Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता. - Page 142 - SexBaba
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Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता.

भाग 174

सोनी का चेहरा लाल हो गया। उत्तेजना और ग्लानि के बीच झूलती हुई वह अंततः एक निर्णय पर पहुँच रही थी। वह जानती थी कि यह रास्ता काँटों भरा है, पर सूरज की खातिर वह अपनी 'पवित्रता' की बलि देने को भी तैयार होने लगी थी।

उसने चाँदनी को खिड़की से आते देखा और मन ही मन मुस्कुराई। उसकी कल्पनाओं ने उसे डराया भी था और एक नया विश्वास भी दिया था। उसे अब लगने लगा था कि वह सूरज को उस 'अनोखे उपहार' के ज़रिए एक नया जीवन देने में ज़रूर सफल होगी।

इसी संतुष्टि और कामुक रोमांच के साथ, सोनी भी एक गहरी और सपनों भरी नींद की आगोश में चली गई…



पर सूरज जाग रहा था…

अब आगे

अपने कमरे में सूरज बिस्तर पर लेटा हुआ था, लेकिन नींद उसकी आँखों से कोसों दूर थी। बाहर सन्नाटा पसर चुका था, पर उसके भीतर ख्यालों का एक तूफ़ान उठा हुआ था। कमरे की खिड़की से छनकर आती चाँदनी सीधे उसके बिस्तर पर गिर रही थी, जो उसे बार-बार उस 'तोहफे' की याद दिला रही थी जिसका वादा सोनी मौसी ने उससे किया था।

अब उसके ज़हन में रोजी की छवि नहीं, बल्कि सोनी मौसी का वह गदराया हुआ बदन था।

सूरज के मन में रोजी और सोनी मौसी की तुलना एक कोमल कली और एक पूर्ण विकसित पुष्प के द्वंद्व जैसी थी:

एक तरफ रोजी थी—पवित्रता और मासूमियत का प्रतीक। उसका यौवन अभी सुबह की पहली किरण जैसा कच्चा और अल्हड़ था। उसकी देह में एक कसी हुई लचक थी, जैसे कोई नई खिलती कली, जो अभी स्पर्श से अनजान है। उसकी सुंदरता में एक शीतल सुकून था, जो मन को बाँधता था।

दूसरी तरफ सोनी मौसी थीं—यौवन के ढलते पड़ाव पर भी एक मादक और गदराया हुआ बदन। उनका शरीर किसी पके हुए रसीले फल की तरह था, जिसमें अनुभव की मिठास और नारीत्व की पूर्णता भरी थी। जहाँ रोजी में 'कसावट' थी, वहीं सोनी में 'भराव' और 'विस्तार' था। उनकी गेहुँआ रंगत और भारी अंगों का उभार सूरज की कल्पनाओं में एक दहकती आग की तरह था, जो मर्यादा की हर दीवार को पिघलाने की शक्ति रखता था।

सूरज के लिए रोजी एक 'शीतल जल' थी जिससे प्यास बुझती, पर सोनी मौसी वह 'नशीली मदिरा' थीं जिसका एक घूँट ही उसे मदहोश कर देने के लिए काफी था।

सूरज सोनी में स्त्री के तीनों रूप देख रहा था और वह उनसे हर बार सुख चाह रहा था जो स्त्री एक पुरुष को दे सकती है…

वात्सल्य जो बचपन से अब तक उसे देती आई थी और बीच-बीच में देती रहती थी..

एक सखा का.. सोनी सूरज की दोस्त भी थी और हमराज भी एक बहन के रूप में वह हमेशा एक दोस्त के जैसे उसका साथ देती थी..

और अब सोनी का वह तीसरा रूप जो स्त्री और पुरुष के मिलन को पूर्णता प्रदान करता है..

सोनी का यह रूप निराला था …

सूरज के हाथों में अब एक,

पुरानी शराब का प्याला था..

उसने अपनी आँखें मूँद लीं और कल्पना की उस जादुई दुनिया में उतर गया जहाँ मर्यादा की दीवारें ढह चुकी थीं। सूरज की कल्पना में, कमरे की मद्धम रोशनी के बीच सोनी मौसी खड़ी थीं। उन्होंने लगभग वैसा ही झीना कुर्ता पहन रखा था जैसा सूरज ने रोजी के लिए पसंद किया था। वह सफ़ेद बारीक कपड़ा उनकी गेहुँआ रंगत और शरीर के उभारों के साथ जैसे न्याय करने की कोशिश कर रहा था। कुर्ते का गला थोड़ा गहरा था, जिससे सोनी की सुराहीदार गर्दन और हँसली की हड्डियों के नीचे का उभार साफ़ झलक रहा था।

जैसे ही सोनी ने एक कदम आगे बढ़ाया, कुर्ते के पतले कपड़े के नीचे उनके भारी और सुडौल वक्षों की थरथराहट ने सूरज की कल्पना को झकझोर दिया। वे उरोज किसी अनुभवी नारी की परिपक्वता और एक युवती की कसावट का अद्भुत मिश्रण लग रहे थे। पारभासी कपड़े को भेदते हुए उनके गाढ़े गुलाबी रंग के निप्पल अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे थे। सूरज ने सोचा कि शायद माँ न बनने के कारण ही उनका यह रूप आज भी इतना नैसर्गिक और अछूता बना हुआ है। वे गुलाबी बिंदु उस सफ़ेद कपड़े को एक सहारा दे रहे थे, जैसे कोई स्तंभ किसी भव्य भवन की छत को थामे हो।

सूरज की नज़रें और नीचे उतरीं। कुर्ते के घेरे के पीछे से सोनी की पतली और लचकदार कमर किसी नागिन की तरह बलखाती महसूस हो रही थी। उसके ठीक नीचे उनकी गहरी और गोल नाभि, जिसे भोजपुरी संस्कृति में सौंदर्य का चरम माना जाता है, उस झीने कपड़े के पीछे से एक रहस्यमयी भँवर की तरह दिख रही थी।

जैसे-जैसे सोनी चलतीं, कुर्ते के दोनों पट हवा में लहराते और उनकी जंघाओं के जोड़ पर काली आभा को उजागर कर जाते। भारी, मांसल और गोरी जंघाओं का वह दृश्य सूरज को अपने पास बुला रहा था। उन जंघाओं के आपस में टकराने से उत्पन्न घर्षण की आवाज़ सूरज के कानों में संगीत की तरह गूँज रही थी। जंघाओं के ऊपरी हिस्से पर, जहाँ दोनों टाँगें एक त्रिकोण बनाती थीं, वहाँ की हल्की श्यामल रंगत और उसके पीछे छिपी उस वर्जित योनि की कल्पना मात्र से सूरज का रोम-रोम सिहर उठा।

सोनी की इस दैवीय और कामुक छवि को अपने दिमाग में गढ़ते हुए सूरज भावुक हो उठा। उसकी आँखों में वासना और सम्मान का एक अजीब मिश्रण था। वह चाहता था कि वह इस कल्पना को अपनी बाँहों में भर ले, लेकिन हकीकत की कड़वाहट उसके सामने खड़ी थी। उसने अपने लिंग की ओर हाथ बढ़ाया, पर वहाँ वही सन्नाटा था—कोई हलचल नहीं, कोई उत्तेजना नहीं।

उसका मन तो वेग से दौड़ रहा था, पर उसका पौरुष अब भी निढाल पड़ा था। यह देखकर उसकी आँखों में आँसू आ गए। उसने हाथ जोड़कर ईश्वर से प्रार्थना की: "हे महादेव, मुझे दुनिया की कोई दौलत नहीं चाहिए। बस एक बार हकीकत में मुझे अपनी मौसी को इस रूप में देखने का सौभाग्य दे दीजिए। क्या मेरा यह शरीर कभी उनकी इस दिव्यता के काबिल बन पाएगा? आखिर मुझे मेरे किस पाप की सजा मिल रही है?"

कल्पना और वास्तविकता के बीच की यह दूरी एक गहरी खाई की तरह थी। एक ओर सोनी थी, जो अपने पति के आलिंगन में सूरज की यादों के सहारे अपनी प्यास बुझा रही थी, और दूसरी ओर यह बेबस नौजवान था, जो अपनी मर्दानगी की वापसी के लिए अपनी मौसी को ही अपना मंदिर मान बैठा था।

धीरे-धीरे, मानसिक थकान और भावनाओं के भारी बोझ ने सूरज की पलकों को झुका दिया। वह उसी झीने कुर्ते के पीछे छिपी सोनी को अपने सीने से लगाए नींद की आगोश में चला गया। हवेली अब पूरी तरह शांत थी, पर उस शांति के गर्भ में एक ऐसा 'कल' छिपा था, जहाँ रिश्तों की नई परिभाषा लिखी जाने वाली थी।

हवेली के विशाल दालान में सुबह की गुनगुनी धूप संगमरमर के फर्श पर खेल रही थी। पूरा परिवार आज फिर एक साथ जुटा था। मेज पर पीतल के गिलासों में गरमा-गरम चाय और ताजे बने पकवानों की खुशबू तैर रही थी। सूरज अपनी कामयाबी की चमक ओढ़े सबके बीच बैठा था, पर चर्चा का रुख अचानक अतीत की गलियों की ओर मुड़ गया।

दादी कजरी ने अपनी धुंधली आँखों से दीवार पर टंगी एक आदमकद तस्वीर की ओर देखा। वह तस्वीर सरयू सिंह की थी—रौबदार मूँछें, आँखों में एक अजीब सी चमक और चेहरे पर खानदानी रईसी का तेज।

कजरी (एक लंबी आह भरते हुए): "आज अगर ऊ रहितें, तँ हवेली के ई खुशी देख के निहाल हो गइले रहितें। कइसन भाग रहे उनका, जवने कुल-खानदान के सूरज जैसन कोहिनूर मिलल।"

पदमा नानी ने भी अपनी माला फेरते हुए हामी भरी। सरयू सिंह का नाम आते ही जैसे माहौल की हवा बदल गई। सुगना की आँखें तुरंत झुक गईं, लाली के चेहरे पर एक फीकी मुस्कान आई, और सोनी... सोनी जैसे पत्थर की मूरत बन गई। उसके कानों में सरयू सिंह की वह भारी आवाज़ और उनकी छुअन की यादें एक सिहरन पैदा कर गई। उसे याद आया कि कैसे सलेमपुर की उस कोठरी में सरयू सिंह के साथ उसने मर्यादाओं की धज्जियां उड़ाई थीं, और कैसे उनकी अकाल मृत्यु के पीछे वह राज़ दफन था जिसमें कहीं न कहीं सोनी का भी योगदान था।

पदमा (भोजपुरी में सुगना की ओर इशारा करते हुए): "जब-जब सूरज के बाबा के नाम आवेला, सुगना सबसे ज्यादा दुखी हो जाले।

कजरी में आगे कहा….आखिर होवे काहे ना? कुंवर जी के छाया में ही तँ ई पूरा परिवार फलल फूलल।"

सुगना ने धीरे से अपनी साड़ी के पल्लू से आँख का कोना पोंछा। आज सरयू सिंह होते तो अपने पुत्र की सफलता को देखकर कितना खुश होते।

कजरी (सूरज का हाथ थामते हुए): "बबुआ, तू तँ उनका आँख के तारा रहलू। तोहार बाबा तोके गोद में लेके पूरा अँगना डोलत रहलन। ऊ कहत रहलें कि 'हमार सूरज एक दिन अइसन चमकती कि पूरा बनारस ओकरा ओजियारे में रही'। देखऽ, आज ऊ बात सच हो गईल।"

सूरज के मन में 'बाबा' की यादें किसी परिकथा जैसी थीं। उसे याद था कि कैसे वे उसे हमेशा अपनी गोद में उठाकर कलेजे से सटाए रखते थे कैसे उनके पास हमेशा कोई न कोई अनोखा खिलौना होता था।

उसे नहीं पता था कि जिस इंसान को वह देवता तुल्य मान रहा है वही उसका पिता है और , उसी के पौरुष की छाया इस हवेली की हर स्त्री पर पड़ी थी यहां तक की सोनी भी जिसकी छत्रछाया में वह अपना पुरुषत्व जागृत करने का प्रयास कर रहा था।

सूरज (भावुक होकर): "दादी, मुझे याद है जब मैं छोटा था, बाबा मुझे कंधे पर बिठाकर गांव घुमाते थे।उनकी आवाज़ में जो रौब था, वो आज भी मेरे कानों में गूँजता है। काश, आज वो अपनी आँखों से मुझे डॉक्टर की सफेद कोट में देख पाते।"

हवेली के इस भावनात्मक माहौल में जहाँ एक तरफ गर्व और ममता का सैलाब था वहीं घर की सभी महिलाएं उनके साथ बिताए गए कामुक पलों को भी याद कर रही थी । किसी स्त्री के लिए यह मुमकिन ही नहीं था कि उनके साथ एक बार संभोग करने के बाद वह उन्हें भूल जाए।

इससे इतर सोनू और विकास भी सरयू सिंह के अनुशासन और उनके व्यक्तित्व की चर्चा करने लगे।

तभी पदमा नानी ने सुगना के कंधे पर हाथ रखा और फिर से भोजपुरी में माहौल को संभालने की कोशिश की।

पदमा: "अरे सुगना! अब आँख मति पोंछू। ई तँ सब उनके पुन्य ह कि आज हवेली में अइसन उत्सव मनावत बानी जा। ऊ जहाँ भी होइहें, ऊपर से हमनी के असीसत होइहें। देखऽ तँ, तोहार बेटा डॉक्टर बन गइल, अब तँ हवेली के कवनो दुख टिके ना पाई।"

सूरज को लग रहा था कि 'बाबा' का आशीर्वाद उसके साथ है, पर उसे नहीं पता था कि अब उसकी असली परीक्षा उस 'उपहार' में छिपी है, जो उसे उन रिश्तों के पार ले जाने वाला था जहाँ सरयू सिंह ने अपनी सत्ता छोड़ी थी।

लाली बीती रात को याद कर रही थी। उत्सव के शोर के बाद जब हवेली सन्नाटे में डूबी, तो सोनू के मन में भी हलचल तेज़ हो गई। सुगना का वह सजा-धजा रूप और उसे हंसना खिलखिलाती देखकर सोनू के भीतर दबी हुई पुरानी वासना फिर से जाग उठी थी। लाली की उपस्थिति में उसने सुगना की उन्हीं पुरानी यादों को टटोला और उसकी उत्तेजना का पूरा वेग लाली की जांघों के बीच उतार कर न सिर्फ लाली को तृप्त कर दिया…अपितु कई दिनों बाद अपनी उत्तेजना पर सुगना का अंश महसूस किया.. सुगना सोनू की जान थी पर सुगना ने यह जानने के बाद की वह सरयू सिंह की पुत्री है खुद को वासना से पूरी तरह विमुक्त कर लिया था.. पर कल उसके चेहरे की मुस्कुराहट नैसर्गिक थी और वही सुगना की पहचान थी.

हमेशा की तरह सोनू और विकास वापस लखनऊ के लिए निकलने वाले थे…

हवेली के हाल में जब विदाई की घड़ियाँ आईं, तो लाली ने अपनी चंचलता और अधिकार के साथ मोर्चा संभाल लिया। जैसे ही विकास ने अपना सूटकेस उठाया और सोनू ने अपनी गाड़ी की चाबी जेब में डाली, लाली बीच में आकर खड़ी हो गई। उसके चेहरे पर कल रात की वह मादक चमक अभी भी बरकरार थी, जो एक तृप्त स्त्री की पहचान होती है।

लाली (दोनों की ओर देखते हुए): "अरे, आप दोनों का तो बस चले तो पंख लगा के उड़ जाएँ! अभी इतनी जल्दी क्या है? सूरज डॉक्टर बन के आया है, हवेली में बरसों बाद ऐसी रौनक आई है, और आप दोनों को अपने काम की पड़ी है? कम से कम दो दिन और रुकिए, तभी इस जश्न का असली मजा आएगा।"

सोनू और विकास एक-दूसरे का मुँह देखने लगे। लाली का यह आग्रह केवल आतिथ्य नहीं था, बल्कि उसके पीछे बीती रात की वह कामुक ऊर्जा थी जिसने लाली को आनंदित कर दिया था और वह इस आनंद को दोबारा भोगना चाहती थी।

सोनू की नज़रों में कल शाम की वह सुगना तैर रही थी—सजी-धजी, रेशमी साड़ी में लिपटी, जिसकी खिलखिलाहट ने सोनू के भीतर उस पुरानी आग को फिर से सुलगा दिया था। कल रात जब वह लाली के साथ बिस्तर पर था, तो उसकी बाहों में लाली तो थी, पर उसके बंद नेत्रों के सामने अपनी सगी दीदी सुगना का वह गदराया हुआ बदन और वही चिर-परिचित खुशबू थी। सुगना की उसी कल्पना के वेग ने सोनू को कल रात इतना उतावला बना दिया था कि लाली दंग रह गई थी। उसने वर्षों बाद अपने पति के भीतर वह प्यास देखी थी, जिसने लाली की देह को भी कल रात पूरी तरह सराबोर कर दिया था।

सोनू ने लाली की आँखों में झाँकते हुए एक तिरछी नज़र सुगना पर डाली, जो पास ही खड़ी मुस्कुरा रही थी।

सुगना ने भी लाली की बात का समर्थन किया उसे इस बात का इल्म नहीं था कि उसे लेकर सोनू के मन में कामुक भावनाएं जाग रही है।

उसने बेहद प्यार से कहा…

हां सोनू रुक जा, बहुत दिन बाद घर में खुशियां आईल बा एक-दो दिन साथे रहबे सबके मन लगी..

हाई कमान का फरमान आ चुका था सुगना की बात टालने का दम किसी में ना था वह इस घर और पूरे परिवार की लाडली थी…

विकास (हँसते हुए): "भाई, अब तो मना करना मुश्किल है। चलो, व्यापार तो चलता रहेगा, अपनों के साथ ये दो दिन फिर कहाँ मिलेंगे।"

विकास ने सोनी की ओर देखा जैसे कल रात की बात याद दिला रहा हो…उसे उम्मीद थी कि आज भी उसे सोनी की मुनिया से वैसा ही स्वागत मिलेगा..

पदमा नानी (भोजपुरी में चहकते हुए): "ई तँ बहुते नीक भइल! सोनू और विकास बाबू रुकीहें तँ हवेली में अउरी दू दिन चहल-पहल रही। सुगना, देखलू? तोहार भाई आजुओ तोर कतना बात मानेला।"

हवेली का वह भव्य हाल अब फिर से हंसी-ठिठोली से भर गया था। लेकिन इस भीड़ के बीच, सूरज और सोनी की नज़रें जब मिलीं, तो उनमें एक मूक संवाद हुआ। विकास और सोनू के रुकने से वह 'उपहार' देने की राह थोड़ी और चुनौतीपूर्ण हो गई थी, पर रोमांच और भी बढ़ गया था।

सोनू और विकास के रुक जाने से जहां पूरा परिवार खुश था वहीं सूरज के चेहरे से खुशियां गायब थी। जिस उपहार का वह बेसब्री से इंतजार कर रहा था उसे पर ग्रहण लग चुका था।

सूरज ने मौका पाकर सोनी को घेर लिया। विकास और सोनू के रुकने के फैसले ने उसे भीतर से तोड़ दिया था। उसकी आँखों में छाई निराशा अब हल्की नाराजगी में बदल चुकी थी।

सोनी अलमारी से कुछ सामान निकाल रही थी, तभी सूरज उसके ठीक पीछे जा खड़ा हुआ।

सूरज (बेहद धीमी और रुआँसी आवाज़ में): "मौसी, यह सब क्या है? आपको ज़रा भी अहसास है कि आप क्या कर रही हैं? मामा और फूफा को रोकने की क्या ज़रूरत थी? आप जानती हैं कि मैं किस हाल में हूँ।"

सोनी धीरे से पलटी। उसके चेहरे पर एक मदहोश कर देने वाली मुस्कान थी। उसने अपनी रेशमी साड़ी का पल्लू ठीक किया और सूरज की आँखों में आँखें डालकर उसे निहारने लगी।

सोनी (धीमे से): "अरे, मेरे डॉक्टर बाबू! इतना गुस्सा? मैंने तो कुछ नहीं किया, यह तो लाली और तेरी माँ सुगना ने उन्हें रोका। और वैसे भी, अपनों के बीच रहने में बुराई क्या है? क्या क्या तू अपने मौसी और मामा को नहीं चाहता है?"

सूरज (तड़पकर): "चाहने की बात नहीं है मौसी, जाने दीजिए मौसी आप नहीं समझेंगी।

आपने वादा किया था कि परीक्षा के बाद वो 'उपहार' देंगी। मैं यहाँ एक-एक पल गिन रहा हूँ और आप हैं कि….। क्या आपको मेरी तकलीफ का ज़रा भी अंदाज़ा है?"

सोनी एक कदम और करीब आई। उसके शरीर की गर्माहट और वही चन्दन की खुशबू सूरज के नथुनों से टकराई। उसने अपनी कोमल उँगलियाँ सूरज की ठुड्डी पर रखीं और उसे थोड़ा और उकसाते हुए बोली।

सोनी: "तड़प तो अच्छी होती है सूरज। जो आग जितनी धीरे सुलगती है, उसका अहसास उतना ही गहरा होता है। अभी तो बस शुरुआत है।इंतजार रख क्या पता तुम्हें वो मिल जाए जो तुम ढूँढ रहे हो?"

