Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता. - Page 134 - SexBaba
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Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता.

भाग 192

जब वे गाड़ी की ओर बढ़े, तो सूरज का अंग पजामे के भीतर अपनी पूरी उग्रता के साथ खड़ा था। सूरज उसी प्रचंड तनाव और अपने पजामे में बन रहे उस 'तम्बू' के साथ ड्राइविंग सीट पर बैठ गया। सामने पहाड़ों का रास्ता था और बगल में विकास, पर सूरज का पूरा ध्यान पीछे बैठी उस 'सूट वाली सुंदरी' पर था जिसकी देह का रस अभी भी उसकी यादों में ताज़ा था। नैनीताल का सफर अब केवल रास्तों का नहीं, बल्कि बेकाबू वासना का होने वाला था।

सोनी तृप्त थी और उसकी मुनिया भी पर. विद्याता ने सोनी विकास और सूरज के बीच संबंधों की नई परिभाषा लिखने की ठान ली थी…

अब आगे..

बीती रात जो संतान सप्तमी की तीसरी रात थी सोनी के गर्भ में एक बार फिर सूरज और विकास दोनों के वीर्य की आहुति हो चुकी थी..

संतान सप्तमी का यह कामुक उत्सव सिर्फ सोनी सूरज और विकास के बीच ही नहीं चल रहा था उधर बनारस में भी वासना अपने पैर पसार रही थी..

सूरज, सोनी और विकास अब नैनीताल की यात्रा पर निकल चुके थे, पर पीछे छोड़ गए थे वह मखमली कमरा, जिसे सुगना और उस घर की बेटियों ने दो रातों को बड़ी हसरतों से सजाया था।

सुगना ने सोनी के निकलने के बाद जब मालती को कमरा लॉक करने और चाबी को नियत स्थान पर रखने का निर्देश दिया, तो मालती के दिमाग में एक 'शरारत' ने जन्म ले लिया। उसने वह चाबी अपनी दरवाजा लाक करने के बाद जींस की तंग जेब में खिसका ली। वह सजे-धजे साटन के बिस्तर का मोह वह छोड़ नहीं पा रही थी। वह जानती थी कि आज रात हवेली में बड़े-बुजुर्ग गहरी नींद में होंगे, वह राजू के साथ अपनी प्यास बुझा पाएगी..

रात के भोजन के पश्चात सब अपने अपने कमरों में जा चुके थे।

मालती ने दबे पाँव छत की ओर रुख किया, जहाँ राजू पहले से ही अँधेरे में उसका इंतज़ार कर रहा था।

मालती (फुसफुसाते हुए): "राजू, आज किस्मत ने हमें वो मौका दिया है जिसकी हमने कभी कल्पना भी नहीं की थी। सोनी मौसी का कमरा... वो साटन की चादर... वो मोगरे की महक... आज सब हमारा है।"

राजू (हैरानी से): "बाकिर मालती, जदि सुगना चाची के पता चल जाई त? बहुत रिस्क बा हो।"

मालती: "कोई रिस्क नहीं है। माँ सो चुकी है। बस चुपचाप मेरे पीछे आ जा..

इधर, सुगना अपने कमरे में लेटी करवटें बदल रही थी। उसके कमरे का पुराना पंखा आज 'चूँ-चूँ' की कर्कश आवाज़ कर रहा था, जो उस शांत रात में किसी डरावनी धुन जैसा लग रहा था। सुगना की आँखों से नींद कोसों दूर थी। उसे अचानक उस सजे-धजे कमरे की याद आई जो अब खाली पड़ा था।

सुगना को ध्यान आया कि सोनी का कमरा आज खाली है क्यों ना आज की रात उसी कमरे में आराम किया जाए कल सुबह जरूर इस पंखे को बनवा लूंगी।

सुगना उठ खड़ी हुई और उस अलमारी की ओर बढ़ी जहाँ चाबियाँ रखी जाती थीं। पर वहाँ चाबी को न देखकर वह ठिठक गई। चाबी गायब थी।

सुगना ने मन ही मन मालती को कोसा। उसे लगा कि उसकी 'आधुनिक' बेटी हमेशा की तरह काम अधूरा छोड़कर कहीं और मशगूल हो गई होगी। पर सुगना हार मानने वालों में से नहीं थी। उसके पास अलमारी में एक 'मास्टर की' भी थी जो हवेली के हर कमरे को खोल सकती थी।

उधर, मालती और राजू दबे पाँव सीढ़ियों से नीचे उतर रहे थे। मालती की जींस की सरसराहट और राजू की तेज़ धड़कनें उस रात के सन्नाटे को चीर रही थीं।

मालती (मन ही मन): "बस एक बार उस साटन के बिस्तर पर राजू के साथ पहुँच जाऊं, फिर ये जींस की बंदिशें और ये डर... सब खत्म हो जाएगा।"

सुगना ने सोनी के कमरे का ताला खोला और भीतर दाखिल हो गई। कमरे की हवा में मोगरे और जैस्मीन का नशा अभी भी बरकरार था। उसने अंदर से आधुनिक शैली का 'नॉब लॉक' घुमाकर उसे फँसा दिया। यह ऐसा लॉक था जिसे अंदर से बस एक बटन दबाकर बंद किया जा सकता था, पर बाहर से इसे चाबी के जरिए खोला जा सकता था।

कमरे की मद्धम लाल और वार्म-व्हाइट रोशनी में साटन की वह मैरून चादर किसी गहरी झील की तरह चमक रही थी। सुगना ने अपनी साड़ी का पल्लू संभाला और नित्य क्रिया के लिए अटैच बाथरूम की ओर बढ़ गई। उसने बाथरूम का दरवाजा पूरी तरह बंद नहीं किया, बस थोड़ा सा सटा दिया।

अभी सुगना हाथ-मुँह धो ही रही थी कि उसे कमरे के मुख्य दरवाजे के हैंडल के घूमने की मद्धम आवाज़ आई। 'क्लिक'—चाबी घूमने की वह परिचित ध्वनि सुगना के कानों में बिजली की तरह कौंधी। वह ठिठक गई। उसने सोचा, "इस वक्त कौन हो सकता है? क्या मालती चाबी लेकर वापस आई है?"

तभी मालती की आवाज आई अरे बाप रे लाइट जलती छूट गई थी यदि मां को मालूम चला तो पक्का डांट पड़ती।

सुगना कोई यकीन हो गया कि यह मालती ही थी।

उसने सावधानी से बाथरूम का दरवाजा थोड़ा और खोला और झरोखे जैसी दरार से कमरे के भीतर झांकने लगी।

मद्धम रोशनी में सुगना की आँखें फटी की फटी रह गईं। वह मालती थी, जो अपनी उसी चुस्त जींस और शर्ट में थी, और उसके साथ राजू था। मालती ने बड़े आत्मविश्वास के साथ पीछे से दरवाजा बंद किया।

राजू (फुसफुसाते हुए): "मालती, जदि यहाँ धरा गइली जा त ज्यान से जाइब। चाची के मालूम चलल त अनर्थ हो जाई।"

मालती (मस्ती में): "अरे तू डर मत, माँ तो अपने कमरे में आराम से सो चुकी होगी। उसे क्या पता कि हम यहाँ 'संतान सप्तमी' का असली उत्सव मनाने आए हैं।"

तू कंडोम तो लाया है ना?

संतान सप्तमी का उत्सव और कंडोम दोनों की बात सुनकर सूचना की रूह कांप गयी। भोजपुरी भाषा में आ रही वह आवाज जानी पहचानी थी सुगना उस अंजान को पहचानने की कोशिश कर रही थी।

तभी मालती ने राजू का हाथ पकड़कर उसे सीधे उस साटन के बिस्तर की ओर खींचा। सुगना ने देखा कि मालती के चेहरे पर डर का नामोनिशान नहीं था, बल्कि वही वासना और अधिकार था जो जो एक कामपिपासु युवती में होता है।

सुगना राजू का यह परिवर्तित रूप देख रही थी जहां मालती खड़ी हिंदी में बात कर रही थी वही राजू अपनी ग्रामीण भाषा भोजपुरी में बात कर रहा था सुगना के लिए यह युगल अनूठा था

बाथरूम की ओट में छिपी सुगना मालती और राजू के बीच बढ़ती नजदीकियां देख रही थी। वह देख रही थी कि उसकी अपनी बेटी, जिसे वह अब तक सिर्फ 'आधुनिक' और 'जिद्दी' समझती थी, वह घर की मर्यादा को तार-तार कर रही थी।

उसने देखा कि राजू ने मालती को पीछे से अपनी बाहों में भर लिया है और उसके हाथ मालती की कमर की उस चुस्त जींस के किनारों को टटोल रहे हैं। मालती ने गर्दन पीछे झुका दी और मोगरे की उन लड़ियों के बीच वह दृश्य बिल्कुल वैसा ही होने जा रहा था, जिसकी कल्पना मालती ने बिस्तर सजाते वक्त की थी।

सुगना पत्थर की मूरत बनी यह सब देख रही थी। एक तरफ उसकी बेटी की बेबाक जवानी थी और दूसरी तरफ उसकी अपनी परवरिश। हवेली के उस सजे-धजे कमरे में अब एक ऐसा खेल शुरू होने वाला था, जिसका गवाह स्वयं विधाता के अलावा सिर्फ 'छिपी हुई' सुगना थी।

हवेली के उस सजे-धजे कमरे में मोगरे की महक अब मालती और राजू की तेज़ होती साँसों के साथ मिलकर और भी भारी हो गई थी। सुगना, जो बाथरूम के दरवाजे की झरोखे जैसी दरार से यह सब देख रही थी, उसका शरीर पसीने से भीग चुका था। उसकी आँखों के सामने उसकी जवान बेटी मालती, जिसकी 5 फुट 7 इंच की सुडौल और छरहरी काया उस चुस्त जींस में किसी नागिन की तरह बलखा रही थी, आज अपनी मर्यादा की सारी सीमाएं लांघने को तैयार थी।

राजू ने पीछे से मालती के पेट पर हाथ रखा और उसकी शर्ट के बटनों को टटोलने लगा। मालती ने अपनी गर्दन पीछे झुकाकर राजू के कंधे पर टिका दी।

मालती (मस्ती भरी आवाज़ में): "राजू... आज देख रही हूँ तेरी उंगलियाँ कांप रही हैं। उस दिन छत पर तो बहुत शेर बन रहा था, आज इस साटन के बिस्तर को देखकर डर गया क्या?"

राजू (मालती के कान के पास भोजपुरी में फुसफुसाते हुए): "डर ई सेज के नईखे मालती, डर त तोहार ई चढ़ल जवानी के बा। ऊपर से ई कमरा... अइसन लागत बा कि हमनी कवनो सरग (स्वर्ग) में आ गइल बानी जा।"

राजू ने धीरे से मालती की शर्ट का पहला बटन खोला। सुगना ने देखा कि शर्ट के भीतर मालती ने कोई अंतःवस्त्र नहीं पहना था, बस उसकी गोरी पीठ और उभरते हुए वक्षों की गोलाई मद्धम रोशनी में चमक उठी। राजू की हथेलियाँ अब मालती के पेट से ऊपर की ओर सरकने लगीं।

मालती: "उम्म... राजू, धीरे नहीं। आज मुझे उस हर एक मोगरे की कली का अहसास चाहिए जो मैंने और सुगना माँ ने यहाँ सजाई है। "

राजू ने अब मालती की शर्ट को उसके कंधों से नीचे सरका दिया। मालती का मादक और गदराया हुआ बदन अब कमर तक नग्न हो चुका था। सुगना की धड़कनें पत्थर की चोट जैसी सुनाई दे रही थीं। उसने देखा कि उसकी बेटी का शरीर किसी तराशी हुई मूरत जैसा था—लम्बी गर्दन, सुडौल कंधे और पूर्णता लिए हुए वक्ष।

राजू अब मालती के सामने आया और उसकी आँखों में देखते हुए उसकी चुस्त जींस के बटन पर हाथ रखा। जींस इतनी टाइट थी कि मालती के पेट की त्वचा और नाभि का गड्ढा साफ उभर रहा था।

राजू (भोजपुरी में): "मालती, ई तोहार जींस कइसन एकदम चपकल (तंग) बा हो... एके उतारे में त आधी रात निकल जाई!"

मालती (शरारत से मुस्कुराते हुए): "तो मेहनत कर न... तुझे क्या लगा था, मालती इतनी आसानी से हाथ आ जाएगी? खींच इसे नीचे।"

राजू ने घुटनों के बल बैठकर मालती की जींस की ज़िप नीचे सरकाई। 'सर्रर्र' की वह आवाज़ सुगना के कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतरी। राजू ने मालती की कमर को पकड़कर उस तंग जींस को नीचे खींचना शुरू किया। मालती ने एक हाथ राजू के सर पर रखा और अपनी लंबी, गोरी और सुडौल टाँगों को एक-एक करके उस जींस की कैद से आज़ाद किया।

अब मालती उस मोगरे से सजे बिस्तर के बीच केवल अपनी छोटी सी पैंटी में खड़ी थी। उसकी लंबी नग्न जाँघें उस मरून चादर के बैकग्राउंड में और भी कामुक लग रही थीं। राजू ने अपनी शर्ट उतार फेंकी; उसका गठीला बदन और उभरते हुए सीने की मांसपेशियां बता रही थीं कि वह भी इस खेल के लिए पूरी तरह तैयार है।

मालती: "आह... राजू, देख हमने कितनी मेहनत से ये बिस्तर बिछाया था। मां को क्या पता था कि उनकी बेटी आज यहाँ 'संतान सप्तमी' की असली पूजा करेगी।"

राजू अब मालती के ऊपर झुक गया और उसके गुलाबी होंठों को अपने कब्ज़े में ले लिया। सुगना बाथरूम के भीतर अपनी साड़ी का पल्लू दाँतों तले दबाए खड़ी थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह बाहर निकलकर इस 'पाप' को रोके, या अपनी ही बेटी के इस प्रचंड यौवन के प्रदर्शन को देखती रहे, जो उसे एक अनजानी उत्तेजना और गहरे अपराधबोध के बीच ले जा रहा था। कमरे में अब मोगरे की महक के साथ-साथ दो जवान शरीरों की गर्मी और भी बढ़ गई थी।

हवेली के उस मखमली सन्नाटे में, सोनी का वह सजा-धजा कमरा अब वासना के एक नए अध्याय का गवाह बन रहा था। सुगना, जो बाथरूम की दरार से यह सब देख रही थी, उसका शरीर पसीने से भीग चुका था। उसकी अपनी बेटी, मालती, आज उसके सामने एक ऐसी स्थिति में थी जिसकी उसने कभी स्वप्न में भी कल्पना नहीं की थी।



हवेली के उस सजे-धजे कमरे में मोगरे की भारी खुशबू अब मालती और राजू की तेज़ होती साँसों के साथ मिलकर और भी मादक हो गई थी। बाथरूम की दरार से झांकती सुगना का शरीर पसीने से भीग चुका था। वह देख रही थी कि मालती, जो उसके पति रतन और उसकी मुंबई वाली पूर्व पत्नी बबीता की संतान थी, आज अपनी रगों में दौड़ रहे उसी 'बार डांसर' माँ के खून का प्रदर्शन कर रही थी। बबीता की वह शोखी और जिस्मानी जादू मालती के 5 फुट 7 इंच के तराशे हुए बदन में जैसे फिर से जी उठा था।सुगना ने अपनी युवावस्था में स्वयं को एक कमसिन और लजीली 'कचनार' की तरह जिया था, जहाँ संभोग एक समर्पण था। पर यहाँ, मालती के रूप में वह एक ऐसी आधुनिक काम-पिपासा देख रही थी जो न केवल बिंदास थी, बल्कि आक्रामक भी थी।राजू अब पूरी तरह नग्न हो चुका था मालती ने अपनी टाँगें मोड़कर राजू को अपनी ओर आने का इशारा किया।मालती (अपनी आँखों में एक अजीब सी ललक लिए): "राजू... क्या देख रहा है? जैसे तूने इसे आज से पहले देखा ही नहीं? आज अपनी और मेरी प्यास जी भर कर बुझा ले।"राजू ने मालती की नाभि के पास अपना चेहरा झुकाया और उसे अपनी जीभ से सहलाने लगा। मालती के मुँह से एक मदहोश सिसकारी निकली और उसने बिस्तर पर बिछी मोगरे की लड़ियों को अपनी मुट्ठियों में भींच लिया।मालती: "आह... हाँ, वहीं... राजू, तेरी ये तड़प मुझे पागल कर रही है। आज इस साटन को हमारे पसीने से भिगो दे।"सुगना ने देखा कि मालती ने खुद आगे बढ़कर राजू के सिर को अपने वक्षों की ओर खींचा। वह अपने बदन के आवेग को छुपाने की कोशिश भी नहीं कर रही थी। उसकी कामुक अदाएं इतनी स्वाभाविक और परिपक्व थीं कि सुगना को अपनी ही परवरिश पर शक होने लगा। मालती का हर अंग जैसे संगीत की लय पर थिरक रहा था।सुगना ने आज कई वर्षों बाद उसे आदमी सत्य को देख रही थी जिसने इस जीवन का सृजन किया है मालती और राजू को इस तरह एक दूसरे में खोया देखकर एक पल के लिए वही अब भूल गई की बिस्तर पर संभोग के लिए आठ और वायु थी उसकी अपनी बेटी है और वह जो देख रही है शायद उसे रोकना चाहिए पर सुखना की सुषुप्त वासना अब जाग चुकी थी…

अपनी वासना के अधीन सुगना उस दृश्य को रोकने की बजाय उसे अपनी आंखें फाड़ कर देख रही थी।



राजू अब मालती के दोनों घुटनों के बीच आ गया था। उसने मालती की लंबी जाँघों को अपने कंधों पर टिकाया, जिससे मालती की 'मुनिया' का वह गुलाबी और कोमल द्वार पूरी तरह उजागर हो गया। सुगना ने देखा कि मालती ने लज्जा का त्याग कर अपनी कमर को थोड़ा ऊपर उठाया ताकि राजू को उसकी गहराई का अंदाज़ा मिल सके।राजू (हाँफते हुए भोजपुरी में): "मालती... तू त सचहूँ कातिल बाड़ू हो। हमके यकीन नईखे होत कि हम सोनी चाची खातिर सजावल ई सेज पर तोके अइसन रगड़े (चोदे) जा तानी।"मालती (तेज़ सांसों के बीच): "तो बातें कम कर और अपना 'काम' शुरू कर। मुझे वो एहसास चाहिए जो इस रात को हमेशा के लिए मेरे जिस्म पर दर्ज कर दे। आ जा राजू... मुझे अपनी जवानी से भर दे!"सुगना का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। मालती का वह बिंदासपन और आवेग देखकर वह सुन्न पड़ गई थी। उसने देखा कि राजू ने एक झटके में मालती के भीतर प्रवेश किया, और मालती की वह चीख, जो दर्द और परम सुख का मिश्रण थी, कमरे की दीवारों से टकराकर सुगना के कानों में गूँज उठी। हवेली के उस पवित्र कमरे में अब एक वर्जित खेल अपनी पूरी तीव्रता के साथ जारी था।सुगना को याद आने लगे अपनी युवावस्था के वे दिन, जब वह इसी तरह छिपकर सोनू और लाली के मिलन को देखा करती थी। उस समय भी वह इसी तरह के द्वंद्व में फंसी रहती थी, पर आज का दृश्य कुछ अलग ही कचोट पैदा कर रहा था। सुगना जानती थी कि मालती उसकी अपनी कोख से नहीं जन्मी थी—वह बार डांसर बबीता और रतन की संतान थी—पर उसका लालन-पालन सुगना ने ही किया था। मालती का अपने मुँहबोले भाई राजू के साथ इस तरह काम-क्रीड़ा में लिप्त होना, समाज की नज़रों में अनर्थ था, पर वासना के इस खेल में समाज और रिश्तों की दीवारें ताश के पत्तों की तरह ढह जाती हैं।

कमरे में राजू और मालती के संभोग की संगीत गूंज रही थी सुगना इस दृश्य को अपनी आंखों से देख रही थी उसे अपनी युवावस्था के दिन याद आ रहे थे जब वह सोनू और लाली को संभोग करते इसी प्रकार देखा करती थी न जाने क्यों उसे यह बुरा नहीं लग रहा था मालती उसकी अपनी पुत्री नहीं थी यह वह भली भांति जानती थी परंतु उसे मालती से ऐसी उम्मीद भी नहीं थी । पर वासना की आग सबको खा जाती है ना रिश्ते नाते सुगना यह बात जानती थी और अपने आंखों के सामने मालती को अपने मुंह बोले भाई राजू से चुदते हुए देख रही थी

हवेली के उस कमरे में मोगरे की भीनी खुशबू अब जिस्मों की भारी महक में तब्दील हो चुकी थी। हवा में कोई वाद्य यंत्र नहीं बज रहा था, फिर भी साटन की चादर पर जिस्मों के टकराने की 'सपाट-सपाट' ध्वनि और मालती की बेकाबू सिसकियाँ एक आदिम संगीत की रचना कर रही थीं। बाथरूम की दरार से सुगना यह सब देख रही थी, और अजीब बात यह थी कि उसके भीतर कोई क्रोध नहीं, बल्कि यादों का एक पुराना झोंका उमड़ रहा था।

सुगना की नज़रें अब मालती की उन फैली हुई जांघों और राजू के उस निरंतर चलते प्रहारों पर जम गई थीं। उसे अहसास हुआ कि वासना की यह आग किसी संस्कार या मर्यादा को नहीं जानती। मालती, जिसे वह कल तक एक बच्ची समझती थी, आज एक पूर्ण कामुक स्त्री बनकर अपने मुँहबोले भाई के पौरुष को अपनी गहराई में समा रही थी।

सुगना सोच रही थी… "रिश्ते? नाते? सब धरे के धरे रह जाते हैं जब खून की गर्मी उबलती है। मालती ने आज वही किया जो उसके खून में था। और मैं... मैं यहाँ खड़ी बस इस आग की लपटों को देख रही हूँ।"

मालती ने एक लंबी और तीखी कराह भरी, उसके पैर राजू की पीठ पर कसते चले गए। सुगना समझ गई कि मालती अब स्खलन की उस दहलीज पर है जहाँ से वापसी मुमकिन नहीं। कमरे में गूँजता वह 'संगीत' अब अपनी चरम सीमा पर था, जहाँ सुगना, मालती और राजू... तीनों ही अलग-अलग तरीकों से उस वर्जित आनंद के भँवर में डूबे हुए थे।

राजू निढल होकर मालती के ऊपर गिर चुका था संभोग के समाप्ति होने के पश्चात सुगना को यह अंदेशा हो गया कि यह प्रेमी युगल बाथरूम में आने की कोशिश करेगा सुगना ने धीरे से बाथरूम का दरवाजा अंदर से बंद कर लिया और चुपचाप खड़ी हो गई जैसा कि उसे अंदेशा था राजू ने बाथरूम का दरवाजा खोलने की कोशिश की और नाकाम रहा उसने बार-बार प्रयास किया और मालती से पूछा यह दरवाजा क्यों नहीं खुल रहा है मालती भी पास आई और उसने भी प्रयास किया पर दरवाजा अंदर से बंद था मालती ने कहा

अरे छोड़ ना राजू अपने कमरे में जाकर कर लेना जहां ज्यादा देर रुकना ठीक नहीं है

दोनों ने जल्दी जल्दी से अपने-अपने कपड़े पहने कुछ देर बाद बेडरूम का दरवाजा लॉक होने की आवाज है और कमरे में एक शांति छा गई…



कमरे में अब सन्नाटा था, लेकिन हवा में अभी भी मालती और राजू के जिस्मों की गर्मी और मोगरे की मसली हुई खुशबू तैर रही थी। सुगना ने कांपते हाथों से बाथरूम का दरवाजा खोला। उसके पैर अभी भी लड़खड़ा रहे थे और दिल की धड़कनें बेकाबू थीं।वह धीरे-धीरे उस साटन के बिस्तर की ओर बढ़ी। उसी मरून चादर पर, जिस पर अब से कुछ देर पहले उसकी अपनी बेटी वासना का आदम खेल खेल रही थी, सुगना सिरहाने पर तकिया रखकर लेट गई। वह चादर अभी भी गरम थी और उस पर मालती के जिस्म की गंध बसी थी। सुगना के दिमाग में रह-रहकर वही दृश्य घूम रहे थे—मालती की नग्न सुडौल जाँघें, उसका वह बिंदासपन और राजू का वह जोश। उन दृश्यों ने सुगना की उस प्यास को जागृत कर दिया था जिसे उसने कई वर्षों से लोक-लाज और मर्यादा की बेड़ियों में जकड़ कर रखा था।सुगना की उंगलियां अब खुद-ब-खुद उसके पेट से नीचे सरकने लगीं। पेटीकोट के नीचे हाथ ले जाते ही उसे अपनी जादुई 'बुर' का अहसास हुआ। वहां पहले से ही इतनी फिसलन और कामुक रस की नमी थी कि वह किसी भी स्पर्श को गहराई तक समाहित करने के लिए आतुर थी। जैसे ही सुगना ने अपने पोरों से अपनी बुर के उस संवेदनशील भागनासे को छुआ, उसके पूरे शरीर में एक करंट सा दौड़ गया।वह अनुभव उतना ही तीव्र और नशीला था, जैसे 12 वर्षों तक लकड़ी के बड़े-बड़े बैरल में सहेज कर रखी गई पुरानी शराब जब पहली बार बाहर आती है, तो उसका नशा सर चढ़कर बोलता है। आज सुगना की वासना जो 12 वर्षों से सुषुप्त थी आज जागृत हो रही थी। सुगना की जाँघें तेज कंपन के साथ कांप रही थीं। उसने अपनी उंगलियों की गति बढ़ाई और अपनी बुर के उस द्वार को सहलाने लगी।उसकी बुर से निकलता हुआ वह गर्म लावा उसकी उंगलियों को भिगो रहा था। अचानक सुगना का पूरा शरीर धनुष की तरह तन गया। उसने अपनी दोनों जाँघों को एक-दूसरे से पूरी मजबूती के साथ भींच लिया। उस तेज खिंचाव और रगड़ के बीच सुगना स्खलित होने लगी। वह चरम सुख, जो उसने कई वर्षों से महसूस नहीं किया था, आज अपनी ही बेटी के संभोग को देख कर प्राप्त हुआ था।सुगना की आँखें कसकर बंद थीं और उसके गले से एक भारी आह निकली। स्खलन के उस क्षण में वह सुध-बुध खो बैठी थी, पर जैसे ही शरीर का वह तूफान शांत हुआ, एक गहरा आत्म-ग्लानि और अपराधबोध उसके मन पर छा गया।सुगना (मन ही मन सिसकते हुए): "हे भगवान! ये मैंने क्या किया? अपनी ही पुत्री के संभोग का आनंद लेकर उत्तेजित होना और फिर उस 'नयन सुख' से खुद को स्खलित करना... क्या यह उचित है? विधाता, इस पाप के लिए मुझे माफ करना।"वह उसी बिस्तर पर पसीने से तर-बतर पड़ी रही। उसकी जाँघें अभी भी रह-रहकर कांप रही थीं। लखनऊ की वह रात जहाँ सोनी और सूरज के मिलन की गवाह बनी थी, वहीं इस हवेली का यह बंद कमरा सुगना के भीतर दफन उस 'सोयी हुई कामुकता' के जागने का गवाह बन गया था।

 
भाग 193

सोनी अपने पति और भांजे के साथ एक नैनीताल की अनोखी यात्रा पर निकल चुकी थी।

गाड़ी जैसे ही पहाड़ों की घुमावदार वादियों में दाखिल हुई, बाहर का तापमान गिर रहा था, पर गाड़ी के भीतर का माहौल किसी सुलगते हुए अंगारे जैसा हो गया था। सूरज ड्राइविंग सीट पर पूरी एकाग्रता दिखाने की कोशिश कर रहा था, लेकिन उसके पजामे के भीतर मचा वह 'तूफान' शांत होने का नाम नहीं ले रहा था। पजामे के कपड़े के ऊपर से ही वह फौलादी उभार इतना स्पष्ट था कि उसे अनदेखा करना अब नामुमकिन था।

सूरज बार-बार बाएं हाथ से गियर बदलता और दाएं हाथ से अपने उस प्रचंड दंड (लंड) को व्यवस्थित करने का प्रयास करता। वह चाहता था कि किसी तरह उस तनाव को जांघों के बीच दबा ले, पर वह योद्धा अपनी पूरी कठोरता के साथ सीधा खड़ा था। बार-बार हाथ नीचे ले जाने की सूरज की इस हरकत ने आखिर बगल में बैठे विकास को मजबूर कर दिया कि वह अपनी नज़र उधर घुमाए।

विकास की नज़र जैसे ही सूरज की जांघों के जोड़ पर पड़ी, उसका दिल एक पल के लिए धड़कना भूल गया। पजामे के ऊपर उभरा वह 'विशाल तम्बू' सूरज की जांघों से शुरू होकर उसकी नाभि की दिशा में किसी पहाड़ की चोटी की तरह तना हुआ था। उसका आकार और मोटाई स्पष्ट थी। विकास ने अपनी पूरी उम्र में किसी पुरुष का ऐसा विकराल और उग्र तनाव नहीं देखा था। वह हक्का-बक्का होकर उस उभार को निहारने लगा।

विकास के मन में विचारों का बवंडर उठ खड़ा हुआ— "इतना भयानक तनाव! क्या जवानी वाकई इतनी ताकतवर होती है? यह लड़का इस हालत में गाड़ी कैसे संभाल रहा है? इसकी धमनियों में खून दौड़ रहा है या कोई खोलता हुआ लावा?"

पिछली सीट पर सोनी बिंदास बैठी हुई थी और बाहर खूबसूरत नजारों का आनंद ले रही थी और रियर व्यू से सूरज उसकी मादक जवानी का सूरज के मन में इस सफर को जितना जल्दी हो सके पूरा करने की लालसा थी उसे पता था होटल में पहुंचते ही उसकी समझदार मौसी कोई ना कोई रास्ता निकाल ही लेगी।

सूरज की जांघों के जोड़ से उठता वह खिंचाव अब असहनीय होता जा रहा था। विकास अभी भी फटी आँखों से उसी 'उभार' को देख रहा था, मानो वह उस शक्ति का अंदाज़ा लगाने की कोशिश कर रहा हो।

पहाड़ों की चढ़ाई तेज़ हो गई थी, पर विकास के दिमाग में अब नैनीताल की वादियां नहीं, बल्कि उसके बगल में बैठा वह 'युवा ज्वालामुखी' घूम रहा था। उसे अहसास होने लगा था कि सुगना ने जिस 'सिंचन' की बात की थी, उसकी असली सामर्थ्य ऐसे ही तने हुए वज्र के भीतर छिपी होती है। गाड़ी की रफ्तार के साथ-साथ वासना का वह मीटर भी अब रेड-लाइन को पार कर चुका था।

पहाड़ों की धुंध और मोड़दार रास्तों के बीच, गाड़ी के भीतर एक अजीब सी खामोशी छा गई थी, जो केवल इंजन की घरघराहट से टूट रही थी। विकास की नज़रें अब भी सूरज की जांघों के बीच उभरे उस 'विशाल पर्वत' पर टिकी थीं। उस प्रचंड उभार ने विकास के अवचेतन मन की उन परतों को कुरेद दिया था, जिन्हें वह समाज के डर से दबाए बैठा था।

सोनी के मन में लंबे और विशाल लंड के प्रति आसक्ति विकास को भली भांति ध्यान थी। यद्यपि सोनी की साउथ अफ्रीका यात्रा को कई वर्ष बीत चुके थे पर अल्बर्ट की छवि न सिर्फ सोनी के मन में अतीत विकास के मन में भी छुपी हुई थी। विकास को अचानक 'अल्बर्ट' की याद आ गई। वह काला, लंबा-तगड़ा नीग्रो, जिसके साथ विकास की सहमति से सोनी ने अपनी कामुकता के सबसे वर्जित प्रयोग किए थे।

विकास को वो रात याद आने लगीं जब वह उसके उकसावे पर सोनी अल्बर्ट के साथ वह अनोखा संभोग किया था। उस समय सोनी का कराहना और अल्बर्ट का वह जंगलीपन विकास को एक अनोखा 'पराया सुख' (Cuckoldry) दे रहा था। अचानक विकास को अपने लिंग में एक तेज तनाव महसूस हुआ हे भगवान यह मुझे क्या हो रहा है जितना ही विकास सोनी को अल्बर्ट की बाहों में देखता उसका लंड उतना ही तेज खड़ा होता..

