Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता. - Page 144 - SexBaba
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Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता.

भाग 186

नजरों ने नजरों की भाषा समझ ली सूरज रुक गया पर उसने सोनी को फोन रखने का इशारा कर दिया बर्दाश्त की सीमा अब पार हो चुकी थी…सोनी ने बात समाप्त की

फोन कटते ही सूरज सोनी से सट गया।

सूरज के लंड का वह भारी और गर्म स्पर्श जैसे ही सोनी के नितंबों पर पड़ा, उसके पूरे शरीर में बिजली की एक लहर दौड़ गई। वह समझ गई कि अब सूरज को और अधिक देर तक रोकना नामुमकिन है। हकीकत और अपनी वासना के बीच झूलती सोनी ने एक झटके में करवट बदली और पीठ के बल आ गई।

अब आगे…

शर्म और उत्तेजना के उस मिले-जुले अहसास में उसने अपनी दोनों जांघों को आपस में सटा लिया और घुटनों को थोड़ा ऊपर की ओर मोड़ लिया, जिससे उसकी जांघों पर खिंची मेहंदी की बेलें और भी स्पष्ट होकर उभर आईं। सूरज अब पूरी तरह उसके सामने बिस्तर पर आ चुका था। उसकी आँखों में एक ऐसी आग थी जो सोनी को भस्म कर देने पर उतारू थी। सोनी की निगाहें जब सूरज के उस विशाल और तने हुए पौरुष पर पड़ीं जिसने स्वयं उसमें जान फूंकी थी, तो उसकी सांसें गले में ही अटक गईं। उतना ही जीवंत और अद्भुत।

सोनी ने दीवार पर लगी घड़ी की ओर इशारा किया, जिसकी सुइयाँ 9:15 की ओर बढ़ रही थीं। उसने अपनी कांपती हुई उंगलियों से अपनी बिखरी जुल्फों को समेटा और एक गहरी, मदहोश कर देने वाली आवाज़ में कहा:

सोनी: "सूरज... घड़ी की सुइयाँ देख ले। मर्यादा और समय, दोनों ही हमारे हाथ से रेत की तरह फिसल रहे हैं। तेरे पास सिर्फ आधा घंटा है। इस आधे घंटे में तुझे जो देखना है, जो पूजना है या जो करना है... कर ले। अपनी सारी अधूरी इच्छाएं आज पूरी कर ले, क्योंकि इसके बाद मैं सिर्फ विकास जी की रहूँगी।"

सोनी की इस 'अनुमति' ने सूरज के भीतर के बांध को पूरी तरह तोड़ दिया। सूरज ने बिना एक पल गंवाए अपने दोनों हाथ सोनी की मुड़ी हुई जांघों पर रखे और उन्हें धीरे-धीरे अलग करना शुरू किया। सोनी ने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं और अपना चेहरा तकिए में छुपा लिया।

जैसे-जैसे सोनी की जांघें खुल रही थीं, सुगना द्वारा रचित वह दिव्य 'कमल' और 'महोगनी की गांठ' अपनी पूरी मादकता के साथ सूरज के सामने उजागर हो रही थी। सूरज की नज़रों की तपिश और उसकी भारी होती साँसें अब सीधे सोनी की उस 'मुनिया' पर पड़ रही थीं, जो सुगना की बातों और अपनी खुद की उत्तेजना से पूरी तरह सराबोर हो चुकी थी।

सूरज ने फुसफुसाते हुए कहा, "आधा घंटा बहुत है मौसी... इस आधे घंटे में मैं आपको वो अहसास दे दूँगा जो आप अपनी पूरी जिंदगी नहीं भूलेंगी।"

उसने अपना चेहरा नीचे झुकाया और अपनी जुबान से उस मेहंदी से सजी दहलीज को चखने के लिए आगे बढ़ा, । कमरे की हवा में अब केवल धड़कनों का शोर था।

होटल के उस आलीशान कमरे में अब केवल सोनी की दबी-कुचली सिसकियाँ और सूरज की भारी होती सांसें गूँज रही थीं। सूरज ने जब अपना चेहरा सोनी की खुली हुई जांघों के बीच टिकाया, तो उसे उस 'काम-रस' और 'इत्र' की मिली-जुली महक ने पूरी तरह से पागल कर दिया।

सूरज ने अपनी जुबान से उस 'महोगनी की गांठ' को सहलाते हुए अपनी कलाकारी शुरू की। उसने सोनी की कोमल त्वचा पर रचे उस मेहंदी के कमल को चूमना और चाटना शुरू किया। सोनी का बदन कमान की तरह मुड़ गया; उसने अपने हाथों से तकिए को इतनी जोर से भींचा कि उसके नाखून मखमली कपड़े में धंस गए।

सूरज केवल चाटने तक ही सीमित नहीं रहा; वह अपनी उंगलियों और होंठों से सोनी की उस नाजुक दरार को तरह-तरह से सहलाने और छेड़ने लगा। वह कभी अपनी उंगलियों से उस 'दहलीज' को टटोलता, तो कभी अपने होंठों के बीच उसे हल्का सा भींच लेता। सोनी को ऐसा महसूस हो रहा था जैसे उसके शरीर के उस गुप्त केंद्र से बिजली की लहरें उठकर उसके दिमाग तक पहुँच रही हों।

सूरज की स्थिति उस खोजी की तरह थी जो किसी तिलिस्मी गुफा के द्वार पर खड़ा हो, जहाँ हर कदम पर एक नया रहस्य उसका स्वागत कर रहा था। सोनी की जांघों के बीच का वह दृश्य केवल मांस और त्वचा का मिलन नहीं था, बल्कि सूरज के लिए वह 'सृष्टि का उद्गम' था।

जैसे ही सूरज ने अपनी उंगलियों के पोरों से उस गुलाबी दरार के किनारों को धीरे से फैलाया, अंदर की गीली और मखमली दीवारों ने अपनी चमक बिखेरी। वह दृश्य इतना सम्मोहक था कि सूरज की पलकें झपकना भूल गईं।

सूरज ने देखा कि वह दरार जितनी संकरी दिख रही थी, छूने पर उतनी ही लचीली और आमंत्रित करने वाली थी। जैसे-जैसे वह अपनी उंगलियों को अंदर की ओर सरकाता, उसे महसूस होता कि वह किसी गर्म, रेशमी दलदल में उतर रहा है। वह अंदर की गहराइयों को नज़रों से नापना चाहता था, लेकिन वहाँ केवल एक अंतहीन, गीला अंधेरा और गुलाबी मांस की परतें थीं जो आपस में लिपटी हुई थीं।


सूरज के मन में एक अजीब सी कसमकस थी। वह सोच रहा था कि प्रकृति ने इस छोटी सी जगह में इतना आकर्षण कैसे भर दिया? वह अपनी उंगलियों से उस 'द्वार' को और चौड़ा करता, यह देखने की कोशिश में कि यह रहस्य कहाँ जाकर खत्म होता है। पर हर बार उसे वही कोमल, स्पंदित करती दीवारें मिलतीं, जो उसकी उंगलियों को कसकर जकड़ लेती थीं।

सुगना की मेहनत और सोनी की अपनी कामोत्तेजना ने उस जगह को पूरी तरह से लथपथ कर दिया था। सूरज की उंगलियाँ जब उस चिकनाहट के संपर्क में आतीं, तो उसे ऐसा लगता जैसे वह किसी दिव्य अमृत को छू रहा हो। वह बार-बार अपनी उंगलियों को अंदर डालता और बाहर निकालता, केवल यह महसूस करने के लिए कि सोनी का शरीर किस तरह उसे भीतर खींचने के लिए व्याकुल है।

सूरज की इस सूक्ष्म जांच और निरंतर स्पर्श ने सोनी के धैर्य की धज्जियां उड़ा दी थीं। जब सूरज अपनी उंगलियों से उस गहराई को टटोलते हुए थोड़ा दबाव बनाता, तो सोनी के गले से एक लंबी, मधुर सिसकी फूट पड़ती:

"आह... सूरज... रुक मत... और गहरा... और अंदर..."

सोनी का नितंब बिस्तर से थोड़ा ऊपर उठ गया था। उसकी जांघों की मांसपेशियाँ तनाव में फड़क रही थीं। उसे महसूस हो रहा था कि सूरज केवल उसे देख नहीं रहा, बल्कि अपनी रूह से उस 'गुफा' के रहस्य को पी जाने की कोशिश कर रहा है।

सूरज अब उस मोड़ पर था जहाँ देखना और महसूस करना काफी नहीं था। उसकी उंगलियाँ अब उस 'गहराई' को और अधिक बर्दाश्त नहीं कर पा रही थीं; वे कांप रही थीं। वह जितना अंदर जाने की कोशिश करता, उसे सोनी की योनि की वे संकुचित होती मांसपेशियाँ महसूस होतीं जो जैसे उसे चुनौती दे रही थीं—"क्या तुम इस आदि-रहस्य को पूरी तरह जान पाओगे?"

कमरे की हवा भारी हो चुकी थी। सूरज का चेहरा पूरी तरह से पसीने और उस 'काम-रस' से भीगा हुआ था। वह एक हाथ से सोनी की एक जांघ को और खींचकर अपनी आँखों के पास लाया, ताकि वह उस गुलाबी केंद्र को और स्पष्ट देख सके। वह कुदरत की इस 'गुफा' में पूरी तरह खो चुका था, यह भूलकर कि समय की सुइयां तेजी से भाग रही हैं।

सोनी (सिसकते हुए): "अह्ह... सूरज...तनी धीरे …आह..ब…. बस कर... तू तो सचमुच पागल है... उह्ह…

सूरज अधीर होकर सोनी का मालपुआ चूस रहा था चाट रहा था और अपने दांतों से हल्का हल्का काट रहा था…

जब सूरज ने सोनी के उसे अद्भुत दाने को अपने होठों के बीच लेकर चूसने की कोशिश की सोनी उत्तेजना से कराह उठी

सूरज बाबू आह….. तनी धीरे…से…… दुखाता .."

सूरज की जुबान का जादू और उंगलियों की हलचल ने सोनी को बेहाल कर दिया था। कमरे में छाई कामुकता के बीच सोनी को तड़प बढ़ चुकी थी:

सोनी: (बालों को खींचते हुए) "सूरज... आह! रुक मत... ये तू क्या कर रहा है?"

सूरज: (बिना रुके) "जो आपका हक है मौसी... चख लेने दो मुझे यह अमृत।"

सोनी: "उह्ह... बहुत गहरा... तू तो जान निकाल लेगा मेरी। विकास जी ने कभी ऐसे..."

सूरज: (हल्का काटते हुए) "उनका नाम मत लो... अभी यहाँ सिर्फ मैं हूँ और आपकी ये तड़पती मुनिया।"

सोनी: "आह! तनी धीरे... सीह्ह... पर छोड़ना मत। आज सब्र का बांध तोड़ दे।"

सूरज: "अभी तो बस दहलीज पर हूँ, महल के अंदर का नजारा तो अभी बाकी है।"

सोनी: "पागल है तू... पूरा पागल... पर ये पागलपन मुझे मार डालेगा। और अंदर... हाँ... वहीं!"

सूरज की जीभ उन गुलाबी गहराइयों में और अंदर उतर रही थी।

सोनी ने तकिए में चेहरा छिपा लिया और उसकी सिसकियां अब चीखों में बदलने लगी थीं। सूरज का हर स्पर्श उसे हकीकत से दूर एक अनजानी दुनिया में ले जा रहा था।

सोनी की 'मुनिया' अब पूरी तरह से पिघल चुकी थी। सूरज की जुबान जब उस संवेदनशील हिस्से पर अपनी हरकतें तेज करती, तो सोनी के पैरों की उंगलियाँ मुड़ जातीं और वह अपनी जांघों से सूरज के सिर को और भी कसकर दबोच लेती। उसे अपनी मर्यादा का कोई होश नहीं था; उसे बस उस 'मीठी कसक' का अहसास हो रहा था जो सुगना की बातों ने शुरू की थी और अब सुगना पुत्र सूरज उसे अंजाम तक पहुँचा रहा था।

सूरज ने अपना चेहरा ऊपर उठाया, उसके होंठ सोनी के काम-रस से चमक रहे थे। सोनी स्खलन के लिए तैयार थी उसे सूरज का अलग होना रास नहीं आया उसने उसकी आंखों में कौतूहल बस देखा जैसे पूछ रही हो क्या हुआ?

सूरज ने सोनी की नशीली आँखों में झांकते हुए कहा, "अभी तो मैंने सिर्फ स्वाद लिया है मौसी... अभी तो इस मंदिर की पूरी पूजा बाकी है।"

सोनी मदहोशी की उस चरम सीमा पर थी जहाँ उसे अब केवल सूरज का स्पर्श ही हकीकत लग रहा था। उसने खुद को सूरज के हवाले कर दिया और अपनी पलके बंद की और जांघों को फैलाते हुए बोली …..तो कर ले पूजा …

अपनी मादक मौसी का यह समर्पण देखकर सूरज बेहद प्रसन्न हो गया पर..समय का कांटा भाग रहा था.

सूरज की धड़कनें बेकाबू थीं और उसका रोम-रोम सोनी के उस मादक बदन में खो जाने को बेताब था, लेकिन अचानक उसकी नज़र दीवार पर लगी घड़ी की सुइयों पर टिक गई। रात के 9:45 बज चुके थे।

वह समय, जो कुछ पल पहले तक ठहर गया था, अब एक जल्लाद की तरह उसे वास्तविकता की याद दिला रहा था। सूरज का विवेक उसकी वासना पर भारी पड़ने लगा। उसे याद आया कि अगले आधे घंटे में उसे सोनी को लेकर स्टेशन पहुँचना है और विकास जी के स्वागत के लिए उसे सुगना की दी हुई उसी मर्यादा में वापस लाना है।

सूरज अचानक सोनी के दहकते बदन से अलग हो गया। वह बिस्तर के किनारे बैठ गया और अपनी तेज़ी से चलती साँसों को काबू करने की कोशिश करने लगा। सोनी, जो अभी-अभी काम-रस के उस गहरे समंदर में गोते खा रही थी, और सूरज के लंड का इंतजार अपनी मुनिया पर कर रही थी…सूरज के इस अचानक अलगाव से सकपका गई। उसकी मदहोश आँखें खुलीं और उसने सूरज को देखा जो उसकी जांघों के बीच से मुंह हटाकर सामने अपने घुटनों के बाल बैठा हुआ था।

नजरें मिलते सूरज ने भारी आवाज़ में कहा, "मौसी... समय खत्म हो गया। हमे स्टेशन चलना चाहिए।"

सोनी को जैसे किसी ने नींद से जगा दिया हो। उसने घड़ी ओर देखा।उसे एहसास हुआ कि वह अपने ही परिवार के होटल में, अपने पति के स्वागत की तैयारियों के बीच, पूरी तरह नग्न अवस्था में अपने भांजे के सामने है। हकीकत की ठंडक ने उसके मन को खिन्न कर दिया और उसकी उत्तेजना के वेग को धीमा कर दिया।

सोनी ने धीरे से उठकर बैठते हुए अपनी बिखरी हुई जुल्फों को समेटा। कमरे की ठंडी हवा अब उसकी नग्न त्वचा पर चुभने लगी थी। उसने ज़मीन पर बिखरी अपनी उन 'मर्यादाओं' (कपड़ों) की ओर देखा जो बेतरतीब पड़े थे।

सूरज ने बिना पीछे मुड़े, मेज़ पर रखे पानी के गिलास की ओर हाथ बढ़ाया और बोला, "मौसी, हमें निकलना होगा। मौसा जी की ट्रेन का वक्त हो रहा है। अगर हम देर से पहुँचे, तो माँ के उन सारे श्रृंगार और मन्नतों का क्या होगा? आप जल्दी से खुद को संभाल लीजिए।"

सोनी के चेहरे पर शर्म और पछतावे की एक हल्की सी लकीर उभरी, पर साथ ही सूरज के उस 'जिम्मेदार' रूप ने उसके मन में उसके लिए सम्मान भी जगाया। वह उठी और कांपते हाथों से अपना पेटीकोट और बनारसी साड़ी उठाने लगी,

सोनी जैसे ही अपना पेटिकोट उठाने के लिए झुकी बिस्तर पर बैठे सूरज को उसकी फूली हुई मुनिया दिखाई पड़ गई जो अब भी उस 'अरबी इत्र' और 'सूरज के स्पर्श' की गंध से महक रही थी।सूरज तड़प कर रह गया पर वह संतुष्ट था उसे अपनी मौसी और खुद पर विश्वास था जो आग उसने लगाई थी वह बिना उसके बुझने वाली नहीं थी यह बात वह भली भांति जानता था।

सोनी मन मसोस कर कपड़ों को सहेज रही थी…मर्यादा की दीवारें जो गिर चुकी थीं, उन्हें फिर से चुनना था—कम से कम दुनिया की नज़रों के लिए।

सोनी का शरीर इस वक्त विद्रोह कर रहा था। सूरज के स्पर्श ने उसे उत्तेजना के जिस शिखर पर पहुँचा दिया था, वहाँ से अचानक नीचे गिरना उसके लिए किसी सदमे से कम नहीं था। उसकी 'मुनिया' अभी भी स्पंदित हो रही थी और सूरज के उस भारी स्पर्श की प्यास उसके रोम-रोम में बाकी थी। शारीरिक रूप से वह पूरी तरह अतृप्त थी, और यह अधूरापन उसके मन में एक अजीब सी झुंझलाहट पैदा कर रहा था। उसे लग रहा था जैसे किसी ने प्यासे के सामने से अमृत का प्याला तब हटा लिया हो, जब वह बस उसे चखने ही वाला था।

घड़ी की उन सुइयों ने उसे हकीकत के धरातल पर पटक दिया था। जैसे-जैसे वह अपने कपड़े उठा रही थी, उसे अपनी सामाजिक स्थिति का अहसास हो रहा था। 'विकास की पत्नी' और 'सूरज की मौसी'—ये दो पहचानें उसके सामने किसी दीवार की तरह खड़ी हो गई थीं। उसे इस बात की टीस थी कि जिस आनंद को उसने अभी महसूस किया, वह केवल आधे घंटे की 'उधार' ली हुई मोहलत थी।

सोनी के मन में सूरज के लिए एक नया और गहरा सम्मान जागा। जहाँ एक तरफ वह उसकी दीवानगी और उसकी अपनी मुनिया के प्रति दीवानगी से प्रभावित थी, वहीं दूसरी ओर वह सूरज के संयम को देखकर हैरान थी। सूरज ने जिस तरह मर्यादा के लिए अपनी वासना को बीच में ही रोक दिया, उसने सोनी को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि सूरज केवल उसे भोगना नहीं चाहता, बल्कि वह उसकी और उसके परिवार की गरिमा का भी रक्षक है।

जब वासना में सम्मान हो तो वासना भी प्यार में तब्दील हो जाती है।

सोनी सूरज से आसक्त हो चुकी थी। काश कि यह मिलन पूर्ण हो पता…सोनी ने अपने मन की व्यथा अपने ईष्ट से कह दी…सोनी ने जो अनुष्ठान किया था ईश्वर ने शायद उसकी लाज रख ली…


साइड टेबल पर रखे इंटरकॉम की घंटी अचानक घनघना उठी। उस खामोश और वासना से भरे कमरे में वह आवाज़ किसी धमाके जैसी लगी। सोनी और सूरज दोनों चौंक गए। सोनी ने सूरज की ओर देखा सूरज ने झिझकते हुए फोन उठाया।

दूसरी तरफ होटल का मैनेजर खन्ना था। खन्ना जिम्मेदार मैनेजर था; वह बनारस की रग-रग से वाकिफ था और उसे बखूबी अंदाज़ा था कि स्टेशन पर मालगाड़ी पलटने का मतलब केवल दो घंटे की देरी नहीं होती। उसने खुद कंट्रोल रूम में अपने संपर्कों से बात की थी ताकि 'मालकिन' को कोई असुविधा न हो।

खन्ना (बड़े ही सलीके और सधी आवाज़ में): "क्षमा कीजिएगा छोटे मालिक, इस वक्त खलल डाला। पर अभी-अभी स्टेशन मास्टर से पक्की खबर मिली है कि पटरी साफ होने में उम्मीद से ज्यादा वक्त लग रहा है। विकास साहब की ट्रेन अब आधी रात यानी 12:30 बजे से पहले कैंट स्टेशन नहीं पहुँच पाएगी। मैंने सोचा मालकिन को स्टेशन पर दिक्कत न हो, इसलिए सूचना दे दूँ। आप लोग डिनर करेंगे?

सूरज को जो चाहिए था डिनर उसमें बाधा डाल सकता था उसने कहा


नहीं आज मौसी का व्रत है और मैं मौसा जी के साथ ही खाऊंगा।

खन्ना - ओके किसी भी चीज़ की ज़रूरत हो तो बस याद कीजिएगा।"


उसने सोनी की तरफ देखा, जिसकी आँखें अभी भी हया और हैरानी से सूरज की तरफ देख रही थीं। सोनी पूरी बात ठीक उसी प्रकार सुन पा रही थी जैसा अब से कुछ देर पहले सोनू सुगना और सोनी की बातें सुन रहा था। हे भगवान तो…क्या सूरज उसकी और सुगना की बातें सुन रहा था…क्या वह सब बातें भी…सोनी शर्म से पानी पानी हो रही थी

पर सूरज की आवाज़ में अब एक अलग ही खनक थी, "मौसी... कुदरत भी आज हमारे पक्ष में है। खन्ना जी का फोन था। फूफाजी की गाड़ी अब रात साढ़े बारह बजे आएगी। हमारे पास अब पूरे दो घंटे हैं।"

सोनी, जो अभी अपने हाथ में पेटिकोट उठाए उसे पहनने की तैयारी कर रही थी सन्न रह गई।

सुगना की मन्नत, वह 'संतान सप्तमी' का व्रत, और सूरज की वह अधूरी पूजा... सब कुछ जैसे फिर से एक चक्रव्यूह की तरह उसके सामने आ खड़ा हुआ।

सूरज धीरे से बिस्तर पर फिर से सोनी के करीब आया और उसके कांपते हाथों से वह पेटिकोट उसके हाथ से लिया और उसे वापस नीचे गिराते हुए सोनी को अपने पास खींच लिया और अपने आलिंगन में लेकर उसने सोनी के कान में शरारत भरी मासूमियत से कहा:

"मौसी, खन्ना जी बहुत समझदार हैं... उन्होंने हमें सिर्फ वक्त नहीं दिया है, बल्कि आपकी उस 'महोगनी की गांठ' को और गहराई से पूजने का न्योता दिया है। क्या अब भी आप जल्दी में हैं?"

सोनी ने एक गहरी और बेबस सांस ली। उसने महसूस किया कि उसकी 'मुनिया' पर लगी मेहंदी अब भी गीली थी, मानो वह खुद भी इस देरी का जश्न मना रही हो। उसने अपनी आँखें मूँद लीं और खुद को फिर से सूरज के हवाले कर दिया। मर्यादा का सूरज अब पूरी तरह ढल चुका था और बनारस की उस होटल की रात अभी शुरू हुई थी।

सोनी के मन में एक गहरा अंतर्द्वंद्व चल रहा था, पर होटल के उस कमरे की एकांत शांति और विधाता के खेल ने उसे एक नया नजरिया दे दिया। वह सोचने लगी कि सुगना दीदी ने उसे जिस 'संतान सप्तमी' के अनुष्ठान के लिए तैयार किया था, उसका सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा 'योनि पूजन' था। शास्त्रों और लोक-परंपराओं में इस रात को देह की पवित्रता और सृजन की शक्ति को पूजना अनिवार्य माना गया था।

सोनी ने आईने में अपनी उस नग्न काया को देखा, जिसे सुगना ने बड़ी हसरत से सजाया था। उसने सोचा, "शायद विधाता को यही मंजूर है। ट्रेन का इस कदर लेट होना और मेरा यहाँ सूरज के साथ अकेले होना कोई इत्तेफाक नहीं हो सकता। यदि विकास जी समय पर नहीं पहुँच पाए, तो क्या यह पूजन अधूरा रह जाएगा? नहीं, यह अनुष्ठान तो आज की रात संपन्न होना ही है।"

सोनी आधुनिक युग की महिला थी उसके हिसाब से दिन रात बारह बजे के बाद बदल जाता है जबकि भारतीय मान्यताओं के अनुसार अगला दिन सूर्योदय के साथ शुरू होता है ।

उसने मन ही मन यह स्वीकार कर लिया कि आज की रात की इस कामुक दीक्षा का 'पुरोहित' सूरज ही बनेगा। उसने सूरज को केवल अपने भांजे के रूप में नहीं, बल्कि उस पुरुष के रूप में देखा जो उसकी देह की इस कलाकृति को पूरी श्रद्धा और प्यास के साथ पूजने के लिए तैयार खड़ा था।

सोनी ने धीरे से अपनी आँखें खोलीं, जिनमें अब झिझक की जगह एक गहरा संकल्प था। उसने बिस्तर पर अपनी जांघों को पूरी तरह फैलाकर उस 'महोगनी की गांठ' को सूरज के सामने पूरी तरह उजागर कर दिया। वह दृश्य ऐसा था जैसे किसी मंदिर के द्वार भक्तों के लिए खोल दिए गए हों।

सोनी ने मद्धम और गंभीर स्वर में कहा, "सूरज... लगता है आज मेरी तक़दीर की लकीरें तेरे हाथों से ही मुकम्मल होनी हैं। यह संतान सप्तमी का व्रत और यह श्रृंगार निष्फल नहीं जाना चाहिए। तूने कहा था न कि तू मुझे पूजना चाहता है? तो ले... आज इस अनुष्ठान को तू ही पूरा कर। आज की रात मेरी इस देह की वेदी का स्वामी तू ही है।"

सूरज सोनी की इस बात को सुनकर स्तब्ध रह गया। उसे लगा जैसे उसे किसी महान यज्ञ का हिस्सा बनने का अधिकार मिल गया हो। उसने अपनी कांपती उंगलियों से सोनी के उस 'कमल' को छुआ, जो अब काम-रस से और भी ज्यादा चमक रहा था।

सूरज ने श्रद्धा और वासना के अद्भुत संगम के साथ अपना सिर झुकाया और सोनी की उस रसीली दहलीज पर अपने होंठ टिका दिए। सोनी ने अपना सिर पीछे की ओर पटक दिया और एक लंबी आह भरी। वह समझ चुकी थी कि आज की रात बनारस के इस सुइ़ट में जो इतिहास लिखा जाएगा, वह उसके और सूरज के बीच एक ऐसा गुप्त बंधन बना देगा जिसे दुनिया की कोई मर्यादा कभी तोड़ नहीं पाएगी।

अब उस कमरे में सिर्फ 'पूजन' था, 'पुजारी' था और सोनी की वह दहकती हुई देह और उसकी जांघों के बीच छुपी वह यज्ञ वेदी थी जो वीर्य आहुति की प्रतीक्षा में अपने अधर खोले उस चर्म दंड का इंतजार कर रही थी जिसने इस सृष्टि की रचना की थी…।

शेष अगले भाग में


कमेंट और पिक्चर के इंतजार में….
 
भाग 187

सूरज ने श्रद्धा और वासना के अद्भुत संगम के साथ अपना सिर झुकाया और सोनी की उस रसीली दहलीज पर अपने होंठ टिका दिए। सोनी ने अपना सिर पीछे की ओर पटक दिया और एक लंबी आह भरी। वह समझ चुकी थी कि आज की रात बनारस के इस सुइ़ट में जो इतिहास लिखा जाएगा, वह उसके और सूरज के बीच एक ऐसा गुप्त बंधन बना देगा जिसे दुनिया की कोई मर्यादा कभी तोड़ नहीं पाएगी।


अब उस कमरे में सिर्फ 'पूजन' था, 'पुजारी' था और सोनी की वह दहकती हुई देह और उसकी जांघों के बीच छुपी वह यज्ञ वेदी थी जो वीर्य आहुति की प्रतीक्षा में अपने अधर खोले उस चर्म दंड का इंतजार कर रही थी जिसने इस सृष्टि की रचना की थी…।

अब आगे..

होटल के उस आलीशान सुइट की मद्धम पीली रोशनी अब उस जुनून की गवाह बन रही थी, जिसने मर्यादा की हर आखिरी दीवार को ढहा दिया था। सूरज, जो अब तक संयम बरत रहा था, सोनी के बदन की उस तड़प और उसकी 'मुनिया' की रसीली पुकार को महसूस करते ही अपने होश खो बैठा। उसके भीतर का युवा पौरुष जो स्वयं सोनी ने जागृत किया था अब एक अनियंत्रित सैलाब बन चुका था और उसी पर न्योछावर होने को आतुर था।

सूरज ने सोनी की भारी जांघों को अपने कंधों पर टिका लिया, जिससे वह 'महोगनी की गांठ' और सुगना द्वारा बनाया गया वह 'कमल' पूरी तरह से उसके प्रहारों के लिए सामने उजागर हो गया। वह भूल गया कि उसके नीचे उसकी सम्माननीय मौसी है; उस क्षण उसे केवल वह कामुक प्रतिमा दिख रही थी जिसे विधाता ने आज की रात उसके लिए ही सजाया था।

जैसे ही उस 'चर्म दंड' का पहला स्पर्श उस रसीली दहलीज से हुआ, सोनी के पूरे शरीर में बिजली की एक लहर दौड़ गई। उसने अपने हाथों से बिस्तर की मखमली चादर को इतनी जोर से जकड़ लिया कि उसकी उंगलियों के पोर सफेद पड़ गए।

सूरज ने जल्दबाजी नहीं की। वह उस अहसास को एक-एक कतरे में पीना चाहता था। जैसे-जैसे वह इंच-दर-इंच उस 'मुनिया' की गहराइयों में उतरने लगा, सोनी का सिर पीछे की ओर लुढ़कता गया और उसके गले की नसें उभर आईं। वह 'महोगनी की गांठ' अब सूरज के प्रहारों के दबाव में अपने केंद्र में उस चर्म दंड के लिए जगह बना रही थी। कमरे की हवा में एक अजीब सी 'चिपचिपाहट' और गर्मी बढ़ गई थी, जो उस जुनून की तीव्रता को बयां कर रही थी।


जब सूरज ने एक अंतिम और निर्णायक दबाव के साथ खुद को सोनी के भीतर पूरी तरह समाहित कर लिया, तो सोनी के मुंह से एक लंबी, बेबस 'आह' निकली जो धीरे-धीरे एक सिसकारी में बदल गई। वह प्रवेश इतना गहरा था कि सोनी को लगा जैसे सूरज उसके रूह के किसी गुप्त हिस्से तक पहुँच गया हो। मिलन पूर्ण हो चुका था सूरज के लिंग में सोने के गर्भ को चूम लिया था।

'पूज्या' और 'पुजारी' एक हो चुके थे।

सोनी की आँखें आधी खुली और आधी बंद थीं, जिनमें अब केवल वासना नहीं, बल्कि एक असीम तृप्ति का भाव था। सूरज की देह का पसीना सोनी की नाभि पर गिरकर चमक रहा था। बनारस के उस बंद कमरे में अब मर्यादा का कोई नामोनिशान नहीं बचा था; वहां केवल दो देह थी जो एक-दूसरे में सिमटकर इतिहास का वह पन्ना लिख रही थीं जिसे 'गुप्त बंधन' कहा जाने वाला था और आने वाले समय में इस कहानी को एक अनोखा और अद्भुत पात्र मिलने जा रहा था।

सूरज ने धीरे पर गहरे धक्के लगाने शुरू किए। हर प्रहार के साथ सोनी का पूरा बदन बिस्तर पर उछल जाता। इसी उन्माद के बीच, सूरज की नजरें सोनी के उन भारी वक्षों पर टिकीं, जो हर धक्के के साथ बेतरतीब लहरों की तरह उछल रहे थे। अपनी उत्तेजना के चरम पर, सूरज ने झुककर सोनी की एक सुडौल चूची को अपने मुँह में भर लिया। वह उन्हें महज़ चूम नहीं रहा था, बल्कि पूरी प्यास और अधिकार के साथ उन्हें ज़ोर-ज़ोर से पीने लगा।

सोनी (सिसकते हुए): "अह्ह... सूरज... धीरे….... आह! तू तो... तू बच्चा नहीं है ... उह्ह धीरे…..!"

