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अपडेट 206
उन दोनों का प्रोग्राम लम्बा चलने वाला था आखिर सागर को चुदाई के सरे गन सीखने वाला था अनुज तो मैंने सोचा अपने प्यार का भी कुछ किया जाये और ये सोचकर नीतू को फ़ोन लगाया जिसने नहीं उठाया फिर जैसे मैंने जेब में रखा उसका बापिस आ गया.
नीतू- हाँ मेरे राजा...
में- कहाँ है मेरी रानी?
नीतू- घर पर हूँ,
में- मेरे काम का क्या हुआ.?
नीतू- कौन सा काम?
में- भूल गयी क्या? भाई का लुंड मिलते hi?
नीतू- अरे भाई तो तुम भी हो और लुंड तो तुम्हारा भी मिला है.
में- बातें मत बना बता न,
नीतू- हाय मन तो नहीं कर रहा, की उससे तुम्हारी बात आगे बाधाओं?
में- क्यों भाई?
नीतू- फिर उसके साथ भी तुम्हारा लुंड बाँटना पड़ेगा मुझे,
में- चल पागल, ऐसा थोड़े hi होता है... तेरे लिए तो मेरा हमेशा तैयार रहता है,
नीतू- रखना hi पड़ेगा, और उससे पहले मेरा हक़ है समझे?
में- हाँ बीटा समझ गया, तू hi नेरे लिए पहले है.
नीतू- ठीक है वैसे मैंने तुंहारा काम पहले hi कर दिया है कल जाना है तुम्हे तो अचे से बन कर जाना, और सुनो अब समय मत गंवाना कल ाचा सा मौका देख कर अपने दिल की बात बता देना उसे...
में- अरे यार कल hi?
नीतू- और क्या, जितना देर करोगे उतना पछतओग
में- ठीक है, कोशिश करता हूँ,
नीतू- कोशिश नहीं, और फिर ऐसा मौका मैं भी बार बार नहीं निकल सकती..
में- चल ठीक है... कल करता हूँ,
नीतू- अभी कहाँ हो?
में- बाघ में..
नीतू- तुंहरे मां ममी आये हैं न?
में- हाँ नाना मां ममी उनके बच्चे सब.
नीतू- हाँ सुना मैंने बढ़ आई है न वह, चलो मिलती हूँ उनसे आकर.
में- ठीक है..
ये कहकर मैंने फ़ोन रख दिया और कल के बारे में सोचने लगा की कैसे कहूंगा अंजलि से मन की बात, कहीं बुरा न मान जाये.. ये सब सोचते हुए मैं घर की और आने लगा,
इधर किरण पल्ली और लाडो में भी अछि बन रही थी तीनो एक दुसरे के साथ खूब मस्तिया रही थी, और साथ hi मोठे मोठे गन्ने चूस रही थी,
लाडो- क्या बात है किरण बड़े मोठे गन्ने खाने की आदत है तुम्हे?
लाडो ने पल्ली को आँख मरते हुए किरण को चिढ़ाते हुए कहा,
किरण - अरे गन्ने तो मोठे hi खाने में मज़ा आता है जो रास से भरे हो?
पल्ली- अरे तू रास भी निगल जाती है सारा,
किरण- और क्या, तो होता hi पीने के लिए.
लाडो- हाँ ये बात तो सही कही, रास तो पीने के लिए hi होता है चाहे ऊपर के होंठों से पियो या नीचे के होंठों से..
ये कहकर पल्ली को ताली मरकर हंसने लगी,
किरण कक भी ये बात एक पल बाद समझ आई तो उसने आँखें बड़ी और मुँह बनाते हुए पर हँसते हुए बोलै- धत्त लाडो बड़ी वो है तू...
लाडो- देख तो पल्ली हमारी किरण कितनी भोली है..
किरण- भोली नहीं हूँ पर तू बहुत शैतान है
पल्ली- अरे ठीक है, ाचा किरण सही सही बता कोई लड़का पटाया या नहीं?
किरण- नहीं तो,
लाडो- पर तेरा बदन तो सही भर रहा है लग रहा है की कोई खूब मसलता है इन संतरो को.
लाडो ने गन्ने से hi किरण के सूट से उसकी चूचियों को छूटे हुए बोलै.
किरण- आइए सूट ख़राब हो जायेगा, और कोई नहीं मसलता मेरी..
लाडो- ाचा फिर ये इतनी भर कैसी रही हैं.
किरण- भर तो तुम दोनों की मुझसे भी ज़्यादा रही हैं तुम किनसे मसलवटी हो... तुम्हारा कोई है आशिक़?
पल्ली- अरे तुझे तो पता है गाओं में सब भाई लगते हैं तो आशिक़ कौन hi होगा,
किरण- हाँ ये तो है यार गाओं क्या आसपास के गाओं तक ये hi हाल रहता है..
लाडो- तभी तो हम तो एक दुसरे की सेवा कर लेते हैं.
किरण- मतलब
लाडो- मतलब ये की हम एक दुसरे से मसलवा लेते हैं,
किरण- अरे तुम लोग आपस में कैसे तुम दोनों तो लड़की हो न फिर कैसे.
पल्ली- अरे तो क्या हुआ मन हमारे पास लड़को की तरह लुंड नहीं है पर बाकि सब तो है, दबाने चुसवाने का मज़ा तो मिल hi जाता है,
किरण- अरे तुम दोनों तो बड़ी तेज़ हो और देखो तो कैसे लल्ल वो साफ़ साफ़ बोल रही है बेशरम,
लाडो- अरे बेशरम क्या इसमें लुंड को लुंड नहीं बोलेन तो क्या छूट बोलेंगे,
किरण इस बात पर हंस पड़ी और बोली- बात तो सही है, वैसे लड़की से दबवाने ने क्या मज़ा आता होगा मैंने सुना है असली मज़ा तो मर्द के हाथों से hi आता है,
किरण का इतना बोलना था की पल्ली ने उसे पीछे से पकड़ लिए और अपने हाथ उसकी चूचियों पर रख कर उन्हें सूट के ऊपर से hi दबाने लगी...
किरण- अह्ह्ह्हह हैए क्या कर रही है पललीई अह्ह्ह्हह्हह ुहहममम
पल्ली- अरे क्यों फड़फड़ा रही है बस मज़े ले और देख मज़ा आता है की नहीं,
किरण- अरे पर,
किरण को भी पल्ली के हाथों से मसलवाने में एक नए तरह का मज़ा आ रहा था तो वो भी थोड़ा शांत हो गयी,
इधर लाडो भी कब तक अलग रहती और वो भी किरण के सामने आई और घूम कर अपनी पीठ किरण की और करके अपना पिछवाड़ा उसके बदन से घिसने लगी साथ hi किरण के हाथ पकड़ कर अपने सीने पर लाकर अपनी चूचियों पर रख दिए और हाथों से दबवाने लगी, किरण जो की पल्ली से चूचियों को मसलवटे हुए हंस भी रही थी और उत्तेजित भी हो रही थी, जब उसके हाथ में लाडो के छुड़छे आये तो उसे भी एक अलग सा एहसास हुआ और वो भी कुछ पल बाद खुद से hi दबाने लगी, तीनो की hi मस्ती चल रही थी की किसी के आने का एहसास उन्हें हुआ तो तीनो झट से अलग हो गयी, इतने में hi अनुज की आवाज़ आई जो उन्हें घर चलने के लिए बुला रहा था, तीनो जल्दी hi खेत से बहार आई और घर की और चल दी,
किरण- सही है बीटा तुम दोनों ऐसे hi लगी रहती होगी,
पल्ली- अरे तो हम तीनो लगी रहेंगी, तुझे भी पूरे मज़े देंगी.
किरण- हाँ ले लिए मज़े मैंने भी मसलवाने के.
लाडो- अरे ये तो कुछ भी नहीं है अभी तो बहुत कुछ देखना बाकि है मेरी गुड़िया रानी,
किरण- बाप रे और क्या क्या करती हो तुम दोनों.
पल्ली- धीरे धीरे सब पता चल जायेगा गुड़िया रानी..
उधर ये तीनो खुसर पुसार करती हुई चल रही थी तो वहीं सागर अनुज के कान खाये जा रहा था ख़ुशी के मरे,
सागर- भाई चुदाई करने में जितना सोचा था उससे भी ज़्यादा मज़ा आता है, हाय मेरे जीवन की पहली चुदाई की मैंने वो भी तेरी वजह से ये एहसान रहेगा तेरा हमेशा.
अनुज- अरे बस न अब शांत भी हो जा,
सागर- अरे कैसे शांत हो जॉन यार मैंने आज पहली बार चुदाई की है, अब तक सिर्फ मुठिया hi था, यार क्या चूचियों थी तै की पापीती से भी बड़ी, और क्या लुंड चूसती हैं.
अनुज- जनता हूँ सेल कई बार छोड़ चूका हूँ मैं और धीरे बोल कोई सुन लेगा.
सागर- यार सबसे बड़ी बात तो गांड भी मरने दी उन्होंने यार सही बताऊँ तो गांड मरने में तो छूट मरने से भी ज़्यादा मज़ा आता है, अब तो जिसे भी छोडूंगा उसकी गांड ज़रूर मारा करूँगा.
anuj-sale चुप हो जा नहीं तो मैं तेरी गांड मार लूंगा,
सागर उसके आगे जाकर झुक गया और बोलै- जो तूने दिलाया है उसकी लिए तो मैं तुझे गांड भी दे दूँ..
