Incest GHAR KI AAG (URDU) - Page 8 - SexBaba
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Incest GHAR KI AAG (URDU)

घर की आग

Episode 34: प्यास, पहरा और परवाज़

सन 1: हवेली का सेहन — मान और बेटी की ख़ुफ़िया गुफ्तगू

नाश्ते के बाद हवेली में हमेशा की तरह chahal-pahal शुरू हो चुकी थी. रशीद साहब और बाक़ी मर्द बहार निकल चुके थे. हिरा ने कॉलेज जाने के लिए अपना बैग उठाया, मगर उसके क़दम सीधे किचन की तरफ गए जहाँ नसीम अकेली खरी कुछ हिदायत दे रही थीं.

"अम्मी... ज़रा एक बात सुनिए," हिरा ने निहायत धीरे से नसीम के क़रीब जा कर कहा.

नसीम ने मुद कर बेटी को देखा. "हिरा? तुम अभी तक गयी नहीं? कॉलेज के लिए देर हो रही है."





हिरा ने अपनी उँगलियों से बैग की स्ट्राप को मरोरा. "अम्मी, वो... कल टेबल पर मैंने जो बात की थी, मैं उस पर क़ाइम हूँ. मगर मुझसे अब और इंतज़ार नहीं हो रहा. मेरी बेचैनी बढ़ती जा रही है. क्या मैं... क्या मैं इस हफ्ते अपनी 'पहली चुदाई' का काम पूरा कर लून? आप इजाज़त दें तोह मैं तयारी करून."





नसीम ने एक गहरी सांस ली और अपने हाथ साफ़ करके हिरा को थोड़ा दूर एक कोने में ले गयीं. "नहीं हिरा. अभी बिलकुल नहीं."

"मगर क्यों अम्मी? अब्बू भी मान गए हैं और सीमा बजी ने उन्हें संभल लिया है," हिरा ने ज़िद्द करते हुए कहा.

"बात अब्बू की नहीं है, हिरा. बात घर के माहौल और ज़िम्मेदारी की है," नसीम ने निहायत संजीदगी से समझाया. "पहली बार जब 'सील' toot-ti है न, तोह सिर्फ खून नहीं निकलता, लड़की की चाल बदल जाती है. उसका ang-ang बोलने लगता है के वो अब कुंवारी नहीं रही. और हमारे घर में अगले कुछ दिनों में मेहमानों का आना जाना शुरू होने वाला है."

नसीम ने हिरा के कंधे पर हाथ रखा. "कराची से शमीम बजी, बिलाल और ज़ोया आ रहे हैं. मैंने उस्मान और ज़ोया के रिश्ते की बुनियाद रख दी है. अगर उस्मान की शादी ज़ोया से पक्की होती है, तोह घर में दावतें होंगी, रस्में होंगी. इन सब kaam-kaaj के लिए मुझे तुम्हारा, आयेशा का और सीमा का 'फिट' होना ज़रुरत है. अगर तुम पहली चुदाई के दर्द और उसके बाद की लचक लेकर मेहमानों के सामने घूमोगी, तोह लोग सवाल उठाएंगे."

हिरा ने होंठ भींचिये. "अम्मी, मैं संभल लूंगी..."

"नहीं संभल पाओगी," नसीम ने बात काटी. "जब पहली बार किसी कमसिन छूट में कोई तगड़ा लुंड अंदर जाता है न, तोह वो जिस्म को अंदर से हिला कर रख देता है. तुम्हारी आँखों की सूजन और तुम्हारे चलने का ढंग सब बता देगा. क्या तुम्हे वह दिन याद है जब आयेशा की 'सील' टूटी थी. पूरे दो दिन तक वो ठीक से खरी नहीं हो सकीय थी. उसकी राणो में इतना दर्द और सूजन थी के जब वो चलती थी तोह उसकी चाल चीख चीख कर बताती थी के उसके साथ क्या हुआ है. " नसीम का चेहरा थोड़ा फिक्रमंद हुआ. "हिरा, तुम भूल रही हो के कराची से शमीम बजी, परवीन ममी और रुक्साना फुप्पो आ रही हैं. ये पुराणी औरतें हैं, इनकी नज़रें चील जैसी तेज़ और तजुर्बा रगों में दौड़ता है. आयेशा की बदली हुई चाल का hi मैं अभी कुछ नहीं कर पायी हूँ, उसकी चाल में अभी भी वो लचक बाक़ी है, अब उन लोगों के सामने मैं एक और नया जोखिम (रिस्क) नहीं ले सकती. अगर उन्होंने आयेशा के ढंग या उसकी बदली हुई लचक पर कोई सवाल खरा कर दिया, तोह मेरे पास कोई जवाब नहीं होगा. मैं उनकी तेज़ नज़रों से तुम्हे और आयेशा को नहीं बचा पाऊँगी."

हिरा ने रोनी सी सूरत बनायीं. "अम्मी, मगर मेरी ये प्यास...? अगर मैंने अभी ये काम पूरा न किया तोह मेरा दिमाग पढ़ाई में नहीं लगेगा."

"तोह ठंडा पानी पियो, और अपनी प्यास को थोड़ा और सब्र सिखाओ, हिरा!" नसीम ने सख्ती मगर मोहब्बत से कहा. "अभी तुम्हारा 'फ्रेश' दिखना ज़रूरी है. एक बार ये रिश्ते की बात पक्की हो जाये, मेहमान चले जाएं, फिर मैं खुद तुम्हे अपने हाथों से तैयार करके तुम्हारे 'जवान लुंड' के हवाले करुँगी. तब तक, सिर्फ अपने मम्मों और होंठों से काम चलाओ, छूट को मेहफ़ूज़ रखो. तुम्हारी ये प्यास थोड़ा और रुक सकती है."





हिरा ने समझ लिया के अम्मी अब नहीं मानेंगी. उसने अपना बैग सही किया और एक गहरी सांस लेकर दरवाज़े की तरफ बरही. "ठीक है अम्मी... मगर याद रखियेगा, ये प्यास जब भड़केगी तोह फिर कण्ट्रोल करना मुश्किल हो जायेगा."

नसीम उसे जाता हुआ देख कर हल्का सा मुस्कुरायी. "ये जवानी भी न... बिलकुल रशीद साहब पर गयी है, दोनों बाप बेटी को सब्र hi नहीं रहता. बड़े उतावले बने फिरते हैं"

सन 2: उस्मान की कार — रास्ता और ख़ुफ़िया मंसूबा

हवेली के बाहर उस्मान की कार स्टार्ट खरी थी. उस्मान ड्राइविंग सीट पर बैठा था, मगर उसके चेहरे पर कल रात dastar-khwan पर हुए धमाके का असर साफ़ नज़र आ रहा tha—Naseem ने जो उसका और ज़ोया का रिश्ता पक्का करने की बात की थी, उससे उसके दिमाग में खुजली हो रही थी. कुछ hi देर में हमजा और आयेशा अपना अपना बैग लेकर कार में दाखिल हुए. आयेशा आगे उस्मान के साथ बैठी, जबकि हमजा पीछे की सीट पर सुकून से दराज़ हो गया.

उस्मान ने कार आगे बढ़ाई, मगर उसकी ख़ामोशी और उदासी से स्टीयरिंग व्हील को पकड़ने का ढंग देख कर आयेशा समझ गयी.

"भैया... क्या बात है? कल रात से आपका चेहरा यूँ उतरा हुआ है जैसे ज़ोया से नहीं, किसी भेड़िये से आपका रिश्ता जोड़ा जा रहा हो? कल रात जब अम्मी ने इस रिश्ते का ज़िक्र किया तब तोह आप बड़े खुश दिख रहे थे, अब अचानक किसलिए उदास बैठे हैं?" आयेशा ने थोड़ी शोखी और हैरत से पूछा.





