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- Dec 5, 2013
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रात को सुगंधा अपने बिस्तर पर क्लास वाली घटना के बारे में ही सोच रही थी और इस घटना के बारे में सोचकर वह पूरी तरह से उत्तेजित हुए जा रही थी वह अपने मन में यही सोच रही थी कि वह लड़के भी तो उसके बेटे की ही उम्र के थे लेकिन उन दोनों की सोच कितनी गंदी थी एक औरत को लेकर वह एक औरत को या तो किसी भी औरत के बारे में कितना गंदा सोच रखते थे जब वह लोग अपनी टीचर को ही इस नजर से देखते हैं तो घर में भी तो अपनी मां बहन को भी गंदी नजरों से देखते होंगे यही सब सोच कर सुगंधा अपने बेटे के बारे में सोच रही थी कि जब वह लड़के उसके बारे में इतना गंदा सोच सकते हैं तो उसका बेटा उसकी जवानी देखकर उसकी भरी हुई मदहोश कर देने वाली जवान देखकर उसके नितंबों का उभार और चूचियों की गोलाई देखकर क्यों नहीं उसकी तरफ आकर्षित होता,,,।
वह अपने मन में यही सब सो कर उत्तेजित हुए जा रही थी और धीरे-धीरे अपने कपड़ों को उतारती जा रही थी वह अपने मन में अपने आप से ही बात करते हुए बोल रही थी कि वह लड़के तो उसे छोड़ने के लिए बोल रहे थे उसकी बड़ी-बड़ी गांड देख कर उत्तेजित हो गए थे लंड खड़ा हो गया था उन लड़कों का तो उसके लड़के का क्यों नहीं खड़ा होता लंड उसकी बड़ी-बड़ी गांड देखकर चुची देखकर क्यों उसका मन नहीं करता चोदने को अपनी मां को,,,, आखिरकार उन लड़कों की उम्र और उसके लड़के की उम्र एक ही तो थी तो उसके लड़के में यह सब बदलाव क्यों नहीं होता है एक औरत को देखकर एक खूबसूरत औरत को देख कर क्यों हुआ उत्तेजित नहीं होता कि उसका लंड खड़ा नहीं होता,,,, चोदने के लिए,,, ऐसा अपने आप से ही बात करते हुए वह धीरे-धीरे अपने कपड़े उतार कर पूरी तरह से नंगी हो गई,,, और एक बार फिर से अपने बेटे की कल्पना करके अपनी दोनों टांगों को खोल दी और फिर अपनी उंगलियों को अपनी गुलाबी बुर में डालकर अपनी जवानी की गर्मी को शांत करने की कोशिश करने लगी,,,।
दूसरे दिन सुबह जब किचन में काम कर रही थी तब तृप्ति बालों में कंघी करते हुए अपनी मां से बोली,,,।
मम्मी मुझे कुछ किताबें चाहिए,,,।
हां तो पैसे ले ले जाकर खरीद लेना,,,
नहीं मम्मी तुम खरीद कर ले आना तुम उसे किताब वाली मार्केट चलाती हो ना जहां पर आधे कीमत में ही किताबें मिलती है,,, वहीं से खरीद लेना,,,,
हां यह तु ठीक कह रही है,,, लेकिन किताबें कौन सी लानी है,,,
मैं तुमको लिख कर दे देता हूं तुमको समय मिले तो खरीद लेना,,,,
तुझे चाहिए कब,,,,,
परसों ही चाहिए क्योंकि एग्जाम की तैयारी करना है ना,,,,
तो ठीक है मैं कल जाकर ले लेती हूं वैसे भी मुझे भी कुछ किताबें खरीदना है,,,,
ठीक है मम्मी मैं अभी लिखकर लाती हूं,,,,