सोनी के वक्ष, जिन पर रची मेहंदी की बेलें अब पसीने से भीगकर चमक रही थीं, सूरज के मुँह और छाती के बीच पिस रहे थे। सूरज एक तरफ से अपनी कमर से प्रहार कर रहा था और दूसरी तरफ सोनी के वक्षों के अग्रभाग को अपने होंठों और दांतों के बीच दबाकर उनका सारा रस पी जाने को बेताब था। सुगना ने उन पर जो केसरिया लेप लगाया था, उसकी महक और स्वाद सूरज के पौरुष को और भी हिंसक बना रहा था।

जैसे-जैसे सूरज की रफ्तार बढ़ी और उसके चूसने की शिद्दत तेज़ हुई, सोनी की आँखों के सामने अँधेरा छाने लगा। उसका रोम-रोम कांप उठा…

सूरज की देह से टपकता पसीना और सोनी के शरीर की वह दहकती गर्मी मिलकर एक ऐसी उमस पैदा कर रही थी, जो सूरज को और उकसा रही थी। सूरज के धक्के अब धीमे लेकिन और भी गहरे और मर्मभेदी हो गए थे। वह सोनी की आंखों में उतरकर उस तृप्ति को देखना चाहता था जिसे उसने खुद अपने हाथों से जगाया था।

सूरज की नजरें सोनी के उस चेहरे पर टिकी थीं जो अब लज्जा और तृप्ति के दोराहे पर था सोनी संभोग में लीन तो थी पर वह सूरज को खुलकर अपने मर्द की तरह स्वीकार करने में शायद अब भी हिचकिचा रही थी। सोनी अपनी पलके आधीबंद की सिर्फ उसे अद्भुत एहसास को महसूस कर रही थी पर उसके अधर मौन थे।उधर सूरज के मन में विचारों की एक तेज लहर दौड़ रही थी:

"यही वह देह है जिसे अब तक मैंने केवल सम्मान की नजरों से देखा था, जिसे छूना तो दूर, जिसके बारे में सोचना भी पाप लगता था। पर आज... आज इस यज्ञ की वेदी पर यह 'पूज्या' खुद अर्पण हो चुकी है। क्या यह वास्तव में वही मौसी है? या यह विधाता की रची वह कामुक प्रतिमा है जिसे सिर्फ मेरे लिए गढ़ा गया था? इसका एक-एक अंग, इसकी यह मखमली त्वचा और इसकी जांघों के बीच का वह मंदिर... अब सब मेरा है। मैं पुजारी हूँ, और आज इस मंदिर का अभिषेक मैं अपने पौरुष से करूँगा।"

उसके मन में एक अजीब सी 'बेशर्मी' घर कर गई थी। वह चाहता था कि सोनी सिर्फ इस सुख को महसूस ही न करे, बल्कि अपनी जुबान से इस 'अधर्म' और 'आनंद' को स्वीकार भी करे। वह उसकी मर्यादा को पूरी तरह ढहा देना चाहता था।

सूरज ने अपने धक्कों की रफ्तार को थोड़ा धीमा किया, लेकिन गहराई और बढ़ा दी। उसने अपना पसीने से भीगा चेहरा सोनी के चेहरे के करीब लाया और अपनी हथेली से उसके तपते हुए गालों को थपथपाया।

सूरज (गहरी और मादक आवाज में): "मौसी... आँखें खोलिए। मुझे देखना है कि आपकी इन आँखों में मेरे लिए कितनी प्यास बची है।"

जब सोनी ने अपनी पलकें नहीं खोलीं, तो सूरज ने अपनी तर्जनी (index finger) से उसकी बंद पलकों को धीरे से ऊपर उठाया। उसकी आँखों में चढ़ी हुई मदहोशी को देखकर सूरज के होंठों पर एक विजयी मुस्कान आ गई।

सूरज: "मौसी... बोलिए ना, कैसा लग रहा है आपको? बोलिए, अच्छा लग रहा है ना? यह उत्तेजना आपकी ही दी हुई है और आपको ही अर्पित करना चाह रहा हूं….(यह कहते हुए सूरज ने अपना लंड एक बार सोनी की योनि से पूरी तरह बाहर निकाल लिया और लंड के सुपाड़े को उसके भागनासे पर रगड़ते हुए सोनी को एहसास दिला दिया कि वह क्या कहना चाह रहा है)

सोनी, जो अब तक केवल सिसकारियों में बात कर रही थी, इस सीधे और नग्न सवाल से कांप उठी। उसे शर्म आ रही थी कि वह अपने भांजे के सामने अपनी देह की भूख को कैसे स्वीकार करे, पर सूरज के बार-बार पूछने और उसके अंगों की निरंतर हलचल ने उसे मजबूर कर दिया।

सोनी (टूटती हुई आवाज में): "सूरज... तू बहुत बेशर्म हो गया है... आह! पर सच तो यह है कि... मुझे यह अहसास बहुत पसंद है। तेरे साथ किया जा रहा यह सहवास... यह रूह को तृप्त कर देने वाला है। तू अद्भुत है सूरज... तूने मुझे आज एक औरत होने का असली मतलब समझा दिया अब आजा मुझमें समा जा…।"

सोनी की इस स्वीकारोक्ति ने सूरज के भीतर जैसे बारूद का काम किया। अब उसके मन में कोई दुविधा नहीं थी। उसने झुककर सोनी के होंठों को इतनी शिद्दत से चूमा कि उनकी सांसें एक-दूसरे में उलझ गईं और लंड एक बार फिर गुलाबी गहराइयों में खो गया…

सूरज के धक्के अब धीमे पर और भी मर्मभेदी हो गए। वह सोनी की रसीली दहलीज के हर कोने को अपने पौरुष से नाप लेना चाहता था। कमरे की हवा में बढ़ती वह 'चिपचिपाहट' और केसर की महक अब उस 'गुप्त बंधन' की मुहर बन रही थी। सूरज के मन में अब बस एक ही लक्ष्य था—इस 'यज्ञ' को उस मुकाम तक ले जाना जहाँ से वापसी का कोई रास्ता न बचे और सोनी की कोख उस 'इतिहास' को संजोने के लिए तैयार हो जाए जिसे आज रात लिखा जा रहा था।

सोनी की हालत अब बेकाबू हो रही थी। सूरज के दांतों का वह वक्षों पर गहरा खिंचाव और नीचे से लगातार होता वह प्रहार उसके भीतर एक ऐसा तूफान ला चुका था जिसे रोक पाना अब उसके बस में नहीं था।

सोनी का पूरा बदन अब कांपने लगा था। उसकी जांघें, जो सूरज के कंधों पर टिकी थीं, अब थरथरा रही थीं। उसे महसूस हो रहा था कि उसके भीतर का वह सैलाब, वह रसीला ज्वार अब बांध तोड़ने को आतुर है। सुगना द्वारा बनाया गया वह 'कमल' अब पूरी तरह खिल चुका था और सूरज के हर प्रहार को सोख रहा था।

"सूरज... रुक मत... आअह्ह! मैं... मैं अब और नहीं सह सकती... कुछ हो रहा है... सूरज!" सोनी की आवाज में एक अजीब सी खनक और तड़प थी।

सूरज ने अपनी गति कम नहीं की। वह तो उस 'पुजारी' की भांति था जो जानता था कि उसकी 'वेदी' अब अपनी चरम आहुति के लिए तैयार है। उसने सोनी के होंठों को अपने दांतों के बीच दबा लिया ताकि उसकी चीखें कमरे की दीवारों के बाहर न जा सकें।

अचानक, सोनी का शरीर पूरी तरह से अकड़ गया। उसकी उंगलियां सूरज की पीठ के मांस में गहरे धंस गईं। वह 'मुनिया' की गहराइयों से उठते हुए उस सुखद झटके को महसूस कर रही थी जिसने उसे सुन्न कर दिया था। उसके भीतर से रसों का एक गर्म फव्वारा फूटा, जिसने उस 'चर्म दंड' को पूरी तरह भिगो दिया। सोनी का सिर पीछे लुढ़क गया, उसकी सांसें उखड़ गईं और वह झटके खाते हुए बिस्तर पर पस्त होने लगी।

सूरज ने उसे महसूस किया—उसकी उस रसीली दीवार का सिकुड़ना और उस तरल का प्रवाह। उसने खुद को अभी भी थामे रखा था। उसका अपना 'पौरुष' अभी भी तनकर खड़ा था, अडिग और शांत। वह थका नहीं था, बल्कि सोनी की उस तृप्ति को महसूस कर एक अजीब सी जीत का अनुभव कर रहा था।

सोनी अब पूरी तरह से निढाल होकर बिस्तर पर फैल गई थी, उसका बदन पसीने और उस चरम आनंद के अवशेषों से चमक रहा था। वह स्खलित होकर शांत हो चुकी थी, लेकिन सूरज की आंखों की वह 'वासना' अब भी शांत नहीं हुई थी; वह तो बस अभी उस मंदिर की पहली आरती का गवाह बना था।

सोनी का बदन ढीला पड़ गया और वह बेतहाशा हाँफने लगी। सूरज ने उसके वक्षों को मुक्त किया और उसके चेहरे के पास अपनी भारी सांसें छोड़ने लगा। 'संतान सप्तमी' का वह अनुष्ठान अपने चरम को छू चुका था। सोनी ने अपनी आँखें खोलीं और सूरज को देखा—उसका पुजारी अब उसका स्वामी बन चुका था असीम तृप्ति के आनंद में सोनी की पलके फिर मूँद गईं।। उसे महसूस हुआ कि सुगना की दी हुई वह 'कामुक दीक्षा' आज पूरी तरह से सफल हो गई थी, और उसके वक्षों पर सूरज के दांतों के निशान उस वर्जित मिलन की अमिट मुहर बन चुके थे।

सूरज ने जब महसूस किया कि सोनी सुख के चरम को छूकर पूरी तरह निढाल हो चुकी है, तो उसने बड़ी शालीनता से खुद पर काबू पाया। वह अभी स्खलित नहीं हुआ था, पर सोनी की हालत देखकर उसने अपना लिंग बाहर निकाल लिया।

सोनी को लगा जैसे किसी ने उसके हृदय से उसका कलेजा निकाल लिया हो पर वह अर्ध चेतन अवस्था में थी।


सोनी की साँसें अब भी उखड़ी हुई थीं और उसका शरीर स्खलन के बाद की उस मीठी सुस्ती में डूबा हुआ था। सूरज बिस्तर के किनारे बैठ गया और कुछ पलों के लिए सोनी को उस सुकून में रहने दिया।

सरयू सिंह के पुत्र सूरज में गजब का संयम था। उसने अपनी सांसों को नियंत्रित किया और सोनी को चैतन्यता का इंतजार करने लगा…

कमरे में छाई खामोशी और ठंडी ए.सी. की हवा ने धीरे-धीरे सोनी की चेतना को वापस लौटाया। जब उसकी आँखों से मदहोशी की धुंध छँटी, तो उसने देखा कि सूरज पसीने से लथपथ पास ही बैठा था। सोनी के पैर के पंजे उसकी गोद में थे उसके तने हुए लंड से टकरा रहे थे। सोनी को जब इसका एहसाह हुआ उसने अपनी आंखें खोलीं उसकी नज़र सूरज के उस अंग पर पड़ी जो अब भी पूरी तरह तना हुआ और अपनी मंज़िल का इंतज़ार कर रहा था।

सोनी अपने पैर पीछे खींचे उसे अपराध बोध हो रहा था कि जिस अद्भुत लिंग में उसे तृप्त किया था वह उसे अपने पैरों से छू रही थी…

क्या हुआ मौसी…सूरज ने सोनी की जांघों पर हाथ फिराने हुए कहा..

कुछ नहीं…सोनी उठकर बैठ गई..और सूरज के माथे को चूम लिया…सोनी का ध्यान अपनी मुनिया पर गया उसे महसूस हो गया कि अबतक सूरज का स्खलन नहीं हुआ है…

सोनी को अचानक 'संतान सप्तमी' के उस गूढ़ रहस्य का स्मरण हुआ जो सुगना ने उसे समझाया था। यह अनुष्ठान तब तक पूर्ण नहीं माना जाता जब तक कि 'बीज' का अर्पण उस पवित्र वेदी पर न हो जाए। उसने महसूस किया कि सूरज ने उसकी संतुष्टि के लिए अपने वेग को रोककर रखा है, पर इस कारण यह धार्मिक और दैवीय अनुष्ठान अभी अधूरा है।

सोनी ने एक गहरी साँस ली और अपनी मुनिया पर हाथ फेरते हुए उन पर रची उस 'मेहंदी' और रिस रहे 'काम-रस' के मिश्रण को देखा। और फिर सूरज की ओर मुखातिब हुई।

सोनी (धीमी और भर्राई हुई आवाज़ में): "सूरज... तू रुक क्यों गया? अभी यह यज्ञ पूरा नहीं हुआ है। सुगना दीदी की मन्नत और इस रात का महत्व तभी सिद्ध होगा जब तू अपनी पूरी आहुति इस वेदी में देगा। मुझे निढाल देखकर तूने खुद को रोक लिया, पर मेरी देह अब भी तेरे उस 'बीज' की प्रतीक्षा कर रही है जिसके बिना यह संतान सप्तमी का व्रत अधूरा रह जाएगा।"

सोनी ने अपना हाथ आगे बढ़ाकर सूरज के लंड को थाम लिया और उसे अपनी हथेलियां में भरकर प्यार करने लगी जैसे वह उसे असीम सुख देने के लिए अपनी कृतज्ञता जाहिर कर रही हो। सोनी को उसे अद्भुत लंड पर इतना प्यार आया कि उसके मन में उसे चूमना की इच्छा जागृत हुई परंतु सूरज के लंड पर होंठ लगाने का मतलब सोनी जानती थी…


उसने सूरज की हथेली को पकड़ कर अपनी मुनिया की तरफ ले गई और उसे स्पर्श कराते हुए बोली

“आज यह तेरे तेज को अपने भीतर धारण करने के लिए तरस रही है…तूने मुझे अद्भुत सुख दिया है अब मुझे पूर्णता का एहसास करा दे मेरी कोख भर दे …. मुझे मां बना दे…”

इसी दौरान सोनी ने अनजाने में ही सूरज के अंगूठे को सहला दिया और सूरज के लंड में अचानक एक तीव्र उत्तेजना हुई और उसका आकार कुछ और बढ़ गया…

उसकी आँखों में अब केवल वासना भर चुकी थी , सूरज ने जब अपनी मौसी के संकल्प और समर्पण को देखा, तो उसका संयम फिर से जवाब दे गया और वह उस अधूरी पूजा को पूर्णता तक ले जाने के लिए तैयार हो गया।

उसने सोनी को एक बार फिर बिस्तर पर लिटा दिया.. और अपने लंड को सोने की चुदी हुई लिसलिसी बुर पर रखकर सोनी की चूचियों को सहलाते हुए नीचे एक जोर का धक्का दिया सोनी की चीख निकल गई…सोनी को अब अफसोस हो रहा था उसने आखिर वह अंगूठा क्यों सहलाया…

होटल के उस सुइट में अब कामवासना का तूफान अपने चरम पर था। सूरज, जो अब तक बातों से सोनी के मन को टटोल रहा था, अपनी कामोत्तेजना के अंतिम वेग को रोक नहीं पाया। उसने सोनी की कमर को अपनी मजबूत पकड़ में जकड़ लिया वापस अपने लिंग को उसी जन्नत में उतार दिया और बेतहाशा, तीव्र धक्के लगाने शुरू किए।

सूरज अब सोनी को पूरी निर्ममता से चोद रहा था। उसे तने हुए विशाल लंड के लिए सोनी की बुर एक कमसिन लड़की की भांति प्रतीत हो रही थी और वह विशाल लंड उसे चीरता हुआ अपनी शक्ति का एहसास कर रहा था। सोनी का रोम रोम कांप रहा था। पर जाने विधाता ने योनि में न जाने सृजन की कैसी शक्ति दी है वह धीरे-धीरे सूरज के विशाल लंड को भी आत्मसात कर चुकी थी और अब सोनी एक बार फिर आनंद की सीढ़ियां चढ़ रही थी।

वहीं दूसरी ओर सुगना के मन में बेचैनी का एक नया बवंडर उठ रहा था। सुगना, जिसने इस पूरी रात की पटकथा अपनी रूह फूंककर लिखी थी, वह बनारस के अपने घर की देहली पर पलक-पावड़े बिछाए विकास का इंतज़ार कर रही थी।

उसके मन में बस एक ही छवि थी—कि विकास समय पर पहुँचेगा और उसकी छोटी बहन सोनी के उस 'मृग-छौने' जैसे बदन में अपने वंश का बीज रोपित करेगा। सुगना ने सोनी के बदन पर जो कामुक रंगरेलियां बनाई थी उसे उसका बेटा खराब कर रहा था। सुगना को क्या पता था कि कुदरत ने उसकी प्रार्थनाओं को सुनने का एक ऐसा रास्ता निकाला है, जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी।

जैसे-जैसे घड़ी की सुइयाँ आगे बढ़ रही थीं और आधी रात का समय नज़दीक आ रहा था, सुगना की धड़कनें तेज़ हो रही थीं। वह बार-बार खिड़की से बाहर झांकती और फिर ठाकुर जी की मूरत के सामने हाथ जोड़कर खड़ी हो जाती।

"हे ईश्वर, आज की रात का एक-एक पल ठहर जाए। यह समय रुक जाए जब तक विकास सोनी के पास न पहुँच जाए। मेरी मेहनत, मेरी मन्नत और सोनी का वह सोलह श्रृंगार निष्फल नहीं जाना चाहिए। आज की रात उस वेदी को उसका पुजारी मिलना ही चाहिए।"

वह ईश्वर से समय को थाम लेने का अनुरोध कर रही थी, ताकि 'संतान सप्तमी' का वह शुभ मुहूर्त निकल न जाए।


हैरानी की बात यह थी कि सुगना की वह प्रार्थना स्वीकार हो रही थी, पर उस ढंग से नहीं जैसा उसने सोचा था। जिस वक्त वह ईश्वर से 'समय रोकने' और 'गर्भ सिंचन' की गुहार लगा रही थी, ठीक उसी वक्त उसका अपना पुत्र, सूरज, अपनी माँ और मौसी की उन गुप्त इच्छाओं और प्रार्थनाओं को साक्षात् साकार कर रहा था।

होटल के उस बंद कमरे में सूरज अपनी पूरी पौरुष शक्ति के साथ सोनी के 'गर्भ सिंचन' के लिए पुरज़ोर प्रयास कर रहा था। सुगना बाहर बैठकर जिस 'बीज अर्पण' के लिए तड़प रही थी, उसका बेटा उसी अनुष्ठान को अपनी रगों के गर्म रक्त से मुकम्मल कर रहा था।


यह नियति का कैसा क्रूर और कामुक मज़ाक था—एक माँ बाहर बैठकर जिस वंश की बेल को सींचने की दुआ कर रही थी, उसका बेटा भीतर उसी बेल की जड़ों में अपनी जवानी का रस उड़ेल रहा था। सुगना की हर आह और हर दुआ, सूरज के हर धक्के और हर प्रहार के साथ सुर मिला रही थी।

बनारस की वह रात अब एक ऐसे रहस्य की गवाह बन चुकी थी, जहाँ प्रार्थना करने वाली माँ थी, त्याग करने वाली मौसी थी, और उन दोनों की अधूरी कामनाओं को अपने पौरुष से पूर्ण करने वाला वह इकलौता पुत्र था। सुगना की अधीरता और सूरज का जुनून, दोनों मिलकर 'संतान सप्तमी' के उस इतिहास को लिख रहे थे, जिसका सच कभी उजाले में नहीं आना था।

सूरज का पौरुष अब एक दहकते हुए अंगारे की तरह था, जो हर प्रहार के साथ सोनी की गहराइयों को झुलसा रहा था। सोनी, जो एक बार फिर उत्तेजना के शिखर पर थी, सूरज के इन अनियंत्रित और शक्तिशाली प्रहारों के नीचे बेबस हो गई। उसके मुँह से निकलने वाली सिसकियाँ अब लंबी आहों और मदहोश कर देने वाली चीखों में बदल चुकी थीं।


जैसे-जैसे सूरज की रफ्तार बढ़ी, सोनी का शरीर कमान की तरह तन गया। उसके पैरों की उंगलियाँ मुड़ गईं और उसकी योनि की मांसपेशियाँ एक तीव्र संकुचन (Contractions) के साथ सूरज के अंग को चारों तरफ से जकड़ने लगीं। सोनी अपनी सुध-बुध खो चुकी थी; उसकी आँखों के सामने रंगीन बिजलियाँ कौंध रही थीं। वह अपनी चरम संतुष्टि के उस विस्फोट में पूरी तरह बह गई, उसका रोम-रोम स्खलन के आनंद से थरथरा उठा।

सोनी के उस गर्म और संकुचित स्पर्श ने सूरज के धैर्य को भी अंतिम सीमा तक पहुँचा दिया। सूरज ने अपनी पूरी ताकत बटोरकर कुछ अंतिम और बेहद गहरे प्रहार किए। वह भूल गया कि वह कहाँ है; उसे बस उस 'यज्ञ' की आखिरी आहुति देनी थी। एक जोरदार और अंतिम धक्के के साथ, सूरज ने अपने पौरुष को सोनी की 'महोगनी की गांठ' की सबसे गहरी गहराई तक धँसा दिया।


अगले ही पल, सूरज का पूरा शरीर कांप उठा। उसके भीतर संचित वह 'दिव्य बीज' एक तीव्र फुहार के साथ मुक्त हो गया। सोनी ने अपने भीतर उस गर्म धारा के प्रवाह को महसूस किया, जो उसके गर्भ की गहराइयों तक पहुँच रही थी। वह वीर्य सोनी की उस प्यासी 'मुनिया' को पूरी तरह से तृप्त और संचित करने लगा। 'संतान सप्तमी' का वह व्रत, जिसकी कामना सुगना ने की थी, उस क्षण में सूरज के उस बीज के अर्पण के साथ साक्षात् पूर्ण हुआ।

सोनी के वक्ष, जिन पर रची मेहंदी अब पसीने और उत्तेजना से दहक रही थी, सूरज की भारी छाती के नीचे बुरी तरह दब रहे थे। उसे महसूस हो रहा था कि सूरज का पौरुष अभी भी उसके भीतर उसी गहराई पर टिका हुआ है, जैसे वह उस पवित्र स्थान को पूरी तरह से अपनी छाप से भर देना चाहता हो।

दोनों जिस्म पसीने से लथपथ, एक-दूसरे में गुंथे हुए, बिस्तर पर निढाल पड़ गए। कमरे में केवल उनकी उखड़ी हुई साँसों का शोर था। बनारस की उस रात ने एक वर्जित लेकिन पूर्ण अनुष्ठान को संपन्न होते देखा था। सोनी ने अपनी आँखें बंद कर लीं, उसे अब एक अजीब सी शांति और तृप्ति का अनुभव हो रहा था—

जैसे उसकी प्यासी देह को अंततः उसका देवता मिल गया हो।

शेष अगले भाग में
 
भाग 188

सोनी के वक्ष, जिन पर रची मेहंदी अब पसीने और उत्तेजना से दहक रही थी, सूरज की भारी छाती के नीचे बुरी तरह दब रहे थे। उसे महसूस हो रहा था कि सूरज का पौरुष अभी भी उसके भीतर उसी गहराई पर टिका हुआ है, जैसे वह उस पवित्र स्थान को पूरी तरह से अपनी छाप से भर देना चाहता हो।



दोनों जिस्म पसीने से लथपथ, एक-दूसरे में गुंथे हुए, बिस्तर पर निढाल पड़ गए। कमरे में केवल उनकी उखड़ी हुई साँसों का शोर था। बनारस की उस रात ने एक वर्जित लेकिन पूर्ण अनुष्ठान को संपन्न होते देखा था। सोनी ने अपनी आँखें बंद कर लीं, उसे अब एक अजीब सी शांति और तृप्ति का अनुभव हो रहा था—जैसे उसकी देह की वेदी को अंततः उसका देवता मिल गया हो।

अब आगे..

उस आलीशान कमरे में अब सन्नाटा था, लेकिन वह सन्नाटा शांति का नहीं, बल्कि आने वाले दिनों के उस तूफ़ान की आहट था जिसकी पटकथा सुगना ने लिख दी थी। वासना का वह पहला ज्वार भले ही थम गया था, लेकिन 'संतान सप्तमी' का असली विधान तो अब शुरू होना था।

सोनी अब भी सूरज के नीचे दबी हुई थी, उसका बदन सूरज के उस अंतिम अर्पण की गरमाहट को अपने भीतर समेटे हुए था। तभी उसे दीदी की कही वह गुप्त बात याद आई, जो इस व्रत का सबसे कठिन और मादक नियम था।

उस गुप्त अध्याय के अनुसार, जिस पुरुष ने पहले दिन इस देह-वेदी पर अपनी आहुति दे दी है, उसे ही अगले सात दिनों तक लगातार इस 'उर्वर' भूमि को सींचना था। नियम स्पष्ट था—सिर्फ एक बार नहीं, बल्कि जितनी बार संभव हो सके, उस 'मुनिया' को वीर्य के अर्पण से तृप्त करना था ताकि वह 'बीज' जड़ पकड़ सके।

सोनी ने धीरे से अपनी आँखें खोलीं और सूरज के चेहरे को देखा, जो अब भी उसकी गर्दन के पास अपनी भारी साँसें छोड़ रहा था। उसे अहसास हुआ कि आज की रात तो महज़ एक 'आगाज' थी; असली अंजाम तो उन आने वाले सात दिनों में लिखा जाना था जहाँ उसे और सूरज को मर्यादा की हर हद को बार-बार पार करना होगा।

मिलन के बाद अब बिछड़ने की तैयारी थी सूरज ने अपना तना हुआ लंड सोनी की मुनिया से बाहर निकाला और हमेशा की तरह वह पक्क …की आवाज सोनी और सूरज दोनों ने सुनी…इस आवाज में भी उतनी ही मधुरता थी जितना सोनी की कराह में थी।

सूरज के साथ-साथ सोनी भी खड़ी हो गई दोनों पूरी तरह नग्न आदिम अवस्था में एक दूसरे के समक्ष खड़े थे…सूरज का अद्भुत और विशाल लंड पूरी उत्तेजना के साथ खड़ा था जिस पर काम रस ऐसे लिपटा हुआ था जैसे उसे किसी मक्खन की हांडी में डुबो दिया गया हो…

सोनी को पता था उसे क्या करना है विधाता की उस अनुपम कृति ने उसे जो सुख और संतोष दिया था उसे शांत करना आवश्यक था…. सोनी अब अपने घुटनों पर थी.. उसने सूरज के तने हुए लंड को अपने हाथों में थाम लिया और प्यार से सहलाते हुए और सूरज की तरफ देखते हुए बोला: "सूरज... तूने जो आज शुरू किया है, उसे अब तुझे ही अंजाम तक पहुँचाना होगा। दीदी ने कहा था कि एक बार की आहुति पर्याप्त नहीं है... इस वेदी को अगले सात दिनों तक तेरे ही अर्पण की प्यास रहेगी।"

सूरज की आँखों में एक नई चमक थी। वह समझ गया कि अब यह खेल सिर्फ एक रात का नहीं रह गया है। उसे अपनी मौसी की उस 'महोगनी की गांठ' को बार-बार अपनी मर्दानगी से सींचना होगा, जब तक कि वह 'कमल' पूरी तरह से फल न देने लगे।

सूरज: "तो तैयार रहिए मौसी... क्योंकि अब सूरज न थकेगा, न रुकेगा। अगले सात दिन बनारस की यह धरती हमारी गवाह बनेगी कि कैसे एक पुजारी अपनी आराध्या को तृप्ति के शिखर तक ले जाता है।"

सोनी ने एक गहरी साँस ली और सूरज ले लंड को और भी कसकर अपने हथेली के आलिंगन में भर लिया । उसे पता था कि अब से लेकर अगले सात दिनों तक, वह केवल विकास की पत्नी नहीं, बल्कि सूरज की वह 'भूमि' होगी जिसे वह अपनी इच्छा और शक्ति से उर्वर बनाएगा। वासना का वह तूफ़ान अब एक स्थायी अग्नि में बदल चुका था।

सोनी के मन में अब विचारों का एक गहरा भंवर उठ रहा था। सूरज के पौरुष की गर्माहट अभी भी उसके रोम-रोम में बसी थी, लेकिन ठंडी हकीकत ने उसके दिमाग के द्वार खटखटा दिए थे। वह जानती थी कि सुगना दीदी ने इस 'संतान सप्तमी' के व्रत के लिए जो ताना-बाना बुना था, उसका केंद्र विकास ही थे। पर नियति ने आज की रात की पहली और सबसे महत्वपूर्ण आहुति सूरज के हाथों दिला दी थी।

सोनी ने एक गहरी सांस ली और अपनी बिखरी हुई जुल्फों को समेटते हुए मन ही मन एक बेहद जटिल और साहसी निर्णय लिया।

सोनी का संकल्प (मन ही मन): "आज की रात जो आग सूरज ने जलाई है, वह अगले सात दिनों तक मुझे सुलगाती रहेगी। मैं सूरज के साथ इस 'वर्जित सत्य' को जियूँगी, क्योंकि मेरी कोख को अब उसी के ताप की प्यास है। पर दुनिया के लिए, सुगना दीदी के लिए और खुद विकास जी के लिए, मैं एक समर्पित पत्नी बनी रहूँगी। यह राज़ इस होटल की दीवारें और मेरी अंतरात्मा ही जानेगी। विकास जी इस व्रत का नाम होंगे, पर सूरज इसकी आत्मा और हकीकत।"

सोनी ने आईने में अपनी चमकती हुई आँखों को देखा। उसके चेहरे पर अब एक चतुर और परिपक्व स्त्री की मुस्कान थी, जिसने अपनी तृप्ति और अपनी मर्यादा, दोनों को एक ही धागे में पिरो लिया था। और खुद को तैयार किया—एक ऐसे दोहरे जीवन के लिए जहाँ वह एक साथ 'देवी' भी थी और 'अप्सरा' भी।

घड़ी की सुइयों ने रात के 11 बजा दिए थे और इसके साथ ही सुइट के उस मायावी वातावरण में हकीकत की घंटी बज चुकी थी। विकास की ट्रेन आने में अब बहुत कम समय बचा था। सोनी भारी कदमों से बाथरूम की ओर बढ़ी ताकि खुद को फिर से उस 'मर्यादित पत्नी' के रूप में ढाल सके जिसका इंतज़ार विकास और सुगना कर रहे थे।

जैसे ही उसने बाथरूम के बड़े आईने के सामने अपनी छवि देखकर सिहर उठी। आईने में दिख रही स्त्री वह सोनी नहीं थी जो शाम को यहाँ आई थी; यह तो सूरज के जुनून की लिखी हुई एक दास्तां थी।

उसकी गोरी चूचियों पर, जिन्हें सुगना ने केसर और चंदन से महकाया था, अब सूरज के दांतों और होठों के गहरे लाल निशान उभरे हुए थे। सूरज ने जिस बेतहाशा अंदाज़ में उन्हें पिया था, वे अब उसकी कामुकता की गवाही दे रहे थे । उसकी सुडौल कमर और भारी नितंबों पर सूरज की उंगलियों के नीले निशान साफ दिख रहे थे, जहाँ उसने सोनी को अपनी ओर खींचने के लिए मजबूती से जकड़ा था।