उस्मान ने एक गहरी सांस ली. "आयेशा, ऐसी बात नहीं है. ज़ोया लड़की बुरी नहीं है, मुझे पसंद भी है... मगर मेरी असल परेशानी कुछ और है. कराची का निज़ाम अलग है और हमारी हवेली का माहौल अलग. मैं बस ये सोच कर परेशां हूँ के क्या वो लड़की हम लोगों के इस खुले माहौल में खुद को ढल पायेगी? कहीं वो यहाँ के ढंग देख कर तमाशा न खरा कर दे."

आयेशा ने मुस्कुरा कर उस्मान का हाथ थमा. "भैया, आप इस बात की फ़िक्र छोर दें. ज़ोया का मेरे साथ एक अच्छा और दोस्ती वाला रिश्ता बन चूका है. वह मेरी ham-umar है, इसलिए वो मेरे नेचर को अच्छे से समझ सकती है और मैं उसे समझा भी सकती हूँ. मैं उसे धीरे धीरे अपने साथ लगाऊंगी, हवेली के rasm-o-riwaaj समझाऊँगी और उसे इस माहौल की आदि बना दूँगी. और फिर अम्मी के होते हुए ये काम और भी आसान होजायेगा, वो बोहोत जल्द यहाँ एडजस्ट कर लेगी."

उस्मान ने थोड़ा शक से देखा जैसे उसे आयेशा की बातों पर पूरा यक़ीन न हो, मगर फिर उसके चेहरे पर दुःख साफ़ नज़र आने लगा. "चलो वो तोह ठीक है... मगर सीमा आपि का क्या? मेरा और सीमा आपि का जो सिलसिला चल रहा था, वो तोह अब ख़तम हो जायेगा. वो मुझसे दूर हो जाएँगी, इसी बात का भी ग़म है मुझे."

हमजा ने पीछे से आगे को झुकते हुए शरारत से कहा, "भैया, आप क्यों दिल छोटा कर रहे हैं? मेरे पास एक ज़बरदस्त तरकीब है. एक बार आपकी और ज़ोया की शादी हो जाये, फिर हम अम्मी के ज़रिये ऐसा मंसूबा बनाएंगे के बिलाल भाई की पूरी फॅमिली को कराची से लाहौर या लाहौर के क़रीब hi कहीं शिफ्ट करवा दें. जब वो यहाँ रहेंगे, तोह सीमा आपि भी हमारे क़रीब hi रहेंगी."

आयेशा ने हमजा की इस शातिर तरकीब पर ख़ुशी ज़ाहिर करते हुए निहायत नॉटी लहजे में कहा, "वह हमजा! तुम्हारा दिमाग तोह harami-pan में सब से आगे चलता है. चलो भैया, अब तोह आपका ग़म दूर हो जाना चाहिए!" उस्मान को भी हमजा की ये तरकीब बिलकुल सही और ठोस लगी.





हमजा ने थोड़ा हँसते हुए आयेशा की तरफ देखा और उसे जलने के लिए बोलै, "और वैसे भी, अब्बू इस शिफ्ट वाले मामले पर फ़ौरन राज़ी हो जायेंगे. उन्हें तोह बस इस बात से मतलब है के जब उनका दिल चाहे, उन्हें सीमा एपीआई की गांड मिलती रहे. उनका ध्यान वहां बनता रहेगा."

ये सुनते hi आयेशा के चेहरे के रंग बदलने लगे. उसके अंदर एक अजीब सी जलन और अकेलेपन का एहसास जागने लगा. उसने सोचा के शादी के बाद उस्मान भाई अपनी (होने वाली) बीवी ज़ोया और पुराणी मोहब्बत सीमा में पूरी तरह मसरूफ हो जायेंगे. हमजा का सिलसिला पहले hi अम्मी और हिरा के साथ अंदर hi अंदर चल रहा है. और अब्बू का ध्यान सीमा एपीआई और हिरा की मौजूदगी की वजह से उस से दूर hi रहेगा. 'तोह फिर मेरा क्या होगा? मैं तोह इस हवेली में बिलकुल अकेली रह जाऊंगी,' आयेशा ने सोचा.

हमजा ने मिरर में आयेशा के चेहरे पर छायी उस ख़ामोशी और जलन को ग़ौर से देखा. वो रसीली आवाज़ में बोलै, "आयेशा बजी... अगर आप भी सीमा एपीआई और हिरा बजी की तरह थोड़ा जिगरा दिखाएं, तोह आपकी भी चंडी हो सकती है. फिर आपको अकेलेपन का रोना नहीं रोना पड़ेगा."

आयेशा ने थोड़ा चौंक कर पीछे देखा. "क्या मतलब हमजा? मैं क्या हिम्मत दिखाऊं?"

उस्मान ने कार की रफ़्तार थोड़ी धीमी की और आयेशा की नरम राण पर हाथ रख कर दबाया. "मतलब साफ़ है आयेशा. तुम मर्द को खुश करने के क़ाबिल हुई भी हो या नहीं, ये तुम्हे साबित करना पड़ेगा. अगर तुम में वो सलाहियत है, तोह हम दोनों भाई हमेशा तुम्हारे साथ हैं."

हमजा ने बात को आगे बढ़ाया, "हाँ बजी... अगर खुद को साबित करना है, तोह आज बल्कि अभी, इस रस्ते में जो सुनसान जगह आती है, वहां अपने मुंह से हम दोनों भाइयों के लुंड चूस कर उन्हें ठंडा करना पड़ेगा. अगर आपने ये इम्तेहान पास कर लिया, तोह आप कभी अकेली नहीं रहेंगी."

आयेशा पहले तोह ये सुन कर घबरा गयी, उसके होंठ थरथराये. "नहीं... तुम दोनों पागल हो गए हो क्या? रस्ते में... इस तरह कार में मैं कैसे... नहीं हमजा ये बिलकुल भी नहीं होसकता...!"

"क्यों नहीं आयेशा? अगर कार में तंगी महसूस हो तोह हम बहार खुले में भी कर सकते हैं. वहां हमें देखने वाला कौन होगा? ख़ास कर इस वक़्त," उस्मान ने शोखी से कहा.

"अपनी हवेली में हर कोई अपनी आग बुझा रहा है, तोह आप अपने इन दो जवान भाइयों को क्यों प्यासा रखना चाहती हैं? हमारी गर्मी दूर कीजिये, और हमारे साथ मज़े कीजिये" पीछे से हमजा की उकसाती हुई आवाज़ आयी.

हमजा और उस्मान ने बार बार उसे उकसाना और उभारना शुरू किया. आयेशा ने एक गहरी सांस ली, उसे डर तोह लग रहा था इस नए एडवेंचर को लेकर, लेकिन कल रात वाली dastar-khwan की बातें और अपने अकेलेपन का खौफ उसके दिमाग पर सवार हो गया. उसने सोचा के जब हवेली में सब आज़ाद हैं, तोह वो क्यों पीछे रहे.

"ठीक है..." आयेशा ने धीरे से अपना दुपट्टा सरका दिया, इस सोंच से उसके अंदर गर्मी बढ़ रही थी और उसके होंठ रसीले हो रहे थे. "जब सब अपनी अपनी आग बुझा रहे हैं, तोह मैं भी अपने हिस्से के मज़े ले hi लून. चलिए भैया, कार को किसी अछि जगह में रोकिये."

उस्मान ने मुस्कुरा कर कार को हाईवे से उतरा और नहर (कैनाल) के किनारे घने पेड़ों और ऊँची झाडिओं की आड़ में खरी कर दी. बाहर बिलकुल ख़ामोशी थी, सिर्फ पानी के बहने की हलके सरसराहट थी.

