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भाग 186
नजरों ने नजरों की भाषा समझ ली सूरज रुक गया पर उसने सोनी को फोन रखने का इशारा कर दिया बर्दाश्त की सीमा अब पार हो चुकी थी…सोनी ने बात समाप्त की
फोन कटते ही सूरज सोनी से सट गया।
सूरज के लंड का वह भारी और गर्म स्पर्श जैसे ही सोनी के नितंबों पर पड़ा, उसके पूरे शरीर में बिजली की एक लहर दौड़ गई। वह समझ गई कि अब सूरज को और अधिक देर तक रोकना नामुमकिन है। हकीकत और अपनी वासना के बीच झूलती सोनी ने एक झटके में करवट बदली और पीठ के बल आ गई।
अब आगे…
शर्म और उत्तेजना के उस मिले-जुले अहसास में उसने अपनी दोनों जांघों को आपस में सटा लिया और घुटनों को थोड़ा ऊपर की ओर मोड़ लिया, जिससे उसकी जांघों पर खिंची मेहंदी की बेलें और भी स्पष्ट होकर उभर आईं। सूरज अब पूरी तरह उसके सामने बिस्तर पर आ चुका था। उसकी आँखों में एक ऐसी आग थी जो सोनी को भस्म कर देने पर उतारू थी। सोनी की निगाहें जब सूरज के उस विशाल और तने हुए पौरुष पर पड़ीं जिसने स्वयं उसमें जान फूंकी थी, तो उसकी सांसें गले में ही अटक गईं। उतना ही जीवंत और अद्भुत।
सोनी ने दीवार पर लगी घड़ी की ओर इशारा किया, जिसकी सुइयाँ 9:15 की ओर बढ़ रही थीं। उसने अपनी कांपती हुई उंगलियों से अपनी बिखरी जुल्फों को समेटा और एक गहरी, मदहोश कर देने वाली आवाज़ में कहा:
सोनी: "सूरज... घड़ी की सुइयाँ देख ले। मर्यादा और समय, दोनों ही हमारे हाथ से रेत की तरह फिसल रहे हैं। तेरे पास सिर्फ आधा घंटा है। इस आधे घंटे में तुझे जो देखना है, जो पूजना है या जो करना है... कर ले। अपनी सारी अधूरी इच्छाएं आज पूरी कर ले, क्योंकि इसके बाद मैं सिर्फ विकास जी की रहूँगी।"
सोनी की इस 'अनुमति' ने सूरज के भीतर के बांध को पूरी तरह तोड़ दिया। सूरज ने बिना एक पल गंवाए अपने दोनों हाथ सोनी की मुड़ी हुई जांघों पर रखे और उन्हें धीरे-धीरे अलग करना शुरू किया। सोनी ने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं और अपना चेहरा तकिए में छुपा लिया।
जैसे-जैसे सोनी की जांघें खुल रही थीं, सुगना द्वारा रचित वह दिव्य 'कमल' और 'महोगनी की गांठ' अपनी पूरी मादकता के साथ सूरज के सामने उजागर हो रही थी। सूरज की नज़रों की तपिश और उसकी भारी होती साँसें अब सीधे सोनी की उस 'मुनिया' पर पड़ रही थीं, जो सुगना की बातों और अपनी खुद की उत्तेजना से पूरी तरह सराबोर हो चुकी थी।
सूरज ने फुसफुसाते हुए कहा, "आधा घंटा बहुत है मौसी... इस आधे घंटे में मैं आपको वो अहसास दे दूँगा जो आप अपनी पूरी जिंदगी नहीं भूलेंगी।"
उसने अपना चेहरा नीचे झुकाया और अपनी जुबान से उस मेहंदी से सजी दहलीज को चखने के लिए आगे बढ़ा, । कमरे की हवा में अब केवल धड़कनों का शोर था।
होटल के उस आलीशान कमरे में अब केवल सोनी की दबी-कुचली सिसकियाँ और सूरज की भारी होती सांसें गूँज रही थीं। सूरज ने जब अपना चेहरा सोनी की खुली हुई जांघों के बीच टिकाया, तो उसे उस 'काम-रस' और 'इत्र' की मिली-जुली महक ने पूरी तरह से पागल कर दिया।
सूरज ने अपनी जुबान से उस 'महोगनी की गांठ' को सहलाते हुए अपनी कलाकारी शुरू की। उसने सोनी की कोमल त्वचा पर रचे उस मेहंदी के कमल को चूमना और चाटना शुरू किया। सोनी का बदन कमान की तरह मुड़ गया; उसने अपने हाथों से तकिए को इतनी जोर से भींचा कि उसके नाखून मखमली कपड़े में धंस गए।
सूरज केवल चाटने तक ही सीमित नहीं रहा; वह अपनी उंगलियों और होंठों से सोनी की उस नाजुक दरार को तरह-तरह से सहलाने और छेड़ने लगा। वह कभी अपनी उंगलियों से उस 'दहलीज' को टटोलता, तो कभी अपने होंठों के बीच उसे हल्का सा भींच लेता। सोनी को ऐसा महसूस हो रहा था जैसे उसके शरीर के उस गुप्त केंद्र से बिजली की लहरें उठकर उसके दिमाग तक पहुँच रही हों।
सूरज की स्थिति उस खोजी की तरह थी जो किसी तिलिस्मी गुफा के द्वार पर खड़ा हो, जहाँ हर कदम पर एक नया रहस्य उसका स्वागत कर रहा था। सोनी की जांघों के बीच का वह दृश्य केवल मांस और त्वचा का मिलन नहीं था, बल्कि सूरज के लिए वह 'सृष्टि का उद्गम' था।
जैसे ही सूरज ने अपनी उंगलियों के पोरों से उस गुलाबी दरार के किनारों को धीरे से फैलाया, अंदर की गीली और मखमली दीवारों ने अपनी चमक बिखेरी। वह दृश्य इतना सम्मोहक था कि सूरज की पलकें झपकना भूल गईं।
सूरज ने देखा कि वह दरार जितनी संकरी दिख रही थी, छूने पर उतनी ही लचीली और आमंत्रित करने वाली थी। जैसे-जैसे वह अपनी उंगलियों को अंदर की ओर सरकाता, उसे महसूस होता कि वह किसी गर्म, रेशमी दलदल में उतर रहा है। वह अंदर की गहराइयों को नज़रों से नापना चाहता था, लेकिन वहाँ केवल एक अंतहीन, गीला अंधेरा और गुलाबी मांस की परतें थीं जो आपस में लिपटी हुई थीं।
सूरज के मन में एक अजीब सी कसमकस थी। वह सोच रहा था कि प्रकृति ने इस छोटी सी जगह में इतना आकर्षण कैसे भर दिया? वह अपनी उंगलियों से उस 'द्वार' को और चौड़ा करता, यह देखने की कोशिश में कि यह रहस्य कहाँ जाकर खत्म होता है। पर हर बार उसे वही कोमल, स्पंदित करती दीवारें मिलतीं, जो उसकी उंगलियों को कसकर जकड़ लेती थीं।
सुगना की मेहनत और सोनी की अपनी कामोत्तेजना ने उस जगह को पूरी तरह से लथपथ कर दिया था। सूरज की उंगलियाँ जब उस चिकनाहट के संपर्क में आतीं, तो उसे ऐसा लगता जैसे वह किसी दिव्य अमृत को छू रहा हो। वह बार-बार अपनी उंगलियों को अंदर डालता और बाहर निकालता, केवल यह महसूस करने के लिए कि सोनी का शरीर किस तरह उसे भीतर खींचने के लिए व्याकुल है।
सूरज की इस सूक्ष्म जांच और निरंतर स्पर्श ने सोनी के धैर्य की धज्जियां उड़ा दी थीं। जब सूरज अपनी उंगलियों से उस गहराई को टटोलते हुए थोड़ा दबाव बनाता, तो सोनी के गले से एक लंबी, मधुर सिसकी फूट पड़ती:
"आह... सूरज... रुक मत... और गहरा... और अंदर..."
