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नाना को ऐसा आनंद ऐसा मज़ा ज़िन्दगी में कभी नहीं आया था जो बेटी को छोड़ते हुए आ रहा था, नाना कभी आँखें बंद करके उस अद्भुत आनंद को महसूस करते तो कभी आँखें खोल कर अपने सामने नंगी बेटी को देखते और सोचते ये सच है भी की नहीं.
मौसी की ऐसी बातों के बाद भी नाना से कुछ बोलै नहीं जा रहा था वो उत्तेजना के ऐसे स्टार पर थे जहाँ से बोलना उनके लिए काफी मुश्किल हो रहा था, वो अभी सिर्फ भाव और आनंद की नदी में बहे जा रहे थे, ऐसा लग रहा था की सब अपने आप हो रहा था, उनकी कमर खुद बा खुद आगे पीछे होकर लुंड को बेटी की गरम छूट में घुसा रही थी.
मौसी- अह्हह्ह्ह्ह बाबा आह्ह्ह्हह्ह कितना गरम लुंड है तुम्हारा आअह्ह्ह्ह छूट के अंदर आग लगा देगा,
मौसी की उत्तेजित बातें सुनकर नाना के बदन में एक अलग प्रकार की झुरझुरी हो रही थी ये एहसास की वो अपनी बेटी को छोड़ रहे हैं, ये hi सोच कर वो खुद को रोक नहीं पाए और मौसी की छूट में झड़ने लगे, झड़ते हुए उनके लुंड ने पिचकारी मार मार कर अपना रास मौसी की छूट में भर दिया, इतना तेज़ स्खलन उनका शायद hi कभी हुआ होगा जैसा अभी हुआ था, झड़ने के बाद लुंड निकल कर नाना बगल में hi लेट कर हांफने लगे दोनों बाप बेटी बिलकुल नंगे एक दुसरे के बगल में लेते थे, दिमाग से अब थोड़ी हवस की धुंध हटी तो नाना को ढेरो सवालों और चिंताओं ने घेर लिए,
नाना के चेहरे के भाव hi बदल गए, हवस और वासना की जगह ग्लानि और चिंता ने ले ली, मौसी ने भी नाना के चेहरे को देखा और बोली- का हुआ बाबा? अचानक परेशां से लग रहे हो,
नाना- क्या बोलेन बिटिया सब बर्बाद हो गया..
नाना उठ कर बैठते हुए बोले,
मौसी- ऐसा क्या हो गया?
नाना- महापाप हो गया बिटिया, ऐसा कभी किसी बाप ने अपनी बेटी के साथ नहीं किआ होगा, अपनी बेटी का घर बर्बाद कर दिया हमने अपनी हवस के चक्कर में,
नाना परेशां होते हुए बोले,
मौसी- अरे बाबा इतना क्यों सोच रहे हो परेशां मत हो,
नाना- इतना अंधे हो गए अपनी हवस में की अपनी hi बेटी के साथ ये सब कर डाला, धिक्कार है हम पर,
मौसी- बाबा बाबा, शांत हो पहले परेशां क्यों हो रहे हो कुछ बर्बाद नहीं हुआ है सब ठीक है,
नाना- पर बिटिया,
मौसी- पर वॉर कुछ नहीं मेरी बात सुनो अब, मुझे बहुत मज़ा आया तुमसे छुड़वाने में, सच कह रही हूँ, और पता होता की बाप का लुंड इतना मज़ा देता है तो न जाने कबका छुड़वा लेती,
मौसी जानकार खुले शब्दों का प्रयोग करते हुए बोली ताकि नाना भी सुनकर थोड़ा खुल सकें.
नाना- तू तू ये सब क्या बोल रही है बिटिया?
नाना हैरान होते हुए बोले,
मौसी- सही बोल रही हूँ बाबा, ाचा तुम बताओ क्या तुम्हे मज़ा नहीं आया अपनी बेटी को छोड़ कर, अपनी बेटी की छूट में अपना मुसल जैसा लुंड घुसकर उसे छोड़ने में तुम्हे कोई आनंद नहीं मिला?
मौसी जितना हो सके खुलकर नाना के सामने बात कर रही थी और कहीं न कहीं उन बातों का असर नाना पर भी हो रहा था, अब उनके दिमाग में सही गलत की जगह फिर से अपनी बेटी का बदन आने लगा, मौसी के सवाल के जवाब में वो खुद बोल पड़े- मज़ा तो बहुत आया बिटिया पर,..
बस मौसी के लिए इतना काफी था,
मौसी- पर वॉर क्या फिर बाबा मज़ा आया तो खुल के कहो और मज़े लो, ये सही गलत, समाज के चक्कर में मत पढ़ो, तुम खुश तो रहोगे तो सब खुश.
नाना को मौसी की बातें सुन थोड़ा अजीब सा लगा और सोचने लगे कुछ ऐसी hi बातें तो कर्मा ने भी की थी, पर अभी उस ख्याल को अलग कर नाना बोले- बिटिया पर दामाद जी? ये उनके साथ तो धोखा हुआ न..
मौसी- कोई धोखा नहीं है बाबा, मैंने उन्हें छूट दे राखी है, वो जिसे चाहे उसे छोड़ सकते हैं और वो छोड़ते भी हैं,
नाना- क्या सवह में और तुझे बुरा नहीं लगता?
नाना हैरान होते हुए बोले,
मौसी- अरे बाबा छूट और लुंड है hi मज़े लेने के लिए तो क्यों इसे बस एक hi जगह दबा कर के रखो, जहाँ मौका मिले खूब मज़े लो,.
नाना- चाहे वो अपनी बेटी hi क्यों न हो?
मौसी- बेटी हो, माँ हो, बहु हो या बहन, अगर छोड़ने को तैयार हो तो क्या सोचना.
नाना ये सुन कुछ सोचने लगे, वहीं मौसी ने हाथ आगे बढ़ा कर नाना के हाथ पकड़ कर अपनी चूचियों पर रख लिए, नाना ने भी हाथ हटाए नहीं बल्कि हल्का हल्का दबाने लगे,
मौसी- क्यों बाबा अब खुश हो?
नाना उनकी बात सुन कर मुस्कुराये और बोले- जिसके हाथ में बेटी की भरी हुई चूचियां हो वो तो खुश होगा hi,
मौसी- ये बात सही कही बाबा, अब आये तुम लाइन पर,
नाना भी मौसी की चूचियों को मसलने लगे, और बोले- अब तूने समझाया है तो सोचता हूँ यही सही.
मौसी- और सही hi कह रही हूँ बाबा अगर खुल कर मज़े लोगे तो यहाँ बहुत चूचियां हैं दबाने को.
नाना- मतलब?
मौसी- मतलब का, इतनी बड़ी बड़ी चूचियों वाली औरतें हैं, क्या पता कहीं मौका बन जाये,
नाना- ाचा किस की बात कर रही है तू?
नाना थोड़ा उत्सुक होते हुए बोले.
मौसी- ओह्हो देखो तो अब रहा नहीं जा रहा तुमसे.
मौसी नाना को छेड़ते हुए बोली.
नाना- अरे तू भी न, अब तू खुद hi तो बोल रही थी.
मौसी- अरे हाँ बाबा, और हैं नहीं जीजी हैं, ममता जीजी हैं, गुंजन है, रज्जो जीजी मंजू जीजी कितनी औरतें हैं एक से एक,
नाना- धत्त्त ये सब कभी नहीं मानेगी,
मौसी- अब तक मेरा लगता था की मुझे छोड़ डोज?
नाना- नहीं उम्मीद तो नहीं थी,
मौसी- फिर बस तुम कोशिश करते रहना और जहाँ मौका मिले घुसा देना लुंड छूट में,
नाना- इतना आसान थोड़े hi है,
मौसी- अरे बाबा जैसे मैं औरत हूँ वो सब भी औरतें hi हैं, जितनी छोड़ने की लालसा मुझे होती है उतनी उन सब को भी,
नाना- बाकि सब का तो ठीक है पर बड़की के साथ मुश्किल है,
मौसी- जब छुटकी चुद गयी तो बड़की के साथ क्या मुश्किल, बस कोशिश करते रहो,
नाना उनकी बात पर हंसने लगे और कुछ जवाब देते उससे पहले hi बहार से आवाज़ आई, जो किरण की थी वो सो कर उठ गयी थी.
मौसी- हाँ बीटा अभी आई रुक,
किरण- बड़ी बुआ बुला रही हैं तुम्हे.
मौसी- आई,
ये कह मौसी और नाना ने जल्दी से कपडे पहने और नाना लेट कर सोने का नाटक करने लगे,
तब जाकर मौसी ने दरवाज़ा खोला और बहार चली गयी, इसके बाद बाकि सब अपने अपने काम में लग गए, अनुज और ममी भी बहार आ गए थे, या कहें तो सिर्फ ममी आयी थी अनुज तो जी भर चुदाई करने के बाद सो गया था,
इधर सागर घर से निकल कर सीधा बिरजू के घर पहुंचा था, और दरवाज़ा खटखटाया तो उसकी किस्मत के हिसाब से लाडो ने खोला, एक दुसरे को देख कर दोनों के चेहरे पर hi हलकी सी मुस्कान आ गयी पर फिर सागर सँभालते हुए बोलै- बिरजू है क्या?
