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अनहानी ( एक प्रेत गाथा )
वह एक बड़ी विचित्र रात थी।
आकाश के माथे पर चांद किसी दुल्हन के टीकें की तरह चमक रहा था। पूरे चांद की रात थी। रेत के समुद्र पर चांदनी किसी चादर की तरह बिछी हुई थी।
फिर भी यह एक भयावह रात थी।
ऐसी मनमोहक रात और ऐसी भयावह?
जब दिलों पर बहशत बरसती हो। अगले पल की खबर न हो कि क्या होने वाला है तो चांदनी क्या करेगी? चांद का यह आकर्षण, यह सौन्दर्य कौन देखेगा? बाहर के नजारे और बाहर का मौसम उसी वक्त ही अच्छा लगता है, जब आदमी के अन्दर का मौसम अच्छा हो। मन में उमंग हो, खुशी हो, सुकून हो।
दूर क्षितिज तक फैला रेगिस्तान..किसी मोटे कालीन की तरह जमीन पर बिछी रेत... धीरे-धीरे बहती ठण्डी हवा....और किसी सुन्दरी के चेहरे की तरह चमकता हुआ...खिला-खिला चांद। सब कुद ही ऐसा था कि मन
खिल-खिल जाए, लेकिन इस आकर्षक रात से आनन्दित होने वाला यहां कोई न था।
जो थे....उनकी आंखों में निर्ममता भरी हुई थी, या आंसू या फिर नींद।
किसी की आंख में आंसू थे तो कोई सो रहा था। जिसकी आंखें बन्द थी...उसकी किस्मत के जुगनू उसकी जिन्दगी में, अंधेरा फैलाने वाले थे।
उस मासूम का क्या दोष था? उस मासूम का कोई दोष हो भी कैसे सकता था? उसका तो अभी नाम तक नहीं रखा गया था। इस दुनिया में आये उसे हुआ ही कितना वक्त था।
एक दिन... बस, एक दिन।
और इस एक दिन ने उसे यह दिन दिखा दिया था कि उसका पालना ऊंट पर कसा जा रहा था। कुछी ही देर की बात थी कि उसक मासूम को इस पालने में डालकर ऊंट हो हांक दिया जाना था...इस अनन्त रेगिस्तान में।
यहां दो ऊंट थें
दूसरा ऊंट उस मजलूम के लिए था, जिसकी आंखें आंसुओं आंखें आंसुओं से भरी हुई थी। उस ममता की मारी का रोआ-रोआ चीख रहा था.... मगर होंठ भिंचे हुए थे। ऐसी वेआवाज चीख को कौन सुनता ? यहां तो चीखने वालों को कोई नहीं सुनात। दूसरे ऊंट पर काठी बांधी जा रही थी..... इस काठी पर इस आंसू भरी आंखों वाली मजलूम औरत को बैठाकर इस ऊंट को भी रेगिस्तान में हाक दिया जाना था।
यहां तीन घोड़े भी थे। दो घोड़ों की पीठ खाली थी। इनके सवार इन ऊंटो को तैयार करने में लगे हुए थे, जबकि एक घोड़े की पीठ पर घुड़सवार मौजूद था और इस घुड़सवार का अंदाज ही निराला था।
वह पचास-पचपन साल का एक तुन्दुरुस्त मजबूत बदल का शख्स था। उसका लिबास हुक्मरानों जैसा था, वह घोड़े की पीठ पर तनी कमर के साथ बैठा था। उसकी गोल-गोल आंखें किसी उल्लू की आंखों की तरह चमक रही थीं। वह अपने बायें हाथ से अपनी मूंछों को बल दे रहा था। वह एक नशे से मदमस्त शख्स था। उसे अपनी दौलत का नशा था। जैसे कोई विजेता था, जिसे अपनी ताकत का घमण्ड था।
ऐसे निर्गम लोग कब किसी की आंख देखते हैं। उन्हें अपनी ख्वाहिशों के सिवाय कुछ नजर नहीं आता। ख्वाहिशों भरी आंखों से कब किसके आंसू नजर आ सकते
यह जमींदार रोशन राय था। वह नाम का ही रोशन था, उसके अन्दर अन्धेरा-ही-अन्धेरा था। उसने अपनी मूंछ छू कर हाथ सीधा किया और कर्कश आवाज में दहाड़ा
"जल्दी करो!"