कार रुकते hi हमजा ने पीछे से अपना हाथ आगे बढ़ाया और आयेशा की सीट को पूरी तरह रेक्लिने करके तक़रीबन नीचे लिटा दिया. इससे पहले के आयेशा संभालती, हमजा ने आगे झुक कर उसके रसीले होंठों को अपने मुंह में भर लिया और उन्हें दीवानावार चूसने लगा. इधर उस्मान आगे से आयेशा के कपडे निकलने में मशग़ूल हो गया. उसने उसकी क़मीज़ को ऊपर खींचने की कोशिश की.

"भैया... रुकिए, ये क्या कर रहे हैं? कपडे मत निकालिये," आयेशा ने हल्का सा ऐतेराज़ दिखाया.

"आयेशा, कपड़ों के साथ मज़ा नहीं आएगा, सब फस जायेगा," उस्मान ने बहाना बनाया और निहायत सफाई से उसकी क़मीज़ और ब्रा को ऊपर करके उसके गोर, भरे हुए मम्मों को बाहर निकल दिया.

मम्मी बाहर आते hi हमजा और उस्मान दोनों की नज़रों में हवस चमक उठी. हमजा उसके दोनों मम्मो को दबाते हुए उसके होंठ चूसने लगा और उस्मान उसके पैरो में बैठ उसकी शलवार भी निकल दी और उसकी छूट चाटने की कोशिश की मगर कार में सीट रेक्लिने होने के बावजूद जगह काम लग रही थी.





"आयेशा, कार में कम्फर्ट नहीं है, मज़ा नहीं आएगा. चलो बहार झाडिओं की आड़ में चलते हैं," उस्मान ने कहा.

आयेशा ने बहार जाने के ख्याल से साफ़ मन कर दिया. उसकी जान निकल रही थी डर से. "नहीं भैया! बिलकुल नहीं. मैं बहार नहीं जाऊँगी. क्यों आप लोग अपनी बहन को रंडी की तरह बाजार में नंगा करना छह रहे हैं? किसी ने देख लिया तोह?"

उस्मान ने उसके गाल को चूमा और निहायत नरमी से समझाया, "आयेशा, पागल मत बनो. हम तुम्हारे भाई हैं, तुम्हारी इज़्ज़त पर कोई आंच नहीं आने देंगे. बहार बिलकुल सुनसान है, झाडिओं के पीछे कोई देख hi नहीं सकता."

दोनों भाइयों ने बिना देर किये कार के दरवाज़े खोले और बहार निकल कर अपनी अपनी पंत और शलवार नीचे करने लगे. जब आयेशा ने कार के अंदर से दोनों भाइयों के तने हुए, लम्बे और गरम औज़ारों को खुले आसमान के नीचे लहराते देखा, तोह उसकी अपनी छूट में एक तेज़ी से लचक उठी. उसका डर हवस में बदलने लगा. वो डरते डरते कार से बहार निकली और झाडिओं की आड़ में अपने पंजों के बल ज़मीन पर बैठ गयी.

उसने निहायत झिझक और फाहिशा शौक़ के साथ दोनों भाइयों के लुंड अपने हाथों में लिए. उनकी गर्मी और सख्ती आयेशा के हाथों को जला रही थी.

"उफ़... तुम दोनों तोह सच में तूफ़ान लेकर घूम रहे हो," आयेशा ने शरमाते हुए दोनों औज़ारों को सहलाया.





"तोह शुरू हो जाओ बजी, पहले किसका चखना है?" हमजा ने मुस्कुराते हुए लुस्टि कमेंट किया. "देखें तोह सही हवेली के मर्दों को खुश करने का हुनर है भी या नहीं?"

आयेशा ने डर के मारे एक बार आसपास देखा के कहीं नहर के किनारे कोई आ न जाये, फिर उसने उस्मान के मोठे लुंड के ऊपरी हिस्से पर अपनी गीली जुबां फेरी.





"अह्ह्ह... आयेशा... ये हुई न बात," उस्मान ने कराहते हुए सुकून की सांस ली और अपना हाथ आयेशा के नए गोर मम्मों पर रख कर उन्हें zor-zor से दबाने लगा.

आयेशा ने बिना देर किये उस्मान का पूरा टोपा अपने मुंह में ले लिया और धीरे धीरे आगे पीछे होने लगी. उसके गले की नरमी उस्मान को पागल कर रही थी. वो डर और शर्म के बीच दोनों मर्दों के मज़े को महसूस कर रही थी. फिर उसने अपना मुंह थोड़ा खोला और हमजा के जवान लुंड को अपनी उँगलियों से ज़ोर से हिलना शुरू किया.

"बजी, थोड़ा इधर भी ध्यान दें, सिर्फ भैया के लुंड को hi मज़ा देंगी क्या?" हमजा ने be-sabri से उसके सर्र के बाल पकड़ते हुए कहा.

आयेशा ने उस्मान का लुंड मुंह से निकला, उसके होंठ थूक से गीले थे. उसने दररते धेरै से पूछा, "हमजा... कोई आ गया तोह? मुझे बोहोत डर लग रहा है."





"कोई नहीं आएगा बजी, आप बस चूसने पर फोकस करें," हमजा ने सरगोशी की.

आयेशा ने हमजा के तने हुए औज़ार को अपने होंठों के बीच दबाया और पूरी ताक़त से चूसना शुरू किया.

खुले में होने वाले इस खेल की वजह से आयेशा के अंदर इतनी गर्मी बढ़ गयी थी के वो लुंड चूसने के साथ साथ अपनी टांगो को आपस में भींची हुए अपनी छूट को भी रगड़ रही थी.





आयेशा बारी बारी दोनों भाइयों का माल चख रही थी. कभी वो उस्मान का लुंड पूरा हलक़ तक ले जाती, तोह कभी हमजा के औज़ार पर अपनी जुबां घूमती.

कार के एक की ठंडक बाहर झाडिओं तक नहीं थी, इसलिए तीनो के जिस्म पर पसीना चमक रहा था.

"उफ़ आयेशा... तुम तोह सच में उस्ताद निकली. सीमा आपि से भी ज़्यादा नरम मुंह है तुम्हारा," उस्मान ने मस्ती में उसके बालों को पकड़ कर थोड़ा अंदर को ढाका दिया.

तभी हमजा उसके मम्मी दबोचते हुए बोलै "बजी... दोनों को साथ में लोना अपने अंदर"

आयेशा ने कोई इंकार नहीं किया बल्कि जोश में अपनी पूरी कोशिश की







"शाबाश आयेशा...., ahhh...haan ऐसे hi खुश करते हैं मर्दों को..." उस्मान ने मज़े में कहा.

"मेरे भाइयों के लिए कुछ भी करुँगी" आयेशा ने उनकी आँखों में देखते हुए बड़ी ada'a से कहा और बरी बरी दोनों के लुंड चूसने लगी.





"बजी... थोड़ा तेज़... लगता है मेरा लुंड मैदान मरने वाला है," हमजा ने अपना लुंड उसके मुंह में थोड़ा झटके से चलते हुए कहा.

आयेशा ने दोनों भाइयों के लुंड को एक साथ अपने दोनों हाथों में लिया, उन्हें आपस में सताया (जोड़ा) और दोनों के टोपे को एक साथ अपनी जुबां से चाटना शुरू किया. वो पूरी तरह इस रंगीन और खौफनाक मस्ती में डूब चुकी थी.





कुछ hi देर में, उस्मान और हमजा दोनों के जिस्म थरथराये और वो झटके लेने लगे.

"आयेशा... पकड़ के रखना... मुंह मत हटाना... आ रहा है..." उस्मान ने भांपते हुए कहा.

