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- Dec 5, 2013
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धनंजय घूमकर सामने आ गया, उसने चौरंगी के मुंह पर एक ठोकर जड़ दी। वह रोशनी में जा लुढ़का । धनंजय उसी तरफ कूद पड़ा ।
" देख चौरंगी मैं कौन हूं । मैं वह पत्रकार धनंजय हूं जिसे तूने शाप दिया था। तूने मेरे सारे परिवार का नाश किया, और मैं समय की प्रतीक्षा में भटकता रहा, बता अब तेरी शक्ति कहाँ गई ?"
अचानक चौरंगी की मुट्ठी में राख उड़ी ।
धनंजय ने कहकहा लगाया ।
"तेरा यह शस्त्र भी बेकार है, क्योंकि मैं वह तेल लगाकर आया हूं जिससे तेरी इस राख का कोई असर मुझपर नहीं हो सकता । चौरंगी अब तू एक ऐसे साँप की तरह लाचार है जिसकी रीढ़ की हड्डी टूट चुकी है, मैं जब चाहूं तुझे गोली मार सकता हूं मगर मैं ऐसा नहीं करूँगा, तुझे मैं अपने साथ ज़िंदा ले चलूँगा ।"
चौरंगी के माथे से खून बह रहा था । उसका चेहरा थकावट के कारण चूर हो गया लगता था। वह धीरे-धीरे उठ खड़ा हुआ और दीवार से सटकर हांफने लगा ।
यह एक रोशन गलियारा था । जिसमें विद्युत प्रकाश जल रहा था,
गलियारे का अंत एक द्वार पर होता नज़र आ रहा था । धनंजय ने उस तरफ एक उड़ती निगाह डाली । वह चौरंगी को खत्म नहीं कर सकता था क्योंकि उसे यहाँ से बाहर निकलने का जो एक मार्ग मालूम था वह बन्द हो चुका था । चौरंगी को शायद यह बात अभी पता नहीं थी ।
“क्या तुम मुझे कानून के हवाले करोगे ? मेरे खिलाफ तुम्हारे पास क्या प्रणाम है ?" चौरंगी ने अपनी साँस पर काबू पाते हुए कहा । "
अगर मुझे कानून का सहारा लेना होता तो आदिवासियों की जगह पुलिस की मदद लेता, मैं जनता हूं कि पुलिस और कानून तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता ।"
"फिर तुम मुझे कहाँ ले जाना चाहते हो ?"
"यह बात मैं बताऊंगा, इस वक्त तो तुम्हें बाहर ले जाऊँगा, तुम्हें उन लोगों की अदालत में पेश करूँगा जो तुम्हारी बर्बादी की राह देख रहे हैं । जो तुमसे इंतकाम लेना चाहते हैं ।"
"तो फिर वक्त क्यों ज़ाया कर रहे हो ? निकलो बाहर मैं उन लोगों का सामना करने के लिये तैयार हूं।"
"बाहर निकलना अब इतना आसान नहीं चौरंगी ।"
“क्या मतलब ? अभी तो तुम सुरंग के रास्ते आये हो ।"
"वह रास्ता हमेशा के लिये बन्द हो चुका... सुरंग ढह गई ।” चौरंगी के माथे की नसें फड़क उठी ।
अचानक उसने कहकहा लगाया ।
"तो यह बात है, इसी वजह से तुम गोली नहीं चला रहे हो, मैं तो अपने आपको मरा समझ चुका हूं परन्तु तुम खुशी का दिन देखे बिना दिन देखे बिना कब्र में फंस गये हो ।"
"तुझे दूसरा रास्ता बताना होगा। वरना तुझे उस तरफ चलना होगा जहाँ जंग हो रही है ।"