उसकी कर्कश आवाज सुनकर वे दोनों घुड़सवार, जो उसके वफादार थे.और तेजी से अपना काम निपटाने लगे। पालने को जल्दी-जल्दी ऊंट की पीठ पर बांध दिया गया और ऊंट की दुम में एक बड़ी घन्टी बांध दी गई।
दूसरा ऊंट भी तैयार था। उस पर काठी बांधी जा चुकी थी और एक बड़ी घन्टी दुम से लटकाई जा चुकी थी। अपना काम निपटा वे दोनों घुड़सवार रोशन राय के सामने आदर से आ खड़े हुए और सीने पर हाथ बांधकर, सिर नवां कर बारी-बारी बोले
"सरकार! मेरा ऊंट तैयार है।"
"मालिक ! मेरा ऊंट भी तैयार है।"
"जाओ, फिर रवाना हो जाओ.... ।” रोशन राय की कर्कश आवाज रात के सन्नाटै में गूंजी।
वे दोनों वापिस पलटे। सामने खड़ी हुई अबला, जो गम से निढाल थी और आने वाले वक्त की कल्पना से
ही जिसका दिल कांप रहा था। आंखों में आंसू थे। जिसकी दुनिया अन्धेरी थी। इस औरत के सीने से लगा, उसका जिगर का टुकड़ा, जो आने वाले वक्त से बेखबर मीठी-मीठी नींद के मजे ले रहा था उसे उस वफादार ने एक झटके से छीन लिया और उसे ऊंट की तरफ से चला।
वह एक बड़ी विचित्र रात थी।
आकाश के माथे पर चांद किसी दुल्हन के टीकें की तरह चमक रहा था। पूरे चांद की रात थी। रेत के समुद्र पर चांदनी किसी चादर की तरह बिछी हुई थी।
फिर भी यह एक भयावह रात थी।
ऐसी मनमोहक रात और ऐसी भयावह?
जब दिलों पर बहशत बरसती हो। अगले पल की खबर न हो कि क्या होने वाला है तो चांदनी क्या करेगी? चांद का यह आकर्षण, यह सौन्दर्य कौन देखेगा? बाहर के नजारे और बाहर का मौसम उसी वक्त ही अच्छा लगता है, जब आदमी के अन्दर का मौसम अच्छा हो। मन में उमंग हो, खुशी हो, सुकून हो।
दूर क्षितिज तक फैला रेगिस्तान..किसी मोटे कालीन की तरह जमीन पर बिछी रेत... धीरे-धीरे बहती ठण्डी हवा....और किसी सुन्दरी के चेहरे की तरह चमकता हुआ...खिला-खिला चांद। सब कुद ही ऐसा था कि मन
खिल-खिल जाए, लेकिन इस आकर्षक रात से आनन्दित होने वाला यहां कोई न था।
जो थे....उनकी आंखों में निर्ममता भरी हुई थी, या आंसू या फिर नींद।
किसी की आंख में आंसू थे तो कोई सो रहा था। जिसकी आंखें बन्द थी...उसकी किस्मत के जुगनू उसकी जिन्दगी में, अंधेरा फैलाने वाले थे।
उस मासूम का क्या दोष था? उस मासूम का कोई दोष हो भी कैसे सकता था? उसका तो अभी नाम तक नहीं रखा गया था। इस दुनिया में आये उसे हुआ ही कितना वक्त था।
एक दिन... बस, एक दिन।
और इस एक दिन ने उसे यह दिन दिखा दिया था कि उसका पालना ऊंट पर कसा जा रहा था। कुछी ही देर की बात थी कि उसक मासूम को इस पालने में डालकर ऊंट हो हांक दिया जाना था...इस अनन्त रेगिस्तान में।