विकास के अंतर्मन में स्मृतियों का जो लावा फूट रहा था, उसने गाड़ी की ठंडी एसी के बावजूद उसके माथे पर पसीने की बूंदें ला दी थीं। उसकी कल्पना बगल में बैठे सूरज के उस 'विकराल उभार' पर जमी थीं, लेकिन दिमाग के परदे पर बरसों पुरानी वह धुंधली और मादक फिल्म चलने लगी थी, जो साउथ अफ्रीका के उस आलीशान विला में फिल्माई गई थी।

विकास को याद आया अल्बर्ट—वह विशालकाय नीग्रो, जिसकी काली चमकती त्वचा और भारी-भरकम जिस्म किसी सधाए हुए जंगली जानवर जैसा था। विकास को अपनी वह उत्तेजना याद आई, जब उसने पहली बार सोनी और अल्बर्ट का मिलन देखा था।

अल्बर्ट का वह अंग... वह कोई इंसानी अंग नहीं, बल्कि काले पत्थर से तराशा गया कोई प्रहारक अस्त्र लगता था। जब उसने पहली बार सोनी की नाजुक कमर को अपने बड़े-बड़े हाथों में जकड़ा था, तो सोनी किसी गुड़िया की तरह उसके सामने असहाय लग रही थी।

विकास के जेहन में वह आवाज़ आज भी गूंज रही थी—सोनी के गले से निकलने वाली वह चीख, जो आधे दर्द और आधे चरम सुख की थी। अल्बर्ट के हर प्रहार पर सोनी का बदन जिस तरह कमान की तरह मुड़ता था और अल्बर्ट का वह जंगलीपन... उस दृश्य ने विकास के भीतर के भीतर एक अनोखी उत्तेजना को जन्म दिया था।

जितना ज़्यादा सोनी अल्बर्ट के नीचे पिसती थी, विकास का अपना लिंग उतना ही ज़्यादा पत्थर की तरह तन जाता था। उसे सोनी को किसी और की 'शक्ति' के सामने समर्पण करते और तृप्त होते देखना एक अनोखा अनुभव था।

अचानक, विकास की चेतना वर्तमान में लौटीं और बगल में बैठे सूरज के उस पजामे फाड़ते उभार पर टिक गईं। उसके दिमाग ने एक बिजली जैसी कौंध के साथ संबंध स्थापित किया— सूरज का यह उभार, उसकी यह जवानी, उसकी यह कच्ची और प्रचंड शक्ति... यह तो बिल्कुल अल्बर्ट जैसी है! बल्कि उससे भी कहीं ज़्यादा जीवंत और खतरनाक, क्योंकि इसमें 'देसी खून' की गर्मी है।

विकास के लिंग में एक ज़ोरदार टीस उठी। उसका अपना लंड पजामे के भीतर पूरी सख़्ती से खड़ा हो चुका था। उसे खुद पर हैरत हो रही थी कि वह अपने सगे भांजे को देखकर उत्तेजित हो रहा है, पर कामुकता तो तर्क नहीं जानती। उसके मन में एक विचार बिजली की तरह दौड़ा:

"अगर सोनी के पास फिर से वही 'अल्बर्ट वाला सुख' पाने का मौका हो, तो क्या वह सूरज को मना कर पाएगी? और क्या मैं... क्या मैं फिर से उसी मिलन के दर्शन एक सुख' का आनंद ले पाऊंगा?"

विकास को अपनी सोच पर घिन भी आ रही थी और एक अजीब सा रोमांच (Thrill) भी। वह कल्पना करने लगा कि होटल पहुँचते ही अगर वह अल्बर्ट की कहानियाँ फिर से छेड़ दे, तो क्या सोनी का मन सूरज की ओर नहीं भटकेगा? उसे लगा कि सूरज की यह 'विशालता' ही वह चाबी है, जो सोनी के भीतर दबे उस 'पुराने ज्वालामुखी' को फिर से फटने पर मजबूर कर सकती है।

सूरज की जाँघों के बीच की वह धड़कती हुई सख़्ती अब विकास के लिए मात्र एक शारीरिक अंग नहीं रह गई थी, वह उसके लिए 'अल्बर्ट के पुनर्जन्म' का प्रतीक बन गई थी। गाड़ी की खिड़की से टकराती सर्द हवा भी विकास के भीतर की उस आग को ठंडा नहीं कर पा रही थी। वह बार-बार अपनी जगह बदलता, अपने तनाव को छुपाने की कोशिश करता, पर उसकी आँखें बार-बार सूरज के उसी 'पहाड़' की ओर लौट आतीं।

वह समझ चुका था कि 'संतान सप्तमी' का यह अनुष्ठान अब केवल श्रद्धा का विषय नहीं रहा, बल्कि यह उसके अपने 'वर्जित सुख' की पुनरावृत्ति का मंच सज रहा था। विकास का मन अब उस 'काली रात' के साये को सूरज के रूप में वर्तमान में उतारने के लिए बेताब हो उठा था।

विकास की बंद आँखों के पीछे अब अल्बर्ट का चेहरा धुंधला होने लगा और उसकी जगह सूरज के जवान और कसरती बदन ने ले ली।

विकास ने कल्पना की कि इसी चलती गाड़ी में, अगर सूरज स्टीयरिंग छोड़कर पीछे चला जाए... तो क्या होगा? उसने कल्पना की कि सोनी, जो उस चुस्त सलवार-सूट में कयामत लग रही है, अपनी जांघें फैलाकर सूरज के उस 'फौलादी मूसल' का स्वागत कर रही है। विकास के मन में एक दृश्य उभरा—

सूरज का वह प्रचंड दंड, जो अभी पजामे को फाड़ने पर तुला है, सोनी की रेशमी सलवार के भीतर गायब हो रहा है। सोनी दर्द और आनंद के उस मिले-जुले अहसास में चीख रही है और विकास, जो हमेशा से इस 'वर्जित सुख' का प्रेमी रहा है, अपनी पत्नी को अपने ही भतीजे के नीचे पिसते हुए देख रहा है।

विकास ने अपनी वासना के अभिभूत होकर जो यह कल्पना की थी क्या वह हकीकत में संभव था सूरज सोनी का भांजा था और उन दोनों के बीच ऐसा रिश्ता बना लगभग असंभव सा था विकास को खुद अपनी सोच पर अफसोस भी हो रहा था पर कामुकता तो कामुकता है उसका क्या एक बार जब दिमाग में यह बात चढ़ गई तो वह बार-बार उसकी संभावनाएं तलाश में लगा

विकास के मन में चल रहा यह द्वंद्व उस आदिम संघर्ष की तरह था, जहाँ संस्कार और वासना एक-दूसरे के सामने तलवारें खींचकर खड़े थे। एक तरफ वह सामाजिक मर्यादा थी जो चीख-चीख कर कह रही थी कि सूरज और सोनी का रिश्ता 'भांजे और मौसी' का है—एक ऐसा पवित्र बंधन जिसे भारतीय समाज में माँ के समान माना जाता है। दूसरी तरफ, विकास की वह कामुक कल्पना थी जिसने अल्बर्ट वाले दौर के बाद रिश्तों की सीमाओं को धुंधला कर दिया था।

विकास को अपनी सोच पर रह-रहकर ग्लानि भी हो रही थी। वह खुद से सवाल कर रहा था, "क्या मैं पागल हो गया हूँ? सूरज सुगना दीदी का बेटा है... यह कैसे संभव है?" उसे लगा कि अगर सुगना को इसकी भनक भी लगी, तो वह उसे जीवित नहीं छोड़ेगी। समाज की नज़र में यह एक ऐसा 'पाप' था जिसकी कोई माफ़ी नहीं थी।

परंतु, कामुकता का एक कड़वा सच यह भी है कि जब वह दिमाग पर चढ़ती है, तो सबसे पहले तर्क और रिश्तों की बलि चढ़ाती है। विकास के मन में बार-बार सुगना के वे शब्द गूँज रहे थे— 'सिंचन', 'अनुष्ठान', और 'मर्दानगी'। उसे लगने लगा कि क्या सुगना ने खुद भी इसी संभावना की ओर इशारा किया था?

विकास का शैतानी दिमाग अब तर्क ढूँढने लगा

उसने सोचा कि यदि यह 'संतान प्राप्ति' का एक गुप्त धार्मिक अनुष्ठान है, तो इसमें शरीर केवल एक माध्यम है। जैसे नियोग प्रथा में होता था।

नैनीताल में उन्हें कोई जानने वाला नहीं होगा। वहां जो कुछ भी होगा, वह उन तीन लोगों के बीच एक 'गुप्त संधि' बनकर रह जाएगा।

विकास को यह अनुमान भी था कि कुंवारे युवा लड़कों में सेक्स को लेकर बड़ी उत्सुकता होती है हो सकता है कि थोड़ा उकसाने पर सूरज भी वासना के जाल में घिरकर सोनी की बाहों में आ जाए।

विकास अब उस स्थिति में था जहाँ से वापसी का रास्ता बंद हो चुका था। अफसोस और शर्मिंदगी की परतें धीरे-धीरे हट रही थीं और उनकी जगह एक योजना ले रही थी। वह अपनी कल्पनाओं में यह देखने लगा कि वह कैसे इन दोनों को करीब लाएगा। क्या वह खुद ही सूरज को उकसाएगा? या वह सोनी को इस अनोखे और वर्जित मिलन के लिए उकसाएगा?

गाड़ी अब नैनीताल की चढ़ाई चढ़ रही थी। बाहर पहाड़ों की ठंडी हवा थी, पर विकास के भीतर एक अनोखा चलेंगे जाग चुका था।उसे अब सूरज और सोनी के बीच का वह 'असंभव' रिश्ता एक 'चुनौती' लगने लगा था। उसे लगने लगा कि अगर वह इस असंभव को संभव कर पाया, तो उसे वह 'पराया सुख' मिलेगा जो उसने अल्बर्ट के साथ पाया था, पर इस बार इसमें अपनापन और 'कुल की वृद्धि' का तड़का भी होगा।

विकास ने तिरछी नज़र से सूरज के चेहरे को देखा, जहाँ तनाव और थकान के निशान थे। फिर उसने पीछे बैठी सोनी को देखा, जो अपनी सलवार-सूट में किसी कयामत सी सज-धज कर बैठी थी। विकास ने मन ही मन तय कर लिया— "रिश्ते केवल नाम के होते हैं, असली सत्य तो वह भूख है जो आज इन दोनों की आँखों में दिख रही है।" उसने उस 'पाप' को 'पुण्य' का चोला पहनाने की तैयारी शुरू कर दी थी।

अपनी वासना में डूबता उतराता विकास तरह-तरह की कल्पना करता और हर बार उसे जब-जब वह हकीकत का जामा पहनाने की कोशिश करता हुआ मुंह की खाता सूरज और सोनी के बीच अल्बर्ट वाले रिश्ते को लाने के लिए ताना-बाना बुना इतना आसान नहीं था। विकास को क्या पता था कि जिस मिलन की वह भूमिका लिख रहा है वह मिलन एक बार नहीं बारंबार पूर्ण हो चुका है।

वह अपनी बुद्धि पर गुमान कर रहा था कि वह एक 'महान निर्देशक' की तरह इस कामुक नाटक की पटकथा लिख रहा है, जबकि पर्दे के पीछे का खेल तो वह पहले ही हार चुका था।

विकास की मनोदशा उस समय किसी मदहोश जुआरी की तरह थी, जो जीत की उम्मीद में अपनी सबसे कीमती विरासत दांव पर लगाने को तैयार था। वह मन ही मन ऐसे 'दृश्य' गढ़ रहा था, ऐसी 'परिस्थितियाँ' बुन रहा था, जिनसे सूरज और सोनी को एक-दूसरे की बाहों में धकेला जा सके। उसे लग रहा था कि उसे इन दोनों को 'मनाना' होगा, उन्हें 'उकसाना' होगा और शायद 'अल्बर्ट' की कहानियाँ सुनाकर सोनी के भीतर की उस सोई हुई प्यास को फिर से जगाना होगा।

गाड़ी की रफ्तार के साथ विकास की योजनाएं भी परवान चढ़ रही थीं। वह सोच रहा था कि नैनीताल पहुँचते ही वह कोई ऐसा 'संयोग' बनाएगा, जिससे उसे उन दोनों को नग्न देखने का मौका मिले। उसे कहाँ पता था कि सूरज और सोनी भी उतनी ही बेसब्री से उस मोड़ का इंतज़ार कर रहे थे।

नैनीताल के ऊँचे पहाड़ अब सामने दिखने लगे थे। सोनी, जो विकास के ठीक पीछे बैठी थी, उसकी नज़रें भी सूरज की जाँघों के बीच मची उस खलबली पर टिकी थीं। जब-जब सूरज का हाथ उस तड़पते हुए उभार को व्यवस्थित करने के लिए नीचे जाता, सोनी के दिल की धड़कन एक पल के लिए रुक जाती।

सोनी को रह-रहकर सुबह की वह हड़बड़ाहट याद आ रही थी। वह मन ही मन खुद को कोस रही थी— "मैं कितनी लापरवाह हूँ... अपने सुख की मदहोशी में मैं सूरज को इस तड़प में अकेला छोड़ आई।" उसे लग रहा था कि सूरज का यह असहनीय तनाव उसके उसी 'अधूरे कृत्य' का परिणाम है।

एक तरफ उसे इस बात का गहरा अफसोस था, तो दूसरी तरफ वह सूरज के उस विकराल पौरुष को देखकर फिर से मोहित हो रही थी। उसे लग रहा था कि सूरज का यह 'अंग' मात्र मांस का टुकड़ा नहीं, बल्कि उसकी मर्दानगी का वह प्रमाण है जो उसे दुनिया के हर पुरुष से श्रेष्ठ बना रहा था। पर साथ ही, विकास की मौजूदगी और 'भांजा-मौसी' के रिश्ते की दीवार उसे अंदर ही अंदर डरा रही थी।

जब भी सूरज की नज़रें रियर-व्यू मिरर (शीशे) में सोनी से टकरातीं, सोनी की आँखों में एक अजीब सा अपराध बोध (Guilt) साफ़ झलकता। वह अपनी नज़रों से जैसे सूरज से माफ़ी मांग रही थी— "मुझे माफ़ कर दे रे सूरज, मेरी वजह से तू इस हाल में है।"

सूरज, जो दर्द और उत्तेजना की उस बारीक लकीर पर खड़ा था, सोनी की उस तड़प को बखूबी महसूस कर रहा था। वह देख रहा था कि उसकी मौसी की आँखें उसकी इस 'हालत' को देखकर कितनी व्याकुल हैं। सूरज की आँखों में गुस्सा नहीं, बल्कि एक अथाह प्रेम और समर्पण था। वह अपनी नज़रों से सोनी को दिलासा दे रहा था— "मौसी, आप दुखी मत होइए... आपकी ये फिक्र ही मेरे इस दर्द की दवा है।"

उस सफर में उन दोनों के बीच एक ऐसे रिश्ते ने आकार ले लिया था, जो केवल वासना तक सीमित नहीं था। यह एक ऐसा गहरा भावनात्मक जुड़ाव था जहाँ एक का सुख दूसरे की मुस्कान बन जाता था और एक की पीड़ा दूसरे की आँखों में आँसू ले आती थी। सोनी को महसूस हो रहा था कि सूरज का वह तनाव अब उसका अपना दर्द बन चुका है। वह चाहकर भी अपनी नज़रें वहां से हटा नहीं पा रही थी।

आखिरकार विकास ने अपनी योजना को अंजाम देने की सोच ली। नैनीताल पहुंचने से कुछ समय पहले ही वह ड्राइविंग सीट पर आ गया और वह तीनों शहर के सबसे खूबसूरत और महंगे फाइव स्टार होटल में पहुंच गए। विकास ने रिसेप्शन पर जाकर बातचीत की और कुछ ही देर बाद तीनों उसे होटल के सबसे खूबसूरत प्रेसिडेंशियल सूट के दरवाजे के सामने खड़े थे।

नैनीताल का वह प्रेसिडेंशियल सुइट अपनी भव्यता से किसी राजा के महल का अहसास करा रहा था। जैसे ही तीनों भीतर दाखिल हुए, वहां की सजावट और माहौल ने उनकी इंद्रियों को झकझोर दिया। सुइट के भीतर कदम रखते ही ऐसा लगता था मानो किसी ने वासना और विलासिता का एक सुंदर संगम तैयार किया हो।

मुख्य बेडरूम के बीचों-बीच वह विशाल और ऊंचा बिस्तर लगा था, जिस पर बिछी सफेद रेशमी चादरें और उस पर रखे लाल मखमली तकिए किसी भी जोड़े को बाहों में भरने के लिए उकसाने को काफी थे। कमरे की मद्धम पीली रोशनी दीवारों पर लगे चित्रों और नक्काशीदार फर्नीचर पर पड़कर एक मादक सुनहरा अहसास पैदा कर रही थी।

बेडरूम से सटा हुआ बाथरूम अपने आप में एक लग्जरी था। वहां का बाथटब इतना बड़ा था कि दो जिस्म आसानी से उसमें समा सकें। कांच की दीवारों और महंगे मार्बल से बना यह कोना किसी भी गुप्त मिलन को यादगार बनाने के लिए तैयार था।

बाहर का ड्राइंग रूम भी किसी से कम नहीं था। वहां रखा वह खूबसूरत बेड (सोफा-कम-बेड) सूरज के लिए सर्वथा उपयुक्त था। विकास ने बड़ी चतुराई से यह व्यवस्था चुनी थी ताकि सूरज ड्राइंग रूम में रहकर भी उनकी 'पहुँच' में रहे।

ड्राइंग रूम में भी एक अलग बाथरूम था, जिसका अर्थ था कि सूरज को अपनी जरूरतों के लिए बेडरूम में आने की मजबूरी नहीं थी, लेकिन विकास के दिमाग में तो योजना कुछ और ही थी।

दोनों ही कमरों की विशाल कांच की खिड़कियों से नैनीताल की दूधिया वादियां और पहाड़ियों की ओट से झांकती झील साफ दिखाई दे रही थी। बाहर बर्फ की हल्की फुहार गिर रही थी, जो खिड़की के कांच पर धुंध पैदा कर रही थी। कमरे के भीतर की गर्माहट और बाहर की वह बर्फीली ठंड एक अद्भुत विरोधाभास पैदा कर रही थी।

सोनी ने कमरे के कोनों को देखा और उसकी सांसें भारी हो गईं। उसे महसूस हुआ कि यह सुइट किसी साधारण यात्रा के लिए नहीं, बल्कि एक शाही हनीमून के लिए डिजाइन किया गया था। विकास ने भी मुस्कुराते हुए कमरे का मुआयना किया, उसे लगा कि उसकी योजना के लिए इससे बेहतर रंगमंच नहीं मिल सकता था।

विकास (हल्की आवाज़ में): "सोनी, देखो तो... यहाँ की हवाओं में ही नशा है। ऐसा लगता है जैसे हम फिर से अपने पुराने दिनों में लौट आए हैं।"

सोनी ने खिड़की से बाहर देखते हुए सूरज की ओर एक तिरछी नज़र डाली, जो अपना बैग ड्राइंग रूम के बिस्तर पर रख रहा था। उस पीली रोशनी में सूरज का कसरती बदन और उसकी जाँघों के बीच का वह असहनीय तनाव और भी उभर कर दिख रहा था।

नैनीताल की वह पहली रात अब सज चुकी थी। वह आलीशान सुइट अब साक्षी बनने वाला था—एक पति की अजीबोगरीब चाहत का, एक मौसी के अपराध बोध से भरे प्यार का, और एक भांजे के उस 'प्रचंड सिंचन' का जो इस सुइट की मर्यादाओं को लांघने के लिए बेताब था।

नैनीताल की उस बर्फीली शाम में, उस आलीशान प्रेसिडेंशियल सुइट के भीतर नियति अपना खेल रच रही थी। किस्मत देखिए कि इतने महंगे होटल के उस कमरे का टेलीफोन खराब था। विकास, जिसे गरमा-गरम चाय और कुछ ज़रूरी सामान मंगवाना था, चिढ़ गया। उसने सोनी को आवाज़ दी और कहा कि वह रिसेप्शन तक जा रहा है क्योंकि इंटरकॉम काम नहीं कर रहा।

जैसे ही मुख्य दरवाज़ा बंद हुआ और विकास के कदमों की आहट कॉरिडोर में ओझल हुई, पूरे सुइट में एक मादक सन्नाटा पसर गया। सोनी, जो बेडरूम में अपनी सलवार-सूट की नसों को ढीला कर रही थी, तेज़ी से ड्राइंग रूम की ओर लपकी।

उसने बाथरूम के दरवाज़े पर ज़ोर से दस्तक दी।

सोनी (धीमी और हड़बड़ाई आवाज़ में): "सूरज! ओ सूरज... जल्दी बाहर आ, दरवाज़ा खोल!"

सूरज, जो अपने उस प्रचंड तनाव को शांत करने की नाकाम कोशिश कर रहा था, झटके से बाहर आया। उसकी आँखों में वासना की सुर्खी थी।

सोनी (आह भरते हुए): "सूरज... मुझे माफ़ कर दे रे! सुबह विकास जी ने ऐसी हड़बड़ी मचाई कि मैं इसे शांत करना ही भूल गई। पूरा रास्ता तू इस आग में जलता रहा, मैं शीशे में सब देख रही थी।"

सोनी ने बड़ी व्याकुलता से अपना हाथ नीचे बढ़ाया और सूरज के पजामे के ऊपर से ही उस कठोर मूसल (लंड) को अपनी मुट्ठी में जकड़ लिया। स्पर्श पाते ही सूरज का शरीर धनुष की तरह तन गया। उसने सोनी की गर्दन में अपना मुँह गड़ा दिया।

सूरज (हांफते हुए): "मौसी, अब बर्दाश्त नहीं होता। यह पजामा फाड़कर बाहर आने को तड़प रहा है। मौसा जी के आने में अभी वक्त है... एक आहुति अभी दे दी जाए?"

सूरज ने सोनी की सूट के घेरे को ऊपर उठाने की कोशिश की, पर सोनी ने बड़ी चतुराई से उसका हाथ रोक दिया।

सोनी: "नहीं सूरज! ऐसी गलती मत करना। विकास जी बस अभी आते ही होंगे। पकड़े गए तो अनर्थ हो जाएगा। पर सुन... मैं तेरा ये तनाव अभी कम किए देती हूँ। वैसे भी आज की मुख्य आहुति तो सुबह-सुबह हो ही चुकी है, यह तो बस सुबह का बचा हुआ नशा है।"

सोनी वहीं घुटनों के बल बैठ गई। उसने सूरज के पजामे की डोरी ढीली की और उस दिग्गज पौरुष को आज़ाद कर दिया। वह अंग अपनी पूरी लम्बाई और कठोरता के साथ सोनी के चेहरे के सामने लहराने लगा। सोनी ने उसे अपने कोमल हाथों में लिया और बड़ी मादकता से उसे सहलाने लगी।

सोनी ने अपने गीले होठों से उस तने हुए अंग के ऊपरी हिस्से को स्पर्श किया और गुब्बारे की हवा निकल गई…

तभी बाहर कॉरिडोर में किसी के चलने की आवाज़ आई। सोनी बिजली की फुर्ती से खड़ी हुई, सूरज का पजामा ठीक किया और वापस बेडरूम की ओर भाग गई, जबकि सूरज वापस अपने बाथरूम में चला गया।

विकास जब कमरे में दाखिल हुआ, तो उसे लगा कि सब कुछ शांत है पर नायक और नायिका दोनों अपने-अपने बाथरूम में अगले मिलन की तैयारी कर रहे थे।

शेष अगले भाग में

 
भाग 194



आईए अब आपको देहरादून लिए चलते हैं जहां इस कहानी का एक मुख्य पात्र अपनी पढ़ाई पूरी कर इस कामुक दुनिया में वापस आने को तैयार था….

देहरादून की हसीन वादियों में बसा दून स्कूल आज एक अलग ही हलचल का गवाह बना हुआ था। चारों तरफ विदाई के हाथ, गले मिलते दोस्त और घर वापसी की ख़ुशी बिखरी हुई थी। कक्षा 12वीं का रिजल्ट उम्मीदों के मुताबिक शानदार रहा था और अब विद्यार्थियों के सामने भविष्य का खुला आसमान था।

इन्हीं विद्यार्थियों के बीच पिंकी अपनी सहेलियों से विदा लेकर अपने सामान के साथ खड़ी थी। पिंकी, जो अपनी मासूमियत और तेज़ दिमाग के लिए स्कूल में जानी जाती थी, आज कुछ ज़्यादा ही चहक रही थी।

पिंकी की काया अब एक बच्ची की नहीं, बल्कि एक खिलती हुई कली की थी। दून की ठंडी हवाओं ने उसके रंग को और भी निखार दिया था। नीली जींस और सफ़ेद कुर्ती में वह सादगी और आधुनिकता का एक अनूठा संगम लग रही थी।



  • उम्र: लगभा 18 वर्ष।
  • कद: 5 फुट 4 इंच, सुडौल और फुर्तीला बदन।
  • आंखें: बड़ी और शरारती, जिनमें अब अपनी माँ मिलने की बेताबी साफ़ झलक रही थी।
स्कूल के भारी नक्काशीदार गेट से जब पिंकी बाहर निकली, तो वहां मौजूद हर शख्स की नजरें एक पल के लिए ठहर गईं। स्कूल के भीतर की दुनिया और बाहर की दुनिया में जमीन आसमान का अंत था बाहर समाज की कामुक निगाहे पिंकी पर टिक गईं..

पिंकी महज एक छात्रा नहीं, बल्कि साक्षात मोम की गुड़िया सी प्रतीत हो रही थी। उसका रंग इतना साफ और निखरा हुआ था जैसे उसे किसी ने सफेद संगमरमर को तराश कर बनाया हो। चेहरे पर मासूमियत और आंखों में भविष्य की चमक लिए, जब वह अपने दोनों हाथों में दो भारी ब्रीफकेस संभाले बाहर आई, तो उसकी कोमलता और उन भारी बैगों का विरोधाभास उसे और भी गरिमामय बना रहा था।

दून स्कूल के उस ऐतिहासिक गेट के बाहर का नज़ारा भीतर की अनुशासनबद्ध दुनिया से बिलकुल जुदा था। वहां हवा में आज़ादी की महक थी, तो साथ ही समाज के उन भूखे भेड़ियों की नज़रें भी, जो स्कूल से निकलने वाली हर 'कली' को अपनी हवस भरी निगाहों से तौल रहे थे।

पिंकी जैसे ही अपने दो भारी ब्रीफकेस घसीटते हुए बाहर आई, गेट के पास खड़े दो टैक्सी ड्राइवर—करम सिंह और छोटू—की नज़रें उस पर जाकर चिपक गईं। करम सिंह, जिसकी उम्र कोई 35 के पार थी और जिसकी आँखों में हमेशा एक गंदी चमक रहती थी, ने अपनी बीड़ी का धुआं हवा में छोड़ा और कोहनी से छोटू को इशारा किया।

करम सिंह (दांत चियाते हुए): "अबे ओए छोटू... ज़रा दाएं देख। लग रहा है आज दून की वादियों में साक्षात अप्सरा उतर आई है। ये सफ़ेद कुर्ती में जो पटाखा बाहर निकला है, इसे देख कर तो लग रहा है जैसे किसी ने मलाई के गोले पर सिंदूर छिड़क दिया हो।"

छोटू, जो अभी जवान ही हो रहा था, पिंकी की सुडौल काया और जींस में कसी उसकी सुडौल जाँघों को देखकर अपनी राल टपकाने लगा।

छोटू (हवस भरी आवाज़ में): "उस्ताद, ये तो कयामत है! इसकी मासूमियत देख रहे हो? पर जींस के भीतर जो बदन की गोलाई उभर रही है, उसे देख कर तो अच्छे-अच्छों का ईमान डोल जाए। साला, मन कर रहा है कि अभी जाकर इसके ये भारी बैग उठा लूँ और इसे अपनी गाड़ी की पिछली सीट पर बिठाकर सीधे मसूरी के किसी अंधेरे कोने में ले जाऊं।"

करम सिंह: "बैग की बात छोड़ छोटे, तूने इसकी चाल देखी? जब ये ब्रीफकेस खींच रही है, तो इसके कुर्ती के नीचे जो उभार (वक्ष) हिल रहे हैं, वो साले कलेजा चीर रहे हैं। कसम से, अगर ये एक रात के लिए हाथ लग जाए, तो मैं अपनी टैक्सी इसके नाम कर दूँ। देख, जींस कितनी तंग है... साला, रगड़-रगड़ के रंग साफ़ हो गया होगा वहां का।"

छोटू (हँसते हुए): "सही कह रहे हो उस्ताद। ये रईसज़ादों की बेटियां बाहर से जितनी भोली दिखती हैं, अंदर से उतनी ही गरम होती हैं। इसकी आँखें देख रहे हो? शरारत तो कूट-कूट कर भरी है। ऐसी 'मोम की गुड़िया' को तो बिस्तर पर लिटाकर बस घंटों निहारने का मन करता है। और जब ये सिसकारी भरेगी, तो सोचो कैसा समां होगा।"

पिंकी इन सब बातों से बेखबर, अपनी माँ मनोरमा से मिलने की बेताबी में अपनी निगाहें इधर-उधर दौड़ा रही थी। उसे अंदाज़ा भी नहीं था कि उसकी कोमलता और निखरा हुआ रंग उन मनचलों के भीतर वासना का कैसा तेज़ाब घोल रहा था। उन ड्राइवरों की नज़रें पिंकी के हर कदम के साथ उसकी कमर और जाँघों के उभारों का पीछा कर रही थीं, मानो वे उसे अपनी निगाहों से ही निर्वस्त्र कर देना चाहते हों।

देहरादून का यह सफर अब पिंकी के लिए सिर्फ घर वापसी नहीं, बल्कि उस कामुक दुनिया के द्वार खोलने वाला था जिसकी उसे अभी रत्ती भर भी भनक नहीं थी।

तभी गेट के ठीक सामने खड़ी एक चमचमाती एम्बेसडर कार का दरवाजा पूरी ठसक के साथ खुला। सरकारी सुरक्षा गार्ड ने फुर्ती से पीछे का दरवाजा खोला और भीतर से जो महिला बाहर निकली, उन्हें देखकर ऐसा लगा मानो वक्त की रफ्तार थम गई हो।

वे कोई और नहीं, मनोरमा थीं।

प्रिय पाठकों, शायद आपको वह मनोरमा एसडीएम याद होंगी, जिनके सानिध्य में सरयू सिंह कार्य किया करते थे। मनोरमा एक कड़क और प्रभावशाली अधिकारी थीं, लेकिन सरयू सिंह और उनके परिवार से वह भली-भांति परिचित थीं। विशेष रूप से सुगना के व्यक्तित्व ने उन्हें बेहद प्रभावित किया था और वह उसे बड़े आदर और सम्मान की दृष्टि से देखती थीं।

यह वही मनोरमा थीं, जो बनारस महोत्सव के दौरान अपने टेंट में सरयू सिंह से अकस्मात चूद गई थीं। उस रात टेंट के अंधेरे में एक बड़ी गलतफहमी हुई थी—सरयू सिंह ने पीछे से मनोरमा को अपनी बाहों में भर लिया था। उस वक्त उनके जेहन में सिर्फ सुगना का ख्याल था और पूर्व नियोजित कार्यक्रम के अनुसार सुगना को वहां होना था। उन्होंने मनोरमा को सुगना समझकर ही दबोच लिया था। इसका विस्तृत विवरण आप लोग पुराने एपिसोड को दोबारा पढ़ कर देख सकते हैं।

मनोरमा, जो हमेशा अनुशासन और सत्ता के घेरे में रहती थीं, सरयू सिंह के उस प्रचंड और मर्दाना स्पर्श के सामने एक पल में निढाल हो गई थीं। वह भूलवश हुआ मिलन मनोरमा के जीवन की वह याद बन गया, जिसे वह आज भी लखनऊ के अपने आलीशान बंगले में अकेलेपन के क्षणों में महसूस करती हैं।

सरयू सिंह और मनोरमा का वह मिलन, जिसने न केवल मनोरमा की देह को तृप्त किया था, बल्कि उसके जीवन की दिशा ही बदल दी थी। मनोरमा की उस प्यासी कोख ने सरयू सिंह के उस प्रचंड पौरुष और उनकी याद को अपने भीतर गहरे तक संजो लिया था। वह भूलवश हुआ संभोग एक जीवंत बीज बो गया था, जो आज पिंकी के रूप में इस धरा पर खेल रहा था।

मनोरमा के व्यक्तित्व में अब वह पहले वाली झिझक या साधारणपन कहीं नहीं था। अब वे एक उच्च और प्रतिष्ठित सरकारी पद पर आसीन हो चुकी थीं, जिसका तेज उनके चेहरे पर साफ झलक रहा था। खादी की सिल्क साड़ी, सलीके से बंधे बाल और आंखों पर चढ़ा कीमती चश्मा उनकी बौद्धिकता और सत्ता का परिचय दे रहा था। खूबसूरती के मामले में वे आज भी अपनी बेटी को टक्कर दे रही थीं, पर उनकी सुंदरता में अब एक राजसी 'ग्रेस' और रुतबा जुड़ चुका था।

पिंकी ने जैसे ही अपनी माँ को देखा, उसके चेहरे पर एक हजार वाट की मुस्कान खिल उठी।

पिंकी (चहकते हुए): "माँ! आप खुद मुझे लेने आईं?"

