Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता. - Page 140 - SexBaba
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Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता.

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भाग 165

सरयू सिंह के मन में लड्डू फूट रहे थे, पर चेहरे पर उन्होंने एक बुजुर्गियत भरा अनुशासन बनाए रखा। उन्होंने अपनी चाय खत्म की और बोले, "ठीक कहत बाड़ू । हमरो मंदिर गईला बहुत दिन हो गइल बा। तू तैयारी करऽ, हम साथे चलब।"

सरयू सिंह के मन में लड्डू फूट रहे थे वह सोनी को अपनी नजरों ओझल नहीं होने देना चाहते थे। अपनी वासना में वही अभी भूल चुके थे कि निमंत्रण मंदिर जाने का था ना की सोनी की जवानी का रसास्वादन का।

यह तो सिर्फ सुगना जानती थी और शायद इसीलिए उसने सोनी को वह विशेष साड़ी पहनाई थी।



अब आगे….

कुछ ही देर बाद सोनी सुगना और सरयू सिंह पैदल ही मंदिर के लिए निकल पड़े यह मंदिर तंत्र-मंत्र के लिए जाना जाता था।

मंदिर के मार्ग में सरयू सिंह आगे आगे चल रहे थे और सोनी और सुगना पीछे-पीछे सरयू सिंह चाहते तो थे की सोनी उनके आगे चले और वह उसकी रसीली जवानी का रसपान अपनी आंखों से कर पाए परंतु यह कहना उचित नहीं होता पर जैसे ही वह मंदिर की सीढ़ियों के समीप पहुंचे उन्होंने सुगना और सोनी से कहा..

अब तू लोग आगे आ जा हम पीछे बानी। पीछे से लफूवा सब बदमाशी कर सकेला।

मंदिर की उन ऊँची सीढ़ियों पर, धूप और अगरबत्ती के धुएं के बीच, जब सरयू सिंह की नज़रें सोनी की गुलाबी शिफॉन वाली देह पर ठहरीं, तो वक्त जैसे ठहर गया। बनारस की वह शाम अचानक बरसों पुरानी उन मदहोश रातों में तब्दील हो गई, जब सलेमपुर की उनकी कोठरी में वासना का राज हुआ करता था।

सोनी को उस गुलाबी साड़ी में देखकर सरयू सिंह के मन में कामुकता का एक ऐसा ज्वार उठा, जिसने मर्यादा की हर दीवार को हिलाकर रख दिया। उन्हें वह दिन याद आ गया जब उन्होंने खुद शहर के सबसे बड़े कपड़े वाले के यहाँ से यह 'गुलाबी शिफॉन' खास साड़ी सुगना के लिए पसंद की थी। उस वक्त सुगना उनकी प्रेयसी थी और सरयू सिंह उसके यौवन के दीवाने थे।

उन्हें याद आने लगा कि कैसे उन्होंने सुगना से ज़िद की थी कि वह बिना किसी अंतःवस्त्र के केवल इस महीन साड़ी को अपने बदन पर लपेटे। जब सुगना वह साड़ी पहनकर उनके सामने आई थी, तो शिफॉन का वह पारदर्शी कपड़ा उसके उभरते हुए बदन की हर लकीर को और भी नुमाया कर रहा था। सरयू सिंह ने उस वक्त सुगना को अपनी गोद में खींच लिया था।

सरयू सिंह की आँखों के सामने वह दृश्य सजीव हो उठा, जब उन्होंने अपने कांपते और मजबूत हाथों से उस गुलाबी साड़ी की एक-एक तह को खोला था। उन्हें याद आया कि कैसे सुगना के मथुनी जैसे उरोज उस साड़ी के हटने के बाद उनकी आँखों के सामने आए थे। वह रेशमी अहसास, सुगना का वह मादक और नग्न बदन, और उस साड़ी का फर्श पर गिरना—यह सब सरयू सिंह के मस्तिष्क में किसी चलचित्र की तरह चलने लगा। उन्होंने सुगना के उस मटकते बदन का जो आनंद लिया था, वह सुख आज सोनी को देखकर उनके पौरुष में एक तीखी लहर पैदा कर रहा था।

जब से उन्हें पता चला था कि सुगना उनकी अपनी पुत्री है तभी से वह सुगना को अपनी कामुकता की जद से बाहर कर चुके थे पर आज उसे गुलाबी साड़ी को देखकर उनके मन में उसे दिन की यादें ताजा हो गई थी।

आज वही साड़ी सोनी के बदन पर थी। सोनी भी उसी गर्भ से निकली थी जिस गर्भ से सुगना दोनों ने सुंदरता रति की पाई थी। अपनी आत्मज्ञानी को मिटाने के लिए उन्होंने अपने मनोमस्तिष्क में सुगना की जगह सोनी के कामुक बदन को स्थान दे दिया था।

सोनी ने पीछे मुड़कर यह देखने की कोशिश की की सरयू सिंह पीछे तो है ना? उसकी नज़रें सरयू सिंह से चार हो गई और सोनी ने अपनी नज़रें झुका ली।

उसी समय सरयू सिंह ने जब एक झलक सोनी की उस पतली कमर और साड़ी के नीचे से झलकती नाभि को देखा, तो उन्हें लगा जैसे सुगना का वही पुराना यौवन और भी ज़्यादा निखर कर उनके सामने आ गया है।

सुगना अपनी सहज चाल में थी, लेकिन उसके बगल में चलती सोनी का व्यक्तित्व उस शाम कुछ अलग ही छटा बिखेर रहा था। सरयू सिंह दो कदम पीछे थे, और उनकी अनुभवी आँखों के लिए यह दूरी किसी वरदान से कम नहीं थी।

सोनी जैसे ही मंदिर की पहली सीढ़ी पर चढ़ी, हवा के एक शरारती झोंके ने उसकी गुलाबी शिफॉन की साड़ी को उसके बदन से और भी कसकर सटा दिया। पारदर्शी कपड़े के नीचे से सोनी की कसरती और सुडौल जंघों की हरकत साफ़ झलक रही थी। सरयू सिंह की नज़रें किसी शिकारी की तरह सोनी के निचले हिस्से पर ठहर गईं। हर पायदान ऊपर चढ़ते वक्त सोनी के भारी और पुष्ट नितंब एक खास लय में मटक रहे थे, जिससे साड़ी का महीन कपड़ा रह-रहकर खिंच जाता और उसकी गोरी पिंडलियों का उभार नुमाया हो जाता।

सोनी का यौवन इस वक्त अपने पूर्ण 'कसाव' पर था। सीढ़ियाँ चढ़ते समय जब वह अपना संतुलन बनाने के लिए थोड़ा आगे झुकती, तो उसकी पतली कमर का वह गहरा मोड़ और चोली के नीचे से झलकती पीठ की ढलान सरयू सिंह के भीतर एक तीखी सिहरन पैदा कर देती। उन्हें सुगना की मौजूदगी का अहसास तक नहीं था; उनकी दुनिया तो बस उस गुलाबी रेशम के घेरे में सिमट गई थी जो सोनी की 'रसभरी जवानी' को ढँकने की नाकाम कोशिश कर रहा था.

सरयू सिंह पीछे चलते हुए अपनी मूँछों को मरोड़ रहे थे, और उनके गले से एक भारी घूँट नीचे उतरा। वे सोनी की उस मटकती हुई जवानी का एक-एक कतरा अपनी नज़रों से पी जाना चाहते थे। उन्हें याद आ रहा था कि कैसे उन्होंने सुगना के लिए यह साड़ी चुनी थी, पर आज सोनी के इस गदराए हुए बदन' पर यह लिबास किसी कयामत से कम नहीं लग रहा था।

जब-जब सोनी का पैर अगली सीढ़ी पर पड़ता, उसकी जांघों की मांसलता साड़ी के आर-पार एक मादक थिरकन पैदा करती। सरयू सिंह का पौरुष इस दृश्य को देखकर अपनी मर्यादा की ज़ंजीरें तोड़ने को आतुर था। उन्हें लग रहा था कि वे इस भीड़भाड़ वाले रास्ते पर ही सोनी को अपनी बाहों के 'अमरबेल' में लपेट लें और उस गुलाबी शिफॉन को हटाकर उस कंचन जैसी देह का स्पर्श करें।

मंदिर की घंटियों की गूँज के बीच, सरयू सिंह के कानों में केवल सोनी की पायल की रुनझुन और उसके कपड़ों की वह सरसराहट गूँज रही थी जो उनकी वासना को और भी भड़का रही थी। सोनी अपनी ही मदमस्त चाल में ऊपर चढ़ती जा रही थी, यह जानते हुए भी कि पीछे से कोई अनुभवी आँखें उसके बदन के एक-एक उतार-चढ़ाव का 'मानसिक वस्त्रहरण' कर रही हैं।

उनकी साँसें भारी होने लगीं। उनके मन में लड्डू फूट रहे थे और एक आदिम इच्छा कुलाँचे मार रही थी—वही इच्छा कि वे एक बार फिर उन हाथों से इस गुलाबी शिफॉन को सोनी के बदन से उतारें। सोनी की वह मादक चाल और सीढ़ियाँ चढ़ते वक्त उसके नितंबों का उभार सरयू सिंह के भीतर उस लंड को जगा चुका था, जिसे उन्होंने बरसों से संभोग सुख से वंचित रखा था।

वे मन ही मन बुदबुदाए, "विधाता, ई कवन परीक्षा लेत हव? साक्षात अप्सरा उतार देले हव...।"

