अपडेट 182 (ा)
अंताक्षरी
"आओ हुज़ूर तुमको... सितारों में ले चालू..
दिल झूम जाये ऐसी बहारों में ले चालू..."
हर लफ्ज़ इतना खनकता सा गूँज रहा था की जैसे कान से सीधा दिल में उतर रहा हो. कल का दिन व्यस्त होने वाला था जिस वजह से अधिकतर लड़कियां अपने अपने बिस्टेर पर जा चुकी थी लेकिन इस घर की छत्त पर भी कुछ बिस्टेर लगे थे जहा से ये मधुर आवाज खामोश वातावरण में शहद सी मिठास भर्ती लगी. अर्जुन हॉल लांघ कर अपने सोने की जगह पंहुचा तोह उसके बिस्टेर के इतर 4 और गद्दे लगे थे. ये सुरीली आवाज थी ज़ुबैदा हुसैन की और उसके गिर्द उतनी हे मुस्तैदी से बैठी अलका, ऋतू, विन्नी और गुरदीप के साथ राजेश मां की बेटी स्वाति श्रोता बानी हुई.
"वाह.. आप तोह गण भी चित्रकारी की तरह बेहद कमाल का जाती है ज़ुबैदा बाजी. एक पल को तोह लगा की कही गलती से आज अलका दीदी का हे मूड तोह नहीं बन्न गया पर इनकी आवाज भी इतना विस्तार नहीं रखती.", पानी का जग एक तरफ रखता हुआ अर्जुन चौकड़ी मारे बैठी ऋतू की बगल में हे गद्दे पर जा लेता. उसकी तारीफ ने तोह ज़ुबैदा के हसीं चेहरे पर अलग हे नूर खिला दिया था, हलकी सी लाली के साथ. ऋतू ने भी स्नेह से अर्जुन के बाल बिखेर कर हँसते हुए अपनी भाई की बात को आगे बढ़ाया.
"सच कहा ारु ने दीदी. अलका अक्सर गुनगुनाती है और आवाज भी बहोत ाची है इसकी लेकिन आप तोह जैसे गाते हुए यहाँ थी हे नहीं. और मुझे तोह लगता था के इस गाने पर आशा जी (भोंसले) के सिवा कोई आवाज कभी खरी उतर हे नहीं सकती. लेकिन बेहद हे उम्दा गया है आपने.", ऋतू की बात सुन्न कर ज़ुबैदा ने मजाक में हाथ जोड़ कर सर झुकाते हुए अभिवादन किया तोह बाकी सभी मुस्कुरा उठे.
"तारीफ के लिए शुक्रिया लेकिन नाचीज इतनी भी कुछ ख़ास नहीं है. खैर अब तोह अलका बेगम आपकी आवाज सुने बिना ये रात नहीं गुजरने वाली. क्या कहती हो विनीता?", ज़ुबैदा की बात पर विन्नी ने भी अलका को गाने का इशारा किया जो बगले झांकती दिखी.
"जरूर जाएगी ये भी और नियम के हिसाब से बारी भी तोह इसकी हे थी लेकिन अब इसके बाद स्वाति और फिर अर्जुन आ गया है तोह आज ये भी बचेगा नहीं. कोई बहाना नहीं चलेगा किसी का.", विन्नी ने जैसे हे अर्जुन का जीकर किया वो तोह तकिये में मुँह दबाने लगा.
"ऐ आलू (अलका), जरा वो किशोर कुमार का तेरे स्टाइल में फीमेल वर्शन सुना न. अजनबी तुम जाने पहचाने से लगते हो...", ऋतू से बेहतर भला अलका को कौन जानता था और उसकी बात तोह जैसे अलका के लिए पत्थर की लकीर थी.
"नहीं नहीं.. अलका दीदी इतना पुराण गण नहीं. मुझे ये दर्द भरे गाने ाचे नहीं लगते.", स्वाति ने चेहरा लटकते हुए जैसे हे ये कहा ऋतू और अलका के साथ बाकी सभी हंस दिए.
"ाचा बाबा तू बता तुझे कौन सा गण सुन्न न है? फिर तोह तेरी हे बारी है.", ऋतू ने भी स्वाति को स्नेह से पुछा. अर्जुन जानता था की उसकी बहनो में सबसे ख़ास बात थी उनका सुलझा हुआ चरित्र और दुसरो को पहल देना.
"वो एक फिल्म है 'सपने' और उसका सांग चंदा रे चंदा रे . मुझे वो सांग बहोत पसंद है.", स्वाति ने ज्यादा सोचे बिना हे ऐसे गाने की फरमाइश रख दी थी जिस से यहाँ बैठे अधिकतर परिचित थे सिवाए अर्जुन के.
"हाँ ये मैंने भी नहीं सुना कभी. जरा सुनाओ तोह अलका दीदी अगर आपको इसकी लाइन्स याद हो तोह.", अर्जुन ने तकिया सही से दबा कर अपना सर थोड़ा उचकते हुए कहा. ऋतू अब उसके सीने से पीठ सताए आराम से बैठी थी.
