट जाना था लेकिन आप तोह इतनी जल्दी जा रहे है.", ऋतू अब अपने पिता की बगल में हे बैठ कर उनका हाथ पकडे अपनी स्थिति बताने लगी.

"अब भी मार्किट से कुछ लेना रह गया क्या? तारा को ले जाओ या फिर हम शाम को चलेंगे. तुमने भी तोह आज मेहंदी लगवानी होगी?", शंकर जी मजे ले रहे थे अपनी लाड़ली के इस द्विअर्थी सम्बोधन से. जैसे वो मेहंदी का जीकर करके कुछ कहना छह रहे हो. कमरे में उनकी बड़ी बेटी भी आ चुकी थी, नाश्ते की प्लेट लिए जो टेबल पर रखने के साथ वही बैठ गयी.

"तभी तोह थोड़ा जल्दी जाना था मुझे. बाद में मेहंदी लग जाने पर तोह कोई काम होने नहीं वाला. और आप न जब कोमल दीदी को बोल हे आये थे नाश्ते के लिए तोह मम्मी के सामने क्यों बहाना बना रहे थे?", ये फंसे मर शंकर शर्मा.

"हैं.. भूल गया था की मैंने मेरी बड़ी गुड़िया को बोल दिया है. एक यही तोह है जो मेरा इतना ख़याल रखती है बाकी दूसरे वाली तोह पता नहीं इस जनम में एक चाय भी पिलाएगी या नहीं.", शंकर जी उठ कर नाश्ते की टेबल पर आ बैठे. कोमल भी मुस्कुरा रही थी और रेखा जी के बहार आते हे वो उन्हें लिए रसोई की तरफ चली गयी. शंकर जी मुस्कुरा रहे थे अपनी बीवी को उस परिधान में देख कर.

"Hello, आप बात बदल रहे है पापा. सीधा बोल दो न के आपके पास मेरे लिए टाइम हे नहीं है.?", ऋतू नखरे से उठ कर जाने लगी लेकिन फिर वही उनके सामने कुर्सी पर आ बैठी.

"और मुझे नहीं पता की आप फ्री होंगे या बिजी. 10 बजे आप मेरे साथ मार्किट चलने वाले है. कह दिया तोह कह दिया. हांजी.", दोनों हाथ टेबल पर पटकती हुई ऋतू ने ज़िद्द दिखा हे दी थी और उसके चेहरे को देख शंकर जी ने मज़बूरी से सर हाँ में हिला दिया. दोनों हाथ जोड़ कर.

"मेरी माँ मैं 9:55 पे तेरे गेट के बहार मिलूंगा और चल पड़ना जहा चलना हो. अब 2 निवाले खा लू अगर इजाजत हो तोह?"

"हाँ खा लीजिये, मैंने कौनसा हाथ पकड़ा हुआ है आपका. लेकिन जाने से पहले 5 हजार दे जाना, मेरे लिए नहीं कोमल दीदी के लिए.", कोमल अभी पराठा ले कर दाखिल हे हुई थी की अपना नाम सुन्न कर ऋतू को घूरने लगी. शंकर जी ने बिना कुछ कहे अपने बटुआ ऋतू को थमा दिया जिसमे से जाने कितने नोट उसने निकले और लगभग खली बटुआ टेबल पर रख कर बहार भाग गयी.

"पापा, मुझे क्यों चाहिए होंगे? और आपने भी उसको दे दिए बिना सवाल किये.", कोमल ने गरम पराठा उनकी प्लेट में रखते हुए शिकायती लहज़े में पुछा.

"बीटा, तुम भी उसको ाचे से जानती हो. उसके पास भी पैसे थे जैसे तुम्हारे पास हैं. लेकिन वो शायद मेरी तरफ से कुछ करना चाहती है इसलिए उसने ऐसा किया होगा. वैसे जब तुम शादी करके इस घर से चली जाओगी तोह तुम्हारी समझदारी के साथ साथ तुम्हारे हाथो के खाने को बहोत मिस करूँगा. मेरी बेटी सचमुच सबसे ाचा खाना बनती है."

"ये बात तोह आपने थोड़े दिन पहले दादी के लिए भी कही थी और फिर माधुरी दीदी के लिए भी. आप आजकल सबको मस्का लगाने लगे हो पापा. और मैं कही नहीं जा रही शादी करके. यही रहूंगी जबतक आप परेशां नहीं हो जाते..", कोमल भी अपने पिता से बातें करके ाचा महसूस कर रही थी.

"हाँ मेरी छाती पर हे मूंग डालो तुम दोनों. लेकिन एक बाप जितना मर्जी अपनी बेटी को अपने पास रखना चाहे, वो रख नहीं पता.", शंकर जी का हाथ अचानक रुक हे गया था और कोमल समझ चुकी थी की उसके पिता ने जो आखिरी बात कही है वो दिल से कही है जिसमे उन्हें अपनी बेटियों की कितनी परवाह है साफ़ जाहिर होती है.

"आपके लिए मैं लस्सी लेके आती हु, चाय ठंडी हो गयी और ये सेहत के लिए ठीक भी नहीं है. पराठा ठंडा हो रहा है.", कोमल ने माहौल को सही करते हुए कप उठाया और बहार चली गयी. बहार सभी लोगो के तैयार होने, सामान ढूंढ़ने और एक दूसरे से बतियाने की आवाजे बता रही थी की सभी जल्दी में है और सबको चाव है आज होने वाले कार्यक्रम का.

