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भाग 184
सुगना की ज़िद के आगे सोनी की एक न चली। आखिरकार, सोनी की धड़कनें तेज हो गई। सोनी उस महँगी बनारसी साड़ी को संभालते हुए बाहर निकली। सूरज पहले ही गाड़ी की सामने वाली सीट का दरवाज़ा खोलकर एक दरबारी की तरह खड़ा था।
जैसे ही सोनी गाड़ी के भीतर बैठी, उसकी देह से उठती इत्र की खुशबू ने गाड़ी के छोटे से केबिन को एक 'कामुक चैम्बर' में बदल दिया। सूरज ने ड्राइवर की सीट संभाली..
सोनी और सूरज की जोड़ी कुछ ही देर में सुगना की नजरों से ओझल हो गई…सुगना ने अनजाने में वह कर दिया था जो शायद सोनी के गर्भवती होने के लिए बेहद जरूरी था
शेष अगले भाग में
गाड़ी हवेली से निकली और बनारस की गलियों के अंधेरे में ओझल हो गई। सोनी खिड़की के बाहर देख रही थी, पर उसे अपने बदन पर पर सूरज की नज़रों की तपिश महसूस हो रही थी। स्टेशन अभी दूर था, और वह 40 मिनट का सफर दोनों के बीच की बची-खुची मर्यादा की कड़ियों को हिलाने वाला था।
गाड़ी के कांच चढ़े हुए थे और भीतर एयर-कंडीशनर की सरसराहट के बीच सोनी के अंगों से उठती इत्र और गीली मेहंदी की तीखी महक ने एक नशीला मायाजाल बुन दिया था।
सूरज ने गाड़ी गियर में डाली, पर उसकी नजरें सड़क से ज्यादा बगल वाली सीट पर बैठी सोनी की जांघों और उभरे हुए वक्ष पर थीं, जो बनारसी साड़ी के भीतर रह-रहकर हलचल पैदा कर रहे थे।
सूरज ने एक गहरी सांस ली और अपनी चुप्पी तोड़ी।
सूरज: "मौसी, माँ ने आपको सजाया है या सीधे किसी अप्सरा लोक से उधार मांगा है? यह जो नीले ब्लाउज के नीचे से लाल मेहंदी की बेलें झांक रही हैं... ये क्या मौसा जी के स्वागत का नक्शा हैं या उन्हें रास्ता भटकाने का इरादा है?"
सोनी ने पहले तो शर्म से नजरें झुका लीं, पर सुगना की रात वाली बातों और अपनी देह में जागती उस मीठी कसक ने उसे भी थोड़ा निडर बना दिया था। उसने अपनी तिरछी नजरों से सूरज को देखा और अपनी साड़ी का पल्लू ठीक किया और बोली..
सोनी (मुस्कुराते हुए): "बड़ा सयाना हो गया है तू सूरज... अपनी मौसी के कपड़ों और मेहंदी का हिसाब रख रहा है? यह श्रृंगार अनुष्ठान के लिए है, और हाँ, अगर तेरे मौसा जी रास्ता भटक भी जाएं, तो उन्हें सही ठिकाने पर लाना मुझे आता है। पर तू बता... गाड़ी चलाने पर ध्यान है या मेरी इन बेलों को गिनने पर?"
सूरज ने अचानक गाड़ी की रफ्तार थोड़ी कम की और अपना बायां हाथ गियर से हटाकर सोनी की सीट के पीछे की तरफ फैला दिया। उसकी उंगलियां सोनी के कंधे को छूते-छूते बची थीं।
सूरज: "गिनना तो तब शुरू करूँगा जब इन्हें छूने की इजाजत मिलेगी। मौसी, कल जब आप रसोई में थीं, तब तो यह सब 'कोरा' था... पर आज …आप कयामत लग रही हैं वैसे यह मेहंदी कहां-कहां लगी है..
सोनी…आज उत्साहित थी और पूरे मूड में थी उसने सूरज को चिढ़ाते हुए कहा…
उन सभी जगह पर जो विकास जी की अमानत है…
सूरज के दिमाग में सोनी का वह नग्न तराशा हुआ बदन घूम गया।
मौसी क्या क्या मेरे लिए कुछ भी नहीं? जिसने मुझे एक नया जीवन दिया क्या मैं उसे देख भी नहीं सकता छू भी नहीं सकता और उसे पूज भी नहीं सकता? सूरज ने अपनी बात बेहद गंभीरता से रख दी सूरज उस महोगनी की गांठ की बात कर रहा था जिसे सोनी बखूबी समझ रही थी।
मौसी उसे दिन आपने मुझे रात में अभी नहीं कहके टाल दिया था आज उत्सव का दिन है और आज आप अप्सरा के रूप में लग रही हैं क्या मेरी ख्वाहिश पूरी नहीं करेंगी।
सोनी का बदन सिहर उठा। उसे वह घटना याद आ गई जब सूरज ने उसे अपने कमरे में खींच लिया था और उनके बीच की नजदीकियां अचानक मिटने वाली थी परंतु सोनी ने हिम्मत करके सूरज को अलग कर दिया था। यह एहसास ही की सूरज उसे कुदरत अवस्था में कुदरत की अनमोल धरोहरों से सजा हुआ देखना चाहता है उसे उत्तेजित कर गया।
सोनी ने एक गहरी और मदहोश कर देने वाली मुस्कान बिखेरी। उसने अपनी आँखों के काजल को आईने में निहारा और फिर सूरज की ओर मुड़कर बोली, "इतनी बेचैनी अच्छी नहीं सूरज। यह श्रृंगार कोई आम दिखावा नहीं है। आज 'संतान सप्तमी' का विशेष व्रत है। तेरी माँ ने यह बेलें सिर्फ सजावट के लिए नहीं, बल्कि एक मन्नत के रूप में मेरे बदन पर उकेरी हैं। यह सब तेरे मौसा जी के स्वागत और कुल के वारिस की कामना के लिए है। सुगना दीदी ने तो अपनी ममता और उम्मीद की सारी कलाकारी आज मुझ पर उतार दी है।"
सूरज के हाथ गियर पर कस गए। उसकी सांसें भारी हो रही थीं। उसने दबी आवाज में कहा, "माँ ने मेहनत तो बहुत की है मौसी, पर इस मेहनत का फल देखने की तड़प मुझे हो रही है। आप बार-बार मौसा जी का नाम ले रही हैं, पर इस वक्त इस बंद गाड़ी में उन बेलों की खुशबू मुझे पागल कर रही है। आपने उस दिन वादा किया था... वो महोगनी की गांठ' दिखाने का। क्या वह भी इसी मेहंदी के जाल में कहीं छिपी है?"
सोनी ने एक लंबी सांस ली। उसे पता था कि वह आग से खेल रही है, पर सुगना की बातों ने उसके भीतर के स्त्रीत्व को जैसे आजाद कर दिया था। उसने सूरज की ओर तिरछी नजरों से देखा, जिसमें झिझक कम और चुनौती ज्यादा थी।
सोनी बोली, "तू अपनी जिद नहीं छोड़ेगा न? देख, यह मर्यादा के खिलाफ है... पर तेरी तड़प देख कर मेरा मन भी पसीज जाता है।"
सूरज ने गाड़ी की रफ्तार और कम कर दी। उसने फुसफुसाते हुए कहा, "सिर्फ एक झलक मौसी... उसे मेहंदी से सजी हुई सुनहरी दहलीज की कल्पना ही मुझे पागल कर रही है।"
पागल है क्या गाड़ी में यह संभव है? सोनी ने सूरज की इच्छा का मान रखते हुए यह बात कह तो दी …सूरज भी निरुत्तर हो गया उसे पता था बनारस की भीड़ भाड़ वाली सड़कों पर अपनी मौसी की जांघों को नग्न कर उस खूबसूरत दहलीज को देखने की कल्पना तो मन में कर सकता था परंतु हकीकत में यह संभव नहीं था।
सूरज मायूस हो गया..
