Incest मटकनी गांड का कमाल - Page 4 - SexBaba
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Incest मटकनी गांड का कमाल

रात को सुगंधा अपने बिस्तर पर क्लास वाली घटना के बारे में ही सोच रही थी और इस घटना के बारे में सोचकर वह पूरी तरह से उत्तेजित हुए जा रही थी वह अपने मन में यही सोच रही थी कि वह लड़के भी तो उसके बेटे की ही उम्र के थे लेकिन उन दोनों की सोच कितनी गंदी थी एक औरत को लेकर वह एक औरत को या तो किसी भी औरत के बारे में कितना गंदा सोच रखते थे जब वह लोग अपनी टीचर को ही इस नजर से देखते हैं तो घर में भी तो अपनी मां बहन को भी गंदी नजरों से देखते होंगे यही सब सोच कर सुगंधा अपने बेटे के बारे में सोच रही थी कि जब वह लड़के उसके बारे में इतना गंदा सोच सकते हैं तो उसका बेटा उसकी जवानी देखकर उसकी भरी हुई मदहोश कर देने वाली जवान देखकर उसके नितंबों का उभार और चूचियों की गोलाई देखकर क्यों नहीं उसकी तरफ आकर्षित होता,,,।

वह अपने मन में यही सब सो कर उत्तेजित हुए जा रही थी और धीरे-धीरे अपने कपड़ों को उतारती जा रही थी वह अपने मन में अपने आप से ही बात करते हुए बोल रही थी कि वह लड़के तो उसे छोड़ने के लिए बोल रहे थे उसकी बड़ी-बड़ी गांड देख कर उत्तेजित हो गए थे लंड खड़ा हो गया था उन लड़कों का तो उसके लड़के का क्यों नहीं खड़ा होता लंड उसकी बड़ी-बड़ी गांड देखकर चुची देखकर क्यों उसका मन नहीं करता चोदने को अपनी मां को,,,, आखिरकार उन लड़कों की उम्र और उसके लड़के की उम्र एक ही तो थी तो उसके लड़के में यह सब बदलाव क्यों नहीं होता है एक औरत को देखकर एक खूबसूरत औरत को देख कर क्यों हुआ उत्तेजित नहीं होता कि उसका लंड खड़ा नहीं होता,,,, चोदने के लिए,,, ऐसा अपने आप से ही बात करते हुए वह धीरे-धीरे अपने कपड़े उतार कर पूरी तरह से नंगी हो गई,,, और एक बार फिर से अपने बेटे की कल्पना करके अपनी दोनों टांगों को खोल दी और फिर अपनी उंगलियों को अपनी गुलाबी बुर में डालकर अपनी जवानी की गर्मी को शांत करने की कोशिश करने लगी,,,।

दूसरे दिन सुबह जब किचन में काम कर रही थी तब तृप्ति बालों में कंघी करते हुए अपनी मां से बोली,,,।

मम्मी मुझे कुछ किताबें चाहिए,,,।

हां तो पैसे ले ले जाकर खरीद लेना,,,

नहीं मम्मी तुम खरीद कर ले आना तुम उसे किताब वाली मार्केट चलाती हो ना जहां पर आधे कीमत में ही किताबें मिलती है,,, वहीं से खरीद लेना,,,,

हां यह तु ठीक कह रही है,,, लेकिन किताबें कौन सी लानी है,,,

मैं तुमको लिख कर दे देता हूं तुमको समय मिले तो खरीद लेना,,,,

तुझे चाहिए कब,,,,,

परसों ही चाहिए क्योंकि एग्जाम की तैयारी करना है ना,,,,

तो ठीक है मैं कल जाकर ले लेती हूं वैसे भी मुझे भी कुछ किताबें खरीदना है,,,,

ठीक है मम्मी मैं अभी लिखकर लाती हूं,,,,

(थोड़ी देर में तृप्ति एक कागज के टुकड़े पर उसे जो किताबें चाहिए थी उसका नाम लिखकर अपनी मम्मी के हाथ में थमा दी,,, तीन किताबें थी और सुगंधा जानती थी कि उस किताब वाली मार्केट में जरूर मिल जाएगी,,,, सुगंधा इस बात से भी खुश थी की उसकी बेटी बहुत समझदार हो गई है वह चाहती तो नहीं किताबें ले सकती थी लेकिन,,, जब वही किताबें आधे कीमत में मिलती हो तो नई किताबें लेकर क्या फायदा इस बात को तृप्ति अच्छी तरह से जानती थी और सुगंध भी अपने बच्चों के लिए वही से ही किताबें खरीद कर लाती थी,,,, थोड़ी देर में सुगंधा खाना बना कर नाश्ता तैयार करके खुद भी तैयार होने लगी,,,)

दूसरे दिन स्कूल से छूटने के बाद वह सीधा इस किताब के बाजार में चली गई चौकी उसकी स्कूल से तकरीबन 2 किलोमीटर और आगे था अपने स्कूल के बाहर ही वह रिक्शा पड़कर थोड़ी ही देर में किताब के बाजार में पहुंच गई,,, यहां पहुंच कर देखी की मार्केट में कुछ ज्यादा भीड़भाड़ था इसलिए वह धीरे-धीरे आगे जाने लगी वह अपने बच्चों के लिए किताबें एक ही दुकान से खरीदती थी और वह दुकान वाला सुगंध को अच्छी तरह से जानता था इसलिए किताबों पर अच्छा खासा डिस्काउंट भी दे देता था काउंटर पर पहुंच कर सुगंधा ने उसे दुकान वाले को परची थमा दी और वह दुकान वाला किताबें निकालने लगा,,,,। और सुगंधा इधर-उधर नजर घुमा कर देखने लगी,, उसे दुकान में किताब के साथ-साथ बहुत सारी स्टेशनरी के साथ-साथ दूसरी वस्तुएं भी मिलती थी जैसे की हेयर तेल साबुन वगैरह-वगैरह जो की काउंटर के पास में ही कांच वाले काउंटर में सजा कर रखा हुआ था तभी उसकी नजर,,,, एक छोटे से पूछ पर गई जिस पर कुछ गंदी तस्वीर छपी हुई थी जिसमें एक मर्द औरत आलिंगन होकर एक दूसरे के होठों का रस चूस रहे थे,,, पहले तो सुगंध को समझ में नहीं आया कि वह वस्तु क्या है जो इतना अश्लील चित्र होने के बावजूद कि उसे दुकान वाले ने उसे काउंटर में सजा कर रखा है लेकिन जब बड़े गौर से उसे पूछ के ऊपर लिखे हुए नाम को पढ़कर देखी तो उसके होश उड़ गए उसकी दोनों टांगों के बीच हलचल होने लगी वह कोहिनूर कंडोम था जिसे देखते ही उसकी सांसे ऊपर नीचे होने लगी,,, उसके पति ने कभी भी कंडोम का उपयोग नहीं किया था इसलिए उसने आज तक कंडोम को अपनी आंखों से देखी भी नहीं थी लेकिन इतना जानती जरूर थी कि कंडोम एक ऐसा प्रोडक्ट है जिसे मर्द इस्तेमाल करते हैं जो कि गर्भ निरोधक के लिए काम आता है,,,

उसे प्रोडक्ट के बारे में सुगंधा और कुछ सोचती इससे पहले ही वह दुकान वाला किताबें लेकर काउंटर पर पहुंच गया और सुगंध भी अपनी नजरों को उसे कंडोम के पैकेट से हटा दी,,,,।

कितना हुआ भैया,,,,

रुकिए हिसाब करके बताता हूं,,,,(इतना कहने के साथ ही वहां तीनों किताब की कीमत लिखकर उसे जोड़ने लगा लेकिन तभी सुगंधा ने उसे काउंटर वाले आदमी पर गौर की वह तिरछी नजरों से उसकी छतिया की तरफ देख रहा था जो की हल्की सी पारदर्शी साड़ी होने की वजह से उसकी चूचियों के बीच की पतली दरार काफी खूबसूरत नजर आ रहा था उसे देखकर वह मन ही मन उत्तेजित हो रहा था इस बात का अहसास होते ही सुगंधा एकदम से सचेत हो गई लेकिन वह उसे काउंटर वाले आदमी के सामने अपनी साड़ी को ठीक करना भी नहीं चाहती थी क्योंकि ऐसा करने पर उसे आदमी को एहसास हो सकता था कि उसने उसकी हरकत को देख ली है इसलिए वह एकदम सहज बनने की कोशिश करने लगी,,,, और वह भी तिरछी नजर से उसे आदमी की तरफ देखने लगी और इस तरह से इधर-उधर देखने लगी कि मानो जैसे कुछ हुआ ही ना हो वह आदमी अभी भी उसकी छातियों की तरफ घूर-घूर कर देख रहा था और बिल बना रहा था,,, उसे आदमी की हरकत को देखकर सुगंध अपने मन में सोचने लगी की दुनिया के सारे मर्द उसकी छाती की तरफ देखते हैं लेकिन उसका बेटा ही नहीं देखता,,,।

थोड़ी देर में बिल बनकर तैयार हो गया और उसे दुकान वाले ने बिल सुगंधा के हाथों में थमा दिया लेकिन बिल थमते समय अपनी उंगली से उसके हाथ की उंगली को स्पर्श कर लिया मानो इतने से ही वह पूरी तरह से सुगंधा को का गया हो वह अंदर ही अंदर एकदम उत्तेजित और प्रसन्न हो गया उसकी हरकत का एहसास सुगंधा को भी अच्छी तरह से था लेकिन वह कुछ बोल नहीं पा रही थी क्योंकि यह सब बेहद सहज था लेकिन बिल देखकर वह उसे काउंटर वाले दुकानदार से बोली,,,)

भैया हम तो तुम्हारे पुराने ग्राहक है थोड़ा तो डिस्काउंट दीजिए,,,।

देखिए बहन जी जो बिल मैंने आपको दिया है वह डिस्काउंट काट कर ही है लेकिन आप हमारे पुराने ग्राहक हैं इसलिए ₹20 ऊपर के कम कर दीजिए,,,,(इतना कहते हुए वह सुगंधा की चूचियों की तरफ देखकर मुस्कुराने लगा,,,, सुगंधा भी जल्दी से अपने पर्स में से ₹200 निकालकर उसे दुकानदार को थमा दी और फिर वह भी मुस्कुराते हुए दुकान की सीढ़ियां उतर गई,,,, और अपने मन में सोच रही थी कि वह उसे दुकानदार को भैया बोल रही थी और वह दुकानदार भी उसे बहन जी बोल रहा था लेकिन उसे मौका मिलता तो अपनी बहन पर चढ़ने से बिल्कुल भी नहीं शर्म करता,,,, इतने से ही सुगंधा को इस बात का ख्याल हो रहा था कि दुनिया में रिश्तेदारी कोई मायने नहीं रखती बस अपनी अपनी जरूरत पूरी होनी चाहिए,,,,

उस किताब के बाजार में सब्जी मार्केट भी थी तो सुगंधा घर के लिए सब्जियां भी खरीदने लगी,,,,,,, सब्जियां खरीदने खरीदे थे उसे थोड़ी देर होने लगी क्योंकि शाम धीरे-धीरे ढल रही थी उसे मालूम था कि आज देर हो चुकी है इसलिए वह सब्जी लेकर और बच्चों के लिए थोड़ा समोसा और जलेबी लेकर वह रिक्शा पकड़ने के लिए जल्दी-जल्दी आगे बढ़ने लगी वह फुटपाथ पर चल रही थी और फुटपाथ पर जगह-जगह पर किताबें बिक रही थी एक जगह पर स्ट्रीट लाइट के नीचे आकर वह रुक गई और बिछी हुई किताबों को देखने लगी जिसमें सारा शरीर मनोहर कहानियां और फिल्मों से संबंधित कुछ किताबें रखी हुई थी सुगंधा को किताबें पढ़ने का भी बहुत शौक था,,, खास करके सरस सलिल वह पढ़ा करती थी,,,, वह धीरे से नीचे झुक कर कुछ सरस सलिल की मैगजीन को इधर-उधर करने लगी और उनमें से दो मैगजीन निकाल कर उसे अपने हाथ में पकड़ लिया और तभी उसकी नजर मनोहर कहानियां पर गई तो वह एक मनोहर कहानी उठाकर उसे जैसे ही पढ़ने को हुई कि उसमें एक दूसरी किताब उसी नजर आ गई जिसके पृष्ठ पढ़ने पर लिखा था,,, मदहोश जवानी,,, सुगंधा पहली बार इस तरह की किताब को अपने हाथ में ली थी और लेखक का नाम था मस्तराम यह सब उसके लिए पहली बार था वह उत्सुकता में उसे किताब को,,, अपने हाथ में लेकर उसके पन्ने पलटने लगी,,,,,, तभी पहले पन्ने पर ही कहानी का शीर्षक उसे दिखाई दिया दूध का कर्ज़,,,,
 
कहानी के शीर्षक को पढ़कर सुगंधा को ऐसा ही लग रहा था कि जैसे कोई सामान्य कहानी होगी,,, सुगंधा इस तरह से खड़ी थी उसके हाथ में तो किताबें सरल सलीम की थी और दूसरे हाथ में मनोहर कहानी की थी और उसके बीच में एक दूसरी किताब थी जिसके पन्ने पलट रही थी पहले पन्ने का तो वह सिर्फ शीर्षक ही पड़ी थी,, लेकिन,दूसरा पन्ना पलट करवा उसकी दो-तीन लाइन पढ़ने की कोशिश करने लगी और पहले ही लाइन पढ़कर उसके होश उड़ गए जिसमें लिखा था अपनी मां की गुलाबी बुर देखकर संजय का लंड एकदम से खड़ा हो गया,,,, इतना पढ़ते ही सुगंधा के तो होश उड़ गए उसे समझ में नहीं आ रहा था कि यह कौन सी किताब है वह एक लाइन पढ़कर ही अपने चारों तरफ देखने लगी कि कहीं कोई उसे देख तो नहीं रहा है लेकिन उसकी किस्मत अच्छी थी कि वहां दूसरा कोई भी नहीं था इसलिए उसकी हिम्मत बढ़ने लगी और बात दूसरी लाइन बिना पढ़े तीसरे पढ़ने की तरफ आगे बढ़ गई जिसमें लिखा था,,,, संजय अपनी मां की दोनों टांगों को खोलकर उसकी मोटी मोटी जांघों को अपने दोनों हाथों से पकड़ कर उसे अपनी जांघों पर खींच लिया,,, संजय की मां पूरी तरह से व्याकुल थी अपने बेटे के साथ हम बिस्तर होने के लिए वह अपने दोनों हाथों से अपनी चूची पकड़ कर जोर-जोर से दबा रही थी,,,, सुगंधा के तो होश उड़ गए उसकी बुर से पानी निकलने लगा हुआ पूरी तरह से मदहोश हो चुकी थी वह समझ नहीं पा रही थी कि यह कैसी कहानी है लेकिन उसका मन बिना पढ़े मचल रहा था वह आगे की लाइन पढ़ने लगी,,,,