(थोड़ी देर में तृप्ति एक कागज के टुकड़े पर उसे जो किताबें चाहिए थी उसका नाम लिखकर अपनी मम्मी के हाथ में थमा दी,,, तीन किताबें थी और सुगंधा जानती थी कि उस किताब वाली मार्केट में जरूर मिल जाएगी,,,, सुगंधा इस बात से भी खुश थी की उसकी बेटी बहुत समझदार हो गई है वह चाहती तो नहीं किताबें ले सकती थी लेकिन,,, जब वही किताबें आधे कीमत में मिलती हो तो नई किताबें लेकर क्या फायदा इस बात को तृप्ति अच्छी तरह से जानती थी और सुगंध भी अपने बच्चों के लिए वही से ही किताबें खरीद कर लाती थी,,,, थोड़ी देर में सुगंधा खाना बना कर नाश्ता तैयार करके खुद भी तैयार होने लगी,,,)
दूसरे दिन स्कूल से छूटने के बाद वह सीधा इस किताब के बाजार में चली गई चौकी उसकी स्कूल से तकरीबन 2 किलोमीटर और आगे था अपने स्कूल के बाहर ही वह रिक्शा पड़कर थोड़ी ही देर में किताब के बाजार में पहुंच गई,,, यहां पहुंच कर देखी की मार्केट में कुछ ज्यादा भीड़भाड़ था इसलिए वह धीरे-धीरे आगे जाने लगी वह अपने बच्चों के लिए किताबें एक ही दुकान से खरीदती थी और वह दुकान वाला सुगंध को अच्छी तरह से जानता था इसलिए किताबों पर अच्छा खासा डिस्काउंट भी दे देता था काउंटर पर पहुंच कर सुगंधा ने उसे दुकान वाले को परची थमा दी और वह दुकान वाला किताबें निकालने लगा,,,,। और सुगंधा इधर-उधर नजर घुमा कर देखने लगी,, उसे दुकान में किताब के साथ-साथ बहुत सारी स्टेशनरी के साथ-साथ दूसरी वस्तुएं भी मिलती थी जैसे की हेयर तेल साबुन वगैरह-वगैरह जो की काउंटर के पास में ही कांच वाले काउंटर में सजा कर रखा हुआ था तभी उसकी नजर,,,, एक छोटे से पूछ पर गई जिस पर कुछ गंदी तस्वीर छपी हुई थी जिसमें एक मर्द औरत आलिंगन होकर एक दूसरे के होठों का रस चूस रहे थे,,, पहले तो सुगंध को समझ में नहीं आया कि वह वस्तु क्या है जो इतना अश्लील चित्र होने के बावजूद कि उसे दुकान वाले ने उसे काउंटर में सजा कर रखा है लेकिन जब बड़े गौर से उसे पूछ के ऊपर लिखे हुए नाम को पढ़कर देखी तो उसके होश उड़ गए उसकी दोनों टांगों के बीच हलचल होने लगी वह कोहिनूर कंडोम था जिसे देखते ही उसकी सांसे ऊपर नीचे होने लगी,,, उसके पति ने कभी भी कंडोम का उपयोग नहीं किया था इसलिए उसने आज तक कंडोम को अपनी आंखों से देखी भी नहीं थी लेकिन इतना जानती जरूर थी कि कंडोम एक ऐसा प्रोडक्ट है जिसे मर्द इस्तेमाल करते हैं जो कि गर्भ निरोधक के लिए काम आता है,,,
उसे प्रोडक्ट के बारे में सुगंधा और कुछ सोचती इससे पहले ही वह दुकान वाला किताबें लेकर काउंटर पर पहुंच गया और सुगंध भी अपनी नजरों को उसे कंडोम के पैकेट से हटा दी,,,,।
कितना हुआ भैया,,,,