पर सोनी इतनी भी निष्ठुर नहीं थी सूरज के चेहरे पर उदासी उसे अच्छी नहीं लगती थी..
सोनी ने धीरे से अपने कांपते हाथों से बनारसी साड़ी के भारी पल्लू को पकड़ा। उसने सूरज की आँखों में झांका और फिर बड़े ही सलीके और अदा के साथ पल्लू के छोर को थोड़ा ढीला किया। जैसे ही रेशमी कपड़ा सरका, नीले ब्लाउज के भीतर दबी उसकी गोरी काया और उस पर रची लाल गाढ़ी मेहंदी की बारीक नक्काशी सूरज की नजरों के सामने आ गई।
उसने अपने वक्ष के ऊपरी हिस्से को थोड़ा सा उभारते हुए व मेहंदी से सजी बेलें दिखाईं, जो उसकी त्वचा पर किसी कामुक कविता की तरह लिखी गई थीं। सूरज की आँखें फटी की फटी रह गईं; उस नक्काशी ने सोनी की सुंदरता को एक दैवीय और मादक रूप दे दिया था।
सोनी ने तुरंत पल्लू वापस सही किया और अपनी धड़कनों को काबू करते हुए कहा, "देख लिया? अब अपनी नजरें सड़क पर रख और मुझे सही सलामत स्टेशन पहुँचा, वरना यह मोहिनी रूप तुझे यहीं भटका देगा।"
सूरज खामोश था, पर उसके दिमाग में अब सड़क के नक़्शे नहीं, बल्कि सोनी के बदन पर खिंची वह लाल लकीरें घूम रही थीं।
सूरज भली भांति जान चुका था कि आज सोनी का यह सजा धजा रूप उसके मौसा जी के लिए ही है और आज उसकी दाल नहीं गलने वाली परंतु सूरज कामुक हो चुका था उसने अपना जादूई अंगूठा सोनी की तरफ करते हुए कहा..
मौसी अपना जादू एक बार फिर चला दीजिए…आज की रात मुझे कम से कम अपनी कल्पनाओं में आने से मत रोकिए..
सोनी समझ चुकी थी कि सूरज क्या चाह रहा है वो सूरज का अंगूठा सहलाने लगी सूरज के लंड में तनाव भरने लगा। कुछ ही पलों में सूरज ने अपना अंगूठा सोनी की उंगलियों से खींच लिया लंड का तनाव पर्याप्त बढ़ चुका था ज्यादा होने पर वह उसे असहज कर सकता था।
सोनी मुकुराने लगी…सूरज का तना हुआ वह अद्भुत लंड उसकी आंखों के सामने घूमने लगा…उसने सूरज की जांघों पर हाथ रखते हुए कहा..
अब खुश…जा मुन्ना जी ले अपनी जिंदगी….
स्टेशन करीब आ रहा था, पर दोनों के बीच की दूरी अब नाममात्र की रह गई थी। सूरज की नजरें बार-बार सोनी की साड़ी के उस हिस्से पर टिक रही थीं जो उसकी जांघों के जोड़ (महोघनी की गांठ) के पास था, जहाँ सुगना ने कमल का फूल बनाया था।
सोनी को महसूस हो रहा था कि सूरज की बातें उसके भीतर उस 'काम-रस' को फिर से जगा रही हैं जो सुबह पूजा के वक्त शांत था। उसने अपनी टांगें आपस में भींच लीं, जिससे उसकी मुनिया पर आई लार बाहर आने लगी।
स्टेशन आ चुका था । सूरज ने अपना लंड व्यवस्थित किया..एक गहरी आह भरी और गाड़ी को प्लेटफॉर्म के ठीक सामने खड़ा किया। उसने इंजन बंद किया और खिड़की के शीशे नीचे करने से पहले एक बार फिर सोनी की आंखों में झांका।
थैंक यू मौसी मुझे इंतजार रहेगा…
काहे का?
उस सुंदर महोगनी की गांठ के दर्शन का…
हट पागल… अब जा….सोन ने प्यार से उसे कंधे पर हाथ रखकर बाहर धकेलते हुए कहा।
सोनी का दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। उसने जल्दी से अपना पल्लू ठीक किया और चेहरे पर एक मर्यादित मुस्कान ओढ़ ली.
बनारस कैंट पर वहाँ अजीब सी अफरातफरी थी। सोनी गाड़ी में ही बैठी रही, जैसा कि सुगना ने कहा था। सूरज गाड़ी खड़ी करके भीतर पूछताछ के लिए गया।
करीब पंद्रह मिनट बाद जब वह लौटा, तो उसके चेहरे पर एक अजीब सी, रहस्यमयी चमक थी। उसने सोनी की खिड़की के पास आकर झुककर कहा।
सूरज: "मौसी, अनर्थ हो गया। बनारस से कुछ मील पहले एक मालगाड़ी पटरी से उतर गई है। पूरा रूट ब्लॉक है। फूफाजी की ट्रेन 'शिवगंगा एक्सप्रेस' अब रात 10:30 से पहले नहीं आने वाली।"
सोनी का दिल डूब गया। वह इस सजी-धजी अवस्था में स्टेशन के बाहर दो-ढाई घंटे इंतज़ार नहीं कर सकती थी।
सोनी (परेशानी में): "अब क्या होगा सूरज? घर वापस जाकर फिर आना तो बहुत मुश्किल होगा। इतनी भीड़ और ट्रैफिक में दो घंटे बर्बाद हो जाएंगे।"
सूरज इसी मौके की तलाश में था। उसने बड़ी सहानुभूति जताते हुए प्रस्ताव रखा।
सूरज: "मौसी, इतनी घबराहट में सड़क पर खड़े रहना ठीक नहीं। पास ही में अपना 'रेडिएंट होटल' है। आप आराम से बैठिएगा, टाइम पर आ जाएंगे…
सोनी असमंजस में थी। एक तरफ सूरज की वह 'आग' थी जिससे वह दोपहर भर बचती रही थी, और दूसरी तरफ बाहर की भीड़ और उमस। नियति ने उसे फिर से सूरज के हवाले कर दिया था।
सोनी (धीमी आवाज़ में): "ठीक है... चल।"
सूरज ने तुरंत गाड़ी मोड़ दी। बनारस की सड़कों पर ट्रैफिक और उमस के बीच, सूरज ने गाड़ी 'रेडिएंट होटल' की भव्य पोर्च में लगा दी। यह होटल शहर के रसूखदार प्रतिष्ठानों में से एक था, जिसका मालिकाना हक सीधे तौर पर विकास (सोनी के पति) के परिवार के पास था।
जैसे ही गाड़ी रुकी, होटल के दरबान ने लपककर दरवाजा खोला। सोनी अपनी भारी बनारसी साड़ी और गहनों को संभालती हुई बाहर निकली। उसके चेहरे पर एक अजीब सी घबराहट थी, क्योंकि वह पहली बार इस तरह सज-धजकर अपने ही परिवार के होटल में इस वक्त आ रही थी।
होटल के भीतर की ठंडी हवा और मद्धम रोशनी ने बाहर की बेचैनी को थोड़ा कम किया। जैसे ही वे रिसेप्शन डेस्क पर पहुँचे, वहां मौजूद सीनियर रिसेप्शनिस्ट, खन्ना, तुरंत अपनी कुर्सी से खड़ा हो गया। उसने विकास की पत्नी को देखते ही हाथ जोड़कर गहरा अभिवादन किया।
खन्ना (बड़े आदर से): "अरे, मालकिन! प्रणाम। आप अचानक इस वक्त? साहब (विकास जी) भी साथ आए हैं क्या?"