संजय अपने लंड पर ढेर सारा थूक लगाकर उसे चिकना कर रहा था और थोड़ा सा तोक अपनी मां की बुर पर भी लगा कर उसे चिकनाहट दे रहा था और थोड़ी देर में अपने मोटे लंड के सूखने को अपनी मां की बुर के मुख्य द्वार पर रखकर जोर से धक्का मारा और उसका पूरा लंड एक ही बार में उसकी मां की बुर में घुस गया,,,,

अब तो सुगंधा से रहा नहीं जा रहा था सुगंध पूरी तरह से पागल हो चुकी थी केवल चार-पांच लाइन पढ़कर ही,,,,, उसका वहां ज्यादा देर तक खड़ा रहना उचित नहीं था,,,, वह उस किताब वाले से बोली,,,

कितना हुआ भाई साहब,,,

₹40 हुए बहन जी,,,,

लेकिन तीन किताबों के तो तीस ही रुपए हुए ना,,,

बहन जी मनोहर कहानी के अंदर एक और किताब है उसका लेकर 40 रुपए हुए,,,,

(उसे किताब वाले की बात सुनकर सुगंधा शर्मिंदा हो गई उसे लग रहा था कि अनजाने में ही वह किताब उसे मनोहर कहानी के अंदर है जबकि ऐसा बिल्कुल भी नहीं था उसका बेचने का यही तरीका था क्योंकि वह जानता था कि वह चीज किताब को मनोहर कहानी में रख रहा है अगर कोई भी खरीदने वाला एक बार पड़ेगा तो वह उसे पूरा पढ़े बिना नहीं रह पाएगा और इसके लिए उसे खरीदना ही होगा जैसा की सुगंधा को भी लग रहा था कि वह इस किताब को जरूर पूरा पढेगी,,,, वह अपने चारों तरफ नजर घुमा कर देखी कि कहीं कोई देख तो नहीं रहा है और ऐसे भी यह जगह बहुत दूर थी और यहां पर उसकी पहचान वाला कोई नहीं था इसलिए वह निश्चिंत होकर लेकिन जल्दबाजी में वह किताब को अपने थेले में रख ली ताकि कोई देख ना ले और अपने पर्स में से ₹40 निकालकर उस किताब वाले को दे दी,,, और फिर थोडा आगे जाकर ओटो पकड़ के अपने घर पहुंच गई,,,,।

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सुगंधा अपनी बेटी के कॉलेज की किताब के साथ-साथ अपने काम की भी किताब खरीद चुकी थी सरस शलील के साथ-साथ मनोहर कहानियां के अंदर रखी हुई उसे अश्लील साहित्य को अपने साथ खरीद लाई थी वैसे तो उसे अश्लील साहित्य का केवल चार-पांच लाइन का ही वह पठन कर पाई थी,,, लेकिन इतना ही कहानी की गहराई को जानने के लिए काफी था,,,,,, बस इतनी सी ही लाइन पढ़कर वह समझ गई थी कि यह कहानी मां बेटे के बीच के अवैध संबंध को लेकर हैं लेकिन क्या है कैसे हैं इसके बारे में वह जानने के लिए पूरी तरह से उत्सुक हो गई थी,,,।

पहली बार इस तरह के अश्लील साहित्य को खरीदने में उसके बदन में अजीब सी हलचल हो रही थी वह तो अच्छा था कि वहां कोई दूसरा नहीं था वह केवल अकेली ही थी वहां पर किताब खरीदने वाली क्योंकि शाम ढलने लगी थी इसलिए लोग अपने-अपने घरों की तरफ चले जा रहे थे किसी को भी वहां खड़े रहने की जल्दबाजी दिखाई नहीं दे रही थी,,,, सुगंधा ने जल्दी से अपने बटुए में से पैसा निकाल कर उस किताब वाले को थमा दी थी,,,, और वहां से निकल गई थी ऑटो पकड़ने के लिए,,,, थोड़ी ही देर में वह घर पहुंच गई थी लेकिन इतनी दूरी में भी उसके मन में अजीब सी उथल-पुथल चल रही थी बार-बार उसके मन में वही शब्द चल रहे थे जिसे उसने मदहोश जवानी की किताब के पन्नों को पलट कर पढी थी,,,,, अपनी मां की गुलाबी बुर देखकर संजय का लंड एकदम से खड़ा हो गया,,,,,, संजय अपनी मां की दोनों टांगों को फैला कर अपने लिए जगह बनाने लगा,,,

किताब के पन्ने की यही लाइन उसके दिलों दिमाग पर हथौड़े की तरह बज रहा था वह पूरी तरह से मदहोश हो चुकी थी,,,, जिंदगी में पहली बार हुआ इस तरह के किताब को अपने हाथ में ली थी जिसके पन्नों को पढ़कर उसके दिलों दिमाग पर गहरा असर पड रहा था,,,, क्योंकि वह पल भर में ही उस मदहोश जवानी की किताब के नायक में अपने बेटे को और उसकी मां में खुद को देख रही थी,,,,,,, वह उसे लाइन में संजय की जगह अपनी बेटी का नाम जोड़कर उसे लाइन को अपने मन में पढ़ रही थी,,,,,,, अपनी मां की गुलाबी बुर देखकर अंकित का लंड खड़ा हो गया,,,,,, अंकित अपनी मां की दोनों टांगों को फैला कर अपने लिए जगह बनाने लगा यह सब शब्दों का जोड़-तोड़ करना सुगंधा को काफी रोमांचित कर दे रहा था,,,, उसकी बुर पानी पानी हुए जा रही थी,,, और उसे किताब को पढ़ने की उत्सुकता उसकी निरंतर बढ़ती जा रही थी,,,।

देखते ही देखते हो अपने घर के आगे के चौराहे पर रिक्शा से उतर गई और पैदल अपने घर पर पहुंच गई शाम ढल चुकी थी अंधेरा हो रहा था उसके दोनों बच्चे घर पर ही मौजूद थे,,, दरवाजे पर दस्तक देने के बाद तृप्ति ने हीं दरवाजा को खोली,,,, और अपनी मां को दरवाजे पर देखते ही वह और कुछ नहीं बस इतना ही पूछी,,,।

किताबें मिल गई मम्मी,,,

हां हां मिल गई,,,,(घर में प्रवेश करते हुए और तृप्ति घर को बंद करके कड़ी लगाते हुए) लेकिन तुझे सिर्फ किताबों की पड़ी है यह नहीं पूछी की इतनी देर क्यों हो गई मेरी तो तुझे फिक्र ही नहीं है,,,

नहीं मम्मी ऐसी बिल्कुल भी बात नहीं है वह क्या है ना की एग्जाम की तैयारी करना है इसलिए किताबें बहुत जरूरी है,,,

और मां,,,(आंखों को ना चाहते हुए एक जगह पर खड़ी होते हुए सुगंधा बोली)

तुम तो जिंदगी की जरूरत हो,,,(और इतना कहने के साथ ही तृप्ति अपने मां के गाल पर चुंबन कर ली और उसके कंधे पर लटके थैले को अपने हाथ से उतारने लगी थी कि उसे रोकते हुए सुगंधा बोली क्योंकि उसे एकाएक याद आ गया था की थैले में वह अश्लील साहित्य भी है,,, इसलिए वह बहाना करते हुए बोली,,,)

अरे कहीं भागी नहीं जा रही हु पहले एक ग्लास पानी तो पिला दे,,,,।

ठीक है मम्मी अभी लाई,,,(इतना कहने के साथ ही तृतीय रसोई घर में पानी लेने के लिए चली गई और सुगंध मौका देखकर तुरंत अपने कमरे में चली गई और जल्दी-जल्दी मनोहर कहानी की किताब में से उसे अश्लील साहित्य को निकाल कर अपने अलमारी के ड्रावर में रखकर उसे लॉक कर दी,,,, और आराम से अपनी बिस्तर पर बैठ गई तब तक तृप्ति हाथ में पानी का गिलास लिए हुए अपनी मां के पास आ गई थी,,,, और सुगंधा उसके हाथ से पानी लेकर पीने लगी,,, और जब तक उसकी मां पानी पीती तब तक तृप्ति थैले में से अपने कॉलेज की किताब को बाहर निकाल कर देखने लगी और बहुत खुश हुई और वहां से चली गई,,,,,।

थोड़ी ही देर में थोड़ा फ्रेश होकर सुगंधा खाना बनाने लगी,,,,,, उसका आज खाना बनाने में मन बिल्कुल भी नहीं लग रहा था अपनी मन में सोच रही थी कि कब वह अपने कमरे में जाएं और आराम से उसे किताब को पड़े क्योंकि अब वह भी किताब की कहानी के बारे में जानने के लिए उत्सुक हो गई थी कि कैसे हालात में एक मां बेटे इतने करीब आ जाते हैं कि दोनों के बीच मर्द और औरत वाला संबंध स्थापित हो जाता है कैसे एक मां अपने ही बेटे के साथ चुदवाने के लिए तैयार हो जाती है,,, और कैसे एक बेटा जो अपनी मां की बुर से ही जन्म लेने के बाद जवान होने के बाद अपने ही लंड को अपनी मां की बुर में डालकर उसकी चुदाई करने को तैयार हो जाता है,,,, यही सब सवाल उसे परेशान कर रहे थे और इसी सवाल का जवाब जानने के लिए वह किताब को पूरी तरह से पढ़ना चाहती थी,,,,

और इसीलिए बहुत जल्दी-जल्दी खाना बनाकर तैयार करती हो समय पर अपने बच्चों को खिलाकर कुछ देर टीवी देखने लगी क्योंकि उसके डेली रूटीन में आता था वह हमेशा अपने बच्चों के साथ टीवी देखा करती थी,,,, और जैसे ही समय हुआ वह उठकर बाथरूम में गई और साड़ी उठाकर पेशाब करने लगे उसकी बुर से आ रही तेज सीटी की आवाज अंकित के कानों में सांप सुनाई दे रही थी जो कि उसके रोज का हो गया था और वहां उसे आवाज पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं देता था लेकिन पल भर के लिए उसके बदन में भी अजीब सी हलचल हो जाती थी जब उसके कानों में इस तरह की आवाज आती थी,,, थोड़ी देर में उसकी मां बाथरूम से बाहर निकली और दोनों बच्चों को सोने की हिदायत देकर खुद अपने कमरे में चली गई,,,।

सुगंधा का दिल जोरो से धड़क रहा था बहुत जल्दी से दरवाजा बंद करके कड़ी लगाने के बाद,,, अलमारी की तरफ गई और धीरे से अलमारी को खोलकर,,, ड्रावर में से उसे किताब को बाहर निकाल ली,,,, हाथ में एक बार फिर से उसे किताब को लेने के बाद सुगंधा के तन बदन में अजीब सी तरंगे उठने लगी वह मदहोश होने लगी किताब का मुख श्रेष्ठ ही बेहद नशीला था,,,, जिस पर एक खूबसूरत लड़की की तस्वीर बनी हुई थी अंगड़ाई लेते हुए और उसे लड़की के बदन पर केवल जालीदार गाउन था जिसमें से उसके बदन का हर एक हिस्सा नजर आ रहा था,,,, मुख्य पृष्ठ के उस तस्वीर को देखकर सुगंधा की जवानी हीलोर मारने लगी,,,, वह जल्द से जल्द उसे किताब को पढ़ लेना चाहती थी,,,, इसलिए उसे किताब को लेकर जल्दी से अपने बिस्तर पर पहुंच गई और पीठ के बाल लाकर कर के नीचे तकिया लगाकर आराम से उस किताब के पन्नों को पलटने लगी,,,।

किताब पढ़ने के बाद उसके बदन में अजीब सी हलचल होने लगी वह पसीने से तरबतर हो गई लेकिन वह अभी पूरी किताब नहीं पड़ी थी केवल पांच पन्ने ही पड़ी थी कि उसके बदन में उत्तेजना अपना असर दिखने लगी उसके बदन में जवानी चिकोटि काटने लगी,,,, उसने आज तक इस तरह की अश्लील कहानी कभी पड़ी नहीं थी इसलिए पहली बार में ही उसके पसीने छूट गए थे साथ में उसकी बुर का पानी भी निकलने लगा था,,,, पांच पन्ने पढ़ने के बाद उसे इतना तो अंदाजा लग गया था कि कहानी क्या है उसकी जिंदगी में और किताब की कहानी में कुछ ज्यादा फर्क नहीं था किताब वाली कहानी में भी एक औरत जल्द ही विधवा हो जाती है और वह खुद भी एक विधवा थी कहानी की नायिका का भी एक जवान लड़का था और उसके खुद का भी एक जवान लड़का था पर कितना था कि उसकी लड़की नहीं थी,,,,,।

कहानी की नायिका किसी स्कूल में नहीं बल्कि किसी ऑफिस में काम करती थी और घर में केवल वह और उसका बेटा संजय ही रहते थे दोनों में काफी मेलजोल था दोनों एक दूसरे को समझते थे और संजय अपनी मां का पूरा ख्याल रखता था यहां तक की आज तक उसने अपनी मां को कभी गलत नजरिया से देखा नहीं था और नहीं कभी उसे नायिका ने भी अपने बेटे को गलत नजरिए से देखी थी दोनों के बीच में मां बेटे वाला पवित्र संबंध नहीं था लेकिन एक दिन अचानक सब कुछ बदल गया,,,,।

एक दिन बरसात हो रही थी और वह भी बड़े जोरों की,,, उसका बेटा संजय घर पर ही था धीरे-धीरे शाम हो रही थी लेकिन उसकी मां का कहीं भी आता पता नहीं था वह बार-बार दरवाजे पर आकर अपनी मां का राह देख रहा था,,,, और तभी थोड़ी देर बाद उसकी मां भीगती हुई उसे नजर आई,,,, अपनी मां को देख कर संजय बहुत खुश हुआ लेकिन इस बात से वह काफी परेशान हो गया क्योंकि उसकी मां पूरी तरह से बरसात के पानी में भीग चुकी थी ऐसे में तबीयत खराब होने का डर था,,,,।