रुकिए हिसाब करके बताता हूं,,,,(इतना कहने के साथ ही वहां तीनों किताब की कीमत लिखकर उसे जोड़ने लगा लेकिन तभी सुगंधा ने उसे काउंटर वाले आदमी पर गौर की वह तिरछी नजरों से उसकी छतिया की तरफ देख रहा था जो की हल्की सी पारदर्शी साड़ी होने की वजह से उसकी चूचियों के बीच की पतली दरार काफी खूबसूरत नजर आ रहा था उसे देखकर वह मन ही मन उत्तेजित हो रहा था इस बात का अहसास होते ही सुगंधा एकदम से सचेत हो गई लेकिन वह उसे काउंटर वाले आदमी के सामने अपनी साड़ी को ठीक करना भी नहीं चाहती थी क्योंकि ऐसा करने पर उसे आदमी को एहसास हो सकता था कि उसने उसकी हरकत को देख ली है इसलिए वह एकदम सहज बनने की कोशिश करने लगी,,,, और वह भी तिरछी नजर से उसे आदमी की तरफ देखने लगी और इस तरह से इधर-उधर देखने लगी कि मानो जैसे कुछ हुआ ही ना हो वह आदमी अभी भी उसकी छातियों की तरफ घूर-घूर कर देख रहा था और बिल बना रहा था,,, उसे आदमी की हरकत को देखकर सुगंध अपने मन में सोचने लगी की दुनिया के सारे मर्द उसकी छाती की तरफ देखते हैं लेकिन उसका बेटा ही नहीं देखता,,,।
थोड़ी देर में बिल बनकर तैयार हो गया और उसे दुकान वाले ने बिल सुगंधा के हाथों में थमा दिया लेकिन बिल थमते समय अपनी उंगली से उसके हाथ की उंगली को स्पर्श कर लिया मानो इतने से ही वह पूरी तरह से सुगंधा को का गया हो वह अंदर ही अंदर एकदम उत्तेजित और प्रसन्न हो गया उसकी हरकत का एहसास सुगंधा को भी अच्छी तरह से था लेकिन वह कुछ बोल नहीं पा रही थी क्योंकि यह सब बेहद सहज था लेकिन बिल देखकर वह उसे काउंटर वाले दुकानदार से बोली,,,)
भैया हम तो तुम्हारे पुराने ग्राहक है थोड़ा तो डिस्काउंट दीजिए,,,।
देखिए बहन जी जो बिल मैंने आपको दिया है वह डिस्काउंट काट कर ही है लेकिन आप हमारे पुराने ग्राहक हैं इसलिए ₹20 ऊपर के कम कर दीजिए,,,,(इतना कहते हुए वह सुगंधा की चूचियों की तरफ देखकर मुस्कुराने लगा,,,, सुगंधा भी जल्दी से अपने पर्स में से ₹200 निकालकर उसे दुकानदार को थमा दी और फिर वह भी मुस्कुराते हुए दुकान की सीढ़ियां उतर गई,,,, और अपने मन में सोच रही थी कि वह उसे दुकानदार को भैया बोल रही थी और वह दुकानदार भी उसे बहन जी बोल रहा था लेकिन उसे मौका मिलता तो अपनी बहन पर चढ़ने से बिल्कुल भी नहीं शर्म करता,,,, इतने से ही सुगंधा को इस बात का ख्याल हो रहा था कि दुनिया में रिश्तेदारी कोई मायने नहीं रखती बस अपनी अपनी जरूरत पूरी होनी चाहिए,,,,
उस किताब के बाजार में सब्जी मार्केट भी थी तो सुगंधा घर के लिए सब्जियां भी खरीदने लगी,,,,,,, सब्जियां खरीदने खरीदे थे उसे थोड़ी देर होने लगी क्योंकि शाम धीरे-धीरे ढल रही थी उसे मालूम था कि आज देर हो चुकी है इसलिए वह सब्जी लेकर और बच्चों के लिए थोड़ा समोसा और जलेबी लेकर वह रिक्शा पकड़ने के लिए जल्दी-जल्दी आगे बढ़ने लगी वह फुटपाथ पर चल रही थी और फुटपाथ पर जगह-जगह पर किताबें बिक रही थी एक जगह पर स्ट्रीट लाइट के नीचे आकर वह रुक गई और बिछी हुई किताबों को देखने लगी जिसमें सारा शरीर मनोहर कहानियां और फिल्मों से संबंधित कुछ किताबें रखी हुई थी सुगंधा को किताबें पढ़ने का भी बहुत शौक था,,, खास करके सरस सलिल वह पढ़ा करती थी,,,, वह धीरे से नीचे झुक कर कुछ सरस सलिल की मैगजीन को इधर-उधर करने लगी और उनमें से दो मैगजीन निकाल कर उसे अपने हाथ में पकड़ लिया और तभी उसकी नजर