लाडो- हाँ अभी बुलाती हूँ,
ये कहकर लाडो अंदर की और मुड़ी तो पीछे से रज्जो चची आई और पूछा कौन है बिटिया?
लाडो- सागर है मम्मी,
रज्जो- अरे तो उसे दरवाज़े पर क्यों रोक रखा है, तू भी न बिलकुल गाढ़ी है,
ये कह रज्जो चची ने दरवाज़ा खोला और बोली- आ बच्चा अंदर आ,
लाडो को अपनी मम्मी से दन्त कहते देख सागर के चेहरे पर हंसी आ गयी जिसे छुपता हुआ बोलै- नहीं बुआ वो मैं बिरजू को बुला रहा था,
रज्जो- क्यों बुआ से नहीं मिलेगा,
सागर- हाँ क्यों नहीं बुआ,
रज्जो- आ फिर अंदर चल बिरजू भी अभी आ रहा है, भैंस को चारा डालने गया है,
रज्जो चची ने सागर को बिठाया और उसके पास बैठ कर बतियाने लगी, उनकी बातों के बीच में hi सागर और लाडो की नज़रें बार बार मिल रही थी, वो दरवाज़े के पास कड़ी हुई थी,
रज्जो- बच्चा कुछ चाय वगेरा पियेगा?
सागर- नहीं बुआ अभी बस खा कर आया हूँ,
इतने में तभी बिरजू और नीतू भी भैंसों को चारा डालकर आगये,
रज्जो- ले आ गया तेरा दोस्त, बिरजू देख सागर तेरा hi इंतज़ार कर रहा था,
सागर- हाँ चल,
बिरजू- बस अभी आया, और बिरजू ने जल्दी से एक टीशर्ट डाली और निकल गया सागर के साथ,
दोनों के जाते hi नीतू ने दरवाज़ा बंद किआ और लाडो की और देख कर मुस्कुरा के बोली- खूब नैन मटक्का चल रहा है..
लाडो- धत्त्त जीजी,
रज्जो- किसका नैन मटक्का?
नीतू- हमारी मैडम और सागर का.
रज्जो- हैं सच्ची ऐसी कुछ बात है का लाडो?
नीतू- अरे मम्मी पल्ली ने बताया मुझे अनुज से बोलै था सागर ने की उसे लाडो अछि लगती है,
रज्जो- अब कुछ दिन पहले ये बात होती तो हम गुस्सा होते बहुत.
रज्जो ने हँसते हुए कहा,
नीतू- अरे गुस्सा होने की क्या बात है मम्मी यही तो उम्र होती है प्यार वयर में पड़ने की, क्यों लाडो,
लाडो ये सुन शर्माकर बोली- कुछ है भी नहीं बेकार में बतंगड़ बना रहे हो,
रज्जो- हाय ढैय्या देखो तो ये लड़की चुड़ते हुए नहीं शर्माती अब कैसे गाल लाल हो रहे हैं इसके,
नीतू- आग दोनों तरफ लगी है मम्मी.
रज्जो- तो अब तो मौका भी है प्रेम कहानी को आगे बढ़ने का,
नीतू- अरे तुम्हे कोई परेशानी नहीं है?
रज्जो- हमें क्या परेशानी होगी, वैसे तो माँ बाप इसलिए डरते हैं की कहीं बहार कोई फायदा उठाकर छोड़ न दे, पर अब चुदाई तो वैसे भी होती है और सागर है भी घर का hi,
नीतू- ये तो है, ले भाई फिर मिल गयी सहमति मम्मी की भी,
लाडो- तुम लोग न साडी कहानी बना लो.
ये कहते हुए शर्मा कर चली गयी,
नीतू और रज्जो चची उसको ऐसे देख हँसते हुए काम पर लग गए,
इधर मैं नीतू के हाथों में अपना हाथ दिए हुए अपनी साड़ी बातें, सरे सच उसे बता रहा था, मैं उसके चेहरे की और भी नहीं देख रहा था मेरी हिम्मत hi नहीं हो रही थी, खैर बात ख़त्म होने पर आई और मैं जैसे hi रुकने वाला था की नीतू ने मेरा हाथ अचानक से छोड़ दिया, मुझे लगा जिसका दर था वही हुआ, मन में जितनी आशंकाएं मैंने बनाई हुई थी जो सोचा हुआ था की अब अंजलि मुझसे कभी बात नहीं करेगी वगेरा वगेरा, वो सब मुझे सच होती हुई महसूस हुई,
मैंने हिम्मत करके उसके चेहरे की और देखा तो वो गाडी के सामने को देख रही थी, मैंने उसकी नज़र का पीछा किआ और सामने देख कर मैं भी चौंक गया या कहूं दर गया, सामने अंजलि के पापा खड़े थे, अंजलि थोड़ा संभाली फिर पापा कहके तुरंत गाडी से उतर कर अपने पापा के पास पहुँच गयी मैं भी दूसरी और से उतर कर उनके पास जाकर नमस्ते की, पर ससुरे को न जाने क्या चिढ थी नमस्ते भी नहीं ली,
ससुरा- यहाँ क्या कर रही है तू?
अंजलि- वो पापा कॉलेज का कुछ काम था इसलिए आई थी,
ससुरा- ाचा पर इसके साथ ये तो तुम्हारे कॉलेज में नहीं पढता,
अंजलि- वो मैं यहाँ कुछ जानती नहीं पापा और नीतू आज आ नहीं सकती थी तो उसने इन्हे ले जाने को कहा,
ससुरा इसके आगे कुछ बोलता की तभी पीछे से एक और आवाज़ आई जो की अंजलि की माँ की थी,
सविता- अरे हो गया तेरा काम?
अंजलि की माँ ने आगे आते हुए कहा,
अंजलि- हाँ मम्मी और तुम लोग आने वाले थे टुन्ने बताया नहीं, तुम्हारे साथ hi आ जाती,
अंजलि ने खुद सवाल रख दिया,
ससुरा- ये तो अपनी माँ से hi पूछ इन्हे hi अचानक से सूझा खरीददारी करने की,
मैंने आगे बढ़ कर उसकी मम्मी को भी नमस्ते किआ तो उन्होंने प्यार से सर पर हाथ फिरते हुए कहा जग जग जिओ बीटा, तुम कर्मा हो न,
में- हाँ ग.
सविता- बहुत ाचा बच्चा है ग, उस रात को इसने hi घर छोड़ा था हमें, पर बीटा तुम मम्मी को लेकर नहीं आये हमारे पास,
में- अरे वो ध्यान से निकल गया आज आप सब लोग hi घर चलिए न सब से मिल भी लेना,
सविता- आज कहाँ, हम सोच रहे थे उन्हें अपने घर बुलाते और एक नयी सहेली बना लेते फुर्सत में,
में- अरे घर चलोगी तो एक क्या कई सहेली बना जाएगी,
सविता - आउंगी पर पहले तुम अपनी मम्मी को हमारे यहाँ घुमा कर लाओ उसके बाद,
में- ठीक है,
मैंने हँसते हुए कहा, सब के चेहरे पर हंसी थी सिवाए ससुरे के, पता नहीं किस बात से चिढ़ा रहता था,
अंजलि- कर्ली खरीद दरी मम्मी?
सविता- अभी कहाँ, अभी तो घूम hi रहे हैं,
अंजलि- तो कर लो, चलो मैं मदद करती हूँ,
सविता- कर्मा बीटा तुम रुकोगे? अगर कुछ काम हो तो चले जाओ,
अंजलि- वैसे रुक जाते तो ाचा होता इतना सारा सामान उठा कर घूमना मुश्किल हो जायेगा,
में- कोई बात नहीं आप लोग खरीददारी कर लो, मैं रुका हूँ,
ससुरा- अगर जाना हो तो जा सकते हो, हम चले जायेंगे.
में- नहीं नहीं कोई बात नहीं, मैं रस्ते में किसी को नहीं छोड़ता,
अब अंजलि और उसकी मम्मी तो दुकान में चली जाती खरीद करने मैं खड़ूस ससुरे के पास रह जाता, साला पता नहीं क्यों किल्स रहता था मुझसे, कुछ बात करो तो एक बात का जवाब ऐसे देता था जैसे एहसान कर रहा हो,
मैं कुछ देर खड़ा रहा फिर बगल की दुकान से दो कोल्डड्रिंक ले आया और एक उसको दी,
ससुरा- ये सब मत किआ करो बाल झाड़ जायेंगे तुम्हारे,
मैंने ये सुन कर उसके बालों की और देखा जो की आधे सर से गायब थे और उसने मुझे ये करते देख लिए,
में- ग वो वैसे कभी कभी पीटा हूँ, अभी गर्मी लग रही थी न इसलिए ले आया,
ससुरे ने जेब से पैसे निकले और मुझे देते हुए कहा- लो कोल्डड्रिंक के,
में- अरे नहीं नहीं ये क्यों दे रहे हो.