जल्दी से उसकी मां घर में प्रवेश कर गई लेकिन वह पूरी तरह से भेज चुकी थी उसके बदन के कपड़े उसके खूबसूरत बदन से चिपक गए थे जिसमें से उसका पूरा अंग एकदम साफ नजर आ रहा था,,, जिस पर अभी तक संजय की नजर नहीं पड़ी थी वह जल्दी से कमरे में जाकर अपनी मां के लिए टावल लेकर आया था ताकि वह जल्दी से वह अपने कपड़ों को बदलकर दूसरे कपड़े पहन ले लेकिन जैसे ही वह टावल लेकर अपनी मां के पास आया उसकी नजर अपनी मां की छाती पर चली गई उसकी मां का ध्यान संजय के ऊपर बिल्कुल भी नहीं था वह अपनी साड़ी को करने से उतर कर उसमें से पानी को निचोड़ रही थी,,, और भीगे हुए ब्लाउज में से उसकी मां की मस्त-मस्त बड़ी-बड़ी चूचियां एकदम साफ नजर आ रही थी क्योंकि उसकी मां ने अंदर ब्रा नहीं पहनी थी,,,, इस तरह का नजारा संजू पहली बार अपनी आंखों से देख रहा था,,,, वह अपनी मां को टावल पकड़ाना भूल गया और प्यासी नजरों से अपनी मां की चूचियों की तरफ देखने लगा जो की पूरी तरह से जवानी से मिली हुई थी और उसे इस बात की भी हैरानी थी कि ब्लाउज के अंदर उसकी मां ब्रा नहीं पहनी थी ब्लाउज के अंदर उसकी मां की चूचियां एकदम नंगी थी,,,,।

और जैसे ही उसकी मां टावल लेने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाई तो अपने बेटे की नजर को अपनी छातियों पर टिकी हुई देखकर वह अंदर तक सिहर उठी,,, पहले तो उसे तेज झटका सा लगा ताज्जुब हुआ अपने बेटे की हरकत पर क्योंकि आज तक उसके बेटे ने उसे इस नजर से कभी नहीं देखा था लेकिन आज की बात कुछ और थी वह अपनी छातियों की तरफ नजर नीचे करके देखी तो वह खुद शर्म से पानी पानी हो गई,,, उसे इस बात का एहसास हुआ कि वाकई में हुआ ब्लाउज के अंदर ब्रा नहीं पहनी थी और उसकी नंगी चूचियां एकदम साफ दिख रही थी,,,,,

वह जल्दी से अपने बेटे के हाथों से टावल लेकर,,, बाथरूम में घुस गई लेकिन जाते-जाते यह उसकी किस्मत का ही दोस्त कहो उसकी नजर अपने बेटे की तने हुए तंबू पर पड़ गई जो की पूरी तरह से एकदम खिला हुआ तंबू की शक्ल में पेट के अंदर उसका लंड पूरी तरह से खड़ा था,,,,, बाथरूम में प्रवेश करते ही वह जल्दी से बाथरूम का दरवाजा बंद कर दी और गहरी गहरी सांस लेने लगी उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि यह सब क्या हो रहा है वह अपनी गलती पर शर्मिंदा होने लगी,,,, लेकिन तभी उसे अपने बेटे के पेट में बना तंबू याद आने लगा बरसों गुजर गए थे उसने अपने पति के बाद किसी के लंड के दर्शन नहीं किए थे और अपने बेटे के पेट में बने तंबू को देखकर उसे एहसास हो गया था कि उसके बेटे का लंड काफी बड़ा है,,,,

अपने बदल से कपड़े उतारते हुए उसके मन में भी अजीब सी हलचल होने लगी थी हालांकि आज तक उसके मन में अपने बेटे को लेकर कभी भी गलत भावना नहीं जागृत हुई थी लेकिन आज न जाने उसे क्या हो रहा था उसके बदन में अजीब सी उलझन हो रही थी आज उसका दिमाग उसका साथ बिल्कुल भी नहीं दे रहा था,,,,।
 
वह जल्दी-जल्दी अपने कपड़े उतार कर दूसरे कपड़ों के लिए बाथरूम के हैंगर पर हाथ बढाई तो हैरान हो गई वह तो कपड़ा लाना ही भूल गई थी,,, उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें और फिर वह टावल को अपने बदन से लपेटकर धीरे से बाथरूम से बाहर निकली,,,, और बिना कुछ बोले अपनी कमरे की तरफ जाने लगी वह बड़ी जल्दबाजी में थी क्योंकि वहीं पर उसका बेटा भी बैठकर पढ़ाई कर रहा था लेकिन अपनी मां को बाथरूम से बाहर निकलते हुए वह देख लिया था और केवल टॉवल में देखकर उसे भी अजीब सा एहसास हो रहा था जल्द से जल्द उसकी मां उसकी नजरों से दूर हो जाना चाहती थी इसलिए लगभग थोड़ा सा तेज चलते हुए वह जाने लगी तो अपने आप ही उसके बदन से टॉवल छूट कर नीचे गिर गई और ऐसे हालात में संजय की नजर अपनी मां पर गई तो वह पूरी तरह से नंगी हो चुकी थी लेकिन वह पीछे से अपनी मां को देख रहा था पूरी तरह नंगी उसकी गोल-गोल बड़ी-बड़ी गांड देखकर उसकी आंखों की चमक बढ़ गई और उसकी मां जल्दबाजी दिखाते हुए जल्दी से टावल को नीचे से उठे और वापस अपने बदन पर लपेटे हुए अपने कमरे में घुस गई,,,,।

थोड़ी देर बाद खाना खाते समय उसकी मां को छींक आ रही थी और संजय को चिंता होने लगी संजय अपनी मां को सरसों के तेल की मालिश करने के लिए बोल रहा था जिसके लिए उसकी मां तैयार हो गई हालांकि वह तैयार तो नहीं होती लेकिन अब उसे भी कुछ-कुछ हो रहा था वह अभी अपने बेटे के हाथों से तेल की मालिश करवाना चाहती थी जिसके लिए वह सारे काम को निपटा कर खुद उसके कमरे में गई और,,, उसके बिस्तर पर लेट गई संजय धीरे-धीरे उसके बदन पर मालिश करने लगा,,, जिसके चलते हैं उसकी मां मदहोश होने लगी संजय की भी हालत खराब होने लगी संजय अपनी मां को पूरी तरह से नंगी देखना चाहता था इसलिए मालिश का बहाना करके धीरे-धीरे उसके बदन पर से वस्त्र को उतारना शुरू कर दिया और जैसे ही वह अपनी बाकी साड़ी को उसकी कमर के ऊपर तक उठाया तो अपनी मां की नंगी बुर देखकर उसका लंड पूरी तरह से खड़ा हो गया जिसका एहसास उसकी मां को भी हो रहा था,,,,,।

कहानी की नायिका अपने बेटे को खुश करती हुई

(इतना भर सुगंधा ने कहानी को पढ़ी थी और उसकी बुर पानी फेंक रही थी,,,, उसका दिमाग एकदम समय रह गया था पहली बार वह इस तरह की अश्लील कहानी को पढ़ रही थी और कहानी में मां बेटे का उल्लेख को देखकर उसकी जवानी और ज्यादा फूट रही थी,,,,, अपनी भी साड़ी को कमर तक उठाए हुए अपनी बुर को अपनी हथेली से मसलते हुए वह आगे कहानी का अध्ययन करने लगी,,,,)

संजय का हाथ सरसों के तेल की मालिश उसकी मां की बुर पर कर रहा था उसकी मां मदहोश में जा रही थी पूरी तरह से पागल हो जा रही थी देखते ही देखते संजय आगे बढ़ने लगा और अपनी मां के ब्लाउज का बटन खोलने लगा वह आज अपनी मां की जवानी से पूरी तरह से खेलने का इरादा बना चुका था और उसकी मां भी अपने बेटे के साथ एकाकार होने का मन बना ली थी,,, देखते ही देखते संजय अपने हाथों को हरकत देते हुए अपनी मां के ब्लाउज के बटन को खोलकर उसके बदन से ब्लाउज को उतार कर वहीं फेंक दिया है अपनी मां की नंगी चूचियों पर सरसों के तेल की धार गिरा कर उसे दोनों हाथों में लेकर जोर-जोर से मसलना शुरू कर दिया,,,(ऐसा पढ़ते हुए सुगंधा की हालत खराब होने लगी और वह अपने हाथ से अपने ब्लाउज का बटन खोलकर अपनी चूचियों को बाहर निकाल कर अपने ही कहां से मसाला शुरू करती और अपने मन में अपने बेटे की कल्पना करने लगी) आगे संजय से रहा नहीं जा रहा था,,,, और वह अपनी मां से इजाजत लिए भी नहीं अपनी मां की चूची को मुंह में लेकर पीना शुरू कर दिया उसकी मां अपने बेटे की हरकत से पूरी तरह से मदहोश हो गई उत्तेजित हो गई उसकी आंखों में चार बोतलों का नशा छाने लगा और वह अपने बेटे के सर पर हाथ रखकर उसे अपनी छाती पर दबाना शुरू कर दी,,,,,।

देखते ही देखते कहानी का अंतिम प्रस्ठ शुरू हो चुका था जिसमें संजय अपनी मां के बदन पर से सारे कपड़ों को उतार कर उसे पूरी तरह से नंगी कर दिया था और यह कार्य खुद सुगंधा अपने हाथों से करके बिस्तर पर पूरी तरह से नंगी हो चुकी थी,,,, संजय बिस्तर पर अपनी मां की नंगी जवान देखकर पागल हुआ जा रहा था और अपने हाथों से अपने कपड़े उतार कर वह भी पूरी तरह से नंगा हो चुका था बाहर तेज बारिश हो रही थी जिसका फायदा संजय और उसकी मां पूरी तरह से उठा लेना चाहते थे संजय का मोटा तगड़ा लंबा लंड देखकर उसकी मां की बुर उत्तेजना के मारे फूलने पिचकने लगी,,,, संजय की मां अपना हाथ आगे बढ़ाकर,,, अपने बेटे के लंड को पकड़ ली बरसों के बाद उसके हाथ में कोई जवान लंड आया था जिससे वह पागलों की तरह खेल रही थी उसे मुंह में लेकर चूस रही थी और देखते ही देखते सब्जी अपनी मां की दोनों टांगों के बीच जगह बना लिया था और फिर अपनी मां की गुलाबी बुर पर अपने लंड को रखकर एक तेज धक्का मारा और संजय का मोटा तगड़ा लंड उसकी मां की बुर के अंदरूनी अडचने को दूर करते हुए सीधा उसकी मां के बच्चेदानी से टकरा गया और उसकी मां के मुंह से एक तेज चीख निकल गई जो की बरसात के शोर में पूरी तरह से दब गई और फिर संजय मौके की नजाकत को समझते हुए अपनी मां की कमर को पकड़ कर अपनी कमर हिलाना शुरू कर दिया और अपनी मां की चुदाई करना शुरू कर दिया,,,।

कहानी समाप्त हो चुकी थी लेकिन यहां से एक नई कहानी का जन्म होने लगा था सुगंध पूरी तरह से मदहोश हो चुकी थी और वहां अपनी दोनों टांगों को खोलकर अपनी दो उंगली को अपनी बुर में डालकर अपने बेटे की कल्पना करते हुए बिस्तर पर अंकित अंकित चिल्ला रही थी और जोर-जोर से अपनी दोनों उंगलियों को अपनी बुर के अंदर बाहर कर रही थी और देखते ही देखते उसकी गुलाबी बुर से तेज फवारा फुटा और वह एकदम लहरा कर झड़ने लगी,,,,,,, '''

कहानी को पढ़ने के साथ-साथ अपनी बुर में उंगली करने में उसे बेहद आनंद की प्राप्ति हुई थी वह पूरी तरह से मदहोश हो चुकी थी और अपनी मन में यही प्रार्थना कर रही थी कि काश उसकी जिंदगी भी कहानी वाली नायिका की तरह हो जाती तो कितना मजा आता है और यही सब सोचते हुए वह नींद की आगोश में चली गई,,,।

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अश्लील उपन्यास को पढ़कर और वह भी एक मां बेटे वाली कहानी को पढ़कर तो मानो जैसे सुगंधा का दिमाग एकदम से बदल गया था,,,, वह अपने आप को कहानी वाली मां की जगह रखकर और उसके लड़के की जगह अपने बेटे को रखकर वह मन में कल्पना करने लगी और उसे ऐसा करने में बहुत ज्यादा आनंद की प्राप्ति होने लगी वह पूरी तरह से पहन चुकी थी वह अपने बेटे के साथ संबंध बनाने के लिए अपने आप को पूरी तरह से तैयार कर चुकी थी बस शुरुआत करने की देरी थी,,,, अब धीरे-धीरे सुगंधा अपने बेटे के सामने अश्लील हरकत करने की शुरुआत कर दी थी,,,, उसे पूरा विश्वास था कि एक न एक दिन उसकी गर्म जवानी के संपर्क में जाकर उसके बेटे का गरम लावा जरूर पिघलेगा,,,, और उम्मीद पर तो दुनिया कायम थी,,,।

ऐसे ही एक दिन वह किचन में सब्जी काट रही थी,,,,,, और सब्जी काटते काटते उसका कामुक दिमाग बड़ी तेजी से चलने लगा घर में उसे वक्त तृप्ति और अंकित दोनों मौजूद थे तृप्ति पढ़ाई कर रही थी और अंकित यूं ही किचन के सामने ही बैठा हुआ था,,,,,, वह अपने बेटे को अपनी तरफ आकर्षित करना चाहती थी इसलिए बार-बार सब्जी काटते हुए अपनी कलाइयों की चूड़ियों को बचा रही थी ताकि उसका बेटा उसकी तरफ देखे लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हो रहा था रह रहा कर सुगंधा को अपने बेटे पर गुस्सा भी आ रहा था क्योंकि वह अच्छी तरह से जानती थी कि अगर उसकी जगह कोई और जवान लड़का होता तो जरूर उसकी तरफ देखकर मुस्कुराता उसकी हरकतों से उत्तेजित होता और उसकी तरफ आकर्षित होकर खुद भी उसके साथ गंदी हरकत करता लेकिन ऐसा कुछ भी ना होता देखकर सुगंध मन ही मां अपने बेटे को ही भला बुरा कहने लगी,,, लेकिन वह अपनी हरकत को जारी रखते हुए अपने मन में कुछ सोचने लगी और फिर उसके बाद,,,,।

