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- Dec 5, 2013
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अपडेट - 94 ~ हेरे आईटी केस.
अब तक...
सुहाना (शिघ्स) : में तुमसे दो दिन में बात करती हु. ी हैवे तो थिंक. मेरा मंद काम करना बंद हो गया तुम्हारे कारण...
दिव्या : दो दिन केवल... ी don't हैवे मच टाइम सुहाना... ी कैन ओनली वेट फॉर 4 डेज ात मैक्स. पर दो दिन के अंदर मुझे तुम्हारा आंसर चाहिए hi चाहिए. No... यदि तुम नहीं आयी तोह में तुम्हे लेने आ जाउंगी.
सुहाना : ी... I'll थिंक!!!
दिव्या : यू हैवे तो के!!!!
*कॉल एंड्स*
और कॉल कट हो गया. सुहाना!!! गहरे चिंतन में डूब गयी.
इस नयी खबर ने... उससे पूरा दुविधा में दाल दिया था. समथिंग... मस्ट बे दोने!
अब आगे...
*Zzzzzzzzzzzzzzzzzzzz*
*Zzzzzzzzzzzzzzzzzzzz*
देरर रात में, कमरे में आती बस एक माध्यम सी नाईट बल्ब की रौशनी में, वीर नींद की वादियों में था. हर्र रात की तरह पारी स्लीप मोड में थी. और प्रत्येक रात्रि के जैसे hi उसके कमरे का दरवाज़ा आज भी खुला हुआ था.
तभी उसके कमरे में एक आहात हुई.
*छहममममम* *छहममममम*
आभूषणों की खनक हुई.
और उस हलके से उजाले में एक साया उमड़ के आया जिसके अगले शान hi...
*क्लिक*
वीर के रूम का दूर अंदर से लॉक हो गया. वीर अपने आस पास हो रही गतिविधियों से अनजान बस मस्त मौला होक सो रहा था. वो साया धीरे धीरे एक औरत के अकार में आकृति स्पष्ट होते हुए आगे बढ़ी और, वीर के बिस्तर पर उसके बगल से आ कर बैठ गयी.
एक कोमल सा स्पर्श वीर के गाल पर हुआ, नरम लाल होंठो की छुवन, उसके बालो पर एक हाथ थमा और उससे सहलाने लगा.
"आज नहीं तोह कल... में भी तुम्हारे दिल में एक स्थिर स्थान बना hi लुंगी. तुम देखना! तुम्हारी साड़ी नाराज़गी दूर कर दूंगी में, मेरे बच्चे...!!!"
जी हाँ, ये श्वेता hi थी. जो अक्सर वीर के कमरे में रात को उससे दुलार करने के लिए आ जाय करती थी. वीर के जागते हुए तोह वह उस से बात भी नहीं कर सकती थी, केवल यही उपाय था उसके पास वीर को क़रीब से निहारने का.
पर हो न हो, उस दिन के बाद से श्वेता का मैं बड़ा hi विचलित रहता था. वही दिन, जब वीर की नज़रे अनायास hi उसके स्तनों पर ठहर गयी थी. श्वेता आये दिन उस घटना को याद करती और खुद से सवाल जवाब करती. की आखिर क्यों वीर ने उसके थानों पर नज़रे गड़ाई थी?
बढ़ती उम्र में औरतो के प्रति आकर्षण तोह एक स्वाभाविक सी बात थी. लेकिन, जो सवाल उससे सबसे ज़्यादा सत्ता रहा था वो ये था की...
घर में इतनी औरतो में, वीर की निगाहें केवल उसके hi ूरोज़ो पर क्यों गयी?? वो भी एक नहीं, दो बार. जब वह किचन में थी तब भी तोह...!!! वीर ने उससे घूर के देखा था. पहली बार का तोह एक दुर्घटना मान सकते है पर दूसरी बार? वो जानती थी की दूसरी बार वह केवल एक संयोग नहीं था. वीर ने वाक़ई मर्ज़ी से उससे देखा था. और यही सोच सोच के श्वेता की रात की नींदें उड़ती जा रही थी. हर्र रात उसकी बेचैनी में गुज़र रही थी.
वो अभी भी वीर को निहारते हुए उसके बगल से लेत इसी सोच में डूबी हुई थी जब एक हिला देने वाला विचार उसके मैं से होते हुए गुज़रा. जिसके बारे में सोचते hi उसकी आँखें हैरानी के मारे फेल गयी. और उसका मुँह अचानक hi खुला का खुला रह गया. वो तेज़्ज़ आवाज़ में जोरर से हैरत भरी आह भरने hi वाली थी की उसने अपने दोनों हाथो से अपने खुले मुँह को धक् लिया. कही कोई जाग जाता तोह मुसीबत हो जाती.
थार ठहराते हाथो के कम्पन को थाम वह वीर को देखि और उसके नैनो से आसुओ की बूंदे छलक उठी.
'तोह क्या ये बात थी मेरे बच्चे? हाँ?'
आसुओ की एक धरा उसके गाल से होते हुए वीर के तकिये पर गिरने लगी. जैसे श्वेता को उसका जवाब मिल गया था. उस सवाल का जवाब जो उससे इतने दिनों से बेचैन कर रहा था.
"ओह्ह्ह्ह मेरा बच्छाए~~ !!!!"
और अगले hi पल उसने वीर के सर्र को थाम अपने उरोजों में दहस्सा लिया. निरंतर वह उसके चेहरे को चूमने लगी.
*छू~* *पूछ* *पूछह~* *मुआअह्ह्ह*
अपना पूरा प्यार बरसाने लगी.
"में ये बात कैसे भूल गयी??? कैसे?????"
उसने और कस के वीर को अपने आग़ोश में भर लिया. वीर का चेहरा उसके ब्लाउज में क़ैद अधनंगे थानों पर टिका हुआ था. श्वेता भली भाति उस त्वचा से त्वचा के स्पर्श को महसूस कर पा रही थी.
"में कितनी बेवक़ूफ़ हु. है न? जो समझ hi न पायी थी अब तक. अनजान बनती रही. अज्ञानी एकदम. जबकि एक माँ होने के नाते मुझे पहले hi समझ जाना चाहिए था. फिर भी में..."
उसने वीर के चेहरे को अपने चेहरे के पास किया,
"में ये कैसे भूल गयी की जब तुम केवल एक साल के थे तब hi तुम्हारी असली माँ तुम्हे चोरर के चली गयी थी. नहीं!!! वह तुम्हारी असली माँ हो hi नहीं सकती. यदि वह तुम्हारी असली माँ होती तोह तुम्हे ऐसे अकेला चोरर के नहीं जाती. हरगिज़ नहीं! वह भी ऐसे परिवार में. उस दिन भी, काव्य की पार्टी में तुम्हारे पिता बृजेश मुझे मन रहे थे. पर अब में वापस नहीं जाने वाली. वह औरत कैसे तुम्हे इस हालत में चोरर के जा सकती है? मेने अपनी भूमि के लिए पूरी ज़िन्दगी गुज़ार दी. और फिर भी मुझे उसकी इतनी चिंता रहती है. तोह फिर वह औरत कैसे तुम्हे...!!?? हाँ! वो तुम्हारी माँ नहीं. में!!! में तुम्हारी माँ हु वीर. शायद भगवान् भी यही चाहते थे. तभी मुझे कोई बीटा न मिला. और फिर मुझे अब तुम मिले हो. और तभी शायद वह औरत तुमसे वंचित है. हाँ!! यही बात है."
"तुम देखना मेरे लाल. में तुम्हे इतना प्यार दूंगी, की कभी तुम्हे एक माँ की कमी अब से खेलने hi नहीं दूंगी. धेरर सारा, खूब सारा प्यार दूंगी अपने बच्चे को."
"में नादान ये समझ रही थी की तुम आकर्षण के चलते मेरे स्तनों को देख रहे थे. और हो भी सकता है की ये एक कारण रहा हो. पर... पर एक और कारण था, है न मेरे बच्चे? है न? में सही हु न? तुमने मात्र एक साल तक hi अपनी माँ का दूध पिया है. और इसलिए तुम मेरे स्तनों को देख रहे थे न? है न मेरे बेटे? में बेवक़ूफ़ अब तक ये समझ न पायी की मेरा बच्चा इसलिए मेरी छाती घूर रहा था. ऑफ़ कोर्स! तभी तोह तुमने मुझे देखा. न रागिनी को, न सुमन को, न आभा को, न उस सोनाली को. सिर्फ मुझे!!! क्युकी खून के रिश्ते से में तुम्हारी एक माँ न सही, पर एक स्टेपमॉम तोह हु hi न? और तुम्हारे अंदर का नन्हा बच्चा एक माँ के दुग्ध की मांग कर रहा था. जिसके लिए वो हमेशा से तड़पता आया है. और उसी के चलते तुम्हारी नज़रे अपने आप hi मेरी ऊपर चली गयी, है न?"
"यही बात है न वीर??? हाईए~ में एक अभागन. काश में उस समय मौजूद होती. तुम्हे अपने दूध से स्तनपान करवा पाती. मेरा बच्चाअ~!!!"