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घर की बैठक में लगभग आधा दर्जन युवक पंडित जी के सम्मुख बैठे थे और सभी के चेहरे पर बड़ा गर्व था इन्हे साक्षात् मिलने पर. संजीव ने उनका परिचय अपने दादा जी करवाया था जो उसकी ट्रेनिंग के समय दोस्त बने थे और आज ाचे पद पर कार्यरत थे. सभी अपने व्यस्त जीवन से अवकाश ले कर सिर्फ इस विवाह में शामिल होने dur-daraaj से आये थे.

"सर, ट्रेनिंग के टाइम भी कभी ऐसा कोई दिन नहीं गुजरा होगा जब आपका उदहारण न दिया गया हो. मैंने आपके बहोत से केस स्टडी किये है पर्सनली नॉलेज इम्प्रूव करने के लिए और आपके काम करने का जो तरीका था वो आज भी एक उदाहरण है. मेरा पसंदीदा केस वो जज मालिक वाला रहा है. कितना डेंजरस साइट रहा होगा न आपके लिए? 5 हत्याएं और कातिलों ने उसके बाद 3 अधिकारी जो जांच कर रहे थे उन्हें भी मार दिया था. आप तोह उस वक़्त sub-inspector थे लेकिन फिर भी वो केस सप रैंक से आपके पास आया. और आपने न सिर्फ सोल्वे किया था बल्कि उसको जिस तरह से खोल कर सामने उजागर किया था वो यकीनन सनसनीखे था.", ये एक लकी के सामान ओहदे वाला अधिकारी था जो 27-28 बरस का थोड़ा सा गंभीर दिखने वाला लेकिन जोशीला इंसान था.

"रूपक बीटा, वैसे तोह मैं कहना चौंगा की वो सिर्फ एक ड्यूटी थी और कभी कभी मामले कुछ मुश्किल हो हे जाते है. लेकिन ये जान कर भी ाचा लगा के आजकल के युवक पुराने तरीके भी स्टडी करते है, दिलचस्पी के साथ. जो अफसर शहीद हुए वो काबिल भी थे और परिपक्व भी लेकिन कही न कही सिस्टम में हे दीमक लग जाती है जो बड़े ओहदे पर ज्यादा असर करती है. मेरे मामले में यही छोटा ओहदा हे मेरे पक्ष में काम कर गया. उन्हें भी लगा होगा की बस डर के मारे पुलिस जैसे तैसे ये केस ख़तम करना चाहती है और इसके लिए ये अदना से औपचारिक सी आया है. लेकिन दूसरा पहलु था मुझे हमारे हे बड़े सिस्टम के मजबूत नेटवर्क की सपोर्ट मिलना. तोह क्रेडिट हमेशा टीम का हे होता है यदाकदा चेहरा एक सामने रख कर. तुम भी एक आदर्श हो युवाओं के लिए. जैसे सेंध तुमने क्सक्सक्सक्स शहर में बड़े बड़े नामी व्यक्तियों पर लगाईं, बेशक इसके लिए तुमने उच्चाधिकारियों को पहले बताया नहीं लेकिन मैं जरूर प्रभावित हुआ. ये दर्शाता है के तुम कार्यतंत्र और प्रणाली को बखूबी समझते हो.", पंडित जो को तोह उनके पसंद का जमघट मिल गया था लेकिन ये घर था और यहाँ वो खुद किसी के सामने ओहदे में कमतर थे.

"ये सब बाद में भी कर लेना जी. बचो की महफ़िल और ख़ुशी में आप अपने किस्से कहानियों से बहार निकलो. अर्जुन बीटा, ये सभी संजीव के hum-kadam दोस्त है और इन्हे तुम होटल ले जाओ. सभी दूर दराज से आये है और शाम को कार्यक्रम में शामिल होने से पहले इन्हे आराम भी करना होगा. तेरे दादा जी का तोह बस नहीं चलता नहीं तोह बहार हे लिखवा दे, रिटायर्ड थाना परिसर. आइये और अपने अनुभव बताये फिर हम आपको सुझाव देंगे.", कौशल्या जी की बातें सुन्न कर सबसे पहले पंडित जी ने हे बहार का रुख किया. बाकी सभी बस हंस रहे थे और उनको देख कर कौशल्या जी भी हंसने लगी.

"आंटी जी, सचमुच आपसे मिलना यादगार अनुभव है. जितने प्रेम से आपने नाश्ता करवाया और बातें की, बहोत ाचा लगा.", सभी ने बारी बरी से उनके चरण स्पर्श किये और फिर विदा ले कर बहार आ गए. अर्जुन तबतक सफारी गाडी निकल कर गेट पे लगा चूका था. संजीव भी अपने दोस्तों को शाम के बारे में बताने के बाद उन्हें गाडी में बैठा कर अपनी दादी के साथ हे अंदर चल दिया. आज उसका अधिकतर समय इनके साथ हे बीतने वाला था. वही 6 लोगो को अपने साथ लिए अर्जुन भी सुबह के 8 बजे सड़क पर गाडी चलने लगा था.

"मैं रूपक हु, ये अमन, इसके साथ आशीष और कार्तिकेयन स्वामी. पीछे वो दोनों संजय और एंड्रू है. तुम्हारे बारे में भी हमने बहोत सुना है छोटे भाई. अर्जुन, यही नाम है न तुम्हारा.", अर्जुन को अपना परिचय देते हुए रूपक ने हे चर्चा शुरू की. कपडे मैले हो चुके थे अर्जुन के लेकिन उसको जैसे इस सबका ध्यान हे न था.

"आप सभी से मिल कर ख़ुशी हुई भैया. लेकिन संजीव भैया कभी भी पुलिस और अपने सर्किल के बारे में घर पे ज्यादा डिसकस नहीं करते. हाँ वो बताते जरूर है की उनके दोस्त P.A. में भी बने थे जो शादी में आएंगे. मैं तोह फ़िलहाल बस पढाई और खेलकूद में हे लगा रहता हु इसलिए वो ये सब नहीं बताते होंगे."