अनुज- सेल नौटंकी बाज़. ये कहते हुए अनुज हंसने लगा, दोनों इसी तरह मस्ती करते हुए घर आ गए,
खैर तब तक मैं नाहा धो चूका था और तभी मेरा फ़ोन बजा तो अंजलि का फ़ोन था, मैं खुश हो गया,
उसने फ़ोन पर बोलै की वो तुम्हे फिर से परेशां कर रही है पर उसे और नीतू को कल कुछ काम भी है तो साथ चल लेना, और उसने प्लीज ऐसे बोलै की मैं उसे किडनी भी बिना हिचकिचाहट के दे देता ये तो बस घूमने का था, मैं समझ गया यर सब प्लान नीतू का है, मैंने भी हाँ बोल कर उसे समय पूछकर तय कर दिया, और फिर कल मिलने को बोलकर उसने फ़ोन रख दिया, मुझे बड़ी ख़ुशी हो रही थी साथ hi दर भी लग रहा था की कल क्या होगा क्या बोलूंगा मैं उससे,
खैर ये सब सोच रहा था की खाने का बुलावा आ गया मैं सबके साथ मिलकर खाना खाया और खा पि कर थोड़ा टहलने को निकला, रस्ते में hi सरजू मुझसे टकरा गया
सरजू- अरे तुझे hi बुलाने वाला था मैं,
में- क्यों आज कौनसी झड़ी में ले जायेगा.
सरजू- अबे चल पेप्सी पिलाता हूँ तुझे,
में- आज ऐसा क्या हो गया सेल बड़ा मेहरबान हो रहा है..
सरजू- अबे तुझे पीनी है की नहीं,
में- ाचा चल चलते हैं,
हम दोनों जल्दी hi पेप्सी और चिप्स लेकर एक पेड़ के नीचे बैठे थे और पि रहे थे.
में- और बता तुझे मंज़िल मिली की नहीं?
सरजू- कौनसी मंज़िल.
में- तेरी माँ की छूट.
सरजू- सेल गली क्यों दे रहा है.
में- अबे यही तो मंज़िल है न तेरी, कहाँ तक पहुंची बात,
सरजू- कहाँ यार.
में- कुछ नहीं हुआ अभी तक?
सरजू- नहीं ज़्यादा नहीं बस परसो रात तीन बार छोड़ा है..
में- क्या?
सरजू मुस्कुराया और बोलै- हाँ यार खूब छोड़ा मम्मी को..
वो खुश होकर बोलै..
में- सही है साले मज़े कर दिए तूने तो, कैसा लगा?
सरजू- ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह यार क्या बताऊँ सही कहूं तो अपनी माँ छोड़ने जैसा मज़ा दुनिया में कहीं नहीं है.
में- सही है यार तूने तो मज़े hi बांध दिए, वैसे हुआ कैसे पूरी बात तो बता..
उसके बाद उसने मुझे शुरू से अंत तक सब बता दिया, सुनने के बाद मेरा मन हुआ की सेल को उसकी बहनो और माँ के और अपने बारे में बता दूँ फिर सोचा अभी नहीं, और थोड़ा मज़े लेने दो क्या पता चची खुद hi बता दें, किसी तरह से.
में- सेल तेरी बात सुनकर तो लुंड खड़ा हो गया, वैसे तुझे अपना वादा याद है न मेरा काम कब करवाएगा.
सरजू- हाँ हरामी पता है तू भी मेरी माँ छोड़ने के पीछे पड़ा है, पर यार समझ नहीं आ रहा वो कैसे मानेगी..
में- ाचा वो मान जाएं तो तुझे तो कोई दिक्कत नहीं है,
सरजू- नहीं यार पहले तो सोचा बुरा लगेगा पर नहीं सोच कर hi लुंड खड़ा हो रहा है की हम मम्मी को साथ छोड़ेंगे तो कैसा लगेगा,
में- मज़ा hi आ जायेगा यार.
सरजू- वैसे सही में मम्मी बड़ी गरम हैं दो लुंड भी आराम से ले लेंगी,
में- अरे इस उम्र में आके औरत की प्यास बढ़ जाती है बदन गदरा जाता है छूट भी बच्चे निकलने के बाद प्यासी रहने लगती है, सही कहूं तो जवान लड़कियों से ज़्यादा प्यासी हो जाती हैं औरतें इस उम्र में.
सरजू- सही कह रहा है यार, मैं तो कह रहा हूँ तू भी चची पर कोशिश कर न, क्या पता बात बन नए दोनों भाई मादरचोद बन जायेंगे.
में- यार सही कहूं तो ऐसा नहीं की सोचा नहीं मैंने, अभी तेरी बात सुनकर भी सोच रहा हूँ की कोशिश करूँगा, पर यार मेरी माँ से फटती बहुत है तुझे पता है उनका गुस्सा.
सरजू- हाँ यार चची वैसे बड़ी अछि हैं पर उनका गुस्सा सही में ख़राब है मुझे भी बड़ा दर लगता है उनसे.
में- वही तो,
सरजू- अरे पर तू कोशिश तो कर, ाचा हमने सोचा था क्या की मम्मी मान जाएँगी पर देख मानी न क्या पता तेरा भी काम बनजाये, वैसे भी तेरी योजना hi काम आई तो तेरे भी काम आ सकती है.
में- ठीक है कोशिश करूँगा, ाचा ये बता चची लुंड कैसा चूसती हैं?
सरजू- बड़ा मस्त यार, रोकना पड़ता है खुद को झड़ने से,
में- चल यार जुगाड़ लगवा मेरा भी..
इतने में पेप्सी भी ख़तम हो गयी थी तो हम लोग बापिस चल दिए घर की तरफ रस्ते में जा hi रहे थे की जग्गू ने मुझे पीछे से बुलाया तो मैंने सरजू को घर जाने को बोलै और जग्गू के पास चला गया..
जग्गू - क्या बात है सरजू से बड़ी यारी चल रही है तेरी.
में- और क्या दोस्त है मेरा पकक्का वाला..
जग्गू- बढ़िया है फिर मैं क्या हूँ.
में- तू चूतिया है.
जग्गू- ाचा तो जा घुसजै उसकी गांड में पक्के वाले दोस्त की.
में- देख तो कैसे लड़कियों की तरह झांटे सुलग रही हैं तेरी.
जग्गू- नहीं नहीं जा अपने पक्के दोस्त के पास,
में- अरे बस अब और बता कहाँ भटक रहा था,
जग्गू- कहीं नहीं तुझसे hi मिलने आ रहा था किसी काम से पर छोड़ तू..
में- अरे बीटा गुस्सा क्यों हो रहा है परसो तेरा जन्मदिन है मेरा आशीर्वाद लेने आया था न.
ये सुनकर जग्गू की भी हंसी निकल गयी...
जग्गू- साला हरामी. याद था तुझे.
में- अपने बेटे का जन्मदिन कैसे भूलूंगा मैं.
जग्गू- बाप का बोल.
में- प्रोग्राम क्या है फिर.
जग्गू- उसी बारे में बात करनी थी यार इस बार पापा कुछ प्रोग्राम बना रहे हैं बताया नहीं है पर बोल रहे थे चाचा और राजन चाचा से बात भी करेंगे
में- ठीक है फिर क्या दिक्कत है, करने दे न उन्हें,
जग्गू- वो सब छोड़ ये बता सरजू का क्या लफड़ा है,
में- अरे तेरे जैसा hi लफड़ा है.
जग्गू- मेरे जैसा मतलब.
में- उसे भी मादरचोद बनना था,
जग्गू- क्या सही में? कैसे मतलब.
में- अरे शांत हो बताता हूँ, फिर चलते हैं..
फिर मैंने जग्गू को सरजू और उसके परिवार की पूरी कहानी सुनाई शुरू से अंत तक की.
जग्गू- अरे भेंचो, बिरजू और लाडो भी...
में- लुंड और छूट तो उनके पास भी हैं बबुआ,
जग्गू- यार वैसे बड़ा मस्त हो गया है, मेरा भी जुगाड़ लगवा कुछ,
में- सबर कर मिलेगा मेरी शरण में रहेगा सब मिलेगा,
जग्गू- जनता हूँ, यार यकीन नहीं हो रहा Chacha(Nilesh सिंह) ने भी रज्जो चची को छोड़ लिए नीतू को भी, अनुज ने भी नीतू और लाडो दोनों के मज़े ले लिए, लगता है चोदामपुर में चुदाई का नशा चढ़ गया है.
में- बढ़िया है न ऐसा नशा hi हमें ाचा लगता है.
हम लोग बातें करते रहे ऐसे hi और बाघ में आ गए जहाँ अनुज और सागर जानवरों का चारा पानी कर रहे थे, उनके साथ नाना भी आये थे. तो जग्गू ने उनके पेअर छुए. नाना से उसे आशीर्वाद दिया खुश रहो खुश रहो..
में- अरे नाना तुम बाघ में कैसे?
नाना- अरे बच्चा हमसे घर पर नहीं रुका जाता ज़्यादा देर... हमें तो खुले में hi ाचा लगता है,
में- बढ़िया है नाना, सही है चलो तुम्हे बाघ घूमते हैं अपने,
नाना- हाँ चलो.
मैं और जग्गू नाना को बाघ घूमने लगे,
नाना हमें खेतों और पेड़ वगेरा के बारे में बताते जा रहे थे, उनकी बातों से hi लग रहा था की उन्हें खेती कितनी पसंद थी,
चलते चलते हम तुबेल के पास पहुँच गए, में- क्या कहते हो नाना डुबकी हो जाये?