*मुऊआआह्ह्ह्ह*
"जी भर के में अपने बच्चे को दूध की तृप्ति करवा पाती. इस से बड़ा सुख मेरे लिए और क्या हो सकता था?"
वो ग़म में सोच सोच कर वीर को चूमती रही. जब इस बार अनायास hi उसके मस्तिष्क में एक भूचाल फैला देने वाला विचार आया. वह संन्न सी होक रह गयी, एकदम स्थिर.
उसका एक हाथ कांपते हुए अपने आप hi वीर के सर्र के पीछे गया. और दूसरा उसके लाल रंग के ब्लाउज पे. आहिस्ता से उसका ब्लाउज उसके हाथ से नीचे सरका और एक सफ़ेद ब्रा का कप उभर के सामने आया जिसमे उसके एक विशाल दुग्ध की थैली क़ैद थी. उसका सीना तेज़्ज़ सासो के चलते ज़र्रों से ऊपर नीचे हो रहा था. वीर के सर्र पर मौजूद हाथ से उसने वीर को धकेल के अपने स्तनों की ऑर्डर किया और...
जैसे hi वीर के चेहरा उसकी ब्रा में बंद उसके दूध से टकराया, श्वेता के अंतर मैं में से एक तेज़्ज़ आवाज़ आयी,
श्वेता!!!!! ये तुम क्या कर रही हो?????
"अह्ह्ह्हह!!???"
और उसने झटके से वीर को अपने स्तन से अलग कर दिया. वो घबराती हुई एकदम से वह से उठी और अपनी हालत को सही करने में लग गयी. पूरी पसीने से भीग चुकी थी वह.
'हे भगवान्!!! ये में क्या करने जा रही थी??? मेरा वीर अब कोई बच्चा नहीं है. वह बड़ा हो चूका है. ये में क्या करने वाली थी? वीर को अपना स्तनपान करवाने का समय बीत चूका है. में उस समय में मौजूद नहीं थी. ओह्ह्ह्ह nooooooooooo~ ये में सच में... क्या करने जा रही थी? जैसे वीर के अंदर का बच्चा दुग्ध की तलाश में था, कही मेरे अंदर का बच्चा भी... उससे स्तनपान करवाने की तलाश में तोह नहीं? नहीं!! ये अब मुमकिन नहीं.'
एक आह भरते हुए वह उठी और जाने से पहले एक बार फिर वीर को देखि. उसका हाथ अपने आप hi उसके एक दूध पर चला गया. और उसने हौले से उससे मसल दिया,
"अब तोह इनमे दूध भी नहीं. में भी न... क्या क्या सोचने लगी थी."
एक अंतिम बार वीर के सर्र पर हाथ फेरर और उससे चूमते हुए वह वह से निकल गयी.
***
सुबह हुई. रोज़ की तरह आलम आज भी वही था. डाइनिंग टेबल पर सभी मौजूद थे, वीर और सोनाली आपस में फ़ूड ट्रक के विषय में बात चीत कर रहे थे. तोह वही आभा और भूमिका खाने में लगी हुई थी, और बाकी तीनो महिलाये अंदर किचन में व्यस्त थी.
सोनाली : तोह इतनी थी पिछले दो हफ्तों की कमाई. कुल मिलाके सब अच्छा hi चल रहा है.
वीर : हम्म! तुम अभी ऐसे hi चलने दो. बाकी जो ट्रक्स है उनके वर्कर्स को भी इन्फॉर्म करना की अभी हमे लगन के साथ केवल क्वालिटी और फेम पर hi फोकस करना है कुछ हफ्ते.
सोनाली : ठीक है! फिर उसके बाद?
वीर : उसके बाद में तुम्हे नयी डिश दूंगा. ऐसी जो कही भी नहीं मिलेगी. वो हमारी सिग्नेचर डिश रहेगी.
सोनाली : क्याआ??? तुम्हे आती है? कैसे सीखी तुमने? एक मिनट!! इसका क्या मतलब की ये डिश कही भी नहीं मिलेगी?
वीर : हाहाहाहा! तुम बस आम खाओ, गुठलिया मत गिनो.
सोनाली (खुसपुसाते हुए) : इतनी hi चिंता है ट्रक की तोह खुद क्यों नहीं चलाते?
वीर (स्माइल्स) : कुछ कहा तुमने?
सोनाली : K-Kuch नहीं!!
वीर ने शरारती ढंग से उससे देखा जैसे बताना चाह रहा था की उसने सब सुन्न लिया है. और सोनाली ये जानते hi मुँह फुला के नीचे सर्र झुका के खाने में लग गयी.
वीर की निगाहें फिर अपने दायी ऑर्डर गयी जहा आभा बैठी हुई थी. पर, वह कुछ उदास सी लग रही थी.
वीर : क्या हुआ?
आभा : ....
वीर : आभा???
आभा (हिचकते हुए): H-Huh????
वीर : क्या हुआ? कुछ बात है क्या?
आभा : N-Nahi!! कुछ भी तोह नहीं!
वीर : झूठ मत बोलो, में जानता हु कुछ बात है. कहो!!! मुझसे कहो!!
आभा एक शान के लिए उससे देखि पर फिर अपने आस पास भूमिका और सोनाली को देख वह चुप रह गयी. वीर ने उसकी परेशानी समझते hi खुद को उसकी ऑर्डर झुकाया और अपने कान को उसके मुँह की ऑर्डर लाते हुए वह ठहर गया. इशारा समझते हुए वो वीर के कान की ऑर्डर झुकी और बोली,
आभा : बात ऐसी hi है वीर जी! कुछ ख़ास नहीं!
वीर : वो में डीडे करूँगा की बात फ़ालतू है या नहीं. तुम मुझे सच सच बताओ सब. क्या बात है?
और फिर दोनों hi एकदम धीमी आवाज़ में एक दूसरे से बात करने लगे,
आभा : दरअसल...
वीर : कहो!
आभा : मुझे ऐसा लगता है की में... में किसी काम की नहीं.
वीर : हँ???
भूमिका : हम्म? क्या बातें हो रही है? आपस में?
सोनाली : !!!!???
वीर : वह... हमारे बीच की बात है, it's ा बिट पर्सनल.
भूमिका : ओह्ह्ह! O-Okay!!
वीर (आभा से) : कहो अब!!
आभा (खुसपुसाते हुए) : माँ जी ंसस की सदस्य बन्न गयी है. बोल चाल में कितनी आगे है वह. सोनाली आपका बिज़नेस अच्छी तरह संभाल रही है. आपकी तै जी और दीदी कितनी बड़ी होटल को संभालती है. रागिनी जी, घर का पूरा ध्यान रखती है. और वह कितनी क़ाबिल है ये हमे बताने की ज़रुरत नहीं. पर में... केवल में hi... मुझसे अच्छा खाना यहाँ सभी बना लेती है... वो जो करती है, वह में कर hi नहीं सकती. और इसलिए, में जानती हु की... M-Mein... में किसी काम की नहीं.
आभा की बात सुन्न वीर को एक नयी जानकारी मिली. वो इस बात से कैसे अनजान रह गया.
[Inferior Complex Masterrr~]
'T-That's...!!!'
[Maaasteerrrr~ Aabha sahi hai. Potentially dekha jaaye toh woh kuch nahi kar rahi hai. Aise me uske andar ye bhavnaaye aaengi hi.]
'हम्म~ के तो थिंक ऑफ़ आईटी. मेने जब आभा को पहली बार चेक किया था तोह... क्या देखा था? उससे घूमने फिररने का शौक है न?'
[Yes!! Master! System me stored information me yahi baat hai.]
'हम्म~'
वीर : तुम चिंता मत करो! तुम्हारी ये परेशानी जल्द hi दूर हो जाएगी. मेरा वादा है ये. और अब इस तरह से सोचना बंद कर दो. ठीक है?
आभा : H-Hmm!
आभा वीर की सांत्वना लेते हुए शांत हो गयी. लेकिन, बात तोह सच थी. वीर को इस मस्ले पर भी ध्यान देना होगा आगे चल के.
वह सभी भी बैठे hi थी की इतने में अनादर से साड़ी महिलाये निकल के बाहर आ गयी. सुमन मुस्कुराती हुई आयी और उसने वीर की प्लेट में एक और ब्रेड रोल रख दिया,
वीर : अरे मेरा हो गया है आलरेडी.
सुमन : *स्माइल्स*
वो बस स्माइल पास करते हुए उसके पानी के गिलास में पानी भरी और उसके सामने भूमिका के बगल से बैठ गयी.
वही रागिनी भी आयी और टेबल की मैं चेयर पर बैठ वह अपनी और सुमन और श्वेता की प्लेट लगाने लगी. श्वेता रागिनी के सामने वाली दूसरे चोरर पर मौजूद चेयर पर बैठ गयी. तोह ख़ामोशी को तोड़ते हुए भूमिका ने बात शुरू की,
भूमिका : माँ~ कल भी आप होटल से जल्दी लौट आयी. क्या बात है?
श्वेता (वीर को देखते हुए) : मेने कुछ डीडे किया है बीटा.
भूमिका : क्या माँ??
वीर को चोरर के सभी की नज़रे श्वेता के ऊपर थी, तोह वही बेचारी श्वेता वीर को सभी की नज़रो से बच के चोरी चोरी देख रही थी.