सोनी का नितंब बिस्तर से थोड़ा ऊपर उठ गया था। उसकी जांघों की मांसपेशियाँ तनाव में फड़क रही थीं। उसे महसूस हो रहा था कि सूरज केवल उसे देख नहीं रहा, बल्कि अपनी रूह से उस 'गुफा' के रहस्य को पी जाने की कोशिश कर रहा है।
सूरज अब उस मोड़ पर था जहाँ देखना और महसूस करना काफी नहीं था। उसकी उंगलियाँ अब उस 'गहराई' को और अधिक बर्दाश्त नहीं कर पा रही थीं; वे कांप रही थीं। वह जितना अंदर जाने की कोशिश करता, उसे सोनी की योनि की वे संकुचित होती मांसपेशियाँ महसूस होतीं जो जैसे उसे चुनौती दे रही थीं—"क्या तुम इस आदि-रहस्य को पूरी तरह जान पाओगे?"
कमरे की हवा भारी हो चुकी थी। सूरज का चेहरा पूरी तरह से पसीने और उस 'काम-रस' से भीगा हुआ था। वह एक हाथ से सोनी की एक जांघ को और खींचकर अपनी आँखों के पास लाया, ताकि वह उस गुलाबी केंद्र को और स्पष्ट देख सके। वह कुदरत की इस 'गुफा' में पूरी तरह खो चुका था, यह भूलकर कि समय की सुइयां तेजी से भाग रही हैं।
सोनी (सिसकते हुए): "अह्ह... सूरज...तनी धीरे …आह..ब…. बस कर... तू तो सचमुच पागल है... उह्ह…
सूरज अधीर होकर सोनी का मालपुआ चूस रहा था चाट रहा था और अपने दांतों से हल्का हल्का काट रहा था…
जब सूरज ने सोनी के उसे अद्भुत दाने को अपने होठों के बीच लेकर चूसने की कोशिश की सोनी उत्तेजना से कराह उठी
सूरज बाबू आह….. तनी धीरे…से…… दुखाता .."
सूरज की जुबान का जादू और उंगलियों की हलचल ने सोनी को बेहाल कर दिया था। कमरे में छाई कामुकता के बीच सोनी को तड़प बढ़ चुकी थी:
सोनी: (बालों को खींचते हुए) "सूरज... आह! रुक मत... ये तू क्या कर रहा है?"
सूरज: (बिना रुके) "जो आपका हक है मौसी... चख लेने दो मुझे यह अमृत।"
सोनी: "उह्ह... बहुत गहरा... तू तो जान निकाल लेगा मेरी। विकास जी ने कभी ऐसे..."
सूरज: (हल्का काटते हुए) "उनका नाम मत लो... अभी यहाँ सिर्फ मैं हूँ और आपकी ये तड़पती मुनिया।"
सोनी: "आह! तनी धीरे... सीह्ह... पर छोड़ना मत। आज सब्र का बांध तोड़ दे।"
सूरज: "अभी तो बस दहलीज पर हूँ, महल के अंदर का नजारा तो अभी बाकी है।"
सोनी: "पागल है तू... पूरा पागल... पर ये पागलपन मुझे मार डालेगा। और अंदर... हाँ... वहीं!"
सूरज की जीभ उन गुलाबी गहराइयों में और अंदर उतर रही थी।
सोनी ने तकिए में चेहरा छिपा लिया और उसकी सिसकियां अब चीखों में बदलने लगी थीं। सूरज का हर स्पर्श उसे हकीकत से दूर एक अनजानी दुनिया में ले जा रहा था।
सोनी की 'मुनिया' अब पूरी तरह से पिघल चुकी थी। सूरज की जुबान जब उस संवेदनशील हिस्से पर अपनी हरकतें तेज करती, तो सोनी के पैरों की उंगलियाँ मुड़ जातीं और वह अपनी जांघों से सूरज के सिर को और भी कसकर दबोच लेती। उसे अपनी मर्यादा का कोई होश नहीं था; उसे बस उस 'मीठी कसक' का अहसास हो रहा था जो सुगना की बातों ने शुरू की थी और अब सुगना पुत्र सूरज उसे अंजाम तक पहुँचा रहा था।
सूरज ने अपना चेहरा ऊपर उठाया, उसके होंठ सोनी के काम-रस से चमक रहे थे। सोनी स्खलन के लिए तैयार थी उसे सूरज का अलग होना रास नहीं आया उसने उसकी आंखों में कौतूहल बस देखा जैसे पूछ रही हो क्या हुआ?
सूरज ने सोनी की नशीली आँखों में झांकते हुए कहा, "अभी तो मैंने सिर्फ स्वाद लिया है मौसी... अभी तो इस मंदिर की पूरी पूजा बाकी है।"
सोनी मदहोशी की उस चरम सीमा पर थी जहाँ उसे अब केवल सूरज का स्पर्श ही हकीकत लग रहा था। उसने खुद को सूरज के हवाले कर दिया और अपनी पलके बंद की और जांघों को फैलाते हुए बोली …..तो कर ले पूजा …
अपनी मादक मौसी का यह समर्पण देखकर सूरज बेहद प्रसन्न हो गया पर..समय का कांटा भाग रहा था.