ससुरा- तुम हमारे काम से रुके हो तो खर्चा भी हम करेंगे,
साला उसकी बात सुनकर मन में एक लाइन आई, उफ़ ये तुम्हारे उसूल उफ़ ये तुम्हारे आदर्श,
मैंने बात बदलने के लिए बोलै- सर ग आपका प्रेम विवाह हुआ था न?
ये सुनकर वो थोड़ा चौंक गया फिर बोलै- तुम्हे किसने बताया, फिर खुद hi अपने सवाल का जवाब देकर बोलै- अंजलि ने hi बताया होगा, हाँ प्रेम विवाह हुआ था,
में- कितनी अछि बात है,
मैंने मुस्कुराते हुए कहा,
ससुरा- पर हमारा प्रेम आज कल की तरह नहीं था, आज कल सिर्फ आकर्षण होता है प्रेम नहीं, पहले एक पसंद फिर दो दिन बाद दूसरी,
में- सही कह रहे हो आप, आज के ज़माने में सच्चा साथी ढूंढना बहुत मुश्किल है,
ससुरा- जितनी कठिनाई से हमने और अंजलि की माँ ने खुद को और परिवार को संभाला है हम hi जानते हैं,
में- बिलकुल इसीलिए अब आपके ख़ुशी के दिन हैं बच्चे बड़े हो गए हैं, अब सेवा करवाने का समय आ गया है,
ससुरा- आज कल के बच्चे सेवा कर दें बड़ी बात है मैंने तो बोल दिया है जब तक बदन में ताकत है मुझे किसी की ज़रुरत नहीं,
में- ऐसा hi स्वाभिमान मुझे भी चाहिए जब मैं बढ़ा हो जॉन,
ये सुनकर वो थोड़ा गर्वान्वित हो गया, मैंने भी सोचा ये खुश तो सब खुश,
जल्दी hi अंजलि और उसकी मम्मी ने खरीददारी कर्ली तो मैंने उनका सामान गाडी में लेकर पीछे रखा और फिर ससुरा मेरे बगल में बैठ गया, अंजलि और उसकी मम्मी पीछे, गाडी लेकर मैं गाओं की और चल दिया, कुछ सोचने पर ध्यान आया की जबसे बात ख़तम हुई है तबसे अंजलि ने एक बार भी मेरी नज़रों में देखा तक नहीं है, अब इसका क्या मतलब समझूँ? गुस्सा है या कुछ और,
बीच में शीशे से उसे देखना भी चाहा पर कोई फायदा नहीं था, खैर उसके गाओं के अड्डे पर पहुंचे तो ससुरा बोल पड़ा- यहीं छोड़ दो हम चले जायेंगे यहाँ से,
में- अरे घर तक छोड़ देता हूँ न,
सविता - और का इतना सामान उठाये कहाँ चलेंगे, चलो बीटा घर तक,
मैंने सोचा सासु माँ को पटना पड़ेगा एक एहि हैं जिनकी ससुरे पर चलती है, जल्दी hi मैं उनके घर पहुँच गया, सारा सामान निकल कर रखा, अब भी अंजलि मेरी और देखने से बच रही थी, सामान लेकर उसकी मम्मी और वो अंदर चले गए अब भी उसने एक बार मुझे नहीं देखा, मैं दरवाजे पर आस लगाए देख रहा था शायद बापिस आएगी,
इतने में ससुरा बोल पड़ा- धन्यवाद इतनी मदद करने के लिए,
इतना सुनकर मैंने भी और रुकना ठीक नहीं समझा और उसे नमस्ते बोल कर गाडी मोड़ने लगा, फिर नज़र बार बार दरवाज़े की और जा रही थी की शायद दिख जाये पर कोई फायदा नहीं अंत में गाडी लेकर मैं निकल गया, दिमाग में भसड़ हो गयी थी, क्या है इस लड़की के दिमाग में बात करेगी आगे या नहीं क्या है कुछ बोले तो सही, वो तो एक नज़र देख तक नहीं रही सोचा फ़ोन या मैसेज कर देता हूँ फिर खुद को रोक लिया, की पीछे पड़ने से कोई फायदा नहीं होने वाला, ये सोच मैं गाओं में लौट आया बाघ में गाडी कड़ी करि वहीं घूमने लगा, देखा तो थोड़ा बहुत काम शुरू हो चूका था, पर मौसा और पापा नज़र नहीं आ रहे थे,
मैं उन लोगो को इधर देख रहा था वो दोनों लोग बाघ को पार करके दूसरी और थे और इस समय नीतू के साथ खेल रहे थे,

पापा बिलकुल नंगे होकर नीतू को खड़ा करके उसकी एक तंग उठा कर पीछे से उसकी गांड मार रहे थे, नीतू के बदन पर सिर्फ एक ब्रा रही उसमे से भी उसकी चूचियां बहार थी जो की मौसा के हाथों द्वारा मसली जा रही थी, मौसा भी पूरे नंगे थे और नीतू अपने एक हाथ से उनका लुंड मुठिया रही थी,
थोड़ा रिस्की तो था पर खुले में चुदाई करने का मज़ा hi अलग आता था, वैसे भी हमारे और चाचा के hi खेत थे जिनके चरों और से तार वगेरा बांध कर के अलग भी कर दिया था तो किसी के आने की असंका न के बराबर थी,
मैं कुछ देर यूँ hi बैठ गया और सोचने लगा की क्या करूँ क्या होगा, क्या मेरा और अंजलि का साथ यहीं तक था, और एक बार को वो मान गयी पर उसने बोलै की आगे से मैं किसी के साथ चुदाई नहीं कर सकता तो क्या मैं रह पाउँगा, साला कुछ समझ नहीं आ रहा था अकेले वही ख्याल आ रहे थे इसलिए सोचा पापा मौसा को ढूंढता हूँ सबके साथ रहूँगा तो दिमाग इतना नहीं चलेगा..
मैं समझ तो गया ये लोग कहाँ होंगे तो बाघ को पार करता हुआ मैं भी दूसरी पार राजन चाचा के खेतों की तरफ पहुंचा तो एक बड़ा hi रोचक दृश्य मेरा इंतज़ार कर रहा था, दूर से hi मैंने देखा की बाघ के बहार hi एक जगह पापा ने अपना अंगोछा बिछाया हुआ था उस पर मौसा पीठ पर लेते हुए थे उनके ऊपर नीतू उनका लुंड अपनी गांड में लिए हुए बैठी थी, और पापा उसके पैरों के बीच में थे अपना लुंड नीतू की छूट में घुसाए हुए,
नीतू की दोहरी चुदाई हो रही थी,

नीतू को कितना आनंद आ रहा था इसका अंदाज़ा उसकी आहों और सिसकियों से हो रहा था,
मैं वहां पहुंचा तो तीनो लोग मुझे देख कर मुस्कुराने लगे,
में- आज तो खुले में hi प्रोग्राम चालू है,
नीतू- अह्हह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह भइयाझ मैं तो आजम लेने आए थी, ताऊजी और मौसा जी मेरे आम दबाने लगे,
मौसा- अह्हह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह बिटिया, तेरे आमों से मीठे कोई आम नहीं हैं पूरे बाघ में,
मौसा नीचे से उसकी गांड मरते हुए बोले...
पापा- अह्हह्ह्ह्ह ये तो सही कहाहहहह अह्ह्ह्हह तेरी छूट आह्ह्ह्हह्ह कितनी गरम है,
नीतू- तुम्हारा लोढ़ा भी बहुत गरम है ताऊजी.
