Incest Pyaar - 100 Baar - Page 35 - SexBaba
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Incest Pyaar - 100 Baar

अपडेट 169

पुष्पक


घर में गीत और शगन का कार्यक्रम अपने स्वरुप हे चल रहा था. केशव मां ने सबके तिलक इत्यादि करके अपने दोनों प्रमुख bhanja-bhanji को कपडे, गहने आदि से भात भर कर वो सब भी दिखाया जो वो अपने साथ ले कर आये थे इन्हे शादी में देने के लिए. ये रिवाज हे थे जिसमे मां हे अपने bhanje/bhanji को पहला शगुन भेंट करते है.

आदतन सभी महिलाये कपडे, गहनों आदि में रूचि ले रही थी और सभी के चेहरों पर खूब waah-wahi थी की केशव जी ने इतना कुछ किया है. रामेश्वर जी से लेकर प्रीती तक सभी के लिए कुछ न कुछ जरूर था. शगुन अभी और आगे बढ़ा जब खुद सोहनलाल जी अपनी बीवी अंजना जी के साथ पधारे. एक पल तोह कौशल्या जी ने हैरत से उनके पीछे सामान लिए आये बिट्टू और राजेश को मन किया लेकिन उन्होंने हे खुद केशव के सर पे हाथ रखने के बाद इजाजत मांगी.

"बहिन जी, बचे तोह हमारे लिए भी सभी बराबर है. संजीव हे तोह पहला बचा था जो हमारे यहाँ रेखा के साथ आया था. केशव बड़ा है और उसके बाद बिट्टू का भी तोह हक़ है. मन करके हमे बहार मैट कीजिये और सरपंच जी भी आये है.", सोहनलाल जी के शब्दों का प्रभाव गहरा हे हुआ कौशल्या जी पर और वही रामेश्वर जी की आँखों में भी हल्का सा गीलापन उभर आया, ख़ुशी से.

"हाँ तोह सोहन भाई वैसे भी यदा कड़ा तोह कोई पुण्य काम करते है. केशव बीटा, आपके साथ अब pita-tulya सोहन भाई है और ये सरपंच पे जुरमाना लगेगा, लाजमी.", अपनी जगह से खड़े हो कर रामेश्वर जी ने कृष्णा जी के पिता और सोहनलाल जी का गले लग कर आभार प्रकट किया. माहौल और भी बेहतर हो गया था जब घर की पहली शादी में वो रिश्तेदार भी जिनकी अपनी अलग अलग बेटियां यहाँ ब्याही गयी थी, उन्होंने भी ललिता जी को बाप की कमी खेलने न दी.

"इस सरपंच की पंचायत तोह मेहमानखाने में लगेगी थानेदार, तुम्हे कुंदन बुला रहा वही पे. यहाँ बेटियों और बचो के बीच दिल्लगी तुम कहा कर रहे हो हमे ाचे से खबर है.", ऐसा मजाक पंडित जी के साथ या तोह खुद कौशल्या जी कर सकती थी या फिर सोहनलाल जी और बस 2-3 उनके hum-umar करीबी. सोहनलाल जी का साथ खुद कौशल्या जी ने दिया इन हंसी के ठहाको के बीच.

"सही कहा भाई साहब आपने. पूर्णिमा तोह चलो इनकी नजरो के aas-pas हे रहती है और आज सुनंदा के साथ साथ अंजना दीदी भी आयी है इसलिए ख़ुशी देखते हे बनती है इनकी.", मधु के साथ साथ रेणुका, राजेश्वरी, रोमिला इत्यादि की भी हंसी की आवाज बुलंद हो गयी थी. वही जिन जिन के नाम कौशल्या जी ने लिए थे वो सभी चेहरा पल्लू में दबाये शर्मसार होने लगी. खिसियाते हुए पंडित जी तोह हाथ जोड़ कर जो वह से निकले पलट कर देखा भी नहीं.

"दादी, अब मुझे समझ आया ये ऋतू क्यों इतनी हंसोड़ है और बेबाक भी. आपने हे घुट्टी दी थी न इसको?", अलका हँसते हुए कौशल्या जी से बोली और ऋतू उसको घूर कर चुप रहने का कहने लगी. हंसी ख़ुशी के इन्ही लम्हो में एक बार फिर से वही शगुन और गीत गूंजने लगे थे. Riti-riwaaj का सही मकसद क्या है ये वही समझ सकते है जिन्हे bhare-poore परिवार को एकत्रित रखने की समझ हो. इनकी जरुरत इतनी हे होती है की अपने के प्रति खुलकर प्रेम जाहिर किया जा सके और निरंतर चलती ज़िन्दगी से कुछ क्षण अपनों के बीच व्यतीत किया जा सके.

"अर्जुन बीटा, अब संजीव को पिछले घर ले जा अपनी किसी भी बुआ के साथ. हमारा पहला घर वही है और तेरी बुआ इसकी छाप वही उतारेगी. नजर बांधने के बाद तुम घर से अकेले बहार नहीं जाओगे इसके बाद संजीव.", कौशल्या जी ने अपनी जगह से उठ कर एक किनारे वाली थाली अर्जुन को पकड़ते हुए दोनों को हिदायत दी. अर्जुन को अब समझ आया था की दादी उस घर को इतना क्यों मानती है.

"माँ, नजर और छाप रेनू को करने दो. माँ बन्न ने वाली है ये तोह बचा भी नजर में शामिल होगा.", मधु ने अपनी जगह रेणुका को आगे कर दिया था और यही महफ़िल में बात खोल भी दी थी की रेणुका गर्भवती है. कृष्णा जी ने एक लाल चुनरी, जो ख़ास थी वो ललिता जी को इशारे से रेणुका को उड़ाने को कहा. अब भात की हे रसम के बीच रेणुका को भी सभी बड़ो का आशीर्वाद मिल गया था.

"ललिता, नेग तैयार रखियो मेरी बेटी के लिए. तेरे छोरे की नजर करके आएगी तोह मर्जी का वचन लेगी तुझसे.", यहाँ ये आवाज पूर्णिमा जी की तरफ से आयी थी जिन्होंने साफ़ कह दिया था उनके लिए भी रेणुका वैसी हे है जैसे Madhu-Shalini.

"वचन है माँ जी, इसकी गोदभरे भी ऐसी हे करुँगी और शगुन रेणुका के भाई साहब जाने.", ललिता जी भी आज उस पीली साड़ी भी बसंत का मौसम लग रही थी जिन्हे बचो के ब्याह से ज्यादा ख़ुशी थी की सभी दिल से यहाँ शामिल है और उन्हें पूरा सत्कार भी मिला. अर्जुन ने अपने बड़े भैया को भी उठने में मदद की और इनके साथ हे प्रीती भी अपनी बुआ के पीछे अफसाना को लिए.

"हम भी जा सकते है न दादी?", उठने के बाद हे प्रीती ने वापिस मदद कर कौशल्या जी से पुछा तोह उन्होंने भी हँसते हुए हाथ के इशारे से जाने को कहा. थाली अब प्रीती के हाथ थी और अर्जुन ने खुद भैया और बाकी सबके लिए दरवाजे खोल सबके बैठने के बाद इलो बहार निकली.

"तुमने ये कार क्यों निकली?", सवाल न चाहते हुए भी प्रीती के मुँह से निकल हे गया जिसका जवाब खुद संजीव भैया ने दिया.

"ऐसा है प्रीती की अर्जुन चाहे जितना भी खुद को नास्तिक या अलग बताये पर जैसा दादी कहती है ये वैसा हे करता है. शुभ काम के लिए जा रहे है इसलिए इसने ब्लैक कार की जगह ये गाडी निकली. देख लो भगवान् में नहीं मानता पर किरशन जी का चला चाबी में रखता है ये.", संजीव भैया भी खुलकर बोलने लगे है ये अब प्रीती के लिए नयी बात नहीं रही थी पर रेणुका को ख़ुशी हुई की उसका बड़ा भतीजा वो गंभीर व्यक्ति नहीं रहा जिसकी आवाज हे यदा कड़ा सुनाई पड़ती थी.

"इस अर्जुन ने तोह तुम्हे भी बोलना सीखा दिया संजीव.", रेणुका बुआ की बात पर एक पल तोह संजीव सकपका गया लेकिन मोर्चा अर्जुन ने अपने हाथ लिया.

"क्यों बुआ, आपको नहीं सिखाया मैंने? आप तोह हमेशा दादी के हे चिपकी रहती थी लेकिन अब देखो तोह लोगो के सामने खुद को प्रीती की बड़ी बहिन बताने लगी हो.", ये बात खुदसे हे जोड़ी थी अर्जुन ने, बहिन वाली. और इसके साथ हे रेणुका बुआ ने उसका हलके से कान खिंच दिया. अकेले होते तोह वो ऐसा कदापि न करती लेकिन इस पल में ये भी जाताना था की बुआ भतीजा भी है ये लोग.

"देखा संजीव इस शैतान को?", बुआ ने ऐसा कहा हे था की अर्जुन ने आईने से एक नजर रेणुका को देखा और जब दोनों की नजरे मिली तोह अर्जुन ने आँख दबा दी. माहौल एकदम हे शांत हो गया था. संजीव मुँह दबाये हंसी रोक रहा था, रेणुका की नजरे शर्म से झुकी थी और अर्जुन की हरकत प्रीती से भी न बची थी जो अब संजीव भैया जैसे हंसी दबा कर बहार देख रही थी.

"अचानक हुआ क्या है?", अफसाना जो इतनी देर से ये सब ख़ुशी से देख रही थी, वो चुप न रह सकीय और इसके बाद बस प्रीती, संजीव और अर्जुन के हंसने की आवाज हे जवाब में मिली. कार रुक चुकी थी और प्रीती ने उचक कर बहार देखा.

"यहाँ तोह पहले से हे अंकल लोग है.", उमेद, राजेश की कार इधर वाले घर के बहार हे कड़ी देख प्रीती ने कहा था. अर्जुन ने उतर कर बड़ा गेट खोला और एक पल के बगीचे की तरफ हैरत से देख वापिस कार में बैठ उसको घर के अंदर हे ले आया.

"यहाँ तोह भैया खुश्ती चल रही है.", अर्जुन के ऐसा कहते हे कार से उतरने वाले सभी के चेहरे उस तरफ गए जहा घांस तैयार करने वाली कच्ची जगह को कुछ ज्यादा हे पोला करके अखाडा सा हे बना दिया था इन लोगो ने. प्रीती ने भी अफसाना की तरह सर से घुमा कर गले में दुपट्टा करते हुए घर के अंदर वाले हिस्से का रुख किया. ये लोग अंदर चले गए और अर्जुन इस अखाड़े की तरफ खिंचा आया जहा दलीप मौसा और धर्मपाल जी अखाड़े के बीच थे वही बहार पूरे जोश में हौंसला बढ़ाते उसके पिता, इन्दर चाचा, उमेद चाचा, राजेश मां, अशोक फूफा के साथ साथ छोटा सांगवान, मेहुल गुलाटी और भूपिंदर भी मौजूद थे.

"मेरे 2000 धर्मपाल भाई पे.", ये इन्दर चाचा ने बोलै हे था की दलीप जी ने अपने सामान तगड़े धर्मपाल जी को काख की तरफ से हाथ दाल कर मिटटी में पीठ के बल पटक दिया और इसके साथ हे चाचा की जगह अब अर्जुन के पिता चहक रहे थे.

"इन्दर, धर्मपाल भाई में अब वो बात न रही जो पहले थी. तब दलीप एक मिनट नहीं टिकता था और आज देख पिछले 10 मिनट में खेल 50-50 रहा लेकिन जीत दलीप की हुई. 5000 हरा है तू, 3 उमेद से और 2 मेरे से.", शंकर की बात सुन्न कर जहा इन्दर का चेहरा थोड़ा मायूस था वही दलीप जी खुद धर्मपाल जी का हाथ थामे अखाड़े के दूसरी तरफ आ बैठे. ये लोग यहाँ पूरी तैयारी से आये थे जैसे उनके पास कपडे थे और साफ़ सफाई के साधन भी.

"भाई, शंकर अगर उमेद के साथ अखाड़े में उतरता है तोह मेरे 10 हजार शंकर पे.", अशोक जी ने ये पेशकश राखी तोह जीजा की बात सुन्न कर तुरंत हे शंकर ने अपनी कमीज उतार कर राजेश को पकड़ा दी. उमेद बगले झाँक रहा था.

"मेरे 15 गज्जू पे जीजा. चल बे गज्जू, नाक न कटवा दियो.", उमेद साफ़ सुथरे कुर्ते पाजामे में था जो इन्दर की बात सुन्न कर झिझकता हुआ खड़ा हुआ. अर्जुन उनसे 20 कदम दूर इधर आँगन में बैठा ये सब देख रहा था. उसके baap-chacha और मां लोग इस उम्र में भी इतने चुस्त और तगड़े है. घर के अंदर रेणुका बुआ वही सब कर रही थी जो उन्हें कौशल्या जी ने समझाया था.

"यार कपड़ो का पन्गा है मेरे नहीं तोह लड़ लेता. तू हे भीड़ ले इन्दर इसके साथ.", उमेद की बार सुन्न कर बाकी सभी के चेहरों पे मुस्कान आयी वही इन्दर के निराशा.

"देख शंकर ने भी तोह शर्ट खोल दी. तू भी कुरता उतार और पाजामे की जगह ये ट्रैक पहन ले जो राजेश लाया है.", यहाँ तोह जितने भी ट्रैक एक तरफ पड़े थे वो सभी प्लास्टिक के लिफाफों में बंद थे, जैसे अभी तक प्रयोग हे न हुए हो. उमेद एक ट्रैक पजामा लिए गाये वाले कमरे में जा घुसा.

"जीजा, ये ट्रैक पाजामे आपके पापा ने अर्जुन के लिए मंगवाए थे और मुझे नई लगता एक भी सही सलामत पहुंचेगा.", राजेश के स्वर में जो विनती थी उसको देख शंकर के साथ साथ बाकी सभी हंसने लगे.

"तू पहले बता देता के ये अर्जुन के हैं. अब कुश्ती का प्रोग्राम भी तुम लोग बनाओ और बाद में रोना भी तुम्हारा. कोई न, 10 और ले आईओ बाद में. तेरा हे भांजा है."

"हाहाहा.. आज तोह वैसे राजेश को भी 2-2 हाथ करने हे चाहिए. साले साहब ने जाने आखिरी बार कब पटखनी खायी होगी?", नरिंदर ने बात को घूमते हुए राजेश को हे लपेट लिया था.

"हाँ, सही कहा इन्दर भाई. ये अपना भुप्पी भी कह रहा के इसको मिटटी का स्वाद बहोत पसंद. एक मुकाबला तोह राजेश भाई और भुप्पी का फिक्स और मेरे पहले से हे 5000 राजेश पे.", ये सांगवान था जो मजे लेने में इनके हे समकक्ष था. दूसरी तरफ बैठा भुप्पी नाराजगी से इन्हे देखने लगा.

"आजा बे भोले, तू भी क्या याद करेगा.", उमेद सिर्फ ट्रैक पाजामे में इधर आया था और उसका जिस्म कही से शंकर से काम न था बल्कि सुघड़ और कुछ चौड़ा हे था शंकर से. वही किसी अरबी घोड़े सा कैसा हुआ शंकर बेशक आधा फुट कद में काम था लेकिन कंधे बताते थे की क्यों बाकी सभी की नजरो में ताक़त का दूसरा नाम था वो.

"मेरे 10 शंकर पे और धरम भाई के 10 उमेद पे.", दलीप ने दोनों की तरफ से जब दांव लगाया तोह धर्मपाल जी भी हंस दिए. इधर इन्दर के 'स्टार्ट' कहते हे वो दोनों तगड़े शरीर एक दूसरे की हथेलियां जकड़े भीड़ गए. सचमुच जोर बराबर हे था इनमे और अर्जुन गौर से देख रहा था के उसके पिता के पत् और पंजे कितने मजबूत है. उमेद के पाँव पीछे सरक रहे थे और इसके बाद अचानक हे शंकर का शरीर हवा में उठा और फिर पीठ मिटटी में.

"ओह बहनचोद.. ये क्या था उमेद भाई?", सांगवान की मुँह से न्यास हे निकला था ये जब उसने शंकर को चित्त देखा.

"टेंशन नहीं परम भाई. इन दोनों का फैंसला ऐसे नहीं होता. गज्जू गरम कर रहा है अभी शंकर को और इनका बेस्ट ऑफ़ 5 है. मतलब जो 3 पटकनी दे गया वो जीतेगा.", नरिंदर के खुलासे से उमेद पर दांव लगाने वाले थोड़े नाखुश दिखे थे लेकिन वो मान रहे थे की उमेद जीतेगा हे. इसके साथ हे फिर से शुरू हुआ दौर लेकिन शंकर ने इस बार पंजे पकड़ने की जगह किसी सांड की तरह झुक्क कर उमेद की कमर गिरफ्त में लेते हुए करारी पटखनी दी. अशोक जी को भी उम्मीद न थी की इस उम्र भी शंकर इतना फुर्तीला होगा.

"ओह भाई.. ये क्या था?"

"जीजा, अभी देखना शंकर की दुनिया कैसे पलट टी है.", नरिंदर को जैसे पहले हे पता था के आगे क्या होना है और इसके बाद के लगातार 2 दांव उमेद ने चतुराई से जीत कर 3-1 से मुकाबला अपने नाम कर लिया. इन दोनों के बीच हर बार बस एक हे डाव में पटखनी हो जाती थी, जैसे क्रिकेट में हर बॉल पर 6 या आउट वाला हिसाब हो. शंकर का जिस्म इतनी देर में हे जैसे कुछ फूल गया था.

"आठ.. साला ये सब अब अपने बस का नहीं रहा.", उमेद एक तरफ हे पसर गया था और शंकर ने पानी पीते हुए मुस्कुरा कर इन्दर की तरफ देखा.

"पता है गज्जू ऐसा क्यों कह रहा है? शंकर की बैटरी चार्ज हो चुकी है अब और अगर इस वक़्त मैं भी इस से भिड़ा तोह गर्दन कल तक दुखती रहेगी.", नरिंदर को गहराई से पता था आपस में हर भाई का हिसाब.

"चाचा जी अगर सिर्फ खेल हे है तोह मेरी तरफ से अर्जुन दावेदार है.", ये आवाज संजीव भैया की थी जो कितनी देर से इधर खड़े थे खुद अर्जुन को खबर न हुई. जैसे प्रीती उनकी बगल में कड़ी थी मतलब साफ़ था के अर्जुन को बलि का बकरा बनाया गया था.

"पैसे वैसे है क्या दूल्हे राजा या ऐसे हे अपना घोडा रेस में उतारने चले आये. रेनू, तू तोह उधार नहीं दे रही इन्हे. देख ले एक नौकरी नहीं करता और दूसरे की जेब फ़िलहाल खाली है.", नरिंदर जी का जवाब सुन्न कर रेणुका बुआ ने हँसते हुए ना में सर हिलाया लेकिन अर्जुन तोह उठ कर कार की तरफ हे चल दिया.

"ओह तेरा घोडा तोह रिवर्स गियर पकड़ गया संजीव. हाहाहा.. पैसे बाद में दे देना भाई, एक हे घर में रहते है सब.", राजेश मां ने टांग खिंचाई की थी और संजीव भैया ने अर्जुन को वापिस बुलाया.

"भैया, पापा और चाचा लोगो में मैं कही भी फिट नहीं बैठता. और घर पे काम भी है अभी.", वो धीमी आवाज में ये सब कह रहा था.

"कोई काम नहीं है अभी घर पे.", अब प्रीती ने भी तिल्ली लगा दी थी

"कोई जुगाड़ बिठा रहे हो क्या तुम सब मिल कर? ाचा जाओ जाओ, कोई बात नहीं. बचो को भी जोश आ जाता है और अपना संजीव तोह वैसे हे हर टाइम अर्जुन अर्जुन करता है.", नरिंदर जी ने तोह ठान हे लिया था बचो को उकसाने का चाहे शंकर और उमेद नजरो से उन्हें मन भी करते रहे.

"मैं तैयार हु चाचा जी लेकिन पापा और फूफा जी के साथ कुश्ती नहीं खेलूंगा.", अर्जुन ने कदम आगे बढ़ाते हुए अपनी शर्त राखी तोह शंकर जी ने भी स्वीकृति दी एक सहयोगी पिता के साथ.

"मेरे 10 नरिंदर पे और शंकर के अर्जुन पे.", उमेद ने अब लपेटा भी तोह खुद मजे लेने वाले नरिंदर को जिसको कटाई उम्मीद नहीं थी अब ये होगा.

"हाँ और मेरे भी 5 इन्दर पे और संजीव के अर्जुन pe.",Ye थे अशोक फूफा जिन्होंने मैं बना लिया था के अब चाचा भतीजा हे मुकाबला करे. कुछ सोच कर धर्मपाल जी ने भी अर्जुन पे दांव लगाया और दलीप की तरफ से नरिंदर पर.

"बीटा अब आ हे जा मैदान में, देखु तोह हमारे थानेदार जी और इस गज्जू ने तुझे कितना तैयार किया है.", नरिंदर जी ने तोह पालक झपकते थे अपनी टीशर्ट उतार कर एक तरफ कुर्सी पर फेंक दी थी. 6 फ़ीट के इन्दर का शरीर आज भी पहलवान सरीखा कैसा हुआ और तगड़ा था. भुयजो पर सख्त मछलिया और 44 का सीना बहुत था बताने के लिए की क्यों उमेद पर वो हमेशा भारी पड़ते रहे.

"चाचा जी के साथ इन्हे मुकाबला नहीं करने दे प्रीती. हमे मालूम है वो क्या हालत करेंगे इनकी.", अफसाना ने बड़ी हे धीमी आवाज में प्रीती के कान में ऐसा कहा था. नरिंदर जी की दहशत से वो वाकिफ थी जब बात उसकी बड़ी पहन पर आयी थी और कैसे नरिंदर जी ने वो शक्श हे गायब कर दिए थे.

"मस्ती मजाक हे है अफसाना जी और चाचा जी प्यार भी बहोत करते है अर्जुन से.", प्रीती ने जवाब देने के साथ साथ एक नजर अर्जुन को देखा जो बिना कोई कपडा ढीला किये जमीन की मिटटी मस्तक से लगा कर नंगे पाँव अखाड़े में उतर आया था. ये सब अभी तक घर वापिस नहीं लौटे थे जिस वजह से तारा को कौशल्या जी ने इधर भेजा था और उसके साथ साथ पंडित जी भी ये घर दिखने के लिए अपने साथ आचार्य जी, हिमानी और छोल साहब को लेते आये.

"अब ये क्या चल रहा है भाई इधर? मैदान कच्चा करने को भेजा था एक को और इधर ये मुस्टंडे मजमा लगाए बैठे है. यहाँ bhaaji-mithaai के लिए हलवाई लगाना था लेकिन ये तोह खुद हे nang-dhadang से लौट लगा रहे है. ऊपर से दामाद को शामिल किया हुआ.", रामेश्वर जी थोड़ा हैरत में थे लेकिन छोल साहब ने उन्हें मुस्कुरा कर दखल देने से रोक दिया. तारा भी इतराती हुई प्रीती के करीब हे आ कड़ी हुई.

"देखते है पंडित जी ये क्या खेल खेल रहे है. वैसे भी वह घर में तोह आज महिलाओ के हे काम है और भोजन के बाद चलो यही मनोरंजन सही.", ये सभी आँगन से इतर हे खड़े थे और अखाड़े वाले लोगो का पूरा ध्यान बस बीच में खड़े अर्जुन और नरिंदर पर था.

"हमने देखा है बे इन्दर चाचा जी को कुश्ती करते और सच कहु न तोह तुमसे भी 2 गुना बेहतर थे वो उस टाइम. पापा उनसे 2 पटकनी की छूट लेते थे.", उमेद ने और हवा भरी मुकाबले में.

"हाँ तोह बीटा अर्जुन तुम्हे 4 पटकनी की छूट. मतलब मैं तभी जीतूंगा जब तुम 5 बार धरती के गले लग चुके होंगे. गज्जू महाराज, ये बगड़ बिल्ला अब मेरे हत्थे चढ़ा है और देखना क्या हाल बनता हु इसका. चल बीटा ये टीशर्ट उतार दे नहीं तोह तेरे साथ बाकी..", अब नरिंदर की नजर अपने पिता और बाकी लोगो पर पड़ चुकी थी और बात अधूरी हे रह गयी.

"लगे रहो भाई... लगे रहो. हम भी देखना चाहते है के 3 साल तक इन्दर क्यों अपराजित रहा Inter-college में. भूल जाओ के हम लोग भी इधर मौजूद है.", आचार्य जी ने उन्हें आश्वासन दिया तोह नरिंदर कुछ सहज हो गया लेकिन अब हालत ये थी की बाकी सभी ऐसे ाचे बचो की तरह अखाड़े के बहार बैठ गए थे जैसे गणित का पीरियड हो और किसी ने भी काम पूरा न किया हो.

"देख कर खेलना बस इन्दर. विवाह का समय है और कोई toot-foot हुई तोह तुम काम काज कैसे करोगे.", रामेश्वर जी ने ये कहा तोह अर्जुन पहली बार मुस्कुराया. बाकी सभी जो अखाड़े से दूर थे वो भी हंस दिए थे पंडित जी के मखौल पर. अर्जुन ने दोनों हाथो में मिटटी ाचे से मसली तोह इस बार खुद शंकर जी ने कहा.

"बीटा, टीशर्ट उतार दो. दांव सही से नहीं लगेगा और इन्दर की पकड़ तुम पर ज्यादा कसेगी अगर कपडे में रहोगे.", अपनी पिता की गहरी बात समझते हे अर्जुन ने अपने कंधे पर लगी पट्टी की परवाह न करते हुए वो कासी हुई टीशर्ट खोल कर कुर्सी पर रख दी. अब जो जिस्म अखाड़े में था उसकी प्रशंशा वह बैठे और खड़े सभी व्यक्तियों की आँखों में थी. हिमानी के तोह मुँह से न्यास हे निकल गया.. 'वाओ' और अफसाना को जब पता लगा की प्रीती उसको हे घूर रही है तोह नजरे झुका ली.

"देख लो देख लो, मजे ले रही हु बस आपके. वो उतना भी कमजोर नहीं है जितना आपको लग रहा था."

"हमने ये तोह नहीं कहा लेकिन इन्दर चाचा के पास अनुभव है. अर्जुन kam-umar है उनके सामने.", अफसाना दबी आवाज में हे गुफ्तगू कर रही थी और रामेश्वर जी चलते हुए नजदीक जा खड़े हुए. उन्होंने भी डॉक्टर टेप से लगी वो पट्टी देख ली थी जिस पर अखाड़े में मौजूद सबकी नजर थी.

"शुरू.", रामेश्वर जी ने हे आवाज दी और अर्जुन जब तक कुछ समझ पता वो इन्दर चाचा का एक हाथ उसकी काख के निचे से गुजरा और फिर वो बस जमीन पर चित्त पड़ा था. तुरंत वो उठ खड़ा हुआ और इधर उधर देखने लगा जैसे अभी ये हुआ क्या था.

"3 मौके और मिलेंगे अभी. टेंशन मत लो बीटा जानी, सीख जाओगे की हर मुकाबले हाथ पकड़ के नहीं होता.", नरिंदर जी ने फिर से उसके सामने खड़े होते हुए कहा और हंस दिए.

"मतलब free-style खेलनी है चाचा जी? चलिए तोह इस बार मेरी पीठि नहीं लगेगी.", अर्जुन थोड़ा संजीदा हो गया था और जिस तरह से उसने अपने दोनों पाँव विभिन्नि कोण पर जमाये थे शंकर जी का ध्यान उधर हे गया. एक बार फिर आवाज आई शुरू और नरिंदर जी गर्दन झुका कर जैसे हे अर्जुन की दूसरी काख की तरफ लपके उनका पूरा जिस्म 180 घूम कर कमर की तरफ से अर्जुन के हाथो में था. सर निचे और पाँव ऊपर. अर्जुन ने उनकी पीठ या सर जमीन पर न लगते हुए करवट के बल मिटटी में गिरा दिया.

"ाचा बच्चू.. लेकिन तगड़े शरीर को गिराने का सिर्फ यही एक दांव नहीं है.", नरिंदर जी को उम्मीद नहीं थी की ऐसा होगा और अर्जुन ने उन्हें चित्त न करके मौका क्यों दिया वो ये भूल कर ज्यादा हे उत्साहित हो गए.

"इन्दर.. ध्यान से..", शंकर ने अपने भाई को चेताया जैसे वो समझ रहे हो की यहाँ अर्जुन क्या करने की चाह रहा है. 1-2 बार यही उपक्रम होता तोह इन्दर अपनी ताक़त से लड़ने वाला था जो शायद सही न होता. लेकिन अर्जुन अपने पिता की बात सुन्न कर जैसे सोच बदल चूका था. मुकाबला शुरू हुआ तोह इस बार चाचा भतीजे की उंगलिया आपस में फांसी थी. शारीरिक बल का उचित प्रदर्शन था जिसमे अर्जुन को एहसास हुआ की सचमुच उसके चाचा अबतक जितने भी लोगो से वो भिड़ा था उनमे शक्तिशाली है. नरम मिटटी में अर्जुन के पाँव इंच इंच पीछे सरक रहे थे और दोनों के सीने चेहरे के साथ साथ एक दूसरे से बस इंच भर दूर.

पीठ व् अकार में खिंच कर ऐसी मांसपेशिया दिखा रही थी जो सांगवान, मेहुल समेत खुद शंकर की कल्पना से परे थी. एक पल ऐसा आया की दोनों स्थिर हो चुके थे. इन्दर इस से आगे जोर लगाने में असमर्थ था पर अर्जुन को रोके रखा.

"तेरा लोंदा सचमुच तगड़ा है शंकर. देख तोह यार कही से लगता है ये 18 का है.? वैसे लगता तोह नरिंदर भी 30 से ऊपर नहीं और हैं भी तुझसे 21 लेकिन अर्जुन ने शरीर चोखा बना रखा.", सांगवान शंकर से बात कर हे रहा था के शंकर की नजर उस सफ़ेद पट्टी के बदल रहे रंग पर पड़ी.

"इन्दर रोक दे बस.. बहोत हुआ.", वो तेजी से उठ कर दोनों के बीच आ खड़ा हुआ और जिस तरह से दोनों को अलग किया था वो दृश्य बताने को बहुत था की इस वक़्त ताक़त में शंकर अपने चरम पर था जिसके एक झटके से अर्जुन मिटटी में औंधे बल गिरा और इन्दर पीठ के. शंकर ने अपने बेटे का हाथ पकड़ कर खड़ा करते हुए जख्म पर ध्यान दिया.

"आप लोग चलिए, हम भी आते है यही से नाहा धो कर.", नरिंदर ने भी देख लिया था के किस वजह से शंकर को इतना ताव आया था. संजीव ने भी प्रीती इत्यादि को कार में बैठने को कहा और पंडित जी मुस्कुरा कर घर के भीतर दाखिल हो गए आचार्य जी और छोल साहब के साथ.

"उतनी बड़ी चोट नहीं है पापा, वैसे हे तार लग गयी थी जाली वाले गमले की.", अर्जुन ने पिता को वो पट्टी खोलते देखा तोह उन्हें रोकना चाहा. बाकी सभी लोग हाथ मुँह धोने लगे थे.

"बीटा, वो तार न इतनी मजबूत नहीं होती की ऐसे पार हो जाए. डॉक्टर हु चुटिया नहीं. जब चोट कंधे की हो तोह जोर कंधे का लगाना भी नहीं चाहिए. किस उल्लू के पाते ने ये ड्रेसिंग की थी?", शंकर ने और कोई सवाल नहीं किया था के कहा से चोट लगी, क्यों बताया नहीं.. बस घाव को ध्यान से देखने के बाद साफ़ रुमाल को गीला करके जखम और ाचे से देखा.

"वो मॉडल टाउन वाले डॉ मक्कड़ के क्लिनिक से.", अर्जुन ने झेंपते हुए जवाब दिया.

"बहनचोद ये बांस वाले भी बाज नहीं आते. मेहुल तू ले जा इसको अपने साथ और गाडी में हे ड्रेसिंग कर दे. लोहे की मोटी कील या वैसा हे कुछ लगा है तोह इंजेक्शन भी दे डीओ. और तुम अभी 4-5 दिन gym-boxing कुछ नहीं करना.", शंकर जी ने वो रुमाल वही कंधे पर दबाने के बाद अर्जुन को वो पकडे रखने का कहा और मोटर पर नहाने चल दिए.

"सॉरी यार पता नहीं था के जख्म गहरा है रिसने भी लगा. ठीक हो जा फिर पटखनी दूंगा तुझे.", नरिंदर जी ने परवाह के साथ साथ मखौल किया था और इधर मेहुल गुलाटी जब अर्जुन को लिए बहार अपनी कार की तरफ बढ़ा तोह संजीव को वह अकेले खड़ा देख अर्जुन ने नजरे झुका ली.

"अंकल आप ड्रेसिंग कर दो इसकी, फिर मैं इसके इंजेक्शन खुद लगवा लाऊंगा.", संजीव के पास अब मौका था अर्जुन से ढेरो सवाल करने का और 10 मिनट बाद हे ये दोनों पैदल घर की तरफ चल दिए.

"इंजेक्शन तोह तेरे महीने पहले हे लगा है जो 6 महीने तक असर रखता है. अब ये बता की तेरे ये चोट लगी कैसे?", अर्जुन इस बात से बच रहा था लेकिन संजीव ने जब उसको अखाड़े में उतरवाया तोह यही जान ने के लिए की आखिर उसके चोट लगी है तोह वो छिपा क्यों रहा है और चोट लगी कैसे.

"अभी बताना जरुरी है क्या भैया?"

"देख फिर मुझे घर से बहार जाने नहीं देंगे, इसलिए तू स्कूटर निकाल और nimbu-jeera के साथ सिग्गट के दौरान अब पूरी कहानी बता.", अर्जुन अब बेबस हो चूका था और संजीव भैया को वो झूठ कभी कहने नहीं वाला था.

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"साला मेरी तोह समझ से हे बहार है ये लड़का. काण्ड कब कर देता है कुछ खबर हे नई होती. तू घर हे था न इन्दर और ये कही गया था इस बीच?", शंकर हाथ मुँह धो कर अब साफ़ कपड़ो में था फिर से. नरिंदर ने एक बार उमेद की तरफ देखा और फिर जवाब दिया.

"ये तोह घर हे था सारा टाइम और चोट इसके कील से हे लगी है जो घर वाली गयम में पता नहीं कैसे बेंच पर पड़ी थी. अर्जुन ने बताया था मुझे पर ऐसी छोटी मोती चोट लगती रहती है यार. चल अब काम धाम देखते है कुछ नहीं तोह थानेदार ने उल्टा लटका देना सबको.", नरिंदर खुद हे बात गोल कर गया था कुछ सोच कर.

"दिमाग से पैदल हे ये उल्लू का पट्ठा.. चल चलते है घर, रोटी के बाद मैं जरा डायमंड पैलेस चक्कर लगा औ राजेश के साथ. तू गज्जू को ले जा कम्युनिटी सेण्टर और फिर एक बार इस कैटरिंग वाले का भी मामला देख लियो. मिलनी के कम्बल और कपडे परम लेने जा रहा भुप्पी के साथ. दलीप भाई, वो हलवाई इधर हे आएंगे भाजी बनाने वाले. खाने के बाद इधर देख लेना थोड़ा क्योंकि बचे भी अबसे इधर हे रहने आएंगे. कही इधर उधर उन्होंने नजर.."

"टेंशन न ले यार, हलवाई की माँ की छूट. इस आँगन में भी नजरे कढ़ाई से ऊपर उठी तोह गांड में पीतल भर दूंगा. चल वैसे भी तगड़ी भूख लगी है और आज रात का कोई सन मत बनाना. धर्मपाल भाई ने कहा है की कल संजीव पार्टी दे रहा है तोह वालिए जी के साथ हे गिलसि खड़केगी.", मस्तमौला दलीप भी इनके साथ हे तैयार हो कर चल दिया. सभी एक साथ हे घर के लिए निकले थे और इस बीच भुप्पी ने ये सवाल नरिंदर से कर हे लिया जो इतनी देर से उसके जेहन में था.

"इन्दर भाई, अर्जुन के बारे में क्या राये है? मेरा मतलब है की तुमने तोह परखा हे होगा उसकी ताक़त को?", नरिंदर ने सफारी का दरवाजा खोलने से पहले जवाब देना हे बेहतर समझा.

"वो एक सेकंड से पहले हे मुझे बराबर कर देता भूपी भाई. जिस तरह से उसने मुझे चरखे की तरह घुमा कर आराम से मिटटी में रखा था उस से साफ़ था के यहाँ बैठा कोई व्यक्ति उसकी टक्कर का नहीं. दूसरी बात ये की वो एक तरह से मेरी हे ताक़त की लिमिट जान गया था लेकिन उसने जोर नहीं लगाया. हाँ शंकर शायद 1 मिनट टिक सके उसके सामने, वो भी अगर ये पहले से तैयार हो. देखा नहीं बेटे का खून देख कर कितनी जान आ गयी थी एकदम से इसमें.? दुनिया के लिए कसाई डॉक्टर है अपना शंकर लेकिन बचो की एक खून की बूँद इसको बर्दाश्त नहीं.", और सफारी की सीट पर इन्दर तुरंत बैठ गया, शंकर को लपेटे में लेने के बाद.

"ये तोह सही कहा भाई. पहली बार देखा की शंकर भी घबराता है और अर्जुन तोह बाप के सामने आज भी नन्हे मुन्ने की तरह सेहम रहा था.", अशोक जी पिछली सीट पर बैठते हुए इस टांग खिंचाई में शामिल हो गए.

"अशोक भाई, बात ये नहीं है की वो अर्जुन का खून था.. वो खून उसमे मुझसे और मुझमे मेरे पिता से आया है. उस खून के एक कतरे के बदले मुझे खुद नहीं पता के मैं किस हद्द तक जा सकता हु."

"शांत रह बे भोले. तू तोह सीरियस हे हो गया. खेल कूद में होता रहता है ये सब.", उमेद अगली सीट पर इन्दर के बराबर आ बैठा था. पिछली पर टांग हे नहीं आणि थी उसकी.

"हाँ ये सही कहा तूने गज्जू. तेरी तोह खेल कूद में टांग 6 बार टूटी है न.. हाहाहा.. ", नरिंदर कहा किसी को बख्शता था और यही उसने उमेद के साथ भी किया. सभी ऐसी हे चुहल करते हुए वापिस घर लौट आये थे जहा आज लगभग 100 लोगो का खाना चल रहा था और गर्मी में भी इंतजाम ऐसा रखा था की किसी के चेहरे पर पसीने की झलक तक न दिखे. इस वक़्त सभी लोग घर में मौजूद थे और घुलमिल रहे थे. गायब थे बस 2 लोग जिनकी तरफ किसी का ध्यान भी न गया.