पेट और जांघों पर रची मेहंदी पसीने और घर्षण की वजह से थोड़ी धुंधली पड़ गई थी, जो उस 'युद्ध' का प्रमाण थी जो अभी-अभी उस मखमली बिस्तर पर लड़ा गया था। जांघों पर रिसा हुआ वीर्य चमक रहा था…

सोनी का कलेजा जोर से धड़कने लगा। उसने थरथराते हाथों से उन निशानों को छूकर देखा। एक पल के लिए उसे अपनी देह से सूरज के पौरुष की वह तीखी गंध आई जिसे वह कभी नहीं भूल सकती थी।

"हे भगवान! मैं विकास जी का सामना कैसे करूँगी?" उसने मन ही मन सोचा। "अगर रोशनी में उन्होंने मुझे देख लिया, तो इन निशानों का क्या जवाब दूँगी? सुगना दीदी ने तो मुझे उनके लिए संवारा था, पर यहाँ तो किसी और ने ही अपनी मुहर लगा दी है।"

वह घबराहट में जल्दी-जल्दी पानी की बौछारें अपने बदन पर डालने लगी, जैसे वह उन निशानों को धो देना चाहती हो। पर वे निशान महज़ त्वचा पर नहीं थे, वे तो उसकी रूह पर अंकित हो चुके थे।

बाहर सूरज अब कपड़े पहनकर शांत बैठा था, पर सोनी के भीतर एक ऐसा चोर घुस गया था जो उसे विकास की आँखों में आँखें डालने से रोक रहा था। 'संतान सप्तमी' का वह गुप्त अनुष्ठान अब एक मीठे अपराध की तरह उसके सीने पर भारी होने लगा था।

स्टेशन का माहौल शोर-शराबे से भरा था, पर सोनी के भीतर एक अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था। जैसे ही विकास ट्रेन से उतरा और सूरज के साथ गाड़ी तक पहुंचा उसकी नज़र अपनी पत्नी पर पड़ी। सोनी बनारसी साड़ी में लिपटी, अपनी दमकती काया लिए उसका इंतजार कर रहीं थी। उसके चेहरे पर छाई वह 'खास' सुर्खी विकास की पारखी नज़रों से छिपी नहीं रही।

तीनों कार में सवार होकर घर की ओर चल दिए। सूरज गाड़ी चला रहा था और विकास पीछे की सीट पर सोनी के साथ बैठा था। पूरे रास्ते विकास की आँखें सोनी के बदन का मुआयना करती रहीं।

विकास को लगा कि सोनी आज कुछ बदली-बदली सी है। उसके चेहरे पर थकान तो थी, पर साथ ही एक ऐसी संतुष्टि और चमक थी जो उसने पहले कभी नहीं देखी थी। वह बार-बार सोनी की ओर झुकता और उसके कान के पास फुसफुसाता:

विकास: "सोनी, आज तुम कुछ ज्यादा ही नशीली लग रही हो। बनारस की हवा लग गई है या सुगना दीदी ने तुम्हें कोई घुट्टी पिलाई है? मेरा तो जी कर रहा है कि घर पहुँचने का इंतज़ार भी न करूँ।"

सोनी का दिल जोरों से धड़क रहा था। वह डर रही थी कि कहीं विकास की नज़र उसकी गर्दन के उन मद्धम निशानों पर न पड़ जाए जो साड़ी के पल्ले के नीचे छुपे थे। उसने अपनी गर्दन और झुका ली और खिड़की के बाहर देखने का नाटक करने लगी।

इधर सूरज शांत होकर ड्राइविंग कर रहा था, पर रियर-व्यू मिरर (Rear-view mirror) में उसकी आँखें बार-बार सोनी से टकरा रही थीं। वह देख रहा था कि कैसे विकास उस शरीर पर अपना अधिकार जता रहा है, जिसे अभी कुछ देर पहले उसने खुद अपनी मर्दानगी से तृप्त किया था। सूरज के चेहरे पर एक गूढ़ मुस्कान थी—उसे पता था कि विकास जिस 'खजाने' को आज रात लूटने की योजना बना रहा है, उसका सबसे कीमती हिस्सा वह पहले ही अपने नाम कर चुका है।

सोनी को विकास का वह 'ताड़ना' (घूरना) असहज कर रहा था। वह सोच रही थी कि सुगना ने घर पर आरती की थाली सजा रखी होगी और उसे विकास के साथ उसी रात के अनुष्ठान में बैठना होगा। उसे रह-रहकर सूरज के वे तीखे स्पर्श याद आ रहे थे, जो अब विकास की नज़रों के नीचे एक 'अपराधबोध' बन रहे थे।

जैसे-जैसे हवेली करीब आ रही थी, सोनी अपनी साड़ी को और कसकर लपेट रही थी। वह जानती थी कि असली परीक्षा तो अब शुरू होगी, जब घर की रोशनी में सुगना की अनुभवी आँखें और विकास की भूखी देह उसका सामना करेगी। 'संतान सप्तमी' की वह रात अब अपने दूसरे और सबसे पेचीदा पड़ाव पर पहुँच चुकी थी।

घर पहुँचते ही सुगना ने दरवाज़ा खोला। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक और संतोष था, जैसे उसकी बरसों की मन्नत आज पूरी होने वाली हो। उसने आरती की थाली पहले ही सजा रखी थी।

सुगना: "पधारो विकास! बड़ी लंबी राह तकवाई तुमने। और सोनी, तू इतनी थकी-थकी क्यों लग रही है? आ जाओ, जल्दी से हाथ-मुँह धो लो, मैंने गरमा-गरम खाना लगाती हूं।"

घर में सन्नाटा था, बाकी सदस्य गहरी नींद में थे, लेकिन सुगना की फुर्ती बता रही थी कि आज की रात उसके लिए कितनी महत्वपूर्ण है। डाइनिंग टेबल पर बनारसी पकवानों की खुशबू फैली हुई थी। विकास भूखा था, इसलिए उसने चाव से खाना शुरू किया, लेकिन उसकी नज़रें रह-रहकर बगल में बैठी सोनी पर टिक जातीं।

सोनी का हाल बेहाल था। वह चाहकर भी नज़रें नहीं उठा पा रही थी। उसे लग रहा था कि सुगना की तेज़ नज़रें उसकी साड़ी के भीतर छिपे उन 'खरोंचों' और 'नीले निशानों को देख लेंगी जो सूरज ने अभी कुछ घंटों पहले उसकी देह पर उकेरे थे। वह बहुत ही सलीके से अपना पल्ला संभाल रही थी।

सुगना (सूरज की ओर देखते हुए): "सूरज, तू भी बैठ जा बेटा। तूने आज बहुत मेहनत की है। सोनी को स्टेशन से होटल और फिर यहाँ लाना... तू न होता तो पता नहीं क्या होता।"

सूरज ने बिना कुछ बोले अपनी माँ की तरफ देखा। उसके चेहरे पर एक गहरी शांति थी। उसने बस इतना कहा, "माँ, मैंने बस वही किया जो आज की रात का नियम था। मेरा फर्ज़ अब पूरा हुआ।" सोनी ने टेबल के नीचे अपनी उंगलियां भींच लीं। वह जानती थी कि सूरज की इस बात के पीछे कितने गहरे अर्थ छिपे हैं।

खाना खत्म होते-होते रात के 1:30 बज चुके थे। बनारस की वह रात अब अपने अंतिम प्रहर में प्रवेश कर रही थी। सुगना ने टेबल साफ की और विकास की ओर देखते हुए धीरे से मुस्कुराई।

सुगना: "अब देर मत करो विकास। शुभ घड़ी निकली जा रही है। कमरा सजा दिया है मैंने, और सोनी... तू जाकर तैयार हो जा। याद है ना, आज की रात का क्या महत्व है?"

सोनी का दिल धड़कना बंद कर गया। वह उठी और भारी कदमों से अपने कमरे की ओर बढ़ी, जहाँ अब उसे विकास के साथ उस 'यज्ञ' का नाटक पूरा करना था जिसकी असली आहुति वह सूरज को दे चुकी थी। सूरज वहीं डाइनिंग हॉल के अंधेरे कोने में खड़ा अपनी मौसी के डगमगाते कदमों को देख रहा था।

बेडरूम का दरवाज़ा बंद होते ही विकास के भीतर का संयम जवाब दे गया। उसने बिना एक पल गंवाए सोनी को पीछे से अपनी आगोश में भर लिया। उसकी गरम सांसें सोनी की गर्दन पर पड़ रही थीं, जहाँ अभी कुछ देर पहले सूरज के होंठों की तपिश थी। विकास के हाथ बेताबी से सोनी के वक्षों की ओर बढ़े। जैसे ही उसने ब्लाउज के ऊपर से उन्हें मसला, उसकी नज़र गहरी कटिंग वाली चोली के भीतर दिख रही मेहंदी की सुर्ख लाल बेलों पर पड़ी।

विकास (हैरानी और उत्तेजना में): "अरे! यह क्या मेरी जान... तुमने आज इन पर भी मेहंदी लगवाई है? सच में, सुगना जी ने तो आज तुम्हें कयामत बना दिया है। ज़रा दिखाओ तो सही, यह कलाकारी कहाँ तक गई है?"

विकास के हाथ ब्लाउज की डोरियों की तरफ बढ़े ही थे कि सोनी ने बड़ी चतुराई से उसके हाथ थाम लिए। उसका दिल तेज़ी से धड़क रहा था क्योंकि उसे पता था कि उन वक्षों पर मेहंदी के साथ-साथ सूरज के दांतों के गहरे निशान भी मौजूद हैं।

सोनी (मुस्कुराते हुए): "इतनी भी क्या जल्दी है? आप जाइए, पहले हाथ-मुँह धोकर कपड़े बदल लीजिए।

विकास -- सुगना दीदी कुछ खास 'सरप्राइज' की बात कर रही थीं,

सोनी --आपका वह उपहार इसी बिस्तर पर आपका इंतज़ार करेगा। वैसे भी बहुत देर हो चुकी है, अब और वक्त मत गंवाइए।"

विकास की आँखों में चमक आ गई। वह मुस्कुराया और 'सरप्राइज' के लालच में बाथरूम की ओर बढ़ गया। जैसे ही बाथरूम का दरवाज़ा बंद हुआ, सोनी ने फुर्ती से काम लेना शुरू किया। उसने अपने शरीर से बनारसी साड़ी और वह टाइट ब्लाउज उतार फेंका। वह पूरी तरह नग्न हो गई, लेकिन आईने में अपने बदन को देखते ही उसकी रूह कांप गई—सूरज के दिए हुए निशानों को छुपाना नामुमकिन था।

उसने तुरंत मन ही मन अपनी योजना को अंतिम रूप दिया। वह बिस्तर पर लेट गई और एक दूध जैसी सफेद चादर को अपने गले तक ओढ़ लिया। उसने तय किया कि वह मुनिया तो दिखाएगी पर चादर को अपने वक्षों से हटने नहीं देगी और जल्दी से कमरे की लाइट को इतना मद्धम कर देगी कि विकास को केवल अहसास हो, कुछ दिखे नहीं।

कुछ ही देर में विकास बाथरूम से निकला। उसने देखा कि कमरे की में लाइट बंद है और केवल कोने में रखा एक छोटा लैंप मद्धम पीली रोशनी बिखेर रहा है। बिस्तर पर सफेद चादर में लिपटी सोनी किसी अप्सरा की तरह लग रही थी।

मद्धम रोशनी में विकास जैसे ही बिस्तर के करीब आया, उसकी धड़कनें सोनी के सौंदर्य को देख कर और तेज़ हो गईं। सोनी ने अपनी योजना के अनुसार एक गहरी साँस ली और चादर को धीरे-धीरे ऊपर खींचना शुरू हुआ सोनी के नंगे पैर पुष्ट जांघें और वह जांघों का जोड़ कुछ भी पलों में उजागर हो गया…। जैसे-जैसे चादर हट रही थी विकास की पुतलियां फैलती जा रही थी। सोनी ने उसे चादर से उन अंगों पर आवरण दिया रहा जहां सूरज ने उसे अदभुत मिलन के दौरान अपने निशान छोड़ दिए थे।

विकास की आँखें फटी की फटी रह गईं। सुगना ने सोनी की 'मुनिया' और जांघों पर जो 'महोगनी की गांठ' और 'कमल' की कलाकारी की थी, वह उस पीली रोशनी में किसी जादुई नक्काशी की तरह चमक रही थी। विकास ने आज से पहले अपनी पत्नी के इस सबसे निजी अंग को इतना सजा हुआ और कामुक कभी नहीं देखा था।उस पर से सूरज की जबरदस्त चूदाई से मुनिया के होंठ फूल कर और भी खूबसूरत हो गए थे।

विकास (हैरानी और विस्मय में): "हे भगवान... सोनी! ... यह तो अद्भुत है। सुगना जी ने वाकई कमाल कर दिया है। ऐसी सजावट... जैसे कोई मंदिर की वेदी हो। सुगना दी इतनी शरारती है मुझे आज मालूम चला"

सोनी ने बहुत ही चतुराई से चादर को इस तरह पकड़ा हुआ था कि उसके वक्ष और ऊपर का हिस्सा ढका रहे। जब विकास नीचे की उस नक्काशी को निहारने में खोया था, सोनी ने अपने हाथों से चादर को अपनी चूचियों पर और कस लिया ताकि सूरज के दाँतों के निशान और वह 'लाल घेरे' विकास की नज़रों से बचे रहें।

विकास मंत्रमुग्ध होकर आगे बढ़ा और अपने कांपते हाथों से उस 'कमल' को छूने की कोशिश करने लगा। उसे लग रहा था कि आज वह अपनी पत्नी को नहीं, बल्कि किसी साक्षात् काम-देवी को प्राप्त करने जा रहा है। उसे इस बात का रत्ती भर भी इल्म नहीं था कि जिस 'वेदी' को वह अब पूजने जा रहा है, वहाँ की पहली और सबसे प्रगाढ़ आहुति उसका अपना भतीजा, सूरज, पहले ही दे चुका है।

सोनी ने अपनी आँखें मूंद लीं। उसे एक तरफ विकास का वह मुग्ध चेहरा दिख रहा था और दूसरी तरफ उसे अपने भीतर अब भी सूरज के उस 'बीज' की गर्माहट महसूस हो रही थी। उसने विकास का सिर अपनी ओर खींचते हुए धीरे से कहा:

सोनी: "अब बस देखिए मत... इस अनुष्ठान को पूरा कीजिए। दीदी की मन्नत और मेरा यह श्रृंगार, दोनों ही आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं।"

विकास ने अब और सब्र नहीं किया। वह उस 'सजी हुई मुनिया' की सुंदरता में ऐसा खोया कि उसे ऊपर के निशानों की सुध ही नहीं रही। वह बस उस 'कमल' के रस को चखने और अपनी प्यास बुझाने के लिए बावला हो उठा। बनारस की उस रात का यह दूसरा और सबसे जटिल प्रहार अब शुरू होने जा रहा था।

विकास अब पूरी तरह से बेकाबू हो चुका था। उसने चादर के भीतर हाथ डालकर सोनी के सुडौल जिस्म को अपनी बांहों में भींच लिया। मौका देखकर सोननी में लाइट को और भी ज्यादा कम कर दिया, पर विकास की भूख इतनी ज्यादा थी कि उसने अंधेरे में ही सोनी के वक्षों को अपने मुँह में भरने के लिए झपट्टा मारा।

जैसे ही विकास के होंठ और दांत सोनी की चूचियों पर टिके, सोनी के मुँह से एक दर्दनाक आह निकल गई।

सोनी: "अह्ह्ह... उह्ह! धीरे... विकास जी, धीरे!"

विकास को लगा कि यह शायद उत्तेजना की आह है, पर हकीकत कुछ और थी। सूरज ने जिस बेतहाशा अंदाज़ में उन वक्षों को चूसा और काटा था, वे हिस्से अब बेहद संवेदनशील और जख्मी थे। विकास का स्पर्श उन ताज़ा निशानों पर नमक की तरह लग रहा था। हर बार जब विकास उन्हें अपने मुँह में दबाता, सोनी को सूरज के उस आदिम जुनून की याद आती, जिसने उसकी देह पर ये निशान छोड़े थे।

विकास अब पूरी लय में आ चुका था। उसने अपनी जांघों के बीच सोनी की नक्काशीदार जांघों को फंसाया और उस 'सजी हुई मुनिया' के भीतर प्रवेश करने के लिए ज़ोर लगाया।

विकास (हाँफते हुए): "सोनी... आज तुम्हारा बदन इतना गरम क्यों है? जैसे आग उगल रहा हो। और यह खुशबू... यह तो पागल कर देने वाली है।"

सोनी बिस्तर की चादर को अपने हाथों में भींचती रही। वह एक अजीब दोराहे पर थी—ऊपर से उसे विकास का प्रहार झेलना था, पर भीतर से उसका रोम-रोम अब भी सूरज के उस 'बीज' और उस बेतहाशा चोदने के अंदाज़ को महसूस कर रहा था। विकास के धक्के उसे वह सुख नहीं दे पा रहे थे जो सूरज ने दिया था, बल्कि वे सूरज के दिए हुए जख्मों को कुरेद रहे थे।

विकास की उत्तेजना अब अपने चरम पर थी। वह सोनी की उस 'सजी हुई देह' के मोहपाश में इस कदर जकड़ा गया था कि उसे वास्तविकता और माया के बीच का अंतर महसूस ही नहीं हो रहा था। सोनी की योजना सफल रही थी—उसने न केवल सूरज के निशानों को चतुराई से विकास के स्पर्श के नीचे छिपा दिया, बल्कि विकास के हर धक्के और हर चुंबन को उन पुराने निशानों पर इस तरह लिया जैसे वह सूरज के उस 'सत्य' पर विकास की 'मर्यादा' का लेप लगा रही हो।

कमरे की मद्धम पीली रोशनी में विकास का चेहरा पसीने से चमक रहा था। वह सोनी की सुडौल जांघों को अपने कंधों पर टिकाए, उस 'महोगनी की गांठ' और 'कमल' की कलाकारी के भीतर गहराई तक उतरने का प्रयास कर रहा था। सोनी ने अपनी आँखें कसकर बंद कर ली थीं। उसे महसूस हो रहा था कि विकास का पुरुषार्थ अब अपने अंतिम वेग की ओर बढ़ रहा है।

सोनी (कांपती आवाज़ में): "विकास जी... सब कुछ अर्पित कर दीजिए... आज की रात खाली नहीं जानी चाहिए... दीदी की मन्नत... मेरी कोख... सब आपकी राह देख रहे हैं!"

सोनी के इन शब्दों ने विकास के भीतर जैसे एक विस्फोट कर दिया। उसने सोनी की कमर को अपनी उंगलियों से इतनी ज़ोर से जकड़ा कि उसके नाखून उन नीले निशानों पर फिर से गड़ गए जो सूरज ने छोड़े थे। लेकिन इस बार सोनी चिल्लाई नहीं, बल्कि उसने उस दर्द को अपनी कोख की प्यास में बदल लिया। विकास ने एक आखिरी, गहरा और शक्तिशाली धक्का लगाया और सोनी के बदन को अपनी पूरी ताकत से भींच लिया।

विकास के कंठ से एक भारी हुंकार निकली। उसे महसूस हुआ कि उसके अस्तित्व का सारा सार, उसकी सारी ऊर्जा और वह 'बीज' एक तीव्र प्रवाह के साथ सोनी की उस 'उर्वर भूमि' में विसर्जित हो रहा है। वह 'संतान सप्तमी' की पहली आधिकारिक आहुति थी जो दुनिया की नज़रों में जायज़ थी।

सोनी को अपने भीतर वह गरमाहट महसूस हुई। विकास का 'अर्पण' अब उस जगह पहुँच रहा था जहाँ कुछ घंटों पहले सूरज ने अपनी छाप छोड़ी थी। दो अलग-अलग पुरुषों का अंश अब उसकी कोख की देहली पर एक-दूसरे से टकरा रहा था। सोनी ने महसूस किया कि विकास अब निढाल होकर उसके ऊपर गिर गया है, उसकी भारी साँसें उसकी गर्दन पर गरम हवा की तरह टकरा रही थीं।

विकास (हाँफते हुए और तृप्ति के स्वर में): "सोनी... आज तुमने मुझे वह दिया है जो सालों में नहीं मिला। सुगना जी सच कहती थीं... बनारस की यह रात खाली नहीं जाएगी। मुझे महसूस हो रहा है... कि आज हमने कुछ महान सिद्ध कर लिया है।"

सोनी ने धीरे से विकास के बालों में अपनी उंगलियां फंसाईं। उसने विकास को अपने सीने से लगा लिया, पर उसकी नज़रें कमरे की उस मद्धम रोशनी में कहीं दूर टिकी थीं। उसे पता था कि विकास जिसे अपनी 'जीत' समझ रहा है, वह दरअसल उस बड़े 'अनुष्ठान' का हिस्सा है जिसका सूत्रधार सूरज है।

विकास के स्खलन के साथ ही 'संतान सप्तमी' का वह पहला दिन संपन्न हुआ। सुगना की पटकथा के अनुसार, बीज बो दिया गया था। विकास अब गहरी और संतुष्ट नींद की आगोश में जा रहा था, उसे इस बात का ज़रा भी अंदाज़ नहीं था कि वह जिस 'खेत' की रखवाली का दंभ भर रहा है, उसकी मिट्टी को पहले ही एक युवा और जोशीले 'किसान' ने अपनी मेहनत से सींच दिया है।

सोनी अब भी जाग रही थी। उसने महसूस किया कि उसके भीतर अब दो सत्यों का वास है। एक वह, जो समाज देखेगा—विकास की संतान। और दूसरा वह, जिसे उसकी आत्मा और देह पूजेगी—सूरज का जुनून। उसे याद आया कि अभी तो छह दिन और बाकी हैं... छह दिन जहाँ उसे इसी तरह दिन में 'सती' और रात में 'अभिसारिका' का किरदार निभाना होगा।

उसने करवट बदली और अंधेरे में खिड़की की ओर देखा, जहाँ से बनारस की रात उसे चुपचाप देख रही थी। उसे पता था कि कल की सुबह जब सूरज (भतीजा) उसके सामने आएगा, तो उसकी आँखों में वही सवाल होगा: "क्या तुम तैयार हो, अगली आहुति के लिए?"

सोनी ने मन ही मन खुद को और मज़बूत किया। 'संतान सप्तमी' का खेल अब महज़ एक व्रत नहीं, बल्कि वासना, समर्पण और धोखे का एक ऐसा संगम बन चुका था जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं था।

पर सुगना के परिवार में खुशियां आने वाली थी..

शेष अगले भाग में

 
भाग 189

उसने करवट बदली और अंधेरे में खिड़की की ओर देखा, जहाँ से बनारस की रात उसे चुपचाप देख रही थी। उसे पता था कि कल की सुबह जब सूरज (भतीजा) उसके सामने आएगा, तो उसकी आँखों में वही सवाल होगा: "क्या तुम तैयार हो, अगली आहुति के लिए?"



सोनी ने मन ही मन खुद को और मज़बूत किया। 'संतान सप्तमी' का खेल अब महज़ एक व्रत नहीं, बल्कि वासना, समर्पण और धोखे का एक ऐसा संगम बन चुका था जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं था।



पर सुगना के परिवार में खुशियां आने वाली थी..



अब आगे…

विकास, जो अपनी पत्नी की जवानी को भोगने के बाद अब गहरी और सुकून भरी नींद में डूबा था, सुबह की पहली किरण के साथ जाग गया।

सूरज की मद्धम रोशनी खिड़की के पर्दों को चीरती हुई कमरे में आ रही थी। विकास ने करवट ली और सामने नग्न सोनी को महसूस कर उसके चेहरे पर एक विजयी मुस्कान आ गई। उसके सामने सोनी निढाल होकर सो रही थी। थकान और रात के भारी अनुष्ठान के कारण वह अभी भी गहरी नींद में थी।

विकास ने धीरे से सफेद चादर को हटाया। सोनी का पूरा बदन उसके सामने बिल्कुल नग्न और बेपर्दा था। विकास की नज़रें सबसे पहले उसकी जांघों पर पड़ीं, जहाँ वह 'महोगनी की गांठ' और सुगना द्वारा बनाई गई कलाकारी अब थोड़ी धुंधली पड़ चुकी थी, पर कल रात के घर्षण के कारण वहाँ एक अजीब सी सुर्खी छाई हुई थी।

पर जैसे ही विकास की नज़र ऊपर की ओर बढ़ी, उसके माथे पर हल्की सी शिकन आ गई।

सोनी के गोरे वक्षों और उसकी सुडौल कमर पर वे नीले और लाल निशान अब दिन की रोशनी में साफ़ झलक रहे थे। विकास को लगा कि शायद कल रात वह खुद ही इतना बेकाबू हो गया था कि उसने अपनी पत्नी के बदन को इस कदर नोच डाला। उसे याद आ रहा था कि कल रात सोनी बार-बार दर्द से कराह रही थी, पर उसने उसे उसकी उत्तेजना समझा था।

"क्या कल रात मैं वाकई इतना हिंसक हो गया था? ये चूचियों पर दांतों के गहरे निशान... और कमर पर उंगलियों के ये नील... शायद इस 'संतान सप्तमी' के जुनून ने मुझे उग्र बना दिया था।"

वह मंत्रमुग्ध होकर अपनी पत्नी के उस बदन को निहारता रहा जिस पर सूरज के दिए निशान थे, पर विकास को अपने होने का गुमान था। उसे कहाँ पता था कि इन निशानों का असली रचयिता कोई और है।

सोनी के चेहरे पर अभी भी रात की उस कश्मकश की थकान थी। उसके मुनिया के होंठ थोड़े सूजे हुए थे और उसकी साँसें अब भी भारी थीं। विकास ने धीरे से अपना हाथ सोनी की कमर पर रखा, ठीक उसी जगह जहाँ सूरज ने उसे कसकर जकड़ा था। स्पर्श पाते ही सोनी नींद में ही सिहरी, जैसे उसका बदन अभी भी उस 'पुराने' स्पर्श को पहचान रहा हो।

विकास उसे जगाना नहीं चाहता था। वह बस वहीं लेटे-लेटे उस 'पवित्र' और 'अपवित्र' के मिलन की गवाह उस सुंदर काया को देखता रहा, यह सोचकर कि आज से उसके वंश का नया अध्याय शुरू हो चुका है। उसे इस बात का इल्म तक नहीं था कि जिस कोख के फलने का वह इंतज़ार कर रहा है, उसे सींचने वाला असली 'माली' सुगना पुत्र सूरज है।

विकास सोनी की मादक काया को बेहद प्यार से आलिंगन में लिए एक बार फिर सो गया।

सुबह की मद्धम रोशनी जब कमरे में फैली, तो सोनी की आँखें भारीपन के साथ खुलीं। उसके पूरे बदन में एक ऐसी थकावट थी जो उसने पहले कभी महसूस नहीं की थी—जैसे उसकी हड्डियों के जोड़-जोड़ ढीले पड़ गए हों। उसने करवट ली तो जांघों के बीच की वह 'महोगनी की गांठ' और कमर की नसों में एक मीठा सा खिंचाव महसूस हुआ।

विकास अभी भी गहरी नींद में था। सोनी धीरे से उठी और लड़खड़ाते कदमों से बाथरूम की ओर बढ़ी। जैसे ही उसने बाथरूम का दरवाज़ा बंद किया और आईने के सामने खड़ी हुई, वह खुद को निहारकर ठिठक गई।

उसने देखा कि उसके गोरे जिस्म पर कल की रात की पूरी दास्तां लिखी हुई थी। उसके वक्षों पर सूरज के दांतों के वे गहरे लाल निशान अब हल्के नीले पड़ रहे थे, और कमर पर उंगलियों के वे छाप किसी युद्ध के पदचिह्नों की तरह उभर आए थे। उसने पानी का नल खोला और ठंडे पानी की बौछारें अपने चेहरे पर डालीं, पर उसका मन कल रात की उन यादों की तपिश में जल रहा था।

बाथरूम की दीवारों के बीच अकेले खड़े होकर उसने अपनी आँखें मूंद लीं और कल रात के उस 'वर्जित अनुष्ठान' को याद करने लगी। उसे याद आया कि कैसे सूरज ने उसे पहली बार उस आलीशान सुइट में छुआ था। वह सूरज का बेतहाशा चोदना, उसकी 'मुनिया' को अपने पौरुष से चीरना, और उसके वक्षों को पूरी प्यास के साथ पीना... वह सब उसकी रूह में बस गया था।

फिर उसे विकास के साथ गुजरी रात के वे घंटे याद आए। विकास की वही पुरानी, जानी-पहचानी छुअन अब उसे फीकी लग रही थी। विकास का वह प्यार, सूरज के उस आदिम जुनून के सामने उसे बेजान सा महसूस हो रहा था। उसे याद आया कि कैसे विकास ने उसके उन्हीं निशानों पर अपना मुंह रखा था, यह सोचकर कि वे उसी के दिए हुए हैं, जबकि सोनी उस दर्द में भी सूरज का नाम जप रही थी।

सोनी ने अपनी हथेलियों से अपने वक्षों को ढका और एक ठंडी आह भरी। उसे खुद पर हैरत हो रही थी कि वह एक ही रात में दो मर्दों की आगोश में रही, पर उसका रोम-रोम केवल उस एक युवक—सूरज—के लिए तड़प रहा था जिसने उसे पहली बार एक 'स्त्री' होने का असली मतलब समझाया था।

उसने शावर खोला और अपने बदन पर धार छोड़ी। पानी की हर बूंद के साथ वह उन निशानों को सहला रही थी। वह जानती थी कि बाहर निकलते ही उसे फिर से आदर्श पत्नी होने का मुखौटा पहनना है, पर इस बंद बाथरूम में वह केवल उस रात की उन मदहोश यादों की कैदी थी। 'संतान सप्तमी' की वह रात अब उसके जीवन का सबसे गहरा और सबसे मीठा राज़ बन चुकी थी।

डाइनिंग टेबल पर सुबह के नाश्ते का दृश्य देखने में तो साधारण था, लेकिन उसके पीछे छिपे राज़ और जज्बात बनारस की उसी सुबह की तरह भारी थे। मेज के चारों ओर चार लोग बैठे थे, पर उनके मन अलग-अलग दिशाओं में दौड़ रहे थे।

सुगना मेज की मुखिया बनी परोस रही थी। उसकी नज़रों में एक अजीब सी तृप्ति थी। वह बार-बार विकास और सोनी के चेहरों को देख रही थी, यह सोचकर कि कल की रात उसके वंश के लिए कितनी कल्याणकारी रही होगी।

विकास बहुत ही खुश और ऊर्जावान लग रहा था। वह मजे से कचौड़ी और जलेबी का आनंद ले रहा था। उसने बीच-बीच में सोनी की तरफ देखा और एक शरारती मुस्कान दी, जैसे वह कल रात के उस 'घमासान' को याद कर रहा हो, जिसका श्रेय वह खुद को दे रहा था।

सूरज बिल्कुल शांत था। वह अपनी चाय का घूंट भर रहा था और उसकी निगाहें अपनी थाली पर टिकी थीं। लेकिन बीच-बीच में जब वह अपनी पलकें उठाता, तो उसकी नज़रों का एक सिरा सोनी से जा टकराता। वह चुपचाप देख रहा था कि कैसे विकास उस अधिकार के साथ सोनी से बात कर रहा था, जिसे सूरज ने कल रात अपनी बांहों में तोड़-मरोड़ दिया था। सूरज के चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी, बस एक पुरुषोचित अहंकार था कि वह सोनी के बदन के एक-एक इंच का असली मालिक बन चुका है।

सोनी की हालत सबसे ज्यादा नाजुक थी। वह अपनी साड़ी के पल्ले को बार-बार गर्दन तक खींच रही थी, ताकि दिन की तेज़ रोशनी में कोई निशान न दिख जाए। उसके बदन की थकावट उसके चेहरे की रंगत से साफ़ झलक रही थी। जब विकास ने उसका हाथ थामने की कोशिश की, तो वह सिहर उठी। उसे लग रहा था कि एक तरफ वह मर्द बैठा है जो उसका 'पति' है, और दूसरी तरफ वह जो उसके 'गर्भ' का असली विधाता बन चुका है।

मेज पर सन्नाटा तो था, पर बर्तन टकराने की आवाज़ के बीच उन तीन लोगों के दिलों की धड़कनें साफ़ सुनी जा सकती थीं।

सुगना (हँसते हुए): "सोनी, तू तो आज कुछ बोल ही नहीं रही? और विकास, आपको बनारस का नाश्ता कैसा लगा?"