में- तुझे देख कर लोढ़ा गरमा जाता है नीतू, ये देख मेरा भी गरमा गे,
मैंने अपनी पंत से अपना लुंड निकलते हुए कहा, नीतू ने मेरे लुंड को देखा और अपनी जीभ को होंठों पर फिरते हुए एक अछि चुड़क्कड़ रैंड की तरह मुझे अपने पास बुलाया, मैंने भी अपना लुंड उसके मुँह के करीब कर दिया जिसे तुरंत उसने मुँह में भर लिए और चूसने लगी, मेरे मुँह से आह्ह्ह्हह्ह निकल गयी,
अब नीतू एक साथ तीन तीन लुंड से चुद रही थी, तीनो छेदों में मोठे मोठे लुंड समाये हुए थे, अब तो बेचारी की आहें भी नहीं निकल रही थी, क्यूंकि मुँह में मेरा लुंड जो घुसा हुआ था, बतियाते हुए हम तीनो लोग उसे तब तक छोड़ते रहे जब तक वो झाड़ न गयी, झड़ने के बाद पापा मौसा ने उसे अंगोछे के ऊपर hi लिटा दिया और फिर अपने अपने कपडे पहनने लगे, नीतू भी तब तक अपनी सांसें ठीक कर रही थी हांफते हुए, तभी मुझे कुछ सूझा और मैं उसके बगल में खड़ा होकर अपने लुंड का निशाना उसकी और लगा कर मूतने लगा, मेरा मूट उसके सीने और बदन को भीगने लगा,
पहले तो वो चौंकी- भइयह कहकर पर फिर मूट में खुद को नहलाने लगी यहाँ तक की मुँह खोल कर भी अपने मुँह में भरने की कोशिश करने लगी, मैंने धार उसके मुँह में कर दी तो उसका मुँह भरगया और फिर मूट उसके चेहरे और गले पर गिरने लगा, वो जातक नहीं रही थी बल्कि अपने मुँह में भर कर खुद पर hi उढेल रही थी, मेरा मूट ख़तम हुआ तो वो भीगी हुई मुझे मुस्कुरा कर देख रही थी.
पापा- ले हमारा अंगोछा ख़राब कर दिया तूने,
ये कहके आगे आकर खुद भी नीतू के ऊपर मूतने लगे, उनकी देखा देखि मौसा भी शुरू हो गए, और नीतू को दोनों ने मूट से पूरी तरह नहला दिया, जल्दी hi हम सब फिर उठ कर तुबेल पर आये और साथ में नहाये भी, नहाकर कपडे पहन कर नीतू और मैं घर की और चल दिए और पापा मौसा वहीं रुक गए, दूसरी और अनुज ने मामी को तो छोड़ लिए था अब उसकी नज़र किरण पर थी और कैसे भी करके वो कोई मौका ढूंढ रहा था और उसे मौका तब मिला जब माँ ने उसे कुछ सामान लेन को भेजा,
अनुज- चल किरण तू भी थोड़ा घूम भी आएगी, किरण भी ख़ुशी ख़ुशी उसके साथ चल दी,
घर से निकले उन्हें 20 मिनट्स हो चुके थे और अभी इस समय अनुज और किरण गाओं के कोने पर जहाँ राजन चाचा का खेत था वहां थे और अनुज ने किरण को घोड़ी बनाया हुआ था और इधर उधर देखते हुए पीछे से उसे छोड़ रहा था,
किरण का पजामा उसके पैरों में था टीशर्ट नीचे हो राखी थी जिसमे से उसकी दोनों चूचियां बहार लटक रही थी, अनुज उसकी कमर थामे लगातार थापें मार रहा था,

किरण- अह्हह्ह्ह्ह अनुजजज्जज अह्हह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह घर्रर्र पररर नहीं छोड़ सकता था,
अनुज- सब थी मौका hi नहीं मिल रहा था आह्ह्ह्ह माज़आआह्ह्ह्हह्ह्ह्ह आए रहा है.
किरण- हाआनंनंन्न मुझी भीई, ऐसे हीईईई...
अनुज- टेरिइइइइ छूट बड़ी मस्तट्ठत है, अह्ह्ह्ह माखन जैसी चिकनी,
किरण- अभी तो गांड का स्वाद नहीं चखा तूने,
अनुज- क्या तू गांड भी मरवा लेती है,
किरण- हाआनंनंन्न.
किरण ने गर्व से कहा.
अनुज- मुझे भी मारनी हैईईई.
किरण- मार लिओ मेरे भइईईईई पर यहाँ नाहीई घर पर,
अनुज- अह्हह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह हॉँण्णन ठीक कह रहियी है,
जल्दी hi अनुज ने अपना रास किरण के चूतड़ों पर छोड़ दिया और दोनों सामान लेकर घर आ गए, अब शाम हो चली थी सब घर आ रहे थे और अभी तो अनुज और किरण जो कोल्डड्रिंक लाये थे सब उसे पीकर ठंडा हो रहे थे, नाना और मां आज कुछ बेचैन नज़र आ रहे थे, नाना के मन में एक बार फिर से बेटी को भोगने के विचार आ रहे थे तो मां माँ के साथ अपनी कहानी आगे बढ़ने को बेताब थे,
कोल्डड्रिंक ख़तम हो गयी तो माँ बोली- चलो भाई बहुत्त हो गया ठंडा अब खाना बनाते हैं गर्मी में,
मौसी- अरे जीजी.
माँ- क्या जीजी खाना तो बनाना पड़ेगा hi,
मामी- और का जीजी तुम बैठो हम बना देंगे,
माँ- क्यों तुझे गर्मी नहीं लगती गुंजन,
इस पर सब हंस पड़े.
मामी- लगती है पर,
मौसी- अरे गर्मी इन कपड़ो की वजह से ज़्यादा लगती है,
किरण- तो कपडे उतर कर बनाओ. हेहही.
मौसी- धत्त पगली,
किरण- सही कह रही हूँ बुआ, इतनी भरी सारे लपेट लेती हो तुम लोग गर्मी तो लगेगी hi,
माँ- अब का करें बिटिया, साड़ी तो पहननी hi पड़ेगी ना,
इसके बाद औरतें खाना बनाने में लग गयी मर्द लोग टीवी देखने लगे बातें करने लगे, मैं बार बार अपना फ़ोन देखता की अंजलि का कोई मैसेज या फ़ोन आया हो. पर अभी तक ऐसा कुछ नहीं हुआ था, थोड़ी देर में ममता चची पल्ली और राजन चाचा भी घर आ गए थे सबने साथ मिलकर खाना खाया, उसी बीच आपस में कुछ योजना बानी और चची ने बोल दिया की मामी आज उनके यहाँ सोयेंगी तो पल्ली ने भी किरण का नाम ले लिए की वो भी चलेगी,
इसके पीछे की वजह ये थी की जबसे सबको मामी और किरण के शामिल होने के बारे में पता चला था तो चची पल्ली चाचा सब बेचैन थे उनका स्वाद चखने के लिए,
पापा मौसा ने भी कहा की वो लोग आज खेत पर सोयेंगे, अनुज ने भी कहा की वो सागर बिरजू भी आज एक साथ सोने वाले हैं, सागर ये सुन खुश हो गया, बचा मैं तो मैंने भी बोल दिया मैं जग्गू और सरजू के साथ सोऊंगा,
माँ- अरे सब बहार सो रहे हो.
मां- मतलब घर पर सिर्फ हम दोनों जीजी और बाबा रह जायेंगे.
मां ने मन hi मन खुश होते हुए कहा, नाना के कान में भी जब ये बात पड़ी तो वो भी मन hi मन खुश होने लगे, जितने काम लोग उनको उतना मौका नज़र आ रहा था अपनी बेटी के साथ बिताने का,
खैर खाना पीना ख़तम हुआ सब लोग धीरे धीरे निकल लिए, अनुज सागर को लेकर बिरजू के घर की जगह जग्गू के घर की और ले गया,
सागर- हम तो बिरजू के यहाँ सोने वाले थे न,
अनुज- अरे वो तो ऐसे hi बोलै था, अगर मज़े करने हैं तो मेरे साथ चल,
सागर- किसके साथ,
अनुज- भाभी के साथ,
सागर- क्या प्रेमा भाभी के साथ,
सागर खुश होते हुए बोलै,
अनुज- हाँ देवर भाभी में मस्ती होती रहती है,
सागर- यार मज़ा आ जायेगा आज तो, भाभी क्या मस्त माल हैं, पर मानेगी?
अनुज- बस देखता जा, पति है नहीं यहाँ तो कोई तो चाहिए न बदन की प्यास बुझाने के लिए वही हम बुझाएंगे,
सागर- बढ़िया मज़ा आ जायेगा, पर वहां बुआ और फूफाजी भी तो होंगे,
अनुज- नहीं आज सब खेत पर सोने वाले हैं भाभी अकेली हैं,
सागर- मज़ा आ गया यार क्या मौका मिला है,
जल्दी hi वो दोनों वहां पहुँच गए और दरवाज़ा भाभी ने खोला जिन्हे देखकर सागर लार टपकने लगा, bhabh,i ने जल्दी hi उन्हें अंदर लिए,
खैर बाकि लोगो की योजना कुछ यूँ थी की ममी और किरण ममता चची और पल्ली, उन्ही के घर पर रात गुजरने वाले थे और उनका साथ पापा मौसा और राजन चाचा देने वाले थे,
दूसरी और मैं, जग्गू, राजपाल ताऊ, मंजू तै, पद्मिनी तै, हम सब लोग दीनू चाचा के यहाँ डेरा जमाये हुए थे, जहाँ उनका पूरा परिवार मौजूद था,
घर पर सिर्फ मां माँ, मौसी और नाना थे, तो आज की रात कैसी गुजरने वाली थी ये सब अगली अपडेट में, जारी रहेगी.