श्वेता : यही की में होटल की देख रेख अब चोरर रही हु.
भूमिका : वहहहहाआटटट????
और इस बार न केवल वह सभी, बल्कि वीर का मुँह भी ब्रेड रोल को चबाते चबाते ृक्क गया.
भूमिका : K-Kya मतलब है आपका?
श्वेता : वही जो तुमने सुना बीटा.
भूमिका : नाहीईईई!!! पर ये अचानक से आप..!!
श्वेता (वीर को देखते हुए) : मेरी कुछ और भी ज़िम्मेदारी है, जिससे में हमेशा से nazar-andaaz करती आयी हु. और इसलिए, अब में पूरा का पूरा ध्यान उस पर देना चाहती हु.
वह मौजूद सभी शोहियार थे. श्वेता ने ये बात किस्से देख के किसके लिए कही थी वह सभी समझ चुके थे. और वो खामोश hi रहे. केवल वीर hi था जो सर्र झुकाये खाने में लगा हुआ था.
भूमिका : ी... ी अंडरस्टैंड माँ!!
श्वेता : हम्म~
और कुछ इस तरह उनका आज का ब्रेकफास्ट हुआ.
जब वीर कार निकालते हुए कही जाने के लिए बाहर पोर्च में आया तोह रागिनी तेज़्ज़ क़दमों के साथ बाहर आके दरवाज़े की देहलीज़ पर कड़ी हो गयी.
रागिनी : आज किधर जा रहे हो?
वीर : वही! काम से थोड़ा.
रागिनी : ऐसा क्या काम रहता है वीर तुम्हारा...!!?
वो टिक कर खड़े होते हुए पूछी,
वीर : ज़रूरी काम है भाभी आज. बिज़नेस से रिलेटेड hi है.
रागिनी : मुझसे भी ज़रूरी...!?
वीर, जो कार का दूर खोलने hi जा रहा था वह ासाहनक रागिनी के इस तरह के सवाल पर पीछे मुद उससे हैरत में देखने लगा,
वीर : ी...
रागिनी (स्माइल्स) : कब तक आओगे??
वीर : जल्दी आने की कोशिश करूँगा.
रागिनी मुस्कान भरे उसके नज़दीक आयी और...
*छू~*
उसके गाल पर हर्र रोज़ की तरह वही एक मीठी प्यारी सी किश उससे देदी. और उसके बाद उसने अपना गाल आगे कर दिया. वो मखमली त्वचा, वो गोरा गोरा गाल और वो हलके पसीने से भीगे किचन में काम करने की वजह से उसकी कलम के आस पास चिपके हुए बाल.
वीर ने एक मौका नहीं गवाया और उसने रागिनी के गाल को अपने होंठो से चूम लिया.
उसकी शर्ट की कल्लोर व्यवस्थित कर रागिनी ने उससे रवाना किया, और वीर कार को रिवर्स लेने लगा. तब रिवर्स लेते टाइम hi उसकी नज़रे ऊपर टेरेस पर चली गयी जहा सुमन कड़ी हुई थी. हाथो में उसके छत पर सुखाने के लिए कपडे थे, और वो अजीब सी मुस्कान होंठो पर सजाये वीर को देख रही थी. रागिनी के घर की टेरेस ऐसी थी की वह से पोर्च, पार्किंग एरिया पूरा नज़र आता था.
'फूऊककककक!!! ओह्ह थैंक गॉड!! सुमन है....'
पल भर के लिए वीर की गांड hi फट गयी थी. यदि और कोई होता तोह न जाने क्या होता.
*Vrrrrooooooooooommmmm*
और वह वह से राहत की एक सांस लेते हुए रवाना हो गया.
***
वत्सला स्टील इंडस्ट्रीज
इवनिंग ~ 4:38 पं
वीर मौजूद था इस वक़्त इस बड़ी कंपनी की मैं ब्रांच के बाहर. वह अकेला नहीं था, साथ में कारन भी था उसके.
कारन : सब हो गया. पर मेरी समझ में नहीं आया वीर. मेने तुम्हे बाकी 2 कम्पनीज के भी शेयर्स के ऑफर्स दिलवाये. वह तोह इस से भी बड़ी थी. फिर तुमने ये क्यों चुनी? लुक! मेरे पास रिपोर्ट भी तैयार है वीर. वत्सला स्टील इंडस्ट्रीज पिछले कई महीनो से लोस्स में चल रही है. ऐसे में अपना पैसा इसके शेयर्स में लगाना... उम्... और ये एक छोटी कंपनी है यदि हम बाकी दो कम्पनीज से कपड़े करे तोह...
वीर (स्माइल्स) : तुम्हे पता लग जाएगा जल्द hi की क्यों मेने वत्सला पर इन्वेस्ट किया.
कारन : हँ???
ऑफ़ कोर्स!! कारन नहीं जानता था, की वीर के पास क्या था.
स्टॉक मास्टर!!!
वह स्किल जो उसने पहली बार उसे की थी. भले hi उसमे 100% सक्सेस रेट नहीं था. पर काम से काम 70% तोह था. और इसलिए वीर ने 3 बड़ी कम्पनीज में से सबसे छोटी वाली को अपना पहला टारगेट चुना. यदि लोस्स भी होये तोह उतना नहीं.
कारन : वेल! अन्य्वयस! अह्ह्ह! दिन भर की भाग दौड़ में थकान हो गयी. हाउ अबाउट सम कॉफ़ी?
वीर (स्माइल्स) : में चाय वाला बाँदा हु...
कारन (स्माइल्स) : यू क्नोव कॉफ़ी इस बेटर थान चाय...
वीर : अब इस बेहेस पे में रात भर बोल सकता हु.
कारन : हाहाहाहाहा~ Lets's जो!!
वह दोनों कार में बैठे hi थे की वीर का फ़ोन बज उठा.
*रिंग* *रिंग*
कॉलर काव्य थी,
वीर : Hello? बोल काव्य!
काव्य : भैयाआआ~ आप कहा हो???
वीर : उम्... में थोड़ा अभी...
काव्य : में, आरोही दी और कृतिका सिटी मॉल में है अपने. ी क्नोव आप कही बाहर hi होंगे, तोह आप यहाँ आ रहे हो. Okay? Bye bye!!!! मुआअह्ह्ह्ह~
वीर : Wh-Whaaaattttttt???
*कॉल एंड्स*
और एक झटके में काव्य ने अपनी बात बोल फ़ोन कट कर दिया.
वीर : ये लड़की भी न...
कारन : क्या हुआ?
वीर : कॉफ़ी नहीं पीना? चलो सिटी मॉल लगा लो गाडी.
कारन : व्हाटटटटटट? वीर माना की में रिच फॅमिली से बिलोंग करता हु पर इसका मतलब ये नहीं की में मॉल में कॉफ़ी पीयूंगा. तुम्हे इतना सब करने की ज़रुरत नहीं...
वीर : यू इडियट!!
कारन : H-Huh???
वीर : काव्य का फ़ोन था. उसने कहा है की वह, आरोही दी, और उसकी फ्रेंड कृतिका वह पर है तोह उसने मुझे बुलाया है. तोह चलो अब, जो भी पीना है अब भी वही पिएंगे.
कारन : ओह्ह्ह!!! ी सी!!! राइट!! मुझे याद आया, में काव्य की b'day पार्टी पर नहीं आ पाया था. उस से सॉरी कहना प्लीज. में बाहर था.
वीर : चल तोह रहे है अभी, तुम खुद hi कहना ये उस से.
कारन : अरे यार! उससे मनाना बोहत मुश्किल है.
वीर : तोह ऐसे काम hi क्यों करते हो?
कारन : ुघठ!!! फाइन! फाइन! I'll तरय तो कन्विंस हेर.
वीर : वैसे... मिस करा क्या लौट आयी?
कारन : हँ?? तुम तोह ऐसे पूछ रहे हो जैसे तुम से ज़्यादा बात मेरी उनसे होती है.
वीर : No रियली, पिछले पास्ट के 3-4 दिनों से मुझे उनका कोई भी मैसेज नहीं आया है.
कारन : ओह्ह्ह्ह! वेल! येह! वो बिजी थी. आज रात को आएंगी वह वापस.
वीर : ी सी! एंड व्हाट अबाउट मिस सोनिआ?
कारन : हँ? व्हाट? हाउ वोउल्ड ी क्नोव अबाउट हेर? तुम्हे उनकी बड़ी बहिन से पूछना चाहिए.
वीर : मिस सुहाना?
सुहाना के बारे में सोचते hi वीर को सुहाना की टेडी बेयर को जोरर जोरर से मार कर हैवानो वाली वह हस्सी की छवि याद आ गयी.
वीर : No! एहम! ी थिंक डायरेक्टली पूछना hi सही रहेगा.
कारन : हम्म~ वैसे... तुमने क्या बताया? कृतिका भी है वह मॉल में?
वीर : हम्म? येह!!!
कारन : ओह्ह्ह! एहम... तोह हमे उन्हें ज़्यादा देरर वेट नहीं करवाना चाहिए. निकलना चाहिए.
वीर : हम्म??