विकास: "दीदी, आज तो हर चीज़ में एक अलग ही स्वाद है। क्यों सोनी, है ना?"

सोनी ने बस धीमे से सिर हिला दिया और एक पल के लिए उसकी आँखें सूरज से मिलीं। उस एक पल के 'आई-कॉन्टैक्ट' ने मेज पर मौजूद उस अदृश्य तनाव को और गहरा कर दिया। सूरज की उन आँखों में कल रात की पूरी दास्तां तैर रही थी, जिसे सोनी चाहकर भी अपनी यादों से नहीं मिटा पा रही थी। नाश्ते की उस टेबल पर 'संतान सप्तमी' का वह गुप्त यज्ञ अब एक नई और खतरनाक करवट लेने की तैयारी में था।

नाश्ते के बाद जब विकास और सूरज बाहर बरामदे में चले गए, सुगना सोनी को हाथ पकड़कर प्यार से खींचते हुए बेडरूम में ले गई और दरवाजा अंदर से बंद कर लिया। सोनी का दिल धड़क रहा था, वह बार-बार अपनी साड़ी के पल्ले से अपनी गर्दन को ढंकने की कोशिश कर रही थी, लेकिन सुगना की पारखी नजरों से कुछ भी छिपाना मुमकिन नहीं था।

सुगना ने बिना कुछ कहे सोनी के करीब आकर बड़े प्यार से उसकी साड़ी का पल्ला गर्दन से हटाया। जैसे ही सूरज के दिए हुए वे गहरे लाल और कमर के नीले निशान उजागर हुए, सुगना की आँखें खुशी से चमक उठीं।

सुगना (हैरानी और खुशी के साथ): "अरे वाह! विकास ने तो कमाल कर दिया। मैंने तो सोचा था कि वह शहर की चकाचौंध में थोड़ा सुस्त पड़ गया होगा, पर ये निशान तो कुछ और ही कहानी कह रहे हैं।"

सोनी शर्म से पानी-पानी हो रही थी। सुगना की जिज्ञासा यहीं नहीं रुकी। उसने दबी ज़ुबान में सोनी से उसके वक्षों के बारे में पूछा। सोनी ने कांपते हाथों से अपने ब्लाउज की डोरी ढीली की और अपने वक्षों को बाहर निकाला। जब सुगना ने उन पर सूरज के दांतों के गहरे निशान देखे, तो वह प्रसन्नता से भर गई। उसे लगा कि विकास ने पूरी रात अपनी मर्दानगी की छाप सोनी के बदन पर छोड़ी है।

सुगना (सोनी को आलिंगन में भरते हुए): "बस यही... वह आग है जिसकी ज़रूरत इस 'संतान सप्तमी' के यज्ञ को थी। सोनी, तू सौभाग्यशाली है कि तुझे ऐसा मर्द मिला जिसने तुझे इस कदर झकझोर दिया।"

सुगना ने सोनी को अपने सीने से लगा लिया और उसकी पीठ सहलाते हुए उसके कान में फुसफुसाकर बोली:

सुगना: "मेरी बात गांठ बांध ले सोनी... अगले 7 दिनों तक तुझे हर बार, बार-बार इसी उत्तेजना के साथ संभोग करना है। अपने बदन को तैयार रख। जिसने इस यज्ञ को कल रात शुरू किया है, उसकी पूर्ण आहुति भी उसी के साथ होनी चाहिए। ईश्वर तेरी मनोकामना ज़रूर पूरी करेंगे।"

सोनी चुपचाप सुगना के आलिंगन में सिमटी रही। उसे पता था कि सुगना जिसे 'विकास' की मर्दानगी समझकर आशीर्वाद दे रही थी, वह दरअसल सुगना के अपने पुत्र सूरज का जुनून था। सुगना का निर्देश मानने से सोनी को इस बात की दोहरी खुशी थी कि वह सूरज की बांहों में भी रहेगी और सुगना की नज़रों में 'सती' भी बनी रहेगी।

सुगना को सोनी का यह हाल देखकर अपनी सुहागरात की याद आ गई, जब सरयू सिंह ने उसे पहली बार बेतहाशा अंदाज़ में चोदा था। उसे याद आया कि कैसे सरयू सिंह ने भी उसके बदन पर ऐसे ही निशान छोड़े थे।

पिता और पुत्र ने पदमा की दोनों बेटियों को तृप्त कर दिया था।

सुगना ने बड़े लाड़ से सोनी की ठुड्डी पकड़कर उसका चेहरा ऊपर उठाया और उसके माथे को चूमते हुए गर्व से बोली:

सुगना: "पगली, शर्मा मत! देख तेरे बदन पर कहाँ-कहाँ ये निशान आए हैं... यही तो एक सुहागन का असली गहना है। बस यही उत्तेजना और ऐसी ही मर्दानगी चाहिए इस अनुष्ठान को पूर्ण करने के लिए। तू बस उसे अपने भीतर समाती जा, कोख अपने आप फल जाएगी।"

सोनी बस मुस्कुरा दी। उसे अहसास था कि वह अब एक ऐसे गुप्त और पवित्र खेल का हिस्सा बन चुकी है, जहाँ मर्यादा की दीवारें केवल दुनिया के लिए थीं, जबकि भीतर केवल 'सूरज' की तपन और 'सुगना' का आशीर्वाद था। सुगना की उन बातों ने सोनी के भीतर सूरज के प्रति प्यास को और बढ़ा दिया था। वह मन ही मन मुस्कुरा रही थी कि कैसे उसने एक बहुत बड़े तूफान को टाल दिया। उसने सूरज का नाम तक नहीं आने दिया, पर वह जानती थी कि सुगना जिस 'सिंचन' की बात कर रही है, उसका असली आनंद वह सूरज की आगोश में ही लेगी, जबकि दुनिया की नज़रों में विकास ही उसका विधाता बना रहेगा।

उधर सुगना एक ऐसे उल्लास में थी, जो पूरी तरह से पवित्रता और कुल की मर्यादा पर आधारित था। वह इस बात से बिल्कुल बेखबर थी कि जिस 'संतान सप्तमी' के अनुष्ठान को वह अपनी देखरेख में आगे बढ़ा रही है, उसकी नींव में मर्यादा की ईंटें पहले ही दरक चुकी हैं। सुगना की आँखों में सोनी के लिए जो प्रेम था, वह एक बड़ी बहन का था जो अपनी छोटी बहन की सूनी गोद भरना चाहती थी, पर उसे इस बात का रत्ती भर भी इल्म नहीं था कि उसका अपना पुत्र सूरज और उसकी सगी बहन सोनी एक-दूसरे के जिस्मानी राज़दार बन चुके हैं।

सुगना का व्यक्तित्व आज भी किसी मदमस्त यौवन की याद दिलाता था। साड़ी के बंद घेरों में उसकी भारी और सुडौल काया एक ऐसी गरिमा समेटे हुए थी, जो किसी को भी प्रभावित कर दे। उसकी चाल में एक अजब सा लोच था, और जब वह मुस्कुराती तो उसके गालों पर पड़ने वाले भँवर आज भी किसी को अपनी ओर खींचने की शक्ति रखते थे। वर्षों पहले सरयू सिंह और सोनू के साथ जो कुछ भी उसके जीवन में घटित हुआ था, उसने उसे भीतर से और भी अधिक 'स्त्रीत्व' से भर दिया था। वह जानती थी कि पुरुष की भूख और स्त्री का समर्पण क्या होता है, पर उसने अपनी इस चपलता को मर्यादा के गहरे आवरण में छिपा रखा था।

सुगना स्वयं में एक ऐसी पहेली थी जो बाहर से ठंडी और शांत दिखती थी, पर जिसके भीतर अनुभवों का एक गर्म लावा बहता था। सरयू सिंह के स्वप्न वाले आशीर्वाद ने उसे अपनी पुरानी यादों के बोझ से मुक्त कर दिया था, जिससे उसकी देह और मन में एक नई ताजगी आ गई थी। वह आज भी उतनी ही कामुक और आमंत्रित करने वाली थी, पर उसकी यह मादकता अब किसी प्रेमी के लिए नहीं, बल्कि अपने परिवार के वंश की रक्षा के लिए 'मार्गदर्शक' के रूप में उभर रही थी।

उसकी सुडौल कमर पर साड़ी का वह खिंचाव और उसकी आँखों का वह गहरा काजल... सब कुछ एक अधिकारपूर्ण स्त्री की कहानी कह रहे थे। वह सोनी को यह सीख दे रही थी कि इन सात दिनों में जिसने इस अनुष्ठान को शुरू किया था वो उसे पूरी तरह से आत्मसात कर ले, यह नहीं जानती थी कि वह अनजाने में अपनी बहन को अपने ही बेटे की आगोश में बार-बार भेजने का आशीर्वाद दे रही है।

सुगना की यह अनभिज्ञता ही इस कहानी का सबसे रोमांचक मोड़ था। वह अपनी बहन को सतीत्व और संतान प्राप्ति का पाठ पढ़ा रही थी, जबकि सोनी उस पाठ को 'सूरज' की तपन के साथ व्यावहारिक रूप दे रही थी। सुगना का यह विश्वास कि "विकास ने सोनी को तृप्त किया है", सोनी के लिए एक ढाल बन गया था, जिसके पीछे वह अपनी और सूरज की उस वर्जित दुनिया को सुरक्षित रख सकती थी।

दोपहर की उस मखमली धूप में, जब घर के बाकी हिस्से सन्नाटे में डूबे थे, सुगना ने एक गहरा निश्वास छोड़ा और विकास तथा सोनी को अपने और करीब आने का इशारा किया। उसके चेहरे पर एक बड़ी बहन की ममता और उस विशेष अनुष्ठान की गंभीरता का मिला-जुला भाव था।

सुगना ने धीरे से विकास का दाहिना हाथ अपने हाथों में लिया। विकास को अपनी हथेली पर सुगना के स्पर्श की एक ऐसी गर्माहट महसूस हुई जो उसने पहले कभी अनुभव नहीं की थी। सुगना की उंगलियों की कोमलता और उस छुअन में एक अजीब सा आकर्षण था, जिसने एक पल के लिए विकास के भीतर एक सिहरन पैदा कर दी। वह उस स्पर्श के सम्मोहन में जैसे बंध सा गया।

सुगना ने विकास का वह हाथ बड़ी आत्मीयता से सोनी के हाथ में रखा और दोनों की हथेलियों को आपस में भींचते हुए बोली:

सुगना: "विकास जी, आज से आप दोनों का हर पल, हर सांस इस अनुष्ठान के प्रति समर्पित होनी चाहिए। यह सात दिन आपके जीवन की सबसे बड़ी तपस्या हैं। मैं चाहती हूँ कि आप दोनों एक-दूसरे में इस कदर खो जाएं कि बीच में कोई तीसरा विचार भी न आए।"

सुगना ने आगे सुझाव देते हुए कहा, "मेरा मन है कि आप दोनों इन कुछ दिनों के लिए कहीं बाहर घूमने चले जाएं। आप दोनों का मन और देह एक-दूसरे के और करीब आएंगे। घर की जिम्मेदारियों से दूर आप इस 'यज्ञ' को और बेहतर तरीके से पूर्ण कर पाएंगे।"

विकास, जो पहले ही सुगना की बातों और उसके जादुई स्पर्श से मोहित था, तुरंत राजी हो गया। उसने उत्साह से कहा, "दीदी, आपका विचार वाकई बहुत सुंदर है। सोनी के लिए भी थोड़ा बदलाव होगा और हम सुकून से वक्त बिता पाएंगे।"

परन्तु, जैसे ही यात्रा की बात छिड़ी, सोनी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह मन ही मन कांप उठी।

सोनी की उलझन (स्वगत): "नहीं... यह नहीं हो सकता! अगर मैं विकास जी के साथ बाहर चली गई, तो सूरज का क्या होगा? इस अनुष्ठान की पहली आहुति तो सूरज ने दी है। मेरी देह और कोख तो अब सूरज की उस तड़प की आदी हो चुकी है। यदि सात दिनों तक वह 'असली पुजारी' मेरे पास नहीं रहा, तो यह व्रत कैसे पूर्ण होगा?"

सोनी ने लड़खड़ाती आवाज़ में बहाने बनाने शुरू किए, "दीदी... अभी बाहर जाना ठीक नहीं होगा। व्रत के नियम हैं, घर का मंदिर है, और फिर मुझे थकावट भी बहुत है। हम यहीं रहकर भी तो सब कर सकते हैं..."

विकास ने उसे टोकते हुए कहा, "अरे सोनी, थकान तो घूमने से मिट जाएगी। और दीदी खुद कह रही हैं, तो नियमों की चिंता तुम क्यों करती हो?"

सुगना ने भी सोनी की पीठ सहलाते हुए उसे मनाया, "पगली, यह तेरे ही भले के लिए है। जा, विकास जी के साथ थोड़ा समय बिता। तेरे चेहरे पर जो यह संकोच है, वह एकांत में ही खुलेगा।"

सोनी जितना मना करती, विकास और सुगना का आग्रह उतना ही बढ़ता गया। सोनी अंदर ही अंदर घुट रही थी; उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह सूरज के बिना इन सात रातों की कल्पना कैसे करे। वह बस बेबसी से सुगना को देख रही थी, जो अनजाने में ही उसे उस 'शक्ति' से दूर भेज रही थी जिसे सोनी अपना सब कुछ मान चुकी थी।

दोपहर का वह एकांत अब सोनी के लिए एक नई चुनौती लेकर आया था—एक तरफ पति का साथ और दीदी का आदेश, तो दूसरी तरफ उस 'वर्जित प्रेम' की अधूरी प्यास।

दोपहर की उस मादक चर्चा के बीच अभी सस्पेंस बना ही था कि अचानक पीछे से सूरज की भारी और अधिकारपूर्ण आवाज़ गूँजी, "अरे! कहाँ जाने की तैयारी हो रही है? मेरी भी छुट्टियाँ चल रही हैं, अकेले-अकेले मजे करने का प्लान है क्या?"

सुगना ने पलटकर अपने बेटे को देखा और हंसते हुए टोकने की कोशिश की, "अरे तू कहाँ जाएगा? ये लोग एकांत के लिए जा रहे हैं, तू बीच में 'दाल-भात में मूसरचंद' क्यों बनेगा? तेरी मौसी और मौसा जी को कुछ वक्त साथ बिताने दे।"

सूरज के चेहरे पर एक कुटिल और आत्मविश्वास से भरी मुस्कान तैर गई। उसने तिरछी नज़रों से सोनी की ओर देखा, जिसकी धड़कनें उस आवाज़ को सुनते ही तेज़ हो गई थीं। सूरज बोला:

"माँ, मैं मूसरचंद नहीं, बल्कि इस रथ का 'सारथी' बनूँगा। ड्राइवर वैसे भी छुट्टी पर है, मैं खुद गाड़ी चलाकर मौसा जी और मौसी को ट्रिप पर ले जाऊँगा। इसी बहाने मेरी भी घूमना-फिरना हो जाएगा और मौसा जी को रास्ते भर आराम भी मिलेगा।"

जैसे ही सूरज ने 'गाड़ी चलाने' की बात की, सोनी का रोम-रोम झंकृत हो उठा। उसे याद आया कि कल रात सूरज ने उसे किस बेरहमी और जुनून के साथ 'चलाया' था। उसके मन में एक बिजली सी कौंधी—क्या यह विधाता का कोई संकेत है?

विकास तो जैसे खुशी से उछल पड़ा। उसे सूरज का साथ और उसकी ड्राइविंग स्किल पर पूरा भरोसा था। उसने तपाक से कहा:

विकास (उत्साह में): "अरे! यह तो सोने पर सुहागा हो गया। सूरज, तू साथ है तो फिर कोई फिक्र ही नहीं। चल, तैयारी कर ले... हम लोग नैनीताल चलेंगे। पहाड़ों के टेढ़े-मेढ़े रास्तों पर हम दोनों बारी-बारी से ड्राइव करेंगे।"

'बारी-बारी से ड्राइव' करने की बात सुनते ही सोनी के भीतर एक सिहरन दौड़ गई। उसे लगा जैसे विकास अनजाने में कोई दोहरी बात कह रहा हो। उसका दिमाग चकराने लगा—हे भगवान! ये लोग गाड़ी चलाने की बात कर रहे हैं या मेरे जिस्म की? सोनी ने कल्पना की... नैनीताल की सर्द रातें, एक तरफ उसका पति विकास और दूसरी तरफ उसका मदमस्त प्रेमी सूरज। दोनों उसे 'बारी-बारी' से अपने प्रेम की ऊँचाइयों तक ले जाएंगे। विधाता ने जैसे सोनी को गर्भवती करने की ठान ली थी, तभी तो उसने विकास के मुँह से वह बात कहलवाई जिसने सोनी की वासना और डर को चरम पर पहुँचा दिया।

सोनी का कलेजा धक-धक कर रहा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह इस ट्रिप से डरे या खुश हो। आने वाले दिन उसके लिए अग्निपरीक्षा से कम नहीं थे, जहाँ उसे दो मर्दों के बीच पिसना था, और उन दोनों को ही यह अहसास दिलाना था कि वही उसके 'असली सारथी' हैं।

उसने मन ही मन अपने इष्ट से प्रार्थना की, पर उसकी प्रार्थना में भी एक अजीब सी माँग थी—वह सूरज की आगोश से दूर नहीं जाना चाहती थी। संतान सप्तमी का यह अनुष्ठान अब एक ऐसे 'रोड ट्रिप' पर निकलने वाला था जहाँ मर्यादा की हर सीमा टूटने वाली थी।

शेष अगले भाग में

 
भाग 190

सोनी का कलेजा धक-धक कर रहा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह इस ट्रिप से डरे या खुश हो। आने वाले दिन उसके लिए अग्निपरीक्षा से कम नहीं थे, जहाँ उसे दो मर्दों के बीच पिसना था, और उन दोनों को ही यह अहसास दिलाना था कि वही उसके 'असली सारथी' हैं।

उसने मन ही मन अपने इष्ट से प्रार्थना की, पर उसकी प्रार्थना में भी एक अजीब सी माँग थी—वह सूरज की आगोश से दूर नहीं जाना चाहती थी। संतान सप्तमी का यह अनुष्ठान अब एक ऐसे 'रोड ट्रिप' पर निकलने वाला था जहाँ मर्यादा की हर सीमा टूटने वाली थी।

अब आगे..

जब सूरज और विकास अपने अपने कमरे में तैयारी करने चले गए, तब सुगना ने सोनी को अकेला पाकर उसे अपने पास बुलाया। सुगना के मन में अपनी बहन के प्रति अगाध प्रेम था, पर वह इस बात से बिल्कुल अनजान थी कि सोनी और सूरज के बीच मर्यादा की लक्ष्मण रेखा पहले ही टूट चुकी है। उसे तो बस यही लग रहा था कि सोनी संतान सप्तमी के कठिन अनुष्ठान और विकास के साथ अकेले जाने के विचार से घबरा रही है।

सुगना ने सोनी के माथे पर हाथ फेरते हुए उसे सांत्वना दी।

सुगना (ममता भरे स्वर में): "सोनी, तू इतनी चिंतित क्यों लग रही है? मैं देख रही हूँ जब से यात्रा की बात चली है, तू कुछ खोई-खोई सी है। देख, मैं तेरी बड़ी बहन ही नहीं, तेरी सहेली भी हूँ। अगर विकास जी को लेकर कोई संकोच है, तो मुझसे कह सकती है।"

सोनी ने नज़रें झुका लीं। उसके भीतर एक तुफ़ान मचा था। वह सुगना को कैसे बताती कि उसकी घबराहट विकास को लेकर नहीं, बल्कि उस 'त्रिकोण' को लेकर है जो इस यात्रा में बनने वाला था। सुगना तो सूरज को अभी भी वही भोला बच्चा समझ रही थी जिसे उसने पाल-पोसकर बड़ा किया था, उसे भनक तक नहीं थी कि उसका अपना बेटा उसकी छोटी बहन के जिस्म का राज़दार बन चुका है।

सोनी (धीमी आवाज़ में): "नहीं दीदी, ऐसी बात नहीं है। बस... घर छोड़कर पहाड़ों पर जाना, और फिर सूरज भी साथ जा रहा है। मुझे डर है कि कहीं मेरी मर्यादा में कोई कमी न आ जाए।"

सुगना हल्के से मुस्कुराई और सोनी का हाथ थामकर बोली:

सुगना: "अरे पगली, तू सूरज की चिंता क्यों करती है? वह तो घर का बच्चा है। वह साथ रहेगा तो विकास जी को पहाड़ों के उन टेढ़े-मेढ़े रास्तों पर मदद मिलेगी। विकास जी ने ठीक ही कहा, जब वे थक जाएंगे तो सूरज 'ड्राइव' संभाल लेगा। तू बस अपने अनुष्ठान पर ध्यान देना। पहाड़ों की वह ठंडी हवा और एकांत तुझे और विकास जी को एक-दूसरे के और करीब लाएगा।"

सुगना की बातों ने सोनी के दिल में एक अजीब सी टीस पैदा कर दी। सुगना जिसे 'मदद' समझ रही थी, सोनी जानती थी कि वह मदद कितनी 'गहरी' होने वाली थी। उसे याद आया कि कैसे विकास ने कहा था कि वे 'बारी-बारी से ड्राइव' करेंगे। अब सोनी को समझ आ रहा था कि इस यात्रा में वह एक ऐसी 'गाड़ी' बनने वाली है जिसे दो चालक अपनी-अपनी बारी से चलाने वाले थे।

सोनी ने बस इतना ही कहा, "दीदी, आप जैसा कहेंगी वैसा ही होगा।"

पर मन ही मन वह कांप रही थी। सुगना की अज्ञानता सोनी के लिए एक सुरक्षा कवच भी थी और एक बोझ भी। नैनीताल की उन बर्फीली रातों में, एक ही होटल के कमरे या आस-पास के कमरों में, जब विकास अपनी थकावट मिटाने के लिए सोनी का सहारा लेगा और सूरज अपनी 'बारी' का इंतज़ार करेगा, तब सोनी को अपनी देह और आत्मा को दो हिस्सों में बाँटना होगा। विधाता ने जैसे उसके लिए एक ऐसा जाल बुन दिया था जहाँ से निकलना नामुमकिन था, और सुगना अनजाने में ही उसे उस आग की ओर धकेल रही थी।

नैनीताल निकलने से पहले की यह शाम बड़ी मादक और ठहरी हुई सी थी। सूरज और सोनी अंदर सामान समेटने में व्यस्त थे, जबकि सुगना और विकास सोफे पर आमने-सामने बैठे चाय की चुस्कियों का आनंद ले रहे थे। सुगना की साड़ी का पल्ला आज कुछ ढीला था और उसकी आँखों में वह चमक थी जो किसी चंचल साली की होती है, पर बातों में अधिकार एक संचालिका जैसा था।

सुगना (शरारती लहजे में): "क्यों विकास जी, कल तो आप लोग वादियों में खो जाएंगे। पर याद रखिएगा, यह महज़ कोई घूमने-फिरने की सैर नहीं है। यह 'संतान सप्तमी' का वह खेल है जिसकी संचालिका मैं हूँ। जैसा-जैसा मैंने सिखाया है, अगर वैसा ही हुआ, तभी बरकत होगी।"

विकास सुगना के इस नए और बिंदास अंदाज़ को देख दंग था। सुगना की आवाज़ में जो रस था, उसने विकास के भीतर एक अजीब सी हलचल पैदा कर दी थी।

विकास (हंसते हुए): "अरे दीदी, जब कमान आपके हाथ में है तो जीत तो पक्की ही है। आपने जो-जो 'पाठ' पढ़ाए हैं, मैं उनका पूरा पालन करूँगा। पर एक बात बताइए..." विकास ने थोड़ा साहस बटोरते हुए सुगना की आँखों में आँखें डालीं, "यदि आपकी देखरेख में यह मिशन कामयाब रहा और हमारे आंगन में किलकारी गूंजी... तो इस संचालिका को बदले में क्या गुरु-दक्षिणा देनी होगी? आखिर इतनी मेहनत तो आप भी कर रही हैं।"

सुगना ने चाय की प्याली टेबल पर रखी और अपनी भारी जाँघों को सहलाते हुए विकास की ओर थोड़ा और झुक गई। उसके बदन से उठती चन्दन की खुशबू विकास के दिमाग पर चढ़ने लगी थी।

सुगना (दबी ज़ुबान में): "गुरु-दक्षिणा? उसने अपनी आंखें नचाते हुए और होंठो पर कातिल मुस्कान लाते हुए सोचने लगी।"

विकास जज्बाती हो गया। उसने अपना हाथ बढ़ाकर सुगना की नरम हथेली को अपनी मुट्ठी में ले लिया। वह धीरे-धीरे उसकी हथेली को अपनी उंगलियों से सहलाने लगा। सुगना ने अपना हाथ खींचा नहीं, बल्कि उस स्पर्श का पूरा मजा लेते हुए उसे एक 'संचालिका' की गरिमा के साथ स्वीकार करने लगी।

चलो वक्त आने पर बताऊंगी…पर फिलहाल अपना सारा ध्यान मेरी सोनी को खुश करने में लगाइए…जो उत्साह अपने बीती रात दिखाया है वह कम नहीं होना चाहिए..

सुगना ने यह बात बोलते हुए अपनी पलके झुका ली…हथेलियों पर विकास का स्पर्श अब उसे और गहरा महसूस हो रहा था। सुगना ने यह बात जिसे कामुकता और चंचलता से की थी यही उसकी खासियत थी विकास के मन में एक अद्भुत और अनजानी सी लहर सी दौड़ गई।

विकास (गहरे स्वर में): "आपका आदेश सर आंखों पर आप एक वादा कीजिए कि हमेशा ऐसे ही हंसते मुस्कुराते रहेंगी.. आपका खुशहाल चेहरा ही इस घर की रौनक है।"

सुगना खिलखिलाकर हँस पड़ी। उसकी हँसी में वह पुरानी चंचलता लौट आई थी। उसने विकास की आँखों में अपनी दहकती हुई नज़रें गड़ा दीं।

सुगना: "मुकर मत जाइयेगा विकास बाबू! वक्त आने पर माँगूँगी अपना हक। अभी तो बस आप अपनी पूरी ताकत नैनीताल और सोनी की उस 'सेवा' में लगाइये।"

तभी अचानक कमरे का दरवाज़ा खुला और सोनी हाल में आ गई। विकास हड़बड़ा गया और झटके से सुगना का हाथ छोड़ दिया। उसके चेहरे पर पकड़े जाने की घबराहट साफ थी। सोनी की नज़रें विकास के कांपते हाथों और सुगना की उस विजयी मुस्कान पर थमीं। वह भांप गई कि यहाँ जीजा-साली के बीच कोई गहरा 'गुप्त समझौता' हुआ है।

सोनी जानती थी कि सुगना को अपनी बातों के जाल में फंसाना मुमकिन नहीं, पर विकास की इस हालत ने उसे चुटकी लेने का मौका दे दिया।

सोनी (मुस्कुराते हुए ताली बजाकर): "वाह! यहाँ तो जाने से पहले ही बहुत लंबी-चौड़ी 'ट्रेनिंग' चल रही है! विकास जी, नैनीताल जाने से पहले ही दीदी के इतने करीब? कहीं ऐसा तो नहीं कि आपका इरादा पहाड़ों की ठंड छोड़कर यहीं बनारस की गर्मी में रुकने का है?"

सोनी ने विकास की ओर ताना कसते हुए कहा, "बेचारे विकास जी... दीदी के सामने आते ही इनकी सारी 'मर्दानगी' भीगी बिल्ली बन जाती थी। दीदी, आपने इन्हें कौन सी घुट्टी पिला दी है जो ये आपका हाथ थामने की जुर्रत कर बैठे?"

सुगना ने बड़ी चतुराई से स्थिति को संभाला और तिरछी नज़र से विकास को देखते हुए बोली, "अरे पगली, ये तो बस विदाई का आशीर्वाद ले रहे थे।?"