मनोरमा (गंभीर पर मधुर स्वर में): "तुम्हारे रिजल्ट की खुशी और घर वापसी का दिन... मैं कैसे नहीं आती पिंकी? चलो, अब तुम्हारी माँ तुम्हें उस दुनिया में वापस ले जा रही है, जहाँ से तुम्हारी असली पहचान शुरू होती है।"

मनोरमा ने आगे बढ़कर अपनी 'संगमरमर की मूरत' को गले से लगा लिया। उस आलिंगन में केवल माँ की ममता नहीं थी, बल्कि एक गौरव भी था। मनोरमा ने पिंकी के माथे को चूमा और गार्ड को इशारा किया कि सामान गाड़ी में रखे।

करम सिंह और छोटू को अपनी औकात याद आ गई.. मनोरमा के साथ है सिक्योरिटी गार्डों को देखकर वह अपनी टैक्सी में छुप गए और नज़रे चुराने लगे उनके लिए पिंकी के आसपास जाना भी अपनी जान से खेलने जैसा था।

एम्बेसडर कार जब दून स्कूल की ढलानों से नीचे उतरने लगी, तो पीछे छूट रही थीं किताबें और हॉस्टल की यादें।

पिंकी एम्बेसडर की पिछली सीट पर मनोरमा के बगल में बैठी थी गाड़ी के भीतर की वातानुकूलित हवा भी उसकी देह से उठने वाली उस भीनी-भीनी 'दूधिया खुशबू' से महक उठी। वह अभी वासना के ककहरे से कोसों दूर थी, लेकिन कुदरत ने उसके बदन को एक ऐसी मादक लिखावट में ढाल दिया था जिसे शब्दों में बांधना मुश्किल था।

उसका रंग किसी ठंडे सफेद संगमरमर की तरह था, जिस पर दून की गुलाबी ठंड ने गालों और उंगलियों के पोरों पर हल्का सा सिंदूरी रंग छिड़क दिया था। पिंकी ने अपनी शालीनता को बनाए रखने के लिए पूरी कोशिश की थी, लेकिन उसकी बढ़ती हुई जवानी उन कपड़ों की सीमाओं को चुनौती दे रही थी।

उभारों का आकर्षण: उसने जो सूती कुर्ती पहनी थी, वह बहुत ढीली नहीं थी। जब वह अपनी माँ से बात करने के लिए थोड़ा झुकती, तो उसके पुष्ट और सुडौल वक्षों का उभार उस कपड़े को भीतर से तान देता। वे अभी कच्चे पर बेहद सलीके से सांचे में ढले हुए मांसल गोले की तरह प्रतीत होते थे, जो उसकी हर सांस के साथ मचल उठते थे।

कमर की लचक: कुर्ती के नीचे से उसकी कमर का वह हिस्सा, जहाँ से वह शुरू होती थी, बहुत ही बारीक और लचीला था। जब वह खिड़की से बाहर देखने के लिए करवट लेती, तो उसकी कमर पर पड़ने वाली हल्की सी सिलवटें उसकी त्वचा की कोमलता का एहसास कराती थीं—मानो कोई मोम की मूरत ज़रा सा छूने पर पिघल जाएगी।

नितंबों का ढलान: सीट पर बैठे होने के कारण उसकी भारी और सुडौल जांघों ने नीली जींस को पूरी तरह भर दिया था। जींस की सिलाई उसके पीछे के उन भरे हुए और गोल नितंबों की बनावट को चाहकर भी छुपा नहीं पा रही थी। वे इतने सख्त और गोल थे कि उनका आकार किसी प्यासे की नज़र को वहीं बांध लेने के लिए काफी था।

गर्दन और कंधे: पिंकी ने अपने बालों को ढीला बांधा था, पर फिर भी कुछ रेशमी लटें उसकी उस लंबी और सुराहीदार गर्दन पर फिसल रही थीं। उसके कंधे इतने चिकने और सफेद थे जैसे उन पर सुबह की पहली ओस जम गई हो। उसके गर्दन के पीछे का वह हिस्सा, जिसे 'नूप' कहते हैं, वहां से उभरती नसों का नीलापन उसकी पवित्रता और कामुकता का एक अजीब संगम पेश कर रहा था।

पिंकी अपनी माँ की बातों में खोई हुई थी, कभी खिलखिलाती तो कभी खिड़की के कांच पर अपनी उंगलियाँ फिराती। उसे इस बात का रत्ती भर भी इल्म नहीं था कि उसकी यह 'अनजान खूबसूरती' अब किसी कली की तरह पूरी तरह चटक चुकी है। वह उस खिलते हुए फूल की तरह थी जिसके पास सुगंध तो बहुत है, पर उसे अभी यह नहीं पता कि भंवरे उसकी इस गंध के पीछे किस हद तक पागल हो सकते हैं।

मनोरमा अपनी बेटी के इस उभरते हुए हुस्न को कनखियों से देख रही थी। उसे अपनी बेटी पर गर्व भी था और शायद वह यह भी महसूस कर रही थी कि अब पिंकी उस उम्र में आ चुकी है जहाँ वह किसी के भी मन में हलचल पैदा कर दे।

देहरादून की पहाड़ियों से नीचे उतरती वह एम्बेसडर कार केवल एक यात्रा पर नहीं थी, बल्कि यह नियति के एक चक्र को पूरा कर रही थी। गाड़ी के भीतर की खामोशी में यादों और उमंगों का एक अनूठा संगम था।

मनोरमा, जो अब सत्ता के शीर्ष पर थीं, अपनी बेटी के निखरे हुए हुस्न को देखकर भावुक हो उठीं। पिंकी के चेहरे पर जब सूरज की रोशनी पड़ती, तो उसकी त्वचा किसी पारभासी कीमती पत्थर की तरह चमक उठती। मनोरमा ने गौर किया कि पिंकी के नक्शों में सरयू सिंह की वह तीक्ष्णता और तेज साफ़ झलक रहा था। उसकी लंबी और सुराहीदार गर्दन, माथे की चौड़ाई और उसकी आँखों में छिपी वह मर्दाना ज़िद—सब कुछ उस रात की याद दिला रहे थे जब सरयू सिंह ने उन्हें अपनी बाहों में भर कर उनके भीतर स्त्रीत्व का एक नया संसार बसा दिया था।

मनोरमा ने पिंकी के रेशमी बालों पर अपना हाथ रखा और बड़े प्यार से सहलाने लगी।

पिंकी अपनी माँ के स्पर्श को महसूस कर उनकी ओर घूमी, जिससे उसकी कुर्ती उसके सुडौल वक्षों पर और भी तन गई। उसकी मुस्कान में जो मासूमियत थी, वह किसी को भी घायल करने के लिए काफी थी।

पिंकी अब भी अपनी ही खूबसूरती से बेखबर थी। वह खिड़की से बाहर भागते पेड़ों को देख रही थी। जब उसने अपना हाथ ऊपर उठाकर अपने बिखरे बालों को संवारा, तो उसकी कुर्ती ऊपर की ओर खिसकी, जिससे उसकी जींस और कुर्ती के बीच से उसकी वह मखमली और सफेद कमर की झलक दिखाई दी। वह त्वचा इतनी साफ और कोमल थी कि मानो कुदरत ने उसे बहुत फुरसत में गढ़ा हो।

सीट पर उसके बैठने के अंदाज़ से उसके पुष्ट नितंबों का उभार जींस को चुनौती दे रहा था। उसकी लंबी और गोरी जांघें, जो जींस के भीतर कसी हुई थीं, उसके पूरे व्यक्तित्व को एक 'एथलेटिक' पर बेहद कामुक रूप दे रही थीं। वह एक ऐसी मूरत थी जिसे देखकर वासना और श्रद्धा, दोनों एक साथ जाग जाएं।

मनोरमा (मंद मुस्कान के साथ): "पिंकी, अब तुम बड़ी हो गई हो। घर पहुँचते ही बहुत कुछ बदलने वाला है। तुम्हारी ये मासूमियत अब दुनिया के सामने एक ढाल बनेगी, या एक चुनौती... यह तो वक्त ही बताएगा।"

पिंकी ने अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से माँ को देखा और उनका हाथ थाम लिया। वह ज्यादा कुछ तो नहीं समझ पाई और बेहद बिंदास तरीके से बोली

जब मेरी मां मेरे साथ है तो मुझे कोई डर नहीं कोई चिंता नहीं…

मनोरमा ने अपनी उंगलियां उसकी बालों से हटाए और उसके गाल को प्यार से सहलाते हुए बोला…. मेरी बच्ची…यह कहते हुए उसके होंठ चुंबन की मुद्रा में आ गए और उसने पिंकी को एक फ्लाइंग किस दे दिया.

कुछ ही देर में मनोरमा और पिंकी एयरपोर्ट के सामने थे जहां से उन्हें लखनऊ वापसी के लिए फ्लाइट पकड़नी थी।

देहरादून एयरपोर्ट का वह दृश्य अपने आप में किसी बड़े घटनाक्रम का संकेत दे रहा था। एक तरफ सत्ता का रसूख था, तो दूसरी तरफ अध्यात्म और जनसैलाब का संगम। मनोरमा की एम्बेसडर कार जब वीआईपी लेन से एंट्रेंस की ओर बढ़ी, तो बाहर का नजारा देखकर मनोरमा की भृकुटियाँ तन गईं।

सुरक्षा गार्ड ने जब बताया कि यह 'परमानंद' का काफिला है, तो मनोरमा के चेहरे पर एक गंभीर विचार कौंध गया।

परमानंद—महज एक नाम नहीं, बल्कि उस विरासत का उत्तराधिकारी था जिसे विद्यानंद ने खड़ा किया था। विद्यानंद, जो दुनिया की नज़रों में एक सिद्ध महात्मा और आश्रम का सर्वेसर्वा था, हकीकत में सरयू सिंह का ही सगा भाई था। सरयू सिंह के परिवार का वह 'तेज' और 'आकर्षण' विद्यानंद की रगों में भी दौड़ रहा था, और वही विरासत अब परमानंद के रूप में सामने थी।

देहरादून एयरपोर्ट का वह कोलाहल जैसे परमानंद के बाहर निकलते ही एक जादुई सन्नाटे में बदल गया। परमानंद का व्यक्तित्व केवल आकर्षक नहीं, बल्कि दिव्य और राजसी था। वह जब अपनी रेशमी धोती और केसरिया कुर्ते में चलता, तो ऐसा लगता मानो किसी प्राचीन गाथा का कोई नायक आधुनिक युग में जीवंत हो उठा हो।

6 फीट की प्रभावशाली लंबाई और तराशा हुआ बलिष्ठ बदन परमानंद की सबसे बड़ी खूबी थी। उसका सीना इतना चौड़ा और मजबूत था कि रेशमी कुर्ते का कपड़ा भी उसके उभारों को छुपाने में नाकाम साबित हो रहा था।

जब वह चलता, तो उसके हाथों की बनावट और बाइसेप्स का कसाव कुर्ते की आधी बाहों से रह-रहकर झांकता था। उसकी कलाई की नसें और मजबूत हथेलियाँ उस पौरुष का परिचय दे रही थीं, जो सरयू सिंह के खानदान की पुश्तैनी निशानी थी।

उसके चेहरे पर वही सरयू सिंह के चिर-परिचित के खानदान का तेज था। तीखी नाक, घनी भौहें और आँखों में एक ऐसी चुंबकीय गहराई थी जो किसी को भी पल भर में अपना कायल बना ले। उसके चेहरे का रुआब ऐसा था कि भीड़ खुद-ब-खुद उसके लिए रास्ता छोड़ देती थी।

उसके कंधे तक आते लंबे, काले और रेशमी बाल धूप में सोने की तरह चमक रहे थे। वे बाल उसकी खूबसूरती में एक 'फरिश्ते' जैसी दिव्यता जोड़ रहे थे। जब पहाड़ों की ठंडी हवा उन बालों को उड़ाती, तो परमानंद का सौंदर्य अपने चरम पर होता।

देहरादून एयरपोर्ट के उस मुख्य प्रवेश द्वार (एंट्रेंस गेट) पर वक्त जैसे एक पल के लिए ठहर गया था। यह केवल एक भौतिक दरवाजा नहीं था, बल्कि दो अलग-अलग दुनियाओं के मिलन का बिंदु था। एक तरफ सत्ता का रसूख लिए मनोरमा और उनकी 'संगमरमर की मूरत' जैसी बेटी पिंकी थी, और दूसरी तरफ जनसैलाब के नायक के रूप में उभरता परमानंद।

जब दोनों पक्ष एक साथ गेट की ओर बढ़े, तो वहां तैनात सुरक्षाकर्मियों के चेहरों पर पसीना आ गया। उनके लिए यह एक बड़ी दुविधा थी—एक तरफ प्रोटोकॉल के अनुसार वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी मनोरमा थीं, जिन्हें प्राथमिकता देना उनका कर्तव्य था, और दूसरी तरफ वह विशाल जनसमूह था जो अपने 'फरिश्ते' परमानंद के लिए किसी भी हद तक जा सकता था।

तभी, वह क्षण आया जब तीनों की निगाहें एक-दूसरे से टकराईं:

परमानंद की दृष्टि: उसने जैसे ही मनोरमा और उनके बगल में खड़ी पिंकी को देखा, उसके चेहरे के तेज में एक नई चमक आ गई। उसकी गहरी और चुंबकीय आँखों ने एक ही पल में पिंकी की उस 'खिलती हुई कली' जैसी काया को भांप लिया। वह अपनी कनखियों से पिंकी की उन मासूम आँखों और उसके सुडौल बदन को निहार रहा था।

पिंकी की हलचल: पिंकी ने जब परमानंद को इतने करीब से देखा, तो उसे अपने बदन में एक सिहरन महसूस हुई। वह ६ फीट का बलिष्ठ युवक, जिसके लंबे बाल उसकी गर्दन पर खेल रहे थे, पिंकी के लिए किसी सपने जैसा था।

इस विषम और तनावपूर्ण स्थिति को भांपते हुए परमानंद ने अपनी शालीनता का परिचय दिया। उसने हाथ के इशारे से अपने समर्थकों को रोका और सुरक्षा गार्डों को संकेत दिया कि वे पहले मनोरमा और पिंकी को आगे जाने दें। उसकी इस अदा में एक ऐसा राजसी रुआब था कि मनोरमा भी एक पल के लिए रुक गईं और उन्होंने हल्की सी मुस्कान के साथ उसे धन्यवाद दिया।

परमानंद ने जब पिंकी की ओर देखा, तो उसकी नज़रों में एक ऐसा 'अधिकार' था जिसने पिंकी के गालों पर सिंदूरी रंग बिखेर दिया।

मनोरमा और पिंकी अब एयरपोर्ट के भीतर प्रवेश कर रही थीं। चेकिंग और सिक्योरिटी की औपचारिकताओं के बीच भी पिंकी का मन वहीं गेट पर अटका हुआ था।

पिंकी के ज़हन में परमानंद की वह बलिष्ठ काया और रेशमी कुर्ते से झांकती उसकी भुजाओं का कसाव एक गहरे प्रभाव की तरह छप चुका था। दून स्कूल की उस मेधावी छात्रा का दिमाग आज पहली बार पढ़ाई से हटकर किसी पुरुष के आकर्षण में उलझ गया था।

वह बार-बार चाहती थी कि एक बार पलटकर उस 'फरिश्ते' को देख ले, पर संकोच और लोक-लाज की बेड़ियाँ उसे रोक रही थीं। उसे अपनी माँ मनोरमा के सामने पलटकर देखना बहुत अजीब लग रहा था।

पिंकी के मन में एक ही बात गूँज रही थी— "क्या वो अब भी मुझे देख रहे होंगे?"

उधर मनोरमा, जो स्वयं सरयू सिंह के उसी खानदान के पौरुष से वाकिफ थीं, अपनी बेटी के चेहरे के बदलते रंगों को देख रही थीं। उन्हें अंदाज़ा हो गया था कि इस 'संयोग' ने पिंकी के भीतर की सोई हुई कामुकता और आकर्षण के बीज को हवा दे दी है।

अब देहरादून पीछे छूट रहा था, लेकिन लखनऊ पहुँचने से पहले ही पिंकी के दिल में परमानंद के नाम की एक अमिट इबारत लिखी जा चुकी थी।

हवाई जहाज़ की छोटी सी खिड़की से बाहर झांकती पिंकी के लिए नीचे की दुनिया किसी खिलौने जैसी लग रही थी। हरी-भरी धरती और रुई के फाहों जैसे बादलों के बीच उसे बार-बार वही छवि दिखाई दे रही थी—वह ६ फीट का बलिष्ठ और तेजस्वी युवा, जिसके लंबे बाल हवा में लहरा रहे थे और जिसकी आँखों में एक अजीब सी कशिश थी।

पिंकी के मन में परमानंद का वह चेहरा किसी अमिट स्याही की तरह छप चुका था। उसे रत्ती भर भी अंदाज़ा नहीं था कि उसकी रगों में जो रक्त दौड़ रहा है, वह उसी तेजस्वी कुल का है जिसका परमानंद हिस्सा है।

पिंकी इस बात से पूरी तरह बेखबर थी कि उसका अस्तित्व सरयू सिंह और मनोरमा के उस 'अकस्मात' और वर्जित मिलन की उपज है। मनोरमा ने इस सत्य को कालकोठरी में बंद कर दिया था, पर नियति ने पिंकी को एक विशेष प्रयोजन के लिए गढ़ा था।

उसे मासूम को क्या पता था कि बनारस की उस कामुक दुनिया में कोई है, जो बड़ी बेसब्री से पिंकी का इंतज़ार कर रहा है। यह इंतज़ार केवल एक मुलाकात का नहीं, बल्कि अपनी मुक्ति और तृप्ति का है।

शेष अगले भाग में

 
भाग 196

विकास (चाय की चुस्की लेते हुए): "देख रहे हो सूरज, तुम्हारी मौसी कैसे घोड़े बेचकर सो रही है? रात की थकान ने इसे बिल्कुल निढाल कर दिया है। वैसे... इस ठंडे मौसम में ऐसी गहरी नींद नसीब वालों को ही मिलती है, है ना?"




विकास की बातों में छिपा वह 'दोहरा अर्थ' सूरज को बेचैन कर रहा था। सूरज का ध्यान अब नैनीताल की वादियों से हटकर पूरी तरह अपनी मौसी के उस मादक बदन पर केंद्रित हो चुका था, जो चादर के भीतर रह-रहकर करवट ले रही थी। विकास ने बड़ी चालाकी से वह मंच तैयार कर दिया था जहाँ अब मौसी और भांजे के बीच की दूरियाँ और भी सिमटने वाली थीं।

अब आगे ..

नैनीताल की वह सुबह अब अपनी मादकता के चरम पर थी। सूरज और विकास सोफे पर बैठकर चाय पी रहे थे और बातें कर रहे थे, तभी बिस्तर पर हलचल हुई। सोनी की नींद खुली और उसने अनजाने में ही एक ऐसी मदहोश कर देने वाली अंगड़ाई ली कि चादर उसके जिस्म से नीचे खिसक गई। उसके गोरे, नग्न कंधे और वक्षों का ऊपरी हिस्सा सुबह की रोशनी में चमक उठा।

जैसे ही उसे अपनी नग्नता और सामने बैठे सूरज और विकास का एहसास हुआ, उसके चेहरे पर शर्म की लाली दौड़ गई। उसने झटके से चादर को अपने गले तक खींच लिया। वह इस समय अपने दो 'आशिकों' के बीच पूरी तरह नग्न, सिर्फ एक सफेद चादर के भीतर कैद थी।

सोनी (हड़बड़ाते हुए): "अरे! ८ बज चुके हैं... मैं तो सोती ही रह गई। आप लोग चाय भी पी रहे हैं और मुझे जगाया तक नहीं?"

उसने अपनी नज़रों को चुराते हुए घड़ी की तरफ देखा और स्थिति को सामान्य करने की कोशिश की।

सोनी: "सूरज, बेटा जा... तू भी जल्दी से तैयार हो जा। नाश्ता करके हमें आज नैनीताल घूमने भी निकलना है। देर हो रही है।"

सूरज ने दबी हुई निगाहों से अपनी मौसी के उस बिखरे हुए हुस्न को देखा और मामा के इशारे पर कमरे से बाहर निकल गया। सूरज के जाते ही सोनी ने चादर को कसकर पकड़ा और विकास की आँखों में आँखें डालते हुए उलाहना दिया।

सोनी: "विकास जी! आप भी न... सूरज को अंदर बुलाने की क्या ज़रूरत थी? मैं यहाँ इस हाल में सो रही थी, उसे कैसा लगा होगा?"

विकास ने अपने दांत दिखाते हुए मुस्कुरा कर बोला अरे इतनी ठंड है कुछ उसे भी तो गर्मी महसूस होनी चाहिए..

सोनी शर्मा गई और बोली आप पूरे पागल हो गए हैं…

नैनीताल की उस मदहोश सुबह में, कमरे के भीतर का तापमान बाहर की बर्फबारी से बिल्कुल उलट था। विकास ने जैसे ही बेडरूम का दरवाज़ा अंदर से बंद किया, कमरे में एक मादक सन्नाटा छा गया। विकास बिस्तर पर सोनी के करीब बैठ गया और चादर के भीतर हाथ डालकर उसके रेशमी बदन को सहलाने लगा।

तभी साइड टेबल पर रखे होटल के लैंडलाइन फोन की घंटी घनघना उठी। विकास ने झल्लाते हुए रिसीवर उठाया पर जैसे ही उसने रिसीवर पर सुगना की आवाज सुनी उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई। उसने उसे सोनी के कान के पास लगा दिया और खुद भी अपने कान सटा दिए.. ताकि वे दोनों बात सुन सकें। दूसरी तरफ से सुगना की आवाज़ गूँजी।

सुगना: "हेलो

सोनी : हा दीदी

सुगना: सोनी! कैसी है मेरी छोटी? नैनीताल की वादियों में विकास जी की गर्मी का मज़ा ले रही है या ठंड से जम गई है?"

सुगना की आवाज़ में वही शरारत थी, जिसमें हक भी था और बेबाकी भी। सोनी ने विकास की ओर देखा, जो इस समय उसकी मुनिया के साथ खेलते हुए बातचीत का आनंद ले रहा था।

सोनी: "अरे दीदी! बाहर तो ठंड है पर विकास जी में तो आग लगी हुई है । विकास जी ने पिछले दिनों में जो रूप दिखाया है, मैंने सालों में नहीं देखा। यकीन मानिए, इस बार की संतान सप्तमी में तो जैसे उनकी कल्पनाओं को पंख लग गए हैं।"

सुगना (हँसते हुए): "वाह! तो विकास जी अब कुछ नया खेल रहे हैं? सच बता, पहाड़ों की इस हवा में उन्होंने क्या अनोखा तजुर्बा कराया? हम बहनों में तो कोई परदा है नहीं, ज़रा मैं भी तो सुनूँ कि विकास जी की कामुकता कहाँ तक जा रही है।"

सोनी: …लगता है आपने इनको भी कुछ घुट्टी पिलाई है तभी आजकल बहकी-बहकी बातें कर रहे हैं।

सुगना: …चल अच्छा ही तो है आखिर उनकी गर्मी का आनंद तो तुझे ही भोगना है वैसे ऐसी क्या अनोखी बात हो गई?

सोनी ने एक लंबी साँस ली और सिसकारी दबाते हुए बोलना जारी रखा।

सोनी: "दीदी, आपको क्या बताऊँ... विकास जी आजकल संभोग के दौरान ऐसी-ऐसी 'वर्जित' बातें करते हैं कि मेरा रोम-रोम सिहर जाता है। वो पुरानी यादों को कुरेदते हैं और ऐसी अनोखी कल्पनाओं का जाल बुनते हैं जो सामान्य समाज में अपवित्र मानी जाती हैं। मुझे कभी-कभी डर लगता है कि कहीं मैं उन वर्जित रास्तों पर खो न जाऊँ।"

सुगना (गंभीर और कामुक स्वर में): "पगली, इसमें डरने वाली क्या बात है? देख सोनी, एक मर्द के मन के भीतर इच्छाओं का अथाह समंदर होता है। कई बार वह ऐसी चीज़ों की कल्पना करता है जो दुनिया की नज़रों में 'वर्जित' होती हैं, लेकिन बिस्तर पर पति-पत्नी के बीच कुछ भी गलत नहीं होता। अगर विकास जी तुझे किसी नए रोमांच की ओर ले जा रहे हैं, तो उसे स्वीकार कर।"

सोनी: "पर दीदी, उनकी कल्पनाएँ बहुत कामुक और अजीब होती हैं... वो किसी पराए पौरुष और अदम्य शक्ति की बातें करते हैं जिसे सुनकर मेरा शरीर तो प्यासा हो जाता है, पर मन कांप जाता है।"

सुगना: " तो बड़े रसिक हैं विकास जी देखने में तो सीधे-साधे लगते हैं पर…सुन सोनी, मर्द की कई इच्छाएं होती हैं और उन्हें पूरा करना ही एक समर्पित स्त्री का कर्तव्य है। कामुकता के उस चरम पर सब कुछ संभव है और सब कुछ पवित्र है। अगर उनकी इन वर्जित बातों से तुझे सुख मिल रहा है और उन्हें आनंद आ रहा है, तो उस सुख को पूरी तरह से जी। एक औरत का शरीर उस प्रचंड शक्ति और समर्पण के लिए ही बना है। तू बस उनकी कल्पनाओं की लहरों पर खुद को छोड़ दे।"

सुगना की इन बातों ने विकास के इरादों को जैसे एक सामाजिक और पारिवारिक स्वीकृति दे दी थी। सुगना को बिल्कुल इल्म नहीं था कि विकास की ये 'वर्जित कल्पनाएँ' असल में किस दिशा में मुड़ रही हैं, लेकिन उसकी बातों ने सोनी के मन के संशय को मिटा दिया था।

सोनी: …अरे थोड़ा तो सब्र कीजिए दीदी हैं फोन पर..

सुगना: …क्या हुआ विकास जी पास में ही है क्या?

सोनी: …हां दीदी इनका मन लगता है रात में भी नहीं भरा सुबह-सुबह ही चालू हो गए हैं..

सुगना: "विकास जी के इस बदले हुए रूप का आनंद ले सोनी। संतान सप्तमी का यह अनुष्ठान तभी सफल होगा जब तेरी आत्मा और शरीर पूरी तरह से समर्पित होंगे। अब फोन रख और विकास जी की उन अनोखी कल्पनाओं में खुद को विसर्जित कर दे।"

सोनी: .. अब आपने कहा है तो करना ही होगा..

दोनों बहनें खिलखिलाकर हँसने लगीं।

सुगना: …मेरा प्यारा सूरज कहां है..?

सोनी:…वह अपने कमरे में तैयार हो रहा होगा बात कराऊं क्या…

सुगना…कोई बात नहीं तू अभी विकास जी का ख्याल रख पर सूरज का भी ध्यान रहना… वह मासूम है अकेला है और एक तू ही है जो उसे अच्छे से समझती है। मैं देख रही हूं कि पिछले कई दिनों से वह तुझे बहुत प्यार करने लगा है क्या जादू किया है तूने उस पर..?

सोनी…सकपका गई.. पर बात संभालते हुए बोली दीदी आप फिक्र मत कीजिए दोपहर में जब बात कीजिएगा खुद ही पूछ लीजिएगा..

सुगना: …ठीक है बाबा, जा अब विकास जी का ध्यान रख…

विकास ने एक विजयी मुस्कान के साथ रिसीवर वापस रखा और सोनी को बिस्तर पर पटक दिया। सुगना की बातों ने अब उस कमरे में वर्जित आनंद की कल्पनाओं पर अपनी मोहर लगा दी थी।

सोनी के फोन रखते ही विकास में ने सूरज के बारे में फिर एक बार बातें छेड़ दी…

विकास (सोनी के कान के पास फुसफुसाते हुए): "उसे कैसा लगा होगा, यह तो तुमने उसकी आँखों में देखा ही होगा सोनी। जब तुम वह अंगड़ाई ले रही थी, तो उसकी नज़रें तुम्हारी गर्दन और उन कंधों पर ऐसे गड़ी थीं जैसे वह तुम्हें वहीं कच्चा चबा जाना चाहता हो।"

सोनी (बनावटी गुस्से से): "छि:! कैसी बातें करते हैं आप। वह बच्चा है, मेरा भांजा है। वह ऐसा क्यों सोचेगा?"

विकास (हँसते हुए और सोनी के स्तनों को चादर के ऊपर से ही दबाते हुए): "बच्चा? सोनी, कल मैंने उसकी जो 'मर्दानगी' देखी है, उसके बाद उसे बच्चा कहना खुद को धोखा देना है। यकीन मानो, जब तुम करवट ले रही थी और तुम्हारा बदन चादर से उभर रहा था, तो सूरज की सांसें तेज हो रही थीं। उसके मन में तुम्हें लेकर जबरदस्त उत्तेजना है, मैं एक मर्द होकर दूसरे मर्द की आंखों की भूख पहचानता हूँ।"

सोनी ने अपना सिर झुका लिया, पर विकास की बातें उसके भीतर एक अजीब सी सनसनी पैदा कर रही थीं। वह विकास का साथ नहीं देना चाहती थी, पर उसका शरीर उन बातों पर प्रतिक्रिया दे रहा था।

सोनी (धीमी आवाज में): "आप जानबूझकर यह सब कर रहे हैं... आप चाहते हैं कि मैं भी वैसा ही सोचूँ जैसा आप सोचते हैं।"

विकास (सोनी की गर्दन चूमते हुए): "मैं सिर्फ सच कह रहा हूँ। क्या तुम्हें महसूस नहीं होता कि जब वह तुम्हें देखता है, तो उसकी नज़रों में एक हवस होती है? वह तुम्हें मौसी नहीं, एक 'मादक औरत' की तरह देख रहा है जिसे वह अपनी बाहों में भरना चाहता है।"

सोनी (उत्तेजित होकर): "अच्छा? और अगर ऐसा है भी, तो आप इतने खुश क्यों हो रहे हैं? आपको बुरा नहीं लगता कि आपका भांजा आपकी पत्नी को वैसी नज़रों से देख रहा है?"

विकास ने सोनी की आँखों में गहराई से देखा और उसके होंठों के करीब आकर बोला, "नहीं सोनी... मुझे बुरा नहीं लगता। बल्कि मुझे तो यह सोचकर और भी मज़ा आता है कि जब वह जवान फौलाद तुम्हें देखेगा, तो वह तुम्हें पाने के लिए किस हद तक तड़पेगा। और मैं चाहता हूँ कि तुम उसकी उस तड़प का मज़ा लो।"

सोनी चुप रही, पर उसके चेहरे की मुस्कान और आँखों की चमक बता रही थी कि विकास ने उसे एक बार फिर उस 'वर्जित' रोमांच की गहराई में धकेल दिया है। वह भले ही मुँह से मना कर रही थी, पर उसके मन में अब सूरज की वह 'कामुक निगाहें' एक मीठी खुजली की तरह घर कर रही थीं।

नैनीताल की वह सुबह अब पूरी तरह से वासना के रंग में रंग चुकी थी। इससे पहले कि सोनी खुद को संभालकर बिस्तर से उठ पाती, विकास ने अपनी बातों के तीखे बाणों से उसके भीतर उत्तेजना का एक और ज्वार पैदा कर दिया। विकास के मन में कल रात की वह 'वर्जित कल्पना' अभी भी किसी अंगारे की तरह सुलग रही थी।

विकास ने अचानक एक झटके के साथ सोनी के बदन से वह सफेद चादर खींच ली। सोनी का धवल, नग्न शरीर सुबह की पहली रोशनी में दूध जैसा सफेद चमक रहा था। विकास की नज़रें तुरंत सोनी की जांघों और उसकी 'मुनिया' के पास टिकीं, जहाँ सूरज के वीर्य की चमक अभी भी स्पष्ट दिखाई दे रही थी। विकास उसे अपना ही अंश मान रहा था, जबकि वह चमक उस 'दूसरी आहुति' की गवाह थी जो सोनी ने रात के एक बजे सूरज के साथ पूर्ण की थी।

विकास (सोनी की जांघों के बीच की गीली चमक को देखते हुए): "अरे वाह सोनी! देखो तो... कल रात के हमारे मिलन के निशान अभी भी तुम्हारी इस कोमल देह पर कायम हैं। लग रहा है जैसे कल रात मैंने तुम्हें वाकई पूरी तरह तृप्त कर दिया था।"

सोनी मन ही मन मुस्कुरा रही थी। उसने कुछ नहीं कहा, बस अपनी हथेलियों से अपनी मुनिया को ढकने की नाकाम कोशिश की। उसे पता था कि वह 'निशान' विकास का नहीं, बल्कि उस जवान ज्वालामुखी का है जिसे उसने कुछ घंटों पहले शांत किया था।

विकास: "ढको मत सोनी... इस मादकता को देखने दो। जब सूरज तुम्हें यहाँ देख रहा था, तो उसकी आँखों में यही प्यास थी।"

विकास अब पूरी तरह कामुक हो चुका था। उसने सोनी की हथेलियों को जबरन हटाकर उसकी जांघों को फैला दिया और उसकी मुनिया के उस संवेदनशील हिस्से को चूमने के लिए अपना चेहरा नीचे ले जाने लगा। सोनी को एक पल के लिए संकोच हुआ; वह नहीं चाहती थी कि विकास उस हिस्से को छुए जहाँ अभी-भी सूरज की ऊर्जा समाई थी। उसने विकास के कंधों को पकड़कर उसे ऊपर खींचने की कोशिश की, पर विकास आज किसी भी नियम को मानने के मूड में नहीं था।

सोनी के पास अब कोई चारा नहीं बचा था। विकास की बातों और उसके स्पर्श ने उसे फिर से उस दहलीज पर खड़ा कर दिया था जहाँ विवेक हार जाता है और शरीर जीत जाता है। उसने विकास को रोका नहीं और उसकी मनोदशा को पढ़ते हुए खुद को उसके हवाले कर दिया।

सोनी ने जितनी पवित्रता और शुद्धता अपने भांजे सूरज के लिए बरती थी (जिसके लिए उसने रात में स्नान किया था), उतनी शुद्धता उसने अपने पति के लिए ज़रूरी नहीं समझी। कारण स्पष्ट था—विकास खुद इस गंदी और मादक स्थिति का आनंद लेना चाहता था। उसे अपनी पत्नी के बदन पर 'कल की थकान' और 'निशान' देखना उत्तेजित कर रहा था।

कुछ ही देर में, विकास सोनी की उस चुदी हुई बुर को एक बार फिर अपने छोटे से अंग से भरने लगा। सोनी बिस्तर पर लेटी छत को निहार रही थी, पर उसके दिमाग में विकास के वे शब्द गूँज रहे थे जो वह हर प्रहार के साथ उसके कान में फुसफुसा रहा था।

विकास (हौले-हौले धक्का मारते हुए): "सोनी... सोचो... सूरज बाहर खड़ा है और वह जानता है कि मैं इस समय तुम्हें अंदर क्या दे रहा हूँ। क्या वह अपनी मौसी की इन सिसकियों को सुनकर खुद को रोक पाएगा?"