मनोहर कहानियां पर गई तो वह एक मनोहर कहानी उठाकर उसे जैसे ही पढ़ने को हुई कि उसमें एक दूसरी किताब उसी नजर आ गई जिसके पृष्ठ पढ़ने पर लिखा था,,, मदहोश जवानी,,, सुगंधा पहली बार इस तरह की किताब को अपने हाथ में ली थी और लेखक का नाम था मस्तराम यह सब उसके लिए पहली बार था वह उत्सुकता में उसे किताब को,,, अपने हाथ में लेकर उसके पन्ने पलटने लगी,,,,,, तभी पहले पन्ने पर ही कहानी का शीर्षक उसे दिखाई दिया दूध का कर्ज़,,,,
वह अपने मन में यही सब सो कर उत्तेजित हुए जा रही थी और धीरे-धीरे अपने कपड़ों को उतारती जा रही थी वह अपने मन में अपने आप से ही बात करते हुए बोल रही थी कि वह लड़के तो उसे छोड़ने के लिए बोल रहे थे उसकी बड़ी-बड़ी गांड देख कर उत्तेजित हो गए थे लंड खड़ा हो गया था उन लड़कों का तो उसके लड़के का क्यों नहीं खड़ा होता लंड उसकी बड़ी-बड़ी गांड देखकर चुची देखकर क्यों उसका मन नहीं करता चोदने को अपनी मां को,,,, आखिरकार उन लड़कों की उम्र और उसके लड़के की उम्र एक ही तो थी तो उसके लड़के में यह सब बदलाव क्यों नहीं होता है एक औरत को देखकर एक खूबसूरत औरत को देख कर क्यों हुआ उत्तेजित नहीं होता कि उसका लंड खड़ा नहीं होता,,,, चोदने के लिए,,, ऐसा अपने आप से ही बात करते हुए वह धीरे-धीरे अपने कपड़े उतार कर पूरी तरह से नंगी हो गई,,, और एक बार फिर से अपने बेटे की कल्पना करके अपनी दोनों टांगों को खोल दी और फिर अपनी उंगलियों को अपनी गुलाबी बुर में डालकर अपनी जवानी की गर्मी को शांत करने की कोशिश करने लगी,,,।
दूसरे दिन सुबह जब किचन में काम कर रही थी तब तृप्ति बालों में कंघी करते हुए अपनी मां से बोली,,,।
मम्मी मुझे कुछ किताबें चाहिए,,,।
हां तो पैसे ले ले जाकर खरीद लेना,,,
नहीं मम्मी तुम खरीद कर ले आना तुम उसे किताब वाली मार्केट चलाती हो ना जहां पर आधे कीमत में ही किताबें मिलती है,,, वहीं से खरीद लेना,,,,
हां यह तु ठीक कह रही है,,, लेकिन किताबें कौन सी लानी है,,,
मैं तुमको लिख कर दे देता हूं तुमको समय मिले तो खरीद लेना,,,,
तुझे चाहिए कब,,,,,
परसों ही चाहिए क्योंकि एग्जाम की तैयारी करना है ना,,,,
तो ठीक है मैं कल जाकर ले लेती हूं वैसे भी मुझे भी कुछ किताबें खरीदना है,,,,
ठीक है मम्मी मैं अभी लिखकर लाती हूं,,,,
(थोड़ी देर में तृप्ति एक कागज के टुकड़े पर उसे जो किताबें चाहिए थी उसका नाम लिखकर अपनी मम्मी के हाथ में थमा दी,,, तीन किताबें थी और सुगंधा जानती थी कि उस किताब वाली मार्केट में जरूर मिल जाएगी,,,, सुगंधा इस बात से भी खुश थी की उसकी बेटी बहुत समझदार हो गई है वह चाहती तो नहीं किताबें ले सकती थी लेकिन,,, जब वही किताबें आधे कीमत में मिलती हो तो नई किताबें लेकर क्या फायदा इस बात को तृप्ति अच्छी तरह से जानती थी और सुगंध भी अपने बच्चों के लिए वही से ही किताबें खरीद कर लाती थी,,,, थोड़ी देर में सुगंधा खाना बना कर नाश्ता तैयार करके खुद भी तैयार होने लगी,,,)
