Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता. - Page 135 - SexBaba
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Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता.

भाग 202

कुछ ही पलों के तीव्र संघर्ष के बाद, दोनों एक साथ चरम सुख के सागर में डूब गए। दोनों के मुंह से एक लंबी और तृप्त कराह निकली और वे एक-दूसरे के बदन पर ढह गए। सोनी की मुनिया के भीतर विकास का वीर्य पूरी गहराई तक समाहित हो रहा था, जो उनके बरसों पुराने सपने को पूरा करने का प्रयास था। दोनों इस ठंडी रात में एक-दूसरे की बाहों में बंधे, ज़ोर-ज़ोर से हाँफते हुए कल होने वाले उस महा-मिलन की कल्पना में खो गए, जहाँ मर्यादा की आखिरी दीवार भी ढहने वाली थी।

अब आगे..

उधर सूरज खुश था उसके मन में एक गहरा संतोष भी था। आज सबसे अच्छी बात यह हुई थी कि सोनी ने उसे अपने कमरे से विदा करने से पहले, लिहाफ़ के भीतर ही उसके लिंग को चूमकर उसके उग्र और बेचैन कर देने वाले तनाव को पूरी तरह शांत कर दिया था। आज की रात पहाड़ों की उस कड़कड़ाती ठंड में भी उसका बदन एक अजब सी तृप्ति और गर्माहट से भरा हुआ था, जो उसे एक मीठे और मदहोश कर देने वाले अहसास की तरफ ले जा रही थी।

सूरज के तनबदन में लगी आग सोनी तात्कालिक तौर पर शांत कर चुकी थी। सोनी के कमरे से आने के बाद सूरज अपने बिस्तर पर लेट किया। सूरज के दिमाग में एक गहरा शक पैदा होने लगा था। उसे रह-रहकर यह विचार आ रहा था कि क्या यह सब कुछ वाकई विकास मौसा जी की मर्जी या सहमति से हो रहा है? इस बात की संभावना उसे इसलिए भी लग रही थी, क्योंकि सोनी मौसी अभी तक गर्भवती नहीं हो पाई थीं और शादी के इतने साल बाद भी वे संतान सुख से वंचित थे। यह बात खुद मौसी ने भी उसके सामने खुलकर स्वीकार की थी कि वे एक बच्चे के लिए कितनी तड़प रही हैं।

तो क्या इस गुप्त सिलसिले के पीछे विकास मौसा जी की भी मूक सहमति है? क्या वे खुद चाहते हैं कि संतान सप्तमी के इस अनुष्ठान के जरिए उनके घर में खुशियां आएं? या फिर सोनी मौसी उनसे छिपकर, बेहद शातिर तरीके से इस वर्जित अनुष्ठान को अंजाम दे रही हैं ताकि अपने जीवन के उस सूनेपन को भर सकें? सूरज का युवा दिमाग इन दोनों संभावनाओं के बीच झूल रहा था।

पर जो भी हो, इन उलझनों के बीच सूरज के मन में एक गहरा संतोष भी था। आज सबसे अच्छी बात यह हुई थी कि सोनी ने उसे अपने कमरे से विदा करने से पहले, लिहाफ़ के भीतर ही उसके लिंग को चूमकर उसके उग्र और बेचैन कर देने वाले तनाव को पूरी तरह शांत कर दिया था। आज की रात पहाड़ों की उस कड़कड़ाती ठंड में भी उसका बदन एक अजब सी तृप्ति और गर्माहट से भरा हुआ था, जो उसे एक मीठे और मदहोश कर देने वाले अहसास की तरफ ले जा रही थी।

अगली सुबह का इंतजार करते हुए सूरज भी सुखद नींद में सो गया।

संतान सप्तमी का अंतिम दिन बेहद महत्वपूर्ण था सुबह-सुबह जब सूरज विकास और सोनी अपनी सुबह की चाय कंप्लीट कर अपने-अपने कमरों में जाने वाले थे तभी सुगना का फोन आ गया सुगना सोनी से बातें करती है और संतान सप्तमी के पिछले अच्छे दिनों का हाल-चाल पूछती थी सोनी भी इशारों सालों में उसे सारी बात बताती है पर्वत सूरज के साथ अपने संभोग को छुपा ले जाती है दूर बैठे विकास और सूरज एक दूसरे से बातें करते रहते हैं पर उनका ध्यान सोने के उत्तरों पर लगा रहता है और वह हम दोनों की बातचीत को समझने का प्रयास करते हैं

संतान सप्तमी के इस अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण दिन की सुबह पहाड़ों की तेज़ ठंड और हल्की धुंध के साथ हुई। कमरे के भीतर गरमा-गरम चाय का दौर चल रहा था। विकास, सोनी और सूरज एक साथ बैठकर चाय की चुस्कियाँ ले रहे थे, लेकिन माहौल में एक अजीब सी खामोशी और आने वाले पल का रोमांच साफ़ महसूस हो रहा था। तभी अचानक सोनी के फोन की घंटी बजी। स्क्रीन पर सूरज की माँ यानी सुगना का नाम चमक रहा था।

सोनी ने बिना एक पल गंवाए लपककर फोन उठाया और वहीं बिस्तर पर पेट के बल लेटकर सुगना से बात करने लगती है। इस तरह लेटने की वजह से उसकी पीठ और नितंबों का उभार मद्धम रोशनी में और भी आकर्षक लग रहा था। बात करते-करते उसने मस्ती में अपने पैरों को थोड़ा ऊपर उठाया, जिससे उसकी रेशमी नाइटी सरककर घुटनों तक आ गई और उसकी गोरी जाँघों का कुछ हिस्सा साफ़ दिखाई देने लगा।

सोनी अपनी बहन सुगना की बातों में इतनी खोई हुई थी और उससे बात करने के अहसास में इतनी उन्मुक्त और मदहोश थी कि उसे इस बात का बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि पीछे बैठे विकास और सूरज एक साथ उसकी इस मादक स्थिति को निहार रहे हैं। पहाड़ों की उस सुबह, सोनी का यह बेबाक और मदहोश अंदाज़ उन दोनों मर्दों की धड़कनों को एक साथ तेज़ कर रहा था।

सूरज विकास के ठीक बगल में बैठा हुआ था और चाहकर भी अपनी नज़रों को काबू में नहीं रख पा रहा था। वह मौसा जी के सामने अपनी मौसी के इस मादक बदन और उभरे हुए नितंबों को देखने से बार-बार कतरा रहा था, उसे लग रहा था कि कहीं उसका यह गुप्त आकर्षण पकड़ा न जाए। लेकिन बिस्तर पर लेटी सोनी की वह मुद्रा इतनी उन्मुक्त और कामुक थी कि उसका युवा मन और उसकी आँखें खुद-ब-खुद उस तरफ खिंची चली जा रही थीं। वह चाय की चुस्की लेने के बहाने बार-बार अपनी पलकें उठाता और नाइटी से बाहर झलकती सोनी की गोरी, चिकनी जाँघों और नंगे घुटनों को एकटक निहारने लगता।

विकास वहीं बैठा सूरज की इस छटपटाहट और उसकी बदलती मनोदशा को बहुत गहराई से समझ रहा था। सूरज की आँखों में अपनी पत्नी के लिए बढ़ती उस बेकाबू वासना और तड़प को भाँपकर विकास के भीतर घृणा के बजाय एक तीव्र उत्तेजना का करंट दौड़ गया। उसे इस बात से गहरा मानसिक और शारीरिक सुख मिल रहा था कि उसका भांजा उसकी पत्नी के अंगों को देखकर अंदर ही अंदर सुलग रहा है। विकास ने जानबूझकर कोई दखल नहीं दिया, बल्कि वह शांत बैठकर इस वर्जित नज़ारे का लुत्फ उठाने लगा।

उधर इन दोनों मर्दों की आंतरिक हलचल से पूरी तरह बेखबर, सोनी एकदम बिंदास और मदहोश होकर फोन पर सुगना से बातें करने में मग्न थी। वह हंसती, मुस्कुराती और बातों-बातों में अपने पैरों को हवा में हिलाती, जिससे उसकी नाइटी का रेशमी कपड़ा बार-बार सरककर उसकी जाँघों को और उजागर कर देता।

सुगना और सोनी के बीच फोन पर बातचीत जारी थी। दोनों बहनें कम और सहेलियाँ ज़्यादा थीं, इसलिए उनके बीच की टोन बेहद अनौपचारिक और खुली हुई थी। हालांकि, सुगना को रत्ती भर भी यह अहसास नहीं था कि सूरज और सोनी के बीच कोई गुप्त संबंध बन चुका है; वह तो बस यही जानती थी कि विकास और सोनी मिलकर संतान सप्तमी का यह पवित्र और कठिन अनुष्ठान पूर्ण कर रहे हैं।

सुगना (फोन पर, धीमी और रसभरी आवाज़ में): "सोनी... छह दिन बीत गए। संतान सप्तमी का यह अनुष्ठान अपनी चरम ऊर्जा पर पहुँच चुका होगा। सच-सच बता, पहाड़ों की इस कड़कड़ाती ठंड में क्या तेरे बदन की तड़प को थोड़ी शांति मिली? अनुष्ठान की वो गुप्त अग्नि क्या तेरे रोम-रोम को जगा पा रही है? विकास जी इस अनुष्ठान को पूरे मन से निभा रहे हैं ना?"

सुगना के इस तीखे और बेबाक सवाल को सुनकर सोनी की रीढ़ में एक सिहरन दौड़ गई। उसने तिरछी नज़रों से बगल के सोफे पर बैठे विकास और सूरज की तरफ देखा। सोनी ने खुद को संभाला और मर्यादा का ध्यान रखते हुए अपनी आवाज़ को बेहद धीमा, मर्यादित लेकिन दोहरा अर्थ रखने वाला बनाया, ताकि सुगना को उसके और विकास के बीच की बात लगे, जबकि पास बैठे सूरज और विकास को उसका असली इशारा समझ आए।

सोनी (धीमे से मुस्कुराते हुए, बेहद रसीली आवाज़ में): "दीदी... आप तो जानती हैं कि यहाँ की हवाओं में कितनी ठंड है, लेकिन इस अनुष्ठान का प्रभाव ऐसा है कि भीतर एक अजब सी गर्माहट बनी हुई है। जो अग्नि आप कह रही हैं, उसकी तपिश इतनी तेज़ है कि यह बदन अब और बर्दाश्त नहीं कर पा रहा। कल रात की आहुति तो इतनी... इतनी गहरी थी कि मैं आपको क्या बताऊँ। जैसे सब कुछ पिघलने ही वाला था।"

सुगना फोन के उस पार खिलखिला कर हँस पड़ी। फिर अचानक उसे अपने बेटे की याद आई।

सुगना (एक माँ वाली ममता के साथ): "चल, यह तो बहुत अच्छी बात है। और सुन, मेरा सूरज कैसा है? पहाड़ों की ठंड उसे लग तो नहीं गई? वो तो पहली बार इतने ठंडे इलाके में गया है। थोड़ा उसका ध्यान रखना, खाने-पीने में बहुत लापरवाही करता है वो।"

सोनी ने फोन को थोड़ा और कसकर पकड़ा और अपनी आँखें सीधे सूरज की नज़रों में डाल दीं, जो उसे ही ताक रहा था।

सोनी (सूरज की आँखों में देखते हुए, शरारत भरी आवाज़ में): "दीदी, आप सूरज की चिंता बिल्कुल मत कीजिए। वो अब बच्चा नहीं रहा, बहुत समझदार और... बहुत 'बड़ा' हो गया है। कल रात भी मैंने उसका पूरा ध्यान रखा था। उसकी हर बेचैनी को शांत करना मुझे अच्छे से आता है। यहाँ तक कि सोने से पहले मैंने खुद पक्का किया कि वो पूरी तरह राहत में सोए।"

सोनी की इस बात का दोहरा मतलब विकास और सूरज को अच्छी तरह समझ आ रहा था। विकास की धड़कनें तेज़ हो गईं, और सूरज ने शरम और उत्तेजना के मारे अपनी नज़रें झुका लीं। सुगना इस गूढ़ इशारे को समझ नहीं पाई और उसने बात का रुख वापस विकास की तरफ मोड़ दिया।

सुगना (फुसफुसाते हुए, सोनी को उकसाते हुए): "अच्छा, यह तो ठीक है। पर ये बता, जीजा जी का क्या हाल है? इस बार के व्रत-त्योहार में उनमें वो पुराना जोश दिख रहा है या नहीं?"

सोनी ने एक गहरी सांस ली, अपने नितंबों को थोड़ा और सहज किया और विकास की तरफ देखते हुए फुसफुसाए अंदाज़ में कहा:

सोनी (इशारों ही इशारों में, बेहद रसीली आवाज़ में): "दीदी, सच कहूँ तो जब से आपने उन्हें वो 'गुरु मंत्र' दिया है ना, तब से तो वो और भी ज़्यादा मादक और बेचैन हो गए हैं। उनके भीतर की तड़प इस कदर बढ़ गई है कि अब वो हर वक्त बस अनुष्ठान को पूर्ण होते देखना चाहते हैं। कल रात भी उनकी वो बेचैनी साफ़ दिख रही थी, और वो इस खेल को और आगे बढ़ाने के लिए बहुत उतावले हैं।"

सोनी की यह बात सुनकर विकास के सीने में गर्व और वासना का एक साथ संचार हुआ। उसे साफ़ समझ आ गया कि सोनी सुगना के सामने ही आज रात होने वाली अंतिम और पूर्ण आहुति की बिसात बिछा रही है, जबकि सुगना इस पूरे सच से पूरी तरह अनजान थी। सूरज का दिल यह सुनकर सीने को चीरकर बाहर आने को बेताब था।

सुगना (एक गहरी सांस लेते हुए): "चलो, आज आखिरी दिन है। अपनी देह के उस पाश को पूरी तरह खोल देना और उस ऊर्जा को खुद में समाहित कर लेना ताकि गोद हरी हो जाए।"

सोनी (धीमे से मुस्कुराते हुए): "जी दीदी, आप निश्चिंत रहिए। आज का अनुष्ठान और आज की पूर्णाहूति ऐसी होगी कि सब कुछ हमेशा के लिए बदल जाएगा और इसे कोई कभी नहीं भूल पाएगा।"

फोन पर सुगना की बातें खत्म होने ही वाली थीं कि अचानक उसे कुछ याद आया और उसने सोनी से कहा, "सोनी, जरा सूरज को फोन देना, मुझे उससे भी थोड़ी बात करनी है।"

सोनी ने तुरंत बिस्तर पर अपनी स्थिति बदली और कमरे के दूसरी तरफ बैठे सूरज को आवाज़ लगाई, "सूरज... इधर आ, तेरी माँ का फोन है, तुझसे बात करना चाहती हैं।"

सूरज ने अपने मौसा जी की तरफ देखा और फिर धड़कते दिल के साथ बिस्तर के करीब आया। सोनी ने मुस्कुराते हुए फोन सूरज के हाथ में थमा दिया, लेकिन वह बिस्तर से उठी नहीं, बल्कि वहीं लेटी रही। सूरज फोन कान से लगाकर सुगना से बात करने लगा।

सुगना (लाड़ भरे अंदाज़ में): "हाँ सूरज, कैसा है रे तू? वहाँ पहाड़ों पर कोई परेशानी तो नहीं हो रही है ना? और सुन... बनारस से निकलते वक्त मैंने जो तुझे एक विशेष पैकेट देकर भेजा था और कहा था कि इसे संतान सप्तमी के अंतिम दिन ही निकालना है, वो याद है ना? आज वो विशेष पैकेट अपनी सोनी मौसी को समर्पित कर देना, उसमें बिल्कुल देरी मत करना।"

सुगना का सीधा मतलब उस धार्मिक पैकेट से था, लेकिन इस माहौल में 'विशेष पैकेट समर्पित करने' की बात सुनते ही सूरज के दिमाग ने मन ही मन सुगना की बातों का एक दूसरा और गुप्त अर्थ निकाल लिया। उसने चुपके से कल रात लिहाफ़ के भीतर के उस नज़ारे को याद किया और इस 'विशेष पैकेट' को अपने युवा अंग और वीर्य के अंश से जोड़ लिया, जिसे आज रात उसे पूरी तरह मौसी को सौंपना था। हालांकि, उसने अपने चेहरे पर इस विचार की एक शिकन भी नहीं आने दी और बेहद सामान्य आवाज़ में जवाब दिया।

सुगना: "और सच-सच बता, तू ठीक है ना वहाँ? तेरी मौसी तेरा ध्यान रख रही है?"

सूरज (बेहद सहज और शांत आवाज़ में): "जी माँ, मैं बिल्कुल ठीक हूँ। आप चिंता मत करो... सोनी मौसी मेरा बहुत ख्याल रख रही हैं। यहाँ मुझे किसी चीज़ की कमी नहीं होने देतीं।"

सूरज की आवाज़ में कहीं भी वासना या उत्तेजना नहीं टपक रही थी, वह अपनी माँ से एक संस्कारी बेटे की तरह ही बात कर रहा था। सुगना उसकी इस सादगी से संतुष्ट होकर आगे बोली।

सुगना (नसीहत देते हुए): "चल, यह तो बहुत अच्छी बात है। लेकिन सुन, सिर्फ मौसी ही तेरा ख्याल रखे, ऐसा नहीं होना चाहिए। तू भी अब बड़ा हो गया है, आज अनुष्ठान का आखिरी और सबसे बड़ा दिन है। मेरी बात गाँठ बांध ले... तुझे भी अपनी सोनी मौसी का बहुत ख्याल रखना है, उन्हें हर हाल में खुश रखना है और इस पावन दिन पर उन्हें बिल्कुल भी परेशान मत करना। जैसा वो कहें, वैसा ही करना।"

माँ की इस नसीहत को सुनकर भी सूरज ने मन ही मन उसका दूसरा, गहरा और कामुक अर्थ निकाला कि आज रात उसे मौसी को शारीरिक रूप से पूरी तरह तृप्त और खुश करना है। लेकिन प्रकट में उसने अपनी आवाज़ को बेहद मर्यादित और गंभीर बनाए रखा।

सूरज (गंभीरता से): "जी माँ, आप बिल्कुल फिक्र मत करो। मौसी कितनी खुश हैं... यह जब आप बनारस वापस आने पर उनसे मिलेंगी, तो खुद उनके चेहरे से ही पूछ लेना। मैं आपकी कही हर बात का पूरा ध्यान रखूँगा।"

सूरज का उत्तर ऊपर से जितना सीधा और मर्यादित था, उसके भीतर छिपा अर्थ उतना ही गहरा था। सूरज ने भले ही अपनी बातों से कुछ भी ज़ाहिर नहीं होने दिया, लेकिन पास ही बिस्तर पर लेटी सोनी उसकी आँखों के ठहराव और इस सयानेपन को देखकर तुरंत सब कुछ समझ गई। सोनी को साफ़ अंदाज़ा हो गया कि सूरज बाहर से जितना शांत दिख रहा है, भीतर से वह आज रात की पूर्णाहूति के लिए उतना ही दृढ़ और तैयार हो चुका है।

यह कहकर सूरज ने फोन रख दिया, और कमरे में फैली खामोशी अब आज के महा-मिलन का इशारा कर रही थी।

विकास जैसे ही फ्रेश होने के लिए बाथरूम में जाता है, कमरे का माहौल एक बार फिर पूरी तरह से बदल जाता है। सूरज बिना कोई देरी किए तुरंत अपनी अटैची के पास पहुँचता है और चैन खोलकर उसमें से अपनी माँ का दिया हुआ वह विशेष पैकेट निकाल लाता है। वह उस पैकेट को लेकर सीधे बिस्तर के पास आता है और मुस्कुराते हुए सोनी मौसी के हाथों में सौंप देता है।

सोनी उस पैकेट को अपने हाथों में लेती है और पलटकर देखते हुए बेहद भावुक और लाड़ भरे लहज़े में कहती है, "तेरी माँ भी ना सूरज... सचमुच सबका कितना ख्याल रखती हैं। बनारस में बैठकर भी उन्हें यहाँ के अनुष्ठान की एक-एक चीज़ की चिंता है।"

सूरज अपनी माँ के इस स्वभाव से अच्छी तरह वाकिफ था। वह गर्व से मुस्कुराते हुए कहता है, "हाँ मौसी, माँ सचमुच अनोखी हैं और हमारे पूरे घर की जान हैं। पर मौसी... आप भी तो कितनी अच्छी हैं, आप भी तो यहाँ हम सबका कितना ध्यान रखती हैं।"

सूरज की आवाज़ में एक गहरा ठहराव और सम्मान था, लेकिन उसकी आँखें सीधे सोनी के बदन और उसके चेहरे की लाली पर टिकी हुई थीं। सोनी भी कोई अनजान नहीं थी, वह सूरज की आँखों में सीधे झाँकती है और उसके दिल में छिपे उस असली आशय को, उस कशिश को बहुत अच्छी तरह समझ रही होती है जो कल रात से उनके बीच पनप रही थी। सोनी के इस सयानेपन और अपनी तारीफ को सुनकर सोनी के भीतर भी एक अजीब सी कामुक उत्तेजना जाग उठती है। वह बेहद रसीले और मादक लहज़े में, आँखें मटकाते हुए कहती है, "और मेरा सूरज भी तो... बिल्कुल अपनी माँ पर ही गया है। दूसरों को खुश रखना और उनका ख्याल रखना इसे भी बहुत अच्छे से आता है।"

सोनी के इस दोहरे और गहरे अर्थ वाले जवाब को सुनकर सूरज के चेहरे पर एक चुलबुली मुस्कान तैर जाती है। दोनों एक-दूसरे की आँखों में छिपे उस मूक आमंत्रण को पढ़ लेते हैं और मद्धम रोशनी में एक-दूसरे को देखकर मुस्कुराने लगते हैं।

सोनी ने उत्सुकता से उस पैकेट की गाँठ को खोला और उसके भीतर रखी एक-एक चीज़ को निकालकर बेहद सलीके और करीने से बिस्तर पर सजाने लगी। जैसे-जैसे सामान बाहर आ रहा था, कमरे के भीतर का माहौल और भी सम्मोहक होता जा रहा था। पैकेट से सबसे पहले एक बेहद सुंदर, गाढ़े लाल रंग का जोड़ा निकला—एक बेहद खूबसूरत, बारीक कढ़ाई वाला लहंगा और चोली। लेकिन जैसे ही सोनी ने लहंगे के नीचे दबे बाकी कपड़ों को उठाया, उसके गालों पर गहरी लाली छा गई। उस जोड़े के साथ ही उसी से मेल खाते हुए बेहद झीने, पारदर्शी और कामुक अंतर्वस्त्र (अंडरगारमेंट्स) भी रखे थे। सुगना का यह चुनाव इस बात का साफ़ संकेत था कि इस अंतिम दिन की आहुति में देह का समर्पण किस हद तक होना था।

इसके बाद सोनी के हाथ में दो सुपारियाँ आईं। ये आम सुपारियाँ नहीं थीं, बल्कि उन दोनों के बीच में विशेष रूप से छेद करके एक मोटा, मज़बूत धागा पिरोया गया था। इस अजीब सी वस्तु को देखकर सोनी के मन में गहरा कौतूहल और अचरज हुआ। उसने अपने पूरे जीवन में पूजा की ऐसी कोई सामग्री या वस्तु आज तक नहीं देखी थी। वह समझ नहीं पा रही थी कि संतान सप्तमी के इस गुप्त अनुष्ठान में इन आपस में बंधी सुपारियों का क्या उपयोग होने वाला है।

इनके अलावा, पैकेट में कुछ पारंपरिक पूजन सामग्री थी और सबसे नीचे रखी थी एक छोटी, नक्काशीदार इत्र की शीशी। सोनी ने जैसे ही उस शीशी को अपने हाथों में लिया और उसका ढक्कन थोड़ा ढीला किया, उसकी एक तीखी, maahak खुशबू सीधे सोनी के मर्म (अंतरात्मा) तक पहुँच गई। इस महक के नाक में घुसते ही सोनी के बदन में एक सिहरन दौड़ गई और अतीत का एक गहरा साया उसकी आँखों के सामने घूम गया। यह वही चिर-परिचित, मदहोश कर देने वाली खुशबू थी जिसे उसने सालों पहले बनारस में सुगना के कमरे में महसूस किया था। यह वही इत्र था जो सुगना ने अपने जीवन के उस वर्जित मोड़ पर, सर्वेश जी (सूरज के पिता) के साथ पहली बार पूर्ण संभोग के समय लगाया था। एक पल के लिए सोनी का पूरा वजूद कांप उठा, पुरानी यादें और उस रात का रहस्य उसके सामने सजीव हो उठा। पर सोनी एक पढ़ी-लिखी, समझदार डॉक्टर थी; उसने तुरंत खुद को संभाला। वह जानती थी कि अतीत में जो कुछ भी हुआ, उसमें इस इत्र की कोई गलती नहीं थी, वह तो महज़ एक संयोग था।