सोनी थोड़ा झेंप गई, उसने अपनी साड़ी का पल्लू ठीक किया। इससे पहले कि वह कुछ बोलती, सूरज ने मोर्चा संभाल लिया।
सूरज (अधिकारपूर्ण स्वर में): "नहीं खन्ना जी, मौसा जी की ट्रेन मालगाड़ी के पलटने की वजह से दो घंटे लेट हो गई है। मौसी को स्टेशन पर रुकने में दिक्कत हो रही थी, इसलिए हमने सोचा कि यहीं रुककर इंतज़ार कर लिया जाए। कोई खाली सुइट है क्या?"
खन्ना: "छोटे मालिक, आप कैसी बातें कर रहे हैं? मालकिन के लिए तो 'शाही सुइट' हमेशा तैयार रहता है। विकास साहब का खास निर्देश है कि यह कमरा किसी और को न दिया जाए।"
खन्ना ने तुरंत एक गोल्डन कार्ड-की (Key) निकाली और एक वेटर को इशारा किया।
खन्ना: "रामू, मालकिन और सूरज बाबू को 'महाराजा सुइट' में ले जाओ।। मालकिन, आपको किसी भी चीज़ की ज़रूरत हो, बस एक बेल बजाइएगा।"
सोनी और सूरज लिफ्ट से तीसरी मंज़िल पर पहुँचे। 'महाराजा सुइट' का दरवाज़ा खुलते ही सोनी कमरे की साज सज्जा से प्रभावित हो गई। कमरे के भीतर की सजावट किसी महल जैसी थी—मखमली कालीन, विशाल नक्काशीदार पलंग, और हल्की मद्धम पीली रोशनी। लगता था विकास ने इसका रिनोवेशन हाल में ही कराया था।
वेटर पानी रखकर बाहर निकल गया और भारी लकड़ी का दरवाज़ा एक भारी 'क्लिक' के साथ बंद हो गया। अब उस विशाल कमरे में सिर्फ सोनी, सूरज और वह मादक 'अरबी इत्र' की खुशबू थी।
सोनी आईने के सामने जाकर खड़ी हो गई। उसे अपना ही रूप डरा रहा था। सुगना ने उसे जिस 'काम-दीक्षा' के लिए तैयार किया था, वह विकास के लिए थी, लेकिन यहाँ एकांत में उसके सामने सूरज खड़ा था।
होटल के उस आलीशान सुइट में खामोशी इतनी गहरी थी कि सोनी को अपनी ही धड़कनों की आवाज़ साफ़ सुनाई दे रही थी। वह जानती थी कि सूरज की आँखों में जो चमक है, वह महज़ इत्तेफाक नहीं है। अपनी घबराहट को छुपाने के लिए वह तेज़ी से कदम बढ़ाती हुई बेडरूम की ओर चली गई, यह सोचकर कि शायद वहां की ओट उसे सूरज की उन बेधती नज़रों से बचा लेगी।
वह कमरे के विशाल आईने के सामने जाकर ठहर गई। बनारसी साड़ी की चमक मद्धम रोशनी में और भी गहरा उठी थी। सोनी ने अपने गले के हार को छुआ, उसकी उंगलियाँ कांप रही थीं। तभी उसे पीछे से कदमों की आहट सुनाई दी। सूरज कमरे की देहलीज़ पार कर चुका था।
सोनी ने आईने के जरिए ही उसे देखा और संभलते हुए बोली, "सूरज... तू यहाँ क्या कर रहा है? जा, बाहर लिविंग रूम में बैठ। मैं थोड़ा आराम करना चाहती हूँ।"
सूरज ने कोई जवाब नहीं दिया। वह धीरे-धीरे चलकर सोनी के बिल्कुल पीछे आकर खड़ा हो गया। आईने में दोनों का प्रतिबिंब एक साथ दिख रहा था—एक तरफ मर्यादा की बेड़ियों में जकड़ी हुई एक सजी-धजी स्त्री, और दूसरी तरफ अपनी चाहत की आग में जलता हुआ एक नौजवान।
अचानक, सूरज बिना कुछ कहे सोनी के पैरों के पास घुटनों के बल बैठ गया और अपना चेहरा सोनी के नितंबों से सटा दिया। सोनी हकबका गई। वह पलटी और उसने सूरज को अपने घुटने के बल पाया। उसने पीछे हटने की कोशिश की पर सूरज की मजबूत बाहों में उसकी जांघों को घेर लिया।
सूरज (अत्यंत मासूमियत और भर्राई हुई आवाज़ में): "मौसी... आज नियति ने हमें यहाँ पहुँचाया है, तो इसमें मेरी क्या गलती? मैं जानता हूँ यह सब मौसा जी के लिए है, पर मेरी आँखों ने जो प्यास कई दिनों से पाली है, क्या उसे एक पल की शांति भी नहीं मिलेगी? आप बार-बार मुझे दूर भेजती हैं, पर क्या आपका दिल नहीं जानता कि मैं आपको किस नज़र से पूजता हूँ?"
सोनी का गला सूख गया। सूरज की मासूमियत और उसकी बातों का भारीपन उसे पिघलाने लगा था। वह बोली, "सूरज... यह ज़िद छोड़ दे। मैं तेरी मौसी हूँ, और यह श्रृंगार एक पवित्र व्रत के लिए है।"
सूरज ने हिम्मत करके सोनी की रेशमी साड़ी के पल्लू का एक कोना अपने हाथ में लिया और उसे अपने चेहरे से छुआते हुए बोला, "पवित्रता तो मन में होती है मौसी। मैंने आपसे कुछ गलत नहीं मांगा... बस एक बार मुझे उसी रूप में आपके दर्शन करने हैं जिस रूप में आपने मेरा पुरुषत्व जागृत किया था.
सूरज अपनी मजबूत बाहों से सोनी की जांघों को घेरे हुए था और अपना चेहरा सोनी के पेडू से सटाया हुआ था। सूरज की गर्म सांसे सोनी को अपनी मुनिया पर महसूस हो रही थी…जो स्वयं अपने साथी सूरज के लंड को याद कर रही थी।
सूरज छोड़ मुझे साड़ी खराब हो जाएगी…सोनी ने अपनी बेबसी दिखाते हुए कहा…
क्या आप अपने इस लाडले की एक छोटी सी मुराद पूरी नहीं करेंगी? जितना आप कहेंगी उतना ही करूंगा आज आपके अनुपम रूप को .. अपनी आंखों में बसा लूँगा ताकि उम्र भर के लिए मेरा ये अकेलापन दूर हो जाए।"
सोनी की सांसें तेज़ हो गई थीं। सुगना की दी हुई उत्तेजना और अब सूरज का यह समर्पण... उसके भीतर के बांध को तोड़ रहा था। सूरज की उंगलियाँ धीरे-धीरे सोनी को जांघों को सहला रही थीं, जिससे सोनी के बदन में एक सिहरन दौड़ गई।
सोनी ने एक गहरी ठंडी सांस ली और अपनी आँखें मूंद लीं। उसे महसूस हो रहा था कि उसकी 'मुनिया' की गीलापन अब उसकी मर्यादा को चुनौती दे रहा है। उसने कांपते हुए स्वर में कहा, "अपने पाप मे...मुझे भी अपने साथ ले डूबेगा।"
सूरज ने उसकी आँखों में झांका, जहाँ अब इंकार की जगह एक मूक सहमति उभर रही थी। उसने फुसफुसाते हुए कहा, "अगर यह पाप है, तो मुझे मंजूर है मौसी। बस एक बार... आप जो कहेंगी मैं प्रायश्चित कर लूंगा।"
सूरज का यह आग्रह अब एक जिद में तब्दील हो चुका था उसने अपने दांतों से सोने की साड़ी के प्लेट को पकड़ा और धीरे से नीचे खींचा..