मंदिर की उस भीड़ में, सरयू सिंह का चेहरा भले ही शांत और बुजुर्गियत वाला था, पर उनकी धोती के भीतर छिपा उनका पौरुष और उनके मन के भीतर चल रहा 'वस्त्रहरण' का वह पुराना खेल, सोनी को अपनी आगोश में लेने के लिए छटपटा रहा था। सुगना की योजना कामयाब हो चुकी थी—सरयू सिंह अब केवल एक ससुर नहीं, बल्कि उस गुलाबी साड़ी के भीतर छिपी जवानी को हासिल करने के लिए बेताब एक शिकारी बन चुके थे।

आखिरकार सुगना सोनी और सरयू सिंह मंदिर के प्रांगण में पहुंच चुके थे। मंदिर के भीतर पीतल के घंटों की गूँज और मंत्रोच्चार के बीच एक अजीब सा भारीपन था। मंदिर में भीड़भाड़ थी। सुगना ने जान-बूझकर सोनी को सरयू सिंह के बिल्कुल बगल में खड़ा कर दिया।

"बाबूजी, पंडित जी से कहि के सोनी के नाम से विशेष संकल्प करवा दीं। कोख हरियर होखे के मन्नत बा।" सुगना ने धीरे से कहा।

पंडित जी ने जब मंत्र पढ़ना शुरू किया, तो भीड़ के दबाव का बहाना बनाकर सुगना ने सोनी को हल्का सा धक्का दिया, जिससे सोनी आगे को गिरने लगी परंतु सरयू सिंह के मजबूत हाथों में उसे थाम लिया। उसका नंगा पेट सीधे सरयू सिंह की हथेली में था। उस रेशमी त्वचा पर खुरदुरे हाथों की छुअन ने सोनी के बदन में बिजली दौड़ा दी। सरयू सिंह का हाथ पत्थर की तरह सख्त था, जिसमें एक दहकती हुई गर्मी थी।

सोनी संभली और खड़ी हो गई। परंतु कलेजा अभी भी धक धक कर रहा था। पूजा प्रारंभ थी।

सभी ईश्वर से अपनी-आप की मन्नते मांग रहे थे। यहां तक कि कहानी के पाठक भी। परंतु सबका निचोड़ एक ही था वह था सोनी और सरयू सिंह का संभोग।

पूजा समाप्त होने के बाद, पंडित जी ने मन्नत का एक धागा दिया। सुगना ने कहा, "बाबूजी, आप ही अपने हाथ से सोनी की कलाई पर यह धागा बाँध दीजिये। बड़ों का आशीर्वाद फलीभूत होता है।"

जब सरयू सिंह ने सोनी की कोमल कलाई को अपने खुरदरे और मजबूत हाथों में थामा, तो सोनी का पूरा शरीर कांप उठा। धागा बाँधते समय सरयू सिंह की उंगलियाँ जान-बूझकर सोनी की हथेलियों और कलाई के भीतरी हिस्से को सहला गईं। वह स्पर्श एक बुजुर्ग का नहीं, बल्कि एक ऐसे पुरुष का था जिसके पौरुष को सोनी अपनी जांघों के बीच स्थान देने वाली थी।

सरयू सिंह ने धीमी और भारी आवाज़ में कहा, "ईश्वर तोहार मनोकामना पूरा करसु।"

नियति सोनी की जिह्वा पर विराजमान हो गई और सोनी ने भी मुस्कुराते हुए कहा..

“और रऊओ…”

हम सभी को पता है की सरयू सिंह की मनोकामना क्या थी।

उसी रात आखिरकार सुगना ने हिम्मत जुटाई और वह हमेशा की तरह दूध लेकर सरयू सिंह के करीब गई। सुगना दबे पांव सरयू सिंह के कमरे में दाखिल हुई। सरयू सिंह बिस्तर पर बैठे एक पुरानी मैगजीन पलट रहे थे, पर उनका ध्यान कहीं और था।

सरयू सिंह ने उसकी ओर देखा। कभी यह चेहरा उनकी रातों का सुकून हुआ करता था, उनकी प्रेयसी, उनकी अर्द्धांगिनी जैसी। पर आज समय का चक्र ऐसा घूमा था कि वह जान चुके थे कि वह उनकी पुत्री थी।

सुगना ने झिझकते हुए अपनी नज़रें झुकाईं और बेहद भावुक स्वर में बोलना शुरू किया।

सुगना: "बाबूजी, आज एगो अइसन बात मन में बा जेकरा बोझ से हमार छाती फाटत बा। समझ में नईखे आवत कि कैसे कहीं, पर अपना पुराना हक से हमके ई बात कहे के हिम्मत करत बानी। अगर रउआ हमके गलत ना समझीं, त हम कुछ बोलीं?"

सरयू सिंह ने सुगना के चेहरे पर उभरी व्याकुलता को देखा। उन्होंने ममता और पुराने जुड़ाव के वशीभूत होकर सुगना का हाथ अपने मजबूत हाथों में थाम लिया। उनकी आवाज़ में एक अजीब सा ठहराव था।

सरयू सिंह: "अरे पगली! हमरा से कवनो बात करे में तोहरा के चिंता ना करे के चाहीं। तू त हमार जान प्राण हउ। जवन मन में बा, एकदम खुलकर बोल। तोहार हर बात सुने और माने खातिर हम हमेशा तैयार बानी।"

सुगना ने एक लंबी और ठंडी सांस ली। उसकी उंगलियाँ सरयू सिंह की हथेलियों पर थिरकीं, जैसे वह शब्द बटोर रही हो। फिर उसने अपनी नज़रें उठाकर सीधे उनकी आँखों में झाँका।

सुगना: "बाबूजी, ई बात सोनी के विषय में बा... ओकर सूनी गोद के लेके।"

सरयू सिंह - ह आज पूजा त भईले बा कौनो और बात बा का?

सुगना: "बाबूजी, सोनी के हालत अब हमरा से देखल नहीं जात। विकास भैया के शहर वाला डॉक्टर त साफ कह देले बाड़न कि कमी उन्ही में बा। सोनी के जिनगी बिना लइका-बच्चा के एकदम रेगिस्तान हो जाई।"

सरयू सिंह: "शहर के डॉक्टर भी हार मान गइले? बाकिर सुगना, एहमें हमनी का का कर सकत बानी जा? ई त सब नसीब के बात ह। देखऽ, हमनी मंदिर में मन्नत मंगले बानी जा, भगवान कुछ न कुछ जरूर करिहें।"

सुगना: "भगवान ओही के साथ देले जे खुद प्रयास करेला। नसीब बदलल जा सकेला बाबूजी, जइसे रउआ हमार बदलले रहनी।"

सरयू सिंह: "सुगना... उ... उ वक्त अलग रहे। अउर सोनी और तू हमरा खातिर एक जैसन बाड़ू। ई मर्यादा के खिलाफ बा।"

सुगना: "मर्यादा त तब टूटी जब सोनी केहू गैर मरद के पास जाई। रउआ त परिवार के बानी। अइसे भी हमनी के जवन रिश्ता रहल बा, ओकरा हिसाब से त उ राउर साली लागत बिया। का रउआ अपना साली के गोद सूनी रहे देब?

सरयू सिंह सुगना को आश्चर्य से देख रहे थे सचमुच वह ऐसी बात कह रही थी जिस पर यकीन करना संभव नहीं था सरयू सिंह का मुंह खुला का खुला रह गया तभी सुगना ने आगे कहा..

सोनी सूरज के पिता से गर्भधारण करे खातिर पूरा मन से तैयार बिया। उ खुद चाहत बिया कि ओकरा के सूरज जइसन 'तेजस्वी' बेटा मिले लेकिन ओकरा के नइखे मालूम कि सूरज रउरे दिहल ह"

सरयू सिंह: (गहिरा सांस लेत, हिचकिचात ) "बाकिर सुगना, दुनिया का कही? अगर केहू के भनक लग गइल त जियब मुहाल हो जाई। सोनी के मरद अउर परिवार का ई बोझ सह पाई?"

सुगना: "दुनिया के फिकर छोड़ि बाबूजी। दुनिया त तबो थू-थू करी जब सोनी बांझ कहलाई। ई राज रउआ, हमरा बीच ही रही सोनी के भी ना मालूम चली। विकास भैया के त बस अपना खानदान के वारिस से मतलब बा, उ काहे केहू से कुछ कहे जइहें?"

सरयू सिंह: "तबो... ई मन गवाही नहीं देत बा। धरम-करम के का होई? ई कवन रीति ह?"

सुगना: (थोड़ा अउर नजदीक जाके) "कवनो मेहरारू के गोद भरल सबसे बड़ धरम ह। रउआ त ओकर उजड़ल बगिया हरियर करे के पुन्य कमायब। देखब, जब लइका के किलकारी गूँजी, त ई सब डर अउर मर्यादा धरल रह जाई। सोनी बड़ा उम्मीद लगवले बिया, का रउआ ओकरा के अइसहीं तड़पत छोड़ देब?"

