अपडेट - 2 ~ थे फॅमिली
अब तक...
कुछ देरर पहले हुई घटना उसके ईमान, उसके गौरव, उसकी इज़्ज़त को छल्ली कर के उसके दिमाग में घूम रही थी.
पर, वह रुका नहीं. यु ासु बहाते हुए वह अपने घर की ऑर्डर गाडी बढ़ाता रहा जो अब बस कुछ hi दूर था.
'बदला तोह में लूंगा. I'll मेक थम पाय. Chun-chun के... एक एक से chun-chun के बदला लूंगा.'
अब आगे...
मुंबई, जिसे मायानगरी के नाम से भी जाना जाता है, उस शहर में एक बहुत hi आलिशान बंगले में कुछ लोग बड़ी hi सीरियस होक एक कमरे में धीमी आवाज़ में बातें कर रहे थे.
"आज कैसे भी करके उसका पत्ता साफ़ कर दो. समझे?" एक लड़के ने भारी आवाज़ में कहा.
उसके पीछे खड़े एक नौजवान लड़के ने उसकी ऑर्डर देखा और हाँ में गर्दन हिलायी, "टेंशन मत लो, भैया. आज उसका पत्ता साफ़ हो जाएगा. मैंने बड़ा hi तगड़ा प्लान बनाया है हाहाहा!"
"कैसा प्लान?"
"भैया! आप बस देखते जाओ. आज दादा जी के डिसिशन लेते समय hi सब कुछ होयेगा. में शो ग्रैंड रखना चाहता हु हाहाहा!"
"शाबाश छोटे! बस ध्यान रहे कोई गड़बड़ न हो. और, अगर होये भी तोह तुम्हारा नाम बिलकुल भी सामने न आये. समझे?"
"हाँ, विवेक भैया! Don't वोर्री! ये प्रांजल जो भी करता है एकदम सॉलिड करता है." प्रांजल ने अपनी छाती thap-thapaate हुए कहा.
विवेक : गुड!
मुस्कुराते हुए विवेक, प्रांजल का बड़ा भाई उसके कमरे से निकल गया.
अभी वो निकला hi था की दरवाज़े के बाहर hi उसकी nayi-naveli पत्नी, रागिनी उसे देखते hi बोल पड़ी. "अरे! तुम यहाँ हो? चलो जल्दी! कुछ देरर में दादा जी अपना डिसिशन देने वाले है. सभी हॉल में इखट्टा हो रहे है."
रागिनी एक बहुत hi गज़ब की स्त्री थी. उसका जिस्म इतना परफेक्ट था मानो भगवन ने बड़ी hi फुर्सत से उसे बनाया था. 27 साल की रागिनी के स्तन कैसे हुए थे और साड़ी में तोह वो क़यामत hi धा देती थी.
उसका गोरा रंग, पतले होंठो में हलकी गुलाबी लिपस्टिक, कमर तक लटकते खुले काले बाल जो नीचे से करलेंड थे, उसके हुस्न पर चार चाँद लगा देते थे. रागिनी का बाप टवस के 2 शोरूम्स का मालिक था. पैसो की तोह कोई कमी hi नहीं थी उसके पास. और, विवेक को ऐसी पत्नी मिली थी, उसकी किस्मत के आखिर क्या कहने थे.
पर, विवेक भी कोई aira-gaira नहीं था. जब ऐसी पत्नी उसे मिली हो तोह अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं था की विवेक का खुद का परिवार कितना अमीर था.
रागिनी की बात सुन्न विवेक ने कमरे में झाँका.
विवेक (चिल्लाते हुए) : छोटे! चल बाहर जल्दी.
प्रांजल : भैया! आप जाओ मुझे तोह इम्पोर्टेन्ट काम है. ः!
रागिनी प्रश्न भरी नज़रो से विवेक को देखि, "प्रांजल को क्या काम भला इस वक़्त!?"
विवेक : तुम चलो! आज तोह बेहतरीन शो होने वाला है. हाहाहा!
और, हस्ते हुए विवेक रागिनी को लेके वह से चला गया.
पर, रागिनी की तोह समझ में hi ना आया की आखिर चल क्या रहा था. अब जब उसके पति ने कहा था कुछ बढ़िया होने वाला है तोह रागिनी केवल इंतज़ार hi कर सकती थी.
*क्लिक*
वीर ने अपने घर पहुंच कर अपनी स्कूटी से छवि घुमाते हुए गाडी बंद करि और उसे जेब में रखते हुए वह गाडी से उतरा.
वह अपने घर पहुंच चूका था. केवल नाम के लिए घर था. एक घर में एक आदमी खुशिया पाटा है, अपनों का प्यार पाटा है, घर में एकता रहती है पर उसके घर का एकदम अलग hi सन था.