नाना को ऐसा आनंद ऐसा मज़ा ज़िन्दगी में कभी नहीं आया था जो बेटी को छोड़ते हुए आ रहा था, नाना कभी आँखें बंद करके उस अद्भुत आनंद को महसूस करते तो कभी आँखें खोल कर अपने सामने नंगी बेटी को देखते और सोचते ये सच है भी की नहीं.
मौसी की ऐसी बातों के बाद भी नाना से कुछ बोलै नहीं जा रहा था वो उत्तेजना के ऐसे स्टार पर थे जहाँ से बोलना उनके लिए काफी मुश्किल हो रहा था, वो अभी सिर्फ भाव और आनंद की नदी में बहे जा रहे थे, ऐसा लग रहा था की सब अपने आप हो रहा था, उनकी कमर खुद बा खुद आगे पीछे होकर लुंड को बेटी की गरम छूट में घुसा रही थी.
मौसी- अह्हह्ह्ह्ह बाबा आह्ह्ह्हह्ह कितना गरम लुंड है तुम्हारा आअह्ह्ह्ह छूट के अंदर आग लगा देगा,
मौसी की उत्तेजित बातें सुनकर नाना के बदन में एक अलग प्रकार की झुरझुरी हो रही थी ये एहसास की वो अपनी बेटी को छोड़ रहे हैं, ये hi सोच कर वो खुद को रोक नहीं पाए और मौसी की छूट में झड़ने लगे, झड़ते हुए उनके लुंड ने पिचकारी मार मार कर अपना रास मौसी की छूट में भर दिया, इतना तेज़ स्खलन उनका शायद hi कभी हुआ होगा जैसा अभी हुआ था, झड़ने के बाद लुंड निकल कर नाना बगल में hi लेट कर हांफने लगे दोनों बाप बेटी बिलकुल नंगे एक दुसरे के बगल में लेते थे, दिमाग से अब थोड़ी हवस की धुंध हटी तो नाना को ढेरो सवालों और चिंताओं ने घेर लिए,
नाना के चेहरे के भाव hi बदल गए, हवस और वासना की जगह ग्लानि और चिंता ने ले ली, मौसी ने भी नाना के चेहरे को देखा और बोली- का हुआ बाबा? अचानक परेशां से लग रहे हो,
नाना- क्या बोलेन बिटिया सब बर्बाद हो गया..
नाना उठ कर बैठते हुए बोले,
मौसी- ऐसा क्या हो गया?
नाना- महापाप हो गया बिटिया, ऐसा कभी किसी बाप ने अपनी बेटी के साथ नहीं किआ होगा, अपनी बेटी का घर बर्बाद कर दिया हमने अपनी हवस के चक्कर में,
नाना परेशां होते हुए बोले,
मौसी- अरे बाबा इतना क्यों सोच रहे हो परेशां मत हो,
नाना- इतना अंधे हो गए अपनी हवस में की अपनी hi बेटी के साथ ये सब कर डाला, धिक्कार है हम पर,
मौसी- बाबा बाबा, शांत हो पहले परेशां क्यों हो रहे हो कुछ बर्बाद नहीं हुआ है सब ठीक है,
नाना- पर बिटिया,
मौसी- पर वॉर कुछ नहीं मेरी बात सुनो अब, मुझे बहुत मज़ा आया तुमसे छुड़वाने में, सच कह रही हूँ, और पता होता की बाप का लुंड इतना मज़ा देता है तो न जाने कबका छुड़वा लेती,
मौसी जानकार खुले शब्दों का प्रयोग करते हुए बोली ताकि नाना भी सुनकर थोड़ा खुल सकें.
नाना- तू तू ये सब क्या बोल रही है बिटिया?
नाना हैरान होते हुए बोले,
मौसी- सही बोल रही हूँ बाबा, ाचा तुम बताओ क्या तुम्हे मज़ा नहीं आया अपनी बेटी को छोड़ कर, अपनी बेटी की छूट में अपना मुसल जैसा लुंड घुसकर उसे छोड़ने में तुम्हे कोई आनंद नहीं मिला?
मौसी जितना हो सके खुलकर नाना के सामने बात कर रही थी और कहीं न कहीं उन बातों का असर नाना पर भी हो रहा था, अब उनके दिमाग में सही गलत की जगह फिर से अपनी बेटी का बदन आने लगा, मौसी के सवाल के जवाब में वो खुद बोल पड़े- मज़ा तो बहुत आया बिटिया पर,..
बस मौसी के लिए इतना काफी था,
मौसी- पर वॉर क्या फिर बाबा मज़ा आया तो खुल के कहो और मज़े लो, ये सही गलत, समाज के चक्कर में मत पढ़ो, तुम खुश तो रहोगे तो सब खुश.
नाना को मौसी की बातें सुन थोड़ा अजीब सा लगा और सोचने लगे कुछ ऐसी hi बातें तो कर्मा ने भी की थी, पर अभी उस ख्याल को अलग कर नाना बोले- बिटिया पर दामाद जी? ये उनके साथ तो धोखा हुआ न..
मौसी- कोई धोखा नहीं है बाबा, मैंने उन्हें छूट दे राखी है, वो जिसे चाहे उसे छोड़ सकते हैं और वो छोड़ते भी हैं,
नाना- क्या सवह में और तुझे बुरा नहीं लगता?
नाना हैरान होते हुए बोले,
मौसी- अरे बाबा छूट और लुंड है hi मज़े लेने के लिए तो क्यों इसे बस एक hi जगह दबा कर के रखो, जहाँ मौका मिले खूब मज़े लो,.
नाना- चाहे वो अपनी बेटी hi क्यों न हो?
मौसी- बेटी हो, माँ हो, बहु हो या बहन, अगर छोड़ने को तैयार हो तो क्या सोचना.
नाना ये सुन कुछ सोचने लगे, वहीं मौसी ने हाथ आगे बढ़ा कर नाना के हाथ पकड़ कर अपनी चूचियों पर रख लिए, नाना ने भी हाथ हटाए नहीं बल्कि हल्का हल्का दबाने लगे,
मौसी- क्यों बाबा अब खुश हो?
नाना उनकी बात सुन कर मुस्कुराये और बोले- जिसके हाथ में बेटी की भरी हुई चूचियां हो वो तो खुश होगा hi,
मौसी- ये बात सही कही बाबा, अब आये तुम लाइन पर,
नाना भी मौसी की चूचियों को मसलने लगे, और बोले- अब तूने समझाया है तो सोचता हूँ यही सही.
मौसी- और सही hi कह रही हूँ बाबा अगर खुल कर मज़े लोगे तो यहाँ बहुत चूचियां हैं दबाने को.
नाना- मतलब?
मौसी- मतलब का, इतनी बड़ी बड़ी चूचियों वाली औरतें हैं, क्या पता कहीं मौका बन जाये,
नाना- ाचा किस की बात कर रही है तू?
नाना थोड़ा उत्सुक होते हुए बोले.
मौसी- ओह्हो देखो तो अब रहा नहीं जा रहा तुमसे.
मौसी नाना को छेड़ते हुए बोली.
नाना- अरे तू भी न, अब तू खुद hi तो बोल रही थी.
मौसी- अरे हाँ बाबा, और हैं नहीं जीजी हैं, ममता जीजी हैं, गुंजन है, रज्जो जीजी मंजू जीजी कितनी औरतें हैं एक से एक,
नाना- धत्त्त ये सब कभी नहीं मानेगी,
मौसी- अब तक मेरा लगता था की मुझे छोड़ डोज?
नाना- नहीं उम्मीद तो नहीं थी,
मौसी- फिर बस तुम कोशिश करते रहना और जहाँ मौका मिले घुसा देना लुंड छूट में,
नाना- इतना आसान थोड़े hi है,
मौसी- अरे बाबा जैसे मैं औरत हूँ वो सब भी औरतें hi हैं, जितनी छोड़ने की लालसा मुझे होती है उतनी उन सब को भी,
नाना- बाकि सब का तो ठीक है पर बड़की के साथ मुश्किल है,
मौसी- जब छुटकी चुद गयी तो बड़की के साथ क्या मुश्किल, बस कोशिश करते रहो,
नाना उनकी बात पर हंसने लगे और कुछ जवाब देते उससे पहले hi बहार से आवाज़ आई, जो किरण की थी वो सो कर उठ गयी थी.
मौसी- हाँ बीटा अभी आई रुक,
किरण- बड़ी बुआ बुला रही हैं तुम्हे.
मौसी- आई,
ये कह मौसी और नाना ने जल्दी से कपडे पहने और नाना लेट कर सोने का नाटक करने लगे,
तब जाकर मौसी ने दरवाज़ा खोला और बहार चली गयी, इसके बाद बाकि सब अपने अपने काम में लग गए, अनुज और ममी भी बहार आ गए थे, या कहें तो सिर्फ ममी आयी थी अनुज तो जी भर चुदाई करने के बाद सो गया था,
इधर सागर घर से निकल कर सीधा बिरजू के घर पहुंचा था, और दरवाज़ा खटखटाया तो उसकी किस्मत के हिसाब से लाडो ने खोला, एक दुसरे को देख कर दोनों के चेहरे पर hi हलकी सी मुस्कान आ गयी पर फिर सागर सँभालते हुए बोलै- बिरजू है क्या?