आयेशा ने डर के मारे होंठों को थोड़ा पीछे किया लेकिन हमजा और उस्मान ने आयेशा का सर पकडे रखा और दोनों ने लुंड को अपने हाथों में पकड़ कर निहायत tez-tez हिलने लगे. अगले hi लम्हे, उस्मान और हमजा दोनों का गरम और गाढ़ा माल झटकों के साथ बाहर निकल कर आयेशा के होंठों, चेहरे और उसके नंगे मम्मों और उसके बाज़ुओं पर धार बन कर गिरने लगा.





आयेशा ने भांपते हुए, सांसें बहाल करते हुए दोनों भाइयों की तरफ देखा. उसके चेहरे पर अब डर के साथ साथ एक अजीब सा सुकून और फतह की मुस्कराहट थी. उसने धीरे से कार से टिश्यू निकल कर अपने हाथ और मम्मी साफ़ किये.

उस्मान और हमजा ने अपनी पंत और शलवार सही की. उस्मान ने आयेशा का गिला चेहरा चूमा, "तुमने साबित कर दिया आयेशा... अब तुम इस हवेली की असली रानी हो. तुम्हारा कोई मुक़ाबला नहीं."

तीनो वापिस कार में बैठे. उस्मान ने कार स्टार्ट की और हाईवे पर बढ़ गयी, मगर अब कार के अंदर का माहौल बिलकुल बदल चूका था. आयेशा अब अकेली नहीं थी, उसने दोनों भाइयों को अपना दीवाना बना लिया था.

सन 3: कराची का घर — शमीम बनु की तड़प और खामोश दीवार

कराची में शाम का वक़्त था. शमीम बनु के घर में एक अजीब सी ख़ामोशी फैली हुई थी. शमीम किचन में खरी चाय बना रही थीं, मगर उनका ध्यान बार बार लाउन्ज की तरफ जा रहा था, जहाँ उनका बीटा बिलाल चुपचाप बैठा था. जब से ज़ोया ने अपनी सख्त और संजीदा नज़रों का पहरा इस घर पर लगाया था, तब से बिलाल अपनी माँ शमीम से दूर भागने लगा था. शमीम के लिए ये सब्र बर्दाश्त से बाहर हो रहा tha—wo बीटा जो उनकी एक आह पर तरप उठता था, वो अब उन्हें देखने से भी कटरा रहा था. शमीम को बिलकुल अंदाज़ा नहीं था के बिलाल ये सब सिर्फ ज़ोया के डर से एक नाटक कर रहा है; वो तोह अंदर से बिलकुल टूट चुकी थीं, उन्हें लग रहा था के ज़ोया की सख्त निगरानी ने उनके बेटे को सच में उनसे दूर कर दिया है.

तभी लाउन्ज में शमीम की छोटी बेटी, फराह, आयी. फराह हमेशा की तरह अपने नखरों में थी, उसने लाउन्ज में आते hi नखरे से अपना फ़ोन सोफे पर फेंका.

"उफ़ अम्मी! कितनी देर लगा रही हैं चाय में? और आपको पता है न, कल सुबह हमे लाहौर के लिए निकलना है, मेरी अभी तक आधी पैकिंग बाक़ी है!" फराह ने किचन की तरफ मुंह करके ऊंची आवाज़ में नखरे से कहा.

शमीम ने चाय की ट्रे उठायी और लाउन्ज में आयीं. उन्होंने ट्रे टेबल पर राखी और फराह को नरम नज़र से देखा. "आ गयी चाय, फराह. अपने भाई को भी दो."

ज़ोया, जो वहां निहायत संजीदगी से बैठी कोई काम कर रही थी, उसने अपनी सख्त और पाकीज़ा नज़रें उठा कर बिलाल पर जमीन. बिलाल ने फ़ौरन अपनी नज़रें झुका लीन और अपनी माँ शमीम की तरफ देखा तक नहीं, बस चुपचाप कप उठाते हुए बोलै, "शुक्रिया अम्मी."

फराह ने अपना कप उठाया और सोफे पर फैलती हुई बोली, "भाई, मुझे लाहौर जा कर बोहोत साड़ी शॉपिंग करनी है. आपको मेरे साथ चलना पड़ेगा, मैं अकेले कहीं नहीं जाने वाली."

बिलाल ने ज़ोया की सख्त नज़र का दबाओ महसूस करते हुए सपाट लहजे में कहा, "हाँ फराह, चलें गए. मगर पहले कल वक़्त पर निकलना ज़रूरी है."

शमीम बनु वहां खरी अपने बेटे के इस rookhe-pan और दूरी को देख कर अंदर hi अंदर सुलग रही थीं. उन्हें लग रहा था के बिलाल सच में उनसे दूर भाग रहा है, और उनका ये लगाओ और उनकी तड़प उन्हें चैन नहीं लेने दे रही थी. वो इस घुटन को बर्दाश्त नहीं कर पायीं और बिना कुछ बोले चुपचाप वहां से घूमें और अपने कमरे में चली गयीं.

कमरे का दरवाज़ा बंद करते hi शमीम के आंसू निकल आये. वो बिस्टेर के कोने पर बैठ गयीं और भांपते हुए खुद से कहने लगीं, "मेरा अपना बीटा... मुझसे यूँ ग़ैरों की तरह दूर भाग रहा है. सिर्फ इस ज़ोया के डर से वो मेरी तरफ एक नज़र देखता तक नहीं. इस लड़की ने मेरे hi घर में मेरे और मेरे बेटे के बीच दीवार खरी कर दी है और बिलाल को मुझसे छीन लिया है."

शमीम के अंदर एक अजीब सी बेचैनी बढ़ रही थी. कल जब लाहौर से नसीम का फ़ोन आया था और उन्होंने उस्मान और ज़ोया के रिश्ते की बात की थी, तोह शमीम को इस अँधेरे में एक उम्मीद की किरण नज़र आयी थी. उन्हें लाहौर (हवेली) के अंदर के माहौल का तोह कोई अंदाज़ा नहीं था, मगर उन्होंने ये ज़रूर सोच लिया था के अगर ज़ोया का रिश्ता उस्मान से पक्का हो जाता है, तोह ज़ोया की साड़ी नज़रें और ध्यान बिलाल पर से हैट कर उसके अपने शूर (उस्मान) पर लग जायेगा. एक बार ज़ोया का पहरा बिलाल पर से हटा, तोह शमीम के लिए अपना बीटा वापिस पाना बोहोत आसान हो जायेगा.

"मुझे बस लाहौर पहुँचने तक ये दूरी और ये तड़प बर्दाश्त करनी होगी," शमीम ने अपने आंसू साफ़ करते हुए खुद को हौसला दिया. "एक बार हम लाहौर पहुँच जाएं, फिर इस ज़ोया का पहरा ख़तम होते hi मेरा बिलाल शायद फिर से मेरे पास लौट आएगा. तब तक मुझे ये सब बर्दाश्त करना hi पड़ेगा."

तभी दरवाज़े पर हलकी सी दस्तक हुई. शमीम ने जल्दी से अपना दुपट्टा सही किया और दरवाज़ा खोला. सामने बिलाल खरा था, उसके चेहरे पर अब भी वही sapaat-pan था के कहीं लाउन्ज में बैठी ज़ोया उसे देख न ले.

"अम्मी..." बिलाल ने निहायत धीरे और सपाट लहजे में कहा, मगर उसकी आँखों में अपनी माँ के लिए वही पुराणी तालाब और be-bassi झांक रही थी जिसे वो छुपा रहा था. "हम कल सुबह hi लाहौर के लिए निकल रहे हैं. ज़ोया कह रही है के सारा सामान वक़्त पर गारी में रखना है. आप भी अपनी तयारी मुकम्मल राखहिएगा."

