Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता. - Page 138 - SexBaba
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Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता.

भाग 156

जैसे ही उस लाल पैंटी में सोनी की बुर को छुआ उसे ऐसा प्रतीत हुए जैसे सरयू सिंह के लंड ने उसकी बुर को छू लिया। सोनी सिहर उठी…सरयू सिंह के सूखे हुए वीर्य से उसे कोई घृणा नहीं थी। अपितु सोनी उस संवेदना को महसूस कर रही थी अचानक उसके मन में ख्याल आया काश इस सूखे हुए वीर्य में अब भी इतनी ताकत होती .. सोनी अब तक गर्भवती नहीं हो पाई थी और पिछले कई वर्षों से वह हर प्रयास कर रही थी।

सोनी की उंगलियां सरयू सिंह के वीर्य से सनी उस लाल पेटी को अपनी सुनहरी गुफा की ओर धकेलने लगी…

काश की वह सूखा हुआ वीर्य उसके गर्भ में एक जीवन का सृजन कर जाता….



अब आगे…

सोनी का घाघरा अब भी उठा हुआ था। गोरी जांघों पर चमकती लाल पैंटी एक दूसरे की खूबसूरती बढ़ा रहे थे और इस खूबसूरत दृश्य का रसपान कोठरी की खिड़की से दो वासना से भरी आंखे कर रही थी। और यह आंखें थी सरयू सिंह की। सोनी ने अचानक खिड़की की तरफ देखा उसे एक साया सा दिखाई पड़ा। उसने झटपट अपना घाघरा गिरा दिया।

दरअसल, सरयू सिंह का वह बक्सा उनके लिए बेहदमहत्वपूर्ण था। उन्होंने आज तक उसकी चाबी किसी से भी साझा नहीं की थी, परंतु कजरी ने आज बिना पूछे और उनकी अनुमति लिए वह चाबी सुगना को दे दी। सरयू सिंह इससे बेहद नाराज हुए। कारण स्पष्ट था—बक्से में उनके कई राज़ दफन थे, जिन्हें वह उजागर नहीं करना चाहते थे। उन्होंने कजरी को बहुत भला-बुरा कहा और उन्हें अपने व्यक्तित्व के उजागर होने का डर सताने लगा। यद्यपि सुगना उनके व्यक्तित्व से पूरी तरह परिचित थी, परंतु यह डर उन्हें खाए जा रहा था कि यदि उसने बक्से में सोनी की लाल पेंटी देख ली—तो यह उनके व्यक्तित्व पर प्रश्न चिन्ह होता। सरयू सिंह की व्यग्रता बढ़ती गई और आखिरकार उन्होंने आनंन फानन में सलेमपुर जाने का निर्णय ले लिया।

अपने व्यक्तित्व की अस्मिता भी बचाए रखने का एकमात्र उपाय यही था कि वह स्वयं सलेमपुर पहुंचकर सुगना को बक्सा खोलने से रोक दें। उन्होंने बस पकड़ी और सलेमपुर की तरफ निकल पड़े।

सलेमपुर के बस स्टॉप पर पहुँचकर वे तेज कदमों से अपने घर की तरफ चल पड़े।

कभी-कभी कुछ ऐसे संयोग बन जाते हैं, जो सामान्य तौर पर मुमकिन नहीं होते, पर जब यह संयोग विधाता ने स्वयं अपने हाथों से रचे हों, तो सब कुछ मुमकिन है।

इधर सोनी सरयू सिंह की कोठरी में सरयू सिंह के वीर्य से सनी उस लाल पैंटी को धारण कर रही थी उधर अपनी कोठरी की खिड़की से सरयू सिंह सोनी को देख रहे थे सोनी को यह अनुमान कतई नहीं था की ऐसा कुछ मुमकिन है। वह बेधड़क होकर उस लाल पेटी को अपनी गोरी जांघों से सरकाते हुए अपने अनावृत कूल्हों को ढक रही थी और सरयू सिंह की निगाहें सोनी के मादक जांघों और कूल्हों का जायजा ले रही थीं। उन्हें इस बात का आश्चर्य हो रहा था कि उस वीर्य से सनी लाल पेंटी को सोनी आखिरकार क्यों पहन रही थी। क्या उसे रंच मात्राl भी घृणा नहीं थी ह…..हे भगवान यह क्या हो रहा था…. सरयू सिंह को यह माजरा समझ नहीं आ रहा था।

एक पल के लिए उन्हें लगा कि वह अंदर जाकर सोनी को इसी स्थिति में रंगे हाथों पकड़ ले परंतु कुछ सोच कर उन्होंने ऐसा नहीं किया अपित वह सोनी के घागरे के नीचे गिरने तक इंतजार करते रहे। जैसे ही सोनी ने बक्से का ताला बंद किया और कोठरी से बाहर निकालने की कोशिश की ठीक उसी समय वह अपनी कोठरी के दरवाजे पर साक्षात आ खड़े हुए …

सोनी न सिर्फ आश्चर्यचकित थी अपितु उसका कलेजा धक-धक करने लगा …

हे भगवान यह क्या हुआ उसने अपनी गर्दन झुकाई और बोली..

आप कब आईनि हां…?

सरयू सिंह मंत्रमुग्ध होकर सोनी की ओर देख रहे थे, परंतु सोनी की नज़रें झुकी हुई थीं। सोनी को एक अनजाना डर सता गया—कहीं सरयू चाचा ने से उसे उस अवस्था में तो नहीं देख लिया। उसने अपने दिमाग पर जोर डाला। “नहीं, नहीं, मैंने दरवाजा जरूर बंद किया था। अभी तो मैने सांकल खोली…पर खिड़की से…पर सरयू चाचा ऐसे क्यों करेंगे…? सोनी कुछ सोच पाने की स्थिति में नहीं थी पर सोनी ने इस बार पूरे आत्म विश्वास से कहा।

ई लीं अपन दवाई यही लेवे आइल रहनी हा..

सरयू सिंह स्वयं अपनी उत्तेजना के आधीन थे। आज कई वर्षों बाद नंगी और जवान सोनी की गदराई जांघों को देखकर उनके मुंह और लंड दोनों पर पानी आ चुका था और ऊपर से आज सोनी ने जो हरकत की थी उन्होंने सरयू सिंह की आग को और भी भड़का दिया था ।

उन्होंने हाथ बढ़ाकर सोनी से वह पीली पोटली ले ली और बरबस सोनी की उन कोमल उंगलियों को अपनी मजबूत अंगुलियों से छू लिया। सोनी चौंक गई। उसने झटपट वह पीली पोटली और चाबी उन्हें थमा दी और तेज कदमों से भागते हुए सुगना की तरफ चल पड़ी।

कुछ कदम चलने के बाद उसने पलट कर पीछे देखा और महसूस किया कि सरयू सिंह अब भी उसके नितंबों पर आंख गड़ाए खड़े थे। सोनी का कलेजा धक-धक कर रहा था, वो सुगना के समीप पहुँच गई। उसने सुगना को सरयू सिंह के आने की सूचना दी।

कुछ ही देर बाद सोनू और सुगना दोनों एक बार फिर अपने घर में उपस्थित थे। सुगना ने सरयू सिंह से प्रश्न किया,

“अरे, आप काहे आ गईं नि?”

सरयू सिंह ने बेहद संजीदगी से जवाब दिया,

“अरे मुखिया जी, बुलवाले रहले, हम बतावे, भुला गईनी हैं। सोचनी की हम भी पहुंच जाई, तोहार लोग के साथ ही वापस चल आएब।”

थोड़ी देर में सब कुछ फिर से सामान्य हो गया। आँगन में पसरी चुप्पी को तोड़ते हुए सरयू सिंह बोले,

“एक कप चाय मिली का? ।”

सुगना ने बात सुनते ही पल्लू सँभाला और रसोई की ओर बढ़ गई।

“सोनी, लाली के घर से ज़रा दूध ले आ,” उसने कहा।

सोनी बिना जवाब दिए निकल पड़ी वह अब भी सहमी हुई थी। थोड़ी ही देर में चूल्हे पर चाय चढ़ गई। अदरक की खुशबू पूरे घर में फैल गई। जब चाय तैयार हो गई तो सुगना ने फिर आवाज़ दी,

“सोनी, बाबूजी को चाय दे आ।”

यह सुनते ही सोनी का कलेजा धक से रह गया। न जाने क्यों आज उसके कदम भारी हो गए। सामने सरयू सिंह थे—रौबदार, गम्भीर जिनके वीर्य से सनी लाल पैंटी उसने अब से कुछ देर पहले पहनी थी और शायद उन्होंने उसे ऐसा करते हुए देख भी लिया था। हालाँकि पास में सोनू भी बैठा था, फिर भी सोनी को अजीब-सी झिझक हो रही थी वह असहज थी।

वह हिम्मत बटोर कर आगे बढ़ी। सिर झुकाए, दोनों हाथों से चाय का कप आगे किया। पर आज तो जैसे विधाता ने उसे सरयू सिंह के सामने परोसने का मन बना लिया था जैसे ही सोनी नीचे झुकी उसका दुपट्टा सरक कर उसके दुग्ध कलशों को नग्न कर गया जो चोली में कैद होने के बावजूद थिरक थिरक कर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे थे। उस पल उसे लगा जैसे उसकी साँसें तेज़ हो गई हों। सरयू सिंह ने कप लिया,

बहुत बढ़िया खुशबू बा…. सरयू सिंह ने अपने नथुनों में हवा भरते हुए कहा सोनी को ऐसा महसूस हुआ जैसे सरयू सिंह ने उसके बदन पर लगाए इत्र की खुशबू के बारे में कहा हो …

सोनी ने जल्दी से कदम पीछे खींच लिए। दिल में जाने कैसी हलचल मची थी। उसे खुद समझ नहीं आ रहा था कि यह घबराहट क्यों है। उसने दुपट्टा ठीक किया और चुपचाप पीछे हट गई।

सोनू ने सरयू सिंह की हां में हां मिलाई और कहा गांव के अदरक के स्वाद और खुशबू अलग होला और सुगना दीदी के चाय तो वैसे भी सबसे अच्छा बनेला।

सुगना के भूतपूर्व और वर्तमान प्रेमी उसके हाथ की बनी चाय पीते बाते करने लगे। सोनी सहमी हुई वापस आंगन में चली गई और सुगना के साथ चाय पीने लगी। पर आज जो हुआ था उसने सोनी को असहज कर दिया था l अमेरिका रिटर्न और अमीर घराने में ब्याही सोनी आज स्वयं को एक साधारण अतृप्त और वासना में लिप्त युवती की देख रही थी।

दोपहर की नींद वैसे भी हल्की होती है। सोनी की आँख खुल गई वह अपनी यादों से अपनी चेतना में वापस आ गई। अतीत की बातों ने उसके चेहरे पर मुस्कुराहट ला दी थी। बाहर डाइनिंग वाले हिस्से से मालती और राजा की खिलखिलाहट सुनाई दे रही थी। उसने दीवार पर टँगी घड़ी की ओर देखा—साढ़े चार बज चुके थे।

सोनी ने पहले नर्सिंग की पढ़ाई की थी और नौकरी भी की थी। परंतु विकास से शादी होने के बाद उसने यह कार्य छोड़ दिया था । परंतु अभी भी वह अपने परिवार के लिए डाक्टर ही थी। वो सबका कालाल पूरा ख्याल रखती थी।

सुगना अपनी अलग उधेड़बुन में थी सूरज की समस्या उसे चिंतित किए हुई थी।

सुगना के परिवार का अतीत वासना से भरा हुआ था स्वयं सुगना इस कृत्य में पूरी तरह संलग्न थी परंतु यह अचानक नहीं हुआ था। जब-जब सुगना अपने अतीत में झांकती उसे कभी-कभी लगता जैसे उसके साथ जो कुछ हुआ था वह विधाता ने ही रचा था वह एक निमित्त मात्र थी।

सूरज जैसा तंदुरुस्त हट्टा कट्टाऔर बेहद खूबसूरत युवा अपनी जांघों के बीच उत्तेजना ना महसूस करें यह अविश्वसनीय था पर कटु सत्य था।

सूरज ने भी कई बार अपने लिंग को सहलाया कामूक कल्पनाएं की पर पर लिंग में रंच मात्र भी संवेदना नहीं हुई। वह एक मुरझाए केले की भांति हमेशा नीचे ही लटका रहा सूरज को बखूबी अहसास था कि यह प्राकृतिक नहीं है परंतु उसे कोई उपाय नहीं सूझ रहा था। रोजी के साथ उसकी नजदीकियां बढ़ रही थी पर प्यार अपनी जगह था और वासना अपनी जगह।

चुंबन में वासना का अंश ना हो तो चुंबन की प्रगाढ़ता कम हो जाती है। रोजी इसे भली भांति महसूस कर रही थी और आखिर एक दिन कॉलेज की छत पर जाने वाली सीढ़ियों पर रोजी और सूरज एक दूसरे के और समीप आ गए।

सूरज और रोजी एक बार फिर करीब आए और दोनों के बीच चुंबनों का आदान-प्रदान होने लगा। आज फिर रोजी ने महसूस किया की जो तत्परता सूरज की तरफ से दिखाई पढ़नी चाहिए उसमें निश्चित ही कुछ कमी थी। रोजी को यह मंजूर नहीं था। रोजी ने हिम्मत जुटाकर चुंबन के दौरान अपनी सुकुमार हथेलियां सूरज की जांघों के बीच लंड के ऊपर सटा दिया।

रोजी के आश्चर्य का ठिकाना ना रहा सूरज का लिंग बिना उत्तेजना एवं कठोरता के सामान्य स्थिति में लटका था। लिंग की कठोरता पेंट के ऊपर से भी पहचानी जा सकती थी शायद इसीलिए रोजी नई लड़की होने के बावजूद इतनी हिम्मत जुटाइ थी परंतु वह स्वयं आश्चर्यचकित थी कि सूरज के लिंग में कोई उत्तेजना एवं कठोरता ही नहीं थी।

उधर सूरज सचेत हो गया था फिर भी उसने रोजी के हाथ को हटाने की चेष्टा नहीं कि वह उसके स्पर्श को महसूस कर अपने लिंग में तनाव की उम्मीद कर रहा था उसने एक बार फिर रोजी को अपने आलिंगन में भरकर चूमने की कोशिश की और स्वयं अपना हाथ नीचे ले जाकर अपनी पेंट की जिप खोल दी।

रोजी को यह थोड़ा असहज लगा परंतु उसने सूरज को रोका नहीं वह सचमुच सूरज को चाहने लगी थी। कुछ ही देर में सूरज का लिंग बाहर आ चुका था पहली बार रोजी ने किसी लड़के का लिंग अपने हाथों से छुआ..

अजब सा एहसास था पर हाय री सूरज की किस्मत।

जिस रोजी जैसी गच्च माल को देखकर अच्छे-अच्छे का लंड खड़ा हो सकता था वह स्वयं सूरज के लंड को हाथ लगा रही थी परंतु उसमें नाम मात्र की उत्तेजना नहीं थी। रोजी ने इसे एक चैलेंज के रूप में ले लिया था उसे स्वयं यह असामान्य लग रहा था उसे उम्मीद थी कि उसके स्पर्श मात्र से सूरज का लंड तनकर उसे सलामी देने लगेगा पर यहां परिस्थितिया विपरीत थी।

सूरज और सोनी की यह रासलीला ज्यादा देर नहीं चली रोजी को ऐसा प्रतीत हुआ जैसे कोई सीढियों से ऊपर आ रहा है। वह सूरज से अलग हुई और छत की तरफ चली गई सूरज ने भी अपने लंड की तरफ निराशा से देखा और उसे वापस अपने अंडरवियर में कैद कर लिया सूरज की निराशा और भी गहरा गई। आज रोजी की मुलायम और संवेदनशील उंगलियां भी उसके लंड में उत्तेजना भरने में नाकाम रही थी सूरज अपनी किस्मत को कोष रहा था और विधाता से अपने लिए न्याय मांग रहा था।

उधर नियति सूरज के भविष्य के पन्ने पलट रही थी। जो जो सूरज आज अपने लिंग में उत्तेजना के लिए तड़प रहा था उसे आने वाले समय में कामुकता के नए अध्याय लिखने थे उसे वह सारे सुख भोगने थे जिसकी कल्पना परिकल्पना भी आज की स्थिति में उसके लिए करना मुमकिन नहीं था।

पर अपने भविष्य से अनजान सूरज एक बार फिर बेहद दुखी हो चुका था और अनमने मन से सीढ़ियां उतर रहा था और अपने विधाता को कोस रहा था यह स्वाभाविक भी था।

कुछ दिन और बीत गए..