यहां दो ऊंट थें
दूसरा ऊंट उस मजलूम के लिए था, जिसकी आंखें आंसुओं आंखें आंसुओं से भरी हुई थी। उस ममता की मारी का रोआ-रोआ चीख रहा था.... मगर होंठ भिंचे हुए थे। ऐसी वेआवाज चीख को कौन सुनता ? यहां तो चीखने वालों को कोई नहीं सुनात। दूसरे ऊंट पर काठी बांधी जा रही थी..... इस काठी पर इस आंसू भरी आंखों वाली मजलूम औरत को बैठाकर इस ऊंट को भी रेगिस्तान में हाक दिया जाना था।
यहां तीन घोड़े भी थे। दो घोड़ों की पीठ खाली थी। इनके सवार इन ऊंटो को तैयार करने में लगे हुए थे, जबकि एक घोड़े की पीठ पर घुड़सवार मौजूद था और इस घुड़सवार का अंदाज ही निराला था।
वह पचास-पचपन साल का एक तुन्दुरुस्त मजबूत बदल का शख्स था। उसका लिबास हुक्मरानों जैसा था, वह घोड़े की पीठ पर तनी कमर के साथ बैठा था। उसकी गोल-गोल आंखें किसी उल्लू की आंखों की तरह चमक रही थीं। वह अपने बायें हाथ से अपनी मूंछों को बल दे रहा था। वह एक नशे से मदमस्त शख्स था। उसे अपनी दौलत का नशा था। जैसे कोई विजेता था, जिसे अपनी ताकत का घमण्ड था।
ऐसे निर्गम लोग कब किसी की आंख देखते हैं। उन्हें अपनी ख्वाहिशों के सिवाय कुछ नजर नहीं आता। ख्वाहिशों भरी आंखों से कब किसके आंसू नजर आ सकते
यह जमींदार रोशन राय था। वह नाम का ही रोशन था, उसके अन्दर अन्धेरा-ही-अन्धेरा था। उसने अपनी मूंछ छू कर हाथ सीधा किया और कर्कश आवाज में दहाड़ा
"जल्दी करो!"
उसकी कर्कश आवाज सुनकर वे दोनों घुड़सवार, जो उसके वफादार थे.और तेजी से अपना काम निपटाने लगे। पालने को जल्दी-जल्दी ऊंट की पीठ पर बांध दिया गया और ऊंट की दुम में एक बड़ी घन्टी बांध दी गई।
दूसरा ऊंट भी तैयार था। उस पर काठी बांधी जा चुकी थी और एक बड़ी घन्टी दुम से लटकाई जा चुकी थी। अपना काम निपटा वे दोनों घुड़सवार रोशन राय के सामने आदर से आ खड़े हुए और सीने पर हाथ बांधकर, सिर नवां कर बारी-बारी बोले
"सरकार! मेरा ऊंट तैयार है।"
"मालिक ! मेरा ऊंट भी तैयार है।"
"जाओ, फिर रवाना हो जाओ.... ।” रोशन राय की कर्कश आवाज रात के सन्नाटै में गूंजी।
वे दोनों वापिस पलटे। सामने खड़ी हुई अबला, जो गम से निढाल थी और आने वाले वक्त की कल्पना से
ही जिसका दिल कांप रहा था। आंखों में आंसू थे। जिसकी दुनिया अन्धेरी थी। इस औरत के सीने से लगा, उसका जिगर का टुकड़ा, जो आने वाले वक्त से बेखबर मीठी-मीठी नींद के मजे ले रहा था उसे उस वफादार ने एक झटके से छीन लिया और उसे ऊंट की तरफ से चला।