"वाह भाई. वैसे बता दू के तुम्हारे भाई साहब उतने भी गंभीर नहीं है. हैं तोह सही लेकिन वो भी मस्ती मजाक कर हे लेता है. जो तुम्हारी भाभी बन्न ने वाली है न उनका भी बहोत रौब था ट्रेनिंग में लेकिन देखो जरा संजीव का ये पहलु की मिस राधिका उस से प्रभावित हो गयी. सभी शाहरुख़ खान बनते रह गए और काजोल को अजय ले उदा. हाहाहा...", ये मस्ती भरा खुलासा किया था पिछली सीट पर बैठे आशीष ने और अर्जुन भी इस पर हंसने लगा था बाकी सभी के साथ. सड़क भी थोड़ी चहल पहल थी क्योंकि ये ऐसा हे वक़्त था.

"वैसे मुझे भी हैरानी तोह बहोत हुई थी ये जान कर की भैया न सिर्फ प्यार लेकिन शादी तक पहुंच गए. आप लोग तोह उनके साथ हे रहे है तोह भाभी के बारे में भी ाचे से जानते होंगे. मेरा मतलब की वो नेचर की कैसी है और ..."

"एक दिन बाद तुम्हे उनके साथ हे तोह रहना है भाई. खुद हे देख लेना और एक्साम्प्ले के लिए बता दू की ये एंड्रू और लकी अरोरा थप्पड़ खा चुके है तुम्हारी राधिका भाभी से. हाँ बेचारो ने ये कष्ट भी तुम्हारे भाई के लिए हे झेला था. हाहाहा..", रूपक ने सबसे आखिर में बैठे अपने दोस्त एंड्रू का किस्सा सुनाया तोह अर्जुन को बड़ी हैरानी हुई लेकिन हंसी तोह उसको भी आ रही थी.

"मतलब भाभी इतने गुस्से वाली है?"

"तुम्हे क्या लगता है कुंडली ऐसे हे मिल गयी उन दोनों की? संजीव जहा शरीफ बैल है तोह राधिका शेरनी है, बस बी मिस्टेक वो वेजीटेरियन निकली. हाहाहा... जोक्स अपार्ट बूत थे बोथ अरे मेड फॉर एच इतर. संजीव का दिया prem-patra ले कर जब एंड्रू गया था तोह राधिका ने बिना पड़े हे वो फाड़ कर इसके थप्पड़ जड़ दिया था. ये थोड़ा काम हे बोलता है, इतना काम की इसने तोह नाम भी नहीं लिया के वो संजीव ने भेजा था. और फिर हमारे दूसरे होशियारचंद मर लकी अरोरा. खुद हे एक हार्ट लगा टेडी बेयर खरीदते है, मुश्किल से सेण्टर में लेके आते है और वीमेन हॉस्टल के बहार अपनी होने वाली भाभी को सॉरी बोलने के उद्देश्य से जाते है. नतीजा शामे और गाल लाल.", यहाँ आशीष ने पूरा वृतांत कह सुनाया और अर्जुन भी गाडी को ओवेर्ब्रिद्गे से ले जाता हुआ ये सुन्न कर दांग हो रहा था. इतना कुछ तोह उसको पता भी न था.

"तोह भैया ने कोई एक्शन नहीं लिया? मेरे दोस्त के साथ ऐसा करे कोई...", वो बात बीच में हे छोड़ कर इनकी तरफ देखने के बाद सामने देखने लगा.

"वही तोह हुआ फिर. संजीव से सेहन नहीं हुआ और उसने नकचढ़ी अमीर under-training नवाबजादी को आड़े हाथो हे ले लिया. वो भी 30-35 लोगो के सामने. गुस्से गुस्से में ये भी बोल गया के अगर राधिका को उसमे दिलचस्पी नहीं भी है तोह उसका कोई हक़ नहीं बनता की उसकी तरफ से भिजवाए लेटर, गिफ्ट को लाने वाले के साथ वो ऐसे पेश आये. राधिका की तोह आँखों में पानी हे आ गया था और रट हुए वो सॉरी बोलती हुई लग गयी थी संजीव के गले. बड़ा मजेदार और .. मजेदार नहीं भाई इमोशनल सा सन था वो. संजीव ने उसके बाद कभी गुस्सा नहीं किया और राधिका ने हमेशा हे हमारे दोस्त को अपनी ऊँगली पर रखा. शादी की बात भी लड़की ने हे चलाई थी नहीं तोह हमारे गंभीर मुनि तोह जैसे मुँह में फेविकोल रखे हुए थे. हाहाहा.. क्या हे किस्सा याद दिला दिया तुमने अर्जुन. खुद हे सोचो की तुम्हे लगता होगा हम लोग जैसे प्रहार फिल्म वाले नाना पाटेकर जैसे कटीली तारो के निचे रहते होंगे, सख्त नियम और सुबह 4 बजे ट्रेनिंग मैदान में बन्दूक ऊपर उठाये.. हाहाहा.. लेकिन सच ये है की अनुशाशन के साथ साथ वह एक कॉलेज जैसा हे माहौल रहता है.", अमन ने ये लम्बा चौड़ा किस्सा सुनते हुए वो समय याद किया तोह बाकी सभी ने आहें भरी. अर्जुन भी खुश था के जैसा उसको लगता था पुलिस ट्रेनिंग के बारे में वो सब इतना बुरा भी नहीं होता. अब तक वो लोग होटल गोल्ड पहुंच चुके थे जहा इन सबका इंतजाम किया गया था.