सरयू सिंह: "अगर सोनी के ईहे मंजूर बा... त हमरा के सोचल पड़ी। बाकिर याद रखिहऽ सुगना, ई बात केहू से मत कहीह।"

सरयू सिंह ने एक गहरी सांस ली। उनके मन में लड्डू फूट रहे थे—सोनी की वह कसी हुई देह, उसकी मादक मुस्कान। गुलाबी साड़ी में उसकी लचकती काया…

सुगना - ना कभी ना …..सुगना ने उन्हें आश्वस्त करते हुए कहा।

पर इ संभव कैसे होई? सरयू सिंह सोच में पड़ गए।

घर में सबसे समझदार आप ही बानी। कोनो उपाय लगा कर सोनी के जीवन में खुशियां भर दी।

सुगना ने अपनी भावनात्मक बातों से सरयू सिंह को लगभग तैयार कर लिया।

अच्छा अभी तू जा हम सोच के बताइब।

अगली सुबह की ताजी धूप जब आंगन में बिखरी, तो सरयू सिंह के चेहरे पर एक गजब की गंभीरता थी। उन्होंने सुगना को अपने पास बुलाया और अपनी रजामंदी देते हुए वे शर्तें रखीं जो इस 'गुप्त अनुष्ठान' की नींव बनने वाली थीं।

सरयू सिंह ने सुगना की आँखों में आँखें डालकर धीमी मगर वजनदार आवाज़ में कहा:

"सुगना, हम तैयार बानी। कुल के दीपक खातिर अउर सोनी के अँधियार जिनगी में अंजोर (उजाला) लावे खातिर हम ई कदम उठावे के राजी बानी। पर एक बात गाँठ बाँध लऽ, सोनी के ई रत्ती भर भी पता ना चले के चाहीं कि ओकर कोख सिंचित करे वाला 'पुरुष' कवन बा। ऊ ई जाने कि ई कवनो दैवीय विधान बा, कवनो अनजान 'अंश' बा। मर्यादा के ई पर्दा कबो हटे के ना चाहीं।"

सुगना ने राहत की सांस ली और बाबूजी के अनुशासन को सर आँखों पर रखा। और उन्हें आश्वस्त करते हुए कहा।

बिल्कुल ऐसे ही कइल जाई सोनी के पता न चली..

सुगना प्रसन्न हो गई…उसने जो प्लान किया था वह घटित हो रहा था सरयू सिंह पूरी तरह तैयार हो चुके थे और सोनी को वह पहले ही रजामंद कर चुकी थी अब इस मिलन का इंतजाम करना बाकी था.

सुनहरी धूप फर्श पर मखमली कालीन बिछा रही थी, सुगना और सोनी एक-दूसरे के बेहद करीब बैठी थीं। कमरे में लोबान की भीनी-भीनी खुशबू तैर रही थी। सुगना ने सोनी का कोमल हाथ अपनी हथेलियों में लिया। उसकी आँखों में एक ऐसी गंभीरता थी जो केवल बड़े संकल्पों में दिखाई देती है।

सुगना ने बातचीत की कमान संभालते हुए विषय को बहुत ही सलीके और गहराई से छेड़ना शुरू किया।

सुगना: (सोनी का हाथ थाम के, फुसफुसा के) "देखऽ सोनी, ई दुनिया के रीति-रिवाज त बांझ कह के तोके मार डालिहें। बाकिर एगो रस्ता बा, जवना से तोहार सूनी गोद हरियर हो सकेला।"

सोनी: (आसा भरी नजरों से) "का कहत बाड़ू दीदी? डॉक्टर त मना कर देले बाड़न, अब कवन रस्ता बचल बा?"

सुगना: "शहर के डॉक्टर फेल हो सकले बाड़न, बाकिर ओकर चमत्कार फेल ना होई। नगर के बाहर एगो 'दिव्य महात्मा' अइले बाड़न। उ कवनो साधारण पुरुष ना हउवन, साक्षात देव-अंश हउवन। कई गो अइसन मेहरारू, जेकर उम्मीद टूट गइल रहे, आज उनकर कृपा से लइका खिलावत बाड़ी।"

सोनी: (हिचकिचाते हुए) "महात्मा? बाकिर दीदी, उ कइसे कृपा करिहें? का कवनो जड़ी-बूटी दिहें?"

सुगना: (गंभीर होके) "ना सोनी, बात समझे के कोशिश करऽ। उ अपना तपोबल अउर शरीर के शक्ति से तोहार कोख भरिहें। तोके उनके साथे एकांत में समय बितावे के पड़ी, उनके सानिध्य में संभोग करे के पड़ी। उ तोहार देह अपवित्र ना, बल्कि धन्य कर दिहें।"

सोनी: (कांपत आवाज में) "ई का कहत बाड़ू दीदी? केहू पर-पुरुष के साथे? हमार धरम-करम... अउर विकास का सोचिहें?"

सुगना: "अरे पगली! विकास के त पता भी ना चली। अउर रहल बात धरम के, त बांझ रहल सबसे बड़ पाप ह। उ महात्मा हउवन, उनकर स्पर्श में अमृत बा। जइसे उनकर तेज बा, ओइसहीं तोके 'तेजस्वी' बेटा मिली। ई कवनो पाप ना, एगो साधना ह। का तू अपना अंचरा में लइका के किलकारी ना सुनल चाहत बाड़ू?"

सोनी: (नजरे नीची करते हुए) "चाहत त बानी दीदी... बाकिर बहुत डर लागत बा। का उ सच में हमार गोद भर दिहें?"

सुगना: "हमार भरोसा करऽ। हम खुद उनकरा बारे में सब जान के ही तोसे कहत बानी। बस एक बार हिम्मत करऽ, तोहार पूरा जिनगी स्वर्ग हो जाई।"

सोनी किम कर्तव्यविमूढ़ होकर सुगना को देख रही थी।

सुगना: "सोनी, ई कवनो खेल नईखे, ई तोहर साधना के फल पावे के बेरा बा। हम सब तैयारी क लेले बानी। सलेमपुर वाली हवेली में हमार जवन कमरा बा, उहवाँ ई 'गुप्त अनुष्ठान' संपन्न होई। उहवाँ सिर्फ तू रहबू, हम रहब, अउर ऊ 'शक्ति' रही जे तोहार जीवन बदले आवत बा।"

सोनी की धड़कनें तेज हो गईं। उसने सुगना की आँखों में झाँकते हुए धीरे से पूछा, "दीदी, एक बार त बता दऽ कि ऊ पुरुष हवें कवन? हमार मन बार-बार इहे पूछत बा।"

सुगना: (दृढ़ता के साथ) "ना सोनी! ई सवाल फिर मत करबू। हम वादा कइले बानी कि पहचान गुप्त रही। बस एतना जान लऽ कि तोहरी कोख में जवन बीज पड़ी, ऊ 'सूरज' जइसन तेजस्वी ना सही, त ओकरा से कम भी ना होई। ई हमार अनुमान ना, विश्वास बा। बस जइसे हम कहत बानी, ओही मर्यादा के पालन तोके करे के पड़ी।"

सुगना ने सोनी को पास खींचते हुए बहुत ही धीमी और मादक आवाज़ में उस 'अनुष्ठान' की विधि समझानी शुरू की, जिसमें कामुकता और नियम दोनों का अद्भुत संगम था।

सुगना: "सोनी, उस दिन तोके पूरी तरह सज-धज के, अपन पूर्ण सुंदरता के साथ तैयार होखे के होई। भले ऊ पुरुष तोहार चेहरा ना देखी, पर तोहार सौंदर्य ओकरा 'वेग' के जगावे खातिर ज़रूरी बा। बिस्तर पर तोके अपनी घुटनों के बल बइठ के, शरीर के आगे की ओर झुका लेवे के होई, जइसे कवनो समर्पित हिरणी होखे। तोहार नितंब बाहर की तरफ उभरे के चाहीं... आज के लोग एकरा के कुछ और कहेले (डॉगी स्टाइल)', पर हमनी खातिर ई वंश-वृद्धि के मुद्रा बा।"

सोनी ने लज्जा से अपनी पलकें झुका लीं, पर सुगना की बातों ने उसके भीतर एक मीठी अगन जगा दी थी।

सुगना: "ऊ महात्मा साक्षात दिव्य तेज लेके अईहें। ऊ तोहार वस्त्र ना उतरिहें, तोहार मर्यादा भंग ना होई। ऊ पीछे से अईहें, बस तोहार लहंगा ऊपर उठईहें अउर पीछे से ही तोहरे भीतर प्रवेश करिहें। न तू उनका के देखबू, न ऊ तोहार कवनो अउर अंग देखीहे। ऊ अपना 'बीज' तोहरे भीतर डालीहें अउर चुपचाप निकल जइहें। बस तोके धैर्य रखे के होई।"

सुगना ने सोनी की ठुड्डी उठाकर उसे अपनी ओर देखने पर मजबूर किया। उसकी आवाज़ अब और भी गंभीर हो गई थी।

सुगना: "एक बात याद रखबू सोनी, ऊ बहुत तेजस्वी पुरुष हवें। जब ऊ तोहरे भीतर अपना पौरुष स्थापित करिहें, त ओकर वेग प्रचंड होई। तोहार बदन थरथराई, मन विचलित होई, पर तोके बिना आवाज़ कइले उस 'आशीर्वाद' के झेल लेवे के बा। कामुकता अउर उत्तेजना के बिना ई मिलन संभव नईखे, एहसे तोहार मन अउर देह—दोनों के समर्पित होखे के पड़ी। मर्यादा इहे बा कि तू ऊ पट्टी ना खोलबू अउर पहचान ना पूछबू।"

सोनी के मन में सरयू सिंह के उस 'वज्र' जैसे पौरुष की छवि कौंध गई, जिसकी उसने कल्पना की थी। सुगना की बातों ने उसके भीतर एक ऐसा रोमांच भर दिया था कि वह उस 'अज्ञात' के प्रचंड प्रहार को सहने के लिए मानसिक रूप से व्याकुल हो उठी। उसे लगा कि वह लहंगा ऊपर उठाना और उस अदृश्य पुरुष का उसके भीतर समा जाना ही उसकी नियति का सबसे बड़ा सच होने वाला है।

सुगना ने सोनी को गले लगा लिया। सोनी का तपता हुआ शरीर गवाही दे रहा था कि वह उस 'दिव्य महात्मा' के प्रचंड वेग को झेलने के लिए पूरी तरह तैयार है।

बिसात बिछ चुकी थी….