तभी उसका ध्यान पैकेट के बिल्कुल खाली हो चुके निचले हिस्से पर गया। वहाँ सब सामान हट जाने के बाद अंत में एक मुड़ा हुआ पत्र निकला। सोनी ने उत्सुकता और थोड़ी सी घबराहट के साथ उस पत्र को अपने हाथों में ले लिया और बिस्तर पर पेट के बल लेटे हुए ही, उसे खोलकर बेहद ध्यान से पढ़ने लगी।

सोनी ने उस पत्र को खोला और उसकी एक-एक पंक्ति को बेहद ध्यान से और डूबकर पढ़ने लगी। सुगना ने उस पत्र में संतान सप्तमी की इस अंतिम और महा-पूर्णाहुति की पूरी गुप्त विधि को विस्तार से समझाया था।

पत्र में सुगना ने लिखा था:

"सोनी, आज का दिन तेरे जीवन का सबसे बड़ा दिन है। मेरी बात ध्यान से सुन, सुबह की चाय के बाद तू सबसे पहले स्नान करके तैयार होना और सीधे मंदिर जाकर देवी माँ का आशीर्वाद लेना। लेकिन तैयार होते समय तुझे एक विशेष काम करना है। मैंने जो इत्र की शीशी भेजी है, उस जादुई सुगंध को तुझे अपने बदन के उन सभी कामुक अंगों पर लगाना है जो किसी भी पुरुष को सबसे प्यारे होते हैं। यहाँ तक कि उस इत्र की कुछ बूंदें तुझे अपनी मुनिया (योनि) के चारों ओर भी लगानी हैं, ताकि उसकी मादकता पुरुष के भीतर की बची-खुची मर्यादा को भी पूरी तरह पिघला दे।

अब बात करती हूँ इन दो सुपारियों की, जिन्हें देखकर तू ज़रूर हैरान हुई होगी। मैंने ये दो अलग-अलग आकार की सुपारियाँ इसलिए भेजी हैं ताकि तू अपनी सुविधा और पसंद के हिसाब से चुन सके। स्नान करने के बाद, इनमें से जो भी सुपारी तेरी मुनिया आसानी से स्वीकार कर पाए, उसे अपनी गहराई के भीतर रख लेना। जब तक तू मंदिर में पूजा करके वापस आएगी, तब तक कई घंटों में तेरी योनि से निकलने वाला वो प्राकृतिक, कामुक अर्क (रस) इस सुपारी के भीतर पूरी तरह समाहित हो चुका होगा।

पूजा से लौटने के बाद, जब महा-मिलन का समय आएगा, तब तुझे यह सिद्ध सुपारी उस पुरुष को खिलानी है जो आज इस अनुष्ठान की पूर्णाहुति करेगा। उससे कहना कि वह इसे चबा-चबाकर इसके भीतर समाए तेरे बदन के उस अमृत रस को पूरी तरह आत्मसात कर ले। छोटा या बड़ा आकार तू खुद तय कर लेना। और हाँ, धागा मैंने इसीलिए पिरोया है ताकि सुपारी अंदर ही न छूट जाए, धागे का एक सिरा बाहर रहेगा जिससे तू उसे बाद में आसानी से निकाल सके।"

पत्र का आखिरी शब्द पढ़ते ही सोनी का पूरा वजूद उत्तेजना और विस्मय से सिहर उठा। वह सुगना की इस अकल्पनीय बुद्धिमत्ता और दूरदर्शिता पर मन ही मन बेहद गर्व कर रही थी। उसे इस बात का अहसास हो गया कि सुगना ने इस अनुष्ठान को सफल बनाने के लिए काम-शास्त्र के कितने गहरे और गुप्त नियमों का सहारा लिया था। अब सोनी के सामने आगे की पूरी तस्वीर बिल्कुल साफ और स्पष्ट हो चुकी थी कि उसे आज के इस विशेष दिन पर क्या और कैसे करना है। उसने बिना किसी देरी के बिस्तर पर सजे उन झीने, कामुक अंतर्वस्त्रों को उठाया और उनके भीतर ही उन सुपारियों को बड़ी चतुराई से लपेटकर अपने पास सुरक्षित रख लिया। अब उसकी धड़कनें तेज़ थीं, और वह बिस्तर पर बैठी हुई बेहद उत्सुकता से विकास के बाथरूम से बाहर आने का इंतज़ार करने लगी, ताकि वह खुद स्नान करने जा सके और सुगना के बताए इस कामुक विधान की शुरुआत कर सके।

बाथरूम के भीतर पहाड़ों की ठंडी हवाओं के बीच गरम पानी की भाप तैर रही थी, जिसने पूरे माहौल को एक रहस्यमयी और मादक कोहरे से भर दिया था। सोनी आज एक अद्भुत मानसिक और शारीरिक ऊर्जा से भरी हुई थी। आज का यह स्नान केवल देह को साफ़ करने के लिए नहीं, बल्कि उस महा-मिलन के लिए खुद को एक पवित्र वेदी की तरह तैयार करने के लिए था, जहाँ सामाजिक वर्जनाएँ और कामुकता दोनों एक दिव्य पवित्रता के साथ एकाकार होने वाले थे। सोनी को साफ़ दिख रहा था कि आज का यह अनुष्ठान इतिहास रचने जा रहा था—एक तरफ वह अपने पति विकास की उस अनोखी, दबी हुई इच्छा को उनके ही सामने पूर्ण करने जा रही थी, और दूसरी तरफ उसी वेदी पर सूरज के साथ उस दिव्य संभोग को अंजाम देने वाली थी, जो संतान सप्तमी की वास्तविक पूर्णाहुति करने वाला था।

सोनी ने दर्पण के सामने खड़े होकर पास पड़े रेज़र को उठाया। पिछले छह-सात दिनों की आपाधापी और पहाड़ों के इस प्रवास में उसकी मुनिया (योनि) के आस-पास हल्के-फुल्के बाल बाहर झांकने लगे थे। उसने बेहद सलीके और बारीकी से उन बालों को साफ़ किया। जब उसकी मुनिया पूरी तरह चिकनी, मखमली और गोरी आभा के साथ चमकने लगी, तो उसने अपने बदन को तौलिये से सुखाया।

अब बारी थी सुगना दीदी के दिए उस गुप्त और कामुक विधान को अमली जामा पहनाने की। सोनी के सामने बिस्तर पर वे दो धागे से बंधी सुपारियाँ रखी थीं। तभी अचानक सोनी के डॉक्टर दिमाग में एक गहरा द्वंद्व और कौतूहल पैदा हुआ। उसने सोचा कि सुगना ने तो एक सुपारी रखने को कहा था जिसे पूर्णाहुति करने वाले पुरुष को खिलाना था। आज का असली योद्धा और उस ऊर्जा का स्रोत निश्चित रूप से सूरज था, इसलिए यह रस सूरज को मिलना अनिवार्य था। लेकिन यदि वह केवल सूरज को ही यह सिद्ध रस पिलाएगी, तो विकास कहीं मन ही मन दुखी या उपेक्षित महसूस न करने लगे, क्योंकि वे भी तो इस अनुष्ठान के साक्षी और उसके पति थे। और यदि बाद में कभी सुगना ने उससे इस बारे में बारीक सवाल पूछ लिया, तो वह क्या जवाब देगी?

इस धर्मसंकट का सोनी ने अपनी बुद्धिमत्ता से एक बेहद कामुक और चमत्कारी हल निकाला। उसने तय किया कि वह किसी को दुखी नहीं करेगी। उसने उन दोनों ही सुपारियों को—छोटी और बड़ी—एक साथ अपने भीतर समाहित करने का फैसला किया। सोनी ने गहरी सांस ली और सुगना की दूरदर्शिता को प्रणाम करते हुए उन दोनों सुपारियों को एक-एक करके अपनी मुनिया की गुलाबी, नम गहराइयों के भीतर धकेल दिया। उसकी रसीली योनि ने उन दोनों सुपारियों को सहर्ष अपनी तड़पती गहराई में स्थान दे दिया।

उन दोनों सुपारियों के बीच पिरोया हुआ वह मोटा, मज़बूत धागा अब उसकी मुनिया के मखमली होठों से बाहर निकलकर नीचे लटक रहा था, जो उसकी योनि की बनावट को और भी ज़्यादा खूबसूरत, उत्तेजक और आमंत्रित बनाने लगा था। धागे के आखिरी छोर पर सुगना ने जो छोटी-छोटी, कलात्मक गांठे बनाई थीं, वे सोनी की गोरी जाँघों के बीच बेहद आकर्षक और किसी गुप्त आभूषण की तरह लग रही थीं। आदमकद आईने में अपनी मुनिया की यह अद्भुत और पूर्ण कामुक तैयारी देखकर सोनी खुद के ही रूप पर मुग्ध हो गई और उसके भीतर रोमांस का एक तीव्र ज्वार उठ गया। उसने तुरंत सुगना के भेजे झीने और कामुक अंतर्वस्त्रों को पहना और बदन पर तौलिया लपेटकर बाथरूम से बाहर आ गई।

बाहर आकर उसने देखा कि विकास इस समय सूरज के कमरे में बैठकर उससे आज की अंतिम पूजा और व्यवस्था के बारे में बातें कर रहा था। कमरे में खुद को अकेला पाकर सोनी ने बिना समय गंवाए सुगना की भेजी इत्र की शीशी उठाई। उसने उस मादक, सम्मोहक इत्र की बूंदें अपनी चूचियों के उभारों पर, नाभि के पास, अपनी पीठ की ढलान, कमसिन कमर और विशेष रूप से अपनी जाँघों और मुनिया के आस-पास के हर उस हिस्से पर करीने से लगाई, जहाँ आज रात सूरज के युवा और बेताब हाथ पहुँचने वाले थे। इत्र की वह खुशबू हवा में तैरते ही पूरे कमरे को एक वर्जित कामुकता से महका गई।

इसके तुरंत बाद, सोनी ने सुगना के भेजे उस गाढ़े लाल रंग के सुंदर लहंगे और चोली को धारण कर लिया। बारीक कढ़ाई वाले उस लहंगे और कसी हुई चोली में सोनी इस वक्त किसी साक्षात कामदेवी की तरह लग रही थी, जिसका रूप पहाड़ों की ठंड में भी आग लगाने के लिए पूरी तरह तैयार हो चुका था।

 
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भाग 203

उसने उस मादक, सम्मोहक इत्र की बूंदें अपनी चूचियों के उभारों पर, नाभि के पास, अपनी पीठ की ढलान, कमसिन कमर और विशेष रूप से अपनी जाँघों और मुनिया के आस-पास के हर उस हिस्से पर करीने से लगाई, जहाँ आज रात सूरज के युवा और बेताब हाथ पहुँचने वाले थे। इत्र की वह खुशबू हवा में तैरते ही पूरे कमरे को एक वर्जित कामुकता से महका गई।

इसके तुरंत बाद, सोनी ने सुगना के भेजे उस गाढ़े लाल रंग के सुंदर लहंगे और चोली को धारण कर लिया। बारीक कढ़ाई वाले उस लहंगे और कसी हुई चोली में सोनी इस वक्त किसी साक्षात कामदेवी की तरह लग रही थी, जिसका रूप पहाड़ों की ठंड में भी आग लगाने के लिए पूरी तरह तैयार हो चुका था।

अब आगे..

सोनी और विकास जब मंदिर जाने के लिए कमरे से बाहर निकलने लगे, तभी विकास ने पीछे मुड़कर सूरज से कहा, "सूरज, तू भी हमारे साथ चल। संतान सप्तमी का यह आखिरी दिन है, तेरा साथ होना शुभ होगा।"

सूरज को पहले तो यह थोड़ा असहज और अजीब लगा। उसे लगा कि पति-पत्नी के इस अनुष्ठानिक दर्शन के बीच उसका जाना शायद ठीक नहीं होगा। लेकिन तभी सोनी ने उसकी तरफ देखा और अपनी खनकती आवाज़ में कहा, "चल ना सूरज, सुगना दीदी ने भी तो कहा था कि आज के दिन मेरा पूरा ख्याल रखना है।" मौसी के इस अपनेपन और अधिकार भरे आग्रह को सूरज टाल नहीं सका और वह भी साथ चलने के लिए तैयार हो गया।

जब तीनों होटल की लॉबी में पहुँचे, तो वहाँ का नज़ारा देखने लायक था। लाल चटक लहंगे और कसी हुई चोली में सजी-धजी सोनी जब अपनी मादक चाल से आगे बढ़ रही थी, तो लॉबी और रिसेप्शन पर मौजूद कर्मचारी और अन्य पर्यटक ठगे से रह गए। पहाड़ों के इस दूरदराज टूरिस्ट स्पॉट पर एक पारंपरिक, दुल्हन की तरह सजी इतनी रूपवान और आकर्षक महिला को देखना सबके लिए एक अनोखा और विस्मयकारी अनुभव था। हर कोई अपनी नज़रें हटाए बिना बस सोनी को ही एकटक निहार रहा था। लेकिन सोनी इन सब नज़रों से बेपरवाह और पूरी तरह बिंदास होकर अपने उस गुप्त 'मिशन' की तरफ आगे बढ़ रही थी, जिसकी बिसात सुगना ने बिछाई थी।

कुछ ही देर बाद तीनों पहाड़ों के बीच स्थित एक प्राचीन और शांत मंदिर में पहुँचे। मंदिर का वातावरण शंख, घंटियों की गूंज और कपूर की खुशबू से पूरी तरह दिव्य हो चुका था। सोनी ने गर्भगृह के सामने खड़े होकर अपनी आँखें बंद कीं और पूरी श्रद्धा से ईश्वर से अपनी सूनी गोद को भरने और गर्भवती होने का वरदान मांगा। जैसे ही उसने अपनी पलकें मूँदीं, उसके अंतर्मन में एक सुंदर, सलोने बालक की धुंधली सी छवि तैर गई। उस कल्पना में जो बालक उसे दिखाई दिया, उसकी नैन-नक्श और मासूमियत बिल्कुल सूरज जैसी थी। इस अलौकिक अहसास से सोनी का मन भर आया और वह ईश्वर के सामने नतमस्तक हो गई।

उसी समय, सोनी के दोनों तरफ खड़े विकास और सूरज ने भी हाथ जोड़कर अपनी आँखें बंद कर लीं। दोनों ने ईश्वर से केवल और केवल सोनी की झोली भरने, उसे दुनिया की हर खुशी देने और उसकी गोद हरी करने की सच्चे दिल से प्रार्थना की। उस पावन घड़ी में मंदिर का पूरा माहौल एक पवित्र पारिवारिक भावना में बदल गया। कुछ पलों के लिए देह की भूख, वासना और सारे गुप्त विचार कहीं गहरे गायब हो गए, और उनकी जगह सिर्फ एक निश्छल समर्पण और श्रद्धा ने ले ली।

पर जैसे ही पूजा-अर्चना समाप्त हुई और वे तीनों मंदिर की सीढ़ियाँ उतरकर वापस बाहर आए, पहाड़ों की उस ठंडी हवा ने एक बार फिर उनके बदन को छुआ। मंदिर परिसर से बाहर कदम रखते ही विकास के दिमाग में आज होने वाले उस अंतिम, वर्जित और चरम अनुष्ठान की कल्पनाएँ दोबारा कौंधने लगीं। अपनी पत्नी के इस देवदासी जैसे रूप और सुगना के उस गुप्त विधान के बारे में सोच-सोचकर विकास के भीतर कामुकता का ज्वार इस कदर बढ़ा कि उसकी मर्यादा एक बार फिर ढहने लगी और उसका अंग कपड़ों के भीतर पूरी तरह से तनकर खड़ा हो गया।

मंदिर से निकलकर होटल वापस आने के रास्ते में गाड़ियों के टायरों की आवाज़ और पहाड़ों के सन्नाटे के बीच सोनी का मन विचारों के एक गहरे भंवर में डूबा हुआ था। वह खिड़की के बाहर खिली हुई धूप को देख रही थी, लेकिन उसका दिमाग आने वाले समय के घटनाक्रमों को बहुत बारीकी से बुनने और समझने की कोशिश कर रहा था।

उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि आखिर वह विकास की उस अनोखी और वर्जित इच्छा को कैसे पूरी करेगी, जिसमें उसका पति स्वयं अपनी ही पत्नी को अपने भांजे की बाहों में सौंपकर उस मिलन का साक्षी बनना चाहता था।

इस योजना के बीच सोनी के मन में एक गहरा डर और चिंता बार-बार सिर उठा रही थी। वह जानती थी कि सूरज एक युवा और गरम खून का लड़का है। इस अंतिम अनुष्ठान की वेदी पर, सुगना के दिए इत्र की मादक महक और संतान सप्तमी के उस माहौल में जब सूरज अपनी वासना के अधीन होकर पूरी तरह से उन्मुक्त (बेकाबू) हो जाएगा, तब उसे संभालना बहुत मुश्किल होगा।

सोनी को सबसे बड़ा डर इस बात का था कि यदि संभोग की उस चरम और मदहोश कर देने वाली घड़ी में सूरज अपनी सुध-बुध खो बैठा, और उसने अपने मुँह से बनारस के उन पुराने मिलनों की चर्चा छोड़ दी, या उनके बीच पहले से बने शारीरिक संबंधों की कोई बात अनजाने में कह दी, तो अनर्थ हो जाएगा। सूरज इस समय खेल के इस नए नियम से बिल्कुल अनजान था कि मौसा जी कमरे में ही कहीं छिपकर सब देखने वाले हैं। सोनी सोच रही थी कि यदि सूरज अपनी बेताबी में ज़्यादा बिंदास या बेपरवाह हो गया, तो विकास के सामने यह बात कैसे छुपी रहेगी कि वे दोनों पहली बार एक नहीं हो रहे हैं, बल्कि उनके बीच पहले ही सब कुछ घटित हो चुका है।

अपनी देह पर लगे इत्र की महक और लहंगे की सरसराहट के बीच सोनी ने मन ही मन यह तय कर लिया कि उसे सूरज पर पूरी तरह नियंत्रण रखना होगा। उसे कुछ ऐसी तरकीब निकालनी होगी जिससे सूरज कमरे में आकर भी एक कड़े अनुशासन और मर्यादा के दायरे में बंधा रहे, ताकि विकास के सामने अतीत का वह गुप्त पन्ना कभी न खुल सके।

होटल के करीब पहुँचते-पूँछते सोनी का दिमाग पूरी तरह सक्रिय हो चुका था। उसने अपनी घबराहट पर काबू पाया और एक गहरी सांस लेकर इस उलझन का तोड़ निकाल लिया। वह समझ गई कि सूरज के गरम खून और उसकी उन्मुक्तता को नियंत्रित करने का केवल एक ही तरीका था—अनुष्ठान के नियमों को और अधिक रहस्यमयी और सख्त बना देना। ऐसा करने से सूरज मर्यादा के डर से खुद ही शांत रहेगा और कुछ भी अतिरिक्त बोलने की हिम्मत नहीं करेगा।

जैसे ही गाड़ी होटल के अहाते में रुकी और वे तीनों उतरकर अपने फ्लोर की तरफ बढ़े, सोनी ने विकास की तरफ देखकर हौले से मुस्कुराया। वह विकास को यह मूक संदेश दे रही थी कि अब खेल का समय आ चुका है।

कमरे में पहुँचते ही, विकास ने पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार सूरज की उपस्थिति में सोनी से कहा

मेरा लखनऊ का एक दोस्त नैनीताल आया है मुझे कुछ देर के लिए जाना पड़ेगा।"

सोनी ने आंखें तरेरते हुए कहा …आज के दिन भी आपको जाना है?

सोनी जाना तो नहीं चाहता पर जरूरी है मैं एक-दो घंटे में आ जाऊंगा प्लीज…

विकास का यह कहना असल में एक संकेत था कि वह बाहर जाने का ढोंग कर रहा है, ताकि सूरज को लगे कि वे कमरे में नहीं हैं, जबकि असल में विकास को थोड़ी ही देर में बालकनी के रास्ते वापस आकर छुपना था।

विकास के कमरे से बाहर निकलते ही, सोनी ने बिना समय गंवाए कमरे का भारी दरवाज़ा अंदर से बंद कर लिया पर लॉक नहीं किया। कमरे में सुगना के इत्र की मादक खुशबू पहले से ही तैर रही थी, जिसने सूरज के भीतर एक सिहरन पैदा कर दी थी। वह लाल लहंगे में सजी अपनी मौसी के इस साक्षात कामदेवी जैसे रूप को देखकर सम्मोहित खड़ा था।

सोनी ने अपनी आवाज़ को बेहद धीमा, गंभीर और रहस्यमयी कर लिया। वह सूरज के ठीक सामने आकर खड़ी हो गई, जिससे उसकी चोली के भीतर से आती इत्र की तेज महक सीधे सूरज के नथुनों में समाने लगी।

सोनी (बेहद गंभीर और दबी आवाज़ में): "सूरज, ध्यान से सुन। संतान सप्तमी की यह महा-पूर्णाहुति कोई साधारण मिलन नहीं है। सुगना दीदी ने इस अंतिम रात के लिए दो बहुत कड़े और अटूट नियम बताए हैं, जिनका पालन तुझे हर हाल में करना होगा। यदि तूने इसमें ज़रा भी चूक की, तो यह अनुष्ठान खंडित हो जाएगा और ईश्वर का कोप हम पर बरसेगा।"

सूरज ने अपनी थूक निगलते हुए मौसी की आँखों में देखा। उसकी वासना इस कड़े लहज़े को सुनकर थोड़ी नियंत्रित हुई।

सूरज (धीमे से): "हाँ मौसी, बताइए। क्या नियम हैं? मैं हर नियम मानने को तैयार हूँ।"

सोनी (उसकी आँखों में आँखें डालकर फुसफुसाते हुए): "पहला नियम—आज संभोग के पहले क्षण से लेकर अंतिम आहुति तक, तुझे पूरी तरह 'मौन व्रत' धारण करना होगा। तेरे मुँह से एक भी शब्द, कोई पुरानी चर्चा, या कोई भी बात नहीं निकलनी चाहिए। यहाँ तक कि आहें भी नहीं। जो कुछ भी होगा, वह पूरी तरह खामोशी के साथ संपन्न होगा।"

सोनी ने यह नियम इसलिए बनाया ताकि सूरज भूलकर भी बनारस के पुराने मिलनों का ज़िक्र न कर बैठे और विकास तक कोई बात न पहुँचे।

सोनी ने आगे कहा: "और दूसरा नियम... आज रात मैं ठीक उसी प्रकार से इस अनुष्ठान को सिद्ध करूँगी, जैसा मैंने बनारस में तेरे भीतर के पुरुषत्व को पहली बार जगाने के लिए किया था। याद है न तुझे?"

'पुरुषत्व को जगाने' की बात सुनते ही सूरज के दिमाग में बिजली की तरह वह पूरा दृश्य कौंध गया। उसे तुरंत याद आया कि कैसे उसकी मौसी ने उसकी आँखों पर पट्टी बाँधकर उसे पूरी तरह से अंधकार में रखकर उसके भीतर की मर्दानगी को चरम पर पहुँचाया था।

सूरज (हड़बड़ाई हुई, भारी आवाज़ में): "मौसी... तो क्या आप मेरी आँखों पर आज फिर से वही पट्टी बाँधने जा रही हैं?"

सोनी ने धीरे से मुस्कुराते हुए आगे बढ़कर सूरज के माथे को चूमा। उसके होंठ जब सूरज की त्वचा से अलग हुए, तो उसकी आवाज़ में एक अकाट्य गहराई थी।

सोनी: "हाँ मेरे वीर, यही इस विधान का अंतिम सत्य है। शास्त्र कहते हैं कि संतान प्राप्ति की यह महा-पूर्णाहुति यदि पति के अलावा किसी अन्य पुरुष के अंश से हो रही हो, तो स्त्री की मर्यादा को बचाए रखने के लिए पुरुष की आँखों पर पट्टी बाँधना अनिवार्य होता है। जब तुम्हारी आँखों के सामने अंधेरा होगा, तभी प्रकृति इस पूर्णाहूति को केवल एक अनुष्ठानिक आहुति मानेगी, कोई पाप नहीं।"

इसी बीच क्लिक की आवाज हुई और सूरज ने पूछा मौसी लगता है कोई आया है..