"चलो भाई पहले एक जाना क्लासिक का पैकेट पकड़ लो और फिर कमरे में फ्रेश हो कर आराम करते है. अर्जुन, शाम को हम लोग खुद हे आ जायेंगे प्रोग्राम की जगह पर. सरकारी गाडी की सुविधा भी है हमारे पास. और बहोत ाचा लगा तुमसे मिल कर. शाम को साथ में वक़्त बिताएंगे, उम्मीद करता हु.", आशीष ने अर्जुन द्वारा रिसेप्शन पर कमरे पता करने के बाद जब उन्हें रास्ता दिखाया तोह एक कर्मचारी खुद हे इन सबका सामान लिए उनके साथ चलने लगा. जाने से पहले सभी ने अर्जुन से हाथ मिला कर उसका धन्यवाद् किया था और अब अर्जुन इधर से निकल कर घर जाने का हे सोच रहा था की शादी की जगह का जायजा लेने के विचार से वो और आगे बढ़ चला.

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"हहहह...", विवान अपने बिस्टेर पर गहरी नींद में सोया हुआ था की अपने जिस्म पर किसी और के स्पर्श से थोड़ा हिलने डुलने लगा. उसको ऐसा लग रहा था जैसे वो कोई कामुक सपना देख रहा है और जैसे हे उसको अपने लिंग पर गीलापन और कसाव महसूस हुआ, उसकी नींद तुरंत उचट गयी. वो हैरानी से देख रहा था उस चेहरे को जिसकी कल्पना नहीं थी. काम से काम इस घर में तोह बिलकुल भी नहीं. ये उसकी सलहज अलीशा थी जो बड़े हे जोशीले अंदाज में विवान का सख्त लिंग मुठी में पाखडे mukh-maithoon कर रही थी. दोनों की नजरे एक होते हे विवान फुर्ती से उठ खड़ा हुआ. कपडे सही करता वो काफी गुस्से में था लेकिन अलीशा के चेहरे पर कुटिल मुस्कान साफ़ बता रही थी की वो इसकी परवाह नहीं करती.

"जो गलतियां हमारा सबकुछ तबाह कर सकती है वो तुम क्यों दोहराना चाहती हो अलीशा? काम से काम इस घर का तोह ख़याल करो और ऐसी एक गलती से मेरा सबकुछ ख़तम हो सकता है. ये बिस्टेर मेरी बीवी का है और ये घर मेरे पापा का.", विवान के शब्द तीखे और गंभीर थे.

"क्यों इतनी टेंशन लेते हो तुम विवान. घर में इस वक़्त कोई नहीं है और तुम तोह जानते हे हो की मेरी जरूरते कितनी है. बस एक बार इसको शांत कर दो और ये तोह तुम्हे भी पसंद है न?", अपना ढीला सा टॉप सरकती हुई अलीशा ने वो गोर बड़े गुब्बारे आधे विवान के सामने नज़र करते हुए कहा तोह विवान ने नजरे हटा ली. अलीशा एक गदराई हुई खूबसूरत महिला थी जिसको नजरअंदाज करना इतना आसान न था.

"वो सब ठीक है अलीशा लेकिन तुम समझा करो की यहाँ हम कौन है और क्या स्थिति है. मैं अपने पिता और बची के सामने गुनहगार नहीं बन्न न चाहता. कपडे ठीक करो और यहाँ से जाओ, अभी के अभी.", अब विवान की आवाज में वो कड़ापन और बेरुखी न थी लेकिन वो नजरे मिलाने से भी बच रहा था जैसे शिकार शिकारी को नजरअंदाज कर रहा हो. लेकिन अलीशा पर तोह जैसे इसका कोई प्रभाव हे न पड़ा. वो अपने सीने का वस्त्र निकल कर विवान के जिस्म से जा लिपटी.

"तुम कुछ और कह रहे हो और तुम्हारा दिल कुछ और. तुम्हे तोह मेरे ये बड़े उभार बहोत पसंद है न विव? और मेरी ये भी तोह तुम्हारी फवौरीते है.", विवान का हाथ पकड़ कर अलीशा ने खुद हे स्कर्ट के अंदर से अपनी योनि पर टिका दिया. साफ़ जाहिर था की इसके अंदर कोई अतिरिक्त वस्त्र मौजूद न था. विवान कुछ कहता उस से पहले हे अलीशा उसके होंठो को बुरी तरह पीने लगी थी और स्वतः हे विवान की आँखें बंद होती हुई बाकी जिस्म को हरकत देने लगी. वो एक हाथ से अलीशा की योनि मसलता हुआ दूसरे से एक बड़े उभर और उसके गुलाबी मॉटे निप्पल को मसलने लगा था. कुटली सी हंसी के साथ अलीशा ने चेहरा अलग करके विवान का पजामा निचे सरका दिया.

"ओह्ह्ह्हह.. तुम किसी दिन सब बर्बाद करवा के रहोगी अलीशा.. उम्मम्मम्म..", लुंड को मुठियाती हुई अलीशा विवान के सीने को चूम रही थी और कुछ हे पल में वो दोनों उस बिस्टेर पे थे जिसका उलाहना विवान अपनी बीवी का बता कर दे रहा था. स्कर्ट ऊपर सरकती हुई अलीशा ने अपने बड़े बड़े चिकने कूल्हे उजागर करते हुए सही मुद्रा बनाई और उस साधारण से सख्त लिंग को अपनी जांघो के बीच रास बहती गुफा का रास्ता दिखा दिया.

