Incest Baadshah ~ The Tales of Debauchery - SexBaba
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Incest Baadshah ~ The Tales of Debauchery

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सभी को सबसे पहले Hello! :hi:

ये मेरी इस फोरम पर दूसरी कहानी होगी. पहली कहानी [Akhir kyu?From hatred to love] को आप सभी ने इतना सराहा और प्यार दिया की मुझे दूसरी कहानी लिखने पर मजबूर कर दिया.

बी थे वे मेरी पहली कहानी पढ़ी या नहीं? नहीं पढ़ी तोह जाओ यार पहले उसको पढ़ो. फिर, ये नयी कहानी में डुबकी लगाना.


ये कहानी एकदम hi हट के होने वाली है. ऐसी कहानी आपने नहीं पढ़ी होगी. कहानी सुब गेंरे - 'सिस्टम' पर आधारित है. जिन्होंने चिनेसे और जापानीज नोवेल्स पढ़ी है इस सुब गेंरे की उन्हें पता होगा. पर जिन्होंने नहीं पढ़ी है उनके लिए ये एकदम नई होने वाली है. इसलिए, मैंने सोचा क्यों न इस सुब गेंरे को यहाँ फोरम पर इंट्रोडस किया जाए. सो, येह I'm थे फर्स्ट ओने तो ब्रिंग थिस गेंरे ईंटो थे फोरम. थैंक में लेटर. :thank_you:

अब कुछ के पॉइंट्स ध्यान में ज़रूर रखियेगा कहानी को पढ़ने से पहले क्युकी बाद में कमेंट सेक्शन में अपुन को कोई बकचोदी नहीं चाहिए. :नोनो:

1. स्टोरी का प्रीफिक्स वैसे तोह में फंतासी रखने वाला था पर क्युकी इसमें इन्सेस्ट भी है काफी मात्रा में तोह मैंने इन्सेस्ट रख दिया.

2. स्टोरी 'हरम' बेस्ड है.

3. स्टोरी बेस्ड तोह रियल वर्ल्ड में hi है पर कुछ लॉजिक्स अप्लाई नहीं होंगे.

4. ये कहानी काल्पनिक है. इसमें चर्चित सभी पात्र केवल मेरी कल्पनाओ का हिस्सा है. अगर कोई नाम, व्यवसाय, या कुछ और असल ज़िन्दगी में किसी से मेल खाता है तोह ये केवल एक संयोग होगा. इसे किसी गलत नज़रिये सा न लिए जाए.

बस इन् 4 पॉइंट्स को ध्यान में रखियेगा. इंट्रो छोटा सा hi दूंगा, में चाहता हु रीडर्स खुद hi कहानी पढ़ के चरक्टेर्स के बारे में जाने ताकि आप पात्रो से और अच्छे से फेमिलिअर हो सके. इसलिए, ज़्यादा बड़ा इंट्रो नहीं दूंगा.

धन्यवाद! :तुम्बुप:
 
आर्क्स

सिस्टम एक्टिवेशन अर्च

अपडेट 1 - अपडेट 9

[Completed]

आतिश अर्च

अपडेट 10 - अपडेट 39

[Completed]

स्लोगन अर्च

अपडेट 40 - अपडेट 76

[Completed]

फेमिग्लिआ अर्च

अपडेट 77 - अपडेट 94, कोंटड.

[Ongoing]

हाउस ऑफ़ थे किलर्स अर्च

अपडेट 95 - अपडेट 109

[Completed]

विलेज अर्च

अपडेट 110 - अपडेट 129

[Completed]

क्रिमसन अर्च

अपडेट 130 - अपडेट 150

[Completed]

बिज़नेस अर्च

अपडेट 151 - अपडेट 167

[Completed]

चीनाटौन अर्च

अपडेट 168 - अपडेट 179

[Completed]

Disembowler's अर्च

अपडेट 180 - अपडेट ???

[Ongoing]

समिट अर्च

अपडेट ??? - अपडेट ???

[Yet to come]

रिफ्त्बोर्न अर्च

फिनाले अर्च

अपडेट ??? - अपडेट ???

[Yet to come]

फुल स्टेटस

वीर ~



स्पोइलर

फुल स्टेटस :









कार्ड्स :

























रेशु ~


स्पोइलर

फुल स्टेटस :










कार्ड्स :











एरिका ~


स्पोइलर

फुल स्टेटस :









कार्ड्स :





अवा ~


स्पोइलर

फुल स्टेटस :










कार्ड्स :















गरोफानो ~



स्पोइलर

फुल स्टेटस :









कार्ड्स :








 
फुल चरक्टेर्स गाइड

[Note : Don't read this if you haven't read the story till the latest update.]


स्पोइलर

मनोरथ : वीर के दादा जी.

बृजेश : मनोरथ का बड़ा बीटा. वीर के डैड.

करुणेश : मनोरथ का छोटा बीटा. वीर के चाचा.

भावना : बृजेश की पहली पत्नी. वीर की सगी माँ.

श्वेता : बृजेश की दूसरी पत्नी. वीर की सौतेली माँ.

सुमित्रा : करुणेश की पत्नी. वीर की चची.

तेजल : बृजेश और भावना की पहली बेटी. वीर की सगी बड़ी बहिन.

वीर : बृजेश और भावना का एकलौता बीटा.

भूमिका : श्वेता के पहले पति से हुई एकलौती बेटी. वीर की step-sister.

विवेक : करुणेश और सुमित्रा का बड़ा बीटा. वीर का कजिन.

प्रांजल : करुणेश और सुमित्रा का दूसरा बीटा. वीर का कजिन.

आरोही : करुणेश और सुमित्रा की पहली बड़ी बेटी. वीर की कजिन.

काव्य : करुणेश और सुमित्रा की सबसे छोटी बेटी. वीर की
कजिन.

बृंदा (देकैसेड) : वीर की दादी जी. मनोरथ की पत्नी.


रागिनी : विवेक की पत्नी. डिवोर्सी. वीर की भाभी.

दिनेश : रागिनी के पिता.

रोहिणी : रागिनी की माँ.

बड़ा भाई अथवा भाभी : लिव्स अब्रॉड.


नईदही मिश्रा : वीर के कॉलेज की क्लास टीचर और एक मैथ्स टीचर. डिवोर्सी.

रजत : निधि का पति. डिवोर्सी.

छाया : रजत की माँ. निधि की सासु माँ.

जूही : निधि और रजत की एकलौती बेटी.

ध्रुव : निधि और रजत का एकलौता बीटा.

श्रेया : निधि की सगी छोटी बहिन.

रमनदीप : निधि के पिता

हेमा : निधि की माँ.

दीप्ती : निधि की भाभी.

ईशान : निधि का बड़ा भाई. दीप्ती का पति.


सोनिआ : बिज़नेस वुमन. ओनर ऑफ़ इलीट मोटर्स. Veer's फ्रेंड.

सुहाना : सोनिआ की बड़ी बहिन. वीर की क्लोज फ्रेंड. ओनर एंड स्पांसर ऑफ़ सेवेरल बुसिनेस्सेस.

गौरव : सुहाना का पति. सीईओ ऑफ़ ग्लोबेरेस.

शैलेन्द्र : ओनर ऑफ़ इलीट मोटर्स. सोनिआ और सुहाना के पिता.

नमृता : सोनिआ और सुहाना की माँ.

छोटा भाई : ुन्नमड फॉर नाउ.

प्रकाश अंकल : शैलेन्द्र के बिज़नेस के एम्प्लोयी. सुहाना और सोनिआ के सेक्रेटरी.


सुचिका : इनफार्मेशन कलेक्टर. Sonia's पर्सनल एंड प्राइवेट सेक्रेटरी. रुचिका की बड़ी बहिन.

पुष्कर (देकैसेड) : Sonia's चाइल्डहुड फ्रेंड.

करा : बिज़नेस वुमन. Nexacom's ओनर. Veer's फ्रेंड.

कारन : करा का छोटा भाई. वीर का फ्रेंड.

किशोर : करा और कारन के पिता. Nexacom's ओनर.

अर्चना (देकैसेड) : करा और कारन की माँ.

माधव : किशोर के घर का बटलर.

रुचिका : Kaera's सेक्रेटरी. यंगर सिस्टर ऑफ़ सुचिका.

जूलिया : Kaera's पर्सनल रुस्सियन माइड.

रघु एंड जस्सी : Kaera's पर्सनल बोडीगार्ड्स.


मृणाल : कारन की एक फेमिलिअर डॉक्टर.

नतालया (अवा) मार्टिन : सेलिब्रिटी/ सिंगर. सोनिआ और करा की चाइल्डहुड फ्रेंड.

जयेश (देकैसेड) : नट के पिता.

ग्रेस मार्टिन (देकैसेड) : नट की माँ.

सुमन : Veer's फर्स्ट स्लेव.


आभा : सुमन के सौतेले बेटे की पत्नी. उसकी बहु. Veer's सेकंड स्लेव.

पुष्पेंद्र : सुमन का दूसरा पति.

अमित : आभा का पति. पुष्पेंद्र का पहली पत्नी से हुआ बीटा.

सोनाली : सुमन की पहले पति से हुई एकमात्र बेटी.


पूर्वी : वीर और तेजल की मुँह बोली मासी. भावना की मुँह बोली बहिन और बचपन की सहेली.

अरुण : पूर्वी का पति. सरकारी स्कूल के अध्यापक. वीर के मौसा जी.

आयुष : पूर्वी और अरुण का एकलौता लड़का.

नंदिनी : श्वेता और भूमिका की होटल की मैनेजर.

प्राची : फ़ूड ट्रक में काम करने वाली सोनाली की सहायक वर्कर.

लुइस : फैशन डिज़ाइनर फ्रॉम पेरिस, हिरद बी वीर.

विभोर : Bhumika's फेमिलिअर. ा ब्रांड लोगो क्रिएटर. ग्राफ़िक डिज़ाइनर.


श्याम : भावना एंड Veer/Tejal's सर्वेंट.

गौरी : Shyam's वाइफ.

जयदेव : श्याम के पिता.

अभिलाषा : गांव में मौजूद भावना और Veer/Tej की सर्वेंट.

धरम सिंह (देकैसेड) : भावना के पिता जी.

विजय सिंह (देकैसेड) : भावना का बड़ा भाई.

हरिकीर्तन सिंह (देकैसेड) : मनोरथ का कजिन भाई.

भानु प्रताप सिंह (देकैसेड) : हरिकीर्तन का बीटा.

धनञ्जय : भानु प्रताप का बीटा.

वंदना : धनञ्जय की माँ. भानु प्रताप सिंह की पत्नी.



अजय : Veer's फर्स्ट एनिमी इन थे कॉलेज.

सुषमा : Ajay's मदर.


प्रज्ञा : Ajay's क्रश.

गोलू (देकैसेड) : Veer's फर्स्ट फ्रेंड.

कृतिका : काव्य की कॉलेज की फ्रेंड. वीर की फ्रेंड. Karan's क्रश.


आतिश राणे (देकैसेड) : Veer's फर्स्ट नेमसिस

रंगा (देकैसेड) : आतिश' राइट हैंड मन.

जतिन : थीफ ऑफ़ Namrita's b'day रिंग.

पवन : भूमिका की होटल में काम करने वाला जतिन का साथी.

माधुरी : (मेट दूरिंग दिल्ली ट्रिप. वीर ोफ्रेड हिज कोट तो हेर.) Pranjal's क्रश. बचपन में वीर के घर खेलने आने वाली लड़की.

प्रभाकर (देकैसेड) : माधुरी के पिता.

ललिता : माधुरी की माँ.


स्लोगन (देकैसेड) : Veer's सेकंड नेमसिस. (अक संजीव मानकर)

स्वाति (देकैसेड) : स्लोगन की बेटी.

सुधा (देकैसेड) : स्लोगन की पत्नी.

गुरु जी (देकैसेड) : नकली भेष धारे हुए आम ठग.

रमन : गुरु जी का राइट हैंड मन.

स्टीव (देकैसेड) : स्लोगन का राइट हैंड मन.

डेक्सटर एंड मैथ्यू : असैसिन्स हिरद बी स्लोगन.

प्रिय : Slogan's बिज़नेस relative's डॉटर.



निहारिका : Veer's थर्ड स्लेव.