जहा आदमी अपने घर पहुंच कर सुकून पाटा है और खुश होता है, वीर इस वक़्त अंदर जाने से hi कटरा रहा था और डर भी रहा था.
शाम के 7:30 बज चुके थे. और, वह पानी से भीगा, हलके खून से सना हुआ यहाँ खड़ा हुआ था. उसने अपनी स्कूटी के मिरर में अपनी शकल देखि तोह पाया उसकी एक आँख पूरी नील पद चुकी थी. इतनी बुरी तरह धोया था उसे अजय और उसके साथियो ने.
"ायर्घ्हहह!" कराहते हुए उसने अपना एक हाथ अपनी पसली पर फेरा.
वह अपने क़दम आगे बढ़ाते हुए दरवाज़े की ऑर्डर बढ़ा. उसका घर जो की नर्क से काम नहीं था. वह इतना आलिशान था की जिसे लोग देखने के बाद तारीफों के पल बाँधने लगते थे.
पर, उन्हें क्या पता था की उस बंगले में अंदर रहने वाले लोग कैसे थे.
वीर अभी बढ़ के दरवाज़े पर आया hi था की इतने में उसके कानो में किसी की आवाज़ पड़ी.
"अरे!? ये में क्या देख रहा हु? ताऊ जी का एकलौता बीटा इस हाल में? और, वह भी आज अपने कॉलेज के सेकंड ईयर के पहले दिन?"
आवाज़ सुनते hi वीर के परर वही थम गए. सामने नज़र दौड़ाई तोह देखा की उसके चाचा का छोटा बीटा, प्रांजल सामने खड़ा हुआ था.
जी हाँ! वह बांग्ला वीर का hi था.
प्रांजल फौरन आगे बढ़ उसे सहारा देने के लिए हुआ तोह वीर ने उसका हाथ गुस्से में झटक दिया और अपने पेर्रो पर hi खड़ा रहा.
प्रांजल : अरे!? अरे!? में तोह बस तुम्हारी मदद कर रहा था छोटे भाई! तुम्हारी ये हालत किसने की? नाम बताओ तुम खाली, देखना तुम्हारा भाई क्या हाल करेगा उस शक़्स का.
पर, वीर जानता था. जो कुछ भी इस वक़्त प्रांजल के मुँह से निकल रहा था, झूठ के अलावा वो और कुछ नहीं हो सकता था.
उसके जैसा कपटी और सयाना इंसान शायद hi वीर ने अपनी पूरी लाइफ में कभी देखा होगा.
प्रांजल : छोटे भाई! दादा जी का जन्मदिन है आज. गुस्सा थूक दो भाई. चलो अच्छा मेरी मदद करवा दो.
पर, वीर तोह जैसे कुछ सुनना hi नहीं चाहता था. वो अंदर जाने लगा की एक बार फिर प्रांजल ने उसका कन्धा थाम लिया.
प्रांजल : भाई! आज दादा जी अपना डिसिशन सुनाने वाले है. उन्हें कितना अच्छा लगेगा अगर तुम उन्हें अपने हाथो से उनके जन्मदिन पर गिफ्ट डोज. है न? अपना गुस्सा अपने ऊपर हावी होने मत दो छोटे भाई! चलो! अंदर तुम्हारा सब इंतज़ार कर रहे है.
वीर भले hi गुस्से में था, पर वह अपने दादा जी की बड़ी hi इज़्ज़त करता था. और, उन्हें मानता भी था. आज उसके दादा जी का जन्मदिन था और उसने पहले से hi अपने दादा जी के लिए एक गिफ्ट तैयार कर के अपने कमरे में रखा हुआ था. Jaise-taise वीर ने अपना गुस्सा निगला.
वीर : आप चलो! में अपने कमरे से दादा जी के लिए गिफ्ट लेके आता हु.
प्रांजल : अरे क्या कह रहे हो भाई? दादा जी और बाकी सब पहले से hi तुम्हारा इंतज़ार कर रहे है और ऐसे में तुम उन्हें और इंतज़ार करवाओगे? तुम अपनी हालत के बारे में मत सोचो. हम सब तोह तुम्हारे अपने hi है, है न? फिर हमारे सामने कैसी झिझक? आओ...
और, प्रांजल उसे खींचते हुए बंगले के अंदर ले गया. चाहते हुए भी वीर उसका विरोध न कर पाया.
अंदर घुसते hi एक मिनी हॉल था जहा बाहरी व्यक्तियों को बैठाया जाता था. और, ख़ास लोगो को hi उसके अंदर वाले बड़े हॉल में एंट्री अल्लोवेद थी.