बड़े से बर्तन में आटा लेकर उसमें पानी डालकर आंटा को गुंथने लगी,,,,,,,,, और फिर धीरे से अपने ब्लाउज के ऊपर के दो बटन जल्दी-जल्दी खोल दी और अपनी चूची को नीचे से पकड़ कर उसे ऊपर की तरफ थोड़ा सा उठा देता कि वह काफी अच्छे आकार में उसके बेटे को दिखाई दे और फिर अपने खुले बालों को दोनों तरफ से अपने गले से नीचे की तरफ लटका दी और कुछ बालों को अपनी आंखों की तरफ कर दी और फिर अपनी साड़ी के पल्लू को एकदम से नीचे गिरा दी,,,, ऐसा करते हुए वह अपने बेटे की तरफ देख रही थी लेकिन उसका बेटा था कि अपने में ही मस्त था वह जवानी से भरी हुई अपनी मां की तरफ देख ही नहीं रहा था,,, और उसी बात का तो उसे मलाल था,,,, और अपने इसी मलाल को वह काम करना चाहती थी इसलिए अपनी तरफ से पूरी तैयारी कर चुकी थी,,, वह वापस आटे को गुंथने लगी,,, देखते ही देखते सुगंध अपने दोनों हाथों में आंटा चुपड ली,,,,।

वह पूरी तैयारी कर चुकी थी उसका दिल बड़े जोरों से धड़क रहा था क्योंकि वह अपनी कामुक हरकत को अंजाम देने जा रही थी एक बार वह अपनी छातियों की तरफ देखने लगी जो की अच्छी खासी उभरी हुई नजर आ रही थी,,,, वह अपने बेटे की तरफ देखी और उसे आवाज लगाते हुए बोली,,,।

अंकित ,,,,ओ,,, अंकित,,,

क्या हुआ ,,,?(वह एकदम से अपनी मां की तरफ देखते हुए बोला,,,)

जरा इधर आना तो,,,,

क्या हो गया,,,(ऐसा कहते हुए वह अपनी जगह पर खड़ा हो गया और रसोइ की तरफ आने लगा,,,, और और अपनी मां के पास पहुंचकर वह बोला,,,)

क्या हुआ मम्मी,,,,?(अंकित अपनी मां की बेहद करीब था ठीक आमने-सामने अगर उसकी जगह कोई और लड़का होता तो उसकी नजर सीधे सुगंधा की भारी भरकर छतिया पर जाती उसकी अस्त व्यस्त हालत पर जाती लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ,,,, वह पूरी तरह से सहज था और इसी बात का गुस्सा सुगंधा के मन में भी था क्योंकि उसका बेटा ठीक उसकी आंखों के सामने खड़ा था और जो चीज जवानी की उम्र में देखना चाहिए वह उसे दिखाई नहीं दे रही थी इसलिए वह थोड़ा गुस्सा दिखाते हुए बोली,,)

अरे हुआ कुछ नहीं बस मेरे चेहरे पर से बाल तो हटा दे,,,,

ओहहहह,,,(अपनी मां के कहने पर उसकी नजर उसके चेहरे पर उड़ रहे उसकी बालों की लातों पर गई तब उसे पता चला कि मामला क्या है और अपना हाथ आगे बढ़ाकर वह अपनी मां के गाल पर से बालों की लटो को हटाने लगा,,,,, अपने बेटे की उंगलियों को अपने गालों पर उसके स्पर्श का अनुभव होते ही सुगंधा उत्तेजना के मारे एकदम से सिहर उठी उसके बदन में झुनझुनी सी फैलने लगी,,,, और वह उत्तेजित होते हुए अपनी छाती के उभार को कुछ ज्यादा ही आगे तरफ बढ़ा दी और इसका एहसास अंकित को भी अच्छी तरह से हुआ अपनी मां की हरकत पर अंकित की नजर सीधे उसकी चूचियों पर चली गई और अपनी मां के ब्लाउज की ऊपर के दो बटन को खुला हुआ देखकर वह हैरान हो क्या क्योंकि उसमें से उसकी आधी चूचियां एकदम बाहर की तरफ झांक रही थी मानो की कैद में पड़े कबूतर बाहर आने के लिए फड़फड़ा रहे हैं यह पहला मौका था जब अंकित अपनी मां की चूचियों की तरफ इस तरह से देख रहा था आखिरकार अंकित पूरी तरह से जवान था औरत को देखकर आकर्षण पैदा होना लाजिमी था ऐसा तो वह पहले कभी अनुभव नहीं किया था लेकिन आज इतने करीब से अपनी मां की मदद कर देने वाली चूचियों को देखकर वह हैरान हो गया,,,, और ऊपर के दो बटन खुले होने की वजह से उसकी मां की आधे से ज्यादा चूचियां एकदम साफ नजर आ रही थी और उसे देखकर ना जाने क्यों अंकित के मुंह में पानी आने लगा ऐसा उसके साथ पहली बार हो रहा था वह अपनी मां के बाल के लटो को उसकी खूबसूरत चेहरे से दूर करते हुए अपनी निगाह को वह अपनी मां की छातियों पर ही टिकाया रह गया,,,,।

अंकित को समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें,,,, अपने बेटे को इस तरह से देखा हुआ प्रकार सुगंधा के तन बदन में उत्तेजना की लहर दौड़ने लगी वह मदहोश होने लगी उसकी दोनों टांगों के बीच उसकी बुर से नमकीन पानी बहने लगा क्योंकि वह अपनी युक्ति में अपनी इरादे में कुछ हद तक कामयाब होती नजर आ रही थी,,,, और इस बार सुगंधा एक कदम धीरे से आगे बढ़ाई और अपनी छतिया को गहरी सांस लेते हुए ऊपर की तरफ कुछ ज्यादा ही उठा दी और उसके ऐसा करने से अंकित के चेहरे की टोढी सीधे सुगंधा की चूचियों पर स्पर्श हो गई और तब जाकर अंकित को होश आया वह एकदम से हड़बड़ा गया,,,, और अपने आप को एकदम से पीछे ले लिया मानो कि जैसे बहुत बड़ा गुनाह कर दिया हो,,,, यह देख कर सुगंधा अपने बेटे को सहज करते हुए बोली,,,

क्या हुआ,,, ऐसे क्यों हड बढ़ा रहा है,,,,(और तुरंत अंकित के ध्यान को दूसरी तरफ घूमाते हुए बोली,,) मेरे साड़ी का पल्लू तो ठीक से कर दे,,,,

ओहहह ,, हां,,,,,,(अपनी मां की बात सुनकर जैसे उसे एकदम से होश आया हो वह तुरंत एक बार फिर से अपनी मां की खूबसूरत बदन की तरफ देखा और उसे इस बात का एहसास सुबह की उसके साड़ी का पल्लू उसके कंधे से नीचे गिर गया था जिसकी वजह से उसकी छाती का उभार एकदम साफ नजर आ रहा था,,,,, वह धीरे से अपनी मां के साड़ी के पल्लू को पकड़ा और उसे ठीक करते हुए उसकी मद-मस्त जानलेवा छातियों को साड़ी के पल्लू से ढंकते हुए,,,) क्या मम्मी तुम भी साड़ी के पल्लू को नहीं संभाल पा रही हो,,,,,

(अपने बेटे किस तरह की बात को सुनकर सुगंधा अपने मन में ही बोली,,, सही कह रहा है बेटा तू अब मुझसे मेरी साड़ी का पल्लू संभाला नहीं जा रहा मेरी जवानी मुझसे संभाली नहीं जा रही है मेरी जवानी बेलगाम हो चुकी है इसे अपने लगाम से कस दे मेरे राजा,,,,, और अपने आप को संभालते हुए वह बोली,,,)

क्या करूं बेटा खाना बनाते समय अक्सर ऐसा हो जाता है और हाथ में मेरे आटा लगा हुआ था वरना मैं खुद ही ठीक कर लेती,,,,((मन में तो आ रहा था कि वह अपने बेटे को ब्लाउज का बटन बंद करने के लिए भी बोलते लेकिन न जाने क्यों इस समय वह शर्म महसूस करने लगी थी और वह ऐसा नहीं बोल पाई,,, लेकिन सुगंधा अपनी नजरों को अपने बेटे की दोनों टांगों के बीच ले जाने से रोक नहीं पाई और जैसे ही उसकी नज़रें अपने बेटे के दोनों टांगों के बीच पहुंची तो वह देखकर हैरान रह गई क्योंकि उसके बेटे की पेंट में आगे वाले भाग में तंबू बना हुआ था और वह तंबू सामान्य बिल्कुल भी नहीं था उसे तंबू का तनाव कुछ ज्यादा ही बड़ा था जिसे देखते ही सुगंधा की बुर उत्तेजना के मारे फुलने पिचकने लगी थी,,,, कुछ पल के लिए तो सुगंधा को लगा कि यह पल यही थम जाए तो कितना अच्छा हो,,,, लेकिन ऐसा संभव नहीं था अंकित अपनी मां की साड़ी के पल्लू को ठीक करके वहां से जल्द से जल्द हट गया और वापस अपनी जगह पर आकर बैठ गया,,,,।

वैसे तो वह अपने आप को हमेशा सामान्य ही रखता था लेकिन आज उसकी मां की ऊभरी हुई छतियो को देखकर उसके होश उड़ गए थे,,, सामान्य तौर पर कभी भी उसकी नजर औरतों की छातियों पर या उनके नितंबों पर पड़ भी जाती थी तो भी वह उस नजारे को गलत नजरिए से नहीं देखता था,,,, लेकिन आज पहली बार वह अपनी मां की खुली चाहती हो और ब्लाउज के खुले हुए बटन को देखकर पूरी तरह से मंत्र मुग्ध हो गया था,,,, पहली बार उसे एहसास हुआ कि औरतों की छातियों में कितना आकर्षण होता है,,,, वह अपनी जगह पर बैठ कर उसी दृश्य के बारे में सोच रहा था और न जाने क्यों उस द्शय के बारे में सोच कर उसके तन-बदन में अजीब सी हलचल हो रही थी,,, तभी अचानक उसे इस बात का एहसास हुआ कि पेंट के अंदर उसका लंड एकदम से तन गया है,,,, और इस एहसास से उसके दिल की धड़कन एकदम से बढ़ने लगी तरफ देखा तो उसमें अच्छा खासा तंबू बना हुआ था जिसे देखकर वह हैरान हो गया था हैरानी उसे इस बात की नहीं थी कि उसका लंड इस समय खड़ा हो गया था हैरानी तो उसे इस बात की थी कि अपनी मां की छातियों को देखकर उसकी हालत हुई थी,,,, इसीलिए उसे बड़ा अजीब लग रहा था क्योंकि उसने आज तक अपनी मां को गलत नजरिए से नहीं देखा था अपनी मां को क्या वह किसी भी औरत और लड़कियों को गलत नजरिए से देखता ही नहीं था,,,। लेकिन आज न जाने उसे क्या हो गया था उसे ऐसा लग रहा था कि उसे बड़े जोरों की पेशाब लगी हुई है वह तुरंत अपनी जगह से उठकर खड़ा हुआ और बाथरूम की तरफ चला गया बाथरूम में जाकर वह बाथरूम का दरवाजा बंद करके अपनी पेंट का बटन खोलकर उसे घुटनों तक खींच दिया और फिर अपने अंडर बियर को दोनों हाथों से पकड़ कर नीचे की तरफ सरकाते हुए खड़े लंड की वजह से ऐसा करने में उसे दिक्कत महसूस हो रही थी,,,, लेकिन फिर भी वह जबरदस्ती करता हुआ अपनी अंडरवियर को नीचे की तरफ खींच दिया और जैसे ही अंडर बियर नीचे गई वैसे ही उसका मोटा तगड़ा लंबा लंड एकदम से स्प्रिंग की तरह उछल पड़ा,,, और तीन चार बार ऊपर नीचे करके होने लगा यह देखकर खुद अंकित भी हैरान हो गया सही मायने में वह अपने खड़े लंड को पहली बार अपनी आंखों से देख रहा था,,,

अंकित का लंड पूरी तरह से अपनी औकात में आ चुका था उत्तेजना के मारे उसके लंड की नशे एकदम फुल चुकी थी जॉकी लंड के उपर उभरी हुई नजर आ रही थी,,,, अपने लंड की हालत को देखकर खुद अंकित हैरान हो गया था,,,, उसकी सांसे ऊपर नीचे हो रही थी वह धड़कते दिल के साथ अपने खड़े और मोटे लंड को अपने हाथ से पकड़ लिया और न जाने क्यों इस समय अपने लंड को पकड़ने में उसे कुछ ज्यादा ही आनंद की अनुभूति हो रही थी और वह एक बार लंड की चमड़ी को पीछे की तरफ खींचा तो उसका सुपाड़ा एकदम से आलू बुखारे की तरह खिल उठा,,,, जोकि रक्त के बहाव के कारण एकदम लाल हो चुका था,,, और फिर उसके लंड से पेशाब की धार फूट पड़ी जो कि सामने की दीवार से टकरा रही थी,,,, अनायास ही पेशाब करते समय लंड की चमड़ी को आगे पीछे वह दो-चार बार खींच दिया,,,, और ऐसा करने पर उसे अद्भुत आनंद की प्राप्ति हो रही थी उसे नहीं मालूम था कि उसके बदन में यह बदलाव किस लिए हो रहा था उसे आनंद किस लिए आ रहा है अगर तीन चार बार वह और अपने लंड की चमड़ी को आगे पीछे करके खींच देता तो उसके लंड से वीर्य का फवारा फुट पड़ता,,,, लेकिन वह अपने बदन में जिस तरह की हलचल हो रही थी उसे देखते हुए उसके मन में थोड़ी घबराहट भी थी और वह तुरंत पेशाब करने के बाद अपने लंड को अपने हाथ से छोड़ दिया,,,,और फिर वह अपनी पेंट को पहनकर बाथरूम से बाहर आ गया,,, लेकिन इस बार वह किचन के सामने नहीं बल्कि अपने मन को शांत करने के लिए घर से बाहर टहलने के लिए निकल गया,,,।