सोनी की आवाज़ में वह खनक थी जिसने सूरज की नसों में दौड़ते खून की रफ्तार बढ़ा दी। वह जैसे ही कुछ और कहने के लिए आगे बढ़ा, अचानक कमरे के दरवाज़े पर भारी कदमों की आहट हुई। सूरज झटके से पीछे हटा।

विकास मुस्कुराते हुए कमरे के भीतर दाखिल हुआ। उसने सूरज के उतरे हुए चेहरे और सोनी की उस रहस्यमयी मुस्कान को देखा।

विकास (हँसते हुए): "अरे वाह! यहाँ क्या मंत्रणा चल रही है? सूरज, लगता है तेरी मौसी का जादू तुझ पर पूरी तरह चल गया है। यह है ही ऐसी, एक बार किसी को अपनी बातों में उलझा ले, तो फिर उसे होश नहीं रहता।"

सूरज सकपका गया। उसके माथे पर पसीने की बूंदें चमकने लगीं। वह कुछ बोलने ही वाला था कि सोनी ने स्थिति संभाल ली।

सोनी (खिलखिलाकर): "अरे छोड़िये भी! यह अब बड़ा डॉक्टर बन गया है ना, तो मुझे सलाह दे रहा था कि इस उम्र में मुझे अपनी सेहत का ख्याल कैसे रखना चाहिए। इसे लगता है कि इसकी मौसी अब बूढ़ी हो रही है।

विकास ने सोनी के कंधे पर हाथ रखा और प्यार से बोला, "बूढ़ी? तुम्हें जो एक बार देख ले, वो अपनी उम्र भूल जाए।

सभी हंसने लगे…

अंततः वह घड़ी आ गई। तीसरे दिन दोपहर को विकास और सोनू विदा हुए।

विकास ने विदा लेते हुए सोनी को गले लगाया और पिछली रातों के अनुराग की चर्चा की। सोनी जानती थी कि उसकी वह कामुकता विकास के लिए नहीं, बल्कि सूरज की कल्पनाओं के कारण थी।

जैसे ही मेहमानों की गाड़ी ओझल हुई, सूरज को लगा जैसे उसके सीने से पत्थर हट गया हो।

सूरज बाज़ार गया और एक प्रतिष्ठित दुकान से वही पारभासी, सफ़ेद मलमली कुर्ता खरीदा जिसकी उसने कल्पना की थी। उसने 'एक्सेल' साइज़ का चुनाव किया, यह सोचते हुए कि मौसी का भरा हुआ बदन उस कपड़े को किस तरह तान देगा।

उसने वह गिफ्ट बॉक्स सोनी की मेज पर रख दिया और अंदर एक पर्ची छोड़ दी। सूरज के जाने के बाद सोनी ने जब उस कुर्ते को देखा, तो उसकी साँसें अटक गईं। वह कपड़ा इतना झीना था कि उसकी मर्यादा का आखिरी पर्दा भी उसके सामने छोटा पड़ रहा था।

सोनी ने वह पर्ची उठाई और पढ़ना शुरू किया उसके कलेजे की धड़कन बढ़ती जा रही थी

आप मेरे रिश्ते में मौसी जरूर है पर पिछले कई वर्षों से आपने मुझे हमेशा सही राह दिखाई है आपकी वजह से ही मुझे अपने लिंग में पहली बार तनाव महसूस हुआ और मैं हस्तमैथुन का सुख ले पाया आप मेरे लिए ईश्वर का वरदान है मुझे पता नहीं कि मैं सामान्य हूं या असामान्य पर मुझे विश्वास है कि यदि अपने साथ दिया तो शायद मेरा पुरुषत्व जाग सके।

मैंने अपनी प्रेमिका की कल्पना हमेशा इसी रूप में की है पहले यह कपड़ा मैंने पहले रोजी के लिए लाया था पर पर मैं सफल नहीं हो पाया मुझे आप इस कपड़े में अप्सरा के रूप में दिखाई पड़ती है.. यदि आप इस एकमात्र वस्त्र को धारण कर सके तो यह मेरी कल्पना साकार करने जैसा होगा बाकी आप मेरी पूज्य हैं और हमेशा रहेंगी।।।

इंतजार रहेगा.. आपको आहत करने के लिए क्षमा प्रार्थी हूं।

सोनी भावुक को गई… तभी सोनी के मन में एक विचार आया। उसने मुस्कुराहट के साथ अपनी पुरानी अलमारी खोली और मखमली कपड़े में लिपटी एक पुरानी चीज़ निकाली।

सोनी ने मन ही मन कहा: "अगर खेल आग का है सूरज, तो चिंगारी भी वैसी ही होगी। तूने मुझे जो पहनाना चाहा है, वह तेरी प्यास है, पर मैं जो तुझे दूँगी, वह तेरी मर्यादा और पौरुष का नया संगम होगा।"

शेष अगले भाग में

 
भाग 175

मैंने अपनी प्रेमिका की कल्पना हमेशा इसी रूप में की है पहले यह कुर्ता मैंने पहले रोजी के लिए लाया था पर मैं सफल नहीं हो पाया मुझे आप इस कपड़े में अप्सरा के रूप में दिखाई पड़ती है.. यदि आप इस एकमात्र वस्त्र को धारण कर सके तो यह मेरी कल्पना साकार करने जैसा होगा बाकी आप मेरी पूज्य हैं और हमेशा रहेंगी।।।

इंतजार रहेगा.. आपको आहत करने के लिए क्षमा प्रार्थी हूं।

सोनी भावुक को गई… तभी सोनी के मन में एक विचार आया। उसने मुस्कुराहट के साथ अपनी पुरानी अलमारी खोली और मखमली कपड़े में लिपटी एक पुरानी चीज़ निकाली।



सोनी ने मन ही मन कहा: "अगर खेल आग का है सूरज, तो चिंगारी भी वैसी ही होगी। तूने मुझे जो पहनाना चाहा है, वह तेरी प्यास है, पर मैं जो तुझे दूँगी, वह तेरी मर्यादा और पौरुष का नया संगम होगा।"

अब आगे..

उसने उस रहस्यमयी वस्तु को एक रेशमी रुमाल में लपेटकर अलमारी के सबसे सुरक्षित कोने में रख दिया। अब उसके चेहरे पर घबराहट नहीं, बल्कि एक अद्भुत आत्मविश्वास था। वह जानती थी कि आज की रात हवेली की दीवारों के पीछे एक ऐसा इतिहास लिखा जाएगा, जहाँ एक मौसी की युक्ति उसके भांजे के जीवन का सबसे बड़ा 'चमत्कार' सिद्ध होगी।

रात्रि का भोजन समाप्त हो चुका था। हवेली के गलियारों में चहल-पहल धीरे-धीरे शांत हो रही थी। सुगना अपनी थकान मिटाने कमरे में जा चुकी थी और लाली ने भी रसोई का काम समेट लिया था। विदा होते समय सोनी ने सूरज की आँखों में झाँककर उसे वह गुप्त निमंत्रण दे दिया था—"रात ठीक 11 बजे, मेरे कमरे में..."

सूरज के लिए घड़ी की हर एक सेकंड की सुई किसी भारी हथौड़े की तरह धड़क रही थी। उसके ज़हन में वही सफेद झीना कुर्ता घूम रहा था जो वह बाज़ार से लाया था। उसे पूरी उम्मीद थी कि आज रात सोनी मौसी उसी पारभासी लिबास में उसका स्वागत करेंगी और वह उनकी देह के हर उभार को अपनी नज़रों से पी पाएगा।

जैसे ही दीवार घड़ी ने 11 का अंक छुआ, सूरज ने दबे पाँव सोनी के कमरे का दरवाज़ा खोला। कमरा मद्धम पीली रोशनी में नहाया हुआ था और इत्र की हल्की खुशबू हवा में तैर रही थी। सूरज की नज़रें सबसे पहले बिस्तर की ओर गईं, पर उसे गहरा धक्का लगा। सोनी मौसी ने वह झीना कुर्ता नहीं, बल्कि अपनी नियमित गुलाबी रेशमी नाइटी पहनी हुई थी।

सूरज के चेहरे पर छाई मायूसी सोनी से छिपी नहीं रही। उसने आगे बढ़कर सूरज का हाथ थामा और उसे बिस्तर के किनारे बैठाया।

सोनी (धीमी और गंभीर आवाज़ में): "तू उदास क्यों हो गया?

सूरज ने अपनी नज़रें झुकाए हुए कहा

मौसी आपको मेरा गिफ्ट पसंद नहीं आया?

“ सूरज अपनी मौसी को उसे वस्त्र में देखना तुझे अच्छा लगेगा? क्या तेरी नजरों में वह उचित है?” सोनी ने जिस विश्वास के साथ यह प्रश्न पूछा था उसका उत्तर ना के अलावा कुछ और नहीं हो सकता था परंतु सूरज चतुर था समझदार था उसने अपना सर झुकाए हुए ही कहा..

मौसी मैंने आपको पूजा है आपको चाहा है मैं आपकी दिल से बहुत इज्जत करता हूं परंतु न जाने मुझे क्यों ऐसा लगता है कि आप ही मेरी हर समस्या का निवारण कर सकती है मैंने अपनी कल्पनाओं में कई बार आपको उस वस्त्र में देखा है और आज मैं अपनी कल्पना को साकार होते हुए देखना चाहता हूं बाकी यह मेरी इच्छा है पूरा करना न करना आपकी मर्जी। मैं सचमुच आपसे प्यार करने लगा हूं एक मौसी की तरह भी और अपने आराध्य की तरह भी।

सोनी निरूतर थी। जो संवेदना और आत्मविश्वास से सूरज ने यह बात कही थी उसने सोनी के अंतर्मन को छू लिया था। आखिर किसी की कल्पना पर कोई कैसे रोक लगा सकता है? उसने स्वयं भी तो सूरज को लेकर कई कल्पनाएं की थी। यह तो सूरज था जो खुलकर अपनी बात का पाया था अन्यथा यदि सोनी स्वयं अपनी कल्पनाओं की बात सूरज के समक्ष रखती तो उनके बीच की मर्यादा नग्नता में तब्दील हो जाती।

चल ठीक है तेरी बात मानती हूं पर मैंनेभी तेरे लिए कुछ सोच कर रखा है…

सोनी ने अलमारी से वही रेशमी रुमाल में लिपटी चीज़ निकाली जिसे उसने दोपहर में सहेज कर रखा था। सूरज ने कोतूहल वश उसे खोला, तो उसकी आँखें फटी की फटी रह गई।

रुमाल के भीतर अमेरिका से लाया गया एक 'ब्लाइंडफोल्ड' (आँखों की पट्टी) और 'हैंडकफ्स' (हथकड़ी) जैसी कोमल पट्टियाँ थीं। यह विकास का लाया हुआ वह उपहार था जिसे सोनी और विकास कभी-कभी अपने एकांत में प्रयोग करते थे।

सूरज भी आधुनिक युग का लड़का था उसने इन कामुक गैजेट्स को ब्लू फिल्मों में देखा था। उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि उसकी सोनी मौसी इस प्रकार के गैजेट्स भी अपने साथ रखती हैं।

सोनी ने सूरज का दिया हुआ गिफ्ट पैकेट अलमारी से बाहर निकाला और बाथरूम की तरफ जाते हुए बोली अब रेडी हो जा मैं भी आती हूं…और हां जितना दिया है उतना ही पहनना…सोनी मुस्कुराते हुए बाथरूम के अंदर प्रवेश कर गई सूरज का अंतर्मन मुस्कुरा रहा था.

सोनी ने तय कर लिया था कि आज वह सूरज के मन से उस डर को हमेशा के लिए निकाल फेंकेगी।

सूरज बिस्तर पर पूरी तरह नग्न होकर लेट चुका था सिरहाने लकड़ी के पलंग पर वह अपने हैंड कफ फंसा चुका था। और आंखों पर सोनी द्वारा दी हुई मलमल की पट्टी चढ़ा चुका था।

मद्धम पीली रोशनी ने कमरे के वातावरण को एक स्वर्णिम आभा से भर दिया था। बिस्तर पर लेटा हुआ सूरज इस समय किसी मर्त्य मानव जैसा नहीं, बल्कि यूनान के किसी प्राचीन शिल्पकार द्वारा तराशी गई 'कामदेव' की जीवंत प्रतिमा जैसा प्रतीत हो रहा था। आँखों पर बंधी मलमल की काली पट्टी और सिरहाने से बंधे उसके हाथ उसे एक अनूठे समर्पण के सौंदर्य में ढाल रहे थे।

सूरज का शरीर उस उम्र में था जहाँ किशोरावस्था की कोमलता और पौरुष की दृढ़ता का मिलन होता है। उसकी चौड़ी और पुष्ट छाती पर पसीने की बारीक बूंदें मोतियों की तरह चमक रही थीं, जो उसकी तेज़ होती धड़कनों के साथ लयबद्ध तरीके से ऊपर-नीचे हो रही थीं। उसके सीने के मध्य से नाभि तक जाती हुई महीन रोमराजि (बालों की लकीर) उसके गोरे रंग पर एक कामुक विरोधाभास पैदा कर रही थी।

उसकी पतली कमर और पसलियों का उभार उसकी कसरती देह की गवाही दे रहा था। जाँघें मांसल, सुडौल और किसी पत्थर की नक्काशी जैसी चिकनी थीं। उन जाँघों के बीच आराम करता उसका वह 'अंग' अपनी नैसर्गिक मासूमियत और खूबसूरती के साथ शांत था। यद्यपि वह अभी तनावमुक्त था, फिर भी उसकी बनावट, उसका गुलाबीपन और उसके मूल की पुष्टता उसकी सुप्त शक्ति का परिचय दे रही थी। वह एक 'मुरझाए हुए कमल' की भांति कोमल था, जो अपनी रति के स्पर्श का इंतज़ार कर रहा था ताकि खिलकर वज्र बन सके।

तभी बाथरूम का दरवाज़ा खुलने की हल्की सी चरचराहट हुई। नंगे पैरों की धीमी आहट और सोनी के पाजेब की छनछन सूरज के कानों में रस घोलने लगी। सोनी जब बाहर आई, तो उसने वही सफेद झीना कुर्ता पहन रखा था। वह कपड़ा इतना महीन था कि सोनी की परिपक्व देह का हर उतार-चढ़ाव किसी रहस्य की तरह खुल रहा था। कुर्ते के पारभासी कपड़े के नीचे से उसके पुष्ट और भारी वक्ष अपनी पूरी गरिमा के साथ उभर रहे थे, जिनके गहरे गुलाबी निप्पल उस कपड़े को भेदने की कोशिश कर रहे थे।

सोनी बिस्तर के पास आकर रुक गई। उसने पट्टी में बंधे सूरज के उस दिव्य और निष्पाप चेहरे को देखा। सूरज के अधखुले होंठ और उसकी गर्दन की उभरी हुई नसें उसकी उत्तेजना को बयां कर रही थीं।

कुछ देर बाद सूरज को बिस्तर पर एक हल्का सा दबाव महसूस हुआ। सोनी बिस्तर पर आ चुकी थी। सोनी ने महसूस किया कि सूरज के लिंग में अब भी कोई तनाव नहीं है। मिलन का इंतजार कर रहे एक युवक के लिंग में तनाव न हो यह असामान्य बात थी पर अब सोनी के लिए यह सामान्य हो चुका था।

वह कक्ष अब एक ऐसी मूक परीक्षा का स्थल बन चुका था, जहाँ कामकला की हज़ारों वर्षों की विरासत एक युवक के शांत पौरुष के सामने घुटने टेक रही थी। बिस्तर पर लेटा सूरज, जिसकी आँखों पर काली मलमल की पट्टी और हाथों में रेशमी बेड़ियाँ थीं, किसी बलिष्ठ मृग की भांति निष्प्राण और समर्पित था।

सोनी ने, जो उस सफेद झीने कुर्ते में किसी अप्सरा जैसी मादक लग रही थी, अपना पहला दांव खेला। उसने अपनी रेशमी और अनुभवी हथेलियों में सूरज के उस 'अंग' को भरा। वह अंग अभी भी किसी 'मुरझाए हुए कमल' की पंखुड़ी की तरह कोमल और शीतल था। सोनी ने अपनी उंगलियों के पोरों से उसके आधार (Base) की नसों को सहलाया, उन्हें जगाने के लिए उन पर दबाव बनाया, पर वहाँ कोई स्पंदन नहीं हुआ।

उसने अपने पुष्ट और भारी वक्षों को नीचे झुकाया। कुर्ते के उस पारभासी और खुरदरे कपड़े का घर्षण जब सूरज के उस कोमल मांस से हुआ, तो लगा जैसे आग और बर्फ का मिलन हो रहा हो। सोनी ने उन विशाल कलशों के बीच उस अंग को दबाकर 'मर्दन' (रगड़) शुरू किया, ताकि देह की गर्मी उस सुप्त पौरुष में प्राण फूंक सके। सूरज के गले से दबी हुई आहें निकल रही थीं, उसका सीना धौंकनी की तरह चल रहा था, पर उसकी जाँघों के बीच का वह हिस्सा किसी गहरी निद्रा में लीन था।

जब स्पर्श और घर्षण निष्फल रहे, तो सोनी ने हार मानने के बजाय उस अंग की शारीरिक संरचना की गहराई में उतरने का निर्णय लिया। उसने अपनी नज़रों से उस अंग की अद्भुत बनावट को पिया। वह अधखिला होने के बावजूद इतना सुडौल और आकर्षक था कि कोई भी शिल्पी ईर्ष्या कर ले। उसके शीर्ष पर स्थित वह 'सुपाड़ा' (Glans) अभी अपनी रक्षात्मक खाल (Foreskin) के भीतर पूरी तरह छुपा हुआ था।

सोनी ने उसे अनावृत्त करने का जतन शुरू किया। उसने अपने एक हाथ के अंगूठे और तर्जनी से उस मखमली खाल को धीरे से पीछे की ओर खींचने का प्रयास किया। वह खाल इतनी तंग और रेशमी थी कि जैसे ही वह पीछे सरकती, वह पुनः अपनी जगह पर लौट आती। सोनी को अहसास हुआ कि सूरज की इस 'निष्पाप देह' ने अब तक पूर्ण विस्तार का अनुभव ही नहीं किया है।

एक हाथ से यह कार्य असंभव देख, सोनी ने अपने दूसरे हाथ का भी सहारा लिया। उसने दोनों हाथों की उंगलियों के तालमेल से उस गीली और फिसलन भरी चमड़ी को पूरी ताकत और नज़ाकत से पीछे की ओर धकेला। जैसे-जैसे वह आवरण हट रहा था, भीतर से वह गहरा गुलाबी और मांसल शिखर बाहर झांकने लगा। वह हिस्सा इतना संवेदनशील और चमकदार था जैसे किसी सीप के भीतर से कोई कीमती मोती बाहर आ रहा हो।

सोनी ने उस अनावृत्त सुपाड़े के मुहाने पर अपने होठों की तप्त और आर्द्र साँसें छोड़ीं। उसने अपनी जुबान की नोक से उस गुलाबी मुहाने को सहलाया, उसे अपने मुँह के अंधेरे और ऊष्म संपुट में भरकर चूसने का हर संभव प्रयास किया। उसकी लार उस अंग पर एक रेशमी लेप की तरह चमक रही थी। सोनी ने अपनी कामकला की हर वह विधा झोंक दी जिससे पत्थर भी पिघल जाए—हल्के दांतों का दबाव, जीभ का गोल घुमाव और हथेलियों की तीव्र रगड़।

पर विडंबना देखिए, वह अंग जो अपनी बनावट में किसी देवता के वरदान जैसा सुंदर था, व्यवहार में किसी शापित पत्थर की तरह जड़ बना रहा। सोनी के इतने गहन और कामुक उपक्रमों के बाद भी, वह 'वज्र' बनने के बजाय अपनी कोमलता में ही सुरक्षित रहा। वह सुपाड़ा, जिसे अब तक उत्तेजना के मारे फटने लगना चाहिए था, सोनी की आँखों के सामने किसी लाचार और कोमा में गए व्यक्ति की भांति निष्प्राण पड़ा था। तनाव जो सूरज के लिंग में आना चाहिए था, वह अब सोनी की थकी हुई उंगलियों और उसकी टूटती उम्मीदों में सिमट कर रह गया था।

सोनी के यह प्रयास सूरज के लिंग में तनाव तो नहीं भर पाए अपितू सूरज को तनावग्रस्त कर दिया। सोनी के मन में भी निराशा के भाव थे।

सोनी बिस्तर पर आ चुकी थी। सोनी को लिंग में तनाव भरने का वह अद्भुत राज पता था। अपनी हार को जीत में बदलने के लिए सोनी ने सूरज के उसे जादुई अंगूठे को सहलाया और उसके लिंग में तनाव भरता गया। खूबसूरत और तना हुआ लिंग सोनी के आंखों के सामने अपनी पूर्ण गरिमा के साथ उपस्थित था। सोनी की योनि में एक अजब सिहरन हुई..