शेष अगले भाग में
 
आप सभी के प्रतिक्रियाओं के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद का कई सारे पुरानेपाठक दिखाई पड़े और कुछनए पाठक भी कहानी सेजुड़े।

जिन पाठकों ने 163 पर अपनीप्रतिक्रिया दी थी उन्हें और जिन्होंने 164 की मांग रखी थी उन्हें भी यह अपडेट भेजा जा चुका है यदि किसी का नाम गलती से छूट गया हो तो कृपया मुझे याद दिला कर अनुग्रहित करें आप सबका जुड़ाव और कहानी के प्रति आपके कॉमेंट्स ही इस कहानी की जान और शान है जुड़े रहिए और लगातार मार्गदर्शित करते रहिए
 
अब हर अपडेट पर आपसे कुछ सुनना चाहूंगा..

अपडेट भेज दिया गया है।

कुछ लिखिएगा जरूर नहीं तो सोने की एक सुंदर सी तस्वीर भेजिएगा अपने कल्पनाओ की
 
भाग 166

सोनी के मन में सरयू सिंह के उस 'वज्र' जैसे पौरुष की छवि कौंध गई, जिसकी उसने कल्पना की थी। सुगना की बातों ने उसके भीतर एक ऐसा रोमांच भर दिया था कि वह उस 'अज्ञात' के प्रचंड प्रहार को सहने के लिए मानसिक रूप से व्याकुल हो उठी। उसे लगा कि वह लहंगा ऊपर उठाना और उस अदृश्य पुरुष का उसके भीतर समा जाना ही उसकी नियति का सबसे बड़ा सच होने वाला है।

सुगना ने सोनी को गले लगा लिया। सोनी का तपता हुआ शरीर गवाही दे रहा था कि वह उस 'दिव्य महात्मा' के प्रचंड वेग को झेलने के लिए पूरी तरह तैयार है।



बिसात बिछ चुकी थी….

अब आगे…

सुगना ने अगले दिन सरयू सिंह के सामने मिलन की रूपरेखा रखी, तो उसने एक और पासा फेंका। वह जानती थी कि सरयू सिंह को औरतों के श्रृंगार और पहनावे में कितनी रुचि है।

"बाबूजी, एगो बात मन में रहे," सुगना ने उन्हें चाय देते हुए कहा, " वह दिन पूजा पाठ करके ई ऊ सब काम कईल जाई। सोनी के उस दिन हमारा बहुत सजावे सवारे के मन बा। ऊ दिन ओकरा जीवन के सबसे महत्वपूर्ण दिन होके के चाहि।

सरयू सिंह बेहद ध्यान से सुगना की बातें सुन रहे थे.. और बेहद गंभीरता के साथ बोले” बात तो सही कहत बाडू…”

सुगना ने आगे कहा …सलेमपुर में जब हमार कोठरी में मिलन होई , त उ कवनो साधारण मेहरारू ना, बल्कि साक्षात रति लागे के चाहीं। रउआ से बढ़िया औरतन के कपड़ा के पहचान केकरा बा? शहर जाईं त अपना हाथ से ओकरा खातिर एगो गुलाबी लहंगा-चोली ले ले आईब। जवन रउआ पसंद कर देब, ओकरा से सुंदर कुछ हो ही ना सकेला।"

सरयू सिंह की आँखों में एक चमक आ गई। सुगना ने उनकी पुरानी रग छेड़ दी थी। अपनी मूँछों पर ताव देते हुए उन्होंने हामी भर दी।

शाम को सरयू सिंह बनारस के सबसे नामी और पुराने 'वस्त्र भंडार' के सामने खड़े थे। दुकान का मालिक, खन्ना जी, उन्हें देखते ही गद्दी से उठ खड़े हुए।

"अरे सरयू बाबू! बड़े दिनों बाद पधारे। आज सलेमपुर की सरकार को क्या सेवा चाहिए?" खन्ना जी ने हाथ जोड़कर पूछा।

सरयू सिंह ने अपनी तशरीफ टिकाई और गंभीर स्वर में बोले, "खन्ना जी, बिटिया खातिर एगो बहुत खास उपहार खरीदे के बा। एगो अइसन गुलाबी लहंगा दिखावऽ जवना के चमक के आगे गुलाब भी फीका पड़ जाय।"

सरयू सिंह ने यह संबोधन बड़ी सोच समझकर किया था शायद अपनी गरिमा के अनुरूप और अपने कामुकता पर आवरण डालने के लिए।

खन्ना जी ने मुस्कुराते हुए अपने सबसे कुशल कारीगर को बुलाया। "सुना आपने? बाबूजी को उनकी लाडली बिटिया के लिए सर्वश्रेष्ठ लहंगा चाहिए। निकालो वो रानी गुलाबी शिफॉन और नेट वाला पीस।"

जब सेल्समैन ने मखमली मेज पर वह गुलाबी शिफॉन का लहंगा फैलाया, तो सरयू सिंह की अनुभवी आँखें उसे ताकने लगीं। कपड़े की महीन बनावट और उस पर हुआ सुनहरी गोटे का काम देख कर उनके मन में सोनी का गदराया हुआ बदन कौंध गया।

सरयू सिंह उस लहंगे के पैकेट के ऊपर लगी उस सुंदरी की तस्वीर को देख रहे थे जिसने यह गुलाबी लहंगे को इसके प्रचार के लिए पहन कर दिखाया हुआ था। उसे लहंगे में उसे सुंदरी का गोरा चिकन पेट और जांघों का कटाव स्पष्ट दिखाई पड़ रहा था सरयू सिंह उस स्त्री की जगह सोनी की कल्पना करने लगे।

खन्ना जी बोले, "बाबूजी, आप फिकर न करें। ये एकदम नया डिजाइन है। पारदर्शी दुपट्टा और खुबसूरत चोली... आपकी बिटिया इसमें बिल्कुल अप्सरा लगेंगी।"

'बिटिया' शब्द सुनकर सरयू सिंह के मन में एक अजीब सी गुदगुदी हुई। वे जानते थे कि जिसे दुनिया 'बिटिया' के लिए उपहार समझ रही है, उसे वे खुद अपने हाथों से सलेमपुर की उस कोठरी में खोलने वाले है।

लहंगे के रेशमी कपड़े को छूते समय सरयू सिंह की उंगलियाँ सिहर उठीं। उन्होंने कल्पना की कि जब सोनी इस तंग गुलाबी चोली में उनके सामने घुटनों के बल झुकेगी, तो उसकी पीठ की ढलान और कमर का वह गहरा मोड़ इस रेशम के नीचे से कैसा कहर ढाएगा।

सरयू सिंह (मन में): "ई गुलाबी रंग जब ओकरा गोरे बदन पर चढ़ी, त कयामत आ जाई। अउर जब हम अपना हाथ से ई लहंगा ऊपर उठा के ओकर पुष्ट जाँघ देखब... विधाता! ई लहंगा ओकर जवानी के ढँके खातिर नईखे, बल्कि हमार प्यास बढ़ावे खातिर बा।"

यह कल्पना मात्र ही उनके पौरुष में तनाव पैदा कर रही थी। दुकान के भीतर ही धोती के नीचे छिपे उनके 'वज्र' ने अपनी उपस्थिति दर्ज करानी शुरू कर दी थी। उन्होंने झटपट भुगतान किया और पैकेट हाथ में लेते हुए उन्हें ऐसा महसूस हुआ जैसे उन्होंने सोनी की नग्न देह को ही अपनी बाहों मे दबा लिया हो।

हवेली पहुँचते ही उन्होंने वह पैकेट सुगना के हाथों में थमा दिया। उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक और चेहरे पर दबी हुई मुस्कान थी।

"ले... तोहार पसंद के सामान आ गइल," सरयू सिंह ने भारी आवाज में कहा।

लहंगे का रंग और उसे लहंगे में सोने की कल्पना कर सुगना मुस्कुराई और सरयू सिंह की तरफ देखा।

सरयू सिंह सुगना से नजरे मिलाने में कतरा रहे थे।

सुगना ने पैकेट खोला और गुलाबी शिफॉन की उस मादकता को देखकर मुस्कुरा दी। वह समझ गई कि शिकारी अब पूरी तरह जाल में है और वह खुद उस हिरनी का श्रृंगार करने और उसे खा जाने के लिए बेताब है।

सुगना ने सरयू सिंह के जन्मदिन के अवसर को इस 'गुप्त मिलन' के लिए चुना। उसने तय किया कि सोनी की कोख को सींचने का यह अनुष्ठान उसी पुरानी कोठरी में होगा, जहाँ उसने स्वयं पहली बार सरयू सिंह के पौरुष का स्वाद चखा था।

योजना के अनुसार, सुगना और सोनी सुबह-सुबह ही सलेमपुर पहुँच गईं। कोठरी को साफ किया गया, चमेली के फूलों से महकाया गया और परदों से दोपहर की रोशनी को कैद करने की नाकाम कोशिश की गई। सुगना ने सोनी को बताया था कि दोपहर में 'महात्मा जी' का आगमन होगा, जो गुप्त रूप से अपनी दैवीय शक्ति उसे प्रदान करेंगे।

सुगना के निर्देश पर सोनी रसोई में महात्मा जी के लिए भोजन तैयार कर रही थी। विशेष रूप से मालपुआ बनाया जा रहा था, क्योंकि सुगना जानती थी कि यह सरयू सिंह का सबसे प्रिय व्यंजन है। सरयू सिंह अक्सर मालपुए की तुलना स्त्री की योनि से किया करते थे—एक ऐसी तुलना जो उनकी कामुक सोच का चरम थी।