जग्गू- अरे रहने दे न.
नाना- काहे रहने दे, तुबेल के ताज़ा पानी में नहाने से बदन में ताज़गी आती है, चलो नहाते हैं.
बस नाना का इतना कहना था की हम लोगो ने तुरंत अपने कपडे उतर दिए और कच्चे में आ गए नाना ने भी अपना कुरता और धोती उतरी और वो भी हमारी तरह कच्चे में आ गए, एक बात तो थी की पोता पोती इतने बड़े हो गए थे पर नाना का बदन अब भी तंदरुस्त था, ये शायद खेती और शुद्ध जीवन का असर था, खैर हम तीनो लोग जल्दी hi हौदी में थे, और तुबेल के पानी से नाहा रहे थे, कुछ देर नहाने के बाद हम लोग बहार निकल आये, और ऐसे hi हौदी के किनारे बैठ कर कच्चा और बदन से पानी सूखने लगे, नाना हमें बता रहे थे की कैसे वो आज भी सुबह 5 बजे तुबेल के पानी से नहाते हैं,
हमारी बातें hi चल रही थी की अचानक से ममता चची भी वहां आ गयी...
म चची- अरे तुम सब लोग इस टाइम नाहा रहे हो, और चाचाजी तुम भी हो बच्चों के साथ.
नाना- हाँ बिटिया, घर पर आराम करते करते ऊब गए थे सोचा गाओं घूम आएं, तू कैसे यहाँ?
ममता- अरे गोबर सूखा जा रहा था, उपला लगाने आई थी, इतना कहकर चची बहते पानी में अपने हाथ और बाल्टी धोने लगी हम लोग उनके सामने hi हौदी की दीवार पर बैठे थे, बाल्टी और हाथ धोने के बाद वो हौदी की दीवार पर झुककर अपना चेहरा भी धोने लगी, पर तभी न जाने कैसे उनका पिछले पेअर फिसला और वो आगे सीढ़ी हौदी में छपाक से गिर पड़ी, और उन्ह्र बचने के लिए हम तीनो भी बापिस हौदी में कूड़े, जल्दी hi पकड़ के हमने चची को उठा दिया और फिर बहार भी निकल लिए,
नाना- बिटिया लगी तो नहीं?
चची- नहीं चाचा पानी में hi तो गिरे थे कुछ नहीं लगी, बस कपडे सरे भीग गए,
ये कहकर चची अपनी साड़ी का पल्लू पकड़ कर निचोड़ने लगी, जिससे उनका गोरा भरा पेट गोल सुन्दर नाभि और भीगा हुआ ब्लाउज और उसमे बंद बड़ी बड़ी चूचियां उजागर हो गयी, अब मेरे और जग्गू के लिए तो चची का यूँ होना नयी बात नहीं थी क्यूंकि हम दोनों hi चची को न जाने कितनी बार भोग चुके थे, पर समस्या तो नाना को हुई जिनकी नज़र कुछ पल के लिए उस दृश्य पर ठहरी तो उनके बदन में गर्मी बढ़ने लगी पर नाना ने तुरंत hi उस और से अपना चेहरा घुमा लिए, इधर चची बिना किसी फ़िक़र के अपनी साड़ी निचोड़ रही थी, नाना ने कुछ देर तो खुद पर काफी संयम किआ पर खुद को दोबारा देखने से नहीं रोक पाए और नज़र बचाकर फिर से देखने लगे तो नज़ारा और बेहतर दिखा, क्यूंकि ब्लाउज भी भीगने की वजह से बिलकुल पारदर्शी हो गया था और चची ब्रा कभी पहनती नहीं थी तो उनको चूचियां और उसका निप्पल हलके पीले रंग के ब्लाउज में काफी अचे से नज़र आ रही थी, ये देख तो नाना की आँखें hi बढ़ी हो गयी, वहीं उनके बदन पर सिर्फ गीला कच्चा था जो की उनके भी बदन से चिपका हुआ था और अभी इस नज़ारे का असर उनके कच्चे क्र अंदर भी हलचल कर रहा था,
चची- हाय ढैय्या ये नहीं सूखने वाली जल्दी, लगता है ऐसे hi घर जाना पड़ेगा, कर्मा लल्ला आते हुए बाल्टी ले ाइयो..
ये कहते हुए चची ने पल्लू को बापिस अपने सीने पर डाला
में- ठीक है चची ले आऊंगा तुम जाओ.
चची ये कहते हुए मुड़कर जाने लगी, नाना की नज़र उन पर hi थी, और जैसे hi नाना को कुछ और दिखा उनकी आँखें और बड़ी हो गयी कुछ पल देखने के बाद नाना बोले- लल्ला ममता बिटिया को रोक..
में- क्यों क्या हुआ नाना,
नाना- अरे रोक तो सही.
में- चची रुको,
मेरी आवाज़ सुनकर चची रुक गयी,
चची- का हुआ बच्चा,
में- नाना बुला रहे हैं तुम्हे..
मैंने ये बोलै तो नाना मुझे देखने लगे,
चची ये सुन बापिस आई और बोली- हाँ चाचाजी क्या हुआ,
नाना- वो बिटिया वो कछु नहीं बस वो.
चची- कोई बात है क्या चाचाजी,
नाना ने कुछ सोचा और बोले- बिटिया ऐसे कपड़ो में गाओं में जाना ठीक नहीं रहेगा..
इस पर चची ने बापिस खुद को देखा और बोली- क्यों कुछ गड़बड़ है चाचाजी?
नाना- हाँ वो ठीक नहीं लग रहे, कर्मा लल्ला बिटिया के कपडे ले आ घर से,
पहले तो मेरी समझ नहीं आया पर फिर कुछ पल बाद मेरी समझ आ गया की क्यों नाना ने चची को रोका था,
में- अभी लता हूँ चची तुम रुको यहीं.
ये कहते हुए मैं उठा और गीले बदन hi अपने कपडे पहनने लगा मुझे देखा देखि जग्गू भी न जाने क्यों मेरे साथ चल दिया, कुछ hi पालो में हम दोनों तुबेल से घर की और भाग पड़े,
कुछ पल के सन्नाटे के बाद चची बोली- वैसे चाचाजी हुआ क्या था तुमने रोका, कोई खराबी हो गयी थी कपड़ों में,
नाना- वो हाँ बिटिया,
चची दोबारा से अपना पल्लू सीने से हटाकर नीचे देखने लगी जिससे एक बार फिर से वही मस्त नज़ारा नाना के सामने आ गया, पर इस बार नाना ने चेहरा नहीं घुमाया,
चची- कहाँ चाचाजी मुझे तो सब ठीक लग रहा है,
नाना- वो बिटिया वो पीछे से थोड़ा,
चची- पीछे से? पीछे से क्या हुआ.
ये कहकर चची ने घूम कर अपना पिछवाड़ा फिर से नाना के सामने कर दिया जिससे नाना की आँखें फिर से चौड़ी हो गयी,
पर चची को तो जैसे समझ hi नहीं आ रहा था,
नाना- वो बिटिया तेरी सारी वो पीछे से फंस गयी है,
तब जाकर चची को समझ आई,
चची- हाय ढैय्या, ये तो हमने देखा hi नहीं, ये कहकर चची तुरंत घूम गयी और साड़ी और पेटीकोट को अपने चूतड़ों की दरार से बहार निकला जो की चिपक कर चची के चूतड़ों के आकर प्रकार दोनों को साफ़ साफ़ दिखा रहे थे.
चची- हाय ढैय्या चाचा जी ाचा हुआ तुमने रोक लिए नहीं तो हमारी तो आज हंसी हो जाती गाओं भर में.
नाना- वही तो बिटिया बेकार में लोग बातें करते,
चची- ाचा हुआ चाचाजी तुमने रोक लिए.
नाना- अरे बिटिया कोई बात नहीं अभी कर्मा कपडा लाये दिए रहा है फिर चिंता ख़तम.
चची- हाँ बिलकुल chacha....ji.
बोलते बोलते hi अचानक चची की नज़र नाना के कच्चे पर पड़ी जो की बिलकुल तम्बू बना हुआ था और ये देख चची के चेहरे पर एक हलकी सी अंधरुनि मुस्कान आ गयी, वो समझ गयी की उनके बदन का जादू नाना पर भी चल गया है, वहीं नाना को तो खुद खबर नहीं थी की उनके कच्चे में क्या हो रहा है,
चची तो चची थी अब नाना तड़प hi रहे थे तो चची ने सोचा अचे से hi तड़पाया जाये,
चची- चाचाजी थोड़ा घूम जाओ न, अब बच्चे साड़ी ला hi रहे हैं तो ये भीगी साड़ी उतर hi देती हूँ.