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अंकित अपनी मां की मस्त-मस्त जवानी के आगे धीरे-धीरे धराशाही हो रहा था और उसे पता भी नहीं चल रहा था,,, उसकी मां सुगंधा ने अपने बालों की लातों को ठीक करवाने के अपने जुगाड़ में पूरी तरह से सफल होती नजर आ रही थी वैसे भी सुगंधा ने पहले से ही अपने ब्लाउज के उपरी बटन को खोलकर अंकित के मन पर गहरी चोट करने के लिए अपने आप को तैयार कर चुकी थी और ठीक वैसा ही हुआ जब अंकित अपनी मां के बाल के लटो को अपने हाथों से ठीक करने के लिए आया तो उसकी नजर सीधे अपनी मां की छातिया पर गई जिसे देखते ही उसकी दोनों टांगों के बीच हलचल होना शुरू हो गया,,, हालांकि ऐसा उसके साथ पहले कभी होता नहीं था लेकिन यह पहली मर्तबा था और पहली मर्तबा में ही वह चारों खाने चित हो चुका था,,, भले ही अंकित अपने आप को दूसरे लड़कों से अलग समझता हो लेकिन आखिरकार था तो वह एक मर्द ही और मर्द की फितरत में ही होता है कि औरत के खूबसूरत बदन उसके उभार उसके उठाव और कटाव को देखकर उत्तेजित हो जाना,,, फिर भले ही ना उसकी आंखों के सामने उसके रिश्तेदारी की ही औरत हो उस औरत का सगा हो यह सब कोई मायने नहीं रखता था,,,।

अंकित अपनी मां की भरी हुई छातियो की तरफ देखकर जिस तरह की उत्तेजना का अनुभव अपने बदन में कर रहा था उसे देखते हुए उसे बाथरूम में जाना ही पड़ा और अपनी पेंट को नीचे सरका कर,,, जिस नजारे को उसने देखा था उसे देखकर वह खुद दंग रह गया था,,, पहली बार वह अपने लंड को गौर से देख रहा था और वह भी पूरी तरह से अपनी औकात में आकर खड़ा हो चुका था जिस पर हाथ रखते हैं उसके बदन में गुदगुदी सी होने लगी थी और उसे वह उत्तेजना के मारे धीरे-धीरे दबा भी रहा था अगर कुछ देर तक वह और अपने लंड को दबाता तो उसके लंड से वीर्य का फवारा फूट पड़ता जिसे वह पूरी तरह से अनजान था लेकिन वह अपनी हरकत को इस समय रोक दिया था क्योंकि उसे अपने बदन में हो रहे हलचल को देखकर थोड़ी घबराहट होने लगी थी और वह अपने मन को शांत करने के लिए घर से बाहर टहलने के लिए निकल गया था,,,।

अपने बेटे की हालत को देखकर सुगंधा मन ही मन मुस्कुरा रही थी और खुश भी हो रही थी क्योंकि उसकी युक्ति काम कर गई थी,,, यह पहली बार था जब वह अपने बेटे को अपनी तरफ आकर्षित करने की कोशिश कर रही थी और जिसमें वह कामयाब हो चुकी थी हालांकि ऐसा करने में उसके खुद के पसीने छूट गए थे माथे से भी और दोनों टांगों के बीच से भी उसे अपनी बुर गीली होती हुई महसूस हो रही थी,,, एक अजीब से दुसाहस का परिणाम वह अपने बदन में अद्भुत तरीके से देख रही थी अपने बेटे के लिए अपने ब्लाउज के ऊपर के दो बटन खोलने उसके लिए किसी पहाड़ चढ़ने से काम नहीं था आखिरकार वह एक शिक्षिका थी और शिक्षा होने के साथ-साथ वह एक मां भी थी और एक मां होने के नाते अपने बेटे के सामने इस तरह की हरकत करना बेहद शर्मनाक भी था लेकिन इसमें बेहद हिम्मत की और बेशर्मी की भी जरूरत होती है जिसे मिला-जुला प्रभाव सुगंधा को अपने मन में उमडता हुआ दिख रहा था,,,।

सुगंधा अपने मन में ठान ली थी कि इस खेल में वह धीरे-धीरे आगे बढ़ेगी अपने बेटे को कभी इस बात का एहसास सही नहीं होने देगी कि जो कुछ भी हो रहा है उसमें उसकी मां की ही चाल है वह सब कुछ ऐसा प्रभाव डालना चाहती थी कि सब कुछ अपने आप हो रहा है और इसी में उसकी भलाई भी थी क्योंकि वह अपने बेटे की नजर में इस तरह से गिरना नहीं चाहती थी क्योंकि उसे इस बात का डर भी था कि अगर उसके बेटे को कहीं इस बात का भनक तक लग गया कि जो कुछ भी उसकी मन कर रही है वह जानबूझकर कर रही है तो वह उसके बारे में क्या सोचेगा इसीलिए वह अच्छी तरह से जानती थी कि इस राह में फुंक फुंक कर कदम रखने में ही भलाई है,, ।

रात को खाना खाने के बाद सभी काम को निपटाने के बाद रोज की तरह तीनों बैठकर टीवी देख रहे थे,,,,,, धारावाहिक खत्म होने के बाद सुगंधा धीरे से बाथरूम में घुस गई बाथरूम जो की ड्राइंग रूम से ही सटा हुआ था जिसमें अगर पानी भी गिरता था तो उसकी आवाज एकदम साफ आई थी और इस बात का एहसास सुगंधा को भी था और सुगंधा पहले तो जब उसके मन में इस तरह की हलचल नहीं होती थी तब वह एकदम संभाल कर पेशाब करती थी ताकि उसकी आवाज अंकित के कानों तक ना पहुंच पाए लेकिन अब माहौल पूरी तरह से बदल चुका था सुगंधा अब इसी तरह के मौके की तलाश में रहती थी वह किसी भी तरह से अपने बेटे को अपनी जवानी के जाल में फसना चाहती थी उसे अपनी आकर्षण में डूबा देना चाहती थी ताकि वह अपने बेटे के साथ अपनी जवानी की प्यास को बुझा सके,,,, उसे जोरों की पेशाब लगी हुई थी और वह बाथरूम में प्रवेश कर चुकी थी,,, लेकिन बाथरूम में जाने से पहले रहा धारावाहिक के खत्म होने के बाद टीवी की आवाज को थोड़ा काम कर दी थी यह कहकर की आवाज को ज्यादा है और जानबूझकर टीवी चालू रखी थी ताकि अंकित वहीं बैठा रहे,,,,।

बाथरूम में प्रवेश करने के बाद वह तुरंत अपनी साड़ी को कमर तक उठा दी और अपनी दोनों टांगों के बीच नजर डालकर अच्छी तो उसके होंठों पर मादक मुस्कान तैरने लगी क्योंकि अब हमेशा किसी न किसी बहाने उसकी बर पानी छोड़ देती थी और उसकी चड्डी क्यों नहीं हो जाती थी ऐसा उसके साथ पहले कभी नहीं होता था लेकिन अब ऐसा बार-बार होता था ऐसा लग रहा था कि जैसे उसकी जवानी फिर से वापस लौट आई है और वह भी पूरे शबाब में,,,, अपनी चड्डी की आदत को देखकर वह गहरी गहरी सांस लेने लगी औरत धीरे से अपनी चड्डी को नीचे करके अपनी चिकनी बुर की तरफ देखने लगी जिस पर हल्के हल्के बालों के हुए थे लेकिन उत्तेजना के मारे कचोरी की तरह फुल चुकी थी और यही खुली हुई बुरी औरत की सबसे बड़ी ताकत होती है क्योंकि कचोरी जैसी खुली हुई किसी भी मर्द को अपनी तरफ आकर्षित करने में पूरी सामर्थ्य रखती है और इतना तो उसे पूरा भरोसा था कि अगर वह अपनी दोनों टांगें खोलकर अपने बेटे को अगर अपने पास आने का आमंत्रण देगी तो उसका बेटा बिल्कुल भी देर नहीं करेगा उसकी दोनों टांगों के बीच जाकर उसकी बुर में समा जाने के लिए लेकिन ऐसा हुआ करना नहीं चाहते थे क्योंकि ऐसा करने में वह अपनी नजर में गिर सकती थी वह कुछ ऐसा माहौल बनाना चाहती थी कि उसका बेटा खुद अपने लंड को उसकी बुर में डालने के लिए ललाईत हो जाए,,, और उसी के चलते वहां एक बार अपनी हथेली को अपनी बर पर रखकर उसे अपनी हथेली में कस के दबोच ली मानो कि जैसे अपने मन में कल्पना कर रही हो कि जैसे उसका बेटा उसकी चिकनी बुर को देखकर उत्तेजित अवस्था में जोर से उसकी बुर दबा दिया हो,,,, गहरी सांस लेते हुए वहां एक दोबारा अपनी हथेली अपनी बुर पर रगड़ कर पेशाब करने के लिए बैठ गई,,, उसे पूरा यकीन था कि पेशाब करने की आवाज उसके बेटे के कानों में जरूर पड़ेगी,,,,।

इसलिए वह धीरे से अपनी दोनों टांगें फैला कर बैठ गई और पेशाब करना शुरू करती और जैसे ही गुलाबी बुर के गुलाबी छेद में से पेशाब की धार बड़ी तेजी से निकली,,, वैसे ही एक लाजवाब तेज सिटी की आवाज बुर में से निकलना शुरू हो गई और बाथरूम के दरवाजे के तकरीबन 5 फीट की दूरी पर बैठकर टीवी देख रहे अंकित के कानों में जैसे ही आवाज पहुंची उसके तो मानो होश उड़ गए उसके कान के साथ-साथ उसका लंड भी खड़ा होने लगा क्योंकि अंकित पूरी तरह से जवान था और इतना तो जानता ही था कि यह सिटी की आवाज कैसी है कहां से आ रही है और क्यों आ रही है उसे मालूम था कि बाथरूम में उसकी मां पेशाब करने गई है और पेशाब करने पर ही औरत की बुर से इस तरह की आवाज आती थी जिसे सुनकर वह पूरी तरह से मदहोश होने लगा था और टीवी पर भले ही उसकी निगाहें थी लेकिन कान बाथरूम के दरवाजे पर सटा हुआ था,,,, पल भर में ही अंकित पूरी तरह से उत्तेजित हो गया और उसकी पेंट में उसका लंड खड़ा होकर तंबू बना दिया वह ना चाहते हुए भी अपने मन में कल्पना करने लगा कि कैसे उसकी मां बाथरूम में बैठकर पेशाब कर रही होगी उसकी गुलाबी बुर से पेशाब की धार निकल रही होगी हालांकि अभी तक अंकित ने किसी औरत को नंगी नहीं देखा था और ना ही उसके खूबसूरत नंगे अंगों को देखा था चुची से लेकर बुर तक अभी तक उसकी आंखों ने औरत के बेस कीमती खजाने को देखा नहीं था इसलिए उसके बारे में कल्पना करना भी उसके बस में नहीं था,,, इसीलिए तो वह अंदर ही अंदर और ज्यादा उत्सुक होने लगता था उसे नजारे को देखने के लिए,,,, लेकिन धीरे-धीरे बाथरूम से आ रही सिटी की आवाज कमजोर पड़ने लगी और उसे इस बात का एहसास होने लगा कि उसकी मां पेशाब करने के आरे पर है और कुछ ही सेकंड में बाथरूम से आ रही सिटी की आवाज एकदम से शांत हो गई क्योंकि सुगंधा पेशाब कर चुकी थी,,,, इसके बाद वह धीरे से खड़ी हुई है अपनी चड्डी को उपर चढकर साड़ी को कमर से नीचे गिरा दी और फिर बाल्टी भरकर पानी गिरने लगी,,, पानी गिराने की आवाज अंकित को सुनाई दे रही थी,,, वह समझ गया कि उसकी मां मुत ली है और किसी भी वक्त बाहर आ जाएगी,,,, और वैसे ही बाथरूम का दरवाजा खुला और उसकी मां बाथरूम से बाहर आ गई लेकिन बाहर आते हैं उसकी नजर सीधे अंकित के पेट की तरफ पड़ी जो कि आगे वाला भाग पूरी तरह से फूला हुआ था और तंबू बना हुआ था जिसे देखकर वह मन ही मन मुस्कुराने लगी और उसे इस बात का यकीन हो गया कि वह जब अंदर बैठकर पेशाब कर रही थी तो पेशाब करने की वजह से सिटी की आवाज उसके बेटे के कानों में जरूर पड़ रही थी जिसे सुनकर ही वह उत्तेजित हुआ है,,,, और वह जल्दी टीवी बंद करके सो जाना इतना कहकर अपने कमरे में चली गई,,,।

अंकित कुछ देर तक इस तरह से बैठकर टीवी देखता रहा कोई फिल्म चल रही थी थोड़ी देर बाद वह भी उठकर अपने कमरे में चला गया क्योंकि वह अपने ध्यान को इन सब चीजों से हटाना चाहता था लेकिन ऐसा हो नहीं पा रहा था,,,, तृप्ति बेठकर टीवी देख रही थी तभी टीवी में चल रही फिल्म में हीरो हीरोइन का हाथ पकड़ कर उसे खींचकर अपनी बाहों में भर लेता है और उसके होठों पर अपनी हॉट रख चुंबन करने लगता है इस दृश्य को देखते ही तृप्ति खत्म बदन में अजीब सी हरकत होने लगी और उसे फिल्म में दिखाई दे रही हीरोइन की जगह खुद वह और हीरो की जगह संदीप की कल्पना करने लगी,,,,,,।

