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- Dec 5, 2013
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अपडेट ~ 87 - थे पास्ट एंड थे प्रॉमिस
अब तक...
श्रेया : वो सब में देख लुंगी... तुम बताओ न, फिर मिल जाएगा न पैसा?
आयुषी : उम्... येह ी गेस...!? ः!?
श्रेया (स्माइल्स) : थैंक्स!!! M-Mein तरय करुँगी... 2-3 लाख भी मिलेंगे तोह चलेगा.
श्रेया (मैं में) : िफ़ ी कैन पुल्ल 4 तो 5 लक्ष फ्रॉम हेरे... तोह दी ने भी 7 लाख जमा कर लिए है. फड़ भी तुड़वा ली थी उन्होंने एक. थें टोटल 12-13 हो hi जाएगा. बूत 50 लाख... बाद की बाद में देखि जाएगी... कही न कही से... हो जाएगा... I'll बोर्रोव सम फ्रॉम फ्रेंड्स... टुमारो थें!!!!
अब आगे...
Nidhi's अपार्टमेंट...
मॉर्निंग ~ 8:05 ऍम
"श्रेया! अभी तक तुम नाहा के नहीं आयी? और ये क्या? नाश्ता पहले hi शुरू हो गया तुम्हारा?"
आवाज़ थी निधि की, जो कुछ देरर पहले hi नाहा के बाहर निकली थी. उसके लम्बे बाल अभी भी गीले थे और भीगने के कारण काले घने रंग की दमक और भी बढ़ा रहे थे.
उन् प्यारी आँखों में बनावटी गुस्सा था श्रेया के प्रति और उसके हाथो में पूजा के लिए कुछ सफ़ेद फूल. बदन पे कस्सी हुई एक नारंगी रंग की साड़ी जो उसके नग्न पेट की मखमली त्वचा को उजागर कर रही थी.
कोई कह सकता था की ऐसी स्त्री, ऐसी औरत को कोई पति अपने पास रखने में असफल रहा? क्युकी, उससे देख अच्छे अच्छे नौजवानो की नियत बिगड़ जाती थी. फिर ऐसी औरत यदि आपकी अपनी पत्नी हो, तोह आप भला कैसे उससे अपने क़रीब से जाने दे सकते हो?
पर ऐसा हुआ था. रजत! निधि के पति ने अपनी घिनौनी फतीशेस के चलते, अपनी पत्नी को खो दिया था. दुसरो को दर्द देने में, खासकर औरतो को फिजिकली हरम पहुचाने में, रजत को आनंद आता था.
एक ऐसा आनंद, जिसका वो कायल हो चूका था. निधि को मारना, पीटना, बदन पे गरम पिघलती हुई मॉम गिराना, बालो को जोरर से खींचना, इत्यादि. इन् सब पीड़ाओं से निधि को गुज़ारता था वह. और निधि का वो बिलखता हुआ, दर्द से पीड़ित चेहरा देख उससे एक असीम सुख प्रदान करता था. पागलो जैसे वो हस्ता, मुँह से जीभ निकाल, जानवरो की तरह उसके भाव हो जाते थे. सरल शब्दों में, वो एक दरिंदा था. जिसके पिंजरे में, निधि जैसी मासूम कोयल, आके फस्स चुकी थी.
इधर निधि आज शायद नाश्ता बना के नाहा के बाहर आयी थी पूजा करने और श्रेया को उसने जब बिना नहाये hi नाश्ता करते हुए देखा तोह उससे डाटने लगी.
श्रेया : उघ! प्लीज दी! पहले पेट पूजा फिर काम दूजा. बाद में नहाने जाउंगी आज. आज बोहत भूख लगी है.
निधि : तुम भी न. देरर रात तक जागती रहोगी, पूरी नींद नहीं लोगी और फिर पूरा रूटीन बिगाड़ लोगी अपना.
श्रेया : सूवीएएए~ लास्ट टाइम बस. ः~
निधि (सर्र हिलाते हुए) : जाओ अब जल्दी. जूही से सीखो कुछ. वो इतनी छोटी होने के बावजूद नाहा धो के चली गयी स्कूल.
श्रेया : हाँ हाँ~ बिकॉज़ it's अप्रैल. जूही को पता है की बस कुछ दिन और. फिर तोह गर्मियों की छुटिया. पर मेरा ऐसा नहीं है न दीदी~ ी हैवे तो वर्क आल थे टाइम.
निधि : यही होती है लाइफ मिस श्रेया!! लाइफ इस हार्ड. ऑलवेज!!!
श्रेया निधि की बात पर कुछ न बोली, पर अंदर hi अंदर वो पूरी तरह से सहमत थी. लाइफ कैन बे ा बीच सोमेतिमेस. It's हार्ड. ऑलवेज!!!
वो अपनी hi सोच में कही डूब गयी,
'Don't वोर्री दी! I'll फिक्स एवरीथिंग फॉर यू. No! वे कैन दो थिस!! टुगेदर!!! मेने माँ को भी मन लिया है. इवन डॉक्टर से भी बात कर ली है. ी जस्ट हैवे तो सबमिट मेडिकल सीकिंग एप्लीकेशन टुडे. उसके बाद, कंपनी कुछ न कुछ राशि ज़रूर देगी.'
श्रेया, एक अच्छे और पॉजिटिव मंद सेट के साथ घर से निकली और कंपनी पहुची.
उसने अपनी कलेग आयुषी से भी कंसल्ट कर लिया था तोह अब बस एप्लीकेशन देने की hi देररि थी.
उसके बाद, श्रेया की माँ के बारे में चेकिंग होएगी की वाक़ई वो हॉस्पिटल में एडमिट है या नहीं? और बस, उसके बाद कंपनी कुछ मेडिकल फी ऑफर कर देगी.
यही था सिंपल सा श्रेया का प्लान. ऑफ़ कोर्स, ये चीटिंग थी एक प्रकार से. पर, आज के ज़माने में कौन चीट नहीं करता?
तो सर्वाइव, ओने मस्ट चीट.
***
Ragini's होम...
वीर के इस घर में, सुबह सुबह वीर नींद की वादियों में था, साथ hi सिस्टम भी स्लीप मोड में था. कुल मिलाके, वो एक चेन्न की नींद सो रहा था.
कॉलेज से आने के बाद वीर का पूरा फोकस निधि के ऊपर hi था और वो बस उसी के लिए अब अपनी नयी प्लानिंग को अंजाम देने वाला था.
सिस्टम का सबसे पहला मिशन ~ 'सोल्वे Nidhi's प्रॉब्लम' जो अब तक पेंडिंग पड़ा हुआ था. एक साल का वक़्त दिया गया था सिस्टम द्वारा. और अभी केवल अराउंड 4 महीने बचे हुए थे इस मिशन को.
रही बात पेनल्टी की? तोह सिस्टम hi पेनल्टी थी. यदि वीर निधि को रजत के चंगुल से चुर्राने में नाकामयाब रहा, तोह वह सिस्टम को खो देगा. हमेशा हमेशा के लिए.
*क्रियाआकककककककक*
इधर उसके रूम का दरवाज़ा खुला और कोई अंदर आया. वीर हमेशा अपने रूम का दरवाज़ा खुला hi रखता था जब जब वो अकेला सोता था. ताकि आभा या सुमन को जब भी आना हो वो आ जा सके.
पर फिलहाल अंदर आने वाला शख्स उन् दोनों में से कोई नहीं था. ये कोई और नहीं, श्वेता थी.
आहिस्ता आहिस्ता वो अंदर आयी, गेट को अंदर से hi बंद किया और वीर के बीएड के पास आकर बैठ गयी.
झुकते हुए वो वीर के सोते हुए उस चेहरे को देख जैसे कही खो गयी. कोमलता से हाथ उसके चेहरे पर फेरर, श्वेता वीर को सोते हुए निहार रही थी. जैसे वो किसी और को नहीं, अपने बच्चे को निहार रही हो.
उसके dil-o-dimaag में यही बस चूका था की वीर उसकी hi संतान है. कोई जरर नहीं, वीर उसका बच्चा है.
वीर का उसकी जान बचाना, अपने लोगो से धुत्कार दिए जाने के बाद वीर का उससे सहारा देना, अपनी एकमात्र होटल को खो देने के बाद, वीर का उससे वापस से दिलवाना. उसके इन् सभी एक्शन्स ने, श्वेता के मैं और ह्रदय में एक गहरी छाप चोरर दी थी.
उसकी नज़रो में वीर अब वह वीर नहीं था. वीर का ओहदा अब बोहत बढ़ चूका था दोनों hi श्वेता और भूमिका के मैं में. खासकर श्वेता के.
"केवल तुम्हे एक माँ का प्यार चाहिए था. जो में तुम्हे कभी न दे सकीय. केवल... केवल एक माँ का प्यार. कितनी गयी गुज़री हु न में? मेरे पास एक बेशक़ीमती हीरा जब से मौजूद था. और में वह उन् चाँद रुपयों के लिए मर्डर रही थी. न केवल मेने उन् रुपयों को खोया, बल्कि उस अनमोल हीरे को भी खो दिया. सही कहते है लोग, लालच बुरी बाला है. है न!? मेरे बच्चे!?"
वीर के बालो पर हाथ फेरर श्वेता आज अपनी मैं की बात बोलती जा रही थी.