सोनी को पता था यह कोई और नहीं बल्कि विकास ही है उसने सूरज की बात को इग्नोर किया और शांति से बोली

अरे यहां कौन आएगा विकास जी तो बाहर गए और मैंने दरवाजा खुद लॉक किया है।

सोनी के इस तार्किक और रहस्यमयी बातों ने सूरज के मन के सारे संशयों को शांत कर दिया। अब वह पूरी तरह से नियंत्रित भी था और डरा हुआ भी कि उसे एक शब्द भी नहीं बोलना है। उसे रत्ती भर भी अंदाज़ा नहीं था कि आँखों पर पट्टी बाँधने का यह विधान असल में सोनी ने इसलिए रचा था ताकि वह अपने मौसा जी को कभी देख न सके।

सोनी ने आगे बढ़कर पलंग के पास रखी अपना लाल दुप्पटा उठाया और बेहद कोमलता से सूरज की आँखों पर बाँध दिया। जैसे ही सूरज की आँखों के सामने पूरी तरह अंधेरा छाया, दृष्टि छिन जाने से उसकी बाकी की इंद्रियाँ दस गुना अधिक संवेदनशील हो चुकी थीं।

इसी बीच बालकनी का झीना परदा धीरे से हटा और विकास बेहद खामोशी से कमरे के भीतर दाखिल हो गया। अपनी पत्नी और भांजे के बीच की उस छुपी हुई, अनोखी केमिस्ट्री और बेताबी को अपनी आँखों से साफ़ देखना उनके भीतर के पौरुष को एक चरम उत्तेजना से भर रहा था। विकास को पूरा आभास हो चुका था कि ये दोनों पहले भी एक हो चुके हैं, लेकिन इस सच को भाँपकर उनके भीतर कोई क्रोध नहीं, बल्कि एक असीम कामुक रोमांच जाग उठा था।

सोनी अब इस त्रिकोणीय खेल के केंद्र में थी। उसने सूरज को पूरी तरह से मौन रहने का निर्देश दे रखा था, इसलिए सूरज बिना कोई शब्द बोले, केवल अपनी भारी होती साँसों के सहारे सोनी के नितंबों को अपनी मजबूत उंगलियों से भींच रहा था।

सूरज की आँखों पर बंधी वह लाल मखमली पट्टी अब उसके लिए केवल एक आवरण नहीं, बल्कि उसकी बाकी सभी इंद्रियों को जगाने का माध्यम बन चुकी थी। दृष्टिहीनता के उस सघन अंधकार में, सूरज की हथेलियाँ बेहद संवेदनशील हो उठी थीं। उसने अपनी उँगलियों और हथेलियों को धीरे-धीरे सोनी के बदन के उतार-चढ़ाव पर फिराना शुरू किया। रेशमी वस्त्रों के ऊपर से भी उसे सोनी के जिस्म की तपिश और उसकी त्वचा की मखमली कोमलता का साफ़ अहसास हो रहा था।

सोनी, जो इस पूरे खेल को अपने नियंत्रण में रखने की कोशिश कर रही थी, सूरज के इस सधे हुए और गहरे स्पर्श के आगे खुद को रोक नहीं पाई। जैसे-जैसे सूरज की हथेलियाँ उसकी कमसिन कमर और पीठ की ढलान को सहला रही थीं, सोनी आत्मसमर्पण के भाव में उसके आलिंगन में खींचती चली गई। उसका सिर सूरज के गठीले कंधे पर टिक गया और उसकी अपनी साँसें भारी होने लगीं।

सूरज ने बिना कोई शब्द बोले, अपनी मौसी को पूरी शिद्दत से अपने आगोश में भर लिया। वह उसके चेहरे के करीब आया और उसके कानों के पीछे तथा सुगना के इत्र से महकती गोरी गर्दन पर अपने तपते हुए होंठ रख दिए। सूरज जिस दीवानगी और अधिकार के साथ सोनी की गर्दन और कानों को चूम रहा था, वह कोई नौसिखिया प्रयास नहीं था। उसमें एक पुराना ठहराव, एक गहरा अनुभव और एक जानी-पहचानी कशिश साफ़ झलक रही थी।


विकास की साँसें इस दृश्य को देखकर ऊपर-नीचे होने लगीं। उनकी छाती धौंकनी की तरह चल रही थी। एक परिपक्व पुरुष होने के नाते, सूरज के चूमने के अंदाज़ और सोनी के उसके प्रति इस सहज झुकाव को देखकर विकास के मन में यह बात शीशे की तरह साफ़ हो गई कि—निश्चित ही यह इन दोनों का पहली बार का मिलन नहीं था। इस बेताबी और जिस्मानी तालमेल के पीछे निश्चित ही कोई गुप्त इतिहास था, जिसकी गवाही कमरे की हर धड़कन दे रही थी। इस अहसास ने विकास के भीतर ईर्ष्या की जगह एक अजीब, वर्जित उत्तेजना को और बढ़ा दिया।

सोनी और सूरज अभी भी खड़े थे। सूरज की उँगलियाँ अब सोनी के वस्त्रों और चोली (ब्लाउज) की डोरियों से खेलने लगी थीं। मौन व्रत के कड़े अनुशासन में बंधा होने के कारण वह कुछ बोल तो नहीं रहा था, लेकिन उसके हाथों की फुर्ती उसकी बेताबी को बयां कर रही थी। उसने बड़ी ही चतुराई से चोली के बंधनों को ढीला किया।

कुछ ही देर में, सोनी के बदन का ऊपरी हिस्सा पूरी तरह अनावृत और नग्न हो गया। मखमली रोशनी में उसकी सुगठित छाती और कमसिन कमर का पूरा हिस्सा विकास की आँखों के सामने पूरी तरह चमक उठा। सोनी की चूचियां तन चुकी थी और निप्पल मणि की भांति और भी कठोर हो गए थे। अब सोनी का पेटिकोट और उस पर लिपटी हुई लाल चटक साड़ी सरक कर आधी खुली, आधी बंधी अवस्था में आ चुकी थी, जो बस सूरज की उँगलियों के अगले स्पर्श और आदेश का बेसब्री से इंतज़ार कर रही थी।

विकास के लिए पीछे खड़े होकर इस दृश्य को देखना किसी ऐसी कल्पना के सच होने जैसा था, जिसे उन्होंने हमेशा अपने भीतर कहीं छुपा कर रखा था। ठीक उनकी आँखों के सामने, उनकी अपनी सुंदर पत्नी की नंगी पीठ पर सूरज की वे मजबूत और युवा हथेलियाँ रेंग रही थीं, जो सोनी के गोरे बदन को पूरी शिद्दत से अपने आगोश में भींच रही थीं। सूरज की उँगलियों का वह कड़ा कसाब जब सोनी की त्वचा को दबाता, तो विकास के भीतर उत्तेजना का एक ऐसा प्रचंड तूफान उठता कि उन्हें लगता जैसे उनका अंग कपड़ों के भीतर ही फट जाएगा। इतना तीव्र तनाव और ऐसी चरम उत्तेजना विकास ने अपने जीवन में कई दिनों बाद—या शायद पहली बार इस रूप में महसूस की थी। वे अपनी साँसें पूरी तरह रोककर, बिना हिले-डुले, इस अद्भुत और अत्यधिक कामुक दृश्य को अपनी आँखों में समेट रहे थे।

उधर सोनी इस समय एक बिल्कुल अलग ही दुनिया में तैर रही थी। सुगना के इत्र की मादक महक, और सूरज के युवा जिस्म की तपिश ने मिलकर उसके सोचने-समझने की शक्ति पर एक पर्दा डाल दिया था। वह सब कुछ भूल चुकी थी—वे नियम, वे जतन और वह सारी चिंताएँ जो वह होटल आने के रास्ते में सोच रही थी, इस समय सूरज के प्रचंड आलिंगन के आगे हवा हो चुकी थीं। वह पूरी तरह से सूरज की बाहों में समाई हुई थी, और उसकी गर्दन पर सूरज के होठों की जो छुअन हो रही थी, उसने उसके भीतर की स्त्री को पूरी तरह तृप्त कर दिया था। कुछ जादुई और मदहोश कर देने वाले पलों के लिए उसके मन से यह संशय और डर पूरी तरह मिट गया कि ठीक पीछे उसका पति विकास खड़ा है और इस वर्जित महा-संगम के एक-एक पल को अपनी आँखों से साफ़-साफ़ देख रहा है। वह तो बस इस आदिम सुख के सागर में बिना किसी बाधा के बहती चली जा रही थी।

सोनी उस मखमली अंधकार और सूरज के युवा आलिंगन में पूरी तरह खोई हुई थी, लेकिन तभी उसे अपने ठीक पीछे एक अनजानी मगर बेहद सधी हुई आहट का अहसास हुआ। विकास दबे और सधे हुए कदमों से, बिना कोई आवाज़ किए, सोनी के ठीक पीछे आ चुके थे।

सोनी जो इस समय अर्ध-नग्न अवस्था में खड़ी थी—उसकी चोली पहले ही ढीली होकर सरक चुकी थी—उसे अचानक अपनी कमर पर लिपटी साड़ी की सिलवटें और ढीली होती हुई महसूस हुईं। वह अभी इस स्पर्श को समझ ही रही थी कि उसे साफ़ अहसास हुआ कि कोई बहुत खामोशी से उसके पेटिकोट की डोरी (नाड़ा) को उँगलियों से टटोलकर धीरे-धीरे खोल रहा है। पीछे से आने वाली उस जानी-पहचानी छुअन और साँसों की गर्माहट से सोनी का पूरा बदन सिहर उठा और उसने तुरंत पहचान लिया कि यह विकास हैं।

विकास का यह रूप देखकर सोनी के भीतर एक तीखी घबराहट दौड़ गई। विकास ने तो सिर्फ दूर से देखने की बात कही थी, फिर वह अचानक इस खेल के बीच में आकर यह सब क्या कर रहे हैं? उसे डर था कि कहीं इस अप्रत्याशित हरकत से सूरज को कुछ शक न हो जाए और पूरा खेल बेकाबू हो जाए।

स्थिति को तुरंत संभालने के लिए, सोनी ने बड़ी ही चतुरता से काम लिया। उसने बिना कोई आवाज़ किए, सूरज को बहुत धीरे से खुद से अलग किया। अचानक आए इस ठहराव से आँखों पर पट्टी बांधे खड़ा सूरज थोड़ा सा सकपकाया, लेकिन सोनी ने उसे अपनी योजनाओं में उलझाए रखने के लिए तुरंत अपने कोमल हाथ आगे बढ़ाए और खड़े-खड़े ही सूरज की शर्ट के बटन एक-एक करके खोलने लगी। सूरज इस नए स्पर्श और मौसी की इस अचानक जागी बेताबी में फिर से मग्न हो गया।

सूरज को शर्ट के बटनों में उलझाकर, सोनी ने चुपके से अपनी कमर पीछे कर दी। उधर विकास ने अपनी उत्तेजना में सोनी के पेटिकोट के नाड़े को पूरी तरह से खोल दिया था, जिससे वह वस्त्र नीचे सरकने लगा था।

सोनी के पूरी तरह नग्न होते ही उसकी मुनिया से निकल रहा वह लाल धागा दिखाई पड़ने लगा जिसके एक सिरे पर लगी हुई सुपाड़ी मुनिया के अंदर उसका काम रस सोख रही थी।

सोनी ने बेहद मादक तरीके से अपना एक हाथ नीचे लाया और पहले एक धागे को पड़कर बाहर खींचा।

सोने की बुर की गहराइयों में डूबी वह बड़ी सुपारी धीरे-धीरे बाहर आने लगी और सोने की मुनिया के रस भरे होठों से टुप…. की आवाज के साथ बाहर आ गई।

सुपारी सोनी के कामरस से फूल चुकी थी उसने सुपारी से धागा हटाया और सुपारी को ऊपर उठाकर विकास की तरफ देखा विकास की मौन सहमति पाकर उसने वह सुपारी सूरज के होठों से सटा दी सूरज को वह मादक गंध याद थी उसने बिना कुछ कहे अपने होंठ खोले और उसे मुंह में ले लिया…

सोनी के काम रस का स्वाद सूरज को बखूबी याद था उसे सुपारी का रहस्य भी पता था।

सोनी ने छोटी सुपारी को भी अपनी मुनिया से बाहर निकाला और उसे विकास के होंठों के बीच रख दिया.. विकास ने भी उसे अपने मुंह में ले लिया।

विकास में सोनी की मुनिया को छूने की कोशिश की…

सोनी ने तुरंत पीछे मुड़कर विकास की आँखों में देखा। उसकी आँखें सवाल भी कर रही थीं और समझा भी रही थीं। सोनी ने बिना कोई शब्द बोले, अपनी उँगलियों से विकास को इशारा किया कि वे अपनी तय की हुई जगह पर जाकर बैठ जाएं और वहीं से इस दृश्य का आनंद लें।

विकास भी सोनी की उस सख्त और डरी हुई नज़र के पीछे के खतरे को समझ गए। वे अपनी भारी होती साँसों को रोककर, दबे कदमों से वापस अपनी नियत जगह पर बैठने के लिए पीछे हट गए, जबकि सोनी ने एक बार फिर पूरी तरह से अपनी आँखें बंद किए खड़े सूरज की तरफ ध्यान केंद्रित किया।

कमरे के भीतर की उत्तेजना अब अपने चरम बिंदु को छू रही थी। कुछ ही पलों के भीतर, सोनी ने सूरज को भी दो पूरी तरह से नग्न कर दिया। मखमली और मद्धम रोशनी में उन दोनों के सुगठित बदन साक्षात कामदेव और कामदेवी की तरह दमक रहे थे। आँखों पर पट्टी बंधा सूरज पूरी तरह अपनी मौसी के देह-सुख में डूबा हुआ था, और सोनी भी सब कुछ भूलकर उसके स्पर्श का आनंद ले रही थी।

उधर, अपनी तय जगह पर बैठे विकास की हालत बेकाबू हो रही थी। वो उस अद्भुत, कड़े और गठीले पौरुष (लिंग) को प्रत्यक्ष देखने के लिए पूरी तरह आतुर था, जिसके बारे में उन्होंने केवल कल्पनाएँ की थीं।

परंतु, विकास इस समय जिस कोण और जगह पर बैठे थे, वहाँ से उनकी नज़रें सूरज के उस अद्भुत लिंग तक नहीं पहुँच पा रही थीं। खड़े होने की स्थिति में, सूरज ठीक सोनी के सामने था, जिसके कारण उसका वह लंड सोनी के सुगठित नितंबों के पीछे पूरी तरह छिपा हुआ था। विकास अपनी गर्दन उठा-उठाकर, थोड़ा तिरछा होकर देखने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन सोनी का कामुक बदन बीच में एक ओट की तरह आ रहा था।

अपनी पत्नी और भांजे के इस महा-मिलन के सबसे मुख्य दृश्य को साफ़ न देख पाने की छटपटाहट में विकास के भीतर की कामुक व्याकुलता और भी तीव्र हो गई। वे बिना कोई आवाज़ किए अपनी जगह पर छटपटा रहे थे, और इस बात का इंतज़ार कर रहे थे कि कब उनकी स्थिति या उन दोनों की दिशा बदले, और वे उस वर्जित दृश्य को अपनी आँखों से साफ़ देख सकें।

कमरे की मखमली रोशनी के बीच, जब सोनी और सूरज ने अपनी स्थिति में थोड़ा सा बदलाव किया, तो विकास की व्याकुल आँखें तुरंत उस ओर टिक गईं। सोनी का बदन जैसे ही थोड़ा सा एक तरफ हटा, सूरज का वह मुख्य अंग (लिंग) पहली बार विकास की नज़रों के ठीक सामने पूरी तरह उजागर हो गया।

"हे भगवान! यह क्या..." विकास के मन में एक गहरा धक्का लगा। उन्होंने जिस प्रचंड, सुगठित और सख़्त तने हुए पौरुष की कल्पना अपने दिमाग में पाल रखी थी, उसके उलट वहाँ का नज़ारा बिल्कुल अलग था। सूरज का लिंग इस समय एक मुरझाए हुए केले की तरह पूरी तरह से ढीला और लटका हुआ था।

विकास को अपनी ही आँखों पर यकीन नहीं हो रहा था। सोनी जैसी साक्षात कामदेवी जैसी रूपवान नग्न स्त्री को अपनी बाहों में भरने और उसकी गर्दन को इतनी दीवानगी से चूमने के बाद भी सूरज के अंग में रत्ती भर का तनाव नहीं था। एक युवा पुरुष का अपनी अत्यंत आकर्षक मौसी के पूर्ण नग्न बदन के स्पर्श के बाद भी इस कदर शांत और शिथिल रहना किसी अजूबे से कम नहीं था।

विकास स्तब्ध रह गया। वो आश्चर्य और कौतूहल से इस अजीबोगरीब मिरेकल (चमत्कार) को एकटक देखने लगा। उनके दिमाग में सवालों का बवंडर उठने लगा कि आखिर इस चरम कामुक माहौल के बाद भी सूरज का पौरुष इस तरह सोया हुआ क्यों है? क्या यह मौन व्रत का असर था, या फिर आँखों पर बंधी उस मखमली पट्टी के अंधेरे का कोई मनोवैज्ञानिक प्रभाव? क्या सोनी के गर्भवती होने का सपना धरा का धरा रह जाएगा…


शेष अगले भाग में
 
भाग 140

हम धीरे-धीरे होटल की तरफ पर चल पड़े। सोनी बार-बार उसे लड़के के बारे में सोच रही थी क्या उसने उसे नग्न देख लिया था जिस समय वह अपनी पैंटी खोज रही थी उसे समय वह निश्चित ही पूरी तरह नग्न थी। हे भगवान वह आदमी क्या सोच रहा होगा…सोनी की बुर जो बाहर से गीली थी अब अंदर से भी गीली होने लगी।



अपनी नग्नता का सोनी ने भी उतना ही आनंद लिया था जितना उसके आस पड़ोस के युवक-युवतियों उसे देख कर लिया था। सोनी अनजाने में भी कामुकता की ऐसी मिसाल पेश कर देती थी जो उसके आस पास के पुरुषों में स्वाभाविक रूप उत्तेजना फैला दे रही थी।

उधर वह लड़का सोनी के बारे में सोच रहा था…

अब आगे

रात को होटल के कोमल बिस्तर पर मैं और सोनी एक दूसरे को बाहों में लिए लेटे हुए थे।सोनी टीवी के रिमोट से लगातार चैनल बदल रही थी…उसे कोई चैनल पसंद ही नहीं आ रहा था। मैं तो चादर में मुंह डाले कभी उसकी चूचियों को चूमता कभी उसकी भरी भरी चूचियों से खेल रहा था…

अचानक सोनी ने मेरा सर चादर से बाहर निकालते हुए बोला .

ये क्या है? यहां होटल में ये सब?

टीवी पर प्रतिबंधित कंटेंट का मैसेज आ रहा था..

सोनी ने उत्सुकता से मुझसे पूछा..

“यस कर दूं?

“तुम्हारा मन कर दो…”

मैने खुद को वापस चादर के अंदर कर लिया और सोनी की चूचियों को चूमने लगा।

उधर टीवी पर सोनी की पसंदीदा पोर्न चालू हो चुकी थी…एक नीग्रो और एक विदेशी लड़की का संभोग जारी था…सोनी एकटक उसे देख रही थी और मेरा काम आसान कर रही थी। नयन सुख का असर जांघों के बीच भी दिखाई पड़ रहा था। बुर नीचे अपनी लार छोड रही थी।

बीच बीच में मै भी टीवी पर चल रहे दृश्यो का जायजा ले लेता।

सोनी से उत्तेजना और बर्दाश्त न हुई और हम एक बार फिर गुत्थंगुथा हो गए। वह मेरे ऊपर आ चुकी थी। सोनी के बड़े लंड की चाहत अब परवान चढ़ चुकी थी। जब तक मैं यह सोच रहा था. मेरा लंड अपनी सोनी की बुर के आगोश में आ चुका था।

सोनी की कमर हिलना शुरू हो चुकी थी मैं उसके स्तनों और नितंबों पर बराबर ध्यान देते हुए संभोग का आनंद लेने लगा।


मैंने सोनीसे पूछा

"वह बिल काउंटर वाला लड़का तुम्हें याद है"

"हां वह कामुक निगाहों से मुझे देख रहा था"

"हां मैंने भी बात नोटिस की थी"

"फिर भी आपने मुझे बिल देने भेज दिया था।"


मैं हंसने लगा

"मैंने सोचा जब वह तुम्हें देख ही रहा है तो और ध्यान से देख ले." मैंने महसूस किया था कि सोनीकी कमर गति में थोड़ी तेजी आ रही थी वह इन बातों से उत्तेजित हो रही थी।

“बीच पर तो साले ने हद ही कर दी” सोनी में बात आगे बढ़ते हुए कहा..

“हां सच में, उसे तुम्हारी पैंटी कैसे मिल गई” मैंने उत्सुकता बस पूछा।

सोनी मुस्कुराने लगी और बड़ी अदा से बोली…

“लगता है वो तैरते हुए आया होगा और पैंटी की डोरी खींच कर पैंटी खींच ले गया होगा …..और लाइए डिजाइनर पैंटी “

सोनी की पेटी अद्भुत थी सिर्फ आगे और पीछे त्रिकोण के आकार में दो कपड़े जो अगल-बगल से कुछ रेशम की डोरियों से बंधे हुए थे..

“लगता है वह तुम्हारे नितंबों के जाल में फंस गया..” मैं सोनी के गदर आए हुए चूतड़ों को सहलाए जा रहा था

सोनी ने कुछ कहा नहीं परंतु उसके चेहरे पर आत्मविश्वास से भरी विजयी मुस्कान थी उसे अपने खजाने का बखूबी अहसास था।


मैंने फिर कहा

"वह लड़का कितना विशालकाय था सोचो उसका लंड कैसा होगा" मैंने सोनी की दुखती रग पर हाथ रख दिया।

सोनीअपनी कमर और तेजी से हिलाने लगी मुझे लगता है इस तरह खुलकर उस नीग्रो के लंड की बातें सुनकर वह अत्यधिक उत्तेजित हो चली थी. उसका चेहरा वासना से लाल हो गया था. वह और बात करने की हालत में नहीं थी। वह लगातार अपने स्तनों को मेरे सीने से रगड़ते हुए मेरे होठों को चूम रही थी और अपनी कमर को अद्भुत गति से हिला रही थी। मैं उसके नितंबों को अपने हाथों से अपनी तरफ खींचे हुआ था तथा अंगुलियों से उसकी गांड को छू रहा था गुदगुदा रहा था।

आ ….. ई…………सोनी बुरी तरह हाफ रही थी…. अचानक वह शांत हो गई पर उसकी कमर अब भी धीरे-धीरे चल रही थी। शायद सोनी अब स्खलित हो रही थी उसकी बुर की कंपकपाहट अद्भुत थी मैं भी उसके साथ साथ स्खलित होने लगा। मैंने सोनी की बुर वीर्य से भर दिया था। वह पसीने से लथपथ हो चुकी थी। मैं उसे जी भर कर प्यार कर रहा था। कुछ देर बाद उसके शांत होने के पश्चात मैने उसकी चुचियों से खेलते हुए कहा...

“एक चैलेंज है तुम्हारे लिए…”

“क्या…” सोनी ने अपनी पलके बंद किए हुए पूछा।

“पहले हां बोलो तभी बताऊंगा..”

“अरे मुझे क्या पता आपका चैलेंज क्या है..” सोनी ने अपनी आंख खोली और मेरे चेहरे को पढ़ने की कोशिश करते हुए बोला..

"सोनी क्या तुम उस नीग्रो लड़के का वीर्य दोहन कर सकती हो?" मैंने उत्तेजना में यह उचित या अनुचित बात कह दी…

सोनी ने अपनी आंख पूरी खोली..

“ये क्या बात है..मजाक है क्या? न उससे जान पहचान न मिलना जुलना और सीधा वीर्य दोहन…” सोनी ने अपनी आंखें मेरे चेहरे पर गड़ाते हुए कहा..