नाना अब इस पर क्या कहते, बस इतना बोले- हाँ बिलकुल बिटिया,
और ये कहकर वो घूम कर बैठ गए, चची ने तुरंत साड़ी उतर दी और सिर्फ ब्लाउज और पेटीकोट में आ गयी और ब्लाउज भी कैसा जो की लगभग पूरा पारदर्शी होकर उनकी चूचियों को साफ़ साफ़ दिखा रहा था,
नाना के मन में बवाल मच रहा था ये सोचकर की बिना साड़ी के ममता बिटिया कैसी लग रही होगी वहीं मन साँझा रहा था की नहीं ये बहुत गलत है. एक मन कह रहा था घूमकर इस सुन्दर चित्र को आँखों में भरलो न जाने मौका फिर मिले न मिले,
नाना किसी तरह से गर्दन घूमने का कोई तरीका सोचने लगे,
अब नाना की ये इच्छा मैंने पूरी करदी थी क्यूंकि मैं तभी भागते हुए आया और बोलै- चची ये रहे कपडे,
मेरी आवाज़ सुनकर नाना भी पलट गए और एक अचे से नज़र चची पर मार कर उनके बदन को अपनी आँखों में बसा लिए,
नाना- अरे लो बिटिया कर्मा आ गया कपडे लेकर,
चाचा- हाँ चाचाजी आखिर, चलो अब बदल लेती हूँ.
में- चची वहां मोटर वाले कमरे में जाकर बदल लो.
चची- हाँ लल्ला,
चची ने मेरे हाथ से कपडे लिए और चल दी वहीं नाना की आँखें चची के साथ साथ चल रही थी,
मैं नाना से कपडे पहनने को बोलने वाला था की तभी मेरी नज़र नाना के कच्चे पर पड़ी जो की बिलकुल तम्बू की तरह तना हुआ था, मेरे चेहरे पर हैरानी और मुस्कान दोनों आ गयी,
मैंने सोचा लो चची के बदन का जादू नाना पर भी चल गया, पर तभी मैंने सोचा की ये सही मौका है नाना के साथ थोड़ा खुलने का, कोशिश तो कर के देखनी hi चाहिए,
मैं नाना के पास जाकर बैठ गया तब तक चची मोटर वाले कमरे में चली गयी थी,
में- नाना चची कितनी अछि हैं न,
नाना- हाँ ? हाँ लल्ला ममता बिटिया तो बड़ी अछि है बड़ी गुनी है,
में- तुम्हे पसंद आये उनके गन?
नाना - हाँ क्यों नहीं आएंगे गन तो पसंद आने के लिए hi होते हैं लल्ला.
में- नाना वैसे कौनसे गन ज़्यादा अचे लगे? आगे वाले या पीछे वाले, या सरे के सरे?
नाना- अरे गन कहाँ आगे पीछे वाले होते हैं तू कैसी बात कर रहा है लल्ला?
इतने में नाना कक जैसे मेरी बात समझ आई और बोले- ऐ लल्ला क्या कह रहा है तू ये बिटिया के बारे में?
में- मैं तो वही कह रहा हूँ नाना जो की ये छोटे नाना मुझे बता रहे हैं,
मैंने उनके कच्चे की और इशारा करके कहा तो नाना ने मेरे इशारे की और देखा और उनकी हवाइयन उड़ने लगी, नाना के चेहरे का रंग hi उड़ गया,
नाना बिलकुल चल हो गए,
में- अरे नाना क्या हुआ ऐसे चुप क्यों हो गए? कुछ बोलो न.
नाना कुछ नहीं बोले.
मुझे लगा मैंने शायद ज़्यादा hi कर दिया
Me-Nana कुछ बोलो ना ऐसे मुझे ाचा नहीं लग रहा,
नाना- का बोलूं लल्ला इतना बड़ा पाप हो गया हमसे,
में- कौनसा पाप, कैसा पाप?
नाना- ये hi पाप, बता ममता बिटिया को देख कर हम बहक गए, वो हमें अपना पिता सामान मानती hai,chheee छी घिन आ रही है हमें खुद पर.
में- अरे नाना क्यों इतना सोच रहे हो, ऐसा कुछ नहीं है,
नाना- लल्ला ऐसे तो ममता बिटिया ने भी हमारे कच्चे को ज़रूर देखा होगा, न जाने क्या सोच रही होगी हमारे बारे में, अब कभी उससे आँखें मिलाने के लायक नहीं रहे हम.
में- ओह्हो नाना सुनो तो सही तुम.
नाना- क्या सुनूं लल्ला?
में- देखो जैसा तुम समझ रहर हो वैसा कुछ भी नहीं है, न कोई पाप हुआ है,
Nana-par ममता बिटिया ने देखा होगा न जाने क्या सोच रही होगी वो हमारे बारे में,
में- अरे कुछ नहीं सोच रही होंगी, ाचा देखो अभी पता चल जायेगा, अभी चची निकलेंगी कपडे बदल कर अगर उनके बर्ताव में कोई बदलाव हो तो कहना अगर नहीं होगा तो तुम ये पाप वाप का रोना बंद करदोगे और मेरी सुनोगे.
नाना- लल्ला यही होगा बहुत बड़ी गलती हो गयी.
में- अब रुको तो सही..
मेरा इतना कहना hi था की चची बहार आ गयी और फिर हमारे पास आकर बाल्टी उठाई और बोली- लल्ला, चाचाजी अब तुम लोग भी कपडे पहन कर घर को आओ खाने का समय होने को है.
में- आते हैं चची.
ये कहकर चची वहां से चली गयी, और तब तक नाना की नज़र नीचे hi थी,
में- देखा कुछ भी ऐसा लगा उनकी बातों से जैसे कुछ भी अलग हो,
नाना भी अब चची के बर्ताव क्र बाद काफी शांत और हल्का महसूस कर रहे थे और मेरी बात सुनकर बोले- हाँ बिटिया ने कुछ अलग तो नहीं किआ, लगता है उसने देखा hi नहीं था,
में- बेकार में परेशां हो रहे थे.
nana-pareshan होने की तो बात है लल्ला, जो भी हुआ है तो गलत hi न, हमें अपनी बिटिया जैसी ममता को देखकर खुद से काबू नहीं खोना चाहिए था...
अरे नाना तुम भी न ज़्यादा सोच रहे हो, मुझे तो ख़ुशी हो रही है तुम्हे ऐसे देख कर,
नाना- ख़ुशी इसमें ख़ुशी की क्या बात है?
में- ख़ुशी इस बात की मेरे नाना इस उम्र में भी इतने तंदरुस्त हैं की उनका औरतों को देखकर खड़ा हो जाता है, वर्ण कई बुद्धो स्व तो खुद नहीं खड़ा हुआ जाता, लुंड तो दूर की बात है.
नाना इस बात पर थोड़ा सोचे और फिर बोले- छही छी बता ऐसी बातें करते हैं कोई नाती और नाना आपस में.
में- अरे नाना और नाती दोस्त बन जाएं फिर तो कर सकते हैं,
नाना- दोस्त. हम बुढऊ से.
में- हाँ और ऐसे वैसे बुढऊ से नहीं अपने नाना से.
मेरी बातों से नाना धीरे धीरे थोड़ा शांत हो रहे थे और मेरी बातों को मान भी रहे थे,
में- फिर करोगे दोस्ती.
नाना- ठीक कर्ली दोस्ती.
में- तो मिलाओ हाथ इसी बात पर,
मैंने और नाना ने हाथ मिलाया,
नाना- ाचा लल्ला तुझे सही में लगता है की ममता बिटिया ने नहीं देखा होगा,
में- पक्का नहीं पता पर मैं तो चाहता हूँ की देखा हो,
नाना- अरे तू तो दोस्त बनकर दुश्मन वाले काम के रहा है.
में- उनकी ख़ुशी के लिए hi छह रहा हु की देखा हो.
नाना- उसकी ख़ुशी? इसमें उसकी ख़ुशी कैसे है.
में- औरत को ख़ुशी कब मिलती है पता है, ?
नाना- कब?
में- जब उसकी कोई तारीफ करे.
नाना- पर इसमें उसकी कौनसी तारीफ है,
में- ाचा उन्हें देख कर उनका बदन देख करउनके बाप की उम्र के आदमी का लुंड खड़ा हो रहा है ये उनके लिए तारीफ hi तो है.
मेरी बात सुनकर नाना मुस्कुरा पड़े, और बोले- बड़ा समझदार दोस्त बनाया है हमने बातें घूमने वाला,
में- वो तो है, वैसे सही में नाना परेशां होने की कोई बात hi नहीं है, तुम प्रकर्ति को समझते हो?
नाना- हाँ?
में- ाचा हम पौधा लगते हैं तो वो बड़ा क्यों होता है?
नाना- क्यूंकि उसकी प्रकृति है बढ़ा होना, बढ़ कर पेड़ बनना,
में- वैसे hi लुंड की भी प्रकृति है खड़ा होना, ये रिश्ते नाते तो सब बाद में आते हैं पहले तो प्रकर्ति hi आती है न, चची बहुत सुन्दर औरत हैं बहुत कामुक भी, अगर उन्हें देखकर लुंड न खड़ा हो तो गलत होगा.
नाना- समाजग नहीं आ रहा हम तेरे नाना हैं या तू हमारा,
में- हम दोस्त हैं नाना.
में- और सही बताऊँ तो चची को देख कर मेरा भी खड़ा हो गया था जबकि मेरे लिए भी तो वो माँ जैसी हैं.
नाना- अरे पर तू बच्चा है. गलती कर सकता है.
Me-are तो लुंड तो लुंड है न बड़े का हो या बच्चे का वो तो अपना काम करेगा hi, चाहे सामने माँ हो या बेटी.
नाना- मेरी बात सुनकर कुछ पल खामोश रहे फिर मुस्कुरा कर बोले- चल अब घर चलते हैं नहीं तो तू हमें न जाने क्या क्या सीखा देगा आज hi.
क
में- हाँ चलो न...
जारी रहेगी.