*पूछ*
अपने गहरे लाल रंग से सजे होंठो से उसने वीर के गाल चूमे, फिर माथा, उसकी चीन और फिर अपने गालो से उसके गाल रगड़ने लगी. उसी के संग उसके बगल से झुक के बैठ गयी वह.
"पर अब में... तुम्हे सब कुछ दूंगी. एक माँ का प्यार जो तुम्हे कभी न मिल सका. वो में दूंगी तुम्हे... मेरा बच्चा... *पूछ* में निभाऊंगी तुम्हारी माँ की भूमिका... में मेरे बेतु... *पूछ* ""
भरपूर कोशिश के बाद भी वो रोक न पायी खुद को, और उसकी आँखों से ासु छलक उठे.
*टिप* *टिप*
आसुओ की बूंदे वीर की t-shirt पर गिर रही थी और श्वेता किसी अतीत में खो गयी.
20 इयर्स एगो...
ये बात थी तब की, जब भूमिका केवल 5 साल की थी. श्वेता एक खुश हाल जीवन व्यतीत कर रही थी.
उसके पास लगभग सब hi कुछ था. एक पति, एक अच्छा घर, एक फूल जैसी सुन्दर बेटी. और क्या hi चाहिए था उससे? यदि कमी थी तोह बस एक चीज़ की. उसके पास एक बीटा नहीं था.
पर शायद उसकी ये ख्वाइश भी पूरी होने जा रही थी. 9 महीने अपने गर्भ में बच्चे को रखने के बाद, आज उसके पेट में अचानक hi दर्द उठा. और श्वेता का पति, हितेश फटाफट श्वेता को लेकर फौरन hi अस्पताल पहुँच गया.
श्वेता स्ट्रेचर पर लेती नर्स के द्वारा अंदर भेजी जा रही थी और हितेश के हाथो को वो जोरर से थामी हुई थी. हितेश भी श्वेता का हाथ थामे, रूम के बाहर तक उसके साथ साथ आया.
और फिर...
डिलीवरी की प्रोसेस शुरू हुई. हर्र गुज़रते पल, श्वेता की ज़ररदार चींखे हॉस्पिटल के उस वार्ड में बिखरती गयी.
दर्द से बिलबिलाती श्वेता सब कुछ सहते जा रही थी. क्युकी, अगले hi पल उससे अपनी एक और संतान देखने को मिलने वाली थी. उसके जन्म और ख़ुशी के लिए श्वेता कुछ भी करने को तैयार थी.
अत्यंत पीड़ा हो या कुछ भी, वो सब सहते जा रही थी. मैं में केवल अच्छे विचार hi आ रहे थे.
भूमिका अब अकेली नहीं रहेगी, उसके साथ उसका एक भाई या बहिन रहेगी अब. उसका पति और भी खुश हो जाएगा अपना वारिस पाने के बाद. बड़ा होक वो अपने माँ बाप के सपने पूरे करेगा. अभी से hi वो इन् ख्वाबो में खो गयी.
"Aaaaaaaaaaaaaa माआआआ~"
दर्द पे दर्द, असहनीय एकदम. माँ होना अपने आप में सुख तोह होता है पर माँ bann'ne का जो रास्ता होता है, उस रास्ते से गुज़रते वक़्त जो पीड़ा होती है, उससे केवल एक महिला hi समझ सकती है. पुरुष नहीं!
आखिर कार, उन् चींखों पर विरहां लगा.
और कुछ अंतराल के बाद, श्वेता की आँखें धीरे धीरे खुली.
'!!!???'
सामने hi हितेश उसका पति बैठा हुआ था. सर्र झुकाये. और अपनी पत्नी की हरकत महसूस करते hi वो उठ के उसके पास आ गया.
श्वेता कुछ न बोली. उसकी हिम्मत hi नहीं हो रही थी. ऐसा महसूस हो रहा था उससे जैसे वो एक जुंग में लड़ के आयी हो. जिधर अब उससे सांस लेने के अलावा और कुछ नहीं सूझ रहा था.
हितेश जान गया की श्वेता क्या पूछना चाहती है इसलिए उससे अब बोलना hi पड़ा.
हितेश : W-Wo...
श्वेता : !!????
पर वो बोलता की तभी डॉक्टर अंदर आ गया और...
हितेश : D-Doctor साहब!
डॉक्टर (नॉड्स) : J-Jiii!
श्वेता (हफ्ते हुए) : M-Mera... मेरा बच्चा??
श्वेता के मुँह से सबसे पहले शब्द यही निकले. उससे अपनी हालत की परवाह नहीं थी. पहला ख़याल आया तोह बस अपनी संतान का.
डॉक्टर : ....
हितेश : ...
श्वेता : ???
डॉक्टर : ी... I'm सो सॉरी मिस बूत... समथिंग तेर्रिब्ले एंड अनवांटेड हप्पेनेड.
श्वेता : ??
डॉक्टर : W-We... वे couldn't सेव योर सोन. He's no मोरे!!! We're सो सॉरी!!
ये सुनते hi, श्वेता कुछ पालो के लिए सन्न रह गयी.
श्वेता : हँ!?
डॉक्टर : डिलीवरी वास् ा फेलियर. वे अरे एक्सट्रेमेली सॉरी.
श्वेता : H-Hitesh!?? D-Dekhiye... Y-Ye क्या कह रहे है?
ये खबर श्वेता को अभी नहीं दी जाने वाली थी. पर अंत में सभी ने यही डीडे किया की अभी देना hi बेहतर थी. यदि इन केस श्वेता को झटका लगने से उसकी हालत बिगड़ती भी है तोह वह वैसे भी डॉक्टर्स की निगरानी में hi रहने वाली थी. इसलिए, ये दुखद समाचार उससे अभी hi दिया गया.
कितनी आस लिए थी वह, क्या क्या सपने नहीं सजाये थे उसने? अपनी कोख से एक नयी संतान को जन्म देने जा रही थी वह.
बेहोशी के बाद अपनी आँखें खुलते hi अपने बच्चे को देखना चाहती थी वह. पर उससे मिला क्या?
जिस संतान को उसने जन्म दिया, उसका बच्चा...
वो छोटी सी नन्ही जान पहले hi जा चुकी थी?
श्वेता को उस शान कितनी पीड़ा महसूस हुई थी, ये कोई भी शब्दों में बया नहीं कर सकता.
खबर सुनते hi उसकी कंडीशन हाइपर हो गयी और एक बार फिर, वह बेहोशी की हालत में चली गयी.
जब उससे पुनः होश आया. तोह उसकी आत्मा से जैसे कुछ गायब हो चूका था. वो एक ज़िंदा लाश की तरह हो चुकी थी. सांस तोह लेती थी, पर कोई जवाब नहीं, आँखों से बस आसुओ की धरा, और sunn'na तोह जैसे चोरर hi दिया था उसने.
इतना बड़ा सदमा लगा था. समय तोह लग्न hi था उभरने में.
9 महीने! 9 महीने तक उसने अपने बच्चे को गर्भ में रख इतना कष्ट उठाया. पर...
सब कुछ ख़तम हो चूका था अब उसके लिए.
बस यही एक अधूरी इच्छा तोह थी उसकी. एक बेटे का होना. बीटा आ भी गया था. पर अंतिम चरण पर जैसे किसी की नज़र लग गयी उसकी खुशियों को और एक झटके में सब कुछ छीन गया उस से.
कुछ समय बीत गया श्वेता को हॉस्पिटल में डॉक्टर्स की निगरानी में. जब उसकी कंडीशन स्टेबल हुई और वो घर जाने की स्थिति में आयी तोह...
एक और बड़ा झटका जैसे उससे लग्न बाकी था.
"हमने आप से एक बात और छिपाई है. उस वक़्त हमारी हिम्मत नहीं हुई आपसे बताने की पर अब चुकी आपकी हालत बेहतर है और आप sunn'ne समझने की हालत में है तोह ये हमारी जॉब है की हम आपको बताये. एक्चुअली... वो... I'm वैरी सॉरी तो तेल्ल यू मिस श्वेता... पर... पर अब आप माँ नहीं बन्न सकती..."
*बुम्म्म्म*
एक और विस्फोट हुआ उसके अंदर. इतना दुःख काम था जो उस से ये भी छीन लिया गया? इससे सुनते hi बची कुछ कसार जो थी, वो भी पूरी हो गयी. पूरी तरह टूट पड़ी वह.
उससे डॉक्टर्स से और जानकारी में फिर पता लगा की, डिलीवरी के वक़्त कुछ ऐसे सरकमस्टान्सेस बन्न गए थे जिसके चलते न केवल उसके बच्चे की जान गयी बल्कि श्वेता की जान बचाने के लिए भी उन् लोगो ने एक्सट्रीम मेझस लिए थे. श्वेता के अंदर कुछ ऐसा बॉडी part था, जो शायद दमगढ़ या रुपतुरेद हो चूका था उस फेल्ड डिलीवरी के वक़्त.
जिसकी वजह से, वह दुबारा माँ bann'ne में असक्षम होक रह गयी.
उस बेचारी से एक माँ bann'ne का सुख भी छीन लिया गया.