वीर ने अपनी नज़र पैनी कर कारन को देखा जो अपना चेहरा छुपाने की कोशिश कर रहा था.
'ओह्ह्ह्हह ी सी~'
[Yesssss Maaasssttteerrr! Something fishy is going on. Ehehehe~ I can smell it. Something is cooking around here. Hehe~]
'बिलकुल पारी! ी एग्री हाहाहाहा~ :लाफ: '
[Wahahahahahahahaha~ :evillaugh: ]
कारन : Wh-What??? मन यू लुक स्केरी... व्हाट हप्पेनेड!!?
वीर : नथिंग!!!
और कारन ने वीर की अजीब सी मुस्कान को इग्नोर कर गाडी आगे बढ़ा दी.
***
सिटी मॉल
इवनिंग ~ 5:12 पं
वीर और कारन जब साथ में पहुचे तोह मॉल में जिधर से भी वो गुज़रते, लड़कियों की नज़रे उन् दोनों पर जाती. वीर पहले से कई गुना हैंडसम जो था. 100 का अपीयरेंस था उसके पास. वही कारन, जो अमीर खानदान में पल बढ़ के पैदा हुआ. जन्म से hi रॉयल्टी का और था उसके इर्द गिर्द. बिलकुल अपनी बहिन की तरह. हलाकि, करा में ये सब गुण कुछ ज़्यादा hi कूट कूट कर भरे थे पर लुक्स और एटिकेट्स में वह भी बोहत आगे था.
काव्य को फिरसे फ़ोन कर पता चला की साड़ी लड़किया लोग ऊपर फ़ूड जोन में बैठी हुई थी.
और जैसे hi वीर और कारन को उन् तीनो ने आते हुए देखा तोह अपनी चेयर्स से वह तीनो hi हाथ दिखा के उन्हें बुलाने लगी.
काव्य तोह सीधे उठी और दौड़ते हुए वो वीर की तरफ आयी. वीर ने अपने आप को अटैक के लिए प्रेपर कर लिया था.
वह हवा के झोके की तरह तेज़्ज़ रफ़्तार में आयी और जोरर से कूदते हुए वीर की छथि में घुस गयी.
काव्य : भैयाआआ~~~
एक बार फिर, उसके आम वीर की छथि पर अपना उभरा उभरा एहसास चोरर गए.
आस पास के सभी लोग उन्हें इस तरह घूर के देख रहे थे, पर आखिर काव्य को अपने भैया के प्रति प्यार दिखाने में कहा शर्म आने वाली थी? उस दिन पार्क में भी नहीं आयी थी. और आज भी नहीं.
काव्य : आ गए आप इहेहे~
वीर : हम्म! यहाँ देखो कौन आया है.
कारन : अहःअहः~ हे काव्य! Hello~ कैसी हो?
काव्य : हम्फ~ भैया ये कौन है?
कारन (मैं में) : फुकककक!!
वीर : ये वही भैया है जो तुम्हारे b'day में नहीं आये थे.
काव्य : हाँ तोह इनसे कह दो की यहाँ आने की अब कोई ज़रुरत नहीं है.
कारन : अरे बहिन!! क्यों टांग खींच रही है? I'm सॉरी न!!!
काव्य : हम्फ~ Let's जो भैया!
कारन समझ चूका था की काव्य को मनाने के लिए उससे और म्हणत की ज़रुरत थी.
और यहाँ से निकला, वह तीनो अपनी टेबल पर आके बैठे.
वीर (स्माइल्स) : हे डीई~
आरोही (स्माइल्स) : हैययय~
कृतिका : अहह!! H-Hello~~
वीर : Hi तेरे!
कारन : H-Hello कृतिका!
वीर आरोही के बगल से बैठ गया तोह वही काव्य वीर के बगल से. कृतिका जो उसके सामने बैठी थी उसके बगल से कारन विराजमान हो गया.
कारन : Hello दी~
आरोही : Hello~
काव्य : दी! आप गंदे लोगो से बात मत करो.
कारन : ुघठ!
काव्य की बात पर सभी हस्सन लगे. कृतिका भी. फिर जब उसने बगल में कारन का मुरझाया हुआ मुँह देखा तोह वह उसके कान में झुकते हुए बोली,
कृतिका : यू विल हैवे तो गिव हेर ा गिफ्ट!
कारन : अह्ह्ह्ह!!!
कृतिका : यस!
कारन (खुसपुसाते हुए) : तुम्हे पता है? विल यू हेल्प में?
कृतिका : उम्... Okay!!! सूरे!!!
कारन वह से जब बहाना बना के उठा तोह वही कृतिका भी वाशरूम के बहाने उठ गयी और दोनों hi वही मॉल में काव्य के लिए गिफ्ट ढूंढने लगे. और इधर वीर मैं hi मैं कारन को शाबाशी दे रहा था.
'लौंडा तोह तेज़्ज़ निकला. क्या बात है!!'
तभी...
काव्य : भैयाआ~ आपको पता है? हेहेहे~
वीर : हम्म???
काव्य : आरोही दी... लुक ात हेर!!
कहते हुए उसने आरोही के पीछे जा कर अचानक hi उसके बालो को पीछे कर दिया, जिस कारण से उसके कान जो पहले ढके हुए थे वह नज़र आ गए. और उन् कानो में...
वीर की दी हुई बालिया थी.
वीर : !!!???
काव्य : दी पे कितनी जांच रही है न? लुक! मेने पेंडंट भी पहना है आपका.
वीर : ओह्ह्ह्हह~
काव्य : और आपको पता है? दी ने बचपन से अपने कान नहीं छिदवाये थे. शी हॉटेड पिएर्सिंग्स. डर था बचपन का उनको हाहाहा~ एंड यू क्नोव... आप की बाली के लिए शी इवन... मंमपप्पह्ह्हह्ह~~???
आरोही ने पीछे पलट के अगले hi पल काव्य का मुँह अपने हाथो से बंद कर दिया. उसके गाल गुलाबी थे...
आरोही (ब्लशेस) : Y-You.... काव्य... तुमने क्यों...!!??
वीर (स्माइल्स) : आईटी रियली लुक्स गुड ों यू.
आरोही : अह्ह्ह्ह!~
काव्य : मंपहहह~ हहहह!! देखा? मेने कहा था न हाहाहा~
बेचारी आरोही शर्म के मारे अपना मुँह फेरर ली. कुछ hi देरर में कारन और कृतिका भी लौट आये और जब कारन ने काव्य को गिफ्ट दिया तोह होना क्या था? अपना हैरी पॉटर का पूरा सेट देखते hi काव्य ने एक पल में कारन को माफ़ कर दिया.
सब हस्सी मज़ाक hi चल रहा था जब अचानक hi...
*रिंग* *रिंग*
वीर के फ़ोन की घंटी बजी.
'मिस सुहाना!!?'
वीर : Hello?
सुहाना : कहा हो तुम?
वीर : में अभी मॉल में था. क्यों क्या...
सुहाना : के फ़ास्ट!
वीर : हँ???
सुहाना : बैठे मत रहो वह, उठो और निकलो वह से जल्दी. के असप!!! मीट में ात माय ऑफिस. It's अर्जेंट!!!
वीर : O-Okay!!!
*कॉल एंड्स*
काव्य : क्या हुआ भैया?
वीर : मुझे निकलना होगा. इमरजेंसी है!! कारन! तुम इन्हे ड्राप कर देना. प्लीज!!! ी हैवे तो जो!
कारन : O-Okay बूत हे...!??
पर वीर ने कुछ नहीं सुना और वह वह से निकल गया.
वह जैसे hi सुहाना के केबिन में पहुचा तोह सुहाना अपना अंगूठा दांतो टेल दबाये किसी चिंता में विंडो के नज़दीक कड़ी हुई थी.
वीर : व्हाट हप्पेनेड?
सुहाना : दो यू रेमेम्बेर?
वीर : रेमेम्बेर व्हाट?
सुहाना : यही की मेने तुम पे 3 फवोर्स किये थे. यू हैवे तो पाय बैक राइट?
वीर : यस! ी रेमेम्बेर!
सुहाना : थें गेट रेडी...
[Ohh no~ Here it comes!!!!]
वीर : हँ???
सुहाना : यू एंड में!!!!! वे अरे गोइंग...
वीर : व्हाटट??? K-Kaha????
सुहाना कुछ देरर तक शांत रही. उसके बाद वह वीर की तरफ देखते हुए बोली,
सुहाना : लॉस वेगास!!!!
वीर : व्हाआआआततततत?????
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आज के लिए इतना hi गाइस!!
ये अपडेट काफी म्हणत से समय देके लिखा है. अराउंड 4.5क वर्ड्स का है. तोह लाइक्स ठोकने का और रेवोस देने का. आल्सो, इसके अगले अपडेट से बिगनिंग होएगी हाउस ऑफ़ थे किलर्स अर्च की. पर उसके पहले, में यहाँ अब एक ब्रेक लूंगा. :डी
स्टोरी में उपदटेस अराउंड 1 वीक तक बंद रहेंगे. :बिगबॉस: मेने काम से काम ब्रेक hi लिया है. फिर मिलते है नए अर्च में नए धमाके के साथ. धन्यवाद!!!