विकास ने चैन की साँस ली, पर उसके मन में सुगना की वह हँसी और 'गुरु-दक्षिणा' का वह वादा एक गहरे नशे की तरह उतर चुका था। नैनीताल जाने से पहले ही, बनारस के उस सोफे पर रिश्तों का एक नया और मादक अध्याय लिखा जा चुका था।

घर के हर कोने में कल की यात्रा की हलचल थी। सोनी का बदन कल के उस भीषण टकराव के बाद एक अजीब सी सुस्ती और भारीपन में था, पर सूरज की स्थिति इसके बिल्कुल उलट थी। पिछली रात उसे जो सुख प्राप्त हुआ था, उसने उसे शांत करने के बजाय उसकी प्यास को और भी प्रचंड कर दिया था। सूरज के लिए वह मिलन तृप्ति नहीं, बल्कि उस नशे की पहली बूंद जैसा था, जिसने उसके भीतर की आग को और भड़का दिया था।

कल के उस 'मल युद्ध' ने विकास और सोनी को तो एक पल के लिए शांत कर दिया था, लेकिन सूरज का मन रह-रहकर उसी स्पर्श को दोबारा पाने के लिए तड़प रहा था। उसे लग रहा था कि कल जो कुछ हुआ, वह तो बस एक शुरुआत थी, असली प्यास तो अब जागनी शुरू हुई है।

घर में सुगना और बाकी लोगों की मौजूदगी के कारण सन्नाटा मिलना मुश्किल था, पर जैसे ही मौका मिला, सूरज ने दबे पाँव सोनी को एक कोने में घेर लिया।

सूरज (दबी हुई उत्तेजना के साथ): "मौसी, कल रात जो मिला उसने तो मेरी बेचैनी और बढ़ा दी है। मैं तब से बस उसी आग में जल रहा हूँ। मेरा मन और मेरा बदन, दोनों ही आपकी उस नरमी के लिए तड़प रहे हैं।"

सोनी (धीमी आवाज़ में): "सूरज, थोड़ा धैर्य रखो। घर की स्थिति देखो, सब यहाँ हैं। मैं तुम्हारी तड़प समझ रही हूँ, बस कुछ देर और... जैसे ही मौका मिलेगा, मैं तुम्हारी इस प्यास को बुझाने की पूरी कोशिश करूँगी।"

सूरज ने सोनी की आँखों में झलकता वह समर्पण देखा और खुद को थोड़ा संभाला। उसे सोनी पर अटूट विश्वास था। वह जानता था कि भले ही घर में भीड़ हो, पर सोनी उसे उस 'अतृप्ति' के साथ रात नहीं बिताने देगी। सूरज की आँखों में अब नैनीताल की यात्रा से पहले ही एक नई जंग का आह्वान था, जहाँ उसे अपनी इस बढ़ी हुई प्यास को मंज़िल तक पहुँचाना था।

सोनी जब वापस सुगना के पास गई, तो उसका दिल ज़ोरों से धड़क रहा था। उसे पता था कि सूरज का यह तनाव आज रात किसी न किसी बहाने से फूटने वाला है, और 'संतान सप्तमी' के इस व्रत में उसे अब एक नई और भीषण अग्निपरीक्षा से गुज़रना होगा।

उधर सोनी का कमरा फिर सजाया जा रहा था। मालती सोनी के कमरे की साथ सजावट और उसे सुंदर सेज को लेकर बड़ी आकर्षित थी.. सोनी का बिस्तर और सरहाना सजाते हुए वह बार-बार उस बिस्तर पर खुद को महसूस करती और अपने प्रेमी राजू के साथ रंगरलियां मनाने की कल्पना कर उसका रोम रोम अलंकृत हो जाता जांघों के बीच वह रसीला द्रव्य उसे अपनी जींस के ऊपर से उसे छूने को आकर्षित करता.. मालती तड़प कर रह जाती और अपनी प्यास अपने कमरे में आने के बाद अपनी मुनिया के दाने को रगड़ते हुए बुझाती।

राजू के साथ उस बिस्तर पर संभोग करने की लालसा मालती के मन में प्रगाढ़ होती जा रही थी।

रात का भोजन समाप्त हो चुका था, लेकिन घर के माहौल में जो एक अनकही गर्माहट थी, वह कम होने का नाम नहीं ले रही थी। सोनी अच्छी तरह जानती थी कि 'संतान सप्तमी' के इस पवित्र और गुप्त अनुष्ठान में उसके शरीर की 'मुनिया' पर हर दिन वीर्यपात होना अनिवार्य था। सूरज इस यज्ञ का पहला और सबसे शक्तिशाली पुजारी था, और सोनी ने मन ही मन यह संकल्प ले लिया था कि आज भी वह सूरज के उस प्रचंड अंश को अपने गर्भ में धारण करके ही रहेगी।

भोजन के बाद बर्तन समेटते हुए भी सोनी का ध्यान बार-बार सीढ़ियों की ओर जा रहा था। सुगना और विकास हॉल में बैठकर कल की यात्रा की अंतिम रूपरेखा तैयार कर रहे थे, और सूरज अपने कमरे में जाने का बहाना बनाकर ऊपर जा चुका था।

सोनी के भीतर एक अजब सी हलचल थी। उसे वह पुराना नियम याद था कि जिस दिन सिंचन नहीं होता, उस दिन अनुष्ठान खंडित माना जाता है। वह सूरज के उस तने हुए अंग की पीड़ा को महसूस कर सकती थी, जो कल रात से ही उसके होठों के स्पर्श के लिए तरस रहा था।

सोनी (स्वगत): "चाहे जो हो जाए, आज रात सूरज का वह तेज व्यर्थ नहीं जाने दूँगी। विधाता ने उसे मेरे लिए ही तो बनाया है।"

जैसे ही घर में सोने की तैयारी होने लगी, सुगना ने विकास से कहा, "विकास जी, आप सोने चलिए, कल सुबह जल्दी निकलना है। सोनी, तू रसोई का काम खत्म करके दूध का गिलास सूरज के कमरे में दे आना "

सोनी के लिए यह आदेश नहीं, बल्कि वह मौका था जिसकी वह प्रार्थना कर रही थी। उसने गरम दूध का गिलास हाथ में लिया, पर उसके हाथ कांप रहे थे। उसे पता था कि जैसे ही वह उस कमरे का दरवाजा बंद करेगी, सूरज का वह संयम, जो उसने दिन भर भीड़ के सामने बनाए रखा था, एक ज्वालामुखी की तरह फटने वाला है।

उसने अपनी साड़ी का पल्ला ठीक किया और भारी कदमों से ऊपर की ओर बढ़ी। उसे पता था कि आज रात की यह 'आहुति' नैनीताल की यात्रा से पहले की सबसे महत्वपूर्ण और गहरी आहुति होने वाली है। सूरज अपने बिस्तर पर उस तड़प के साथ उसका इंतज़ार कर रहा था, जहाँ मर्यादा की सीमाएँ धुंधली पड़ जाती हैं और केवल सृजन की प्यास शेष रह जाती है।

रात के उस सन्नाटे में, सूरज के कमरे का दरवाजा बंद होते ही जैसे वक्त थम गया। सोनी हाथ में दूध का गिलास लिए अभी मुड़ी ही थी कि सूरज ने उसे पीछे से अपनी फौलादी बाहों में भर लिया। सूरज के शरीर की तपन और उसके अंग का वह प्रचंड उभार सोनी की पीठ पर साफ महसूस हो रहा था।

सूरज के हाथ सोनी के नंगे पेट पर थे सोनी ने अपने हाथों से उसे अलग करने की कोशिश की और इसी दौरान उसने सूरज के अंगूठे को सहला दिया सूरज का लंड तनता गया और सोनी के नितंबों के बीच चुभने लगा।

मौसी में आपका ही इंतजार कर रहा था

क्यों किस लिए सोनी ने सूरज को चिढ़ाते हुए पूछा

अरे भूल गई आप आज की आहुति नहीं देनी क्या? सूरज ने बेबाक होकर सोनी की चूचियों को मीसते हुए कहा..

सोनी सूरज को तरसा रही थी उसने अपनी गर्दन घुमाई और सूरज के होंठों को चूमते हुए बोला..

कौन सी आहुति?

सूरज को कुछ कहने की ज़रूरत नहीं थी। उसकी सांसें और उसके हाथों की पकड़ सब बयां कर रही थी। उसने बिना वक्त गंवाए सोनी को अपने आलिंगन में और जोर से कस लिया। सोनी की साड़ी का पल्ला कंधे से सरक चुका था। सूरज ने अपने दोनों हाथ सोनी के वक्षों पर मजबूती से जमा दिए और उसे धीरे-धीरे आगे की ओर झुकने पर मजबूर किया।

सोनी समझ चुकी थी कि आज 'सारथी' अपनी पूरी लय में है। उसने कोई प्रतिरोध नहीं किया, बल्कि खुद को उस समर्पण के लिए तैयार कर लिया जिसके लिए वह यहाँ आई थी। जैसे ही सूरज ने पीछे से उस पर अधिकार जमाया, सोनी के मुँह से एक दबी हुई आह निकली। 'संतान सप्तमी' का वह पुजारी आज अपने पूरे वेग के साथ अपनी मुनिया पर आहुति देने को तैयार था। कमरे में केवल उन दोनों की भारी होती सांसों और धड़कनों का शोर था, जो नैनीताल की यात्रा से पहले इस गुप्त यज्ञ को पूर्ण कर रहे थे।

कमरे के उस मद्धम सन्नाटे में सूरज और सोनी के बीच की मर्यादाएं किसी मोम की तरह पिघल चुकी थीं। सूरज ने जैसे ही सोनी को बिस्तर पर 'डॉगी स्टाइल' में किया, सोनी की साँसें तेज़ हो गईं। वह जानती थी कि सुगना और विकास नीचे इंतज़ार कर रहे होंगे, इसलिए समय की बर्बादी उसे गँवारा नहीं थी।

सूरज उत्तेजना में सोनी की साड़ी उतारने की कोशिश करने लगा, पर सोनी ने उसे रोक दिया।

सोनी (फुसफुसाते हुए): "सूरज, इतना समय नहीं है। बस जल्दी कर ले... कोई ऊपर आ सकता है।"

सोनी ने खुद ही अपनी साड़ी और पेटीकोट को ऊपर सरकाकर अपने गोरे नितंबों तक समेट लिया। जैसे ही उसकी 'मुनिया' सूरज के सामने उजागर हुई, कमरे का तापमान और बढ़ गया। सूरज ने बिना एक पल की देरी किए, पूरे वेग के साथ सोनी की गहराइयों में प्रवेश कर दिया। समय की अहमियत सोनी भी समझ रही थी और सूरज भी। कमरे में देह से देह के टकराने की 'थप-थप' की आवाज़ें गूँजने लगीं।

सोनी ने उत्तेजना में भर कर सूरज को टोका, "सूरज... धीरे... इतनी ज़ोर से मत कर, आवाज़ बाहर जाएगी।" उसकी यह हिदायत सूरज की रफ्तार को कम करने के बजाय उसे और भी उग्र कर गई।

कुछ ही पलों के उस प्रचंड संघर्ष के बाद, सूरज के पौरुष का बांध टूट गया। उसने एक अंतिम और गहरा प्रहार किया और अपने पूरे अस्तित्व का सार सोनी के गर्भ में उड़ेल दिया। सोनी ने उस गर्माहट को महसूस किया और संतोष की एक गहरी सांस ली।

संभोग के बाद, सोनी ने सूरज के वीर्य से सने उस अंग को अपने हाथों में लिया और बड़ी कोमलता से उसे चूमकर उसका तनाव शांत किया। सूरज ने उसे भावुक होकर गले लगा लिया और उसके होठों को अपने होठों में भरकर उस सुख को पूरी तरह आत्मसात कर लिया।

आलिंगन के बीच ही सोनी ने सूरज की आँखों में आँखें डालकर वह बात कह दी जिसने सूरज के होश उड़ा दिए।

सोनी: "सूरज, नैनीताल ट्रिप में अपनी सारी मुरादें पूरी कर लेना। अगले सात दिन कोई रोक-टोक नहीं है, बस वक्त और मौके का इंतज़ार करना।"

सूरज हक्का-बक्का रह गया। उसे अपनी कानों पर यकीन नहीं हो रहा था।

सूरज: "मौसी... क्या सचमुच? जब चाहे तब?" सोनी (मुस्कुराते हुए): "हाँ, जब चाहे तब, जितना चाहे उतना, और जैसे चाहे वैसे।"

सूरज ने जोश में आकर सोनी को फिर से अपनी बाहों में भरने की कोशिश की, पर सोनी ने उसके मजबूत सीने पर हाथ रखकर उसे बिस्तर पर पीछे धकेल दिया।

सोनी: "बस, अब बहुत हुआ। अब यह दूध पी और सो जा। कल की तैयारी कर और अपने बदन में ताकत बचाकर रख... अभी उस ताकत की बहुत ज़रूरत पड़ने वाली है।"

सोनी ने अपनी साड़ी ठीक की और एक विजयी मुस्कान के साथ कमरे से बाहर निकल गई, पीछे सूरज को एक नई उम्मीद और असीमित उत्तेजना के साथ छोड़ते हुए। नैनीताल की राह अब केवल पहाड़ों की चढ़ाई नहीं, बल्कि वासना के उन शिखरों की यात्रा होने वाली थी जहाँ हर दिन एक नया इतिहास लिखा जाना था।

बनारस की सुबह की ताजी हवाओं में नैनीताल की यात्रा का उत्साह घुला हुआ था। सुगना ने विदाई की रस्म को बड़ी आत्मीयता से निभाया। उसने सूरज को अपने सीने से लगाया, तो उसकी आँखों में ममता की एक चमक थी। उसने अपने बेटे के कान में जो हिदायतें दीं, उनमें एक माँ का स्नेह था, पर वह इस बात से बेखबर थी कि उसके 'कलेजे का टुकड़ा' अब सोनी के 'जिस्म का सारथी' बन चुका है।

जब सोनी ने सुगना के चरण छुए, तो सुगना ने उसे गले लगाकर बड़ी गंभीरता से कहा, "सोनी, सूरज तेरे साथ है तो मुझे चिंता नहीं, पर याद रखना कि तू जिस 'काम' के लिए जा रही है, वह सबसे ऊपर है। अनुष्ठान की पवित्रता बनी रहे।" सोनी ने सुगना को जो आश्वासन दिया, वह नियति के साथ किया गया एक गुप्त करार था। सोनी के कदम जब गाड़ी की ओर बढ़े, तो उसके भीतर एक अजीब सी झुनझुनी थी। उसे पता था कि वह सूरज का ख्याल किस तरह रखने वाली है।

विकास ने जब सुगना से आशीर्वाद लिया, तो सुगना ने उसे वही पुरानी नसीहत दोहराई, जो 'संतान सप्तमी' की सफलता के लिए अनिवार्य थी। सुगना जब अपनी बात पूरी करने के लिए शब्दों की तलाश कर रही थी, तब विकास ने उसकी हिचकिचाहट को भांप लिया। सुगना के भीतर जो एक अजीब सी कामुक सजगता जागी थी, विकास उसे स्वीकार कर चुका था।

विकास (शरारत और दृढ़ता के साथ): > "दीदी, आप फिक्र मत कीजिए। मैं आपकी बहन का भी ख्याल रखूँगा और संतान सप्तमी के लिए आपके निर्देश का भी... अपनी बहन की मुनिया को शिकायत का मौका नहीं मिलेगा।"

सुगना ने विकास की पीठ पर एक मीठी चपत लगाई। उस शब्द में एक ऐसी सघन अश्लीलता थी जो इतनी आत्मीयता में लिपटी हुई थी कि वह किसी मंत्र की तरह लग रही थी। विकास मुस्कुराते हुए गाड़ी में जाकर बैठ गया।

सूरज ड्राइविंग सीट पर पूरी तरह से तैयार था। उसके हाथों ने जब स्टेयरिंग थामा, तो उसे उस 'कमान' का अहसास हुआ जो उसे अगले सात दिनों तक संभालनी थी। उसने रियर-व्यू मिरर (शीशे) में सोनी की ओर देखा। सोनी की नज़रें भी सूरज की आँखों में समा गईं। उस एक पल के मौन संवाद में नैनीताल की उन बर्फीली वादियों का पूरा खाका खिंच गया।

सुगना ने हाथ हिलाकर उन्हें विदा किया। जैसे ही गाड़ी ने गति पकड़ी, बनारस के घाट और गलियां पीछे छूटने लगीं। सूरज के पैर एक्सीलेटर पर थे, पर उसका मन उस 'ड्राइव' के बारे में सोच रहा था जो उसे विकास के साथ 'बारी-बारी' से सोनी की देह पर करनी था।

सड़क पर भागती वह गाड़ी अब केवल लोहे का एक ढांचा नहीं थी, बल्कि वासना, सृजन और मर्यादाओं के टूटने का एक चलता-फिरता मंदिर बन गई थी। नियति मुस्कुरा रही थी, क्योंकि उसे पता था कि इस यात्रा के अंत तक, सोनी की 'मुनिया' और उसका गर्भ एक नया इतिहास लिखने वाले थे। सफर लंबा था, और प्यास... उससे भी कहीं ज़्यादा गहरी।

 
भाग 191

सुगना ने हाथ हिलाकर उन्हें विदा किया। जैसे ही गाड़ी ने गति पकड़ी, बनारस के घाट और गलियां पीछे छूटने लगीं। सूरज के पैर एक्सीलेटर पर थे, पर उसका मन उस 'ड्राइव' के बारे में सोच रहा था जो उसे विकास के साथ 'बारी-बारी' से सोनी की देह पर करनी था।

सड़क पर भागती वह गाड़ी अब केवल लोहे का एक ढांचा नहीं थी, बल्कि वासना, सृजन और मर्यादाओं के टूटने का एक चलता-फिरता मंदिर बन गई थी। नियति मुस्कुरा रही थी, क्योंकि उसे पता था कि इस यात्रा के अंत तक, सोनी की 'मुनिया' और उसका गर्भ एक नया इतिहास लिखने वाले थे। सफर लंबा था, और प्यास... उससे भी कहीं ज़्यादा गहरी।

अब आगे…

विकास की आँखों के सामने खिड़की से बाहर भागते पेड़ और सड़क धुंधली होती जा रही थी, और स्मृतियों का एक पुराना झरोखा खुलता जा रहा था। अगली सीट पर बैठा विकास भले ही सूरज की ड्राइविंग देख रहा था, पर उसका मन सालों पीछे उस दौर में चला गया था जब जीवन इतना जटिल नहीं था।

सुगना के व्यवहार में आए इस अचानक बदलाव ने विकास के भीतर एक हलचल मचा दी थी। पिछले कई वर्षों से उसने सुगना को केवल एक गंभीर, शांत और घर की मर्यादा का पालन करने वाली बड़ी बहन के रूप में देखा था। उनके बीच जीजा-साली वाला वह चुलबुलापन कभी नहीं रहा, जो अक्सर भारतीय परिवारों में देखा जाता है। सुगना हमेशा से एक 'ठहरे हुए पानी' की तरह थी—शांत, गंभीर और अपनी जिम्मेदारियों में सिमटी हुई।

परंतु, पिछले दो दिनों में सुगना ने जिस तरह से 'संतान सप्तमी' के अनुष्ठान को लेकर अपनी बातें रखीं, जिस तरह उसने 'मुनिया' जैसे अंतरंग शब्दों का प्रयोग किया और जिस अधिकार के साथ उसने विकास को सोनी के करीब जाने के लिए उकसाया, उसने विकास की धारणा को पूरी तरह बदल दिया था।

विकास को याद आने लगे वे दिन जब वह अपने जिगरी दोस्त सोनू के साथ उसके घर जाया करता था। सोनू, सुगना का सगा भाई था। उन दिनों सुगना एक खिलखिलाती, चंचल और बेहद खूबसूरत युवती थी। उसकी आँखों में एक ऐसी चमक थी जो किसी को भी ठहरने पर मजबूर कर देती। वह मर्यादित तो थी, पर उसकी हंसी में एक ऐसी खनक थी जो पूरे घर को जीवंत कर देती थी।

सोनी से विवाह के पश्चात भी सुगना विकास से उतना नहीं खुली थी जिससे दोनों के बीच हंसी मजाक हो पता कारण स्पष्ट था उस दौरान सुगना और सोनू के बीच जो चल रहा था सुगना किसी हालत में उसे विकास के समक्ष नहीं लाना चाहती उसे पता था यदि उसने विकास से हंसी मजाक शुरू किया तो यह किसी भी हद तक आगे जा सकता था।

उसे पता था वह अकेली थी, जवान थी और अपने पति के बिना भी अपना जीवन खुशहाली से व्यतीत कर रही थी। ऐसे में हर मर्द उससे सहानुभूति दिखाती और उसके नजदीक आने की कोशिश करता।

और सरयू सिंह जी की मृत्यु के बाद तो सुगना जैसे पत्थर हो गई थी।

आज वही सुगना, जो सालों तक एक 'पत्थर की मूरत' बनकर जी रही थी, अचानक एक कामुक मार्गदर्शक की भूमिका में कैसे आ गई? विकास को लगने लगा कि क्या सुगना के भीतर भी कोई अधूरी प्यास दबी हुई है? क्या वह सोनी के माध्यम से अपनी उन इच्छाओं को दोबारा देख रही है जो शायद समय के साथ कहीं दब गई थीं?

पिछली सीट पर सोनी, रात भर की उत्तेजना और दोहरी चूदाई की थकान के बाद अब शांत थी और सीट पर लेटी ही थी।, वह भी नहीं जानती थी कि उसका पति इस समय अपनी साली की पुरानी यादों के भंवर में फंसा हुआ है। सूरज गाड़ी को पूरी रफ्तार से नैनीताल की ओर ले जा रहा था, पर गाड़ी के भीतर चल रहे विचारों के पहिये उससे भी कहीं तेज़ घूम रहे थे। विकास का मन अब केवल नैनीताल पहुँचने के लिए नहीं, बल्कि सुगना के इस नए और रहस्यमयी व्यक्तित्व को समझने के लिए भी बेचैन था। उसे लग रहा था कि यह यात्रा केवल सोनी के गर्भ को सींचने की नहीं, बल्कि रिश्तों की उन परतों को खोलने की भी है जिन्हें सालों से ढका गया था।

गाड़ी की खिड़की से टकराती हवाओं के बीच विकास का मन अब वर्तमान में नहीं, बल्कि सलेमपुर की उस धुंधली और मादक रात की गलियों में भटक रहा था। यादों का कारवां उसे उस कोठरी तक ले गया, जो कभी शरीर सिंह की विरासत हुआ करती थी।

विकास को वो दिन याद आया, जब वह सलेमपुर पहुँचा ही था जब उसने सुगना को देखा। वह सुगना नहीं थी, वह तो जैसे साक्षात श्रृंगार की कोई देवी थी। किसी विशेष अनुष्ठान के लिए सुगना ने खुद को जिस तरह सजाया था, उसने विकास के भीतर दबी हुई बरसों की प्यास को एक झटके में जगा दिया। गहनों की खनक, रेशमी साड़ी की सरसराहट और उसके माथे पर लगी वह सुर्ख बिंदी... सुगना का वह रूप किसी दहकते हुए शोले जैसा था, जो मर्यादा की चादर ओढ़े हुए भी वासना की आँच दे रहा था।

विकास के मन में एक अजीब सी कशमकश थी। उसे सोनू के सहयोग से सोनी के साथ उसी के घर में, उसी के परिवार की नाक के नीचे संभोग करने की मूक अनुमति तो मिली थी, और उसने उस कोठरी में सोनी के जिस्म को जमकर खंगाला भी था। सोनी के साथ बिताए वे पल अनोखे मिलन के गवाह थे। उसकी आँखों के सामने जो जीवंत सुगना का अक्स था, उसने विकास के विवेक को सुन्न कर दिया था सुगना ने विकास की उत्तेजना पर निश्चित ही अपना अक्स छोड़ा था जिसका असर विकास की हिलती हुई कमर पर दिख रहा था और जिसका लाभ सोनी की मुनिया को मिल रहा था। विकास की यह उत्तेजना अनोखी थी पर उसे अपनी जुबान पर लाना असंभव था।

यह रात वहीं काली रात थी जब लाली के उकसावे पर सोनू ने सुगना के साथ पहली बार संबंध बनाए थे….

( इस रात की दास्तान विस्तार पूर्वक पढ़ने के लिए भाग 101 और 102 पढ़ सकते हैं)

उस समय सुगना के साथ कोई भी प्रत्यक्ष छेड़खानी करना विकास की हिम्मत से बाहर था। सुगना का व्यक्तित्व ऐसा था कि उसके सामने खड़े होते ही श्रद्धा सर झुका लेती थी। पर मन? मन तो किसी सीमा को नहीं पहचानता। विकास ने अपनी कल्पनाओं में उस रात सुगना को वह सब कुछ करते देखा, जो उसका कामुक मन चाहता था। पर सुगना कि इस कामुकता की आगोश में उसका दोस्त सोनू सुगना की जांघों के बीच उस अद्भुत गुफा में डुबकियां लगा रहा था ले रहा था..

"समाज की बेड़ियाँ हाथों और पैरों को बाँध सकती हैं, पर आँखों और कल्पनाओं को नहीं। विकास ने अपनी बंद आँखों के पीछे सुगना को उस मर्यादा के कवच से बाहर निकाला लिया था । कल्पना की उस कोठरी में, उसने सुगना को निर्वस्त्र भी किया, उसे अपनी बाहों में भी भींचा और वह सब कुछ पाया जो हकीकत में मुमकिन नहीं था।"

इंसान का मन एक ऐसा रंगमंच है जहाँ वह किसी भी पावन मूरत को अपनी वासना का पात्र बना सकता है। सुगना की वह छवि, वह सात्विक सौंदर्य, विकास के लिए उस रात एक वर्जित फल की तरह था—जिसे चखना गुनाह था, पर जिसकी कल्पना करना ही परम सुख था।

पिछली सीट पर सोई हुई सोनी और ड्राइविंग सीट पर बैठा सूरज... इन सबके बीच विकास सुगना के उस बदले हुए रूप को आज की यादों से जोड़ रहा था। उसे अहसास हुआ कि सलेमपुर की उस रात जो आग लगी थी, वह आज बनारस में 'मुनिया' और 'अनुष्ठान' के बहाने सुगना खुद ही भड़का रही थी।

विकास ने एक लंबी सांस ली। उसे लगा कि नैनीताल का यह सफर केवल सोनी के गर्भ की सिंचाई का नहीं है, बल्कि उसके मन के उस पुराने 'सलेमपुर वाले जुनून' को भी एक नई दिशा देने वाला है। सुगना ने खुद ही जो राह खोली थी, उस पर अब विकास के कदम रुकने वाले नहीं थे। गाड़ी पहाड़ों की ओर बढ़ रही थी, और विकास का मन वासना की उस कोठरी की ओर, जहाँ सुगना आज भी सज-धज कर खड़ी थी।

लखनऊ की सीमा में प्रवेश करते ही शाम का धुंधलका गहराने लगा था। गोमती नगर की सड़कों पर दौड़ती गाड़ी के भीतर एक अजीब सी खामोशी छाई थी, जिसे केवल एसी की सरसराहट तोड़ रही थी। विकास का हाथ आगे की सीट पर टिका था, पर उसका ध्यान बार-बार रियर-व्यू मिरर में दिख रही सोनी की थकी हुई आँखों पर जा रहा था।

सलेमपुर और बनारस की वे कामुक यादें विकास के भीतर एक गहरी उत्तेजना पैदा कर चुकी थी। उसका लंड खड़ा हो चुका था … उसे सुगना का वह 'मुनिया' वाला शब्द और 'बारी-बारी से ड्राइव' करने की बात रह-रहकर याद आ रही थी।

अचानक, विकास ने एक गहरा निश्वास छोड़ा और सूरज की ओर देखा।

विकास: "सूरज, गाड़ी को बाएं मोड़ ले। गोमती नगर वाले फ्लैट की तरफ चल। मुझे लगता है आज रात हमें लखनऊ में ही रुकना चाहिए।"

सोनी ने चौंककर विकास को देखा। उसके भीतर एक बिजली सी कौंधी—लखनऊ का वह फ्लैट, जहाँ कोई तीसरा नहीं होगा!

सूरज: "क्यों मौसा जी? मैं तो अभी दो-चार घंटे और खींच सकता हूँ। पहाड़ों की ठंडी हवा का इंतज़ार है।"

विकास: (एक रहस्यमयी मुस्कान के साथ) "बेटा, सफर का असली आनंद मंजिल पर नहीं, रास्ते के पड़ावों में है। सोनी काफी थक गई है, और मैं नहीं चाहता कि हम नैनीताल पहुँचते-पहुँचते इतने निढाल हो जाएं कि नैनीताल की खूबसूरत वादियों का आनंद ही नहीं ले सके। आज रात लखनऊ में 'विश्राम' करेंगे और कल सुबह चलेंगे।"

सूरज ने स्टीयरिंग घुमाते हुए शीशे में सोनी को देखा। सोनी की नज़रों में डर और उत्तेजना का एक अनोखा मिश्रण था। सूरज समझ गया कि मौसा जी जिस 'विश्राम' की बात कर रहे हैं, वह असल में वह काम युद्ध' है जिसके लिए वह खुद भी बेताब था।

सोनी भी उठकर बैठ गई उसने भी अपनी जांघें और कमर कस ली…उसे पता था आहुति का समय हो चुका है। उसकी मुनिया सतर्क थी आतुर थी।

फ्लैट का दरवाज़ा जैसे ही खुला, सोंधी धूल और बंद कमरे की उमस ने उनका स्वागत किया। विकास ने खिड़कियां खोलीं और ठंडी हवा भीतर आने लगी। सामान रखकर सूरज हाथ-मुँह धोने चला गया।

विकास ने मौका पाकर रसोई में पानी पी रही सोनी को पीछे से अपनी बाहों में जकड़ लिया। उसकी पकड़ में एक अधिकार था।

विकास: (सोनी के कान के पास फुसफुसाते हुए) "सोनी... सुगना दीदी ने जिस 'यज्ञ' की नींव बनारस में रखी थी, आज इस फ्लैट के सन्नाटे में उसकी पहली बड़ी आहुति देनी है। मैं चाहता हूँ कि आज रात मेरी तपस्या तुम्हारे गर्भ को उस फल से भर दे जिसका हम बरसों से इंतज़ार कर रहे हैं।"

सोनी का बदन विकास की तपन से पिघलने लगा। उसे अपनी मर्यादा याद थी, पर उसे यह भी पता था कि इस यज्ञ का 'दूसरा पुजारी' भी इसी छत के नीचे है।

सोनी: (धीमी आवाज़ में) "जी... मैंने भी मन में यही संकल्प लिया है। आज की रात हर आहुति को मैं अपने भीतर समेट लूँगी।"

लखनऊ के उस फ्लैट में शाम का धुंधलका अब गहरा चुका था। विकास ने अपनी शर्ट के बटन ठीक किए और अपनी जेब से बटुआ निकाला।

विकास: "सोनी, सफर की थकान की वजह से तुम्हारा चेहरा उतर गया है। तुम और सूरज तब तक हाथ-मुँह धोकर फ्रेश हो जाओ, मैं पास के ही एक अच्छे रेस्तरां से गरमा-गरम खाना पैक करवा लाता हूँ। घर में अभी चूल्हा जलाने की शक्ति किसी में नहीं है।"

सूरज ने सिर हिलाकर मौसा जी की बात का समर्थन किया, पर उसकी नजरें सोनी की कमर के उस उभार पर थीं जो साड़ी के पल्ले से छनकर बाहर आ रहा था। जैसे ही विकास ने बाहर से दरवाजा बंद किया और उसके कदमों की आहट सीढ़ियों पर ओझल हुई, फ्लैट के भीतर का सन्नाटा अचानक एक मादक गर्जना में बदल गया।

सोनी अभी रसोई की स्लैब से लगकर खड़ी ही थी कि सूरज ने एक तेंदुए की तरह झपटकर उसे अपनी फौलादी बाहों में दबोच लिया। सूरज के शरीर की तपन और उसके पौरुष का वह सख्त खिंचाव सोनी की पीठ पर साफ महसूस हो रहा था।

सोनी: (घबराकर और हांफते हुए) "सूरज... तनिक रुक! विकास जी कभी भी आ सकते हैं।"

सोनी ने स्वाभाविक रूप से अपनी ना नुकूर दिखाई पर वह स्वयं जानती थी कि वह अपनी अंतरात्मा से सूरज से मिलन का इंतजार कर रही थी।

सूरज: (सोनी की गर्दन पर अपने होंठ जमाते हुए) "मौसा जी को आने में कम से कम आधा घंटा लगेगा मौसी। आपने कहा था न कि मैं जहाँ चाहूँ, जैसे चाहूँ... तो आज शुरुआत यहीं से होगी।"

सूरज ने बिना समय गंवाए सोनी को सामने की ओर घुमाया और उसे रसोई की स्लैब पर बैठा दिया। सोनी की साड़ी का पल्ला नीचे गिर चुका था। सूरज ने अपने दोनों हाथ सोनी के भारी वक्षों पर जमा दिए और उन्हें अपनी उंगलियों से भींचते हुए सोनी के होंठों को अपने मुँह में भर लिया। वह चुंबन नहीं था, वह तो जैसे सोनी के अस्तित्व को सोख लेने की एक कोशिश थी।

सूरज ने एक ही झटके में अपने कपड़े उतार फेंके। उसका लटका हुआ लंड किसी काम का ना था उसने कातर निगाहों से सोनी की तरफ देखा और अपना अंगूठा उसके सामने कर दिया…

सोनी यह जानती थी कि सूरत चाहे जितना भी मन ही मन उत्तेजित हो जब तक वह चाबी नहीं भरेगी सूरज का पौरुष किसी काम का नहीं। सोनी ने हमेशा की तरह अंगूठा सहलाया और सूरज का लिंग अपना आकार और तनाव बढ़ता गया सोनी ने अपनी निगाहें नीचे की और अपने उसे जादुई खिलौने को अपने जागृत रूप में देखकर उसका अंगूठा छोड़ दिया।

उसका पौरुष अपनी पूरी कठोरता और उग्रता के साथ सोनी के सामने था। सोनी ने जब उस 'असली सारथी' के उस प्रचंड रूप को देखा, तो उसकी अपनी वासना ने मर्यादा के हर बांध को तोड़ दिया।

सोनी ने खुद ही अपनी साड़ी और पेटीकोट को ऊपर सरकाया और अपने दोनों पैर सूरज की कमर के इर्द-गिर्द कस लिए। सूरज ने सोनी के नितंबों को सहारा दिया और एक ही झटके में, पूरे वेग के साथ उस 'मुनिया' की गहराई में प्रवेश कर दिया।

सोनी: "आह्ह्ह... सूरज! तुम तो... जान ही ले लोगे।"

कमरे में देह से देह के टकराने की 'थप-थप' की आवाज़ें गूँजने लगीं। सूरज की रफ्तार पहाड़ों पर चलने वाली उस उग्र हवा की तरह थी जो सब कुछ उड़ा ले जाना चाहती थी। वह सोनी को स्लैब पर टिकाकर बार-बार गहरे प्रहार कर रहा था। सोनी का पूरा बदन पसीने से भीग चुका था और उसके मुँह से निकलने वाली सिसकियां रसोई की दीवारों से टकराकर वापस लौट रही थीं।

सूरज को पता था कि समय कम है, इसलिए उसने अपनी पूरी ऊर्जा उस एक पल में झोंक दी। उसने सोनी को अपनी बाहों में कसकर जकड़ा और एक अंतिम, सबसे गहरा प्रहार किया। जैसे ही उसका बांध टूटा, उसने अपने जीवन का सारा 'तेज', वह गाढ़ा और मादक वीर्य, सोनी के गर्भ की उस उपजाऊ मिट्टी में उड़ेल दिया। सोनी ने भी अपना स्खलन साथ ही साथ पूरा किया। यही पूर्ण तृप्ति थी।

सोनी ने उस गर्म लावे को अपने भीतर महसूस किया और संतोष की एक ऐसी आह भरी जो उसके आत्मा तक को तृप्त कर गई। सूरज ने अपनी आहुति दे दी थी—वह आहुति जो विकास की आहुति से कहीं अधिक सघन और शक्तिशाली थी।

सोनी: (सूरज के माथे का पसीना पोंछते हुए) "अब जल्दी कर... वह आते ही होंगे। तूने तो आज सच में मेरा रोम-रोम झंकृत कर दिया।"

सूरज ने मुस्कुराते हुए सोनी के होंठों को चूमा और अपने कपड़े समेटकर बाथरूम की ओर जाने लगा।

सोनी ने उसे याद दिलाया…. सूरज का लैंड अभी पूरी तरह तनाव में था सूरज वापस मुड़ कर सोनी के पास आया और सोनी ने एक बार फिर अपने होठों के जादू से उसे अद्भुत योद्धा को आराम मुद्रा में पहुंचा दिया जिसने अब से कुछ देर पहले उसकी जांघों के बीच तहलका मचाया हुआ था।

सोनी ने जल्दी-जल्दी अपने कपड़े ठीक किए और चेहरे पर पानी का छींटा मारा ताकि विकास को उस 'महायज्ञ' की भनक तक न लगे जो उसके पीछे अभी-अभी संपन्न हुआ था। लखनऊ की यह शाम अब विकास के आने का इंतज़ार कर रही थी, पर सोनी के गर्भ में सूरज का 'वंश' अपना स्थान सुरक्षित कर चुका था।

रसोई की स्लैब, जहाँ अभी कुछ देर पहले सूरज के पौरुष का प्रचंड वेग थमा था, अब सोनी वहां बहुत ही सहजता से पानी के गिलास लगा रही थी। हालाँकि, उसके चेहरे पर छाई वह लाली और आँखों की चमक उसके भीतर मची हलचल को बयां कर रही थी।

विकास: (हाथ में पैकेट संभालते हुए) "लो, गरमा-गरम खाना आ गया। सोनी, तुम तो नहा लीं? चेहरा एकदम गुलाब जैसा खिल उठा है। थकान उतर गई क्या?"