उन दोनों का प्रोग्राम लम्बा चलने वाला था आखिर सागर को चुदाई के सरे गन सीखने वाला था अनुज तो मैंने सोचा अपने प्यार का भी कुछ किया जाये और ये सोचकर नीतू को फ़ोन लगाया जिसने नहीं उठाया फिर जैसे मैंने जेब में रखा उसका बापिस आ गया.
नीतू- हाँ मेरे राजा...
में- कहाँ है मेरी रानी?
नीतू- घर पर हूँ,
में- मेरे काम का क्या हुआ.?
नीतू- कौन सा काम?
में- भूल गयी क्या? भाई का लुंड मिलते hi?
नीतू- अरे भाई तो तुम भी हो और लुंड तो तुम्हारा भी मिला है.
में- बातें मत बना बता न,
नीतू- हाय मन तो नहीं कर रहा, की उससे तुम्हारी बात आगे बाधाओं?
में- क्यों भाई?
नीतू- फिर उसके साथ भी तुम्हारा लुंड बाँटना पड़ेगा मुझे,
में- चल पागल, ऐसा थोड़े hi होता है... तेरे लिए तो मेरा हमेशा तैयार रहता है,
नीतू- रखना hi पड़ेगा, और उससे पहले मेरा हक़ है समझे?
में- हाँ बीटा समझ गया, तू hi नेरे लिए पहले है.
नीतू- ठीक है वैसे मैंने तुंहारा काम पहले hi कर दिया है कल जाना है तुम्हे तो अचे से बन कर जाना, और सुनो अब समय मत गंवाना कल ाचा सा मौका देख कर अपने दिल की बात बता देना उसे...
में- अरे यार कल hi?
नीतू- और क्या, जितना देर करोगे उतना पछतओग
में- ठीक है, कोशिश करता हूँ,
नीतू- कोशिश नहीं, और फिर ऐसा मौका मैं भी बार बार नहीं निकल सकती..
में- चल ठीक है... कल करता हूँ,
नीतू- अभी कहाँ हो?
में- बाघ में..
नीतू- तुंहरे मां ममी आये हैं न?
में- हाँ नाना मां ममी उनके बच्चे सब.
नीतू- हाँ सुना मैंने बढ़ आई है न वह, चलो मिलती हूँ उनसे आकर.
में- ठीक है..
ये कहकर मैंने फ़ोन रख दिया और कल के बारे में सोचने लगा की कैसे कहूंगा अंजलि से मन की बात, कहीं बुरा न मान जाये.. ये सब सोचते हुए मैं घर की और आने लगा,
इधर किरण पल्ली और लाडो में भी अछि बन रही थी तीनो एक दुसरे के साथ खूब मस्तिया रही थी, और साथ hi मोठे मोठे गन्ने चूस रही थी,
लाडो- क्या बात है किरण बड़े मोठे गन्ने खाने की आदत है तुम्हे?
लाडो ने पल्ली को आँख मरते हुए किरण को चिढ़ाते हुए कहा,
किरण - अरे गन्ने तो मोठे hi खाने में मज़ा आता है जो रास से भरे हो?
पल्ली- अरे तू रास भी निगल जाती है सारा,
किरण- और क्या, तो होता hi पीने के लिए.
लाडो- हाँ ये बात तो सही कही, रास तो पीने के लिए hi होता है चाहे ऊपर के होंठों से पियो या नीचे के होंठों से..
ये कहकर पल्ली को ताली मरकर हंसने लगी,
किरण कक भी ये बात एक पल बाद समझ आई तो उसने आँखें बड़ी और मुँह बनाते हुए पर हँसते हुए बोलै- धत्त लाडो बड़ी वो है तू...
लाडो- देख तो पल्ली हमारी किरण कितनी भोली है..
किरण- भोली नहीं हूँ पर तू बहुत शैतान है
पल्ली- अरे ठीक है, ाचा किरण सही सही बता कोई लड़का पटाया या नहीं?
किरण- नहीं तो,
लाडो- पर तेरा बदन तो सही भर रहा है लग रहा है की कोई खूब मसलता है इन संतरो को.
लाडो ने गन्ने से hi किरण के सूट से उसकी चूचियों को छूटे हुए बोलै.
किरण- आइए सूट ख़राब हो जायेगा, और कोई नहीं मसलता मेरी..
लाडो- ाचा फिर ये इतनी भर कैसी रही हैं.
किरण- भर तो तुम दोनों की मुझसे भी ज़्यादा रही हैं तुम किनसे मसलवटी हो... तुम्हारा कोई है आशिक़?
पल्ली- अरे तुझे तो पता है गाओं में सब भाई लगते हैं तो आशिक़ कौन hi होगा,
किरण- हाँ ये तो है यार गाओं क्या आसपास के गाओं तक ये hi हाल रहता है..
लाडो- तभी तो हम तो एक दुसरे की सेवा कर लेते हैं.
किरण- मतलब
लाडो- मतलब ये की हम एक दुसरे से मसलवा लेते हैं,
किरण- अरे तुम लोग आपस में कैसे तुम दोनों तो लड़की हो न फिर कैसे.
पल्ली- अरे तो क्या हुआ मन हमारे पास लड़को की तरह लुंड नहीं है पर बाकि सब तो है, दबाने चुसवाने का मज़ा तो मिल hi जाता है,
किरण- अरे तुम दोनों तो बड़ी तेज़ हो और देखो तो कैसे लल्ल वो साफ़ साफ़ बोल रही है बेशरम,
लाडो- अरे बेशरम क्या इसमें लुंड को लुंड नहीं बोलेन तो क्या छूट बोलेंगे,
किरण इस बात पर हंस पड़ी और बोली- बात तो सही है, वैसे लड़की से दबवाने ने क्या मज़ा आता होगा मैंने सुना है असली मज़ा तो मर्द के हाथों से hi आता है,
किरण का इतना बोलना था की पल्ली ने उसे पीछे से पकड़ लिए और अपने हाथ उसकी चूचियों पर रख कर उन्हें सूट के ऊपर से hi दबाने लगी...
किरण- अह्ह्ह्हह हैए क्या कर रही है पललीई अह्ह्ह्हह्हह ुहहममम
पल्ली- अरे क्यों फड़फड़ा रही है बस मज़े ले और देख मज़ा आता है की नहीं,
किरण- अरे पर,
किरण को भी पल्ली के हाथों से मसलवाने में एक नए तरह का मज़ा आ रहा था तो वो भी थोड़ा शांत हो गयी,
इधर लाडो भी कब तक अलग रहती और वो भी किरण के सामने आई और घूम कर अपनी पीठ किरण की और करके अपना पिछवाड़ा उसके बदन से घिसने लगी साथ hi किरण के हाथ पकड़ कर अपने सीने पर लाकर अपनी चूचियों पर रख दिए और हाथों से दबवाने लगी, किरण जो की पल्ली से चूचियों को मसलवटे हुए हंस भी रही थी और उत्तेजित भी हो रही थी, जब उसके हाथ में लाडो के छुड़छे आये तो उसे भी एक अलग सा एहसास हुआ और वो भी कुछ पल बाद खुद से hi दबाने लगी, तीनो की hi मस्ती चल रही थी की किसी के आने का एहसास उन्हें हुआ तो तीनो झट से अलग हो गयी, इतने में hi अनुज की आवाज़ आई जो उन्हें घर चलने के लिए बुला रहा था, तीनो जल्दी hi खेत से बहार आई और घर की और चल दी,
किरण- सही है बीटा तुम दोनों ऐसे hi लगी रहती होगी,
पल्ली- अरे तो हम तीनो लगी रहेंगी, तुझे भी पूरे मज़े देंगी.
किरण- हाँ ले लिए मज़े मैंने भी मसलवाने के.
लाडो- अरे ये तो कुछ भी नहीं है अभी तो बहुत कुछ देखना बाकि है मेरी गुड़िया रानी,
किरण- बाप रे और क्या क्या करती हो तुम दोनों.
पल्ली- धीरे धीरे सब पता चल जायेगा गुड़िया रानी..
उधर ये तीनो खुसर पुसार करती हुई चल रही थी तो वहीं सागर अनुज के कान खाये जा रहा था ख़ुशी के मरे,
सागर- भाई चुदाई करने में जितना सोचा था उससे भी ज़्यादा मज़ा आता है, हाय मेरे जीवन की पहली चुदाई की मैंने वो भी तेरी वजह से ये एहसान रहेगा तेरा हमेशा.
अनुज- अरे बस न अब शांत भी हो जा,
सागर- अरे कैसे शांत हो जॉन यार मैंने आज पहली बार चुदाई की है, अब तक सिर्फ मुठिया hi था, यार क्या चूचियों थी तै की पापीती से भी बड़ी, और क्या लुंड चूसती हैं.
अनुज- जनता हूँ सेल कई बार छोड़ चूका हूँ मैं और धीरे बोल कोई सुन लेगा.
सागर- यार सबसे बड़ी बात तो गांड भी मरने दी उन्होंने यार सही बताऊँ तो गांड मरने में तो छूट मरने से भी ज़्यादा मज़ा आता है, अब तो जिसे भी छोडूंगा उसकी गांड ज़रूर मारा करूँगा.
anuj-sale चुप हो जा नहीं तो मैं तेरी गांड मार लूंगा,
सागर उसके आगे जाकर झुक गया और बोलै- जो तूने दिलाया है उसकी लिए तो मैं तुझे गांड भी दे दूँ..