कॉलेज के पुराने बरगदों की छाया में सूरज और रोज़ी की कहानी चुपचाप पनप रही थी। रोजी अब भी इस उम्मीद में थी कि सूरज के लिंग की उत्तेजना शायद उसके सहज होने पर ठीक हो जाए। दोनों एक ही कॉलेज में डॉक्टरी की पढ़ाई कर रहे थे। दिन भर किताबों और प्रैक्टिकल्स में उलझे रहने के बाद वे अक्सर साथ टहलते। सूरज और रोजी की जोड़ी देखने में बेहद खूबसूरत थी ऐसा लगता था जैसे दोनों एक दूसरे के लिए ही बने हो। यही बात रोजी की सहेली ने उन दोनों को साथ देखकर कह दी

ओह नाइस पेयर मेड फॉर ईच अदर ….

दोनों हँसते हुए कैंटीन की ओर बढ़ गए। उनका प्रेम सहज था—बिना दिखावे के, बिना शोर के।

लेकिन इस सुकून के बीच एक बेचैनी भी थी। शाहिद, जो रोज़ी पर एकतरफा मोहित था, अक्सर किसी न किसी बहाने उसके सामने आ खड़ा होता।

“रोज़ी, आज तुमने मुझे पहचाना भी नहीं,” शाहिद ने एक दिन रास्ता रोकते हुए कहा।

रोज़ी ने सख़्त लहजे में जवाब दिया, “शाहिद, मैंने पहले भी कहा है—मुझे तुम्हारा यूँ बार-बार मिलना पसंद नहीं। प्लीज़ मुझे परेशान मत करो।”

शाहिद ने झुंझलाकर कहा, “इतना घमंड किस बात का है? मैं बस दोस्ती करना चाहता हूँ।”

“दोस्ती ज़बरदस्ती नहीं होती,” रोज़ी ने साफ़ शब्दों में कहा और वहाँ से हट गई।

एक दिन कॉलेज के आँगन में बात बिगड़ गई। शाहिद ने फिर कोई आपत्तिजनक टिप्पणी कर दी।

रोज़ी भड़क उठी, “तुम्हें समझ क्यों नहीं आता? अपनी हद में रहो!”

उसी समय सूरज वहाँ पहुँचा।

“क्या बात है?” सूरज ने शांत स्वर में पूछा।

शाहिद तमतमाकर बोला, “तुम बीच में क्यों बोल रहे हो? तुम्हें किसी ने बुलाया?”

सूरज ने संयम से कहा, “जब कोई किसी को परेशान करे, तो बोलना पड़ता है। तुम गलत कर रहे हो।”

यह सुनते ही शाहिद का अहंकार भड़क उठा।

“ज़्यादा हीरो मत बनो,” उसने सूरज की ओर बढ़ते हुए कहा।

शाम को कॉलेज के बाहर माहौल और भयावह हो गया। शाहिद अपने दोस्तों के साथ सूरज को घेर चुका था।

“आज बहुत समझदार बन रहे थे न?” शाहिद ने व्यंग्य से कहा।

सूरज ने दृढ़ता से जवाब दिया, “अगर सच बोलना समझदारी है, तो हाँ—मैं बनूँगा।”

धक्का-मुक्की शुरू हो गई।

“छोड़ो मुझे!” सूरज ने कहा, लेकिन जवाब में मुक्के बरसने लगे। कुछ ही पलों में सूरज ज़मीन पर लड़खड़ा गया। उसके हाथ पर ज़ोर का वार पड़ा।

“आह!” सूरज के मुँह से कराह निकल गई। उसका अंगूठा बुरी तरह मुड़ गया था।

एक दोस्त बोला, “चलो, बहुत हो गया।”

शाहिद ने जाते-जाते कहा, “याद रखना, अगली बार बीच में मत पड़ना।”

थोड़ी देर बाद रोज़ी दौड़ती हुई आई।

“सूरज! ये सब क्या हुआ?” उसकी आवाज़ काँप रही थी।

सूरज ने दर्द छिपाते हुए कहा, “कुछ नहीं… बस एक छोटी सी लड़ाई।”

रोज़ी ने उसका हाथ देखते ही कहा, “ये छोटी बात नहीं है! तुम्हें बहुत चोट लगी है।”

सूरज ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “अगर तुम्हारी इज़्ज़त बचाने की कीमत ये चोट है, तो मुझे मंज़ूर है।”

रोज़ी की आँखों में आँसू भर आए।

“मैं नहीं चाहती थी कि तुम्हें तकलीफ़ हो,” उसने धीमे से कहा।

सूरज ने कहा, “प्यार में कभी-कभी दर्द भी आता है, रोज़ी। लेकिन मैं तुम्हारे साथ खड़ा रहूँगा।”

उस दिन के बाद कॉलेज वही था, रास्ते वही थे, पर सूरज और रोज़ी के रिश्ते में एक नया भरोसा जुड़ गया था—जो शब्दों से नहीं, बल्कि साहस और त्याग से लिखा गया था।

सूरज को घर पहुंचते पहुंचते देर हो गई सब उसका इंतजार कर रहे थे सूरज के लटके हुए चेहरे को देखकर सुगना बेचैन हो गई वह उसकी तरफ बढ़ी…

“आ गए सूरज? आज कुछ ठीक नहीं लग रहा तुझे… चेहरा उतरा-उतरा सा क्यों है?”

सूरज:

“कुछ नहीं मां, बस थोड़ा थक गया हूँ।”

सुगना:

“थकान में आँखें ऐसे नहीं झुकतीं बेटा। कॉलेज में सब ठीक तो है ना?”

सूरज:

“हाँ… ठीक ही है।”

सुगना:

“तो फिर ये हाथ छुपा क्यों रहा है? ज़रा इधर दिखा।”

सूरज:

“अरे मां, कुछ नहीं हुआ।”

सुगना:

“कुछ नहीं हुआ तो अंगूठा इतना सूजा कैसे है? साफ दिख रहा है।”

सूरज:

“बस लग गया था, मामूली सा।”

सुगना:

“मामूली? बैठ, पहले दवा लगाती हूँ, फिर पूछूँगी।”

सुगना उठी आर सी से जाकर कच्ची हल्दी और चूने का लेप बनाकर लाई और सूरज के अंगूठे पर लपेट दिया एक सफेद कपड़े से उसने उसे चारों तरफ से बंद भी दिया सूरज का यह अंगूठा वही जादुई अंगूठा था जिसे सोनी, मोनी मालती द्वारा सहलाए जाने पर सूरज के लिंग का आकार अप्रत्याशित रूप से बढ़ता था यद्यपि इस घटना को कई वर्ष बीत चुके थे और सभी के जेहन से यह विलक्षण घटना अब निकल चुकी थी वैसे भी 12 वर्षों का समय बहुत सारी स्मृतियों को मिटा देता है सरयू सिंह की मृत्यु के बाद जब से सुगना के परिवार में वासना का अकाल पड़ा था सोनी ने भी इस बात को लगभग भूल ही दिया था और कभी यह प्रयोग दोबारा नहीं किया था सूरज के बचपन की यह खासियत बचपन की स्मृतियों के साथ ही दफन हो गई थी।

सूरज:

“मां, बस अब रहने दो… अपने आप ठीक हो जाएगा।”

सुगना:

“चुपचाप बैठ। मां से ज़्यादा अक्ल मत चला।”

सूरज:

“ठीक है…”

सुगना:

“अब बता, कॉलेज में क्या हुआ?”

सूरज:

“कुछ खास नहीं… बस थोड़ी बहस हो गई थी।”

सुगना:

“किससे?”

सूरज:

“कुछ लड़कों से।”

सुगना:

“और बहस में हाथ सूज गया?”

सूरज:

“थोड़ा धक्का लग गया था।”

सुगना:

“तू तो झगड़ा करने वाला नहीं है, फिर बात इतनी बढ़ी क्यों?”

सूरज:

“बस बात-बात में…”

सुगना:

“पूरी बात बता सूरज, आधी बात से मन और घबराता है।”

सूरज:

“मां, सच में अब सब ठीक है। ज़्यादा कुछ नहीं हुआ।”

सुगना:

“ठीक है, नहीं बताना तो मत बता… पर याद रख, मां से छुपाने की ज़रूरत नहीं होती।”

सूरज:

“मैं जानता हूँ मां।”

सुगना:

“आज हाथ से कोई काम मत करना। आराम कर।”

सूरज:

“जी मां।”

सुगना:

“और सुन, अगर कुछ मन में चल रहा हो तो दबा कर मत रखना।”

सूरज:

“…ठीक है।”

सूरज अपने कमरे में चला गया। अंगूठे का दर्द अब भी था।

शाम होते-होते सभी इस बारे में बात करने लगे।

शाम को जब यह खबर लाली के पुत्र राजू और शैतान राजा तक पहुँची, तो राजा तुरंत ही उत्साहित हो गया। उसे झगड़ा करना पसंद था।

राजा (राजू से):

“भैया, चलो… शहीद को देखकर आते हैं। इस बार उसे सबक सिखाना पड़ेगा।”

छोटे राजा ने अपने बड़े भाई राजू से शाहिद को सबक सिखाने के लिए उसका साथ मांगा।

राजू (थोड़ा गंभीर होकर):

“रुको, राजा। पहले सूरज से पूरी घटना सुनो। बिना जाने सीधे झगड़े में कूदना ठीक नहीं होता।”

दोनों सूरज के कमरे में गए। सूरज ने जो घटनाक्रम बताया, वह ज्यादा गंभीर नहीं था। सूरज के अनुरोध पर, आगे इस बात को बढ़ाने से सभी ने मना कर दिया।

धीरे-धीरे कमरे में पूरा परिवार इकट्ठा हो गया। कुछ ही देर में खूबसूरत मालती, लाली की पुत्री रीमा और सूरज की छोटी बहन मधु भी पहुँच गईं।

मधु (चिंतित होकर):

“भैया, अंगूठा अब कैसा है? अभी भी दर्द है?”

सूरज (मुस्कुराते हुए):

“ठीक है, मधु। बस थोड़ा सा दर्द है, चिंता मत करो।”

मालती और रीमा ने पास आकर देखा। सूरज उन दोनों से छोटा था उन्होंने उसके सर पर हाथ फेरा उसके हाथों को सहलाया पर जादुई अंगूठा हल्दी चूने में लिपटा अभी सूरज की बहनों की पहुंच से दूर था।

राजू और राजा थोड़ा पीछे खड़े होकर यह सब देख रहे थे।

राजा (थोड़ा शरारत भरे अंदाज़ में):

“भैया, अगली बार कुछ हुआ तो साले शाहिद को छोड़ेंगी नहीं।”

राजू (मुस्कुराते हुए):

“हाँ, पर समझदारी से। कोई झगड़ा नहीं।”

सूरज ने हल्की मुस्कान दी और कहा,

“देखो, समझदारी और धैर्य ही सबसे बड़ी ताकत है। अब सब शांत रहो।”

मालती और रीमा ने मुस्कुराते हुए सूरज की ओर देखा। और प्यार से बोला…

इतना प्यारा तो है सूरज कोई कैसे इससे लड़ सकता है।

कमरे में हल्की हँसी फैल गई। हवेली की यह शाम, बहनों, सूरज और पूरे परिवार के साथ, अचानक और खुशनुमा, सुरक्षित और प्यार भरी लगने लगी। पूरा परिवार एक था पर छोटी डॉक्टरनी सोनी किसी काम से अपने पति विकास के साथ बाहर गई हुई थी।

हवेली की एक सामान्य सुबह…

सुगना अब अपनी अधेड़ अवस्था में पहुँच चुकी थी, पर कुदरत ने उसे जिस खूबसूरत बदन, चमकती त्वचा और मासूम चेहरे से नवाज़ा था, वह आज भी जस का तस था। उम्र का असर दिखाई देता था, पर आज भी सुगना एक प्रभावशाली महिला थी।

सरयू सिंह की मृत्यु के बाद सोनी ने हवेली की जिम्मेदारी धीरे-धीरे संभाल ली। सुगना, न जाने क्यों, सफ़ेद वस्त्र पहनना शुरू कर दिया था। अक्सर वह सफ़ेद साड़ी में दिखाई पड़ती—विधवा के रूप में नहीं, पर रंग में सादगी अवश्य थी। कह सकते हैं, यह सादगी अब सुगना का अपना “ड्रेस कोड” बन चुकी थी।

सुबह-सुबह सुगना हवेली के एक बड़े हाल में योगा क्लास चलाया करती थी। इन क्लासों का कोई व्यावसायिक उद्देश्य नहीं था; यह बस लोगों से जुड़ने और उनके साथ स्वस्थ जीवन साझा करने का एक साधन था। कई महिलाएं और लड़कियां उसकी योगा क्लास में नियमित रूप से आती थीं। हल्की सुनहरी धूप जब हाल में आती, तो पूरा माहौल और भी खुशनुमा हो जाता।

सुगना को योगा करते हुए देख कर ऐसा लगता ही नहीं था कि वह वही सुगना है, जो दिन में साड़ी पहने हवेली में एक अधेड़ महिला के रूप में दिखाई पड़ती है। योग के दौरान वह आधुनिक और चुस्त कपड़ों में दिखाई देती, जिससे उसके शरीर की फिटनेस और खूबसूरती स्वाभाविक रूप से दिखने लगती।

सुगना अपनी युवावस्था में जितनी सुंदर थी, आज भी उतनी ही सुंदर थी। अगर आप वर्तमान में श्वेता तिवारी को जानते हैं, तो उसकी फिटनेस की तुलना सुगना की फिटनेस से की जा सकती है। कुल मिलाकर, सुगना अब भी बेहद आकर्षक थी, पर उसने अपनी इच्छाओं और वासना पर पूरी तरह नियंत्रण पा लिया था।

सोनू के साथ जो रंगरलिया उसने मनाई थी, अब वह उन्हें याद भी नहीं करना चाहती थी। पिछले कई वर्षों से उसने सोनू से दूरी बनाए रखी थी। सोनू भी यह बात भली-भांति जानता था कि अब वह दिन लौटकर नहीं आएंगे। पर सोनू और सुगना में प्यार और सम्मान अब भी था।

सरयू सिंह की मृत्यु के बाद सुगना की वासना पर जो ग्रहण लगा था, वह अब तक कायम रहा। सोनू अपनी उम्मीदें छोड़ चुका था, और सुगना अपने नए व्यक्तित्व और रूप के साथ हवेली में सोनू के साथ रह रही थी।

सूरज के अंगूठे की चोट का आज दूसरा दिन था। हल्दी-चूने के लेप ने निश्चित ही फायदा किया था और सूजन कुछ कम हो गई थी। सुगना ने आज भी नया लेप बनाकर सूरज के अंगूठे पर लगा दिया।

शाम होते-होते सोनी और विकास भी हवेली आ चुके थे। सूरज सबका दुलारा था। उसके हाथ में सफेद पट्टी देखकर सोनी दौड़ती हुई उसके पास आई। उसने सूरज के हाथ अपने हाथों में लेकर उसकी आँखों में झाँकते हुए पूछा,

“सूरज, यह क्या हुआ?”

“कुछ नहीं मौसी, बस थोड़ी-सी चोट लग गई थी,” सूरज ने मुस्कराकर कहा।

तभी रसोईघर से सुगना बाहर आई और बोली,

“अरे , कॉलेज में कुछ बदमाश बच्चों से इसकी लड़ाई हो गई थी, तभी हाथ में चोट लग गई।”

सूरज के अंगूठे को ध्यान से देखते हुए सोनी ने पूछा,

“दीदी, आपने इसमें क्या लगाया है?”

“कुछ नहीं, बस हल्दी-चूने का लेप लगाया है। कल से सूजन कम हो रही है। एक-दो दिन में ठीक हो जाएगा,” सुगना ने विश्वास से कहा।

“दीदी, मेरे पास सूजन की एक अच्छी दवा है। अगर लगा दें तो जल्दी आराम मिल जाएगा,” सोनी ने कहा।

प्राकृतिक उपचारों पर सुगना का भरोसा अब भी अडिग था। उसने हल्के स्वर में कहा,

“अच्छा ठीक है, पहले फ्रेश हो जा। रात में सोते समय लगा देना।”

सोनी ने सुगना की बात मान ली।

अचानक वह उठी और अपने साथ लाई थैली से एक सुंदर-सी जींस और टी-शर्ट निकालकर सूरज को देते हुए बोली,

“हैप्पी बर्थडे टू यू, सूरज!”

सूरज खुशी से खिल उठा। । नीली जींस और सफेद टी-शर्ट सचमुच बहुत खूबसूरत थी। उसने सोनी के हाथ चूमे, फिर झुककर अपने बाएँ हाथ से उनके पैर छुए और खुशी-खुशी बोला,

“थैंक यू, मौसी।पर मौसी मेरा जन्मदिन तो कल है।”

“कोई बात नहीं आज यह रख ले कल एक और खूबसूरत उपहार दूंगी”

एक और खूबसूरत उपहार सोनी ने यह बात बिना सोचे समझे कही थी पर नियति ने उसके शब्द पकड़ लिए और उसके चेहरे पर एक कामुक मुस्कान दौड़ गई….