"हाँ क्यों नहीं. जब सभी ने गण है तोह मुझे क्या परेशानी. वैसे गण ाचा सेलेक्ट किया है तुमने स्वाति.", और इसके बाद अलका ने चेहरा रुमाल से साफ़ करके पानी से गाला टर्र किया और एक गहरी सांस भर के जो सुर से सुर मिलाये अर्जुन की भी गर्दन ऊँची उठ गयी.
'गुलशन गुलशन.. वादी वादी बहती है रेशम जैसी हवा...
जंगल जंगल, पर्वत पर्वत.. है नींद में सब एक, एक मेरे सिवा...
चंदा.. चंदा..
आजा सपनो की नीली नदियां में नहाये
आजा ये तारे चूंकि हम, घर बनाये
इन धुंदली धुंदली राहों में, आ दोनों हे खो जाए..
चंदा रे चंदा रे..'
अलका ने कोई कसार न छोड़ी थी इस गीत को गाने में और उसके dhime-tej बदलते सुरो के साथ आवाज को बदलने की कला ने जैसे सभी को बाँध सा दिया था. वो सिर्फ होंठो से हे संगीत प्रदर्शन न करके, हाथ और चेहरे की भाव भंगिमाएं भी हर लफ्ज़ से बदलती किसी रूहानी से पल में समां गयी थी. बोल ख़तम होते होते जैसे वह कोई और बाकी हे न रहा हो.
"ओह भाई.. क्या हो यार तुम? एक पल के लिए तोह लगा हे नहीं के ये किसी घरेलु सी लड़की की आवाज होगी. हाँ तुम घरेलु तोह बिलकुल नहीं लगती लेकिन कसम खुदा की अलका, तुम खुद नहीं जानती की तुम्हारा ये हुनर कितना क़यामत खेज है. सुभानअल्लाह.", ज़ुबैदा की तारीफ और हैरानी पर जहाँ अलका शर्मा रही थी वही ऋतू जैसे फकर कर रही थी की अलका उसकी हमदम है.
"बिलकुल सही कहा दीदी और मैं न वॉकमेन पे ये सांग बहोत सुनती हु लेकिन अलका दीदी ने तोह बिना हे म्यूजिक के कमाल कर दिया."
"थैंक यू थैंक यू.. वैसे हर लड़की बाथरूम सिंगर होती हे है और ये ऋतू ने हे मुझे बाथरूम से रूम सिंगर बनाया है. अब मुझे गण ाचा लगता है और इसको सुन्न न... हाहाहा.. चलो अब मेरी बहोत तारीफ हो चुकी, स्वाति तुम्हारी बारी है. और न गाने पर सजा याद है न?", अर्जुन सजा शब्द सुनते हे अपनी जगह से उठ कर ऋतू के बराबर आ बैठा.
"ये सजा वजा का क्या सन है? मैं तोह सोने लगा हु इसके बाद."
"बच्चू, यहाँ नहीं सो सकते अगर नहीं गए सकते तोह. सजा तुम्हे बता देंगे पहले जरा स्वाति की आवाज भी सुन्न ले.", विन्नी ने साफ़ साफ़ अर्जुन को धमका हे दिया था मीठे लफ्ज़ो में. मुँह पर हाथ रख कर वो ख़ामोशी से बैठा तोह ऋतू ने एक बार फिर उसके सर पे हाथ फिराया लेकिन इस बार ये स्पर्श था हौंसला और तसल्ली वाला. ऋतू की छाया टेल तोह अर्जुन खुद अर्जुन बन्न रहा था. स्वाति ने भी thik-thak आवाज और सुरो में अपनी पसंद का गण सुनाया तोह अब बारी अर्जुन की थी.
"देखो मैंने कभी भी गण नहीं गया है बस सुने है."
"देख ारु, सच मुझे भी पता है के तू कितना जाता है और कौन गवाह है जिसको तूने फ़िरोज़ खान की फिल्म के गाने सुनाये है. चल चाहे 2 हे लाइन सुना दे लेकिन बस गए. सजा पता है क्या है? जो नहीं जाएगा वो कल रात संगीत में शामिल नहीं होगा.", अलका ने बड़े हे प्यार से अर्जुन को समझाया और विन्नी के साथ साथ ज़ुबैदा और गुरदीप ने भी नजरो से उसको उत्साहित किया गाने के लिए.
"कुछ भी गए सकता हु न? देखो मैं संगीत पार्टी मिस नहीं करना चाहता अगर यही सजा है तोह.", अर्जुन ने अपने लम्बे कुण्डल से बाल दोनों हाथो से समेत कर पीछे करते हुए एक नजर सभी को देखा.
"हाँ लेकिन बस कोई देशभक्ति वाला या स्कूल की पोएम न हो. बाकी जो दिल करे वो गए देना. मुझे नहीं लगता के तुम इस से बेहतर कुछ सुना पाओगे.", विन्नी ने अर्जुन की खिंचाई करते हुए कहा जिस पर वो थोड़ा झेंपता सा अपनी बहिन ऋतू की तरफ लाचारी से देखने लगा जैसे कह रहा हो के ये कहा फंस गया.