"जंग |?" वह ठहाका मारकर हंस पड़ा, "अभी कुछ देर में तुम्हें आग की लपटें दिखाई देंगी, जो यहाँ भी पहुँचती होंगी, नहीं तो धुआँ तो भरने ही वाला होगा। वहाँ जंग कहाँ है ? वहाँ तो सिर्फ आग है, बोलो चलते हो आग में ? जेनरेटर तक भी आग पहुँच चुकी होगी, इसके बाद बिजली से खुलने वाले सारे रास्ते बन्द हो जायेंगे और लाइन कट जायेगी ।"
“मुझे डराओ नहीं । उसी तरफ चलो चाहे आग हो या धुआँ। या तो मैं तुम्हें उनके सामने झोंक दूँगा या तुम्हें उनसे बचने के लिये दूसरा रास्ता बताना ही पड़ेगा ।"
"तुम्हारे सामने बड़ी भारी विवशता है कि तुम मेरा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते ।"
"यह तुम्हारी ग़लतफहमी है ।" इतना कहकर उसने माइनर जेब में रखी और चौरंगी पर लात घूंसों की बरसात शुरू कर दी । वह भी शायद यही चाहता था । वह जूडो-कराटे सीखा हुआ जान पड़ता था । धनंजय के हौसले बुलंद थे। कुछ देर चौरंगी जिस व्यंग से पिटा था, उससे लगता था कि मार के आगे वह अधिक देर नहीं टिक सकता परन्तु इस बार चौरंगी का रूप ही दूसरा था । धनंजय का एक भी वार उसपर सफल नहीं बैठ रहा था ।
इसी दृढ़ युद्ध के बीच धुएं का गुब्बार उड़ता हुआ गलियारे में तैर गया । धुआ उस दरवाज़े से आ रहा था जो गलियारे के अंत में था। धुए क पहले झोंके के साथ ही वह दोनों रुक गये ।
चौरंगी ने कहकहा लगाया - "मैंने झूठ नहीं कहा था, अब आग हमसे बहुत करीब है ।"
इसका अहसास उसे भी हो गया था ।
उसने दरवाज़े के पार एक शोला भड़कता देखा, फिर आग का जाल नज़र आने लगा। यह स्थिति बड़ी भयानक थी। वे दोनों ही ऐसी स्थिति में थे, जहाँ एक तरफ कुआं था तो दूसरी तरफ खाई ।
उसी क्षण विद्युत प्रकाश भी गुम हो गया। अब सिर्फ आग का प्रकाश वहाँ धीरे-धीरे तेज़ पड़ता जा रहा था। धनंजय के चेहरे पर और भी बेचैनी फैलती जा रही थी। उसकी तपिश धीरे-धीरे तेज़ पड़ती जा रही थी । उसने चौरंगी की तरफ देखा जो शांत भाव से खड़ा था ।
अपनी मौत से पहले मैं तुम्हें मरता देखना पसंद करूँगा ।"
"इस बात को मैं भी समझता हूं, परन्तु मुझे विश्वास है कि बाहर निकलते ही तेरा हथियार फिर से गोली उगलने के लिये तैयार हो जायेगा । अगर तू अपने सारे हथियार फेंक दे तो मैं तुझे बाहर निकलने के रास्ते पर ले जा सकता हूं ।
आग की लपटें करीब आती जा रही थीं ।
"तुम्हारी यह शर्त मुझे मंजूर है ।" धनंजय ने कहा ।
"तो फेंक दो हथियार ।"
धनंजय ने हथियार फेंक दिये ।
"जब तक हम बाहर न निकलें, हमें एक अच्छे दोस्त की तरह व्यवहार करना है।" चौरंगी बोला ।
दोस्त की तरह या
"तुम जैसे आदमी के साथ दोस्ती करना मेरे लिये मुनासिब नहीं, फिर भी जान बचाने के लिये यह विचार अच्छा है ।"
"आओ तो दोनों आदमी एक-एक बक्सा उठा लें ।”