सोनी धीरे से उसके ऊपर आई और अपनी जाँघों को सूरज की जाँघों के दोनों तरफ फैलाकर बैठ गई। हालाँकि सूरज आँखों पर पट्टी बँधी होने के कारण सोनी की नग्नता को देख नहीं पा रहा था, लेकिन उसे अहसास था कि मौसी उसके ठीक ऊपर है और उनकी देह की ऊष्मा उसे छू रही है। सोनी की चिकनी जांघों का स्पर्श अपनी जांघों पर महसूस कर सूरज का तना हुआ लिंग में तनाव और बढ़ गया। सूरज की धड़कनें तेज थी उसे फिर वह डर सताने लगा कि कहीं उसे दिन जो रोजी के साथ हुआ था कही वह दुबारा तो नहीं होगा…

सोनी ने धीरे से झुककर सूरज के कान के पास फुसफुसाते हुए कहा, "सूरज... अब मैं वो करने जा रही हूँ जो शायद मर्यादा के खिलाफ है, पर मुझे तुझे तेरा उपहार देना है और तुझे इस त्रासदी से निकालना है। मुझे माफ करना।"

सोनी की आवाज़ में ममता और एक अनजानी सी सिहरन घुली हुई थी। उसने कोमलता से सूरज के उस फौलादी लिंग को अपनी हथेली में भरा। वह पूरी तरह जागृत और गर्म था। सोनी ने उसे अपनी जाँघों के बीच के उस सबसे संवेदनशील हिस्से, अपनी भग्नासा (Clitoris) को सूरज के लिंग के शीर्ष (Glans) के करीब ले आई।

जैसे ही सोनी ने सूरज के लिंग के मुकुट को अपनी भग्नासा से स्पर्श कराया, सूरज के पूरे शरीर में बिजली का एक झटका सा लगा। वह पल जिसका उसे डर था, आ चुका था—रोजी के साथ इसी स्पर्श पर उसका पतन हुआ था।

सूरज (हैरानी और उत्साह में): "मौसी! यह... यह तो अभी भी तना हुआ है! क्या आपने सच में इसे वहां स्पर्श किया है?"

सोनी (धीमी और मादक आवाज़ में): "हाँ सूरज... देख, तेरा पौरुष हार नहीं मान रहा। यह तो और भी ज़्यादा सख्त हो गया है।"

सूरज: "मौसी... एक बार फिर से कीजिए ना! मुझे यकीन नहीं आ रहा!"

सोनी के मन में भी एक अजीब सा उन्माद जाग उठा था। उसने एक बार फिर उसके लिंग को अपनी भग्नासा से स्पर्श कराया। सूरज के लिंग पर आया काम-रस (Pre-cum) और सोनी की बुर पर आया काम रस जब एक-दूसरे से मिले, तो एक मखमली फिसलन पैदा हुई। सोनी ने उसे विश्वास दिलाने के लिए उसके लिंग को अपनी भग्नासा पर थोड़ा और रगड़ा।

सूरज (उत्साह से चिल्लाते हुए): "मौसी! यह तो जादू है! मुझे विश्वास नहीं हो रहा कि यह अभी भी पत्थर की तरह तना हुआ है। मैं हार नहीं रहा मौसी, मैं जीत रहा हूँ!"

सोनी को सूरज की यह खुशी देखकर एक असीम संतोष मिला। उसकी ममता अब धीरे-धीरे कामुकता में घुलने लगी थी। उसने सूरज के लिंग को अपनी जाँघों के बीच दबाया और उसे अपनी भग्नासा पर बार-बार रगड़ना शुरू किया। हर रगड़ के साथ सूरज का आत्मविश्वास बढ़ रहा था। वह जो कल तक अपनी मर्दानगी को कोस रहा था, आज सोनी के सुरक्षित स्पर्श में एक विजेता महसूस कर रहा था।

सोनी की सिसकियाँ भी अब गहरी होने लगी थीं। सोनी का शरीर स्वयं उत्तेजना से कांप रहा था परंतु उसका ध्यान उसकी पूरी एकाग्रता सूरज के उस अटूट तनाव पर थी।

सोनी: "देख सूरज, तू संपूर्ण है। तेरा डर सिर्फ एक वहम था। आज तूने अपनी उस कमी को जीत लिया है।"

सूरज के चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान थी जो महीनों बाद लौटी थी। सोनी के भग्नाशे के सीधे स्पर्श के बावजूद, उसका तनाव न केवल कायम था, बल्कि वह अपनी पराकाष्ठा को छू रहा था। उसे समझ आ गया था कि उसे अब किसी उपचार की नहीं, बस इसी विश्वास की ज़रूरत थी।

रात की खामोशी में केवल उनकी तेज़ होती धड़कनों और रेशमी कपड़े की सरसराहट सुनाई दे रही थी। सूरज के बार-बार अनुरोध करने पर सोनी ने अपनी हिचकिचाहट को एक तरफ रख दिया। उसे लगा कि यदि एक बार और स्पर्श करने से सूरज का आत्मविश्वास हमेशा के लिए लौट आता है, तो वह यह जोखिम बार बार उठाएगी।

सोनी ने सूरज के लिंग को अपनी भग्नासा (Clitoris) पर फिर से रगड़ना शुरू किया। लेकिन इस बार उत्तेजना की लहर इतनी तीव्र थी कि वह केवल एक 'प्रयोग' नहीं रह गई। रगड़ते-रगड़ते सोनी को खुद होश नहीं रहा कि कब उसका शरीर और नीचे झुक गया और वह स्पर्श भग्नासा से खिसक कर उसकी योनि (Labia) के कोमल होठों तक पहुँच गया। सोनी का अपना काम-रस (lubrication) अब सूरज के लिंग के शीर्ष को पूरी तरह भिगो चुका था।

सूरज, जिसकी आँखों पर अब भी मलमल का पर्दा था, इस अभूतपूर्व अहसास से पागल हो उठा। उसे अपनी मर्दानगी पर इतना भरोसा पहले कभी नहीं हुआ था।

मौसी मेरे हाथ खोल दीजिए मैं आपको आलिंगन में लेना चाहता हूं.. सोनी स्वयं उत्साहित थी और खुश थी उसने सूरज के हाथ उस हैंड कफ से बाहर निकाल दिए।

सूरज ने अपनी बाहें खोल दीं और एक मासूम पुकार के साथ सोनी को अपने आलिंगन में आमंत्रित किया। सोनी भी उसकी इस अपार खुशी में बह गई और उसे सीने से लगाने के लिए नीचे झुकी।

उसी क्षण, कुदरत ने अपना खेल दिखाया। जैसे ही सोनी झुकी, उसकी योनि ठीक सूरज के तने हुए लिंग के मुहाने पर आ गई। आलिंगन की चाहत में सूरज की कमर खुद-ब-खुद ऊपर की ओर उठी और उसके लिंग का सुपड़ा (Glans) सोनी की योनि के द्वार में प्रवेश कर गया।

सोनी बुरी तरह चौंकी। उसे एक गर्म और बिजली जैसा अहसास अपनी देह की गहराइयों में महसूस हुआ। उसने सूरज के चेहरे की तरफ देखा सूरज की आंखें अब भी उस ब्लाइंडफोल्ड से बंद थी। वह अपनी कमर ऊपर उठाकर अलग होना चाहती थी, पर सूरज की मजबूत बाँहों ने, जो इस वक्त जीत के उन्माद में थीं, उसे अपनी ओर और कस लिया। उस खिंचाव के कारण सूरज का पत्थर जैसा सख्त लिंग लगभग पूरा सोनी के भीतर समा गया।

सोनी (काँपती और दबी आवाज़ में): "सूरज... मुझे छोड़... यह पाप है! हम यह नहीं कर सकते!"

सोनी के शब्द 'पाप' की बात कर रहे थे, पर उसके बदन की सिहरन और उसकी योनि की पकड़ कुछ और ही बयाँ कर रही थी। उसका शरीर सूरज के उस प्रचंड पौरुष को ठुकरा नहीं पा रहा था। उसकी कमर ऊपर उठने के बजाय खुद-ब-खुद नीचे की ओर झुकती गई, जिससे वह मिलन और भी गहरा हो गया।

कमरे में एक अजीब सा सन्नाटा छा गया। कुछ पलों के लिए सब कुछ थम गया। न सूरज ने अपनी कमर हिलाई, न ही सोनी ने कोई हलचल की। वे बस उसी स्थिति में एक-दूसरे में सिमटे रहे।

नियति सांसे थामें इस अद्भुत और कामुक दृश्य को देख रही…थी खजुराहो की मूर्तियों जैसे प्रेम आलिंगन में लिप्त सूरज और सोनी की जोड़ी अनुपम थी अद्वितीय थी..

शेष अगले भाग में…

पाठकों से अनुरोध है की इसी परिपेक्ष्य में सूरज और सोनी की तस्वीर साझा करें पर ध्यान रहे पिक्चर सुंदर होनी चाहिए गंदी नहीं..




पिक्चर के साथ आपको क्या पसंद आया क्या नापसंद यह भी मुझे सूचित करेंगे तो मुझे और भी खुशी होगी धन्यवाद।



अगला अपडेट मिलन का अपडेट है जो आपके द्वारा भेजी गई चित्र के बाद आपके डायरेक्ट मैसेज पर भेज दिया जाएगा..

 
भाग 176

सोनी (काँपती और दबी आवाज़ में): "सूरज... मुझे छोड़... यह पाप है! हम यह नहीं कर सकते!"



सोनी के शब्द 'पाप' की बात कर रहे थे, पर उसके बदन की सिहरन और उसकी योनि की पकड़ कुछ और ही बयाँ कर रही थी। उसका शरीर सूरज के उस प्रचंड पौरुष को ठुकरा नहीं पा रहा था। उसकी कमर ऊपर उठने के बजाय खुद-ब-खुद नीचे की ओर झुकती गई, जिससे वह मिलन और भी गहरा हो गया।

कमरे में एक अजीब सा सन्नाटा छा गया। कुछ पलों के लिए सब कुछ थम गया। न सूरज ने अपनी कमर हिलाई, न ही सोनी ने कोई हलचल की। वे बस उसी स्थिति में एक-दूसरे में सिमटे रहे।



अब आगे…

इस बीच सूरज सूरज की हथेलियां सोनी की उसे झीने कुर्ते से ढकी पीठ पर घूम रही थी। यह महसूस कर चुका था कि उसकी मौसी सोनी ने उसकी कामुक कल्पना का माँन रख लिया है।

सूरज ने सोनी को अपने आलिंगन में और कसा उसे अपने सीने पर सोनी की नग्न और तनी हुई चुचियों का एहसास भी हुआ.. उधर सोनी मदहोश हो रही थी।

दोनों के सीने धड़कन की तेज़ गति से एक-दूसरे से टकरा रहे थे। सूरज, जो अब भी दुनिया को उस मलमल के पर्दे के पीछे से महसूस कर रहा था, बड़ी मासूमियत से फुसफुसाया।

सूरज: "मौसी... मुझे यकीन नहीं हो रहा। आखिर क्या जादू है? जो स्पर्श मुझे डराता था, आज वह मुझे मुकम्मल महसूस करा रहा है। मैं... मैं आपके भीतर हूँ ना मौसी?"

सूरज की उस मासूमियत और उसकी आवाज़ में छिपी जीत ने सोनी के प्रतिरोध को पूरी तरह खत्म कर दिया। वह समझ गई कि यह केवल एक शारीरिक मिलन नहीं, बल्कि उस डर की अंत्येष्टि थी जिसने सूरज को अपाहिज बना रखा था। सोनी ने अपनी आँखें बंद कर लीं और सूरज के कंधों पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली, मानो वह भी इस 'पाप' में अपनी मर्जी से शामिल हो गई हो।

सूरज की वह मासूमियत भरी बात सुनकर सोनी के पास कोई शब्द नहीं बचे थे। वह एक डॉक्टर की तरह शुरू हुई थी, पर अब वह एक ऐसी औरत बन चुकी थी जिसके भीतर की ममता और दबी हुई कामनाएँ एक साथ पिघल रही थीं। उसने सूरज को कसकर अपने आलिंगन में भर लिया।

सूरज, जो महीनों से अपनी मर्दानगी को लेकर कुंठित था, आज सोनी के उस रेशमी और तप्त सानिध्य में खुद को एक राजा महसूस कर रहा था। सोनी की योनि की वह मखमली पकड़ और उसकी नाइटी के भीतर की ऊष्मा ने सूरज के भीतर एक ऐसा ज्वार पैदा कर दिया जिसे संभालना उसके बस में नहीं था।

सूरज (उत्तेजना में फुसफुसाते हुए): "मौसी... मैं... मैं खुद को रोक नहीं पा रहा हूँ। ये अनुभव अनोखा है"

सूरज ने अपनी कमर को बस एक-दो बार ही धीरे से आगे-पीछे किया। वह युवा था और सोनी जैसी परिपक्व और सुंदर महिला का वह सजीव स्पर्श उसके लिए किसी दैवीय अनुभव से कम नहीं था। जैसे ही उसका लिंग सोनी की गहराइयों से टकराया, उसकी नसों में एक तीव्र बिजली सी कौंधी।

सोनी अभी खुद को संभालने की कोशिश कर ही रही थी कि उसने महसूस किया कि सूरज का पूरा शरीर अकड़ गया है। सूरज के लिंग ने एक जोरदार झटका लिया और उसका सारा संचित वेग, उसका पौरुष, सोनी की गहराइयों में एक गर्म फुहारे की तरह फूट पड़ा।

सूरज के स्खलन की वह गरमाहट जब सोनी ने अपने भीतर महसूस की, तो वह सिहर उठी। वह स्तंभित रह गई। सूरज ने अपनी पूरी ताकत से सोनी को जकड़ लिया और गहरी साँसें लेते हुए बेतहाशा अपना वीर्यपात करने लगा। उसे यह एहसास भी नहीं रहा कि वह अपनी मां समान मौसी का गर्भ सिंचित कर रहा है…

पूरी तरह वीर्यपात करने के बाद सूरज पकड़ ढीली हुई पर लंड का तनाव जस का तस था। सूरज ने जो वीर सोनी के गर्भ में उड़ेला था वह अब भी अंदर था सूरज का लंड उसे बाहर आने से रोक रहा था।

सूरज (निढाल होकर): "मौसी... मुझे माफ कर दीजिएगा..।"

सोनी निशब्द थी। उसका अपना स्खलन नहीं हुआ था, वह अभी भी उत्तेजना के एक अधूरे मोड़ पर खड़ी थी, पर उसके चेहरे पर एक सुकून था। उसने देखा कि जिस सूरज का आत्मविश्वास राख हो चुका था, आज वह एक विजेता की तरह उसकी योनि में अपना वीर्यपात कर चुका था मर्यादा की दीवारें ढह चुकी थीं, पर एक युवक का भविष्य बच गया था।

सूरज के स्खलन की वह गर्म फुहार जब सोनी की गहराइयों में समाई, तो हवेली का वह कमरा क्षण भर के लिए एकदम निशब्द हो गया। सूरज बिस्तर पर सीधा लेटा हुआ था, उसकी आँखों पर मलमल की वह पट्टी अब भी बंधी थी। सोनी उसके ठीक ऊपर, अपनी जाँघों को सूरज की जाँघों के दोनों तरफ फैलाकर बैठी थी। सूरज की साँसें तेज़ थीं, पर एक अद्भुत बात थी—चरम आनंद के उस वेग के बाद भी, सूरज के लिंग का तनाव रत्ती भर भी कम नहीं हुआ था। वह अब भी पत्थर की तरह सख्त था और सोनी की योनि की मखमली दीवारों को भीतर तक पूरी तरह भरे हुए था।

सोनी इस अभूतपूर्व अनुभव से स्तब्ध थी। उसने महसूस किया कि सूरज का पौरुष न केवल जाग्रत हुआ है, बल्कि वह अपनी पूर्ण सामर्थ्य के साथ उसके भीतर आत्मसात हो चुका है। सूरज के लिंग की धड़कनें अब सोनी योनि मार्ग को सहला रही थीं।

सूरज (काँपती और भारी आवाज़ में): "मौसी... मैं अब और इस अंधेरे में नहीं रहना चाहता। क्या मैं इसे हटा सकता हूँ? क्या मैं अपनी मुक्ति दायिनी अपनी देवी को देख सकता हूँ?"

सोनी, जो सूरज की इस जीत से ममता और कामुकता के एक अनूठे भँवर में थी, अब उसे और मना नहीं कर पाई। उसने धीरे से कहा, "हटा ले सूरज... आज तूने अपना पुरुषत्व प्राप्त कर लिया है मुझे खुशी है तू सफल हुआ और हमारी साधना सफल हुई।"

सूरज ने काँपते हाथों से अपनी आँखों से वह मलमल की पट्टी हटा दी। जैसे ही उसकी आँखें खुलीं, कमरे की मद्धम रोशनी में जो दृश्य उसके सामने था, उसने उसके पौरुष को और भी प्रचंड कर दिया। परंतु, जैसे ही सूरज की नज़रें सोनी से मिलीं, सोनी ने लज्जा और संकोच के मारे अपनी पलकें मूँद लीं। उसकी बंद आँखों के किनारों पर नमी थी और चेहरे पर एक लालिमा, जो उसके भीतर मचे तूफान को बयाँ कर रही थी।

सूरज ने अपनी प्यासी निगाहों से अपनी मौसी के उस यौवन का रसपान करना शुरू किया जिसका उसने सपना देखा था। वह सफेद झीना कुर्ता, जिसे वह बाज़ार से लाया था, सोनी के पसीने और उत्तेजना से उनके बदन पर पूरी तरह चिपक गया था। कुर्ते के पारभासी कपड़े के नीचे से सोनी की भारी-भारी, पुष्ट चूचियाँ अपनी पूरी गरिमा के साथ उभर रही थीं नीचे लटकने के कारण उनका आकर और गोल हो गया था। गुलाबी और तने हुए निप्पल उस महीन कपड़े को चीरकर बाहर आने को बेताब दिख रहे थे।

सूरज की नज़रें अपनी मौसी के उस उन्नत वक्ष पर जमी थीं, पर उसका शरीर अब भी सोनी के साथ गहराई से जुड़ा था। सूरज चाहता तो था कि वह दोनों चूचियों को अपने हाथों में भर ले परंतु उसकी हिम्मत नहीं पड़ रही थी। उसका ध्यान अपने लिंग पर था।

उसने अपने मजबूत हाथों से सोनी की पतली कमर को पकड़ा और उसे धीरे से थोड़ा ऊपर उठाया।

वह देखना चाहता था—वह उस स्थान को अपनी आँखों से निहारना चाहता था जहाँ उसकी विजय गाथा लिखी जा रही थी। जैसे ही उसने सोनी को ऊपर उठाया, उसे साफ़ दिखा कि उसका बलिष्ठ लिंग, सोनी की गोरी और रसीली जाँघों के बीच, उनकी योनि के गुलाबी होंठों को चीरता हुआ गहरे तक समाया हुआ था। वह मिलन स्थल काम-रस और वीर्य के मिश्रण से पूरी तरह गीला हो चुका था, जो मद्धम रोशनी में मोतियों की तरह चमक रहा था।

सोनी ने एक लंबी और गरम आह भरी। सूरज ने देखा कि उसकी हरकत से सोनी के शरीर में एक सिहरन दौड़ गई है। सूरज का तनाव अब अपनी पराकाष्ठा पर था।

उसने उठने की कोशिश की और सोनी के उन काँपते हुए गुलाबी होंठों के पास अपना चेहरा ले गया।

सूरज: "मौसी... आपकी आँखें बंद हैं, पर आपकी अतृप्त देह पुकार रही है। आपने मुझे नया जीवन दिया है, अब मुझे इसे तृप्त करने दीजिए।"

अपनी पलके बंद किए ही सूरज के माथे को चूमने की कोशिश की पर सूरज ने अपने माथे की जगह अपने होंठ सोनी के अधरों से सटा दिए…पहल सूरज ने की पर सौनी पिघलती गई….आज सोनी महसूस कर रही थी और अब सूरज के इशारों पर फिसल रही थी।

सूरज ने धीरे से सोनी के वक्ष को उस झीने कुर्ते के ऊपर से ही अपनी हथेलियों में भरा। स्पर्श इतना उत्तेजक था कि सोनी की आँखें एक पल के लिए खुलीं और फिर मदहोशी में बंद हो गईं। सूरज ने अब अपनी कमर को एक लयबद्ध गति देना शुरू किया। हर धचके के साथ वह सोनी की योनि की उन परतों को महसूस कर रहा था जो अब उसके स्वागत में पूरी तरह खुल चुकी थीं।

सोनी अब समर्पण मुद्रा में थी सूरज ने सोनी के वजन को अपने शरीर पर महसूस किया और उसने सोनी को आराम देने का फैसला कर लिया।

सूरज धीरे से बिस्तर पर उठकर बैठने लगा। उसकी इस हरकत के साथ सोनी का शरीर भी एक लय में ऊपर उठता है, क्योंकि उनका जुड़ाव अभी भी अटूट था—सूरज का कठोर लिंग अभी भी सोनी की योनि की गहराइयों में उसी तरह समाहित था। सोनी सूरज की मंशा समझ जाती है और उसके निर्देशों का पालन करते हुए अपनी जाँघों और घुटनों को सलीके से मोड़ती जाती है। कुछ ही पलों में वे दोनों बिस्तर पर बैठने की मुद्रा में आ जाते हैं।