सोनी ने आँखें मूँद लीं। वह विकास के साथ संभोग तो कर रही थी, पर उसके मन का केंद्र अब भी सूरज ही था। विकास की हर हरकत, हर बात और हर धक्का उसे उसी दिशा में ले जा रहा था जहाँ सूरज का वह अद्भुत लिंग उसका इंतज़ार कर रहा था। सोनी ने विकास की कमर में अपनी टाँगें कस लीं और उस मादक विचार के साथ खुद को झड़ने दिया कि यह केवल विकास नहीं, बल्कि सूरज की ओर बढ़ने वाला एक और कदम है।

जब यह कामुक सत्र समाप्त हुआ, तो दोनों पसीने से लथपथ निढाल पड़े थे। पर इस बार भी चर्चा का अंत सूरज पर ही हुआ। विकास ने सोनी के गाल चूमते हुए कहा, "आज जब हम घूमने निकलेंगे, तो सूरज की आँखों में देखना सोनी... वह आज तुम्हें और भी ज्यादा हसरत से देखेगा।" सोनी बस मुस्कुरा दी, क्योंकि वह जानती थी कि आज का दिन नैनीताल की वादियों में और भी बड़े 'विस्फोट' लेकर आने वाला है।

नैनीताल की वह सुबह किसी जन्नत से कम नहीं थी। धुंध की हल्की चादर को चीरते हुए सूरज की किरणें झील के पानी पर सुनहरी आभा बिखेर रही थीं। सूरज, सोनी और विकास तीनों नैनीताल की वादियों में सुबह-सुबह भ्रमण के लिए निकले थे। तीनों के बीच हंसी-मजाक का दौर चल रहा था और वे नैनीताल की खूबसूरती व पहाड़ों की ठंडी हवा का आनंद ले रहे थे। सैर के दौरान सोनी की सुंदरता वाकई देखने लायक थी; गुलाबी ठंड के कारण उसके गाल सुर्ख हो रहे थे और फिटिंग वाले कपड़ों में उसका बदन किसी मूरत जैसा लग रहा था। सूरज की नज़रें बार-बार भटककर अपनी मौसी के उस कामुक और सुडौल बदन पर टिक जाती थीं, जिसे वह चाहकर भी नज़रअंदाज़ नहीं कर पा रहा था। विकास यह सब देख रहा था, पर उसके चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान थी।

दोपहर होते-होते जब वे वापस लौटे, तो वादियों की वह मादकता कमरे के भीतर भी सिमट आई। सुइट में सन्नाटा था और बाहर की ठंडी हवा खिड़कियों से टकरा रही थी। विकास और सोनी बिस्तर पर लेटे हुए थे। सोनी दोपहर की एक छोटी सी नींद लेने की कोशिश कर रही थी, पर विकास के मन में चल रहा तूफ़ान थमा नहीं था।

वह रह-रहकर सुबह की उस घटना और सैर के दौरान सूरज की उन प्यासी निगाहों का जिक्र करने लगा। विकास का बार-बार उकसाना आखिरकार अपना काम कर गया। सोनी, जो अब तक खामोश लेटी थी।

विकास उसके बदन से खेलते हुए एक बार फिर सूरज के बारे में कामुक बातें करने लगा।

सोनी अचानक उठकर बैठ गई। उसने बिखरे हुए बालों को पीछे किया और विकास की आँखों में सीधे झांकते हुए उस संजीदगी से सवाल किया जिसने कमरे की शांति को एक भारी तनाव में बदल दिया।

सोनी: "विकास जी, आखिर आप चाहते क्या हैं? अब बस कीजिए यह पहेलियाँ बुझाना और खुलकर बताइए कि आपके मन में क्या चल रहा है।"

विकास एक पल के लिए सकपका गया। उसने उम्मीद नहीं की थी कि आराम के इन पलों में सोनी उसे इतनी सीधे तरीके से कटघरे में खड़ा कर देगी। कुछ देर सन्नाटा रहा, फिर विकास ने धीरे से सोनी के हाथों को अपने हाथों में लिया। उसकी आवाज़ में एक अजीब सा ठहराव और गहराई थी।

विकास (गहरी आवाज़ में): "सोनी... तुम जानती हो कि मेरी मेडिकल रिपोर्ट क्या कहती है। मेरे वीर्य में शुक्राणुओं की कमी एक कड़वा सच है। हम यह 'संतान सप्तमी' का अनुष्ठान कर रहे हैं, पर वैज्ञानिक तरीके से मेरी कोख भरने की संभावना बहुत कम है। मुझे लगता है विधाता ने ही यह संयोग रचा है कि सूरज हमारे साथ यहाँ है।"

सोनी की सांसें थम सी गईं। विकास ने उसकी हथेलियों को सहलाते हुए आगे कहा।

विकास: "उसका वह विशाल और अद्भुत लिंग उसे एक विशेष पौरुष का स्वामी बनाता है। सोनी, यदि तुम मेरा साथ दो... तो इस अनुष्ठान की असली पूर्णाहूति सूरज के साथ संभोग से हो सकती है। हो सकता है, उसका वह प्रचंड और जीवंत वीर्य तुम्हारी कोख में उस नए जीवन का सृजन कर दे जिसके लिए हम तरस रहे हैं।"

सोनी यह सुनकर हतप्रभ रह गई। उसके भीतर एक जबरदस्त द्वंद्व शुरू हो गया। जिस कार्य को वह पिछले चार पांच दिनों से छिपकर, अपनी मर्यादा और विवशता के बीच कर रही थी, आज उसका पति खुद उसे वही 'आहुति' देने के लिए कह रहा था। उसके मन में एक शोर मचा— 'हे भगवान! यह कैसा न्याय है? मेरा पति खुद मुझे अपने ही भांजे की बाहों में सौंपने की बात कर रहा है!'

सोनी का चेहरा भावनाओं के भंवर में फंस गया था। एक तरफ वह पुराना राज था और दूसरी तरफ विकास का यह 'प्रस्ताव' जिसने अब सारे बंधनों को मानसिक रूप से तोड़ दिया था। वह अंदर से कांप उठी, पर उसने खुद को संभाला।

सोनी (धीमी और भारी आवाज़ में): "विकास जी... आपने आज वह बात कह दी है जिसकी कल्पना भी मेरे लिए असंभव थी। मुझे... मुझे सोचने का समय चाहिए। मेरा सर बहुत भारी हो रहा है, मुझे कुछ देर अकेले छोड़ दीजिए।"

सोनी ने करवट ले ली और आँखें मूंद लीं। कमरे की उस दोपहर वाली खामोशी में अब सूरज का वह 'विशाल साया' और गहरा हो गया था। विकास उसे अकेला छोड़कर बाहर चला गया, पर सोनी की बंद आँखों के सामने अब 'संतान सप्तमी' का पांचवां दिन एक नई और वैधानिक कामुकता की ओर बढ़ने को तैयार था। अब उसे छिपना नहीं था, क्योंकि अब यह खेल उसके पति की रजामंदी का हिस्सा बन चुका था।

सोनी ने अपने और सूरज के रिश्ते को एक नया रूप देने की ठान ली पर ठीक वैसे ही जैसे विकास चाहता था। वह अदभुत मिलन जो वह सूरज के साथ घूमती आई थी उसे स्वाभाविक तौर पर घटित होते दिखाना था।

शाम की ढलती रोशनी में नैनीताल का माल रोड किसी सजी हुई दुल्हन की तरह चमक रहा था। ठंडी हवाओं के बीच सूरज, सोनी और विकास एक बार फिर सैर पर निकले। माल रोड की एक आलीशान दुकान पर विकास की नजर एक बेहद खूबसूरत और पारभासी नाइटी पर पड़ी। विकास ने बिना देर किए वह नाइटी सोनी के लिए खरीद ली। सोनी ने उसे हाथ में तो ले लिया, पर उसके दिमाग में अभी भी दोपहर वाली विकास की बातें किसी चक्रवात की तरह घूम रही थीं।

वह मन ही मन तरह-तरह की संभावनाओं पर विचार कर रही थी। एक तरफ उसका पति था जो खुद उसे आगे बढ़ा रहा था, और दूसरी तरफ उसका वह जवान भांजा जिसका पौरुष किसी ज्वालामुखी जैसा था। आखिरकार, मॉल रोड की भीड़ और वादियों की मादकता के बीच उसने अपना मन बना लिया—इस 'कामुक अनुष्ठान' को अब एक निर्णायक मोड़ देना ही होगा।

रात को डिनर के बाद, होटल के सुइट में माहौल बिल्कुल बदल चुका था। सोनी ने वही मादक नाइटी पहनी, जो उसके बदन के हर उतार-चढ़ाव को बड़ी बेरहमी से नुमायां कर रही थी। बेडरूम की बड़ी टीवी पर एक सुंदर फिल्म शुरू हुई, जो इत्तेफाक से सूरज की पसंदीदा थी।

सोनी (कमरे से आवाज देते हुए): "सूरज! आजा बेटा... देख तेरी फेवरेट फिल्म चल रही है, साथ मिलकर देखते हैं।"

सोनी इस मादक नाइटी में थी सूरज के कमरे में आने से पहले उसने लिखा ओढ़ लिया और सिरहाने सर लगा कर बैठ गई।

सूरज दअंदर आया और सोनी के बिस्तर के बगल में लगे सोफे पर बैठ गया, पर विकास ने बड़ी सहजता से उसे इशारा किया।

विकास: "अरे वहाँ क्यों खड़ा है? यहाँ बिस्तर पर आराम से टेक लगाकर बैठ जा, साथ में फिल्म का मजा लेंगे।"

सोनी की रूह कांप गई। लिहाफ के अंदर लगभग नग्न थी। उसकी मादक जांघें नाइटी से बाहर थी उसने अपने हाथ से नाइटी को नीचे खिसकाकर उसे ढकने की कोशिश की पर नाकाम रही।

सूरज बिस्तर पर आ चुका था…उसने बरमूडा पहना हुआ था।

बिस्तर का भूगोल अब किसी गहरी साजिश का हिस्सा लग रहा था। एक तरफ विकास, बीच में सोनी और दूसरी तरफ सूरज। तीनों ने बिस्तर के सिरहाने (Headboard) पर अपने सिर टिकाए और फिल्म देखने लगे। बिस्तर के खूबसूरत लिहाफ ने तीनों के कामुक बदनों को ढक लिया था। पर आग सुलग रही थी।



शेष अगले भाग में
 
मेरे प्रिय पाठकों,

जिन्होंने भी नए अपडेट की मांग की थी, मैंने उन तक इसे पहुँचा दिया है।हर बार अपडेट देने के बाद आप सबकी यह मुकम्मल खामोशी मुझे निराश करती है।

मैं कई बार कह चुका हूँ कि एक लेखक अकेले कहानी नहीं लिखता, पाठक का सहयोग ही उसकी कलम की ताकत होता है। अगर आप पढ़कर भी कुछ नहीं कहेंगे, तो मुझे आगे लिखने की प्रेरणा कहाँ से मिलेगी? इस कहानी का वजूद और इसका औचित्य सिर्फ और सिर्फ आपसे जुड़ा है।

  • खुलकर बोलिए: अच्छा लगा या बुरा, जो भी महसूस हुआ—कम से कम दो-चार लाइनें तो लिखिए।
  • झिझक छोड़िए: अगर लिखने में आलस या शर्म आती है, तो उस सीन से जुड़ी कोई तस्वीर या इमोजी ही भेज दीजिए। पर कुछ तो कहिए!
  • जब मैं अपडेट्स प्राइवेट करना शुरू करता हूँ, तब कुछ हलचल दिखती है, वरना सब फिर शांत हो जाते हैं।
मैं यह नहीं कहता कि सभी पाठक रोज़ कमेंट करें, पर कम से कम इतना फीडबैक तो मिले कि मुझे लगे कि मेरी मेहनत उपयोगी है।

याद रखिएगा, यह कहानी आपके सहयोग से चल रही है। अगर आपका साथ रहा तो ही यह सफर आगे बढ़ेगा,

इंतजार में
 
भाग 197

विकास: "अरे वहाँ क्यों खड़ा है? यहाँ बिस्तर पर आराम से टेक लगाकर बैठ जा, साथ में फिल्म का मजा लेंगे।"



सोनी की रूह कांप गई। लिहाफ के अंदर लगभग नग्न थी। उसकी मादक जांघें नाइटी से बाहर थी उसने अपने हाथ से नाइटी को नीचे खिसकाकर उसे ढकने की कोशिश की पर नाकाम रही।

सूरज बिस्तर पर आ चुका था…उसने बरमूडा पहना हुआ था।



बिस्तर का भूगोल अब किसी गहरी साजिश का हिस्सा लग रहा था। एक तरफ विकास, बीच में सोनी और दूसरी तरफ सूरज। तीनों ने बिस्तर के सिरहाने (Headboard) पर अपने सिर टिकाए और फिल्म देखने लगे। बिस्तर के खूबसूरत लिहाफ ने तीनों के कामुक बदनों को ढक लिया था। पर आग सुलग रही थी।

अब आगे.

सोनी अपने दोनों 'प्रेमियों' के बीच लेटी हुई थी। विकास जानबूझकर खामोश था, जैसे वह इस तनावपूर्ण मादकता का आनंद ले रहा हो। तभी, फिल्म के एक रोमांचक सीन के दौरान सोनी ने अपने पैर मोड़े और लिहाफ के अंदर उसकी नंगी जांघ सूरज की हथेली से टकरा गई।

उस एक स्पर्श ने जैसे कमरे के भीतर बिजली दौड़ा दी। सूरज को यकीन नहीं हो रहा था कि उसकी मौसी लिहाफ ने अंदर नग्न है। उसकी सांसें भारी होने लगीं। सूरज ने सोने की नंगी जांघों को टटोल कर इस सत्य को समझने की कोशिश की। सोनी को अपनी जाँघ पर सूरज के हाथ की वह फौलादी गर्मी साफ़ महसूस हो रही थी। उसने अपनी जाँघ हटाई नहीं, बल्कि उसे वहीं टिकाए रखा।

अपने पति विकास की उपस्थिति में सोनी ने जो उस वर्जित स्पर्श को अपनी मूक सहमति दे दी थी उसे आभास था कि यही आगे चलकर आज की रात 'संतान सप्तमी' का यह अनुष्ठान अपनी उस पूर्णाहुति की ओर बढ़ेगा, जिसका सपना विकास देख रहा था और जिसकी प्यास सोनी और सूरज के रोम-रोम में बसी थी।

जब तक लिंग में तनाव न हो वासना का कोई औचित्य नहीं होता। सोनी यह बात भली-भांति जानती थी उसने अपने हाथ बढ़ाए और सूरज के जादूई अंगूठे को सहलाकर सूरज के लिंग में तनाव भर दिया।

विकास की उपस्थिति में तनाव का जायजा ले पाना कठिन था पर सूरज ने स्वयं अपना अंगूठा खींचकर अपने तनाव को नियंत्रण में रखने की कोशिश की।

लिहाफ के भीतर का वह मूक संसार अब एक ऐसी जादुई और रहस्यमयी बिसात बन चुका था, जहाँ हर स्पर्श एक नई कहानी लिख रहा था। विकास, सोनी और सूरज—तीनों के शरीर एक ही लिहाफ के नीचे थे, पर तीनों के मन के भाव अलग-अलग लहरें पैदा कर रहे थे।

एक तरफ सूरज की उंगलियां पूरी बेबाक और जीवंत गहराई के साथ सोनी की बाईं जाँघ की रेशमी त्वचा पर रेंग रही थीं। सूरज के लिए यह अहसास किसी दिव्य वरदान जैसा था; उसकी उंगलियों में वह तप्त आकर्षण था जो सोनी के रोम-रोम को पिघलाने के लिए काफी था। वह इतनी सावधानी और नजाकत से सोनी को टटोल रहा था कि लिहाफ की ज़रा सी भी हलचल विकास को किसी खतरे का संकेत न दे सके।

वहीं दूसरी तरफ विकास का पिक्चर देखने में मन नहीं लग रहा था वह तो अपने मन में बार-बार यही जुगत लगा रहा था कि सोनी और सूरज को कैसे समीप लाया जाए अपनी एक तरफा उत्तेजना के अधीन विकास में अपने हाथ बढ़ाए और सोने की दूसरी जांघ को सहलाने लगा।

सब कुछ संयमित तरीके से चल रहा था। विकास अपनी पत्नी की दाईं जाँघ पर अपना पूरा अधिकार जमाए बैठा था। वह सोनी के बदन की बढ़ती हुई गर्मी और उसकी तेज़ होती साँसों को महसूस कर रहा था। विकास को यह कतई अंदाज़ा नहीं था कि सूरज की उंगलियां इस समय उसकी पत्नी की मर्यादा के कितने करीब पहुँच चुकी हैं, लेकिन उसके अपने मन के भीतर एक अजीब और वर्जित हसरत कुलबुला रही थी।

विकास का अंतर्मन: "सोनी का बदन आज कितना दहक रहा है... जैसे इसके भीतर कोई ज्वालामुखी फूटने को तैयार हो। काश! मेरी यह कल्पना हकीकत होती कि इस समय सिर्फ मैं ही नहीं, बल्कि सूरज का वह प्रचंड पौरुष भी इसके बदन की इस कोमलता का आनंद ले रहा होता। अगर सूरज का वह ओजस्वी स्पर्श इस समय सोनी को महसूस होता, तो यह नज़ारा कितना अद्भुत होता!"

विकास अपनी ही उस वर्जित कल्पना में खोया हुआ था, जिसे वह हकीकत में घटते हुए देख नहीं पा रहा था। उसे लग रहा था कि वह सिर्फ सोच रहा है, जबकि उसके ठीक बगल में वह 'अकल्पनीय' घटित हो रहा था।

सोनी की हालत अब उस कश्ती जैसी थी जो दो मीठे तूफानों के बीच झूल रही थी। उसे अपनी एक जाँघ पर पति का जाना-पहचाना अधिकार महसूस हो रहा था, तो दूसरी जाँघ पर सूरज का वह अदम्य और ओजस्वी स्पर्श उसे किसी नई दुनिया की सैर करा रहा था। विकास की उन वर्जित कल्पनाओं ने सोनी को मानसिक रूप से पहले ही तैयार कर दिया था, और अब जब वह असलियत में दोहरी उत्तेजना के बीच फंसी थी, तो उसका विवेक पूरी तरह शून्य हो चुका था।

उसने अपनी आँखें मूँद लीं और खुद को पूरी तरह उन दोनों के हाथों के हवाले कर दिया। विकास की मूक हसरत और सूरज का वह बेताब और जीवंत स्पर्श मिलकर सोनी के भीतर कामुकता का एक ऐसा ज्वार उठा रहे थे, जो अब किसी भी बांध को तोड़ने के लिए तैयार था। 'संतान सप्तमी' का वह गुप्त अनुष्ठान अब अपनी उस पूर्णाहुति की ओर बढ़ रहा था जहाँ केवल देह की पुकार और वासना का दिव्य प्रताप शेष रह गया था।

लिहाफ के भीतर उस मादक सन्नाटे में हलचल अपनी चरम सीमा पर थी। एक तरफ सूरज की उंगलियां अपनी बेताब गहराई के साथ उस गुप्त द्वार की देहलीज को चूमने ही वाली थीं, तो दूसरी तरफ विकास का अनुभवी हाथ भी अपने लक्ष्य के बेहद करीब पहुँच चुका था। सोनी को महसूस हो रहा था कि अब बस एक पल की बात है और दोनों तरफ से बढ़ती हुई वे उंगलियां उस एक बिंदु पर मिल जाएंगी जहाँ उसका सारा संयम टूटकर बिखर जाएगा।

सोनी का हृदय किसी डरे हुए पक्षी की तरह तेज़ी से धड़क रहा था। उत्तेजना की वह लहर इतनी तीव्र थी कि उसे लग रहा था जैसे उसका पूरा वजूद ही पिघल जाएगा। कल्पनाओं में इस 'वर्जित खेल' को सोचना जितना आसान और रोमांचक था, हकीकत में उस दोहरे स्पर्श को अपनी देह पर झेलना उतना ही कठिन होता जा रहा था।

जैसे ही दोनों की उंगलियां उस अंतिम मुहाने सोनी की मुनिया के स्पर्श के लिए बढ़ीं, सोनी का सोया हुआ विवेक अचानक जाग उठा। उसे लगा कि अगर अब उसने खुद को नहीं रोका, तो वह एक ऐसे रास्ते पर निकल जाएगी जहाँ से वापसी मुमकिन नहीं होगी। एक अजीब सी घबराहट और मर्यादा की अंतिम लकीर ने उसके हाथ को हरकत में ला दिया।

उसने अपनी दाहिनी ओर हाथ बढ़ाया और विकास के उस हाथ को बड़ी मज़बूती से थाम लिया जो आगे बढ़ने को आतुर था। विकास एकदम से ठिठक गया। उसे समझ नहीं आया कि जो सोनी अब तक इस आनंद में पूरी तरह डूबी हुई थी, उसने अचानक उसका हाथ क्यों रोक दिया। उसने एक कौतूहल और सवालिया नज़रों से सोनी के चेहरे की ओर देखा।

सोनी ने इस पल में अपनी बुद्धिमानी का परिचय दिया। उसने कुछ बोला नहीं, बस अपनी झुकी हुई पलकों और चेहरे की नजाकत से विकास को एक मौन आदेश दिया। उसकी आँखों में एक ऐसी विनती और शांति थी, जिसने विकास के बढ़ते हुए आवेग को वहीं थाम लिया। सोनी ने धीरे-धीरे, लेकिन एक दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ, विकास के हाथ को अपने बदन से अलग कर दिया।

विकास निशब्द रह गया। वह समझ नहीं पा रहा था कि क्या सोनी डर गई है ? पर सोनी के उस मौन आदेश में एक ऐसी गरिमा थी कि विकास चाहकर भी दोबारा आगे नहीं बढ़ सका। वह खामोश होकर अपनी जगह पर स्थिर हो गया, जबकि दूसरी तरफ सूरज, जिसे अभी इस बदलाव का पूरी तरह अंदाज़ा नहीं था, लिहाफ के दूसरे कोने में सांसें रोके इस ठहराव के पीछे की वजह समझने की कोशिश कर रहा था।

नैनीताल की उस रात में, लिहाफ के भीतर का वह 'विस्फोट' होने से ठीक पहले शांत हो गया था, पर उस खामोशी में अब एक नई तरह का तनाव और अनकही बेचैनी घर कर गई थी।

सोनी को लगा कि सूरज शायद उसके पति विकास की उपस्थिति में उसकी मुनिया को छूने की हिम्मत नहीं जुटाएगा पर सूरज की जवानी और उसका साहस आज सारी सरहदों को लांघ चुका था। सूरज का हाथ सरकते-सरकते अब सोनी की 'मुनिया' के उस तप्त मुहाने तक पहुँच गया था, जहाँ से कामुकता का लावा फूटने ही वाला था।

सोनी आश्चर्यचकित थी सूरज का वह अदम्य साहस उसे झकझोर रहा था और साथ ही साथ उत्तेजित कर रहा था हे भगवान यह लड़का क्या चाहता है?

सोनी को अपनी देह के भीतर एक अद्भुत हलचल महसूस हो रही थी। सूरज के पोर अब उसकी मुनिया के रेशमी बालों को पार कर उस संवेदनशील दाने (clitoris) को सहलाने लगे थे। सोनी की साँसें अब बेकाबू हो रही थीं, और उसका शरीर रह-रहकर एक मीठे खिंचाव के साथ कांप उठता था।

सोनी ने महसूस किया कि विकास अब बिल्कुल शांत हो गया है और उसके चेहरे पर उदासी है सोनी ने अपने हाथ बढ़ाए और उन्हें हाथों से विकास के लंड को सहलाने लगी जिससे उसने उसके हाथ को अपनी मनिया से दूर किया था।

सोनी के हाथों में आते ही विकास का लंड तनने लगा और चेहरे पर उत्तेजना और खुशी दिखाई पड़ने लगी। सूरज की उपस्थिति में सोने का यह कामुक कृत्य विकास की उम्मीदें बढ़ा रहा था।

बिस्तर के भीतर चल रहा यह लुका-छिपी का खेल अब अपनी पराकाष्ठा पर था। टीवी पर फिल्म का कोई नाटकीय दृश्य चल रहा था, लेकिन सोनी के बदन के भीतर जो ड्रामा चल रहा था, उसकी पटकथा सूरज अपनी उंगलियों से लिख रहा था।

सोनी एक गजब के द्वंद्व में फंसी थी। वह अपनी उत्तेजना को छुपाने के लिए बार-बार विकास से फिल्म के किरदारों और कहानी के बारे में बात करती।

सोनी (कांपती आवाज में): "विकास जी... देखिए, ये हीरो कितना... कितना अजीब व्यवहार कर रहा है न?"

जैसे ही सोनी कोई वाक्य बोलने की कोशिश करती, सूरज लिहाफ के नीचे अपनी उंगलियों की गति और तीव्रता बढ़ा देता। और सोनी की आवाज लहरा..जाती..

यही घटना जब एक दो बार हुई तो विकास में सोनी की असहजता ताड़ ली… और बोला क्या हुआ सोनी तुम ठीक तो हो ना?

सूरज ने अपनी उंगलियां रोक ली और सोनी अपनी उत्तेजना को नियंत्रित करते हुए बोली…हां हां… क्या आपको फिल्म में मजा नहीं आ रहा है?

नहीं नहीं चलो कुछ देर और देखते हैं.. विकास ने कहा और एक बार फिर तीनों फिल्म देखने में लग गए..

सूरज की उंगलियाँ अब सोनी की मुनिया के सबसे संवेदनशील हिस्से को बड़े अधिकार के साथ मसल रही थीं। सूरज को यह अहसास हो चुका था कि मौसी न केवल उसके स्पर्श को स्वीकार कर रही हैं, बल्कि उसका भरपूर आनंद भी ले रही हैं।

यह प्रक्रिया यही नहीं रुकी विकास किसी ने किसी बहाने सोनी से बात करता और हर बार उसे सोनी की आवाज में कुछ बदलाव महसूस होता।

जब सूरज की उंगलियाँ उस जादुई दाने पर दबाव बनातीं, तो सोनी के गले से निकलने वाले शब्द बीच में ही टूट जाते और उसकी आवाज़ किसी सुरीले वाद्य यंत्र की तरह लहराने लगती।

विकास (हैरानी से सोनी की ओर देखते हुए): "क्या हुआ सोनी? तुम्हारी आवाज़ ऐसे क्यों लड़खड़ा रही है? तुम ठीक तो हो न? चेहरे पर इतना पसीना क्यों है?"

सोनी (जल्दी से खुद को संभालते हुए): "नहीं... कुछ नहीं, बस कमरा थोड़ा गरम लग रहा है। फिल्म कितनी इमोशनल है न, बस वही देख रही थी।"

उसी समय, सोनी ने लिहाफ के नीचे अपना हाथ ले जाकर सूरज की भारी हथेली को कसकर पकड़ लिया। उसका यह स्पर्श एक साथ दो संदेश दे रहा था—ऊपर से वह ऐसा दिखावा कर रही थी जैसे वह सूरज से रुकने का अनुरोध कर रही हो, पर भीतर ही भीतर उसकी पकड़ सूरज की उंगलियों को उस केंद्र से हटने नहीं दे रही थी। वह सूरज के हाथ को बस दबाकर रह जाती, जैसे कह रही हो— 'अब बस कर पगले, वरना मैं सबके सामने चिल्ला पडूँगी।'

पर सूरज अब पूरी तरह खुल चुका था। उसे पता था कि मौसी की यह 'ना' वास्तव में एक बहुत बड़ी 'हाँ' है। जैसे ही सोनी विकास से बात करने के लिए मुड़ती, सूरज अपनी मध्यम उंगली को उस गीले और फिसलन भरे द्वार के भीतर थोड़ा और धकेल देता।

सोनी की तड़प अब बर्दाश्त से बाहर हो रही थी। उसकी जाँघें रह-रहकर आपस में भिंचतीं और फिर सूरज के हाथ को रास्ता देने के लिए फैल जातीं। विकास को यह सब कुछ बड़ा अनूठा और मादक लग रहा था। उसे लग रहा था कि शायद नैनीताल की हवा और इस फिल्म के रोमांस ने उसकी पत्नी को इतना कामुक बना दिया है।

विकास इस बात से अब भी पूरी तरह अनजान था कि जिसे वह फिल्म का असर समझ रहा था, वह दरअसल उसके अपने भांजे के पौरुष का जादू था, जो उसकी पत्नी की बुर के भीतर उंगलियों के जरिए 'संतान सप्तमी' के अनुष्ठान की एक नई इबारत लिख रहा था। सोनी अब उस मुकाम पर थी जहाँ उसकी सिसकियाँ अब किसी भी पल एक तीखी कराह में बदल सकती थीं।

सोनी की देह अब उस मुकाम पर पहुँच चुकी थी जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं था। सूरज की उंगलियों ने उसकी मुनिया के भीतर वह हलचल मचा दी थी कि वह स्खलन के बिल्कुल मुहाने पर खड़ी थी। उसे अच्छी तरह पता था कि यदि वह अभी इसी वक्त स्खलित हुई, तो उसके जिस्म की वह तड़प, वह झटका और उसकी जाँघों की वह बेकाबू मरोड़ विकास से छिप नहीं पाएगी। विकास बगल में ही लेटा था, और सोनी की देह का एक-एक कंपन उसे हकीकत के बहुत करीब ले जा सकता था।

सोनी ने एक आखिरी लंबी और गरम सांस ली, अपनी आँखों को कसकर भींचा और लिहाफ के भीतर ही बड़ी मशक्कत के साथ सूरज के हाथ को अपनी मुनिया से अलग किया। उसका पूरा बदन पसीने से तर-बतर था और धड़कनें किसी तेज चलते इंजन की तरह बज रही थीं। उसने अपनी सारी हिम्मत जुटाई और आवाज़ को जितना हो सके उतना सामान्य रखने की कोशिश करते हुए बोली:

सोनी: "विकास जी... अब बस कीजिए। बहुत रात हो गई है और फिल्म भी अब खत्म होने वाली है। कल सुबह जल्दी उठना है, हमें नैनीताल के बाकी पॉइंट्स भी तो घूमने जाना है।"

फिर उसने सूरज की ओर रुख किया, जो अभी भी अपनी उंगलियों पर लगी उस 'मादक नमी' के नशे में डूबा हुआ था।

सोनी (धीमी आवाज में): "सूरज... बेटा, तू भी जा अब। बहुत देर हो गई है, जाकर अपने कमरे में सो जा।"

सूरज का मन तो जैसे वहीं जम गया था। वह उस अधूरे खेल को बीच में छोड़कर जाने के लिए तैयार नहीं था, पर मौसी का आदेश और मौसा की मौजूदगी ने उसे उठने पर मजबूर कर दिया। वह बेमन से बिस्तर से उठा, उसकी आँखों में एक अजीब सी अतृप्ति थी।

वह धीरे-धीरे कदम बढ़ाते हुए अपने कमरे की ओर जाने लगा। जैसे ही वह कमरे के दरवाजे पर पहुँचा, उसके कदम ठिठक गए। उसने एक बार पीछे मुड़कर देखा। कमरे की मद्धम रोशनी में सोनी अभी भी बिस्तर पर लेटी थी। सूरज की नज़रें सीधे सोनी की आँखों से टकराईं। इसी दौरान सूरज ने अपनी उंगलियों को जो सोने की मुनिया के रस में डूबी थी चूम लिया। सोनी सिहर उठी उसका अपना भांजा उसके ही पति के सामने उसके बुर से निकले कामरस में डूबी उंगलियों को उसके सामने ही चूम रहा था।

सोनी की उन कजरारी और नशीली आँखों में उस वक्त एक साफ़ पैगाम तैर रहा था। उन आँखों में कोई डांट नहीं थी, बल्कि एक गहरा वादा था। वे आँखें जैसे कह रही थीं— "अभी जा सूरज... थोडा सब्र कर। तेरी ये मौसी अभी शांत नहीं हुई है, वो कल रात की भांति फिर आएगी तेरी अद्भुत आहुति लेने।"

सूरज ने एक गहरी सांस ली और मन ही मन उस 'आधी रात' के इंतजार में अपने कमरे में दाखिल हो गया। सूरज ने दरवाजा बंद कर दिया। उधर बिस्तर पर सोनी ने करवट ली, पर उसकी जाँघों के बीच की वह गीली उत्तेजना अब भी उसे याद दिला रही थी कि 'संतान सप्तमी' की यह रात अभी खत्म नहीं हुई है।

सूरज के कमरे से बाहर जाते ही विकास के भीतर का संयम पूरी तरह टूट गया। उसने झटके से लिहाफ फेंका और सोनी के बदन पर किसी भूखे शिकारी की तरह टूट पड़ा। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक और जिज्ञासा थी।

विकास ने सोनी के हाथों को बिस्तर पर दबोचते हुए भारी आवाज़ में पूछा, "सोनी... आखिर तुमने लिहाफ के अंदर मेरा हाथ क्यों पकड़ा था?"

