- Joined
- Dec 5, 2013
- Messages
- 33,600
रिस्तोमे प्यारकी अनुभुती
अध्याय - २३०
श्रीधरके लीये पुजामे बैठनेके लीये ब्रीन्दाने जीतुलालके साथ बैठनेके लीये मना करदीया.. तो जीतुलाल तीलमीलाते गुस्सा करने लगा.. तभी ब्रीन्दाने जीतुलालकी ओर कातील स्माइल करते श्रीधरके पास बसंती ओर उनके पती विभुको बीठा दीया.. तो जीतुलाल उन दोनोको देखकर सन्न रेह गया.. ओर वहासे उठकर जवेरीलाल ओर वृन्दाके पास जाकर बैठ गया.. तो वृन्दा उनको अपने पास बैठे देखकर बहुत खुस होगइ.... अब आगे
तो दुसरी ओर हवेलीपे सबलोग सुबह थोडी देरसे जगे.. तब मंजु जागते ही अपने रुममे चली गइ.. तब दया नंगी ही देवायतसे चीपककर उनके बाजुओको तकीया बनाकर सो रही थी.. मंजु दोनोको देखकर हसने लगी.. ओर उसने दरवाजा बंध करदीया ओर दोनोके पास आकर जगाने लगी.. तब दया अपनी हालत देखकर गभराते हुअे जटसे बैठ गइ.. ओर सर्मसार होते अपनी सारीसे अपने तनको ढकने लगी..
मंजुला : (मुस्कुराते) दया बहेन.. रहेने दीजीये.. यहा तो सब कमीनी सुबह सुबह अैसी हालतमे ही मीलेगी.. कहो.. कैसी रही दोनोकी सुहागरात..? आपको नीचे कोइ तकलीफ तो नही हुइ..?
दया : (सरमाते नामे गरदन हीलाते) नही दीदी.. बहुत अच्छी रही.. दीदी.. थेन्क्स.. आपने मेरा सपना पुरा कर दीया.. आपका ओर पुनम दीदीका बहुत बहुत सुक्रीया..
मंजुला : (पास बैठपे प्यारसे सरको सहेलाते) दया बहेन.. कैसी बाते कर रही हे..? अपनोका सुक्रिया अदा नही करते.. आप तो हमारी अपनी बहेन हे.. हम सबसे बडी.. ओर आपका सपना तो तब पुरा होगा जब आप नौ महिनेके बाद हमे अेक फुल जैसी बच्ची देगी.. हें..हें..हें..
दया : (खुसीके मारे मंजुके गले लगते) दीदी.. आपको ओर पुनोदीदीको तो सब पता चल जाता हे.. आज मे बहुत खुस हु.. आपने अेक नोकरानीको इतना बडा दर्जा दिया.. मेरे पास बोलनेके लीये सब्द नही हे..
मंजुला : (सरको सहेलाते) नही दयाबहेन.. आप ओर रजीया कभी हमारी नौकरानी थी ही नही.. बस.. सीर्फ कुछ समयका इन्तजार था.. जो आगया.. अब आपको यही रहेना हे.. चलीये नहा लीजीये.. सबलोग आजाये तो वहा साहुकारके यहा सादीमे भी जाना हे.. मे लखनको जगाके आती हु.. आप हमारे पतीको भी जगा दीजीये..
दया : (सरमाते धीरेसे) दीदी.. अेक बात पुछु..? चलो मे तो आपकी बहेन हु.. हमारे बापुकी सुतान.. तो फीर रजुदीदी..? उसने भी लखन भैयासे सादी करली हे.. तो क्या वो भी..
मंजुला : (पास सटकर बैठते धीरेसे) दीदी.. आज तक कीसीने उनके बारेमे पुछा नही.. लेकन आज आपको बताती हु.. याद रखना ये बात रजु दीदीको पता नही लगनी चाहीये.. जीस तराह वो हमारे घरपे काम कर रहीथी उसी तराह अेक जमानेमे उनकी मां भी यहा काम करती थी.. जो अेक विधवा थी.. आप समज गइनां..?
दया : (मुस्कुराते) जी दीदी.. सबकुछ समज गइ.. मुजे ओर कुछ नही जानना.. बस.. इतना सुनकर ही खुस हुकी वो भी हमारी बहेन हे..
मंजुला : (मुस्कुराते खडी होते जाते) दीदी.. कुछ राज राज ही रहेने देना चाहीये.. हें..हें..हें..