मार्किट से संजीव भैया के साथ आने के बाद अर्जुन गायब था और वैसे हे वालिए जी और उनकी श्रीमती के व्यस्त होने पर अन्नू भी नदारद थी. इन दोनों की गुमशुदगी सिर्फ एक इंसान की नजर में थी, कोमल दीदी के.

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मरीना अभी माधुरी दीदी के कमरे में थी जहाँ उनकी शादी के गहने और कपडे आदि सभी लड़कियां देखने में लगी थी और बीच बीच में माधुरी दीदी के मजे भी लिए जा रहे थे. विक्की इधर प्रीती के साथ अंदर आयी और सबसे पहले मरीना से वैसे हे मिली जैसा रूस का रिवाज था, गाल चूम कर. अफसाना, जो पहले शादी का लाल जोड़ा देख रही थी अब हैरत से प्रीती और मरीना का मिलना देख रही थी.

"टेंशन मैट लो अफसाना बेगम ये दोनों विदेशी है. वैसे तोह आप भी मोरक्को से है तोह विक्की आपसे वैसे हे मिल लेगी. क्यों विक्की?", अलका कहा आदत से बाज आती थी और हँसते हुए उसने अफसाना की खिंचाई की तोह वो घबराती हुई कोमल की तरफ सरक गयी.

"नहीं नहीं.. हमे ये सब पसंद नहीं."

"ये तुमसे मजाक कर रही है अफसाना. अलका, थोड़ा काम कर दो ये मजाक.", कोमल दीदी ने झूठी दांत लगाईं थी और अलका हंसती हुई विक्की से गले लग कर मिलने के बाद उसके पिछवाड़े पर हाथ फिरती हुई अफसाना को आँख मार दी.

"हां..", अफसाना ने मुँह पर हाथ रखने से पहले बस यही कहा था और अब मरीना भी हँसते हँसते एक तरफ से अफसाना की बगल में आ बैठी.

"तुम बहोत ज्यादा सुन्दर हो अफसाना.", मरीना के मुँह से ये जुबान सुन्न कर अफसाना के होश हे उड़द गए थे.

"आप हिंदी बोलती है? और हम सुन्दर नहीं है इतने, बस चश्म आपके हे जैसे है बस.", अफसाना इतने हे समय में काम से काम घुल मिल कर बोलने तोह लगी थी. और मरीना ने बिना बताये उसका गाल चूम लिया.

"तुम भी हिंदी बोलती हो, हम भी. दोस्त बन गए न इस बात पर?", मरीना की इस बात पर अफसाना ने मुस्कुरा कर नजरे झपका दी. अब जहा बाकी सब गहने कपड़ो में लगे थे वही प्रीती खिसक कर मरीना और अफसाना के पास आ बैठी.

"वैसे आप काम हे उर्दू उसे करना अफसाना जी मरीना दीदी के साथ. हिंदी तोह इन्हे ठीक ठाक आती है लेकिन उर्दू जरा भी नहीं. वैसे मरीना दीदी आपके मुम्मा कहा है?"

"मुम्मा तोह तुम्हारे घर गए है अभी लेकिन तुम्हारा लवर बॉय कहा है? घर में इतने लोग है और वही मिसिंग है. अलका तुम्हे पता है अर्जुन कहा है?", मरीना ने ये नाम ले कर कमरे में मौजूद हर लड़की का ध्यान अपनी तरफ करवा दिया था और विक्की का सबसे पहले. जो शायद यहाँ आयी भी इस आस में थी लेकिन प्रीती जानती थी की अर्जुन नहीं है और वो कहा है ये कोमल को पता था.

"आपने कही जाना था क्या अर्जुन के साथ?"

"वो तोह घायल थे और उन्होंने किसी को खबर भी नहीं लगने दी.", अफसाना और प्रीती ने एक साथ अपनी अपनी बात कही थी और अफसाना के बताने पर कोमल की आँखें बड़ी हो गयी.

"तुम्हे कैसे पता अफसाना की अर्जुन के चोट लगी है? और सुबह से तोह वो बिलकुल सही लग रहा tha.",Komal को चिंता होते देख अफसाना को अपनी गलती का एहसास हो चूका था और वही आरती के चेहरे पर भी परेशानी साफ़ नजर आ रही थी.

"वो दिख तोह सलामत हे रहे थे आपि लेकिन हमने वो दूसरे घर.. ", अफसाना को ऐसे बोलते देख प्रीती ने हे बात संभाली उसका हाथ दबाते हुए.

"नहीं दीदी, ऐसी कोई चोट नहीं थी और वो पिछले घर गए थे न हम लोग तोह वह इन्दर चाचा जी के साथ अर्जुन खेल रहा था. बस वही उसके कंधे पर लगा बैंडेज दिखा था और अफसाना के साथ साथ सभी ने देखा था. शायद काम करते टाइम हे कुछ लगा होगा.", दरवाजे पर खामोश कड़ी ऋतू ये सब सुन्न भी चुकी थी और अब उसको सुबह अर्जुन के घर से जाने का कुछ कुछ समझ भी आ चूका था.

"चलो छोडो ये सब और अब ये बताओ के आज रात उधर वाले घर में क्या धमाल किया जाए?", ऋतू ने अंदर आने के साथ हे ये किस्सा यही निबटा दिया और उसके दरवाजा बंद करने पर बाकी सभी लड़कियां भी समझ गयी की आज कुछ तोह गड़बड़ घोटाला करने का इरादा है ऋतू का.

"ऐसा है रात में खाना यहाँ कोई नहीं खायेगा और जो भी हमारे साथ वह जा रहा है उतने लोगो के हिसाब से खाना पैक होगा.", ये अलका थी, ऋतू की हर खुराफात में उसकी 50:50 की भागीदार.

"प्रीती के पास वोडका है और विन्नी दीदी ने एक बॉक्स बियर सही जगह छिपा राखी है.", तारा ने प्लान को थोड़ा और खोल कर बताया जिसके साथ हे एक बार फिर अफसाना हैरानी से देखने लगी.

"आप घबराये नहीं, आपको नहीं पिलायेंगे. वैसे इस कमरे में जितने भी है इनमे से किसी को अलकोहल का एक्सपीरियंस नहीं है. बस ये एक हे बार करके देखने का दिल था ऋतू दीदी और हम सबका. बाकी पता नहीं कौन कौन एग्री होता है.", प्रीती भी थोड़ा घबरा रही थी कोमल दीदी के साथ साथ माधुरी दीदी के भी यहाँ होने से.

"मैं तोह सबसे पहले हु इसमें और कीर्ति भी.", जसलीन ने चहकते हुए सहमति दी और उसके साथ हे मरीना ने भी हाथ उठा दिया.

"I'm आल्सो इन. मैं आज रात को यही रहने वाली हु एंड वोडका इस माय ड्रिंक.", मरीना के बाद आरती ने भी हाथ उठाया तोह प्रियंका हैरान हे हो गयी. उसकी छोटी बहिन सचमुच अब छोटी नहीं रही थी.

"देखो अब ये मौका फिर शायद हे मिले कभी लाइफ में तोह मेरी भी हां है. सिर्फ एक गिलास बियर.", ये आवाज थी सबको हैरान करने वाले शख्स की, जिसकी उम्मीद यहाँ बैठी घर की किसी भी लड़की ने नहीं की थी. कोमल दीदी ने पार्टी में शामिल होने का फैंसला किया था और अलका उनका चेहरा हाथ से सेहला कर जैसे बुखार देखने लगी.

"कमाल हे हो गया ये तोह फिर. पिंकी दीदी फिर तोह आपका भी बनता है."

"नहीं नहीं.. तुम लोग हे करो ये सब और वैसे भी मुझे माधुरी दीदी के साथ हे रहने का आदेश है. उस घर में मैं नहीं जा सकती और वैसे भी शराब के हाथ नहीं लगाना."

"मुँह लगा लेना पिंकी डार्लिंग, हाथ में पकड़ लुंगी. यार देखो हम सब एकसाथ फिर कभी हो न हो, क्या पता. दादी को मैं बोल दूंगी की आज माधुरी दीदी के साथ रुपाली एडजस्ट कर लेगी."

"मैं भी जा रही हु, मैं नहीं एडजस्ट करने वाली.", ख़ामोशी से सबकी सुनती हुई रुपाली ने तुरंत मन किया और सभी हंसी निकल गयी.

"चलो फिर दोने है की हम सभी लोग आज वह धमाल करने वाले है. लेकिन इसके साथ पूरी बात भी सुन्न लो.", अलका जैसे कुछ बड़ा हे बताने वाली थी और माहौल एकदम शांत हो गया लेकिन उसकी बात को आगे बढ़ाया तारा ने.

"गेम्स भी होंगी और पीने वाले को वो खेलनी भी पड़ेंगी. कोमल दीदी आप सोच लीजियेगा एक बार फिर से और बाकी सभी जो बाद में कही न नुकुर करने लगे. एक रात के लिए सभी बराबर होंगे तोह No लिहाज."

"ज्यादा से ज्यादा कौनसी गेम्स होंगी तारा? Truth-Dare, बोतल घुमा कर टास्क देना या ब्लैंडफोल्ड & गेस? बस इतना जरूर ध्यान रखना की वो हद्द पार न हो जिस से सुबह उठने पर किसी को बुरा लगे.", कोमल दीदी ने तोह एक और बम गिरा दिया था ये खेलो के नाम ले कर और उनकी बात सुन्न कर तारा ने हैरत के साथ हे हाँ में सर हिला दिया.

"मतलब साफ़ है फिर की गेम्स, बियर और पार्टी. 9 बजे यहाँ से चलेंगे और फिर पूरा घर हमारा."

"अगर हम पीयेंगे नहीं तोह क्या हम शरीक नहीं हो सकते आप लोगो के साथ? वो ऐसा है कोमल आपि के इस्लाम में शराब गुनाह hai.",Afsana की इतनी मासूमियत से कही बात और खुद हे उसका शामिल होने का दिल देख कोमल दीदी ने उसका गाल सहलाते हुए कहा.

"बिलकुल, तुम साथ हे चलोगी हमारे और जो तुम्हे ाचा लगे वही करना.", अब अफसाना के चेहरे पर भी एक दिलकश मुस्कान नुमाया थी. इस बीच दरवाजे पर हुई thak-thak से अलका ने सभी को शांत रहने का इशारा दिए और दरवाजा खोलते हे गहरी सांस भरी.

"सब लोग ऐसे क्यों देख रहे हो यार? मैं हे हु और जैसा अलका ने कहा था मैं सामान भी ले आयी.", हिमानी के एक हाथ में कपडे का बैग और दूसरे में वो धुप का चस्मा था जो वो ज्यादातर पहने रहती थी. बैग अलका को पकड़ते हुए उसने खुद हे दरवाजा वापिस लगा दिया. जसलीन की नजर बड़े गौर से हिमानी का अवलोकन करने लगी थी.

"अरे हैरान मत हो यार, बीमारी नहीं है ये बस मेरी आँखें न इस Alka-Ritu के साथ साथ प्रीती जैसी है. प्यार हे इतना ज्यादा है न मेरा इनके साथ.", हिमानी ने खुद हे अपना परिचय देने के साथ साथ पंजाब वाली हर लड़की से हाथ मिलते हुए अपनी दो रंगी आँखों का चटपटा किस्सा सुना दिया. अलका ने बैग खोल कर देखा तोह अंदर हरे कांच की 3 बोतल थी.

"अरे हम लोग शराबी नहीं है जो इतनी बॉटल्स जुगाड़ ली. और तुम यहाँ क्यों ले आयी हिमानी, फंस जाएंगे यार अगर किसी ने गलती से भी देख लिया तोह.", हिमानी अभी उन सबमे हे व्यस्त थी और अलका न तुरंत बैग बंद करके अलमारी में छुपा दिए.

"वो वाइन है अलका दीदी, बियर से भी लाइट.", ऐसा प्रीती ने कहा था और अब जैसे वही फंस गयी थी.

"तुझे बड़ा पता है ये लाइट और स्ट्रांग का? कही तू भी दादा जी की बोतल से चोरी चोरी नशा तोह नहीं करती?", आरती का ऐसा कहना था और प्रीती ने तुरंत ना में सर हिला दिया.

"हाहाहा... कितनी प्यारी हो तुम प्रीती. वैसे ये ठीक कह रही है अलका. वाइन में उतना अलकोहल नहीं होता और ये बोतल मेरे मां जी के बार से उठाई है मैंने. उन्हें तोह पता भी नहीं होगा की 3 बोतल गायब हुई है. वैसे आपसे हम नहीं मिले, शायद वह घर पे देखा जरूर था जब प्रीती के साथ थी.", हिमानी बड़े आराम से प्रीती के पास हे बैठते हुए अफसाना से ru-ba-ru हुई जो खुद हैरान थी की एक खूबसूरत लड़की और वो भी दोनों अलग अलग नैनों वाली उसके सामने थी.

"हम अफसाना हुसैन है आपि और आप तोह जैसे खुदा का करिश्मा हे है. ऐसे चश्म हमने आज सिर्फ दूसरी हे बार देखे है ज़िन्दगी में.", अफसाना हाथ जोड़ कर मिलने लगी थी और हिमानी ने उसको गले लगा कर परिचय दिया.

"यार ये सब छोडो और अब पार्टी का मामला जमाओ. मैं तोह बहोत एक्ससिटेड हो रही हु और लाइफ में पहली बार कुछ चोरी किया है लेकिन दुःख नहीं है.", हिमानी ने ऋतू से कहा था जो कुछ सोच रही थी.

"पार्टी तोह होगी हे हिमानी लेकिन हम लोग पार्टी कर तोह माधुरी दीदी की शादी की ख़ुशी में रहे है और यही वह होंगी नहीं. अजीब नहीं रहेगा?", अब पहली बार माधुरी दीदी के चेहरे पर थोड़ी चमक आयी थी जो पहले इसलिए हे खामोश थी की किसी ने उनसे पुछा हे नहीं था.

"हम्म्म. सही कहा यार.. लेकिन बिल्ली के गले में घंटी कौन बंधेगा?", अलका के ऐसा कहने पर विन्नी ने भी हाथ खड़े कर दिए जो यहाँ सबसे बड़ी थी.

"अर्जुन..", सुझाव आया था रुपाली की तरफ से और उसके मैं में क्या चल रहा था इसकी खबर किसी को नहीं थी.

"पागल है रुपाली. वो भला क्यों और कैसे कर सकता है ऐसा? और ये शराब वाली बात उसको पता चली तोह समझ ले गए काम से.", आरती ने असहमति दिखाई थी इस सुझाव पर.

"तुम्हारे पास कोई सुझाव है? नहीं है न. इसलिए मेरी बात सुनो और इसमें थोड़ा सच और बाकी झूठ बोलना पड़ेगा. अर्जुन से ये कहना है की हम सभी लोग खाने, डांस की पार्टी कर रही है माधुरी दीदी के साथ. उसने तोह वैसे भी हमारी सेफ्टी के लिए उस घर में सोना हे है लेकिन वो रहेगा छत्त पर और निचे से हम रखेंगे सबकुछ बंद. अर्जुन की हेल्प के बिना तोह वैसे भी पॉसिबल नहीं क्योंकि हम इतना सामान वह लेके कैसे जाएंगे? तारा या कोई भी कार तोह चला लेगा लेकिन वह कार ले जाने की परमिशन? घर तोह पास में हे है.", रुपाली ने असलियत से सबका सामना करवाया तोह कोमल दीदी ने जवाब दिया.

"मैं बात करुँगी उस से और वो सबकुछ करेगा. बस उसको पूरा सच बताना जरुरी है. और दादी जरुरी माधुरी दीदी से पूछेंगी तोह दीदी आप उन्हें इतना कह देना की आपका भी दिल है सबके साथ घुलने मिलने का. उनके सामने ये बियर वाला मामला नहीं जाना चाहिए बस.", अब सबके दिमाग में बात घुस चुकी थी की ये काम किस तरीके से होगा.

"दोने.", आरती खुश होते हुए बोली और बाकी सबके साथ अब माधुरी दीदी भी उत्साहित थी. शाम के 6 बज चुके थे और हलके से शोर के साथ हे सबका ध्यान बहार गया.

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"शंकर, शांत मेरे भाई शांत. देख वो खुद आया है हमारे घर और वो भी अकेला.", घर के बहार ये लम्बी शाही कार रुकी तोह जो शानदार शक्श उस से उतरा था उसको देखते हे बगीचे के पास इन्दर, उमेद, दलीप से बातचीत में मशगूल शंकर की भानवे उठ गयी. बेशक इन लोगो में कभी कोई तनाव या ख़ास बातचीत न हुई थी पर दुश्मनी तोह अगली पीढ़ी तक आ हे चुकी थी. पुष्पक 2 हे कदम आगे बढ़ा था और उसका सामना अपने से भी 2-3 इनके और उतने हे तगड़े युवक से हुआ.

"दोस्त, हम श्री रामेश्वर शर्मा जी से मिलने की चाहत रखते है. आप परिवार से हे है शायद.?", अर्जुन भी दांग था उस व्यक्ति को सामने देख जिसकी janam-kundli कुछ समय पहले हे उसके हाथ लगी थी. लेकिन इतना नरम व्यवहार और बात करने की तमीज से वो इतना तोह समझ हे चूका था की पुष्पक किसी गलत उद्देश्य से नहीं आया.

"पापा से तुम्हे क्यों मिलना है पुष्पक?", शंकर ने अर्जुन को एक तरफ करते हुए पुष्पक के सामने खड़े होते हुए सवाल देगा. स्वर में गुस्सा नहीं था लेकिन दिमाग हल्का अभी भी गरम था.

"प्रणाम शंकर भाई साहब. ये तोह नहीं कहेंगे की मिल कर ख़ुशी हुई क्योंकि आज हम खुश नहीं हो सकते. हाँ आप यकीनन ाचे दिख रहे है. ताऊ जी से आवश्यक काम है हमे और अगर आप चाहे तोह मुलाकात के वक़्त शामिल रह सकते है.", शंकर का तोह सारा गुस्सा हे हवा हो गया जब पुष्पक ने उसके सामने हाथ जोड़ कर भाई साहब के साथ साथ पंडित जी के लिए ताऊ जी कहा.

"आओ, मेरे साथ चलो पिंटू. पापा बैठक में हे है और घर में बचो का विवाह है इसलिए शंकर थोड़ा डिस्टर्ब है.", इन्दर ने माहौल को समझते हुए पुष्पक को अपने साथ लिया लेकिन बाकी सब भी उन दोनों के पीछे हे चल दिए. अर्जुन को भी अब जान न था के ये शक्श उनके घर कैसे और क्यों.

"प्रणाम ताऊ जी. क्षमा चाहते है की ऐसे shub-avsar पर हम आपके niwas-sthaan पर समस्या लेकर आये.", बैठक में फ़िलहाल सिर्फ कौशल्या जी और रामेश्वर जी के साथ उनके छोटे भाई और मधु हे थे. एकके ये सजीला सा व्यक्ति इन्दर के साथ उनके सामने आया और दोनों हाथ उनके चरणों पर रखते हुए मुखातिब हुआ. ऐसा हे उसने कौशल्या जी के साथ के किया था और उनके सिवा किसी और को देखा तक नहीं. रामेश्वर जी तोह जैसे इस व्यक्ति को सबसे बेहतर पहचानते थे और उन्होंने पुष्पक को दोनों कंधे पर हाथ रख कर अपने गले से लगाया.

"कैसे हो तुम पिंटू बीटा? और जो भी अवसर हो तुम हमारे पास be-jhijhak आ सकते हो. हाँ हमारी बंदिश अलग है लेकिन तुमसे हमे शिकायत नहीं. इन्दर, भाई के लिए खाना लगवाओ.", रामेश्वर जी ने बाकी सभी को ऊँगली के इशारे से बहार जाने को कहा लेकिन अर्जुन के चेहरे को देख उसको अपने हे करीब बैठने को कहा.

"ताऊ जी, क्षमा कीजियेगा लेकिन हम अन्न ग्रहण नहीं कर सकते. समय का अभाव है और आपका ये भोजन हम पर उधार रहा."

"शांत रहो बीटा.. तुम घर पे हो और तुम्हारी जो भी समस्या है हम उसका उचित निदान करेंगे. एक चाय हे पी लो हमारे साथ?", रामेश्वर जी के ऐसा कहने पर उसने सिर्फ हाँ में सर हिलाया लेकिन आँखों से झरर झरर आंसू गिरने लगे थे पुष्पक के और उसके दूसरी तरफ बैठी कौशल्या जी ने बिना देरी किये सीने से लगा लिया.

"न मेरे बचे न.. तू हमेशा से हमारे लिए वही पिंटू है जो बचपन में था. चाहे दुःख हो या सुख, तेरे ताऊ जी और तेरी ये ताई, हमेशा तेरे लिए मौजूद है. आ नहीं सकते बस जो तुझे ाचे से पता है.", कौशल्या जी के सर सहलाने से जल्द हे पुष्पक संभल गया.

"टा जी, आपने हे नाम दिया था हमे और सच कहु तोह मेरे ख़ुशी के वही दिन मुझे याद है जिनमे आप और ताऊजी शामिल थे. पंजाब से राजस्थान क्या गए, हम बंधन में ऐसे बंधे की लौट न पाए.", पुष्पक का चेहरा खुद कौशल्या जी ने अपने पल्लू से साफ़ किया और अब कही उसका ध्यान अपने सामने बैठे उसी युवक पर गया जिस से वो बहार मिला था. इधर ललिता जी 2 कप चाय और कुछ मिष्ठान वह रख कर जैसे ख़ामोशी से आयी थी वैसे हे लौट गयी.

"ये तुम्हारे चाचा है अर्जुन. पुष्पक और बीटा ये हमारे पौत्र अर्जुन है, अपने शंकर के सुपुत्र.", अर्जुन ने अब हाथ जोड़ कर अभिवादन किया था जब पुष्पक को चाचा बताया गया.

"खुशनसीब है आप अर्जुन जो इनकी छाया में बड़े हो रहे हो. हमारे ताऊ जी से बेहतर राजा और साधू हमने जीवनकाल में नहीं देखा. आपके चाचा है लगते है हम और आप बेजिझक हमारे पास आ सकते है.", पुष्पक ने ज्यादा और कुछ नहीं कहा. कौशल्या जी ने चाय का कप सामने किया तोह पुष्पक ने भी सलीके से थाम लिए. कौशल्या जी अपने पति के इशारे से अभी आने का बोल कर बहार चली गयी

"अब हमारे युवराज अपने आने का प्रयोजन बताएँगे? तुम्हारी हालत बहोत कुछ बयान कर रही है पिंटू और तुम जल्दी में भी हो.", रामेश्वर जी ने अर्जुन को एक बार देख कर चाय उठा ली. यहाँ बस अब यही 3 लोग थे और अंदर वाले कमरे का दरवाजा कौशल्या जी बंद कर चुकी थी. पुष्पक ने भी अब कही ध्यान दिया था माहौल पर लेकिन अर्जुन के वह बैठने से समझ चूका था की ये लड़का पंडित जी का अजीज है.

"बुआ जी का देहांत हो गया है ताऊ जी. कुमारी अनामिका ने अपनी 2 अंतिम इतछाये हमसे कही थी क्योंकि उन्होंने कभी हमे माँ की कमी महसूस नहीं होने दी थी."

"दुर्भाग्य.. क्षमा करना बेटे ये हमको बिल्कुल ज्ञात न था. प्रभु उन जैसे दिव्या आत्मा को अपने चरणों में जगह दे.", रामेश्वर जी की आँखों में एक पल में हे पानी भर आया था जो इन दोनों से छिपा न रह सका.

"आप इसका असर न होने दे ताऊ जी. घर का माहौल बरकरार रखिये और जो रिश्ते अदृश्य है वो वैसे हे रहे तोह सबके लिए ठीक होगा. उन्होंने आपका शुक्रिया कहा था उन्हें महफूज रखने के लिए और हर मुसीबत से बचने के लिए. दूसरी ख्वाहिश थी की कुमारी बिंदिया के साथ शबनम बिटिया भी उनके संस्कार में शामिल हो. हम चाहते है के हमारे ताऊजी ये ख्वाहिश पूरी करे.", अभी पुष्पक की बात ख़तम हे हुई थी और रामेश्वर जी ने अर्जुन को फ़ोन इधर खिसकने को कहा. एक नंबर जो उन्हें भली भाँती याद था मिलते हुए उन्होंने बात शुरू की.

"कपूर साहब, शबनम मिर्ज़ा के सभी चार्ज तत्काल प्रभाव से हटवा दिए जाए. ब्रिटिश एम्बेसी में इसकी सूचना एक क्लीन चित के साथ भिजवाए, ये आवश्यक है.", दूसरी तरफ से भी ज्यादा कुछ नहीं कहा गया सिवाए हाँ के.

"तुम्हारे पास शबनम का नंबर है?", रामेश्वर जी ने ये सवाल अर्जुन से किया था और उसने झेंपते हुए हाँ कहा और आँखे मूँद कर जैसे कुछ याद किया और antar-rashtriya नंबर मिलाने लगा. पुष्पक भी हैरान था अर्जुन के ऐसा करने पर लेकिन रामेश्वर जी ज्यादा हैरान हुए जब अर्जुन खुद हे बात करने लगा.

"नमस्ते चची, मैं अर्जुन. जी..", अर्जुन ने परिचय दिया और सामने से बिंदिया ने भी उसका ख़ुशी से स्वागत किया था.

"हाँ बात कुछ ऐसी थी चची जी की आपको शबनम दीदी के साथ इंडिया निकलना होगा, तुरंत. हाँ.. दीदी के चार्ज हटवा दिए है बाउजी ने और आपको दिल्ली नहीं उतरना.", अर्जुन वैसे हे उनकी बात सुन्न ने लगा जो बिंदिया कह रही थी. चिंता लाजमी थी ऐसे बात करने से.

"जी पुष्पक चाचा जी यही सामने बैठे है उनसे बात कर लीजिये. आगे वही बता देंगे आपको.", अर्जुन शोक समाचार खुदसे नहीं देना चाहता था और हैंडल पुष्पक की तरफ बढ़ा दिया.

"प्रणाम दीदी. आप तत्काल पिता जी के niwas-sthaan के लिए निकालिये. बुआ नहीं रही और उनकी अंतिम इत्छा थी की आप दोनों उनके संस्कार में शामिल हो. ताऊजी के यहाँ मंगल अवसर पर हम ऐसी बात कर रहे है. चाहे तोह संस्कार के बाद हे वापिस लौट सकती है.", पुष्पक ने उम्मीद के विपरीत बात कहने के साथ हे फ़ोन काट दिया था.

"आज्ञा दीजिये ताऊ जी. संस्कार के 13 दिन पूरे होते हे हम आपके पास आएंगे. सफर अधिक है और समय से पहुंचना है.", पुष्पक ने एक बार फिर उनके चरण स्पर्श करने के बाद हाथ जोड़ कर इजाजत मांगी. कोई शुक्रिया नहीं कोई laag-lapet नहीं, जैसे ख़ास अधिकार हो

"हम आते तुम्हारे साथ बीटा बस."

"आपको तोह कुंवर सा हे नहीं रोक सकते ताऊ जी लेकिन फ़िलहाल आप घर देखिये और हम ये जिम्मेवारी निभाते है. जल्द मिलेंगे आपसे. अर्जुन आप एक ख़ास व्यक्ति है और इतना हमे भी अनुमान हो गया है की बदलाव की बयार लाने वाले सैलाब हो. शुक्रिया.", ये बात उसने अर्जुन से कही थी और पंडित जी खुद पुष्पक को साथ लिए बहार निकले जहा आँगन में उनके दोनों बेटे खड़े थे उमेद और दलीप के साथ. कौशल्या जी ने पुष्पक को विदा करने से पहले उसका तिलक जरूर किया था, परंपरा.

"तै जी, भोजन पर जल्द आएंगे. आज्ञा दीजिये.", कार में बैठने से पहले पुष्पक ने फिर से दोनों के चरण स्पर्श किये थे और कुछ सोच कर अपने पाँव से जूती उतार कर अर्जुन की तरफ सरका दी.

"आपके लिए हम कुछ ला न सके लेकिन चाचा और भतीजे में दोस्त का रिश्ता भी रहता है. हमारी मौजरी को पहन कर सम्मान दीजियेगा अर्जुन.", नंगे पाँव हे वो अपनी कार में बैठ कर जिस तरफ से आया था वापिस उस तरफ निकल चला. मुश्किल से वो 30 मिनट भी नहीं रुका था लेकिन अर्जुन को जरूर दुविधा में छोड़ गया था.

"पहन लो बीटा पहन लो इन्हे. उसने तुम्हे अपना वारिस बनाया है जूती सौंप कर. पुष्पक का अहित मैट करना और वो तुम्हारा उचित ध्यान भी रखेगा, जब तुम्हे जरुरत होगी.", रामेश्वर जी के कहने भर से अर्जुन ने चप्पल उतार कर वो sone-chaandi के तार वाली जूती पहन ली थी, रत्ती भर भी अकार अलग न था उनका अर्जुन के पाँव के लिए.
 
अपडेट 170

हैंगओवर (1)

"भाई भोले, तुम पुष्पक से किस बात पे भड़क रहे थे? एक तोह वो खुद हे चल कर आया था और वो भी अकेला. दूसरा उसने तोह तुम्हे हाथ जोड़ कर मान दिया और अगर ध्यान दिया हो तोह मुझे देख कर उसने जैसे नजरे निचे की थी उसका साफ़ मतलब था की वो खुद को हमारा गुनेहगार मानता है. बेवजह हे तुम बेकाबू हो जाते हो भाई.", घर से ज्यादा जवाब सवाल किये बिना शंकर अब कम्युनिटी सेण्टर की तरफ निकल चला था और उसके साथ दलीप, उमेद और नरिंदर भी कार में मौजूद थे.

"वो बात नहीं है गज्जू. शंकर को उस परिवार से हे समस्या है जबसे वो घटना हुई थी वह हवेली पर. पिंटू तोह सबसे ज्यादा रहा हे शंकर के साथ है जब भी हम पंजाब वाले घर जाते थे. बस 8 साल का पिंटू फिर वापिस न लौटा और अपना शंकर है थोड़ा इमोशनल. लेकिन अब जैसे पापा लोग सबसे अलग हुए तोह हम भी उनके साथ हे आये न. वैसा हे पिंटू के साथ हुआ.", शंकर नरिंदर की भी बात सुन्न रहा था और उमेद की भी. बस दलीप हे था जो सुन्न कर और वह पुष्पक को देख कर अभी तक दुविधा में था.

"दलीप, तुम बताओ जरा इन दोनों को पुष्पक के बारे में जो भी तुम्हे पता लगा है. यहाँ मैं किसी को परिवार के पुराने दुश्मन या उसके रिश्ते की वजह से नहीं माप रहा. गज्जू अपनी जगह ठीक और इन्दर तुम अपनी जगह. लेकिन ये साला पिंटू अब कुंवर पुष्पक है जिसकी कुंडली दलीप लेके आया है राजस्थान से.", शंकर ने सिग्गट सुलगते हुए कार एक तरफ घुमाई और ये सड़क अब थोड़ी शांत थी.

"ऐसा है भाई लोगो की मैं निवेदिता केस पर था और वही पता लगा था की वो लड़की पुष्पक के साथ जुडी थी. कपूर भी उसमे शामिल था और बाद में इंद्रनील ने निवेदिता का रपे करके उसको मार दिया. पुष्पक के बारे में पता लगा है की वो शाही जीवन की जगह अपनी अलग हे ज़िन्दगी जीता है जिसमे शराब, नशे, लड़की और maar-kaat भरपूर है. हाँ उसने कभी किसी लड़की की जान नहीं ली है और सच कहु तोह अब मुझे महसूस हो रहा है की मामला जैसे कुछ और हे है. इंद्रनील ने 70 के लगभग कुवांरी गरीब लड़किया गायब कर दी है पिछले कुछ सालो में. और जो दहशत है इनकी वह उसमे पुष्पक की पकड़ सामाजिक ज्यादा है और इंद्रनील की असामाजिक. मतलब बड़े वाला हैवान है और छोटे वाला जनता के बीच रहने वाला. ये तोह महल में भी नहीं रहता और इंद्रनील को उसके बाप ने विदेश भिजवा दिया. फिर से सभी कड़ी मिलाने पड़ेंगी जैसे कुछ छोटा सा हिस्सा गायब हो गया हो.", दलीप ने दिमाग खुजाते हुए तफ्सील से हर पहलु बताया जितना उसको समझ आया था.

"देखो दलीप भाई, मैं एक बात बताता चालू आपको. पिंटू बलात्कार जैसा घिनोना काम नहीं कर सकता किसी भी सूरत में. हाँ वो raaj-aadesh का सम्मान करते हुए 10-15 लाशें बड़े आराम से गिरा सकता है. पाली, राजस्थान में कुछ आरसे पहले हे एक घटना हुई थी जिसमे 18 व्यक्ति बुरी तरह ksht-vishakt मृत मिले थे. उनके पास असला भी था और अफीम भी. दबे छिपे भी जो नाम पता चला था वो कुंवर पुष्पक का था लेकिन ब्सफ़ ने इस मामले को साफ़ करवा दिए था. और अब आते है आपके निवेदिता वाले केस पर.", नरिंदर जैसे दलीप से भी कही ज्यादा जानकारी रखता था और तभी बताता था जब जरुरत हो.

"तुम निवेदिता केस में क्या जानते हो?", शंकर के ऐसा कहने पर उमेद मुस्कुराया जिसको दलीप ने सिग्गट सौंप दी थी.

"क्यों भोले? मैं और इन्दर भी तोह उस दिन छत्त पर हे थे सबके साथ जब इस केस की बात चल रही थी. अब इन्दर तुम्हे बताएगा जो जमीन पर चलने वाले अफसर देख नहीं पाए.", उमेद भी जानता था कुछ हद्द तक. दलीप भोचक्का सा कभी बगल में बैठे इन्दर की तरफ देखता तोह कभ अगली सीट पर बैठे उमेद को.

"हाँ तोह बात ऐसी है दलीप भाई की निवेदिता कोई राह चलती लड़की तोह थी नहीं जो बस या ज्यादा से ज्यादा कार में दिल्ली से हरयाणा होती हुई जयपुर, जोधपुर और बारमेर तक चली जाए. अप्रैल महीने में हे 3 बार वो हवाई यात्रा से जयपुर गयी थी और एक बार तोह उसकी बगल में बैठे थे अपने पिंटू भाई उर्फ़ पुष्पक. संजीव के पास टिकट डिटेल होंगी, अगर जरुरत हो आपको तोह. अब आते है कपूर वाले किस्से पर और जिस दिन निवेदिता हरयाणा, पंजाब तक देखि गयी थी.", नरिंदर के चेहरे पर रहस्यमयी मुस्कान थी बात के दौरान.

"हाँ बोलो भाई.", दलीप जैसे कुछ ज्यादा हे तेजी में था सच जान ने के लिए.

"उस समय तोह नहीं पता चला था इस सबका लेकिन संजीव के हाथ लगी थी पुष्पक की तस्वीर और वो चर्चा करता हे है अपने छोटे भाई से. अब वो फोटो देख कर अपने छोटे नवाब ने बताया के वो इस आदमी से कही मिला है और ज्यादा सोचने पर उसको ध्यान भी आ गया की एक लड़की की हेल्प की थी उसने और पुष्पक उसकी कार में सो रहा था या बेहोश था. मतलब उस समय तक कपूर तोह उनके साथ था हे नहीं. और निवेदिता की तस्वीर देख कर अर्जुन ने ये भी कन्फर्म कर दिया था के यही युवती थी जिसकी मदद अर्जुन ने की थी. मतलब तोह साफ़ है की हरयाणा तक वो दोनों सलामत थे और उनके साथ कोई न था. अब कपूर संभालता था ड्रग्स का कारोबार जिसकी देखरेख करता है इंद्रनील और अगर लड़की कपूर से मिली होगी जैसा की मेरा अनुमान है क्योंकि वो पिंटू के करीब थी तोह यहाँ से खेल हो जाता है दोतरफा. फॉरेंसिक रिपोर्ट क्या बता रही थी दलीप भाई? मतलब कितने लोगो ने उसके साथ दुष्कर्म किया? वीर्य मिलान हुआ या नहीं और तुमने जिसकी गवाही दर्ज की है क्या वो व्यक्ति भरोसे के लायक है?", नरिंदर ने पूरी जांच की धज्जिया उदा कर रख दी थी अपने समीकरण और जानकारी दिखा कर. अब दलीप के माथे पर पसीना साफ़ झलक रहा था. शंकर भी हैरत में था की उसका भाई भी इन सब लफड़ो पर इतनी गहराई से सोच विचार करता है.

"वैसे अर्जुन को नहीं पता निवेदिता मामले का. मैं ये बात पहले हे खोल दू. बेशक संजीव उसके साथ सबकुछ साँझा करता है लेकिन निवेदिता का न तोह उसने नाम लिया था अर्जुन के सामने और न हे दुर्घटना बताई है. इन्दर जो भी कह रहा है उसमे मुझे विभिन्न कोण नजर आ रहे है, अनुमानित.", उमेद ने भी अपनी राये सामने राखी ये बताने के साथ की इस मामले में अर्जुन दूर दूर तक नहीं है.

"हहहह.. मादरचोद .. साला अजीब हे लफड़ा है रे ये तोह. दलीप भाई इन दोनों के कहने के मुताबिक तोह फिर पुष्पक ने लड़की के साथ दुराचार की जगह मर्जी से सब किया होगा अगर स्पर्म मैच भी होता तोह जो की मल्टीप्ल इन्वॉल्वमेंट की वजह से अब मुमकिन भी नहीं? और निवेदिता किस से भाग रही थी जो राजस्थान गयी पुष्पक के साथ? कपूर तोह साला देख कर हे हवसी लगता था और इंद्रनील का हिसाब वैसे हे लड़की के मामले में बयान करने लायक नहीं. पुष्पक नशे का कारोबार नहीं करता तोह फिर वो नशा कैसे करता?", शंकर अनजाने हे इस गुथी में शामिल हो गया था जबकि चर्चा का विषय तोह कुछ और हे था.

"केस तोह बंद हे हो चूका न भोले और पिंटू ने कहा भी था न के वो जल्दी हे चाचा जी से मिलने आएगा. क्या पता अनजाने हे वो कोई जानकारी देदे. और अगर दलीप चाहे तोह अब केस को रिवर्स तरीके से देखना शुरू कर दे. दिल्ली की high-class लड़की जो 21-22 साल की और 38-40 साल का पिंटू. करीबी सहेलियों और दोस्तों से पता किया जाए के निवेदिता के शौक क्या था और अगर उन्हें भी पुष्पक की कोई जानकारी है तोह बहुत कुछ पता चल सकता है. मेरे हिसाब से दिल्ली में लड़की पर दबाव होगा और पुष्पक शायद अपने पिता की वजह से हिचकीःक्या रहा होगा. ये लड़कियां अगर पीछे पड़ जाये तोह यमराज को भी मन सकती है. इस हिसाब से वो सुरक्षित रहने के लिए ज़िद्द करके पुष्पक के साथ निकली होगी और ... दलीप, लड़की की ऑटोप्सी रिपोर्ट में ड्रग्स मिले थे क्या?", उमेद एक दम से अलग हे दिशा में ले चला था इस मामले को.