सूरज की धड़कनें बेकाबू थीं और उसका रोम-रोम सोनी के उस मादक बदन में खो जाने को बेताब था, लेकिन अचानक उसकी नज़र दीवार पर लगी घड़ी की सुइयों पर टिक गई। रात के 9:45 बज चुके थे।
वह समय, जो कुछ पल पहले तक ठहर गया था, अब एक जल्लाद की तरह उसे वास्तविकता की याद दिला रहा था। सूरज का विवेक उसकी वासना पर भारी पड़ने लगा। उसे याद आया कि अगले आधे घंटे में उसे सोनी को लेकर स्टेशन पहुँचना है और विकास जी के स्वागत के लिए उसे सुगना की दी हुई उसी मर्यादा में वापस लाना है।
सूरज अचानक सोनी के दहकते बदन से अलग हो गया। वह बिस्तर के किनारे बैठ गया और अपनी तेज़ी से चलती साँसों को काबू करने की कोशिश करने लगा। सोनी, जो अभी-अभी काम-रस के उस गहरे समंदर में गोते खा रही थी, और सूरज के लंड का इंतजार अपनी मुनिया पर कर रही थी…सूरज के इस अचानक अलगाव से सकपका गई। उसकी मदहोश आँखें खुलीं और उसने सूरज को देखा जो उसकी जांघों के बीच से मुंह हटाकर सामने अपने घुटनों के बाल बैठा हुआ था।
नजरें मिलते सूरज ने भारी आवाज़ में कहा, "मौसी... समय खत्म हो गया। हमे स्टेशन चलना चाहिए।"
सोनी को जैसे किसी ने नींद से जगा दिया हो। उसने घड़ी ओर देखा।उसे एहसास हुआ कि वह अपने ही परिवार के होटल में, अपने पति के स्वागत की तैयारियों के बीच, पूरी तरह नग्न अवस्था में अपने भांजे के सामने है। हकीकत की ठंडक ने उसके मन को खिन्न कर दिया और उसकी उत्तेजना के वेग को धीमा कर दिया।
सोनी ने धीरे से उठकर बैठते हुए अपनी बिखरी हुई जुल्फों को समेटा। कमरे की ठंडी हवा अब उसकी नग्न त्वचा पर चुभने लगी थी। उसने ज़मीन पर बिखरी अपनी उन 'मर्यादाओं' (कपड़ों) की ओर देखा जो बेतरतीब पड़े थे।
सूरज ने बिना पीछे मुड़े, मेज़ पर रखे पानी के गिलास की ओर हाथ बढ़ाया और बोला, "मौसी, हमें निकलना होगा। मौसा जी की ट्रेन का वक्त हो रहा है। अगर हम देर से पहुँचे, तो माँ के उन सारे श्रृंगार और मन्नतों का क्या होगा? आप जल्दी से खुद को संभाल लीजिए।"
सोनी के चेहरे पर शर्म और पछतावे की एक हल्की सी लकीर उभरी, पर साथ ही सूरज के उस 'जिम्मेदार' रूप ने उसके मन में उसके लिए सम्मान भी जगाया। वह उठी और कांपते हाथों से अपना पेटीकोट और बनारसी साड़ी उठाने लगी,
सोनी जैसे ही अपना पेटिकोट उठाने के लिए झुकी बिस्तर पर बैठे सूरज को उसकी फूली हुई मुनिया दिखाई पड़ गई जो अब भी उस 'अरबी इत्र' और 'सूरज के स्पर्श' की गंध से महक रही थी।सूरज तड़प कर रह गया पर वह संतुष्ट था उसे अपनी मौसी और खुद पर विश्वास था जो आग उसने लगाई थी वह बिना उसके बुझने वाली नहीं थी यह बात वह भली भांति जानता था।
सोनी मन मसोस कर कपड़ों को सहेज रही थी…मर्यादा की दीवारें जो गिर चुकी थीं, उन्हें फिर से चुनना था—कम से कम दुनिया की नज़रों के लिए।
सोनी का शरीर इस वक्त विद्रोह कर रहा था। सूरज के स्पर्श ने उसे उत्तेजना के जिस शिखर पर पहुँचा दिया था, वहाँ से अचानक नीचे गिरना उसके लिए किसी सदमे से कम नहीं था। उसकी 'मुनिया' अभी भी स्पंदित हो रही थी और सूरज के उस भारी स्पर्श की प्यास उसके रोम-रोम में बाकी थी। शारीरिक रूप से वह पूरी तरह अतृप्त थी, और यह अधूरापन उसके मन में एक अजीब सी झुंझलाहट पैदा कर रहा था। उसे लग रहा था जैसे किसी ने प्यासे के सामने से अमृत का प्याला तब हटा लिया हो, जब वह बस उसे चखने ही वाला था।
घड़ी की उन सुइयों ने उसे हकीकत के धरातल पर पटक दिया था। जैसे-जैसे वह अपने कपड़े उठा रही थी, उसे अपनी सामाजिक स्थिति का अहसास हो रहा था। 'विकास की पत्नी' और 'सूरज की मौसी'—ये दो पहचानें उसके सामने किसी दीवार की तरह खड़ी हो गई थीं। उसे इस बात की टीस थी कि जिस आनंद को उसने अभी महसूस किया, वह केवल आधे घंटे की 'उधार' ली हुई मोहलत थी।
सोनी के मन में सूरज के लिए एक नया और गहरा सम्मान जागा। जहाँ एक तरफ वह उसकी दीवानगी और उसकी अपनी मुनिया के प्रति दीवानगी से प्रभावित थी, वहीं दूसरी ओर वह सूरज के संयम को देखकर हैरान थी। सूरज ने जिस तरह मर्यादा के लिए अपनी वासना को बीच में ही रोक दिया, उसने सोनी को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि सूरज केवल उसे भोगना नहीं चाहता, बल्कि वह उसकी और उसके परिवार की गरिमा का भी रक्षक है।
जब वासना में सम्मान हो तो वासना भी प्यार में तब्दील हो जाती है।
सोनी सूरज से आसक्त हो चुकी थी। काश कि यह मिलन पूर्ण हो पता…सोनी ने अपने मन की व्यथा अपने ईष्ट से कह दी…सोनी ने जो अनुष्ठान किया था ईश्वर ने शायद उसकी लाज रख ली…
साइड टेबल पर रखे इंटरकॉम की घंटी अचानक घनघना उठी। उस खामोश और वासना से भरे कमरे में वह आवाज़ किसी धमाके जैसी लगी। सोनी और सूरज दोनों चौंक गए। सोनी ने सूरज की ओर देखा सूरज ने झिझकते हुए फोन उठाया।
दूसरी तरफ होटल का मैनेजर खन्ना था। खन्ना जिम्मेदार मैनेजर था; वह बनारस की रग-रग से वाकिफ था और उसे बखूबी अंदाज़ा था कि स्टेशन पर मालगाड़ी पलटने का मतलब केवल दो घंटे की देरी नहीं होती। उसने खुद कंट्रोल रूम में अपने संपर्कों से बात की थी ताकि 'मालकिन' को कोई असुविधा न हो।
खन्ना (बड़े ही सलीके और सधी आवाज़ में): "क्षमा कीजिएगा छोटे मालिक, इस वक्त खलल डाला। पर अभी-अभी स्टेशन मास्टर से पक्की खबर मिली है कि पटरी साफ होने में उम्मीद से ज्यादा वक्त लग रहा है। विकास साहब की ट्रेन अब आधी रात यानी 12:30 बजे से पहले कैंट स्टेशन नहीं पहुँच पाएगी। मैंने सोचा मालकिन को स्टेशन पर दिक्कत न हो, इसलिए सूचना दे दूँ। आप लोग डिनर करेंगे?