सारिका : महिला मंडल की एक सदस्य.

विकास : निहारिका का पति.

ऋत्विक : निहारिका का बीटा.

आयुषी : Niharika's फर्स्ट स्लेव.

इशानी : Niharika's सेकंड स्लेव.



दिव्या : सुहाना की बचपन की दोस्त. वीर की फ्रेंड. ा डिटेक्टिव फ्रॉम लॉस वेगास. फब्कक स्पेशल एजेंट.

इक : Divya's हस्बैंड. आल्सो ा डिटेक्टिव.

अशिता : सुहाना की पर्सनल साइकोलोजिस्ट.

माइक : Veer's फ्रेंड इन इन्वेस्टीगेशन डिपार्टमेंट.

नोलन : इन्वेस्टीगेशन डिपार्टमेंट के हेड. वीर से परिचित.

जिम थे स्लिपरी : फर्स्ट क्रिमिनल ऑफ़ होक.

निघतवलकेर : सेकंड क्रिमिनल ऑफ़ होक.

एमा : निघतवलकेर के मेन्शन में वीर के साथ की सर्वाइवर. वीर से परिचित.

जोए : निघतवलकेर के मेन्शन की एक और सर्वाइवर. वीर से परिचित.

डेनियल (देकैसेड): फर्स्ट विक्टिम ऑफ़ होक गैंग.

कोन्नोर (देकैसेड) : फर्स्ट विक्टिम ऑफ़ निघतवलकेर.

जैकब (देकैसेड) : सेकंड विक्टिम ऑफ़ निघतवलकेर.

रोने (देकैसेड) : थर्ड विक्टिम ऑफ़ निघतवलकेर.

चेस्टर (देकैसेड) : फोर्थ विक्टिम ऑफ़ निघतवलकेर.

पिचर (देकैसेड) : थर्ड क्रिमिनल ऑफ़ होक.

शेर्लोट (देकैसेड) : सेलिब्रिटी सिंगर. Natalia's फ्रेंड. विक्टिम ऑफ़ पिचर.

फ्रेड (देकैसेड) : Divya's फेमिलिअर इनफार्मेशन फाइंडर. विक्टिम ऑफ़ पिचर.

क्रिमसन (देकैसेड) : आल्सो नोन अस कार्लोस. ओने ऑफ़ थे सिस्टम होल्डर्स.

जेडेन (देकैसेड) : Crimson's बेस्ट फ्रेंड.

स्वीटी : गर्ल हु ुसेड तो वर्क विथ क्रिमसन. केयर्स फॉर मनी.

क्रिस : डग्सी (फ्रेंच एजेंसी) का एजेंट.

हाना तेराशिमा : डग्सी की एक फीमेल एजेंट.

आंद्रे : डग्सी का एक एजेंट.

ज़ेवियर : डग्सी का हेड.

एरिक : हेलीकाप्टर पायलट. Veer's फ्रेंड नाउ.


तमन्ना : India's ओने ऑफ़ थे मोस्ट फेमस फ़ूड ब्लॉगर.

आदेश जयसिंघानी : ओनर ऑफ़ कैसा बेले.

कुमार : कैसा Belle's प्रोजेक्ट मैनेजर.

अंकित : सीनियर एम्प्लोयी ऑफ़ कैसा बेले सेंत बी आदेश तो होटल प्रेस्टीज.

नारंग : होटल Prestige's ex-chef.

कमल मौर्या : Kritika's फादर.

साराभाई : गैंग लीडर.

सूर्य : राइट हैंड मन ऑफ़ साराभाई.


ली रेशु : ओने ऑफ़ थे सिस्टम होल्डर्स. Order's लार्ड.

ली एरिका : ली Renshu's डॉटर. (सिस्टम होल्डर.)

गरोफानो : अक वायलेट. ओने ऑफ़ थे सिस्टम होल्डर्स. ओनर ऑफ़ गरोफानो प्रोडक्ट्स कंपनी.

चार्ल्स निचोलसों (देकैसेड) : Garofano's स्टेप फादर.

ऐठन निचोलसों : चार्ल्स Nicholson's यंगर बरोथेर.

जॉव लॉन्ग (देकैसेड) : Legion's लार्ड. ानोथेर सिस्टम होल्डर.

केन : ओने ऑफ़ थे इम्पोर्टेन्ट ट्राइब मेंबर्स.

क्लार्क : Divya's एस्कॉर्ट फ्रॉम थे फब्कक.

रेबेका : डायरेक्टर ऑफ़ फब्कक. ओने ऑफ़ थे सिस्टम होल्डर्स.

अननोन मास्क्ड गाए : सिस्टम होल्डर.

मर. क्ष : ???

तृषा : दसप अफसर इन थाने पुलिस स्टेशन, मुंबई.

रोहन : डगप ऑफ़ महाराष्ट्र. हस्बैंड ऑफ़ तृषा.

पीहू : रोहन एंड Trisha's लिटिल डॉटर.

जीतू काका : हेड कांस्टेबल इन थाने पुलिस स्टेशन, मुंबई.

शेखर : इंस्पेक्टर इन कण्ट्रोल रूम, ठाणे.

अनिल सालस्कर : सुब इंस्पेक्टर. Trisha's अकुइन्टने.

पारिजात घर लेडीज ~

सुधा : वेल वेरसेद इन स्टिचिंग. मदर ऑफ़ ओने किध हु वास् ताकें फ्रॉम हेर. सेर्वेस वीर.

मुक्त : डार्क स्कन्नेड वुमन. वेल वेरसेद इन राजस्थानी किसीने. हेड शेफ इन होटल प्रेस्टीज. सेर्वेस वीर.

सैली : डॉटर ऑफ़ मुक्त. डार्क स्कन्नेड. सेर्वेस वीर.

वर्षा : वेल वेरसेद इन बॉटनी, परफ्यूम स्टडी एंड आयुर्वेदा मेडिसिन्स फ्रॉम प्लांट्स. सेर्वेस वीर.

कप्तान : ओने ऑफ़ थे सिस्टम होल्डर्स इन ऑस्ट्रेलिया. फाउंडर एंड लीडर ऑफ़ 'ओर्फना'

मिया : फर्स्ट मेंबर ऑफ़ थे ओर्फना.

रोज़ेल्ला : ओने ऑफ़ थे मेंबर्स ऑफ़ ओर्फना.

डेज़ी : पैरामेडिक इन ओर्फना.

दीपू : ऑय विटनेस ऑफ़ थे मर्डर केस इन पंचगनी.

मुकेश : ओने ऑफ़ थे विक्टिम्स ऑफ़ थे मर्डर्स इन पंचगनी.

मिनिस्ट्री ऑफ़ फ़ूड एंड हेल्थ मेंबर्स ~

डॉ. मेहता : सीनियर नूट्रिशनिस्ट.

मस. कपूर : जूनियर ऑफिसियल.

मर. शर्मा : पैनल हेड.

डॉ. रओ : एपिडेमीओलॉजिस्ट.

मर. खुराना : पालिसी एनालिस्ट.

रणजीत मंडल : अलियास ऑफ़ धनञ्जय सिंह. ुसेड तो वर्क फॉर रमन.

सतबीर : ओने ऑफ़ थे में ऑफ़ रणजीत.

राजू : ओने ऑफ़ थे में ऑफ़ रणजीत.

पिंटू : ओने ऑफ़ थे में ऑफ़ रणजीत.

गुल्लू : ओने ऑफ़ थे में ऑफ़ रणजीत.

बलदेव सिंह : भावना के पिता जी के पूर्वज. बिजईपुर की हवेली के पहले मालिक.

परिणीति : पारिजात की पहली लीडर.

पद्मिनी : ओने ऑफ़ थे लेडीज ऑफ़ पारिजात अंडर Parineeti's गाइडेंस.

बाबा परमहंस महादेवानन्द जी : पुष्कर शहर से एक सिद्ध महापुरुष.

संतोष : वंदना के असली पिता.

रेणुका : वंदना की असली माता. अभिलाषा की बड़ी बहिन.

कएल : सिस्टम होल्डर फ्रॉम स्पेन.

अलेजांद्रो : सिस्टम होल्डर फ्रॉम स्पेन. पं कैंडिडेट.

रफाएल इबानेज़ (देकैसेड) : राइवल पं कैंडिडेट ऑफ़ अलेजांद्रो. No रोले.

बलहार : Mumbai's नई डॉन. वर्क्स अंडर वीर.

दिग्विजय शेखावत : पॉलिटिशियन इन मुंबई. (नयी दिशा पार्टी के सदस्य.)
 
इंट्रोडक्शन :

चरक्टेर्स के बारे में ज़्यादा कुछ नहीं बताऊंगा. आप खुद उनके बारे में पढ़ के उन्हें जानिएगा. एक छोटा सा इंट्रो दे रहा हु ताकि रिलेशनशिप समझ आ सके आपको.

1. वीर (आगे - 20 यरस) : कहानी का मैं करैक्टर. (प्रोटागोनिस्ट)

2. मनोरथ (आगे - 80 यरस) : वीर के दादा जी. परम्पराओ और अनुसाशन को बोहत मानते है. घर में जो सबसे अनुसाशित है और बुद्धिमत्ता से भरपूर है उसी को ये महत्व देते है. इनके 2 पेट्रोल पंप थे जो इन्होने अपने बच्चो में बाँट दिए.

3. बृजेश (आगे -56 यरस) : वीर के डैड, मनोरथ का बड़ा लड़का. एक पेट्रोल पंप का मालिक है. उसके अलावा एक लक्ज़री होटल है जिससे उसकी पत्नी संभालती है.

4. श्वेता (आगे - 47 यरस) : वीर की सौतेली माँ (Step-mom), बृजेश की दूसरी पत्नी. श्वेता कही से भी 47 की प्रतीत नहीं होती. ये बृजेश द्वारा बनवाई गयी होटल की मालकिन है और उससे अपनी बेटी के साथ संभालती है.

5. भूमिका (आगे - 25 यरस) : श्वेता और उसके पहले पति की एकलौती बेटी, वीर की Step-sister. B.com और होटल मैनेजमेंट का कोर्स करने के बाद अब अपनी माँ के साथ होटल संभालती है.






6. करुणेश (आगे - 55 यरस) : मनोरथ का दूसरा बीटा, वीर के चाचा. बृजेश का छोटा भाई है और साथ hi उस दूसरे पेट्रोल पंप का मालिक.

7. सुमित्रा (आगे - 49 यरस) : करुणेश की पत्नी, वीर की चची. गदरायी हुई है पर मोती कही से भी नहीं. बड़ी बड़ी छुछिया, गोरी मखमली त्वचा, नैन नक्श जो मदहोश कर दे.

8. विवेक (आगे - 28 यरस) : करुणेश और सुमित्रा का बड़ा बीटा. करुणेश ने विवेक पे काफी पैसा खर्च किया है जिसके चलते आज विवेक की खुद की एक ऑटोमोबाइल्स की कंपनी है.

9. रागिनी (आगे - 27 यरस) : विवेक की पत्नी, वीर की भाभी. क़यामत है एकदम रागिनी. एक ऐसी लड़की जिससे हर्र कोई अपनी बनाना चाहे. जिससे देख के मुँह से बस यही निकालता है की काश ये मेरी होती.

10. आरोही (आगे - 22 यरस) : करुणेश और सुमित्रा की बड़ी बेटी. वीर के hi शामे कॉलेज में उसकी सीनियर है. काम बोलती है. दिखने में ख़ूबसूरत और अलग किस्म की ब्यूटी है ये. इससे देख के नशा सा चढ़ जाए किसी को भी.

11. प्रांजल (आगे - 21 यरस) : करुणेश और सुमित्रा का छोटा बीटा. अभी B.com कर रहा है शामे कॉलेज से.

12. काव्य (आगे - 18 यरस) : करुणेश और सुमित्रा की छोटी बेटी. चंचल, शर्मीली और थोड़ी सवेंदनशील. अभी अभी कॉलेज में आयी है तोह अभी दुनिया दारी के बारे उतना सब नहीं पता. दिखने में एकदम क्यूट है और प्यारी.





ये था इंट्रो, बाकी चरक्टेर्स समय आने पर इंट्रोडस होते जाएंगे.


धन्यवाद!
 
अपडेट -1 ~ ान ुंफोरगेटाब्ले इंसिडेंट.