"हाँ भाई. ये तोह मैं बताना हे भूल गया था. निवेदिता महंगे नशो की एडिक्ट थी और उसकी कलाई पर आखिरी समय भी निशाँ थे. उसके घरवाले भी जानते थे इस बात को लेकिन समाज का हवाला दे कर अपनी पावर के दम से उन्होंने रिपोर्ट में ड्रग्स वाली बात हटवा दी थी. वो पहली वाली रिपोर्ट भी वालिए जी के पास मिल सकती है.", दलीप ने इतनी बड़ी बात को नजरअंदाज किया था.

"अगले महीने की तनख्वाह मेरे और गज्जू के नाम कर देने दलीप भाई. केस सोल्वे कर दिया है हमने आपका. और ये अपना पिंटू इश्क़ में था और तजा नशेड़ी बना होगा ऐसी सोहबत में. नहीं तोह कार में बेहोश क्यों होता जब दोनों निकल हे रहे हो दिल्ली से राजस्थान?"

"केस तोह बंद हो गया भाई लेकिन दिल कर रहा है की अब इसकी जांच अपने दम पर करू. शुक्रिया तुम दोनों का और संजीव का भी. बहोत सी नाजुक कड़ियाँ रह गयी थी मुझसे.", चारो हे लोग अब इस आलिशान से कम्युनिटी सेण्टर में आ चुके थे जहा कल संजीव की शराब पार्टी थी और 3 बाद संगीत कार्यक्रम.

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रात 8 बजे के करीब अन्नू की आँख खुली तोह अभी तक शरीर में रह रह कर kaam-visphot महसूस हो रहे थे. बंद कमरे में वो चादर के अंदर पूर्णतया निर्वस्त्र थी और गदराये जिस्म के हर हिस्से पर अर्जुन की kaam-kala के स्पर्श भली भांति महसूस करती हुई अकेले में मुस्कुराने लगी.

'आह.. सबसे ज्यादा इस प्यार को हे मिस किया था मैंने.. जितना भी कहु की जोर से करो लेकिन कितनी परवाह है उसको जो निशाँ न हो इसलिए सबकुछ प्यार से करता है... उफ़.. बस वो कुछ ज्यादा हे बड़ा है जालिम.. नहीं जालिम नहीं मेरे प्यारे अर्जुन का... िसष्ठ..', गोर गुब्बारों के गुलाबी निप्पल अभी तक अकड़े थे और शरीर जैसे टूटन में डूबा हुआ. जैसे तैसे करके ढीली ब्रा और कमीज पहन कर अन्नू बिस्टेर से कड़ी हुई तोह अपनी सूजी हुई गुलाब सी छूट को देख फिर से मुस्कुरा दी.

'पंतय नहीं पहन सकती.', अलमारी से ढीला पजामा निकाल कर जैसे तैसे पहना और बिस्टेर समेत कर बाल हे बना रही थी की दरवाजे पर दस्तक हुई.

"अन्नू बीटा, कितना आराम करेगी. अब उठ जा फिर रात को आराम से जी भर के सो लेना. जानती हुई हवाई यात्रा की थकान अभी भी है.", उनकी माता जी के ऐसा कहते हे अन्नू ने तुरंत दरवाजा खोल दिया. कमर से निचे तक के उसके लम्बे बाल अब एक रबर से जुड़े में बांध चुके थे. माता जी कुछ पल तोह अपनी बेटी की चमक को हे देखती रही.

"माँ, थोड़ी हे देर तोह सोई थी और जब आप लोग आये थे तभी आँख लगी थी मेरी. वैसे पापा घर पे हे है?", बेध्यानी में अन्नू उनके साथ हे बहार निकल कर थोड़ा आगे चलने लगी तोह उसकी माता जी ने अनजाने हे अपनी बेटी को गौर से देखा. अन्नू निहायती खूबसूरत युवती थी और पौने 6 फ़ीट की ये सरदारनी शरीर से भी उतनी हे मांसल और गौरवर्ण थी की mata-pita को जल्द हे बड़े होने का एहसास करवा दे.

"वो तेरे पापा तोह गुप्ता जी के उधर गए है किसी काम से लेकिन मैं क्या कह रही थी अन्नू?", दोनों maa-beti हॉल में आयी तोह अन्नू के लिए दूध और माता जी की चाय टेबल पर राखी थी.

"हाँ माँ, कहो आप क्या कह रही thi?",Annu चौकड़ी मार कर सोफे पर पसर के बैठी थी जिस से फिर वही ख़ास एहसास हुआ अपनी जांघो के बीच लेकिन चेहरे पर भाव न आने दिए. 'अर्जुन, किसी दिन मरवा मैट देना..'

"वो पारुल की भी शादी हो रही है, माधुरी भी तेरी हे उम्र की है बीटा. अब तू भी कुछ सोच ले, चाहे शादी डिग्री के बाद कर लेना पर लड़का देख के रोक ले तोह सही रहेगा.", अन्नू ने ज्यादा हैरत नहीं दिखाई थी अपनी माँ के ऐसा कहने पर बस नाखुश दिखी.

"ऐसा है माँ, पारुल का मामला है love-shove का और माधुरी हमेशा से इंट्रोवर्ट और फॅमिली में रहने वाली लड़की है. मेरा तोह देखो इन दोनों में से कुछ भी नहीं. बाकी आप बताओ आपको मेरे अभी शादी न करने से कुछ परेशानी है?", अन्नू ने तोह बात हे अपनी माँ के सर पर दाल दी थी.

"हर चीज का सही वक़्त होता है बीटा और उम्र भी. तू पढ़ाई के बाद फिर कुछ और ढून्ढ लेगी या नौकरी करने लगी तोह, शादी फिर ताल देगी. जवान बेटी बोझ नहीं होती लेकिन जिम्मेवारी तोह होती है. अब पारुल ने अगर खुदसे लड़का ढून्ढ लिया तोह तू भी ढून्ढ ले अगर हमारी पसंद से नहीं करना तोह. बस अँगरेज़ न हो तेरे भाई की तरह.", अब अन्नू क्या बताती की उसके वाला एक तोह पहले से 5 साल छोटा है और ऊपर से उसका तोह रिश्ता पहले हे हो चूका है.

"ठीक है ढून्ढ लुंगी लेकिन अभी 2 साल तोह भूल हे जाओ ये सब. वैसे आपने Parul-Charul को बताया के मैं आयी हुई हु?", अन्नू ने बात हे ख़तम कर दी थी और भोली माता जी को तोह समझ हे नहीं ये सब.

"हाँ, थोड़ी देर पहले हे बात हुई थी मेरी बहिन जी से. फिर पारुल ने तुझसे बात करने के लिए कहा तोह मैंने बता दिया था की तू थकी हुई है और आराम कर रही है अभी. कल आएगी वो दोनों पंडित जी के हे फंक्शन पे तोह मिल लेंगी और वही से इधर आ जाएँगी. वैसे तुझे अर्जुन कैसा लगता है?", ये तोह एकदम से उसकी माता जी ने जैसे धमाका कर दिए अर्जुन का जीकर करके. लेकिन अन्नू के चेहरे पर हलकी मुस्कान हे आयी जैसे वो भी अब भाप छिपाना सीख चुकी थी.

"कैसा लगता है से क्या मतलब है माँ.? मेरा सबसे ख़ास दोस्त है अर्जुन और दिल का उतना बुरा भी नहीं है. मैं स्टडी से ले कर हर टॉपिक पे उस से बात कर सकती हो जिस पर मैं शायद पारुल या आपसे भी न कर सकू. छोटा है लेकिन सच कहु तोह उसका लाइफ के लिए जो विज़न है वो शायद मुझसे या आपसे भी कही ज्यादा गहरा है और साफ़ है. आपको तोह वो मुझसे भी ज्यादा पसंद है. क्यों नहीं है क्या?", अन्नू ने बखान करने के बाद फिर से बॉल अपनी माँ के पाले में दाल दी. आंटी जी भी स्वाभाविक तौर पर मुस्कुराने लगे थे.

"मेरा बिबा बचा है वो अन्नू. पता नहीं क्या रिश्ता है उसके साथ लेकिन जब वो घर में होता है न तोह मुझे एक पल भी तुम्हारी या तेरे पापा की याद तक नहीं आती. घर के काम करते हुए मेरी बातें सुनता रहता है, कोई आ जाये मुझसे मिलने तोह समझदार बेटी की तरह मुझे मेहमान के पास बैठा कर खुद रसोई संभल लेता है. कुछ करने को न हो तोह लूडो, शतरंज में लगा लेता है. तेरे पीछे से उसने तेरे कमरे की हर चीज को उतने हे ध्यान से रखा जैसे तू रखती है. मैं कहती थी की मैं साफ़ कर देती हु तोह हमेशा यही बोल देना की मैं अपने घुटनो का ध्यान राखु. तेरे कमरे को वो ाचे से जानता है. Kam-umar है लेकिन जो भी करता है सच्चे मैं से पूरे दिल के साथ. सोचती हु की या तोह वो मेरी कोख से पैदा होता या अगर तेरी उम्र का होता तोह दामाद बना लेती. हाहाहा..", अन्नू के गाल पर गद्दे उभर आये थे अपनी माँ के विचार सुन्न कर.

"इतना भी न सोचो माँ. आपके साथ उसकी बॉन्डिंग ाची है तोह फिर क्या फरक पड़ता है की आपसे पैदा हुआ है या नहीं.? रही दामाद वाली बात तोह फिर ghar-jamaai तोह वो बनता नहीं. वैसे एक बात बतानी थी आपको?", अन्नू थोड़ा गंभीर लहजे में बोली तोह माता जी ने कप वापिस टेबल पर रख दिया.

"हाँ बीटा, कोई परेशानी वाली बात है क्या?"

"नहीं बात इतनी भी बड़ी नहीं है लेकिन मुझे लगता है की आपको पता होनी चाहिए. वो अब मैं भाई के घर नहीं रहती. 2 हफ्ते पहले हॉस्टल शिफ्ट हो गयी हु.", अन्नू बस इतना कह कर चुप हो गयी थी.

"वो सुधरा नहीं न अन्नू? तुझे मेरी कसम है पूरी बात बता. और तू ऐसे एकदम कैसे आयी थी इसकी वजह भी?", उसकी माता जी ने मौका देख कर अपने मैं का सवाल भी कर दिया.

"भाई सचमुच बदल गया है माँ या शायद मैं पहले उसको उतना जानती हे नहीं टी. बहिन हु न तोह बचपन के बाद हमारी बातचीत हमेशा थोड़ी बहोत हे होती थी जिसमे कुछ ख़ास होता हे नहीं था. हाँ मैं भाई को प्यार करती थी क्योंकि हम दोनों हे तोह थे बस. लेकिन जब मैं वह गयी तोह पहले दिन हे समझ आ गया था के वो आपका कहना सही था जो भी आप मजाक या सीरियस हो कर कहती थी. उसको बस अपने in-laws और बीवी की हे फ़िक्र है. मुझसे मिला भी तोह ऐसे जैसे कल हे मिले हो. कोई वो छोटी बहिन से मिलने वाली ख़ुशी नहीं और घर जाने के बाद niyam-kanoon का पाठ. मुझे लगा चलो फॅमिली है और वैसे भी मैं तोह खुद हे time-table और डिसिप्लिन में यकीन रखती हु लेकिन नेक्स्ट डे हे समझ आ गया की अपने भाई के घर रहना है तोह कुकिंग, क्लीनिंग, वाशिंग मुझे करनी होगी.", अन्नू की माता जी के तोह चेहरे के रंग हे उड़द गए ये सुन्न कर. आज तक उन्होंने अन्नू से कभी चाय का कप तक रसोई में रखने को न कहा था और वह उनकी नौक बची को पूरे घर के काम करने पड़े.

"उसकी बीवी? वो तेरे साथ काम नहीं करती थी?", फिर भी उन्होंने ने सोच कर ये पुछा शायद भाभी नानन्द मिल कर हे करती हो.

"हाहाहा.. वो 10 बजे उठने पर कॉफ़ी भी खुद नहीं बनती माँ. भाई हर रात काम के बाद उसके साथ फुल शराब के नशे में घर आता है. मैं ये सब भी सेहन कर लेती क्योंकि ये उनकी अपनी लाइफ है लेकिन..."

"क्या लेकिन अन्नू बीटा?"

"वो bhai-behan के रिश्ते को नहीं समझता माँ.. संडे को अर्जुन से मैं बात कर रही थी जैसा हर वीकेंड करती हु लेकिन उनके घर वो मैं दूसरी हे बार कर रही थी और भाई मेरे पीछे खड़ा कुछ देर देखता रहा और उसके बाद .. उसके बाद उसने मुझ पर वो सभी इल्जाम लगाए जो कोई भी बड़ा भाई सिर्फ सोचने भर से डूब मरे. तब भी मैंने कहा था के वो खुद हे देख ले की मैं क्या बात कर रही हु लेकिन वो बस जो भी दिल किया कहता रहा. उस रात मैं सो न सकीय, रात भर मैं रोई और फिर यूनिवर्सिटी में हॉस्टल के लिए अप्लाई कर दिया अगले दिन. मैंने तोह पहले हे आपसे कहा था की हॉस्टल ठीक रहेगा.", अन्नू की आँखों में आंसू आ चुके थे ये सब बताते हुए.

"मेरी बची.. वो सच में कपूत है और यहाँ था तब भी वो घुन्ना हे था जिसको ghar-pariwar की िज्जात्त की जरा कदर नहीं थी. तोह अगले दिन से हे तू हॉस्टल चली गयी थी?"

"2 दिन बाद माँ.. लेकिन उस मंडे हे आपके बेटे ने दिखा दिया था के वो इंसान के रूप में भेड़िया है. मैं तोह ये सोच कर हे रात वह रुकी थी की भाई के काम से आने के बाद उसको बता कर सुबह हे किसी होटल में 5-6 दिन रुक जाउंगी. सामान पैक था मेरा लेकिन भाई वैसे हे नशे की हालत में आया आधी रात को और अपनी हे बहिन.. छी.. वो तोह अगर मैं कमजोर पड़ जाती तोह जाने क्या होता.. उसकी बीवी भी aas-pados के डर की वजह से beech-bachaav में आयी और मैंने भी आपका और पापा का सोच कर चुपचाप वह से निकलना हे ठीक समझा. सबकुछ ऐसे टाइम हुआ था के मैं अकेली वह सुनसान सड़क पर रात के 1 बजे अपनी हालत के बारे में सोचती रही.", अन्नू की aap-beeti सुन्न कर जहा माँ का दिल फट रहा था वही उन्हें अपनी परिवरिश के 2 बिलकुल हे विपरीत पहलु नजर आये थे. अब वो भी आंसू लिए अपनी बेटी की बगल में आ बैठी थी.

"मेरी बची के साथ इतना सबकुछ हो गया और हमे खबर भी नहीं? तू वह अकेली कैसे रही मेरी बची? कैसे सामना किया तूने उस अनजान देश में इन हालात का.?", रट हुए अन्नू के चेहरे पर एकाएक मुस्कान आ गयी थी ये सुन्न कर.

"वही आपका दूसरा बीटा माँ. हिम्मतत करके मैंने सबसे पहले उसको हे फ़ोन किया था और शायद मेरी किस्मत इतनी बुरी भी नहीं है. अर्जुन ने हे फ़ोन उठाया था और आधे घंटे बाद मैं उसके हे एक परिचित के घर थी जिसने न मुझसे कोई सवाल किया न ज़िन्दगी की बारे में पुछा. फिर हॉस्टल भी मुझे समय से 3 दिन पहले मिल गया और अब वह कुछ लोग है जो मेरा ध्यान रखते है, अर्जुन की वजह से. एक तोह मिस मिर्ज़ा है जिनके पापा ट्रस्टी भी है यूनिवर्सिटी के. नरक से स्वर्ग में हे पंहुचा दिया मुझे आपके इस अर्जुन बेटे ने.", आज अन्नू की माता जी को जैसे अर्जुन ने अनचाहे हे खरीद लिया था. वो भी गीले नयनो के साथ हल्का मुस्कुरा दी.

"मैं इतना तोह महसूस करती हे हु बीटा की अर्जुन ख़ास है और वो मेरे लिए मेरा बीटा हे है. लेकिन उसने साबित कर दिया की परवाह और प्यार के लिए खून का रिश्ता हे होना जरुरी नहीं. हाँ खून के रिश्ते बेशक कलंकित कर देते है. तेरे भाई का हिसाब भी मैं अब ाचे से करुँगी."

"आपको मेरी कसम है माँ जो आपने इस सबका जीकर भी पापा से किया. और रही बात भाई की तोह वो खुद हे माफ़ी मांगने आया था यूनिवर्सिटी में. पता नहीं वह उसको किसने मजबूर किया लेकिन यहाँ से तोह कनेक्शन अर्जुन हे है. गिड़गिड़ा रहा था वो मेरे सामने की उसका रेस्टोरेंट बंद हो जायेगा और वो अपने बीवी बचे के साथ सड़क पर आ जायेगा. मामले को वही ख़तम करना हे मुझे सही लगा. बस फिर कुछ वक़्त लगा मुझे अपना मैं सँभालने में लेकिन अब मैं बहोत आराम से अपनी पढ़ाई और लाइफ जी रही हु.", अन्नू ने खुद हे अपनी माँ के चेहरे को साफ़ करके गले से लगा लिया. उसकी माता जी भी बेटी के गले से लग कर अब सुकून में थी.

"तोह तू वह से इधर अर्जुन के घर की शादी अटेंड करने आ गयी? अब ये भी बता दे की कोई और ख़ास काम तोह नहीं? कसम नहीं देती लेकिन सच सच बताना.", माँ बेटी की दोस्त बन्न न चाहती थी और इन दोनों का रिश्ता पहले भी कुछ खुलापन लिए हे था.

"शादी का तोह मुझे बताया था अर्जुन ने, माँ. 4 दिन पहले वैसे हे अर्जुन से फ़ोन पर बात हो रही थी की लाइन कट हो गयी. फिर इंटरनेट से मैसेज किया तोह उसने वैसे हे बोल दिया की अगर बात करनी है तोह अब डिनर पे हे करेंगे, वो भी आपके और पापा के साथ. वो मजाक कर रहा था लेकिन जाने क्या हुआ मुझे की मैंने टिकट करवा ली. माँ, उसने खाने का भी पुछा तोह आपके और पापा के साथ. मुझे सचमुच फील हुआ की मैं पहली बार लाइफ में घर से बहार निकली हु और वह आप और पापा मेरे साथ नहीं हो. जो भी था लेकिन अपने घर से बेस्ट कुछ भी नहीं. महीने भर में हे मुझे पूरी लाइफ समझ आ गयी.", अन्नू अभी भी थोड़ी भावुक और सोच में लीं थी. कभी चेहरे पर मुस्कान आती तोह गभी दर्द.

"तोह यही रह ले न अन्नू, नहीं करवाती तेरी शादी जबतक तू नहीं कहती."

"2 साल की हे तोह बात है माँ और अब मेरे लिए ये एक लक्ष्य है जैसे खुद को साबित करना. अर्जुन ने मुझे हिम्मत दी है और अब फिर से कायर बन्न कर नहीं रहना. मेरा फैंसला लिया हुआ हे अगर मैं बरकरार नहीं रख सकती तोह अपनी हे लाइफ से इन्साफ कैसा.? हाँ ये भी उस उल्लू ने हे कहा था मुझे. बूत ट्रस्ट में, ी ऍम स्ट्रांग नाउ. बाकी आपके वाहेगुरु जी वह भी है और अब तोह मैं गुरुघर भी जाने लगी हु उधर.", अन्नू ने थोड़ी मस्ती से कहा था.

"इस अर्जुन को मेरे हाथ लगने तोह दे जरा. मैं बताती हु इसको जो इतने बड़े बड़े काम करने लगा है और देख के तोह ये भी नहीं लगता के इसको अपने हे शहर का कुछ पता होगा. जाने ये एहसान मानु या एक सच्चे बेटे का कर्त्तव्य?"

"ओह माँ, इतना भी सीरियस मत लो हाँ. उसकी ड्यूटी है ये सब और आपके या पापा के लिए वो होगा आप लोगो का बीटा लेकिन मेरे लिए तोह मेरे ऐसा दोस्त है जिसके बिना शायद हे मैं अपने आप से मिल पाती. वैसे taam-jhaam तोह तगड़ा किया है उसके दादा जी ने शादी के लिए.", अन्नू ने एक बार फिर चर्चा अर्जुन पुराण से हटा कर अलग जीकर शुरू कर दिया था. दिल का अनकहा दर्द जब किसी अपने को बयान कर दिया जाए तोह इंसान बेहतर महसूस करता है. अन्नू ने भी कुछ सोच कर अपनी माँ से ये सभी राज सांझे किये थे और अपनी बेटी को हालात से लड़ कर मजबूत होता देख उसकी माता जी भी खुश थी.

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"सुन्न ारु, जरा इधर साइड में आ.", अर्जुन की तोह कोमल दीदी के ऐसा कहते हे फट गयी थी. अभी वो अपने दादा जी से फुर्सत ले कर बहार निकला हे था की गंभीर चेहरा लिए सामने कोमल दीदी आ कड़ी हुई. उन्होंने उसको बगीचे की तरफ बुलवाया तोह सेहमा हुआ वो चुपचाप हे साथ हो लिया.

"जी दीदी.", अर्जुन बगले झाँक रहा था जैसे दीदी ने उसकी अन्नू वाली चोरी पकड़ ली हो. लेकिन कोमल दीदी जैसे उस मुद्दे पर बात नहीं करने आयी थी.

"देख मैं जो भी कह रही हु उसको ध्यान से समझना और ये काम तू हे कर सकता है.", अब अर्जुन ने एक गहरी सांस ली और चेहरे पर से परेशानी छू मंतर हो चुकी थी.

"हाँ हाँ दीदी, बस आप बोलो तोह क्या करना है? सब कर सकता हु आपके लिए."

"शांत हो कर ध्यान से सुन्न. घर की सभी लड़कियां और जो बहार से आयी है वो सभी पिछले घर रुकने वाली है आज रात.", कोमल दीदी अभी बताना शुरू हे किया था और अर्जुन तपाक से बीच में हे बोल पड़ा.

"हाँ तोह मैं वही रहूँगा न दीदी सबकी सेफ्टी के लिए. और सच कहता हु कुछ भी ऐसा वैसा नहीं होगा."

"ारु, सुन्न तोह ले पहले. अब चुप रह बस. हाँ तोह मैं कह रही हु की सभी वह जाएंगी अब से 15-20 मिनट बाद. और तुझे दादी को मानना है के आज रात माधुरी दीदी भी सबके साथ वह जाए.", अब थोड़ा झटका लगा था अर्जुन को दीदी की ये बात सुन्न कर. माधुरी दीदी की तोह शादी है और आज हे उनकी नजर बंधी है. चलो नजर छोड़ भी दो तोह रात के लिए दूसरे घर उनका रहना दादी कैसे मानेगी.

"कहा फांस्वा रही हो दीदी? आपसे मेरा हंसना खेलना सेहन नहीं होता तोह बोल दो बस. लेकिन..", अर्जुन कुछ कहता उस से पहले हे दीदी ने फिर से टोक दिया.

"देख, उनका भी दिल है और बाकी सभी का भी. एक छोटी सी पार्टी राखी है वह दीदी की शादी होने की ख़ुशी में. सभी बहोत खुश है के वो लाइफ में एक नया एक्सपीरियंस लेने के लिए. सबके साथ ghul-mil कर मस्ती करने का यही एक अवसर है और कल से तोह फिर किसी को मौका भी नहीं मिलेगा. छोटी सी बियर पार्टी और डांस जैसा हे कुछ है, माधुरी दीदी का दिल है ये करने का. ारु, दीदी फिर शादी करके अपने ससुराल चली जायेगी और वह ये सब तोह नहीं हो सकता. कितने हे लोग आये है और हिमानी, प्रीती, मरीना, विन्नी दीदी ने तोह सब तैयारी भी कर राखी है. दादी से रिक्वेस्ट करके उनसे परमिशन ले ले न भाई. मेरे लिए प्लीज....", कोमल दीदी ने बिना लाग लपेट के सब कुछ बता दिया था और जैसे हे उन्होंने अर्जुन का हाथ पकड़ कर प्लीज कहा अर्जुन के दिमाग से बियर पार्टी शब्द तोह निकल हे गया. बस अनुमति लेनी थी अब तोह हर हाल में, अपनी कोमल दीदी के लिए.

"मैं कर लूंगा दीदी और दादी मन भी नहीं करेगी देख लेना. लाइफ में ऐसे मोमेंट्स आते हे कितने है और इस शादी के बाद तोह फिर से आप लोगो की वही लाइफ शुरू हो जायेगी. मैं दादी से अभी बात करता हु.", अर्जुन को इतना गंभीर देख खुद कोमल दीदी भी हैरान थी लेकिन वो जानती थी की अर्जुन अब कैसे भी करके दादी को मन हे लेगा.

"उसके बाद माधुरी दीदी वाले कमरे में आ जाना.", कोमल दीदी ने उसका गाल सेहला कर कहा और तुरंत गलियारे से होती हुई अंदर चली गयी. अर्जुन भी अपनी दादी के कमरे में आ घुसा जहा वो बिस्टेर पर हे बैठी पूर्णिमा जी के साथ साथ बरखा मामी और ललिता जी के साथ कुछ चर्चा में लगी थी. मेनका अभी अभी रेणुका के साथ अंदर गयी थी.

"दादी आपसे के जरुरी बात करनी थी मैंने. लेकिन पहले आप पूरी बात सुन्न लेना, प्लीज.", अर्जुन ने अंदर आते हे बिना किसी की तरफ ध्यान दिए कौशल्या जी से कहा.

"हाँ, तू पूछने कबसे लगा कुछ कहने से पहले? बैठ इधर और तू मिला क्या बरखा मामी से अपनी?", कुआशालय जी अपने हे राग सुना रही थी और अर्जुन का दिमाग जैसे अपनी कोमल दीदी के चेहरे को हे याद किये जा रहा था.

"हाँ, मामी जी से मैं मिला हु दादी और मेरे लिए ये ड्रेस भी बड़ी ाची लेके आयी है. वैसे आप मेरी बात तोह सुनो."

"तू मुझे हे बता दे बीटा, कौशल्या से क्या पूछ रहा है?", पूर्णिमा जी ने अर्जुन को दुलारते हुए कहा जिस से कौशल्या जी मुस्कुराते हुए ना में गर्दन हिलने लगी.

"वो न आपसे परमिशन चाहिए थी.", अर्जुन फिर से उलझने लगा था और उसके चेहरे के बदलते भाव देख अब कौशल्या जी ने ये मजाक छोड़ उसकी पीठ सेहलायी.

"हाँ तोह जिस काम के लिए तू आया है वो शायद इन लड़कियों की पार्टी वाला है. मैंने तोह ऋतू को दोपहर में हे कह दिया था के अब घर बंद करके तुम लोग जितना दिल करे naach-gana करो, hanso-majaak मस्ती करो. वो तुझे भेज कर तेरा मजाक उड़वा रही है मेरे बैलबुद्धि.", अर्जुन ने जैसे हे ये सुना वो हैरान हुआ लेकिन फिर कोमल दीदी तोह मजाक भी नहीं करती.

"क्या उन्होंने बताया के माधुरी दीदी भी उनके साथ रहना चाहती है?"

"तेरा दिमाग ठिकाने है बीटा? कल से माधुरी के बाटना लगेगा, और उसकी शादी है तोह ब्याह से 3 दिन पहले मैं उसको घर से बहार कैसे भेज दू?", कौशल्या जी के स्वर में गुस्सा तनिक भी न था लेकिन वो कुछ सख्ती से कह रही थी.

"तोह मतलब अगर माधुरी दीदी की शादी हो और उसमे वो न जाए तोह शादी हो जायेगी दादी?", अर्जुन भी अपनी दादी से ऐसे हे बोलै जैसे उन्होंने कहा था लेकिन दोनों के व्यंग में शब्दों का अंतर था. अर्जुन ने उतने हे प्यार से कहा था जितनी सकती से कौशल्या जी ने.

"ये क्या कह रहा है तू?"

"तोह यही तोह बात है दादी. अब माधुरी दीदी की शादी की ख़ुशी सभी बहने मिल कर मानना चाहती है जिसमे हिमानी दीदी, मरीना, विन्नी दीदी के साथ साथ जो लोग चाचा जी के शहर से आये है वो भी होंगे. और जिसकी शादी हो रही है वही पार्टी में न हो तोह फिर ये कैसे पार्टी? दीदी के बाटना तोह कल से लग्न है, बात तोह आज रात की है न.", अब कौशल्या जी कुछ सोचने लगी थी क्योंकि बात बचो की ख़ुशी की थी और पूर्णिमा जी ने भी नजरो से सहमति दी लेकिन इस बीच देवकी जी बोल उठी, जिनकी राये अर्जुन लेना हे नहीं चाहता था.

"ये सब शोभा नहीं देता फिर चाहे वो घर भी अपना हे क्यों न हो. लड़कियां कोई गवैये या बंजारों की नहीं है बीटा, रसूख वाले खानदान की है. जीजी ने बिना माधुरी के भी कैसे इजाजत दे दी ये तोह वही जाने. ये सब शौक मर्दो को हे ठीक लगते है.", अर्जुन का दिल तोह किया की वो अपना हे सर फोड़ ले लेकिन उसने बड़ी आस से अपनी दादी की तरफ फिर से देख.

"दादी, फिर तोह माधुरी दीदी अपने ससुराल चली जायेगी. समझ लो ये उनकी पहली और आखिरी इत्छा है जाने से पहले. उन्हें मैंने भरोसा दिलवाया है दादी, वो जाएंगी नहीं जबतक आप अनुमति नहीं देती.", अभी अर्जुन ये सब कह हे रहा था की रामेश्वर जी मेहमान कमरे से इस तरफ चले आये. देवकी जी ने तोह घूंगट हे गिरा लिया.

"मूंदे न जड़ो हाँ हे केहनी है थानेदारनी जी ताः ेहना विचार काहदे लायी? पड़ोस विच ओह अपना हे घर है, बचे सारे ख़ुशी ख़ुशी ralan-milange तेह माधुरी ने यह सब कहना हे नहीं चाहिदा सी. तुस्सी आप कहना सी के ढोली बुलवाओ, रोला पाउ तेह घरो जान तोह पहला यादें चंगी लेके जाओ. मैं हुन्न वि सलाह हे दित्ती है, मालिक तुस्सी हो.", रामेश्वर जी इतना कह कर अर्जुन के सर पे हाथ फेरते हुए अपने छोटे भाई के साथ बहार की तरफ चल दिए सैर पर. कौशल्या जी के चेहरे पर चमक हे आ गयी थी जैसे वो जो चाहती हो वैसा हे हुआ हो.

"इसको बोलते है परमिशन, अर्जुन बीटा. मैं तोह हाँ कह भी देती लेकिन जब ऊँची आवाज में कहा था तोह तेरे हे दादा जी को सुनाने के लिए कहा था. मेरी बच्चियां चाहे तोह हर रोज हल्ला करे, उनके बाप का घर है. मैं आयी पूर्णिमा इन सबकी क्लास लगा कर.", कौशल्या जी हंसती हुई बिस्टेर से कड़ी हे हुई थी और बहार की तरफ से Alka-Aarti ने उन्हें अपनी बाहों में भर लिया.

"ओह दादी, थैंक यू सो मच.. आप सबसे बेस्ट हो.", अर्जुन हैरान था के दादी को इनका भी पता था जो बहार कड़ी सब सुन्न रही थी.

"चल अब माधुरी को भी कह दे की अपने कपडे भी साथ लेले, सोने के टाइम के. अर्जुन, कोई लड़की वह पैदल नहीं जायेगी. तारा के साथ गाडी में इन्हे ध्यान से लेके जाना है इनके सामान के साथ. और अलका, बीटा शिकायत का मौका नहीं मिलना चाहिए aas-pados से की शोर कही ज्यादा हे हो तुम्हारे स्पीकर का.", इसके बाद कौशल्या जी ने खुद हे पिछले कमरे में जा कर सभी को अनुमति दे दी थी की वो ाचे से khaaye-peeye, नाच गण करे और घर को बंद रखे. अर्जुन आँगन में हे था जब ऋतू उसके पास आयी.

"बहार प्रीती तुझे म्यूजिक सिस्टम देगी, 2 बैग और एक ये बैग भी लेता जा. हाँ, उमेद चाचा वाली कार की डिक्की में एक बियर की पति भी है डिक्की में. किसी को पता नहीं लग्न चाहिए इतने ध्यान से उसको अपनी कार में रख. जब सबकुछ हो जाए तोह मुझे बता देना, फिर चलते है पिछले घर.", अर्जुन तोह ये भूल हे गया था के उसकी बहने कैसी पार्टी करने वाली है. बैग में भी बोतल हे थी जो हिमानी लायी थी और अब इतना सामान लेके जाना था. मरता क्या न करता और अगले 10 मिनट में हे उसकी कार में इतनी शराब और बियर थी जिसको रखना गैरकानूनी हे कहा जाए.

"मैडम, दूसरी मालकिन को भी बोल दो की सब सामान फिट हो गया है.", अर्जुन ने याचिका करते हुए प्रीती से कहा था जिस पर वो हंसने लगी.

"बच्चू, अभी तोह ये वो सामान है जो हमारे पास था. ये लिस्ट में जो लिखा है वो आप हमको सेक्टर की मार्के से ला देना, बिजी थे इसलिए खुद नहीं ला सके. मैं बुला की लायी दीदी को, आप जरा एक ों रखो कार का.", प्रीती ने भी अर्जुन को उसकी हे भाषा ने नहले पर सीधा बेगम हे मारी.

'धन्य हो प्रभु. यहाँ बात हुई थी परमिशन दिलाने की लेकिन ये कहा पता था के हम हे ऑर्केस्ट्रा धोयेंगे और हम हे ड्रिवेरी भी.', अर्जुन किस्मत को कोस रहा था लेकिन उसको उम्मीद भी थी की उसकी बहनो का दिल इतना नरम तोह होगा हे जो उसको पार्टी देखने देंगी. अभी तोह बाकी रंग देखने बाकी थे. जल्द हे उसकी कार में अलका, प्रीती, अफसाना और हिमानी सवार हो गयी और सफारी में तारा ने अपने साथ ऋतू, कोमल, आरती, प्रियंका, माधुरी दीदी के साथ साथ रुपाली और विन्नी दीदी को बैठा लिया. जसलीन अपनी कार में कीर्ति, गुरदीप और मरीना को लिए उनके साथ हे चल पड़ी. कोमल दीदी ने मंजू से भी आग्रह किया था लेकिन उसने घर पे हे रेखा जी के साथ रुकने और गर्भ का हवाला दे कर मन कर दिया था. अब पिछले घर में 16 लड़कियों की महफ़िल लगने वाली थी जिसका ख़याल करके हे बाकी सबके साथ साथ अर्जुन भी उत्साहित था.

"वैसे तुम ये सामान जल्दी ले आना, कन्फेक्शनरी पर हे मिल जायेगा. बाकी देख लेना आसपास से हे.", घर पहुंचते हे सबसे पहले तोह एक बार फिर से अर्जुन कुली के अवतार में आ गया था. किसी भी लड़की ने एक थैला तक उठाने की जेहमत न करि. कमरों में रखे 4 बीएड के अलावा 8 अतिरिक्त गद्दे उन्होंने घर के भीतर वाले बड़े आँगन में अर्जुन से सेट करवाने के बाद म्यूजिक सिस्टम भी सही से लगवाया. प्रीती के साथ अनुभवी मरीना, जसलीन और हिमानी ने रसोई संभाल ली थी, बर्फ, gilaas-plate के साथ साथ बाकी सामान लगाने के लिए.

"और सामान लाने के बाद भी कुछ काम होगा क्या?", अर्जुन विचार कर रहा था के वो कहेंगी की नहीं बस सामान ले आओ फिर पार्टी करते है.

"हाँ बस यही सामान ला कर दे दो फिर तुमसे कोई और काम नहीं. छत्त पर या बहार वाले कमरे में सो जाना, उधर कूलर भी लगा है.", बस दूध में गिरी मक्खी की तरह निकलना क्या होता है ये अर्जुन को आज हे पता चला था. ये साफ़ था की इस लड़कियों की महफ़िल में सख्ताई से उसका प्रवेश मन था.

"समझा करो ारु, कल संजीव भैया की पार्टी में सिर्फ लड़के हे होंगे वैसे हे यहाँ हम सिर्फ लड़कियां हे है. थैंक यू सो मच भाई.", कोमल दीदी ने अपने भाई के मैं की जान कर उसको सचाई से अवगत करवाया तोह अर्जुन भी उन्हें घर के ये दरवाजा बंद करने का बोल कर बहार का गेट बंद करके मार्किट निकल चला.

"यार ये गिलास है? ऐसे तोह वो कैंडल वाला होता.", यहाँ तोह तुरंत हे एक बड़ी ट्रे में छोटे और बड़े अलग अलग तरह के गिलास, जो इनमे से हे कोई मार्किट से लाया था ट्रे में सजे गड्डो के बीच वाले खाली फर्श पर सजे थे. विन्नी ने तोह देसी काम करते हुए स्टील की बाल्टी में हे घर से लायी 4-5 ट्रे बर्फ की खाली करने के बाद 6 बोतल बियर उड़ेल दी थी ठंडी होने के लिए. आरती उन छोटे छोटे कांच के गिलासों को देख हैरान थी.

"ये टकीला शॉट के गिलास है आरती, पर हम इसमें वोडका शॉट लगाएंगे. वैसे म्यूजिक तोह बस फ़िलहाल बैकग्राउंड के लिए है.", हिमानी ने आरती को समझने के साथ हे वाइन की सभी बोतल फ्रिज में लगा दी. लड़कियां वैसे भी घर के काम और खाना लगाने में दक्ष होती है और इधर सबने मिल कर झटपट हे महफ़िल सजा दी थी. उन्हें क्या पता था के इनके baap-chacha भी ऐसे हे जमीन पर गद्दे लगा कर प्रोग्राम जमाते है, खून का हे असर था शायद.

"मैं पहले हे बता देती हु की जिसका फर्स्ट एक्सपीरियंस है वो सिर्फ बियर या वाइन हे ले. वोडका काम खराब कर सकती है तोह जिसने रिस्क लेना हो वही ले, नहीं तोह बाद में शिकायत नहीं.", विन्नी ने एक गद्दे पर चुककडी लगते हुए अपनी बगल में माधुरी दीदी को बैठा लिया. सभी लड़कियां फिलहाल 4 गड्डो पर 4-4 के जोड़े में थी और प्रीती एक और ट्रे में माध्यम अकार का केक लिए प्रकट हुई.