सोनी महसूस कर रही थी दोनों के बीच की दीवार साड़ी की प्लेट के साथा ढह रही थी…मर्यादा की मजबूत दीवार ताश के पत्तों की तरह ढहती चली गई और सोनी के बदन पर वह खूबसूरत नीली साड़ी जमींदोज हो गई।
होटल के उस आलीशान सुइट की मद्धम रोशनी में वक्त जैसे ठहर गया था। सोनी अब अपने सामाजिक लिबासों के बोझ से आजाद थी, पर उसकी देह पर टिकी सूरज की नजरों का बोझ उसे और भी ज्यादा भारी महसूस हो रहा था। भारी बनारसी साड़ी अब कालीन पर एक सुनहरे ढेर की तरह पड़ी थी, और सोनी केवल अपने रेशमी पेटीकोट और उस तंग नीले ब्लाउज में सूरज के सामने खड़ी थी।
सोनी के भारी वक्ष, जो नीले ब्लाउज की तंग बंदिशों में कैद थे, उसकी तेज होती धड़कनों के साथ रह-रहकर ऊपर-नीचे हो रहे थे। ब्लाउज की गहरी कटाई से उसकी गोरी छाती पर रची गई मेहंदी की बारीक बेलें साफ झलक रही थीं, जो गर्दन से होती हुई नीचे की गहराइयों में उतर रही थीं।
कमर पर की गई मेहंदी की सजावट अब और भी उजागर हो गई थी बेटी को उन्हें ढकने में नाकाम हो रहा था।
सूरज अभी भी घुटनों के बल बैठा था। उसकी आंखों के ठीक सामने सोनी का वह पेट (कमर) था, जहाँ सुगना ने अपनी ममता और कलाकारी की सारी हदें पार कर दी थीं। नाभि के चारों ओर गहरे लाल रंग का एक चक्र बना था, जिससे निकलती हुई बारीक लकीरें पेटीकोट के नाड़े के भीतर लुप्त हो रही थीं।
सूरज की नजरें उस पेटीकोट की रेशमी डोरी पर टिकी थीं, जो 'महोगनी की गांठ' और उन गुप्त रास्तों की आखिरी पहरेदार थी। पेटीकोट के पतले कपड़े के ऊपर से भी सोनी की सुडौल जांघों का उभार साफ झलक रहा था।
सूरज (धीमी, भर्राई हुई आवाज में):
"मौसी, आज यकीन हो गया कि कुदरत ने आपको फुर्सत में गढ़ा है। यह पेटीकोट की डोरी... यह जैसे उस खजाने का ताला है जिसे खोलने का हक शायद सिर्फ नसीब वालों को मिलता है। . क्या मैं देख सकता हूँ कि अपने उस 'दहलीज' को कैसे सजाया है?"
सोनी का बदन बिजली की तरह कौंध गया। वह जानती थी कि यहाँ से वापस लौटना नामुमकिन है। उसने अपनी कांपती उंगलियों से सूरज के बालों को छुआ और मद्धम स्वर में बोली:
सोनी:"सूरज, तू बहुत जिद्दी है। जा कर ले अपने मन की"
सूरज ने बिना देरी किए, बड़ी कोमलता से पेटीकोट की डोरी को अपने दांत से पकड़ा और जैसे ही उसने गांठ खींची, रेशमी कपड़ा सोनी के गोरे बदन से फिसलता हुआ नीचे गिर गया।
अब सोनी के पास छिपाने के लिए कुछ नहीं बचा था। उसके जांघों के उस संधि स्थल पर, वह 'महोगनी की गांठ' झांक रही थी।, सुगना ने उस पर गहरे लाल रंग का एक 'पूर्ण विकसित कमल' बनाया था। उस कमल की पंखुड़ियां सोनी की रसीली जांघों तक फैली हुई थीं। उस जगह से उठती इत्र, गीली मेहंदी और सोनी के निजी अंगों की प्राकृतिक गंध ने कमरे की हवा को पूरी तरह मादक बना दिया था।
सूरज की आंखें फटी की फटी रह गईं। वह उस नग्न सौंदर्य को देखकर मंत्रमुग्ध था। सोनी की जांघों के बीच की वह 'सुनहरी दरार', जो अब मेहंदी के गहरे रंगों से घिरी हुई थी, उसे किसी पवित्र अनुष्ठान की वेदी जैसी लग रही थी। सोनी ने शर्म से अपनी दोनों बाहें अपने वक्ष पर बांध लीं, पर उसकी नजरों में अब सूरज के लिए एक अनकही प्यास साफ झलक रही थी।
होटल के उस सुइट की मद्धम पीली रोशनी में सोनी अब किसी प्राचीन मंदिर की उस जीवंत प्रतिमा की तरह लग रही थी, जिस पर प्रकृति ने अपना सारा सौंदर्य लुटा दिया हो।
सूरज ने अपने गाल सोनी के पेडू से सटा दूर उसकी गर्म सांसे अब सीधा सोनी की मुनिया पर पड़ रही थी..उत्तेजना चरम पर थी…
सूरज, जो अब तक घुटनों के बल बैठकर उस 'मेहंदी से सजी दहलीज' को निहार रहा था, धीरे-धीरे खड़ा हुआ। उसकी आँखों में वासना से कहीं अधिक एक गहरा भावुक उन्माद था।
जैसे ही वह खड़ा हुआ, उसने बिना एक पल गंवाए सोनी को अपनी मज़बूत बाहों के घेरे में ले लिया। सोनी, जो अब तक केवल अपने ऊपरी अंतर्वस्त्रों और उस नग्न नक्काशी के साथ खड़ी थी, सूरज के स्पर्श से सिहर उठी। सूरज ने अपना चेहरा सोनी के कोमल गालों से सटा दिया। उसके चेहरे की हल्की रगड़ और उसकी गर्म साँसें सोनी की गर्दन पर किसी बिजली के झटके की तरह महसूस हो रही थीं।
सूरज (भरी हुई आवाज़ में): "मौसी... आज मुझे स्वर्ग मिल गया। आप मेरी अप्सरा है आराध्या है आप मेरी इबादत हैं।"
सोनी की बाहें, जो अब तक रक्षात्मक तरीके से उसके वक्ष पर बँधी थीं, धीरे-धीरे ढीली पड़ने लगीं। सूरज के शरीर की गरमी और उसके आलिंगन की कशिश ने सोनी के भीतर की बची-खुची झिझक को पिघला दिया था। वह सूरज के कंधे पर अपना सिर टिकाकर एक लंबी और बेबस सांस छोड़ गई। उसे महसूस हुआ कि सूरज की उंगलियाँ अब उसके नीले ब्लाउज के पीछे लगे हुकों पर बड़ी नजाकत के साथ हरकत कर रही हैं।
सूरज और सोनी की तड़प बढ़ती जा रही थी और नियति घड़ी की सुइयों को रोकने की नाकाम कोशिश कर रही थी..