तृप्ति पल भर में ही उत्तेजित होने लगी भले ही वह संदीप की हरकत की वजह से उससे नाराज थी लेकिन कहीं ना कहीं उसे भी संदीप की हरकत पूरी तरह से मदहोश कर गई थी उसे दिन कोचिंग से लौटते समय जिस तरह से संदीप ने अंधेरे का फायदा उठाते उसे अपनी बाहों में भर लिया था और उसकी दोनों चूचियों पर हाथ रखकर कुर्ती के ऊपर से ही दबाया था और,,, उसकी तरफ से किसी भी प्रकार का विरोध ना होता देखकर हिम्मत करते हुए वह अपनी हथेली को उसकी कुर्ती में डालकर पेटी के अंदर से उसकी बुर को दबोच लिया था यह सब तृप्ति को पूरी तरह से मदहोश कर जाता था और जब भी उस पल का ख्याल आता था तो,,, तृप्ति को अपनी बुर पानी छोड़ती हुई महसूस होती थी और उसे समय वह पूरी तरह से मदहोश हो जाती थी और इस समय भी उसका यही हाल था,,, टीवी पर चल रहे फिल्म के रोमांटिक दृश्य को देखकर अनायास ही संदीप की कल्पना करके उसकी बुर कचोरी की तरह फूलना शुरू हो गई थी जिस पर वह अनजाने में ही अपनी सलवार पर हाथ रखकर धीरे-धीरे अपनी बुर पर दबाव बढ़ा रही थी,,, और टीवी पर चल रहा है दृश्य धीरे-धीरे अपनी मदहोशी बिखेरना शुरू कर दिया,,, लेकिन तभी फिल्म की हीरोइन को जैसे होश आया हो और वह तुरंत हीरो के हाथ में से दूर होते हुए मुस्कुराकर वहां से भाग गई पर यह दृश्य देखकर तृप्ति को भी होश आ गया और वहां अपनी हरकत पर शर्मिंदा होने लगी और धीरे से उठकर टीवी को बंद कर दी और एक गिलास ठंडा पानी पीकर अपने मन को शांत करने की कोशिश करने लगी और अपने कमरे में जाकर सो गई दूसरी तरफ सुगंधा अपने सारे वस्त्र त्याग कर पूरी तरह से नग्न अवस्था में बिस्तर पर करवटें बदलते हुए अपनी बुर को हथेली में दबा दबा कर उसका पानी निकाल रही थी,,,, आज जो कुछ भी उसने अपनी तरफ से हरकत की थी उसका प्रभाव उसके बेटे पर बहुत ही गहरा पड़ रहा था जिसका अंदाजा उसे अच्छी तरह से था वह अच्छी तरह से जानती थी कि उसका बेटा बहुत ही सीधा-साधा है दूसरे लड़कों की तरह बिल्कुल भी नहीं है वरना अब तक कुछ का कुछ कर दिया होता,,,,।

एक दिन रविवार को शाम के समय वह बगीचे में टहलने के लिए गया था,,, बगीचा काफी बड़ा था बगीचे के आगे भाग में थोड़ी भीड़भाड़ थी तो अंकित धीरे-धीरे बगीचे के पीछे वाले भाग में चला गया यहां पर कुछ थोड़ी शांति थी लेकिन जहां-था कुछ लोग बैठे हुए नजर आते थे और वह एक तरफ की कुर्सी पर बैठ गया और ठंडी ठंडी हवा का लुफ्त उठाने लगा,,, तभी उसके कानों में एक लड़की की आवाज आई जो आवाज एकदम जानी पहचानी थी वह तुरंत एकदम जैसे होश में आया हो और वह तुरंत अपने बगल वाली जो कि तकरीबन 5 मीटर की दूरी पर रखी हुई बेंच थी उस पर देखा तो उसकी बहन तृप्ति बैठी हुई थी और वह भी एक लड़के के साथ दोनों आपस में बातें कर रहे थे और दोनों की बातें उसे साफ सुनाई दे रही थी,,,।

संदीप मुझे बगीचे में मिलना ठीक नहीं लगता मुलाकात तो कॉलेज में हो जाती है फिर बगीचा क्यों,,?(अपनी बहन तृप्ति की बात सुनकर तो अंकित के होश उड़ गए और वह दोनों उसे देख ना ले इसलिए वह तुरंत बेंच पर से उठकर एक छोटे से घने फुल के पौधे के पीछे अपने आप को छुपा कर उन दोनों की बातों को सुनने लगा और दोनों की तरफ देखने लगा,,,)

मैं भी जानता हूं तृप्ति इस तरह से बगीचा में मिलना ठीक नहीं है लेकिन क्या करूं तुमसे दो घड़ी मिलकर बातें करने का मन करता है जो की कॉलेज में मुमकिन नहीं हो पता वहां पर बातें करने का मतलब है कि तुम्हारी बदनामी हो जाएगी कोई देख लेगा तो तरह-तरह की बात बनाएगा,,,।

और यहां यहां भी तो वही होने वाला है अगर कोई नहीं देख लिया तो मेरी तो बदनामी हो जाएगी,,,

ऐसा कुछ भी नहीं होगा तृप्ति मुझ पर भरोसा रखो,,,,

तुम पर भरोसा,,,, तुम पर भरोसा करके देखी थी अगर मैं अपने आप को संभाल ली ना होती तो उसी दिन अनर्थ हो जाता,,,,।

(अपनी बहन के मुंह से इस तरह की बातें सुनकर अंकित एकदम से चौंक गया उसे समझ में नहीं आ रहा था कि कैसा अनर्थ हो जाता और वह कौन सी बात कर रही है लेकिन इतना तो वह समझ ही रहा था कि कुछ गड़बड़ वाली ही बात है इसलिए वह दोनों की तरफ देख रहा था और उसे लड़के को पहचानने की कोशिश कर रहा था लेकिन अंकित उसे पहचान नहीं पा रहा था कि वह कौन है लेकिन उसे अंदाजा हो गया था कि उसके साथ पढ़ने वाला ही कोई लड़का है,,,,)

अरे नहीं त्रिप्ति उस दिन जैसी गलती मुझसे नहीं होगी,,, उसे दिन तो अंधेरा और एकांत पाकर में बहक गया था वैसे भी तुम्हारी खूबसूरती देखकर कोई भी बहक जाए,,,,(संदीप काफी शातिर लड़का था,,, वह अच्छी तरह से जानता था की लड़कियों की तारीफ करने पर वह जल्दी पिघल जाती है और ऐसा ही हो रहा था अपनी तारीफ संदीप के मुंह से सुनकर वह मंद मंद मुस्कुरा रही थी लेकिन थोड़ी ही दूरी पर छुप कर देख रहा अंकित गुस्से से आग बाबूला हुआ जा रहा था,,,,)
 
चलो रहने दो बेवजह तारीफ करने को,,,,

(अंकित कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उसकी बहन बगीचे में इस तरह से किसी से मिलेगी,,,, और दूसरी तरफ मौके की नजाकत को देखते हुए संदीप पूरा फायदा उठाना चाहता था और इसलिए अपने हाथ को ऊपर की तरफ ले जाकर उसके कंधे पर रख दिया और अपनी हाथ की उंगलियों को उसकी छाती के उभार पर हल्के हल्के घूमाना शुरू कर दिया जिसका गोलापन संदीप को साथ महसूस हो रहा था और उसे बहुत मजा आ रहा था और वह बोला,,,)

अपनी कसम खाकर कहता हूं कि मैं आज तक तुम्हारी जैसी खूबसूरत लड़की देखा नहीं हूं इसलिए तो तुम्हारे पीछे लट्टू हूं,, (इस तरह की मनमोहक बातें करके संदीप तृप्ति की चूची पर अपनी उंगलियों को घुमा रहा था जिसका एहसास तृप्ति को भी हो रहा था,,, और न जाने क्यों तृप्ति को भी संदीप की हरकत से आनंद आ रहा था वह उसकी चूची को होले होले से स्पर्श कर रहा था लेकिन उसकी दोनों टांगों के बीच उसकी बुर में हलचल हो रही थी,,,, अंकित उसे लड़के की हरकत को देखकर गुस्से से क्रोधित हुआ जा रहा था लेकिन इस समय वह कुछ भी कर सकते की स्थिति में नहीं था उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें वह लड़का उसकी आंखों के सामने ही उसकी बहन की चूची पर हाथ को मारा था लेकिन वह कुछ कह नहीं पा रहा था क्योंकि उसकी बहन भी इसमें शामिल थी,,,,)

चलो अब रहने दो संदीप कल कॉलेज में मुलाकात होगी अब चलते हैं बहुत देर हो गई है,,,

नहीं तृप्ति ऐसा मत करो कुछ देर और रुक जाओ,,,

नहीं मैं नहीं रुक सकती मम्मी घर पर इंतजार कर रही होगी और वैसे भी शाम ढलने वाली है,,,, और वैसे भी इस सिचुएशन पर मुझे एक गाना याद आ गया,,,

कौन सा,,,?

ढल गया दिन हो गई शाम जाने दो घर जाना है,,,

अभी-अभी तो आई हो अभी अभी जाना है,,(आगे की कड़ी को संदीप पूरा करके हंसने लगा और इसी के साथ तृप्ति भी हंसने लगी,,,, और अपनी जगह से उठकर खड़ी हो गई लेकिन तभी संदीप उसका हाथ पकड़ लिया और संदीप की ईस हरकत पर तृप्ति पूरी तरह से शर्मा गई और अपने अगल-बगल देखने लगी अंकित जल्दी से झाड़ी के पीछे छुप गया,,,)

यह क्या कर रहे हो संदीप छोड़ो मेरा हाथ कोई देख लेगा तो गजब हो जाएगा,,,

ऐसे नहीं छोडूंगा पहले एक पप्पी दो,,,

अरे यह कैसी जिद है,,,(तृप्ति मुस्कुराते हुए बोली)

यह एक प्रेमी की प्रेमिका से जिद है क्या प्रेमिका इतना भी अपने प्रेमी की जीद को पूरी नहीं कर पाएगी,,,

(तृप्ति का हाथ अभी भी संदीप के हाथ में था तृप्ति मुस्कुरा रही थी और उसकी बात सुनकर अपने इधर-उधर देखकर धीरे से झुकी और उसके गाल पर अपने लाल-लाल हॉट रख दी और मौका देखकर संदीप जल्दी से उसके झुकाने की वजह से कुर्ती में से उसकी चूची को दबा दिया और संदीप की हरकत पर वह एकदम से चौंक गई और बोली,,,)

हाए,,,, यह क्या कर रहे हो,,,

इतना तो कर ही सकता हूं,,, (संदीप की हरकत और उसकी बात सुनकर कुछ देर तक तृप्ति उसे गुस्से से घूरने का नाटक करती रही और फिर मुस्कुरा कर अपना पर्स कंधे पर लटका कर,,, चलने लगी और संदीप की बेंच पर से उठकर खड़ा हो गया और उसके पीछे-पीछे चलने लगा यह सब देखकर अंकित का खून खौल रहा था लेकिन वह कुछ भी कर सके नहीं की स्थिति में नहीं था वह कुछ देर तक वही बैठ कर सोचने लगा क्योंकि उसे अपनी बहन से इस तरह की उम्मीद बिल्कुल भी नहीं थी,,, वह अपने मन में सोच रहा था कि चलकर सब कुछ अपनी मां से बता दे या इस बारे में तृप्ति से ही बात करें लेकिन ऐसा करने की उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी क्योंकि इस तरह की बातों का जिक्र भी उसने अभी तक अपने घर में ना तो सुना था और ना ही किया था इसलिए उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें कुछ देर बगीचे में बैठने के बाद वह भी वहां से उठकर घर की ओर चल दिया लेकिन घर पर पहुंचने पर भी वह अपनी बहन से या अपनी मां से बगीचे वाली बात का जिक्र नहीं कर पाया,,,)

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अंकीत ने जो कुछ भी बगीचे में देखा था उसका जिक्र ना तो अपनी बहन से ही और ना ही अपनी मां से कर पाया था क्योंकि वह ऐसे माहौल में पला बढा नहीं हुआ था जहां इस तरह की बातें होती हो,,, वह हमेशा से ही सीधा-साधा लड़का था यहां तक की जवानी की दहलीज पर कदम रखने के बावजूद भी उसमें दूसरे लड़कों की तरह बदलाव बिल्कुल भी नहीं आया था,,,,,, सीधा-साधा लड़का होने के नाते वह अपनी मां और बहन के बारे में भी अच्छी तरह से जानता था वह उन दोनों से भी भली भांति परिचित था लेकिन बगीचे में अपनी बहन को दूसरे लड़के के साथ देखकर और जिस तरह की हरकत हुआ लड़का उसके साथ किया था और खुद उसकी बहन ने जाते-जाते उसे एक चुंबन दी थी यह सब देखते हुए उसके तो होश उड़ गए थे वह अपनी बहन के बारे में कभी इस तरह की बात सपने में भी नहीं सोच सकता था वह पहली बार अपने घर के सदस्य को इस तरह की हरकत करते हुए देखा था इसलिए तो उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें,,,,।

खास करके अंकित उसे लड़के की हरकत के बारे में सोचकर हैरान था और काफी गुस्से में भी था लेकिन वह अपना सारा गुस्सा पी गया था उससे भी ज्यादा गुस्सा तो उसे अपनी बहन पर आ रहा था क्योंकि उसे लड़के की ऐसी हरकत के बावजूद भी वह कुछ नहीं बोली थी बस मुस्कुरा दी थी ,,, अंकित की जगह कोई और भाई होता तो शायद इस समय उसे लड़के का मुंह तोड़ दिया होता लेकिन अंकित झगड़ा तकरार से हमेशा दूर रहता था इसलिए ऐसा होकर भी नहीं पाया था वरना कौन भाई होगा जब उसकी आंखों के सामने ही कोई लड़का उसकी बहन की चूची दबा दे और वह कुछ ना बोले,,,,,,।

घर पर पहुंचा तो सब कुछ सहज था उसकी बहन तर्प्ति भी अपने काम में मस्त थी,,,,,, अंकित को अपनी बड़ी बहन तृप्ति का यही सादगी भरा रूप सबसे ज्यादा अच्छा लगता था घर का काम करती हुई पढ़ाई करती हुई अपनी मां के काम में हाथ बटाती हुई,,,, तृप्ति के इसी रूप को इसी व्यवहार को अंकित बहुत पसंद करता था ना कि बगीचे वाले व्यवहार को क्योंकि बगीचे में जिस तरह की हरकत उसने उस लड़के के साथ की थी उसे बारे में तो वह कभी सोच भी नहीं सकता था,,, लेकिन तभी बगीचे वाली बात उसे याद आने लगी जब वह लड़का कह रहा था कि उसकी बहन की खूबसूरती में वह पूरी तरह से खो गया था इसलिए बहक गया था,,,।