"ये केक?", माधुरी दीदी ने थोड़ा हैरानी से देखा. थोड़ी घबराहट उन्हें भी हो रही थी ऐसे काम में लेकिन सभी को उत्साहित देखो वो भी सहज हे रही. केक देख कर जरूर वो हैरान हुई जिस पर लिखा था 'क्वीन - माधुरी दीदी'

"आपकी पार्टी है तोह केक कटेगा हे दीदी. तारा, पहले ये 15 गिलास में बियर भर दे यार और ऋतू हेल्प कर जरा इसकी.", अलका ने अपनी बड़ी बहिन को चहकते हुए कहा और दूसरी तरफ मग से बियर भर भर के Ritu-Tara सभी गिलास तैयार करने लगी. बहार गेट की आवाज सुन्न कर कोमल दीदी ने तुरंत दुपट्टा सही करते हुए दरवाजा खोला और सामने अर्जुन को देख खाने -पीने का सामान ले कर इस बार चिटकनी हे लगा दी.

'कमाल है इनका तोह. थैंक यू तक नहीं कहा. चल भाई अर्जुन यहाँ से तोह वैसे हे कुछ नजर नहीं आना, ऊपर हे चलते है. आराम करने.', अर्जुन पिछले रस्ते से उन सीढ़ियों से होता खुली छत्त पर चढ़ गया जहा उसका बिस्टेर लगा था. इस घर की सबसे ख़ास बात थी हर तरफ ऊँची दीवारे और इमारत के चारो तरफ खाली जगह.

"अगर किसी को कपडे बदलने है तोह फिर अभी बदल लो, कमरे और बाथरूम खाली है. बाद में पार्टी के बीच इधर उधर गायब नहीं होना.", प्रियंका ने अपनी जगह से खड़े हो कर एक कमरे का रुख किया तोह 3 और भी अलग कमरे में चली गयी. अफसाना बड़े गौर से सबकुछ देख रही थी और उसके लिए 16वे गिलास में अलका ने ठंडा जूस भर दिया.

"ये तोह ठीक रहेगा न अफसाना? साथ बैठी हो तोह काम से काम जूस हे पी लो."

"जी, आपि. शुक्रिया.", वो अभी भी गले और सर पे दुपट्टा लिए थी लेकिन जैसे हे अपने से बड़ी युवतिओं को अब पाजामे टीशर्ट में देखा तोह झिझकते हुए दुपट्टा सिर्फ गले में रहने दिया. जसलीन और तारा तोह आदतन जांघ तक की निक्कर में हे कमरों से बहार प्रकट हुई और कुछ वैसा हे विन्नी ने किया. अब लगभग हर लड़की tshirt-pajame में थी या वैसे हे ढीले वस्त्रो में.

"चलो पहले माधुरी दीदी केक काटो और उसके बाद सभी एक साथ चियर्स करेंगे.", मरीना ने ये कमान सँभालते हुए एक साफ़ छुरी दीदी की तरफ बधाई और गाने के आवाज बढ़ा दी अलका ने. तालियों के साथ हे केक भी कटा और सबने चाहे थोड़ा हे सही लेकिन माधुरी दीदी को अपने हाथो से खिलाया.

"टोस्ट करो दीदी, पहला गिलास आप हे उठाओगी.", रुपाली के ऐसा कहते हे माधुरी दीदी ने ख़ुशी और कांपते हाथो से बियर से भरा एक गिलास उठा कर थोड़ा आगे किया था की सभी ने बारी बारी से अपने गिलास उनके साथ धीमे से भिड़ाये.

"आपकी शादी की ख़ुशी में. आपके ाचे जीवन के लिए और आने वाले हर पल के लिए. ख़ुशी में.", ये नैरा अपनी अपनी तरह सभी ने दिया था. सबसे आखिर में अफसाना ने भी आगे खिसक कर नजाकत से गिलास लगाया.

"आपकी ख़ुशी में हमे शामिल करने के लिए शुक्रिया आपि.", और इसके साथ हे कई चेहरों पर ऐसे भाव आये जैसे जहर चख लिया हो.

'युक.'

'उफ़...'

'छियई.. कैसा स्वाद है इसका? कड़वा..'

"इसको कैसे पी सकता है कोई?"

ये कहने वाली थी ऋतू, अलका, रुपाली, आरती, गुरदीप और प्रियंका. कोमल, माधुरी को भी ये स्वाद जरा न भय था लेकिन उन्होंने आवाज न की.

"एक काम करो तुम लोग. स्मेल किये बिना बस पूरा गिलास गले से निचे उतार लो. दवाई समझ के और वैसे इसका टास्ते इतना बुरा भी नहीं है. बाकी बियर ठंडी हो जाने दो फिर ज्यादा ाचा लगेगा.", विन्नी ने तोह 2 हे घूँट में गिलास खली रख कर ऐसे मुँह साफ़ किया जैसे बिल्ली दूध पीने के बाद. किसी का ध्यान प्रीती की तरफ न गया जो सबसे पहले हे खली गिलास रखे इनकी तरफ देख रही थी.

"वाह.. जरा इस प्रीती को तोह देखो यार. मैडम ने सबसे पहले गिलास साफ़ कर दिया.", हिमानी के ऐसा बताते हे Ritu-Alka बड़ी हैरानी से प्रीती को देख रही थी और उधर कोमल ने भी अपना गिलास निबटा कर फर्श पर टिका दिया. Jasleen-Keerti भी उनके साथ हे फारिग हुई और अब तोह Ritu-Alka ने एक दूसरे को देख कर बिना समय गवाए ऐसे बियर ख़तम की जैसे ये उनका रोज का काम हो. सीने में उठिति जलन किसी को दिखती कैसे.

"यार कुछ दो मुझे स्वाद बदलने के लिए.", रुपाली की आँखों में पानी आ चूका था और उसको ऐसा लग रहा था जैसे मुँह में जहर और दिमाग में हथोड़ा लग रहा हो. विन्नी ने तुरंत टेल हुए काजू उसकी तरफ बढ़ा दिए. सभी अब जायके के लिए कुछ न कुछ खाने लगे थे. Vinni-Marina और हिमानी ने आपस में एक इशारा किया और साफ़ पानी जैसी वोडका उन छोटे गिलासों में ऊपर तक भर दी. जसलीन ने भी हाँ भरी.

"अब ये क्या करने लगी हो आप लोग?", अलका तोह अभी से थोड़ा अजीब महसूस कर रही थी और वोडका के पेग बनते देख बस यही पूछा.

"वोडका कौन लेगा? देखो, शॉट लगाने की जरुरत नहीं है. अगर पहले ड्रिंक की है कभी तोह जूस या कोला में मिला कर ले सकती हो.", हिमानी ने सबकी तरफ देख कर कहा.

"मैं कोला में लुंगी.", कोमल ने एक बार फिर सबको हैरत में दाल दिया. और उसकी हिम्मत देख प्रीती और कीर्ति ने भी हां कहा. तारा बाकी गिलास फिर से बियर के बनाने लगी थी जिसको देख रुपाली ने थोड़ी देर बाद का कहा अपने लिए.

"चियर्स एवरीवन. और इसके बाद शुरू होगा स्पिन था बोतल. जिसकी तरफ बोतल का ढक्कन रुका, उसको बोतल की बैक साइड वाला टास्क देगा. और सबको पता है न के लिमिट क्रॉस नहीं करनी.?", विन्नी ने वो टकीला गिलास उठा कर दूसरे हाथ में नमक लगा निम्बू का टुकड़ा उठाते हुए कहा और मरीना, हिमानी, जसलीन ने एक बारी में हे वो गरम वोडका गले ने निचे उतार ली. ऋतू तोह हैरत से देख रही थी की ये चक्कर क्या है. निम्बू क्यों चाट रही ये सब ये पानी पी कर. बाकी सभी अब आराम से बियर पी रही थी.

"तुम्हे ये तरय करना चाहिए पिंकी और अलका बियर से ाचा टास्ते है इसका. कोला हे लग रही है बस.", कोमल दीदी ने ऐसा कहा था और उनका अनुसरण करती प्रीती और कीर्ति ने भी यही कहा के vodka-cola बियर जितनी बुरी भी नहीं.

"मेरा बना दो ये वाला. बियर से तोह सर घूम रहा है, कोला से ठीक हो जायेगा.", रुपाली ने इत्छा तोह जाता दी लेकिन मरीना ने सर पे हाथ रख लिए

"यू क्नोव, don't मिक्स योर अल्कोहल रुपाली. अगर वोडका पीयो तोह फिर अगला भी वोडका हे लेना."

"ठीक है मैं वोडका हे लुंगी. मीठी तोह लगेगी जैसा कोमल दीदी की शकल से लग रहा है.", इस बीच ऋतू ने तोह बियर के हाथ भी न लगाया था और सबके गिलास अगले 5-10 मिनट में फर्श पर खाली रखे थे. मरीना ने फिर से टेक्विअल गिलास उठाये और फिर हिमानी, विन्नी और जसलीन ने हामी भरी.

"ऋतू, ख़तम करो अपनी बियर.", आरती ने ऋतू को याद दिलाया तोह उसने ना में गर्दन हिला दी.

"वाइन की बोतल हे देदो मुझे तोह. न वोडका न बियर. रोमिला आंटी यही पीती है न? बस मैं वही लुंगी.", ऋतू को पता नहीं क्या सूझी और अलका जैसे हे अपनी जगह से कड़ी हुई कदम हिल गए.

"देख के डार्लिंग देख के.. सलामत फ्रिज तक चली जाओगी न?", विन्नी ने मजे लेते हुए कहा तोह अलका भी हंसने लगी.

"पाँव सो गया था दीदी, नशे नहीं हुए.", वापिस वो ठीक आयी थी और इसके साथ हे हिमानी ने एक खाली बोतल पहले खुद घुमा कर माधुरी दीदी को दिखाई और फिर उन्हें घूमने को कहा.

"सब रेडी हो न?", जसलीन ने नैरा बुलंद किया था और सभी तैयार. बोतल संगमरमर के फर्श पर घूमी तोह 16 जोड़ी आँखें बस उसको हे देखती रही.

"ओह्ह्ह्ह.. शीट..", ये रुकी थी मरीना की तरफ और उसकी दूसरी और थी विन्नी.

"आओ ठाकुर. पहली हे बार में हमारी पकड़ में आ गए आप तोह. मेरी रुस्सियन फ्रेंड के लिए एक पंजाबी गण लगा दिया जाए जरा.", विन्नी दीदी का विचार सुन्न कर मरीना मायूस सी हुई लेकिन अब नाचना तोह था हे जिसके लिए आगे 4 गद्दे जोड़ कर उन्होंने मंच बनाया हुआ था.

"दीदी, वो पंजाबी कद शायद घर हे रह गयी. सताया मूवी का उस टाइप का हे गण है एक.", प्रीती के कदम अभी से हिलने लगे थे जो कद देख रहे थी.

"लगा दो यार, बस नाचते हुए देखना है मैंने इस माँ की गुड़िया को.", विन्नी ने मरीना को आँख मारते हुए कहा और जल्द हे गण शुरू हो गया. 'सपने में मिलती है..' मरीना नाच चाहे जैसा मर्जी रही थी लेकिन उसकी कमरे से ले कर वक्षो से कुछ निचे तक का फक्क गोरा पतला बदन साफ़ झलक रहा था. 1 मिनट में हे पसीने से नाहा गयी तोह विन्नी ने गण बंद करवा दिया.

"वाह यार तुम्हे तोह नाचना भी आता है.", रुपाली भी इतने में हे हिल चुकी थी जो मरीना के निर्वस्त्र पत् पर हाथ रखती हुई बोली.

"बी चांस यही एक सांग सुना है मैंने. थैंक यू प्रीती. नाउ ी बदली नीड ानोथेर ड्रिंक, no मोरे शॉट्स विन्नी.", मरीना वातानुकूलन के बावजूद पसीने में तर बतर थी. एक बार फिर बोतल घूमी और इस बार रुकी अफसाना पर जिसकी आँखों में डर साफ़ दिखने लगा था. उसके सामने थी कोमल दीदी. यहाँ फिर से बियर, वोडका के गिलास बन्न रहे थे और ऋतू वो अजीब सी वाइन सीधा बोतल मुँह के लगाए पी रही थी.

"घबराओ नहीं अफसाना जी, दीदी तुमसे कुछ भी ऐसा वैसा नहीं करवाने वाली."

"आपि कहेंगी तोह हम नाच सकते है पर ऐसे गाने पर मुश्किल होगा.", अफसाना ने ऋतू को जवाब देते हुए कोमल दीदी की तरफ भी निगाह राखी.

"ऐसा करो अफसाना, तुम ऋतू के कपडे पहन कर दिखा दो एक baar.",Masti में ये बात अलका ने कही थी और बाकी सभी मुस्कुराने लगे.

"शठ.. मैं कह सकती हुई जो कहना है अलका. अफसाना, तुम बहोत प्यारी बची हो लेकिन मैंने तुम्हारे मुँह से हिंदी या इंग्लिश बिलकुल भी नहीं सुनी. हिंदी में तुम बताओ की तुम्हे यहाँ सबसे ज्यादा क्या ाचा लगा और इंग्लिश में बताओ क्या बुरा.", कोमल ने खुद को ाचे से संभाला हुआ था. अफसाना भी इस कार्य को सुन्न कर कुछ सहज हुई.

"कोमल दीदी, हमे सबसे ज्यादा पसंद आया आपका परिवार. यहाँ सभी एकसाथ रहते है और सबका ख़याल रखते है. ी दो नॉट लिखे पीपल हु जस्ट लुक ात उस अस सेक्स ऑब्जेक्ट. ी फसद सुच इंसिडेंट जस्ट आफ्टर लीविंग माय सिटी. थैंक यू.", अफसाना ने हर शब्द बड़े ध्यान से और रुक रुक कर कहा था लेकिन बिलकुल सही. और जो सन्देश उसने अंग्रेजी में दिया था उसको सुन्न कर बगल में बैठी ऋतू ने उसका गाल हे चूम लिया.

"ब्यूटीफुल. और तुम अपने साथ रखा करो एक नाइफ. जो ऐसा वैसा करे, उसकी आँख में हे दाल देना. अब हो हे इतनी सुन्दर.", ऋतू के अंदाज पर सभी हंसने लगे थे और इस बीच सबके हाथ उनके jaam-gilaas नुमाया था.

"Aapi,aapke मुँह शराब लगी hai.",Afsana ने झेंपते हुए जवाब दिया जब सभी उसकी तारीफ भी कर रहे थे.

"आये हाय मेरी ाफसु. मतलब तुम ऋतू को अपना गाल चूमने दे सकती हो अगर ये नार्मल हो तोह? मैं तोह बचपन से तेरे साथ रही हु यार. फिर इतनी na-insaafi.", आरती के इस डायलाग ने एक बार फिर सबको हंसने पर मजबूर कर दिया था और अफसाना का चेहरा शर्म से गुलाबी होने लगा.

"हमने ऐसा तोह नहीं कहा. ऋतू आपि भी आपके हे जैसी है आरती.", अफसाना के धीमे से आवाज देने के लहजे में अब झिझक काम थी और ऋतू ने उसको अपनी बगल में ले लिया. बोतल फिर एक बार घूमी थी और माहौल में इतनी जल्दी हे नशा हावी होने लगा. मरीना ने स्विच बोर्ड देख 4 में से 2 तुबे बुझा कर माहौल थोड़ा खुशनुमा किया. बोतल का रुख इस बार अलका पर था और उसको कार्य देने का जिम्मा मिला तारा को. दोनों के चेहरे पर जैसे अलग सी चमक आ गयी थी.

"अलका डार्लिंग, ऐसा है की पहले तोह अपनी बियर ख़तम करो और फिर जरा ऋतू को लिप तो लिप.", यहाँ बैठे ज्यादातर के चेहरे हैरत से भर उठे तारा की बात सुन्न कर लेकिन प्रीती, आरती मुस्कुरा रही थी.

"ये लिमिट से बहार है तारा.", माधुरी दीदी को भी सुरूर था लेकिन इतना भी नहीं की सही गलत की पहचान न हो.

"ऑलराइट ऑलराइट. माधुरी दीदी, लिमिट का मतलब सामने वाले को बुरा नहीं लग्न चाहिए.", अलका ने आँख दबा कर कहा और अपनी तरफ देखती हुई ऋतू को ऐसे लपका जैसे दयावान का विनोद खन्ना माधुरी दीक्षित को पकड़ता है. दोनों की नजरे बड़े गौर से एक दूसरे को कुछ पल देखती रही और फिर सुर्ख होंठो के 2 जोड़े एक दूसरे से आहिस्ता से जुड़ गए. विन्नी कुछ पल देखती रही और जैसे हे अलका ऋतू का चुम्बन गहराने लगा उनका हाथ खुद अपनी जाएंगे के बीच सहलाने लगा. मरीना भी ऐसे खो गयी जैसे जादू चल रहा हो. कोमल ने तोह नजरे हे दूसरी तरफ कर ली थी एक मुस्कान के साथ. ालके के सीने पर ऋतू के हाथ पहुंचे हे थे की तारा ने रुकने की आवाज लगा दी.

"ओह तुम दोनों बस भी करो. देखो जरा बाकी सबकी हालत खराब कर दी. मुझे तोह लगा था टच कर के अलग हो जाओगी.", तारा ने झूठा गुस्सा दिखाया था और अफसाना के तोह रोये खड़े हो चुके थे इस बीच.

"यार मैं क्या कहती हु, थोड़ा डांस करके खाना खाते है. नहीं तोह फिर पक्का कुछ ऊंच नीच हो जानी नशे में.", प्रियंका को अंदेशा हो चूका था के अब क्या होगा. सभी ने अपने अपने जाम ख़तम करते हुए ये बात मान ली थी लेकिन विन्नी ने साफ़ कह दिया था के डांस के बाद वो तोह अभी ड्रिंक लेगी.

"हाँ, मैं और कीर्ति भी. मरीना तुम?", जसलीन ने भी इरादे जाता दिए थे के वो अभी मस्ती में रहेगी.

"ऐसा है की माधुरी दीदी के साथ मैं और कोमल तोह आराम करेंगे. रुपाली तुम्हारी हालत भी ठीक नहीं है.", प्रियंका दीदी ने खड़े होते हुए अपने इरादे बता दिए.

"जिसका दिल करे वो पीना और जिसने आराम करना है वो करे. लेकिन डांस के बाद ट्रुथ & डरे जरूर होगा. और माधुरी दीदी भी खेलेंगी, ऐसा पहले हे कहा था.", अलका ने खड़े होते हुए वेंगाबोय्स की कद सिस्टम में डालते हुए एक और तुबेलिघ्त बंद कर दी. इस बीच किसी ने गौर नहीं किया था के मरीना अब पाजामे और एक स्पोर्ट्स ब्रा में नाचने को तैयार कड़ी थी. साफ़ था के ये रात अब वैसी होने वाली थी जिसकी उम्मीद यहाँ किसी को नहीं थी. सिर्फ 11 हे बजे थे और आधे से ज्यादा अपने जीवन के पहले नशे में चूर बस थिरकने शुरू हे हुए थे. इन्हे जरा भी भान न था के दारु उतरने के बाद अगले दिन क्या होता है.
 
गेस करो अर्जुन रात में किसके हाथ चढ़ने वाला है? 3 लोगो के अगर सही जवाब आये तोह अपडेट आज रात दूंगा. 😅🙌
 
अपडेट 171

हैंगओवर (2)

रेगिस्तान की जमीन दिन में जितना अधिक ताप्ती थी उस से कही ज्यादा ठंडी ये चन्द्रमा से सजी रात के अँधेरे में रहती थी. हर तरफ रेत के ऊँचे टीले और इतना गहरा सन्नाटा की 5 कोस दूर कही रट सियार की आवाज तक यहाँ सुनी जा सकती थी. ऐसे निर्जन माहौल में कोई मजबूत शख्स भी अकेले इधर आने से पहले 10 बार सोचता और फिर भी हिम्मत नहीं होती. लेकिन जैसे कोई था जिसमे शायद अब दिल बचा हे नहीं था.

ये कोई पुरुष न हो कर 2 महिलाये थी, 60 बरस से अधिक की बूढी औरते. बर्फ मानिंद ठंडी रेत के इस मरुस्थल में ये दोनों हे बड़ी निर्भीकता से चली जा रही थी जैसे अन्धकार में भी इन्हे अपनी मंज़िल का भली भांति ज्ञान था. सफ़ेद साड़ी में इन दोनों को इस तरह विचरण करते कोई व्यक्ति अगर देख लेता तोह निश्चित hridya-aghaat से मारा जाता. कितनी हे देर चलने के बाद इनकी आँखों में वो चमक दिखी जो हर मुसाफिर को अपनी मंज़िल दिखने पे आती है.

"रेशमा, बस आज बाबा हमारी तपस्या को समझ जाए. जीने की अब आस नहीं बची लेकिन जबतक इन raaj-pariwar के हर मर्द की गति न देख लू, मेरा शरीर प्राण नहीं त्यागेगा.", ये लाजवंती थी और उसके साथ सरपंच की विधवा या सच कहा जाए तोह लाजवंती की बहिन रेशमा. इनका रिश्ता जैसे और किसी को ज्ञात न था. 100 कदम दूर आग के अलाव की चमक हे इनकी मंजिल थी.

"जीजी, सभी अपने अंजाम पहुंचेंगे der-saver. महाराजा का वंश ख़तम करने के साथ साथ रघुबीर सिंह की नेसल भी मिटेगी. बाबा ने कहा था के आज रात वो हमारी समस्या का निदान करेंगे.", रेशमा के लहजे में भी सार्ड प्रतिशोध की आग थी और चेहरे पर aasha-ummeed. Mantra-tantra की दुनिया में अधिकतर वही शामिल होते है जिन्हे बाकी दुनिया में कोई उम्मीद नहीं दिखती. इस से कुछ हांसिल होता है या व्यक्ति का मस्तिष्क ख़ास जकड में क़ैद हो कर बस अपनी दुर्गति करवाता है, इसका कोई उचित साक्ष्य नहीं मिलता.

"सबसे जरुरी है उस कौशल्या के घमंड को चूर करना और उसकी हर औलाद की मृत्यु स्वयं कौशल्या अपने सामने देखे. 13 बरस की उम्र से बस बदले में जल रही हु. कोई नहीं बचेगा अब.", लाजवंती के जीवन का सार क्या था वो तोह पता नहीं लेकिन इतना जरूर था के उसके या उसके अपनों के साथ कुछ तोह गलत हुआ था. हो ये भी सकता है की जो नजरो ने देखा हो बाल्यावस्था में वो वैसा न हो जैसा दिखा. लेकिन प्रतिशोध की ज्वाला में इंसान फिर इंसान कहा रहता है. दोनों बहने अब उस चिटा के समकक्ष कड़ी थी जिसका वजूद लगभग एक तिहाई रह गया था.

स्याह काले शरीर का लम्बा चौड़ा तांत्रिक, जिसकी आँखों को देख कर किसी का भी दिल देहल जाए वो बड़े इत्मीनान से चिटा से निकाली हुई एक बड़ी हड्डी से बचा कुछ इंसानी मांस उधेड़ रहा था. जिस्म पर लेशमात्र भी वस्त्र न थे और ललाट पर राख और रक्तिम टीका. समीप हे रेत में रखे उलटे कपाल से मदिरा ग्रहण करता हुआ वो अजीब नजरो से इन दोनों औरतो को देख रहा था जो दहकती lakdiyon/koylo के उस पर कड़ी थी. तांत्रिक के बगल में हे बैठा वो श्वान भूखी नजरो से वो मज्जा (हड्डी) देख रहा था जो उसके स्वामी के हाथ थी.

"आओ लॉलीअ, बड़े उचित समय पर आयी. जो सामग्री कही थी वो तोह लायी हो न?", अब तांत्रिक लाजवंती को ऐसे बुला रहा था जैसे वो कोई 10-12 बरस की बची हो. उसकी बात सुन्न कर दोनों बहने चिटा के करीब से गुजर कर तांत्रिक से 2 कदम दूर हे हाथ जोड़ कर घुटनो के बल बैठ गयी. निवार से बना एक झोला रेशमा ने उस खोपड़ी के करीब रखा और कपडे का उतना हे बड़ा झोला लाजवंती ने. अब वो कला श्वान अपने मालिक से वो इंसानी हड्डी ले कर इस उजाले से दूर पीछे अंधकार में जा चूका था. चिटा से 3 गज दूर भी भयंकर ऊष्मा से दोनों औरत कुछ आहात थी और वो निर्वस्त्र तांत्रिक उनसे विपरीत कही ज्यादा हे उत्साहित. रेत में चौकड़ी लगा कर बैठा हुआ भी वो इतना लम्बा चौड़ा था की साधारण मनुष्य भये से हे उसकी तरफ देखने की गुस्ताखी न करे.

"बाबा, जो भी आपने कहा था वो सब लेके आये है. अब बहोत हो चूका ये घुट्ट घुट्ट कर जीना. जो भी करना है अब खुल कर होगा और सबकी मौत से हे दिल को ठंडक पहुंचेगी. आप जितना मुश्किल से मुश्किल उपाए कहोगे मैं करने को तैयार हु. बस मरने से पहले मैं उन परिवारों का नाश देखना चाहती हु, सर्वनाश.", लाजवंती भावुक होने के साथ साथ क्रोध से भरी रोने हे लगी थी लेकिन उस तांत्रिक के चेहरे पर तोह भाव हे अलग थे. वो खुश हो रहा था लेकिन रेशमा जैसे समझ रही थी इसका अर्थ.

"प्रतिशोध का नियम तुम्हे भली भाँती पता है लॉलीअ. तुम्हे देख कर मैं साफ़ बता सकता हु की तुम्हारे पास अब अधिक कुछ बचा नहीं है. जीवन के बदले में जीवन, मृत्यु के बदले मृत्यु का खेल तुमने हे चुना लेकिन अब तोह तुम्हारे पास पर्याप्त मोहरे बाकी है हे नहीं. क्या दांव पर लगाओगी और किसके बदले?", तांत्रिक ने अपनी बात कह कर एक पाँव खोलते हुए घुटना ऊपर उठा कर पाँव रेत पर सामने रख दिया. कपाल को मुँह से लगते हुए वो इस बार पूरी मदिरा हलक में उतार चूका था. लाजवंती के तोह चेहरे पर सिर्फ एक सपाट भाव था और रेशमा कुछ भयभीत. उसकी नजर तांत्रिक की नग्न जांघो के बीच ardh-uttejjit उस भयंकर लिंग पर थी जिसका अकार इस अवस्था में भी उसके पंजे से 3 इंच अधिक होगा.

"रामेश्वर के एक पुत्र के बदले में मैं खुद को कुर्बान करती हु बाबा. कुमारी लतिका के जीवन में ग्रहण लाने के लिए रेशमा भी बलिदान को त्यार है. आप बताओ क्या ये मुमकिन है?", अब तांत्रिक के चेहरे पर ख़ुशी की जगह वासना नजर आ रही थी. वो क्या सोच रहा था ये तोह कहना मुश्किल था लेकिन उसके इरादे नेक न थे.

"वस्त्र त्याग दो रेशमा और यहाँ जांग पर बैठो. लॉलीअ, तुम जो चाहती हो ठीक वैसा तोह मुमकिन नहीं क्योंकि तुम अक्षत कुंवारी नहीं हो. परन्तु तुमने हमारी बरसो सेवा की है इसलिए कुछ उपाए तोह जरूर करेंगे. जितना बल हो वो एकत्रित करना होगा.", रेशमा का पहले हे कंठ सूख चूका था उस भयानक लिंग से और तांत्रिक की बात सुन्न कर उसने एक बार अपनी बड़ी बहिन की तरफ देखा और कांपते हाथो से सफ़ेद धोती खोल कर वो बाकी अंदरूनी वस्त्र भी हटाने लगी. तांत्रिक ने के झोला खोल कर तजा मारा मुर्गा, मदिरा की बोतल और वो सफ़ेद कपडा बहार निकल लिया.

"आप बस ये देखिये की कितना नुक्सान किया जा सकता है. मुझसे जो बन्न पड़ेगा मैं करने को तैयार हु. वैसे भी जीवन तोह संकट में आ हे चूका है, आखिरी जुंग के लिए अब मुझे किसी चीज का भये नहीं.", लाजवंती देख रही थी की वो पौने गज का सफ़ेद वस्त्र तांत्रिक ने भूमि समतल करके चौकोर बिछा दिया था. मदिरा की बोतल से एक बड़ा घूँट पानी की तरह पी कर तांत्रिक ने उस मुर्गे का सर घुमा कर बड़े आराम से शेर से जुड़ा कर दिया था. रक्त उस कपाल में भरते हुए तांत्रिक अत्यधिक वासना से रेशमा के दमकते शरीर को निहार रहा था. चिटा की मद्धिम आंच में रेशमा का जिस्म कही से भी 60 बरस का प्रतीत न हुआ. वो आज भी जैसे कोई अधेड़ सुघड़ महिला था.

"ये asthi-passe हे तये करेंगे की तुम जो चाहती हो वो कितना मुमकिन है. रेशमा, अगर मैं विचलित है तोह तुम जा सकती हो.", मुर्गे के लहू से सफ़ेद वस्त्र पर एक ख़ास यन्त्र बनाते हुए तांत्रिक अपने दूसरे हाथ में 3 पांसों को हौले हौले हिला रहा था. उसकी बात सुन्न कर रेशमा ख़ामोशी से तांत्रिक की दोनों बहो के बीच उस चौड़ी जांग पर अपने सुडोल नितम्भ रखती बैठ गयी. इस स्पर्श मात्रा से रेशमा सिहर उठी थी लेकिन अब पीछे जा कर भी मौत नसीब थी तोह कुछ करके हे मरना बेहतर लगा.

"बाबा, रेशमा भी तोह अक्षत नहीं है. क्या इसका बलिदान कबूल होगा?", जब तांत्रिक वो चित्र बना चूका तोह उसका वही कपाल वाला हाथ रेशमा के एक नरम दूध को मजबूती से दबाने लगा था. तांत्रिक का ध्यान अभी भी लाजवंती पर था जो अपनी बहिन का सतांन मर्दन होते देख रही थी.

"हमने तुमसे क्या लिया था लॉलीअ? भूल गयी? जनम देने वाले स्थान (छूट) की जगह मृत्यु द्वार (गुदा). रेशमा वह से अक्षत है अभी तक.", तांत्रिक के चेहरे पर घिनोने भाव देख लाजवंती भी मुस्कुराई जैसे उसको याद आ गया था के उसने क्या बलिदान दिया था. रेशमा दर्द से चीखना चाहती थी लेकिन पूरी हिम्मत से वो होंठो को बंद किये तांत्रिक की जोर सेहती रही. दूसरे हाथ से वो तीनो पांसे उस तांत्रिक ने कपडे पर बने यन्त्र पर उछाल दिए. क्या अंक आया ये देखने तक की जेहमत न उठाई तांत्रिक ने और अब उसके दोनों हाथ आजाद थे.

"इसको अपने मुख में लो रेशमा बेटी. इसको तैयार करो अपने लिए.", रेशमा को अपने ऊपर से उठाते हुए जब तांत्रिक ने उसकी नाजुक कलाई पकड़ कर उस हाहाकारी लिंग से अवगत करवाया तोह रेशम की सांस रुकने हे लगी थी. 10-11 इंच का वो स्याह कला लिंग आज रेशमा को अपनी मौत का हथियार प्रतीत हो रहा था. उसकी दुर्गन्ध से हे रेशमा को उबाक होने लगी जो तांत्रिक देख कर मुस्करा दिया. मदिरा अपने लिंग पे गिरते हुए जैसे उसने ये दुर्गन्ध काम की.

"रेशमा बहिन, घबराओ नहीं. जैसे बाबा कहते है करो.", लाजवंती के ऐसा कहने पर रेशमा अभी उस दहकते हुए सुपडे पर झुकी हे थी की तांत्रिक ने उसका सर पकड़ कर अपने मूसल पर दबा दिया. रेशमा समझ चुकी थी की ये करना हे होगा. होंठ बुरी तरफ फ़ैल चुके थे और आँखों में ानुस लिए वो मुख मैथुन करने लगी. अब तांत्रिक का हाथ फिर से आजाद था. पांसे पर बने विभिन अक्षर देख वो वासना भूल कर बड़े ध्यान से लाजवंती को घूरने लगा.

"तुमने हमे सच से अनजान रखा है लॉलीअ. परन्तु हमने तुम्हे बेटी कहा है इसलिए माफ़ करते है. तुम्हे jal-samadhi लेनी होगी अपने उस कुकर्म के लिए जिसकी अनुमति कोई विद्या और साधना नहीं देती. तुम्हे कौशल्या के पुत्र का जीवन हारना है तोह उसके बदले तुम्हारी कोख भी ख़तम होगी. फैंसला तुम्हारे हाथ में है की आगे बढ़ना है या वापिस जाना है. 2 बलिदान के बदले एक वरदान हांसिल करना चाहोगी?", तांत्रिक ने वो पांसे यन्त्र से उठा कर फिर से मुठी में दबाये और लाजवंती के जवाब की प्रतीक्षा करने लगा. वही रेशमा अभी तक किसी मशीन सी लगी थी आधे या उस से काम लिंग को मुँह के अंदर बहार करती.

"जान के बदले जान के कीमत होनी चाहिए न बाबा? फिर 2 के बदले एक क्यों.", लाजवंती ने अपनी शंका जाहिर कर हे दी.

"नवजात हत्या की है तुमने लॉलीअ, एक नवजात हत्या का मतलब 2 जीवन ख़तम किये है तुमने. मैं सर्वज्ञता नहीं हु लेकिन ये पांसे यही कहते है की तुम दोषी हो. और कौशल्या का शुक्र इतना बुलंद है की उसके पुत्र मृत्यु को भी बांध सकते है. फिर तोह 2 जीवन के बदले भी अगर एक मारा जाता है तोह ये सौदा कही से भी नुक्सान का नहीं. बस फिर तुम जीवन से मुक्त हो जाओगी. हम फिर से पांसे फेंकेंगे, अपना विचार बना लो. उठो रेशमा, भोगने का समय शुरू हो गया है.", रात्रि के सही 12 बजे ये दानव से शरीर का स्वामी अपनी जगह से उठा तोह रेशम उसके सामने एक बची हे लग रही थी. 7 फ़ीट ऊँचा और असाधारण चौड़ा ये तांत्रिक स्वयं काल प्रतीत होता था. बिना समय गवाए एक और सफ़ेद वस्त्र भूमि पर बिछाते हुए उसने रेशमा को ठंडी मरुस्थल रेत पर ऐसे लिटाया था जिस से उसका सिर्फ योनि और उस से कुछ निचे का भाग उस वस्त्र के ऊपर था.

"दुःख से जीवन शुरू होता है और दर्द हे सुख की पहली सीढ़ी.", तांत्रिक ने इतनी हे घोषणा करने के पश्चात अपना भयंकर लिंग उन साधारण से उभरे हुए कूल्हों के बीच दबाते हुए ऐसा प्रहार किया था की एक पल के लिए वातावरण में बस रेशमा की karn-bhedi चीख हे सुनाई पड़ी. 2 बार चीखने के पश्चात वो कटे मुर्गे से फड़फड़ाती हुई बेहोश हो गयी. गुदाद्वार फट चूका था जिस से बेहटा राखत उस सफ़ेद वस्त्र को रंगने लगा था, रेशमा की जांघो के साथ. लाजवंती की भी आँखों में आंसू थे पर चेहरा सपाट. ऐसी कीमत उसने तब चुकाई थी जब वो मात्रा 15 बरस की थी.

"ये तुम जितनी साहसी नहीं है लॉलीअ. आठ.. ये दुर्बल है और इसका बलिदान कितना सफल होगा ये मैं भोगने के बाद बताता हु.", तांत्रिक ऐसे अप्राकृतक सहवास कर रहा था जैसे रेशमा सिर्फ लाश हो और दुनिया की आखिरी महिला की लाश. 10 मिनट बाद रेशम होश में आने लगी थी और लाजवंती ने बिना देरी किये तांत्रिक की मदिरा उसके मुँह से लगा दी. तांत्रिक अपनी लाल आँखों को बड़ा करता हुआ वहशियाना तरीके से मुस्कुराया. अब भी रेशमा चीख रही थी लेकिन यहाँ इस निर्जन रेगिस्तान में बस यही 3 तोह थे. तांत्रिक के धक्के और गहरे होते चले गए और उतनी हे गर्जना करता वो बुरी तरह राउंड रहा था रेशमा के गुदाद्वार को. आअह्ह्ह्हह.. की गहरी आवाज करता वो दानव शरीर रह रह कर झटके खाने लगा था. रेशमा जैसे नजर हे नहीं आयी उसके लम्बे चौड़े शेर टेल.

"इसको आराम करने दो लॉलीअ. धरती इसका दर्द सोख लेगी. हमारे अंग को साफ़ करो.", लाजवंती ने बिना घिन्न दिखाए वो खून और कॉमर्स में लिसड़ा लिंग शराब से साफ़ करके अपने मुँह में भर लिया, कुशलता से. एक मिनट बाद हे तांत्रिक अब वही बैठा था जहा पांसे और यन्त्र थे. रेशमा वैसे हे निर्जीव सी एक तरफ पड़ी थी और उसके guda-bhedan से निकले रक्त वाले वस्त्र में पांसे रख कर हिलाते हुए तांत्रिक ने वो वस्त्र यन्त्र पर गिरा दिया.

"असंभव.", तांत्रिक के चेहरे पर अब हैरत के भाव थे. वो वेह्शी दानव जो काल सा दीखता था उसके हे चेहरे पर गहरा दुःख और हैरानी उजागर थी पांसे देख कर.

"क्या हुआ बाबा? क्या असंभव है?", लाजवंती के सपाट चेहरे पर भी खौफ उभर आया था.

"लॉलीअ, कुमारी लतिका को क्षति पहुंचने के लिए रेशमा का बलिदान पर्याप्त नहीं है. तुम्हे निराश नहीं करूँगा क्योंकि उसका जीवन शाही नहीं रहने वाला. मुझे खेद है बिटिया की इतने बलिदान के बावजूद बस यही मुमकिन है. वो कुमारी है और तुम्हारे पास अपने रक्त में कोई कौमार्य है तोह उसके बलिदान से तुम जैसा चाहो वैसा हशर हो सकता है कुमारी लतिका का. दुःख तोह जल्द हे शामिल होंगे लतिका के जीवन में. अब तुम अपना निर्णय भी बता दो, जिस से मैं फिर पांसों का जवाब लू.", तांत्रिक से कुछ खफा थी लाजवंती क्योंकि उसको लतिका का जीवन नष्ट करना था और बस इतना हे हो पाया की वो खानदान से अलग हो जायेगी. अब उम्मीद थी अपने और अपनी बेटी के बलिदान से.

"इसका क्या भरोसा है बाबा की मेरे और मेरी बेटी के बलिदान से कौशल्या का पुत्र जरूर मृत्यु को प्राप्त होगा.? कही मेरी बहिन की तरह हमारे बलिदान से भी कुछ ख़ास न हुआ तोह?", अब तांत्रिक भी गहरी सोच में डूब चूका था. रक्त भरे कपाल में बोतल से शराब दाल कर वो आँख मूँद कुछ घूँट पीटा रहा. उसके लिए तोह लहू और पानी में भी फरक न था जैसे. और इतनी शराब भी उसको जैसे असर नहीं कर रही थी.