अनुज- सेल नौटंकी बाज़. ये कहते हुए अनुज हंसने लगा, दोनों इसी तरह मस्ती करते हुए घर आ गए,
खैर तब तक मैं नाहा धो चूका था और तभी मेरा फ़ोन बजा तो अंजलि का फ़ोन था, मैं खुश हो गया,
उसने फ़ोन पर बोलै की वो तुम्हे फिर से परेशां कर रही है पर उसे और नीतू को कल कुछ काम भी है तो साथ चल लेना, और उसने प्लीज ऐसे बोलै की मैं उसे किडनी भी बिना हिचकिचाहट के दे देता ये तो बस घूमने का था, मैं समझ गया यर सब प्लान नीतू का है, मैंने भी हाँ बोल कर उसे समय पूछकर तय कर दिया, और फिर कल मिलने को बोलकर उसने फ़ोन रख दिया, मुझे बड़ी ख़ुशी हो रही थी साथ hi दर भी लग रहा था की कल क्या होगा क्या बोलूंगा मैं उससे,
खैर ये सब सोच रहा था की खाने का बुलावा आ गया मैं सबके साथ मिलकर खाना खाया और खा पि कर थोड़ा टहलने को निकला, रस्ते में hi सरजू मुझसे टकरा गया
सरजू- अरे तुझे hi बुलाने वाला था मैं,
में- क्यों आज कौनसी झड़ी में ले जायेगा.
सरजू- अबे चल पेप्सी पिलाता हूँ तुझे,
में- आज ऐसा क्या हो गया सेल बड़ा मेहरबान हो रहा है..
सरजू- अबे तुझे पीनी है की नहीं,
में- ाचा चल चलते हैं,
हम दोनों जल्दी hi पेप्सी और चिप्स लेकर एक पेड़ के नीचे बैठे थे और पि रहे थे.
में- और बता तुझे मंज़िल मिली की नहीं?
सरजू- कौनसी मंज़िल.
में- तेरी माँ की छूट.
सरजू- सेल गली क्यों दे रहा है.
में- अबे यही तो मंज़िल है न तेरी, कहाँ तक पहुंची बात,
सरजू- कहाँ यार.
में- कुछ नहीं हुआ अभी तक?
सरजू- नहीं ज़्यादा नहीं बस परसो रात तीन बार छोड़ा है..
में- क्या?
सरजू मुस्कुराया और बोलै- हाँ यार खूब छोड़ा मम्मी को..
वो खुश होकर बोलै..
में- सही है साले मज़े कर दिए तूने तो, कैसा लगा?
सरजू- ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह यार क्या बताऊँ सही कहूं तो अपनी माँ छोड़ने जैसा मज़ा दुनिया में कहीं नहीं है.
में- सही है यार तूने तो मज़े hi बांध दिए, वैसे हुआ कैसे पूरी बात तो बता..
उसके बाद उसने मुझे शुरू से अंत तक सब बता दिया, सुनने के बाद मेरा मन हुआ की सेल को उसकी बहनो और माँ के और अपने बारे में बता दूँ फिर सोचा अभी नहीं, और थोड़ा मज़े लेने दो क्या पता चची खुद hi बता दें, किसी तरह से.
में- सेल तेरी बात सुनकर तो लुंड खड़ा हो गया, वैसे तुझे अपना वादा याद है न मेरा काम कब करवाएगा.
सरजू- हाँ हरामी पता है तू भी मेरी माँ छोड़ने के पीछे पड़ा है, पर यार समझ नहीं आ रहा वो कैसे मानेगी..
में- ाचा वो मान जाएं तो तुझे तो कोई दिक्कत नहीं है,
सरजू- नहीं यार पहले तो सोचा बुरा लगेगा पर नहीं सोच कर hi लुंड खड़ा हो रहा है की हम मम्मी को साथ छोड़ेंगे तो कैसा लगेगा,
में- मज़ा hi आ जायेगा यार.
सरजू- वैसे सही में मम्मी बड़ी गरम हैं दो लुंड भी आराम से ले लेंगी,
में- अरे इस उम्र में आके औरत की प्यास बढ़ जाती है बदन गदरा जाता है छूट भी बच्चे निकलने के बाद प्यासी रहने लगती है, सही कहूं तो जवान लड़कियों से ज़्यादा प्यासी हो जाती हैं औरतें इस उम्र में.
सरजू- सही कह रहा है यार, मैं तो कह रहा हूँ तू भी चची पर कोशिश कर न, क्या पता बात बन नए दोनों भाई मादरचोद बन जायेंगे.
में- यार सही कहूं तो ऐसा नहीं की सोचा नहीं मैंने, अभी तेरी बात सुनकर भी सोच रहा हूँ की कोशिश करूँगा, पर यार मेरी माँ से फटती बहुत है तुझे पता है उनका गुस्सा.
सरजू- हाँ यार चची वैसे बड़ी अछि हैं पर उनका गुस्सा सही में ख़राब है मुझे भी बड़ा दर लगता है उनसे.
में- वही तो,
सरजू- अरे पर तू कोशिश तो कर, ाचा हमने सोचा था क्या की मम्मी मान जाएँगी पर देख मानी न क्या पता तेरा भी काम बनजाये, वैसे भी तेरी योजना hi काम आई तो तेरे भी काम आ सकती है.
में- ठीक है कोशिश करूँगा, ाचा ये बता चची लुंड कैसा चूसती हैं?
सरजू- बड़ा मस्त यार, रोकना पड़ता है खुद को झड़ने से,
में- चल यार जुगाड़ लगवा मेरा भी..
इतने में पेप्सी भी ख़तम हो गयी थी तो हम लोग बापिस चल दिए घर की तरफ रस्ते में जा hi रहे थे की जग्गू ने मुझे पीछे से बुलाया तो मैंने सरजू को घर जाने को बोलै और जग्गू के पास चला गया..
जग्गू - क्या बात है सरजू से बड़ी यारी चल रही है तेरी.
में- और क्या दोस्त है मेरा पकक्का वाला..
जग्गू- बढ़िया है फिर मैं क्या हूँ.
में- तू चूतिया है.
जग्गू- ाचा तो जा घुसजै उसकी गांड में पक्के वाले दोस्त की.
में- देख तो कैसे लड़कियों की तरह झांटे सुलग रही हैं तेरी.
जग्गू- नहीं नहीं जा अपने पक्के दोस्त के पास,
में- अरे बस अब और बता कहाँ भटक रहा था,
जग्गू- कहीं नहीं तुझसे hi मिलने आ रहा था किसी काम से पर छोड़ तू..
में- अरे बीटा गुस्सा क्यों हो रहा है परसो तेरा जन्मदिन है मेरा आशीर्वाद लेने आया था न.
ये सुनकर जग्गू की भी हंसी निकल गयी...
जग्गू- साला हरामी. याद था तुझे.
में- अपने बेटे का जन्मदिन कैसे भूलूंगा मैं.
जग्गू- बाप का बोल.
में- प्रोग्राम क्या है फिर.
जग्गू- उसी बारे में बात करनी थी यार इस बार पापा कुछ प्रोग्राम बना रहे हैं बताया नहीं है पर बोल रहे थे चाचा और राजन चाचा से बात भी करेंगे
में- ठीक है फिर क्या दिक्कत है, करने दे न उन्हें,
जग्गू- वो सब छोड़ ये बता सरजू का क्या लफड़ा है,
में- अरे तेरे जैसा hi लफड़ा है.
जग्गू- मेरे जैसा मतलब.
में- उसे भी मादरचोद बनना था,
जग्गू- क्या सही में? कैसे मतलब.
में- अरे शांत हो बताता हूँ, फिर चलते हैं..
फिर मैंने जग्गू को सरजू और उसके परिवार की पूरी कहानी सुनाई शुरू से अंत तक की.
जग्गू- अरे भेंचो, बिरजू और लाडो भी...
में- लुंड और छूट तो उनके पास भी हैं बबुआ,
जग्गू- यार वैसे बड़ा मस्त हो गया है, मेरा भी जुगाड़ लगवा कुछ,
में- सबर कर मिलेगा मेरी शरण में रहेगा सब मिलेगा,
जग्गू- जनता हूँ, यार यकीन नहीं हो रहा Chacha(Nilesh सिंह) ने भी रज्जो चची को छोड़ लिए नीतू को भी, अनुज ने भी नीतू और लाडो दोनों के मज़े ले लिए, लगता है चोदामपुर में चुदाई का नशा चढ़ गया है.
में- बढ़िया है न ऐसा नशा hi हमें ाचा लगता है.
हम लोग बातें करते रहे ऐसे hi और बाघ में आ गए जहाँ अनुज और सागर जानवरों का चारा पानी कर रहे थे, उनके साथ नाना भी आये थे. तो जग्गू ने उनके पेअर छुए. नाना से उसे आशीर्वाद दिया खुश रहो खुश रहो..
में- अरे नाना तुम बाघ में कैसे?
नाना- अरे बच्चा हमसे घर पर नहीं रुका जाता ज़्यादा देर... हमें तो खुले में hi ाचा लगता है,
में- बढ़िया है नाना, सही है चलो तुम्हे बाघ घूमते हैं अपने,
नाना- हाँ चलो.
मैं और जग्गू नाना को बाघ घूमने लगे,
नाना हमें खेतों और पेड़ वगेरा के बारे में बताते जा रहे थे, उनकी बातों से hi लग रहा था की उन्हें खेती कितनी पसंद थी,
चलते चलते हम तुबेल के पास पहुँच गए, में- क्या कहते हो नाना डुबकी हो जाये?