विकास पूरे आत्मविश्वास से सोनी को समझाते हुए बोला

“अरे यहां के पुरुष बस इसी फिराक में रहते हैं किसी ने मौका दिया और उसके साथ हो लिए..कई औरते जिन्हें बड़ा हथियार पसंद होता है वो अक्सर इनके संपर्क आ जाती हैं “ मैने सोनी को समझाते हुए बोला..


"और यदि इस दौरान उसने मेरे से जबरदस्ती संभोग कर लिया तब…...मैं तो मर ही जाऊंगी ? उसने मेरे सीने से अपना सर चिपकाते हुए कहा।

मुझे हंसी आ गई…पर मैने अपनी हंसी पर अंकुश लगाते

“अरे पागल वो ऐसा कभी नहीं कर सकता..”

सोनी शायद मेरी बात से संतुष्ट न थी। मैने आगे उसे समझाने की कोशिश की..


"वह रेस्टोरेंट् होटल से जुड़ा हुआ है उसकी इतनी हिम्मत नहीं होगी की वह यहां के अतिथियों से इस प्रकार का व्यवहार करें परंतु मुझे नहीं लगता कि तुम इतनी हिम्मत जुटा पाओगी कि उसके लंड के दर्शन कर पाओ और उसका वीर्य दोहन कर सको"

सोनीमुस्कुराते हुए बोली

"और यदि कर दिया तो?"

मैंने कहा

"तुम जब भी कहोगी तुम्हारी एक बात बिना कहे मान लूंगा चाहे वह कुछ भी हो"


वह मुस्कुराते हुए बोली…

"आपका हुकुम सर आंखों पर कल शाम तक उस काले नीग्रो का वीर्य मेरे हाथों में होगा मेरे आका" वो मुस्कुरा रही थी।

मैंने भी मुस्कुराते हुए उसे चूम लिया और कल के दिन के बारे में सोचते हुए सो गया।

(मैं सोनी)

अगली सुबह विकास सेमिनार के लिए निकल चुका था। उसके होटल से जाने के बाद मुझे अपने चैलेंज को पूरा करने के लिए तैयार होना था. मुझे अपनी सहेली की बातें याद आ रही थीं। उसने मुझसे कहा था सोनी यदि संभव हो तो वहां जाकर किसी नीग्रो का लंड देखना। वहां मेल प्रॉस्टिट्यूट या जिगोलो बड़े आसानी से उपलब्ध होते हैं। हम सभी ने उस काले लंड को टीवी पर तो देखा है पर क्या हकीकत में वह वैसा ही होता है?


तुम्हें विकासके साथ साउथ अफ्रीका जाने का मौका मिल रहा है हो सकता है तुम्हे यह अवसर मिले तुम इस अवसर को अपने हाथ से जाने मत देना।

जीवन में कामुकता का अतिरेक अमिट छाप छोड़ता है यह हमारे जीवन की अनोखी याद होती है. वैसे भी विकास तुम्हारी इच्छाओं का मान रखता है।.

मैं अपनी सहेली की इन बातों को ध्यान में रखते हुए पूरी तरह मन बना चुकी थी। मैं स्वयं भगवान द्वारा बनाई गई अद्भुत कलाकृति थी और वैसा ही वह अद्भुत विशालकाय नीग्रो. मुझे भगवान ने सुंदर शरीर के अलावा सोचने समझने की अद्भुत शक्ति भी दी थी. मुझे उनके द्वारा बनाई गई हर कलाकृति को देखने और भोगने का अधिकार था.

विकास ने जो दलील मुझे दी थी मैं उससे भी आश्वस्त थी कि वह नीग्रो मेरे साथ जबरदस्ती नहीं करेगा। आखिर मैं भी तो उसका वीर्य दोहन ही करने वाली थी कत्ल नहीं। मैने अपनी दूसरी बिकनी निकाली और मन में कुछ डर और उत्साह लिए तैयार होने लगी।

यह बिकिनी बेहद खूबसूरत थी यह सुर्ख लाल रंग की रेशम की बनी हुई थी। मैं इस बिकिनी को पहन कर जब आईने के सामने गई तो मैंने अपनी सुंदरता और इस मदमस्त यौवन के लिए भगवान को एक बार फिर शुक्रिया कहा। उन्होंने मुझे धरती पर शायद इसीलिए भेजा था कि मैं अपनी कामुकता की पूर्ति कर सकूं। मैंने बिकनी के ऊपर एक काली जालीदार टॉप पहन ली। यह टॉप मेरे शरीर की बनावट को और भी अच्छी तरह से उजागर कर रही थी। ढकी हुई नग्नता ज्यादा उत्तेजक होती है. टॉप मेरे नितंबों तक आ रही थी पर उसे ढकने में नाकामयाब हो रही थी।

मैं सज धज कर उस नीग्रो से मिलने चल पड़ी। बीच पर अकेले जाते समय मुझे थोड़ा अटपटा लग रहा था पर मेरा उद्देश्य निर्धारित था। कुछ ही देर में मैं उस रेस्टोरेंट के सामने बीच पर पहुंच गई मैंने अपनी जालीदार टॉप को रेत पर रख दिया और समुंद्र की लहरों का आनंद लेने चल पड़ी। मैं बार-बार होटल की तरफ ही देख रही थी। मेरे मन में इच्छा थी कि वह लड़का मुझे देख कर बीच पर आए।

सुबह का वक्त था रेस्टोरेंट में बियर पीने वालों की कमी थी। कुछ ही देर में मैंने उस लड़के को बीच पर टहलते हुए देखा। वह बार-बार मुझे देख रहा था। उसके मन में निश्चय ही सोच रहा होगा कि आज मैं अकेली क्यों हूं? मैं कुछ देर अठखेलियां करने के बाद समुन्द्र से बाहर आई. वह मेरी जालीदार नाइटी के ठीक बगल में खड़ा था. वह लगभग 7 फुट ऊँचा हट्टा कट्टा जवान था। चौड़ा सीना पुस्ट जाँघे पतली कमर और जाँघों की जोड़ पर आया उभार उसकी मर्दानगी को प्रदर्शित करता था एक ही कमी थी उसका चेहरा और रंग।

मैं उसके पास आ चुकी थी। जैसे ही मैं अपनी टॉप को उठाने के लिए झुकी मेरे नितंब उसकी आंखों के ठीक सामने आ गए. मैं यह जान गयी थी कि वह मुझे घूर रहा है। मेरा रास्ता आसान हो रहा था। मैं उसके रेस्टोरेंट की तरफ चल पड़ी। वह भी मुझे पीछे से देखते हुए रेस्टोरेंट की तरफ आने लगा।

मैं अभी भी इस बात से घबराई थी कि यदि कहीं उत्तेजना वश उसने मुझ पर संभोग के लिए दबाव बनाया मैं उसे किस प्रकार ठुकरा पाऊंगी उस नीग्रो से संभोग करना मेरे बस का नहीं था। मैं कोमलंगी और सामान्य युवती थी। मुझ में उत्तेजना तो बहुत थी पर उसके विशालकाय लिंग को अपनी बुरमें समाहित करने की क्षमता शायद मुझ में नहीं थी । मुझे सिर्फ उत्तेजना और कामुकता में ही आनंद आता था। किसी अन्य पुरुष से संभोग मैने अब तक नहीं किया था पर जब से विकास ने इस वीर्य दोहन के कार्य के लिए मुझे चेलेंज किया था तो मैंने भी उसे स्वीकार कर लिया था। ऐसा लग रहा था जैसे मैं अपनी उस काल्पनिक इच्छा के पीछे भाग रही थी जिसे विकास से साझा करना कठिन था पर वो बिना कहे शायद यह समझ गया था।

मैं रेस्टोरेंट् में एक किनारे की टेबल पर जाकर बैठ गई। मेरा चेहरा रिसेप्शन की तरफ था। अचानक उस लड़के को मैंने अपनी तरफ आते देखा उसने एक सुंदर टी-शर्ट और बरमूडा पहना हुआ था। वह आने के बाद मुझसे बोला (वह मुझसे अंग्रेजी में ही बात कर रहा था पर मैं पाठकों की सुविधा के लिए उसे हिंदी में व्यक्त कर रही हूँ)

मैम आप क्या लेना पसंद करेंगी?

मैं उससे इस तरह अचानक बात करने में घबरा रही थी। मैंने जल्दी बाजी में बोल दिया

“रेड वाइन” मैं उससे नज़रें नहीं मिला रही थी।


“मैम एक बार आप यहां की स्पेशल डिश ट्राई कीजिए”

उसने आग्रह किया

क्या है वो..

उसने अंग्रेजी में डिश का जो भी नाम बताया वो नाम मैंने पहले कभी नहीं सुना था पर दोबारा पूछ कर मैं खुद को नासमझ नहीं जताना चाहती थी..


“ठीक है ले आइए”

कुछ ही देर में वह समुद्री मछली से बनी हुई एक डिश और रेड वाइन लेकर आ गया। मैं अभी भी अपनी कामुक अदाओं के साथ टेबल पर बैठी हुई थी। जैसे ही वह मेरा ऑर्डर रखकर जाने को हुआ मैंने उससे कहा…

यहां पास में कोई आईलैंड नहीं है क्या? मैने हिम्मत जुटा कर उससे बात करने की कोशिश की। जबकि विकास मुझे यहां के बारे में सब कुछ समझा चुका था।

मेरी बात सुनकर वो खुश हो गया और बोला..

“एक आईलैंड है तो पर वह यहां से थोड़ा दूर है वहां सिर्फ प्राइवेट बोट से जाया जा सकता है.”


“ओके थैंक यू”

“मैम, यदि आप वहां जाना चाहती हैं तो मैं आपको ले जा सकता हूं। आप मेरी प्राइवेट बोट पर वहां जा सकती हैं।” उसने आगे बढ़कर कहा..

“आपका नाम क्या है।”

“मैम अल्बर्ट” उसने अपना आईकार्ड भी दिखाया।

इसके बाद तो वह बिना रुके अपनी वोट और उस आईलैंड के बारे में ढेर सारी बातें बताने लगा। मैंने बात खत्म करते हुए अंततः कहा..

“ठीक है।”

वो खुश हो गया। उसने अपने साथी को इशारा किया और कुछ देर किसी से फोन पर बातें की। अपनी वाइन खत्म करने के बाद मैं उसकी बोट में सवार होकर आइलैंड के लिए निकल रही थी। अल्बर्ट ने ट्रिप के लिए आवश्यक सामान बोट में रख लिया था।

जैसा विकास ने समझाया था अब तक सब कुछ वैसा ही हो रहा था। मुझे विकास की जानकारी पर संदेह हो रहा था सब कुछ इतना आसानी से घट रहा था जैसे यह सुनियोजित हो।

अल्बर्ट का दोस्त भी उसी की तरह हट्टा कट्टा था। वो बोट चला रहा था। जैसे- जैसे वोट बीच से दूर हो रही थी मेरी धड़कन तेज हो रही थी। मैं आज दो अपरिचित हट्टे कट्टे मर्दो के साथ एक अपरिचित आईलैंड पर जा रही थी। मेरे साथ वहां क्या होने वाला था यह तो वक्त ही बताता पर मैं उत्तेजित थी। मुझे परिस्थितियों और भगवान पर भरोसा था।


अल्बर्ट मेरे पास आकर मुझसे बातें कर रहा था। वह मुझे उस आईलैंड के बारे में बता रहा था। उसकी बातों से मुझे मालूम हुआ कि वह आईलैंड खूबसूरत तो था और वहां अन्य लोगों का आना जाना नहीं था। सिर्फ होटल में रहने वाले कुछ पर्यटक वहां जाते थे। वह अभी पर्यटन के हिसाब से विकसित नहीं हुआ था। मेरा डर एक बार के लिए और बढ़ गया। उस सुनसान आईलैंड पर इन दो मर्दों के साथ अकेले घूमना और अपने उद्देश्य की पूर्ति करना यह एक अजीब कार्य था।

मैं निर्विकार भाव से होने वाली घटनाओं की प्रतीक्षा कर रही थी। कुछ ही देर में वह टापू दिखाई देने लगा। मैं उस टापू की सुंदरता देखकर मंत्रमुग्ध थी। वहां पहुंचने से कुछ ही देर पहले समुंद्र में कई सारी छोटी-छोटी मछलियां तैरती हुई दिखाई दी। अल्बर्ट ने मुझे बताया कि यह मछलियां किसी भी प्रकार का नुकसान नहीं पहुंचाती बल्कि जब यह आपके शरीर से टकराती हैं तो आपको अद्भुत आनंद देती हैं। उसने मुझसे कहा आप चाहे तो पानी में उतर कर इसका आनंद ले सकती हैं।

उसने मुझसे यह भी पूछा कि आपको स्विमिंग आती है? मैंने ना में सर हिला दिया. पर मैं मछलियों की सुंदरता देखकर पानी में उतरने को तैयार हो गई. मैंने अल्बर्ट को भी पानी में आने को कहा. मुझे अकेले डर लग रहा था. मैने अपनी जालीदार टॉप को एक बार फिर बाहर कर दिया।

मैंने उस टॉप को वही वोट पर रखा और अल्बर्ट के साथ पानी में कूद गयी। बोट चला रहा दूसरा युवक कुछ देर के लिए मेरी नग्नता का आनंद ले पाया। मैं और अल्बर्ट पानी में थे मछलियां बार-बार मेरी जाँघों और स्तनों से टकराती और अलग किस्म की उत्तेजना देती। कई बार वह मेरे कमर को पूरी तरह से घेर लेती थीं । कई बार अल्बर्ट अपने हाथों से उन मछलियों को मेरे शरीर से हटाया। अल्बर्ट के हाथ अपने पेट और नितंबों पर लगते ही मेरी उत्तेजना बढ़ गई। उसकी बड़ी-बड़ी हथेलियां मेरे नितंबों से अकस्मात ही टकरा रही थी। जब उसे इसका एहसास होता वह तुरंत ही बोल उठता सॉरी मैंम


मैंने अल्बर्ट से कहा ..

"इट्स ओके, आई एम इंज्योयिंग फीसेस आर मैग्नीफिसेंट"

सचमुच उन छोटी मछलियों का स्पर्श मुझे रोमांचक लग रहा था वह अपने छोटे-छोटे होठों से मेरी जाँघों और पेट को छू रही थीं। मुझे गुदगुदी हो रही थी और साथ ही साथ उत्तेजना भी।

कुछ मछलियां तो जैसे शैतानी करने के मूड में थी। वह बार-बार मेरी दोनों जांघों के बीच घुसने का प्रयास कर रही थीं। अपने होठों से वह मेरी त्वचा को कभी चुमतीं तथा तथा कभी चूसतीं। वो कभी इधर हिलती कभी उधर मुझे सचमुच उत्तेजना महसूस होने लगी।


ऐसा लग रहा था जैसे प्रकृति ने भी मुझे छेड़ने के लिए इन सुकुमार मछलियों को भेज दिया था। वो मेरी बुरको भी चूमने की कोशिश कर रहीं थीं। मेरी बुर ने बिकनी की चादर ओढ़ रखी थी वह मन ही मन मैदान में उतरने को तैयार थी उसे सिर्फ मेरे सहयोग के प्रतीक्षा थी वह चाह कर भी अपनी चादर हटा पाने में असमर्थ थी।

मेरा पूरा शरीर मछलियों के चुंबन का आनंद ले रहा था मैंने अपनी बुरको दुखी नहीं किया। मैंने अपने दोनों हाथ नीचे किये और अपनी बिकनी को खींचकर अपनी जांघो तक कर दिया। एक पल के।लिए मैं भूल गई कि अल्बर्ट पास ही था…यद्यपि उसका ध्यान अपने साथी से बात करने में था।

पानी की ठंडी ठंडी धार मेरी बुरके होठों को छूने लगी।


कुछ मछलियां मेरे पेट और स्तनों के आसपास भी थी मैं गर्दन तक पानी में डूबी हुई थी।

छोटी छोटी मछलीयां मेरी दोनों जांघों के बीच से बार-बार निकलती वह बुरके होठों को चुमतीं। बुरभी अब खुश हो गई थी ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे वह मछलियों के लिए अपना प्रेम रस उत्सर्जित कर रही थी बुरका यह प्रेम रस मछलियों को कुछ ज्यादा ही पसंद आ गया था वह उसके होठों से प्रेम रस पीने को आतुर दिख रही थीं।


कुछ ही देर में मेरी बुरके होठों पर मछलियों का जमावड़ा लगने लगा मैंने अपनी दोनों जाँघें सटा दीं। मछलियां तितर-बितर हो गई मेरे होठों पर मुस्कान आ गयी । जिसे देखकर अल्बर्ट ने कहा

"मैम आर यू इंजॉयिंग"

"यस दीस फिशेस आर मैग्नीफिसेंट" मेरे इतना कहते-कहते छोटी-छोटी मछलियों ने मेरी जांघों के जोड़ पर एकबार फिर जमावड़ा लगा लिया वो मेरी दोनों जांघों को फैलाने का असफल प्रयास कर रही थीं मैंने अपना दिल बड़ा करते हुए अपनी जांघों को फैला दिया एक बार फिर मेरी बुरका प्रेम रस उन्हें तृप्त कर रहा था वह उत्तेजित होकर बुरके दोनों होठों के बीच से प्रेम रस लूटने के प्रयास में थी मेरी उत्तेजना चरम पर थी जी करता था कि मैं अपने स्तनों पर से भी वह आवरण हटा दूं जो मेरी बिकनी के ऊपरी भाग ने उन्हें दिया हुआ था वह भी इस अद्भुत सुख की प्रतीक्षा में थे परंतु मैं यह हिम्मत नहीं जुटा पाई अल्बर्ट बगल में ही था समुंद्र के स्वच्छ जल में मेरे स्तन स्पष्ट दिखाई दे जाते।

मेरी बुरपर मछलियों का आक्रमण तेजी से हो रहा मेरी बुरमचल रही थी वह मुझ से मदद की गुहार मांग रही थी पर मैंने उसे उसके हाल पर छोड़ दिया मैं उसे स्खलित होते हुए देखना चाहती थी। आखिर इस उत्तेजना के लिए वह स्वयं आगे आई थी मछलियां बुर के दोनों होठों के बीच घुसने का प्रयास कर रही थी पर उनमें इतनी ताकत नहीं थी आज भी विकास को बुर के मुख में लंड को प्रवेश कराने में कुछ ताकत तो अवश्य लगानी पड़ती थी यह ताकत लगाना छोटी और प्यारी मछलियों के बस का नहीं था।


इसी दौरान मछलियों ने मेरी गांड को भी घेर लिया जैसे ही मैं अपने घुटने थोड़ा ऊपर करती मेरी गांड उनकी जद में आ जाती और मेरे घुटने नीचे करते ही वह गांड से दूर भाग जातीं। मेरे नितंबों का दबाव झेल पाना उनके लिए कठिन हो जाता। मुझे अब इस खेल में मजा आने लगा था चेहरे पर मुस्कुराहट लिए मैं आकाश को देख रही थी और प्रकृति की यह अद्भुत रचनाएं मेरी उत्तेजना को एक नया आयाम दे रहीं थीं।

जब मछलियां मेरी बुरके दोनों होंठो के बीच घुसने का प्रयास कर रही थीं। तभी कुछ मछलियों में मेरी भग्नासा को अपना निशाना बना लिया। उसका विशेष आकार उन्हें अपना आहार जैसा महसूस हुआ। वह तेजी से उसे चूस चूस कर खाने का प्रयास करने लगीं।


मुझसे अब बर्दाश्त नहीं हो रहा था मैंने अपने हाथों से उन्हें हटाने का प्रयास किया पर मेरे हाथ कमर तक पहुंचकर ही रुक गए। मुझे वह उत्तेजना अद्भुत महसूस हो रही थी। मैंने अपनी बुरको सिकोड़ कर उसके होठों को करीब लाने की कोशिश की। मछलियां कुछ देर के लिए वहां से हटीं पर आकुंचन के हटते ही वह दोबारा उसके होठों पर आ गयीं। ( आज यही क्रिया कीगल क्रिया के नाम से जानी जाती है )

मैं यह अद्भुत खेल ज्यादा देर नहीं खेल पाई मेरी बुरस्खलित होने लगी. मेरी बुर मछलियों के इस अद्भुत प्रेम से हार चुकी थी. उसके होंठ फैल चुके थे मछलियां जी भर कर प्रेम रस पी रही थी. मेरा मुंह खुला हुआ था आंखें आकाश की तरफ देखती हुई अद्भुत प्रकृति को धन्यवाद अर्पित कर रही थीं।

मुझे मदहोश देखकर अल्बर्ट ने कहा

मैंम आर यू कंफर्टेबल

मैं मैं वापस अपनी चेतना में लौट आई अपने हाथ नीचे किया और पेटी को वापस ऊपर कर अपनी अमानत को ढक लिया। वापस नाव पर चढ़ना बेहद कठिन था अल्बर्ट को आखिर मेरी मदद करनी पड़ी मुझे नाव पर चढ़ने के लिए अल्बर्ट ने मेरे नितंबों को थाम लिया और ऊपर की तरफ धकेला .. किसी पराए मर्द का मजबूत हाथ आज पहली बार मेरे नितंबों से सट रहा था…मुझे अभी विकास का चैलेंज पूरा करना था…


कुछ होने वाला था…

क्या सोनी कामयाब रहेगी…या ये कामयाबी उसे महंगी पड़ेगी…

शेष अगले भाग में..

अगला एपिसोड पाठकों की प्रतिक्रिया आते ही उन्हें भेज दिया जाएगा।
 
भाग 141



मैं मैं वापस अपनी चेतना में लौट आई अपने हाथ नीचे किया और पेटी को वापस ऊपर कर अपनी अमानत को ढक लिया। वापस नाव पर चढ़ना बेहद कठिन था अल्बर्ट को आखिर मेरी मदद करनी पड़ी मुझे नाव पर चढ़ने के लिए अल्बर्ट ने मेरे नितंबों को थाम लिया और ऊपर की तरफ धकेला .. किसी पराए मर्द का मजबूत हाथ आज पहली बार मेरे नितंबों से सट रहा था…मुझे अभी विकास का चैलेंज पूरा करना था…

कुछ होने वाला था…



क्या सोनी कामयाब रहेगी…या ये कामयाबी उसे महंगी पड़ेगी…

अब आगे..