शेष अगले भाग में…
सुगना की ज़िद के आगे सोनी की एक न चली। आखिरकार, सोनी की धड़कनें तेज हो गई। सोनी उस महँगी बनारसी साड़ी को संभालते हुए बाहर निकली। सूरज पहले ही गाड़ी की सामने वाली सीट का दरवाज़ा खोलकर एक दरबारी की तरह खड़ा था।
जैसे ही सोनी गाड़ी के भीतर बैठी, उसकी देह से उठती इत्र की खुशबू ने गाड़ी के छोटे से केबिन को एक 'कामुक चैम्बर' में बदल दिया। सूरज ने ड्राइवर की सीट संभाली..
सोनी और सूरज की जोड़ी कुछ ही देर में सुगना की नजरों से ओझल हो गई…सुगना ने अनजाने में वह कर दिया था जो शायद सोनी के गर्भवती होने के लिए बेहद जरूरी था
शेष अगले भाग में
गाड़ी हवेली से निकली और बनारस की गलियों के अंधेरे में ओझल हो गई। सोनी खिड़की के बाहर देख रही थी, पर उसे अपने बदन पर पर सूरज की नज़रों की तपिश महसूस हो रही थी। स्टेशन अभी दूर था, और वह 40 मिनट का सफर दोनों के बीच की बची-खुची मर्यादा की कड़ियों को हिलाने वाला था।
गाड़ी के कांच चढ़े हुए थे और भीतर एयर-कंडीशनर की सरसराहट के बीच सोनी के अंगों से उठती इत्र और गीली मेहंदी की तीखी महक ने एक नशीला मायाजाल बुन दिया था।
सूरज ने गाड़ी गियर में डाली, पर उसकी नजरें सड़क से ज्यादा बगल वाली सीट पर बैठी सोनी की जांघों और उभरे हुए वक्ष पर थीं, जो बनारसी साड़ी के भीतर रह-रहकर हलचल पैदा कर रहे थे।
सूरज ने एक गहरी सांस ली और अपनी चुप्पी तोड़ी।
सूरज: "मौसी, माँ ने आपको सजाया है या सीधे किसी अप्सरा लोक से उधार मांगा है? यह जो नीले ब्लाउज के नीचे से लाल मेहंदी की बेलें झांक रही हैं... ये क्या मौसा जी के स्वागत का नक्शा हैं या उन्हें रास्ता भटकाने का इरादा है?"
सोनी ने पहले तो शर्म से नजरें झुका लीं, पर सुगना की रात वाली बातों और अपनी देह में जागती उस मीठी कसक ने उसे भी थोड़ा निडर बना दिया था। उसने अपनी तिरछी नजरों से सूरज को देखा और अपनी साड़ी का पल्लू ठीक किया और बोली..
सोनी (मुस्कुराते हुए): "बड़ा सयाना हो गया है तू सूरज... अपनी मौसी के कपड़ों और मेहंदी का हिसाब रख रहा है? यह श्रृंगार अनुष्ठान के लिए है, और हाँ, अगर तेरे मौसा जी रास्ता भटक भी जाएं, तो उन्हें सही ठिकाने पर लाना मुझे आता है। पर तू बता... गाड़ी चलाने पर ध्यान है या मेरी इन बेलों को गिनने पर?"
सूरज ने अचानक गाड़ी की रफ्तार थोड़ी कम की और अपना बायां हाथ गियर से हटाकर सोनी की सीट के पीछे की तरफ फैला दिया। उसकी उंगलियां सोनी के कंधे को छूते-छूते बची थीं।
सूरज: "गिनना तो तब शुरू करूँगा जब इन्हें छूने की इजाजत मिलेगी। मौसी, कल जब आप रसोई में थीं, तब तो यह सब 'कोरा' था... पर आज …आप कयामत लग रही हैं वैसे यह मेहंदी कहां-कहां लगी है..
सोनी…आज उत्साहित थी और पूरे मूड में थी उसने सूरज को चिढ़ाते हुए कहा…
उन सभी जगह पर जो विकास जी की अमानत है…
सूरज के दिमाग में सोनी का वह नग्न तराशा हुआ बदन घूम गया।
मौसी क्या क्या मेरे लिए कुछ भी नहीं? जिसने मुझे एक नया जीवन दिया क्या मैं उसे देख भी नहीं सकता छू भी नहीं सकता और उसे पूज भी नहीं सकता? सूरज ने अपनी बात बेहद गंभीरता से रख दी सूरज उस महोगनी की गांठ की बात कर रहा था जिसे सोनी बखूबी समझ रही थी।
मौसी उसे दिन आपने मुझे रात में अभी नहीं कहके टाल दिया था आज उत्सव का दिन है और आज आप अप्सरा के रूप में लग रही हैं क्या मेरी ख्वाहिश पूरी नहीं करेंगी।
सोनी का बदन सिहर उठा। उसे वह घटना याद आ गई जब सूरज ने उसे अपने कमरे में खींच लिया था और उनके बीच की नजदीकियां अचानक मिटने वाली थी परंतु सोनी ने हिम्मत करके सूरज को अलग कर दिया था। यह एहसास ही की सूरज उसे कुदरत अवस्था में कुदरत की अनमोल धरोहरों से सजा हुआ देखना चाहता है उसे उत्तेजित कर गया।
सोनी ने एक गहरी और मदहोश कर देने वाली मुस्कान बिखेरी। उसने अपनी आँखों के काजल को आईने में निहारा और फिर सूरज की ओर मुड़कर बोली, "इतनी बेचैनी अच्छी नहीं सूरज। यह श्रृंगार कोई आम दिखावा नहीं है। आज 'संतान सप्तमी' का विशेष व्रत है। तेरी माँ ने यह बेलें सिर्फ सजावट के लिए नहीं, बल्कि एक मन्नत के रूप में मेरे बदन पर उकेरी हैं। यह सब तेरे मौसा जी के स्वागत और कुल के वारिस की कामना के लिए है। सुगना दीदी ने तो अपनी ममता और उम्मीद की सारी कलाकारी आज मुझ पर उतार दी है।"
सूरज के हाथ गियर पर कस गए। उसकी सांसें भारी हो रही थीं। उसने दबी आवाज में कहा, "माँ ने मेहनत तो बहुत की है मौसी, पर इस मेहनत का फल देखने की तड़प मुझे हो रही है। आप बार-बार मौसा जी का नाम ले रही हैं, पर इस वक्त इस बंद गाड़ी में उन बेलों की खुशबू मुझे पागल कर रही है। आपने उस दिन वादा किया था... वो महोगनी की गांठ' दिखाने का। क्या वह भी इसी मेहंदी के जाल में कहीं छिपी है?"
सोनी ने एक लंबी सांस ली। उसे पता था कि वह आग से खेल रही है, पर सुगना की बातों ने उसके भीतर के स्त्रीत्व को जैसे आजाद कर दिया था। उसने सूरज की ओर तिरछी नजरों से देखा, जिसमें झिझक कम और चुनौती ज्यादा थी।
सोनी बोली, "तू अपनी जिद नहीं छोड़ेगा न? देख, यह मर्यादा के खिलाफ है... पर तेरी तड़प देख कर मेरा मन भी पसीज जाता है।"
सूरज ने गाड़ी की रफ्तार और कम कर दी। उसने फुसफुसाते हुए कहा, "सिर्फ एक झलक मौसी... उसे मेहंदी से सजी हुई सुनहरी दहलीज की कल्पना ही मुझे पागल कर रही है।"
पागल है क्या गाड़ी में यह संभव है? सोनी ने सूरज की इच्छा का मान रखते हुए यह बात कह तो दी …सूरज भी निरुत्तर हो गया उसे पता था बनारस की भीड़ भाड़ वाली सड़कों पर अपनी मौसी की जांघों को नग्न कर उस खूबसूरत दहलीज को देखने की कल्पना तो मन में कर सकता था परंतु हकीकत में यह संभव नहीं था।
सूरज मायूस हो गया..