"हाँ तोह आपने ारु को इतना फ़िज़ूल समझा है क्या दीदी. ये लिस्टनेर है लेकिन नॉलेज ाची है इसकी भी म्यूजिक में. दादा जी भी अक्सर रेडियो पे इसके साथ हे गाने सुनते देखे है हमने.", अलका ने अर्जुन का पक्ष लेते हुए कहा तोह ऋतू ने भी उसकी हथेली पर ताली मारते हुए कहा.
"हाँ नहीं तोह.", और ऋतू की बात के बाद अर्जुन ने दबी हुई आवाज में बड़ी सरल आवाज में ये पंक्तियाँ शुरू की.
'हम तेरे शहर में आये है... मुसाफिर की तरह..
हम तेरे शहर में आये है मुसाफिर की तरह..
सिर्फ एक बार मुलाक़ात का मौका दे दे..
हम तेरे शहर में..
मेरी मंज़िल है कहाँ
मेरा ठिकाना है कहाँ..(2)
सुबह तक तुझसे बिछड़ कर,
मुझे जाना है कहाँ..
सोचने के लिए एक रात का मौका दे दे..
हम तेरे शहर में आये है मुसाफि की तरह."
"ओहो, जनाब बेशक सुर में ढीले है लेकिन पसंद की दाद देनी पड़ेगी. गुलाम अली खान साहब को सुन्न न बताता है की सचमुच गहराई वाले इंसान हो. खैर अब गण सुना है और कल नाच भी देखेंगे.", ज़ुबैदा के एकसार सफ़ेद दमकते दांत और मुस्कान बहोत कुछ कह रही थी जो गाने से कुछ अलग था. अर्जुन भी एक बार फिर बिस्टेर पर पसर चूका था अपनी बारी ख़तम करके.
"वह कोई मजबूरी या सजा थोड़ी न होगी. और मैं सबकुछ सुनता हु जो सुना दे. ये दादा जी को पसंद है और अलका दीदी ने उनका जीकर किया था इसलिए ये सुना दिया. बाकी कल संगीत नहीं लेडीज संगीत है जिसमे मैं नहीं नाचने वाला.", अर्जुन बात ख़तम करके थोड़ा पीछे हुआ जो साफ़ इशारा था ऋतू के लिए जगह बनाने का.
"ोये तुम दोनों एकसाथ सो रहे हो?", विन्नी ने जिस तरह से ये कहा था वो कोई कटाक्ष न था, बस चाहत थी जैसे वो उस जगह सोना चाहती हो.
"हाँ तोह आपको और कोई जगह खली दिख रही है? वैसे भी ये हर जगह सो जाता है तोह आज मैं इसकी जगह क्यों नहीं?", ऋतू ने अपने बालो से वो कपडे का रबर निकाल कर सिरहाने रखने के बाद टीशर्ट को दुरुस्त करते हुए चादर सही से फैलाई और सबकी तरफ चेहरा करती अर्जुन के सामने लेट गयी. अलका बस मुस्कुरा रही थी, जिसने ठीक वैसे हे अपने कमर तक लम्बे बालो को रबर से आजाद करने के बाद बिछावन सही करके सोने का उपक्रम किया.
"मेरा मतलब था के इस तरफ जगह खाली है और मुझे यहाँ डर लगेगा.", विन्नी ने आखिरी कोशिश की लेकिन यहाँ गुरदीप ने अनजाने हे ऋतू का साथ दे दिया.
"दीदी, मैं भी अकेले नहीं सोना चाहती. आपके हे साथ जोड़ लेती हु अपना बिस्टेर क्योंकि ज़ुबैदा बाजी तोह अलका और स्वाति के बीच है.", ऋतू मुँह दबाये इस बात पर हंसने लगी थी जिस पर अर्जुन ने भी मंद मंद हँसते हुए पीछे से ऋतू के ऊपर अपनी ब्याह रख दी. थोड़ा सिकुड़ती हुई ऋतू अब पूरी तरह अर्जुन से जुड़ चुकी थी. दोनों शरीर पर चादर लेते हुए उसने स्वाति से कूलर चालू करने का कह दिया.
"वैसे ये तोह सचमुच मजेदार है ऋतू. ऐसे खुले में सोना और वो भी सबके साथ कितना ाचा लगता है न?", स्वाति ने कूलर चालू करने के बाद अपना पजामा सही किया और पानी पी कर अलका के करीब हे आ गयी.
"हाँ.. अब लगता है क्योंकि ऐसे हंसी ख़ुशी के मौके बार बार तोह नहीं आते.", चादर के भीतर ऋतू ने अपने ऊपर आया अर्जुन का हाथ सही करते हुए अपने उभार पर ाचे से रख लिया था. जैसे ये भी एक चाहत थी ऋतू की जिसमे वो इतने लोगो की मौजदगी में भी अर्जुन के साथ आत्मीयता से जुड़ सके. अर्जुन ने भी वासना परे करके आहिस्ता से उसके सीने को सेहला कर हाथ पतली कमर पर टिका दिया, टीशर्ट के भीतर निर्वस्त्र कमर पे.
"वैसे आप लोगो में से किसी के पास कल थोड़ा समय हो तोह मेरी ड्रेस का कुछ काम करवाना है.", ज़ुबैदा की बात का जवाब अलका ने हे दिया.