श्वेता महीनो तक इतना गंभीर रही, उसकी हालत देख आस पास के लोग बस तरस hi जताते थे. हर्र वक़्त रोना, उदासी में डूबे रहना, किसी काम में मैं न लग्न. श्वेता जैसे छोपे उप नहीं कर पा रही थी.
पर जैसे तैसे, उपरवाले के चमत्कार से, उसने हिम्मत बाँधी. जो हुआ, सो हुआ. उससे आगे बढ़ना था अब. उसके पास एक हस्ता खेलता परिवार था. हितेश और भूमिका. वो अपने चलते उन्हें उदास नहीं रखना चाहती थी.
आखिर कार वो अपनी उस हालत से थोड़ा ठीक हुई. पर...
पर जैसे वाक़ई उसकी खुशियों को किसी की नज़र लग चुकी थी. एक दिन, जब वो बैठी हुई, भूमिका के लिए ठण्ड में स्वेटर बुन्न रही थी. तब एक लेटर आया उसके नाम पे.
घर की नौकरानी उससे वो लेटर देने आयी. लेटर खोलते hi जैसे hi उसने पूरा पढ़ा वो हड़बड़ा की चींखते हुए उठ गयी.
"Aaaaaaaaaa~"
आस पास रखे बर्तन भी गिर पड़े. और कमरे में उनका शोर फेल गया. उसके थार ठहराते हाथो से वो चिट्ठी ज़मीन पर गिर गयी.
जो उसने अपने कभी जीवन में भी नहीं सोचा था वो हो गया.
हितेश, उसका पति...
पहले से hi...
शादी शुदा था!!!!!!
लेटर उसी की ऑर्डर से था. और बस चाँद शब्द hi लिखे हुए थे~
"श्वेता! मुझे माफ़ कर देना. मेने तुम्हे पहले नहीं बताया. कभी हिम्मत hi नहीं हुई. पर सच बात ये है की, में शादी शुदा हु. तुम मेरी पहली नहीं, दूसरी पत्नी हो. में जानता हु तुम्हे झटका लगा होगा ये पढ़ के. पर यही सच्चाई है. तुमसे मिलने के बाद मुझे नहीं लगा था की हमारी शादी इतनी जल्दी हो जाएगी. खासकर ऐसे की तुम भाग के मुझसे शादी करोगी. और में खुद को रोकक भी न पाया. मेरे पास कोई वारिस नहीं था. पहली पत्नी से भी 2 लड़किया थी मुझे. और तुमसे भी भूमिका हुई. में इस बार बोहत hi सकारात्मक था. सोचा था इस बार हमारा एक बीटा होगा. पर एक दुखद समाचार hi मिला. वही मेरी पहली पत्नी ने... मुझे इस बार एक बीटा दे दिया. मुझे माफ़ करना. अब में तुम्हारा देख भाल नहीं रख पाउँगा."
"तुम एक बेहद hi ख़ूबसूरत और प्यारी औरत हो श्वेता. यदि मुझे पहले तुम मिली होती, तोह में दूसरी शादी कभी नहीं करता. अपनी गलतियों की सजा के तौर पर... तुम्हारे लिए वो घर तुम्हारे नाम कर के जा रहा हु. कुछ पैसे भी है अलमारी में. भूमिका के नाम भी कुछ पैसे है. ये मेरे ग्लानि के चलते तुम्हारे लिए. मुझे ढूंढ़ने की कोशिश न करना. में नहीं मिलूंगा कभी. मेरा नाम, हितेश नहीं है. और न कभी था. तुम चाहो तोह पुलिस में कंप्लेंट कर सकती हो. पर कोई फायदा नहीं होगा. में बोहत दूर जा चूका होऊंगा तब तक. इसलिए खुद को परेशां मत करना. तुम जानती हो की में भी कोई इतना अमीर नहीं की दो दो परिवार संभाल सकू. अब चुकी मेरा बीटा मेरे पास है. तोह में उसकी पढ़ाई और भविष्य के लिए पैसे जोड़ना चाहूंगा. भूमिका के लिए में एक अच्छा बाप न बन्न सका. माफ़ कर देना मुझे श्वेता. माफ़ कर देना. ~ हितेश!"
बस! यही चाँद शब्द थे उस खत में.
श्वेता सोच रही थी की वो अपने दुःख से बाहर आ पाएगी. और अब? ये क्या था? भगवन तोह जैसे उस से सुख chheen'ne पर hi तुले हुए थे. इस बार तोह उसका पूरा संसार hi उजाड़ गया.
डाट देने पड़ेगी श्वेता की, जो इतना सब कुछ सहने में बावजूद अपना मानसिक संतुलन नहीं खोयी. बेशक, वो बेहद रोई, टूट टूट के रोई, विलाप किया, और न जाने किन किन हालातो से गुज़री. पर अभी भी उसने अपना आप और संतुलन नहीं खोया था.
उससे इतना बड़ा धोका मिला था. इतना बड़ा धोका. उस दिन से hi, भूमिका उसके लिए एक बेटी तोह थी hi पर एक बीटा भी बन्न गयी. वही सब कुछ थी उसका.
श्वेता ने उन् पैसो से भूमिका को पढ़या लिखाया. खुद उसने होटल मैनेजमेंट के लिए कोर्स किया. सब कुछ उन्ही पैसो से.
पर पैसे तोह पैसे थे. एक न एक दिन तोह ख़तम होने hi थे. श्वेता काम भी करती थी पर उसकी आए इतनी नहीं थी की वो भूमिका की फीस के साथ साथ घर के सारे खर्चे उठा पाए.
नतीजा? उससे अपना घर भी बेचना पड़ गया. वो सड़क पर आ चुकी थी. Be-sahaara एकदम. जब दर दर वो भटक रही थी.
तब... तब उसकी मुलाक़ात एक शख्स से हुई.
बृजेश!!!
श्वेता चाहती नहीं थी. पर... पर अपनी भूमिका के लिए जैसे वो सब कुछ करने को राज़ी थी. उससे पता लगा की बृजेश भी एक औरत की तलाश में था. तोह बस, श्वेता ने कोई कसार नहीं छोर्री, बृजेश के संग अपना रिश्ता जोड़ने में.
और जल्द hi दोनों की शादी भी हो गयी. कुछ इस तरह श्वेता ने फिर बृजेश के घर में क़दम रखा.
उससे समझ आ चूका था की खुद की संपत्ति होना कितना ज़रूरी होता था. मैं में वो ठान चुकी थी, की...
की वो हमेशा अपने और भूमिका के बारे में hi सोचेगी. क्युकी कोई किसी का अपना नहीं होता. भूमिका को भी वह वही सिखाती. अपनी दास्तान के बारे में बताती.
और इस घर में आते hi उसकी पहचान हुई फिर वीर से.
"वीर!!! आज से में तुम्हारी माँ हु. ठीक है?"
वीर से उसने कहा, तोह वीर ने कुछ न कहा. वो उससे देखा और रट हुए अपने स्कूल का बैग लिए अपने कमरे में घुस गया.
'क्या हुआ इस लड़के को?'
श्वेता आये दिन वीर से बात करने का तरय करती, पर वीर कुछ न कहता. उसने सोचा था की वीर को प्यार से रखे. बेटे की कमी उससे हमेशा महसूस होती थी. और अब रिश्तो के चलते, वीर तोह उसका hi बीटा था न? तोह वीर को अपना maan'ne में क्या बुराई थी?
पर... श्वेता का ये विचार din-ba-din बदलता गया. जब आये दिन वीर के किस्से उसके कानो में पड़ने लगे.
"आज वीर ने क्लास में पंत में hi सुसु कर ली. हाहाहा~"
प्रांजल आये दिन कुछ न कुछ बताता.
"अरे... हाहाहा~ आज वीर को सर से मार पड़ी. सर का दिया हुआ होमवर्क hi नहीं किया इसने हेहेहे~"
"पता? पता? आज क्या हुआ? वीर ने आज क्लास के लड़को से झगड़ा कर लिया और फिर उन् लोगो ने इससे धो दिया. हहै"
"दादा जी! वीर न ऑटो में... एक लड़की की स्कर्ट खींच रहा था आज. वो बोहत रोई थी. आप चाहो तोह मेरे दोस्तों से पूछ लेना."
तोह कही विवेक की शिकायते,
"वीर ने तोह मेरी इज़्ज़त hi डवा दी कॉलेज में. में इससे टचफ़ेस्ट दिखाने ले गया था और ये... उघ! अब क्या बोलू में, मेरे दोस्तों के सामने मज़ाक बना दिया. आखिरी साल है मेरा, अब क्या सोचेंगे वो मेरे बारे में."
तोह कही आस पड़ोस के लोग,
"आप अपने वीर को समझाइये. कल मेरे आँगन में डेल हुए कपड़ो में कीचड उछाल के गया है ये."
"अरे ये तोह कुछ भी नहीं है. एक दिन इसने कॉलोनी के उस सब्ज़ी वाले के सर्र में पत्थर मार के उसका सर्र फोड़ दिया था. मेने और नीलम ने पट्टी करि थी उनकी. और ये? ये भाग गया था वह से."
"केवल इतना hi नहीं, अरे एक दिन इसने वो क्या कहते है... कौन सा खेल रहता है? मार गेंद!?? गेंद से मारते है जिसमे? अरे इसने उस ठोस गेंद से उस कोष्टा साहब के छोटे बच्चे को मार दिया था. कोष्टा साहब ने इससे मेरे सामने थप्पड़ मारा था."