सूरज को जो चाहिए था डिनर उसमें बाधा डाल सकता था उसने कहा
नहीं आज मौसी का व्रत है और मैं मौसा जी के साथ ही खाऊंगा।
खन्ना - ओके किसी भी चीज़ की ज़रूरत हो तो बस याद कीजिएगा।"
उसने सोनी की तरफ देखा, जिसकी आँखें अभी भी हया और हैरानी से सूरज की तरफ देख रही थीं। सोनी पूरी बात ठीक उसी प्रकार सुन पा रही थी जैसा अब से कुछ देर पहले सोनू सुगना और सोनी की बातें सुन रहा था। हे भगवान तो…क्या सूरज उसकी और सुगना की बातें सुन रहा था…क्या वह सब बातें भी…सोनी शर्म से पानी पानी हो रही थी
पर सूरज की आवाज़ में अब एक अलग ही खनक थी, "मौसी... कुदरत भी आज हमारे पक्ष में है। खन्ना जी का फोन था। फूफाजी की गाड़ी अब रात साढ़े बारह बजे आएगी। हमारे पास अब पूरे दो घंटे हैं।"
सोनी, जो अभी अपने हाथ में पेटिकोट उठाए उसे पहनने की तैयारी कर रही थी सन्न रह गई।
सुगना की मन्नत, वह 'संतान सप्तमी' का व्रत, और सूरज की वह अधूरी पूजा... सब कुछ जैसे फिर से एक चक्रव्यूह की तरह उसके सामने आ खड़ा हुआ।
सूरज धीरे से बिस्तर पर फिर से सोनी के करीब आया और उसके कांपते हाथों से वह पेटिकोट उसके हाथ से लिया और उसे वापस नीचे गिराते हुए सोनी को अपने पास खींच लिया और अपने आलिंगन में लेकर उसने सोनी के कान में शरारत भरी मासूमियत से कहा:
"मौसी, खन्ना जी बहुत समझदार हैं... उन्होंने हमें सिर्फ वक्त नहीं दिया है, बल्कि आपकी उस 'महोगनी की गांठ' को और गहराई से पूजने का न्योता दिया है। क्या अब भी आप जल्दी में हैं?"
सोनी ने एक गहरी और बेबस सांस ली। उसने महसूस किया कि उसकी 'मुनिया' पर लगी मेहंदी अब भी गीली थी, मानो वह खुद भी इस देरी का जश्न मना रही हो। उसने अपनी आँखें मूँद लीं और खुद को फिर से सूरज के हवाले कर दिया। मर्यादा का सूरज अब पूरी तरह ढल चुका था और बनारस की उस होटल की रात अभी शुरू हुई थी।
सोनी के मन में एक गहरा अंतर्द्वंद्व चल रहा था, पर होटल के उस कमरे की एकांत शांति और विधाता के खेल ने उसे एक नया नजरिया दे दिया। वह सोचने लगी कि सुगना दीदी ने उसे जिस 'संतान सप्तमी' के अनुष्ठान के लिए तैयार किया था, उसका सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा 'योनि पूजन' था। शास्त्रों और लोक-परंपराओं में इस रात को देह की पवित्रता और सृजन की शक्ति को पूजना अनिवार्य माना गया था।
सोनी ने आईने में अपनी उस नग्न काया को देखा, जिसे सुगना ने बड़ी हसरत से सजाया था। उसने सोचा, "शायद विधाता को यही मंजूर है। ट्रेन का इस कदर लेट होना और मेरा यहाँ सूरज के साथ अकेले होना कोई इत्तेफाक नहीं हो सकता। यदि विकास जी समय पर नहीं पहुँच पाए, तो क्या यह पूजन अधूरा रह जाएगा? नहीं, यह अनुष्ठान तो आज की रात संपन्न होना ही है।"
सोनी आधुनिक युग की महिला थी उसके हिसाब से दिन रात बारह बजे के बाद बदल जाता है जबकि भारतीय मान्यताओं के अनुसार अगला दिन सूर्योदय के साथ शुरू होता है ।
उसने मन ही मन यह स्वीकार कर लिया कि आज की रात की इस कामुक दीक्षा का 'पुरोहित' सूरज ही बनेगा। उसने सूरज को केवल अपने भांजे के रूप में नहीं, बल्कि उस पुरुष के रूप में देखा जो उसकी देह की इस कलाकृति को पूरी श्रद्धा और प्यास के साथ पूजने के लिए तैयार खड़ा था।
सोनी ने धीरे से अपनी आँखें खोलीं, जिनमें अब झिझक की जगह एक गहरा संकल्प था। उसने बिस्तर पर अपनी जांघों को पूरी तरह फैलाकर उस 'महोगनी की गांठ' को सूरज के सामने पूरी तरह उजागर कर दिया। वह दृश्य ऐसा था जैसे किसी मंदिर के द्वार भक्तों के लिए खोल दिए गए हों।
सोनी ने मद्धम और गंभीर स्वर में कहा, "सूरज... लगता है आज मेरी तक़दीर की लकीरें तेरे हाथों से ही मुकम्मल होनी हैं। यह संतान सप्तमी का व्रत और यह श्रृंगार निष्फल नहीं जाना चाहिए। तूने कहा था न कि तू मुझे पूजना चाहता है? तो ले... आज इस अनुष्ठान को तू ही पूरा कर। आज की रात मेरी इस देह की वेदी का स्वामी तू ही है।"
सूरज सोनी की इस बात को सुनकर स्तब्ध रह गया। उसे लगा जैसे उसे किसी महान यज्ञ का हिस्सा बनने का अधिकार मिल गया हो। उसने अपनी कांपती उंगलियों से सोनी के उस 'कमल' को छुआ, जो अब काम-रस से और भी ज्यादा चमक रहा था।
सूरज ने श्रद्धा और वासना के अद्भुत संगम के साथ अपना सिर झुकाया और सोनी की उस रसीली दहलीज पर अपने होंठ टिका दिए। सोनी ने अपना सिर पीछे की ओर पटक दिया और एक लंबी आह भरी। वह समझ चुकी थी कि आज की रात बनारस के इस सुइ़ट में जो इतिहास लिखा जाएगा, वह उसके और सूरज के बीच एक ऐसा गुप्त बंधन बना देगा जिसे दुनिया की कोई मर्यादा कभी तोड़ नहीं पाएगी।
अब उस कमरे में सिर्फ 'पूजन' था, 'पुजारी' था और सोनी की वह दहकती हुई देह और उसकी जांघों के बीच छुपी वह यज्ञ वेदी थी जो वीर्य आहुति की प्रतीक्षा में अपने अधर खोले उस चर्म दंड का इंतजार कर रही थी जिसने इस सृष्टि की रचना की थी…।
शेष अगले भाग में
कमेंट और पिक्चर के इंतजार में….