सरयू सिंह का मानना था कि मालपुआ और योनि, दोनों की प्रकृति एक जैसी होती है। मालपुआ जितना घी और चाशनी में सराबोर होता है, उतना ही वह कोमल और रसभरा हो जाता है। वे कहते थे कि जिस तरह एक उत्तेजित स्त्री की योनि स्पर्श मात्र से रसीली और चिकनी हो जाती है, मालपुआ भी उसी तरह अपनी मिठास छोड़ता है। मालपुए का वह घेरा, जो किनारों से थोड़ा कुरकुरा और बीच से एकदम मुलायम और मांसल होता है, उन्हें योनि के कोमल होंठों की याद दिलाता था। वे अक्सर कहते थे:

"मालपुआ अउर मेहरारू के योनि में कवनो फर्क नइखे। जइसे-जइसे तू एकरा के मुँह में ले के चूसबू, ई अउर रस छोड़त जाई। ई त ओही रसीली कोमलता के स्वाद ह, जवन आदमी के रोम-रोम जगा देला।"

सोनी जब मालपुए तल रही थी, तो उसकी अपनी देह की गर्मी उस आंच के साथ मिल रही थी। वह बेखबर थी कि वह जिसके लिए यह प्रसाद बना रही है, वह उसकी योनि के रस का पान करने के लिए कितना आतुर है।

निर्धारित समय पर सरयू सिंह पधार चुके थे। सुगना ने उन्हें अपनी कोठरी में विश्राम करने को कहा और स्वयं सोनी को तैयार करने के लिए आंगन में आ गई।

सुगना ने जब सोनी को उस गुलाबी शिफॉन के लहंगे और कसी हुई चोली में सजाया, तो वह साक्षात स्वर्ग से उतरी अप्सरा लग रही थी। चोली की सिलाई इतनी बारीक और चुस्त थी कि सोनी के पुष्ट उरोजों का उभार और उनके बीच की वह गहरी घाटी, लहंगे के सुनहरे गोटे के साथ मिलकर एक अद्भुत दृश्य रच रही थी। सुगना ने सोनी की आँखों पर रेशमी काली पट्टी बाँधी, जिससे उसका गोरा चेहरा और भी मादक और रहस्यमयी हो उठा।

"दीदी, महात्मा जी के पास जाए में लाज लागत बा..." सोनी ने कांपती आवाज़ में कहा।

सुगना ने उसे थामते हुए कोठरी के भीतर प्रवेश कराया। सरयू सिंह पलंग पर विराजमान थे। जैसे ही सोनी ने चौखट लांघी, सरयू सिंह की अनुभवी आँखें फटी की फटी रह गईं। पट्टी बँधी होने के कारण सोनी का ध्यान अपने डगमगाते कदमों पर था, जिससे उसकी पतली कमर की लचक और चोली के भीतर कैद उसके यौवन का 'कसाव' हर कदम पर एक नई कहानी लिख रहा था।

सोनी ने झुककर भोजन की थाली सरयू सिंह के सम्मुख रखी। उस झुकाव के साथ ही चोली के भीतर से झाँकती उसकी दुग्ध-धवल देह और गहरी नाभि का वह दृश्य सरयू सिंह के मस्तिष्क में बिजली की तरह कौंध गया। उन्होंने अपनी दृष्टि नीची कर ली, पर उनके भीतर वासना का एक ज्वार उठ चुका था।

थाली रखने के बाद सुगना के दिए गए निर्देशानुसार उसने महात्मा जी को उसी अवस्था में झुके झुके ही प्रणाम किया सरयू सिंह ने अपने हाथ सोने के सर पर रखकर उसे आशीर्वाद दिया। न जाने सोनी को ऐसा क्यों लगा कि यह हाथ जाना पहचाना है परंतु शक गुंजाइश नहीं थी।

सोनी धीरे-धीरे पीछे मुड़ी और सधे हुए कदमों से बाहर निकल गई।

सुगना ने चुपचाप पंखा झलना शुरू किया। सरयू सिंह ने थाली में से एक रसीला मालपुआ उठाया। वह घी में तरबतर, किनारों से कुरकुरा और बीच से एकदम मांसल और कोमल था। सरयू सिंह ने उसे अपनी नासिका के पास लाकर उसकी सोंधी महक महसूस की।

सरयू सिंह (अत्यंत भावुक स्वर में): "सुगना, ई भोजन ना ह, ई त कवनो साधना के प्रसाद लागता के बनवले बा?

सुगना ने विनम्रता से कहा, "बाबूजी, सोनी बिहान से ही चूल्हा के आंच सह के ई मालपुआ तैयार कइले बिया। ओकर श्रद्धा अउर ओकर देह के तपिश, दोनों एह प्रसाद में उतर गइल बा।"

सरयू सिंह ने अत्यंत तृप्ति के साथ भोजन समाप्त किया। मालपुए की मिठास ने उनके भीतर एक आदिम भूख जगा दी थी।

भोजन के पश्चात सुगना पात्र समेटकर बाहर चली गई ताकि सरयू सिंह थोड़ा विश्राम कर सकें। जैसे ही द्वार बंद हुआ, सरयू सिंह ने अपनी धोती की गाँठ से एक छोटी सी पुड़िया निकाली। इसमें शहर के मशहूर वैद्य जी से खरीदी हुई शिलाजीत की गोलियाँ थीं।

उन्होंने एक गोली हथेली पर रखी, फिर रुक गए। उनकी आँखों के सामने अभी भी गुलाबी लहंगे में लिपटी सोनी की वह कसी हुई काया और उसके पुष्ट अंगों का उभार नाच रहा था। उन्हें लगा कि वर्षों बाद यह एकमात्र अवसर मिला है, और वे इसमें कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते थे।

सरयू सिंह (मन में): "आज के मिलन साधारण ना होई। विधाता हमके ई 'रति' सौंपले बाड़न, त हमके भी अपना पौरुष के चरम देखावे के पड़ी”

उन्होंने बिना हिचकिचाए शिलाजीत की दो गोलियां एक साथ गले से नीचे उतार लीं। कुछ ही क्षणों में शिलाजीत का ताप उनके रक्त में घुलने लगा। उनके रोम-रोम में एक नई ऊर्जा और पौरुष का ऐसा तनाव पैदा होने लगा जो मर्यादा की हर ज़ंजीर को तोड़ने के लिए पर्याप्त था।

बाहर आँगन में सोनी अनभिज्ञ थी कि भीतर एक 'शिकारी' अपनी शक्ति को चरम पर पहुँचा चुका है, और कुछ ही देर में वह 'अनुष्ठान' शुरू होने वाला है जिसका इंतज़ार सलेमपुर की ये दीवारें भी बेसब्री से कर रही थीं।

सुगना ने बड़ी कुशलता से सोनी को बिस्तर के ठीक बीचों-बीच उस विशेष मुद्रा में स्थापित कर दिया था। सोनी 'डॉगी स्टाइल' में अपने घुटनों और हथेलियों के बल झुकी हुई थी, उसकी आँखों पर बंधी काली रेशमी पट्टी ने उसे बाहरी दुनिया से पूरी तरह काट दिया था। उसकी कमर का गहरा ढलान उसके भारी और गदराए हुए नितंबों को पीछे की ओर किसी चुनौती की तरह उभार रहा था। सोनी भी अब इस मिलन का बेसब्री से इंतजार कर रही थी। उसे अपनी बहन सुगना पर पूरा विश्वास था। इस अद्भुत मिलन कि आस में उसकी बुर पनिया गई थी।

गुलाबी घाघरा सोनी की जांघों के पास थोड़ा सिमटा हुआ था, और जांघों के जोड़ों से उठती इत्र की तीव्र खुशबू पूरे कमरे में मदहोशी फैला रही थी। सोनी का पूरा बदन अनजाने डर और एक अजीब सी उत्तेजना से थरथरा रहा था—वह उस 'दिव्य अंश' को ग्रहण करने के लिए पूरी तरह आतुर थी।

सुगना बाहर गई और सरयू सिंह की कोठरी में जाकर उन्हें आमंत्रित किया।

सरयू सिंह जब सुहाना के कमरे की दहलीज पर पहुँचे, तो सामने का दृश्य देखकर उनका कलेजा मुँह को आ गया। अपनी 'ख्वाबों की परी' को इस समर्पित अवस्था में देखकर उनके पौरुष में एक ऐसी कशिश उठी जो मर्यादा की हर दीवार को ढहा देने के लिए काफी थी।

सुगना ने सरयू सिंह को कमरे के भीतर किया और धीरे से बाहर निकलते-निकलते उसने सरयू सिंह की आँखों में झाँका और बेहद प्यार भरे, दबे स्वर में भोजपुरी में हिदायत दी:

सुगना: "बाबूजी, तनी धीरे से... अभी भी सुकुवार लइका बिया, ख्याल राखब। हम बाहरे बानी।"

किवाड़ बंद होते ही कमरे के भीतर एक भारी सन्नाटा पसर गया, जिसमें केवल दो ध्वनियाँ गूँज रही थीं—एक सोनी की उखड़ती हुई सांसें और दूसरा सरयू सिंह के भीतर धड़कता हुआ उनका मदमत्त पौरुष।

सरयू सिंह ने जैसे ही अपनी धोती की गाँठ खोली, उनका 'वज्र' किसी म्यान से निकली तलवार की तरह झटके के साथ आज़ाद हो गया। शिलाजीत की दोहरी खुराक और सामने सजी-धजी सोनी की उस 'समर्पित मुद्रा' ने उनके रक्त में जैसे आग लगा दी थी। उन्होंने गर्व से नीचे झुककर अपने उस अंग को निहारा, जो आज अपनी पूरी लंबाई और मोटाई के साथ तना हुआ था।