"देखिये दादा जी! हम सब आपको अपने दादा जी जैसा मानते है. पर अपने इस पोते को समझाइये. क्रिकेट खेलते वक़्त, रैकवार साहब का बच्चा आँगन में था तोह इसने ऐसी गेंद फेकि की उसके सर्र को जा लगी. रैकवार जी की पत्नी ने इससे मारा था फिर."
और न जाने क्या क्या... ये तोह 1% भी नहीं था उन् शिकायतों में से.
और ऐसे hi, श्वेता का लगाव वीर के प्रति कमज़ोर होता गया, उसका विचार वीर के लिए बदलने लगा. वो वीर को प्यार तोह देना चाहती थी, पर...
आये दिन ऐसी घटनाओ से वीर जैसे उस से दूर जाता चला गया. वो यदि वीर को देखती तोह बस उससे सर्र झुका के अपने कमरे में जाता हुआ.
*थुड़*
और एक तेज़्ज़ आवाज़ के साथ उसका कमरा बंद हो जाता.
ज़्यादा समय नहीं लगा, जब श्वेता की नज़रो में वीर मात्र एक अजनबी के सामान बन्न के रह गया.
और श्वेता ने वीर के प्रति प्यार, इज़्ज़त, लगाव, चिंता सब कुछ जैसे नज़र अंदाज़ कर दिया. कही लुप्त हो गयी जैसे.
फिर आया वो समय, जहा श्वेता ने अपनी सूझ बूझ से एक होटल अपने नाम करवाई.
कितना ज़रूरी था ये सब. यदि उससे धोका मिला भी तोह काम से काम जीने के लिए उसके पास कोई सहारा तोह रहेगा.
पर उससे और चाहिए था. जितना मिल सके उतना बेहतर. खबर मिली, मनोरथ की प्रॉपर्टी की. जब दो प्राणी किसी एक चीज़ का शिकार करते है तोह अक्सर वो रास्ते में एक दूसरे से मिल hi जाते है.
यहाँ भी वही हुआ, श्वेता जाके मिल चुकी थी विवेक और प्रांजल से. फिर वो समय आया जहा प्रॉपर्टी के नाम पर वो वीर को घर से बाहर निकलवाने के प्लान में भी पीछे न हटी.
ये सब ज़रूरी था. उसके लिए केवल भूमिका hi सब कुछ थी. तोह उसने ये किया.
पर मिला क्या? ठेंगा! प्रॉपर्टी हाथ से निकल गयी. फिरसे, उससे धोका मिला. अपने नए परिवार से.
वो वक़्त आया, जिधर वो अपनी जान पर खेल रही थी. और अपनी साड़ी उम्मीद खो चुकी थी. सोच रही थी की कितना व्यर्थ बीता उसका जीवन. पर उस वक़्त तब...
उसी ने उससे बचाया. उसी वीर ने जिससे वो शुरू से अंत तक नेग्लेक्ट करती आयी. उसी शान, श्वेता के अंदर का वो ग्लानि का बाँध टूट गया. और उसके मैं ने ये बैठा लिया की वीर उसकी hi तोह संतान है.
हाँ! जिस संतान के लिए वो इतना तदपि, वो जैसे यही था. जब वीर ने कहा था की वो उसकी माँ नहीं, तब...
इसलिए बोहत ज़्यादा पीड़ा हुई थी उससे. वीर कुछ भी छीन ले उस से. पर... पर कभी भी ये हक़ न छीने उस से. वीर की माँ होने का हक़.
एक बीटा उससे मिल चूका था. अपना बीटा. अपनी संतान. और अब उससे कुछ नहीं चाहिए था.
कुछ भी नहीं. न पैसा... न शोहरत... न कोई प्रॉपर्टी...
बस... वीर!!!
*टिप* *टिप*
ासु जब उसके हाथ पर गिरे, तोह श्वेता एकदम से जैसे अपने अतीत से बाहर आयी.
यही था उसका अतीत. वीर अभी भी सो रहा था. वो तोह भूल hi गयी थी की वो यहाँ वीर को निहारने आयी थी. अतीत को जितना भी भुला दो, एक न एक बार सामने आ hi जाता है.
"मेरा बच्चा...!!!"
*पूछ*
आसुओ को पॉच, उसने वीर के सर्र को उठाया और उसके चेहरे को अपनी छथि में समां लिया.
जैसे hi वीर का चेहरा उसके अध् नग्न ूरोज़ से टकराया, एक सिहरन उसके पूरे बदन में फेल गयी. एक चिंगारी... भड़क उठी.
और उसकी रुलाई चूत गयी. वीर के चेहरे को कस के पूरी ताक़त से उसने अपने स्तनों में दबा लिया. पल्लू तोह पहले hi गिर चूका था. उन् बड़े दूध की दरार में वीर का चेहरा छुप चूका था.
"मेरा बच्चा.. *सुबुक* ओह्ह मेरा बच्चा ♡ *सुबुक* मुझे माफ़ कर दे वीर... इस औरत को माफ़ कर दे... *सुबुक* में कसम खाती हु, आज से ये श्वेता तुझपे कोई हानि नहीं आने देगी मेरे बच्चे... अहह~ मेरा बेतु... *मुआअह्ह्ह्ह* *सुबुक* ी स्वेअर वीर... माफ़ कर दे इस औरत को... माफ़ कर दे... *सुबुक* "
वो बड़बड़ाती रही. जब तक की उसने वीर के पूरे चेहरे पर अपनी चुम्बनों की बरसात नहीं कर दी. और फिर be-mann वो उससे चोरर के अपने कमरे में गयी.
***
इवनिंग ~ 7:44 पं
वीर दिन भर के कुछ काम निपटा के जब घर आया तोह अपने कमरे में जा के उसने हाथ मुँह धोये.
और बाहर आते hi नीचे से उससे रागिनी की आवाज़ सुनाई दी,
"वीर! तुमसे मिलने श्रेया आयी है."
'हम्म? श्रेया जी?'
सवाल लिए वो नीचे आया तोह श्रेया ऑफिस के hi कपड़ो में बैठी हुई थी. और वीर को देख एक फीकी सी स्माइल पास की उसने.
श्रेया : उम्... वीर... K-Kya हम अकेले में बात कर सकते है थोड़ा?
ये सुनते hi वीर को आश्चर्य हुआ हो या न हुआ हो, पर रागिनी के कान ज़रूर खड़े हो गए थे. वो एक तीखी नज़र से श्रेया को देखि पर श्रेया के उसके देखने पर फ़ौरन hi रागिनी ने अपनी आँखों के एक्सप्रेशन बदल लिए.
रागिनी (स्माइल्स) : वीर! अपने रूम में ले जाओ. श्रेया को शायद कुछ पर्सनल बात करनी होगी.
रागिनी की वो स्माइल देख वीर समझ गया. वो जैसे कहना चाह रही थी, 'जाओ! जाके बात करो. और बाद में मुझे सब कुछ बताना क्या क्या हुआ उस बंद कमरे में. यदि एक भी डिटेल छूटहि तोह देखना फिर.'
वीर हाँ में सर्र हिलाते हुए उठा और श्रेया को अपने कमरे में लेके गया. अभी वह आके अपने कमरे का दरवाज़ा बंद किया hi था की...
श्रेया पीछे से उस पर टूट पड़ी. उसकी पीठ को जोरर से जकड श्रेया के हाथो ने उसके पेट को कस लिया.
"हँ?"
वीर सोचा शायद ये फन वे में था पर... लेकिन श्रेया के अगले पल hi सुबुकने की आवाज़ और हिचकियो ने वीर को हैरानी में दाल दिया.
वीर : Sh-Shreya जी!? क्या हुआ?
और श्रेया ने सब कुछ बता दिया...
सब कुछ. जो आज उसके साथ हुआ. सुनते सुनते वीर की आँखें फैलती चली गयी और मुट्ठी कस्सति गयी.
बस बचा था तोह...
*डिंग*
[Mission : 1) Rescue the prey from the pरेडिटोर.
2) कॉन्कर निहारिका बंसल.
रिवार्ड्स : 1) ???? पॉइंट्स.
2) 3 फ्री क्वेस्ट हंट अत्तेम्प्ट्स.
वेन्यू : क्सक्सक्सक्सक्सक्सक्स कंपनी.
टाइम लिमिट : 2 डेज.
मिशन फेलियर पेनल्टी : 8000 पॉइंट्स.]
वीर पलटा और उसने श्रेया को अपने सीने से लगा लिया,
"Don't वोर्री! ी प्रॉमिस! 2 दिन के अंदर hi अंदर... I'll टर्न थे इवेंट्स. एंड, you'll बे फाइन."
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आज के लिए इतना hi गाइस.
नई अर्च पास आते जा रहा है. ी थिंक, उसकी स्टार्टिंग से पहले अभी मोरे थान 5 उपदटेस तोह लग जाने hi चाहिए, कुछ मैटर्स को सॉर्ट आउट होने में. बाकी, लिखे ठोकने का और रेवोस रखने का. और सोचने का, की ऐसा क्या हुआ होगा श्रेया के साथ? :स्माइल2:
धन्यवाद!