अब तक...
सुहाना (शिघ्स) : में तुमसे दो दिन में बात करती हु. ी हैवे तो थिंक. मेरा मंद काम करना बंद हो गया तुम्हारे कारण...
दिव्या : दो दिन केवल... ी don't हैवे मच टाइम सुहाना... ी कैन ओनली वेट फॉर 4 डेज ात मैक्स. पर दो दिन के अंदर मुझे तुम्हारा आंसर चाहिए hi चाहिए. No... यदि तुम नहीं आयी तोह में तुम्हे लेने आ जाउंगी.
सुहाना : ी... I'll थिंक!!!
दिव्या : यू हैवे तो के!!!!
*कॉल एंड्स*
और कॉल कट हो गया. सुहाना!!! गहरे चिंतन में डूब गयी.
इस नयी खबर ने... उससे पूरा दुविधा में दाल दिया था. समथिंग... मस्ट बे दोने!
अब आगे...
*Zzzzzzzzzzzzzzzzzzzz*
*Zzzzzzzzzzzzzzzzzzzz*
देरर रात में, कमरे में आती बस एक माध्यम सी नाईट बल्ब की रौशनी में, वीर नींद की वादियों में था. हर्र रात की तरह पारी स्लीप मोड में थी. और प्रत्येक रात्रि के जैसे hi उसके कमरे का दरवाज़ा आज भी खुला हुआ था.
तभी उसके कमरे में एक आहात हुई.
*छहममममम* *छहममममम*
आभूषणों की खनक हुई.
और उस हलके से उजाले में एक साया उमड़ के आया जिसके अगले शान hi...
*क्लिक*
वीर के रूम का दूर अंदर से लॉक हो गया. वीर अपने आस पास हो रही गतिविधियों से अनजान बस मस्त मौला होक सो रहा था. वो साया धीरे धीरे एक औरत के अकार में आकृति स्पष्ट होते हुए आगे बढ़ी और, वीर के बिस्तर पर उसके बगल से आ कर बैठ गयी.
एक कोमल सा स्पर्श वीर के गाल पर हुआ, नरम लाल होंठो की छुवन, उसके बालो पर एक हाथ थमा और उससे सहलाने लगा.
"आज नहीं तोह कल... में भी तुम्हारे दिल में एक स्थिर स्थान बना hi लुंगी. तुम देखना! तुम्हारी साड़ी नाराज़गी दूर कर दूंगी में, मेरे बच्चे...!!!"
जी हाँ, ये श्वेता hi थी. जो अक्सर वीर के कमरे में रात को उससे दुलार करने के लिए आ जाय करती थी. वीर के जागते हुए तोह वह उस से बात भी नहीं कर सकती थी, केवल यही उपाय था उसके पास वीर को क़रीब से निहारने का.
पर हो न हो, उस दिन के बाद से श्वेता का मैं बड़ा hi विचलित रहता था. वही दिन, जब वीर की नज़रे अनायास hi उसके स्तनों पर ठहर गयी थी. श्वेता आये दिन उस घटना को याद करती और खुद से सवाल जवाब करती. की आखिर क्यों वीर ने उसके थानों पर नज़रे गड़ाई थी?
बढ़ती उम्र में औरतो के प्रति आकर्षण तोह एक स्वाभाविक सी बात थी. लेकिन, जो सवाल उससे सबसे ज़्यादा सत्ता रहा था वो ये था की...
घर में इतनी औरतो में, वीर की निगाहें केवल उसके hi ूरोज़ो पर क्यों गयी?? वो भी एक नहीं, दो बार. जब वह किचन में थी तब भी तोह...!!! वीर ने उससे घूर के देखा था. पहली बार का तोह एक दुर्घटना मान सकते है पर दूसरी बार? वो जानती थी की दूसरी बार वह केवल एक संयोग नहीं था. वीर ने वाक़ई मर्ज़ी से उससे देखा था. और यही सोच सोच के श्वेता की रात की नींदें उड़ती जा रही थी. हर्र रात उसकी बेचैनी में गुज़र रही थी.
वो अभी भी वीर को निहारते हुए उसके बगल से लेत इसी सोच में डूबी हुई थी जब एक हिला देने वाला विचार उसके मैं से होते हुए गुज़रा. जिसके बारे में सोचते hi उसकी आँखें हैरानी के मारे फेल गयी. और उसका मुँह अचानक hi खुला का खुला रह गया. वो तेज़्ज़ आवाज़ में जोरर से हैरत भरी आह भरने hi वाली थी की उसने अपने दोनों हाथो से अपने खुले मुँह को धक् लिया. कही कोई जाग जाता तोह मुसीबत हो जाती.
थार ठहराते हाथो के कम्पन को थाम वह वीर को देखि और उसके नैनो से आसुओ की बूंदे छलक उठी.
'तोह क्या ये बात थी मेरे बच्चे? हाँ?'
आसुओ की एक धरा उसके गाल से होते हुए वीर के तकिये पर गिरने लगी. जैसे श्वेता को उसका जवाब मिल गया था. उस सवाल का जवाब जो उससे इतने दिनों से बेचैन कर रहा था.
"ओह्ह्ह्ह मेरा बच्छाए~~ !!!!"
और अगले hi पल उसने वीर के सर्र को थाम अपने उरोजों में दहस्सा लिया. निरंतर वह उसके चेहरे को चूमने लगी.
*छू~* *पूछ* *पूछह~* *मुआअह्ह्ह*
अपना पूरा प्यार बरसाने लगी.
"में ये बात कैसे भूल गयी??? कैसे?????"
उसने और कस के वीर को अपने आग़ोश में भर लिया. वीर का चेहरा उसके ब्लाउज में क़ैद अधनंगे थानों पर टिका हुआ था. श्वेता भली भाति उस त्वचा से त्वचा के स्पर्श को महसूस कर पा रही थी.
"में कितनी बेवक़ूफ़ हु. है न? जो समझ hi न पायी थी अब तक. अनजान बनती रही. अज्ञानी एकदम. जबकि एक माँ होने के नाते मुझे पहले hi समझ जाना चाहिए था. फिर भी में..."
उसने वीर के चेहरे को अपने चेहरे के पास किया,
"में ये कैसे भूल गयी की जब तुम केवल एक साल के थे तब hi तुम्हारी असली माँ तुम्हे चोरर के चली गयी थी. नहीं!!! वह तुम्हारी असली माँ हो hi नहीं सकती. यदि वह तुम्हारी असली माँ होती तोह तुम्हे ऐसे अकेला चोरर के नहीं जाती. हरगिज़ नहीं! वह भी ऐसे परिवार में. उस दिन भी, काव्य की पार्टी में तुम्हारे पिता बृजेश मुझे मन रहे थे. पर अब में वापस नहीं जाने वाली. वह औरत कैसे तुम्हे इस हालत में चोरर के जा सकती है? मेने अपनी भूमि के लिए पूरी ज़िन्दगी गुज़ार दी. और फिर भी मुझे उसकी इतनी चिंता रहती है. तोह फिर वह औरत कैसे तुम्हे...!!?? हाँ! वो तुम्हारी माँ नहीं. में!!! में तुम्हारी माँ हु वीर. शायद भगवान् भी यही चाहते थे. तभी मुझे कोई बीटा न मिला. और फिर मुझे अब तुम मिले हो. और तभी शायद वह औरत तुमसे वंचित है. हाँ!! यही बात है."
"तुम देखना मेरे लाल. में तुम्हे इतना प्यार दूंगी, की कभी तुम्हे एक माँ की कमी अब से खेलने hi नहीं दूंगी. धेरर सारा, खूब सारा प्यार दूंगी अपने बच्चे को."
"में नादान ये समझ रही थी की तुम आकर्षण के चलते मेरे स्तनों को देख रहे थे. और हो भी सकता है की ये एक कारण रहा हो. पर... पर एक और कारण था, है न मेरे बच्चे? है न? में सही हु न? तुमने मात्र एक साल तक hi अपनी माँ का दूध पिया है. और इसलिए तुम मेरे स्तनों को देख रहे थे न? है न मेरे बेटे? में बेवक़ूफ़ अब तक ये समझ न पायी की मेरा बच्चा इसलिए मेरी छाती घूर रहा था. ऑफ़ कोर्स! तभी तोह तुमने मुझे देखा. न रागिनी को, न सुमन को, न आभा को, न उस सोनाली को. सिर्फ मुझे!!! क्युकी खून के रिश्ते से में तुम्हारी एक माँ न सही, पर एक स्टेपमॉम तोह हु hi न? और तुम्हारे अंदर का नन्हा बच्चा एक माँ के दुग्ध की मांग कर रहा था. जिसके लिए वो हमेशा से तड़पता आया है. और उसी के चलते तुम्हारी नज़रे अपने आप hi मेरी ऊपर चली गयी, है न?"
"यही बात है न वीर??? हाईए~ में एक अभागन. काश में उस समय मौजूद होती. तुम्हे अपने दूध से स्तनपान करवा पाती. मेरा बच्चाअ~!!!"
*मुऊआआह्ह्ह्ह*
"जी भर के में अपने बच्चे को दूध की तृप्ति करवा पाती. इस से बड़ा सुख मेरे लिए और क्या हो सकता था?"