दूसरे दिन स्कूल से छूटने के बाद वह सीधा इस किताब के बाजार में चली गई चौकी उसकी स्कूल से तकरीबन 2 किलोमीटर और आगे था अपने स्कूल के बाहर ही वह रिक्शा पड़कर थोड़ी ही देर में किताब के बाजार में पहुंच गई,,, यहां पहुंच कर देखी की मार्केट में कुछ ज्यादा भीड़भाड़ था इसलिए वह धीरे-धीरे आगे जाने लगी वह अपने बच्चों के लिए किताबें एक ही दुकान से खरीदती थी और वह दुकान वाला सुगंध को अच्छी तरह से जानता था इसलिए किताबों पर अच्छा खासा डिस्काउंट भी दे देता था काउंटर पर पहुंच कर सुगंधा ने उसे दुकान वाले को परची थमा दी और वह दुकान वाला किताबें निकालने लगा,,,,। और सुगंधा इधर-उधर नजर घुमा कर देखने लगी,, उसे दुकान में किताब के साथ-साथ बहुत सारी स्टेशनरी के साथ-साथ दूसरी वस्तुएं भी मिलती थी जैसे की हेयर तेल साबुन वगैरह-वगैरह जो की काउंटर के पास में ही कांच वाले काउंटर में सजा कर रखा हुआ था तभी उसकी नजर,,,, एक छोटे से पूछ पर गई जिस पर कुछ गंदी तस्वीर छपी हुई थी जिसमें एक मर्द औरत आलिंगन होकर एक दूसरे के होठों का रस चूस रहे थे,,, पहले तो सुगंध को समझ में नहीं आया कि वह वस्तु क्या है जो इतना अश्लील चित्र होने के बावजूद कि उसे दुकान वाले ने उसे काउंटर में सजा कर रखा है लेकिन जब बड़े गौर से उसे पूछ के ऊपर लिखे हुए नाम को पढ़कर देखी तो उसके होश उड़ गए उसकी दोनों टांगों के बीच हलचल होने लगी वह कोहिनूर कंडोम था जिसे देखते ही उसकी सांसे ऊपर नीचे होने लगी,,, उसके पति ने कभी भी कंडोम का उपयोग नहीं किया था इसलिए उसने आज तक कंडोम को अपनी आंखों से देखी भी नहीं थी लेकिन इतना जानती जरूर थी कि कंडोम एक ऐसा प्रोडक्ट है जिसे मर्द इस्तेमाल करते हैं जो कि गर्भ निरोधक के लिए काम आता है,,,
उसे प्रोडक्ट के बारे में सुगंधा और कुछ सोचती इससे पहले ही वह दुकान वाला किताबें लेकर काउंटर पर पहुंच गया और सुगंध भी अपनी नजरों को उसे कंडोम के पैकेट से हटा दी,,,,।
कितना हुआ भैया,,,,
रुकिए हिसाब करके बताता हूं,,,,(इतना कहने के साथ ही वहां तीनों किताब की कीमत लिखकर उसे जोड़ने लगा लेकिन तभी सुगंधा ने उसे काउंटर वाले आदमी पर गौर की वह तिरछी नजरों से उसकी छतिया की तरफ देख रहा था जो की हल्की सी पारदर्शी साड़ी होने की वजह से उसकी चूचियों के बीच की पतली दरार काफी खूबसूरत नजर आ रहा था उसे देखकर वह मन ही मन उत्तेजित हो रहा था इस बात का अहसास होते ही सुगंधा एकदम से सचेत हो गई लेकिन वह उसे काउंटर वाले आदमी के सामने अपनी साड़ी को ठीक करना भी नहीं चाहती थी क्योंकि ऐसा करने पर उसे आदमी को एहसास हो सकता था कि उसने उसकी हरकत को देख ली है इसलिए वह एकदम सहज बनने की कोशिश करने लगी,,,, और वह भी तिरछी नजर से उसे आदमी की तरफ देखने लगी और इस तरह से इधर-उधर देखने लगी कि मानो जैसे कुछ हुआ ही ना हो वह आदमी अभी भी उसकी छातियों की तरफ घूर-घूर कर देख रहा था और बिल बना रहा था,,, उसे आदमी की हरकत को देखकर सुगंध अपने मन में सोचने लगी की दुनिया के सारे मर्द उसकी छाती की तरफ देखते हैं लेकिन उसका बेटा ही नहीं देखता,,,।