"आह्हः.. बस यही कमी महसूस हो रही थी मुझे... उम्म्म..", यहाँ जैसे सिर्फ जिस्मानी भूख हे थी इन दोनों के दरमियान और अगले 5-7 मिनट तक अलीशा निरंतर ऊपर निचे उछलती हे दोनों जिस्मो को ये असीम काम सुख देती रही. बड़े बड़े गुब्बारों से चुके ऊपर निचे उछाल रहे थे जिन्हे विवान कभी मसलता तोह कभी काट लेता. अलीशा की गर्मी के सामने वो ज्यादा न ठहर सका लेकिन इतने में अलीशा भी जैसे अपना कॉमर्स बरसाने लगी थी. उन्माद में जैसे हे उसने विवान के लिंग को अपनी जांघो में कैसा, वो भी छूट की गहराई में खाली होने लगा. दोनों पसीने से भीग चुके थे और कुछ पल ऐसे हे निष्प्राण से मूरत बने रहे.

"ओह्ह्ह्हह्ह.. तुमने आखिर कर हे ली न अपनी मनमानी. अब जल्दी से कपडे ठीक करो इस से पहले की कोई लौट आये. और मैं बाथरूम होने के बाद कुछ देर आराम करूँगा.", अलीशा से अलग हो कर विवान तुरंत हे अंदर वाले बाथरूम में जा घुसा. अलीशा मुस्कुराती हुई अपने कपडे पहन कर बिना चादर ठीक किये कमरे से निकल चली. कुछ बूँद सफ़ेद तरल की जैसे उसने जानबूझ कर रोमिला के बिस्टेर पर रहने दी थी. कोई 2 मिनट बाद रोमिला इस कमरे में लौटी तोह एक हे नजर में समझ चुकी थी की इधर क्या हुआ होगा. वो तोह बस अपना पर्स लेने यहाँ आयी थी लेकिन जैसे एक और जख्म उसकी आत्मा पे लिखना तये था यहाँ आने पर. उसके पति ने फिर से बेवफाई कर हे दी थी और अलीशा अभी तक अपनी मनमानी से पीछे नहीं हटी.

'ये आखिर बार था अलीशा और इसकी सजा तुम दोनों को मिलेगी.', रोमिला ने भी चादर को सही न करके पर्स उठाया और धड़ाम से दरवाजा बंद करके बहार चली गयी. विवान को उसने इशारा दे दिया था के वो कमरे में आयी थी और दरवाजा पटकने का मतलब क्या था. विवान शरीर साफ़ करके कमरे में आया तोह बिस्टेर की हालत देख कर उसके किनारे हे सर पकड़ कर बैठ गया. अपने घर लौटे अभी चाँद घंटे हे गुजरे थे और वो बेवफाई कर चूका था जिसकी गिनती नहीं थी.

'पता नहीं अब क्या होगा? वो प्रीती या डैड को नहीं बताएगी, इतना जानता हु. साली अलीशा रंडी, तू गलत खेल रही है...', सामने दिवार पर जोर से घूंसा मारने के बाद विवान इस गलती पर दर्द से दोहरा हो गया. वो बस खुद के साथ साथ अपनों को भी दुःख हे पंहुचा रहा था.

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एक तरफ जहा पंडित जी के संसार में खुशियों भरा दिन था और ढेरो लोग घर और कार्यक्रम में शामिल होने आ रहे थे वही एक दूसरी जगह भी थी जहा सबकुछ इसके विपरीत था. और ये जगह भी पंडित जी के संसार से सेंकडो (100स) कोस दूर Bihar-Bengal की सरहद थी. लगभग कंकाल सा ये 35-40 वर्ष का व्यक्ति कमीज की जेब से तम्बाखू और चूना निकल कर रगड़ने हे लगा था की एक जोरदार थप्पड़ से मिटटी सूंघने लगा.

"बुरचूड़ी के इन्हे काम करने आये हो या कलेक्टर बने खातिर? तुहार बहिन छोड़ू बांसडीके.. निकल इन्हे से.", सुपारी रंग की चमकदार कमीज और उस से गहरे रंग की चकचक पतलून पहने ये एक तगड़ा सा व्यक्ति था कोई 30 बरस का. बुर्शट के ऊपर वाले 3 बटन खुले थे और सोने की मोटी जंजीर सी चैन उसके गले में झिलमिल चमकती हुई बता रही थी की वो कुछ तोह हैसियत रखता है. चारदीवारी वाले इस 15-16 एकड़ वाले भूखंड पर आधी जगह वृक्षों से घिरी थी और बीच में कोई 25-30 कमरे खड़े थे, जैसे कोई सराये या धर्मशाला दुनिया की नजर से बचा कर राखी हो. जमीन पर थप्पड़ खा कर गिरा व्यक्ति क्षमा मांगता हुआ उठ कर उन कमरों की और चल दिया जहा शायद उसकी नियुक्ति थी.

'500 रूपया महीना फ्री में मिलता है क्या बे? सेल हराम की खा खा कर अपनी औकात भूल जाते है.', मुँह से पान की पीक एक तरफ गिरता ये आदमी जिस तरह से जीभ को मुँह में फिर कर दांत साफ़ करता हुआ बड़बड़ा रहा था इस से साफ़ पता लगता था के वो बहोत हे घिनोना भी है घमंडी होने के साथ साथ.

"माई बाप, डिलीवरी खातिर कलकत्ते (कलकत्ता) से बिमल शेठ आया है.", ये एक नेपाली मूल का आदमी था लेकिन यहाँ के माहौल में जैसे इसका रंग भी पक्क चूका था जुबान के साथ साथ. हाथ जोड़ कर जिस तरह से वो char-diwari के बहार आये व्यक्ति की सूचना दे रहा था इस साफ़ पता चलता था की उसकी कंधे पे तंगी बन्दूक से ज्यादा ईमान गिरा हुआ है.