सोनी की पुष्ट जाँघें सूरज की मजबूत जाँघों पर टिकी थीं, पर उनका लिंग-योनि का मिलन इस बैठने की स्थिति में और भी सघन हो गया था। सूरज ने सोनी के गदराए नितंबों को अपनी मजबूत हथेलियों में भरा और उन्हें दबाते हुए अपनी ओर और कस लिया। इस करीबी ने उनके शरीरों के बीच की दूरी को शून्य कर दिया था। कुछ ही पलों बाद, सूरज ने बड़ी कोमलता से सोनी को पीठ के बल बिस्तर पर लिटा दिया, पर वह खुद उनके ऊपर हावी रहा।

हवेली के उस मद्धम प्रकाश में सूरज सोनी की मदमस्त जवानी को अपनी आँखों से निहार रहा था। वहाँ कुछ पलों के लिए एक जादुई शांति छा गई। सोनी भली-भांति समझ रही थी कि उसका भांजा आज अपनी दबी हुई कल्पनाओं का रसपान कर रहा है। वह एक मौन साधिका की तरह अपनी पलकें मूँदे पड़ी रही, मानो उसने खुद को पूरी तरह सूरज के हवाले कर दिया हो। सूरज धीरे से उन पर झुका और उसके माथे तथा गुलाबी होंठों को चूमते हुए उनके कान में फुसफुसाया।

सूरज: "मौसी... मैं एक बार फिर से वह सब महसूस करना चाहता हूँ, पर इस बार अपनी आँखों के सामने।"

सोनी ने एक गहरी साँस ली और अपनी मौन स्वीकृति दे दी।

सूरज ने अपनी पकड़ थोड़ी ढीली की और धीरे-धीरे अपने लिंग को सोनी की योनि से बाहर निकालना शुरू किया। जैसे ही वह सख्त अंग बाहर आया, सोनी की योनि से सूरज का वह गाढ़ा वीर्य छलक-छलक कर बाहर आने लगा।

सूरज की नजरों ने जब सोनी की योनि को पहली बार देखा तो देखता ही रह गया। सोनी की योनि की बनावट किसी महोघनी के प्राचीन वृक्ष की उस कामुक गाँठ (Knot) की तरह थी, जो समय के साथ और भी सघन, गहरी और नक्काशीदार हो जाती है। महोघनी की लकड़ी जैसी वह मखमली रंगत और उसके भीतर छुपी हुई वे अनंत परतें, जो अब सूरज के प्रहारों से सुर्ख लाल होकर फूल गई थीं। योनि के वे मांसल और कोमल ओष्ठ (Labia) अधखुले गुलाब की तरह बाहर की ओर मुड़ गए थे, जिनसे सूरज का वीर्य रुक-रुक कर बाहर आ रहा था।

वह 'महोघनी की गाँठ' अब भी स्पंदित हो रही थी, मानो सूरज के उस पौरुष को वापस पुकार रही हो। वीर्य की वह सफेद और लसलसी चमक सोनी की चिकनी त्वचा के साथ मिलकर एक ऐसा मोहक विरोधाभास पैदा कर रही थी, जो सूरज की आँखों में दोबारा वासना का ज्वार उठाने के लिए काफी था।

सोनी ने अपनी जाँघों को और भी फैला दिया। उसकी साँसें तेज़ थीं और वक्षों का उतार-चढ़ाव उसकी अतृप्ति की गवाही दे रहा था। सोनी की आँखें अर्द्ध-निमीलित (आधे बंद) थीं और उनमें एक अजीब सी भूख थी।

उसकी योनि से रिसता वह द्रव्य और उसकी देह से उठती वह तीखी 'पुरुष-गंध' वातावरण को और भी उत्तेजक बना रही थी। वह अपनी कमर को हल्का सा ऊपर उठा रही थी, जैसे उस महोघनी की गाँठ में अभी और प्रहारों को झेलने की शक्ति बाकी हो। वह पूरी तरह सूरज के रस में भीग चुकी थी, पर उसका अंतर्मन अभी भी उस 'महा-सुख' की प्रतीक्षा में तड़प रहा था।

सूरज ने देखा कि वीर्य की कुछ बूंदें सोनी की योनि के मुहाने पर मोतियों की तरह जमी हुई थीं, जबकि बाकी का हिस्सा धीरे-धीरे फिसलकर सोनी के नितंबों के नीचे बिछी चादर को भिगो रहा था। सोनी की योनि से निकलता वह काम-रस और वीर्य का मिश्रण मद्धम प्रकाश में अद्भुत चमक पैदा कर रहा था। वह स्थान पूरी तरह आर्द्र और चिपचिपा हो चुका था।

सोनी की योनि के होंठ उत्तेजना और घर्षण के कारण थोड़े सूजे हुए और गहरे गुलाबी हो चुके थे। उस स्थान से उठती एक सोंधी और मादक गंध ने सूरज के मष्तिष्क को फिर से उन्माद से भर दिया। वह अपनी मौसी की उस 'मुनिया' की सुंदरता से इतना मोहित हो गया.. कि उसने झुक कर उसे चूमने की कोशिश की सोनी को जैसे ही अपनी जांघों पर सूरज के सर का एहसास हुआ उसने सूरज का सर पकड़ लिया और उसे अपनी बुर को चूमने से रोक लिया…

सूरज ….ये नहींं ……सोनी वासना की पराकाष्ठा पर सूरज को नहीं ले जाना चाहती थी…सूरज ने सोनी की बात मान ली पर उसकी योनि की जगह अपने सर को आगे ले जाकर उसकी नाभि को चूम लिया और उसकी नाभि के केंद्र पर अपनी जीभ घुमा दी.

सोनी मन ही मन सोच रही थी कि सूरज में कामुकता का भंडार है..अपने पहले मिलन में ये इतना उत्तेजक है तो आगे क्या करेगा….

नाभि से आ रही मादक गंध और उसके अनोखे स्वाद ने सूरज का पौरुष एक बार फिर से फड़क उठा। उसे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था कि उसकी मौसी का वह पवित्र शरीर अब उसके पौरुष के चिन्हों से सजा हुआ था। वह दृश्य इतना कामुक और गरिमामय था कि सूरज कुछ क्षणों के लिए एकटक उसे निहारता रहा, मानो वह इस छवि को अपनी आत्मा में हमेशा के लिए अंकित कर लेना चाहता हो।

सूरज अब अपनी जिज्ञासा और एक प्रेमी की दीवानगी के साथ अपने पौरुष का परीक्षण कर रहा था। उसने अपने उस पत्थर की तरह सख्त अंग को दोबारा सोनी की भग्नासा (Clitoris) पर रखा। वह देखना चाहता था कि जो लिंग के तनाव कम होने की घटना रोजी के साथ हो रही थी वह अब मौसी के साथ क्यों नहीं हो रही थी।

वह देखना चाहता था कि क्या यह तनाव केवल एक इत्तेफाक था या उसकी मर्दानगी वाकई लौट आई है। वह अपने लिंग को सोनी के उस कोमल दाने पर धीरे-धीरे रगड़ने लगा। कभी वह उसे उस पर मखमल की तरह फिसलाता, तो कभी हल्के धक्के के साथ उस पर चोट करता।

सोनी: "उह्ह... सूरज... आआह्ह...मत कर.."

सोनी का पूरा बदन हर रगड़ के साथ धनुष की तरह ऊपर की ओर खिंच जाता। उत्तेजना की लहरें उसके भीतर सुनामी ला रही थीं। वह चाहती थी कि सूरज यह 'टॉर्चर' बंद करे, क्योंकि उसके भीतर की प्यास अब उसे पागल कर रही थी। उसने अपने होंठों को अपने ही दाँतों के नीचे दबा रखा था ताकि उसकी आवाज़ कमरे से बाहर न जाए, पर उसकी सिसकियाँ और सीत्कारें (Moans) उसकी बेबसी बयाँ कर रही थीं।

सूरज रुकने का नाम नहीं ले रहा था। वह उस गीले और फिसलन भरे स्थान पर अपने लिंग को बार-बार रगड़ता रहा। अंततः, सोनी का सब्र जवाब दे गया। उसकी देह अब केवल स्पर्श नहीं, बल्कि पूर्ण समर्पण माँग रही थी। उसने एक गहरी और तड़पती हुई आह भरी और अपनी दोनों बाहें सूरज के लिए फैला दीं ठीक वैसे ही जैसे सूरज ने अब से कुछ देर पहले फैलाई थी।

सोनी (सिसकते हुए): "अब और नहीं सूरज... अब और बर्दाश्त नहीं होता... आआह्ह …आजा….!"

सूरज ने जैसे ही यह सुना, उसने सोनी की दोनों हथेलियां को अपनी हथेली से पकड़कर उसे सोनी के सर के पीछे कर दिया। इसी बीच सोनी की उंगलियों ने सूरज के उस जादुई अंगूठे को एक बार फिर सहला दिया।

सोनी ने यह काम जानबूझकर किया था इसके पहले उसने सूरज के लिंग में उतना ही तनाव भरा था जितना की एक युवा में होना चाहिए पर सोनी अब सूरज को भी प्रथम मिलन का एहसास करना चाहती थी क्योंकि यह सूरज के लिए भी उसका कौमार्य भंग करने जैसा था। दूसरी तरफ सोनी स्वयं भी इस मिलन को यादगार बनाना चाहिए लंबे और मजबूत लिंग से संभोग करने की उसकी तमन्ना आज पूरी हो रही थी।

अंगूठा सहलाए जाने से सूरज के लिंग का तनाव और आकार और भी बढ़ गया. उस तनाव को मजबूत आवरण की जरूरत थी…..सूरज ने अति उत्तेजना में आव देखा न ताव, अपनी पकड़ मजबूत की और एक ही झटके में अपना पूरा पौरुष सोनी की योनि की गहराइयों में उतारने की कोशिश की।

"उईईई माँ….….आआह्ह! सूरज.. तनी धीरे से….दुखाता." सोनी के मुँह से एक चीख निकल गई.

सोनी की लिसलिसी चिपचिपी बुर सूरज के उस विशाल लिंग के लिए प्रतिरोध दिखा रही थी। सूरज को ऐसा लगा जैसे वह किसी अभेद्य दीवार को लांघने की कोशिश कर रहा हो।

उस तीव्र घर्षण और प्रतिरोध के बीच, अचानक सूरज को अपने लिंग के अग्रभाग (सुपाड़े) के ठीक निचले हिस्से में, जहाँ संवेदनाओं का केंद्र होता है, एक तीखी और बिजली जैसी टीस महसूस हुई। वह दर्द इतना तीव्र था कि सूरज के बदन में एक सिहरन दौड़ गई। सोनी की उस तंग और मांसल दीवारों के दबाव से, सूरज के लिंग के निचले हिस्से का वह कोमल तंतु (पतला धागा) उस खिंचाव को बर्दाश्त नहीं कर पाया और सूरज का कौमार्य भंग हो गया… सूरज के रक्त की पहली बूंद सोने की योनि से निकल रहे रजरस से मिलकर एकाकार हो रही थी।

उधर सोनी अपने दर्द को कम करने की कोशिश में उसने सूरज की पीठ पर अपने नाखून गड़ा दिए…सूरज को एहसास हुआ जैसे उसने कोई गलती कर दी हो उधर उसका लिंग सोनी की योनि के प्रतिरोध को महसूस कर उसे और भेदने का मन बन चुका था और अपने स्वामी के आदेश की प्रतीक्षा कर रहा था।

दरअसल सोनी के अंगूठा सहलाए जाने से लिंग काआकर कुछ ज्यादा ही बढ़ गया था और सूरज के धक्का लगाने के बावजूद वह वह सोने की चिपचिपी योनि में आधा ही जा पाया..

सोनी हाफ रही थी.. उसकी आंखों में दर्द के आंसू थे पर जिस लंबे और मजबूत लिंग की कल्पना सोनी ने की थी वह आज उसके भीतर था और उसे वही एहसास दिला रहा था जैसा उसने अपने प्रथम मिलन में महसूस किया था। उसने अपनी पलके खोली और सूरज की आंखों में आंखें डालते हुए बोला…

“सूरज थोड़ा धीरे-धीरे ….”

सूरज के लिए सोनी सर्वस्व थी .. जिसने उसे पुरुषत्व का वरदान दिया था उसने अपने लिंग को थोड़ा बाहर निकाला और बेहद प्यार से सोनी की योनि के अंदर प्रवेश करने लगा..

सूरज सोनी पर पूरी तरह हावी हो चुका था अब तक जितना कामशास्त्र का ज्ञान उसने प्राप्त किया था वह सब वह सोनी पर उड़ेल देना चाहता था। सोनी की दोनों हथेलियां उसकी हथेली में थी पर सूरज का मुंह अब भी स्वतंत्र था उसने बिना किसी हिचक के सोनी की दाहिनी चूची को अपने मुंह में भर लिया…

सोनी कराह उठी उसकी जांघें और भी ज्यादा फैल गई…उसकी उत्तेजना ने सूरज के लिंग को और भी रास्ता दिया…जैसे-जैसे सूरज सोने की मदमस्त चूचियों को चूसता गया.. उसका लिंग सोने की योनि में और गहरी और गहरे तक उतरता गया…

सोनी को ऐसा महसूस हो रहा था जैसे उसके बदन का खालीपन अब पूरी तरह भर चुका है.. योनि का फैलाव अपने चरम पर था और उसकी कोमल दीवारें सूरज के तने हुए लिंग को पूरी तरह जकड़े हुए थीं…

सूरज का पौरुष अब पूरी तरह से जागृत हो चुका था। उसने महसूस किया कि सोनी की योनि की चिपचिपाहट और उसकी गर्माहट उसके लिंग को भीतर की ओर आमंत्रित कर रही है। वह अब केवल एक भांजा नहीं था जो उपचार ढूंढ रहा था, बल्कि वह एक पूर्ण पुरुष था जो अपनी कामुकता की नई ऊंचाइयों को छू रहा था। उसने अपनी कमर को एक खास लय (Rhythm) में हिलाना शुरू किया। हर धक्के के साथ उसका लिंग सोनी की योनि की उन परतों को खोल रहा था जो उसका पति विकास वर्षों से नहीं खोल पाया था।

सोनी को महसूस हो रहा था कि सूरज का वह फौलादी लिंग उसके गर्भाशय की दीवार से टकरा रहा है। वह दर्द जो शुरुआत में था, अब एक मीठे उन्माद में बदल चुका था। उसने अपनी टांगों को सूरज की कमर के चारों ओर और भी कस लिया, मानो वह उसे खुद के और भी करीब खींच लेना चाहती हो।

सूरज ने अब अपना मुंह सोनी की दूसरी चूची की ओर मोड़ा। उसके गीले स्पर्श और दांतों की हल्की सी पकड़ ने सोनी को पागल कर दिया। सोनी ने अपने हाथ सूरज की पकड़ से खींचने की कोशिश की और सूरज ने सोनी के हाथों को आजाद कर दिया.

सोनी सूरज के सर के बाल पकड़ कर उसे खुद से दूर करने की कोशिश करने लगी पर सूरज उसकी चूची को और भी उन्माद से चूसता रहा अंतत सोनी का प्रतिरोध खत्म हो गया और वह स्वयं सूरज के सर को अपनी चुची पर और भी सटाती चली गई

सोनी: "ओह्ह... सूरज... तू क्या कर रहा है... बस…कर…... आआह्ह!"

सूरज की रफ़्तार अब धीरे-धीरे बढ़ने लगी थी। कमरे में जिस्मों के टकराने की वह मादक 'थप-थप' की आवाज़ गूँजने लगी जो किसी आदिम संगीत जैसी लग रही थी। हर प्रहार के साथ सोनी की योनि से निकलता काम-रस (Lubrication) उस मिलन को और भी चिकना और गहरा बना रहा था। सूरज अब पूरी तरह से सोनी के भीतर समा चुका था; उनका संगम इतना गहरा था कि उनके पसीने से भीगे जिस्म एक-दूसरे से चिपक गए थे।

सोनी की सिसकियां अब तेज़ हो गई थीं, उसकी आँखें फिर से मुँदने लगी थीं और उसका शरीर उत्तेजना के उस शिखर की ओर बढ़ रहा था जहाँ पहुँचकर सब कुछ धुंधला हो जाता है। सूरज ने महसूस किया कि सोनी की योनि की दीवारें उसके लिंग को जोर-जोर से जकड़ रही हैं, जो इस बात का संकेत था कि चरमानंद की घड़ी अब बस कुछ ही पलों की दूरी पर है।

सूरज ने अपने हाथों की पकड़ सोनी की हथेलियों पर और मजबूत की और अपनी कमर के वेग को अपनी पूरी शक्ति के साथ चरम पर ले गया।

सूरज की कमर की गति अब किसी बेकाबू लहर की तरह हो गई थी। वह अब केवल प्रहार नहीं कर रहा था, बल्कि सोनी की देह की गहराइयों में अपने अस्तित्व की मुहर लगा रहा था। सोनी का शरीर हर धक्के के साथ बिस्तर पर ऊपर-नीचे हो रहा था, और उसकी जांघों के बीच मची उस हलचल ने कमरे के सन्नाटे को पूरी तरह चीर दिया था।

सोनी की सिसकियाँ अब टूटने लगी थीं और उनका स्थान गहरी और मदहोश कर देने वाली सीत्कारों ने ले लिया था।

सोनी: "आह्ह... सूरज... बस... अब और नहीं... मैं... मैं ... उईईई माँ!"

सोनी का पूरा बदन अचानक धनुष की तरह अकड़ गया। उसकी योनि की दीवारों ने सूरज के लिंग को एक ऐसी अविश्वसनीय पकड़ में जकड़ लिया जैसे कोई उसे अपनी बाहों में भींच रहा हो। सोनी की आँखें उलट गईं और उसके मुँह से एक लंबी, थरथराती हुई आह निकली। वह चरमानंद के उस शिखर से नीचे गिर रही थी जहाँ केवल सुख का अहसास होता है।

सोनी के उस तीव्र संकुचन और उसकी योनि की उस मखमली जकड़न ने सूरज के सब्र का बांध भी तोड़ दिया। उसे महसूस हुआ जैसे उसके रीढ़ की हड्डी से एक गर्म बिजली दौड़ती हुई उसके पौरुष में जमा हो गई है। सूरज ने एक आखिरी, सबसे गहरा और प्रचंड धक्का मारा और सोनी के गर्भाशय के मुहाने पर अपना सारा संचित वेग, अपना सारा पौरुष, एक गर्म झरने की तरह उड़ेल दिया।

सूरज: "मौसी... आआह्ह!"

सूरज का पूरा शरीर काँप उठा। वह कई सेकंडों तक उसी स्थिति में सोनी के ऊपर जकड़ा रहा, जबकि उसका लिंग सोनी की गहराइयों में अपना अंतिम कतरा कतरा खाली कर रहा था। सूरज ने सोनी के गर्भ में सिर्फ अपना वीर्य ही नहीं अपने कौमार्य भंग होने से निकला हुआ रक्त भी अर्पित किया था…

सोनी ने उसे अपनी बाहों में कसकर भींच लिया, मानो वह उस गर्म अहसास को हमेशा के लिए अपने भीतर कैद कर लेना चाहती हो।

कमरे में अब केवल उनकी हाँफती हुई साँसों की आवाज़ें थीं। पसीने से भीगे हुए दोनों जिस्म एक-दूसरे में सिमटे हुए थे। सूरज का लंड जब सोनी की योनि से बाहर आया तो एक पक्क.. की आवाज हुई…यह आवाज किसी सिलेंडर से पिस्टन खींचने पर होने वाली आवाज जैसी थी।

सोनी ने इस आवाज को पहले भी सुना था उसे वह दिन याद आ गया जब सरयू सिंह ने उसे स्खलित करने के बाद अपना लिंग उसकी योनि से खींचा था। आज वही काम सरयू सिंह के पुत्र ने किया था।

सूरज धीरे से सोनी के बगल में ढह गया पर उसके लंड का तनाव अब भी वैसा ही बना हुआ था।

सूरज का वीर्य एक बार फिर सोनी की योनि से छलकने को था पर सोनी ने अपनी जांघें से ऊपर कर ली जैसे ही वह वीर्य के हर कतरे को संजो लेना चाहती हो..

सूरज का हाथ अब भी सोनी की कमर पर था। सोनी ने करवट ली और सूरज की आँखों में देखा—उन आँखों में अब वह पुराना डर नहीं, बल्कि एक विजेता का गर्व और अपनी 'आराध्या' के प्रति अगाध कृतज्ञता थी।

सोनी ने धीरे से सूरज के माथे से पसीना पोंछा और उसके होंठों पर एक ममता भरा चुंबन अंकित किया।

सोनी (धीमी आवाज़ में): "आज बनारस का यह सूरज सच में उदय हो गया है।"

शेष अगले भाग में…
 
अपने ऑनलाइन पाठकों जो अब तक कहानी तो पढ़ रहे हैं पर फोरम पर लॉगिन करके अपने कमेंट नहीं दे पा रहे हहैं उनके लिए यह एपिसोड में पब्लिकली पोस्ट कर रहा हूं।

जिन पाठकों ने मेरे अनुरोध पर पिक्चर्स भेजी थी उन्हें दिल से धन्यवाद।
 
भाग 177

सूरज का वीर्य एक बार फिर सोनी की योनि से छलकने को था पर सोनी ने अपनी जांघें से ऊपर

कर ली जैसे ही वह वीर्य के हर कतरे को संजो लेना चाहती हो..