कुछ होने वाला था सूरज की किस्मत पलटने वाली थी…उसकी मायूसी खुशी में बदलने वाली थी…

 
भाग 157

“हैप्पी बर्थडे टू यू, सूरज!”



सूरज खुशी से खिल उठा। । नीली जींस और सफेद टी-शर्ट सचमुच बहुत खूबसूरत थी। उसने सोनी के हाथ चूमे, फिर झुककर अपने बाएँ हाथ से उनके पैर छुए और खुशी-खुशी बोला,

“थैंक यू, मौसी।पर मौसी मेरा जन्मदिन तो कल है।”

“कोई बात नहीं आज यह रख ले कल एक और खूबसूरत उपहार दूंगी”

एक और खूबसूरत उपहार सोनी ने यह बात बिना सोचे समझे कही थी पर नियति ने उसके शब्द पकड़ लिए और उसके चेहरे पर एक कामुक मुस्कान दौड़ गई….

कुछ होने वाला था सूरज की किस्मत पलटने वाली थी…उसकी मायूसी खुशी में बदलने वाली थी…



अब आगे..

युवाओं में जन्मदिन का उत्साह देखने लायक होता है। सूरज भी इससे अछूता नहीं था। अंगूठे की चोट की पीड़ा को भुलाकर वह सोनी द्वारा लाए गए कपड़ों को उत्साह से अपने बदन पर पहनकर देखने लगा। अंगूठे की पीड़ा इसमें आड़े आ रही थी पर उत्साह कायम था। कपड़े न केवल बेहद खूबसूरत थे, बल्कि उनकी चमक से अंदाज़ा लगाया जा सकता था कि वे महंगे भी होंगे। सोनी का यह स्नेह सूरज के चेहरे पर मुस्कान ले आया। सच तो यह था कि केवल सोनी ही नहीं, घर का हर सदस्य सूरज को बेहद प्यार करता था। वह घर का सबसे होनहार बेटा था और कुछ ही समय में डॉक्टर बनने वाला था। डॉक्टर बनना पूरे परिवार के लिए सिर्फ एक उपलब्धि नहीं, बल्कि गर्व और सम्मान की बात थी।

उधर शाहिद जिसने सूरज पर हाथ उठाया था पूरे परिवार के लिए अब एक तरह का विलेन बन चुका था। लेकिन राजा, जो उम्र में सूरज से छोटा जरूर था, उसने शाहिद से बदला लेने की ठान ली थी। उसका बदमाशी में अंदाज़ ऐसा था जैसे वह खुद गैंग ऑफ़ वासेपुर के नवाजुद्दीन सिद्दीकी की तरह किसी बड़े खेल का हिस्सा हो।

इस बीच, सूरज अपने आने वाले कल अपने जन्म दिन के बारे में सोच रहा था। कल उसे समय निकालकर रोज़ी से भी मिलना था। एक तरफ वह अपनी मर्दानगी पर लगे सवालों को लेकर झिझक महसूस करता था, लेकिन अब धीरे-धीरे वह रोज़ी के लिए कुछ खास महसूस करने लगा था।

घर में सभी कल सूरज के जन्मदिन की तैयारियों के बारे में बात कर रहे थे। सुगना, हमेशा की तरह, सूरज के लिए तरह-तरह के व्यंजन बनाने में व्यस्त थी, और पूरा परिवार बड़े उत्साह और आनंद के साथ इसका इंतजार कर रहा था। सूरज परिवार के लिए सिर्फ एक बेटा ही नहीं, बल्कि घर की खुशी और ऊर्जा का केंद्र भी था।

कल शाम को, घर में एक पारिवारिक पार्टी होने वाली थी। कुछ मेहमान भी इसमें शरीक होने वाले थे। पूरे घर में खुशियों की हलचल थी—हँसी, बातचीत और व्यंजनों की खुशबू से माहौल भर गया था। सूरज अपने कमरे में बैठा थोड़ी-सी घबराहट और उत्साह के मिश्रित भाव के साथ सोच रहा था कि कल का दिन कितना खास होने वाला है।

डिनर के बाद हॉल में हल्की पीली रोशनी फैली हुई थी। टीवी बंद था, मगर घर में अपनापन और हँसी तैर रही थी। सूरज सोफ़े पर सबके बीच बैठा था। उसका जादुई अंगूठा कपड़े के पीछे हल्दी के लेप में लिपटा हुआ, जैसे चुपचाप अपनी ऊर्जा वापस बुला रहा हो। सूरज न जाने क्या सोच कर मुस्कुरा रहा था।

मालती की नज़र सीधे सूरज पर टिक गई।

मालती:

“सूरज, क्या हुआ क्यों मुस्कुरा रहे हो”

सूरज:

(हल्की हँसी के साथ)

“कुछ नहीं दीदी, बस थकान है।”

मालती ने भौंहें उठाईं।

मालती:

“थकान से आदमी मुस्कुराता है क्या?”

सामने कुर्सी पर बैठे विकास (जो सभी युवाओं का मौसा था ) ने गला साफ़ किया और मुस्कुराते हुए बोला—

“अरे मालती, छोड़ो उसे। ये उम्र ही ऐसी होती है वैसे भी कल उसका जन्मदिन है कुछ सपने संजो रहा होगा।”

सूरज ने राहत की साँस ली, मगर वो ज़्यादा देर की नहीं थी।

“ आप ही बताइए… क्या आपको भी नहीं लग रहा कि इसमें कुछ चल रहा है?” मालती ने राजू की तरफ देखते हुए कहा। राजू और मालती के बीच खिचड़ी पक रही थी अपितु यह कहा जाए कि पक चुकी थी पर इसका अंदाजा परिवार में किसी को नहीं था।

राजू:

(हँसते हुए)

“लग तो रहा है। आँखों में चमक है और होठों पर मुस्कुराहट। ये सब बिना वजह नहीं आता।”

सूरज झेंप गया।

सूरज:

“राजू भैया, आप भी दीदी की तरफ़ हो गए।”

राजू:

“मैं किसी की तरफ़ नहीं हूँ , बस ज़िंदगी की तरफ़ हूँ। जब दिल किसी को पसंद करने लगे, तो आदमी थोड़ा बदल ही जाता है।”

हॉल में हल्की हँसी गूंज गई।

छोटा भाई राजा चुटकी ले बैठा—

“मतलब पक्का कुछ है!”

मालती ने मौका नहीं छोड़ा।

“तो नाम तो बता दो कम से कम।”

सूरज कुछ पल चुप रहा। फिर बोला—

सूरज:

“अभी नाम लेने का वक्त नहीं आया है।”

सूरज ने रीमा की तरफ देखा। रीमा लाली की पुत्री थी और वह सूरज को मन ही मनपसंद करती थी यद्यपि सूरज उस उम्र में थोड़ा छोटा था परंतु फिर भी वह सूरज को चाहती थी।

सुगना रसोई से आवाज़ देती हैं—

“अब बस करो तुम लोग। कल उसका जन्मदिन है। उसे तंग मत करो।

मालती मुस्कुरा कर पीछे हट गई।

अब हाई कमान का आर्डर आ चुका है कोई सूरज भैया को छेड़ेगा नहीं। छोटी मधु ने खड़े होकर सबको नसीहत दी और सबको अंताक्षरी खेलने के लिए आमंत्रित कर लिया।

सूरज ने हल्की मुस्कान के साथ अपने लिपटे हुए अंगूठे को देखा उसे बार-बार ही महसूस हो रहा था कि कल उसकी दिनचर्या में इस अंगूठे का कितना अहम रोल था। आज पेंट पहनते समय उसे काफी दिक्कत हुई थी और कल तो दिन भर उसे इस दर्द के साथ ही रहना था।

रात के 11:00 बज चुके थे। सोनी सुगना भी बच्चों के साथ बातें कर रहे थे। कुछ लोग अभी भी उत्साह में थे, कुछ जम्हाईया ले रहे थे पर इस सजी हुई महफ़िल से हटने को कोई तैयार नहीं था। और जाए भी कैसे? सबका प्रिय सूरज, बस एक घंटे बाद, अपने जन्मदिन की शुरुआत करने वाला था। सभी उसे “हैप्पी बर्थडे” कहने का इंतजार कर रहे थे।

बातचीत कभी सोनी और विकास की अमेरिका यात्रा पर जाती, युवाओं के अमेरिका को लेकर उत्साह स्वाभाविक रूप से था। कभी सुगना और लाली सलेमपुर और सीतापुर की पुरानी यादों में खो जाती, और कभी बच्चे सरयू सिंह की अकाल मृत्यु के बारे में जानना चाहते। पर हमेशा की तरह, सुगना ऐसे सवालों को टाल देती। कभी-कभी वह दुखी भी हो जाती और सभी को यह एहसास दिलाती कि कुछ बातें ना पूछना ही बेहतर है।

लोग जितना सूरज से प्यार करते थे, उससे ज्यादा सुगना का सम्मान। यद्यपि यह हवेली सोनी और विकास की थी, लेकिन घर में सबसे अधिक सम्मान सुगना का ही था। वह घर की मालकिन तो न थी पर मुखिया अवश्य थी। सुगना की बात सभी के लिए मान्य थी, और क्यों नहीं—वह सबका उतना ही ख्याल रखती थी, चाहे वह सूरज हो या परिवार का सबसे दुष्ट बेटा, राजा। राजा भी जानता था कि वह गलत है, पर सुगना के प्यार की वजह से वह भी सहज और शांत महसूस करता था।

महफ़िल में हँसी, यादें और बातचीत का सिलसिला चलता रहा। हर कोई, चाहे बड़ा हो या छोटा, अपने अपने अनुभवों और भावनाओं में खोया था। लेकिन सबके दिलों में एक बात तय थी सूरज सबका प्यारा था और अपनी मां सुगना की जान था।

की सुइयाँ धीरे-धीरे बारह बजने को तैयार थीं। कुछ सेकंड पहले ही बच्चों का उत्साह शिखर पर था। सभी उठकर एक साथ “10… 9… 8… 7…” चिल्लाने लगे। आवाज़ धीरे-धीरे तेज़ होती गई और आखिरकार

“हैप्पी बर्थडे टू यू,

हैप्पी बर्थडे टू यू”

की गूंज के साथ सभी ने सूरज को बारी-बारी से गले लगाया।

छोटी मधु ने बड़े भाई के पैर छुए। छोटा राजा भागकर फ्रिज से बड़ा-सा केक निकाल लाया और थोड़ी ही देर में सूरज ने उस खूबसूरत केक को काटा। हमेशा की तरह केक पर पहला हक उसकी माँ का था। सुगना ने बेहद प्यार से सूरज के माथे को चूमा। दूसरा केक उसने अपनी सोनी मौसी को खिलाया और फिर धीरे-धीरे सभी बड़ों को बारी-बारी से केक खिलाया। सबसे आख़िर में उसने अपनी छोटी बहन मधु को केक खिलाया।

नियति मुस्कुराते हुए सूरज और मधु दोनों को साथ देख रही थी। उन्हें साथ देखकर नियति एक बार फिर विधाता को याद कर रही थी, जिन्होंने उनके भाग्य में न जाने क्यों वह लिख दिया था, जो निश्चित ही एक पाप था।

बहरहाल, धीरे-धीरे सूरज के जन्मदिन का यह छोटा-सा सेलिब्रेशन समाप्त हुआ और सब अपने-अपने कमरों में जाने लगे। सुगना, सोनी और सूरज अब सूरज के कमरे में आ चुके थे। सुगना और सोनी ने सूरज को बहुत प्यार किया और उसे ढेर सारी शुभकामनाएँ दीं। सुगना के ज़ेहन में अब भी सूरज की शारीरिक कमी का ख्याल घूम जाता था, और वह दुखी हो जाती थीं। आज सूरज 21 वर्ष का हो चुका था।

कुछ देर और बातचीत करने के बाद सुगना और सोनी दोनों ने एक बार फिर सूरज को शुभकामनाएँ दीं, उसके माथे पर हाथ फेरा और अपने-अपने कमरों की ओर चल पड़ीं।

अभी सुगना और सोनी हाल में ही पहुँची थीं कि सूरज ने अंदर अपने लिहाफ़ को ऊपर खींचने की कोशिश की और गलती से अपने चोटिल अंगूठे का सहारा ले लिया। सूरज के मुँह से एक हल्की-सी कराह निकल गई।

सुगना और सोनी वापस सूरज के कमरे में आ गईं। सूरज उनके आने का कारण समझ गया। उसने गर्दन बाहर निकालकर कहा,

“अरे, कोई बात नहीं। अंगूठा लिहाफ़ से टकरा गया था।”

सोनी को अचानक अपनी उस दवा की याद आ गई, जो सूरज के अंगूठे पर लगानी थी। उसने कहा,

“दीदी, आप जाकर सो जाइए। मैं सूरज के अंगूठे पर वह दवा लगा दूँगी। मुझे विश्वास है इससे दर्द में ज़रूर राहत मिलेगी।”

सुगना ने भी साथ रुकने की बात कही, तो सोनी बोली,

“दीदी, आप पूरी तरह थक चुकी हैं। रसोई में इतने पकवान बनाना कोई आसान काम नहीं होता। आपको आराम करना चाहिए, दवा मैं लगा दूँगी।”

सोनी ने सुगना के कंधे थामकर उसे धीरे-धीरे उसके कमरे की ओर भेज दिया। सुगना और सोनी का आपसी स्नेह इस उम्र तक भी बना हुआ था।

कुछ देर बाद सोनी दवा लेकर सूरज के कमरे में पहुँची।

नियति, सोनी और सूरज को एक साथ देखकर मुस्कुरा रही थी। सोनी ने अपने शुरुआती दिनों में नर्स के रूप में काम किया था, इसलिए उसे चिकित्सा का कुछ ज्ञान था। आज नर्स सोनी, डॉक्टर बनकर सूरज के अंगूठे पर मलहम लगाने आई थी।

जैसे ही सोनी ने सूरज के अंगूठे की पट्टी हटाई, चूने और हल्दी का सूखा लेप भी पट्टी के साथ निकल आया। हल्दी का थोड़ा-सा अंश अब भी अंगूठे पर लगा था। सोनी ने अपनी कोमल उँगलियों से उसे धीरे-धीरे साफ़ किया।

सूरज को एक अजीब-सी अनुभूति हुई, जैसे अंगूठे में हल्का-सा करंट दौड़ गया हो। सोनी ने अपनी उँगलियों पर मलहम निकाला और सूरज के अंगूठे पर लगा दिया। जैसे ही उसने अंगूठे को अपने अंगूठे और तर्जनी के बीच लेकर हल्के से सहलाया, सूरज के पूरे शरीर में फिर एक सिहरन-सी दौड़ गई।

अचानक सूरज ने महसूस किया कि उसके लिंग में हलचल हो रही।

लिंग की रक्त कोशिकाओ में रक्त प्रवाह अचानक तेज हो गया था सूरज के लिंग में अचानक तनाव आना शुरू हो गया था सूरज आश्चर्यचकित था। जैसे-जैसे सोनी सूरज के अंगूठे को सहलाए जा रही थी वैसे वैसे सूरज के लिंग का तनाव बढ़ता जा रहा था यह तनाव सुखद था। लिंग में तनाव आना वैसे भी सुखद अनुभूति देता है। सूरज ने सोनी से नजर बचाकर अपना दूसरा हाथ लिहाफ के अंदर ले जाकर इस आश्चर्य को महसूस करना चाहा।

सूरज का लंड तनकर खड़ा हो चुका था। सूरज के लिंग में आशातीत वृद्धि हुई थी और शायद इसी कारण सूरज को अपना हाथ लिहाफ के अंदर ले जाना पड़ा था।

सोनी ने सूरज के हाथों की हलचल उसकी जांघों के बीच देख ली लिहाफ सूरज की इस हरकत को छुपा पाने में नाकाम रहा था।

सोने की उंगलियां रुक गई और सूरज ने सोने की आंखों को अपनी कमर की तरफ देखते हुए देख लिया।

सूरज झेंप गया परंतु उसने स्थिति संभाली और बोला…मौसी यह कौन सा मलहम है

सोनी ने अपने दूसरे हाथ से मलहम का डिब्बा सूरज की ओर दिखाई परंतु अब भी वह चिंतित थी बचपन में सूरज के अंगूठे को सहलाए जाने से होने वाली प्रतिक्रिया उसे याद आ रही थी हे भगवान …कहीं वह सच तो नहीं। सोनी का कलेजा धक-धक करने लगा उसे एक अनजाना डर सताने लगा उसके हाथ रुक गए सूरज ने फिर एक बार उसका ध्यान अपनी और खींचा।

“मौसी यह अंगूठे के पीछे ज्यादा मलहम लगा है इसे फैला दीजिए।”

सोनी ने अनमने ढंग से उसे मलहम को चारों तरफ बराबरी से लगा दिया और सूरज के लिंग का तनाव और आकार को और भी ज्यादा बढ़ा दिया।

लिंग के तनाव का असर सूरज के चेहरे पर भी दिखाई पड़ने लगा उसका मासूम चेहरा वासना से तमतमा उठा था। सोनी को पक्का यकीन हो गया की निश्चित ही बचपन की वह घटना आज दोबारा रिपीट हो चुकी है उसने सूरज का हाथ छोड़ दिया और हड़बड़ी में वहां से उठते हुए बोली..