"हँ.. इन्हे हे लिवा लाओ शेठ को. और तुम्हार बिटिया की खबर आयी?"

"जी माई बाप. तुली अपने साथ 4 को ले कर कटिहार पहुंच गयी थी कल रात. चरों 15-16 के बीच है.", खींसे निपोरता से ये पालतू व्यक्ति देख रहा था के उसके जवाब पर उसका मालिक अब मुस्कुराने लगा था.

"छग्गू, पूरे 15 हजार तुझे दूंगा और उतने हे तेरी तुली को. बस अब शेठ को बुला और लाली को बोल जगह इन्हे 2 कुर्सी जमा दे.", ये व्यक्ति था दुर्गेश यादव उर्फ़ लल्ला जी. सरहद पार से behla-fusla कर या jor-jabardasti से नेपाली मूल की kam-umar लड़कियां ला कर सोंगची, पटना और दिल्ली तक ये उन्हें बेचता था. बाप इस जगह का सबसे बड़ा ट्रांसपोर्ट का व्यापारी था जिसके ट्रक समूचे उत्तर भारत में माल धुलाई पर लगे रहते थे और ये रसूख का इस्तेमाल करके ऐसा व्यापार करता था जो कही से भी इंसानियत वाला न था.

लल्ला करम के साथ साथ दिल से भी दरिंदा हे था जिसके लिए कमसिन लड़की सिर्फ माल और उसके लिए काम करने वाले लोग बस keede-makode सी हैसियत रखते थे. जाने कितनो को हे इसने मौत के घात उतरा था और दबे छिपे ये कहावत मशहूर थी की चम्पारण के हांड़ी मीट में बकरा होता है लेकिन लल्ला जी इंसान के गोश्त की हांड़ी पकाते है. अब तक एक काली कॉन्टेसा कार char-diwari से अंदर आ कर कुछ हे दुरी पर रुक चुकी थी. उन कमरों की तरफ से भी एक 22-23 बरस की महिला 2 निवार वाली कुर्सियां लिए दुर्गेश यादव के सामने जांचा कर जाने लगी. शरीर पर बस एक पारदर्शी सी सस्ती साड़ी और पैबंद लगा ब्लाउज हे था जो उसके यौवन को छुपाने की जगह दिखा ज्यादा रहा था. दुर्गेश उसकी सांवली चिकनी कमर और माध्यम से कूल्हों को देख मैं में लुंड सेहला रहा था क्योंकि अभी ज्यादा जरुरी काम जो थे.

"लाली, इन्हे पानी भिजवा दियो और यह के बाद 2 कप चाय. आओ शेठ, तुम्हारा हे इन्तजार था.", ये बिमल सेठ भी शकल से पूरा घाघ सा व्यक्ति था, बंगाली झलक लिए. आँखों पर मोठे फ्रेम का चस्मा, सजीली सी घनी मूछ और सांवली रंगत के साथ घुंगराले तेली बाल. 2 गनमैन कार के पास हे थे और ड्राइवर एक अटैची लिए ठीक सेठ के पीछे.

"ोर्रे लल्ला जी, बाबा हम तोह कल हे कोलकाता से आ गया था. वो तोह ीदार का मटन हमको भ गया तोह रात पिछले सेहर हे कमरा में रुक गया. अब तुम्हारा साथ इतना पुराण डीलिंग है तोह रात सावेर से क्या प्रॉब्लम होता? हेहेहे..", चमचागिरी की चाशनी ाचे से लपेटनी आती थी बिमल सेठ को और इसके साथ हे उसने विप की वो अटैची यादव के सामने रख दी.

"न तुम कही भागे जा रहे शेठ और न तुम्हारा माल. इस बार आर्डर थोड़ा बड़ा देना क्योंकि अगले 3 महीने काम बंद रहेगा इस तरफ.", नोटों को बस गद्दियों के हिसाब से गईं कर यादव ने अटैची एक तरफ रख दी. अब तक लाली भी पानी ले आयी थी और उसके सहमे हुए चेहरे से पहले सेठ की नजर उस छोटे से ब्लाउज या कहे चोली में से झांकते कैसे हुए सांवले उभारो पर जा रुकी. यादव भी ये बात ध्यान से देख रहा था. पानी होंठो से लगते हुए भी सेठ के मुँह से लार टपकती लगी. लाली तुरंत वह से निकल चली.

"ये माल तोह करारा है शेठ लेकिन लाली न बिकाऊ है और न हे मैंने खुद इस्पे हाथ डाला है. वैसे तुमने अगला आर्डर नहीं बताया.", यादव जैसे आदमी की भी क्या मजबूरी हो सकती है जो लाली अभी तक उस से बची रही.

"ोर्रे लल्ला जी, हम तोह यही देख रहा था के ये वास्तबिक सुंदरता की देवी है बिलकुल असली संदेश की तरह. हाँ वो आर्डर तोह मैं दूंगा लेकिन इस बार कुछ फॉरेन क्लाइंट लोग है. 6 चाहिए और तुमसे बन्न सके तोह 13-14 से ऊपर का नहीं हो. एक का 2 लाख हम तुमको देगा.", ये डिमांड सुन्न कर एक पल को तोह यादव कुछ गंभीर हुआ लेकिन हर लड़की का 2 लाख सुन्न कर आँखों में चमक आ गयी.

"देश से बहार भेज रहे हो शेठ?"

"बाबा यही समझ लो. शेख लोग है और उनके साथ डील मतलब तुम्हारा भी फ्यूचर बिज़नेस ट्रिपल और हमारा भी. पान खिलाओ अब इस बात पर.", सेठ की बात सुन्न कर यादव ने पांदनी निकाल कर एक पान उसको दिया और एक अपने मुँह में रखने के बाद उँगलियाँ कमीज से साफ़ कर ली.