अभी प्रांजल और वीर दोनों hi मिनी हॉल में थे जहा एक ख़ूबसूरत सा फ्लावर वैसे मौजूद था. उसके ird-gird एक लाल रिबन लिप्त हुआ था और हैप्पी बर्थडे का एक टैग भी लगा हुआ था.
जब वीर की नज़र उसपे पड़ी तोह वह उसे देखते hi चौंक गया, जो की लाज़मी था. वो फ्लावर वैसे इतना महंगा और इतना सुन्दर प्रतीत हो रहा था की कोई भी उसे एक बार देखने के बाद दुबारा ज़रूर देखता.
प्रांजल (खुश होते हुए) : यही है वो गिफ्ट छोटे भाई. ताऊ जी यानी की तुम्हारे डैड ने खुद इसे मंगवाया है. और, यदि तुम दादा जी को अपने हाथो से ये गिफ्ट डोज तोह वह कितना खुश हो जाएंगे, नहीं!?
पर, वीर जानता था की यह प्रांजल जो इस वक़्त भेद जैसा मासूम प्रतीत हो रहा था, वह असल में भेद नहीं बल्कि भेद के वेश में एक भेड़िया था.
वीर ने ना चाहते हुए भी हाँ में सर्र हिलाया और वैसे उठाके वो दोनों hi अंदर बड़े हॉल में प्रवेश किये.
बड़ा हॉल इतना बड़ा था और लाइट्स से इतना जगमगा रहा था की देखने वाले देखते hi रह जाए. ऊपर न जाने कितना महंगा एक झूमर लटका हुआ था जिसे देख के बस मुँह से तारीफ निकलती.
अंदर एक सिंगल सीट लक्ज़री वाले सोफे पर वीर के दादा जी बैठे हुए थे. आज उनका 80तह बर्थडे था. और, उनके agal-bagal वाले सोफे पर उनके दो बेटे बैठे हुए था. बड़ा बीटा जिसका नाम था, बृजेश. और, छोटा बीटा जिसका नाम था, करुणेश.
करुणेश : पापा जी आपको पार्टी रख लेनी चाहिए थी.
मनोरथ : हम्फ! कभी भी ये गलती मत करना. ये सब पार्टी जो तुम लोग करते हो न इसी के कारण तुम्हारे दुश्मन बढ़ते है. जितनी रईसी लोगो को दिखाओगे, उतने hi गलत इरादे लोगो के मैं में उमड़ते है.
वीर के दादा जी ने हिदायत देते हुए कहा.
इधर अंदर जैसे hi वीर और प्रांजल आये, सभी की नज़रें उन् दोनों पर जा तिकी.
वीर के पिता, बृजेश ने जैसे hi अपने लड़के की हालत देखि तोह उसकी आँखें फटी की फटी रह गयी. उसने सोफे के हट्टे को इतनी ज़ोर से भींचा मानो उसे उखाड़ के hi फेक देगा.
क्या बृजेश का ये गुस्सा अपने बेटे को इस हालत में देख के उसका ये हाल करने वाले के ऊपर था?
बिलकुल भी नहीं!
बल्कि बृजेश इस वक़्त अपने बेटे पर गुस्सा था. यदि अभी कोई और मौजूद न होता तोह उसने खड़े होक पहले hi 2-4 झापड़ वीर को रसीद दिए होते.
उसका बीटा वो भी ऐसे हाल में? वीर का ये रूप मानो बृजेश की इमेज पर एक छाता था. न जाने उसके बाकी घर वाले क्या सोच रहे होंगे अब ऐसे में.
यही सोचके उसे इतना गुस्सा आ रहा था पर उसके पिता का आज जन्मदिन था और वह कुछ भी बखेड़ा खड़ा करना नहीं चाहता था.
नकली स्माइल देते हुए उसने अपने बेटे वीर को देखा.
बृजेश : आ गए!? कहा रह गए थे इतनी देरर तक? और यह क्या हालत बना राखी है अपनी? किस से मार खा के आ रहे हो?
वीर की मानो ये सवाल सुनते hi sitti-pitti गुल हो गयी. अपने डैड की भारी भरकम आवाज़ सुनते hi उसके अंदर का डर जाग उठा. उसके हाँथ कांपने लगे थे.
इसके पहले वो कुछ जवाब दे पाटा, बगल में खड़े प्रांजल ने तपाक से बोलै.
प्रांजल : ताऊ जी! यही बात मैंने वीर से बाहर अभी पूछी थी. तोह, वीर कहने लगा की आज उसे एक सीनियर लड़की पसंद आ गयी थी. और, वीर उस लड़की को कही ले जाना चाहता था पर लड़की के प्रेमी ने विरोध किया और वीर को ये बिलकुल भी पसंद न आया और वो दोनों एक दूसरे से जा लड़े. ये उसी का नतीजा है, ताऊ जी.