"ये राह इतनी हे आसान होती तोह तुम यहाँ दुर्गम अन्धकार में हमारे पास नहीं आती. अगर तुम दोहरे बलिदान को तैयार हो तोह मैं किर्या जारी रख सकता हु. वापिस लौटना तुम्हारे हाथ है लॉलीअ लेकिन वह भी अब तुम्हारे पास ज्यादा कुछ बाकी नहीं.", तांत्रिक ने जैसे पूरी तरह लाजवंती को अपने वश में किया हुआ था. किसी के भविष्य और अहित का खेल कितना सही होगा ये तोह समय के गर्भ में है.

"मैं तैयार हु बाबा. जब कुछ जीवन में बचा हे नहीं तोह ऐसे जीवन का भी क्या फायदा. बस मेरी बेटी के लिए चिंतित थी पर अब नहीं हु. उसके बदले अगर कौशल्या आजीवन दुःख में रह कर नरक महसूस करेगी तोह मेरे लिए इतना हे सुखदायी रहेगा. आप फैंसला करो बाबा.", लाजवंती के निर्णय पर तांत्रिक ने फिर से वो पैंसे आँख मूँद कर उस यन्त्र पर फेंके. कुछ पल उन पर आये anko/chitro की गणना करने के बाद अपने गंदले होंठो को चबाता हुआ वो कहने लगा.

"अपार दुःख हांसिल होगा कौशल्या को. ऐसा दुःख जिस से उसका उबरना असंभव सामान होगा. 5 वर्ष बाद चन्र्द चक्र के अनुसार ऐसा योग बनेगा जिस से तुम्हारी बेटी की बलि उनका विनाश कर देगी. इस दौरान तुम्हे जीवित रहना होगा लॉलीअ, अज्ञातवास में जीवित रहना होगा. सही समय पर तुम्हारा प्रकट होना हे उस घटना को अंजाम देगा. तुम्हारी बेटी का त्याग तुम्हारी इत्छा जरूर पूरी करेगा. अब हमे आराम की आवशयकता है लॉलीअ, अपनी श्रद्धा दिखाओ.", तांत्रिक ने इतना बताने के साथ हे बोतल में बची मदिरा मुँह से लगते हुए अपना शरीर उस रेत पर बिछा दिया. लाजवंती को ाचे से पता था के अब तांत्रिक की क्या सेवा करनी है. अपने जिस्म को वस्त्रहीन करती हुई वो अब देहसुख से तांत्रिक को आराम देने वाली थी.

लाजवंती ने जो राह चुनी थी, उसका अंजाम कही से भी फलदायी न था. इतने बरस सिर्फ प्रतिशोध में जलने से उसने अपना सबकुछ खो दिया था और जाने कितने हे मासूम इस राह पर बेमौत अपना जीवन हार चुके थे. और आज परिस्थितियां ऐसी हो चुकी थी की लाजवंती को दिन का खुला उजाला भी नसीब न था.

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पूरी तरह से बंद इस घर के बड़े आँगन में संगीत kaan-fodu स्तर पर बज रहा था और हर ठुमकता शरीर पसीने से चिपके वस्त्रो में जैसे दिन दुनिया से परे बस अपनी हे वश में न रहा. कुछ देर नाचने के बाद माधुरी दीदी अपने साथ प्रीती, अफसाना, प्रियंका, कोमल और तारा को एक कमरे में भोजन के लिए लेजा चुकी थी. इन सबके लिए ये पहला मौका था सिवाए प्रीती के लिए जो वाइन से परिचित थी. फिर भी यहाँ कमरे में सिर्फ माधुरी दीदी और कोमल हे कुछ बेहतर थी जिनके साथ साथ खाना परोसती हुई अफसाना. वो भी आज अपने जीवन में पहली बार सबके साथ ghul-milkar नाची थी, बिना शराब को हाथ तक लगाए. प्रीती थोड़े ज्यादा नशे में थी जिसको खुद अफसाना खाना खिला रही थी क्योंकि भोजन जरुरी था.

"यार तुम बहोत ाची हो.. बहोत प्यारी भी. तुम्हारे बस दूदू छोटे है.. सॉरी..", प्रीती की आँखें भारी हो चुकी थी और वो जो भी बोल रही थी खुद उसको भी पता न था. अफसाना शर्म से लाल हो रही थी वही कोमल दीदी के चेहरे पर मुस्कराहट आ चुकी थी प्रीती की बात सुन्न कर. तारा को भी वो खुद खिला रही थी जो बार बार सोने की जिद्द करने लगती.

"अफसाना, बुरा मैट मान न ये सब पहली बार हुआ है न इसलिए. वैसे तुम्हारे साथ होना सचमुच फायदेमंद हे रहा. नहीं तोह इतना को कैसे सँभालते हम.", ऐसा कुछ हाल प्रियंका का था जिसको माधुरी दीदी खिला रही थी और वो मस्ती में कभी कभी उनके उभर पर हाथ रख देती. लेकिन जो भी बोल रही थी वो साफ़ नहीं था.

"कोमल आपि, हम तोह वही कर रहे है जो बाकी सभी हमारे साथ करते है. इतने प्यार के बदले तोह हम कुछ ज्यादा कर हे कहा पाए. और हमे प्रीती की बात का बुरा नहीं लग रहा. होश में नहीं है न लेकिन आपका भी तोह ये पहली बार हे था आपि.", अफसाना जान न चाहती थी की कोमल इतना पीने के बाद भी सम्भली हुई कैसे है. माधुरी दीदी ने काम पी थी फिर भी उनके चेहरे से साफ़ पता चलता था के उन्हें भी नशा है.

"ध्यान ड्रिंक करने पे नहीं था न मेरा अफसाना. जिस काम में ध्यान न हो फिर वो आपको प्रभावित नहीं करता. तुमने देखा न ऋतू, अलका और रुपाली को? उनके साथ हे गुरदीप भी बगल वाले कमरे में बेहोश सोई पड़ी है. वो लोग वही फर्श पर या गड्डो पर हे गिर जाती तोह चोट भी लग सकती थी. रुपाली का शरीर तोह ड्रिंक अल्लोव हे नहीं किया. ये प्रीती तारा फिर भी सेहन कर गयी है और इन्हे सुबह परेशानी भी नहीं होगी. तुम भी खा लो फिर कपडे बदल कर यही प्रीती के साथ हे सो जाना.", कोमल दीदी ने अब तक तारा को खिला दिया था और वो जमीन पर बिछे गद्दे पर पसर चुकी थी, प्रियंका की बगल में.

"एक बिस्टेर पर हम 4 लोग सो पाएंगे आपि?", अफसाना ने प्रीती को वही बीएड पर लिटाने के साथ जब सर के निचे तकिया दिए तोह बंद आँखों से हे प्रीती ने उसका गाल चूम कर अपने सीने से लगा लिया. अफसाना अब उलझन से कोमल दीदी को देख रही थी और कमरे में हे साथ बने बाथरूम से बहार आती माधुरी दीदी भी हंसने लगी.

"कोई बात नहीं, तुम भी प्रीती के कान में बोल दो गूडनिघत.", माधुरी दीदी के ऐसा कहने पर अफसाना ने वही किया और शर्म से उठ कर बाथरूम में चली गयी. उसके पीछे हे कोमल दीदी ने आवाज दी.

"अफसाना, तुम बीएड पर हे सो जाना प्रीती के साथ. मैं बगल वाले कमरे में Alka-Ritu के पास जा रही हु. उन्हें भी देखना होगा कही सुबह तक उनकी हालत ठीक न हो.", कोमल उठ कर कमरे से बहार आयी तोह मुस्कुराने लगी. अंग्रेजी गांव पर मरीना, हिमानी और विन्नी दीदी जानलेवा नृत्य कर रही थी. वह बस इतनी हे रौशनी थी की ये लोग नजर आ सके, कमरे से आती लाइट की वजह से. जसलीन फर्श पर सिर्फ निक्कर में बैठी थी और हाथ में वोडका का गिलास लिए वो बैठे बैठे भी झूम रही थी. सीने पर काली ब्रा में उसको इस वक़्त कोई ब्रह्मचारी देख लेता तोह अपनी तपस्या भूल जाता.

"आये हाय मेरी कोमल डार्लिंग.. ट्रुथ एंड डरे तोह खेला हे नई तुमने... उमाठ.", विन्नी दीदी के शरीर पे भी घुटनो से कुछ ऊपर की चुस्त निक्कर और तान्नियों वाली कमर तक की बनियान सी टीशर्ट थी जिसमे उनके मॉटे उभर पास्सेने से जगमग होते क़ैद थे. कोमल को कमर से पकड़ कर चूमने के बाद वो फिर से नाचने लगी थी. कोमल को भी नींद चढ़ी थी लेकिन उस से पहले जितना मुमकिन था उतनी देखभाल जरुरी थी. कीर्ति को सामने वाले कमरे में गुरदीप की बगल में लिटा कर कोमल ने 3 गिलास में थोड़ा पानी और निम्बू का रास मिलाया. ये सब वो अपनी उन 3 नादान बहनो के लिए कर रही थी जिनसे शराब सेहन नहीं हुई थी. ट्रे में तीनो गिलास लिए वो अब Ritu-Alka और रुपाली के कमरे में आ कड़ी हुई. दरवाजा ाचे से बंद करके एक नजर उन लड़कियों पर डाली तोह मुस्कुरा उठी.

'ये अलका और ऋतू सचमुच हे एक है.', अलका और ऋतू को एक दूसरे के बाहों में सोया देख खुद से इतना कहती वो फिर निचे गद्दे पर पसरी रुपाली का सर गॉड में रख कर एक गिलास उसके होंठो से लगा दी. शायद उसको भी जोरो की प्यास लगी थी और बिना आँखे खोले हे वो आधा गिलास ख़तम कर गयी.

'चलो एक महारानी ने तोह पीया. ऋतू का मुश्किल है.', कोमल की बात सही थी और ऋतू के हलक में वो nimbu-paani उड़ेलने में उन्हें 5 मिनट से अधिक लगे और फिर भी थोड़ा बहोत उसके गाल से बह कर बिस्टेर पर गिरा. कपडे से उसका चेहरा साफ़ करके यही अलका के साथ दोहराया और फिर लाइट बंद करके अलका की बगल में हे पसर गयी. पूरा आँगन साफ़ किया था कोमल ने और अफसाना ने रसोई समेटने में उतना हे साथ दिया था उनका. बहार बस अब वो 4 लड़कियां थी और उनके पास लगभग आधी बोतल वोडका. डेढ़ ख़तम हो चुकी थी सबके साथ. बगल वाले कमरे में भी अब ऐसी हे शांति थी जहा अफसाना ने जैसे तैसे पजामा टीशर्ट पहनकर प्रीती के आगोश में खुदको ढीला छोड़ दिया था. माधुरी दीदी तकिया दबोचे गहरी नींद में जा चुकी थी.

"ट्रुथ एंड डरे जो पहले खेला था.. ये उस से आगे जायेगा. No लिमिट्स... मतलब बस जान नहीं देनी बाकी जो दिल करे..", गाने धीमे करके विन्नी ने अब 4 पेग बना दिए थे चारो के लिए. मरीना कही ज्यादा हे आगे थी इन सबसे जो बगल में वाइन की बोतल भी दबाये थी. जसलीन को शराब का अनुभव था लेकिन असर उस पर भी भरपूर था नशे का.

"हाँ.. तोह ट्रुथ & डरे में लिमिट थोड़ी होती है. हिकककक.. मैं बोतल स्पिन करती हु, जिस पर रुकेगी वो सेलेक्ट करेगा क्या करना है. उसके बाद बोतल भी वही स्पिन करेगा... Okay?", हिमानी को जैसे पहले आदत थी क्योंकि उसका एकाकी जीवन दुखभरा था वो भी देश से बहार. मतलब साफ़ था के ये चारो लड़कियां या तोह बहार देश रही थी या यहाँ भी इन्हे शराब की उपलब्धता थी.

"रेडी.. स्पिन डार्लिंग स्पिन.", मरीना के ऐसा कहते हे हिमानी ने वो खाली हरी बोतल फर्श पर घुमा दी. जोश कुछ ज्यादा हे था जो बोतल किसे पंखे सी घूमती हुई 15-20 चक्कर के बाद कुछ धीमी हुई और आखिर में मरीना की तरफ हे जा रुकी.

"ट्रुथ. नकली जाट की बेटी हे फांसी..", मरीना के खूबसूरत चेहरा पर नशीली मुस्कान थी. उसके पतले पतले गुलाबी होंठ इतने आकर्षक थे की सिर्फ उन्हें चूमने मात्रा से हे इंसान का सखलन हो जाए. बोतल हिमानी ने घुमाई थी इसका मतलब था की सवाल भी वही करेगी.

"तोह तुमने चुना है सच बोलना. अब साथ ड्रिंक की है तोह तुम झूठ तोह वैसे भी नहीं बोलने वाली. तुम वर्जिन हो मरीना? और अगर नहीं तोह किस आगे में तुमने पहली बार सेक्स किया था?", पहला हे सवाल धमाकेदार था जो बताने को बहोत था के ये खेल किस तरफ जा सकता है. हिमानी ने इसके साथ हे एक घूँट गिलास से लिया और चेहरा रुमाल से साफ़ करती हुई मरीना की तरफ देखने लगी.

"Don't मंद हाँ.. मतलब ये बुरी बात भी हो सकती है बूत I'm स्टिल वर्जिन. एक चांस मिला था बूत वो लड़का एग्रेसिव होने लगा तोह मैंने मुँह टॉड दिए. रूस में अभी लास्ट ईयर की बात है. बूत मैंने सेक्स देखा है अपनी फ्रेंड्स को करते हुए. दिल करता है मेरा भी लेकिन ी वांट आईटी स्पेशल. सो it's माय टर्न तो स्पिन था बोतल.", मरीना ने अपना जवाब देने के साथ हे बोतल घुमा दी जो रुकी जसलीन की तरफ. जसलीन ने भी एक घूँट पीने के बाद चुना डरे.

"डरे.. डेरिंग गर्ल. वो क्या बोलते शेरनी और समथिंग. तोह मिस जसलीन आप अभी स्मूच करो हिमानी को जैसे ऋतू और अलका ने किया था. ठोस वाइल्ड कैट्स वेरे तू मच.. आह्हः..", मरीना ने निर्देश देने के साथ हे अपनी जांघो के बीच हाथ रख कर दबा दिया. जसलीन बेझिझक हिमानी के करीब सरक आयी. Gori-gulabi हिमानी और उसका उतना हे कटीला जिस्म, लड़को के साथ साथ लड़की को उत्तेजिट कर सकता था. यहाँ मर्यादा भुला कर इन दोनों के होंठ आपस में चिपके तोह जैसे जसलीन अपने मुँह में भरी वोडका हिमानी से साँझा करने लगी. हिमानी बस उसका साथ दे रही थी और दृश्य कामोत्तेजक होने लगा.

"स्टॉप. एनफ.", जसलीन अलग हुई तोह हिमानी की सांसें उखड़ी हुई थी. बिना आगे कोई बात किये जसलीन ने बोतल घुमाई जो विन्नी की तरफ रुकी.

"डरे.", विन्नी ने भी अंगड़ाई लेते हुए अपने इरादे जाता दिए. उसके गुब्बारों पर जसलीन की नजर अटक सी गयी थी. चारो में से विन्नी के हे उभार सबसे बड़े और सुडोल थे जिन पर उसको खुद गर्व था.

"अपना टॉप और ब्रा उतार दो.", जसलीन ने एक पल में हे खेल कही आगे बढ़ा दिया था. विन्नी ने एक पल सोचा और फिर वो बनियान उतार कर एक तरफ रख दी. पसीने से चमकती मॉटे स्तनों की घाटी और वो लाल ब्रा में क़ैद मॉटे मॉटे वक्ष बेहद उन्नत थे. हाथ पीछे करके विन्नी ने ब्रा भी उतार कर एक तरफ रख दी. अब गुलाबी निप्पल पूरी अकड़ से उभरे दिखे. उसका जिस्म सचमुच क़यामत था जिसका सबूत था बाकी तीनो की नजरो का उसके उभारो से चिपकना.

"वाओ. यू हैवे रियली ग्रेट बूब्स विन्नी. सो परफेक्ट एंड राउंड. बहार से नहीं दीखते ये इतने बड़े होंगे.", मरीना ने हाथ हे लगा दिया था उनपर. विन्नी बस मुस्कुरा भर दी.

"थैंक यू मरीना. और सचमुच इन्हे गर्मी लग रही थी अब ाचा है मैं ऐसे हे रहूंगी.", विन्नी ने फिर से घूँट भरी और बोतल घुमा दी. इस बार हिमानी हे फांसी थी.

"डरे.", हिमानी ने गिलास खली करके अपना जवाब दिया. विन्नी बड़े गौर से उसका चेहरा पढ़ने लगी जैसे कुछ समझ रही हो.

"मरीना के ब्रैस्ट पे किश करो. दोनों पे.", यहाँ मरीना हैरान हुई लेकिन उसने कुछ कहने की जगह बस अपनी ब्रा ऊपर चढ़ा ली. वैसे भी उसने सिर्फ ब्रा हे पहनी थी. हथेली में सही से समां सके इतने बड़े सफ़ेद चुके थे मरीना के और उनपर नुकीले छोटे छोटे से निप्पल गवाही देते थे की उन पर खुद मरीना का हाथ नहीं लगा होगा. हिमानी ने कांपते हाथो से एक उभर थमा हे था की मरीना के साथ साथ जसलीन के मुँह से भी शिकारी निकल गयी. होंठ लगते हे मरीना ने हिमानी का चेहरा अपने उभर पर दबा दिया. उसका मजा हिमानी ने हे खराब किया जो जल्दी से दोनों उभर चूम कर अपनी जगह बैठ गयी.

"आह.. यार तुम किश उसको कर रही थी और मजे जसलीन को आ रहे थे. वैसे तुम भी कमाल की हो मरीना. किसी सही मर्द के हाथ लगी तोह जाने वो तुम्हे इस मखमल बदन का क्या हाल करेगा, प्यार से.", विन्नी के ऐसा कहने पर मरीना शर्माने लगी थी लेकिन अब उसके भी जिस्म पर ब्रा नदारद थी. बोतल फिर से घूमी और अब मरीना पर हे रुकी.

"डरे.", मरीना ने देरी किये बिना कहा.

"टास्क देने से पहले ऐसा करते है की एक एक पेग बॉटम्स उप करते है.", विन्नी ने चारो खाली गिलास अपने सामने रख कर बची हुई साड़ी वोडका निबटा दी. पेग बड़े थे और कोला बस इतनी जितनी वोडका. लेकिन कोई पीछे न हटा और जब गिलास फर्श पर रखे तोह जसलीन हिल चुकी थी.

"अपना लोअर उतार कर तुम्हे छत पर जाना है मरीना. फ़िक्र मैट करो, रात के इस टाइम कोई नई देखेगा. बस तुम्हारी डेरिंग देखनी है.", हिमानी भूल गयी थी की छत्त पर अर्जुन भी सोया हुआ है. मरीना ने तोह तुरंत हे अपना पजामा फर्श पर गिरा दिया. लम्बे बदन पर अब एक धागा तक न था. किसी ञंञैस्ट सी उसकी लम्बी टाँगे, जिन पर बालो का रोया तक न था उन्हें देख कर विन्नी भी प्रशंशा करने लगी. माँ सी एकसार चकिनी थी मरीना और उसकी लम्बी टांगो के बीच गुलाबी पतले चीरे के ठीक ऊपर नाम मात्रा सुनहरे झांट.

"बहोत हे ज्यादा खूबसूरत हो यार तुम तोह. लेस्बियन भी बन जाऊ तुम्हारे लिए.", जसलीन तोह नशे में कुछ ज्यादा हे दिल खोल कर बोल रही थी.

"थैंक यू डार्लिंग बूत I'm स्ट्रैट. जैसा विन्नी ने कहा न एक मर्द, ी वांट तहत. जो प्यार से मुझे प्यार दे.", मरीना की चाल में ऐसी चपलता थी की देखने वाला बस खो सा जाए. नीताभ अकार में कुछ छोटे लेकिन उतने हे लचकदार और फूले हुए. उसको इस तरफ से दरवाजा खोल सीढ़ी पर जाते देख खुद विन्नी ने अपनी छूट को सेहला दिया. किसी ने ध्यान नहीं दिया की मरीना अपने साथ वाइन की आधी भरी बोतल भी ले गयी थी.

"सहित... अब शोर मचने से कोई फायदा नहीं विन्नी.. मैं भूल गयी थी ऊपर अर्जुन भी है.", हिमानी की आँखें चढ़ चुकी थी और वैसा हे हाल जसलीन का था. विन्नी ने जैसे तैसे खुद को खड़ा किया तोह उसकी भी हालत बाकी दोनों जैसी हे थी. मरीना इनसे कही ज्यादा ऊर्जावान निकली.

"यार उसको रोकना हे पड़ेगा.. अर्जुन को देख कर रूस की बर्फ पिघल जायेगी. बहनचोद मैं बर्बाद हो जाउंगी यार.. शहहह.. तुम मेरे साथ चलो. गड़बड़ हो गयी बहोत बड़ी.. gadbad.",Ab विन्नी के होंठ सूखने लगे थे और किस्मत से जो बोतल हाथ लगी थी वो भी बियर की. गरम बियर से हे गाला टर्र करती वो लड़खड़ाती हुई मरीना का पजामा और वो बियर लिए साढ़े कदमो, जो अभी भी लड़खड़ा रहे थे.. उनके साथ मरीना की दिशा में चलने लगी. जसलीन तोह वही गद्दे पर उलट गयी थी और उसको देखा देखि हिमानी भी.

"वाओ थिस इस हेवन.. अरे तुम कौन हो? ओह तुम तोह अर्जुन ho..hikkk.. मेरे अर्जुन मैं तुम्हारी ड्राइवर.. सो रहे हो? उठो न अर्जुन..", मरीना छत्त पर आयी तोह खुली हवा में कुछ देर झूमने के बाद अर्जुन के गद्दे पर आ बैठी. उसकी आवाज बहोत धीमी थी लेकिन हरकते तेज. अर्जुन थका हरा कुछ वक़्त पहले हे सोया था कूलर की ठंडी हवा में. उसकी नंगी चौड़ी छाती पर हाथ फिरती मरीना भी खो सी गयी. निक्कर में उभरे उसके अंग को देख वो हंसने हे लगी थी.

'यहाँ क्या है? एनाकोंडा.. hehehe..Klashinkov.. लालला.. सबको मार दूंगी.. ऊप्स ये तोह pp..penis है.. सचमुच पेनिस है?", मरीना ने जैसे हे अर्जुन की निक्कर में हाथ दाल कर उसका मूसल पकड़ा अर्जुन हड़बड़ाते हुए उठ खड़ा हुआ. मरीना को अपनी बगल में निर्वस्त्र बैठे और वो भी लुंड को मजबूती से पकडे देख उसकी हालत खराब हो गई.

"ये.. ये आप क्या कर रही हो?"

"ऊप्स.. हिककक.. गोली चला रही हु.. हेहेहे.. ये 2 अलग से पाउच में क्यों राखी है तुमने..? हिक्क.. ड्राइवर, यू स्लीप एंड दो नॉट इंटरफारे.. इतना गरम क्यों है ये?", मरीना जोर से दबा रही थी और लुंड अकड़ता जा रहा था. अर्जुन के दिमाग ने काम करना हे बंद कर दिया. फिर भी उसने एक और कोशिश करि.

"मरीना दीदी, ये मेरा पेनिस है. आप गलत कर रही हो ये सब... ओह आपको नशे.."

"चुप्प रहो तुम... गोली मार दूंगी तुम्हे.. बड़े क्यूट हो यार तुम bhi..ummaahhhh..", एक हाथ से लुंड दबोचे मरीना ने दूसरे हाथ में पकड़ी बोतल फर्श में रख कर उस हाथ से अर्जुन का सर अपनी तरफ खिंच लिया. एक हल्का सा चुम्बन हे हुआ था की अर्जुन ने मरीना का लुंड पे कैसा हाथ मजबूतीस पकड़ा.

"शठ.. No no no.. ी विल शॉट..", और इतना बोलते हे मरीना की आँखों से आंसू गिरने लगे. वो धमकी दे रही थी चिल्लाने की लेकिन खुद हे लुंड छोड़ कर वो अर्जुन के गले में बाहें दाल उस से लिपट कर सुबकने लगी.

"कलम डाउन मरीना, प्लीज कलम डाउन. मैं किसी को नहीं कहूंगा और तुम चाहो तोह यही सो सकती हो. मैं तुम्हारे कपडे लेके आता हु या फिर तुम मेरी टीशर्ट पहन कर ये चादर ले लो. चुप हो जाओ प्लीज.", अर्जुन पूरे अपनेपन से मरीना को शांत करवा रहा था जो इतना सुन्न कर कुछ अलग हुई. लेकिन वो अभी भी अर्जुन के गले में बहन डाले थी और ध्यान से बस उसकी आँखों में हे देखती रही.

"लव में अर्जुन.. ी वांट यू तो लव में एंड टेक माय विर्जिनिटी.", अर्जुन के तोह दिमाग पे जैसे किसी ने बर्फ की सिल्ली गिरा दी हो ऐसा कह कर. वो कुछ जवाब देता उस से पहले हे मरीना के पतले गुलाबी होंठ इस बार जो उसके होंठो से जुड़े, फिर अलग न हुए. शराब की महक अर्जुन के लिए नयी बात थी लेकिन ज्यादा बड़ी बात थी मरीना का ये पागलपन.

'हे भगवन, अब ये दिन भी दिखने थे?', अर्जुन के निर्वस्त्र चौड़े सीने पर खुद हे मरीना अपने नरम और माध्यम उभार दबाती हुई किसी साइबेरियन शेरनी सी उसके होंठो को मुँह में भर कर चूस रही थी. उसकी पकड़ इतनी मजबूत हो चली थी जैसी जोंक की शरीर पर. लम्बी सुडोल टांगो के घेरे में क़ैद अर्जुन की कमर भी जिस्म का खून दबता महसूस कर रही थी. विन्नी अभी नीच 3 सीढ़ियां हे चढ़ कर बैठी थी और ऊपर चल रहे घमासान से अनभिज्ञ. आज देसी घोडा विदेशी शेरनी की गिरफ्त में था, जो नशे में कुछ ज्यादा हे खूंखार थी.

"आह्हः..", अर्जुन के होंठ आजाद होते हे उसके मुँह से सिसकारी निकल गयी. निचला होंठ लहू तक छोड़ने लगा था. वही मरीना की आँखों में अलग हे चमक थी.

"यू अरे सो स्वीट एंड डेल्सिओउस.. उमाहहह.", मरीना ने अपनी पतली गुलाबी जीभ लम्बी करते हुए उसके होंठ से बेहटा खून चाट कर अपने इरादे bhali-bhaanti जाता दिए.

"मरीना, आप ये गलत कर रही है. आप नशे में है और आपको पता भी नहीं की क्या हो रहा है."

"शठ.. मैं बोलती हु क्या हो रहा है.. जब बुइ ने तुमसे मिलवाया था.. हमे तुम तभी पसंद आ गए थे अर्जुन. वो सूट तुमने हे दिलवाया था जो आज हम पहन कर आये थे.. थे वे यू ट्रीट एवरीवन एंड हाउ केयरिंग यू अरे, ी लव यू फॉर तहत. यू वांनै हेअर माय हार्ट एनीमोर? अल्कोहल नहीं होता तोह मैं यहाँ आ भी नहीं सकती थी. थैंक्स तो हिमानी... ी ऍम नॉट ा टटोटलेर डार्लिंग बूत ी वास् सो होपलेस आफ्टर डिस्कवरिंग योर ट्रू लव विथ प्रीती.. बूत यू एक्वाली लव ऋतू एंड don't लिए. मैंने देखा है और फील भी किया है अर्जुन. माय सिक्स्थ सेंस इवन सेक्स तहत अलका एंड तारा अरे आल्सो योर लव शेयर.", मरीना ने जो धमाका किया था वो शायद आजतक का सबसे बड़ा खुलासा था अर्जुन के जीवन में, किसी बाहरी व्यक्ति द्वारा. मरीना ने कहा था के वो दूध पीती बची नहीं है और उसको ऊपर अर्जुन तक कुछ शराब की जरुरत थी जिसमे हिमानी ने भी उसका साथ दिया. मरीना जानती थी की अर्जुन प्रीती के साथ साथ ऋतू से भी उतना हे प्यार करता है. और छाती इंद्री तोह ये भी इशारा करती थी की अर्जुन अलका और तारा को भी प्रेम करता है. इस बीच उसने खुद के भी प्रेम का इजहार कर दिया था जो वो पहली हे नजर में अर्जुन से कर बैठी थी.

"थिस इस रॉंग मरीना. आप मेरे लिए बहिन जैसी हो और अगर बात ये है की तुम्हे लगता है मैं ऋतू से प्यार करता हु तोह हाँ ये सच है. मैं करता हु प्यार, करता हु.", अर्जुन ने जैसे ऋतू का सुन्न कर बाकी सब भुला हे दिया.

"Don't वोर्री अर्जुन. तुम ट्रस्ट करो मैं ये बात कभी किसी से नहीं कहूँगी. मैं ब्लैकमेल या फाॅर्स नहीं कर रही बूत वो बहिन वाली बात है तोह क्लियर कर देती हु. एक बहिन का प्यार एक्सेप्ट करना और दूसरे को नहीं, it's नॉट फेयर अर्जुन it's नॉट फेयर. मुझमे इतनी कॉन्फिडेंस नै है... ी विल नेवर एवर बे थिस मच डेरिंग तो एक्सप्रेस माय ट्रू लव फॉर यू.", मरीना आँखों में आंसू लिए इस बार कड़ी हुई तोह उसने अपने बदन पर चादर ओढ़ ली थी. सारा नशा जैसे हवा हो चूका था और अर्जुन इस चांदनी रात में बस वो चमकते आंसू देख कर देहल उठा.

"Sorry.Sorry मरीना मुझे नहीं पता था के आप मुझसे प्यार करने लगी हो. हाँ आप सचमुच प्यारी हो और समझदार भी लेकिन आप इस सबका अंजाम नहीं समझ रही. आप चाहो तोह मेरे साथ यही सो जाओ, हम इस पर फिर आराम से बात करेंगे.", अर्जुन अब जितना सही से समझा सकता था वो समझने की कोशिश कर रहा था. ये तोह पता लग हे चूका था के मरीना का इश्क़ वो अपने दिल में दबाये थी और नशे में हे उसमे हिम्मत आयी थी इजहार करने की

"सी, ी don't नीड यू सिम्पथी. प्यार कर सकते हो? सोने के लिए घर मेरे पास भी है. मैं इस रात हे यहाँ हु और डिसिशन तुम्हारा है अर्जुन िफ़ यू वांट में हेरे फॉर ानोथेर किंग नाइट्स. और वो बहिन वाला पॉइंट तुम डिसागरी नहीं कर सकते.", मरीना अभी भी नंगे पाँव चादर ओढ़े कड़ी अर्जुन को देख रही थी. अर्जुन के साथ ये सबकुछ जीवन में पहली बार हो रहा था और वो भी ऐसे जैसे सपना हो. रात के 2 बजे एक खूबसूरत लड़की जिसके लिए उसने कभी वैसा सोचा भी नहीं था लेकिन लड़की उसके प्रेम में क़ैद थी.

"मैं एकदम से कैसे कह दू आपको? मैं आपके प्यार को महसूस कर सकता हु मरीना लेकिन...", अर्जुन की बात अधूरी हे रह गयी जब फिर से मरीना चादर गिरा कर उसकी गॉड में आ बैठी.

"लेकिन कुछ नहीं होता अर्जुन. मुझे बस प्यार करो, ऐसा प्यार जो मुझे मिला नहीं लेकिन मैं रोज मांगती हु.", मरीना ने इस बार फिर से वाइन की बोतल उठा कर एक तगड़ा घूँट भरा और अपने होंठ अर्जुन के होंठो से मिला दिए. उसकी कशिश से हे अर्जुन को एहसास हो गया था मरीना की दीवानगी का लेकिन व्यथित मैं में ढेरो सवाल थे और उन सभी पर मरीना हावी होती गयी.

'अंशु से भी मुझे बाद में प्यार हुआ था, उसको जाने कबसे था. क्या मरीना गलत है? नहीं... इसको सहारे की जरुरत है, मेरी जरुरत है.', अर्जुन ने भी मैं बना लिया था एक हद्द तक मरीना को प्यार के बदले प्यार देने का. अब उसके शरीर की हरकत से मरीना का दिल भी मचलने लगा था. अर्जुन के मजबूत हाथ मरीना की चिकनी पीठ पर रेंगते हुए उसको सँभालते हुए एहसास करा रहे थे की अर्जुन प्यार के बदले प्यार हे देगा. ये चुम्बन होंठो से आगे जाता हुआ अब एक दूसरे की जीभ चूसने तक बढ़ चूका था. मरीना पूरे आवेश से अर्जुन की पीठ पर नाखून दबती बेतहाशा बस उसके होंठो का रस निचोड़ती रही. दोनों अलग हुए तोह सांसें उखड चुकी थी और अब कही अर्जुन ने उसके गुलाबी चेहरे से निचे उन माध्यम से सैंट्रो को देखा. मरीना शर्म से एक बार फिर उसके गले जा लगी.

"Don't डरे तो सी माय ब्रैस्ट लिखे थिस. गंदे लड़के हो tum..siiiiii", अपने सुघड़ कूल्हों पर अर्जुन के मजबूत मॉटे लिंग का स्पंदनद महसूस करते हे मरीना की छूट ने कॉमर्स उड़ेल दिया. गहरी सांसें भर्ती हुई वो ऐसे हे चिपकी रही. अर्जुन का एक हाथ उसके उठे हुए कूल्हे को सहलाने लगा तोह वो फिर से पीछे हुई.

"मैं देखना चाहती हु.", मरीना ने लड़खड़ाती आवाज में कहा था और अर्जुन ने भी अपनी निक्कर उतार कर वो हथियार उजागर कर दिए जो कुछ समय पहले मरीना ने नशे में दबोचा हुआ था.

थिस इस.. मॉन्स्टर.", नशे से भरी मरीना की आँखों में अब और भी ढेरो रंग शामिल थे. अर्जुन के प्रचंड लिंग और उसकी सख्ती को वो भली भाँती देख रही थी, हथेली में पकड़ कर. पतली लम्बी उँगलियाँ भी पर्याप्त नहीं थी उसका घेराव करने में.

"हम सेक्स नहीं करेंगे.", अर्जुन ने जैसे अपना जवाब दिया लेकिन इसके साथ हे उसके मुँह से एक सिसकारी निकल गयी. अर्जुन की जांघो के बीच अपने सुनहरी बाल फैलाये मरीना ने एक हे बार में आधा लुंड होंठो से अंदर भर लिया था. उसको तकलीफ तोह हुई क्योंकि जबड़े अपनी हद्द तक खुल चुके थे लेकिन जल्द हे एक हाथ से वो मूसल मजबूती से पकडे मरीना अपने सर को सावधानी से हिलने लगी.

"उफ़.. स्टॉप आईटी.. आपके टीथ लग रहे है..", अर्जुन को जब लुंड में दर्द महसूस हुआ तोह उसने मरीना से हटने की गुजारिश की. मरीना भी उतनी हे तेजी से अलग हो गयी.

"सॉरी.. मूवी में देखा था और हमे लगा ये बॉयज को ाचा लगता होगा. योर पेनिस इस नॉट इजी तो स्वालो. सॉरी..", अर्जुन उसके चेहरे की मासूमियत देख अपना दर्द भी भूल गया.

"तभी कहा था के जो भी करेंगे आराम से करेंगे. जरुरी तोह नहीं की ये सब पहली बार में हे करे. यहाँ मेरे बराबर लेटो.", अर्जुन ने मरीना के लम्बे जिस्म को पूरी तरह अपने आगोश में लेते हुए गद्दे पर लिटा लिया. करवट लिए दोनों हलके हलके एक दूसरे को चूमने लगे. मरीना खुश थी अर्जुन के अनुभवी चुम्बनों से और जिस तरह वो पूरे शरीर को सेहला रहा था. एक टांग उठा कर मरीना ने ाचे से अर्जुन की जांघो पर चढ़ा ली. उसके इरादे जरा भी नेक न थे क्योंकि अगले हे पल अपनी गुलाबी लकीर सी छूट को अर्जुन के सुपडे पर दबाने लगी थी.

"Nahi..nahi...", अर्जुन रोकता हे रहा और थूक से सना उसका मोटा सूपड़ा मरीना की ras-bahati मुनिया में आधा जा फंसा. एक पल मरीना के चेहरे पर दर्द उभरा लेकिन अगले हे पल जबतक अर्जुन कुछ समझता मरीना ने अपने जिस्म की पूरी तगत लगते हुए कमर अर्जुन की जांघो से जोड़ दी. इस बार उसकी चीख से मोहल्ला उठ सकता था जो अर्जुन के मुँह में डब्ब गयी. शरीर परकटी मुर्गी सा फड़कने लगा था और छूट से खून की एक पतली धार ृस्टि हुई गद्दे को भिगोने लगी. अर्जुन के जिस्म पर पसीने आ चुके थे ये सब अचानक होने से. मरीना ने दर्द में उसकी पीठ बुरी तरह नोच दी थी जिसका एहसास तक न हुआ.

"मरीना.. कलम डाउन.. प्लीज शोर मैट करना. हम दोनों फंस जाएंगे.. प्लीज..", उसके मुँह को अपने हाथ से दबाये अर्जुन गुजारिश कर रहा था और मरीना फटी आँखों से आंसू बहती हाँ में सर हिलने लगी.

"ोुउउउउउउउ.. यू टरेड माय पुसी.. ओह god..please don't मूव.. don't मूव ी बेग तो यू.", मरीना के जिस्म में दर्द की तेज लहर अभी तक दौड़ रही थी. छूट में जैसे मोटा बांस फंसा हो और हुआ भी ऐसा हे था क्योंकि पहली हे बार में उसने इतना मोटा लुंड आधा अपनी नाजुक छूट में फंसाया था.

"मन भी किया था मैंने तुम्हे.. हम कुछ नहीं करते.. जस्ट कलम डाउन.", अर्जुन ने बड़ी हिम्मत से खुद को मरीना से अलग किया तोह सचमुच छूट की लकीर खून से भरी थी. उसने वही चादर छूट पर रखते हुए मरीना के माथे को चूम कर कुछ देर सर सहलाया. आज वो खुद को ऐसा मान रहा था जैसे लुंड उसमे घुसा हो लेकिन वो चीख भी नहीं सकता. निचे 15 लड़कियां और भी थी. मरीना को आवाज न करते देख जब नजर उसपे की तोह वो दर्द भुलाने के लिए फिर से वाइन की बोतल मुँह के लगाए रोये जा रही थी.

"मैं तुम्हे निचे बीएड पर सुला देता हु. ज्यादा नहीं हुआ, इसलिए सुबह तक ठीक हो जाओगी.", मरीना ने भी हाँ में सर हिला दिया क्योंकि आज नशे में उसने इतना बड़ा काण्ड किया था जिसके लिए सिर्फ वो खुद हे जिम्मेवार थी. अर्जुन को परेशां देख उसने अपना चेहरा साफ़ किया.