शमीम ने बेटे के इस रूखे अंदाज़ को देखा तोह उनका दिल मज़ीद भर आया के वो कितना बदल गया है. उन्होंने भरी आवाज़ में कहा, "ठीक है बिलाल, मैं बिलकुल तैयार हूँ. तुम फ़िक्र मत करो."

बिलाल ने एक आखरी गहरी नज़र अपनी माँ पर डाली और फ़ौरन मुद गया, ताके लाउन्ज में बैठी ज़ोया को कोई शक न हो. दरवाज़ा बंद करके शमीम ने एक गहरी सांस ली. कल का सफर उन्हें लाहौर लेकर जा रहा था, जहाँ रिश्तों की एक नयी सियासत उनका इंतज़ार कर रही थी.

Episode 34 ख़तम

क्लिफहैंगर: क्या लाहौर की हवा ज़ोया के यह सख्त पहरा तोड़ पायेगी? बहन भाइयों के इस एडवेंचर के बाद जब घर लौटेंगे तोह किस तरह उनका इस्तेकबाल होगा? क्या मिस किरण हमजा के क्लास बंक करने पर रशीद साहब से हमजा की शिकायत लगाएंगी? नसीम और सीमा का आगे क्या प्लान है?
 
बहोत hi जल्दबाज़ी में किया है इस मर्तबा एडिटिंग वर्क, पता नहीं कितनी मिस्टेक्स हैं.......... प्लीज इग्नोर िफ़ यू फंड सम.
 
जितनी जल्दी जल्दी आपके रेविएवस एंड लाइक्स आएंगे नेक्स्ट episode भी उल्टी hi जल्दी मिलने के चान्सेस बढ़ेंगे.

योर रेविएवस, कमैंट्स एंड सपोर्ट इस थे रियल फ्यूल हेरे.

लव यू आल.
 
मुझे लगता है के शायद मेरे लिखने का अंदाज़ या तो लोगों तक ठीक से पहुँच नहीं प् रहा, या फिर उतना पसंद नहीं आ रहा. व्यूज तो काफी अच्छे आ रहे हैं, लेकिन रेविएवस बोहोत काम मिलते हैं.

मेरी आपसे गुज़ारिश है के अगर आपको मेरा काम पसंद आता है तो थोड़ी सी तारीफ या अपनी राइ ज़रूर दिया कीजिये. और अगर किसी जगह कमी महसूस हो या कुछ पसंद न आये, तो यह भी बताईये के क्या और क्यों पसंद नहीं आया. इससे मुझे अपनी राइटिंग को और बेहतर बनाने का मौक़ा मिलेगा.
 
अभी अभी Episode 35 का पहला सन लिख कर कम्पलीट किया है, और वह एक टिपिकल ड्रामा स्टाइल में टर्न हो गया. शुरू में इस episode के लिए मेरे आइडियाज कुछ और थे, लेकिन अब लगता है के मैं इसी टोन को सेकंड सन में भी कंटिन्यू करूँगा… और सच कहूं तो इसमें मुझे यह काफी मज़ा आ रहा है.
 
बहोत सारे लोग स्टोरी के साथ गिफ्स ऐड करने की रिक्वेस्ट दाल रहे हैं डीएम में जबकि मैं रेगुलरली गिफ्स ऐड कर रहा हूँ....

मुझे लगता है के 'High-resolution गिफ्स' (जो 5मब से ज़्यादा साइज की हैं) स्लो इंटरनेट स्पीड पर लोड होने में थोड़ा वक़्त ले रहीं हैं. जो के episode 34 को मैं आज फिर एक बार पढ़ते वक़्त महसूस किया.

इसलिए एपिसोड्स पढ़ते वक़्त थोड़ा सब्र रखें, एक बार साड़ी गिफ्स लोड हो जाएँगी 3-4 में तब पढ़ लेना आपको भी मज़ा आएगा गिफ्स के साथ कहानी पढ़ने में.





फॉर एक्साम्प्ले एक GIF यहाँ देरहा हूँ आप लोग देखिये कितना वक़्त लग रहा है इसे लोड होने में.
 
घर की आग

Episode 35: सच का धमाका — बिखरे कांच — ख़ुफ़िया मंसूबे

सन 1: हवेली का दालान — रशीद साहब का क़हर और खौफनाक सच

नहर के किनारे उस खौफनाक और गरम एडवेंचर के बाद जब उस्मान की कार दोबारा हवेली के बाहर आकर रुकी, तोह कार के अंदर का नशा अब धीरे धीरे डर में बदल रहा था. आयेशा ने जल्दी से अपना हुलिया सही किया, दुपट्टा सर पर जमाया, मगर उसके चेहरे पर पसीने की बूँदें अभी भी मौजूद थीं. हमजा ने पीछे से अपनी जीन्स सही की और उस्मान ने एक ठंडी सांस लेकर कार का इंजन बंद किया.

वक़्त तेज़ी से निकल चूका था. न तोह हमजा कोचिंग जा पाया था, न आयेशा कॉलेज, और उस्मान जो हवेली का सब से ज़िम्मेदार बीटा था, वो आज ऑफिस के एहम तरीन दिन पर गायब था.

तीनो जैसे hi धीरे क़दमों से हवेली के आँगन में दाखिल हुए, पूरे दालान में एक अजीब सा भरी सन्नाटा था. किचन के पास नसीम सहमी हुई खरी थीं और सामने दीवान पर रशीद साहब बैठे हुए थे. उनके हाथ में ऑफिस की कुछ फाइल्स थीं और उनका चेहरा गुस्से से सुर्ख हो रहा था. उनकी गहरी और भरी नज़रें जैसे hi इन तीनो पर पड़ीं, हवेली का तापमान अचानक गिर गया.

"आगये तुम लोग?" रशीद साहब की आवाज़ पूरे दालान में किसी दहाड़ की तरह गूंजी.

उस्मान ने आगे बढ़ने की कोशिश की, उसके हलक़ में कांटे चुभने लगे थे. "अब्बू... वो एक्चुअली..."





"ज़ुबान बंद रखो अपनी, उस्मान!" रशीद साहब बिस्टेर से उठे, उनका भरी जिस्म और उनका जलाल देख कर आयेशा डर के मारे एक क़दम पीछे हैट गयी. रशीद साहब ने फाइल्स टेबल पर पटक दें. "तुम्हे अंदाज़ा भी है के आज ऑफिस में क्या तमाशा हुआ है? मालिक साहब की डील आज फाइनल होनी थी. दो करोड़ की वो डील, जिस पर हमारे नए प्रोजेक्ट का दारोमदार था, वो सिर्फ इसलिए अटक गयी क्यूंकि हवेली का बड़ा बीटा, जो खुद को बड़ा डायरेक्टर समझता है, वो टाइम पर हाज़िर hi नहीं था! डिलेड पेमेंट का बहाना बना कर मालिक साहब ने डील रोक दी है और हमारे बिज़नेस पर एक ऐसा नेगेटिव रिमार्क लगाया है जिसे साफ़ करने में महीनो लगेंगे!"

उस्मान ने सर झुका लिया, उसकी मर्दानगी अब्बू के इस जलाल के सामने बिलकुल ढीली पद गयी थी. "अब्बू, मुझसे ग़लती हुई... रस्ते में थोड़ा टाइम लग गया..."

"कहाँ लग गया टाइम?!" रशीद साहब ने दाहररा. "तुम्हारा फ़ोन बंद था, हमजा का फ़ोन बंद था. यह दोनों बचे कॉलेज और कोचिंग के बहाने निकले और तुम इन्हें चोर्ने निकले थे. दो घंटे का रास्ता चार घंटे में कैसे बदला? मुझे साफ़ साफ़ बताओ के क्या चल रहा है, वर्ण आज मैं भूल जाऊँगा के तुम इस हवेली के वारिस हो!"