*थुड़*

एक ज़ोरदार धक्का वीर की पीठ पर पड़ा और वो सामने की ऑर्डर girte-girte बचा.

"हाहाहाहाहा!!!"

और, तभी पीछे से कई लोगो की हस्सन की आवाज़ें सुनाई दी.

वीर के हाथ काँप रहे थे. धक्के के कारण उसका मोबाइल फ़ोन girte-girte बचा था, उसने फौरन hi उसे अपने कांपते हुए हाथो में कस के थामा और फ़ोन की स्क्रीन ों करके वो कांटेक्ट लिस्ट में से किसी का नाम ढूंढ के उसने अपना फ़ोन कानो की ऑर्डर बढ़ाया hi था की तभी...

*थुड़*

एक और धक्का ज़ोर से उसकी पीठ पर पड़ा, पर इस बार वो खुद को संभाल न सका और सामने की ऑर्डर धड़ाम से गिर पड़ा. उसका फ़ोन हाथो से छुटक कर कई टप्पा खाते हुए ज़मीन पर जा गिरा. पता नहीं सही सलामत बचा भी था उसका फ़ोन या नहीं.

वीर ने कराहते हुए अपनी नज़रे ऊपर करि और देखा. करीब 5 से 6 लड़के उसके सामने खड़े हुए थे. और, उनका लीडर जिसका नाम 'अजय' था वो अपनी ढुके बाइक पर अदब के साथ बैठे हुए उसकी इस हालत पर मज़े ले रहा था.

अजय : हाहाहा! क्यों बी चूज़े! बोल!? करेगा ऐसी हरकत दुबारा?

अपने कांपते हुए पेर्रो को वीर ने बड़ी hi मुश्किल से कण्ट्रोल किया और उठा.

आखिर उसकी गलती क्या थी? आज उसके अपने कॉलेज में 2ंद ईयर का पहला दिन था और पहले दिन hi उसके साथ ये सब हो रहा था?

शाम के 7 बज चुके थे और वीर जिसे 2 घंटे पहले hi अपने घर पहुंच जाना चाहिए था वो यहाँ 6 से 7 लड़को द्वारा बुली किया जा रहा था.

वीर शुरू से hi एक कमज़ोर युवक था. उसे देख के ऐसा लगता था मानो उसकी रचना भगवान् ने बड़ी hi कठोरता से करि हो.

न वो पढ़ाई में होशियार था, न दिखने में कोई बहुत हैंडसम था, शरीर से भी कमज़ोर था, बोल चाल में भी एकदम पीछे और उसमे कोई भी टैलेंट नहीं था. कुल मिलाके एक भोंदू सा इंसान.

अपने नाम का उल्टा hi था वीर. वीरता नाम की तोह कोई चीज़ hi नहीं थी उसमे. पर बेचारे उसमे उसकी क्या गलती थी? वह तोह जैसा था, वैसा था. क्या उसकी इस बात का फायदा उठाना ज़रूरी था?

आज वह यहाँ कॉलेज के पीछे की सुनसान सड़को में मौजूद था. वह आना नहीं चाहता था पर उसे यहाँ लाया गया था.





सामने खड़े उसके कॉलेज के सीनियर्स उसपे अत्याचार करने के लिए उसे यहाँ सुनसान जगह पर लाये हुए थे.

पर, इसमें वीर की गलती क्या थी?

उसकी गलती यह थी की आज कॉलेज के डिपार्चर के वक़्त वह एक ख़ूबसूरत सीनियर लड़की को देख रहा था, जो की लाज़मी था. वो थी hi इतनी ख़ूबसूरत की कोई भी उसे देख के अपनी नज़रें न हटा पाटा. वो पतली कमर, तीखे नैन, भारी स्तन, परफेक्ट फिगर और वो क़ातिलाना चेहरा. किसी को भी मदहोश कर दे.

पर, बदक़िस्मती से वीर जब उस सुन्दर लड़की को ताड़ रहा था, अजय ने उसे ऐसा करते देख पकड़ लिया था.

और बस, यही वीर की गलती थी.

वह लड़की अजय की काफी अच्छी दोस्त थी जिसके पीछे अजय हाथ धोके काफी समय से पड़ा हुआ था. उस लड़की का नाम था प्रज्ञा, जो की अजय की क्लासमेट थी.

वीर की नज़र ने hi अजय को इतना गुस्सा दिला दिया था की उसका मैं कर रहा था की वो उसी वक़्त वीर की आँखें नोच ले. आखिर हिम्मत कैसे हुई किसी लड़के की उसकी होने वाली गफ को टकटकी लगा के देखने की.

कॉलेज में किसी ने भी आज तक उसके खिलाफ जाने की हिम्मत नहीं की थी. तोह, फिर आखिर इस वीर की कैसे हिम्मत हो गयी?

यही बात अजय को बिलकुल न खली.

वीर को यहाँ लाके आज वो उसे अच्छा सबक सिखाने वाला था. ताकि, भविष्य में कोई भी उसकी प्रज्ञा को घूरने से पहले 100 बार सोचे.

अजय (गुर्राते हुए) : मैंने कुछ पूछा तेरे से चूज़े. बोल? करेगा ऐसी हरकत फिरसे?

वीर भले hi कमज़ोर था पर वो अपने खुद के प्रति ईमानदार ज़रूर था. उसे पता था उसने कोई गलती नहीं की है. आखिर एक सुन्दर लड़की को यदि आपने कुछ सेकण्ड्स देख लिया तोह क्या वो आपकी गलती है? बिलकुल भी नहीं! वीर तोह केवल प्रज्ञा की सुंदरता की प्रशंशा कर रहा था मैं hi मैं.

इसमें पिटाई की बात कहा से आ गयी?


और, यही ध्यान में रखते हुए उसने अजय के सवाल का कोई उत्तर नहीं दिया. वो बस chup-chap अपना निचला होंठ दांतो से दबाये हुए सर्र झुकाये खड़ा रहा. उसकी मुट्ठी जोरर से कस्सी हुई थी.

अजय : ये ऐसे नहीं मानेगा. दोसे दो साले को.

उसकी बात सुन्न उसके सारे साथी वीर की तरफ बढ़ने लगे. Jaise-jaise वीर पीछे जाता, waise-waise वो और क़रीब आते.

और, कुछ पल के अंदर hi वीर अब 6 लोगो से घिरा हुआ था. इसके पहले की वो कुछ कह पाटा, उन् 6 के 6 लौंडो ने वीर पे मुक्के और लातें बरसाना शुरू कर दी.

"ायर्घ्हहहहहह"

वीर की कराहने की आवाज़ सुनसान रोड में गूँज रही थी पर न तोह कोई sunn'ne वाला था और न hi कोई मदद करने वाला. वो लड़के रुकने का नाम नहीं ले रहे थे.

कोई उसके पेट में मारता तोह कोई उसके गाल पे, कोई पीठ पे वार करता तोह कोई उसकी पसली पे. और, हर एक हमले पर वीर के मुँह से एक दर्द भरी चींख निकल जाती जो उस सुनसान सड़क की शान्ति को झंझोर कर रख देती. देखते hi देखते कुछ hi पालो में वो अब नीचे गिर चूका था.

उसने अपने हाथो से अपना सर्र बचाया और परर सिकोड़े पर लड़को को तोह जैसे फ़र्क़ hi नहीं पड़ना था.

अपनी लातें उठाते हुए उन् सभी ने उसपे इतने वार किये की उसके माथे और होंठो से खून बहने लगा.


जब अजय ने क़रीब आके वो लाल खून देखा तोह उसे अंदर hi अंदर एक सुकून सा मिला. जैसे उसका गुस्सा कुछ हद्द तक शांत हो गया था. उसने फौरन hi अपने पंटरों को रोक दिया.

अपनी लात उठाते हुए उसने अपना जूता वीर के सर्र पर रख दिया.

अजय : समझ आया चूज़े? अगर तू ने इतना कह दिया होता की अहिंदा से तू ऐसी हरकत नहीं करेगा तोह तेरे साथ ये सब नहीं होता.

वीर ने कोई जवाब नहीं दिया. वह बस अपनी jaise-taise अधखुली आँखों से अजय को घूर रहा था.

अजय : पर, तुझे bann'na था हीरो. है न? तोह लो फिर! अब बांके दिखा हीरो. कान खोल के सुन्न ले चूज़े, अहिंदा से तू यदि मुझे गलती से भी प्रज्ञा के aas-paas भी दिखा न तोह तेरी गांड तोड़ के रख दूंगा. समझा बहनचोद?

कहते हुए अजय ने अपने परर का भार बढ़ाते हुए वीर का चेहरा मसल दिया जिसके चलते उसकी एक और चींख निकल गयी.

अजय : ौलेलेलेले बच्चे को दर्द हो रहा है? रुको अभी दर्द दूर कर देता हु. ज़रा वो लोल्लिपोप तोह लाना. देखो इधर एक बच्चा रो रहा है.

और, उसकी बात सुन्न सभी लड़के zor-zor से ठहाके लगाने लगे.

उन् लड़को में से एक ने अपना बैग खोला और एक लोल्लिपोप निकालते हुए अजय को थमा दी.

अजय ने फौरन hi लोल्लिपोप का रेपर खोला और वीर की तरफ नीचे झुक गया.

अजय : तुझे पता है में ये लोल्लिपोप लेके क्यों घूमता हु हमेशा? ताकि तुझ जैसे बच्चे जब उधम करने लगते है न तोह उनकी अकाल ठिकाने लगा सकू.

इतना बोल वो लोल्लिपोप जोरर से वीर के मुँह में घुसा दी जिसके चलते एक और कराह वीर के मुँह से निकली.

अजय : पर, फिर बच्चे रोने लग जाते है तोह आखिर बड़े होने के नाते मेरा फ़र्ज़ भी तोह बनता है न? की में उन्हें चुप करवौ? इसलिए उसके लिए ये लोल्लिपोप. अब अच्छे बच्चे की तरह ये लोल्लिपोप चुसो और अपने घर की ऑर्डर निकल लेना. समझा?

उसने वीर का गाल थप तपाया और जाने के लिए उठ खड़ा हुआ पर जाने से पहले वह एक बार और पीछे मुदा और वीर को देखा.

अजय : पुलिस या घर में कुछ भी बताने की कोशिश करना भी मत चूज़े. बाद में तू hi पछताएगा नहीं तोह. इन फैक्ट, किसी के सामने भी मुँह मत खोलना.

लड़का 1 : अजय भाई हलकी boonda-baandi शुरू हो गयी है, हमें निकलना चाहिए.

उसके एक दोस्त ने जताया तोह अजय ने भी हां में गर्दन हिलायी.

और, अजय समेत सभी लड़के apni-apni बाइक पर सवार हुए पर तभी अजय को कुछ सूझा और वह अपनी बाइक नीचे पड़े वीर के ird-gird घुमाने लगा और उसके दोस्त भी यही करने लगे.

*क्रैक*

वीर ने जोरर से उस लोल्लिपोप को अपने दांतो से कटरा. उसकी आँखें गुस्से से लाल थी पर वह कुछ भी नहीं कर सकता था. लड़के उसके ird-gird बाइक को घुमा रहे थे और अगले hi पल अजय ने उसकी ऑर्डर थूका जिसके चलते वो थूक सीधा जाते हुए वीर की शर्ट पर गिरा.

"हाहाहाहाहा"

*वरूम* *वरूम*

हस्ते हुए अजय अपनी टोली के साथ, बाइक पर सवार वह से निकल गया. और, उस सुनसान जगह पे अब केवल वीर hi अकेला पड़ा हुआ था.

बिजली कड़की और तेज़ बारिश शुरू हो गयी. यही वीर की किस्मत थी. अब तोह उसके कपडे भी भीग जाने थे. पर बारिश से एक बात अच्छी हुई. वह यह की वीर की शर्ट में गिरा अजय का थूक धूल गया.

*थू*

लोल्लिपोप को ज़ोर से थूकते हुए वीर खड़ा हुआ तोह वो लड़खड़ा गया और girte-girte बचा. हर जगह इतना दर्द था की पूछो मत. बारिश तेज़ हो चुकी थी और वह लंगड़ाते हुए अपनी स्कूटी के पास jaise-taise पंहुचा और सीट पर टिक के बैठ गया.