"I'm नॉट तहत स्ट्रांग. सॉरी अर्जुन. तुम सही थे, ये आराम से करना चाहिए. प्लीज मुझे निचे ले चलो.", अर्जुन ने वैसे हे वो चादर पूरी गले तक ुधा कर मरीना को गॉड में उठाया तोह वो अभी भी सिसक रही थी.

'बुरा फस्वय भगवन आज तोह. ये लड़की भी पागल है और अगर निचे किसी को भनक भी लगी तोह मैं बर्बाद हो जाऊंगा. बचा लेना भगवान्.', अर्जुन ram-ram करता हुआ सावधानी से निचे आया तोह चौड़ी सीढ़ी पर विन्नी दीदी सोई मिली. एक बार तोह उसका दिल हे बैठ गया था. फिर भी हिम्मत करके वो सावधानी से घर के अंदर दाखिल हुआ. सामने हे हिमानी और जसलीन नीम बेहोशी में नशे से टुल्ल लुढ़की दिखी. सबसे पहला हे कमरा खाली देख अर्जुन ने सावधानी से मरीना को लेटाया और उसके बाद बहार सीढ़ियों पर सोई विन्नी दीदी के पास रखे मरीना के कपडे ला कर उसके जिस्म को प्यार से ढाका.

"दर्द ज्यादा हो तोह मैं सुबह मेडिसिन दे दूंगा मरीना. अब आराम करो.", अर्जुन ने जैसे हे झुक कर धीमी आवाज में मरीना से कहा उसने लपक कर उसके होंठो पर वाइन से गीले अपने होंठो चिपका दिए. कुछ सेकंड चूमने के बाद उसने बस इतना हे कहा.

"थैंक यू अर्जुन एंड सॉरी. हम अब आराम से करेंगे नेक्स्ट टाइम. गूडनिघत.", मरीना दर्द में भी मुस्कुराई तोह अर्जुन ने भी वैसे हे मुस्कुराते हुए हामी भरी. एक अभी तक चालु था कमरे में. चादर कुछ सोच कर वो वापिस ले चला.

'ये विन्नी दीदी भी न. इन्हे यहाँ नहीं छोड़ सकता.", नींद में थका अर्जुन विन्नी दीदी को परवाह से देख कर उन्हें गॉड में उठाये ऊपर चल दिया. इस वक़्त शायद उसका भी दिमाग काम नहीं कर रहा था. विन्नी नींद में हे बड़बड़ा रही थी जब अर्जुन के गले लगी.

'मेरा अर्जुन खा जायेगी वो शेरनी.. मेरा अर्जुन.. अकेला है..' और अर्जुन उनके प्रेम को देख खुश होता रहा. चाट पर उन्हें अपनी बगल में लिटा कर वो भी नींद में डूब गया. आज आधी रात के बाद उसके साथ बहुत कुछ घटा था और अभी बस पूरा आराम चाहिए था आने वाले कल में काम करने के लिए.

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'सहित.. ये सर क्यों घूम रहा है. प्यार भी लगी है.. ये कोमल दीदी भी न..', जाने इस कमरे में क्या हुआ था के ऋतू प्यास की वजह से 4 बजे उठी तोह अपनी बगल में कोमल दीदी को सोये पाया. उनका एक उभर नुमाया था जो नींद में ऋतू ने हे निकला था, जाने क्या सोच के. सावधानी से उसने दीदी की टीशर्ट सही की तोह ध्यान फर्श पर लेती रुपाली पर गया. अलका तोह यहाँ थी हे नहीं.

'बेडा गर्क हो इस बियर पार्टी का.. आठ..", खुद के कपडे सही करती वो बहार निकली तोह हिमानी और जसलीन उधर नहीं थी. ऋतू को तोह उनके बारे में पता भी नहीं था. चलती हुई रसोईघर में फ्रिज से ठन्डे पानी की बोतल सीधा मुँह लगा कर आधी खाली करने के बाद जैसे कुछ आराम मिला. अंदर अजीब सी गर्मी अभी भी लग रही थी.

"ोये कीर्ति.. कड़ी हो कीर्ति.. यहाँ कैसे सो रही हो.?", ऋतू को अब साफ़ साफ़ दिख रहा था और रसोईघर में कीर्ति ऐसी हालत में थी की कोई और देख लेता तोह हंगामा लाजमी था. ऊपर टीशर्ट और निचे निर्वस्त्र. ऋतू ने बड़ी हिम्मत करके उसको जैसे तैसे उठाया और घसीट कर सबसे पहले कमरे में हे ले चली. यहाँ बीएड पर मरीना अकेली सोई थी और निचे गद्दा खाली. ऋतू ने फुर्ती दिखते हुए उसके बगल वाले कमरे को टटोला तोह वह गुरदीप की बगल में हिमानी को सोये देख कुछ शांत हुई. हिमानी के ऊपर हे कीर्ति का पजामा गिरा था और उसकी खुदकी टीशर्ट चुचो तक छड़ी थी.

'बहनचोद.. हुआ क्या है यहाँ रात में?', ऋतू के मुँह से गाली हे निकल गयी थी. हिमानी जैसी लड़की और उसकी ये हालत. उसको भी सही करके वो कीर्ति के पास वापिस पहुंच पजामा पहना कर अपना दुखता दिमाग दौड़ने लगी. अभी भी अलका नजर नहीं आयी थी उसको. बस अब एक हे कमरे बाकी था इस घर में.

'यार 9 लोग एक कमरे में? ऐसा क्या खेल खेल रहे थे मेरे सोने के baad?',Ritu ने दबे पाँव माधुरी दीदी वाले कमरे का दरवाजा खोला तोह रहा सहा होश भी हवा हो गया. Tara-Priyanka एक दूसरे पर टांग चढ़ाये चिपकी हुई थी. माधुरी दीदी की काख के निचे तकिया था लेकिन जो दृश्य सबसे हैरानी वाला था वो था अफसाना की टीशर्ट में प्रीती का हाथ और अफसाना का प्रीती के कूल्हों पर, पाजामे के अंदर. वो तोह ऐसी चिपकी हुई थी जैसे बीच से हवा भी नहीं जानी चाहिए.

'अरे कमीनो दारु पी थी या वियाग्रा? ऋतू, कुछ सोच इस से पहले अर्जुन उठ जाए.. अर्जुन.. और यहाँ तोह 5 हे लोग है. जसलीन, विन्नी दीदी, अलका और आरती कहा गयी?', ऋतू ने इन सभी को ऐसे हे छोड़ सबसे पहले बाथरूम देखने शुरू किये. यहाँ कोई न था लेकिन उसके खुदके कमरे के बाथरूम में अलका सोई मिली. वाशबेसिन में कांच का गिलास था मतलब वो ये पानी पी रही थी. ऋतू ने उसको घसीट कर गद्दे पर किया तोह अलका कुनमुनाते हुए उठ हे गयी.

"क्या कर रही है यार? शरीर दुःख रहा hai..aah.. और मैं यहाँ गद्दे पे क्यों हु? ऋतू गाला सूख रहा है यार पानी तोह दे.", अलका की हालत देख ऋतू ने अभी कुछ न कहा और पानी की बोतल ले आयी.

"शठ.. ध्यान से सुन्न अलका. रात यहाँ पता नहीं क्या हुआ है लेकिन माहौल समझ से परे है. अभी भी जसलीन, आरती और विन्नी दीदी नहीं दिख रही. शोर नहीं करना, घर के बहार देखते है उनको."

"तूने तोह कोई कमाल नहीं कर दिया न? मुझे इतना तोह याद है की मैं बीएड से उठी थी और तू कोमल दीदी को चूम रही थी. फिर मुझे प्यास लगी और मैं शायद बाथरूम में हे सो गयी. यार ये शराब बहोत बुरी चीज है.", अलका ने पूरी बोतल गले में उड़ेलने के बाद ऋतू की बात को समझा.

"ओह यार ऋतू, पक्का हमारी लगने वाली है अगर विन्नी दीदी, आरती और जसलीन गायब है तोह. बाकी सब बाद में देखते है और इन्हे ढूंढ़ना जरुरी है.", अलका का शरीर जैसे ऊर्जा से भर उठा.

"वही तोह अलका, गार्डन में देख मैं छत्त पर देखती हु.", ऋतू उसको साथ लिए बहार निकली तोह अलका ने भी बगल वाले कमरे का वो दृश्य देखा जिसमे अफसाना और ऋतू अंतरंग चिपकी थी.

"सच में यार.. बुरे फसे. उस अफसाना को हे देख, प्रीती ने दबोच हे लिया नशे में."

"अरे वो तोह सामने है, बाद में देख लेंगे उनका सन.", अब बात सचमुच घबराने वाली हे थी क्योंक आरती और जसलीन तोह निचे से हे गायब थी और विन्नी को अर्जुन ले गया था, खून से भीगी चादर के साथ. लड़कियों की दारु पार्टी में फंसा था तोह अर्जुन और उस से जरुरी था बाकी दोनों लड़कियों को ढूंढ़ना. हैंगओवर भारी पड़ने वाला था अब. वो हरी बोतल अभी भी फर्श पबथि.
 
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अपडेट 172

हैंगओवर (3)

"ये महारानी तोह इधर आँगन में मजे से सो रही है!", साढ़े 4 बज चुके थे अलका और ऋतू को बेहतर होने के बाद घर के बगीचे और गाये वाले कमरे की chhaan-bin करके इधर सामने आँगन तक आने में. जसलीन और विन्नी तोह नहीं दिखी थी पर आरती जरूर फर्श पर सिकुड़ी हुई सोई मिली. वो सही हालत में थी और सोने के तरीके से साफ़ था की वो खुद हे इधर आयी होगी.

"गद्दा पे सो रही है मैडम और यहाँ पानी के साथ साथ खाने की प्लेट भी है. मतलब शायद हमारे सोने के बाद अंदर शोर की वजह से ये इधर आयी होगी. चल इसको सोने दे ऋतू और अब विन्नी दीदी और जसलीन पर ध्यान दे. निचे तोह वो कही दिखी नहीं.", अलका को अभी भी आलस आ रहा था लेकिन सुबह की प्राकृतिक ठंडक ने सर का दर्द जरूर दूर किया.

"हाँ.. अब तोह बस छत्त हे बाकी है और इसका मतलब है की जो मैं नहीं चाहती थी वैसा हे कुछ हुआ होगा. गेट देख ाचे से बंद है.", ऋतू अब परेशां थी और अलका को भी मालूम था उसका इशारा किस तरफ है.

"देख, जो भी हो तू गुस्सा काबू रखना. अर्जुन तोह एक बार भी निचे नहीं आया था इसलिए उसकी गलती तोह होने से रही. बाकी क्या पता जैसा तू सोच रही है वैसा कुछ भी न हो.", अलका ने ऋतू की कलाई थाम कर उसको सीढ़ियों की तरफ ले जाते हुए कहा.

"विन्नी दीदी का पूरा हक़ है लेकिन जो भी हो उन्हें इधर कण्ट्रोल करना चाहिए था. जाने अब क्या हालत हो ऊपर. लेकिन मैं पहले हे कह देती हु की अगर अर्जुन ने कुछ भी ऐसा वैसा किया होगा न उनके साथ तोह मैं टाँगे टॉड दूंगी उसकी. नशे में विन्नी दीदी होगी लेकिन उसको कण्ट्रोल जरुरी hai.",Dono ऐसी हे धीमी आवाज में बात करती हुई ऊपर आयी तोह कुछ समय लगा उन्हें स्थिति समझने में. अर्जुन गद्दे से निचे सोया हुआ था जिसके साथ जसलीन बुरी तरह सी करवट के बल चिपकी हुई गद्दे पर थी. उन दोनों से आगे उसी गद्दे पर कूलर के सामने विन्नी दीदी खुद को चादर में मुँह तक ढके गहरी नींद में थी.

"वाह मेरे शेर, तू कुछ न भी करे तब भी कुछ तोह हो हे जाता है. ले ऋतू देख ले इस कन्हैया के हाल. जसलीन भी इसकी दीवानी होगी, ये तोह खबर तक न लगी. रात कही इन दोनों ने हे अर्जुन का काम तोह नहीं कर दिया.?", अलका हंस रही थी जबकि ऋतू गंभीरता से कभी अर्जुन तोह कभी बाकी दोनों पर गौर करती रही. थोड़ा समीप जा कर ऋतू ने उजली चादर पर आखिर वो निशाँ देख हे लिया जो गहरा था. अलका की नजर अब तक विन्नी दीदी की ऊपर आधी चादर के उस दाग पर जा चुकी थी.

"कण्ट्रोल कर ऋतू.. तमाशा हो जायेगा अगर अभी तूने कुछ किया तोह.", अलका अब हंसने की जगह गंभीर हो चुकी थी वही ऋतू की आँखों में अनजाने हे आंसू उभर आये. इन दोनों की फुसफुसाहट की वजह से या किसी और कारण, अर्जुन कसमसाता हुआ जसलीन को अपने आप से अलग करता हुआ उठ खड़ा हुआ. अभी भी उसका ध्यान नहीं गया था ऋतू और अलका पर. फर्श पर सोने से उसका शरीर हल्का दुःख रहा था और अंगड़ाई लेते हुए न्यास हे उसके मुँह से निकल गया.

"आठ माँ. इस जसलीन के चक्कर में पूरी पीठ दुःख रही है. और ये विन्नी दीदी.. उफ़.. दारु पीने का पता है लेकिन उसके बाद.. आह्हः.", अभी वो ढंग से आँखे खोल हे रहा था की ये 'चत्ताक' की तेज आवाज वातावरण में गूंझ उठी. ऋतू से सेहन हे नहीं हुआ था अर्जुन का वो सब कहना और भरे दिल, गीली आँखों के बावजूद उसने पूरी जान से अर्जुन का गाल सेक दिया था. थप्पड़ इतना तेज था की ऋतू का हाथ बुरी तरह झनझना गया था और उधर अर्जुन के तोह अंदरूनी गाल की तरफ से खून मुँह में रिसने लगा. जब तक वो कुछ समझता ऋतू रोटी हुई निचे दौड़ गयी और उसके पीछे हे अलका भी.

'अब ये क्या था? आह्हः.. शरीर पहले हे टूट रहा था और अब तोह आठ.. ऋतू ने मुझे क्यों थप्पड़ मारा? मैंने तोह पी भी नहीं थी.. कही मरीना?', अर्जुन की गांड फट चुकी थी इतना सोचते हे. उसका ध्यान इस तरफ बिलकुल न था जहा जसलीन और विन्नी अभी तक बेखबर सोई पड़ी थी. वही ऋतू अपने कमरे में जाते हे मुँह पर हाथ रखे खुल कर रोने लगी थी.

"शहहह. अरे यार तू चुप भी हो जा ऋतू. कलेश हो जाएगा अगर बात फ़ैल गयी तोह. तुझे मन भी किया था की अभी काबू रखियो और बाद में सबकुछ अर्जुन से पूछ लेते.", अलका ने ऋतू को बाहों में भर कर दुलारते हुए कहा लेकिन जाने क्यों ऋतू का मैं इतना व्यथित हुआ था आज. उसको अर्जुन के लगभग सभी सम्बन्धो की जानकारी थी पर आज जैसे ऋतू का दिल उसके साथ न था.

"यार अलका, विन्नी दीदी अकेले उसके साथ होती तोह मैं कण्ट्रोल भी करती. पर तूने ध्यान से नहीं देखा जसलीन के शॉर्ट्स भी वह से डार्क थे. ारु से इतना भी कण्ट्रोल नहीं हुआ और एक हे टाइम पे वो अपनी बड़ी बहिन के साथ साथ उस जसलीन के साथ भी? छियई.. अब उन दोनों की हालत सबके सामने होगी और ारु अकेला लड़का था यहाँ सबकी नजरो में.", ऋतू अभी ये सब बोल हे रही थी, रट हुए और अर्जुन घर के अंदर जमा पार्टी का सारा सामान, बोतल इत्यादि बोरी में भर कर पिछली तरफ से हे निकल कर घर से बहार चला गया. उसने किसी से बात तक न की थी और न किसी कमरे में झाँक कर देखा.

"चल खुद को सही कर ऋतू इस से पहल की बाकी सब उठ जाए. शायद अर्जुन बरामदे से हो कर गया है अभी. और सुबह भी होने लगी है तोह बहार का kooda-karkat भी ठिकाने लगाना है. विन्नी दीदी और जसलीन से अभी कुछ नहीं कहना.", अलका समझदारी से काम ले रही थी और इतनी देर में ऋतू को शांत करवा दिया था.

मैं फ्रेश हो के आयी, तू दीदी को जगा और उधर अफसाना भी उठने वाली होगी नमाज के लिए उस से पहले वह भी जरा हालत ठीक कर दे.", ऋतू टोलिया उठा कर बाथरूम में घुस गयी. उसको खुद अब बुरा लग रहा था अर्जुन पर हाथ उठा कर लेकिन अर्जुन पर खासी नाराजगी भी थी. अलका के बस हिलने भर से कोमल दीदी जाग गयी. कपडे दुरुस्त करने के बाद एक बार बाथरूम की तरफ देखा तोह अलका ने बता दिया के वह ऋतू है.

"मैं सामने वाले कमरे का बाथरूम उसे कर लेती हु. अर्जुन को भी जगा दे अलका, सफाई तोह रात में हे कर दी थी और थोड़ी बहोत बोतल इधर फर्श पे हे होंगी जिन्हे वो थोड़ा दूर फेंक आएगा.", कोमल दीदी ने सबसे पहले तोह अपना साफ़ salwar-kameej उठाया जो बैग में वो यहाँ ले कर आयी थी. और फिर अलका के साथ हे बहार निकली तोह हॉल में कोई बोतल या बचा हुआ खाना न दिखा. गद्दे भी सभी उठा कर अर्जुन गुरदीप वाले कमरे में हे दिवार से खड़े कर गया था.

"मतलब वो पहले हे सबकुछ समेत गया? माधुरी दीदी को जगा दे या पहले उनके बाथरूम में खुद फ्रेश हो जा. मेहमान जबतक चाहे सोने देना इन्हे.", कोमल दीदी ने फिर एकाएक अलका के गाल को ऐसे सहलाया जैसे बड़ी बहिन छोटी को स्नेह जाता रही हो.

"आप नाहा लो, तब तक मैं चाय रख देती हु. मैं उस घर हे नहाउंगी दीदी, कोमल दीदी को अभी उठा रही हु.", इस घर में भी रसोई का पूरा सामान था और दूध पहले हे फ्रिज में रखा था पिछले दिन चाय इत्यादि के लिए. अलका अपनी बड़ी बहिन को जगाने कमरे में दाखिल हुई तोह वो पहले हे बाथरूम जा चुकी थी. अंदर से पानी गिरने की आवाज बता रही थी की माधुरी दीदी नाहा कर हे आएँगी.

"ऐ प्रीती, थोड़ा सही से सो.", अब अलका ने chumbak-jodi को अलग किया था जो एक दूसरे से कस के लिपटी सो रही थी. प्रीती का हाथ अफसाना की टीशर्ट से बहार निकाल कर सावधानी से प्रीती को हे हिलाया. प्रीती की आँखों में अभी भी आलस था लेकिन वो अब दूसरी तरफ करवट के बल हो गयी.

"स्ट्रांग सी कॉफ़ी हे पीला दो दीदी.. आह्हः.. सर दुःख रहा है जोरो का.", प्रीती कुछ चेतन हुई तोह आखें बंद किये हे अपने बालो को दोनों हाथो से इकट्ठा करती हुई रबर बांध कर कमरे में गौर से देखने लगी. बगल में अफसाना किसी मासूम से बचे की तरह सिकुड़ी हुई सो रही थी. तारा प्रियंका ने तोह उठने से हे इंकार कर दिया था.

"यहाँ चाय है सिर्फ. तुम 5 मिनट आराम करो, मैं बना कर लाती हु.", अलका को भी अब एक जोरदार चाय की तालाब महसूस हो रही थी और इस सब खटपट के बीच रुपाली और गुरदीप भी जाग चुकी थी. अलका बहार से हमेशा की तरह शांत थी लेकिन उतनी हे दुखी भी थी ऋतू के रोने और अर्जुन के साथ वो सब होने पर. चूल्हे पर चाय का पानी रख कर वो बस सोच रही थी की आखिर गलती किसकी होगी.

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"अब कन्धा कैसा है तुम्हारा? और एक्सरसाइज तोह नहीं कर रहे न आज?", अर्जुन उस घर का सारा कूड़ा ठिकाने लगा कर घर में घुसते हे बहार नलके पर हाथ मुँह धो रहा था की इधर वाले स्नानघर से अपने पिता को तैयार हो कर अपने पास खड़े देख थोड़ा सेहम सा गया. आज पहली बार उसका दिन इतने बुरे तरीके से शूरा हुआ था और जैसे वो खुदको हे दोषी मान कर अपराधबोध से ग्रसित था. पिता की आवाज से तन्द्रा भांग हुई तोह चेहरा तार पर लटके तोलिये से साफ़ करते हुए जवाब दिया.

"गुड मॉर्निंग पापा. अभी एक वीक तक कोई पिहिसीकाल एक्सरसाइज नहीं करूँगा. कन्धा अब ठीक है काफी हद्द तक. आप कही जा रहे है क्या इतनी सुबह?", 5 बजे अपने पिता को पतलून कमीज में हमेशा की तरह तैयार देख उसने हे बात आगे बढ़ा दी. शंकर जी अब बड़े गौर से उसके चेहरे को देख रहे थे और एकदम से उन्होंने उसकी ठुड्डी के निचे हाथ रख कर उसके बाए गाल पर आयी लालिमा और होंठ के हलके से उभार को परख लिया.

"अब ये नक्शा किसने छपा तेरे चेहरे पर और किस वजह से?", अर्जुन की तोह सिट्टीपिट्टी हे गम हो गयी थी. उसके पिता जितने हंसमुख थे उतने हे गंभीर डॉक्टर भी, जो हर चीज बड़ी पैनी निगाह से देखते थे.

"वो यहाँ आने से पहले.. मैंने सोचा की निचे दीदी लोगो को उठा दू.. दरवाजा खोलने के बदले ये मिला. मैंने सॉरी बोल दिया था पापा.", अर्जुन आज पहली बार अपने पिता से एक झूठ बोल रहा था और शंकर जी के चेहरे पर लम्बी मुस्कान आ गयी.

"हाहाहा.. मतलब ऋतू अभी भी तुम्हे कभी कभी पथ पढ़ा हे देती है? चलो आगे से ध्यान रखना की हर इंसान का पर्सनल स्पेस होता है और कभी कभी गटेल खोलने की जगह नॉक करके बहार से भी बताया जा सकता है. उसकी नींद जबरदस्ती से खराब करोगे तोह ऐसा फिर से हो सकता है.", शंकर जी का अनुमान एकदम सटीक था की ये कारनामा सिर्फ ऋतू हे कर सकती है लेकिन उन्हें जरा भी अंदाजा नहीं था के अर्जुन के साथ जो भी हुआ है उसकी सही वजह आखिर क्या थी.

"जी पापा एंड I'm रियली सॉरी िफ़ थिस इस ेम्बरसिंग फॉर यू तू. आईटी हैपेंड बी मिस्टेक.", ऋतू के सामने जो अर्जुन सिर्फ उलझन में था अभी वो न जाने क्यों एकाएक भावुक होने लगा था. उसकी आँखों के कोरो से आंसू बनते हुए शंकर जी ने भांप लिए थे और वो अपने बेटे के इस गुमनाम दर्द को सेहन न कर सके.

"कोई बात नहीं बीटा. कभी कभी आप गलत नहीं होते लेकिन सजा देने वाला शायद खुद परेशां होता है और अक्सर वो किसी और की गलती पर अपने हे करीबी को चोट पंहुचा देता है. तुम अपनी हालत ठीक करो और फिर तैयार हो कर अपनी ऋचा दीदी को खुद ले कर आओ उनके घर से. मैं बनने (हंसमुख) मां को लेने स्टेशन जा रहा हु. चाहो तोह अपने साथ किसी को भी ले जाना.", शंकर जी ने बड़े हे प्यार से अपने बेटे को ऐसे गले लगाया था जैसे वो ाचे से उसके दर्द को समझ चुके हो. बहोत काम होता है की एक बाप अपने बेटे को मानसिक सांत्वना दे, खुल कर. अर्जुन भी 'जी पापा' बोल कर उनके आगोश से निकल अंदर की तरफ चला गया. नरिंदर के साथ साथ इस दृश्य को खुस कौशल्या जी ने देखा था, जो वह शंकर और उसके पिता के लिए नाश्ता लिए कड़ी थी. पंडित जी बस अभी अभी मेहमान कमरे से तैयार हो कर निकले थे.

"हाँ तोह तू कबसे अर्जुन को इतना प्यार करने लगा? मतलब प्यार तोह तू करता है लेकिन ऐसे खुल कर दिखाना तोह पहली बार हे हो रहा मेरे सामने. और चंद्रो ताई के तोह तू जा रहा था न?", नरिंदर अपने भाई के करीब आ कर धीमी आवाज में गुफ्तगू कर रहा था. शंकर के चेहरे पर एक फीकी सी मुस्कान तैर गयी.

"वो जब पैदा हुआ था न तोह मैंने हे peet-peet कर कांसे की थाली फाड़ दी थी. सीखा तेरे लोंदे को जरा दिल मजबूत रखना कितना जरुरी है. किसी दिन अगर ये जीवन की कोई भी जुंग हरा न तोह उसकी वजह यही होगी इन्दर. जज्बाती है लेकिन सबकुछ अंदर हे भर्र के रखने वाला. यहाँ बहनचोद हम अपनी गलती साबित होने के बाद नहीं मानते और ये लड़का हर वक़्त दिल से हे चलता है. आजा नाश्ता करते है फिर मैं भी तेरे साथ स्टेशन हे चलता हु.", शंकर ने बात आधी अधूरी बताई और अपने पिता की बगल में हे दरी पर विराजमान हो गया, नाश्ते के लिए. पंडित जी अपने मित्र चंद्रकांत के निवास जाने वाले थे और इसके साथ हे कुछ ख़ास लोगो से व्यक्तिगत मुलाकात भी थी.

"इसका रिजल्ट भी आने वाला होगा शंकर. यही रखना है बाहरवीं (12तह) तक या किसी बड़े स्कूल में भेजना है?", अपने पिता की ऐसी बात सुन्न कर अब शंकर झेंप रहा था. उसको लगा की आज फिर अर्जुन को बोर्डिंग भेजने वाली बात पर तना दिया जा रहा है.

"घर हे ठीक है और इसका स्कूल उतना बुरा भी नहीं है यहाँ वाला. Ritu-Komal और बाकी सभी बचे वही पढ़े है पापा. बोर्डिंग भेजना कुछ गलत था लेकिन इसके व्यक्तित्व को निखारा भी है वह की शिक्षा ने. अब ये घर है तोह आप सभी सुनिश्चित भी रहते है. अर्जुन को अब कही नहीं भेजना मैंने, बाकी उसकी मर्जी जो वो करना चाहे.", शंकर आतीं मदद कर पराठे प्लेट में रखते हुए शायद कुछ और भी सोच रहा था. कौशल्या जी बड़े ध्यान से देख रही थी की उनके पति आखिर कहना क्या चाह रहे है.

"बोर्डिंग वाली बात नहीं कर रहा हु मैं शंकर. अर्जुन इंजीनियरिंग की डिग्री दिल्ली से करना चाहता है और अगर वो 11-12 कक्षा भी वही से करेगा तोह एडमिशन में उतनी समस्या नहीं आएगी. ये मेरा व्यक्तिगत विचार है और तुम लोग इसको अन्यथा नहीं लेना. बाकी रिजल्ट आने दो उसके बाद विचार कर लेना और अर्जुन से भी चर्चा कर लेना. 5 दिन वह स्कूल में पढ़ेगा और 2 दिन इधर परिवार में.", शंकर तोह पिता की बात पर खामोश हे रहा लेकिन कौशल्या जी के बोहेन चढ़ चुकी थी.

"देखो जी, जो जैसे चल रहा है न उसको वैसे हे चलने दो. नहीं मिला अगर बढ़िया कॉलेज में दाखिला तोह यही के कॉलेज से बा कर लेगा. मेरी तरफ से तोह न भी पढ़े तोह kaam-dhanda कर लेगा कुछ लेकिन अभी 2 साल वो यही रहेगा, मैं बोल देती हु. बड़े आये समस्या हल करने वाले. इन्दर, देख क्या रहा है प्लेट को? नाश्ता कर और अपने मां को लेने निकल.", कौशल्या जी भड़कते हुए सबसे छोटे बेटे पर गुस्सा निकाल भीतर चल दी. वही शंकर हे अकेला मुस्कुरा रहा था.

"वैसे आपकी बात गलत नहीं है पापा. उसको दिल्ली में हॉस्टल की जगह अलग से रिहायश दी जाए तोह वो भी दुनिया समझेगा. इसके दोस्त हे कितने है जरा देखो आप.? धर्मपाल भाई साहब का बीटा बस और उसके सिवा मैंने तोह इसको किसी बहार के लड़के से दोस्ती करते नहीं देखा. बाकी मुझे नहीं लगता की माँ इस बारे में अब कुछ भी सुनेगी. मैं तोह जीकर भी नहीं करूँगा अपने मुँह से लेकिन इन्दर समझा सकता है.", जग से अपने गिलास में लस्सी डालते हुए शंकर ने यहाँ इन्दर की टांग खिंचाई करते हुए उसको भी मुद्दे में शामिल करने की कोशिश की.

"देख लो पापा इसको आप. मैं तोह चैन से रोटी खा रहा हु लेकिन इसको जैसे ये भी पसंद नहीं आ रहा. आपको और मुझे घर से निकलवायेगा ये अगर ऐसी कोई भी बात अभी की तोह. शादी तक तोह आराम रहने दो.", नरिंदर ने झूठा नखरा दिखते हुए शंकर की हे प्लेट और लस्सी का गिलास अपनी तरफ सरका लिया.

"पता नहीं तुम लोग बड़े कब होंगे? अब अर्जुन तक मैं ये बात अपने तरीके से हे पहुँचाऊँगा. वो समझेगा तोह बाकी सबको खुद हे मन लेगा. वैसे भी अब उसका वक़्त है दुनिया और माहौल को समझने का. उसकी दादी का बस चले तोह बगल वाले स्कूल न जाने दे उसको. शंकर, आज रिश्तेदार आएंगे तोह बहु और बचो को समझा देना कमरे तैयार करने के लिए. उधर गुप्ता वाली कोठी भी तैयार है जहा 15-20 लोग रह सकते है. अर्जुन ने गद्दे, कूलर इत्यादि लगवा दिए थे. बाकी इन्दर एक बार सतीश के साथ उसके होटल भी जा आएगा. अब मेहमान जुटने लगेंगे और घर में ढेरो रिवाज भी होने है. राजकुमार मंडी से आने के बाद बाकी काम देख लेगा इधर.", रामेश्वर जी ने दोनों का ध्यान अब घर के जरुरी कार्यो पर करवाया तोह वो भी पिछली बात भूल कर बड़े ध्यान से सब सुन्न ने लगे. कुछ और चर्चा करने के बाद वो दोनों एक हे कार से स्टेशन की तरफ निकल चले और अब अर्जुन भी नाहा धो कर बहार आ गया था हवेली जाने के लिए.

"बरखुरदार, तुम्हारी सवारी थोड़ा घूम कर जा सकती है?", रामेश्वर जी जूते पहन कर अब पूरी तरह त्यार थे और अर्जुन भी उनके सामने हे था.

"जी दादा जी जैसा आप कहो. कहा चलना है?"

"मुझे तुम बस चन्दर्कांत की कोठी पर उतार देना और वही से आगे निकल जाना.", रामेश्वर जी घर के बहार हे कड़ी अर्जुन की कार में बैठने से पहले एक निगाह पिछली सीट पर मार चुके थे. फ़िलहाल उन्होंने उसको कुछ न कहा क्योंकि उन्हें पता था जो भी हो इस सबसे अर्जुन का सरोकार नहीं होगा. उनके बेटे हे थे जो ऐसा कुछ कर सकते थे. यहाँ से 6 बजे कार निकल कर सेक्टर की खामोश सी सड़क पर चलने लगी थी. दिन आगे व्यस्त होने वाला था क्योंकि आज लड़की की हल्दी थी, कल मेहंदी का कार्यक्रम रखा था और फिर संगीत.

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"यार किचन में अगर कुछ निम्बू है तोह देख न माधुरी. सर भारी हो रहा है मेरा और ये Himani-Marina उठी या नहीं?", तक़रीबन 6 बजने से कुछ पहले हे विन्नी उजाला होने पर यहाँ पिछले घर में भीतर आयी तोह Madhuri-Priyanka को सब व्यवस्थित करते पाया. जो जरुरी सफाई थी वो दोनों मिल कर कर रही थी इस हॉल की. ऋतू इस आवाज से कमरे से बहार आयी तोह अपने सामने विन्नी दीदी को आराम से दूसरे कमरों को झांकते पाया.

"अभी बना देती हु निम्बू पानी और तब तक चाहो तोह बाथरूम हो आओ. हिमानी उधर वाले कमरे के बाथरूम में नाहा रही है और मरीना ने शायद थोड़ी ज्यादा पी ली थी इसलिए वो निम्बू पानी के साथ पेनकिलर खा कर थोड़ा आराम कर रही है. जसलीन ठीक है न?", माधुरी ने फ्रिज से 2 निम्बू निकाल कर राजसी में जाते हुए कहा.

"हाँ यार कुछ ज्यादा हे हो गयी थी रात. और मरीना का लिवर शायद सबसे ज्यादा मजबूत है. वो तोह वाइन की बोतल भी खाली कर गयी वोडका के बाद. जसलीन भी आ गयी.", विन्नी अंदर दाखिल होती जसलीन को मुस्कुरा कर देखा जिसकी चुस्त निक्कर अभी भी जांघो के बीच फांसी थी. चेहरा बता रहा था के उसकी भी हालत उतनी ठीक नहीं है.

"मेरे लिए भी बना देना दीदी बस पानी थोड़ा काम और एक पूरा निम्बू दाल देना. सरिदों या कोई डिस्प्रिन भी हो तोह देना. मुझे तोह ये भी याद नहीं की मैं ऊपर कब चली गयी. शायद हिमानी यही हॉल में मेरे साथ सो रही थी और उसके उठने के बाद मैं नींद में ऊपर चली गयी. याद नहीं.. उफ़.", ऋतू बड़े गौर से ये सब देख रही थी और इधर आरती के साथ अफसाना भी तैयार हो कर बहार आ चुकी थी.

"आपके शॉर्ट्स पर निशाँ किस चीज के है ये? मतलब चोट तोह नहीं लगी कोई?", आरती इस वक़्त पूरी तरह से ठीक नजर आ रही थी.

"यार ये न वाइन है जो पता नहीं किस कम्बख्त ने गद्दे पर गिरा दी थी. विन्नी दीदी आप बोतल ले कर गयी थी क्या ऊपर?", अब तोह ऋतू के टूटते उड़द चुके थे ये सुन्न कर और बाकी सभी हंस रहे थे जैसे उन्हें जसलीन की हालत पर मजा आया हो. एक बार फिर ऋतू की आँखें गीली होने लगी थी जिसको रोकने के लिए वो तुरंत कमरे के बाथरूम में जा घुसी.

"ओह नहीं यार मैं ये वाइन शाइन ड्रिंक नहीं करती. मरीना गयी थी छत्त पर जब उसको गर्मी लग रही थी. उसने हे गिराई होगी क्योंकि सबसे ज्यादा उसने हे पी थी. फिर खुद तोह आ कर निचे सो गयी और अर्जुन का मुझे कुछ पता नहीं. मैं भी कब वह गयी और जसलीन कब आयी मुझे तोह ये भी पता नहीं.", विन्नी अभी तक बाथरूम नहीं गयी थी और माधुरी दीदी ने 2 गिलास nimbu-paani के उन दोनों को पकड़ा दिए. जसलीन तोह एक हे सांस में गिलास खली करके मरीना वाले कमरे में दौड़ गयी और विन्नी छोटे छोटे घूँट लेती हुई जैसे रात की कहानी याद करने लगी.

"वैसे सच कहु तोह एक बार तोह लग रहा था हम लोग फंस जाएंगे. पर उतना कुछ हाथ से बहार नहीं हुआ. अर्जुन तोह सबके उठने से पहले हे सारा kachra-bottles ले कर निकल गया था. आप भी फ्रेश हो जाओ और आराम भी करना होगा तोह वही कर लेना थोड़ा टाइम. तारा नाहा के आ रही है और जसलीन के आते हे हम निकल चलेंगे.", प्रियंका ने इस बीच ये सब बताया तोह विन्नी गिलास लिए हे एक बाथरूम की तरफ बढ़ गयी. गुरदीप भी नाहा धो कर सलवार कमीज में आ चुकी थी. उसके चेहरे के भाव तोह ठीक थे लेकिन दिल में कसक थी की कल रात अगर वो नहीं पीती तोह अर्जुन के साथ कुछ न कुछ मौका जरूर बन्न जाता.

"सॉरी अफसाना जी. मुझे ऋतू दीदी ने बताया के मैंने रात आपके साथ कुछ गलत किया और शायद नींद में भी", प्रीती और अफसाना घर के बहार उजाले में टहल रही थी. कुछ समय बाद जब दोनों हे खामोश दिखे तोह बात प्रीती ने हे शुरू की.

"सॉरी की कोई बात नहीं प्रीती. और आप हमे नाम से हे बुलाये, जी लगाना जरुरी नहीं. आप हमारी दोस्त है और आप नशे में थी. दोस्त ऐसी बातों का बुरा नहीं मानते. खैर, हमे आपका खाना खिलाना ाचा लगा.", अफसाना ने इस वक़्त जो प्यारी मुस्कान दिखाई थी प्रीती ने उतने हे प्यार से उसको गले लगा लिया.

"थैंक यू सो मच. गिलटी फील हो रहा था पिछले एक घंटे से और अलका दीदी तोह जैसे अभी और भी कुछ बताएंगी. मुझे याद नहीं लेकिन आपने पूरा ख्याल रखा मेरा.", अभी वो दोनों गले लगी हे हुई थी की आरती अपने साथ ऋतू को लिए इधर आ गयी.

"ओह बस करो यार तुम दोनों अब. मतलब प्रीती का तोह समझ आता है की ऋतू के साथ रह कर दिमाग हिल गया लेकिन तुम तोह अफसाना डार्लिंग ऐसे ख्याल तक अपने दिल में नहीं लाती थी.", आरती हँसते हुए टांग खिंच रही थी लेकिन अफसाना की जगह जवाब प्रीती ने हे दिया.

"ऐसा है न आरती दीदी, ये अब हमारी भी दोस्त है. और मैं इन्हे वही प्यार दे रही थी जो इन्होने मुझे दिया. रात खाना भी खिलाया और सोने के वक़्त भी ध्यान रखा. हाँ आप कमाल हो जो Ritu-Alka दीदी से पहले हे बिना किसी की नजर में आये यहाँ आँगन में अपना खाना अकेले हे खा पी कर मस्त सो gayi.",Is बीच ऋतू ने बड़ा गेट खोल दिया था.