वो ग़म में सोच सोच कर वीर को चूमती रही. जब इस बार अनायास hi उसके मस्तिष्क में एक भूचाल फैला देने वाला विचार आया. वह संन्न सी होक रह गयी, एकदम स्थिर.
उसका एक हाथ कांपते हुए अपने आप hi वीर के सर्र के पीछे गया. और दूसरा उसके लाल रंग के ब्लाउज पे. आहिस्ता से उसका ब्लाउज उसके हाथ से नीचे सरका और एक सफ़ेद ब्रा का कप उभर के सामने आया जिसमे उसके एक विशाल दुग्ध की थैली क़ैद थी. उसका सीना तेज़्ज़ सासो के चलते ज़र्रों से ऊपर नीचे हो रहा था. वीर के सर्र पर मौजूद हाथ से उसने वीर को धकेल के अपने स्तनों की ऑर्डर किया और...
जैसे hi वीर के चेहरा उसकी ब्रा में बंद उसके दूध से टकराया, श्वेता के अंतर मैं में से एक तेज़्ज़ आवाज़ आयी,
श्वेता!!!!! ये तुम क्या कर रही हो?????
"अह्ह्ह्हह!!???"
और उसने झटके से वीर को अपने स्तन से अलग कर दिया. वो घबराती हुई एकदम से वह से उठी और अपनी हालत को सही करने में लग गयी. पूरी पसीने से भीग चुकी थी वह.
'हे भगवान्!!! ये में क्या करने जा रही थी??? मेरा वीर अब कोई बच्चा नहीं है. वह बड़ा हो चूका है. ये में क्या करने वाली थी? वीर को अपना स्तनपान करवाने का समय बीत चूका है. में उस समय में मौजूद नहीं थी. ओह्ह्ह्ह nooooooooooo~ ये में सच में... क्या करने जा रही थी? जैसे वीर के अंदर का बच्चा दुग्ध की तलाश में था, कही मेरे अंदर का बच्चा भी... उससे स्तनपान करवाने की तलाश में तोह नहीं? नहीं!! ये अब मुमकिन नहीं.'
एक आह भरते हुए वह उठी और जाने से पहले एक बार फिर वीर को देखि. उसका हाथ अपने आप hi उसके एक दूध पर चला गया. और उसने हौले से उससे मसल दिया,
"अब तोह इनमे दूध भी नहीं. में भी न... क्या क्या सोचने लगी थी."
एक अंतिम बार वीर के सर्र पर हाथ फेरर और उससे चूमते हुए वह वह से निकल गयी.
***
सुबह हुई. रोज़ की तरह आलम आज भी वही था. डाइनिंग टेबल पर सभी मौजूद थे, वीर और सोनाली आपस में फ़ूड ट्रक के विषय में बात चीत कर रहे थे. तोह वही आभा और भूमिका खाने में लगी हुई थी, और बाकी तीनो महिलाये अंदर किचन में व्यस्त थी.
सोनाली : तोह इतनी थी पिछले दो हफ्तों की कमाई. कुल मिलाके सब अच्छा hi चल रहा है.
वीर : हम्म! तुम अभी ऐसे hi चलने दो. बाकी जो ट्रक्स है उनके वर्कर्स को भी इन्फॉर्म करना की अभी हमे लगन के साथ केवल क्वालिटी और फेम पर hi फोकस करना है कुछ हफ्ते.
सोनाली : ठीक है! फिर उसके बाद?
वीर : उसके बाद में तुम्हे नयी डिश दूंगा. ऐसी जो कही भी नहीं मिलेगी. वो हमारी सिग्नेचर डिश रहेगी.
सोनाली : क्याआ??? तुम्हे आती है? कैसे सीखी तुमने? एक मिनट!! इसका क्या मतलब की ये डिश कही भी नहीं मिलेगी?
वीर : हाहाहाहा! तुम बस आम खाओ, गुठलिया मत गिनो.
सोनाली (खुसपुसाते हुए) : इतनी hi चिंता है ट्रक की तोह खुद क्यों नहीं चलाते?
वीर (स्माइल्स) : कुछ कहा तुमने?
सोनाली : K-Kuch नहीं!!
वीर ने शरारती ढंग से उससे देखा जैसे बताना चाह रहा था की उसने सब सुन्न लिया है. और सोनाली ये जानते hi मुँह फुला के नीचे सर्र झुका के खाने में लग गयी.
वीर की निगाहें फिर अपने दायी ऑर्डर गयी जहा आभा बैठी हुई थी. पर, वह कुछ उदास सी लग रही थी.
वीर : क्या हुआ?
आभा : ....
वीर : आभा???
आभा (हिचकते हुए): H-Huh????
वीर : क्या हुआ? कुछ बात है क्या?
आभा : N-Nahi!! कुछ भी तोह नहीं!
वीर : झूठ मत बोलो, में जानता हु कुछ बात है. कहो!!! मुझसे कहो!!
आभा एक शान के लिए उससे देखि पर फिर अपने आस पास भूमिका और सोनाली को देख वह चुप रह गयी. वीर ने उसकी परेशानी समझते hi खुद को उसकी ऑर्डर झुकाया और अपने कान को उसके मुँह की ऑर्डर लाते हुए वह ठहर गया. इशारा समझते हुए वो वीर के कान की ऑर्डर झुकी और बोली,
आभा : बात ऐसी hi है वीर जी! कुछ ख़ास नहीं!
वीर : वो में डीडे करूँगा की बात फ़ालतू है या नहीं. तुम मुझे सच सच बताओ सब. क्या बात है?
और फिर दोनों hi एकदम धीमी आवाज़ में एक दूसरे से बात करने लगे,
आभा : दरअसल...
वीर : कहो!
आभा : मुझे ऐसा लगता है की में... में किसी काम की नहीं.
वीर : हँ???
भूमिका : हम्म? क्या बातें हो रही है? आपस में?
सोनाली : !!!!???
वीर : वह... हमारे बीच की बात है, it's ा बिट पर्सनल.
भूमिका : ओह्ह्ह! O-Okay!!
वीर (आभा से) : कहो अब!!
आभा (खुसपुसाते हुए) : माँ जी ंसस की सदस्य बन्न गयी है. बोल चाल में कितनी आगे है वह. सोनाली आपका बिज़नेस अच्छी तरह संभाल रही है. आपकी तै जी और दीदी कितनी बड़ी होटल को संभालती है. रागिनी जी, घर का पूरा ध्यान रखती है. और वह कितनी क़ाबिल है ये हमे बताने की ज़रुरत नहीं. पर में... केवल में hi... मुझसे अच्छा खाना यहाँ सभी बना लेती है... वो जो करती है, वह में कर hi नहीं सकती. और इसलिए, में जानती हु की... M-Mein... में किसी काम की नहीं.
आभा की बात सुन्न वीर को एक नयी जानकारी मिली. वो इस बात से कैसे अनजान रह गया.
[Inferior Complex Masterrr~]
'T-That's...!!!'
[Maaasteerrrr~ Aabha sahi hai. Potentially dekha jaaye toh woh kuch nahi kar rahi hai. Aise me uske andar ye bhavnaaye aaengi hi.]
'हम्म~ के तो थिंक ऑफ़ आईटी. मेने जब आभा को पहली बार चेक किया था तोह... क्या देखा था? उससे घूमने फिररने का शौक है न?'
[Yes!! Master! System me stored information me yahi baat hai.]
'हम्म~'
वीर : तुम चिंता मत करो! तुम्हारी ये परेशानी जल्द hi दूर हो जाएगी. मेरा वादा है ये. और अब इस तरह से सोचना बंद कर दो. ठीक है?
आभा : H-Hmm!
आभा वीर की सांत्वना लेते हुए शांत हो गयी. लेकिन, बात तोह सच थी. वीर को इस मस्ले पर भी ध्यान देना होगा आगे चल के.
वह सभी भी बैठे hi थी की इतने में अनादर से साड़ी महिलाये निकल के बाहर आ गयी. सुमन मुस्कुराती हुई आयी और उसने वीर की प्लेट में एक और ब्रेड रोल रख दिया,
वीर : अरे मेरा हो गया है आलरेडी.
सुमन : *स्माइल्स*
वो बस स्माइल पास करते हुए उसके पानी के गिलास में पानी भरी और उसके सामने भूमिका के बगल से बैठ गयी.
वही रागिनी भी आयी और टेबल की मैं चेयर पर बैठ वह अपनी और सुमन और श्वेता की प्लेट लगाने लगी. श्वेता रागिनी के सामने वाली दूसरे चोरर पर मौजूद चेयर पर बैठ गयी. तोह ख़ामोशी को तोड़ते हुए भूमिका ने बात शुरू की,
भूमिका : माँ~ कल भी आप होटल से जल्दी लौट आयी. क्या बात है?
श्वेता (वीर को देखते हुए) : मेने कुछ डीडे किया है बीटा.
भूमिका : क्या माँ??
वीर को चोरर के सभी की नज़रे श्वेता के ऊपर थी, तोह वही बेचारी श्वेता वीर को सभी की नज़रो से बच के चोरी चोरी देख रही थी.