बारिश के पानी से उसके माथे से निकल रहा खून भी साफ़ होने लगा था. उसने अपना फ़ोन उठाते हुए अपने जेब में दाल लिया. पता नहीं ज़िंदा भी था उसका फ़ोन या नहीं, क्यूंकि स्क्रीन की लाइट अभी तक जल रही थी.

पर, वीर को तोह जैसे कुछ फ़र्क़ hi नहीं पड़ना था. वह हफ्ते हुए बस बैठा सड़क को घूर रहा था जहा अभी वह कुछ देरर पहले बुरी तरह लातो और घुसो का शिकार हुआ था.

अब तोह उसमे अपनी मुठी कस्सणे तक के लिए दम नहीं बचा था. क्या किस्मत दी थी भगवान् ने उसे.

आज पहला दिन और उसके साथ ये व्यवहार हुआ. ऊपर से तब, जब उसकी कोई गलती भी नहीं थी. क्या एक ख़ूबसूरत लड़की को देखना गुनाह था? जब उस लड़की ने उसे कुछ नहीं कहा तोह भला ये अजय कौन होता था उसके साथ ऐसा सुलूक करने वाला?

न चाहते हुए भी वीर की रुलाई छूठ पड़ी. और, वह बिना कोई आवाज़ किये zor-zor से रोने लगा. शरीर पूरा भीग चूका था उसका. और, बारिश की बूँदें जैसे hi उसके घावों पर पड़ती उसे और ज़्यादा दर्द देती.

Rote-rote वीर ने अपनी स्कूटी उठायी और घर की तरफ चल दिया. उसे hi पता था की वह कितनी मुश्किल से इस वक़्त स्कूटी को चला रहा था. उसके जेब में उसका फ़ोन अभी भी कांटेक्ट लिस्ट शो कर रहा था.

शायद गिरने के कारण फ़ोन की स्क्रीन एक जगह जा के अटक चुकी थी. उस कांटेक्ट लिस्ट में उसका कोई भी दोस्त नहीं था. स्कूल में भी उसके दोस्त नहीं थे और आज भी कॉलेज में वह अकेला hi बैठा हुआ था.

कांटेक्ट लिस्ट में केवल 3 hi नाम थे. एक उसके पिता बृजेश का, एक उसकी चची सुमित्रा का और एक उसकी छोटी बहिन काव्य का.

जिन्हे कॉल करने की वीर उस वक़्त एक्टिंग कर रहा था. जी हाँ! एक्टिंग कर रहा था. क्यूंकि, वीर जानता था, बृजेश को पता चलेगा तोह वह उल्टा और मारेगा hi उसे. सुमित्रा और काव्य इसमें कुछ नहीं कर सकती थी. रही बात बाकी फॅमिली मेंबर्स की तोह उनके नंबर्स थे hi नहीं उसके फ़ोन में.

उसके घरवाले उसकी मदद बिलकुल न करते.

आखिर क्यों?

क्यूंकि, यही तोह उसका परिवार था. केवल नाम का परिवार था बाकी उसकी घर में क्या hi इज़्ज़त थी वो bhali-bhanti जानता था.

अब तक उसे घर से निकाला नहीं गया था यही बात काफी थी.

उसे इतना प्रताड़ित किया जाता था की पूछो मत. पता नहीं कैसे वह उन् सब के बीच इतने साल तक जी लिया.

यदि कोई और होता तोह गुस्से में खुद hi भाग गया होता या अब तक ट्रस्ट आ चूका होता और न जाने क्या कर लिया होता. पर, वीर chup-chap सब कुछ सेहत था.

क्यूंकि, उसे पता था की विरोध करने का कोई फायदा नहीं था. और, अगर वह जाता भी तोह कहा जाता? वो 20 साल का hi था और अभी तोह उसने कॉलेज की दुनिया भी ठीक से नहीं देखि थी.

पर, आज जो हुआ उस से वीर को इतना तोह समझ आ गया था की कॉलेज की लाइफ के बचे हुए बाकी 3 साल उसकी स्कूल लाइफ से कई गुना बत्तर होने वाले थे.

वीर तेज़ रफ़्तार में गाडी चलाये जा रहा था. बारिश और आसुओ के कारण उसकी आँखें धुंधली हो चली थी. गाड़ियों की हेडलाइट्स की रौशनी किसी जुगनू के प्रकार उसकी आँखों में आती और जाती.

कुछ देरर पहले हुई घटना उसके ईमान, उसके गौरव, उसकी इज़्ज़त को छल्ली कर के उसके दिमाग में घूम रही थी.

पर, वह रुका नहीं. यु ासु बहाते हुए वो अपने घर की ऑर्डर गाडी बढ़ाता रहा जो अब बस कुछ hi दूर था.

'बदला तोह में लूंगा. I'll मेक थम पाय. Chun-chun के... एक एक से chun-chun के बदला लूंगा.'

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कहानी शुरू हो चुकी है.

अब से में और आप इस कहानी का सफर साथ में तय करेंगे और इसे अंत तक पहुचाएंगे.

आज के लिए इतना hi गाइस!


धन्यवाद!
 
अपडेट - 2 ~ थे फॅमिली

अब तक...

कुछ देरर पहले हुई घटना उसके ईमान, उसके गौरव, उसकी इज़्ज़त को छल्ली कर के उसके दिमाग में घूम रही थी.

पर, वह रुका नहीं. यु ासु बहाते हुए वह अपने घर की ऑर्डर गाडी बढ़ाता रहा जो अब बस कुछ hi दूर था.

'बदला तोह में लूंगा. I'll मेक थम पाय. Chun-chun के... एक एक से chun-chun के बदला लूंगा.'

अब आगे...

मुंबई, जिसे मायानगरी के नाम से भी जाना जाता है, उस शहर में एक बहुत hi आलिशान बंगले में कुछ लोग बड़ी hi सीरियस होक एक कमरे में धीमी आवाज़ में बातें कर रहे थे.

"आज कैसे भी करके उसका पत्ता साफ़ कर दो. समझे?" एक लड़के ने भारी आवाज़ में कहा.

उसके पीछे खड़े एक नौजवान लड़के ने उसकी ऑर्डर देखा और हाँ में गर्दन हिलायी, "टेंशन मत लो, भैया. आज उसका पत्ता साफ़ हो जाएगा. मैंने बड़ा hi तगड़ा प्लान बनाया है हाहाहा!"

"कैसा प्लान?"

"भैया! आप बस देखते जाओ. आज दादा जी के डिसिशन लेते समय hi सब कुछ होयेगा. में शो ग्रैंड रखना चाहता हु हाहाहा!"

"शाबाश छोटे! बस ध्यान रहे कोई गड़बड़ न हो. और, अगर होये भी तोह तुम्हारा नाम बिलकुल भी सामने न आये. समझे?"

"हाँ, विवेक भैया! Don't वोर्री! ये प्रांजल जो भी करता है एकदम सॉलिड करता है." प्रांजल ने अपनी छाती thap-thapaate हुए कहा.

विवेक : गुड!

मुस्कुराते हुए विवेक, प्रांजल का बड़ा भाई उसके कमरे से निकल गया.

अभी वो निकला hi था की दरवाज़े के बाहर hi उसकी nayi-naveli पत्नी, रागिनी उसे देखते hi बोल पड़ी. "अरे! तुम यहाँ हो? चलो जल्दी! कुछ देरर में दादा जी अपना डिसिशन देने वाले है. सभी हॉल में इखट्टा हो रहे है."

रागिनी एक बहुत hi गज़ब की स्त्री थी. उसका जिस्म इतना परफेक्ट था मानो भगवन ने बड़ी hi फुर्सत से उसे बनाया था. 27 साल की रागिनी के स्तन कैसे हुए थे और साड़ी में तोह वो क़यामत hi धा देती थी.

उसका गोरा रंग, पतले होंठो में हलकी गुलाबी लिपस्टिक, कमर तक लटकते खुले काले बाल जो नीचे से करलेंड थे, उसके हुस्न पर चार चाँद लगा देते थे. रागिनी का बाप टवस के 2 शोरूम्स का मालिक था. पैसो की तोह कोई कमी hi नहीं थी उसके पास. और, विवेक को ऐसी पत्नी मिली थी, उसकी किस्मत के आखिर क्या कहने थे.

पर, विवेक भी कोई aira-gaira नहीं था. जब ऐसी पत्नी उसे मिली हो तोह अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं था की विवेक का खुद का परिवार कितना अमीर था.

रागिनी की बात सुन्न विवेक ने कमरे में झाँका.

विवेक (चिल्लाते हुए) : छोटे! चल बाहर जल्दी.

प्रांजल : भैया! आप जाओ मुझे तोह इम्पोर्टेन्ट काम है. ः!

रागिनी प्रश्न भरी नज़रो से विवेक को देखि, "प्रांजल को क्या काम भला इस वक़्त!?"

विवेक : तुम चलो! आज तोह बेहतरीन शो होने वाला है. हाहाहा!

और, हस्ते हुए विवेक रागिनी को लेके वह से चला गया.

पर, रागिनी की तोह समझ में hi ना आया की आखिर चल क्या रहा था. अब जब उसके पति ने कहा था कुछ बढ़िया होने वाला है तोह रागिनी केवल इंतज़ार hi कर सकती थी.

*क्लिक*

वीर ने अपने घर पहुंच कर अपनी स्कूटी से छवि घुमाते हुए गाडी बंद करि और उसे जेब में रखते हुए वह गाडी से उतरा.

वह अपने घर पहुंच चूका था. केवल नाम के लिए घर था. एक घर में एक आदमी खुशिया पाटा है, अपनों का प्यार पाटा है, घर में एकता रहती है पर उसके घर का एकदम अलग hi सन था.

जहा आदमी अपने घर पहुंच कर सुकून पाटा है और खुश होता है, वीर इस वक़्त अंदर जाने से hi कटरा रहा था और डर भी रहा था.

शाम के 7:30 बज चुके थे. और, वह पानी से भीगा, हलके खून से सना हुआ यहाँ खड़ा हुआ था. उसने अपनी स्कूटी के मिरर में अपनी शकल देखि तोह पाया उसकी एक आँख पूरी नील पद चुकी थी. इतनी बुरी तरह धोया था उसे अजय और उसके साथियो ने.

"ायर्घ्हहह!" कराहते हुए उसने अपना एक हाथ अपनी पसली पर फेरा.

वह अपने क़दम आगे बढ़ाते हुए दरवाज़े की ऑर्डर बढ़ा. उसका घर जो की नर्क से काम नहीं था. वह इतना आलिशान था की जिसे लोग देखने के बाद तारीफों के पल बाँधने लगते थे.

पर, उन्हें क्या पता था की उस बंगले में अंदर रहने वाले लोग कैसे थे.

वीर अभी बढ़ के दरवाज़े पर आया hi था की इतने में उसके कानो में किसी की आवाज़ पड़ी.

"अरे!? ये में क्या देख रहा हु? ताऊ जी का एकलौता बीटा इस हाल में? और, वह भी आज अपने कॉलेज के सेकंड ईयर के पहले दिन?"

आवाज़ सुनते hi वीर के परर वही थम गए. सामने नज़र दौड़ाई तोह देखा की उसके चाचा का छोटा बीटा, प्रांजल सामने खड़ा हुआ था.

जी हाँ! वह बांग्ला वीर का hi था.

प्रांजल फौरन आगे बढ़ उसे सहारा देने के लिए हुआ तोह वीर ने उसका हाथ गुस्से में झटक दिया और अपने पेर्रो पर hi खड़ा रहा.

प्रांजल : अरे!? अरे!? में तोह बस तुम्हारी मदद कर रहा था छोटे भाई! तुम्हारी ये हालत किसने की? नाम बताओ तुम खाली, देखना तुम्हारा भाई क्या हाल करेगा उस शक़्स का.

पर, वीर जानता था. जो कुछ भी इस वक़्त प्रांजल के मुँह से निकल रहा था, झूठ के अलावा वो और कुछ नहीं हो सकता था.

उसके जैसा कपटी और सयाना इंसान शायद hi वीर ने अपनी पूरी लाइफ में कभी देखा होगा.

प्रांजल : छोटे भाई! दादा जी का जन्मदिन है आज. गुस्सा थूक दो भाई. चलो अच्छा मेरी मदद करवा दो.