मेरे गदराए हुए कूल्हों को थाम कर अल्बर्ट भी आनंदित था। उंगलियों की हरकत जब तक मैं महसूस कर पाती तभी समुद्र की एक तेज लहर आयी।

अचानक आयी इस लहर ने हम दोनों को असंतुलित कर दिया। मैं पूरी तरह उसके आलिंगन में आ गई। मुझे सहारा देने के लिए उसने मुझे अपने आप से चिपका लिया। एक पल के लिए मुझे लगा जैसे किसी काले साए ने मुझे अपने आगोश में ले लिया। अल्बर्ट की हथेलियां मेरी पीठ और नितंबों पर थी वह उनसे मुझे सहारा दिए हुए था। उसके विशालकाय लिंग का एहसास मुझे अपने जांघों पर हो रहा था। वह मुझसे कद काठी में काफी बड़ा था और मैं सामान्य कद काठी की। अल्बर्ट ने अपने हाथ वापस पानी में डाल कर हिलाने लगा ताकि वह हम दोनों को पानी के ऊपर तैरता रख सके। उसके अचानक मेरी पीठ पर से हाथ हटाने से मैं पानी में नीचे जाने लगी।

डूबते को तिनके का सहारा

मैंने अपनी सारी हिम्मत जुटा कर उस दिव्य हथियार को पकड़ लिया जो बरमूडा के अंदर एक खूंटे की भांति तना था।

मैं उस का सहारा लेकर ऊपर आने की कोशिश की इस दौरान मैंने उसके लिंग का अंदाज लगा लिया। इस छोटी सी घटना ने अल्बर्ट के मन में भी उम्मीद जगा दी होगी। वह बेहद खुश दिखाई दे रहा था। न जाने उसके मन में हिम्मत कहां से आई उसने एक बार फिर अपनी हथेलियां का सपोर्ट हटा लिया और मैं फिर पानी में जाने लगी। पर इस बार मै सचेत थी मैंने अल्बर्ट के गले में अपनी गोरी बाहें डाल दीं। मेरी चूची अल्बर्ट के ठुड्ढी के पास थी।

हम दोनों की अठखेलियां कुछ देर यूं ही चली।

मैंने मुस्कुराते हुए अल्बर्ट से वापस वोट पर चलने को कहा मैं अब थक चुकी थी। उसने मुझे मेरे पैरों से पकड़ कर ऊपर उठा लिया। उसके वोट पर जाने वाली सीढ़ी थोड़ी ऊंची थी। अल्बर्ट के दोनों हाथ मेरी जांघों के निचले हिस्से पर थे तथा उसका चेहरा मेरे पेट से टकरा रहा था। उसके मोटे मोटे होंठ मेरी बुरके बिल्कुल समीप थे।

यद्यपि मैं जानती थी कि मेरा और अल्बर्ट का मेल असंभव है हम दोनों एक दूसरे के लिए नहीं बने थे। वह अलग था और मैं अलग। परंतु जिस सहजता से वह मुझे पेश आ रहा था मुझे बेहद अच्छा लग रहा था।

मैंने बोट की सीढ़ी पकड़ ली और धीरे-धीरे ऊपर चढ़ने लगी। और अपने गदराए हुए कूल्हे उसकी आंखों के सामने परोस दिए। क्या मंजर रहा होगा वह भी पीछे पीछे ऊपर आ गया। मैने पलट कर देखा उसने झट से अपनी पलके झुका लीं।

बरमूडा के अंदर उसका लिंग अब और भी स्पष्ट दिखाई पड़ रहा था। बरमूडा गीला होने से वो उसके शरीर से चिपक गया था। वो उसे छुपाने की कोशिश कर रहा था परंतु उसकी मर्दानगी छुपने लायक नहीं थी।

हम दोनों वोट पर आ चुके थे मेरी नग्नता का दर्शन अब वोट पर बैठा दूसरा आदमी भी कर रहा था। मैंने अपनी जालीदार नाइटी पहनने की कोशिश नहीं की। अल्बर्ट ने वोट से लाकर एक साफ और सुंदर तोलिया मुझे अपना शरीर पोछने के लिए दिया। वह पूरी व्यवस्था करके आया था। थोड़ा आराम करते हुए मैं आईलैंड के आने का इंतजार कर रही थी।

तभी मैंने देखा वह दूसरा आदमी रेड वाइन की बोतल और गिलास लिए हुए हमारे पास आ गया उसने भी बड़े आदर से मुझे कहा "मैम यू आर सो ब्यूटीफुल आर यू इन बॉलीवुड?"

मैं उसकी बात से बहुत खुश हो गई.

अल्बर्ट ने कहा

"ही इज माय फ्रेंड माइकल"

मैंने रेड वाइन की बोतल ले ली और अपने हाथों से उसे तीन गिलासों में डाल दिया.

माइकल मेरे हाथों से रेड वाइन का ग्लास पकड़ते हुए बहुत खुश था। कभी कभी मैं सोचने लगती कि यदि अल्बर्ट और माइकल दोनों के मन में पाप होता तो मेरा क्या होता। यदि वह अपनी दरिंदगी पर आते तो मेरी दुर्गति करने के लिए एक ही काफी था और यहां तो दो दो थे। पर अभी तक मुझे उनके व्यवहार मे सिर्फ और सिर्फ सौम्यता नजर आ रही थी। उनमें उत्तेजना तो अवश्य थी पर उन्होंने उसे नियंत्रित किया हुआ था।

यही बात मुझे सर्वाधिक पसंद है। मुझे लगता है की स्त्रियों को ही कामुकता की कमान संभालनी चाहिए और पुरुषों को उनकी इच्छा अनुसार ही उनका साथ देना चाहिए और उनकी पूर्ण सहमति से सहवास करना चाहिए.

मैं रेड वाइन पीते हुए और समुंद्र की ओर देखते हुए यह बातें सोच रही थी और वह दोनों मेरी नग्नता का जी भर कर आनंद ले रहे थे। रेड वाइन का ग्लास खत्म हो चुका था और मैं हलके सुरूर में आ चुकी थी।

बोट आइलैंड के बिल्कुल समीप आ चुकी थी. मैं और अल्बर्ट उतरकर किनारे पर आ गए माइकल ने भी वोट को किनारे पर बांध दिया और वोट पर से आवश्यक सामग्री लेकर हमारे साथ आईलैंड को देखने निकल पड़ा.

हम तीनों आईलैंड की खूबसूरती का आनंद लेते हुए अंदर की तरफ चल पड़े ऊपर वाले ने आईलैंड बेहद खूबसूरती से बनाया था वहां पूरी तरह हरियाली थी अलग प्रकार के पेड़ थे और छोटी-छोटी पहाड़िया थीं. अद्भुत दृश्य था मैं प्रकृति के द्वारा बनाई खूबसूरत जगह पर धूप का आनंद ले रही थी. प्रकृति के दो अनमोल नगीने मेरे साथ में थे मैं मन ही मन सोच रही थी की प्रकृति किस किस तरह के जीव बनाती है निश्चय हैं उसकी इन खूबसूरत कलाकृतियों में कोई न कोई बात रहती है जिससे हम सभी का उनमें आकर्षण बना रहता है।

एक अनोखी बात थी। बीच पर काफी कम लोग दिखाई पड़ रहे थे उनमें अक्सर मेरी उम्र की ही कई सारी युवतियां थी और सभी के साथ माइकल और अल्बर्ट जैसे लोग थे।

अधिकतर युवतियों बेहद उत्तेजक बिकनी में थी और कई टॉपलेस होकर घूम रही थी।

एक अंग्रेजन तो पूरी तरह नंगी थी और दो काले सायों के बीच मिस फिक्र होकर चल रही थी उनसे हंस कर बातें कर रही थी यह देखकर मुझे भी साहस आ रहा था। यह कैसा अनोखा द्वीप था। सभी युवतियां यहां अकेली ही आई थी। क्या वह भी मेरे जैसी हिम्मतवाली थी या यह कोई अनोखा द्वीप था और इसके नियम भी अनोखे थे।

मैं इस रहस्य को समझने में पूरी तरह नाकाम थी। कुछ भी देर बाद एक और भी युवती जो मुझे कल होटल के रेस्टोरेंट में मिली थी वह भी दो मुस्टंड नीग्रो के साथ इस बीच पर टहल रही थी।

मेरा आत्मविश्वास अब पूरी तरह बढ़ चुका था इतना तो अवश्य था कि मैं यहां अकेली नही थी।

मैं इस खूबसूरत आईलैंड पर आकर अपने आप को खुशकिस्मत महसूस कर रही थी काश विकास मेरे साथ होता। कुछ ही देर में हम थक चुके थे. दोपहर के लगभग 1:00 बज रहे होंगे.

मुझे भूख लग आई थी मैंने अल्बर्ट से कहा वह बोला

"यस मैम आई हैव समथिंग फॉर यू"

माइकल और अल्बर्ट ने अपने साथ लाए सामान से एक चादर निकाली. हमने वही चादर बिछाकर खाना खाया अल्बर्ट और माइकल ने आईलैंड पर आने की पूरी तैयारी की थी चादर निकालते समय बैग से कंडोम के पैकेट भी निकल कर गिर गया एक बार के लिए मेरी रूह कांप गई.

ऐसा लगा जैसे इसी चादर पर मेरा योनि मर्दन होने वाला था। पर अल्बर्ट ने अपनी नज़रें झुकाए हुए ही उस पैकेट को पकड़ा और वापस बाग में डाल दिया। मेरे मन का डर अल्बर्ट और माइकल की सौम्यता ने दबा रखा था.

कुछ ही देर में हम तीनों खाना खा रहे थे मैंने थोड़ा सा ही खाना खाया क्योंकि वह समुद्री फूड था अंत में माइकल ने एक सुंदर स्वीट डिश निकाली यह कॉन्टिनेंटल डिश थी जो मुझे बेहद पसंद थी. मैंने उसे खाया और मैं तृप्त हो गई.

मुझे यह बात समझ नहीं आ रही थी कि अल्बर्ट को मेरी पसंद की स्वीट डिश का पता कैसे चला। मैं जब अल्बर्ट से पूछा तो वो बोला..

“ मोस्ट ऑफ द इंडियन विमेन लाइक दिस”

मैं अभी भी अपनी बिकनी में ही थी वह दोनों मेरी नग्नता के आदि हो चुके थे. मैं भी अपने आप को सहज महसूस कर रही थी.

मेरा पेट भर चुका था सुनहरी धूप में बैठे बैठे मुझे नींद आने लगी . अल्बर्ट ने हवा से फूलने वाला तकिया निकाला और अपने बड़े-बड़े फेफड़ों से तीन-चार फूक में ही उसे फुला दिया और मुझसे कहा

"मैम, यू कैन टेक रेस्ट"

मेरा इतना आदर और सत्कार उन दोनों द्वारा किया जा रहा था जो एक तरफ मुझे सहज भी कर रहा था पर दूसरी तरफ कही न कहीं मेरे मन में डर भी था. फिर भी मैं वह तकिया लेकर करवट लेकर सो गयी. उसी दौरान अल्बर्ट के एक बात कही

" मैम, इफ यू डोंट माइंड वी कैन गिव यू रिलैक्सिंग फुट मसाज"

मैं वास्तव में थकी हुई थी और मेरे कोमल पैर दर्द भी कर रहे थे. मुझे अंततः अल्बर्ट का वीर्य दोहन करना ही था मैंने उसे अनुमति दे दी. कुछ ही देर में अल्बर्ट मेरे पैरों को दबा रहा था उसकी हथेलियां मेरे पैरों को घुटनों तक दबा रही थी वह उसके ऊपर नहीं आ रहा था शायद उसे अपनी मर्यादा मालूम थी. माइकल ने भी मेरे हाथों को दबाना शुरू किया था.

उन दोनों के इस तरह मसाज करने से मुझे अद्भुत आनंद आ रहा था मुझे पता था उन दोनों को भी मेरे कोमल शरीर को छूने में निश्चय ही आनंद आ रहा होगा. मुझे कब झपकी लग गई मुझे याद भी नहीं। अल्बर्ट के हाथ मेरी जांघों तक पहुंच चुके थे। कुछ देर तक तो मैं उसके अनोखे स्पर्श का आनंद लेती रही पर मन में डर अब भी कायम था। उधर माइकल की उंगलियां मेरे कंधों तक पहुंच चुकी थी। यदि मैं उन्हें नहीं रोकती तो शायद उनकी उंगलियां मेरी बुर और चूचियों को सहला रही होती।

मैंने अपनी पलकें खोल दीं. वह दोनों झेंप गए .. काले काले होठों के बीच से मोती जैसे दांत दिखाई पड़ने लगे उन दोनों के ही लिंग पूरी तरह तने हुए थे। मैंने मन ही मन यह सोच लिया। मेरे लिए अल्बर्ट और माइकल दोनों एक जैसे ही थे दोनों का व्यवहार अनूठा था मैं सोच लिया यदि संभव हुआ तो मैं दोनों का ही वीर्य दोहन करूंगी.

"मैम, आर यू कंफर्टेबल नाउ"

मैंने मुस्कुराकर हां में सर हिलाया. मेरी अंगड़ाई से मेरे स्तनों का उभार एक बार और उनकी निगाहों में आ चुका था. मैंने उन दोनों को ढेर सारा थैंक्यू बोला खासकर उनके उस रिलैक्सिंग मसाज के लिए. अब मुझे अपने असली उद्देश्य को पूरा करना था.

मैंने अल्बर्ट से कहा

"आई वांट टू गो वॉशरूम"

वह दोनों हंसने लगे अल्बर्ट ने कहा

"मैम, यह प्राकृतिक द्वीप है आपको यहां यह कार्य प्राकृतिक तरीके से ही करना होगा हां आप हमसे दूर जाकर किसी पेड़ का सहारा ले सकती हैं."

हम बीच की जिस जगह पर थे वहां से हरियाली कुछ दूर थी मेरी वहां अकेले जाने की हिम्मत नहीं थी. मैंने अल्बर्ट को कहा अपने साथ चलने के लिए कहा वह मेरे साथ चल पड़ा.

मैं रास्ते में अपने अगले स्टेप के बारे में सोच रही थी अल्बर्ट थोड़ा दूर खड़ा था और मैं बाथरूम करने के लिए झाड़ी की ओट का सहारा लेकर अपनी पैंटी पहले नीचे की फिर कुछ सोचकर मैने उसे बाहर निकाल दिया। मेरा दिल धक धक करने लगा अल्बर्ट पास ही खड़ा था मैं पेड़ की ओट में थी पर उसके करीब थी।

आखिर मैं नीचे बैठ चुकी थी। इस मूत्र विसर्जन में अद्भुत आनंद आ रहा था. बहती हुई हवा मेरी नंगी बुरको सहला रही थी यह सिहरन एक अद्भुत सुख दे रही थी. मैं कई वर्षों बाद बाहर खुले में मूत्र विसर्जन कर रही थी और शायद इस तरह से खुले में नग्न होकर पहली बार।

मैंने मूत्र को काफी देर से रोका हुआ था। एक बार जब मूत्र विसर्जन शुरू हुआ उसकी धार अद्भुत रूप से तेज थी। मूत्र की धार निकलते हुए वैसे भी अवरुद्ध सीटी की आवाज निकाल रही थी । मूत्र की धार तेज थी वह लगभग मेरे शरीर से एक हाथ दूर गिर रही थी। वहीं पास में कुछ छोटे कीड़े मकोड़े चल रहे थे मेरे न चाहते हुए भी वह उससे भीगते हुए तितर-बितर हो रहे थे। मुझे भी अब उन्हें भीगोने में मजा आने लगा था। मैं अपनी कमर को ऊपर नीचे कर अपनी मूत्र की धार से उन पर निशाना लगाती। मेरी इस प्रक्रिया में मेरे कोमल नितंब कभी ऊपर उठते कभी नीचे। अचानक मुझे ध्यान आया अल्बर्ट पीछे ही खड़ा है। वह क्या सोच रहा होगा? मैं शर्म के मारे लाल हो गयी अपनी मैंम का यह रूप उसने शायद सोचा भी नहीं होगा। पर जो गलती होनी थी वह हो चुकी थी।

मैंने यह अनुभव अपनी युवावस्था में कभी महसूस नहीं किया था. . जब मैं उठ कर खड़ी हुई तभी मैंने निर्णय लिया कि यदि अभी नहीं तो कभी नहीं.मैंने अपनी लाल बिकिनी अपने हाथ में ली. मैं उसी अवस्था में बाहर आ गयी. अल्बर्ट मुझे इस तरह नग्न देखकर आश्चर्यचकित था.

वाह अपनी बड़ी बड़ी आंखें फाड़े मुझे देख रहा था वह मेरे बिल्कुल करीब आ चुका था. मुझे ऐसा लग रहा था कि वह कभी भी अपने सब्र का बांध तोड़ कर मुझे अपनी आगोश में भर लेगा. मेरा डर एक बार फिर उफान पर था. मैं झुक कर अपनी बिकनी दोबारा पहनने लगी. अल्बर्ट ने घुटनों के बल बैठ कर मुझसे कहा

"मैम, इफ यू डोंट माइंड प्लीज बी लाइक दिस. आई हैव नेवर सीन सच ए ब्यूटीफुल लेडी इन माई लाइफ. वी विल नॉट टच यू. यू आर द मोस्ट ब्यूटीफुल वूमेन आई हैव एवर सीन"

तारीफ हर सुंदरी को पसंद आती है मैं भी इससे अछूती नहीं थी. मैं उसकी इस अदा की कायल हो गयी. मैंने कहा

"ओके..ओके.. बट प्लीज डोंट टच मी"

उसने अपने दोनों कान पकड़ लिए और सर झुकाए हुए बोला..

विल टच यू ओनली व्हेन यू विश ..

वो मेरी नंगी बुर को छोड़ मेरी चूचियों को देख रहा था। मैं उसका इरादा समझ गई…

मैंने अपनी बिकनी के दूसरे भाग की तरफ इशारा किया जिसने मेरे खूबसूरत स्तनों को थोड़ा बहुत ढक कर रखा था. और मुस्कुराते हुए बोली

यू वांट मी टू रिमूव दिस?

उसने एक बार फिर खीसें निपोर दीं

"मैम, सो नाइस आफ यू"

मैंने अंततः बिकिनी का वह भाग भी हटा दिया और मैं पूरी तरह नग्न हो गयी. इस बीच पर पूरी तरह नग्न होने वाली में पहली युवती नहीं थी। इस तरह अल्बर्ट के सामने नग्न होकर मैंने अपनी हिम्मत की नई मिसाल पेश की थी. पर अल्बर्ट को देखकर लगता नहीं था कि वह उग्र होकर मेरे साथ कोई जबर्दस्ती करेगा. अल्बर्ट बड़ी बड़ी आंखों से मेरी नग्नता का आनंद ले रहा था. मेरे हाथ में मेरी बिकिनी थी अल्बर्ट में हाथ बढ़ाकर वह बिकनी मुझसे ले ली और अपनी बरमूडा की जेब में डाल दिया.

हम दोनों वापस माइकल की तरफ आने लगे अल्बर्ट को यह उम्मीद नहीं थी कि मैं इस तरह माइकल की तरफ चल पड़ूँगी.

मैंने यह जान लिया था कि वह दोनों दोस्त एक ही थे रास्ते में मैंने अल्बर्ट से पूछा

"आर यू सेटिस्फाइड नाउ?"

"यस मैम, यू आर वेरी ब्यूटीफुल लाइक दिस आईलैंड. ऑल नेचुरल."

मेरे साथ चलने की वजह से वह मुझे ध्यान से नहीं देख पा रहा था. कुछ ही देर में हम माइकल के पास आ चुके थे मुझे नग्न देखकर माइकल की आंखें फटी रह गई थीं. एक बार फिर मैं वापस में चादर पर बैठ चुकी थी. मैंने स्वयं को वज्रासन में व्यवस्थित कर लिया था जिससे मेरी बुरके होंठ मेरी जांघों के बीच छूप गए थे पर मेरे दोनों नग्न स्तन उन दोनों विशालकाय पुरुषों को खुला निमंत्रण दे रहे थे.

उन्होंने मुझे फिर से एक बार रेड वाइन ऑफर की मैंने ग्लास ले लिया वह दोनों मेरी नग्नता का आनंद ले रहे थे. अचानक मैंने अल्बर्ट से कहा..

"मैं यहां पर पूर्णतया नग्न हूं और आप दोनों कपड़े पहने हुए यह उचित नहीं" वह दोनों मुस्कुराने लगे उन्होंने एक ही झटके में अपने बरमूडा को अपने शरीर से अलग कर दिया. मेरे सामने दो काले साए अपने विशालकाय लिंग जो अब पूरी तरह उत्तेजित अवस्था में थे के साथ खड़े थे.

मैं उन दोनों को देखकर अपने आप को एक दूसरी दुनिया में महसूस कर रही थी. कभी-कभी मुझे लगता कि जैसे मैं एक स्वप्नलोक में आ गयी हूँ जिसमें हम तीनों के अलावा कोई नहीं था.

मैं पूरी तरह नग्न थी और वह दोनों भी. उनके लिंग बेहद आकर्षक थे और पूरी तरह काले थे. लिंग का अगला भाग हल्का मशरूम के जैसे लाल था लिंग के ऊपर की चमड़ी स्वता ही पीछे हो गई थी. बड़े नींबू के आकार के उनके सुपारे अपने रंग को शरीर के रंग से अलग किए हुए थे. उनके अंडकोष छोटे ही थे परंतु उनमें गजब का तनाव था. दोनों की उम्र 20 -22 वर्ष के आसपास रही होगी ऐसे उत्तेजक और जवान नवयुवक मैंने आज तक नहीं देखे थे.

भगवान ने उनके चेहरे को छोड़कर बाकी हर जगह सुंदरता भर भर के प्रधान की थी।

उनकी उत्तेजना और असीम काम शक्ति अद्भुत थी. मुझ जैसी कोमलंगी निश्चय ही इनके लिए नहीं बनी थी पर जिस तरह सफेद छोटा रसगुल्ला छोटे -बड़े सभी लोगों की प्यास बुझाता है मेरी सुंदरता इन दोनों के लिए एक उसी तरह थी.

उनके लिंग में आई उत्तेजना में निश्चय ही मेरा योगदान था. वह दोनों इस तरह मेरे सामने खड़े थे मुझे देखकर हंसी भी आ रही थी. ऐसा लग रहा था जैसे वो अपने शारीरिक सौष्ठव का प्रदर्शन मेरे सामने कर रहे थे. मैं उठ खड़ी हुई मैंने कहा

"आप दोनों बेहद सुंदर हैं एंड योर …. "

मेरे जुबान से लन्ड शब्द नहीं निकला पर मेरी निगाहों ने उनके लंड की तरफ इशारा कर दिया।

“मैंम वुड यू लाइक तो टच इट”

यह सुनहरा अवसर था मेरे हाथ आगे बढ़े और उनके चेहरे पर मुस्कान आ गई मैंने अल्बर्ट और माइकल में भेद नहीं किया और कुछ ही पलों में मेरे दोनों हाथों में दो अद्भुत लंड थे जिसकी हूबहू कल्पना तो मैं नहीं की थी तुरंत यह सरयू सिंह के लंड से मिलते-जुलते थे।

वह दोनों खुश हो गए मैंने अपने दोनों हाथों से उन दोनों के लिंग को अपनी मुट्ठी में पकड़ने की कोशिश की। मैं सफल तो नहीं हुई परंतु उनके लंड में अचानक एक उछाल आया ऐसा लगा जैसे मैं किसी जिंदा कोबरे को पकड़ लिया हो। मेरी रूह कांप रही थी. मेरे सीने की धड़कन तेज थी.

मुझे लगता है लिंग का आकार मेरी कलाई से लेकर कोहनी तक था लिंग की मोटाई भी कमोबेश वैसी ही थी.

मैं उनके लिंग को छू रही थी ऐसा लग रहा था जैसे मैं उसका पचीस प्रतिशत भाग ही हथेलियों में पकड़ पा रही थी. बाकी का भाग अभी भी खुला हुआ था. मैंने उनके लिंग को ऊपर से नीचे तक सहलाया. वह दोनों आनंद में अपनी आंखें ऊपर किये आकाश की तरफ देख रहे थे.

अद्भुत उत्तेजक माहौल में मेरी बुरभी अपना प्रेम रस अपने होठों तक ले आयी थी. अचानक अल्बर्ट की नजर उस पर पड़ गई वह मुस्कुराते हुए बोला

"मैम, आपको अच्छा लगा?

मैंने कहा

"यस यू बोथ आर मैग्नीफिसेंट"

माइकल ने इस पर हिम्मत जुटाकर कहा "क्या हम आपको दोबारा छू सकते हैं?"

मैं भी अब पूरी तरह उत्तेजित हो चली थी मैं जिस उद्देश्य के लिए वीरान टापू पर आई थी वह पूरा होने वाला था. मैंने सर हिलाकर माइकल को अपनी सहमति दे दी जिसे अल्बर्ट ने भी देख लिया. वह दोनों मेरे समीप आ चुके थे और मेरे कंधे और पीठ को सहला रहे थे शायद उन्हें मेरी अनमोल अमानतों को छूने के लिए नीचे झुकना पड़ रहा था। अल्बर्ट ने मेरे कंधों को पड़कर ऊपर उठाना चाहा और मैं खड़ी हो गई। उन दोनों काले सायों ने मुझे घेर लिया।

वह दोनों मेरी पीठ को सहलाना शुरू कर चुके थे मेरा हाथ अभी भी उन दोनों के लिंग को सहला रहा था. उत्तेजना बढ़ रही थी. कुछ ही देर में उन्होंने उनकी हथेलियां मेरे नितंबों तक आ गयीं. मैंने मना नहीं किया वह उन्हें प्यार से सहला रहे थे मैं चाहती थी कि वह उन्हें थोड़ा और तेजी से दबाए पर शायद वो इतनी हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे.

मैंने स्वयं उनके लिंग को और तेजी से सहलाया जिससे उन्हें अद्भुत उत्तेजना हुयी इस उत्तेजना में उन्होंने मेरे नितंबों को तेजी से पकड़ लिया. उनकी बड़ी-बड़ी हथेलियों मेरे नितंबों को पूरी तरह अपने आगोश में ले चुकीं थीं. उनकी उंगलियां मेरे नितंबों के बीच की दरार में कभी-कभी मेरी को भी छू रहीं थी.