सूरज का हाथ अब भी सोनी की कमर पर था। सोनी ने करवट ली और सूरज की आँखों में देखा—उन आँखों में अब वह पुराना डर नहीं, बल्कि एक विजेता का गर्व और अपनी 'आराध्या' के प्रति अगाध कृतज्ञता थी।

सोनी ने धीरे से सूरज के माथे से पसीना पोंछा और उसके होंठों पर एक ममता भरा चुंबन अंकित किया।

सोनी (धीमी आवाज़ में): "आज बनारस का यह सूरज सच में उदय हो गया है।"

अब आगे…


सोनी बिस्तर से उठी। उसके बदन पर सूरज का दिया वह रेशमी कुर्ता अब भी था..

उसका ध्यान सूरज के तने हुए लिंग पर गया जिसने उसे जन्नत की सैर कराई थी और उसके गर्भ को सिंचित किया था। इस अद्भुत चर्मदंड को अब विश्राम देने की बारी थी।

सोनी ने झुक कर काम रस से लथपथ उस लिंग को अपने होठों से चुम लिया हमेशा की तरह उसका तनाव गायब हो गया..

जैसे कोई मां अपने छोटे बच्चे को पुचकारती है और उसका तनाव खत्म कर उसे सुलाती है वैसे ही सोनी ने सूरज के लिंग को बड़े प्यार से उसकी जांघों पर सुला दिया।

कुछ पलों बाद …सूरज उठकर खड़ा हो गया वह पूरी तरह नग्न था सोनी भी सूरज के दिए कुर्ते में अर्धनग्न अवस्था में थी।

अचानक सूरज का ध्यान सोनी की जांघों के जोड़ पर गया जहां वीर्य के साथ-साथ कुछ लालिमा भी थी जो निश्चित थी रक्त की थी.. सोनी ने भी सूरज की निगाहों का अनुसरण किया..

सूरज ने सोनी की आंखों में झांकते हुए पूछा… ये कैसे?

आज मेरे सूरज का कौमार्य भंग हुआ है ये उसकी ही निशानी है…

सूरज ने अपने लिंग की तरफ देखा लालिमा का कुछ अंश उस पर भी था…यद्यपि सूरज पूरी तरह समझ नहीं पाया पर वह शांत ही रहा..

बिछड़ने का वक्त आ चुका था..

सूरज ने पूरे आदर भाव से झुक कर सोनी के चरण छुए और कृतज्ञ भाव से बोला..

मौसी मेरा पुरुषत्व जागने के लिए मैं आपका ऋणी हूं

आप मेरे लिए हमेशा पूज्य हैं और पूज्य रहेंगी.. कोई गलती हुई हो तो मुझे माफ कर दीजिएगा..

सोनी ने उसे अपने गले से लगा लिया। सोनी और सूरज का मिलन अद्भुत था अनोखा था इस आलिंगन में वात्सल्य था या तृप्त हो चुकी वासना कहना कठिन था।

सोनी ने उसके सर को अपने दोनों हाथों से पकड़ कर अपने होठों से उसके होठों पर चुंबन लिया…सोनी के होठों ने सूरज के लिंग से जो काम रास चुराया था सोनी ने उसे अनजाने में ही सूरज के होठों से साझा कर लिया था..

सूरज अपने कमरे में पहुँचा, तो उसका शरीर थकावट से चूर था, पर मन किसी हिमालय की चोटी पर बैठा उत्सव मना रहा था। कमरे की कुंडी चढ़ाते ही उसने आईने में अपनी मस्कुलर देह को निहारा। सोनी मौसी के बदन की चंदन जैसी खुशबू और उनके स्त्रीत्व का वह 'महोघनी रस' अभी भी उसके रोम-रोम में बसा था।

तभी उसे नीचे के हिस्से में एक भारीपन और हल्की कसक महसूस हुई। वह बाथरूम की ओर बढ़ा। जैसे ही उसने पेशाब की धार छोड़ी, अचानक उसके लिंग के अग्रभाग (सुपाड़े) के ठीक निचले हिस्से में एक ऐसी तीव्र और तीखी चनचनाहट हुई, जैसे किसी ने जलती हुई माचिस की तीली छुआ दी हो।

सूरज के मुँह से एक दबी हुई सिसकारी निकल गई— "उह्ह...!"

वह दर्द इतना बिजली जैसा था कि उसकी बोझिल आंखें खुल गई। उसने जल्दी से पानी के छींटे मारे और मद्धम लाइट में अपने उस 'विजेता' अंग को हाथों में लिया। उसने धीरे से सुपाड़े की कोमल त्वचा (Foreskin) को पीछे की ओर सरकाया और लिंग को पलटकर नीचे की ओर देखा।

वहाँ, उस संवेदी केंद्र के पास, वह महीन और नाजुक तंतु (Frenulum), जो अब तक उसके कौमार्य की रक्षा कर रहा था, बीच से टूट चुका था। वह जगह हल्की सुर्ख लाल थी और वहाँ से रक्त की एक आखिरी नन्ही बूंद मोती की तरह उभर रही थी।

सूरज की आँखों में एक चमक आ गई। अब उसे समझ आया कि सोनी मौसी की जाँघों पर वह लालिमा और उसके पौरुष पर लगा वह 'राजतिलक' कहाँ से आया था। वह कोई घाव नहीं था, वह तो उसके 'बालपन' के अंत और 'पूर्ण पुरुषत्व' के उदय का प्रमाण पत्र था। उस बारीक धागे के टूटने ने ही उसे वह आज़ादी दी थी कि वह सोनी की गहराइयों को पूरी तरह नाप सका।

उसने एक गहरी और संतुष्ट साँस ली। चेहरे पर एक शरारती और गर्व भरी मुस्कान फैल गई।

सूरज (मन ही मन): "तो यह था वह बंधन... जो आज मौसी की 'मुनिया' की तड़प ने हमेशा के लिए तोड़ दिया।"

वह वापस अपने बिस्तर पर आया और बिना वस्त्रों के ही चादर तानकर लेट गया। जैसे ही उसने आँखें मूंदीं, उसे फिर से वही 'थप-थप' का संगीत, सोनी मौसी की भीगी हुई सिसकियाँ और उनके वक्षों का वह भारी भराव महसूस होने लगा। उसके पौरुष की वह पहली और महा-विजय अब एक मीठी याद बनकर उसकी रगों में तैर रही थी।

पूर्ण तृप्ति, रूहानी सुकून और देह की शांति के साथ, बनारस का वह 'सूरज' आज एक असली मर्द बनकर गहरी और सपनों भरी निद्रा की आगोश में समा गया। हवेली का सन्नाटा अब उसके लिए डरावना नहीं, बल्कि एक मधुर लोरी जैसा था।

हवेली की दीवारें गवाह थीं कि आज रात सोनी और सूरज का प्यार एक नए आयाम को प्राप्त कर चुका था उनके इस अद्भुत संगम ने एक नए जीवन की नींव रख दी थी..

अगली सुबह जब सोनी की जब आँखें खुलीं, तो उसे अपने पूरे अस्तित्व में एक भारीपन महसूस हुआ। जैसे ही उसने करवट लेने की कोशिश की, उसकी कमर में एक तीव्र और अजब सी कसक उठी। यह वह मीठा दर्द था जिसे अक्सर एक नव-विवाहिता अपनी सुहागरात के बाद महसूस करती है। सूरज के उस प्रचंड पौरुष का प्रहार और उसकी योनि की दीवारों का वह असाधारण फैलाव—कल रात की हर हरकत का निशान आज उसके शरीर पर एक सुखद टीस बनकर उभर रहा था।

सोनी बिस्तर पर ही लेटी रही। उसे ऐसा लग रहा था जैसे वह अब भी सूरज के उसी गाढ़े द्रव्य से पूरी तरह सिंचित है। वह तृप्ति, जिसकी उसे बरसों से तलाश थी, आज उसके चेहरे पर एक अनोखे तेज के रूप में झलक रही थी। उसकी त्वचा पहले से कहीं ज्यादा चमकदार और आँखें शांत लग रही थीं।

तभी दरवाजे पर दस्तक हुई और सुगना अंदर दाखिल हुई। कमरे की हवा अभी भी कल रात की उस मादक और कस्तूरी जैसी गंध से लदी हुई थी—पसीने, काम-रस और सूरज के वीर्य की वह मिली-जुली महक जिसे एक अनुभवी स्त्री तुरंत पहचान सकती थी। सुगना को भी इसका आभास हुआ पर विकास कल तक यहीं था। सोनी अब तक जीवन आ आंनद ले रही टी

सुगना ने नाक सिकोड़ी और सीधे खिड़की की ओर बढ़ी। सुगना: "हमेशा कमरा बंद मत रखा कर सोनी... कैसी अजब सी गंध आने लगती है। खुली हवा आने-जाने दिया कर।"

जैसे ही सुगना ने खिड़की के पल्ले खोले, ताजी हवा ने कमरे के सन्नाटे को तोड़ा। सुगना अब सोनी के बिस्तर के पास आई। उसने देखा कि सोनी अब भी चादर ओढ़े लेटी है, जबकि वह अक्सर सूरज निकलने से पहले ही रसोई में होती थी।

सुगना: "आज क्या बात है? सूरज सर पर चढ़ आया है और तू अब तक बिस्तर नहीं छोड़ रही? तबीयत तो ठीक है न?"

जैसे ही सुगना ने सोनी के माथे को छूने के लिए चादर हटाने की कोशिश की, सोनी ने झटके से चादर को अपनी मुट्ठी में भींच लिया। उसे याद आया कि बिस्तर के उस हिस्से पर कल रात की वह 'सफेद गवाही यानी सूरज का वीर्य ' अब भी होगा। अगर सुगना ने वह देख लिया, तो अनर्थ हो जाएगा।

सोनी (चेहरे पर एक बनावटी मुस्कान लाते हुए): "अरे नहीं दीदी... बस आज बड़े दिनों बाद बहुत अच्छी और गहरी नींद आई है। ऐसा लग रहा है जैसे देह की सारी थकान मिट गई हो। आज थोड़ा देर तक लेटने का मन है, आप जाइए मैं आती हूँ।"

सुगना ने अपनी छोटी बहन के चेहरे को गौर से देखा। उसे सोनी का चेहरा आज कुछ अलग लगा। वह थकान तो थी, पर आँखों में एक अजीब सी संतुष्टि थी। वह तेज, जो केवल एक पूरी तरह तृप्त स्त्री के चेहरे पर आता है, सोनी का मुखमंडल दमक रहा था।

सुगना: "थकान है या कुछ और? चेहरा तो ऐसे चमक रहा है जैसे गंगा में डुबकी लगा कर आई हो। खैर, आराम कर ले। मैं नाश्ता बनाती हूँ, पर ज्यादा देर मत करना।"

सुगना के बाहर जाते ही सोनी ने राहत की एक लंबी साँस छोड़ी। उसने धीरे से चादर हटाकर अपनी जाँघों की ओर देखा, जहाँ सूरज के पौरुष के अवशेष अब भी उसकी त्वचा पर एक पारभासी परत की तरह चमक रहे थे। उसे एहसास हुआ कि मर्यादा और प्यास की उस जंग ने उसे एक ऐसा सुख दिया है, जिसे वह चाहकर भी अब कभी भुला नहीं पाएगी।

सुगना के कमरे से बाहर जाते ही सोनी ने राहत की एक लंबी सांस ली। उसने धीरे से अपने बदन से वह चादर हटाई और अपनी देह की स्थिति को निहारा। उसकी गोरी जाँघों पर सूरज के वीर्य के सूखे हुए निशान किसी सफ़ेद रेशमी धागे की तरह चमक रहे थे। उसकी योनि मार्ग अब भी उस भारी मिलन की गवाह दे रहा था—वहाँ एक हल्की सी जलन और भारीपन था, जो उसे कल रात के उस तूफ़ान की याद दिला रहा था।

सोनी लड़खड़ाते कदमों से बाथरूम की ओर बढ़ी। हर कदम के साथ उसकी कमर की वह 'सुहाग-टीस' उसे विचलित कर रही थी। उसने बाथरुम का दरवाजा बंद किया और आइने के सामने खड़ी हो गई। जैसे ही उसने अपनी नाईटी उत्तरी, उसकी आँखें फटी की फटी रह गई।

उसके पुष्ट वक्ष पर सूरज के दाँतों के निशान गहरे लाल हो चुके थे। दाहिनी चूची के पास सूरज के जुनून की गवाही साफ़ दिख रही थी। उसकी गर्दन और कंधों पर सूरज के हाथों की पकड़ के नीले निशान उभर आए थे। सोनी ने अपनी उंगलियों से उन निशानों को छुआ—उस मीठे दर्द में एक गजब का सुकून था। उसे याद आया कि कैसे वासना के आवेग में सूरज एक अबोध बालक से एक युवा शिकारी में बदल गया था।

उसने शावर खोला। जैसे ही गुनगुना पानी उसके बदन पर गिरा, उसकी योनि से सूरज का वह द्रव्य धीरे-धीरे बहकर पैरों के रास्ते जमीन पर उतरने लगा। सोनी ने अपनी आँखें मूंद लीं। उसे लगा जैसे सूरज की खुशबू अब भी उसके रोम-रोम में बसी है। उसने शावर जेल से अपनी देह को रगड़ा, पर मन ही मन वह उन निशानों को मिटाना नहीं चाहती थी। वह चाहती थी कि सूरज का यह 'अधिकार' उसके बदन पर सदा के लिए अंकित हो जाए।

सोनी ने बड़ी सावधानी से एक गाढ़े नीले रंग की साड़ी पहनी और ब्लाउज के पल्लू को इस तरह लपेटा कि उसके गले और वक्ष के निशान पूरी तरह छुप जाएं। जब वह हाल में पहुँची, तो वहाँ का नजारा बदला हुआ था।

सूरज डाइनिंग टेबल पर बैठा था। आज वह अखबार नहीं पढ़ रहा था, बल्कि सामने रखी चाय की चुस्की ले रहा था। उसकी पीठ सीधी थी, कंधे चौड़े लग रहे थे और उसकी आँखों में वह अपराधी भाव (Guilt) गायब था। सुगना रसोई से बाहर निकली।

सुगना: "अरे सोनी! आ गई? सम्हाल तेरे लाड़ले को... तब से 10 बार पूछ चुका है मौसी नहीं आई?

सोनी ने धीरे से कुर्सी खींची और सूरज के सामने बैठ गई। सूरज ने अपनी नज़रें उठाईं और सीधे सोनी की आँखों में देखा। उन आँखों में अब 'मौसी' के लिए सम्मान तो था, पर साथ ही एक 'प्रेमी' की वह चमक भी थी जो यह कह रही थी कि वह अब सोनी के हर राज़ का हिस्सेदार है।

सूरज: "मौसी, आज आपके हाथ की चाय नहीं मिली? आपकी तबीयत तो ठीक है ना? "

सोनी का दिल जोरों से धड़कने लगा। वह समझ गई कि सूरज किस ओर इशारा कर रहा है।

सोनी (धीमी आवाज़ में): "आज देर हो गई सूरज... तबीयत थोड़ी सुस्त थी।"

सुगना (हँसते हुए): "अरे, रात भर कमरा बंद करके सोएगी तो सुस्ती तो आएगी ही। सूरज, तू डॉक्टर है, अपनी मौसी को कोई ताकत की दवा लिख दे।"

सुगना की यह बात सुनकर सोनी का चेहरा सिन्दूरी हो गया। उसने नीचे सर झुका लिया। सूरज ने एक शरारती मुस्कान के साथ सोनी की ओर देखा और कहा, "माँ, मौसी छोटी डॉक्टरनी ही नहीं जादूगरनी है.. उन्होंने तो खुद मेरा इलाज किया है।

क्यों क्या हुआ? सुगना ने आश्चर्य से पूछा..

यह तो आप मौसी से ही पूछ लीजिए? सूरज ने सोनी की तरफ इशारा करते हुए कहा।

सोनी सकपका गई सूरज ने उसे फंसा दिया था पर सोनी ने मुस्कुराते हुए कहा ..

“छोड़ ना दीदी यह कुछ ज्यादा ही शैतान हो गया है”

तुम दोनों की बातें अब मेरी समझ में नहीं आती है…तुम दोनों डॉक्टर- डॉक्टरनी खेलो मैं चली अपना काम करने….

सूरज का पैर अनजाने में मेज के नीचे सोनी के पैर से टकराया। सोनी के पूरे बदन में बिजली सी दौड़ गई। उसने अपनी नज़रें उठाकर सूरज को देखा, जैसे कह रही हो—'अब तो मान जा', पर सूरज की आँखों में एक नई भूख थी, जो यह बता रही थी कि कल रात तो बस शुरुआत थी।

सोनी ने मेज के नीचे से अपनी साड़ी का पल्लू कसकर पकड़ लिया। सूरज का यह नया रूप, यह आत्मविश्वास उसे डरा भी रहा था और एक अजीब सी उत्तेजना भी दे रहा था।

सूरज और सोनी की दुनिया से दूर, चलिए चलते हैं विद्यानंद के उस शांत और भव्य आश्रम में, जहाँ इन दिनों बनारस महोत्सव में जाने की तैयारियाँ अपने चरम पर थीं। हवा में चंदन और धूप की महक घुली हुई थी, लेकिन आश्रम के अधिष्ठाता विद्यानंद के मन में स्मृतियों का एक अलग ही बवंडर उठ रहा था।

विद्यानंद पर अब उम्र अपना प्रभाव दिखाने लगी थी। 70-75 वर्ष की आयु में भी उनके चेहरे का तेज कम नहीं हुआ था, बल्कि समय की झुर्रियों ने उनके व्यक्तित्व को और भी अधिक गरिमामय बना दिया था। जैसे ही 'बनारस' का नाम उनके कानों में पड़ता, उनके मानस पटल पर पुरानी स्मृतियों के चित्र सजीव हो उठते।

"इंसान अपनी इंद्रियों पर विजय पा सकता है, पर स्मृतियाँ? वे तो उस बरगद की जड़ों की तरह होती हैं जो पत्थर को चीर कर भी अपना स्थान बना लेती हैं।"

विद्यानंद को अपनी छठी इंद्रिय और अपनी साधना पर अभिमान था, पर वह स्वयं से यह सत्य नहीं छिपा सकते थे कि वह अपने अतीत की उन अमिट छापों को मिटाने में असफल रहे हैं, जिन्होंने कभी उनके जीवन की दिशा बदली थी। वह एक ऐसे साधक थे जिसने संसार तो जीत लिया था, पर अपने हृदय के एक कोने में दबे उस 'पुराने घर' से हार गए थे।

तभी कक्ष के द्वार पर एक आहट हुई। मोनी, जिसे अब दुनिया ‘वज्र नंदिनी' के नाम से जानती थी, कक्ष में प्रविष्ट हुई। श्वेत वस्त्रों में लिपटी मोनी इस समय साक्षात् पवित्रता और सौंदर्य का प्रतिरूप लग रही थी। उसका सौंदर्य ऐसा था जिसे शब्दों में बांधना कठिन था:

भक्तों के लिए: वह एक देवी का स्वरूप थी, शांत और पूजनीय।

कलाकारों के लिए: वह खजुराहो की किसी सजीव मूर्ति की भांति उत्कृष्ट थी।

रतन जैसे कामुक व्यक्तियों के लिए: वह एक ऐसी अतृप्त प्यास थी, जिसे देख कर वासना और व्याकुलता और बढ़ जाए।

मोनी ने झुककर विद्यानंद के चरण स्पर्श किए और उनके समीप बैठकर मधुर स्वर में कहा, "भगवन, बनारस महोत्सव की तैयारियाँ लगभग पूर्ण हो चुकी हैं।

परमानंद बहुत उत्साहित है। वह बार-बार प्रस्थान के समय के बारे में पूछ रहा है।"

'परमानंद' का नाम सुनते ही विद्यानंद के गंभीर चेहरे पर एक मद्धम मुस्कान तैर गई। उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक आ गई।

"परमानंद दिव्य है, नंदिनी ," विद्यानंद ने धीमी लेकिन दृढ़ आवाज में कहा। "वह परम तेजस्वी है। भले ही तुमने उसे जन्म दिया है, लेकिन वह केवल तुम्हारा पुत्र नहीं है। वह इस आश्रम का भविष्य है, इसका उत्तराधिकारी है।"

आश्रम की चहारदीवारी के भीतर यही सत्य स्थापित था कि परमानंद ईश्वर का वरदान है, जिसे स्वयं विधाता ने विद्यानंद के पास इस गद्दी को संभालने के लिए भेजा है। विद्यानंद की बातों पर तर्क करना किसी के वश में नहीं था, और न ही किसी की इतनी धृष्टता थी।

जब परमानंद इस आश्रम में आया था, तब उसकी आयु मात्र एक वर्ष थी। उसकी अबोध आँखों के तेज ने तभी सबको वश में कर लिया था। आश्रमवासियों ने इसे 'ईश्वरीय संकेत' मानकर स्वीकार कर लिया था, यह जाने बिना कि इस दिव्यता के पीछे अतीत के कौन से गहरे राज छिपे हैं।

मोनी ने झुककर विद्यानंद के चरण स्पर्श किए और उनके समीप बैठकर मधुर स्वर में कहा, "भगवन, बनारस महोत्सव की तैयारियाँ लगभग पूर्ण हो चुकी हैं।

परमानंद बहुत उत्साहित है। वह बार-बार प्रस्थान के समय के बारे में पूछ रहा है।"