पर, वीर तोह जैसे कुछ सुनना hi नहीं चाहता था. वो अंदर जाने लगा की एक बार फिर प्रांजल ने उसका कन्धा थाम लिया.

प्रांजल : भाई! आज दादा जी अपना डिसिशन सुनाने वाले है. उन्हें कितना अच्छा लगेगा अगर तुम उन्हें अपने हाथो से उनके जन्मदिन पर गिफ्ट डोज. है न? अपना गुस्सा अपने ऊपर हावी होने मत दो छोटे भाई! चलो! अंदर तुम्हारा सब इंतज़ार कर रहे है.

वीर भले hi गुस्से में था, पर वह अपने दादा जी की बड़ी hi इज़्ज़त करता था. और, उन्हें मानता भी था. आज उसके दादा जी का जन्मदिन था और उसने पहले से hi अपने दादा जी के लिए एक गिफ्ट तैयार कर के अपने कमरे में रखा हुआ था. Jaise-taise वीर ने अपना गुस्सा निगला.

वीर : आप चलो! में अपने कमरे से दादा जी के लिए गिफ्ट लेके आता हु.

प्रांजल : अरे क्या कह रहे हो भाई? दादा जी और बाकी सब पहले से hi तुम्हारा इंतज़ार कर रहे है और ऐसे में तुम उन्हें और इंतज़ार करवाओगे? तुम अपनी हालत के बारे में मत सोचो. हम सब तोह तुम्हारे अपने hi है, है न? फिर हमारे सामने कैसी झिझक? आओ...

और, प्रांजल उसे खींचते हुए बंगले के अंदर ले गया. चाहते हुए भी वीर उसका विरोध न कर पाया.

अंदर घुसते hi एक मिनी हॉल था जहा बाहरी व्यक्तियों को बैठाया जाता था. और, ख़ास लोगो को hi उसके अंदर वाले बड़े हॉल में एंट्री अल्लोवेद थी.

अभी प्रांजल और वीर दोनों hi मिनी हॉल में थे जहा एक ख़ूबसूरत सा फ्लावर वैसे मौजूद था. उसके ird-gird एक लाल रिबन लिप्त हुआ था और हैप्पी बर्थडे का एक टैग भी लगा हुआ था.

जब वीर की नज़र उसपे पड़ी तोह वह उसे देखते hi चौंक गया, जो की लाज़मी था. वो फ्लावर वैसे इतना महंगा और इतना सुन्दर प्रतीत हो रहा था की कोई भी उसे एक बार देखने के बाद दुबारा ज़रूर देखता.

प्रांजल (खुश होते हुए) : यही है वो गिफ्ट छोटे भाई. ताऊ जी यानी की तुम्हारे डैड ने खुद इसे मंगवाया है. और, यदि तुम दादा जी को अपने हाथो से ये गिफ्ट डोज तोह वह कितना खुश हो जाएंगे, नहीं!?

पर, वीर जानता था की यह प्रांजल जो इस वक़्त भेद जैसा मासूम प्रतीत हो रहा था, वह असल में भेद नहीं बल्कि भेद के वेश में एक भेड़िया था.

वीर ने ना चाहते हुए भी हाँ में सर्र हिलाया और वैसे उठाके वो दोनों hi अंदर बड़े हॉल में प्रवेश किये.

बड़ा हॉल इतना बड़ा था और लाइट्स से इतना जगमगा रहा था की देखने वाले देखते hi रह जाए. ऊपर न जाने कितना महंगा एक झूमर लटका हुआ था जिसे देख के बस मुँह से तारीफ निकलती.

अंदर एक सिंगल सीट लक्ज़री वाले सोफे पर वीर के दादा जी बैठे हुए थे. आज उनका 80तह बर्थडे था. और, उनके agal-bagal वाले सोफे पर उनके दो बेटे बैठे हुए था. बड़ा बीटा जिसका नाम था, बृजेश. और, छोटा बीटा जिसका नाम था, करुणेश.

करुणेश : पापा जी आपको पार्टी रख लेनी चाहिए थी.

मनोरथ : हम्फ! कभी भी ये गलती मत करना. ये सब पार्टी जो तुम लोग करते हो न इसी के कारण तुम्हारे दुश्मन बढ़ते है. जितनी रईसी लोगो को दिखाओगे, उतने hi गलत इरादे लोगो के मैं में उमड़ते है.

वीर के दादा जी ने हिदायत देते हुए कहा.

इधर अंदर जैसे hi वीर और प्रांजल आये, सभी की नज़रें उन् दोनों पर जा तिकी.

वीर के पिता, बृजेश ने जैसे hi अपने लड़के की हालत देखि तोह उसकी आँखें फटी की फटी रह गयी. उसने सोफे के हट्टे को इतनी ज़ोर से भींचा मानो उसे उखाड़ के hi फेक देगा.

क्या बृजेश का ये गुस्सा अपने बेटे को इस हालत में देख के उसका ये हाल करने वाले के ऊपर था?

बिलकुल भी नहीं!

बल्कि बृजेश इस वक़्त अपने बेटे पर गुस्सा था. यदि अभी कोई और मौजूद न होता तोह उसने खड़े होक पहले hi 2-4 झापड़ वीर को रसीद दिए होते.

उसका बीटा वो भी ऐसे हाल में? वीर का ये रूप मानो बृजेश की इमेज पर एक छाता था. न जाने उसके बाकी घर वाले क्या सोच रहे होंगे अब ऐसे में.

यही सोचके उसे इतना गुस्सा आ रहा था पर उसके पिता का आज जन्मदिन था और वह कुछ भी बखेड़ा खड़ा करना नहीं चाहता था.

नकली स्माइल देते हुए उसने अपने बेटे वीर को देखा.

बृजेश : आ गए!? कहा रह गए थे इतनी देरर तक? और यह क्या हालत बना राखी है अपनी? किस से मार खा के आ रहे हो?

वीर की मानो ये सवाल सुनते hi sitti-pitti गुल हो गयी. अपने डैड की भारी भरकम आवाज़ सुनते hi उसके अंदर का डर जाग उठा. उसके हाँथ कांपने लगे थे.

इसके पहले वो कुछ जवाब दे पाटा, बगल में खड़े प्रांजल ने तपाक से बोलै.

प्रांजल : ताऊ जी! यही बात मैंने वीर से बाहर अभी पूछी थी. तोह, वीर कहने लगा की आज उसे एक सीनियर लड़की पसंद आ गयी थी. और, वीर उस लड़की को कही ले जाना चाहता था पर लड़की के प्रेमी ने विरोध किया और वीर को ये बिलकुल भी पसंद न आया और वो दोनों एक दूसरे से जा लड़े. ये उसी का नतीजा है, ताऊ जी.

प्रांजल की बात सुनते hi वीर को एक ज़ोरदार झटका लगा. उसने अपनी फटी आँखों से पलट के प्रांजल को घूरा तोह पाया की प्रांजल बड़ा hi मासूम सा चेहरा बनाये वह खड़ा हुआ था, जैसे कुछ हुआ hi न हो.

प्रांजल : मैंने वीर को समझाया भी की ऐसे maar-peet करना बिलकुल भी अच्छी बात नहीं है. वीर को तोह फिर भी काम चोट आयी है. न जाने वीर ने उस लड़के को कितनी बुरी तरह पीटा होगा.

ऐसी वाणी बोलिये, मैं का आप खोये.

औरन को शीतल करे, आपहु शीतल होये.


पर, कबीर की ये पंक्तिया इस वक़्त व्यर्थ थी.

प्रांजल ने जो मधुर वाणी बोली थी वो वीर को शीतल करना तोह दूर उसे इतना aag-baboola कर रही थी की यदि उसकी बस चलती तोह वो इसी समय प्रांजल पर टूट पड़ता.

प्रांजल की इमेज घर में एक बहुत hi संस्कारी लड़के की थी, पर वो असल में कैसा था यह बात सभी नहीं जानते थे.

बृजेश (गुस्से में) : तुम्हारी इतनी हिम्मत, वीर!?

मनोरथ : शांत हो जाओ! हल्ला नहीं!

बृजेश : पर, पापा जी-

मनोरथ : स्स्स्सस्छ्हःहः!!!

बृजेश : हम्फ!

मनोरथ : वीर! तुम्हे पता है क्या किया है तुमने?

वीर : नहीं! दादा जी... वह में...

मनोरथ : जो हुआ सो हुआ. अब इसकी चर्चा कोई नहीं करेगा.

और, सब शांत हो गए.

वीर ने जब हॉल में मौजूद सभी लोगो पर नज़रें फिराई.

तोह, उसकी नज़र अपने दादा जी के दायी ऑर्डर रखे सोफे पर गयी जहा उसके डैड, बृजेश के बगल से बैठी हुई उसकी सौतेली माँ, श्वेता उससे बॉहे सिकोड़े हुए देख रही थी.

फिर, उसकी नज़र श्वेता के बगल से बैठी हुई श्वेता की एकमात्र एकलौती बेटी, भूमिका पर गयी. जो उसे देखते hi अपना मुँह फेरर ली.

जब वीर ने दादा जी के बायीं ऑर्डर रखे सोफे पर नज़र दौड़ाई तोह देखा की उसके चाचा करुणेश और उनकी पत्नी सुमित्रा यानी की उसकी चची दोनों hi नज़रें गड़ाए उसे hi घूर रहे थे.

सुमित्रा उसे बॉहे सिकोड़े उसके चेहरे को hi देख रही थी.

उनकी hi बगल से उसके चाचा के बड़े बेटे, विवेक और उसकी पत्नी रागिनी भी बैठे हुए थे. वो दोनों भी उसे hi घूर रहे थे.

और, जब वीर ने स्टैर्स पर नज़रें दौड़ाई तोह देखा की उसके चाचा करुणेश की बड़ी बेटी आरोही और छोटी बेटी काव्य दोनों hi साथ में केक लेते हुए नीचे आ रही थी.

वो दोनों hi नीचे आयी और केक को सामने राखी कांच की एक टेबल पर रखा और साइड वही सोफे पर बैठ गयी.

जहा आरोही ने उसे एक बार देख के अपनी नज़रे फेरर ली, वही दूसरी ऑर्डर काव्य उसे ऐसी हालत में देख अपनी बॉहे सिकोड़े उसे बड़ी hi हमदर्दी से देख रही थी पर बोली कुछ नहीं.

कहा एक तरफ उसके परिवार वाले जो नए कपडे पहने, सजके बैठे हुए था और कहा वह जो पीटने के बाद एकदम गीला और खून के निशाँ और घावों से भरपूर.

मनोरथ : डॉक्टर को दिखवा के अपनी दवा करवाना मत भूलना.

वीर : ज... जी.

बृजेश (ज़ोर से) : अब khade-khade इंतज़ार क्या कर रहे हो? आगे बढ़ो और अपने दादा जी को तोहफा दो.

मनोरथ : आओ वीर!

और अपने दादा जी की सहूलियत से वीर आगे बढ़ते हुए अपने दादा जी को गिफ्ट देने जाने लगा.

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आज के लिए इतना hi दोस्तों!


धन्यवाद!
 
अपडेट - 3 ~ ा फुल फ्लेङ्गेद प्लान

अब तक...

बृजेश (ज़ोर से) : अब khade-khade इंतज़ार क्या कर रहे हो? आगे बढ़ो और अपने दादा जी को तौहफा दो.

मनोरथ : आओ वीर!

और, अपने दादा जी की सहूलियत से वीर आगे बढ़ते हुए अपने दादा जी को गिफ्ट देने जाने लगा.


अब आगे...

वीर के दादा जी, मनोरथ उस पर कई हद्द तक भरोसा करते थे. क्यूंकि, जितनी भी शिकायत वो सुनते आ रहे थे, उन्होंने आज तक वीर को कभी अपनी आँखों से कोई गलत काम करते नहीं देखा था. और, आज यह पहली बार नहीं था जब प्रांजल के मुँह से उन्होंने वीर की घटना के बारे में सुना था.

यह तोह सालो से चला आ रहा था. कोई न कोई आके मनोरथ के सामने वीर के कर्मो की शिकायत करता और वीर केवल सर्र झुकाये खड़ा रहता. वीर विरोध किया करता था पर उसके पास अपनी बात को सही साबित करने का कोई प्रूफ नहीं रहता था. और, इसलिए अब उसने विरोध करना भी छोर दिया था.