उनका लिंग महज़ मांस का टुकड़ा नहीं, बल्कि वर्षों की संचित वासना और आज की उत्तेजना का एक जीवंत प्रमाण लग रहा था। गहरा कत्थई रंग, जिस पर उभरी हुई नीली नसें किसी पर्वत पर बहती हुई धाराओं की तरह साफ़ दिखाई दे रही थीं। अग्रभाग (सुपारी) उत्तेजना के मारे गहरा लाल और चिकना हो चुका था, जिससे काम-रस की एक छोटी सी बूंद रिसकर उसे और भी चमकीला बना रही थी। उसकी कठोरता ऐसी थी कि जैसे उसे छूने पर उंगलियाँ सिहर जाएँ। सरयू सिंह को महसूस हुआ कि आज उनका यह 'अस्त्र' सलेमपुर की उस पुरानी कोठरी में एक नया इतिहास लिखने के लिए व्याकुल है।

पलंग के बीचों-बीच 'डॉगी स्टाइल' में झुकी हुई सोनी को देखकर सरयू सिंह की आँखों में एक शिकारी जैसी चमक आ गई। गुलाबी शिफॉन का वह लहंगा जिसे वे खुद बनारस से चुनकर लाए थे, अब सोनी के उभरे हुए नितंबों पर किसी रेशमी चादर की तरह फैला हुआ था। चोली की कसी हुई डोरियों के बीच से झाँकती उसकी गोरी पीठ की ढलान और कमर का वह गहरा मोड़ उनके भीतर की रही-सही मर्यादा को भी भस्म कर रहा था।

सरयू सिंह के मन में विचारों का एक बवंडर उठ खड़ा हुआ:

"विधाता! ई कवनो हाड़-मांस के पुतली नईखे, ई त साक्षात रति हवे। जवना देह के हम सपना देखत रहनी, आज ऊ हमरा सोझा एह तरह झुकल बिया कि जइसे कवनो बलिदानी वेदी पर आहुति देवे के इंतज़ार करत होखे।"

उन्हें रह-रहकर उस गुलाबी दुपट्टे और पारदर्शी चोली के भीतर कैद सोनी के यौवन पर प्यार और वासना का मिला-जुला अहसास हो रहा था। उन्हें अपनी पसंद पर नाज़ हो रहा था—वही गुलाबी रंग, वही शिफॉन की छुअन, और वही सलेमपुर की गंध।

सरयू सिंह अपने मजबूत और भारी कदमों से सोनी की तरफ बढ़े, कदमों की धाप न सिर्फ कोठरी में बल्कि सोनी के कलेजे में भी हलचल पैदा कर रही थी। सोनी की आँखों पर बँधी पट्टी ने उसे लौकिक रूप से अनजान रखा था कि 'महात्मा जी' अब उसके बिल्कुल करीब हैं, लेकिन उनके कदमों की थाप और उसकी घटती दूरी और अब भारी और गर्म सांसें अब सोनी को अपने पास महसूस होने लगी थीं। सरयू सिंह ने अपनी थरथराती उंगलियों से उस गुलाबी लहंगे के घेरे को छुआ सोनी सिहर उठी। उन्होंने उसे धीरे से ऊपर उठाना शुरू किया।

जैसे-जैसे कपड़ा ऊपर सरक रहा था, सोनी की दूध जैसी सफेद जाँघें और उनके बीच का वह प्रतिबंधित द्वार उजागर होने लगा। इत्र और शरीर की स्वाभाविक गंध ने सरयू सिंह के दिमाग को सुन्न कर दिया।

उन्होंने अपने वज्र को अपने हाथ में थामा और उसकी कठोरता को महसूस करते हुए मन ही मन बोले:

"आज ई वज्र जब एह गुलाबी कली के भीतर जाई, त बंजर कोख धन्य हो जाई। सोनी हमार रानी , तू जानत नईखू कि तोहार ई सजल देह आज कवन प्रलय ले आवे वाला बा।"

शिलाजीत का ताप अब उनके संयम की अंतिम डोर को भी काट चुका था।

उन्होंने एक हाथ सोनी की पतली कमर पर रखा। स्पर्श होते ही सोनी का शरीर बिजली के झटके की तरह काँप उठा, उसका रौवा रोवा खड़ा हो गया। सरयू सिंह ने यह महसूस किया और अपना चेहरा उसके नितंबों के करीब ले आये…

सोनी की रेशमी बुर अपने अघ खुले होंठों पर वासना की मीठी लार लिए उनका इंतजार कर रही थी

शेष अगले भाग में…
 
साथियों अगला अपडेट जो एक कामुक अपडेट है जो अब तैयार है।

आप सब से अनुरोध है गुलाबी लहंगे और चोली में या साड़ी में , मिलन के लिए आतुर नग्न या अर्धनग्न सोनी की तस्वीर साझा करें। आपकी तस्वीर आते ही मै आपको यह विशेष अपडेट भेज दूंगा..

मुझे इंतजार रहेगा...आशा है आप मुझे गलत नहीं समझेंगे
 
वेलकम बैक

अपडेट 164 सेंत

फॉर 167प्लीज शेयर पिक्स ऑफ़ सोनी ऑफ़ योर इमेजिनेशन
 
डिअर फ्रेंड्स के फॉरवर्ड दोनोट शाय...

वे आल अरे हेरे फॉर एंटरटेनिंग एच इतर...
 
साथियों आपको जानकारी देना चाहूंगा की अपडेट नंबर 164 पब्लिकली पोस्ट कर दिया गया है जो पेज नंबर 916 पर उपलब्ध है.

आप सब की सक्रिय भागीदारी ही इस कहानी की जान है और यही इस कहानी को आगे बढ़ाएगी या बीच में रोक देगी...

आप सबके लवली कमेंट्स पढ़ कर मुझे

मुझे एपिसोड लिखने में आनंद आ रहा है और यही

लवली आनंद का अस्तित्व है।

मुझे उम्मीद है कि यदि आपको कहानी पसंद आ रही होगी तो आप निश्चित ही हिम्मत जताकर कहानी के पटल पर रहेंगे और अपनी प्रतिक्रियाओं के माध्यम से इस कहानी को आगे बढ़ाने में अपना योगदान देंगे।

अपडेट नंबर 167 को प्राप्त करने के लिए अपने दिमाग दिमाग मेंचल रही दिमाग में चल रही सोनी की एक पिक्चर साझा करें यह मेरा निर्देश नहीं आग्रह है।।

अब तक जिन लोगों ने पिक्चर्स साझा की है उन्हें अपडेट 167 भेजा जा चुका है।
 
भाग 168

सरयू सिंह की तेजी से हिलती हुई कमर और सोनी की हालत देखकर सुगना से रहा नहीं गया उसने खिड़की से ही पुकारा

बाबूजी…. तनी धीरे से ….सुगना के मुंह से यह वाक्य सुनते ही सरयू सिंह ने सुगना की तरफ देखा.. सुगना को उनकी आंखों में वही पुरानी वासना दिखाई पड़ी जिसका आनंद वह अब तक लेती आई थी। उसे अफसोस हुआ उसने यह आखिरकार क्यों बोला। वो खिड़की पर से हट गई पर अब देर हो चुकी थी सुगना की यह कामुक कराह सरयू सिंह के तन बदन में आग लगा गई वो अपनी वासना के चरम पर पहुंच गए। उनका बदन ऐंठने लगा…

नियति साँसे रोके विधाता की लिखी किताब के पन्ने पलटने लगी।

अब आगे..

यह कामुक उदगार सुगना के मुंह से मंदिर में बज रही घंटियों की भांति सरयू सिंह के कानों में बजने लगा। अतीत में न जाने उन्होंने सुगना के मुख से यह कामुक कर कितनी बार सुनी थी और हर बार पूरे तन मन से सुगना और अपनी कामवासना को शांत किया था।


उन्होंने अपने लंड को पूरी तरह सोनी को सुगना मानकर उसके गर्भ में उतार दिया सोनी को ऐसा लगा जैसे उसका पेट ऊपर की तरफ चढ़ गया। सोनी को सांस लेने में भी दिक्कत हो रही थी सरयू सिंह ने अपना लंड पीछे किया पर शायद खुद को संभाल नहीं पाए उनके मुख से एक आह ….निकली.. जो कामुक कतई नहीं थी।

वीर्य की पहली धार भी निकलने को तैयार थी परंतु …

नियति ने सरयू सिंह को उनके किए की सजा देने की ठान ली….

सरयू सिंह का लंड अचानक ही सोनी की बुर से बाहर आ गया…


वीर्य की पहली धार बाहर आई परंतु सोनी की प्यासी बुर की जगह वह उसके पेट उसकी चूचियों और चेहरे पर गिरी। अगले ही पल और सरयू सिंह एक कटी हुई लाश की तरह अचानक पीछे की तरफ गिर गए।

लंड से वीर्य की धार पिचकारी की भांति रह रह कर निकल रही थी और उनके शरीर से प्राण भी।

सोनी हड़बड़ा कर बिस्तर से उठी और उसने सुगना को आवाज़ लगाई सुगना स्वयं सांकल खोलकर अंदर आ गई और दोनों बहने सरयू सिंह के सर को अपने हाथों से सहलाने लगी.. सरयू सिंह बार-बार सुगना सुगना पुकारे जा रहे थे उनके लंड वीर्य अभी भी निकल रहा था जो नग्न सोनी के शरीर पर और सुगना पर गिर रहा था। मरते समय भी वह अपने वीर्य से उनकी प्यारी सुगना और उसकी अपनी अप्सरा सोनी को नहला रहे थे।

सुगना और सोनी दोनों उनका सर सहला रही थी सोनी ने लोटे से उन पर उन्हें पानी पिलाने की कोशिश परंतु सरयू सिंह परलोक के दरवाजे पर पहुंच चुके थे उन्होंने अंतिम बार सुगना को अपनी तरफ खींचा और उनके माथे पर चुंबन लेते हुए बोले …

हमार गलती माफ करती दिहे…हम पापी हई…सुगन आश्चर्य से उनकी तरफ देख रही थी उसे समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर सरयू सिंह ने कौन सा पाप किया है।

सरयू सिंह ने सोनी को भी अपनी तरफ खींचा और उसके भी माथे को चूमते हुए बोले…

हमरा के माफ कर दीह…... तहर काम ना भईल……सरयू सिंह तेजी से हांफने लगे…और अपनी अंतिम सांसों पर काबू करने की नाकाम कोशिश करते हुए बोले

पर हम आशीर्वाद देत बानी तहर कोख जरूर हरिहर होई…….सूरज….सूरज…सु…र…….