सोनी ने नज़रें झुका लीं। उसके भीतर अभी भी सूरज के उस गाढ़े सिंचन की गर्माहट महसूस हो रही थी।

सोनी: "जी... बस थोड़ा पानी डाला तो बेहतर महसूस हो रहा है। आप हाथ-मुँह धो लीजिए, मैं खाना लगाती हूँ।"

सूरज बाथरूम से बाहर निकला, उसके बाल गीले थे और चेहरे पर एक विजयी मुस्कान थी। उसने विकास की ओर ऐसे देखा जैसे वह इस घर का असली मालिक हो।

सूरज: "मौसा जी, आप बैठिए। मैं और मौसी मिलकर सब परोस देते हैं। आज भूख भी बहुत ज़ोर की लगी है।"

तीनों डाइनिंग टेबल पर बैठे। विकास बड़े चाव से खाना खा रहा था और कल के सफर की योजनाएँ बना रहा था। वह बीच-बीच में सोनी का हाथ थाम लेता, यह जताने के लिए कि वह आज रात के लिए कितना उत्साहित है।

विकास: "सूरज, कल सुबह रास्ता थोड़ा घुमावदार है। तुम्हें अपनी पूरी एकाग्रता 'ड्राइविंग' पर रखनी होगी।"

सूरज: (सोनी की ओर तिरछी नज़र से देखते हुए) "आप चिंता न करें मौसा जी। मेरी 'पकड़' बहुत मज़बूत है। चाहे गाड़ी हो या रास्ता, मैं उसे उसकी मंज़िल तक पहुँचाना जानता हूँ।"

सोनी ने नीचे टेबल के नीचे महसूस किया कि सूरज का पैर उसके पैर को सहला रहा था। वह कांप उठी। एक तरफ पति का स्नेह था और दूसरी तरफ प्रेमी का वह दुस्साहस।

खाना खाने के बाद विकास ने सूरज को शुभरात्रि कहा और सोनी का हाथ पकड़कर बेडरूम की ओर ले गया। सूरज ने अपने कमरे का दरवाज़ा थोड़ा खुला छोड़ दिया, उसकी आँखें साफ़ कह रही थीं कि वह अभी 'रिटायर' नहीं हुआ है।

कमरे के भीतर विकास ने सोनी को सीने से लगा लिया।

विकास: "सोनी, अब कोई बाधा नहीं है। सुगना दीदी के शब्दों को याद करो... आज रात हमें वह सृजन करना है जो हमारे कुल का उजाला बने।"

विकास ने बड़े ही धीमे और आत्मीय तरीके से सोनी के वस्त्रों को अलग किया। वह अपनी 'आहुति' देने के लिए तैयार था। उसने सोनी को बेड पर लिटाया और उस पर अपना अधिकार स्थापित किया। विकास का मिलना किसी शांत नदी की तरह था—मर्यादित, सधा हुआ और प्रेमपूर्ण। सोनी ने उसे पूरा सहयोग दिया, क्योंकि वह जानती थी कि यह उसका धर्म है।

पर जैसे ही विकास अपनी चरम तृप्ति पाकर सोनी की बाँहों में निढाल होकर सो गया। सोनी की मुनिया भी अब पूरी तरह थक चुकी थी उसने दोहरी आहुति को अपने भीतर इस प्यार से संजोने की कोशिश की.. और अपने गोद में खेलने वाले बच्चों की कल्पना करते हुए एक गहरी नींद में सो गई…

लखनऊ की वह सुबह जितनी शांत थी, फ्लैट के भीतर की हवा उतनी ही कामुक और भारी हो चुकी थी। सोनी स्नान करने के बाद गुलाबी रंग की पारदर्शी नाइटी पहनकर जैसे ही रसोई की ओर बढ़ी, उसके गीले बदन से उठती चंदन और साबुन की महक ने हाल में उसका इंतजार कर रहे सूरज के सब्र का बांध तोड़ दिया। सूरज ने बीच रास्ते में ही सोनी की कलाई पकड़ी और उसे घसीटकर अपने कमरे में ले गया।

सूरज (उत्तेजना में फुसफुसाते हुए): "मौसी, ये गुलाबी नाइटी पहनकर आप आग लगा रही हैं... कल रात के बाद भी मेरी प्यास बुझी नहीं है एक बार और।"

सोनी ने एक बार अपने बेडरूम के बंद दरवाजे की तरफ देखा और फिर मुस्कुराते हुए सूरज के पौरुष की चाबी (अंगूठे) को अपनी उंगलियों से धीरे-धीरे सहलाया। स्पर्श पाते ही सूरज का 'अंग' किसी फौलादी दंड की तरह पजामे को फाड़कर बाहर निकलने के लिए मचल उठा।

सोनी: "सूरज, तनिक संभल के जल्दी कर ... विकास जी जाग चुके हैं।"

सूरज ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने एक हाथ से सोनी का मुँह भींचा और दूसरे हाथ से उसकी नाइटी को ऊपर सरकाकर उसे अपने बिस्तर पर लिटा दिया। बिना किसी भूमिका के, सूरज ने अपने दहकते हुए पौरुष को एक ही झटके में सोनी की 'मुनिया' की गहराई में उतार दिया। सोनी के गले से एक तीखी आह निकली जिसे सूरज ने अपने चुंबन में सोख लिया।

सूरज के धक्के किसी मशीन की तरह चल रहे थे। वह सोनी को बिस्तर और अपने शरीर के बीच पीस देना चाहता था। सूरज और सोनी का प्यार अंगूठा था जो अब तुरंत ही परवान चढ़ जाता था।

तभी विकास की कड़क आवाज़ गूँजी— "सोनी! कितनी देर हो रही है? चाय अब तक बनी नहीं क्या?"

उस आवाज़ ने जैसे दोनों पर ठंडा पानी डाल दिया। सोनी का शरीर अभी स्खलन के आनंद में काँप ही रहा था कि वह डर के मारे हड़बड़ा गई और सूरज ने अपने प्रहार जारी रखें और पूर्णाहुति के बाद ही सोनी को अपने आगोश से जाने दिया पर इस जल्दबाज़ी में सोनी वह सबसे ज़रूरी काम करना भूल गई—वह सूरज के उस वज्र जैसे दंड (लंड) को अपने होठों से शांत करना भूल गई, जो स्खलन के बाद भी अपनी पूरी कठोरता के साथ खड़ा था।

सोनी हाँफती हुई रसोई में भागी। उसकी जाँघों के बीच से सूरज का वह गाढ़ा रस रिसकर नीचे बह रहा था। उसी मदहोश अवस्था में उसने चाय तैयार की और विकास के सामने ले गई। विकास ने उसे देखा तो चौंक गया।

विकास: "अरे सोनी! आज तो तुम किसी खिली हुई कली की तरह दमक रही हो। क्या बात है, लखनऊ की हवा लग गई क्या?"

सोनी ने शरमाकर नज़रें झुका लीं। उसे पता था कि इस चमक के पीछे सूरज का वह 'ताज़ा सिंचन' था जो अभी भी उसके भीतर गर्माहट पैदा कर रहा था। विकास बाथरूम गया, तो सोनी ने जल्दी से खुद को साफ़ किया और साड़ी की जगह एक सलवार-सूट पहन लिया। उस सूट ने सोनी के उभारों और उसकी कामुक काया को इस कदर बेपर्दा किया कि वह किसी अप्सरा से कम नहीं लग रही थी।

जब वे गाड़ी की ओर बढ़े, तो सूरज का अंग पजामे के भीतर अपनी पूरी उग्रता के साथ खड़ा था। सूरज उसी प्रचंड तनाव और अपने पजामे में बन रहे उस 'तम्बू' के साथ ड्राइविंग सीट पर बैठ गया। सामने पहाड़ों का रास्ता था और बगल में विकास, पर सूरज का पूरा ध्यान पीछे बैठी उस 'सूट वाली सुंदरी' पर था जिसकी देह का रस अभी भी उसकी यादों में ताज़ा था। नैनीताल का सफर अब केवल रास्तों का नहीं, बल्कि बेकाबू वासना का होने वाला था।

सोनी तृप्त थी और उसकी मुनिया भी पर. विद्याता ने सोनी विकास और सूरज के बीच संबंधों की नई परिभाषा लिखने की ठान ली थी…

शेष अगले भाग में…
 
भाग 192

जब वे गाड़ी की ओर बढ़े, तो सूरज का अंग पजामे के भीतर अपनी पूरी उग्रता के साथ खड़ा था। सूरज उसी प्रचंड तनाव और अपने पजामे में बन रहे उस 'तम्बू' के साथ ड्राइविंग सीट पर बैठ गया। सामने पहाड़ों का रास्ता था और बगल में विकास, पर सूरज का पूरा ध्यान पीछे बैठी उस 'सूट वाली सुंदरी' पर था जिसकी देह का रस अभी भी उसकी यादों में ताज़ा था। नैनीताल का सफर अब केवल रास्तों का नहीं, बल्कि बेकाबू वासना का होने वाला था।

सोनी तृप्त थी और उसकी मुनिया भी पर. विद्याता ने सोनी विकास और सूरज के बीच संबंधों की नई परिभाषा लिखने की ठान ली थी…

अब आगे..

बीती रात जो संतान सप्तमी की तीसरी रात थी सोनी के गर्भ में एक बार फिर सूरज और विकास दोनों के वीर्य की आहुति हो चुकी थी..

संतान सप्तमी का यह कामुक उत्सव सिर्फ सोनी सूरज और विकास के बीच ही नहीं चल रहा था उधर बनारस में भी वासना अपने पैर पसार रही थी..

सूरज, सोनी और विकास अब नैनीताल की यात्रा पर निकल चुके थे, पर पीछे छोड़ गए थे वह मखमली कमरा, जिसे सुगना और उस घर की बेटियों ने दो रातों को बड़ी हसरतों से सजाया था।

सुगना ने सोनी के निकलने के बाद जब मालती को कमरा लॉक करने और चाबी को नियत स्थान पर रखने का निर्देश दिया, तो मालती के दिमाग में एक 'शरारत' ने जन्म ले लिया। उसने वह चाबी अपनी दरवाजा लाक करने के बाद जींस की तंग जेब में खिसका ली। वह सजे-धजे साटन के बिस्तर का मोह वह छोड़ नहीं पा रही थी। वह जानती थी कि आज रात हवेली में बड़े-बुजुर्ग गहरी नींद में होंगे, वह राजू के साथ अपनी प्यास बुझा पाएगी..

रात के भोजन के पश्चात सब अपने अपने कमरों में जा चुके थे।

मालती ने दबे पाँव छत की ओर रुख किया, जहाँ राजू पहले से ही अँधेरे में उसका इंतज़ार कर रहा था।

मालती (फुसफुसाते हुए): "राजू, आज किस्मत ने हमें वो मौका दिया है जिसकी हमने कभी कल्पना भी नहीं की थी। सोनी मौसी का कमरा... वो साटन की चादर... वो मोगरे की महक... आज सब हमारा है।"

राजू (हैरानी से): "बाकिर मालती, जदि सुगना चाची के पता चल जाई त? बहुत रिस्क बा हो।"

मालती: "कोई रिस्क नहीं है। माँ सो चुकी है। बस चुपचाप मेरे पीछे आ जा..

इधर, सुगना अपने कमरे में लेटी करवटें बदल रही थी। उसके कमरे का पुराना पंखा आज 'चूँ-चूँ' की कर्कश आवाज़ कर रहा था, जो उस शांत रात में किसी डरावनी धुन जैसा लग रहा था। सुगना की आँखों से नींद कोसों दूर थी। उसे अचानक उस सजे-धजे कमरे की याद आई जो अब खाली पड़ा था।

सुगना को ध्यान आया कि सोनी का कमरा आज खाली है क्यों ना आज की रात उसी कमरे में आराम किया जाए कल सुबह जरूर इस पंखे को बनवा लूंगी।

सुगना उठ खड़ी हुई और उस अलमारी की ओर बढ़ी जहाँ चाबियाँ रखी जाती थीं। पर वहाँ चाबी को न देखकर वह ठिठक गई। चाबी गायब थी।

सुगना ने मन ही मन मालती को कोसा। उसे लगा कि उसकी 'आधुनिक' बेटी हमेशा की तरह काम अधूरा छोड़कर कहीं और मशगूल हो गई होगी। पर सुगना हार मानने वालों में से नहीं थी। उसके पास अलमारी में एक 'मास्टर की' भी थी जो हवेली के हर कमरे को खोल सकती थी।

उधर, मालती और राजू दबे पाँव सीढ़ियों से नीचे उतर रहे थे। मालती की जींस की सरसराहट और राजू की तेज़ धड़कनें उस रात के सन्नाटे को चीर रही थीं।

मालती (मन ही मन): "बस एक बार उस साटन के बिस्तर पर राजू के साथ पहुँच जाऊं, फिर ये जींस की बंदिशें और ये डर... सब खत्म हो जाएगा।"

सुगना ने सोनी के कमरे का ताला खोला और भीतर दाखिल हो गई। कमरे की हवा में मोगरे और जैस्मीन का नशा अभी भी बरकरार था। उसने अंदर से आधुनिक शैली का 'नॉब लॉक' घुमाकर उसे फँसा दिया। यह ऐसा लॉक था जिसे अंदर से बस एक बटन दबाकर बंद किया जा सकता था, पर बाहर से इसे चाबी के जरिए खोला जा सकता था।

कमरे की मद्धम लाल और वार्म-व्हाइट रोशनी में साटन की वह मैरून चादर किसी गहरी झील की तरह चमक रही थी। सुगना ने अपनी साड़ी का पल्लू संभाला और नित्य क्रिया के लिए अटैच बाथरूम की ओर बढ़ गई। उसने बाथरूम का दरवाजा पूरी तरह बंद नहीं किया, बस थोड़ा सा सटा दिया।

अभी सुगना हाथ-मुँह धो ही रही थी कि उसे कमरे के मुख्य दरवाजे के हैंडल के घूमने की मद्धम आवाज़ आई। 'क्लिक'—चाबी घूमने की वह परिचित ध्वनि सुगना के कानों में बिजली की तरह कौंधी। वह ठिठक गई। उसने सोचा, "इस वक्त कौन हो सकता है? क्या मालती चाबी लेकर वापस आई है?"

तभी मालती की आवाज आई अरे बाप रे लाइट जलती छूट गई थी यदि मां को मालूम चला तो पक्का डांट पड़ती।

सुगना कोई यकीन हो गया कि यह मालती ही थी।

उसने सावधानी से बाथरूम का दरवाजा थोड़ा और खोला और झरोखे जैसी दरार से कमरे के भीतर झांकने लगी।

मद्धम रोशनी में सुगना की आँखें फटी की फटी रह गईं। वह मालती थी, जो अपनी उसी चुस्त जींस और शर्ट में थी, और उसके साथ राजू था। मालती ने बड़े आत्मविश्वास के साथ पीछे से दरवाजा बंद किया।

राजू (फुसफुसाते हुए): "मालती, जदि यहाँ धरा गइली जा त ज्यान से जाइब। चाची के मालूम चलल त अनर्थ हो जाई।"

मालती (मस्ती में): "अरे तू डर मत, माँ तो अपने कमरे में आराम से सो चुकी होगी। उसे क्या पता कि हम यहाँ 'संतान सप्तमी' का असली उत्सव मनाने आए हैं।"

तू कंडोम तो लाया है ना?

संतान सप्तमी का उत्सव और कंडोम दोनों की बात सुनकर सूचना की रूह कांप गयी। भोजपुरी भाषा में आ रही वह आवाज जानी पहचानी थी सुगना उस अंजान को पहचानने की कोशिश कर रही थी।

तभी मालती ने राजू का हाथ पकड़कर उसे सीधे उस साटन के बिस्तर की ओर खींचा। सुगना ने देखा कि मालती के चेहरे पर डर का नामोनिशान नहीं था, बल्कि वही वासना और अधिकार था जो जो एक कामपिपासु युवती में होता है।

सुगना राजू का यह परिवर्तित रूप देख रही थी जहां मालती खड़ी हिंदी में बात कर रही थी वही राजू अपनी ग्रामीण भाषा भोजपुरी में बात कर रहा था सुगना के लिए यह युगल अनूठा था

बाथरूम की ओट में छिपी सुगना मालती और राजू के बीच बढ़ती नजदीकियां देख रही थी। वह देख रही थी कि उसकी अपनी बेटी, जिसे वह अब तक सिर्फ 'आधुनिक' और 'जिद्दी' समझती थी, वह घर की मर्यादा को तार-तार कर रही थी।

उसने देखा कि राजू ने मालती को पीछे से अपनी बाहों में भर लिया है और उसके हाथ मालती की कमर की उस चुस्त जींस के किनारों को टटोल रहे हैं। मालती ने गर्दन पीछे झुका दी और मोगरे की उन लड़ियों के बीच वह दृश्य बिल्कुल वैसा ही होने जा रहा था, जिसकी कल्पना मालती ने बिस्तर सजाते वक्त की थी।

सुगना पत्थर की मूरत बनी यह सब देख रही थी। एक तरफ उसकी बेटी की बेबाक जवानी थी और दूसरी तरफ उसकी अपनी परवरिश। हवेली के उस सजे-धजे कमरे में अब एक ऐसा खेल शुरू होने वाला था, जिसका गवाह स्वयं विधाता के अलावा सिर्फ 'छिपी हुई' सुगना थी।

हवेली के उस सजे-धजे कमरे में मोगरे की महक अब मालती और राजू की तेज़ होती साँसों के साथ मिलकर और भी भारी हो गई थी। सुगना, जो बाथरूम के दरवाजे की झरोखे जैसी दरार से यह सब देख रही थी, उसका शरीर पसीने से भीग चुका था। उसकी आँखों के सामने उसकी जवान बेटी मालती, जिसकी 5 फुट 7 इंच की सुडौल और छरहरी काया उस चुस्त जींस में किसी नागिन की तरह बलखा रही थी, आज अपनी मर्यादा की सारी सीमाएं लांघने को तैयार थी।

राजू ने पीछे से मालती के पेट पर हाथ रखा और उसकी शर्ट के बटनों को टटोलने लगा। मालती ने अपनी गर्दन पीछे झुकाकर राजू के कंधे पर टिका दी।

मालती (मस्ती भरी आवाज़ में): "राजू... आज देख रही हूँ तेरी उंगलियाँ कांप रही हैं। उस दिन छत पर तो बहुत शेर बन रहा था, आज इस साटन के बिस्तर को देखकर डर गया क्या?"

राजू (मालती के कान के पास भोजपुरी में फुसफुसाते हुए): "डर ई सेज के नईखे मालती, डर त तोहार ई चढ़ल जवानी के बा। ऊपर से ई कमरा... अइसन लागत बा कि हमनी कवनो सरग (स्वर्ग) में आ गइल बानी जा।"

राजू ने धीरे से मालती की शर्ट का पहला बटन खोला। सुगना ने देखा कि शर्ट के भीतर मालती ने कोई अंतःवस्त्र नहीं पहना था, बस उसकी गोरी पीठ और उभरते हुए वक्षों की गोलाई मद्धम रोशनी में चमक उठी। राजू की हथेलियाँ अब मालती के पेट से ऊपर की ओर सरकने लगीं।

मालती: "उम्म... राजू, धीरे नहीं। आज मुझे उस हर एक मोगरे की कली का अहसास चाहिए जो मैंने और सुगना माँ ने यहाँ सजाई है। "

राजू ने अब मालती की शर्ट को उसके कंधों से नीचे सरका दिया। मालती का मादक और गदराया हुआ बदन अब कमर तक नग्न हो चुका था। सुगना की धड़कनें पत्थर की चोट जैसी सुनाई दे रही थीं। उसने देखा कि उसकी बेटी का शरीर किसी तराशी हुई मूरत जैसा था—लम्बी गर्दन, सुडौल कंधे और पूर्णता लिए हुए वक्ष।

राजू अब मालती के सामने आया और उसकी आँखों में देखते हुए उसकी चुस्त जींस के बटन पर हाथ रखा। जींस इतनी टाइट थी कि मालती के पेट की त्वचा और नाभि का गड्ढा साफ उभर रहा था।

राजू (भोजपुरी में): "मालती, ई तोहार जींस कइसन एकदम चपकल (तंग) बा हो... एके उतारे में त आधी रात निकल जाई!"

मालती (शरारत से मुस्कुराते हुए): "तो मेहनत कर न... तुझे क्या लगा था, मालती इतनी आसानी से हाथ आ जाएगी? खींच इसे नीचे।"

राजू ने घुटनों के बल बैठकर मालती की जींस की ज़िप नीचे सरकाई। 'सर्रर्र' की वह आवाज़ सुगना के कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतरी। राजू ने मालती की कमर को पकड़कर उस तंग जींस को नीचे खींचना शुरू किया। मालती ने एक हाथ राजू के सर पर रखा और अपनी लंबी, गोरी और सुडौल टाँगों को एक-एक करके उस जींस की कैद से आज़ाद किया।

अब मालती उस मोगरे से सजे बिस्तर के बीच केवल अपनी छोटी सी पैंटी में खड़ी थी। उसकी लंबी नग्न जाँघें उस मरून चादर के बैकग्राउंड में और भी कामुक लग रही थीं। राजू ने अपनी शर्ट उतार फेंकी; उसका गठीला बदन और उभरते हुए सीने की मांसपेशियां बता रही थीं कि वह भी इस खेल के लिए पूरी तरह तैयार है।

मालती: "आह... राजू, देख हमने कितनी मेहनत से ये बिस्तर बिछाया था। मां को क्या पता था कि उनकी बेटी आज यहाँ 'संतान सप्तमी' की असली पूजा करेगी।"

राजू अब मालती के ऊपर झुक गया और उसके गुलाबी होंठों को अपने कब्ज़े में ले लिया। सुगना बाथरूम के भीतर अपनी साड़ी का पल्लू दाँतों तले दबाए खड़ी थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह बाहर निकलकर इस 'पाप' को रोके, या अपनी ही बेटी के इस प्रचंड यौवन के प्रदर्शन को देखती रहे, जो उसे एक अनजानी उत्तेजना और गहरे अपराधबोध के बीच ले जा रहा था। कमरे में अब मोगरे की महक के साथ-साथ दो जवान शरीरों की गर्मी और भी बढ़ गई थी।

हवेली के उस मखमली सन्नाटे में, सोनी का वह सजा-धजा कमरा अब वासना के एक नए अध्याय का गवाह बन रहा था। सुगना, जो बाथरूम की दरार से यह सब देख रही थी, उसका शरीर पसीने से भीग चुका था। उसकी अपनी बेटी, मालती, आज उसके सामने एक ऐसी स्थिति में थी जिसकी उसने कभी स्वप्न में भी कल्पना नहीं की थी।



हवेली के उस सजे-धजे कमरे में मोगरे की भारी खुशबू अब मालती और राजू की तेज़ होती साँसों के साथ मिलकर और भी मादक हो गई थी। बाथरूम की दरार से झांकती सुगना का शरीर पसीने से भीग चुका था। वह देख रही थी कि मालती, जो उसके पति रतन और उसकी मुंबई वाली पूर्व पत्नी बबीता की संतान थी, आज अपनी रगों में दौड़ रहे उसी 'बार डांसर' माँ के खून का प्रदर्शन कर रही थी। बबीता की वह शोखी और जिस्मानी जादू मालती के 5 फुट 7 इंच के तराशे हुए बदन में जैसे फिर से जी उठा था।सुगना ने अपनी युवावस्था में स्वयं को एक कमसिन और लजीली 'कचनार' की तरह जिया था, जहाँ संभोग एक समर्पण था। पर यहाँ, मालती के रूप में वह एक ऐसी आधुनिक काम-पिपासा देख रही थी जो न केवल बिंदास थी, बल्कि आक्रामक भी थी।राजू अब पूरी तरह नग्न हो चुका था मालती ने अपनी टाँगें मोड़कर राजू को अपनी ओर आने का इशारा किया।मालती (अपनी आँखों में एक अजीब सी ललक लिए): "राजू... क्या देख रहा है? जैसे तूने इसे आज से पहले देखा ही नहीं? आज अपनी और मेरी प्यास जी भर कर बुझा ले।"राजू ने मालती की नाभि के पास अपना चेहरा झुकाया और उसे अपनी जीभ से सहलाने लगा। मालती के मुँह से एक मदहोश सिसकारी निकली और उसने बिस्तर पर बिछी मोगरे की लड़ियों को अपनी मुट्ठियों में भींच लिया।मालती: "आह... हाँ, वहीं... राजू, तेरी ये तड़प मुझे पागल कर रही है। आज इस साटन को हमारे पसीने से भिगो दे।"सुगना ने देखा कि मालती ने खुद आगे बढ़कर राजू के सिर को अपने वक्षों की ओर खींचा। वह अपने बदन के आवेग को छुपाने की कोशिश भी नहीं कर रही थी। उसकी कामुक अदाएं इतनी स्वाभाविक और परिपक्व थीं कि सुगना को अपनी ही परवरिश पर शक होने लगा। मालती का हर अंग जैसे संगीत की लय पर थिरक रहा था।सुगना ने आज कई वर्षों बाद उसे आदमी सत्य को देख रही थी जिसने इस जीवन का सृजन किया है मालती और राजू को इस तरह एक दूसरे में खोया देखकर एक पल के लिए वही अब भूल गई की बिस्तर पर संभोग के लिए आठ और वायु थी उसकी अपनी बेटी है और वह जो देख रही है शायद उसे रोकना चाहिए पर सुखना की सुषुप्त वासना अब जाग चुकी थी…

अपनी वासना के अधीन सुगना उस दृश्य को रोकने की बजाय उसे अपनी आंखें फाड़ कर देख रही थी।



राजू अब मालती के दोनों घुटनों के बीच आ गया था। उसने मालती की लंबी जाँघों को अपने कंधों पर टिकाया, जिससे मालती की 'मुनिया' का वह गुलाबी और कोमल द्वार पूरी तरह उजागर हो गया। सुगना ने देखा कि मालती ने लज्जा का त्याग कर अपनी कमर को थोड़ा ऊपर उठाया ताकि राजू को उसकी गहराई का अंदाज़ा मिल सके।राजू (हाँफते हुए भोजपुरी में): "मालती... तू त सचहूँ कातिल बाड़ू हो। हमके यकीन नईखे होत कि हम सोनी चाची खातिर सजावल ई सेज पर तोके अइसन रगड़े (चोदे) जा तानी।"मालती (तेज़ सांसों के बीच): "तो बातें कम कर और अपना 'काम' शुरू कर। मुझे वो एहसास चाहिए जो इस रात को हमेशा के लिए मेरे जिस्म पर दर्ज कर दे। आ जा राजू... मुझे अपनी जवानी से भर दे!"सुगना का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। मालती का वह बिंदासपन और आवेग देखकर वह सुन्न पड़ गई थी। उसने देखा कि राजू ने एक झटके में मालती के भीतर प्रवेश किया, और मालती की वह चीख, जो दर्द और परम सुख का मिश्रण थी, कमरे की दीवारों से टकराकर सुगना के कानों में गूँज उठी। हवेली के उस पवित्र कमरे में अब एक वर्जित खेल अपनी पूरी तीव्रता के साथ जारी था।सुगना को याद आने लगे अपनी युवावस्था के वे दिन, जब वह इसी तरह छिपकर सोनू और लाली के मिलन को देखा करती थी। उस समय भी वह इसी तरह के द्वंद्व में फंसी रहती थी, पर आज का दृश्य कुछ अलग ही कचोट पैदा कर रहा था। सुगना जानती थी कि मालती उसकी अपनी कोख से नहीं जन्मी थी—वह बार डांसर बबीता और रतन की संतान थी—पर उसका लालन-पालन सुगना ने ही किया था। मालती का अपने मुँहबोले भाई राजू के साथ इस तरह काम-क्रीड़ा में लिप्त होना, समाज की नज़रों में अनर्थ था, पर वासना के इस खेल में समाज और रिश्तों की दीवारें ताश के पत्तों की तरह ढह जाती हैं।