अब तक...
श्रेया : वो सब में देख लुंगी... तुम बताओ न, फिर मिल जाएगा न पैसा?
आयुषी : उम्... येह ी गेस...!? ः!?
श्रेया (स्माइल्स) : थैंक्स!!! M-Mein तरय करुँगी... 2-3 लाख भी मिलेंगे तोह चलेगा.
श्रेया (मैं में) : िफ़ ी कैन पुल्ल 4 तो 5 लक्ष फ्रॉम हेरे... तोह दी ने भी 7 लाख जमा कर लिए है. फड़ भी तुड़वा ली थी उन्होंने एक. थें टोटल 12-13 हो hi जाएगा. बूत 50 लाख... बाद की बाद में देखि जाएगी... कही न कही से... हो जाएगा... I'll बोर्रोव सम फ्रॉम फ्रेंड्स... टुमारो थें!!!!
अब आगे...
Nidhi's अपार्टमेंट...
मॉर्निंग ~ 8:05 ऍम
"श्रेया! अभी तक तुम नाहा के नहीं आयी? और ये क्या? नाश्ता पहले hi शुरू हो गया तुम्हारा?"
आवाज़ थी निधि की, जो कुछ देरर पहले hi नाहा के बाहर निकली थी. उसके लम्बे बाल अभी भी गीले थे और भीगने के कारण काले घने रंग की दमक और भी बढ़ा रहे थे.
उन् प्यारी आँखों में बनावटी गुस्सा था श्रेया के प्रति और उसके हाथो में पूजा के लिए कुछ सफ़ेद फूल. बदन पे कस्सी हुई एक नारंगी रंग की साड़ी जो उसके नग्न पेट की मखमली त्वचा को उजागर कर रही थी.
कोई कह सकता था की ऐसी स्त्री, ऐसी औरत को कोई पति अपने पास रखने में असफल रहा? क्युकी, उससे देख अच्छे अच्छे नौजवानो की नियत बिगड़ जाती थी. फिर ऐसी औरत यदि आपकी अपनी पत्नी हो, तोह आप भला कैसे उससे अपने क़रीब से जाने दे सकते हो?
पर ऐसा हुआ था. रजत! निधि के पति ने अपनी घिनौनी फतीशेस के चलते, अपनी पत्नी को खो दिया था. दुसरो को दर्द देने में, खासकर औरतो को फिजिकली हरम पहुचाने में, रजत को आनंद आता था.
एक ऐसा आनंद, जिसका वो कायल हो चूका था. निधि को मारना, पीटना, बदन पे गरम पिघलती हुई मॉम गिराना, बालो को जोरर से खींचना, इत्यादि. इन् सब पीड़ाओं से निधि को गुज़ारता था वह. और निधि का वो बिलखता हुआ, दर्द से पीड़ित चेहरा देख उससे एक असीम सुख प्रदान करता था. पागलो जैसे वो हस्ता, मुँह से जीभ निकाल, जानवरो की तरह उसके भाव हो जाते थे. सरल शब्दों में, वो एक दरिंदा था. जिसके पिंजरे में, निधि जैसी मासूम कोयल, आके फस्स चुकी थी.
इधर निधि आज शायद नाश्ता बना के नाहा के बाहर आयी थी पूजा करने और श्रेया को उसने जब बिना नहाये hi नाश्ता करते हुए देखा तोह उससे डाटने लगी.
श्रेया : उघ! प्लीज दी! पहले पेट पूजा फिर काम दूजा. बाद में नहाने जाउंगी आज. आज बोहत भूख लगी है.
निधि : तुम भी न. देरर रात तक जागती रहोगी, पूरी नींद नहीं लोगी और फिर पूरा रूटीन बिगाड़ लोगी अपना.
श्रेया : सूवीएएए~ लास्ट टाइम बस. ः~
निधि (सर्र हिलाते हुए) : जाओ अब जल्दी. जूही से सीखो कुछ. वो इतनी छोटी होने के बावजूद नाहा धो के चली गयी स्कूल.
श्रेया : हाँ हाँ~ बिकॉज़ it's अप्रैल. जूही को पता है की बस कुछ दिन और. फिर तोह गर्मियों की छुटिया. पर मेरा ऐसा नहीं है न दीदी~ ी हैवे तो वर्क आल थे टाइम.
निधि : यही होती है लाइफ मिस श्रेया!! लाइफ इस हार्ड. ऑलवेज!!!
श्रेया निधि की बात पर कुछ न बोली, पर अंदर hi अंदर वो पूरी तरह से सहमत थी. लाइफ कैन बे ा बीच सोमेतिमेस. It's हार्ड. ऑलवेज!!!
वो अपनी hi सोच में कही डूब गयी,
'Don't वोर्री दी! I'll फिक्स एवरीथिंग फॉर यू. No! वे कैन दो थिस!! टुगेदर!!! मेने माँ को भी मन लिया है. इवन डॉक्टर से भी बात कर ली है. ी जस्ट हैवे तो सबमिट मेडिकल सीकिंग एप्लीकेशन टुडे. उसके बाद, कंपनी कुछ न कुछ राशि ज़रूर देगी.'
श्रेया, एक अच्छे और पॉजिटिव मंद सेट के साथ घर से निकली और कंपनी पहुची.
उसने अपनी कलेग आयुषी से भी कंसल्ट कर लिया था तोह अब बस एप्लीकेशन देने की hi देररि थी.
उसके बाद, श्रेया की माँ के बारे में चेकिंग होएगी की वाक़ई वो हॉस्पिटल में एडमिट है या नहीं? और बस, उसके बाद कंपनी कुछ मेडिकल फी ऑफर कर देगी.
यही था सिंपल सा श्रेया का प्लान. ऑफ़ कोर्स, ये चीटिंग थी एक प्रकार से. पर, आज के ज़माने में कौन चीट नहीं करता?
तो सर्वाइव, ओने मस्ट चीट.
***
Ragini's होम...
वीर के इस घर में, सुबह सुबह वीर नींद की वादियों में था, साथ hi सिस्टम भी स्लीप मोड में था. कुल मिलाके, वो एक चेन्न की नींद सो रहा था.
कॉलेज से आने के बाद वीर का पूरा फोकस निधि के ऊपर hi था और वो बस उसी के लिए अब अपनी नयी प्लानिंग को अंजाम देने वाला था.
सिस्टम का सबसे पहला मिशन ~ 'सोल्वे Nidhi's प्रॉब्लम' जो अब तक पेंडिंग पड़ा हुआ था. एक साल का वक़्त दिया गया था सिस्टम द्वारा. और अभी केवल अराउंड 4 महीने बचे हुए थे इस मिशन को.
रही बात पेनल्टी की? तोह सिस्टम hi पेनल्टी थी. यदि वीर निधि को रजत के चंगुल से चुर्राने में नाकामयाब रहा, तोह वह सिस्टम को खो देगा. हमेशा हमेशा के लिए.
*क्रियाआकककककककक*
इधर उसके रूम का दरवाज़ा खुला और कोई अंदर आया. वीर हमेशा अपने रूम का दरवाज़ा खुला hi रखता था जब जब वो अकेला सोता था. ताकि आभा या सुमन को जब भी आना हो वो आ जा सके.
पर फिलहाल अंदर आने वाला शख्स उन् दोनों में से कोई नहीं था. ये कोई और नहीं, श्वेता थी.
आहिस्ता आहिस्ता वो अंदर आयी, गेट को अंदर से hi बंद किया और वीर के बीएड के पास आकर बैठ गयी.
झुकते हुए वो वीर के सोते हुए उस चेहरे को देख जैसे कही खो गयी. कोमलता से हाथ उसके चेहरे पर फेरर, श्वेता वीर को सोते हुए निहार रही थी. जैसे वो किसी और को नहीं, अपने बच्चे को निहार रही हो.
उसके dil-o-dimaag में यही बस चूका था की वीर उसकी hi संतान है. कोई जरर नहीं, वीर उसका बच्चा है.
वीर का उसकी जान बचाना, अपने लोगो से धुत्कार दिए जाने के बाद वीर का उससे सहारा देना, अपनी एकमात्र होटल को खो देने के बाद, वीर का उससे वापस से दिलवाना. उसके इन् सभी एक्शन्स ने, श्वेता के मैं और ह्रदय में एक गहरी छाप चोरर दी थी.
उसकी नज़रो में वीर अब वह वीर नहीं था. वीर का ओहदा अब बोहत बढ़ चूका था दोनों hi श्वेता और भूमिका के मैं में. खासकर श्वेता के.
"केवल तुम्हे एक माँ का प्यार चाहिए था. जो में तुम्हे कभी न दे सकीय. केवल... केवल एक माँ का प्यार. कितनी गयी गुज़री हु न में? मेरे पास एक बेशक़ीमती हीरा जब से मौजूद था. और में वह उन् चाँद रुपयों के लिए मर्डर रही थी. न केवल मेने उन् रुपयों को खोया, बल्कि उस अनमोल हीरे को भी खो दिया. सही कहते है लोग, लालच बुरी बाला है. है न!? मेरे बच्चे!?"
वीर के बालो पर हाथ फेरर श्वेता आज अपनी मैं की बात बोलती जा रही थी.