कहेते मंजु उपरके रुममे चली गइ.. तो रमा ओर नीलमके रुममे नजर डालती हे.. तो वो मां बेटी भी नंगी अेक दुसरेसे चीपककर सोइ हुइ थी.. तो मंजु मुस्कुराते लखनके कमरेमे चली गइ.. तो लखन घोडे बेचकर सो रहा था.. ओर उनके लोअरमे अब भी बहुत बडा तंबु दीख रहा था.. तब मंजु उनके पास बेडपे बैठ गइ.. ओर थोडी देर उस तंबुकी ओर देखती रही.. फीर मुस्कुराते लखनके सरको सहेलाते उसे जगाती हे..
लखन : (जटसे बैठते) अरे भाभीमां आप..? मुजे आवाज लगाती.. मे आजाता..
मंजुला : (मुस्कुराते) नही.. मे मेरे राजा बेटेको देखने ओर उनसे कुछ बाते करने आइ थी.. क्युकी तेरे पास तो इस मांके साथ बैठकर बाते करनेका टाइम ही नही हे.. तो मुजे आना पडा..
लखन : (बैठेही हग करते) नही मोम.. बस आप हुकुम कीजीये आपका बेटा हाजीर होजायेगा.. कहीये क्या बात करनी थी..? कुछ खास बात थी क्या..?
मंजुला : (मुस्कुराते गाल सहेलाते) हां बेटा.. वो भी सीर्फ तुमसे बात करनी थी.. इसीलीये तो मे यहा आइ हु.. सुन.. अब मे चाहती हु तुम तेरी सभी जीम्वेवारी अच्छी तराह सम्हाल लो..
लखन : (मुस्कुराते) भाभीमां.. मेने हमारे बीजनेसका काम भी सुरु करदीया हे.. ओर सुरुआत भी अच्छी हुइ.. हमारे पार्टनर भी बहुत अच्छे हे.. तो कोइ प्रोबलेम नही हे.. फीर भी मे सब देख रहा हु..
मंजुला : (मुस्कुराते) गुड.. बेटे मे सीर्फ बीजनेसकी बात करने नही आइ.. वोतो तुम अच्छेसे सम्हालने लगे हो.. हमे सब दीख रहा हे.. मुजे कुछ ओर बात भी करनी हे.. सुन.. क्या सृतीके साथ कुछ अनबन हुइ हेनां..?
लखन : (सर जुकाते धीरेसे) जी भाभीमां.. आपको ओर पुनोदीदीको सब पता हे क्या हुआ था.. इसमे मेरी कोइ गलती नही थी.. मेने उनको बहुत मना कीया था.. पर वो नही मानी.. ओर मुजे खरी खोटी सुननी पडी..
मंजुला : (मुस्कुराते) बेटा.. जानती हु मे.. की तेरी कोइ गलती नही थी.. सुन.. तुम हम ओरतोको कभी समज नही पाओगे.. इसीलीये तुजे थोडा समजाने आइ हु.. वो तो यहासे जाते वक्त ही तुमसे रीलेशन बनानेका मन बनाकर गइ थी.. बस.. तेरी ज्यादा सरीफाइ ओर अच्छाइसे बात नही बनी.. क्युकी तुम दोनोके बीच देवर भाभीका रीस्ता आडे आ रहा था.. तुम इतना भी सरीफ मत बनो.. कमसे कम इस घरकी ओरतोके सामने तो कभी नही.. समज गया..?
लखन : (आस्चर्यसे सामने देखते) भाभीमां.. मे कुछ समजा नही.. आप खुलकर बताओनां.. क्युकी मुजे दिलके अेक कोनेमे अब भी लगता हे मे बडे भैयाको चीट कर रहा हु..
मंजुला : (मुस्कुराते) बेटा.. कोइ चीट नही हे.. वो भीतो यही करेगे.. अब तुजे कैसे समजाउ..? क्या जमाना आ गया हे.. अब मुजे अपने बेटेको ही थोडा बदमास बननेका ज्ञान देना पड रहा हे.. हें..हें..हें..
लखन : (सरमाते मुस्कुराते) मोम.. अब ये सब आप नही कहोगी तो कौन कहेगा..? बताइअेनां..
मंजुला : (मुस्कुराते) हंम.. ठीक हे बेटा.. सुन.. ओरत चाहे कीतनी ही कामी क्युना हो.. वो पहेल कभी नही करेगी.. हर ओरत हमेसा चाहती हेकी पहेल हमेसा पुरुष ही करे.. ओर हमारे घरकी तो सभी ओरते कामी हे.. वो क्यु..? ये तुजे भी पता हे.. इस बारेमे तुजे बतानेकी जरुरत नही हे.. तो तुम कीसको भी मीलनेमे संकोच मत करो की वो क्या सोचेगी.. रीस्तेमे क्या हे.. बस.. तुजे अपना कर्तव्य नीभाना हे..