अब सो जाओ एक बार फिर हैप्पी बर्थडे टू यू

सोनी ने धड़कते हुए कलेजे के बावजूद अपने होठों पर मुस्कुराहट लाई और सूरज के कमरे से बाहर निकल गई जाते समय उसने दरवाजा बंद कर दिया।

सोनी को बचपन की बातें पूरी तरह याद आ चुकी थी इस तनाव का निदान क्या था उसे यह भी याद आ चुका था। क्या उसे अपने होंठ सूरज के…. हे भगवान नहीं नहीं ऐसा नहीं हो सकता। जितना ही वह इस बारे में सोचती उतना ही उसका दिल घबराने लगता। अपने मन में घबराहट और तेज धड़कनों के साथ सोनी बिस्तर पर आ चुकी थी पर दिमाग में वही बातें घूम रही थी।

उधर अपनी मौसी सोनी के जाने के बाद सूरज बिस्तर पर से उठा उसने दरवाजा लॉक किया और वापस बिस्तर पर आकर अपने लंड को आजाद कर दिया। लंड अंडरवियर से बाहर आते ही उछलकर खड़ा हो गया।

सूरज अपने खड़े लंड को देखकरआश्चर्यचकित था। इतना सुंदर लंड तो उसने पोर्न वेबसाइट पर भी नहीं देखा था। लगभग 2 इंच व्यास और आठ इंच लंबी कद काठी का वह लंड एक खूबसूरत सुपड़ा लिए हुए था। जो उसकी खूबसूरती को और भी बढ़ा रहा था। लंड पर तनीहुई उभरी नसें यह साबित कर रही थी की यह न सिर्फ कसरत्ती है अपितु कसरत करने के लिए ही बना है।

सूरज ने अपने हाथ से उसे सहलाने की कोशिश की यह अनुभूति अनुपम थी विशिष्ट थी। आज पहली बार अपने जीवन में वह अपने खड़े लंड को सहला रहा था। सूरज आनंद के सागर में गोते लगाने लगा। किसी युवा द्वारा अपने लंड को सहलाना स्वतः ही उत्तेजना और कल्पनाओं को जन्म देता है।

सूरज को अपने लंड को सहलाने बेहद मजा आ रहा था और हो भी क्यों ना सूरज की कल्पनाएं परवान चढ़ने लगी उसे रोजी का ध्यान आया…

उसने अपना मोबाइल उठाया ..

रोजी का मैसेज मोबाइल पर आया हुआ था

हैप्पी बर्थडे माय लव…

सूरज ने उसे थैंक यू नोट भेजा। वह चाहता तो था कि अपने खड़े लंड को एक बार रोजी को दिखाएं और अपनी मर्दानगी साबित करे पर यह संभव नहीं था। फिर भी उसने अपने मोबाइल से अपने खड़े लंड की फोटो ली और उसे अपने मोबाइल में छुपा लिया।

रोजी सुबह-सुबह के लिए रोज पार्क में जाती थी वह पार्क सूरज की हवेली से ज्यादा दूर नहीं था अचानक सूरज के दिमाग में कुछ आया और उसने रोजी को एक बार फिर मैसेज किया।

कल जॉगिंग के लिए जाओगी क्या?

उधर रोजी अब तक सो चुकी थी जवाब आने की उम्मीद नहीं थी सूरज ने मोबाइल किनारे रख दिया और अपनी जांघों के बीच खिले हुए फूल को अपनी हथेली से पड़कर एक बार फिर निहारने लगा।

सूरज अपने लंड को बड़े प्रेम से सहला रहा था कभी वह उसके ऊपर उभर रही सांप जैसी नसों को छूता कभी उसके सुपाड़े के पीछे उस अति संवेदनशील जगहों को। हर बार उसके शरीर में एक सुखद अनुभूति होती जैसे-जैसे सूरज अपने लंड को सहलाता गया वासना अपने आयाम बढ़ाती गई वह बार-बार रोजी को नग्न और नग्न करने की कोशिश करता परंतु यह कठिन था दरअसल इसके पूर्व सूरज ने कभी भी अपनी वासना को फलीभूत नहीं किया था।

वैसे भी जब लंड में तनाव ही ना हो तो कामुक कल्पनाओं का क्या फायदा। पर आज स्थितियां अलग थीं

सूरज ने अपनी वासना के तूफान को और हवा दी लंड सूरज की हथेलियों द्वारा मसला जा रहा था…उत्तेजना ने उत्कर्ष प्राप्त किया और सूरज के लंड से वीर्य की धार फूट पड़ी आह…..मौ…सी………..

सूरज का लंड लगातार वीर्य उगलता रहा और सूरज के लिहाफ पर उसके छींटे गिरते रहे…

सूरज के लिए हस्तमैथुन का यह पहला अनुभव था जितना सुख उसने आज महसूस किया था यह अनोखा था अद्भुत था सूरज को उसके जन्मदिन का उपहार मिल चुका था…

सूरज कुछ देर उसी स्थिति में रहा अपने लंड का यह रूप उसके लिए अनोखा था वह मर्दानगी से भरा हुआ था। सूरज का स्वाभिमान आज अपने चरम पर था अब तक उसने अपने लंड में तनाव न आने को लेकर जितनी चिंता की थी एक पल में ही वह सब खुशियों में बदल गया था।

सूरज ने अपने लंड की तरफ देखा वह अब भी वैसे ही तना हुआ था। सूरज ने अब तक जो पढ़ाई की थी या जो समझा था उसके अनुसार वीर्य स्खलन के बाद लंड को वापस सामान्य स्थिति में आ जाना चाहिए था परंतु लंड का तनाव यथावत था।

सूरज ने उसे वापस अंडरवियर में कैद करने की कोशिश की परंतु यह कठिन था। सूरज को यकीन ही नहीं हो रहा था कि ऐसा कैसे हो सकता है उसने इधर-उधर ध्यान भटकाया पर स्थिति जस की तस थी। लंड का तनाव कम होने का नाम ही नहीं ले रहा था। सूरज तने हुए लंड के साथ सूरज अब असहज महसूस करने लगा।

पर इन खुशियों को साझा करने वाला कोई भी ना था उसे अचानक रोजी का ध्यान आया। उसने मोबाइल उठाया पर रोजी का कोई मैसेज नहीं था।

सूरज ने एक बार फिर अपने इतने हुए लंड को अपना हाथों से सहलाना शुरू किया और कुछ ही देर की मेहनत के पश्चात एक बार फिर वीर्य स्खलन करने में कामयाब रहा परंतु जिस उद्देश्य के लिए यह किया गया था उसमें आनंद कम और लिंग का तनाव घटना प्राथमिकता थी। पर दुर्भाग्य दोबारा वीर्य स्खलन होने के बावजूद लिंग का तनाव कम न हुआ।

सूरज पूरी तरह थक चुका था लगातार दो बार हस्तमैथुन कर उसका शरीर शिथिल पड़ चुका था परंतु लिंग वैसे ही तनाव हुआ था सूरज की धड़कनें बढ़ी हुई थी उसने लिहाफ अपने बदन पर डाला और अपना ध्यान उसे तने हुए लिंग से हटाने की कोशिश की पर शायद यह संभव नहीं था जब लिंग में तनाव चरम पर होता है मनुष्य को और कुछ नहीं सोचता है आप अपना ध्यान चाह कर भी नहीं हटा सकते यही स्थिति सूरज की थी रात के दो बज चुके थे और सूरज अब भी अपनी खुशियों से जूझ रहा था। थकावट से कभी उसकी आंखें नींद से बोझिल होती परंतु उसके लंड का तनाव उसे सोने नहीं दे रहा था।

सुबह के 5:00 बज चुके थे अचानक मोबाइल पर ट्रिंग की आवाज हुई। सूरज ने मोबाइल उठाया यह रोजी का ही मैसेज था

हां आ रही हूं क्यों पूछ रहे हो

मैं भी आ रहा हूं सूरज ने रिप्लाई किया

अरे वह तो बर्थडे बॉय से सुबह-सुबह ही मुलाकात होगी चलो मैं तैयार होकर आता हूं सी यू

रोजी का मैसेज स्पष्ट था दोबारा रिप्लाई करने की जरूरत नहीं थी सूरज भी बिस्तर से उठा उसकी आंखें नींद पूरी नहीं होने की वजह से लाल थी पर लंड अभी उसी तरह तना हुआ था।

सूरज ने बड़ी मुश्किल से अपनी नित्य कर्म निपटा ए तने हुए लंड की वजह से उसे कई दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है वह तैयार हुआ बड़ी मुश्किल से लैंड को अपने पेट में कैद करने की कोशिश की पर उसका आकार और तनाव छुपाने लायक नहीं था सूरज ने सबसे ढीली डाली शर्ट पहनी और उसके ऊपर एक आवरण सा दे दिया।

एक तरफ सूरज के मन में खुशी थी कि उसके लंड में आज पहली बार तनाव आया था पर लगातार तनाव ने उसके मन में चिंता की लकीरें डाल दी थी।

सूरज ने अपनी मोटरसाइकिल उठाई और कुछ ही देर में रोजी के पास पार्क में पहुंच गया रोजी उसका इंतजार कर रही थी रोजी ने उसे एक खूबसूरत सा फूल दिया और बोला

Happy b day to you ..हमेशा इस फूल की तरह ही हंसते मुस्कुराते रहना

सूरज ने अपनी बाहें खोल दी और रोजी सूरज से सटती चली गई। सूरज की मजबूत बाहों ने रोजी को अपने आगोश में ले लिया दोनों प्रेमिका एक दूसरे से बेहद करीब आ गए। सूरज ने अपने हाथ से रोजी की कमर को सहारा देकर अपनी ओर खींचा और पहली बार रोजी ने अपने नाभि के नीचे एक तने और कठोर अंग को महसूस किया यह निश्चित ही सूरज का तनाव हुआ था। रोजी सहम गई उसने सर उठाकर सूरज के चेहरे की तरफ देखा सूरज ने पहले तो उसके माथे को चुम्मा और धीरे-धीरे उसके होंठ रोजी के होठों से सट गए।

चुंबनों की प्रगाढ़ता बढ़ती गई और रोजी की मन में कुछ हलचल होने लगी। अचानक रोजी ने अपना हाथ नीचे किया और सूरज के लंड में आए इस तनाव को महसूस करने की कोशिश की। रोजी की कोमल हथेलियां सूरज के लंड को पेट के ऊपर से ही महसूस कर रही थी। लंड का आकार और तनाव दोनों ही रोजी को आश्चर्यचकित कर रहा था। वह एक तरफ शर्मा भी रही थी दूसरी तरफ इस तनाव को देखकर खुश भी हो रही थी। सूरज की मर्दानगी को लेकर जो प्रश्न उसके अंतर्मन में पिछले कुछ दिनों से उठ रहे थे वह सब अचानक ही शांत हो गए थे। सूरज एक पूर्ण मर्द की भांति उसके समक्ष उपस्थित था रोजी ने सूरज के चुंबनों का प्रति उत्तर और भी आत्मीयता से देना शुरू कर दिया तथा अपनी हथेली से उसके लंड को दबाकर और सहलाकर उसका जायजा लेने की कोशिश की सूरज ने उसका हाथ पकड़ लिया और उससे अलग होते हुए बोला

अरे यह पब्लिक प्लेस है कंट्रोल करो…

दोनों मुस्कुराने लगे सूरज ने अपने शर्ट ठीक की और दोनों पार्क में तरह-तरह की बातें करते हुए घूमने लगे परंतु आज खुशियों का दिन था सूरज के लिंग के तनाव ने न सिर्फ सूरज को शहीद कर दिया था बल्कि अब रोगी के मन में भी तंगी फूटने लगी थी सूरज जैसे मर्द को अपनी जिंदगी में पाकर वह बेहद प्रसन्न थी बेहद खुश थी…

आज कॉलेज आओगे क्या ? रोजी ने पूछा

नहीं आज तो मुश्किल है आज बर्थडे मना लेते हैं

सूरज ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया। सुबह के 6:30 बज चुके थे जॉगिंग का टाइम पूरा हो चुका था अब बिछड़ने का वक्त था। बिछड़ते वक़्त सूरज और रोजी एक बार फिर आलिंगन बद्ध हुए। सूरज मैं एक बार फिर रोजी को चूमने की कोशिश की रोजी ने उसे निराश ना किया इस बार उसने फिर सूरज के लंड पर हाथ लगाने की कोशिश की और उसके आश्चर्य का ठिकाना ना रहा लंड पूरी तरह तना हुआ था…

रोजी को यह यकीन ही नहीं हो रहा था कि यह तुरंत ही कैसे खड़ा हो गया था.. वह तुरंत सूरत से अलग हुई और बोली..

आज तो छोटे मियां पूरे जोश में दिखाई पड़ रहे हैं उसकी आंखों ने नीचे झुक कर सूरज को उसकी बात पूरी तरह समझा दी.. सूरज मुस्कुरा कर रह गया.

उसे सूरज की स्थिति का ज्ञान नहीं था यह तनाव अब सूरज के मानसिक तनाव का कारण बन चुका था।

सूरज वापस घर आ चुका था अभी भी घर में सब सो ही रहे थे सिर्फ सुगना और सोनी जगे हुए थे और हवेली के खूबसूरत हाल में चाय पी रहे थे। सूरज को अंदर आते देख सुगना खुश हो गई। सुगना ने सूरज को अपने पास बुलाया और बगल में बैठा लिया। सूरज सकुचा रहा था उसने अपनी शर्ट ठीक की बने हुए लंड को यथासंभव छुपाने की कोशिश की पर सामने बैठी अपनी मौसी से छुपा पाने में नाकाम रहा। सोनी की यह बेहद असहज लगा ऐसा लग रहा था जैसे सूरज में अपनी पेट में कोई बड़ा खीरा छुपाया हुआ हो…

आ बैठ …अरे इतनी सुबह-सुबह कहां चले गए थे…

सुगना ने सूरज के माथे पर प्यार से हाथ फिरते हुए कहा

कुछ नहीं थोड़ा टहलने का मन कर रहा था बाहर ही घूम रहा था।

यह तेरी आंखें लाल क्यों है नींद नहीं आई क्या? सुगना ने सूरज की आंखों में लाल डोरे देखते हुए कहा…

सूरत हड़बड़ा गया यह लाल डोरे कुछ तो अनिद्रा की वजह से और कुछ सूरज के तने हुए लंड की वजह से भी..

कुछ नहीं मां सब ठीक है मुझे भी चाय पीनी है सूरज ने बात टालते हुए कहा

ठीक है मैं लेकर आती हूं।

सुगना रसोई में चाय लेने चली गई इधर सोनी ने सूरज को असहज देखकर अपने सोफे से उठकर सूरज के पास आ गई और उसकी हाथों को अपने हथेली में लेकर सहलाते हुए बोली।

क्या हुआ बर्थडे बॉय आज टेंशन में क्यों है?

कुछ नहीं मौसी सब ठीक है बस थोड़ा नींद डिस्टर्ब हुई थी..

सूरज ने बात टालने की कोशिश की..

क्यों क्या हो गया? …सोनी ने सूरज की आंखों में आंखें डालते हुए पूछा।

सूरज ने कुछ नहीं कहा अपनी गर्दन झुका ली

मुझे कुछ नहीं बोलना..

तभी सोनी ने सूरज के टूटे हुए अंगूठे को अपनी कोमल उंगलियों से सहलाते हुए पूछा

और अंगूठे का दर्द कैसा है?

सोने की अंगूठा सहलाए जाने से सूरज के लंड में एक और तेज करंट दौड़ी और उसके लंड का तनाव और आकार और भी बढ़ गया…

सूरज के मुंह से कराह निकल गई…

सूरज ने अपना अंगूठा सोनी के हाथ से खींच लिया और बोला

मौसी अब बस..