नजरों ने नजरों की भाषा समझ ली सूरज रुक गया पर उसने सोनी को फोन रखने का इशारा कर दिया बर्दाश्त की सीमा अब पार हो चुकी थी…सोनी ने बात समाप्त की
फोन कटते ही सूरज सोनी से सट गया।
सूरज के लंड का वह भारी और गर्म स्पर्श जैसे ही सोनी के नितंबों पर पड़ा, उसके पूरे शरीर में बिजली की एक लहर दौड़ गई। वह समझ गई कि अब सूरज को और अधिक देर तक रोकना नामुमकिन है। हकीकत और अपनी वासना के बीच झूलती सोनी ने एक झटके में करवट बदली और पीठ के बल आ गई।
अब आगे…
शर्म और उत्तेजना के उस मिले-जुले अहसास में उसने अपनी दोनों जांघों को आपस में सटा लिया और घुटनों को थोड़ा ऊपर की ओर मोड़ लिया, जिससे उसकी जांघों पर खिंची मेहंदी की बेलें और भी स्पष्ट होकर उभर आईं। सूरज अब पूरी तरह उसके सामने बिस्तर पर आ चुका था। उसकी आँखों में एक ऐसी आग थी जो सोनी को भस्म कर देने पर उतारू थी। सोनी की निगाहें जब सूरज के उस विशाल और तने हुए पौरुष पर पड़ीं जिसने स्वयं उसमें जान फूंकी थी, तो उसकी सांसें गले में ही अटक गईं। उतना ही जीवंत और अद्भुत।
सोनी ने दीवार पर लगी घड़ी की ओर इशारा किया, जिसकी सुइयाँ 9:15 की ओर बढ़ रही थीं। उसने अपनी कांपती हुई उंगलियों से अपनी बिखरी जुल्फों को समेटा और एक गहरी, मदहोश कर देने वाली आवाज़ में कहा:
सोनी: "सूरज... घड़ी की सुइयाँ देख ले। मर्यादा और समय, दोनों ही हमारे हाथ से रेत की तरह फिसल रहे हैं। तेरे पास सिर्फ आधा घंटा है। इस आधे घंटे में तुझे जो देखना है, जो पूजना है या जो करना है... कर ले। अपनी सारी अधूरी इच्छाएं आज पूरी कर ले, क्योंकि इसके बाद मैं सिर्फ विकास जी की रहूँगी।"
सोनी की इस 'अनुमति' ने सूरज के भीतर के बांध को पूरी तरह तोड़ दिया। सूरज ने बिना एक पल गंवाए अपने दोनों हाथ सोनी की मुड़ी हुई जांघों पर रखे और उन्हें धीरे-धीरे अलग करना शुरू किया। सोनी ने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं और अपना चेहरा तकिए में छुपा लिया।
जैसे-जैसे सोनी की जांघें खुल रही थीं, सुगना द्वारा रचित वह दिव्य 'कमल' और 'महोगनी की गांठ' अपनी पूरी मादकता के साथ सूरज के सामने उजागर हो रही थी। सूरज की नज़रों की तपिश और उसकी भारी होती साँसें अब सीधे सोनी की उस 'मुनिया' पर पड़ रही थीं, जो सुगना की बातों और अपनी खुद की उत्तेजना से पूरी तरह सराबोर हो चुकी थी।
सूरज ने फुसफुसाते हुए कहा, "आधा घंटा बहुत है मौसी... इस आधे घंटे में मैं आपको वो अहसास दे दूँगा जो आप अपनी पूरी जिंदगी नहीं भूलेंगी।"
उसने अपना चेहरा नीचे झुकाया और अपनी जुबान से उस मेहंदी से सजी दहलीज को चखने के लिए आगे बढ़ा, । कमरे की हवा में अब केवल धड़कनों का शोर था।
होटल के उस आलीशान कमरे में अब केवल सोनी की दबी-कुचली सिसकियाँ और सूरज की भारी होती सांसें गूँज रही थीं। सूरज ने जब अपना चेहरा सोनी की खुली हुई जांघों के बीच टिकाया, तो उसे उस 'काम-रस' और 'इत्र' की मिली-जुली महक ने पूरी तरह से पागल कर दिया।
सूरज ने अपनी जुबान से उस 'महोगनी की गांठ' को सहलाते हुए अपनी कलाकारी शुरू की। उसने सोनी की कोमल त्वचा पर रचे उस मेहंदी के कमल को चूमना और चाटना शुरू किया। सोनी का बदन कमान की तरह मुड़ गया; उसने अपने हाथों से तकिए को इतनी जोर से भींचा कि उसके नाखून मखमली कपड़े में धंस गए।
सूरज केवल चाटने तक ही सीमित नहीं रहा; वह अपनी उंगलियों और होंठों से सोनी की उस नाजुक दरार को तरह-तरह से सहलाने और छेड़ने लगा। वह कभी अपनी उंगलियों से उस 'दहलीज' को टटोलता, तो कभी अपने होंठों के बीच उसे हल्का सा भींच लेता। सोनी को ऐसा महसूस हो रहा था जैसे उसके शरीर के उस गुप्त केंद्र से बिजली की लहरें उठकर उसके दिमाग तक पहुँच रही हों।
सूरज की स्थिति उस खोजी की तरह थी जो किसी तिलिस्मी गुफा के द्वार पर खड़ा हो, जहाँ हर कदम पर एक नया रहस्य उसका स्वागत कर रहा था। सोनी की जांघों के बीच का वह दृश्य केवल मांस और त्वचा का मिलन नहीं था, बल्कि सूरज के लिए वह 'सृष्टि का उद्गम' था।
जैसे ही सूरज ने अपनी उंगलियों के पोरों से उस गुलाबी दरार के किनारों को धीरे से फैलाया, अंदर की गीली और मखमली दीवारों ने अपनी चमक बिखेरी। वह दृश्य इतना सम्मोहक था कि सूरज की पलकें झपकना भूल गईं।
सूरज ने देखा कि वह दरार जितनी संकरी दिख रही थी, छूने पर उतनी ही लचीली और आमंत्रित करने वाली थी। जैसे-जैसे वह अपनी उंगलियों को अंदर की ओर सरकाता, उसे महसूस होता कि वह किसी गर्म, रेशमी दलदल में उतर रहा है। वह अंदर की गहराइयों को नज़रों से नापना चाहता था, लेकिन वहाँ केवल एक अंतहीन, गीला अंधेरा और गुलाबी मांस की परतें थीं जो आपस में लिपटी हुई थीं।
सूरज के मन में एक अजीब सी कसमकस थी। वह सोच रहा था कि प्रकृति ने इस छोटी सी जगह में इतना आकर्षण कैसे भर दिया? वह अपनी उंगलियों से उस 'द्वार' को और चौड़ा करता, यह देखने की कोशिश में कि यह रहस्य कहाँ जाकर खत्म होता है। पर हर बार उसे वही कोमल, स्पंदित करती दीवारें मिलतीं, जो उसकी उंगलियों को कसकर जकड़ लेती थीं।
सुगना की मेहनत और सोनी की अपनी कामोत्तेजना ने उस जगह को पूरी तरह से लथपथ कर दिया था। सूरज की उंगलियाँ जब उस चिकनाहट के संपर्क में आतीं, तो उसे ऐसा लगता जैसे वह किसी दिव्य अमृत को छू रहा हो। वह बार-बार अपनी उंगलियों को अंदर डालता और बाहर निकालता, केवल यह महसूस करने के लिए कि सोनी का शरीर किस तरह उसे भीतर खींचने के लिए व्याकुल है।
सूरज की इस सूक्ष्म जांच और निरंतर स्पर्श ने सोनी के धैर्य की धज्जियां उड़ा दी थीं। जब सूरज अपनी उंगलियों से उस गहराई को टटोलते हुए थोड़ा दबाव बनाता, तो सोनी के गले से एक लंबी, मधुर सिसकी फूट पड़ती:
"आह... सूरज... रुक मत... और गहरा... और अंदर..."