"हाँ आप ले जाना ारु को दोपहर में संजीव भैया की हल्दी के बाद. और फिलहाल तोह मुझे नींद आ रही है, सभी को गूडनिघत.", अलका ने चेहरे तक चादर करके शुबरात्रि बोलै तोह कई स्वर में वही जवाब मिला. रात के गहराने पर कुछ हे समय बाद यहाँ माहौल शांत हो चूका था. ऋतू और अर्जुन भी एक दूसरे के आगोश में मीठी नींद में जा चुके थे, अगले बड़े दिन से पहले आराम करने के लिए.
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"मैं क्या कह रहा था भोले, वो विष्णु का पता लगवाया जाए?", घर की छत पर आधी रात में भी इन लोगो की आँखों से नींद जैसे कोसो दूर थी. सारा दिन bhaag-daud के बाद ये मित्र मंडली बोतल खोल कर जाम के साथ वही पुराने किस्से कहानी शुरू किये थे जो संजीव की पार्टी में अधूरा रह गया था. उमेद के जिस्म पर एक लुंगी थी और वही इन्दर घुटनो तक का ढीला कच्चा सा पहने हुए सबके गिलास भरने में लगा था. राजकुमार जी भी आज इनमे शामिल थे और हैरानी की बात थी की उन्होंने संजीव को भी रात का खाना न खाने देते हुए अपने साथ यहाँ बैठाया हुआ था.
"अगर ये व्यक्ति ख़ास है तोह आप मुझे डिटेल्स दीजिये उमेद चाचा जी, मेरे पास बहोत से लायक खोजी है जो सरकारी न होते हुए भी बड़े मुस्तैद है.", संजीव ने जैसे तैसे अपनी सिग्गट की तालाब रोक राखी थी शंकर जी को पीते हुए देख. अजीब हे दस्तूर है समाज में जहा शराब बाप बीटा साथ पी सकते है लेकिन धूम्रपान जैसे adhed-awastha तक एक परदे में रहता है.
"इसलिए तोह गज्जू ने जीकर किया है संजीव लल्ला. बात ऐसी है की हमारे कॉलेज में 2 लोग थे और दोनों हे बहोत ख़ास. ज़िन्दगी की bhaag-daud में हम उनसे दूर हो गए और शायद उनकी जरुरत के समय उनका साथ भी न दे पाए. बलवान और विष्णु थे वो 2 लोग लेकिन विष्णु का एहसान है हम सब पर. शंकर ने कोशिश की लेकिन काफी देरी से और मैं तोह कभी भी समाज में था हे नहीं. अब ये गज्जू की सूई अटक गयी है तोह जैसे तैसे विष्णु को ढूंढ़ना हे होगा. लेकिन गज्जू यार तुझे विष्णु की चाहत कैसे हो गयी इतने समय बाद? अब तोह ghar-pariwar के साथ साथ kaam-dhande के लिए भी पूरा वक़्त नहीं है फिर विष्णु मिल भी गया तोह क्या करेगा?", नरिंदर का तर्क अपनी जगह सही था और शंकर गहरी सोच में लगातार काश पे काश लगाए जा रहा था. सिग्रत्ती ख़तम करके उमेद की जगह जवाब शंकर ने दिया.
"बात ऐसी है इन्दर की अक्सर दुश्मन उसको हे हथियार बना लेते है हमारे खिलाफ जो हमारे करीब रहा हो और हमसे ताक़तवर भी. विष्णु के परिवार के साथ बहोत बुरा हुआ लेकिन उस से पहले वो बड़ी घटना में हमारा साथी था. क्या लगता है तुम्हे की अगर वो किसी गलत व्यक्ति की शरण में गया तोह कितना नुक्सान कर सकता है? तुम भली भांति परिचित हो इस बात से की कई दुश्मन ऐसे है जो 15-20 बरस से खामोश है. वो दुश्मन लागत हे नहीं अब लेकिन कुछ भी संभव है. विष्णु के बाद बलवान भी गायब हुआ और दोनों के हे परिवार नहीं रहे.", शंकर की बात सुन्न कर एक पल को तोह नरिंदर के साथ साथ राजकुमार जी और संजीव तक के होश उड़द चुके थे लेकिन उमेद सहमत था.
"मतलब आप लोगो से भी ताक़तवर थे वो 2 लोग? मैंने बहोत कुछ जाना है शंकर चाचा आपके और इन्दर चाचा के बारे में. वो कहानियां लगती है लेकिन हैं सच. उन सभी में उमेद चाचा आपका भी पूरा जीकर रहा है जिस से साफ़ पता चलता है की आप लोगो के कारनामे कटाई साधारण नहीं थे. फिर ये विष्णु और बलवान के लिए आप लोगो का इतना सतर्क होना तोह बहोत कुछ चेतावनी जैसा हे लगता है.", संजीव ने सबसे आखिर में अपने गिलास से चुस्की लेते हुए बात कहने से पहले राजकुमार जी की तरफ देख कर हे कहा.