लाडो- हाँ अभी बुलाती हूँ,
ये कहकर लाडो अंदर की और मुड़ी तो पीछे से रज्जो चची आई और पूछा कौन है बिटिया?
लाडो- सागर है मम्मी,
रज्जो- अरे तो उसे दरवाज़े पर क्यों रोक रखा है, तू भी न बिलकुल गाढ़ी है,
ये कह रज्जो चची ने दरवाज़ा खोला और बोली- आ बच्चा अंदर आ,
लाडो को अपनी मम्मी से दन्त कहते देख सागर के चेहरे पर हंसी आ गयी जिसे छुपता हुआ बोलै- नहीं बुआ वो मैं बिरजू को बुला रहा था,
रज्जो- क्यों बुआ से नहीं मिलेगा,
सागर- हाँ क्यों नहीं बुआ,
रज्जो- आ फिर अंदर चल बिरजू भी अभी आ रहा है, भैंस को चारा डालने गया है,
रज्जो चची ने सागर को बिठाया और उसके पास बैठ कर बतियाने लगी, उनकी बातों के बीच में hi सागर और लाडो की नज़रें बार बार मिल रही थी, वो दरवाज़े के पास कड़ी हुई थी,
रज्जो- बच्चा कुछ चाय वगेरा पियेगा?
सागर- नहीं बुआ अभी बस खा कर आया हूँ,
इतने में तभी बिरजू और नीतू भी भैंसों को चारा डालकर आगये,
रज्जो- ले आ गया तेरा दोस्त, बिरजू देख सागर तेरा hi इंतज़ार कर रहा था,
सागर- हाँ चल,
बिरजू- बस अभी आया, और बिरजू ने जल्दी से एक टीशर्ट डाली और निकल गया सागर के साथ,
दोनों के जाते hi नीतू ने दरवाज़ा बंद किआ और लाडो की और देख कर मुस्कुरा के बोली- खूब नैन मटक्का चल रहा है..
लाडो- धत्त्त जीजी,
रज्जो- किसका नैन मटक्का?
नीतू- हमारी मैडम और सागर का.
रज्जो- हैं सच्ची ऐसी कुछ बात है का लाडो?
नीतू- अरे मम्मी पल्ली ने बताया मुझे अनुज से बोलै था सागर ने की उसे लाडो अछि लगती है,
रज्जो- अब कुछ दिन पहले ये बात होती तो हम गुस्सा होते बहुत.
रज्जो ने हँसते हुए कहा,
नीतू- अरे गुस्सा होने की क्या बात है मम्मी यही तो उम्र होती है प्यार वयर में पड़ने की, क्यों लाडो,
लाडो ये सुन शर्माकर बोली- कुछ है भी नहीं बेकार में बतंगड़ बना रहे हो,
रज्जो- हाय ढैय्या देखो तो ये लड़की चुड़ते हुए नहीं शर्माती अब कैसे गाल लाल हो रहे हैं इसके,
नीतू- आग दोनों तरफ लगी है मम्मी.
रज्जो- तो अब तो मौका भी है प्रेम कहानी को आगे बढ़ने का,
नीतू- अरे तुम्हे कोई परेशानी नहीं है?
रज्जो- हमें क्या परेशानी होगी, वैसे तो माँ बाप इसलिए डरते हैं की कहीं बहार कोई फायदा उठाकर छोड़ न दे, पर अब चुदाई तो वैसे भी होती है और सागर है भी घर का hi,
नीतू- ये तो है, ले भाई फिर मिल गयी सहमति मम्मी की भी,
लाडो- तुम लोग न साडी कहानी बना लो.
ये कहते हुए शर्मा कर चली गयी,
नीतू और रज्जो चची उसको ऐसे देख हँसते हुए काम पर लग गए,
इधर मैं नीतू के हाथों में अपना हाथ दिए हुए अपनी साड़ी बातें, सरे सच उसे बता रहा था, मैं उसके चेहरे की और भी नहीं देख रहा था मेरी हिम्मत hi नहीं हो रही थी, खैर बात ख़त्म होने पर आई और मैं जैसे hi रुकने वाला था की नीतू ने मेरा हाथ अचानक से छोड़ दिया, मुझे लगा जिसका दर था वही हुआ, मन में जितनी आशंकाएं मैंने बनाई हुई थी जो सोचा हुआ था की अब अंजलि मुझसे कभी बात नहीं करेगी वगेरा वगेरा, वो सब मुझे सच होती हुई महसूस हुई,
मैंने हिम्मत करके उसके चेहरे की और देखा तो वो गाडी के सामने को देख रही थी, मैंने उसकी नज़र का पीछा किआ और सामने देख कर मैं भी चौंक गया या कहूं दर गया, सामने अंजलि के पापा खड़े थे, अंजलि थोड़ा संभाली फिर पापा कहके तुरंत गाडी से उतर कर अपने पापा के पास पहुँच गयी मैं भी दूसरी और से उतर कर उनके पास जाकर नमस्ते की, पर ससुरे को न जाने क्या चिढ थी नमस्ते भी नहीं ली,
ससुरा- यहाँ क्या कर रही है तू?
अंजलि- वो पापा कॉलेज का कुछ काम था इसलिए आई थी,
ससुरा- ाचा पर इसके साथ ये तो तुम्हारे कॉलेज में नहीं पढता,
अंजलि- वो मैं यहाँ कुछ जानती नहीं पापा और नीतू आज आ नहीं सकती थी तो उसने इन्हे ले जाने को कहा,
ससुरा इसके आगे कुछ बोलता की तभी पीछे से एक और आवाज़ आई जो की अंजलि की माँ की थी,
सविता- अरे हो गया तेरा काम?
अंजलि की माँ ने आगे आते हुए कहा,
अंजलि- हाँ मम्मी और तुम लोग आने वाले थे टुन्ने बताया नहीं, तुम्हारे साथ hi आ जाती,
अंजलि ने खुद सवाल रख दिया,
ससुरा- ये तो अपनी माँ से hi पूछ इन्हे hi अचानक से सूझा खरीददारी करने की,
मैंने आगे बढ़ कर उसकी मम्मी को भी नमस्ते किआ तो उन्होंने प्यार से सर पर हाथ फिरते हुए कहा जग जग जिओ बीटा, तुम कर्मा हो न,
में- हाँ ग.
सविता- बहुत ाचा बच्चा है ग, उस रात को इसने hi घर छोड़ा था हमें, पर बीटा तुम मम्मी को लेकर नहीं आये हमारे पास,
में- अरे वो ध्यान से निकल गया आज आप सब लोग hi घर चलिए न सब से मिल भी लेना,
सविता- आज कहाँ, हम सोच रहे थे उन्हें अपने घर बुलाते और एक नयी सहेली बना लेते फुर्सत में,
में- अरे घर चलोगी तो एक क्या कई सहेली बना जाएगी,
सविता - आउंगी पर पहले तुम अपनी मम्मी को हमारे यहाँ घुमा कर लाओ उसके बाद,
में- ठीक है,
मैंने हँसते हुए कहा, सब के चेहरे पर हंसी थी सिवाए ससुरे के, पता नहीं किस बात से चिढ़ा रहता था,
अंजलि- कर्ली खरीद दरी मम्मी?
सविता- अभी कहाँ, अभी तो घूम hi रहे हैं,
अंजलि- तो कर लो, चलो मैं मदद करती हूँ,
सविता- कर्मा बीटा तुम रुकोगे? अगर कुछ काम हो तो चले जाओ,
अंजलि- वैसे रुक जाते तो ाचा होता इतना सारा सामान उठा कर घूमना मुश्किल हो जायेगा,
में- कोई बात नहीं आप लोग खरीददारी कर लो, मैं रुका हूँ,
ससुरा- अगर जाना हो तो जा सकते हो, हम चले जायेंगे.
में- नहीं नहीं कोई बात नहीं, मैं रस्ते में किसी को नहीं छोड़ता,
अब अंजलि और उसकी मम्मी तो दुकान में चली जाती खरीद करने मैं खड़ूस ससुरे के पास रह जाता, साला पता नहीं क्यों किल्स रहता था मुझसे, कुछ बात करो तो एक बात का जवाब ऐसे देता था जैसे एहसान कर रहा हो,
मैं कुछ देर खड़ा रहा फिर बगल की दुकान से दो कोल्डड्रिंक ले आया और एक उसको दी,
ससुरा- ये सब मत किआ करो बाल झाड़ जायेंगे तुम्हारे,
मैंने ये सुन कर उसके बालों की और देखा जो की आधे सर से गायब थे और उसने मुझे ये करते देख लिए,
में- ग वो वैसे कभी कभी पीटा हूँ, अभी गर्मी लग रही थी न इसलिए ले आया,
ससुरे ने जेब से पैसे निकले और मुझे देते हुए कहा- लो कोल्डड्रिंक के,
में- अरे नहीं नहीं ये क्यों दे रहे हो.