*पूछ*
अपने गहरे लाल रंग से सजे होंठो से उसने वीर के गाल चूमे, फिर माथा, उसकी चीन और फिर अपने गालो से उसके गाल रगड़ने लगी. उसी के संग उसके बगल से झुक के बैठ गयी वह.
"पर अब में... तुम्हे सब कुछ दूंगी. एक माँ का प्यार जो तुम्हे कभी न मिल सका. वो में दूंगी तुम्हे... मेरा बच्चा... *पूछ* में निभाऊंगी तुम्हारी माँ की भूमिका... में मेरे बेतु... *पूछ* ""
भरपूर कोशिश के बाद भी वो रोक न पायी खुद को, और उसकी आँखों से ासु छलक उठे.
*टिप* *टिप*
आसुओ की बूंदे वीर की t-shirt पर गिर रही थी और श्वेता किसी अतीत में खो गयी.
20 इयर्स एगो...
ये बात थी तब की, जब भूमिका केवल 5 साल की थी. श्वेता एक खुश हाल जीवन व्यतीत कर रही थी.
उसके पास लगभग सब hi कुछ था. एक पति, एक अच्छा घर, एक फूल जैसी सुन्दर बेटी. और क्या hi चाहिए था उससे? यदि कमी थी तोह बस एक चीज़ की. उसके पास एक बीटा नहीं था.
पर शायद उसकी ये ख्वाइश भी पूरी होने जा रही थी. 9 महीने अपने गर्भ में बच्चे को रखने के बाद, आज उसके पेट में अचानक hi दर्द उठा. और श्वेता का पति, हितेश फटाफट श्वेता को लेकर फौरन hi अस्पताल पहुँच गया.
श्वेता स्ट्रेचर पर लेती नर्स के द्वारा अंदर भेजी जा रही थी और हितेश के हाथो को वो जोरर से थामी हुई थी. हितेश भी श्वेता का हाथ थामे, रूम के बाहर तक उसके साथ साथ आया.
और फिर...
डिलीवरी की प्रोसेस शुरू हुई. हर्र गुज़रते पल, श्वेता की ज़ररदार चींखे हॉस्पिटल के उस वार्ड में बिखरती गयी.
दर्द से बिलबिलाती श्वेता सब कुछ सहते जा रही थी. क्युकी, अगले hi पल उससे अपनी एक और संतान देखने को मिलने वाली थी. उसके जन्म और ख़ुशी के लिए श्वेता कुछ भी करने को तैयार थी.
अत्यंत पीड़ा हो या कुछ भी, वो सब सहते जा रही थी. मैं में केवल अच्छे विचार hi आ रहे थे.
भूमिका अब अकेली नहीं रहेगी, उसके साथ उसका एक भाई या बहिन रहेगी अब. उसका पति और भी खुश हो जाएगा अपना वारिस पाने के बाद. बड़ा होक वो अपने माँ बाप के सपने पूरे करेगा. अभी से hi वो इन् ख्वाबो में खो गयी.
"Aaaaaaaaaaaaaa माआआआ~"
दर्द पे दर्द, असहनीय एकदम. माँ होना अपने आप में सुख तोह होता है पर माँ bann'ne का जो रास्ता होता है, उस रास्ते से गुज़रते वक़्त जो पीड़ा होती है, उससे केवल एक महिला hi समझ सकती है. पुरुष नहीं!
आखिर कार, उन् चींखों पर विरहां लगा.
और कुछ अंतराल के बाद, श्वेता की आँखें धीरे धीरे खुली.
'!!!???'
सामने hi हितेश उसका पति बैठा हुआ था. सर्र झुकाये. और अपनी पत्नी की हरकत महसूस करते hi वो उठ के उसके पास आ गया.
श्वेता कुछ न बोली. उसकी हिम्मत hi नहीं हो रही थी. ऐसा महसूस हो रहा था उससे जैसे वो एक जुंग में लड़ के आयी हो. जिधर अब उससे सांस लेने के अलावा और कुछ नहीं सूझ रहा था.
हितेश जान गया की श्वेता क्या पूछना चाहती है इसलिए उससे अब बोलना hi पड़ा.
हितेश : W-Wo...
श्वेता : !!????
पर वो बोलता की तभी डॉक्टर अंदर आ गया और...
हितेश : D-Doctor साहब!
डॉक्टर (नॉड्स) : J-Jiii!
श्वेता (हफ्ते हुए) : M-Mera... मेरा बच्चा??
श्वेता के मुँह से सबसे पहले शब्द यही निकले. उससे अपनी हालत की परवाह नहीं थी. पहला ख़याल आया तोह बस अपनी संतान का.
डॉक्टर : ....
हितेश : ...
श्वेता : ???
डॉक्टर : ी... I'm सो सॉरी मिस बूत... समथिंग तेर्रिब्ले एंड अनवांटेड हप्पेनेड.
श्वेता : ??
डॉक्टर : W-We... वे couldn't सेव योर सोन. He's no मोरे!!! We're सो सॉरी!!
ये सुनते hi, श्वेता कुछ पालो के लिए सन्न रह गयी.
श्वेता : हँ!?
डॉक्टर : डिलीवरी वास् ा फेलियर. वे अरे एक्सट्रेमेली सॉरी.
श्वेता : H-Hitesh!?? D-Dekhiye... Y-Ye क्या कह रहे है?
ये खबर श्वेता को अभी नहीं दी जाने वाली थी. पर अंत में सभी ने यही डीडे किया की अभी देना hi बेहतर थी. यदि इन केस श्वेता को झटका लगने से उसकी हालत बिगड़ती भी है तोह वह वैसे भी डॉक्टर्स की निगरानी में hi रहने वाली थी. इसलिए, ये दुखद समाचार उससे अभी hi दिया गया.
कितनी आस लिए थी वह, क्या क्या सपने नहीं सजाये थे उसने? अपनी कोख से एक नयी संतान को जन्म देने जा रही थी वह.
बेहोशी के बाद अपनी आँखें खुलते hi अपने बच्चे को देखना चाहती थी वह. पर उससे मिला क्या?
जिस संतान को उसने जन्म दिया, उसका बच्चा...
वो छोटी सी नन्ही जान पहले hi जा चुकी थी?
श्वेता को उस शान कितनी पीड़ा महसूस हुई थी, ये कोई भी शब्दों में बया नहीं कर सकता.
खबर सुनते hi उसकी कंडीशन हाइपर हो गयी और एक बार फिर, वह बेहोशी की हालत में चली गयी.
जब उससे पुनः होश आया. तोह उसकी आत्मा से जैसे कुछ गायब हो चूका था. वो एक ज़िंदा लाश की तरह हो चुकी थी. सांस तोह लेती थी, पर कोई जवाब नहीं, आँखों से बस आसुओ की धरा, और sunn'na तोह जैसे चोरर hi दिया था उसने.
इतना बड़ा सदमा लगा था. समय तोह लग्न hi था उभरने में.
9 महीने! 9 महीने तक उसने अपने बच्चे को गर्भ में रख इतना कष्ट उठाया. पर...
सब कुछ ख़तम हो चूका था अब उसके लिए.
बस यही एक अधूरी इच्छा तोह थी उसकी. एक बेटे का होना. बीटा आ भी गया था. पर अंतिम चरण पर जैसे किसी की नज़र लग गयी उसकी खुशियों को और एक झटके में सब कुछ छीन गया उस से.
कुछ समय बीत गया श्वेता को हॉस्पिटल में डॉक्टर्स की निगरानी में. जब उसकी कंडीशन स्टेबल हुई और वो घर जाने की स्थिति में आयी तोह...
एक और बड़ा झटका जैसे उससे लग्न बाकी था.
"हमने आप से एक बात और छिपाई है. उस वक़्त हमारी हिम्मत नहीं हुई आपसे बताने की पर अब चुकी आपकी हालत बेहतर है और आप sunn'ne समझने की हालत में है तोह ये हमारी जॉब है की हम आपको बताये. एक्चुअली... वो... I'm वैरी सॉरी तो तेल्ल यू मिस श्वेता... पर... पर अब आप माँ नहीं बन्न सकती..."
*बुम्म्म्म*
एक और विस्फोट हुआ उसके अंदर. इतना दुःख काम था जो उस से ये भी छीन लिया गया? इससे सुनते hi बची कुछ कसार जो थी, वो भी पूरी हो गयी. पूरी तरह टूट पड़ी वह.
उससे डॉक्टर्स से और जानकारी में फिर पता लगा की, डिलीवरी के वक़्त कुछ ऐसे सरकमस्टान्सेस बन्न गए थे जिसके चलते न केवल उसके बच्चे की जान गयी बल्कि श्वेता की जान बचाने के लिए भी उन् लोगो ने एक्सट्रीम मेझस लिए थे. श्वेता के अंदर कुछ ऐसा बॉडी part था, जो शायद दमगढ़ या रुपतुरेद हो चूका था उस फेल्ड डिलीवरी के वक़्त.
जिसकी वजह से, वह दुबारा माँ bann'ne में असक्षम होक रह गयी.
उस बेचारी से एक माँ bann'ne का सुख भी छीन लिया गया.