सरयू सिंह अपनी बात पूरी नहीं कर पाए…पर सोनी के दिमाग में सूरज जैसे खूबसूरत बच्चे की तस्वीर घूम गई जिसके लिए वह यह अनुष्ठान करने आई थी.

सरयू सिंह ने अपनी पलकें बंद कर ली और परलोक सिधार गए। नियति ने उन्हें उनके किए के लिए सजा दे दी थी। नियति उनकी मनोदशा जान रही थी। यह जानने के पश्चात भी कि सुगना उनकी अपनी पुत्री है आज वह उसे अपनी वासना में फिर घसीट लाए थे जो कि एक निक्रिस्ट पाप था।


सुगना और नंगी सोनी फफक फफक कर रो रही थी।

सरयू सिंह का दुखद अंत हो चुका था और सोनी की कोख एक बार फिर प्यासी ही छूट गई थी।

सरयू सिंह के प्राण पखेरू उड़ते ही कमरे का वातावरण एक भारी और डरावनी खामोशी में डूब गया। वह पुरुष, जो कुछ ही क्षण पहले वासना और शक्ति का प्रतीक बना हुआ था, अब केवल एक बेजान देह मात्र रह गया था। नियति का चक्र अपनी पूरी क्रूरता के साथ घूम चुका था।

उस शांत कमरे में केवल सोनी और सुगना के सिसकने की आवाजें गूँज रही थीं।

सुगना के कानों में सरयू सिंह के अंतिम शब्द "हमार गलती माफ करती दिहे… हम पापी हई…" किसी जलते हुए लोहे की तरह चुभ रहे थे।

सरयू सिंह ने कौन सा पाप किया था…सुगना इस बात से अभी पूरी तरह अनभिज्ञ थी…. उधर सोनी सरयू सिंह के अंतिम शब्द याद कर रही थी

तोहर कोख जरूर हरिहर होई सूरज… सूरज…..

सूरज का नाम सोनी के जेहन में तेजी से गूंजने लगा.. सूरज….. सूरज….. सूरज…… सूरज….. आवाज लगातार तेज होती जा रही थी… ऐसा लगा जैसे हवेली की दीवारें चीख चीख कर सूरज का नाम पुकार रही है…

सोनीअचकचा कर उठ गई…अतीत से वर्तमान का सफर कुछ पलों का था।

सोनी का स्वप्न टूट चुका था वह उठकर बैठ गई सूरज शब्द अभी भी उसके दिमाग में घूम रहा था क्या सरयू सिंह कुछ कहना चाहते थे…

अब तक तो वह यही समझती आई थी की सरयू सिंह उसे सूरज जैसा बेटा पाने का आशीर्वाद दे रहे थे परंतु……अब बदली हुई परिस्थितियों में…सूरज…… के साथ….

सोनी सोच में पड़ गई…

हे भगवान क्या उन्होंने जो सोचा था क्या वह अब घटित हो रहा है …क्या उन्होंने उसके गर्भधारण के लिए सूरज की परिकल्पना की थी…हे विधाता यह क्या हो रहा है सोनी को कुछ समझ नहीं आ रहा था। वह अभी तुरंत नींद से जागी थी उसने अपने सर को झटका दिया और वापस अपनी खोई हुई निद्रा वापस लाने का असफल प्रयास करने लगी..


उधर सूरज के कमरे में..

सुगना के मालिश करके जाने के बाद, सूरज की आँखों से नींद कोसों दूर थी। उसे अपनी मौसी सोनी पर गुस्सा आ रहा था जिसने उसके अरमानों पर पानी फेर दिया था। उसने आज की रात के लिए न जाने कितनी कल्पनाएं की थी। पर अब अपने हाथों में अपना लंड लिए सोनी के बारे में ही सोच रहा था। बंद आँखों के पीछे केवल सोनी द्वारा किया गया मुखमैथुन और वह अद्भुत स्खलन घूम रहा था। सूरज अपने तने हुए लंड को सहलाते हुए अपनी कल्पनाओं में अब सोनी को मर्यादाओं से परे जाकर नग्न कर रहा था।


बिस्तर की चादर उसे कांटों की तरह चुभ रही थी। उसने करवट बदली, पर उसकी बंद आँखों के सामने बार-बार वही दृश्य आ रहा था—बाथरूम में सोनी का घुटनों के बल बैठना और फिर उसके पुरुषत्व को अपने मुख की ऊष्म गहराइयों में समेट लेना।

सूरज का हाथ उस 'मखमली स्तंभ' को तेजी से सहलाने लगा, जो अब तक मर्यादा की हर सीमा को पार कर और सख्त हो चुका था। उसकी कल्पना अब उस मुखमैथुन से कई कदम आगे निकल चुकी थी। काश! सोनी मौसी अचानक ही बाथरूम से निकल न जाती। वह कल्पना में डूबता गया और सोचता गया। वह अपने कांपते हाथों से सोनी की उस रेशमी नाइटी की डोरियाँ खोल रहा है। नाइटी सरककर फर्श पर गिरती है और उसके नीचे से सोनी का वह कंचन जैसा तराशा हुआ बदन धीरे-धीरे उजागर होता है।


सूरज की कल्पना में सोनी अब पूरी तरह नग्न थी। उसे सोनी के वे भारी और पुष्ट उरोज याद आने लगे, जो आज दोपहर उसके सीने से सटे थे। वह महसूस कर रहा था कि कैसे वह अपनी दोनों हथेलियों में उन मांसल अंगों को भरकर भींच रहा है। सोनी की पतली कमर का वह गहरा मोड़ और वह नाभि-कुंड उसकी नसों में लावा बहा रहा था।

सूरज ने अपनी आँखें और भी कसकर बंद कर लीं। वह देख रहा था कि वह सोनी को बिस्तर पर झुका चुका है। वह सोनी से नजरे नहीं मिल पा रहा है मर्यादा की लकीर अभी उसे अपनी नज़रे चुराने पर मजबूर कर रही है। पर सोनी स्वयं'डॉगी स्टाइल' की उस मुद्रा में अगर उसे निमंत्रण दे रही है। सोनी के पुष्ट नितंबों का उभार उसकी आँखों के सामने था। वह कल्पना कर रहा था कि वह पीछे से अपनी पूरी ताकत के साथ उस काल्पनिक गुलाबी दरार को चीरते हुए अपने लंड को उसके भीतर गहरे तक उतार रहा है।

उसे लग रहा था कि दीवार के उस पार सोनी भी शायद इसी तरह की कश्मकश में जल रही होगी और अपनी जांघें फैलाए उसका इंतजार कर रही होगी। सूरज की कल्पना बेलगाम हो रही थी।

मर्यादा की चादर अब बहुत झीनी हो चुकी थी, और वासना का तूफ़ान सूरज और सोनी के बीच मर्यादा की नींव हिलाने को तैयार था।

इस अद्भुत कल्पना और उत्तेजना के शिखर पर पहुंचकर सूरज का वीर्य स्खलित हो गया। उसने अपनी पजामी को ही उस वीर्य को सोख लेने दिया।

सोनी सूरज के लिए अब केवल 'मौसी' नहीं अभी तू एक काम पिपासु स्त्री की भांति दिखाई पड़ रही थी। हस्तमैथुन के बाद भी उसके शरीर की वह आदिम आग शांत नहीं हुई। उसका पुरुषत्व जैसे किसी अलौकिक प्यास से तड़प रहा था। सूरज को भी यह आभास हो चला था कि जब तक उसकी मौसी सोनी अपने होठों से इस लंड को नहीं छुएगी इसका तनाव कम नहीं होगा।

सूरज ने पूरी रात करवटें बदलते हुए बिताई और सुबह के 5:30 बजे, जब भोर की पहली किरण ने दस्तक दी, उसने सोनी के कमरे के दरवाजे पर दस्तक दे दी।

सोनी हड़बड़ाकर उठी। उसने अपने बिखरे कपड़े ठीक किए और दरवाजा खोला। सामने सूरज खड़ा था—आँखों में रात भर जागने की थकान और चेहरे पर एक अजीब सी बेबसी।

सूरज (रुँधे गले से): "मौसी..." सूरज सिसकने लगा।

सोनी: "क्या हुआ सूरज?" सोनी ने उसके रुआँसे चेहरे को देखकर पूछा।

सूरज: "मैं रात भर सो नहीं पाया हूँ।"

सोनी ने एक गहरी नजर उस पर डाली। उसने पूरी आत्मीयता से पूछा, "क्यों? क्या बात है सूरज? तबीयत तो ठीक है?"

सूरज: "मौसी, कल रात से ही यह... यह तनाव कम नहीं हो रहा।"

सोनी: "पर ये हुआ कैसे?"