ससुरा- तुम हमारे काम से रुके हो तो खर्चा भी हम करेंगे,
साला उसकी बात सुनकर मन में एक लाइन आई, उफ़ ये तुम्हारे उसूल उफ़ ये तुम्हारे आदर्श,
मैंने बात बदलने के लिए बोलै- सर ग आपका प्रेम विवाह हुआ था न?
ये सुनकर वो थोड़ा चौंक गया फिर बोलै- तुम्हे किसने बताया, फिर खुद hi अपने सवाल का जवाब देकर बोलै- अंजलि ने hi बताया होगा, हाँ प्रेम विवाह हुआ था,
में- कितनी अछि बात है,
मैंने मुस्कुराते हुए कहा,
ससुरा- पर हमारा प्रेम आज कल की तरह नहीं था, आज कल सिर्फ आकर्षण होता है प्रेम नहीं, पहले एक पसंद फिर दो दिन बाद दूसरी,
में- सही कह रहे हो आप, आज के ज़माने में सच्चा साथी ढूंढना बहुत मुश्किल है,
ससुरा- जितनी कठिनाई से हमने और अंजलि की माँ ने खुद को और परिवार को संभाला है हम hi जानते हैं,
में- बिलकुल इसीलिए अब आपके ख़ुशी के दिन हैं बच्चे बड़े हो गए हैं, अब सेवा करवाने का समय आ गया है,
ससुरा- आज कल के बच्चे सेवा कर दें बड़ी बात है मैंने तो बोल दिया है जब तक बदन में ताकत है मुझे किसी की ज़रुरत नहीं,
में- ऐसा hi स्वाभिमान मुझे भी चाहिए जब मैं बढ़ा हो जॉन,
ये सुनकर वो थोड़ा गर्वान्वित हो गया, मैंने भी सोचा ये खुश तो सब खुश,
जल्दी hi अंजलि और उसकी मम्मी ने खरीददारी कर्ली तो मैंने उनका सामान गाडी में लेकर पीछे रखा और फिर ससुरा मेरे बगल में बैठ गया, अंजलि और उसकी मम्मी पीछे, गाडी लेकर मैं गाओं की और चल दिया, कुछ सोचने पर ध्यान आया की जबसे बात ख़तम हुई है तबसे अंजलि ने एक बार भी मेरी नज़रों में देखा तक नहीं है, अब इसका क्या मतलब समझूँ? गुस्सा है या कुछ और,
बीच में शीशे से उसे देखना भी चाहा पर कोई फायदा नहीं था, खैर उसके गाओं के अड्डे पर पहुंचे तो ससुरा बोल पड़ा- यहीं छोड़ दो हम चले जायेंगे यहाँ से,
में- अरे घर तक छोड़ देता हूँ न,
सविता - और का इतना सामान उठाये कहाँ चलेंगे, चलो बीटा घर तक,
मैंने सोचा सासु माँ को पटना पड़ेगा एक एहि हैं जिनकी ससुरे पर चलती है, जल्दी hi मैं उनके घर पहुँच गया, सारा सामान निकल कर रखा, अब भी अंजलि मेरी और देखने से बच रही थी, सामान लेकर उसकी मम्मी और वो अंदर चले गए अब भी उसने एक बार मुझे नहीं देखा, मैं दरवाजे पर आस लगाए देख रहा था शायद बापिस आएगी,
इतने में ससुरा बोल पड़ा- धन्यवाद इतनी मदद करने के लिए,
इतना सुनकर मैंने भी और रुकना ठीक नहीं समझा और उसे नमस्ते बोल कर गाडी मोड़ने लगा, फिर नज़र बार बार दरवाज़े की और जा रही थी की शायद दिख जाये पर कोई फायदा नहीं अंत में गाडी लेकर मैं निकल गया, दिमाग में भसड़ हो गयी थी, क्या है इस लड़की के दिमाग में बात करेगी आगे या नहीं क्या है कुछ बोले तो सही, वो तो एक नज़र देख तक नहीं रही सोचा फ़ोन या मैसेज कर देता हूँ फिर खुद को रोक लिया, की पीछे पड़ने से कोई फायदा नहीं होने वाला, ये सोच मैं गाओं में लौट आया बाघ में गाडी कड़ी करि वहीं घूमने लगा, देखा तो थोड़ा बहुत काम शुरू हो चूका था, पर मौसा और पापा नज़र नहीं आ रहे थे,
मैं उन लोगो को इधर देख रहा था वो दोनों लोग बाघ को पार करके दूसरी और थे और इस समय नीतू के साथ खेल रहे थे,

पापा बिलकुल नंगे होकर नीतू को खड़ा करके उसकी एक तंग उठा कर पीछे से उसकी गांड मार रहे थे, नीतू के बदन पर सिर्फ एक ब्रा रही उसमे से भी उसकी चूचियां बहार थी जो की मौसा के हाथों द्वारा मसली जा रही थी, मौसा भी पूरे नंगे थे और नीतू अपने एक हाथ से उनका लुंड मुठिया रही थी,
थोड़ा रिस्की तो था पर खुले में चुदाई करने का मज़ा hi अलग आता था, वैसे भी हमारे और चाचा के hi खेत थे जिनके चरों और से तार वगेरा बांध कर के अलग भी कर दिया था तो किसी के आने की असंका न के बराबर थी,
मैं कुछ देर यूँ hi बैठ गया और सोचने लगा की क्या करूँ क्या होगा, क्या मेरा और अंजलि का साथ यहीं तक था, और एक बार को वो मान गयी पर उसने बोलै की आगे से मैं किसी के साथ चुदाई नहीं कर सकता तो क्या मैं रह पाउँगा, साला कुछ समझ नहीं आ रहा था अकेले वही ख्याल आ रहे थे इसलिए सोचा पापा मौसा को ढूंढता हूँ सबके साथ रहूँगा तो दिमाग इतना नहीं चलेगा..
मैं समझ तो गया ये लोग कहाँ होंगे तो बाघ को पार करता हुआ मैं भी दूसरी पार राजन चाचा के खेतों की तरफ पहुंचा तो एक बड़ा hi रोचक दृश्य मेरा इंतज़ार कर रहा था, दूर से hi मैंने देखा की बाघ के बहार hi एक जगह पापा ने अपना अंगोछा बिछाया हुआ था उस पर मौसा पीठ पर लेते हुए थे उनके ऊपर नीतू उनका लुंड अपनी गांड में लिए हुए बैठी थी, और पापा उसके पैरों के बीच में थे अपना लुंड नीतू की छूट में घुसाए हुए,
नीतू की दोहरी चुदाई हो रही थी,

नीतू को कितना आनंद आ रहा था इसका अंदाज़ा उसकी आहों और सिसकियों से हो रहा था,
मैं वहां पहुंचा तो तीनो लोग मुझे देख कर मुस्कुराने लगे,
में- आज तो खुले में hi प्रोग्राम चालू है,
नीतू- अह्हह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह भइयाझ मैं तो आजम लेने आए थी, ताऊजी और मौसा जी मेरे आम दबाने लगे,
मौसा- अह्हह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह बिटिया, तेरे आमों से मीठे कोई आम नहीं हैं पूरे बाघ में,
मौसा नीचे से उसकी गांड मरते हुए बोले...
पापा- अह्हह्ह्ह्ह ये तो सही कहाहहहह अह्ह्ह्हह तेरी छूट आह्ह्ह्हह्ह कितनी गरम है,
नीतू- तुम्हारा लोढ़ा भी बहुत गरम है ताऊजी.
में- तुझे देख कर लोढ़ा गरमा जाता है नीतू, ये देख मेरा भी गरमा गे,
मैंने अपनी पंत से अपना लुंड निकलते हुए कहा, नीतू ने मेरे लुंड को देखा और अपनी जीभ को होंठों पर फिरते हुए एक अछि चुड़क्कड़ रैंड की तरह मुझे अपने पास बुलाया, मैंने भी अपना लुंड उसके मुँह के करीब कर दिया जिसे तुरंत उसने मुँह में भर लिए और चूसने लगी, मेरे मुँह से आह्ह्ह्हह्ह निकल गयी,
अब नीतू एक साथ तीन तीन लुंड से चुद रही थी, तीनो छेदों में मोठे मोठे लुंड समाये हुए थे, अब तो बेचारी की आहें भी नहीं निकल रही थी, क्यूंकि मुँह में मेरा लुंड जो घुसा हुआ था, बतियाते हुए हम तीनो लोग उसे तब तक छोड़ते रहे जब तक वो झाड़ न गयी, झड़ने के बाद पापा मौसा ने उसे अंगोछे के ऊपर hi लिटा दिया और फिर अपने अपने कपडे पहनने लगे, नीतू भी तब तक अपनी सांसें ठीक कर रही थी हांफते हुए, तभी मुझे कुछ सूझा और मैं उसके बगल में खड़ा होकर अपने लुंड का निशाना उसकी और लगा कर मूतने लगा, मेरा मूट उसके सीने और बदन को भीगने लगा,
पहले तो वो चौंकी- भइयह कहकर पर फिर मूट में खुद को नहलाने लगी यहाँ तक की मुँह खोल कर भी अपने मुँह में भरने की कोशिश करने लगी, मैंने धार उसके मुँह में कर दी तो उसका मुँह भरगया और फिर मूट उसके चेहरे और गले पर गिरने लगा, वो जातक नहीं रही थी बल्कि अपने मुँह में भर कर खुद पर hi उढेल रही थी, मेरा मूट ख़तम हुआ तो वो भीगी हुई मुझे मुस्कुरा कर देख रही थी.