"हर इंसान से बेहतर इंसान हमे मिल हे जाता है संजीव. तुम बहोत छोटे हो और जैसे तुमने इनके किस्से सुने है, हम सभी भाइयों ने तुम्हारे दोनों दादा (Rameshwar/Raghuvir) के. जो इनसे कही बेहतर और बेहद हे सुनियोजित तरीके से अंजाम दिए गए होते थे. विष्णु नाम से तोह मैं भी वाकिफ हु लेकिन कभी राब्ता न हुआ सिवाए एक छोटी सी मुलाकात के जब उसके साथ अज्जू था. अर्जुन सिंह, तुम्हारा चाचा.", राजकुमार जी भी जैसे अब भाग लेने लगे थे इन परस्पर गुफ्तगू में. शंकर ने भी अपने बड़े भाई की बात को सही ठहराया.
"अगर तुमने किस्से सुने है तोह फिर हमारा अनुभव भी सुन्न हे लो संजीव. विष्णु के समकक्ष खुद अज्जू और इन्दर, एकसाथ भी नहीं थे. उस समय अज्जू और विष्णु को वैसे हे सम्बोधित किया जाता था जैसे Nar-Narayan को. विष्णु के ख़ास भी अज्जू और इन्दर हे थे. बलवान हमारा था. शंकर की जो चिंता है वही मेरी भी है. अगर वो उनका दूर होना एक time-bomb निकला तोह फिर समझ लो की ये मिश्रा, ताराचंद, लोकदल लुंड कुछ भी नहीं उनके सामने. जिसमे संयम हो और ताक़त भी ख़ामोशी के साथ साथ, उसको कभी हलके में नहीं आंकना चाहिए.", उमेद ने जाम खाली करने के बाद तुरंत हे सभी गिलास बोतल से फिर से बना दिए. अब वो राजकुमार जी से ले कर काश लगा रहा था. इन सबके बीच नरिंदर अब बेहद खामोश था जैसे वो कुछ सोच रहा हो और इन सबसे अलग हे मनोस्थिति हो.
"फिर तोह मैं हर हाल में पता लगा के रहूँगा चाचा जी. शादी के बाद मेरा सबसे पहला केस यही होगा. एक गुमशुदा विद्यार्थी का जो बरसो से गायब है. कानूनी तौर पर न सही लेकिन केस यही होगा. जोइनिंग अगस्त में है और वादा करता हु उस से पहले मैं ये दोनों व्यक्ति आपसे मिलवा के रहूँगा, हर कीमत पर अगर वो ज़िंदा हुए तोह.", संजीव जज्बाती नहीं होता था लेकिन आज जैसे वो भी सेहन नहीं कर प् रहा था के उसके मजबूत स्तम्भ भी किसी इंसान के सामने खुद को कमतर बता रहे हो.
"पंडित जी के स्टाइल में हे रहना भतीजे श्री. नहीं तोह तुम मिलवाओ या न मिलवाओ, विष्णु तुम्हे जरूर दूसरी दुनिया से मिलवा देगा. अगर वो गलत राह पे हुआ तोह.", हँसते हुए नरिंदर ने ये कहा तोह बाकी सभी ने संजीव की भावुकता और बचकाना बात पर हंस दिया. वो भी झेंपता हुआ अनजाने में उमेद चाचा से सिग्रत्ती लेता काश लगा बैठा जिस पर फिर से ठहाका लगा लेकिन राजकुमार जी ने अपने बेटे की पीठ सेहला कर आश्वस्त किया की अब वो उसके पिता से बेहतर दोस्त है.
"वैसे तुम्हे कुछ करने की जरुरत नहीं अगर मेरी सलाह मानो तोह.", अब कही नरिंदर जी ने एक रहस्यमयी बात से शुरुआत की थी और बाकी सभी निगाहे उन पर हे जा तिकी.
"ये बिलकुल मत कहना इन्दर की अर्जुन को इशारा करना है?", उमेद तुरंत लपका इसके विरोध में और राजकुमार जी तोह हैरान हो गए जब इस महफ़िल में घर के सबसे छोटे सदस्य का जीकर हुआ.
"अर्जुन? क्या मतलब इसका उमेद?", उनका सवाल वाजिब था और अब इस पारस्परिक गुफ्तगू में उन्हें ये बताना जरुरी हो गया था के जाने अनजाने इन सबके लिए अर्जुन भी काम कर हे रहा था. बेशक अर्जुन की सबको परवाह थी पर वो लड़का आदत से मजबूर था, खून की खासियत की वजह से.
"वो बचा नहीं है राजू भाई. मतलब वो बचा है लेकिन नहीं है..", उमेद से तोह कुछ कहते हे नहीं बना और शंकर को तोह अब बेचैनी होने लगी थी क्योंकि ऐसे किसी भी जोखिम भरे काम पे उनके एकलौते बेटे को लगाना कटाई मंजूर न था.
"क्या लगा रखा है ये की वो बचा है, बचा नहीं है? अरे साफ़ साफ़ बोलो की बात क्या है और ये अर्जुन कही संजीव के साथ तोह मिलीभगत नहीं कर रहा?", राजकुमार जी झुंझला गए थे क्योंकि उन्हें भी अपना वो भतीजा उतना हे प्यारा था जितना हर वो शक्श जिसके लिए वो कुछ भी कर गुजरे. अर्जुन उनका अजीज था चाहे वो दर्शाते नहीं थे.