"वाह शेठ, तुम्हारे साथ बिज़नेस का यही मजा है. इन्हे लोकल में साला 50 के ऊपर कोई 17-18 वाली के नहीं देता और तुम साला 13 वाली का 2 लाख सेट कर दिया. हाथ डालो बहार के धंदे में और मैं लाइन लगा दूंगा एक नंबर माल की. ओह बुदहु, शेठ का माल बुलवाओ बुरचूड़ी के.", इस आवाज पर वही अधेड़ सा कंकालनुमा व्यक्ति हाथ जोड़ने के बाद एक कमरे में दाखिल हो गया. सेठ ने भी अपने ड्राइवर को इशारा किया तोह वो गेट की तरफ लपका. उस सुरक्षाकर्मी से बात करके गेट खुलवाया गया तोह ये नीली जीप अंदर दाखिल हुई. हर तरफ से इस्पात की चादर लगी जीप ऐसी थी जैसे मुर्गियां धोने का वाहन.

"लो शेठ, देख लो. सभी को ट्रेनिंग दिया है और तुम्हारी हर बात मानेंगी. कोई भी 17 से बहार नहीं है और निचे से बंद.", वो अधेड़ एक कतार से ये 8 लड़कियां यहाँ ले आया था और सभी kam-umar नेपाली मूल की सेहमी हुई सी गोरी पतली लड़कियां.

"बाबा यही चीज तोह हमको तुम्हारा पसंद है. ब्यूटीफुल. ऐ सब ऐसे हे लाइन से जीप में बैठो डार्लिंग.", सेठ इतना बोल कर खड़ा हे हुआ था के सररर से उसके भेजे को चीरती एक गोली निकल गयी. कटे वृक्ष सा बिमल सेठ जमीन पर गिरा था और उसके सर से गहरा लहू मिटटी को रंगने लगा. चाँद सेकंड में हे अंदर के कमरों से 10-11 बंदूकधारी ढ़ढ़ढ़ करते हुए तैनात हो चुके थे और उतनी हे जल्दी सभी जमीन पर, बिमल सेठ के दोनों प्रेहरियो और ड्राइवर समेत. अब वह पुरुष कोई बाकी था तोह एक खुद यादव, उसका गुलाम और वो अधेड़. लड़कियां सभी जमीन पर घुटनो के भार बैठी थी सर झुकाये, कुछ का तोह पेशाब तक निकल गया था.

"अरे कौन मादरचोद है बे जो पीछे से गोली चला रहा. भोंसड़ीक..", और इसके साथ हे अगली गोली उसके कंधे में आ धंसी. मुख्या द्वार एक झटके में उखड कर जमीन पर पड़ा था और ट्रक अंदर दाखिल होता ठीक उन लड़कियों के सामने आ रुका. उसकी छत पर बैठे आदमी ने चुग्गे को बंदूक जमीन पर गिराने का इशारा किया तोह तुरंत पालन हुआ.

"बहोत समय इस दीमक की जड़े खोज रहा था और देखो साला लेके भी आया तोह उस दल्ले के पास जिसका अपना कुछ है हे नहीं.", ड्राइवर सीट से लपक कर ये फुर्तीला आदमी ठीक यादव के ऊपर आ खड़ा हुआ. बात कहने के साथ हे वो चुग्गे का भेजा खोल चूका था.

"अबे तुम हो कौन बे? ज़िंदा न बचोगे भोंसक..

"खामोश.. साला गांड 2 फाड़ हो चुकी है लेकिन हेकड़ी ख़तम नहीं हो रही. विश्वास, सभी लड़कियों को ट्रक में बैठा और ये पैसे बाँट दे इनमे.", अपने उस बंदूकधारी को आदेश देते हुए भी इस व्यक्ति की नजर यादव पर हे थी. लाली दरी सेहमी सी एक तरफ कड़ी थी जिसने ट्रक में जाने से इंकार कर दिया था. बाकी सभी लड़कियों को अंदर बैठने के बाद विशवास उन कमरों को देखने चल दिया.

"तुम हो कौन.. आठ.", यादव का सीना तक खून से लथपथ हो चूका था और वो सोने की जंजीर जैसे बता रही थी की उसका कोई मोल नहीं लहू के सामने.

"तुम्हारे बाप के बाप का भाई हु मैं और मरने से पहले सुन्न लो हमारा नाम, विष्णु. विष्णु वर्धन.. जब तक तुम जैसे परभक्षी पनपेंगे, तब तब उनके पीछे आएगा विष्णु वर्धन.", और इसके साथ हे यादव की आँखे खुली हे रह गयी, गोली ठीक माथे के बीच धंसने के बाद. विशवास 2 बैग लिए इधर हे आ चूका था और उसकी बन्दूक की नोक पर वो अधेड़ और लाली भी यही आ गए.

"हाँ तोह ये ज़िंदा क्यों है अब तक? और लड़की तुम्हे यही रहना है तोह मरना होगा नहीं तोह साथ चलो."

"सर, इन दोनों बैग में पैसा है. और ये आदमी साफ़ है जिसको यहाँ बंधुआ बनाया हुआ था."

"चल तू निकल यहाँ से. और अब तुम बोलोगी भी या मार दू?", आवाज सपाट थी और जबड़े भींचे हुए. लेकिन लाली जैसे अब सेहमी हुई न थी.

"ये आदमी खरीद के लाया था हमको, ब्याह का बोल कर. हम कहा जाए अब? घर लौटे तोह िज्जात्त चला जायेगा और इन्हे रहे तोह पुलिस हमको पकड़ेगा या बड़े मालिक हे ख़तम कर देई हमको. इतना को मारे हो तोह हुंका भी एक गोली काहे नहीं मार देते?", अब जैसे विष्णु लाजवाब हे हो चूका था.