श्वेता : यही की में होटल की देख रेख अब चोरर रही हु.
भूमिका : वहहहहाआटटट????
और इस बार न केवल वह सभी, बल्कि वीर का मुँह भी ब्रेड रोल को चबाते चबाते ृक्क गया.
भूमिका : K-Kya मतलब है आपका?
श्वेता : वही जो तुमने सुना बीटा.
भूमिका : नाहीईईई!!! पर ये अचानक से आप..!!
श्वेता (वीर को देखते हुए) : मेरी कुछ और भी ज़िम्मेदारी है, जिससे में हमेशा से nazar-andaaz करती आयी हु. और इसलिए, अब में पूरा का पूरा ध्यान उस पर देना चाहती हु.
वह मौजूद सभी शोहियार थे. श्वेता ने ये बात किस्से देख के किसके लिए कही थी वह सभी समझ चुके थे. और वो खामोश hi रहे. केवल वीर hi था जो सर्र झुकाये खाने में लगा हुआ था.
भूमिका : ी... ी अंडरस्टैंड माँ!!
श्वेता : हम्म~
और कुछ इस तरह उनका आज का ब्रेकफास्ट हुआ.
जब वीर कार निकालते हुए कही जाने के लिए बाहर पोर्च में आया तोह रागिनी तेज़्ज़ क़दमों के साथ बाहर आके दरवाज़े की देहलीज़ पर कड़ी हो गयी.
रागिनी : आज किधर जा रहे हो?
वीर : वही! काम से थोड़ा.
रागिनी : ऐसा क्या काम रहता है वीर तुम्हारा...!!?
वो टिक कर खड़े होते हुए पूछी,
वीर : ज़रूरी काम है भाभी आज. बिज़नेस से रिलेटेड hi है.
रागिनी : मुझसे भी ज़रूरी...!?
वीर, जो कार का दूर खोलने hi जा रहा था वह ासाहनक रागिनी के इस तरह के सवाल पर पीछे मुद उससे हैरत में देखने लगा,
वीर : ी...
रागिनी (स्माइल्स) : कब तक आओगे??
वीर : जल्दी आने की कोशिश करूँगा.
रागिनी मुस्कान भरे उसके नज़दीक आयी और...
*छू~*
उसके गाल पर हर्र रोज़ की तरह वही एक मीठी प्यारी सी किश उससे देदी. और उसके बाद उसने अपना गाल आगे कर दिया. वो मखमली त्वचा, वो गोरा गोरा गाल और वो हलके पसीने से भीगे किचन में काम करने की वजह से उसकी कलम के आस पास चिपके हुए बाल.
वीर ने एक मौका नहीं गवाया और उसने रागिनी के गाल को अपने होंठो से चूम लिया.
उसकी शर्ट की कल्लोर व्यवस्थित कर रागिनी ने उससे रवाना किया, और वीर कार को रिवर्स लेने लगा. तब रिवर्स लेते टाइम hi उसकी नज़रे ऊपर टेरेस पर चली गयी जहा सुमन कड़ी हुई थी. हाथो में उसके छत पर सुखाने के लिए कपडे थे, और वो अजीब सी मुस्कान होंठो पर सजाये वीर को देख रही थी. रागिनी के घर की टेरेस ऐसी थी की वह से पोर्च, पार्किंग एरिया पूरा नज़र आता था.
'फूऊककककक!!! ओह्ह थैंक गॉड!! सुमन है....'
पल भर के लिए वीर की गांड hi फट गयी थी. यदि और कोई होता तोह न जाने क्या होता.
*Vrrrrooooooooooommmmm*
और वह वह से राहत की एक सांस लेते हुए रवाना हो गया.
***
वत्सला स्टील इंडस्ट्रीज
इवनिंग ~ 4:38 पं
वीर मौजूद था इस वक़्त इस बड़ी कंपनी की मैं ब्रांच के बाहर. वह अकेला नहीं था, साथ में कारन भी था उसके.
कारन : सब हो गया. पर मेरी समझ में नहीं आया वीर. मेने तुम्हे बाकी 2 कम्पनीज के भी शेयर्स के ऑफर्स दिलवाये. वह तोह इस से भी बड़ी थी. फिर तुमने ये क्यों चुनी? लुक! मेरे पास रिपोर्ट भी तैयार है वीर. वत्सला स्टील इंडस्ट्रीज पिछले कई महीनो से लोस्स में चल रही है. ऐसे में अपना पैसा इसके शेयर्स में लगाना... उम्... और ये एक छोटी कंपनी है यदि हम बाकी दो कम्पनीज से कपड़े करे तोह...
वीर (स्माइल्स) : तुम्हे पता लग जाएगा जल्द hi की क्यों मेने वत्सला पर इन्वेस्ट किया.
कारन : हँ???
ऑफ़ कोर्स!! कारन नहीं जानता था, की वीर के पास क्या था.
स्टॉक मास्टर!!!
वह स्किल जो उसने पहली बार उसे की थी. भले hi उसमे 100% सक्सेस रेट नहीं था. पर काम से काम 70% तोह था. और इसलिए वीर ने 3 बड़ी कम्पनीज में से सबसे छोटी वाली को अपना पहला टारगेट चुना. यदि लोस्स भी होये तोह उतना नहीं.
कारन : वेल! अन्य्वयस! अह्ह्ह! दिन भर की भाग दौड़ में थकान हो गयी. हाउ अबाउट सम कॉफ़ी?
वीर (स्माइल्स) : में चाय वाला बाँदा हु...
कारन (स्माइल्स) : यू क्नोव कॉफ़ी इस बेटर थान चाय...
वीर : अब इस बेहेस पे में रात भर बोल सकता हु.
कारन : हाहाहाहाहा~ Lets's जो!!
वह दोनों कार में बैठे hi थे की वीर का फ़ोन बज उठा.
*रिंग* *रिंग*
कॉलर काव्य थी,
वीर : Hello? बोल काव्य!
काव्य : भैयाआआ~ आप कहा हो???
वीर : उम्... में थोड़ा अभी...
काव्य : में, आरोही दी और कृतिका सिटी मॉल में है अपने. ी क्नोव आप कही बाहर hi होंगे, तोह आप यहाँ आ रहे हो. Okay? Bye bye!!!! मुआअह्ह्ह्ह~
वीर : Wh-Whaaaattttttt???
*कॉल एंड्स*
और एक झटके में काव्य ने अपनी बात बोल फ़ोन कट कर दिया.
वीर : ये लड़की भी न...
कारन : क्या हुआ?
वीर : कॉफ़ी नहीं पीना? चलो सिटी मॉल लगा लो गाडी.
कारन : व्हाटटटटटट? वीर माना की में रिच फॅमिली से बिलोंग करता हु पर इसका मतलब ये नहीं की में मॉल में कॉफ़ी पीयूंगा. तुम्हे इतना सब करने की ज़रुरत नहीं...
वीर : यू इडियट!!
कारन : H-Huh???
वीर : काव्य का फ़ोन था. उसने कहा है की वह, आरोही दी, और उसकी फ्रेंड कृतिका वह पर है तोह उसने मुझे बुलाया है. तोह चलो अब, जो भी पीना है अब भी वही पिएंगे.
कारन : ओह्ह्ह!!! ी सी!!! राइट!! मुझे याद आया, में काव्य की b'day पार्टी पर नहीं आ पाया था. उस से सॉरी कहना प्लीज. में बाहर था.
वीर : चल तोह रहे है अभी, तुम खुद hi कहना ये उस से.
कारन : अरे यार! उससे मनाना बोहत मुश्किल है.
वीर : तोह ऐसे काम hi क्यों करते हो?
कारन : ुघठ!!! फाइन! फाइन! I'll तरय तो कन्विंस हेर.
वीर : वैसे... मिस करा क्या लौट आयी?
कारन : हँ?? तुम तोह ऐसे पूछ रहे हो जैसे तुम से ज़्यादा बात मेरी उनसे होती है.
वीर : No रियली, पिछले पास्ट के 3-4 दिनों से मुझे उनका कोई भी मैसेज नहीं आया है.
कारन : ओह्ह्ह्ह! वेल! येह! वो बिजी थी. आज रात को आएंगी वह वापस.
वीर : ी सी! एंड व्हाट अबाउट मिस सोनिआ?
कारन : हँ? व्हाट? हाउ वोउल्ड ी क्नोव अबाउट हेर? तुम्हे उनकी बड़ी बहिन से पूछना चाहिए.
वीर : मिस सुहाना?
सुहाना के बारे में सोचते hi वीर को सुहाना की टेडी बेयर को जोरर जोरर से मार कर हैवानो वाली वह हस्सी की छवि याद आ गयी.
वीर : No! एहम! ी थिंक डायरेक्टली पूछना hi सही रहेगा.
कारन : हम्म~ वैसे... तुमने क्या बताया? कृतिका भी है वह मॉल में?
वीर : हम्म? येह!!!
कारन : ओह्ह्ह! एहम... तोह हमे उन्हें ज़्यादा देरर वेट नहीं करवाना चाहिए. निकलना चाहिए.
वीर : हम्म??
वीर ने अपनी नज़र पैनी कर कारन को देखा जो अपना चेहरा छुपाने की कोशिश कर रहा था.