रशीद साहब का गुस्सा इस वक़्त आसमान पर था. नसीम ने आगे बढ़ कर उनका बाज़ू पकड़ने की कोशिश की, "साहब... बचे हैं, ग़लती हो गयी... आप ठंडा पानी..."

"नसीम, तुम बीच में मत आओ!" रशीद साहब ने उन्हें झटक दिया. उनकी नज़रें अब आयेशा पर जमीं जो डर के मारे थरथर काँप रही थी. आयेशा का ज़ेहन पहले hi कमज़ोर था, और नहर के किनारे जो कुछ हुआ था, (रशीद साहब) अब्बू के खौफ ने उसे अंदर से तोड़ दिया था. उसे लग रहा था के अब्बू को सब पता चल चूका है.

रशीद साहब आयेशा के बिलकुल क़रीब आकर खरे हो गए, उनकी तेज़ नज़रें आयेशा के चेहरे और उसके ढीले दुपट्टे पर थीं. "आयेशा... तुम बताओ. तुम्हारी यूनिवर्सिटी कहाँ है और तुम लोग कहाँ थे? अगर तुमने झूट बोलै, तोह मुझसे बुरा कोई नहीं होगा."

आयेशा के होंठ थरथराये, उसने रोनी सी सूरत बना ली. उसने उस्मान और हमजा की तरफ देखा, मगर उन दोनों के सर्र झुके हुए थे. बाप का क़हर ऐसा था के आयेशा की हिम्मत टूट गयी और डर के मारे उसके मुंह से सच निकल गया.

"अब्बू... अब्बू मुझे माफ़ कर दें! मेरी कोई ग़लती नहीं है!" आयेशा रोने लगी, उसके आंसू बह निकले. "हम... हम लोग कॉलेज नहीं गए थे. उस्मान भाई ने कार नहर के किनारे, झाडिओं के पीछे रोक दी थी..."

"आयेशा!!" उस्मान ने धीरे से उसे टोकना चाहा, मगर रशीद साहब ने गुस्से में उस्मान को एक सख्त घूर (नज़र) के साथ खामोश कर दिया.

"बोलो आयेशा, क्या हुआ था वहां?" रशीद साहब की आवाज़ अब भरी और खौफनाक हो चुकी थी.

आयेशा ने हिचकियाँ लेते हुए सब उगल दिया. "अब्बू... वहां बहार... खुले में... हमजा और उस्मान भाई ने मुझे अपनी बातों से गरम और मजबूर किया... उन्हों ने... उन्हों ने मुझसे अपने लुंड चूसने को कहा... और हम तीनो बहार खुले आसमान के नीचे... वही सब कर रहे थे... इसलिए देर हो गयी...!"

यह सुन्ना था के दालान में जैसे क़यामत टूट पड़ी. नसीम ने डर के मारे अपने मुंह पर हाथ रख लिया, उनकी आँखें फटी की फटी रह गयीं. उन्हें अंदाज़ा नहीं था के बचे इस हद्द तक गुज़र जायेंगे.

रशीद साहब जहाँ खरे थे, वही जैम गए. उनका चेहरा गुस्से से अब सुर्ख से कला पड़ने लगा था. उन्हों ने पहले उस्मान को देखा, फिर हमजा को, और आखिर में आयेशा को. उनका सांस तेज़ी से चल रहा था. पहले तोह वो सिर्फ ऑफिस न पहुंचने और बिज़नेस के नुक्सान पर नाराज़ थे, मगर जब इस देरी की असली वजह वे हुई, तोह उनका गुस्सा एक खौफनाक क़हर में बदल गया.

"फाहिशा हसरतों के घुलम...!" रशीद साहब की आवाज़ नहर के तूफ़ान की तरह गूंजी. उन्हों ने आगे बढ़ कर उस्मान के चेहरे पर एक सख्त थप्पड़ रसीद किया. "तुम्हें अपना वारिस बनाया था! बिज़नेस की ज़िम्मेदारी दी थी! और तुम... तुम अपनी hi बहन को बाहर सड़कों पर, झाडिओं में नंगा करके अपनी जिन्सी आग बुझा रहे थे?!"

उस्मान थप्पड़ खा कर पीछे हटा, उसने अपना गाल पकड़ लिया मगर मुंह से एक लफ्ज़ नहीं निकला.

रशीद साहब अब हमजा की तरफ मुड़े, उन्हों ने उसके बाल पकडे और उसे झटका दिया. "और तुम... कोचिंग के बहाने अपनी बहन के जिस्म के साथ खेल रहे हो खुले आम? तुम लोगों को हवेली में काम जगह मिलती है? तुम्हारे लुंड इतने जवान हो गए हैं के तुम्हें हवेली की चारदीवारी छोटी लगने लगी है?!"

रशीद साहब पूरे दालान में गुस्से से चक्कर काटने लगे, उनका गुस्सा अब इस बात पर सब से ज़्यादा था के हवेली की इज़्ज़त बाहर नीलम हो रही थी. "मुझे इस बात का दुःख नहीं है के तुम लोग आपस में क्या कर रहे हो! इस हवेली का निज़ाम जो है, वो चारदीवारी के अंदर है! मगर तुम लोग इतने लापरवाह, इतने be-gairat हो गए हो के चारदीवारी के बहार, खुलेआम नहर के किनारे हवेली की इज़्ज़त को नीलम करने पर तुले हुए हो?! अगर वहां कोई आजाता, अगर किसी की नज़र मेरी बेटी पर पद जाती, या किसी को इसका इल्म होजाता के तुम लोग आपस में bhai-bahen हो, तोह इस हवेली की शान और मेरा नाम कहाँ जाता?!"

रशीद साहब ने गुस्से में टेबल पर पारी हुई गिलास की सुराही उठायी और ज़मीन पर दे मारी. गिलास के टुकड़े पूरे फर्श पर फेल गए. आयेशा चीख कर नसीम के पीछे छुप गयी.





"ज़िम्मेदारियों को छोर कर, बिज़नेस का दो करोड़ का नुक्सान करके तुम लोग बहार randi-baazi कर रहे हो?!" रशीद साहब उस्मान के बिलकुल सामने आकर खरे हो गए, उनकी आँखें गुस्से से उबाल रही थीं. "उस्मान! अगर कल तक मालिक साहब की डील फाइनल नहीं हुई, और हमारे खंडन पर कोई आंच आयी, तोह मैं तुम तीनो की जवान जिस्मों का वो हाल करूंगा के तुम लोग ज़िन्दगी भर याद रखोगे!"

उन्हों ने हमजा की तरफ देखा, "और तुम... कल से अगर तुम्हारा क़दम इस हवेली से बाहर बिना मेरी इजाज़त के निकला, तोह मैं तुम्हारी टांगें तोड़ दूंगा!"

दालान में सिर्फ रशीद साहब के सांस लेने की भरी आवाज़ थी. उस्मान, हमजा और आयेशा, तीनो गुनहगारों की तरह सर झुकाये खरे थे, उनकी जवानी का सारा नशा बाप के इस क़हर के सामने काफूर हो चूका था. नसीम चुपचाप खरी आंसू बहा रही थीं, उन्हें समझ नहीं आ रहा था के इस तूफ़ान को कैसे संभालें.

रशीद साहब ने एक आखरी धररात वाली नज़र तीनो पर डाली, "नसीम! इन दोनों को उनके कमरों में बंद करो. और उस्मान... तुम अभी के अभी मेरे साथ ऑफिस चलोगे, इस डील को बचाने के लिए जो मरना पड़े, मारो, मगर मुझे नुक्सान नहीं चाहिए!"