यह कराह अंगूठे के दर्द की वजह से नहीं थी अपितु लंड में आए बेहद तनाव की वजह से थी।

सूरज ने अपना हाथ नीचे किया और तनाव से फट रहे लंड को अपने पैंट में और जगह देने की कोशिश की।

सूरज के शर्ट का आवरण हटते ही सोनी ने सूरज के पेट के अंदर आए उसे अप्रत्याशित उभार को देख लिया जो कतई सामान्य नहीं था। उसका आकार यह निश्चित तौर पर बता रहा था कि यह सूरज का लिंग है। लिंग… पर इतना बड़ा? सूरज तो अभी नया-नया युवा था। यह उभार अप्रत्याशित था सोनी घबरा गई। सोने के चेहरे पर हवाईया उड़ने लगी।

इतनी सुबह-सुबह अपनी मां और मौसी के पास बैठे सूरज के लंड में इतना तनाव आना अप्रत्याशित था।

अचानक उसे बचपन की वह घटना पूरी तरह याद आ गई जब वह बचपन में सूरज के अंगूठे को मजाक मजाक में सहलाया करती थी और…. फिर …. जैसे-जैसे सोनी को वह घटना याद आती गई सोने के चेहरे पर शिकन आते गई

हे भगवान मुझसे यह क्या हो गया…

सूरज अब और असहज हो चुका था वह अपने रूम में जाने के लिए उठा। तभी सुगना चाय लेकर आ चुकी थी

अरे बैठ पहले चाय पी ले.. फिर जाना..

सूरज से अपने लंड का तनाव और सहा नहीं जा रहा था फिर भी उसने अपनी मां की बात मान ली और बड़ी मुश्किल से बैठकर अपने बने हुए लंड को छुपाते हुए जल्दी जल्दी चाय पीने लगा।

उधर सोनी का कलेजा धक-धक कर रहा था उसे अब यकीन हो चला था कि सूरज के लिंग में आया हुआ तनाव निश्चित ही उसके अंगूठे सहलाए जाने के कारण हुआ था।

सोनी मन ही मन सोच रही थी पर तब तो सूरज एक बालक था अब तो तने हुए लिंग को शिथिल करने का उपाय सर्वविदित था। क्या सूरज को हस्तमैथुन के बारे में नहीं मालूम था? क्या सूरज ने इस तनाव को कम करने के लिए हस्तमैथुन नहीं किया होगा…

प्रश्न जटिल था सूरज की असहज स्थिति देखकर सोनी स्वयं परेशान हो गई थी इस प्रश्न का उत्तर जानना जरूरी था। सूरज के लिंग का तनाव कम करने का उपाय सोनी को बखूबी याद था पर ……

हे भगवान…. यह असंभव था….

पुत्र समान जवान सूरज का लंड ……चूमना……सोनी की रूह कांप उठी…अनिष्ट की आशंका से सोनी के माथे पर पसीने की बूंद चालक आई…थी…





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भाग 158

उधर सोनी का कलेजा धक-धक कर रहा था उसे अब यकीन हो चला था कि सूरज के लिंग में आया हुआ तनाव निश्चित ही उसके अंगूठे सहलाए जाने के कारण हुआ था।

सोनी मन ही मन सोच रही थी पर तब तो सूरज एक बालक था अब तो तने हुए लिंग को शिथिल करने का उपाय सर्वविदित था। क्या सूरज को हस्तमैथुन के बारे में नहीं मालूम था? क्या सूरज ने इस तनाव को कम करने के लिए हस्तमैथुन नहीं किया होगा…

प्रश्न जटिल था सूरज की असहज स्थिति देखकर सोनी स्वयं परेशान हो गई थी इस प्रश्न का उत्तर जानना जरूरी था। सूरज के लिंग का तनाव कम करने का उपाय सोनी को बखूबी याद था पर ……

हे भगवान…. यह असंभव था….

पुत्र समान जवान सूरज का लंड ……चूमना……सोनी की रूह कांप उठी…अनिष्ट की आशंका से सोनी के माथे पर पसीने की बूंद चालक आई…थी…


अब आगे..

सूरज अपने कमरे में जा चुका था उसने अपना दरवाजा बंद कर लिया। सुगना ने भी सूरज के व्यवहार में परिवर्तन महसूस कर लिया था उसके जाते ही उसने सोनी से पूछा

इसे क्या हुआ आज बर्थडे के दिन भी कुछ टेंशन में लग रहा है।

सोनी स्वयं परेशान हो गई थी पर उसने संजीदगी से कहा

मुझे नहीं पता पर लग रहा कोई न कोई बात जरूर है?

सुगना अपने पुत्र को परेशान नहीं देख सकती थी वह उठ खड़ी हुई और बोली

मैं सूरज से मिलकर आती हूं…

सोनी भी उठ खड़ी हुई तभी सोने में घड़ी की तरफ निगाह दौड़ाई सुबह के 7.15 हो चुके थे..

दीदी घड़ी देखिए आपके योगा का समय हो गया। सुगना समय की पाबंद थी वैसे भी उसकी योगा क्लास में ढेर सारे सदस्य आया करते थे सुगना को उन्हें इंतजार करना पसंद नहीं था वह समय की कद्र करती थी।

सुगना को असमंजस में देखकर सोनी ने कहा आप जाइए मैं सूरज से बात करती हूं…

सुगना मन ही मन सोचने लगी की कही सूरज आज फिर अपनी मर्दानगी की बात को लेकर तो तनाव में नहीं आ गया है। हे भगवान आपने मुझे किसी मुसीबत में डाल दिया है…

सुगना को क्या पता था कि कल रात ही उसे अपने जन्मदिन का उपहार मिल चुका था और सूरज ने अपने जीवन में पहली बार वीर्य स्खलन का आनंद भी ले लिया था। और अब जो होने वाला था वह और भी अनूठा था सुगना तैयार होकर अपनी योगा क्लास में चली गई और इधर सोनी में सूरज के दरवाजे पर दस्तक दे दी।

दो-तीन बार खटखटाने पर अंदर से सूरज की आवाज आई..

कौन है अभी जाइए मैं सो रहा हूं…

आवाज की तल्खी से व्यक्ति की मनोदशा को पहचानना एक कला होती है सोनी ने सूरज की आवाज में छपी वेदना को पहचान लिया और बोली

सूरज दरवाजा खोलो मुझे तुमसे बात करनी है।

मौसी अभी नहीं बाद में.. सूरज की आवाज में वेदना स्पष्ट थी

सोनी ने दोबारा कहा..

सूरज मुझे तुम्हारी परेशानी पता है दरवाजा खोलो..

सूरज मजबूर हो चुका था वह उठा अपने तने हुए लंड को व्यवस्थित किया और आकर दरवाजे की चटकनी खोल दी पर तुरंत ही भाग कर बिस्तर में घुस गया..

सोनी अंदर आ चुकी थी वह सूरज के पास बिस्तर पर आकर बैठकर गई..

सूरज ने लिहाफ अपनी गर्दन तक ओढ़ रखी थी और अपने दोनों घुटने ऊपर किए हुए थे जिससे लिहाफ में उसके इतने हुए लिंग पर एक मजबूत आवरण कर लिया था और लिंग का आकार पूरी तरह छुप गया था

सोनी को अब पूरी तरह यकीन हो चुका था कि लंड में आया हुआ यह तनाव निश्चित ही उसके अंगूठे के सहलाए जाने की वजह से था। अपनी बात की पुष्टि के लिए उसने एक बार चुटकी ली और बेहद संजीदा स्वर में बोली,

“सूरज, अंगूठे का दर्द कैसा है? ला, एक बार फिर मलहम लगा दूँ।”

सूरज की तो जैसे साँस हलक में अटक गई। अभी कुछ देर पहले ही, जब सोनी ने उसका अंगूठा फिर से हाथ में लिया था, तो वह तनाव से फटने की कगार पर आ गया था। अब यदि मौसी ने दोबारा अंगूठा सहलाया, तो जाने क्या होगा। यह सोचकर उसने झट से अपना अंगूठा सीने पर रखकर छुपाने की कोशिश की और बेहद हड़बड़ी में बोला,

“नहीं मौसी, अंगूठा मत छूना।”

क्यों, क्या हुआ? मैंने कुछ गलत कर दिया क्या, सूरज?”

सोनी कहती ही जा रही थी, तभी सूरज ने बीच में बात काटते हुए कहा,

“मौसी, प्लीज़… मैं वैसे ही बहुत परेशान हूँ। मुझे और परेशान मत कीजिए।”

इतना कहकर सूरज ने लिहाफ अपने चेहरे तक खींच लिया।

सोनी सूरज की वेदना समझ रही थी। उसने बेहद संजीदा स्वर में कहा,

“सूरज, मैं तुम्हारी मौसी हूँ। मौसी माँ समान होती है। तुम अपनी परेशानी खुलकर मुझे बता सकते हो। मैं कोई न कोई उपाय ज़रूर करूँगी।”

सूरज किस मुंह से यह बताता कि उसका लंड तना हुआ है और दो बार वीर्य स्खलन करने के बाद भी उसमें रंच मात्र भी तनाव कम नहीं हुआ है।

सूरज ने कोई उत्तर नहीं दिया सोनी ने फिर कहा

“ मुझसे शरमाओ मत यदि वह तुम्हारे प्राइवेट पार्ट की बात है तब भी मैंने बचपन में तुम्हें पूरी तरह नग्न देखा है वैसे भी मैं नर्स रही हूं मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता? क्या तुम्हारे प्राइवेट पार्ट में कोई दिक्कत है।

सूरज की तो जैसे हक्की बक्की गुम हो गई ।वह कुछ बोल पाने की स्थिति में नहीं था । सोनी ने फिर जिद की

“देखो बताओगे नहीं तो मैं तुम्हारी मदद कैसे करूंगी” सूरज के सब्र का बांध टूट गया उसके सुबकने की आवाज सोनी ने सुन ली। उसने लिहाफ खींचा और सूरज का उदास चेहरा और आंखों में आंसू को देखकर सोनी ने उठकर उसके माथे को चूमा और बोली

“ अब कुछ मत कहना अपनी आंखें बंद कर लो और जब तक मैं ना कहूं आंखें मत खोलना …”

सूरज कुछ कह पाने की स्थिति में नहीं था वह एक टक सोनी को देखे जा रहा था। सोनी ने अपनी उंगलियों से सूरज की पलकें बंद की और लिहाफ को एक बार फिर उसके चेहरे पर डाल दिया।

कुछ ही देर में सोनी ने लिहाफ को नीचे से पकड़ा और उसके पैरों और जांघों अनावृत्त करते हुए लिहाफ को उसके कमर तक ले आई। पेट के अंदर लंड खूंटे की भांति तना हुआ था। सूरज को लग चुका था कि अब उसका लंड उसकी नर्स मौसी की आंखों के सामने आने में चंद पलों की देरी थी।

अब कोई चारा न था। वह चुपचाप बुद्धू बन पड़ा रहा बस एक अंतिम बार उसने सोनी को रोकने की कोशिश की

“ मौसी छोड़ दीजिए “

पर सोनी ने उसकी बात अनसुनी कर दी सोनी की उंगलियों ने पेट का हुक खोल दिया और अंडर बीयर हटाते ही अंदर से गेहुआं सांप अपना फन उठा कर बाहर आ गया। क्या खूबसूरत और प्यारा लंड था। बेदाग चिकना … नीली नसें उसकी खूबसूरती को और भी ज्यादा बढ़ा रही थी. गुलाबी सुपlड़ा खूबसूरती में होड़ लगाने को तैयार था ।

सोनी रुकी नहीं उसने सूरज के अंडरवियर को थोड़ा और नीचे कर दिया। तभी सोनी को याद आया अरे उसने दरवाजे की चटकनी तो लगाई ही नहीं। सोनी बिस्तर से उठी और जाकर सिटकनी लगाने लगी।

उधर सूरज बिस्तर पर आधा नंगा लेटा हुआ था।

सूरज ने सिटकनी लगाने की आवाज महसूस की उसका करेजा धक-धक करने लगा …

हे भगवान यह क्या हो रहा था? परंतु सूरज के पास कोई उपाय नहीं था वह चुपचाप पड़ा रहा ।

सोनी एक बार फिर बिस्तर पर आइ और सूरज के अंडरवियर को पूरी तरह नीचे कर दिया सूरज ने यंत्रवत अपनी कमर उठाकर सोनी की मदद कर दी सोनू सूरज की पेंट और अंडरवियर दोनों जांघों तक आ चुके थे और लंड एक गन्ने की पूरी तरह तना हुआ खड़ा था सोनी उस लंड को देखकर हतप्रभ थी।

सरयू सिंह के पुत्र सूरज का लंड उनसे भी बेहतर था। उधर सूरज का लंड अब रह कर उछाल मार रहा था शायद सोनू के मन में चल रहे विचारों से लंड में यह हनक पैदा हो रही थी आखिरकार आज पहली बार सूरज का लंड किसी स्त्री के सामने नग्न हुआ था।

उधर सोनी की सांस हलक में अटक चुकी थी वह आंखें फाड़कर इस खूबसूरत और दिव्य लंड को देख रही थी। सोनी ने अब तक दो ही विशालकाय लिंग देखे थे एक तो उसे नीग्रो अल्बर्ट का दूसरा सरयू सिंह का। पर सूरज उन सब पर भारी था इतना खूबसूरत इतना दिव्य इतना मजबूत उतना ही कोमल कई विरोधाभास थे। लंड को त्वचा इतनी कोमल कि उसे पर आई नशे त्वचा को आसानी से उठा दे रही थी और अपने अस्तित्व का प्रदर्शन कर रही थी और कठोरता ऐसी जैसे वह इसका आकलन करने के लिए आकर्षित कर रहा हो।

सोनी उसे खूबसूरत लंड को अपने हाथों से महसूस करना चाहती थी मन के किसी कोने में वासना अपना फन उठा रही थी।

तभी उसकी चेतना ने उसे याद दिलाया कि जिस लंड को वह घूर रही है वह उसके पुत्र समान है। सोनी को इस लंड को शांत करने का उपाय याद आ चुका था उसने हिम्मत जुटा कर धीरे-धीरे अपने होंठ लंड के समीप ले आई।

लंड के समीप आते ही लंड से आ रही मर्दाना गंध हमने सोनी का ध्यान अपनी ओर खींचा… खुशबू मदहोश कर देने वाली थी। सोनी अपनी वासना में घिर चुकी थी..

उसके होंठ फड़कने लगे…सोनी के मन में क्या चल रहा था यह तो वही जाने परंतु जैसे ही उसने अपने होंठ सूरज के तने हुए लंड के सुपाड़े से लगाया लंड का आकार छोटा होने लगा…ऐसा लगा जैसे किसी ने गुब्बारे में छेद कर दिया हो देखते ही देखते लंड का तनाव पूरी तरह गायब हो गया और वह सामान्य स्थिति में आ गया…

सूरज ने चैन की सांस ली…वह मन ही मन बहुत खुश हो गया उसे इतना तो एहसास हुआ कि सोनी के किसी जीवित अंग ने उसके लंड को छुआ था जिसकी वजह से उसका तनाव कम हो गया था पर वह अंग कौन सा था क्या था इसका आकलन सूरज नहीं कर पाया करता भी कैसे उसकी आंखें बंद थी और चेहरे पर लिहाफ पड़ा हुआ था।

सोनी ने एक आखरी बार सूरज के लंड को दोबारा देखा जो एक मासूम और अबोध की तरह एक तरफ लटका हुआ था पर अब भी उतना ही खूबसूरत था।

सोनी ने उसे छूने की जहमत नहीं उठाई और न हीं सूरज के पेंट को ऊपर खींचने की। सोनी ने लिहाफ को ही खींचकर सूरज के अधो भाग को ढक दिया और उठकर दरवाजे के पास आ गई। उसने सिटकनी खोली और निकलते हुए बोली ..