सूरज: "जब सोफे पर मालती और रीमा दीदी ने मेरा अंगूठा सहलाया था, तभी से। रात में माँ ने मालिश भी की, पर उनके हाथ की छुअन से कुछ नहीं हुआ। मौसी, हाथ का दर्द तो चला गया, पर यहाँ... यहाँ बहुत दिक्कत है।"

सूरज की नजरें अपनी पजामी के उस उभरे हुए हिस्से पर टिकी थीं, जो उसकी बेचैनी की गवाही दे रहा था। सोनी का दिल जोर से धड़का। उसने एक पल के लिए बाहर गलियारे में झाँका और फिर उसे अंदर बुला लिया।

सोनी (धीमी आवाज में): "अंदर आ जा... और अपनी आँखें बंद कर ले।"

सूरज ने बिना कोई सवाल किए आदेश का पालन किया। कमरे में हल्की रोशनी और सुबह की शांति के बीच, सोनी एक बार फिर घुटनों के बल नीचे बैठी। उसने कांपते हाथों से उसकी पजामी की डोरी ढीली की और उस प्रचंड, सुगठित और तने हुए अंग को बाहर निकाला।

सूरज के उस मखमली स्तंभ पर सूखे हुए काम-रस की वह विशिष्ट गंध अब और भी मादक हो चुकी थी। पजामी से भी सूरज के वीर्य की अनोखी गंध आ रही थी। सोनी की नस-नस में एक सिहरन दौड़ गई। उसने अपनी भावनाओं पर पत्थर रखते हुए, झुककर अपने कोमल होंठों से उस गर्म और फौलादी अंग को स्पर्श किया। उस स्पर्श से सूरज के पूरे बदन में एक लहर दौड़ गई, पर लिंग का तनाव गायब हो गया।

सोनी ने उस मखमली अहसास को महसूस किया, पर खुद को और आगे बहकने से रोक लिया। उसने जल्दी से पजामी ऊपर की और खड़ी हो गई।

सोनी (गंभीर स्वर में): "अब जा और सोने की कोशिश कर। और सुन सूरज... अपने अंगूठे को संभाल कर रख। इन सब बातों से जितना दूर रहेगा, उतना अच्छा है; अन्यथा तेरी पढ़ाई और भविष्य पर इसका असर पड़ेगा।"

सूरज कुछ कहना चाहता था, पर सोनी की आँखों में जो दृढ़ता और आदेश था, उसने उसे चुप कर दिया। वह बिना कुछ बोले, भारी कदमों से अपने कमरे की ओर लौट गया, जबकि सोनी वहीं खड़ी अपनी ही सांसों की गति को सामान्य करने की कोशिश कर रही थी।

अगली सुबह सब कुछ सामान्य था। सोनी और सूरज यथासंभव नजरें नहीं मिला रहे थे। यदि कहीं दोनों एक-दूसरे से टकराते भी, तो भी सोनी का मर्यादित व्यवहार सूरज की उम्मीदों पर पानी फेर देता। सुगना ने आज सुबह भी सूरज के हाथ की मालिश की, जादुई अंगूठे को भी सहलाया, पर सब कुछ सामान्य रहा।

सूरज कॉलेज पहुँच गया, जहाँ उसकी प्रेमिका रोजी उसका बेसब्री से इंतजार कर रही थी। कॉलेज के गलियारों में सूरज और रोजी की जोड़ी किसी मिसाल से कम नहीं थी, लेकिन सूरज के भीतर एक ऐसा द्वंद्व चल रहा था जिसकी खबर किसी को न थी। मेडिकल की मोटी किताबों के बीच जब वह अपनी आँखें मूँदता, तो उसे रोजी का मासूम चेहरा नहीं, बल्कि मौसी सोनी का वह मादक और वर्जित सान्निध्य याद आता।

एक-दो दिन और बीत गए। सोनी ने सूरज से दूरी बनाकर रखी और सूरज की माँ उसके हाथों की मालिश करती रही। सूरज की तड़प बढ़ती जा रही थी, पर सोनी अपनी मर्यादा लाँघने को तैयार नहीं थी। सूरज बेमन से कॉलेज जाता।

कॉलेज के कैंपस में जहाँ अमलतास के फूल बिछ जाते थे, वहाँ सूरज और रोजी की जोड़ी किसी रूमानी फिल्म के दृश्य जैसी लगती थी। लेकिन इस सुनहरी तस्वीर के पीछे एक कड़वा सच छिपा था—सूरज की बढ़ती हुई बेरुखी और रोजी का टूटता हुआ विश्वास।

रोजी, जिसका यौवन किसी तराशे हुए संगमरमर की तरह दमकता था, सूरज के करीब रहकर भी उससे कोसों दूर महसूस कर रही थी। इस मानसिक और शारीरिक दूरी को पाटने के लिए उसने कई जतन किए, पर नतीजा सिफर रहा। लाइब्रेरी के पीछे वाले एकांत कोने में, जब रोजी सूरज के सीने से लगकर अपनी आँखें मूँद लेती, तो उसे उम्मीद होती कि सूरज की बाहें उसे और कसकर थाम लेंगी। वह अपनी तेज होती धड़कनों के जरिए सूरज को यह बताना चाहती थी कि उसका रोम-रोम उसे पुकार रहा है। लेकिन सूरज पत्थर की मूरत बना रहता। उसके हाथ रोजी की कमर पर तो होते, पर उनमें वह 'अधिकार' और 'तड़प' गायब थी। सूरज की नजरें शून्य में कहीं भटक रही होतीं, जहाँ बार-बार सोनी मौसी का वह चेहरा और वह बाथरूम वाला वाकया कौंध जाता था।

रोजी अक्सर अपनी बात कहने के लिए शब्दों का नहीं, स्पर्श का सहारा लेती। जब वह प्यार से सूरज के गालों को चूमती या उसके होंठों के करीब आती, तो सूरज प्रतिक्रिया तो देता, पर वह किसी मशीनी क्रिया जैसी होती। रोजी को महसूस होता कि सूरज का 'मन' उस स्पर्श में शामिल नहीं है। उसे लगता जैसे वह किसी ऐसे व्यक्ति के साथ है जो शरीर से तो वहाँ मौजूद है, पर जिसकी आत्मा कहीं और कैद है। रोजी की खूबसूरती सूरज के लिए जैसे बेअसर होती जा रही थी।

"सूरज, क्या मैं अब तुम्हें अच्छी नहीं लगती?" रोजी ने कई बार भीगी आँखों से पूछा। सूरज का हर बार 'थकान' या 'पढ़ाई का बोझ' कहकर बात टाल देना रोजी के दिल को छलनी कर देता था।

सूरज की इस बेरुखी की असली वजह वह 'वर्जित आकर्षण' था जो उसने अपनी मौसी के साथ महसूस किया था। जब रोजी उसे गले लगाती, तो उसे मौसी की उस रात की 'रेशमी नाइटी' की छुअन याद आती। रोजी का निश्छल प्रेम उसे उस 'आदिम प्यास' के सामने छोटा लगने लगा था, जो सोनी मौसी ने अनजाने में उसके भीतर जगा दी थी।

एक दिन रोजी अपनी सहेलियों, महक और टीना के साथ बैठी थी। उसने धीमी आवाज़ में अपनी व्यथा साझा की। महक और टीना, जो प्रेम और देह की वर्जनाओं को पार कर चुकी थीं, रोजी की बातें सुनकर हैरान रह गईं।

महक: "रोजी, पुरुष का प्रेम केवल उसकी आँखों में नहीं, उसकी छुअन की शिद्दत में होता है। अगर सूरज पत्थर बना रहता है, तो शायद तुमने अभी तक अपनी स्त्रीत्व की उस अग्नि को नहीं सुलगाया है जो किसी भी पुरुष के संयम को पिघला दे।"

टीना: "देख रोजी, ईश्वर ने तुझे एक ऐसी काया दी है जो किसी भी शिल्पी का स्वप्न हो सकती है। तेरे ये तराशे हुए उभार, तेरी कमर की ढलान और तेरी आँखों में तैरता यह नशा—ये सब केवल देखने के लिए नहीं हैं। पुरुष का पुरुषत्व तब तक पूर्णतः जागृत नहीं होता जब तक वह स्त्री के पूर्ण समर्पण का अनुभव न कर ले। तूने अब तक उसे केवल अपना चेहरा दिखाया है, अपनी रूह की प्यास और बदन की पुकार नहीं।"

सहेलियों ने उसे काम-कला के उन सूक्ष्म पहलुओं के बारे में बताया जहाँ मौन भी मुखर हो जाता है। उन्होंने समझाया कि स्त्री का शरीर एक जीती-जागती कविता है। महक ने उसे प्रेरित करते हुए कहा: "जब तू उसके करीब हो, तो केवल एक प्रेमिका मत बन, एक ऐसी मोहिनी बन जा कि उसे दुनिया का हर बंधन तुच्छ लगने लगे। उसे तेरी देह के उस सुगंधित आकर्षण में डूबने दे।"

रोजी को अहसास हुआ कि शायद समर्पण ही वह चाबी है जो सूरज के मन के बंद दरवाजे खोल सकती है। उसने तय किया कि वह अब अपनी सुंदरता को केवल एक आभूषण नहीं, बल्कि एक अस्त्र की तरह प्रयोग करेगी। वह सूरज को उस चरम सुख की दहलीज तक ले जाएगी, जहाँ पहुँचकर इंसान सब कुछ भूल जाता है और अपनी संगिनी के तन-बदन और रूह में समा जाता है।

उसने अपने जन्मदिन को एक 'अंतिम हथियार' की तरह इस्तेमाल करने का सोचा। उसने मन ही मन ठान लिया कि वह अपनी पूरी गरिमा और सुंदरता को सूरज के सामने 'समर्पित' कर देगी, ताकि सूरज के मन से हर दूसरा ख्याल मिट जाए और सिर्फ 'रोजी' ही शेष रहे।


शेष अगले भाग में
 
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