जग्गू- अरे रहने दे न.
नाना- काहे रहने दे, तुबेल के ताज़ा पानी में नहाने से बदन में ताज़गी आती है, चलो नहाते हैं.
बस नाना का इतना कहना था की हम लोगो ने तुरंत अपने कपडे उतर दिए और कच्चे में आ गए नाना ने भी अपना कुरता और धोती उतरी और वो भी हमारी तरह कच्चे में आ गए, एक बात तो थी की पोता पोती इतने बड़े हो गए थे पर नाना का बदन अब भी तंदरुस्त था, ये शायद खेती और शुद्ध जीवन का असर था, खैर हम तीनो लोग जल्दी hi हौदी में थे, और तुबेल के पानी से नाहा रहे थे, कुछ देर नहाने के बाद हम लोग बहार निकल आये, और ऐसे hi हौदी के किनारे बैठ कर कच्चा और बदन से पानी सूखने लगे, नाना हमें बता रहे थे की कैसे वो आज भी सुबह 5 बजे तुबेल के पानी से नहाते हैं,
हमारी बातें hi चल रही थी की अचानक से ममता चची भी वहां आ गयी...
म चची- अरे तुम सब लोग इस टाइम नाहा रहे हो, और चाचाजी तुम भी हो बच्चों के साथ.
नाना- हाँ बिटिया, घर पर आराम करते करते ऊब गए थे सोचा गाओं घूम आएं, तू कैसे यहाँ?
ममता- अरे गोबर सूखा जा रहा था, उपला लगाने आई थी, इतना कहकर चची बहते पानी में अपने हाथ और बाल्टी धोने लगी हम लोग उनके सामने hi हौदी की दीवार पर बैठे थे, बाल्टी और हाथ धोने के बाद वो हौदी की दीवार पर झुककर अपना चेहरा भी धोने लगी, पर तभी न जाने कैसे उनका पिछले पेअर फिसला और वो आगे सीढ़ी हौदी में छपाक से गिर पड़ी, और उन्ह्र बचने के लिए हम तीनो भी बापिस हौदी में कूड़े, जल्दी hi पकड़ के हमने चची को उठा दिया और फिर बहार भी निकल लिए,
नाना- बिटिया लगी तो नहीं?
चची- नहीं चाचा पानी में hi तो गिरे थे कुछ नहीं लगी, बस कपडे सरे भीग गए,
ये कहकर चची अपनी साड़ी का पल्लू पकड़ कर निचोड़ने लगी, जिससे उनका गोरा भरा पेट गोल सुन्दर नाभि और भीगा हुआ ब्लाउज और उसमे बंद बड़ी बड़ी चूचियां उजागर हो गयी, अब मेरे और जग्गू के लिए तो चची का यूँ होना नयी बात नहीं थी क्यूंकि हम दोनों hi चची को न जाने कितनी बार भोग चुके थे, पर समस्या तो नाना को हुई जिनकी नज़र कुछ पल के लिए उस दृश्य पर ठहरी तो उनके बदन में गर्मी बढ़ने लगी पर नाना ने तुरंत hi उस और से अपना चेहरा घुमा लिए, इधर चची बिना किसी फ़िक़र के अपनी साड़ी निचोड़ रही थी, नाना ने कुछ देर तो खुद पर काफी संयम किआ पर खुद को दोबारा देखने से नहीं रोक पाए और नज़र बचाकर फिर से देखने लगे तो नज़ारा और बेहतर दिखा, क्यूंकि ब्लाउज भी भीगने की वजह से बिलकुल पारदर्शी हो गया था और चची ब्रा कभी पहनती नहीं थी तो उनको चूचियां और उसका निप्पल हलके पीले रंग के ब्लाउज में काफी अचे से नज़र आ रही थी, ये देख तो नाना की आँखें hi बढ़ी हो गयी, वहीं उनके बदन पर सिर्फ गीला कच्चा था जो की उनके भी बदन से चिपका हुआ था और अभी इस नज़ारे का असर उनके कच्चे क्र अंदर भी हलचल कर रहा था,
चची- हाय ढैय्या ये नहीं सूखने वाली जल्दी, लगता है ऐसे hi घर जाना पड़ेगा, कर्मा लल्ला आते हुए बाल्टी ले ाइयो..
ये कहते हुए चची ने पल्लू को बापिस अपने सीने पर डाला
में- ठीक है चची ले आऊंगा तुम जाओ.
चची ये कहते हुए मुड़कर जाने लगी, नाना की नज़र उन पर hi थी, और जैसे hi नाना को कुछ और दिखा उनकी आँखें और बड़ी हो गयी कुछ पल देखने के बाद नाना बोले- लल्ला ममता बिटिया को रोक..
में- क्यों क्या हुआ नाना,
नाना- अरे रोक तो सही.
में- चची रुको,
मेरी आवाज़ सुनकर चची रुक गयी,
चची- का हुआ बच्चा,
में- नाना बुला रहे हैं तुम्हे..
मैंने ये बोलै तो नाना मुझे देखने लगे,
चची ये सुन बापिस आई और बोली- हाँ चाचाजी क्या हुआ,
नाना- वो बिटिया वो कछु नहीं बस वो.
चची- कोई बात है क्या चाचाजी,
नाना ने कुछ सोचा और बोले- बिटिया ऐसे कपड़ो में गाओं में जाना ठीक नहीं रहेगा..
इस पर चची ने बापिस खुद को देखा और बोली- क्यों कुछ गड़बड़ है चाचाजी?
नाना- हाँ वो ठीक नहीं लग रहे, कर्मा लल्ला बिटिया के कपडे ले आ घर से,
पहले तो मेरी समझ नहीं आया पर फिर कुछ पल बाद मेरी समझ आ गया की क्यों नाना ने चची को रोका था,
में- अभी लता हूँ चची तुम रुको यहीं.
ये कहते हुए मैं उठा और गीले बदन hi अपने कपडे पहनने लगा मुझे देखा देखि जग्गू भी न जाने क्यों मेरे साथ चल दिया, कुछ hi पालो में हम दोनों तुबेल से घर की और भाग पड़े,
कुछ पल के सन्नाटे के बाद चची बोली- वैसे चाचाजी हुआ क्या था तुमने रोका, कोई खराबी हो गयी थी कपड़ों में,
नाना- वो हाँ बिटिया,
चची दोबारा से अपना पल्लू सीने से हटाकर नीचे देखने लगी जिससे एक बार फिर से वही मस्त नज़ारा नाना के सामने आ गया, पर इस बार नाना ने चेहरा नहीं घुमाया,
चची- कहाँ चाचाजी मुझे तो सब ठीक लग रहा है,
नाना- वो बिटिया वो पीछे से थोड़ा,
चची- पीछे से? पीछे से क्या हुआ.
ये कहकर चची ने घूम कर अपना पिछवाड़ा फिर से नाना के सामने कर दिया जिससे नाना की आँखें फिर से चौड़ी हो गयी,
पर चची को तो जैसे समझ hi नहीं आ रहा था,
नाना- वो बिटिया तेरी सारी वो पीछे से फंस गयी है,
तब जाकर चची को समझ आई,
चची- हाय ढैय्या, ये तो हमने देखा hi नहीं, ये कहकर चची तुरंत घूम गयी और साड़ी और पेटीकोट को अपने चूतड़ों की दरार से बहार निकला जो की चिपक कर चची के चूतड़ों के आकर प्रकार दोनों को साफ़ साफ़ दिखा रहे थे.
चची- हाय ढैय्या चाचा जी ाचा हुआ तुमने रोक लिए नहीं तो हमारी तो आज हंसी हो जाती गाओं भर में.
नाना- वही तो बिटिया बेकार में लोग बातें करते,
चची- ाचा हुआ चाचाजी तुमने रोक लिए.
नाना- अरे बिटिया कोई बात नहीं अभी कर्मा कपडा लाये दिए रहा है फिर चिंता ख़तम.
चची- हाँ बिलकुल chacha....ji.
बोलते बोलते hi अचानक चची की नज़र नाना के कच्चे पर पड़ी जो की बिलकुल तम्बू बना हुआ था और ये देख चची के चेहरे पर एक हलकी सी अंधरुनि मुस्कान आ गयी, वो समझ गयी की उनके बदन का जादू नाना पर भी चल गया है, वहीं नाना को तो खुद खबर नहीं थी की उनके कच्चे में क्या हो रहा है,
चची तो चची थी अब नाना तड़प hi रहे थे तो चची ने सोचा अचे से hi तड़पाया जाये,
चची- चाचाजी थोड़ा घूम जाओ न, अब बच्चे साड़ी ला hi रहे हैं तो ये भीगी साड़ी उतर hi देती हूँ.
नाना अब इस पर क्या कहते, बस इतना बोले- हाँ बिलकुल बिटिया,
और ये कहकर वो घूम कर बैठ गए, चची ने तुरंत साड़ी उतर दी और सिर्फ ब्लाउज और पेटीकोट में आ गयी और ब्लाउज भी कैसा जो की लगभग पूरा पारदर्शी होकर उनकी चूचियों को साफ़ साफ़ दिखा रहा था,
नाना के मन में बवाल मच रहा था ये सोचकर की बिना साड़ी के ममता बिटिया कैसी लग रही होगी वहीं मन साँझा रहा था की नहीं ये बहुत गलत है. एक मन कह रहा था घूमकर इस सुन्दर चित्र को आँखों में भरलो न जाने मौका फिर मिले न मिले,
नाना किसी तरह से गर्दन घूमने का कोई तरीका सोचने लगे,
अब नाना की ये इच्छा मैंने पूरी करदी थी क्यूंकि मैं तभी भागते हुए आया और बोलै- चची ये रहे कपडे,
मेरी आवाज़ सुनकर नाना भी पलट गए और एक अचे से नज़र चची पर मार कर उनके बदन को अपनी आँखों में बसा लिए,
नाना- अरे लो बिटिया कर्मा आ गया कपडे लेकर,
चाचा- हाँ चाचाजी आखिर, चलो अब बदल लेती हूँ.