आज भी कुछ ऐसा hi था. वीर के पास कोई सबूत नहीं था अपनी बेगुनाही साबित करने का. और, क्या कहता वह? कौन उसकी बातो का यकीन करता?

पिछले कई सालो से जो इमेज उसकी घर में बानी हुई थी, उसके चलते तो कोई उस पर रेहम भी नहीं खाता था.

जब वीर अपने हाथो में वो फ्लावर वैसे लेते हुए आगे बढ़ा तभी अचानक से पता नहीं क्या हुआ उसका परर फिसला और वह बुरी तरह सामने की ऑर्डर जा गिरा.

*क्रैश*

फ्लावर वैसे उसके हाथो से छूठ कर गोल घुमते हुए एक तेज़ शोर करते हुए नीचे जा गिरा और एक hi झटके में वो sundar-sa वैसे ढेर सारे टुकड़ो में बिखर गया.

"Aaaaaaaaaaa," वह बैठी महिलाये और लड़कियों के मुँह से कुछ ऐसी hi हैरानी भरी आवाज़ निकली.

और, फिर एक शान्ति सी छा गयी.

सब की आँखें फटी की फटी रह गयी. सभी वीर को ऐसे देख रहे थे जैसे मानो उसने किसी का खून कर दिया हो.

देखे भी क्यों न, आखिर वो फ्लावर वैसे इतना कीमती जो था. मनोरथ को शुरू से hi पौधे और फ्लावर वसेस का बहुत शौक था, यही कारण था की उनके घर में एक अलग से गार्डन भी था.

इस वक़्त वीर की हालत ख़राब थी. उसने खुद अपने दादा जी के लिए एक फ्लावर वैसे चुन के रखा हुआ था जिसे वो बाद में उन्हें देने वाला था. इस वैसे के सामने उसका वैसे तोह कुछ भी नहीं था. पर, अब क्या? अब तोह वो वैसे उसके हाथो टूट चूका था.

बस! बृजेश जो अपना गुस्सा पहले hi बड़ी मुश्किल से कण्ट्रोल किये हुए था वो उठ खड़ा हुआ और चिल्लाया.

बृजेश : हराम खोर! तुझे पता है वो तौहफा कितना महंगा था?

अपने डैड की गरजती आवाज़ सुन्न एक बार फिर वो सिहर उठा. बृजेश उसे aag-baboola होक खा जाने वाली नज़रो से घूर रहा था.

मनोरथ : ब्रिजिस्शह्ह्ह!!!

बृजेश : पापा जी... आप... आप जानते है ये तौहफा कितने का था? ये फ्लावर वैसे 3 लाख का था. मैंने खुद इम्पोर्ट करवाया था चीन से इसे आपके लिए... और, इस बेवक़ूफ़ ने...

वैसे की कीमत सुनते hi वह खड़े लोगो को जैसे एक बड़ा झटका लगा. 3 लाख उन् सबके सामने यु बर्बाद होक बिखर के जो पड़े हुए थे.

सबसे ज़्यादा हालत तोह वीर की खराब थी. उसकी समझ नहीं आ रहा था वो करे क्या.

बृजेश से अब रहा न गया, वो वैसे hi कई सालो से वीर से परेशां था. वीर उसकी हर उम्मीदों पर पानी फेर देता था.

वीर की तरफ तेज़ क़दमों के साथ जाते हुए वह उसे एक ज़ोरदार थप्पड़ मारने hi वाला था की-

मनोरथ : ब्रीजेएससष्ठ!!

बृजेश : पर, पापा जी-

मनोरथ : आज मेरा जन्मदिन है. और, मेरे जन्मदिन के दिन तुम ऐसा सुलूक करोगे तोह मतलब hi क्या? जो हुआ उसे एक गलती मान के आगे बढ़ो. वैसे कितना hi महंगा क्यों न हो, वो तोह अब टूट चूका है. अब उसके पीछे रोने का कोई फायदा नहीं. रही बात पैसो की तोह इसके पैसे में दे दूंगा.

बृजेश : ये आप कैसी बातें कर रहे हो, पापा जी? आपका जन्मदिन है. में भला आप से पैसे क्यों लूंगा?

मनोरथ की बात सुन्न बृजेश ने अपने हाथ रोक लिए पर उसका गुस्सा अभी तक काम नहीं हुआ था.

प्रांजल : दादा जी, मैंने वीर से कहा था बाहर hi की अपने शूज उतार दे, क्यूंकि बारिश से गीले हो चुके है. पर, वीर ने मेरी सुनी hi नहीं. बोलै की मैड्स तोह घर में लगी hi है, वो किस काम आएँगी?

और, उसकी बात सुन्न सभी की नज़रें वीर के पेर्रो पर गयी जो गीले जूते पहना हुआ था और फर्श को गन्दा कर रहा था.

और, ये देख बृजेश और क्रोधित हो गया. तभी, वीर की स्टेपमॉम श्वेता उठ कड़ी हुई.

श्वेता : वीर din-ba-din लापरवाह होता जा रहा है.

प्रांजल : वीर! अपने जूते उतारो, इधर आओ ये स्लीपर्स पहन लो और अब गलती हो गयी तोह हो गयी. ये देखो भगवन का प्रसाद रखा हुआ है. दादा जी को ये प्रसाद दो और उनसे माफ़ी मांग लो.

प्रांजल उसे हाथ पकड़ के उसके जूते उतरवाया और उसे वही दादा जी के पास राखी एक स्लीपर्स को पहना दिया. प्रांजल ने वही टेबल पे रखे हुए दही शक्कर जो की भगवन को चढ़ाया गया था उसे कटोरी में लाके वीर को थमा दिया.

प्रांजल : जाओ वीर! दादा जी को प्रसाद दो और माफ़ी मांगो.

वीर बेचारा इतना सेहम गया था आज की घटनाओ से. आज उसकी ज़िन्दगी का सबसे मनहूस और बुरा दिन था.

वीर ने प्रसाद की कटोरी हाथ में थामी और वह आगे बढ़ा hi था की फिरसे उसका परर न जाने कैसे फिसला और प्रसाद की कटोरी उसके हाथ से छटक कर सीधे उसके दादा जी की ऑर्डर जा गिरी.

सारा का सारा प्रसाद उसके दादा जी के कपड़ो पर जा गिरा.

बस! बृजेश का जो गुस्सा अभी अपनी लिमिट पर था, वो क्रॉस हो गया. वो आगे बढ़ा और-

*चटाक* *चटाक* *चटाक*

थप्पड़ो की झड़ी लगा दी और वीर के गालो पर raseed-raseed के मारते गया.

थप्पड़ो की गूँज से काव्य सेहमते हुए सब कुछ देख रही थी. उसे वाक़ई वीर पे तरस आ रहा था. आरोही भी बॉहे सिकोड़ती हुई सामने हो रहे दृश्य को देख रही थी.

वही प्रांजल और विवेक ख़ुशी से फूले नहीं समां रहे थे.

विवेक (खुसपुसाते हुए) : यही है वो ग्रैंड शो... ः!

रागिनी : ओह्ह्ह! तोह, तुम इसकी बात कर रहे थे. पर... पर, ये कुछ ज़्यादा नहीं हो गया?

विवेक : हम्फ! ज़्यादा कहा ये तोह अभी भी काम है.

रागिनी : और, ये आईडिया किस का था?

विवेक (स्माइल्स) : छोटे का...

रागिनी (हैरानी में) : प्रांजल का??? देवर जी कुछ ज़्यादा hi चतुर हो रहे है आज कल.

इधर थप्पड़ो से वीर के गाल लाल हो चले थे.

बृजेश (गुस्से में) : तू जानता है आज तूने क्या किया है? हराम खोर! वो प्रसाद हमारे कुल की देवी का था. और, तूने उसे ज़मीन पे गिरा दिया? और, वो भी पापा जी के ऊपर? नए कपडे भी ख़राब कर दिए तूने उनके. 3 लाख के तौह्फे का चुना लगा दिया. Roz-roz तेरे हाथ से कुछ न कुछ गड़बड़ होती hi है. बीटा नहीं पनौती है तू. में कहता हु निकल जा... निकल जा इसी वक़्त घर से... और, अहिंदा से इस घर में क़दम भी मत रखना.

और, बृजेश उसको हाथो से पकड़ के घसीट के बाहर ले गया और जोरर से धक्का देते हुए उसे दरवाज़े के बाहर फेक दिया.

घर में मौजूद सभी लोग दरवाज़े की ऑर्डर तेज़ क़दमों के साथ आये सिवाए मनोरथ के.

आज तक देवी के प्रसाद का ऐसा अपमान उनके कुल में किसी ने भी नहीं किया था. मनोरथ खुद अभी इस वक़्त अत्यंत दुःख और गुस्से में थे. इसी कारण उन्होंने बृजेश को भी इस बार नहीं टोका.

और, वो वही बैठे हुए chup-chap अपने hi मैं में देवी से क्षमा मांगने लगे.

बृजेश : निकल जा! निकल जा इस घर से... आज से तेरा और मेरा कोई सम्बन्ध नहीं. मर्डर गया आज से तू मेरे लिए... मेरा कोई बीटा नहीं है. ख़बरदार यदि तूने इस घर में दुबारा क़दम भी रखा तोह...

वीर कांपते हुए सब कुछ अपनी आँखों से देख रहा था, ये पल भर में क्या से क्या हो गया. आज क्यों उसके साथ ये सब हुआ?

वीर की सौतेली माँ, श्वेता सामने के नज़ारे को बड़ी hi ख़ुशी से देख रही थी. उसकी मैं की मुराद पूरी जो हो गयी थी. अब उसकी बेटी hi जायदाद की मालकिन बनेगी. यही सोचते हुए वो अपनी बेटी की ऑर्डर मुड़ी तोह देखा की उसकी बेटी, भूमिका के चेहरे पर कोई एक्सप्रेशन नहीं थे. और, ये जान कर श्वेता को ख़ुशी हुई की उसकी बेटी के मैं में भी वीर के प्रति कोई भाव नहीं है.

वीर के ासु उसकी आँखों से लगातार बहे जा रहे थे. पर, वो कुछ नहीं बोलै.

वो chup-chap उठा और बाहर की ऑर्डर चल दिया. उसने अपने जेब में से गाडी की छवि निकाली और वो गाडी ों करने hi वाला था की पीछे से बृजेश की आवाज़ आयी.

बृजेश : ये गाडी तेरी नहीं है.

और, वीर छवि को गाडी में लगे hi चोरर कर घर से बाहर निकल आया.

उसने एक झलक पीछे मुद के देखा. श्वेता और भूमिका उसे बिना कोई भाव के देख रही थी. बृजेश की आँखों में भयानक गुस्सा नज़र आ रहा था. वही उसके करुणेश चाचा भी उसे बिना कोई भाव के देख रहे थे.

उसकी सुमित्रा चची थोड़ा चिंतित ज़रूर प्रतीत हो रही थी.

विवेक और प्रांजल के चेहरों पर हलकी ख़ुशी नज़र आ रही थी. रागिनी और आरोही बॉहे सिकोड़े जैसे किसी सोच में डूबी हुई थी. जब उसकी नज़र काव्य पर गयी तोह काव्य ने सेहमते हुए सर्र झुका लिया.

बस! उसके बाद वीर पलट के घर से दूर जाने लगा. घर के सिक्योरिटी गार्ड्स भी वीर को जाता हुआ देख रहे थे.

अचानक बादल गरजे और बारिश फिरसे शुरू हो गयी.

पर, वीर न रुका. और, कुछ hi पालो में वो अपने घरवालों की नज़रो से ओझल हो चूका था.

इस वक़्त वीर को बारिश अच्छी लग रही थी. उसे अपनी लग रही थी. जब अजय से मार खाते वक़्त वो घर लौट रहा था तब भी बारिश ने उसका साथ दिया था. और, अभी जहा उसके घरवालों ने उसे घर से निकाल के उसे अकेला छोर दिया तब भी बारिश उसका साथ दे रही थी.

उसके saath-saath मौसम भी यु रो रहा था. वीर बिना कोई आवाज़ किये rote-rote बस चलता जा रहा था.