तभी अल्बर्ट का हाथ ने सामने से आकर मेरी बुर को घेर लिया। बर से रस रही लार को सहारा मिला और वह माइकल की उंगलियों को भिगो गई। उसने अपना हाथ हटाया और मेरे चेहरे के सामने से लाते हुए अपनी नासिक पर ले गया और उसे सूंघते हुए बोला..

“मैम यू स्मेल सो नाइस…”

मैं स्वयं बेहद उत्तेजित महसूस कर रही थी। अल्बर्ट की इस हरकत में मुझे और भी ज्यादा उत्तेजित कर दिया था।

तभी अल्बर्ट में अपनी रस से भीगी उंगलियां माइकल के नथुनों से सटा दी और उससे अपनी भाषा में कुछ बोला..

उन दोनों को अनजान भाषा में बात करते हुए देखकर मैं डर गई और इंटरफेयर किया

“व्हाट यू पीपल आर टॉकिंग”

सॉरी मैंम .. यू स्मैल सो नाइस.. वी कुड नॉट कंट्रोल अप्रेसिंग यू..

एक बार फिर अल्बर्ट की उंगलियां मेरी बुर पर थी.. मेरा ध्यान उनके लैंड से हटकर अपनी उत्तेजना पर केंद्रित हो रहा था मैं आई थी यहां कुछ और करने पर हो कुछ और रहा था। माइकल की उंगलियों को अपनी बुर पर फिसलते हुए महसूस कर मुझे मन ही मन या ख्याल आ रहा था कि अल्बर्ट अपनी उंगली मेरी बुरके अंदर प्रवेश करा दे उनकी उंगलियां एक सामान्य किशोर के लिंग जितनी मोटी थी पर उन्होंने यह नहीं किया. मैं स्वयं आगे बढ़कर उन्हें ऐसा करने के लिए प्रेरित नहीं कर सकती थी. यह उनकी उत्तेजना को और भड़का सकता था और संभव था कि वह संभोग के लिए मुझ पर दबाव बनाने लगते.

मुझे बहुत संभाल कर चलना था. अचानक मेरे दिमाग में एक ख्याल आया. वहां पास में एक पेड़ की ठूंठ पड़ी थी जिसका ऊपरी भाग समतल था. मुझे ऐसा प्रतीत हुआ कि यदि मैं उस पर खड़ी हो जाओ तो मेरी बुर इनके लिंग के उचाई तक आ जाएगी.

मैं अल्बर्ट और माइकल के लिंग को पकड़े हुए उधर चल पड़ी. मैंने अगल-बगल निगाह दौड़ाई.. कुछ ही दूर पर कई सारे जोड़े कामुक गतिविधियों में लिप्त थे. अब लगभग यह द्वीप एक नग्न द्वीप में तब्दील हो चुका था। मेरा ध्यान बाई तरफ गया…कुछ दूर पर मेरे अल्बर्ट की तरह ही दिखने वाला एक नीग्रो एक अंग्रेजन को चोद रहा था..

मैं अपनी फटी हुई आंखों से एक लाइव ब्लू फिल्म देख रही थी अल्बर्ट और माइकल मेरे आगे बढ़ने का इंतजार कर रहे थे मुझे आश्चर्य से इनका मुख घटनाओं को देखते हुए अल्बर्ट ने कहा

मैं यहां पर यह सामान्य बात है यह द्वीप इसीलिए अनोखा है। यहां पर लगभग सभी लोग इसीलिए आते हैं। यह सब लोग आपके ही होटल में रह रहें हैं।

मुझे अब सहज महसूस हो रहा था। मैं अपने मिशन पर आगे बढ़ चुकी थी

वह दोनों भी आज्ञाकारी बच्चों की तरह मेरे साथ साथ वहां तक आ गए. मैं लकड़ी के ठूंठ पर खड़ी हो गई और अल्बर्ट को अपने पीछे आने के लिए कहा.

अल्बर्ट मेरे पीछे आ चुका था. मैंने उसके लिंग को अपनी दोनों जांघों के बीच से निकालते हुए सामने ला दिया और स्वयं अपना भार अल्बर्ट के सीने पर दे दिया. मेरी पीठ उसके सीने से सटी हुई थी मेरे नितंब की जांघों उसे छू रहे थे उसका लिंग मेरी बुरसे सटा हुआ सामने की तरफ मेरी हथेलियों में था.

मैं अपनी इच्छा से उसके लिंग को सहला रही थी. सुपारे पर हाथ फिराते समय उसका लिंग उछल जाता और मेरी बुरके होठों को थपथपा देता. उत्तेजना मुझ में पूरी तरह भर चुकी थी बुरका प्रेम रस उसके लिंग को भिगो रहा था.

माइकल मेरे ठीक सामने था। मैं अल्बर्ट और माइकल के बीच में सैंडविच बनी हुई थी। माइकल का लैंड मेरी नाभि से टकरा रहा था। मैं एक हाथ से माइकल के लंड के सुपाड़े को सहला रही थी और दूसरे हाथ से अल्बर्ट के लंड को अपनी बुर पर रगड़ भी रही थी और हथेलियां से उसके सुपाड़े को मसल रही थी। माइकल मेरी दोनों चूचियों को हल्के-हल्के सहला रहा था। बीच-बीच में वह शायद अपनी उत्तेजना पर काबू नहीं रख पाता और चूचियों को जोर से मसल देता..

अल्बर्ट की उंगलियां भी मेरी मदद करने को आ पहुंची थी। वह स्वयं अपने लंड को मेरी बुर पर रगड़ रहा था और अपनी उंगलियों से मेरी भगनासा को छू रहा था..

चिपचिपा प्रेम रस उसके लिंग को सहलाने में मेरी मदद कर रहा था मेरी आंखें बंद हो रही थी. कुछ ही देर में माइकल और अल्बर्ट ने अपनी स्थितियां बदल लीं।

मैंने माइकल को भी उसी तरह अपनी बुरके संपर्क में ला दिया था. मेरे लिए वह दोनों एक ही थे अद्भुत विशालकाय और एक मजबूत लिंग के स्वामी जिनका मुझे बीर्य दोहन करना था.

कुछ ही देर में उन दोनों के लिंग में अद्भुत कठोरता महसूस होने लगी। ऐसा नहीं था की लार सिर्फ मेरी बुर से बह रही थी उनके लंड से भी वीर्य रिस रिस कर बाहर आ रहा था..

किसकी उंगलियां कहां से प्रेम रस चुरा रही थी यह कहना कठिन था पर दोनों के लंड मेरी हथेली में फिसल रहे थे..

माइकल का लंड मेरी बुर पर रगड़ रहा था…एक पल के लिए मुझे लगा जैसे मैं स्वयं भी उसे अंग्रेजन में की भांति यहीं पर चुद जाऊं….

इस विचार मात्र ने मेरी उत्तेजना को चरम पर पहुंचा दिया। अपने पति से विश्वासघात ना ना यह पाप…मैं नहीं करूंगी..

अल्बर्ट की उंगलियां लगातार मेरे भागना से को शहला रही थी। आखिर उन्होंने ही तो मुझे वीर्य दोहन के लिए भेजा है अब जब मैं पराए मर्द का लंड पकड़ ही लिया है तो उसे…आह अपनी बुर…में…..आह….

मेरा ध्यान भटक रहा था मैं यहां उनका वीर्य दोहन करने आई थी और खुद स्खलन की कगार पर पहुंच गई थी..

मेरा बदन कांप रहा था…. अचानक मेरे सामने खड़ा माइकल नीचे झुका और मेरी चूचियों के ठीक सामने अपने होठों को रखते हुए मेरी तरफ देखा जैसे मुझे अनुमति मांग रहा हो…

मैं उत्तेजना की पराकाष्ठा पर थी मना कर पाना मेरे बस में नहीं था मैंने अपने होंठ अपने दांतों में भींच रखे थे..

मैंने सहमति में अपनी पलके झुका दी और मेरी आधी चूंची अल्बर्ट के मुंह में थी..

इधर उसने मेरी चूची चुसनी शुरू की और उधर मेरी बुर ने रसदार छोड़ दी मैं मदहोश होने लगी मेरे हाथ रुक गए और मैं इस स्खलन के परमानंद में खो गई। कुछ देर तक उन्होंने मेरे शरीर के साथ क्या किया मुझे इसका अंदाजा भी नहीं लगा पर इतना अवश्य था मैं तृप्त थी और इस अद्भुत सुख के लिए उनके शुक्रगुजार थी।

वापस अपनी चेतना में आने के बाद मैंने खुद को नियंत्रित किया और उस ठूंठ पर से उतर कर वापस रेत पर आ गई मैं घुटनों के बल बैठ चुकी थी..

मेरी तेज चलती हुई सांसों को देखकर माइकल ने बड़े अदब से पूछा..

मैंम वुड यू लाइक टू टेक वॉटर

मैंने उसकी नम्रता को दिल से सलाम किया कि इस उत्तेजक घड़ी में भी वह अपना संयम बनाए हुए था और अपनी मेहमान नवाजी में कोई कमी नहीं रख रहा था मैंने अपने हाथ आगे बढ़ाएं और वापस उन दोनों के लंड को पकड़ते हुए बोला

“लेट मी फिनिश एंड रिटर्न यू द फेवर”

मैं अपने छोटे-छोटे कोमल हाथों से उन्हें आगे पीछे कर रही थी मेरे हाथ दुखने लगे थे वह दोनों मेरे गालों को सहना रहे थे. वह दोनों आसमान की तरफ देख रहे थे।

अचानक अल्बर्ट और माइकल ने अपने हाथों को मेरी मदद के लिए ला दिया उनकी बड़ी-बड़ी हथेलियां उनके लिंग के अनुसार ही थी और उसके लिए सर्वथा उपयुक्त थी मैं अपनी कोमल हथेलियों से उनके सुपारे को मसलने लगी अचानक अल्बर्ट के लिंग से निकली वीर्य धारा मेरे गालों पर पड़ी। जब तक मैं अपने आप को संभाल पाती तब तक माइकल का स्खलन भी प्रारंभ हो गया।

मैं अपने चेहरे को दोनों हथेलियों से ढकी हुई थी और वह दोनों अपने वीर्य की धार से मुझे भिगो रहे थे उनके मुख से एक अजीब सी बुदबुदाने गदगुदाने की आवाज आ रही थी जिसमें कभी-कभी मैम शब्द सुनाई पड़ रहा था मुझे पता था वह अपनी कल्पनाओं में मेरा योनि मर्दन कर रहे थे पर यह उनकी कल्पना थी जिस पर उनका हक था और उनके हक पर मुझे कोई आपत्ति नहीं थी.

मैंने उनकी उत्तेजना शांत होने का इंतजार किया वीर्य वर्षा रुक जाने के पश्चात मैंने चेहरे पर से अपने हाथ हटाए और उठ खड़ी हुयी. वीर्य की कुछ बूंदे मेरे स्तनों से होती हुई मेरी जांघों के जोड़ तक पहुंच चुकी थी जो मेरी योनि के होठों को स्पर्श कर रहीं थीं. मेरी बुर से स्खलित हुआ प्रेम रस उन अद्भुत मर्दों की वीर्य से मिल रहा था।

अंततः मैंने विकास के चैलेंज को पूरा कर दिया था। मैं विकास के पास जल्द से जल्द पहुंचना चाहती थी और उनसे अपनी विजय की सूचना देकर उनका प्यार और प्रोत्साहन पाना चाहती थी।

वह दोनों संतुष्ट दिखाई पड़ रहे थे. अल्बर्ट और माइकल ने मेरे स्तनों पर लगे हुए वीर्य को अपनी हथेलियों से पोछना चाहा। जितना ही उन्होंने इसे पोछा उतना ही वह फैलता गया। वैसे मुझे इसकी आदत पड़ चुकी थी विकास की यह पसंदीदा आदत थी.

मैं उठ खड़ी हुई।

तभी माइकल और अल्बर्ट दोनों घुटनों के बल आकर मुझसे क्षमा मांगने लगे..

"मैम आई एम सॉरी वी कुड नॉट कंट्रोल"

मैंने उनके सर पर हाथ रख दिया और उनके बालों को सहला दिया मेरी इस क्रिया से उनकी आत्मग्लानि कम हुई और उन दोनों ने अपना चेहरा मेरी नग्न जांघों से सटा दिया उनके होठों से निकलने वाली गर्म सांसे मेरी बुर पर महसूस हुई।

"इट्स ओके, इट्स ओके नो प्रॉब्लम"

वह दोनों खुश हो गए काले चेहरों के पीछे से उनके सुंदर और सफेद दात स्पष्ट दिखाई पड़ने लगे।

माइकल भागकर तोलिया ले आया पर तब तक मेरे शरीर पर लगा हुआ वीर्य लगभग सूख चुका था। वीर्य की लकीरें मेरे पेट और स्तनों पर साफ दिखाई पड़ रही थीं। मैंने माइकल से तौलिया ले लिया और अपनी कमर के चारों तरफ लपेट लिया। मेरी नग्नता ने अपना कार्य कर लिया था हम तीनों रेत पर पड़ी हुई चादर की तरफ चल पड़े।

अल्बर्ट ने मेरी बिकनी अपनी बरमूडा से निकाली और बिकनी का निचला भाग अपने हाथों में पकड़ कर रेत पर पर बैठ गया जैसे वह मुझे इसे पहनाने में मदद करना चाह रहा था। मैंने तोलिया गिरा दिया और अपने पैरों को बारी-बारी से बिकनी के अंदर डाल दिया। अल्बर्ट की उंगलियां उसे खींचती हुई मेरी कमर तक ले आयी। इस दौरान मेरी जांघों पर एक बार फिर अल्बर्ट की हथेलियों का स्पर्श महसूस हुआ। एक पल के लिए मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे अल्बर्ट के अंगूठे ने मेरी बुरके मुकुट (भगनासा) को छू लिया था मैं सिहर गयी थी।

पैंटी से मेरी बुर को ढकते हुए अल्बर्ट ने मेरी आंखों में देखते हुए बोला..

“इट लुक लाइक ए हेवन एंड स्मेल लाइक नेक्टर योर हसबैंड इस वेरी लकी”

मेरा ध्यान अपनी बुर पर था तभी मैंने माइकल के हाथों को अपने स्तनों पर महसूस किया वह मुझे बिकनी का उपरी भाग पहना रहा था। उन दोनों का यह प्रेम देखकर मैं मन ही मन उनकी सौम्यता की कायल हो गई थी।

उन दोनों में अद्भुत समानता थी दोनों ही अपनी उत्तेजना को काबू में रखना जानते थे जो मुझे पुरुषों में सर्वाधिक प्रिय है। उन्होंने आज मेरी नग्नता का जी भर कर आनंद लिया था शायद यह उनसे ज्यादा मेरी जरूरत थी। मुझे भी आज उनके लिंग का जो दिव्य दर्शन प्राप्त हुआ था यह मेरे लिए यादगार था।

हम तीनों वापस अपने होटल की तरफ चल पड़े थे इस वीरान टापू पर इन दो पुरुषों का वीर्य स्खलन मेरे जीवन की अद्भुत रोमांचक घटना थी। मैं विकास से मिलने के लिए बेकरार थी। मैं उनसे अपनी इस विषय पर निश्चय ही कोई अद्भुत उपहार चाहती थी।

मैं मन ही मन मुस्कुरा रही थी और इस तरह सकुशल लौटने के लिए भगवान का शुक्रिया अदा कर रही थी। अल्बर्ट और माइकल मेरे पसंदीदा हो चुके थे इन्होंने मुझे आज खुश कर दिया था। कुछ देर बाद होटल की खूबसूरत बिल्डिंग दिखाई देने लगी।

मेरी अधीरता बढ़ती जा रही थी शाम के 5:00 बज रहे थे काश विकास वहां पर होते। बोट के किनारे लगते ही मैं बीच पर उतर गयी। अचानक विकास दिखाई पड़े मैं उनकी तरफ भागी ठीक उसी प्रकार से जिस तरह से जेल से छूटा हुआ कोई कैदी अपने परिवार जनों को देखकर दौड़ता है।

उन दोनों ने मेरे साथ कोई दुर्व्यवहार नहीं किया था पर विकास को देखकर मैं बिना उनका शुक्रिया अदा किये ही उनकी तरफ भाग गयी थी। कुछ ही देर में वह दोनों मेरी जालीदार टॉप को हाथों में लिए मेरे पास आये और बोले

"मैम यू हैव लेफ्ट योरटॉप"

मैंने विकास से उन दोनों का परिचय कराया और कहा

"अल्बर्ट और माइकल इन दोनों लोगों ने मुझे एक खूबसूरत टापू दिखाया और कई सारे प्राकृतिक नजारे भी ये बहुत अच्छे हैं" वह दोनों मुस्कुरा रहे थे.

विकास ने उन्हें थैंक्यू कहा और वह दोनों रेस्टोरेंट की तरफ चल पड़े। मैं और विकास एक बार फिर समंदर की लहरों के बीच में आ गए। विकास मेरी और प्रश्नवाचक निगाहों से देख रहा था। पर मैं कुछ नहीं बोल रही थी। समुद्र के अंदर जाते हैं विकास ने मेरे स्तनों को छुआ उन्हें अपने हाथ पर चिपचिपाहट का एहसास हुआ वाह तुरंत ही समझ गए।

उन्होंने मेरे होठों को अपने होठों के बीच भर लिया और बेहद प्यार से चूमने लगे कुछ देर के लिए उन्होंने अपने होंठ अलग किया और बोला.

. ब्रेव सोनी यू वोंन द चैलेंज..

उन्होंने स्वयं अपने वीर्य से न जाने मुझे कितनी बार भिगोया था और नहाते समय उसे अपने ही हाथों से साफ किया था उन्हें अंदाज लग गया था कि मैं जीत चुकी थी।वह बेहद खुश थे।

समुद्र में बिकास के साथ अठखेलियां करके मैं तरोताजा हो गई थी मुझे पता था विकास मेरे अद्भुत कार्य के लिए मुझे होटल ले जाकर कसकर चोदने लिए तैयार थे और मैं भी इसका इंतजार कर रही थी। हम दोनों बेहद खुश थे।

मैंने विकास से पूछा..

अरे आपका चैलेंज मैने पूरा किया मेरा इनाम कहां है..

“कल मिलेगा बराबर मिलेगा…” विकास मुस्कुरा रहे थे…

शेष अगले भाग में..
 
देय तो प्रोब्लेम्स बीइंग फसद बी थिस साइट ी ऍम ुनाबले तो सेंड उपदटेस तो readers..hence ी ऍम टेकिंग ा पॉज..

सॉरी फॉर थे शामे..

कीप एंजोयिंग
 
उधर दक्षिण अफ्रीका मैं सोनी और विकास न जाने किस धुन में थे सोनी ने उन दोनों नीग्रो का वीर्य दोहन कर अपनी कामुकता में एक नई ऊंचाई प्राप्त की थी और उसकी दिशा तेजी से वासना में लिप्त युवती की तरह बढ़ रही थी। कुछ समय के लिए सोनी और विकास को उनके हाल पर छोड़ देते हैं और लिए वापस लिए चलते हैं जौनपुर में जहां सुगना अपने बच्चों और अपनी मां पदमा के साथ रह रही थी।



शनिवार का दिन था सोनू आज अपनी पत्नी लाली और उसके बच्चों के साथ जौनपुर से बनारस आने वाला था। सुगना और उसके बच्चे भी अपने मांमा से मिलने के लिए बेहद लालायित थे।

सुगना और सोनू के मिलन में काफी समय बीत चुका था सोनू का चेहरा चमक रहा था और गर्दन का दाग पूरी तरह गायब था। ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे सोनू का चरित्र बेदाग था।

पर यह सच नहीं था। सोनू का दिल तो अक्सर सुगना में ही खोया रहता था कमोबेश यही हाल सुगना का भी था। पर अपनी मर्यादाओं का जितना निर्वहन सुगना करती थी शायद सोनू में यह धीरज नहीं था वह मौका पाते ही सुगना को अपनी बाहों में भर लेने की कोशिश करता पर सुगना समय देखकर ही उसके करीब आती वरना वह उचित और सुरक्षित दूरी बनाए रखती थी।

जौनपुर में लाली और सोनू अपना अपना सामान पैक कर रहे थे तभी लाली ने कहा..

“ए सोनू जैसे हमार भाग्य खुल गईल का वैसे सुगना के भी दोसर शादी ना हो सकेला”

एक पल के लिए सोनू को लगा जैसे लाली की सलाह उचित थी परंतु सुगना को खोने के एहसास मात्र से सोनू की रूह कांप उठी वह तपाक से बोला

“अरे सुगना दीदी तो अभी सुहागन बिया जीजा घर छोड़कर भागल बाड़े पर जिंदा बाड़े ऐसे में दोसर शादी?

लाली निरुतर थी।

कुछ घंटे के सफर के बाद सोनू अपनी पत्नी लाली और उसके बच्चों के साथ बनारस आ चुका था।

यह एक संयोग ही था कि उसी समय सलेमपुर से सरयू सिंह और कजरी भी बनारस सुगना के घर आ पहुंचे थे।

सुगना ने सरयू सिंह और कजरी के चरण छुए और उन दोनों का आशीर्वाद प्राप्त किया। दोनों ने निर्विकार भाव से सुगना को खुश रहने का आशीर्वाद दिया उन्हें इस बात का इल्म न था कि उनका आशीर्वाद किस प्रकार फलीभूत होगा पर नियती ने सुगना के जीवन में खुशियां बिखरने का मन बना लिया था।

आज सुगना का पूरा परिवार उसके साथ था। सिर्फ उसकी दोनों बहनें उसे दूर थी पर अपनी अपनी जगह आनंद में थी। और उसका भगोड़ा पति रतन भी उसकी छोटी बहन मोनी के बुर में मगन मस्त था।

बातों ही बातों में पता चला की सरयू सिंह कजरी को उसके कंधे में उठे दर्द का इलाज करने के लिए बनारस आए थे। परंतु डॉक्टर ने उन्हें कुछ चेकअप कराने के लिए सोमवार तक रुकने का निर्देश दिया था।और आखिरकार दोनों सुगना के घर आ पहुंचे थे।

पूरा परिवार एक साथ बैठे पुराने दिनों को याद कर रहा था। सरयू सिंह को अब अपने पुराने दिनों से कोई सरोकार न था। कजरी और पदमा अब उनके लिए बेमानी हो चली थी। वैसे भी जिसने सुगना को भोग लिया हो उसे कोई और स्त्री पसंद आए यह कठिन था। परंतु जब से सरयू सिंह को यह बात ज्ञात हुई थी कि सुगना उनकी अपनी ही पुत्री है तब से उनके विचार सुगना के प्रति पूरी तरह बदल चुके थे।

सोनू बार-बार सुगना की तरफ देख रहा था जैसे उसकी आंखों में अपने प्रति आकर्षक और प्यार देखना चाह रहा हो। मन ही मन वह अपने विधाता से सुगना के साथ एकांत मांग रहा था परंतु यहां ठीक उसके उलट पूरा परिवार सुगना के घर में इकट्ठा हो चुका था।

इस भरे पूरे परिवार के बीच सुगना के साथ एकांत खोजना लगभग नामुमकिन सा प्रतीत हो रहा था तभी कजरी ने कहा…

“ए सुगना कॉल सलेमपुर चल जाइबे का?”

काहे का बात बा? सुगना ने आश्चर्य से पूछा

“मुखिया के बेटी के गहना हमरा बक्सा में रखल बा…काल ओकरा के देवल जरूरी बा.. हम त काल ना जा सकब यही से कहत बानी”

सुगना के बोलने से पहले सोनू बोल उठा

“चाची तू चिंता मत कर हम सुगना दीदी के लेकर चल जाएब और काम करके वापस आ जाएब”

“हां ईहे ठीक रही गाड़ी से जयीहें लोग तो टाइम भी कम लागी। “

सरयू सिंह ने अपना विचार रख रख कर इस बात पर मोहर लगा दी।

तभी लाली बोल उठी..