रशीद साहब गुस्से में पालते और बाहर की तरफ निकल गए. उस्मान ने एक गहरी और be-bassi भरी नज़र हमजा और आयेशा पर डाली, और चुपचाप अब्बू के पीछे निकल गया. हवेली के दालान में अब सिर्फ खौफ और आने वाले तूफ़ान का सन्नाटा बाक़ी था.

सन 2: हवेली का दालान — सीमा का खौफ और Baap-Beton की रुखसत

रशीद साहब के गुस्से का तूफ़ान जब पूरे दालान में गरज रहा था, तोह किचन के परदे के पीछे सीमा खरी ठरताहार काँप रही थी. उसने अपनी बहन आयेशा के मुंह से निकला एक एक लफ्ज़ सुना था. जब आयेशा ने खुलेआम नहर के किनारे दोनों भाइयों का लुंड चूसने का सच उगला, ये सुनकर पहले तोह उसकी छूट में एक हलकी sar-saraahat हुई, और उसकी छूट उस सोंच से पानी बहाने लगी. एक्ससिटेमेंट में वो अपने आप को आयेशा की जगह तसव्वुर करने लगी. लेकिन जब रशीद साहब का ग़ुस्सा और खौफनाक गरज सुनी, तोह सीमा का अपना कलेजा हलक़ को आ गया.

जैसे hi रशीद साहब ने गुस्से में गिलास की सुराही ज़मीन पर पटकी, सीमा ने डर कर अपने कान बंद कर लिए. उसका ध्यान बार बार ज़मीन पर बिखरे कांच के टुकड़ों से हैट कर अब्बू के उस गुस्से पर जा रहा था जो इस वक़्त आग बरसा रहा था. वो रोने वाली हो गयी थी, मगर डर के मारे उसकी आवाज़ नहीं निकल रही थी.

"उस्मान! तुम अभी के अभी मेरे साथ ऑफिस चलोगे, इस डील को बचाने के लिए जो मरना पड़े, मारो, मगर मुझे नुक्सान नहीं चाहिए!" रशीद साहब के यह आखरी अलफ़ाज़ पुरे दालान में गूंजे.

रशीद साहब जैसे hi गुस्से में बाहर की तरफ मुड़ने लगे, उनका फ़ोन ज़ोर से बजा. उन्होंने झटके से फ़ोन कान से लगाया, "हाँ, बोलो!... क्या?! मालिक साहब इस्लामाबाद निकल गए हैं?! उन्होंने मीटिंग कैंसिल कर दी?"

रशीद साहब का चेहरा गुस्से से मज़ीद खौफनाक हो गया. उन्होंने फ़ोन कटा और उस्मान को घूर कर देखा. "मालिक साहब हाथों से निकल रहे हैं. वो डिलेड पेमेंट की वजह से गुस्से में अपनी डील हमेशा के लिए रोकने इस्लामाबाद निकल गए हैं. ये सब तुम्हारी लापरवाही का नतीजा है उस्मान...! अगर आज हम उनके पीछे इस्लामाबाद न पहुंचे, तोह यह दो करोड़ का नुक्सान हमारी पूरी हवेली को ले डूबेगा!"

उस्मान ने जल्दी से अपना चेहरा साफ़ किया, बाप के थप्पड़ का निशान अभी भी उसके गाल पर सुर्ख चमक रहा था, मगर बिज़नेस का डर अब उस पर भी सवार था. "अब्बू... मैं जारी निकलता हूँ. हम अभी के अभी इस्लामाबाद के लिए निकलते हैं. मैं वहां चल कर मालिक साहब से खुद बात करूंगा, उन्हें हर हाल में मनाऊंगा."

रशीद साहब ने गहरी और भारी सांस ली. उनका गुस्सा अभी ठंडा नहीं हुआ था, मगर पैसे और इज़्ज़त का मामला पहले था. उन्होंने किचन के परदे की तरफ देखा जहाँ सीमा छुपने की कोशिश कर रही थी.

"सीमा! बाहर आओ!" रशीद साहब की करकट भरी आवाज़ आयी.

सीमा डरते डरते परदे से बाहर निकली, उसके सर्र से दुपट्टा सरका हुआ था और चेहरे पर खौफ साफ़ था. "J-Ji अब्बू..."





रशीद साहब उसके क़रीब आये, उनकी नज़रों में सीमा के लिए अभी भी वह आज शाम वाले सेशन की थोड़ी तालाब थी, मगर गुस्से ने उस पर पहरा बिठा दिया था. "सीमा, हम इस्लामाबाद जा रहे हैं. मालिक साहब को मानाने में दो से तीन दिन लग सकते हैं. हमारी gair-maujoodgi में घर का माहौल ख़राब नहीं होना चाहिए. और नसीम... तुम इन बच्चों (हमजा और आयेशा) पर नज़र रखना. मैं वापिस आकर इनका हिस्सा पूरा करूंगा."

सीमा ने धीरे से सर हिलाया, मगर अंदर hi अंदर उसने एक ठंडी सांस ली. सीमा के दिल को थोड़ा सुकून मिला के चलो, अगले do-teen दिन तक अब्बू हवेली में नहीं होंगे, तोह उनका वह खौफनाक "अनल सेशन" जो आज शाम को होने वाला था, वो थोड़े दिनों के लिए ताल गया था. मगर उसे उस्मान की फ़िक्र और बिज़नेस में नुक्सान का ग़म भी था.

उस्मान ने एक आखरी नज़र सीमा पर डाली. दोनों की आँखों में एक दुसरे के लिए be-bassi थी. कल तक जो उस्मान और सीमा हवेली के कोनों में मज़ा लेते थे, वो आज बाप के क़हर के सामने अलग हो रहे थे.

"नसीम, चलो सामान और फाइल्स जारी में रखो," रशीद साहब ने हिदायत दी.

कुछ hi देर में, हवेली के sarbarh—Rashid साहब और Usman—do से तीन दिन के लम्बे और मुश्किल सफर पर इस्लामाबाद के लिए निकल गए. हवेली का बड़ा दरवाज़ा बंद होते hi दालान में जैसे जान वापिस आयी, मगर तनाव अभी भी काम नहीं हुआ था.

हमजा अभी भी वही सर झुकाये खरा था, और आयेशा ज़मीन पर बैठी हिचकियाँ ले रही थी. सीमा लपक कर आयेशा के पास आयी और उसे ज़मीन से उठाया.

"आयेशा... पागल लड़की! तुमने अब्बू के सामने सब क्यों उगल दिया? तुम्हारी एक ग़लती से आज पूरा घर टूटने की कगार पर आ गया है!" सीमा ने धीरे से मगर गुस्से में आयेशा को झिंझोरते हुए कहा.





नसीम ने पीछे से आकर सीमा का हाथ पकड़ा. "सीमा, अब उसे मत दांतो. जो होना था वो हो गया. अब्बू का गुस्सा तुमने देख लिया है. कल सुबह कराची से शमीम बजी और उनके बचे भी आ रहे हैं. इस तनाव के बीच हम उन्हें कैसे संभालेंगे... मुझे बस यही डर खाये जा रहा है."

सीमा ने हमजा की तरफ देखा जिसका चेहरा अभी भी सख्त था. हवेली के मर्द जा चुके थे, मगर अगले do-teen दिन में जो आग लगने वाली थी, उसकी बुनियाद अब बोहोत गहरा चुकी थी.

सन 3: कराची का घर — सुबह की रुखसत और ख़ुफ़िया खिचड़ी

कराची में सुबह के चेह बज रहे थे. घर में लाहौर निकलने की bhagam-bhag शुरू हो चुकी थी. बैग्स लाउन्ज में लग चुके थे, मगर इस dauda-baagi के दरमियान रिश्तों के अंदर चल रही ख़ुफ़िया खिचड़ी अब नए रुख इख़्तियार कर रही थी.