कमरे में राजू और मालती के संभोग की संगीत गूंज रही थी सुगना इस दृश्य को अपनी आंखों से देख रही थी उसे अपनी युवावस्था के दिन याद आ रहे थे जब वह सोनू और लाली को संभोग करते इसी प्रकार देखा करती थी न जाने क्यों उसे यह बुरा नहीं लग रहा था मालती उसकी अपनी पुत्री नहीं थी यह वह भली भांति जानती थी परंतु उसे मालती से ऐसी उम्मीद भी नहीं थी । पर वासना की आग सबको खा जाती है ना रिश्ते नाते सुगना यह बात जानती थी और अपने आंखों के सामने मालती को अपने मुंह बोले भाई राजू से चुदते हुए देख रही थी

हवेली के उस कमरे में मोगरे की भीनी खुशबू अब जिस्मों की भारी महक में तब्दील हो चुकी थी। हवा में कोई वाद्य यंत्र नहीं बज रहा था, फिर भी साटन की चादर पर जिस्मों के टकराने की 'सपाट-सपाट' ध्वनि और मालती की बेकाबू सिसकियाँ एक आदिम संगीत की रचना कर रही थीं। बाथरूम की दरार से सुगना यह सब देख रही थी, और अजीब बात यह थी कि उसके भीतर कोई क्रोध नहीं, बल्कि यादों का एक पुराना झोंका उमड़ रहा था।

सुगना की नज़रें अब मालती की उन फैली हुई जांघों और राजू के उस निरंतर चलते प्रहारों पर जम गई थीं। उसे अहसास हुआ कि वासना की यह आग किसी संस्कार या मर्यादा को नहीं जानती। मालती, जिसे वह कल तक एक बच्ची समझती थी, आज एक पूर्ण कामुक स्त्री बनकर अपने मुँहबोले भाई के पौरुष को अपनी गहराई में समा रही थी।

सुगना सोच रही थी… "रिश्ते? नाते? सब धरे के धरे रह जाते हैं जब खून की गर्मी उबलती है। मालती ने आज वही किया जो उसके खून में था। और मैं... मैं यहाँ खड़ी बस इस आग की लपटों को देख रही हूँ।"

मालती ने एक लंबी और तीखी कराह भरी, उसके पैर राजू की पीठ पर कसते चले गए। सुगना समझ गई कि मालती अब स्खलन की उस दहलीज पर है जहाँ से वापसी मुमकिन नहीं। कमरे में गूँजता वह 'संगीत' अब अपनी चरम सीमा पर था, जहाँ सुगना, मालती और राजू... तीनों ही अलग-अलग तरीकों से उस वर्जित आनंद के भँवर में डूबे हुए थे।

राजू निढल होकर मालती के ऊपर गिर चुका था संभोग के समाप्ति होने के पश्चात सुगना को यह अंदेशा हो गया कि यह प्रेमी युगल बाथरूम में आने की कोशिश करेगा सुगना ने धीरे से बाथरूम का दरवाजा अंदर से बंद कर लिया और चुपचाप खड़ी हो गई जैसा कि उसे अंदेशा था राजू ने बाथरूम का दरवाजा खोलने की कोशिश की और नाकाम रहा उसने बार-बार प्रयास किया और मालती से पूछा यह दरवाजा क्यों नहीं खुल रहा है मालती भी पास आई और उसने भी प्रयास किया पर दरवाजा अंदर से बंद था मालती ने कहा

अरे छोड़ ना राजू अपने कमरे में जाकर कर लेना जहां ज्यादा देर रुकना ठीक नहीं है

दोनों ने जल्दी जल्दी से अपने-अपने कपड़े पहने कुछ देर बाद बेडरूम का दरवाजा लॉक होने की आवाज है और कमरे में एक शांति छा गई…



कमरे में अब सन्नाटा था, लेकिन हवा में अभी भी मालती और राजू के जिस्मों की गर्मी और मोगरे की मसली हुई खुशबू तैर रही थी। सुगना ने कांपते हाथों से बाथरूम का दरवाजा खोला। उसके पैर अभी भी लड़खड़ा रहे थे और दिल की धड़कनें बेकाबू थीं।वह धीरे-धीरे उस साटन के बिस्तर की ओर बढ़ी। उसी मरून चादर पर, जिस पर अब से कुछ देर पहले उसकी अपनी बेटी वासना का आदम खेल खेल रही थी, सुगना सिरहाने पर तकिया रखकर लेट गई। वह चादर अभी भी गरम थी और उस पर मालती के जिस्म की गंध बसी थी। सुगना के दिमाग में रह-रहकर वही दृश्य घूम रहे थे—मालती की नग्न सुडौल जाँघें, उसका वह बिंदासपन और राजू का वह जोश। उन दृश्यों ने सुगना की उस प्यास को जागृत कर दिया था जिसे उसने कई वर्षों से लोक-लाज और मर्यादा की बेड़ियों में जकड़ कर रखा था।सुगना की उंगलियां अब खुद-ब-खुद उसके पेट से नीचे सरकने लगीं। पेटीकोट के नीचे हाथ ले जाते ही उसे अपनी जादुई 'बुर' का अहसास हुआ। वहां पहले से ही इतनी फिसलन और कामुक रस की नमी थी कि वह किसी भी स्पर्श को गहराई तक समाहित करने के लिए आतुर थी। जैसे ही सुगना ने अपने पोरों से अपनी बुर के उस संवेदनशील भागनासे को छुआ, उसके पूरे शरीर में एक करंट सा दौड़ गया।वह अनुभव उतना ही तीव्र और नशीला था, जैसे 12 वर्षों तक लकड़ी के बड़े-बड़े बैरल में सहेज कर रखी गई पुरानी शराब जब पहली बार बाहर आती है, तो उसका नशा सर चढ़कर बोलता है। आज सुगना की वासना जो 12 वर्षों से सुषुप्त थी आज जागृत हो रही थी। सुगना की जाँघें तेज कंपन के साथ कांप रही थीं। उसने अपनी उंगलियों की गति बढ़ाई और अपनी बुर के उस द्वार को सहलाने लगी।उसकी बुर से निकलता हुआ वह गर्म लावा उसकी उंगलियों को भिगो रहा था। अचानक सुगना का पूरा शरीर धनुष की तरह तन गया। उसने अपनी दोनों जाँघों को एक-दूसरे से पूरी मजबूती के साथ भींच लिया। उस तेज खिंचाव और रगड़ के बीच सुगना स्खलित होने लगी। वह चरम सुख, जो उसने कई वर्षों से महसूस नहीं किया था, आज अपनी ही बेटी के संभोग को देख कर प्राप्त हुआ था।सुगना की आँखें कसकर बंद थीं और उसके गले से एक भारी आह निकली। स्खलन के उस क्षण में वह सुध-बुध खो बैठी थी, पर जैसे ही शरीर का वह तूफान शांत हुआ, एक गहरा आत्म-ग्लानि और अपराधबोध उसके मन पर छा गया।सुगना (मन ही मन सिसकते हुए): "हे भगवान! ये मैंने क्या किया? अपनी ही पुत्री के संभोग का आनंद लेकर उत्तेजित होना और फिर उस 'नयन सुख' से खुद को स्खलित करना... क्या यह उचित है? विधाता, इस पाप के लिए मुझे माफ करना।"वह उसी बिस्तर पर पसीने से तर-बतर पड़ी रही। उसकी जाँघें अभी भी रह-रहकर कांप रही थीं। लखनऊ की वह रात जहाँ सोनी और सूरज के मिलन की गवाह बनी थी, वहीं इस हवेली का यह बंद कमरा सुगना के भीतर दफन उस 'सोयी हुई कामुकता' के जागने का गवाह बन गया था।

 
भाग 193

सोनी अपने पति और भांजे के साथ एक नैनीताल की अनोखी यात्रा पर निकल चुकी थी।

गाड़ी जैसे ही पहाड़ों की घुमावदार वादियों में दाखिल हुई, बाहर का तापमान गिर रहा था, पर गाड़ी के भीतर का माहौल किसी सुलगते हुए अंगारे जैसा हो गया था। सूरज ड्राइविंग सीट पर पूरी एकाग्रता दिखाने की कोशिश कर रहा था, लेकिन उसके पजामे के भीतर मचा वह 'तूफान' शांत होने का नाम नहीं ले रहा था। पजामे के कपड़े के ऊपर से ही वह फौलादी उभार इतना स्पष्ट था कि उसे अनदेखा करना अब नामुमकिन था।

सूरज बार-बार बाएं हाथ से गियर बदलता और दाएं हाथ से अपने उस प्रचंड दंड (लंड) को व्यवस्थित करने का प्रयास करता। वह चाहता था कि किसी तरह उस तनाव को जांघों के बीच दबा ले, पर वह योद्धा अपनी पूरी कठोरता के साथ सीधा खड़ा था। बार-बार हाथ नीचे ले जाने की सूरज की इस हरकत ने आखिर बगल में बैठे विकास को मजबूर कर दिया कि वह अपनी नज़र उधर घुमाए।

विकास की नज़र जैसे ही सूरज की जांघों के जोड़ पर पड़ी, उसका दिल एक पल के लिए धड़कना भूल गया। पजामे के ऊपर उभरा वह 'विशाल तम्बू' सूरज की जांघों से शुरू होकर उसकी नाभि की दिशा में किसी पहाड़ की चोटी की तरह तना हुआ था। उसका आकार और मोटाई स्पष्ट थी। विकास ने अपनी पूरी उम्र में किसी पुरुष का ऐसा विकराल और उग्र तनाव नहीं देखा था। वह हक्का-बक्का होकर उस उभार को निहारने लगा।

विकास के मन में विचारों का बवंडर उठ खड़ा हुआ— "इतना भयानक तनाव! क्या जवानी वाकई इतनी ताकतवर होती है? यह लड़का इस हालत में गाड़ी कैसे संभाल रहा है? इसकी धमनियों में खून दौड़ रहा है या कोई खोलता हुआ लावा?"

पिछली सीट पर सोनी बिंदास बैठी हुई थी और बाहर खूबसूरत नजारों का आनंद ले रही थी और रियर व्यू से सूरज उसकी मादक जवानी का सूरज के मन में इस सफर को जितना जल्दी हो सके पूरा करने की लालसा थी उसे पता था होटल में पहुंचते ही उसकी समझदार मौसी कोई ना कोई रास्ता निकाल ही लेगी।

सूरज की जांघों के जोड़ से उठता वह खिंचाव अब असहनीय होता जा रहा था। विकास अभी भी फटी आँखों से उसी 'उभार' को देख रहा था, मानो वह उस शक्ति का अंदाज़ा लगाने की कोशिश कर रहा हो।

पहाड़ों की चढ़ाई तेज़ हो गई थी, पर विकास के दिमाग में अब नैनीताल की वादियां नहीं, बल्कि उसके बगल में बैठा वह 'युवा ज्वालामुखी' घूम रहा था। उसे अहसास होने लगा था कि सुगना ने जिस 'सिंचन' की बात की थी, उसकी असली सामर्थ्य ऐसे ही तने हुए वज्र के भीतर छिपी होती है। गाड़ी की रफ्तार के साथ-साथ वासना का वह मीटर भी अब रेड-लाइन को पार कर चुका था।

पहाड़ों की धुंध और मोड़दार रास्तों के बीच, गाड़ी के भीतर एक अजीब सी खामोशी छा गई थी, जो केवल इंजन की घरघराहट से टूट रही थी। विकास की नज़रें अब भी सूरज की जांघों के बीच उभरे उस 'विशाल पर्वत' पर टिकी थीं। उस प्रचंड उभार ने विकास के अवचेतन मन की उन परतों को कुरेद दिया था, जिन्हें वह समाज के डर से दबाए बैठा था।

सोनी के मन में लंबे और विशाल लंड के प्रति आसक्ति विकास को भली भांति ध्यान थी। यद्यपि सोनी की साउथ अफ्रीका यात्रा को कई वर्ष बीत चुके थे पर अल्बर्ट की छवि न सिर्फ सोनी के मन में अतीत विकास के मन में भी छुपी हुई थी। विकास को अचानक 'अल्बर्ट' की याद आ गई। वह काला, लंबा-तगड़ा नीग्रो, जिसके साथ विकास की सहमति से सोनी ने अपनी कामुकता के सबसे वर्जित प्रयोग किए थे।

विकास को वो रात याद आने लगीं जब वह उसके उकसावे पर सोनी अल्बर्ट के साथ वह अनोखा संभोग किया था। उस समय सोनी का कराहना और अल्बर्ट का वह जंगलीपन विकास को एक अनोखा 'पराया सुख' (Cuckoldry) दे रहा था। अचानक विकास को अपने लिंग में एक तेज तनाव महसूस हुआ हे भगवान यह मुझे क्या हो रहा है जितना ही विकास सोनी को अल्बर्ट की बाहों में देखता उसका लंड उतना ही तेज खड़ा होता..

विकास के अंतर्मन में स्मृतियों का जो लावा फूट रहा था, उसने गाड़ी की ठंडी एसी के बावजूद उसके माथे पर पसीने की बूंदें ला दी थीं। उसकी कल्पना बगल में बैठे सूरज के उस 'विकराल उभार' पर जमी थीं, लेकिन दिमाग के परदे पर बरसों पुरानी वह धुंधली और मादक फिल्म चलने लगी थी, जो साउथ अफ्रीका के उस आलीशान विला में फिल्माई गई थी।

विकास को याद आया अल्बर्ट—वह विशालकाय नीग्रो, जिसकी काली चमकती त्वचा और भारी-भरकम जिस्म किसी सधाए हुए जंगली जानवर जैसा था। विकास को अपनी वह उत्तेजना याद आई, जब उसने पहली बार सोनी और अल्बर्ट का मिलन देखा था।

अल्बर्ट का वह अंग... वह कोई इंसानी अंग नहीं, बल्कि काले पत्थर से तराशा गया कोई प्रहारक अस्त्र लगता था। जब उसने पहली बार सोनी की नाजुक कमर को अपने बड़े-बड़े हाथों में जकड़ा था, तो सोनी किसी गुड़िया की तरह उसके सामने असहाय लग रही थी।

विकास के जेहन में वह आवाज़ आज भी गूंज रही थी—सोनी के गले से निकलने वाली वह चीख, जो आधे दर्द और आधे चरम सुख की थी। अल्बर्ट के हर प्रहार पर सोनी का बदन जिस तरह कमान की तरह मुड़ता था और अल्बर्ट का वह जंगलीपन... उस दृश्य ने विकास के भीतर के भीतर एक अनोखी उत्तेजना को जन्म दिया था।

जितना ज़्यादा सोनी अल्बर्ट के नीचे पिसती थी, विकास का अपना लिंग उतना ही ज़्यादा पत्थर की तरह तन जाता था। उसे सोनी को किसी और की 'शक्ति' के सामने समर्पण करते और तृप्त होते देखना एक अनोखा अनुभव था।

अचानक, विकास की चेतना वर्तमान में लौटीं और बगल में बैठे सूरज के उस पजामे फाड़ते उभार पर टिक गईं। उसके दिमाग ने एक बिजली जैसी कौंध के साथ संबंध स्थापित किया— सूरज का यह उभार, उसकी यह जवानी, उसकी यह कच्ची और प्रचंड शक्ति... यह तो बिल्कुल अल्बर्ट जैसी है! बल्कि उससे भी कहीं ज़्यादा जीवंत और खतरनाक, क्योंकि इसमें 'देसी खून' की गर्मी है।

विकास के लिंग में एक ज़ोरदार टीस उठी। उसका अपना लंड पजामे के भीतर पूरी सख़्ती से खड़ा हो चुका था। उसे खुद पर हैरत हो रही थी कि वह अपने सगे भांजे को देखकर उत्तेजित हो रहा है, पर कामुकता तो तर्क नहीं जानती। उसके मन में एक विचार बिजली की तरह दौड़ा:

"अगर सोनी के पास फिर से वही 'अल्बर्ट वाला सुख' पाने का मौका हो, तो क्या वह सूरज को मना कर पाएगी? और क्या मैं... क्या मैं फिर से उसी मिलन के दर्शन एक सुख' का आनंद ले पाऊंगा?"

विकास को अपनी सोच पर घिन भी आ रही थी और एक अजीब सा रोमांच (Thrill) भी। वह कल्पना करने लगा कि होटल पहुँचते ही अगर वह अल्बर्ट की कहानियाँ फिर से छेड़ दे, तो क्या सोनी का मन सूरज की ओर नहीं भटकेगा? उसे लगा कि सूरज की यह 'विशालता' ही वह चाबी है, जो सोनी के भीतर दबे उस 'पुराने ज्वालामुखी' को फिर से फटने पर मजबूर कर सकती है।

सूरज की जाँघों के बीच की वह धड़कती हुई सख़्ती अब विकास के लिए मात्र एक शारीरिक अंग नहीं रह गई थी, वह उसके लिए 'अल्बर्ट के पुनर्जन्म' का प्रतीक बन गई थी। गाड़ी की खिड़की से टकराती सर्द हवा भी विकास के भीतर की उस आग को ठंडा नहीं कर पा रही थी। वह बार-बार अपनी जगह बदलता, अपने तनाव को छुपाने की कोशिश करता, पर उसकी आँखें बार-बार सूरज के उसी 'पहाड़' की ओर लौट आतीं।

वह समझ चुका था कि 'संतान सप्तमी' का यह अनुष्ठान अब केवल श्रद्धा का विषय नहीं रहा, बल्कि यह उसके अपने 'वर्जित सुख' की पुनरावृत्ति का मंच सज रहा था। विकास का मन अब उस 'काली रात' के साये को सूरज के रूप में वर्तमान में उतारने के लिए बेताब हो उठा था।

विकास की बंद आँखों के पीछे अब अल्बर्ट का चेहरा धुंधला होने लगा और उसकी जगह सूरज के जवान और कसरती बदन ने ले ली।

विकास ने कल्पना की कि इसी चलती गाड़ी में, अगर सूरज स्टीयरिंग छोड़कर पीछे चला जाए... तो क्या होगा? उसने कल्पना की कि सोनी, जो उस चुस्त सलवार-सूट में कयामत लग रही है, अपनी जांघें फैलाकर सूरज के उस 'फौलादी मूसल' का स्वागत कर रही है। विकास के मन में एक दृश्य उभरा—

सूरज का वह प्रचंड दंड, जो अभी पजामे को फाड़ने पर तुला है, सोनी की रेशमी सलवार के भीतर गायब हो रहा है। सोनी दर्द और आनंद के उस मिले-जुले अहसास में चीख रही है और विकास, जो हमेशा से इस 'वर्जित सुख' का प्रेमी रहा है, अपनी पत्नी को अपने ही भतीजे के नीचे पिसते हुए देख रहा है।

विकास ने अपनी वासना के अभिभूत होकर जो यह कल्पना की थी क्या वह हकीकत में संभव था सूरज सोनी का भांजा था और उन दोनों के बीच ऐसा रिश्ता बना लगभग असंभव सा था विकास को खुद अपनी सोच पर अफसोस भी हो रहा था पर कामुकता तो कामुकता है उसका क्या एक बार जब दिमाग में यह बात चढ़ गई तो वह बार-बार उसकी संभावनाएं तलाश में लगा

विकास के मन में चल रहा यह द्वंद्व उस आदिम संघर्ष की तरह था, जहाँ संस्कार और वासना एक-दूसरे के सामने तलवारें खींचकर खड़े थे। एक तरफ वह सामाजिक मर्यादा थी जो चीख-चीख कर कह रही थी कि सूरज और सोनी का रिश्ता 'भांजे और मौसी' का है—एक ऐसा पवित्र बंधन जिसे भारतीय समाज में माँ के समान माना जाता है। दूसरी तरफ, विकास की वह कामुक कल्पना थी जिसने अल्बर्ट वाले दौर के बाद रिश्तों की सीमाओं को धुंधला कर दिया था।

विकास को अपनी सोच पर रह-रहकर ग्लानि भी हो रही थी। वह खुद से सवाल कर रहा था, "क्या मैं पागल हो गया हूँ? सूरज सुगना दीदी का बेटा है... यह कैसे संभव है?" उसे लगा कि अगर सुगना को इसकी भनक भी लगी, तो वह उसे जीवित नहीं छोड़ेगी। समाज की नज़र में यह एक ऐसा 'पाप' था जिसकी कोई माफ़ी नहीं थी।

परंतु, कामुकता का एक कड़वा सच यह भी है कि जब वह दिमाग पर चढ़ती है, तो सबसे पहले तर्क और रिश्तों की बलि चढ़ाती है। विकास के मन में बार-बार सुगना के वे शब्द गूँज रहे थे— 'सिंचन', 'अनुष्ठान', और 'मर्दानगी'। उसे लगने लगा कि क्या सुगना ने खुद भी इसी संभावना की ओर इशारा किया था?

विकास का शैतानी दिमाग अब तर्क ढूँढने लगा

उसने सोचा कि यदि यह 'संतान प्राप्ति' का एक गुप्त धार्मिक अनुष्ठान है, तो इसमें शरीर केवल एक माध्यम है। जैसे नियोग प्रथा में होता था।

नैनीताल में उन्हें कोई जानने वाला नहीं होगा। वहां जो कुछ भी होगा, वह उन तीन लोगों के बीच एक 'गुप्त संधि' बनकर रह जाएगा।

विकास को यह अनुमान भी था कि कुंवारे युवा लड़कों में सेक्स को लेकर बड़ी उत्सुकता होती है हो सकता है कि थोड़ा उकसाने पर सूरज भी वासना के जाल में घिरकर सोनी की बाहों में आ जाए।

विकास अब उस स्थिति में था जहाँ से वापसी का रास्ता बंद हो चुका था। अफसोस और शर्मिंदगी की परतें धीरे-धीरे हट रही थीं और उनकी जगह एक योजना ले रही थी। वह अपनी कल्पनाओं में यह देखने लगा कि वह कैसे इन दोनों को करीब लाएगा। क्या वह खुद ही सूरज को उकसाएगा? या वह सोनी को इस अनोखे और वर्जित मिलन के लिए उकसाएगा?

गाड़ी अब नैनीताल की चढ़ाई चढ़ रही थी। बाहर पहाड़ों की ठंडी हवा थी, पर विकास के भीतर एक अनोखा चलेंगे जाग चुका था।उसे अब सूरज और सोनी के बीच का वह 'असंभव' रिश्ता एक 'चुनौती' लगने लगा था। उसे लगने लगा कि अगर वह इस असंभव को संभव कर पाया, तो उसे वह 'पराया सुख' मिलेगा जो उसने अल्बर्ट के साथ पाया था, पर इस बार इसमें अपनापन और 'कुल की वृद्धि' का तड़का भी होगा।

विकास ने तिरछी नज़र से सूरज के चेहरे को देखा, जहाँ तनाव और थकान के निशान थे। फिर उसने पीछे बैठी सोनी को देखा, जो अपनी सलवार-सूट में किसी कयामत सी सज-धज कर बैठी थी। विकास ने मन ही मन तय कर लिया— "रिश्ते केवल नाम के होते हैं, असली सत्य तो वह भूख है जो आज इन दोनों की आँखों में दिख रही है।" उसने उस 'पाप' को 'पुण्य' का चोला पहनाने की तैयारी शुरू कर दी थी।

अपनी वासना में डूबता उतराता विकास तरह-तरह की कल्पना करता और हर बार उसे जब-जब वह हकीकत का जामा पहनाने की कोशिश करता हुआ मुंह की खाता सूरज और सोनी के बीच अल्बर्ट वाले रिश्ते को लाने के लिए ताना-बाना बुना इतना आसान नहीं था। विकास को क्या पता था कि जिस मिलन की वह भूमिका लिख रहा है वह मिलन एक बार नहीं बारंबार पूर्ण हो चुका है।

वह अपनी बुद्धि पर गुमान कर रहा था कि वह एक 'महान निर्देशक' की तरह इस कामुक नाटक की पटकथा लिख रहा है, जबकि पर्दे के पीछे का खेल तो वह पहले ही हार चुका था।

विकास की मनोदशा उस समय किसी मदहोश जुआरी की तरह थी, जो जीत की उम्मीद में अपनी सबसे कीमती विरासत दांव पर लगाने को तैयार था। वह मन ही मन ऐसे 'दृश्य' गढ़ रहा था, ऐसी 'परिस्थितियाँ' बुन रहा था, जिनसे सूरज और सोनी को एक-दूसरे की बाहों में धकेला जा सके। उसे लग रहा था कि उसे इन दोनों को 'मनाना' होगा, उन्हें 'उकसाना' होगा और शायद 'अल्बर्ट' की कहानियाँ सुनाकर सोनी के भीतर की उस सोई हुई प्यास को फिर से जगाना होगा।

गाड़ी की रफ्तार के साथ विकास की योजनाएं भी परवान चढ़ रही थीं। वह सोच रहा था कि नैनीताल पहुँचते ही वह कोई ऐसा 'संयोग' बनाएगा, जिससे उसे उन दोनों को नग्न देखने का मौका मिले। उसे कहाँ पता था कि सूरज और सोनी भी उतनी ही बेसब्री से उस मोड़ का इंतज़ार कर रहे थे।

नैनीताल के ऊँचे पहाड़ अब सामने दिखने लगे थे। सोनी, जो विकास के ठीक पीछे बैठी थी, उसकी नज़रें भी सूरज की जाँघों के बीच मची उस खलबली पर टिकी थीं। जब-जब सूरज का हाथ उस तड़पते हुए उभार को व्यवस्थित करने के लिए नीचे जाता, सोनी के दिल की धड़कन एक पल के लिए रुक जाती।

सोनी को रह-रहकर सुबह की वह हड़बड़ाहट याद आ रही थी। वह मन ही मन खुद को कोस रही थी— "मैं कितनी लापरवाह हूँ... अपने सुख की मदहोशी में मैं सूरज को इस तड़प में अकेला छोड़ आई।" उसे लग रहा था कि सूरज का यह असहनीय तनाव उसके उसी 'अधूरे कृत्य' का परिणाम है।

एक तरफ उसे इस बात का गहरा अफसोस था, तो दूसरी तरफ वह सूरज के उस विकराल पौरुष को देखकर फिर से मोहित हो रही थी। उसे लग रहा था कि सूरज का यह 'अंग' मात्र मांस का टुकड़ा नहीं, बल्कि उसकी मर्दानगी का वह प्रमाण है जो उसे दुनिया के हर पुरुष से श्रेष्ठ बना रहा था। पर साथ ही, विकास की मौजूदगी और 'भांजा-मौसी' के रिश्ते की दीवार उसे अंदर ही अंदर डरा रही थी।

जब भी सूरज की नज़रें रियर-व्यू मिरर (शीशे) में सोनी से टकरातीं, सोनी की आँखों में एक अजीब सा अपराध बोध (Guilt) साफ़ झलकता। वह अपनी नज़रों से जैसे सूरज से माफ़ी मांग रही थी— "मुझे माफ़ कर दे रे सूरज, मेरी वजह से तू इस हाल में है।"

सूरज, जो दर्द और उत्तेजना की उस बारीक लकीर पर खड़ा था, सोनी की उस तड़प को बखूबी महसूस कर रहा था। वह देख रहा था कि उसकी मौसी की आँखें उसकी इस 'हालत' को देखकर कितनी व्याकुल हैं। सूरज की आँखों में गुस्सा नहीं, बल्कि एक अथाह प्रेम और समर्पण था। वह अपनी नज़रों से सोनी को दिलासा दे रहा था— "मौसी, आप दुखी मत होइए... आपकी ये फिक्र ही मेरे इस दर्द की दवा है।"

उस सफर में उन दोनों के बीच एक ऐसे रिश्ते ने आकार ले लिया था, जो केवल वासना तक सीमित नहीं था। यह एक ऐसा गहरा भावनात्मक जुड़ाव था जहाँ एक का सुख दूसरे की मुस्कान बन जाता था और एक की पीड़ा दूसरे की आँखों में आँसू ले आती थी। सोनी को महसूस हो रहा था कि सूरज का वह तनाव अब उसका अपना दर्द बन चुका है। वह चाहकर भी अपनी नज़रें वहां से हटा नहीं पा रही थी।

आखिरकार विकास ने अपनी योजना को अंजाम देने की सोच ली। नैनीताल पहुंचने से कुछ समय पहले ही वह ड्राइविंग सीट पर आ गया और वह तीनों शहर के सबसे खूबसूरत और महंगे फाइव स्टार होटल में पहुंच गए। विकास ने रिसेप्शन पर जाकर बातचीत की और कुछ ही देर बाद तीनों उसे होटल के सबसे खूबसूरत प्रेसिडेंशियल सूट के दरवाजे के सामने खड़े थे।

नैनीताल का वह प्रेसिडेंशियल सुइट अपनी भव्यता से किसी राजा के महल का अहसास करा रहा था। जैसे ही तीनों भीतर दाखिल हुए, वहां की सजावट और माहौल ने उनकी इंद्रियों को झकझोर दिया। सुइट के भीतर कदम रखते ही ऐसा लगता था मानो किसी ने वासना और विलासिता का एक सुंदर संगम तैयार किया हो।

मुख्य बेडरूम के बीचों-बीच वह विशाल और ऊंचा बिस्तर लगा था, जिस पर बिछी सफेद रेशमी चादरें और उस पर रखे लाल मखमली तकिए किसी भी जोड़े को बाहों में भरने के लिए उकसाने को काफी थे। कमरे की मद्धम पीली रोशनी दीवारों पर लगे चित्रों और नक्काशीदार फर्नीचर पर पड़कर एक मादक सुनहरा अहसास पैदा कर रही थी।

बेडरूम से सटा हुआ बाथरूम अपने आप में एक लग्जरी था। वहां का बाथटब इतना बड़ा था कि दो जिस्म आसानी से उसमें समा सकें। कांच की दीवारों और महंगे मार्बल से बना यह कोना किसी भी गुप्त मिलन को यादगार बनाने के लिए तैयार था।

बाहर का ड्राइंग रूम भी किसी से कम नहीं था। वहां रखा वह खूबसूरत बेड (सोफा-कम-बेड) सूरज के लिए सर्वथा उपयुक्त था। विकास ने बड़ी चतुराई से यह व्यवस्था चुनी थी ताकि सूरज ड्राइंग रूम में रहकर भी उनकी 'पहुँच' में रहे।

ड्राइंग रूम में भी एक अलग बाथरूम था, जिसका अर्थ था कि सूरज को अपनी जरूरतों के लिए बेडरूम में आने की मजबूरी नहीं थी, लेकिन विकास के दिमाग में तो योजना कुछ और ही थी।

दोनों ही कमरों की विशाल कांच की खिड़कियों से नैनीताल की दूधिया वादियां और पहाड़ियों की ओट से झांकती झील साफ दिखाई दे रही थी। बाहर बर्फ की हल्की फुहार गिर रही थी, जो खिड़की के कांच पर धुंध पैदा कर रही थी। कमरे के भीतर की गर्माहट और बाहर की वह बर्फीली ठंड एक अद्भुत विरोधाभास पैदा कर रही थी।

सोनी ने कमरे के कोनों को देखा और उसकी सांसें भारी हो गईं। उसे महसूस हुआ कि यह सुइट किसी साधारण यात्रा के लिए नहीं, बल्कि एक शाही हनीमून के लिए डिजाइन किया गया था। विकास ने भी मुस्कुराते हुए कमरे का मुआयना किया, उसे लगा कि उसकी योजना के लिए इससे बेहतर रंगमंच नहीं मिल सकता था।

विकास (हल्की आवाज़ में): "सोनी, देखो तो... यहाँ की हवाओं में ही नशा है। ऐसा लगता है जैसे हम फिर से अपने पुराने दिनों में लौट आए हैं।"

सोनी ने खिड़की से बाहर देखते हुए सूरज की ओर एक तिरछी नज़र डाली, जो अपना बैग ड्राइंग रूम के बिस्तर पर रख रहा था। उस पीली रोशनी में सूरज का कसरती बदन और उसकी जाँघों के बीच का वह असहनीय तनाव और भी उभर कर दिख रहा था।

नैनीताल की वह पहली रात अब सज चुकी थी। वह आलीशान सुइट अब साक्षी बनने वाला था—एक पति की अजीबोगरीब चाहत का, एक मौसी के अपराध बोध से भरे प्यार का, और एक भांजे के उस 'प्रचंड सिंचन' का जो इस सुइट की मर्यादाओं को लांघने के लिए बेताब था।

नैनीताल की उस बर्फीली शाम में, उस आलीशान प्रेसिडेंशियल सुइट के भीतर नियति अपना खेल रच रही थी। किस्मत देखिए कि इतने महंगे होटल के उस कमरे का टेलीफोन खराब था। विकास, जिसे गरमा-गरम चाय और कुछ ज़रूरी सामान मंगवाना था, चिढ़ गया। उसने सोनी को आवाज़ दी और कहा कि वह रिसेप्शन तक जा रहा है क्योंकि इंटरकॉम काम नहीं कर रहा।

जैसे ही मुख्य दरवाज़ा बंद हुआ और विकास के कदमों की आहट कॉरिडोर में ओझल हुई, पूरे सुइट में एक मादक सन्नाटा पसर गया। सोनी, जो बेडरूम में अपनी सलवार-सूट की नसों को ढीला कर रही थी, तेज़ी से ड्राइंग रूम की ओर लपकी।

उसने बाथरूम के दरवाज़े पर ज़ोर से दस्तक दी।

सोनी (धीमी और हड़बड़ाई आवाज़ में): "सूरज! ओ सूरज... जल्दी बाहर आ, दरवाज़ा खोल!"