“हमरो के लेले चला हम भी अपना मां बाबूजी से भेंट कर लेब”

अचानक सोनू को सारा खेल खराब होता हुआ दिखने लगा परंतु लाली ने जो बात कही थी उसे आसानी से कटपना कठिन था तभी सुगना ने कहा

“ते बाद में चल जईहे बच्चा सबके भी देख के परी मां अकेले का का करी”

बात सच थी कजरी की बाहों में दर्द था और सुगना की मां पदमा इन सभी बच्चों को संभालने और सबका ख्याल रखने में अकेले अक्षम थी। सुगना की बात सुनकर लाली चुप हो गई उसकी बात टालने का साहस उसमें कतई नहीं था।

सोनू तो जैसे कल्पना लोक में विचरण करने लगा सुगना के साथ एकांत वह भी सलेमपुर में और सुगना के अपने घर में।

सुगना का वह कमरा …वह सुगना की सुहाग का पलंग वह दीपावली की रात जब उसने पहली बार सुगना के साथ उसके प्रतिरोध के बावजूद काम आनंद लिया था।

उसे अद्भुत और अलौकिक अनुभूति को याद कर सोनू का लंड तुरंत ही खड़ा हो गया। उसे यकीन ही नहीं हो रहा था। वह अपने विचारों में खोया हुआ था तभी सुगना ने बोला..

“ए सोनू तोर जाए के मन नईखे का ? कोनो बात ना हम बस से चल जाएब”

सोनू ने सुगना की आंखों में शरारत देख ली…

“ठीक बा काल 10 बजे चलेके..”

सोनू अपनी अपनी खुशी को छुपाने में नाकामयाब था शायद इसीलिए वह सुगना से नजरे नहीं मिल रहा था उसने वहां से उठ जाना ही उचित समझा और बच्चों को लेकर बाहर आइसक्रीम खिलाने चला गया।



सुगना खुश थी उसने मन ही मन सोनू के गर्दन पर दाग लगाने की ठान ली थी…
 
भाग 142

सोनू बेहद उत्साहित था। रात भर वह अगले दिन के बारे में सोचता रहा और मन ही मन अपने ईश्वर से प्रार्थना करता रहा की सुगना और उसके मिलन में कोई व्यवधान नहीं आए उसे इतना तो विश्वास हो चला था कि जब सुगना ने ही मिलन का मन बना लिया है तो विधाता उसका मन जरूर रखेंगे..

अगली सुबह सुगना के बच्चों सूरज और मधु को भी यह एहसास हो चला था कि उनकी मां उन्हें कुछ घंटे के लिए छोड़कर सलेमपुर जाने वाली है। वह दोनों सुबह से ही दुखी और मुंह लटकाए हुए थे।

बच्चों का अपना नजरिया होता है सुगना को छोड़ना उन्हें किसी हालत में गवारा नहीं था सोनू ने उन दोनों को खुश करने की भरसक कोशिश की तरह-तरह के खिलौने बक्से से निकाल कर दिए पर फिर भी स्थिति कमोवेश वैसी ही रही।

तभी सरयू सिंह ने बाकी बच्चों को बाहर पार्क चलने के लिए आग्रह किया लाली के बच्चे तुरंत ही तैयार हो गए और अब सूरज और मधु भी अपने साथियों और दोस्तों के साथ पार्क में जाने के लिए राजी हो गए।

सोनू और सुगना दोनों संतुष्ट थे।

सोनू ने गाड़ी स्टार्ट की और अपनी अप्सरा को अपनी बगल में बैठ कर सलेमपुर के लिए निकल पड़ा।

अपने मोहल्ले से बाहर निकलते ही सोनू ने सुगना की तरफ देखा जो कनखियों से सोनू को ही देख रही थी

आंखें चार होते ही सोनू ने मुस्कुराते हुए पूछा

“दीदी का देखत बाड़े”

सुगना ने अपनी नज़रें झुकाए हुए कहा.

“तोर गर्दन के दाग देखत रहनि हा”

“अब तो दाग बिल्कुल नईखे..” सोनू ने उत्साहित होते हुए कहा।

“हमरा से दूर रहबे त दाग ना लागी” सुगना ने संजीदा होते हुए कहा उसे इस बात का पूरी तरह इल्म हो चुका था कि सोनू के गर्दन का दाग निश्चित ही उनके कामुक मिलन की वजह से ही उत्पन्न होता था।

“हमारा अब भी की बात पर विश्वास ना होला. सरयू चाचा के भी तो ऐसा ही दाग होते रहे ऊ कौन गलत काम करत रहन” सोनू ने इस जटिल प्रश्न को पूछ कर सुगना को निरुत्तर कर दिया था। सरयू सिंह सुगना की दुखती रख थे। यह बात वह भली भांति जानती थी कि उनके माथे का दाग भी सुगना से मिलन के कारण ही था परंतु उनके बारे में बात कर वह स्वयं को और अपने रिश्ते को आशाए नहीं करना चाहती थी उसने तुरंत ही बात पलटी और बोला..

“चल ठीक बा …और लाली के साथ मन लगे लगल”

“का भइल सोनी के गइला के बाद हिंदी प्रैक्टिस छूट गईल?” शायद सोनू इस वक्त अपने और लाली के बारे में बात नहीं करना चाहता था उसका पूरा ध्यान सुगना पर केंद्रित था।

“नहीं नहीं मैं अब भी हिंदी बोल सकती हूं” सुगना ने हिंदी में बोलकर सोनू के ऑब्जरवेशन को झूठलाने की कोशिश की।

“अच्छा ठीक है मान लिया…वास्तव में आप साफ-साफ हिंदी बोलने लगी है.. “

अपनी तारीफ सुनकर सुगना खुश हो गई और सोनू की तरफ उसके आगे बोलने का इंतजार करने लगी..

“ दीदी एक बात बता उस दिन जो मैंने सलेमपुर में किया था क्या वह गलत था?”

सुगना को यह उम्मीद नहीं थी उसने प्रश्न टालने की कोशिश की “किस दिन?”

“वह दीपावली के दिन”

अब कुछ सोचने समझने की संभावना नहीं थी सुगना को उसे काली रात की याद आ गई जब उसके और सोनू के बीच पाप घटित हुआ था।

पर शायद वह पाप ही था जिसने सोनू और सुगना को बेहद करीब ला दिया था इतना करीब कि दोनों दो जिस्म एक जान हो चुके थे।

प्यार सुगना पहले भी सोनू से करती थी परंतु प्यार का यह रूप प्रेम की पराकाष्ठा थी और उसका आनंद सोनू और सुगना बखूबी उठा रहे थे। सोनू के प्रश्न का उत्तर यदि वर्तमान स्थिति में था तो यही था कि हां सोनू तुमने उस दिन जो किया था अच्छा ही किया था पर सुगना यह बात बोल नहीं पाई वह तब भी मर्यादित थी और अब भी।

“बोल ना दीदी चुप काहे बाड़े”

सोनू ने एक बार फिर अपनी मातृभाषा बोलकर सुगना की संवेदनाओं को जागृत किया।

“हां ऊ गलत ही रहे”

“पर क्यों अब तो आप उसको गलत नहीं मानती”

“तब मुझे नहीं पता था की मैं तुम्हारी सगी बहन नहीं हूं”

सुगना ने अपना पक्ष रखने की कोशिश की तभी उसे सोनू की बात याद आने लगी।

अच्छा सोनू यह तो बता “मैं किसकी पुत्री हूं मेरे पिता कौन है?”

“माफ करना दीदी मैं यहां बात बात कर हम दोनों की मां पदमा को शर्मसार नहीं कर सकता हो सकता है उन्होंने कभी भावावेश में आकर किसी पर पुरुष से संबंध बनाए हों पर अब उसे बारे में बात करना उचित नहीं होगा”

सुगना महसूस कर रही थी कि उसके और सोनू के बीच बातचीत संजीदा हो रही थी। उधर सुगना आज स्वयं मिलन का मूड बनाए हुए थी। उसने अपना ध्यान दूसरी तरफ केंद्रित किया और सोनू को उकसाते हुए बोली..

“तोरा अपना बहिनी के संग ही मन लागेला का?”

काहे? सोनू ने उत्सुकता बस पूछा।

“ते पहिले लाली के संग भी सुतत रहले अब हमरो में ओ ही में घासीट लीहले”

आशय

तुम पहले लाली के साथ भी सो रहे थे और बाद में मुझे भी उसमें घसीट लिया।

अब सोनू भी पूरी तरह मूड में आ चुका था उसने कहा..

“तोहर लोग के प्यार अनूठा बा…”

काहे…? सुगना ने सोनू के मनोभाव को समझने की चेष्टा की।

सोनू ने अपना बाया हाथ बढ़ाकर सुगना की जांघों को दबाने का प्रयास किया पर सुगना ने उसकी कलाई पकड़ ली और खुद से दूर करते हुए बोली।

“ठीक से गाड़ी चलाओ ई सब घर पहुंच कर”

सुगना की बात सुनकर सोनू बाग बाग हो गया उसने गाड़ी की रफ्तार तेज कर दी सुगना मुस्कुराने लगी उसने सोनू की जांघों पर हाथ रखकर बोला

“अरे सोनू तनी धीरे चल नाता हमरा के बिस्तर पर ले जाए से पहले अस्पताल पहुंचा देबे” सुगना खिलखिलाकर हंस पड़ी।

हस्ती खिलखिलाती सुगना को यदि कोई मर्द देख ले तो उसकी नपुंसकता कुछ ही पलों में समाप्त हो जाए ऐसी खूबसूरत और चंचल थी सुगना सोनू ने अपनी रफ़्तार कुछ कम की और मन ही मन सुगना को खुश और संतुष्ट करने के लिए प्लानिंग करने लगा।

उधर सुगना भी सोनू को खुश करने के बारे में सोच रही थी। आज वह उसे दीपावली की काली रात में घटित पाप को पूरी सहमति और समर्पण के साथ अपनाने जा रही थी।

आईये अब उधर दक्षिण अफ्रीका में सोनी और विकास का हाल-चाल ले लेते हैं वह भी विकास की जुबानी

(मैं विकास)

खाना खाने के पश्चात मैं और सोनीटहलते हुए होटल के शॉपिंग एरिया में आ गए थे

मैंने सोनीके लिए कुछ उपहार खरीदे वही पास में एक मसाज सेंटर था। सोनीअपने लिए कुछ छोटे-मोटे सामान खरीद रही थी तब तक मैं उस मसाज सेंटर में चला गया। यह मसाज सेंटर अद्भुत था मैंने रिसेप्शनिस्ट से वहां मिल रही सुविधाओं के बारे में जानना चाहा उसने मुझे ब्राउज़र दे दिया और कहा सर इसमें सभी प्रकार की सुविधाएं हैं आप अपनी इच्छा अनुसार जो सुविधा चाहिए वह पसंद कर सकते हैं। यह सारी बातें उसने धाराप्रवाह अंग्रेजी में समझायीं।

मैं ब्राउज़र लेकर वापस आ गया। सोनीबहुत खुश थी मैं उसे एक लिंगरी शॉप में ले गया मैंने सोनीके लिए कई सारे लिंगरी सेट खरीदें। वहां मिलने वाली ब्रा और पेंटी बहुत ही खूबसूरत थी। और उनमें एक अलग किस्म की कामुकता थी। सोनीउसे देखकर शरमा रही थी। पता नहीं सोनीमें ऐसी कौन सी खासियत थी कि ऐसे अद्भुत कामुक कार्य करने के बाद भी वह उसी सादगी और सौम्यता से मेरी प्यारी बन जाती और छोटी-छोटी बातों पर उसका चेहरा शर्म से लाल हो जाता सुगना की कुछ खूबियां सोनी में भी आ गईं थीं

हम सब कुछ देर बाद होटल वापस आ चुके थे।

रात में मैं और सोनीअल्बर्ट के बारे में बातें कर रहे थे सोनीअल्बर्ट के लिंग के बारे में मुझसे खुलकर बात कर रही वह अपनी कोहनी से हाथ की कलाई को दिखाते हुए बोली विकास उसका लिंग इतना बड़ा और एकदम काला था।

मैं उसकी बात सुनकर हंस रहा था सोनीके कोमल हाथों मैं मैं उसके लिंग की कल्पना से ही अत्यंत उत्तेजित हो उठा। सोनीमेरे ऊपर आ चुकी थी और अपनी कमर को धीरे धीरे हिला रही मैं उसके स्तनों को अपने सीने में सटाए हुए उसे चूम रहा था।

उसके कोमल नितंबों पर हाथ फेरते हुए मुझे अद्भुत आनंद की प्राप्ति हो रही थी। आज सोनीने जो किया था वह शाबाशी की हकदार थी मैं उसके नितंबों पर हल्के हाथों से थपथपा कर उसके अदम्य साहस की तारीफ कर रहा था और वह मेरी तरफ देख कर कामुकता भरी निगाहों से मुस्कुरा रही थी।

अचानक मैंने उससे कहा

"सोनीयदि अल्बर्ट का काला लिंग तुम्हारी बुरमें होता तो?"

वह मुस्कुराई और बोली

"यह बुर तब आपके किसी काम की नहीं रहती"

मैंने उसे फिर छेड़ा अरे यह सोनी जिम्नास्ट की बुरहै… उंगली और अंगूठे को एक जैसा ही पकड़ती है।.

मेरी इन उत्तेजक बातों से सोनीकी कमर तेजी से हिलने लगी थी ऐसा लग रहा था जैसे वह भी इस कल्पना से ही उत्तेजित हो रही थी। मैंने उससे फिर कहा

" एक बार कल्पना करो कि यह अल्बर्ट का काला लिंग है" वह शरमा गई उसमें मेरे गालों पर चिकोटी काटी उसकी कमर अभी भी तेजी से चल रही थी। उसने आंखें बंद कर ली अचानक मैंने उसकी कमर में अद्भुत तेजी दिखी चेहरा तमतमाता हुआ लाल हो चुका था।

मेरी सोनी स्खलित हो रही थी मैने भी अपना योगदान देकर उसके स्खलन को और उत्तेजना प्रदान की और स्वयं भी स्खलित हो गया। मैंने उसके चेहरे पर ऐसी उत्तेजना आज के पहले कभी नहीं देखी थी उसकी बुर ने आज जी भर कर प्रेम रस छोड़ा था मैं उसकी उत्तेजना से स्वयं विस्मित था। मेरे हाथ उसके नितंबों को सहला रहे थे और वह निढाल होकर मेरे सीने पर गिर चुकी थी।

मैंने मन ही मन सोच लिया था हो ना हो यह अल्बर्ट के लिंग की कल्पना मात्र का परिणाम था। हम दोनों संभोग के पश्चात मेरे द्वारा लाए गए मसाज पार्लर का ब्राउज़र पड़ने लगी मैंने सोनीकी तरफ एक बार फिर देखा और बोला चलो ना कल ट्राई करते हैं फिर यह मौका कहां मिलेगा वह शर्मा रही थी पर अंत में उसने मुझसे चिपकते हुए बोला ठीक है पर आप वही रहेंगे तभी और जरूरत पड़ने पर मेरी मदद करेंगे। मैं यह रिस्क अकेले नहीं ले पाऊंगी मैंने भी इस अद्भुत मिलन के लिए अपनी सहमति दे दी। मैं भी मन ही मन इस उत्तेजक संभोग को देखना चाहता था।

ऐसा अद्भुत दृश्य मैंने सिर्फ फिल्मों में ही देखा था और कल यह मेरी आंखों के सामने घटित होने वाला था। सोनीभी एक अद्भुत आनंद में डूबने वाली थी वह उसके लिए आनंद होता या कष्ट यह समय की बात थी। पर मेरी वहां उपस्थिति ही काफी थी मेरी सोनीको कोई कष्ट पहुंचाया यह असंभव था।

अगले एपिसोड में आप क्या पढ़ना चाहेंगे

1 सोनू और सुगना का मिलन

Ya

2 सोनी का अद्भुत मसाज

आप सभी पाठकों के कॉमेंट्स का इंतजार रहेगा
 
भाग 143

अरे सोनू तनी धीरे चल नाता हमरा के बिस्तर पर ले जाए से पहले अस्पताल पहुंचा देबे” सुगना खिलखिलाकर हंस पड़ी।

हस्ती खिलखिलाती सुगना को यदि कोई मर्द देख ले तो उसकी नपुंसकता कुछ ही पलों में समाप्त हो जाए ऐसी खूबसूरत और चंचल थी सुगना सोनू ने अपनी रफ़्तार कुछ कम की और मन ही मन सुगना को खुश और संतुष्ट करने के लिए प्लानिंग करने लगा।


उधर सुगना भी सोनू को खुश करने के बारे में सोच रही थी। आज वह उसे दीपावली की काली रात में घटित पाप को पूरी सहमति और समर्पण के साथ अपनाने जा रही थी।

अब आगे…

सोनू बेहद उत्साहित था। रात भर वह अगले दिन के बारे में सोचता रहा और मन ही मन अपने ईश्वर से प्रार्थना करता रहा की सुगना और उसके मिलन में कोई व्यवधान नहीं आए उसे इतना तो विश्वास हो चला था कि जब सुगना ने ही मिलन का मन बना लिया है तो विधाता उसका मन जरूर रखेंगे..

अगली सुबह सुगना के बच्चों सूरज और मधु को भी यह एहसास हो चला था कि उनकी मां उन्हें कुछ घंटे के लिए छोड़कर सलेमपुर जाने वाली है। वह दोनों सुबह से ही दुखी और मुंह लटकाए हुए थे।

बच्चों का अपना नजरिया होता है सुगना को छोड़ना उन्हें किसी हालत में गवारा नहीं था सोनू ने उन दोनों को खुश करने की भरसक कोशिश की तरह-तरह के पुराने खिलौने बक्से से निकाल कर दिए पर फिर भी स्थिति कमोवेश वैसी ही रही।

तभी सरयू सिंह ने बाकी बच्चों को बाहर पार्क चलने के लिए आग्रह किया लाली के बच्चे तुरंत ही तैयार हो गए और अब सूरज और मधु भी अपने साथियों और दोस्तों के साथ पार्क में जाने के लिए राजी हो गए।

सोनू और सुगना दोनों संतुष्ट थे। सरयू सिंह ने अपनी पुत्री सुगना की खुशी का अनजाने में ही ख्याल रख लिया था।

सोनू ने और देर नहीं की उसने गाड़ी स्टार्ट की और अपनी अप्सरा को अपनी बगल में बैठा कर सलेमपुर के लिए निकल पड़ा।

अपने मोहल्ले से बाहर निकलते ही सोनू ने सुगना की तरफ देखा जो कनखियों से सोनू को ही देख रही थी

आंखें चार होते ही सोनू ने मुस्कुराते हुए पूछा

“दीदी का देखत बाड़े”

सुगना ने अपनी नज़रें झुकाए हुए कहा.

“तोर गर्दन के दाग देखत रहनि हा”

“अब तो दाग बिल्कुल नईखे..” सोनू ने उत्साहित होते हुए कहा।

“हमरा से दूर रहबे त दाग ना लागी” सुगना ने संजीदा होते हुए कहा उसे इस बात का पूरी तरह इल्म हो चुका था कि सोनू के गर्दन का दाग निश्चित ही उनके कामुक मिलन की वजह से ही उत्पन्न होता था।

“हमारा अब भी ई बात पर विश्वास ना होला. सरयू चाचा के भी तो ऐसा ही दाग होते रहे ऊ कौन गलत काम करत रहन” सोनू ने इस जटिल प्रश्न को पूछ कर सुगना को निरुत्तर कर दिया था। सरयू सिंह सुगना की दुखती रख थे। यह बात वह भली भांति जानती थी कि उनके माथे का दाग भी सुगना से मिलन के कारण ही था परंतु उनके बारे में बात कर वह स्वयं को और अपने रिश्ते को आशंकित नहीं करना चाहती थी उसने तुरंत ही बात पलटी और बोला..

“चल ठीक बा …और लाली के साथ मन लगे लगल”

“का भइल सोनी के गइला के बाद हिंदी प्रैक्टिस छूट गईल का?” शायद सोनू इस वक्त अपने और लाली के बारे में बात नहीं करना चाहता था उसका पूरा ध्यान सुगना पर केंद्रित था।

“नहीं नहीं मैं अब भी हिंदी बोल सकती हूं” सुगना ने हिंदी में बोलकर सोनू के ऑब्जरवेशन को झूठलाने की कोशिश की।

“अच्छा ठीक है मान लिया…वास्तव में आप साफ-साफ हिंदी बोलने लगी हैं.. “

अपनी तारीफ सुनकर सुगना खुश हो गई और सोनू की तरफ देखते हुए उसके आगे बोलने का इंतजार करने लगी..

“दीदी एक बात बता उस रात जो मैंने सलेमपुर में किया था क्या वह गलत था?”

एक पल के लिए सुगना को लगा जैसे सोनू इस काली रात की बात कर रहा है जब उसने सुगना के साथ पहली बार संभोग किया था। पर सुगना को यह उम्मीद नहीं थी अनजान बनते हुए उसने प्रश्न टालने की कोशिश की “किस दिन?”

“वो दीपावली के दिन”

अब कुछ सोचने समझने की संभावना नहीं थी सुगना को उस काली रात की याद आ गई जब उसके और सोनू के बीच पाप घटित हुआ था।

पर शायद वह पाप ही था जिसने सोनू और सुगना को बेहद करीब ला दिया था इतना करीब कि दोनों दो जिस्म एक जान हो चुके थे।


प्यार सुगना पहले भी सोनू से करती थी परंतु प्यार का यह रूप प्रेम की पराकाष्ठा थी और उसका आनंद सोनू और सुगना बखूबी उठा रहे थे। सोनू के प्रश्न का उत्तर यदि वर्तमान स्थिति में था तो यही था कि

सुगना के अंतरात्मा चीख चीख कर कह रही थी…”हां सोनू तुमने उस दिन जो किया था अच्छा ही किया था पर सुगना यह बात बोल नहीं पाई वह तब भी मर्यादित थी और अब भी”

“बोल ना दीदी चुप काहे बाड़े”

सोनू ने एक बार फिर अपनी मातृभाषा बोलकर सुगना की संवेदनाओं को जागृत किया।

“हां ऊ गलत ही रहे”

“पर क्यों अब तो आप उसको गलत नहीं मानती”

“तब मुझे नहीं पता था की मैं तुम्हारी सगी बहन नहीं हूं”

सुगना ने अपना पक्ष रखने की कोशिश की तभी उसे सोनू की बात याद आने लगी।

अच्छा सोनू यह तो बता “मैं किसकी पुत्री हूं मेरे पिता कौन है?”

“माफ करना दीदी मैं यह बात कर हम दोनों की मां पदमा को शर्मसार नहीं कर सकता हो सकता है उन्होंने कभी भावावेश में आकर किसी पर पुरुष से संबंध बनाए हों पर अब उसे बारे में बात करना उचित नहीं होगा”

सुगना महसूस कर रही थी कि उसके और सोनू के बीच बातचीत संजीदा हो रही थी। उधर सुगना आज स्वयं मिलन का मूड बनाए हुए थी। उसने अपना ध्यान दूसरी तरफ केंद्रित किया और सोनू को उकसाते हुए बोली..

“तोरा अपना बहिनी के संग ही मन लागेला का?”

काहे? सोनू ने उत्सुकता बस पूछा।

“ते पहिले लाली के संग भी सुतत रहले अब हमरो के भी घसीट लीहले”

(आशय : तुम पहले लाली के साथ भी सो रहे थे और बाद में मुझे भी उसमें घसीट लिया।)

अब सोनू भी पूरी तरह मूड में आ चुका था उसने कहा..