श्वेता महीनो तक इतना गंभीर रही, उसकी हालत देख आस पास के लोग बस तरस hi जताते थे. हर्र वक़्त रोना, उदासी में डूबे रहना, किसी काम में मैं न लग्न. श्वेता जैसे छोपे उप नहीं कर पा रही थी.
पर जैसे तैसे, उपरवाले के चमत्कार से, उसने हिम्मत बाँधी. जो हुआ, सो हुआ. उससे आगे बढ़ना था अब. उसके पास एक हस्ता खेलता परिवार था. हितेश और भूमिका. वो अपने चलते उन्हें उदास नहीं रखना चाहती थी.
आखिर कार वो अपनी उस हालत से थोड़ा ठीक हुई. पर...
पर जैसे वाक़ई उसकी खुशियों को किसी की नज़र लग चुकी थी. एक दिन, जब वो बैठी हुई, भूमिका के लिए ठण्ड में स्वेटर बुन्न रही थी. तब एक लेटर आया उसके नाम पे.
घर की नौकरानी उससे वो लेटर देने आयी. लेटर खोलते hi जैसे hi उसने पूरा पढ़ा वो हड़बड़ा की चींखते हुए उठ गयी.
"Aaaaaaaaaa~"
आस पास रखे बर्तन भी गिर पड़े. और कमरे में उनका शोर फेल गया. उसके थार ठहराते हाथो से वो चिट्ठी ज़मीन पर गिर गयी.
जो उसने अपने कभी जीवन में भी नहीं सोचा था वो हो गया.
हितेश, उसका पति...
पहले से hi...
शादी शुदा था!!!!!!
लेटर उसी की ऑर्डर से था. और बस चाँद शब्द hi लिखे हुए थे~
"श्वेता! मुझे माफ़ कर देना. मेने तुम्हे पहले नहीं बताया. कभी हिम्मत hi नहीं हुई. पर सच बात ये है की, में शादी शुदा हु. तुम मेरी पहली नहीं, दूसरी पत्नी हो. में जानता हु तुम्हे झटका लगा होगा ये पढ़ के. पर यही सच्चाई है. तुमसे मिलने के बाद मुझे नहीं लगा था की हमारी शादी इतनी जल्दी हो जाएगी. खासकर ऐसे की तुम भाग के मुझसे शादी करोगी. और में खुद को रोकक भी न पाया. मेरे पास कोई वारिस नहीं था. पहली पत्नी से भी 2 लड़किया थी मुझे. और तुमसे भी भूमिका हुई. में इस बार बोहत hi सकारात्मक था. सोचा था इस बार हमारा एक बीटा होगा. पर एक दुखद समाचार hi मिला. वही मेरी पहली पत्नी ने... मुझे इस बार एक बीटा दे दिया. मुझे माफ़ करना. अब में तुम्हारा देख भाल नहीं रख पाउँगा."
"तुम एक बेहद hi ख़ूबसूरत और प्यारी औरत हो श्वेता. यदि मुझे पहले तुम मिली होती, तोह में दूसरी शादी कभी नहीं करता. अपनी गलतियों की सजा के तौर पर... तुम्हारे लिए वो घर तुम्हारे नाम कर के जा रहा हु. कुछ पैसे भी है अलमारी में. भूमिका के नाम भी कुछ पैसे है. ये मेरे ग्लानि के चलते तुम्हारे लिए. मुझे ढूंढ़ने की कोशिश न करना. में नहीं मिलूंगा कभी. मेरा नाम, हितेश नहीं है. और न कभी था. तुम चाहो तोह पुलिस में कंप्लेंट कर सकती हो. पर कोई फायदा नहीं होगा. में बोहत दूर जा चूका होऊंगा तब तक. इसलिए खुद को परेशां मत करना. तुम जानती हो की में भी कोई इतना अमीर नहीं की दो दो परिवार संभाल सकू. अब चुकी मेरा बीटा मेरे पास है. तोह में उसकी पढ़ाई और भविष्य के लिए पैसे जोड़ना चाहूंगा. भूमिका के लिए में एक अच्छा बाप न बन्न सका. माफ़ कर देना मुझे श्वेता. माफ़ कर देना. ~ हितेश!"
बस! यही चाँद शब्द थे उस खत में.
श्वेता सोच रही थी की वो अपने दुःख से बाहर आ पाएगी. और अब? ये क्या था? भगवन तोह जैसे उस से सुख chheen'ne पर hi तुले हुए थे. इस बार तोह उसका पूरा संसार hi उजाड़ गया.
डाट देने पड़ेगी श्वेता की, जो इतना सब कुछ सहने में बावजूद अपना मानसिक संतुलन नहीं खोयी. बेशक, वो बेहद रोई, टूट टूट के रोई, विलाप किया, और न जाने किन किन हालातो से गुज़री. पर अभी भी उसने अपना आप और संतुलन नहीं खोया था.
उससे इतना बड़ा धोका मिला था. इतना बड़ा धोका. उस दिन से hi, भूमिका उसके लिए एक बेटी तोह थी hi पर एक बीटा भी बन्न गयी. वही सब कुछ थी उसका.
श्वेता ने उन् पैसो से भूमिका को पढ़या लिखाया. खुद उसने होटल मैनेजमेंट के लिए कोर्स किया. सब कुछ उन्ही पैसो से.
पर पैसे तोह पैसे थे. एक न एक दिन तोह ख़तम होने hi थे. श्वेता काम भी करती थी पर उसकी आए इतनी नहीं थी की वो भूमिका की फीस के साथ साथ घर के सारे खर्चे उठा पाए.
नतीजा? उससे अपना घर भी बेचना पड़ गया. वो सड़क पर आ चुकी थी. Be-sahaara एकदम. जब दर दर वो भटक रही थी.
तब... तब उसकी मुलाक़ात एक शख्स से हुई.
बृजेश!!!
श्वेता चाहती नहीं थी. पर... पर अपनी भूमिका के लिए जैसे वो सब कुछ करने को राज़ी थी. उससे पता लगा की बृजेश भी एक औरत की तलाश में था. तोह बस, श्वेता ने कोई कसार नहीं छोर्री, बृजेश के संग अपना रिश्ता जोड़ने में.
और जल्द hi दोनों की शादी भी हो गयी. कुछ इस तरह श्वेता ने फिर बृजेश के घर में क़दम रखा.
उससे समझ आ चूका था की खुद की संपत्ति होना कितना ज़रूरी होता था. मैं में वो ठान चुकी थी, की...
की वो हमेशा अपने और भूमिका के बारे में hi सोचेगी. क्युकी कोई किसी का अपना नहीं होता. भूमिका को भी वह वही सिखाती. अपनी दास्तान के बारे में बताती.
और इस घर में आते hi उसकी पहचान हुई फिर वीर से.
"वीर!!! आज से में तुम्हारी माँ हु. ठीक है?"
वीर से उसने कहा, तोह वीर ने कुछ न कहा. वो उससे देखा और रट हुए अपने स्कूल का बैग लिए अपने कमरे में घुस गया.
'क्या हुआ इस लड़के को?'
श्वेता आये दिन वीर से बात करने का तरय करती, पर वीर कुछ न कहता. उसने सोचा था की वीर को प्यार से रखे. बेटे की कमी उससे हमेशा महसूस होती थी. और अब रिश्तो के चलते, वीर तोह उसका hi बीटा था न? तोह वीर को अपना maan'ne में क्या बुराई थी?
पर... श्वेता का ये विचार din-ba-din बदलता गया. जब आये दिन वीर के किस्से उसके कानो में पड़ने लगे.
"आज वीर ने क्लास में पंत में hi सुसु कर ली. हाहाहा~"
प्रांजल आये दिन कुछ न कुछ बताता.
"अरे... हाहाहा~ आज वीर को सर से मार पड़ी. सर का दिया हुआ होमवर्क hi नहीं किया इसने हेहेहे~"
"पता? पता? आज क्या हुआ? वीर ने आज क्लास के लड़को से झगड़ा कर लिया और फिर उन् लोगो ने इससे धो दिया. हहै"
"दादा जी! वीर न ऑटो में... एक लड़की की स्कर्ट खींच रहा था आज. वो बोहत रोई थी. आप चाहो तोह मेरे दोस्तों से पूछ लेना."
तोह कही विवेक की शिकायते,
"वीर ने तोह मेरी इज़्ज़त hi डवा दी कॉलेज में. में इससे टचफ़ेस्ट दिखाने ले गया था और ये... उघ! अब क्या बोलू में, मेरे दोस्तों के सामने मज़ाक बना दिया. आखिरी साल है मेरा, अब क्या सोचेंगे वो मेरे बारे में."
तोह कही आस पड़ोस के लोग,
"आप अपने वीर को समझाइये. कल मेरे आँगन में डेल हुए कपड़ो में कीचड उछाल के गया है ये."
"अरे ये तोह कुछ भी नहीं है. एक दिन इसने कॉलोनी के उस सब्ज़ी वाले के सर्र में पत्थर मार के उसका सर्र फोड़ दिया था. मेने और नीलम ने पट्टी करि थी उनकी. और ये? ये भाग गया था वह से."
"केवल इतना hi नहीं, अरे एक दिन इसने वो क्या कहते है... कौन सा खेल रहता है? मार गेंद!?? गेंद से मारते है जिसमे? अरे इसने उस ठोस गेंद से उस कोष्टा साहब के छोटे बच्चे को मार दिया था. कोष्टा साहब ने इससे मेरे सामने थप्पड़ मारा था."