सूरज, जो अपने उस प्रचंड तनाव को शांत करने की नाकाम कोशिश कर रहा था, झटके से बाहर आया। उसकी आँखों में वासना की सुर्खी थी।

सोनी (आह भरते हुए): "सूरज... मुझे माफ़ कर दे रे! सुबह विकास जी ने ऐसी हड़बड़ी मचाई कि मैं इसे शांत करना ही भूल गई। पूरा रास्ता तू इस आग में जलता रहा, मैं शीशे में सब देख रही थी।"

सोनी ने बड़ी व्याकुलता से अपना हाथ नीचे बढ़ाया और सूरज के पजामे के ऊपर से ही उस कठोर मूसल (लंड) को अपनी मुट्ठी में जकड़ लिया। स्पर्श पाते ही सूरज का शरीर धनुष की तरह तन गया। उसने सोनी की गर्दन में अपना मुँह गड़ा दिया।

सूरज (हांफते हुए): "मौसी, अब बर्दाश्त नहीं होता। यह पजामा फाड़कर बाहर आने को तड़प रहा है। मौसा जी के आने में अभी वक्त है... एक आहुति अभी दे दी जाए?"

सूरज ने सोनी की सूट के घेरे को ऊपर उठाने की कोशिश की, पर सोनी ने बड़ी चतुराई से उसका हाथ रोक दिया।

सोनी: "नहीं सूरज! ऐसी गलती मत करना। विकास जी बस अभी आते ही होंगे। पकड़े गए तो अनर्थ हो जाएगा। पर सुन... मैं तेरा ये तनाव अभी कम किए देती हूँ। वैसे भी आज की मुख्य आहुति तो सुबह-सुबह हो ही चुकी है, यह तो बस सुबह का बचा हुआ नशा है।"

सोनी वहीं घुटनों के बल बैठ गई। उसने सूरज के पजामे की डोरी ढीली की और उस दिग्गज पौरुष को आज़ाद कर दिया। वह अंग अपनी पूरी लम्बाई और कठोरता के साथ सोनी के चेहरे के सामने लहराने लगा। सोनी ने उसे अपने कोमल हाथों में लिया और बड़ी मादकता से उसे सहलाने लगी।

सोनी ने अपने गीले होठों से उस तने हुए अंग के ऊपरी हिस्से को स्पर्श किया और गुब्बारे की हवा निकल गई…

तभी बाहर कॉरिडोर में किसी के चलने की आवाज़ आई। सोनी बिजली की फुर्ती से खड़ी हुई, सूरज का पजामा ठीक किया और वापस बेडरूम की ओर भाग गई, जबकि सूरज वापस अपने बाथरूम में चला गया।

विकास जब कमरे में दाखिल हुआ, तो उसे लगा कि सब कुछ शांत है पर नायक और नायिका दोनों अपने-अपने बाथरूम में अगले मिलन की तैयारी कर रहे थे।

शेष अगले भाग में

 
भाग 194



आईए अब आपको देहरादून लिए चलते हैं जहां इस कहानी का एक मुख्य पात्र अपनी पढ़ाई पूरी कर इस कामुक दुनिया में वापस आने को तैयार था….

देहरादून की हसीन वादियों में बसा दून स्कूल आज एक अलग ही हलचल का गवाह बना हुआ था। चारों तरफ विदाई के हाथ, गले मिलते दोस्त और घर वापसी की ख़ुशी बिखरी हुई थी। कक्षा 12वीं का रिजल्ट उम्मीदों के मुताबिक शानदार रहा था और अब विद्यार्थियों के सामने भविष्य का खुला आसमान था।

इन्हीं विद्यार्थियों के बीच पिंकी अपनी सहेलियों से विदा लेकर अपने सामान के साथ खड़ी थी। पिंकी, जो अपनी मासूमियत और तेज़ दिमाग के लिए स्कूल में जानी जाती थी, आज कुछ ज़्यादा ही चहक रही थी।

पिंकी की काया अब एक बच्ची की नहीं, बल्कि एक खिलती हुई कली की थी। दून की ठंडी हवाओं ने उसके रंग को और भी निखार दिया था। नीली जींस और सफ़ेद कुर्ती में वह सादगी और आधुनिकता का एक अनूठा संगम लग रही थी।



  • उम्र: लगभा 18 वर्ष।
  • कद: 5 फुट 4 इंच, सुडौल और फुर्तीला बदन।
  • आंखें: बड़ी और शरारती, जिनमें अब अपनी माँ मिलने की बेताबी साफ़ झलक रही थी।
स्कूल के भारी नक्काशीदार गेट से जब पिंकी बाहर निकली, तो वहां मौजूद हर शख्स की नजरें एक पल के लिए ठहर गईं। स्कूल के भीतर की दुनिया और बाहर की दुनिया में जमीन आसमान का अंत था बाहर समाज की कामुक निगाहे पिंकी पर टिक गईं..

पिंकी महज एक छात्रा नहीं, बल्कि साक्षात मोम की गुड़िया सी प्रतीत हो रही थी। उसका रंग इतना साफ और निखरा हुआ था जैसे उसे किसी ने सफेद संगमरमर को तराश कर बनाया हो। चेहरे पर मासूमियत और आंखों में भविष्य की चमक लिए, जब वह अपने दोनों हाथों में दो भारी ब्रीफकेस संभाले बाहर आई, तो उसकी कोमलता और उन भारी बैगों का विरोधाभास उसे और भी गरिमामय बना रहा था।

दून स्कूल के उस ऐतिहासिक गेट के बाहर का नज़ारा भीतर की अनुशासनबद्ध दुनिया से बिलकुल जुदा था। वहां हवा में आज़ादी की महक थी, तो साथ ही समाज के उन भूखे भेड़ियों की नज़रें भी, जो स्कूल से निकलने वाली हर 'कली' को अपनी हवस भरी निगाहों से तौल रहे थे।

पिंकी जैसे ही अपने दो भारी ब्रीफकेस घसीटते हुए बाहर आई, गेट के पास खड़े दो टैक्सी ड्राइवर—करम सिंह और छोटू—की नज़रें उस पर जाकर चिपक गईं। करम सिंह, जिसकी उम्र कोई 35 के पार थी और जिसकी आँखों में हमेशा एक गंदी चमक रहती थी, ने अपनी बीड़ी का धुआं हवा में छोड़ा और कोहनी से छोटू को इशारा किया।

करम सिंह (दांत चियाते हुए): "अबे ओए छोटू... ज़रा दाएं देख। लग रहा है आज दून की वादियों में साक्षात अप्सरा उतर आई है। ये सफ़ेद कुर्ती में जो पटाखा बाहर निकला है, इसे देख कर तो लग रहा है जैसे किसी ने मलाई के गोले पर सिंदूर छिड़क दिया हो।"

छोटू, जो अभी जवान ही हो रहा था, पिंकी की सुडौल काया और जींस में कसी उसकी सुडौल जाँघों को देखकर अपनी राल टपकाने लगा।

छोटू (हवस भरी आवाज़ में): "उस्ताद, ये तो कयामत है! इसकी मासूमियत देख रहे हो? पर जींस के भीतर जो बदन की गोलाई उभर रही है, उसे देख कर तो अच्छे-अच्छों का ईमान डोल जाए। साला, मन कर रहा है कि अभी जाकर इसके ये भारी बैग उठा लूँ और इसे अपनी गाड़ी की पिछली सीट पर बिठाकर सीधे मसूरी के किसी अंधेरे कोने में ले जाऊं।"

करम सिंह: "बैग की बात छोड़ छोटे, तूने इसकी चाल देखी? जब ये ब्रीफकेस खींच रही है, तो इसके कुर्ती के नीचे जो उभार (वक्ष) हिल रहे हैं, वो साले कलेजा चीर रहे हैं। कसम से, अगर ये एक रात के लिए हाथ लग जाए, तो मैं अपनी टैक्सी इसके नाम कर दूँ। देख, जींस कितनी तंग है... साला, रगड़-रगड़ के रंग साफ़ हो गया होगा वहां का।"

छोटू (हँसते हुए): "सही कह रहे हो उस्ताद। ये रईसज़ादों की बेटियां बाहर से जितनी भोली दिखती हैं, अंदर से उतनी ही गरम होती हैं। इसकी आँखें देख रहे हो? शरारत तो कूट-कूट कर भरी है। ऐसी 'मोम की गुड़िया' को तो बिस्तर पर लिटाकर बस घंटों निहारने का मन करता है। और जब ये सिसकारी भरेगी, तो सोचो कैसा समां होगा।"

पिंकी इन सब बातों से बेखबर, अपनी माँ मनोरमा से मिलने की बेताबी में अपनी निगाहें इधर-उधर दौड़ा रही थी। उसे अंदाज़ा भी नहीं था कि उसकी कोमलता और निखरा हुआ रंग उन मनचलों के भीतर वासना का कैसा तेज़ाब घोल रहा था। उन ड्राइवरों की नज़रें पिंकी के हर कदम के साथ उसकी कमर और जाँघों के उभारों का पीछा कर रही थीं, मानो वे उसे अपनी निगाहों से ही निर्वस्त्र कर देना चाहते हों।

देहरादून का यह सफर अब पिंकी के लिए सिर्फ घर वापसी नहीं, बल्कि उस कामुक दुनिया के द्वार खोलने वाला था जिसकी उसे अभी रत्ती भर भी भनक नहीं थी।

तभी गेट के ठीक सामने खड़ी एक चमचमाती एम्बेसडर कार का दरवाजा पूरी ठसक के साथ खुला। सरकारी सुरक्षा गार्ड ने फुर्ती से पीछे का दरवाजा खोला और भीतर से जो महिला बाहर निकली, उन्हें देखकर ऐसा लगा मानो वक्त की रफ्तार थम गई हो।

वे कोई और नहीं, मनोरमा थीं।

प्रिय पाठकों, शायद आपको वह मनोरमा एसडीएम याद होंगी, जिनके सानिध्य में सरयू सिंह कार्य किया करते थे। मनोरमा एक कड़क और प्रभावशाली अधिकारी थीं, लेकिन सरयू सिंह और उनके परिवार से वह भली-भांति परिचित थीं। विशेष रूप से सुगना के व्यक्तित्व ने उन्हें बेहद प्रभावित किया था और वह उसे बड़े आदर और सम्मान की दृष्टि से देखती थीं।

यह वही मनोरमा थीं, जो बनारस महोत्सव के दौरान अपने टेंट में सरयू सिंह से अकस्मात चूद गई थीं। उस रात टेंट के अंधेरे में एक बड़ी गलतफहमी हुई थी—सरयू सिंह ने पीछे से मनोरमा को अपनी बाहों में भर लिया था। उस वक्त उनके जेहन में सिर्फ सुगना का ख्याल था और पूर्व नियोजित कार्यक्रम के अनुसार सुगना को वहां होना था। उन्होंने मनोरमा को सुगना समझकर ही दबोच लिया था। इसका विस्तृत विवरण आप लोग पुराने एपिसोड को दोबारा पढ़ कर देख सकते हैं।

मनोरमा, जो हमेशा अनुशासन और सत्ता के घेरे में रहती थीं, सरयू सिंह के उस प्रचंड और मर्दाना स्पर्श के सामने एक पल में निढाल हो गई थीं। वह भूलवश हुआ मिलन मनोरमा के जीवन की वह याद बन गया, जिसे वह आज भी लखनऊ के अपने आलीशान बंगले में अकेलेपन के क्षणों में महसूस करती हैं।

सरयू सिंह और मनोरमा का वह मिलन, जिसने न केवल मनोरमा की देह को तृप्त किया था, बल्कि उसके जीवन की दिशा ही बदल दी थी। मनोरमा की उस प्यासी कोख ने सरयू सिंह के उस प्रचंड पौरुष और उनकी याद को अपने भीतर गहरे तक संजो लिया था। वह भूलवश हुआ संभोग एक जीवंत बीज बो गया था, जो आज पिंकी के रूप में इस धरा पर खेल रहा था।

मनोरमा के व्यक्तित्व में अब वह पहले वाली झिझक या साधारणपन कहीं नहीं था। अब वे एक उच्च और प्रतिष्ठित सरकारी पद पर आसीन हो चुकी थीं, जिसका तेज उनके चेहरे पर साफ झलक रहा था। खादी की सिल्क साड़ी, सलीके से बंधे बाल और आंखों पर चढ़ा कीमती चश्मा उनकी बौद्धिकता और सत्ता का परिचय दे रहा था। खूबसूरती के मामले में वे आज भी अपनी बेटी को टक्कर दे रही थीं, पर उनकी सुंदरता में अब एक राजसी 'ग्रेस' और रुतबा जुड़ चुका था।

पिंकी ने जैसे ही अपनी माँ को देखा, उसके चेहरे पर एक हजार वाट की मुस्कान खिल उठी।

पिंकी (चहकते हुए): "माँ! आप खुद मुझे लेने आईं?"

मनोरमा (गंभीर पर मधुर स्वर में): "तुम्हारे रिजल्ट की खुशी और घर वापसी का दिन... मैं कैसे नहीं आती पिंकी? चलो, अब तुम्हारी माँ तुम्हें उस दुनिया में वापस ले जा रही है, जहाँ से तुम्हारी असली पहचान शुरू होती है।"

मनोरमा ने आगे बढ़कर अपनी 'संगमरमर की मूरत' को गले से लगा लिया। उस आलिंगन में केवल माँ की ममता नहीं थी, बल्कि एक गौरव भी था। मनोरमा ने पिंकी के माथे को चूमा और गार्ड को इशारा किया कि सामान गाड़ी में रखे।

करम सिंह और छोटू को अपनी औकात याद आ गई.. मनोरमा के साथ है सिक्योरिटी गार्डों को देखकर वह अपनी टैक्सी में छुप गए और नज़रे चुराने लगे उनके लिए पिंकी के आसपास जाना भी अपनी जान से खेलने जैसा था।

एम्बेसडर कार जब दून स्कूल की ढलानों से नीचे उतरने लगी, तो पीछे छूट रही थीं किताबें और हॉस्टल की यादें।

पिंकी एम्बेसडर की पिछली सीट पर मनोरमा के बगल में बैठी थी गाड़ी के भीतर की वातानुकूलित हवा भी उसकी देह से उठने वाली उस भीनी-भीनी 'दूधिया खुशबू' से महक उठी। वह अभी वासना के ककहरे से कोसों दूर थी, लेकिन कुदरत ने उसके बदन को एक ऐसी मादक लिखावट में ढाल दिया था जिसे शब्दों में बांधना मुश्किल था।

उसका रंग किसी ठंडे सफेद संगमरमर की तरह था, जिस पर दून की गुलाबी ठंड ने गालों और उंगलियों के पोरों पर हल्का सा सिंदूरी रंग छिड़क दिया था। पिंकी ने अपनी शालीनता को बनाए रखने के लिए पूरी कोशिश की थी, लेकिन उसकी बढ़ती हुई जवानी उन कपड़ों की सीमाओं को चुनौती दे रही थी।

उभारों का आकर्षण: उसने जो सूती कुर्ती पहनी थी, वह बहुत ढीली नहीं थी। जब वह अपनी माँ से बात करने के लिए थोड़ा झुकती, तो उसके पुष्ट और सुडौल वक्षों का उभार उस कपड़े को भीतर से तान देता। वे अभी कच्चे पर बेहद सलीके से सांचे में ढले हुए मांसल गोले की तरह प्रतीत होते थे, जो उसकी हर सांस के साथ मचल उठते थे।

कमर की लचक: कुर्ती के नीचे से उसकी कमर का वह हिस्सा, जहाँ से वह शुरू होती थी, बहुत ही बारीक और लचीला था। जब वह खिड़की से बाहर देखने के लिए करवट लेती, तो उसकी कमर पर पड़ने वाली हल्की सी सिलवटें उसकी त्वचा की कोमलता का एहसास कराती थीं—मानो कोई मोम की मूरत ज़रा सा छूने पर पिघल जाएगी।

नितंबों का ढलान: सीट पर बैठे होने के कारण उसकी भारी और सुडौल जांघों ने नीली जींस को पूरी तरह भर दिया था। जींस की सिलाई उसके पीछे के उन भरे हुए और गोल नितंबों की बनावट को चाहकर भी छुपा नहीं पा रही थी। वे इतने सख्त और गोल थे कि उनका आकार किसी प्यासे की नज़र को वहीं बांध लेने के लिए काफी था।

गर्दन और कंधे: पिंकी ने अपने बालों को ढीला बांधा था, पर फिर भी कुछ रेशमी लटें उसकी उस लंबी और सुराहीदार गर्दन पर फिसल रही थीं। उसके कंधे इतने चिकने और सफेद थे जैसे उन पर सुबह की पहली ओस जम गई हो। उसके गर्दन के पीछे का वह हिस्सा, जिसे 'नूप' कहते हैं, वहां से उभरती नसों का नीलापन उसकी पवित्रता और कामुकता का एक अजीब संगम पेश कर रहा था।

पिंकी अपनी माँ की बातों में खोई हुई थी, कभी खिलखिलाती तो कभी खिड़की के कांच पर अपनी उंगलियाँ फिराती। उसे इस बात का रत्ती भर भी इल्म नहीं था कि उसकी यह 'अनजान खूबसूरती' अब किसी कली की तरह पूरी तरह चटक चुकी है। वह उस खिलते हुए फूल की तरह थी जिसके पास सुगंध तो बहुत है, पर उसे अभी यह नहीं पता कि भंवरे उसकी इस गंध के पीछे किस हद तक पागल हो सकते हैं।

मनोरमा अपनी बेटी के इस उभरते हुए हुस्न को कनखियों से देख रही थी। उसे अपनी बेटी पर गर्व भी था और शायद वह यह भी महसूस कर रही थी कि अब पिंकी उस उम्र में आ चुकी है जहाँ वह किसी के भी मन में हलचल पैदा कर दे।

देहरादून की पहाड़ियों से नीचे उतरती वह एम्बेसडर कार केवल एक यात्रा पर नहीं थी, बल्कि यह नियति के एक चक्र को पूरा कर रही थी। गाड़ी के भीतर की खामोशी में यादों और उमंगों का एक अनूठा संगम था।

मनोरमा, जो अब सत्ता के शीर्ष पर थीं, अपनी बेटी के निखरे हुए हुस्न को देखकर भावुक हो उठीं। पिंकी के चेहरे पर जब सूरज की रोशनी पड़ती, तो उसकी त्वचा किसी पारभासी कीमती पत्थर की तरह चमक उठती। मनोरमा ने गौर किया कि पिंकी के नक्शों में सरयू सिंह की वह तीक्ष्णता और तेज साफ़ झलक रहा था। उसकी लंबी और सुराहीदार गर्दन, माथे की चौड़ाई और उसकी आँखों में छिपी वह मर्दाना ज़िद—सब कुछ उस रात की याद दिला रहे थे जब सरयू सिंह ने उन्हें अपनी बाहों में भर कर उनके भीतर स्त्रीत्व का एक नया संसार बसा दिया था।

मनोरमा ने पिंकी के रेशमी बालों पर अपना हाथ रखा और बड़े प्यार से सहलाने लगी।

पिंकी अपनी माँ के स्पर्श को महसूस कर उनकी ओर घूमी, जिससे उसकी कुर्ती उसके सुडौल वक्षों पर और भी तन गई। उसकी मुस्कान में जो मासूमियत थी, वह किसी को भी घायल करने के लिए काफी थी।

पिंकी अब भी अपनी ही खूबसूरती से बेखबर थी। वह खिड़की से बाहर भागते पेड़ों को देख रही थी। जब उसने अपना हाथ ऊपर उठाकर अपने बिखरे बालों को संवारा, तो उसकी कुर्ती ऊपर की ओर खिसकी, जिससे उसकी जींस और कुर्ती के बीच से उसकी वह मखमली और सफेद कमर की झलक दिखाई दी। वह त्वचा इतनी साफ और कोमल थी कि मानो कुदरत ने उसे बहुत फुरसत में गढ़ा हो।

सीट पर उसके बैठने के अंदाज़ से उसके पुष्ट नितंबों का उभार जींस को चुनौती दे रहा था। उसकी लंबी और गोरी जांघें, जो जींस के भीतर कसी हुई थीं, उसके पूरे व्यक्तित्व को एक 'एथलेटिक' पर बेहद कामुक रूप दे रही थीं। वह एक ऐसी मूरत थी जिसे देखकर वासना और श्रद्धा, दोनों एक साथ जाग जाएं।

मनोरमा (मंद मुस्कान के साथ): "पिंकी, अब तुम बड़ी हो गई हो। घर पहुँचते ही बहुत कुछ बदलने वाला है। तुम्हारी ये मासूमियत अब दुनिया के सामने एक ढाल बनेगी, या एक चुनौती... यह तो वक्त ही बताएगा।"

पिंकी ने अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से माँ को देखा और उनका हाथ थाम लिया। वह ज्यादा कुछ तो नहीं समझ पाई और बेहद बिंदास तरीके से बोली

जब मेरी मां मेरे साथ है तो मुझे कोई डर नहीं कोई चिंता नहीं…

मनोरमा ने अपनी उंगलियां उसकी बालों से हटाए और उसके गाल को प्यार से सहलाते हुए बोला…. मेरी बच्ची…यह कहते हुए उसके होंठ चुंबन की मुद्रा में आ गए और उसने पिंकी को एक फ्लाइंग किस दे दिया.

कुछ ही देर में मनोरमा और पिंकी एयरपोर्ट के सामने थे जहां से उन्हें लखनऊ वापसी के लिए फ्लाइट पकड़नी थी।

देहरादून एयरपोर्ट का वह दृश्य अपने आप में किसी बड़े घटनाक्रम का संकेत दे रहा था। एक तरफ सत्ता का रसूख था, तो दूसरी तरफ अध्यात्म और जनसैलाब का संगम। मनोरमा की एम्बेसडर कार जब वीआईपी लेन से एंट्रेंस की ओर बढ़ी, तो बाहर का नजारा देखकर मनोरमा की भृकुटियाँ तन गईं।

सुरक्षा गार्ड ने जब बताया कि यह 'परमानंद' का काफिला है, तो मनोरमा के चेहरे पर एक गंभीर विचार कौंध गया।

परमानंद—महज एक नाम नहीं, बल्कि उस विरासत का उत्तराधिकारी था जिसे विद्यानंद ने खड़ा किया था। विद्यानंद, जो दुनिया की नज़रों में एक सिद्ध महात्मा और आश्रम का सर्वेसर्वा था, हकीकत में सरयू सिंह का ही सगा भाई था। सरयू सिंह के परिवार का वह 'तेज' और 'आकर्षण' विद्यानंद की रगों में भी दौड़ रहा था, और वही विरासत अब परमानंद के रूप में सामने थी।

देहरादून एयरपोर्ट का वह कोलाहल जैसे परमानंद के बाहर निकलते ही एक जादुई सन्नाटे में बदल गया। परमानंद का व्यक्तित्व केवल आकर्षक नहीं, बल्कि दिव्य और राजसी था। वह जब अपनी रेशमी धोती और केसरिया कुर्ते में चलता, तो ऐसा लगता मानो किसी प्राचीन गाथा का कोई नायक आधुनिक युग में जीवंत हो उठा हो।

6 फीट की प्रभावशाली लंबाई और तराशा हुआ बलिष्ठ बदन परमानंद की सबसे बड़ी खूबी थी। उसका सीना इतना चौड़ा और मजबूत था कि रेशमी कुर्ते का कपड़ा भी उसके उभारों को छुपाने में नाकाम साबित हो रहा था।

जब वह चलता, तो उसके हाथों की बनावट और बाइसेप्स का कसाव कुर्ते की आधी बाहों से रह-रहकर झांकता था। उसकी कलाई की नसें और मजबूत हथेलियाँ उस पौरुष का परिचय दे रही थीं, जो सरयू सिंह के खानदान की पुश्तैनी निशानी थी।

उसके चेहरे पर वही सरयू सिंह के चिर-परिचित के खानदान का तेज था। तीखी नाक, घनी भौहें और आँखों में एक ऐसी चुंबकीय गहराई थी जो किसी को भी पल भर में अपना कायल बना ले। उसके चेहरे का रुआब ऐसा था कि भीड़ खुद-ब-खुद उसके लिए रास्ता छोड़ देती थी।

उसके कंधे तक आते लंबे, काले और रेशमी बाल धूप में सोने की तरह चमक रहे थे। वे बाल उसकी खूबसूरती में एक 'फरिश्ते' जैसी दिव्यता जोड़ रहे थे। जब पहाड़ों की ठंडी हवा उन बालों को उड़ाती, तो परमानंद का सौंदर्य अपने चरम पर होता।

देहरादून एयरपोर्ट के उस मुख्य प्रवेश द्वार (एंट्रेंस गेट) पर वक्त जैसे एक पल के लिए ठहर गया था। यह केवल एक भौतिक दरवाजा नहीं था, बल्कि दो अलग-अलग दुनियाओं के मिलन का बिंदु था। एक तरफ सत्ता का रसूख लिए मनोरमा और उनकी 'संगमरमर की मूरत' जैसी बेटी पिंकी थी, और दूसरी तरफ जनसैलाब के नायक के रूप में उभरता परमानंद।

जब दोनों पक्ष एक साथ गेट की ओर बढ़े, तो वहां तैनात सुरक्षाकर्मियों के चेहरों पर पसीना आ गया। उनके लिए यह एक बड़ी दुविधा थी—एक तरफ प्रोटोकॉल के अनुसार वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी मनोरमा थीं, जिन्हें प्राथमिकता देना उनका कर्तव्य था, और दूसरी तरफ वह विशाल जनसमूह था जो अपने 'फरिश्ते' परमानंद के लिए किसी भी हद तक जा सकता था।

तभी, वह क्षण आया जब तीनों की निगाहें एक-दूसरे से टकराईं:

परमानंद की दृष्टि: उसने जैसे ही मनोरमा और उनके बगल में खड़ी पिंकी को देखा, उसके चेहरे के तेज में एक नई चमक आ गई। उसकी गहरी और चुंबकीय आँखों ने एक ही पल में पिंकी की उस 'खिलती हुई कली' जैसी काया को भांप लिया। वह अपनी कनखियों से पिंकी की उन मासूम आँखों और उसके सुडौल बदन को निहार रहा था।

पिंकी की हलचल: पिंकी ने जब परमानंद को इतने करीब से देखा, तो उसे अपने बदन में एक सिहरन महसूस हुई। वह ६ फीट का बलिष्ठ युवक, जिसके लंबे बाल उसकी गर्दन पर खेल रहे थे, पिंकी के लिए किसी सपने जैसा था।

इस विषम और तनावपूर्ण स्थिति को भांपते हुए परमानंद ने अपनी शालीनता का परिचय दिया। उसने हाथ के इशारे से अपने समर्थकों को रोका और सुरक्षा गार्डों को संकेत दिया कि वे पहले मनोरमा और पिंकी को आगे जाने दें। उसकी इस अदा में एक ऐसा राजसी रुआब था कि मनोरमा भी एक पल के लिए रुक गईं और उन्होंने हल्की सी मुस्कान के साथ उसे धन्यवाद दिया।

परमानंद ने जब पिंकी की ओर देखा, तो उसकी नज़रों में एक ऐसा 'अधिकार' था जिसने पिंकी के गालों पर सिंदूरी रंग बिखेर दिया।

मनोरमा और पिंकी अब एयरपोर्ट के भीतर प्रवेश कर रही थीं। चेकिंग और सिक्योरिटी की औपचारिकताओं के बीच भी पिंकी का मन वहीं गेट पर अटका हुआ था।

पिंकी के ज़हन में परमानंद की वह बलिष्ठ काया और रेशमी कुर्ते से झांकती उसकी भुजाओं का कसाव एक गहरे प्रभाव की तरह छप चुका था। दून स्कूल की उस मेधावी छात्रा का दिमाग आज पहली बार पढ़ाई से हटकर किसी पुरुष के आकर्षण में उलझ गया था।

वह बार-बार चाहती थी कि एक बार पलटकर उस 'फरिश्ते' को देख ले, पर संकोच और लोक-लाज की बेड़ियाँ उसे रोक रही थीं। उसे अपनी माँ मनोरमा के सामने पलटकर देखना बहुत अजीब लग रहा था।

पिंकी के मन में एक ही बात गूँज रही थी— "क्या वो अब भी मुझे देख रहे होंगे?"

उधर मनोरमा, जो स्वयं सरयू सिंह के उसी खानदान के पौरुष से वाकिफ थीं, अपनी बेटी के चेहरे के बदलते रंगों को देख रही थीं। उन्हें अंदाज़ा हो गया था कि इस 'संयोग' ने पिंकी के भीतर की सोई हुई कामुकता और आकर्षण के बीज को हवा दे दी है।

अब देहरादून पीछे छूट रहा था, लेकिन लखनऊ पहुँचने से पहले ही पिंकी के दिल में परमानंद के नाम की एक अमिट इबारत लिखी जा चुकी थी।

हवाई जहाज़ की छोटी सी खिड़की से बाहर झांकती पिंकी के लिए नीचे की दुनिया किसी खिलौने जैसी लग रही थी। हरी-भरी धरती और रुई के फाहों जैसे बादलों के बीच उसे बार-बार वही छवि दिखाई दे रही थी—वह ६ फीट का बलिष्ठ और तेजस्वी युवा, जिसके लंबे बाल हवा में लहरा रहे थे और जिसकी आँखों में एक अजीब सी कशिश थी।

पिंकी के मन में परमानंद का वह चेहरा किसी अमिट स्याही की तरह छप चुका था। उसे रत्ती भर भी अंदाज़ा नहीं था कि उसकी रगों में जो रक्त दौड़ रहा है, वह उसी तेजस्वी कुल का है जिसका परमानंद हिस्सा है।

पिंकी इस बात से पूरी तरह बेखबर थी कि उसका अस्तित्व सरयू सिंह और मनोरमा के उस 'अकस्मात' और वर्जित मिलन की उपज है। मनोरमा ने इस सत्य को कालकोठरी में बंद कर दिया था, पर नियति ने पिंकी को एक विशेष प्रयोजन के लिए गढ़ा था।

उसे मासूम को क्या पता था कि बनारस की उस कामुक दुनिया में कोई है, जो बड़ी बेसब्री से पिंकी का इंतज़ार कर रहा है। यह इंतज़ार केवल एक मुलाकात का नहीं, बल्कि अपनी मुक्ति और तृप्ति का है।

शेष अगले भाग में

 
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