सॉरी सूरज गलती मेरी ही थी …थोड़ी देर आराम कर लो फिर बात करेंगे…

सूरज को यह सारा माजरा समझ नहीं आ रहा था। पर वह सुकून की सांस ले रहा था।

इधर सूरज सुकून की सांस ले रहा था उधर सोनी का दिल अभी धड़क रहा था। कितना खूबसूरत था वह लंड सोनी की वासना तड़प उठी थी उसने महसूस किया कि आज कई दिनों बाद उसकी योनि में कुछ हलचल महसूस हुई थी ।

संवेदनाओं की तरंगे योनि द्वार पर अपनी सरगम छेड़ रही थी सोनी को अपने पुराने दिन याद आने लगे कभी वह कभी अल्बर्ट के बारे में सोचती कभी सरयू सिंह के बारे में। अपना आखिर अपना होता है अल्बर्ट सोनी का अपना नहीं था उससे मुलाकात कुछ घंटे की थी परंतु सरयू सिंह …उनके साथ तो सोनी की कई यादें जुड़ी हुई थी।

सोनी एक बार फिर अपनी यादों में खो गई…

जब से उसने सलेमपुर में सरयू सिंह के बक्से से अपनी लाल पैंटी को उनके वीर्य से सना हुआ पाया था इतना तो वह जान ही चुकी थी की सरयू सिंह अविवाहित अवश्य थे परंतु ब्रह्मचारी कतई नहीं थे। न जाने क्यों वह स्वयं अब उनकी उत्तेजना को जाने अनजाने बढ़ाने को तत्पर थी।

उस घटना के कुछ दिनों बाद एक दिन बनारस में सोनी सुगना के घर में ही थी। उसे सुबह-सुबह कहीं जाना था वह गुसलखाने में स्नान करने चली गई दरअसल सरयू सिंह इसी वक्त स्नान के लिए जाया करते थे। एक तो सोनी स्नान में ज्यादा वक्त लगाया करती थी । उसे अपने शरीर का ख्याल रखना बेहद पसंद था सोनी ने एक बार जब अपने वस्त्र उतारे और स्नान शुरू किया समय निकलता गया सरयू सिंह गलियारे में इधर-उधर भटक रहे थे और गुसलखाने के खाली होने का इंतजार कर रहे थे इसी दौरान सुगना ने सरयू सिंह की बेचैनी महसूस कर ली और बाथरूम के दरवाजे पर जाकर धीमी आवाज में बोली

ए सोनी जल्दी कर बाबूजी के नहाए के टाइम हो गइल बा।

गुसलखाने के अंदर नल से निकल रहा पानी बाल्टी में गिरकर आवाज कर रहा था। सोनी ने यह तो महसूस किया की सुगना कुछ कह रही है पर सुगना की आवाज स्पष्ट नहीं थी अंदर से सोनी ने नल बंद किया और आवाज दी…

क्या हुआ दीदी क्या बोल रही हो

अरे बाबूजी के नहाए के टाइम हो गइल बा तनी जल्दी कर।

ठीक बा सोनी ने फिर आवाज दी और नल चालू कर दिया।

सरयू सिंह स्नान के लिए इंतजार कर रहे हैं यह बात सोनी की रास आ गई।

अगले कुछ मिनट में सोनी ने अपना स्नान पूरा कर लिया पर अपने वस्त्र जो उसने रहने से पहले उतरे थे उन्हें धुलने का समय कम पड़ गया फिर भी उसने एक-एक करके अपने सारे वस्त्र कपड़ा धोने वाली बाल्टी में डालें पर अपनी खूबसूरत पेंटी को देखकर उसे सरयू सिंह की याद आ गई।

उसने मन ही मन कुछ सोचा और अपने बदन से उतारी हुई पेंटी को धोने की बजाय वहीं नल के ऊपर टांग दिया। सोनी मन ही मन मुस्कुरा रही थी..

वह जानबूझकर सरयू सिंह की वासना को अब भड़काने की कोशिश कर रही थी।

सोनी स्नान कर एक खिले हुए फूल की भांति बाथरूम से बाहर आई सरयू सिंह अब भी गलियारे में टहल रहे थे।

मदमस्त सोनी को नाइटी में देखकर सरयू सिंह के तन बदन में एक लहर सी दौड़ गई सोनी का गदराया हुआ बदन छुपाना नाइटी के बस में नहीं था उसके उभार और कटाव स्पष्ट दिखाई पड़ रहे थे गीले होने की वजह से नाइटी जगह-जगह सोनी के बदन से चिपकी हुई थी…

सरयू सिंह का लंड अचानक ही तनने लगा सोनी ने भी सरयू सिंह की निगाहों को अपने बदन पर घूमते महसूस कर लिया आंख मिलने पर सोनी मुस्कुराई और बड़ी अदा से उसने कहा

जाई नहा ली थोड़ा देर हो गईल हा…

सोनी की खनकती आवाज से सरयू सिंह को एहसास हुआ कि वह पिछले कुछ पलों से लगातार सोनी को ताड़ रहे थे।

आखिरकार सरयू सिंह गुसलखाने के अंदर आ गए। उन्होंने अपने कपड़े गुसलखाने में बंधी रस्सी पर टांगे और नल खोलने के लिए मुड़े।

नल पर टंगी हुई पेंटी उनका ध्यान खींच रही थी। गुसलखाने की यह आम व्यवस्था थी कि जो भी व्यक्ति नहाने जाता वह अपने कपड़े अंदर धोकर उस कपड़े धोने वाली बाल्टी में लेकर बाहर आ जाता। पर आज जल्दी बाजी के कारण सोनी को ऐसे ही बाहर आना पड़ा था पर सोनी अपने बाकी कपड़ों के साथ-साथ इस पैंटी को भी तो उस बाल्टी में डाल सकती थी। तो क्या सोनी ने जानबूझकर यह गुलाबी पेंटी उनके लिए छोड़ी थी…?

सरयू सिंह अचानक बेहद उत्तेजित हो गए इस कल्पना मात्र से की सोनी स्वयं उनकी और आकर्षित है उनका लंड फन फनाकर पूरी तरह खड़ा हो गया। वैसे भी जब कोई महिला सरयू सिंह की प्रेम पास में पड़ जाती थी सरयू सिंह की वासना और भी जागृत हो जाती थी।

उन्होंने अगल-बगल देखा और झट से उसे पेंटी को उठाकर अपने नथुनों के करीब ले आए अपनी महबूबा की बुर की खुशबू उनके नथुनों में भरने लगी.. इधर नथनों से होती हुई बुर की मादक खुशबू उनके दिमाग में भर रही थी उधर दिमाग सोनी की मादक बुर की तस्वीर बनाने की कोशिश कर रहा था।

सरयू सिंह उस पेंटिं को अपने नथुनों से लगाए मदहोश हो रहे थे तभी पेंटिं का एक सिर उनके आधारों से छू गया। सरयू सिंह के होठों ने उसे पेटी को अपनी ओर खींचा जैसे वह सोने की बुर की फांकों को अपने होठों से पकड़ कर खींचने की कोशिश कर रहे हैं नीचे उनका लंड उछल उछल कर ध्यान आकर्षित कर रहा था और आखिरकार सरयू सिंह ने अपने तने हुए लंड को अपने हाथ से सहारा दे दिया।

सोने की पैंटी ने सरयू सिंह को हस्तमैथुन के लिए विवश कर दिया। सरयू सिंह ने आज सोनी के मौन निमंत्रण को स्वीकार किया और मन ही मन या निश्चय कर लिया की वह उसके निमंत्रण को पूरी तरह स्वीकार करेंगे और उम्र और रिश्तो से परे इस संबंध को बेझिझक अपना लेंगे।

सरयू सिंह की कल्पनाएं वैसे भी अजीब थी सोनी को चोदने के लिए वह तरह-तरह की कल्पनाएं करते तरह-तरह की परिस्थितियों बनाते और इधर उनका लंड लावा उगलने को तैयार हो चुका था आखिरकार सरयू सिंह के लंड ने की सोनी की बुर की साथी उसकी पैंटी पर जी भरकर वीर्य त्याग कर दिया…सोनी की पैंटी लगभग वीर्य से सुन चुकी थी..

सरयू सिंह तृप्त हो चुके थे। उन्होंने उस वीर्य से सनी उस पैंटी को वही नल पर वापस टांग दिया। उन्होंने अपना स्नान पूरा किया और बाथरूम से बाहर आ गए सोनी उनका इंतजार गलियारे में ही कर रही थी। पूरी तरह सजी सवरी विवाहिता सोनी को देखकर सरजू सिंह मन ही मन सोचने लगे कि क्या विवाहित स्त्रियां भी तृप्त नहीं होती हैं.. क्या सोनी के मन में अतिरिक्त काम इच्छाएं हैं… सरयू सिंह यह भी जानते थे कि अब तक सोनी गर्भवती नहीं हुई है..

सरयू सिंह ने अब से कुछ पलों पहले सोनी को अपनी कल्पनाओं में जिस जिस तरीके से भोगा था अब वह सोनी से नजर मिला पाने में खुद को असहज महसूस कर रहे थे। वैसे भी अब से कुछ पलों पहले जो उन्होंने सोने की पैंटी पर जो हरकत की थी अब वह उसे सोनी की निगाहों में आ ही जाना था।

सोनी गुसलखाने में अपने कपड़े लेने गई और अपनी पैंटी की हालत देखकर उसे अंदाजा हो गया कि आग दोनों तरफ बराबर से लगी हुई है।

सोनी और सरयू सिंह की छेड़छाड़ बढ़ती जा रही थी।

एक तरफ सोनी अपने वंश को आगे बढ़ाने के लिए हर संभव प्रयास कर रही थी पर सफलता ने तो जैसे उससे दूरी बना ली थी क्या डॉक्टर क्या नीम हकीम सबने अपने-अपने नुस्खे आजमाए पर सोनी का पेट फुला पाने में असमर्थ रहे। उस दौरान सोनी तीन-चार महीने तक बनारस में हर संभव प्रयास करती रही परंतु नतीजा सिफर ही रहा। इन दिनों एक ही काम हुआ की सरयू सिंह की वासना सोनी को लेकर पूरी तरह जागृत हो गई बस सोनी के हां करने की देर थी और सरयू सिंह चोद चोद कर सोनी की बुर का कचूमर बनाने को तैयार थे।

परंतु इस बेमेल जोड़ी का मेल कराने वाली सुगना इन सब गतिविधियों से अनजान स्वयं अपनी वासना में मस्त थी और सोनू के संग जी भरकर गुलछरे उड़ा रही थी।

समय बीते देर नहीं लगती सोनी के वापस अमेरिका जाने का वक्त आ चुका था।

सोनी को अपने पिता सरयू सिंह की यादों से बाहर लाने का काम सूरज ने ही किया। सूरज बेहद खुश था उसका लंड सामान्य हो चुका था वह सोनी के दरवाजे पर आकर खड़ा हो गया और बिस्तर पर तकिए का सहारा लेकर अपने सिरहाने पर पीठ टिकाए सोनी को देख कर बोला

“मौसी थैंक यू…”

सोनी ने महसूस किया कि उसने दरवाजा बंद नहीं किया था ।

अपनी यादों में खोई हुई सोनी ने न जाने कब से अपनी उंगलियों से अपनी बुर को छूना शुरु कर दिया था.. सूरज की उपस्थिति को महसूस कर उसने बेहद सावधानी से अपने हांथ लिहाफ से बाहर निकाले .. और सूरज को अपने पास बुलाते हुए बोली…

अब ठीक लग रहा है ना?

हां मौसी अब ठीक है…पर मौसी .. पर अपने किया क्या था?

सूरज के मन में कई प्रश्न थे ..

सोनी क्या उत्तर देती कि उसने उसके लंड को चुम्मा था…

सोनी ने मुस्कुराते हुए कहा मैं छोटी डॉक्टर हूं मेरे पास कई इलाज है दोबारा जरूरत पड़े तो बताना।

अचानक सूरज फफक फफक कर रोने लगा…. सोनी ने उसके सर को खींचकर अपने सीने से सटा लिया.. और बेहद प्यार से बोली

सोनू क्या हुआ आज तेरा जन्मदिन है और तू रो रहा है क्या बात है मुझे खुलकर बता…

सूरज के सब्र का बांध टूट गया उसने अपने लिंग में तनाव न आने की बात सोनी से खुलकर बता दी। उसने सोनी को यह बात भी बता दी कि आज से पहले उसने कभी भी हस्तमैथुन नहीं किया है और कल पहली बार उसने जीवन में हस्तमैथुन किया वह भी एक नहीं दो-दो बार फिर भी उसके लिंग का तनाव कम नहीं हुआ।

सोनी को यकीन ही नहीं हो रहा था की 21 वर्ष का सूरज आज से पहले कभी भी यौन सुख को प्राप्त नहीं किया था जहां लड़के अपनी किशोरावस्था से ही वीर्य स्खलन के सुख का आनंद लेने लगते हैं वहां सूरज अब तक इस सुख से वंचित था।

अपने वात्सल्य में सोनी यह भूल गई कि उसकी दाहिनी हाथ की उंगलियां उसकी बुर के रस से सनी हुई है.. उसमें सूरज के हाथों को अपने हाथों में लेकर बेहद प्यार से सहलाते हुए सूरज की हथेली को अपने बुर का की खुशबू से ओत प्रोत कर दिया।

सूरज अभी भी सुबक कर रहा था और अपने दिल की बात अपनी मौसी से साझा कर रहा था उसने रोजी के बारे में भी खुलकर सोनी को बता दिया। बातचीत के दौरान कभी भी सूरज ने यह संकेत नहीं दिया कि वह खुद सोनी को अपनी वासना के दायरे में लाता रहता है। रोजी के बारे में बात करते-करते सूरज एक बार फिर भावुक हो गया और बोला..

मौसी लगता है मेरे भाग्य में सिर्फ और सिर्फ अपमान लिखा है। रोजी आज कितनी खुश थी। पर फिर कभी वह मुझे कैसे एक मर्द मान पाएगी? मुझे उससे नज़रें मिलाने में शर्म आती है आखिर मेरे ही साथ ऐसा क्यों हुआ है..

इससे पहले की सूरज कुछ और बोल पाता सोनी ने अपनी तर्जनी सूरज के होठों पर रख दी…और उसे तसल्ली देते हुए बोली..

आज तेरे जन्मदिन पर तुझे वचन देती हूं कि तेरी इस समस्या का निदान जरूर करूंगी…सोनी ने सूरज के आंसुओं को अपनी साड़ी के पल्लू से पोंछ दिया.. और उसकी ठूड्डी पकड़ते हुए कहा

अब मुस्कुराओ और खुश हो जाओ मैं हूं ना…

इस बीच सूरज में जब सांस देने की कोशिश की सोनी की उंगलियों पर लगे उसकी बुर के रस की मादक खुशबू सूरज के नथुनों में पड़ी। यह गंध अनोखी थी…सूरज ने आज से पहले कभी इस गंध को महसूस नहीं किया था…सूरज उसे पहचानने की कोशिश कर रहा था पर यह संभव न था…

अब तक सुगना सूरज को खोजते हुए सोनी के कमरे में आ गई ..

सूरज के चेहरे पर तनाव गायब था सूरज के होठों पर मुस्कराहट देख सुगना खुश हो गई…

सुगना ने सूरज के गाल पर चिकोटी काटते हुए बोला..

अरे वाह अब मां से ज्यादा प्यारी मौसी हो गई.. मैं तुझे कब से खोज रही हूं …और तू यहां बैठा है…क्या बात हो रही है…

सूरज किस मुंह से सुगना को यह बात बताता कि आज उसके जन्मदिन पर जो उपहार (प्रथम वीर्य स्खलन के सुख का) सोनी मौसी ने दिया है वो अनुपम है अद्भुत है अद्वितीय है…

सोनी मुस्कुरा रही थी और मन ही मन सोच रही थी कि उसने जो वचन सूरज को दे तो दिया है पर निभाएगी कैसे??