“तोहर लोग के प्यार अनूठा बा…”

काहे…? सुगना ने सोनू के मनोभाव को समझने की चेष्टा की।

सोनू ने अपना बाया हाथ बढ़ाकर सुगना की जांघों को दबाने का प्रयास किया पर सुगना ने उसकी कलाई पकड़ ली और खुद से दूर करते हुए बोली।

“ठीक से गाड़ी चलाओ ई सब घर पहुंच कर”

सुगना की बात सुनकर सोनू बाग बाग हो गया उसने गाड़ी की रफ्तार तेज कर दी सुगना मुस्कुराने लगी उसने सोनू की जांघों पर हाथ रखकर बोला

“अरे सोनू तनी धीरे चल नहीं तो मैं पलंग की बजाय अस्पताल में लेटी मिलूंगी” सुगना खिलखिलाकर हंस पड़ी।

हस्ती खिलखिलाती सुगना को यदि कोई मर्द देख ले तो उसकी नपुंसकता कुछ ही पलों में समाप्त हो जाए ऐसी खूबसूरत और चंचल थी सुगना। सोनू ने अपनी रफ़्तार कुछ कम की और मन ही मन सुगना को खुश और संतुष्ट करने के लिए प्लानिंग करने लगा।

उधर सुगना भी सोनू को खुश करने के बारे में सोच रही थी। आज वह दीपावली की काली रात में घटित पाप को अपना चुकी थी और और अब पूरी सहमति और समर्पण के साथ सोनू को अपनाने जा रही थी।

कितना अजीब सहयोग था सुगना के माथे का सिंदूर का रंग बदल चुका था । गले का मंगलसूत्र भी सोनू द्वारा ही लाया हुआ था। और उसके दिलों दिमाग पर अब सरयू सिंह की जगह सोनू राज कर रहा था।

सोनू स्वयं सुगना के बारे में सोच रहा था।

सुगना के प्रति सोनू के मन में आकर्षण तभी उत्पन्न हुआ था जब वह किशोरावस्था से गुजर रहा था स्त्री शरीर की पहली परिकल्पना उसने सुगना के रूप में ही की थी। अपनी किशोरावस्था में जब-जब वह सुगना के अंगों को देखता उसे अंदर ही अंदर एक अजब सी संवेदना होती पर मन में पाप अपराध बोध भी जन्म लेता।

उस समय सुगना के कामुक अंगों को देख पाना लगभग असंभव था पर पर इसके बावजूद वह सुगना की गोरी पीठ और घुटने के नीचे सुंदर टांगों को देखने में कामयाब रहा था वैसे भी सुगना की सुडौल कद काठी स्वयं ही उसकी चोली के पीछे छुपे खजाने का बखान करती थी।

जितना ही सोनू उन दिनों के बारे में सोचता सुगना का मासूम चेहरा उसकी आंखों के सामने घूमने लगता गांव की एक सुंदर अल्हड़ लड़की सुगना आज एक पूर्ण युवती बन चुकी थी जो इस समय कार के शीशे से बाहर लहलहाती फसलों को देख रही थी।

सुगना के विवाह के पश्चात सोनू और सुगना दूर हो गए थे पर सोनू को लाली का सानिध्य प्राप्त हो चुका था। लाली ने सोनू को अपने मुंह बोले भाई की तरह अपना लिया था आखिर वह उसकी सहेली का भाई था। लाली सोनू के करीब आती गई और सोनू की कामुकता अब लाली के सहारे उफान भरने लगी…

बनारस हॉस्टल आने के बाद जब सोनू ने लाली से और नजदीकी बढ़ाई तब जाकर उसे स्त्री शरीर के उन दोनों अद्भुत अंगों का दर्शन और स्पर्श सुख का लाभ प्राप्त हुआ…

जब एक बार सोनू ने लाली की चूचियों और बुर का स्वाद चख लिया उसकी कल्पना में न जाने कब सुगना वापस अपना स्थान खोजने लगी। सोनू को पता था कि उसका जीजा सुगना को छोड़कर जा चुका था। सुंदर और अतृप्त सुगना के कामुक जीवन में अपनी जगह बनाने के लिए सोनू मन ही मन सुगना के नजदीक आने की कोशिश करने लगा नियति ने सोनू का साथ दिया और आज वह अपनी प्यारी सुगना को उसके ही पलंग पर भोगने उसी के घर पर ले जा रहा था।

सुगना को उसके अपने ही सुहाग सेज पर चोदने की कल्पना कर सोनू का लंड पूरी तरह खड़ा हो गया जैसे ही सोनू ने स्टेरिंग से अपने हाथ हटाकर अपने लंड को व्यवस्थित करना चाह सुगना ने सोनू की यह हरकत ताड़ ली..

सोनू शर्मा गया इससे पहले की सोनू कुछ बोलता सुगना का हाथ सोनू की जांघों के बीच आ गया और सुगना में सोनू के तने हुए लंड का आकलन अपनी हथेलियां के दबाव से महसूस कर लिया और तुरंत ही सोनू के कंधे पर चपत लगाते हुए कहा..

“तोहरा दिन भर यही सब में मन लागेला का सोचत रहले हा…?”

जो सोनू सो रहा था वह बता पाना कठिन था पर उसने बेहद संजीदगी से बात बदलते हुए कहा..

“दीदी उस दिन जब सलेमपुर में पूजा थी और रतन जीजू आए थे और आप लोगों ने साथ में पूजा की थी उस दिन आप बहुत सुंदर लग रही थी”

सुगना को वह दिन याद आ गया जब उसने रतन को एक बार फिर अपने पति के रूप में स्वीकार किया था और अपने कुलदेवी के सामने पूजा अर्चना की थी और उसके बाद रतन के साथ अपनी सुहागरात मनाई थी। पर हाय री सुगना की किस्मत पुरुषार्थ से भरा रतन जो एक खूबसूरत और तगड़े लंड का स्वामी था अभिशप्त सुगना को स्खलित करने में नाकामयाब रहा था।

“बोल ना दीदी”

सुगना ने अपने चेहरे पर आश्चर्य के भाव लाते हुए सोनू से पूछा

“क्यों क्या बात है क्यों पूछ रहे हो?”

“उस दिन आपने सुन्दर लहंगा पहना था और जो इत्र लगाया था वह अनूठा था”

सुगना को उसे दिन की पूरी घटनाएं याद आ गई उसे यह भी बखूबी याद था कि जब सोनू उसके चरण छूने के लिए नीचे झुका था तो उसके लहंगे से उठ रही इत्र की खुशबू को उसने जिस तरह सूंघा था वह अलग था और बेहद कामुक था सुगना को तब सोनू से यह अपेक्षा कतई नहीं थी।

सुगना ने सोनू कि इस हरकत को बखूबी नोट किया था परंतु जानबूझकर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी थी उसे इतना तो इल्म अवश्य ताकि सोनू लाली के साथ कामुक गतिविधियों में लिप्त है और शायद यही वजह हो कि उसने अपनी काम इच्छा के बस में आकर यह हिमाकत की थी।


परंतु कई बातों पर प्रतिक्रिया न देना ही उचित होता है शायद सुगना ने तब इसीलिए अपनी प्रतिक्रिया नहीं दी थी पर अब जब सोनू ने वह बात छेड़ ही दी थी तो सुगना ने पूछा..

“ते इत्र कहा सूंघले?

सोनू से उत्तर देते नहीं बना। वह किस्म से कहता है कि वह अपनी बड़ी बहन की बुर पर लगा इत्र सूंघ रहा था । पर अब जब उसके और सुगना के बीच शर्म की दीवार हट रही थी उसने हिम्मत जुटा और बोला..

“दीदी हम बता ना सकी पर वह दिन तो बिल्कुल अप्सरा जैसन लागत रहलू और ऊ खुशबू…. सोनू ने एक लंबी आह भरी…

सोनू कहना तो बहुत कुछ चाहता था परंतु अब भी हिचकचा रहा था।

इससे पहले की उन दोनों का बात और आगे बढ़ती सलेमपुर का बाजार आ चुका था। सोनू ने गाड़ी रोकी और मिठाई की दुकान से जाकर जलपान के लिए कुछ आइटम और मिठाइयां खरीद लाया।

कुछ भी देर बाद उसकी कार सलेमपुर गांव के बीच से गुजरती सरयू सिंह के दरवाजे तक जा पहुंची।

कार का पीछा कर रहे पिछड़े वर्ग के बच्चे अब थक चुके थे। सुगना कार से बाहर आई और सोनू द्वारा खरीदी गई मिठाई में से कुछ भाग उन बच्चों में बांट दिया। बच्चे सुगना दीदी दीदी...चिल्ला कर अपनी मिठाई मांग रहे थे और सुगना सबको मिठाई बाट रही थी।सुगना निराली थी शायद इसीलिए वह हर दिल अजीज थी।

लाली के माता पिता हरिया और उसकी पत्नी भी अब तक बाहर आ चुके थे। अपनी पुत्री को ना देख कर वह थोड़े उदास हुए पर जब सुगना ने पूरी बात समझाइ वह सुगना और सोनू के आदर् सत्कार में लग गए।

जलपान कर सुगना और सोनू अपने घर में आ गए।


सुगना ने सर्वप्रथम कजरी द्वारा बताए गए गहने को उसके बक्से से निकला और सोनू को देते हुए बोली..

“सोनू इकरा के जाकर मुखिया जी के घर दे आओ और हां जाए से पहले गाड़ी में से हमरा बैग निकाल दे”

“तू हिंदी ना बोल पईबू” सोनू सुगना को चिढ़ाते हुए बोला

“ठीक है एसडीएम साहब अब हिंदी ही बोलूंगी …अब जो”

सुगना मुस्कुरा रही थी और सोनू को अपनी अदाओं से घायल किया जा रही थी।

“अब जो…. ये तो हिंदी नहीं है”

सुगना सोनू को बड़ी अदा से मारने दौड़ी..पर सोनू हंसते हुए गाड़ी से बैग निकालने चला गया।


पर न जाने क्यों सुगना से रहा नहीं क्या वह उसके पीछे-पीछे गाड़ी तक आ गई सोनू ने सुगना से पूछा

“ दो-चार घंटा खातिर अतना बड़ बैग काहे ले आइल बाड़ू”

“अब ते काहे भोजपुरी बोलत बाड़े” सुगना ने सोनू को उलाहना देते हुए कहा।

“बताव ना पूजाई के समान लेले बाड़ू का”

सोनू ने जिस संदर्भ में यह बात कही थी वह सुगना बखूबी समझ चुकी थी। बुर की पूजा का मतलब सुगना भली भांति समझती थी और सोनू इस भाषा को सीख चुका था।

सुगना एक पल के लिए शर्मा गई पर अपनी भावनाओं पर काबू करते हुए बोली

“अपना काम से काम रख ….”

वह सोनू से नज़रे चुराते हुए बैग लेकर अंदर जाने लगी तभी सोनू ने उसे पीछे से आकर पकड़ लिया अपने हाथों से उसके नंगे पेट को सहलाने लगा। उसकी हथेलियां ऊपर की तरफ बढ़ने लगी वह सुगना के कानों को चूमने की कोशिश कर रहा था और कान में फुसफुसाकर बोला..

“हमार इनाम कब मिली?”

“पहले मुखिया के घर जो और हां बाहर से ताला लगा दीहे वापस आवत समय पीछे के दरवाजा से आ जाईहे.”

सोनू सुगना की बात को पूरी तरह समझ चुका था बाहर ताला लगा होने का मतलब यह था कि घर में कोई नहीं था पिछले दरवाजे से आकर वह बिना किसी रुकावट के सुगना के साथ रंगरलिया मना सकता था।

सोनू ने अपनी पकड़ ढीली की और एक बार उसकी दोनों चूचियों को अपनी हथेली में भरते हुए बोला..

“जो हुकुम मेरे आका…”

सुगना खिलखिला कर हंस पड़ी वह उसकी पकड़ से दूर हुई और उसे धकेलते हुए बोली

“अब जो ना त देर होई “

“ फेर भोजपुरी…”

सोनू मुस्कुराते हुए उससे दूर हुआ पर दरवाजे से निकलने से पहले उसने एक बार फिर सुगना की तरफ देखा और अपने होठों को गोल कर उसे चूमने की कोशिश की यह कुछ-कुछ फ्लाइंग किस जैसा ही था सुगना ने उसी प्रकार सोनू को रिप्लाई कर उसे खुश कर दिया..

सोनू के जाने के पश्चात सुगना अपनी तैयारी में लग गई।

सजना सवरना हर स्त्री को पसंद होता है सुगना भी इससे अछूती नहीं थी। और आज तो उसे सोनू को खुश करना था जब स्त्री किसी पुरुष को अपनी अंतरात्मा से प्यार करती है तो वह उसके लिए पूरी तन्मयता से खुद को तैयार करती है आज सुगना भी अपने बैग में वही गुलाबी लहंगा चोली लेकर आई थी जो सोनू ने अपनी होने वाली पत्नी लाली के लिए चुना था और जो तात्कालिक परिस्थिति बस सुगना के भाग्य में आ गया था।

सुगना ने स्नान किया अपने केस सवारे और सोनू द्वारा दिया हुआ लहंगा चोली पहन लिया अंतर वस्त्रों की जरूरत शायद नहीं थी इसलिए सुगना ने पैंटी नहीं पहनी। पर चोली सुगना की कोमल चूचियों को तंग कर रही थी सुगना ने ब्रा ढूंढने के लिए अपना पुराना संदूक खोला..

संदूक खोलते ही सुगना की पुरानी यादें ताजा हो गई..

सरयू सिंह के साथ बिताई गई पहली रात और उसका गवाह वह लाल जोड़ा सुगना को आकर्षित कर रहा था उसने उसे लाल जोड़े को बाहर निकाल लिया और उस खूबसूरत जोड़े को सहलाते हुए सरयू सिंह के साथ बिताई गई अपनी पहली रात को याद करने लगी।

सरयू सिंह ने उसे जितना प्यार दिया था उसने उसके जीवन में खुशियों के रंग बिखेर दिए थे सुगना तब एक अल्लढ नवयौवना थी.. और सरयू सिंह कामकला में पारंगत जिस खूबसूरती से उन्होंने सुगना में वासना के रंग भरे और उसे पुष्पित पल्लवित होने दिया.. उसने सुगना के व्यक्तित्व को और निखार दिया था। व्यक्तित्व ही क्या सुगना की चूचियां उसके नितंब कटीली कमर सब कुछ कहीं ना कहीं सरयू सिंह के कारण ही थे।

वह उसके जनक भी थे उसे सजाने संवारने वाले भी थे और भोगने वाले भी।

उन्होंने न जाने कितनी बार सुगना को नग्न कर उसकी मालिश की थी कभी तेल से कभी अपने श्वेत धवल वीर्य से।

सुगना ने लहंगे पर लगे सरयू सिंह के वीर्य और अपने रज रस के दागों को देखा और मन ही मन मुस्कुराने लगी चेहरे की चमक बढ़ती चली गई।

अचानक सुगना का ध्यान संदूक में रखे अपने दूसरे लहंगे पर गया जो उसकी सास कजरी ने उसके लिए लाया था यह वही लहंगा था जो उसने रतन को अपने पति स्वरूप में स्वीकार करने के बाद घर की उसे विशेष पूजा में पहना था। पर शायद सुगना स्वाभाविक संबंधों के लिए बनी ही नहीं थी रतन के लाख जतन करने के बाद भी वह सुगना को स्खलित करने में नाकामयाब रहा था और यह जोड़ा सिर्फ और सिर्फ रतन के वीर्य का गवाह था पर सुगना का काम रास इस लहंगे के भाग में न था।

संदूक खाली हो चुका था और सुगना जिस खूबसूरत लाल ब्रा को ढूंढ रही थी वो अब साफ दिखाई पड़ रही थी सुगना ने उसे अपने हाथों में ले लिया यह ब्रा भी सुगना की पहली रात की गवाह थी पर सबसे पहले उसका साथ छोड़ कर जाने वाली या ब्रा पूरी तरह कुंवारी थी सरयू सिंह के वीर्य के दाग इस पर अब भी नहीं लगे थे।

सुगना ने अपनी चोली को उतारा और उसे खूबसूरत ब्रा को पहनने की कोशिश की।

सुगना चाह कर भी उस छोटी ब्रा में अपनी भरी भरी चूचियों को कैद करने में नाकाम रही…

सुगना की चूचियां अब अपना आकर ले चुकी थी और अब वह छोटी ब्रा में कैद होने के लिए तैयार नहीं थी एक तो उसके पहले मिलन की यादों ने उसकी चूचियों को और भी तान दिया था….

आखिरकार सुगना ने आज पहनी हुई अपनी पुरानी ब्रा को ही धारण किया अपनी चोली पहनी और अपने लहंगे को संदूक में वापस रखने लगी तभी अचानक उसे एहसास हुआ जैसे सोनू घर के पिछले दरवाजे को खोल रहा है।

वह अपने अतीत को अपने वर्तमान पर हावी नहीं होने देना चाहती थी आज उसका एकमात्र उद्देश्य सोनू को खुश करना था और कई दिनों से उसके अपने बदन में उठ रही काम अग्नि को शांत करना था। उसने फटाफट अपने पुराने लहंगे को वापस संदूक में बंद किया अपने कपड़े को व्यवस्थित किया और अपने बालों में कंघी करने लगी। अभी वह अपने बाल सवांर ही रही थी कि सोनू उसके समक्ष आ गया।

अभी सुगना की तैयारी में एक कमी थी वह थी सुगंधित इत्र का प्रयोग सुगना ने उसे बक्से से निकाल तो लिया था परंतु इसका प्रयोग नहीं कर पाई थी।

उसने सोनू से कहा..

“ए सोनू पीछे पलट हमारा तरफ मत देखिहे “

सोनू अधीर था वह सुगना की खूबसूरती का वैसे ही कायल था और इस समय तो सुगना बला की खूबसूरत लग रही थी। कमरे में व्याप्त स्नान की ही सुगना की खुशबू उसे मदहोश कर रही थी। सजी धजी सुगना से नज़रें हटाना कठिन था।

सोनू ने सुगना के दोनों कंधों को अपनी हथेलियां से पकड़ लिया और उसकी आंखों में आंखें डालते हुए बोला..

“कुछ बाकी बा का ?”

“….तोहरा से जवन बोला तानी ऊ कर” सुगना ने अपने हाथों से सोनू को पलटने का निर्देश देते हुए कहा।

अभी सोनू सुगना को जी भर कर देख भी नहीं पाया था पर बड़ी बहन सुगना का निर्देश टाल पाना कठिन था..

सोनू कोई और चारा न देख पलट गया ..

तभी सुगना की एक और हिदायत आई

“जब तक ना कहब पीछे मत देखिहे”

सोनू ने न जाने क्यों अपनी आंखें बंद कर ली शायद वह पीछे हो रहे घटनाक्रम का अंदाजा लगाना चाहता था।

सुगना ने इत्र की बोतल निकाली अपना लहंगा उठाया और इत्र में भीगी हुई रुई को अपनी दोनों जांघों के जोड़ पर रगड़ दिया।

इससे पहले कि वह इत्र की शीशी बंद कर पाती…

सोनू बोल उठा..

“दीदी ई खुशबू तो हम पहले भी सूंघले बानी”

सुगना मुस्कुरा उठी उसे पता था यह इत्र उसने कब लगाया था और यह भी बखूबी याद था कि सोनू ने उसके चरण छुते समय इस खुशबु को महसूस किया था।

“कब सूंघले बाड़े ते ही बता दे”

“पहले बोल मुड़ जाई?” सोनू अब बेचैन हो रहा था पर बिना सुगना के निर्देश के वह वापस नहीं मुड़ सकता था।

“ले हम ही तोरा सामने आ गईनी अब बता दे”

सोनू खूबसूरत और सजी-धजी सुगना को देखकर उसकी धड़कने तेज हो गईं..

सुगना के केश अब भी हल्के गीले थे..चेहरा दमक रहा था माथे पर सिंदूर आंखों में कजरा और होंठो पर लिपस्टिक उसकी खूबसूरती पर चार चांद लगा रहे थे।

गर्दन में लटक रहा सोनू का मंगलसूत्र चूचियों की घाटी में और गहरे उतर जाने को व्याकुल था।

भरी भरी मदमस्त चूचियां चोली के आवरण में कैद थी पर छलक छलक कर अपने अस्तित्व का एहसास करा रही थी।

चूचियों के ठीक नीचे सुगना का सपाट पेट और कटावदार कमर जो इस उम्र में भी किशोरियों जैसे थी सुगना का व्यक्तित्व और सुंदरता निखार रही थी।

नाभि का खूबसूरत बटन न जाने कितने मर्दों की नींद उड़ाई लेता था वह सोनू को बरबस आकर्षित कर रहा था। जिस प्रकार मिठाई की दुकान पर खड़ा ग्राहक मिठाइयों को लेकर कंफ्यूज रहता है उसी प्रकार सोनू की स्थिति थी सुगना के खजाने को वह जी भर कर देखना चाह रहा था पर नज़रें इधर-उधर फिसल रही थी।

सोनू अभी सुगना को निहार ही रहा था तभी सुगना बोल पड़ी

“ का देखे लगले कुछ बतावत रहले हा ऊ खुशबू के बारे में.”

सोनू घुटनों के बल बैठ गया.. उसने अपना सर नीचे किया और सुगना के अलता लगे खूबसूरत पैरों की तरफ अपना सर ले जाने लगा एक पल के लिए सुगना को लगा जैसे वह उसके पैरों पर अपना कर रख रहा हो।

शायद सुगना इसके लिए तैयार न थी उसने झुक कर सोनू को पकड़ने की कोशिश की पर तब तक सोनू के होंठ सुगना के पंजों को चूम चुके थे।

लहंगे के भीतर से आ रही इत्र की खुशबू सोनू के नथुनों में पढ़ चुकी थी।

सोनू अपना सर उठाता गया और इत्र की खुशबू के स्रोत को ढूंढता गया। सुगना का लहंगा सोनू के सर के साथ-साथ ऊपर उठ रहा था न जाने क्यों सुगना यंत्रवत खड़ी थी। सोनू लगातार सुगना के पैरों को चूमें जा रहा था.. घुटनों के ऊपर पहुंचते पहुंचते सुगना का सब्र जवाब दे गया। उसे अपनी नग्नता का एहसास हुआ यदि वह सोनू को नहीं रोकती तो काम रस की बूंदे उसकी प्यासी बर से छलक कर टपक पड़ती। वह एक कदम पीछे हटी और लहंगे ने वापस नीचे गिर कर उसके खूबसूरत पैरों को ढक लिया।

सोनू को यह यह नागवार गुजरा उसने आश्चर्य से सुगना की तरफ देखा। कितना तारतम्य था सुगना और सोनू में सुगना ने सोनू के मनोभाव को ताड़ लिया और अपनी सरल मुस्कान से उसकी तरफ देखते हुए बोला

“ना पहचानले नू?”

सोनू के मन में उपजा गुस्सा तुरंत शांत हो गया..

उसने लहंगे के ऊपर से ही सुगना की जांघों को सूंघते हुए बोला

“दीदी ये वही खुशबू ह जब तू रतन जीजा के साथ पूजा करे के समय लगवले रहलू “

“तब से बहुत बदमाश बाड़े ओ समय भी तू यही सूंघत रहले”

सोनू शर्मा गया। …पर अब सुगना और सोनू के बीच शर्म की दीवार हट रही थी।

“तू पहले भी अप्सरा जैसन रहलू मन तो बहुत करत रहे पर डर लागत रहे”

“का मन करत रहे?” सुगना ने मुस्कुराते हुए सोनू को छेड़ा.

सोनू अचानक उठ खड़ा हुआ और सुगना को अपनी बाहों में भरते हुए उसके होठों को चूम लिया और अपने बदन से सटाए हुए सुगना को सोनू पूरी तरह आलिंगन में भर चुका था उसकी हथेलियां सुगना की पीठ से होते हुए नितंबों की तरफ बढ़ रही थी।

सुगना खिले हुए फूलों की तरह दमक रही थी परंतु सोनू शायद उतना फ्रेश महसूस नहीं कर रहा था अचानक उसने कहा…

“दीदी 1 मिनट रुक तनी हम भी नहा ली”

सुगना ने उसे नहीं रोका उसने तुरंत ही सरयू सिंह की एक धोती लाकर सोनू को दी और कुछ ही पलों में सोनू वह धोती पहनकर आंगन में लगे हैंड पंप पर आ गया।

सोनू का गठीला बदन हल्की धूप में चमक रहा था। धोती को अपनी जांघों पर लपेटे सोनू हैंड पंप चलाकर बाल्टी में पानी भर रहा था।

सुगना अपने कमरे से सोनू को देख रही थी जो अब एक पूर्ण मर्द बन चुका था। सोनू की मजबूत भुजाएं चौड़ा सीना और गठीली कमर किसी भी स्त्री को अपने मोहपाश में बांधने में सक्षम थी।

अचानक सोनू ने सुगना के कमरे की तरफ देखा खिड़की से ललचायी आंखों से ताकती सुगना की निगाहें सोनू से मिल गई। आंखों ने आंखों की भाषा पढ़ ली सुगना सोनू में जो देख रही थी उसका असर उसकी जांघों के बीच महसूस हो रहा था। सुगना की बुर पानिया गई थी।

नजरे मिलते ही सुगाना ने अपनी आंखें झुका ली। पर लंड और तन गया…

शेष अगले भाग में…
 
क्या कोई बता सकता है कि पेज के टॉप परदिखाए गए पोल को कैसे हटाया जा सकता है।
 
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