पर सोनी इतनी भी निष्ठुर नहीं थी सूरज के चेहरे पर उदासी उसे अच्छी नहीं लगती थी..
सोनी ने धीरे से अपने कांपते हाथों से बनारसी साड़ी के भारी पल्लू को पकड़ा। उसने सूरज की आँखों में झांका और फिर बड़े ही सलीके और अदा के साथ पल्लू के छोर को थोड़ा ढीला किया। जैसे ही रेशमी कपड़ा सरका, नीले ब्लाउज के भीतर दबी उसकी गोरी काया और उस पर रची लाल गाढ़ी मेहंदी की बारीक नक्काशी सूरज की नजरों के सामने आ गई।
उसने अपने वक्ष के ऊपरी हिस्से को थोड़ा सा उभारते हुए व मेहंदी से सजी बेलें दिखाईं, जो उसकी त्वचा पर किसी कामुक कविता की तरह लिखी गई थीं। सूरज की आँखें फटी की फटी रह गईं; उस नक्काशी ने सोनी की सुंदरता को एक दैवीय और मादक रूप दे दिया था।
सोनी ने तुरंत पल्लू वापस सही किया और अपनी धड़कनों को काबू करते हुए कहा, "देख लिया? अब अपनी नजरें सड़क पर रख और मुझे सही सलामत स्टेशन पहुँचा, वरना यह मोहिनी रूप तुझे यहीं भटका देगा।"
सूरज खामोश था, पर उसके दिमाग में अब सड़क के नक़्शे नहीं, बल्कि सोनी के बदन पर खिंची वह लाल लकीरें घूम रही थीं।
सूरज भली भांति जान चुका था कि आज सोनी का यह सजा धजा रूप उसके मौसा जी के लिए ही है और आज उसकी दाल नहीं गलने वाली परंतु सूरज कामुक हो चुका था उसने अपना जादूई अंगूठा सोनी की तरफ करते हुए कहा..
मौसी अपना जादू एक बार फिर चला दीजिए…आज की रात मुझे कम से कम अपनी कल्पनाओं में आने से मत रोकिए..
सोनी समझ चुकी थी कि सूरज क्या चाह रहा है वो सूरज का अंगूठा सहलाने लगी सूरज के लंड में तनाव भरने लगा। कुछ ही पलों में सूरज ने अपना अंगूठा सोनी की उंगलियों से खींच लिया लंड का तनाव पर्याप्त बढ़ चुका था ज्यादा होने पर वह उसे असहज कर सकता था।
सोनी मुकुराने लगी…सूरज का तना हुआ वह अद्भुत लंड उसकी आंखों के सामने घूमने लगा…उसने सूरज की जांघों पर हाथ रखते हुए कहा..
अब खुश…जा मुन्ना जी ले अपनी जिंदगी….
स्टेशन करीब आ रहा था, पर दोनों के बीच की दूरी अब नाममात्र की रह गई थी। सूरज की नजरें बार-बार सोनी की साड़ी के उस हिस्से पर टिक रही थीं जो उसकी जांघों के जोड़ (महोघनी की गांठ) के पास था, जहाँ सुगना ने कमल का फूल बनाया था।
सोनी को महसूस हो रहा था कि सूरज की बातें उसके भीतर उस 'काम-रस' को फिर से जगा रही हैं जो सुबह पूजा के वक्त शांत था। उसने अपनी टांगें आपस में भींच लीं, जिससे उसकी मुनिया पर आई लार बाहर आने लगी।
स्टेशन आ चुका था । सूरज ने अपना लंड व्यवस्थित किया..एक गहरी आह भरी और गाड़ी को प्लेटफॉर्म के ठीक सामने खड़ा किया। उसने इंजन बंद किया और खिड़की के शीशे नीचे करने से पहले एक बार फिर सोनी की आंखों में झांका।
थैंक यू मौसी मुझे इंतजार रहेगा…
काहे का?
उस सुंदर महोगनी की गांठ के दर्शन का…
हट पागल… अब जा….सोन ने प्यार से उसे कंधे पर हाथ रखकर बाहर धकेलते हुए कहा।
सोनी का दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। उसने जल्दी से अपना पल्लू ठीक किया और चेहरे पर एक मर्यादित मुस्कान ओढ़ ली.
बनारस कैंट पर वहाँ अजीब सी अफरातफरी थी। सोनी गाड़ी में ही बैठी रही, जैसा कि सुगना ने कहा था। सूरज गाड़ी खड़ी करके भीतर पूछताछ के लिए गया।
करीब पंद्रह मिनट बाद जब वह लौटा, तो उसके चेहरे पर एक अजीब सी, रहस्यमयी चमक थी। उसने सोनी की खिड़की के पास आकर झुककर कहा।
सूरज: "मौसी, अनर्थ हो गया। बनारस से कुछ मील पहले एक मालगाड़ी पटरी से उतर गई है। पूरा रूट ब्लॉक है। फूफाजी की ट्रेन 'शिवगंगा एक्सप्रेस' अब रात 10:30 से पहले नहीं आने वाली।"
सोनी का दिल डूब गया। वह इस सजी-धजी अवस्था में स्टेशन के बाहर दो-ढाई घंटे इंतज़ार नहीं कर सकती थी।
सोनी (परेशानी में): "अब क्या होगा सूरज? घर वापस जाकर फिर आना तो बहुत मुश्किल होगा। इतनी भीड़ और ट्रैफिक में दो घंटे बर्बाद हो जाएंगे।"
सूरज इसी मौके की तलाश में था। उसने बड़ी सहानुभूति जताते हुए प्रस्ताव रखा।
सूरज: "मौसी, इतनी घबराहट में सड़क पर खड़े रहना ठीक नहीं। पास ही में अपना 'रेडिएंट होटल' है। आप आराम से बैठिएगा, टाइम पर आ जाएंगे…
सोनी असमंजस में थी। एक तरफ सूरज की वह 'आग' थी जिससे वह दोपहर भर बचती रही थी, और दूसरी तरफ बाहर की भीड़ और उमस। नियति ने उसे फिर से सूरज के हवाले कर दिया था।
सोनी (धीमी आवाज़ में): "ठीक है... चल।"
सूरज ने तुरंत गाड़ी मोड़ दी। बनारस की सड़कों पर ट्रैफिक और उमस के बीच, सूरज ने गाड़ी 'रेडिएंट होटल' की भव्य पोर्च में लगा दी। यह होटल शहर के रसूखदार प्रतिष्ठानों में से एक था, जिसका मालिकाना हक सीधे तौर पर विकास (सोनी के पति) के परिवार के पास था।
जैसे ही गाड़ी रुकी, होटल के दरबान ने लपककर दरवाजा खोला। सोनी अपनी भारी बनारसी साड़ी और गहनों को संभालती हुई बाहर निकली। उसके चेहरे पर एक अजीब सी घबराहट थी, क्योंकि वह पहली बार इस तरह सज-धजकर अपने ही परिवार के होटल में इस वक्त आ रही थी।
होटल के भीतर की ठंडी हवा और मद्धम रोशनी ने बाहर की बेचैनी को थोड़ा कम किया। जैसे ही वे रिसेप्शन डेस्क पर पहुँचे, वहां मौजूद सीनियर रिसेप्शनिस्ट, खन्ना, तुरंत अपनी कुर्सी से खड़ा हो गया। उसने विकास की पत्नी को देखते ही हाथ जोड़कर गहरा अभिवादन किया।
खन्ना (बड़े आदर से): "अरे, मालकिन! प्रणाम। आप अचानक इस वक्त? साहब (विकास जी) भी साथ आए हैं क्या?"