सोनी का नितंब बिस्तर से थोड़ा ऊपर उठ गया था। उसकी जांघों की मांसपेशियाँ तनाव में फड़क रही थीं। उसे महसूस हो रहा था कि सूरज केवल उसे देख नहीं रहा, बल्कि अपनी रूह से उस 'गुफा' के रहस्य को पी जाने की कोशिश कर रहा है।
सूरज अब उस मोड़ पर था जहाँ देखना और महसूस करना काफी नहीं था। उसकी उंगलियाँ अब उस 'गहराई' को और अधिक बर्दाश्त नहीं कर पा रही थीं; वे कांप रही थीं। वह जितना अंदर जाने की कोशिश करता, उसे सोनी की योनि की वे संकुचित होती मांसपेशियाँ महसूस होतीं जो जैसे उसे चुनौती दे रही थीं—"क्या तुम इस आदि-रहस्य को पूरी तरह जान पाओगे?"
कमरे की हवा भारी हो चुकी थी। सूरज का चेहरा पूरी तरह से पसीने और उस 'काम-रस' से भीगा हुआ था। वह एक हाथ से सोनी की एक जांघ को और खींचकर अपनी आँखों के पास लाया, ताकि वह उस गुलाबी केंद्र को और स्पष्ट देख सके। वह कुदरत की इस 'गुफा' में पूरी तरह खो चुका था, यह भूलकर कि समय की सुइयां तेजी से भाग रही हैं।
सोनी (सिसकते हुए): "अह्ह... सूरज...तनी धीरे …आह..ब…. बस कर... तू तो सचमुच पागल है... उह्ह…
सूरज अधीर होकर सोनी का मालपुआ चूस रहा था चाट रहा था और अपने दांतों से हल्का हल्का काट रहा था…
जब सूरज ने सोनी के उसे अद्भुत दाने को अपने होठों के बीच लेकर चूसने की कोशिश की सोनी उत्तेजना से कराह उठी
सूरज बाबू आह….. तनी धीरे…से…… दुखाता .."
सूरज की जुबान का जादू और उंगलियों की हलचल ने सोनी को बेहाल कर दिया था। कमरे में छाई कामुकता के बीच सोनी को तड़प बढ़ चुकी थी:
सोनी: (बालों को खींचते हुए) "सूरज... आह! रुक मत... ये तू क्या कर रहा है?"
सूरज: (बिना रुके) "जो आपका हक है मौसी... चख लेने दो मुझे यह अमृत।"
सोनी: "उह्ह... बहुत गहरा... तू तो जान निकाल लेगा मेरी। विकास जी ने कभी ऐसे..."
सूरज: (हल्का काटते हुए) "उनका नाम मत लो... अभी यहाँ सिर्फ मैं हूँ और आपकी ये तड़पती मुनिया।"
सोनी: "आह! तनी धीरे... सीह्ह... पर छोड़ना मत। आज सब्र का बांध तोड़ दे।"
सूरज: "अभी तो बस दहलीज पर हूँ, महल के अंदर का नजारा तो अभी बाकी है।"
सोनी: "पागल है तू... पूरा पागल... पर ये पागलपन मुझे मार डालेगा। और अंदर... हाँ... वहीं!"
सूरज की जीभ उन गुलाबी गहराइयों में और अंदर उतर रही थी।
सोनी ने तकिए में चेहरा छिपा लिया और उसकी सिसकियां अब चीखों में बदलने लगी थीं। सूरज का हर स्पर्श उसे हकीकत से दूर एक अनजानी दुनिया में ले जा रहा था।
सोनी की 'मुनिया' अब पूरी तरह से पिघल चुकी थी। सूरज की जुबान जब उस संवेदनशील हिस्से पर अपनी हरकतें तेज करती, तो सोनी के पैरों की उंगलियाँ मुड़ जातीं और वह अपनी जांघों से सूरज के सिर को और भी कसकर दबोच लेती। उसे अपनी मर्यादा का कोई होश नहीं था; उसे बस उस 'मीठी कसक' का अहसास हो रहा था जो सुगना की बातों ने शुरू की थी और अब सुगना पुत्र सूरज उसे अंजाम तक पहुँचा रहा था।
सूरज ने अपना चेहरा ऊपर उठाया, उसके होंठ सोनी के काम-रस से चमक रहे थे। सोनी स्खलन के लिए तैयार थी उसे सूरज का अलग होना रास नहीं आया उसने उसकी आंखों में कौतूहल बस देखा जैसे पूछ रही हो क्या हुआ?
सूरज ने सोनी की नशीली आँखों में झांकते हुए कहा, "अभी तो मैंने सिर्फ स्वाद लिया है मौसी... अभी तो इस मंदिर की पूरी पूजा बाकी है।"
सोनी मदहोशी की उस चरम सीमा पर थी जहाँ उसे अब केवल सूरज का स्पर्श ही हकीकत लग रहा था। उसने खुद को सूरज के हवाले कर दिया और अपनी पलके बंद की और जांघों को फैलाते हुए बोली …..तो कर ले पूजा …
अपनी मादक मौसी का यह समर्पण देखकर सूरज बेहद प्रसन्न हो गया पर..समय का कांटा भाग रहा था.