सोनी ने कोई जवाब नहीं दिया, बस एक रहस्यमयी और मदहोश कर देने वाली मुस्कान बिखेरी। उसने धीरे-धीरे अपनी दोनों जाँघों को विकास के सामने पूरा फैला दिया। जैसे ही विकास की नज़रें नीचे गईं, उसके होश उड़ गए। सोनी की मुनिया इस समय पूरी तरह कामुक रस में डूबी हुई थी। वह इतनी गीली थी कि उससे रिसता हुआ द्रव बिस्तर की चादर पर एक गोल गीला घेरा बना चुका था, जो मद्धम रोशनी में चमक रहा था।

विकास (हैरानी और उत्तेजना से): "अरे!.. सोनी, फिल्म में ऐसा क्या देख लिया तुमने जो तुम इस कदर पिघल गईं?"

सोनी ने विकास की आँखों में आँखें डालीं और उसे संभोग के लिए आमंत्रित करते हुए अपनी कमर को हल्का सा ऊपर उठाया। विकास ने अब और इंतज़ार नहीं किया; उसने अपने तने हुए लिंग को उस फैली हुई और मदहोश मुनिया के मुहाने पर रखा और एक ही गहरे झटके में अंदर प्रवेश कर गया।

सोनी के मुँह से एक तीखी और सुखद आह निकली। विकास ने उसके ऊपर झुकते हुए, प्रहार जारी रखते हुए फिर वही सवाल दोहराया, "सोनी... तुमने मेरी बात का जवाब नहीं दिया। आखिर ये आग कैसे लगी?"

सोनी ने विकास को अपनी बाहों में कस लिया और उसे अपनी ओर खींचते हुए फुसफुसाकर बोली, "आपने दोपहर में मुझसे एक प्रश्न किया था न?याद कीजिए?"

विकास कुछ पलों के लिए ठिठका, उसने अपनी गति धीमी की और सोचते हुए बोला, "वही... सूरज वाली बात?"

जैसे ही विकास को अहसास हुआ, उसने सोनी की बुर को और गहराई से चोदते हुए उत्तेजित होकर पूछा, "क्या सच में? क्या ये उसी का असर है?"

सोनी ने शर्म और बेबाकी के एक अजीब से मिश्रण के साथ अपनी दोनों हथेलियों से अपनी आँखें ढँक लीं और सिसकते हुए कबूल किया, "हाँ... यह सब उस सूरज की उंगलियों की ही करामात है। उसी ने मुझे इस हाल तक पहुँचाया है।"

क्या सचमुच सूरज ने तुम्हारी मुनिया को स्पर्श किया है?

हां क्या मैंने गलत किया ? सोनी ने वापस प्रश्न किया

विकास यह सुनकर जैसे पागल हो गया। उसे अपनी पत्नी के मुँह से यह 'सच' सुनकर एक वर्जित और प्रचंड सुख मिल रहा था। उसने सोनी के होठों और चेहरे को चूमने लगा जैसे वह सोनी को इस अद्भुत कार्य के लिए शाबाशी दे रहा हो। उसने अपनी चोदने की गति दोगुनी कर दी, मानो वह सूरज की उस 'करामात' को अपने पौरुष से और भी गहरा करना चाहता हो। उस रात नैनीताल के उस कमरे में, मर्यादा और संस्कारों की बलि चढ़ चुकी थी और विकास अपनी पत्नी को उसी उत्तेजना में डूबे हुए देख रहा था जिसका बीज उसके भांजे ने बोया था।

होटल के उस बंद कमरे में विकास और सोनी के जिस्मों के टकराने की आवाज़ें और उनकी तेज़ होती साँसें एक अजीब सा उन्माद पैदा कर रही थीं। विकास इस समय संभोग के उस अंतिम पड़ाव पर था जहाँ इंसान के भीतर छिपी सारी दबी हुई इच्छाएं बाहर आ जाती हैं।

विकास ने सोनी के दोनों हाथों को बिस्तर पर कसकर जकड़ लिया और उसके कानों के पास किसी पागल प्रेमी की तरह फुसफुसाने लगा।

विकास (हौले-हौले प्रहार करते हुए): "सोनी... महसूस करो.. और, कल्पना करो कि यह सूरज का वह विशाल और फौलादी अंग है। वही दिव्य लिंग जो तुम्हारे भीतर के सारे सूखे को खत्म कर देगा। रिश्ते-नाते, लाज-शर्म सब कुछ भूल जाओ सोनी! उसे पूरी तरह अपना लो।"

सोनी की आँखें बंद थीं, पर उसके दिमाग में सूरज का वह बलिष्ठ बदन और उसकी प्यासी आँखें घूम रही थीं। विकास उसे और भी गहराई से झकझोरते हुए आगे बोला:

विकास: "वह सूरज ही है जो हमारे सारे अरमान पूरे करेगा... मेरे भी और तुम्हारे भी। इस 'संतान सप्तमी' की असली पूर्णाहुति केवल वही दिव्य लिंग कर सकता है। सोनी, उसे स्वीकार कर लो... उसे अपने भीतर समाहित करने का वादा करो!"

विकास अनियंत्रित होकर सोनी को चोद रहा था उसे यह अंदाजा भी नहीं था कि बाहर कमरे में सूरज अंदर की गतिविधियों को महसूस कर रहा है।

जब थप ..थप.. के आदिम संगीत की गूंज बढ़ने लगी सूरज का मन विचलित होने लगा और वह अंदर चल रहे घटनाक्रम का अंदाजा कर रहा था और अपने लंड को अपने हाथों से सहलाते हुए अपनी मौसी का इंतजार कर रहा था जो फिलहाल अंदर चूद रही थी।

सोनी इस समय एक ऐसे भँवर में थी जहाँ उसे विकास का स्पर्श और सूरज की याद, दोनों एक साथ चरम सुख की ओर ले जा रहे थे। विकास के हर प्रहार के साथ सोनी को ऐसा लग रहा था जैसे वह सूरज की उन फौलादी बाहों में है। उसका शरीर धनुष की तरह तन गया और वह पूर्ण तृप्ति के साथ स्खलन की ओर बढ़ने लगी।

विकास अब पूरी तरह निढाल होने वाला था, उसने स्खलन के ठीक पहले सोनी के चेहरे को अपनी हथेलियों में लिया और एक अंतिम बार पूछा:

विकास: "बोलो सोनी... तुम उसे अपनाओगी ना? क्या तुम मुझे संतान सुख दोगी ना? मुझसे वादा करो!"

सोनी के भीतर चल रहा तूफ़ान अब अपनी सीमा पार कर चुका था। उसकी जाँघों में एक तीव्र कंपन हुआ और उसके मुँह से एक गहरी, भारी और सिसकती हुई आवाज़ निकली:

सोनी: "हाँ... ….आ…...!"

उस एक 'हाँ' के साथ ही सोनी का शरीर धीरे-धीरे झटके लेते हुए स्खलित होने लगी…इसी दौरान विकास में सोनी की चूची के तने हुए निप्पल को अपने दांतों से दबा दिया और सोनी कराह उठी

आह…तनी….धीरे से ….

सोनी कुछ ही पलों में निढाल हो गई। विकास ने भी अपना सारा अंश सोनी की उस तृप्त गहराई में छोड़ दिया। कमरे में एक भारी सन्नाटा छा गया, जिसमें केवल उनकी हाँफती हुई आवाज़ें सुनाई दे रही थीं।

नैनीताल की वादियों में आज मर्यादा की एक और दीवार ढह चुकी थी। संतान सप्तमी का पंचम अध्याय आज उस वादे के साथ समाप्त हुआ, जिसने भविष्य के एक वर्जित और रोमांचक मिलन की नींव रख दी थी।

शेष अगले भाग में..

 
भागा 198

विकास: "बोलो सोनी... तुम उसे अपनाओगी ना? क्या तुम मुझे संतान सुख दोगी ना? मुझसे वादा करो!"

सोनी के भीतर चल रहा तूफ़ान अब अपनी सीमा पार कर चुका था। उसकी जाँघों में एक तीव्र कंपन हुआ और उसके मुँह से एक गहरी, भारी और सिसकती हुई आवाज़ निकली:

सोनी: "हाँ... ….आ…...!"

उस एक 'हाँ' के साथ ही सोनी का शरीर धीरे-धीरे झटके लेते हुए स्खलित होने लगी और कुछ ही पलों में निढाल हो गई। विकास ने भी अपना सारा अंश सोनी की उस तृप्त गहराई में छोड़ दिया। कमरे में एक भारी सन्नाटा छा गया, जिसमें केवल उनकी हाँफती हुई आवाज़ें सुनाई दे रही थीं।


नैनीताल की वादियों में आज मर्यादा की एक और दीवार ढह चुकी थी। संतान सप्तमी का पंचम अध्याय आज उस वादे के साथ समाप्त हुआ, जिसने भविष्य के एक वर्जित और रोमांचक मिलन की नींव रख दी थी।

अब आगे..


इधर जब नैनीताल के में लिहाफ के भीतर सूरज अपनी मौसी सोनी के बदन को अपनी उंगलियों से सहला रहा था, और उधर मीलों दूर बनारस में सुगना जो अब नींद की आगोश में जा चुकी थी के अवचेतन में एक अजीब सी धुंध छाने लगी।

सुगना अवचेतन मन की उस दुनिया में पहुंच गई जगह दिमाग का नियंत्रण खत्म हो जाता है जिसे हम स्वप्न भी कहते हैं।

स्वप्न के शुरुआती दृश्यों में वही पुरानी वासना, दहकती हुई हकीकत तैरने लगी जिसे उसने कभी अपनी नंगी आँखों से साक्षात देखा था कभी उसे सरयू सिंह और कजरी दिखाई पड़ते तो कभी सोनू और लाली कभी वह खुद को सोनू के साथ देखती .. सब कुछ आस्पष्ट और बेतुका था। पर आज उसे स्वप्न में अपनी पुत्री मालती और लाली के पुत्र राजू के बीच का वह प्रचंड संभोग दिखाई देने लगा जिसे वह अपनी नंगी आंखों से देख चुकी थी। वह आदिम और अदम्य मिलन, जिस्मों की वह बेबाक रगड़ और मदहोश कर देने वाली सिसकियाँ सुगना के बंद दिमाग के भीतर दोबारा जीवंत हो उठीं। मालती की फैली हुई कोमल पर पुष्ट जाँघें और राजू के तने हुए लंड का ओजस्वी प्रहार देखकर स्वप्न में भी सुगना का बदन तपने लगा था।

पर तभी, उस जादुई और रहस्यमयी स्वप्न का भूगोल अचानक बदलने लगा। धीरे-धीरे सुगना के स्वप्न से राजू का चेहरा धुंधला होता गया और उस पुरुष का बदन भी परिवर्तित होने लगा। अब जो पुरुष सुगना के स्वप्न में संभोग रत दिखाई दे रहा था, वह कोई साधारण इंसान नहीं बल्कि किसी दिव्य युवा जैसा था। उसका खूबसूरत और कसा हुआ बदन अद्भुत था, और उस युवती को योनि से निकलता हुआ उसका सुदृढ़ लिंग और भी अद्भुत ..

स्वप्न की उस अलौकिक रोशनी में, वह पूरी तरह से तना हुआ लिंग अपनी पूरी भव्यता और कठोरता के साथ रह रह कर दिखाई दे रहा था। उसका रंग तांबे की तरह चमक रहा था, जिस पर पौरुष की उभरी हुई नीली नसें साफ देखी जा सकती थीं। वह किसी ठोस संगमरमर की लाट की तरह सीधा, अभेद्य और अत्यंत गर्वीला था, जो पुरुषार्थ की चरम सीमा को दर्शा रहा था। उसकी लंबाई और मोटाई में एक ऐसा आदिम आकर्षण था जो किसी भी स्त्री के भीतर की सुप्त इच्छाओं को पल भर में जगा दे।

उस अंजान युवती के बदन को मथते हुए संभोग के दौरान जब वह अंग उस गहराई से बाहर निकलता और फिर पूरी ताकत से अंदर धंसता, तो उसकी चमक और भी तीव्र हो जाती थी। उस मखमली और तप्त मार्ग के रसों से भीगा हुआ वह अंग अत्यंत चिकना, मांसल और प्रलयकारी प्रतीत हो रहा था। हर प्रहार के साथ उसका शीर्ष भाग (ग्लांस) गहरे सिंदूरी रंग में चमक उठता था, जो उत्तेजना की उस पराकाष्ठा को दिखा रहा था जहाँ पहुँचकर मर्यादा का हर नियम टूट जाता है।

सुगना के लिए यह नजारा जितना अनोखा था, उससे कहीं ज़्यादा सम्मोहक था। उस विराट और कड़े पौरुष की गति और उसकी नग्न खूबसूरती ने सुगना के अवचेतन में कामुकता का एक ऐसा तूफ़ान खड़ा कर दिया था। वह अंग जैसे-जैसे अपनी पूरी शिद्दत के साथ उस देह को तृप्त कर रहा था, सुगना का खुद का बदन भी उसी ताल पर सुलग रहा था।


इस अलौकिक दृश्य को देखकर सुगना बार-बार उस युगल को पहचानने की कोशिश करने लगी। वह जितना ही उन्हें पहचानने की कोशिश करती, उस पुरुष का चेहरा उतना ही धुंधला होता जाता, पर उसके खूबसूरत बदन और उस अद्भुत संभोग की गति ने सुगना के भीतर हलचल मचा दी थी। सुगना चरम उत्तेजना से तपने लगी थी। तभी अचानक, उस धुंध के पार से उस व्यक्ति का चेहरा पूरी तरह साफ़ दिखाई पड़ गया—वह कोई और नहीं, बल्कि सूरज था!

सूरज को इस रूप में देखते ही सुगना काँप उठी और उसकी बढ़ती हुई उत्तेजना पर अचानक एक डर का ग्रहण लग गया। अब वह घबराहट और व्याकुलता में बार-बार उस युवती को पहचानने की कोशिश करने लगी जिसके साथ सूरज पूरी दीवानगी से संभोग रत था। पर यह बेहद कठिन था; बारंबार प्रयास करने के बाद भी उस युवती का चेहरा साफ़ देख पाना संभव नहीं हो पा रहा था।

आखिरकार, जब सूरज ने अपने प्रहारों की रफ्तार को और तीव्र कर दिया, तो सुगना का पूरा बदन थर-थर काँपने लगा। और जैसे ही सूरज अपने चरम सुख पर पहुँचकर स्खलित होने लगा। वह ठीक उसी प्रकार अपने लिंग से निकलते हुए वीर्य से उस युवती को भिगोने लगा जैसे सरयू सिंह किया करते थे।

स्वप्न में सुगना को ऐसे लगा जैसे वह वीर्य उसके ऊपर ही गिर रहा हो….झटके से सुगना की नींद खुल गई।

वह बिस्तर पर उठकर बैठ गई। उसका दिल किसी धौकनी की तरह तेज़ी से धड़क रहा था, गला पूरी तरह सूख चुका था और उसका पूरा बदन पसीने से तर-बतर था। कमरे के सन्नाटे में वह केवल अपनी भारी सांसों की आवाज़ सुन पा रही थी। उसने अपनी हथेलियों से अपना चेहरा पोंछा, पर उसके दिमाग में अभी भी सूरज का वह कसरती बदन और वह अनोखा संभोग किसी जलती हुई तस्वीर की तरह छपा हुआ था। वह समझ नहीं पा रही थी कि उसके अवचेतन मन ने यह विचित्र स्वप्न क्यों देखा था।

सुगना को जब अपनी जांघों के बीच गीलेपन का एहसास हुआ तो वह न सिर्फ शर्मसार हुई अपित खुद को कोसते हुए बाथरूम में शू शू के लिए चली गई…और स्वप्न से उपजी वासना और उससे उपजा कामरस उस पतली मूत्रधार के साथ विसर्जित हो गया…सुगना मुस्कुरा रही थी एक पल के लिए उसके जेहन में आया कि शायद

विद्यानंद की बात गलत थी और उसका पुत्र एक पूर्ण और सामान्य मर्द था वह शापित नहीं था..

नियति मुस्कुरा रही थी …सुगना जो सोच रही थी शायद वह पूर्ण सत्य नहीं था।

अगली सुबह जब नैनीताल की ठंडी सुनहरी धूप खिड़की के पर्दों को चीरकर सोनी की आँखों पर पड़ी, तो उसकी नींद खुली। बगल में विकास अभी भी बेखबर सोया हुआ था। सोनी ने एक गहरी साँस ली। टूटते बदन ने उसे रात के उस मंजर को याद दिला दिया। विकास की बाहों में जो उसने स्खलित होते समय 'हाँ…..' कही थी, वह केवल एक शब्द नहीं था, बल्कि अपनी मर्यादा की बलि देने का एक औपचारिक वादा था।

तभी उसे अचानक सूरज का ख्याल आया। रात के उस आखिरी पल में, जब उसने सूरज का हाथ अपनी मुनिया से हटाया था, तब उसकी आँखों में जो वादा था, वह अब सोनी के दिल पर बोझ बनने लगा। उसे याद आया कि कैसे सूरज एक प्यासे मुसाफिर की तरह उसकी आँखों में देख रहा था।

सोनी का अंतर्मन: "हे भगवान! मैंने उसे कल रात वह इशारा तो कर दिया था, पर खुद यहाँ विकास जी के साथ तृप्त होकर सो गई। वह बेचारा रात भर अपने लिंग में तनाव लिए किस हाल में रहा होगा? मैंने उसकी प्यास जगा के उसेअधर में छोड़ दिया।"

सोनी ने धीरे से चादर हटाई और बिस्तर से उतरी। उसने फर्श पर पड़ी अपनी रेशमी नाइटी उठाई और उसे पहन लिया। अपनी मर्यादा और स्थिति का ख्याल रखते हुए, उसने उसके साथ आया मैचिंग गाउन भी डाल लिया और उसकी बेल्ट को कमर पर कसकर बांध लिया। इस लिबास में वह एक बेहद आकर्षक और मादक स्त्री लग रही थी पर एक कामुक पर मर्यादित स्त्रीत्व बरकरार था जो एक मौसी की गरिमा के लिए ज़रूरी था।

वह दबे पाँव कमरे से बाहर निकली और सूरज के कमरे की ओर बढ़ी।

सोनी ने जैसे ही सूरज के कमरे का दरवाज़ा खोला, दरवाजा खुलने की आवाज में विकास की नींद तोड़ दी उसने सोनी को बाहर जाते देखा।

सोनी सूरज के कमरे में आ चुकी थी , सूरज बालकनी के पास खड़ा बाहर की धुंध को देख रहा था। सोनी की आहट सुनकर सूरज ने पलट कर पीछे देखा और तुरंत ही अपनी नज़रें सोनी से फेर कर फिर बाहर देखने लगा। उसके चेहरे पर रात भर की जागृति और उस 'अधूरे वादे' की कड़वाहट साफ़ झलक रही थी जिसे सोनी ने पहचान लिया।

सूरज सोनी को इस हाल में—गाउन में लिपटी हुई और सुबह की ताजगी से महकती हुई—देखकर सूरज के भीतर की नाराजगी एक पल के लिए कम हुई पर नाराजगी सूरज का हक था।

सोनी ने जैसे ही अपनी मखमली हथेलियाँ सूरज की चौड़ी पीठ पर रखीं, सूरज के बदन में एक सिहरन दौड़ गई, पर उसने खुद को सख्त बनाए रखा।

सूरज (बिना मुड़े, रूखी आवाज़ में): "अब यहाँ आने का क्या फायदा मौसी? रात तो बीत गई मैं रात भर सो नहीं पाया. आपने इसे जगा कर मझधार में छोड़ दिया।"

सूरज की बालकनी से आई हुई आवाज ने विकास का ध्यान खींचा और वह उठकर अपने कमरे की बालकनी से उनकी बातें सुनने लगा। खिड़कियों के पर्दे हटाकर उसने बाहर देखने की कोशिश की पर खिड़कियों परछाई धुंध में सूरज और सोनी की परछाई ही दिख रही थी। विकास को का शक अब वह यकीन में बदलने लगा।

सोनी ने धीरे से घूमकर उसके सामने कदम रखा। गाउन के भीतर छुपे सोनी के बदन से उठ रही मादक गंध सूरज के नथुनों से टकरा रही थी।

सोनी (धीमी और लाड़ भरी आवाज़ में): "नाराज़ हो? देखो, सुबह-सुबह सबसे पहले तुम्हारे पास ही तो आई हूँ।"

सूरज ने कोई उत्तर नहीं दिया वह नैनीताल की उन खूबसूरत वादियों को देखने लगा।

सोनी ने बड़ी नज़ाकत से अपने दोनों कान पकड़े और मासूमियत से अपनी पलकें झुका लीं।

सोनी: "सच में सूरज, बहुत गहरी नींद आ गई थी। रात की थकान और... खैर, मुझे माफ़ कर दो न। देखो, अपनी प्यारी मौसी को ऐसे तड़पाओगे क्या?"

उसने अपनी खूबसूरत आंखों से सूरज को देखा और गाउन के पल्ले को हल्का सा सँभाला जिससे उसकी भारी-भारी चूचियां और स्पष्ट दिखाई पड़ने लगी। उसकी इस अदा ने सूरज के गुस्से की दीवार को हिला कर रख दिया।

सूरज (थोड़ा नरम पड़ते हुए): "माफ़ी इतनी आसान नहीं है। आपको अंदाज़ा भी है कि रात मैंने कैसे काटी है अंदर आप तो मजे में थी..

सोनी : नहीं सूरज मुझे तेरा ध्यान था...

झूठ मत बोलिए मौसी अंदर की थप थप…की आवाज बाहर तक आ रही थी…सूरज ने यह कहकर सोनी को शर्मसार कर दिया था.

सोनी ने एक कदम और करीब बढ़ाया, इतनी करीब कि उसकी साँसों की गर्मी सूरज महसूस कर सके। उसने अपना हाथ सूरज की ठुड्डी पर रखा और उसका चेहरा अपनी ओर किया।

सोनी: "जानती हूँ पगले, इसीलिए तो हुई आई हूँ। वो वादा अभी भी मेरी आँखों में है। क्या अब भी अपने कान पकड़े रखूँ या माफी की कोई गुंजाइश है?"

सोनी की कजरारी आँखों में घुली वो बेबसी और प्यार देख कर सूरज का सारा पौरुष पिघलने लगा। उसने सोनी के हाथों को अपने हाथों में ले लिया और उन्हें अपने सीने से सटा लिया।

सोनी ने सूरज के हाथों को अपने हाथों में लेकर बड़ी गहराई से उसकी आँखों में देखा। उसकी आवाज़ में अब वह 'मौसी' वाला संकोच नहीं, बल्कि एक प्रेमिका वाली बेबाकी थी।

सोनी: "सूरज, खुश हो जा ला इसे चुम्मी लेकर शांत कर दूं..

सूरज: वैसे नहीं जैसे कल आपने बिस्तर पर अधूरा छोड़ दिया था…

सोनी: ठीक है आज एक बार फिर …बल्कि उससे भी ज्यादा….अब खुश..

सूरज को एक पल के लिए अपने कानों पर यकीन नहीं हुआ। उसकी आँखें फैल गईं और धड़कनें और तेज़ हो गईं।

सूरज ने मन ही मन सोचा….क्या उसकी मौसी यह कहना चाह रही है कि वह इस बिस्तर पर विकास के समक्ष उससे ….नहीं नही…? सूरज अब वयस्क हो चुका था उसकी कल्पनाएं भी बोल्ड हो चुकी थी पर इतनी भी नहीं की वह ऐसी परिकल्पना कर पाता।

सूरज: "सच में मौसी पर मौसा जी?

सोनी ने एक मदहोश कर देने वाली मुस्कान बिखेरी और सूरज के गाल को अपनी उंगलियों से सहलायाऔर बोला

सोनी: अपनी मौसी पर भरोसा रख जो वादा किया है तो निभाऊंगी भी…

सूरज अभी भी आश्चर्यचकित था पर बात को बदलते हुए बोला तो क्या रात तक इंतजार करना होगा?

सोनी: "पगले, इंतज़ार कैसा? अब तो मैं तेरी ही हूँ... भूल गया…क्या…. जब चाहे, जैसे चाहे और जहाँ चाहे..वहां

सोनी के मुंह से यह वाक्य सुनकर विकास के रोंगटे खड़े हो गए…सूरज और सोनी के बीच की यह केमिस्ट्री उसकी समझ से बाहर थी पर इतना अवश्य था कि सोनी और सूरज एक दूसरे के बेहद नजदीक है। विकास की धड़कनें तेज हो गई।

उधर सूरज का सारा संयम जवाब दे गया। उसने झटके से सोनी को अपने मज़बूत आलिंगन में भर लिया। सोनी का गाउन में लिपटा बदन सूरज के सीने से सट गया। सूरज ने अपने हाथ नीचे ले जाकर सोनी के भरे हुए नितंबों को अधिकार के साथ सहलाना शुरू कर दिया।

विकास का शक यकीन में बदल गया जिस तरह से सूरज की मजबूत हथेलियां ने सोनी के नितंबों को अपने आगोश में लिया था यह साबित करता था की सोनी और सूरज एक दूसरे से अंतरंग हो चुके हैं या फिर इसके बेहद करीब हैं।

सोनी के मुँह से एक हल्की सी सिसकारी निकली, इसी दौरान विकास का हाथ खिड़की के पास रखे फूलदान से टकराया और एक आवाज हुई…जिसने सोनी और सूरज का ध्यान अपनी तरफ खींचा..

सोनी ने कहा लगता है विकास जी उठ गए..

सूरज ने स्वतः ही सोनी को खुद से अलग कर दिया सूरज समझदार था और अपनी मौसी को असहज स्थिति में नहीं डालना चाहता था.. उसने धीरे से कहा ठीक है अब आप इंतजार करिए…

सोनी अपने कमरे में आ गई और कुछ ही देर बाद सोनी की मधुर आवाज आई


सूरज आ जा चाय पी ले…

चाय के कपो से उठती भाप और नैनीताल की उस ठंडी सुबह के बीच, होटल के कमरे का सन्नाटा किसी गहरी साज़िश जैसा लग रहा था। विकास ने मुस्कुराते हुए चाय की ट्रे टेबल पर रखी।

विकास: "लो भई, पहाड़ों की इस कड़क ठंड में गरमा-गरम चाय हाजिर है। सोनी, आज तुम्हारे चेहरे की रंगत कुछ बदली हुई है, रात की थकान अभी उतरी नहीं क्या?"

सोनी ने गाउन के पल्लू को और कसते हुए चाय का कप उठाया और नज़रें झुका लीं। उसके ज़हन में अभी-भी सूरज के उस मज़बूत आलिंगन और नितंबों पर उसके गर्म हाथों का अहसास ताज़ा था। वह चाय की चुस्की लेते हुए मन ही मन सोच रही थी कि विकास जिस खेल के सूत्रधार बन रहे थे, उसकी हकीकत कितनी रोमांचक और खतरनाक मोड़ ले चुकी है।

उधर सूरज चाय का कप हाथ में थामे खिड़की के बाहर देख रहा था, पर उसकी नज़रें कांच में पड़ रहे मौसी के अक्स पर टिकी थीं। मौसी की वे बातें—'जब चाहे, जैसे चाहे और जहाँ चाहे'—उसके दिमाग में हथौड़े की तरह बज रही थीं। वह हैरान भी था और बेहद उत्तेजित भी। क्या सचमुच मौसी को मौसा जी से कोई डर नहीं है…क्या वो उनके सामने ही ? इस बोल्ड कल्पना मात्र से ही उसका मन मचल उठा। उसने खुद को शांत रखने के लिए चाय का एक लंबा घूंट लिया।

विकास उन दोनों के बीच तैर रहे इस आकर्षण को पहचान चुका था लेकिन अपनी ही वर्जित हसरतों में डूबा हुआ था। वह सूरज की कसरती पीठ और सोनी की झुकी हुई कजरारी आँखों को देख रहा था।

वास्तव में, विकास को सोनी पर शक आज या कल में नहीं हुआ था। उस शक की पहली चिंगारी तो उसी दिन सुलग गई थी जब 'संतान सप्तमी' की वह पहली रात थी। जब सोनी उसे स्टेशन या गाड़ी से लेने आई थी, तब विकास ने उसके चेहरे पर एक अजीब सा बिखराव, एक अनजानी घबराहट और एक ऐसी कामुक बेबाकी देखी थी जो सोनी के स्वभाव के बिल्कुल विपरीत थी। उस दिन सोनी का वह रूप देखकर ही विकास के मन में पहला सवाल उठा था।

और यह शक महज़ एक अंदेशा नहीं रहा, बल्कि तब और गहरा गया जब अगले दिन की रात के संभोग के बाद विकास की नजरें सोनी के गोरे बदन पर पड़ी थीं। उसने सोनी के जिस्म पर, खासकर उसकी जांघों और कमर के पास, वे गहरे नीले और सुर्ख निशान देखे थे। विकास उन निशानों को देखकर अंदर तक सन्न रह गया था। उसे अपनी ही मर्दानगी पर यकीन नहीं हो रहा था कि क्या बीती रात को संभोग के दौरान यह सब कुछ उसके खुद के द्वारा किया गया है? क्या उसने वाकई इतनी उग्रता दिखाई थी?

उसका तार्किक दिमाग बार-बार कह रहा था कि वो इतना ज्यादा भीही उग्र नहीं था जिससे सोनी के बदन पर वैसे गहरे और उग्र निशान पड़ें। पर जो दूसरी बात उसके दिमाग में कौंध रही थी, उस कड़वी हकीकत पर यकीन करना उसके लिए और भी कठिन था।

पर विकास को अभी यह समझ आने लगा था। उस दिन लखनऊ से नैनीताल के लिए निकलते समय सूरज के लिंग में लगातार तनाव क्यों था? किसी भी मर्द के लिंग में तनाव का कायम रहना तभी संभव है जब वह लगातार किसी स्त्री के बारे में सोच रहा हो जिस प्रकार सूरज की निगाहें बार-बार सोनी की तरफ जा रही थी विकास को यह आभास हो रहा था कि कहीं सूरज के लिंग में आया हुआ तनाव सोनी की वजह से तो नहीं? विकास को सूरज के लिंग के तनाव के लगातार बने रहने के कारण और उसके निवारण दोनों के बारे में आभास नहीं था। उसे नहीं पता था कि उसकी पत्नी सोनी सूरज के लिए क्या मायने रखती है?