सोनी थोड़ा झेंप गई, उसने अपनी साड़ी का पल्लू ठीक किया। इससे पहले कि वह कुछ बोलती, सूरज ने मोर्चा संभाल लिया।
सूरज (अधिकारपूर्ण स्वर में): "नहीं खन्ना जी, मौसा जी की ट्रेन मालगाड़ी के पलटने की वजह से दो घंटे लेट हो गई है। मौसी को स्टेशन पर रुकने में दिक्कत हो रही थी, इसलिए हमने सोचा कि यहीं रुककर इंतज़ार कर लिया जाए। कोई खाली सुइट है क्या?"
खन्ना: "छोटे मालिक, आप कैसी बातें कर रहे हैं? मालकिन के लिए तो 'शाही सुइट' हमेशा तैयार रहता है। विकास साहब का खास निर्देश है कि यह कमरा किसी और को न दिया जाए।"
खन्ना ने तुरंत एक गोल्डन कार्ड-की (Key) निकाली और एक वेटर को इशारा किया।
खन्ना: "रामू, मालकिन और सूरज बाबू को 'महाराजा सुइट' में ले जाओ।। मालकिन, आपको किसी भी चीज़ की ज़रूरत हो, बस एक बेल बजाइएगा।"
सोनी और सूरज लिफ्ट से तीसरी मंज़िल पर पहुँचे। 'महाराजा सुइट' का दरवाज़ा खुलते ही सोनी कमरे की साज सज्जा से प्रभावित हो गई। कमरे के भीतर की सजावट किसी महल जैसी थी—मखमली कालीन, विशाल नक्काशीदार पलंग, और हल्की मद्धम पीली रोशनी। लगता था विकास ने इसका रिनोवेशन हाल में ही कराया था।
वेटर पानी रखकर बाहर निकल गया और भारी लकड़ी का दरवाज़ा एक भारी 'क्लिक' के साथ बंद हो गया। अब उस विशाल कमरे में सिर्फ सोनी, सूरज और वह मादक 'अरबी इत्र' की खुशबू थी।
सोनी आईने के सामने जाकर खड़ी हो गई। उसे अपना ही रूप डरा रहा था। सुगना ने उसे जिस 'काम-दीक्षा' के लिए तैयार किया था, वह विकास के लिए थी, लेकिन यहाँ एकांत में उसके सामने सूरज खड़ा था।
होटल के उस आलीशान सुइट में खामोशी इतनी गहरी थी कि सोनी को अपनी ही धड़कनों की आवाज़ साफ़ सुनाई दे रही थी। वह जानती थी कि सूरज की आँखों में जो चमक है, वह महज़ इत्तेफाक नहीं है। अपनी घबराहट को छुपाने के लिए वह तेज़ी से कदम बढ़ाती हुई बेडरूम की ओर चली गई, यह सोचकर कि शायद वहां की ओट उसे सूरज की उन बेधती नज़रों से बचा लेगी।
वह कमरे के विशाल आईने के सामने जाकर ठहर गई। बनारसी साड़ी की चमक मद्धम रोशनी में और भी गहरा उठी थी। सोनी ने अपने गले के हार को छुआ, उसकी उंगलियाँ कांप रही थीं। तभी उसे पीछे से कदमों की आहट सुनाई दी। सूरज कमरे की देहलीज़ पार कर चुका था।
सोनी ने आईने के जरिए ही उसे देखा और संभलते हुए बोली, "सूरज... तू यहाँ क्या कर रहा है? जा, बाहर लिविंग रूम में बैठ। मैं थोड़ा आराम करना चाहती हूँ।"
सूरज ने कोई जवाब नहीं दिया। वह धीरे-धीरे चलकर सोनी के बिल्कुल पीछे आकर खड़ा हो गया। आईने में दोनों का प्रतिबिंब एक साथ दिख रहा था—एक तरफ मर्यादा की बेड़ियों में जकड़ी हुई एक सजी-धजी स्त्री, और दूसरी तरफ अपनी चाहत की आग में जलता हुआ एक नौजवान।
अचानक, सूरज बिना कुछ कहे सोनी के पैरों के पास घुटनों के बल बैठ गया और अपना चेहरा सोनी के नितंबों से सटा दिया। सोनी हकबका गई। वह पलटी और उसने सूरज को अपने घुटने के बल पाया। उसने पीछे हटने की कोशिश की पर सूरज की मजबूत बाहों में उसकी जांघों को घेर लिया।
सूरज (अत्यंत मासूमियत और भर्राई हुई आवाज़ में): "मौसी... आज नियति ने हमें यहाँ पहुँचाया है, तो इसमें मेरी क्या गलती? मैं जानता हूँ यह सब मौसा जी के लिए है, पर मेरी आँखों ने जो प्यास कई दिनों से पाली है, क्या उसे एक पल की शांति भी नहीं मिलेगी? आप बार-बार मुझे दूर भेजती हैं, पर क्या आपका दिल नहीं जानता कि मैं आपको किस नज़र से पूजता हूँ?"
सोनी का गला सूख गया। सूरज की मासूमियत और उसकी बातों का भारीपन उसे पिघलाने लगा था। वह बोली, "सूरज... यह ज़िद छोड़ दे। मैं तेरी मौसी हूँ, और यह श्रृंगार एक पवित्र व्रत के लिए है।"
सूरज ने हिम्मत करके सोनी की रेशमी साड़ी के पल्लू का एक कोना अपने हाथ में लिया और उसे अपने चेहरे से छुआते हुए बोला, "पवित्रता तो मन में होती है मौसी। मैंने आपसे कुछ गलत नहीं मांगा... बस एक बार मुझे उसी रूप में आपके दर्शन करने हैं जिस रूप में आपने मेरा पुरुषत्व जागृत किया था.
सूरज अपनी मजबूत बाहों से सोनी की जांघों को घेरे हुए था और अपना चेहरा सोनी के पेडू से सटाया हुआ था। सूरज की गर्म सांसे सोनी को अपनी मुनिया पर महसूस हो रही थी…जो स्वयं अपने साथी सूरज के लंड को याद कर रही थी।
सूरज छोड़ मुझे साड़ी खराब हो जाएगी…सोनी ने अपनी बेबसी दिखाते हुए कहा…
क्या आप अपने इस लाडले की एक छोटी सी मुराद पूरी नहीं करेंगी? जितना आप कहेंगी उतना ही करूंगा आज आपके अनुपम रूप को .. अपनी आंखों में बसा लूँगा ताकि उम्र भर के लिए मेरा ये अकेलापन दूर हो जाए।"
सोनी की सांसें तेज़ हो गई थीं। सुगना की दी हुई उत्तेजना और अब सूरज का यह समर्पण... उसके भीतर के बांध को तोड़ रहा था। सूरज की उंगलियाँ धीरे-धीरे सोनी को जांघों को सहला रही थीं, जिससे सोनी के बदन में एक सिहरन दौड़ गई।
सोनी ने एक गहरी ठंडी सांस ली और अपनी आँखें मूंद लीं। उसे महसूस हो रहा था कि उसकी 'मुनिया' की गीलापन अब उसकी मर्यादा को चुनौती दे रहा है। उसने कांपते हुए स्वर में कहा, "अपने पाप मे...मुझे भी अपने साथ ले डूबेगा।"
सूरज ने उसकी आँखों में झांका, जहाँ अब इंकार की जगह एक मूक सहमति उभर रही थी। उसने फुसफुसाते हुए कहा, "अगर यह पाप है, तो मुझे मंजूर है मौसी। बस एक बार... आप जो कहेंगी मैं प्रायश्चित कर लूंगा।"
सूरज का यह आग्रह अब एक जिद में तब्दील हो चुका था उसने अपने दांतों से सोने की साड़ी के प्लेट को पकड़ा और धीरे से नीचे खींचा..