उसने अपने सीने पर लटका पेंडंट अपने हाथो में थाम लिया. एक बड़ा hi प्यारा सा पेंडंट था, एकदम अलग टाइप का.

उसे भींचते हुए वीर के ासु और तेज़ी से बहने लगे. ये वह पेंडंट था जो उसकी असली माँ ने उसे पहनाया था.

वीर को अपनी असली माँ के बारे में कुछ भी नहीं पता था. बस इतना पता था की उस माँ ने उसे जन्म दिया है. जब भी वो बृजेश से अपनी माँ के बारे में पूछता तोह बृजेश बस एक hi बात बोलता : "नाम मत लो उस कमीनी औरत का..."

उसकी माँ का नाम था भावना. वीर के जन्म के कुछ महीने बाद hi भावना घर से चली गयी थी.

कहा गयी वह, किस हाल में होगी अभी, ज़िंदा भी है या नहीं उसकी माँ, उसे कुछ नहीं पता था. यहाँ तक की उसकी माँ का नाम भी उसके दादा जी ने उसे बताया था. न hi उस औरत को लेकर घर में चर्चा होती थी न hi कोई उसके बारे में कोई टॉपिक छेड़ता था.

वीर को तोह ये भी नहीं पता था की उसकी माँ कैसी दिखती थी. कोई भी फोटो एल्बम नहीं था, उसकी माँ से जुडी कोई भी चीज़ नहीं थी घर में.

बारिश के कारण सड़को पर अभी गाड़िया भी काम चलती हुई नज़र आ रही थी. उसे नहीं पता था वो कहा जा रहा है. जब तक उसके परर चल रहे थे वो बस चलता जा रहा था. उसे अपनी सगी माँ की याद आने लगी. यदि वो यहाँ होती अभी तोह उसकी माँ उसके साथ कैसा व्यव्हार करती? क्या उसे प्यार देती? या फिर बृजेश की hi तरह वह भी...!?

पानी से भीगा हुआ वीर मैं रोड पर आ चूका था, अभी वो मुड़ने hi वाला था की एकदम से एक कार मोड़ से आयी और वीर ने पलट के कार को देखा.

पर, तब तक बहुत देरर हो चुकी थी.

कार का अगला हिस्सा उसकी पसली से टकराया और ठोकर होते hi वो ज़ोर से जाते हुए दूर गिर पड़ा.

"ओह्ह्ह्ह! नूवो...." कार में बैठे एक आदमी के मुँह से निकला.

कार को झटका लगते hi पीछे बैठी एक लड़की फौरन hi आगे की सीट से जा भिड़ी, "आआह्ह्ह्ह!"

आदमी : मैडम आप ठीक तो है न?

लड़की (सर्र मलते हुए) : हाँ! में... में ठीक हु.

फिर, जैसे hi उस लड़की ने सामने देखा तोह उसकी मानो सांसें hi अटक गयी. सामने एक लड़का ज़मीन पर डाला हुआ था और उसे समझने में देरर न लगी की abhi-abhi उसकी कार किस से टकराई थी.

वो लड़का वह बारिश में कार से भीड़ के पड़ा भीग रहा था.

लड़की (घबराते हुए) : ये... ये....

आदमी : इन् सब का समय नहीं है, मैडम. हमें जल्द hi निकलना होगा.

और, इतना बोल वह आदमी फौरन hi गाडी आगे बढ़ाने लगा.

लड़की (चिल्लाते हुए) : ये क्या बोल रहे हो आप? नहीं... हम ऐसे उसे छोर कर नहीं जा सकते.

आदमी : मैडम! बात को समझिये... इस वक़्त हमारा यहाँ से निकलना बहुत ज़रूरी है.

और, उसने कार के एक्सेलरेटर पर परर रख कार आगे बढ़ा दी.

लड़की पीछे मुद विंडो से उस लड़के को देख रही थी, उसका निचला होंठ दांतो तले जोरर से दबा हुआ था की मानो खून hi निकल आये. आँखों में हलके ासु भी आ चुके थे.

'I'm सॉरी...' उसने मैं में कहा.

और, वो कार पालक झपकते hi लोगो की नज़रो से ओझल हो गयी.

इधर एक्सीडेंट देख aas-paas के जो भी लोग दूकान के नीचे बारिश से बचने के लिए खड़े हुए थे वो दौड़ते हुए आये और वीर को उठाने लगे.





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आज के लिए इतना hi गाइस!

धन्यवाद!

दो लीव ा लिखे!
 
अपडेट - 4 ~ इन थे हॉस्पिटल

अब तक...

लड़की पीछे मुद विंडो से उस लड़के को देख रही थी, उसका निचला होंठ दांतो टेल ज़ोर से दबा हुआ था की मानो खून hi निकल आये. आँखों में हलके ासु भी आ चुके थे.

"I'm सॉरी..." उसने मैं में कहा.

और, वह कार पालक झपकते hi लोगो की नज़रो से ओझल हो गयी.

इधर एक्सीडेंट देख aas-paas के जो भी लोग दूकान के नीचे बारिश से बचने के लिए खड़े हुए थे वो दौड़ते हुए आये और वीर को उठाने लगे.


अब आगे...

"अरे... अरे... उठाओ... उठाओ..."

"जल्दी... जल्दी..."

"कार वाला मादरचोद भाग गया..."

"उठ्वाओ भाईलोग..."

और, वह मौजूद लोग फौरन hi वीर के पास आके उसे उठाने लगे. बिना बारिश की परवाह किये.

अगर, उसके परिवार वाले होते तोह क्या वह उसे इस वक़्त उठाते?

शायद हाँ? या शायद नहीं!?

"अरे इसे तोह बहुत ज़्यादा चोट आयी है, खून बह रहा है काफी, जल्दी एम्बुलेंस को कॉल करो कोई..."

वह खड़े एक आदमी ने चिल्लाया तोह अगले ने फौरन hi 108 डायल करते हुए एम्बुलेंस बुलवा ली.

अभी वो लोग सावधानी से वीर को उठा hi रहे थे की इतने में उसी मोड़ से एक और कार आयी पर भीड़ के कारण उस कार को रुकना पड़ा.

कार वाले ने जब हॉर्न मारी तोह उसे इतनी गालिया पड़ी की उसे न चाहते हुए भी रुकना पड़ा.

"धत्त बहनचोद!! इसकी माँ की आँख..." कार वाले ने स्टीयरिंग पे ज़ोर से हाथ मारते हुए चिल्लाया.

दूसरा आदमी : अब कुछ नहीं हो सकता. कार घुमा लो.

पहला आदमी : बॉस को पता चला तोह वह हमारी गर्दन न उदा दे.

दूसरा आदमी : में बॉस को समझा दूंगा. तुम कार घुमा लो.

पहला आदमी : ठीक है!

और, वो कार रिवर्स करके वह से निकल गए.

इधर लोग वीर को उठा के एक शॉप के नीचे लिटा के उसकी छोटो पर रुमाल या कपडा बाँध के jaise-taise खून रोकने की कोशिश कर रहे थे.

कुछ देरर में hi एम्बुलेंस आयी और वीर को लेके हॉस्पिटल की ऑर्डर चली गयी.

***


वीर के घर में...

सभी लोग इस वक़्त मनोरथ के कमरे में मौजूद थे. मनोरथ अपने बिस्तर पर बैठा हुआ था तोह वही बाकी सभी खड़े हुए उसे hi देख रहे थे.

मनोरथ : आज तक प्रसाद का ऐसा अपमान हमारे घर में किसी ने भी नहीं किया.

प्रांजल : दादा जी! वीर को वाक़ई ऐसा नहीं करना था.

काव्य : पर... दादा जी! वो तोह... उन्होंने jaan-boojh के नहीं किया होगा.

प्रांजल : काव्य? ये तुम क्या कह रही हो? पहली बार मानते है की उसका परर फिसल गया और वो वैसे टूट गया पर दूसरी बार भी?

प्रांजल की बात सुन्न बेचारी काव्य कुछ विरोध hi न कर पायी और सर्र झुका ली.

सुमित्रा : जेठ जी... आपको ऐसे... वीर को घर से नहीं निकालना था.

बृजेश : मैंने जो भी किया है बहुत soch-samajh के किया है. में ये क़दम पहले hi उठाने वाला था पर हमेशा पापा जी के कारण रुक जाता था. लेकिन, आज तोह उसने हद्द hi पार कर दी. आखिर उस कमीनी की कोख से जो पैदा हुआ है, ऐसा hi होना था. मेरे तोह एक भी गुड़ नहीं है उसमे.

मनोरथ : वो जैसा भी है इस परिवार का हिस्सा है. उसे जाके वापस ले आओ. अभी ज़्यादा दूर नहीं गया होगा.

बृजेश : बिलकुल भी नहीं, पापा जी. मैंने आपको पहले भी बोल के रखा है, की जिस दिन ये अपनी हद्द पार करेगा उस दिन में इसे घर से निकाल दूंगा. और, आज यही हुआ है. अब में उसे इस घर में घुसने तक नहीं दूंगा. आप अपना फैसला सुनाइए पापा जी.

मनोरथ : तोह तुम लोग उसे वापस नहीं लाओगे?

बृजेश : बिलकुल भी नहीं!

मनोरथ : तोह, फिर मेरा भी यही फैसला है. ज़मीन और जायदाद किसको मिलेगी ये भी तब hi निर्णय होगा जब परिवार का हर एक सदस्य घर में मौजूद होगा.

बृजेश : पापा जी!??

विवेक : दादा जी!? ये आप...!?

मनोरथ के फैसले से मानो सबको एक झटका सा लगा. जिस पल के लिए वो सभी बेक़रार थे की आखिर किसको ज़मीन और जायदाद दी जाएगी वो पल तोह आया hi नहीं. उल्टा, अब जब तक घर में वीर नहीं आ जाता तब तक फैसला ताल चूका था.

मनोरथ के पास ढेर साड़ी ज़मीन थी जिसकी कीमत करोडो में थी और जायदाद भी. और, ये सब कुछ घर के उसी सदस्य को मिलने वाला था जो मनोरथ की आँखों में इसके लिए सही था.

उसके 2 पेट्रोल पंप भी रहे जो उसने अपने बेटो को दे दिए थे. एक पेट्रोल पंप का मालिक जहा बृजेश था तोह वही दूसरे का मालिक करुणेश.

करुणेश ने दिमाग से पैसा कमाते हुए अपने बेटे विवेक की ऊपर लगाया और आज विवेक की खुद की एक ऑटोमोबाइल्स की कंपनी थी. भले hi वर्ल्डवाइड नहीं थी अभी पर उसका बिज़नेस zoro-shoro से चल रहा था.

करुणेश की बड़ी बेटी आरोही और छोटी बेटी काव्य, वीर के hi कॉलेज में थी और वो दोनों भी B.Tech कर रही थी. जहा आरोही और वीर की ब्रांच शामे थी ~ आईटी.

वही काव्य कस ब्रांच से बिलोंग करती थी.

प्रांजल भी शामे कॉलेज में था पर वो B.com कर रहा था. उसकी बिल्डिंग अलग थी पर साड़ी बिल्डिंग्स साथ में hi थी, जिस कारण वो ब्रेक के टाइम आरोही और काव्य से मिलने जाता रहता था.

करुणेश को अपने बेटे बेटियों की कोई चिंता नहीं थी.

पर, बृजेश का ऐसा नहीं था. बृजेश को भी एक पेट्रोल पंप दिया गया था मनोरथ द्वारा. उसने भी दिमाग से अपनी एक लक्ज़री होटल खुलवाई जो शहर में काफी मशहूर थी. जहा वो पेट्रोल पंप संभालता था तोह वही उसकी होटल उसकी दूसरी पत्नी श्वेता संभालती थी.

श्वेता के hi साथ उसकी बेटी, भूमिका भी उसका साथ देती थी.

और, आज यही फैसला लिया जाने वाला था की किसको ज़मीन और जायदाद मिलेगी.

पर, सब कुछ धरा का धरा रह गया.

मनोरथ : मेरा फैसला साफ़ है. जाओ और मुझे अकेला छोर दो अभी.

विवेक : पर, दादा जी...

मनोरथ : मैंने कहा जाओ. और, बृजेश... अगर, तुम वीर को वापस नहीं लाने वाले तोह मुझे उसके बारे में हर चीज़ बताओ. इस वक़्त कहा है वह. किसके घर ठहर रहा है? वो मेरा पोता है. में जानना चाहता हु वो सही सलामत है या नहीं?