दोनों वापस बक्से के पास पहुँचे। आग की तपिश इस स्थान पर भी पहुँच चुकी थी अतः इन्हें जल्दी ही वह जगह छोड़नी पड़ी। वे सीढ़ियां उतरते हुए सुरंग के कमरे में पहुँचे । चौरंगी ने स्पाती द्वार की तरफ चलने के लिये कहा । शीघ्र ही वह द्वार के पास पहुँच गए। चौरंगी ने द्वार पर लटक रही एक ज़ंजीर को पूरी शक्ति लगाकर खींचा। स्पाती द्वार खुलता चला गया। इस दरवाज़े के भीतर ज़मीन के अन्दर बना एक छोटा सा घाट था, जिसमें एक छोटी नौका खड़ी नज़र आ रही थी, दूसरी ओर पानी से भरी सुरंग थी। चौरंगी ने नाव में बक्सा रखा और फुर्ती के साथ घूम पड़ा । उसके हाथ में स्टेनगन दबी थी । यह गन नौका के गुप्त खाने में रखी थी। उसकी गतिविधि धनंजय से छिपी नहीं रह सकी । उसने फौरन टॉर्च बुझाकर पानी में डाइव लगा दी । गोलियों की तड़तड़ाहट के साथ ही वहाँ गुप्त अन्धकार छा गया ।
चौरंगी ने नौका का इंजन तैयार किया और उसे सुरंग में दौड़ा दिया । नौका का अग्रिम प्रकाश सुरंग को चीरता चला गया। कुछ समय बाद ही वह सुरंग से निकलकर एक जंगली नहर में आ गया। वह खुले आकाश के नीचे था । आकाश में चंद्रमा तैर रहा था । उसे दूर आकाश में शोले भड़कते नज़र आये। साथ ही भयानक जंगी शोर सुनाई पड़ा, जो धीरे-धीरे लोप हो गया। स्टेनगन संभाले वह खतरे की सीमा से बाहर आ गया । यहाँ से मुख्य सड़क अधिक दूर नहीं थी । वह जानता था आदिवासी अभी कई घटा तक घरा डाल पड़ रहग, फिलहाल वह उनके घेरे से बाहर था। नौका द्वारा आगे नदी में जाना खतरे से खाली नहीं था । इस नदी के दोनों तरफ उसके गुप्त ठिकाने थे। नदी पर उसका अपना एक घाट था, जिसमें अक्सर सामान आया-जाया करता था । इस बात को आदिवासी अच्छी तरह जानते थे, इसलिये आगे नौका का प्रयोग नहीं किया जा सकता था ।
उसने बक्सा नौका से उतारा, एक बक्सा तो वह वहीं छोड़ आया था । उसने धनंजय को पानी में कूदते देख लिया था अतः वहाँ रुककर गोलियां बरसाते रहना उसने ठीक नहीं समझा । उस बक्से को तो वह समय रहते बाद में भी ला सकता था और इस बात को भी वह अच्छी तरह जानता था कि धनंजय जीवित होने के बाद भी सुरंग से तैर कर बाहर नहीं निकल सकता था। पानी की उस सुरंग में सर्प तैरते थे जो नौका की आवाज़ से दूर इधर-उधर दुबक जाते थे, परन्तु दूसरी स्थिति में वह पूरी तरह सुरंग पर कब्ज़ा जमाये रहते थे। इसके अलावा कई स्थानों पर कीचड़ और दलदल थी ।
दूसरे बक्से में वह आवश्यक कागज़ात थे जिनके द्वारा वह ब्लैकमेलिंग करता था। नकद पूँजी जो हीरे जवाहरातों के रूप में थी वह साथ ले आया था ।
नौका रोकने के उपरांत वह बक्सा उतार कर चल पड़ा। इस स्थान का चप्पा-चप्पा उसने छाना हुआ था, वह जानता था यहाँ कुछ पुराने खंडहर और गुफाएं हैं, जहाँ बक्से को छिपाया जा सकता है। जल्द ही उसने एक गुफा तलाश कर ली। वह टॉर्च जलाए उसमें बढ़ता चला गया। किसी खतरनाक जानवर से सामना होने की उसे कोई उम्मीद नहीं थी ।
" देख चौरंगी मैं कौन हूं । मैं वह पत्रकार धनंजय हूं जिसे तूने शाप दिया था। तूने मेरे सारे परिवार का नाश किया, और मैं समय की प्रतीक्षा में भटकता रहा, बता अब तेरी शक्ति कहाँ गई ?"