विद्यानंद और वज्रनंदिनी (मोनी) के बीच परमानंद के 'दिव्य' होने की चर्चा चल ही रही थी कि कक्ष के द्वार पर एक हल्की आहट हुई। यह माधवी थी। यद्यपि समय ने उसके चेहरे पर भी रेखाएँ खींच दी थीं, किंतु उसकी आँखों की कोमलता और सेवा भाव आज भी वैसा ही था।

'परमानंद' का नाम सुनते ही माधवी के पग जैसे वहीं थम गए। उसकी आँखों के सामने वर्तमान का वह 18 वर्षीय हष्ट-पुष्ट और तेजस्वी युवक ओझल हो गया, और वह स्मृतियों के एक गहरे महासागर में डूबती चली गई।

कक्षा के द्वार पर ही ठिठकी हुई, माधवी की आँखें शून्य में निहारने लगीं। वह वर्तमान से कटकर सीधे 17 वर्ष पीछे, उस अलौकिक भोर में पहुँच गई, जिसने इस आश्रम का इतिहास बदल दिया था।

माधवी को वह सुबह आज भी कल की तरह याद थी। ब्रह्ममुहूर्त का समय था, चारों ओर गहरा सन्नाटा और गंगा की धीमी लहरों की आवाज़। वह रोज़ की तरह विद्यानंद की पूजा के लिए ताज़े फूल चुनने आश्रम के पुष्प उद्यान में गई थी।

ओस की बूंदों से भीगे मोगरे और पारिजात के झुरमुट के बीच, उसकी दृष्टि एक स्थान पर ठहर गई। वहाँ, धवल और सुनहरे रेशमी वस्त्रों में लिपटा हुआ, एक अबोध शिशु सोया हुआ वह बालक साधारण नहीं लग रहा था। यद्यपि वह वस्त्रों में लिपटा था, लेकिन उसके शरीर से एक अद्भुत आभा, एक मद्धम सा प्रकाश उत्सर्जित हो रहा था, जिसने उस अंधेरे कोने को रोशन कर दिया था।

माधवी ने जब उसे उठाने के लिए हाथ बढ़ाए, तो वह सिहर उठी। उसे लगा जैसे वह किसी मनुष्य को नहीं, बल्कि साक्षात् ईश्वर के एक अंश को स्पर्श कर रही है। वह इतना पवित्र और कोमल था कि उसे छूने में भी भय लग रहा था।

उस बालक की शांत मुद्रा और उसके चेहरे पर बिखरा अकल्पनीय तेज देखकर माधवी के मुख से शब्द नहीं निकले, केवल आँखों से श्रद्धा के आँसू बह निकले थे। उसे ऐसा प्रतीत हुआ जैसे विधाता ने स्वयं स्वर्ग से उतरकर इस बालक को इस उद्यान में रख दिया हो, ताकि यह विद्यानंद की तपस्या का प्रमाण बने।

क्या सोच रही हो माधवी ? विद्यानंद की मधुर आवाज ने माधवी की तंद्रा तोड़ी।

"भगवन," माधवी ने वर्तमान में लौटते हुए, धीमी और कंपकपाती आवाज़ में कहा, "जब भी परमानंद की बात आती है, मेरी आत्मा उसी भोर में लौट जाती है। वह दृश्य! वह रेशम में लिपटा हुआ नन्हा सा देवदूत! वह कोई साधारण बच्चा नहीं था, महाराज। वह साक्षात् विधाता का हस्ताक्षर था, जिसे मैंने स्वयं अपनी आँखों से उस उद्यान में ईश्वर के वरदान की तरह पाया था।"

माधवी की आँखों में आज भी वही विस्मय और अटूट विश्वास था। उसके लिए परमानंद के आगमन में कोई संशय नहीं था; वह केवल और केवल एक 'दिव्य चमत्कार' था।

विद्यानंद ने माधवी की ओर देखा। उसकी श्रद्धा अचूक थी, और यही वह विश्वास था जिसने पूरे आश्रम को यह मानने पर विवश कर दिया था कि परमानंद 'ईश्वर का वरदान' है।

लेकिन विद्यानंद के अंतर्मन में, उस 'दिव्यता' के पीछे छिपा अतीत का वह राज, जिसे वह सालों से दबाए बैठे थे, एक बार फिर सिर उठाने लगा था। परमानंद का वह एक वर्ष की आयु में आश्रम में आना, उसकी अबोध आँखों का वह तेज... क्या वह सब सचमुच ईश्वर की मर्जी थी? या फिर कुछ ऐसा, जिसका सच केवल विद्यानंद और मोनी ही जानते थे?

कुछ ही देर में विद्यानंद की सूक्ष्म साधना का वक्त हो गया। इधर विद्यानंद ने अपनी पलके बंद की उधर मोनी की निगाह टेबल पर पड़े अखबार पर गई जिस पर एक बेहद सुंदर और प्रतिभाशाली युवक की तस्वीर थी। न जाने मोनी को ऐसा क्यों महसूस हुआ कि वह बालक विलक्षण है।

मोनी की उंगलियाँ काँपते हुए उस कागज़ के पन्ने पर ठिठक गईं।

अखबार की पंक्तियाँ किसी मंत्र की तरह उसके कानों में गूँजने लगीं:

मेधा का उदय: बनारस का 'सूरज' बना चिकित्सा जगत का नया सितारा

वाराणसी: बनारस मेडिकल कॉलेज के दीक्षांत समारोह में इस वर्ष का सर्वश्रेष्ठ स्नातक (Topper) होने का गौरव सूरज को प्राप्त हुआ है। उसकी असाधारण मेधा और शांत स्वभाव ने शिक्षकों को चकित कर दिया है।

स्थानीय जनमानस उसे 'बनारस का उगता हुआ सूरज' कहकर पुकार रहा है। सूरज की इस उपलब्धि के पीछे उसकी माँ सुगना का अटूट धैर्य और पिता रतन का तप है। एक साधारण पृष्ठभूमि से निकलकर स्वर्ण पदक तक का यह सफर प्रेरणा की नई गाथा लिख रहा है।

मोनी अपने अतीत को याद करने लगी सुगना को भूल पाना वैसे भी असंभव था । एक-एक करके इस कथा के सारे किरदार मोनी के दिमाग में घूमने लगे.. और जब बात विलक्षण सूरज पर आई वह परमानंद को याद करने लगी…. और उसकी तुलना सूरज से करने लगी. सूरज जितना विलक्षण था…परमानंद भी उतना ही तेजस्वी था मोनी को परमानंद की जन्म गाथा याद आने लगी..


शेष अगले भाग में..
 
भाग 178

एक साधारण पृष्ठभूमि से निकलकर स्वर्ण पदक तक का यह सफर प्रेरणा की नई गाथा लिख रहा है।

मोनी अपने अतीत को याद करने लगी सुगना को भूल पाना वैसे भी असंभव था । एक-एक करके इस कथा के सारे किरदार मोनी के दिमाग में घूमने लगे.. और जब बात विलक्षण सूरज पर आई वह परमानंद को याद करने लगी…. और उसकी तुलना सूरज से करने लगी. सूरज जितना विलक्षण था…परमानंद भी उतना ही तेजस्वी था मोनी को परमानंद का जन्म का याद आने लगा….

अब आगे…..

मोनी आँखों पर पट्टी बाँधे, हृदय की बढ़ती धड़कनों के साथ उस मखमली बिस्तर पर बैठी अपने परीक्षक का इंतजार कर रही थी ( भाग 150 में इसका संदर्भ लिया जा सकता है )। सन्नाटा इतना गहरा था कि उसे अपनी ही साँसों की आवाज़ सुनाई दे रही थी। तभी उसे कमरे के भारी नक्काशीदार दरवाज़े के खुलने और बंद होने की हल्की सी आहट मिली।

धीमे और सधे हुए कदमों की चाप उसके करीब आने लगी। मोनी का पूरा शरीर अनजाने डर और उत्तेजना के मिले-जुले अहसास से सिहर उठा। वह व्यक्ति उसके बिलकुल करीब आकर खड़ा हो गया। मोनी को उसकी देह की ऊष्मा और एक जानी-पहचानी गंध का आभास हुआ, लेकिन वह कुछ बोल नहीं पा रही थी।

शून्य कक्ष की मद्धम और सुनहरी रोशनी में, मखमली बिछौने पर लेटी मोनी किसी अप्सरा की भांति प्रतीत हो रही थी, जिसे विधाता ने स्वयं फुर्सत के क्षणों में तराशा हो। इक्कीस वर्ष की वह ढलती हुई देह अपनी पूर्णता के उस शिखर पर थी, जहाँ बचपन की मासूमियत और यौवन की प्रखरता का अद्भुत संगम होता है।

मोनी का शरीर एक जीवित कविता की तरह था, जिसके हर अंग में रस और छंद भरा था। उसकी गेहुँआ रंगत ऐसी थी मानो ढलते सूरज की किरणें मलाई में घुल गई हों। आँखों पर बंधी वह काली रेशमी पट्टी उसके चेहरे के उभारों को और भी रहस्यमयी बना रही थी। उसके अधर (होंठ) कामदेव के धनुष की तरह रसीले और स्वभावतः लाल थे, जो उत्तेजना के वेग में थोड़े खुले हुए थे, मानो किसी अनकहे मंत्र का जाप कर रहे हों।

उसके उन्नत और पुष्ट वक्ष, उसकी हर गहरी साँस के साथ ऊपर-नीचे हो रहे थे, जैसे शांत समुद्र में उठती लहरें। वे दो श्वेत कमलों की भांति गौरवपूर्ण थे, जिनके अग्र भाग (निप्पल) उत्तेजना और कक्ष की शीतलता के कारण किसी कठोर मणिक की तरह तन गए थे। उनके चारों ओर की श्याम आभा (Areola) उसकी त्वचा की शुभ्रता पर एक मादक विरोधाभास पैदा कर रही थी।

उसकी कमर इतनी पतली और लचीली थी कि जैसे कोई मृणाल (कमल का नाल) हो। पेट का वह मखमली मैदान उसकी गहरी नाभि के पास जाकर एक मोहक भँवर बनाता था। नाभि के इर्द-गिर्द बिखरी पसीने की बारीक बूंदें मोतियों की माला जैसी आभा दे रही थीं।

उसकी जाँघें कदली (केले) के स्तंभों की तरह चिकनी, मांसल और सुडौल थीं। वे नीचे की ओर बढ़ते हुए टखनों के पास जाकर अत्यंत सुकुमार हो जाती थीं। जाँघों के मिलन स्थल पर प्रकृति का वह 'दिव्य और अद्भुत चीरा' अपने रेशमी आवरण के भीतर सुरक्षित था, जो आज अपनी पहली बलि के लिए आतुर और जाग्रत था।

मोनी की नग्न काया से एक सोंधी और मादक गंध फूट रही थी—यह चंदन के लेप, कस्तूरी और उसके अपने शरीर की नैसर्गिक काम-गंध का मिश्रण था। उसके खुले हुए कृष्ण-केश (काले बाल) बिस्तर पर इस तरह बिखरे थे जैसे किसी श्याम घटा ने चाँदनी को अपनी बाहों में भर लिया हो।

उसकी देह का रोम-रोम स्पंदित था। वह केवल मांस का पुंज नहीं, बल्कि वासना और उपासना के बीच झूलती एक 'जीवंत वेदी' लग रही थी। वह पूर्णतः निशब्द और निश्चल थी, पर उसकी देह का कण-कण उस परीक्षक के उस 'वज्र स्पर्श' की प्रतीक्षा में एक अनजानी अग्नि में पिघल रहा था।

अचानक, एक बेहद कोमल और रेशमी स्पर्श उसके दाहिने टखने पर महसूस हुआ। वह स्पर्श किसी उंगली का नहीं, बल्कि शायद किसी नर्म पंख या रेशम के कपड़े का था। धीरे-धीरे वह स्पर्श उसके पैरों की पिंडलियों से होता हुआ ऊपर की ओर बढ़ने लगा। मोनी ने अपनी जाँघों को और भी कस लिया, लेकिन वह अदृश्य परीक्षक रुकने वाला नहीं था।

हवा में एक हल्की सी फुसफुसाहट गूँजी, जो सीधे मोनी के कान के पास थी:

"देवी, संयम की असली परीक्षा तभी होती है जब देह समर्पण करना चाहे और आत्मा उसे रोके। देखते हैं, मेरा विश्वास जीतता है या आपका हठ।"

मोनी के शरीर में एक करंट सा दौड़ गया। यह आवाज़... यह तो खुद विद्यानंद की थी! उसे अब समझ आया कि यह 'विशेष दर्जा' और 'अंतिम परीक्षा' कितनी व्यक्तिगत होने वाली थी।

विद्यानंद की उंगलियाँ, जो अब सुगंधित तेल से सराबोर थीं, मोनी की कमर के घेरे पर रेंगने लगीं। उसने बड़ी चतुराई से मोनी के शरीर के उन हिस्सों को छूना शुरू किया जहाँ संवेदनाएँ सबसे तीव्र होती हैं। मोनी का मन कह रहा था कि वह पलंग के सिरहाने लगा लाल बटन दबा दे, लेकिन उसकी महत्वाकांक्षा ने उसके हाथ रोक रखे थे। वह हारना नहीं चाहती थी।

मोनी के गदराए बदन पर जब विद्यानंद के पौरों ने दबाव बनाया, तो उसकी बंद आँखों के पीछे रंग-बिरंगे चिनार फूटने लगे। उसकी साँसें उखड़ने लगीं और वह अनजाने में ही बिस्तर की चादर को अपनी मुट्ठियों में भींचने लगी।

विद्यानंद ने अब अपना चेहरा मोनी के चेहरे के इतना करीब कर लिया कि उसकी गर्म साँसें मोनी के होंठों को छू रही थीं। उसने मोनी के कान की लौ को धीरे से अपने होंठों के स्पर्श से सहलाया। मोनी का पूरा बदन धनुष की तरह तन गया। वह अपनी जाँघों के बीच उस 'बरमूडा ट्रायंगल' में एक अजीब सी तड़प महसूस कर रही थी, जिसे उसने 11 महीनों से दबा कर रखा था।

विद्यानंद का हाथ अब धीरे-धीरे मोनी की जाँघों के उस जोड़ की ओर बढ़ रहा था, जहाँ प्रकृति का वह 'अद्भुत चीरा' छुपा हुआ था। मोनी को लगा जैसे वह पिघल रही है। उसे अहसास हुआ कि विद्यानंद उसे संभोग के लिए नहीं, बल्कि उसके आत्म-समर्पण के लिए मजबूर कर रहे थे।

जैसे ही विद्यानंद की उंगलियों ने उस संवेदनशील स्थान को छुआ, मोनी के मुँह से एक दबी हुई आह निकली। उसका हाथ काँपते हुए उस लाल बटन की ओर बढ़ा...

विद्यानंद की उंगलियों का स्पर्श अब और भी अधिक अधिकारपूर्ण हो चला था। मोनी को महसूस हुआ कि वह व्यक्ति अब केवल स्पर्श नहीं कर रहे बल्कि अपनी ऊर्जा उसके शरीर में समाहित करने का प्रयास कर रहे है। सुगंधित तेल की वजह से उसकी त्वचा और भी अधिक संवेदनशील हो गई थी।

विद्यानंद की उंगलियां अब मोनी के उन अंगों तक पहुँच चुकी थीं जिन्हें उसने अब तक दुनिया से बचा कर रखा था। वह व्यक्ति मोनी के 'बरमूडा ट्रायंगल' के किनारों को सहलाते हुए उसके चरम को छूने की कोशिश कर रहा था। मोनी का पूरा शरीर एक अनजानी अग्नि में जलने लगा। उसकी जांघों के बीच एक अजीब सी बेचैनी और गीलापन महसूस होने लगा, जो उसके 11 महीनों के संयम को चुनौती दे रहा था।

विद्यानंद ने अब धीरे से मोनी की गर्दन पर अपने होंठों का दबाव बनाया। मोनी ने अपनी गर्दन पीछे की ओर झुका दी। उसकी आँखों पर बँधा रुमाल उसकी उत्तेजना को और बढ़ा रहा था क्योंकि वह देख नहीं पा रही थी कि अगला प्रहार कहाँ से होगा। वह व्यक्ति अब अपनी उंगलियों से मोनी के उस 'अद्भुत चीरे' के बिल्कुल मुहाने पर खेल रहा था।

मोनी का हाथ सिरहाने रखे लाल बटन के बिल्कुल करीब था। उसकी उंगलियाँ बटन को छू रही थीं, लेकिन उसका मन अब भी इस परीक्षा को जीतने के लिए आतुर था। तभी उस व्यक्ति ने अपनी उंगलियों को थोड़ा और गहराई में ले जाने की कोशिश की। मोनी के मुँह से एक सिसकारी निकली। उसे अहसास हुआ कि विद्यानंद का यह तरीका उसे संभोग के लिए उकसा रहा है।

विद्यानंद का ध्यान अब मोनी के उन्नत वक्षों की ओर मुड़ा। उनकी हथेलियाँ मोनी के सीने को बड़ी कोमलता से सहला रही थीं, जैसे किसी कीमती रत्न की तराश कर रहे हों। अगले ही पल, विद्यानंद ने अपनी गर्दन झुकाई और एक अबोध बच्चे की तरह मोनी की पुष्ट चूची को अपने होंठों के घेरे में ले लिया।

मोनी के हलक से एक तड़पती हुई सिसकारी निकली। एक तरफ विद्यानंद की उंगलियों का नीचे चलता वह जादुई कंपन और दूसरी तरफ उनके होंठों का ऊपर की ओर वह कोमल खिंचाव—मोनी को ऐसा लगा जैसे उसका अस्तित्व दो हिस्सों में बँट रहा है। उसकी साँसें तेज़ और भारी हो गई थीं। वह विद्यानंद के बालों में अपनी उंगलियाँ फँसाकर उन्हें अपनी ओर और ज़ोर से भींच रही थी, जो इस बात का प्रमाण था कि उसका हठ अब कामवासना के आगे घुटने टेक रहा है।

विद्यानंद की थ्योरी सही साबित होती दिख रही थी—निरंतर स्पर्श और चुंबन स्त्री को संभोगरत होने के लिए विवश कर ही देते हैं।

विद्यानंद की उंगलियाँ, अब मोनी की योनि के मुहाने पर एक विशेष लय में घूमने लगीं। विद्यानंद ने अपनी साधना से प्राप्त उस सूक्ष्म कंपन (Vibration) को अपनी पोरों में केंद्रित किया और उसे सीधे मोनी के भगनासे (Clitoris) पर स्पर्श कराया।

वह स्पर्श इतना विद्युतकारी था कि मोनी का पूरा शरीर धनुष की तरह बिस्तर से ऊपर उठ गया। उसके योनिकुंड से 'रज-रस' का प्रवाह फूट पड़ा, जो विद्यानंद की उंगलियों के साथ मिलकर एक चिकनी और मादक फिसलन पैदा कर रहा था। मोनी ने अपनी जाँघों को और कसने का प्रयास किया ताकि वह उस सुखद हमले को रोक सके, लेकिन उसकी देह अब उसके नियंत्रण से बाहर हो रही थी। वासना के उस तीव्र ज्वार में वह अनजाने में ही अपनी जाँघों को थोड़ा फैला देती, जिससे विद्यानंद को और भी गहरा प्रवेश मिल जाता।

इसी चरम उत्तेजना के बीच, विद्यानंद ने अपनी साधना से ऊर्जस्वित उस अद्भुत लिंग को मोनी की जाँघों के बीच लाकर स्पर्श कराया। मोनी ने उस पत्थर जैसी कठोरता और उसमें होते तीव्र स्पंदन को अपनी कोमल त्वचा पर महसूस किया। वह लिंग केवल मांस का टुकड़ा नहीं, बल्कि ऊर्जा का एक पुंज लग रहा था जो मोनी की अंतरात्मा तक को झकझोर रहा था।

विद्यानंद ने अब अपने लिंग को मोनी की योनि के मुहाने पर टिका दिया। वे बार-बार उसे मोनी के भगनासे पर रगड़ते और फिर झटके से हटा लेते। यह 'प्रहार और वापसी' की तकनीक मोनी को पागल कर रही थी। उसे वह सुख, वह पूर्णता चाहिए थी जिसे उसने 11 महीनों से अपनी कल्पनाओं में संजोया था।

मोनी की जाँघें अब पूरी तरह खुल चुकी थीं। वह आमंत्रित कर रही थी, वह पुकार रही थी। विद्यानंद को अपनी विजय का विश्वास हो गया। उन्होंने जैसे ही अपने लिंग का पूरा दबाव मोनी के उस कौमार्य (Hymen) पर बनाया, जो अब तक सुरक्षित था, ठीक उसी क्षण मोनी के भीतर एक विस्फोट हुआ।

विद्यानंद की उत्तेजक गतिविधियों ने मोनी को स्खलित (Orgasm) होने पर मजबूर कर दिया था। वह सुख की लहरों में बह रही थी, उसका शरीर काँप रहा था। लेकिन, जैसे ही उसे महसूस हुआ कि विद्यानंद का लिंग उसके कौमार्य को भेदने वाला है, उसकी 'दृढ़ प्रतिज्ञा' अचानक जाग उठी। चरम सुख के उस झोंके के बीच भी उसका हाथ बिजली की गति से सिरहाने की ओर बढ़ा और उसने लाल बटन दबा दिया।

"टिक!" की आवाज़ के साथ ही कमरे की मुख्य लाइटें जल उठीं।

मोनी स्खलित होकर निढाल पड़ी थी, उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे और वह हाँफ रही थी। वह अपनी देह की वासना से हार गई थी, लेकिन उसने अपना 'कौमार्य' बचा लिया था। विद्यानंद, जिनका लिंग अब भी उत्तेजित अवस्था में था, तुरंत मोनी से दूर हो गए। उन्होंने एक गहरी साँस ली और अपनी साधना के बल पर अपनी उत्तेजना को कुछ ही पलों में शांत कर लिया।

विद्यानंद ने पट्टी बाँधे हुए मोनी की ओर एक नज़र डाली। उनकी आँखों में प्रशंसा का भाव था। मोनी उस परीक्षा में सफल हुई थी जहाँ कोई भी साधारण स्त्री अपना कौमार्य खो देती। विद्यानंद बिना एक शब्द बोले, शांत कदमों से कक्ष से बाहर निकल गए, पीछे छोड़ गए एक ऐसी मोनी को जो अब अपनी देह और आत्मा के बीच के उस महीन अंतर को समझ चुकी थी।….