"बातें बाद में कर लेना तुम लोग. हम घर चलते है पहले.", ऋतू के ऐसे रूखे जवाब से प्रीती तुरंत सही हो गयी. बाकी दोनों चुपचाप बहार आयी और आरती ने गेट वापिस लगा दिया.

"वो कार अर्जुन ले गया न और बाकी सब 2 गाडी में आ जायेंगे. अफसाना तुम्हे पैदल चलने में परेशानी तोह नहीं?", ऋतू ने अब थोड़े नरम स्वर में बात कही थी जिस पर अफसाना ने अपना दुपट्टा सही करके बस ना में सर हिला दिया.

"वो गया कब यहाँ से? न हे रात में अर्जुन की कोई आवाज सुनाई दी और न सुबह. 5 सवा 5 तोह मैं भी उठ गयी थी.", प्रीती ने सड़क पर चलते हुए एक बार हे ऋतू को देखा था लेकिन फिर नजरे सामने कर ली. ऋतू का चेहरा हे बता रहा था के वो परेशां है चाहे जितना मर्जी छिपा ले.

"बस उस से कुछ पहले हे चला गया था वो हमारा कूड़ा समेत कर. आइंदा नाम नहीं लेना beer-vodka का. जिसने पीनी हो वो बंद कमरे में करे ये सब.", ऋतू को खुदको हे नहीं समझ आ रहा था के वो कहना क्या चाहती है और गुस्सा किस पर निकल रही है.

"देख ऋतू, तू क्यों परेशां है ये मुझे नहीं पता और मैं पूछूँगी भी नहीं क्योंकि बात बताने वाली होती तोह अब तक बता चुकी होती. सब चाहते थे की वैसा हो और रात गयी तोह बात भी गयी. अपनी परेशानी का हल कर जैसा तू हमेशा ठन्डे दिमाग से करती है. तू हे एक है जिसने सबको आपस इस कदर जोड़ दिया है की कभी लगता हे नहीं हम बहने है और अलग अलग. इस सबकी वजह है तू और अगर तू हे परेशां रहेगी तोह असर सभी पर होगा. जिसके लिए परेशां है उस से बात कर, वो तुझसे ऊपर किसी को नहीं मानता.", आरती ने राह में चलते चलते ऋतू की हथेली अपने हाथ में लेते हुए बड़े धीमे स्वर में कहा था. ऋतू ने एक बार आरती को बड़े हे अपनेपन से देखा जो ऋतू की हालत बिना कहे कुछ समझ चुकी थी. एक बार फिर ऋतू के दिल में दर्द सा उभरने लगा था पर अभी उसको अर्जुन से माफ़ी मांगने तक ये आंसू ऐसे हे रोके रखने थे.

"हाँ.. सॉरी प्रीती, रात के बाद से कुछ ाचा नहीं लग रहा था इसलिए वो सब बोल दिया. अफसाना तुम भी माफ़ करना प्लीज.", ऋतू ने दोनों से माफ़ी मांग कर नजरे झुका ली थी.

"ऋतू आपि, अपनों पे हे तोह गुस्सा होना जायज है. कही बहार वाले दिल थोड़ी समझते है. प्रीती ने कहा है हमे की आप परेशां है और हम भी समझते है. वैसे आप सचमुच ख़ास है.", अफसाना अब कही ज्यादा उर्दू के लफ्ज़ प्रयोग नहीं कर रही थी. उसके खुश चेहरे को देख एक बार तोह खुद ऋतू उसके गले लग्न चाहती थी लेकिन घर से बहार होने की वजह से बस प्रतिउत्तर में आभार भरी नजरो से पहले अफसाना को देखा और फिर प्रीती को जो खुद जैसे ऋतू के दर्द को पहचान कर खामोश थी.

"चलो अब सबसे पहले मैं सबको कॉफ़ी पिलाती हु फिर हल्दी के शगुन की तैयारी करते है.", ऋतू ने बगीचे से अंदर आते हुए तीनो को झूठी मुस्कान से कहा. झूठी इसलिए क्योंकि यहाँ भी अर्जुन की कार नदारद थी.

"आपि अब तोह कॉफ़ी तभी पिएंगे जब आपके शिकवे ख़तम होंगे. हम कुछ वक़्त चची के पास रहते है, आपको ठीक लगे तोह.", अफसाना ने घर में दाखिल होते हुए कौशल्या जी और देवकी को प्रणाम किया जिन्होंने उसके सर पे हाथ फेर कर आशीर्वाद से नवाजा. अफसाना और आरती अंदर चली गयी थी और प्रीती अपने घर.

"तू खबर भी रखा कर थोड़ी बहोत. और सोई नई क्या रात ठीक से?", कौशल्या जी ऋतू को लिए बहार आँगन में बिछी चारपाई पर हे बैठ गयी. अनामिका चची अपनी दोनों सास के लिए चाय ले आयी थी और उनके पीछे हे रेणुका बुआ और मंजू भी इधर आ गयी. वो दोनों कुर्सी पर हे बैठी अपने अपने दूध के गिलास के ले कर. मंजू से ऋतू मुस्कुरा कर हे मिली थी जैसा इनका प्यार गहरा था वैसे इन्हे अब औपचारिकता की जरुरत नहीं थी.

"ऐसा क्या हुआ जिसकी मुझे खबर नहीं दादी? और आपको मेरा चेहरा इसलिए अलग लग रहा है क्योंकि मैं कुछ ज्यादा हे सोई हु. अब बताओ क्या बात है.?", ऋतू खुद को ाचे से संभल चुकी थी. सबसे काम हैंगओवर वाली ऋतू ने आज पहले हे सबसे बड़ी गलती कर दी थी.

"तेरे दादा जी नया राग अलाप रहे है और मुझे लगता है वो अपने पौटे को भी इसलिए साथ ले गए है subah-savere.", कौशल्या जी पहेलियाँ सी बुझा रही थी और ऋतू के साथ साथ अब अनामिका, मंजू और रेणुका का भी ध्यान उनकी बातों पर था. देवकी जी को मीठे बिस्कुट और चाय के सिवा वह कुछ और नहीं दिख रहा था.

"साफ़ बोलो न दादी की वो ऐसा क्या कर रहे है? और कहा गया है ारु?", अब कौशल्या जी को तोह किसी ने बताया नहीं था के अर्जुन तोह सिर्फ पंडित जी को उनकी मंज़िल पर छोड़ा आगे हवेली से ऋचा को लेने गया है.

"वो तेरे बाप से कह रहे थे की अर्जुन को बड़ी कक्षा के लिए 2 साल दिल्ली भेज दे फिर वही वो आगे कॉलेज कर लेगा.", अभी वो इतना हे बोली थी की ऋतू ने थोड़ा जोर से अपनी दादी का हाथ पकड़ लिया. ये असहनीय था और कौशल्या जी समझ गयी थी अपनी लाड़ली का दर्द. मंजू की भी आँखें बड़ी हो गयी थी.

"अर्जुन ने क्या कहा दादी जी?", मंजू ने हे ऋतू की जगह सवाल किया था. ऋतू तोह बोलने से हे गयी थी.

"नहीं उसको नहीं कहा था तुम्हारे दादा जी ने. मैंने खबरदार कर दिया था के ऐसा वो भूल जाए की अर्जुन को अब कही भेज देंगे. शंकर ने भी मन कर दिया था लेकिन जैसे ये कह रहे थे और फिर अपने साथ अर्जुन को लेकर गए है तोह मुझे लगता है वो अर्जुन को अपने झांसे में ले लेंगे और वो उनकी बात ताल नहीं सकता.", कौशल्या जी अभी ये मंजू की तरफ देख कर कह रही थी और ऋतू के होंठ थोड़े कसने लगे. शरीर में कंपकमी होने लगी थी और ऐसा लग रहा था जैसे शरीर साथ हे न दे रहा हो. जीभ तालु में चिपक गयी थी जिस वजह से वो बोल भी नहीं पायी लेकिन आँखों से लम्बी धार बहती हुई गाल से निचे उतर कर चेहरे से निचे गिरने लगी. अब कही उसका सबर और हिम्मत जवाब दे चुकी थी. अर्जुन पर अनजाने में हे हाथ उठाने की इतनी बड़ी सजा की कल्पना तक न थी ऋतू को. किस्मत ऐसा नहीं कर सकती.

"मेरी बची.. ऋतू बीटा.. ऋतू..", अब कौशल्या जी का चेहरा सफ़ेद पड़ गया था जब काम्पटी हुई ऋतू का शरीर बुरी तरह से ऐंठने लगा. उन्होंने तुरंत हे उसको अपने कलेजे से लगा लिया. पीठ को तेज तेज सहलाती हुई वो जैसे उसके शरीर को गर्मी दे कर शांत करने लगी. रेणुका भी तुरंत बगल में आ बैठी. पानी का गिलास ऋतू के कैसे हुए जबड़ो से लगाती हुई रेणुका के भी हाथ कांप रहे थे. एक सार्ड झटका सा लगा ऋतू के दिल में जिस से उसकी जकड़न काम हुई. होंठ हलके से खुले और पानी ने जैसे सूखे मुँह में तरावट भर दी. अब वो ढीली पड़ चुकी थी लेकिन रुलाई निरनन्तर चलने लगी. ऋतू के शरीर में फिर से हरकत महसूस करके कौशल्या जी को भी कुछ आराम आया. जो कुछ क्षण पहले उन्होंने देखा था उस चेहरे ने तोह उनका दिल हे बैठा दिया था.

"मेरी बची.. मैं अर्जुन को ऐसे कही नई जाने दूंगी. चाहे तेरे दादा बोले या तेरा बाप. तू आइंदा ऐसा मैट करना बेटी, कभी भी ऐसे हार नहीं मान न. मेरी प्यारी बेटी इतनी कमजोर नहीं है.", कौशल्या जी अभी भी उसको बाहों में लिए थापक रही थी. देवकी तोह अब कुछ ज्यादा हे हैरत से अपनी जेठानी और पौती को देखे जा रही थी. ऋतू की हालत देख मंजू भी अफ़सोस में थी लेकिन उस से तोह कुछ कहते हे न बना.

"बड़ी माँ, ने कह दिया न ऋतू की अर्जुन यही रहेगा. और तुम तोह इतनी कमजोर नहीं हो जो रोने लगो? उसके लिए लड़ने वाली आज रोने कैसे लगी?", रेणुका बुआ को बस इतना पता था की अर्जुन के लिए ऋतू कुछ भी कर सकती है पर उन्हें भी नहीं पता था की वजह कुछ और भी है.

"सॉरी दादी.. सॉरी बुआ. मैं चेहरा धो के आयी.", ऋतू आज अपने शरीर को हे संभल नहीं प् रही थी. कुछ अलग हे चल रहा था उसके मैं में जो वो बहार वाली सीढ़ियां चढ़ती हुई सीधा अर्जुन के कमरे में चली आयी. दोनों तरफ से दरवाजे लगा कर वो औंधे मुँह बिस्टेर पर गिरती अब फफक कर रोने लगी थी. अलका सही थी की उसको अर्जुन से बात करनी चाहिए थी लेकिन फिर भी इतना गुस्सा और वो भी अपने प्यार पे हाथ उठाना कही से भी सही न था जिसका एहसास करके उसके आंसू नहीं रुक रहे थे.

"ऐसे क्या हार जेड है जीजी अर्जुन में जो लड़की सफ़ेद पड़ गई? घर के लड़के तोह बहार जाते हे है लेकिन ये तोह ऐसे रो रही जैसे उसकी बहिन न हो..", देवकी आगे कुछ कहती उस से पहले हे कौशल्या जी ने ऊँगली 'न' में हिलाते हुए आगे बोलने से रोक दिया.

"दुनिया है उसकी अर्जुन और आज वो रो रही है क्योंकि शायद वजह कुछ होगी. भाई से पहले हे 8-9 बरस दूर रही है जिसका दर्द आज तक है. ये लड़की शंकर के साथ तेरे जेठ के भी घुटने टिकवा सकती है उसके लिए. अब वो तू जो भी समझ देवकी लेकिन ख़याल अपने तक हे सिमित रख. मैं जानती हु ऋतू ने आजतक कभी खिलौना तक नई माँगा जबसे उसको अर्जुन मिला. बाकी तेरे जेठ जी का राशन मैं बंद करती हु, जरा घर आने दे इन्हे.", कौशल्या जी आहात तोह हुई थी लेकिन भावनाये प्रकट करना जैसे उन्हें शोभा नहीं देता था.

"ये सब भी आ गयी है बड़ी माँ. हम तैयारी देखते है और फिर थोड़ी देर तक नाश्ते के लिए मेहमान आने लगेंगे.", रेणुका बुआ ने तारा और जसलीन की कार घर के बहार रुकते हे कौशल्या जी का ध्यान माहौल से हटते हुए कहा. वो भी थोड़ी सहज होती हुई चाय का कप उठा कर पीने लगी, बेशक अब वो पीने लायक तोह नहीं रही थी. सभी लड़कियां लौट आयी थी और अब आगे काफी व्यस्त दिन रहने वाला था.

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"आओ आओ अर्जुन बीटा. जग जग जियो, भगवन तुम्हे लम्बी उम्र दे.", चंद्रो देवी अब पूरी तरह स्वस्थ थी. अर्जुन अपने खयालो में खोया हुआ आज जिस रफ़्तार से इधर आया था उसको खुद पता नहीं चला. हवेली के बहार कार रोकते हे गेट के सामने चंद्रो देवी सुल्तान को घूमती दिखी. उनका आशीर्वाद ले कर वो उनके साथ हे अंदर दाखिल हुआ. सुल्तान उसके हे साथ उछलता कूदता चल रहा था जिसको बीच बीच में अर्जुन सेहला देता तोह वो गोल गोल घूम कर ख़ुशी जाहिर करता.

"सब ठीक है न बड़ी दादी? आप अब पहले से ाची लग रही हो. नमस्ते चची जी.", अर्जुन ने चंद्रो दादी से बात करते हुए हे गुड्डी काकी के पाँव छुए और उसके बाद अपनी ख़ास बुआ सुशीला से गले लग कर मिला. वो भी जैसे गुजरते वक़्त के साथ कही ज्यादा हे निखार रही थी. गुड्डी काकी ने भी अर्जुन को आशीर्वाद दिया और उसके बाद आँगन में एक तरफ बिजेन्दर भैया नजर आये जो नाहा कर निकले थे और दूसरी तरफ मधुलता, जो audhni-ghaghre की जगह आज एक सफ़ेद साड़ी में थी. अर्जुन ने बिना देरी किये सबसे पहले मधुलता के सामने हाथ जोड़ कर charan-sparsh किया.

"कैसी हो काकी? आप पहले से कमजोर लग रही हो.", अब अर्जुन ने कमजोर किस लहजे में कहा था ये तोह बस वही जानता था लेकिन मधुलता बस इतने में हे खुश हो गई की अर्जुन ने उसका ऐसे सम्मान किया और हाल भी पुछा.

"मैं तोह पहले से ाची हु अर्जुन. शायद तुम कुछ समय बाद आये हो इसलिए ऐसा लग रहा है. ऋचा को लेने आये हो?", अब मधुलता का ध्यान गया शंकर की अनुपस्थिति पर. अर्जुन भी हाँ कहता हुआ अपनी तरफ मुस्कुरा कर देख रहे बिजेन्दर के पास चला आया. जिसके खाने की थाली सुशीला बुआ लगा रही थी. दोनों गले लग कर मिले, पूरे अपनेपन से.

"तू तोह और बढ़ता जा रहा है चाँद. वैसे फ़ोन भी कर लिया कर कभी कभी, सांझ को घर हे रहता हु मैं.", बिजेन्दर अर्जुन को लिए वही खुले आँगन में खाट पे बैठ गया. चंद्रो देवी भी सामने हे कुर्सी दाल कर अर्जुन का हालचाल लेने लगी.

"फ़ोन तोह तब करू जब मुझे यहाँ का नंबर पता हो भैया. न कभी आपने दिया न किसी चची ने.", अर्जुन जानबूझ कर ऐसा कह रहा था और मधुलता के चेहरे पर अलग हे मुस्कान तैर गयी. वो चूल्हे के सामने गुड्डी के साथ काम करवाने लगी थी और सुशीला ने बिजेन्दर को थाली देने के साथ हे अर्जुन को भी दूध का बड़ा गिलास थमा दिया.

"ये तेरा भाई है, भाभी नहीं जो दिल्लगी कर रहा. बबिता और ऋचा के साथ बतलाने के टाइम नंबर कहा से आया करता तेरे पास? बिजेन्दर, इसके भी हवा लग गयी थोड़े दिन में. माँ, आपकी रोटी भी घायल दू?", सुशीला का दिल था थोड़ी देर अर्जुन से बात करने का लेकिन अभी सुबह का वक़्त था और चंद्रो देवी की दिनचर्या अटल थी इसलिए पूछना हे बेहतर समझा. अर्जुन मंद मंद हंस रहा था बिजेन्दर के साथ.

"रोटी तोह रुक के खा लुंगी मैं. पहले ऋचा को बता दे वो तैयार हो जाए. दोनों भाभी ननद अभी तक जाने क्या किस्से गढ़ रही है. अर्जुन, बीटा तू पराठे खायेगा या चूरमा?", सुशीला वह से अनुपमा और ऋचा को बुलाने चल दी.

"दादी जी मैं नाश्ता करके आया हु और वैसे तोह दूध भी पी के चला था. इसलिए आधा मैं सुल्तान को दे रहा हु अगर आपको बुरा न लगे तोह.", अर्जुन ने जब बिजेन्दर को सुल्तान की तरफ रोटी का टुकड़ा उछलते देखा तोह उसका भी दिल किया वो ये दूध उसे पीला दी. नाश्ते के लिए वो झूठ बोल हे चूका था.

"ाची बात है बीटा. वैसे अब तोह रिश्तेदार भी आने शुरू हो गए होंगे?"

"कोई ख़ास तोह नहीं पहुंचे दादी जी लेकिन पंजाब वाले दादा जी आ गए थे. मधु बुआ और फूफा जी भी आये है और जो लोग आएंगे वो मेरे ख्याल से आज या कल में आने वाले होंगे. बाउजी (पंडित जी), बोल रहे थे के आप लोग भी 11 बजे तक तैयार रहना उमेद चाचा आएंगे.", अर्जुन सुल्तान को वो सारा दूध पीला चूका था बातों बातों में. इधर ऋचा ख़ुशी ख़ुशी सुशीला के साथ आ रही थी. अनुपमा ने जाने क्यों अर्जुन को देख घूंगट निकाल लिया था.

"कैसी हो दीदी?", अर्जुन बेझिझक ऋचा से गले लग कर मिला जो मधुलता भी गौर से देखने लगी. उसकी बेटी एकदम इतनी खुश हो रही थी अर्जुन के साथ.

"मैं तोह परफेक्ट लेकिन देख ले एक दिन का बोल कर फिर मेरी याद नहीं आयी?"

"याद नहीं आती तोह फिर मैं आता हे क्यों? हाँ वो थोड़े घर में काम ज्यादा थे और अब आप चलोगी तोह टाइम मिलेगा हंसने बोलने का.", अर्जुन ऋचा के साथ हे वापिस बिजेन्दर के बराबर बैठ गया था.

"जब उमेद ने आना हे था तोह तेरी जरुरी परेड करवानी थी रामेश्वर ने? बबिता का भी फ़ोन आया था थोड़ी देर पहले. कौशल्या ने उसको भी बुलाया है दामाद के परिवार के साथ. जब से उसका ब्याह होया है पाँव उसके भी न टिक रहे.", अर्जुन कैसे कहता के उसके तोह पाँव वो भारी भी कर चूका है लेकिन बबिता का नाम सुन्न कर उसके चेहरे पर आयी ख़ुशी ऋचा के साथ साथ सुशीला भी ताड़ चुकी थी.

"अब दीदी के लिए तोह मुझे पापा ने कहा था और आपके लिए यहाँ आते हुए दादा जी ने. ाचा है बबिता दीदी आ रही है तोह सबसे ghul-mil लेंगी. उनके जैसे बातें भी करने वाले है उधर घर में 3-4 लोग. वैसे भैया आप आज भी खेत जा रहे हो? और ये भाभी का तोह मैं देवर लगता हु लेकिन जरा देखो इन्हे.", अर्जुन ने अनुपमा की तरफ सबका ध्यान करवाया तोह वो अपने पाँव से जमीन कुरेदने लग्ग पड़ी.

"हाहाहा.. देख ले दादी छोरे ने. सीधा न कहता के मेरी लुगाई से nain-mattakka करना है.", बिजेन्दर ने अर्जुन की तरफ से ये चुहल की थी और अनुपमा तोह शर्म के मारे अपने कमरे में हे दौड़ गयी.

"भगा हे दिया आपने तोह उन्हें. वैसे जवाब नहीं दिया आपने की आप क्यों नहीं आ रहे?"

"देख भाई मैं जाऊंगा रात में संजीव की पार्टी पे. ये महिलाओ वाले मामले में वही ठीक. बाकी संगीत वाले दिन भी आऊंगा तेरी भाभी को लेके और ब्याह वाले दिन तोह होऊंगा हे वही. नानके से भी गोलू होगा हे मेरे साथ और विकास सांझ में आएगा हे लेने. तुझसे अब रोज हे मिलूंगा. खेत में थोड़ा काम चल रहा है तोह निगाह रखनी जरुरी है. चल तुझसे शाम को मिलता हु. दादी, भत्ते का हिसाब लेता आऊंगा.", बिजेन्दर ने अर्जुन का सर सहलाने के बाद अपने कमरे का रुख किया जहा मुँह मीठा करके वो काम पे जाने वाला था.

"ऋचा, खाली जायेगी बेटी?", सुशीला बुआ ने जब ऋचा को चेताया तोह वो अलग हे अंदाज में मुस्कुरा दी.

"ताई, मेरा तोह सारा सामान पहले हे वही है. मैं कौनसा बैग लेके वापिस आयी थी. बस अर्जुन उठे तोह मैं कार में बैठु.", अब मधुलता थोड़ी नाराज दिखी जिसको चंद्रो देवी ने भी देख लिया.

"माँ से मिल ले अपनी एक बार. जा मुन्नी जो देना है समझाना है, कर ले.", चंद्रो देवी के कहने पर ऋचा बेमन से अपने कमरे की तरफ चल दी और उसके बाद मधुलता भी.

"दादी, सरपंच की बीवी रेशमा का कुछ पता चला क्या?", अर्जुन ने अनजाने हे ये सवाल कर दिया था जिसपर सुशीला ने उसकी जांघ दबा कर रोकना भी चाहा.

"क्या पता चलना था उसका बीटा? सरपंच तोह मैंने भत्ते में फूंक दिया और जो रेशमा हाथ चढ़ जाती तोह उसका भी वही हाल करती. तू भी अपने दादा और भाई की तरह पुलिस की तैयारी में लगा है?", अर्जुन तोह हैरान था की जो सरपंच गायब था उसको चंद्रो देवी ने मार के फूंक भी दिया था.

"नहीं नहीं. ऐसी बात नहीं है दादी. वो तोह भैया को बाउजी से बात करते सुना था के रेशमा अभी तक गायब है.", अर्जुन के जवाब पर सुशीला ने तगड़ा खुलासा किया.

"गायब तोह मुन्नी की माँ भी है उस दिन से हे. माँ, मैं रोटी घायल रही.", सुशीला ने साफ़ कह दिया था के इस काण्ड में रेशम की साथी कौन है. चंद्रो देवी तोह चाह के भी कुछ बोल हे न सकीय सुशीला के सामने.

"मेरे कमरे में हे ले आ सुशीला. बिस्टेर पे बैठ के हे खा लुंगी यहाँ अब गर्मी लग रही. अर्जुन बीटा तू भी अंदर हे आजा कूलर चला देती हु.", सुशीला ने चंद्रो देवी के पीठ पीछे अर्जुन को इशारा से मन कर दिया.

"नहीं दादी जी, मैं बस निकल रहा हु और खाने के वक़्त बात करना भी सही नहीं. आप आ तोह रही हो थोड़ी देर बाद. वही बात करूँगा आपसे.", सुशीला अंदर चली गयी थी अपनी सास के पीछे उसका खाना ले कर और अर्जुन सोच रहा था के बुआ ने मन क्यों किया.

"बीटा, वो अजमेर से आगे क्सक्सक्सक्स गाँव में मिलेंगी दोनों. जान 3 तरफ़ा संकट में है उन दुष्टो की लेकिन माँ जी को हलके में न लियो. मैं जानती हु की तुम भी बहोत कुछ ढून्ढ रहे हो. ब्याह वाले दिन बात करुँगी तुमसे.", ये गुड्डी काकी थी जो दबी आवाज में जैसे बहोत कुछ हे बता गयी थी अर्जुन को लेकिन नजर चूल्हे पर रखे हुए. अर्जुन लाजवाब था क्योंकि उसने कभी गुड्डी काकी को ज्यादा बोलते नहीं सुना था.

"आप जानती है कुछ.?", अर्जुन ने भी सुलतान को सहलाते हुए ध्यान दूसरी तरफ रखा जिस से किसी की नजर न पड़े.

"मेरे पति ने कभी कोई गलत काम नहीं किया था लेकिन जिन्होंने किया था उनकी सजा भी मेरे पति को मिली. सुदर्शन भी इन्होने हे बदला है जो आज भी काले दिल के हो कर अपनापन दिखने का ढोंग करते है. ब्याह वाले दिन हे बात कर सकुंगी क्योंकि मुझे नजरो में रहने के आदेश है.", अर्जुन ने भी मज़बूरी को भली भाँती समझा. वो कुछ वक़्त पहले हे परिचित हुआ था चंद्रो देवी के दूसरे पहलु से जिसमे उन्होंने सबके सामने बयान किया था के सरपंच को उन्होंने मारा है.

"आप अपना ध्यान रखिये चची. एक गलती तोह मैंने आपके साथ पहले हे अनजाने में कर चूका हु. अब दूसरी नहीं करूँगा. मुमकिन हुआ तभी बात करेंगे नहीं तोह फिर कुछ और तरीका.", अर्जुन अब इधर से उठ कर कार की तरफ बढ़ने लगा था. ऋचा आ चुकी थी और अनुपमा से मिल कर वो भी अर्जुन के बराबर हे चलने लगी.

"ध्यान से चलना कार.", सुशीला बुआ ने अर्जुन को हिदयात दी और वो पलट कर मुस्कुरा दिया. जाली वाले दरवाजे के पीछे से मधुलता बड़े गौर से दोनों को देख रही थी. अर्जुन का उसकी बेटी के लिए दरवाजा खोलना, इतना हंस हंस कर बोलना कही कुछ और तोह नहीं. दिमाग भी वैसा हे था जैसी करम. अर्जुन वह से जा चूका था और इधर मधुलता सीधा चन्दोर देवी के कक्ष में आ कड़ी हुई.

"आप कई बारी कुछ ज्यादा हे बोल जाती हो माँ जी.", चंद्रो देवी ने इस बात पर बस फीकी हंसी दिखा दी. वो बिस्टेर पर बैठ कर इत्मीनान से रोटी सब्जी खा रही थी.

"बात ऐसी है मुन्नी के वो है अभी kam-umar और तू है उस से बड़े बचे की माँ. कई बार तू भी काण्ड कुछ ज्यादा हे बड़े कर जाती है. मैं तोह न बोलती तुझे कुछ.", मधुलता के चेहरे पर सख्त भाव उभर आये थे अपनी सास की बात सुन्न कर.

"रेशमा कोई राह चलती लुगाई तोह न है माँ जी? मौसी है वो मेरी.", अब जैसे चंद्रो देवी को अपनी गलती का एहसास हुआ.

"छोड़ उस बात को और मैंने कौनसा गोली उतार दी तेरी मौसी के? वो अपनी हद्द में रही और मैं मेरी में. और तू भी रह जितना तुझे समझाया है. न अब तेरे पास फ़ौज है और न तेरी मौसी के पास. मेरे पास जो है वो मैं दांव पे लगाती न किसी हाल में. गलती से भी उलझ न जाइयो इस वाले अर्जुन से. उस अज्जू से मुठभेड़ में raja-maharaja, chor-daikait, pehalwan-jamindaar कत्थे हो के भी जमीन चाट गए थे और ये उस से भी 10 कदम आगे है. लड़के की तरफ तेरी नजर खराब हुई न मुन्नी तोह देहलीज से बहार कर के छाती से गुलाबो का बारूद उतार दूंगी.", अपनी हे रौ में बह कर चंद्रो देवी ने अपना इरादा साफ़ कर दिया था के अब हवेली में कोई ऊंच नीच नहीं होनी चाहिए. मुन्नी के पास भी अभी ज्यादा कुछ बचा नहीं था.

"वक़्त बताएगा माँ जी के फ़ौज किसके पास है. रही बात अज्जू की तोह मेरा उस से न तब कोई लेना देना था और न मैं उसकी बात आज करती. आप अपने करार पर रहो और मैं मेरे पे. मेरी माँ तक ये पंहुचा या इसका दादा तोह वो किसी के लिए ठीक न होगा. और रोटी ला के दू?", मधुलता और चंद्रो के बीच जाने कौनसा karaar-nama था जिस से ये बंधी थी. लेकिन इतना साफ़ था के दोनों की तरफ से एक भी गलती होने की सूरत में इस हवेली में भी बहोत कुछ घट्ट सकता था.

"ना.. तेरी बात सुन्न के हे पेट भर गया. ले जा थाली और जा के नाश्ता कर ले. ब्याह में हवेली की बहु के हिसाब से हे रहियो, शंकर की पहली बन ने की गलती न हो.", जाते हुए भी मधुलता का चेहरा तमतमा गया था.

'बुढ़िया, तू किसी दिन ऐसी टाँगेगी की अपनी हालत पे खुद तरस आएगा. शंकर की पहली तोह मैं हु हे और इस अर्जुन का भी खेल मैं हे ख़तम करुँगी.', मैं में हे सबको कोसती हुई वो बहार आँगन में बर्तन धोने वाली जगह तक पहुंचते पहुंचते वही विधवा और मासूम वाला मुखौटा ओढ़ चुकी थी. सुशीला बड़े गौर से सब कुछ देख रही थी और उसने पूरी बात सुनी थी बगल वाले कमरे से. एक वही थी जिस से मधुलता उलझने की गलती नहीं कर सकती थी लेकिन सुशीला दिल से अर्जुन को अपना मानती थी और अब उसने ठान लिया था के इस मुन्नी को कैसे उसकी औकात दिखानी है.

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कुमार सारंग के महल में कल चूल्हा नहीं जला था और आज सवेरे भी कुछ हालत वैसी हे थी लेकिन अपनी बेटी द्वारा चाय देने पर वो मन न कर सका. इस बड़े shayan-kaksh के बहार हे ये बैठक थी जहा सारंग पूरी रात जागता हुआ बैठा रहा था. लतिका के आने पर हे उसकी तन्द्रा भांग हुई

"आप भी नहीं सोई न बिटिया?"

"मुझे महल में अब नींद नहीं आती पापा.", लतिका के लहजे में इस वक़्त कोई शाही व्यवहार न था और एक वही थी जिसके सामने सारंग भी कुछ हद्द तक आम व्यक्ति की तरह रहता था.

"आपको आदत दाल लेनी चाहिए महल की. कितना समय और अविवाहित रहेंगी? पुष्पक ने हमे पहले हे परेशां किया हुआ और आप उनकी के pad-chinho पर चल रही है. आपकी बुआ के संस्कार के बाद आप चाहे तोह हमसे विचार कर सकती इस बारे में."

"भाई आधी रात के बाद आये थे और अभी भी वो महल के बहार उद्यान में बैठे है. उन्हें चाय दे सकते है?", लतिका द्वारा याद करवाने पर सारंग ने अपना कप भी ट्रे में रख दिया.

"आपके साथ हम भी चलते है.", लतिका ने खुद हे वो ट्रे उठा ली जबकि 2 दासी दरवाजे से बहार कड़ी जैसे इन्तजार में थी की कब उन्हें पुकारा जाए.

"आप कोई ऐसी वैसी बात मैट करना पापा. भाई बताते नहीं लेकिन वो अंदर से बहोत ज्यादा हे दुखी है. बिंदिआ दीदी अगले 2 घंटे में यहाँ पहुंच जाएंगी और उन्हें लेने भाई खुद एयरपोर्ट जा रहे है.", सारंग की चाल में वही आकर्षण था जो उसके व्यक्तित्व में था. और उसके बराबर चलती ये खूबसूरत गुलाब सी लतिका कुछ ऐसी थी जैसे उपवन में विचरण करती swarn-mrigya. ढेरो घराने के रिश्ते ठुकरा कर अब वो दिल्ली के किसी कॉलेज अस्त. प्रोफेसर नियुक्त थी.

"प्रणाम राजा साहब.", पुष्पक इतनी सुबह भी कल वाले कपड़ो में था नंगे पाँव लेकिन आँखों पर काले रंग का चस्मा लगाए. सारंग आज पहली बार जैसे नियम से अलग अपने बेटे के हे बगल में बैठा था.

"ये आपको शोभा नहीं देता राजा साहब. हम सेवक है आपके और समकक्ष नहीं बैठ सकते.", पुष्पक तुरंत उठने लगा था लेकिन सारंग ने अपने बेटे को कलाई से पकड़ कर बगल में वापिस बैठने को विवश कर दिया. दोनों को चाय का एक एक कप दे कर लतिका भी उनके सामने हे कुर्सी पर बैठ गयी.

"हम इस लम्हे में इस लड़की के पिता है जो आपकी बहिन है कुंवर सा. जो पहले से नालायक हो उस से कोई दुःख नहीं होता. लेकिन जो श्रेष्ठ हो और फिर भी वो जीवन को गंभीर न ले, उस से जरूर नाराजगी होती है. आप हमारे वंश को आगे बढ़ा सकते थे पूरे maan-sammaan के साथ लेकिन ऐसा नहीं किया.", सारंग अभी कुछ और भी बोलता लेकिन लतिका ने तुरतं बगावत दिखा दी.

"पापा, मैंने पहले हे आपसे कहा था के आप भाई के साथ कोई गंभीर बात नहीं करेंगे. आप अगर यही सब कहने आये है तोह फिर मुझे खेद होगा लेकिन आप हमे बात करने दे.", पुष्पक जैसे इस पल में यहाँ था हे नहीं जो बस मुस्कुरा दिया व्यथित होने पर भी.

"क्षमा देवी क्षमा करे हमे. दिल की बात अक्सर होंठो पर आ जाती है जब रहबर बगल में बैठा हो. वैसे आपके पूजनीय ताऊ जी कैसे है? और हम देख रहे है के अब आपने अपनी मौजरी भी उतार दी बाकी शाही निशाँ के साथ."

"वो वैसे हे जैसे आज से 32 साल पहले थे राजा साहब. वक़्त के साथ जैसे और ज्यादा बेहतर राजा बन चुके है. ताई जी ने भी अपने पिंटू का स्वागत गले से लगा कर किया था और उतना हे स्नेह हमे इन्दर भैया ने दिया. हाँ आपसे अनुजती लिए बिना हमने वो मौजरी अपने भतीजे को सौंप दी.", पुष्पक ने चाय का एक घूँट ले कर नजरे अपनी बहिन की तरफ राखी जिसको चश्मे के ऊपर से दिख नहीं रहा था के उसका भाई उसको देख रहा है या कही और.

"राजा.. हम्म्म. चलो तुम उन्हें इतना मान तोह देते हो. ाची बात है और अपने उन राजा साहब के सामने गुहार लगाने के बाद सचमुच सुनवाई हो हे गयी.", सारंग क्या चाहता था ये तोह किसी को क्या खबर थी लेकिन पुष्पक दुःख में भी मुस्कुराये जा रहा था.

"आज भी हम उनके साथ वही महसूस करते है जो बाल्यावस्था में करते थे. उन्हें आदेश दिया और पल भर में उन्होंने कार्य अंजाम दे दिया. वैसे राजा साहब, आपसे हमने कल कहा था के हम हमारा ौधा छोड़ रहे है. 3 बरस बाद वो स्थान हमारे भतीजे को हम स्वयं दे देंगे, आपकी अनुमति से. वसीयत तोह सब आपकी हे है बस वो नाम हम अगली पीढ़ी में देना चाहते है.", लतिका बड़े गौर से सुन्न रही थी और सारंग मुस्कुरा उठा अपने बेटे की ऐसी पागलपन वाली बात सुन्न कर.

"जानते हो अगर वो यहाँ आएगा तोह क्या हशर होगा? हम हमारी बात नहीं कर रहे लेकिन राज और इंद्रनील से तुम वाकिफ हो.", ये एक साफ़ धमकी थी सारंग की और पुष्पक शांत हे रहा. वो अपने पिता से कभी अनुचित बात करता भी नै था.

"हमको तोह नहीं लगता के वो युवक साधारण मनुष्यो से रुक पायेगा, राजा साहब. आपको मुंशी दादा जी तोह याद हे होंगे? उनसे कुछ बेहतर है वो और ताऊजी के एकमात्र निजी. आपको जरा भी निराशा नहीं होगी हमारे भतीजे से मिलने पर. हम खुद उन्हें लेके आएंगे और वापिस छोड़ कर भी आएंगे.", और सारंग ये भी जानता था की पुष्पक के मुँह कोई नहीं लगेगा अगर वो ठान चूका हो.

"आपका जो दिल करे वो कीजिये कुंवर. आपको वह कोई परेशानी नहीं हुई तोह इसके बदले हम भी सिर्फ इस व्यक्ति को आने की इजाजत देते है. इसके अलावा हर नियम वही है और बरकरार रहेगा. पंडित जी के कोई भी सुपत्र इधर जोर आजमाइश पे आये तोह उनको शमशान नसीब होगा पूरे सम्मान के साथ. और हम ये भी जानते है की उनके सुपुत्र भी कुवंर इंद्रनील और राज के लिए यही सोच रखते है. आप ठहरे संत महात्मा जिनकी रगो में समय के साथ पानी भर चूका है.", सारंग अब व्यग्र हो कर यहाँ से उठ कर चल दिया.

"आप चलेंगी हमारी साथ दीदी को लिवा लाने?", पुष्पक ने बिना हे laag-lapet लतिका से पुछा तोह वो मुस्कुरा उठी. एक यही भाई था जिसको वो पसंद करती थी लेकिन गुस्सा भी हो जाती थी जब जब कारनामे पता चलते थे.

"आप किसी को कष्ट नहीं देंगे, maar-peet नहीं करेंगे तोह हम अभी कपडे बदल कर आ रहे है. आप कार उधर हे ले कर आये, ड्राइव हम करेंगे.", लतिका उठ कर जाने लगी थी.

"जो आगया देवी. सेवक वही मौजूद रहेगा. हाँ राजा साहब से कहती आएगा के ध्वज झुका देना चाहिए इस अवसर पर. हम कहेंगे तोह गुस्ताखी कही जायेगी और आप कहेंगी तोह आदेश.", गंभीरता में भी सिर्फ भाई बहिन हे मजाक कर सकते है और ऐसा हे कुछ इन दोनों के बीच था.