"ब्याह करोगी?", विष्णु के ऐसे सवाल और उसकी उम्र का अंदाजा लगाती लाली जैसे मूरत बन्न चुकी थी.

"हमसे नहीं. हमारे लिए तोह बेटी सामान हो तुम और हम ब्रह्मचारी है जो गोली तोह क्या बुरी नजर भी नहीं मार सकते. तुम बैठो गाडी में और कलकत्ते जा कर हम करते है तुम्हारे लिए उचित प्रबंध. जिसकी खुदकी कोई दुनिया न हो वो या तोह दुनिया उजाड़ता है या फिर बसता है. चलो भाई विशवास, पैसा रखो बिमल की गाडी में और इन सभी लड़कियों को टिकट करवा कर ाचे से भिजवा देना. हम वही मिलेंगे जहा रात रुके थे.", विश्वास भक्त आदमी था इस व्यक्ति का और दोनों बैग कॉन्टेसा में रख कर वो खुद ट्रक पे सवार हो गया. लाली को विष्णु ने पिछली सीट पर बैठाया और खुद स्टीयरिंग पर.

"हमारे एक मित्र थे बिटिया जिनका कहना था की आपका जीवन किसी के जाने से ख़तम नहीं होता चाहे वो आपका परिवार हे क्यों न हो. वो ख़तम होता है जब आप ये सोच लो के ज़िन्दगी बोझ है. बस तभी से हमने सोच लिया के ज़िन्दगी बिगड़ने वालो के पीछे पदों, अपने तोह खैर दिल में हमेशा हे रहेंगे.", कार चालू करने से पहले विष्णु ने अपनी कलाई को देखते हुए अतीत का पथ सुनाया और चाबी घुमा दी. हरे जोड़ने से वह लिखा था 'Inder-Vishnu'

"हम का कहे आपको?"

"फ़िलहाल तोह पिता हे बोल लो जब बिटिया मान लिया है लेकिन हफ्ते 10 दिन बाद तुम अपनी दुनिया में होगी और याद रखना के उस दुनिया में हम नहीं होंगे.", इसके साथ हे विष्णु वर्धन लल्ला जी लंका दहन करके निकल चला इस चार दीवारी सी. अब लाली भी कुछ हद्द तक सहज हो चुकी थी.

"वैसे आप जो करते है वो भी तोह गलत है.", लाली ने साफ़ हिंदी में बात करने की ाची कोशिश की थी.

"हाँ गलत तोह है बिटिया लेकिन विरावो में अक्सर कानून कमजोर का साथ नहीं देता. या तोह खुद हे कानून बनाओ या फिर जुल्मी के भोगी. हमको पहला वाला ठीक लगा तोह वही करने लगे. और उन बच्चियों की चिंता मैट करना, विश्वास का नाम और काम एक जैसा है. वो उन्हें सही जगह पंहुचा कर लौट आएगा.", विष्णु ने कार भागने की कोई जेहमत न की थी और इन संकरी सड़को पर शायद विरानो के सिवा कुछ था भी नहीं. पहला क़स्बा हे यहाँ से 50 कोस था.

"इसलिए हमको आपसे डर नहीं लगा क्योंकि ज़िन्दगी ने इतना तोह सीखा हे दिया है के नजरे क्या कहती है. आप क्या सारा जीवन ऐसे हे रहेंगे?"

"मेरा भाई आएगा न एक दिन मुझे घर ले जाने. फिर विरानो में नहीं आऊंगा वापिस. अभी वो शायद खुद उलझा हुआ है अपनी दुनिया में लेकिन वो आएगा, मेरा दिल यही कहता है.", इसके बाद विष्णु ने बात न करते हुए स्टेरो का बटन दबा दिया. गाने के बोल थे

'मोने पोरे रूबी रे, कविताये ठुमके एक दिन कोहतो कोरे देखी ची..

तुझे बिन जाने ...

बिन पहचाने ..

मैंने हृदय से लगाया...

पर मेरे प्यार के बदले में तूने... मुझको ये दिन दिखलाया..

जैसे विरहा की ... हृत्त मैंने काटी.. तड़प के आहें भर भर के..

जले मैं तेरा भी.. किसी के मिलान को.. अनामिका तू भी तरसे..

मोने पोरे रूबी रे.. कविताये ठुमके एक दिन कोहतो कोरे देखि ची

आज हाय रूबी ray..deke बोलो ामा के टॉमके कोठों जानो देखि ची..

मोने पोरे रूबी रे..

आज कितनी हे मासूम ज़िंदगियाँ बचाई थी इस रहस्यमयी व्यक्ति ने और ख़तम कर दिया था उस स्त्रोत को जो आगे जाने और किते घर उजाड़ता. कई लोग जीवन में मकसद बनाते है लेकिन जैसे इस इंसान का तोह मकसद हे जीवन बनाना था. कही तोह जरूर मंज़िल मिलनी थी लेकिन कब, इसका जवाब जैसे खुद विष्णु के पास न था.
 




बस यु हे कुछ खयको के गर्भ से.

वर्तमान समय तक 67 प्रे बुकिंग्स के लिए सभी का धन्यवाद. और आप लोग अपनी व्यक्तिगत राये जरूर दे की कैसे मैं इस पुस्तक रुपी लक्ष्य को और बेहतरी से अंजाम तक ले जा सकू. एक हे साथ कई दिशाओं में कार्य जारी है, मुश्किल आना लाजमी है लेकिन मैं दृढ निश्चय और आप सभी के विश्वास पर इसमें सफल रहूँगा. 🌱🙏
 
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