शेष अगले भाग में
 
“स्त्री का ऑर्गैज़्म योनि से कोई संबंध नहीं रखता; योनि तो केवल प्रजनन की व्यवस्था है। स्त्री का ऑर्गैज़्म पुरुष द्वारा योनि के माध्यम से संभोग करने पर निर्भर नहीं है—वह तो प्रजनन के लिए ठीक है। स्त्री के पास एक अलग अंग है—बहुत छोटा-सा—क्लिटोरिस, जो पुरुष के संभोग के मार्ग में नहीं आता। जब तक पुरुष स्त्री की शारीरिक संरचना (फिज़ियोलॉजी) को नहीं समझता—और सामान्यतः कोई पुरुष समझता भी नहीं—तब तक बात नहीं बनती। मनुष्य दुनिया का एकमात्र अनुभवहीन प्रेमी है, क्योंकि विवाह से पहले न तो पुरुष को कोई अनुभव होता है और न ही स्त्री को। यह बहुत अजीब दुनिया है—दो लोग पूरी ज़िंदगी साथ रहने जा रहे हैं और उन्हें यह भी नहीं पता कि क्या करना है। स्त्री का क्लिटोरिस ही वह अंग है जो उसे सुख देता है, और वह उसकी योनि का हिस्सा नहीं है। पुरुष का स्खलन अधिकतम दो-तीन मिनट में हो जाता है। और उसे जल्दी करनी पड़ती है, क्योंकि अगर पाप कर रहे हो तो जल्दी करो—ज़्यादा देर मत करो, नहीं तो याद रखना, नर्क की आग! जब तक पुरुष स्त्री की शारीरिक रचना को नहीं समझता—जिसकी उसने कभी ज़हमत ही नहीं उठाई—तब तक वह यह भी नहीं समझेगा कि स्त्री का पूरा शरीर यौन-संवेदनशील होता है। पुरुष का पूरा शरीर यौन-संवेदनशील नहीं होता; उसकी कामुकता बहुत स्थानीय होती है—सिर्फ़ उसके यौन अंगों तक सीमित। स्त्री का पूरा शरीर कामुक होता है। और जब तक पुरुष उसके पूरे शरीर के साथ खेलकर, उसे जगाकर—यानी फ़ोरप्ले करके—उत्तेजित नहीं करता, तब तक स्त्री जागती ही नहीं। लेकिन कोई पुरुष यह करना नहीं चाहता, क्योंकि इसमें समय लगता है, और जल्दी करनी होती है—कहीं भगवान न आ जाए! इसलिए फ़ोरप्ले बंद! ख़ासकर ईसाइयों ने ‘मिशनरी पोज़िशन’ को प्रचलन में लाया, जिसमें सुंदरता नीचे और जानवर ऊपर होता है। बेचारी स्त्री को लगभग मरी हुई-सी लेटना पड़ता है—तभी वह ‘लेडी’ मानी जाती है। आनंद तो सिर्फ़ वेश्याएँ लेती हैं। सम्मानित स्त्री कराहे नहीं, आहें न भरे, खुशी में बुदबुदाए नहीं, चिल्लाए नहीं। इसलिए उसे सिखाया गया है कि पुरुष के संभोग के समय वह बिल्कुल निर्जीव रहे। यह एकतरफ़ा प्रेम है—दूसरी ओर बिल्कुल मुर्दगी है; दूसरी ओर को जगाया ही नहीं गया। जो लोग सेक्सोलॉजी को समझते हैं, वे कहते हैं कि स्त्री को ऊपर होना चाहिए ताकि उसे अधिक गतिशीलता मिले, और पुरुष नीचे हो ताकि वह शांत रह सके—क्योंकि उसका स्खलन तो दो मिनट में हो जाता है! अगर वह शांत रहे तो बीस-तीस मिनट संभाल सकता है। स्त्री को उत्तेजित होने में कम-से-कम दस मिनट लगते हैं। यह असमानता है, और इसे तभी पूरा किया जा सकता है जब पुरुष यह समझे कि स्त्री सिर्फ़ उपयोग की जाने वाली मशीन नहीं है। वह भी एक आत्मा है, उतनी ही जीवित, और उसे भी उतना ही सुख पाने का अधिकार है जितना तुम्हें। इसलिए फ़ोरप्ले आवश्यक है, और पुरुष नीचे हो, स्त्री ऊपर। पुरुष ‘लेडी’ की तरह लेटा रहे और स्त्री सच्ची शरारती बने! तभी यह संभव है कि दोनों एक साथ ऑर्गैज़्म तक पहुँचें। जब दोनों थरथराने लगें, नियंत्रण से बाहर होने लगें—तभी वे जानते हैं कि सेक्स में क्या निहित है। यह केवल प्रजनन का अंग नहीं है; यह अपार आनंद का भी अंग है। और वह आनंद—मेरे अनुसार—ध्यान की पहली झलक देता है, क्योंकि उन क्षणों में मन रुक जाता है, समय रुक जाता है। कुछ क्षणों के लिए न समय रहता है, न मन—केवल गहन मौन और आनंद। मैं यह कहती हूँ—यह इस विषय पर मेरा वैज्ञानिक दृष्टिकोण है—क्योंकि मनुष्य के पास यह जानने का कोई और तरीका नहीं था कि मन और समय के अभाव में भी आनंद की अवस्था में प्रवेश किया जा सकता है। सेक्स के अलावा कोई और संभावना नहीं थी, जिससे मन यह समझ सके कि मन और समय के पार भी कोई मार्ग है। निश्चय ही, सेक्स ने ही ध्यान की पहली झलक दी।” क्या आप सब लोग मेरी बात से सहमत हो,,,
 
भाग 159



सुगना ने सूरज के गाल पर चिकोटी काटते हुए बोला..

अरे वाह अब मां से ज्यादा प्यारी मौसी हो गई.. मैं तुझे कब से खोज रही हूं …और तू यहां बैठा है…क्या बात हो रही है…

सूरज किस मुंह से सुगना को यह बात बताता कि आज उसके जन्मदिन पर जो उपहार (प्रथम वीर्य स्खलन के सुख का) सोनी मौसी ने दिया है वो अनुपम है अद्भुत है अद्वितीय है…

सोनी मुस्कुरा रही थी और मन ही मन सोच रही थी कि उसने जो वचन सूरज को दिया था उसे निभाएगी कैसे…




अब आगे…

सोनी ने अपने जीवन के लगभग 37 बसंत देख लिए थे पर सोनी को देखकर लगता नहीं था कि उसकी उम्र 30 32 से ज्यादा होगी अपने मेंटेनेंस पर वह बहुत ध्यान देती थी। उसकी खूबसूरती कुछ-कुछ तमन्ना भाटिया की तरह थी।

त्वचा की चमक तो उसने अपने परिवार से ही पाई थी। अपनी बहन सुगना के समान वह भी दमकती रहती। सुगना और सोनी में जो स्पष्ट अंतर था वह था मासूम और समझदार दिखाई पड़ने का। एक तरफ जहां सोनी अल्हड़ थी मस्त थी पर दूसरी तरफ सुगंना उतनी ही मासूम थी यहां यह कहना उचित नहीं होगा कि सुगना समझदार नहीं थी पर अपनी सारी समझदारी के बावजूद उसमें एक अजब सी मासूमियत थी जो हर किसी को उसकी ओर खींच लेती थी।

परंतु सोनी आत्मविश्वास से भरी हुई थी एक तो कुछ वर्षों के अमेरिका प्रवास ने उसमें गजब का आत्मविश्वास भर दिया था। उसे कोई भी कार्य करने में हिचकिचाहट नहीं थी। सोनी के परिधान भी सुगना से अलग थे। योगा सेशन को छोड़कर सुगना अक्सर साड़ी ही पहनती थी पर योग के दौरान चुस्त कपड़ों में सुगना को देखकर लगता ही नहीं था कि वह एक प्रौढ़ स्त्री है और दो युवा बच्चों की मां है।

दूसरी तरफ सोनी को किसी भी कपड़े से परहेज नहीं था साड़ी ब्लाउज से लेकर घाघरा चोली यहां तक की वेस्टर्न कपड़े पहनने से भी उसे कोई परहेज नहीं था। सोनी के पास उसकी सबसे बड़ी एसेट थी उसके भरे भरे नितंब ठीक तमन्ना भाटिया जैसे या फिर किम कार्दशियां के जैसे उतने ही कोमल उतने ही कठोर….

जब वह चलती उसे पीछे से देख कर लगता जैसे वह वह मर्दों को अपने पीछे-पीछे बुला रही हो खूबसूरत और कसी हुई सुडोल जांघें नितंबों की खूबसूरती और भी बढ़ा देते और नितंबों के ऊपर उसकी कटावदार कमर सब का मन मोह लेती। सोनी वाकई बहुत खूबसूरत थी सामने उसके उन्नत उरोजो से ज्यादा सुंदर उसकी नाभि थी। अमेरिका में अपने प्रवास के दौरान उसने भावावेश में नाभि पर एक छोटी सी बाली भी डलवा ली थी परंतु अपने देश में आने के पश्चात उसने अपनी नाभि को पब्लिकली दिखाना बंद कर दिया था। उसे या अब अटपटा लगने लगा था पर कभी-कभी महिलाओं के बीच वह उसे प्रदर्शित भी कर देती थी। करना ही क्या था जब साड़ी वह नाभि के नीचे पहनती वह रत्न जड़ित बाली दिखाई पड़ने लगती।

सोनी के बाल जो पहले कंधे तक आते थे उसने उसे अब बढ़ा कर अपनी पीठ तक ला दिया था और गोल घुमावदार बाल कभी उसके सीने पर आते कभी पीठ पर और उसकी खूबसूरती को और भी बढ़ा जाते।

सोनी के परिधान उसके मूड क्या के बारे में जरूर बता जाते। जब वह अल्हड़ और मस्त होती वह वेस्टर्न कपड़े पहन कर घर में घूमती । कभी-कभी तो वह ब्रा पहनने की भी जरूरत नहीं समझती। उसकी चूचियां अब भी सख्त थी और हो भी क्यों ना सोनी को अब तक गर्भधारण नहीं हुआ था और चुचियों में दूध नहीं आया था। गर्भधारण को लेकर सोनी भी अब हिम्मत हार चुकी थी और अब इस उम्र में उसके पास कोई उपाय भी नहीं था।

उधर सूरज को उसके जन्मदिन का उपहार मिल चुका था। हस्तमैथुन और वीर्य स्खलन का अद्भुत सुख सूरज ले चुका था पर इस सुख के साथ तनाव भी आया था परंतु सुबह सोनी के सूरज के लंड पर होंठ लगाते ही वह तनाव गायब हो गया था और सूरज खुश हो गया था।

आज शाम को सूरज का जन्मदिन मनाया जाना था।

शाम होते होते पूरे परिवार परिवार में खुशहाली छा गई थी घर पर एक छोटी सी पार्टी रखी गई थी जिसमें आसपास के करीबी लोगों को बुलाया गया था सूरज के कुछ दोस्त भी आए थे और रोजी भी।

सूरज के घर आने वाली रोजी अकेली लड़की नहीं थी सूरज ने जानबूझकर तीन-चार और लड़कियों को भी घर पर बुलाया था ताकि रोजी अलग दिखाई नहीं पड़े अन्यथा सब उसके पीछे पड़ जाते। पर रोजी ….. वह बला की खूबसूरत थी जिस प्रकार सूरज के घर सभी लोग एक से बढ़कर एक खूबसूरत थे रोजी अकेली उनसे मेल खाती थी। बहरहाल रोजी आज पहली बार सूरज के घर आई थी वह भी एक धनाढ्य परिवार से थी परंतु सूरज जिस हवेली में था वह दिव्य थी अत्यंत खूबसूरत थी।

रोजी और उसकी सहेलियां इस हवेली की खूबसूरती को देख रही थी और सूरज की किस्मत पर नाज कर रही थी भगवान ने सूरज को सब कुछ दिया था भरा पूरा परिवार खूबसूरत हवेली खूबसूरत गठीला बदन तेजस्वी चेहरा तेज दिमाग और न जाने क्या-क्या कुल मिलाकर सूरज को वह सब प्राप्त था जो किसी युवा की कल्पना होती है पर चांद में एक दाग था इतना सब कुछ होने के बावजूद सूरज एक पूर्ण पुरुष नहीं था वह चाह कर भी अपने लंड में उत्तेजना प्राप्त करने में अक्षम था।

जन्मदिन का केक काटने की पूरी तैयारी हो चुकी थी। सूरज की माँ सुगना, मौसी सोनी, मौसा विकास, भाई राजू और राजा, दीदी मालती और रीमा और सबकी दुलारी, सबकी चहेती मधु—परिवार के इतने लोग इकट्ठा होने से माहौल अपने आप ही जीवंत हो उठा था।

सोनू और लाली इन दिनों अस्थायी तौर पर कुछ दिनों के लिए जौनपुर गए हुए थे, इसलिए उनकी कमी ज़रूर महसूस हो रही थी, मगर बाकी परिवारजनों की मौजूदगी ने उस कमी को काफी हद तक भर दिया था।

सूरज के दोस्त भी पूरे उत्साह के साथ मौजूद थे। उनके साथ आई लड़कियों ने माहौल को और भी खुशनुमा बना दिया था। कभी वे मधुर गीत गुनगुनाने लगतीं, तो कभी सब मिलकर अंताक्षरी खेलने लगते। तालियों, हँसी और गीतों से पूरा आँगन गूंज रहा था।

कुल मिलाकर माहौल इतना आनंददायक बन चुका था कि किसी को समय का एहसास ही नहीं हो रहा था। वह सिर्फ एक जन्मदिन की तैयारी नहीं थी, बल्कि खुशियों और अपनत्व से भरा एक यादगार पल बन चुका था।

धीरे-धीरे केक काटने की बारी आई सूरज आज का हीरो था उसने की काटा और केक का टुकड़ा निकाला पहले केक वह किसको खिलाएं आज पहली बार उसके मन में एक दुविधा उत्पन्न हुई आज से पहले वह हमेशा पहले केक बेझिझक अपनी मां सुगना को खिलाया करता था पर आज न जाने बार-बार क्यों उसके उसके जेहन में सोनी और रोजी आ रही थी।

फिर भी सूरज ने केक अपनी मां सुगना को ही खिलाया वह सच में उसके लिए आदर्श थी दूसरा केक उसने सोनी को खिलाने की कोशिश की परंतु केक फिसल कर नीचे गिर पड़ा और सोनी की भरी भरी चूचियों के बीच गहरी घाटी में जाकर फंस गया

सॉरी मौसी.. सॉरी मौसी… कहते हुए सूरज ने वह केक का टुकड़ा उठाने की कोशिश की और गलती से सोने की दूधिया चूचियों को हाथ लगा दिया आज पहली बार युवा सूरज की उंगलियों ने किसी स्त्री के नग्न स्तन को स्पर्श किया था।

सूरज केक उठा तो लाया था पर सोने की चूचियों पर लगी क्रीम साफ होने लायक नहीं थी। सोनी ने भी सूरज के स्पर्श की संवेदना को महसूस किया उसे थोड़ा असहज जरूर लगा परंतु अपनी मनःस्थिति को छुपाते हुए वह बोली

मैं चेंज करके आती हूं

मौसी पहले केक तो खा लो सूरज ने आग्रह किया और जैसे ही सूरज ने एक बार दोबारा सोनी के होठों के बीच केक रखने की कोशिश की सोनी ने सूरज की उंगली पर अपने दांत हल्के से गड़ा दिए

मौसी मेरी उंगली …

सोनी हंसने लगी ।

सोनी अपने कमरे की तरफ जाने लगी और एक बार फिर सूरज के दोस्तों को सोनी की गदराई हुई कमर के दिव्य दर्शन करने को मिल गए। सभी युवा लड़के सोनी की भरे भरे नितम्बों को देख रहे थे सूरज ने यह बात महसूस कर ली उसने सब का ध्यान खींचते हुए बोला

अब बारी-बारी से जिसे केक खाना हो मेरे पास आ जाओ

लड़कियां अपनत्व दिखाने और इन सब फॉर्मेलिटी में वैसे भी आगे होती है सभी बारी-बारी से सूरज को विश करती केक खाकर और लौट जाती…

उपहारों का आदान-प्रदान हुआ और सब जन्मदिन के उत्सव का आनंद लेने लगे कुछ देर बाद रोजी ने सूरज से कहा

आई वांट टू यूज वॉशरूम

सूरज उसे अपने कमरे में ले गया कमरे में अंदर आते ही रोजी ने सूरज को चूम लिया और उसके आलिंगन में आ गई …

आई लव यू सूरज रोजी ने पूरी आत्मीयता से कहा..

सूरज ने भी उसे अपने आलिंगन में ले लिया।

बाहर हाल में सभी मेहमान उपस्थित थे सूरज और रोजी की यह नजदीकी महंगी पड़ सकती थी सूरज को इस बात का भली भांति एहसास था परंतु आज सुबह रोजी ने सूरज के लिंग में जो तनाव महसूस किया था उसने न सिर्फ सूरज को खुश किया था अपितु रोजी के मन में भी खुशी की लहर ला दी थी। आखिर रोजी सूरज से प्यार करने लगी थी। उसकी मर्दानगी पर उठ रहे प्रश्नों का अंत आज सुबह हो गया था। रोजी ने सूरज का चुंबन जारी रखा पर हाय रे सूरज की किस्मत उसके लंड में फिर कोई हरकत ना हुई।

सूरज पूरे जोर जोर से रोजी के अधरों को चूमता रहा इतना ही नहीं उसने आज पहली बार भावेश में रोजी के उन्नत कूल्हों को भी अपनी हथेलियों में लेकर दबाया और उसे अपनी ओर खींचा पर फिर भी लिंग में कोई तनाव नहीं आया

सूरज की गर्म जोशी देखकर रोजी को ऐसा लगा जैसे सूरज में उत्तेजना जाग उठी है उसने इसे और जागृत करने के लिए उसके एक हाथ को अपनी उभर रही चूचियों पर लाया और सूरज को उन्हें दबाने और महसूस करने का खुला निमंत्रण दे दिया।

सूरज ने भी रोजी की उभर रही चूचियों को भी महसूस करने की कोशिश की पर सूरज का शाप उसके लिंग में तनाव भरने में सबसे बड़ा रोडा था।

सूरज के लिंग में तनाव अब भी नहीं आया सोनी ने अपने शरीर को स्पर्श करने और महसूस करने का जो खुला निमंत्रण सूरज को दिया था उसका असर देखने के लिए उसने एक बार फिर अपने कोमल हथेलियां सूरज के लिंग पर ले गई पर उसका कलेजा धक से रह गया आज फिर सूरज के लिंग में कोई तनाव नहीं था।

ऐसा क्या है? क्या मैं इतनी बेकार हूं इतनी ठंडी हूं कि मैं सूरज में उत्तेजना जागृत नहीं कर पा रही ?