"वो मेरे साथ नहीं पापा, दादा जी के साथ काम करता है. मतलब वो खोजी है और इस से ज्यादा कुछ नहीं. जैसे दादा जी लोअर लेवल से ले कर हायर तक सभी जगह अपने विश्वासपात्र बना कर रखते थे ठीक वही हिसाब अर्जुन का है. नेटवर्क. तोह इन्दर चाचा जी का मतलब था के उसको अनजाने में हे हिंट दी जाए जिस से वो इन लोगो के बारे में कुछ पता करे लेकिन उसके पूरा होने से पहले कमान अपने हाथ में मैं ले लू.", संजीव ने बात सँभालने की भरपूर कोशिश की थी. इस बीच सभी के गिलास फिर से ख़तम हो चुके थे पर राजकुमार जी जैसे संतुष्ट न थे इस दलील से.
"वो मासूम है और अगर समझदार भी है तोह उसको इस सबसे दूर रखो शंकर. ऐसा इंसान जो दिल से मासूम हो और एक पारिवारिक दायरे में हो अगर उसने कुछ गलत भोग लिया तोह वो तुम्हारे इस विष्णु, बलवान या यु कहो की अपने पिता जी से भी ज्यादा खूंखार बन्न गया तोह रोके न रुकेगा. उसकी मासूमियत मैट ख़तम करना मेरे भाई किसी ऐसी चाहत में जिस से उसका दिल हे पलट जाए. जिसके पास संयम और ताक़त हो ख़ामोशी के साथ साथ उसका दुरपयोग भी नहीं करते.", आज तोह राजकुमार जी ने जैसे इन सभी के चक्षु हे खोल दिए थे इतनी बड़ी बात कह कर. उन्होंने नरिंदर और शंकर का भी कथन उनके ऊपर हे दे मारा था. अब कुछ पल ख़ामोशी रहने के बाद उन्होने हे बात शुरू की.
"वो पहले भी कुछ काण्ड कर चूका है?"
"हाँ. बहोत सारे और उनमे हमरा दोष नहीं है राजू भाई. भीम से ले कर छोटी और उसके बाद तोह जाने किस किस की मांजी वो लड़का अकेला हे थोक चूका है मैं बता नहीं सकता. आपकी बात का हे डर मुझे भी है और शंकर को भी. अगर अर्जुन मदमस्त हठी बना तोह वो बहोत कुछ तबाह कर सकता है लेकिन आपको ये भी बता दू की उसमे अधिकतर गुण चाचा जी वाले है या उस से भी पुराने. वो भोले जैसा नहीं है और शायद भोले जैसा भी है.", उमेद ने जिस तरह से ये कहा था राजकुमार जी समझ चुके थे की वो शंकर जैसा कैसे है.
"फिर तोह मैं तुम सबके बीच में बस एक अनादि आदमी हु उमेद. मुझे दुनिया की सिर्फ इतनी समझ है जितनी एक गृहस्थ इंसान को होनी चाहिए. संजीव बीटा, वो तुम्हारी जिम्मेवारी है और मैं जानता हु के तुम त्याग का पर्याय हो अगर बात अर्जुन की है तोह. निराश मैट करना.", कितनी बड़ी बात कह दी थी आज राजकुमार जी ने और जाम खाली करते हे वो निचे चल दिए, अपनी बीवी के पास.
"आपको अर्जुन की काबिलयत पर शक है चाचा जी?", संजीव ने अपने पिता के जाते हे अलग सिग्रत्ती सुलगा ली थी. अब उसका सवाल था उमेद सिंह से.
"हे इस प्रेसियस तो में बिकॉज़ हे रमिंडस में ऑफ़ माय फादर. हिज पोटेंशियल इस स्टिल ुँतौचेड बूत यू नेवर क्नोव व्हाट हप्पेंस नेक्स्ट. बीटा एक बात कहूंगा ध्यान से सुन्न न.", आज उमेद ने अंग्रेजी में कुछ कहा था और बाकी सभी बड़े ध्यान से उसको सुन्न रहे थे.
"जी."