में- चची वहां मोटर वाले कमरे में जाकर बदल लो.
चची- हाँ लल्ला,
चची ने मेरे हाथ से कपडे लिए और चल दी वहीं नाना की आँखें चची के साथ साथ चल रही थी,
मैं नाना से कपडे पहनने को बोलने वाला था की तभी मेरी नज़र नाना के कच्चे पर पड़ी जो की बिलकुल तम्बू की तरह तना हुआ था, मेरे चेहरे पर हैरानी और मुस्कान दोनों आ गयी,
मैंने सोचा लो चची के बदन का जादू नाना पर भी चल गया, पर तभी मैंने सोचा की ये सही मौका है नाना के साथ थोड़ा खुलने का, कोशिश तो कर के देखनी hi चाहिए,
मैं नाना के पास जाकर बैठ गया तब तक चची मोटर वाले कमरे में चली गयी थी,
में- नाना चची कितनी अछि हैं न,
नाना- हाँ ? हाँ लल्ला ममता बिटिया तो बड़ी अछि है बड़ी गुनी है,
में- तुम्हे पसंद आये उनके गन?
नाना - हाँ क्यों नहीं आएंगे गन तो पसंद आने के लिए hi होते हैं लल्ला.
में- नाना वैसे कौनसे गन ज़्यादा अचे लगे? आगे वाले या पीछे वाले, या सरे के सरे?
नाना- अरे गन कहाँ आगे पीछे वाले होते हैं तू कैसी बात कर रहा है लल्ला?
इतने में नाना कक जैसे मेरी बात समझ आई और बोले- ऐ लल्ला क्या कह रहा है तू ये बिटिया के बारे में?
में- मैं तो वही कह रहा हूँ नाना जो की ये छोटे नाना मुझे बता रहे हैं,
मैंने उनके कच्चे की और इशारा करके कहा तो नाना ने मेरे इशारे की और देखा और उनकी हवाइयन उड़ने लगी, नाना के चेहरे का रंग hi उड़ गया,
नाना बिलकुल चल हो गए,
में- अरे नाना क्या हुआ ऐसे चुप क्यों हो गए? कुछ बोलो न.
नाना कुछ नहीं बोले.
मुझे लगा मैंने शायद ज़्यादा hi कर दिया
Me-Nana कुछ बोलो ना ऐसे मुझे ाचा नहीं लग रहा,
नाना- का बोलूं लल्ला इतना बड़ा पाप हो गया हमसे,
में- कौनसा पाप, कैसा पाप?
नाना- ये hi पाप, बता ममता बिटिया को देख कर हम बहक गए, वो हमें अपना पिता सामान मानती hai,chheee छी घिन आ रही है हमें खुद पर.
में- अरे नाना क्यों इतना सोच रहे हो, ऐसा कुछ नहीं है,
नाना- लल्ला ऐसे तो ममता बिटिया ने भी हमारे कच्चे को ज़रूर देखा होगा, न जाने क्या सोच रही होगी हमारे बारे में, अब कभी उससे आँखें मिलाने के लायक नहीं रहे हम.
में- ओह्हो नाना सुनो तो सही तुम.
नाना- क्या सुनूं लल्ला?
में- देखो जैसा तुम समझ रहर हो वैसा कुछ भी नहीं है, न कोई पाप हुआ है,
Nana-par ममता बिटिया ने देखा होगा न जाने क्या सोच रही होगी वो हमारे बारे में,
में- अरे कुछ नहीं सोच रही होंगी, ाचा देखो अभी पता चल जायेगा, अभी चची निकलेंगी कपडे बदल कर अगर उनके बर्ताव में कोई बदलाव हो तो कहना अगर नहीं होगा तो तुम ये पाप वाप का रोना बंद करदोगे और मेरी सुनोगे.
नाना- लल्ला यही होगा बहुत बड़ी गलती हो गयी.
में- अब रुको तो सही..
मेरा इतना कहना hi था की चची बहार आ गयी और फिर हमारे पास आकर बाल्टी उठाई और बोली- लल्ला, चाचाजी अब तुम लोग भी कपडे पहन कर घर को आओ खाने का समय होने को है.
में- आते हैं चची.
ये कहकर चची वहां से चली गयी, और तब तक नाना की नज़र नीचे hi थी,
में- देखा कुछ भी ऐसा लगा उनकी बातों से जैसे कुछ भी अलग हो,
नाना भी अब चची के बर्ताव क्र बाद काफी शांत और हल्का महसूस कर रहे थे और मेरी बात सुनकर बोले- हाँ बिटिया ने कुछ अलग तो नहीं किआ, लगता है उसने देखा hi नहीं था,
में- बेकार में परेशां हो रहे थे.
nana-pareshan होने की तो बात है लल्ला, जो भी हुआ है तो गलत hi न, हमें अपनी बिटिया जैसी ममता को देखकर खुद से काबू नहीं खोना चाहिए था...
अरे नाना तुम भी न ज़्यादा सोच रहे हो, मुझे तो ख़ुशी हो रही है तुम्हे ऐसे देख कर,
नाना- ख़ुशी इसमें ख़ुशी की क्या बात है?
में- ख़ुशी इस बात की मेरे नाना इस उम्र में भी इतने तंदरुस्त हैं की उनका औरतों को देखकर खड़ा हो जाता है, वर्ण कई बुद्धो स्व तो खुद नहीं खड़ा हुआ जाता, लुंड तो दूर की बात है.
नाना इस बात पर थोड़ा सोचे और फिर बोले- छही छी बता ऐसी बातें करते हैं कोई नाती और नाना आपस में.
में- अरे नाना और नाती दोस्त बन जाएं फिर तो कर सकते हैं,
नाना- दोस्त. हम बुढऊ से.
में- हाँ और ऐसे वैसे बुढऊ से नहीं अपने नाना से.
मेरी बातों से नाना धीरे धीरे थोड़ा शांत हो रहे थे और मेरी बातों को मान भी रहे थे,
में- फिर करोगे दोस्ती.
नाना- ठीक कर्ली दोस्ती.
में- तो मिलाओ हाथ इसी बात पर,
मैंने और नाना ने हाथ मिलाया,
नाना- ाचा लल्ला तुझे सही में लगता है की ममता बिटिया ने नहीं देखा होगा,
में- पक्का नहीं पता पर मैं तो चाहता हूँ की देखा हो,
नाना- अरे तू तो दोस्त बनकर दुश्मन वाले काम के रहा है.
में- उनकी ख़ुशी के लिए hi छह रहा हु की देखा हो.
नाना- उसकी ख़ुशी? इसमें उसकी ख़ुशी कैसे है.
में- औरत को ख़ुशी कब मिलती है पता है, ?
नाना- कब?
में- जब उसकी कोई तारीफ करे.
नाना- पर इसमें उसकी कौनसी तारीफ है,
में- ाचा उन्हें देख कर उनका बदन देख करउनके बाप की उम्र के आदमी का लुंड खड़ा हो रहा है ये उनके लिए तारीफ hi तो है.
मेरी बात सुनकर नाना मुस्कुरा पड़े, और बोले- बड़ा समझदार दोस्त बनाया है हमने बातें घूमने वाला,
में- वो तो है, वैसे सही में नाना परेशां होने की कोई बात hi नहीं है, तुम प्रकर्ति को समझते हो?
नाना- हाँ?
में- ाचा हम पौधा लगते हैं तो वो बड़ा क्यों होता है?
नाना- क्यूंकि उसकी प्रकृति है बढ़ा होना, बढ़ कर पेड़ बनना,
में- वैसे hi लुंड की भी प्रकृति है खड़ा होना, ये रिश्ते नाते तो सब बाद में आते हैं पहले तो प्रकर्ति hi आती है न, चची बहुत सुन्दर औरत हैं बहुत कामुक भी, अगर उन्हें देखकर लुंड न खड़ा हो तो गलत होगा.
नाना- समाजग नहीं आ रहा हम तेरे नाना हैं या तू हमारा,
में- हम दोस्त हैं नाना.
में- और सही बताऊँ तो चची को देख कर मेरा भी खड़ा हो गया था जबकि मेरे लिए भी तो वो माँ जैसी हैं.
नाना- अरे पर तू बच्चा है. गलती कर सकता है.
Me-are तो लुंड तो लुंड है न बड़े का हो या बच्चे का वो तो अपना काम करेगा hi, चाहे सामने माँ हो या बेटी.
नाना- मेरी बात सुनकर कुछ पल खामोश रहे फिर मुस्कुरा कर बोले- चल अब घर चलते हैं नहीं तो तू हमें न जाने क्या क्या सीखा देगा आज hi.
क
में- हाँ चलो न...
जारी रहेगी.























