थोड़ी देर में बिल बनकर तैयार हो गया और उसे दुकान वाले ने बिल सुगंधा के हाथों में थमा दिया लेकिन बिल थमते समय अपनी उंगली से उसके हाथ की उंगली को स्पर्श कर लिया मानो इतने से ही वह पूरी तरह से सुगंधा को का गया हो वह अंदर ही अंदर एकदम उत्तेजित और प्रसन्न हो गया उसकी हरकत का एहसास सुगंधा को भी अच्छी तरह से था लेकिन वह कुछ बोल नहीं पा रही थी क्योंकि यह सब बेहद सहज था लेकिन बिल देखकर वह उसे काउंटर वाले दुकानदार से बोली,,,)
भैया हम तो तुम्हारे पुराने ग्राहक है थोड़ा तो डिस्काउंट दीजिए,,,।
देखिए बहन जी जो बिल मैंने आपको दिया है वह डिस्काउंट काट कर ही है लेकिन आप हमारे पुराने ग्राहक हैं इसलिए ₹20 ऊपर के कम कर दीजिए,,,,(इतना कहते हुए वह सुगंधा की चूचियों की तरफ देखकर मुस्कुराने लगा,,,, सुगंधा भी जल्दी से अपने पर्स में से ₹200 निकालकर उसे दुकानदार को थमा दी और फिर वह भी मुस्कुराते हुए दुकान की सीढ़ियां उतर गई,,,, और अपने मन में सोच रही थी कि वह उसे दुकानदार को भैया बोल रही थी और वह दुकानदार भी उसे बहन जी बोल रहा था लेकिन उसे मौका मिलता तो अपनी बहन पर चढ़ने से बिल्कुल भी नहीं शर्म करता,,,, इतने से ही सुगंधा को इस बात का ख्याल हो रहा था कि दुनिया में रिश्तेदारी कोई मायने नहीं रखती बस अपनी अपनी जरूरत पूरी होनी चाहिए,,,,
उस किताब के बाजार में सब्जी मार्केट भी थी तो सुगंधा घर के लिए सब्जियां भी खरीदने लगी,,,,,,, सब्जियां खरीदने खरीदे थे उसे थोड़ी देर होने लगी क्योंकि शाम धीरे-धीरे ढल रही थी उसे मालूम था कि आज देर हो चुकी है इसलिए वह सब्जी लेकर और बच्चों के लिए थोड़ा समोसा और जलेबी लेकर वह रिक्शा पकड़ने के लिए जल्दी-जल्दी आगे बढ़ने लगी वह फुटपाथ पर चल रही थी और फुटपाथ पर जगह-जगह पर किताबें बिक रही थी एक जगह पर स्ट्रीट लाइट के नीचे आकर वह रुक गई और बिछी हुई किताबों को देखने लगी जिसमें सारा शरीर मनोहर कहानियां और फिल्मों से संबंधित कुछ किताबें रखी हुई थी सुगंधा को किताबें पढ़ने का भी बहुत शौक था,,, खास करके सरस सलिल वह पढ़ा करती थी,,,, वह धीरे से नीचे झुक कर कुछ सरस सलिल की मैगजीन को इधर-उधर करने लगी और उनमें से दो मैगजीन निकाल कर उसे अपने हाथ में पकड़ लिया और तभी उसकी नजर मनोहर कहानियां पर गई तो वह एक मनोहर कहानी उठाकर उसे जैसे ही पढ़ने को हुई कि उसमें एक दूसरी किताब उसी नजर आ गई जिसके पृष्ठ पढ़ने पर लिखा था,,, मदहोश जवानी,,, सुगंधा पहली बार इस तरह की किताब को अपने हाथ में ली थी और लेखक का नाम था मस्तराम यह सब उसके लिए पहली बार था वह उत्सुकता में उसे किताब को,,, अपने हाथ में लेकर उसके पन्ने पलटने लगी,,,,,, तभी पहले पन्ने पर ही कहानी का शीर्षक उसे दिखाई दिया दूध का कर्ज़,,,,