पर सूरज जैसा पढ़ा लिखा और सुशील और शालीन युवा अपनी मौसी के बारे में ऐसे ख्याल रखेगा यह उसकी उम्मीद से परे था पर अब जब शक हो ही गया था तो उसे दूर करना भी जरूरी था और विकास ने उसी शक ने निवारण के अपनी चाल चल दी थी…और सोनी के मन में पहले अल्बर्ट और फिर सूरज का ख्याल ला दिया।

विकास का अंतर्मन: "रात को सोनी जिस तरह पिघली थी, वह सिर्फ मेरी वजह से नहीं था। उसके भीतर की असली आग तो सूरज के इस युवा बदन को देखकर भड़की है। तभी सोनी संतान सप्तमी की पहली रात से बेहद कामुक तरीके से पेश आ रही है। काश, आज जब हम बाहर निकलें, तो मुझे इन दोनों को और करीब लाने का कोई मौका मिल जाए।"

एक तरफ जहां विकास अपने शक के निवारण के लिए सोनी और सूरज को करीब ला रहा था वही उसके मन में वही आग एक बार फिर सुलग रही थी..लाइन अल्बर्ट और सोनी को करीब लाया था।

कमरे में तीनों चुप थे, पर उस चाय की चुस्कियों के साथ तीन अलग-अलग कहानियों की पटकथा लिखी जा रही थी। सोनी का द्वंद्व, सूरज की बेताबी और विकास की वर्जित इच्छा—तीनों मिलकर 'संतान सप्तमी' के इस अगले अध्याय को एक ऐसे मुकाम पर ले जाने के लिए तैयार थे जहाँ मर्यादा की हर दीवार को ढह जाना था।

विकास: "चलो, जल्दी चाय खत्म करो और तैयार हो जाओ। आज हमें नैनी पीक की चढ़ाई करनी है, वहाँ का नज़ारा बेहद खूबसूरत होता है।"

सूरज ने कप टेबल पर रखा और सोनी की आँखों में सीधे झाँकते हुए धीरे से मुस्कुराया, मानो कह रहा हो कि दिन का खेल अब शुरू होने वाला है।

चाय के खाली कप टेबल पर रखे जा चुके थे, लेकिन कमरे के भीतर का तापमान अभी भी उन तीनों की अंदरूनी हरारत से गर्माया हुआ था। विकास ने खड़े होकर अंगड़ाई ली और दोनों की तरफ देखा।

विकास: "चलो भाई, अब बातें बहुत हो गईं। जल्दी से तुम दोनों तैयार हो जाओ, फिर हमें नैनी पीक के लिए निकलना है। सुना है वहाँ सुबह की धूप में पहाड़ बेहद खूबसूरत दिखते हैं।"

सूरज: "जी मौसा जी, मैं बस दस मिनट में तैयार होकर आता हूँ।"

सूरज ने बिस्तर से उठते हुए एक बार फिर सोनी की तरफ देखा। सोनी अपने गाउन के पल्लू को उँगलियों में लपेटे हुए उसे ही देख रही थी। सूरज की आँखों में अब वह सुबह वाली नाराजगी पूरी तरह गायब हो चुकी थी, उसकी जगह एक गहरी बेताबी और जीत की चमक थी। उसने जाते-जाते सोनी को एक ऐसा लुक दिया जो सीधे उसके अंतर्मन को भेद गया।

जैसे ही सूरज अपने कमरे की तरफ गया, विकास ने सोनी के पास आकर उसके कंधे पर हाथ रखा। सोनी का बदन विकास के छूते ही थोड़ा सा ठिठक गया, क्योंकि उसकी त्वचा पर अभी भी सूरज के उस प्रचंड आलिंगन की सिहरन बाकी थी।

विकास (सोनी के चेहरे को निहारते हुए): "सोनी, आज वाकई तुम कमाल लग रही हो। इस गाउन में तुम्हारी खूबसूरती और भी ज़्यादा कातिलाना लग रही है। सच कहूँ तो, कल रात के बाद से मेरा मन भी कुछ अजीब सी कल्पनाओं में गोते खा रहा है।"

सोनी ने अपनी कजरारी आँखों को थोड़ा सा घुमाया और विकास की छाती पर हाथ रखकर उन्हें धीरे से पीछे धकेला।

सोनी (मदहोश मुस्कुराते हुए): "अच्छा? अभी तो आप नैनी पीक जाने की जल्दी में थे? अब अपनी इन कल्पनाओं को ज़रा लगाम दीजिए विकास जी, वरना हम यहीं रह जाएंगे और दिन का सारा मज़ा किरकिरा हो जाएगा।"

विकास सोनी की इस अदा पर फिदा होकर हँस पड़ा। उसे लग रहा था कि उनकी पत्नी आज पहले से कहीं ज़्यादा बोल्ड और चंचल हो गई है। वह अलमारी से अपने कपड़े निकालने लगे, जबकि सोनी आईने के सामने जाकर अपने बिखरे बालों को सँवारने लगी।

आईने में खुद को देखते हुए सोनी का हाथ उसकी कमर और नितंबों पर गया, जहाँ कुछ देर पहले सूरज की उंगलियों का दबाव था। उसका दिल ज़ोर से धड़का। उसने मन ही मन सोचा—'आज का पूरा दिन हमारा है... सूरज ने तो अभी से अपने तेवर दिखा दिए हैं। विकास जी जिस आग को भड़का रहे हैं, लगता है एक दिन वह हम सबको अपनी चपेट में ले लेगी।'

विकास तैयार होकर होटल के रिसेप्शन पर जाकर आगे का कार्यक्रम तय कर रहा था इसी दौरान सूरज सोनी के कमरे में आता है सोनी अपने सूटकेस से कपड़े निकालकर आज के लिए कपड़े पसंद कर रही थी।

एक सफ़ेद स्कर्ट पर सूरज का ध्यान टिक गया उसने उसे कपड़े को अपने हाथ में लिया और उसकी कोमलता को महसूस करते हुए बोला मौसी आज यही पहनीए आप पर बहुत सुंदर लगेगा।

सोनी खुश हो गई उसने भी अपने मन में यही सोचा था पर सूरज का सपोर्ट पा कर उसका संशय दूर हो गया।

अब तू जा मुझे तैयार होने दे…

सूरज ने सोनी को अपनी बाहों में भरने की कोशिश की पर सोनी ने सूरज से हाथ जोड़ते हुए कहा सूरज पहले ही बहुत देर हो चुकी है थोड़ा सब्र कर ले…

सूरज भी वक्त की नजाकत समझता था …देर हो रही थी उसने कहा मौसी ठीक है पर ध्यान रखिएगा स्कर्ट तो ठीक है पर उसके नीचे कुछ भी नहीं..

सोनी ने आश्चर्यचकित होते हुए पूछा …क्या कुछ नहीं?

सूरज ने पास पड़ी सोनी की पतली झीनी काली पैंटी को अपने हाथ में उठाया और सोनी को दिखाते हुए अपनी जेब में रख लिया…

अब समझ आया……. सूरज ने मुस्कुराते हुए कहा और दरवाजे से बाहर निकल गया

बदमाश….सोनी ……इतना ही कह पाई…

सूरज की बातों ने माहौल को गर्म कर दिया था. उसका लंड कल रात से ही तना हुआ था…नियति सूरज की मनोदशा को पढ़ने का प्रयास कर रही थी पर असफल थी। उसे भी आगे होने वाले घटनाक्रम का इंतजार था…

शेष अगले भाग में…
 
भाग 199

सूरज ने पास पड़ी सोनी की पतली झीनी काली पैंटी को अपने हाथ में उठाया और सोनी को दिखाते हुए अपनी जेब में रख लिया…

अब समझ आया……. सूरज ने मुस्कुराते हुए कहा और दरवाजे से बाहर निकल गया

बदमाश….सोनी ……इतना हीं कह पाई…


सूरज की बातों ने माहौल को गर्म कर दिया था. उसका लंड कल रात से ही तना हुआ था…नियति सूरज की मनोदशा को पढ़ने का प्रयास कर रही थी पर असफल थी। उसे भी आगे होने वाले घटनाक्रम का इंतजार था…

अब आगे..

होटल के लॉबी से निकलकर जब तीनों नैनीताल की खुली वादियों में आए, तो सुबह की धूप देवदार के पत्तों से छनकर सोनी के बदन पर पड़ रही थी। सफ़ेद घेरदार स्कर्ट और चटक पीले रंग के टॉप में सोनी किसी खिलती हुई कली जैसी लग रही थी उम्र जैसे 5- 6 वर्ष कम हो गई हो। कपड़ों का यह संयोजन उसकी गहुंआ रंगत और सुडौल बदन को और भी ज़्यादा निखार रहा था। सूरज किसी फिल्मी हीरो की तरह सोनी के साथ-साथ चल रहा था। सोनी और सूरज की खूबसूरत जोड़ी को इतना घुला मिला देखकर विकास का शक गहरा दिया साथ ही साथ उसके मन में वह वर्जित इच्छा और कुलांचे मारने लगी।

सूरज की उस आख़िरी हिदायत और उसकी बदमाशी के कारण, सोनी ने आज अपनी पैंटी को पहनने का विचार त्याग दिया था। उसकी मखमली त्वचा और पिछले कुछ दिनों की लगातार चूदाई से संवेदनशील हो चुकी मुनिया पर अब कपड़ों की कोई दीवार नहीं थी।

जैसे ही मॉल रोड पर चलते हुए नैनीताल की वह ठंडी, बर्फीली हवा का झोंका आया, सोनी की सफ़ेद स्कर्ट हवा के वेग से हल्की सी लहराई। वह सर्द हवा बिना किसी रुकावट के सीधे उसकी नंगी जाँघों को छूती हुई ऊपर की ओर बढ़ी और सीधे उस तप्त, रेशमी मुनिया के होंठों से मुहाने से जा टकराई मुनिया के अंदर की नमी ने भी उस बर्फीली छुअन को महसूस किया सोनी के पूरे बदन में करंट सा दौड़ गया। उसके रोंगटे खड़े हो गए और उसने अनजाने में ही अपनी जाँघों को आपस में थोड़ा भींच लिया।

चलते-चलते सोनी का हाथ बार-बार अपनी स्कर्ट के घेर को सँभालने के बहाने नीचे जाता। उसे हर पल यह अहसास रोमांचित कर रहा था कि वह पूरी तरह से मुक्त और नग्न है, और कोई भी तीव्र हवा का झोंका उसके इस गुप्त रहस्य को दुनिया के सामने ला सकता था। इस वर्जित रोमांच ने उसकी आँखों की मादकता को दोगुना कर दिया था और उसके चेहरे पर उत्तेजना की एक हल्की सुर्खी बिखर गई थी।

विकास आगे चल रहा था, लेकिन जब उसने मुड़कर सोनी को देखा, तो वह उसकी बदली हुई चाल और चेहरे के इस अनोखे हाव-भाव को देखकर दंग रह गया।

विकास (मुस्कुराते हुए): "सोनी, इस सफ़ेद स्कर्ट में तुम वाकई अप्सरा लग रही हो। पर तुम बार-बार अपनी स्कर्ट को इस तरह क्यों पकड़ रही हो? क्या हवा से डर लग रहा है?"

सोनी ने एक बार फिर अपनी जाँघों के बीच उठती उस तीव्र सिहरन को दबाया और बगल में चल रहे सूरज की तरफ़ देखा। सूरज की गहरी और जलती हुई नज़रें सीधे सोनी की कमर और स्कर्ट के उस हिस्से पर टिकी थीं, जहाँ उसकी जेब में वह काली पैंटी सुरक्षित रखी थी। सूरज के चेहरे पर एक कुटिल और विजयी मुस्कान थी, मानो वह आँखों ही आँखों में अपनी मौसी के उस बिना कपड़े वाले बदन की बेबसी का लुत्फ़ उठा रहा हो।

सोनी (अपनी सांसों को संभालते हुए, विकास से): "नहीं विकास जी... बस पहाड़ों की हवा थोड़ी तेज़ है ना, इसलिए सँभाल रही हूँ।"

सोनी की आवाज़ में वह कंपन साफ़ था, जिसे विकास ने उसकी सामान्य घबराहट समझा, पर सूरज उस कंपन के पीछे छिपी असली आग को बख़ूबी पहचानता था। उस ठंडी धूप में चलते हुए भी, सोनी का वह बिना पैंटी वाला बदन सूरज की दी हुई इस गुप्त कामुक सज़ा की वजह से अंदर ही अंदर सुलग रहा था, और सोनी अपनी नग्न मुनिया के साथ उस पल की तरफ़ बढ़ रही थी जहाँ यह रोमांच अपनी चरम सीमा को छूने वाला था।

टैक्सी के दरवाज़े पर पहुँचकर विकास ने आगे बढ़कर फ्रंट सीट का दरवाज़ा खोला। वह बिना किसी छिपे हुए इरादे के, बेहद सामान्य तरीके से आगे की सीट पर बैठ गया ताकि रास्ते में ड्राइवर से नैनी पीक के मार्ग और उससे जुड़ी सावधानियों के बारे में बात कर सके। बैठते हुए उसने पीछे मुड़कर सहजता से कहा, "सोनी, सूरज, तुम दोनों पीछे बैठ जाओ।"

विकास के इस सामान्य से कदम ने पीछे की सीट पर एक बेहद विस्फोटक स्थिति की ज़मीन तैयार कर दी।

पहले सूरज अंदर की तरफ़ जाकर बैठ गया। उसके ठीक बाद जैसे ही सोनी ने अपनी सफ़ेद घेरदार स्कर्ट को सँभालते हुए अंदर कदम बढ़ाया और सीट पर बैठने के लिए नीचे झुकी, सूरज ने पलक झपकते ही अपना मज़बूत हाथ सीट पर ठीक उस जगह फैला दिया जहाँ सोनी को बैठना था।

चूँकि स्कर्ट का घेरा बैठने की मुद्रा में स्वाभाविक रूप से थोड़ा ऊपर की तरफ़ खिंच गया था, इसलिए जैसे ही सोनी का बदन नीचे आया, उसके पुष्ट और भरे हुए नितंबों का निचला हिस्सा बिना किसी रुकावट के सीधे सूरज की नग्न, पर गर्म हथेली पर टिक गया। बीच में कपड़े की कोई भी दीवार न होने के कारण सूरज के पोरों को सोनी के जिस्म की वह रेशमी, मखमली कोमलता और अंदरूनी हरारत साक्षात महसूस हुई।

इस अप्रत्याशित और सीधे स्पर्श से सोनी के रीढ़ की हड्डी में एक ज़ोरदार सिहरन दौड़ी। वह पूरी तरह चौंक उठी और उसकी आँखें फैल गईं। उसने झटके से सूरज की तरफ़ देखा, जहाँ सूरज के चेहरे पर एक धीमा, मदहोश कर देने वाला और आक्रामक सम्मोहन था। उसकी उंगलियाँ अब सोनी के नितंबों के निचले हिस्से को अपनी पकड़ में कसने लगी थीं।

सोनी का दिल इतनी तेज़ी से धड़क रहा था कि उसे लगा उसकी आवाज़ बाहर आ जाएगी, पर आगे की सीट पर बैठे विकास की उपस्थिति के कारण वह चाहकर भी न तो चिल्ला सकती थी और न ही कोई कड़ा विरोध दर्ज करा सकती थी। लोक-लाज और पकड़े जाने के उस तीखे डर ने उसकी उत्तेजना को चरम पर पहुँचा दिया।

खुद को इस असहज और कामुक स्थिति से बचाने और अपने इस गुप्त रहस्य को छुपाने के लिए, सोनी ने तुरंत अपनी बगल में रखी पीली शॉल को उठाया और उसे अपने पैरों और जाँघों के ऊपर इस तरह ओढ़कर फैला लिया कि बाहर से कुछ भी दिखाई न दे। शॉल के उस पर्दे के नीचे, विकास की नज़रों से दूर, पहाड़ों के उन घुमावदार रास्तों पर गाड़ी के हर मोड़ के साथ सूरज की उंगलियाँ सोनी के उस तप्त और नग्न मांस को अपने अधिकार के साथ सहला रही थीं, और सोनी अपनी आँखें मूँदकर उस वर्जित सुख के भँवर में डूबती जा रही थी।

शॉल के उस झीने और सुरक्षित पर्दे के नीचे, टैक्सी की सीट पर एक मूक और अत्यंत तीव्र वासना का खेल चल रहा था। जैसे-जैसे गाड़ी नैनीताल के पथरीले और घुमावदार रास्तों पर आगे बढ़ रही थी, मोड़ों के बहाने सूरज का दबाव और उसकी उंगलियों की हरकत सोनी के उस नग्न, मांसल हिस्से पर और गहरी होती जा रही थी।

कपड़ों की किसी भी दीवार के न होने के कारण, सूरज की तपती हुई उंगलियाँ अब सोनी के नितंबों के निचले हिस्से से आगे बढ़कर सीधे उसकी जाँघों के उस सबसे संवेदनशील और गुप्त मुहाने तक पहुँच चुकी थीं।


हवा ओर पानी अपना रास्ता खुद खोज लेते है। सूरज की उंगलियों ने भी मुनिया के द्वार का रास्ता खोज लिया जो स्वयं अपनी लार टपकाते हुए उसी का इंतजार कर रही थी।

शॉल के नीचे, विकास की नज़रों से पूरी तरह छिपकर, सूरज ने अपनी उंगली को सोनी की उस तप्त, कोमल मुनिया के अंदर धीरे से उतार दिया।

जैसे ही सूरज की उंगली ने उस मखमली गहराई को छुआ और उसके भीतर धीरे-धीरे घूमना शुरू किया, सोनी के पूरे वजूद में एक अजब सी, असहनीय बेचैनी दौड़ गई। वह बेचैनी ऐसी थी जो सीधे उसकी रीढ़ से होते हुए उसके दिमाग पर हावी हो रही थी। जब-जब सूरज की उंगली उस नम और बेहद संवेदनशील मुहाने के भीतर एक घेरा बनाती, सोनी के भीतर का तापमान और बढ़ने लगता। उसकी जाँघें खुद-ब-खुद भींचने लगतीं, पर सूरज की मज़बूत पकड़ उसे और आज़ादी देती।

सोनी के अंतर्मन में एक भयानक द्वंद्व और तूफ़ान खड़ा हो गया था। आगे की सीट पर उसका पति विकास बैठा था, जो अनजाने में ही सही, इस पूरे खेल का रचयिता था। पकड़े जाने का वह तीखा, खौफनाक डर और दूसरी तरफ़ जाँघों के बीच से उठती वह अदम्य, आदिम उत्तेजना—दोनों ने मिलकर सोनी की चेतना को सुन्न कर दिया था।

जब भी गाड़ी किसी तीखे मोड़ पर मुड़ती और सूरज की उंगली उस मखमली रस से भीगी गहराई में थोड़ा और जोर से घूमती, सोनी के मुँह से एक सिसकी निकलने को होती। वह तुरंत अपने दाँतों से अपने निचले होंठ को भींच लेती ताकि कोई आवाज़ बाहर न आए। उसकी कजरारी आँखें मूँद जातीं और उसकी सांसें इतनी भारी और तेज़ हो जातीं कि उसका पीला टॉप उसकी छाती के उभारों के साथ तेज़ी से ऊपर-नीचे होने लगता।

वह चाहकर भी सूरज को हटा नहीं पा रही थी, क्योंकि वह बेचैनी अब एक ऐसे मादक नशे में बदल चुकी थी जिसका अंत वह खुद इस चलती गाड़ी में, मर्यादाओं को पूरी तरह भस्म करते हुए देखना चाहती थी। सूरज की उंगलियों की हर हरकत सोनी को उस मुकाम पर धकेल रही थी जहाँ सही और गलत का हर फासला मिट जाता है।

टैक्सी के रुकते ही वासना का वह मूक और तीखा खेल वहीं थम गया। गाड़ी अब नैनी पीक के मुख्य पड़ाव पर खड़ी थी। सोनी ने झटके से अपने बदन को थोड़ा सीधा किया, शॉल को समेटा और अपनी बिखरी हुई सांसों को काबू में करने का प्रयास किया। गाड़ी का दरवाज़ा खुलते ही वह अपनी सफेद स्कर्ट को संभालती हुई तुरंत बाहर उतर आई। पहाड़ों की बर्फीली हवा ने एक बार फिर उसकी नंगी जाँघों को छुआ, जिससे उसकी सिहरन और बढ़ गई।

सूरज भी अपनी मखमली और विजयी मुस्कान के साथ गाड़ी से बाहर आया। विकास अभी आगे बढ़कर ड्राइवर से कुछ बात कर रहा था, इसी का फायदा उठाकर सूरज बिल्कुल सोनी के सामने आकर खड़ा हो गया। उसने अपनी आँखों में गहरे सम्मोहन के साथ सीधे सोनी की कजरारी आँखों में झाँका और अपनी उसी मध्यमा उंगली (middle finger) को, जो कुछ देर पहले तक सोनी की मखमली गहराई का रस चख रही थी, धीरे से अपने होठों से छुआकर चूम लिया।

सूरज की इस बेबाक और कामुक हरकत ने सोनी के भीतर जैसे एक करंट दौड़ा दिया। लज्जा, उत्तेजना और पकड़े जाने के डर से उसने तुरंत अपनी नज़रें सूरज के चेहरे से फेर लीं। उसका दिल अभी भी ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था और जाँघों के बीच का वह गीलापन उसे एक अजब सी बेचैनी दे रहा था।

खुद को सामान्य दिखाने के लिए सोनी तुरंत आगे बढ़ी और विकास के करीब जाकर खड़ी हो गई।

सोनी (थोड़ी कांपती और भारी आवाज़ में): "विकास जी... यहाँ से ऊपर की चढ़ाई कितनी और रह गई है? हवा बहुत तेज़ है, हमें जल्दी चलना चाहिए।"

विकास ने मुड़कर अपनी पत्नी के लाल होते चेहरे और उसकी भारी सांसों को देखा। वह उसकी इस घबराहट के पीछे की असली वज़ह से अनजान, उसकी खूबसूरती पर एक बार फिर मुग्ध हो गया।

विकास: "बस थोड़ी ही दूर है सोनी। चलो, तुम दोनों मेरे साथ आओ, ऊपर चलकर कड़क धूप में चाय पिएंगे तो सारी थकान मिट जाएगी।"

विकास आगे-आगे रास्ते पर चढ़ने लगा। सोनी ने अपनी शॉल को बदन पर और कस लिया, लेकिन उसके पैर अभी भी उस चरम छुअन की वज़ह से काँप रहे थे। उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा, पर उसे पता था कि सूरज उसके ठीक पीछे, उसकी बिना पैंटी वाली स्कर्ट के अंदर थिरकते हुए नितम्बों को अपनी आँखों से नापते हुए आगे बढ़ रहा है।

नैनी पीक के मुख्य बिंदु पर हवा का वेग और बढ़ गया था, जिससे चारों तरफ फैली धुंध तेज़ी से तैर रही थी। वहाँ सैलानियों की आवाजाही वाकई बहुत कम थी, जिससे उस शांत और बर्फीले माहौल में एक अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था।

मुख्य चोटी से थोड़ी ही दूरी पर, एक संकरा और पथरीला रास्ता ऊपर की ओर जा रहा था, जहाँ एक अलग व्यू पॉइंट बना हुआ था। वह रास्ता पेड़ों और झाड़ियों के बीच से होकर गुज़रता था, जिसके कारण सामान्यतः आम सैलानी थकान या डर की वजह से वहाँ जाने से बचते थे।

सूरज की युवा आँखों में उस एकांत को देखकर एक अलग ही चमक आ गई। उसने तुरंत ऊपर जाने की इच्छा जताई।

सूरज: "मौसा जी, देखिए वह ऊपर वाला व्यू पॉइंट कितना सही लग रहा है! वहाँ से पूरी घाटी और झील का नज़ारा एकदम साफ़ दिखेगा। चलिए ना, वहाँ चलते हैं।"

विकास ने अपनी भारी सांसों को सँभाला और एक बेंच पर बैठते हुए अपनी दोनों हथेलियों से घुटनों को सहलाया। पहाड़ों की इस तीखी चढ़ाई ने उसके स्टैमिना को पूरी तरह निचोड़ दिया था।

विकास: "अरे नहीं भाई, मेरे बस की तो अब एक कदम भी चलना नहीं है। तुम लोग चाहो तो हो आओ, मैं यहीं बैठकर धूप सेकता हूँ और तस्वीरें खींचता हूँ।"

विकास का मना करना सूरज के लिए किसी मनचाही मुराद के पूरे होने जैसा था। उसने तुरंत सोनी की तरफ़ देखा, जिसकी सफ़ेद स्कर्ट हवा में हल्की-हल्की उड़ रही थी और जाँघों के बीच की वह बिना पैंटी वाली बेबसी उसे अब भी अंदर ही अंदर बेचैन कर रही थी।

सूरज (सोनी की आँखों में आँखें डालते हुए): "मौसी, आप तो चलेंगी ना मेरे साथ? मौसा जी तो थक गए हैं, पर आप इतनी जल्दी हार नहीं मान सकतीं। चलिए, मैं आपको सँभालते हुए ले चलूँगा।"

सोनी ने पहले विकास की तरफ़ देखा, जो पूरी तरह बेफ़िक्र होकर कैमरे के लेंस को साफ़ कर रहा था, और फिर उसने सूरज के उस चौड़े सीने और उसकी आँखों में छिपे उस आमंत्रण को पढ़ा, जो गाड़ी में अधूरी रह गई उस उंगली की हरकत का हिसाब माँग रहा था। सोनी का दिल एक बार फिर ज़ोर से धड़का। उसे पता था कि उस ऊँचे और सुनसान व्यू पॉइंट पर जाने का मतलब क्या है—वहाँ मर्यादा की बची-खुची कसर भी पूरी होनी थी।

सोनी (धीमे से मुस्कुराते हुए और अपनी पीली शॉल को सँभाला): "ठीक है, जब सूरज इतनी ज़िद कर रहा है, तो मैं हो आती हूँ विकास जी। आप यहीं आराम करिए, हम बस दस-पंद्रह मिनट में नज़ारा देखकर वापस आते हैं।"

विकास: "हाँ-हाँ, बिल्कुल जाओ। सूरज, अपनी मौसी का ध्यान रखना, रास्ता थोड़ा संकरा है।"

सूरज (एक कुटिल विजयी मुस्कान के साथ): "आप चिंता मत कीजिए मौसा जी, मौसी को मैं ऐसे सँभालूँगा कि उन्हें कोई शिक़ायत नहीं होगी।"

सोनी ने आगे कदम बढ़ा दिया, और सूरज उसके ठीक पीछे-पीछे उस संकरे रास्ते पर चलने लगा। जैसे ही वे दोनों विकास की नज़रों से ओझल होकर घने देवदार के पेड़ों की ओट में पहुँचे, चारों तरफ़ की धुंध ने उन्हें पूरी तरह अपनी आगोश में ले लिया।


रास्ता पथरीला और चढ़ाई वाला था, जिससे सोनी की सांसें और तेज़ होने लगीं। पैंटी न पहनने के कारण, जब भी वह कदम आगे बढ़ाती, स्कर्ट के भीतर हवा की हर छुअन उसे एक तीखी सिहरन दे रही थी।

सूरज सोनी के ठीक पीछे चल रहा था। उसकी नज़रें सोनी की कमर के लचीले उतार-चढ़ाव और हवा में लहराती सफ़ेद स्कर्ट पर टिकी थीं। कुछ ही मिनटों की चढ़ाई के बाद, वे उस सुनसान व्यू पॉइंट पर पहुँच गए। वहाँ दूर-दूर तक कोई दूसरा सैलानी नहीं था; चारों तरफ केवल ऊंचे पेड़, गहरी खामोशी और धुंध की एक चादर थी।

सोनी ने व्यू पॉइंट की रेलिंग को पकड़कर एक गहरी सांस ली और घाटी के नज़ारे को देखने लगी। तभी सूरज बिल्कुल उसके पीछे आकर खड़ा हो गया। उसने बिना कोई वक़्त गँवाए अपने दोनों हाथ आगे बढ़ाए और सोनी को रेलिंग के सहारे घेरते हुए उसकी पतली कमर को गाउन और स्कर्ट के ऊपर से कसकर पकड़ लिया।

सोनी (चौंकते हुए, पर धीमी आवाज़ में): "सूरज... क्या कर रहा है? यहाँ कोई भी आ सकता है।"

सूरज (सोनी के गले के पास अपनी गर्म सांसें छोड़ते हुए): "कोई नहीं आएगा मौसी। यहाँ सिर्फ हम दोनों हैं। सोनी जहां खड़ी थी वहां से वह रास्ता दिखाई पड़ रहा था जिससे वो दोनों ऊपर आए थे। मतलब साफ था कोई ऊपर आता तो वो उन्हें जरूर दिखाई पड़ता।

सूरज ने अपनी एक हथेली को सोनी की कमर से नीचे सरकाया। सफ़ेद स्कर्ट के घेर को थोड़ा ऊपर उठाते हुए, उसका नग्न और तप्त हाथ सीधे सोनी की रेशमी, नग्न जाँघों से जा टकराया। जब सूरज की उंगलियों ने उस मखमली त्वचा को छुआ।

इस सीधे और बेबाक स्पर्श से सोनी के मुँह से एक दबी हुई कराह निकली। उसने अपनी आँखें मूँद लीं और उसका बदन सूरज के मजबूत सीने से पूरी तरह सट गया। सूरज की उंगलियाँ अब उसकी जाँघों से ऊपर की ओर बढ़ते हुए, उस सबसे संवेदनशील और नम मुहाने की तरफ बढ़ने लगीं, जहाँ सुबह से ही उत्तेजना का एक तूफ़ान सुलग रहा था।

शॉल और स्कर्ट के उस झीने पर्दे के पीछे, सूरज की उंगलियों का स्पर्श सोनी के बदन में बिजली की तरह दौड़ रहा था। जब उसकी उंगलियों ने उस मखमली और पूरी तरह से नग्न गहराई को छुआ, तो सोनी का पूरा वजूद काँप उठा। हवा की ठंडी छुअन और सूरज के हाथ की अदम्य तपिश ने मिलकर उसके भीतर एक ऐसा सैलाब ला दिया था जिसे रोक पाना अब उसके बस में नहीं था।

सूरज ने अपने होठों को सोनी के कान के पास सटाया और बेहद भारी आवाज़ में फुसफुसाया, "मौसी... इस ठंडे पहाड़ पर आपका यह बदन कितना गर्म है। इजाजत हो तो आज की आहुति यहीं दे दी जाए….

सोनी खुद भी गरम हो चुकी थी पर सोनी समझदार थी यहां टूरिस्ट स्पॉट पर इस तरह खुलेआम सेक्स करना संभव नहीं था उसने कहा सूरज यहां यह संभव नहीं..

सूरज ने सोनी की आंखों में आंखें डालते हुए कहा


मौसी अपने ही तो कहा था.. जब चाहे….. जहां चाहे…. जैसे चाहे …..अब आप अपने वादे से पलट रही हो..

सोनी ने रेलिंग पर अपनी पकड़ को और मज़बूत कर लिया। उसके गोरे गोरे गालों पर वासना की लाली फैल गई। उसने अपनी आँखें बंद किए हुए ही अपनी गर्दन को थोड़ा पीछे की तरफ झुकाया, जिससे उसका पूरा बदन सूरज के चौड़े और कसरती सीने में और गहराई से धँस गया।

सोनी (हाँफते हुए, टूटी आवाज़ में): "सूरज... ले कर ले अपने मन की।" इतना कहते हुए सोनी अपने दोनों हाथों से रेलिंग को पकड़ कर सामने झुकती चली गई और उसके नितंब बेहद कामुक तरीके से सूरज को आमंत्रित करने लगे।

सोनी की यह बेबाक और आत्मसमर्पण देखकर सूरज के भीतर का पुरुषार्थ अपनी चरम सीमा पर पहुँच गया। उसने एक हाथ से सोनी की स्कर्ट को पूरी तरह ऊपर की तरफ समेट दिया, जिससे उसके पुष्ट, गोरे और पूरी तरह से नग्न नितंब उस धुंधली रोशनी में पूरी तरह अनावृत हो गए। दूसरे हाथ से उसने अपनी पैंट की जिप को नीचे सरकाया, और उसका वह विराट, तपा हुआ पौरुष अपनी पूरी कठोरता के साथ बाहर आ गया।

सूरज ने सोनी को थोड़ा और आगे की तरफ झुकाया। सोनी ने रेलिंग को मजबूती से थाम लिया और अपनी जाँघों को थोड़ा फैला दिया, जिससे उसकी वह तप्त और गीली गहराई सूरज के उस कड़े अंग के सामने पूरी तरह से खुल गई।

बिना एक पल की भी देरी किए, सूरज ने अपने पौरुष के शीर्ष भाग को सोनी के उस मखमली मुहाने पर टिकाया और एक ही गहरे, प्रचंड और सधे हुए प्रहार के साथ उसे सोनी के भीतर पूरा उतार दिया।

"आहहह... सूरज...!" सोनी के मुँह से एक तीखी, मादक और दर्दभरी कराह निकली, जो उस एकांत घाटी में गूँज कर रह गई। उसकी जाँघें इस आकस्मिक और गहरे मिलन से थर-थर काँपने लगीं। बीच में कपड़े की कोई भी दीवार न होने के कारण, सूरज का वह तप्त लिंग सोनी की उस अनंत कोमलता को चीरता हुआ उसकी गहराई के अंतिम छोर तक जा टकराया था।

सूरज ने सोनी की पतली कमर को दोनों हाथों से जकड़ लिया और अपनी गति को तीव्र करना शुरू कर दिया। हर अंदरूनी प्रहार के साथ, उन दोनों के जिस्मों के टकराने की एक सोंधी और मादक आवाज़ हवा में तैरने लगी। सोनी की सफ़ेद स्कर्ट हर धक्के के साथ हवा में लहरा रही थी, और उसका पीला टॉप उसकी छाती के भारी उभारों के साथ तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रहा था।

नैनी पीक की उस बर्फीली धुंध के बीच, मर्यादा की हर सीमा पूरी तरह से भस्म हो चुकी थी। विकास नीचे बेंच पर बैठा अनजाने में जिस हकीकत की पटकथा लिख रहा था, उसे सूरज और सोनी उस ऊँचे पॉइंट पर पूरी तरह से सच कर रहे थे।

सूरज के हर एक गहरे प्रहार के साथ सोनी के मुँह से निकलने वाली सिसकियाँ और तेज़ होती जा रही थीं। रेलिंग को थामे हुए उसका पूरा बदन इस प्रचंड वेग के सामने पूरी तरह समर्पित हो चुका था। पहाड़ों की वह ठंडी हवा अब उन दोनों के जिस्मों से उठती गर्मी के सामने बेअसर साबित हो रही थी। सूरज ने अपनी पकड़ सोनी की कमर पर और मज़बूत कर ली, जिससे हर धक्के के साथ दोनों की देह एक-दूसरे से पूरी शिद्दत से टकरा रही थी।

सूरज का उन्माद अब नियंत्रण की हर सीमा को लांघ चुका था। उसने अपनी एक मज़बूत हथेली को आगे बढ़ाकर सोनी के पीले टॉप के भीतर से उसकी भारी और तप्त छाती के उभार को पूरी मर्दानगी और अधिकार के साथ भींच लिया।

बिना एक पल गंवाए, सूरज ने अपने दूसरे हाथ से सोनी की एक सुडौल और नग्न जांघ को ऊपर उठाया और उसे लोहे की ठंडी रेलिंग पर टिका दिया। इस नई मुद्रा ने सोनी के उस मखमली मार्ग को सूरज के पौरुष के सामने पूरी तरह से अनावृत और बेबस कर दिया। अब उनके बीच की दूरी शून्य हो चुकी थी और प्रवेश का रास्ता पूरी तरह सीधा और गहरा हो गया था।

सोनी प्रचंड वासना के आगोश में डूबी सूरज की मर्दानगी को अपने भीतर समाहित कर रही थी।

इस अद्भुत संभोग के दौरान सूरज अपनी हथेली से कभी सोनी की एक चूची को पूरी ताकत से पकड़ता, तो कभी अपनी एक ही हथेली में उसकी दोनों चूचियों को एक साथ जकड़ने की कोशिश करता। पर जितनी बड़ी और मर्दानी सूरज की हथेली थी, सोनी की चूचियाँ शायद आकार में उससे भी कहीं बड़ी और भरी हुई थीं। उसकी हथेलियों से फिसलते उन भारी उभारों को एक साथ मुट्ठी में भींचने का वह अंदाज़ बेहद अनोखा और कामुक था। सोनी के लिए अपने स्त्रीत्व का यह मथना और चूचियों पर सूरज की उंगलियों का वह तीखा दबाव एक ऐसा सुख दे रहा था जो उसने पहले कभी महसूस नहीं किया था। इस गहरे स्पर्श से सोनी के मुँह से वासना की एक और भारी सिसकी निकली।

आह …सूरज…बस ऐसे ही….