अचानक चौरंगी की मुट्ठी में राख उड़ी ।
धनंजय ने कहकहा लगाया ।
"तेरा यह शस्त्र भी बेकार है, क्योंकि मैं वह तेल लगाकर आया हूं जिससे तेरी इस राख का कोई असर मुझपर नहीं हो सकता । चौरंगी अब तू एक ऐसे साँप की तरह लाचार है जिसकी रीढ़ की हड्डी टूट चुकी है, मैं जब चाहूं तुझे गोली मार सकता हूं मगर मैं ऐसा नहीं करूँगा, तुझे मैं अपने साथ ज़िंदा ले चलूँगा ।"
चौरंगी के माथे से खून बह रहा था । उसका चेहरा थकावट के कारण चूर हो गया लगता था। वह धीरे-धीरे उठ खड़ा हुआ और दीवार से सटकर हांफने लगा ।
यह एक रोशन गलियारा था । जिसमें विद्युत प्रकाश जल रहा था,
गलियारे का अंत एक द्वार पर होता नज़र आ रहा था । धनंजय ने उस तरफ एक उड़ती निगाह डाली । वह चौरंगी को खत्म नहीं कर सकता था क्योंकि उसे यहाँ से बाहर निकलने का जो एक मार्ग मालूम था वह बन्द हो चुका था । चौरंगी को शायद यह बात अभी पता नहीं थी ।
“क्या तुम मुझे कानून के हवाले करोगे ? मेरे खिलाफ तुम्हारे पास क्या प्रणाम है ?" चौरंगी ने अपनी साँस पर काबू पाते हुए कहा । "
अगर मुझे कानून का सहारा लेना होता तो आदिवासियों की जगह पुलिस की मदद लेता, मैं जनता हूं कि पुलिस और कानून तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता ।"
"फिर तुम मुझे कहाँ ले जाना चाहते हो ?"
"यह बात मैं बताऊंगा, इस वक्त तो तुम्हें बाहर ले जाऊँगा, तुम्हें उन लोगों की अदालत में पेश करूँगा जो तुम्हारी बर्बादी की राह देख रहे हैं । जो तुमसे इंतकाम लेना चाहते हैं ।"
"तो फिर वक्त क्यों ज़ाया कर रहे हो ? निकलो बाहर मैं उन लोगों का सामना करने के लिये तैयार हूं।"
"बाहर निकलना अब इतना आसान नहीं चौरंगी ।"
“क्या मतलब ? अभी तो तुम सुरंग के रास्ते आये हो ।"
"वह रास्ता हमेशा के लिये बन्द हो चुका... सुरंग ढह गई ।” चौरंगी के माथे की नसें फड़क उठी ।
अचानक उसने कहकहा लगाया ।
"तो यह बात है, इसी वजह से तुम गोली नहीं चला रहे हो, मैं तो अपने आपको मरा समझ चुका हूं परन्तु तुम खुशी का दिन देखे बिना दिन देखे बिना कब्र में फंस गये हो ।"
"तुझे दूसरा रास्ता बताना होगा। वरना तुझे उस तरफ चलना होगा जहाँ जंग हो रही है ।"
"जंग |?" वह ठहाका मारकर हंस पड़ा, "अभी कुछ देर में तुम्हें आग की लपटें दिखाई देंगी, जो यहाँ भी पहुँचती होंगी, नहीं तो धुआँ तो भरने ही वाला होगा। वहाँ जंग कहाँ है ? वहाँ तो सिर्फ आग है, बोलो चलते हो आग में ? जेनरेटर तक भी आग पहुँच चुकी होगी, इसके बाद बिजली से खुलने वाले सारे रास्ते बन्द हो जायेंगे और लाइन कट जायेगी ।"