कक्ष के भीतर छाई वह भारी खामोशी अब किसी गंभीर विमर्श की पृष्ठभूमि तैयार कर रही थी। मोनी ने अपनी आँखों से वह रेशमी पट्टी हटाई। उसकी आँखें सुजी हुई थीं और चेहरा उस 'रज-रस' के ज्वार के बाद की थकान और लज्जा से झुका हुआ था। वह अब भी पूरी तरह नग्न थी पर उसने सफेद चादर अपने बदन पर ओढ़ रखी थी। उसे अपनी नग्नता और लज्जा का एहसास था।

तभी विद्यानंद कक्ष में दोबारा दाखिल हुए। अब उनके वस्त्र सलीके से थे और उनके चेहरे पर वही चिर-परिचित शांत और गंभीर भाव था, जैसे कुछ हुआ ही न हो।

विद्यानंद मोनी के सामने रखे एक लकड़ी के आसन पर बैठ गए। उन्होंने मोनी की ओर देखा, जिसमें अब एक अपराधी भाव (Guilt) था।

मोनी (काँपती आवाज़ में): "गुरुदेव... मैं अपनी देह के वेग को नहीं रोक पाई। मैं... मैं कलुषित हो गई। क्या मैं अनुत्तीर्ण हो गई हूँ?"

विद्यानंद (धीमी और ओजपूर्ण आवाज़ में): "नहीं मोनी, तुम भ्रमित हो। शरीर एक यंत्र (Machine) है, जिसका स्वभाव है स्पर्श पर प्रतिक्रिया देना। जैसे आग के पास जाने पर त्वचा जलती है, वैसे ही काम-ऊर्जा के स्पर्श पर देह का स्खलित होना केवल एक जैविक प्रक्रिया है। तुम उत्तीर्ण हो।"

मोनी ने विस्मय से उनकी ओर देखा।

विद्यानंद: "असली परीक्षा यह नहीं थी कि तुम्हारी देह शांत रहे। असली परीक्षा यह थी कि जब तुम्हारी देह सुख के अंतिम छोर पर खड़ी हो, जब इंद्रियाँ तुम्हारे विवेक को अंधा करने की कोशिश कर रही हों, तब भी क्या तुम्हारा 'अहं' और तुम्हारी 'प्रतिज्ञा' जागृत है? उस क्षण में, जब तुम स्खलित हो रही थीं, तुम्हारा विवेक इतना प्रबल था कि तुमने वह लाल बटन दबाया। तुमने अपने कौमार्य को उस चरम सुख की भेंट नहीं चढ़ने दिया। यही वह सूक्ष्म अंतर है जो एक साधारण स्त्री और एक साधिका में होता है।"

विद्यानंद ने मोनी के पास जाकर उसके माधे पर हाथ रखा।

विद्यानंद: "जो रज-रस तुम्हारी योनि से बहा है, वह तुम्हारी पराजय नहीं, बल्कि तुम्हारे भीतर सोई हुई उस कुण्डलिनी ऊर्जा का जागरण है जिसे हमने कई महीनों से संचित किया था। आज तुमने जान लिया है कि तुम्हारी देह की सीमाएँ क्या हैं और तुम्हारी आत्मा की शक्ति कितनी प्रचंड है। जो स्त्री अपने चरमानंद के क्षण में 'न' (No) कहने की शक्ति रखती है, वह सृष्टि के किसी भी प्रलोभन को जीत सकती है।"

मोनी को अब धीरे-धीरे उस शांति का अनुभव होने लगा जो कल रात की उथल-पुथल के बाद गायब हो गई थी। उसे समझ आया कि विद्यानंद उसे संभोगरत नहीं कर रहे थे, बल्कि उसे उसके अपने ही 'स्व' (Self) से परिचित करा रहे थे।

मोनी: "तो क्या मेरा कौमार्य अब भी मेरी सबसे बड़ी शक्ति है?"

विद्यानंद: "निश्चित रूप से। तुम्हारा कौमार्य केवल एक शारीरिक पर्दा नहीं है, वह तुम्हारी संकल्प शक्ति का प्रतीक है। आज के बाद तुम्हारी साधना एक नए स्तर पर पहुँच जाएगी। अब तुम्हें देह का डर नहीं रहेगा, क्योंकि तुमने देह के सबसे बड़े शत्रु—काम को अपनी उंगलियों पर नचाया है।"

विद्यानंद कक्ष से बाहर जाने के लिए मुड़े, पर दरवाजे पर रुककर बोले: "कल सुबह ब्रह्म मुहूर्त में नदी तट पर एक वस्त्र में उपस्थिति रहना हमें तुम्हारी इस जाग्रत ऊर्जा को ज्ञान के प्रकाश में बदलना है।"

अगले दिन ब्रह्म मुहूर्त की उस अलौकिक बेला में, जब प्रकृति स्वयं निद्रा और जागरण के बीच झूल रही थी, मोनी का गंगा तट की ओर बढ़ना किसी मानवी का नहीं, बल्कि किसी चंचल अप्सरा के धरती पर उतरने जैसा आभास दे रहा था। उसके शरीर पर लिपटे हुए सफ़ेद सूती वस्त्र शुचिता का प्रतीक तो थे, लेकिन उसकी देह की प्रखर कामुकता को ढंक पाने में पूरी तरह असमर्थ थे।

सफ़ेद महीन सूती साड़ी उसके शरीर से इस तरह लिपटी थी जैसे पर्वत की चोटियों पर ताजी बर्फ की परत चढ़ी हो। भोर की उस नमी और गंगा की शीतल फुहारों के कारण वस्त्र उसके बदन के उतार-चढ़ाव से चिपक गए थे। साड़ी के नीचे उसके पुष्ट और उन्नत वक्षों का उभार साफ़ झलक रहा था, जो हर कदम के साथ एक विशेष लय में स्पंदित हो रहे थे। वस्त्र की शुभ्रता और उसकी गेहुंआ त्वचा के बीच का वह मिलन आँखों में एक मादक प्यास जगाने वाला था।

इक्कीस वर्ष की वह दहकती हुई देह अपनी पूर्णता के उस शिखर पर थी, जहाँ मांसल सुडौलता और कोमलता का अद्भुत तालमेल होता है। उसकी कमर इतनी पतली और लचीली थी कि जैसे कोई मलयज चंदन की लता हो। चलने के दौरान उसके कूल्हों का जो उतार-चढ़ाव और लचक पैदा हो रही थी, वह शांत खड़ी हवा में भी हलचल पैदा कर देने के लिए काफी थी। उसकी गहरी नाभि, जो साड़ी के झीने परदे से रह-रहकर झांक रही थी, किसी गहरे भंवर की तरह रहस्यमयी और आकर्षक लग रही थी।

मोनी की काया से इस समय किसी कृत्रिम इत्र की नहीं, बल्कि स्नान से पूर्व लगाए गए चंदन, कपूर और उसके अपने शरीर की नैसर्गिक 'काम-गंध' की एक मिश्रित सुगंध फूट रही थी। उसके खुले हुए काले बाल, जो कमर के नीचे तक लहरा रहे थे, उस श्वेत परिवेश में रात के अंधेरे का आभास दे रहे थे।

मोनी के चेहरे पर बिखरी वह सात्विक शांति और देह से फूटती वह अदम्य कामुकता—दोनों मिलकर उसे एक ऐसी 'जीवंत वेदी' बना रहे थे, जिसे देखकर भक्त और विलासी, दोनों के मन डोल जाएं।

वह जैसे-जैसे गंगा के शीतल जल की ओर बढ़ रही थी, उसकी देह का रोम-रोम उस स्पर्श के लिए आतुर था। वह केवल एक स्त्री नहीं, बल्कि भोर के उस शांत वातावरण में वासना और उपासना के बीच का एक जीवित सेतु लग रही थी।

गंगा की शीतल धाराएँ घाट की सीढ़ियों से टकराकर एक मधुर संगीत उत्पन्न कर रही थीं। मोनी ने धीरे से अपने पाँव उस ठंडे जल में रखे। जल का वह प्रथम स्पर्श उसके गरम बदन पर किसी बिजली की तरह दौड़ा, जिससे उसके अंगों में एक सिहरन पैदा हुई।

जैसे-जैसे मोनी गहराई की ओर बढ़ी, गंगा का जल उसकी जाँघों तक आ पहुँचा। सफ़ेद सूती साड़ी जल सोखते ही पारदर्शी होने लगी और उसके बदन से किसी दूसरी त्वचा की तरह चिपक गई। जल की लहरें जब उसकी सुडौल जाँघों और कूल्हों से टकराईं, तो वस्त्रों का वह झीना आवरण अब किसी रहस्य को छुपा पाने में असमर्थ था। उसकी गेहुँआ रंगत पानी के भीतर और भी निखर उठी थी।

जब जल मोनी की पतली कमर तक पहुँचा, तो उसने अपनी अंजुली में जल भरा और उसे आकाश की ओर अर्पण किया। इस मुद्रा में उसके उन्नत और पुष्ट वक्ष और भी ऊपर की ओर तन गए। भीगी हुई साड़ी के नीचे से उसके वक्षों की गोलाई और उनके सख्त हो चुके निप्पल साफ़ झलक रहे थे, जो जल की शीतलता के कारण किसी कठोर मणि की तरह उभर आए थे।

उसने एक गहरी डुबकी लगाई। जब वह जल से बाहर निकली, तो उसके काले घने बाल उसके चेहरे और कंधों पर नागिन की तरह लिपटे हुए थे। पानी की बूंदें उसके चेहरे से ढलकर उसकी गर्दन के उस नाजुक मोड़ से होती हुई, उसके वक्षों की घाटी में जाकर विलीन हो रही थीं।

मोनी ने जल के भीतर ही अपने बदन को धीरे-धीरे सहलाना शुरू किया। उसकी मखमली त्वचा पर जब उसकी अपनी ही उंगलियाँ फेरीं, तो उसे विद्यानंद के उस 'वज्र स्पर्श' की याद आ गई। भोर की उस मद्धम रोशनी में, भीगे हुए सफ़ेद वस्त्रों में लिपटी मोनी किसी अप्सरा जैसी लग रही थी, जिसका हर अंग कामुकता और पवित्रता के बीच एक युद्ध लड़ रहा था।

उसकी नाभि के पास जमा पानी की बूंदें हीरों की तरह चमक रही थीं। वह जल के बीचों-बीच खड़ी होकर सूर्योदय की प्रतीक्षा कर रही थी, पर उस समय वह स्वयं किसी उगते हुए सूरज के तेज और कामुक आकर्षण से कम नहीं लग रही थी।

विद्यानंद तट पर बैठे मोनी को निहार रहे थे…कलयुगी विश्वामित्र को मेनका मिल चुकी थी.और वो मन ही मन आश्रम को उसका उत्तराधिकारी देने का निश्चय कर चुके थे….

शेष अगले भाग में
 
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में वेटिंग फोर्य रीडर्स कमेंट

नहीं तो कुछ युवा पढाई के पीछे छूट जायेंगे
 
भाग 179

उसकी नाभि के पास जमा पानी की बूंदें हीरों की तरह चमक रही थीं। वह जल के बीचों-बीच खड़ी होकर सूर्योदय की प्रतीक्षा कर रही थी, पर उस समय वह स्वयं किसी उगते हुए सूरज के तेज और कामुक आकर्षण से कम नहीं लग रही थी।


विद्यानंद तट पर बैठे मोनी को निहार रहे थे…कलयुगी विश्वामित्र को मेनका मिल चुकी थी.और वो मन ही मन आश्रम को उसका उत्तराधिकारी देने का निश्चय कर चुके थे….



अब आगे मोनी ने जैसे ही गंगा की शीतल गोद से बाहर कदम रखा, भोर की सुनहरी और कच्ची धूप ने उसके भीगे बदन का अभिषेक किया। सफेद सूती साड़ी अब पूरी तरह पारदर्शी होकर उसके शरीर से किसी दूसरी त्वचा की तरह चिपक गई थी। पानी की बूंदें उसके उन्नत वक्षों की घाटी से ढलकर उसकी गहरी नाभि के भंवर में समा रही थीं।

अचानक उसकी दृष्टि सामने बने पत्थर के ऊंचे आसन पर पड़ी, जहाँ विद्यानंद स्थिर भाव से बैठे उसे ही निहार रहे थे। उनकी आँखों में आज वह गुरु वाली तटस्थता नहीं, बल्कि एक आदिम और गहरा आकर्षण था, जिसे देख मोनी का हृदय जोरों से धड़कने लगा।

जैसे ही मोनी को अपनी स्थिति का आभास हुआ—भीगे वस्त्रों में उसकी देह का कण-कण विद्यानंद के सामने उजागर था—उसके भीतर लज्जा की एक तीव्र लहर दौड़ गई। उसने अनजाने में ही अपनी बाहों से अपने पुष्ट वक्षों को ढकने का प्रयास किया, लेकिन भीगी साड़ी ने उसके शरीर के उभारों को और भी प्रखरता से उभार दिया था।

मोनी की गेहुँआ रंगत लज्जा के कारण रक्तिम हो उठी। उसके गाल ढलते सिंदूर की तरह लाल हो गए और उसने अपनी पलकें झुका लीं।

ठंडी हवा के झोंके जब उसके भीगे बदन से टकराए, तो उसके रोम-रोम सिहर उठे। लज्जा और उत्तेजना के उस अनूठे संगम में वह किसी थरथराती हुई जलपरी के समान प्रतीत हो रही थी।

विद्यानंद, जिन्हें मोनी अब तक केवल एक कठोर साधक मानती थी, आज एक अलग ही रूप में थे। उनकी दृष्टि मोनी की जाँघों के उस सुडौल घेरे से होती हुई उसकी पतली कमर और फिर उसके कपोलों पर टिकी थी।

"मोनी, लज्जा नारी का आभूषण है, लेकिन सत्य यह है कि प्रकृति ने तुम्हें जिस सौंदर्य से नवाज़ा है, वह छुपने के लिए नहीं, पूजे जाने के लिए है।"

विद्यानंद की आवाज़ में आज एक अजीब सी खनक थी। उन्होंने धीरे से आसन छोड़ा और मोनी की ओर बढ़ने लगे। मोनी वहीं जड़वत खड़ी रही; उसके पैर जैसे रेत में धँस गए हों। उसे अपनी नग्नता का बोध तो था, पर विद्यानंद के उस चुंबकीय व्यक्तित्व के सामने वह भागने की शक्ति खो चुकी थी।

विद्यानंद ने मोनी के करीब आकर उसके गीले और ठंडे कंधों पर अपना हाथ रखा। उस स्पर्श में कल रात वाली परीक्षा की ऊष्मा थी। उन्होंने मोनी की ठुड्डी को ऊपर उठाकर उसकी आँखों में झाँका।

विद्यानंद का आंतरिक संवाद: उनकी आँखों में एक दृढ़ निश्चय चमक रहा था। वे जानते थे कि मोनी का यह 'वज्र-कौमार्य' और उनकी 'सिद्ध-ऊर्जा' जब मिलेंगे, तो जो बीज अंकुरित होगा, वह साधारण मानव नहीं, बल्कि इस आश्रम का वह तेजस्वी उत्तराधिकारी होगा जो युगों-युगों तक इस ज्ञान की परंपरा को जीवित रखेगा। विश्वामित्र का संयम मेनका के रूप के आगे पिघल चुका था, और आज विद्यानंद ने भी अपनी साधना को इस 'जीवंत वेदी' पर अर्पित करने का मन बना लिया था।

विद्यानंद के स्पर्श में आज वह गुरु वाली दूरी नहीं, बल्कि एक अधिकारपूर्ण ऊष्मा थी। उन्होंने मोनी का हाथ थामा और उसे गंगा तट से दूर, आश्रम के एक अत्यंत गोपनीय और सुरक्षित 'गर्भगृह' की ओर ले गए। यह कक्ष पत्थर की दीवारों से बना था, जहाँ केवल लोबान और कस्तूरी की मदहोश करने वाली गंध तैर रही थी। कक्ष के केंद्र में एक वेदी थी, जिसके चारों ओर सुगंधित तेलों के दीये जल रहे थे।

कक्ष का द्वार बंद होते ही विद्यानंद मोनी के सम्मुख आकर खड़े हो गए। मोनी के भीगे वस्त्र अब भी उसके शरीर से चिपके थे, जिससे उसके अंगों की सुडौलता साफ झलक रही थी।

"मोनी, साधना का प्रथम चरण है—आवरणों का त्याग। जब तक देह वस्त्रों के मोह में है, आत्मा सत्य को नहीं देख सकती।"

विद्यानंद के सधे हुए हाथों ने मोनी की भीगी साड़ी के पल्लू को स्पर्श किया। मोनी का हृदय किसी पिंजरे में बंद पंछी की तरह फड़फड़ाने लगा। जैसे-जैसे वस्त्र उसके शरीर से अलग होकर नीचे गिरते गए, उसकी गेहुँआ रंगत और ढलती हुई सुडौल काया उस मद्धम रोशनी में कुंदन की तरह चमक उठी। जब अंतिम वस्त्र भी भूमि पर गिर गया, तब मोनी पूर्णतः नग्न अवस्था में उनके सामने खड़ी थी—एक ऐसी जीवंत प्रतिमा की भाँति जिसे विधाता ने स्वयं अपने हाथों से गढ़ा हो।

विद्यानंद ने रेशम का एक अत्यंत कोमल और सूखा वस्त्र उठाया। उन्होंने अत्यंत धैर्य और श्रद्धा के साथ मोनी के भीगे बदन को सुखाना आरंभ किया।

जब वह रेशमी वस्त्र मोनी के पुष्ट और उन्नत वक्षों पर रेंग रहा था, तो मोनी ने अपनी आँखें मूंद लीं। जल की बूंदें जब उन गौर वर्ण के कमलों से पोंछी गईं, तो उनके अग्र भाग (निप्पल) उत्तेजना और सिहरन से और भी अधिक कठोर हो गए।

वस्त्र अब उसकी पतली कमर और उस गहरी नाभि के पास पहुँचा, जहाँ पानी की कुछ बूंदें अभी भी हीरों की तरह चमक रही थीं। विद्यानंद के हाथों का दबाव मोनी के भीतर एक मीठी अगन लगा रहा था।

जब वे उसकी मांसल जंघाओं और कदली स्तंभों जैसे पैरों को सुखा रहे थे, मोनी का शरीर धनुष की तरह तन गया। वह नग्नता की लज्जा और उस स्पर्श के सुख के बीच झूल रही थी।

चंदन के लेप की तरह महकने लगी, तब विद्यानंद ने उसे वेदी पर लेटने का संकेत दिया। उन्होंने हाथ में कुमकुम, केसर और सुगंधित इत्र लिया।

उन्होंने मोनी के उन्नत वक्षों पर केसर का तिलक लगाया। उनके लिए ये केवल मांस के लोथड़े नहीं, बल्कि सृष्टि की पोषण शक्ति के प्रतीक थे। उन्होंने अत्यंत कोमलता से अपने पोरों से उन कठोर मणियों को सहलाया, जिससे मोनी के मुँह से एक दबी हुई सिसकारी निकली।

:उन्होंने उसकी नाभि के उस 'मोहक भँवर' में सुगंधित तेल की एक बूंद टपकाई और अपनी उंगली से उसे चक्राकार घुमाया। मोनी के पेट की मांसपेशियाँ इस दिव्य स्पर्श से संकुचित होने लगीं।

योनिकुंड की वंदना (शक्ति का केंद्र): अंत में, विद्यानंद मोनी की जाँघों के बीच उस 'दिव्य चीरे' के सम्मुख नतमस्तक हुए। उन्होंने कुमकुम से उस संवेदनशील स्थान के चारों ओर एक सुरक्षा चक्र बनाया। मोनी का वह दिव्य त्रिकोण अब अपनी पूरी प्रखरता के साथ जाग्रत था। जब विद्यानंद ने उस स्थान को अपने मंत्रोपचारित स्पर्श से छुआ, तो मोनी को ऐसा लगा जैसे उसके भीतर कोई ज्वालामुखी फटने वाला है।

विद्यानंद ने मोनी की आँखों में देखते हुए कहा, "आज यह कामुकता नहीं, बल्कि उस बीज के लिए भूमि तैयार करना है, जो इस संसार को नया प्रकाश देगा।"