सोने की मादक कराह ने सूरज में उत्साह भर दिया। सूरज ने अपनी कमर को एक ज़ोरदार झटका दिया, जिससे उसका वह कड़ा और नस-नस उभरा हुआ अंग सोनी की उस रस से सराबोर गहराई में जड़ तक धंस गया।

"उफ्फ़... आआह्ह... सूरज... तनी धीरे…. से….....!" सोनी का पूरा वजूद इस गहरे और तीखे प्रहार से थरथरा उठा।

जांघ के रेलिंग पर टिके होने के कारण सूरज के हर धक्के का वेग सीधे उसकी गहराई के अंतिम छोर को मथ रहा था। सूरज ने अब अपनी गति को अत्यंत उग्र और तीव्र कर दिया। हर अंदरूनी प्रहार के साथ दोनों के गुप्तांगों के आपस में भीषण और बेबाक तरीके से टकराने की एक तीखी, चिपचिपी और कामुक आवाज़ उस सन्नाटे में गूँजने लगी। उस तप्त मार्ग से निकलता हुआ कामरस सूरज के कड़े अंग को और भी चिकना बना रहा था, जिससे हर धक्का एक कटीली सनसनी पैदा कर रहा था।

सोनी ने आँखें मीच रखी थीं और वह हवा में बेतरतीब लहराती अपनी सफ़ेद स्कर्ट के बीच पूरी तरह नग्न होकर उस आदिम सुख की पराकाष्ठा पर झूल रही थी। उसकी छाती का वह भारी उभार सूरज की उंगलियों की जकड़ में पूरी तरह से कुचल रहा था, और नैनी पीक की उस बर्फीली धुंध में दोनों मर्यादा और लोक-लाज को पूरी तरह भस्म करते हुए वासना के उस घने भंवर में डूबते चले गए जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं था।

सोनी (आँखें बंद किए, हाँफती हुई आवाज़ में): "सूरज... आह्... बस ऐसे ही... रुकना मत...!"

सूरज का पौरुष भी अब अपनी चरम सीमा पर था। उसने गति को और भी तीव्र कर दिया, जिससे सोनी के बदन में एक तीव्र कंपन होने लगा। उस सुनसान व्यू पॉइंट की धुंध में दोनों कामुकता के उस शिखर पर पहुँच चुके थे जहाँ लोक-लाज और मर्यादा पूरी तरह मिट चुकी थी।

तभी, नीचे मुख्य पॉइंट से विकास की आवाज़ गूँजी, "सूरज... सोनी... कहाँ रह गए तुम दोनों? अब वापस आ जाओ, बहुत देर हो रही है!"

विकास की आवाज़ कानों में पड़ते ही सोनी के भीतर पकड़े जाने का डर और उत्तेजना एक साथ चरम पर पहुँच गए। उसी झटके के साथ, सूरज ने एक आखिरी और गहरा प्रहार किया, और संतान सप्तमी की छठी आहुति सोनी के गर्भ को तृप्त कर गई। चरम सुख की पराकाष्ठा पर सूरज सोनी पर पूरी तरह झुक गया और उसकी गर्दन को चूमते हुए अंदर स्खलित होता रहा।

सोनी और सूरज दोनों हाफ रहे थे पर उस हालत में भी सूरज सोनी की सम्हाले हुए था। मौसी आप ठीक हैं ना।

सोनी अपनी उखाड़ता हुई सांसों को काबू में करते हुए बोली…हां मैं ठीक हूं तू ठीक है ना?

सोनी ने अपनी गर्दन घुमाई और सूरज की ओर देखा सूरज ने उसके सूखे हुए अधरों को चूम लिया…

सूरज ने तुरंत खुद को सँभाला और अपनी पैंट ठीक की। सोनी ने भी काँपते हाथों से अपनी सफ़ेद स्कर्ट के घेर को नीचे किया और शॉल को बदन पर लपेट लिया। दोनों के चेहरों पर उस वर्जित मिलन की लाली साफ़ चमक रही थी।

पर जैसे ही सोनी खड़ी हुई उसकी मुनिया से सूरज का वीर्य रिश्ते हुए उसकी जांघों पर आने लगा।

सोनी ने सूरज की तरफ देखते हुए बोला..


अब तो मेरी पैंटी दे दे

सूरज ने मुस्कुराते हुए …अपनी जेब से वह काली पैंटी निकाली और नीचे बैठते हुए पैंटी को फैलाकर सोनी को उसमें अपने पैर डालने के लिए आमंत्रित किया…

सूरज ने पैंटी को सरका कर सोनी की जांघों तक पहुंचा दिया और सोनी ने आगे उसे उसकी जगह पर…सोनी को मुनिया को अब उसकी आहुति और उसका आवरण मिला चुका था।

सूरज (धीमी आवाज़ में मुस्कुराते हुए): "चलिए मौसी, मौसा जी बुला रहे हैं। आज का यह नज़ारा हमेशा याद रहेगा।"

सोनी ने अपनी बिखरी ज़ुल्फ़ों को सँभाला और सूरज को एक गहरी, तृप्त नज़र से देखते हुए आगे बढ़ गई। सोनी की चाल में एक लचक आ चुकी थी जो शायद इस नए आसन में संभोग करने के कारण जन्मी थी।

सूरज..मुस्कुरा रहा था और सोनी उसकी कातिल निगाहों को अपनी बलखाती कमर पर महसूस कर शर्मशार हो रही थी…और इस अद्भुत चूदाई का एहसास और जांघों से रिसते हुए वीर्य को महसूस करते धीरे-धीरे सूरज के पीछे चल रही थी।


जब वे दोनों नीचे पहुँचे, तो विकास कैमरे के साथ उनका इंतज़ार कर रहा था। वह इस बात से पूरी तरह अनजान था कि ऊपर के व्यू पॉइंट पर 'संतान सप्तमी' की छठी आहुति सकुशल संपन्न हो चुकी थी और अब इंतजार था विकास के सपने पूरे होने का और उसे अद्भुत पूर्ण आहुति का जिसकी कल्पना विकास पिछले कुछ दिनों से कर रहा था…

सोनी भी आखिरकार अपने पति की इच्छा का मान रखते हुए उस अनोखी पूर्णाहुति के लिए खुद को तैयार कर रही थी।

शेष अगले भाग में..
 
भाग 200

जब वे दोनों नीचे पहुँचे, तो विकास कैमरे के साथ उनका इंतज़ार कर रहा था। वह इस बात से पूरी तरह अनजान था कि ऊपर के व्यू पॉइंट पर 'संतान सप्तमी' की छठी आहुति सकुशल संपन्न हो चुकी थी और अब इंतजार था विकास के सपने पूरे होने का और उसे अद्भुत पूर्ण आहुति का जिसकी कल्पना विकास पिछले कुछ दिनों से कर रहा था…

सोनी भी आखिरकार अपने पति की इच्छा का मान रखते हुए उस अनोखी पूर्णाहुति के लिए खुद को तैयार कर रही थी।

अब आगे..

विकास अपनी बेंच से उठ खड़ा हुआ और उसने दोनों के चेहरों को गौर से देखा। सोनी के चेहरे पर पहाड़ों की ठंड के बावजूद एक अस्वाभाविक सुर्खी और लाली थी, और उसकी सांसें अब भी पूरी तरह सामान्य नहीं हो पाई थीं। उधर सूरज के चेहरे पर एक ऐसी तृप्ति और विजय की चमक थी जिसे छुपा पाना उसके लिए मुश्किल हो रहा था।

विकास ने सोनी के करीब आकर उसके जैकेट के कॉलर को थोड़ा ठीक किया और मुस्कुराते हुए बोला, "अरे सोनी, तुम्हारे गाल तो एकदम लाल हो गए हैं। लगता है ऊपर की बर्फीली हवा तुम्हें कुछ ज़्यादा ही लग गई।

सोनी ने घबराहट में अपनी शॉल को बदन पर और कस लिया। उसे हर पल यह डर सता रहा था कि उसकी बिना पैंटी वाली स्कर्ट के नीचे का गीलापन कहीं उसकी चाल से ज़ाहिर न हो जाए। उसने अपनी कजरारी नज़रें झुकाते हुए बात को सँभाला।

सोनी (धीमी और थोड़ी कांपती आवाज़ में): "हाँ विकास जी, ऊपर हवा बहुत तेज़ और बर्फीली थी। खड़े होना भी मुश्किल हो रहा था, इसलिए हम बस एक नज़र देखकर तुरंत नीचे आ गए। अच्छा हुआ आप ऊपर नहीं गए।"

सूरज ने विकास के कंधे पर हाथ रखा और एक गहरी, मादक मुस्कान के साथ कहा, "हाँ मौसा जी, मौसी बिल्कुल सच कह रही हैं। ऊपर का नज़ारा वाकई इतना 'प्रचंड' और गहरा था कि उसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। मौसी तो ऊपर जाते ही पूरी तरह काँप उठी थीं। मैंने बस उन्हें थोड़ा सँभाला और हम नीचे आ गए।"

सूरज के इस दोहरे अर्थ वाले वाक्य को सुनकर सोनी के बदन में एक बार फिर सिहरन दौड़ गई। उसने चोरी-छिपे सूरज को एक ऐसी तीखी और कामुक नज़र से देखा, जिसमें डांट भी थी और उस वर्जित मिलन का असीम आभार भी।

विकास (अनजान बनते हुए हंस पड़ा): "चलो-चलो, कोई बात नहीं। अब धूप भी ढलने लगी है और ठंड बढ़ रही है। नीचे मुख्य बाज़ार की तरफ चलते हैं, वहाँ किसी अच्छे रेस्तरां में बैठकर गर्मा-गरम कॉफ़ी पीते हैं। आज का दिन वाकई बहुत यादगार रहा।"

तीनों वापस नीचे की ओर बढ़ने लगे। विकास आगे-आगे चल रहा था, और सोनी उसके पीछे अपनी स्कर्ट को संभालती हुई बेहद संभल-संभल कर कदम रख रही थी। सूरज उसके ठीक पीछे था, उसकी आँखें सोनी के नितंबों के उस थिरकते हुए उभार पर टिकी थीं, जिसे कुछ ही देर पहले उसने अपने प्रचंड पौरुष से मथा था।

नैनीताल की वह शाम धीरे-धीरे और घनी तथा सर्द होती जा रही थी। दिनभर की शारीरिक थकान और पहाड़ों की बर्फीली हवाओं से बचने के लिए तीनों जल्द ही होटल आ गए…

सोनी और विकास जब तक संतान सप्तमी की आहुति की तैयारी करते हैं तब तक लिए आपको लखनऊ लिए चलते हैं जहां हमारी मोम की गुड़िया पिंकी एक नई दुनिया में प्रवेश कर रही थी…

जब पिंकी देहरादून से लखनऊ पहुँची, तो उसकी आँखें वहाँ की चकाचौंध को देखकर फटी की फटी रह गईं। अपनी माँ के प्रभाव और पद के कारण मिले उस विशाल, भव्य शासकीय बंगले की शानो-शौकत ने पिंकी को अंदर तक प्रभावित कर दिया था। ऊंचे-ऊंचे नक्काशीदार दरवाज़े, बंगले के सामने फैला हरा-भरा लॉन, मुस्तैद खड़े कर्मचारी और वहाँ का रसूखदार माहौल देखकर पिंकी को पहली बार अपनी माँ की असली ताकत और रुतबे का अहसास हुआ था। वह मन ही मन इस वैभव को देखकर बेहद रोमांचित और सम्मोहित थी।

लेकिन पिंकी के दिल में एक अलग ही बेचैनी और धड़कन चल रही थी। वह बेसब्री से एक ऐसे मोड़ का इंतज़ार कर रही थी जो उसके भविष्य की दिशा तय करने वाला था। उसने कुछ समय पहले ही NEET (नीट) की कठिन परीक्षा दी थी, और आज उसका परिणाम (रिजल्ट) घोषित होने वाला था।

सुबह से ही बंगले में पिंकी का मन तनावपूर्ण और उत्सुकता से भरा था। पिंकी बार-बार अपने लैपटॉप की स्क्रीन पर उंगलियां चला रही थी, उसका दिल किसी धौंकनी की तरह तेज़ी से धड़क रहा था।

और फिर, ठीक दोपहर के वक्त वह पल आ ही गया। जैसे ही उसने वेबसाइट पर अपना रोल नंबर डाला और पेज रिफ्रेश हुआ, स्क्रीन पर चमकते हुए नंबरों ने उसकी दुनिया बदल दी।

पिंकी नीट की परीक्षा में न केवल पास हो गई थी, बल्कि उसने बेहद शानदार अंकों के साथ सफलता हासिल की थी!

रिजल्ट देखते ही पिंकी के मुँह से एक चीख निकल गई। उसकी आँखों में खुशी के आँसू तैर गए। डॉक्टर बनने का उसका जो सपना था, अब उसकी पहली और सबसे मज़बूत नींव रखी जा चुकी थी। बंगले के शांत और गंभीर माहौल में अचानक उत्सव का रंग घुल गया। उसने इसकी सूचना तुरंत अपनी मां मनोरमा को दी।

इस बड़ी सफलता ने पिंकी के भीतर एक नया आत्मविश्वास भर दिया था। वह अब केवल एक साधारण लड़की नहीं थी, बल्कि सफलता की सीढ़ी चढ़ चुकी एक भावी डॉक्टर थी। लेकिन नियति की मुस्कान कुछ और ही कह रही थी; लखनऊ के इस रसूखदार बंगले में मिली यह कामयाबी, पिंकी के जीवन में आगे चलकर किन नए और गुप्त रिश्तों की नींव रखने वाली थी, इससे वह अभी पूरी तरह अनजान थी।

नीट (NEET) में पिंकी की इस अभूतपूर्व सफलता की सूचना पाकर मनोरमा अपने सारे प्रशासनिक काम और औपचारिकताएं छोड़कर भागते हुए सीधे बंगले पर आ गईं। एक सख्त और रसूखदार अधिकारी के रूप में पहचानी जाने वाली मनोरमा आज केवल एक गौरवान्वित माँ थीं। कमरे में दाखिल होते ही उन्होंने बिना एक पल गंवाए अपनी बेटी पिंकी को पूरी शिद्दत से गले से लगा लिया। पिंकी की यह सफलता निश्चित रूप से मनोरमा के सामाजिक और प्रशासनिक रुतबे को और भी ऊंचा करने वाली थी, और अपनी माँ की आँखों में यह सम्मान देखकर पिंकी का दिल भी गर्व से भर उठा।

इस बड़ी खुशखबरी के बाद पूरे शासकीय बंगले में उत्सव का माहौल हो गया। मनोरमा ने इस ऐतिहासिक मौके को यादगार बनाने के लिए शाम को ही शहर के तमाम आला अधिकारियों और गणमान्य लोगों को आमंत्रित कर एक शानदार पार्टी का आयोजन किया।

शाम होते ही पूरा बंगला रोशनी से जगमगा उठा, लेकिन उस महफ़िल की असली रौनक तो पिंकी थी। पेस्टल रंग के खूबसूरत लिबास में जब पिंकी मेहमानों के बीच पहुँची, तो उसकी सादगी, मासूमियत और खिलती हुई खूबसूरती ने सबका मन मोह लिया। वहाँ मौजूद हर शख्स की नजरें बस उसी गुड़िया जैसी लड़की पर आकर टिक गई थीं।

भीड़ में मौजूद उम्रदराज महिलाएं और सज्जन पिंकी के इस शालीन रूप और उसकी इतनी बड़ी कामयाबी को देखकर उसे अपने घर की बहू बनाने के सपने बुनने लगे, तो कुछ उसे अपनी बेटी के रूप में देखकर गर्व महसूस कर रहे थे। लेकिन उसी महफ़िल के एक कोने में खड़े कुछ कामुक युवा अधिकारी और रसूखदार घरों के लड़के भी थे, जिनकी नजरें बिल्कुल अलग थीं। वे सभ्यता के मुखौटे के पीछे से पिंकी की इस नई-नई उभरती हुई जवानी, उसके सुडौल बदन और उसकी मासूमियत को अपनी भूखी आँखों से नाप रहे थे। पिंकी की उभरती जवानी सबका मन मोहने वाली थी।

नीट (NEET) जैसी कठिन परीक्षा में इतनी शानदार सफलता पाने के बाद पिंकी के भीतर का सारा तनाव जैसे कपूर हो गया था। अब वह पूरी तरह से उन्मुक्त और आज़ाद महसूस कर रही थी। और हो भी क्यों न, उसने अपनी रातों की नींद और दिन का चैन दांव पर लगाकर वह मुकाम हासिल किया था, जिसका उसने सपना देखा था। अब उसके सामने एक लंबी, बेफ़िक्र छुट्टियां थीं और अपनी मर्जी से जीने की पूरी आज़ादी थी।

दोपहर के वक्त, जब बंगले के ज्यादातर कर्मचारी अपने-अपने कामों में व्यस्त थे और माँ अपने शासकीय दौरों पर थीं, पिंकी अकेले उस विशाल लिविंग रूम में आलीशान सोफे पर पसर गई। उसने हाथ में रिमोट लिया और टीवी स्क्रीन पर अलग-अलग ओटीटी प्लेटफॉर्म्स को स्क्रोल करने लगी।

तभी उसका ध्यान नेटफ्लिक्स (Netflix) पर गया। उसने आज से पहले कभी इस तरह आज़ादी से कंटेंट एक्सप्लोर नहीं किया था। हॉस्टल और स्कूल के कड़े नियमों और पाबंदियों के बीच उसे इस तरह के मनोरंजन की सुविधा कहाँ मयस्सर थी! पर अब, इस आलीशान शासकीय बंगले के एकांत में वह हर पाबंदी से परे थी।

उंगलियां रिमोट पर थिरक रही थीं और हॉलीवुड फिल्मों की लिस्ट सामने से गुज़र रही थी। अचानक स्क्रोल करते-करते उसकी नजर 'द ब्लू लगून' (The Blue Lagoon) फिल्म के पोस्टर पर जाकर टिक गई। पोस्टर पर नीले समंदर, घने जंगलों और दो बेहद खूबसूरत, मासूम किरदारों की झलक थी। पिंकी के भीतर की उत्सुकता और कौतूहल जाग उठा। उसने बिना ज्यादा सोचे रिमोट का बटन दबाया और फिल्म पर क्लिक कर दिया।

पूरे आलीशान हॉल में पिंकी बिल्कुल अकेली थी। टीवी की बड़ी स्क्रीन पर फिल्म शुरू हुई—एक सुनसान, बेहद खूबसूरत और अछूते द्वीप (island) की कहानी, जहाँ दो बच्चे सभ्यता से दूर, प्रकृति की गोद में अकेले बड़े होते हैं। शुरुआत में पिंकी उस अद्भुत प्राकृतिक सुंदरता, नीले पानी और फिल्म के दृश्यों में खो गई। उसे यह सब किसी जादुई दुनिया जैसा लग रहा था।

पर जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ी, कहानी ने एक बिल्कुल नया और गहरा मोड़ लिया। द्वीप पर अकेले बड़े हो रहे उन दोनों किशोर किरदारों के भीतर उम्र के साथ शारीरिक और हार्मोनल बदलाव आने लगते हैं। समाज, लोक-लाज या किसी भी नियम-कायदे से अनजान, वे दोनों धीरे-धीरे एक-दूसरे के आकर्षण में बंधने लगते हैं।

स्क्रीन पर जब उन दोनों के बीच के प्राकृतिक, मासूम और अत्यंत तीव्र शारीरिक आकर्षण के दृश्य उभरने लगे, तो सोफे पर बैठी पिंकी का बदन जैसे सुन्न हो गया। फिल्म में जो कुछ हो रहा था—बिना किसी हिचक के दो शरीरों का एक-दूसरे में खो जाना, वह आदिम और शुद्ध कामुकता—उसने पिंकी को अंदर तक हिलाकर रख दिया।

किताबों और पढ़ाई की दुनिया में डूबी रहने वाली पिंकी ने कभी इस तरह की भावनाओं और दृश्यों को इतनी गहराई से महसूस नहीं किया था। टीवी की स्क्रीन से निकलती रोशनी पिंकी के चेहरे पर पड़ रही थी, जहाँ आश्चर्य, घबराहट और एक अजीब सी अनजानी उत्तेजना के भाव एक साथ उभर रहे थे। उसका दिल तेज़ी से धड़कने लगा और वह अपनी पलकें झपकाना भी भूल गई।

फिल्म के उस सम्मोहक और आदिम दृश्य में डूबी पिंकी के भीतर एक ऐसा ज्वार उठ रहा था, जिससे वह अब तक पूरी तरह अनजान थी। बड़ी स्क्रीन पर दो जिस्मों का वह बेबाक मिलन उसके अंतर्मन की गहराइयों को झकझोर रहा था। कमरे की खामोशी में केवल उसकी अपनी तेज़ होती सांसों की आवाज़ गूँज रही थी।

उम्र के इस पड़ाव पर आते-आते, किताबों और सख्त अनुशासन के पीछे दबी हुई उसकी शारीरिक चेतना आज अचानक जाग उठी थी। देखते ही देखते, उसके पूरे वजूद में एक अनजानी, मीठी और अत्यंत तीव्र सिहरन दौड़ गई। एक ऐसा अहसास, जो सीधा उसकी नाभि से उठकर उसके पूरे बदन को सुन्न कर रहा था।

ना चाहते हुए भी, एक अज्ञात और आदिम खिंचाव के तहत उसकी हथेली खुद-ब-खुद उसकी जाँघों के उस सबसे गुप्त और संवेदनशील मुहाने की तरफ बढ़ने पर मजबूर हो गई। जब पिंकी का हाथ उसकी नाइट ड्रेस के भीतर सरका, तो वह खुद हैरान रह गई। आज पहली बार उसने अपने उस बेहद निजी हिस्से पर इतना सारा अद्भुत, चिपचिपा और गर्म कामरस महसूस किया था। उसका पूरा बदन इस नए और अछूते अनुभव से काँप उठा।

जैसे ही उसकी काँपती हुई उंगलियों के पोरों ने उस मखमली, रस से भीगी गहराई के सबसे संवेदनशील बिंदु को धीरे से छुआ, उसके पूरे शरीर में बिजली का एक तेज़ करंट सा दौड़ गया। वह तीखा और जादुई स्पर्श ऐसा था कि पिंकी के मुँह से अनजाने में ही एक हल्की, मादक सिसकी निकल गई। उसकी आँखें खुद-ब-खुद मूँद गईं और सोफे पर उसका बदन पूरी तरह से अकड़ गया। जीवन में पहली बार, इस अनजाने और तीव्र शारीरिक सुख के अहसास से वह अंदर तक सिहर उठी थी, जहाँ दुनिया का हर नियम उस पल के लिए पूरी तरह ओझल हो गया था।

जब पिंकी को यह अहसास हुआ कि उसकी पैंटी पूरी तरह से भीग चुकी है, तो अचानक उसे एक घबराहट ने घेर लिया। उस अद्भुत और तीव्र सुख के चरम पर पहुँचते ही वह जैसे होश में आई। खुद को इस तरह एक अनजानी वासना के भँवर में घिरा देख वह अंदर से थोड़ा असहज हो उठी। उसने बिना एक पल गँवाए रिमोट उठाया और तुरंत उस फिल्म को बंद कर दिया। अब उस स्क्रीन को आगे देख पाने में वह खुद को पूरी तरह असहाय महसूस कर रही थी; उसका दिल अभी भी ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।

वह सोफे से उठी और तेज़ी से भागते हुए अपने बेडरूम में चली गई। उसने अपनी नाइट ड्रेस को ऊपर किया और अपनी भीगी हुई पैंटी को शरीर से बाहर निकाला। जब उसने उस पर आए चिपचिपे और गाढ़े कामरस के उस गीले निशान को देखा, तो वह थोड़ी हैरान और घबरा भी गई। अपनी ही देह से निकले इस अद्भुत रस का रूप उसके लिए बिल्कुल नया था।

उसने उसी भीगी हुई पैंटी के सूखे हिस्से से अपनी उस बेहद खूबसूरत और कामरस से सराबोर गहराई को धीरे से पोंछा और साफ किया। इसके बाद, उसने अपनी अलमारी से तुरंत एक दूसरी साफ पैंटी निकाली, उसे पहना और अपने कपड़ों को ठीक किया।

खुद को पूरी तरह सामान्य करने के लिए वह वापस अपनी मेज पर आई और अपनी किताबों के साथ मिलकर एकाग्र होने की कोशिश करने लगी। बाहर से भले ही वह फिर से एक शांत और संजीदा छात्रा बन चुकी थी, लेकिन अंदर से वह पूरी तरह बदल चुकी थी। नीट (NEET) की सफलता के बाद, आज अपनी ही उंगलियों से मिला यह शारीरिक सुख और जागृत हुआ यह स्त्रीत्व पिंकी के लिए जीवन का सबसे अनूठा और कभी न भूलने वाला अहसास बन गया था।

रात के सन्नाटे में जब पूरा शासकीय बंगला सो चुका था, पिंकी अपने आलीशान बेडरूम के मखमली बिस्तर पर लेटी हुई थी। कमरे में खिड़की से छनकर आ रही चाँदनी बिखर रही थी, लेकिन पिंकी की आँखों में नींद कोसों दूर थी। दोपहर के उस अनूठे अहसास की गूँज अब धीरे-धीरे उसके पूरे वजूद पर हावी होने लगी थी।

बिस्तर की गर्माहट में लेटे हुए, उसका मन बार-बार 'द ब्लू लगून' के उन्हीं दृश्यों की ओर खिंचा चला जा रहा था। फिल्म के वे दो किशोर, समाज की बंदिशों से दूर, एक-दूसरे की बाहों में सिमटे हुए जिस जादुई दुनिया का आनंद ले रहे थे, वह छवि पिंकी के दिमाग में अंकित हो चुकी थी।

एक होनहार छात्रा के रूप में उसने अपनी मेडिकल की किताबों में मानव शरीर की संरचना और पुरुष शरीर विज्ञान (Anatomy) के बारे में सब कुछ पढ़ा था। वह रेखाचित्रों और तकनीकी शब्दों से भली-भांति परिचित थी, लेकिन किताबी ज्ञान और हकीकत के अहसास में कितना बड़ा फासला होता है, यह आज उसे समझ आ रहा था। सख्त और अनुशासित हॉस्टल लाइफ में इन सब बातों पर सोचना भी मुमकिन नहीं था।

करवटें बदलते हुए पिंकी के मन में एक बेहद मासूम और स्वाभाविक कौतूहल अंगड़ाइयां ले रहा था। वह कल्पना करने की कोशिश कर रही थी कि किताबों के पन्नों से इतर, असल जिंदगी में किसी पुरुष का स्पर्श कैसा महसूस होता होगा? वह पौरुष, जिसकी ताकत और गर्माहट के बारे में कहानियों में सुना था, असल रूप और आकार में कैसा दिखता होगा? किसी पुरुष की मज़बूत बाहों के घेरे में आने पर एक स्त्री के भीतर कैसी सिहरन दौड़ती होगी?

इन्हीं हल्की-फुल्की, मखमली और अनजानी काम-कल्पनाओं के भँवर में उलझे-उलझे, न जाने कब पिंकी की पलकें भारी हो गईं और वह गहरी नींद के आगोश में समा गई।

नींद में उसका अवचेतन मन उसे एक बेहद खूबसूरत और जादुई सपने की दुनिया में ले गया। सपने में धुंध और चाँदनी के बीच एक अनाम, सुगठित और दिव्य पुरुष आकृति उभर रही थी। उस आकृति का केवल एक स्पर्श ही पिंकी के पूरे बदन में परमानंद की एक मीठी लहर दौड़ा रहा था। किताबों की सूखी दुनिया से दूर, सपनों के इस अछूते संसार में पिंकी पहली बार एक स्त्री सुलभ पूर्णता और असीम सुख के अहसास को महसूस कर रही थी, जहाँ न कोई पाबंदी थी और न ही किसी बात का संकोच।

नींद की उस मखमली वादियों में, पिंकी का अवचेतन मन जिस दिव्य पुरुष की आकृति को गढ़ रहा था, वह कोई काल्पनिक चेहरा नहीं था। धुंध और चाँदनी के बीच उभर कर आने वाला वह सुगठित बदन और सम्मोहक रूप किसी और का नहीं, बल्कि परमानंद का था।

वही परमानंद, जिससे पिंकी की मुलाकात कुछ समय पहले एयरपोर्ट पर हुई थी। उस वक्त की एक संक्षिप्त सी मुलाकात, उनकी आँखों का मिलना और परमानंद का वह रसूखदार व आकर्षक व्यक्तित्व पिंकी के दिलो-दिमाग पर इस कदर अपनी छाप छोड़ चुका था कि आज उसकी पहली काम-कल्पना का नायक वही बन बैठा था।

सपने में जैसे ही परमानंद की मज़बूत और गर्म हथेलियों ने पिंकी के सुकुमार बदन को छुआ, उसके पूरे शरीर में परमानंद (परम-आनंद) की एक तीखी और मीठी लहर दौड़ गई। एयरपोर्ट की उस औपचारिक मुलाकात के पीछे छिपा आकर्षण अब पिंकी के सपनों में एक उन्मुक्त और सुंदर हकीकत बनकर उभर रहा था, जहाँ वह जीवन में पहली बार किसी पुरुष के स्पर्श के जादुई अहसास को महसूस कर रही थी।

अगले दिन की दोपहर एक बार फिर वही खामोशी लेकर आई। मनोरमा अपने प्रशासनिक दौरों पर निकल चुकी थीं और विशाल शासकीय बंगला पूरी तरह से शांत था। पिंकी के कदम अपने आप लिविंग रूम की तरफ बढ़ गए। कल रात के उस जादुई सपने और अधूरी छूटी फिल्म की कशिश उसके मन पर इस कदर हावी थी कि वह खुद को रोक नहीं पाई।

उसने एक बार फिर नेटफ्लिक्स चालू किया और 'द ब्लू लगून' फिल्म को वहीं से देखना शुरू किया जहाँ कल छोड़ा था। अब फिल्म अपने अंतिम पड़ाव पर थी, जहाँ दोनों किशोर किरदार पूरी तरह से परिपक्व हो चुके थे। स्क्रीन पर अब केवल शारीरिक आकर्षण नहीं, बल्कि उनके बीच का एक गहरा, आत्मिक और अटूट प्रेम उभर कर आ रहा था। वे दोनों एक-दूसरे की आँखों में खोए हुए, इस संसार से बेखबर, प्रकृति की गोद में संपूर्णता को महसूस कर रहे थे।

फिल्म के इन दृश्यों ने पिंकी के कोमल और संवेदनशील मन पर एक बहुत ही गहरा और अमिट प्रभाव डाला। किताबों में डूबी रहने वाली पिंकी के लिए यह सिर्फ एक शारीरिक क्रिया नहीं थी, बल्कि दो आत्माओं का एक ऐसा मिलन था जिसकी गहराई ने उसे अंदर तक झकझोर दिया था।

फिल्म खत्म होने के बाद भी वह काफी देर तक शून्य में ताकती रही। उसके मन में एक नई और तीव्र इच्छा ने जन्म ले लिया था। वह भी एक स्त्री और पुरुष के बीच होने वाले उस मुकम्मल प्यार, उस असीम विश्वास और समर्पण की गहराई में डूबना चाहती थी। उसे अहसास हो चुका था कि जीवन का यह रंग कितना खूबसूरत और जादुई है। उसकी कल्पनाओं में अब सिर्फ उत्तेजना नहीं, बल्कि परमानंद के साथ उस गहरे प्रेम और आलिंगन में पूरी तरह खो जाने की एक बेताब चाहत पनप रही थी।

तभी, अपनी कल्पनाओं और विचारों के समंदर में डूबी पिंकी का ध्यान अचानक पास ही रखे एक आलीशान लकड़ी के मैगजीन स्टैंड पर गया। वहाँ कई तरह की राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाएँ सजी हुई थीं, लेकिन उन सबके बीच एक पुराना अखबार भी करीने से रखा हुआ था। उत्सुकतावश पिंकी ने उस अखबार को उठाया।

जैसे ही उसकी नज़र मुख्य पृष्ठ पर पड़ी, वह ठिठक गई। अखबार के पन्ने पर एक बेहद आकर्षक, सुगठित और तेजस्वी युवा की बड़ी सी तस्वीर छपी हुई थी। उस चेहरे में एक गज़ब का आत्मविश्वास और चमक थी। तस्वीर के ठीक नीचे बड़े-बड़े अक्षरों में एक बोल्ड टाइटल लिखा था:

"सूरज ने किया बनारस का नाम रोशन !"