"आते है.", लतिका एक अदा से आगे बढ़ गयी और पुष्पक फिर से gambhir-bhavuk. अब वो बिंदिया और शबनम को लेने जा रहा था. इस अवसर पर भी इंद्रनील का न आना जैसे उसकी पीड़ा में इजाफा कर गया. अभी भी वो नंगे पाँव चलता हुआ दूसरी तरफ बढ़ा था और कुछ आगे अपने चाचा राज्यवर्धन से सामना हो गया जो संस्कार की त्यारियां करवा कर वापिस आ रहा था.

"सुना है हमारे भतीजे श्री सियारो के घर मुलाकात करके आये है.", वो आदतन गलत जुबान से हे मुखातिब हुआ लेकिन ये भूल गया था के जो सामने है वो कुंवर पुष्पक है.

"जी चाचा जी और हम आपको एक कबीले गौर बात बताये? वो सियार भी शरीर और हिम्मत में इतने बड़े है की अकेले हे रेगिस्तान के 5-10 शेर निबटा दे. हमे तोह यकीन हे नहीं था लेकिन अब जान गए है की उनका वंश एक नरसिंघ का है बस नाम चाहे सियार लो या फिर सेवक. भगवन नारायण अपनी कृपा रखे और आपका उनसे सामना न हे हो. खम्मा घनी.", राज्यवर्धन तोह मैं हे मैं जल कर राख हो गया था ऐसे अपमान से लेकिन पुष्पक के थोड़ा और मुँह लगता तोह वो ाचे से उसकी िज्जात्त उतार देता. ज्यादा कुछ कहे बिना वो अपने बड़े भाई की तरफ चल दिया.

"घनी खम्मा छोटे कुंवर सा."

'जिस दिन हाथ लगे न मेरे वो, तेरे सामने हे उनकी अर्थी उठेगी. आजा पंडित का हितेषी बड़ा.'

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"तुम ऐसे क्यों चल रही हो मरीना? रात कुछ ऐसा वैसा तोह नहीं हो गया?", मरीना ऊपर वाले कमरे में आ रही थी और उसके पीछे हे गौर से देखती हुई अलका. ऋतू अभी तक खुद को बंद किये जाने कब अर्जुन के बिस्टेर पर वो तकिया बाहों में लिए सो चुकी थी. पिछले हिस्से में यहाँ कमरे में पहले से हे आरती, जसलीन, विन्नी दीदी और कोमल दीदी मौजूद थी. हिमानी को उसके घर अभी तारा हे छोड़ने गयी थी.

"ये रात कुछ ज्यादा हे टल्ली थी अलका और मुझे लगता है की सीढ़ियों से गिर होंगी तभी चाल में लड़खड़ाहट है.", आरती की बात पर मरीना हेल से मुस्कुराये. वो कैसे कहती की कल जोश जोश में वो उस हथियार से टकरा गयी जिसने आधे में हे उसकी दुर्गति कर दी थी.

"ओह.. जसलीन तुम तोह ठीक लग रही हो लेकिन कपडे पे तुम्हारे भी खून था शायद. मरीना तुम थोड़ा आराम कर लो अगर ज्यादा दर्द है तोह.", अलका का दिमाग तोह तभी से घूमा हुआ था जबसे उसने ऋतू को दर्द में देखा था.

"ये भी इस मरीना की वाइन का किया धरा है यार. गद्दे को भिगो आयी थी ये जब छत्त पर गयी थी बोतल लिए. आप तोह निचे आ कर सो गयी और जब मैं वह सोने गयी तोह बिना परवाह किये उसी गद्दे पर पसर गयी. नए शार्ट थे वो मेरे लेकिन कोई बात नहीं. वैसे सच कहु तोह याद मुझे भी कुछ नहीं के मैं कैसे ऊपर पहुंची पर थैंक्स तोह अर्जुन जो खुद गद्दे से उठ कर फर्श पे सोया और मुझे वह सोने दिया.", जसलीन के बयान से अलका की हालत हे खराब हो गयी. विन्नी दीदी तोह अलग हे चुस्ती फुर्ती से भरी देखि थी खुद अलका ने. मतलब साफ़ था के तीनो ने हे कुछ भी नहीं किया था.

"वो चादर पे अर्जुन का ब्लड था जिसको लिए विन्नी दीदी सो रही थी.", अब मरीना अंदर हे अंदर थोड़ा हिली लेकिन आँखें मूँद कर वो करवट के बल लेती रही.

"बताया तोह था कल प्रीती ने की अर्जुन के चोट लगी है. रात में पट्टी खुल गयी होगी बेचारे की.", कोमल दीदी ने भी अब ये सही अनुमान दिया तोह अलका निरुत्तर हो गयी.

"हाँ. और वो पागल अभी भी आराम करने की जगह काम और bhaag-daud में लगा है. वैसे सबने नाश्ता किया लेकिन ऋतू ने नहीं. कहा है वो शहजादी?", भोजन तोह क्या अलका ने तोह अभी तक चाय भी न पी थी ऋतू के चक्कर में. उसके पूछने पर जवाब फिर से कोमल दीदी ने दिया.

"वो कह रही थी की उसका सर थोड़ा भारी है लेकिन हैं वो अर्जुन के कमरे में हे. शायद अल्कोहल का इफ़ेक्ट अभी तक उसपे है.", विन्नी ने कहने को तोह ये कह दिया लेकिन अलका हे जानती थी की सच क्या है.

"वो ऐसा है न के सुबह अर्जुन ने कसम दी थी उसको की आज नाश्ता एकसाथ हे करना है. ऋतू अब तभी कमरे से निकलेगी जब वो आएगा. आप सब उसको मन हे लेती खाने के लिए इसलिए वो बंद है. हैंगओवर तोह जिनको हुआ है उन्हें तोह खबर तक भी नहीं. जिसने थोड़ी से पी वो शराबी हो गया.", अलका आँख मार कर हंसती हुई कमरे से निकल कर अर्जुन वाली तरफ बढ़ चली. निचे आँगन में ऋचा को अपनी दादी से मिलते देख वो थोड़ा तेज भागी. लेकिन एक गहरी मुस्कान से वो बस हलके से खुले दरवाजे के अंदर का दृश्य देखने लगी.

अर्जुन और ऋतू की आँखों में आंसू थे लेकिन ऋतू को अपनी गॉड में किसी फूल की तरह उठाये वो सबकुछ भूल कर बस होंठो को चूमे जा रहा था. शायद ये सब ऋतू कर रही थी और ऐसे हे वो अर्जुन को बिस्टेर पर गिराए रोटी हुई पूरे चेहरे को अपने होंठो से सजाने लगी.

'साला इनका तोह मेरी भी समझ से बहार है. वो भी रो रही और ये भी. ऊपर से दोनों हैं कहा ये भी भूल के बस लगे हुए है. वॉचमन अलका जो है इनकी सुरक्षा में. लव यू बोथ.. उमाहहह..', अलका ने देखा की अब ऋतू अर्जुन के सीने पर सर रखे लेती है और अर्जुन बस उसके सर को सेहला रहा है तोह हलके से खंखार दी.

"अलका, दरवाजा उधर से बंद कर दे. एक घंटे तक कोई इधर दिखना नहीं चाहिए.", ऋतू ने चिल्ला कर कहा था आँखों में अभी आंसू थे लेकिन हलकी सी मुस्कराहट के साथ.

"जी मेमसाब. सही तरीका है हैंगओवर उतरने का ये भी. वैसे थोड़ी मेरी भी छड़ी हुई है.."

"बंद कर दे दरवाजा अलका.. Ummmm",Ritu के चीखने के बाद अलका ने बस यही दृश्य देखा था जिसमे वो अर्जुन के होंठो को दांतो के बीच बंद कर चुकी थी.
 
अर्जुन और ऋतू का वर्णन ख़तम नहीं किया है दोस्तों. और न हे जल्दबाजी की है. रोका है उस जगह जहा अलका का दृष्टिकोण था और शुरू फिर से होगा जब अर्जुन घर में आते हे कही और न जा कर सीधा अपने कमरे में आया.

अभी पुष्पक और बिंदिया का भी एक भावनातमक दृश्य आएगा क्योंकि इस किरदार को भी ाचे से खोलना है. कुछ पहलु शामिल होंगे उसके ऐसे जीवन और फिर जो दुःख बिंदिया को मिले. जब लतिका शामिल होगी उनकी बातचीत में तोह क्या असर होगा ये भी देखना होगा.

अर्जुन ढूंढेगा लाजवंती को या अभी वो इस बारे में सोचेगा हे नहीं? मरीना का राज खुलेगा या वो अभी फिर हिम्मत दिखाएगी अर्जुन के साथ? बबिता भी बहोत कुछ साँझा करेगी आने पर.

मुन्नी और चंद्रो देवी के राज थोड़ा समय लेंगे खुलने में.

आप सभी के प्रेम के लिए धन्यवाद. कल अपडेट दूंगा.
 
अपडेट 173

Milan-Virah (ा)

"मुझे पता है अंदर आप हो. दरवाजा खोलो.", ये अर्जुन था जो ऋचा को घर में ले कर आते हे सीधा बहार से हे अपने कमरे की तरफ बढ़ चला. यहाँ से दरवाजा अंदर की तरफ से हे बंद था और इस बात का पुख्ता इशारा की अंदर वही है जिसका दिल अर्जुन से अलग न था. पहले जहाँ थप्पड़ लगने पर उसको हैरत हुई थी वही इतनी देर तक ऋतू से दूर रहते हुए उसने महसूस किया था वो खुद हे जिम्मेवार्ट था. क्या गुजर रही होगी ऋतू के दिल पर जिसने अनगिनत दुःख ख़ुशी से स्वीकार किये थे सिर्फ उसकी ख़ुशी के लिए. यहाँ दरवाजे पर दस्तक और इस आवाज को सुन्न कर तकिये में मुँह दबाये कुछ शांत हुई ऋतू की आँखों में फिर से आंसू आ चुके थे.

"ारु, सॉरी...", ऋतू अभी दरवाजे के उस तरफ हे कड़ी थी और जैसे हे दोनों की नजरे आपस में मिली भीगी आँखों लिए उसके सामने खड़े अर्जुन ने लपक कर उसको अपनी बाहों में भर लिए. स्प्रिंग की वजह से दरवाजा स्वतः हे बंद हो चूका था और एक दूसरे की नाक से नाक लगाए Arjun-Ritu बिना कुछ बोले बस वो सब तड़प भुलाने लगे जो पिछले 3 घंटो में उन्होंने सही थी.

"ी ऍम सॉरी ऋतू. मैं बहोत बुरा हु..", अर्जुन से कुछ कहते नहीं बन रहा था और उसकी बात सुन्न कर ऋतू के गुलाबी गोर गाल पर वो ashru-dhara कुछ ज्यादा हे तेज हो गयी. आँखें बंद किये वो दोनों बस एक दूसरे के चेहरे से चेहरा लगाए थे.

"माफ़ कर दे ारु.. तुझे अनजाने हे दर्द दे बैठी.. तू मेरी गलती पर भी खुद को हे कोस रहा है. प्लीज मुझे छोड़ कर मैट जाना ारु, मुझसे दूर नहीं जाना.", अब हालत ये थी की दोनों हे एक दूसरे से माफ़ी मांग रहे थे और अर्जुन ने अपने हाथो में थामे उस खूबसूरत चेहरे से बहते आंसू दोनों अंगूठे से साफ़ करते हुए ऋतू के होंठो को हल्का सा चूम लिया.

"तुमसे 180 मिनट दूर रहकर मुझे बस इतना हे एहसास हुआ की मैं कितना अधूरा हु ऋतू. ये एहसास इसलिए था क्यूंकि तुम्हारा दर्द मुझे थोड़ा वक़्त से समझ आया.", अर्जुन और ऋतू के बीच कभी शारीरिक वासना तोह थी हे नहीं. आज भी उत्तेजना की जगह दोनों के दिल बस एक दूसरे के लिए लालायित थे, बाहों में भर कर बस एक दूसरे के करीब होने को. आगे बढ़ते हुए कब ऋतू उचक कर उसकी गॉड में आ लिपटी और कब वो हल्का सा चुम्बन इस कदर गहरा हो गया इसका वर्णन आसान तोह नहीं. आंसुओ का वो खारापन भी होंठो को वो सुख दे रहा था जो वही समझ सकता है जो बरसो अपने प्रेम के लिए तड़पा हो.

शनये शनये आगे बढ़ता हुआ अर्जुन बिस्टेर तक आया हे था, जहा कुछ देर पहले रोटी हुई ऋतू कितने हे दर्द में बस अर्जुन के वह होने का एहसास ले रही थी. लेकिन ऋतू की जगह अर्जुन बिस्टेर पर लुढ़का जो उसको भी पता न चला के ये हुआ कैसे. पूरे चेहरे को ऋतू दोनों हाथो में लिए कुछ पल देखती रही. अर्जुन ने पनियाई आँखों में झाका तोह वो ऋतू के चेहरे पर उसके विपरीत अब हलकी मुस्कराहट थी.

अर्जुन अभी और चौंका जब उसको ज्ञात हुआ ऋतू की सजगता का. उसको तोह जैसे aas-pas का कुछ भान हे न रहा था लेकिन ऋतू अपने प्यार को निहारने के साथ हे वो हलकी सी आहात भी पहचान गयी जो दूसरे दरवाजे के पीछे से आयी.

"अलका, दरवाजा उधर से बंद कर दे. एक घंटे तक कोई इधर दिखना नहीं चाहिए.", ऋतू ने चिल्ला कर कहा था आँखों में अभी आंसू थे लेकिन हलकी सी मुस्कराहट के साथ.

"जी मेमसाब. सही तरीका है हैंगओवर उतरने का ये भी. वैसे थोड़ी मेरी भी छड़ी हुई है.."

"बंद कर दे दरवाजा अलका.. Ummmm",Ritu के चीखने के बाद अलका ने बस यही दृश्य देखा था जिसमे वो अर्जुन के होंठो को दांतो के बीच बंद कर चुकी थी. अर्जुन ने स्वयं को पूरी तरह ऋतू के हवाले कर छोड़ा था और अलका ने टेलीविज़न चला कर उस कमरे से आती हर ध्वनि को विराम दे दिया.

"मैं अपने आप से हे परेशां थी ारु. कल रात मैंने जाना की मैं क्या हु.", ऋतू अब जैसी एक अलग हे सोच में बड़े आराम से अर्जुन के सीने पर सर रखे पूरी तरह लेती थी. अर्जुन उतने हे प्यार से उसके भूरे बालो को सहलाता हुआ बड़े प्यार से, बस उसकी आवाज सुन्न रहा था.

"ये जो शराब है न भाई, ये इंसान को एक सच तोह दिखा देती है. आप कमजोर या नशे में जाने लगो तोह सबसे पहले ध्यान अपने प्यार का हे आता है. अलका ने मुझे किश किया था कल रात और बंद आँखों से मुझे तुम नजर आये. मैं आना चाहती थी तुम्हारे पास लेकिन मैं तोह बस चाँद गिलास बियर के सामने हार गयी. बहार से सबको लगा होगा की मैं नशे में आउट हो चुकी हु. लग्न भी चाहिए क्योंकि बहार से तोह मैं खुद लाश हे थी लेकिन अंदर से सब अलग था और जाने उस फीलिंग क्यों कहते है जो वो थी. तुम्हारे साथ हर गुजरा समय घूमने लगा लेकिन जिस्म जैसे लकवा मार चूका था.", ऋतू की बात सुन्न कर अर्जुन अंदर से जैसे वही महसूस करने लगा था जो ऋतू उसको बता रही थी.

"फिर दीदी?", भावनाओ में एक बार फिर वो अपनी प्यारी दीदी का वही ारु बन चूका था जिसको उतनी हे पवाह थी जितनी हर परवाह करने वाले छोटे बही को होती है.

"फिर मुझे लगा किसी ने उस जहर को काटने की दवा दी और मैं इतंजार करने लगी कब मेरा जिस्म हरकत देगा. और भी बहोत कुछ हुआ होगा क्योंकि सबकुछ याद नहीं. उठी तोह aas-pas के माहौल ने रही सही हिम्मत कमजोर कर दी. जसलीन और विन्नी दीदी नहीं मिले थे और तब तक मेरा मैं हजारो गलत विचार बना चूका था. अलका समझा भी रही थी मुझे की मैं कण्ट्रोल करू लेकिन जाने क्यों मैं खुद को रोक हे न पायी जब मैंने वो दृश्य देखा.", ऋतू की आँखें तोह सूख चुकी थी और बात कहते हुए वो कुछ सुकून में भी थी लेकिन मैं में जैसे द्वन्द छिड़ गया था.

"क्या दृश्य था दीदी?"

"तेरे ऊपर जसलीन और बगल में विन्नी दीदी. एक की चादर खून से सनी थी और दूसरी के शॉर्ट्स. मैं ये भी भूल गयी थी की तू इतना गलत काम नहीं कर सकता की अपनी बहिन को किसी और के सामने प्यार करे. तुझे भी चोट लगी हुई है तोह उसका खून भी हो सकता है. जसलीन के वो निशाँ उतने गहरे भी नहीं थे जितने किसी लहू के होते है. ारु मुझे पहली बार लगा की मेरे प्यार में कुछ कमी है और मुझसे वो हो गया जो करने से पहले मैं अपना हाथ काट सकती हु.", ऋतू फिर से ग़मगीन होने लगी थी लेकिन अर्जुन ने दोनों बाहों में लेते हुए उसका माथा चूम कर कहा.

"तभी तोह कहा था मैंने की मुझे माफ़ कर दो. वो चादर पर खून मेरा नहीं था लेकिन मैं वो सब करना हे नहीं चाहता था.", अर्जुन की बात सुन्न कर ऋतू के चेहरे पर कुछ अलग से भाव उभर आये.

"विन्नी दीदी और जसलीन तोह बहोत बाद में आये थे दीदी. मरीना आयी थी ऊपर जब मैं सो रहा था. वो नशे में लग रही थी और मेरे साथ मस्ती मजाक करती हुई बहोत खुश थी. फिर उसने वो सब कहा जो मुझे सपने में भी उम्मीद नहीं थी. मैं फिर भी उसको कैसे न कैसे मन हे चूका था लेकिन उसने वो किया जो नहीं होना चाहिए था..", इसके बाद अर्जुन ने पूरा मामला बयान कर दिया जिसको सुन्न कर जाने कितने हे तरह के भाव आये और गए ऋतू के चेहरे पर लेकिन अंत में वो उसके सीने पर गाल रख कर बड़े आराम से लेट गयी.

"अलका अक्सर कहती थी की ऐसा सिर्फ हम दोनों के साथ नहीं है जो कभी कभी तुझे सब भूल कर वैसे देखने लगती है जैसे ये समाज इजाजत नहीं देता. हाँ लगभग 10 महीने तोह मैंने तुझसे सीधे मुँह बात भी नहीं करि और अलका को भी नहीं बताती थी की मेरी दीवानगी अब पहले से कही आगे बढ़ चुकी है तुम्हारे लिए. फिर मैंने जब गौर किया तोह वैसा चाहने वाली और भी दिखी लेकिन जिसने तुम्हारे दिल को जान लिया फिर वो तुमसे सिर्फ प्यार हे कर सकती है ारु, सिर्फ प्यार. मरीना ने भी तोह गलत नहीं किया लेकिन क्या ये सब कभी थमेगा ारु?", ऋतू ने पहली बार थोड़ा खुल कर ये बात उठाई थी जिसमे वो चिंतित थी अर्जुन के bahu-sambandho के प्रति. अर्जुन ने थोड़ा कस कर ऋतू को सीने से लगा लिया.

"100 दिनों में मैं खुद नहीं जानता की मैंने बरसो का जीवन कैसे जी लिया. मैं चाह कर भी उस इंसान की तरफ से अपने कदम पीछे नहीं ले पता जिसकी आँखों में खालीपन, दर्द, प्यार या समर्पण दीखता है. मैं शायद कुछ हद्द तक बदल जाता हु लेकिन आपके साथ मुझमे हवस की जगह वही सब अपनी नजरो में मिलता है जो मैं दुसरो के देखता हु. आप एक बार मुझे बाँध दो दीदी, कही कोमल दीदी का डर सच हे न हो जाए.", अर्जुन की बात पर ऋतू ने शरारत से उसकी नाक पर हलके से काट लिया. गंभीर समय में भी उसकी मस्ती देख अर्जुन भी जैसे वो सब भूलने लगा था जो कह रहा था.

"प्यार अपनी जगह है और तुम्हारी लाइफ की ये बड़ी प्रॉब्लम अपनी जगह. घोडा सिर्फ रेस में हे नहीं दुड्ता ारु. वो रेस के लिए तैयार बरसो की म्हणत करने पर होता है. तुम्हारा एक कड़वा सच ये भी है की फ़िलहाल जो भी इन दिनों में तुम में बदलाव आये है वो कोई और तोह झेलने से पहले शायद अपांग भी हो सकता था. तुम बोलते नहीं और मैं भी तुम्हे सामने से बताती नहीं लेकिन हफ्ते के 7 दिन तुम्हे हर अलग इंसान सँभालने की कोशिश करता है क्योंकि हर रोज एक नहीं संभल सकता, ात लीस्ट हम से तोह नहीं. मेरी भी गलती है की तुम्हे शादी के दिनों में कुछ भी वैसा करने से मन किया, ये भूल कर की तुम्हारा शरीर इस बदलाव को कितनी मुश्किल से सेहन कर रहा है.", ऋतू भी अस्पष्ट थी या वो कही ज्यादा हे चाहत रखती थी जिसकी क्या हे परिभाषा हो.

"मैं कोशिश कर सकता हु कण्ट्रोल करने की.", अर्जुन के चेहरे पर कोई विशेष दर्द न दिखा जब गलती से ऋतू का हाथ उसके चोटिल कंधे से आ टकराया. लेकिन वो गलती जल्द हे समझ गयी.

"सॉरी. पता नहीं चला की तुम्हारी चोट पर हाथ आ गया. और ये कण्ट्रोल उतना जरुरी भी नहीं है बस माहौल ऐसा है जिसमे कोई छोटी सी भी गलती कब बड़ी बन्न जाये पता तक नहीं चलेगा ारु. तुम मुझे अभी भी प्यार कर सकते हो और जब ठीक लगे तोह उसको भी जिसको पसंद करते हो.", ऋतू का दिल बस आराम चाहत था लेकिन फिर भी उसने कोशिश की.

"ऐसे हे कुछ देर मेरे साथ सो सकती हो? मैं रात भर सो नहीं पाया.", अर्जुन ने ऋतू की पतली कमर से आगे बानी उस उठान पर थपकी देते हुए कहा तोह वो भी गुलाबी होंठो से मुस्कुरा कर एक गीला चुम्बन अर्जुन को देने के बाद बिना कुछ कहे बड़े आराम से शांत हो गयी. वो एक घंटा संसर्ग के लिए तोह इन्हे नहीं चाहिए था. दिल का गुबार हल्का करने के बाद उसको सुकून देने के लिए बस ये समय साथ बिताना था. कुछ हे समय में दोनों उस अवस्था में हे नींद में जा चुके थे. घर की chehal-pehal, शादी के माहौल और हर तीसरे व्यक्ति से दूर सिर्फ अपने संसार में.

अर्जुन के शरीर के बदलाव अगर कोई गहराई से समझ पाया था तोह वो सबसे प्रमुख ऋतू हे थी. अलका ने कुछ सोच कर एक नजर उनके कमरे में देखा तोह उसका दिल भी प्यार से भर उठा. दिल से उन्हें दुआएं देती हुई वो हॉल कमरे को हे बहार से बंद करके पिछले हिस्से में चली गयी. अब उसका भी पेट भर चूका था ये उन्हें प्यार से सोये देख.

'बस ऐसे हे साथ रहना, ढेरो रुकावट आएँगी लेकिन सामना करने से हमसफ़र बन्न हे जाते है.'

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पंडित रामेश्वर जी के संसार से दूर राजस्थान के इस रेगिस्तानी शहर में harsh-ullaas से विपरीत माहौल कही ज्यादा हे दुःख भरा था. जहा उस तरफ विवाह का खुशनुमा माहौल था वही क्सक्सक्सक्स शहर में कुमार सारंग के यहाँ कुमारी अनामिका उर्फ़ दमयंती का अंतिम संस्कार आयोजित था. Ram-naam सत्य है के बोल से सेंकडो की संख्या में लोग इंसान की अंतिम भूमि तक वो पार्थिव शरीर लिए आये थे.

दमयंती उर्फ़ अनामिका का जीवन असीम दुःख, त्याग और एकाकीपन से भरा रहा. आज अंतिम यात्रा और daah-sanskaar के समय चाहे जितना भी शाही सम्मान, शौक करता हुजूम और aadha-adhura परिवार शामिल था लेकिन इस पल में भी दमयंती के निकट वो व्यक्ति न था जिसकी उपस्थिति होनी चाहिए थी. ये कैसा प्रेम था जिसमे दुःख सिर्फ दमयंती को हे मिले और अंत में भी वो इंसान mrit-chehra तक देखने न आया. शमशान में अर्थी के समीप सारंग का पूर्ण परिवार था सिवाए महिलाओ के. हर व्यक्ति गंभीर, दुखी या फिर मैं हे मैं उधेड़बुन में खोया.

"राज, पता करो ये कुमार पुष्पक कहा रह गए? पार्थिव शरीर को मुखाग्नि उन्हें हे देनी है.", सारंग सामने लड़कयों से सजाये जा चुके दमयंती के शरीर को देखने के बाद अपने हे करीब गभीरता से खड़े राज्यवर्धन से बोलै जो ज्यादा कुछ कहे बिना हाँ भरता हुआ मुदा और हैरत से उधर हे देखने लगा जहा शमशान का द्वार था.

"भाई साहब. पुष्पक का मानसिक संतुलन तोह नहीं खराब हो गया?", ऐसा हाल सिर्फ उसका हे नहीं था. सफ़ेद पगड़ियों में मजूद धोती कुर्ते वाले वो बुजुर्ग, अधेड़ लोग भी देख रहे थे कैसे पुष्पक अपना मुड़नें करवाए चला आ रहा था. हैरानी की बात थी उसके साथ बिंदिया और शबनम का आना. महिलाओ को संस्कार में आने की सख्त मनाही थी उस समाज में और शाही महिला का शमशान के भीतर होना तोह जैसे कुछ ज्यादा हे अनैतिक था.

"अभी शांत रहिये राज क्योंकि कुमार पुष्पक के पास जरूर इसका जवाब होगा. ऐसे समय पर विवाद करके कोई लाभ नहीं. देखते है ये आखिर चाहते क्या है.", सारंग ने बिंदिया को प्रणाम किया और बिंदिया ने भी भीगी आँखों से उन्हें. शबनम का चेहरा बता रहा था के वो भी शायद अभी चुप हुई है.

"चलिए दीदी, शायद सभी हमारा हे इन्तजार कर रहे है.", पुष्पक बिंदिया को लिए आगे बढ़ने लगा था, चिटा की तरफ. वो अपने कदम रोकने की कोशिश करती रही लेकिन फिर जैसे दिल ने सविकिरीति दे हे दी की पुष्पक गलत नहीं कर रहा. वह खड़ा हर व्यक्ति देख रहा था ये अध्भुत्त और अकल्पनीय अनहोनी.

शमशान का पंडित भी हैरान था लेकिन उसके हाथ से मशाल ले कर पुष्पक ने बिंदिया का भी दाया हाथ उस पर रख दिया. चिटा का एक फेरा पूरा करते हुए पुष्पक की भी आँखों में फिर से आंसू उमड़ आये थे लेकिन वो संयम से अपनी बुआ की बेटी के साथ दमयंती को मुखाग्नि दे कर कुछ पीछे हो गया. मशाल भी चिटा की लकड़ियों के बीच रख कर. हर गुजरते पल के साथ अग्नि तीव्र होती जा रही थी और पुष्पक बस उन लपटों को अपलक निहारता रहा जैसे वो इसकी तपिश से खुद को पिघला रहा हो.

"अगर आप के दिल में अभी और भी बेइज्जत्त करने के विचार है तोह इतना सोच क्यों रहे हो कुमार?", सारंग खुद हे इन दोनों के करीब आ खड़ा हुआ. 30 मिनट बीत चुके थे जिसका एहसास तक न हुआ था पुष्पक को. Bade-bujurg लोग बातें करते हुए धीरे धीरे निकल रहे थे और सारंग को भी जैसे सेहन नहीं हुआ था जो कुछ भी थोड़ा बहोत उसके कानो ने सुना था.

"एक माँ के लिए उसके सभी बचे एक सामान होते है राजा साहब. कुमारी बिंदिया को ये हक़ सिर्फ इसलिए नहीं मिल सकता था की वो एक महिला है? हमने हमारी बुआ के मैं को जाना था और अगर हमारे ऐसा करने से कोई नियम भंग्ग हुआ है तोह सजा के हक़दार भी है. बस हमारे लिए जो मायने रखता है वो परिवार और उचित हक़. हम राजा नहीं है और प्रजा हमको ban-ne नहीं दिया गया.", बिंदिया अपनी सजल आँखों से देख रही थी इस व्यक्ति को. जो दिल से इतना दयालु और साफ़ था. पुष्पक का ये पहलु तोह सिर्फ वही जान पाया था जिसने कभी उसको अपने गले लगाया हो. सारंग खुद अब लाजवाब था क्योंकि उसने भी एक राजा के शाशन में जाना था की जहा पुत्र न हो वह पुत्री हे बागडोर संभालती है. लेकिन वो हरगिज इसमें विश्वास न कर पाया.

"आपके दुःख को हम भली भाँती समझ सकते है बेटी. खैर फिलहाल सबसे पहले आप घर चलिए, यहाँ के सभी कार्य राज देख लेंगे. कुमार पुष्पक, आपको जो ठीक लगे वैसा कीजियेगा. ये एक पिता कह रहा है, न की क्षेत्र के raaj-gharane के प्रमुख.', सारंग के चेहरे पर सिर्फ सपाट भाव थे बेशक पथराई आँखों में अत्यधिक दुःख.

"आप चलिए राजा साहब, हम दीदी और भांजी के साथ आ रहे है.", पुष्पक इस से अधिक कुछ न कहता हुआ एक तरफ हाथ से चलने वाले नल की तरफ बढ़ गया. धीरे धीरे समूचा शमशान निर्जन हो गया था और पीछे बची थी तोह बस दमयंती की निरन्त जलती चिटा. जीवन भर एकाकीपन में जलने वाली का जीवन का अंत भी ठंडक भरा न रहा. पुष्पक hath-mooh धो कर बहार आया तोह शमशान की दिवार पर लिखे उन शब्दों के देख दर्द में भी हलके से मुस्कुरा दिया. 'अंतिम मंज़िल यही है और इंसान जाने कहा कहा फिरता रहा..'

"भाई, तुम मां जी से इतने नाराज क्यों हो? माफ़ करना क्योंकि हमारी मुलाकात हाथ की उँगलियों से भी काम रही है इसलिए ज्यादा नहीं पता लेकिन वो आपके पिता है.", बिंदिया ने बहोत हे नरम लफ्जो में ऐसा कहा था कार की पिछली सीट पर बैठते हुए. कार में आगे अभी लतिका हे विराजमान थी जो अंदर नहीं आयी थी.

"माँ, मां से इस समय तोह सवाल न कीजिये.", शबनम ने अपनी लाल हो चुकी आँखों पर गहरा कला चस्मा लगते हुए खिड़की से बहार इस निर्जन से स्थान को देखते हुए कहा. पुष्पक ने भी कार चालू करने के बाद पिछली सीट को आईने से देखा और आगे बढ़ चला.

"जवाब तोह आपने दे हे दिया दीदी. मैं उनसे नाराज नहीं हु क्योंकि जो खुद हे होश में न रहा हो उसको किसी से क्या शिकायत. आप लोगो ने क्या क्या सहा होगा, कितनी परेशानिया का सामना किया होगा वो भी बुआ के नजरबन्द से जीवन में. भाई राजा और बहिन फ़कीर.. हहहहह.. राखी भी तोह एक कसम है न दीदी? क्यों फिर एक ताक़तवर इंसान ये कसम न निभा सका? क्यों रामेश्वर ताऊजी हे बुआ की देखभाल करते रहे, चाहे अप्रत्यक्ष रूप से सही लेकिन उन्होंने आपकी शिक्षा के साथ साथ बुआ को भी जितना मुनासिब हुआ उतना सहयोग दिया. और हम, कुंवर पुष्पक अपनी इस बड़ी बहिन से 22 वर्ष तक तोह अनजान हे रहे.", पुष्पक ने जो राज खोला था वो जैसे वज्रपात सा कर गया बिंदिया के दिल पर. जिस इंसान के साथ वो जीवन भर बदला प्रतिशोध और षड़यंत्र करती रही वास्तविकता में वही उनका पालनहार निकला. ऐसे हे कुछ भाव शबनम के चेहरे पर भी नजर आये, बेशक आँखों को ढकने के.

"तुम इतने यकीन से ये सब कैसे कह सकते हो की उन्होंने परिवार की मदद की? और क्या जानते हो तुम पुष्पक जो हमे नहीं मालूम? ये सब किसी बहार के व्यक्ति ने कहा तुम्हे?", शबनम अपनी माता का शौक इस पल में भुला कर विस्मित नेत्रों से बस आगे कार चला रहे पुष्पक को देखती रही.

"ताऊ जी और उनका परिवार कभी दान करने वाली जमीन तक पर अपनी पट्टिका नहीं लगवाता दीदी. हमने ये सब अपने कान से सुना था जब बुआ इंग्लैंड से इधर आयी थी और राजा साहब से उनकी बहस हो रही थी. नील भाई साहब ने कोई कुकरम किया था जिस वजह से बुआ उन्हें समझा रही थी लेकिन राजा साहब को वह भी अपने खुले शेर को समर्थन देना था. वजह तोह हम नहीं जानते की ताऊजी ने ऐसा क्यों किया और न हम पूछने की इत्छा रखते है. अब आप खुद हे देख लीजिये की उनके घर से हमने आपसे कल बात की थी और शबनम बिटिया आजादी से इधर है आज.", बिंदिया की आँखों में इस बार जो आंसू थे उनमे पश्चाताप हे भरा था. शबनम अपनी माँ को एक तरफ से लगाती हुई सांत्वना देने लगी.

"मां जी, उतनी हे सुरक्षा और िज्जात्त मुझे उनके पौटे ने भी दी. अपनी गलतियों से मैं तोह उस मासूम को जान से हे मारने गयी थी और इस बीच कुछ करम ऐसे भी किये जिनकी सजा सबसे बड़ी है कानून की नजर में लेकिन पंडित जी के साथ साथ उनके दोनों पौतो ने मेरी पूरी देखभाल की और वापिस अपने घर पहुंचाया. जबकि पुख्ता सबूत थे उनके पास लेकिन उन्होंने बदला लेने की जगह आजाद कर दिया. आप वह गए थे तोह उस से भी मिले होंगे जो पहली नजर में हे ख़ास लगता है?", अर्जुन का एक बार भी शबनम ने नाम न लिया था और कार धीमी गति से चलता हुआ पुष्पक एक बार बगल में बैठी हुई लतिका को देख मुस्कुरा दिया.

"हमारे लिए तोह दिल से राजा हमारे ताऊ जी हे है शबनम. वो दिल से इतने समृद्ध है की बदले की भावना हे नहीं रखते. बस उनके कुछ नियम है जीवन में और उन पर वो अटल है. जिसको हमने उनके करीब देखा वो जैसे अपने आप में हे बेशकीमती है. चलो अब उसके ज्यादा हे मुरीद हो गए जो उसने हमारी भांजी का इतना ख़याल रखा. कुछ और भी जानती हो उसके बारे में?", पुष्पक और शबनम की बातों में लतिका का सबर जवाब दे गया.

"अब नाम भी तोह होगा न भाई उसका जिसकी इतनी बातें हो रही है? और शबनम तुम तोह ले सकती हो न उसका नाम अगर हमारे बड़े भाई इतना सम्मान दे रहे है किसी लड़के को."

"अर्जुन शर्मा नाम है मौसी उसका. उम्र में छोटा है लेकिन उपकार है मुझ पर इसलिए नाम लेना ठीक नहीं लगता. शंकर जी से सामना हुआ था तोह उसके बाद मुझे लगा था के शायद अर्जुन मुझसे वैसे हे पेश आये. भूल गयी थी की बेहोशी की हालत में मुझे मरने से बचने वाला मेरी जान कैसे ले सकता है. कुछ हे समय में 3-3 जीवनदान दे दिए तोह बताओ ऐसे सीधा नाम कैसे ले सकती हु.? उपकार तोह माँ पर किये है उसने लेकिन अब इनके साथ कुछ ममता सी जुड़ गयी है तोह वो इनसे सीधा बात करता है.", शबनम ने पाया था की उसकी माँ ानुस थाम चुकी है लेकिन दुःख जैसे बढ़ चूका था.

"वैसे नील मां जी की अर्धांगिनी नजर नहीं आयी हमे मौसी? और क्या वजह है की मां जी आपने अभी तक विवाह नहीं किया?", शबनम के सवाल भी माहौल से अलग हे थे और लतिका ने पीछे मदद कर पलके झपकते हुए उसको शांत रहने का इशारा दिया.

"बड़ी भाभी उत्तरांचल में है अपने पीहर और हमारे ये भाई साहब कहते है की विवाह समस्याओ का आगमन है. चलिए आप हमारे साथ हमारे कक्ष में आये. दीदी आपको कुछ समय शौक में आयी महिलाओ से मिलना होगा.", कार महल के सामने उद्यान में आ रुकी थी. शबनम को अपने साथ आने क्या न्योता दे कर लतिका ने बिंदिया को भी बता दिया था की अभी shauk-sabha में उसको बैठना होगा.

"दीदी, मैं शाम को मिलता हु आपसे. जरा खदान तक जाना है.", पुष्पक कार से नहीं उतरा और बिंदिया भी ख़ामोशी से अंदर की तरफ चल दी, एक निगाह अपने ममेरे भाई को देख. अवसाद ने फिर से पुष्पक को घेर लिया था और अब वो कुछ लम्हे इस सबसे दूर जाना चाहता था.
 
दोस्तों आप लोग अपडेट की लम्बाई को लेकर निराश होंगे और ऐसा होना लाजमी भी है.

सिर्फ 2 दृश्य हे इस अपडेट में प्रस्तुत किये और सच कहु तोह मेरी सोच के मुताबिक तीसरा दृश्य शामिल करने से अपडेट बहोत अधूरा लगता जिसका परिणाम विपरीत होता. ऐसे दृश्य के बाद हंसी ख़ुशी के दृश्य या संसर्ग क्रीड़ा बेमतलब लगता. फिल्म देख रहे हो शोले और एकदम से इमरान हाश्मी का भीगे होंठ शुरू हो जाए तोह कैसा लगेगा? एयर फिर उसके ठीक बाद पारिवारिक हम आपके हैं कौन.

बस ये भी एक बड़ी वजह थी थकान के साथ साथ जो मैंने इस अपडेट को उस तरह समाप्त किया. भावनातमक पक्ष को नज़र में रखते हुए.

🙏💙
 
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