सोनी महसूस कर रही थी दोनों के बीच की दीवार साड़ी की प्लेट के साथा ढह रही थी…मर्यादा की मजबूत दीवार ताश के पत्तों की तरह ढहती चली गई और सोनी के बदन पर वह खूबसूरत नीली साड़ी जमींदोज हो गई।
होटल के उस आलीशान सुइट की मद्धम रोशनी में वक्त जैसे ठहर गया था। सोनी अब अपने सामाजिक लिबासों के बोझ से आजाद थी, पर उसकी देह पर टिकी सूरज की नजरों का बोझ उसे और भी ज्यादा भारी महसूस हो रहा था। भारी बनारसी साड़ी अब कालीन पर एक सुनहरे ढेर की तरह पड़ी थी, और सोनी केवल अपने रेशमी पेटीकोट और उस तंग नीले ब्लाउज में सूरज के सामने खड़ी थी।
सोनी के भारी वक्ष, जो नीले ब्लाउज की तंग बंदिशों में कैद थे, उसकी तेज होती धड़कनों के साथ रह-रहकर ऊपर-नीचे हो रहे थे। ब्लाउज की गहरी कटाई से उसकी गोरी छाती पर रची गई मेहंदी की बारीक बेलें साफ झलक रही थीं, जो गर्दन से होती हुई नीचे की गहराइयों में उतर रही थीं।
कमर पर की गई मेहंदी की सजावट अब और भी उजागर हो गई थी बेटी को उन्हें ढकने में नाकाम हो रहा था।
सूरज अभी भी घुटनों के बल बैठा था। उसकी आंखों के ठीक सामने सोनी का वह पेट (कमर) था, जहाँ सुगना ने अपनी ममता और कलाकारी की सारी हदें पार कर दी थीं। नाभि के चारों ओर गहरे लाल रंग का एक चक्र बना था, जिससे निकलती हुई बारीक लकीरें पेटीकोट के नाड़े के भीतर लुप्त हो रही थीं।
सूरज की नजरें उस पेटीकोट की रेशमी डोरी पर टिकी थीं, जो 'महोगनी की गांठ' और उन गुप्त रास्तों की आखिरी पहरेदार थी। पेटीकोट के पतले कपड़े के ऊपर से भी सोनी की सुडौल जांघों का उभार साफ झलक रहा था।
सूरज (धीमी, भर्राई हुई आवाज में):
"मौसी, आज यकीन हो गया कि कुदरत ने आपको फुर्सत में गढ़ा है। यह पेटीकोट की डोरी... यह जैसे उस खजाने का ताला है जिसे खोलने का हक शायद सिर्फ नसीब वालों को मिलता है। . क्या मैं देख सकता हूँ कि अपने उस 'दहलीज' को कैसे सजाया है?"
सोनी का बदन बिजली की तरह कौंध गया। वह जानती थी कि यहाँ से वापस लौटना नामुमकिन है। उसने अपनी कांपती उंगलियों से सूरज के बालों को छुआ और मद्धम स्वर में बोली:
सोनी:"सूरज, तू बहुत जिद्दी है। जा कर ले अपने मन की"
सूरज ने बिना देरी किए, बड़ी कोमलता से पेटीकोट की डोरी को अपने दांत से पकड़ा और जैसे ही उसने गांठ खींची, रेशमी कपड़ा सोनी के गोरे बदन से फिसलता हुआ नीचे गिर गया।
अब सोनी के पास छिपाने के लिए कुछ नहीं बचा था। उसके जांघों के उस संधि स्थल पर, वह 'महोगनी की गांठ' झांक रही थी।, सुगना ने उस पर गहरे लाल रंग का एक 'पूर्ण विकसित कमल' बनाया था। उस कमल की पंखुड़ियां सोनी की रसीली जांघों तक फैली हुई थीं। उस जगह से उठती इत्र, गीली मेहंदी और सोनी के निजी अंगों की प्राकृतिक गंध ने कमरे की हवा को पूरी तरह मादक बना दिया था।
सूरज की आंखें फटी की फटी रह गईं। वह उस नग्न सौंदर्य को देखकर मंत्रमुग्ध था। सोनी की जांघों के बीच की वह 'सुनहरी दरार', जो अब मेहंदी के गहरे रंगों से घिरी हुई थी, उसे किसी पवित्र अनुष्ठान की वेदी जैसी लग रही थी। सोनी ने शर्म से अपनी दोनों बाहें अपने वक्ष पर बांध लीं, पर उसकी नजरों में अब सूरज के लिए एक अनकही प्यास साफ झलक रही थी।
होटल के उस सुइट की मद्धम पीली रोशनी में सोनी अब किसी प्राचीन मंदिर की उस जीवंत प्रतिमा की तरह लग रही थी, जिस पर प्रकृति ने अपना सारा सौंदर्य लुटा दिया हो।
सूरज ने अपने गाल सोनी के पेडू से सटा दूर उसकी गर्म सांसे अब सीधा सोनी की मुनिया पर पड़ रही थी..उत्तेजना चरम पर थी…
सूरज, जो अब तक घुटनों के बल बैठकर उस 'मेहंदी से सजी दहलीज' को निहार रहा था, धीरे-धीरे खड़ा हुआ। उसकी आँखों में वासना से कहीं अधिक एक गहरा भावुक उन्माद था।
जैसे ही वह खड़ा हुआ, उसने बिना एक पल गंवाए सोनी को अपनी मज़बूत बाहों के घेरे में ले लिया। सोनी, जो अब तक केवल अपने ऊपरी अंतर्वस्त्रों और उस नग्न नक्काशी के साथ खड़ी थी, सूरज के स्पर्श से सिहर उठी। सूरज ने अपना चेहरा सोनी के कोमल गालों से सटा दिया। उसके चेहरे की हल्की रगड़ और उसकी गर्म साँसें सोनी की गर्दन पर किसी बिजली के झटके की तरह महसूस हो रही थीं।
सूरज (भरी हुई आवाज़ में): "मौसी... आज मुझे स्वर्ग मिल गया। आप मेरी अप्सरा है आराध्या है आप मेरी इबादत हैं।"
सोनी की बाहें, जो अब तक रक्षात्मक तरीके से उसके वक्ष पर बँधी थीं, धीरे-धीरे ढीली पड़ने लगीं। सूरज के शरीर की गरमी और उसके आलिंगन की कशिश ने सोनी के भीतर की बची-खुची झिझक को पिघला दिया था। वह सूरज के कंधे पर अपना सिर टिकाकर एक लंबी और बेबस सांस छोड़ गई। उसे महसूस हुआ कि सूरज की उंगलियाँ अब उसके नीले ब्लाउज के पीछे लगे हुकों पर बड़ी नजाकत के साथ हरकत कर रही हैं।
सूरज और सोनी की तड़प बढ़ती जा रही थी और नियति घड़ी की सुइयों को रोकने की नाकाम कोशिश कर रही थी..
शेष अगले भाग में…