“मुझे डराओ नहीं । उसी तरफ चलो चाहे आग हो या धुआँ। या तो मैं तुम्हें उनके सामने झोंक दूँगा या तुम्हें उनसे बचने के लिये दूसरा रास्ता बताना ही पड़ेगा ।"
"तुम्हारे सामने बड़ी भारी विवशता है कि तुम मेरा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते ।"
"यह तुम्हारी ग़लतफहमी है ।" इतना कहकर उसने माइनर जेब में रखी और चौरंगी पर लात घूंसों की बरसात शुरू कर दी । वह भी शायद यही चाहता था । वह जूडो-कराटे सीखा हुआ जान पड़ता था । धनंजय के हौसले बुलंद थे। कुछ देर चौरंगी जिस व्यंग से पिटा था, उससे लगता था कि मार के आगे वह अधिक देर नहीं टिक सकता परन्तु इस बार चौरंगी का रूप ही दूसरा था । धनंजय का एक भी वार उसपर सफल नहीं बैठ रहा था ।
इसी दृढ़ युद्ध के बीच धुएं का गुब्बार उड़ता हुआ गलियारे में तैर गया । धुआ उस दरवाज़े से आ रहा था जो गलियारे के अंत में था। धुए क पहले झोंके के साथ ही वह दोनों रुक गये ।
चौरंगी ने कहकहा लगाया - "मैंने झूठ नहीं कहा था, अब आग हमसे बहुत करीब है ।"
इसका अहसास उसे भी हो गया था ।
उसने दरवाज़े के पार एक शोला भड़कता देखा, फिर आग का जाल नज़र आने लगा। यह स्थिति बड़ी भयानक थी। वे दोनों ही ऐसी स्थिति में थे, जहाँ एक तरफ कुआं था तो दूसरी तरफ खाई ।
उसी क्षण विद्युत प्रकाश भी गुम हो गया। अब सिर्फ आग का प्रकाश वहाँ धीरे-धीरे तेज़ पड़ता जा रहा था। धनंजय के चेहरे पर और भी बेचैनी फैलती जा रही थी। उसकी तपिश धीरे-धीरे तेज़ पड़ती जा रही थी । उसने चौरंगी की तरफ देखा जो शांत भाव से खड़ा था ।
अपनी मौत से पहले मैं तुम्हें मरता देखना पसंद करूँगा ।"
"इस बात को मैं भी समझता हूं, परन्तु मुझे विश्वास है कि बाहर निकलते ही तेरा हथियार फिर से गोली उगलने के लिये तैयार हो जायेगा । अगर तू अपने सारे हथियार फेंक दे तो मैं तुझे बाहर निकलने के रास्ते पर ले जा सकता हूं ।
आग की लपटें करीब आती जा रही थीं ।
"तुम्हारी यह शर्त मुझे मंजूर है ।" धनंजय ने कहा ।
"तो फेंक दो हथियार ।"
धनंजय ने हथियार फेंक दिये ।
"जब तक हम बाहर न निकलें, हमें एक अच्छे दोस्त की तरह व्यवहार करना है।" चौरंगी बोला ।
दोस्त की तरह या
"तुम जैसे आदमी के साथ दोस्ती करना मेरे लिये मुनासिब नहीं, फिर भी जान बचाने के लिये यह विचार अच्छा है ।"
"आओ तो दोनों आदमी एक-एक बक्सा उठा लें ।”