"अर्जुन ने बहोत काम उम्र में एकाकीपन के साथ साथ बदलाव झेले है. वो परिपक्व होने के बाद मासूम हुआ है. ऐसे व्यक्ति को काम पे लगाना भी जरुरी है और नियंत्रण में रखना भी. कल को अगर यही कुत्ते खोल कर दुश्मनो के पीछे छोड़ने लगा तोह तुम नहीं जानते की ये क्या क्या करेगा. वो Raghu-Ram मिल कर करते थे जिसने हमे शिक्षा दी लेकिन इसका खून तोह जैसे सबकुछ सीख कर हे इस दुनिया में आया है. जिस दिन इसने तरस खाना बंद किया तोह समझ लो Shankar-Umed-Inder इतिहास होंगे. तुम एक ाचे सारथि हो संजीव, ठीक उस कृष्ण की तरह जो अर्जुन की ताक़त से परिचित था फिर भी उसको सिमित ताक़त के साथ कुरुक्षेत्र में लेके उतरा. वही अर्जुन बिना कृष्ण की पहले भी एक युद्ध में उतरा था सुभद्रा को सारथि बनाये. अनगिनत सेनापति, आधा दर्जन Karan-bhrata, हर शूरवीर समेत कारन, दुर्योधन, सुकुमार, द्रोणाचार्य तभी हार चूका था जब वो सुभद्रा को लिए निकल गया था. मतलब साफ़ है की कोई ऐसा भी होना जरुरी है जो ताक़त को सिमित करे. विष्णु से हमारा यही अभिप्राय है लेकिन तुम्हे इस अर्जुन को सिमित इस्तेमाल में रखना है.", उमेद ने एक लम्बी चौड़ी दलील दे डाली इतिहास सुनते हुए और संजीव सिर्फ मुस्कुराता रहा.
"चलो एक बात आज कर हे लेता हु आप सभी के सामने. ये मैट कहना की शराब के नशे में बोल रहा हु क्योंकि मैं अधः पीने वाला पव्वे से पहले सेट नहीं होता. अर्जुन, जिसको उमेद चाचा आपने शारीरिक शिक्षा दी. जीवन के लक्ष्य शंकर चाचा आपने दर्शाये और सबसे ख़ास बेटे का एहसास इन्दर चाचा आपने दिया. वो आखिर है कौन? वो हमेशा से हे इन सबसे अलग एक शिकारी है जो आप लोग न भी सिखाते तोह पारंगत हे होता. यहाँ एक विज्ञान की बात करूँगा और उस पर आप ध्यान दीजियेगा. शंकर चाचार और इन्दर चाचा में दादा जी खून है तोह ये निर्भीक है ठीक वैसे हे जैसे उमेद चाचा आप रघुवीर दादा जी की वजह से. लेकिन अर्जुन.. उसमे इसके साथ हे कुछ विशिष्ठ है. वो अपने pad-dada के साथ साथ अपने नाना से मेल खता है. कुन्दनलाल जी की सच्चाई कोई नहीं जानता लेकिन दादा जी जानते है. थोड़ी बहोत मैं भी और वो इशारा करती है की सामान दिमाग वाले व्यक्ति बहोत पहले से एकसाथ रहे है. वो कुछ क्षेत्र में आप लोगो से कही बेहतर है और इसका प्रमाण आपको रेखा चची की दिमाग से मिल हे जायेगा. वो किताब एक बार पढ़ते हे याद कर लेती है. मेरे इम्तिहान से पहले उन्हें वो सबकुछ याद हो चूका था जो वो मुझे पढ़ा रही थी. 2 काफी ख़ास खून मिलने पर सबसे बेहतरीन संस्करण अर्जुन के रूप में हमारे सामने है जिसको झुठलाया नहीं जा सकता. ताक़त पिता से और दिमाग माँ से. इसके साथ साथ उस पर हर किसी ने ध्यान दिया लेकिन ध्यान रोकने पर. उसको आजादी दो थोड़ी तभी वो ठहर पायेगा नहीं तोह be-lakshya वो अपनी हे धुरी में घूमता रह जायेगा. मेरा gair-sarkari ख़ास व्यक्ति वही है और उसका प्रमाण मैं आप सभी को अगर दूंगा तोह पाँव के निचे से जमीन न खिसक गयी तोह नाम संजीव राजकुमार शर्मा नहीं.", इतने लम्बे चौड़े विश्लेषण के बाद संजीव ने एक हे घूँट में जाम खली करके नमकीन पहली बार मुँह में ली. बाकी तीनो जैसे अभी तक उसके कहे शब्दों को टोल रहे थे.
"तुम ाचे से जानते हो न अपने इस छोटे भाई को?", ये तंज था खुद शंकर जी का.
"हो सकता है कुछ ज्यादा हे देख लिया हो तुमने.", इसके साथ हे इन्दर जी ने प्रहार किया शब्दों का.
"वो बहोत भावुक और समझौता करने वाला इंसान है संजीव. हाँ मजबूत है अगर किसी घेरे में मल्ल्युद्ध हो या फिर लड़ाई जैसे भीम के वक़्त हुई. वो लड़ना जानता है लेकिन क्या वो अभिमन्यु से आगे अर्जुन बन्न चूका है?", उमेद ने भी दोनों का तिरस्कार न करते हुए यहाँ अर्जुन के खिलाफ पहली बार बात कही जो शायद चाल हे थी लेकिन एक भरी चाल.
"आप लोग हे अगर बवंडर चाहते हो तोह मैं क्या कहु.", संजीव ने सिर्फ अपना हे जाम बनाते हुए कहा
"मतलब?", नरिंदर जी ने सवाल किया
"जो भी बात यहाँ होगी चाचा जी वो यही रहेगी तोह मैं आगे कहूंगा. कसम लीजिये उस ख़ास की आप सभी जिसके जाने का दुःख आपको सेहन न हो तभी मैं आगे बात करूँगा.", संजीव ने बिना पानी मिलाये हे वो जाम गले से निचे उतार लिया. वो आज अपने भाई के लिए जैसे समाज से बाघी हो चूका था और अगर बात किसी एक को चुनन ने की आती तोह तोह निश्चित कर चूका था की इनकी कसम टूटने को वो याद रखेगा.