"देखिये दादा जी! हम सब आपको अपने दादा जी जैसा मानते है. पर अपने इस पोते को समझाइये. क्रिकेट खेलते वक़्त, रैकवार साहब का बच्चा आँगन में था तोह इसने ऐसी गेंद फेकि की उसके सर्र को जा लगी. रैकवार जी की पत्नी ने इससे मारा था फिर."
और न जाने क्या क्या... ये तोह 1% भी नहीं था उन् शिकायतों में से.
और ऐसे hi, श्वेता का लगाव वीर के प्रति कमज़ोर होता गया, उसका विचार वीर के लिए बदलने लगा. वो वीर को प्यार तोह देना चाहती थी, पर...
आये दिन ऐसी घटनाओ से वीर जैसे उस से दूर जाता चला गया. वो यदि वीर को देखती तोह बस उससे सर्र झुका के अपने कमरे में जाता हुआ.
*थुड़*
और एक तेज़्ज़ आवाज़ के साथ उसका कमरा बंद हो जाता.
ज़्यादा समय नहीं लगा, जब श्वेता की नज़रो में वीर मात्र एक अजनबी के सामान बन्न के रह गया.
और श्वेता ने वीर के प्रति प्यार, इज़्ज़त, लगाव, चिंता सब कुछ जैसे नज़र अंदाज़ कर दिया. कही लुप्त हो गयी जैसे.
फिर आया वो समय, जहा श्वेता ने अपनी सूझ बूझ से एक होटल अपने नाम करवाई.
कितना ज़रूरी था ये सब. यदि उससे धोका मिला भी तोह काम से काम जीने के लिए उसके पास कोई सहारा तोह रहेगा.
पर उससे और चाहिए था. जितना मिल सके उतना बेहतर. खबर मिली, मनोरथ की प्रॉपर्टी की. जब दो प्राणी किसी एक चीज़ का शिकार करते है तोह अक्सर वो रास्ते में एक दूसरे से मिल hi जाते है.
यहाँ भी वही हुआ, श्वेता जाके मिल चुकी थी विवेक और प्रांजल से. फिर वो समय आया जहा प्रॉपर्टी के नाम पर वो वीर को घर से बाहर निकलवाने के प्लान में भी पीछे न हटी.
ये सब ज़रूरी था. उसके लिए केवल भूमिका hi सब कुछ थी. तोह उसने ये किया.
पर मिला क्या? ठेंगा! प्रॉपर्टी हाथ से निकल गयी. फिरसे, उससे धोका मिला. अपने नए परिवार से.
वो वक़्त आया, जिधर वो अपनी जान पर खेल रही थी. और अपनी साड़ी उम्मीद खो चुकी थी. सोच रही थी की कितना व्यर्थ बीता उसका जीवन. पर उस वक़्त तब...
उसी ने उससे बचाया. उसी वीर ने जिससे वो शुरू से अंत तक नेग्लेक्ट करती आयी. उसी शान, श्वेता के अंदर का वो ग्लानि का बाँध टूट गया. और उसके मैं ने ये बैठा लिया की वीर उसकी hi तोह संतान है.
हाँ! जिस संतान के लिए वो इतना तदपि, वो जैसे यही था. जब वीर ने कहा था की वो उसकी माँ नहीं, तब...
इसलिए बोहत ज़्यादा पीड़ा हुई थी उससे. वीर कुछ भी छीन ले उस से. पर... पर कभी भी ये हक़ न छीने उस से. वीर की माँ होने का हक़.
एक बीटा उससे मिल चूका था. अपना बीटा. अपनी संतान. और अब उससे कुछ नहीं चाहिए था.
कुछ भी नहीं. न पैसा... न शोहरत... न कोई प्रॉपर्टी...
बस... वीर!!!
*टिप* *टिप*
ासु जब उसके हाथ पर गिरे, तोह श्वेता एकदम से जैसे अपने अतीत से बाहर आयी.
यही था उसका अतीत. वीर अभी भी सो रहा था. वो तोह भूल hi गयी थी की वो यहाँ वीर को निहारने आयी थी. अतीत को जितना भी भुला दो, एक न एक बार सामने आ hi जाता है.
"मेरा बच्चा...!!!"
*पूछ*
आसुओ को पॉच, उसने वीर के सर्र को उठाया और उसके चेहरे को अपनी छथि में समां लिया.
जैसे hi वीर का चेहरा उसके अध् नग्न ूरोज़ से टकराया, एक सिहरन उसके पूरे बदन में फेल गयी. एक चिंगारी... भड़क उठी.
और उसकी रुलाई चूत गयी. वीर के चेहरे को कस के पूरी ताक़त से उसने अपने स्तनों में दबा लिया. पल्लू तोह पहले hi गिर चूका था. उन् बड़े दूध की दरार में वीर का चेहरा छुप चूका था.
"मेरा बच्चा.. *सुबुक* ओह्ह मेरा बच्चा ♡ *सुबुक* मुझे माफ़ कर दे वीर... इस औरत को माफ़ कर दे... *सुबुक* में कसम खाती हु, आज से ये श्वेता तुझपे कोई हानि नहीं आने देगी मेरे बच्चे... अहह~ मेरा बेतु... *मुआअह्ह्ह्ह* *सुबुक* ी स्वेअर वीर... माफ़ कर दे इस औरत को... माफ़ कर दे... *सुबुक* "
वो बड़बड़ाती रही. जब तक की उसने वीर के पूरे चेहरे पर अपनी चुम्बनों की बरसात नहीं कर दी. और फिर be-mann वो उससे चोरर के अपने कमरे में गयी.
***
इवनिंग ~ 7:44 पं
वीर दिन भर के कुछ काम निपटा के जब घर आया तोह अपने कमरे में जा के उसने हाथ मुँह धोये.
और बाहर आते hi नीचे से उससे रागिनी की आवाज़ सुनाई दी,
"वीर! तुमसे मिलने श्रेया आयी है."
'हम्म? श्रेया जी?'
सवाल लिए वो नीचे आया तोह श्रेया ऑफिस के hi कपड़ो में बैठी हुई थी. और वीर को देख एक फीकी सी स्माइल पास की उसने.
श्रेया : उम्... वीर... K-Kya हम अकेले में बात कर सकते है थोड़ा?
ये सुनते hi वीर को आश्चर्य हुआ हो या न हुआ हो, पर रागिनी के कान ज़रूर खड़े हो गए थे. वो एक तीखी नज़र से श्रेया को देखि पर श्रेया के उसके देखने पर फ़ौरन hi रागिनी ने अपनी आँखों के एक्सप्रेशन बदल लिए.
रागिनी (स्माइल्स) : वीर! अपने रूम में ले जाओ. श्रेया को शायद कुछ पर्सनल बात करनी होगी.
रागिनी की वो स्माइल देख वीर समझ गया. वो जैसे कहना चाह रही थी, 'जाओ! जाके बात करो. और बाद में मुझे सब कुछ बताना क्या क्या हुआ उस बंद कमरे में. यदि एक भी डिटेल छूटहि तोह देखना फिर.'
वीर हाँ में सर्र हिलाते हुए उठा और श्रेया को अपने कमरे में लेके गया. अभी वह आके अपने कमरे का दरवाज़ा बंद किया hi था की...
श्रेया पीछे से उस पर टूट पड़ी. उसकी पीठ को जोरर से जकड श्रेया के हाथो ने उसके पेट को कस लिया.
"हँ?"
वीर सोचा शायद ये फन वे में था पर... लेकिन श्रेया के अगले पल hi सुबुकने की आवाज़ और हिचकियो ने वीर को हैरानी में दाल दिया.
वीर : Sh-Shreya जी!? क्या हुआ?
और श्रेया ने सब कुछ बता दिया...
सब कुछ. जो आज उसके साथ हुआ. सुनते सुनते वीर की आँखें फैलती चली गयी और मुट्ठी कस्सति गयी.
बस बचा था तोह...
*डिंग*
[Mission : 1) Rescue the prey from the pरेडिटोर.
2) कॉन्कर निहारिका बंसल.
रिवार्ड्स : 1) ???? पॉइंट्स.
2) 3 फ्री क्वेस्ट हंट अत्तेम्प्ट्स.
वेन्यू : क्सक्सक्सक्सक्सक्सक्स कंपनी.
टाइम लिमिट : 2 डेज.
मिशन फेलियर पेनल्टी : 8000 पॉइंट्स.]
वीर पलटा और उसने श्रेया को अपने सीने से लगा लिया,
"Don't वोर्री! ी प्रॉमिस! 2 दिन के अंदर hi अंदर... I'll टर्न थे इवेंट्स. एंड, you'll बे फाइन."
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आज के लिए इतना hi गाइस.
नई अर्च पास आते जा रहा है. ी थिंक, उसकी स्टार्टिंग से पहले अभी मोरे थान 5 उपदटेस तोह लग जाने hi चाहिए, कुछ मैटर्स को सॉर्ट आउट होने में. बाकी, लिखे ठोकने का और रेवोस रखने का. और सोचने का, की ऐसा क्या हुआ होगा श्रेया के साथ? :स्माइल2:
धन्यवाद!