प्रांजल की बात सुनते hi वीर को एक ज़ोरदार झटका लगा. उसने अपनी फटी आँखों से पलट के प्रांजल को घूरा तोह पाया की प्रांजल बड़ा hi मासूम सा चेहरा बनाये वह खड़ा हुआ था, जैसे कुछ हुआ hi न हो.
प्रांजल : मैंने वीर को समझाया भी की ऐसे maar-peet करना बिलकुल भी अच्छी बात नहीं है. वीर को तोह फिर भी काम चोट आयी है. न जाने वीर ने उस लड़के को कितनी बुरी तरह पीटा होगा.
ऐसी वाणी बोलिये, मैं का आप खोये.
औरन को शीतल करे, आपहु शीतल होये.
पर, कबीर की ये पंक्तिया इस वक़्त व्यर्थ थी.
प्रांजल ने जो मधुर वाणी बोली थी वो वीर को शीतल करना तोह दूर उसे इतना aag-baboola कर रही थी की यदि उसकी बस चलती तोह वो इसी समय प्रांजल पर टूट पड़ता.
प्रांजल की इमेज घर में एक बहुत hi संस्कारी लड़के की थी, पर वो असल में कैसा था यह बात सभी नहीं जानते थे.
बृजेश (गुस्से में) : तुम्हारी इतनी हिम्मत, वीर!?
मनोरथ : शांत हो जाओ! हल्ला नहीं!
बृजेश : पर, पापा जी-
मनोरथ : स्स्स्सस्छ्हःहः!!!
बृजेश : हम्फ!
मनोरथ : वीर! तुम्हे पता है क्या किया है तुमने?
वीर : नहीं! दादा जी... वह में...
मनोरथ : जो हुआ सो हुआ. अब इसकी चर्चा कोई नहीं करेगा.
और, सब शांत हो गए.
वीर ने जब हॉल में मौजूद सभी लोगो पर नज़रें फिराई.
तोह, उसकी नज़र अपने दादा जी के दायी ऑर्डर रखे सोफे पर गयी जहा उसके डैड, बृजेश के बगल से बैठी हुई उसकी सौतेली माँ, श्वेता उससे बॉहे सिकोड़े हुए देख रही थी.
फिर, उसकी नज़र श्वेता के बगल से बैठी हुई श्वेता की एकमात्र एकलौती बेटी, भूमिका पर गयी. जो उसे देखते hi अपना मुँह फेरर ली.
जब वीर ने दादा जी के बायीं ऑर्डर रखे सोफे पर नज़र दौड़ाई तोह देखा की उसके चाचा करुणेश और उनकी पत्नी सुमित्रा यानी की उसकी चची दोनों hi नज़रें गड़ाए उसे hi घूर रहे थे.
सुमित्रा उसे बॉहे सिकोड़े उसके चेहरे को hi देख रही थी.
उनकी hi बगल से उसके चाचा के बड़े बेटे, विवेक और उसकी पत्नी रागिनी भी बैठे हुए थे. वो दोनों भी उसे hi घूर रहे थे.
और, जब वीर ने स्टैर्स पर नज़रें दौड़ाई तोह देखा की उसके चाचा करुणेश की बड़ी बेटी आरोही और छोटी बेटी काव्य दोनों hi साथ में केक लेते हुए नीचे आ रही थी.
वो दोनों hi नीचे आयी और केक को सामने राखी कांच की एक टेबल पर रखा और साइड वही सोफे पर बैठ गयी.
जहा आरोही ने उसे एक बार देख के अपनी नज़रे फेरर ली, वही दूसरी ऑर्डर काव्य उसे ऐसी हालत में देख अपनी बॉहे सिकोड़े उसे बड़ी hi हमदर्दी से देख रही थी पर बोली कुछ नहीं.
कहा एक तरफ उसके परिवार वाले जो नए कपडे पहने, सजके बैठे हुए था और कहा वह जो पीटने के बाद एकदम गीला और खून के निशाँ और घावों से भरपूर.
मनोरथ : डॉक्टर को दिखवा के अपनी दवा करवाना मत भूलना.
वीर : ज... जी.
बृजेश (ज़ोर से) : अब khade-khade इंतज़ार क्या कर रहे हो? आगे बढ़ो और अपने दादा जी को तोहफा दो.
मनोरथ : आओ वीर!
और अपने दादा जी की सहूलियत से वीर आगे बढ़ते हुए अपने दादा जी को गिफ्ट देने जाने लगा.
.
.
.
.
.
.
.
.
.
.
आज के लिए इतना hi दोस्तों!
धन्यवाद!