अध्याय - २३०
श्रीधरके लीये पुजामे बैठनेके लीये ब्रीन्दाने जीतुलालके साथ बैठनेके लीये मना करदीया.. तो जीतुलाल तीलमीलाते गुस्सा करने लगा.. तभी ब्रीन्दाने जीतुलालकी ओर कातील स्माइल करते श्रीधरके पास बसंती ओर उनके पती विभुको बीठा दीया.. तो जीतुलाल उन दोनोको देखकर सन्न रेह गया.. ओर वहासे उठकर जवेरीलाल ओर वृन्दाके पास जाकर बैठ गया.. तो वृन्दा उनको अपने पास बैठे देखकर बहुत खुस होगइ.... अब आगे
तो दुसरी ओर हवेलीपे सबलोग सुबह थोडी देरसे जगे.. तब मंजु जागते ही अपने रुममे चली गइ.. तब दया नंगी ही देवायतसे चीपककर उनके बाजुओको तकीया बनाकर सो रही थी.. मंजु दोनोको देखकर हसने लगी.. ओर उसने दरवाजा बंध करदीया ओर दोनोके पास आकर जगाने लगी.. तब दया अपनी हालत देखकर गभराते हुअे जटसे बैठ गइ.. ओर सर्मसार होते अपनी सारीसे अपने तनको ढकने लगी..
मंजुला : (मुस्कुराते) दया बहेन.. रहेने दीजीये.. यहा तो सब कमीनी सुबह सुबह अैसी हालतमे ही मीलेगी.. कहो.. कैसी रही दोनोकी सुहागरात..? आपको नीचे कोइ तकलीफ तो नही हुइ..?
दया : (सरमाते नामे गरदन हीलाते) नही दीदी.. बहुत अच्छी रही.. दीदी.. थेन्क्स.. आपने मेरा सपना पुरा कर दीया.. आपका ओर पुनम दीदीका बहुत बहुत सुक्रीया..
मंजुला : (पास बैठपे प्यारसे सरको सहेलाते) दया बहेन.. कैसी बाते कर रही हे..? अपनोका सुक्रिया अदा नही करते.. आप तो हमारी अपनी बहेन हे.. हम सबसे बडी.. ओर आपका सपना तो तब पुरा होगा जब आप नौ महिनेके बाद हमे अेक फुल जैसी बच्ची देगी.. हें..हें..हें..
दया : (खुसीके मारे मंजुके गले लगते) दीदी.. आपको ओर पुनोदीदीको तो सब पता चल जाता हे.. आज मे बहुत खुस हु.. आपने अेक नोकरानीको इतना बडा दर्जा दिया.. मेरे पास बोलनेके लीये सब्द नही हे..
मंजुला : (सरको सहेलाते) नही दयाबहेन.. आप ओर रजीया कभी हमारी नौकरानी थी ही नही.. बस.. सीर्फ कुछ समयका इन्तजार था.. जो आगया.. अब आपको यही रहेना हे.. चलीये नहा लीजीये.. सबलोग आजाये तो वहा साहुकारके यहा सादीमे भी जाना हे.. मे लखनको जगाके आती हु.. आप हमारे पतीको भी जगा दीजीये..
दया : (सरमाते धीरेसे) दीदी.. अेक बात पुछु..? चलो मे तो आपकी बहेन हु.. हमारे बापुकी सुतान.. तो फीर रजुदीदी..? उसने भी लखन भैयासे सादी करली हे.. तो क्या वो भी..
मंजुला : (पास सटकर बैठते धीरेसे) दीदी.. आज तक कीसीने उनके बारेमे पुछा नही.. लेकन आज आपको बताती हु.. याद रखना ये बात रजु दीदीको पता नही लगनी चाहीये.. जीस तराह वो हमारे घरपे काम कर रहीथी उसी तराह अेक जमानेमे उनकी मां भी यहा काम करती थी.. जो अेक विधवा थी.. आप समज गइनां..?
दया : (मुस्कुराते) जी दीदी.. सबकुछ समज गइ.. मुजे ओर कुछ नही जानना.. बस.. इतना सुनकर ही खुस हुकी वो भी हमारी बहेन हे..
मंजुला : (मुस्कुराते खडी होते जाते) दीदी.. कुछ राज राज ही रहेने देना चाहीये.. हें..हें..हें..