बहकने शब्द से अंकित को कुछ ज्यादा समझ में नहीं आ रहा था लेकिन जवान हो चुका अंकित इतना तो समझ ही रहा था कि कहीं उसकी बहन उसे लड़के के बीच शारीरिक संबंध स्थापित नहीं हो गया है कहीं उसे लड़के ने उसकी बहन की चुदाई तो नहीं कर दिया है और अगर ऐसा हो गया तो फिर वह कहीं मुंह दिखाने के लायक नहीं रह जाएगा,,,, फिर अपने मन में सोचा नहीं नहीं ऐसा वह नहीं कर सकती आखिरकार उसमें भी तो उसकी मां की संस्कार है वह भला कैसे बहन सकती है लेकिन फिर अपने ही सवाल का ढेर सारा जवाब उसके मन में अपने आप ही उमड रहा था वह अपने मन में यही सोच कर हैरान हुए जा रहा था की कही वाकई में उसकी बहन और उसे लड़के के बीच शारीरिक संबंध स्थापित हो गया हो तो क्या होगा यही सोचकर वह एकदम हैरान हो गया था और इस बात की गंभीरता को समझते हुए वह अपनी मां से इस बारे में बात करना चाहता था और अपनी बहन को भी समझाना चाहता था लेकिन अभी खुद उसके मन में ही शंका बनी हुई थी इसलिए वह इस तरह की बात छेड़ने से भी घबरा रहा था,,,।

लेकिन देखते ही देखते 15 दिन गुजर गए और अंकित ने बगीचे वाली बात का जिक्र तक नहीं किया वहीं दूसरी तरफ सुगंधा धीरे-धीरे अपने बेटे को अपनी तरफ आकर्षित करने का सारा जुगाड़ बनाकर उसे पर अमल करने लगी और उसे इस बात का एहसास भी होने लगा कि उसका बेटा भी उसे देखने की कोशिश करता था उसकी तरफ देखकर आकर्षित होता था,,, लेकिन इस तरह की देखा ताकि से आगे अभी तक कुछ बात बन नहीं पाई थी,,,। और इस बात का मलाल सुगंध को भी रहता था लेकिन इस खेल में भी उसे बहुत मजा आ रहा था रोज ही वह अपनी बेटी को अपनी तरफ आकर्षित करने के चक्कर में अपनी बुर की थी कर लेती थी और फिर रात को अपने बेटे के बारे में कल्पना करके कभी उंगली तो कभी मुली गाजर और खीरा डालकर अपनी जवानी की आदत को बुझाने की कोशिश करती थी लेकिन यह आगे सी थी कि जितना बुझाने की कोशिश करती थी उतनी ज्यादा और भडक जाती थी,,,।

ऐसे ही एक दिन अंकित का दोस्त सूरज बातें करते हुए चाय की दुकान पर बैठा हुआ था की तभी वहां से अंकित के पड़ोस वाली लड़की सुमन हाथ किताब ली अपने घर की तरफ जाने लगी जिसे देखकर सूरज गर्म आहे भरता हुआ बोला,,,।

यार अंकित तेरी पड़ोस वाली लड़की तो देख कितनी जवान हो चुकी है गांड कितनी मस्त हो गई है,,,।

(सूरज की बात पर अनजाने में ही अंकित ने भी अपनी नजर उठा कर उसे लड़की की तरह देख लिया जो कि अपने घर की तरफ चली जा रही थी और उसकी पीठ और नितंब अंकित की तरफ ही थे अनजाने में ही अंकित का ध्यान उसकी गोल-गोल गांड पर चली गई थी जो कि वाकई में कसी हुई सलवार में कुछ ज्यादा ही उभार लिए हुए नजर आ रही थी,,,, लेकिन जब उसे स्थिति का एहसास हुआ वह सूरज पर नाराज होते हुए बोला,,,)

यार सूरज इस तरह की बातें मत किया कर यह अपनी सुषमा आंटी है ना उनकी लड़की है समझा और उसे भी मैं अपनी बहन की नजरिए से देखता हूं,,,

अंकित तु सच में एकदम पागल है हर लड़की को अपनी बहन की नजर से देखेगा तो शादी किससे करेगा और अगर सच में हर लड़की को अपनी बहन समझेगा तो सुहागरात के दिन चुदाई किसकी करेगा,,, सुहागरात वाली रात को ऐसा बोलेगा,,,।

दीदी जरा सा अपनी कमर उठाओ ना तुम्हारी चड्डी उतारना है,,,(और इतना कहकर वह हंसने लगा उसे हंसता हुआ देखकर अंकित को बहुत गुस्सा आया लेकिन न जाने क्यों चड्डी उतारने वाली बात पर उसके बदन में अजीब सी हलचल आने लगी खास करके उसकी दोनों टांगों के बीच कुछ ज्यादा ही हलचल महसूस होने लगी,,,, क्योंकि सूरज की बात सुनते ही उसके मन में कल्पना का चित्र उभरने लगा था कि वाकई में जैसा उसका दोस्त कह रहा है वैसा ही वह उसके साथ उसकी चड्डी उतारने के लिए कह रहा है,,, सूरज की बात तो उसे उत्तेजित कर देने वाली लगी थी लेकिन फिर भी वह नाराजगी दर्शाते हुए बोला,,,।)

सच में सूरज तू बहुत बिगड़ गया है तू भी रौनक जैसा हो गया है,,,

मैं रोनक जैसा नहीं हो गया हूं अंकित सारे लड़के रौनक जैसे हैं और वैसे होते ही हैं क्योंकि यह तो प्राकृतिक है,,, लड़कियों और औरतों को देखकर हम जैसे लड़कियां आकर्षित नहीं होंगे तो कौन होगा,,,, लेकिन रौनक मैं तुझे एक बात बताना चाहता हूं तो शायद अपनी पड़ोस वाली लड़की के बारे में कुछ जानता नहीं है इसलिए उसे अपनी बड़ी बहन का दर्जा देता है लेकिन क्या वह तुझे अपने भाई का दर्जा देती है कभी नहीं देती होगी क्योंकि उसके बारे में तु कुछ जानता ही नहीं है,,,,।

चल अब रहने दे सूरज किसी को बदनाम करने से कोई फायदा नहीं है,,,

मैं कहां बदनाम कर रहा हूं वह तो खुद बदनाम है तू नहीं जानता कि उसके कितने लड़कों के साथ चक्कर हैं और वह न जाने कितने लड़कों के साथ सो भी चुकी है इसलिए देखता नहीं है उसकी गांड कितनी बड़ी-बड़ी है,,, उसे उम्र की लड़कियों को देखा उसे देख,,,(एक पल के लिए तो सूरज के मन में ख्याल आया था कि वह सीधे-सीधे कह दे कि तेरी बहन की गांड देखा और उसकी गांड देखा लेकिन ऐसा कहने में बात भी कर सकती थी इसलिए वह अंकित की बहन का उदाहरण नहीं दिया लेकिन अपनी बात को समझने की पूरी कोशिश कर रहा था लेकिन सीधा-साधा अंकित उसकी बात समझ नहीं पा रहा था तो आश्चर्य से सूरज की तरफ देख रहा था सूरज उसके मन में उठ रहे सवाल को शायद उसके चेहरे पर पढ़ लिया था इसलिए वह बोला)

देख अंकित जो लड़कियां ज्यादा चुडक्कड़ होती है उनकी गांड सबसे पहले बड़ी हो जाती है जैसा कि तेरी पड़ोस वाली लड़की की गांड कैसी बड़ी-बड़ी है वह न जाने कितने लड़कों से चुदवा चुकी है,,,, अगर मेरी बात करते चाहिए यकीन नहीं होता तो दूसरे लड़कों से पूछ ले सब लोग जानते हैं एक सिर्फ तू ही नहीं जानता,,,,।

(सूरज की बात सुनकर अंकित एकदम से हैरान हो गया था क्योंकि वह अपने पड़ोस वाली सुषमा आंटी की लड़की को सीधी साधी ही समझता था लेकिन सूरज के मुंह से उसके बारे में हकीकत जानकर उसके पैरों तले जमीन खिसक गई थी लेकिन चुदाई वाली बातें से उसके तन-बड़े उत्तेजना की लहर भी उठ रही थी और पल भर में उसे अपनी बहन का ख्याल आ गया क्योंकि वह भी अपनी बहन को बहुत सीधी-सादी समझता था लेकिन बगीचे में अपनी बहन को दूसरे लड़के के साथ देखकर उसका यह भरम धीरे-धीरे टूट रहा था और आज सुमन के बारे में जान कर दो उसे अपने मन में डर लगने लगा था कि कहीं उसकी बहन तृप्ति भी तो नहीं सुमन की तरह लड़कों से चुदवाती हो,,,, फिर अपने ही सवाल का जवाब अपने मन में खुद को देते हुए नहीं-नहीं ऐसा नहीं हो सकता तृप्ति सुमन की तरह नहीं हो सकती,,,,)

अरे क्या सोच रहा है मैं सच कह रहा हूं और सच कहूं तो अपने साथ के जितने लड़के हैं सब कोई,,, उसके पीछे पड़े हुए हैं और अगर वह तैयार हो तो सब छोड़ना भी चाहते हैं लेकिन किसी का नंबर ही नहीं लग रहा है वह बाहर बाहर ही सब कुछ करवा लेती है और तुझे तो इन सब के बारे में अनुभव ही नहीं है नहीं तो खुद तू अपनी नजर से पहचान लेता उसकी छाती के संतरे कितने बड़े हो गए हैं उसकी गांड कितनी बड़ी हो गई है,,,।

यह सब बदलाव,,,(अंकित उत्सुकता और आश्चर्य जताते हुए दबे स्वर में बोला,,,)

हां अंकित यह सब बदलाव लड़कियों के शरीर में आ ही जाते हैं जब मरद का हाथ लगता है लड़कियों की चूची पर हाथ लगाते ही उन्हें दबाते ही उनका आकार बढ़ना शुरू हो जाता है और गांड भी फैलने लगती है,,,,,(इतना वह कहीं रहा था कि तभी उनका एक दोस्त और भी उनके पास आया जिसे देखकर सूरज उसे बैठने के लिए बोला और अपनी बात को आगे बढ़ते हुए उस दोस्त से मुखातिब होता हुआ बोला,,) यार तू जरा बता इसे सुमन के बारे में,,,।

अरे उसके बारे में क्या बताना उसके बारे में सब कोई जानता है बस यही पड़ोस में रहकर कुछ नहीं जानता,,

और यह महानुभाव उसे बड़ी दीदी समझते हैं उसे बड़ी दीदी कहकर बुलाते हैं,,,,(सूरज की बात सुनते ही सूरज और उसका दोस्त दोनों तरह के लगाकर हंसने लगे और सूरज का दोस्त हंसते हुए बोला)

बहुत बड़ी दीदी बड़ी दीदी कहता है ना किसी दिन देखना तेरे पर अगर फिदा हो गई तो तेरे लिए अपनी टांग खोल देगी फिर चाटते रहना अपनी बड़ी दीदी की बुर,,,,।
 
(अंकित को समझ में नहीं आ रहा था कि वह दोनों की बातों को सुनकर कैसा बर्ताव करें उसके चेहरे के भाव बदल तो रहे थे उसे आश्चर्य हो रहा था क्योंकि आज तक वह सुमन के बारे में अनजान बना था और जिस तरह से उसके दोस्त ने दोनों टांगें फैला कर बुर चाटने वाली बात कहा था उसे सुनकर उसका लंड खड़ा हो गया था,,,, कुछ देर तक तीनों वहीं बैठकर बातें करते रहे और फिर सूरज जाते-जाते बोला,,,)

यार अंकित तेरी बात बन सकती है तू अगर चाहे तो सुमन तुझे जरूर कुछ करने देगी,,,।

धत् यार तू भी,,,,

अरे सच कह रहा हूं बाकी तेरी मर्जी,,,(इतना कहकर सूरज वहां से चला गया और अंकित कुछ देर तक वहीं बैठकर सुमन के बारे में सोचता रहा क्योंकि आज तक उसने सुमन के अंदर कोई इस तरह की हरकत देख ही नहीं था जिसे देखकर सुमन के बारे में उसे कोई शक हो लेकिन उसके दोस्त भी उसे झूठ नहीं बोल सकते थे इसलिए काफी सोच विचार करने के बाद वहां धीरे से वहां से उठाओ और अपने घर की तरफ चल दिया धीरे-धीरे शाम ढल चुकी थी और अंधेरा अपनी चादर बिछाने के लिए उतारू हो रहा था,,, अंकित अपने घर में पहुंच कर सबसे पहले तृप्ति के ऊपर नजर घुमा कर देखने लगा वह अपने दोस्त की बात को अपनी बहन पर आजमा रहा था वह कर नजरों से अपनी बहन की छाती की गोली को और उसके नितंबों के आकार की तरफ देखकर अंदाजा लगा रहा था कि कहीं उसकी बहन भी तो नहीं सुमन की तरह निकल गई लेकिन ,,, लेकिन अपनी बहन की छाती और अपनी बहन की गांड की तरफ देखकर उसे थोड़ा संतोष हुआ कि उसकी बहन की छाती सुमन की तरह बड़ी-बड़ी नहीं थी और गांड का आकार भी एकदम सीमित था भले ही वह थोड़ा उभरा हुआ था लेकिन सुमन की तरह चौड़ा नहीं था इसलिए उसे इस बात का एहसास होने लगा कि अभी तक उसकी बहन में लंड नहीं लिया और जैसे ही अपने मन में अपनी बहन के लिए लंड लेने वाली बात का ख्याल आया,,, तुरंत ही उसका खुद का लंड खड़ा हो गया,,,, जैसे तैसे करके वह अपनी बहन के ऊपर से अपना ख्याल दूसरी तरफ घूमने की कोशिश करने लगा तो वैसे ही उसे खाना बनाती हुई अपनी मां नजर आने लगी और उसकी बड़ी-बड़ी गांड और बड़ी-बड़ी चूची देखकर वह उसे पर शक करने के बारे में सोच भी नहीं सकता था क्योंकि वह तो शादीशुदा और उम्र के इस पड़ाव पर पहुंच चुकी थी जहां पर उसकी खूबसूरती चार चांद बन गई थी और उसकी बड़ी-बड़ी गांड और बड़ी-बड़ी चूची देखकर उसे इस बात का अंदाजा तो लगी गया था कि उसकी मां दो बच्चों की मां हो चुकी थी और इसके लिए न जाने कितनी बार चुदवा चुकी थी,,, अपनी मां के बारे में इस तरह के शब्द अपने जेहन में आते ही वह पल भर के लिए शर्मिंदा हो गया,,, और अपने ध्यान को दूसरी तरफ बांटने की कोशिश करने लगा,,,,।)

दूसरे दिन रविवार का दिन था और दोपहर के समय सुगंधा एक कटोरी आम का अचार भरकर अंकित को थमाते हुए बोली,,,।

ले अंकित इसे पड़ोस वाली आंटी के वहां दे आना तो,,,

अरे यह क्या है,,,(हाथ में कटोरी को पकड़ते हुए)

आम का अचार है और क्या है दिखाई नहीं दे रहा है क्या,,,!