बृजेश : ठीक.

और, घर के मुखिया की आवाज़ सुन्न सभी बेमानन वह से निकल गए.

इधर कमरे में आते hi विवेक प्रांजल पे टूट पड़ा.

विवेक : छोटे ये क्या कर दिया तूने? ये डाव तोह उल्टा hi पद गया. दादा जी ने तोह फैसला hi ताल दिया. अब जब तक वो वीर नहीं आ जाता तब तक दादा जी कोई फैसला नहीं सुनाएंगे.

प्रांजल : भैया! अब मुझे क्या पता था ऐसा हो जाएगा? मैंने तोह यही सोचा था आज वीर को दादा जी की नज़रो में गिरा दूंगा तोह दादा जी उसका नाम लेंगे hi नहीं. पर, मुझे नहीं पता था ताऊ जी उसे घर से बाहर hi निकाल देंगे.

रागिनी : मैंने कहा था ये कुछ ज़्यादा hi हो गया है.

प्रांजल : आप लोग टेंशन मत लो. हम लोग कैसे भी करके दादा जी को मन लेंगे और वो जल्द hi फैसला ले लेंगे. फिलहाल, एक मुसीबत तोह गयी.

विवेक : हम्म!! पर, छोटे तूने वो सब किया कैसे?

विवेक के सवाल करने पर प्रांजल ने मुस्कुराते हुए जेब से कुछ निकाला और उन् दोनों को दिखाया.

प्रांजल : ः! भैया! सारा कमाल इसका है.

विवेक (हैरानी में) : ये तोह... ये तोह... ये तोह तुफाईल है छोटे.

प्रांजल : ः! हाँ भैया! आपके hi यहाँ से लाया हु.

तुफाईल एक ऐसा स्लिपरी आयल जिसे ऑटोमोबाइल्स में उसे किया जाता है. न केवल ये ऑटोमोबाइल्स के लिए बल्कि ये अपनी सलीपनेस के लिए भी जाना जाता है.

प्रांजल : ये मैंने फ्लोर पर दाल दिया था. और, में वीर को वही से ले गया जहा ये आयल मैंने डाला था. बस! फिर क्या था, उसका गीला जूता जैसे hi उसपे पड़ा, वीर फिसला और वैसे सीधा नीचे... हाहाहा!

रागिनी : पर, वो प्रसाद का क्या?

प्रांजल : भाभी! वो भी इसका hi कमाल है. मैंने स्लीपर्स के नीचे भी इसे लगा के रखा हुआ था.

रागिनी (स्माइल्स) : वाह! मान गए तुम्हे भी. पर वो चोट का क्या जो वीर को पहले से hi लगी हुई थी?

प्रांजल : वो भी मेरे कहने पर हुआ था, भाभी. मेरे कई चलो में से एक है वो अजय. मैंने उसको कह के रखा था की आज पहला दिन है तोह कोई भी बहाना बना के आज जम्म के ठुकाई कर देना उस वीर की... और उसने यही किया हाहाहाहा!

विवेक : पर छोटे, वो आयल ज़मीन पर नज़र क्यों नहीं आया?

प्रांजल : कैसे आएगा, भैया? मैंने उससे कारपेट के एकदम बगल से गिराया था हाहाहा!

और, उसके साथ hi विवेक भी हस्सन लगा. रागिनी मुस्कुराते हुए दोनों को देख रही थी. जहा ये जश्न मन रहे थे तोह वही कोई और था जो इस वक़्त अपनी सासो से लड़ रहा था.

***


हॉस्पिटल...

नर्स : इसकी हालत बहुत क्रिटिकल है, डॉक्टर.

डॉक्टर : ी क्नोव. हमसे जो बन्न पड़ेगा हम करेंगे.

नर्स : Ok! मगर, इसकी फॅमिली...!? इसका मोबाइल तोह काम hi नहीं कर रहा है.

डॉक्टर : मैंने वार्ड बॉय को बोलै है वो इसके फ़ोन की सिम अपने फ़ोन में डालके इसके घर वालो को कॉल करेगा.

नर्स : हम्म!!

और, वीर का ट्रीटमेंट शुरू हो चूका था.

वार्ड बॉय ने जब वीर की सिम दाल के बृजेश को कॉल किया तोह बृजेश ने ये सोच के कॉल नहीं उठाया की ज़रूर वीर ने पैसे मांगने के लिए फ़ोन किया होगा और गुस्से में उसने अपना फ़ोन hi बंद कर दिया.

वार्ड बॉय ने जब सुमित्रा को कॉल किया तोह कॉल लग hi नहीं रहा था. कैसे लगता? प्रांजल ने अपनी माँ के फ़ोन में वीर का नंबर ब्लॉक जो कर के रखा था.

फिर उसने आखिरी नंबर जो की काव्य का था उसे कॉल किया.

इधर इस वक़्त काव्य आरोही और प्रांजल के साथ hi बैठी हुई थी. नंबर देखते hi काव्य सोच में पद गयी.

'वीर भैया मुझे क्यों कॉल कर रहे है?? फ़ोन उठा लू? ठिक्क है, उठा लेती हु.'

पर, इसके पहले की वो फ़ोन उठा पाती, प्रांजल ने उसका फ़ोन छिना लिया.

प्रांजल : ज़रा देखो तोह... वीर अब हमारी काव्य को फ़ोन लगा रहा है. क्यों काव्य?

काव्य : फ़ोन दीजिये, भैया.

प्रांजल : नहीं! ज़रूर अब अपनी प्यारी बहिन से पैसे मांगने के लिए फ़ोन कर रहा होगा. क्यूंकि, बाहर अब उसे पैसो की ज़रुरत तोह पड़ेगी hi...

और, उसने फौरन hi फ़ोन काट के उसका नंबर hi ब्लॉक कर दिया.

प्रांजल : अब तुम्हे डिस्टर्बेंस नहीं होगा बहिन हाहाहा!

काव्य : हम्म?

प्रांजल : अच्छा वो सब छोरो, चलो हम सब पिज़्ज़ा मंगवाते है.

काव्य : मेरा मैं नहीं है भैया आप hi खाओ. आज वीर भैया के साथ इतना सब कुछ हो गया और आपको पिज़्ज़ा की पड़ी है?

प्रांजल : अरे ये क्या बात हुई यार? काव्य तुम अब भी उसे अपना भाई मानती हो? वो भाई कहने लायक नहीं है, काव्य. खर्र छोरो! आरोही दी, आप तोह खाओगी न?

आरोही : नहीं!

प्रांजल : ठीक है, तोह में hi मंगवा लेता हु.

और, वह वह से चला जाता है.

काव्य अपना फ़ोन लिए सोचती रहती है की आखिर वीर ने उसे क्यों कॉल लगाया होगा. वो सोचती है की अगली बार यदि फ़ोन आया तोह वह ज़रूर उठाएगी. पर, उसे क्या पता था की प्रांजल ने वीर का नंबर hi ब्लॉक कर दिया था.

***

इधर हॉस्पिटल में एक वार्ड में एक लड़की अपनी माँ के पास बैठी हुई थी.

लड़की : माँ! अब में चलती हु... तुम ध्यान रखना, ठीक?

औरत : हाँ बीटा! मुझे क्या... तुम्हारे पापा तोह रहेंगे hi न मेरे साथ. अब तुम जाओ. रात हो रही है, बीटा. और फिर, जूही अकेली पड़ोस में ज़्यादा देरर नहीं रह पाएगी. जा बीटा.

लड़की : जी माँ! चलती हु. तुम ध्यान रखना अपना हाँ!? कोई भी दिक्कत हो तोह-

औरत : अरे बाबा! हाँ! पता है मुझे. जा अब तू.

लड़की : ठीक!

और, लड़की अपनी माँ के वार्ड से बाहर निकल आती है.

अभी वो आगे बढ़ के निकलने hi वाली थी की उसने देखा की उसकी माँ के बगल वाले वार्ड के बाहर डॉक्टर और वार्ड बॉय के बीच बहस हो रही थी जिसे देख वो रुक गयी.

डॉक्टर : देखो कैसे भी करके इसके परिवार वालो को इन्फॉर्म करो. कैसे भी करके.

वार्ड बॉय : अरे सर! किसी ने फ़ोन hi नहीं उठाया.

डॉक्टर : हाँ तोह लगाते रहो. नहीं तोह फिर पुलिस को इन्फॉर्म करो क्यूंकि उसके शरीर पे maar-peet के भी निशाँ है.

इन् दोनों की बहस चल रही थी की तभी वो लड़की जिज्ञासा पूर्वक आगे बढ़ी और उसने वार्ड में झाँक के देखा, जब उसने पेशेंट का चेहरा देखा तोह एकदम hi चौंक गयी और उसके मुँह से तेज़ स्वर में निकला, "वीईईडर!??"

डॉक्टर (पलटते हुए) : आप? आप जानती है इसे?

लड़की : हँ? में... हाँ! वह मेरा स्टूडेंट है. में उसे पिछले एक साल से जानती हु.

डॉक्टर : भगवन का शुक्र है चलो कोई तोह मिला. आपका शुभ नाम?

लड़की : निधि!

डॉक्टर : Okay, तोह निधि जी-! आप इधर आइये ज़रा मेरे साथ.


कुछ देरर बाद...

निधि वीर के कॉलेज में मैथ्स पढ़ाती थी. और, इस साल वो वीर की hi क्लास की class-teacher थी.

वो वीर को जानती भी थी. भले hi वीर पढ़ने में होशियार नहीं था पर वीर सबसे शांत बच्चा था उसकी क्लास में. और, हो भी क्यों न? उसके दोस्त hi नहीं थे.

आज निधि अपनी माँ जिन्हे कल hi अचानक माइनर हार्ट अटैक आ गया था उन्हें hi देखने के लिए हॉस्पिटल में आयी हुई थी. पर, इत्तेफ़ाक़ से उसे वीर भी यही मिल गया.

वीर के लिए साड़ी कागज़ी काम निधि ने किया और यहाँ तक की अपने पिता जी से निधि ने वीर के लिए मेडिकल फीस भी एडवांस्ड में कुछ जमा करवाने को कह दिया.

सब कुछ इतनी जल्दी हुआ की निधि की खुद समझ में नहीं आया. और, इस वक़्त वो वार्ड के दरवाज़े की विंडो गिलास से झांकते हुए वीर को देख रही थी और सोच में पड़ी हुई थी.

'ये अचानक... ये वीर हादसे में कैसे...!? और, इसके घरवाले फ़ोन क्यों नहीं उठा रहे है!? कैसे लोग है? मुझे कल जाके उनसे बात करनी पड़ेगी.'

निधि ये सोच हॉस्पिटल से निकल गयी.

पर, उसके जाते वीर की हालत बिगड़ना शुरू हो गयी थी.

नर्स : डॉक्टर...

डॉक्टर : ी क्नोव...

*बीप बीप बीप*

उसकी हार्ट बीट बिलकुल बंद होने की कगार पर आ चुकी थी.

-की तभी अचानक से ऐसा कुछ हुआ जिसके चलते उसकी हार्टबीट वापस से नार्मल हो गयी.

डॉक्टर : फेव. He's आउट ऑफ़ डेंजर नाउ.

और, कुछ देरर बाद hi डॉक्टर्स और नर्स वीर की हालत स्टेबल रूप में चोरर के बाहर आ गए.

पर, किसी को नहीं पता था...

की जब उसकी सांसें जाने hi वाली थी...

तब, उसके अंदर एक आवाज़ गूंजी थी...

जो किसी को सुनाई नहीं दी थी...

और उस आवाज़ के बोल थे...

*डिंग*

[System has been activated.]

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आज के लिए इतना hi गाइस!


धन्यवाद!
 
यहाँ से कहानी चेंज होनी शुरू हो जाएगी. ये एक एकदम hi नई प्लाट सेटिंग होनी वाली है आप लोगो के लिए. और यहाँ से hi कुछ रियल वर्ल्ड लॉजिक्स अप्लाई नहीं होंगे. आने वाले उपदटेस बोहत hi इंटरेस्टिंग और एकदम अलग किस्म के होने वाले है आपलोगो के लिए.
 
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