"माँ कसम.", शंकर
"पापा हमेशा सामने है.", उमेद
"परिवार से ऊपर कुछ नहीं.", नरिंदर
और तीनो हे तुरंत कसम उठाने के बाद वैसे हे नेट पेग लगा कर टकटकी से संजीव को देखने लगे.
"जीवन कटाई वैसा नहीं है चाचा जी जैसा हम सभी देखते या चाहते है. इंद्रधनुष के दृश्य में रहने वाला अक्सर काले सफ़ेद का मोहताज रहता है.", संजीव अब जैसे विचार बना चूका था कुछ बड़ा कहने का.
"मतलब.?", यहाँ पेग बनाते हुए इस बार शंकर जी ने खुद हे सोडा पानी डाला क्योंकि नेट पीना खतरनाक था ऐसे जज्बाती माहौल में.
"प्यार.... छोटा सा लफ्ज़ लेकिन मायने बहोत बड़े है इसके चाचा जी और मैंने जाना ये जब खुद महसूस किया. मैं उस इंद्रधनुष से बहार था सब राण होते हुए भी लेकिन जो काले घेरे में रहा उसके पास सप्तरंग थे. अर्जुन.. अर्जुन के पास सबकुछ था जबकि कोई चाहत भी नहीं."
"मुझे इसका कोई भान नहीं.", नरिंदर जी ने थोड़ा करीब होते हुए गिलास में बर्फ के टुकड़े दाल कर संजीव को देखा. उन्हें अलग हे झुरझुरी हो रही थी जैसे वो कुछ नया जान ने वाले थे.
"अर्जुन के आदर्श है स्वयं शंकर चाचा. मजबूत निर्णय भी वैसा हे व्यक्ति ले सकता है. वो सबसे ज्यादा किसी को मानता है तोह कृष्णा चची को और अगर बात आये कुर्बान होने की तोह फिर उमेद चाचा. आपने कही देखि है ऐसी विविधता?", संजीव ने सभी को लपेट लिया था और खुद शंकर जी जानते थे की उनका बीटा कभी उनके विरुद्ध नहीं हो सकता.
"तुम सही हो इस मामले में और मैं समर्थन करता हु की वो ऐसा हे है. लेकिन हम विष्णु को भूल रहे है.", नरिंदर जी ने बात काटनी चाही.
"विष्णु आपके पास होगा मेरी जोइनिंग से पहले लेकिन बात पूरी नहीं हुई चाचा जी. मेरी शादी का गिफ्ट हे समझ लो.", आज संजीव ने इन तीनो को जैसे लपेट हे लिया था और उपहार के जीकर पर वो खामोश हे हो गए.
"बोलो भी आप लोग. खामोश क्यों हो? सवाल तोह बहोत होंगे."
"तुम अर्जुन की हरेक जिरह नहीं जानते संजीव. समय बहोत कुछ बिगाड़ देगा.", शंकर के अंतर्मन से निकली इस बात पर संजीव थोड़ा गंभीर हो गया.
"वही डर है है चाचा जी की तब मैं आपके खिलाग रहूँगा या आप मेरा साथ देंगे.?", ये अलग हे विस्फोट था जो संजीव ने किया था उन पर.
"क्या मतलब की मैं तुम्हारे खिलाफ?"
"जाने दीजिये इस बात को चाचा जी. जिसने दूध नहीं पीया वो ख़ास और जिसने पीया वो अनदेखा.", संजीव ने ऐसा करारा प्रहार किया था अपने शंकर चाचा पर की वो कुछ पल तक बस सोचते हे रह गए.
"ऋतू के लिए बोल रहे हो?", जल्दबाजी में मुँह से निकल हे गए शंकर लेकिन यहाँ नरिंदर की बोहेन तन्न गयी.
"मतलब की आपको ठीक से पता है? वो असली कृष्ण है चाचा जी और सच कहु तोह पहले मुझे भी असहनीय सा लगा फिर जब ज्ञान चक्षु खुले तोह उस से बेहतर कुछ था हे नहीं. क्यों उमेद चाचा जी? सुभद्रा और अर्जुन से बेहतर कोई rann-neeti में रहा है क्या?", ये अजीब संवाद था जिसमे संजीव ने साफ़ जाहिर कर दिया था के Ritu-Arjun का रिश्ता उसको स्वीकार भी है लेकिन वो असलियत में कुछ और भी है.
"हाँ बीटा. सब सही है. मैं अब बस सोने हे लगा हु.", उमेद तोह वह से उठ कर एक तरफ हे चल दिया लेकिन नरिंदर अभी भी शंकर को घूर रहा था के ये कौनसी अंताक्षरी है जिसका उसको नहीं पता. गहरी रात के साथ हे संजीव भी ख़ामोशी से निकल चला अपने बिस्टेर की तरफ, शंकर नरिंदर को छोड़ कर.
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क्रमश