अरे मुझे दिखाई तो दे रहा है लेकिन इतना सारा उन्हें देने की क्या जरूरत है,,,

अरे बुद्धू सुषमा ने मुझे पहले से ही आचार देने के लिए बोल रखी थी इसलिए दे रही हूं,,,, अब जा जल्दी से पहुंचा दे,,,,

ठीक है मम्मी,,,,(इतना कहकर अंकित कटोरी लेकर घर से बाहर निकल गया रविवार का दिन होने की वजह से तृप्ति भी घर पर थी,,, वैसे तो इस समय वह कोचिंग के लिए घर से बाहर चली जाती थी लेकिन आज वह घर पर ही थी इसीलिए सुगंधा भी मन महसूस कर रह गई थी वरना अभी तक तो वह अपने बेटे को अपनी जवानी के जलवे दिखा दी होती,,,।

अंकित हाथ में अचार की कटोरी लेकर दरवाजे पर खड़ा था और दरवाजे की कड़ी बजाकर आवाज दे रहा था,,,, लेकिन अंदर से कोई आवाज नहीं आ रही थी तो वह धीरे से दरवाजे पर हाथ रखा तो दरवाजा खुद ब खुद खुल गया,,,, वह धीरे से घर में प्रवेश किया वह इधर-उधर देखने लगा लेकिन कोई नजर नहीं आ रहा था तो वह देखते ही देखते सीधा आगे की तरफ बढ़ने लगा और देखते ही देखते वहां घर के अंतिम कमरे की तरफ पहुंच गया और अंतिम कमरे की तरफ पहुंचते ही जैसे ही कमरे की तरफ नजर डाला तो अंदर का नजारा देखकर उसके होश उड़ गए,,, वैसे भी अगर उसकी जगह कोई और होता तो शायद उसके भी होश उड़ जाते क्योंकि अंदर का नजारा ही इतना मदहोश कर देने वाला था कि खुद संस्कारी अंकित का भी इमान डोलने लगा,,,,।

दरवाजा हल्का सा खुला हुआ था और वह दरवाजे पर दस्तक देने ही वाला था कि उसकी नजर कैमरे के अंदर चली गई थी और अंदर का नजारा देखकर उसके तो होश उड़ गए थे क्योंकि अंदर कमरे में सुमन जो की गीले बालों से लग रहा था कि अभी-अभी नहा कर आई थी और उसके बदन पर केवल एक टावर थी जो कि वह टॉवल भी वह इस तरह से पकड़े हुए थे कि टॉवल उसके आधे नितंबों को ही ढंक पा रहा था,,,, और सुमन की खूबसूरत गोरी गोरी गांड और उसके बीच वाली फांक एकदम साफ नजर आ रही थी,,, और ऐसे हालात में सुमन की खूबसूरत गांड आधे चांद की तरह नजर आ रही थी,,, जिसे देखकर अंकित तन बदन में चार बोतलों का नशा चढ़ना शुरू हो गया था,,।

वैसे भी अंकित के लिए यह पहला मौका था जब वह किसी खूबसूरत लड़की को अर्धनग्न अवस्था में देख रहा था और वह अलमारी में से कुछ ढूंढ रही थी और अंकित को समझते देर नहीं लगी कि वह अपने पहनने के लिए कपड़े ढूंढ रही थी और थोड़ी देर में उसे ड्राोवर में से,,, कोई कपड़ा मिल गया लेकिन दरवाजे के पीछे खड़ा अंकित समझ नहीं पा रहा था कि उसे क्या मिला है और वह थोड़ी ही देर में जब पीछे की तरफ हाथ लाकर उसका हुक लगाने लगी तब उसे इस बात का एहसास हुआ कि वह ब्रा पहन रही थी और दोनों हाथ का उपयोग करने की वजह से उसकी कमर पर लिपटा हुआ टावल एकदम से नीचे उसके कदमों में जाकर गिर गया,,, और वह पूरी तरह से नंगी हो गई और उसे नग्न अवस्था में देखकर उसके नंगे बदन को देखकर अंकित का बिना कहीं उसका लंड पूरी तरह से खड़ा हो गया और अपनी औकात में आ गया अंकित का तो इस नजारे को देखकर उसकी आंखें फटी जा रही थी उसका दिमाग काम करना बंद हो गया था पहली बार जिंदगी में वहां किसी खूबसूरत लड़की को बिना कपड़ों के देख रहा था उसके अंगों को देख रहा था उसकी मखमली चिकनी पीठ को देख रहा था और इसके नितंबों की गोली को देख रहा था जो कि वाकई में बेहद खूबसूरत उभार लिए हुए थे,,,।

शायद इस बारे में कपड़े पहने होने की वजह से अंकित सुमन की खूबसूरत नितंबों के बारे में कल्पना भी नहीं कर सकता था,,, लेकिन उसे ऐसा लग रहा था कि शायद जैसे उसकी कल्पना से भी ज्यादा खूबसूरत नजारा वह देख रहा था,,,। उत्तेजना के मारे अंकित का गला सूख रहा था वह गहरी गहरी सांस ले रहा था उसे इस बात का डर था कि कहीं उसके हाथ से अचार की कटोरी छूट न जाए और फिर कहीं इस तरह के खूबसूरत नजारे पर पर्दा ना पड़ जाए,,, अंदर नहा कर कपड़े पहन रही सुमन का ध्यान दरवाजे पर बिल्कुल भी नहीं था उसका दरवाजा हल्का सा खुला हुआ ही था जो कि अंकित से आने से पहले ही वह बाथरुम से नहा कर अपने कमरे में गई थी,,,।

देखते ही देखते वह अपनी ब्रा का हक बंद करके उसे पहन कर अपनी नारंगियों को उसके कप में ढंक ली थी लेकिन अफसोस की बात यह थी कि उसकी नंगी संतरों को अंकित अपनी आंखों से देख नहीं पाया था,,, उसके अंको की हरकत की वजह से उसके गोल-गोल नितंबो में अजीब सी थिरकन हो रही थी जिसे देखकर अंकित का लंड अंगड़ाई ले रहा था,,, अंकित के लिए यह पहला मौका था जब वह किसी खूबसूरत लड़की को नंगी और इतने करीब से देख रहा था इसलिए तो उसकी हालत एकदम से खराब हो गई थी,,,, ब्रा को पहनने के बाद वह वापस ड्रोवर को खोलकर उसमें से फिर से कपड़ा ढूंढने लगी लेकिन इस बार अंकित को अंदाजा हो गया था कि वह क्या ढूंढ रही है पर थोड़ी ही देर में वहां लाल रंग की चड्डी निकाल कर उसे अपने ऊपर करके उसके गोल बड़े छेद में डाली और फिर वापस दूसरी काम को भी उसी तरह से दूसरे गोले में डाल दी और दोनों हाथों से पकड़ कर चड्डी को ऊपर की तरफ खींचने लगी एक औरत का या खूबसूरत लड़की का कपड़ा पहनना कपड़ा उतारना भी मर्दों के लिए बेहद हसीन नजारा होता है जिसे देखने के लिए उनकी आंखें हमेशा ललाईत रहती है लेकिन ऐसा खूबसूरत नजारा और दूसरी औरतों को कपड़े बदलते हुए देख पाना बहुत कम लोगों की किस्मत में होता है और इस समय किस्मत का धनी था अंकित जो कि अनजाने में ही इस तरह के खूबसूरत दृश्य को देखकर उत्तेजित हो गया था,,, जैसे ही वह लाल रंग की चड्डी को कमर पर चढ़ाकर अपनी गोल-गोल गांड को उसे छोटी सी चड्डी में छुपाने की नाकाम कोशिश करने लगी वैसे ही अंकित को भी इस बात का एहसास हुआ कि वह गलत जगह पर खड़ा था,,,। अगर ऐसे में उसकी नजर उस पर पड़ जाती तो लेने के देने पड़ जाते ,,, इसलिए वह धीरे से अपने कदम पीछे लिया और वापस दरवाजे के पास पहुंचकर वहां पर दस्तक देने लगा मानो के जैसे अभी-अभी आया हो,,,, अंकित को अपने कदम पीछे लेता देख कर सुमन मंद मंद मुस्कुरा रही थी क्योंकि उसकी उपस्थिति को वह अलमारी में लगे शीशे में देख चुकी थी जिस बात से अंकित पूरी तरह से अनजान था और जानबूझकर सुमन अंकित को देखकर ही अपनी टॉवल को नीचे गिर कर नंगी हो गई थी क्योंकि वह अंकित को अपनी नंगी गांड अपना नंगा जिस्म दिखाना चाहती थी क्योंकि उसे अपनी जवानी पर पूरा विश्वास था कि उसके नंगे बदन को देखकर अंकित जरूर कुछ ना कुछ करेगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ,,, लेकिन उसे पूरा विश्वास था कि वह अंकित को अपनी जवानी के रस में पूरी तरह से डूबा कर ही रहेगी,,,,।

सुमन जल्दी-जल्दी अपने कपड़े पहन ली और दरवाजे के पास आ गई जहां पर वह अंकित को देखकर मुस्कुराने लगी और बोली,,,।

अंकित क्या हुआ कुछ काम था क्या,,,?

कककककक,,, कुछ नहीं,,,(सुमन की खूबसूरत चेहरे की तरफ एक टक देखते हुए अंकित बोला) मम्मी ने आचार भिजवाई थी वह लेकर आया हूं,,,(इतना कहकर उसकी नजर अपने आप ही सुमन की छतियो पर चली गई जिसका अंदाजा सुमन को भी हो गया और वह मन ही मन मुस्कुराने लगी,,,, लेकिन तभी उसकी नजर अंकित के पेंट की तरफ गई तो उसमे बना तंबू देखकर उसके तो होश उड़ गए क्योंकि सुमन अब तक तीन-चार लड़कों के साथ संबंध बन चुकी थी और सबके लंड के बारे में अच्छी तरह से जानती थी लेकिन अंकित के पेट में बना तंबू देख कर उसके होश उड़ गए थे क्योंकि उसे अंदाजा लग गया था कि अंकित के पेंट में मामूली लंड नहीं था,,, वासना से भरी हुई सुमन की आंखों में वासना साफ नजर आ रहा था उसका मन तो कर रहा था कि अपना हाथ आगे बढ़ाकर अंकित के पेट के ऊपर से ही उसके लंड को पकड़ ले और फिर उसे अपनी बुर में लेकर अपनी प्यास बुझाने लेकिन एकाएक ऐसा करना उचित नहीं था वह भी धीरे-धीरे इस खेल में आगे बढ़ना चाहती थी इसलिए उससे बोली,,,)

ठीक है अंकित इसे लेकर किचन में आ जाओ,,,(इतना कहकर वहां आगे आगे अपनी गोल-गोल गांड को कुछ ज्यादा ही मटकाते हुए चलने लगी ताकि अंकित का ध्यान उसकी गांड पर रहे और ऐसा ही हुआ उसकी गोल-गोल गांड पर नजर पड़ते हैं अंकित का कलेजा सूखने लगा वह उत्तेजना के सागर में डूबने लगा,,, देखते ही देखते सुमन किचन में आ गई थी और अंकित ठीक उसके पीछे खड़ा था सुमन का दिमाग ऐसी हालत में कुछ ज्यादा ही काम करता था और वह अपने ठीक पीछे खड़े अंकित की तरफ ध्यान न देकर एकदम से नीचे झुकी और किचन के नीचे का ड्रोवर खोलने लगी और जैसे ही वह नीचे झुकी उसकी गोल-गोल गांड सीधे अंकित के खड़े लंड पर जाकर टकरा गई और जैसे ही सुमन को अपनी गांड के बीचो-बीच अंकित का लंड महसूस हुआ वह एकदम से मदहोश हो गई और पल भर में ही समझ गई कि अगर अंकित का लंड उसकी बुर में घुसेगा तो क्या हालत करेगा,,, और दूसरी तरफ,,, अंकित का भी बुरा हाल था उसके झुकने पर जिस तरह से पेट में तना हुआ उसका लंड सुमन की गांड से जाकर टकराया था उसके पूरे बदन में हलचल सी मच गई थी ,,, उसके बदन में सुरसुरी सी दौड़ गई थी,,,, पल भर में ही उसे लगा कि जैसे कि मानो उसे स्वर्ग का सुख प्राप्त हो गया हो,, वह पूरी तरह से मदहोश हो गया था एक हाथ में उसके कटोरी थी इसलिए वह एक ही हाथ को उसकी गोल-गोल कांड पर रख पाया था वरना वह दोनों हाथों से उसकी गांड की दोनों फांको को थाम लेता,,,, लेकिन अंकित की यह हरकत सुमन के बदले में भी हलचल मचा गई थी उसकी बुर से मदन रस अमृत बूंद बनकर उसकी पतली दरार से बहने लगी थी,,, वह इस हालत में ज्यादा देर तक झुकी नहीं रह सकती थी इसलिए मन मसोस कर खड़ी हो गई और बिना कुछ बोले अंकित की तरफ देखकर मुस्कुराने लगी और फिर उसके हाथ से अचार की कटोरी लेकर ड्रोवर में रखने लगी,,, अंकित के हालात का सुमन को अंदाजा हो चुका था सुमन समझ गई किसी उसकी जवानी का तूफान अंकित को रौंद कर रख दिया है लेकिन मुझसे ज्यादा कुछ कर पाती से पहले ही उसके कानों में उसकी मां की आवाज आने लगी जिसे सुनकर वह भी एकदम सकते में आ गई अंकित भी धीरे से किचन से बाहर आ गया और फिर,,, सुषमा को देखकर नमस्ते करते हुए बोला,,,।)

आंटी मा ने अचार भेजा है,,,

सच में तुम अचार लाए हो अंकित,,,

हां मम्मी अंकित अचार लेकर आया था मैं किचन में रखकर आ रही हूं,,,

ओहहहह बेटा तुम्हारी मां कितनी अच्छी है उसे धन्यवाद बोलना,,,

ठीक है आंटी,,,(और इतना कहकर अंकित कमरे से बाहर निकल गया)

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