मोनी अब पूरी तरह से पिघल चुकी थी। उसका कौमार्य और उसकी देह अब विद्यानंद की उस प्रचंड ऊर्जा में समाहित होने के लिए व्याकुल थी।

साधना कक्ष के भीतर जलते दीपों की मद्धम लौ मोनी की नग्न देह पर पड़कर उसे स्वर्णमयी आभा दे रही थी। लोबान का धुआँ और कस्तूरी की सुगंध ने वातावरण को पूरी तरह मादक बना दिया था। विद्यानंद ने अब उस 'विशेष साधना' के अंतिम चरण की ओर कदम बढ़ाया, जहाँ शब्द मौन हो जाते हैं और केवल स्पर्श ही मंत्र बन जाता है।

विद्यानंद ने घुटनों के बल बैठकर मोनी की देह के प्रति अपना सम्मान प्रकट किया। उन्होंने अपने होंठों का प्रथम स्पर्श मोनी के ललाट पर किया, जिसे वह 'आज्ञा चक्र' की जागृति कह रहे थे।

पुष्ट वक्षों का अर्चन: धीरे-धीरे उनके होंठ नीचे की ओर सरके और मोनी के उन्नत वक्षों के शिखर पर ठहर गए। उन्होंने उन कठोर मणियों (निप्पल्स) को अत्यंत कोमलता से अपने मुख के घेरे में लिया। मोनी के भीतर एक विद्युत तरंग दौड़ गई। उसकी साँसें उखड़ने लगीं और उसने पीछे की ओर झुकते हुए अपनी कमर को थोड़ा ऊपर उठाया। विद्यानंद का यह चुंबन केवल वासना नहीं, बल्कि उस 'अमृत-कलश' का आह्वान था जो सृष्टि का पोषण करता है।

नाभि का भँवर: उनके गर्म होंठ अब मोनी के पेट के मखमली मैदान को पार करते हुए उसकी गहरी नाभि तक पहुँचे। वहाँ का स्पर्श इतना तीव्र था कि मोनी की जाँघें अनजाने में ही फैलने लगीं।



योनिकुंड की 'मुख-साधना' (Oral Worship)विद्यानंद ने अब अपनी साधना के सबसे गोपनीय हिस्से की शुरुआत की। उन्होंने मोनी की मांसल और सुडौल जाँघों को अपने कंधों पर टिकाया, जिससे वह 'दिव्य और अद्भुत चीरा' पूरी तरह उनके सम्मुख उजागर हो गया।

प्रथम स्पर्श: विद्यानंद ने अपनी गरम साँसों को उस संवेदनशील स्थान पर छोड़ा। मोनी का पूरा शरीर धनुष की तरह तन गया। जब उनके होंठों ने पहली बार अमृत कलश के द्वार के मुहाने को छुआ, तो मोनी के मुँह से एक लंबी सिसकारी निकली।

रस का प्रवाह: विद्यानंद अपनी जिह्वा और होंठों के विशेष कौशल से मोनी के भगनासे (Clitoris) को उत्तेजित करने लगे। यह कोई साधारण क्रिया नहीं थी; वे अपनी मंत्र-शक्ति से उस स्थान की सोई हुई ऊर्जा को ऊपर की ओर खींच रहे थे। मोनी को ऐसा महसूस हुआ जैसे उसकी योनि के भीतर कोई सहस्त्र दल कमल खिल रहा हो।

समर्पण का शिखर: मोनी का 'रज-रस' अब प्रचुर मात्रा में प्रवाहित होने लगा था। विद्यानंद ने उस दिव्य रस का पान किया, मानो वे किसी यज्ञ की आहुति स्वीकार कर रहे हों। मोनी का संयम अब पूरी तरह टूट चुका था। वह स्वयं अपने स्तनों को अपनी मुट्ठियों में भींच रही थी और उसका मुख से से 'आह' और 'उह' के स्वर से आ रहे थे।

विद्यानंद के मुख और जीभ की उस मादक और कुशल अदाकारी ने मोनी को उस मानसिक स्तर पर पहुँचा दिया जहाँ देह और आत्मा का भेद मिट जाता है। वह स्खलित (Orgasm) होने के मुहाने पर खड़ी थी, और उसका कौमार्य अब उस प्रचंड 'वज्र-लिंग' के प्रवेश के लिए पूरी तरह आतुर और जाग्रत हो चुका था।

विद्यानंद ने ऊपर उठकर मोनी की आँखों में देखा—वहाँ अब केवल और केवल समर्पण था।

साधना कक्ष की मद्धम रोशनी में वातावरण अब अपनी चरम पराकाष्ठा पर था। विद्यानंद, जो अब तक एक उपासक की भाँति मोनी की देह की वंदना कर रहे थे, धीरे से सीधे खड़े हो गए। मोनी, जो स्खलन के सुखद झोंकों से अभी उबरी ही थी, अर्ध-उन्मीलित आँखों से अपने गुरु और अब अपने 'स्वामी' की ओर निहारने लगी।

विद्यानंद ने अत्यंत गरिमा और शांत भाव से अपने कटि-वस्त्र का त्याग किया। जैसे ही वह अंतिम आवरण हटा, मोनी की आँखें विस्मय और श्रद्धा से फटी की फटी रह गईं। उसके सम्मुख वह 'अद्भुत लिंग' साक्षात खड़ा था, जो किसी साधारण पुरुष का अंग नहीं, बल्कि वर्षों की अखंड ब्रह्मचर्य साधना और ऊर्ध्वरेता योग का जीवंत प्रमाण था।

वह लिंग किसी चिकने और काले पत्थर की तरह कठोर और चमकीला था। उसकी लंबाई और मोटाई मोनी की कल्पनाओं से कहीं अधिक थी। उसमें नीली नसें इस तरह उभर रही थीं जैसे किसी विशाल पर्वत पर नदियाँ बह रही हों।

वह अंग केवल मांस का पुंज नहीं लग रहा था; उसमें एक निरंतर सूक्ष्म कंपन (Vibration) हो रहा था, जो कक्ष की वायु को भी स्पंदित कर रहा था। उसके अग्र भाग (Mani) से 'अमृत' की एक बूंद झलक रही थी, जो मोनी के लिए किसी वरदान के समान थी।



विद्यानंद ने गंभीर स्वर में कहा…अब तुम लिंग स्पर्श और पूजन कर सकती हो..

मोनी ने घुटनों के बल बैठकर उस 'ऊर्जा के स्तंभ' को अपने हाथों में लिया। स्पर्श मात्र से उसके शरीर में सहस्त्रों वोल्ट का करंट दौड़ गया। वह अंग इतना गरम और स्पंदित था कि मोनी को लगा जैसे वह किसी दहकते हुए सूर्य को स्पर्श कर रही हो।

मोनी ने अपनी काँपती उंगलियों से उस वज्र-लिंग के मूल से शिखर तक का स्पर्श किया। उसकी गेहूंए रंग की त्वचा और उस श्याम वर्ण के लिंग का मिलन एक अद्भुत दृश्य उत्पन्न कर रहा था।

मोनी ने पास रखे स्वर्ण कलश से सुगंधित गंगाजल लिया और अत्यंत श्रद्धा के साथ उस दिव्य लिंग पर उसकी धारा प्रवाहित की। जल की बूंदें जब उस तप्त अंग से टकराईं, तो मोनी को लगा जैसे वह किसी पूज्य लिंग का अभिषेक कर रही हो।

अभिषेक के पश्चात, मोनी ने झुककर उस तेजस्वी अंग के अग्र भाग को अपने होंठों से छुआ। उसने अपनी जिह्वा से उस पर लगे जल को पोंछा, मानो वह किसी महान यज्ञ का प्रसाद ग्रहण कर रही हो। विद्यानंद की साँसें अब गहरी होने लगी थीं,

विद्यानंद ने मोनी को अपनी सुदृढ़ और तपस्वी जाँघों पर बैठा लिया। मोनी की नग्न पीठ विद्यानंद के पुष्ट वक्ष से टिकी थी, और उसकी जाँघें विद्यानंद के कूल्हों के दोनों ओर फैली थीं। विद्यानंद के हाथ मोनी के उन्नत वक्षों और उसकी चिकनी जाँघों पर निरंतर रेंग रहे थे, जबकि मोनी का कोमल हाथ उनके उस 'वज्र-लिंग' की कठोरता को सहलाते हुए उसकी धड़कन महसूस कर रहा था।

इसी मादक अवस्था में, दोनों के बीच एक विलक्षण 'काम-शास्त्रार्थ' छिड़ गया।

मोनी (काँपती आवाज़ में): "गुरुदेव, शास्त्र कहते हैं कि काम (वासना) मोक्ष के मार्ग में बाधा है। फिर आज हम दहलीज पर खड़े हैं, क्या वह मुझे मेरी साधना से दूर नहीं ले जाएगा? क्या एक शिष्य का अपने गुरु के साथ यह शारीरिक मिलन अधर्म नहीं?"

विद्यानंद (गंभीर और ओजपूर्ण स्वर में): "मोनी, यह संसार का सबसे बड़ा भ्रम है कि काम और अध्यात्म अलग-अलग हैं। काम वह आदि-शक्ति है जिससे सृष्टि का सृजन हुआ है। बाधा 'काम' नहीं, बल्कि उसमें 'आसक्ति' (Attachment) है। जब एक गुरु अपनी शिष्या को यह दीक्षा देता है, तो वह केवल शरीर का मिलन नहीं, बल्कि दो ऊर्जाओं का विलय होता है। मैं तुम्हें भोग नहीं रहा हूँ, मैं तुम्हारे भीतर सोई हुई उस शक्ति को जगा रहा हूँ जो केवल इस 'चरम प्रहार' से ही जागृत हो सकती है।"

मोनी: "किंतु गुरुदेव, समाज इसे केवल वासना कहेगा। क्या एक स्त्री का अपने कौमार्य को इस प्रकार अर्पित करना उसे कलुषित नहीं करता?"

विद्यानंद: "समाज चर्म-चक्षुओं से देखता है, साधक आत्म-चक्षुओं से। कौमार्य केवल एक भौतिक पर्दा नहीं है, वह एक संचित ऊर्जा है। आज जब मेरा यह वज्र-लिंग तुम्हारे उस सुरक्षित द्वार का भेदन करेगा, तो वह केवल रक्त की कुछ बूंदें नहीं बहाएगा, बल्कि तुम्हारे भीतर के उस अवरोध को तोड़ेगा जो तुम्हें साधारण स्त्री बनाए रखता है। यह 'मैथुन' नहीं, 'यज्ञ' है। इसमें आहुति तुम्हारे अहंकार की है और फल... इस आश्रम का वह दिव्य उत्तराधिकारी है।"

बातचीत के दौरान विद्यानंद के होंठ मोनी के कान के पीछे की संवेदनशील त्वचा को चूम रहे थे। मोनी ने उनके लिंग की कठोरता को और कसकर अपनी मुट्ठी में भींच लिया।

विद्यानंद: "देखो मोनी, तुम्हारा हाथ जिस अंग को सहला रहा है, वह कामदेव का आयुध है। जब यह तुम्हारे भीतर प्रवेश करेगा, तो वह केवल सुख नहीं देगा, बल्कि तुम्हारे रोम-रोम में ज्ञान के उस प्रकाश को भरेगा जो केवल संभोग के शिखर पर ही प्राप्त होता है। क्या तुम इस 'महा-संभोग' के लिए तैयार हो?"

मोनी (उत्तेजना के चरम पर): "गुरुदेव, आपकी वाणी ने मेरे संशय को भस्म कर दिया है। मेरी देह अब केवल मांस नहीं, आपकी वेदी है। मुझे उस पूर्णता की ओर ले चलिए जहाँ गुरु और शिष्य, पुरुष और प्रकृति एक हो जाते हैं।"

विद्यानंद ने मोनी को अपनी जाँघों से थोड़ा और ऊपर उठाया और उसे सीधे उस 'अद्भुत लिंग' के मुहाने पर ला खड़ा किया। अब संवाद समाप्त हो चुका था और सृजन की घड़ी आ चुकी थी।

साधना कक्ष की वायु अब पूरी तरह से शांत हो चुकी थी। लोबान का धुआँ कुंडलिनी की तरह ऊपर उठ रहा था, और दीयों की कांपती लौ मोनी की स्वर्ण-काया पर नृत्य कर रही थी। विद्यानंद ने अपनी पकड़ और मजबूत की और मोनी के सुडौल नितंबों को थामकर उसे उस 'वज्र-लिंग' के ठीक मुहाने पर टिका दिया।

विद्यानंद के उस तप्त और कठोर अंग का अग्र भाग अब मोनी की योनि के कोमल ओष्ठों (Labia) के बीच निरंतर रगड़ खा रहा था। जैसे-जैसे वे अपनी कमर को एक विशेष लय में संचालित कर रहे थे, लिंग का वह मुकुट (Glans) मोनी की 'भग्नासा' (Clitoris) पर मीठे और सधे हुए प्रहार कर रहा था।

हर बार जब वह कठोर मणिक मोनी के उस संवेदनशील केंद्र को छूकर गुजरता, मोनी के पूरे शरीर में एक सिहरन दौड़ जाती। वह स्पर्श केवल चमड़ी का नहीं था, बल्कि विद्यानंद की वर्षों की संचित ऊर्जा का सीधा प्रहार था।

उस घर्षण के कारण मोनी की 'काम-अग्नि' अब पूरी तरह भड़क उठी थी। उसकी योनि से 'रज-रस' का प्रवाह इतना बढ़ गया था कि वह स्थान अब पूरी तरह सिक्त और चिकना हो चुका था। लिंग और योनि के उस 'चुंबन' से एक मदहोश कर देने वाली ध्वनि (Squelching sound) निकल रही थी, जो कक्ष के सन्नाटे को चीर रही थी।

विद्यानंद अपनी कमर को कभी चक्राकार (Circular) तो कभी ऊपर-नीचे की ओर व्यवस्थित करते। वे जानते थे कि पूर्ण प्रवेश से पहले इस बाहरी घर्षण का क्या महत्व है।

"मोनी, यह घर्षण केवल देह का ताप नहीं है... यह उस द्वार को खोलने की प्रार्थना है जहाँ से नया जीवन जन्म लेगा। महसूस करो इस स्पंदन को, यह सृजन की पहली आहट है।"

मोनी ने पीछे की ओर झुककर अपना सिर विद्यानंद के कंधे पर टिका दिया। उसके खुले हुए बाल विद्यानंद के चेहरे पर बिखर गए। वह उस घर्षण के सुख में इतनी डूबी थी कि उसके पैर हवा में कांप रहे थे। उसे महसूस हो रहा था कि वह 'वज्र-लिंग' बार-बार उसके कौमार्य के द्वार को खटखटा रहा है, मानो कोई सम्राट अपनी जीत से पहले किले के द्वार पर खड़ा हो।

जब घर्षण अपनी चरम सीमा पर पहुँचा और मोनी की उत्तेजना ने उसे सिसकने पर मजबूर कर दिया, तब विद्यानंद ने अपनी गति धीमी की। उन्होंने मोनी के कान के पास फुसफुसाते हुए कहा, "तैयार हो जाओ मोनी... अब यह 'अग्नि-स्तंभ' अपनी मंजिल की ओर प्रस्थान करेगा।"

मोनी ने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं और अपने हाथों से विद्यानंद की जाँघों को और भी मजबूती से जकड़ लिया। उसकी योनि अब उस प्रचंड प्रहार को झेलने के लिए पूरी तरह फैल चुकी थी और धड़क रही थी।

विद्यानंद ने मोनी को उस पुष्प-शय्या और चंदन की सुगंध से महकती वेदी पर लेटने का संकेत दिया। मोनी का भीगा बदन अब पूरी तरह सूख चुका था, लेकिन उत्तेजना के कारण उसकी त्वचा पर गुलाबी आभा दौड़ रही थी।

जैसे ही मोनी वेदी पर लेटी, विद्यानंद ने उसकी पुष्ट और सुडौल जाँघों को धीरे से फैलाया और उनके मध्य अपना स्थान ग्रहण किया।

धीरे-धीरे मोनी के शरीर के ऊपर झुक गए। उनका विशाल और सुगठित वक्ष मोनी के उन्नत वक्षों को स्पर्श कर रहा था, लेकिन उन्होंने अपने शरीर का पूरा भार अपने मजबूत हाथों और घुटनों पर टिका रखा था।

उनका 'वज्र-लिंग' मोनी की योनि के ठीक मुहाने पर टिका था—अत्यंत निकट, फिर भी अभी तक भीतर प्रविष्ट नहीं। वह स्पर्श मोनी के भीतर बिजली की लहरें पैदा कर रहा था।

विद्यानंद ने अपनी आँखों की गहराई मोनी की मदहोश आँखों में उतार दी। उनके चेहरे पर एक दिव्य संकल्प था।

विद्यानंद (गंभीर और गूँजती आवाज़ में): "मोनी, अपनी चेतना को जाग्रत करो। यह क्षण केवल देह के सुख का नहीं, बल्कि युगों के उत्तरदायित्व का है। मेरी आँखों में देखो और बताओ... क्या तुम इस आश्रम को उसका 'कुल-दीपक' और उत्तराधिकारी देने का संकल्प लेती हो? क्या तुम तैयार हो अपनी इस देह-वेदी पर मेरे इस साधना-पुंज को स्वीकार करने के लिए?"

मोनी (सिसकते हुए और उत्तेजना में काँपते स्वर में): "स्वामी... अब मैं 'मैं' कहाँ रही? आपकी इस प्रचंड ऊर्जा के स्पर्श ने मेरे अहंकार और मेरे संशय को भस्म कर दिया है। मेरा रोम-रोम केवल आपके इस प्रहार की प्रतीक्षा कर रहा है। यह देह अब आपकी अमानत है, इसे अपनी साधना का माध्यम बना लीजिए।"

विद्यानंद: "स्मरण रहे मोनी, जब मेरा यह वज्र-लिंग तुम्हारे कौमार्य का भेदन करेगा, तो वह केवल रक्त की कुछ बूंदें नहीं होंगी। वह तुम्हारे भीतर की साधारण स्त्री की मृत्यु होगी और एक 'शक्ति' का जन्म होगा। क्या तुम उस पीड़ा और उस परमानंद को एक साथ झेलने का सामर्थ्य रखती हो?"

मोनी (उनकी आँखों में डूबते हुए): "गुरुदेव, आपके चरणों में बैठकर मैंने ज्ञान पाया, और आज आपकी इस गोद में बैठकर मैं पूर्णता पाना चाहती हूँ। इस आश्रम को तेजस्वी वारिस देना मेरा सौभाग्य होगा। आप देर न करें... आपकी यह कठोरता (लिंग) मेरी योनि के द्वार पर किसी वरदान की तरह दस्तक दे रही है। मुझे अपनी शरण में ले लीजिए।"

विद्यानंद: "तो फिर साक्षी रहे यह गंगा का तट, यह पवित्र अग्नि और यह साधना कक्ष... आज एक नया इतिहास रचा जाएगा।"

विद्यानंद के होंठ अब मोनी के माथे पर टिक गए, और उनका हाथ नीचे जाकर उस 'वज्र-लिंग' को दिशा देने लगा। मोनी ने अपनी जाँघों को और थोड़ा फैला दिया, उसका पूरा शरीर किसी कमान की तरह तन गया था। वातावरण में केवल भारी साँसों की आवाजें और लोबान की मादक गंध बची थी।

प्रवेश का वह महान क्षण अब अत्यंत निकट था।

कक्ष के भीतर सन्नाटा इतना गहरा था कि मोनी के हृदय की धड़कनें विद्यानंद को अपने वक्ष पर स्पष्ट सुनाई दे रही थीं। विद्यानंद ने अपने सुदृढ़ हाथों से मोनी की कमर को नीचे से सहारा दिया और उसे थोड़ा ऊपर की ओर उठाया, ताकि उनकी ऊर्जा का केंद्र (लिंग) और मोनी का शक्ति केंद्र (योनि) एक सीधी रेखा में आ सकें।

विद्यानंद का वह तप्त 'वज्र-लिंग' अब मोनी की योनि के गीले और उत्तेजित द्वार पर पूरी शक्ति के साथ टिका हुआ था। मोनी की साँसें तेज़ हो गईं और उसने अनजाने में ही विद्यानंद के बलिष्ठ कंधों को अपनी उंगलियों से जकड़ लिया।

विद्यानंद ने धीरे-धीरे अपनी कमर का दबाव आगे की ओर बढ़ाया। जैसे ही लिंग का मणिक (अग्र भाग) मोनी के उस सुरक्षित 'कौमार्य-द्वार' से टकराया, मोनी के मुँह से एक दबी हुई आह निकली। वह दबाव इतना प्रचंड था कि मोनी को लगा जैसे उसके भीतर कोई शक्तिपुंज प्रवेश करने की कोशिश कर रहा हो।

विद्यानंद रुके नहीं। उन्होंने मोनी की आँखों में देखते हुए अपनी मंत्र-शक्ति का आह्वान किया। "धैर्य रखो मोनी, यह भेदन केवल देह का नहीं, अज्ञानता के पर्दे का है।"

जैसे ही विद्यानंद ने एक झटके के साथ अपनी कमर को आगे धकेला, कक्ष में एक हल्की सी कराह सुनाई दी..

स्वामी….. आह….तनी धीरे से….दुखता…

नियति मुस्कुरा रही थी…

शेष अगले भाग में

 
कितने पाठक चाहते है सुगना कामुक दुनिया में वापस आए...?
 
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