कहेते मंजु उपरके रुममे चली गइ.. तो रमा ओर नीलमके रुममे नजर डालती हे.. तो वो मां बेटी भी नंगी अेक दुसरेसे चीपककर सोइ हुइ थी.. तो मंजु मुस्कुराते लखनके कमरेमे चली गइ.. तो लखन घोडे बेचकर सो रहा था.. ओर उनके लोअरमे अब भी बहुत बडा तंबु दीख रहा था.. तब मंजु उनके पास बेडपे बैठ गइ.. ओर थोडी देर उस तंबुकी ओर देखती रही.. फीर मुस्कुराते लखनके सरको सहेलाते उसे जगाती हे..
लखन : (जटसे बैठते) अरे भाभीमां आप..? मुजे आवाज लगाती.. मे आजाता..
मंजुला : (मुस्कुराते) नही.. मे मेरे राजा बेटेको देखने ओर उनसे कुछ बाते करने आइ थी.. क्युकी तेरे पास तो इस मांके साथ बैठकर बाते करनेका टाइम ही नही हे.. तो मुजे आना पडा..
लखन : (बैठेही हग करते) नही मोम.. बस आप हुकुम कीजीये आपका बेटा हाजीर होजायेगा.. कहीये क्या बात करनी थी..? कुछ खास बात थी क्या..?
मंजुला : (मुस्कुराते गाल सहेलाते) हां बेटा.. वो भी सीर्फ तुमसे बात करनी थी.. इसीलीये तो मे यहा आइ हु.. सुन.. अब मे चाहती हु तुम तेरी सभी जीम्वेवारी अच्छी तराह सम्हाल लो..
लखन : (मुस्कुराते) भाभीमां.. मेने हमारे बीजनेसका काम भी सुरु करदीया हे.. ओर सुरुआत भी अच्छी हुइ.. हमारे पार्टनर भी बहुत अच्छे हे.. तो कोइ प्रोबलेम नही हे.. फीर भी मे सब देख रहा हु..
मंजुला : (मुस्कुराते) गुड.. बेटे मे सीर्फ बीजनेसकी बात करने नही आइ.. वोतो तुम अच्छेसे सम्हालने लगे हो.. हमे सब दीख रहा हे.. मुजे कुछ ओर बात भी करनी हे.. सुन.. क्या सृतीके साथ कुछ अनबन हुइ हेनां..?
लखन : (सर जुकाते धीरेसे) जी भाभीमां.. आपको ओर पुनोदीदीको सब पता हे क्या हुआ था.. इसमे मेरी कोइ गलती नही थी.. मेने उनको बहुत मना कीया था.. पर वो नही मानी.. ओर मुजे खरी खोटी सुननी पडी..
मंजुला : (मुस्कुराते) बेटा.. जानती हु मे.. की तेरी कोइ गलती नही थी.. सुन.. तुम हम ओरतोको कभी समज नही पाओगे.. इसीलीये तुजे थोडा समजाने आइ हु.. वो तो यहासे जाते वक्त ही तुमसे रीलेशन बनानेका मन बनाकर गइ थी.. बस.. तेरी ज्यादा सरीफाइ ओर अच्छाइसे बात नही बनी.. क्युकी तुम दोनोके बीच देवर भाभीका रीस्ता आडे आ रहा था.. तुम इतना भी सरीफ मत बनो.. कमसे कम इस घरकी ओरतोके सामने तो कभी नही.. समज गया..?
लखन : (आस्चर्यसे सामने देखते) भाभीमां.. मे कुछ समजा नही.. आप खुलकर बताओनां.. क्युकी मुजे दिलके अेक कोनेमे अब भी लगता हे मे बडे भैयाको चीट कर रहा हु..
मंजुला : (मुस्कुराते) बेटा.. कोइ चीट नही हे.. वो भीतो यही करेगे.. अब तुजे कैसे समजाउ..? क्या जमाना आ गया हे.. अब मुजे अपने बेटेको ही थोडा बदमास बननेका ज्ञान देना पड रहा हे.. हें..हें..हें..
लखन : (सरमाते मुस्कुराते) मोम.. अब ये सब आप नही कहोगी तो कौन कहेगा..? बताइअेनां..
मंजुला : (मुस्कुराते) हंम.. ठीक हे बेटा.. सुन.. ओरत चाहे कीतनी ही कामी क्युना हो.. वो पहेल कभी नही करेगी.. हर ओरत हमेसा चाहती हेकी पहेल हमेसा पुरुष ही करे.. ओर हमारे घरकी तो सभी ओरते कामी हे.. वो क्यु..? ये तुजे भी पता हे.. इस बारेमे तुजे बतानेकी जरुरत नही हे.. तो तुम कीसको भी मीलनेमे संकोच मत करो की वो क्या सोचेगी.. रीस्तेमे क्या हे.. बस.. तुजे अपना कर्तव्य नीभाना हे..