पापा- ले हमारा अंगोछा ख़राब कर दिया तूने,
ये कहके आगे आकर खुद भी नीतू के ऊपर मूतने लगे, उनकी देखा देखि मौसा भी शुरू हो गए, और नीतू को दोनों ने मूट से पूरी तरह नहला दिया, जल्दी hi हम सब फिर उठ कर तुबेल पर आये और साथ में नहाये भी, नहाकर कपडे पहन कर नीतू और मैं घर की और चल दिए और पापा मौसा वहीं रुक गए, दूसरी और अनुज ने मामी को तो छोड़ लिए था अब उसकी नज़र किरण पर थी और कैसे भी करके वो कोई मौका ढूंढ रहा था और उसे मौका तब मिला जब माँ ने उसे कुछ सामान लेन को भेजा,
अनुज- चल किरण तू भी थोड़ा घूम भी आएगी, किरण भी ख़ुशी ख़ुशी उसके साथ चल दी,
घर से निकले उन्हें 20 मिनट्स हो चुके थे और अभी इस समय अनुज और किरण गाओं के कोने पर जहाँ राजन चाचा का खेत था वहां थे और अनुज ने किरण को घोड़ी बनाया हुआ था और इधर उधर देखते हुए पीछे से उसे छोड़ रहा था,
किरण का पजामा उसके पैरों में था टीशर्ट नीचे हो राखी थी जिसमे से उसकी दोनों चूचियां बहार लटक रही थी, अनुज उसकी कमर थामे लगातार थापें मार रहा था,

किरण- अह्हह्ह्ह्ह अनुजजज्जज अह्हह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह घर्रर्र पररर नहीं छोड़ सकता था,
अनुज- सब थी मौका hi नहीं मिल रहा था आह्ह्ह्ह माज़आआह्ह्ह्हह्ह्ह्ह आए रहा है.
किरण- हाआनंनंन्न मुझी भीई, ऐसे हीईईई...
अनुज- टेरिइइइइ छूट बड़ी मस्तट्ठत है, अह्ह्ह्ह माखन जैसी चिकनी,
किरण- अभी तो गांड का स्वाद नहीं चखा तूने,
अनुज- क्या तू गांड भी मरवा लेती है,
किरण- हाआनंनंन्न.
किरण ने गर्व से कहा.
अनुज- मुझे भी मारनी हैईईई.
किरण- मार लिओ मेरे भइईईईई पर यहाँ नाहीई घर पर,
अनुज- अह्हह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह हॉँण्णन ठीक कह रहियी है,
जल्दी hi अनुज ने अपना रास किरण के चूतड़ों पर छोड़ दिया और दोनों सामान लेकर घर आ गए, अब शाम हो चली थी सब घर आ रहे थे और अभी तो अनुज और किरण जो कोल्डड्रिंक लाये थे सब उसे पीकर ठंडा हो रहे थे, नाना और मां आज कुछ बेचैन नज़र आ रहे थे, नाना के मन में एक बार फिर से बेटी को भोगने के विचार आ रहे थे तो मां माँ के साथ अपनी कहानी आगे बढ़ने को बेताब थे,
कोल्डड्रिंक ख़तम हो गयी तो माँ बोली- चलो भाई बहुत्त हो गया ठंडा अब खाना बनाते हैं गर्मी में,
मौसी- अरे जीजी.
माँ- क्या जीजी खाना तो बनाना पड़ेगा hi,
मामी- और का जीजी तुम बैठो हम बना देंगे,
माँ- क्यों तुझे गर्मी नहीं लगती गुंजन,
इस पर सब हंस पड़े.
मामी- लगती है पर,
मौसी- अरे गर्मी इन कपड़ो की वजह से ज़्यादा लगती है,
किरण- तो कपडे उतर कर बनाओ. हेहही.
मौसी- धत्त पगली,
किरण- सही कह रही हूँ बुआ, इतनी भरी सारे लपेट लेती हो तुम लोग गर्मी तो लगेगी hi,
माँ- अब का करें बिटिया, साड़ी तो पहननी hi पड़ेगी ना,
इसके बाद औरतें खाना बनाने में लग गयी मर्द लोग टीवी देखने लगे बातें करने लगे, मैं बार बार अपना फ़ोन देखता की अंजलि का कोई मैसेज या फ़ोन आया हो. पर अभी तक ऐसा कुछ नहीं हुआ था, थोड़ी देर में ममता चची पल्ली और राजन चाचा भी घर आ गए थे सबने साथ मिलकर खाना खाया, उसी बीच आपस में कुछ योजना बानी और चची ने बोल दिया की मामी आज उनके यहाँ सोयेंगी तो पल्ली ने भी किरण का नाम ले लिए की वो भी चलेगी,
इसके पीछे की वजह ये थी की जबसे सबको मामी और किरण के शामिल होने के बारे में पता चला था तो चची पल्ली चाचा सब बेचैन थे उनका स्वाद चखने के लिए,
पापा मौसा ने भी कहा की वो लोग आज खेत पर सोयेंगे, अनुज ने भी कहा की वो सागर बिरजू भी आज एक साथ सोने वाले हैं, सागर ये सुन खुश हो गया, बचा मैं तो मैंने भी बोल दिया मैं जग्गू और सरजू के साथ सोऊंगा,
माँ- अरे सब बहार सो रहे हो.
मां- मतलब घर पर सिर्फ हम दोनों जीजी और बाबा रह जायेंगे.
मां ने मन hi मन खुश होते हुए कहा, नाना के कान में भी जब ये बात पड़ी तो वो भी मन hi मन खुश होने लगे, जितने काम लोग उनको उतना मौका नज़र आ रहा था अपनी बेटी के साथ बिताने का,
खैर खाना पीना ख़तम हुआ सब लोग धीरे धीरे निकल लिए, अनुज सागर को लेकर बिरजू के घर की जगह जग्गू के घर की और ले गया,
सागर- हम तो बिरजू के यहाँ सोने वाले थे न,
अनुज- अरे वो तो ऐसे hi बोलै था, अगर मज़े करने हैं तो मेरे साथ चल,
सागर- किसके साथ,
अनुज- भाभी के साथ,
सागर- क्या प्रेमा भाभी के साथ,
सागर खुश होते हुए बोलै,
अनुज- हाँ देवर भाभी में मस्ती होती रहती है,
सागर- यार मज़ा आ जायेगा आज तो, भाभी क्या मस्त माल हैं, पर मानेगी?
अनुज- बस देखता जा, पति है नहीं यहाँ तो कोई तो चाहिए न बदन की प्यास बुझाने के लिए वही हम बुझाएंगे,
सागर- बढ़िया मज़ा आ जायेगा, पर वहां बुआ और फूफाजी भी तो होंगे,
अनुज- नहीं आज सब खेत पर सोने वाले हैं भाभी अकेली हैं,
सागर- मज़ा आ गया यार क्या मौका मिला है,
जल्दी hi वो दोनों वहां पहुँच गए और दरवाज़ा भाभी ने खोला जिन्हे देखकर सागर लार टपकने लगा, bhabh,i ने जल्दी hi उन्हें अंदर लिए,
खैर बाकि लोगो की योजना कुछ यूँ थी की ममी और किरण ममता चची और पल्ली, उन्ही के घर पर रात गुजरने वाले थे और उनका साथ पापा मौसा और राजन चाचा देने वाले थे,
दूसरी और मैं, जग्गू, राजपाल ताऊ, मंजू तै, पद्मिनी तै, हम सब लोग दीनू चाचा के यहाँ डेरा जमाये हुए थे, जहाँ उनका पूरा परिवार मौजूद था,
घर पर सिर्फ मां माँ, मौसी और नाना थे, तो आज की रात कैसी गुजरने वाली थी ये सब अगली अपडेट में, जारी रहेगी.





























