सूरज की धड़कनें बेकाबू थीं और उसका रोम-रोम सोनी के उस मादक बदन में खो जाने को बेताब था, लेकिन अचानक उसकी नज़र दीवार पर लगी घड़ी की सुइयों पर टिक गई। रात के 9:45 बज चुके थे।
वह समय, जो कुछ पल पहले तक ठहर गया था, अब एक जल्लाद की तरह उसे वास्तविकता की याद दिला रहा था। सूरज का विवेक उसकी वासना पर भारी पड़ने लगा। उसे याद आया कि अगले आधे घंटे में उसे सोनी को लेकर स्टेशन पहुँचना है और विकास जी के स्वागत के लिए उसे सुगना की दी हुई उसी मर्यादा में वापस लाना है।
सूरज अचानक सोनी के दहकते बदन से अलग हो गया। वह बिस्तर के किनारे बैठ गया और अपनी तेज़ी से चलती साँसों को काबू करने की कोशिश करने लगा। सोनी, जो अभी-अभी काम-रस के उस गहरे समंदर में गोते खा रही थी, और सूरज के लंड का इंतजार अपनी मुनिया पर कर रही थी…सूरज के इस अचानक अलगाव से सकपका गई। उसकी मदहोश आँखें खुलीं और उसने सूरज को देखा जो उसकी जांघों के बीच से मुंह हटाकर सामने अपने घुटनों के बाल बैठा हुआ था।
नजरें मिलते सूरज ने भारी आवाज़ में कहा, "मौसी... समय खत्म हो गया। हमे स्टेशन चलना चाहिए।"
सोनी को जैसे किसी ने नींद से जगा दिया हो। उसने घड़ी ओर देखा।उसे एहसास हुआ कि वह अपने ही परिवार के होटल में, अपने पति के स्वागत की तैयारियों के बीच, पूरी तरह नग्न अवस्था में अपने भांजे के सामने है। हकीकत की ठंडक ने उसके मन को खिन्न कर दिया और उसकी उत्तेजना के वेग को धीमा कर दिया।
सोनी ने धीरे से उठकर बैठते हुए अपनी बिखरी हुई जुल्फों को समेटा। कमरे की ठंडी हवा अब उसकी नग्न त्वचा पर चुभने लगी थी। उसने ज़मीन पर बिखरी अपनी उन 'मर्यादाओं' (कपड़ों) की ओर देखा जो बेतरतीब पड़े थे।
सूरज ने बिना पीछे मुड़े, मेज़ पर रखे पानी के गिलास की ओर हाथ बढ़ाया और बोला, "मौसी, हमें निकलना होगा। मौसा जी की ट्रेन का वक्त हो रहा है। अगर हम देर से पहुँचे, तो माँ के उन सारे श्रृंगार और मन्नतों का क्या होगा? आप जल्दी से खुद को संभाल लीजिए।"
सोनी के चेहरे पर शर्म और पछतावे की एक हल्की सी लकीर उभरी, पर साथ ही सूरज के उस 'जिम्मेदार' रूप ने उसके मन में उसके लिए सम्मान भी जगाया। वह उठी और कांपते हाथों से अपना पेटीकोट और बनारसी साड़ी उठाने लगी,
सोनी जैसे ही अपना पेटिकोट उठाने के लिए झुकी बिस्तर पर बैठे सूरज को उसकी फूली हुई मुनिया दिखाई पड़ गई जो अब भी उस 'अरबी इत्र' और 'सूरज के स्पर्श' की गंध से महक रही थी।सूरज तड़प कर रह गया पर वह संतुष्ट था उसे अपनी मौसी और खुद पर विश्वास था जो आग उसने लगाई थी वह बिना उसके बुझने वाली नहीं थी यह बात वह भली भांति जानता था।
सोनी मन मसोस कर कपड़ों को सहेज रही थी…मर्यादा की दीवारें जो गिर चुकी थीं, उन्हें फिर से चुनना था—कम से कम दुनिया की नज़रों के लिए।
सोनी का शरीर इस वक्त विद्रोह कर रहा था। सूरज के स्पर्श ने उसे उत्तेजना के जिस शिखर पर पहुँचा दिया था, वहाँ से अचानक नीचे गिरना उसके लिए किसी सदमे से कम नहीं था। उसकी 'मुनिया' अभी भी स्पंदित हो रही थी और सूरज के उस भारी स्पर्श की प्यास उसके रोम-रोम में बाकी थी। शारीरिक रूप से वह पूरी तरह अतृप्त थी, और यह अधूरापन उसके मन में एक अजीब सी झुंझलाहट पैदा कर रहा था। उसे लग रहा था जैसे किसी ने प्यासे के सामने से अमृत का प्याला तब हटा लिया हो, जब वह बस उसे चखने ही वाला था।
घड़ी की उन सुइयों ने उसे हकीकत के धरातल पर पटक दिया था। जैसे-जैसे वह अपने कपड़े उठा रही थी, उसे अपनी सामाजिक स्थिति का अहसास हो रहा था। 'विकास की पत्नी' और 'सूरज की मौसी'—ये दो पहचानें उसके सामने किसी दीवार की तरह खड़ी हो गई थीं। उसे इस बात की टीस थी कि जिस आनंद को उसने अभी महसूस किया, वह केवल आधे घंटे की 'उधार' ली हुई मोहलत थी।
सोनी के मन में सूरज के लिए एक नया और गहरा सम्मान जागा। जहाँ एक तरफ वह उसकी दीवानगी और उसकी अपनी मुनिया के प्रति दीवानगी से प्रभावित थी, वहीं दूसरी ओर वह सूरज के संयम को देखकर हैरान थी। सूरज ने जिस तरह मर्यादा के लिए अपनी वासना को बीच में ही रोक दिया, उसने सोनी को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि सूरज केवल उसे भोगना नहीं चाहता, बल्कि वह उसकी और उसके परिवार की गरिमा का भी रक्षक है।
जब वासना में सम्मान हो तो वासना भी प्यार में तब्दील हो जाती है।
सोनी सूरज से आसक्त हो चुकी थी। काश कि यह मिलन पूर्ण हो पता…सोनी ने अपने मन की व्यथा अपने ईष्ट से कह दी…सोनी ने जो अनुष्ठान किया था ईश्वर ने शायद उसकी लाज रख ली…
साइड टेबल पर रखे इंटरकॉम की घंटी अचानक घनघना उठी। उस खामोश और वासना से भरे कमरे में वह आवाज़ किसी धमाके जैसी लगी। सोनी और सूरज दोनों चौंक गए। सोनी ने सूरज की ओर देखा सूरज ने झिझकते हुए फोन उठाया।
दूसरी तरफ होटल का मैनेजर खन्ना था। खन्ना जिम्मेदार मैनेजर था; वह बनारस की रग-रग से वाकिफ था और उसे बखूबी अंदाज़ा था कि स्टेशन पर मालगाड़ी पलटने का मतलब केवल दो घंटे की देरी नहीं होती। उसने खुद कंट्रोल रूम में अपने संपर्कों से बात की थी ताकि 'मालकिन' को कोई असुविधा न हो।
खन्ना (बड़े ही सलीके और सधी आवाज़ में): "क्षमा कीजिएगा छोटे मालिक, इस वक्त खलल डाला। पर अभी-अभी स्टेशन मास्टर से पक्की खबर मिली है कि पटरी साफ होने में उम्मीद से ज्यादा वक्त लग रहा है। विकास साहब की ट्रेन अब आधी रात यानी 12:30 बजे से पहले कैंट स्टेशन नहीं पहुँच पाएगी। मैंने सोचा मालकिन को स्टेशन पर दिक्कत न हो, इसलिए सूचना दे दूँ। आप लोग डिनर करेंगे?