ज़ोया अपने कमरे में आखरी बैग बांध रही थी के फराह ada'a से चलती हुई अंदर आयी और बिस्टेर पर बैठ गयी. उसके चेहरे पर लाहौर जाने का शौक़ तोह था, मगर एक क़ुराध भी थी.





"ज़ोया बजी... एक बात बताइये," फराह ने अपना हैंडबैग उंगलिओं पर घूमते हुए पूछा. "अम्मी ने तोह कल रात से आपकी और उस्मान भाई के रिश्ते की माला जपना शुरू करदी है, लेकिन आपके दिल में क्या चल रहा है? आप तोह बिलकुल खामोश हैं, जैसे आपकी शादी नहीं, किसी और की हो रही हो."

ज़ोया ने सूटकेस की ज़िप बंद की और निहायत संजीदगी से फराह की तरफ देखा. "फराह, शादी कोई खेल नहीं है जिसे लेकर मैं subah-shaam नाचती फिरूं. हवेली का माहौल और वहां के लोग... उन्हें पहले देखना और समझना ज़रूरी है. अम्मी जो सोच रही हैं, वो उनका फैसला है. मेरा फैसला वहां के हालत देख कर होगा."

फराह ने थोड़ा आगे झुक कर शोखी से पूछा, "अच्छा, चलिए उस्मान भाई को छोड़िये... वहां हवेली में जो हमारी ham-umar लड़कियां hain—Ayesha बजी और हिरा बजी —उनके बारे में आपका क्या ख्याल है? जब मैं उनसे आखरी बार उनसे मिली थी तब तोह मैं इतनी सायानी नाहिबति के अचे से समझ सकूँ. आप तोह पहले भी उनसे बात कर चुकी हैं. किसी हैं दोनों? क्या मेरी उनसे जमेगी?"

ज़ोया के चेहरे पर एक हलके सुकून का एहसास आया. "आयेशा बोहोत नरम और दोस्ती पसंद लड़की है. उसका और मेरा बांड बोहोत जल्दी बन गया था, वो दिल की साफ़ है और मेरी बातों को समझती है. अब भी कभी कभी मेरी बात होती रहती उस से, रही बात हिरा की... तोह वो थोड़ी उतावली और चुलबुली है, बिलकुल तुम्हारे जैसी. जब तुम वहां जाओगी, तोह मुझे लगता है तुम्हारी हिरा से ज़्यादा जमेगी, क्यूंकि तुम दोनों के नखरे एक जैसे हैं."

फराह यह सुन कर मुस्कुरा दी. "चलो, शुक्र है वहां कोई तोह मेरे जैसा मिलेगा."

इसी गुफ्तगू के दौरान, ज़ोया का ध्यान दिखय में सामान रखने की फ़िक्र में थोड़ा बात गया, और जो सख्त पहरा वो हमेशा शमीम और बिलाल पर लगाए हुए रहती थी, वो थोड़ा ढीला पद गया.

किचन के पास, शमीम बनु ने देखा के ज़ोया कमरे में फराह के साथ मसरूफ है. उन्होंने इस मौके का फायदा उठाने का सोचा. बिलाल लाउन्ज में आखरी बैग उठा रहा था. शमीम ने तेज़ी से नरम क़दमों से बिलाल के क़रीब जा कर उसके बाज़ू पर हाथ रखा. उनकी आँखों में तड़प और बेचैनी थी.





"बिलाल... मेरी जान," शमीम ने निहायत धीरे से सरगोशी की, उनकी आवाज़ में मिन्नत थी. "ज़ोया अभी कमरे में है. मुझ से अब ये दूरी बर्दाश्त नहीं होती बीटा. कल से तुम मुझसे यूँ कटरा रहे हो जैसे मैं तुम्हारी माँ नहीं, कोई दुश्मन हूँ. मुझे एक बार गले से लगा लो, या जैसे पहले मुझसे प्यार भरी बातें करते थे वैसे दो बोल hi बोल लिया करो कभी कभी, बीटा... तुम्हारी बेरुकि से मेरा दम घुट रहा है."

शमीम को लगा था के ज़ोया के हिफ़ाज़ती पहरे के hat-te hi बिलाल उन्हें सीने से लगा लेगा. मगर बिलाल का रिएक्शन बिलकुल उल्टा था. बिलाल ने निहायत सपाट चेहरे के साथ अपनी माँ का हाथ अपने बाज़ू से हटाया, उसके चेहरे पर न तोह कोई डर था और न hi कोई तालाब.

"अम्मी, सुबह सुबह यह सब शुरू मत कीजिये. सामान उठाने दें मुझे, देर हो रही है," बिलाल ने निहायत रूखे और be-rukhi वाले लहजे में कहा.

शमीम बनु वही झटका खा कर खरी रह गयीं. उन्हें लग रहा था के बिलाल, ज़ोया के डर से दूर भाग रहा है, मगर असल सच कुछ और था. बिलाल इस वक़्त डर नहीं रहा था, बल्कि वो तोह उस ख़ुफ़िया प्लान पर अमल कर रहा था जो उसने सीमा के साथ मिलकर बनाया tha—Saima और बिलाल ने तय किया था के जब तक ज़ोया के इस संजीदा लहजे का कोई इलाज नहीं मिलजाता, तब तक बिलाल को अपनी माँ (शमीम) से मुकम्मल दूरी दिखानी है और उन्हें तारपा कर रखना है, ताके घर में कोई नया शक पैदा न हो और ज़ोया का ध्यान भटका रहे.

बिलाल ने एक भरी सूटकेस उठाया और बिना मुद के देखे बाहर गारी की तरफ बढ़ गया. शमीम के आंसू निकल आये, उन्हें अंदाज़ा hi नहीं था के उनका बीटा उन्हें तड़पने के लिए इस ख़ुफ़िया मंसूबे का हिस्सा बन चूका है.

तभी ज़ोया और फराह कमरे से बाहर आयीं. ज़ोया ने शमीम के चेहरे पर छायी उदासी को देखा, मगर कुछ बोले बिना अपना हैंडबैग उठाया. "अम्मी, गारी तैयार है. चलिए."

शमीम ने अपना दुपट्टा सही किया और अपने अंदरूनी ग़म को दबाते हुए बाहर की तरफ बारहिं. गारी में आगे बिलाल के साथ ज़ोया बैठी, और पीछे शमीम और फराह. गारी जब लाहौर के लिए स्टार्ट हुई, तोह गारी के अंदर सब खामोश थे, मगर सब के दिमाग में अलग अलग खिचड़ी पाक रही थी.





शमीम इस उम्मीद में थीं के लाहौर जा कर ज़ोया का रिश्ता उस्मान से होते hi बिलाल उन्हें वापिस मिल जायेगा, जबकि बिलाल आगे बैठा मुस्कुरा रहा था के लाहौर पहुँचते hi सीमा के साथ मिलकर वो इस खेल को एक नया रुख देने वाला है.

Episode 35 ख़तम

क्लिफहैंगर : क्या इस्लामाबाद का यह सफर उस्मान अपनी होशियारी से बचा पायेगा या दो करोड़ की डील डूब जाएगी? रशीद साहब के इस खौफनाक क़हर के बाद अब हवेली में हमजा और आयेशा का क्या होगा, और जब हिरा को ये सब पता चलेगा तो उसका रिएक्शन कैसा रहेगा? क्या बिलाल और उसकी फॅमिली का ये लम्बा सफर आसान रहेगा या कुछ अलग होगा? क्या सीमा और बिलाल का ख़ुफ़िया प्लान लाहौर की ज़मीन पर क़दम रखते hi शुरू हो जायेगा?
 
नेक्स्ट Episode में नया माल आरहा "किन्ज़ा", "मिस किरण" की बहन और सौतन





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