'ओह्ह्ह्हह ी सी~'
[Yesssss Maaasssttteerrr! Something fishy is going on. Ehehehe~ I can smell it. Something is cooking around here. Hehe~]
'बिलकुल पारी! ी एग्री हाहाहाहा~ :लाफ: '
[Wahahahahahahahaha~ :evillaugh: ]
कारन : Wh-What??? मन यू लुक स्केरी... व्हाट हप्पेनेड!!?
वीर : नथिंग!!!
और कारन ने वीर की अजीब सी मुस्कान को इग्नोर कर गाडी आगे बढ़ा दी.
***
सिटी मॉल
इवनिंग ~ 5:12 पं
वीर और कारन जब साथ में पहुचे तोह मॉल में जिधर से भी वो गुज़रते, लड़कियों की नज़रे उन् दोनों पर जाती. वीर पहले से कई गुना हैंडसम जो था. 100 का अपीयरेंस था उसके पास. वही कारन, जो अमीर खानदान में पल बढ़ के पैदा हुआ. जन्म से hi रॉयल्टी का और था उसके इर्द गिर्द. बिलकुल अपनी बहिन की तरह. हलाकि, करा में ये सब गुण कुछ ज़्यादा hi कूट कूट कर भरे थे पर लुक्स और एटिकेट्स में वह भी बोहत आगे था.
काव्य को फिरसे फ़ोन कर पता चला की साड़ी लड़किया लोग ऊपर फ़ूड जोन में बैठी हुई थी.
और जैसे hi वीर और कारन को उन् तीनो ने आते हुए देखा तोह अपनी चेयर्स से वह तीनो hi हाथ दिखा के उन्हें बुलाने लगी.
काव्य तोह सीधे उठी और दौड़ते हुए वो वीर की तरफ आयी. वीर ने अपने आप को अटैक के लिए प्रेपर कर लिया था.
वह हवा के झोके की तरह तेज़्ज़ रफ़्तार में आयी और जोरर से कूदते हुए वीर की छथि में घुस गयी.
काव्य : भैयाआआ~~~
एक बार फिर, उसके आम वीर की छथि पर अपना उभरा उभरा एहसास चोरर गए.
आस पास के सभी लोग उन्हें इस तरह घूर के देख रहे थे, पर आखिर काव्य को अपने भैया के प्रति प्यार दिखाने में कहा शर्म आने वाली थी? उस दिन पार्क में भी नहीं आयी थी. और आज भी नहीं.
काव्य : आ गए आप इहेहे~
वीर : हम्म! यहाँ देखो कौन आया है.
कारन : अहःअहः~ हे काव्य! Hello~ कैसी हो?
काव्य : हम्फ~ भैया ये कौन है?
कारन (मैं में) : फुकककक!!
वीर : ये वही भैया है जो तुम्हारे b'day में नहीं आये थे.
काव्य : हाँ तोह इनसे कह दो की यहाँ आने की अब कोई ज़रुरत नहीं है.
कारन : अरे बहिन!! क्यों टांग खींच रही है? I'm सॉरी न!!!
काव्य : हम्फ~ Let's जो भैया!
कारन समझ चूका था की काव्य को मनाने के लिए उससे और म्हणत की ज़रुरत थी.
और यहाँ से निकला, वह तीनो अपनी टेबल पर आके बैठे.
वीर (स्माइल्स) : हे डीई~
आरोही (स्माइल्स) : हैययय~
कृतिका : अहह!! H-Hello~~
वीर : Hi तेरे!
कारन : H-Hello कृतिका!
वीर आरोही के बगल से बैठ गया तोह वही काव्य वीर के बगल से. कृतिका जो उसके सामने बैठी थी उसके बगल से कारन विराजमान हो गया.
कारन : Hello दी~
आरोही : Hello~
काव्य : दी! आप गंदे लोगो से बात मत करो.
कारन : ुघठ!
काव्य की बात पर सभी हस्सन लगे. कृतिका भी. फिर जब उसने बगल में कारन का मुरझाया हुआ मुँह देखा तोह वह उसके कान में झुकते हुए बोली,
कृतिका : यू विल हैवे तो गिव हेर ा गिफ्ट!
कारन : अह्ह्ह्ह!!!
कृतिका : यस!
कारन (खुसपुसाते हुए) : तुम्हे पता है? विल यू हेल्प में?
कृतिका : उम्... Okay!!! सूरे!!!
कारन वह से जब बहाना बना के उठा तोह वही कृतिका भी वाशरूम के बहाने उठ गयी और दोनों hi वही मॉल में काव्य के लिए गिफ्ट ढूंढने लगे. और इधर वीर मैं hi मैं कारन को शाबाशी दे रहा था.
'लौंडा तोह तेज़्ज़ निकला. क्या बात है!!'
तभी...
काव्य : भैयाआ~ आपको पता है? हेहेहे~
वीर : हम्म???
काव्य : आरोही दी... लुक ात हेर!!
कहते हुए उसने आरोही के पीछे जा कर अचानक hi उसके बालो को पीछे कर दिया, जिस कारण से उसके कान जो पहले ढके हुए थे वह नज़र आ गए. और उन् कानो में...
वीर की दी हुई बालिया थी.
वीर : !!!???
काव्य : दी पे कितनी जांच रही है न? लुक! मेने पेंडंट भी पहना है आपका.
वीर : ओह्ह्ह्हह~
काव्य : और आपको पता है? दी ने बचपन से अपने कान नहीं छिदवाये थे. शी हॉटेड पिएर्सिंग्स. डर था बचपन का उनको हाहाहा~ एंड यू क्नोव... आप की बाली के लिए शी इवन... मंमपप्पह्ह्हह्ह~~???
आरोही ने पीछे पलट के अगले hi पल काव्य का मुँह अपने हाथो से बंद कर दिया. उसके गाल गुलाबी थे...
आरोही (ब्लशेस) : Y-You.... काव्य... तुमने क्यों...!!??
वीर (स्माइल्स) : आईटी रियली लुक्स गुड ों यू.
आरोही : अह्ह्ह्ह!~
काव्य : मंपहहह~ हहहह!! देखा? मेने कहा था न हाहाहा~
बेचारी आरोही शर्म के मारे अपना मुँह फेरर ली. कुछ hi देरर में कारन और कृतिका भी लौट आये और जब कारन ने काव्य को गिफ्ट दिया तोह होना क्या था? अपना हैरी पॉटर का पूरा सेट देखते hi काव्य ने एक पल में कारन को माफ़ कर दिया.
सब हस्सी मज़ाक hi चल रहा था जब अचानक hi...
*रिंग* *रिंग*
वीर के फ़ोन की घंटी बजी.
'मिस सुहाना!!?'
वीर : Hello?
सुहाना : कहा हो तुम?
वीर : में अभी मॉल में था. क्यों क्या...
सुहाना : के फ़ास्ट!
वीर : हँ???
सुहाना : बैठे मत रहो वह, उठो और निकलो वह से जल्दी. के असप!!! मीट में ात माय ऑफिस. It's अर्जेंट!!!
वीर : O-Okay!!!
*कॉल एंड्स*
काव्य : क्या हुआ भैया?
वीर : मुझे निकलना होगा. इमरजेंसी है!! कारन! तुम इन्हे ड्राप कर देना. प्लीज!!! ी हैवे तो जो!
कारन : O-Okay बूत हे...!??
पर वीर ने कुछ नहीं सुना और वह वह से निकल गया.
वह जैसे hi सुहाना के केबिन में पहुचा तोह सुहाना अपना अंगूठा दांतो टेल दबाये किसी चिंता में विंडो के नज़दीक कड़ी हुई थी.
वीर : व्हाट हप्पेनेड?
सुहाना : दो यू रेमेम्बेर?
वीर : रेमेम्बेर व्हाट?
सुहाना : यही की मेने तुम पे 3 फवोर्स किये थे. यू हैवे तो पाय बैक राइट?
वीर : यस! ी रेमेम्बेर!
सुहाना : थें गेट रेडी...
[Ohh no~ Here it comes!!!!]
वीर : हँ???
सुहाना : यू एंड में!!!!! वे अरे गोइंग...
वीर : व्हाटट??? K-Kaha????
सुहाना कुछ देरर तक शांत रही. उसके बाद वह वीर की तरफ देखते हुए बोली,
सुहाना : लॉस वेगास!!!!
वीर : व्हाआआआततततत?????
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आज के लिए इतना hi गाइस!!
ये अपडेट काफी म्हणत से समय देके लिखा है. अराउंड 4.5क वर्ड्स का है. तोह लाइक्स ठोकने का और रेवोस देने का. आल्सो, इसके अगले अपडेट से बिगनिंग होएगी हाउस ऑफ़ थे किलर्स अर्च की. पर उसके पहले, में यहाँ अब एक ब्रेक लूंगा. :डी
स्टोरी में उपदटेस अराउंड 1 वीक तक बंद रहेंगे. :बिगबॉस: मेने काम से काम ब्रेक hi लिया है. फिर मिलते है नए अर्च में नए धमाके के साथ. धन्यवाद!!!


