सूरज को जो चाहिए था डिनर उसमें बाधा डाल सकता था उसने कहा
नहीं आज मौसी का व्रत है और मैं मौसा जी के साथ ही खाऊंगा।
खन्ना - ओके किसी भी चीज़ की ज़रूरत हो तो बस याद कीजिएगा।"
उसने सोनी की तरफ देखा, जिसकी आँखें अभी भी हया और हैरानी से सूरज की तरफ देख रही थीं। सोनी पूरी बात ठीक उसी प्रकार सुन पा रही थी जैसा अब से कुछ देर पहले सोनू सुगना और सोनी की बातें सुन रहा था। हे भगवान तो…क्या सूरज उसकी और सुगना की बातें सुन रहा था…क्या वह सब बातें भी…सोनी शर्म से पानी पानी हो रही थी
पर सूरज की आवाज़ में अब एक अलग ही खनक थी, "मौसी... कुदरत भी आज हमारे पक्ष में है। खन्ना जी का फोन था। फूफाजी की गाड़ी अब रात साढ़े बारह बजे आएगी। हमारे पास अब पूरे दो घंटे हैं।"
सोनी, जो अभी अपने हाथ में पेटिकोट उठाए उसे पहनने की तैयारी कर रही थी सन्न रह गई।
सुगना की मन्नत, वह 'संतान सप्तमी' का व्रत, और सूरज की वह अधूरी पूजा... सब कुछ जैसे फिर से एक चक्रव्यूह की तरह उसके सामने आ खड़ा हुआ।
सूरज धीरे से बिस्तर पर फिर से सोनी के करीब आया और उसके कांपते हाथों से वह पेटिकोट उसके हाथ से लिया और उसे वापस नीचे गिराते हुए सोनी को अपने पास खींच लिया और अपने आलिंगन में लेकर उसने सोनी के कान में शरारत भरी मासूमियत से कहा:
"मौसी, खन्ना जी बहुत समझदार हैं... उन्होंने हमें सिर्फ वक्त नहीं दिया है, बल्कि आपकी उस 'महोगनी की गांठ' को और गहराई से पूजने का न्योता दिया है। क्या अब भी आप जल्दी में हैं?"
सोनी ने एक गहरी और बेबस सांस ली। उसने महसूस किया कि उसकी 'मुनिया' पर लगी मेहंदी अब भी गीली थी, मानो वह खुद भी इस देरी का जश्न मना रही हो। उसने अपनी आँखें मूँद लीं और खुद को फिर से सूरज के हवाले कर दिया। मर्यादा का सूरज अब पूरी तरह ढल चुका था और बनारस की उस होटल की रात अभी शुरू हुई थी।
सोनी के मन में एक गहरा अंतर्द्वंद्व चल रहा था, पर होटल के उस कमरे की एकांत शांति और विधाता के खेल ने उसे एक नया नजरिया दे दिया। वह सोचने लगी कि सुगना दीदी ने उसे जिस 'संतान सप्तमी' के अनुष्ठान के लिए तैयार किया था, उसका सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा 'योनि पूजन' था। शास्त्रों और लोक-परंपराओं में इस रात को देह की पवित्रता और सृजन की शक्ति को पूजना अनिवार्य माना गया था।
सोनी ने आईने में अपनी उस नग्न काया को देखा, जिसे सुगना ने बड़ी हसरत से सजाया था। उसने सोचा, "शायद विधाता को यही मंजूर है। ट्रेन का इस कदर लेट होना और मेरा यहाँ सूरज के साथ अकेले होना कोई इत्तेफाक नहीं हो सकता। यदि विकास जी समय पर नहीं पहुँच पाए, तो क्या यह पूजन अधूरा रह जाएगा? नहीं, यह अनुष्ठान तो आज की रात संपन्न होना ही है।"
सोनी आधुनिक युग की महिला थी उसके हिसाब से दिन रात बारह बजे के बाद बदल जाता है जबकि भारतीय मान्यताओं के अनुसार अगला दिन सूर्योदय के साथ शुरू होता है ।
उसने मन ही मन यह स्वीकार कर लिया कि आज की रात की इस कामुक दीक्षा का 'पुरोहित' सूरज ही बनेगा। उसने सूरज को केवल अपने भांजे के रूप में नहीं, बल्कि उस पुरुष के रूप में देखा जो उसकी देह की इस कलाकृति को पूरी श्रद्धा और प्यास के साथ पूजने के लिए तैयार खड़ा था।
सोनी ने धीरे से अपनी आँखें खोलीं, जिनमें अब झिझक की जगह एक गहरा संकल्प था। उसने बिस्तर पर अपनी जांघों को पूरी तरह फैलाकर उस 'महोगनी की गांठ' को सूरज के सामने पूरी तरह उजागर कर दिया। वह दृश्य ऐसा था जैसे किसी मंदिर के द्वार भक्तों के लिए खोल दिए गए हों।
सोनी ने मद्धम और गंभीर स्वर में कहा, "सूरज... लगता है आज मेरी तक़दीर की लकीरें तेरे हाथों से ही मुकम्मल होनी हैं। यह संतान सप्तमी का व्रत और यह श्रृंगार निष्फल नहीं जाना चाहिए। तूने कहा था न कि तू मुझे पूजना चाहता है? तो ले... आज इस अनुष्ठान को तू ही पूरा कर। आज की रात मेरी इस देह की वेदी का स्वामी तू ही है।"
सूरज सोनी की इस बात को सुनकर स्तब्ध रह गया। उसे लगा जैसे उसे किसी महान यज्ञ का हिस्सा बनने का अधिकार मिल गया हो। उसने अपनी कांपती उंगलियों से सोनी के उस 'कमल' को छुआ, जो अब काम-रस से और भी ज्यादा चमक रहा था।
सूरज ने श्रद्धा और वासना के अद्भुत संगम के साथ अपना सिर झुकाया और सोनी की उस रसीली दहलीज पर अपने होंठ टिका दिए। सोनी ने अपना सिर पीछे की ओर पटक दिया और एक लंबी आह भरी। वह समझ चुकी थी कि आज की रात बनारस के इस सुइ़ट में जो इतिहास लिखा जाएगा, वह उसके और सूरज के बीच एक ऐसा गुप्त बंधन बना देगा जिसे दुनिया की कोई मर्यादा कभी तोड़ नहीं पाएगी।
अब उस कमरे में सिर्फ 'पूजन' था, 'पुजारी' था और सोनी की वह दहकती हुई देह और उसकी जांघों के बीच छुपी वह यज्ञ वेदी थी जो वीर्य आहुति की प्रतीक्षा में अपने अधर खोले उस चर्म दंड का इंतजार कर रही थी जिसने इस सृष्टि की रचना की थी…।
शेष अगले भाग में
कमेंट और पिक्चर के इंतजार में….