यह कोई साधारण इत्तेफाक नहीं था। कहानी के इस गहरे ताने-बाने को समझने वाले पाठक यह बात अच्छी तरह जानते हैं कि पिंकी की माँ मनोरमा, बनारस के उस परिवार से और सुगना से सीधे तौर पर जुड़ी हुई थीं। मनोरमा न केवल सुगना को गहराई से जानती थीं, बल्कि वह सूरज के वजूद और उसकी प्रतिभा से भी पूरी तरह वाकिफ थीं।

मनोरमा एक बेहद दूरदर्शी और समझदार महिला थीं। उन्होंने जानबूझकर उस अखबार की कटिंग को अपने इस आलीशान मैगजीन स्टैंड में ऐसी जगह सजाया था, जहाँ पिंकी की नजर उस पर आसानी से पड़ सके। मनोरमा का मकसद बिल्कुल साफ था—वह चाहती थीं कि उनकी बेटी पिंकी जब भी उस तेजस्वी और सफल युवा की तस्वीर को देखे, तो उसके भीतर भी जीवन में कुछ असाधारण करने और सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित करने की प्रेरणा जागे। वह पिंकी को सूरज की तरह ही चमकते हुए देखना चाहती थीं।

पिंकी उस अखबार को हाथ में थामे, उस तस्वीर में दिख रहे 'सूरज' के चेहरे को एकटक निहारने लगी। उसे क्या पता था कि जिस बनारस और जिस सूरज की कहानी को वह महज़ एक प्रेरणा समझकर देख रही है वह नैनीताल में अपनी मौसी के गर्भधारण के लिए संतान सप्तमी की अंतिम आहुति देने को तैयार था।

अखबार में सूरज के बारे में विस्तार से पढ़कर पिंकी के मन में सूरज के प्रति सम्मान जाग उठा सचमुच सूरज ने जो किया था वह हर मेडिकल स्टूडेंट की तमन्ना होती है और वही तमन्ना पिंकी की खुद भी थी..

उसने मन ही मन सोचा काश इनसे मुलाकात हो पाती…

इधर पिंकी ने सोचा उधर नियति ने उसके मन की बात पढ़ ली…

शेष अगले भाग में…

 
भाग 201

नैनी पीक की यात्रा एक तरफ़ जहां थका देने वाली थी वहीं सोनी और सूरज के बीच हुआ खुले आसमान के नीचे किया गया वह सेक्स अद्भुत था।




होटल आने के बाद…

कमरे की मद्धम रोशनी में सोनी और विकास बिस्तर पर एक-दूसरे के बेहद करीब बैठे थे। बाहर पहाड़ों की ठंडी हवा चल रही थी, लेकिन कमरे के भीतर का माहौल धीरे-धीरे गरमाने लगा था। सोनी का ध्यान भले ही विकास की बातों पर था, लेकिन उसका अवचेतन मन अभी भी नैनी पीक की उन वादियों में ही भटका हुआ था। उसके दिमाग में बार-बार वही अद्भुत और बेबाक मिलन याद आ रहा था, जो उसने आज पहली बार खुले आसमान के नीचे, प्रकृति की गोद में महसूस किया था। वह एक ऐसा तीव्र और अनोखा अहसास था, जिसने उसकी देह के रोम-रोम को जगा दिया था। उस उन्मुक्त पल को याद करते ही सोनी भीतर तक रोमांचित हो उठ रही थी। आज की उस कामुक याद का असर इस कदर गहरा था कि सोनी के गोरे चेहरे पर एक अजीब सी लालिमा छा गई और उसकी आँखों में एक अजब सी उत्तेजना और चमक तैरने लगी। उसकी सांसें थोड़ी भारी होने लगी थीं, जिसे विकास बेहद करीब से महसूस कर पा रहा था।

विकास ने सोनी के चेहरे पर आए इस अचानक बदलाव, उस लाली और उसकी आँखों की पिघलती हुई वासना को बखूबी ताड़ लिया। उसने धीरे से अपना हाथ सोनी की मखमली कमर पर रख दिया और उसकी आँखों में आँखें डालते हुए पूछा, "क्या मेरी सोनी ने मेरे लिए आज भी कोई सरप्राइज सोच रखा है? क्या हम दोनों की हसरत इस बार पूरी होगी?"

सोनी ने अपनी आँखें विकास की आँखों में टिका दीं। वह एक पल के लिए ठहर गई और यह समझने की कोशिश करने लगी कि आखिर विकास के हर एक शब्द के पीछे छिपा असली इशारा क्या है। वह बखूबी जानती थी कि विकास के दिमाग में इस वक्त सिर्फ और सिर्फ एक ही बात चल रही थी—वह वर्जित मिलन, जिसकी कल्पना उसने सोनी और सूरज को एक साथ रखकर की थी। यहाँ यह बात साफ़ थी कि सूरज, सोनी का सगा भांजा था (उसकी बहन का बेटा); उनका रिश्ता मौसी-भांजे का था, फिर भी विकास के दिमाग में उन दोनों को लेकर वही वासना और एक अजीब सी तड़प थी जो एक समय अल्बर्ट को लेकर थी। सोनी का दिल एक बार फिर ज़ोरों से धड़कने लगा। वह उस रिश्ते की मर्यादा तो पहले ही लांघ चुकी थी पर अपने पति के सामने उसे लांघने की झिझक और उस वर्जित अहसास का रोमांच, दोनों के बीच एक मानसिक युद्ध महसूस कर रही थी।

सोनी ने अपनी चूचियों पर फिसल रही नाईटी को ठीक किया और विकास को कुरेदते हुए धीमी पर मादक आवाज़ में पूछा, "आपके मन में फिर वही बात चल रही है ना? आप बार-बार सूरज और मेरे मिलन की ज़िद क्यों कर रहे हैं? ये ठीक नहीं"

विकास ने सोनी का हाथ अपने हाथों में ले लिया और उसके करीब आते हुए फुसफुसाया, "सोनी, हम दोनों कितने बरसों से संतान सुख का इंतजार कर रहे हैं। मैं चाहता हूँ कि तुम सूरज के साथ संभोग करो, ताकि तुम्हें माँ बनने का वो सुख मिल सके जिसके लिए हम तरस गए हैं। संतान सप्तमी का यह मौका इसीलिए तो है।"

सोनी के चेहरे पर एक गहरी लाली छा गई, लेकिन उसने विकास की आँखों में झाँकते हुए उसके भीतर छिपे उस दूसरे सच को भी बाहर निकालना चाहा, "और तुम्हारी वो दूसरी चाहत? उसके बारे में कुछ नहीं कहोगे?"

विकास की सांसें तेज़ हो गईं। उसकी आँखों में बरसों पुराना वो दृश्य तैर गया जब उसने अपनी पत्नी को किसी और के साथ देखा था। उसने सोनी के और करीब आकर उसके कान के पास हाँफते हुए कहा, " can't forget... हाँ सोनी, मैं कैसे भूल सकता हूँ कि जब अल्बर्ट अपने मजबूत और लंबे लिंग से तुम्हें चरम सुख दे रहा था, वो देखकर मुझे कितना आनंद आया था। तुम्हारा वो मदहोश बदन और वो वासना का उग्र खेल देखकर मेरी नस-नस सुलग उठी थी। मैं वही असीम सुख, वही नज़ारा एक बार फिर सूरज के साथ तुम्हें देखकर लूटना चाहता हूँ।"

विकास ने सोनी को अपनी बाहों में थोड़ा और भींच लिया और बेहद मद्धम आवाज़ में बीती रात के उस गुप्त सिलसिले को याद दिलाया, "सोनी... भूल गई क्या कि कल रात तुमने किस तरह तड़पकर उसकी उँगलियों को अपनी मुनिया पर टिका दिया था? वो अहसास कितना उग्र होगा। मैं चाहता हूँ कि आज की रात भी तुम कुछ ऐसा ही कमाल कर दो। अपने बदन का वो जादू बिखेरो कि वो युवा तुम्हारे इस रूप-पाश में बंधकर दुनिया के सारे रिश्ते-नाते भूलकर खुद-ब-खुद खिंचा चला आए।"

विकास की यह बेबाक बात सुनकर सोनी के भीतर काम-रस का एक और तेज़ ज्वार उठ गया। लेकिन तभी उसने विकास के गले में पड़ी अपनी बाहों को थोड़ा ढीला किया और उसकी आँखों में झाँकते हुए एक व्यावहारिक सवाल दागा, "विकास, तुम जो कह रहे हो वो सुनने में जितना उन्मादित लगता है, हकीकत में उतना ही पेचीदा है। एक बात बताओ... क्या सूरज तुम्हारी उपस्थिति में, तुम्हारे सामने मुझसे संभोग करने के लिए राजी होगा? वो एक युवा है, उसमें वासना कूट-कूट कर भरी होगी, मैं मानती हूँ... पर वो इतना विकृत या बेबाक होगा कि अपने ही मौसा के सामने मर्यादा की सारी दीवारें ढहा दे? यह मैं नहीं मान सकती। हमें किसी और संभावना पर विचार करना होगा।"

सोनी की यह बात सीधे निशाने पर लगी और विकास भी गहरी चिंता और असमंजस में पड़ गया। दोनों बिस्तर पर आमने-सामने बैठ गए और इस वर्जित खेल को सुरक्षित तरीके से अंजाम देने के लिए अन्य रास्तों और संभावनाओं पर बात करने लगे। विकास ने शुरुआत में गुप्त रूप से किसी ओट या पर्दे के पीछे छिपकर देखने का सुझाव दिया, लेकिन सोनी पूरी तरह सहमत नहीं थी।

आखिरकार, गहराई से सोचने के बाद सोनी के दिमाग में एक नई और अचूक तरकीब आई, जिससे सूरज की झिझक भी पूरी तरह खत्म हो जाती और विकास के अरमान भी…

सोनी ने आँखों में एक शातिर चमक लाते हुए कहा, चलिए आपकी बात मान ली यदि मैंने यह कर दिखाया तो मुझे क्या मिलेगा?

विकास की खुशी का ठिकाना नहीं रहा वह सोनी को गले लगाते हुए बोला…

तुम्हें सिर्फ इशारा करने की देर है मैं हमेशा तुम्हारी खुशियां चाहता हूं जो चाहे जब चाहे जैसे चाहो मांग लेना मैं पीछे नहीं हटूंगा..

सोनी और विकास एक दूसरे के आलिंगन में आ गए सोनी मुस्कुरा रही थी उसे पता था इस बार संतान सप्तमी का यह अनुष्ठान निश्चित थी उसके जीवन में खुशियां लाने वाला था वह मुस्कुराते हुए बोली अभी तो फिलहाल भूख लगी है चलिए खाना ऑर्डर करते हैं सूरज भी भूखा होगा…

विकास ने तुरंत होटल के मेन्यू से उन तीनों की पसंद का लज़ीज़ खाना ऑर्डर कर दिया। कुछ ही देर में गरमा-गरम खाना कमरे में आ चुका था। सूरज को भी बुला लिया गया और तीनों एक साथ बैठकर खाना खाने लगे।

सोनी इस वक्त अपनी एक विशेष और बेहद खूबसूरत नाइटी में सजी-धजी बैठी थी। उस मद्धम रोशनी में उसका रूप और भी निखर कर आ रहा था। खाना खाते वक्त, सूरज चाहकर भी अपनी नज़रें सोनी पर से हटा नहीं पा रहा था। उसकी निगाहें बार-बार सोनी की नाइटी से झलकते उसके सुडौल बदन और उसकी चूचियों के उभार पर जाकर टिक जाती थीं। जवानी के जोश और इस जादुई माहौल में सूरज के भीतर एक अजीब सी बेचैनी बढ़ रही थी, जिसे वह छुपाने की नाकाम कोशिश कर रहा था।

विकास टेबल के दूसरी तरफ बैठकर बड़े गौर से सूरज की इन चोरी-छिपे देखती नज़रों को नोटिस कर रहा था। सूरज की आँखों में अपनी पत्नी के लिए बढ़ती हुई उस वासना और तड़प को देखकर विकास के भीतर एक अजीब सा रोमांच और खुशी थी। उसे साफ दिख रहा था कि जो बिसात उन्होंने बिछाई है, उसका असर सूरज पर होना शुरू हो चुका है।

सोनी भी सूरज की उस बेताब नज़र से अनजान नहीं थी। उसने अपनी थाली से एक निवाला उठाया और सूरज की तरफ देखते हुए अपनी आवाज़ को और धीमा और रसीला बना लिया।

सोनी (सूरज को देखते हुए, शरारत भरी आवाज़ में): "सूरज... क्या बात है, खाना पसंद नहीं आया क्या? तुम्हारा ध्यान खाने पर कम और कहीं और ज़्यादा लग रहा है।"

सूरज अचानक टोकने से हड़बड़ा गया। उसका चेहरा थोड़ा लाल हो गया और उसने नज़रें चुराते हुए अपनी प्लेट की तरफ देखा।

सूरज (हकलाते हुए, खुद को संभालते हुए): "नहीं मौसी... ऐसी बात नहीं है। खाना बहुत अच्छा है। बस... थोड़ा पहाड़ों की इस ठंड का असर है, अजीब सी बेचैनी हो रही है।"

विकास ने इस मौके का फायदा उठाया और एक गहरी मुस्कान के साथ सूरज के कंधे पर हाथ रखा।

विकास (हंसते हुए, बड़े लाड़ से): "अरे सूरज, पहाड़ों की ठंड में ऐसा होता है। वैसे अब तुम बच्चे नहीं रहे, काफी बड़े और समझदार हो गए हो। अब हमें तुम्हारे घर बसाने की भी चिंता करनी चाहिए। सोनी, देखो तो हमारा सूरज कितना बड़ा हो गया है, अब इसके लिए कोई सुंदर और सुशील सी लड़की ढूंढनी पड़ेगी जो इस घर की रौनक बढ़ाए।"

विकास की यह बात सुनकर सूरज के चेहरे पर शरम की एक गहरी लाली दौड़ गई। उसने अपनी नज़रें झुका लीं, लेकिन उसका दिल इस जादुई और मादक माहौल में कुछ और ही कशमकश से गुज़र रहा था। सोनी ने मंद-मंद मुस्कुराते हुए अपनी नाइटी के पल्लू को थोड़ा और संभाला, और उसकी आँखों की रहस्यमयी चमक सूरज की धड़कनों को और तेज़ कर रही थी। उसे अंदाज़ा भी नहीं था कि इस पारिवारिक बातचीत के पीछे कौन सा अनोखा और वर्जित खेल आकार ले रहा था।

भोजन के उपरांत कमरे का माहौल एक बार फिर पूरी तरह बदल चुका था। सोनी ने अपनी उस खास फ्रंट-ओपन नाइटी के जादू को बिखरने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। वह बिस्तर के बीचों-बीच, सिरहाने के सहारे एक अजब सी मदहोशी में लेटी हुई थी। उसके खुले हुए बाल उसके सीने तक आ रहे थे और उसकी दुनिया छाती को ढकने की नाकाम कोशिश कर रहे थे। उसने बेहद चालाकी से बिस्तर पर अपने एक तरफ विकास के लिए और दूसरी तरफ सूरज के लिए जगह बना कर रखी थी। बीती रात के उस गुप्त सिलसिले को आगे बढ़ाने के लिए विकास ने अपनी योजना के मुताबिक सूरज को आवाज़ लगाई, "अरे सूरज! वहां अकेले क्यों बोर हो रहे हो? इधर आ जाओ, साथ में बैठकर कोई अच्छी सी फिल्म देखते हैं।"

सूरज को तो अपनी किस्मत पर यकीन ही नहीं हो रहा था। विकास की आवाज़ सुनते ही उसके दिमाग में कल रात के वो सारे कामुक दृश्य तैर गए, जब उसने इसी कमरे में मौसी की मुनिया के उस रेशमी और गीले स्पर्श के एहसास और महक को महसूस किया था।

वह बेहद उत्साह और धड़कते दिल के साथ विकास और सोनी के कमरे की तरफ बढ़ गया। सच तो यह था कि आज ही नैनी पीक की उन वादियों में सोनी को जी भरकर और बेहद उग्रता से भोगने के बावजूद, सूरज के भीतर की काम-अग्नि शांत नहीं हुई थी। सोनी के उस रूप-पाश और पहाड़ों की इस ठंडी हवा ने उसके लिंग के तनाव को जरा भी कम नहीं होने दिया था; वह वैसे ही पूरी तरह अकड़ा और बेचैन बना हुआ था।

अपने उस उग्र और तनाव से भरे लिंग को अपने पाजामे के भीतर किसी तरह सहजता से छुपाता हुआ सूरज एक बार फिर उसी बिस्तर पर आ पहुँचा, जहाँ कल रात कामुकता की एक नई इबारत लिखी गई थी।

कुछ देर तक इधर-उधर की पारिवारिक और घर की बातें चलती रहीं। माहौल में एक अजीब सी शांति तैर रही थी, लेकिन बिस्तर पर मौजूद तीनों किरदारों के भीतर भावनाओं और हसरतों का तूफ़ान चल रहा था। तभी, अचानक सोनी बिस्तर पर थोड़ा नीचे की तरफ खिसकते हुए लिहाफ़ (कंबल) के पूरी तरह अंदर आ गई। एक तरफ विकास और दूसरी तरफ सूरज इस लिहाफ़ को अपने सीने तक सटाए हुए सीधे लेटे थे, और अब इसी लिहाफ़ के भीतर सोनी अपना सिर पूरी तरह छुपा चुकी थी। उसका यह अचानक लिहाफ़ के अंदर चले जाना दोनों मर्दों के लिए अप्रत्याशित था। विकास ने माहौल को सामान्य बनाए रखने का नाटक करते हुए सोनी से पूछा, "अरे सोनी, क्या हुआ? तुम्हें आज बड़ी जल्दी नींद आने लगी?" लिहाफ़ के अंदर से सोनी की थोड़ी दबी और थकी हुई आवाज़ आई, "हाँ, आज पहाड़ों पर घूमने की वजह से मैं थोड़ा थक गई हूँ..." यह कहते हुए उसने लिहाफ़ के भीतर ही करवट ले ली। उसने अपनी पीठ विकास की तरफ कर ली थी और उसका चेहरा अब पूरी तरह सूरज की तरफ था।

कुछ देर शांत रहने के बाद, लिहाफ़ के भीतर छाई उस खामोशी और अंधेरे का फायदा उठाते हुए सोनी ने अपनी योजना को अमली जामा पहनाना शुरू कर दिया। सूरज, जो अब तक मायूस होकर सीधा लेटा हुआ था, अचानक अपनी मौसी के इस अप्रत्याशित कदम से भीतर तक सिहर उठा। सोनी ने बेहद सहजता से अपना हाथ सूरज के पाजामे की तरफ बढ़ाया। उसकी उँगलियों का स्पर्श पाते ही सूरज की धड़कनें रुक सी गईं। सोनी ने बिना कोई आवाज़ किए पाजामे की चेन को नीचे सरकाया और उस सूरज के पूरी तरह तने और बेताब लिंग को आहिस्ता से बाहर निकाल लिया। सूरज का पूरा बदन इस छुअन से कांप उठा। लिहाफ़ के भीतर मौसी के हाथों की गर्माहट और अपने लिंग पर उनकी मखमली पकड़ महसूस करते ही उसकी आँखों के आगे जैसे अंधेरा छा गया। वासना और रोमांच का एक ऐसा वेग उसके भीतर दौड़ा कि वह पूरी तरह सुन्न हो गया।

बिस्तर के दूसरी तरफ लेटा विकास, जो लगातार अपनी आँखों और कानों को चौकन्ना रखे हुए था, लिहाफ़ में होने वाली इस अचानक हलचल को ताड़ गया। कंबल का एक हिस्सा जिस तरह से हिला और सोनी की बांह की जो हरकत हुई, उससे विकास को तुरंत समझ आ गया कि सोनी ने बिसात का पहला और सबसे बड़ा मोहरा चल दिया है। अपनी पत्नी के हाथ में अपने ही भांजे के तने हुए अंग की कल्पना मात्र से विकास की नस-नस में उत्तेजना का एक ज़बरदस्त करंट दौड़ गया। वह बिना हिले-डुले, अपनी साँसों को रोककर इस गुप्त और वर्जित खेल के अगले पड़ाव का इंतज़ार करने लगा।

लिहाफ़ के भीतर सोनी की उँगलियों का जादू अब सूरज के पूरे वजूद पर हावी हो चुका था। वह बेहद धीमे लेकिन बेहद प्रभावी अंदाज़ में सूरज के अंग को सहलाते हुए उसकी उत्तेजना को पल-पल चरम सीमा की तरफ बढ़ा रही थी। सूरज अपनी आँखें बंद किए, इस असीम और वर्जित सुख के वेग में पूरी तरह डूबा हुआ था। कल रात सूरज ने जिस तरह सोनी के बदन को तड़पाकर अपनी उँगलियों के इशारे पर नचाया था, आज सोनी ठीक उसी अंदाज़ में अपना मीठा बदला निकाल रही थी।

विकास ने जानबूझकर सूरज से सामान्य बातें करने की कोशिश की, "वैसे सूरज, नैनीताल का यह मौसम तुम्हें कैसा लगा? आगे का क्या प्लान है तुम्हारा?" विकास के इस अचानक पूछे गए सवाल पर सूरज ने खुद को संभालने की कोशिश की। उसने जवाब देने के लिए जैसे ही अपना मुंह खोला, ठीक उसी पल लिहाफ़ के भीतर सोनी ने अपनी चाल और तेज़ कर दी। सूरज जैसे ही उत्तर देने लगा, सोनी ने उसके अंग के सबसे संवेदनशील हिस्से (सुपारी) को अपनी उँगलियों से और ज़ोर से सहलाना शुरू कर दिया।

इस तीव्र स्पर्श से सूरज के भीतर काम-रस का एक ऐसा तेज़ ज्वार उठा कि उसके मुंह से निकलने वाले शब्द टूट गए। वह बोलना तो चाह रहा था, लेकिन उत्तेजना के अतिरेक के कारण उसकी आवाज़ ठीक उसी प्रकार लड़खड़ाने लगी, जैसे कल रात सूरज के स्पर्श पर सोनी की आवाज़ लड़खड़ा रही थी। सूरज चाहकर भी अपनी सामान्य आवाज़ में बात नहीं कर पा रहा था; उसकी हर सांस एक भारी आह में बदल रही थी। लिहाफ़ की ओट में सोनी मंद-मंद मुस्कुरा रही थी और विकास टीवी की आवाज़ के पीछे सूरज की उस कांपती और लड़खड़ाती आवाज़ को साफ सुन रहा था। इस वर्जित दृश्य की कल्पना से विकास की अपनी धड़कनें भी बेकाबू हो रही थीं।

तभी टीवी पर विकास का फेवरेट गाना आ जाता है और कुछ देर के लिए विकास का ध्यान सोनी और सूरज से हटकर टीवी पर केंद्रित हो जाता है। कमरे में केवल टीवी की आवाज़ गूंज रही थी और बिस्तर पर एक अजीब सी खामोशी छा गई थी।

कुछ मिनटों की यह चुप्पी तब टूटी, जब सूरज ने अचानक बिस्तर से नीचे उतरने का फैसला लिया। अपने चेहरे की घबराहट और बदन की उस तीव्र हलचल को छुपाने की नाकाम कोशिश करते हुए वह थोड़ा हकलाकर बोला, "मौसा जी... आप लोग... आप लोग देखिए पिक्चर। मुझे अब बहुत तेज़ नींद आ रही है, और सच कहूं तो मैं भी आज दिनभर की दौड़-भाग से बुरी तरह थक गया हूँ। मैं अपने कमरे में सोने जाता हूँ।"

सूरज का अचानक बिस्तर से उठना और जाने की बात कहना विकास के लिए किसी झटके से कम नहीं था। वह टीवी के सम्मोहन से बाहर आया और उसने हैरान होकर पहले सूरज को और फिर लिहाफ़ के भीतर से चेहरा बाहर निकालती हुई सोनी को देखा। सोनी की आँखों में खेल के इस तरह अचानक बीच में रुक जाने की कोई निराशा नहीं थी, बल्कि एक शातिर और विजयी मुस्कान थी। वह जानती थी कि लिहाफ़ के भीतर जो काम वह कर चुकी है, वह सूरज को पूरी रात सोने नहीं देगा और वह अनजाने में उनकी अगली चाल के लिए पूरी तरह तैयार हो चुका है।

सूरज को इस तरह से जाते देखकर विकास का दिल पूरी तरह से टूट गया। उसकी आँखों के सामने आया हुआ वो असीम सुख का नज़ारा अचानक गायब हो चुका था, जिससे उसके भीतर एक अजीब सी तड़प और निराशा छा गई। सूरज ने जैसे ही कमरे का दरवाजा बाहर से बंद किया, विकास तुरंत लिहाफ़ के भीतर थोड़ा आगे खिसका और सोनी का कंधा पकड़कर उसका चेहरा अपनी तरफ घुमा लिया।

विकास की आँखों में अधीरता और मायूसी साफ़ दिख रही थी। उसने धीमी और व्याकुल आवाज़ में पूछा, "सोनी... यह क्या हुआ? वह इस तरह अचानक क्यों चला गया?"

सोनी ने विकास के इस सवाल का कोई सीधा जवाब नहीं दिया। उसके चेहरे पर निराशा के बजाय एक रहस्यमयी और शातिर मुस्कान खेल रही थी। उसने अपनी उंगली विकास के होठों पर रख दी, जिससे वह चुप हो गया। फिर उसने बेहद मादक अंदाज़ में लिहाफ़ का एक कोना उठाया और आँखों के इशारे से विकास को पूरी तरह से लिहाफ़ के भीतर, उस घने अंधेरे में आने को कहा।

जैसे ही विकास लिहाफ़ के भीतर आया, सोनी उसके और करीब सरक आई और मादक अंदाज में उसे संभोग के लिए आमंत्रित किया। विकास एक बार फिर अपने मन में संशय लिए सोनी की जांघों के बीच उसकी मुनिया पर अपना तना हुआ लंड रगड़ रहा था। मुनिया पूरी तरह गीली थी, जो सोनी की चरम उत्तेजना को बयां कर रही थी।

विकास बिस्तर पर सोनी को अपनी बाहों में बुरी तरह भींचते और उसे भोगते हुए पूछ रहा था, "आखिर क्या हुआ? सूरज चला क्यों गया? मुझे साफ-साफ बताओ..."

सोनी ने कोई उत्तर नहीं दिया अभी तो अपनी कमर ऊंची कर विकास के लिंग को अपने भीतर और गहरे तक लेने की कोशिश की।

विकास ने सोनी को चोदते हुए उसकी फ्रंट-ओपन नाइटी के इक्का-दुक्का बचे हुए बटनों को भी खोलकर उसकी चूचियों को पूरी तरह नग्न कर दिया। सोनी बनावटी झिझक में उसे रोक रही थी, पर विकास इस वक्त कुछ भी सुनने को तैयार नहीं था। उसने सोनी के दोनों हाथ पकड़कर उसके सिर के पीछे कर दिए और उसे पूरी गहराई तक चोदते हुए उसके सीने पर झुकने लगा।

सोनी बार-बार उसे रोक रही थी, "विकास, प्लीज... चूची मत पीना... ?"

विकास ने हाँफते हुए पूछना चाहा, "पर क्यों सोनी? अचानक ऐसा क्या हुआ?"

"बस ऐसे ही... मैं मना कर रही हूँ ना, प्लीज मत पीना!" सोनी ने अपने होंठ अपने दाँतों में दबा लिए।

जितना ही सोनी मना करती, विकास की उत्तेजना उतनी ही बढ़ती जाती। अब तो उसने उग्र होकर कहा, "तुमने मेरी उत्सुकता आसमान पर पहुँचा दी है, प्लीज बताओ ना क्यों नहीं?"

"मैं तुम्हें नहीं बता सकती..." इससे पहले कि सोनी कुछ और बोल पाती, विकास ने लपककर उसकी चूची को अपने मुंह में भरने की कोशिश की।

लेकिन जैसे ही उसके होंठ ने सोनी के निप्पल को घेरा, अचानक विकास के होठों पर एक अजब सा, गाढ़ा स्वाद आया। उसने चौंककर अपने होंठ हटाए और पूछा, "यह तुम्हें क्या हुआ? इतना ज्यादा पसीना क्यों है यहाँ?"

सोनी ने आखिरकार अपनी ज़बान खोल दी। वह बेहद दबी और मादक आवाज़ में बोली, "मैं मना कर रही थी ना...ये पसीना नहीं है।

विकास: तो ये क्या है? इतना मादक कितनी कामुक गंध है ..

सोनी (मादक आवाज में): यह आज की मेहनत ये वही अर्क है जो हमें संतान सुख देगा।

विकास को यकीन नहीं हो रहा था सोनी जिस ओर इशारा कर रही थी वह उसकी सोच के परे था..

किसका: क्या सचमुच..? इतना कहते हुए विकास में एक बार फिर सोनी की चूची को मुंह में भरने की कोशिश की।

सोनी: आह.. तनी धीरे से….

विकास: पर कैसे?

सोनी: लिहाफ़ के भीतर आज मैंने कल का बदला निकाल लिया और सूरज स्खलित कर दिया पर वो लड़का बहुत बदमाश है... उसने अपनी सारी मलाई (वीर्य) मेरे मेरी चूचियों पर ही गिरा दिया..."

सोनी की यह बात सुनते ही विकास की उत्तेजना सारी हदें पार कर गई। उसे यकीन नहीं था कि सोनी इस वर्जित खेल को इस हद तक आगे बढ़ा सकती है। वह बेहद खुश और रोमांचित हो गया। उसने पहले तो सोनी के होठों को चूमा और फिर उसी तीव्र उत्तेजना और वासना से अभिभूत होकर उसने दोबारा आगे बढ़कर सोनी की उसी वीर्य से सनी चूची को अपने मुंह में भर लिया।

उसे सूरज के वीर्य से कोई भी घृणा नहीं थी, और होती भी कैसे? विकास ने जो स्वप्न सूरज और सोनी को लेकर देखा था, उसमें घृणा या संकोच का कोई स्थान नहीं था। वह तो बस इस अनोखे और वर्जित सुख के अहसास में पूरी तरह डूब जाना चाहता था।

विकास मन ही मन सोच रहा था आखिर सोनी और सूरज के बीच यह कामुक दृश्य कैसे संपन्न हुआ होगा क्या सोनी ने सिर्फ सूरज के इस स्खलन को अपने हाथों से संपन्न किया या अपने मुखमैथुन की अद्भुत कला से? पर उसने सोनी से यह प्रश्न पूछने की हिम्मत नहीं थी पर वह बारंबार सोनी को चूम रहा था उसके होठों को भी और उसकी चुचियों को भी।

सूरज का वीर्य सोनी की चूचियों से उठकर सोनी के अधरो तक भी जा रहा था। विकास और सोनी एक दूसरे में समाहित हो गए थे वैसे उन्होंने सूरज का वीर्य भी आत्मसात कर लिया आखिर यही वीर्य उनके जीवन में खुशियां भरने वाला था।

उधर सोनी की जांघों के बीच विकास के लंड की हलचल तेज हो चुकी थी वह सोनी को लगातार चोद रहा था और अब सोनी भी विकास के उत्साह को देखकर स्खलन की कगार पर पहुंच रही थी। जिस तरीके से विकास ने सूरज के वीर्य को पूरी खुशी के साथ अपना लिया था सोनी कभी खुश थी और इस अद्भुत और कामुक मिलन का आनंद ले रही थी।

इसी तीव्र और मदहोश कर देने वाले पलों के बीच, विकास ने सोनी के चेहरे के करीब आकर भारी साँसों के साथ एक बेहद महत्वपूर्ण प्रश्न पूछा, "तो सोनी... क्या सूरज के साथ तुम्हारा यह पूर्ण मिलन कल संपन्न होगा?"

सोनी ने उत्तेजना से भारी अपनी आँखें खोलीं और विकास के चेहरे को देखते हुए मंद-मंद मुस्कुराई। उसने हाँफते हुए बेहद रसीली आवाज़ में कहा, "हाँ विकास... कल का बाहर घूमने का सारा प्लान कैंसिल। कल इस संतान सप्तमी के अनुष्ठान की असली और पूर्ण आहुति दी जाएगी।"

सोनी के चेहरे पर झलकता यह अटूट विश्वास और उसकी आँखों में तैरती कामुकता की लाली देखकर विकास का उत्साह सातवें आसमान पर पहुँच गया। इस बात ने उसकी काम-वासना को इतना उग्र कर दिया कि उसने अपने अंतिम झटकों की गति को और अधिक बढ़ा दिया। कमरे की मद्धम रोशनी और लिहाफ़ के अंधेरे में दोनों के बदन एक-दूसरे से बुरी तरह लिपटे हुए थे।

कुछ ही पलों के तीव्र संघर्ष के बाद, दोनों एक साथ चरम सुख के सागर में डूब गए। दोनों के मुंह से एक लंबी और तृप्त कराह निकली और वे एक-दूसरे के बदन पर ढह गए। सोनी की मुनिया के भीतर विकास का वीर्य पूरी गहराई तक समाहित हो रहा था, जो उनके बरसों पुराने सपने को पूरा करने का प्रयास था। दोनों इस ठंडी रात में एक-दूसरे की बाहों में बंधे, ज़ोर-ज़ोर से हाँफते हुए कल होने वाले उस महा-मिलन की कल्पना में खो गए, जहाँ मर्यादा की आखिरी दीवार भी ढहने वाली थी।

शेष अगले भाग में

 
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