दोनों वापस बक्से के पास पहुँचे। आग की तपिश इस स्थान पर भी पहुँच चुकी थी अतः इन्हें जल्दी ही वह जगह छोड़नी पड़ी। वे सीढ़ियां उतरते हुए सुरंग के कमरे में पहुँचे । चौरंगी ने स्पाती द्वार की तरफ चलने के लिये कहा । शीघ्र ही वह द्वार के पास पहुँच गए। चौरंगी ने द्वार पर लटक रही एक ज़ंजीर को पूरी शक्ति लगाकर खींचा। स्पाती द्वार खुलता चला गया। इस दरवाज़े के भीतर ज़मीन के अन्दर बना एक छोटा सा घाट था, जिसमें एक छोटी नौका खड़ी नज़र आ रही थी, दूसरी ओर पानी से भरी सुरंग थी। चौरंगी ने नाव में बक्सा रखा और फुर्ती के साथ घूम पड़ा । उसके हाथ में स्टेनगन दबी थी । यह गन नौका के गुप्त खाने में रखी थी। उसकी गतिविधि धनंजय से छिपी नहीं रह सकी । उसने फौरन टॉर्च बुझाकर पानी में डाइव लगा दी । गोलियों की तड़तड़ाहट के साथ ही वहाँ गुप्त अन्धकार छा गया ।
चौरंगी ने नौका का इंजन तैयार किया और उसे सुरंग में दौड़ा दिया । नौका का अग्रिम प्रकाश सुरंग को चीरता चला गया। कुछ समय बाद ही वह सुरंग से निकलकर एक जंगली नहर में आ गया। वह खुले आकाश के नीचे था । आकाश में चंद्रमा तैर रहा था । उसे दूर आकाश में शोले भड़कते नज़र आये। साथ ही भयानक जंगी शोर सुनाई पड़ा, जो धीरे-धीरे लोप हो गया। स्टेनगन संभाले वह खतरे की सीमा से बाहर आ गया । यहाँ से मुख्य सड़क अधिक दूर नहीं थी । वह जानता था आदिवासी अभी कई घटा तक घरा डाल पड़ रहग, फिलहाल वह उनके घेरे से बाहर था। नौका द्वारा आगे नदी में जाना खतरे से खाली नहीं था । इस नदी के दोनों तरफ उसके गुप्त ठिकाने थे। नदी पर उसका अपना एक घाट था, जिसमें अक्सर सामान आया-जाया करता था । इस बात को आदिवासी अच्छी तरह जानते थे, इसलिये आगे नौका का प्रयोग नहीं किया जा सकता था ।
उसने बक्सा नौका से उतारा, एक बक्सा तो वह वहीं छोड़ आया था । उसने धनंजय को पानी में कूदते देख लिया था अतः वहाँ रुककर गोलियां बरसाते रहना उसने ठीक नहीं समझा । उस बक्से को तो वह समय रहते बाद में भी ला सकता था और इस बात को भी वह अच्छी तरह जानता था कि धनंजय जीवित होने के बाद भी सुरंग से तैर कर बाहर नहीं निकल सकता था। पानी की उस सुरंग में सर्प तैरते थे जो नौका की आवाज़ से दूर इधर-उधर दुबक जाते थे, परन्तु दूसरी स्थिति में वह पूरी तरह सुरंग पर कब्ज़ा जमाये रहते थे। इसके अलावा कई स्थानों पर कीचड़ और दलदल थी ।
दूसरे बक्से में वह आवश्यक कागज़ात थे जिनके द्वारा वह ब्लैकमेलिंग करता था। नकद पूँजी जो हीरे जवाहरातों के रूप में थी वह साथ ले आया था ।
नौका रोकने के उपरांत वह बक्सा उतार कर चल पड़ा। इस स्थान का चप्पा-चप्पा उसने छाना हुआ था, वह जानता था यहाँ कुछ पुराने खंडहर और गुफाएं हैं, जहाँ बक्से को छिपाया जा सकता है। जल्द ही उसने एक गुफा तलाश कर ली। वह टॉर्च जलाए उसमें बढ़ता चला गया। किसी खतरनाक जानवर से सामना होने की उसे कोई उम्मीद नहीं थी ।