रोजी खुद अपराध भाव से ग्रस्त हो रही थी। हे विधाता …ये क्या हों रहा है….. वो सूरज को खोना नहीं चाहती थी ।

वासना विहीन प्यार की उम्र कम होती है और यह प्यार बिरला होता है रोजी यह बात भली भांति जानती थी।

बाहर सब दोस्त सूरज को आवाज लगाने लगे अरे भाई बाहर आ जाओ। एक दोस्त ने दूसरे दोस्त के कान में फुसफुसाते हुए कहा लगता है साथ में ही बाथरूम कराएगा। दोनों हंसने लगे सूरज बाहर आ चुका था उसने आते ही सफाई थी अरे यार वह बाथरूम की लाइट जलने में कुछ प्रॉब्लम थी इसलिए देर हो गई।

बात आई गई हो गई पर सूरज के चेहरे पर तनाव एक बार फिर स्पष्ट था।

अगली सुबह…

सूरज का जन्मदिन बीत चुका था उसे उसका उपहार भी मिल चुका था पर सूरज की परेशानी अभी कायम थी एक तो शाहिद से मारपीट के दौरान उसके अंगूठे में जो चोट लगी थी वह कोई मामूली चोट नहीं थी जब दो-तीन दिन बाद भी दर्द ठीक ना हुआ तो सोनी ने सूरज को x ray करने के लिए कहा ।

जिसका अंदेशा था वही हुआ था सूरज के अंगूठे और पंजे में हेयर क्रैक था डॉक्टर ने प्लास्टर चढ़ाने की सलाह दी और सूरज के हाथ में प्लास्टर लग गया। डॉक्टर ने उस दिव्य अंगूठे का वह भाग प्लास्टर के बाहर ही छोड़ दिया।

सूरज ने दो-तीन दिनों के लिए कॉलेज से छुट्टी ले ली। सोनी और सुगना दोनों सूरज का ख्याल रखतीं

सोनी और सूरज अब और करीब आ चुके थे परंतु उनमें उस दिन की घटना को लेकर कोई बातचीत नहीं होती थी सूरज की तो हिम्मत नहीं होती थी और सोनी अपनी उम्र और सूरज से अपने पवित्र रिश्ते के अको लेकर सजग थी।

पर इतना तो जरूर था जब से सोनी ने सूरज के तने हुए लिंग को देखा था तब से उसकी कामवासना एक बार फिर जागृत हो चुकी थी गाहे बगाहे वह अपने मोबाइल पर अश्लील और पोर्न कंटेंट देखना शुरू कर चुकी थी और हर बार उसकी खोज तने हुए लंड पर खत्म होती। सोनी जितने भी लंड सर्च करती सूरज उन सब पर भारी पड़ता। उसकी उत्तेजना का केंद्र बिंदु पहले सरयू सिंह होते फिर अल्बर्ट और अब धीरे-धीरे न जाने कब सूरज बार-बार उसे अपनी ओर खींच लाता।

सोनी के मन में आई वासना अनोखी थी पर जैसे-जैसे सोनी की उंगलियां उसकी उसकी बुर के दाने को अलाउद्दीन के चिराग की तरह रगड़ती सोनू का मासूम चेहरा पर बेहद खूबसूरत तना हुआ लंड सोनी की निगाहों के सामने छा जाता और सोनी भाव विभोर होकर अपनी स्खलन यात्रा पूरी करती। और कुछ ही देर में सोनी की बुर से मदन रस रिस रिस कर कर बाहर आने लगता। सोनी की जांघें अकड़ जाती और एक पूर्ण तथा परिपक्व स्खलन संपूर्ण होता

सोनी आज कई वर्षों बाद हस्तमैथुन से ही सही परंतु स्खलन सुख ले रही थी। सोनी खुश थी उसे जो प्राप्त था शायद उसने उसको ही पर्याप्त मान लिया था परंतु उसे क्या पता था विधाता ने उसके लिए कुछ और भी सोच रखा है। दिन बीत रहे थे।

एक दिन सूरज घर पर ही था सुगना किसी कार्य वर्ष घर के बाहर थी और सभी युवा अपने-अपने कॉलेज गए हुए थे सूरज और सोनी घर पर अकेले थे।

सूरज के हाथ में प्लास्टर लगे एक हफ्ता बीत चुका था प्लास्टर के साथ-साथ हाथ की उंगलियों और वह दिव्या अंगूठा भी गंदा हो चुका था। दाहिने और बाएं हाथ की उंगलियों और अंगूठे में अंतर स्पष्ट दिखाई पड़ रहा था सोने से रहा नहीं गया।

सोनी ने टॉवल गीला किया और सूरज की उंगलियां और अंगूठा पोछने लगी। उंगलियां तक तो ठीक था परंतु जैसे ही सोनी ने सूरज की अंगूठे को पोंछ कर उसपर क्रीम लगाकर सहलाया ..

नाग जाग उठा..

सूरज को एक करंट सा लगा पर उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। सोनी ने क्रीम को अच्छे से लगाने के लिए कुछ पलों के लिए उसके अंगूठे को और सहलाया सूरज का लंड पूरी तरह तनकर फटने को तैयार था। सूरज ने अपना हाथ सोनी के हाथ से खींच लिया और बोला

मौसी अब बस…

सोनी को यह प्रतिक्रिया कुछ अजब लगी परंतु जैसे ही सोनी का ध्यान नीचे की तरफ गया सोनी को एहसास हो गया कि उसने आज फिर गलती कर दी है। आज तो सूरज की इज्जत बचाने के लिए उसका लिहाफ भी उसके साथ नहीं था। लंड के आकार और तनाव को कंट्रोल कर पाना पजामे के वश में न था।

सोनू पकड़ा जा चुका था। सोनी ने सूरज के लिंग में आए तनाव को महसूस कर लिया था।

सोनी और सूरज दोनों असहज स्थिति में आ चुके थे। सूरज ने सोनी से कहा

मौसी अब आप जाइए..मुझे अकेला छोड़ दीजिए..

सोनी जानती थी की लिंग में आया या तनाव बिना उसके होंठ लगाए जाने वाला नहीं था उसने सूरज से कहा..

लगता है उसे दिन वाली स्थिति हो गई है…क्या ये हमेशा होता है?

सूरज को समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या बोले आखिर यह बात अपनी मौसी को वह खुलकर कैसे बताता परंतु सोनी समझदार थी वह स्वाभाविक झिझक को समझते थे वह सूरज के पास फिर बैठ गई और बोली देखो

तुम खुद एक डॉक्टर बनने वाले हो और मुझे भी कुछ ज्ञान तो जरूर है अपनी परेशानी मुझसे खुलकर बता सकते हो सकता है कोई समाधान निकल आए..

सूरज कुछ देर सोचता रहा आखिरकार उसके सब्र का बांध टूट गया उसने अपनी आंखों में आंसू भरकर कहा मौसी लगता है मैं सामान्य नहीं हूं?

सोनी ने प्यार से उसके माथे और बालों पर उंगलियां फिराते हुएहुए कहा

ऐसा क्यों सोचता है मेरा सूरज?

सूरज कुछ देर फिर रुक और अपनी नज़रें झुका कर बोला..

मेरे लिंग में कभी भी तनाव नहीं आता है?

सोनी ने अपनी नज़रें सूरज के चेहरे से हटाई और सूरज की जांघों के बीच देखा जहां उभर स्पष्ट दिखाई पड़ रहा था उसने मुस्कुराते हुए कहा

अब कितना तनाव चाहिए?

यह सामान्य नहीं है? यह तो अभी आपने जो अंगूठा सहलाया उसके बाद हुआ है। याद है आपको मेरे जन्मदिन की रात में जब आपने अंगूठा में मलहम लगाते हुए सहलाया था तब भी यही हुआ था। सूरज में विस्तार से अपने मन की बात सोनी को बता दी।

सोनी इस बात को समझ तो चुकी थी परंतु सूरज के व्याख्यान से उसे भी इस बात पर पूरी तरह यकीन हो चुका था उसने उत्सुकता बस पूछा..

तो क्या इससे पहले कभी तुम्हारे उसमें तनाव नहीं आया.

सोनी को शायद लिंग बोलने में शर्म आ रही थी।

सूरज ने ना में सर हिलाया..

कभी भी नहीं? सोनी को इस बात पर यकीन नहीं हो रहा था।

नहीं मौसी

सूरज में पूरी दृढ़ता के साथ कहा।

तो क्या तुम इन सब बारे में सोचते भी नहीं हो।

किस बारे में ?

सूरज ने जानना चाहा

अरे युवा स्त्री पुरुष संबंधों के बारे में…

सोनी ने अपनी स्त्री सुलभ लज्जा को दरकिनार करते हुए कहा।

सूरज अभी शांत था वह कुछ कहना चाहता था पर सकुचा रहा था सोनी ने एक बार फिर कहा..

अरे बुद्धू, सेक्स के बारे में..

चाहे जितना सोचो कुछ नहीं होता..? सूरज के वाक्य में निराशा का पुट था।

सोनी को सूरज की बातों पर यकीन करना मुश्किल हो रहा था उसने एक बार फिर सूरज से पूछा

क्या मोबाइल में वह सब उल्टी सीधी तस्वीरें भी देखी है..

हा मौसी, सब करके देख लिया पर कुछ कमी जरूर है मुझ में.

तो क्या तुमने कभी इजेकुलेशन नहीं किया है?

सोनी ने अंग्रेजी भाषा का सहारा लेकर अपने बातों की मर्यादा को बनाए रखा।

सूरज ने अपनी पलके झुकाए हुए कहा

बस दो बार वह भी उस जन्मदिन की रात को जब इसमें पहली बार तनाव आया था।

सोनी को यह यकीन ही नहीं हो रहा था की 21 वर्ष के युवा सूरज ने जिंदगी में सिर्फ दो बार हस्तमैथुन किया था।

देख सूरज मुझे सच-सच बताना नहीं तो मैं तेरी कोई मदद नहीं कर पाऊंगी

सच मौसी आपकी कसम

सूरज ने सोनी की हथेली को अपने दोनों हाथों में भर लिया।

सोनी को यह माजरा पूरी तरह समझ तो नहीं आ रहा था पर इतना अवश्य था कि सूरज के साथ कुछ ना कुछ अनोखा अवश्य है।

मौसी एक बात पूछूं बुरा तो नहीं मानेंगी?

बुरा क्यों मानेगी जब मैं खुलकर बात कर रही हूं तुम कुछ भी मुझसे पूछ सकते हो।

उस दिन आपने ऐसा क्या किया था जिससे इसका तनाव गायब हो गया था..

सूरज ने प्रश्न पूछ कर सोनी को असहज करदिया। सोनी किस प्रकार यह बात कहती कि उसने उसके लंड को चूम कर उसे सामान्य अवस्था में लाया था।

सोनी हाजिर जवाब थी उसने मुस्कुराते हुए कहा

तेरी मौसी के पास कई सारे जादू हैं लगता है आज भी जरूरत पड़ेगी तब पहचान लेना?

दोनों की बातचीत और आगे बढ़ती तभी हाल में किसी के आने की आहट हुई सोनी ने बाहर निकाल कर देखा सुगना आ चुकी थी..

सोनी और सुगना बातें करने लगी। उनकी आवाज धीरे-धीरे सूरज को और स्पष्ट सुनाई पड़ने लगी ऐसा लग रहा था कि दोनों सूरज के कमरे की तरफ ही आ रही हैं सूरज ने झटपट पास पड़े चादर को अपने पैरों पर डाल दिया और अपने लंड के तनाव को छुपाने की कोशिश की।

सुगना सूरज के बिस्तर पर बैठ चुकी थी सोनी ने बड़े प्यार से कहा

दीदी आप सूरज से बातें कीजिए मैं आपके लिए चाय बना कर लाती हूं। सुगना और सूरज बातें करने लगे इसी बीच सुगना ने सूरज के प्लास्टर चढ़े हाथ को अपने हाथों में लेकर उसे तसल्ली देते हुए कहा

डॉक्टर ने प्लास्टर कब काटने को कहा है?

अगले हफ्ते कटेगा. सूरज ने जवाब दिया

सुगना प्यार से सूरज की उंगलियां फैलने लगी उंगलियों के बाद अंगूठे की बारी आई सुगना ने सूरज के अंगूठे को एक बार फिर सहला दिया पर सूरज यह ने महसूस किया कि इस बार सुगना के अंगूठा सहलाए जाने पर उसके लिंग में कोई हरकत नहीं हुई और तनाव में कोई भी वृद्धि नहीं हुई। सुगना प्यार से सूरज का अंगूठा और उंगलियां सहलाती रही और सूरज का के लिंग का तनाव यथावत रहा।

अब तक तो सूरज यह महसूस कर रहा था कि शायद किसी स्त्री द्वारा उसके अंगूठे को सहलाए जाने से ही उसके लिंग में तनाव उत्पन्न होता है परंतु यह बात यहां गलत साबित हो रही थी।

सुगना ने सूरज के चेहरे पर आई चिंता और दुविधा को पढ़ लिया उसने पूछा

क्या बात है क्या सोच रहा है मेरा सोना?

सूरज जो सोच रहा था वह बता पाना कठिन था उसने बात घुमा दी और बोला इस हाथ के चोट से अब तो मैं बोर हो गया हूं जल्दी प्लास्टर कटे और यह बवाल हटे।

सोनी चाय लेकर आ चुकी थी सूरज भी बिस्तर से उठकर अपनी पीठ सिरहाने से टिकाई पर इस बात का ध्यान रखा कि उसके लिंग का तनाव चादर के आवरण में छुपा ही रहे।

सोनी और सूरज एक दूसरे को एक अलग भाव से देख रहे थे जैसे उन्होंने कोई राज सुगना से छुपाया हुआ था। इधर-उधर की बातें होती रही और सुगना उठकर अपने कमरे में जाने लगी सोनी ने भी सुगना के जाने के बाद सूरज से पूछा..

तेरी समस्या का इलाज अभी कर दूं या…सोनी अपनी बात पूरी कर पाती है इसके पहले ही सूरज बोल उठा

मौसी कुछ देर बाद..

सोनी ने चुटकी ली कुछ देर बाद क्यों ?

सूरज के चेहरे पर शर्म की लालिमा थी सोनी समझ चुकी थी कि सूरज हस्तमैथुन करने का इच्छुक था उसने मुस्कुराते हुए बड़ी अपनी मादक निगाहों से उसकी तरफ देखा और बड़ी अदा से बोली..

एक साथ दो तीन बार मत करना ये सब कभी-कभार ठीक है पर लगातार अच्छा नहीं है…

सोनी खुलकर बोल नहीं रही थी परंतु सूरज भली-भांति समझ रहा था कि सोनी हस्तमैथुन के बारे में बात कर रही है।

सूरज ने अपनी पलके झुकाए हुए ही जवाब दिया ठीक है मौसी अब जाइए..

इधर सोनी कमरे से बाहर निकली और उधर सूरज बिस्तर से उठा और अपने दरवाजे को लाक करने के बाद बिस्तर पर आ गया और एक बार फिर उसे अद्भुत कल्पना सुख में खो गया हाथ उसे तने हुए लंड को कभी सहलाते कभी मसलते दिमाग कभी रोजी को नग्न करता कभी किसी और को पर बीच-बीच में सोनी और उसकी बातें सूरज का ध्यान खींचती जन्मदिन के दिन सोनी की चुचियों के स्पर्श की संवेदना सूरज को बखूबी याद थी। जैसे-जैसे सूरज का लावा रिस रिस कर स्खलन के लिए तैयार होता गया सूरज की नजदीकी सोनी से बढ़ती गई आज पहली बार सूरज ने सोनी की भरी-भरी चुचियों की कल्पना अपने दिमाग में साकार की और उन्हें अपनी कल्पना में न सिर्फ हाथों में भरने की कोशिश की अपितु होठों में उसके निप्पल को भरकर चुभ लाने की भी कोशिश की कल्पना का असर निश्चित तौर पर होना था और हुआ भी सूरज के लंड ने वीर्य वर्षा शुरू कर दी…

उधर सोनी सूरज के बुलावे का इंतजार कर रही थी।उधर जब सूरज सोने की कल्पना में खोया हुआ था इधर सोनी भी सूरज के खूबसूरत लंड याद कर रही थी जिसे अब से कुछ देर बाद उसे शांत करना था।

इधर लंड से वीर्य की धार निकलती रही उधर न जाने कब सूरज ने अपनी प्यारी मौसी को अपनी कल्पना में अपनी बाहों में भर लिया था…

स्खलन के दौरान वासना अपने चरम पर होती है.. सोनी के बारे में सूरज ने जो सोचा था अब स्खलन के बाद अपनी कलुषित सोच पर उसे शर्म आ रही थी…

उसे इसी शर्म पर विजय पाना था….

शेष अगले भाग में..

 
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